सर्ग-101
तं तु रामः समाज्ञाय भ्रातरं गुरुवत्सलम्।
लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा प्रष्टुं समुपचक्रमे॥१॥
लक्ष्मणसहित श्रीरामचन्द्रजी ने अपने गुरुभक्त भाई भरत को अच्छी तरह समझाकर अथवा उन्हें अपने में अनुरक्त जानकर उनसे इस प्रकार पूछना आरम्भ किया— ॥१॥
किमेतदिच्छेयमहं श्रोतुं प्रव्याहृतं त्वया।
यन्निमित्तमिमं देशं कृष्णाजिनजटाधरः।।
हित्वा राज्यं प्रविष्टस्त्वं तत् सर्वं वक्तुमर्हसि ॥३॥
‘भाई! तुम राज्य छोड़कर वल्कल, कृष्णमृगचर्म और जटा धारण करके जो इस देश में आये हो, इसका क्या कारण है? जिस निमित्त से इस वन में तुम्हारा प्रवेश हुआ है, यह मैं तुम्हारे मुँह से सुनना चाहता हूँ। तुम्हें सब कुछ साफ-साफ बताना चाहिये’ ॥ २-३॥
इत्युक्तः केकयीपुत्रः काकुत्स्थेन महात्मना।
प्रगृह्य बलवद् भूयः प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत्॥४॥
ककुत्स्थवंशी महात्मा श्रीरामचन्द्रजी के इस प्रकार पूछने पर भरत ने बलपूर्वक आन्तरिक शोक को दबा पुनः हाथ जोड़कर इस प्रकार कहा- ॥४॥
आर्य तातः परित्यज्य कृत्वा कर्म सुदुष्करम्।
गतः स्वर्गं महाबाहः पुत्रशोकाभिपीडितः॥५॥
‘आर्य! हमारे महाबाहु पिता अत्यन्त दुष्कर कर्म करके पुत्रशोक से पीड़ित हो हमें छोड़कर स्वर्गलोक को चले गये॥५॥
चकार सा महत्पापमिदमात्मयशोहरम्॥६॥
‘शत्रुओं को संताप देने वाले रघुनन्दन! अपनी स्त्री एवं मेरी माता कैकेयी की प्रेरणा से ही विवश हो । पिताजी ने ऐसा कठोर कार्य किया था। मेरी माँ ने अपने सुयश को नष्ट करने वाला यह बड़ा भारी पाप किया है॥६॥
सा राज्यफलमप्राप्य विधवा शोककर्शिता।
पतिष्यति महाघोरे नरके जननी मम॥७॥
‘अतः वह राज्यरूपी फल न पाकर विधवा हो गयी। अब मेरी माता शोक से दुर्बल हो महाघोर नरक में पड़ेगी॥७॥
तस्य मे दासभूतस्य प्रसादं कर्तुमर्हसि।
अभिषिञ्चस्व चाद्यैव राज्येन मघवानिव॥८॥
‘अब आप अपने दासस्वरूप मुझ भरत पर कृपा कीजिये और इन्द्र की भाँति आज ही राज्य ग्रहण करने के लिये अपना अभिषेक कराइये॥८॥
इमाः प्रकृतयः सर्वा विधवा मातरश्च याः।
त्वत्सकाशमनुप्राप्ताः प्रसादं कर्तुमर्हसि॥९॥
‘ये सारी प्रकृतियाँ (प्रजा आदि) और सभी विधवा माताएँ आपके पास आयी हैं। आप इन सबपर कृपा करें॥९॥
तथानुपूर्व्या युक्तश्च युक्तं चात्मनि मानद।
राज्यं प्राप्नुहि धर्मेण सकामान् सुहृदः कुरु॥ १०॥
‘दूसरों को मान देने वाले रघुवीर! आप ज्येष्ठ होने के नाते राज्य-प्राप्ति के क्रमिक अधिकार से युक्त हैं, न्यायतः आपको ही राज्य मिलना उचित है; अतः आप धर्मानुसार राज्य ग्रहण करें और अपने सुहृदों को सफल-मनोरथ बनावें॥ १०॥
भवत्वविधवा भूमिः समग्रा पतिना त्वया।
शशिना विमलेनेव शारदी रजनी यथा॥११॥
‘आप-जैसे पति से युक्त हो यह सारी वसुधा वैधव्यरहित हो जाय और निर्मल चन्द्रमा से सनाथ हुई शरत्काल की रात्रि के समान शोभा पाने लगे॥ ११॥
एभिश्च सचिवैः सार्धं शिरसा याचितो मया।
भ्रातुः शिष्यस्य दासस्य प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥१२॥
‘मैं इन समस्त सचिवों के साथ आपके चरणों में मस्तक रखकर यह याचना करता हूँ कि आप राज्य ग्रहण करें। मैं आपका भाई, शिष्य और दास हूँ आप मुझपर कृपा करें॥ १२ ॥
तदिदं शाश्वतं पित्र्यं सर्वं सचिवमण्डलम्।
पूजितं पुरुषव्याघ्र नातिक्रमितुमर्हसि ॥१३॥
‘पुरुषसिंह! यह सारा मन्त्रिमण्डल अपने यहाँ कुलपरम्परा से चला आ रहा है। ये सभी सचिव पिताजी के समय में भी थे। हम सदा से इनका सम्मान करते आये हैं, अतः आप इनकी प्रार्थना न ठुकरायें’ ॥ १३॥
एवमुक्त्वा महाबाहुः सबाष्पः कैकयीसुतः।
रामस्य शिरसा पादौ जग्राह भरतः पुनः॥१४॥
ऐसा कहकर कैकेयी पुत्र महाबाहु भरत ने नेत्रों से आँसू बहाते हुए पुनः श्रीरामचन्द्रजी के चरणों से माथा टेक दिया॥१४॥
तं मत्तमिव मातङ्गं निःश्वसन्तं पुनः पुनः।
भ्रातरं भरतं रामः परिष्वज्येदमब्रवीत्॥१५॥
उस समय वे मतवाले हाथी के समान बारंबार लंबी साँस खींचने लगे, तब श्रीराम ने भाई भरत को उठाकर हृदय से लगा लिया और इस प्रकार कहा- ॥१५॥
कुलीनः सत्त्वसम्पन्नस्तेजस्वी चरितव्रतः।
राज्यहेतोः कथं पापमाचरेन्मद्विधो जनः॥१६॥
‘भाई! तुम्हीं बताओ। उत्तम कुल में उत्पन्न, सत्त्वगुणसम्पन्न, तेजस्वी और श्रेष्ठ व्रतों का पालन करने वाला मेरे-जैसा मनुष्य राज्य के लिये पिताकी आज्ञाका उल्लङ्घन रूप पाप कैसे कर सकता है?॥ १६॥
न दोषं त्वयि पश्यामि सूक्ष्ममप्यरिसूदन।
न चापि जननीं बाल्यात् त्वं विगर्हितमर्हसि॥ १७॥
‘शत्रुसूदन ! मैं तुम्हारे अंदर थोड़ा-सा भी दोष नहीं देखता। अज्ञानवश तुम्हें अपनी माताकी भी निन्दा नहीं करनी चाहिये॥ १७॥
कामकारो महाप्राज्ञ गुरूणां सर्वदानघ।
उपपन्नेषु दारेषु पुत्रेषु च विधीयते॥१८॥
‘निष्पाप महाप्राज्ञ! गुरुजनों का अपनी अभीष्ट स्त्रियों और प्रिय पुत्रों पर सदा पूर्ण अधिकार होता है। वे उन्हें चाहे जैसी आज्ञा दे सकते हैं॥ १८ ॥
वयमस्य यथा लोके संख्याताः सौम्य साधुभिः।
भार्याः पुत्राश्च शिष्याश्च त्वमपि ज्ञातुमर्हसि॥
‘सौम्य! माताओंसहित हम भी इस लोक में श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा महाराज के स्त्री-पुत्र और शिष्य कहे गये हैं, अतः हमें भी उनको सब तरह की आज्ञा देने का अधिकार था। इस बात को तुम भी समझने योग्य हो।
वने वा चीरवसनं सौम्य कृष्णाजिनाम्बरम्।
राज्ये वापि महाराजो मां वासयितुमीश्वरः॥ २०॥
‘सौम्य! महाराज मुझे वल्कल वस्त्र और मृगचर्म धारण कराकर वन में ठहरावें अथवा राज्य पर बिठावें -इन दोनों बातों के लिये वे सर्वथा समर्थ थे॥ २० ॥
यावत् पितरि धर्मज्ञ गौरवं लोकसत्कृते।
तावद् धर्मकृतां श्रेष्ठ जनन्यामपि गौरवम्॥२१॥
‘धर्मज्ञ! धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ भरत! मनुष्य की विश्ववन्द्य पिता में जितनी गौरव-बुद्धि होती है, उतनी ही माता में भी होनी चाहिये॥२१॥
एताभ्यां धर्मशीलाभ्यां वनं गच्छेति राघव।
मातापितृभ्यामुक्तोऽहं कथमन्यत् समाचरे॥२२॥
‘रघुनन्दन! इन धर्मशील माता और पिता दोनों ने जब मुझे वन में जाने की आज्ञा दे दी है, तब मैं उनकी आज्ञा के विपरीत दूसरा कोई बर्ताव कैसे कर सकता हूँ? ॥ २२॥
त्वया राज्यमयोध्यायां प्राप्तव्यं लोकसत्कृतम्।
वस्तव्यं दण्डकारण्ये मया वल्कलवाससा॥ २३॥
‘तुम्हें अयोध्या में रहकर समस्त जगत् के लिये आदरणीय राज्य प्राप्त करना चाहिये और मुझे वल्कल वस्त्र धारण करके दण्डकारण्य में रहना चाहिये॥ २३॥
एवमुक्त्वा महाराजो विभागं लोकसंनिधौ।
व्यादिश्य च महाराजो दिवं दशरथो गतः॥२४॥
‘क्योंकि महाराज दशरथ बहुत लोगों के सामने हम दोनों के लिये इस प्रकार पृथक्-पृथक् दो आज्ञाएँ देकर स्वर्ग को सिधारे हैं॥ २४ ॥
स च प्रमाणं धर्मात्मा राजा लोकगुरुस्तव।
पित्रा दत्तं यथाभागमुपभोक्तुं त्वमर्हसि ॥२५॥
‘इस विषय में लोकगुरु धर्मात्मा राजा ही तुम्हारे लिये प्रमाणभूत हैं उन्हीं की आज्ञा तुम्हें माननी चाहिये और पिता ने तुम्हारे हिस्से में जो कुछ दिया है, उसीका तुम्हें यथावत् रूप से उपभोग करना चाहिये। २५॥
चतुर्दश समाः सौम्य दण्डकारण्यमाश्रितः।
उपभोक्ष्ये त्वहं दत्तं भागं पित्रा महात्मना॥ २६॥
‘सौम्य! चौदह वर्षोंतक दण्डकारण्य में रहने के बाद ही महात्मा पिता के दिये हुए राज्य-भाग का मैं उपभोग करूँगा॥ २६॥
यदब्रवीन्मां नरलोकसत्कृतः पिता महात्मा विबुधाधिपोपमः।
तदेव मन्ये परमात्मनो हितं न सर्वलोकेश्वरभावमव्ययम्॥२७॥
‘मनुष्यलोक में सम्मानित और देवराज इन्द्र के तुल्य तेजस्वी मेरे महात्मा पिता ने मुझे जो वनवास की आज्ञा दी है, उसीको मैं अपने लिये परम हितकारी समझता हूँ। उनकी आज्ञा के विरुद्ध सर्वलोकेश्वर ब्रह्मा का अविनाशी पद भी मेरे लिये श्रेयस्कर नहीं है’ ॥ २७॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकाधिकशततमः सर्गः॥ १०१॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में एक सौ एकवाँ सर्ग पूराहुआ॥१०१॥
* * कुछ प्रतियों में यह सर्ग १०४ वें सर्ग के रूप में वर्णित है। १०० वें सर्ग के बाद के तीन स!के बाद इसका उल्लेख हुआ है।
सर्ग-102
रामस्य वचनं श्रुत्वा भरतः प्रत्युवाच ह।
किं मे धर्माद विहीनस्य राजधर्मः करिष्यति॥
श्रीरामचन्द्रजी की बात सुनकर भरत ने इस प्रकार उत्तर दिया— भैया! मैं राज्य का अधिकारी न होने के कारण उस राजधर्म के अधिकार से रहित हूँ, अतः मेरे लिये यह राजधर्म का उपदेश किस काम आयगा? ॥ १॥
शाश्वतोऽयं सदा धर्मः स्थितोऽस्मासु नरर्षभ।
ज्येष्ठ पुत्रे स्थिते राजा न कनीयान् भवेन्नृपः॥ २॥
‘नरश्रेष्ठ ! हमारे यहाँ सदा से ही इस शाश्वत धर्म का पालन होता आया है कि ज्येष्ठ पुत्र के रहते हुए छोटा पुत्र राजा नहीं हो सकता॥२॥
स समृद्धां मया सार्धमयोध्यां गच्छ राघव।
अभिषेचय चात्मानं कुलस्यास्य भवाय नः॥३॥
‘अतः रघुनन्दन! आप मेरे साथ समृद्धिशालिनी अयोध्यापुरी को चलिये और हमारे कुल के अभ्युदय के लिये राजा के पद पर अपना अभिषेक कराइये॥३॥
राजानं मानुषं प्राहुर्देवत्वे सम्मतो मम।
यस्य धर्मार्थसहितं वृत्तमाहुरमानुषम्॥४॥
‘यद्यपि सब लोग राजा को मनुष्य कहते हैं, तथापि मेरी राय में वह देवत्वपर प्रतिष्ठित है; क्योंकि उसके धर्म और अर्थयुक्त आचार को साधारण मनुष्य के लिये असम्भावित बताया गया है॥ ४॥
केकयस्थे च मयि तु त्वयि चारण्यमाश्रिते।
धीमान् स्वर्गं गतो राजा यायजूकः सतां मतः॥
‘जब मैं केकयदेश में था और आप वन में चले आये थे, तब अश्वमेध आदि यज्ञों के कर्ता और सत्पुरुषों द्वारा सम्मानित बुद्धिमान् महाराज दशरथ स्वर्गलोक को चले गये॥५॥
निष्क्रान्तमात्रे भवति सहसीते सलक्ष्मणे।
दुःखशोकाभिभूतस्तु राजा त्रिदिवमभ्यगात्॥ ६॥
‘सीता और लक्ष्मण के साथ आपके राज्य से निकलते ही दुःख-शोक से पीड़ित हुए महाराज स्वर्गलोक को चल दिये॥६॥
उत्तिष्ठ पुरुषव्याघ्र क्रियतामुदकं पितुः।
अहं चायं च शत्रुघ्नः पूर्वमेव कृतोदकौ॥७॥
‘पुरुषसिंह ! उठिये और पिता को जलाञ्जलि दान कीजिये। मैं और यह शत्रुघ्न—दोनों पहले ही उनके लिये जलाञ्जलि दे चुके हैं॥७॥
प्रियेण किल दत्तं हि पितृलोकेषु राघव।
अक्षयं भवतीत्याहर्भवांश्चैव पितुः प्रियः॥८॥
‘रघुनन्दन! कहते हैं, प्रिय पुत्र का दिया हुआ जल आदि पितृलोक में अक्षय होता है और आप पिता के परम प्रिय पुत्र हैं॥८॥
त्वामेव शोचंस्तव दर्शनेप्सुस्त्वय्येव सक्तामनिवर्त्य बुद्धिम्।
त्वया विहीनस्तव शोकरुग्णस्त्वां संस्मरन्नेव गतः पिता ते॥९॥
‘आपके पिता आप से विलग होते ही शोक के कारण रुग्ण हो गये और आपके ही शोक में मग्न हो, आपको ही देखने की इच्छा रखकर, आपमें ही लगी हुई बुद्धि को आपकी ओर से न हटाकर, आपका ही स्मरण करते हुए स्वर्ग को चले गये’ ॥९॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे व्यधिकशततमः सर्गः॥ १०२॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्ड में एक सौ दोवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०२॥
सर्ग-103
तां श्रुत्वा करुणां वाचं पितुर्मरणसंहिताम्।
राघवो भरतेनोक्तां बभूव गतचेतनः॥१॥
भरत की कही हुई पिता की मृत्यु से सम्बन्ध रखने वाली करुणाजनक बात सुनकर श्रीरामचन्द्रजी दुःख के कारण अचेत हो गये॥१॥
तं तु वज्रमिवोत्सृष्टमाहवे दानवारिणा।
वाग्वजं भरतेनोक्तममनोज्ञं परंतपः॥२॥
प्रगृह्य रामो बाहू वै पुष्पिताङ्ग इव द्रुमः।
वने परशुना कृत्तस्तथा भुवि पपात ह॥३॥
भरत के मुख से निकला हुआ वह वचन वज्र-सा लगा, मानो दानवशत्रु इन्द्र ने युद्धस्थल में वज्र का प्रहार-सा कर दिया हो। मन को प्रिय न लगने वाले उस वाग्-वज्र को सुनकर शत्रुओं को संताप देने वाले श्रीराम दोनों भुजाओं को ऊपर उठाकर जिसकी डालियाँ खिली हुई हों, वन में कुल्हाड़ी से कटे हुए उस वृक्ष की भाँति पृथ्वी पर गिर पड़े (भरत के दर्शन से श्रीराम को हर्ष हुआ था, पिताकी मृत्यु के संवाद से दुःख; अतः उन्हें खिले और कटे हुए पेड़ की उपमा दी गयी है) ॥२-३॥
तथा हि पतितं रामं जगत्यां जगतीपतिम्।
कूलघातपरिश्रान्तं प्रसुप्तमिव कुञ्जरम्॥४॥
भ्रातरस्ते महेष्वासं सर्वतः शोककर्शितम्।
रुदन्तः सह वैदेह्या सिषिचुः सलिलेन वै॥५॥
पृथ्वीपति श्रीराम इस प्रकार पृथ्वी पर गिरकर नदी के तटको दाँतों से विदीर्ण करने के परिश्रम से थककर सोये हुए हाथी के समान प्रतीत होते थे। शोक के कारण दुर्बल हुए उन महाधनुर्धर श्रीराम को सब ओर से घेरकर सीतासहित रोते हुए वे तीनों भाई आँसुओं के जलसे भिगोने लगे॥ ४-५ ।।
स तु संज्ञां पुनर्लब्ध्वा नेत्राभ्यामश्रुमुत्सृजन्।
उपाक्रामत काकुत्स्थः कृपणं बहु भाषितुम्॥६॥
थोड़ी देर बाद पुनः होश में आने पर नेत्रों से अश्रुवर्षा करते हुए ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम ने अत्यन्त दीन वाणी में विलाप आरम्भ किया।॥ ६॥
स रामः स्वर्गतं श्रुत्वा पितरं पृथिवीपतिम्।
उवाच भरतं वाक्यं धर्मात्मा धर्मसंहितम्॥७॥
पृथ्वीपति महाराज दशरथ को स्वर्गगामी हुआ सुनकर धर्मात्मा श्रीराम ने भरत से यह धर्मयुक्त बात कही-
किं करिष्याम्ययोध्यायां ताते दिष्टां गतिं गते।
कस्तां राजवराद्धीनामयोध्यां पालयिष्यति॥८॥
‘भैया! जब पिताजी परलोकवासी हो गये, तब अयोध्या में चलकर अब मैं क्या करूँगा? उन राजशिरोमणि पिता से हीन हुई उस अयोध्या का अब कौन पालन करेगा? ॥ ८॥
किं नु तस्य मया कार्यं दुर्जातेन महात्मनः।
यो मृतो मम शोकेन स मया न च संस्कृतः॥९॥
‘हाय! जो पिताजी मेरे ही शोक से मृत्यु को प्राप्त हुए, उन्हीं का मैं दाह-संस्कार तक न कर सका। मुझ जैसे व्यर्थ जन्म लेने वाले पुत्र से उन महात्मा पिता का कौन-सा कार्य सिद्ध हुआ?॥ ९॥
अहो भरत सिद्धार्थो येन राजा त्वयानघ।
शत्रुजेन च सर्वेषु प्रेतकृत्येषु सत्कृतः॥१०॥
‘निष्पाप भरत ! तुम्हीं कृतार्थ हो, तुम्हारा अहोभाग्य है, जिससे तुमने और शत्रुघ्न ने सभी प्रेतकार्यों (पारलौकिककृत्यों) में संस्कार-कर्म के द्वारा महाराज का पूजन किया है।॥ १० ॥
निष्प्रधानामनेकानां नरेन्द्रेण विना कृताम्।
निवृत्तवनवासोऽपि नायोध्यां गन्तुमुत्सहे॥११॥
‘महाराज दशरथ से हीन हुई अयोध्या अब प्रधान शासक से रहित हो अस्वस्थ एवं आकुल हो उठी है; अतः वनवास से लौटने पर भी मेरे मन में अयोध्या जाने का उत्साह नहीं रह गया है। ११॥
समाप्तवनवासं मामयोध्यायां परंतप।
कोऽनुशासिष्यति पुनस्ताते लोकान्तरं गते॥ १२॥
‘परंतप भरत! वनवास की अवधि समाप्त करके यदि मैं अयोध्या में जाऊँ तो फिर कौन मुझे कर्तव्य का उपदेश देगा; क्योंकि पिताजी तो परलोकवासी हो गये॥ १२॥
पुरा प्रेक्ष्य सुवृत्तं मां पिता यान्याह सान्त्वयन्।
वाक्यानि तानि श्रोष्यामि कुतः कर्णसुखान्यहम्॥१३॥
‘पहले जब मैं उनकी किसी आज्ञा का पालन करता था, तब वे मेरे सद्व्यवहार को देखकर मेरा उत्साह बढ़ाने के लिये जो-जो बातें कहा करते थे, कानों को सुख पहुँचाने वाली उन बातों को अब मैं किसके मुख से सुनूँगा’॥
एवमुक्त्वाथ भरतं भार्यामभ्येत्य राघवः।
उवाच शोकसंतप्तः पूर्णचन्द्रनिभाननाम्॥१४॥
भरत से ऐसा कहकर शोकसंतप्त श्रीरामचन्द्रजी पूर्ण चन्द्रमा के समान मनोहर मुखवाली अपनी पत्नी के पास आकर बोले- ॥१४॥
सीते मृतस्ते श्वशुरः पितृहीनोऽसि लक्ष्मण।
भरतो दःखमाचष्टे स्वर्गतिं पृथिवीपतेः॥१५॥
‘सीते! तुम्हारे श्वशुर चल बसे। लक्ष्मण! तुम पितृहीन हो गये। भरत पृथ्वीपति महाराज दशरथ के स्वर्गवास का दुःखदायी समाचार सुना रहे हैं’॥ १५ ॥
ततो बहुगुणं तेषां बाष्पं नेत्रेष्वजायत।
तथा ब्रुवति काकुत्स्थे कुमाराणां यशस्विनाम्॥ १६॥
श्रीरामचन्द्रजी के ऐसा कहने पर उन सभी यशस्वी कुमारों के नेत्रों में बहुत अधिक आँसू उमड़ आये॥१६॥
ततस्ते भ्रातरः सर्वे भृशमाश्वास्य दुःखितम्।
अब्रुवञ्जगतीभर्तुः क्रियतामुदकं पितुः ॥१७॥
तदनन्तर सभी भाइयों ने दुःखी हुए श्रीरामचन्द्रजी को सान्त्वना देते हुए कहा—’भैया! अब पृथ्वीपति पिताजी के लिये जलाञ्जलि दान कीजिये’ ॥ १७ ॥
सा सीता स्वर्गतं श्रुत्वा श्वशुरं तं महानृपम्।
नेत्राभ्यामश्रुपूर्णाभ्यां न शशाकेक्षितुं प्रियम्॥ १८॥
अपने श्वशुर महाराज दशरथ के स्वर्गवास का समाचार सुनकर सीता के नेत्रों में आँसू भर आये। वे अपने प्रियतम श्रीरामचन्द्रजी की ओर देख न सकीं। १८॥
सान्त्वयित्वा तु तां रामो रुदतीं जनकात्मजाम्।
उवाच लक्ष्मणं तत्र दुःखितो दुःखितं वचः॥ १९॥
तदनन्तर रोती हुई जनककुमारी को सान्त्वना देकर दुःखमग्न श्रीराम ने अत्यन्त दुःखी हुए लक्ष्मण से कहा॥
आनयेङ्गुदिपिण्याकं चीरमाहर चोत्तरम्।
जलक्रियार्थं तातस्य गमिष्यामि महात्मनः॥२०॥
‘भाई! तुम इङ्गदी का पिसा हुआ फल और चीर एवं उत्तरीय ले आओ। मैं महात्मा पिता को जलदान देने के लिये चलूँगा।।२०।।
सीता पुरस्ताद् व्रजतु त्वमेनामभितो व्रज।
अहं पश्चाद् गमिष्यामि गतिञ्जूषा सुदारुणा॥ २१॥
‘सीता आगे-आगे चलें। इनके पीछे तुम चलो और तुम्हारे पीछे मैं चलूँगा। शोक के समय की यही परिपाटी है, जो अत्यन्त दारुण होती है’ ॥२१॥
ततो नित्यानुगस्तेषां विदितात्मा महामतिः।
मृदुर्दान्तश्च कान्तश्च रामे च दृढभक्तिमान्॥ २२॥
सुमन्त्रस्तैर्नृपसुतैः सार्धमाश्वास्य राघवम्।
अवतारयदालम्ब्य नदीं मन्दाकिनीं शिवाम्॥ २३॥
तत्पश्चात् उनके कुल के परम्परागत सेवक, आत्मज्ञानी, परम बुद्धिमान्, कोमल स्वभाव वाले, जितेन्द्रिय, तेजस्वी और श्रीराम के सुदृढ़ भक्त सुमन्त्र समस्त राजकुमारों के साथ श्रीराम को धैर्य बँधाकर
उन्हें हाथ का सहारा दे कल्याणमयी मन्दाकिनी के तट पर ले गये। २२-२३॥
ते सुतीर्थां ततः कृच्छ्रादुपगम्य यशस्विनः।
नदीं मन्दाकिनी रम्यां सदा पुष्पितकाननाम्॥ २४॥
शीघ्रस्रोतसमासाद्य तीर्थं शिवमकर्दमम्।
सिषिचुस्तूदकं राज्ञे तत एतद् भवत्विति ॥२५॥
वे यशस्वी राजकुमार सदा पुष्पित कानन से सुशोभित, शीघ्र गति से प्रवाहित होने वाली और उत्तम घाटवाली रमणीय नदी मन्दाकिनी के तट पर कठिनाई से पहुँचे तथा उसके पङ्करहित, कल्याणप्रद, तीर्थभूत जल को लेकर उन्होंने राजा के लिये जल दिया। उस समय वे बोले—’पिताजी! यह जल आपकी सेवा में उपस्थित हो’।
प्रगृह्य तु महीपालो जलापूरितमञ्जलिम्।
दिशं याम्यामभिमुखो रुदन् वचनमब्रवीत्॥ २६॥
एतत् ते राजशार्दूल विमलं तोयमक्षयम्।
पितृलोकगतस्याद्य मद्दत्तमुपतिष्ठतु ॥२७॥
पृथ्वीपालक श्रीराम ने जल से भरी हुई अञ्जलि ले दक्षिण दिशा की ओर मुँह करके रोते हुए इस प्रकार कहा—’मेरे पूज्य पिता राजशिरोमणि महाराज दशरथ! आज मेरा दिया हुआ यह निर्मल जल पितृलोक में गये हुए आपको अक्षय रूप से प्राप्त हो’॥ २६-२७॥
ततो मन्दाकिनीतीरं प्रत्युत्तीर्य स राघवः।
पितुश्चकार तेजस्वी निर्वापं भ्रातृभिः सह॥ २८॥
इसके बाद मन्दाकिनीके जल से निकलकर किनारे पर आकर तेजस्वी श्रीरघुनाथजी ने अपने भाइयों के साथ मिलकर पिताके लिये पिण्डदान किया॥२८॥
ऐङ्गदं बदरैर्मिश्रं पिण्याकं दर्भसंस्तरे।
न्यस्य रामः सुदुःखा? रुदन् वचनमब्रवीत्॥ २९॥
उन्होंने इङ्गदी के गूदे में बेर मिलाकर उसका पिण्ड तैयार किया और बिछे हुए कुशों पर उसे रखकर अत्यन्त दुःख से आर्त हो रोते हुए यह बात कही— ॥ २९॥
इदं भुक्ष्व महाराज प्रीतो यदशना वयम्।
यदन्नः पुरुषो भवति तदन्नास्तस्य देवताः॥ ३०॥
‘महाराज! प्रसन्नतापूर्वक यह भोजन स्वीकार कीजिये; क्योंकि आजकल यही हम लोगों का आहार है। मनुष्य स्वयं जो अन्न खाता है, वही उसके देवता भी ग्रहण करते हैं’॥ ३०॥
ततस्तेनैव मार्गेण प्रत्युत्तीर्य सरित्तटात्।
आरुरोह नरव्याघ्रो रम्यसानुं महीधरम्॥३१॥
ततः पर्णकुटीद्वारमासाद्य जगतीपतिः।
परिजग्राह पाणिभ्यामुभौ भरतलक्ष्मणौ ॥३२॥
इसके बाद उसी मार्ग से मन्दाकिनी तट के ऊपर आकर पृथ्वीपालक पुरुषसिंह श्रीराम सुन्दर शिखर वाले चित्रकूट पर्वत पर चढ़े और पर्णकुटी के द्वार पर आकर भरत और लक्ष्मण दोनों भाइयों को दोनों हाथों से पकड़कर रोने लगे॥ ३१-३२ ॥
तेषां तु रुदतां शब्दात् प्रतिशब्दोऽभवद् गिरौ।
भ्रातॄणां सह वैदेह्या सिंहानां नर्दतामिव॥३३॥
सीतासहित रोते हुए उन चारों भाइयों के रुदन शब्द से उस पर्वत पर गरजते हुए सिंहों के दहाड़ने के समान प्रतिध्वनि होने लगी।॥ ३३॥
महाबलानां रुदतां कुर्वतामुदकं पितुः।
विज्ञाय तुमुलं शब्दं त्रस्ता भरतसैनिकाः॥३४॥
अब्रुवंश्चापि रामेण भरतः संगतो ध्रुवम्।
तेषामेव महान् शब्दः शोचतां पितरं मृतम्॥ ३५॥
पिताको जलाञ्जलि देकर रोते हुए उन महाबली भाइयों के रोदन का तुमुल नाद सुनकर भरत के सैनिक किसी भय की आशङ्का से डर गये। फिर उसे पहचानकर वे एक-दूसरे से बोले—’निश्चय ही भरत श्रीरामचन्द्रजी से मिले हैं। अपने परलोकवासी पिता के लिये शोक करने वाले उन चारों भाइयों के रोने का ही यह महान् शब्द है’ ।। ३४-३५ ॥
अथ वाहान् परित्यज्य तं सर्वेऽभिमुखाः स्वनम्।
अप्येकमनसो जग्मुर्यथास्थानं प्रधाविताः॥ ३६॥
यों कहकर उन सबने अपनी सवारियों को तो वहीं छोड़ दिया और जिस स्थान से वह आवाज आ रही थी, उसी ओर मुँह किये एकचित्त होकर वे दौड़ पड़े॥
हयैरन्ये गजैरन्ये रथैरन्ये स्वलंकृतैः।
सुकुमारास्तथैवान्ये पद्भिरेव नरा ययुः ॥ ३७॥
उनसे भिन्न जो सुकुमार मनुष्य थे, उनमें से कुछ लोग घोड़ों से, कुछ हाथियों से और कुछ सजे-सजाये रथों से ही आगे बढ़े। कितने ही मनुष्य पैदल ही चल दिये॥ ३७॥
अचिरप्रोषितं रामं चिरविप्रोषितं यथा।
द्रष्टकामो जनः सर्वो जगाम सहसाश्रमम्॥३८॥
यद्यपि श्रीरामचन्द्रजी को परदेश में आये अभी थोड़े ही दिन हुए थे, तथापि लोगों को ऐसा जान पड़ता था कि मानो वे दीर्घकाल से परदेश में रह रहे हैं; अतः सब लोग उनके दर्शन की इच्छा से सहसा आश्रम की ओर चल दिये॥ ३८॥
भ्रातृणां त्वरितास्ते तु द्रष्टुकामाः समागमम्।
ययुर्बहुविधैर्यानैः खुरनेमिसमाकुलैः॥३९॥
वे लोग चारों भाइयों का मिलन देखने की इच्छा से खुरों एवं पहियों से युक्त नाना प्रकार की सवारियों द्वारा बड़ी उतावली के साथ चले ॥ ३९॥
सा भूमिर्बहुभिर्यानै रथनेमिसमाहता।
मुमोच तुमुलं शब्दं द्यौरिवाभ्रसमागमे॥४०॥
अनेक प्रकार की सवारियों तथा रथ की पहियों से आक्रान्त हुई वह भूमि भयंकर शब्द करने लगी; ठीक उसी तरह जैसे मेघों की घटा घिर आने पर आकाश में गड़गड़ाहट होने लगती है॥ ४० ॥
तेन वित्रासिता नागाः करेणुपरिवारिताः।
आवासयन्तो गन्धेन जग्मुरन्यदनं ततः॥४१॥
उस तुमुल नाद से भयभीत हुए हाथी हथिनियों से घिरकर मद की गन्ध से उस स्थान को सुवासित करते हुए वहाँ से दूसरे वन में भाग गये। ४१॥
वराहवृकसिंहाश्च महिषाः सृमरास्तथा।
व्याघ्रगोकर्णगवया वित्रेसुः पृषतैः सह ॥४२॥
वराह, भेड़िये, सिंह, भैंसे, सृमर (मृगविशेष), व्याघ्र, गोकर्ण (मृगविशेष) और गवय (नीलगाय), चितकबरे हरिणों सहित संत्रस्त हो उठे॥ ४२ ॥
रथाह्वहंसानत्यूहाः प्लवाः कारण्डवाः परे।
तथा पुंस्कोकिलाः क्रौञ्चा विसंज्ञा भेजिरे दिशः॥४३॥
चक्रवाक, हंस, जलकुक्कुट, वक, कारण्डव, नरकोकिल और क्रौञ्च पक्षी होश-हवाश खोकर विभिन्न दिशाओं में उड़ गये॥ ४३॥
तेन शब्देन वित्रस्तैराकाशं पक्षिभिर्वृतम्।
मनुष्यैरावृता भूमिरुभयं प्रबभौ तदा॥४४॥
उस शब्द से डरे हुए पक्षी आकाश में छा गये और नीचे की भूमि मनुष्यों से भर गयी। इस प्रकार उन दोनों की समानरूप से शोभा होने लगी॥४४॥
ततस्तं पुरुषव्याघ्रं यशस्विनमकल्मषम्।
आसीनं स्थण्डिले रामं ददर्श सहसा जनः॥ ४५॥
लोगों ने सहसा पहुँचकर देखा—यशस्वी, पापरहित, पुरुषसिंह श्रीराम वेदी पर बैठे हैं॥ ४५ ॥
विगर्हमाणः कैकेयीं मन्थरासहितामपि।
अभिगम्य जनो रामं बाष्पपूर्णमुखोऽभवत्॥ ४६॥
श्रीराम के पास जाने पर सबके मुख आँसुओं से भीग गये और सब लोग मन्थरासहित कैकेयी की निन्दा करने लगे॥ ४६॥
तान् नरान् बाष्पपूर्णाक्षान् समीक्ष्याथ सुदुःखितान्।
पर्यष्वजत धर्मज्ञः पितृवन्मातृवच्च सः॥४७॥
उन सब लोगों के नेत्र आँसुओं से भरे हुए थे और वे सब-के-सब अत्यन्त दुःखी हो रहे थे। धर्मज्ञ श्रीराम ने उन्हें देखकर पिता-माताकी भाँति हृदय से लगाया।
स तत्र कांश्चित् परिषस्वजे नरान् नराश्च केचित्तु तमभ्यवादयन्।
चकार सर्वान् सवयस्यबान्धवान् यथार्हमासाद्य तदा नृपात्मजः॥४८॥
श्रीराम ने कुछ मनुष्यों को वहाँ छाती से लगाया तथा कुछ लोगों ने पहुँचकर वहाँ उनके चरणों में प्रणाम किया। राजकुमार श्रीराम ने उस समय वहाँ आये हुए सभी मित्रों और बन्धु-बान्धवों का यथायोग्य सम्मान किया॥४८॥
ततः स तेषां रुदतां महात्मनां भुवं च खं चानुविनादयन् स्वनः।
गुहा गिरीणां च दिशश्च संततं मृदङ्गघोषप्रतिमो विशुश्रुवे॥४९॥
उस समय वहाँ रोते हुए उन महात्माओं का वह रोदन-शब्द पृथ्वी, आकाश, पर्वतों की गुफा और सम्पूर्ण दिशाओं को निरन्तर प्रतिध्वनित करता हुआ मृदङ्गकी ध्वनि के समान सुनायी पड़ता था॥ ४९॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्र्यधिकशततमः सर्गः॥ १०३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में एक सौ तीनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०३॥
सर्ग-104
वसिष्ठः पुरतः कृत्वा दारान् दशरथस्य च।
अभिचक्राम तं देशं रामदर्शनतर्षितः॥१॥
महर्षि वसिष्ठजी महाराज दशरथ की रानियों को आगे करके श्रीरामचन्द्रजी को देखने की अभिलाषा लिये उस स्थान की ओर चले, जहाँ उनका आश्रम था॥ १॥
राजपत्न्यश्च गच्छन्त्यो मन्दं मन्दाकिनी प्रति।
ददृशुस्तत्र तत् तीर्थं रामलक्ष्मणसेवितम्॥२॥
राजरानियाँ मन्द गति से चलती हुई जब मन्दाकिनी के तट पर पहुँची, तब उन्होंने वहाँ श्रीराम और लक्ष्मण के स्नान करने का घाट देखा॥२॥
कौसल्या बाष्पपूर्णेन मुखेन परिशुष्यता।
सुमित्रामब्रवीद् दीनां याश्चान्या राजयोषितः॥
इस समय कौसल्या के मुँह पर आँसुओं की धारा बह चली। उन्होंने सूखे एवं उदास मुख से दीन सुमित्रा तथा अन्य राजरानियों से कहा- ॥३॥
इदं तेषामनाथानां क्लिष्टमक्लिष्टकर्मणाम्।
वने प्राक्कलनं तीर्थं ये ते निर्विषयीकृताः॥४॥
‘जो राज्य से निकाल दिये गये हैं तथा जो दूसरों को क्लेश न देने वाले कार्य ही करते हैं, उन मेरे अनाथ बच्चों का यह वन में दुर्गम तीर्थ है, जिसे इन्होंने पहले पहल स्वीकार किया है॥४॥
इतः सुमित्रे पुत्रस्ते सदा जलमतन्द्रितः।
स्वयं हरति सौमित्रिर्मम पुत्रस्य कारणात्॥५॥
‘सुमित्रे! आलस्यरहित तुम्हारे पुत्र लक्ष्मण स्वयं आकर सदा यहीं से मेरे पुत्र के लिये जल ले जाया करते हैं॥ ५॥
जघन्यमपि ते पुत्रः कृतवान् न तु गर्हितः।
भ्रातुर्यदर्थरहितं सर्वं तद् गर्हितं गुणैः॥६॥
‘यद्यपि तुम्हारे पुत्र ने छोटे-से-छोटा सेवा-कार्य भी स्वीकार किया है, तथापि इससे वे निन्दित नहीं हुए हैं; क्योंकि सद्गुणों से युक्त ज्येष्ठ भाई के प्रयोजन से रहित जो कार्य होते हैं, वे ही सब निन्दित माने गये हैं॥ ६॥
अद्यायमपि ते पुत्रः क्लेशानामतथोचितः।
नीचानर्थसमाचारं सज्जं कर्म प्रमुञ्चतु॥७॥
‘तुम्हारा यह पुत्र भी उन क्लेशों के योग्य नहीं है, जिन्हें आजकल वह सहन करता है। अब श्रीराम लौट चलें और निम्न श्रेणी के पुरुषों के योग्य जो दुःखजनक कार्य उसके सामने प्रस्तुत है, उसे वह छोड़ दे—उसे करने का अवसर ही उसके लिये न रह जाय’॥ ७॥
दक्षिणाग्रेषु दर्भेषु सा दर्दश महीतले।
पितुरिङ्गदिपिण्याकं न्यस्तमायतलोचना॥८॥
आगे जाकर विशाललोचना कौसल्या ने देखा कि श्रीराम ने पृथ्वी पर बिछे हुए दक्षिणाग्र कुशों के ऊपर अपने पिता के लिये पिसे हुए इङ्गदी के फल का पिण्ड रख छोड़ा है॥ ८॥
तं भूमौ पितुरार्तेन न्यस्तं रामेण वीक्ष्य सा।
उवाच देवी कौसल्या सर्वा दशरथस्त्रियः॥९॥
दुःखी राम के द्वारा पिता के लिये भूमि पर रखे हुए उस पिण्ड को देखकर देवी कौसल्या ने दशरथ की सब रानियों से कहा- ॥९॥
इदमिक्ष्वाकुनाथस्य राघवस्य महात्मनः।
राघवेण पितुर्दत्तं पश्यतैतद् यथाविधि॥१०॥
‘बहनो! देखो, श्रीराम ने इक्ष्वाकुकुल के स्वामी रघुकुलभूषण महात्मा पिता के लिये यह विधिपूर्वक पिण्डदान किया है॥१०॥
तस्य देवसमानस्य पार्थिवस्य महात्मनः।
नैतदौपयिकं मन्ये भुक्तभोगस्य भोजनम्॥११॥
‘देवता के समान तेजस्वी वे महामना भूपाल नाना प्रकार के उत्तम भोग भोग चुके हैं। उनके लिये यह भोजन मैं उचित नहीं मानती।। ११ ॥
चतुरन्तां महीं भुक्त्वा महेन्द्रसदृशो भुवि।
कथमिङ्गदिपिण्याकं स भुङ्क्ते वसुधाधिपः॥ १२॥
‘जो चारों समुद्रों तक की पृथ्वी का राज्य भोगकर भूतल पर देवराज इन्द्र के समान प्रतापी थे, वे भूपाल महाराज दशरथ पिसे हुए इङ्गुदी-फल का पिण्ड कैसे खा रहे होंगे? ॥ १२॥
अतो दुःखतरं लोके न किंचित् प्रतिभाति मे।
यत्र रामः पितुर्दद्यादिङ्गदीक्षोदमृद्धिमान्॥१३॥
‘संसार में इससे बढ़कर महान् दुःख मुझे और कोई नहीं प्रतीत होता है, जिसके अधीन होकर श्रीराम समृद्धिशाली होते हुए भी अपने पिता को इङ्गुदी के पिसे हुए फल का पिण्ड दें॥ १३॥
रामेणेङ्गदिपिण्याकं पितुर्दत्तं समीक्ष्य मे।
कथं दुःखेन हृदयं न स्फोटति सहस्रधा॥१४॥
‘श्रीराम ने अपने पिता को इङ्गुदी का पिण्याक (पिसा हुआ फल) प्रदान किया है—यह देखकर दुःख से मेरे हृदय के सहस्रों टुकड़े क्यों नहीं हो जाते हैं ? ॥ १४॥
श्रुतिस्तु खल्वियं सत्या लौकिकी प्रतिभाति मे।
यदन्नः पुरुषो भवति तदन्नास्तस्य देवताः॥
‘यह लौकिकी श्रुति (लोकविख्यात कहावत)निश्चय ही मुझे सत्य प्रतीत हो रही है कि मनुष्य स्वयं जो अन्न खाता है, उसके देवता भी उसी अन्न को ग्रहण करते हैं’।
एवमा सपत्न्यस्ता जग्मुराश्वास्य तां तदा।
ददृशुश्चाश्रमे रामं स्वर्गच्युतमिवामरम्॥१६॥
इस प्रकार शोक से आर्त हुई कौसल्या को उस समय उनकी सौतें समझा-बुझाकर उन्हें आगे ले गयीं। आश्रम पर पहुँचकर उन सबने श्रीराम को देखा, जो स्वर्ग से गिरे हुए देवता के समान जान पड़ते थे॥ १६॥
तं भोगैः सम्परित्यक्तं रामं सम्प्रेक्ष्य मातरः।
आर्ता मुमुचुरश्रूणि सस्वरं शोककर्शिताः॥१७॥
भोगों का परित्याग करके तपस्वी जीवन व्यतीत करने वाले श्रीराम को देखकर उनकी माताएँ शोक से कातर हो गयी और आर्तभाव से फूट-फूटकर रोती हुई आँसू बहाने लगीं॥ १७॥
तासां रामः समुत्थाय जग्राह चरणाम्बुजान्।
मातृणां मनुजव्याघ्रः सर्वासां सत्यसंगरः॥१८॥
सत्यप्रतिज्ञ नरश्रेष्ठ श्रीराम माताओं को देखते ही उठकर खड़े हो गये और बारी-बारी से उन सबके चरणारविन्दों का स्पर्श किया।॥ १८॥
ताः पाणिभिः सुखस्पर्शेर्मुद्रङ्गलितलैः शुभैः।
प्रममा रजः पृष्ठाद् रामस्यायतलोचनाः॥१९॥
विशाल नेत्रों वाली माताएँ स्नेहवश जिनकी अंगुलियाँ कोमल और स्पर्श सुखद था, उन सुन्दर हाथों से श्रीराम की पीठ से धूल पोंछने लगीं॥ १९ ॥
सौमित्रिरपि ताः सर्वा मातृः सम्प्रेक्ष्य दुःखितः।
अभ्यवादयदासक्तं शनै रामादनन्तरम्॥२०॥
श्रीराम के बाद लक्ष्मण भी उन सभी दुःखिया माताओं को देखकर दुःखी हो गये और उन्होंने स्नेहपूर्वक धीरे-धीरे उनके चरणों में प्रणाम किया। २०॥
यथा रामे तथा तस्मिन् सर्वा ववृतिरे स्त्रियः।
वृत्तिं दशरथाज्जाते लक्ष्मणे शुभलक्षणे॥२१॥
उन सब माताओं ने श्रीराम के साथ जैसा बर्ताव किया था, वैसे ही उत्तम लक्षणों से युक्त दशरथनन्दन लक्ष्मण के साथ भी किया॥ २१॥
सीतापि चरणांस्तासामुपसंगृह्य दुःखिता।
श्वश्रूणामश्रुपूर्णाक्षी सम्बभूवाग्रतः स्थिता॥ २२॥
तदनन्तर आँसूभरे नेत्रोंवाली दुःखिनी सीता भी सभी सासुओं के चरणों में प्रणाम करके उनके आगे खड़ी हो गयी॥ २२॥
तां परिष्वज्य दुःखार्ता माता दुहितरं यथा।
वनवासकृतां दीनां कौसल्या वाक्यमब्रतीत्॥ २३॥
तब दुःख से पीड़ित हई कौसल्या ने जैसे माता अपनी बेटी को हृदय से लगा लेती है, उसी प्रकार वनवास के कारण दीन (दुर्बल) हुई सीता को छाती से चिपका लिया और इस प्रकार कहा- ॥ २३ ॥
वैदेहराजन्यसुता स्नुषा दशरथस्य च।
रामपत्नी कथं दुःखं सम्प्राप्ता विजने वने ॥ २४॥
‘विदेहराज जनक की पुत्री, राजा दशरथ की पुत्रवधू तथा श्रीराम की पत्नी इस निर्जन वन में क्यों दुःख भोग रही है ? ॥ २४॥
पद्ममातपसंतप्तं परिक्लिष्टमिवोत्पलम्।
काञ्चनं रजसा ध्वस्तं क्लिष्टं चन्द्रमिवाम्बुदैः॥ २५॥
‘बेटी! तुम्हारा मुख धूप से तपे हुए कमल, कुचले हुए उत्पल, धूल से ध्वस्त हुए सुवर्ण और बादलों से ढके हुए चन्द्रमा की भाँति श्रीहीन हो रहा है।॥ २५ ॥
मुखं ते प्रेक्ष्य मां शोको दहत्यग्निरिवाश्रयम्।
भृशं मनसि वैदेहि व्यसनारणिसम्भवः॥२६॥
‘विदेहनन्दिनि! जैसे आग अपने उत्पत्ति स्थान काष्ठ को दग्ध कर देती है, उसी प्रकार तुम्हारे इस मुख को देखकर मेरे मन में संकटरूपी अरणि से उत्पन्न हुआ यह शोकानल मुझे जलाये देता है’। २६॥
ब्रुवन्त्यामेवमार्तायां जनन्यां भरताग्रजः।
पादावासाद्य जग्राह वसिष्ठस्य च राघवः॥२७॥
शोकाकुल हुई माता जब इस प्रकार विलाप कर रही थी, उसी समय भरत के बड़े भाई श्रीराम ने वसिष्ठजी के चरणों में पड़कर उन्हें दोनों हाथों से पकड़ लिया॥ २७॥
पुरोहितस्याग्निसमस्य तस्य वै बृहस्पतेरिन्द्र इवामराधिपः।
प्रगृह्य पादौ सुसमृद्धतेजसः सहैव तेनोपविवेश राघवः ॥ २८॥
जैसे देवराज इन्द्र बृहस्पति के चरणों का स्पर्श करते हैं, उसी प्रकार अग्नि के समान बढ़े हुए तेजवाले पुरोहित वसिष्ठजी के दोनों पैर पकड़कर श्रीरामचन्द्रजी उनके साथ ही पृथ्वीपर बैठ गये॥ २८॥
ततो जघन्यं सहितैः स्वमन्त्रिभिः पुरप्रधानैश्च तथैव सैनिकैः।
जनेन धर्मज्ञतमेन धर्मवानुपोपविष्टो भरतस्तदाग्रजम्॥२९॥
तदनन्तर धर्मात्मा भरत एक साथ आये हुए अपने सभी मन्त्रियों, प्रधान-प्रधान पुरवासियों, सैनिकों तथा परम धर्मज्ञ पुरुषों के साथ अपने बड़े भाई के पास उनके पीछे जा बैठे ॥ २९॥
उपोपविष्टस्तु तदातिवीर्यवांस्तपस्विवेषेण समीक्ष्य राघवम्।
श्रिया ज्वलन्तं भरतः कृताञ्जलिर्यथा महेन्द्रः प्रयतः प्रजापतिम्॥३०॥
उस समय श्रीराम के आसन के समीप बैठे हुए अत्यन्त पराक्रमी भरत ने दिव्य दीप्ति से प्रकाशित होने वाले श्रीरघुनाथजी को तपस्वी के वेश में देखकर उनके प्रति उसी प्रकार हाथ जोड़ लिये जैसे देवराज इन्द्र प्रजापति ब्रह्माके समक्ष विनीतभाव से हाथ जोड़ते हैं।॥ ३०॥
किमेष वाक्यं भरतोऽद्य राघवं प्रणम्य सत्कृत्य च साधु वक्ष्यति।
इतीव तस्यार्यजनस्य तत्त्वतो बभूव कौतूहलमुत्तमं तदा॥३१॥
उस समय वहाँ बैठे हुए श्रेष्ठ पुरुषों के हृदय में यथार्थ रूप से यह उत्तम कौतूहल-सा जाग उठा कि देखें ये भरतजी श्रीरामचन्द्रजी को सत्कारपूर्वक प्रणाम करके आज उत्तम रीति से उनके समक्ष क्या कहते हैं? ॥ ३१॥
स राघवः सत्यधृतिश्च लक्ष्मणो महानुभावो भरतश्च धार्मिकः।
वृताः सुहृद्भिश्च विरेजिरेऽध्वरे यथा सदस्यैः सहितास्त्रयोऽग्नयः॥३२॥
वे सत्यप्रतिज्ञ श्रीराम, महानुभाव लक्ष्मण तथा धर्मात्मा भरत—ये तीनों भाई अपने सुहृदों से घिरकर यज्ञशाला में सदस्यों द्वारा घिरे हुए त्रिविध अग्नियों के समान शोभा पा रहे थे॥ ३२॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतुरधिकशततमः सर्गः॥ १०४॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में एक सौ चारवाँ सर्ग पूरा हुआ॥१०४॥
सर्ग-105
ततः पुरुषसिंहानां वृतानां तैः सुहृद्गणैः।
शोचतामेव रजनी दुःखेन व्यत्यवर्तत॥१॥
रजन्यां सुप्रभातायां भ्रातरस्ते सुहृवृताः।
मन्दाकिन्यां हुतं जप्यं कृत्वा राममुपागमन्॥२॥
अपने सुहृदों से घिरकर बैठे हुए पुरुषसिंह श्रीराम आदि भाइयों की वह रात्रि पिताकी मृत्यु के दुःख से शोक करते हुए ही व्यतीत हुई। सबेरा होने पर भरत आदि तीनों भाई सुहृदों के साथ ही मन्दाकिनी के
तटपर गये और स्नान, होम एवं जप आदि करके पुनः श्रीराम के पास लौट आये॥ १-२ ।।
तूष्णीं ते समुपासीना न कश्चित् किंचिदब्रवीत्।
भरतस्तु सुहृन्मध्ये रामं वचनमब्रवीत्॥३॥
वहाँ आकर सभी चुपचाप बैठ गये। कोई कुछ नहीं बोल रहा था। तब सुहृदों के बीच में बैठे हुए भरत ने श्रीराम से इस प्रकार कहा— ॥३॥
सान्त्विता मामिका माता दत्तं राज्यमिदं मम।
तद् ददामि तवैवाहं भुक्ष्व राज्यमकण्टकम्॥ ४॥
‘भैया ! पिताजीने वरदान देकर मेरी माता को संतुष्ट कर दिया और माता ने यह राज्य मुझे दे दिया। अब मैं अपनी ओर से यह अकण्टक राज्य आपकी ही सेवा में समर्पित करता हूँ। आप इसका पालन एवं उपभोग कीजिये॥४॥
महतेवाम्बुवेगेन भिन्नः सेतुर्जलागमे।
दुरावरं त्वदन्येन राज्यखण्डमिदं महत्॥५॥
‘वर्षाकाल में जल के महान् वेग से टूटे हुए सेतु की भाँति इस विशाल राज्यखण्ड को सँभालना आपके सिवा दूसरे के लिये अत्यन्त कठिन है॥ ५॥
गतिं खर इवाश्वस्य तार्क्ष्यस्येव पतत्त्रिणः।
अनुगन्तुं न शक्तिर्मे गतिं तव महीपते॥६॥
‘पृथ्वीनाथ! जैसे गदहा घोड़े की और अन्य साधारण पक्षी गरुड़ की चाल नहीं चल सकते, उसी प्रकार मुझमें आपकी गतिका—आपकी पालनपद्धति का अनुसरण करने की शक्ति नहीं है॥६॥
सुजीवं नित्यशस्तस्य यः परैरुपजीव्यते।
राम तेन तु दुर्जीवं यः परानुपजीवति॥७॥
‘श्रीराम ! जिसके पास आकर दूसरे लोग जीवननिर्वाह करते हैं, उसीका जीवन उत्तम है और जो दूसरों का आश्रय लेकर जीवन निर्वाह करता है, उसका जीवन दुःखमय है (अतः आपके लिये राज्य करना ही उचित है)॥७॥
यथा तु रोपितो वृक्षः पुरुषेण विवर्धितः।
ह्रस्वकेन दुरारोहो रूढस्कन्धो महाद्रुमः॥८॥
स यदा पुष्पितो भूत्वा फलानि न विदर्शयेत्।
स तां नानुभवेत् प्रीतिं यस्य हेतोः प्ररोपितः॥९॥
एषोपमा महाबाहो तदर्थं वेत्तुमर्हसि।
यत्र त्वमस्मान् वृषभो भर्ता भृत्यान् न शाधि हि॥ १०॥
‘जैसे फल की इच्छा रखने वाले किसी पुरुष ने एक वृक्ष लगाया, उसे पाल-पोसकर बड़ा किया; फिर उसके तने मोटे हो गये और वह ऐसा विशाल वृक्ष हो गया कि किसी नाटे कद के पुरुष के लिये उस पर चढ़ना अत्यन्त कठिन था। उस वृक्ष में जब फूल लग जायँ, उसके बाद भी यदि वह फल न दिखा सके तो जिसके लिये उस वृक्ष को लगाया गया था, वह उद्देश्य पूरा न हो सका। ऐसी स्थिति में उसे लगाने वाला पुरुष उस प्रसन्नता का अनुभव नहीं करता, जो फल की प्राप्ति होने से सम्भावित थी। महाबाहो ! यह एक उपमा है, इसका अर्थ आप स्वयं समझ लें (अर्थात् पिताजी ने आप-जैसे सर्वसद्गुण सम्पन्न पुत्र को लोकरक्षा के लिये उत्पन्न किया था। यदि आपने राज्यपालन का भार अपने हाथ में नहीं लिया तो उनका वह उद्देश्य व्यर्थ हो जायगा)। इस राज्यपालन के अवसर पर आप श्रेष्ठ एवं भरण-पोषण में समर्थ होकर भी यदि हम भृत्यों का शासन नहीं करेंगे तो पूर्वोक्त उपमा ही आपके लिये लागू होगी॥ ८–१०॥
श्रेणयस्त्वां महाराज पश्यन्त्वय्याश्च सर्वशः।
प्रतपन्तमिवादित्यं राज्यस्थितमरिंदमम्॥११॥
‘महाराज! विभिन्न जातियों के सङ्घ और प्रधानप्रधान पुरुष आप शत्रुदमन नरेश को सब ओर तपते हुए सूर्य की भाँति राज्यसिंहासन पर विराजमान देखें। ११॥
तथानुयाने काकुत्स्थ मत्ता नर्दन्तु कुञ्जराः।
अन्तःपुरगता नार्यो नन्दन्तु सुसमाहिताः॥१२॥
‘ककुत्स्थकुलभूषण! इस प्रकार आपके अयोध्या को लौटते समय मतवाले हाथी गर्जना करें और अन्तःपुर की स्त्रियाँ एकाग्रचित्त होकर प्रसन्नतापूर्वक आपका अभिनन्दन करें’॥ १२ ॥
तस्य साध्वनुमन्यन्त नागरा विविधा जनाः।
भरतस्य वचः श्रुत्वा रामं प्रत्यनुयाचतः॥१३॥
इस प्रकार श्रीराम से राज्य-ग्रहण के लिये प्रार्थना करते हुए भरतजी की बात सुनकर नगर के भिन्न-भिन्न मनुष्यों ने उसका भलीभाँति अनुमोदन किया॥१३॥
तमेवं दुःखितं प्रेक्ष्य विलपन्तं यशस्विनम्।
रामः कृतात्मा भरतं समाश्वासयदात्मवान्॥ १४॥
तब शिक्षित बुद्धिवाले अत्यन्त धीर भगवान् श्रीरामने यशस्वी भरत को इस तरह दुःखी हो विलाप करते देख उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा- ॥१४॥
नात्मनः कामकारो हि पुरुषोऽयमनीश्वरः।
इतश्चेतरतश्चैनं कृतान्तः परिकर्षति ॥ १५॥
‘भाई! यह जीव ईश्वर के समान स्वतन्त्र नहीं है, अतः कोई यहाँ अपनी इच्छा के अनुसार कुछ नहीं कर सकता। काल इस पुरुष को इधर-उधर खींचता रहता है॥१५॥
सर्वे क्षयान्ता निचयाः पतनान्ताः समुच्छ्रयाः।
संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं च जीवितम्॥ १६॥
‘समस्त संग्रहों का अन्त विनाश है। लौकिक उन्नतियों का अन्त पतन है। संयोग का अन्त वियोग है और जीवन का अन्त मरण है ॥ १६ ॥
यथा फलानां पक्वानां नान्यत्र पतनाद् भयम्।
एवं नरस्य जातस्य नान्यत्र मरणाद् भयम्॥ १७॥
‘जैसे पके हुए फलों को पतन के सिवा और किसी से भय नहीं है, उसी प्रकार उत्पन्न हुए मनुष्यों को मृत्यु के सिवा और किसी से भय नहीं है। १७॥
यथाऽऽगारं दृढस्थूणं जीर्णं भूत्वोपसीदति।
तथावसीदन्ति नरा जरामृत्युवशंगताः॥१८॥
‘जैसे सुदृढ़ खम्भेवाला मकान भी पुराना होने पर गिर जाता है, उसी प्रकार मनुष्य जरा और मृत्यु के वश में पड़कर नष्ट हो जाते हैं॥ १८ ॥
अत्येति रजनी या तु सा न प्रतिनिवर्तते।
यात्येव यमुना पूर्ण समुद्रमुदकार्णवम्॥१९॥
‘जो रात बीत जाती है, वह लौटकर फिर नहीं आती है। जैसे यमुना जल से भरे हुए समुद्र की ओर जाती ही है, उधर से लौटती नहीं॥ १९ ॥
अहोरात्राणि गच्छन्ति सर्वेषां प्राणिनामिह।
आयूंषि क्षपयन्त्याशु ग्रीष्मे जलमिवांशवः॥ २०॥
‘दिन-रात लगातार बीत रहे हैं और इस संसार में सभी प्राणियों की आयुका तीव्र गति से नाश कर रहे हैं। ठीक वैसे ही जैसे सूर्य की किरणें ग्रीष्म-ऋतु में जल को शीघ्रतापूर्वक सोखती रहती हैं॥ २० ॥
आत्मानमनुशोच त्वं किमन्यमनुशोचसि।
आयुस्तु हीयते यस्य स्थितस्यास्य गतस्य च॥ २१॥
‘तुम अपने ही लिये चिन्ता करो, दूसरे के लिये क्यों बार-बार शोक करते हो। कोई इस लोक में स्थित हो या अन्यत्र गया हो, जिस किसीकी भी आयु तो निरन्तर क्षीण ही हो रही है॥ २१॥
सहैव मृत्युव्रजति सह मृत्युर्निषीदति।
गत्वा सुदीर्घमध्वानं सह मृत्युर्निवर्तते॥२२॥
‘मृत्यु साथ ही चलती है, साथ ही बैठती है और बहुत बड़े मार्ग की यात्रा में भी साथ ही जाकर वह मनुष्य के साथ ही लौटती है॥ २२॥
गात्रेषु वलयः प्राप्ताः श्वेताश्चैव शिरोरुहाः।
जरया पुरुषो जीर्णः किं हि कृत्वा प्रभावयेत्॥ २३॥
‘शरीर में झुर्रियाँ पड़ गयीं, सिर के बाल सफेद हो गये। फिर जरावस्था से जीर्ण हुआ मनुष्य कौन-सा उपाय करके मृत्यु से बचने के लिये अपना प्रभाव प्रकट कर सकता है ? ॥ २३॥
नन्दन्त्युदित आदित्ये नन्दन्त्यस्तमितेऽहनि।
आत्मनो नावबुध्यन्ते मनुष्या जीवितक्षयम्॥ २४॥
‘लोग सूर्योदय होने पर प्रसन्न होते हैं, सूर्यास्त होने पर भी खुश होते हैं; किंतु यह नहीं जानते कि प्रतिदिन अपने जीवन का नाश हो रहा है।॥ २४ ॥
हृष्यन्त्य॒तुमुखं दृष्ट्वा नवं नवमिवागतम्।
ऋतूनां परिवर्तेन प्राणिनां प्राणसंक्षयः॥२५॥
“किसी ऋतु का प्रारम्भ देखकर मानो वह नयी-नयी आयी हो (पहले कभी आयी ही न हो), ऐसा समझकर लोग हर्ष से खिल उठते हैं, परंतु यह नहीं जानते कि इन ऋतुओं के परिवर्तन से प्राणियों के प्राणों का (आयुका) क्रमशः क्षय हो रहा है।॥ २५ ॥
यथा काष्ठं च काष्ठं च समेयातां महार्णवे।।
समेत्य तु व्यपेयातां कालमासाद्य कंचन॥ २६॥
एवं भार्याश्च पुत्राश्च ज्ञातयश्च वसूनि च।
समेत्य व्यवधावन्ति ध्रुवो ह्येषां विनाभवः॥२७॥
‘जैसे महासागर में बहते हुए दो काठ कभी एकदूसरे से मिल जाते हैं और कुछ काल के बाद अलग भी हो जाते हैं, उसी प्रकार स्त्री, पुत्र, कुटुम्ब और धन भी मिलकर बिछुड़ जाते हैं; क्योंकि इनका वियोग अवश्यम्भावी है॥ २६-२७॥
नात्र कश्चिद् यथाभावं प्राणी समतिवर्तते।
तेन तस्मिन् न सामर्थ्यं प्रेतस्यास्त्यनुशोचतः॥ २८॥
‘इस संसार में कोई भी प्राणी यथा समय प्राप्त होने वाले जन्म-मरण का उल्लङ्घन नहीं कर सकता। इसलिये जो किसी मरे हुए व्यक्ति के लिये बारंबार शोक करता है, उसमें भी यह सामर्थ्य नहीं है कि वह अपनी ही मृत्यु को टाल सके॥२८॥
यथा हि सार्थं गच्छन्तं ब्रूयात् कश्चित् पथि स्थितः।
अहमप्यागमिष्यामि पृष्ठतो भवतामिति ॥ २९॥
एवं पूर्वैर्गतो मार्गः पितृपैतामहैर्भुवः।
तमापन्नः कथं शोचेद् यस्य नास्ति व्यतिक्रमः॥ ३०॥
‘जैसे आगे जाते हुए यात्रियों अथवा व्यापारियों के समुदाय से रास्ते में खड़ा हुआ पथिक यों कहे कि मैं भी आप लोगों के पीछे-पीछे आऊँगा और तदनुसार वह उनके पीछे-पीछे जाय, उसी प्रकार हमारे पूर्वज पिता-पितामह आदि जिस मार्गसे गये हैं, जिस पर जाना अनिवार्य है तथा जिससे बचने का कोई उपाय नहीं है, उसी मार्ग पर स्थित हुआ मनुष्य किसी और के लिये शोक कैसे करे? ॥ २९-३० ॥
वयसः पतमानस्य स्रोतसो वानिवर्तिनः।
आत्मा सुखे नियोक्तव्यः सुखभाजः प्रजाः स्मृताः॥३१॥
‘जैसे नदियों का प्रवाह पीछे नहीं लौटता, उसी प्रकार दिन-दिन ढलती हुई अवस्था फिर नहीं लौटती है। उसका क्रमशः नाश हो रहा है, यह सोचकर आत्मा को कल्याण के साधनभूत धर्म में लगावे; क्योंकि सभी लोग अपना कल्याण चाहते हैं॥३१॥
धर्मात्मा सुशुभैः कृत्स्नैः क्रतुभिश्चाप्तदक्षिणैः।
धूतपापो गतः स्वर्गं पिता नः पृथिवीपतिः॥३२॥
‘तात! हमारे पिता धर्मात्मा थे। उन्होंने पर्याप्त दक्षिणाएँ देकर प्रायः सभी परम शुभकारक यज्ञों का अनुष्ठान किया था। उनके सारे पाप धुल गये थे। अतः वे महाराज स्वर्गलोक में गये हैं। ३२ ।।
भृत्यानां भरणात् सम्यक् प्रजानां परिपालनात्।
अर्थादानाच्च धर्मेण पिता नस्त्रिदिवं गतः॥३३॥
वे भरण-पोषण के योग्य परिजनों का भरण करते थे। प्रजाजनों का भलीभाँति पालन करते थे और प्रजाजनों से धर्म के अनुसार कर आदि के रूप में धन लेते थे—इन सब कारणों से हमारे पिता उत्तम स्वर्गलोक में पधारे हैं।॥ ३३॥
कर्मभिस्तु शुभैरिष्टैः क्रतुभिश्चाप्तदक्षिणैः।
स्वर्गं दशरथः प्राप्तः पिता नः पृथिवीपतिः॥ ३४॥
‘सर्वप्रिय शुभ कर्मों तथा प्रचुर दक्षिणवाले यज्ञों के अनुष्ठानों से हमारे पिता पृथ्वीपति महाराज दशरथ स्वर्गलोक में गये हैं॥३४॥
इष्ट्व बहुविधैर्यज्ञैर्भोगांश्चावाप्य पुष्कलान्।
उत्तमं चायुरासाद्य स्वर्गतः पृथिवीपतिः॥ ३५॥
‘उन्होंने नाना प्रकार के यज्ञों द्वारा यज्ञपुरुष की आराधना की, प्रचुर भोग प्राप्त किये और उत्तम आयु पायी थी, इसके बाद वे महाराज यहाँ से स्वर्गलोक को पधारे हैं।
आयुरुत्तममासाद्य भोगानपि च राघवः।
न स शोच्यः पिता तात स्वर्गतः सत्कृतः सताम्॥ ३६॥
‘तात! अन्य राजाओं की अपेक्षा उत्तम आयु और श्रेष्ठ भोगों को पाकर हमारे पिता सदा सत्पुरुषों के द्वारा सम्मानित हुए हैं; अतः स्वर्गवासी हो जाने पर भी वे शोक करने योग्य नहीं हैं ॥ ३६॥
स जीर्णमानुषं देहं परित्यज्य पिता हि नः।
दैवीमृद्धिमनुप्राप्तो ब्रह्मलोकविहारिणीम्॥३७॥
‘हमारे पिता ने जराजीर्ण मानव-शरीर का परित्याग करके दैवी सम्पत्ति प्राप्त की है, जो ब्रह्मलोक में विहार कराने वाली है।॥ ३७॥
तं तु नैवंविधः कश्चित् प्राज्ञः शोचितुमर्हसि।
त्वद्विधो मद्विधश्चापि श्रुतवान् बुद्धिमत्तरः॥ ३८॥
‘कोई भी ऐसा विद्वान्, जो तुम्हारे और मेरे समान शास्त्र-ज्ञान-सम्पन्न एवं परम बुद्धिमान् है, पिताजी के लिये शोक नहीं कर सकता॥ ३८ ॥
एते बहुविधाः शोका विलापरुदिते तदा।
वर्जनीया हि धीरेण सर्वावस्थासु धीमता॥३९॥
‘धीर एवं प्रज्ञावान् पुरुष को सभी अवस्थाओं में ये नाना प्रकार के शोक, विलाप तथा रोदन त्याग देने चाहिये।
स स्वस्थो भव मा शोको यात्वा चावस तां पूरीम्।
तथा पित्रा नियुक्तोऽसि वशिना वदतां वर॥४०॥
‘इसलिये तुम स्वस्थ हो जाओ, तुम्हारे मन में शोक नहीं होना चाहिये। वक्ताओं मे श्रेष्ठ भरत! तुम यहाँ से जाकर अयोध्यापुरी में निवास करो; क्योंकि मन को वश में रखने वाले पूज्य पिताजी ने तुम्हारे लिये यही आदेश दिया है॥ ४०॥
यत्राहमपि तेनैव नियुक्तः पुण्यकर्मणा।
तत्रैवाहं करिष्यामि पितुरार्यस्य शासनम्॥४१॥
उन पुण्यकर्मा महाराज ने मुझे भी जहाँ रहने की आज्ञा दी है, वहीं रहकर मैं उन पूज्य पिता के आदेश का पालन करूँगा॥४१॥
न मया शासनं तस्य त्यक्तुं न्याय्यमरिंदम।
स त्वयापि सदा मान्यः स वै बन्धुः स नः पिता॥ ४२॥
‘शत्रुदमन भरत! पिताकी आज्ञा की अवहेलना करना मेरे लिये कदापि उचित नहीं है। वे तुम्हारे लिये भी सर्वदा सम्मान के योग्य हैं; क्योंकि वे ही हमलोगों के हितैषी बन्धु और जन्मदाता थे॥४२॥
तद् वचः पितुरेवाहं सम्मतं धर्मचारिणाम्।
कर्मणा पालयिष्यामि वनवासेन राघव॥४३॥
रघुनन्दन! मैं इस वनवासरूपी कर्म के द्वारा पिताजी के ही वचन का जो धर्मात्माओं को भी मान्य है, पालन करूँगा॥४३॥
धार्मिकेणानृशंसेन नरेण गुरुवर्तिना।
भवितव्यं नरव्याघ्र परलोकं जिगीषता॥४४॥
‘नरश्रेष्ठ! परलोकपर विजय पाने की इच्छा रखने वाले मनुष्य को धार्मिक, क्रूरता से रहित और गुरुजनों का आज्ञापालक होना चाहिये॥४४॥
आत्मानमनुतिष्ठ त्वं स्वभावेन नरर्षभ।
निशाम्य तु शुभं वृत्तं पितुर्दशरथस्य नः॥४५॥
‘मनुष्योंमें श्रेष्ठ भरत! हमारे पूज्य पिता दशरथ के शुभ आचरणों पर दृष्टिपात करके तुम अपने धार्मिक स्वभाव के द्वारा आत्मा की उन्नति के लिये प्रयत्न करो’॥
इत्येवमुक्त्वा वचनं महात्मा पितुर्निदेशप्रतिपालनार्थम्।
यवीयसं भ्रातरमर्थवच्च प्रभुर्मुहूर्ताद् विरराम रामः॥४६॥
सर्वशक्तिमान् महात्मा श्रीराम एक मुहूर्त तक अपने छोटे भाई भरत से पिताकी आज्ञा का पालन कराने के उद्देश्य से ये अर्थयुक्त वचन कहकर चुप हो गये। ४६॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चाधिकशततमः सर्गः॥१०५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में एक सौ पाँचवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०५॥
सर्ग-106
एवमुक्त्वा तु विरते रामे वचनमर्थवत्।
ततो मन्दाकिनीतीरे रामं प्रकृतिवत्सलम्॥१॥
उवाच भरतश्चित्रं धार्मिको धिार्मकं वचः।
को हि स्यादीदृशो लोके यादृशस्त्वमरिंदम॥२॥
ऐसा अर्थयुक्त वचन कहकर जब श्रीराम चुप हो गये, तब धर्मात्मा भरत ने मन्दाकिनी के तट पर प्रजावत्सल धर्मात्मा श्रीराम से यह विचित्र बात कही —’शत्रुदमन रघुवीर! इस जगत् में जैसे आप हैं, वैसा दूसरा कौन हो सकता है ? ॥ १-२॥
न त्वां प्रव्यथयेद दुःखं प्रीतिर्वा न प्रहर्षयेत्।
सम्मतश्चापि वृद्धानां तांश्च पृच्छसि संशयान्॥ ३॥
‘कोई भी दुःख आपको व्यथित नहीं कर सकता। कितनी ही प्रिय बात क्यों न हो, वह आपको हर्षोत्फुल्ल नहीं कर सकती। वृद्ध पुरुषों के सम्माननीय होकर भी आप उनसे संदेह की बातें पूछते हैं॥३॥
यथा मृतस्तथा जीवन् यथासति तथा सति।
यस्यैष बुद्धिलाभः स्यात् परितप्येत केन सः॥ ४॥
‘जैसे मरे हुए जीवका अपने शरीर आदि से कोई सम्बन्ध नहीं रहता, उसी प्रकार जीते-जी भी वह उनके सम्बन्धसे रहित है। जैसे वस्तु के अभाव में उसके प्रति राग-द्वेष नहीं होता, वैसे ही उसके रहने पर भी मनुष्य को राग-द्वेष से शुन्य होना चाहिये। जिसे ऐसी विवेकयुक्त बुद्धि प्राप्त हो गयी है, उसको संताप क्यों होगा? ॥ ४॥
परावरज्ञो यश्च स्याद् यथा त्वं मनुजाधिप।
स एव व्यसनं प्राप्य न विषीदितुमर्हति॥५॥
‘नरेश्वर! जिसे आपके समान आत्मा और अनात्माका ज्ञान है, वही संकट में पड़ने पर भी विषाद नहीं कर सकता॥५॥
अमरोपमसत्त्वस्त्वं महात्मा सत्यसंगरः।
सर्वज्ञः सर्वदर्शी च बुद्धिमांश्चासि राघव॥६॥
‘रघुनन्दन! आप देवताओं की भाँति सत्त्वगुण से सम्पन्न, महात्मा, सत्यप्रतिज्ञ, सर्वज्ञ, सबके साक्षी और बुद्धिमान् हैं॥६॥
न त्वामेवंगुणैर्युक्तं प्रभवाभवकोविदम्।
अविषह्यतमं दुःखमासादयितुमर्हति॥७॥
‘ऐसे उत्तम गुणों से युक्त और जन्म-मरण के रहस्य को जानने वाले आपके पास असह्य दुःख नहीं आ सकता॥ ७॥
प्रोषिते मयि यत् पापं मात्रा मत्कारणात् कृतम्।
क्षुद्रया तदनिष्टं मे प्रसीदतु भवान् मम॥८॥
‘जब मैं परदेश में था, उस समय नीच विचार रखने वाली मेरी माता ने मेरे लिये जो पाप कर डाला, वह मुझे अभीष्ट नहीं है; अतः आप उसे क्षमा करके मुझ पर प्रसन्न हों॥८॥
धर्मबन्धेन बद्धोऽस्मि तेनेमां नेह मातरम्।
हन्मि तीव्रण दण्डेन दण्डाहाँ पापकारिणीम्॥
‘मैं धर्म के बन्धन में बँधा हूँ, इसलिये इस पाप करने वाली एवं दण्डनीय माता को मैं कठोर दण्ड देकर मार नहीं डालता॥९॥
कथं दशरथाज्जातः शुभाभिजनकर्मणः।
जानन् धर्ममधर्मं च कुर्यां कर्म जुगुप्सितम्॥ १०॥
‘जिनके कुल और कर्म दोनों ही शुभ थे, उन महाराज दशरथ से उत्पन्न होकर धर्म और अधर्म को जानता हुआ भी मैं मातृवधरूपी लोकनिन्दित कर्म कैसे करूँ? ॥ १०॥
गुरुः क्रियावान् वृद्धश्च राजा प्रेतः पितेति च।
तातं न परिगर्हेऽहं दैवतं चेति संसदि॥११॥
‘महाराज मेरे गुरु, श्रेष्ठ यज्ञकर्म करने वाले, बड़ेबूढ़े, राजा, पिता और देवता रहे हैं और इस समय परलोकवासी हो चुके हैं, इसीलिये इस भरी सभा में मैं उनकी निन्दा नहीं करता हूँ॥ ११ ॥
को हि धर्मार्थयो नमीदृशं कर्म किल्बिषम्।
स्त्रियः प्रियचिकीर्षुः सन् कुर्याद् धर्मज्ञ धर्मवित्॥ १२॥
‘धर्मज्ञ रघुनन्दन! कौन ऐसा मनुष्य है, जो धर्म को जानते हुए भी स्त्री का प्रिय करने की इच्छा से ऐसा धर्मऔर अर्थ से हीन कुत्सित कर्म कर सकता है ? ॥ १२॥
अन्तकाले हि भूतानि मुह्यन्तीति पुरा श्रुतिः।
राज्ञैवं कुर्वता लोके प्रत्यक्षा सा श्रुतिः कृता॥ १३॥
‘लोक में एक प्राचीन किंवदन्ती है कि अन्तकाल में सब प्राणी मोहित हो जाते हैं उनकी बुद्धि नष्ट हो जाती है। राजा दशरथ ने ऐसा कठोर कर्म करके उस किंवदन्ती की सत्यता को प्रत्यक्ष कर दिखाया॥ १३ ॥
साध्वर्थमभिसंधाय क्रोधान्मोहाच्च साहसात्।
तातस्य यदतिक्रान्तं प्रत्याहरतु तद् भवान्॥१४॥
‘पिताजी ने क्रोध, मोह और साहस के कारण ठीक समझ कर जो धर्म का उल्लङ्घन किया है, उसे आप पलट दें—उसका संशोधन कर दें॥१४॥
पितुर्हि समतिक्रान्तं पुत्रो यः साधु मन्यते।
तदपत्यं मतं लोके विपरीतमतोऽन्यथा॥१५॥
‘जो पुत्र पिताकी की हुई भूल को ठीक कर देता है, वही लोक में उत्तम संतान माना गया है। जो इसके विपरीत बर्ताव करता है, वह पिताकी श्रेष्ठ संतति नहीं है॥ १५ ॥
तदपत्यं भवानस्तु मा भवान् दुष्कृतं पितुः।
अति यत् तत् कृतं कर्म लोके धीरविगर्हितम्॥
‘अतः आप पिताकी योग्य संतान ही बने रहें। उनके अनुचित कर्म का समर्थन न करें। उन्होंने इस समय जो कुछ किया है, वह धर्म की सीमा से बाहर है। संसार में धीर पुरुष उसकी निन्दा करते हैं॥ १६ ॥
कैकेयीं मां च तातं च सुहृदो बान्धवांश्च नः।
पौरजानपदान् सर्वांस्त्रातुं सर्वमिदं भवान्॥१७॥
‘कैकेयी, मैं, पिताजी, सुहृद्गुण, बन्धु-बान्धव, पुरवासी तथा राष्ट्र की प्रजा-इन सबकी रक्षा के लिये आप मेरी प्रार्थना स्वीकार करें॥ १७॥
क्व चारण्यं क्व च क्षात्रं क्व जटाः क्व च
पालनम्। ईदृशं व्याहतं कर्म न भवान् कर्तुमर्हति॥१८॥
‘कहाँ वनवास और कहाँ क्षात्रधर्म? कहाँ जटाधारण और कहाँ प्रजा का पालन? ऐसे परस्परविरोधी कर्म आपको नहीं करने चाहिये ॥ १८ ॥
एष हि प्रथमो धर्मः क्षत्रियस्याभिषेचनम्।
येन शक्यं महाप्राज्ञ प्रजानां परिपालनम्॥१९॥
‘महाप्राज्ञ! क्षत्रिय के लिये पहला धर्म यही है कि उसका राज्यपर अभिषेक हो, जिससे वह प्रजा का भलीभाँति पालन कर सके॥१९॥
कश्च प्रत्यक्षमुत्सृज्य संशयस्थमलक्षणम्।
आयतिस्थं चरेद् धर्मं क्षत्रबन्धुरनिश्चितम्॥ २०॥
‘भला कौन ऐसा क्षत्रिय होगा, जो प्रत्यक्ष सुख के साधनभूत प्रजापालन रूप धर्म का परित्याग करके संशय में स्थित, सुखके लक्षणसे रहित, भविष्य में फल देने वाले अनिश्चित धर्मका आचरण करेगा?॥ २०॥
अथ क्लेशजमेव त्वं धर्मं चरितुमिच्छसि।
धर्मेण चतुरो वर्णान् पालयन् क्लेशमाप्नुहि ॥ २१॥
‘यदि आप क्लेशसाध्य धर्म का ही आचरण करना चाहते हैं तो धर्मानुसार चारों वर्गों का पालन करते हुए ही कष्ट उठाइये॥ २१॥
चतुर्णामाश्रमाणां हि गार्हस्थ्यं श्रेष्ठमुत्तमम्।
आहुर्धर्मज्ञ धर्मज्ञास्तं कथं त्यक्तुमिच्छसि ॥२२॥
“धर्मज्ञ रघुनन्दन! धर्म के ज्ञाता पुरुष चारों आश्रमों में गार्हस्थ्य को ही श्रेष्ठ बतलाते हैं, फिर आप उसका परित्याग क्यों करना चाहते हैं? ॥ २२॥
श्रुतेन बालः स्थानेन जन्मना भवतो ह्यहम्।
स कथं पालयिष्यामि भूमिं भवति तिष्ठति॥ २३॥
‘मैं शास्त्रज्ञान और जन्मजात अवस्था दोनों ही दृष्टियों से आपकी अपेक्षा बालक हूँ, फिर आपके रहते हुए मैं वसुधा का पालन कैसे करूँगा? ।। २३॥
हीनबुद्धिगुणो बालो हीनस्थानेन चाप्यहम्।
भवता च विनाभूतो न वर्तयितुमुत्सहे॥२४॥
‘मैं बुद्धि और गुण दोनों से हीन हूँ, बालक हूँ तथा मेरा स्थान आपसे बहुत छोटा है; अतः मैं आपके बिना जीवन-धारण भी नहीं कर सकता, राज्य का पालन तो दूरकी बात है॥२४॥
इदं निखिलमप्यग्रयं राज्यं पित्र्यमकण्टकम्।
अनुशाधि स्वधर्मेण धर्मज्ञ सह बान्धवैः॥ २५॥
‘धर्मज्ञ रघुनन्दन! पिताका यह सारा राज्य श्रेष्ठ और निष्कण्टक है, अतः आप बन्धु-बान्धवों के साथ स्वधर्मानुसार इसका पालन कीजिये॥ २५ ॥
इहैव त्वाभिषिञ्चन्तु सर्वाः प्रकृतयः सह।
ऋत्विजः सवसिष्ठाश्च मन्त्रविन्मन्त्रकोविदाः॥ २६॥
‘मन्त्रज्ञ रघुवीर! मन्त्रों के ज्ञाता महर्षि वसिष्ठ आदि सभी ऋत्विज् तथा मन्त्री, सेनापति और प्रजा आदि सारी प्रकृतियाँ यहाँ उपस्थित हैं। ये सब लोग यहीं आपका राज्याभिषेक करें॥ २६॥
अभिषिक्तस्त्वमस्माभिरयोध्यां पालने व्रज।
विजित्य तरसा लोकान् मरुद्भिरिव वासवः॥ २७॥
‘हमलोगों के द्वारा अभिषिक्त होकर आप मरुद्गणों से अभिषिक्त हुए इन्द्र की भाँति वेगपूर्वक सब लोकों को जीतकर प्रजा का पालन करने के लिये अयोध्या को चलें॥
ऋणानि त्रीण्यपाकुर्वन् दुहृदः साधु निर्दहन्।
सुहृदस्तर्पयन् कामैस्त्वमेवात्रानुशाधि माम्॥ २८॥
‘वहाँ देवता, ऋषि और पितरों का ऋण चुकायें, दुष्ट शत्रुओं का भलीभाँति दमन करें तथा मित्रों को उनके इच्छानुसार वस्तुओं द्वारा तृप्त करते हुए आप ही अयोध्या में मुझे धर्म की शिक्षा देते रहें॥२८॥
अद्यार्य मुदिताः सन्तु सुहृदस्तेऽभिषेचने।
अद्य भीताः पलायन्तु दुष्प्रदास्ते दिशो दश॥ २९॥
‘आर्य! आपका अभिषेक सम्पन्न होने पर सुहृद्गण प्रसन्न हों और दुःख देने वाले आपके शत्रु भयभीत होकर दसों दिशाओं में भाग जायें ॥ २९॥
आक्रोशं मम मातुश्च प्रमृज्य पुरुषर्षभ।
अद्य तत्रभवन्तं च पितरं रक्ष किल्बिषात्॥३०॥
‘पुरुषप्रवर! आज आप मेरी माता के कलङ्क को धो-पोंछकर पूज्य पिताजी को भी निन्दा से बचाइये। ३०॥
शिरसा त्वाभियाचेऽहं कुरुष्व करुणां मयि।
बान्धवेषु च सर्वेषु भूतेष्विव महेश्वरः॥३१॥
‘मैं आपके चरणों में माथा टेककर याचना करता हूँ। आप मुझपर दया कीजिये। जैसे महादेवजी सब प्राणियों पर अनुग्रह करते हैं, उसी प्रकार आप भी अपने बन्धु-बान्धवों पर कृपा कीजिये॥३१॥
अथवा पृष्ठतः कृत्वा वनमेव भवानितः।
गमिष्यति गमिष्यामि भवता सार्धमप्यहम्॥३२॥
‘अथवा यदि आप मेरी प्रार्थना को ठुकराकर यहाँ से वन को ही जायँगे तो मैं भी आपके साथ जाऊँगा’। ३२॥
तथाभिरामो भरतेन ताम्यता प्रसाद्यमानः शिरसा महीपतिः।
न चैव चक्रे गमनाय सत्त्ववान् मतिं पितुस्तद् वचने प्रतिष्ठितः॥३३॥
ग्लानि में पड़े हुए भरत ने मनोभिराम राजा श्रीराम को उनके चरणों में माथा टेककर प्रसन्न करने की चेष्टा की तथापि उन सत्त्वगुणसम्पन्न रघुनाथजी ने पिताकी आज्ञा में ही दृढ़तापूर्वक स्थित रहकर अयोध्या जाने का विचार नहीं किया॥३३॥
तदद्भुतं स्थैर्यमवेक्ष्य राघवे समं जनो हर्षमवाप दुःखितः।
न यात्ययोध्यामिति दुःखितोऽभवत् स्थिरप्रतिज्ञत्वमवेक्ष्य हर्षितः॥३४॥
श्रीरामचन्द्रजी की वह अद्भुत दृढ़ता देखकर सबलोग एक ही साथ दुःखी भी हुए और हर्ष को भी प्राप्त हुए। ये अयोध्या नहीं जा रहे हैं—यह सोचकर वे दुःखी हुए और प्रतिज्ञा-पालन में उनकी दृढ़ता देखकर उन्हें हर्ष हुआ॥
तमृत्विजो नैगमयूथवल्लभास्तथा विसंज्ञाश्रुकलाश्च मातरः।
तथा ब्रुवाणं भरतं प्रतुष्टवुः प्रणम्य रामं च ययाचिरे सह ॥ ३५॥
उस समय ऋत्विज् पुरवासी, भिन्न-भिन्न समुदाय के नेता और माताएँ अचेत-सी होकर आँस बहाती हुई पूर्वोक्त बातें कहने वाली भरत की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगी और सबने उनके साथ ही योग्यतानुसार श्रीरामजी के सामने विनीत होकर उनसे अयोध्या लौट चलने की याचना की॥ ३५ ॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे षडधिकशततमः सर्गः॥ १०६॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में एक सौ छवाँ सर्ग पूराहुआ॥ १०६॥
सर्ग-107
पुनरेवं ब्रुवाणं तं भरतं लक्ष्मणाग्रजः।
प्रत्युवाच ततः श्रीमान् ज्ञातिमध्ये सुसत्कृतः॥
जब भरत पुनः इस प्रकार प्रार्थना करने लगे, तब कुटुम्बीजनों के बीच में सत्कारपूर्वक बैठे हुए लक्ष्मण के बड़े भाई श्रीमान् रामचन्द्रजी ने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया- ॥१॥
उपपन्नमिदं वाक्यं यस्त्वमेवमभाषथाः।
जातः पुत्रो दशरथात् कैकेय्यां राजसत्तमात्॥ २॥
‘भाई! तुम नृपश्रेष्ठ महाराज दशरथ के द्वारा केकयराज कन्या माता कैकेयी के गर्भसे उत्पन्न हुए हो; अतःतुमने जो ऐसे उत्तम वचन कहे हैं, वे सर्वथा तुम्हारे योग्य हैं।
पुरा भ्रातः पिता नः स मातरं ते समुद्रहन्।
मातामहे समाश्रौषीद् राज्यशुल्कमनुत्तमम्॥३॥
‘भैया ! आज से बहुत पहले की बात है—पिताजी का जब तुम्हारी माताजी के साथ विवाह हुआ था, तभी उन्होंने तुम्हारे नाना से कैकेयी के पुत्र को राज्य देने की उत्तम शर्त कर ली थी॥३॥
देवासुरे च संग्रामे जनन्यै तव पार्थिवः।
सम्प्रहृष्टो ददौ राजा वरमाराधितः प्रभुः ॥४॥
‘इसके बाद देवासुर-संग्राम में तुम्हारी माता ने प्रभावशाली महाराज की बड़ी सेवा की; इससे संतुष्ट होकर राजा ने उन्हें वरदान दिया॥४॥
ततः सा सम्प्रतिश्राव्य तव माता यशस्विनी।
अयाचत नरश्रेष्ठं द्वौ वरौ वरवर्णिनी॥५॥
‘उसी की पूर्ति के लिये प्रतिज्ञा कराकर तुम्हारी श्रेष्ठ वर्णवाली यशस्विनी माता ने उन नरश्रेष्ठ पिताजी से दो वर माँगे॥५॥
तव राज्यं नरव्याघ्र मम प्रव्राजनं तथा।
तच्च राजा तथा तस्यै नियुक्तः प्रददौ वरम्॥६॥
‘पुरुषसिंह ! एक वर के द्वारा इन्होंने तुम्हारे लिये राज्य माँगा और दूसरे के द्वारा मेरा वनवास। इनसे इस प्रकार प्रेरित होकर राजा ने वे दोनों वर इन्हें दे दिये॥
तेन पित्राहमप्यत्र नियुक्तः पुरुषर्षभ।
चतुर्दश वने वासं वर्षाणि वरदानिकम्॥७॥
‘पुरुषप्रवर! इस प्रकार उन पिताजी ने वरदान के रूप में मुझे चौदह वर्षों तक वनवास की आज्ञा दी है।
सोऽयं वनमिदं प्राप्तो निर्जनं लक्ष्मणान्वितः।
सीतया चाप्रतिद्वन्द्वः सत्यवादे स्थितः पितुः॥ ८॥
‘यही कारण है कि मैं सीता और लक्ष्मण के साथ इस निर्जन वन में चला आया हूँ। यहाँ मेरा कोई प्रतिद्वन्द्वी नहीं है। मैं यहाँ पिताजी के सत्य की रक्षा में स्थित रहूँगा॥
भवानपि तथेत्येव पितरं सत्यवादिनम्।
कर्तुमर्हसि राजेन्द्र क्षिप्रमेवाभिषिञ्चनात्॥९॥
‘राजेन्द्र ! तुम भी उनकी आज्ञा मानकर शीघ्र ही राज्य पद पर अपना अभिषेक करा लो और पिता को सत्यवादी बनाओ—यही तुम्हारे लिये उचित है॥९॥
ऋणान्मोचय राजानं मत्कृते भरत प्रभुम्।
पितरं त्राहि धर्मज्ञ मातरं चाभिनन्दय॥१०॥
‘धर्मज्ञ भरत! तुम मेरे लिये पूज्य पिता राजा दशरथ को कैकेयी के ऋण से मुक्त करो, उन्हें नरक में गिरने से बचाओ और माता का भी आनन्द बढ़ाओ॥ १०॥
श्रूयते धीमता तात श्रुतिर्गीता यशस्विना।
गयेन यजमानेन गयेष्वेव पितॄन् प्रति॥११॥
‘तात! सुना जाता है कि बुद्धिमान्, यशस्वी राजा गयने गय-देश में ही यज्ञ करते हुए पितरों के प्रति एक कहावत कही थी॥ ११॥
पुन्नाम्नो नरकाद् यस्मात् पितरं त्रायते सुतः।
तस्मात् पुत्र इति प्रोक्तः पितॄन् यः पाति सर्वतः॥ १२॥
‘(वह इस प्रकार है-) बेटा पुत् नामक नरक से पिता का उद्धार करता है, इसलिये वह पुत्र कहा गया है। वही पुत्र है, जो पितरों की सब ओर से रक्षा करता
एष्टव्या बहवः पुत्रा गुणवन्तो बहुश्रुताः।
तेषां वै समवेतानामपि कश्चिद् गयां व्रजेत्॥ १३॥
‘बहुत-से गुणवान् और बहुश्रुत पुत्रों की इच्छा करनी चाहिये। सम्भव है कि प्राप्त हुए उन पुत्रों में से कोई एक भी गया की यात्रा करे ? ॥ १३॥
एवं राजर्षयः सर्वे प्रतीता रघुनन्दन।
तस्मात् त्राहि नरश्रेष्ठ पितरं नरकात् प्रभो॥१४॥
‘रघुनन्दन! नरश्रेष्ठ भरत! इस प्रकार सभी राजर्षियों ने पितरों के उद्धार का निश्चय किया है, अतः प्रभो! तुम भी अपने पिता का नरक से उद्धार करो॥ १४॥
अयोध्यां गच्छ भरत प्रकृतीरुपरञ्जय।
शत्रुघ्नसहितो वीर सह सर्वैर्द्विजातिभिः॥१५॥
‘वीर भरत! तुम शत्रुघ्न तथा समस्त ब्राह्मणों को साथ लेकर अयोध्या को लौट जाओ और प्रजा को सुख दो॥
प्रवेक्ष्ये दण्डकारण्यमहमप्यविलम्बयन्।
आभ्यां तु सहितो वीर वैदेह्या लक्ष्मणेन च॥
‘वीर! अब मैं भी लक्ष्मण और सीता के साथ शीघ्र ही दण्डकारण्य में प्रवेश करूँगा॥१६॥
त्वं राजा भरत भव स्वयं नराणां वन्यानामहमपि राजराण्मृगाणाम्।
गच्छ त्वं पुरवरमद्य सम्प्रहृष्टः संहृष्टस्त्वहमपि दण्डकान् प्रवेक्ष्ये॥१७॥
‘भरत! तुम स्वयं मनुष्यों के राजा बनो और मैं जंगली पशुओं का सम्राट बनूँगा। अब तुम अत्यन्त हर्षपूर्वक श्रेष्ठ नगर अयोध्या को जाओ और मैं भी प्रसन्नतापूर्वक दण्डक-वन में प्रवेश करूँगा॥ १७ ॥
छायां ते दिनकरभाः प्रबाधमानं वर्षत्रं भरत करोतु मूर्ध्नि शीताम्।
एतेषामहमपि काननद्रुमाणां छायां तामतिशयिनीं शनैः श्रयिष्ये॥१८॥
‘भरत ! सूर्य की प्रभा को तिरोहित कर देने वाला छत्र तुम्हारे मस्तक पर शीतल छाया करे। अब मैं भी धीरे-धीरे इन जंगली वृक्षों की घनी छाया का आश्रय लूँगा। १८॥
शत्रुघ्नस्त्वतुलमतिस्तु ते सहायः सौमित्रिर्मम विदितः प्रधानमित्रम्।
चत्वारस्तनयवरा वयं नरेन्द्र सत्यस्थं भरत चराम मा विषीद॥१९॥
‘भरत! अतुलित बुद्धिवाले शत्रुघ्न तुम्हारी सहायता में रहें और सुविख्यात सुमित्राकुमार लक्ष्मण मेरे प्रधान मित्र (सहायक) हैं; हम चारों पुत्र अपने पिता राजा दशरथ के सत्य की रक्षा करें। तुम विषाद मत करो’ ॥ १९॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्ताधिकशततमः सर्गः॥ १०७॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में एक सौ सातवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०७॥
सर्ग-108
आश्वासयन्तं भरतं जाबालिब्राह्मणोत्तमः।
उवाच रामं धर्मज्ञं धर्मापेतमिदं वचः॥१॥
जब धर्मज्ञ श्रीरामचन्द्रजी भरत को इस प्रकार समझा-बुझा रहे थे, उसी समय ब्राह्मणशिरोमणि जाबालि ने उनसे यह धर्मविरुद्ध वचन कहा— ॥१॥
साधु राघव मा भूत् ते बुद्धिरेवं निरर्थिका।
प्राकृतस्य नरस्येव ह्यार्यबुद्धेस्तपस्विनः॥२॥
‘रघुनन्दन! आपने ठीक कहा, परंतु आप श्रेष्ठ बुद्धिवाले और तपस्वी हैं; अतः आपको गँवार मनुष्य की तरह ऐसा निरर्थक विचार मन में नहीं लाना चाहिये॥२॥
कः कस्य पुरुषो बन्धुः किमाप्यं कस्य केनचित्।
एको हि जायते जन्तुरेक एव विनश्यति॥३॥
‘संसार में कौन पुरुष किसका बन्धु है और किससे किसको क्या पाना है? जीव अकेला ही जन्म लेता और अकेला ही नष्ट हो जाता है॥३॥
तस्मान्माता पिता चेति राम सज्जेत यो नरः।
उन्मत्त इव स ज्ञेयो नास्ति कश्चिद्धि कस्यचित्॥ ४॥
‘अतः श्रीराम! जो मनुष्य माता या पिता समझकर किसी के प्रति आसक्त होता है, उसे पागल के समान समझना चाहिये; क्योंकि यहाँ कोई किसी का कुछ भी नहीं है॥ ४॥
यथा ग्रामान्तरं गच्छन् नरः कश्चिद् बहिर्वसेत्।
उत्सृज्य च तमावासं प्रतिष्ठेतापरेऽहनि॥५॥
एवमेव मनुष्याणां पिता माता गृहं वसु।
आवासमात्रं काकुत्स्थ सज्जन्ते नात्र सज्जनाः॥
‘जैसे कोई मनुष्य दूसरे गाँव को जाते समय बाहर किसी धर्मशाला में एक रात के लिये ठहर जाता हैऔर दूसरे दिन उस स्थान को छोड़कर आगे के लिये प्रस्थित हो जाता है, इसी प्रकार पिता, माता, घर और धन—ये मनुष्यों के आवास मात्र हैं। ककुत्स्थकुलभूषण ! इनमें सज्जन पुरुष आसक्त नहीं होते हैं॥६॥
पित्र्यं राज्यं समुत्सृज्य स नार्हसि नरोत्तम।
आस्थातुं कापथं दुःखं विषमं बहुकण्टकम्॥ ७॥
‘अतः नरश्रेष्ठ! आपको पिता का राज्य छोड़कर इस दुःखमय, नीचे-ऊँचे तथा बहुकण्टकाकीर्ण वन के कुत्सित मार्ग पर नहीं चलना चाहिये॥ ७॥
समृद्धायामयोध्यायामात्मानमभिषेचय।
एकवेणीधरा हि त्वा नगरी सम्प्रतीक्षते॥८॥
“आप समृद्धिशालिनी अयोध्या में राजा के पद पर अपना अभिषेक कराइये। वह नगरी प्रोषितभर्तृ का नारी की भाँति एक वेणी धारण करके आपकी प्रतीक्षा करती है॥८॥
राजभोगाननुभवन् महार्हान् पार्थिवात्मज।
विहर त्वमयोध्यायां यथा शक्रस्त्रिविष्टपे॥९॥
‘राजकुमार ! जैसे देवराज इन्द्र स्वर्ग में विहार करते हैं, उसी प्रकार आप बहुमूल्य राजभोगों का उपभोग करते हुए अयोध्या विहार कीजिये॥९॥
न ते कश्चिद् दशरथस्त्वं च तस्य च कश्चन।
अन्यो राजा त्वमन्यस्तु तस्मात् कुरु यदुच्यते॥ १०॥
‘राजा दशरथ आपके कोई नहीं थे और आप भी उनके कोई नहीं हैं। राजा दूसरे थे और आप भी दूसरे हैं; इसलिये मैं जो कहता हूँ, वही कीजिये॥१०॥
बीजमात्रं पिता जन्तोः शुक्रं शोणितमेव च।
संयुक्तमृतुमन्मात्रा पुरुषस्येह जन्म तत्॥११॥
‘पिता जीव के जन्म में निमित्त कारण मात्र होता है। वास्तव में ऋतुमती माता के द्वारा गर्भ धारण किये हुए वीर्य और रज का परस्पर संयोग होने पर ही पुरुष का यहाँ जन्म होता है॥ ११॥
गतः स नृपतिस्तत्र गन्तव्यं यत्र तेन वै।
प्रवृत्तिरेषा भूतानां त्वं तु मिथ्या विहन्यसे ॥१२॥
‘राजा को जहाँ जाना था, वहाँ चले गये। यह प्राणियों के लिये स्वाभाविक स्थिति है। आप तो व्यर्थ ही मारे जाते (कष्ट उठाते) हैं।॥ १२ ॥
अर्थधर्मपरा ये ये तांस्तान् शोचामि नेतरान्।
ते हि दुःखमिह प्राप्य विनाशं प्रेत्य लेभिरे॥ १३॥
‘जो-जो मनुष्य प्राप्त हुए अर्थ का परित्याग करके धर्मपरायण हुए हैं, उन्हीं-उन्हीं के लिये मैं शोक करता हूँ, दूसरों के लिये नहीं। वे इस जगत् में धर्म के नाम पर केवल दुःख भोगकर मृत्यु के पश्चात् नष्ट हो गये हैं।
अष्टकापितृदेवत्यमित्ययं प्रसृतो जनः।
अन्नस्योपद्रवं पश्य मृतो हि किमशिष्यति॥ १४॥
‘अष्ट का आदि जितने श्राद्ध हैं, उनके देवता पितर हैं श्राद्ध का दान पितरों को मिलता है। यही सोचकर लोग श्राद्ध में प्रवृत्त होते हैं; किन्तु विचार करके देखिये तो इसमें अन्न का नाश ही होता है। भला, मरा हुआ मनुष्य क्या खायेगा॥१४ ।।
यदि भुक्तमिहान्येन देहमन्यस्य गच्छति।
दद्यात् प्रवसतां श्राद्धं न तत् पथ्यशनं भवेत्॥ १५॥
‘यदि यहाँ दूसरे का खाया हुआ अन्न दूसरे के शरीर में चला जाता हो तो परदेश में जाने वालों के लिये श्राद्ध ही कर देना चाहिये; उनको रास्ते के लिये भोजन देना उचित नहीं है।॥ १५॥
दानसंवनना ह्येते ग्रन्था मेधाविभिः कृताः।
यजस्व देहि दीक्षस्व तपस्तप्यस्व संत्यज॥१६॥
‘देवताओं के लिये यज्ञ और पूजन करो, दान दो, यज्ञ की दीक्षा ग्रहण करो, तपस्या करो और घर-द्वार छोड़कर संन्यासी बन जाओ इत्यादि बातें बताने वाले ग्रन्थ बुद्धिमान् मनुष्यों ने दान की ओर लोगों की प्रवृत्ति कराने के लिये ही बनाये हैं॥ १६ ॥
स नास्ति परमित्येतत् कुरु बुद्धिं महामते।
प्रत्यक्षं यत् तदातिष्ठ परोक्षं पृष्ठतः कुरु॥१७॥
‘अतः महामते! आप अपने मन में यह निश्चय कीजिये कि इस लोक के सिवा कोई दूसरा लोक नहीं है (अतः वहाँ फल भोगने के लिये धर्म आदि के पालन की आवश्यकता नहीं है)। जो प्रत्यक्ष राज्यलाभ है, उसका आश्रय लीजिये, परोक्ष (पारलौकिक लाभ) को पीछे ढकेल दीजिये॥१७॥
सतां बुद्धिं पुरस्कृत्य सर्वलोकनिदर्शिनीम्।
राज्यं स त्वं निगृह्णीष्व भरतेन प्रसादितः॥ १८॥
‘सत्पुरुषों की बुद्धि, जो सब लोगों के लिये राह दिखाने वाली होने के कारण प्रमाणभूत है, आगे करके भरत के अनुरोध से आप अयोध्या का राज्य ग्रहण कीजिये’ ॥ १८॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टाधिकशततमः सर्गः॥ १०८॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में एक सौ आठवाँ सर्ग पूराहुआ॥ १०८॥
सर्ग-109
जाबालेस्तु वचः श्रुत्वा रामः सत्यपराक्रमः।
उवाच परया सूक्त्या बुद्ध्याविप्रतिपन्नया॥१॥
जाबालि का यह वचन सुनकर सत्यपराक्रमी श्रीरामचन्द्रजी ने अपनी संशयरहित बुद्धि के द्वारा श्रुतिसम्मत सदुक्ति का आश्रय लेकर कहा- ॥१॥
भवान् मे प्रियकामार्थं वचनं यदिहोक्तवान्।
अकार्यं कार्यसंकाशमपथ्यं पथ्य संनिभम्॥२॥
‘विप्रवर! आपने मेरा प्रिय करने की इच्छा से यहाँ जो बात कही है, वह कर्तव्य-सी दिखायी देती है; किंतु वास्तव में करने योग्य नहीं है। वह पथ्य-सी दीखने पर भी वास्तव में अपथ्य है॥२॥
निर्मर्यादस्तु पुरुषः पापाचारसमन्वितः।
मानं न लभते सत्सु भिन्नचारित्रदर्शनः॥३॥
‘जो पुरुष धर्म अथवा वेद की मर्यादा को त्याग देता है, वह पापकर्म में प्रवृत्त हो जाता है। उसके आचार और विचार दोनों भ्रष्ट हो जाते हैं; इसलिये वह सत्पुरुषों में कभी सम्मान नहीं पाता है॥३॥
कुलीनमकुलीनं वा वीरं पुरुषमानिनम्।
चारित्रमेव व्याख्याति शुचिं वा यदि वाशुचिम्॥ ४॥
‘आचार ही यह बताता है कि कौन पुरुष उत्तम कुल में उत्पन्न हुआ है और कौन अधम कुल में, कौन वीर है और कौन व्यर्थ ही अपने को पुरुष मानता है तथा कौन पवित्र है और कौन अपवित्र?॥ ४॥
अनार्यस्त्वार्य संस्थानः शौचाद्धीनस्तथा शुचिः।
लक्षण्यवदलक्षण्यो दुःशीलः शीलवानिव॥५॥
‘आपने जो आचार बताया है, उसे अपनाने वाला पुरुष श्रेष्ठ-सा दिखायी देने पर भी वास्तव में अनार्य होगा। बाहर से पवित्र दीखने पर भी भीतर से अपवित्र होगा। उत्तम लक्षणों से युक्त-सा प्रतीत होने पर भी वास्तव में उसके विपरीत होगा तथा शीलवान्-सा दीखने पर भी वस्तुतः वह दुःशील ही होगा॥ ५॥
अधर्मं धर्मवेषेण यद्यहं लोकसंकरम्।
अभिपत्स्ये शुभं हित्वा क्रियां विधिविवर्जिताम्॥ ६॥
कश्चेतयानः पुरुषः कार्याकार्यविचक्षणः।
बहु मन्येत मां लोके दुर्वृत्तं लोकदूषणम्॥७॥
‘आपका उपदेश चोला तो धर्म का पहने हुए है, किंतु वास्तव में अधर्म है। इससे संसार में वर्ण संकरता का प्रचार होगा। यदि मैं इसे स्वीकार करके वेदोक्त शुभकर्मों का अनुष्ठान छोड़ दूँ और विधिहीन कर्मों में लग जाऊँ तो कर्तव्य-अकर्तव्य का ज्ञान रखने वाला कौन समझदार मनुष्य मुझे श्रेष्ठ समझकर आदर देगा? उस दशा में तो मैं इस जगत् में दुराचारी तथा लोक को कलङ्कित करने वाला समझा जाऊँगा। ६-७॥
कस्य यास्याम्यहं वृत्तं केन वा स्वर्गमाप्नुयाम्।
अनया वर्तमानोऽहं वृत्त्या हीनप्रतिज्ञया॥८॥
‘जहाँ अपनी की हुई प्रतिज्ञा तोड़ दी जाती है, उस वृत्ति के अनुसार बर्ताव करने पर मैं किस साधन से स्वर्गलोक प्राप्त करूँगा तथा आपने जिस आचार का उपदेश दिया है, वह किसका है, जिसका मुझे अनुसरण करना होगा; क्योंकि आपके कथनानुसार मैं पिता आदि में से किसी का कुछ भी नहीं हूँ॥८॥
कामवृत्तोऽन्वयं लोकः कृत्स्नः समुपवर्तते।
यद्धृत्ताः सन्ति राजानस्तद्वृत्ताः सन्ति हि प्रजाः ॥९॥
‘आपके बताये हुए मार्ग से चलने पर पहले तो मैं स्वेच्छाचारी हूँगा। फिर यह सारा लोक स्वेच्छाचारी हो जायगा; क्योंकि राजाओं के जैसे आचरण होते हैं, प्रजा भी वैसा ही आचरण करने लगती है।॥९॥
सत्यमेवानृशंसं च राजवृत्तं सनातनम्।
तस्मात् सत्यात्मकं राज्यं सत्ये लोकः प्रतिष्ठितः॥ १०॥
‘सत्य का पालन ही राजाओं का दयाप्रधान धर्म है – सनातन आचार है, अतः राज्य सत्यस्वरूप है। सत्य में ही सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठित है॥ १० ॥
ऋषयश्चैव देवाश्च सत्यमेव हि मेनिरे।
सत्यवादी हि लोकेऽस्मिन् परं गच्छति चाक्षयम्॥ ११॥
‘ऋषियों और देवताओं ने सदा सत्य का ही आदर किया है। इस लोक में सत्यवादी मनुष्य अक्षय परम धाम में जाता है॥ ११॥
उद्विजन्ते यथा सोन्नरादनृतवादिनः।
धर्मः सत्यपरो लोके मूलं सर्वस्य चोच्यते॥१२॥
‘झूठ बोलने वाले मनुष्य से सब लोग उसी तरह डरते हैं, जैसे साँप से संसार में सत्य ही धर्म की पराकाष्ठा है और वही सबका मूल कहा जाता है। १२॥
सत्यमेवेश्वरो लोके सत्ये धर्मः सदाश्रितः।
सत्यमूलानि सर्वाणि सत्यान्नास्ति परं पदम्॥ १३॥
‘जगत् में सत्य ही ईश्वर है। सदा सत्य के ही आधार पर धर्म की स्थिति रहती है। सत्य ही सबकी जड़ है। सत्य से बढ़कर दूसरा कोई परम पद नहीं है॥ १३॥
दत्तमिष्टं हुतं चैव तप्तानि च तपांसि च।
वेदाः सत्यप्रतिष्ठानास्तस्मात् सत्यपरो भवेत्॥ १४॥
‘दान, यज्ञ, होम, तपस्या और वेद-इन सबका आधार सत्य ही है; इसलिये सबको सत्यपरायण होना चाहिये॥१४॥
एकः पालयते लोकमेकः पालयते कुलम्।
मज्जत्येको हि निरय एकः स्वर्गे महीयते॥१५॥
‘एक मनुष्य सम्पूर्ण जगत् का पालन करता है, एक समूचे कुल का पालन करता है, एक नरक में डूबता है और एक स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होता है। १५॥
सोऽहं पितुर्निदेशं तु किमर्थं नानुपालये।
सत्यप्रतिश्रवः सत्यं सत्येन समयीकृतम्॥१६॥
‘मैं सत्यप्रतिज्ञ हूँ और सत्य की शपथ खाकर पिता के सत्य का पालन स्वीकार कर चुका हूँ, ऐसी दशा में मैं पिता के आदेश का किसलिये पालन नहीं करूँ? ॥ १६॥
नैव लोभान्न मोहाद् वा न चाज्ञानात् तमोऽन्वितः।
सेतुं सत्यस्य भेत्स्यामि गुरोः सत्यप्रतिश्रवः॥ १७॥
‘पहले सत्यपालन की प्रतिज्ञा करके अब लोभ, मोह अथवा अज्ञान से विवेकशून्य होकर मैं पिता के सत्य की मर्यादा भङ्ग नहीं करूँगा॥१७॥
असत्यसंधस्य सतश्चलस्यास्थिरचेतसः।
नैव देवा न पितरः प्रतीच्छन्तीति नः श्रुतम्॥ १८॥
‘हमने सुना है कि जो अपनी प्रतिज्ञा झूठी करने के कारण धर्म से भ्रष्ट हो जाता है, उस चञ्चल चित्तवाले पुरुष के दिये हुए हव्य-कव्य को देवता और पितर नहीं स्वीकार करते हैं।॥ १८ ॥
प्रत्यगात्ममिमं धर्मं सत्यं पश्याम्यहं ध्रुवम्।
भारः सत्पुरुषैश्चीर्णस्तदर्थमभिनन्द्यते॥१९॥
‘मैं इस सत्यरूपी धर्म को समस्त प्राणियों के लिये हितकर और सब धर्मों में श्रेष्ठ समझता हूँ। सत्पुरुषों ने जटा-वल्कल आदि के धारणरूप तापस धर्म का पालन किया है, इसलिये मैं भी उसका अभिनन्दन करता हूँ॥
क्षात्रं धर्ममहं त्यक्ष्ये ह्यधर्मं धर्मसंहितम्।
क्षुद्रैर्नृशंसैलुब्धैश्च सेवितं पापकर्मभिः ॥२०॥
‘जो धर्मयुक्त प्रतीत हो रहा है, किंतु वास्तव में अधर्म रूप है, जिसका नीच, क्रूर, लोभी और पापाचारी पुरुषों ने सेवन किया है, ऐसे क्षात्र धर्म का (पिता की आज्ञा भङ्ग करके राज्य ग्रहण करने का) मैं अवश्य त्याग करूँगा (क्योंकि वह न्याययुक्त नहीं है) ॥२०॥
कायेन कुरुते पापं मनसा सम्प्रधार्य तत्।
अनृतं जिह्वया चाह त्रिविधं कर्म पातकम्॥ २१॥
‘मनुष्य अपने शरीरसे जो पाप करता है, उसे पहले मनके द्वारा कर्तव्यरूपसे निश्चित करता है। फिर जिह्वाकी सहायतासे उस अनृत कर्म (पाप) को वाणीद्वारा दूसरोंसे कहता है, तत्पश्चात् औरोंके सहयोगसे उसे शरीरद्वारा सम्पन्न करता है। इस तरह एक ही पातक कायिक, वाचिक और मानसिक भेदसे तीन प्रकारका होता है॥ २१॥
भूमिः कीर्तिर्यशो लक्ष्मीः पुरुषं प्रार्थयन्ति हि।
सत्यं समनुवर्तन्ते सत्यमेव भजेत् ततः॥२२॥
‘पृथ्वी, कीर्ति, यश और लक्ष्मी—ये सब-की-सब सत्यवादी पुरुष को पाने की इच्छा रखती हैं और शिष्ट पुरुष सत्य का ही अनुसरण करते हैं, अतः मनुष्य को सदा सत्य का ही सेवन करना चाहिये॥ २२ ॥
श्रेष्ठं ह्यनार्यमेव स्याद् यद् भवानवधार्य माम्।
आह युक्तिकरैर्वाक्यैरिदं भद्रं कुरुष्व ह ॥ २३॥
‘आपने उचित सिद्ध करके तर्कपूर्ण वचनों के द्वारा मुझसे जो यह कहा है कि राज्य ग्रहण करने में ही कल्याण है; अतः इसे अवश्य स्वीकार करो। आपका यह आदेश श्रेष्ठ-सा प्रतीत होने पर भी सज्जन पुरुषों द्वारा आचरण में लाने योग्य नहीं है (क्योंकि इसे स्वीकार करने से सत्य और न्याय का उल्लङ्घन होता है) ॥२३॥
कथं ह्यहं प्रतिज्ञाय वनवासमिमं गुरोः।
भरतस्य करिष्यामि वचो हित्वा गुरोर्वचः॥२४॥
‘मैं पिताजी के सामने इस तरह वन में रहने की प्रतिज्ञा कर चुका हूँ। अब उनकी आज्ञा का उल्लङ्घन करके मैं भरत की बात कैसे मान लूंगा॥ २४॥
स्थिरा मया प्रतिज्ञाता प्रतिज्ञा गुरुसंनिधौ।
प्रहृष्टमानसा देवी कैकेयी चाभवत् तदा॥ २५॥
‘गुरु के समीप की हुई मेरी वह प्रतिज्ञा अटल है। किसी तरह तोड़ी नहीं जा सकती। उस समय जबकि मैंने प्रतिज्ञा की थी, देवी कैकेयी का हृदय हर्ष से खिल उठा था॥ २५॥
वनवासं वसन्नेव शुचिनियतभोजनः।
मूलपुष्पफलैः पुण्यैः पितॄन् देवांश्च तर्पयन्॥ २६॥
‘मैं वन में ही रहकर बाहर-भीतर से पवित्र हो नियमित भोजन करूँगा और पवित्र फल, मूल एवं पुष्पों द्वारा देवताओं और पितरों को तृप्त करता हुआ प्रतिज्ञा का पालन करूँगा॥ २६॥
संतुष्टपञ्चवर्गोऽहं लोकयात्रां प्रवाहये।
अकुहः श्रद्दधानः सन् कार्याकार्यविचक्षणः॥ २७॥
‘क्या करना चाहिये और क्या नहीं, इसका निश्चय मैं कर चुका हूँ। अतः फल-मूल आदि से पाँचों इन्द्रियों को संतुष्ट करके निश्छल, श्रद्धापूर्वक लोकयात्रा (पिता की आज्ञा के पालनरूप व्यवहार) का निर्वाह करूँगा॥ २७॥
कर्मभूमिमिमां प्राप्य कर्तव्यं कर्म यच्छुभम्।
अग्निर्वायुश्च सोमश्च कर्मणां फलभागिनः॥ २८॥
‘इस कर्मभूमि को पाकर जो शुभ कर्म हो, उसका अनुष्ठान करना चाहिये; क्योंकि अग्नि, वायु तथा सोम भी कर्मो के ही फल से उन-उन पदों के भागी हुए
शतं क्रतूनामाहृत्य देवराट् त्रिदिवं गतः।
तपांस्युग्राणि चास्थाय दिवं प्राप्ता महर्षयः॥ २९॥
‘देवराज इन्द्र सौ यज्ञों का अनुष्ठान करके स्वर्गलोक को प्राप्त हुए हैं। महर्षियों ने भी उग्र तपस्या करके दिव्य लोकों में स्थान प्राप्त किया है’ ॥ २९॥
अमृष्यमाणः पुनरुग्रतेजा निशम्य तन्नास्तिकवाक्यहेतुम्।
अथाब्रवीत् तं नृपतेस्तनूजो विगर्हमाणो वचनानि तस्य॥३०॥
उग्र तेजस्वी राजकुमार श्रीराम परलोक की सत्ता का खण्डन करने वाले जाबालि के पूर्वोक्त वचनों को सुनकर उन्हें सहन न कर सकने के कारण उन वचनों की निन्दा करते हुए पुनः उनसे बोले- ॥३०॥
सत्यं च धर्मं च पराक्रमं च भूतानुकम्पां प्रियवादितां च।
द्विजातिदेवातिथिपूजनं च पन्थानमाहुस्त्रिदिवस्य सन्तः॥ ३१॥
‘सत्य, धर्म, पराक्रम, समस्त प्राणियों पर दया, सबसे प्रिय वचन बोलना तथा देवताओं, अतिथियों और ब्राह्मणों की पूजा करना—इन सबको साधु पुरुषों ने स्वर्गलोक का मार्ग बताया है॥३१॥
तेनैवमाज्ञाय यथावदर्थमेकोदयं सम्प्रतिपद्य विप्राः।
धर्मं चरन्तः सकलं यथावत् कांक्षन्ति लोकागममप्रमत्ताः॥ ३२॥
‘सत्पुरुषों के इस वचन के अनुसार धर्म का स्वरूप जानकर तथा अनुकूल तर्क से उसका यथार्थ निर्णय करके एक निश्चय पर पहुँचे हुए सावधान ब्राह्मण भलीभाँति धर्माचरण करते हुए उन-उन उत्तम लोकों को प्राप्त करना चाहते हैं॥ ३२॥
निन्दाम्यहं कर्म कृतं पितुस्तद् यस्त्वामगृह्णाद् विषमस्थबुद्धिम्।
बुद्ध्यानयैवंविधया चरन्तं सुनास्तिकं धर्मपथादपेतम्॥३३॥
‘आपकी बुद्धि विषम-मार् गमें स्थित है—आपने वेद-विरुद्ध मार्ग का आश्रय ले रखा है। आप घोर नास्तिक और धर्म के रास्ते से कोसों दूर हैं। ऐसी पाखण्डमयी बुद्धि के द्वारा अनुचित विचार का प्रचार करने वाले आपको मेरे पिताजी ने जो अपना याजक बना लिया, उनके इस कार्य की मैं निन्दा करता हूँ। ३३॥
यथा हि चोरः स तथा हि बुद्धस्तथागतं नास्तिकमत्र विद्धि।
तस्माद्धि यः शक्यतमः प्रजानां स नास्तिके नाभिमुखो बुधः स्यात्॥ ३४॥
‘जैसे चोर दण्डनीय होता है, उसी प्रकार (वेदविरोधी) बुद्ध (बौद्धमतावलम्बी) भी दण्डनीय है तथागत (नास्तिकविशेष) और नास्तिक (चार्वाक्) को भी यहाँ इसी कोटि में समझना चाहिये। इसलिये प्रजा पर अनुग्रह करने के लिये राजा द्वारा जिस नास्तिक को दण्ड दिलाया जा सके, उसे तो चोर के समान दण्ड दिलाया ही जाय; परंतु जो वश के बाहर हो, उस नास्तिक के प्रति विद्वान् ब्राह्मण कभी उन्मुख न हो-उससे वार्तालाप तक न करे॥ ३४॥
त्वत्तो जनाः पूर्वतरे द्विजाश्च शुभानि कर्माणि बहूनि चक्रुः।
छित्त्वा सदेमं च परं च लोकं तस्माद् द्विजाः स्वस्ति कृतं हुतं च ॥ ३५॥
‘आपके सिवा पहले के श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने इहलोक और परलोक की फल-कामना का परित्याग करके वेदोक्त धर्म समझकर सदा ही बहुत-से शुभकर्मो का अनुष्ठान किया है। अतः जो भी ब्राह्मण हैं, वे वेदों को ही प्रमाण मानकर स्वस्ति (अहिंसा और सत्य आदि), कृत (तप, दान और परोपकार आदि) तथा हुत (यज्ञ-याग आदि) कर्मों का सम्पादन करते हैं। ३५॥
धर्मे रताः सत्पुरुषैः समेतास्तेजस्विनो दानगुणप्रधानाः।
अहिंसका वीतमलाश्च लोके भवन्ति पूज्या मुनयः प्रधानाः॥३६॥
‘जो धर्म में तत्पर रहते हैं, सत्पुरुषों का साथ करते हैं, तेज से सम्पन्न हैं, जिनमें दानरूपी गुण की प्रधानता है, जो कभी किसी प्राणी की हिंसा नहीं करते तथा जो मलसंसर्ग से रहित हैं, ऐसे श्रेष्ठ मुनि ही संसार में पूजनीय होते हैं’। ३६ ।।
इति ब्रुवन्तं वचनं सरोषं रामं महात्मानमदीनसत्त्वम्।
उवाच पथ्यं पुनरास्तिकं च सत्यं वचः सानुनयं च विप्रः॥३७॥
महात्मा श्रीराम स्वभाव से ही दैन्यभाव से रहित थे। उन्होंने जब रोष पूर्वक पूर्वोक्त बात कही, तब ब्राह्मण जाबालि ने विनयपूर्वक यह आस्तिकतापूर्ण सत्य एवं हितकर वचन कहा- ॥ ३७॥
न नास्तिकानां वचनं ब्रवीम्यहं न नास्तिकोऽहं न च नास्ति किंचन।
समीक्ष्य कालं पनरास्तिकोऽभवं भवेय काले पुनरेव नास्तिकः॥ ३८॥
‘रघुनन्दन! न तो मैं नास्तिक हूँ और न नास्तिकों की बात ही करता हूँ। परलोक आदि कुछ भी नहीं है, ऐसा मेरा मत नहीं है। मैं अवसर देखकर फिर आस्तिक हो गया और लौकिक व्यवहार के समय आवश्यकता होने पर पुनः नास्तिक हो सकता हूँ-नास्तिकों की-सी बातें कर सकता हूँ॥ ३८॥
स चापि कालोऽयमुपागतः शनैर्यथा मया नास्तिकवागुदीरिता।
निवर्तनार्थं तव राम कारणात् प्रसादनार्थं च मयैतदीरितम्॥३९॥
‘इस समय ऐसा अवसर आ गया था, जिससे मैंने धीरे-धीरे नास्तिकों की-सी बातें कह डालीं। श्रीराम ! मैंने जो यह बात कही, इसमें मेरा उद्देश्य यही था कि किसी तरह आपको राजी करके अयोध्या लौटने के लिये तैयार कर लूँ’॥ ३९॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे नवाधिकशततमः सर्गः॥ १०९॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में एक सौ नौवाँ सर्ग पूरा हुआ॥१०९॥
सर्ग-110
क्रुद्धमाज्ञाय रामं तु वसिष्ठः प्रत्युवाच ह।
जाबालिरपि जानीते लोकस्यास्य गतागतिम्॥
श्रीरामचन्द्रजी को रुष्ट जानकर महर्षि वसिष्ठजी ने उनसे कहा—’रघुनन्दन ! महर्षि जाबालि भी यह जानते हैं कि इस लोक के प्राणियों का परलोक में जाना और आना होता रहता है (अतः ये नास्तिक नहीं हैं)॥१॥
निवर्तयितुकामस्तु त्वामेतद् वाक्यमब्रवीत्।
इमां लोकसमुत्पत्तिं लोकनाथ निबोध मे॥२॥
‘जगदीश्वर ! इस समय तुम्हें लौटाने की इच्छा से ही इन्होंने यह नास्तिकतापूर्ण बात कही थी। तुम मुझसे इस लोक की उत्पत्ति का वृत्तान्त सुनो॥२॥
सर्वं सलिलमेवासीत् पृथिवी तत्र निर्मिता।
ततः समभवद् ब्रह्मा स्वयंभूर्दैवतैः सह ॥३॥
‘सृष्टि के प्रारम्भकाल में सब कुछ जलमय ही था। उस जल के भीतर ही पृथ्वी का निर्माण हुआ। तदनन्तर देवताओं के साथ स्वयंभू ब्रह्मा प्रकट हुए।
स वराहस्ततो भूत्वा प्रोज्जहार वसुंधराम्।
असृजच्च जगत् सर्वं सह पुत्रैः कृतात्मभिः॥४॥
‘इसके बाद उन भगवान् विष्णु स्वरूप ब्रह्मा ने ही वराह रूप से प्रकट होकर जल के भीतर से इस पृथ्वी को निकाला और अपने कृतात्मा पुत्रों के साथ इस सम्पूर्ण जगत् की सृष्टि की॥४॥
आकाशप्रभवो ब्रह्मा शाश्वतो नित्य अव्ययः।
तस्मान्मरीचिः संजज्ञे मरीचेः कश्यपः सुतः॥५॥
‘आकाश स्वरूप परब्रह्म परमात्मा से ब्रह्माजी का प्रादुर्भाव हुआ है, जो नित्य, सनातन एवं अविनाशी हैं। उनसे मरीचि उत्पन्न हुए और मरीचि के पुत्र कश्यप हुए।
विवस्वान् कश्यपाज्जज्ञे मनुर्वैवस्वतः स्वयम्।
स तु प्रजापतिः पूर्वमिक्ष्वाकुस्तु मनोः सुतः॥६॥
‘कश्यप से विवस्वान् का जन्म हुआ। विवस्वान् के पुत्र साक्षात् वैवस्वत मनु हुए, जो पहले प्रजापति थे। मनु के पुत्र इक्ष्वाकु हुए॥६॥
यस्येयं प्रथमं दत्ता समृद्धा मनुना मही।
तमिक्ष्वाकुमयोध्यायां राजानं विद्धि पूर्वकम्॥
जिन्हें मनु ने सबसे पहले इस पृथ्वी का समृद्धिशाली राज्य सौंपा था, उन राजा इक्ष्वाकु को तुम अयोध्या का प्रथम राजा समझो॥७॥
इक्ष्वाकोस्तु सुतः श्रीमान् कुक्षिरित्येव विश्रुतः।
कुक्षेरथात्मजो वीरो विकुक्षिरुदपद्यत॥८॥
‘इक्ष्वाकु के पुत्र श्रीमान् कुक्षि के नाम से विख्यात हुए। कुक्षि के वीर पुत्र विकुक्षि हुए॥ ८॥
विकुक्षेस्तु महातेजाः बाणः पुत्रः प्रतापवान्।
बाणस्य च महाबाहुरनरण्यो महातपाः॥९॥
‘विकुक्षि के महातेजस्वी प्रतापी पुत्र बाण हुए। बाण के महाबाहु पुत्र अनरण्य हुए, जो बड़े भारी तपस्वी थे॥
नानावृष्टिर्बभूवास्मिन् न दुर्भिक्षः सतां वरे।
अनरण्ये महाराजे तस्करो वापि कश्चन॥१०॥
‘सत्पुरुषों में श्रेष्ठ महाराज अनरण्य के राज्य में कभी अनावृष्टि नहीं हुई, अकाल नहीं पड़ा और कोई चोर भी नहीं उत्पन्न हुआ॥१०॥
अनरण्यान्महाराज पृथू राजा बभूव ह।
तस्मात् पृथोर्महातेजास्त्रिशङ्करुदपद्यत॥११॥
‘महाराज! अनरण्यसे राजा पृथु हुए। उन पृथु से महातेजस्वी त्रिशंकु की उत्पत्ति हुई॥ ११ ॥
स सत्यवचनाद् वीरः सशरीरो दिवं गतः।
त्रिशङ्कोरभवत् सूनुधुन्धुमारो महायशाः॥१२॥
‘वे वीर त्रिशंकु विश्वामित्र के सत्य वचन के प्रभाव से सदेह स्वर्गलोक को चले गये थे। त्रिशंकु के महायशस्वी धुन्धुमार हुए॥ १२ ॥
धुन्धुमारान्महातेजा युवनाश्वो व्यजायत।
युवनाश्वसुतः श्रीमान् मान्धाता समपद्यत॥१३॥
‘धुन्धुमार से महातेजस्वी युवनाश्व का जन्म हुआ। युवनाश्व के पुत्र श्रीमान् मान्धाता हुए॥ १३ ॥
मान्धातुस्तु महातेजाः सुसंधिरुदपद्यत।
सुसंधेरपि पुत्रौ द्वौ ध्रुवसंधिः प्रसेनजित्॥१४॥
‘मान्धाता के महान् तेजस्वी पुत्र सुसंधि हुए। सुसंधि के दो पुत्र हुए-ध्रुवसंधि और प्रसेनजित्॥ १४॥
यशस्वी ध्रुवसंधेस्तु भरतो रिपुसूदनः।
भरतात् तु महाबाहोरसितो नाम जायत॥१५॥
‘ध्रुवसंधि के यशस्वी पुत्र शत्रुसूदन भरत थे। महाबाहु भरत से असित नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। १५॥
यस्यैते प्रतिराजान उदपद्यन्त शत्रवः।
हैहयास्तालजङ्घाश्च शूराश्च शशबिन्दवः॥
‘जिसके शत्रुभूत प्रतिपक्षी राजा ये हैहय, तालजंघ और शूर शशबिन्दु उत्पन्न हुए थे॥ १६ ॥
तांस्तु सर्वान् प्रतिव्यूह्य युद्धे राजा प्रवासितः।
स च शैलवरे रम्ये बभूवाभिरतो मुनिः॥१७॥
‘उन सबका सामना करने के लिये सेना का व्यूह बनाकर युद्ध के लिये डटे रहने पर भी शत्रुओं की संख्या अधिक होने के कारण राजा असित को हारकर परदेश की शरण लेनी पड़ी। वे रमणीय शैल-शिखर पर प्रसन्नतापूर्वक रहकर मुनिभाव से परमात्मा का मन नचिन्तन करने लगे।
ढे चास्य भार्ये गर्भिण्यौ बभूवतुरिति श्रुतिः।
तत्र चैका महाभागा भार्गवं देववर्चसम्॥१८॥
ववन्दे पद्मपत्राक्षी कांक्षिणी पुत्रमुत्तमम्।
एका गर्भविनाशाय सपत्न्यै गरलं ददौ॥१९॥
“सुना जाता है कि असित की दो पत्नियाँ गर्भवती थीं। उनमें से एक महाभागा कमललोचना राजपत्नी नेउत्तम पुत्र पाने की अभिलाषा रखकर देवतुल्य तेजस्वी भृगुवंशीच्यवन मुनि के चरणों में वन्दना की और दूसरी रानी ने अपनी सौत के गर्भ का विनाश करने के लिये उसे जहर दे दिया।
भार्गवश्च्यवनो नाम हिमवन्तमुपाश्रितः।
तमृषिं साभ्युपागम्य कालिन्दी त्वभ्यवादयत्॥ २०॥
‘उन दिनों भृगुवंशी च्यवन मुनि हिमालय पर रहते थे। राजा असित की कालिन्दी नामवाली पत्नी ने ऋषि के चरणों में पहुँचकर उन्हें प्रणाम किया॥ २० ॥
स तामभ्यवदत् प्रीतो वरेप्सुं पुत्रजन्मनि।
पुत्रस्ते भविता देवि महात्मा लोकविश्रुतः॥ २१॥
धार्मिकश्च सुभीमश्च वंशकर्तारिसूदनः।
‘मुनि ने प्रसन्न होकर पुत्र की उत्पत्ति के लिये वरदान चाहने वाली रानी से इस प्रकार कहा—’देवि! तुम्हें एक महामनस्वी लोकविख्यात पुत्र प्राप्त होगा, जो धर्मात्मा, शत्रुओं के लिये अत्यन्त भयंकर, अपने वंश को चलाने वाला और शत्रुओं का संहारक होगा’। २१ १/२॥
श्रुत्वा प्रदक्षिणं कृत्वा मुनिं तमनुमान्य च॥२२॥
पद्मपत्रसमानाक्षं पद्मगर्भसमप्रभम्।
ततः सा गृहमागम्य पत्नी पुत्रमजायत ॥२३॥
‘यह सुनकर रानी ने मुनि की परिक्रमा की और उनसे विदा लेकर वहाँ से अपने घर आने पर उस रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसकी कान्ति कमल के भीतरी भाग के समान सुन्दर थी और नेत्र कमलदल के समान मनोहर थे॥ २२-२३॥
सपत्न्या तु गरस्तस्यै दत्तो गर्भजिघांसया।
गरेण सह तेनैव तस्मात् स सगरोऽभवत्॥२४॥
‘सौत ने उसके गर्भ को नष्ट करने के लिये जो गर (विष) दिया था, उस गर के साथ ही वह बालक प्रकट हुआ; इसलिये सगर नाम से प्रसिद्ध हुआ॥ २४॥
स राजा सगरो नाम यः समुद्रमखानयत्।
इष्ट्वा पर्वणि वेगेन त्रासयान इमाः प्रजाः॥२५॥
‘राजा सगर वे ही हैं, जिन्होंने पर्व के दिन यज्ञ की दीक्षा ग्रहण करके खुदाई के वेग से इन समस्त प्रजाओं को भयभीत करते हुए अपने पुत्रों द्वारा समुद्र को खुदवाया था॥ २५ ॥
असमञ्जस्तु पुत्रोऽभूत् सगरस्येति नः श्रुतम्।
जीवन्नेव स पित्रा तु निरस्तः पापकर्मकृत्॥ २६॥
‘हमारे सुनने में आया है कि सगर के पुत्र असमञ्ज हुए, जिन्हें पापकर्म में प्रवृत्त होने के कारण पिताने जीते-जी ही राज्य से निकाल दिया था॥ २६ ॥
अंशुमानपि पुत्रोऽभूदसमञ्जस्य वीर्यवान्।
दिलीपोंऽशुमतः पुत्रो दिलीपस्य भगीरथः॥ २७॥
‘असमञ्ज के पुत्र अंशुमान् हुए, जो बड़े पराक्रमी थे। अंशुमान् के दिलीप और दिलीप के पुत्र भगीरथ हुए।॥ २७॥
भगीरथात् ककुत्स्थश्च काकुत्स्था येन तु स्मृताः।
ककुत्स्थस्य तु पुत्रोऽभूद् रघुर्येन तु राघवाः॥ २८॥
‘भगीरथ से ककुत्स्थ का जन्म हुआ, जिनसे उनके वंशवाले ‘काकुत्स्थ’ कहलाते हैं। ककुत्स्थ के पुत्र रघु हुए, जिनसे उस वंश के लोग ‘राघव’ कहलाये। २८॥
रघोस्तु पुत्रस्तेजस्वी प्रवृद्धः पुरुषादकः।
कल्माषपादः सौदास इत्येवं प्रथितो भवि॥२९॥
‘रघु के तेजस्वी पुत्र कल्माषपाद हुए, जो बड़े होने पर शापवश कुछ वर्षों के लिये नरभक्षी राक्षस हो गये थे। वे इस पृथ्वी पर सौदास नाम से विख्यात थे।
कल्माषपादपुत्रोऽभूच्छङ्खणस्त्विति नः श्रुतम्।
यस्तु तदीर्यमासाद्य सहसैन्यो व्यनीनशत्॥३०॥
‘कल्माषपाद के पुत्र शङ्खण हुए, यह हमारे सुनने में आया है, जो युद्ध में सुप्रसिद्ध पराक्रम प्राप्त करके भी सेनासहित नष्ट हो गये थे॥ ३०॥
शङ्खणस्य तु पुत्रोऽभूच्छूरः श्रीमान् सुदर्शनः।
सुदर्शनस्याग्निवर्ण अग्निवर्णस्य शीघ्रगः॥३१॥
‘शङ्खण के शूरवीर पुत्र श्रीमान् सुदर्शन हुए। सुदर्शन के पुत्र अग्निवर्ण और अग्निवर्ण के पुत्र शीघ्रग थे॥
शीघ्रगस्य मरुः पुत्रो मरोः पुत्रः प्रशुश्रुवः।
प्रशुश्रुवस्य पुत्रोऽभूदम्बरीषो महामतिः॥३२॥
‘शीघ्रग के पुत्र मरु, मरु के पुत्र प्रशुश्रुव तथा प्रशुश्रुव के महाबुद्धिमान् पुत्र अम्बरीष हुए॥ ३२॥
अम्बरीषस्य पुत्रोऽभून्नहुषः सत्यविक्रमः।
नहुषस्य च नाभागः पुत्रः परमधार्मिकः॥३३॥
‘अम्बरीष के पुत्र सत्यपराक्रमी नहुष थे। नहुष के पुत्र नाभाग हुए, जो बड़े धर्मात्मा थे॥३३॥
अजश्च सुव्रतश्चैव नाभागस्य सुतावुभौ।
अजस्य चैव धर्मात्मा राजा दशरथः सुतः॥३४॥
‘नाभाग के दो पुत्र हुए-अज और सुव्रत। अज के धर्मात्मा पुत्र राजा दशरथ थे॥ ३४ ॥
तस्य ज्येष्ठोऽसि दायादो राम इत्यभिविश्रुतः।
तद् गृहाण स्वकं राज्यमवेक्षस्व जगन्नृप॥ ३५॥
‘दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र तुम हो, जिसकी ‘श्रीराम’ के नाम से प्रसिद्धि है। नरेश्वर! यह अयोध्या का राज्य तुम्हारा है, इसे ग्रहण करो और इसकी देखभाल करते रहो॥ ३५॥
इक्ष्वाकूणां हि सर्वेषां राजा भवति पूर्वजः।
पूर्वजे नावरः पुत्रो ज्येष्ठो राजाभिषिच्यते॥३६॥
‘समस्त इक्ष्वाकुवंशियों के यहाँ ज्येष्ठ पुत्र ही राजा होता आया है। ज्येष्ठ के होते हुए छोटा पुत्र राजा नहीं होता है। ज्येष्ठ पुत्र का ही राजा के पद पर अभिषेक होता है॥ ३६॥
स राघवाणां कुलधर्ममात्मनः सनातनं नाद्य विहन्तुमर्हसि।
प्रभूतरत्नामनुशाधि मेदिनी प्रभूतराष्ट्रां पितृवन्महायशः॥३७॥
‘महायशस्वी श्रीराम! रघुवंशियों का जो अपना सनातन कुलधर्म है, उसको आज तुम नष्ट न करो। बहुत-से अवान्तर देशोंवाली तथा प्रचुर रत्नराशि से सम्पन्न इस वसुधा का पिता की भाँति पालन करो’। ३७॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे दशाधिकशततमः सर्गः॥ ११०॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में एक सौ दसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११०॥
सर्ग-111
वसिष्ठः स तदा राममुक्त्वा राजपुरोहितः।
अब्रवीद् धर्मसंयुक्तं पुनरेवापरं वचः॥१॥
उस समय राजपुरोहित वसिष्ठ ने पूर्वोक्त बातें कहकर पुनः श्रीराम से दूसरी धर्मयुक्त बातें कहीं-॥ १॥
पुरुषस्येह जातस्य भवन्ति गुरवः सदा।
आचार्यश्चैव काकुत्स्थ पिता माता च राघव॥ २॥
‘रघुनन्दन! ककुत्स्थ कुलभूषण! इस संसार में उत्पन्न हुए पुरुष के सदा तीन गुरु होते हैं—आचार्य, पिता और माता॥२॥
पिता ह्येनं जनयति पुरुषं पुरुषर्षभ।
प्रज्ञां ददाति चाचार्यस्तस्मात् स गुरुरुच्यते॥३॥
‘पुरुषप्रवर! पिता पुरुष के शरीर को उत्पन्न करता है, इसलिये गुरु है और आचार्य उसे ज्ञान देता है, इसलिये गुरु कहलाता है॥३॥
स तेऽहं पितुराचार्यस्तव चैव परंतप।
मम त्वं वचनं कुर्वन् नातिवर्तेः सतां गतिम्॥४॥
‘शत्रुओं को संताप देने वाले रघुवीर! मैं तुम्हारे पिता का और तुम्हारा भी आचार्य हूँ; अतः मेरी आज्ञा का पालन करने से तुम सत्पुरुषों के पथ का त्याग करने वाले नहीं समझे जाओगे॥ ४॥
इमा हि ते परिषदो ज्ञातयश्च नृपास्तथा।
एषु तात चरन् धर्मं नातिवर्तेः सतां गतिम्॥५॥
‘तात! ये तुम्हारे सभासद्, बन्धु-बान्धव तथा सामन्त राजा पधारे हुए हैं, इनके प्रति धर्मानुकूल बर्ताव करने से भी तुम्हारे द्वारा सन्मार्गका उल्लङ्घन नहीं होगा॥५॥
वृद्धाया धर्मशीलाया मातुर्नार्हस्यवर्तितुम्।
अस्या हि वचनं कुर्वन् नातिवर्तेः सतां गतिम्॥ ६॥
‘अपनी धर्मपरायणा बूढ़ी माता की बात तो तुम्हें कभी टालनी ही नहीं चाहिये। इनकी आज्ञा का पालन करके तुम श्रेष्ठ पुरुषों के आश्रयभूत धर्म का उल्लङ्घन करने वाले नहीं माने जाओगे॥६॥
भरतस्य वचः कुर्वन् याचमानस्य राघव।
आत्मानं नातिवर्तेस्त्वं सत्यधर्मपराक्रम॥७॥
‘सत्य, धर्म और पराक्रम से सम्पन्न रघुनन्दन ! भरत अपने आत्मस्वरूप तुमसे राज्य ग्रहण करने और अयोध्या लौटने की प्रार्थना कर रहे हैं, उनकी बात मान लेने से भी तुम धर्म का उल्लङ्घन करने वाले नहीं कहलाओगे’ ॥ ७॥
एवं मधुरमुक्तः स गुरुणा राघवः स्वयम्।
प्रत्युवाच समासीनं वसिष्ठं पुरुषर्षभः॥८॥
गुरु वसिष्ठ ने सुमधुर वचनों में जब इस प्रकार कहा, तब साक्षात् पुरुषोत्तम श्रीराघवेन्द्र ने वहाँ बैठे हुए वसिष्ठजी को यों उत्तर दिया॥८॥
यन्मातापितरौ वृत्तं तनये कुरुतः सदा।
न सुप्रतिकरं तत् तु मात्रा पित्रा च यत्कृतम्॥९॥
यथाशक्तिप्रदानेन स्वापनोच्छादनेन च।
नित्यं च प्रियवादेन तथा संवर्धनेन च ॥१०॥
‘माता और पिता पुत्र के प्रति जो सर्वदा स्नेहपूर्ण बर्ताव करते हैं, अपनी शक्ति के अनुसार उत्तम खाद्य पदार्थ देने, अच्छे बिछौने पर सुलाने, उबटन आदि लगाने, सदा मीठी बातें बोलने तथा पालन-पोषण करने आदि के द्वारा माता और पिता ने जो उपकार किया है, उसका बदला सहज ही नहीं चुकाया जा सकता॥
स हि राजा दशरथः पिता जनयिता मम।
आज्ञापयन्मां यत् तस्य न तन्मिथ्या भविष्यति॥ ११॥
‘अतः मेरे जन्मदाता पिता महाराज दशरथने मुझे जो आज्ञा दी है, वह मिथ्या नहीं होगी’ ॥ ११ ॥
एवमुक्तस्तु रामेण भरतः प्रत्यनन्तरम्।
उवाच विपुलोरस्कः सूतं परमदुर्मनाः॥१२॥
श्रीरामचन्द्रजी के ऐसा कहने पर चौड़ी छाती वाले भरतजी का मन बहुत उदास हो गया। वे पास ही बैठे हुए सूत सुमन्त्र से बोले- ॥ १२॥
इह तु स्थण्डिले शीघ्रं कुशानास्तर सारथे।
आर्य प्रत्युपवेक्ष्यामि यावन्मे सम्प्रसीदति॥१३॥
निराहारो निरालोको धनहीनो यथा द्विजः।
शये पुरस्ताच्छालायां यावन्मां प्रतियास्यति॥ १४॥
‘सारथे! आप इस वेदी पर शीघ्र ही बहुत-से कुश बिछा दीजिये। जबतक आर्य मुझ पर प्रसन्न नहीं होंगे,तब तक मैं यहीं इनके पास धरना दूंगा। जैसे साहूकार या महाजनके द्वारा निर्धन किया हुआ ब्राह्मण उसके घर के दरवाजे पर मुँह ढककर बिना खाये-पिये पड़ा रहता है, उसी प्रकार मैं भी उपवासपूर्वक मुख पर आवरण डालकर इस कुटिया के सामने लेट जाऊँगा। जब तक मेरी बात मानकर ये अयोध्या को नहीं लौटेंगे, तब तक मैं इसी तरह पड़ा रहूँगा’ ॥ १३-१४ ॥
स तु राममवेक्षन्तं सुमन्त्रं प्रेक्ष्य दुर्मनाः।
कुशोत्तरमुपस्थाप्य भूमावेवास्थितः स्वयम्॥ १५॥
यह सुनकर सुमन्त्र श्रीरामचन्द्रजी का मुँह ताकने लगे। उन्हें इस अवस्था में देख भरत के मन में बड़ादुःख हुआ और वे स्वयं ही कुश की चटाई बिछाकर जमीन पर बैठ गये॥ १५ ॥
तमुवाच महातेजा रामो राजर्षिसत्तमः।
किं मां भरत कुर्वाणं तात प्रत्युपवेक्ष्यसे ॥१६॥
तब महातेजस्वी राजर्षिशिरोमणि श्रीराम ने उनसे कहा- ‘तात भरत! मैं तुम्हारी क्या बुराई करता हूँ, जो मेरे आगे धरना दोगे? ॥ १६ ॥
ब्राह्मणो ह्येकपाइँन नरान् रोडुमिहार्हति।
न तु मूर्धाभिषिक्तानां विधिः प्रत्युपवेशने ॥१७॥
‘ब्राह्मण एक करवट से सोकर धरना देकर मनुष्यों को अन्याय से रोक सकता है, परंतु राजतिलक ग्रहण करने वाले क्षत्रियों के लिये इस प्रकार धरना देने का विधान नहीं है॥ १७ ॥
उत्तिष्ठ नरशार्दूल हित्वैतद् दारुणं व्रतम्।
पुरवर्यामितः क्षिप्रमयोध्यां याहि राघव॥१८॥
‘अतः नरश्रेष्ठ रघुनन्दन! इस कठोर व्रत का परित्याग करके उठो और यहाँ से शीघ्र ही अयोध्यापुरी को जाओ’॥
आसीनस्त्वेव भरतः पौरजानपदं जनम्।
उवाच सर्वतः प्रेक्ष्य किमार्यं नानुशासथ ॥१९॥
यह सुनकर भरत वहाँ बैठे-बैठे ही सब ओर दृष्टि डालकर नगर और जनपद के लोगों से बोले —’आपलोग भैया को क्यों नहीं समझाते हैं ?’॥ १९॥
ते तदोचुर्महात्मानं पौरजानपदा जनाः।
काकुत्स्थमभिजानीमः सम्यग् वदति राघवः॥ २०॥
तब नगर और जनपद के लोग महात्मा भरत से बोले —’हम जानते हैं, काकुत्स्थ श्रीरामचन्द्रजी के प्रति आप रघुकुल-तिलक भरत जी ठीक ही कहते हैं। २०॥
एषोऽपि हि महाभागः पितुर्वचसि तिष्ठति।
अत एव न शक्ताः स्मो व्यावर्तयितुमञ्जसा॥ २१॥
‘परंतु ये महाभाग श्रीरामचन्द्रजी भी पिता की आज्ञा के पालन में लगे हैं, इसलिये यह भी ठीक ही है। अतएव हम इन्हें सहसा उस ओर से लौटाने में असमर्थ हैं’ ॥ २१॥
तेषामाज्ञाय वचनं रामो वचनमब्रवीत्।
एवं निबोध वचनं सुहृदां धर्मचक्षुषाम्॥ २२॥
उन पुरवासियों के वचन का तात्पर्य समझकर श्रीराम ने भरत से कहा—’भरत! धर्मपर दृष्टि रखने वाले सुहृदों के इस कथन को सुनो और समझो॥ २२॥
एतच्चैवोभयं श्रुत्वा सम्यक् सम्पश्य राघव।
उत्तिष्ठ त्वं महाबाहो मां च स्पृश तथोदकम्॥ २३॥
‘रघुनन्दन! मेरी और इनकी दोनों बातों को सुनकर उन पर सम्यक् रूप से विचार करो। महाबाहो! अब शीघ्र उठो तथा मेरा और जल का स्पर्श करो’ ॥ २३॥
अथोत्थाय जलं स्पृष्ट्वा भरतो वाक्यमब्रवीत्।
शृण्वन्तु मे परिषदो मन्त्रिणः शृणुयुस्तथा॥ २४॥
न याचे पितरं राज्यं नानुशासामि मातरम्।
एवं परमधर्मज्ञं नानुजानामि राघवम्॥२५॥
यह सुनकर भरत उठकर खड़े हो गये और श्रीराम एवं जल का स्पर्श करके बोले—’मेरे सभासद् और मन्त्री सब लोग सुनें न तो मैंने पिताजी से राज्य माँगा था और न माता से ही कभी इसके लिये कुछ
कहा था। साथ ही, परम धर्मज्ञ श्रीरामचन्द्रजी के वनवास में भी मेरी कोई सम्मति नहीं है॥ २४-२५॥
यदि त्ववश्यं वस्तव्यं कर्तव्यं च पितुर्वचः।
अहमेव निवत्स्यामि चतुर्दश वने समाः॥२६॥
‘फिर भी यदि इनके लिये पिताजी की आज्ञा का पालन करना और वन में रहना अनिवार्य है तो इनके बदले मैं ही चौदह वर्षों तक वन में निवास करूँगा’॥ २६॥
धर्मात्मा तस्य सत्येन भ्रातुर्वाक्येन विस्मितः।
उवाच रामः सम्प्रेक्ष्य पौरजानपदं जनम्॥२७॥
भाई भरत की इस सत्य बात से धर्मात्मा श्रीराम को बड़ा विस्मय हुआ और उन्होंने पुरवासी तथा राज्यनिवासी लोगों की ओर देखकर कहा- ॥२७॥
विक्रीतमाहितं क्रीतं यत् पित्रा जीवता मम।
न तल्लोपयितुं शक्यं मया वा भरतेन वा॥२८॥
‘पिताजी ने अपने जीवनकाल में जो वस्तु बेंच दी है, या धरोहर रख दी है, अथवा खरीदी है, उसे मैं अथवा भरत कोई भी पलट नहीं सकता॥ २८ ॥
उपाधिन मया कार्यो वनवासे जुगुप्सितः।
युक्तमुक्तं च कैकेय्या पित्रा मे सुकृतं कृतम्॥ २९॥
‘मुझे वनवास के लिये किसी को प्रतिनिधि नहीं बनाना चाहिये; क्योंकि सामर्थ्य रहते हुए प्रतिनिधि से काम लेना लोक में निन्दित है। कैकेयी ने उचित माँग ही प्रस्तुत की थी और मेरे पिताजी ने उसे देकर पुण्य कर्म ही किया था।
जानामि भरतं क्षान्तं गुरुसत्कारकारिणम्।
सर्वमेवात्र कल्याणं सत्यसंधे महात्मनि॥३०॥
‘मैं जानता हूँ, भरत बड़े क्षमाशील और गुरुजनों का सत्कार करने वाले हैं, इन सत्यप्रतिज्ञ महात्मा में सभी कल्याणकारी गुण मौजूद हैं॥ ३० ॥
अनेन धर्मशीलेन वनात् प्रत्यागतः पुनः।
भ्रात्रा सह भविष्यामि पृथिव्याः पतिरुत्तमः॥ ३१॥
‘चौदह वर्षों की अवधि पूरी करके जब मैं वन से लौटूंगा, तब अपने इन धर्मशील भाई के साथ इस भूमण्डल का श्रेष्ठ राजा होऊँगा॥३१॥
वृतो राजा हि कैकेय्या मया तद्वचनं कृतम्।
अनृतान्मोचयानेन पितरं तं महीपतिम्॥३२॥
‘कैकेयी ने राजा से वर माँगा और मैंने उसका पालन स्वीकार कर लिया, अतः भरत! अब तुम मेरा कहना मानकर उस वर के पालन द्वारा अपने पिता महाराज दशरथ को असत्य के बन्धन से मुक्त करो’। ३२॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकादशाधिकशततमः सर्गः॥१११॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में एक सौ ग्यारहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १११॥
सर्ग-112
तमप्रतिमतेजोभ्यां भ्रातृभ्यां रोमहर्षणम्।
विस्मिताः संगमं प्रेक्ष्य समुपेता महर्षयः॥१॥
उन अनुपम तेजस्वी भ्राताओं का वह रोमाञ्चकारी समागम देख वहाँ आये हुए महर्षियों को बड़ा विस्मय हुआ॥१॥
अन्तर्हिता मुनिगणाः स्थिताश्च परमर्षयः।
तौ भ्रातरौ महाभागौ काकुत्स्थौ प्रशशंसिरे ॥२॥
अन्तरिक्ष में अदृश्य भाव से खड़े हुए मुनि तथा वहाँ प्रत्यक्ष रूप में बैठे हुए महर्षि उन महान् भाग्यशाली ककुत्स्थवंशी बन्धुओं की इस प्रकार प्रशंसा करने लगे— ॥२॥
सदा? राजपुत्रौ द्वौ धर्मज्ञौ धर्मविक्रमौ।
श्रुत्वा वयं हि सम्भाषामुभयोः स्पृहयामहे ॥३॥
‘ये दोनों राजकुमार सदा श्रेष्ठ, धर्म के ज्ञाता और धर्म मार्ग पर ही चलने वाले हैं। इन दोनों की बातचीत सुनकर हमें उसे बारंबार सुनते रहने की ही इच्छा होती है ॥३॥
ततस्त्वृषिगणाः क्षिप्रं दशग्रीववधैषिणः।
भरतं राजशार्दूलमित्यूचुः संगता वचः॥४॥
तदनन्तर दशग्रीव रावण के वध की अभिलाषा रखने वाले ऋषियों ने मिलकर राजसिंह भरत से तुरंत ही यह बात कही— ॥४॥
कुले जात महाप्राज्ञ महावृत्त महायशः।
ग्राह्यं रामस्य वाक्यं ते पितरं यद्यवेक्षसे॥५॥
‘महाप्राज्ञ! तुम उत्तम कुल में उत्पन्न हुए हो। तुम्हारा आचरण बहुत उत्तम और यश महान् है। यदि तुम अपने पिता की ओर देखो उन्हें सुख पहुँचाना चाहो तो तुम्हें श्रीरामचन्द्रजी की बात मान लेनी चाहिये॥ ५॥
सदानृणमिमं रामं वयमिच्छामहे पितुः।
अनृणत्वाच्च कैकेय्याः स्वर्गं दशरथो गतः॥६॥
‘हमलोग इन श्रीराम को पिता के ऋण से सदा उऋण देखना चाहते हैं। कैकेयी का ऋण चुका देने के कारण ही राजा दशरथ स्वर्ग में पहुँचे हैं’ ॥ ६॥
एतावदुक्त्वा वचनं गन्धर्वाः समहर्षयः।
राजर्षयश्चैव तथा सर्वे स्वां स्वां गतिं गताः॥ ७॥
इतना कहकर वहाँ आये हुए गन्धर्व, महर्षि और राजर्षि सब अपने-अपने स्थान को चले गये॥७॥
हह्लादितस्तेन वाक्येन शुशुभे शुभदर्शनः।
रामः संहृष्टवदनस्तानृषीनभ्यपूजयत्॥८॥
जिनके दर्शन से जगत् का कल्याण हो जाता है, वे भगवान् श्रीराम महर्षियों के वचन से बहुत प्रसन्न हुए। उनका मुख हर्षोल्लास से खिल उठा, इससे उनकी बड़ी शोभा हुई और उन्होंने उन महर्षियों की सादर प्रशंसा की॥८॥
त्रस्तगात्रस्तु भरतः स वाचा सज्जमानया।
कृताञ्जलिरिदं वाक्यं राघवं पुनरब्रवीत्॥९॥
परंतु भरत का सारा शरीर थर्रा उठा। वे लड़खड़ाती हुई जबान से हाथ जोड़कर श्रीरामचन्द्रजी से बोले- ॥ ९॥
राम धर्ममिमं प्रेक्ष्य कुलधर्मानुसंततम्।
कर्तुमर्हसि काकुत्स्थ मम मातुश्च याचनाम्॥ १०॥
‘ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम! हमारे कुलधर्म से सम्बन्ध रखने वाला जो ज्येष्ठ पुत्र का राज्यग्रहण और प्रजापालन रूप धर्म है, उसकी ओर दृष्टि डालकर आप मेरी तथा माता की याचना सफल कीजिये॥ १०॥
रक्षितुं सुमहद् राज्यमहमेकस्तु नोत्सहे।
पौरजानपदांश्चापि रक्तान् रञ्जयितुं तदा ॥११॥
‘मैं अकेला ही इस विशाल राज्य की रक्षा नहीं कर सकता तथा आपके चरणों में अनुराग रखने वाले इन पुरवासी तथा जनपदवासी लोगों को भी आपके बिना प्रसन्न नहीं रख सकता ॥ ११॥
ज्ञातयश्चापि योधाश्च मित्राणि सुहृदश्च नः।
त्वामेव हि प्रतीक्षन्ते पर्जन्यमिव कर्षकाः॥१२॥
‘जैसे किसान मेघ की प्रतीक्षा करते रहते हैं, उसी प्रकार हमारे बन्धु-बान्धव, योद्धा, मित्र और सुहृद् सब लोग आपकी ही बाट जोहते हैं ॥ १२ ॥
इदं राज्यं महाप्राज्ञ स्थापय प्रतिपद्य हि।
शक्तिमान् स हि काकुत्स्थ लोकस्य परिपालने॥
‘महाप्राज्ञ ! आप इस राज्य को स्वीकार करके दूसरे किसी को इसके पालन का भार सौंप दीजिये। वही पुरुष आपके प्रजावर्ग अथवा लोक का पालन करने में समर्थ हो सकता है’ ॥१३॥
एवमुक्त्वापतद् भ्रातुः पादयोर्भरतस्तदा।
भृशं सम्प्रार्थयामास राघवेऽतिप्रियं वदन्॥१४॥
ऐसा कहकर भरत अपने भाई के चरणों पर गिर पड़े। उस समय उन्होंने श्रीरघुनाथजी से अत्यन्त प्रिय वचन बोलकर उनसे राज्यग्रहण करने के लिये बड़ी प्रार्थना की॥
तमङ्के भ्रातरं कृत्वा रामो वचनमब्रवीत्।
श्यामं नलिनपत्राक्षं मत्तहंसस्वरः स्वयम्॥१५॥
तब श्रीरामचन्द्रजी ने श्यामवर्ण कमलनयन भाई भरत को उठाकर गोद में बिठा लिया और मदमत्तहंस के समान मधुर स्वर में स्वयं यह बात कही-॥ १५॥
आगता त्वामियं बुद्धिः स्वजा वैनयिकी च या।
भृशमुत्सहसे तात रक्षितुं पृथिवीमपि॥१६॥
‘तात! तुम्हें जो यह स्वाभाविक विनयशील बुद्धि प्राप्त हुई है इस बुद्धि के द्वारा तुम समस्त भूमण्डल की रक्षा करने में भी पूर्णरूप से समर्थ हो सकते हो॥ १६॥
अमात्यैश्च सुहृद्भिश्च बुद्धिमद्भिश्च मन्त्रिभिः।
सर्वकार्याणि सम्मन्त्र्य महान्त्यपि हि कारय॥ १७॥
‘इसके सिवा अमात्यों, सुहृदों और बुद्धिमान् मन्त्रियों से सलाह लेकर उनके द्वारा सब कार्य, वे कितने ही बड़े क्यों न हों, करा लिया करो॥ १७ ॥
लक्ष्मीश्चन्द्रादपेयाद् वा हिमवान् वा हिमं त्यजेत्।
अतीयात् सागरो वेलां न प्रतिज्ञामहं पितुः॥१८॥
‘चन्द्रमा से उसकी प्रभा अलग हो जाय, हिमालय हिम का परित्याग कर दे, अथवा समुद्र अपनी सीमा को लाँघकर आगे बढ़ जाय, किंतु मैं पिताकी प्रतिज्ञा नहीं तोड़ सकता॥ १८ ॥
कामाद् वा तात लोभाद् वा मात्रा तुभ्यमिदं
कृतम्। न तन्मनसि कर्तव्यं वर्तितव्यं च मातृवत्॥१९॥
‘तात! माता कैकेयी ने कामना से अथवा लोभवश तुम्हारे लिये जो कुछ किया है, उसको मनमें न लाना और उसके प्रति सदा वैसा ही बर्ताव करना जैसा अपनी पूजनीया माता के प्रति करना उचित है’ ।। १९॥
एवं ब्रुवाणं भरतः कौसल्यासुतमब्रवीत्।
तेजसाऽऽदित्यसंकाशं प्रतिपच्चन्द्रदर्शनम्॥२०॥
जो सूर्य के समान तेजस्वी हैं तथा जिनका दर्शन प्रतिपदा (द्वितीया) के चन्द्रमा की भाँति आह्लादजनक है, उन कौसल्यानन्दन श्रीराम के इस प्रकार कहने पर भरत उनसे यों बोले- ॥ २० ॥
अधिरोहार्य पादाभ्यां पादुके हेमभूषिते।
एते हि सर्वलोकस्य योगक्षेमं विधास्यतः॥२१॥
‘आर्य! ये दो सुवर्णभूषित पादुकाएँ आपके चरणों में अर्पित हैं, आप इन पर अपने चरण रखें। येही सम्पूर्ण जगत् के योगक्षेम का निर्वाह करेंगी’। २१॥
सोऽधिरुह्य नरव्याघ्रः पादुके व्यवमुच्य च।
प्रायच्छत् सुमहातेजा भरताय महात्मने ॥२२॥
तब महातेजस्वी पुरुषसिंह श्रीराम ने उन पादुकाओं पर चढ़कर उन्हें फिर अलग कर दिया और महात्मा भरत को सौंप दिया।। २२।।
स पादुके सम्प्रणम्य रामं वचनमब्रवीत्।
चतुर्दश हि वर्षाणि जटाचीरधरो ह्यहम्॥२३॥
फलमूलाशनो वीर भवेयं रघुनन्दन।
तवागमनमाकांक्षन् वसन् वै नगराद् बहिः॥ २४॥
तव पादुकयोय॑स्य राज्यतन्त्रं परंतप।
उन पादुकाओं को प्रणाम करके भरत ने श्रीराम से कहा—’वीर रघुनन्दन! मैं भी चौदह वर्षों तक जटा और चीर धारण करके फल-मूल का भोजन करता हुआ आपके आगमन की प्रतीक्षा में नगर से बाहर ही रहूँगा। परंतप! इतने दिनों तक राज्य का सारा भार आपकी इन चरण-पादुकाओं पर ही रखकर मैं आपकी बाट जोहता रहूँगा॥
चतुर्दशे हि सम्पूर्णे वर्षेऽहनि रघूत्तम ॥२५॥
न द्रक्ष्यामि यदि त्वां तु प्रवेक्ष्यामि हुताशनम्।
‘रघुकुलशिरोमणे! यदि चौदहवाँ वर्ष पूर्ण होने पर नूतन वर्ष के प्रथम दिन ही मुझे आपका दर्शन नहीं मिलेगा तो मैं जलती हुई आग में प्रवेश कर जाऊँगा’॥
तथेति च प्रतिज्ञाय तं परिष्वज्य सादरम्॥२६॥
शत्रुघ्नं च परिष्वज्य वचनं चेदमब्रवीत्।।
श्रीरामचन्द्रजी ने ‘बहुत अच्छा’ कहकर स्वीकृति दे दी और बड़े आदर के साथ भरत को हृदय से लगाया। तत्पश्चात् शत्रुघ्न को भी छाती से लगाकर यह बात कही
मातरं रक्ष कैकेयीं मा रोषं कुरु तां प्रति॥ २७॥
मया च सीतया चैव शप्तोऽसि रघुनन्दन।
इत्युक्त्वाश्रुपरीताक्षो भ्रातरं विससर्ज ह॥२८॥
‘रघुनन्दन! मैं तुम्हें अपनी और सीता की शपथ दिलाकर कहता हूँ कि तुम माता कैकेयी की रक्षा करना, उनके प्रति कभी क्रोध न करना’—इतना कहते-कहते उनकी आँखों में आँसू उमड़ आये। उन्होंने व्यथित हृदय से भाई शत्रुघ्न को विदा किया। २७-२८॥
स पादुके ते भरतः स्वलंकृते महोज्ज्वले सम्परिगृह्य धर्मवित् ।
प्रदक्षिणं चैव चकार राघवं चकार चैवोत्तमनागमूर्धनि॥२९॥
धर्मज्ञ भरत ने भलीभाँति अलंकृत की हुई उन परम उज्ज्वल चरणपादुकाओं को लेकर श्रीरामचन्द्रजी की परिक्रमा की तथा उन पादुकाओं को राजा की सवारी में आने वाले सर्वश्रेष्ठ गजराज के मस्तक पर स्थापित किया॥
अथानुपूर्व्या प्रतिपूज्य तं जनं गुरूंश्च मन्त्री प्रकृतीस्तथानुजौ।
व्यसर्जयद् राघववंशवर्धनः स्थितः स्वधर्मे हिमवानिवाचलः॥३०॥
तदनन्तर अपने धर्म में हिमालय की भाँति अविचल भाव से स्थित रहने वाले रघुवंशवर्धन श्रीराम ने क्रमशः वहाँ आये हुए जनसमुदाय, गुरु, मन्त्री, प्रजा तथा दोनों भाइयों का यथायोग्य सत्कार करके उन्हें विदा किया।
तं मातरो बाष्पगृहीतकण्ठ्यो दुःखेन नामन्त्रयितुं हि शेकुः।
स चैव मातृरभिवाद्य सर्वा रुदन् कुटीं स्वां प्रविवेश रामः॥३१॥
उस समय कौसल्या आदि सभी माताओं का गला आँसुओं से रुंध गया था। वे दुःख के कारण श्रीराम को सम्बोधित भी न कर सकीं। श्रीराम भी सब माताओं को प्रणाम करके रोते हुए अपनी कुटिया में चले गये॥ ३१॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे द्वादशाधिकशततमः सर्गः॥११२॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में एक सौ बारहवाँ सर्गपूरा हुआ॥ ११२॥
सर्ग-113
ततः शिरसि कृत्वा तु पादुके भरतस्तदा।
आरुरोह रथं हृष्टः शत्रुघ्नसहितस्तदा ॥१॥
तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजी की दोनों चरणपादुकाओं को अपने मस्तक पर रखकर भरत शत्रुघ्न के साथ प्रसन्नता-पूर्वक रथ पर बैठे॥१॥
वसिष्ठो वामदेवश्च जाबालिश्च दृढव्रतः।
अग्रतः प्रययुः सर्वे मन्त्रिणो मन्त्रपूजिताः॥२॥
वसिष्ठ, वामदेव तथा दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रत का पालन करने वाले जाबालि आदि सब मन्त्री, जो उत्तम मन्त्रणा देने के कारण सम्मानित थे, आगे-आगे चले॥ २॥
मन्दाकिनी नदी रम्यां प्राङ्मुखास्ते ययुस्तदा।
प्रदक्षिणं च कुर्वाणाश्चित्रकूटं महागिरिम्॥३॥
वे सब लोग चित्रकूट नामक महान् पर्वत की परिक्रमा करते हुए परम रमणीय मन्दाकिनी नदी को पार करके पूर्व दिशा की ओर प्रस्थित हुए॥३॥
पश्यन् धातुसहस्राणि रम्याणि विविधानि च।
प्रययौ तस्य पाइँन ससैन्यो भरतस्तदा॥४॥
उस समय भरत अपनी सेना के साथ सहस्रों प्रकार के रमणीय धातुओं को देखते हुए चित्रकूट के किनारे से होकर निकले॥ ४॥
अदूराच्चित्रकूटस्य ददर्श भरतस्तदा।
आश्रमं यत्र स मुनिर्भरद्वाजः कृतालयः॥५॥
चित्रकूट से थोड़ी ही दूर जाने पर भरत ने वह आश्रम देखा, जहाँ मुनिवर भरद्वाज जी निवास करते थे* ॥
* यह आश्रम यमुना से दक्षिण दिशा में चित्रकूट के कुछ निकट था। गङ्गा और यमुना के बीच प्रयाग वाला आश्रम, जहाँ वन में जाते समय श्रीरामचन्द्रजी तथा भरत आदि ने विश्राम किया था, इससे भिन्न जान पड़ता है। तभी इस आश्रम पर भरद्वाज से मिलने के बाद भरत आदि के यमुना पार करने का उल्लेख मिलता है-‘ततस्ते यमुनां दिव्यां नदीं तीवॉर्मिमालिनीम्।’ इस द्वितीय आश्रम से श्रीराम और भरत के समागम का समाचार शीघ्र प्राप्त हो सकता था; इसीलिये भरद्वाजजी भरत के लौटने के समय यहीं मौजूद थे।
स तमाश्रममागम्य भरद्वाजस्य वीर्यवान्।
अवतीर्य रथात् पादौ ववन्दे कुलनन्दनः॥६॥
अपने कुल को आनन्दित करने वाले पराक्रमी भरत महर्षि भरद्वाज के उस आश्रमपर पहुँचकर रथ से उतर पड़े और उन्होंने मुनि के चरणों में प्रणाम किया॥६॥
ततो हृष्टो भरद्वाजो भरतं वाक्यमब्रवीत्।
अपि कृत्यं कृतं तात रामेण च समागतम्॥७॥
उनके आने से महर्षि भरद्वाज को बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने भरत से पूछा—’तात! क्या तुम्हारा कार्य सम्पन्न हुआ? क्या श्रीरामचन्द्रजी से भेंट हुई?’॥ ७॥
एवमुक्तः स तु ततो भरद्वाजेन धीमता।
प्रत्युवाच भरद्वाजं भरतो धर्मवत्सलः॥८॥
बुद्धिमान् भरद्वाजजी के इस प्रकार पूछने पर धर्मवत्सल भरत ने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया-॥ ८॥
स याच्यमानो गुरुणा मया च दृढविक्रमः।
राघवः परमप्रीतो वसिष्ठं वाक्यमब्रवीत्॥९॥
‘मुने! भगवान् श्रीराम अपने पराक्रम पर दृढ़ रहने वाले हैं। मैंने उनसे बहुत प्रार्थना की। गुरुजी ने भी अनुरोध किया तब उन्होंने अत्यन्त प्रसन्न होकर गुरुदेव वसिष्ठजी से इस प्रकार कहा- ॥९॥
पितुः प्रतिज्ञां तामेव पालयिष्यामि तत्त्वतः।
चतुर्दश हि वर्षाणि या प्रतिज्ञा पितुर्मम॥१०॥
‘मैं चौदह वर्षों तक वन में रहूँ, इसके लिये मेरे पिताजी ने जो प्रतिज्ञा कर ली थी, उनकी उस प्रतिज्ञाका ही मैं यथार्थ रूप से पालन करूँगा’ ॥ १० ॥
एवमुक्तो महाप्राज्ञो वसिष्ठः प्रत्युवाच ह।
वाक्यज्ञो वाक्यकुशलं राघवं वचनं महत्॥११॥
‘उनके ऐसा कहने पर बात के मर्म को समझने वाले महाज्ञानी वसिष्ठजी ने बातचीत करने में कुशल श्रीरघुनाथजी से यह महत्त्वपूर्ण बात कही— ॥११॥
एते प्रयच्छ संहृष्टः पादुके हेमभूषिते।
अयोध्यायां महाप्राज्ञ योगक्षेमकरो भव॥१२॥
‘महाप्राज्ञ! तुम प्रसन्नतापूर्वक ये स्वर्णभूषित पादुकाएँ अपने प्रतिनिधि के रूप में भरत को दे दो और इन्हीं के द्वारा अयोध्या के योगक्षेम का निर्वाह करो’॥
एवमुक्तो वसिष्ठेन राघवः प्राङ्मुखः स्थितः।
पादुके हेमविकृते मम राज्याय ते ददौ ॥१३॥
‘गुरु वसिष्ठजी के ऐसा कहने पर पूर्वाभिमुख खड़े हुए श्रीरघुनाथजी ने अयोध्या के राज्य का संचालन करने के लिये ये दोनों स्वर्णभूषित पादुकाएँ मुझे दे दीं॥ १३॥
निवृत्तोऽहमनुज्ञातो रामेण सुमहात्मना।
अयोध्यामेव गच्छामि गृहीत्वा पादुके शुभे॥ १४॥
‘तत्पश्चात् मैं महात्मा श्रीराम की आज्ञा पाकर लौट आया हूँ और उनकी इन मङ्गलमयी चरणपादुकाओं को लेकर अयोध्या को ही जा रहा हूँ’॥ १४॥
एतच्छ्रत्वा शुभं वाक्यं भरतस्य महात्मनः।
भरद्वाजः शुभतरं मुनिर्वाक्यमुदाहरत्॥१५॥
महात्मा भरत का यह शुभ वचन सुनकर भरद्वाज मुनि ने यह परम मङ्गलमय बात कही— ॥ १५ ॥
नैतच्चित्रं नरव्याघ्र शीलवृत्तविदां वरे।
यदार्यं त्वयि तिष्ठेत्तु निम्नोत्सृष्टमिवोदकम्॥१६॥
‘भरत! तुम मनुष्यों में सिंह के समान वीर तथा शील और सदाचार के ज्ञाताओं में श्रेष्ठ हो। जैसे जल नीची भूमि वाले जलाशय में सब ओर से बहकर चला आता है, उसी प्रकार तुममें सारे श्रेष्ठ गुण स्थित हों यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है॥ १६ ॥
अनृणः स महाबाहुः पिता दशरथस्तव।
यस्य त्वमीदृशः पुत्रो धर्मात्मा धर्मवत्सलः॥ १७॥
‘तुम्हारे पिता महाबाहु राजा दशरथ सब प्रकार से उऋण हो गये, जिनके तुम-जैसा धर्म प्रेमी एवं धर्मात्मा पुत्र है’ ॥ १७॥
तमृषि तु महाप्राज्ञमुक्तवाक्यं कृताञ्जलिः।
आमन्त्रयितुमारेभे चरणावुपगृह्य च॥१८॥
उन महाज्ञानी महर्षि के ऐसा कहने पर भरत ने हाथ जोड़कर उनके चरणों का स्पर्श किया; फिर वे उनसे जाने की आज्ञा लेने को उद्यत हुए॥ १८॥
ततः प्रदक्षिणं कृत्वा भरद्वाजं पुनः पुनः।
भरतस्तु ययौ श्रीमानयोध्यां सह मन्त्रिभिः॥ १९॥
तदनन्तर श्रीमान् भरत बारंबार भरद्वाज मुनि की परिक्रमा करके मन्त्रियों सहित अयोध्या की ओर चल दिये॥ १९॥
यानैश्च शकटैश्चैव हयैर्नागैश्च सा चमूः।
पुनर्निवृत्ता विस्तीर्णा भरतस्यानुयायिनी॥२०॥
फिर वह विस्तृत सेना रथों, छकड़ों, घोड़ों और हाथियों के साथ भरत का अनुसरण करती हुई अयोध्या को लौटी॥२०॥
ततस्ते यमुनां दिव्यां नदीं तीोर्मिमालिनीम्।
ददृशुस्तां पुनः सर्वे गङ्गां शिवजलां नदीम्॥ २१॥
तत्पश्चात् आगे जाकर उन सब लोगों ने तरंगमालाओं से सुशोभित दिव्य नदी यमुना को पार करके पुनः शुभसलिला गङ्गाजी का दर्शन किया॥२१॥
तां रम्यजलसम्पूर्णां संतीर्य सहबान्धवः।
शृङ्गवेरपुरं रम्यं प्रविवेश ससैनिकः ॥ २२॥
फिर बन्धु-बान्धवों और सैनिकों के साथ मनोहर जल से भरी हुई गङ्गा के भी पार होकर वे परम रमणीय शृङ्गवेरपुर में जा पहुँचे॥ २२ ॥
शृङ्गवेरपुराद् भूय अयोध्यां संददर्श ह।
अयोध्यां तु तदा दृष्ट्वा पित्रा भ्रात्रा विवर्जिताम्॥ २३॥
भरतो दुःखसंतप्तः सारथिं चेदमब्रवीत्।
शृङ्गवेरपुर से प्रस्थान करने पर उन्हें पुनः अयोध्यापुरी का दर्शन हुआ, जो उस समय पिता और भाई दोनों से विहीन थी। उसे देखकर भरत ने दुःखसे संतप्त हो सारथि से इस प्रकार कहा- ॥ २३ १/२ ॥
सारथे पश्य विध्वस्ता अयोध्या न प्रकाशते॥ २४॥
निराकारा निरानन्दा दीना प्रतिहतस्वना॥ २५॥
‘सारथि सुमन्त्रजी! देखिये, अयोध्या की सारी शोभा नष्ट हो गयी है; अतः यह पहले की भाँति प्रकाशित नहीं होती है। इसका वह सुन्दर रूप, वह आनन्द जाता रहा। इस समय यह अत्यन्त दीन और नीरव हो रही है’ ॥ २४-२५॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्रयोदशाधिकशततमः सर्गः ॥ ११३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में एक सौ तेरहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११३॥
सर्ग-114
स्निग्धगम्भीरघोषेण स्यन्दनेनोपयान् प्रभुः।
अयोध्यां भरतः क्षिप्रं प्रविवेश महायशाः॥१॥
इसके बाद प्रभावशाली महायशस्वी भरत ने स्निग्ध, गम्भीर घर्घर घोष से युक्त रथ के द्वारा यात्रा करके शीघ्र ही अयोध्या में प्रवेश किया॥१॥
बिडालोलूकचरितामालीननरवारणाम्।
तिमिराभ्याहतां कालीमप्रकाशां निशामिव॥२॥
उस समय वहाँ बिलाव और उल्लू विचर रहे थे। घरों के किवाड़ बंद थे। सारे नगर में अन्धकार छा रहा था। प्रकाश न होने के कारण वह पुरी कृष्णपक्ष की काली रात के समान जान पड़ती थी॥२॥
राहशत्रोः प्रियां पत्नीं श्रिया प्रज्वलितप्रभाम्।
ग्रहेणाभ्युदितेनैकां रोहिणीमिव पीडिताम्॥३॥
जैसे चन्द्रमा की प्रिय पत्नी और अपनी शोभा से प्रकाशित कान्ति वाली रोहिणी उदित हुए राहु नामक ग्रह के द्वारा अपने पति के ग्रस लिये जाने पर अकेली -असहाय हो जाती है, उसी प्रकार दिव्य ऐश्वर्य से प्रकाशित होने वाली अयोध्या राजा के कालकवलित हो जाने के कारण पीड़ित एवं असहाय हो रही थी॥ ३॥
अल्पोष्णक्षुब्धसलिलां घर्मतप्तविहंगमाम्।
लीनमीनझषग्राहां कृशां गिरिनदीमिव॥४॥
वह पुरी उस पर्वतीय नदी की भाँति कृशकाय दिखायी देती थी, जिसका जल सूर्य की किरणों से तपकर कुछ गरम और गँदला हो रहा हो, जिसके पक्षी धूप से संतप्त होकर भाग गये हों तथा जिसके मीन, मत्स्य और ग्राह गहरे जल में छिप गये हों॥ ४॥
विधूमामिव हेमाभां शिखामग्नेः समुत्थिताम्।
हविरभ्युक्षितां पश्चाच्छिखां विप्रलयं गताम्॥
जो अयोध्या पहले धूमरहित सुनहरी कान्तिवाली प्रज्वलित अग्निशिखा के समान प्रकाशित होती थी वही श्रीरामवनवास के बाद हवनीय दुग्ध से सींची गयी अग्नि की ज्वाला के समान बुझकर विलीन-सी हो गयी है॥ ५॥
विध्वस्तकवचां रुग्णगजवाजिरथध्वजाम्।
हतप्रवीरामापन्नां चमूमिव महाहवे॥६॥
उस समय अयोध्या महासमर में संकटग्रस्त हुई उस सेना के समान प्रतीत होती थी, जिसके कवच कटकर गिर गये हों, हाथी, घोड़े, रथ और ध्वजा छिन्न-भिन्न हो गये हों और मुख्य-मुख्य वीर मार डाले गये हों। ६॥
सफेनां सस्वनां भूत्वा सागरस्य समुत्थिताम्।
प्रशान्तमारुतोद्धतां जलोर्मिमिव निःस्वनाम्॥ ७॥
प्रबल वायु के वेग से फेन और गर्जना के साथ उठी हुई समुद्र की उत्ताल तरंग सहसा वायु के शान्त हो जाने पर जैसे शिथिल और नीरव हो जाती है, उसी प्रकार कोलाहलपूर्ण अयोध्या अब शब्दशून्य-सी जान पड़ती थी॥७॥
त्यक्तां यज्ञायुधैः सर्वैरभिरूपैश्च याजकैः।
सुत्याकाले सुनिर्वृत्ते वेदिं गतरवामिव॥८॥
यज्ञकाल समाप्त होने पर ‘स्फ्य’ आदि यज्ञसम्बन्धी आयुधों तथा श्रेष्ठ याजकों से सूनी हुई वेदी जैसे मन्त्रोच्चारण की ध्वनि से रहित हो जाती है, उसी प्रकार अयोध्या सुनसान दिखायी देती थी॥ ८॥
गोष्ठमध्ये स्थितामार्तामचरन्तीं नवं तृणम्।
गोवृषेण परित्यक्तां गवां पत्नीमिवोत्सुकाम्॥९॥
जैसे कोई गाय साँड़ के साथ समागम के लिये उत्सुक हो, उसी अवस्था में उसे साँड़ से अलग कर दिया गया हो और वह नूतन घास चरना छोड़कर आर्त भाव से गोष्ठ में बँधी हुई खड़ी हो, उसी तरह अयोध्यापुरी भी आन्तरिक वेदना से पीड़ित थी॥९॥
प्रभाकराद्यैः सुस्निग्धैः प्रज्वलद्भिरिवोत्तमैः।
वियुक्तां मणिभिर्जात्यैर्नवां मुक्तावलीमिव॥१०॥
श्रीराम आदि से रहित हुई अयोध्या मोतियों की उस नूतन माला के समान श्रीहीन हो गयी थी, जिसकी अत्यन्त चिकनी-चमकीली, उत्तम तथा अच्छी जातिकी पद्मराग आदि मणियाँ उससे निकालकर अलग कर दी गयी हों। १० ॥
सहसाचरितां स्थानान्महीं पुण्यक्षयाद् गताम्।
संहृतद्युतिविस्तारां तारामिव दिवश्च्युताम्॥११॥
जो पुण्य-क्षय होने के कारण सहसा अपने स्थान से भ्रष्ट हो पृथ्वी पर आ पहुँची हो, अतएव जिसकी विस्तृत प्रभा क्षीण हो गयी हो, आकाश से गिरी हुई उस तारिका की भाँति अयोध्या शोभाहीन हो गयी थी॥ ११॥
पुष्पनद्धां वसन्तान्ते मत्तभ्रमरशालिनीम्।
द्रुतदावाग्निविप्लुष्टां क्लान्तां वनलतामिव॥ १२॥
जो ग्रीष्म ऋतु में पहले फूलों से लदी हुई होने के कारण मतवाले भ्रमरों से सुशोभित होती रही हो और फिर सहसा दावानल के लपेट में आकर मुरझा गयी हो, वन की उस लता के समान पहले की उल्लासपूर्ण अयोध्या अब उदास हो गयी थी॥ १२ ॥
सम्मढनिगमां सर्वां संक्षिप्तविपणापणाम्।
प्रच्छन्नशशिनक्षत्रां द्यामिवाम्बुधरैर्युताम्॥१३॥
वहाँके व्यापारी वणिक् शोक से व्याकुल होने के कारण किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये थे, बाजार-हाट और दूकानें बहुत कम खुली थीं। उस समय सारी पुरी उस आकाश की भाँति शोभाहीन हो गयी थी, जहाँ बादलों की घटाएँ घिर आयी हों और तारे तथा चन्द्रमा ढक गये हों ॥ १३॥
क्षीणपानोत्तमैर्भग्नैः शरावैरभिसंवृताम्।
हतशौण्डामिव ध्वस्तां पानभूमिमसंस्कृताम्॥ १४॥
(उन दिनों अयोध्यापुरी की सड़कें झाड़ी-बुहारी नहीं गयी थीं, इसलिये यत्र-तत्र कूड़े-करकट के ढेर पड़े थे। उस अवस्थामें) वह नगरी उस उजड़ी हुई पानभूमि (मधुशाला) के समान श्रीहीन दिखायी देती थी, जिसकी सफाई न की गयी हो, जहाँ मधु से खाली टूटी-फूटी प्यालियाँ पड़ी हों और जहाँ के पीने वाले भी नष्ट हो गये हों॥ १४ ॥
वृक्णभूमितलां निम्नां वृक्णपात्रैः समावृताम्।
उपयुक्तोदकां भग्नां प्रपां निपतितामिव॥१५॥
उस पुरी की दशा उस पौंसले की-सी हो रही थी, जो खम्भों के टूट जाने से ढह गया हो, जिसका चबूतरा छिन्न-भिन्न हो गया हो, भूमि नीची हो गयी हो, पानी चुक गया हो और जलपात्र टूट-फूटकर इधर-उधर सब ओर बिखरे पड़े हों॥ १५॥
विपुलां विततां चैव युक्तपाशां तरस्विनाम्।
भूमौ बाणैर्विनिष्कृत्तां पतितां ज्यामिवायुधात्॥ १६॥
जो विशाल और सम्पूर्ण धनुष में फैली हुई हो, उसकी दोनों कोटियों (किनारों) में बाँधने के लिये जिसमें रस्सी जुड़ी हुई हो, किंतु वेगशाली वीरों के बाणों से कटकर धनुष से पृथ्वी पर गिर पड़ी हो, उस प्रत्यञ्चा के समान ही अयोध्यापुरी भी स्थानभ्रष्ट हुई सी दिखायी देती थी॥ १६॥
सहसा युद्धशौण्डेन हयारोहेण वाहिताम्।
निहतां प्रतिसैन्येन वडवामिव पातिताम्॥१७॥
जिसपर युद्धकुशल घुड़सवार ने सवारी की हो और जिसे शत्रुपक्ष की सेना ने सहसा मार गिराया हो, युद्धभूमि में पड़ी हुई उस घोड़ी की जो दशा होती है, वही उस समय अयोध्यापुरी की भी थी (कैकेयी के कुचक्र से उसके संचालक नरेश का स्वर्गवास और युवराज का वनवास हो गया था) ॥ १७॥
भरतस्तु रथस्थः सन् श्रीमान् दशरथात्मजः।
वाहयन्तं रथश्रेष्ठं सारथिं वाक्यमब्रवीत्॥ १८॥
रथ पर बैठे हुए श्रीमान् दशरथनन्दन भरत ने उस समय श्रेष्ठ रथ का संचालन करने वाले सारथि सुमन्त्र से इस प्रकार कहा- ॥ १८॥
किं नु खल्वद्य गम्भीरो मूर्च्छितो न निशाम्यते।
यथापुरमयोध्यायां गीतवादित्रनिःस्वनः॥१९॥
‘अब अयोध्या में पहले की भाँति सब ओर फैला हुआ गाने-बजाने का गम्भीर नाद नहीं सुनायी पड़ता; यह कितने कष्ट की बात है!॥ १९॥
वारुणीमदगन्धश्च माल्यगन्धश्च मूर्च्छितः।
चन्दनागुरुगन्धश्च न प्रवाति समन्ततः॥२०॥
‘अब चारों ओर वारुणी (मधु) की मादक गन्ध, व्याप्त हुई फूलों की सुगन्ध तथा चन्दन और अगुरु की पवित्र गन्ध नहीं फैल रही है॥ २०॥
यानप्रवरघोषश्च सुस्निग्धहयनिःस्वनः।
प्रमत्तगजनादश्च महांश्च रथनिःस्वनः॥२१॥
‘अच्छी-अच्छी सवारियों की आवाज, घोड़ों के हींसने का सुस्निग्ध शब्द, मतवाले हाथियों का चिग्घाड़ना तथा रथों की घर्घराहट का महान् शब्दये सब नहीं सुनायी दे रहे हैं ॥ २१॥
नेदानीं श्रूयते पुर्यामस्यां रामे विवासिते।
चन्दनागुरुगन्धांश्च महार्हाश्च वनस्रजः॥२२॥
गते रामे हि तरुणाः संतप्ता नोपभुञ्जते।
बहिर्यात्रां न गच्छन्ति चित्रमाल्यधरा नराः॥ २३॥
‘श्रीरामचन्द्रजी के निर्वासित होने के कारण ही इस पुरी में इस समय इन सब प्रकार के शब्दों का श्रवण नहीं हो रहा है। श्रीराम के चले जाने से यहाँ के तरुण बहुत ही संतप्त हैं। वे चन्दन और अगुरु की सुगन्ध का सेवन नहीं करते तथा बहुमूल्य वनमालाएँ भी नहीं धारण करते। अब इस पुरी के लोग विचित्र फूलों के हार पहनकर बाहर घूमने के लिये नहीं निकलते हैं।। २२-२३॥
नोत्सवाः सम्प्रवर्तन्ते रामशोकार्दिते पुरे।
सा हि नूनं मम भ्रात्रा पुरस्यास्य द्युतिर्गता॥२४॥
‘श्रीराम के शोक से पीड़ित हुए इस नगर में अब नाना प्रकार के उत्सव नहीं हो रहे हैं। निश्चय ही इस पुरी की वह सारी शोभा मेरे भाई के साथ ही चली गयी॥
नहि राजत्ययोध्येयं सासारेवार्जुनी क्षपा।
कदा नु खलु मे भ्राता महोत्सव इवागतः ॥ २५॥
जनयिष्यत्ययोध्यायां हर्षं ग्रीष्म इवाम्बुदः।
‘जैसे वेगयुक्त वर्षा के कारण शुक्लपक्ष की चाँदनी रात भी शोभा नहीं पाती है, उसी प्रकार नेत्रों से आँसू बहाती हुई यह अयोध्या भी शोभित नहीं हो रही है। अब कब मेरे भाई महोत्सव की भाँति अयोध्या में पधारेंगे और ग्रीष्म-ऋतु में प्रकट हुए मेघ की भाँति सबके हृदय में हर्ष का संचार करेंगे। २५ १/२ ॥
तरुणैश्चारुवेषैश्च नरैरुन्नतगामिभिः॥२६॥
सम्पतद्भिरयोध्यायां नाभिभान्ति महापथाः।
‘अब अयोध्या की बड़ी-बड़ी सड़कें हर्ष से उछलकर चलते हुए मनोहर वेषधारी तरुणों के शुभागमन से शोभा नहीं पा रही हैं’॥ २६ १/२॥
इति ब्रुवन् सारथिना दुःखितो भरतस्तदा ॥२७॥
अयोध्यां सम्प्रविश्यैव विवेश वसतिं पितुः।
तेन हीनां नरेन्द्रेण सिंहहीनां गुहामिव॥२८॥
इस प्रकार सारथि के साथ बातचीत करते हुए दुःखी भरत उस समय सिंह से रहित गुफा की भाँति राजा दशरथ से हीन पिता के निवास स्थान राजमहल में गये॥
तदा तदन्तःपुरमुज्झितप्रभं सुरैरिवोत्कृष्टमभास्करं दिनम्।
निरीक्ष्य सर्वत्र विभक्तमात्मवान् मुमोच बाष्पं भरतः सुदुःखितः॥२९॥
जैसे सूर्य के छिप जाने से दिन की शोभा नष्ट हो जाती है और देवता शोक करने लगते हैं, उसी प्रकार उस समय वह अन्तःपुर शोभाहीन हो गया था और वहाँ के लोग शोकमग्न थे। उसे सब ओर से स्वच्छता और सजावट से हीन देख भरत धैर्यवान् होने पर भी अत्यन्त दुःखी हो आँसू बहाने लगे॥ २९ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतुर्दशाधिकशततमः सर्गः॥११४॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में एक सौ चौदहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११४॥
सर्ग-115
ततो निक्षिप्य मातृस्ता अयोध्यायां दृढव्रतः।
भरतः शोकसंतप्तो गुरूनिदमथाब्रवीत्॥१॥
तदनन्तर सब माताओं को अयोध्या में रखकर दृढप्रतिज्ञ भरत ने शोक से संतप्त हो गुरुजनों से इस प्रकार कहा
नन्दिग्रामं गमिष्यामि सर्वानामन्त्रयेऽत्र वः।
तत्र दुःखमिदं सर्वं सहिष्ये राघवं विना॥२॥
‘अब मैं नन्दिग्राम को जाऊँगा, इसके लिये आप सब लोगों की आज्ञा चाहता हूँ। वहाँ श्रीराम के बिना प्राप्त होने वाले इस सारे दुःख को सहन करूँगा॥ २॥
गतश्चाहो दिवं राजा वनस्थः स गुरुर्मम।
रामं प्रतीक्षे राज्याय स हि राजा महायशाः॥३॥
‘अहो! महाराज (पूज्य पिताजी) तो स्वर्ग को सिधारे और वे मेरे गुरु (पूजनीय भ्राता) श्रीरामचन्द्रजी वन में विराज रहे हैं। मैं इस राज्य के लिये वहाँ श्रीराम की प्रतीक्षा करता रहूँगा; क्योंकि वे महायशस्वी श्रीराम ही हमारे राजा हैं ॥३॥
एतच्छ्रुत्वा शुभं वाक्यं भरतस्य महात्मनः।
अब्रुवन् मन्त्रिणः सर्वे वसिष्ठश्च पुरोहितः॥४॥
महात्मा भरत का यह शुभ वचन सुनकर सब मन्त्री और पुरोहित वसिष्ठ जी बोले- ॥ ४॥
सुभृशं श्लाघनीयं च यदुक्तं भरत त्वया।
वचनं भ्रातृवात्सल्यादनुरूपं तवैव तत्॥५॥
‘भरत! भ्रातृभक्ति से प्रेरित होकर तुमने जो बात कही है, वह बहुत ही प्रशंसनीय है वास्तव में वह तुम्हारे ही योग्य है॥५॥
नित्यं ते बन्धुलुब्धस्य तिष्ठतो भ्रातृसौहृदे।
मार्गमार्यं प्रपन्नस्य नानुमन्येत कः पुमान्॥६॥
‘तुम अपने भाई के दर्शन के लिये सदा लालायित रहते हो और भाई के ही सौहार्द (हितसाधन) में संलग्न हो। साथ ही श्रेष्ठ मार्ग पर स्थित हो, अतः कौन पुरुष तुम्हारे विचार का अनुमोदन नहीं करेगा’।
मन्त्रिणां वचनं श्रुत्वा यथाभिलषितं प्रियम्।
अब्रवीत् सारथिं वाक्यं रथो मे युज्यतामिति॥ ७॥
मन्त्रियों का अपनी रुचि के अनुरूप प्रिय वचन सुनकर भरत ने सारथि से कहा—’मेरा रथ जोतकर तैयार किया जाय’ ॥ ७॥
प्रहृष्टवदनः सर्वा मातृः समभिभाष्य च।
आरुरोह रथं श्रीमान्शत्रुघ्नेन समन्वितः॥८॥
फिर उन्होंने प्रसन्नवदन होकर सब माताओं से बातचीत करके जाने की आज्ञा ली। इसके बाद शत्रुघ्न के सहित श्रीमान् भरत रथ पर सवार हुए॥८॥
आरुह्य तु रथं क्षिप्रं शत्रुघ्नभरतावुभौ।
ययतुः परमप्रीतौ वृतौ मन्त्रिपुरोहितैः॥९॥
रथ पर आरूढ़ होकर परम प्रसन्न हुए भरत और शत्रुघ्न दोनों भाई मन्त्रियों तथा पुरोहितों से घिरकर शीघ्रतापूर्वक वहाँ से प्रस्थित हुए॥९॥
अग्रतो गुरवः सर्वे वसिष्ठप्रमुखा द्विजाः।
प्रययुः प्राङ्मुखाः सर्वे नन्दिग्रामो यतो भवेत्॥ १०॥
आगे-आगे वसिष्ठ आदि सभी गुरुजन एवं ब्राह्मणचल रहे थे। उन सब लोगों ने अयोध्या से पूर्वाभिमुख होकर यात्रा की और उस मार्ग को पकड़ा, जो नन्दिग्राम की ओर जाता था॥ १० ॥
बलं च तदनाहूतं गजाश्वरथसंकुलम्।
प्रययौ भरते याते सर्वे च पुरवासिनः॥११॥
भरत के प्रस्थित होने पर हाथी, घोड़े और रथों से भरी हुई सारी सेना भी बिना बुलाये ही उनके पीछे पीछे चल दी और समस्त पुरवासी भी उनके साथ हो लिये॥ ११॥
रथस्थः स तु धर्मात्मा भरतो भ्रातृवत्सलः।
नन्दिग्रामं ययौ तूर्णं शिरस्यादाय पादुके॥१२॥
धर्मात्मा भ्रातृवत्सल भरत अपने मस्तक पर भगवान् श्रीराम की चरणपादु का लिये रथ पर बैठकर बड़ी शीघ्रता से नन्दिग्राम की ओर चले ॥ १२ ॥
भरतस्तु ततः क्षिप्रं नन्दिग्रामं प्रविश्य सः।
अवतीर्य रथात् तूर्णं गुरूनिदमभाषत॥१३॥
नन्दिग्राम में शीघ्र पहुँचकर भरत तुरंत ही रथ से उतर पड़े और गुरुजनों से इस प्रकार बोले- ॥ १३॥
एतद राज्यं मम भ्रात्रा दत्तं संन्यासमुत्तमम्।
योगक्षेमवहे चेमे पादुके हेमभूषिते॥१४॥
‘मेरे भाई ने यह उत्तम राज्य मुझे धरोहर के रूपमें दिया है, उनकी ये सुवर्णविभूषित चरणपादुकाएँ ही सबके योगक्षेम का निर्वाह करनेवाली हैं’॥ १४ ॥
भरतः शिरसा कृत्वा संन्यासं पादुके ततः।
अब्रवीद् दुःखसंतप्तः सर्वं प्रकृतिमण्डलम्॥ १५॥
तत्पश्चात् भरत ने मस्तक झुकाकर उन चरणपादुकाओं के प्रति उस धरोहर रूप राज्य को समर्पित करके दुःख से संतप्त हो समस्त प्रकृतिमण्डल (मन्त्री, सेनापति और प्रजा आदि) से कहा-॥ १५॥
छत्रं धारयत क्षिप्रमार्यपादाविमौ मतौ।
आभ्यां राज्ये स्थितो धर्मः पादुकाभ्यां गुरोर्मम॥ १६॥
‘आप सब लोग इन चरणपादुकाओं के ऊपर छत्र धारण करें। मैं इन्हें आर्य रामचन्द्रजी के साक्षात् चरण मानता हूँ। मेरे गुरु की इन चरणपादुकाओं से ही इस राज्य में धर्म की स्थापना होगी॥१६॥
भ्रात्रा तु मयि संन्यासो निक्षिप्तः सौहृदादयम्।
तमिमं पालयिष्यामि राघवागमनं प्रति॥१७॥
‘मेरे भाई ने प्रेम के कारण ही यह धरोहर मुझे सौंपी है, अतः मैं उनके लौटने तक इसकी भलीभाँति रक्षा करूँगा॥१७॥
क्षिप्रं संयोजयित्वा तु राघवस्य पुनः स्वयम्।
चरणौ तौ तु रामस्य द्रक्ष्यामि सहपादुकौ ॥१८॥
‘इसके बाद मैं स्वयं इन पादुकाओं को पुनः शीघ्र ही श्रीरघुनाथजी के चरणों से संयुक्त करके इन पादुकाओं से सुशोभित श्रीराम के उन युगल चरणों का दर्शन करूँगा॥
ततो निक्षिप्तभारोऽहं राघवेण समागतः।
निवेद्य गुरवे राज्यं भजिष्ये गुरुवर्तिताम्॥१९॥
‘श्रीरघुनाथजी के आने पर उनसे मिलते ही मैं अपने उन गुरुदेव को यह राज्य समर्पित करके उनकी आज्ञा के अधीन हो उन्हीं की सेवा में लग जाऊँगा। राज्य का यह भार उन पर डालकर मैं हलका हो जाऊँगा॥ १९॥
राघवाय च संन्यासं दत्त्वेमे वरपादुके।
राज्यं चेदमयोध्यां च धूतपापो भवाम्यहम्॥ २०॥
‘मेरे पास धरोहर रूप में रखे हुए इस राज्य को, अयोध्या को तथा इन श्रेष्ठ पादुकाओं को श्रीरघुनाथजी की सेवा में समर्पित करके मैं सब प्रकार के पापताप से मुक्त हो जाऊँगा॥२०॥
अभिषिक्ते तु काकुत्स्थे प्रहृष्टमुदिते जने।
प्रीतिर्मम यशश्चैव भवेद् राज्याच्चतुर्गुणम्॥ २१॥
‘ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम का अयोध्या के राज्य पर अभिषेक हो जाने पर जब सब लोग हर्ष और आनन्द में निमग्न हो जायेंगे, तब मुझे राज्य पाने की अपेक्षा चौगुनी प्रसन्नता और चौगुने यश की प्राप्ति होगी’ ॥ २१॥
एवं तु विलपन् दीनो भरतः स महायशाः।
नन्दिग्रामेऽकरोद् राज्यं दुःखितो मन्त्रिभिः सह॥ २२॥
इस प्रकार दीनभाव से विलाप करते हुए दुःखमग्न महायशस्वी भरत मन्त्रियों के साथ नन्दिग्राम में रहकर राज्य का शासन करने लगे॥ २२ ॥
स वल्कलजटाधारी मुनिवेषधरः प्रभुः।
नन्दिग्रामेऽवसद् धीरः ससैन्यो भरतस्तदा ॥२३॥
सेनासहित प्रभावशाली धीर-वीर भरत ने उस समय वल्कल और जटा धारण करके मुनिवेषधारी हो नन्दिग्राम में निवास किया॥ २३॥
रामागमनमाकांक्षन् भरतो भ्रातृवत्सलः।
भ्रातुर्वचनकारी च प्रतिज्ञापारगस्तदा।
पादके त्वभिषिच्याथ नन्दिग्रामेऽवसत् तदा॥ २४॥
भाई की आज्ञा का पालन और प्रतिज्ञा के पार जाने की इच्छा करने वाले भ्रातृवत्सल भरत श्रीरामचन्द्रजी के आगमन की आकांक्षा रखते हुए उनकी चरणपादुकाओं को राज्य पर अभिषिक्त करके उन दिनों नन्दिग्राम में रहने लगे।
सवालव्यजनं छत्रं धारयामास स स्वयम्।
भरतः शासनं सर्वं पादुकाभ्यां निवेदयन्॥२५॥
भरतजी राज्य-शासनका समस्त कार्य भगवान् श्रीराम की चरणपादुकाओं को निवेदन करके करते थे तथा स्वयं ही उनके ऊपर छत्र लगाते और चँवर डुलाते थे॥ २५॥
ततस्तु भरतः श्रीमानभिषिच्यार्यपादुके।
तदधीनस्तदा राज्यं कारयामास सर्वदा॥ २६॥
श्रीमान् भरत बड़े भाई की उन पादुकाओं को राज्य पर अभिषिक्त करके सदा उनके अधीन रहकर उन दिनों राज्य का सब कार्य मन्त्री आदि से कराते थे।॥ २६॥
तदा हि यत् कार्यमुपैति किंचि दुपायनं चोपहृतं महार्हम्।
स पादुकाभ्यां प्रथमं निवेद्य चकार पश्चाद् भरतो यथावत्॥२७॥
उस समय जो कोई भी कार्य उपस्थित होता, जो भी बहुमूल्य भेंट आती, वह सब पहले उन पादुकाओं को निवेदन करके पीछे भरत जी उसका यथावत् प्रबन्ध करते थे॥ २७॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चदशाधिकशततमः सर्गः॥११५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में एक सौ पंद्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११५॥
सर्ग-116
प्रतियाते तु भरते वसन् रामस्तदा वने।
लक्षयामास सोढेगमथौत्सुक्यं तपस्विनाम्॥१॥
भरत के लौट जाने पर श्रीरामचन्द्रजी उन दिनों जब वन में निवास करने लगे, तब उन्होंने देखा कि वहाँ के तपस्वी उद्विग्न हो वहाँ से अन्यत्र चले जाने के लिये उत्सुक हैं॥१॥
ये तत्र चित्रकूटस्य पुरस्तात् तापसाश्रमे।
राममाश्रित्य निरतास्तानलक्षयदुत्सुकान्॥२॥
पहले चित्रकूट के उस आश्रम में जो तपस्वी श्रीराम का आश्रय लेकर सदा आनन्दमग्न रहते थे, उन्हीं को श्रीराम ने उत्कण्ठित देखा (मानो वे कहीं जाने के विषय में कुछ कहना चाहते हों) ॥ २॥
नयनैर्भुकुटीभिश्च रामं निर्दिश्य शङ्किताः।
अन्योन्यमुपजल्पन्तः शनैश्चक्रुर्मिथः कथाः॥
नेत्रों से, भौहें टेढ़ी करके, श्रीराम की ओर संकेत करके मन-ही-मन शङ्कित हो आपस में कुछ सलाह करते हुए वे तपस्वी मुनि धीरे-धीरे परस्पर वार्तालाप कर रहे थे॥३॥
तेषामौत्सुक्यमालक्ष्य रामस्त्वात्मनि शङ्कितः।
कृताञ्जलिरुवाचेदमृषिं कुलपतिं ततः॥४॥
उनकी उत्कण्ठा देख श्रीरामचन्द्रजी के मन में यह शङ्का हुई कि मुझसे कोई अपराध तो नहीं बन गया। तब वे हाथ जोड़कर वहाँ के कुलपति महर्षि से इस प्रकार बोले- ॥४॥
न कश्चिद् भगवन् किंचित् पूर्ववृत्तमिदं मयि।
दृश्यते विकृतं येन विक्रियन्ते तपस्विनः॥५॥
‘भगवन् ! क्या मुझमें पूर्ववर्ती राजाओं का-सा कोई बर्ताव नहीं दिखायी देता अथवा मुझमें कोई विकृत भाव दृष्टिगोचर होता है, जिससे यहाँ के तपस्वी मुनि विकार को प्राप्त हो रहे हैं॥ ५॥
प्रमादाच्चरितं किंचित् कच्चिन्नावरजस्य मे।
लक्ष्मणस्यर्षिभिदृष्टं नानुरूपं महात्मनः॥६॥
‘क्या मेरे छोटे भाई महात्मा लक्ष्मण का प्रमादवश किया हुआ कोई ऐसा आचरण ऋषियों ने देखा है, जो उसके योग्य नहीं है॥६॥
कच्चिच्छुश्रूषमाणा वः शुश्रूषणपरा मयि।
प्रमदाभ्युचितां वृत्तिं सीता युक्तां न वर्तते॥७॥
‘अथवा क्या जो अर्घ्य-पाद्य आदि के द्वारा सदा आपलोगों की सेवा करती रही है, वह सीता इस समय मेरी सेवा में लग जाने के कारण एक गृहस्थ की सती नारी के अनुरूप ऋषियों की समुचित सेवा नहीं कर पाती है?’ ॥ ७॥
अथर्षिर्जरया वृद्धस्तपसा च जरां गतः।
वेपमान इवोवाच रामं भूतदयापरम्॥८॥
श्रीराम के इस प्रकार पूछने पर एक महर्षि जो जरावस्था के कारण तो वृद्ध थे ही, तपस्या द्वारा भी वृद्ध हो गये थे, समस्त प्राणियों पर दया करने वाले श्रीराम से काँपते हुए-से बोले- ॥८॥
कुतः कल्याणसत्त्वायाः कल्याणाभिरतेः सदा।
चलनं तात वैदेह्यास्तपस्विष विशेषतः॥९॥
‘तात! जो स्वभाव से ही कल्याणमयी है और सदा सबके कल्याण में ही रत रहती है, वह विदेहनन्दिनी सीता विशेषतः तपस्वीजनों के प्रति बर्ताव करते समय अपने कल्याणमय स्वभाव से विचलित हो जाय, यह कैसे सम्भव है? ॥९॥
त्वन्निमित्तमिदं तावत् तापसान् प्रति वर्तते।
रक्षोभ्यस्तेन संविग्नाः कथयन्ति मिथः कथाः॥ १०॥
‘आपके ही कारण तापसों पर यह राक्षसों की ओर से भय उपस्थित होने वाला है, उससे उद्विग्न हुए ऋषि आपस में कुछ बातें (कानाफूसी) कर रहे हैं॥ १० ॥
रावणावरजः कश्चित् खरो नामेह राक्षसः।
उत्पाट्य तापसान् सर्वाञ्जनस्थाननिवासिनः॥ ११॥
धृष्टश्च जितकाशी च नृशंसः पुरुषादकः।
अवलिप्तश्च पापश्च त्वां च तात न मृष्यते॥ १२॥
‘तात! यहाँ वनप्रान्त में रावण का छोटा भाई खर नामक राक्षस है, जिसने जनस्थान में रहने वाले समस्त तापसों को उखाड़ फेंका है। वह बड़ा ही ढीठ, विजयोन्मत्त, क्रूर, नरभक्षी और घमंडी है। वह आपको भी सहन नहीं कर पाता है॥ ११-१२ ॥
त्वं यदाप्रभृति ह्यस्मिन्नाश्रमे तात वर्तसे।
तदाप्रभृति रक्षांसि विप्रकुर्वन्ति तापसान्॥१३॥
‘तात! जब से आप इस आश्रम में रह रहे हैं, तबसे सब राक्षस तापसों को विशेष रूप से सताने लगे हैं।
दर्शयन्ति हि बीभत्सैः क्रूरैर्भीषणकैरपि।
नानारूपैर्विरूपैश्च रूपैरसुखदर्शनैः॥१४॥
अप्रशस्तैरशुचिभिः सम्प्रयुज्य च तापसान्।
प्रतिजन्त्यपरान् क्षिप्रमनार्याः पुरतः स्थितान्॥ १५॥
‘वे अनार्य राक्षस बीभत्स (घृणित), क्रूर और भीषण, नाना प्रकार के विकृत एवं देखने में दुःखदायक रूप धारण करके सामने आते हैं और पापजनक अपवित्र पदार्थों से तपस्वियों का स्पर्श कराकर अपने सामने खड़े हुए अन्य ऋषियों को भी पीड़ा देते हैं॥ १४-१५॥
तेषु तेष्वाश्रमस्थानेष्वबुद्धमवलीय च।
रमन्ते तापसांस्तत्र नाशयन्तोऽल्पचेतसः॥१६॥
“वे उन-उन आश्रमों में अज्ञात रूप से आकर छिप जाते हैं और अल्पज्ञ अथवा असावधान तापसों का विनाश करते हुए वहाँ सानन्द विचरते रहते हैं। १६ ।।
अवक्षिपन्ति स्रुग्भाण्डानग्नीन् सिञ्चन्ति वारिणा।
कलशांश्च प्रमर्दन्ति हवने समुपस्थिते॥१७॥
‘होमकर्म आरम्भ होनेपर वे सुक्-सुवा आदि यज्ञसामग्रियों को इधर-उधर फेंक देते हैं। प्रज्वलित अग्नि में पानी डाल देते हैं और कलशों को फोड़ डालते हैं॥
तैर्दुरात्मभिराविष्टानाश्रमान् प्रजिहासवः।
गमनायान्यदेशस्य चोदयन्त्य॒षयोऽद्य माम्॥ १८॥
‘उन दुरात्मा राक्षसों से आविष्ट हुए आश्रमों को त्याग देने की इच्छा रखकर ये ऋषिलोग आज मुझे यहाँ से अन्य स्थान में चलने के लिये प्रेरित कर रहे हैं। १८॥
तत् पुरा राम शारीरीमुपहिंसां तपस्विषु।
दर्शयन्ति हि दुष्टास्ते त्यक्ष्याम इममाश्रमम्॥ १९॥
‘श्रीराम! वे दुष्ट राक्षस तपस्वियों की शारीरिक हिंसा का प्रदर्शन करें, इसके पहले ही हम इस आश्रम को त्याग देंगे॥ १९॥
बहुमूलफलं चित्रमविदूरादितो वनम्।
अश्वस्याश्रममेवाहं श्रयिष्ये सगणः पुनः॥२०॥
‘यहाँसे थोड़ी ही दूरपर एक विचित्र वन है, जहाँ फल-मूलकी अधिकता है। वहीं अश्वमुनिका आश्रम है, अतः ऋषियोंके समूहको साथ लेकर मैं पुनः उसी आश्रमका आश्रय लूँगा॥ २० ॥
खरस्त्वय्यपि चायुक्तं पुरा राम प्रवर्तते।
सहास्माभिरितो गच्छ यदि बुद्धिः प्रवर्तते॥२१॥
‘श्रीराम! खर आपके प्रति भी कोई अनुचित बर्ताव करे, उसके पहले ही यदि आपका विचार हो तो हमारे साथ ही यहाँ से चल दीजिये॥ २१॥
सकलत्रस्य संदेहो नित्यं युक्तस्य राघव।
समर्थस्यापि हि सतो वासो दुःखमिहाद्य ते॥
‘रघुनन्दन! यद्यपि आप सदा सावधान रहने वाले तथा राक्षसों के दमन में समर्थ हैं, तथापि पत्नी के साथ आजकल उस आश्रम में आपका रहना संदेहजनक एवं दुःखदायक है’ ॥ २२॥
इत्युक्तवन्तं रामस्तं राजपुत्रस्तपस्विनम्।
न शशाकोत्तरैर्वाक्यैरवबढुं समुत्सुकम्॥२३॥
ऐसी बात कहकर अन्यत्र जाने के लिये उत्कण्ठित हुए उन तपस्वी मुनि को राजकुमार श्रीराम सान्त्वनाजनक उत्तरवाक्यों द्वारा वहाँ रोक नहीं सके। २३॥
अभिनन्द्य समापृच्छ्य समाधाय च राघवम्।
स जगामाश्रमं त्यक्त्वा कुलैः कुलपतिः सह। २४॥
तत्पश्चात् वे कुलपति महर्षि श्रीरामचन्द्रजी का अभिनन्दन करके उनसे पूछकर और उन्हें सान्त्वना देकर इस आश्रम को छोड़ वहाँ से अपने दल के ऋषियों के साथ चले गये॥ २४॥
रामः संसाध्य ऋषिगणमनुगमनाद् देशात् तस्मात् कुलपतिमभिवाद्य ऋषिम्।
सम्यक्प्रीतैस्तैरनुमत उपदिष्टार्थः पुण्यं वासाय स्वनिलयमुपसम्पेदे॥२५॥
श्रीरामचन्द्रजी वहाँ से जाने वाले ऋषियों के पीछे पीछे जाकर उन्हें विदा दे कुलपति ऋषि को प्रणाम करके परम प्रसन्न हुए उन ऋषियों की अनुमति ले उनके दिये हुए कर्तव्यविषयक उपदेश को सुनकर लौटे और निवास करने के लिये अपने पवित्र आश्रम में आये॥ २५॥
आश्रममृषिविरहितं प्रभुः क्षणमपि न जहौ स राघवः।
राघवं हि सततमनुगतास्तापसाश्चार्षचरिते धृतगुणाः॥ २६॥
उन ऋषियों से रहित हुए आश्रम को भगवान् श्रीराम ने एक क्षण के लिये भी नहीं छोड़ा। जिनका ऋषियों के समान ही चरित्र था, उन श्रीरामचन्द्रजी में निश्चय ही ऋषियों की रक्षा की शक्तिरूप गुण विद्यमान है। ऐसा विश्वास रखने वाले कुछ तपस्वीजनों ने सदा श्रीराम का ही अनुसरण किया। वे दूसरे किसी आश्रम में नहीं गये॥ २६ ॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे षोडशाधिकशततमः सर्गः॥११६॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में एक सौ सोलहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥११६॥
सर्ग-117
राघवस्त्वपयातेषु सर्वेष्वनुविचिन्तयन्।
न तत्रारोचयद् वासं कारणैर्बहुभिस्तदा ॥१॥
उन सब ऋषियों के चले जाने पर श्रीरामचन्द्रजी ने जब बारंबार विचार किया, तब उन्हें बहुत-से ऐसे कारण ज्ञात हुए, जिनसे उन्होंने स्वयं भी वहाँ रहना उचित न समझा॥१॥
इह मे भरतो दृष्टो मातरश्च सनागराः।
सा च मे स्मृतिरन्वेति तान् नित्यमनुशोचतः॥२॥
उन्होंने मन-ही-मन सोचा, ‘इस आश्रम में मैं भरत से, माताओं से तथा पुरवासी मनुष्यों से मिल चुका हूँ। वह स्मृति मुझे बराबर बनी रहती है और मैं प्रतिदिन उन सब लोगों का चिन्तन करके शोकमग्न हो जाता हूँ॥
स्कन्धावारनिवेशेन तेन तस्य महात्मनः।
हयहस्तिकरीषैश्च उपमर्दः कृतो भृशम्॥३॥
‘महात्मा भरत की सेना का पड़ाव पड़ने के कारण हाथी और घोड़ों की लीदों से यहाँ की भूमि अधिक अपवित्र कर दी गयी है॥३॥
तस्मादन्यत्र गच्छाम इति संचिन्त्य राघवः।
प्रातिष्ठत स वैदेह्या लक्ष्मणेन च संगतः॥४॥
‘अतः हमलोग भी अन्यत्र चले जायँ’ ऐसा सोचकर श्रीरघुनाथ जी सीता और लक्ष्मण के साथ वहाँ से चल दिये॥
सोऽत्रेराश्रममासाद्य तं ववन्दे महायशाः।
तं चापि भगवानत्रिः पुत्रवत् प्रत्यपद्यत॥५॥
वहाँ से अत्रि के आश्रम पर पहुँचकर महायशस्वी श्रीराम ने उन्हें प्रणाम किया तथा भगवान् अत्रि ने भी उन्हें अपने पुत्र की भाँति स्नेहपूर्वक अपनाया॥५॥
स्वयमातिथ्यमादिश्य सर्वमस्य सुसत्कृतम्।
सौमित्रिं च महाभागं सीतां च समसान्त्वयत्॥
उन्होंने स्वयं ही श्रीराम का सम्पूर्ण आतिथ्य-सत्कार करके महाभाग लक्ष्मण और सीता को भी सत्कारपूर्वक संतुष्ट किया॥६॥
पत्नीं च तामनुप्राप्तां वृद्धामामन्त्र्य सत्कृताम्।
सान्त्वयामास धर्मज्ञः सर्वभूतहिते रतः॥७॥
अनसूयां महाभागां तापसी धर्मचारिणीम्।
प्रतिगृह्णीष्व वैदेहीमब्रवीदृषिसत्तमः॥८॥
सम्पूर्ण प्राणियों के हित में तत्पर रहने वाले धर्मज्ञ मुनिश्रेष्ठ अत्रि ने अपने समीप आयी हुई सबके द्वारा सम्मानित तापसी एवं धर्मपरायणा बूढ़ी पत्नी महाभागा अनसूया को सम्बोधित करके सान्त्वनापूर्ण वचनों द्वारा संतुष्ट किया और कहा—’देवि! विदेहराजनन्दिनी सीता को सत्कारपूर्वक हृदय से लगाओ’ ॥ ७-८॥
रामाय चाचचक्षे तां तापसी धर्मचारिणीम्।
दश वर्षाण्यनावृष्टया दग्धे लोके निरन्तरम्॥९॥
यया मूलफले सृष्टे जाह्नवी च प्रवर्तिता।
उग्रेण तपसा युक्ता नियमैश्चाप्यलंकृता॥१०॥
दश वर्षसहस्राणि यया तप्तं महत् तपः।
अनसूयाव्रतैस्तात प्रत्यूहाश्च निबर्हिताः॥११॥
तत्पश्चात् उन्होंने श्रीरामचन्द्रजी को धर्मपरायणा तपस्विनी अनसूया का परिचय देते हुए कहा—’एक समय दसवर्षों तक वृष्टि नहीं हुई, उस समय जब सारा जगत् निरन्तर दग्ध होने लगा, तब जिन्होंने उग्र तपस्या से युक्त तथा कठोर नियमों से अलंकृत होकर अपने तपके प्रभाव से यहाँ फल-मूल उत्पन्न कियेऔर मन्दाकिनीकी पवित्र धारा बहायी तथा तात! जिन्होंने दस हजार वर्षांतक बड़ी भारी तपस्या करके अपने उत्तम व्रतों के प्रभाव से ऋषियों के समस्त विघ्नों का निवारण किया था, वे ही यह अनसूया देवी हैं॥
देवकार्यनिमित्तं च यया संत्वरमाणया।
दशरात्रं कृता रात्रिः सेयं मातेव तेऽनघ॥१२॥
‘निष्पाप श्रीराम! इन्होंने देवताओं के कार्य के लिये अत्यन्त उतावली होकर दस रात के बराबर एक ही रात बनायी थी; वे ही ये अनसूया देवी तुम्हारे लिये माता की भाँति पूजनीया हैं॥ १२॥
तामिमां सर्वभूतानां नमस्कार्यां तपस्विनीम्।
अभिगच्छतु वैदेही वृद्धामक्रोधनां सदा॥१३॥
‘ये सम्पूर्ण प्राणियों के लिये वन्दनीया तपस्विनी हैं। क्रोध तो इन्हें कभी छू भी नहीं सका है। विदेहनन्दिनी सीता इन वृद्धा अनसूया देवी के पास जायँ’ ।। १३॥
एवं ब्रुवाणं तमृषि तथेत्युक्त्वा स राघवः।
सीतामालोक्य धर्मज्ञामिदं वचनमब्रवीत्॥१४॥
ऐसी बात कहते हुए अत्रि मुनि से ‘बहुत अच्छा’ कहकर श्रीरामचन्द्रजी ने धर्मज्ञा सीता की ओर देखकर यह बात कही— ॥१४॥
राजपुत्रि श्रुतं त्वेतन्मुनेरस्य समीरितम्।
श्रेयोऽर्थमात्मनः शीघ्रमभिगच्छ तपस्विनीम्॥ १५॥
‘राजकुमारी! महर्षि अत्रि के वचन तो तुमने सुन ही लिये; अब अपने कल्याण के लिये तुम शीघ्र ही इन तपस्विनी देवी के पास जाओ॥ १५ ॥
अनसूयेति या लोके कर्मभिः ख्यातिमागता।
तां शीघ्रमभिगच्छ त्वमभिगम्यां तपस्विनीम्॥ १६॥
‘जो अपने सत्कर्मों से संसार में अनसूया के नाम से विख्यात हुई हैं, वे तपस्विनी देवी तुम्हारे आश्रय लेने योग्य हैं; तुम शीघ्र उनके पास जाओ’ ॥ १६ ॥
सीता त्वेतद् वचः श्रुत्वा राघवस्य यशस्विनी।
तामत्रिपत्नी धर्मज्ञामभिचक्राम मैथिली॥१७॥
श्रीरामचन्द्रजी की यह बात सुनकर यशस्विनी मिथिलेश-कुमारी सीता धर्म को जानने वाली अत्रिपत्नी अनसूया के पास गयीं ॥ १७॥
शिथिलां वलितां वृद्धां जरापाण्डुरमूर्धजाम्।
सततं वेपमानाङ्गी प्रवाते कदलीमिव ॥१८॥
अनसूया वृद्धावस्था के कारण शिथिल हो गयी थीं; उनके शरीर में झुर्रियाँ पड़ गयीं थीं तथा सिर के बाल सफेद हो गये थे। अधिक हवा चलने पर हिलते हुए कदली-वृक्ष के समान उनके सारे अङ्ग निरन्तर काँप रहे थे॥१८॥
तां तु सीता महाभागामनसूयां पतिव्रताम्।
अभ्यवादयदव्यग्रा स्वं नाम समुदाहरत्॥१९॥
सीता ने निकट जाकर शान्तभाव से अपना नाम बताया और उन महाभागा पतिव्रता अनसूया को प्रणाम किया॥ १९॥
अभिवाद्य च वैदेही तापसी तां दमान्विताम्।
बद्धाञ्जलिपुटा हृष्टा पर्यपृच्छदनामयम्॥२०॥
उन संयमशीला तपस्विनी को प्रणाम करके हर्ष से भरी हुई सीता ने दोनों हाथ जोड़कर उनका कुशलसमाचार पूछा ॥ २०॥
ततः सीतां महाभागां दृष्ट्वा तां धर्मचारिणीम्।
सान्त्वयन्त्यब्रवीद् वृद्धा दिष्ट्या धर्ममवेक्षसे॥ २१॥
धर्म का आचरण करने वाली महाभागा सीता को देखकर बूढ़ी अनसूया देवी उन्हें सान्त्वना देती हुई बोलीं—’सीते! सौभाग्य की बात है कि तुम धर्म पर ही दृष्टि रखती हो॥ २१॥
त्यक्त्वा ज्ञातिजनं सीते मानवृद्धिं च मानिनि।
अवरुद्धं वने रामं दिष्ट्या त्वमनुगच्छसि ॥२२॥
‘मानिनी सीते! बन्धु-बान्धवों को छोड़कर और उनसे प्राप्त होने वाली मान-प्रतिष्ठा का परित्याग करके तुम वन में भेजे हुए श्रीराम का अनुसरण कर रही हो —यह बड़े सौभाग्य की बात है।॥ २२॥
नगरस्थो वनस्थो वा शुभो वा यदि वाशुभः।
यासां स्त्रीणां प्रियो भर्ता तासां लोका महोदयाः॥२३॥
‘अपने स्वामी नगर में रहें या वन में, भले हों या बुरे, जिन स्त्रियों को वे प्रिय होते हैं, उन्हें महान् अभ्युदयशाली लोकों की प्राप्ति होती है।॥ २३॥
दुःशीलः कामवृत्तो वा धनैर्वा परिवर्जितः।
स्त्रीणामार्यस्वभावानां परमं दैवतं पतिः॥२४॥
‘पति बुरे स्वभाव का, मनमाना बर्ताव करने वाला अथवा धनहीन ही क्यों न हो, वह उत्तम स्वभाववाली नारियों के लिये श्रेष्ठ देवता के समान है। २४॥
नातो विशिष्टं पश्यामि बान्धवं विमृशन्त्यहम्।
सर्वत्र योग्यं वैदेहि तपःकृतमिवाव्ययम्॥२५॥
‘विदेहराजनन्दिनि! मैं बहुत विचार करने पर भी पति से बढ़कर कोई हितकारी बन्धु नहीं देखती। अपनी की हुई तपस्या के अविनाशी फल की भाँति वह इस लोक में और परलोक में सर्वत्र सुख पहुँचाने में समर्थ होता है॥२५॥
न त्वेवमनुगच्छन्ति गुणदोषमसत्स्त्रियः।
कामवक्तव्यहृदया भर्तृनाथाश्चरन्ति याः॥२६॥
‘जो अपने पति पर भी शासन करती हैं, वे काम के अधीन चित्तवाली असाध्वी स्त्रियाँ इस प्रकार पति का अनुसरण नहीं करतीं। उन्हें गुण-दोषों का ज्ञान नहीं होता; अतः वे इच्छानुसार इधर-उधर विचरती रहती हैं।॥ २६॥
प्राप्नुवन्त्ययशश्चैव धर्मभ्रंशं च मैथिलि।
अकार्यवशमापन्नाः स्त्रियो याः खलु तद्विधाः॥ २७॥
‘मिथिलेशकुमारी! ऐसी नारियाँ अवश्य ही अनुचित कर्म में फँसकर धर्म से भ्रष्ट हो जाती हैं और संसार में उन्हें अपयश की प्राप्ति होती है॥ २७॥
त्वद्विधास्तु गुणैर्युक्ता दृष्टलोकपरावराः।
स्त्रियः स्वर्गे चरिष्यन्ति यथा पुण्यकृतस्तथा॥ २८॥
‘किंतु जो तुम्हारे समान लोक-परलोक को जानने वाली साध्वी स्त्रियाँ हैं, वे उत्तम गुणों से युक्त होकर पुण्यकर्मों में संलग्न रहती हैं; अतः वे दूसरे पुण्यात्माओं की भाँति स्वर्गलोक में विचरण करेंगी।२८॥
तदेवमेतं त्वमनुव्रता सती पतिप्रधाना समयानुवर्तिनी।
भव स्वभर्तुः सहधर्मचारिणी यशश्च धर्मं च ततः समाप्स्यसि ॥२९॥
‘अतः तुम इसी प्रकार अपने इन पतिदेव श्रीरामचन्द्रजी की सेवा में लगी रहो—सतीधर्म का पालन करो, पति को प्रधान देवता समझो और प्रत्येक समय उनका अनुसरण करती हुई अपने स्वामी की सहधर्मिणी बनो, इससे तुम्हें सुयश और धर्म दोनों की प्राप्ति होगी’ ॥ २९॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्तदशाधिकशततमः सर्गः॥११७॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में एक सौ सत्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥११७॥
सर्ग-118
सा त्वेवमुक्ता वैदेही त्वनसूयानसूयया।
प्रतिपूज्य वचो मन्दं प्रवक्तुमुपचक्रमे ॥१॥
तपस्विनी अनसूया के इस प्रकार उपदेश देने पर किसी के प्रति दोषदृष्टि न रखने वाली विदेहराजकुमारी सीता ने उनके वचनों की भूरि-भूरि प्रशंसा करके धीरे-धीरे इस प्रकार कहना आरम्भ किया— ॥१॥
नैतदाश्चर्यमार्यायां यन्मां त्वमनुभाषसे।
विदितं तु ममाप्येतद् यथा नार्याः पतिर्गुरुः॥२॥
‘देवि! आप संसार की स्त्रियों में सबसे श्रेष्ठ हैं। आपके मुँह से ऐसी बातों का सुनना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। नारी का गुरु पति ही है, इस विषय में जैसा आपने उपदेश किया है, यह बात मुझे भी पहले से ही विदित है॥२॥
यद्यप्येष भवेद् भर्ता अनार्यो वृत्तिवर्जितः।
अद्वैधमत्र वर्तव्यं यथाप्येष मया भवेत्॥३॥
‘मेरे पतिदेव यदि अनार्य (चरित्रहीन) तथा जीविका के साधनों से रहित (निर्धन) होते तो भी मैं बिना किसी दुविधा के इनकी सेवा में लगी रहती॥३॥
किं पुनर्यो गुणश्लाघ्यः सानुक्रोशो जितेन्द्रियः।
स्थिरानुरागो धर्मात्मा मातृवत्पितृवत्प्रियः॥४॥
‘फिर जब कि ये अपने गणों के कारण ही सबकी प्रशंसा के पात्र हैं, तब तो इनकी सेवा के लिये कहना ही क्या है। ये श्रीरघुनाथजी परम दयालु, जितेन्द्रिय, दृढ़ अनुराग रखने वाले, धर्मात्मा तथा माता-पिता के समान प्रिय हैं।॥ ४॥
यां वृत्तिं वर्तते रामः कौसल्यायां महाबलः।
तामेव नृपनारीणामन्यासामपि वर्तते॥५॥
‘महाबली श्रीराम अपनी माता कौसल्या के प्रति जैसा बर्ताव करते हैं वैसा ही महाराज दशरथ की दूसरी रानियों के साथ भी करते हैं॥५॥
सकृद् दृष्टास्वपि स्त्रीषु नृपेण नृपवत्सलः।
मातृवद् वर्तते वीरो मानमुत्सृज्य धर्मवित्॥६॥
‘महाराज दशरथ ने एक बार भी जिन स्त्रियों को प्रेमदृष्टि से देख लिया है, उनके प्रति भी ये पितृवत्सल धर्मज्ञ वीर श्रीराम मान छोड़कर माता के समान ही बर्ताव करते हैं॥६॥
आगच्छन्त्याश्च विजनं वनमेवं भयावहम्।
समाहितं हि मे श्वश्र्वा हृदये यत् स्थिरं मम॥ ७॥
‘जब मैं पति के साथ निर्जन वन में आने लगी, उस समय मेरी सास कौसल्या ने मुझे जो कर्तव्य का उपदेश दिया था, वह मेरे हृदय में ज्यों-का-त्यों स्थिरभाव से अङ्कित है॥७॥
पाणिप्रदानकाले च यत् पुरा त्वग्निसंनिधौ।
अनुशिष्टं जनन्या मे वाक्यं तदपि मे धृतम्॥८॥
‘पहले मेरे विवाह-काल में अग्नि के समीप माता ने मुझे जो शिक्षा दी थी, वह भी मुझे अच्छी तरह याद है।॥८॥
न विस्मृतं तु मे सर्वं वाक्यैः स्वैर्धर्मचारिणि।
पतिशुश्रूषणान्नार्यास्तपो नान्यद् विधीयते॥९॥
‘धर्मचारिणि! इसके सिवा मेरे अन्य स्वजनों ने अपने वचनों द्वारा जो-जो उपदेश किया है, वह भी मुझे भूला नहीं है। स्त्री के लिये पति की सेवा के अतिरिक्त दूसरे किसी तप का विधान नहीं है॥९॥
सावित्री पतिशुश्रूषां कृत्वा स्वर्गे महीयते।
तथावृत्तिश्च याता त्वं पतिशुश्रूषया दिवम्॥१०॥
‘सत्यवान की पत्नी सावित्री पति की सेवा करके ही स्वर्गलोक में पूजित हो रही हैं। उन्हीं के समान बर्ताव करने वाली आप (अनसूया देवी) ने भी पति की सेवा के ही प्रभाव से स्वर्गलोक में स्थान प्राप्त कर लिया है॥१०॥
वरिष्ठा सर्वनारीणामेषा च दिवि देवता।
रोहिणी न विना चन्द्रं मुहूर्तमपि दृश्यते॥११॥
‘सम्पूर्ण स्त्रियों में श्रेष्ठ यह स्वर्ग की देवी रोहिणी पतिसेवा के प्रभाव से ही एक मुहूर्त के लिये भी चन्द्रमा से बिलग होती नहीं देखी जाती॥ ११ ॥
एवंविधाश्च प्रवराः स्त्रियो भर्तृदृढव्रताः।
देवलोके महीयन्ते पुण्येन स्वेन कर्मणा ॥१२॥
‘इस प्रकार दृढ़तापूर्वक पातिव्रत्य-धर्म का पालन करने वाली बहुत-सी साध्वी स्त्रियाँ अपने पुण्यकर्म के बल से देवलोक में आदर पा रही हैं ॥१२॥
ततोऽनसूया संहृष्टा श्रुत्वोक्तं सीतया वचः।
शिरसाऽऽघ्राय चोवाच मैथिली हर्षयन्त्युत॥ १३॥
तदनन्तर सीता के कहे हुए वचन सुनकर अनसूया को बड़ा हर्ष हुआ। उन्होंने उनका मस्तक सूंघा और फिर उन मिथिलेशकुमारी का हर्ष बढ़ाते हुए इस प्रकार कहा
नियमैर्विविधैराप्तं तपो हि महदस्ति मे।
तत् संश्रित्य बलं सीते छन्दये त्वां शुचिव्रते॥ १४॥
‘उत्तम व्रत का पालन करने वाली सीते! मैंने अनेक प्रकार के नियमों का पालन करके बहुत बड़ी तपस्या संचित की है। उस तपोबल का ही आश्रय लेकर मैं तुमसे इच्छानुसार वर माँगने के लिये कहती हूँ॥१४॥
उपपन्नं च युक्तं च वचनं तव मैथिलि।
प्रीता चासम्युचितां सीते करवाणि प्रियं च किम्॥ १५॥
‘मिथिलेशकुमारी सीते! तुमने बहुत ही युक्तियुक्त और उत्तम वचन कहा है। उसे सुनकर मुझे बड़ा संतोष हुआ है, अतः बताओ मैं तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करूँ?’॥
तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा विस्मिता मन्दविस्मया।
कृतमित्यब्रवीत् सीता तपोबलसमन्विताम्॥ १६॥
उनका यह कथन सुनकर सीता को बड़ा आश्चर्य हुआ। वे तपोबलसम्पन्न अनसूया से मन्द-मन्द मुसकराती हुई बोलीं-‘आपने अपने वचनों द्वारा ही मेरा सारा प्रिय कार्य कर दिया, अब और कुछ करने की आवश्यकता नहीं है’।
सा त्वेवमुक्ता धर्मज्ञा तया प्रीततराभवत्।
सफलं च प्रहर्षं ते हन्त सीते करोम्यहम्॥१७॥
सीता के ऐसा कहने पर धर्मज्ञ अनसूया को बड़ी प्रसन्नता हुई। वे बोलीं-‘सीते! तुम्हारी निर्लोभता से जो मुझे विशेष हर्ष हुआ है (अथवा तुम में जो लोभहीनता के कारण सदा आनन्दोत्सव भरा रहता है), उसे मैं अवश्य सफल करूँगी॥१७॥
इदं दिव्यं वरं माल्यं वस्त्रमाभरणानि च।
अङ्गरागं च वैदेहि महार्हमनुलेपनम्॥१८॥
मया दत्तमिदं सीते तव गात्राणि शोभयेत्।
अनुरूपमसंक्लिष्टं नित्यमेव भविष्यति॥१९॥
‘यह सुन्दर दिव्य हार, यह वस्त्र, ये आभूषण, यह अङ्गराग और बहुमूल्य अनुलेपन मैं तुम्हें देती हूँ। विदेह-नन्दिनि सीते! मेरी दी हुई ये वस्तुएँ तुम्हारे अङ्गों की शोभा बढ़ायेंगी। ये सब तुम्हारे ही योग्य हैं
और सदा उपयोग में लायी जानेपर निर्दोष एवं निर्विकार रहेंगी॥
अङ्गरागेण दिव्येन लिप्ताङ्गी जनकात्मजे।
शोभयिष्यसि भर्तारं यथा श्रीविष्णुमव्ययम्॥ २०॥
‘जनककिशोरी! इस दिव्य अङ्गराग को अङ्गों में लगाकर तुम अपने पति को उसी प्रकार सुशोभित करोगी, जैसे लक्ष्मी अविनाशी भगवान् विष्णु की शोभा बढ़ाती है’।
सा वस्त्रमङ्गरागं च भूषणानि स्रजस्तथा।
मैथिली प्रतिजग्राह प्रीतिदानमनुत्तमम्॥२१॥
प्रतिगृह्य च तत् सीता प्रीतिदानं यशस्विनी।
श्लिष्टाञ्जलिपुटा धीरा समुपास्त तपोधनाम्॥ २२॥
अनसूया की आज्ञा से धीर स्वभाव वाली यशस्विनी मिथिलेशकुमारी सीता ने उस वस्त्र, अङ्गराग, आभूषण और हार को उनकी प्रसन्नता का परम उत्तम उपहार समझकर ले लिया। उस प्रेमोपहार को ग्रहण करके वे दोनों हाथ जोड़कर उन तपोधना अनसूया की सेवामें बैठी रहीं।
तथा सीतामुपासीनामनसूया दृढव्रता।
वचनं प्रष्टमारेभे कथां कांचिदनुप्रियाम्॥२३॥
तदनन्तर इस प्रकार अपने निकट बैठी हुई सीता से दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रत का पालन करने वाली अनसूया ने कोई परम प्रिय कथा सुनाने के लिये इस प्रकार पूछना आरम्भ किया— ॥ २३ ॥
स्वयंवरे किल प्राप्ता त्वमनेन यशस्विना।
राघवेणेति मे सीते कथा श्रतिमुपागता॥२४॥
‘सीते! इन यशस्वी राघवेन्द्र ने तुम्हें स्वयंवर में प्राप्त किया था, यह बात मेरे सुनने में आयी है॥ २४ ॥
तां कथां श्रोतुमिच्छामि विस्तरेण च मैथिलि।
यथाभूतं च कात्स्येन तन्मे त्वं वक्तुमर्हसि॥ २५॥
‘मिथिलेशनन्दिनि! मैं उस वृत्तान्त को विस्तार के साथ सुनना चाहती हूँ। अतः जो कुछ जिस प्रकार हुआ, वह सब पूर्ण रूप से मुझे बताओ’ ॥ २५ ॥
एवमुक्ता तु सा सीता तापसी धर्मचारिणीम्।
श्रूयतामिति चोक्त्वा वै कथयामास तां कथाम्॥ २६॥
उनके इस प्रकार आज्ञा देने पर सीता ने उन धर्मचारिणी तापसी अनसूया से कहा—’माताजी ! सुनिये।’ ऐसा कहकर उन्होंने उस कथा को इस प्रकार कहना आरम्भ किया
मिथिलाधिपतिर्वीरो जनको नाम धर्मवित्।
क्षत्रकर्मण्यभिरतो न्यायतः शास्ति मेदिनीम्॥ २७॥
‘मिथिला जनपद के वीर राजा ‘जनक’ नाम से प्रसिद्ध हैं। वे धर्म के ज्ञाता हैं, अतः क्षत्रियोचित कर्म में तत्पर रहकर न्यायपूर्वक पृथ्वी का पालन करते हैं ।। २७॥
तस्य लाङ्गलहस्तस्य कृषतः क्षेत्रमण्डलम्।
अहं किलोत्थिता भित्त्वा जगतीं नृपतेः सुता॥ २८॥
‘एक समय की बात है, वे यज्ञ के योग्य क्षेत्र को हाथ में हल लेकर जोत रहे थे; इसी समय मैं पृथ्वी को फाड़कर प्रकट हुई। इतने मात्र से ही मैं राजा जनक की पुत्री हुई।
स मां दृष्ट्वा नरपतिर्मुष्टिविक्षेपतत्परः।
पांसुगुण्ठितसर्वाङ्गीं विस्मितो जनकोऽभवत्॥ २९॥
‘वे राजा उस क्षेत्र में ओषधियों को मुट्ठी में लेकर बो रहे थे। इतने ही में उनकी दृष्टि मेरे ऊपर पड़ी। मेरे सारे अङ्गों में धूल लिपटी हुई थी। उस अवस्था में मुझे देखकर राजा जनक को बड़ा विस्मय हुआ॥ २९ ॥
अनपत्येन च स्नेहादङ्कमारोप्य च स्वयम्।
ममेयं तनयेत्युक्त्वा स्नेहो मयि निपातितः॥३०॥
‘उन दिनों उनके कोई दूसरी संतान नहीं थी, इसलिये स्नेहवश उन्होंने स्वयं मुझे गोद में ले लिया और ‘यह मेरी बेटी है’ ऐसा कहकर मुझ पर अपने हृदय का सारा स्नेह उड़ेल दिया॥ ३० ॥
अन्तरिक्षे च वागुक्ता प्रतिमामानुषी किल।
एवमेतन्नरपते धर्मेण तनया तव॥३१॥
‘इसी समय आकाशवाणी हुई, जो स्वरूपतःमानवी भाषा में कही गयी थी (अथवा मेरे विषय में प्रकट हुई वह वाणी अमानुषी दिव्य थी)। उसने कहा —’नरेश्वर! तुम्हारा कथन ठीक है, यह कन्या धर्मतः तुम्हारी ही पुत्री है’।
ततः प्रहृष्टो धर्मात्मा पिता मे मिथिलाधिपः।
अवाप्तो विपुलामृद्धिं मामवाप्य नराधिपः॥ ३२॥
‘यह आकाशवाणी सुनकर मेरे धर्मात्मा पिता मिथिला नरेश बड़े प्रसन्न हुए। मुझे पाकर उन नरेश ने मानो कोई बड़ी समृद्धि पा ली थी॥ ३२ ॥
दत्ता चास्मीष्टवद्देव्यै ज्येष्ठायै पुण्यकर्मणे।
तया सम्भाविता चास्मि स्निग्धया मातृसौहृदात्॥
‘उन्होंने पुण्यकर्मपरायणा बड़ी रानी को, जो उन्हें अधिक प्रिय थीं, मुझे दे दिया। उन स्नेहमयी महारानी ने मातृसमुचित सौहार्द से मेरा लालन-पालन किया॥ ३३॥
पतिसंयोगसुलभं वयो दृष्ट्वा तु मे पिता।
चिन्तामभ्यगमद् दीनो वित्तनाशादिवाधनः॥ ३४॥
‘जब पिता ने देखा कि मेरी अवस्था विवाह के योग्य हो गयी, तब इसके लिये वे बड़ी चिन्ता में पड़े। जैसे कमाये हुए धन का नाश हो जाने से निर्धन मनुष्य को बड़ा दुःख होता है, उसी प्रकार वे मेरे विवाह की चिन्ता से बहुत दुःखी हो गये॥ ३४॥
सदृशाच्चापकृष्टाच्च लोके कन्यापिता जनात्।
प्रधर्षणमवाप्नोति शक्रेणापि समो भुवि॥३५॥
‘संसार में कन्या के पिता को, वह भूतल पर इन्द्र के ही तुल्य क्यों न हो, वर पक्ष के लोगों से, वे अपने समान या अपने से छोटी हैसियत के ही क्यों न हों, प्रायः अपमान उठाना पड़ता है॥ ३५ ॥
तां धर्षणामदूरस्थां संदृश्यात्मनि पार्थिवः।
चिन्तार्णवगतः पारं नाससादाप्लवो यथा॥३६॥
‘वह अपमान सहन करने की घड़ी अपने लिये बहुत समीप आ गयी है, यह देखकर राजा चिन्ता के समुद्र में डूब गये। जैसे नौकारहित मनुष्य पार नहीं पहुँच पाता, उसी प्रकार मेरे पिता भी चिन्ता का पार नहीं पा रहे थे।
अयोनिजां हि मां ज्ञात्वा नाध्यगच्छत् स चिन्तयन्।
सदृशं चाभिरूपं च महीपालः पतिं मम॥३७॥
‘मुझे अयोनिजा कन्या समझकर वे भूपाल मेरे लिये योग्य और परम सुन्दर पति का विचार करने लगे; किंतु किसी निश्चय पर नहीं पहुँच सके॥३७॥
तस्य बुद्धिरियं जाता चिन्तयानस्य संततम्।
स्वयंवरं तनूजायाः करिष्यामीति धर्मतः॥३८॥
‘सदा मेरे विवाह की चिन्ता में पड़े रहने वाले उन महाराज के मन में एक दिन यह विचार उत्पन्न हुआ कि मैं धर्मतः अपनी पुत्री का स्वयं वर करूँगा॥ ३८ ॥
महायज्ञे तदा तस्य वरुणेन महात्मना।
दत्तं धनुर्वरं प्रीत्या तूणी चाक्षय्यसायकौ॥ ३९॥
‘उन्हीं दिनों उनके एक महान् यज्ञ में प्रसन्न होकर महात्मा वरुण ने उन्हें एक श्रेष्ठ दिव्य धनुष तथा अक्षय बाणों से भरे हुए दो तरकस दिये॥ ३९ ॥
असंचाल्यं मनुष्यैश्च यत्नेनापि च गौरवात्।
तन्न शक्ता नमयितुं स्वप्नेष्वपि नराधिपाः॥४०॥
‘वह धनुष इतना भारी था कि मनुष्य पूरा प्रयत्न करने पर भी उसे हिला भी नहीं पाते थे। भूमण्डल के नरेश स्वप्न में भी उस धनुष को झुकाने में असमर्थ थे। ४०॥
तद्धनुः प्राप्य मे पित्रा व्याहृतं सत्यवादिना।
समवाये नरेन्द्राणां पूर्वमामन्त्र्य पार्थिवान्॥४१॥
‘उस धनुष को पाकर मेरे सत्यवादी पिता ने पहले भूमण्डल के राजाओं को आमन्त्रित करके उन नरेशों के समूहमें यह बात कही— ॥४१॥
इदं च धनुरुद्यम्य सज्यं यः कुरुते नरः।
तस्य मे दुहिता भार्या भविष्यति न संशयः॥ ४२॥
‘जो मनुष्य इस धनुष को उठाकर इस पर प्रत्यञ्चा चढ़ा देगा, मेरी पुत्री सीता उसी की पत्नी होगी; इसमें संशय नहीं है॥४२॥
तच्च दृष्ट्वा धनुःश्रेष्ठं गौरवाद् गिरिसंनिभम्।
अभिवाद्य नृपा जग्मुरशक्तास्तस्य तोलने॥४३॥
‘अपने भारीपन के कारण पहाड़-जैसे प्रतीत होने वाले उस श्रेष्ठ धनुष को देखकर वहाँ आये हुए राजा जब उसे उठाने में समर्थ न हो सके, तब उसे प्रणाम करके चले गये॥
सुदीर्घस्य तु कालस्य राघवोऽयं महाद्युतिः।
विश्वामित्रेण सहितो यज्ञं द्रष्टुं समागतः॥४४॥
लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा रामः सत्यपराक्रमः।
विश्वामित्रस्तु धर्मात्मा मम पित्रा सुपूजितः॥ ४५॥
‘तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् ये महातेजस्वी रघुकुल-नन्दन सत्यपराक्रमी श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण को साथ ले विश्वामित्रजी के साथ मेरे पिताका यज्ञ देखने के लिये मिथिला में पधारे। उस समय मेरे पिताने धर्मात्मा विश्वामित्र मुनि का बड़ा आदरसत्कार किया॥ ४४-४५॥
प्रोवाच पितरं तत्र राघवौ रामलक्ष्मणौ।
सुतौ दशरथस्येमौ धनुर्दर्शनकांक्षिणौ।
धनुर्दर्शय रामाय राजपुत्राय दैविकम्॥४६॥
‘तब वहाँ विश्वामित्रजी मेरे पिता से बोले —’राजन्! ये दोनों रघुकुलभूषण श्रीराम और लक्ष्मण महाराज दशरथ के पुत्र हैं और आपके उस दिव्य धनुष का दर्शन करना चाहते हैं। आप अपना वह देवप्रदत्त धनुष राजकुमार श्रीराम को दिखाइये’। ४६॥
इत्युक्तस्तेन विप्रेण तद् धनुः समुपानयत्।
तद् धनुर्दर्शयामास राजपुत्राय दैविकम्॥४७॥
‘विप्रवर विश्वामित्र के ऐसा कहने पर पिताजी ने उस दिव्य धनुष को मँगवाया और राजकुमार श्रीराम को उसे दिखाया॥४७॥
निमेषान्तरमात्रेण तदानम्य महाबलः।
ज्यां समारोप्य झटिति पूरयामास वीर्यवान्॥ ४८॥
‘महाबली और परम पराक्रमी श्रीराम ने पलक मारते-मारते उस धनुष पर प्रत्यञ्चा चढ़ा दी और उसे तुरंत कान तक खींचा॥ ४८॥
तेनापूरयता वेगान्मध्ये भग्नं द्विधा धनुः।
तस्य शब्दोऽभवद् भीमः पतितस्याशनेर्यथा॥ ४९॥
“उनके वेगपूर्वक खींचते समय वह धनुष बीच से ही टूट गया और उसके दो टुकड़े हो गये। उसके टूटते समय ऐसा भयंकर शब्द हुआ मानो वहाँ वज्र टूट पड़ा हो॥ ४९॥
ततोऽहं तत्र रामाय पित्रा सत्याभिसंधिना।
उद्यता दातुमुद्यम्य जलभाजनमुत्तमम्॥५०॥
‘तब मेरे सत्यप्रतिज्ञ पिताने जल का उत्तम पात्र लेकर श्रीराम के हाथ में मुझे दे देने का उद्योग किया। ५०॥
दीयमानां न तु तदा प्रतिजग्राह राघवः।
अविज्ञाय पितुश्छन्दमयोध्याधिपतेः प्रभोः॥ ५१॥
‘उस समय अपने पिता अयोध्यानरेश महाराज दशरथ के अभिप्राय को जाने बिना श्रीराम ने राजा जनक के देने पर भी मुझे नहीं ग्रहण किया॥५१॥
ततः श्वशुरमामन्त्र्य वृद्धं दशरथं नृपम्।
मम पित्रा त्वहं दत्तां रामाय विदितात्मने॥५२॥
‘तदनन्तर मेरे बूढ़े श्वशुर राजा दशरथ की अनुमति लेकर पिताजी ने आत्मज्ञानी श्रीराम को मेरा दान कर दिया॥५२॥
मम चैवानुजा साध्वी ऊर्मिला शुभदर्शना।
भार्यार्थे लक्ष्मणस्यापि दत्ता पित्रा मम स्वयम्॥ ५३॥
‘तत्पश्चात् पिताजी ने स्वयं ही मेरी छोटी बहिन सती साध्वी परम सुन्दरी ऊर्मिला को लक्ष्मण की पत्नी रूप से उनके हाथ में दे दिया॥५३॥
एवं दत्तास्मि रामाय तथा तस्मिन् स्वयंवरे।
अनुरक्तास्मि धर्मेण पतिं वीर्यवतां वरम्॥५४॥
‘इस प्रकार उस स्वयंवर में पिताजी ने श्रीराम के हाथ में मुझको सौंपा था। मैं धर्म के अनुसार अपने पति बलवानों में श्रेष्ठ श्रीराम में सदा अनुरक्त रहती हूँ’॥ ५४॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टादशाधिकशततमः सर्गः॥११८॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में एक सौ अठारहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११८॥
सर्ग-119
अनसूया तु धर्मज्ञा श्रुत्वा तां महतीं कथाम्।
पर्यष्वजत बाहुभ्यां शिरस्याघ्राय मैथिलीम्॥१॥
धर्म को जानने वाली अनसूया ने उस लंबी कथा को सुनकर मिथिलेशकुमारी सीता को अपनी दोनों भुजाओं से अङ्क में भर लिया और उनका मस्तक सूंघकर कहा
व्यक्ताक्षरपदं चित्रं भाषितं मधुरं त्वया।
यथा स्वयंवरं वृत्तं तत् सर्वं च श्रुतं मया॥२॥
‘बेटी! तुमने सुस्पष्ट अक्षर वाले शब्दों में यह विचित्र एवं मधुर प्रसङ्ग सुनाया। तुम्हारा स्वयंवर जिस प्रकार हुआ था, वह सब मैंने सुन लिया॥२॥
रमेयं कथया ते तु दृढं मधुरभाषिणि।
रविरस्तं गतः श्रीमानुपोह्य रजनीं शुभाम्॥३॥
दिवसं परिकीर्णानामाहारार्थं पतत्त्रिणाम्।
संध्याकाले निलीनानां निद्रार्थं श्रूयते ध्वनिः॥ ४॥
‘मधुरभाषिणी सीते! तुम्हारी इस कथा में मेरा मन बहुत लग रहा है; तथापि तेजस्वी सूर्यदेव रजनी की शुभ वेला को निकट पहुँचाकर अस्त हो गये। जो दिन में चारा चुगने के लिये चारों ओर छिटके हुए थे, वे पक्षी अब संध्याकाल में नींद लेने के लिये अपने घोंसलों में आकर छिप गये हैं; उनकी यह ध्वनि सुनायी दे रही है।
एते चाप्यभिषेकार्द्रा मुनयः कलशोद्यताः।
सहिता उपवर्तन्ते सलिलाप्लुतवल्कलाः॥५॥
‘ये जल से भीगे हुए वल्कल धारण करने वाले मुनि, जिनके शरीर स्नान के कारण आर्द्र दिखायी देते हैं, जलसे भरे कलश उठाये एक साथ आश्रम की ओर लौट रहे हैं।॥ ५ ॥
अग्निहोत्रे च ऋषिणा हुते च विधिपूर्वकम्।
कपोताङ्गारुणो धूमो दृश्यते पवनोद्धतः॥६॥
‘महर्षि (अत्रि) ने विधिपूर्वक अग्निहोत्र-सम्बन्धी होमकर्म सम्पन्न कर लिया है, अतः वायु के वेग से ऊपर को उठा हुआ यह कबूतर के कण्ठ की भाँति श्यामवर्ण का धूम दिखायी दे रहा है॥६॥
अल्पवर्णा हि तरवो घनीभूताः समन्ततः।
विप्रकृष्टेन्द्रिये देशे न प्रकाशन्ति वै दिशः॥७॥
‘अपनी इन्द्रियों से दूर देश में चारों ओर जो वृक्ष दिखायी देते हैं, वे थोड़े पत्तेवाले होने पर भी अन्धकार से व्याप्त हो घनीभूत हो गये हैं; अतएव दिशाओं का भान नहीं हो रहा है ॥७॥
रजनीचरसत्त्वानि प्रचरन्ति समन्ततः।
तपोवनमृगा ह्येते वेदितीर्थेषु शेरते॥८॥
‘रात को विचरने वाले प्राणी (उल्लू आदि) सब ओर विचरण कर रहे हैं तथा ये तपोवन के मृग पुण्यक्षेत्र स्वरूप आश्रम के वेदी आदि विभिन्न प्रदेशों में सो रहे हैं।॥ ८॥
सम्प्रवृत्ता निशा सीते नक्षत्रसमलंकृता।
ज्योत्स्नाप्रावरणश्चन्द्रो दृश्यतेऽभ्युदितोऽम्बरे॥
‘सीते! अब रात हो गयी, वह नक्षत्रों से सज गयी है। आकाश में चन्द्रदेव चाँदनी की चादर ओढ़े उदित दिखायी देते हैं॥९॥
गम्यतामनुजानामि रामस्यानुचरी भव।
कथयन्त्या हि मधुरं त्वयाहमपि तोषिता॥१०॥
‘अतः अब जाओ, मैं तुम्हें जाने की आज्ञा देती हूँ। जाकर श्रीरामचन्द्रजी की सेवा में लग जाओ। तुमने अपनी मीठी-मीठी बातों से मुझे भी बहुत संतुष्ट किया है॥१०॥
अलंकुरु च तावत् त्वं प्रत्यक्षं मम मैथिलि।
प्रीतिं जनय मे वत्से दिव्यालंकारशोभिनी॥११॥
‘बेटी! मिथिलेशकुमारी! पहले मेरी आँखों के सामने अपने-आपको अलंकृत करो। इन दिव्य वस्त्र और आभूषणों को धारण करके इनसे सुशोभित हो मुझे प्रसन्न करो’॥
सा तदा समलंकृत्य सीता सुरसुतोपमा।
प्रणम्य शिरसा पादौ रामं त्वभिमुखी ययौ॥ १२॥
यह सुनकर देवकन्या के समान सुन्दरी सीता ने उस समय उन वस्त्राभूषणों से अपना शृङ्गार किया और अनसूया के चरणों में सिर झुकाकर प्रणाम करने के अनन्तर वे श्रीराम के सम्मुख गयीं॥ १२ ॥
तथा तु भूषितां सीतां ददर्श वदतां वरः।
राघवः प्रीतिदानेन तपस्विन्या जहर्ष च॥१३॥
श्रीराम ने जब इस प्रकार सीता को वस्त्र और आभूषणों से विभूषित देखा, तब तपस्विनी अनसूया के उस प्रेमोपहार के दर्शन से वक्ताओं में श्रेष्ठ श्रीरघुनाथजी को बड़ी प्रसन्नता हुई॥ १३॥
न्यवेदयत् ततः सर्वं सीता रामाय मैथिली।
प्रीतिदानं तपस्विन्या वसनाभरणस्रजाम्॥१४॥
उस समय मिथिलेशकुमारी सीता ने तपस्विनी अनसूया के हाथ से जिस प्रकार वस्त्र, आभूषण और हार आदि का प्रेमोपहार प्राप्त हुआ था, वह सब श्रीरामचन्द्रजी से कह सुनाया।॥ १४ ॥
प्रहृष्टस्त्वभवद् रामो लक्ष्मणश्च महारथः।
मैथिल्याः सत्क्रियां दृष्ट्वा मानुषेषु सुदुर्लभाम्॥
भगवान् श्रीराम और महारथी लक्ष्मण सीता का वह सत्कार, जो मनुष्यों के लिये सर्वथा दुर्लभ है, देखकर बहुत प्रसन्न हुए॥ १५ ॥
ततः स शर्वरीं प्रीतः पुण्यां शशिनिभाननाम्।
अर्चितस्तापसैः सर्वैरुवास रघुनन्दनः॥१६॥
तदनन्तर समस्त तपस्विजनों से सम्मानित हुए रघुकुलनन्दन श्रीराम ने अनसूया के दिये हुए पवित्र अलंकार आदि से अलंकृत चन्द्रमुखी सीता को देखकर बड़ी प्रसन्नता के साथ वहाँ रात्रिभर निवास किया॥१६॥
तस्यां रात्र्यां व्यतीतायामभिषिच्य हुताग्निकान्।
आपृच्छेतां नरव्याघ्रौ तापसान् वनगोचरान्॥ १७॥
वह रात बीतने पर जब सभी वनवासी तपस्वी मुनि स्नान करके अग्निहोत्र कर चुके, तब पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मण ने उनसे जाने के लिये आज्ञा माँगी॥ १७॥
तावूचुस्ते वनचरास्तापसा धर्मचारिणः।
वनस्य तस्य संचारं राक्षसैः समभिप्लुतम्॥१८॥
रक्षांसि पुरुषादानि नानारूपाणि राघव।
वसन्त्यस्मिन् महारण्ये व्यालाश्च रुधिराशनाः॥ १९॥
तब वे धर्मपरायण वनवासी तपस्वी उन दोनों भाइयों से इस प्रकार बोले—’रघुनन्दन! इस वन का मार्ग राक्षसों से आक्रान्त है—यहाँ उनका उपद्रव होता रहता है। इस विशाल वन में नानारूपधारी नरभक्षी राक्षस तथा रक्तभोजी हिंसक पशु निवास करते हैं। १८-१९॥
उच्छिष्टं वा प्रमत्तं वा तापसं ब्रह्मचारिणम्।
अदन्त्यस्मिन् महारण्ये तान् निवारय राघव॥ २०॥
‘राघवेन्द्र ! जो तपस्वी और ब्रह्मचारी यहाँ अपवित्र अथवा असावधान अवस्था में मिल जाता है, उसे वे राक्षस और हिंसक जन्तु इस महान् वन में खा जाते हैं; अतः आप उन्हें रोकिये—यहाँ से मार भगाइये।२०॥
एष पन्था महर्षीणां फलान्याहरतां वने।
अनेन तु वनं दुर्गं गन्तुं राघव ते क्षमम्॥२१॥
‘रघुकुलभूषण! यही वह मार्ग है, जिससे महर्षि लोग वन के भीतर फल-मूल लेने के लिये जाते हैं। आपको भी इसी मार्ग से इस दुर्गम वन में प्रवेश करना चाहिये’॥ २१॥
इतीरितः प्राञ्जलिभिस्तपस्विभिर्द्विजैः कृतस्वस्त्ययनः परंतपः।
वनं सभार्यः प्रविवेश राघवः सलक्ष्मणः सूर्य इवाभ्रमण्डलम्॥२२॥
तपस्वी ब्राह्मणों ने हाथ जोड़कर जब ऐसी बातें कहीं और उनकी मङ्गलयात्रा के लिये स्वस्तिवाचन किया, तब शत्रुओं को संताप देने वाले भगवान् श्रीराम ने अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ उस वन में प्रवेश किया, मानो सूर्यदेव मेघों की घटा के भीतर घुस गये हों॥ २२॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकोनविंशत्यधिकशततमः सर्गः॥११९॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में एक सौ उन्नीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११९॥
। अयोध्याकाण्डं सम्पूर्णम् ।