॥श्री गणेशाय नम:॥
॥श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
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सम्पूर्ण वाल्मीकि रामायण
[काव्य बीजं सनातनम्]

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अयोध्याकाण्डम्

प्रातःकाल के मङ्गलवाद्य-घोष को सुनकर भरत का दुःखी होना और उसे बंद कराकर विलाप करना, वसिष्ठजी का सभा में आकर मन्त्री आदि को बुलाने के लिये दूत भेजना

एकाशीतितमः सर्गः 

सर्ग-81


ततो नान्दीमुखीं रात्रिं भरतं सूतमागधाः।

तुष्टुवुः सविशेषज्ञाः स्तवैर्मङ्गलसंस्तवैः॥१॥

इधर अयोध्या में उस अभ्युदयसूचक रात्रि का थोड़ा-सा ही भाग अवशिष्ट देख स्तुति-कलाके विशेषज्ञ सूत और मागधों ने मङ्गलमयी स्तुतियों द्वारा भरत का स्तवन आरम्भ किया॥१॥

सुवर्णकोणाभिहतः प्राणदद्यामदुन्दुभिः।

दध्मुः शङ्खांश्च शतशो वाद्यांश्चोच्चावचस्वरान्॥ २॥

प्रहरकी समाप्ति को सूचित करने वाली दुन्दुभि सोने के डंडे से आहत होकर बज उठी। बाजे बजाने वालों ने शङ्ख तथा दूसरे-दूसरे नाना प्रकार के सैकड़ों बाजे बजाये॥२॥

स तूर्यघोषः सुमहान् दिवमापूरयन्निव।

भरतं शोकसंतप्तं भूयः शोकैररन्धयत्॥३॥

वाद्यों का वह महान् तुमुल घोष समस्त आकाश को व्याप्त करता हुआ-सा गूंज उठा और शोकसंतप्त भरत को पुनः शोकाग्नि की आँच से राँध ने लगा॥३॥

ततः प्रबुद्धो भरतस्तं घोषं संनिवर्त्य च।

नाहं राजेति चोक्त्वा तं शत्रुघ्नमिदमब्रवीत्॥४॥

वाद्यों की उस ध्वनि से भरत की नींद खुल गयी; वे जाग उठे और ‘मैं राजा नहीं हूँ’ ऐसा कहकर उन्होंने उन बाजों का बजना बंद करा दिया। तत्पश्चात् वे शत्रुघ्न से बोले

पश्य शत्रुघ्न कैकेय्या लोकस्यापकृतं महत्।

विसृज्य मयि दुःखानि राजा दशरथो गतः॥५॥

‘शत्रुघ्न! देखो तो सही, कैकेयी ने जगत् का कितना महान् अपकार किया है। महाराज दशरथ मुझ पर बहुत-से दुःखों का बोझ डालकर स्वर्गलोक को चले गये॥५॥

तस्यैषा धर्मराजस्य धर्ममूला महात्मनः।

परिभ्रमति राजश्रीनौरिवाकर्णिका जले॥६॥

‘आज उन धर्मराज महामना नरेश की यह धर्ममूला राजलक्ष्मी जल में पड़ी हुई बिना नाविक की नौका के समान इधर-उधर डगमगा रही है॥६॥

यो हि नः सुमहान् नाथः सोऽपि प्रव्राजितो वने।

अनया धर्ममुत्सृज्य मात्रा मे राघवः स्वयम्॥७॥

‘जो हमलोगों के सबसे बड़े स्वामी और संरक्षक हैं, उन श्रीरघुनाथजी को भी स्वयं मेरी इस माता ने धर्म को तिलाञ्जलि देकर वन में भेज दिया’ ॥ ७॥

इत्येवं भरतं वीक्ष्य विलपन्तमचेतनम्।

कृपणा रुरुदुः सर्वाः सुस्वरं योषितस्तदा ॥८॥

उस समय भरत को इस प्रकार अचेत हो-होकर विलाप करते देख रनिवास की सारी स्त्रियाँ दीनभाव से फूट-फूटकर रोने लगीं॥ ८॥

तथा तस्मिन् विलपति वसिष्ठो राजधर्मवित्।

सभामिक्ष्वाकुनाथस्य प्रविवेश महायशाः॥९॥

जब भरत इस प्रकार विलाप कर रहे थे, उसी समय राजधर्म के ज्ञाता महायशस्वी महर्षि वसिष्ठ ने इक्ष्वाकुनाथ राजा दशरथ के सभाभवन में प्रवेश किया॥९॥

शातकुम्भमयीं रम्यां मणिहेमसमाकुलाम्।

सुधर्मामिव धर्मात्मा सगणः प्रत्यपद्यत॥१०॥

स काञ्चनमयं पीठं स्वस्त्यास्तरणसंवृतम्।

अध्यास्त सर्ववेदज्ञो दूताननुशशास च॥११॥

वह सभाभवन अधिकांश सुवर्ण का बना हुआ था। उसमें सोने के खम्भे लगे थे। वह रमणीय सभा देवताओं की सुधर्मा सभा के समान शोभा पाती थी। सम्पूर्ण वेदों के ज्ञाता धर्मात्मा वसिष्ठ ने अपने शिष्यगण के साथ उस सभा में पदार्पण किया और सुवर्णमय पीठ पर जो स्वस्तिका कार बिछौने से ढका हुआ था, वे विराजमान हुए। आसन ग्रहण करने के पश्चात् उन्होंने दूतों को आज्ञा दी— ॥ १०-११।।

ब्राह्मणान् क्षत्रियान् योधानमात्यान् गणवल्लभान्।

क्षिप्रमानयताव्यग्राः कृत्यमात्ययिकं हि नः॥ १२॥

सराजपुत्रं शत्रुघ्नं भरतं च यशस्विनम्।

युधाजितं सुमन्त्रं च ये च तत्र हिता जनाः॥ १३॥

‘तुमलोग शान्तभाव से जाकर ब्राह्मणों, क्षत्रियों, योद्धाओं, अमात्यों और सेनापतियों को शीघ्र बुला लाओ। अन्य राजकुमारों के साथ यशस्वी भरत और शत्रुघ्न को, मन्त्री युधाजित् और सुमन्त्र को तथा और भी जो हितैषी पुरुष वहाँ हों उन सबको शीघ्र बुलाओ। हमें उनसे बहुत ही आवश्यक कार्य है’। १२-१३॥

ततो हलहलाशब्दो महान् समुदपद्यत।

रथैरश्वैर्गजैश्चापि जनानामुपगच्छताम्॥१४॥

तदनन्तर घोड़े, हाथी और रथों से आने वाले लोगों का महान् कोलाहल आरम्भ हुआ॥१४॥

ततो भरतमायान्तं शतक्रतुमिवामराः।

प्रत्यनन्दन् प्रकृतयो यथा दशरथं तथा॥१५॥

तत्पश्चात् जैसे देवता इन्द्र का अभिनन्दन करते हैं, उसी प्रकार समस्त प्रकृतियों (मन्त्री-प्रजा आदि) ने आते हुए भरत का राजा दशरथ की ही भाँति अभिनन्दन किया॥

ह्रद इव तिमिनागसंवृतः स्तिमितजलो मणिशङ्खशर्करः।

दशरथसुतशोभिता सभा सदशरथेव बभूव सा पुरा॥१६॥

तिमि नामक महान् मत्स्य और जलहस्ती से युक्त, स्थिर जलवाले तथा मुक्ता आदि मणियों से युक्त शङ्खऔर बालुका वाले समुद्र के जलाशय की भाँति वह सभा दशरथ पुत्र भरत से सुशोभित होकर वैसी ही शोभा पाने लगी, जैसे पूर्वकाल में राजा दशरथ की उपस्थिति से शोभा पाती थी* ॥ १६॥

* यहाँ सभा उपमेय और ह्रद (जलाशय) उपमान है। जलाशय के जो विशेषण दिये गये हैं, वे सभा में इस प्रकार संगत होते हैं—सभा में तिमि और जलहस्ती के चित्र लगे हैं। स्थिर जल की जगह उसमें स्थिर तेज है, खम्भों में मणियाँ जड़ी गयी हैं, शङ्ख के चित्र हैं तथा फर्श में सोने का लेप लगा है, जो स्वर्णबालु का-सा प्रतीत होता है।

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकाशीतितमः सर्गः॥ ८१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में इक्यासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥८१॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अयोध्याकाण्डम्

वसिष्ठजी का भरत को राज्य पर अभिषिक्त होने के लिये आदेश देना,भरत का उसे अनुचित बताकर श्रीराम को लाने के लिये वन में चलने की तैयारी का आदेश देना

द्वयशीतितमः सर्गः 

सर्ग-82


तामार्यगणसम्पूर्णां भरतः प्रग्रहां सभाम्।

ददर्श बुद्धिसम्पन्नः पूर्णचन्द्रां निशामिव॥१॥

बुद्धिमान् भरत ने उत्तम ग्रह-नक्षत्रों से सुशोभित और पूर्ण चन्द्रमण्डल से प्रकाशित रात्रि की भाँति उस सभा को देखा। वह श्रेष्ठ पुरुषों की मण्डली से भरी-पूरी तथा वसिष्ठ आदि श्रेष्ठ मुनियों की उपस्थिति से शोभायमान थी॥१॥

आसनानि यथान्यायमार्याणां विशतां तदा।

वस्त्राङ्गरागप्रभया द्योतिता सा सभोत्तमा॥२॥

उस समय यथायोग्य आसनों पर बैठे हुए आर्य पुरुषों के वस्त्रों तथा अङ्गरागों की प्रभा से वह उत्तम सभा अधिक दीप्तिमती हो उठी थी॥२॥

सा विद्वज्जनसम्पूर्णा सभा सुरुचिरा तथा।

अदृश्यत घनापाये पूर्णचन्द्रेव शर्वरी॥३॥

जैसे वर्षाकाल व्यतीत होने पर शरद्-ऋतु की पूर्णिमा को पूर्ण चन्द्रमण्डल से अलंकृत रजनी बड़ी मनोहर दिखायी देती है, उसी प्रकार विद्वानों के समुदाय से भरी हुई वह सभा बड़ी सुन्दर दिखायी देती थी॥३॥

राज्ञस्तु प्रकृतीः सर्वाः स सम्प्रेक्ष्य च धर्मवित् ।

इदं पुरोहितो वाक्यं भरतं मृदु चाब्रवीत्॥४॥

उस समय धर्म के ज्ञाता पुरोहित वसिष्ठजी ने राजा की सम्पूर्ण प्रकृतियों को उपस्थित देख भरत से यह मधुर वचन कहा— ॥४॥

तात राजा दशरथः स्वर्गतो धर्ममाचरन्।

धनधान्यवतीं स्फीतां प्रदाय पृथिवीं तव॥५॥

‘तात! राजा दशरथ यह धन-धान्य से परिपूर्ण समृद्धिशालिनी पृथिवी तुम्हें देकर स्वयं धर्म का आचरण करते हुए स्वर्गवासी हुए हैं ॥ ५ ॥

रामस्तथा सत्यवृत्तिः सतां धर्ममनुस्मरन्।

नाजहात् पितुरादेशं शशी ज्योत्स्नामिवोदितः॥ ६॥

‘सत्यपूर्ण बर्ताव करने वाले श्रीरामचन्द्रजी ने सत्पुरुषों के धर्म का विचार करके पिताकी आज्ञा का उसी प्रकार उल्लङ्घन नहीं किया, जैसे उदित चन्द्रमा अपनी चाँदनी को नहीं छोड़ता है॥६॥

पित्रा भ्रात्रा च ते दत्तं राज्यं निहतकण्टकम्।

तद् भुक्ष्व मुदितामात्यः क्षिप्रमेवाभिषेचय॥ ७॥

उदीच्याश्च प्रतीच्याश्च दाक्षिणात्याश्च केवलाः।

कोट्यापरान्ताः सामुद्रा रत्नान्युपहरन्तु ते॥८॥

‘इस प्रकार पिता और ज्येष्ठ भ्राता—दोनों ने ही तुम्हें यह अकण्टक राज्य प्रदान किया है। अतः तुम मन्त्रियों को प्रसन्न रखते हुए इसका पालन करो और शीघ्र ही अपना अभिषेक करा लो। जिससे उत्तर, पश्चिम, दक्षिण, पूर्व और अपरान्त देश के निवासी राजा तथा समुद्र में जहाजों द्वारा व्यापार करने वाले व्यवसायी तुम्हें असंख्य रत्न प्रदान करें। ७-८॥

तच्छ्रुत्वा भरतो वाक्यं शोकेनाभिपरिप्लुतः।

जगाम मनसा रामं धर्मज्ञो धर्मकांक्षया॥९॥

यह बात सुनकर धर्मज्ञ भरत शोक में डूब गये और धर्मपालन की इच्छा से उन्होंने मन-ही-मन श्रीराम की शरण ली॥ ९॥

सबाष्पकलया वाचा कलहंसस्वरो युवा।

विललाप सभामध्ये जगहें च पुरोहितम्॥१०॥

नवयुवक भरत उस भरी सभा में आँसू बहाते हुए गद्गद वाणी द्वारा कलहंस के समान मधुर स्वर से विलाप करने और पुरोहितजी को उपालम्भ देने लगे – ॥१०॥

चरितब्रह्मचर्यस्य विद्यास्नातस्य धीमतः।

धर्मे प्रयतमानस्य को राज्यं मद्विधो हरेत्॥११॥

‘गुरुदेव! जिन्होंने ब्रह्मचर्य का पालन किया, जो सम्पूर्ण विद्याओं में निष्णात हुए तथा जो सदा ही धर्म के लिये प्रयत्नशील रहते हैं, उन बुद्धिमान् श्रीरामचन्द्रजी के राज्य का मेरे-जैसा कौन मनुष्य अपहरण कर सकता है ? ॥ ११॥

कथं दशरथाज्जातो भवेद् राज्यापहारकः।

राज्यं चाहं च रामस्य धर्मं वक्तुमिहार्हसि ॥१२॥

‘महाराज दशरथ का कोई भी पुत्र बड़े भाई के राज्य का अपहरण कैसे कर सकता है? यह राज्य और मैं दोनों ही श्रीराम के हैं; यह समझकर आपको इस सभा में धर्मसंगत बात कहनी चाहिये (अन्याययुक्त नहीं)॥

ज्येष्ठः श्रेष्ठश्च धर्मात्मा दिलीपनहुषोपमः।

लब्धुमर्हति काकुत्स्थो राज्यं दशरथो यथा॥ १३॥

‘धर्मात्मा श्रीराम मुझसे अवस्था में बड़े और गुणों में भी श्रेष्ठ हैं। वे दिलीप और नहुष के समान तेजस्वी हैं; अतः महाराज दशरथ की भाँति वे ही इस राज्य को पाने के अधिकारी हैं॥ १३॥

अनार्यजुष्टमस्वयं कुर्यां पापमहं यदि।

इक्ष्वाकूणामहं लोके भवेयं कुलपांसनः॥१४॥

‘पाप का आचरण तो नीच पुरुष करते हैं। वह मनुष्य को निश्चय ही नरक में डालने वाला है। यदि श्रीरामचन्द्रजी का राज्य लेकर मैं भी पापाचरण करूँ तो संसार में इक्ष्वाकुकुल का कलंक समझा जाऊँगा॥ १४॥

यद्धि मात्रा कृतं पापं नाहं तदपि रोचये।

इहस्थो वनदुर्गस्थं नमस्यामि कृताञ्जलिः॥१५॥

‘मेरी माता ने जो पाप किया है, उसे मैं कभी पसंद नहीं करता; इसीलिये यहाँ रहकर भी मैं दुर्गम वन में निवास करने वाले श्रीरामचन्द्रजी को हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ॥ १५ ॥

राममेवानुगच्छामि स राजा द्विपदां वरः।

त्रयाणामपि लोकानां राघवो राज्यमर्हति॥१६॥

‘मैं श्रीराम का ही अनुसरण करूँगा। मनुष्यों में श्रेष्ठ श्रीरघुनाथजी ही इस राज्य के राजा हैं। वे तीनों ही लोकों के राजा होने योग्य हैं ॥ १६॥

तद्वाक्यं धर्मसंयुक्तं श्रुत्वा सर्वे सभासदः।

हर्षान्मुमुचुरश्रूणि रामे निहितचेतसः॥ १७॥

भरत का वह धर्मयुक्त वचन सुनकर सभी सभासद् श्रीराम में चित्त लगाकर हर्ष के आँसू बहाने लगे। १७॥

यदि त्वार्यं न शक्ष्यामि विनिवर्तयितुं वनात्।

वने तत्रैव वत्स्यामि यथार्यो लक्ष्मणस्तथा॥१८॥

भरत ने फिर कहा—’यदि मैं आर्य श्रीराम को वन से न लौटा सकूँगा तो स्वयं भी नरश्रेष्ठ लक्ष्मण की भाँति वहीं निवास करूँगा॥ १८॥

सर्वोपायं तु वर्तिष्ये विनिवर्तयितुं बलात्।

समक्षमार्यमिश्राणां साधूनां गुणवर्तिनाम्॥१९॥

‘मैं आप सभी सद्गुणयुक्त बर्ताव करने वाले पूजनीय श्रेष्ठ सभासदों के समक्ष श्रीरामचन्द्रजी को बलपूर्वक लौटा लाने के लिये सारे उपायों से चेष्टा करूँगा॥ १९॥

विष्टिकान्तिकाः सर्वे मार्गशोधकदक्षकाः।

प्रस्थापिता मया पूर्वं यात्रा च मम रोचते॥२०॥

‘मैंने मार्गशोधन में कुशल सभी अवैतनिक तथा वेतनभोगी कार्यकर्ताओं को पहले ही यहाँ से भेज दिया है। अतः मुझे श्रीरामचन्द्रजी के पास चलना ही अच्छा जान पड़ता है’ ॥ २०॥

एवमुक्त्वा तु धर्मात्मा भरतो भ्रातृवत्सलः।

समीपस्थमुवाचेदं सुमन्त्रं मन्त्रकोविदम्॥२१॥

सभासदों से ऐसा कहकर भ्रातृवत्सल धर्मात्मा भरत पास बैठे हुए मन्त्रवेत्ता सुमन्त्र से इस प्रकार बोले-॥

तूर्णमुत्थाय गच्छ त्वं सुमन्त्र मम शासनात्।

यात्रामाज्ञापय क्षिप्रं बलं चैव समानय॥२२॥

‘सुमन्त्रजी! आप जल्दी उठकर जाइये और मेरी आज्ञा से सबको वन में चलने का आदेश सूचित कर दीजिये और सेना को भी शीघ्र ही बुला भेजिये’। २२॥

एवमुक्तः सुमन्त्रस्तु भरतेन महात्मना।

प्रहृष्टः सोऽदिशत् सर्वं यथासंदिष्टमिष्टवत्॥२३॥

महात्मा भरत के ऐसा कहने पर सुमन्त्र ने बड़े हर्ष के साथ सबको उनके कथनानुसार वह प्रिय संदेश सुना दिया॥ २३॥

ताः प्रहृष्टाः प्रकृतयो बलाध्यक्षा बलस्य च।

श्रुत्वा यात्रां समाज्ञप्तां राघवस्य निवर्तने॥२४॥

‘श्रीरामचन्द्रजी को लौटा लाने के लिये भरत जायँगे और उनके साथ जाने के लिये सेना को भी आदेश प्राप्त हुआ है’ यह समाचार सुनकर वे सभी प्रजाजन तथा सेनापतिगण बहुत प्रसन्न हुए॥२४॥

ततो योधाङ्गनाः सर्वा भर्तृन् सर्वान् गृहे गृहे।

यात्रागमनमाज्ञाय त्वरयन्ति स्म हर्षिताः॥२५॥

तदनन्तर उस यात्रा का समाचार पाकर सैनिकों की सभी स्त्रियाँ घर-घर में हर्ष से खिल उठीं और अपने पतियों को जल्दी तैयार होने के लिये प्रेरित करने लगीं।

ते हयैर्गोरथैः शीघ्रं स्यन्दनैश्च मनोजवैः।

सह योषिद्बलाध्यक्षा बलं सर्वमचोदयन्॥२६॥

सेनापतियों ने घोड़ों, बैलगाड़ियों तथा मन के समान वेगशाली रथों सहित सम्पूर्ण सेना को स्त्रियों सहित यात्रा के लिये शीघ्र तैयार होने की आज्ञा दी॥२६॥

सज्जं तु तद् बलं दृष्ट्वा भरतो गुरुसंनिधौ।

रथं मे त्वरयस्वेति सुमन्त्रं पार्श्वतोऽब्रवीत्॥२७॥

सेना को कूँच के लिये उद्यत देख भरत ने गुरु के समीप ही बगल में खड़े हुए सुमन्त्र से कहा—’आप मेरे रथ को शीघ्र तैयार करके लाइये’ ॥ २७॥

भरतस्य तु तस्याज्ञां परिगृह्य प्रहर्षितः।

रथं गृहीत्वोपययौ युक्तं परमवाजिभिः ॥ २८॥

भरत की उस आज्ञा को शिरोधार्य करके सुमन्त्र बड़े हर्ष के साथ गये और उत्तम घोड़ों से जुता हुआ रथ लेकर लौट आये॥२८॥

स राघवः सत्यधृतिः प्रतापवान् ब्रुवन् सुयुक्तं दृढसत्यविक्रमः।

गुरुं महारण्यगतं यशस्विनं प्रसादयिष्यन् भरतोऽब्रवीत् तदा ॥ २९॥

तब सुदृढ़ एवं सत्य पराक्रम वाले सत्यपरायण प्रतापी भरत विशाल वन में गये हुए अपने बड़े भाई यशस्वी श्रीराम को लौटा लाने के निमित्त राजी करने के लिये यात्रा के उद्देश्य से उस समय इस प्रकार बोले – ॥ २९॥

तूर्णं त्वमुत्थाय सुमन्त्र गच्छ बलस्य योगाय बलप्रधानान्।

आनेतुमिच्छामि हि तं वनस्थं प्रसाद्य रामं जगतो हिताय॥३०॥

‘सुमन्त्रजी! आप शीघ्र उठकर सेनापतियों के पास जाइये और उनसे कहकर सेना को कल फॅच करने के लिये तैयार होने का प्रबन्ध कीजिये; क्योंकि मैं सारे जगत् का कल्याण करने के लिये उन वनवासी श्रीराम को प्रसन्न करके यहाँ ले आना चाहता हूँ’॥ ३०॥

स सूतपुत्रो भरतेन सम्यगाज्ञापितः सम्परिपूर्णकामः।

शशास सर्वान् प्रकृतिप्रधानान् बलस्य मुख्यांश्च सुहृज्जनं च॥३१॥

भरत की यह उत्तम आज्ञा पाकर सूतपुत्र सुमन्त्र ने अपना मनोरथ सफल हुआ समझा और उन्होंने प्रजावर्ग के सभी प्रधान व्यक्तियों, सेनापतियों तथा सुहृदों को भरत का आदेश सुना दिया॥३१॥

ततः समुत्थाय कुले कुले ते राजन्यवैश्या वृषलाश्च विप्राः।

अयूयुजन्नुष्ट्ररथान् खरांश्च नागान् हयांश्चैव कुलप्रसूतान्॥३२॥

तब प्रत्येक घर के लोग ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र उठ-उठकर अच्छी जाति के घोड़े, हाथी, ऊँट, गधे तथा रथों को जोतने लगे॥ ३२ ॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे व्यशीतितमः सर्गः॥ ८२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में बयासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८२॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अयोध्याकाण्डम्

भरत की वनयात्रा और शृङ्गवेरपुर में रात्रिवास

त्र्यशीतितमः सर्गः 

सर्ग-83


ततः समुत्थितः कल्यमास्थाय स्यन्दनोत्तमम्।

प्रययौ भरतः शीघ्रं रामदर्शनकाम्यया॥१॥

तदनन्तर प्रातःकाल उठकर भरत ने उत्तम रथपर आरूढ़ हो श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन की इच्छा से शीघ्रतापूर्वक प्रस्थान किया॥१॥

अग्रतः प्रययुस्तस्य सर्वे मन्त्रिपुरोहिताः।

अधिरुह्य हयैर्युक्तान् रथान् सूर्यरथोपमान्॥२॥

उनके आगे-आगे सभी मन्त्री और पुरोहित घोड़े जुते हुए रथों पर बैठकर यात्रा कर रहे थे। वे रथ सूर्यदेव के रथ के समान तेजस्वी दिखायी देते थे॥२॥

नवनागसहस्राणि कल्पितानि यथाविधि।

अन्वयुर्भरतं यान्तमिक्ष्वाकुकुलनन्दनम्॥३॥

यात्रा करते हुए इक्ष्वाकुकुलनन्दन भरत के पीछे पीछे विधिपूर्वक सजाये गये नौ हजार हाथी चल रहे थे॥

षष्ठी रथसहस्राणि धन्विनो विविधायुधाः।

अन्वयुर्भरतं यान्तं राजपुत्रं यशस्विनम्॥४॥

यात्रापरायण यशस्वी राजकुमार भरत के पीछे साठ हजार रथ और नाना प्रकार के आयुध धारण करने वाले धनुर्धर योद्धा भी जा रहे थे॥ ४॥

शतं सहस्राण्यश्वानां समारूढानि राघवम्।

अन्वयुर्भरतं यान्तं राजपुत्रं यशस्विनम्॥५॥

उसी प्रकार एक लाख घुड़सवार भी उन यशस्वी रघुकुलनन्दन राजकुमार भरत की यात्रा के समय उनका अनुसरण कर रहे थे॥५॥

कैकेयी च सुमित्रा च कौसल्या च यशस्विनी।

रामानयनसंतुष्टा ययुर्यानेन भास्वता॥६॥

कैकेयी, सुमित्रा और यशस्विनी कौसल्या देवी भी श्रीरामचन्द्रजी को लौटा लाने के लिये की जाने वाली उस यात्रा से संतुष्ट हो तेजस्वी रथ के द्वारा प्रस्थित

प्रयाताश्चार्यसंघाता रामं द्रष्टुं सलक्ष्मणम्।

तस्यैव च कथाश्चित्राः कुर्वाणा हृष्टमानसाः॥ ७॥

ब्राह्मण आदि आर्यों (त्रैवर्णिकों) के समूह मन में अत्यन्त हर्ष लेकर लक्ष्मणसहित श्रीराम का दर्शन करने के लिये उन्हीं के सम्बन्ध में विचित्र बातें कहते सुनते हुए यात्रा कर रहे थे॥७॥

मेघश्यामं महाबाहुं स्थिरसत्त्वं दृढव्रतम्।

कदा द्रक्ष्यामहे रामं जगतः शोकनाशनम्॥८॥

(वे आपस में कहते थे—) ‘हमलोग दृढ़ता के साथ उत्तम व्रत का पालन करने वाले तथा संसार का दुःख दूर करने वाले, स्थितप्रज्ञ, श्यामवर्ण महाबाहु श्रीराम का कब दर्शन करेंगे? ॥ ८॥

दृष्ट एव हि नः शोकमपनेष्यति राघवः।

तमः सर्वस्य लोकस्य समुद्यन्निव भास्करः॥९॥

‘जैसे सूर्यदेव उदय लेते ही सारे जगत् का अन्धकार हर लेते हैं, उसी प्रकार श्रीरघुनाथ जी हमारी आँखों के सामने पड़ते ही हमलोगों का सारा शोक संताप दूर कर देंगे’॥ ९॥

इत्येवं कथयन्तस्ते सम्प्रहृष्टाः कथाः शुभाः।

परिष्वजानाश्चान्योन्यं ययुर्नागरिकास्तदा॥१०॥

इस प्रकार की बातें कहते और अत्यन्त हर्ष से भरकर एक-दूसरे का आलिङ्गन करते हुए अयोध्या के नागरिक उस समय यात्रा कर रहे थे॥ १० ॥

ये च तत्रापरे सर्वे सम्मता ये च नैगमाः।

रामं प्रतिययुर्हृष्टाः सर्वाः प्रकृतयः शुभाः॥११॥

उस नगर में जो दूसरे सम्मानित पुरुष थे, वे सब लोग तथा व्यापारी और शुभ विचार वाले प्रजाजन भी बड़े हर्ष के साथ श्रीराम से मिलने के लिये प्रस्थित हुए ॥ ११॥

मणिकाराश्च ये केचित् कुम्भकाराश्च शोभनाः।

सूत्रकर्मविशेषज्ञा ये च शस्त्रोपजीविनः॥१२॥

मायूरकाः क्राकचिका वेधका रोचकास्तथा।

दन्तकाराः सुधाकारा ये च गन्धोपजीविनः॥ १३॥

सुवर्णकाराः प्रख्यातास्तथा कम्बलकारकाः।

स्नापकोष्णोदका वैद्या धूपकाः शौण्डिकास्तथा॥१४॥

रजकास्तुन्नवायाश्च ग्रामघोषमहत्तराः।

शैलूषाश्च सह स्त्रीभिर्यान्ति कैवर्तकास्तथा॥ १५॥

समाहिता वेदविदो ब्राह्मणा वृत्तसम्मताः।

गोरथैर्भरतं यान्तमनुजग्मुः सहस्रशः॥१६॥

जो कोई मणिकार (मणियों को सान पर चढ़ाकर चमका देने वाले), अच्छे कुम्भकार, सूत का ताना बाना करके वस्त्र बनाने की कला के विशेषज्ञ, शस्त्र निर्माण करके जीविका चलाने वाले, मायूरक (मोर की पाँखों से छत्र-व्यजन आदि बनाने वाले), आरे से चन्दन आदि की लकड़ी चीरने वाले, मणि-मोती आदि में छेद करने वाले, रोचक (दीवारों और वेदी आदि में शोभा का सम्पादन करने वाले), दन्तकार (हाथी के दाँत आदि से नाना प्रकार की वस्तुओं का निर्माण करने वाले), सुधाकार (चूना बनाने वाले), गन्धी, प्रसिद्ध सोनार, कम्बल और कालीन बनाने वाले, गरम जल से नहलाने का काम करने वाले, वैद्य, धूपक (धूपन-क्रिया द्वारा जीविका चलाने वाले), शौण्डिक (मद्यविक्रेता), धोबी, दर्जी, गाँवों तथा गोशालाओं के महतो, स्त्रियोंसहित नट, केवट तथा समाहितचित्त सदाचारी वेदवेत्ता सहस्रों ब्राह्मण बैलगाड़ियों पर चढ़कर वन की यात्रा करने वाले भरत के पीछे-पीछे गये॥ १२–१६ ॥

सुवेषाः शुद्धवसनास्ताम्रमृष्टानुलेपिनः।

सर्वे ते विविधैर्यानैः शनैर्भरतमन्वयुः ॥१७॥

सबके वेश सुन्दर थे। सबने शुद्ध वस्त्र धारण कर रखे थे तथा सबके अङ्गों में ताँबे के समान लाल रंग का अङ्गराग लगा था। वे सब-के-सब नाना प्रकार के वाहनों द्वारा धीरे-धीरे भरत का अनुसरण कर रहे थे॥ १७॥

प्रहृष्टमुदिता सेना सान्वयात् कैकयीसुतम्।

भ्रातुरानयने यातं भरतं भ्रातृवत्सलम्॥१८॥

हर्ष और आनन्द में भरी हुई वह सेना भाई को बुलाने के लिये प्रस्थित हुए कैकेयी कुमार भ्रातृवत्सल भरत के पीछे-पीछे चलने लगी॥ १८॥

ते गत्वा दूरमध्वानं रथयानाश्वकुञ्जरैः।

समासेदुस्ततो गङ्गां शृङ्गवेरपुरं प्रति॥ १९॥

इस प्रकार रथ, पालकी, घोड़े और हाथियों के द्वारा बहुत दूर तक का मार्ग तय कर लेने के बाद वे सब लोग शृङ्गवेरपुर में गङ्गाजी के तट पर जा पहुँचे॥ १९ ॥

यत्र रामसखा वीरो गुहो ज्ञातिगणैर्वृतः।।

निवसत्यप्रमादेन देशं तं परिपालयन्॥२०॥

जहाँ श्रीरामचन्द्रजी का सखा वीर निषादराज गुह सावधानी के साथ उस देश की रक्षा करता हुआ अपने भाई-बन्धुओं के साथ निवास करता था॥ २० ॥

उपेत्य तीरं गङ्गायाश्चक्रवाकैरलंकृतम्।

व्यवतिष्ठत सा सेना भरतस्यानुयायिनी॥२१॥

चक्रवाकों से अलंकृत गङ्गा तट पर पहुँचकर भरत का अनुसरण करने वाली वह सेना ठहर गयी॥ २१ ॥

निरीक्ष्यानुत्थितां सेनां तां च गङ्गां शिवोदकाम्।

भरतः सचिवान् सर्वानब्रवीद् वाक्यकोविदः॥ २२॥

पुण्यसलिला भागीरथी का दर्शन करके अपनी उस सेना को शिथिल हुई देख बातचीत करने की कला में कुशल भरत ने समस्त सचिवों से कहा— ॥ २२ ॥

निवेशयत मे सैन्यमभिप्रायेण सर्वतः।

विश्रान्ताः प्रतरिष्यामः श्व इमां सागरङ्गमाम्॥ २३॥

‘आपलोग मेरे सैनिकों को उनकी इच्छा के अनुसार यहाँ सब ओर ठहरा दीजिये। आज रात में विश्राम कर लेने के बाद हम सब लोग कल सबेरे इन सागर गामिनी नदी गङ्गाजी को पार करेंगे॥ २३ ।।

दातुं च तावदिच्छामि स्वर्गतस्य महीपतेः।

और्ध्वदेहनिमित्तार्थमवतीर्योदकं नदीम्॥ २४॥

‘यहाँ ठहरने का एक और प्रयोजन है—मैं चाहता हूँ कि गङ्गाजी में उतरकर स्वर्गीय महाराज के पारलौकिक कल्याण के लिये जलाञ्जलि दे दूं’। २४॥

तस्यैवं ब्रुवतोऽमात्यास्तथेत्युक्त्वा समाहिताः।

न्यवेशयंस्तांश्छन्देन स्वेन स्वेन पृथक् पृथक्॥ २५॥

उनके इस प्रकार कहने पर सभी मन्त्रियों ने ‘तथास्तु’ कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार की और समस्त सैनिकों को उनकी इच्छा के अनुसार भिन्नभिन्न स्थानों पर ठहरा दिया॥ २५ ॥

निवेश्य गङ्गामनु तां महानदी चमं विधानैः परिबर्हशोभिनीम।

उवास रामस्य तदा महात्मनो विचिन्तमानो भरतो निवर्तनम्॥२६॥

महानदी गङ्गा के तटपर खेमे आदि से सुशोभित होने वाली उस सेना को व्यवस्थापूर्वक ठहराकर भरत ने महात्मा श्रीराम के लौटने के विषय में विचार करते हुए उस समय वहीं निवास किया॥ २६ ॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्र्यशीतितमः सर्गः॥ ८३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में तिरासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८३॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अयोध्याकाण्डम्

निषादराज गुह का अपने बन्धुओं भेंट की सामग्री ले भरत के पास जाना और उनसे आतिथ्य स्वीकार करने के लिये अनुरोध करना

चतुरशीतितमः सर्गः 

सर्ग-84


ततो निविष्टां ध्वजिनीं गङ्गामन्वाश्रितां नदीम्।

निषादराजो दृष्ट्वैव ज्ञातीन् स परितोऽब्रवीत्॥

उधर निषादराज गुह ने गङ्गा नदी के तटपर ठहरी हुई भरत की सेना को देखकर सब ओर बैठे हुए अपने भाई-बन्धुओं से कहा- ॥१॥

महतीयमितः सेना सागराभा प्रदृश्यते।

नास्यान्तमवगच्छामि मनसापि विचिन्तयन्॥२॥

‘भाइयो! इस ओर जो यह विशाल सेना ठहरी हुई है समुद्र के समान अपार दिखायी देती है; मैं मन से बहुत सोचने पर भी इसका पार नहीं पाता हूँ॥२॥

यदा नु खलु दुर्बुद्धिर्भरतः स्वयमागतः।

स एष हि महाकायः कोविदारध्वजो रथे॥३॥

‘निश्चय ही इसमें स्वयं दुर्बुद्धि भरत भी आया हआ है; यह कोविदार के चिह्मवाली विशाल ध्वजा उसी के रथ पर फहरा रही है॥३॥

बन्धयिष्यति वा पाशैरथ वास्मान् वधिष्यति।

अनु दाशरथिं रामं पित्रा राज्याद् विवासितम्॥ ४॥

‘मैं समझता हूँ कि यह अपने मन्त्रियों द्वारा पहले हमलोगों को पाशों से बँधवायेगा अथवा हमारा वध कर डालेगा; तत्पश्चात् जिन्हें पिता ने राज्य से निकाल दिया है, उन दशरथनन्दन श्रीराम को भी मार डालेगा॥४॥

सम्पन्नां श्रियमन्विच्छंस्तस्य राज्ञः सुदुर्लभाम्।

भरतः कैकयीपुत्रो हन्तुं समधिगच्छति॥५॥

‘कैकेयी का पुत्र भरत राजा दशरथ की सम्पन्न एवं सुदुर्लभ राजलक्ष्मी को अकेला ही हड़प लेना चाहता है, इसीलिये वह श्रीरामचन्द्रजी को वन में मार डालने के लिये जा रहा है।॥ ५॥

भर्ता चैव सखा चैव रामो दाशरथिर्मम।

तस्यार्थकामाः संनद्धा गङ्गानूपेऽत्र तिष्ठत॥६॥

‘परंतु दशरथकुमार श्रीराम मेरे स्वामी और सखा हैं, इसलिये उनके हित की कामना रखकर तुमलोग अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित हो यहाँ गङ्गा के तटपर मौजूद रहो॥

तिष्ठन्तु सर्वदाशाश्च गङ्गामन्वाश्रिता नदीम्।

बलयुक्ता नदीरक्षा मांसमूलफलाशनाः॥७॥

‘सभी मल्लाह सेनाके साथ नदीकी रक्षा करते हुए गङ्गाके तटपर ही खड़े रहें और नावपर रखे हुए फल-मूल आदिका आहार करके ही आजकी रात बितावें॥ ७॥

नावां शतानां पञ्चानां कैवर्तानां शतं शतम्।

संनद्धानां तथा यूनां तिष्ठन्त्वत्यभ्यचोदयत्॥८॥

‘हमारे पास पाँच सौ नावें हैं, उनमेंसे एक-एक नावपर मल्लाहोंके सौ-सौ जवान युद्ध-सामग्रीसे लैस होकर बैठे रहें।’ इस प्रकार गुहने उन सबको आदेश दिया॥ ८॥

यदि तुष्टस्तु भरतो रामस्येह भविष्यति।

इयं स्वस्तिमती सेना गङ्गामद्य तरिष्यति॥९॥

उसने फिर कहा कि ‘यदि यहाँ भरत का भाव श्रीराम के प्रति संतोषजनक होगा, तभी उनकी यह सेना आज कुशलपूर्वक गङ्गा के पार जा सकेगी’। ९॥

इत्युक्त्वोपायनं गृह्य मत्स्यमांसमधूनि च।

अभिचक्राम भरतं निषादाधिपतिर्मुहः॥१०॥

यों कहकर निषादराज गुह मत्स्यण्डी* (मिश्री), फल के गूदे और मधु आदि भेंट की सामग्री लेकर भरत के पास गया॥१०॥

* यहाँ मूल में ‘मत्स्य’ शब्द ‘मत्स्यण्डी’ अर्थात् मिश्री का वाचक है। ‘मत्स्यण्डी’ इस नामका एक अंश ‘मत्स्य’ है, अतः नाम के एक अंश के ग्रहण से सम्पूर्ण नाम का ग्रहण किया गया है।

तमायान्तं तु सम्प्रेक्ष्य सूतपुत्रः प्रतापवान्।

भरतायाचचक्षेऽथ समयज्ञो विनीतवत्॥११॥

उसे आते देख समयोचित कर्तव्यको समझनेवाले प्रतापी सूतपुत्र सुमन्त्रने विनीतकी भाँति भरतसे कहा – ॥११॥

एष ज्ञातिसहस्रेण स्थपतिः परिवारितः।

कुशलो दण्डकारण्ये वृद्धो भ्रातुश्च ते सखा॥ १२॥

तस्मात् पश्यतु काकुत्स्थं त्वां निषादाधिपो गुहः।

असंशयं विजानीते यत्र तौ रामलक्ष्मणौ ॥१३॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण! यह बूढ़ा निषादराज गुह अपने सहस्रों भाई-बन्धुओं के साथ यहाँ निवास करता है। यह तुम्हारे बड़े भाई श्रीराम का सखा है। इसे दण्डकारण्य के मार्ग की विशेष जानकारी है। निश्चय

ही इसे पता होगा कि दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण कहाँ हैं, अतः निषादराज गुह यहाँ आकर तुमसे मिलें, इसके लिये अवसर दो’ ॥ १२-१३॥

एतत् तु वचनं श्रुत्वा सुमन्त्राद् भरतः शुभम्।

उवाच वचनं शीघ्रं गुहः पश्यतु मामिति ॥१४॥

सुमन्त्र के मुख से यह शुभ वचन सुनकर भरत ने कहा—’निषादराज गुह मुझसे शीघ्र मिलें इसकी व्यवस्था की जाय’ ॥ १४॥

लब्ध्वानुज्ञां सम्प्रहृष्टो ज्ञातिभिः परिवारितः।

आगम्य भरतं प्रह्वो गुहो वचनमब्रवीत्॥१५॥

मिलने की अनुमति पाकर गुह अपने भाई बन्धुओं के साथ वहाँ प्रसन्नतापूर्वक आया और भरत से मिलकर बड़ी नम्रता के साथ बोला- ॥१५॥

निष्कुटश्चैव देशोऽयं वञ्चिताश्चापि ते वयम्।

निवेदयाम ते सर्वं स्वके दाशगृहे वस॥१६॥

‘यह वन-प्रदेश आपके लिये घर में लगे हुए बगीचे के समान है। आपने अपने आगमन की सूचना न देकर हमें धोखे में रख दिया—हम आपके स्वागत की कोई तैयारी न कर सके। हमारे पास जो कुछ है, वह सब आपकी सेवा में अर्पित है। यह निषादों का घर आपका ही है, आप यहाँ सुखपूर्वक निवास करें॥१६॥

अस्ति मूलफलं चैतन्निषादैः स्वयमर्जितम्।

आर्द्र शुष्कं तथा मांसं वन्यं चोच्चावचं तथा॥ १७॥

‘यह फल-मूल आपकी सेवा में प्रस्तुत है। इसे निषाद लोग स्वयं तोड़कर लाये हैं। इनमें से कुछ फल तो अभी हरे ताजे हैं और कुछ सूख गये हैं।इनके साथ तैयार किया हुआ फल का गूदा भी है। इन सबके सिवा नाना प्रकार के दूसरे-दूसरे वन्य पदार्थ भी हैं। इन सबको ग्रहण करें॥ १७॥

आशंसे स्वाशिता सेना वत्स्यत्येनां विभावरीम्।

अर्चितो विविधैः कामैः श्वः ससैन्यो गमिष्यसि॥ १८॥

‘हम आशा करते हैं कि यह सेना आज की रात यहीं ठहरेगी और हमारा दिया हुआ भोजन स्वीकार करेगी। नाना प्रकार की मनोवाञ्छित वस्तुओं से आज हम सेनासहित आपका सत्कार करेंगे, फिर कल सबेरे आप अपने सैनिकों के साथ यहाँ से अन्यत्र जाइयेगा’ ॥ १८॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतुरशीतितमः सर्गः॥ ८४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में चौरासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥८४॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अयोध्याकाण्डम्

गुह और भरत की बातचीत तथा भरत का शोक

पञ्चाशीतितमः सर्गः 

सर्ग-85


एवमुक्तस्तु भरतो निषादाधिपतिं गुहम्।

प्रत्युवाच महाप्राज्ञो वाक्यं हेत्वर्थसंहितम्॥१॥

निषादराज गुह के ऐसा कहने पर महाबुद्धिमान् भरत ने युक्ति और प्रयोजनयुक्त वचनों में उसे इस प्रकार उत्तर दिया- ॥१॥

ऊर्जितः खलु ते कामः कृतो मम गुरोः सखे।

यो मे त्वमीदृशीं सेनामभ्यर्चयितुमिच्छसि॥२॥

‘भैया ! तुम मेरे बड़े भाई श्रीराम के सखा हो। मेरी इतनी बड़ी सेना का सत्कार करना चाहते हो, यह तुम्हारा मनोरथ बहुत ही ऊँचा है। तुम उसे पूर्ण ही समझो तुम्हारी श्रद्धा से ही हम सब लोगों का सत्कार हो गया’ ॥ २॥

इत्युक्त्वा स महातेजा गुहं वचनमुत्तमम्।

अब्रवीद् भरतः श्रीमान् पन्थानं दर्शयन् पुनः॥ ३॥

यह कहकर महातेजस्वी श्रीमान् भरत ने गन्तव्य मार्ग को हाथ के संकेत से दिखाते हुए पुनः गुह से उत्तम वाणी में पूछा- ॥३॥

कतरेण गमिष्यामि भरद्वाजाश्रमं यथा।

गहनोऽयं भृशं देशो गङ्गानूपो दुरत्ययः॥४॥

‘निषादराज! इन दो मार्गों में से किसके द्वारा मुझे भरद्वाज मुनि के आश्रम पर जाना होगा? गङ्गा के किनारे का यह प्रदेश तो बड़ा गहन मालूम होता है। इसे लाँघकर आगे बढ़ना कठिन है’ ॥ ४ ॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राजपुत्रस्य धीमतः।

अब्रवीत् प्राञ्जलिर्भूत्वा गुहो गहनगोचरः॥५॥

बुद्धिमान् राजकुमार भरत का यह वचन सुनकर वन में विचरने वाले गुह ने हाथ जोड़कर कहा— ॥५॥

दाशास्त्वनुगमिष्यन्ति देशज्ञाः सुसमाहिताः।

अहं चानुगमिष्यामि राजपुत्र महाबल॥६॥

‘महाबली राजकुमार! आपके साथ बहत-से मल्लाह जायँगे, जो इस प्रदेश से पूर्ण परिचित तथा भलीभाँति सावधान रहने वाले हैं। इनके सिवा मैं भी आपके साथ चलूँगा॥६॥

कच्चिन्न दुष्टो व्रजसि रामस्याक्लिष्टकर्मणः।

इयं ते महती सेना शङ्कां जनयतीव मे॥७॥

‘परन्तु एक बात बताइये, अनायास ही महान् पराक्रम करने वाले श्रीरामचन्द्रजी के प्रति आप कोई दुर्भावना लेकर तो नहीं जा रहे हैं? आपकी यह विशाल सेना मेरे मन में शङ्का-सी उत्पन्न कर रही है’ ॥ ७॥

तमेवमभिभाषन्तमाकाश इव निर्मलः।

भरतः श्लक्ष्णया वाचा गुहं वचनमब्रवीत्॥८॥

ऐसी बात कहते हुए गुह से आकाश के समान निर्मल भरत ने मधुर वाणी में कहा— ॥८॥

मा भूत् स कालो यत् कष्टं न मां शङ्कितुमर्हसि।

राघवः स हि मे भ्राता ज्येष्ठः पितृसमो मतः॥९॥

‘निषादराज! ऐसा समय कभी न आये। तुम्हारी बात सुनकर मुझे बड़ा कष्ट हुआ। तुम्हें मुझपर संदेह नहीं करना चाहिये। श्रीरघुनाथजी मेरे बड़े भाई हैं। मैं उन्हें पिता के समान मानता हूँ॥९॥

तं निवर्तयितुं यामि काकुत्स्थं वनवासिनम्।

बुद्धिरन्या न मे कार्या गृह सत्यं ब्रवीमि ते॥ १०॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम वन में निवास करते हैं, अतः उन्हें लौटा लाने के लिये जा रहा हूँ। गुह ! मैं तुमसे सच कहता हूँ। तुम्हें मेरे विषय में कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये’ ॥ १० ॥

स तु संहृष्टवदनः श्रुत्वा भरतभाषितम्।

पुनरेवाब्रवीद वाक्यं भरतं प्रति हर्षितः॥११॥

भरत की बात सुनकर निषादराज का मुँह प्रसन्नता से खिल उठा। वह हर्ष से भरकर पुनः भरत से बोला- ॥ ११॥

धन्यस्त्वं न त्वया तुल्यं पश्यामि जगतीतले।

अयत्नादागतं राज्यं यस्त्वं त्यक्तुमिहेच्छसि॥ १२॥

‘आप धन्य हैं, जो बिना प्रयत्न के हाथ में आये हुए राज्य को त्याग देना चाहते हैं। आपके समान धर्मात्मा मुझे इस भूमण्डल में कोई नहीं दिखायी देता ॥ १२ ॥

शाश्वती खलु ते र्कीतिर्लोकाननु चरिष्यति।

यस्त्वं कृच्छ्रगतं रामं प्रत्यानयितुमिच्छसि ॥१३॥

‘कष्टप्रद वन में निवास करने वाले श्रीराम को जो आप लौटा लाना चाहते हैं, इससे समस्त लोकों में आपकी अक्षय कीर्ति का प्रसार होगा’ ॥ १३ ॥

एवं सम्भाषमाणस्य गुहस्य भरतं तदा।

बभौ नष्टप्रभः सूर्यो रजनी चाभ्यवर्तत॥१४॥

जब गुह भरत से इस प्रकार की बातें कह रहा था, उसी समय सूर्यदेव की प्रभा अदृश्य हो गयी और रात का अन्धकार सब ओर फैल गया॥१४॥

संनिवेश्य स तां सेनां गुहेन परितोषितः।

शत्रुजेन समं श्रीमाञ्छयनं पुनरागमत्॥१५॥

गुहके बर्ताव से श्रीमान् भरत को बड़ा संतोष हुआ और वे सेना को विश्राम करने की आज्ञा दे शत्रुघ्न के साथ शयन करने के लिये गये॥ १५ ॥

रामचिन्तामयः शोको भरतस्य महात्मनः।

उपस्थितो ह्यनर्हस्य धर्मप्रेक्षस्य तादृशः॥१६॥

धर्मपर दृष्टि रखने वाले महात्मा भरत शोक के योग्य नहीं थे तथापि उनके मन में श्रीरामचन्द्रजी के लिये चिन्ता के कारण ऐसा शोक उत्पन्न हुआ, जिसका वर्णन नहीं हो सकता॥ १६ ॥

अन्तर्दाहेन दहनः संतापयति राघवम्।

वनदाहाग्निसंतप्तं गूढोऽग्निरिव पादपम्॥१७॥

जैसे वन में फैले हुए दावानल से संतप्त हुए वृक्ष को उसके खोखले में छिपी हुई आग और भी अधिक जलाती है, उसी प्रकार दशरथ-मरणजन्य चिन्ता की आग से संतप्त हुए रघुकुलनन्दन भरत को वह रामवियोग से उत्पन्न हुई शोकाग्नि और भी जलाने लगी॥ १७॥

प्रसृतः सर्वगात्रेभ्यः स्वेदं शोकाग्निसम्भवम्।

यथा सूर्यांशुसंतप्तो हिमवान् प्रसृतो हिमम्॥ १८॥

जैसे सूर्य की किरणों से तपा हुआ हिमालय अपनी पिघली हुई बर्फ को बहाने लगता है, उसी प्रकार भरत शोकाग्निसे संतप्त होने के कारण अपने सम्पूर्ण अङ्गों से पसीना बहाने लगे॥ १८॥

ध्याननिर्दरशैलेन विनिःश्वसितधातुना।

दैन्यपादपसंघेन शोकायासाधिशृङ्गिणा॥१९॥

प्रमोहानन्तसत्त्वेन संतापौषधिवेणुना।

आक्रान्तो दुःखशैलेन महता कैकयीसुतः॥२०॥

उस समय कैकेयीकुमार भरत दुःख के विशाल पर्वत से आक्रान्त हो गये थे। श्रीरामचन्द्रजी का ध्यान ही उसमें छिद्ररहित शिलाओं का समूह था। दुःखपूर्ण उच्छ्वास ही गैरिक आदि धातु का स्थान ले रहा था। दीनता(इन्द्रियों की अपने विषयों से विमुखता) ही वृक्षसमूहों के रूप में प्रतीत होती थी। शोकजनित आयास ही उस दुःखरूपी पर्वत के ऊँचे शिखर थे। अतिशय मोह ही उसमें अनन्त प्राणी थे। बाहरभीतर की इन्द्रियों में होने वाले संताप ही उस पर्वत की ओषधियाँ तथा बाँस के वृक्ष थे॥ १९-२० ॥

विनिःश्वसन् वै भृशदुर्मनास्ततः प्रमूढसंज्ञः परमापदं गतः।

शमं न लेभे हृदयज्वरार्दितो नरर्षभो यूथहतो यथर्षभः॥२१॥

उनका मन बहुत दुःखी था। वे लंबी साँस खींचते हुए सहसा अपनी सुध-बुध खोकर बड़ी भारी आपत्ति में पड़ गये। मानसिक चिन्ता से पीड़ित होने के कारण नरश्रेष्ठ भरत को शान्ति नहीं मिलती थी। उनकी दशा अपने झुंड से बिछुड़े हुए वृषभ की-सी हो रही थी॥ २१॥

गुहेन सार्धं भरतः समागतो महानुभावः सजनः समाहितः।

सुदुर्मनास्तं भरतं तदा पुनगुहः समाश्वासयदग्रज प्रति॥२२॥

परिवार सहित एकाग्रचित्त महानुभाव भरत जब गुह से मिले, उस समय उनके मन में बड़ा दुःख था। वे अपने बड़े भाई के लिये चिन्तित थे, अतः गुह ने उन्हें पुनः आश्वासन दिया॥ २२ ॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चाशीतितमः सर्गः॥ ८५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में पचासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥८५॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अयोध्याकाण्डम्

निषादराज गुह के द्वारा लक्ष्मण के सद्भाव और विलाप का वर्णन

षडशीतितमः सर्गः 

सर्ग-86


आचचक्षेऽथ सद्भावं लक्ष्मणस्य महात्मनः।

भरतायाप्रमेयाय गुहो गहनगोचरः॥१॥

वनचारी गुह ने अप्रमेय शक्तिशाली भरत से महात्मा लक्ष्मण के सद्भाव का इस प्रकार वर्णन किया— ॥१॥

तं जाग्रतं गुणैर्युक्तं वरचापेषुधारिणम्।

भ्रातृगुप्त्यर्थमत्यन्तमहं लक्ष्मणमब्रुवम्॥२॥

‘लक्ष्मण अपने भाई की रक्षा के लिये श्रेष्ठ धनुष और बाण धारण किये अधिक कालतक जागते रहे। उस समय उन सद्गुणशाली लक्ष्मण से मैंने इस प्रकार कहा— ॥२॥

इयं तात सुखा शय्या त्वदर्थमुपकल्पिता।

प्रत्याश्वसिहि शेष्वास्यां सुखं राघवनन्दन॥३॥

उचितोऽयं जनः सर्वो दुःखानां त्वं सुखोचितः।

धर्मात्मस्तस्य गुप्त्यर्थं जागरिष्यामहे वयम्॥४॥

 ‘तात रघुकुलनन्दन! मैंने तुम्हारे लिये यह सुखदायिनी शय्या तैयार की है। तुम इसपर सुखपूर्वक सोओ और भलीभाँति विश्राम करो। यह (मैं) सेवक तथा इसके साथ के सब लोग वनवासी होने के कारण दुःख सहन करने के योग्य हैं (क्योंकि हम सबको कष्ट सहने का अभ्यास है); परंतु तुम सुख में ही पले होने के कारण उसी के योग्य हो। धर्मात्मन्! हमलोग श्रीरामचन्द्रजी की रक्षा के लिये रातभर जागते रहेंगे॥ ३-४॥

नहि रामात् प्रियतरो ममास्ति भुवि कश्चन।

मोत्सुको भूर्ब्रवीम्येतदथ सत्यं तवाग्रतः॥५॥

‘मैं तुम्हारे सामने सत्य कहता हूँ कि इस भूमण्डल में मुझे श्रीराम से बढ़कर प्रिय दूसरा कोई नहीं है; अतः तुम इनकी रक्षा के लिये उत्सुक न होओ॥५॥

अस्य प्रसादादाशंसे लोकेऽस्मिन् सुमहद्यशः।

धर्मावाप्तिं च विपुलामर्थकामौ च केवलौ॥६॥

‘इन श्रीरघुनाथजी के प्रसाद से ही मैं इस लोक में महान् यश, प्रचुर धर्मलाभ तथा विशुद्ध अर्थ एवं भोग्य वस्तु पाने की आशा करता हूँ॥६॥

सोऽहं प्रियसखं रामं शयानं सह सीतया।

रक्षिष्यामि धनुष्पाणिः सर्वैः स्वैातिभिः सह॥ ७॥

‘अतः मैं अपने समस्त बन्धु-बान्धवों के साथ हाथ में धनुष लेकर सीता के साथ सोये प्रिय सखा श्रीराम की (सब प्रकार से) रक्षा करूँगा॥ ७ ॥

नहि मेऽविदितं किंचिद् वनेऽस्मिंश्चरतः सदा।

चतुरङ ह्यपि बलं प्रसहेम वयं युधि॥८॥

“इस वन में सदा विचरते रहने के कारण मुझसे यहाँ की कोई बात छिपी नहीं है। हमलोग यहाँ युद्ध में शत्रु की चतुरङ्गिणी सेना का भी अच्छी तरह सामना कर सकते हैं’॥ ८॥

एवमस्माभिरुक्तेन लक्ष्मणेन महात्मना।

अनुनीता वयं सर्वे धर्ममेवानुपश्यता॥९॥

‘हमारे इस प्रकार कहने पर धर्म पर ही दृष्टि रखने वाले महात्मा लक्ष्मण ने हम सब लोगों से अनुनयपूर्वक कहा- ॥९॥

कथं दाशरथौ भूमौ शयाने सह सीतया।

शक्या निद्रा मया लब्धं जीवितानि सुखानि वा॥ १०॥

‘निषादराज ! जब दशरथनन्दन श्रीराम देवी सीता के साथ भूमिपर शयन कर रहे हैं, तब मेरे लिये उत्तम शय्या पर सोकर नींद लेना, जीवन-धारण के लिये स्वादिष्ट अन्न खाना अथवा दूसरे-दूसरे सुखों को भोगना कैसे सम्भव हो सकता है ? ॥ १० ॥

यो न देवासुरैः सर्वैः शक्यः प्रसहितुं युधि।

तं पश्य गुह संविष्टं तृणेषु सह सीतया॥११॥

‘गुह ! देखो, सम्पूर्ण देवता और असुर मिलकर भी युद्ध में जिनके वेग को नहीं सह सकते, वे ही श्रीराम इस समय सीता के साथ तिनकों पर सो रहे हैं॥ ११॥

महता तपसा लब्धो विविधैश्च परिश्रमैः।

एको दशरथस्यैष पुत्रः सदृशलक्षणः॥१२॥

अस्मिन् प्रव्राजिते राजा न चिरं वर्तयिष्यति।

विधवा मेदिनी नूनं क्षिप्रमेव भविष्यति॥१३॥

‘महान् तप और नाना प्रकार के परिश्रमसाध्य उपायों द्वारा जो यह महाराज दशरथ को अपने समान उत्तम लक्षणों से युक्त ज्येष्ठ पुत्र के रूप में प्राप्त हुए हैं, उन्हीं इन श्रीराम के वन में आ जाने से राजा दशरथ

अधिक काल तक जीवित नहीं रह सकेंगे जान पड़ता है निश्चय ही यह पृथ्वी अब शीघ्र विधवा हो जायगी॥ १२-१३॥

विनद्य सुमहानादं श्रमेणोपरताः स्त्रियः।

निर्घोषो विरतो नूनमद्य राजनिवेशने॥१४॥

‘अवश्य ही अब रनिवास की स्त्रियाँ बड़े जोर से आर्तनाद करके अधिक श्रम के कारण अब चुप हो गयी होंगी और राजमहल का वह हाहाकार इस समय शान्त हो गया होगा॥१४॥

कौसल्या चैव राजा च तथैव जननी मम।

नाशंसे यदि ते स जीवेयुः शर्वरीमिमाम्॥१५॥

‘महारानी कौसल्या, राजा दशरथ तथा मेरी माता सुमित्रा—ये सब लोग आज की इस रात तक जीवित रह सकेंगे या नहीं यह मैं नहीं कह सकता॥ १५ ॥

जीवेदपि च मे माता शत्रुघ्नस्यान्ववेक्षया।

दुःखिता या हि कौसल्या वीरसूर्विनशिष्यति॥ १६॥

‘शत्रुघ्न की बाट देखने के कारण सम्भव है, मेरी माता सुमित्रा जीवित रह जायँ; परंतु पुत्र के विरह से दुःख में डूबी हुई वीर-जननी कौसल्या अवश्य नष्ट हो जायँगी॥ १६ ॥

अतिक्रान्तमतिक्रान्तमनवाप्य मनोरथम्।

राज्ये राममनिक्षिप्य पिता मे विनशिष्यति॥ १७॥

(महाराज की इच्छा थी कि श्रीराम को राज्य पर अभिषिक्त करूँ) अपने उस मनोरथ को न पाकर श्रीराम को राज्यपर स्थापित किये बिना ही ‘हाय! मेरा सब कुछ नष्ट हो गया! नष्ट हो गया !!’ ऐसा कहते हुए मेरे पिताजी अपने प्राणों का परित्याग कर देंगे। १७॥

सिद्धार्थाः पितरं वृत्तं तस्मिन् काले ह्युपस्थिते।

प्रेतकार्येषु सर्वेषु संस्करिष्यन्ति भूमिपम्॥१८॥

‘उनकी उस मृत्यु का समय उपस्थित होने पर जो लोग वहाँ रहेंगे और मेरे मरे हुए पिता महाराज दशरथ का सभी प्रेतकार्यों में संस्कार करेंगे, वे ही सफल मनोरथ और भाग्यशाली हैं॥ १८ ॥

रम्यचत्वरसंस्थानां सुविभक्तमहापथाम्।

हर्म्यप्रासादसम्पन्नां सर्वरत्नविभूषिताम्॥१९॥

गजाश्वरथसम्बाधां तूर्यनादविनादिताम्।

सर्वकल्याणसम्पूर्णां हृष्टपुष्टजनाकुलाम्॥२०॥

आरामोद्यानसम्पूर्णां समाजोत्सवशालिनीम्।

सुखिता विचरिष्यन्ति राजधानी पितुर्मम॥२१॥

‘(यदि पिताजी जीवित रहे तो) रमणीय चबूतरों और चौराहों के सुन्दर स्थानों से युक्त, पृथक्-पृथक् बने हुए विशाल राजमार्गों से अलंकृत, धनिकों की अट्टालिकाओं और देवमन्दिरों एवं राजभवनों से सम्पन्न, सब प्रकार के रत्नों से विभूषित, हाथियों,घोड़ों और रथों के आवागमन से भरी हुई, विविध वाद्यों की ध्वनियों से निनादित, समस्त कल्याणकारी वस्तुओं से भरपूर, हृष्ट-पुष्ट मनुष्यों से व्याप्त, पुष्पवाटिकाओं और उद्यानों से परिपूर्ण तथा सामाजिक उत्सवों से सुशोभित हुई मेरे पिता की राजधानी अयोध्यापुरी में जो लोग विचरेंगे, वास्तव में वे ही सुखी हैं॥ १९–२१॥

अपि सत्यप्रतिज्ञेन सार्धं कुशलिना वयम्।

निवृत्ते समये ह्यस्मिन् सुखिताः प्रविशेमहि॥ २२॥

‘क्या वनवास की इस अवधि के समाप्त होने पर सकुशल लौटे हुए सत्यप्रतिज्ञ श्रीराम के साथ हमलोग अयोध्यापुरी में प्रवेश कर सकेंगे’ ॥ २२ ॥

परिदेवयमानस्य तस्यैवं हि महात्मनः।

तिष्ठतो राजपुत्रस्य शर्वरी सात्यवर्तत॥२३॥

‘इस प्रकार विलाप करते हुए महामनस्वी राजकुमार लक्ष्मण की वह सारी रात जागते ही बीती॥ २३॥

प्रभाते विमले सूर्ये कारयित्वा जटा उभौ।

अस्मिन् भागीरथीतीरे सुखं संतारितौ मया॥ २४॥

‘प्रातःकाल निर्मल सूर्योदय होने पर मैंने भागीरथी के तट पर (वट के दूध से) उन दोनों के केशों को जटा का रूप दिलवाया और उन्हें सुखपूर्वक पार उतारा॥ २४॥

जटाधरौ तौ द्रुमचीरवाससौ महाबलौ कुञ्जरयूथपोपमौ।

वरेषुधीचापधरौ परंतपौ व्यपेक्षमाणौ सह सीतया गतौ॥२५॥

‘सिरपर जटा धारण करके वल्कल एवं चीर-वस्त्र पहने हुए, महाबली, शत्रुसंतापी श्रीराम और लक्ष्मण दो गजयूथपतियों के समान शोभा पाते थे। वे सुन्दर तरकस और धनुष धारण किये इधर-उधर देखते हुए सीता के साथ चले गये’ ॥ २५ ॥

इत्याचे श्रीमद्रारामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे षडशीतितमः सर्गः॥ ८६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में छियासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥८६॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अयोध्याकाण्डम्

भरत की मूर्छा से गुह, शत्रुघ्न और माताओं का दुःखी होना, भरत का गुह से श्रीराम आदि के भोजन और शयन आदि के विषय में पूछना

सप्ताशीतितमः सर्गः 

सर्ग-87


गुहस्य वचनं श्रुत्वा भरतो भृशमप्रियम्।

ध्यानं जगाम तत्रैव यत्र तच्छ्रुतमप्रियम्॥१॥

गुह का श्रीराम के जटाधारण आदि से सम्बन्ध रखने वाला अत्यन्त अप्रिय वचन सुनकर भरत चिन्तामग्न हो गये। जिन श्रीराम के विषय में उन्होंने अप्रिय बात सुनी थी, उन्हीं का वे चिन्तन करने लगे (उन्हें यह चिन्ता हो गयी कि अब मेरा मनोरथ पूर्ण न हो सकेगा। श्रीराम ने जब जटा धारण कर ली, तब वे शायद ही लौटें)॥१॥

सुकुमारो महासत्त्वः सिंहस्कन्धो महाभुजः।

पुण्डरीकविशालाक्षस्तरुणः प्रियदर्शनः॥२॥

प्रत्याश्वस्य मुहूर्तं तु कालं परमदुर्मनाः।

ससाद सहसा तोत्रैर्हदि विद्ध इव द्विपः॥३॥

भरत सुकुमार होने के साथ ही महान् बलशाली थे, उनके कंधे सिंह के समान थे, भुजाएँ बड़ी-बड़ी और नेत्र विकसित कमल के सदृश सुन्दर थे। उनकी अवस्था तरुण थी और वे देखने में बड़े मनोरम थे। उन्होंने गुह की बात सुनकर दो घड़ी तक किसी प्रकार धैर्य धारण किया, फिर उनके मन में बड़ा दुःख हुआ। वे अंकुश से विद्ध हुए हाथी के समान अत्यन्त व्यथित होकर सहसा दुःख से शिथिल एवं मूर्च्छित हो गये। २-३॥

भरतं मूर्च्छितं दृष्ट्वा विवर्णवदनो गुहः।

बभूव व्यथितस्तत्र भूमिकम्पे यथा द्रुमः॥४॥

भरत को मूर्छित हुआ देख गुह के चेहरे का रंग उड़ गया। वह भूकम्प के समय मथित हुए वृक्ष की भाँति वहाँ व्यथित हो उठा॥ ४॥

तदवस्थं तु भरतं शत्रुघ्नोऽनन्तरस्थितः।

परिष्वज्य रोदोच्चैर्विसंज्ञः शोककर्शितः॥५॥

शत्रुघ्न भरत के पास ही बैठे थे। वे उनकी वैसी अवस्था देख उन्हें हृदय से लगाकर जोर-जोर से रोने लगे और शोक से पीड़ित हो अपनी सुध-बुध खो बैठे॥५॥

ततः सर्वाः समापेतुर्मातरो भरतस्य ताः।

उपवासकृशा दीना भर्तृव्यसनकर्शिताः॥६॥

तदनन्तर भरत की सभी माताएँ वहाँ आ पहुँचीं। वे पति वियोग के दुःखसे दुःखी, उपवास कर नेके कारण दुर्बल और दीन हो रही थीं॥६॥

ताश्च तं पतितं भूमौ रुदत्यः पर्यवारयन्।

कौसल्या त्वनुसृत्यैनं दुर्मनाः परिषस्वजे॥७॥

भूमि पर पड़े हुए भरत को उन्होंने चारों ओर से घेर लिया और सब-की-सब रोने लगीं। कौसल्या का हृदय तो दुःख से और भी कातर हो उठा। उन्होंने भरत के पास जाकर उन्हें अपनी गोद में चिपका लिया॥७॥

वत्सला स्वं यथा वत्समुपगुह्य तपस्विनी।

परिपप्रच्छ भरतं रुदती शोकलालसा॥८॥

जैसे वत्सला गौ अपने बछड़े को गले से लगाकर चाटती है, उसी तरह शोक से व्याकुल हुई तपस्विनी कौसल्या ने भरत को गोद में लेकर रोते-रोते पूछा- ॥

पुत्र व्याधिर्न ते कच्चिच्छरीरं प्रति बाधते।

अस्य राजकुलस्याद्य त्वदधीनं हि जीवितम्॥९॥

‘बेटा! तुम्हारे शरीर को कोई रोग तो कष्ट नहीं पहुँचा रहा है ? अब इस राजवंश का जीवन तुम्हारे ही अधीन है॥९॥

त्वां दृष्ट्वा पुत्र जीवामि रामे सभ्रातृके गते।

वृत्ते दशरथे राज्ञि नाथ एकस्त्वमद्य नः॥१०॥

‘वत्स! मैं तुम्हींको देखकर जी रही हूँ। श्रीराम लक्ष्मणके साथ वनमें चले गये और महाराज दशरथ स्वर्गवासी हो गये; अब एकमात्र तुम्हीं हमलोगोंके रक्षक हो॥१०॥

कच्चिन्न लक्ष्मणे पुत्र श्रुतं ते किंचिदप्रियम्।

पुत्रे वा ह्येकपुत्रायाः सहभार्ये वनं गते॥११॥

‘बेटा! सच बताओ, तुमने लक्ष्मण के सम्बन्ध में अथवा मुझ एक ही पुत्रवाली मा के बेटे वन में सीतासहित गये हुए श्रीराम के विषय में कोई अप्रिय बात तो नहीं सुनी है?’ ॥ ११॥

स मुहूर्तं समाश्वस्य रुदन्नेव महायशाः।

कौसल्यां परिसान्त्व्येदं गुहं वचनमब्रवीत्॥१२॥

दो ही घड़ी में जब महायशस्वी भरत का चित्त स्वस्थ हुआ, तब उन्होंने रोते-रोते ही कौसल्या को सान्त्वना दी (और कहा—’मा! घबराओ मत, मैंने कोई अप्रिय बात नहीं सुनी है’)। फिर निषादराज गुह से इस प्रकार पूछा- ॥ १२॥

भ्राता मे क्वावसद् रात्रौ क्व सीता क्व च लक्ष्मणः।

अस्वपच्छयने कस्मिन् किं भुक्त्वा गुह शंस मे॥

‘गुह ! उस दिन रात में मेरे भाई श्रीराम कहाँ ठहरे थे? सीता कहाँ थीं? और लक्ष्मण कहाँ रहे? उन्होंने क्या भोजन करके कैसे बिछौने पर शयन किया था? ये सब बातें मुझे बताओ’ ॥ १३॥

सोऽब्रवीद् भरतं हृष्टो निषादाधिपतिर्मुहः।

यद्विधं प्रतिपेदे च रामे प्रियहितेऽतिथौ॥१४॥

ये प्रश्न सुनकर निषादराज गुह बहुत प्रसन्न हुआ और उसने अपने प्रिय एवं हितकारी अतिथि श्रीराम के आने पर उनके प्रति जैसा बर्ताव किया था, वह सब बताते हुए भरत से कहा- ॥१४॥

अन्नमुच्चावचं भक्ष्याः फलानि विविधानि च।

रामायाभ्यवहारार्थं बहुशोऽपहृतं मया॥१५॥

‘मैंने भाँति-भाँति के अन्न, अनेक प्रकार के खाद्य पदार्थ और कई तरह के फल श्रीरामचन्द्रजी के पास भोजन के लिये प्रचुर मात्रा में पहुँचाये॥ १५॥

तत् सर्वं प्रत्यनुज्ञासीद् रामः सत्यपराक्रमः।

न हि तत् प्रत्यगृह्णात् स क्षत्रधर्ममनुस्मरन्॥ १६॥

‘सत्यपराक्रमी श्रीराम ने मेरी दी हुई सब वस्तुएँ स्वीकार तो कीं किंतु क्षत्रियधर्म का स्मरण करते हुए उनको ग्रहण नहीं किया—मुझे आदरपूर्वक लौटा दिया॥

नह्यस्माभिः प्रतिग्राह्यं सखे देयं तु सर्वदा।

इति तेन वयं सर्वे अनुनीता महात्मना॥१७॥

‘फिर उन महात्मा ने हम सब लोगों को समझाते हुए कहा—’सखे! हम-जैसे क्षत्रियों को किसी से कुछ लेना नहीं चाहिये; अपितु सदा देना ही चाहिये। १७॥

लक्ष्मणेन यदानीतं पीतं वारि महात्मना।

औपवास्यं तदाकार्षीद् राघवः सह सीतया॥ १८॥

‘सीतासहित श्रीराम ने उस रात में उपवास ही किया। लक्ष्मण जो जल ले आये थे, केवल उसी को उन महात्मा ने पीया॥१८॥

ततस्तु जलशेषेण लक्ष्मणोऽप्यकरोत् तदा।

वाग्यतास्ते त्रयः संध्यां समुपासन्त संहिताः॥ १९॥

‘उनके पीने से बचा हुआ जल लक्ष्मण ने ग्रहण किया। (जलपान के पहले) उन तीनों ने मौन एवं एकाग्रचित्त होकर संध्योपासना की थी॥१९॥

सौमित्रिस्तु ततः पश्चादकरोत् स्वास्तरं शुभम्।

स्वयमानीय बहींषि क्षिप्रं राघवकारणात्॥२०॥

‘तदनन्तर लक्ष्मण ने स्वयं कुश लाकर श्रीरामचन्द्रजी के लिये शीघ्र ही सुन्दर बिछौना बिछाया॥२०॥

तस्मिन् समाविशद् रामः स्वास्तरे सह सीतया।

प्रक्षाल्य च तयोः पादौ व्यपाक्रामत् स लक्ष्मणः॥ २१॥

‘उस सुन्दर बिस्तर पर जब सीता के साथ श्रीराम विराजमान हुए, तब लक्ष्मण उन दोनों के चरण पखारकर वहाँ से दूर हट आये॥ २१॥

एतत् तदिङ्गुदीमूलमिदमेव च तत् तृणम्।

यस्मिन् रामश्च सीता च रात्रिं तां शयितावुभौ॥ २२॥

‘यही वह इङ्गुदी-वृक्ष की जड़ है और यही वह तृण है, जहाँ श्रीराम और सीता—दोनों ने रात्रि में शयन किया था॥ २२॥

नियम्य पृष्ठे तु तलाङ्गलित्रवान् शरैः सुपूर्णाविषुधी परंतपः।

महद्धनुः सज्जमुपोह्य लक्ष्मणो निशामतिष्ठत् परितोऽस्य केवलम्॥ २३॥

‘शत्रुसंतापी लक्ष्मण अपनी पीठ पर बाणों से भरे दो तरकस बाँधे, दोनों हाथों की अंगुलियों में दस्ताने पहने और महान् धनुष चढ़ाये श्रीराम के चारों ओर घूमकर केवल पहरा देते हुए रात भर खड़े रहे ॥ २३॥

ततस्त्वहं चोत्तमबाणचापभृत् स्थितोऽभवं तत्र स यत्र लक्ष्मणः।

अतन्द्रितैातिभिरात्तकार्मुकैमहेन्द्रकल्पं परिपालयंस्तदा ॥ २४॥

‘तदनन्तर मैं भी उत्तम बाण और धनुष लेकर वहीं आ खड़ा हुआ, जहाँ लक्ष्मण थे। उस समय अपने बन्धु-बान्धवों के साथ, जो निद्रा और आलस्य का त्याग करके धनुष-बाण लिये सदा सावधान रहे, मैं देवराज इन्द्र के समान तेजस्वी श्रीराम की रक्षा करता रहा’ ॥ २४॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्ताशीतितमः सर्गः॥ ८७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में सतासीवाँ सर्ग पूराहुआ॥८७॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अयोध्याकाण्डम्

श्रीराम की कुश-शय्या देखकर भरत का स्वयं भी वल्कल और जटाधारण करके वन में रहने का विचार प्रकट करना

अष्टाशीतितमः सर्गः 

सर्ग-88


तच्छ्रुत्वा निपुणं सर्वं भरतः सह मन्त्रिभिः।

इङ्गदीमूलमागम्य रामशय्यामवैक्षत॥१॥

निषादराज की सारी बातें ध्यान से सुनकर मन्त्रियों सहित भरत ने इंगुदी-वृक्ष की जड़ के पास आकर श्रीरामचन्द्रजी की शय्या का निरीक्षण किया। १॥

अब्रवीज्जननीः सर्वा इह तस्य महात्मनः।

शर्वरी शयिता भूमाविदमस्य विमर्दितम्॥२॥

फिर उन्होंने समस्त माताओं से कहा—’यहीं महात्मा श्रीराम ने भूमि पर शयन करके रात्रि व्यतीत की थी। यही वह कुशसमूह है, जो उनके अङ्गों से विमर्दित हुआ था॥

महाराजकुलीनेन महाभागेन धीमता।

जातो दशरथेनोवा॒ न रामः स्वप्तमर्हति॥३॥

‘महाराजों के कुल में उत्पन्न हुए परम बुद्धिमान् महाभाग राजा दशरथ ने जिन्हें जन्म दिया है, वे श्रीराम इस तरह भूमि पर शयन करने के योग्य नहीं हैं॥३॥

अजिनोत्तरसंस्तीर्णे वरास्तरणसंचये।

शयित्वा पुरुषव्याघ्रः कथं शेते महीतले॥४॥

‘जो पुरुषसिंह श्रीराम मुलायम मृगचर्म की विशेष चादर से ढके हुए तथा अच्छे-अच्छे बिछौनों के समूह से सजे हुए पलंग पर सदा सोते आये हैं, वे इस समय पृथ्वी पर कैसे शयन करते होंगे? ॥ ४॥

प्रासादाग्रविमानेषु वलभीषु च सर्वदा।

हैमराजतभौमेषु वरास्तरणशालिषु॥५॥

पुष्पसंचयचित्रेषु चन्दनागुरुगन्धिषु।

पाण्डुराभ्रप्रकाशेषु शुकसंघरुतेषु च॥६॥

प्रासादवरवर्येषु शीतवत्सु सुगन्धिषु।

उषित्वा मेरुकल्पेषु कृतकाञ्चनभित्तिषु॥७॥

‘जो सदा विमानाकार प्रासादों के श्रेष्ठ भवनों और अट्टालिकाओं में सोते आये हैं तथा जिनकी फर्श सोने और चाँदी की बनी हई है, जो अच्छे बिछौनों से सुशोभित हैं, पुष्पराशि से विभूषित होने के कारण जिनकी विचित्र शोभा होती है, जिनमें चन्दन और अगुरु की सुगन्ध फैली रहती है, जो श्वेत बादलों के समान उज्ज्वल कान्ति धारण करते हैं, जिनमें शुकसमूहों का कलरव होता रहता है, जो शीतल हैं एवं कपूर आदि की सुगन्ध से व्याप्त होते हैं, जिनकी दीवारों पर सुवर्ण का काम किया गया है तथा जो ऊँचाई में मेरु पर्वत के समान जान पड़ते हैं, ऐसे सर्वोत्तम राजमहलों में जो निवास कर चुके हैं, वे श्रीराम वन में पृथ्वी पर कैसे सोते होंगे? ॥ ५–७॥

गीतवादित्रनिर्घोषैर्वराभरणनिःस्वनैः।

मृदङ्गवरशब्दैश्च सततं प्रतिबोधितः॥८॥

बन्दिभिर्वन्दितः काले बहुभिः सूतमागधैः।

गाथाभिरनुरूपाभिः स्तुतिभिश्च परंतपः॥९॥

‘जो गीतों और वाद्यों की ध्वनियों से, श्रेष्ठ आभूषणों की झनकारों से तथा मृदङ्गों के उत्तम शब्दों से सदा जगाये जाते थे, बहुत-से वन्दीगण समय-समय पर जिनकी वन्दना करते थे, सूत और मागध अनुरूप गाथाओं और स्तुतियों से जिनको जगाते थे, वे शत्रुसंतापी श्रीराम अब भूमि पर कैसे शयन करते होंगे? ॥ ८-९॥

अश्रद्धेयमिदं लोके न सत्यं प्रतिभाति मा।

मुह्यते खलु मे भावः स्वप्नोऽयमिति मे मतिः॥ १०॥

‘यह बात जगत् में विश्वास के योग्य नहीं है मुझे यह सत्य नहीं प्रतीत होती। मेरा अन्तःकरण अवश्य ही मोहित हो रहा है। मुझे तो ऐसा मालूम होता है कि यह कोई स्वप्न है॥ १०॥

न नूनं दैवतं किंचित् कालेन बलवत्तरम्।

यत्र दाशरथी रामो भूमावेवमशेत सः॥११॥

‘निश्चय ही काल के समान प्रबल कोई दूसरा देवता नहीं है, जिसके प्रभाव से दशरथनन्दन श्रीराम को भी इस प्रकार भूमि पर सोना पड़ा ॥ ११ ॥

यस्मिन् विदेहराजस्य सुता च प्रियदर्शना।

दयिता शयिता भूमौ स्नुषा दशरथस्य च ॥१२॥

‘उस काल के ही प्रभाव से विदेहराज की परम सुन्दरी पुत्री और महाराज दशरथ की प्यारी पुत्रवधू सीता भी पृथ्वी पर शयन करती हैं॥ १२॥

इयं शय्या मम भ्रातुरिदमावर्तितं शुभम्।

स्थण्डिले कठिने सर्वं गात्रैर्विमृदितं तृणम्॥ १३॥

‘यही मेरे बड़े भाई की शय्या है। यहीं उन्होंने करवटें बदली थीं। इस कठोर वेदी पर उनका शुभ शयन हुआ था, जहाँ उनके अङ्गों से कुचला गया सारा तृण अभी तक पड़ा है॥ १३॥

मन्ये साभरणा सुप्ता सीतास्मिन्शयने शुभा।

तत्र तत्र हि दृश्यन्ते सक्ताः कनकबिन्दवः॥ १४॥

‘जान पड़ता है, शुभलक्षणा सीता शय्यापर आभूषण पहने ही सोयी थीं; क्योंकि यहाँ यत्र-तत्र सुवर्ण के कण सटे दिखायी देते हैं ॥ १४॥

उत्तरीयमिहासक्तं सुव्यक्तं सीतया तदा।

तथा ह्येते प्रकाशन्ते सक्ताः कौशेयतन्तवः॥ १५॥

‘यहाँ उस समय सीता की चादर उलझ गयी थी, यह साफ दिखायी दे रहा है; क्योंकि यहाँ सटे हुए ये रेशम के तागे चमक रहे हैं॥ १५ ॥

मन्ये भर्तुः सुखा शय्या येन बाला तपस्विनी।

सुकुमारी सती दुःखं न विजानाति मैथिली॥

‘मैं समझता हूँ कि पति की शय्या कोमल हो या कठोर, साध्वी स्त्रियों के लिये वही सुखदायिनी होती है, तभी तो वह तपस्विनी एवं सुकुमारी बाला सतीसाध्वी मिथिलेशकुमारी सीता यहाँ दुःख का अनुभव नहीं कर रही हैं॥ १६॥

हा हतोऽस्मि नृशंसोऽस्मि यत् सभार्यः कृते मम।

ईदृशीं राघवः शय्यामधिशेते ह्यनाथवत्॥१७॥

‘हाय! मैं मर गया—मेरा जीवन व्यर्थ है। मैं बड़ा क्रूर हूँ, जिसके कारण सीतासहित श्रीराम को अनाथ की भाँति ऐसी शय्या पर सोना पड़ता है॥ १७ ॥

सार्वभौमकुले जातः सर्वलोकसुखावहः।।

सर्वप्रियकरस्त्यक्त्वा राज्यं प्रियमनुत्तमम्॥१८॥

कथमिन्दीवरश्यामो रक्ताक्षः प्रियदर्शनः।

सुखभागी न दुःखार्हः शयितो भुवि राघवः॥ १९॥

‘जो चक्रवर्ती सम्राट् के कुल में उत्पन्न हुए हैं, समस्त लोकों को सुख देने वाले हैं तथा सबका प्रिय करने में तत्पर रहते हैं, जिनका शरीर नीले कमल के समान श्याम, आँखें लाल और दर्शन सबको प्रिय लगने वाला है तथा जो सुख भोगने के ही योग्य हैं, दुःख भोगने के कदापि योग्य नहीं हैं, वे ही श्रीरघुनाथ जी परम उत्तम प्रिय राज्य का परित्याग करके इस समय पृथ्वी पर शयन करते हैं ॥ १८-१९ ॥

धन्यः खलु महाभागो लक्ष्मणः शुभलक्षणः।

भ्रातरं विषमे काले यो राममनुवर्तते ॥२०॥

‘उत्तम लक्षणों वाले लक्ष्मण ही धन्य एवं बड़भागी हैं, जो संकट के समय बड़े भाई श्रीराम के साथ रहकर उनकी सेवा करते हैं। २०॥

सिद्धार्था खलु वैदेही पतिं यानुगता वनम्।

वयं संशयिताः सर्वे हीनास्तेन महात्मना ॥ २१॥

‘निश्चय ही विदेहनन्दिनी सीता भी कृतार्थ हो गयीं, जिन्होंने पति के साथ वन का अनुसरण किया है। हम सब लोग उन महात्मा श्रीराम से बिछुड़कर संशय में पड़ गये हैं (हमें यह संदेह होने लगा है कि श्रीराम हमारी सेवा स्वीकार करेंगे या नहीं) ॥ २१॥

अकर्णधारा पृथिवी शून्येव प्रतिभाति मे।

गते दशरथे स्वर्गं रामे चारण्यमाश्रिते॥२२॥

‘महाराज दशरथ स्वर्गलोक को गये और श्रीराम वनवासी हो गये, ऐसी दशा में यह पृथ्वी बिना नाविक की नौका के समान मुझे सूनी-सी प्रतीत हो रही है॥ २२॥

न च प्रार्थयते कश्चिन्मनसापि वसुंधराम्।

वने निवसतस्तस्य बाहवीर्याभिरक्षिताम्॥२३॥

‘वन में निवास करने पर भी उन्हीं श्रीराम के बाहुबल से सुरक्षित हुई इस वसुन्धरा को कोई शत्रु मन से भी नहीं लेना चाहता है॥ २३ ॥

शून्यसंवरणारक्षामयन्त्रितहयद्विपाम्।

अनावृतपुरद्वारां राजधानीमरक्षिताम्॥२४॥

अप्रहृष्टबलां शून्यां विषमस्थामनावृताम्।

शत्रवो नाभिमन्यन्ते भक्ष्यान् विषकृतानिव॥ २५॥

‘इस समय अयोध्या की चहारदीवारी की सब ओर से रक्षा का कोई प्रबन्ध नहीं है, हाथी और घोड़े बँधे नहीं रहते हैं—खुले विचरते हैं, नगर द्वार का फाटक खुला ही रहता है, सारी राजधानी अरक्षित है, सेना में हर्ष और उत्साह का अभाव है, समस्त नगरी रक्षकों से सूनी-सी जान पड़ती है, सङ्कट में पड़ी हुई है, रक्षकों के अभाव से आवरणरहित हो गयी है. तो भी शत्रु विषमिश्रित भोजन की भाँति इसे ग्रहण करने की इच्छा नहीं करते हैं। श्रीराम के बाहुबल से ही इसकी रक्षा हो रही है॥ २४-२५ ॥

अद्यप्रभृति भूमौ तु शयिष्येऽहं तृणेषु वा।

फलमूलाशनो नित्यं जटाचीराणि धारयन्॥ २६॥

‘आज से मैं भी पृथ्वी पर अथवा तिनकों पर ही सोऊँगा, फल-मूल का ही भोजन करूँगा और सदा वल्कल वस्त्र तथा जटा धारण किये रहूँगा॥ २६ ॥

तस्याहमुत्तरं कालं निवत्स्यामि सुखं वने।

तत् प्रतिश्रुतमार्यस्य नैव मिथ्या भविष्यति॥ २७॥

‘वनवास के जितने दिन बाकी हैं, उतने दिनों तक मैं ही वहाँ सुखपूर्वक निवास करूँगा, ऐसा होने से आर्य श्रीराम की की हुई प्रतिज्ञा झूठी नहीं होगी॥२७॥

वसन्तं भ्रातुरर्थाय शत्रुनो मानुवत्स्यति।

लक्ष्मणेन सहायोध्यामार्यो मे पालयिष्यति॥ २८॥

‘भाई के लिये वन में निवास करते समय शत्रुघ्न मेरे साथ रहेंगे और मेरे बड़े भाई श्रीराम लक्ष्मण को साथ लेकर अयोध्या का पालन करेंगे॥२८॥

अभिषेक्ष्यन्ति काकुत्स्थमयोध्यायां द्विजातयः।

अपि मे देवताः कुर्युरिमं सत्यं मनोरथम्॥२९॥

‘अयोध्या में ब्राह्मणलोग ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम का अभिषेक करेंगे। क्या देवता मेरे इस मनोरथ को सत्य (सफल) करेंगे? ॥ २९॥

प्रसाद्यमानः शिरसा मया स्वयं बहुप्रकारं यदि न प्रपत्स्यते।

ततोऽनुवत्स्यामि चिराय राघवं वनेचरं नार्हति मामुपेक्षितुम्॥३०॥

‘मैं उनके चरणों पर मस्तक रखकर उन्हें मनाने की चेष्टा करूँगा। यदि मेरे बहुत कहने पर भी वे लौटने को राजी न होंगे तो उन वनवासी श्रीराम के साथ मैं भी दीर्घकाल तक वहीं निवास करूँगा वे मेरी उपेक्षा नहीं करेंगे’ ॥ ३०॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टाशीतितमः सर्गः॥ ८८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्डमें अट्ठासीवाँ सर्ग पूरा हुआ। ८८॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अयोध्याकाण्डम्

भरत का सेनासहित गङ्गापार करके भरद्वाज के आश्रम पर जाना

एकोननवतितमः सर्गः 

सर्ग-89


व्युष्य रात्रिं तु तत्रैव गङ्गाकूले स राघवः।

काल्यमुत्थाय शत्रुघ्नमिदं वचनमब्रवीत्॥१॥

शृङ्गवेरपुर में ही गङ्गा के तटपर रात्रि बिताकर रघुकुलनन्दन भरत प्रातःकाल उठे और शत्रुघ्न से इस प्रकार बोले- ॥१॥

शत्रुघ्नोत्तिष्ठ किं शेषे निषादाधिपतिं गुहम्।

शीघ्रमानय भद्रं ते तारयिष्यति वाहिनीम्॥२॥

‘शत्रुघ्न ! उठो, क्या सो रहे हो। तुम्हारा कल्याण हो, तुम निषादराज गुह को शीघ्र बुला लाओ, वही हमें गङ्गा के पार उतारेगा’ ॥ २॥

जागर्मि नाहं स्वपिमि तथैवार्यं विचिन्तयन्।

इत्येवमब्रवीद् भ्राता शत्रुनो विप्रचोदितः॥३॥

उनसे इस प्रकार प्रेरित होने पर शत्रुघ्न ने कहा – ‘भैया! मैं भी आपकी ही भाँति आर्य श्रीराम का चिन्तन करता हुआ जाग रहा हूँ, सोता नहीं हूँ’॥३॥

इति संवदतोरेवमन्योन्यं नरसिंहयोः।

आगम्य प्राञ्जलिः काले गुहो वचनमब्रवीत्॥४॥

वे दोनों पुरुषसिंह जब इस प्रकार परस्पर बातचीत कर रहे थे, उसी समय गुह उपयुक्त वेला में आ पहुँचा और हाथ जोड़कर बोला— ॥ ४॥

कच्चित् सुखं नदीतीरेऽवात्सीः काकुत्स्थ शर्वरीम्।

कच्चिच्च सहसैन्यस्य तव नित्यमनामयम्॥५॥

‘ककुत्स्थ कूलभूषण भरतजी! इस नदी के तट पर आप रात में सुख से रहे हैं न? सेनासहित आपको यहाँ कोई कष्ट तो नहीं हुआ है? आप सर्वथा नीरोग हैं न?’॥

गुहस्य तत् तु वचनं श्रुत्वा स्नेहादुदीरितम्।

रामस्यानुवशो वाक्यं भरतोऽपीदमब्रवीत्॥६॥

गुह के स्नेहपूर्वक कहे गये इस वचन को सुनकर श्रीराम के अधीन रहने वाले भरत ने यों कहा- ॥६॥

सुखा नः शर्वरी धीमन् पूजिताश्चापि ते वयम्।

गङ्गां तु नौभिर्बह्वीभिर्दाशाः संतारयन्तु नः॥७॥

‘बुद्धिमान् निषादराज! हम सब लोगों की रात बड़े सुख से बीती है। तुमने हमारा बड़ा सत्कार किया। अब ऐसी व्यवस्था करो, जिससे तुम्हारे मल्लाह बहुत-सी नौकाओं द्वारा हमें गङ्गा के पार उतार दें’।७॥

ततो गुहः संत्वरितः श्रुत्वा भरतशासनम्।

प्रतिप्रविश्य नगरं तं ज्ञातिजनमब्रवीत्॥८॥

भरत का यह आदेश सुनकर गुह तुरंत अपने नगर में गया और भाई-बन्धुओं से बोला— ॥८॥

उत्तिष्ठत प्रबुध्यध्वं भद्रमस्तु हि वः सदा।

नावः समुपकर्षध्वं तारयिष्यामि वाहिनीम्॥९॥

‘उठो, जागो, सदा तुम्हारा कल्याण हो नौकाओं को खींचकर घाटपर ले आओ। भरत की सेना को गङ्गाजी के पार उतारूँगा’॥९॥

ते तथोक्ताः समुत्थाय त्वरिता राजशासनात्।

पञ्च नावां शतान्येव समानिन्युः समन्ततः॥ १०॥

गुह के इस प्रकार कहने पर अपने राजा की आज्ञा से सभी मल्लाह शीघ्र ही उठ खड़े हुए और चारों ओर से पाँच सौ नौकाएँ एकत्र कर लाये॥ १० ॥

अन्याः स्वस्तिकविज्ञेया महाघण्टाधरावराः।

शोभमानाः पताकिन्यो युक्तवाहाः सुसंहताः॥ ११॥

इन सबके अतिरिक्त कुछ स्वस्तिक नाम से प्रसिद्ध नौकाएँ थीं; जो स्वस्तिकके चिह्नों से अलंकृत होने के कारण उन्हीं चिह्नों से पहचानी जाती थीं। उनपर ऐसी पताकाएँ फहरा रही थीं, जिनमें बड़ी-बड़ी घण्टियाँ लटक रही थीं। स्वर्ण आदि के बने हुए चित्रों से उन नौकाओं की विशेष शोभा हो रही थी। उनमें नौका खेने के लिये बहुत-से डाँड़ लगे हुए थे तथा चतुर नाविक उन्हें चलाने के लिये तैयार बैठे थे। वे सभी नौकाएँ बड़ी मजबूत बनी थीं॥ ११॥

ततः स्वस्तिकविज्ञेयां पाण्डुकम्बलसंवृताम्।

सनन्दिघोषां कल्याणी गुहो नावमुपाहरत्॥१२॥

उन्हीं में से एक कल्याणमयी नाव गुह स्वयं लेकर आया, जिसमें श्वेत कालीन बिछे हुए थे तथा उस स्वस्तिक नामवाली नाव पर माङ्गलिक शब्द हो रहा था॥ १२॥

तामारुरोह भरतः शत्रुघ्नश्च महाबलः।

कौसल्या च सुमित्रा च याश्चान्या राजयोषितः॥

पुरोहितश्च तत् पूर्वं गुरवो ब्राह्मणाश्च ये।

अनन्तरं राजदारास्तथैव शकटापणाः॥१४॥

उस पर सबसे पहले पुरोहित, गुरु और ब्राह्मण बैठे। तत्पश्चात् उस पर भरत, महाबली शत्रुघ्न, कौसल्या, सुमित्रा, कैकेयी तथा राजा दशरथ की जो अन्य रानियाँ थीं, वे सब सवार हुईं। तदनन्तर राजपरिवार की दूसरी स्त्रियाँ बैठीं। गाड़ियाँ तथा क्रय विक्रय की सामग्रियाँ दूसरी-दूसरी नावों पर लादी गयीं॥ १३-१४॥

आवासमादीपयतां तीर्थं चाप्यवगाहताम्।

भाण्डानि चाददानानां घोषस्तु दिवमस्पृशत्॥

कुछ सैनिक बड़ी-बड़ी मशालें जलाकर* अपने खेमों में छूटी हुई वस्तुओं को सँभालने लगे। कुछ लोग शीघ्रतापूर्वक घाट पर उतरने लगे तथा बहुत-से सैनिक अपने-अपने सामान को ‘यह मेरा है, यह मेरा है’ इस तरह पहचानकर उठाने लगे। उस समय जो महान् कोलाहल मचा, वह आकाश में गूंज उठा।। १५ ॥

* यहाँ ‘आवासमादीपयताम्’ का अर्थ कुछ टीकाकारों ने यह किया है कि वे अपने आवासस्थान में आग लगाने लगे। ‘आवश्यक वस्तुओं को लाद लेने के बाद जो मामूली झोंपड़े और नगण्य वस्तुएँ शेष रह जाती हैं, उनमें छावनी उखाड़ते समय आग लगा देना—यह सेना का धर्म बताया गया है। इसके दो रहस्य हैं, किसी शत्रुपक्षीय व्यक्ति के लिये अपना कोई निशान न छोडना—यह सैनिक नीति है। दसरा यह है कि इस तरह आग लगाकर जाने से विजय-लक्ष्मी की प्राप्ति होती है—ऐसा उनका परम्परागत विश्वास है।

पताकिन्यस्तु ता नावः स्वयं दाशैरधिष्ठिताः।

वहन्त्यो जनमारूढं तदा सम्पेतुराशुगाः॥१६॥

उन सभी नावों पर पताकाएँ फहरा रही थीं। सबके ऊपर खेने वाले कई मल्लाह बैठे थे। वे सब नौकाएँ उस समय चढ़े हुए मनुष्यों को तीव्रगति से पार ले जाने लगीं॥ १६॥

नारीणामभिपूर्णास्तु काश्चित् काश्चित् तु वाजिनाम्।

काश्चित् तत्र वहन्ति स्म यानयुग्यं महाधनम्॥ १७॥

कितनी ही नौकाएँ केवल स्त्रियों से भरी थीं, कुछ नावों पर घोड़े थे तथा कुछ नौकाएँ गाड़ियों, उनमें जोते जाने वाले घोडे, खच्चर. बैल आदि वाहनों तथा बहुमूल्य रत्न आदि को ढो रही थीं॥ १७॥

तास्तु गत्वा परं तीरमवरोप्य च तं जनम्।

निवृत्ता काण्डचित्राणि क्रियन्ते दाशबन्धुभिः॥ १८॥

वे दूसरे तट पर पहुँचकर वहाँ लोगों को उतारकर जब लौटीं, उस समय मल्लाहबन्धु जल में उनकी विचित्र गतियों का प्रदर्शन करने लगे॥ १८ ॥

सवैजयन्तास्तु गजा गजारोहैः प्रचोदिताः।

तरन्तः स्म प्रकाशन्ते सपक्षा इव पर्वताः ॥१९॥

वैजयन्ती पताकाओं से सुशोभित होने वाले हाथी महावतों से प्रेरित होकर स्वयं ही नदी पार करने लगे। उस समय वे पंखधारी पर्वतों के समान प्रतीत होते थे॥

नावश्चारुरुहुस्त्वन्ये प्लवैस्तेरुस्तथापरे।

अन्ये कुम्भघटैस्तेरुरन्ये तेरुश्च बाहुभिः॥२०॥

कितने ही मनुष्य नावों पर बैठे थे और कितने ही बाँस तथा तिनकोंसे बने हुए बेड़ों पर सवार थे। कुछ लोग बड़े-बड़े कलशों, कुछ छोटे घड़ों और कुछ अपनी बाहुओं से ही तैरकर पार हो रहे थे॥ २० ॥

सा पुण्या ध्वजिनी गङ्गां दाशैः संतारिता स्वयम्।

मैत्रे मुहूर्ते प्रययौ प्रयागवनमुत्तमम्॥२१॥

इस प्रकार मल्लाहों की सहायता से वह सारी पवित्र सेना गङ्गा के पार उतारी गयी। फिर वह स्वयं मैत्र* नामक मुहूर्त में उत्तम प्रयाग वन की ओर प्रस्थित हो गयी॥ २१॥

* दो-दो घड़ी (दण्ड) का एक मुहूर्त होता है। दिन में कुल पंद्रह मुहूर्त बीतते हैं। इनमें से तीसरे मुहूर्त को ‘मैत्र’ कहते हैं। बृहस्पति ने पंद्रह मुहूर्तो के नाम इस प्रकार गिनाये हैं रौद्र, सार्प, मैत्र, पैत्र, वासव, आप्य, वैश्व, ब्राह्म, प्राज, ईश, ऐन्द्र, ऐन्द्राग्न, नैर्ऋत, वारुणार्यमण तथा भगी जैसा कि वचन है॥

रौद्रः सार्पस्तथा मैत्रः पैत्रो वासव एव च।

आप्यो वैश्वस्तथा ब्राह्मः प्राजेशैन्द्रास्तथैव च।

ऐन्द्राग्नो नैर्ऋतश्चैव वारुणार्यमणो भगी।

एतेऽह्नि क्रमशो ज्ञेया मुहूर्ता दश पश्च च॥

आश्वासयित्वा च चमं महात्मा निवेशयित्वा च यथोपजोषम्।

द्रष्टुं भरद्वाजमृषिप्रवर्यमृत्विक्सदस्यैर्भरतः प्रतस्थे॥२२॥

वहाँ पहुँचकर महात्मा भरत सेना को सुखपूर्वक विश्राम की आज्ञा दे उसे प्रयाग वन में ठहराकर स्वयंऋत्विजों तथा राजसभा के सदस्यों के साथ ऋषिश्रेष्ठ भरद्वाज का दर्शन करने के लिये गये॥ २२ ॥

स ब्राह्मणस्याश्रममभ्युपेत्य महात्मनो देवपुरोहितस्य।

ददर्श रम्योटजवृक्षदेशं महदनं विप्रवरस्य रम्यम्॥ २३॥

देवपुरोहित महात्मा ब्राह्मण भरद्वाज मुनि के आश्रम पर पहुँचकर भरत ने उन विप्रशिरोमणि के रमणीय एवं विशाल वन को देखा, जो मनोहर पर्णशालाओं तथा वृक्षावलियों से सुशोभित था॥ २३॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकोननवतितमः सर्गः॥ ८९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में नवासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८९॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अयोध्याकाण्डम्

भरत और भरद्वाज मुनि की भेंट एवं बातचीत तथा मुनि का अपने आश्रम पर ही ठहरने का आदेश देना

नवतितमः सर्गः 

सर्ग-90


भरद्वाजाश्रमं गत्वा क्रोशादेव नरर्षभः।

जनं सर्वमवस्थाप्य जगाम सह मन्त्रिभिः॥१॥

पद्भ्यामेव तु धर्मज्ञो न्यस्तशस्त्रपरिच्छदः।

वसानो वाससी क्षौमे पुरोधाय पुरोहितम्॥२॥

धर्म के ज्ञाता नरश्रेष्ठ भरत ने भरद्वाज-आश्रम के पास पहुँचकर अपने साथ के सब लोगों को आश्रम से एक कोस इधर ही ठहरा दिया था और अपने भी अस्त्रशस्त्र तथा राजोचित वस्त्र उतारकर वहीं रख दिये थे। केवल दो रेशमी वस्त्र धारण करके पुरोहित को आगे किये वे मन्त्रियों के साथ पैदल ही वहाँ गये॥ १-२॥

ततः संदर्शने तस्य भरद्वाजस्य राघवः।

मन्त्रिणस्तानवस्थाप्य जगामानुपुरोहितम्॥३॥

आश्रम में प्रवेश करके जहाँ दूर से ही मुनिवर भरद्वाज का दर्शन होने लगा। वहीं उन्होंने उन मन्त्रियों को खड़ा कर दिया और पुरोहित वसिष्ठजी को आगे करके वे पीछे-पीछे ऋषिके पास गये॥३॥

वसिष्ठमथ दृष्ट्वैव भरद्वाजो महातपाः।

संचचालासनात् तूर्णं शिष्यानय॑मिति ब्रुवन्॥ ४॥

महर्षि वसिष्ठ को देखते ही महातपस्वी भरद्वाज आसन से उठ खड़े हुए और शिष्यों से शीघ्रतापूर्वक अर्घ्य ले आने को कहा॥४॥

समागम्य वसिष्ठेन भरतेनाभिवादितः।

अबुध्यत महातेजाः सुतं दशरथस्य तम्॥५॥

फिर वे वसिष्ठ से मिले। तत्पश्चात् भरत ने उनके चरणों में प्रणाम किया। महातेजस्वी भरद्वाज समझ गये कि ये राजा दशरथ के पुत्र हैं॥ ५ ॥

ताभ्यामर्थ्य च पाद्यं च दत्त्वा पश्चात् फलानि च।

आनुपूर्व्याच्च धर्मज्ञः पप्रच्छ कुशलं कुले॥६॥

धर्मज्ञ ऋषि ने क्रमशः वसिष्ठ और भरत को अर्घ्य, पाद्य तथा फल आदि निवेदन करके उन दोनों के कुल का कुशल-समाचार पूछा ॥ ६॥

अयोध्यायां बले कोशे मित्रेष्वपि च मन्त्रिप।

जानन् दशरथं वृत्तं न राजानमुदाहरत्॥७॥

इसके बाद अयोध्या, सेना, खजाना, मित्रवर्ग तथा मन्त्रिमण्डल का हाल पूछा। राजा दशरथ की मृत्यु का वृत्तान्त वे जानते थे; इसलिये उनके विषय में उन्होंने कुछ नहीं पूछा ॥ ७॥

वसिष्ठो भरतश्चैनं पप्रच्छतुरनामयम्।

शरीरेऽग्निषु शिष्येषु वृक्षेषु मृगपक्षिषु॥८॥

वसिष्ठ और भरत ने भी महर्षि के शरीर, अग्निहोत्र, शिष्यवर्ग, पेड़-पत्ते तथा मृग-पक्षी आदि का कुशल समाचार पूछा ॥ ८॥

तथेति तु प्रतिज्ञाय भरद्वाजो महायशाः।

भरतं प्रत्युवाचेदं राघवस्नेहबन्धनात्॥९॥

महायशस्वी भरद्वाज ‘सब ठीक है’ ऐसा कहकर श्रीराम के प्रति स्नेह होने के कारण भरत से इस प्रकार बोले- ॥९॥

किमिहागमने कार्यं तव राज्यं प्रशासतः।

एतदाचक्ष्व सर्वं मे न हि मे शुध्यते मनः॥१०॥

‘तुम तो राज्य कर रहे हो न? तुम्हें यहाँ आने की क्या आवश्यकता पड़ गयी? यह सब मुझे बताओ, क्योंकि मेरा मन तुम्हारी ओर से शुद्ध नहीं हो रहा है —मेरा विश्वास तुम पर नहीं जमता है॥ १० ॥

सुषुवे यममित्रघ्नं कौसल्याऽऽनन्दवर्धनम्।

भ्रात्रा सह सभार्यो यश्चिरं प्रव्राजितो वनम्॥ ११॥

नियुक्तः स्त्रीनिमित्तेन पित्रा योऽसौ महायशाः।

वनवासी भवेतीह समाः किल चतुर्दश॥१२॥

कच्चिन्न तस्यापापस्य पापं कर्तुमिहेच्छसि।

अकण्टकं भोक्तुमना राज्यं तस्यानुजस्य च॥ १३॥

‘जो शत्रुओं का नाश करने वाला है, जिस आनन्दवर्धक पुत्र को कौसल्या ने जन्म दिया है तथा तुम्हारे पिता ने स्त्री के कारण जिस महायशस्वी पुत्र को चौदह वर्षों तक वन में रहने की आज्ञा देकर उसे भाई

और पत्नी के साथ दीर्घकाल के लिये वन में भेज दिया है, उस निरपराध श्रीराम और उसके छोटे भाई लक्ष्मण का तुम अकण्टक राज्य भोगने की इच्छा से कोई अनिष्ट तो नहीं करना चाहते हो?’ ॥ ११–१३॥

एवमुक्तो भरद्वाजं भरतः प्रत्युवाच ह।

पर्यश्रुनयनो दुःखाद् वाचा संसज्जमानया॥१४॥

भरद्वाजजी के ऐसा कहने पर दुःख के कारण भरत की आँखें डबडबा आयीं। वे लड़खड़ाती हुई वाणी में उनसे इस प्रकार बोले- ॥ १४ ॥

हतोऽस्मि यदि मामेवं भगवानपि मन्यते।

मत्तो न दोषमाशङ्के मैवं मामनुशाधि हि॥१५॥

‘भगवन् ! यदि आप पूज्यपाद महर्षि भी मुझे ऐसा समझते हैं, तब तो मैं हर तरह से मारा गया। यह मैं निश्चित रूप से जानता हूँ कि श्रीराम के वनवास में मेरी ओर से कोई अपराध नहीं हुआ है, अतः आप मुझसे ऐसी कठोर बात न कहें॥ १५ ॥

न चैतदिष्टं माता मे यदवोचन्मदन्तरे।

नाहमेतेन तुष्टश्च न तद्वचनमाददे॥१६॥

‘मेरी आड़ लेकर मेरी माता ने जो कुछ कहा या किया है, यह मुझे अभीष्ट नहीं है। मैं इससे संतुष्ट नहीं हूँ और न माता की उस बात को स्वीकार ही करता

अहं तु तं नरव्याघ्रमुपयातः प्रसादकः।

रतिनेतुमयोध्यायां पादौ चास्याभिवन्दितुम्॥ १७॥

‘मैं तो उन पुरुषसिंह श्रीराम को प्रसन्न करके अयोध्या में लौटा लाने और उनके चरणों की वन्दना करने के लिये जा रहा हूँ॥ १७॥

तं मामेवंगतं मत्वा प्रसादं कर्तुमर्हसि।

शंस मे भगवन् रामः क्व सम्प्रति महीपतिः॥ १८॥

‘इसी उद्देश्यसे मैं यहाँ आया हूँ। ऐसा समझकर आपको मुझपर कृपा करनी चाहिये। भगवन् ! आप मुझे बताइये कि इस समय महाराज श्रीराम कहाँ हैं?’ ॥ १८॥

वसिष्ठादिभिर्ऋत्विग्भिर्याचितो भगवांस्ततः।

उवाच तं भरद्वाजः प्रसादाद् भरतं वचः॥१९॥

इसके बाद वसिष्ठ आदि ऋत्विजों ने भी यह प्रार्थना की कि भरत का कोई अपराध नहीं है। आप इन पर प्रसन्न हों। तब भगवान् भरद्वाज ने प्रसन्न होकर भरत से कहा- ॥ १९॥

त्वय्येतत् पुरुषव्याघ्र युक्तं राघववंशजे।

गुरुवृत्तिर्दमश्चैव साधूनां चानुयायिता॥ २०॥

‘पुरुषसिंह ! तुम रघुकुल में उत्पन्न हुए हो। तुममें गुरुजनों की सेवा, इन्द्रियसंयम तथा श्रेष्ठ पुरुषों के अनुसरण का भाव होना उचित ही है॥ २० ॥

जाने चैतन्मनःस्थं ते दृढीकरणमस्त्विति।

अपृच्छं त्वां तवात्यर्थं कीर्तिं समभिवर्धयन्॥ २१॥

‘तुम्हारे मन में जो बात है, उसे मैं जानता हूँ; तथापि मैंने इसलिये पूछा है कि तुम्हारा यह भाव और भी दृढ़ हो जाय तथा तुम्हारी कीर्ति का अधिकाधिक विस्तार हो॥ २१॥

जाने च रामं धर्मज्ञं ससीतं सहलक्ष्मणम्।

अयं वसति ते भ्राता चित्रकूटे महागिरौ॥२२॥

‘मैं सीता और लक्ष्मणसहित धर्मज्ञ श्रीराम का पता जानता हूँ। ये तुम्हारे भ्राता श्रीरामचन्द्र महापर्वत चित्रकूट पर निवास करते हैं॥ २२॥

श्वस्तु गन्तासि तं देशं वसाद्य सह मन्त्रिभिः।

एतं मे कुरु सुप्राज्ञ कामं कामार्थकोविद ॥२३॥

‘अब कल तुम उस स्थान की यात्रा करना। आज अपने मन्त्रियों के साथ इस आश्रम में ही रहो। महाबुद्धिमान् भरत! तुम मेरी इस अभीष्ट वस्तु को देने में समर्थ हो, अतः मेरी यह अभिलाषा पूर्ण करो’ ॥२३॥

ततस्तथेत्येवमुदारदर्शनः प्रतीतरूपो भरतोऽब्रवीद् वचः।

चकार बुद्धिं च तदाश्रमे तदा निशानिवासाय नराधिपात्मजः॥२४॥

तब जिनके स्वरूप एवं स्वभाव का परिचय मिल गया था, उन उदार दृष्टिवाले भरत ने ‘तथास्तु’ कहकर मुनि की आज्ञा शिरोधार्य की तथा उन राजकुमार ने उस समय रात को उस आश्रम में ही निवास करनेका विचार किया॥२४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे नवतितमः सर्गः॥९०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में नब्बेवाँ सर्ग पूरा हुआ।९०॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अयोध्याकाण्डम्

भरद्वाज मुनि के द्वारा सेनासहित भरत का दिव्य सत्कार

एकनवतितमः सर्गः 

सर्ग-91


कृतबुद्धिं निवासाय तत्रैव स मुनिस्तदा।

भरतं केकयीपुत्रमातिथ्येन न्यमन्त्रयत्॥१॥

जब भरत ने उस आश्रम में ही निवास का दृढ़निश्चय कर लिया, तब मुनि ने कैकेयीकुमार भरत को अपना आतिथ्य ग्रहण करने के लिये न्यौता दिया॥१॥

अब्रवीद् भरतस्त्वेनं नन्विदं भवता कृतम्।

पाद्यमय॑मथातिथ्यं वने यदुपपद्यते॥२॥

यह सुनकर भरत ने उनसे कहा—’मुने! वन में जैसा आतिथ्य-सत्कार सम्भव है, वह तो आप पाद्य, अर्घ्य और फल-मूल आदि देकर कर ही चुके’ ॥ २॥

अथोवाच भरद्वाजो भरतं प्रहसन्निव।

जाने त्वां प्रीतिसंयुक्तं तष्येस्त्वं येन केनचित्॥

उनके ऐसा कहने पर भरद्वाजजी भरत से हँसते हुए से बोले—’भरत ! मैं जानता हूँ, मेरे प्रति तुम्हारा प्रेम है; अतः मैं तुम्हें जो कुछ दूंगा, उसी से तुम संतुष्ट हो जाओगे॥३॥

सेनायास्तु तवैवास्याः कर्तुमिच्छामि भोजनम्।

मम प्रीतिर्यथारूपा त्वम मनुजर्षभ॥४॥

‘किंतु इस समय मैं तुम्हारी सेना को भोजन कराना चाहता हूँ। नरश्रेष्ठ! इससे मुझे प्रसन्नता होगी और जिस तरह मुझे प्रसन्नता हो, वैसा कार्य तुम्हें अवश्य करना चाहिये॥ ४॥

किमर्थं चापि निक्षिप्य दूरे बलमिहागतः।

कस्मान्नेहोपयातोऽसि सबलः पुरुषर्षभ॥५॥

‘पुरुषप्रवर! तुम अपनी सेना को किसलिये इतनी दूर छोड़कर यहाँ आये हो, सेनासहित यहाँ क्यों नहींआये?’ ॥ ५॥

भरतः प्रत्युवाचेदं प्राञ्जलिस्तं तपोधनम्।

न सैन्येनोपयातोऽस्मि भगवन् भगवद्भयात्॥६॥

तब भरत ने हाथ जोड़कर उन तपोधन मुनि को उत्तर दिया—’भगवन् ! मैं आपके ही भय से सेना के साथ यहाँ नहीं आया॥६॥

राज्ञा हि भगवन् नित्यं राजपुत्रेण वा तथा।

यत्नतः परिहर्तव्या विषयेषु तपस्विनः॥७॥

‘प्रभो! राजा और राजपुत्र को चाहिये कि वे सभी देशों में प्रयत्नपूर्वक तपस्वीजनों को दूर छोड़कर रहें(क्योंकि उनके द्वारा उन्हें कष्ट पहुँचने की सम्भावना रहती है)॥

वाजिमुख्या मनुष्याश्च मत्ताश्च वरवारणाः।

प्रच्छाद्य भगवन् भूमिं महतीमनुयान्ति माम्॥८॥

‘भगवन्! मेरे साथ बहुत-से अच्छे-अच्छे घोड़े, मनुष्य और मतवाले गजराज हैं, जो बहुत बड़े भूभाग को ढककर मेरे पीछे-पीछे चलते हैं।। ८॥

ते वृक्षानुदकं भूमिमाश्रमेषूटजांस्तथा।।

न हिंस्युरिति तेनाहमेक एवागतस्ततः॥९॥

‘वे आश्रम के वृक्ष, जल, भूमि और पर्णशालाओं को हानि न पहुँचायें, इसलिये मैं यहाँ अकेला ही आया हूँ॥

आनीयतामितः सेनेत्याज्ञप्तः परमर्षिणा।

तथानुचक्रे भरतः सेनायाः समुपागमम्॥१०॥

तदनन्तर उन महर्षि ने आज्ञा दी कि ‘सेना को यहीं ले आओ’ तब भरत ने सेना को वहीं बुलवा लिया॥ १०॥

अग्निशालां प्रविश्याथ पीत्वापः परिमृज्य च।

आतिथ्यस्य क्रियाहेतोर्विश्वकर्माणमाह्वयत्॥

इसके बाद मुनिवर भरद्वाज ने अग्निशाला में प्रवेश करके जल का आचमन किया और ओठ पोंछकर भरत के आतिथ्य-सत्कार के लिये विश्वकर्मा आदि का आवाहन किया॥११॥

आह्वये विश्वकर्माणमहं त्वष्टारमेव च।

आतिथ्यं कर्तुमिच्छामि तत्र मे संविधीयताम्॥ १२॥

वे बोले—’मैं विश्वकर्मा त्वष्टा देवता का आवाहन करता हूँ। मेरे मन में सेनासहित भरत का आतिथ्यसत्कार करने की इच्छा हुई है। इसमें मेरे लिये वे आवश्यक प्रबन्ध करें॥ १२॥

आह्वये लोकपालांस्त्रीन् देवान् शक्रपुरोगमान्।

आतिथ्यं कर्तुमिच्छामि तत्र मे संविधीयताम्॥

‘जिनके अगुआ इन्द्र हैं, उन तीन लोकपालों का (अर्थात् इन्द्रसहित यम, वरुण और कुबेर नामक देवताओं का) मैं आवाहन करता हूँ। इस समय भरत का आतिथ्य-सत्कार करना चाहता हूँ, इसमें मेरे लिये वे लोग आवश्यक प्रबन्ध करें॥ १३॥

प्राक्स्रोतसश्च या नद्यस्तिर्यक्स्रोतस एव च।

पृथिव्यामन्तरिक्षे च समायान्त्वद्य सर्वशः॥१४॥

‘पृथिवी और आकाश में जो पूर्व एवं पश्चिम की ओर प्रवाहित होने वाली नदियाँ हैं, उनका भी मैं आवाहन करता हूँ; वे सब आज यहाँ पधारें॥ १४ ॥

अन्याः सवन्तु मैरेयं सुरामन्याः सुनिष्ठिताम्।

अपराश्चोदकं शीतमिक्षुकाण्डरसोपमम्॥ १५॥

‘कुछ नदियाँ मैरेय प्रस्तुत करें। दूसरी अच्छी तरह तैयार की हुई सुरा ले आवें तथा अन्य नदियाँ ईंख के पोरुओं में होने वाले रस की भाँति मधुर एवं शीतल जल तैयार करके रखें॥ १५॥

आह्वये देवगन्धर्वान् विश्वावसुहहाहुहुन्।

तथैवाप्सरसो देवगन्धर्वैश्चापि सर्वशः॥१६॥

‘मैं विश्वावसु, हाहा और हूहू आदि देव-गन्धर्वो का तथा उनके साथ समस्त अप्सराओं का भी आवाहन करता हूँ॥

घृताचीमथ विश्वाची मिश्रकेशीमलम्बुषाम्।

नागदत्तां च हेमां च सोमामद्रिकृतस्थलीम्॥ १७॥

‘घृताची, विश्वाची, मिश्रकेशी, अलम्बुषा नागदत्ता, हेमा, सोमा तथा अद्रिकृतस्थली (अथवा पर्वत पर निवास करने वाली सोमा) का भी मैं आवाहन करता हूँ॥ १७॥

शक्रं याश्चोपतिष्ठन्ति ब्रह्माणं याश्च भामिनीः।

सर्वास्तुम्बुरुणा सार्धमाह्वये सपरिच्छदाः॥१८॥

‘जो अप्सराएँ इन्द्र की सभा में उपस्थित होती हैं तथा जो देवाङ्गनाएँ ब्रह्माजी की सेवा में जाया करती हैं, उन सबका मैं तुम्बुरु के साथ आवाहन करता हूँ। । वे अलङ्कारों तथा नृत्यगीत के लिये अपेक्षित अन्यान्य उपकरणों के साथ यहाँ पधारें॥ १८ ॥

वनं कुरुषु यद् दिव्यं वासोभूषणपत्रवत्।

दिव्यनारीफलं शश्वत् तत्कौबेरमिहैव तु॥१९॥

‘उत्तर कुरुवर्ष में जो दिव्य चैत्ररथ नामक वन है, जिसमें दिव्य वस्त्र और आभूषण ही वृक्षों के पत्ते हैं और दिव्य नारियाँ ही फल हैं, कुबेर का वह सनातन दिव्य वन यहीं आ जाय॥ १९ ॥

इह मे भगवान् सोमो विधत्तामन्नमुत्तमम्।

भक्ष्यं भोज्यं च चोष्यं च लेह्यं च विविधं बहु॥ २०॥

‘यहाँ भगवान् सोम मेरे अतिथियों के लिये उत्तम अन्न, नाना प्रकार के भक्ष्य, भोज्य, लेह्य और चोष्य की प्रचुर मात्रामें व्यवस्था करें॥ २० ॥

विचित्राणि च माल्यानि पादपप्रच्युतानि च।

सुरादीनि च पेयानि मांसानि विविधानि च॥ २१॥

‘वृक्षों से तुरंत चुने गये नाना प्रकार के पुष्प, मधु आदि पेय पदार्थ तथा नाना प्रकार के फलों के गूदे भी भगवान् सोम यहाँ प्रस्तुत करें’॥ २१॥

एवं समाधिना युक्तस्तेजसाप्रतिमेन च।

शिक्षास्वरसमायुक्तं सुव्रतश्चाब्रवीन्मुनिः॥२२॥

इस प्रकार उत्तम व्रत का पालन करने वाले भरद्वाज मुनि ने एकाग्रचित्त और अनुपम तेज से सम्पन्न हो शिक्षा (शिक्षाशास्त्र में बतायी गयी उच्चारणविधि) और (व्याकरणशास्त्रोक्त प्रकृति-प्रत्यय सम्बन्धी)स्वर से युक्त वाणी में उन सबका आवाहन किया॥ २२॥

मनसा ध्यायतस्तस्य प्राङ्मुखस्य कृताञ्जलेः।

आजग्मुस्तानि सर्वाणि दैवतानि पृथक् पृथक्॥ २३॥

इस तरह आवाहन करके मुनि पूर्वाभिमुख हो हाथ जोड़े मन-ही-मन ध्यान करने लगे। उनके स्मरण करते ही वे सभी देवता एक-एक करके वहाँ आ पहुँचे॥ २३॥

मलयं दर्दुरं चैव ततः स्वेदनदोऽनिलः।

उपस्पृश्य ववौ युक्त्या सुप्रियात्मा सुखं शिवः॥ २४॥

फिर तो वहाँ मलय और दर्दर नामक पर्वतोंका स्पर्श करके बहनेवाली अत्यन्त प्रिय और सुखदायिनी हवा धीरे-धीरे चलने लगी, जो स्पर्शमात्रसे शरीरके पसीनेको सुखा देनेवाली थी॥ २४॥

ततोऽभ्यवर्षन्त घना दिव्याः कुसुमवृष्टयः।

देवदुन्दुभिघोषश्च दिक्षु सर्वासु शुश्रुवे॥२५॥

तत्पश्चात् मेघगण दिव्य पुष्पों की वर्षा करने लगे। सम्पूर्ण दिशाओं में देवताओं की दुन्दुभियों का मधुर शब्द सुनायी देने लगा॥ २५ ॥

प्रववुश्चोत्तमा वाता ननृतुश्चाप्सरोगणाः।

प्रजगुर्देवगन्धर्वा वीणाः प्रमुमुचुः स्वरान्॥ २६॥

उत्तम वायु चलने लगी। अप्सराओं के समुदायों का नृत्य होने लगा। देवगन्धर्व गाने लगे और सब ओर वीणाओं की स्वरलहरियाँ फैल गयीं ॥ २६ ॥

स शब्दो द्यां च भूमिं च प्राणिनां श्रवणानि च।

विवेशोच्चावचः श्लक्ष्णः समो लयगुणान्वितः॥ २७॥

संगीत का वह शब्द पृथ्वी, आकाश तथा प्राणियों के कर्णकुहरों में प्रविष्ट होकर गूंजने लगा।आरोह-अवरोह से युक्त वह शब्द कोमल एवं मधुर था, समताल से विशिष्ट और लयगुण से सम्पन्न था॥ २७॥

तस्मिन्नेवंगते शब्दे दिव्ये श्रोत्रसुखे नृणाम्।

ददर्श भारतं सैन्यं विधानं विश्वकर्मणः ॥२८॥

इस प्रकार मनुष्यों के कानों को सुख देने वाला वह दिव्य शब्द हो ही रहा था कि भरत की सेना को विश्वकर्मा का निर्माण कौशल दिखायी पड़ा ॥ २८॥

बभूव हि समा भूमिः समन्तात् पञ्चयोजनम्।

शादलैर्बहुभिश्छन्ना नीलवैदूर्यसंनिभैः ॥ २९॥

चारों ओर पाँच योजनतक की भूमि समतल हो गयी। उस पर नीलम और वैदूर्य मणि के समान नाना प्रकार की घनी घास छा रही थी॥ २९॥

तस्मिन् बिल्वाः कपित्थाश्च पनसा बीजपूरकाः।

आमलक्यो बभूवुश्च चूताश्च फलभूषिताः॥ ३०॥

स्थान-स्थान पर बेल, कैथ, कटहल, आँवला, बिजौरा तथा आम के वृक्ष लगे थे, जो फलों से सुशोभित हो रहे थे॥ ३०॥

उत्तरेभ्यः कुरुभ्यश्च वनं दिव्योपभोगवत्।

आजगाम नदी सौम्या तीरजैर्बहभिर्वृता॥३१॥

उत्तर कुरुवर्ष से दिव्य भोग-सामग्रियों से सम्पन्न चैत्ररथ नामक वन वहाँ आ गया। साथ ही वहाँ की रमणीय नदियाँ भी आ पहुँचीं, जो बहुसंख्यक तटवर्ती वृक्षों से घिरी हुई थीं॥३१॥

चतुःशालानि शुभ्राणि शालाश्च गजवाजिनाम्।

हर्म्यप्रासादसंयुक्ततोरणानि शुभानि च ॥ ३२॥

उज्ज्व ल, चार-चार कमरों से युक्त गृह (अथवा गृहयुक्त चबूतरे) तैयार हो गये। हाथी और घोड़ोंके रहनेके लिये शालाएँ बन गयीं। अट्टालिकाओं तथा सतमंजिले महलों से युक्त सुन्दर नगरद्वार भी निर्मित हो गये॥३२॥

सितमेघनिभं चापि राजवेश्म सुतोरणम्।

शुक्लमाल्यकृताकारं दिव्यगन्धसमुक्षितम्॥ ३३॥

राजपरिवार के लिये बना हुआ सुन्दर द्वार से युक्त दिव्य भवन श्वेत बादलों के समान शोभा पा रहा था।उसे सफेद फूलों की मालाओं से सजाया और दिव्य सुगन्धित जल से सींचा गया था॥ ३३॥

चतुरस्रमसम्बाधं शयनासनयानवत्।

दिव्यैः सर्वरसैर्युक्तं दिव्यभोजनवस्त्रवत्॥ ३४॥

वह महल चौकोना तथा बहुत बड़ा था उसमें संकीर्णता का अनुभव नहीं होता था। उसमें सोने, बैठने और सवारियों के रहने के लिये अलग-अलग स्थान थे।वहाँ सब प्रकार के दिव्य रस, दिव्य भोजन और दिव्य वस्त्र प्रस्तुत थे॥ ३४॥ ।

उपकल्पितसर्वान्नं धौतनिर्मलभाजनम्।

क्लृप्तसर्वासनं श्रीमत्स्वास्तीर्णशयनोत्तमम्॥ ३५॥

सब तरहके अन्न और धुले हुए स्वच्छ पात्र रखे गये थे। उस सुन्दर भवन में कहीं बैठने के लिये सब प्रकार के आसन उपस्थित थे और कहीं सोने के लिये सुन्दर शय्याएँ बिछी थीं॥ ३५॥

प्रविवेश महाबाहुरनुज्ञातो महर्षिणा।

वेश्म तद रत्नसम्पूर्ण भरतः कैकयीसुतः॥३६॥

अनुजग्मुश्च ते सर्वे मन्त्रिणः सपुरोहिताः।

बभूवुश्च मुदा युक्तास्तं दृष्ट्वा वेश्मसंविधिम्॥ ३७॥

महर्षि भरद्वाज की आज्ञा से कैकेयी पुत्र महाबाहु भरत ने नाना प्रकार के रत्नों से भरे हुए उस महल में प्रवेश किया। उनके साथ-साथ पुरोहित और मन्त्री भी उसमें गये। उस भवन का निर्माण कौशल देखकर उन सब लोगों को बड़ी प्रसन्नता हुई। ३६-३७॥

तत्र राजासनं दिव्यं व्यजनं छत्रमेव च।

भरतो मन्त्रिभिः सार्धमभ्यवर्तत राजवत्॥ ३८॥

उस भवन में भरत ने दिव्य राजसिंहासन, चँवर और छत्र भी देखे तथा वहाँ राजा श्रीराम की भावना करके मन्त्रियों के साथ उन समस्त राजभोग्य वस्तुओं की प्रदक्षिणा की।

आसनं पूजयामास रामायाभिप्रणम्य च।

वालव्यजनमादाय न्यषीदत् सचिवासने॥३९॥

सिंहासन पर श्रीरामचन्द्रजी महाराज विराजमान हैं, ऐसी धारणा बनाकर उन्होंने श्रीराम को प्रणाम किया और उस सिंहासन की भी पूजा की फिर अपने हाथ में चँवर ले, वे मन्त्री के आसन पर जा बैठे॥ ३९ ॥

आनुपूर्व्यान्निषेदुश्च सर्वे मन्त्रिपुरोहिताः।

ततः सेनापतिः पश्चात् प्रशास्ता च न्यषीदत॥ ४०॥

तत्पश्चात् पुरोहित और मन्त्री भी क्रमशः अपने योग्य आसनों पर बैठे फिर सेनापति और प्रशास्ता (छावनी की रक्षा करने वाले) भी बैठ गये॥ ४०॥

ततस्तत्र मुहूर्तेन नद्यः पायसकर्दमाः।

उपातिष्ठन्त भरतं भरद्वाजस्य शासनात्॥४१॥

तदनन्तर वहाँ दो ही घड़ी में भरद्वाज मुनि की आज्ञा से भरत की सेवा में नदियाँ उपस्थित हुईं, जिनमें कीच के स्थान में खीर भरी थी॥ ४१॥

आसामुभयतःकूलं पाण्डुमृत्तिकलेपनाः।

रम्याश्चावसथा दिव्या ब्राह्मणस्य प्रसादजाः॥ ४२॥

उन नदियों के दोनों तटों पर ब्रह्मर्षि भरद्वाज की कृपा से दिव्य एवं रमणीय भवन प्रकट हो गये थे, जो चूने से पुते हुए थे॥ ४२॥

तेनैव च मुहूर्तेन दिव्याभरणभूषिताः।

आगुर्विंशतिसाहस्राः ब्रह्मणा प्रहिताः स्त्रियः॥ ४३॥

उसी मुहूर्त में ब्रह्माजी की भेजी हुई दिव्य आभूषणों से विभूषित बीस हजार दिव्याङ्गनाएँ वहाँ आयीं॥४३॥

सुवर्णमणिमुक्तेन प्रवालेन च शोभिताः।

आगुर्विंशतिसाहस्राः कुबेरप्रहिताः स्त्रियः॥४४॥

याभिर्गृहीतः पुरुषः सोन्माद इव लक्ष्यते।

इसी तरह सुवर्ण, मणि, मुक्ता और मूंगों के आभूषणों से सुशोभित, कुबेर की भेजी हुई बीस हजार दिव्य महिलाएँ भी वहाँ उपस्थित हईं, जिनका स्पर्श पाकर पुरुष उन्मादग्रस्त-सा दिखायी देता है॥ ४४ १/२॥

आगुर्विंशतिसाहस्रा नन्दनादप्सरोगणाः॥४५॥

नारदस्तुम्बुरुर्गोपः प्रभया सूर्यवर्चसः।

एते गन्धर्वराजानो भरतस्याग्रतो जगुः ॥ ४६॥

इनके सिवा नन्दनवन से बीस हजार अप्सराएँ भी आयीं। नारद, तुम्बुरु और गोप अपनी कान्ति से सूर्य के समान प्रकाशित होते थे। ये तीनों गन्धर्वराज भरत के सामने गीत गाने लगे॥ ४५-४६ ॥

अलम्बुषा मिश्रकेशी पुण्डरीकाथ वामना।

उपानृत्यन्त भरतं भरद्वाजस्य शासनात्॥४७॥

अलम्बुषा, मिश्रकेशी, पुण्डरी का और वामना—ये चार अप्सराएँ भरद्वाज मुनि की आज्ञा से भरत के समीप नृत्य करने लगीं॥४७॥

यानि माल्यानि देवेषु यानि चैत्ररथे वने।

प्रयागे तान्यदृश्यन्त भरद्वाजस्य तेजसा॥४८॥

जो फूल देवताओं के उद्यानों में और जो चैत्ररथ वन में हुआ करते हैं, वे महर्षि भरद्वाज के प्रताप से प्रयाग में दिखायी देने लगे॥४८॥

बिल्वा मार्दङ्गिका आसन् शम्याग्राहा बिभीतकाः।

अश्वत्था नर्तकाश्चासन् भरद्वाजस्य तेजसा॥ ४९॥

भरद्वाज मुनि के तेज से बेल के वृक्ष मृदङ्ग बजाते, बहेड़े के पेड़ शम्या नामक ताल देते और पीपल के वृक्ष वहाँ नृत्य करते थे। ४९॥

ततः सरलतालाश्च तिलकाः सतमालकाः।

प्रहृष्टास्तत्र सम्पेतुः कुब्जा भूत्वाथ वामनाः॥ ५०॥

तदनन्तर देवदारु, ताल, तिलक और तमाल नामक वृक्ष कुबड़े और बौने बनकर बड़े हर्ष के साथ भरत की सेवा में उपस्थित हुए॥५०॥

शिंशपाऽऽमलकी जम्बूर्याश्चान्याः कानने लताः।

मालती मल्लिका जातियश्चान्याः कानने लताः।

प्रमदाविग्रहं कृत्वा भरद्वाजाश्रमेऽवसन्॥५१॥

शिंशपा, आमल की और जम्बू आदि स्त्रीलिङ्गवृक्ष तथा मालती, मल्लिका और जाति आदि वन की लताएँ नारी का रूप धारण करके भरद्वाज मुनि के आश्रम में आ बसीं॥५१॥

सुरां सुरापाः पिबत पायसं च बुभुक्षिताः।

मांसानि च सुमेध्यानि भक्ष्यन्तां यो यदिच्छति॥ ५२॥

(वे भरतके सैनिकों को पुकार-पुकारकर कहती थीं -) ‘मधु का पान करने वाले लोगो! लो, यह मधु पान कर लो। तुममें से जिन्हें भूख लगी हो, वे सब लोग यह खीर खाओ और परम पवित्र फलों के गूदे

भी प्रस्तुत हैं, इनका आस्वादन करो। जिसकी जो इच्छा हो, वही भोजन करो’ ॥ ५२॥

उच्छोद्य स्नापयन्ति स्म नदीतीरेषु वल्गुषु।

अप्येकमेकं पुरुषं प्रमदाः सप्त चाष्ट च॥५३॥

सात-आठ तरुणी स्त्रियाँ मिलकर एक-एक पुरुष को नदी के मनोहर तटोंपर उबटन लगा-लगाकर नहलाती थीं॥

संवाहन्त्यः समापेतुर्नार्यो विपुललोचनाः।

परिमृज्य तदान्योन्यं पाययन्ति वराङ्गनाः॥५४॥

बड़े-बड़े नेत्रोंवाली सुन्दरी रमणियाँ अतिथियों का पैर दबाने के लिये आयी थीं। वे उनके भीगे हुए अङ्गों को वस्त्रों से पोंछकर शुद्ध वस्त्र धारण कराकर उन्हें स्वादिष्ट पेय (दूध आदि) पिलाती थीं॥ ५४॥

हयान् गजान् खरानुष्ट्रांस्तथैव सुरभेः सुतान्।

अभोजयन् वाहनपास्तेषां भोज्यं यथाविधि॥

तत्पश्चात् भिन्न-भिन्न वाहनों की रक्षा में नियुक्त मनुष्यों ने हाथी, घोड़े, गधे, ऊँट और बैलों को भलीभाँति दाना-घास आदि का भोजन कराया॥ ५५ ॥

इखूश्च मधुलाजांश्च भोजयन्ति स्म वाहनान्।

इक्ष्वाकुवरयोधानां चोदयन्तो महाबलाः॥५६॥

इक्ष्वाकुकुलके श्रेष्ठ योद्धाओं की सवारी में आने वाले वाहनों को वे महाबली वाहन-रक्षक (जिन्हें महर्षि ने सेवा के लिये नियुक्त किया था) प्रेरणा दे-देकर गन्ने के टुकड़े और मधुमिश्रित लावे खिलाते थे। ५६॥

नाश्वबन्धोऽश्वमाजानान्न गजं कुञ्जरग्रहः।

मत्तप्रमत्तमुदिता सा चमूस्तत्र सम्बभौ ॥५७॥

घोड़े बाँधने वाले सईस को अपने घोड़े का और हाथीवान को अपने हाथी का कुछ पता नहीं था। सारी सेना वहाँ मत्त-प्रमत्त और आनन्दमग्न प्रतीत होती थी॥५७॥

तर्पिताः सर्वकामैश्च रक्तचन्दनरूषिताः।

अप्सरोगणसंयुक्ताः सैन्या वाचमुदीरयन्॥५८॥

सम्पूर्ण मनोवाञ्छित पदार्थों से तृप्त होकर लाल चन्दन से चर्चित हुए सैनिक अप्सराओं का संयोग पाकर निम्नाङ्कित बातें कहने लगे- ॥ ५८॥ ।

नैवायोध्यां गमिष्यामो न गमिष्याम दण्डकान्।

कुशलं भरतस्यास्तु रामस्यास्तु तथा सुखम्॥ ५९॥

‘अब हम अयोध्या नहीं जायेंगे, दण्डकारण्य में भी नहीं जायेंगे। भरत सकुशल रहें (जिनके कारण हमें इस भूतल पर स्वर्गका सुख मिला) तथा श्रीरामचन्द्रजी भी सुखी रहें (जिनके दर्शन के लिये आने पर हमें इस दिव्य सुख की प्राप्ति हुई)’ ॥ ५९॥

इति पादातयोधाश्च हस्त्यश्वारोहबन्धकाः।

अनाथास्तं विधिं लब्ध्वा वाचमेतामुदीरयन्॥ ६०॥

इस प्रकार पैदल सैनिक तथा हाथीसवार, घुड़सवार, सईस और महावत आदि उस सत्कार को पाकर स्वच्छन्द हो उपर्युक्त बातें कहने लगे॥ ६० ॥

सम्प्रहृष्टा विनेदुस्ते नरास्तत्र सहस्रशः।

भरतस्यानुयातारः स्वर्गोऽयमिति चाब्रुवन्॥६१॥

भरत के साथ आये हुए हजारों मनुष्य वहाँ का वैभव देखकर हर्ष के मारे फूले नहीं समाते थे और जोर जोर से कहते थे—यह स्थान स्वर्ग है॥ ६१॥

नृत्यन्तश्च हसन्तश्च गायन्तश्चैव सैनिकाः।

समन्तात् परिधावन्तो माल्योपेताः सहस्रशः॥ ६२॥

सहस्रों सैनिक फूलों के हार पहनकर नाचते, हँसते और गाते हुए सब ओर दौड़ते फिरते थे॥६२॥

ततो भुक्तवतां तेषां तदन्नममृतोपमम्।

दिव्यानुवीक्ष्य भक्ष्यांस्तानभवद् भक्षणे मतिः॥ ६३॥

उस अमृत के समान स्वादिष्ट अन्न का भोजन कर चुकने पर भी उन दिव्य भक्ष्य पदार्थों को देखकर उन्हें पुनः भोजन करने की इच्छा हो जाती थी॥ ६३॥

प्रेष्याश्चेट्यश्च वध्वश्च बलस्थाश्चापि सर्वशः।

बभूवुस्ते भृशं प्रीताः सर्वे चाहतवाससः॥६४॥

दास-दासियाँ, सैनिकों की स्त्रियाँ और सैनिक सबके-सब नूतन वस्त्र धारण करके सब प्रकार से अत्यन्त प्रसन्न हो गये थे॥६४॥

कुञ्जराश्च खरोष्ट्राश्च गोऽश्वाश्च मृगपक्षिणः।

बभूवुः सुभृतास्तत्र नातो ह्यन्यमकल्पयत्॥६५॥

हाथी, घोड़े, गदहे, ऊँट, बैल, मृग तथा पक्षी भी वहाँ पूर्ण तृप्त हो गये थे; अतः कोई दूसरी किसी वस्तु की इच्छा नहीं करता था॥६५॥

नाशुक्लवासास्तत्रासीत् क्षुधितो मलिनोऽपि वा।

रजसा ध्वस्तकेशो वा नरः कश्चिददृश्यत॥ ६६॥

उस समय वहाँ कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं दिखायी देता था, जिसके कपड़े सफेद न हों, जो भूखा या मलिन रह गया हो, अथवा जिसके केश धूल से धूसरित हो गये हों॥६६॥

आजैश्चापि च वाराहैर्निष्ठानवरसंचयैः।

फलनिर्वृहसंसिद्धैः सूपैर्गन्धरसान्वितैः॥६७॥

पुष्पध्वजवतीः पूर्णाः शुक्लस्यान्नस्य चाभितः।

ददृशुर्विस्मितास्तत्र नरा लौहीः सहस्रशः॥ ६८॥

अजवाइन मिलाकर बनाये गये, वराही कन्द से तैयार किये गये तथा आम आदि फलों के गरम किये हुए रस में पकाये गये उत्तमोत्तम व्यञ्जनों के संग्रहों, सुगन्धयुक्त रसवाली दालों तथा श्वेत रंग के भातों से भरे हुए सहस्रों सुवर्ण आदि के पात्र वहाँ सब ओर रखे हुए थे, जिन्हें फूलों की ध्वजाओं से सजाया गया था। भरत के साथ आये हुए सब लोगों ने उन पात्रों को आश्चर्यचकित होकर देखा ॥ ६७-६८ ॥

बभूवुर्वनपार्श्वेषु कूपाः पायसकर्दमाः।

ताश्च कामदुघा गावो द्रुमाश्चासन् मधुच्युतः॥ ६९॥

वन के आस-पास जितने कुएँ थे, उन सबमें गाढ़ी स्वादिष्ट खीर भरी हुई थी। वहाँ की गौएँ कामधेनु (सब प्रकार की कामनाओं को पूर्ण करने वाली) हो गयी थीं और उस दिव्य वन के वृक्ष मधु की वर्षा करते थे॥ ६९॥

वाप्यो मैरेयपूर्णाश्च मृष्टमांसचयैर्वृताः।

प्रतप्तपिठरैश्चापि मार्गमायूरकौक्कुटैः॥७०॥

भरत की सेना में आये हए निषाद आदि निम्न वर्ग के लोगों की तृप्ति के लिये वहाँ मधु से भरी हुई बावड़ियाँ प्रकट हो गयी थीं तथा उनके तटों पर तपे हुए पिठर (कुण्ड) में पकाये गये मृग, मोर और मुर्गों के स्वच्छ मांस भी ढेर-के-ढेर रख दिये गये थे।॥ ७० ॥

पात्रीणां च सहस्राणि स्थालीनां नियुतानि च।

न्यर्बुदानि च पात्राणि शातकुम्भमयानि च॥ ७१॥

वहाँ सहस्रों सोने के अन्नपात्र, लाखों व्यञ्जनपात्र और लगभग एक अरब थालियाँ संगृहीत थीं॥ ७१॥

स्थाल्यः कुम्भ्यः करम्भ्यश्च दधिपूर्णाः सुसंस्कृताः।

यौवनस्थस्य गौरस्य कपित्थस्य सुगन्धिनः॥ ७२॥

ह्रदाः पूर्णा रसालस्य दध्नः श्वेतस्य चापरे।

बभूवुः पायसस्यान्ये शर्कराणां च संचयाः॥ ७३॥

पिठर, छोटे-छोटे घड़े तथा मटके दही से भरे हुए थे और उनमें दही को सुस्वादु बनाने वाले सोंठ आदि मसाले पड़े हुए थे। एक पहर पहले के तैयार किये हुए केसर मिश्रित पीतवर्ण वाले सुगन्धित तक्र के कई तालाब भरे हुए थे। जीरा आदि मिलाये हुए तक्र (रसाल), सफेद दही तथा दूध के भी कई कुण्ड पृथक्-पृथक् भरे हुए थे शक्करों के कई ढेर लगे थे। ७२-७३॥

कल्कांश्चूर्णकषायांश्च स्नानानि विविधानि च।

ददृश जनस्थानि तीर्थेष सरितां नराः॥७४॥

स्नान करने वाले मनुष्यों को नदी के घाटोंपर भिन्नभिन्न पात्रों में पीसे हुए आँवले, सुगन्धित चूर्ण तथाऔर भी नाना प्रकार के स्नानोपयोगी पदार्थ दिखायी देते थे॥ ७४॥

शुक्लानंशुमतश्चापि दन्तधावनसंचयान्।

शुक्लांश्चन्दनकल्कांश्च समुद्रेष्ववतिष्ठतः॥ ७५॥

साथ ही ढेर-के-ढेर दाँतन, जो सफेद कूँचे वाले थे, वहाँ रखे हए थे। सम्पुटों में घिसे हए सफेद चन्दन विद्यमान थे। इन सब वस्तुओं को लोगों ने देखा। ७५॥

दर्पणान् परिमृष्टांश्च वाससां चापि संचयान्।

पादुकोपानहं चैव युग्मान्यत्र सहस्रशः॥७६॥

इतना ही नहीं, वहाँ बहुत-से स्वच्छ दर्पण, ढेर-केढेर वस्त्र और हजारों जोड़े खड़ाऊँ और जूते भी दिखायी देते थे॥ ७६॥

आञ्जनीः कङ्कतान् कूर्चाश्छत्राणि च धनूंषि च।

मर्मत्राणानि चित्राणि शयनान्यासनानि च॥ ७७॥

काजलों सहित कजरौटे, कंघे, कूर्च (थकरी या ब्रश), छत्र, धनुष, मर्मस्थानों की रक्षा करने वाले कवच आदि तथा विचित्र शय्या और आसन भी वहाँ दृष्टिगोचर होते थे॥ ७७॥

प्रतिपानह्रदान् पूर्णान् खरोष्ट्रगजवाजिनाम्।

अवगाह्यसुतीर्थांश्च ह्रदान् सोत्पलपुष्करान्।

आकाशवर्णप्रतिमान् स्वच्छतोयान् सुखाप्लवान्॥७८॥

गधे, ऊँट, हाथी और घोड़ों के पानी पीने के लिये कई जलाशय भरे थे, जिनके घाट बड़े सुन्दर और सुखपूर्वक उतरने योग्य थे। उन जलाशयों में कमल और उत्पल शोभा पा रहे थे। उनका जल आकाश के समान स्वच्छ था तथा उनमें सुखपूर्वक तैरा जा सकता था।

नीलवैदूर्यवर्णाश्च मृदून् यवससंचयान्।

निर्वापार्थं पशूनां ते ददृशुस्तत्र सर्वशः॥७९॥

पशुओं के खाने के लिये वहाँ सब ओर नील वैदूर्यमणि के समान रंगवाली हरी एवं कोमल घास की ढेरियाँ लगी थीं। उन सब लोगों ने वे सारी वस्तुएँ देखीं॥ ७९॥

व्यस्मयन्त मनुष्यास्ते स्वप्नकल्पं तदद्भुतम्।

दृष्ट्वाऽऽतिथ्यं कृतं तादृग् भरतस्य महर्षिणा॥ ८०॥

महर्षि भरद्वाज के द्वारा सेनासहित भरत का किया हुआ वह अनिर्वचनीय आतिथ्य-सत्कार अद्भुत और स्वप्न के समान था। उसे देखकर वे सब मनुष्य आश्चर्यचकित हो उठे। ८० ॥

इत्येवं रममाणानां देवानामिव नन्दने।

भरद्वाजाश्रमे रम्ये सा रात्रिय॑त्यवर्तत॥८१॥

जैसे देवता नन्दनवन में विहार करते हैं, उसी प्रकार भरद्वाज मुनि के रमणीय आश्रम में यथेष्ट क्रीडा विहार करते हुए उन लोगों की वह रात्रि बड़े सुख से बीती॥

प्रतिजग्मुश्च ता नद्यो गन्धर्वाश्च यथागतम्।

भरद्वाजमनुज्ञाप्य ताश्च सर्वा वराङ्गनाः॥८२॥

तत्पश्चात् वे नदियाँ, गन्धर्व और समस्त सुन्दरी अप्सराएँ भरद्वाजजी की आज्ञा ले जैसे आयी थीं, उसी प्रकार लौट गयीं। ८२।।

तथैव मत्ता मदिरोत्कटा नरास्तथैव दिव्यागुरुचन्दनोक्षिताः।

तथैव दिव्या विविधाः स्रगुत्तमाःपृथग्विकीर्णा मनुजैः प्रमर्दिताः॥ ८३॥

सबेरा हो जाने पर भी लोग उसी प्रकार मधुपान से मत्त एवं उन्मत्त दिखायी देते थे। उनके अङ्गों पर दिव्य अगुरुयुक्त चन्दन का लेप ज्यों-का-त्यों दृष्टिगोचर हो रहा था। मनुष्यों के उपभोग में लाये गये नाना प्रकार के दिव्य उत्तम पुष्पहार भी उसी अवस्था में पृथक्-पृथक् बिखरे पड़े थे॥ ८३॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकनवतितमः सर्गः॥ ९१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में इक्यानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९१॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अयोध्याकाण्डम्

भरत का भरद्वाज मुनि से श्रीराम के आश्रम जाने का मार्ग जानना, वहाँ से चित्रकूट के लिये सेनासहित प्रस्थान करना

द्विनवतितमः सर्गः 

सर्ग-92


ततस्तां रजनीं व्यष्य भरतः सपरिच्छदः।

कृतातिथ्यो भरद्वाजं कामादभिजगाम ह॥१॥

परिवार सहित भरत इच्छानुसार मुनि का आतिथ्य ग्रहण करके रात भर आश्रम में ही रहे। फिर सबेरे जाने की आज्ञा लेने के लिये वे महर्षि भरद्वाज के पास गये॥१॥

तमृषिः पुरुषव्याघ्र प्रेक्ष्य प्राञ्जलिमागतम्।

हताग्निहोत्रो भरतं भरद्वाजोऽभ्यभाषत॥२॥

पुरुषसिंह भरत को हाथ जोड़े अपने पास आया देख भरद्वाजजी अग्निहोत्र का कार्य करके उनसे बोले – ॥२॥

कच्चिदत्र सुखा रात्रिस्तवास्मद्विषये गता।

समग्रस्ते जनः कच्चिदातिथ्ये शंस मेऽनघ॥३॥

‘निष्पाप भरत! क्या हमारे इस आश्रम में तुम्हारी यह रात सुख से बीती है? क्या तुम्हारे साथ आये हुए सब लोग इस आतिथ्य से संतुष्ट हुए हैं? यह बताओ’॥

तमुवाचाञ्जलिं कृत्वा भरतोऽभिप्रणम्य च।

आश्रमादुपनिष्क्रान्तमृषिमुत्तमतेजसम्॥४॥

तब भरत ने आश्रम से बाहर निकले हुए उन उत्तम तेजस्वी महर्षि को प्रणाम करके उनसे हाथ जोड़कर कहा- ॥४॥

सुखोषितोऽस्मि भगवन् समग्रबलवाहनः।

बलवत्तर्पितश्चाहं बलवान् भगवंस्त्वया॥५॥

‘भगवन् ! मैं सम्पूर्ण सेना और सवारी के साथ यहाँ सुखपूर्वक रहा हूँ तथा सैनिकोंसहित मुझे पूर्ण रूप से तृप्त किया गया है॥५॥

अपेतक्लमसंतापाः सुभिक्षाः सुप्रतिश्रयाः।

अपि प्रेष्यानुपादाय सर्वे स्म सुसुखोषिताः॥६॥

‘सेवकों सहित हम सब लोग ग्लानि और संताप से रहित हो उत्तम अन्न-पान ग्रहण करके सुन्दर गृहों का आश्रय ले बड़े सुख से यहाँ रात भर रहे हैं॥६॥

आमन्त्रयेऽहं भगवन् कामं त्वामृषिसत्तम।

समीपं प्रस्थितं भ्रातुमैत्रेणेक्षस्व चक्षुषा॥७॥

‘भगवन्! मुनिश्रेष्ठ! अब मैं अपनी इच्छा के अनुसार आपसे आज्ञा लेने आया हूँ और अपने भाई के समीप प्रस्थान कर रहा हूँ; आप मुझे स्नेहपूर्ण दृष्टि से देखिये॥

आश्रमं तस्य धर्मज्ञ धार्मिकस्य महात्मनः।

आचक्ष्व कतमो मार्गः कियानिति च शंस मे॥ ८॥

‘धर्मज्ञ मुनीश्वर! बताइये, धर्मपरायण महात्मा श्रीराम का आश्रम कहाँ है ? कितनी दूर है ? और वहाँ पहुँचने के लिये कौन-सा मार्ग है ? इसका भी मुझसे स्पष्ट रूप से वर्णन कीजिये’ ॥ ८॥

इति पृष्टस्तु भरतं भ्रातुर्दर्शनलालसम्।

प्रत्युवाच महातेजा भरद्वाजो महातपाः॥९॥

इस प्रकार पूछे जाने पर महातपस्वी, महातेजस्वी भरद्वाज मुनि ने भाई के दर्शन की लालसा वाले भरत को इस प्रकार उत्तर दिया- ॥९॥

भरतार्धतृतीयेषु योजनेष्वजने वने।

चित्रकूटगिरिस्तत्र रम्यनिर्झरकाननः॥१०॥

‘भरत! यहाँसे ढाई योजन (दस कोस)* की दूरी पर एक निर्जन वन में चित्रकूट नामक पर्वत है, जहाँ के झरने और वन बड़े ही रमणीय हैं (प्रयाग से चित्रकूट की आधुनिक दूरी लगभग २८ कोस है)। १०॥

* सर्ग ५४ के श्लोक २८ में मूल ग्रन्थ में दस कोस की दूरी लिखी है और यहाँ ढाई योजन। दोनों स्थलों में दस कोस का ही संकेत है। रामायणशिरोमणि नामक व्याख्या में दोनों जगह कपिजलाधिकरण न्याय से अथवा एकशेष के द्वारा यह दूरी तिगुनी करके दिखायी गयी है। प्रयाग से चित्रकूट की दूरी लगभग २८ कोस की मानी जाती है। रामायणशिरोमणिकार की मान्यता के अनुसार ३० कोस की दूरी में और इस दूरी में अधिक अन्तर नहीं है। मील का माप पुराने क्रोश-मान की अपेक्षा छोटा है, इसलिये ८० मील की यह दूरी मानी जाती है।

उत्तरं पार्श्वमासाद्य तस्य मन्दाकिनी नदी।

पुष्पितद्रुमसंछन्ना रम्यपुष्पितकानना॥११॥

अनन्तरं तत्सरितश्चित्रकूटं च पर्वतम्। ।

तयोः पर्णकुटीं तात तत्र तौ वसतो ध्रुवम्॥१२॥

“उसके उत्तरी किनारे से मन्दाकिनी नदी बहती है, जो फूलों से लदे सघन वृक्षों से आच्छादित रहती है, उसके आस-पास का वन बड़ा ही रमणीय और नाना प्रकार के पुष्पों से सुशोभित है। उस नदी के उस पार चित्रकूट पर्वत है। तात! वहाँ पहुँचकर तुम नदी और पर्वत के बीच में श्रीराम की पर्णकुटी देखोगे। वे दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण निश्चय ही उसी में निवास करते हैं। ११-१२ ।।

दक्षिणेन च मार्गेण सव्यदक्षिणमेव च।

गजवाजिसमाकीर्णां वाहिनीं वाहिनीपते॥१३॥

वाहयस्व महाभाग ततो द्रक्ष्यसि राघवम्।

‘सेनापते ! तुम यहाँ से हाथी-घोड़ों से भरी हुई अपनी सेना लेकर पहले यमुना के दक्षिणी किनारे से जो मार्ग गया है, उससे जाओ आगे जाकर दो रास्ते मिलेंगे, उनमें से जो रास्ता बायें दाबकर दक्षिण दिशा की ओर गया है, उसी से सेना को ले जाना। महाभाग! उस मार्ग से चलकर तुम शीघ्र ही श्रीरामचन्द्रजी का दर्शन पा जाओगे’॥

प्रयाणमिति च श्रुत्वा राजराजस्य योषितः॥ १४॥

हित्वा यानानि यानार्हा ब्राह्मणं पर्यवारयन्।

‘अब यहाँ से प्रस्थान करना है’ यह सुनकर महाराज दशरथ की स्त्रियाँ, जो सवारी पर ही रहने योग्य थीं, सवारियों को छोड़कर ब्रह्मर्षि भरद्वाज को प्रणाम करने के लिये उन्हें चारों ओर से घेरकर खड़ी हो गयीं॥

वेपमाना कृशा दीना सह देव्या सुमित्रया॥१५॥

कौसल्या तत्र जग्राह कराभ्यां चरणौ मुनेः।

उपवास के कारण अत्यन्त दुर्बल एवं दीन हुई देवी कौसल्या ने, जो काँप रही थीं, सुमित्रा देवी के साथ अपने दोनों हाथों से भरद्वाज मुनि के पैर पकड़ लिये।

असमृद्धेन कामेन सर्वलोकस्य गर्हिता॥१६॥

कैकेयी तत्र जग्राह चरणौ सव्यपत्रपा।।

तं प्रदक्षिणमागम्य भगवन्तं महामुनिम्॥१७॥

अदूराद् भरतस्यैव तस्थौ दीनमनास्तदा।

तत्पश्चात् जो अपनी असफल कामना के कारण सब लोगों के लिये निन्दित हो गयी थी, उस कैकेयी ने लज्जित होकर वहाँ मुनि के चरणों का स्पर्श किया और उन महामुनि भगवान् भरद्वाज की परिक्रमा करके वह दीनचित्त हो उस समय भरत के ही पास आकर खड़ी हो गयी। १६-१७ १/२ ॥

तत्र पप्रच्छ भरतं भरद्वाजो महामुनिः॥१८॥

विशेषं ज्ञातुमिच्छामि मातृणां तव राघव।

तब महामुनि भरद्वाज ने वहाँ भरत से पूछा —’रघुनन्दन! तुम्हारी इन माताओं का विशेष परिचय क्या है ? यह मैं जानना चाहता हूँ’ ॥ १८ १/२ ॥

एवमुक्तस्तु भरतो भरद्वाजेन धार्मिकः॥१९॥

उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा वाक्यं वचनकोविदः।

भरद्वाज के इस प्रकार पूछने पर बोलने की कला में कुशल धर्मात्मा भरत ने हाथ जोड़कर कहा- ॥ १९ १/२॥

यामिमां भगवन् दीनां शोकानशनकर्शिताम्॥ २०॥

पितुर्हि महिषीं देवी देवतामिव पश्यसि।

एषां तं पुरुषव्याघ्रं सिंहविक्रान्तगामिनम्॥२१॥

कौसल्या सुषुवे रामं धातारमदितिर्यथा।

‘भगवन्! आप जिन्हें शोक और उपवास के कारण अत्यन्त दुर्बल एवं दुःखी देख रहे हैं, जो देवी-सी दृष्टिगोचर हो रही हैं’ ये मेरे पिता की सबसे बड़ी महारानी कौसल्या हैं। जैसे अदिति ने धाता नामक आदित्य को उत्पन्न किया था, उसी प्रकार इन कौसल्या देवी ने सिंह के समान पराक्रमसूचक गति से चलने वाले पुरुषसिंह श्रीराम को जन्म दिया है। २०-२१ १/२ ॥

अस्या वामभुजं श्लिष्टा या सा तिष्ठति दुर्मनाः॥ २२॥

इयं सुमित्रा दुःखार्ता देवी राज्ञश्च मध्यमा।

कर्णिकारस्य शाखेव शीर्णपुष्पा वनान्तरे॥२३॥

एतस्यास्तौ सुतौ देव्याः कुमारौ देववर्णिनौ।

उभौ लक्ष्मणशत्रुघ्नौ वीरौ सत्यपराक्रमौ॥ २४॥

‘इनकी बायीं बाँह से सटकर जो उदास मन से खड़ी हैं तथा दुःख से आतुर हो रही हैं और आभूषण शून्य होने से वनके भीतर झड़े हुए पुष्पवाले कनेर की डाल के समान दिखायी देती हैं, ये महाराज की मझली रानी देवी सुमित्रा हैं। सत्यपराक्रमी वीर तथा देवताओं के तुल्य कान्तिमान् वे दोनों भाई राजकुमार लक्ष्मण और शत्रुघ्न इन्हीं सुमित्रा देवी के पुत्र हैं॥ २२ -२४॥

यस्याः कृते नरव्याघ्रौ जीवनाशमितो गतौ।

राजा पुत्रविहीनश्च स्वर्गं दशरथो गतः॥ २५ ॥

क्रोधनामकृतप्रज्ञां दृप्तां सुभगमानिनीम्।

ऐश्वर्यकामां कैकेयीमनार्यामार्यरूपिणीम्॥२६॥

ममैतां मातरं विद्धि नृशंसां पापनिश्चयाम्।

यतोमूलं हि पश्यामि व्यसनं महदात्मनः॥२७॥

‘और जिसके कारण पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मण यहाँ से प्राण-सङ्कट की अवस्था (वनवास) में जा पहुँचे हैं तथा राजा दशरथ पुत्रवियोग का कष्ट पाकर स्वर्गवासी हुए हैं, जो स्वभाव से ही क्रोध करने वाली, अशिक्षित बुद्धिवाली, गर्वीली, अपने आपको सबसे अधिक सुन्दरी और भाग्यवती समझने वाली तथा राज्य का लोभ रखने वाली है, जो शक्ल-सूरत से आर्या होने पर भी वास्तव में अनार्या है, इस कैकेयी को मेरी माता समझिये। यह बड़ी ही क्रूर और पापपूर्ण विचार रखने वाली है। मैं अपने ऊपर जो महान् संकट आया हुआ देख रहा हूँ, इसका मूल कारण यही है’ ॥ २५–२७॥

इत्युक्त्वा नरशार्दूलो बाष्पगद्गदया गिरा।

विनिःश्वस्य स ताम्राक्षः क्रुद्धो नाग इव श्वसन्॥ २८॥

अश्रुगद्गद वाणी से इस प्रकार कहकर लाल आँखें किये पुरुषसिंह भरत रोष से भरकर फुफकारते हुए सर्प की भाँति लंबी साँस खींचने लगे॥ २८॥

भरद्वाजो महर्षिस्तं ब्रुवन्तं भरतं तदा।

प्रत्युवाच महाबुद्धिरिदं वचनमर्थवित्॥२९॥

उस समय ऐसी बातें कहते हुए भरत से श्रीरामावतार के प्रयोजन को जानने वाले महाबुद्धिमान् महर्षि भरद्वाज ने उनसे यह बात कही- ॥ २९॥

न दोषेणावगन्तव्या कैकेयी भरत त्वया।

रामप्रव्राजनं ह्येतत् सुखोदकं भविष्यति॥३०॥

‘भरत! तुम कैकेयी के प्रति दोष-दृष्टि न करो। श्रीराम का यह वनवास भविष्य में बड़ा ही सुखद होगा॥

देवानां दानवानां च ऋषीणां भावितात्मनाम्।

हितमेव भविष्यद्धि रामप्रव्राजनादिह ॥३१॥

‘श्रीराम के वन में जाने से देवताओं, दानवों तथा परमात्मा का चिन्तन करने वाले महर्षियों का इस जगत् में हित ही होने वाला है’ ॥ ३१॥

अभिवाद्य तु संसिद्धः कृत्वा चैनं प्रदक्षिणम्।

आमन्त्र्य भरतः सैन्यं युज्यतामिति चाब्रवीत्॥ ३२॥

श्रीराम का पता जानकर और मुनि का आशीर्वाद पाकर कृतकृत्य हुए भरत ने मुनि को मस्तक झुका उनकी प्रदक्षिणा करके जाने की आज्ञा ले सेना को कूच के लिये तैयार होने का आदेश दिया॥ ३२॥

ततो वाजिरथान् युक्त्वा दिव्यान् हेमविभूषितान्।

अध्यारोहत् प्रयाणार्थं बहून् बहुविधो जनः॥ ३३॥

तदनन्तर अनेक प्रकार की वेश-भूषावाले लोग बहुत-से दिव्य घोड़ों और दिव्य रथों को, जो सुवर्ण से विभूषित थे, जोतकर यात्रा के लिये उनपर सवार हुए॥

गजकन्या गजाश्चैव हेमकक्ष्याः पताकिनः।

जीमूता इव घर्मान्ते सघोषाः सम्प्रतस्थिरे ॥ ३४॥

बहुत-सी हथिनियाँ और हाथी, जो सुनहरे रस्सों से कसे गये थे और जिनके ऊपर पताकाएँ फहरा रही थीं, वर्षा-काल के गरजते हुए मेघों के समान घण्टानाद करते हुए वहाँ से प्रस्थित हुए।॥ ३४॥

विविधान्यपि यानानि महान्ति च लघूनि च।

प्रययुः सुमहार्हाणि पादैरपि पदातयः॥ ३५॥

नाना प्रकार के छोटे-बड़े बहुमूल्य वाहनों पर सवार हो उनके अधिकारी चले और पैदल सैनिक अपने पैरों से ही यात्रा करने लगे॥ ३५॥

अथ यानप्रवेकैस्तु कौसल्याप्रमुखाः स्त्रियः।

रामदर्शनकांक्षिण्यः प्रययुर्मुदितास्तदा ॥ ३६॥

तत्पश्चात् कौसल्या आदि रानियाँ उत्तम सवारियों पर बैठकर श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन की अभिलाषा से प्रसन्नतापूर्वक चलीं॥ ३६॥

चन्द्रार्कतरुणाभासां नियुक्तां शिबिकां शुभाम्।

आस्थाय प्रययौ श्रीमान् भरतः सपरिच्छदः॥ ३७॥

इसी प्रकार श्रीमान् भरत नवोदित चन्द्रमा और सूर्य के समान कान्तिमती शिविका में बैठकर आवश्यक सामग्रियों के साथ प्रस्थित हुए। उस शिविका को कहाँरों ने अपने कंधों पर उठा रखा था। ३७॥

सा प्रयाता महासेना गजवाजिसमाकुला।

दक्षिणां दिशमावृत्य महामेघ इवोत्थितः॥३८॥

हाथी-घोड़ों से भरी हुई वह विशाल वाहिनी दक्षिण दिशा को घेरकर उमड़ी हुई महामेघों की घटा के समान चल पड़ी॥ ३८॥

वनानि च व्यतिक्रम्य जुष्टानि मृगपक्षिभिः।

गङ्गायाः परवेलायां गिरिष्वथ नदीष्वपि॥ ३९॥

गङ्गा के उस पार पर्वतों तथा नदियों के निकटवर्ती वनों को, जो मृगों और पक्षियों से सेवित थे, लाँघकर वह आगे बढ़ गयी॥ ३९॥

सा सम्प्रहृष्टद्विपवाजियूथा वित्रासयन्ती मृगपक्षिसंघान्।

महदनं तत् प्रविगाहमाना रराज सेना भरतस्य तत्र॥४०॥

उस सेना के हाथी और घोड़ों के समुदाय बड़े प्रसन्न थे। जंगल के मृगों और पक्षिसमूहों को भयभीत करती हुई भरत की वह सेना उस विशाल वन में प्रवेश करके वहाँ बड़ी शोभा पा रही थी॥ ४० ॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे दिनवतितमः सर्गः॥ ९२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में बानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ।९२॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अयोध्याकाण्डम्

सेनासहित भरत की चित्रकूट-यात्रा का वर्णन

त्रिनवतितमः सर्गः 

सर्ग-93


तया महत्या यायिन्या ध्वजिन्या वनवासिनः।

अर्दिता यूथपा मत्ताः सयूथाः सम्प्रदुद्रुवुः ॥१॥

यात्रा करने वाली उस विशाल वाहिनी से पीड़ित हो वनवासी यूथपति मतवाले हाथी आदि अपने यूथों के साथ भाग चले॥१॥

ऋक्षाः पृषतमुख्याश्च रुरवश्च समन्ततः।

दृश्यन्ते वनवाटेषु गिरिष्वपि नदीषु च॥२॥

रीछ, चितकबरे मृग तथा रुरु नामक मृग वन प्रदेशों में, पर्वतों में और नदियों के तटों पर चारों ओर उस सेना से पीड़ित दिखायी देते थे॥२॥

स सम्प्रतस्थे धर्मात्मा प्रीतो दशरथात्मजः।

वृतो महत्या नादिन्या सेनया चतुरङ्गया॥३॥

महान् कोलाहल करने वाली उस विशाल चतुरंगिणी सेना से घिरे हुए धर्मात्मा दशरथनन्दन भरत बड़ी प्रसन्नता के साथ यात्रा कर रहे थे॥३॥

सागरौघनिभा सेना भरतस्य महात्मनः।

महीं संछादयामास प्रावृषि द्यामिवाम्बुदः॥४॥

जैसे वर्षा ऋतु में मेघों की घटा आकाश को ढकलेती है, उसी प्रकार महात्मा भरत की समुद्र-जैसी उस विशाल सेना ने दूर तक के भूभाग को आच्छादित कर लिया था॥

तुरंगौघैरवतता वारणैश्च महाबलैः।

अनालक्ष्या चिरं कालं तस्मिन् काले बभूव सा॥

घोड़ों के समूहों तथा महाबली हाथियों से भरी और दूर तक फैली हुई वह सेना उस समय बहुत देर तक दृष्टि में ही नहीं आती थी॥ ५॥

स गत्वा दूरमध्वानं सम्परिश्रान्तवाहनः।

उवाच वचनं श्रीमान् वसिष्ठं मन्त्रिणां वरम्॥६॥

दूर तक का रास्ता तै कर लेने पर जब भरत की सवारियाँ बहुत थक गयीं, तब श्रीमान् भरत ने मन्त्रियों में श्रेष्ठ वसिष्ठजी से कहा- ॥६॥

यादृशं लक्ष्यते रूपं यथा चैव मया श्रुतम्।

व्यक्तं प्राप्ताः स्म तं देशं भरद्वाजो यमब्रवीत्॥ ७॥

‘ब्रह्मन् ! मैंने जैसा सुन रखा था और जैसा इस देश का स्वरूप दिखायी देता है, इससे स्पष्ट जान पड़ता है कि भरद्वाजजी ने जहाँ पहुँचने का आदेश दिया था, उस देश में हम लोग आ पहुँचे हैं॥७॥

अयं गिरिश्चित्रकूटस्तथा मन्दाकिनी नदी।

एतत् प्रकाशते दूरान्नीलमेघनिभं वनम्॥८॥

‘जान पड़ता है यही चित्रकूट पर्वत है तथा वह मन्दाकिनी नदी बह रही है। यह पर्वतके आसपासका वन दूरसे नील मेघके समान प्रकाशित हो रहा है॥८॥

गिरेः सानूनि रम्याणि चित्रकूटस्य सम्प्रति।

वारणैरवमृद्यन्ते मामकैः पर्वतोपमैः॥९॥

‘इस समय मेरे पर्वताकार हाथी चित्रकूट के रमणीय शिखरों का अवमर्दन कर रहे हैं॥९॥

मुञ्चन्ति कुसुमान्येते नगाः पर्वतसानुषु।

नीला इवातपापाये तोयं तोयधरा घनाः॥१०॥

‘ये वृक्ष पर्वत शिखरों पर उसी प्रकार फूलों की वर्षा कर रहे हैं, जैसे वर्षाकाल में नील जलधर मेघ उन पर जल की वृष्टि करते हैं’॥१०॥

किंनराचरितं देशं पश्य शत्रुघ्न पर्वते।

हयैः समन्तादाकीर्णं मकरैरिव सागरम्॥११॥

(इसके बाद भरत शत्रुघ्न से कहने लगे-) ‘शत्रुघ्न ! देखो, इस पर्वत की उपत्यका में जो देश है, जहाँ पर किन्नर विचरा करते हैं, वही प्रदेश हमारी सेना के घोड़ों से व्याप्त होकर मगरों से भरे हुए समुद्र के समान प्रतीत होता है।

एते मृगगणा भान्ति शीघ्रवेगाः प्रचोदिताः।

वायुप्रविद्धाः शरदि मेघजाला इवाम्बरे॥१२॥

‘सैनिकों के खदेड़े हुए ये मृगों के झुंड तीव्र वेग से भागते हुए वैसी ही शोभा पा रहे हैं, जैसे शरत्काल के आकाश में हवा से उड़ाये गये बादलों के समूह सुशोभित होते हैं।॥ १२॥

कुर्वन्ति कुसुमापीडान् शिरःसु सुरभीनमी।

मेघप्रकाशैः फलकैर्दाक्षिणात्या नरा यथा॥ १३॥

‘ये सैनिक अथवा वृक्ष मेघ के समान कान्तिवाली ढालों से उपलक्षित होने वाले दक्षिण भारतीय मनुष्यों के समान अपने मस्तकों अथवा शाखाओं पर सुगन्धित पुष्प गुच्छमय आभूषणों को धारण करते हैं॥ १३॥

निष्कूजमिव भूत्वेदं वनं घोरप्रदर्शनम्।

अयोध्येव जनाकीर्णा सम्प्रति प्रतिभाति मे॥ १४॥

‘यह वन जो पहले जनरव-शून्य होने के कारण अत्यन्त भयंकर दिखायी देता था, वही इस समय हमारे साथ आये हुए लोगों से व्याप्त होने के कारण मुझे अयोध्यापुरी के समान प्रतीत होता है॥ १४ ॥

खरैरुदीरितो रेणर्दिवं प्रच्छाद्य तिष्ठति।

तं वहत्यनिलः शीघ्रं कुर्वन्निव मम प्रियम्॥१५॥

‘घोड़ों की टापों से उड़ी हुई धूल आकाश को आच्छादित करके स्थित होती है, परंतु उसे हवा मेरा प्रिय करती हुई-सी शीघ्र ही अन्यत्र उड़ा ले जाती है।

स्यन्दनांस्तुरगोपेतान् सूतमुख्यैरधिष्ठितान्।

एतान् सम्पततः शीघ्रं पश्य शत्रुघ्न कानने॥

‘शत्रुघ्न ! देखो, इस वन में घोड़ों से जुते हुए और श्रेष्ठ सारथियों द्वारा संचालित हुए ये रथ कितनी शीघ्रता से आगे बढ़ रहे हैं। १६ ॥

एतान् वित्रासितान् पश्य बहिणः प्रियदर्शनान्।

एवमापततः शैलमधिवासं पतत्त्रिणः॥१७॥

‘जो देखने में बड़े प्यारे लगते हैं उन मोरों को तो देखो। ये हमारे सैनिकों के भय से कितने डरे हुए हैं। इसी प्रकार अपने आवास-स्थान पर्वत की ओर उड़ते हुए अन्य पक्षियों पर भी दृष्टिपात करो॥ १७॥

अतिमात्रमयं देशो मनोज्ञः प्रतिभाति मे।

तापसानां निवासोऽयं व्यक्तं स्वर्गपथोऽनघ॥ १८॥

‘निष्पाप शत्रुघ्न ! यह देश मुझे बड़ा ही मनोहर प्रतीत होता है। तपस्वी जनों का यह निवास स्थान वास्तव में स्वर्गीय पथ है॥ १८॥

मृगा मृगीभिः सहिता बहवः पृषता वने।

मनोज्ञरूपा लक्ष्यन्ते कुसुमैरिव चित्रिताः॥१९॥

‘इस वन में मृगियों के साथ विचरने वाले बहुत-से चितकबरे मृग ऐसे मनोहर दिखायी देते हैं, मानो इन्हें फूलों से चित्रित—सुसज्जित किया गया हो ॥ १९॥

साधु सैन्याः प्रतिष्ठन्तां विचन्वन्तु च काननम्।

यथा तौ पुरुषव्याघ्रौ दृश्येते रामलक्ष्मणौ ॥२०॥

‘मेरे सैनिक यथोचित रूप से आगे बढ़ें और वन में सब ओर खोजें, जिससे उन दोनों पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मण का पता लग जाय’ ॥ २० ॥

भरतस्य वचः श्रुत्वा पुरुषाः शस्त्रपाणयः।

विविशुस्तद्वनं शूरा धूमाग्रं ददृशुस्ततः॥२१॥

भरत का यह वचन सुनकर बहुत-से शूरवीर पुरुषों ने हाथों में हथियार लेकर उस वन में प्रवेश किया। तदनन्तर आगे जाने पर उन्हें कुछ दूरपर ऊपर को धुआँ उठता दिखायी दिया॥ २१॥

ते समालोक्य धूमाग्रमूचुर्भरतमागताः।

नामनुष्ये भवत्यग्निर्व्यक्तमत्रैव राघवौ॥२२॥

उस धूमशिखा को देखकर वे लौट आये और भरत से बोले—’प्रभो! जहाँ कोई मनुष्य नहीं होता, वहाँ आग नहीं होती। अतः श्रीराम और लक्ष्मण अवश्य यहीं होंगे॥

अथ नात्र नरव्याघ्रौ राजपुत्रौ परंतपौ।

अन्ये रामोपमाः सन्ति व्यक्तमत्र तपस्विनः॥ २३॥

‘यदि शत्रुओं को संताप देने वाले पुरुषसिंह राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण यहाँ न हों तो भी श्रीराम-जैसे तेजस्वी दूसरे कोई तपस्वी तो अवश्य ही होंगे’॥ २३॥

तच्छ्रुत्वा भरतस्तेषां वचनं साधुसम्मतम्।

सैन्यानुवाच सर्वांस्तानमित्रबलमर्दनः॥२४॥

उनकी बातें श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा मानने योग्य थीं, उन्हें सुनकर शत्रुसेना का मर्दन करने वाले भरत ने उन समस्त सैनिकों से कहा- ॥ २४॥

यत्ता भवन्तस्तिष्ठन्तु नेतो गन्तव्यमग्रतः।

अहमेव गमिष्यामि सुमन्त्रो धृतिरेव च ॥२५॥

‘तुम सब लोग सावधान होकर यहीं ठहरो! यहाँ से आगे न जाना। अब मैं ही वहाँ जाऊँगा। मेरे साथ सुमन्त्र और धृति भी रहेंगे’ ॥ २५ ॥

एवमुक्तास्ततः सैन्यास्तत्र तस्थुः समन्ततः।

भरतो यत्र धूमाग्रं तत्र दृष्टिं समादधत्॥२६॥

उनकी ऐसी आज्ञा पाकर समस्त सैनिक वहीं सब ओर फैलकर खड़े हो गये और भरत ने जहाँ धुआँ उठ रहा था, उस ओर अपनी दृष्टि स्थिर की॥ २६॥

व्यवस्थिता या भरतेन सा चमूनिरीक्षमाणापि च भूमिमग्रतः।

बभूव हृष्टा नचिरेण जानती प्रियस्य रामस्य समागमं तदा ॥२७॥

भरत के द्वारा वहाँ ठहरायी गयी वह सेना आगे की भूमिका निरीक्षण करती हुई भी वहाँ हर्षपूर्वक खड़ी रही; क्योंकि उस समय उसे मालूम हो गया था कि अब शीघ्र ही श्रीरामचन्द्रजी से मिलने का अवसर आनेवाला है॥ १७॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्रिनवतितमः सर्गः॥ ९३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में तिरानबेवाँ सर्ग पूराहुआ॥९३॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अयोध्याकाण्डम्

श्रीराम का सीता को चित्रकूट की शोभा दिखाना

चतुर्नवतितमः सर्गः 

सर्ग-94


दीर्घकालोषितस्तस्मिन् गिरौ गिरिवरप्रियः।

वैदेह्याः प्रियमाकांक्षन् स्वं च चित्तं विलोभयन्॥

अथ दाशरथिश्चित्रं चित्रकूटमदर्शयत्।

भार्याममरसंकाशः शचीमिव पुरंदरः॥२॥

गिरिवर चित्रकूट श्रीराम को बहुत ही प्रिय लगता था। वे उस पर्वत पर बहुत दिनों से रह रहे थे। एक दिन अमरतुल्य तेजस्वी दशरथनन्दन श्रीराम विदेहराजकुमारी सीता का प्रिय करने की इच्छा से तथा

अपने मन को भी बहलाने के लिये अपनी भार्या को विचित्र चित्रकूट की शोभा का दर्शन कराने लगे, मानो देवराज इन्द्र अपनी पत्नी शची को पर्वतीय सुषमा का दर्शन करा रहे हों।

न राज्यभ्रंशनं भद्रे न सुहृद्भिर्विनाभवः।

मनो मे बाधते दृष्ट्वा रमणीयमिमं गिरिम्॥३॥

(वे बोले-) ‘भद्रे! यद्यपि मैं राज्य से भ्रष्ट हो गया हँ तथा मुझे अपने हितैषी सुहृदों से विलग होकर रहना पड़ता है, तथापि जब मैं इस रमणीय पर्वत की ओर देखता हूँ, तब मेरा सारा दुःख दूर हो जाता है राज्य का न मिलना और सुहृदों का विछोह होना भी मेरे मन को व्यथित नहीं कर पाता है॥३॥

पश्येममचलं भद्रे नानाद्विजगणायुतम्।

शिखरैः खमिवोद्विद्वैर्धातुमद्भिर्विभूषितम्॥४॥

‘कल्याणि! इस पर्वत पर दृष्टिपात तो करो, नाना प्रकार के असंख्य पक्षी यहाँ कलरव कर रहे हैं। नाना प्रकार के धातुओं से मण्डित इसके गगन-चुम्बी शिखर मानो आकाश को बेध रहे हैं। इन शिखरों से विभूषित हुआ यह चित्रकूट कैसी शोभा पा रहा है !॥ ४॥

केचिद् रजतसंकाशाः केचित् क्षतजसंनिभाः।

पीतमाञ्जिष्ठवर्णाश्च केचिन्मणिवरप्रभाः॥५॥

पुष्पार्ककेतकाभाश्च केचिज्ज्योतीरसप्रभाः।

विराजन्तेऽचलेन्द्रस्य देशा धातुविभूषिताः॥६॥

‘विभिन्न धातुओं से अलंकृत अचलराज चित्रकूट के प्रदेश कितने सुन्दर लगते हैं! इनमें से कोई तो चाँदी के समान चमक रहे हैं। कोई लोहू की लाल आभा का विस्तार करते हैं। किन्हीं प्रदेशों के रंग पीले और मंजिष्ठ वर्ण के हैं। कोई श्रेष्ठ मणियों के समान उद्भासित होते हैं। कोई पुखराज के समान, कोई स्फटिक के सदृश और कोई केवड़े के फूल के समान कान्ति वाले हैं तथा कुछ प्रदेश नक्षत्रों और पारे के समान प्रकाशित होते हैं ॥ ५-६॥

नानामृगगणैर्दीपितरक्ष्वृक्षगणैर्वृतः।

अदुष्टैर्भात्ययं शैलो बहुपक्षिसमाकुलः॥७॥

‘यह पर्वत बहुसंख्यक पक्षियों से व्याप्त है तथा नाना प्रकार के मृगों, बड़े-बड़े व्याघ्रों, चीतों और रीछों से भरा हुआ है। वे व्याघ्र आदि हिंसक जन्तु अपने दुष्टभाव का परित्याग करके यहाँ रहते हैं और इस पर्वत की शोभा बढ़ाते हैं॥७॥

आम्रजम्ब्वसनैलॊधैः प्रियालैः पनसैर्धवैः ।

अङ्कोलैर्भव्यतिनिशैर्बिल्वतिन्दुकवेणुभिः॥८॥

काश्मर्यारिष्टवरणैर्मधूकैस्तिलकैरपि।

बदर्यामलकैर्नीपैत्रधन्वनबीजकैः॥९॥

पुष्पवद्भिः फलोपेतैश्छायावद्भिर्मनोरमैः।

एवमादिभिराकीर्णः श्रियं पुष्यत्ययं गिरिः॥ १०॥

‘आम, जामुन, असन, लोध, प्रियाल, कटहल, धव, अंकोल, भव्य, तिनिश, बेल, तिन्दुक, बाँस, काश्मरी (मधुपर्णिका), अरिष्ट (नीम), वरण, महुआ, तिलक, बेर, आँवला, कदम्ब, बेत, धन्वन (इन्द्रजौ), बीजक (अनार) आदि घनी छाया वाले वृक्षों से, जो फूलों और फलों से लदे होने के कारण मनोरम प्रतीत होते थे, व्याप्त हुआ यह पर्वत अनुपम शोभा का पोषण एवं विस्तार कर रहा है।८-१०॥

शैलप्रस्थेषु रम्येषु पश्येमान् कामहर्षणान्।

किंनरान् द्वन्दशो भद्रे रममाणान् मनस्विनः॥

‘इन रमणीय शैलशिखरों पर उन प्रदेशों को देखो, जो प्रेम-मिलन की भावना का उद्दीपन करके आन्तरिक हर्ष को बढ़ाने वाले हैं। वहाँ मनस्वी किन्नर दो-दो एक साथ होकर टहल रहे हैं।११॥

शाखावसक्तान् खड्गांश्च प्रवराण्यम्बराणि च।

पश्य विद्याधरस्त्रीणां क्रीडोद्देशान् मनोरमान्॥ १२॥

‘इन किन्नरों के खड्ग पेड़ों की डालियों में लटक रहे हैं। इधर विद्याधरों की स्त्रियों के मनोरम क्रीड़ा स्थलों तथा वृक्षों की शाखाओं पर रखे हुए उनके सुन्दर वस्त्रों की ओर भी देखो॥ १२॥

जलप्रपातैरुद्भेदैनिष्पन्दैश्च क्वचित् क्वचित्।

स्रवद्भिर्भात्ययं शैलः स्रवन्मद इव द्विपः॥१३॥

‘इसके ऊपर कहीं ऊँचेसे झरने गिर रहे हैं, कहीं जमीन के भीतर से सोते निकले हैं और कहीं-कहीं छोटे-छोटे स्रोत प्रवाहित हो रहे हैं। इन सबके द्वारा यह पर्वत मद की धारा बहाने वाले हाथी के समान शोभा पाता है॥ १३॥

गुहासमीरणो गन्धान् नानापुष्पभवान् बहून्।

घ्राणतर्पणमभ्येत्य कं नरं न प्रहर्षयेत्॥१४॥

‘गुफाओं से निकली हुई वायु नाना प्रकार के पुष्पों की प्रचुर गन्ध लेकर नासिका को तृप्त करती हुई किस पुरुष के पास आकर उसका हर्ष नहीं बढ़ा रही है॥१४॥

यदीह शरदोऽनेकास्त्वया सार्धमनिन्दिते।

लक्ष्मणेन च वत्स्यामि न मां शोकः प्रधर्षति॥ १५॥

‘सती-साध्वी सीते! यदि तुम्हारे और लक्ष्मण के साथ मैं यहाँ अनेक वर्षां तक रहूँ तो भी नगरत्याग का शोक मुझे कदापि पीड़ित नहीं करेगा॥ १५ ॥

बहपुष्पफले रम्ये नानाद्विजगणायते।

विचित्रशिखरे ह्यस्मिन् रतवानस्मि भामिनि॥ १६॥

‘भामिनि! बहुतेरे फूलों और फलों से युक्त तथा नाना प्रकार के पक्षियों से सेवित इस विचित्र शिखर वाले रमणीय पर्वत पर मेरा मन बहुत लगता है॥ १६॥

अनेन वनवासेन मम प्राप्तं फलद्वयम्।

पितुश्चानृण्यता धर्मे भरतस्य प्रियं तथा॥१७॥

‘प्रिये ! इस वनवास से मुझे दो फल प्राप्त हुए हैं दो लाभ हुए हैं—एक तो धर्मानुसार पिता की आज्ञा का पालन रूप ऋण चुक गया और दूसरा भाई भरत का प्रिय हुआ॥१७॥

वैदेहि रमसे कच्चिच्चित्रकूटे मया सह।

पश्यन्ती विविधान् भावान् मनोवाक्कायसम्मतान्॥ १८॥

‘विदेहकुमारी! क्या चित्रकूट पर्वत पर मेरे साथ मन, वाणी और शरीर को प्रिय लगने वाले भाँति भाँति के पदार्थों को देखकर तुम्हें आनन्द प्राप्त होता है? ॥ १८॥

इदमेवामृतं प्राहू राज्ञि राजर्षयः परे।

वनवासं भवार्थाय प्रेत्य मे प्रपितामहाः॥१९॥

‘रानी! मेरे प्रपितामह मनु आदि उत्कृष्ट राजर्षियों ने नियमपूर्वक किये गये इन वनवास को ही अमृत बतलाया है इससे शरीर त्याग के पश्चात् परम कल्याण की प्राप्ति होती है॥ १९ ॥

शिलाः शैलस्य शोभन्ते विशालाः शतशोऽभितः।

बहुला बहुलैर्वर्णैर्नीलपीतसितारुणैः ॥२०॥

‘चारों ओर इस पर्वत की सैकड़ों विशाल शिलाएँ शोभा पा रही हैं, जो नीले, पीले, सफेद और लाल आदि विविध रंगों से अनेक प्रकार की दिखायी देती हैं॥ २०॥

निशि भान्त्यचलेन्द्रस्य हुताशनशिखा इव।

ओषध्यः स्वप्रभालक्ष्म्या भ्राजमानाः सहस्रशः॥ २१॥

‘रात में इस पर्वतराज के ऊपर लगी हुई सहस्रों ओषधियाँ अपनी प्रभासम्पत्ति से प्रकाशित होती हुई अग्निशिखा के समान उद्भासित होती हैं।॥ २१॥

केचित् क्षयनिभा देशाः केचिदुद्यानसंनिभाः।

केचिदेकशिला भान्ति पर्वतस्यास्य भामिनि॥ २२॥

‘भामिनि! इस पर्वत के कई स्थान घर की भाँति दिखायी देते हैं (क्योंकि वे वृक्षों की घनी छाया से आच्छादित हैं) और कई स्थान चम्पा, मालती आदि फूलों की अधिकता के कारण उद्यान के समान सुशोभित होते हैं तथा कितने ही स्थान ऐसे हैं जहाँ बहुत दूरतक एक ही शिला फैली हुई है। इन सबकी बड़ी शोभा होती है॥ २२॥

भित्त्वेव वसुधां भाति चित्रकूटः समुत्थितः।

चित्रकूटस्य कूटोऽयं दृश्यते सर्वतः शुभः॥ २३॥

‘ऐसा जान पड़ता है कि यह चित्रकूट पर्वत पृथ्वी को फाड़कर ऊपर उठ आया है। चित्रकूट का यह शिखर सब ओर से सुन्दर दिखायी देता है॥ २३॥

कुष्ठस्थगरपुंनागभूर्जपत्रोत्तरच्छदान्।

कामिनां स्वास्तरान् पश्य कुशेशयदलायुतान्॥ २४॥

‘प्रिये! देखो, ये विलासियों के बिस्तर हैं, जिनपर उत्पल, पुत्रजीवक, पुन्नाग और भोजपत्र–इनके पत्ते ही चादर का काम देते हैं तथा इनके ऊपर सब ओर से कमलों के पत्ते बिछे हुए हैं।॥ २४ ॥

मृदिताश्चापविद्धाश्च दृश्यन्ते कमलस्रजः।

कामिभिर्वनिते पश्य फलानि विविधानि च॥

‘प्रियतमे! ये कमलों की मालाएँ दिखायी देती हैं, जो विलासियों द्वारा मसलकर फेंक दी गयी हैं। उधर देखो, वृक्षों में नाना प्रकार के फल लगे हुए हैं।॥ २५ ॥

वस्वौकसारां नलिनीमतीत्यैवोत्तरान् कुरून्।

पर्वतश्चित्रकूटोऽसौ बहुमूलफलोदकः॥२६॥

‘बहुत-से फल, मूल और जल से सम्पन्न यह चित्रकूट पर्वत कुबेर-नगरी वस्वौकसारा (अलका), इन्द्रपुरी नलिनी (अमरावती अथवा नलिनी नाम से प्रसिद्ध कुबेर की सौगन्धिक कमलों से युक्त पुष्करिणी) तथा उत्तर कुरु को भी अपनी शोभा से तिरस्कृत कर रहा है॥ २६ ॥

इमं तु कालं वनिते विजहिवांस्त्वया च सीते सह लक्ष्मणेन।

रतिं प्रपत्स्ये कुलधर्मवर्धिनी सतां पथि स्वैर्नियमैः परैः स्थितः॥२७॥

‘प्राणवल्लभे सीते! अपने उत्तम नियमों को पालन करते हुए सन्मार्ग पर स्थित रहकर यदि तुम्हारे और लक्ष्मण के साथ यह चौदह वर्षों का समय मैं सानन्द व्यतीत कर लूँगा तो मुझे वह सुख प्राप्त होगा जो कुल धर्म को बढ़ाने वाला है’ ॥ २७॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतुर्नवतितमः सर्गः॥ ९४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में चौरानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥९४॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अयोध्याकाण्डम्

श्रीराम का सीता के प्रति मन्दाकिनी नदी की शोभा का वर्णन

पञ्चनवतितमः सर्गः 

सर्ग-95


अथ शैलाद् विनिष्क्रम्य मैथिली कोसलेश्वरः।

अदर्शयच्छुभजलां रम्यां मन्दाकिनी नदीम्॥१॥

तदनन्तर उस पर्वत से निकलकर कोसल नरेश श्रीरामचन्द्रजी ने मिथिलेशकुमारी सीता को पुण्यसलिला रमणीय मन्दाकिनी नदी का दर्शन कराया ॥१॥

अब्रवीच्च वरारोहां चन्द्रचारुनिभाननाम्।

विदेहराजस्य सुतां रामो राजीवलोचनः॥२॥

और उस समय कमलनयन श्रीराम ने चन्द्रमा के समान मनोहर मुख तथा सुन्दर कटिप्रदेशवाली विदेहराजनन्दिनी सीता से इस प्रकार कहा- ॥२॥

विचित्रपुलिनां रम्यां हंससारससेविताम्।

कुसुमैरुपसम्पन्नां पश्य मन्दाकिनी नदीम्॥३॥

‘प्रिये! अब मन्दाकिनी नदी की शोभा देखो, हंस और सारसों से सेवित होने के कारण यह कितनी सुन्दर जान पड़ती है। इसका किनारा बड़ा ही विचित्र है। नाना प्रकार के पुष्प इसकी शोभा बढ़ा रहे हैं॥३॥

नानाविधैस्तीररुहैर्वृतां पुष्पफलद्रुमैः।

राजन्तीं राजराजस्य नलिनीमिव सर्वतः॥४॥

‘फल और फूलों के भार से लदे हुए नाना प्रकार के तटवर्ती वृक्षों से घिरी हुई यह मन्दाकिनी कुबेर के सौगन्धिक सरोवर की भाँति सब ओर से सुशोभित हो रही है॥४॥

मृगयूथनिपीतानि कलुषाम्भांसि साम्प्रतम्।

तीर्थानि रमणीयानि रतिं संजनयन्ति मे॥५॥

‘हरिनों के झुंड पानी पीकर इस समय यद्यपि यहाँ का जल गेंदला कर गये हैं तथापि इसके रमणीय घाट मेरे मन को बड़ा आनन्द दे रहे हैं॥५॥

जटाजिनधराः काले वल्कलोत्तरवाससः।

ऋषयस्त्ववगाहन्ते नदीं मन्दाकिनीं प्रिये॥६॥

‘प्रिये! वह देखो, जटा, मृगचर्म और वल्कल का उत्तरीय धारण करने वाले महर्षि उपयुक्त समय में आकर इस मन्दाकिनी नदी में स्नान कर रहे हैं॥६॥

आदित्यमुपतिष्ठन्ते नियमादूर्ध्वबाहवः।

एते परे विशालाक्षि मुनयः संशितव्रताः॥७॥

‘विशाललोचने! ये दूसरे मुनि, जो कठोर व्रत का पालन करने वाले हैं, नैत्यिक नियम के कारण दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर सूर्यदेव का उपस्थान कर रहे हैं।

मारुतोद्धृतशिखरैः प्रनृत्त इव पर्वतः।

पादपैः पुष्पपत्राणि सृजद्भिरभितो नदीम्॥८॥

‘हवा के झोंके से जिनकी शिखाएँ झूम रही हैं, अतएव जो मन्दाकिनी नदी के उभय तटों पर फूल और पत्ते बिखेर रहे हैं, उन वृक्षों से उपलक्षित हुआ यह पर्वत मानो नृत्य-सा करने लगा है॥८॥

क्वचिन्मणिनिकाशोदां क्वचित् पुलिनशालिनीम्।

क्वचित् सिद्धजनाकीर्णां पश्य मन्दाकिनी नदीम्॥९॥

‘देखो! मन्दाकिनी नदी की कैसी शोभा है; कहीं तो इसमें मोतियों के समान स्वच्छ जल बहता दिखायी देता है, कहीं यह ऊँचे कगारों से ही शोभा पाती है । (वहाँ का जल कगारों में छिप जाने के कारण दिखायी नहीं देता है) और कहीं सिद्धजन इसमें अवगाहन कर रहे हैं तथा यह उनसे व्याप्त दिखायी देती है।

निर्धूतान् वायुना पश्य विततान् पुष्पसंचयान्।

पोप्लूयमानानपरान् पश्य त्वं तनुमध्यमे॥१०॥

‘सूक्ष्म कटिप्रदेशवाली सुन्दरि ! देखो, वायु के द्वारा उड़ाकर लाये हुए ये ढेर-के-ढेर फूल किस तरह मन्दाकिनी के दोनों तटों पर फैले हुए हैं और वे दूसरे पुष्पसमूह कैसे पानी पर तैर रहे हैं॥ १० ॥

पश्यैतदल्गुवचसो रथाङ्गाह्वयना द्विजाः।

अधिरोहन्ति कल्याणि निष्कूजन्तः शुभा गिरः॥

‘कल्याणि! देखो तो सही, ये मीठी बोली बोलने वाले चक्रवाक पक्षी सुन्दर कलरव करते हुए किस तरह नदी के तटों पर आरूढ़ हो रहे हैं॥ ११॥

दर्शनं चित्रकूटस्य मन्दाकिन्याश्च शोभने।

अधिकं पुरवासाच्च मन्ये तव च दर्शनात्॥१२॥

‘शोभने! यहाँ जो प्रतिदिन चित्रकूट और मन्दाकिनी का दर्शन होता है, वह नित्य-निरन्तर तुम्हारा दर्शन होने के कारण अयोध्या निवास की अपेक्षा भी अधिक सुखदजान पड़ता है। १२ ।।

विधूतकल्मषैः सिद्वैस्तपोदमशमान्वितैः।

नित्यविक्षोभितजलां विगाहस्व मया सह ॥१३॥

‘इस नदी में प्रतिदिन तपस्या, इन्द्रिय संयम और मनोनिग्रह से सम्पन्न निष्पाप सिद्ध महात्माओं के अवगाहन करने से इसका जल विक्षुब्ध होता रहता है। चलो, तुम भी मेरे साथ इसमें स्नान करो॥ १३॥

सखीवच्च विगाहस्व सीते मन्दाकिनी नदीम्।

कमलान्यवमज्जन्ती पुष्कराणि च भामिनि॥ १४॥

‘भामिनि सीते! एक सखी दूसरी सखी के साथ जैसे क्रीड़ा करती है, उसी प्रकार तुम मन्दाकिनी नदी में उतरकर इसके लाल और श्वेत कमलों को जल में डुबोती हुई इसमें स्नान-क्रीड़ा करो॥ १४ ॥

त्वं पौरजनवद् व्यालानयोध्यामिव पर्वतम्।

मन्यस्व वनिते नित्यं सरयूवदिमां नदीम्॥१५॥

‘प्रिये! तुम इस वन के निवासियों को पुरवासी मनुष्यों के समान समझो, चित्रकूट पर्वत को अयोध्या के तुल्य मानो और इस मन्दाकिनी नदी को सरयू के सदृश जानो॥ १५ ॥

लक्ष्मणश्चैव धर्मात्मा मन्निदेशे व्यवस्थितः।

त्वं चानुकूला वैदेहि प्रीतिं जनयती मम॥१६॥

‘विदेहनन्दिनि! धर्मात्मा लक्ष्मण सदा मेरी आज्ञा के अधीन रहते हैं और तुम भी मेरे मन के अनुकूल ही चलती हो; इससे मुझे बड़ी प्रसन्नता होती है॥ १६ ॥

उपस्पृशंस्त्रिषवणं मधुमूलफलाशनः।

नायोध्यायै न राज्याय स्पृहये च त्वया सह॥ १७॥

‘प्रिये! तुम्हारे साथ तीनों काल स्नान करके मधुर फल-मूल का आहार करता हुआ मैं न तो अयोध्या जाने की इच्छा रखता हूँ और न राज्य पाने की ही॥ १७॥

इमां हि रम्यां गजयूथलोडितां निपीततोयां गजसिंहवानरैः।

सुपुष्पितां पुष्पभरैरलंकृतां न सोऽस्ति यः स्यान्न गतक्लमः सखी॥१८॥

‘जिसे हाथियों के समूह मथे डालते हैं तथा सिंह और वानर जिसका जल पिया करते हैं, जिसके तट पर सुन्दर पुष्पों से लदे वृक्ष शोभा पाते हैं तथा जो पुष्प समूहों से अलंकृत है, ऐसी इस रमणीय मन्दाकिनी नदी में स्नान करके जो ग्लानिरहित और सुखी न हो जाय—ऐसा मनुष्य इस संसार में नहीं है’ ॥ १८॥

इतीव रामो बहुसंगतं वचः प्रियासहायः सरितं प्रति ब्रुवन्।

चचार रम्यं नयनाञ्जनप्रभं स चित्रकूटं रघुवंशवर्धनः॥१९॥

रघुवंश की वृद्धि करने वाले श्रीरामचन्द्रजी मन्दाकिनी नदी के प्रति ऐसी अनेक प्रकार की सुसंगत बातें कहते हुए नील-कान्तिवाले रमणीय चित्रकूट पर्वत पर अपनी प्रिया पत्नी सीता के साथ विचरने लगे॥१९॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चनवतितमः सर्गः॥ ९५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में पंचानबेवाँ सर्ग पूराहुआ॥ ९५॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अयोध्याकाण्डम्

लक्ष्मण का शाल-वृक्ष पर चढ़कर भरत की सेना को देखना और उनके प्रति अपना रोषपूर्ण उद्गार प्रकट करना

षण्णवतितमः सर्गः 

सर्ग-96


तां तदा दर्शयित्वा तु मैथिली गिरिनिम्नगाम्।

निषसाद गिरिप्रस्थे सीतां मांसेन छन्दयन्॥१॥

इस प्रकार मिथिलेशकुमारी सीता को मन्दाकिनी नदी का दर्शन कराकर उस समय श्रीरामचन्द्रजी पर्वत के समतल प्रदेश में उनके साथ बैठ गये और तपस्वी-जनों के उपभोग में आने योग्य फल-मूल के गूदे से उनकी मानसिक प्रसन्नता को बढ़ाने—उनका लालन करने लगे।

इदं मेध्यमिदं स्वादु निष्टप्तमिदमग्निना।

एवमास्ते स धर्मात्मा सीतया सह राघवः॥२॥

धर्मात्मा रघुनन्दन सीताजी के साथ इस प्रकार की बातें कर रहे थे—’प्रिये! यह फल परम पवित्र है। यह बहुत स्वादिष्ट है तथा इस कन्द को अच्छी तरह आग पर सेका गया है’ ॥ २॥

तथा तत्रासतस्तस्य भरतस्योपयायिनः।

सैन्यरेणुश्च शब्दश्च प्रादुरास्तां नभस्पृशौ॥३॥

इस प्रकार वे उस पर्वतीय प्रदेश में बैठे हुए ही थे कि उनके पास आने वाली भरत की सेना की धूल और कोलाहल दोनों एक साथ प्रकट हुए और आकाश में फैलने लगे॥३॥

एतस्मिन्नन्तरे त्रस्ताः शब्देन महता ततः।

अर्दिता यूथपा मत्ताः सयूथाद् दुद्रुवुर्दिशः॥४॥

इसी बीच में सेना के महान् कोलाहल से भयभीत एवं पीड़ित हो हाथियों के कितने ही मतवाले यूथपति अपने यूथों के साथ सम्पूर्ण दिशाओं में भागने लगे। ४॥

स तं सैन्यसमुद्भूतं शब्दं शुश्राव राघवः।

तांश्च विप्रद्रुतान् सर्वान् यूथपानन्ववैक्षत॥५॥

श्रीरामचन्द्रजी ने सेना से प्रकट हुए उस महान् कोलाहल को सुना तथा भागे जाते हुए उन समस्त यूथपतियों को भी देखा ॥ ५ ॥

तांश्च विप्रद्रुतान् दृष्ट्वा तं च श्रुत्वा महास्वनम्।

उवाच रामः सौमित्रिं लक्ष्मणं दीप्ततेजसम्॥६॥

उन भागे हुए हाथियों को देखकर और उस महाभयंकर शब्द को सुनकर श्रीरामचन्द्रजी उद्दीप्त तेज वाले सुमित्राकुमार लक्ष्मण से बोले—॥६॥

हन्त लक्ष्मण पश्येह सुमित्रा सुप्रजास्त्वया।

भीमस्तनितगम्भीरं तुमुलः श्रूयते स्वनः॥७॥

‘लक्ष्मण ! इस जगत् में तुमसे ही माता सुमित्रा श्रेष्ठ पुत्र वाली हुई हैं। देखो तो सही—यह भयंकर गर्जना के साथ कैसा गम्भीर तुमुल नाद सुनायी देता है।॥ ७॥

गजयथानि वारण्ये महिषा वा महावने।

वित्रासिता मृगाः सिंहैः सहसा प्रद्रता दिशः॥८॥

राजा वा राजपुत्रो वा मृगयामटते वने।

अन्यद्वा श्वापदं किंचित् सौमित्रे ज्ञातुमर्हसि॥९॥

‘सुमित्रानन्दन! पता तो लगाओ, इस विशाल वन में ये जो हाथियों के झुंड अथवा भैंसे या मृग जो सहसासम्पूर्ण दिशाओं की ओर भाग चले हैं, इसका क्या कारण है ? इन्हें सिंहों ने तो नहीं डरा दिया है अथवा कोई राजा या राजकुमार इस वन में आकर शिकार तो नहीं खेल रहा है या दूसरा कोई हिंसक जन्तु तो नहीं प्रकट हो गया है ? ।। ८-९॥

सुदुश्चरो गिरिश्चायं पक्षिणामपि लक्ष्मण।

सर्वमेतद् यथातत्त्वमभिज्ञातुमिहार्हसि॥१०॥

‘लक्ष्मण! इस पर्वत पर अपरिचित पक्षियों का आना-जाना भी अत्यन्त कठिन है (फिर यहाँ किसी हिंसक जन्तु वा राजा का आक्रमण कैसे सम्भव है)। अतः इन सारी बातों की ठीक-ठीक जानकारी प्राप्त करो’ ॥ १०॥

स लक्ष्मणः संत्वरितः सालमारुह्य पुष्पितम्।

प्रेक्षमाणो दिशः सर्वाः पूर्वां दिशमवैक्षत ॥११॥

भगवान् श्रीराम की आज्ञा पाकर लक्ष्मण तुरंत ही फूलों से भरे हुए एक शाल-वृक्ष पर चढ़ गये और सम्पूर्ण दिशाओं की ओर देखते हुए उन्होंने पूर्व दिशा की ओर दृष्टिपात किया॥११॥

उदङ्मुखः प्रेक्षमाणो ददर्श महतीं चमूम्।

गजाश्वरथसम्बाधां यत्तैर्युक्तां पदातिभिः॥१२॥

तत्पश्चात् उत्तर की ओर मँह करके देखने पर उन्हें एक विशाल सेना दिखायी दी, जो हाथी, घोड़े और रथों से परिपूर्ण तथा प्रयत्नशील पैदल सैनिकों से संयुक्त थी॥

तामश्वरथसम्पूर्णां रथध्वजविभूषिताम्।

शशंस सेनां रामाय वचनं चेदमब्रवीत्॥१३॥

घोड़ों और रथों से भरी हई तथा रथ की ध्वजा से विभूषित उस सेना की सूचना उन्होंने श्रीरामचन्द्रजी को दी और यह बात कही— ॥ १३॥

अग्निं संशमयत्वार्यः सीता च भजतां गुहाम्।

सज्यं कुरुष्व चापं च शरांश्च कवचं तथा॥ १४॥

‘आर्य! अब आप आग बुझा दें (अन्यथा धुआँ देखकर यह सेना यहीं चली आयगी) देवी सीता गुफा में जा बैठें। आप अपने धनुष पर प्रत्यञ्चा चढ़ा लें और बाण तथा कवच धारण कर लें ॥१४॥

तं रामः पुरुषव्याघ्रो लक्ष्मणं प्रत्युवाच ह।

अङ्गावेक्षस्व सौमित्रे कस्येमां मन्यसे चमूम्॥ १५॥

यह सुनकर पुरुषसिंह श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा —’प्रिय सुमित्राकुमार! अच्छी तरह देखो तो सही, तुम्हारी समझ में यह किसकी सेना हो सकती है ?’॥ १५॥

एवमुक्तस्तु रामेण लक्ष्मणो वाक्यमब्रवीत्।

दिधक्षन्निव तां सेनां रुषितः पावको यथा॥ १६॥

श्रीराम के ऐसा कहने पर लक्ष्मण रोष से प्रज्वलित हुए अग्निदेव की भाँति उस सेना की ओर इस तरह देखने लगे, मानो उसे जलाकर भस्म कर देना चाहते हों और इस प्रकार बोले- ॥१६॥

सम्पन्नं राज्यमिच्छंस्तु व्यक्तं प्राप्याभिषेचनम्।

आवां हन्तुं समभ्येति कैकेय्या भरतः सुतः॥ १७॥

‘भैया! निश्चय ही यह कैकेयी का पुत्र भरत है, जो अयोध्या में अभिषिक्त होकर अपने राज्य को निष्कण्टक बनाने की इच्छा से हम दोनों को मार डालने के लिये यहाँ आ रहा है॥ १७ ॥

एष वै सुमहान् श्रीमान् विटपी सम्प्रकाशते।

विराजत्युज्ज्वलस्कन्धः कोविदारध्वजो रथे॥ १८॥

‘सामने की ओर यह जो बहुत बड़ा शोभासम्पन्न वृक्ष दिखायी देता है, उसके समीप जो रथ है, उसपरउज्ज्वल तने से युक्त कोविदार वृक्ष से चिह्नित ध्वज शोभा पा रहा है॥ १८॥

भजन्त्येते यथाकाममश्वानारुह्य शीघ्रगान्।

एते भ्राजन्ति संहृष्टा गजानारुह्य सादिनः ॥१९॥

‘ये घुड़सवार सैनिक इच्छानुसार शीघ्रगामी घोड़ों पर आरूढ़ हो इधर ही आ रहे हैं और ये हाथीसवार भी बड़े हर्ष से हाथियों पर चढ़कर आते हए प्रकाशित हो रहे हैं।

गृहीतधनुषावावां गिरिं वीर श्रयावहे।

अथवेहैव तिष्ठावः संनद्धावुद्यतायुधौ॥२०॥

‘वीर! हम दोनों को धनुष लेकर पर्वत के शिखर पर चलना चाहिये अथवा कवच बाँधकर अस्त्रशस्त्रधारण किये यहीं डटे रहना चाहिये।॥ २० ॥

अपि नौ वशमागच्छेत् कोविदारध्वजो रणे।

अपि द्रक्ष्यामि भरतं यत्कृते व्यसनं महत्॥२१॥

त्वया राघव सम्प्राप्तं सीतया च मया तथा।

यन्निमित्तं भवान् राज्याच्च्युतो राघव शाश्वतात्॥

‘रघुनन्दन! आज यह कोविदार के चिह्न से युक्त ध्वजवाला रथ रणभूमि में हम दोनों के अधिकार में आ जायगा और आज मैं अपनी इच्छा के अनुसार उस भरत को भी सामने देखेंगा कि जिसके कारण आपको, सीता को और मुझे भी महान् संकट का सामना करना पड़ा है तथा जिसके कारण आप अपने सनातन राज्याधिकार से वञ्चित किये गये हैं।॥ २२॥

सम्प्राप्तोऽयमरिर्वीर भरतो वध्य एव हि।

भरतस्य वधे दोषं नाहं पश्यामि राघव॥२३॥

‘वीर रघुनाथजी! यह भरत हमारा शत्रु है और सामने आ गया है; अतः वध के ही योग्य है। भरत का वध करने में मुझे कोई दोष नहीं दिखायी देता ॥ २३ ॥

पूर्वापकारिणं हत्वा न ह्यधर्मेण युज्यते।

पूर्वापकारी भरतस्त्यागेऽधर्मश्च राघव॥२४॥

‘रघुनन्दन! जो पहले का अपकारी रहा हो, उसको मारकर कोई अधर्म का भागी नहीं होता है। भरत ने पहले हम लोगों का अपकार किया है, अतः उसे मारने में नहीं, जीवित छोड़ देने में ही अधर्म है। २४ ।।

एतस्मिन् निहते कृत्स्नामनुशाधि वसुंधराम्।

अद्य पुत्रं हतं संख्ये कैकेयी राज्यकामुका॥ २५॥

मया पश्येत् सुदुःखार्ता हस्तिभिन्नमिव द्रुमम्।

‘इस भरत के मारे जाने पर आप समस्त वसुधा का शासन करें। जैसे हाथी किसी वृक्ष को तोड़ डालता है, उसी प्रकार राज्य का लोभ करने वाली कैकेयी आज अत्यन्त दुःखसे आर्त हो इसे मेरे द्वारा युद्ध में मारा गया देखे ॥ २५ १/२॥

कैकेयीं च वधिष्यामि सानुबन्धां सबान्धवाम्॥ २६॥

कलुषेणाद्य महता मेदिनी परिमुच्यताम्।

‘मैं कैकेयी का भी उसके सगे-सम्बन्धियों एवं बन्धु-बान्धवों सहित वध कर डालूँगा। आज यह पृथ्वी कैकेयी रूप महान् पाप से मुक्त हो जाय॥ २६ १/२॥

अद्येमं संयतं क्रोधमसत्कारं च मानद ॥२७॥

मोक्ष्यामि शत्रुसैन्येषु कक्षेष्विव हुताशनम्।

‘मानद! आज मैं अपने रोके हुए क्रोध और तिरस्कार को शत्रु की सेनाओं पर उसी प्रकार छोडूंगा, जैसे सूखे घास-फूस के ढेर में आग लगा दी जाय॥ २७ १/२॥

अद्यैव चित्रकूटस्य काननं निशितैः शरैः॥ २८॥

छिन्दन शत्रशरीराणि करिष्ये शोणितोक्षितम्।

‘अपने तीखे बाणों से शत्रुओं के शरीरों के टुकड़े-टुकड़े करके मैं अभी चित्रकूट के इस वन को रक्त से सींच दूंगा॥ २८ १/२॥

शरैर्निभिन्नहृदयान् कुञ्जरांस्तुरगांस्तथा ॥२९॥

श्वापदाः परिकर्षन्तु नरांश्च निहतान् मया।

‘मेरे बाणों से विदीर्ण हुए हृदय वाले हाथियों और घोड़ों को तथा मेरे हाथ से मारे गये मनुष्यों को भीगीदड़ आदि मांसभक्षी जन्तु इधर-उधर घसीटें॥ २९ १/२॥

शराणां धनुषश्चाहमनृणोऽस्मिन् महावने।

ससैन्यं भरतं हत्वा भविष्यामि न संशयः॥३०॥

‘इस महान् वन में सेनासहित भरत का वध करके मैं धनुष और बाण के ऋण से उऋण हो जाऊँगा—इसमें संशय नहीं है’ ॥ ३० ॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे षण्णवतितमः सर्ग॥ ९६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में छियानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९६॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अयोध्याकाण्डम्

श्रीराम का लक्ष्मण के रोष को शान्त करके भरत के सद्भाव का वर्णन करना,लक्ष्मण का लज्जित होना और भरत की सेना का पर्वत के नीचे छावनी डालना

सप्तनवतितमः सर्गः 

सर्ग-97


सुसंरब्धं तु भरतं लक्ष्मणं क्रोधमूर्च्छितम्।

रामस्तु परिसान्त्व्याथ वचनं चेदमब्रवीत्॥१॥

लक्ष्मण भरत के प्रति रोषावेश के कारण क्रोधवश अपना विवेक खो बैठे थे, उस अवस्था में श्रीराम ने उन्हें समझा-बुझाकर शान्त किया और इस प्रकार कहा—

किमत्र धनुषा कार्यमसिना वा सचर्मणा।

महाबले महोत्साहे भरते स्वयमागते॥२॥

‘लक्ष्मण! महाबली और महान् उत्साही भरत जब स्वयं यहाँ आ गये हैं, तब इस समय यहाँ धनुष अथवा ढाल-तलवार से क्या काम है ? ॥ २॥

पितुः सत्यं प्रतिश्रुत्य हत्वा भरतमाहवे।

किं करिष्यामि राज्येन सापवादेन लक्ष्मण॥३॥

‘लक्ष्मण! पिता के सत्य की रक्षा के लिये प्रतिज्ञा करके यदि मैं युद्ध में भरत को मारकर उनका राज्य छीन लूँ तो संसार में मेरी कितनी निन्दा होगी, फिर उस कलंकित राज्य को लेकर मैं क्या करूँगा? ॥ ३॥

यद् द्रव्यं बान्धवानां वा मित्राणां वा क्षये भवेत्।

नाहं तत् प्रतिगृह्णीयां भक्ष्यान् विषकृतानिव॥ ४॥

‘अपने बन्धु-बान्धवों या मित्रों का विनाश करके जिस धन की प्राप्ति होती हो, वह तो विषमिश्रित भोजन के समान सर्वथा त्याग देने योग्य है; उसे मैं कदापि ग्रहण नहीं करूँगा॥ ४॥

धर्ममर्थं च कामं च पृथिवीं चापि लक्ष्मण।

इच्छामि भवतामर्थे एतत् प्रतिशृणोमि ते॥५॥

‘लक्ष्मण! मैं तुमसे प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ कि धर्म, अर्थ, काम और पृथ्वी का राज्य भी मैं तुम्हीं लोगों के लिये चाहता हूँ॥ ५॥

भ्रातॄणां संग्रहार्थं च सुखार्थं चापि लक्ष्मण।

राज्यमप्यहमिच्छामि सत्येनायुधमालभे॥६॥

सुमित्राकुमार! मैं भाइयों के संग्रह और सुख के लिये ही राज्य की भी इच्छा करता हूँ और इस बात की सच्चाई के लिये मैं अपना धनुष छूकर शपथ खाता हूँ॥

नेयं मम मही सौम्य दुर्लभा सागराम्बरा।

नहीच्छेयमधर्मेण शक्रत्वमपि लक्ष्मण ॥७॥

‘सौम्य लक्ष्मण! समुद्र से घिरी हई यह पृथिवी मेरे लिये दुर्लभ नहीं है, परंतु मैं अधर्म से इन्द्र का पद पाने की भी इच्छा नहीं कर सकता॥ ७॥

यद् विना भरतं त्वां च शत्रुघ्नं वापि मानद।

भवेन्मम सुखं किंचिद् भस्म तत् कुरुतां शिखी॥ ८॥

‘मानद! भरत को, तुमको और शत्रुघ्न को छोड़कर यदि मुझे कोई सुख मिलता हो तो उसे अग्निदेव जलाकर भस्म कर डालें॥८॥

मन्येऽहमागतोऽयोध्यां भरतो भ्रातृवत्सलः।

मम प्राणैः प्रियतरः कुलधर्ममनुस्मरन्॥९॥

श्रुत्वा प्रव्राजितं मां हि जटावल्कलधारिणम्।

जानक्या सहितं वीर त्वया च पुरुषोत्तम॥१०॥

स्नेहेनाक्रान्तहृदयः शोकेनाकुलितेन्द्रियः।

द्रष्टमभ्यागतो ह्येष भरतो नान्यथाऽऽगतः॥११॥

‘वीर! पुरुषप्रवर! भरत बड़े भ्रातृभक्त हैं। वे मुझे प्राणों से भी बढ़कर प्रिय हैं। मुझे तो ऐसा मालूम होता है, भरत ने अयोध्या में आने पर जब सुना है कि मैं तुम्हारे और जानकी के साथ जटा-वल्कल धारण करके वन में आ गया हूँ, तब उनकी इन्द्रियाँ शोक से व्याकुल हो उठी हैं और वे कुलधर्म का विचार करके स्नेहयुक्त हृदय से हमलोगों से मिलने आये हैं। इन भरत के आगमन का इसके सिवा दूसरा कोई उद्देश्य नहीं हो सकता॥९–११॥

अम्बां च केकयीं रुष्य भरतश्चाप्रियं वदन्।

प्रसाद्य पितरं श्रीमान् राज्यं मे दातुमागतः॥१२॥

‘माता कैकेयी के प्रति कुपित हो, उन्हें कठोर वचन सुनाकर और पिताजी को प्रसन्न करके श्रीमान् भरत मुझे राज्य देने के लिये आये हैं ॥ १२॥

प्राप्तकालं यथैषोऽस्मान् भरतो द्रष्टमर्हति।

अस्मासु मनसाप्येष नाहितं किंचिदाचरेत्॥१३॥

‘भरत का हम लोगों से मिलने के लिये आना सर्वथा समयोचित है वे हमसे मिलने के योग्य हैं। हमलोगों का कोई अहित करने का विचार तो वे कभी मन में भी नहीं ला सकते॥१३॥

विप्रियं कृतपूर्वं ते भरतेन कदा नु किम्।

ईदृशं वा भयं तेऽद्य भरतं यद् विशङ्कसे॥१४॥

‘भरत ने तुम्हारे प्रति पहले कब कौन-सा अप्रिय बर्ताव किया है, जिससे आज तुम्हें उनसे ऐसा भय लग रहा है और तुम उनके विषय में इस तरह की आशङ्का कर रहे हो? ॥ १४॥

नहि ते निष्ठरं वाच्यो भरतो नाप्रियं वचः।

अहं ह्यप्रियमुक्तः स्यां भरतस्याप्रिये कृते॥१५॥

‘भरत के आने पर तुम उनसे कोई कठोर या अप्रिय वचन न बोलना। यदि तुमने उनसे कोई प्रतिकूल बात कही तो वह मेरे ही प्रति कही हुई समझी जायगी॥ १५॥

कथं नु पुत्राः पितरं हन्युः कस्यांचिदापदि।

भ्राता वा भ्रातरं हन्यात् सौमित्रे प्राणमात्मनः॥ १६॥

‘सुमित्रानन्दन ! कितनी ही बड़ी आपत्ति क्यों न आ जाय, पुत्र अपने पिता को कैसे मार सकते हैं? अथवा भाई अपने प्राणों के समान प्रिय भाई की हत्या कैसे कर सकता है ? ॥ १६॥

यदि राज्यस्य हेतोस्त्वमिमां वाचं प्रभाषसे।

वक्ष्यामि भरतं दृष्ट्वा राज्यमस्मै प्रदीयताम्॥ १७॥

‘यदि तुम राज्य के लिये ऐसी कठोर बात कहते हो तो मैं भरत से मिलने पर उन्हें कह दूँगा कि तुम यह राज्य लक्ष्मण को दे दो॥ १७॥

उच्यमानो हि भरतो मया लक्ष्मण तद्वचः।

राज्यमस्मै प्रयच्छेति बाढमित्येव मंस्यते॥१८॥

‘लक्ष्मण ! यदि मैं भरत से यह कहूँ कि ‘तुम राज्य इन्हें दे दो’ तो वे बहुत अच्छा’ कहकर अवश्य मेरी बात मान लेंगे’ ॥ १८॥

तथोक्तो धर्मशीलेन भ्रात्रा तस्य हिते रतः।

लक्ष्मणः प्रविवेशेव स्वानि गात्राणि लज्जया॥ १९॥

अपने धर्मपरायण भाई के ऐसा कहने पर उन्हीं के हित में तत्पर रहने वाले लक्ष्मण लज्जावश मानो अपने अङ्गों में ही समा गये—लाज से गड़ गये॥ १९ ॥

तद्वाक्यं लक्ष्मणः श्रुत्वा व्रीडितः प्रत्युवाच ह।

त्वां मन्ये द्रष्टमायातः पिता दशरथः स्वयम्॥ २०॥

श्रीराम का पूर्वोक्त वचन सुनकर लज्जित हुए लक्ष्मण ने कहा—’भैया! मैं समझता हूँ, हमारे पिता महाराज दशरथ स्वयं ही आपसे मिलने आये हैं’। २०॥

व्रीडितं लक्ष्मणं दृष्ट्वा राघवः प्रत्युवाच ह।

एष मन्ये महाबाहुरिहास्मान् द्रष्टमागतः॥२१॥

लक्ष्मण को लज्जित हुआ देख श्रीराम ने उत्तर दिया —’मैं भी ऐसा ही मानता हूँ कि हमारे महाबाहु पिताजी ही हमलोगों से मिलने आये हैं ॥ २१॥

अथवा नौ ध्रुवं मन्ये मन्यमानः सुखोचितौ।

वनवासमनुध्याय गृहाय प्रतिनेष्यति॥२२॥

‘अथवा मैं ऐसा समझता हूँ कि हमें सुख भोगने के योग्य मानते हुए पिताजी वनवास के कष्ट का विचार करके हम दोनों को निश्चय ही घर लौटा ले जायेंगे। २२॥

इमां चाप्येष वैदेहीमत्यन्तसुखसेविनीम्।

पिता मे राघवः श्रीमान् वनादादाय यास्यति॥ २३॥

‘मेरे पिता रघुकुलतिलक श्रीमान् महाराज दशरथ अत्यन्त सुख का सेवन करने वाली इन विदेहराजनन्दिनी सीता को भी वन से साथ लेकर ही घर को लौटेंगे॥ २३॥

एतौ तौ सम्प्रकाशेते गोत्रवन्तौ मनोरमौ।

वायुवेगसमौ वीरौ जवनौ तुरगोत्तमौ॥ २४॥

‘अच्छे घोड़ोंके कुलमें उत्पन्न हुए ये ही वे दोनों वायुके समान वेगशाली, शीघ्रगामी, वीर एवं मनोरम अपने उत्तम घोड़े चमक रहे हैं।॥ २४ ॥

स एष सुमहाकायः कम्पते वाहिनीमुखे।

नागः शत्रुजयो नाम वृद्धस्तातस्य धीमतः॥२५॥

‘परम बुद्धिमान् पिताजी की सवारी में रहने वाला यह वही विशालकाय शत्रुजय नामक बूढ़ा गजराज है, जो सेना के मुहाने पर झूमता हुआ चल रहा है ॥ २५ ॥

न तु पश्यामि तच्छत्रं पाण्डुरं लोकविश्रुतम्।

पितुर्दिव्यं महाभाग संशयो भवतीह मे ॥ २६॥

‘महाभाग! परंतु इसके ऊपर पिताजी का वह विश्वविख्यात दिव्य श्वेतछत्र मुझे नहीं दिखायी देता है—इससे मेरे मन में संशय उत्पन्न होता है॥२६॥

वृक्षायादवरोह त्वं कुरु लक्ष्मण मद्वचः।

इतीव रामो धर्मात्मा सौमित्रिं तमुवाच ह॥२७॥

अवतीर्य तु सालानात् तस्मात् स समितिंजयः।

लक्ष्मणः प्राञ्जलिर्भूत्वा तस्थौ रामस्य पार्श्वतः॥ २८॥

‘लक्ष्मण! अब मेरी बात मानो और पेड़ से नीचे उतर आओ।’ धर्मात्मा श्रीराम ने सुमित्राकुमार लक्ष्मण से जब ऐसी बात कही, तब युद्ध में विजय पाने वाले लक्ष्मण उस शाल वृक्ष के अग्रभाग से उतरे

और श्रीराम के पास हाथ जोड़कर खड़े हो गये। २७-२८॥

भरतेनाथ संदिष्टा सम्मर्दो न भवेदिति।

समन्तात् तस्य शैलस्य सेना वासमकल्पयत्॥ २९॥

उधर भरत ने सेना को आज्ञा दी कि ‘यहाँ किसी को हमलोगों के द्वारा बाधा नहीं पहुँचनी चाहिये।’ उनका यह आदेश पाकर समस्त सैनिक पर्वत के चारों ओर नीचे ही ठहर गये॥ २९॥

अध्यर्धमिक्ष्वाकुचमूर्योजनं पर्वतस्य ह।

पार्वे न्यविशदावृत्य गजवाजिनराकुला॥३०॥

उस समय हाथी, घोड़े और मनुष्यों से भरी हुई इक्ष्वाकुवंशी नरेश की वह सेना पर्वत के आस-पास की डेढ़ योजन (छः कोस) भूमि घेरकर पड़ाव डाले हुए थी॥

सा चित्रकूटे भरतेन सेना धर्मं पुरस्कृत्य विध्य दर्पम्।

प्रसादनार्थं रघुनन्दनस्य विरोचते नीतिमता प्रणीता॥३१॥

नीतिज्ञ भरत धर्म को सामने रखते हुए गर्व  को त्यागकर रघुकुलनन्दन श्रीराम को प्रसन्न करने के लिये जिसे अपने साथ ले आये थे, वह सेना चित्रकूट पर्वत के समीप बड़ी शोभा पा रही थी॥३१॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्तनवतितमः सर्गः॥९७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में सत्तानबेवाँ सर्ग पूराहुआ॥ ९७॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अयोध्याकाण्डम्

भरत के द्वारा श्रीराम के आश्रम की खोज का प्रबन्ध तथा उन्हें आश्रम का दर्शन

अष्टनवतितमः सर्गः 

सर्ग-98


निवेश्य सेनां तु विभुः पद्भ्यां पादवतां वरः।

अभिगन्तुं स काकुत्स्थमियेष गुरुवर्तकम्॥१॥

निविष्टमात्रे सैन्ये तु यथोद्देशं विनीतवत्।

भरतो भ्रातरं वाक्यं शत्रुघ्नमिदमब्रवीत्॥२॥

इस प्रकार सेना को ठहराकर जंगम प्राणियों में श्रेष्ठ एवं प्रभावशाली भरत ने गुरुसेवापरायण (एवं पिता के आज्ञा पालक) श्रीरामचन्द्रजी के पास जाने का विचार किया। जब सारी सेना विनीत भाव से यथास्थान ठहर गयी, तब भरत ने अपने भाई शत्रुघ्न से इस प्रकार कहा- ॥ १-२॥

क्षिप्रं वनमिदं सौम्य नरसंधैः समन्ततः।

लुब्धैश्च सहितैरेभिस्त्वमन्वेषितुमर्हसि ॥३॥

‘सौम्य! बहुत-से मनुष्यों के साथ इन निषादों को भी साथ लेकर तुम्हें शीघ्र ही इस वन में चारों ओर श्रीरामचन्द्रजी की खोज करनी चाहिये॥३॥

गुहो ज्ञातिसहस्रेण शरचापासिपाणिना।

समन्वेषतु काकुत्स्थावस्मिन् परिवृतः स्वयम्॥ ४॥

‘निषादराज गुह स्वयं भी धनुष-बाण और तलवार धारण करने वाले अपने सहस्रों बन्धु-बान्धवों से घिरे हुए जायँ और इस वन में ककुत्स्थवंशी श्रीराम और लक्ष्मण का अन्वेषण करें॥४॥

अमात्यैः सह पौरैश्च गुरुभिश्च द्विजातिभिः।

सह सर्वं चरिष्यामि पद्भ्यां परिवृतः स्वयम्॥

‘मैं स्वयं भी मन्त्रियों, पुरवासियों, गुरुजनों तथा ब्राह्मणों के साथ उन सबसे घिरा रहकर पैदल ही सारे वन में विचरण करूँगा॥ ५॥

यावन्न रामं द्रक्ष्यामि लक्ष्मणं वा महाबलम्।

वैदेहीं वा महाभागां न मे शान्तिर्भविष्यति॥६॥

‘जबतक श्रीराम, महाबली लक्ष्मण अथवा महाभागा विदेहराजकुमारी सीता को न देख लूँगा, तब तक मुझे शान्ति नहीं मिलेगी॥६॥

यावन्न चन्द्रसंकाशं तद् द्रक्ष्यामि शुभाननम्।

भ्रातः पद्मविशालाक्षं न मे शान्तिर्भविष्यति॥ ७॥

‘जब तक अपने पूज्य भ्राता श्रीराम के कमलदल के सदृश विशाल नेत्रों वाले सुन्दर मुखचन्द्र का दर्शन न कर लूँगा, तब तक मेरे मन को शान्ति नहीं प्राप्त होगी॥ ७॥

सिद्धार्थः खलु सौमित्रिर्यश्चन्द्रविमलोपमम्।

मुखं पश्यति रामस्य राजीवाक्षं महाद्युतिम्॥८॥

‘निश्चय ही सुमित्राकुमार लक्ष्मण कृतार्थ हो गये, जो श्रीरामचन्द्रजी के उस कमलसदृश नेत्र वाले महातेजस्वी मुख का निरन्तर दर्शन करते हैं, जो चन्द्रमा के समान निर्मल एवं आह्लाद प्रदान करने वाला है॥८॥

यावन्न चरणौ भ्रातुः पार्थिवव्यञ्जनान्वितौ।

शिरसा प्रग्रहीष्यामि न मे शान्तिर्भविष्यति॥९॥

‘जबतक भाई श्रीराम के राजोचित लक्षणों से युक्त चरणारविन्दों को अपने सिर पर नहीं रखुंगा, तब तक मुझे शान्ति नहीं मिलेगी॥९॥

यावन्न राज्ये राज्याहः पितृपैतामहे स्थितः।

अभिषिक्तो जलक्लिन्नो न मे शान्तिर्भविष्यति॥ १०॥

‘जब तक राज्य के सच्चे अधिकारी आर्य श्रीराम पिता-पितामहों के राज्य पर प्रतिष्ठित हो अभिषेक के जल से आर्द्र नहीं हो जायँगे, तबतक मेरे मन को शान्ति नहीं प्राप्त होगी॥ १०॥

कृतकृत्या महाभागा वैदेही जनकात्मजा।

भर्तारं सागरान्तायाः पृथिव्या यानुगच्छति॥ ११॥

‘जो समुद्रपर्यन्त पृथ्वी के स्वामी अपने पतिदेव श्रीरामचन्द्रजी का अनुसरण करती हैं, वे जनककिशोरी विदेहराजनन्दिनी महाभागा सीता अपने इस सत्कर्म से कृतार्थ हो गयीं॥ ११॥

सुशुभश्चित्रकूटोऽसौ गिरिराजसमो गिरिः।

यस्मिन् वसति काकुत्स्थः कुबेर इव नन्दने॥ १२॥

‘जैसे नन्दनवन में कुबेर निवास करते हैं, उसी प्रकार जिसके वन में ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामचन्द्रजी विराज रहे हैं, वह चित्रकूट परममङ्गलकारी तथा गिरिराज हिमालय एवं वेंकटाचल के समान श्रेष्ठ पर्वत है॥ १२॥

कृतकार्यमिदं दुर्गवनं व्यालनिषेवितम्।

यदध्यास्ते महाराजो रामः शस्त्रभृतां वरः॥१३॥

‘यह सर्पसेवित दुर्गम वन भी कृतार्थ हो गया, जहाँ शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ महाराज श्रीराम निवास करते हैं’।

एवमुक्त्वा महाबाहुर्भरतः पुरुषर्षभः।

पद्भ्यामेव महातेजाः प्रविवेश महद् वनम्॥ १४॥

ऐसा कहकर महातेजस्वी पुरुषप्रवर महाबाहु भरत ने उस विशाल वन में पैदल ही प्रवेश किया। १४॥

स तानि द्रुमजालानि जातानि गिरिसानुषु।

पुष्पिताग्राणि मध्येन जगाम वदतां वरः॥१५॥

वक्ताओं में श्रेष्ठ भरत पर्वतशिखरों पर उत्पन्न हुए वृक्षसमूहों के, जिनकी शाखाओं के अग्रभाग फूलों से भरे थे, बीच से निकले॥ १५ ॥

स गिरेश्चित्रकूटस्य सालमारुह्य सत्वरम्।

रामाश्रमगतस्याग्नेर्ददर्श ध्वजमुच्छ्रितम्॥१६॥

आगे जाकर वे बड़ी तेजी से चित्रकूट पर्वत के एक शाल-वृक्ष पर चढ़ गये और वहाँ से उन्होंने श्रीरामचन्द्रजी के आश्रम पर सुलगती हुई आग का ऊपर उठता हुआ धुआँ देखा ॥ १६॥ ।

तं दृष्ट्वा भरतः श्रीमान् मुमोद सहबान्धवः।

अत्र राम इति ज्ञात्वा गतः पारमिवाम्भसः ॥ १७॥

उस धूम को देखकर श्रीमान् भरत को अपने भाई शत्रुघ्न-सहित बड़ी प्रसन्नता हुई और ‘यहीं श्रीराम हैं’ यह जानकर उन्हें अथाह जल से पार हो जाने के समान संतोष प्राप्त हआ॥ १७॥

स चित्रकूटे तु गिरौ निशम्य रामाश्रमं पुण्यजनोपपन्नम्।

गुहेन सार्धं त्वरितो जगाम पुनर्निवेश्यैव चमूं महात्मा॥१८॥

इस प्रकार चित्रकूट पर्वत पर पुण्यात्मा महर्षियों से युक्त श्रीरामचन्द्रजी का आश्रम देखकर महात्मा भरत ने ढूँढ़ने के लिये आयी हुई सेना को पुनः पूर्व स्थान पर ठहरा दिया और वे स्वयं गुह के साथ शीघ्रतापूर्वक आश्रम की ओर चल दिये॥ १८ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टनवतितमः सर्गः॥ ९८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में अट्ठानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९८॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अयोध्याकाण्डम्

भरत का शत्रुघ्न आदि के साथ श्रीराम के आश्रम पर जाना, उनकी पर्णशाला देख रोते-रोते चरणों में गिरना, श्रीराम का उन सबको हृदय से लगाना

नवनवतितमः सर्गः 

सर्ग-99


निविष्टायां तु सेनायामुत्सुको भरतस्ततः।

जगाम भ्रातरं द्रष्टं शत्रुघ्नमनुदर्शयन्॥१॥

सेना के ठहर जाने पर भाई के दर्शन के लिये उत्कण्ठित होकर भरत अपने छोटे भाई शत्रुघ्न को आश्रम के चिह्न दिखाते हुए उसकी ओर चले॥१॥

ऋषिं वसिष्ठं संदिश्य मातृमें शीघ्रमानय।

इति त्वरितमग्रे स जगाम गुरुवत्सलः॥२॥

गुरुभक्त भरत महर्षि वसिष्ठ को यह संदेश देकर कि आप मेरी माताओं  को साथ लेकर शीघ्र ही आइये, तुरंत आगे बढ़ गये॥२॥

सुमन्त्रस्त्वपि शत्रुघ्नमदूरादन्वपद्यत।

रामदर्शनजस्त! भरतस्येव तस्य च ॥३॥

सुमन्त्र भी शत्रुघ्न के समीप ही पीछे-पीछे चल रहे थे। उन्हें भी भरत के समान ही श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन की तीव्र अभिलाषा थी॥३॥

गच्छन्नेवाथ भरतस्तापसालयसंस्थिताम्।

भ्रातुः पर्णकुटी श्रीमानुटजं च ददर्श ह॥४॥

चलते-चलते ही श्रीमान् भरत ने तपस्वीजनों के आश्रमों के समान प्रतिष्ठित हुई भाई की पर्णकुटी और झोंपड़ी देखी॥ ४॥

शालायास्त्वग्रतस्तस्या ददर्श भरतस्तदा।

काष्ठानि चावभग्नानि पुष्पाण्यपचितानि च॥५॥

उस पर्णशाला के सामने भरत ने उस समय बहुत-से कटे हुए काष्ठ के टुकड़े देखे, जो होम के लिये संगृहीत थे। साथ ही वहाँ पूजा के लिये संचित किये हुए फूल भी दृष्टिगोचर हुए॥ ५ ॥

स लक्ष्मणस्य रामस्य ददर्शाश्रममीयुषः।

कृतं वृक्षेष्वभिज्ञानं कुशचीरैः क्वचित् क्वचित्॥

आश्रमपर आने-जाने वाले श्रीराम और लक्ष्मण के द्वारा निर्मित मार्गबोधक चिह्न भी उन्हें वृक्षों में लगे दिखायी दिये, जो कशों और चीरों द्वारा तैयार करके कहीं-कहीं वृक्षों की शाखाओं में लटका दिये गये थे। ६॥

ददर्श च वने तस्मिन् महतः संचयान् कृतान्।

मृगाणां महिषाणां च करीषैः शीतकारणात्॥

उस वन में शीत-निवारण के लिये मृगों की लेंडी और भैंसों के सूखे हुए गोबर के ढेर एकत्र करके रखे गये थे, जिन्हें भरत ने अपनी आँखों देखा ॥ ७॥

गच्छन्नेव महाबाहुर्युतिमान् भरतस्तदा।

शत्रुघ्नं चाब्रवीद् हृष्टस्तानमात्यांश्च सर्वशः॥८॥

उस समय चलते-चलते ही परम कान्तिमान् महाबाहु भरत ने शत्रुघ्न तथा सम्पूर्ण मन्त्रियों से अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा- ॥८॥

मन्ये प्राप्ताः स्म तं देशं भरद्वाजो यमब्रवीत्।

नातिदूरे हि मन्येऽहं नदीं मन्दाकिनीमितः॥९॥

‘जान पड़ता है कि महर्षि भरद्वाज ने जिस स्थान का पता बताया था, वहाँ हमलोग आ गये हैं। मैं समझता हूँ मन्दाकिनी नदी यहाँ से अधिक दूर नहीं है॥९॥

उच्चैर्बद्धानि चीराणि लक्ष्मणेन भवेदयम्।

अभिज्ञानकृतः पन्था विकाले गन्तुमिच्छता॥१०॥

‘वृक्षों में ऊँचे बँधे हए ये चीर दिखायी दे रहे हैं।अतः समय-बे समय जल आदि लाने के निमित्त बाहर जाने की इच्छा वाले लक्ष्मण ने जिसकी पहचान के लिये यह चिह्न बनाया है, वह आश्रम को जाने वाला मार्ग यही हो सकता है॥ १० ॥

इतश्चोदात्तदन्तानां कुञ्जराणां तरस्विनाम्।

शैलपाइँ परिक्रान्तमन्योन्यमभिगर्जताम् ॥११॥

‘इधर से बड़े-बड़े दाँत वाले वेगशाली हाथी निकलकर एक-दूसरे के प्रति गर्जना करते हुए इस पर्वत के पार्श्वभाग में चक्कर लगाते रहते हैं (अतः उधर जाने से रोकने के लिये लक्ष्मण ने ये चिह्न बनाये होंगे) ॥ ११॥

यमेवाधातुमिच्छन्ति तापसाः सततं वने।

तस्यासौ दृश्यते धूमः संकुलः कृष्णवर्त्मनः॥ १२॥

‘वन में तपस्वी मुनि सदा जिनका आधान करना चाहते हैं, उन अग्निदेव का यह अति सघन धूम दृष्टिगोचर हो रहा है।॥ १२॥

अत्राहं पुरुषव्याघ्रं गुरुसत्कारकारिणम्।

आर्य द्रक्ष्यामि संहृष्टं महर्षिमिव राघवम्॥१३॥

‘यहाँ मैं गुरुजनों का सत्कार करने वाले पुरुषसिंह आर्य रघुनन्दन का सदा आनन्दमग्न रहने वाले महर्षि की भाँति दर्शन करूँगा’ ॥ १३॥

अथ गत्वा मुहूर्तं तु चित्रकूटं स राघवः।

मन्दाकिनीमनुप्राप्तस्तं जनं चेदमब्रवीत्॥१४॥

तदनन्तर रघुकुलभूषण भरत दो ही घडी में मन्दाकिनी के तट पर विराजमान चित्रकूट के पास जा पहुँचे और अपने साथ वाले लोगों से इस प्रकार बोले –॥

जगत्यां पुरुषव्याघ्र आस्ते वीरासने रतः।

जनेन्द्रो निर्जनं प्राप्य धिने जन्म सजीवितम्॥ १५॥

‘अहो! मेरे ही कारण पुरुषसिंह महाराज श्रीरामचन्द्र इस निर्जन वन में आकर खुली पृथ्वी के ऊपर वीरासन से बैठते हैं; अतः मेरे जन्म और जीवन को धिक्कार है॥ १५ ॥

मत्कृते व्यसनं प्राप्तो लोकनाथो महाद्युतिः।

सर्वान् कामान् परित्यज्य वने वसति राघवः॥ १६॥

‘मेरे ही कारण महातेजस्वी लोकनाथ रघुनाथ भारी संकट में पड़कर समस्त कामनाओं का परित्याग करके वन में निवास करते हैं।॥ १६॥

इति लोकसमाक्रुष्टः पादेष्वद्य प्रसादयन्।

रामं तस्य पतिष्यामि सीताया लक्ष्मणस्य च॥ १७॥

‘इसलिये मैं सब लोगों के द्वारा निन्दित हूँ, अतः मेरे जन्म को धिक्कार है! आज मैं श्रीराम को प्रसन्न करने के लिये उनके चरणों में गिर जाऊँगा। सीता और लक्ष्मण के भी पैरों पढूंगा’ ॥ १७॥

एवं स विलपंस्तस्मिन् वने दशरथात्मजः।

ददर्श महतीं पुण्यां पर्णशालां मनोरमाम्॥१८॥

इस तरह विलाप करते हुए दशरथकुमार भरत ने उस वन में एक बड़ी पर्णशाला देखी, जो परम पवित्र और मनोरम थी॥ १८॥

सालतालाश्वकर्णानां पर्णैर्बहुभिरावृताम्।

विशालां मृदुभिस्तीर्णां कुशैर्वेदिमिवाध्वरे॥ १९॥

वह शाल, ताल और अश्वकर्ण नामक वृक्षों के बहुत-से पत्तों द्वारा छायी हुई थी; अतः यज्ञशाला में जिस पर कोमल कुश बिछाये गये हों, उस लंबीचौड़ी वेदी के समान शोभा पा रही थी॥ १९॥

शक्रायुधनिकाशैश्च कार्मुकै रसाधनैः।

रुक्मपृष्ठैर्महासारैः शोभितां शत्रुबाधकैः॥२०॥

वहाँ इन्द्रधनुष के समान बहुत-से धनुष रखे गये थे, जो गुरुतर कार्य-साधन में समर्थ थे। जिनके पृष्ठभाग सोने से मढ़े गये थे और जो बहुत ही प्रबल तथा शत्रुओं को पीड़ा देने वाले थे। उनसे उस पर्णकुटी की बड़ी शोभा हो रही थी॥२०॥

अर्करश्मिप्रतीकाशैोरैस्तूणगतैः शरैः।

शोभितां दीप्तवदनैः सर्भोगवतीमिव॥२१॥

वहाँ तरकसों में बहुत-से बाण भरे थे, जो सूर्य की किरणों के समान चमकीले और भयङ्कर थे। उन बाणों से वह पर्णशाला उसी प्रकार सुशोभित होती थी, जैसे दीप्तिमान् मुख वाले सोसे भोगवती पुरी शोभित होती है॥२१॥

महारजतवासोभ्यामसिभ्यां च विराजिताम्।

रुक्मबिन्दुविचित्राभ्यां चर्मभ्यां चापि शोभिताम्॥२२॥

सोने की म्यानों में रखी हुई दो तलवारें और स्वर्णमय बिन्दुओं से विभूषित दो विचित्र ढालें भी उस आश्रम की शोभा बढ़ा रही थीं॥ २२॥

गोधाङ्गलिरासक्तैश्चित्रकाञ्चनभूषितैः।

अरिसंधैरनाधृष्यां मृगैः सिंहगुहामिव ॥२३॥

वहाँ गोह के चमड़े के बने हुए बहुत-से सुवर्णजटित दस्ताने भी टॅगे हुए थे। जैसे मृग सिंह की गुफा पर आक्रमण नहीं कर सकते, उसी प्रकार वह पर्णशाला शत्रुसमूहों के लिये अगम्य एवं अजेय थी॥ २३॥

प्रागुदक्प्रवणां वेदिं विशालां दीप्तपावकाम्।

ददर्श भरतस्तत्र पुण्यां रामनिवेशने॥२४॥

श्रीराम के उस निवास स्थान में भरत ने एक पवित्र एवं विशाल वेदी भी देखी, जो ईशान कोण की ओर कुछ नीची थी। उसपर अग्नि प्रज्वलित हो रही थी॥ २४॥

निरीक्ष्य स मुहूर्तं तु ददर्श भरतो गुरुम्।

उटजे राममासीनं जटामण्डलधारिणम्॥२५॥

कृष्णाजिनधरं तं तु चीरवल्कलवाससम्।

ददर्श राममासीनमभितः पावकोपमम्॥२६॥

पर्णशाला की ओर थोड़ी देरतक देखकर भरत ने कुटिया में बैठे हुए अपने पूजनीय भ्राता श्रीराम को देखा, जो सिर पर जटामण्डल धारण किये हुए थे। उन्होंने अपने अङ्गों में कृष्णमृगचर्म तथा चीर एवं वल्कल वस्त्र धारण कर रखे थे। भरत को दिखायी दिया कि श्रीराम पास ही बैठे हैं और प्रज्वलित अग्नि के समान अपनी दिव्य प्रभा फैला रहे हैं। २५-२६॥

सिंहस्कन्धं महाबाहुं पुण्डरीकनिभेक्षणम्।

पृथिव्याः सागरान्ताया भर्तारं धर्मचारिणम्॥ २७॥

उपविष्टं महाबाहं ब्रह्माणमिव शाश्वतम्।

स्थण्डिले दर्भसंस्तीर्णे सीतया लक्ष्मणेन च॥२८॥

समुद्रपर्यन्त पृथ्वी के स्वामी, धर्मात्मा, महाबाहु श्रीराम सनातन ब्रह्मा की भाँति कुश बिछी हुई वेदीपर बैठे थे। उनके कंधे सिंह के समान, भुजाएँ बड़ी-बड़ीऔर नेत्र प्रफुल्ल कमल के समान थे। उस वेदी पर वे सीता और लक्ष्मण के साथ विराजमान थे॥ २७-२८॥

तं दृष्ट्वा भरतः श्रीमान् शोकमोहपरिप्लुतः।

अभ्यधावत धर्मात्मा भरतः केकयीसुतः॥ २९॥

उन्हें इस अवस्था में देख धर्मात्मा श्रीमान् कैकेयीकुमार भरत शोक और मोह में डूब गये तथा बड़े वेग से उनकी ओर दौड़े॥२९॥

दृष्ट्वैव विललापा” बाष्पसंदिग्धया गिरा।

अशक्नुवन् वारयितुं धैर्याद् वचनमब्रुवन्॥३०॥

भाई की ओर दृष्टि पड़ते ही भरत आर्तभाव से विलाप करने लगे। वे अपने शोक के आवेग को धैर्य से रोक न सके और आँसू बहाते हुए गद्गद वाणी में बोले- ॥३०॥

यः संसदि प्रकृतिभिर्भवेद् युक्त उपासितुम्।

वन्यैर्मृगैरुपासीनः सोऽयमास्ते ममाग्रजः॥ ३१॥

‘हाय! जो राजसभा में बैठकर प्रजा और मन्त्रिवर्ग के द्वारा सेवा तथा सम्मान पाने के योग्य हैं, वे ही ये मेरे बड़े भ्राता श्रीराम यहाँ जंगली पशुओं से घिरे हुए बैठे हैं।

वासोभिर्बहुसाहस्रों महात्मा पुरोचितः।

मृगाजिने सोऽयमिह प्रवस्ते धर्ममाचरन्॥३२॥

‘जो महात्मा पहले कई सहस्र वस्त्रों का उपयोग करते थे, वे अब धर्माचरण करते हुए यहाँ केवल दो मृगचर्म धारण करते हैं॥३२॥

अधारयद् यो विविधाश्चित्राः सुमनसः सदा।

सोऽयं जटाभारमिमं सहते राघवः कथम्॥३३॥

‘जो सदा नाना प्रकार के विचित्र फूलों को अपने सिर पर धारण करते थे, वे ही ये श्रीरघुनाथजी इस समय इस जटाभार को कैसे सहन करते हैं? ॥ ३३॥

यस्य यज्ञैर्यथादिष्टैर्युक्तो धर्मस्य संचयः।

शरीरक्लेशसम्भूतं स धर्म परिमार्गते॥३४॥

‘जिनके लिये शास्त्रोक्त यज्ञों के अनुष्ठान द्वारा धर्म का संग्रह करना उचित है, वे इस समय शरीर को कष्ट देनेसे प्राप्त होने वाले धर्म का अनुसंधान कर रहे हैं।॥ ३४॥

चन्दनेन महार्हेण यस्याङ्गमुपसेवितम्।

मलेन तस्याङ्गमिदं कथमार्यस्य सेव्यते॥ ३५॥

‘जिनके अङ्गों की बहुमूल्य चन्दन से सेवा होती थी, उन्हीं मेरे पूज्य भ्राता का यह शरीर कैसे मल से सेवित हो रहा है॥ ३५॥

मन्निमित्तमिदं दुःखं प्राप्तो रामः सुखोचितः।

धिग्जीवितं नृशंसस्य मम लोकविगर्हितम्॥३६॥

‘हाय! जो सर्वथा सुख भोगने के योग्य हैं, वे श्रीराम मेरे ही कारण ऐसे दुःख में पड़ गये हैं। ओह! मैं कितना क्रूर हूँ? मेरे इस लोकनिन्दित जीवन को धिक्कार है!’ ॥ ३६॥

इत्येवं विलपन् दीनः प्रस्विन्नमुखपङ्कजः।

पादावप्राप्य रामस्य पपात भरतो रुदन्॥३७॥

इस प्रकार विलाप करते-करते भरत अत्यन्त दुःखी हो गये। उनके मुखारविन्दपर पसीने की बूंदें दिखायी देने लगीं। वे श्रीरामचन्द्रजी के चरणों तक पहँचने के पहले ही पृथ्वी पर गिर पड़े॥ ३७॥

दुःखाभितप्तो भरतो राजपुत्रो महाबलः।

उक्त्वाऽऽर्येति सकृद् दीनं पुनर्नोवाच किंचन॥ ३८॥

अत्यन्त दुःख से संतप्त होकर महाबली राजकुमार भरत ने एक बार दीनवाणी में ‘आर्य’ कहकर पुकारा फिर वे कुछ न बोल सके॥ ३८॥

बाष्पैः पिहितकण्ठश्च प्रेक्ष्य रामं यशस्विनम्।

आर्येत्येवाभिसंक्रुश्य व्याहर्तुं नाशकत् ततः॥ ३९॥

आँसुओं से उनका गला रुंध गया था। यशस्वी श्रीराम की ओर देख वे ‘हा! आर्य’ कहकर चीख उठे। इससे आगे उनसे कुछ बोला न जा सका। ३९॥

शत्रुघ्नश्चापि रामस्य ववन्दे चरणौ रुदन्।

तावुभौ च समालिङ्य रामोऽप्यश्रूण्यवर्तयत्॥ ४०॥

फिर शत्रुघ्न ने भी रोते-रोते श्रीराम के चरणों में प्रणाम किया। श्रीराम ने उन दोनों को उठाकर छाती से लगा लिया। फिर वे भी नेत्रों से आँसुओं की धारा बहाने लगे॥ ४०॥

ततः सुमन्त्रेण गुहेन चैव समीयतू राजसुतावरण्ये।

दिवाकरश्चैव निशाकरश्च यथाम्बरे शुक्रबृहस्पतिभ्याम्॥४१॥

तत्पश्चात् राजकुमार श्रीराम तथा लक्ष्मण उस वन में सुमन्त्र और निषादराज गुह से मिले, मानो आकाश में सूर्य और चन्द्रमा, शुक्र और बृहस्पति से मिल रहे हों।

तान् पार्थिवान् वारणयूथपार्हान् समागतांस्तत्र महत्यरण्ये।

वनौकसस्तेऽभिसमीक्ष्य सर्वे त्वश्रूण्यमुञ्चन् प्रविहाय हर्षम्॥४२॥

यूथपति गजराज पर बैठकर यात्रा करने योग्य उन चारों राजकुमारों को उस विशाल वन में आया देख समस्त वनवासी हर्ष छोड़कर शोक के आँसू बहाने लगे॥४२॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे नवनवतितमः सर्गः॥ ९९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में निन्यानबेवाँ सर्ग पूराहुआ॥९९॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अयोध्याकाण्डम्

श्रीराम का भरत को कुशल-प्रश्न के बहाने राजनीति का उपदेश करना

शततमः सर्गः 

सर्ग-100


जटिलं चीरवसनं प्राञ्जलिं पतितं भुवि।

ददर्श रामो दुर्दर्श युगान्ते भास्करं यथा॥१॥

कथंचिदभिविज्ञाय विवर्णवदनं कृशम्।

भ्रातरं भरतं रामः परिजग्राह पाणिना॥२॥

आघ्राय रामस्तं मूर्ध्नि परिष्वज्य च राघवम्।

अङ्के भरतमारोप्य पर्यपृच्छत सादरम्॥३॥

जटा और चीर-वस्त्र धारण किये भरत हाथ जोड़कर पृथ्वी पर पड़े थे, मानो प्रलयकाल में सूर्यदेव धरती पर गिर गये हों। उनको उस अवस्था में देखना किसी भी स्नेही सुहृद् के लिये अत्यन्त कठिन था। श्रीराम ने उन्हें देखा और जैसे-तैसे किसी तरह पहचाना। उनका मुख उदास हो गया था। वे बहुत दुर्बल हो गये थे। श्रीराम ने भाई भरत को अपने हाथ से पकड़कर उठाया और उनका मस्तक सूंघकर उन्हें हृदय से लगा लिया। इसके बाद रघुकुलभूषण भरत को गोद में बिठाकर श्रीराम ने बड़े आदर से पूछा – ॥१-३॥

क्व नु तेऽभूत् पिता तात यदरण्यं त्वमागतः।

न हि त्वं जीवतस्तस्य वनमागन्तुमर्हसि ॥४॥

‘तात! पिताजी कहाँ थे कि तुम इस वन में आये हो? उनके जीते-जी तो तुम वन में नहीं आ सकते थे॥

चिरस्य बत पश्यामि दूराद् भरतमागतम्।

दुष्प्रतीकमरण्येऽस्मिन् किं तात वनमागतः॥५॥

‘मैं दीर्घकाल के बाद दूर से (नाना के घर से) आये हुए भरत को आज इस वन में देख रहा हूँ; परंतु इनका शरीर बहुत दुर्बल हो गया है। तात! तुम क्यों वन में आये हो? ॥ ५॥

कच्चिन्नु धरते तात राजा यत् त्वमिहागतः।

कच्चिन्न दीनः सहसा राजा लोकान्तरं गतः॥

‘भाई! महाराज जीवित हैं न? कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि वे अत्यन्त दुःखी होकर सहसा परलोकवासी हो गये हों और इसीलिये तुम्हें स्वयं यहाँ आना पड़ा हो?॥

कच्चित् सौम्य न ते राज्यं भ्रष्टं बालस्य शाश्वतम्।

कच्चिच्छुश्रूषसे तात पितुः सत्यपराक्रम॥७॥

‘सौम्य! तुम अभी बालक हो, इसलिये परम्परा से चला आता हुआ तुम्हारा राज्य नष्ट तो नहीं हो गया? सत्यपराक्रमी तात भरत! तुम पिताजी की सेवा-शुश्रूषा तो करते हो न? ॥ ७॥

कच्चिद् दशरथो राजा कुशली सत्यसंगरः।

राजसूयाश्वमेधानामाहर्ता धर्मनिश्चितः॥८॥

‘जो धर्म पर अटल रहने वाले हैं तथा जिन्होंने राजसूय एवं अश्वमेध-यज्ञों का अनुष्ठान किया है, वे सत्यप्रतिज्ञ महाराज दशरथ सकुशल तो हैं न? ॥ ८॥

स कच्चिद् ब्राह्मणो विद्वान् धर्मनित्यो महाद्युतिः।

इक्ष्वाकूणामुपाध्यायो यथावत् तात पूज्यते॥९॥

‘तात! क्या तुम सदा धर्म में तत्पर रहनेवाले, विद्वान्, ब्रह्मवेत्ता और इक्ष्वाकुकुल के आचार्य महातेजस्वी वसिष्ठजी की यथावत् पूजा करते हो? ॥ ९॥

तात कच्चिच्च कौसल्या सुमित्रा च प्रजावती।

सुखिनी कच्चिदार्या च देवी नन्दति कैकयी॥ १०॥

‘भाई! क्या माता कौसल्या सुख से हैं? उत्तम संतानवाली सुमित्रा प्रसन्न हैं और आर्या कैकेयी देवी भी आनन्दित हैं? ॥ १०॥

कच्चिद् विनयसम्पन्नः कुलपुत्रो बहुश्रुतः।

अनसूयुरनुद्रष्टा सत्कृतस्ते पुरोहितः॥११॥

‘जो उत्तम कुल में उत्पन्न, विनयसम्पन्न, बहुश्रुत, किसी के दोष न देखने वाले तथा शास्त्रोक्त धर्मो पर निरन्तर दृष्टि रखने वाले हैं, उन पुरोहितजी का तुमने पूर्णतः सत्कार किया है ? ॥ ११॥

कच्चिदग्निषु ते युक्तो विधिज्ञो मतिमानृजुः।

हुतं च होष्यमाणं च काले वेदयते सदा॥१२॥

‘हवनविधि के ज्ञाता, बुद्धिमान् और सरल स्वभाव वाले जिन ब्राह्मण देवता को तुमने अग्निहोत्रकार्य के लिये नियुक्त किया है, वे सदा ठीक समयपर आकर क्या तुम्हें यह सूचित करते हैं कि इस समय अग्नि में आहुति दे दी गयी और अब अमुक समय में हवन करना है?॥

कच्चिद् देवान् पितॄन् भृत्यान् गुरून् पितृसमानपि।

वृद्धाश्च तात वैद्यांश्च ब्राह्मणांश्चाभिमन्यसे॥ १३॥

‘तात! क्या तुम देवताओं, पितरों, भृत्यों, गुरुजनों, पिता के समान आदरणीय वृद्धों, वैद्यों और ब्राह्मणों का सम्मान करते हो? ॥ १३॥

इष्वस्त्रवरसम्पन्नमर्थशास्त्रविशारदम्।

सुधन्वानमुपाध्यायं कच्चित् त्वं तात मन्यसे॥ १४॥

‘भाई! जो मन्त्ररहित श्रेष्ठ बाणों के प्रयोग तथा मन्त्रसहित उत्तम अस्त्रों के प्रयोग के ज्ञान से सम्पन्न और अर्थशास्त्र (राजनीति) के अच्छे पण्डित हैं, उन आचार्य सुधन्वा का क्या तुम समादर करते हो? ॥ १४॥

कच्चिदात्मसमाः शूराः श्रुतवन्तो जितेन्द्रियाः।

कुलीनाश्चेङ्गितज्ञाश्च कृतास्ते तात मन्त्रिणः॥ १५॥

‘तात! क्या तुमने अपने ही समान शूरवीर, शास्त्रज्ञ, जितेन्द्रिय, कुलीन तथा बाहरी चेष्टाओं से ही मन की बात समझ लेने वाले सुयोग्य व्यक्तियों को ही मन्त्री बनाया है ? ॥ १५ ॥

मन्त्रो विजयमूलं हि राज्ञां भवति राघव।

सुसंवृतो मन्त्रिधुरैरमात्यैः शास्त्रकोविदैः॥१६॥

‘रघुनन्दन! अच्छी मन्त्रणा ही राजाओं की विजय का मूल कारण है। वह भी तभी सफल होती है, जब नीति-शास्त्रनिपुण मन्त्रिशिरोमणि अमात्य उसे सर्वथा गुप्त रखें॥ १६॥

कच्चिन्निद्रावशं नैषि कच्चित् कालेऽवबुध्यसे।

कच्चिच्चापररात्रेषु चिन्तयस्यर्थनैपुणम्॥१७॥

‘भरत! तुम असमय में ही निद्रा के वशीभूत तो नहीं होते? समय पर जाग जाते हो न? रात के पिछले पहर में अर्थसिद्धि के उपायपर विचार करते हो न?॥ १७॥

कच्चिन्मन्त्रयसे नैकः कच्चिन्न बहुभिः सह।

कच्चित् ते मन्त्रितो मन्त्रो राष्ट्रं न परिधावति॥ १८॥

‘(कोई भी गुप्त मन्त्रणा दो से चार कानों तक ही गुप्त रहती है; छः कानों में जाते ही वह फूट जाती है,अतः मैं पूछता हूँ-) तुम किसी गूढ़ विषय पर अकेले ही तो विचार नहीं करते? अथवा बहुत

लोगों के साथ बैठकर तो मन्त्रणा नहीं करते? कहीं ऐसा तो नहीं होता कि तुम्हारी निश्चित की हुई गुप्त मन्त्रणा फूटकर शत्रु के राज्य तक फैल जाती हो?॥१८॥

कच्चिदर्थं विनिश्चित्य लघुमूलं महोदयम्।

क्षिप्रमारभसे कर्म न दीर्घयसि राघव॥१९॥

‘रघुनन्दन! जिसका साधन बहुत छोटा और फल बहुत बड़ा हो, ऐसे कार्य का निश्चय करने के बाद तुम उसे शीघ्र प्रारम्भ कर देते हो न? उसमें विलम्ब तो नहीं करते? ॥ १९॥

कच्चिन्नु सुकृतान्येव कृतरूपाणि वा पुनः।

विदस्ते सर्वकार्याणि न कर्तव्यानि पार्थिवाः॥ २०॥

‘तुम्हारे सब कार्य पूर्ण हो जानेपर अथवा पूरे होनेके समीप पहुँचनेपर ही दूसरे राजाओंको ज्ञात होते हैं न? कहीं ऐसा तो नहीं होता कि तुम्हारे भावी कार्यक्रमको वे पहले ही जान लेते हों? ॥ २० ॥

कच्चिन्न तर्कैर्युक्त्या वा ये चाप्यपरिकीर्तिताः।

त्वया वा तव वामात्यैर्बुध्यते तात मन्त्रितम्॥ २१॥

‘तात! तुम्हारे निश्चित किये हुए विचारों को तुम्हारे या मन्त्रियों के प्रकट न करने पर भी दूसरे लोग तर्क और युक्तियों के द्वारा जान तो नहीं लेते हैं? (तथा तुमको और तुम्हारे अमात्यों को दूसरों के गुप्त विचारों का पता लगता रहता है न?) ॥ २१॥

कच्चित् सहस्रैर्मूर्खाणामेकमिच्छसि पण्डितम्।

पण्डितो ह्यर्थकृच्छेषु कुर्यान्निःश्रेयसं महत्॥ २२॥

‘क्या तुम सहस्रों मूल् के बदले एक पण्डित को ही अपने पास रखने की इच्छा रखते हो? क्योंकि विद्वान् पुरुष ही अर्थसंकट के समय महान् कल्याण कर सकता है॥ २२॥

सहस्राण्यपि मूर्खाणां यद्युपास्ते महीपतिः।

अथवाप्ययुतान्येव नास्ति तेषु सहायता॥२३॥

‘यदि राजा हजार या दस हजार मूल् को अपने पास रख ले तो भी उनसे अवसर पर कोई अच्छी सहायता नहीं मिलती॥ २३॥

एकोऽप्यमात्यो मेधावी शूरो दक्षो विचक्षणः।

राजानं राजपुत्रं वा प्रापयेन्महतीं श्रियम्॥२४॥

‘यदि एक मन्त्री भी मेधावी, शूर-वीर, चतुर एवं नीतिज्ञ हो तो वह राजा या राजकुमार को बहुत बड़ी सम्पत्ति की प्राप्ति करा सकता है॥ २४॥

कच्चिन्मुख्या महत्स्वेव मध्यमेषु च मध्यमाः।

जघन्याश्च जघन्येषु भृत्यास्ते तात योजिताः॥ २५॥

‘तात! तुमने प्रधान व्यक्तियों को प्रधान, मध्यम श्रेणी के मनुष्यों को मध्यम और छोटी श्रेणी के लोगों को छोटे ही कामों में नियुक्त किया है न? ॥ २५॥

अमात्यानुपधातीतान् पितृपैतामहान् शुचीन्।

श्रेष्ठान् श्रेष्ठेषु कच्चित् त्वं नियोजयसि कर्मसु॥ २६॥

‘जो घूस न लेते हों अथवा निश्छल हों, बापदादों के समय से ही काम करते आ रहे हों तथा बाहर-भीतर से पवित्र एवं श्रेष्ठ हों, ऐसे अमात्यों को ही तुम उत्तम कार्यों में नियुक्त करते हो न? ॥ २६॥

कच्चिन्नोग्रेण दण्डेन भृशमुद्रेजिताः प्रजाः।

राष्ट्र तवावजानन्ति मन्त्रिणः कैकयीसुत॥२७॥

‘कैकेयीकुमार! तुम्हारे राज्य की प्रजा कठोर दण्ड से अत्यन्त उद्विग्न होकर तुम्हारे मन्त्रियों का तिरस्कार तो नहीं करती? ॥ २७॥

कच्चित् त्वां नावजानन्ति याजकाः पतितं यथा।

उग्रप्रतिग्रहीतारं कामयानमिव स्त्रियः॥२८॥

‘जैसे पवित्र याजक पतित यजमान का तथा स्त्रियाँ कामचारी पुरुष का तिरस्कार कर देती हैं, उसी प्रकार प्रजा कठोरता पूर्वक अधिक कर लेने के कारण तुम्हारा अनादर तो नहीं करती? ॥ २८॥

उपायकुशलं वैद्यं भृत्यसंदूषणे रतम्।

शूरमैश्वर्यकामं च यो हन्ति न स हन्यते॥२९॥

‘जो साम-दाम आदि उपायों के प्रयोग में कुशल, राजनीतिशास्त्र का विद्वान्, विश्वासी भृत्यों को फोड़ने में लगा हुआ, शूर (मरने से न डरने वाला) तथा राजा के राज्य को हड़प लेने की इच्छा रखने वाला है—ऐसे पुरुष को जो राजा नहीं मार डालता है, वह स्वयं उसके हाथ से मारा जाता है॥ २९ ॥

कच्चिद् धृष्टश्च शूरश्च धृतिमान् मतिमान् शुचिः ।

कुलीनश्चानुरक्तश्च दक्षः सेनापतिः कृतः॥ ३०॥

‘क्या तुमने सदा संतुष्ट रहने वाले, शूरवीर, धैर्यवान्, बुद्धिमान्, पवित्र, कुलीन एवं अपने में अनुराग रखने वाले, रणकर्मदक्ष पुरुष को ही सेनापति बनाया है? ॥ ३०॥

बलवन्तश्च कच्चित् ते मुख्या युद्धविशारदाः।

दृष्टापदाना विक्रान्तास्त्वया सत्कृत्य मानिताः॥ ३१॥

‘तुम्हारे प्रधान-प्रधान योद्धा (सेनापति) बलवान्, युद्धकुशल और पराक्रमी तो हैं न? क्या तुमने उनके शौर्य की परीक्षा कर ली है? तथा क्या वे तुम्हारे द्वारा सत्कारपूर्वक सम्मान पाते रहते हैं ? ॥ ३१॥

कच्चिद बलस्य भक्तं च वेतनं च यथोचितम्।

सम्प्राप्तकालं दातव्यं ददासि न विलम्बसे॥ ३२॥

‘सैनिकों को देने के लिये नियत किया हुआ समुचित वेतन और भत्ता तुम समय पर दे देते हो न? देने में विलम्ब तो नहीं करते? ॥ ३२॥

कालातिक्रमणे ह्येव भक्तवेतनयो ताः।

भर्तुरप्यतिकुप्यन्ति सोऽनर्थः सुमहान् कृतः॥ ३३॥

‘यदि समय बिताकर भत्ता और वेतन दिये जाते हैं तो सैनिक अपने स्वामी पर भी अत्यन्त कुपित हो जाते हैं और इसके कारण बड़ा भारी अनर्थ घटित हो जाता है।

कच्चित् सर्वेऽनुरक्तास्त्वां कुलपुत्राः प्रधानतः।

कच्चित् प्राणांस्तवार्थेषु संत्यजन्ति समाहिताः॥ ३४॥

‘क्या उत्तम कुल में उत्पन्न मन्त्री आदि समस्त प्रधान अधिकारी तुमसे प्रेम रखते हैं? क्या वे तुम्हारे लिये एकचित्त होकर अपने प्राणों का त्याग करने के लिये उद्यत रहते हैं? ॥ ३४॥

कच्चिज्जानपदो विद्वान् दक्षिणः प्रतिभानवान्।

यथोक्तवादी दूतस्ते कृतो भरत पण्डितः॥ ३५॥

‘भरत! तुमने जिसे राजदूत के पद पर नियुक्त किया है, वह पुरुष अपने ही देश का निवासी, विद्वान्, कुशल, प्रतिभाशाली और जैसा कहा जाय, वैसी ही बात दूसरे के सामने कहने वाला और सदसद्विवेकयुक्त है न? ॥ ३५ ॥

कच्चिदष्टादशान्येषु स्वपक्षे दश पञ्च च।

त्रिभिस्त्रिभिरविज्ञातैत्सि तीर्थानि चारकैः॥ ३६॥

‘क्या तुम शत्रुपक्ष के अठारह’ और अपने पक्ष के पंद्रह तीर्थों की तीन-तीन अज्ञात गुप्तचरों द्वारा देखभाल या जाँच-पड़ताल करते रहते हो? ॥ ३६ ।।

१. शत्रुपक्ष के मन्त्री, पुरोहित, युवराज, सेनापति, द्वारपाल, अन्तर्वेशिक (अन्तःपुर का अध्यक्ष), कारागाराध्यक्ष, कोषाध्यक्ष, यथायोग्य कार्योंमें धनका व्यय करने वाला सचिव, प्रदेष्टा (पहरेदारों को काम बताने वाला), नगराध्यक्ष (कोतवाल), कार्यनिर्माणकर्ता (शिल्पियों का परिचालक), धर्माध्यक्ष, सभाध्यक्ष, दण्डपाल, दुर्गपाल, राष्ट्रसीमापाल तथा वनरक्षक-ये अठारह तीर्थ हैं, जिनपर राजा को दृष्टि रखनी चाहिये। मतान्तर से ये अठारह तीर्थ इस प्रकार हैं-मन्त्री, पुरोहित, युवराज, सेनापति, द्वारपाल, अन्तःपुराध्यक्ष, कारागाराध्यक्ष, धनाध्यक्ष, राजा की आज्ञा से सेवकों को काम बताने वाला. वादी-प्रतिवादी से मामले की पूछताछ करने वाला, प्राड्विवाक (वकील), धर्मासनाधिकारी (न्यायाधीश), व्यवहार-निर्णेता, सभ्य, सेना को जीविका-निर्वाह के लिये धन देने का अधिकारी (सेनानायक) कर्मचारियों को काम पूरा होने पर वेतन देने के लिये राजा से धन लेने वाला, नगराध्यक्ष, राष्ट्रसीमापाल तथा वनरक्षक, दुष्टों को दण्ड देने का अधिकारी तथा जल, पर्वत, वन एवं दुर्गम भूमि की रक्षा करने वाला—इन पर राजा को दृष्टि रखनी चाहिये। २. उपर्युक्त अठारह तीर्थों में से आदि के तीन को छोड़कर शेष पंद्रह तीर्थ अपने पक्ष के भी सदा परीक्षणीय हैं।

कच्चिद व्यपास्तानहितान् प्रतियातांश्च सर्वदा।

दुर्बलाननवज्ञाय वर्तसे रिपुसूदन॥ ३७॥

‘शत्रुसूदन ! जिन शत्रुओं को तुमने राज्य से निकाल दिया है, वे यदि फिर लौटकर आते हैं तो तुम उन्हें दुर्बल समझकर उनकी उपेक्षा तो नहीं करते? ॥ ३७॥

कच्चिन्न लोकायतिकान् ब्राह्मणांस्तात सेवसे।

अनर्थकुशला ह्येते बालाः पण्डितमानिनः॥ ३८॥

‘तात ! तुम कभी नास्तिक ब्राह्मणों का संग तो नहीं करते हो? क्योंकि वे बुद्धि को परमार्थ की ओर से विचलित करने में कुशल होते हैं तथा वास्तव में अज्ञानी होते हुए भी अपने को बहुत बड़ा पण्डित मानते हैं॥ ३८॥

धर्मशास्त्रेषु मुख्येषु विद्यमानेषु दुर्बुधाः।

बद्धिमान्वीक्षिकी प्राप्य निरर्थं प्रवदन्ति ते॥ ३९॥

‘उनका ज्ञान वेद के विरुद्ध होने के कारण दूषित होता है और वे प्रमाणभूत प्रधान-प्रधान धर्मशास्त्रों के होते हुए भी तार्किक बुद्धि का आश्रय लेकर व्यर्थ बकवाद किया करते हैं॥ ३९॥

वीरैरध्युषितां पूर्वमस्माकं तात पूर्वकैः।

सत्यनामां दृढद्वारा हस्त्यश्वरथसंकुलाम्॥४०॥

ब्राह्मणैः क्षत्रियैर्वैश्यैः स्वकर्मनिरतैः सदा।

जितेन्द्रियैर्महोत्साहैर्वृतामार्यैः सहस्रशः॥४१॥

प्रासादैर्विविधाकारैर्वृतां वैद्यजनाकुलाम्।

कच्चित् समुदितां स्फीतामयोध्यां परिरक्षसे॥ ४२॥

‘तात! अयोध्या हमारे वीर पूर्वजों की निवास भूमि है; उसका जैसा नाम है, वैसा ही गुण है। उसके दरवाजे सब ओर से सुदृढ़ हैं। वह हाथी, घोड़े और रथों से परिपूर्ण है। अपने-अपने कर्मों में लगे हुए ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य सहस्रों की संख्या में वहाँ सदा निवास करते हैं। वे सब-के-सब महान् उत्साही, जितेन्द्रिय और श्रेष्ठ हैं। नाना प्रकार के राजभवन और मन्दिर उसकी शोभा बढ़ाते हैं। वह नगरी बहुसंख्यक विद्वानों से भरी है। ऐसी अभ्युदयशील और समृद्धिशालिनी नगरी अयोध्या की तुम भलीभाँति रक्षा तो करते हो न? ॥ ४०-४२॥

कच्चिच्चैत्यशतैर्जुष्टः सुनिविष्टजनाकुलः।

देवस्थानैः प्रपाभिश्च तटाकैश्चोपशोभितः॥ ४३॥

प्रहृष्टनरनारीकः समाजोत्सवशोभितः।

सुकृष्टसीमापशुमान् हिंसाभिरभिवर्जितः॥४४॥

अदेवमातृको रम्यः श्वापदैः परिवर्जितः।

परित्यक्तो भयैः सर्वैः खनिभिश्चोपशोभितः॥ ४५॥

विवर्जितो नरैः पापैर्मम पूर्वैः सुरक्षितः।

कच्चिज्जनपदः स्फीतः सुखं वसति राघव॥ ४६॥

‘रघुनन्दन भरत! जहाँ नाना प्रकार के अश्वमेध आदि महायज्ञों के बहुत-से चयन-प्रदेश (अनुष्ठानस्थल) शोभा पाते हैं, जिसमें प्रतिष्ठित मनुष्य अधिक संख्या में निवास करते हैं, अनेकानेक देवस्थान, पौंसले और तालाब जिसकी शोभा बढ़ाते हैं, जहाँ के स्त्री-पुरुष सदा प्रसन्न रहते हैं, जो सामाजिक उत्सवों के कारण सदा शोभासम्पन्न दिखायी देता है, जहाँ खेत जोतने में समर्थ पशुओं की अधिकता है, जहाँ किसी प्रकार की हिंसा नहीं होती, जहाँ खेती के लिये वर्षा के जल पर निर्भर नहीं रहना पड़ता (नदियों के जल से ही सिंचाई हो जाती है), जो बहुत ही सुन्दर और हिंसक पशुओं से रहित है, जहाँ किसी तरह का भय नहीं है, नाना प्रकार की खाने जिसकी शोभा बढ़ाती हैं, जहाँ पापी मनुष्यों का सर्वथा अभाव है तथा हमारे पूर्वजों ने जिसकी भलीभाँति रक्षा की है, वह अपना कोसल देश धन-धान्य से सम्पन्न और सुखपूर्वक बसा हुआ है न? ॥ ४३–४६॥ ।

कच्चित् ते दयिताः सर्वे कृषिगोरक्षजीविनः।

वार्तायां संश्रितस्तात लोकोऽयं सखमेधते॥४७॥

‘तात! कृषि और गोरक्षा से आजीविका चलाने वाले सभी वैश्य तुम्हारे प्रीतिपात्र हैं न? क्योंकि कृषि और व्यापार आदि में संलग्न रहने पर ही यह लोक सुखी एवं उन्नतिशील होता है।। ४७॥

तेषां गुप्तिपरीहारैः कच्चित् ते भरणं कृतम्।

रक्ष्या हि राज्ञा धर्मेण सर्वे विषयवासिनः॥४८॥

‘उन वैश्यों को इष्ट की प्राप्ति कराकर और उनके अनिष्ट का निवारण करके तुम उन सब लोगों का भरण-पोषण तो करते हो न? क्योंकि राजा को अपने राज्य में निवास करने वाले सब लोगों का धर्मानुसार पालन करना चाहिये॥४८॥

कच्चित् स्त्रियः सान्त्वयसे कच्चित् तास्ते सुरक्षिताः।

कच्चिन्न श्रद्दधास्यासां कच्चिद् गुह्यं न भाषसे॥ ४९॥

‘क्या तुम अपनी स्त्रियों को संतुष्ट रखते हो? क्या वे तुम्हारे द्वारा भलीभाँति सुरक्षित रहती हैं? तुम उनपर अधिक विश्वास तो नहीं करते? उन्हें अपनी गुप्त बात तो नहीं कह देते? ॥ ४९ ।।

कच्चिन्नागवनं गुप्तं कच्चित् ते सन्ति धेनुकाः।

कच्चिन्न गणिकाश्वानां कुञ्जराणां च तृप्यसि॥ ५०॥

‘जहाँ हाथी उत्पन्न होते हैं, वे जंगल तुम्हारे द्वारा सुरक्षित हैं न? तुम्हारे पास दूध देने वाली गौएँ तो अधिक संख्या में हैं न? (अथवा हाथियों को फँसाने वाली हथिनियों की तो तुम्हारे पास कमी नहीं है?) तुम्हें हथिनियों, घोड़ों और हाथियों के संग्रह से कभी तृप्ति तो नहीं होती? ॥ ५० ॥

कच्चिद् दर्शयसे नित्यं मानुषाणां विभूषितम्।

उत्थायोत्थाय पूर्वाणे राजपुत्र महापथे॥५१॥

‘राजकुमार! क्या तुम प्रतिदिन पूर्वाह्नकाल में वस्त्राभूषणों से विभूषित हो प्रधान सड़क पर जा-जाकर नगरवासी मनुष्यों को दर्शन देते हो? ॥ ५१॥

कच्चिन्न सर्वे कर्मान्ताः प्रत्यक्षास्तेऽविशङ्कया।

सर्वे वा पुनरुत्सृष्टा मध्यमेवात्र कारणम्॥५२॥

‘काम-काज में लगे हुए सभी मनुष्य निडर होकर तुम्हारे सामने तो नहीं आते? अथवा वे सब सदा तुमसे दूर तो नहीं रहते? क्योंकि कर्मचारियों के विषय में मध्यम स्थिति का अवलम्बन करना ही अर्थसिद्धि का कारण होता है॥५२॥

कच्चिद् दुर्गाणि सर्वाणि धनधान्यायुधोदकैः।

यन्त्रैश्च प्रतिपूर्णानि तथा शिल्पिधनुर्धरैः॥५३॥

‘क्या तुम्हारे सभी दुर्ग (किले) धन-धान्य, अस्त्रशस्त्र, जल, यन्त्र (मशीन), शिल्पी तथा धनुर्धर सैनिकोंसे भरे-पूरे रहते हैं? ॥ ५३॥

आयस्ते विपुलः कच्चित् कच्चिदल्पतरो व्ययः।

अपात्रेषु न ते कच्चित् कोषो गच्छति राघव॥ ५४॥

‘रघुनन्दन ! क्या तुम्हारी आय अधिक और व्यय बहुत कम है? तुम्हारे खजाने का धन अपात्रों के हाथ में तो नहीं चला जाता? ॥ ५४॥

देवतार्थे च पित्रर्थे ब्राह्मणाभ्यागतेषु च।

योधेषु मित्रवर्गेषु कच्चिद् गच्छति ते व्ययः॥

‘देवता, पितर, ब्राह्मण, अभ्यागत, योद्धा तथा मित्रों के लिये ही तो तुम्हारा धन खर्च होता है न? ॥ ५५॥

कच्चिदार्योऽपि शुद्धात्मा क्षारितश्चापकर्मणा।

अदृष्टः शास्त्रकुशलैर्न लोभाद् बध्यते शुचिः॥

‘कभी ऐसा तो नहीं होता कि कोई मनुष्य किसी श्रेष्ठ, निर्दोष और शुद्धात्मा पुरुष पर भी दोष लगा दे तथा शास्त्रज्ञान में कुशल विद्वानो द्वारा उसके विषय में विचार कराये बिना ही लोभवश उसे आर्थिक दण्ड दे दिया जाता हो? ॥५६॥

गृहीतश्चैव पृष्टश्च काले दृष्टः सकारणः।

कच्चिन्न मुच्यते चोरो धनलोभान्नरर्षभ॥५७॥

‘नरश्रेष्ठ ! जो चोरी में पकड़ा गया हो, जिसे किसी ने चोरी करते समय देखा हो, पूछताछ से भी जिसके चोर होने का प्रमाण मिल गया हो तथा जिसके विरुद्ध (चोरी का माल बरामद होना आदि) और भी बहुत से कारण (सबूत) हों, ऐसे चोर को भी तुम्हारे राज्य में धन के लालच से छोड़ तो नहीं दिया जाता है? ॥ ५७॥

व्यसने कच्चिदाढ्यस्य दुर्बलस्य च राघव।

अर्थं विरागाः पश्यन्ति तवामात्या बहुश्रुताः॥ ५८॥

‘रघुकुलभूषण! यदि धनी और गरीब में कोई विवाद छिड़ा हो और वह राज्य के न्यायालय में निर्णय के लिये आया हो तो तुम्हारे बहुज्ञ मन्त्री धन आदि के लोभ को छोड़कर उस मामले पर विचार करते हैं न? ॥ ५८॥

यानि मिथ्याभिशस्तानां पतन्त्यश्रूणि राघव।

तानि पुत्रपशून् जन्ति प्रीत्यर्थमनुशासतः॥५९॥

‘रघुनन्दन ! निरपराध होने पर भी जिन्हें मिथ्या दोष लगाकर दण्ड दिया जाता है, उन मनुष्यों की आँखों से जो आँसू गिरते हैं, वे पक्षपातपूर्ण शासन करने वाले राजा के पुत्र और पशुओं का नाश कर डालते हैं। ५९॥

कच्चिद् वृद्धांश्च बालांश्च वैद्यान् मुख्यांश्च

राघव। दानेन मनसा वाचा त्रिभिरेतैर्बुभूषसे॥६०॥

‘राघव! क्या तुम वृद्ध पुरुषों, बालकों और प्रधान प्रधान वैद्यों का आन्तरिक अनुराग, मधुर वचन और धनदान-इन तीनों के द्वारा सम्मान करते हो? ।। ६०॥

कच्चिद् गुरूंश्च वृद्धाश्च तापसान् देवतातिथीन्।

चैत्यांश्च सर्वान् सिद्धार्थान् ब्राह्मणांश्च नमस्यसि॥६१॥

‘गुरुजनों, वृद्धों, तपस्वियों, देवताओं, अतिथियों, चैत्य वृक्षों और समस्त पूर्णकाम ब्राह्मणों को नमस्कार करते हो न? ॥ ६१॥

कच्चिदर्थेन वा धर्ममर्थं धर्मेण वा पुनः।

उभौ वा प्रीतिलोभेन कामेन न विबाधसे॥६२॥

‘तुम अर्थ के द्वारा धर्म को अथवा धर्म के द्वारा अर्थ को हानि तो नहीं पहुँचाते? अथवा आसक्ति और लोभ रूप काम के द्वारा धर्म और अर्थ दोनों में बाधा तो नहीं आने देते?॥

कच्चिदर्थं च कामं च धर्मं च जयतां वर।

विभज्य काले कालज्ञ सर्वान् वरद सेवसे॥ ६३॥

‘विजयी वीरों में श्रेष्ठ, समयोचित कर्तव्य के ज्ञाता तथा दूसरों को वर देने में समर्थ भरत! क्या तुम समय का विभाग करके धर्म, अर्थ और काम का योग्य समय में सेवन करते हो? ॥ ६३॥

कच्चित् ते ब्राह्मणाः शर्म सर्वशास्त्रार्थकोविदाः।

आशंसन्ते महाप्राज्ञ पौरजानपदैः सह ॥६४॥

‘महाप्राज्ञ! सम्पूर्ण शास्त्रों के अर्थ को जानने वाले ब्राह्मण पुरवासी और जनपदवासी मनुष्यों के साथ तुम्हारे कल्याण की कामना करते हैं न? ॥ ६४॥

नास्तिक्यमनृतं क्रोधं प्रमादं दीर्घसूत्रताम्।

अदर्शनं ज्ञानवतामालस्यं पञ्चवृत्तिताम्॥६५॥

एकचिन्तनमर्थानामनर्थज्ञैश्च मन्त्रणम्।

निश्चितानामनारम्भं मन्त्रस्यापरिरक्षणम्॥६६॥

मङ्गलाद्यप्रयोगं च प्रत्युत्थानं च सर्वतः।

कच्चित् त्वं वर्जयस्येतान् राजदोषांश्चतुर्दश॥ ६७॥

‘नास्तिकता, असत्य-भाषण, क्रोध, प्रमाद, दीर्घसूत्रता, ज्ञानी पुरुषों का संग न करना, आलस्य, नेत्र आदि पाँचों इन्द्रियों के वशीभूत होना, राजकार्यों के विषय में अकेले ही विचार करना, प्रयोजन को न

समझने वाले विपरीतदर्शी मूल् से सलाह लेना, निश्चित किये हुए कार्यों का शीघ्र प्रारम्भ न करना,गुप्त मन्त्रणा को सुरक्षित न रखकर प्रकट कर देना, माङ्गलिक आदि कार्यों का अनुष्ठान न करना तथा सब शत्रुओं पर एक ही साथ चढ़ाई कर देना—ये राजा के चौदह दोष हैं। तुम इन दोषों का सदा परित्याग करते हो न?॥ ६५-६७॥

दशपञ्चचतुर्वर्गान् सप्तवर्गं च तत्त्वतः।

अष्टवर्गं त्रिवर्गं च विद्यास्तिस्रश्च राघव॥ ६८॥

इन्द्रियाणां जयं बुद्ध्वा षाड्गुण्यं दैवमानुषम्।

कृत्यं विंशतिवर्गं च तथा प्रकृतिमण्डलम्॥६९॥

यात्रादण्डविधानं च द्वियोनी संधिविग्रहौ।

कच्चिदेतान् महाप्राज्ञ यथावदनुमन्यसे॥७०॥

‘महाप्राज्ञ भरत! दशवर्ग,’ पञ्चवर्ग,२ चतुर्वर्ग, सप्तवर्ग, अष्टवर्ग,५ त्रिवर्ग,६ तीन विद्या, बुद्धि के द्वारा इन्द्रियों को जीतना, छः गुण, दैवी और मानुषी बाधाएँ, राजा के नीतिपूर्ण कार्य,१० विंशतिवर्ग,११ प्रकृतिमण्डल,१२ यात्रा (शत्रु पर आक्रमण), दण्डविधान (व्यूहरचना) तथा दो-दो गुणों की१३ योनिभूत संधि और विग्रह–इन सबकी ओर तुम यथार्थ रूप से ध्यान देते हो न? इनमें से त्यागने योग्य दोषों को त्यागकर ग्रहण करने योग्य गुणों को ग्रहण करते हो न?॥ ६८-७० ॥

१. काम से उत्पन्न होने वाले दस दोषों को दशवर्ग कहते है। ये राजा के लिये त्याज्य हैं। मनुजी ने उनके नाम इस प्रकार गिनाये हैं -आखेट, जुआ, दिन में सोना, दूसरों की निन्दा करना, स्त्री में आसक्त होना, मद्यपान, नाचना, गाना, बाजा बजाना और व्यर्थ घूमना। २. जलदुर्ग, पर्वतदुर्ग, वृक्षदुर्ग, ईरिणदुर्ग और धन्वदुर्ग ये पाँच प्रकार के दुर्ग पञ्चवर्ग कहलाते हैं। इनमें आरम्भ के तीन तो प्रसिद्ध ही हैं। जहाँ किसी प्रकार की खेती नहीं होती, ऐसे प्रदेश को ईरिण कहते हैं। बालू से भरी मरुभूमि को धन्व कहते हैं। गर्मी के दिनों में वह शत्रुओं के लिये दुर्गम होती है। इन सब दुर्गो का यथासमय उपयोग करके राजा को आत्मरक्षा करनी चाहिये। ३. साम, दान, भेद और दण्ड–इन चार प्रकार की नीति को चतुर्वर्ग कहते हैं। ४. राजा, मन्त्री, राष्ट्र, किला, खजाना, सेना और मित्रवर्ग–ये परस्पर उपकार करने वाले राज्य के सात अङ्ग हैं। इन्हीं को सप्तवर्ग कहा गया है। ५. चुगली, साहस, द्रोह, ईर्ष्या, दोषदर्शन, अर्थदूषण, वाणी की कठोरता और दण्ड की कठोरता ये क्रोध से उत्पन्न होने वाले आठ दोष अष्टवर्ग माने गये हैं। किसी-किसी के मत में खेती की उन्नति करना, व्यापार को बढ़ाना, दुर्ग बनवाना, पुल निर्माण कराना, जंगल से हाथी पकड़कर मँगवाना, खानों पर अधिकार प्राप्त करना, अधीन राजाओं से कर लेना और निर्जन प्रदेश को आबाद करना—ये राजा के लिये उपादेय आठ गुण ही अष्टवर्ग हैं। ६. धर्म, अर्थ और काम को अथवा उत्साह-शक्ति, प्रभुशक्ति तथा मन्त्रशक्ति को त्रिवर्ग कहते हैं। ७. त्रयी, वार्ता और दण्डनीति—ये तीन विद्याएँ हैं। इनमें तीनों वेदों को त्रयी कहते हैं। कृषि और गोरक्षा आदि वार्ता के अन्तर्गत हैं तथा नीतिशास्त्र का नाम दण्डनीति है। ८. संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और समाश्रय-ये छः गुण हैं। इनमें शत्रु से मेल रखना संधि, उससे लड़ाई छेड़ना विग्रह, आक्रमण करना यान, अवसर की प्रतीक्षामें बैठे रहना आसन, दुरंगी नीति बर्तना द्वैधीभाव और अपने से बलवान् राजा की शरण लेना समाश्रय कहलाता है। ९. आग लगना, बाढ़ आना, बीमारी फैलना, अकाल पड़ना और महामारी का प्रकोप होना—ये पाँच दैवी बाधाएँ हैं। राज्य के अधिकारियों. चोरों, शत्रुओं और राजा के प्रिय व्यक्तियों से स्वयं राजा के लोभ से जो भय प्राप्त होता है, उसे मानवी बाधा कहते हैं। १०. शत्रु राजाओं के सेवकों में से जिनको वेतन न मिला हो, जो अपमानित किये गये हों, जो अपने मालिक के किसी बर्ताव से कुपित हों तथा जिन्हें भय दिखाकर डराया गया हो, ऐसे लोगों को मनचाही वस्तु देकर फोड़ लेना राजा का कृत्य (नीतिपूर्ण कार्य) माना गया है। ११. बालक, वृद्ध, दीर्घकाल का रोगी, जातिच्युत, डरपोक, भीरु मनुष्यों को साथ रखने वाला, लोभी लालची लोगों को आश्रय देने वाला, मन्त्री, सेनापति आदि प्रकृतियों को असंतुष्ट रखने वाला, विषयों में आसक्त, चञ्चलचित्त मनुष्यों से सलाह लेने वाला, देवता और ब्राह्मणों की निन्दा करने वाला, दैवका मारा हुआ, भाग्य के भरोसे पुरुषार्थ न करने वाला, दुर्भिक्ष से पीड़ित, सैनिक-कष्ट से युक्त (सेनारहित), स्वदेश में न रहने वाला, अधिक शत्रुओं वाला, अकाल (क्रूर ग्रहदशा आदि से युक्त) और सत्यधर् मसे रहित—ये बीस प्रकार के राजा संधि के योग्य नहीं माने गये हैं। इन्हीं को विंशतिवर्ग के नाम से कहा गया है। १२. राज्य के स्वामी, अमात्य, सुहृद्, कोष, राष्ट्र, दुर्ग और सेना-राज्य के इन सात अङ्गों को ही प्रकृतिमण्डल कहते हैं। किसी-किसी के मत में मन्त्री, राष्ट्र, किला, खजाना और दण्ड—ये पाँच प्रकृतियाँ अलग हैं और बारह राजाओं के समूह को मण्डल कहा है। १३. द्वैधीभाव और समाश्रय-ये इनकी योनिसंधि हैं और यान तथा आसन इनकी योनिविग्रह हैं, अर्थात् प्रथम दो संधिमूलक और अन्तिम दो विग्रहमूलक हैं।

मन्त्रिभिस्त्वं यथोद्दिष्टं चतुर्भिस्त्रिभिरेव वा।

कच्चित् समस्तैर्व्यस्तैश्च मन्त्रं मन्त्रयसे बुध॥ ७१॥

‘विद्वन् ! क्या तुम नीतिशास्त्र की आज्ञा के अनुसार चार या तीन मन्त्रियों के साथ—सबको एकत्र करके अथवा सबसे अलग-अलग मिलकर सलाह करते हो? ॥ ७१॥

कच्चित् ते सफला वेदाः कच्चित् ते सफलाः कियाः।

कच्चित् ते सफला दाराः कच्चित् ते सफलं श्रुतम्॥७२॥

‘क्या तुम वेदों की आज्ञा के अनुसार काम करके उन्हें सफल करते हो? क्या तुम्हारी क्रियाएँ सफल (उद्देश्य की सिद्धि करने वाली) हैं? क्या तुम्हारी स्त्रियाँ भी सफल (संतानवती) हैं? और क्या तुम्हारा शास्त्रज्ञान भी विनय आदि गुणों का उत्पादक होकर सफल हुआ है ? ॥ ७२॥

कच्चिदेषैव ते बुद्धिर्यथोक्ता मम राघव।

आयुष्या च यशस्या च धर्मकामार्थसंहिता॥ ७३॥

‘रघुनन्दन ! मैंने जो कुछ कहा है, तुम्हारी बुद्धि का भी ऐसा ही निश्चय है न? क्योंकि यह विचार आयु और यश को बढ़ाने वाला तथा धर्म, काम और अर्थ की सिद्धि करने वाला है॥७३॥

यां वृत्तिं वर्तते तातो यां च नः प्रपितामहः।

तां वृत्तिं वर्तसे कच्चिद् या च सत्पथगा शुभा॥ ७४॥

‘हमारे पिताजी जिस वृत्ति का आश्रय लेते हैं, हमारे प्रपितामहों ने जिस आचरण का पालन किया है, सत्पुरुष भी जिसका सेवन करते हैं और जो कल्याण का मूल है, उसीका तुम पालन करते हो न? ॥ ७४॥

कच्चित् स्वादुकृतं भोज्यमेको नाश्नासि राघव।

कच्चिदाशंसमानेभ्यो मित्रेभ्यः सम्प्रयच्छसि॥ ७५॥

‘रघुनन्दन ! तुम स्वादिष्ट अन्न अकेले ही तो नहीं खा जाते? उसकी आशा रखने वाले मित्रों को भी देते हो न?॥ ७५॥

राजा तु धर्मेण हि पालयित्वा महीपतिर्दण्डधरः प्रजानाम्।

अवाप्य कृत्स्नां वसुधां यथावदितश्च्युतः स्वर्गमुपैति विद्वान्॥७६॥

‘इस प्रकार धर्म के अनुसार दण्ड धारण करने वाला विद्वान् राजा प्रजाओं का पालन करके समूची पृथ्वी को यथावत् रूप से अपने अधिकार में कर लेता है तथा देहत्याग करने के पश्चात् स्वर्गलोक में जाता है’॥ ७६॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे शततमः सर्गः॥१००॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में सौवाँ सर्ग पूरा हुआ।१००॥