सर्ग-61
ततो रामो महातेजा धनुरादाय वीर्यवान्।
किरीटिनं महाकायं कुम्भकर्णं ददर्श ह॥१॥
तदनन्तर हाथ में धनुष लेकर बल-विक्रम से सम्पन्न महातेजस्वी श्रीराम ने किरीटधारी महाकाय राक्षस कुम्भकर्ण को देखा ॥१॥
तं दृष्ट्वा राक्षसश्रेष्ठं पर्वताकारदर्शनम्।
क्रममाणमिवाकाशं पुरा नारायणं यथा॥२॥
सतोयाम्बुदसंकाशं काञ्चनाङ्गदभूषणम्।
दृष्ट्वा पुनः प्रदुद्राव वानराणां महाचमूः॥३॥
वह पर्वत के समान दिखायी देता था और राक्षसों में सबसे बड़ा था। जैसे पूर्वकाल में भगवान् नारायण ने आकाश को नापने के लिये डग भरे थे, उसी प्रकार वह भी डग बढ़ाता जा रहा था। सजल जलधर के समान काला कुम्भकर्ण सोने के बाजूबन्द से विभूषित था। उसे देखकर वानरों की वह विशाल सेना पुनः बड़े वेग से भागने लगी॥ २-३॥
विद्रुतां वाहिनीं दृष्ट्वा वर्धमानं च राक्षसम्।
सविस्मितमिदं रामो विभीषणमुवाच ह॥४॥
अपनी सेना को भागते तथा राक्षस कुम्भकर्ण को बढ़ते देख श्रीरामचन्द्रजी को बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्होंने विभीषण से पूछा- ॥४॥
कोऽसौ पर्वतसंकाशः किरीटी हरिलोचनः।
लङ्कायां दृश्यते वीरः सविद्युदिव तोयदः॥५॥
‘यह लङ्कापुरी में पर्वत के समान विशालकाय वीर कौन है, जिसके मस्तक पर किरीट शोभा पाता हैऔर नेत्र भूरे हैं? यह ऐसा दिखायी देता है मानो बिजलीसहित मेघ हो॥५॥
पृथिव्यां केतुभूतोऽसौ महानेकोऽत्र दृश्यते।
यं दृष्ट्वा वानराः सर्वे विद्रवन्ति ततस्ततः॥६॥
‘इस भूतल पर यह एकमात्र महान् ध्वज-सा दृष्टिगोचर होता है। इसे देखकर सारे वानर इधर-उधर भाग चले हैं॥६॥
आचक्ष्व सुमहान् कोऽसौ रक्षो वा यदि वासुरः।
न मयैवंविधं भूतं दृष्टपूर्वं कदाचन॥७॥
‘विभीषण! बताओ। यह इतने बड़े डील-डौल का कौन है? कोई राक्षस है या असुर? मैंने ऐसे प्राणी को पहले कभी नहीं देखा’ ॥ ७॥
सम्पृष्टो राजपुत्रेण रामेणाक्लिष्टकर्मणा।
विभीषणो महाप्राज्ञः काकुत्स्थमिदमब्रवीत्॥८॥
अनायास ही बड़े-बड़े कर्म करने वाले राजकुमार श्रीराम ने जब इस प्रकार पूछा, तब परम बुद्धिमान् विभीषण ने उन ककुत्स्थकुलभूषण रघुनाथजी से इस प्रकार कहा- ॥८॥
येन वैवस्वतो युद्धे वासवश्च पराजितः।
सैष विश्रवसः पुत्रः कुम्भकर्णः प्रतापवान्।
अस्य प्रमाणसदृशो राक्षसोऽन्यो न विद्यते॥९॥
‘भगवन् ! जिसने युद्ध में वैवस्वत यम और देवराज इन्द्र को भी पराजित किया था, वही यह विश्रवा का प्रतापी पुत्र कुम्भकर्ण है। इसके बराबर लंबा दूसरा कोई राक्षस नहीं है॥९॥
एतेन देवा युधि दानवाश्च यक्षा भुजंगाः पिशिताशनाश्च।
गन्धर्वविद्याधरकिंनराश्च सहस्रशो राघव सम्प्रभग्नाः॥१०॥
‘रघुनन्दन ! इसने देवता, दानव, यक्ष, नाग, राक्षस, गन्धर्व, विद्याधर और किन्नरों को सहस्रों बार युद्ध में मार भगाया है॥ १०॥
शूलपाणिं विरूपाक्षं कुम्भकर्णं महाबलम्।
हन्तुं न शेकुस्त्रिदशाः कालोऽयमिति मोहिताः॥११॥
‘इसके नेत्र बड़े भयंकर हैं। यह महाबली कुम्भकर्ण जब हाथ में शूल लेकर युद्धमें खड़ा हुआ, उस समय देवता भी इसे मारने में समर्थ न हो सके। यह कालरूप है, ऐसा समझकर वे सब-के-सब मोहित हो गये थे॥
प्रकृत्या ह्येष तेजस्वी कुम्भकर्णो महाबलः।
अन्येषां राक्षसेन्द्राणां वरदानकृतं बलम्॥१२॥
‘कुम्भकर्ण स्वभाव से ही तेजस्वी और महाबलवान् है। अन्य राक्षसपतियों के पास जो बल है, वह वरदान से प्राप्त हुआ है॥ १२॥
बालेन जातमात्रेण क्षुधार्तेन महात्मना।
भक्षितानि सहस्राणि प्रजानां सुबहून्यपि॥१३॥
‘इस महाकाय राक्षस ने जन्म लेते ही बाल्यावस्था में भूख से पीड़ित हो कई सहस्र प्रजाजनों को खा डाला था॥
तेषु सम्भक्ष्यमाणेषु प्रजा भयनिपीडिताः।
यान्त स्म शरणं शक्रं तमप्यर्थं न्यवेदयन्॥१४॥
‘जब सहस्रों प्रजाजन इसका आहार बनने लगे, तब भयसे पीड़ित हो वे सब-के-सब देवराज इन्द्र की शरण में गये और उन सबने उनके समक्ष अपना कष्ट निवेदन किया॥१४॥
स कुम्भकर्णं कुपितो महेन्द्रो जघान वज्रेण शितेन वज्री।
स शक्रवज्राभिहतो महात्मा चचाल कोपाच्च भृशं ननाद॥१५॥
‘इससे वज्रधारी देवराज इन्द्र को बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने अपने तीखे वज्र से कुम्भकर्ण को घायल कर दिया। इन्द्र के वज्र की चोट खाकर यह महाकाय राक्षस क्षुब्ध हो उठा और रोषपूर्वक जोर-जोर से सिंहनाद करने लगा॥ १५ ॥
तस्य नानद्यमानस्य कुम्भकर्णस्य रक्षसः।
श्रुत्वा निनादं वित्रस्ताः प्रजा भूयो वितत्रसुः॥१६॥
‘राक्षस कुम्भकर्ण के बारंबार गर्जना करने पर उसका भयंकर सिंहनाद सुनकर प्रजावर्ग के लोग भयभीत हो और भी डर गये॥ १६ ॥
ततः क्रुद्धो महेन्द्रस्य कुम्भकर्णो महाबलः।
निष्कृष्यैरावताद् दन्तं जघानोरसि वासवम्॥१७॥
‘तदनन्तर कुपित हुए महाबली कुम्भकर्ण ने इन्द्र के ऐरावत के मुँह से एक दाँत उखाड़ लिया और उसी से देवेन्द्र की छाती पर प्रहार किया॥१७॥
कुम्भकर्णप्रहारार्तो विजज्वाल स वासवः।
ततो विषेदुः सहसा देवा ब्रह्मर्षिदानवाः॥१८॥
‘कुम्भकर्ण के प्रहार से इन्द्र व्याकुल हो गये और उनके हृदय में जलन होने लगी। यह देखकर सब देवता, ब्रह्मर्षि और दानव सहसा विषाद में डूब गये। १८॥
प्रजाभिः सह शक्रश्च ययौ स्थानं स्वयंभुवः।
कुम्भकर्णस्य दौरात्म्यं शशंसुस्ते प्रजापतेः॥१९॥
‘तत्पश्चात् इन्द्र उन प्रजाजनों के साथ ब्रह्माजी के धाम में गये। वहाँ जाकर उन सबने प्रजापति के समक्ष कुम्भकर्ण की दुष्टता का विस्तारपूर्वक वर्णन किया।
प्रजानां भक्षणं चापि देवानां चापि धर्षणम्।
आश्रमध्वंसनं चापि परस्त्रीहरणं भृशम्॥२०॥
‘इसके द्वारा प्रजा के भक्षण, देवताओं के धर्षण (तिरस्कार), ऋषियों के आश्रमों के विध्वंस तथा परायी स्त्रियों के बारंबार हरण होने की भी बात बतायी॥२०॥
एवं प्रजा यदि त्वेष भक्षयिष्यति नित्यशः।
अचिरेणैव कालेन शून्यो लोको भविष्यति॥२१॥
‘इन्द्रने कहा-‘भगवन् ! यदि यह नित्यप्रति इसी प्रकार प्रजाजनों का भक्षण करता रहा तो थोड़े ही समय में सारा संसार सूना हो जायगा’॥ २१॥
वासवस्य वचः श्रुत्वा सर्वलोकपितामहः।
रक्षास्यावाहयामास कुम्भकर्णं ददर्श ह॥२२॥
‘इन्द्र की यह बात सुनकर सर्वलोकपितामह ब्रह्मा ने सब राक्षसों को बुलाया और कुम्भकर्ण से भी भेंट की॥ २२॥
कुम्भकर्णं समीक्ष्यैव वितत्रास प्रजापतिः।
कुम्भकर्णमथाश्वास्तः स्वयंभूरिदमब्रवीत्॥२३॥
‘कुम्भकर्ण को देखते ही स्वयम्भू प्रजापति थर्रा उठे। फिर अपने को सँभालकर वे उस राक्षस से बोले – ॥२३॥
ध्रुवं लोकविनाशाय पौलस्त्येनासि निर्मितः।
तस्मात् त्वमद्यप्रभृति मृतकल्पः शयिष्यसे ॥२४॥
“कुम्भकर्ण! निश्चय ही इस जगत् का विनाश करने के लिये ही विश्रवा ने तुझे उत्पन्न किया है; अतः मैं शाप देता हूँ, आज से तू मुर्दे के समान सोता रहेगा’॥
ब्रह्मशापाभिभूतोऽथ निपपाताग्रतः प्रभोः।
ततः परमसम्भ्रान्तो रावणो वाक्यमब्रवीत्॥२५॥
‘ब्रह्माजी के शाप से अभिभूत होकर वह रावण के सामने ही गिर पड़ा। इससे रावण को बड़ी घबराहट हुई और उसने कहा— ॥२५॥
प्रवृद्धः काञ्चनो वृक्षः फलकाले निकृत्यते।
न नप्तारं स्वकं न्याय्यं शप्तुमेवं प्रजापते॥२६॥
“प्रजापते! अपने द्वारा लगाया और बढ़ाया हुआ सुवर्णरूप फल देने वाला वृक्ष फल देने के समय नहीं काटा जाता है। यह आपका नाती है, इसे इस प्रकार शाप देना कदापि उचित नहीं है ॥२६॥
न मिथ्यावचनश्च त्वं स्वप्स्यत्येव न संशयः।
कालस्तु क्रियतामस्य शयने जागरे तथा॥२७॥
“आपकी बात कभी झूठी नहीं होती, इसलिये अब इसे सोना ही पड़ेगा, इसमें संशय नहीं है; परंतु आप इसके सोने और जागने का कोई समय नियत कर दें’॥२७॥
रावणस्य वचः श्रुत्वा स्वयंभूरिदमब्रवीत्।
शयिता ह्येष षण्मासमेकाहं जागरिष्यति॥२८॥
‘रावण का यह कथन सुनकर स्वयम्भू ब्रह्मा ने कहा —’यह छः मास तक सोता रहेगा और एक दिन जगेगा॥ २८॥
एकेनाना त्वसौ वीरश्चरन् भूमिं बुभुक्षितः।
व्यात्तास्यो भक्षयेल्लोकान् संवृद्ध इव पावकः॥२९॥
“उस एक दिन ही यह वीर भूखा होकर पृथ्वी पर विचरेगा और प्रज्वलित अग्नि के समान मुँह फैलाकर बहुत-से लोगों को खा जायगा’ ॥ २९॥
सोऽसौ व्यसनमापन्नः कुम्भकर्णमबोधयत्।
त्वत्पराक्रमभीतश्च राजा सम्प्रति रावणः॥३०॥
‘महाराज! इस समय आपत्ति में पड़कर और आपके पराक्रम से भयभीत होकर राजा रावण ने कुम्भकर्ण को जगाया है॥ ३०॥
स एष निर्गतो वीरः शिबिराद् भीमविक्रमः।
वानरान् भृशसंक्रुद्धो भक्षयन् परिधावति॥३१॥
‘यह भयानक पराक्रमी वीर अपने शिबिर से निकला है और अत्यन्त कुपित हो वानरों को खा जाने के लिये सब ओर दौड़ रहा है॥ ३१॥
कुम्भकर्णं समीक्ष्यैव हरयोऽद्य प्रदुद्रुवुः।
कथमेनं रणे क्रुद्धं वारयिष्यन्ति वानराः॥३२॥
‘जब कुम्भकर्ण को देखकर ही आज सारे वानर भाग चले, तब रणभूमि में कुपित हुए इस वीर को ये आगे बढ़ने से कैसे रोक सकेंगे? ॥ ३२ ॥
उच्यन्तां वानराः सर्वे यन्त्रमेतत् समुच्छ्रितम्।
इति विज्ञाय हरयो भविष्यन्तीह निर्भयाः॥३३॥
‘सब वानरों से यह कह दिया जाय कि यह कोई व्यक्ति नहीं, काया द्वारा निर्मित ऊँचा यन्त्रमात्र है। ऐसा जानकर वानर निर्भय हो जायँगे’ ॥ ३३॥
विभीषणवचः श्रुत्वा हेतुमत् सुमुखोद्गतम्।
उवाच राघवो वाक्यं नीलं सेनापतिं तदा ॥३४॥
विभीषण के सुन्दर मुख से निकली हुई यह युक्तियुक्त बात सुनकर श्रीरघुनाथजी ने सेनापति नील से कहा—॥
गच्छ सैन्यानि सर्वाणि व्यूह्य तिष्ठस्व पावके।
द्वाराण्यादाय लङ्कायाश्चर्याश्चास्याथ संक्रमान्॥३५॥
‘अग्निनन्दन! जाओ, समस्त सेनाओं की मोर्चे बंदी करके युद्ध के लिये तैयार रहो और लङ्का के द्वारों तथा राजमार्गों पर अधिकार जमाकर वहीं डटे रहो ॥ ३५ ॥
शैलशृङ्गाणि वृक्षांश्च शिलाश्चाप्युपसंहरन्।
भवन्तः सायुधाः सर्वे वानराः शैलपाणयः॥३६॥
‘पर्वतों के शिखर, वृक्ष और शिलाएँ एकत्र कर लो तथा तुम और सब वानर अस्त्र-शस्त्र एवं पत्थर लिये तैयार रहो’ ॥ ३६॥
राघवेण समादिष्टो नीलो हरिचमूपतिः।
शशास वानरानीकं यथावत् कपिकुञ्जरः॥३७॥
श्रीरघुनाथजी की यह आज्ञा पाकर वानरसेनापति कपिश्रेष्ठनील ने वानरसैनिकों को यथोचित कार्य के लिये आदेश दिया॥ ३७॥
ततो गवाक्षः शरभो हनूमानङ्गदस्तथा।
शैलशृङ्गाणि शैलाभा गृहीत्वा द्वारमभ्ययुः॥३८॥
तदनन्तर गवाक्ष, शरभ, हनुमान् और अङ्गद आदि पर्वताकार वानर पर्वतशिखर लिये लङ्का के द्वार पर डट गये॥ ३८॥
रामवाक्यमुपश्रुत्य हरयो जितकाशिनः।
पादपैरर्दयन् वीरा वानराः परवाहिनीम्॥३९॥
विजयोल्लास से सुशोभित होने वाले वीर वानर श्रीरामचन्द्रजी की पूर्वोक्त आज्ञा सुनकर वृक्षों द्वारा शत्रुसेना को पीड़ित करने लगे॥ ३९ ॥
ततो हरीणां तदनीकमुग्रं रराज शैलोद्यतवृक्षहस्तम्।
गिरेः समीपानुगतं यथैव महन्महाम्भोधरजालमुग्रम्॥४०॥
तदनन्तर हाथों में शैल-शिखर और वृक्ष लिये वानरों की वह भयंकर सेना पर्वत के समीप घिरी हुई मेघों की बड़ी भारी उग्र घटा के समान सुशोभित होने लगी॥ ४०॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे एकषष्टितमः सर्गः॥६१॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में इकसठवाँ सर्ग पूरा हुआ।६१॥
सर्ग-62
स तु राक्षसशार्दूलो निद्रामदसमाकुलः।
राजमार्गं श्रिया जुष्टं ययौ विपुलविक्रमः॥१॥
महापराक्रमी राक्षसशिरोमणि कुम्भकर्ण निद्रा और मद से व्याकुल हो अलसाया हुआ-सा शोभाशाली राजमार्ग से जा रहा था॥१॥
राक्षसानां सहस्रैश्च वृतः परमदुर्जयः।
गृहेभ्यः पुष्पवर्षेण कीर्यमाणस्तदा ययौ॥२॥
वह परम दुर्जय वीर हजारों राक्षसों से घिरा हुआ यात्रा कर रहा था। सड़क के किनारे पर जो मकान थे, उनमें से उसके ऊपर फूल बरसाये जा रहे थे॥२॥
स हेमजालविततं भानुभास्वरदर्शनम्।
ददर्श विपुलं रम्यं राक्षसेन्द्रनिवेशनम्॥३॥
उसने राक्षसराज रावण के रमणीय एवं विशाल भवन का दर्शन किया, जो सोने की जाली से आच्छादित होने के कारण सूर्यदेव के समान दीप्तिमान् दिखायी देता था॥
स तत्तदा सूर्य इवाभ्रजालं प्रविश्य रक्षोधिपतेर्निवेशनम्।
ददर्श दूरेऽग्रजमासनस्थं स्वयंभुवं शक्र इवासनस्थम्॥४॥
जैसे सूर्य मेघों की घटा में छिप जायँ, उसी प्रकार कुम्भकर्ण ने राक्षसराज के महल में प्रवेश किया और राजसिंहासन पर बैठे हुए अपने भाई को दूरसे ही देखा, मानो देवराज इन्द्र ने दिव्य कमलासन पर विराजमान स्वयम्भू ब्रह्मा का दर्शन किया हो॥४॥
भ्रातुः स भवनं गच्छन् रक्षोगणसमन्वितः।
कुम्भकर्णः पदन्यासैरकम्पयत मेदिनीम्॥५॥
राक्षसोंसहित कुम्भकर्ण अपने भाई के भवन में जाते समय जब-जब एक-एक पैर आगे बढ़ाता था, तब-तब पृथ्वी काँप उठती थी॥ ५ ॥
सोऽभिगम्य गृहं भ्रातुः कक्ष्यामभिविगाह्य च।
ददर्शोद्विग्नमासीनं विमाने पुष्पके गुरुम्॥६॥
भाई के भवन में जाकर जब वह भीतर की कक्षा में प्रविष्ट हुआ, तब उसने अपने बड़े भाई को उद्विग्न अवस्था में पुष्पक विमान पर विराजमान देखा॥६॥
अथ दृष्ट्वा दशग्रीवः कुम्भकर्णमुपस्थितम्।
तूर्णमुत्थाय संहृष्टः संनिकर्षमुपानयत्॥७॥
कुम्भकर्ण को उपस्थित देख दशमुख रावण तुरंत उठकर खड़ा हो गया और बड़े हर्ष के साथ उसे अपने समीप बुला लिया॥७॥
अथासीनस्य पर्यङ्के कुम्भकर्णो महाबलः।
भ्रातुर्ववन्दे चरणौ किं कृत्यमिति चाब्रवीत्॥८॥
महाबली कुम्भकर्ण ने सिंहासन पर बैठे हुए अपने भाई के चरणों में प्रणाम किया और पूछा—’कौन-सा कार्य आ पड़ा है ?’॥ ८॥
उत्पत्य चैनं मुदितो रावणः परिषस्वजे।
स भ्रात्रा सम्परिष्वक्तो यथावच्चाभिनन्दितः॥९॥
रावण ने उछलकर बड़ी प्रसन्नता के साथ कुम्भकर्ण को हृदय से लगा लिया। भाई रावण ने उसका आलिंगन करके यथावत् रूप से अभिनन्दन किया॥९॥
कुम्भकर्णः शुभं दिव्यं प्रतिपेदे वरासनम्।
स तदासनमाश्रित्य कुम्भकर्णो महाबलः॥१०॥
संरक्तनयनः क्रोधाद् रावणं वाक्यमब्रवीत्।
इसके बाद कुम्भकर्ण सुन्दर दिव्य सिंहासन पर बैठा। उस आसन पर बैठकर महाबली कुम्भकर्ण ने क्रोध से लाल आँखें किये रावण से पूछा- ॥ १० १/२॥
किमर्थमहमादृत्य त्वया राजन् प्रबोधितः॥११॥
शंस कस्माद् भयं तेऽत्र को वा प्रेतो भविष्यति।
‘राजन् ! किसलिये तुमने बड़े आदर के साथ मुझे जगाया है? बताओ, यहाँ तुम्हें किससे भय प्राप्त हुआ है? अथवा कौन परलोक का पथिक होने वाला है?’ ॥ ११ १/२॥
भ्रातरं रावणः क्रुद्धं कुम्भकर्णमवस्थितम्॥१२॥
रोषेण परिवृत्ताभ्यां नेत्राभ्यां वाक्यमब्रवीत्।
तब रावण अपने पास बैठे हुए कुपित भाई कुम्भकर्ण से रोष से चञ्चल आँखें किये बोला—॥ १२ १/२॥
अद्य ते सुमहान् कालः शयानस्य महाबल॥१३॥
सुषुप्तस्त्वं न जानीषे मम रामकृतं भयम्।
‘महाबली वीर! तुम्हारे सोये-सोये दीर्घकाल व्यतीत हो गया। तुम गाढ़ निद्रा में निमग्न होने के कारण नहीं जानते कि मुझे राम से भय प्राप्त हुआ है। १३ १/२॥
एष दाशरथिः श्रीमान् सुग्रीवसहितो बली॥१४॥
समुद्रं लवयित्वा तु मूलं नः परिकृन्तति।
‘ये दशरथकुमार बलवान् श्रीमान् राम सुग्रीव के साथ समुद्र लाँघकर यहाँ आये हैं और हमारे कुल का विनाश कर रहे हैं॥ १४ १/२॥
हन्त पश्यस्व लङ्कायां वनान्युपवनानि च॥१५॥
सेतुना सुखमागत्य वानरैकार्णवं कृतम्।
‘हाय! देखो तो सही, समुद्र में पुल बाँधकर सुखपूर्वक यहाँ आये हुए वानरों ने लङ्का के समस्त वनों और उपवनों को एकार्णवमय बना दिया है— यहाँ वानररूपी जल का समुद्र-सा लहरा रहा है॥ १५ १/२॥
ये राक्षसा मुख्यतमा हतास्ते वानरैयुधि॥१६॥
वानराणां क्षयं युद्धे न पश्यामि कथंचन।
न चापि वानरा युद्धे जितपूर्वाः कदाचन ॥१७॥
‘हमारे जो मुख्य-मुख्य राक्षस वीर थे, उन्हें वानरों ने युद्ध में मार डाला; किंतु रणभूमि में वानरों का संहार होता मुझे किसी तरह नहीं दिखायी देता। युद्ध में कभी कोई वानर पहले जीते नहीं गये हैं॥ १६-१७॥
तदेतद् भयमुत्पन्नं त्रायस्वेह महाबल।
नाशय त्वमिमानद्य तदर्थं बोधितो भवान्॥१८॥
‘महाबली वीर! इस समय हमारे ऊपर यही भय उपस्थित हुआ है। तुम इससे हमारी रक्षा करो और आज इन वानरों को नष्ट कर दो। इसीलिये हमने तुम्हें जगाया है॥ १८॥
सर्वक्षपितकोशं च स त्वमभ्युपपद्य माम्।
त्रायस्वेमां पुरीं लङ्कां बालवृद्धावशेषिताम्॥१९॥
‘हमारा सारा खजाना खाली हो गया है; अतः मुझपर अनुग्रह करके तुम इस लङ्कापुरी की रक्षा करो; अब यहाँ केवल बालक और वृद्ध ही शेष रह गये हैं॥ १९॥
भ्रातुरर्थे महाबाहो कुरु कर्म सुदुष्करम्।
मयैवं नोक्तपूर्वो हि भ्राता कश्चित् परंतप॥२०॥
‘महाबाहो! तुम अपने इस भाई के लिये अत्यन्त दुष्कर पराक्रम करो। परंतप! आज से पहले कभी किसी भाई से मैंने ऐसी अनुनय-विनय नहीं की थी॥२०॥
त्वय्यस्ति मम च स्नेहः परा सम्भावना च मे।
देवासुरेषु युद्धेषु बहुशो राक्षसर्षभ॥२१॥
त्वया देवाः प्रतिव्यूह्य निर्जिताश्चासुरा युधि॥२२॥
‘तुम्हारे ऊपर मेरा बड़ा स्नेह है और मुझे तुमसे बड़ी आशा है। राक्षसशिरोमणे! तुमने देवासुरसंग्राम के अवसरों पर अनेक बार प्रतिद्वन्द्वी का स्थान लेकर रणभूमि में देवताओं और असुरों को भी परास्त किया है।
तदेतत् सर्वमातिष्ठ वीर्यं भीमपराक्रम।
नहि ते सर्वभूतेषु दृश्यते सदृशो बली॥ २३॥
‘अतः भयंकर पराक्रमी वीर! तुम्हीं यह सारा पराक्रमपूर्ण कार्य सम्पन्न करो; क्योंकि समस्त प्राणियों में तुम्हारे समान बलवान् मुझे दूसरा कोई नहीं दिखायी देता है॥२३॥
कुरुष्व मे प्रियहितमेतदुत्तमं यथाप्रियं प्रियरण बान्धवप्रिय।
स्वतेजसा व्यथय सपत्नवाहिनीं शरद्धनं पवन इवोद्यतो महान्॥२४॥
‘तुम युद्धप्रेमी तो हो ही, अपने बन्धु-बान्धवों से भी बड़ा प्रेम रखते हो। इस समय तुम मेरा यही प्रिय और उत्तम हित करो। अपने तेज से शत्रुओं की सेना को उसी तरह व्यथित कर दो, जैसे वेग से उठी हुई प्रचण्ड वायु शरद्-ऋतु के बादलों को छिन्न-भिन्न कर देती है’ ॥ २४॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे द्विषष्टितमः सर्गः॥६२॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में बासठवाँ सर्ग पूरा हुआ।६२॥
सर्ग-63
तस्य राक्षसराजस्य निशम्य परिदेवितम्।
कुम्भकर्णो बभाषेदं वचनं प्रजहास च॥१॥
राक्षसराज रावण का यह विलाप सुनकर कुम्भकर्ण ठहाका मारकर हँसने लगा और इस प्रकार बोला – ॥१॥
दृष्टो दोषो हि योऽस्माभिः पुरा मन्त्रविनिर्णये।
हितेष्वनभियुक्तेन सोऽयमासादितस्त्वया॥२॥
‘भाईसाहब! पहले (विभीषण आदि के साथ) विचार करते समय हमलोगों ने जो दोष देखा था, वही तुम्हें इस समय प्राप्त हुआ है; क्योंकि तुमने हितैषी पुरुषों और उनकी बातों पर विश्वास नहीं किया था। २॥
शीघ्रं खल्वभ्युपेतं त्वां फलं पापस्य कर्मणः।
निरयेष्वेव पतनं यथा दुष्कृतकर्मणः॥३॥
‘तुम्हें शीघ्र ही अपने पापकर्म का फल मिल गया। जैसे कुकर्मी पुरुषों का नरकों में पड़ना निश्चित है, उसी प्रकार तुम्हें भी अपने दुष्कर्म का फल मिलना अवश्यम्भावी था॥३॥
प्रथमं वै महाराज कृत्यमेतदचिन्तितम्।
केवलं वीर्यदर्पण नानुबन्धो विचारितः॥४॥
‘महाराज! केवल बल के घमंड से तुमने पहले इस पापकर्म की कोई परवा नहीं की। इसके परिणाम का कुछ भी विचार नहीं किया था॥ ४॥
यः पश्चात्पूर्वकार्याणि कुर्यादैश्वर्यमास्थितः।
पूर्वं चोत्तरकार्याणि न स वेद नयानयौ॥५॥
‘जो ऐश्वर्य के अभिमान में आकर पहले करने योग्य कार्यों को पीछे करता है और पीछे करने योग्य कार्यों को पहले कर डालता है, वह नीति तथा अनीति को नहीं जानता है॥५॥
देशकालविहीनानि कर्माणि विपरीतवत्।
क्रियमाणानि दुष्यन्ति हवींष्यप्रयतेष्विव॥६॥
‘जो कार्य उचित देश-काल न होने पर विपरीत स्थिति में किये जाते हैं, वे संस्कारहीन अग्नियों में होमे गये हविष्य की भाँति केवल दुःख के ही कारण होते हैं॥६॥
त्रयाणां पञ्चधा योगं कर्मणां यः प्रपद्यते।
सचिवैः समयं कृत्वा स सम्यग् वर्तते पथि॥७॥
‘जो राजा सचिवों के साथ विचार करके क्षय, वृद्धि और स्थानरूप से उपलक्षित साम, दान और दण्ड– इन तीनों कर्मो के पाँच* प्रकार के प्रयोग को काम में लाता है, वही उत्तम नीति-मार्ग पर विद्यमान है, ऐसा समझना चाहिये॥७॥
* कार्य को आरम्भ करने का उपाय, पुरुष और द्रव्यरूप सम्पत्ति, देश-काल का विभाग, विपत्ति को टालने का उपाय और कार्य की सिद्धि–ये पाँच प्रकार के योग हैं।
यथागमं च यो राजा समयं च चिकीर्षति।
बुध्यते सचिवैर्बुद्ध्या सुहृदश्चानुपश्यति॥८॥
‘जो नरेश नीतिशास्त्र के अनुसार मन्त्रियों के साथ क्षय* आदि के लिये उपयुक्त समय का विचार करके तदनुरूप कार्य करता है और अपनी बुद्धि से सुहृदों की भी पहचान कर लेता है, वही कर्तव्य और अकर्तव्य का विवेक कर पाता है॥८॥
* जब अपनी वृद्धि और शत्रु की हानि का समय हो तब दण्डोपयोगी यान (युद्धयात्रा) उचित है। अपनी और शत्रु की समान स्थिति हो तो सामपूर्वक संधि कर लेना उचित है। तथा जब अपनी हानि और शत्रु की वृद्धि का समय हो, तब उसे कुछ देकर उसका आश्रय ग्रहण करना उचित होता है।
धर्ममर्थं हि कामं वा सर्वान् वा रक्षसां पते।
भजेत पुरुषः काले त्रीणि द्वन्द्वानि वा पुनः॥९॥
‘राक्षसराज! नीतिज्ञ पुरुष को चाहिये कि धर्म,अर्थ या काम का अथवा सबका अपने समय पर सेवन करे अथवा तीनों द्वन्द्वों का—धर्म-अर्थ, अर्थ-धर्म और काम-अर्थ इन सबका भी उपयुक्त समय में ही सेवन करे*॥
* यहाँ यह बात कही गयी है कि शास्त्र के अनुसार प्रातःकाल धर्म का, मध्याह्नकाल में अर्थ का और रात्रि में कामसेवन का विधान है; अतः उन-उन समयों में धर्म आदि का सेवन करना चाहिये अथवा प्रातःकाल में धर्म और अर्थरूप द्वन्द्व का, मध्याह्नकाल में अर्थ और धर्म का और रात्रि में काम और अर्थ का सेवन करे। जो हर समय केवल काम का ही सेवन करता है, वह पुरुषों में अधम कोटि का है।
त्रिषु चैतेषु यच्छ्रेष्ठं श्रुत्वा तन्नावबुध्यते।
राजा वा राजमात्रो वा व्यर्थं तस्य बहुश्रुतम्॥१०॥
‘धर्म, अर्थ और काम—इन तीनों में धर्म ही श्रेष्ठ है; अतः विशेष अवसरों पर अर्थ और काम की उपेक्षा करके भी धर्म का ही सेवन करना चाहिये—इस बात को विश्वसनीय पुरुषों से सुनकर भी जो राजा या राजपुरुष नहीं समझता अथवा समझकर भी स्वीकार नहीं करता, उसका अनेक शास्त्रों का अध्ययन व्यर्थ ही है॥ १०॥
उपप्रदानं सान्त्वं च भेदं काले च विक्रमम्।
योगं च रक्षसां श्रेष्ठ तावुभौ च नयानयौ॥११॥
काले धर्मार्थकामान् यः सम्मन्त्र्य सचिवैः सह।
निषेवेतात्मवाँल्लोके न स व्यसनमाप्नुयात् ॥१२॥
‘राक्षसशिरोमणे! जो मनस्वी राजा मन्त्रियों से अच्छी तरह सलाह करके समय के अनुसार दान, भेद और पराक्रमका, इनके पूर्वोक्त पाँच प्रकार के योग का, नय और अनय का तथा ठीक समय पर धर्म, अर्थ और काम का सेवन करता है, वह इस लोक में कभी दुःख या विपत्ति का भागी नहीं होता॥ ११-१२॥
हितानुबन्धमालोक्य कुर्यात् कार्यमिहात्मनः।
राजा सहार्थतत्त्वज्ञैः सचिवैर्बुद्धिजीविभिः॥१३॥
‘राजा को चाहिये कि वह अर्थतत्त्वज्ञ एवं बुद्धिजीवी मन्त्रियों की सलाह लेकर जो अपने लिये परिणाम में हितकर दिखायी देता हो, वही कार्य करे॥१३॥
अनभिज्ञाय शास्त्रार्थान् पुरुषाः पशुबुद्धयः।
प्रागल्भ्याद् वक्तुमिच्छन्ति मन्त्रिष्वभ्यन्तरीकृताः॥१४॥
‘जो पशु के समान बुद्धिवाले किसी तरह मन्त्रियों के भीतर सम्मिलित कर लिये गये हैं, वे शास्त्र के अर्थ को तो जानते नहीं, केवल धृष्टतावश बातें बनाना चाहते हैं।
अशास्त्रविदुषां तेषां कार्यं नाभिहितं वचः।
अर्थशास्त्रानभिज्ञानां विपुलां श्रियमिच्छताम्॥१५॥
‘शास्त्र के ज्ञान से शून्य और अर्थशास्त्र से अनभिज्ञ होते हुए भी प्रचुर सम्पत्ति चाहने वाले उन अयोग्य मन्त्रियों की कही हुई बात कभी नहीं माननी चाहिये।
अहितं च हिताकारं धाष्ट्याज्जल्पन्ति ये नराः।
अवश्यं मन्त्रबाह्यास्ते कर्तव्याः कृत्यदूषकाः॥१६॥
‘जो लोग धृष्टता के कारण अहितकर बात को हित का रूप देकर कहते हैं, वे निश्चय ही सलाह लेने योग्य नहीं हैं। अतः उन्हें इस कार्य से अलग कर देना चाहिये। वे तो काम बिगाड़ने वाले ही होते हैं। १६॥
विनाशयन्तो भर्तारं सहिताः शत्रुभिर्बुधैः।
विपरीतानि कृत्यानि कारयन्तीह मन्त्रिणः॥१७॥
‘कुछ बुरे मन्त्री साम आदि उपायों के ज्ञाता शत्रुओं के साथ मिल जाते हैं और अपने स्वामी का विनाश करने के लिये ही उससे विपरीत कर्म करवाते हैं॥१७॥
तान् भर्ता मित्रसंकाशानमित्रान् मन्त्रनिर्णये।
व्यवहारेण जानीयात् सचिवानुपसंहितान्॥१८॥
‘शास्त्र के ज्ञान से शून्य और अर्थशास्त्र से अनभिज्ञ होते हुए भी प्रचुर सम्पत्ति चाहने वाले उन अयोग्य मन्त्रियों की कही हुई बात कभी नहीं माननी चाहिये।
अहितं च हिताकारं धाष्ट्याज्जल्पन्ति ये नराः।
अवश्यं मन्त्रबाह्यास्ते कर्तव्याः कृत्यदूषकाः॥१६॥
‘जो लोग धृष्टता के कारण अहितकर बात को हित का रूप देकर कहते हैं, वे निश्चय ही सलाह लेने योग्य नहीं हैं। अतः उन्हें इस कार्य से अलग कर देना चाहिये। वे तो काम बिगाड़ने वाले ही होते हैं। १६॥
विनाशयन्तो भर्तारं सहिताः शत्रुभिर्बुधैः।
विपरीतानि कृत्यानि कारयन्तीह मन्त्रिणः॥१७॥
‘कुछ बुरे मन्त्री साम आदि उपायों के ज्ञाता शत्रुओं के साथ मिल जाते हैं और अपने स्वामी का विनाश करने के लिये ही उससे विपरीत कर्म करवाते हैं॥१७॥
तान् भर्ता मित्रसंकाशानमित्रान् मन्त्रनिर्णये।
व्यवहारेण जानीयात् सचिवानुपसंहितान्॥१८॥
‘जब किसी वस्तु या कार्य के निश्चय के लिये मन्त्रियों की सलाह ली जा रही हो, उस समय राजा व्यवहार के द्वारा ही उन मन्त्रियों को पहचानने का प्रयत्न करे, जो घूस आदि लेकर शत्रुओं से मिल गये हैं और अपने मित्र-से बने रहकर वास्तव में शत्रु का काम करते हैं।
चपलस्येह कृत्यानि सहसानुप्रधावतः।
छिद्रमन्ये प्रपद्यन्ते क्रौञ्चस्य खमिव द्विजाः॥१९॥
‘जो राजा चंचल है—आपातरमणीय वचनों को सुनकर ही संतुष्ट हो जाता है और सहसा बिना सोचे विचारे ही किसी भी कार्य की ओर दौड़ पड़ता है, उसके इस छिद्र (दुर्बलता)-को शत्रुलोग उसी तरह ताड़ जाते हैं, जैसे क्रौंच पर्वत के छेद को पक्षी। (क्रौंचपर्वत के छेद से होकर पक्षी जैसे पर्वत के उस पार आते-जाते हैं, उसी तरह शत्रु भी राजा के उस छिद्र या कमजोरी से लाभ उठाते हैं) ॥ १९ ॥
यो हि शत्रुमवज्ञाय आत्मानं नाभिरक्षति।
अवाप्नोति हि सोऽनर्थान् स्थानाच्च व्यवरोप्यते॥२०॥
‘जो राजा शत्रु की अवहेलना करके अपनी रक्षा का प्रबन्ध नहीं करता है, वह अनेक अनर्थों का भागी होता और अपने स्थान (राज्य)-से नीचे उतार दिया जाता है।
यदुक्तमिह ते पूर्वं प्रियया मेऽनुजेन च।
तदेव नो हितं वाक्यं यथेच्छसि तथा कुरु॥२१॥
‘तुम्हारी प्रिय पत्नी मन्दोदरी और मेरे छोटे भाई विभीषण ने पहले तुमसे जो कुछ कहा था, वही हमारे लिये हितकर था। यों तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वैसा करो’॥
तत् तु श्रुत्वा दशग्रीवः कुम्भकर्णस्य भाषितम्।
भ्रुकुटिं चैव संचक्रे क्रुद्धश्चैनमभाषत॥२२॥
कुम्भकर्ण की यह बात सुनकर दशमुख रावण ने भौंहें टेढ़ी कर ली और कुपित होकर उससे कहा- ॥ २२॥
मान्यो गुरुरिवाचार्यः किं मां त्वमनुशाससे।
किमेवं वाक्श्रमं कृत्वा यद् युक्तं तद् विधीयताम्॥२३॥
‘तुम माननीय गुरु और आचार्य की भाँति मुझे उपदेश क्यों दे रहे हो? इस तरह भाषण देने का परिश्रम करने से क्या लाभ होगा? इस समय जो उचित और आवश्यक हो, वह काम करो॥ २३॥
विभ्रमाच्चित्तमोहाद् वा बलवीर्याश्रयेण वा।
नाभिपन्नमिदानीं यद् व्यर्था तस्य पुनः कथा॥२४॥
‘मैंने भ्रम से, चित के मोह से अथवा अपने बलपराक्रम के भरोसे पहले जो तुमलोगों की बात नहीं मानी थी, उसकी इस समय पुनः चर्चा करना व्यर्थ है॥२४॥
अस्मिन् काले तु यद् युक्तं तदिदानीं विचिन्त्यताम्।
गतं तु नानुशोचन्ति गतं तु गतमेव हि ॥२५॥
ममापनयजं दोषं विक्रमेण समीकुरु।
‘जो बात बीत गयी, सो तो बीत ही गयी। बुद्धिमान् लोग बीती बात के लिये बारंबार शोक नहीं करते हैं। अब इस समय हमें क्या करना चाहिये, इसका विचार करो। अपने पराक्रम से मेरे अनीतिजनित दुःख को शान्त कर दो॥ २५ ॥
यदि खल्वस्ति मे स्नेहो विक्रमं वाधिगच्छसि॥२६॥
यदि कार्यं ममैतत्ते हृदि कार्यतमं मतम्।
‘यदि मुझ पर तुम्हारा स्नेह है, यदि अपने भीतर यथेष्ट पराक्रम समझते हो और यदि मेरे इस कार्य को परम कर्तव्य समझकर हृदय में स्थान देते हो तो युद्ध करो॥
स सुहृद् यो विपन्नार्थं दीनमभ्युपपद्यते॥२७॥
स बन्धुर्योऽपनीतेषु साहाय्यायोपकल्पते।
‘वही सुहृद् है, जो सारा कार्य नष्ट हो जानेसे दुःखी हुए स्वजन पर अकारण अनुग्रह करता है तथा वही बन्धु है, जो अनीति के मार्ग पर चलने से संकट में पड़े हुए पुरुषों की सहायता करता है’॥ २७ १/२॥
तमथैवं ब्रुवाणं स वचनं धीरदारुणम्॥२८॥
रुष्टोऽयमिति विज्ञाय शनैः श्लक्ष्णमुवाच ह।
रावण को इस प्रकार धीर एवं दारुण वचन बोलते देख उसे रुष्ट समझकर कुम्भकर्ण धीरे-धीरे मधुर वाणी में कुछ कहने को उद्यत हुआ॥ २८ १/२॥
अतीव हि समालक्ष्य भ्रातरं क्षुभितेन्द्रियम्॥२९॥
कुम्भकर्णः शनैर्वाक्यं बभाषे परिसान्त्वयन्।
उसने देखा मेरे भाई की सारी इन्द्रियाँ अत्यन्त विक्षुब्ध हो उठी हैं; अतः कुम्भकर्ण ने धीरे-धीरे उसे सान्त्वना देते हुए कहा- ॥ २९ १/२॥
शृणु राजन्नवहितो मम वाक्यमरिंदम॥३०॥
अलं राक्षसराजेन्द्र संतापमुपपद्य ते।
रोषं च सम्परित्यज्य स्वस्थो भवितुमर्हसि ॥३१॥
‘शत्रुदमन महाराज! सावधान होकर मेरी बात सुनो। राक्षसराज! संताप करना व्यर्थ है। अब तुम्हें रोष त्यागकर स्वस्थ हो जाना चाहिये॥ ३०-३१॥
नैतन्मनसि कर्तव्यं मयि जीवति पार्थिव।
तमहं नाशयिष्यामि यत् कृते परितप्यते॥३२॥
‘पृथ्वीनाथ! मेरे जीते-जी तुम्हें मन में ऐसा भाव नहीं लाना चाहिये। तुम्हें जिसके कारण संतप्त होना पड़ रहा है, उसे मैं नष्ट कर दूंगा॥ ३२॥
अवश्यं तु हितं वाच्यं सर्वावस्थं मया तव।
बन्धुभावादभिहितं भ्रातृस्नेहाच्च पार्थिव॥३३॥
‘महाराज! अवश्य ही सब अवस्थाओं में मुझे तुम्हारे हित की बात कहनी चाहिये। अतः मैंने बन्धुभाव और भ्रातृ-स्नेह के कारण ही ये बातें कही हैं।॥ ३३॥
सदृशं यच्च कालेऽस्मिन् कर्तुं स्नेहेन बन्धुना।
शत्रूणां कदनं पश्य क्रियमाणं मया रणे॥३४॥
‘इस समय एक भाई को स्नेहवश जो कुछ करना उचित है, वही करूँगा। अब रणभूमि में मेरे द्वारा किया जाने वाला शत्रुओं का संहार देखो॥ ३४॥
अद्य पश्य महाबाहो मया समरमूर्धनि।
हते रामे सह भ्रात्रा द्रवन्तीं हरिवाहिनीम्॥३५॥
‘महाबाहो! आज युद्ध के मुहाने पर मेरे द्वारा भाईसहित राम के मारे जाने के पश्चात् तुम देखोगे कि वानरों की सेना किस तरह भागी जा रही है॥ ३५॥
अद्य रामस्य तद् दृष्ट्वा मयाऽऽनीतं रणाच्छिरः।
सुखी भव महाबाहो सीता भवतु दुःखिता॥३६॥
‘महाबाहो ! आज मैं संग्रामभूमि में राम का सिर काट लाऊँगा। उसे देखकर तुम सुखी होना और सीता दुःख में डूब जायगी॥ ३६॥
अद्य रामस्य पश्यन्तु निधनं सुमहत् प्रियम्।
लङ्कायां राक्षसाः सर्वे ये ते निहतबान्धवाः॥३७॥
‘लङ्का में जिन राक्षसों के सगे-सम्बन्धी मारे गये हैं, वे भी आज राम की मृत्यु देख लें। यह उनके लिये बहुत ही प्रिय बात होगी॥ ३७॥
अद्य शोकपरीतानां स्वबन्धुवधशोचिनाम्।
शत्रोर्युधि विनाशेन करोम्यश्रुप्रमार्जनम्॥३८॥
‘अपने भाई-बन्धुओं के मारे जाने से जो लोग अत्यन्त शोक में डूबे हुए हैं, आज युद्ध में शत्रु का नाश करके मैं उनके आँसू पोंछूगा॥ ३८॥
अद्य पर्वतसंकाशं ससूर्यमिव तोयदम्।
विकीर्णं पश्य समरे सुग्रीवं प्लवगेश्वरम्॥३९॥
‘आज पर्वत के समान विशालकाय वानरराज सुग्रीव को समराङ्गण में खून से लथपथ होकर गिरे हुए देखोगे, जो सूर्यसहित मेघ के समान दृष्टिगोचर होंगे॥
कथं च राक्षसैरेभिर्मया च परिसान्त्वितः।
जिघांसुभिर्दाशरथिं व्यथसे त्वं सदानघ॥४०॥
‘निष्पाप निशाचरराज! ये राक्षस तथा मैं सब लोग दशरथपुत्र राम को मार डालने की इच्छा रखते हैं और तुम्हें इस बात के लिये आश्वासन देते हैं तो भी तुम सदा व्यथित क्यों रहते हो? ॥ ४०॥
मां निहत्य किल त्वां हि निहनिष्यति राघवः।
नाहमात्मनि संतापं गच्छेयं राक्षसाधिप॥४१॥
‘राक्षसराज! पहले मेरा वध करके ही राम तुम्हें मार सकेंगे; किंतु मैं अपने विषय में राम से संताप या भय नहीं मानता॥४१॥
कामं त्विदानीमपि मां व्यादिश त्वं परंतप।
न परः प्रेक्षणीयस्ते युद्धायातुलविक्रम॥४२॥
‘शत्रुओं को संताप देने वाले अनुपम पराक्रमी वीर! इस समय तुम इच्छानुसार मुझे युद्ध के लिये आदेश दो। शत्रुओं से जूझने के लिये तुम्हें दूसरे किसी की ओर देखने की आवश्यकता नहीं है॥ ४२ ॥
अहमुत्सादयिष्यामि शत्रूस्तव महाबलान्।
यदि शक्रो यदि यमो यदि पावकमारुतौ॥४३॥
तानहं योधयिष्यामि कुबेरवरुणावपि।
‘तुम्हारे महाबली शत्रु यदि इन्द्र, यम, अग्नि, वायु, कुबेर और वरुण भी हों तो मैं उनसे भी युद्ध करूँगा तथा उन सबको उखाड़ फेंकूँगा॥ ४३ १/२॥
गिरिमात्रशरीरस्य शितशूलधरस्य मे॥४४॥
नर्दतस्तीक्ष्णदंष्ट्रस्य बिभीयाद् वै पुरंदरः।
‘मेरा पर्वत के समान विशाल शरीर है। मैं हाथ में तीखा त्रिशूल धारण करता हूँ और मेरी दाढ़ें भी बहुत तीखी हैं। मेरे सिंहनाद करने पर इन्द्र भी भय से थर्रा उठेंगे॥ ४४ १/२॥
अथ वा त्यक्तशस्त्रस्य मृद्नतस्तरसा रिपून्॥४५॥
न मे प्रतिमुखः कश्चित् स्थातुं शक्तो जिजीविषुः।
‘अथवा यदि मैं शस्त्र त्याग करके भी वेगपूर्वक शत्रुओं को रौंदता हुआ रणभूमि में विचरने लगूं तो कोई भी जीवित रहने की इच्छावाला पुरुष मेरे सामने नहीं ठहर सकता॥ ४५ १/२॥
नैव शक्त्या न गदया नासिना निशितैः शरैः॥४६॥
हस्ताभ्यामेव संरभ्य हनिष्यामि सवज्रिणम्।
‘मैं न तो शक्ति से, न गदा से, न तलवार से और न पैने बाणों से ही काम लूँगा। रोष से भरकर केवल दोनों हाथों से ही वज्रधारी इन्द्र-जैसे शत्रु को भी मौत के घाट उतार दूंगा।। ४६ १/२॥
यदि मे मुष्टिवेगं स राघवोऽद्य सहिष्यति॥४७॥
ततः पास्यन्ति बाणौघा रुधिरं राघवस्य मे।
‘यदि राम आज मेरी मुट्ठी का वेग सह लेंगे तो मेरे बाणसमूह अवश्य ही उनका रक्त पान करेंगे॥ ४७ १/२॥
चिन्तया तप्यसे राजन् किमर्थं मयि तिष्ठति॥४८॥
सोऽहं शत्रुविनाशाय तव निर्यातुमुद्यतः।
‘राजन्! मेरे रहते हुए तुम किसलिये चिन्ता की आग से झुलस रहे हो? मैं तुम्हारे शत्रुओं का विनाश करने के लिये अभी रणभूमि में जाने को उद्यत हूँ॥ ४८ १/२॥
मुञ्च रामाद् भयं घोरं निहनिष्यामि संयुगे॥४९॥
राघवं लक्ष्मणं चैव सुग्रीवं च महाबलम्।
‘तुम्हें राम से जो घोर भय हो रहा है, उसे त्याग दो। मैं रणभूमि में राम, लक्ष्मण और महाबली सुग्रीव को अवश्य मार डालूँगा॥ ४९ १/२॥
हनूमन्तं च रक्षोभं येन लङ्का प्रदीपिता॥५०॥
हरीश्च भक्षयिष्यामि संयुगे समुपस्थिते।
असाधारणमिच्छामि तव दातुं महद् यशः॥५१॥
‘युद्ध उपस्थित होने पर मैं राक्षसों का संहार करने वाले उस हनुमान् को भी जीवित नहीं छोडूंगा, जिसने लङ्का जलायी थी। साथ ही अन्य वानरों को भी खा जाऊँगा। आज मैं तुम्हें अलौकिक एवं महान् यश प्रदान करना चाहता हूँ॥ ५०-५१॥
यदि चेन्द्राद् भयं राजन् यदि चापि स्वयंभुवः।
ततोऽहं नाशयिष्यामि नैशं तम इवांशुमान्॥५२॥
‘राजन् !यदि तुम्हें इन्द्र अथवा स्वयम्भू ब्रह्मा से भी भय है तो मैं उस भय को भी उसी तरह नष्ट कर दूंगा, जैसे सूर्य रात्रि के अन्धकार को॥५२॥
अपि देवाः शयिष्यन्ते मयि क्रुद्धे महीतले।
यमं च शमयिष्यामि भक्षयिष्यामि पावकम्॥५३॥
‘मेरे कुपित होने पर देवता भी धराशायी हो जायेंगे। (फिर मनुष्यों और वानरों की तो बात ही क्या है ?) मैं यमराज को भी शान्त कर दूंगा। सर्वभक्षी अग्नि का भी भक्षण कर जाऊँगा॥५३॥
आदित्यं पातयिष्यामि सनक्षत्रं महीतले।
शतक्रतुं वधिष्यामि पास्यामि वरुणालयम्॥५४॥
‘नक्षत्रोंसहित सूर्य को भी पृथ्वी पर मार गिराऊँगा, इन्द्र का भी वध कर डालूँगा और समुद्र को भी पी जाऊँगा॥ ५४॥
पर्वतांश्चूर्णयिष्यामि दारयिष्यामि मेदिनीम्।
दीर्घकालं प्रसुप्तस्य कुम्भकर्णस्य विक्रमम्॥५५॥
अद्य पश्यन्तु भूतानि भक्ष्यमाणानि सर्वशः।
न त्विदं त्रिदिवं सर्वमाहारो मम पूर्यते॥५६॥
‘पर्वतों को चूर-चूर कर दूंगा। भूमण्डल को विदीर्ण कर डालूँगा। आज मेरे द्वारा खाये जाने वाले सब प्राणी दीर्घकाल तक सोकर उठे हुए मुझ कुम्भकर्ण का पराक्रम देखें। यह सारी त्रिलोकी आहार बन जाय तो भी मेरा पेट नहीं भर सकता॥ ५५-५६॥
वधेन ते दाशरथेः सुखावहं सुखं समाहर्तुमहं व्रजामि।
निहत्य रामं सह लक्ष्मणेन खादामि सर्वान् हरियूथमुख्यान्॥५७॥
‘दशरथकुमार श्रीराम का वध करके मैं तुम्हें उत्तरोत्तर सुख की प्राप्ति कराने वाले सुख-सौभाग्य को देना चाहता हूँ। लक्ष्मणसहित राम का वध करके सभी प्रधान-प्रधान वानरयूथपतियों को खा जाऊँगा॥ ५७॥
रमस्व राजन् पिब चाद्य वारुणीं कुरुष्व कृत्यानि विनीय दुःखम्।
मयाद्य रामे गमिते यमक्षयं चिराय सीता वशगा भविष्यति॥५८॥
‘राजन्! अब मौज करो, मदिरा पीओ और मानसिक दुःख को दूर करके सब कार्य करो। आज मेरे द्वारा राम यमलोक पहुँचा दिये जायेंगे; फिर तो सीता चिरकाल (सदा)-के लिये तुम्हारे अधीन हो जायगी’॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे त्रिषष्टितमः सर्गः॥६३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में तिरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ।६३॥
सर्ग-64
तदुक्तमतिकायस्य बलिनो बाहुशालिनः।
कुम्भकर्णस्य वचनं श्रुत्वोवाच महोदरः॥१॥
अपनी भुजाओं से सुशोभित होने वाले विशालकाय एवं बलवान् राक्षस कुम्भकर्ण का यह वचन सुनकर महोदर ने कहा- ॥१॥
कुम्भकर्ण कुले जातो धृष्टः प्राकृतदर्शनः।
अवलिप्तो न शक्नोषि कृत्यं सर्वत्र वेदितुम्॥२॥
‘कुम्भकर्ण! तुम उत्तम कुल में उत्पन्न हुए हो; परंतु तुम्हारी दृष्टि (बुद्धि) निम्नश्रेणी के लोगों के समान है। तुम ढीठ और घमंडी हो, इसलिये सभी विषयों में क्या कर्तव्य है—इस बात को नहीं जान सकते॥२॥
नहि राजा न जानीते कुम्भकर्ण नयानयौ।
त्वं तु कैशोरकाद् धृष्टः केवलं वक्तुमिच्छसि॥३॥
‘कुम्भकर्ण! हमारे महाराज नीति और अनीति को नहीं जानते हैं, ऐसी बात नहीं है। तुम केवल अपने बचपन के कारण धृष्टतापूर्वक इस तरह की बातें कहना चाहते हो॥३॥
स्थानं वृद्धिं च हानिं च देशकालविधानवित्।
आत्मनश्च परेषां च बुध्यते राक्षसर्षभः॥४॥
‘राक्षसशिरोमणि रावण देश-काल के लिये उचित कर्तव्य को जानते हैं और अपने तथा शत्रुपक्ष के स्थान, वृद्धि एवं क्षय को अच्छी तरह समझते हैं। ४॥
यत् त्वशक्यं बलवता वक्तुं प्राकृतबुद्धिना।
अनुपासितवृद्धेन कः कुर्यात् तादृशं बुधः॥५॥
‘जिसने वृद्ध पुरुषों की उपासना या सत्संग नहीं किया है और जिसकी बुद्धि गँवारों के समान है, ऐसा बलवान् पुरुष भी जिस कर्म को नहीं कर सकता— जिसे अनुचित समझता है, वैसे कर्म को कोई बुद्धिमान् पुरुष कैसे कर सकता है ? ॥ ५ ॥
यांस्तु धर्मार्थकामांस्त्वं ब्रवीषि पृथगाश्रयान्।
अवबोद्धं स्वभावेन नहि लक्षणमस्ति तान्॥६॥
‘जिन अर्थ, धर्म और काम को तुम पृथक्-पृथक् आश्रयवाले बता रहे हो, उन्हें ठीक-ठीक समझने की तुम्हारे भीतर शक्ति ही नहीं है॥६॥
कर्म चैव हि सर्वेषां कारणानां प्रयोजनम्।
श्रेयः पापीयसां चात्र फलं भवति कर्मणाम्॥७॥
‘सुख के साधनभूत जो त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ एवं काम) हैं, उन सबका एकमात्र कर्म ही प्रयोजक है (क्योंकि जो कर्मानुष्ठान से रहित है, उसका धर्म, अर्थ अथवा काम–कोई भी पुरुषार्थ सफल नहीं होता)। इसी तरह एक पुरुष के प्रयत्न से सिद्ध होने वाले सभी शुभाशुभ व्यापारों का फल यहाँ एक ही कर्ता को प्राप्त होता है (इस प्रकार जब परस्पर विरुद्ध होने पर भी धर्म और काम का अनुष्ठान एक ही पुरुष के द्वारा होता देखा जाता है, तब तुम्हारा यह कहना कि केवल धर्म का ही अनुष्ठान करना चाहिये, धर्मविरोधी काम का नहीं, कैसे संगत हो सकता है ?) ॥७॥
निःश्रेयसफलावेव धर्मार्थावितरावपि।
अधर्मानर्थयोः प्राप्तं फलं च प्रत्यवायिकम्॥८॥
‘निष्कामभाव से किये गये धर्म (जप, ध्यान आदि) और अर्थ (धनसाध्य यज्ञ, दान आदि)-ये चित्तशुद्धि के द्वारा यद्यपि निःश्रेयस (मोक्ष)-रूप फल की प्राप्ति कराने वाले हैं तथापि कामना-विशेष से स्वर्ग एवं अभ्युदय आदि अन्य फलों की भी प्राप्ति कराते हैं। पूर्वोक्त जपादिरूप या क्रियामय नित्यधर्म का लोप होने पर अधर्म और अनर्थ प्राप्त होते हैं और उनके रहते हुए प्रत्यवायजनित फल भोगना पड़ता है (परंतु काम्य-कर्म न करने से प्रत्यवाय नहीं होता, यह धर्म और अर्थ की अपेक्षा काम की विशेषता है)॥ ८॥
ऐहलौकिकपारक्यं कर्म पुंभिर्निषेव्यते।
कर्माण्यपि तु कल्याणि लभते काममास्थितः॥
‘जीवों को धर्म और अधर्म के फल इस लोक और परलोक में भी भोगने पड़ते हैं। परंतु जो कामनाविशेष के उद्देश्य से यत्नपूर्वक कर्मों का अनुष्ठान करता है, उसे यहाँ भी उसके सुख-मनोरथ की प्राप्ति हो जाती है। धर्म आदि के फल की भाँति उसके लिये कालान्तर या लोकान्तर की अपेक्षा नहीं होती है (इस तरह काम धर्म और अर्थ से विलक्षण सिद्ध होता है)॥९॥
तत्र क्लृप्तमिदं राज्ञा हृदि कार्यं मतं च नः।
शत्रौ हि साहसं यत् तत् किमिवात्रापनीयते॥१०॥
‘यहाँ राजा के लिये कामरूपी पुरुषार्थ का सेवन उचित है ही* ऐसा ही राक्षसराज ने अपने हृदय में निश्चित किया है और यही हम मन्त्रियों की भी सम्मति है। शत्रु के प्रति साहसपूर्ण कार्य करना कौन सी अनीति है (अतः इन्होंने जो कुछ किया है, उचित ही किया है) ॥१०॥
* यहाँ महोदर ने रावण की चापलूसी करने के लिये ‘कामवाद’ की स्थापना या प्रशंसा की है। यह आदर्श मत नहीं है। वास्तव में धर्म, अर्थ और काम में धर्म ही प्रधान है; अतः उसी के सेवन से प्राणिमात्र का कल्याण हो सकता है।
एकस्यैवाभियाने तु हेतुर्यः प्राहृतस्त्वया।
तत्राप्यनुपपन्नं ते वक्ष्यामि यदसाधु च॥११॥
‘तुमने युद्ध के लिये अकेले अपने ही प्रस्थान करने के विषय में जो हेतु दिया है (अपने महान् बल के द्वारा शत्रु को परास्त कर देने की जो घोषणा की है) उसमें भी जो असंगत एवं अनुचित बात कही गयी है, उसे मैं तुम्हारे सामने रखता हूँ॥ ११॥
येन पूर्वं जनस्थाने बहवोऽतिबला हताः।
राक्षसा राघवं तं त्वं कथमेको जयिष्यसि॥१२॥
‘जिन्होंने पहले जनस्थान में बहुत-से अत्यन्त बलशाली राक्षसों को मार डाला था, उन्हीं रघुवंशी वीर श्रीराम को तुम अकेले ही कैसे परास्त करोगे?॥ १२॥
ये पूर्वं निर्जितास्तेन जनस्थाने महौजसः।
राक्षसांस्तान् पुरे सर्वान् भीतानद्य न पश्यसि॥१३॥
‘जनस्थान में श्रीराम ने पहले जिन महान् बलशाली निशाचरों को मार भगाया था, वे आज भी इस लङ्कापुरी में विद्यमान हैं और उनका वह भय अबतक दूर नहीं हुआ है। क्या तुम उन राक्षसों को नहीं देखते हो? ॥ १३॥
तं सिंहमिव संक्रुद्धं रामं दशरथात्मजम्।
सर्प सुप्तमहो बुद्ध्वा प्रबोधयितुमिच्छसि॥१४॥
‘दशरथकुमार श्रीराम अत्यन्त कुपित हुए सिंह के समान पराक्रमी एवं भयंकर हैं, क्या तुम उनसे भिड़ने का साहस करते हो? क्या जान-बूझकर सोये हुए सर्प को जगाना चाहते हो? तुम्हारी मूर्खता पर आश्चर्य होता है !॥ १४॥
ज्वलन्तं तेजसा नित्यं क्रोधेन च दुरासदम्।
कस्तं मृत्युमिवासह्यमासादयितुमर्हति॥१५॥
‘श्रीराम सदा ही अपने तेज से देदीप्यमान हैं। वे क्रोध करने पर अत्यन्त दुर्जय और मृत्यु के समान असह्य हो उठते हैं। भला कौन योद्धा उनका सामना कर सकता है ? ॥ १५ ॥
संशयस्थमिदं सर्वं शत्रोः प्रतिसमासने।
एकस्य गमनं तात नहि मे रोचते भृशम्॥१६॥
‘हमारी यह सारी सेना भी यदि उस अजेय शत्रु का सामना करने के लिये खड़ी हो तो उसका जीवन भी संशय में पड़ सकता है। अतः तात! युद्ध के लिये तुम्हारा अकेले जाना मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगता है॥ १६॥
हीनार्थस्तु समृद्धार्थं को रिपुं प्राकृतं यथा।
निश्चितं जीवितत्यागे वशमानेतुमिच्छति॥१७॥
‘जो सहायकों से सम्पन्न और प्राणों की बाजी लगाकर शत्रुओं का संहार करने के लिये निश्चित विचार रखने वाला हो, ऐसे शत्रु को अत्यन्त साधारण मानकर कौन असहाय योद्धा वश में लाने की इच्छा कर सकता है ?॥
यस्य नास्ति मनुष्येषु सदृशो राक्षसोत्तम।
कथमाशंससे योद्धं तुल्येनेन्द्रविवस्वतोः॥१८॥
‘राक्षसशिरोमणे! मनुष्यों में जिनकी समता करने वाला दूसरा कोई नहीं है तथा जो इन्द्र और सूर्य के समान तेजस्वी हैं, उन श्रीराम के साथ युद्ध करने का हौसला तुम्हें कैसे हो रहा है ?’ ॥ १८ ॥
एवमुक्त्वा तु संरब्धं कुम्भकर्णं महोदरः।
उवाच रक्षसां मध्ये रावणं लोकरावणम्॥१९॥
रोष के आवेश से युक्त कुम्भकर्ण से ऐसा कहकर महोदर ने समस्त राक्षसों के बीच में बैठे हुए लोकों को रुलाने वाले रावण से कहा- ॥ १९ ॥
लब्ध्वा पुरस्ताद् वैदेहीं किमर्थं त्वं विलम्बसे।
यदीच्छसि तदा सीता वशगा ते भविष्यति॥२०॥
‘महाराज! आप विदेहकुमारी को अपने सामने पाकर भी किसलिये विलम्ब कर रहे हैं? आप जब चाहें तभी सीता आपके वश में हो जायगी॥ २० ॥
दृष्टः कश्चिदुपायो मे सीतोपस्थानकारकः।
रुचितश्चेत् स्वया बुद्धया राक्षसेन्द्र ततः शृणु॥२१॥
‘राक्षसराज! मुझे एक ऐसा उपाय सूझा है, जो सीता को आपकी सेवा में उपस्थित करके ही रहेगा। आप उसे सुनिये। सुनकर अपनी बुद्धि से उस पर विचार कीजिये और ठीक ऊँचे तो उसे काम में लाइये॥ २१॥
अहं दिजिह्वः संह्रादी कुम्भकर्णो वितर्दनः।
पञ्च रामवधायैते निर्यान्तीत्यवघोषय॥२२॥
‘आप नगर में यह घोषित करा दें कि महोदर, द्विजिह्व, संह्रादी, कुम्भकर्ण और वितर्दन—ये पाँच राक्षस राम का वध करने के लिये जा रहे हैं।॥ २२ ॥
ततो गत्वा वयं युद्धं दास्यामस्तस्य यत्नतः।
जेष्यामो यदि ते शत्रून् नोपायैः कार्यमस्ति नः॥२३॥
‘हमलोग रणभूमि में जाकर प्रयत्नपूर्वक श्रीराम के साथ युद्ध करेंगे। यदि आपके शत्रुओं पर हम विजय पा गये तो हमारे लिये सीता को वश में करने के निमित्त दूसरे किसी उपाय की आवश्यकता ही नहीं रह जायगी॥ २३॥
अथ जीवति नः शत्रुर्वयं च कृतसंयुगाः।
ततः समभिपत्स्यामो मनसा यत् समीक्षितम्॥२४॥
‘यदि हमारा शत्रु अजेय होने के कारण जीवित ही रह गया और हम भी युद्ध करते-करते मारे नहीं गये तो हम उस उपाय को काम में लायेंगे, जिसे हमने मन से सोचकर निश्चित किया है॥ २४ ॥
वयं युद्धादिहैष्यामो रुधिरेण समुक्षिताः।
विदार्य स्वतनुं बाणै रामनामाङ्कितैः शरैः॥ २५॥
भक्षितो राघवोऽस्माभिर्लक्ष्मणश्चेति वादिनः।
ततः पादौ ग्रहीष्यामस्त्वं नः कामं प्रपूरय॥२६॥
राम नाम से अङ्कित बाणों द्वारा अपने शरीर को घायल कराकर खून से लथपथ हो हम यह कहते हुए युद्धभूमि से यहाँ लौटेंगे कि हमने राम और लक्ष्मण को खा लिया है। उस समय हम आपके पैर पकड़कर यह भी कहेंगे कि हमने शत्रु को मारा है। इसलिये आप हमारी इच्छा पूरी कीजिये॥ २५-२६॥
ततोऽवघोषय पुरे गजस्कन्धेन पार्थिव।
हतो रामः सह भ्रात्रा ससैन्य इति सर्वतः॥२७॥
‘पृथ्वीनाथ! तब आप हाथी की पीठ पर किसी को बिठाकर सारे नगर में यह घोषणा करा दें कि भाई और सेना के सहित राम मारा गया॥२७॥
प्रीतो नाम ततो भूत्वा भृत्यानां त्वमरिंदम।
भोगांश्च परिवारांश्च कामान् वसु च दापय॥२८॥
ततो माल्यानि वासांसि वीराणामनुलेपनम्।
पेयं च बहु योधेभ्यः स्वयं च मुदितः पिब॥२९॥
‘शत्रुदमन! इतना ही नहीं, आप प्रसन्नता दिखाते हुए अपने वीर सेवकों को उनकी अभीष्ट वस्तुएँ, तरह-तरह की भोग-सामग्रियाँ, दास-दासी आदि, धनरत्न, आभूषण, वस्त्र और अनुलेपन दिलावें। अन्य योद्धाओं को भी बहुत-से उपहार दें तथा स्वयं भी खुशी मनाते हुए मद्यपान करें॥ २८-२९ ॥
ततोऽस्मिन् बहुलीभूते कौलीने सर्वतो गते।
भक्षितः ससुहृद् रामो राक्षसैरिति विश्रुते॥३०॥
प्रविश्याश्वास्य चापि त्वं सीतां रहसि सान्त्वयन्।
धनधान्यैश्च कामैश्च रत्नैश्चैनां प्रलोभय॥३१॥
‘तदनन्तर जब लोगों में सब ओर यह चर्चा फैल जाय कि राम अपने सुहृदोंसहित राक्षसों के आहार बन गये और सीता के कानों में भी यह बात पड़ जाय, तब आप सीता को समझाने के लिये एकान्त में उसके वासस्थान पर जायँ और तरह-तरह से धीरज बँधाकर उसे धन-धान्य, भाँति-भाँति के भोग और रत्न आदि का लोभ दिखावें॥
अनयोपधया राजन् भूयः शोकानुबन्धया।
अकामा त्वदशं सीता नष्टनाथा गमिष्यति॥३२॥
‘राजन्! इस प्रवञ्चना से अपने को अनाथ मानने वाली सीता का शोक और भी बढ़ जायगा और वह इच्छा न होने पर भी आपके अधीन हो जायगी॥ ३२॥
रमणीयं हि भर्तारं विनष्टमधिगम्य सा।
नैराश्यात् स्त्रीलघुत्वाच्च त्वदशं प्रतिपत्स्यते॥३३॥
‘अपने रमणीय पति को विनष्ट हुआ जान वह निराशा तथा नारी-सुलभ चपलता के कारण आपके वश में आ जायगी॥३३॥
सा पुरा सुखसंवृद्धा सुखार्हा दुःखकर्शिता।
त्वय्यधीनं सुखं ज्ञात्वा सर्वथैव गमिष्यति॥३४॥
‘वह पहले सुख में पली हुई है और सुख भोगने के योग्य है; परंतु इन दिनों दुःख से दुर्बल हो गयी है। ऐसी दशा में अब आपके ही अधीन अपना सुख समझकर सर्वथा आपकी सेवा में आ जायगी॥ ३४॥
एतत् सुनीतं मम दर्शनेन रामं हि दृष्ट्वैव भवेदनर्थः।
इहैव ते सेत्स्यति मोत्सुको भू महानयुद्धेन सुखस्य लाभः॥ ३५॥
‘मेरे देखने में यही सबसे सुन्दर नीति है। युद्ध में तो श्रीराम का दर्शन करते ही आपको अनर्थ (मृत्यु)-की प्राप्ति हो सकती है; अतः आप युद्धस्थल में जाने के लिये उत्सुक न हों, यहीं आपके अभीष्ट मनोरथ की सिद्धि हो जायगी। बिना युद्ध के ही आपको सुख का महान् लाभ होगा।
अनष्टसैन्यो ह्यनवाप्तसंशयो रिपुं त्वयुद्धेन जयञ्जनाधिपः।
यशश्च पुण्यं च महान्महीपते श्रियं च कीर्तिं च चिरं समश्नुते॥३६॥
महाराज! जो राजा बिना युद्ध के ही शत्रु पर विजय पाता है, उसकी सेना नष्ट नहीं होती। उसका जीवन भी संशय में नहीं पड़ता, वह पवित्र एवं महान् यश पाता तथा दीर्घकालतक लक्ष्मी एवं उत्तम कीर्ति का उपभोग करता है’ ॥ ३६॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे चतुःषष्टितमः सर्गः॥६४॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में चौंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ।६४॥
सर्ग-65
स तथोक्तस्तु निर्भय॑ कुम्भकर्णो महोदरम्।
अब्रवीद् राक्षसश्रेष्ठं भ्रातरं रावणं ततः॥१॥
महोदर के ऐसा कहने पर कुम्भकर्ण ने उसे डाँटा और अपने भाई राक्षसशिरोमणि रावण से कहा— ॥
सोऽहं तव भयं घोरं वधात् तस्य दुरात्मनः।
रामस्याद्य प्रमार्जामि निर्वैरो हि सुखी भव॥२॥
‘राजन्! आज मैं उस दुरात्मा राम का वध करके तुम्हारे घोर भय को दूर कर दूंगा। तुम वैरभाव से मुक्त होकर सुखी हो जाओ॥२॥
गर्जन्ति न वृथा शूरा निर्जला इव तोयदाः।
पश्य सम्पद्यमानं तु गर्जितं युधि कर्मणा॥३॥
‘शूरवीर जलहीन बादल के समान व्यर्थ गर्जना नहीं किया करते। तुम देखना, अब युद्धस्थल में मैं अपने पराक्रम के द्वारा ही गर्जना करूँगा॥३॥
न मर्षयन्ति चात्मानं सम्भावयितुमात्मना।
अदर्शयित्वा शूरास्तु कर्म कुर्वन्ति दुष्करम्॥४॥
‘शूरवीरों को अपने ही मुँह से अपनी तारीफ करना सहन नहीं होता। वे वाणी के द्वारा प्रदर्शन न करके चुपचाप दुष्कर पराक्रम प्रकट करते हैं॥ ४॥
विक्लवानां ह्यबुद्धीनां राज्ञां पण्डितमानिनाम्।
रोचते त्वदचो नित्यं कथ्यमानं महोदर॥५॥
‘महोदर! जो भीरु, मूर्ख और झूठे ही अपने को पण्डित मानने वाले होंगे, उन्हीं राजाओं को तुम्हारे द्वारा कही जाने वाली ये चिकनी-चुपड़ी बातें सदा अच्छी लगेंगी॥५॥
युद्धे कापुरुषैर्नित्यं भवद्भिः प्रियवादिभिः।
राजानमनुगच्छद्भिः सर्वं कृत्यं विनाशितम्॥६॥
‘युद्ध में कायरता दिखाने वाले तुम-जैसे चापलूसों ने ही सदा राजा की हाँ-में-हाँ मिलाकर सारा काम चौपट किया है॥६॥
राजशेषा कृता लङ्का क्षीणः कोशो बलं हतम्।
राजानमिममासाद्य सुहृच्चिह्नममित्रकम्॥७॥
‘अब तो लङ्का में केवल राजा शेष रह गये हैं। खजाना खाली हो गया और सेना मार डाली गयी। इस राजा को पाकर तुमलोगों ने मित्र के रूप में शत्रु का काम किया है॥७॥
एष निर्याम्यहं युद्धमुद्यतः शत्रुनिर्जये।
दुर्नयं भवतामद्य समीकर्तुं महाहवे॥८॥
‘यह देखो, अब मैं शत्रु को जीतने के लिये उद्यत होकर समरभूमि में जा रहा हूँ। तुमलोगों ने अपनी खोटी नीति के कारण जो विषम परिस्थिति उत्पन्न कर दी है, उसका आज महासमर में समीकरण करना है —इस विषम संकट को सर्वदा के लिये टाल देना है’॥ ८॥
एवमुक्तवतो वाक्यं कुम्भकर्णस्य धीमतः।
प्रत्युवाच ततो वाक्यं प्रहसन् राक्षसाधिपः॥९॥
बुद्धिमान् कुम्भकर्ण ने जब ऐसी वीरोचित बात कही, तब राक्षसराज रावण ने हँसते हुए उत्तर दिया – ॥९॥
महोदरोऽयं रामात् तु परित्रस्तो न संशयः।
न हि रोचयते तात युद्धं युद्धविशारद॥१०॥
‘युद्धविशारद तात! यह महोदर श्रीराम से बहुत डर गया है, इसमें संशय नहीं है। इसीलिये यह युद्ध को पसंद नहीं करता है॥ १० ॥
कश्चिन्मे त्वत्समो नास्ति सौहृदेन बलेन च।
गच्छ शत्रुवधाय त्वं कुम्भकर्ण जयाय च॥११॥
‘कुम्भकर्ण! मेरे आत्मीयजनों में सौहार्द और बल की दृष्टि से कोई भी तुम्हारी समानता करने वाला नहीं है। तुम शत्रुओं का वध करने और विजय पाने लिये युद्धभूमि में जाओ॥ ११॥ ।
शयानः शत्रुनाशार्थं भवान् सम्बोधितो मया।
अयं हि कालः सुमहान् राक्षसानामरिंदम॥१२॥
‘शत्रुदमन वीर! तुम सो रहे थे। तुम्हारे द्वारा शत्रुओं का नाश कराने के लिये ही मैंने तुम्हें जगाया है। राक्षसों की युद्धयात्रा के लिये यह सबसे उत्तम समय है॥ १२॥
संगच्छ शूलमादाय पाशहस्त इवान्तकः।
वानरान् राजपुत्रौ च भक्षयादित्यतेजसौ॥१३॥
‘तुम पाशधारी यमराज की भाँति शूल लेकर जाओ और सूर्य के समान तेजस्वी उन दोनों राजकुमारों तथा वानरों को मारकर खा जाओ॥ १३॥
समालोक्य तु ते रूपं विद्रविष्यन्ति वानराः।
रामलक्ष्मणयोश्चापि हृदये प्रस्फुटिष्यतः॥१४॥
‘वानर तुम्हारा रूप देखते ही भाग जायँगे तथा राम और लक्ष्मण के हृदय भी विदीर्ण हो जायँगे’ ॥ १४ ॥
एवमुक्त्वा महातेजाः कुम्भकर्णं महाबलम्।
पुनर्जातमिवात्मानं मेने राक्षसपुङ्गवः॥१५॥
महाबली कुम्भकर्ण से ऐसा कहकर महातेजस्वी राक्षसराज रावण ने अपना पुनः नया जन्म हुआ-सा माना॥
कुम्भकर्णबलाभिज्ञो जानंस्तस्य पराक्रमम्।
बभूव मुदितो राजा शशाङ्क इव निर्मलः॥१६॥
राजा रावण कुम्भकर्ण के बल को अच्छी तरह जानता था, उसके पराक्रम से भी पूर्ण परिचित था; इसलिये वह निर्मल चन्द्रमा के समान परम आह्लाद से भर गया॥१६॥
इत्येवमुक्तः संहृष्टो निर्जगाम महाबलः।
राज्ञस्तु वचनं श्रुत्वा योद्धुमुद्युक्तवांस्तदा ॥१७॥
रावण के ऐसा कहने पर महाबली कुम्भकर्ण बहुत प्रसन्न हुआ। वह राजा रावण की बात सुनकर उस समय युद्ध के लिये उद्यत हो गया और लङ्कापुरी से बाहर निकला॥ १७॥
आददे निशितं शूलं वेगाच्छत्रुनिबर्हणः।
सर्वं कालायसं दीप्तं तप्तकाञ्चनभूषणम्॥१८॥
शत्रुओं का संहार करने वाले उस वीर ने बड़े वेग से तीखा शूल हाथ में लिया, जो सब-का-सब काले लोहे का बना हुआ, चमकीला और तपाये हुए सुवर्ण से विभूषित था॥ १८ ॥
इन्द्राशनिसमप्रख्यं वज्रप्रतिमगौरवम्।
देवदानवगन्धर्वयक्षपन्नगसूदनम्॥१९॥
उसकी कान्ति इन्द्र के अशनि के समान थी। वह वज्रके समान भारी था तथा देवताओं, दानवों, गन्धों , यक्षों और नागों का संहार करनेवाला था। १९॥
रक्तमाल्यमहादामं स्वतश्चोद्गतपावकम्।
आदाय विपुलं शूलं शत्रुशोणितरञ्जितम्॥२०॥
कुम्भकर्णो महातेजा रावणं वाक्यमब्रवीत्।
गमिष्याम्यहमेकाकी तिष्ठत्विह बलं मम॥२१॥
उसमें लाल फूलों की बहुत बड़ी माला लटक रही थी और उससे आग की चिनगारियाँ झड़ रही थीं। शत्रुओं के रक्तसे रँगे हुए उस विशाल शूल को हाथ में लेकर महातेजस्वी कुम्भकर्ण रावण से बोला—’मैं अकेला ही युद्ध के लिये जाऊँगा। अपनी यह सारी सेना यहीं रहे ॥ २०-२१॥
अद्य तान् क्षुधितः क्रुद्धो भक्षयिष्यामि वानरान्।
कुम्भकर्णवचः श्रुत्वा रावणो वाक्यमब्रवीत्॥२२॥
‘आज मैं भूखा हूँ और मेरा क्रोध भी बढ़ा हुआ है। इसलिये समस्त वानरों को भक्षण कर जाऊँगा।’ कुम्भकर्ण की यह बात सुनकर रावण बोला— ॥२२॥
सैन्यैः परिवृतो गच्छ शूलमुद्गरपाणिभिः।
वानरा हि महात्मानः शूराः सुव्यवसायिनः॥२३॥
एकाकिनं प्रमत्तं वा नयेयुर्दशनैः क्षयम्।
तस्मात् परमदुर्धर्षः सैन्यैः परिवृतो व्रज।
रक्षसामहितं सर्वं शत्रुपक्षं निषूदय॥२४॥
‘कुम्भकर्ण! तुम हाथों में शूल और मुद्गर धारण करने वाले सैनिकों से घिरे रहकर युद्ध के लिये यात्रा करो, क्योंकि महामनस्वी वानर बड़े वीर और अत्यन्त उद्योगी हैं। वे तुम्हें अकेला या असावधान देख दाँतों से काट-काटकर नष्ट कर डालेंगे; इसलिये सेना से घिरकर सब ओर से सुरक्षित हो यहाँ से जाओ। उस दशा में तुम्हें परास्त करना शत्रुओं के लिये बहुत कठिन होगा। तुम राक्षसों का अहित करने वाले समस्त शत्रुदल का संहार करो’ ॥ २३-२४॥
अथासनात् समुत्पत्य स्रजं मणिकृतान्तराम्।
आबबन्ध महातेजाः कुम्भकर्णस्य रावणः॥२५॥
यों कहकर महातेजस्वी रावण अपने आसन से उठा और एक सोने की माला, जिसके बीच-बीच में मणियाँ पिरोयी हुई थीं, लेकर उसने कुम्भकर्ण के गले में पहना दी॥ २५॥
अङ्गदान्यङ्गलीवेष्टान् वराण्याभरणानि च।
हारं च शशिसंकाशमाबबन्ध महात्मनः॥२६॥
बाजूबंद, अंगूठियाँ, अच्छे-अच्छे आभूषण और चन्द्रमा के समान चमकीला हार-इन सबको उसने महाकाय कुम्भकर्ण के अङ्गों में पहनाया॥२६॥
दिव्यानि च सुगन्धीनि माल्यदामानि रावणः।
गात्रेषु सज्जयामास श्रोत्रयोश्चास्य कुण्डले॥२७॥
उतना ही नहीं, रावण ने उसके विभिन्न अङ्गों में दिव्य सुगन्धित फूलों की मालाएँ भी बंधवा दी और दोनों कानों में कुण्डल पहना दिये॥२७॥
काञ्चनाङ्गदकेयूरनिष्काभरणभूषितः।
कुम्भकर्णो बृहत्कर्णः सुहुतोऽग्निरिवाबभौ ॥२८॥
सोने के अङ्गद, केयूर और पदक आदि आभूषणों से भूषित तथा घड़े के समान विशाल कानों वाला कुम्भकर्ण घी की उत्तम आहुति पाकर प्रज्वलित हुई अग्नि के समान प्रकाशित हो उठा॥ २८॥
श्रोणीसूत्रेण महता मेचकेन व्यराजत।
अमृतोत्पादने नद्धो भुजङ्गेनेव मन्दरः॥२९॥
उसके कटिप्रदेश में काले रंग की एक विशाल करधनी थी, जिससे वह अमृत की उत्पत्ति के लिये किये गये समुद्रमन्थन के समय नागराज वासुकि से लिपटे हुए मन्दराचल के समान शोभा पाता था॥ २९॥
स काञ्चनं भारसहं निवातं विद्युत्प्रभं दीप्तमिवात्मभासा।
आबध्यमानः कवचं रराज संध्याभ्रसंवीत इवाद्रिराजः॥३०॥
तदनन्तर कुम्भकर्ण की छाती में एक सोने का कवच बाँधा गया, जो भारी-से-भारी आघात सहन करने में समर्थ, अस्त्र-शस्त्रों से अभेद्य तथा अपनी प्रभा से विद्युत् के समान देदीप्यमान था। उसे धारण करके कुम्भकर्ण संध्याकाल के लाल बादलों से संयुक्त गिरिराज अस्ताचल के समान सुशोभित हो रहा था। ३०॥
सर्वाभरणसर्वाङ्गः शूलपाणिः स राक्षसः।
त्रिविक्रमकृतोत्साहो नारायण इवाबभौ॥३१॥
सारे अङ्गों में सभी आवश्यक आभूषण धारण करके हाथों में शूल लिये वह राक्षस कुम्भकर्ण जब आगे बढ़ा, उस समय त्रिलोकी को नापने के लिये तीन डग बढ़ाने को उत्साहित हुए भगवान् नारायण (वामन)-के समान जान पड़ा॥३१॥
भ्रातरं सम्परिष्वज्य कृत्वा चापि प्रदक्षिणम्।
प्रणम्य शिरसा तस्मै प्रतस्थे स महाबलः॥ ३२॥
भाई को हृदय से लगाकर उसकी परिक्रमा करके उस महाबली वीर ने उसे मस्तक झुकाकर प्रणाम किया। तत्पश्चात् वह युद्ध के लिये चला ॥ ३२॥
तमाशीर्भिः प्रशस्ताभिः प्रेषयामास रावणः।
शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषैः सैन्यैश्चापि वरायुधैः॥ ३३॥
उस समय रावण ने उत्तम आशीर्वाद देकर श्रेष्ठ आयुधों से सुसज्जित सेनाओं के साथ उसे युद्ध के लिये विदा किया। यात्रा के समय उसने शङ्ख और दुन्दुभि आदि बाजे भी बजवाये॥ ३३॥
तं गजैश्च तुरंगैश्च स्यन्दनैश्चाम्बुदस्वनैः।
अनुजग्मुर्महात्मानो रथिनो रथिनां वरम्॥३४॥
हाथी, घोड़े और मेघों की गर्जना के समान घर्घराहट पैदा करने वाले रथों पर सवार हो अनेकानेक महामनस्वी रथी वीर रथियों में श्रेष्ठ कुम्भकर्ण के साथ गये॥ ३४॥
सपैंरुष्टैः खरैश्चैव सिंहद्विपमृगद्विजैः।
अनुजग्मुश्च तं घोरं कुम्भकर्ण महाबलम्॥३५॥
कितने ही राक्षस साँप, ऊँट,गधे, सिंह, हाथी, मृग और पक्षियों पर सवार हो-होकर उस भयंकर महाबली कुम्भकर्ण के पीछे-पीछे गये॥ ३५ ॥
स पुष्पवर्षैरवकीर्यमाणो धृतातपत्रः शितशूलपाणिः।
मदोत्कटः शोणितगन्धमत्तो विनिर्ययौ दानवदेवशत्रुः॥ ३६॥
उस समय उसके ऊपर फूलों की वर्षा हो रही थी। सिरपर श्वेत छत्र तना हुआ था और उसने हाथ में तीखा त्रिशूल ले रखा था। इस प्रकार देवताओं और दानवों का शत्रु तथा रक्त की गन्ध से मतवाला कुम्भकर्ण, जो स्वाभाविक मद से भी उन्मत्त हो रहा था, युद्ध के लिये निकला॥ ३६॥
पदातयश्च बहवो महानादा महाबलाः।
अन्वयू राक्षसा भीमा भीमाक्षाः शस्त्रपाणयः॥३७॥
उसके साथ बहुत-से पैदल राक्षस भी गये, जो बड़े बलवान्, जोर-जोर से गर्जना करने वाले, भीषण नेत्रधारी और भयानक रूप वाले थे। उन सबके हाथों में नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्र थे॥ ३७॥
रक्ताक्षाः सुबहुव्यामा नीलाञ्जनचयोपमाः।
शूलानुद्यम्य खड्गांश्च निशितांश्च परश्वधान्॥३८॥
भिन्दिपालांश्च परिघान् गदाश्च मुसलानि च।
तालस्कन्धांश्च विपुलान् क्षेपणीयान् दुरासदान्॥३९॥
उनके नेत्र रोष से लाल हो रहे थे। वे सभी कई व्याम* ऊँचे और काले कोयले के ढेर की भाँति काले थे। उन्होंने अपने हाथों में शूल, तलवार, तीखी धारवाले फरसे, भिन्दिपाल, परिघ, गदा, मूसल, बड़े-बड़े ताड़ के वृक्षों के तने और जिन्हें कोई काट न सके, ऐसी गुलेलें ले रखी थीं॥ ३८-३९॥
* लंबाई का एक नाप। दोनों भुजाओं को दोनों ओर फैलाने पर एक हाथ की उँगलियों के सिरे से दूसरे हाथ की उँगलियों के सिरेतक जितनी दूरी होती है, उसे ‘व्याम’ कहते हैं।
अथान्यद्रपुरादाय दारुणं घोरदर्शनम्।
निष्पपात महातेजाः कुम्भकर्णो महाबलः॥४०॥
तदनन्तर महातेजस्वी महाबली कुम्भकर्ण ने बड़ा उग्र रूप धारण किया, जिसे देखने पर भय मालूम होता था। ऐसा रूप धारण करके वह युद्ध के लिये चल पड़ा॥ ४०॥
धनुःशतपरीणाहः स षट्शतसमुच्छ्रितः।
रौद्रः शकटचक्राक्षो महापर्वतसंनिभः॥४१॥
उस समय वह छः सौ धनुष के बराबर विस्तृत और सौ धनुष के बराबर ऊँचा हो गया। उसकी आँखें दो गाड़ी के पहियों के समान जान पड़ती थीं। वह विशाल पर्वत के समान भयंकर दिखायी देता था। ४१॥
संनिपत्य च रक्षांसि दग्धशैलोपमो महान्।
कुम्भकर्णो महावकत्रः प्रहसन्निदमब्रवीत्॥४२॥
पहले तो उसने राक्षस-सेना की व्यूह-रचना की। फिर दावानल से दग्ध हुए पर्वत के समान महाकाय कुम्भकर्ण अपना विशाल मुख फैलाकर अट्टहास करता हुआ इस प्रकार बोला— ॥ ४२ ॥
अद्य वानरमुख्यानां तानि यूथानि भागशः।
निर्दहिष्यामि संक्रुद्धः पतङ्गानिव पावकः॥४३॥
‘राक्षसो! जैसे आग पतंगों को जलाती है, उसी प्रकार मैं भी कुपित होकर आज प्रधान-प्रधान वानरों के एक-एक झुंड को भस्म कर डालूँगा॥४३॥
नापराध्यन्ति मे कामं वानरा वनचारिणः।
जातिरस्मद्विधानां सा पुरोद्यानविभूषणम्॥४४॥
‘यों तो वन में विचरने वाले बेचारे वानर स्वेच्छा से मेरा कोई अपराध नहीं कर रहे हैं; अतः वे वध के योग्य नहीं हैं। वानरों की जाति तो हम-जैसे लोगों के नगरोद्यान का आभूषण है॥४४॥
पुररोधस्य मूलं तु राघवः सहलक्ष्मणः।
हते तस्मिन् हतं सर्वं तं वधिष्यामि संयुगे॥४५॥
‘वास्तव में लङ्कापुरी पर घेरा डालने के प्रधान कारण हैं लक्ष्मणसहित राम। अतः सबसे पहले मैं उन्हीं को युद्ध में मारूँगा। उनके मारे जाने पर सारी वानर-सेना स्वतः मरी हुई-सी हो जायगी’॥ ४५ ॥
एवं तस्य ब्रुवाणस्य कुम्भकर्णस्य राक्षसाः।
नादं चक्रुर्महाघोरं कम्पयन्त इवार्णवम्॥४६॥
कुम्भकर्ण के ऐसा कहने पर राक्षसों ने समुद्र को कम्पित-सा करते हुए बड़ी भयानक गर्जना की। ४६॥
तस्य निष्पततस्तूर्णं कुम्भकर्णस्य धीमतः।
बभूवुर्घोररूपाणि निमित्तानि समन्ततः॥४७॥
बुद्धिमान् राक्षस कुम्भकर्ण के रणभूमि की ओर पैर बढ़ाते ही चारों ओर घोर अपशकुन होने लगे॥४७॥
उल्काशनियुता मेघा बभूवुर्गर्दभारुणाः।
ससागरवना चैव वसुधा समकम्पत॥४८॥
गदहों के समान भूरे रंगवाले बादल घिर आये। साथ ही उल्कापात हुआ और बिजलियाँ गिरी। समुद्र और वनोंसहित सारी पृथ्वी काँपने लगी॥४८॥
घोररूपाः शिवा नेदुः सज्वालकवलैर्मुखैः।
मण्डलान्यपसव्यानि बबन्धुश्च विहंगमाः॥४९॥
भयानक गीदड़ियाँ मुँह से आग उगलती हुई अमङ्गलसूचक बोली बोलने लगीं। पक्षी मण्डल बाँधकर उसकी दक्षिणावर्त परिक्रमा करने लगे। ४९॥
निष्पपात च गृध्रोऽस्य शूले वै पथि गच्छतः।
प्रास्फुरन्नयनं चास्य सव्यो बाहुरकम्पत॥५०॥
रास्ते में चलते समय कुम्भकर्ण के शूलपर गीध आ बैठा। उसकी बायीं आँख फड़कने लगी और बायीं भुजा कम्पित होने लगी॥५०॥
निष्पपात तदा चोल्का ज्वलन्ती भीमनिःस्वना।
आदित्यो निष्प्रभश्चासीन्न वाति च सुखोऽनिलः॥५१॥
फिर उसी समय जलती हुई उल्का भयंकर आवाज के साथ गिरी। सूर्य की प्रभा क्षीण हो गयी और हवा इतने वेग से चल रही थी कि सुखद नहीं जान पड़ती थी॥
अचिन्तयन् महोत्पातानुदितान् रोमहर्षणान्।
निर्ययौ कुम्भकर्णस्तु कृतान्तबलचोदितः॥५२॥
इस प्रकार रोंगटे खड़े कर देन वाले बहुत-से बड़े-बड़े उत्पात प्रकट हुए; किंतु उनकी कुछ भी परवा न करके काल की शक्ति से प्रेरित हुआ कुम्भकर्ण युद्ध के लिये निकल पड़ा॥५२॥
स लयित्वा प्राकारं पद्भ्यां पर्वतसंनिभः।
ददर्शाभ्रघनप्रख्यं वानरानीकमद्भुतम्॥५३॥
वह पर्वत के समान ऊँचा था। उसने लङ्का की चहारदीवारी को दोनों पैरों से लाँघकर देखा कि वानरों की अद्भुत सेना मेघों की घनीभूत घटा के समान छा रही है॥५३॥
ते दृष्ट्वा राक्षसश्रेष्ठं वानराः पर्वतोपमम्।
वायुनुन्ना इव घना ययुः सर्वा दिशस्तदा॥५४॥
उस पर्वताकार श्रेष्ठ राक्षस को देखते ही समस्त वानर हवा से उड़ाये गये बादलों के समान तत्काल सम्पूर्ण दिशाओं में भाग चले॥५४॥
तद् वानरानीकमतिप्रचण्डं दिशो द्रवद्भिन्नमिवाभ्रजालम्।
स कुम्भकर्णः समवेक्ष्य हर्षान्ननाद भूयो घनवद्धनाभः॥५५॥
छिन्न-भिन्न हुए बादलों के समूह की भाँति उस अतिशय प्रचण्ड वानर-वाहिनी को सम्पूर्ण दिशाओं में भागती देख मेघों के समान काला कुम्भकर्ण बड़े हर्ष के साथ सजल जलधर के सदृश गम्भीर स्वर में बारंबार गर्जना करने लगा॥ ५५॥
ते तस्य घोरं निनदं निशम्य यथा निनादं दिवि वारिदस्य।
पेतुर्धरण्यां बहवः प्लवङ्गा निकृत्तमूला इव शालवृक्षाः॥५६॥
आकाश में जैसी मेघों की गर्जना होती है, उसी के समान उस राक्षस का घोर सिंहनाद सुनकर बहुत-से वानर जड़ से कटे हुए सालवृक्षों के समान पृथ्वी पर गिर पड़े॥५६॥
विपुलपरिघवान् स कुम्भकर्णो रिपुनिधनाय विनिःसृतो महात्मा।
कपिगणभयमाददत् सुभीमं प्रभुरिव किंकरदण्डवान् युगान्ते॥५७॥
महाकाय कुम्भकर्ण ने शूल की ही भाँति अपने एक हाथ में विशाल परिघ भी ले रखा था। वह वानरसमूहों को अत्यन्त घोर भय प्रदान करता हुआ प्रलय काल में संहार के साधनभूत कालदण्डों से युक्त भगवान् कालरुद्र के समान शत्रुओं का विनाश करने के लिये पुरीसे बाहर निकला॥ ५७॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे पञ्चषष्टितमः सर्गः॥६५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में पैंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ।६५॥
सर्ग-66
स लवयित्वा प्राकारं गिरिकूटोपमो महान्।
निर्ययौ नगरात् तूर्णं कुम्भकर्णो महाबलः॥१॥
महाबली कुम्भकर्ण पर्वत-शिखर के समान ऊँचा और विशालकाय था। वह परकोटा लाँघकर बड़ी तेजी के साथ नगर से बाहर निकला॥१॥
ननाद च महानादं समुद्रमभिनादयन्।
विजयन्निव निर्घातान् विधमन्निव पर्वतान्॥२॥
बाहर आकर पर्वतों को कँपाता और समुद्र को जाता हुआ-सा वह उच्चस्वर से गम्भीर नाद करने लगा। उसकी वह गर्जना बिजली की कड़क को भी मात कर रही थी॥
तमवध्यं मघवता यमेन वरुणेन वा।
प्रेक्ष्य भीमाक्षमायान्तं वानरा विप्रदुद्रुवुः॥३॥
इन्द्र, यम अथवा वरुण के द्वारा भी उसका वध होना असम्भव था। उस भयानक नेत्रवाले निशाचर को आते देख सभी वानर भाग खड़े हुए।३॥
तांस्तु विप्रद्रुतान् दृष्ट्वा राजपुत्रोऽङ्गदोऽब्रवीत्।
नलं नीलं गवाक्षं च कुमुदं च महाबलम्॥४॥
उन सबको भागते देख राजकुमार अङ्गद ने नल, नील, गवाक्ष और महाबली कुमुद को सम्बोधित करके कहा- ॥४॥
आत्मनस्तानि विस्मृत्य वीर्याण्यभिजनानि च।
क्व गच्छत भयत्रस्ताः प्राकृता हरयो यथा॥५॥
‘वानर वीरो! अपने उत्तम कुलों और उन अलौकिक पराक्रमों को भुलाकर साधारण बंदरों की भाँति भयभीत हो तुम कहाँ भागे जा रहे हो? ॥ ५ ॥
साधु सौम्या निवर्तध्वं किं प्राणान् परिरक्षथ।
नालं युद्धाय वै रक्षो महतीयं विभीषिका॥६॥
‘सौम्य स्वभाववाले बहादुरो! अच्छा होगा कि तुम लौट आओ। क्यों जान बचाने के फेर में पड़े हो? यह राक्षस हमारे साथ युद्ध करने की शक्ति नहीं रखता। यह तो इसकी बड़ी भारी विभीषिका है-इसने माया से विशाल रूप धारण करके तुम्हें डराने के लिये व्यर्थ घटाटोप फैला रखा है॥६॥
महतीमुत्थितामेनां राक्षसानां विभीषिकाम्।
विक्रमाद् विधमिष्यामो निवर्तध्वं प्लवङ्गमाः॥७॥
‘अपने सामने उठी हुई राक्षसों की इस बड़ी भारी विभीषिका को हम अपने पराक्रम से नष्ट कर देंगे। अतः वानरवीरो! लौट आओ’ ॥ ७॥
कृच्छ्रेण तु समाश्वस्य संगम्य च ततस्ततः।
वृक्षान् गृहीत्वा हरयः सम्प्रतस्थू रणाजिरे॥८॥
तब वानरों ने बड़ी कठिनाई से धैर्य धारण किया और जहाँ-तहाँ से एकत्र हो हाथों में वृक्ष लेकर वे रणभूमि की ओर चले॥८॥
ते निवर्त्य तु संरब्धाः कुम्भकर्णं वनौकसः।
निजघ्नुः परमक्रुद्धाः समदा इव कुञ्जराः॥९॥
प्रांशुभिर्गिरिशृङ्गैश्च शिलाभिश्च महाबलाः।
पादपैः पुष्पिताग्रैश्च हन्यमानो न कम्पते॥१०॥
लौटने पर वे महाबली वानर मतवाले हाथियों की भाँति अत्यन्त क्रोध और रोष से भर गये और कुम्भकर्ण के ऊपर ऊँचे-ऊँचे पर्वतीय-शिखरों, शिलाओं तथा खिले हुए वृक्षों से प्रहार करने लगे। उनकी मार खाकर भी कुम्भकर्ण विचलित नहीं होता था॥९-१०॥
तस्य गात्रेषु पतिता भिद्यन्ते बहवः शिलाः।
पादपाः पुष्पिताग्राश्च भग्नाः पेतुर्महीतले॥११॥
उसके अङ्गों पर गिरी हुई बहुतेरी शिलाएँ चूर-चूर हो जाती थीं और वे खिले हुए वृक्ष भी उसके शरीर से टकराते ही टूक-टूक होकर पृथ्वी पर गिर पड़ते थे। ११॥
सोऽपि सैन्यानि संक्रुद्धौ वानराणां महौजसाम्।
ममन्थ परमायत्तो वनान्यग्निरिवोत्थितः॥१२॥
उधर क्रोध से भरा हुआ कुम्भकर्ण भी अत्यन्त सावधान हो महाबली वानरों की सेनाओं को उसी प्रकार रौंदने लगा, जैसे बढ़ा हुआ दावानल बड़े-बड़े जंगलों को जलाकर भस्म कर देता है॥ १२॥
लोहितार्दास्तु बहवः शेरते वानरर्षभाः।
निरस्ताः पतिता भूमौ ताम्रपुष्पा इव द्रुमाः॥१३॥
बहुत-से श्रेष्ठ वानर खून से लथपथ हो धरती पर सो गये। जिन्हें उठाकर उसने ऊपर फेंक दिया, वे लाल फूलों से लदे हुए वृक्षों की भाँति पृथ्वी पर गिर पड़े।
लङ्घयन्तः प्रधावन्तो वानरा नावलोकयन्।
केचित् समुद्रे पतिताः केचिद् गगनमास्थिताः॥१४॥
वानर ऊँची-नीची भूमि को लाँघते हुए जोर-जोर से भागने लगे। वे आगे-पीछे और अगल-बगल में कहीं भी दृष्टि नहीं डालते थे। कोई समुद्र में गिर पड़े और कोई आकाश में ही उड़ते रह गये॥ १४॥
वध्यमानास्तु ते वीरा राक्षसेन च लीलया।
सागरं येन ते तीर्णाः पथा तेनैव दुद्रुवुः॥१५॥
उस राक्षस ने खेल-खेल में ही जिन्हें मारा, वे वीर वानर जिस मार्ग से समुद्र पार करके लङ्का में आये थे, उसी मार्ग से भागने लगे॥ १५ ॥
ते स्थलानि तदा निम्नं विवर्णवदना भयात्।
ऋक्षा वृक्षान् समारूढाः केचित् पर्वतमाश्रिताः॥१६॥
भय के मारे वानरों के मुख की कान्ति फीकी पड़ गयी। वे नीची जगह देख-देखकर भागने और छिपने लगे। कितने ही रीछ वृक्षों पर जा चढ़े और कितनों ने पर्वतों की शरण ली॥ १६॥
ममज्जुरर्णवे केचिद् गुहाः केचित् समाश्रिताः।
निपेतुः केचिदपरे केचिन्नैवावतस्थिरे।
केचिद् भूमौ निपतिताः केचित् सुप्ता मृता इव॥१७॥
कितने ही वानर और भालू समुद्र में डूब गये। कितनों ने पर्वतों की गुफाओं का आश्रय लिया। कोई गिरे, कोई एक स्थान पर खड़े न रह सके, इसलिये भागे। कुछ धराशायी हो गये और कोई-कोई मुर्दो के समान साँस रोककर पड़ गये॥ १७॥
तान् समीक्ष्याङ्गदो भग्नान् वानरानिदमब्रवीत्।
अवतिष्ठत युध्यामो निवर्तध्वं प्लवंगमाः॥१८॥
उन वानरों को भागते देख अङ्गद ने इस प्रकार कहा —’वानरवीरो! ठहरो, लौट आओ। हम सब मिलकर युद्ध करेंगे॥ १८॥
भग्नानां वो न पश्यामि परिक्रम्य महीमिमाम्।
स्थानं सर्वे निवर्तध्वं किं प्राणान् परिरक्षथ॥१९॥
‘यदि तुम भाग गये तो सारी पृथ्वी की परिक्रमा करके भी कहीं तुम्हें ठहरने के लिये स्थान मिल सके, ऐसा मुझे नहीं दिखायी देता (सुग्रीव की आज्ञा के बिना कहीं भी जाने पर तुम जीवित नहीं बच सकोगे)। इसलिये सब लोग लौट आओ। क्यों अपने ही प्राण बचाने की फिक्र में पड़े हो? ॥ १९॥
निरायुधानां क्रमतामसङ्गगतिपौरुषाः।
दारा झुपहसिष्यन्ति स वै घातः सुजीवताम्॥२०॥
‘तुम्हारे वेग और पराक्रम को कोई रोकने वाला नहीं है। यदि तुम हथियार डालकर भाग जाओगे तो तुम्हारी स्त्रियाँ ही तुमलोगों का उपहास करेंगी और वह उपहास जीवित रहने पर भी तुम्हारे लिये मृत्यु के समान दुःखदायी होगा॥ २०॥
कुलेषु जाताः सर्वेऽस्मिन् विस्तीर्णेषु महत्सु च।
क्व गच्छत भयत्रस्ताः प्राकृता हरयो यथा।
अनार्याः खलु यद्भीतास्त्यक्त्वा वीर्यं प्रधावत॥२१॥
‘तुम सब लोग महान् और बहुत दूर तक फैले हुए श्रेष्ठ कुल में उत्पन्न हुए हो। फिर साधारण वानरों की भाँति भयभीत होकर कहाँ भागे जा रहे हो ? यदि तुम पराक्रम छोड़कर भय के कारण भागते हो तो निश्चय ही अनार्य समझे जाओगे॥२१॥
विकत्थनानि वो यानि भवद्भिर्जनसंसदि।
तानि वः क्व नु यातानि सोदग्राणि हितानि च॥२२॥
‘तुम जन-समुदाय में बैठकर जो डींग हाँका करते थे कि हम बड़े प्रचण्ड वीर हैं और स्वामी के हितैषी हैं, तुम्हारी वे सब बातें आज कहाँ चली गयीं? ॥२२॥
भीरोः प्रवादाः श्रूयन्ते यस्तु जीवति धिक्कृतः।
मार्गः सत्पुरुषैर्जुष्टः सेव्यतां त्यज्यतां भयम्॥२३॥
‘जो सत्पुरुषों द्वारा धिकृत होकर भी जीवन धारण करता है, उसके उस जीवन को धिक्कार है, इस तरह के निन्दात्मक वचन कायरों को सदा सुनने पड़ते हैं। इसलिये तुमलोग भय छोड़ो और सत्पुरुषों द्वारा सेवित मार्ग का आश्रय लो॥ २३॥
शयामहे वा निहताः पृथिव्यामल्पजीविताः।
प्राप्नुयामो ब्रह्मलोकं दुष्प्रापं च कुयोधिभिः॥२४॥
‘यदि हमलोग अल्पजीवी हों और शत्रु के द्वारा मारे जाकर रणभूमि में सो जायँ तो हमें उस ब्रह्मलोक की प्राप्ति होगी, जो कुयोगियों के लिये परम दुर्लभ है॥ २४॥
अवाप्नुयामः कीर्तिं वा निहत्वा शत्रुमाहवे।
निहता वीरलोकस्य भोक्ष्यामो वसु वानराः॥२५॥
‘वानरो! यदि युद्ध में हमने शत्रु को मार गिराया तो हमें उत्तम कीर्ति मिलेगी और यदि स्वयं ही मारे गये तो हम वीरलोक के वैभव का उपभोग करेंगे॥ २५॥
न कुम्भकर्णः काकुत्स्थं दृष्ट्वा जीवन् गमिष्यति।
दीप्यमानमिवासाद्य पतङ्गो ज्वलनं यथा॥२६॥
श्रीरघुनाथजी के सामने जानेपर कुम्भकर्ण जीवित नहीं लौट सकेगा; ठीक उसी तरह, जैसे प्रज्वलित अग्नि के पास पहुँचकर पतङ्ग भस्म हुए बिना नहीं रह सकता॥ २६॥
पलायनेन चोद्दिष्टाः प्राणान् रक्षामहे वयम्।
एकेन बहवो भग्ना यशो नाशं गमिष्यति॥२७॥
‘यदि हमलोग प्रख्यात वीर होकर भी भागकर अपने प्राण बचायेंगे और अधिक संख्या में होकर भी एक योद्धा का सामना नहीं कर सकेंगे तो हमारा यश मिट्टी में मिल जायगा’ ॥ २७॥
एवं ब्रुवाणं तं शूरमङ्गदं कनकाङ्गदम्।
द्रवमाणास्ततो वाक्यमूचुः शूरविगर्हितम्॥ २८॥
सोने का बाजूबंद धारण करने वाले शूरवीर अङ्गद जब ऐसा कह रहे थे, उस समय उन भागते हुए वानरों ने उन्हें ऐसा उत्तर दिया, जिसकी शौर्य-सम्पन्न योद्धा सदा निन्दा करते हैं॥२८॥
कृतं नः कदनं घोरं कुम्भकर्णेन रक्षसा।
न स्थानकालो गच्छामो दयितं जीवितं हि नः॥२९॥
वे बोले—’राक्षस कुम्भकर्ण ने हमारा घोर संहार मचा रखा है; अतः यह ठहरने का समय नहीं है। हम जा रहे हैं; क्योंकि हमें अपनी जान प्यारी है’ ॥ २९॥
एतावदुक्त्वा वचनं सर्वे ते भेजिरे दिशः।
भीमं भीमाक्षमायान्तं दृष्ट्वा वानरयूथपाः॥३०॥
इतनी बात कहकर भयानक नेत्रवाले भीषण कुम्भकर्ण को आते देख उन सब वानर-यूथपतियों ने विभिन्न दिशाओं की शरण ली॥ ३०॥
द्रवमाणास्तु ते वीरा अङ्गदेन बलीमुखाः।
सान्त्वनैश्चानुमानैश्च ततः सर्वे निवर्तिताः॥३१॥
तब उन भागते हुए सभी वीर वानरों को अङ्गद ने सान्त्वना और आदर-सम्मान के द्वारा लौटाया॥ ३१॥
प्रहर्षमुपनीताश्च वालिपुत्रेण धीमता।
आज्ञाप्रतीक्षास्तस्थुश्च सर्वे वानरयूथपाः॥३२॥
बुद्धिमान् वालिपुत्र ने उन सबको प्रसन्न कर लिया। वे सब वानरयूथपति सुग्रीव की आज्ञा की प्रतीक्षा करते हुए खड़े हो गये॥ ३२॥
ऋषभशरभमैन्दधूम्रनीलाः कुमुदसुषेणगवाक्षरम्भताराः।
द्विविदपनसवायुपुत्रमुख्यास्त्वरिततराभिमुखं रणं प्रयाताः॥३३॥
तदनन्तर ऋषभ, शरभ, मैन्द, धूम्र, नील, कुमुद, सुषेण, गवाक्ष, रम्भ, तार, द्विविद, पनस और वायुपुत्र हनुमान् आदि श्रेष्ठ वानर-वीर तुरंत हीकुम्भकर्ण का सामना करने के लिये रणक्षेत्र की ओर बढ़े॥ ३३॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे षट्षष्टितमः सर्गः॥६६॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में छाछठवाँ सर्ग पूरा हुआ।६६॥
सर्ग-67
ते निवृत्ता महाकायाः श्रुत्वाङ्गदवचस्तदा।
नैष्ठिकी बुद्धिमास्थाय सर्वे संग्रामकाङ्गिणः॥१॥
अङ्गद के पूर्वोक्त वचन सुनकर वे सब विशालकाय वानर मरने-मारनेका निश्चय करके युद्ध की इच्छा से लौटे थे॥१॥
समुदीरितवीर्यास्ते समारोपितविक्रमाः।
पर्यवस्थापिता वाक्यैरङ्गदेन बलीयसा॥२॥
महाबली अङ्गद ने उनके पूर्व-पराक्रमों का वर्णन करके अपने वचनों द्वारा उन्हें सुदृढ़ एवं बलविक्रमसम्पन्न बनाकर खड़ा कर दिया था॥२॥
प्रयाताश्च गता हर्षं मरणे कृतनिश्चयाः।
चक्रुः सुतुमुलं युद्धं वानरास्त्यक्तजीविताः॥३॥
अब वे वानर मरने का निश्चय करके बड़े हर्ष के साथ आगे बढ़े और जीवन का मोह छोड़कर अत्यन्त भयंकर युद्ध करने लगे॥३॥
अथ वृक्षान् महाकायाः सानूनि सुमहान्ति च।
वानरास्तूर्णमुद्यम्य कुम्भकर्णमभिद्रवन्॥४॥
उन विशालकाय वानर-वीरों ने वृक्ष तथा बड़े-बड़े पर्वत-शिखर लेकर तुरंत ही कुम्भकर्ण पर धावा किया॥
कुम्भकर्णः सुसंक्रुद्धो गदामुद्यम्य वीर्यवान्।
धर्षयन् स महाकायः समन्ताद् व्यक्षिपद् रिपून्॥
परंतु अत्यन्त क्रोध से भरे हुए विक्रमशाली महाकाय कुम्भकर्ण ने गदा उठाकर शत्रुओं को घायल करके उन्हें चारों ओर बिखेर दिया॥५॥
शतानि सप्त चाष्टौ च सहस्राणि च वानराः।
प्रकीर्णाः शेरते भूमौ कुम्भकर्णेन ताडिताः॥६॥
कुम्भकर्ण की मार खाकर आठ हजार सात सौ वानर तत्काल धराशायी हो गये॥६॥
षोडशाष्टौ च दश च विंशत्त्रिंशत्तथैव च।
परिक्षिप्य च बाहुभ्यां खादन् स परिधावति।
भक्षयन् भृशसंक्रुद्धो गरुडः पन्नगानिव॥७॥
वह सोलह, आठ, दस, बीस और तीस-तीस वानरों को अपनी दोनों भुजाओं से समेट लेता और जैसे गरुड़ सो को खाता है, उसी प्रकार अत्यन्त क्रोधपूर्वक उनका भक्षण करता हुआ सब ओर दौड़ता-फिरता था॥७॥
कृच्छ्रेण च समाश्वस्ताः संगम्य च ततस्ततः।
वृक्षाद्रिहस्ता हरयस्तस्थुः संग्राममूर्धनि॥८॥
उस समय वानर बड़ी कठिनाई से धैर्य धारण करके इधर-उधर से एकत्र हुए और वृक्ष तथा पर्वतशिखर हाथ में लेकर संग्रामभूमि में डटे रहे॥८॥
ततः पर्वतमुत्पाट्य द्विविदः प्लवगर्षभः।
दुद्राव गिरिशृङ्गाभं विलम्ब इव तोयदः॥९॥
तत्पश्चात् मेघ के समान विशाल शरीरवाले वानरशिरोमणि द्विविद ने एक पर्वत उखाड़कर पर्वतशिखर के समान ऊँचे कुम्भकर्ण पर आक्रमण किया॥९॥
तं समुत्पाट्य चिक्षेप कुम्भकर्णाय वानरः।
तमप्राप्य महाकायं तस्य सैन्येऽपतत् ततः॥१०॥
उस पर्वत को उखाड़कर द्विविद ने कुम्भकर्ण के ऊपर फेंका; किंतु वह उस विशालकाय राक्षस तक न पहुँचकर उसकी सेना में जा गिरा ॥ १०॥
ममर्दाश्वान् गजांश्चापि रथांश्चापि गजोत्तमान्।
तानि चान्यानि रक्षांसि एवं चान्यदगिरेः शिरः॥११॥
उस पर्वत-शिखर ने राक्षससेना के कितने ही घोड़ों, हाथियों, रथों, गजराजों तथा दूसरे-दूसरे राक्षसों को भी कुचल डाला॥११॥
तच्छैलवेगाभिहतं हताश्वं हतसारथिम्।
रक्षसां रुधिरक्लिन्नं बभूवायोधनं महत्॥१२॥
उस समय वह महान् युद्धस्थल, जिसमें शैलशिखर के वेग से कितने ही घोड़े और सारथि कुचल गये थे, राक्षसों के रुधिर से गीला हो गया॥१२॥
रथिनो वानरेन्द्राणां शरैः कालान्तकोपमैः।
शिरांसि नर्दतां जह्रः सहसा भीमनिःस्वनाः॥१३॥
रथियों ने प्रलयकालीन यमराज के समान भयंकर बाणों से गर्जते हुए वानरयूथपतियों के मस्तकों को सहसा काटना आरम्भ किया।॥ १३॥
वानराश्च महात्मानः समुत्पाट्य महाद्रुमान्।
रथानश्वान् गजानुष्ट्रान् राक्षसानभ्यसूदयन्॥१४॥
महामनस्वी वानर भी बड़े-बड़े वृक्ष उखाड़कर शत्रुसेना के रथ, घोड़े, हाथी, ऊँट और राक्षसों का संहार करने लगे॥१४॥
हनूमान् शैलशृङ्गाणि शिलाश्च विविधान् द्रुमान्।
ववर्ष कुम्भकर्णस्य शिरस्यम्बरमास्थितः॥१५॥
हनुमान् जी आकाश में पहुँचकर कुम्भकर्ण के मस्तक पर पर्वत-शिखरों, शिलाओं और नाना प्रकार के वृक्षों की वर्षा करने लगे॥ १५ ॥
तानि पर्वतश्रृङ्गाणि शूलेन स बिभेद ह।
बभञ्ज वृक्षवर्षं च कुम्भकर्णो महाबलः॥१६॥
परंतु महाबली कुम्भकर्ण ने अपने शूल से उन पर्वतशिखरों को फोड़ डाला और बरसाये जाने वाले वृक्षों के भी टुकड़े-टुकड़े कर डाले॥१६॥
ततो हरीणां तदनीकमुग्रं दुद्राव शूलं निशितं प्रगृह्य।
तस्थौ स तस्यापततः परस्ता न्महीधराग्रं हनुमान् प्रगृह्य ॥१७॥
तत्पश्चात् उसने अपने तीक्ष्ण शूल को हाथ में लेकर वानरों की उस भयंकर सेना पर आक्रमण किया। यह देख हनुमान जी एक पर्वत-शिखर हाथ में लेकर उस आक्रमणकारी राक्षस का सामना करने के लिये खड़े हो गये॥१७॥
स कुम्भकर्णं कुपितो जघान वेगेन शैलोत्तमभीमकायम्।
संचुक्षुभे तेन तदाभिभूतो मेदागात्रो रुधिरावसिक्तः॥१८॥
उन्होंने कुपित हो श्रेष्ठ पर्वत के समान भयानक शरीरवाले कुम्भकर्ण पर बड़े वेग से प्रहार किया। उनकी उस मार से कुम्भकर्ण व्याकुल हो उठा। उसका सारा शरीर चर्बी से गीला हो गया और वह रक्त से नहा गया॥
स शूलमाविध्य तडित्प्रकाशं गिरिं यथा प्रज्वलिताग्निशृङ्गम्।
बाह्वन्तरे मारुतिमाजघान गुहोऽचलं क्रौञ्चमिवोग्रशक्त्या॥१९॥
फिर तो उसने भी बिजली के समान चमकते हुए शूल को घुमाकर जिसके शिखर पर आग जल रही हो, उस पर्वत के समान हनुमान जी की छाती में उसी तरह मारा, जैसे स्वामी कार्तिकेय ने अपनी भयानक शक्ति से क्रौञ्चपर्वत पर आघात किया था॥ १९॥
स शूलनिर्भिन्नमहाभुजान्तरः प्रविह्वलः शोणितमुद्रमन् मुखात् ।
ननाद भीमं हनुमान् महाहवे युगान्तमेघस्तनितस्वनोपमम्॥२०॥
उस महासमर में शूल की चोट से हनुमान जी की दोनों भुजाओं के बीच का भाग (वक्षःस्थल) विदीर्ण हो गया। वे व्याकुल हो गये और मुँह से रक्त वमन करने लगे। उस समय पीड़ा के मारे उन्होंने बड़ा भयंकर आर्तनाद किया, जो प्रलयकाल के मेघों की गर्जना के समान जान पड़ता था॥ २०॥
ततो विनेदुः सहसा प्रहृष्टा रक्षोगणास्तं व्यथितं समीक्ष्य।
प्लवंगमास्तु व्यथिता भयार्ताः प्रदुद्रुवुः संयति कुम्भकर्णात्॥२१॥
हनुमान जी को आघात से पीड़ित देख राक्षसों के हर्ष की सीमा न रही। वे सहसा जोर-जोर से कोलाहल करने लगे। इधर कुम्भकर्ण के भय से पीड़ित एवं व्यथित हुए वानर युद्धभूमि छोड़कर भागने लगे। २१॥
ततस्तु नीलो बलवान् पर्यवस्थापयन् बलम्।
प्रविचिक्षेप शैलाग्रं कुम्भकर्णाय धीमते॥२२॥
यह देख बलवान् नील ने वानरसेना को धैर्य बँधाने एवं सुस्थिर रखनेके लिये बुद्धिमान् कुम्भकर्ण पर एक पर्वत का शिखर चलाया॥ २२॥
तदापतन्तं सम्प्रेक्ष्य मुष्टिनाभिजघान ह।
मुष्टिप्रहाराभिहतं तच्छैलाग्रं व्यशीर्यत।
सविस्फुलिङ्गं सज्वालं निपपात महीतले॥२३॥
उस पर्वत शिखर को अपने ऊपर आता देख कुम्भकर्ण ने उसपर मुक्के से आघात किया। उसका मुक्का लगते ही वह शिखर चूर-चूर होकर बिखर गया और आग की चिनगारियाँ तथा लपटें निकालता हुआ पृथ्वी पर गिर पड़ा॥ २३॥
ऋषभः शरभो नीलो गवाक्षो गन्धमादनः।
पञ्च वानरशार्दूलाः कुम्भकर्णमुपाद्रवन्॥२४॥
इसके बाद ऋषभ, शरभ, नील, गवाक्ष और गन्धमादन—इन पाँच प्रमुख वानरवीरों ने कुम्भकर्ण पर धावा किया॥ २४॥
शैलैर्वृक्षैस्तलैः पादैर्मुष्टिभिश्च महाबलाः।
कुम्भकर्णं महाकायं निजघ्नुः सर्वतो युधि॥२५॥
वे महाबली वीर चारों ओर से घेरकर युद्धस्थल में महाकाय कुम्भकर्ण को पर्वतों, वृक्षों, थप्पड़ों, लातों और मुक्कों से मारने लगे॥२५॥
स्पर्शानिव प्रहारांस्तान् वेदयानो न विव्यथे।
ऋषभं तु महावेगं बाहुभ्यां परिषस्वजे॥२६॥
यद्यपि ये लोग बड़े जोर-जोर से प्रहार करते थे, तथापि उसे ऐसा जान पड़ता था मानो कोई धीरे से छू रहा हो। अतः इनकी मार से उसे तनिक भी पीड़ा नहीं हुई। उसने महान् वेगशाली ऋषभ को अपनी दोनों भुजाओं में भर लिया॥२६॥
कुम्भकर्णभुजाभ्यां तु पीडितो वानरर्षभः।
निपपातर्षभो भीमः प्रमुखागतशोणितः॥ २७॥
कुम्भकर्ण की दोनों भुजाओं से दबकर पीड़ित हुए भयंकर वानरशिरोमणि ऋषभ के मुँह से खून निकलने लगा और वे पृथ्वी पर गिर पड़े॥२७॥
मुष्टिना शरभं हत्वा जानुना नीलमाहवे।
आजघान गवाक्षं तु तलेनेन्द्ररिपुस्तदा।
पादेनाभ्यहनत् क्रुद्धस्तरसा गन्धमादनम्॥२८॥
तदनन्तर उस समरभूमि में इन्द्रद्रोही कुम्भकर्ण ने शरभ को मुक्के से मारकर नील को घुटने से रगड़ दिया और गवाक्ष को थप्पड़ से मारा। फिर क्रोध से भरकर उसने गन्धमादन को बड़े वेग से लात मारी॥ २८॥
दत्तप्रहारव्यथिता मुमुहुः शोणितोक्षिताः।
निपेतुस्ते तु मेदिन्यां निकृत्ता इव किंशुकाः॥२९॥
उसके प्रहार से व्यथित हुए वानर मूर्च्छित हो गये और रक्त से नहा उठे। फिर कटे हुए पलाश-वृक्ष की भाँति पृथ्वी पर गिर पड़े॥२९॥
तेषु वानरमुख्येषु पातितेषु महात्मसु।
वानराणां सहस्राणि कुम्भकर्णं प्रदुद्रुवुः ॥३०॥
उन महामनस्वी प्रमुख वानरों के धराशायी हो जाने पर हजारों वानर एक साथ कुम्भकर्ण पर टूट पड़े॥
तं शैलमिव शैलाभाः सर्वे तु प्लवगर्षभाः।
समारुह्य समुत्पत्य ददंशुश्च महाबलाः॥३१॥
पर्वत के समान प्रतीत होने वाले वे समस्त महाबली वानर-यूथपति उस पर्वताकार राक्षस के ऊपर चढ़ गये और उछल-उछलकर उसे दाँतों से काटने लगे॥३१॥
तं नखैर्दशनैश्चापि मुष्टिभिर्बाहुभिस्तथा।
कुम्भकर्णं महाबाहुं निजघ्नुः प्लवगर्षभाः॥३२॥
वे वानरशिरोमणि नखों, दाँतों, मुक्कों और हाथों से महाबाहु कुम्भकर्ण को मारने लगे॥ ३२॥
स वानरसहस्रेस्तु विचितः पर्वतोपमः।
रराज राक्षसव्याघ्रो गिरिरात्मरुहैरिव॥३३॥
जैसे पर्वत अपने ऊपर उगे हुए वृक्षों से सुशोभित होता है, उसी प्रकार सहस्रों वानरों से व्याप्त हुआ वह पर्वताकार राक्षस वीर अद्भुत शोभा पाने लगा॥३३॥
बाहुभ्यां वानरान् सर्वान् प्रगृह्य स महाबलः।
भक्षयामास संक्रुद्धो गरुडः पन्नगानिव॥३४॥
जैसे गरुड़ सो को अपना आहार बनाते हैं, उसी तरह अत्यन्त कुपित हुआ वह महाबली राक्षस समस्त वानरों को दोनों हाथों से पकड़-पकड़कर भक्षण करने लगा॥३४॥
प्रक्षिप्ताः कुम्भकर्णेन वक्त्रे पातालसंनिभे।
नासापुटाभ्यां संजग्मुः कर्णाभ्यां चैव वानराः॥३५॥
कुम्भकर्ण अपने पाताल के समान मुख में वानरों को झोंकता जाता था और वे उसके कानों तथा नाकों की राह से बाहर निकलते जाते थे॥ ३५ ॥
भक्षयन् भृशसंक्रुद्धो हरीन् पर्वतसंनिभः।
बभञ्ज वानरान् सर्वान् संक्रुद्धो राक्षसोत्तमः॥३६॥
अत्यन्त क्रोध से भरकर वानरों का भक्षण करते हुए पर्वत के समान विशालकाय उस राक्षसराज ने समस्त वानरों के अङ्ग-भङ्ग कर डाले॥ ३६॥
मांसशोणितसंक्लेदां कुर्वन् भूमिं स राक्षसः।
चचार हरिसैन्येषु कालाग्निरिव मूर्च्छितः॥ ३७॥
रणभूमि में रक्त और मांस की कीच मचाता हुआ वह राक्षस बढ़ी हुई प्रलयाग्नि के समान वानरसेना में विचरने लगा॥ ३७॥
वज्रहस्तो यथा शक्रः पाशहस्त इवान्तकः।
शूलहस्तो बभौ युद्धे कुम्भकर्णो महाबलः॥३८॥
शूल हाथ में लेकर संग्रामभूमि में विचरता हुआ महाबली कुम्भकर्ण वज्रधारी इन्द्र और पाशधारी यमराज के समान जान पड़ता था॥ ३८॥
यथा शुष्काण्यरण्यानि ग्रीष्मे दहति पावकः।
तथा वानरसैन्यानि कुम्भकर्णो ददाह सः॥३९॥
जैसे ग्रीष्म ऋतु में दावानल सूखे जंगलों को जला देता है, उसी प्रकार कुम्भकर्ण वानरसेनाओं को दग्ध करने लगा॥३९॥
ततस्ते वध्यमानास्तु हतयूथाः प्लवंगमाः।
वानरा भयसंविग्ना विनेदुर्विकृतैः स्वरैः॥४०॥
जिनके यूथ-के-यूथ नष्ट हो गये थे, वे वानर कुम्भकर्ण की मार खाकर भय से उद्विग्न हो उठे और विकृत स्वर में चीत्कार करने लगे॥ ४०॥
अनेकशो वध्यमानाः कुम्भकर्णेन वानराः।
राघवं शरणं जग्मुर्व्यथिता भिन्नचेतसः॥४१॥
कुम्भकर्ण के हाथ से मारे जाते हुए बहुत-से वानर, जिनका दिल टूट गया था, व्यथित हो श्रीरघुनाथजी की शरण में गये॥४१॥
प्रभग्नान् वानरान् दृष्ट्वा वज्रहस्तात्मजात्मजः।
अभ्यधावत वेगेन कुम्भकर्णं महाहवे॥४२॥
वानरों को भागते देख वालिकुमार अङ्गद उस महासमर में कुम्भकर्ण की ओर बड़े वेग से दौड़े॥ ४२॥
शैलशृङ्गं महद् गृह्य विनदन् स मुहुर्मुहुः।
त्रासयन् राक्षसान् सर्वान् कुम्भकर्णपदानुगान्॥४३॥
चिक्षेप शैलशिखरं कुम्भकर्णस्य मूर्धनि।
उन्होंने बारंबार गर्जना करके एक विशाल शैलशिखर हाथ में ले लिया और कुम्भकर्ण के पीछे चलने वाले समस्त राक्षसों को भयभीत करते हुए उस पर्वत-शिखर को उसके मस्तक पर दे मारा॥ ४३
१/२॥
स तेनाभिहतो मूर्ध्नि शैलेनेन्द्ररिपुस्तदा॥४४॥
कुम्भकर्णः प्रजज्वाल क्रोधेन महता तदा।
सोऽभ्यधावत वेगेन वालिपुत्रममर्षणः॥४५॥
मस्तक पर उस पर्वत-शिखरकी चोट खाकर इन्द्रद्रोही कुम्भकर्ण उस समय महान् क्रोध से जल उठा और उस प्रहार को सहन न कर सकने के कारण बड़े वेग से वालिपुत्र की ओर दौड़ा॥ ४४-४५ ॥
कुम्भकर्णो महानादस्त्रासयन् सर्ववानरान्।
शूलं ससर्ज वै रोषादङ्गदे तु महाबलः॥४६॥
बड़े जोर से गर्जना करने वाले महाबली कुम्भकर्ण ने समस्त वानरों को संत्रस्त करते हुए अङ्गद पर बड़े रोष से शूल का प्रहार किया॥ ४६॥
तदापतन्तं बलवान् युद्धमार्गविशारदः।
लाघवान्मोक्षयामास बलवान् वानरर्षभः॥४७॥
किंतु युद्धमार्ग के ज्ञाता बलवान् वानरशिरोमणि अङ्गद ने फुर्ती से हटकर अपनी ओर आते हुए उस शूल से अपने-आपको बचा लिया॥४७॥
उत्पत्य चैनं तरसा तलेनोरस्यताडयत्।
स तेनाभिहतः कोपात् प्रमुमोहाचलोपमः॥४८॥
साथ ही बड़े वेग से उछलकर उन्होंने उसकी छाती में एक थप्पड़ मारा। क्रोधपूर्वक चलाये हुए उस थप्पड़ की मार खाकर वह पर्वताकार राक्षस मूर्च्छित हो गया॥४८॥
स लब्धसंज्ञोऽतिबलो मुष्टिं संगृह्य राक्षसः।
अपहस्तेन चिक्षेप विसंज्ञः स पपात ह॥४९॥
थोड़ी देर में जब उसे होश हुआ, तब उस अत्यन्त बलशाली राक्षस ने भी बायें हाथ से मुक्का बाँधकर अङ्गद पर प्रहार किया, जिससे वे अचेत होकर पृथ्वी पर गिर पड़े॥४९॥
तस्मिन् प्लवगशार्दूले विसंज्ञे पतिते भुवि।
तच्छूलं समुपादाय सुग्रीवमभिदुद्रुवे॥५०॥
वानरप्रवर अङ्गद के अचेत एवं धराशायी हो जाने पर कुम्भकर्ण वही शूल लेकर सुग्रीव की ओर दौड़ा॥५०॥
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य कुम्भकर्णं महाबलम्।
उत्पपात तदा वीरः सुग्रीवो वानराधिपः॥५१॥
महाबली कुम्भकर्ण को अपनी ओर आते देख वीर वानरराज सुग्रीव तत्काल ऊपर की ओर उछले॥
स पर्वताग्रमुत्क्षिप्य समाविध्य महाकपिः।
अभिदुद्राव वेगेन कुम्भकर्णं महाबलम्॥५२॥
महाकपि सुग्रीव ने एक पर्वत-शिखर को उठा लिया और उसे घुमाकर महाबली कुम्भकर्ण पर वेगपूर्वक धावा किया॥५२॥
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य कुम्भकर्णः प्लवंगमम्।
तस्थौ विवृत्तसर्वाङ्गो वानरेन्द्रस्य सम्मुखः॥५३॥
वानर सुग्रीव को आक्रमण करते देख कुम्भकर्ण अपने सारे अङ्गों को फैलाकर उन वानरराज के सामने खड़ा हो गया॥५३॥
कपिशोणितदिग्धाङ्गं भक्षयन्तं महाकपीन्।
कुम्भकर्णं स्थितं दृष्ट्वा सुग्रीवो वाक्यमब्रवीत्॥५४॥
कुम्भकर्ण का सारा शरीर वानरों के रक्त से नहा उठा था। वह बड़े-बड़े वानरों को खाता हुआ उनके सामने खड़ा था। उसे देखकर सुग्रीव ने कहा- ॥५४॥
पातिताश्च त्वया वीराः कृतं कर्म सुदुष्करम्।
भक्षितानि च सैन्यानि प्राप्तं ते परमं यशः॥
त्यज तद् वानरानीकं प्राकृतैः किं करिष्यसि।
सहस्वैकं निपातं मे पर्वतस्यास्य राक्षस॥५६॥
‘राक्षस! तुमने बहुत-से वीरों को मार गिराया, अत्यन्त दुष्कर कर्म कर दिखाया और कितने ही सैनिकों को अपना आहार बना लिया। इससे तुम्हें शौर्य का महान् यश प्राप्त हुआ है। अब इन वानरों की सेना को छोड़ दो। इन साधारण बंदरों से लड़कर क्या करोगे? यदि शक्ति हो तो मेरे चलाये हुए इस पर्वत की एक ही चोट सह लो’॥ ५५-५६॥
तद् वाक्यं हरिराजस्य सत्त्वधैर्यसमन्वितम्।
श्रुत्वा राक्षसशार्दूलः कुम्भकर्णोऽब्रवीद् वचः॥५७॥
वानरराज की यह सत्त्व और धैर्य से युक्त बात सुनकर राक्षसप्रवर कुम्भकर्ण बोला— ॥ ५७॥
प्रजापतेस्तु पौत्रस्त्वं तथैवर्लरजःसुतः।
धृतिपौरुषसम्पन्नस्तस्माद् गर्जसि वानर ॥५८॥
‘वानर ! तुम प्रजापति के पौत्र, ऋक्षरजा के पुत्र तथा धैर्य एवं पौरुष से सम्पन्न हो। इसीलिये इस तरह गरज रहे हो’॥ ५८॥
स कुम्भकर्णस्य वचो निशम्य व्याविध्य शैलं सहसा मुमोच।
तेनाजघानोरसि कुम्भकर्णं शैलेन वज्राशनिसंनिभेन॥५९॥
कुम्भकर्ण की यह बात सुनकर सुग्रीव ने उस शैलशिखर को घुमाकर सहसा उसके ऊपर छोड़ दिया। वह वज्र और अशनि के समान था। उसके द्वारा उन्होंने कुम्भकर्ण की छाती में गहरी चोट पहुँचायी॥ ५९॥
तच्छैलशृङ्गं सहसा विभिन्नं भुजान्तरे तस्य तदा विशाले।
ततो विषेदुः सहसा प्लवंगा रक्षोगणाश्चापि मुदा विनेदुः॥६०॥
किंतु उसके विशाल वक्षःस्थल से टकराकर वह शैल-शिखर सहसा चूर-चूर हो गया। यह देख वानर तत्काल विषाद में डूब गये और राक्षस बड़े हर्ष के साथ गर्जना करने लगे॥६०॥
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य कुम्भकर्णं महाबलम्।
उत्पपात तदा वीरः सुग्रीवो वानराधिपः॥५१॥
महाबली कुम्भकर्ण को अपनी ओर आते देख वीर वानरराज सुग्रीव तत्काल ऊपर की ओर उछले॥
स पर्वताग्रमुत्क्षिप्य समाविध्य महाकपिः।
अभिदुद्राव वेगेन कुम्भकर्णं महाबलम्॥५२॥
महाकपि सुग्रीव ने एक पर्वत-शिखर को उठा लिया और उसे घुमाकर महाबली कुम्भकर्णपर वेगपूर्वक धावा किया॥५२॥
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य कुम्भकर्णः प्लवंगमम्।
तस्थौ विवृत्तसर्वाङ्गो वानरेन्द्रस्य सम्मुखः॥५३॥
वानर सुग्रीव को आक्रमण करते देख कुम्भकर्ण अपने सारे अङ्गों को फैलाकर उन वानरराज के सामने खड़ा हो गया॥५३॥
कपिशोणितदिग्धाङ्गं भक्षयन्तं महाकपीन्।
कुम्भकर्णं स्थितं दृष्ट्वा सुग्रीवो वाक्यमब्रवीत्॥५४॥
कुम्भकर्ण का सारा शरीर वानरों के रक्त से नहा उठा था। वह बड़े-बड़े वानरों को खाता हुआ उनके सामने खड़ा था। उसे देखकर सुग्रीव ने कहा- ॥५४॥
पातिताश्च त्वया वीराः कृतं कर्म सुदुष्करम्।
भक्षितानि च सैन्यानि प्राप्तं ते परमं यशः॥
त्यज तद् वानरानीकं प्राकृतैः किं करिष्यसि।
सहस्वैकं निपातं मे पर्वतस्यास्य राक्षस॥५६॥
‘राक्षस! तुमने बहुत-से वीरों को मार गिराया, अत्यन्त दुष्कर कर्म कर दिखाया और कितने ही सैनिकों को अपना आहार बना लिया। इससे तुम्हें शौर्य का महान् यश प्राप्त हुआ है। अब इन वानरों की सेना को छोड़ दो। इन साधारण बंदरों से लड़कर क्या करोगे? यदि शक्ति हो तो मेरे चलाये हुए इस पर्वत की एक ही चोट सह लो’॥ ५५-५६॥
तद् वाक्यं हरिराजस्य सत्त्वधैर्यसमन्वितम्।
श्रुत्वा राक्षसशार्दूलः कुम्भकर्णोऽब्रवीद् वचः॥५७॥
वानरराज की यह सत्त्व और धैर्य से युक्त बात सुनकर राक्षसप्रवर कुम्भकर्ण बोला— ॥ ५७॥
प्रजापतेस्तु पौत्रस्त्वं तथैवर्लरजःसुतः।
धृतिपौरुषसम्पन्नस्तस्माद् गर्जसि वानर ॥५८॥
‘वानर ! तुम प्रजापति के पौत्र, ऋक्षरजा के पुत्र तथा धैर्य एवं पौरुष से सम्पन्न हो। इसीलिये इस तरह गरज रहे हो’॥ ५८॥
स कुम्भकर्णस्य वचो निशम्य व्याविध्य शैलं सहसा मुमोच।
तेनाजघानोरसि कुम्भकर्णं शैलेन वज्राशनिसंनिभेन॥५९॥
कुम्भकर्ण की यह बात सुनकर सुग्रीव ने उस शैलशिखर को घुमाकर सहसा उसके ऊपर छोड़ दिया। वह वज्र और अशनि के समान था। उसके द्वारा उन्होंने कुम्भकर्ण की छाती में गहरी चोट पहुँचायी॥ ५९॥
तच्छैलशृङ्गं सहसा विभिन्नं भुजान्तरे तस्य तदा विशाले।
ततो विषेदुः सहसा प्लवंगा रक्षोगणाश्चापि मुदा विनेदुः॥६०॥
किंतु उसके विशाल वक्षःस्थल से टकराकर वह शैल-शिखर सहसा चूर-चूर हो गया। यह देख वानर तत्काल विषाद में डूब गये और राक्षस बड़े हर्ष के साथ गर्जना करने लगे॥६०॥
स शैलशृङ्गाभिहतश्चुकोप ननाद रोषाच्च विवृत्य वक्त्रम्।
व्याविध्य शूलं स तडित्प्रकाशं चिक्षेप हपृक्षपतेर्वधाय॥६१॥
उस पर्वत-शिखर की चोट खाकर कुम्भकर्ण को बड़ा क्रोध हुआ। वह रोष से मुँह फैलाकर जोर-जोर से गर्जना करने लगा। फिर उसने बिजली के समान चमकने वाले उस शूल को घुमाकर सुग्रीव के वध के लिये चलाया॥ ६१॥
तत् कुम्भकर्णस्य भुजप्रणुन्नं शूलं शितं काञ्चनधामयष्टिम्।
क्षिप्रं समुत्पत्य निगृह्य दोर्ध्या बभञ्ज वेगेन सुतोऽनिलस्य॥६२॥
कुम्भकर्ण के हाथ से छूटे हुए उस तीखे शूल को, जिसके डंडे में सोने की लड़ियाँ लगी हुई थीं, वायुपुत्र हनुमान् ने शीघ्र उछलकर दोनों हाथों से पकड़ लिया और उसे वेगपूर्वक तोड़ डाला॥ ६२॥
कृतं भारसहस्रस्य शूलं कालायसं महत्।
बभञ्ज जानुमारोप्य तदा हृष्टः प्लवंगमः॥६३॥
वह महान् शूल हजार भार काले लोहे का बना हुआ था, जिसे हनुमान् जी ने बड़े हर्ष के साथ अपने घुटनों में लगाकर तत्काल तोड़ दिया॥६३॥
शूलं भग्नं हनुमता दृष्ट्वा वानरवाहिनी।
हृष्टा ननाद बहुशः सर्वतश्चापि दुद्रुवे॥६४॥
हनुमान् जी के द्वारा शूल को तोड़ा गया देख वानरसेना बड़े हर्ष से भरकर बारंबार सिंहनाद करने लगी और चारों ओर दौड़ लगाने लगी॥ ६४॥
बभूवाथ परित्रस्तो राक्षसो विमुखोऽभवत्।
सिंहनादं च ते चक्रुः प्रहृष्टा वनगोचराः।
मारुतिं पूजयांचक्रुर्दृष्ट्वा शूलं तथागतम्॥६५॥
परंतु वह राक्षस भय से थर्रा उठा। उसके मुख पर उदासी छा गयी और वनचारी वानर अत्यन्त प्रसन्न हो सिंहनाद करने लगे। उन सबने शूल को खण्डित हुआ देख पवनकुमार हनुमान जी की भूरि-भूरि प्रशंसा की॥
स तत् तथा भग्नमवेक्ष्य शूलं चुकोप रक्षोधिपतिर्महात्मा।
उत्पाट्य लङ्कामलयात् स शृङ्गं जघान सुग्रीवमुपेत्य तेन॥६६॥
इस प्रकार उस शूल को भग्न हुआ देख महाकाय राक्षसराज कुम्भकर्ण को बड़ा क्रोध हुआ और उसने लङ्का के निकटवर्ती मलय पर्वत का शिखर उठाकर सुग्रीव के निकट जा उन पर दे मारा॥६६॥
स शैलशृङ्गाभिहतो विसंज्ञः पपात भूमौ युधि वानरेन्द्रः।।
तं वीक्ष्य भूमौ पतितं विसंज्ञं नेदुः प्रहृष्टा युधि यातुधानाः॥६७॥
उस शैल-शिखर से आहत हो वानरराज सुग्रीव अपनी सुध-बुध खो बैठे और युद्धभूमि में गिर पड़े। उन्हें अचेत होकर पृथ्वी पर पड़ा देख निशाचरों को बड़ी प्रसन्नता हुई और वे रणक्षेत्र में सिंहनाद करने लगे॥ ६७॥
समभ्युपेत्याद्भुतघोरवीर्य स कुम्भकर्णो युधि वानरेन्द्रम्।
जहार सुग्रीवमभिप्रगृह्य यथानिलो मेघमिव प्रचण्डः॥६८॥
तदनन्तर कुम्भकर्ण ने युद्धस्थल में अद्भुत एवं भयानक पराक्रम प्रकट करने वाले वानरराज सुग्रीव के पास जाकर उन्हें उठा लिया और जैसे प्रचण्ड वायु बादलों को उड़ा ले जाती है, उसी तरह वह उन्हें हर ले गया॥ ६८॥
स तं महामेघनिकाशरूपमुत्पाट्य गच्छन् युधि कुम्भकर्णः।
रराज मेरुप्रतिमानरूपो मेरुर्यथा व्युच्छ्रितघोरशृङ्गः॥६९॥
कुम्भकर्ण का स्वरूप मेरुपर्वत के समान जान पड़ता था। वह महान् मेघ के समान रूपवाले सुग्रीव को उठाकर जब युद्धस्थल से चला, उस समय भयानक ऊँचे शिखरोंवाले मेरुगिरि के समान ही शोभा पाने लगा॥
ततस्तमादाय जगाम वीरः संस्तूयमानो युधि राक्षसेन्द्रः।
शृण्वन् निनादं त्रिदिवालयानां प्लवङ्गराजग्रहविस्मितानाम्॥७०॥
उन्हें लेकर वह वीर राक्षसराज लङ्का की ओर चल दिया। उस समय युद्धस्थल में सभी राक्षस उसकी स्तुति कर रहे थे। वानरराज के पकड़े जाने से आश्चर्यचकित हुए देवताओं का दुःखजनित शब्द उसे स्पष्ट सुनायी दे रहा था॥ ७० ॥
ततस्तमादाय तदा स मेने हरीन्द्रमिन्द्रोपममिन्द्रवीर्यः।
अस्मिन् हते सर्वमिदं हतं स्यात् सराघवं सैन्यमितीन्द्रशत्रः॥७१॥
इन्द्र के समान पराक्रमी इन्द्रद्रोही कुम्भकर्ण ने उस समय देवेन्द्रतुल्य तेजस्वी वानरराज सुग्रीव को पकड़कर मन-ही-मन यह मान लिया कि इनके मारे जाने से श्रीरामसहित यह सारी वानर-सेना स्वतः नष्ट हो जायगी॥
विद्रुतां वाहिनीं दृष्ट्वा वानराणामितस्ततः।
कुम्भकर्णेन सुग्रीवं गृहीतं चापि वानरम्॥७२॥
हनूमांश्चिन्तयामास मतिमान् मारुतात्मजः।
एवं गृहीते सुग्रीवे किं कर्तव्यं मया भवेत्॥७३॥
‘वानरों की सेना इधर-उधर भाग रही है और वानरराज सुग्रीव को कुम्भकर्ण ने पकड़ लिया है’, यह देखकर बुद्धिमान् पवनकुमार हनुमान् ने सोचा — ‘सुग्रीव के इस प्रकार पकड़ लिये जाने पर मुझे क्या करना चाहिये?
यद्धि न्याय्यं मया कर्तुं तत् करिष्याम्यसंशयम्।
भूत्वा पर्वतसंकाशो नाशयिष्यामि राक्षसम्॥७४॥
‘मेरे लिये जो भी करना उचित होगा, उसे मैं निःसन्देह करूँगा। पर्वताकार रूप धारण करके उस राक्षस का नाश कर डालूँगा॥ ७४॥
मया हते संयति कुम्भकर्णे महाबले मुष्टिविशीर्णदेहे।
विमोचिते वानरपार्थिवे च भवन्तु हृष्टाः प्लवगाः समग्राः॥७५॥
‘युद्धस्थल में अपने मुक्कों से मार-मारकर महाबली कुम्भकर्ण के शरीर को चूर-चूर कर दूंगा; इस प्रकार जब वह मेरे हाथ से मारा जायगा तथा वानरराज सुग्रीव को उसकी कैद से छुड़ा लिया जायगा, तब सारे वानर हर्ष से खिल उठेंगे; अच्छा ऐसा ही हो॥ ७५ ॥
अथवा स्वयमप्येष मोक्षं प्राप्स्यति वानरः।
गृहीतोऽयं यदि भवेत् त्रिदशैः सासुरोरगैः॥७६॥
‘अथवा ये सुग्रीव स्वयं ही उसकी पकड़ से छूट जायेंगे। यदि इन्हें देवता, असुर अथवा नाग भी पकड़ लें तो ये अपने ही प्रयत्न से उनकी कैद से भी छुटकारा पा जायँगे॥ ७६॥
मन्ये न तावदात्मानं बुध्यते वानराधिपः।
शैलप्रहाराभिहतः कुम्भकर्णेन संयुगे॥७७॥
‘मैं समझता हूँ कि युद्ध में कुम्भकर्ण ने शिला के प्रहार से सुग्रीव को जो गहरी चोट पहुँचायी है, उससे अचेत हुए वानरराज को अभी तक होश नहीं हुआ है।
अयं मुहूर्तात् सुग्रीवो लब्धसंज्ञो महाहवे।
आत्मनो वानराणां च यत् पथ्यं तत् करिष्यति॥७८॥
‘एक ही मुहूर्त में जब सुग्रीव सचेत होंगे, तब महासमर में अपने और वानरों के लिये जो हितकर कर्म होगा, उसे करेंगे॥ ७८॥
मया तु मोक्षितस्यास्य सुग्रीवस्य महात्मनः।
अप्रीतिश्च भवेत् कष्टा कीर्तिनाशश्च शाश्वतः॥७९॥
‘यदि मैं इन्हें छुड़ाऊँ तो महात्मा सुग्रीव को प्रसन्नता नहीं होगी, उलटे इनके मन में खेद होगा और सदा के लिये इनके यश का नाश हो जायगा॥ ७९॥
तस्मान्मुहूर्तं कांक्षिष्ये विक्रम मोक्षितस्य तु।
भिन्नं च वानरानीकं तावदाश्वासयाम्यहम्॥८०॥
‘अतः मैं एक मुहूर्त तक उनके छूटने की प्रतीक्षा करूँगा। फिर वे छूट जायेंगे तो उनका पराक्रम देलूँगा। तब तक भागी हुई वानर-सेना को धैर्य बँधाता हूँ’॥ ८०॥
इत्येवं चिन्तयित्वाथ हनूमान् मारुतात्मजः।
भूयः संस्तम्भयामास वानराणां महाचमूम्॥८१॥
ऐसा विचारकर पवनकुमार हनुमान् ने वानरों की उस विशाल वाहिनी को पुनः आश्वासन दे स्थिरतापूर्वक स्थापित किया॥ ८१॥
स कुम्भकर्णोऽथ विवेश लङ्कां स्फुरन्तमादाय महाहरिं तम्।
विमानचर्यागृहगोपुरस्थैः पुष्पाग्रयवर्षैरभिपूज्यमानः॥ ८२॥
उधर कुम्भकर्ण हाथ-पैर हिलाते हुए महावानर सुग्रीव को लिये-दिये लङ्का में घुस गया। उस समय विमानों (सतमहले मकानों), सड़क के दोनों ओर बनी हुई गृहपंक्तियों तथा गोपुरों में रहने वाले स्त्री-पुरुष उत्तम फूलों की वर्षा करके कुम्भकर्ण का स्वागतसत्कार कर रहे थे॥ ८२॥
लाजगन्धोदवर्षैस्तु सेच्यमानः शनैः शनैः।
राजवीथ्यास्तु शीतत्वात् संज्ञां प्राप महाबलः॥८३॥
लावा और गन्धयुक्त जल की वर्षाद्वारा अभिषिक्त हो राजमार्ग की शीतलता के कारण महाबली सुग्रीव को धीरे-धीरे होश आ गया॥ ८३॥
ततः स संज्ञामुपलभ्य कृच्छ्राद् बलीयसस्तस्य भुजान्तरस्थः।
अवेक्षमाणः पुरराजमार्ग विचिन्तयामास मुहर्महात्मा॥८४॥
तब बड़ी कठिनाई से सचेत हो बलवान् कुम्भकर्ण की भुजाओं में दबे हुए महात्मा सुग्रीव नगर और राजमार्ग की ओर देखकर बारंबार इस प्रकार विचार करने लगे— ॥ ८४॥
एवं गृहीतेन कथं नु नाम शक्यं मया सम्प्रतिकर्तुमद्य।
तथा करिष्यामि यथा हरीणां भविष्यतीष्टं च हितं च कार्यम्॥ ८५॥
‘इस प्रकार इस राक्षस की पकड़ में आकर अब मैं किस तरह इससे भरपूर बदला ले सकता हूँ? मैं वही करूँगा, जिससे वानरों का अभीष्ट और हितकर कार्य हो’ ।। ८५॥
ततः कराग्रैः सहसा समेत्य राजा हरीणाममरेन्द्रशत्रोः।
खरैश्च कर्णौ दशनैश्च नासां ददंश पादैर्विददार पाश्वौं॥८६॥
ऐसा निश्चय करके वानरों के राजा सुग्रीव ने सहसा हाथों के तीखे नखों द्वारा इन्द्रशत्रु कुम्भकर्ण के दोनों कान नोच लिये, दाँतों से उसकी नाक काट ली और अपने पैरों के नखों से उस राक्षस की दोनों पसलियाँ फाड़ डालीं॥८६॥
स कुम्भकर्णो हृतकर्णनासो विदारितस्तेन रदैर्नखैश्च।
रोषाभिभूतः क्षतजार्द्रगात्रः सुग्रीवमाविध्य पिपेष भूमौ॥ ८७॥
सुग्रीव के दाँतों और नखों से दोनों कानों का निम्न भाग और नाक कट जाने तथा पार्श्वभाग के विदीर्ण हो जाने से कुम्भकर्ण का सारा शरीर लहूलुहान हो गया। तब उसे बड़ा रोष हुआ और उसने सुग्रीव को घुमाकर भूमि पर पटक दिया। पटककर वह उन्हें भूमि पर रगड़ने लगा॥ ८७॥
स भूतले भीमबलाभिपिष्टः सुरारिभिस्तैरभिहन्यमानः।
जगाम खं कन्दुकवज्जवेन पुनश्च रामेण समाजगाम॥८८॥
भयानक बलशाली कुम्भकर्ण जब उन्हें पृथ्वी पर रगड़ रहा था और वे देवद्रोही राक्षस उनपर सब ओर से चोट कर रहे थे, उसी समय सुग्रीव सहसा गेंद की भाँति वेगपूर्वक आकाश में उछले और पुनः श्रीरामचन्द्रजी से आ मिले॥ ८८॥
कर्णनासाविहीनस्तु कुम्भकर्णो महाबलः।
रराज शोणितोत्सिक्तो गिरिः प्रस्रवणैरिव॥८९॥
महाबली कुम्भकर्ण अपनी नाक और कान खो बैठा। उसके अङ्गों से इस तरह खून बहने लगा, जैसे पर्वत से पानी के झरने गिरते हैं। वह रक्त से नहा उठा और झरनों से युक्त शैलशिखर की भाँति शोभा पाने लगा॥
शोणिताो महाकायो राक्षसो भीमदर्शनः।
युद्धायाभिमुखो भूयो मनश्चक्रे निशाचरः॥९०॥
महाकाय राक्षस रक्त से नहाकर और भी भयानक दिखायी देने लगा। उस निशाचर ने पुनः शत्रु के सामने जाकर युद्ध करने का विचार किया॥९० ॥
अमर्षाच्छोणितोद्गारी शुशुभे रावणानुजः।
नीलाञ्जनचयप्रख्यः ससंध्य इव तोयदः॥९१॥
अमर्षपूर्वक रक्त वमन करता हुआ रावण का छोटा भाई कुम्भकर्ण, जिसके शरीर का रंग काले मेघ के समान था, संध्याकाल के बादल की भाँति सुशोभित हो रहा था।
गते च तस्मिन् सुरराजशत्रुः क्रोधात् प्रदुद्राव रणाय भूयः।
अनायुधोऽस्मीति विचिन्त्य रौद्रो घोरं तदा मुद्गरमाससाद॥९२॥
सुग्रीव के निकल भागने पर वह इन्द्रद्रोही राक्षस फिर युद्ध के लिये दौड़ा। उस समय यह सोचकर कि ‘मेरे पास कोई हथियार नहीं है’ उसने एक बड़ा भयंकर मुद्गर ले लिया॥९२॥
ततः स पुर्याः सहसा महौजा निष्क्रम्य तद् वानरसैन्यमुग्रम्।
बभक्ष रक्षो युधि कुम्भकर्णः प्रजा युगान्ताग्निरिव प्रवृद्धः॥९३॥
तदनन्तर महाबलशाली राक्षस कुम्भकर्ण सहसा लङ्कापुरी से निकलकर प्रजा का भक्षण करने वाली प्रलयकाल की प्रज्वलित अग्नि के समान उस भयंकर वानर-सेना को युद्धस्थल में अपना आहार बनाने लगा॥
बुभुक्षितः शोणितमांसगृनुः प्रविश्य तद् वानरसैन्यमुग्रम्।
चखाद रक्षांसि हरीन् पिशाचानृक्षांश्च मोहाद् युधि कुम्भकर्णः।
यथैव मृत्युर्हरते युगान्ते स भक्षयामास हरीश्च मुख्यान्॥९४॥
उस समय कुम्भकर्ण को भूख सता रही थी, अतएव वह रक्त और मांस के लिये लालायित हो रहा था। उसने उस भयंकर वानर-सेना में प्रवेश करके मोहवश वानरों और भालुओं के साथ-साथ राक्षसों तथा पिशाचों को भी खाना आरम्भ कर दिया। वह प्रधान-प्रधान वानरों को उसी प्रकार अपना ग्रास बना रहा था, जैसे प्रलयकाल में मृत्यु प्राणियों के प्राणों का अपहरण करती है॥९४॥
एकं द्वौ त्रीन् बहून् क्रुद्धो वानरान् सह राक्षसैः।
समादायैकहस्तेन प्रचिक्षेप त्वरन् मुखे॥९५॥
वह बड़ी उतावली के साथ एक हाथ से क्रोधपूर्वक एक, दो, तीन तथा बहुत-बहुत राक्षसों और वानरों को समेटकर अपने मुँह में झोंक लेता था॥ ९५॥
सम्प्रस्रवंस्तदा मेदः शोणितं च महाबलः।
वध्यमानो नगेन्द्राग्रैर्भक्षयामास वानरान्॥९६॥
उस समय वह महाबली निशाचर पर्वत-शिखरों की मार खाता हुआ भी मुँह से वानरों की चर्बी और रक्त गिराता हुआ उन सबका भक्षण कर रहा था॥ ९६ ॥
ते भक्ष्यमाणा हरयो राम जग्मुस्तदा गतिम्।
कुम्भकर्णो भृशं क्रुद्धः कपीन् खादन् प्रधावति॥९७॥
उसके द्वारा खाये जाते हुए वानर भयभीत हो उस समय भगवान् श्रीराम की शरण में गये। उधर कुम्भकर्ण अत्यन्त कुपित हो वानरों को अपना आहार बनाता हुआ सब ओर उन पर धावा करने लगा। ९७॥
शतानि सप्त चाष्टौ च विंशत् त्रिंशत् तथैव च।
सम्परिष्वज्य बाहुभ्यां खादन् विपरिधावति॥९८॥
वह सात, आठ, बीस, तीस तथा सौ-सौ वानरों को अपनी दोनों भुजाओं में भर लेता और उन्हें खाता हुआ रणभूमि में दौड़ता-फिरता था॥९८ ॥
मेदोवसाशोणितदिग्धगात्रः कर्णावसक्तग्रथितान्त्रमालः।
ववर्ष शूलानि सुतीक्ष्णदंष्ट्रः कालो युगान्तस्थ इव प्रवृद्धः॥९९॥
उसके शरीर में मेद, चर्बी और रक्त लिपटे हुए थे। उसके कानों में आँतों की मालाएँ उलझी हुई थीं तथा उसकी दाढ़ें बहुत तीखी थीं। वह महाप्रलय के समय प्राणियों का संहार करने वाले विशाल रूपधारी काल के समान वानरों पर शूलों की वर्षा कर रहा था॥९९॥
तस्मिन् काले सुमित्रायाः पुत्रः परबलार्दनः।
चकार लक्ष्मणः क्रुद्धो युद्धं परपुरंजयः॥१००॥
उस समय शत्रुनगरी पर विजय पाने तथा शत्रुओं का संहार करने वाले सुमित्राकुमार लक्ष्मण कुपित होकर उस राक्षस के साथ युद्ध करने लगे॥ १०० ।।
स कुम्भकर्णस्य शरान् शरीरे सप्त वीर्यवान्।
निचखानाददे चान्यान् विससर्ज च लक्ष्मणः॥१०१॥
उन पराक्रमी लक्ष्मण ने कुम्भकर्ण के शरीर में सात बाण धंसा दिये। फिर दूसरे बाण लिये और उन्हें भी उस पर छोड़ दिया॥१०१॥
पीड्यमानस्तदस्त्रं तु विशेषं तत् स राक्षसः।
ततश्चुकोप बलवान् सुमित्रानन्दवर्धनः॥१०२॥
उनसे पीड़ित हुए उस राक्षस ने लक्ष्मण के उस अस्त्र को निःशेष कर दिया। तब सुमित्रा के आनन्द को बढ़ाने वाले बलवान् लक्ष्मण को बड़ा क्रोध हुआ। १०२॥
अथास्य कवचं शुभ्रं जाम्बूनदमयं शुभम्।
प्रच्छादयामास शरैः संध्याभ्रमिव मारुतः॥१०३॥
उन्होंने कुम्भकर्ण के सुवर्णनिर्मित सुन्दर एवं दीप्तिमान् कवच को अपने बाणों से ढककर उसी तरह अदृश्य कर दिया, जैसे हवाने संध्याकाल के बादल को उखाड़कर अदृश्य कर दिया हो॥ १०३॥
नीलाञ्जनचयप्रख्यः शरैः काञ्चनभूषणैः।
आपीड्यमानः शुशुभे मेघैः सूर्य इवांशुमान्॥१०४॥
काले कोयले के ढेर की-सी कान्तिवाला कुम्भकर्ण लक्ष्मण के सुवर्णभूषित बाणों से आच्छादित हो मेघों से ढके हुए अंशुमाली सूर्य के समान शोभा पा रहा था।
ततः स राक्षसो भीमः सुमित्रानन्दवर्धनम्।
सावज्ञमेव प्रोवाच वाक्यं मेघौघनिःस्वनः॥१०५॥
तब उस भयंकर राक्षस ने मेघ की गर्जना के समान गम्भीर स्वर से सुमित्रानन्दन लक्ष्मण का तिरस्कार करते हुए कहा— ॥ १०५॥
अन्तकस्याप्यकष्टेन युधि जेतारमाहवे।
युध्यता मामभीतेन ख्यापिता वीरता त्वया॥१०६॥
‘लक्ष्मण! मैं युद्ध में यमराज को भी बिना कष्ट उठाये ही जीत लेने की शक्ति रखता हूँ। तुमने मेरे साथ निर्भय होकर युद्ध करते हुए अपनी अद्भुत वीरता का परिचय दिया है॥ १०६॥
प्रगृहीतायुधस्येह मृत्योरिव महामृधे।
तिष्ठन्नप्यग्रतः पूज्यः किमु युद्धप्रदायकः॥१०७॥
‘जब मैं महासमर में मृत्यु के समान हथियार लेकर युद्ध के लिये उद्यत होऊँ, उस समय जो मेरे सामने खड़ा रह जाय, वह भी प्रशंसा का पात्र है। फिर जो मुझे युद्ध प्रदान कर रहा हो, उसके लिये तो कहना ही क्या है ?॥ १०७॥
ऐरावतं समारूढो वृतः सर्वामरैः प्रभुः।
नैव शक्रोऽपि समरे स्थितपूर्वः कदाचन॥१०८॥
‘ऐरावत पर आरूढ़ हो सम्पूर्ण देवताओं से घिरे हुए शक्तिशाली इन्द्र भी पहले मेरे सामने युद्ध में नहीं ठहर सके हैं॥ १०८॥
अद्य त्वयाहं सौमित्रे बालेनापि पराक्रमैः।
तोषितो गन्तुमिच्छामि त्वामनुज्ञाप्य राघवम्॥१०९॥
‘सुमित्रानन्दन! तुमने बालक होकर भी आज अपने पराक्रम से मुझे संतुष्ट कर दिया, अतः मैं तुम्हारी अनुमति लेकर युद्ध के लिये श्रीराम के पास जाना चाहता हूँ॥ १०९॥
यत् तु वीर्यबलोत्साहैस्तोषितोऽहं रणे त्वया।
राममेवैकमिच्छामि हन्तुं यस्मिन् हते हतम्॥ ११०॥
‘तुमने अपने वीर्य, बल और उत्साह से रणभूमि में मुझे संतोष प्रदान किया है; इसलिये अब मैं केवल राम को ही मारना चाहता हूँ, जिनके मारे जाने पर सारी शत्रुसेना स्वतः मर जायगी॥ ११० ॥
रामे मयात्र निहते येऽन्ये स्थास्यन्ति संयुगे।
तानहं योधयिष्यामि स्वबलेन प्रमाथिना॥१११॥
‘मेरे द्वारा राम के मारे जाने पर जो दूसरे लोग युद्धभूमि में खड़े रहेंगे, उन सबके साथ मैं अपने संहारकारी बल के द्वारा युद्ध करूँगा’॥ १११॥
इत्युक्तवाक्यं तद् रक्षः प्रोवाच स्तुतिसंहितम्।
मृधे घोरतरं वाक्यं सौमित्रिः प्रहसन्निव॥११२॥
वह राक्षस जब पूर्वोक्त बात कह चुका, तब सुमित्राकुमार लक्ष्मण रणभूमि में ठठाकर हँस पड़े और उससे प्रशंसा मिश्रित कठोर वाणी में बोले- ॥ ११२॥
यस्त्वं शक्रादिभिर्देवैरसह्यः प्राप्य पौरुषम्।
तत् सत्यं नान्यथा वीर दृष्टस्तेऽद्य पराक्रमः॥११३॥
एष दाशरथी रामस्तिष्ठत्यद्रिरिवाचलः।
‘वीर कुम्भकर्ण! तुम महान् पौरुष पाकर जो इन्द्र आदि देवताओं के लिये भी असह्य हो उठे हो, वह तुम्हारा कथन बिलकुल ठीक है, झूठ नहीं है। मैंने स्वयं अपनी आँखों से आज तुम्हारा पराक्रम देख लिया। ये रहे दशरथनन्दन भगवान् श्रीराम, जो पर्वत के समान अविचल भाव से खड़े हैं’॥ ११३ १/२॥
इति श्रुत्वा ह्यनादृत्य लक्ष्मणं स निशाचरः॥११४॥
अतिक्रम्य च सौमित्रिं कुम्भकर्णो महाबलः।
राममेवाभिदुद्राव कम्पयन्निव मेदिनीम्॥११५॥
लक्ष्मण की यह बात सुनकर उसका आदर न करते हुए महाबली निशाचर कुम्भकर्ण ने सुमित्राकुमार को लाँघकर श्रीराम पर ही धावा किया। उस समय वह अपने पैरों की धमक से पृथ्वी को कम्पित-सी किये देता था॥
अथ दाशरथी रामो रौद्रमस्त्रं प्रयोजयन्।
कुम्भकर्णस्य हृदये ससर्ज निशितान् शरान्॥११६॥
उसे आते देख दशरथनन्दन श्रीराम ने रौद्रास्त्रका प्रयोग करके कुम्भकर्ण के हृदय में अनेक तीखे बाण मारे॥ ११६॥
तस्य रामेण विद्धस्य सहसाभिप्रधावतः।
अङ्गारमिश्राः क्रुद्धस्य मुखान्निश्चेरुरर्चिषः॥११७॥
श्रीराम के बाणों से घायल हो वह सहसा उन पर टूट पड़ा। उस समय क्रोध से भरे हुए कुम्भकर्ण के मुख से अङ्गारमिश्रित आग की लपटें निकल रही थीं॥ ११७॥
रामास्त्रविद्धो घोरं वै नर्दन् राक्षसपुङ्गवः।
अभ्यधावत संक्रुद्धो हरीन् विद्रावयन् रणे॥११८॥
भगवान् श्रीराम के अस्त्रसे पीड़ित हो राक्षसप्रवर कुम्भकर्ण घोर गर्जना करता और रणभूमि में वानरों को खदेड़ता हुआ क्रोधपूर्वक उनकी ओर दौड़ा॥ ११८ ॥
तस्योरसि निमग्नास्ते शरा बर्हिणवाससः।
हस्ताच्चास्य परिभ्रष्टा गदा चोर्ध्या पपात ह॥११९॥
श्रीराम के बाणों में मोर के पंख लगे हुए थे। वे कुम्भकर्ण की छाती में फँस गये। अतः व्याकुलता के कारण उसके हाथ से गदा छूटकर पृथ्वी पर गिर पड़ी॥ ११९॥
आयुधानि च सर्वाणि विप्रकीर्यन्त भूतले।
स निरायुधमात्मानं यदा मेने महाबलः॥१२०॥
मुष्टिभ्यां च कराभ्यां च चकार कदनं महत्।
इतना ही नहीं, उसके अन्य सब आयुध भी भूमि पर बिखर गये। जब उसने समझ लिया कि अब मेरे पास कोई हथियार नहीं है, तब उस महाबली निशाचर ने दोनों मुक्कों और हाथों से ही वानरों का महान् संहार आरम्भ किया॥ १२० १/२॥
स बाणैरतिविद्धाङ्गः क्षतजेन समुक्षितः।
रुधिरं परिसुस्राव गिरिः प्रस्रवणं यथा॥१२१॥
बाणों से उसके सारे अङ्ग अत्यन्त घायल हो गये थे, इसलिये वह खून से नहा उठा और जैसे पर्वत झरने बहाता है, उसी तरह वह अपनी देह से रक्त की धारा बहाने लगा॥ १२१॥
स तीवेण च कोपेन रुधिरेण च मूर्च्छितः।
वानरान् राक्षसानृक्षान् खादन् स परिधावति॥१२२॥
वह खून से लथपथ और दुःसह क्रोध से व्याकुल होकर वानरों, भालुओं तथा राक्षसों को भी खाता हुआ चारों ओर दौड़ने लगा॥ १२२ ॥
अथ शृङ्गं समाविध्य भीमं भीमपराक्रमः।
चिक्षेप राममुद्दिश्य बलवानन्तकोपमः॥१२३॥
इसी बीच में यमराज के समान प्रतीत होने वाले उस बलवान् एवं भयानक पराक्रमी निशाचर ने एक भयंकर पर्वत का शिखर उठाया और उसे घुमाकर श्रीरामचन्द्रजी को लक्ष्य करके चला दिया॥ १२३॥
अप्राप्तमन्तरा रामः सप्तभिस्तमजिह्मगैः।
चिच्छेद गिरिशृङ्गं तं पुनः संधाय कार्मुकम्॥१२४॥
परंतु श्रीराम ने पुनः धनुष का संधान करके सीधे जाने वाले सात बाण मारकर उस पर्वत-शिखर को बीच में ही टूक-टूक कर डाला, अपने पास तक नहीं आने दिया॥
ततस्तु रामो धर्मात्मा तस्य शृङ्गं महत् तदा।
शरैः काञ्चनचित्राङ्गैश्चिच्छेद भरताग्रजः॥१२५॥
तन्मेरुशिखराकारं द्योतमानमिव श्रिया।
द्वे शते वानराणां च पतमानमपातयत्॥१२६॥
भरत के बड़े भाई धर्मात्मा श्रीराम ने सुवर्णभूषित विचित्र बाणों द्वारा जब उस महान् पर्वतशिखर को काट दिया, उस समय अपनी प्रभा से प्रकाशित-सा होते हुए उस मेरुपर्वत के शृङ्गसदृश शिखर ने भूमि पर गिरते-गिरते दो सौ वानरों को धराशायी कर दिया। १२५-१२६॥
तस्मिन् काले स धर्मात्मा लक्ष्मणो राममब्रवीत्।
कुम्भकर्णवधे युक्तो योगान् परिमृशन् बहून्॥१२७॥
उस समय धर्मात्मा लक्ष्मण ने, जो कुम्भकर्ण के वध के लिये नियुक्त थे, उसके वध की अनेक युक्तियों का विचार करते हुए श्रीराम से कहा— ॥ १२७॥
नैवायं वानरान् राजन् न विजानाति राक्षसान्।
मत्तः शोणितगन्धेन स्वान् परांश्चैव खादति॥१२८॥
‘राजन्! यह राक्षस शोणित की गन्ध से मतवाला हो गया है; अतः न वानरों को पहचानता है न राक्षसों को अपने और पराये दोनों ही पक्षों के योद्धाओं को खा रहा है। १२८॥
साध्वेनमधिरोहन्तु सर्वतो वानरर्षभाः।
यूथपाश्च यथा मुख्यास्तिष्ठन्त्वस्मिन् समन्ततः॥१२९॥
‘अतः श्रेष्ठ वानर-यूथपतियों में जो प्रधान लोग हैं, वे सब ओर से इसके ऊपर चढ़ जायँ और इसके शरीर पर ही बैठे रहें॥ १२९॥
अद्यायं दुर्मतिः काले गुरुभारप्रपीडितः।
प्रचरन् राक्षसो भूमौ नान्यान् हन्यात् प्लवंगमान्॥१३०॥
‘ऐसा होने से यह दुर्बुद्धि निशाचर इस समय भारी भार से पीड़ित हो रणभूमि में विचरण करते समय दूसरे वानरों को नहीं मार सकेगा’ ॥ १३०॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राजपुत्रस्य धीमतः।
ते समारुरुहुर्हृष्टाः कुम्भकर्णं महाबलाः॥१३१॥
बुद्धिमान् राजकुमार लक्ष्मण की यह बात सुनकर वे महाबली वानर-यूथपति बड़े हर्ष के साथ कुम्भकर्ण पर चढ़ गये॥ १३१॥
कुम्भकर्णस्तु संक्रुद्धः समारूढः प्लवंगमैः।
व्यधूनयत् तान् वेगेन दुष्टहस्तीव हस्तिपान्॥१३२॥
वानरों के चढ़ जाने पर कुम्भकर्ण अत्यन्त कुपित हो उठा और जैसे बिगडैल हाथी महावतों को गिरा देता है, उसी प्रकार उसने वेगपूर्वक वानरों को अपनी देह हिलाकर गिरा दिया॥ १३२॥
तान् दृष्ट्वा निधुतान् रामो रुष्टोऽयमिति राक्षसम्।
समुत्पपात वेगेन धनुरुत्तममाददे॥१३३॥
उन सबको गिराया गया देख श्रीराम ने यह समझ लिया कि कुम्भकर्ण रुष्ट हो गया है। फिर वे बड़े वेग से उछलकर उस राक्षस की ओर दौड़े और एक उत्तम धनुष हाथ में ले लिया॥ १३३॥
क्रोधरक्तेक्षणो धीरो निर्दहन्निव चक्षुषा।
राघवो राक्षसं वेगादभिदुद्राव वेगितः।
यूथपान् हर्षयन् सर्वान् कुम्भकर्णबलार्दितान्॥१३४॥
उस समय उनके नेत्र क्रोध से लाल हो रहे थे। वे धीर-वीर श्रीरघुनाथजी उसकी ओर इस प्रकार देखने लगे, मानो उसे अपनी दृष्टि से दग्ध कर डालेंगे। उन्होंने कुम्भकर्ण के बल से पीड़ित समस्त
वानरयूथपतियों का हर्ष बढ़ाते हुए बड़े वेग से उस राक्षस पर धावा किया॥१३४॥
स चापमादाय भुजंगकल्पं दृढज्यमुग्रं तपनीयचित्रम्।
हरीन् समाश्वास्य समुत्पपात रामो निबद्धोत्तमतूणबाणः॥१३५॥
सुदृढ़ प्रत्यञ्चा से संयुक्त, सर्प के समान भयंकर और सुवर्ण से जटित होने के कारण विचित्र शोभा से सम्पन्न उग्र धनुष को हाथ में लेकर श्रीराम ने उत्तम तरकस और बाण बाँध लिये और वानरों को आश्वासन देकर उन्होंने कुम्भकर्ण पर बड़े वेग से आक्रमण किया॥१३५॥
स वानरगणैस्तैस्तु वृतः परमदुर्जयैः।
लक्ष्मणानुचरो वीरः सम्प्रतस्थे महाबलः॥।१३६॥
उस समय अत्यन्त दुर्जय वानरसमूहों ने उन्हें चारों ओर से घेर रखा था। लक्ष्मण उनके पीछे-पीछे चल रहे थे। इस प्रकार वे महाबली वीर श्रीराम आगे बढ़े॥ १३६॥
स ददर्श महात्मानं किरीटिनमरिंदमम्।
शोणिताप्लुतरक्ताक्षं कुम्भकर्णं महाबलः॥१३७॥
सर्वान् समभिधावन्तं यथा रुष्टं दिशागजम्।
मार्गमाणं हरीन् क्रुद्धं राक्षसैः परिवारितम्॥१३८॥
उन महान् बलशाली श्रीराम ने देखा, महाकाय शत्रुदमन कुम्भकर्ण मस्तक पर किरीट धारण किये सब ओर धावा कर रहा है। उसके सारे अङ्ग खून से लथपथ हो रहे हैं। वह रोष से भरे हुए दिग्गज की भाँति क्रोधपूर्वक वानरों को खोज रहा है और उन सब पर आक्रमण करता है। बहुत-से राक्षस उसे घेरे हुए हैं॥ १३७-१३८॥
विन्ध्यमन्दरसंकाशं काञ्चनाङ्गदभूषणम्।
स्रवन्तं रुधिरं वक्त्राद् वर्षमेघमिवोत्थितम्॥१३९॥
वह विन्ध्य और मन्दराचल के समान जान पड़ता है। सोने के बाजूबंद उसकी भुजाओं को विभूषित किये हुए हैं तथा वह (वर्षाकाल में) उमड़े हुए जलवर्षी मेघ की भाँति मुँह से रक्त की वर्षा कर रहा है॥ १३९॥
जिह्वया परिलिह्यन्तं सृक्किणी शोणितोक्षिते।
मृनन्तं वानरानीकं कालान्तकयमोपमम्॥१४०॥
जिह्वा के द्वारा रक्त से भीगे हुए जबड़े चाट रहा है और प्रलयकाल के संहारकारी यमराज की भाँति वानरों की सेना को रौंद रहा है॥ १४०॥
तं दृष्ट्वा राक्षसश्रेष्ठं प्रदीप्तानलवर्चसम्।
विस्फारयामास तदा कार्मुकं पुरुषर्षभः॥१४१॥
इस प्रकार प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी राक्षसशिरोमणि कुम्भकर्ण को देखकर पुरुषप्रवर श्रीराम ने तत्काल अपना धनुष खींचा॥ १४१॥
स तस्य चापनि?षात् कुपितो राक्षसर्षभः।
अमृष्यमाणस्तं घोषमभिदुद्राव राघवम्॥१४२॥
उनके धनुष की टंकार सुनकर राक्षसश्रेष्ठ कुम्भकर्ण कुपित हो उठा और उस टंकारध्वनि को सहन न करके श्रीरघुनाथजी की ओर दौड़ा* ॥ १४२॥
* इस श्लोक के बाद कुछ प्रतियों में निम्नाङ्कित श्लोक अधिक उपलब्ध होते हैं, जो उपयोगी होने से यहाँ अर्थसहित दिये जा रहे हैं
पुरस्ताद् राघवस्यार्थे गदायुक्तो विभीषणः।
अभिदुद्राव वेगेन भ्राता भ्रातरमाहवे॥
विभीषणं पुरो दृष्ट्वा कुम्भकर्णोऽब्रवीदिदम्।
प्रहरस्व रणे शीघ्रं क्षत्रधर्मे स्थिरो भव॥
भ्रातृस्नेहं परित्यज्य राघवस्य प्रियं कुरु।
अस्मत्कार्यं कृतं वत्स यस्त्वं राममुपागतः॥
त्वमेको रक्षसां लोके सत्यधर्माभिरक्षिता।
नास्ति धर्माभिरक्तानां व्यसनं तु कदाचन॥
संतानार्थं त्वमेवैकः कुलस्यास्य भविष्यसि।
राघवस्य प्रसादात् त्वं रक्षसां राज्यमाप्स्यसि॥
प्रकृत्या मम दुर्धर्ष शीघ्रं मार्गादपक्रम।
न स्थातव्यं पुरस्तान्मे सम्भ्रमान्नष्टचेतसः॥
न वेद्मि संयुगेसक्तःस्वान्परान् वा निशाचर।
रक्षणीयोऽसि मे वत्स सत्यमेतद् ब्रवीमि ते॥
एवमुक्तो वचस्तेन कुम्भकर्णेन धीमता।
विभीषणो महाबाहुः कुम्भकर्णमुवाच ह॥
गदितं मे कुलस्यास्य रक्षणार्थमिरंदम।
न श्रुतं सर्वरक्षोभिस्ततोऽहं राममागतः॥
कृतं तु तन्महाभाग सुकृतं दुष्कृतं तु वा।
एवमुक्त्वाश्रुपूर्णाक्षो गदापाणिर्विभीषणः।
एकान्तमाश्रितो भूत्वा चिन्तयामास संस्थितः॥
तब श्रीरामचन्द्रजी के लिये युद्ध करने के निमित्त गदा हाथ में लिये विभीषण उनके आगे आकर खड़े हो गये और उस युद्धस्थल में भाई होकर भाई का सामना करने के लिये बड़े वेग से आगे बढ़े। विभीषण को सामने देखकर कुम्भकर्ण ने इस प्रकार कहा—’वत्स! तुम भाई का स्नेह छोड़कर श्रीरघुनाथजी का प्रिय करो और रणभूमि में शीघ्र मेरे ऊपर गदा चलाओ। इस समय तुम क्षात्रधर्म में दृढ़तापूर्वक स्थिर रहो। तुम जो श्रीराम की शरण में आ गये, इससे तुमने हमलोगों का काम बना दिया। राक्षसों में एक तुम्हीं ऐसे हो, जिसने इस जगत् में सत्य और धर्म की रक्षा की है। जो धर्म में अनुरक्त होते हैं, उन्हें कभी कोई दुःख नहीं भोगना पड़ता है। अब एकमात्र तुम्हीं इस कुल की संतानपरम्परा को सुरक्षित रखने के लिये जीवित रहोगे। श्रीरघुनाथजी की कृपा से तुम्हें राक्षसों का राज्य प्राप्त होगा। दुर्जय वीर ! मेरी प्रकृति से तो तुम परिचित ही हो; अतः शीघ्र मेरा रास्ता छोड़कर दूर हट जाओ। इस समय सम्भ्रम के कारण मेरी विचारशक्ति नष्ट हो गयी है; अतः तुम्हें मेरे सामने नहीं खड़ा होना चाहिये। निशाचर! इस समय युद्ध में आसक्त होने के कारण मुझे अपने अथवा पराये की पहचान नहीं हो रही है, तथापि वत्स! तुम मेरे लिये रक्षणीय हो —मैं तुम्हारा वध करना नहीं चाहता। यह तुमसे सच्ची बात कहता हूँ।’ बुद्धिमान् कुम्भकर्ण के ऐसा कहने पर महाबाह विभीषण ने उससे कहा—’शत्रुओं का दमन करने वाले वीर! मैंने इस कुल की रक्षा के लिये बहुत कुछ कहा था; किंतु समस्त राक्षसों ने मेरी बात नहीं सुनी; अतः मैं निराश होकर श्रीराम की शरण में आ गया। महाभाग! यह मेरे लिये पुण्य हो या पाप। अब मैंने श्रीराम का आश्रय तो ग्रहण कर ही लिया।’ ऐसा कहकर गदाधारी विभीषण के नेत्रों में आँसू भर आये और वे एकान्त का आश्रय ले खड़े होकर चिन्ता करने लगे।
ततस्तु वातोद्धतमेघकल्पं भुजंगराजोत्तमभोगबाहुः।
तमापतन्तं धरणीधराभमुवाच रामो युधि कुम्भकर्णम्॥१४३॥
तदनन्तर जिनकी भुजाएँ नागराज वासुकि के समान विशाल और मोटी थीं, उन भगवान् श्रीराम ने पवन की प्रेरणा से उमड़े हुए मेघ के समान काले और पर्वत के समान ऊँचे शरीरवाले कुम्भकर्ण को आक्रमण करते देख रणभूमि में उससे कहा- ॥ १४३॥
आगच्छ रक्षोऽधिप मा विषादमवस्थितोऽहं प्रगृहीतचापः।
अवेहि मां राक्षसवंशनाशनं यस्त्वं मुहूर्ताद् भविता विचेताः॥१४४॥
‘राक्षसराज! आओ, विषाद न करो। मैं धनुष लेकर खड़ा हूँ। मुझे राक्षसवंश का विनाश करने वाला समझो। अब तुम भी दो ही घड़ी में अपनी चेतना खो बैठोगे (मर जाओगे)’ ॥ १४४॥
रामोऽयमिति विज्ञाय जहास विकृतस्वनम्।
अभ्यधावत संक्रुद्धो हरीन् विद्रावयन् रणे॥१४५॥
‘यही राम हैं’—यह जानकर वह राक्षस विकृत स्वर में अट्टहास करने लगा और अत्यन्त कुपित हो रणक्षेत्र में वानरों को भगाता हुआ उनकी ओर दौड़ा॥ १४५ ॥
दारयन्निव सर्वेषां हृदयानि वनौकसाम्।
प्रहस्य विकृतं भीमं स मेघस्तनितोपमम्॥१४६॥
कुम्भकर्णो महातेजा राघवं वाक्यमब्रवीत्।
नाहं विराधो विज्ञेयो न कबन्धः खरो न च।
न वाली न च मारीचः कुम्भकर्णः समागतः॥१४७॥
महातेजस्वी कुम्भकर्ण समस्त वानरों के हृदय को विदीर्ण-सा करता हुआ विकृत स्वर में जोर-जोर से हँसकर मेघ-गर्जना के समान गम्भीर एवं भयंकर वाणी में श्रीरघुनाथजी से बोला—’राम! मुझे विराध, कबन्ध और खर नहीं समझना चाहिये। मैं मारीच और वाली भी नहीं हूँ। यह कुम्भकर्ण तुमसे लड़ने आया है॥ १४६-१४७॥
पश्य मे मुद्गरं भीमं सर्वं कालायसं महत्।
अनेन निर्जिता देवा दानवाश्च पुरा मया॥१४८॥
‘मेरे इस भयंकर एवं विशाल मुद्गर की ओर देखो। यह सब-का-सब काले लोहे का बना हुआ है। मैंने पूर्वकाल में इसी के द्वारा समस्त देवताओं और दानवों को परास्त किया है॥ १४८॥
विकर्णनास इति मां नावज्ञातुं त्वमर्हसि।
स्वल्पापि हि न मे पीडा कर्णनासाविनाशनात्॥१४९॥
‘मेरे नाक-कान नीचे से कट गये हैं, ऐसा समझकर तुम्हें मेरी अवहेलना नहीं करनी चाहिये। इन दोनों अङ्गों के नष्ट होनेसे मुझे थोड़ी-सी भी पीड़ा नहीं होती
दर्शयेक्ष्वाकुशार्दूल वीर्यं गात्रेषु मेऽनघ।
ततस्त्वां भक्षयिष्यामि दृष्टपौरुषविक्रमम्॥१५०॥
‘निष्पाप रघुनन्दन! तुम इक्ष्वाकुवंश के वीर पुरुष हो, अतः मेरे अङ्गों पर अपना पराक्रम दिखाओ। तुम्हारे पौरुष एवं बल-विक्रम को देख लेनेके बाद ही मैं तुम्हें खाऊँगा’ ॥ १५०॥
स कुम्भकर्णस्य वचो निशम्य रामः सुपुङ्खान् विससर्ज बाणान्।
तैराहतो वज्रसमप्रवेगैन चुक्षुभे न व्यथते सुरारिः॥१५१॥
कुम्भकर्ण की यह बात सुनकर श्रीराम ने उसके ऊपर सुन्दर पंखवाले बहुत-से बाण मारे। वज्र के समान वेगवाले उन बाणों की गहरी चोट खाने पर भी वह देवद्रोही राक्षस न तो क्षुब्ध हुआ और न व्यथित ही॥
यैः सायकैः सालवरा निकृत्ता वाली हतो वानरपुङ्गवश्च।
ते कुम्भकर्णस्य तदा शरीरं वज्रोपमा न व्यथयाम्प्रचक्रुः॥१५२॥
जिन बाणों से श्रेष्ठ सालवृक्ष काटे गये और वानरराज वाली का वध हुआ, वे ही वज्रोपम बाण उस समय कुम्भकर्ण के शरीर को व्यथा न पहुँचा सके॥ १५२॥
स वारिधारा इव सायकांस्तान् पिबन् शरीरेण महेन्द्रशत्रुः।
जघान रामस्य शरप्रवेगं व्याविध्य तं मुद्गरमुग्रवेगम्॥१५३॥
देवराज इन्द्रका शत्रु कुम्भकर्ण जल की धारा के समान श्रीराम की बाणवर्षा को अपने शरीर से पीने लगा और भयंकर वेगशाली मुद्गर को चारों ओर से घुमाघुमाकर उनके बाणों के महान् वेग को नष्ट करने लगा॥
ततस्तु रक्षः क्षतजानुलिप्तं वित्रासनं देवमहाचमूनाम्।
व्याविध्य तं मुद्गरमुग्रवेगं विद्रावयामास चमूं हरीणाम्॥१५४॥
तदनन्तर वह राक्षस देवताओं की विशाल सेना को भयभीत करने वाले और खून से लिपटे हुए उस उग्र वेगशाली मुद्गर को घुमा-घुमाकर वानरों की वाहिनी को खदेड़ने लगा॥ १५४॥
वायव्यमादाय ततोऽपरास्त्रं रामः प्रचिक्षेप निशाचराय।
समुद्गरं तेन जहार बाहुं स कृत्तबाहुस्तुमुलं ननाद ॥१५५॥
यह देख भगवान् श्रीराम ने वायव्य नामक दूसरे अस्त्र का संधान करके उसे कुम्भकर्ण पर चलाया और उसके द्वारा उस निशाचर की मुद्गरसहित दाहिनी बाँह काट डाली। बाँह कट जाने पर वह राक्षस भयानक आवाज में चीत्कार करने लगा। १५५॥
स तस्य बाहुर्गिरिशृङ्गकल्पः समुद्गरो राघवबाणकृत्तः।
पपात तस्मिन् हरिराजसैन्ये जघान तां वानरवाहिनीं च॥१५६॥
श्रीरघुनाथजी के बाण से कटी हुई वह बाँह, जो पर्वतशिखर के समान जान पड़ती थी, मुद्गर के साथ ही वानरों की सेना में गिरी। उसके नीचे दबकर कितने ही वानर-सैनिक अपने प्राणों से हाथ धो बैठे॥ १५६॥
ते वानरा भग्नहतावशेषाः पर्यन्तमाश्रित्य तदा विषण्णाः।
प्रपीडिताङ्गा ददृशुः सुघोरं नरेन्द्ररक्षोऽधिपसंनिपातम्॥१५७॥
जो अङ्ग-भङ्ग होने या मरने से बचे, वे खिन्नचित्त हो किनारे जाकर खड़े हो गये। उनके शरीर में बड़ी पीड़ा हो रही थी और वे चुपचाप महाराज श्रीराम और राक्षस कुम्भकर्ण के घोर संग्राम को देखने लगे। १५७॥
स कुम्भकर्णोऽस्त्रनिकृत्तबाहुमहासिकृत्ताग्र इवाचलेन्द्रः।
उत्पाटयामास करेण वृक्षं ततोऽभिदुद्राव रणे नरेन्द्रम्॥१५८॥
वायव्यास्त्र से एक बाँह कट जाने पर कुम्भकर्ण शिखरहीन पर्वत के समान प्रतीत होने लगा। उसने एक ही हाथ से एक ताड़ का वृक्ष उखाड़ लिया और उसे लेकर रणभूमि में महाराज श्रीराम पर धावा किया। १५८॥
तं तस्य बाहुं सहतालवृक्षं समुद्यतं पन्नगभोगकल्पम्।
ऐन्द्रास्त्रयुक्तेन जघान रामो बाणेन जाम्बूनदचित्रितेन ॥ १५९॥
तब श्रीराम ने एक सुवर्णभूषित बाण निकालकर उसे ऐन्द्रास्त्र से अभिमन्त्रित किया और उसके द्वारा सर्प के समान उठी हुई राक्षस की दूसरी बाँह को भी वृक्षसहित काट गिराया॥ १५९॥
स कुम्भकर्णस्य भुजो निकृत्तः पपात भूमौ गिरिसंनिकाशः।
विचेष्टमानो निजघान वृक्षान् शैलान् शिलावानरराक्षसांश्च ॥१६०॥
कुम्भकर्ण की वह कटी हुई बाँह पर्वत-शिखर के समान पृथ्वी पर गिरी और छटपटाने लगी। उसने कितने ही वृक्षों, शैलशिखरों, शिलाओं, वानरों और राक्षसों को भी कुचल डाला॥ १६० ॥
तं छिन्नबाहुं समवेक्ष्य रामः समापतन्तं सहसा नदन्तम्।
द्वावर्धचन्द्रौ निशितौ प्रगृह्य चिच्छेद पादौ युधि राक्षसस्य॥१६१॥
उन दोनों भुजाओं के कट जाने पर वह राक्षस सहसा आर्तनाद करता हुआ श्रीराम पर टूट पड़ा। उसे आक्रमण करते देख श्रीराम ने दो तीखे अर्धचन्द्राकार बाण लेकर उनके द्वारा युद्धस्थल में उस राक्षस के
दोनों पैर भी उड़ा दिये ॥ १६१॥
तौ तस्य पादौ प्रदिशो दिशश्च गिरेगुहाश्चैव महार्णवं च।
लङ्कां च सेनां कपिराक्षसानां विनादयन्तौ विनिपेततुश्च ॥१६२॥
उसके दोनों पैर दिशा-विदिशा, पर्वत की कन्दरा, महासागर, लङ्कापुरी तथा वानरों और राक्षसों की सेनाओं को भी प्रतिध्वनित करते हुए पृथ्वी पर गिर पड़े॥ १६२॥
निकृत्तबाहुर्विनिकृत्तपादो विदार्य वक्त्रं वडवामुखाभम्।
दुद्राव रामं सहसाभिगर्जन् राहुर्यथा चन्द्रमिवान्तरिक्षे॥१६३॥
दोनों बाँहों और पैरों के कट जाने पर उसने वडवानल के समान अपने विकराल मुख को फैलाया और जैसे राहु आकाश में चन्द्रमा को ग्रस लेता है, उसी प्रकार वह श्रीराम को ग्रसने के लिये भयानक गर्जना करता हुआ सहसा उनके ऊपर टूट पड़ा।
अपूरयत् तस्य मुखं शिताग्रै रामः शरैर्हेमपिनद्धपुकैः।
सम्पूर्णवकत्रो न शशाक वक्तुं चुकूज कृच्छ्रेण मुमूर्च्छ चापि॥१६४॥
तब श्रीरामचन्द्रजी ने सुवर्णजटित पंखवाले अपने तीखे बाणों से उसका मुँह भर दिया। मुँह भर जाने पर वह बोलने में भी असमर्थ हो गया और बड़ी कठिनाई से आर्तनाद करके मूर्छित हो गया॥ १६४॥
अथाददे सूर्यमरीचिकल्पं स ब्रह्मदण्डान्तककालकल्पम्।
अरिष्टमैन्द्रं निशितं सुपुङ्ख रामः शरं मारुततुल्यवेगम्॥१६५॥
तं वज्रजाम्बूनदचारुपुङ्ख प्रदीप्तसूर्यज्वलनप्रकाशम्।
महेन्द्रवज्राशनितुल्यवेगं रामः प्रचिक्षेप निशाचराय॥१६६॥
इसके बाद भगवान् श्रीराम ने ब्रह्मदण्ड तथा विनाशकारी काल के समान भयंकर एवं तीखा बाण, जो सूर्य की किरणों के समान उद्दीप्त, इन्द्रास्त्र से अभिमन्त्रित, शत्रुनाशक, तेजस्वी सूर्य और प्रज्वलित अग्नि के समान देदीप्यमान, हीरे और सुवर्ण से विभूषित सुन्दर पंख से युक्त, वायु तथा इन्द्र के वज्र और अशनि के समान वेगशाली था, हाथ में लिया और उस निशाचर को लक्ष्य करके छोड़ दिया। १६५-१६६॥
स सायको राघवबाहुचोदितो दिशःस्वभासा दश सम्प्रकाशयन्।
विधूमवैश्वानरभीमदर्शनो जगाम शक्राशनिभीमविक्रमः॥१६७॥
श्रीरघुनाथजी की भुजाओं से प्रेरित होकर वह बाण अपनी प्रभा से दसों दिशाओं को प्रकाशित करता हुआ इन्द्र के वज्र की भाँति भयंकर वेग से चला। वह धूमरहित अग्नि के समान भयानक दिखायी देता था। १६७॥
स तन्महापर्वतकूटसंनिभं सुवृत्तदंष्ट्रं चलचारुकुण्डलम्।
चकर्त रक्षोऽधिपतेः शिरस्तदा यथैव वृत्रस्य पुरा पुरंदरः॥१६८॥
जैसे पूर्वकाल में देवराज इन्द्र ने वृत्रासुर का मस्तक काट डाला था, उसी प्रकार उस बाण ने राक्षसराज कुम्भकर्ण के महान् पर्वतशिखर के समान ऊँचे, सुन्दर गोलाकार दाढ़ों से युक्त तथा हिलते हुए मनोहर कुण्डलों से अलंकृत मस्तक को धड़ से अलग कर दिया॥ १६८॥
कुम्भकर्णशिरो भाति कुण्डलालंकृतं महत्।
आदित्येऽभ्युदिते रात्रौ मध्यस्थ इव चन्द्रमाः॥१६९॥
कुम्भकर्ण का वह कुण्डलों से अलंकृत विशाल मस्तक प्रातःकाल सूर्योदय होने पर आकाश के मध्य में विराजमान चन्द्रमा की भाँति निस्तेज प्रतीत होता था। १६९॥
तद् रामबाणाभिहतं पपात रक्षःशिरः पर्वतसंनिकाशम्।
बभञ्ज चर्यागृहगोपुराणि प्राकारमुच्चं तमपातयच्च ॥१७०॥
श्रीराम के बाणों से कटा हुआ राक्षस का वह पर्वताकार मस्तक लङ्का में जा गिरा। उसने अपने धक्के से सड़क के आस-पास के कितने ही मकानों, दरवाजों और ऊँचे परकोटे को भी धराशायी कर दिया॥ १७०॥
तच्चातिकायं हिमवत् प्रकाशं रक्षस्तदा तोयनिधौ पपात।
ग्राहान् परान् मीनवरान् भुजंगमान् ममर्द भूमिं च तथा विवेश॥१७१॥
इसी प्रकार उस राक्षस का विशाल धड़ भी, जो हिमालय के समान जान पड़ता था, तत्काल समुद्र के जल में गिर पड़ा और बड़े-बड़े ग्राहों, मत्स्यों तथा साँपों को पीसता हुआ पृथ्वी के भीतर समा गया। १७१॥
तस्मिन् हते ब्राह्मणदेवशत्रौ महाबले संयति कुम्भकर्णे।
चचाल भूर्भूमिधराश्च सर्वे हर्षाच्च देवास्तुमुलं प्रणेदुः॥१७२॥
ब्राह्मणों और देवताओं के शत्रु महाबली कुम्भकर्ण के युद्ध में मारे जाने पर पृथ्वी डोलने लगी, पर्वत हिलने लगे और सम्पूर्ण देवता हर्ष से भरकर तुमुल नाद करने लगे॥
ततस्तु देवर्षिमहर्षिपन्नगाः सुराश्च भूतानि सुपर्णगुह्यकाः।
सयक्षगन्धर्वगणा नभोगताः प्रहर्षिता रामपराक्रमेण॥१७३॥
उस समय आकाश में खड़े हुए देवर्षि, महर्षि, सर्प, देवता, भूतगण, गरुड़, गुह्यक, यक्ष और गन्धर्वगण श्रीराम का पराक्रम देखकर बहुत प्रसन्न हुए॥ १७३॥
ततस्तु ते तस्य वधेन भूरिणा मनस्विनो नैर्ऋतराजबान्धवाः।
विनेदुरुच्चैर्व्यथिता रघूत्तमं हरिं समीक्ष्यैव यथा मतंगजाः॥१७४॥
कुम्भकर्ण के महान् वध से राक्षसराज रावण के मनस्वी बन्धुओं को बड़ा दुःख हुआ। वे रघुकुलतिलक श्रीराम की ओर देखकर उसी तरह उच्च स्वरसे रोने-कल्पने लगे, जैसे सिंह पर दृष्टि पड़ते ही मतवाले हाथी चीत्कार कर उठते हैं॥ १७४॥
स देवलोकस्य तमो निहत्य सूर्यो यथा राहुमुखाद् विमुक्तः।
तथा व्यभासीद्धरिसैन्यमध्ये निहत्य रामो युधि कुम्भकर्णम्॥१७५॥
देवसमूह को दुःख देने वाले कुम्भकर्ण का युद्ध में वध करके वानर-सेना के बीच में खड़े हुए भगवान् श्रीराम अन्धकार का नाश करके राहु के मुख से छूटे हुए सूर्यदेव के समान प्रकाशित हो रहे थे। १७५ ॥
प्रहर्षमीयुर्बहवश्च वानराः प्रबुद्धपद्मप्रतिमैरिवाननैः।
अपूजयन् राघवमिष्टभागिनं हते रिपौ भीमबले नृपात्मजम्॥१७६॥
भयानक बलशाली शत्रु के मारे जाने से बहुसंख्यक वानरों को बड़ी प्रसन्नता हुई। उनके मुख विकसित कमल की भाँति हर्षोल्लास से खिल उठे तथा उन्होंने सफल मनोरथ हुए राजकुमार भगवान् श्रीराम की भूरिभूरि प्रशंसा की। १७६॥
स कुम्भकर्णं सुरसैन्यमर्दनं महत्सु युद्धेषु कदाचनाजितम्।
ननन्द हत्वा भरताग्रजो रणे महासुरं वृत्रमिवामराधिपः॥ १७७॥
जो बड़े-बड़े युद्धों में कभी पराजित नहीं हुआ था तथा देवताओं की सेना को भी कुचल डालने वाला था, उस महान् राक्षस कुम्भकर्ण को रणभूमि में मारकर रघुनाथजी को वैसी ही प्रसन्नता हुई जैसी वृत्रासुर का वध करके देवराज इन्द्र को हुई थी॥ १७७॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे सप्तषष्टितमः सर्गः॥६७॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में सरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ।६७॥
सर्ग-68
कुम्भकर्णं हतं दृष्ट्वा राघवेण महात्मना।
राक्षसा राक्षसेन्द्राय रावणाय न्यवेदयन्॥१॥
महात्मा श्रीरामचन्द्रजी के द्वारा कुम्भकर्ण को मारा गया देख राक्षसों ने अपने राजा रावण से जाकर कहा – ॥१॥
राजन् स कालसंकाशः संयुक्तः कालकर्मणा।
विद्राव्य वानरी सेनां भक्षयित्वा च वानरान्॥२॥
‘महाराज! काल के समान भयंकर पराक्रमी कुम्भकर्ण वानरसेना को भगाकर तथा बहुत-से वानरों को अपना आहार बनाकर स्वयं भी काल के गाल में चले गये॥२॥
प्रतपित्वा मुहूर्तं तु प्रशान्तो रामतेजसा।
कायेनार्धप्रविष्टेन समुद्रं भीमदर्शनम्॥३॥
निकृत्तनासाकर्णेन विक्षरद्रुधिरेण च।
रुद्ध्वा द्वारं शरीरेण लङ्कायाः पर्वतोपमः॥४॥
कुम्भकर्णस्तव भ्राता काकुत्स्थशरपीडितः।
अगण्डभूतो विवृतो दावदग्ध इव द्रुमः॥५॥
‘वे दो घड़ी तक अपने प्रताप से तपकर अन्त में श्रीराम के तेज से शान्त हो गये। उनका आधा शरीर (धड़) भयानक दिखायी देने वाले समुद्र में घुस गया और आधा शरीर (मस्तक) नाक-कान कट जाने से खून बहाता हुआ लङ्का के द्वार पर पड़ा है। उस शरीर के द्वारा आपके भाई पर्वताकार कुम्भकर्ण लङ्का का द्वार रोक कर पड़े हैं। वे श्रीराम के बाणों से पीड़ित हो हाथ, पैर और मस्तक से हीन नंग-धडंग धड़ के रूप में परिणत हो दावानल से दग्ध हुए वृक्ष की भाँति नष्ट हो गये’ ॥३-५॥
श्रुत्वा विनिहतं संख्ये कुम्भकर्णं महाबलम्।
रावणः शोकसंतप्तो मुमोह च पपात च॥६॥
‘महाबली कुम्भकर्ण युद्धस्थल में मारा गया’ यह सुनकर रावण शोक से संतप्त एवं मूर्च्छित हो गया और तत्काल पृथ्वी पर गिर पड़ा॥६॥
पितृव्यं निहतं श्रुत्वा देवान्तकनरान्तकौ।
त्रिशिराश्चातिकायश्च रुरुदुः शोकपीडिताः॥७॥
अपने चाचा के निधन का समाचार सुनकर देवान्तक, नरान्तक, त्रिशिरा और अतिकाय दुःख से पीड़ित हो फूट-फूटकर रोने लगे॥ ७॥
भ्रातरं निहतं श्रुत्वा रामेणाक्लिष्टकर्मणा।
महोदरमहापाश्वौँ शोकाक्रान्तौ बभूवतुः॥८॥
अनायास ही महान् कर्म करने वाले श्रीराम के द्वारा भाई कुम्भकर्ण मारे गये, यह सुनकर उसके सौतेले भाई महोदर और महापार्श्व शोक से व्याकुल हो गये। ८॥
ततः कृच्छ्रात् समासाद्य संज्ञां राक्षसपुङ्गवः।
कुम्भकर्णवधाद् दीनो विललापाकुलेन्द्रियः॥
तदनन्तर बड़े कष्ट से होश में आने पर राक्षसराज रावण कुम्भकर्ण के वध से दुःखी हो विलाप करने लगा। उसकी सारी इन्द्रियाँ शोक से व्याकुल हो उठी थीं॥९॥
हा वीर रिपुदर्पन कुम्भकर्ण महाबल।
त्वं मां विहाय वै दैवाद् यातोऽसि यमसादनम्॥१०॥
(वह रो-रोकर कहने लगा-) ‘हा वीर! हा महाबली कुम्भकर्ण! तुम शत्रुओं के दर्प का दलन करने वाले थे; किंतु दुर्भाग्यवश मुझे असहाय छोड़कर यमलोक को चल दिये॥१०॥
मम शल्यमनुद्धृत्य बान्धवानां महाबल।
शत्रुसैन्यं प्रताप्यैकः क्व मां संत्यज्य गच्छसि॥११॥
‘महाबली वीर! तुम मेरा तथा इन भाई-बन्धुओं का कण्टक दूर किये बिना शत्रुसेना को संतप्त करके मुझे छोड़ अकेले कहाँ चले जा रहे हो? ॥ ११॥
इदानीं खल्वहं नास्मि यस्य मे पतितो भुजः।
दक्षिणोऽयं समाश्रित्य न बिभेमि सुरासुरात्॥१२॥
‘इस समय मैं अवश्य ही नहीं के बराबर हूँ; क्योंकि मेरी दाहिनी बाँह कुम्भकर्ण धराशायी हो गया। जिसका भरोसा करके मैं देवता और असुर किसी से नहीं डरता था॥ १२॥
कथमेवंविधो वीरो देवदानवदर्पहा।
कालाग्निप्रतिमो ह्यद्य राघवेण रणे हतः॥१३॥
‘देवताओं और दानवों का दर्प चूर करनेवाला ऐसा वीर, जो कालाग्नि के समान प्रतीत होता था, आज रणक्षेत्र में राम के हाथ से कैसे मारा गया? ॥ १३ ॥
यस्य ते वज्रनिष्पेषो न कुर्याद् व्यसनं सदा।
स कथं रामबाणार्तः प्रसुप्तोऽसि महीतले॥१४॥
‘भाई! तुम्हें तो वज्र का प्रहार भी कभी कष्ट नहीं पहुँचा सकता था। वही तुम आज राम के बाणों से पीड़ित हो भूतल पर कैसे सो रहे हो? ॥ १४ ॥
एते देवगणाः सार्धमृषिभिर्गगने स्थिताः।
निहतं त्वां रणे दृष्ट्वा निनदन्ति प्रहर्षिताः॥१५॥
‘आज समराङ्गण में तुम्हें मारा गया देख आकाश में खड़े हुए ये ऋषियोंसहित देवता हर्षनाद कर रहे हैं।
ध्रुवमद्यैव संहृष्टा लब्धलक्षाः प्लवंगमाः।
आरोक्ष्यन्तीह दुर्गाणि लङ्काद्वाराणि सर्वशः॥१६॥
‘निश्चय ही अब अवसर पाकर हर्ष से भरे हुए वानर आज ही लङ्का के समस्त दुर्गम द्वारों पर चढ़ जायेंगे॥१६॥
राज्येन नास्ति मे कार्यं किं करिष्यामि सीतया।
कुम्भकर्णविहीनस्य जीविते नास्ति मे मतिः॥१७॥
‘अब मुझे राज्य से कोई प्रयोजन नहीं है। सीता को लेकर भी मैं क्या करूँगा? कुम्भकर्ण के बिना जीने का मेरा मन नहीं है॥ १७॥
यद्यहं भ्रातृहन्तारं न हन्मि युधि राघवम्।
ननु मे मरणं श्रेयो न चेदं व्यर्थजीवितम्॥१८॥
‘यदि मैं युद्धस्थल में अपने भाई का वध करने वाले राम को नहीं मार सकता तो मेरा मर जाना ही अच्छा है। इस निरर्थक जीवन को सुरक्षित रखना कदापि अच्छा नहीं है॥ १८॥
अद्यैव तं गमिष्यामि देशं यत्रानुजो मम।
नहि भ्रातॄन् समुत्सृज्य क्षणं जीवितुमुत्सहे॥१९॥
‘मैं आज ही उस देश को जाऊँगा, जहाँ मेरा छोटा भाई कुम्भकर्ण गया है। मैं अपने भाइयों को छोड़कर क्षणभर भी जीवित नहीं रह सकता॥ १९ ॥
देवा हि मां हसिष्यन्ति दृष्ट्वा पूर्वापकारिणम्।
कथमिन्द्रं जयिष्यामि कुम्भकर्ण हते त्वयि॥२०॥
‘मैंने पहले देवताओं का अपकार किया था। अब वे मुझे देखकर हँसेंगे। हा कुम्भकर्ण! तुम्हारे मारे जाने पर अब मैं इन्द्र को कैसे जीत सकूँगा? ॥ २०॥
तदिदं मामनुप्राप्तं विभीषणवचः शुभम्।
यदज्ञानान्मया तस्य न गृहीतं महात्मनः॥२१॥
‘मैंने महात्मा विभीषण की कही हुई जिन उत्तम बातों को अज्ञानवश स्वीकार नहीं किया था, वे मेरे ऊपर आज प्रत्यक्षरूप से घटित हो रही हैं॥ २१॥
विभीषणवचस्तावत् कुम्भकर्णप्रहस्तयोः।
विनाशोऽयं समुत्पन्नो मां वीडयति दारुणः॥२२॥
‘जब से कुम्भकर्ण और प्रहस्तका यह दारुण विनाश उत्पन्न हुआ है, तभी से विभीषण की बात याद आकर मुझे लज्जित कर रही है॥ २२॥
तस्यायं कर्मणः प्राप्तो विपाको मम शोकदः।
यन्मया धार्मिकः श्रीमान् स निरस्तो विभीषणः॥२३॥
‘मैंने धर्मपरायण श्रीमान् विभीषण को जो घर से निकाल दिया था, उसी कर्म का यह शोकदायक परिणाम अब मुझे भोगना पड़ रहा है’ ॥ २३॥
इति बहुविधमाकुलान्तरात्मा कृपणमतीव विलप्य कुम्भकर्णम्।
न्यपतदपि दशाननो भृशार्तस्तमनुजमिन्द्ररिपुं हतं विदित्वा॥२४॥
इस प्रकार भाँति-भाँति से दीनतापूर्वक अत्यन्त विलाप करके व्याकुलचित्त हुआ दशमुख रावण अपने छोटे भाई इन्द्रशत्रु कुम्भकर्ण के वध का स्मरण करके बहुत ही व्यथित हो पुनः पृथ्वी पर गिर पड़ा। २४॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डेऽष्टषष्टितमः सर्गः॥ ६८॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में अड़सठवाँ सर्ग पूरा हुआ।६८॥
सर्ग-69
एवं विलपमानस्य रावणस्य दुरात्मनः।
श्रुत्वा शोकाभिभूतस्य त्रिशिरा वाक्यमब्रवीत्॥१॥
दुरात्मा रावण जब शोक से पीड़ित हो इस प्रकार विलाप करने लगा, तब त्रिशिरा ने कहा- ॥१॥
एवमेव महावीर्यो हतो नस्तातमध्यमः।
न तु सत्पुरुषा राजन् विलपन्ति यथा भवान्॥२॥
‘राजन्! इसमें संदेह नहीं कि हमारे मझले चाचा, जो इस समय युद्ध में मारे गये हैं, ऐसे ही महान् पराक्रमी थे; परंतु आप जिस प्रकार रोते-कलपते हैं, उस तरह श्रेष्ठ पुरुष किसी के लिये विलाप नहीं करते हैं॥२॥
नूनं त्रिभुवनस्यापि पर्याप्तस्त्वमसि प्रभो।
स कस्मात् प्राकृत इव शोचस्यात्मानमीदृशम्॥
‘प्रभो! निश्चय आप अकेले ही तीनों लोकों से भी लोहा लेने में समर्थ हैं; फिर इस तरह साधारण पुरुष की भाँति क्यों अपने-आपको शोक में डाल रहे हैं? ॥३॥
ब्रह्मदत्तास्ति ते शक्तिः कवचं सायको धनुः।
सहस्रखरसंयुक्तो रथो मेघसमस्वनः॥४॥
‘आपके पास ब्रह्माजी की दी हुई शक्ति, कवच, धनुष तथा बाण हैं; साथ ही मेघ-गर्जना के समान शब्द करने वाला रथ भी है, जिसमें एक हजार गदहे जोते जाते हैं॥४॥
त्वयासकृद्धि शस्त्रेण विशस्ता देवदानवाः।
स सर्वायुधसम्पन्नो राघवं शास्तुमर्हसि॥५॥
‘आपने एक ही शस्त्र से देवताओं और दानवों को अनेक बार पछाड़ा है, अतः सब प्रकार के अस्त्रशस्त्रों से सुसज्जित होने पर आप राम को भी दण्ड दे सकते हैं॥५॥
कामं तिष्ठ महाराज निर्गमिष्याम्यहं रणे।
उद्धरिष्यामि ते शत्रून् गरुडः पन्नगानिव॥६॥
‘अथवा महाराज! आपकी इच्छा हो तो यहीं रहें। मैं स्वयं युद्ध के लिये जाऊँगा और जैसे गरुड़ सो का संहार करते हैं, उसी तरह मैं आपके शत्रुओं को जड़ से उखाड़ फेंकूँगा॥६॥
शम्बरो देवराजेन नरको विष्णुना यथा।
तथाद्य शयिता रामो मया युधि निपातितः॥७॥
‘जैसे इन्द्र ने शम्बरासुर को और भगवान् विष्णु ने नरकासुर को मार गिराया था, उसी प्रकार युद्धस्थल में आज मेरे द्वारा मारे जाकर राम सदा के लिये सो जायँगे’॥७॥
* यहाँ जिस नरकासुर का नाम आया है, वह विप्रचित्ति नामक दानव के द्वारा सिंहिका के गर्भ से उत्पन्न हुए वातापि आदि सात पुत्रों में से एक था। उनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं-वातापि, नमुचि, इल्वल, सृमर, अन्धक, नरक और कालनाभ। भगवान् श्रीकृष्ण ने द्वापर में जिस भूमिपुत्र नरकासुर का वध किया था, वह यहाँ उल्लिखित नरकासुर से भिन्न था। त्रिशिरा और रावण के समय में तो उसका जन्म ही नहीं हुआ था।
श्रुत्वा त्रिशिरसो वाक्यं रावणो राक्षसाधिपः।
पुनर्जातमिवात्मानं मन्यते कालचोदितः॥८॥
त्रिशिरा की यह बात सुनकर राक्षसराज रावण को इतना संतोष हुआ कि वह अपना नया जन्म हुआ-सा मानने लगा। काल से प्रेरित होकर ही उसकी ऐसी बुद्धि हो गयी॥८॥
श्रुत्वा त्रिशिरसो वाक्यं देवान्तकनरान्तकौ।
अतिकायश्च तेजस्वी बभूवुर्युद्धहर्षिताः॥९॥
त्रिशिरा का उपर्युक्त कथन सुनकर देवान्तक, नरान्तक और तेजस्वी अतिकाय—ये तीनों युद्ध के लिये उत्साहित हो गये॥९॥
ततोऽहमहमित्येवं गर्जन्तो नैर्ऋतर्षभाः।
रावणस्य सुता वीराः शक्रतुल्यपराक्रमाः॥१०॥
‘मैं युद्ध के लिये जाऊँगा, मैं जाऊँगा’ ऐसा कहते और गर्जते हुए वे तीनों श्रेष्ठ निशाचर युद्ध के लिये तैयार हो गये। रावण के वे वीर पुत्र इन्द्र के समान पराक्रमी थे॥
अन्तरिक्षगताः सर्वे सर्वे मायाविशारदाः।
सर्वे त्रिदशदर्पघ्नाः सर्वे समरदुर्मदाः॥११॥
वे सब-के-सब आकाश में विचरण करने वाले, मायाविशारद, रणदुर्मद तथा देवताओं का भी दर्प दलन करने वाले थे॥ ११॥
सर्वे सुबलसम्पन्नाः सर्वे विस्तीर्णकीर्तयः।
सर्वे समरमासाद्य न श्रूयन्ते स्म निर्जिताः॥१२॥
देवैरपि सगन्धर्वैः सकिंनरमहोरगैः।
सर्वेऽस्त्रविदुषो वीराः सर्वे युद्धविशारदाः।
सर्वे प्रवरविज्ञानाः सर्वे लब्धवरास्तथा॥१३॥
वे सभी उत्तम बल से सम्पन्न थे। उन सबकी कीर्ति तीनों लोकों में फैली हुई थी और समरभूमि में आने पर गन्धर्वो, किन्नरों तथा बड़े-बड़े नागोंसहित देवताओं से भी कभी उन सबकी पराजय नहीं सुनी गयी थी। वे सभी अस्त्रवेत्ता, सभी वीर और सभी युद्ध की कला में निपुण थे। उन सबको शस्त्रों और शास्त्रों का उत्तम ज्ञान प्राप्त था और सबने तपस्या के द्वारा वरदान प्राप्त किया था॥ १२-१३॥
स तैस्तथा भास्करतुल्यवर्चसैः सुतैर्वृतः शत्रुबलश्रियार्दनैः।
रराज राजा मघवान् यथामरै तो महादानवदर्पनाशनैः॥१४॥
सूर्य के समान तेजस्वी तथा शत्रुओं की सेना और सम्पत्ति को रौंद डालने वाले उन पुत्रों से घिरा हुआ राक्षसों का राजा रावण बड़े-बड़े दानवों का दर्प चूर्ण करने वाले देवताओं से घिरे हुए इन्द्र की भाँति शोभा पा रहा था।
स पुत्रान् सम्परिष्वज्य भूषयित्वा च भूषणैः।
आशीर्भिश्च प्रशस्ताभिः प्रेषयामास वै रणे॥१५॥
उसने अपने पुत्रों को हृदय से लगाकर नाना प्रकार के आभूषणों से विभूषित किया और उत्तम आशीर्वाद देकर रणभूमि में भेजा ॥ १५ ॥
युद्धोन्मत्तं च मत्तं च भ्रातरौ चापि रावणः।
रक्षणार्थं कुमाराणां प्रेषयामास संयुगे॥१६॥
रावण ने अपने दोनों भाई युद्धोन्मत्त (महापार्श्व) और मत्त (महोदर)-को भी युद्ध में कुमारों की रक्षा के लिये भेजा॥१६॥
तेऽभिवाद्य महात्मानं रावणं लोकरावणम्।
कृत्वा प्रदक्षिणं चैव महाकायाः प्रतस्थिरे॥१७॥
वे सभी महाकाय राक्षस समस्त लोकों को रुलाने वाले महामना रावण को प्रणाम और उसकी परिक्रमा करके युद्ध के लिये प्रस्थित हुए॥ १७ ॥
सर्वोषधीभिर्गन्धैश्च समालभ्य महाबलाः।
निर्जग्मुर्नैर्ऋतश्रेष्ठाः षडेते युद्धकाक्षिणः॥१८॥
त्रिशिराश्चातिकायश्च देवान्तकनरान्तकौ।
महोदरमहापाश्वौं निर्जग्मुः कालचोदिताः॥१९॥
सब प्रकार की ओषधियों तथा गन्धों का स्पर्श करके युद्ध की अभिलाषा रखने वाले त्रिशिरा, अतिकाय, देवान्तक, नरान्तक, महोदर और महापार्श्व—ये छः महाबली श्रेष्ठ निशाचर काल से प्रेरित हो युद्ध के लिये पुरी से बाहर निकले ॥ १९॥
ततः सुदर्शनं नागं नीलजीमूतसंनिभम्।
ऐरावतकुले जातमारुरोह महोदरः॥२०॥
उस समय महोदर ऐरावत के कुल में उत्पन्न हुए काले मेघ के समान रंगवाले ‘सुदर्शन’ नामक हाथी पर सवार हुआ॥२०॥
सर्वायुधसमायुक्तस्तूणीभिश्चाप्यलंकृतः।
रराज गजमास्थाय सवितेवास्तमूर्धनि॥२१॥
समस्त आयुधों से सम्पन्न और तूणीरों से अलंकृत महोदर उस हाथी की पीठ पर बैठकर अस्ताचल के शिखर पर विराजमान सूर्यदेव के समान शोभा पा रहा था॥ २१॥
हयोत्तमसमायुक्तं सर्वायुधसमाकुलम्।
आरुरोह रथश्रेष्ठं त्रिशिरा रावणात्मजः॥२२॥
रावणकुमार त्रिशिरा एक उत्तम रथ पर आरूढ़ हुआ, जिसमें सब प्रकार के अस्त्र-शस्त्र रखे गये थे और उत्तम घोड़े जुते हुए थे॥ २२ ॥
त्रिशिरा रथमास्थाय विरराज धनुर्धरः।
सविधुदुल्कः सज्वालः सेन्द्रचाप इवाम्बुदः॥२३॥
उस रथ में बैठकर धनुष धारण किये त्रिशिरा विद्युत् , उल्का, ज्वाला और इन्द्रधनुष से युक्त मेघ के समान शोभा पाने लगा॥ २३॥
त्रिभिः किरीटैस्त्रिशिराः शुशुभे स रथोत्तमे।
हिमवानिव शैलेन्द्रस्त्रिभिः काञ्चनपर्वतैः॥ २४॥
उस उत्तम रथ में सवार हो तीन किरीटों से युक्त त्रिशिरा तीन सुवर्णमय शिखरों से युक्त गिरिराज हिमालय के समान शोभा पा रहा था॥ २४ ॥
अतिकायोऽतितेजस्वी राक्षसेन्द्रसुतस्तदा।
आरुरोह रथश्रेष्ठं श्रेष्ठः सर्वधनुष्मताम्॥२५॥
राक्षसराज रावण का अत्यन्त तेजस्वी पुत्र अतिकाय समस्त धनुर्धारियों में श्रेष्ठ था। वह भी उस समय एक उत्तम रथ पर आरूढ़ हुआ॥ २५ ॥
सुचक्राक्षं सुसंयुक्तं स्वनुकर्षं सुकूबरम्।
तूणीबाणासनैर्दीप्तं प्रासासिपरिघाकुलम्॥२६॥
उस रथ के पहिये और धुरे बहुत सुन्दर थे। उसमें उत्तम घोड़े जुते हुए थे तथा उसके अनुकर्ष और कूबर भी सुदृढ़ थे। तूणीर, बाण और धनुष के कारण वह रथ उद्दीप्त हो रहा था। प्रास, खड्ग और परिघों से वह भरा हुआ था॥ २६॥
१. रथ के धुरेपर कूबर के आधाररूप से स्थापित काष्ठविशेष को अनुकर्ष कहते हैं।
२. कूबर उस काष्ठ को कहते हैं, जिसपर जुआ रखा जाता है। गाडी के हरसों को भी प्राचीनकाल में कूबर कहा जाता था।
स काञ्चनविचित्रेण किरीटेन विराजता।
भूषणैश्च बभौ मेरुः प्रभाभिरिव भासयन्॥२७॥
वह सुवर्णनिर्मित विचित्र एवं दीप्तिशाली किरीट तथा अन्य आभूषणों से विभूषित हो अपनी प्रभा से प्रकाश का विस्तार करते हुए मेरुपर्वत के समान सुशोभित होता था॥ २७॥
स रराज रथे तस्मिन् राजसूनुर्महाबलः।
वृतो नैर्ऋतशार्दूलैर्वज्रपाणिरिवामरैः॥२८॥
उस रथपर श्रेष्ठ निशाचरों से घिरकर बैठा हुआ वह महाबली राक्षस राजकुमार देवताओं से घिरे हुए वज्रपाणि इन्द्र के समान शोभा पाता था॥ २८॥
हयमुच्चैःश्रवःप्रख्यं श्वेतं कनकभूषणम्।
मनोजवं महाकायमारुरोह नरान्तकः॥२९॥
नरान्तक उच्चैःश्रवा के समान श्वेत वर्णवाले एक सुवर्णभूषित विशालकाय और मन के समान वेगशाली अश्व पर आरूढ़ हुआ॥ २९॥
गृहीत्वा प्रासमुल्काभं विरराज नरान्तकः।
शक्तिमादाय तेजस्वी गुहः शिखिगतो यथा॥३०॥
उल्का के समान दीप्तिमान् प्रास हाथ में लेकर तेजस्वी नरान्तक शक्ति लिये मोर पर बैठे हुए तेजःपुञ्ज से सम्पन्न कुमार कार्तिकेय के समान सुशोभित हो रहा था॥३०॥
देवान्तकः समादाय परिघं हेमभूषणम्।
परिगृह्य गिरिं दोर्थ्यां वपुर्विष्णोर्विडम्बयन्॥३१॥
देवान्तक स्वर्णभूषित परिघ लेकर समुद्रमन्थन के समय दोनों हाथों से मन्दराचल उठाये हुए भगवान्विष्णु के स्वरूपका अनुकरण-सा कर रहा था॥ ३१॥
महापावो महातेजा गदामादाय वीर्यवान्।
विरराज गदापाणिः कुबेर इव संयुगे॥३२॥
महातेजस्वी और पराक्रमी महापार्श्व हाथ में गदा लेकर युद्धस्थलमें गदाधारी कुबेर के समान शोभा पाने लगा॥
ते प्रतस्थुर्महात्मानोऽमरावत्याः सुरा इव।
तान् गजैश्च तुरङ्गैश्च रथैश्चाम्बुदनिःस्वनैः॥३३॥
अनूत्पेतुर्महात्मानो राक्षसाः प्रवरायुधाः।
अमरावतीपुरी से निकलने वाले देवताओं के समान वे सभी महाकाय निशाचर लङ्कापुरी से चले। उनके पीछे श्रेष्ठ आयुध धारण किये विशालकाय राक्षस हाथी, घोड़ों तथा मेघ की गर्जना के समान घर्घराहट पैदा करने वाले रथों पर सवार हो युद्ध के लिये निकले॥ ३३ १/२॥
ते विरेजुर्महात्मानः कुमाराः सूर्यवर्चसः॥३४॥
किरीटिनः श्रिया जुष्टा ग्रहा दीप्ता इवाम्बरे।
वे सूर्यतुल्य तेजस्वी, महामनस्वी राक्षस राजकुमार मस्तक पर किरीट धारण करके उत्तम शोभा-सम्पत्ति से सेवित हो आकाश में प्रकाशित होने वाले ग्रहों के समान सुशोभित हो रहे थे॥३४ १/२॥
प्रगृहीता बभौ तेषां शस्त्राणामवलिः सिता॥३५॥
शरदभ्रप्रतीकाशा हंसावलिरिवाम्बरे।
उनके द्वारा धारण की हुई अस्त्र-शस्त्रों की श्वेत पंक्ति आकाश में शरद्ऋतु के बादलों की भाँति उज्ज्वल कान्ति से युक्त हंसों की श्रेणी के समान शोभा पा रही थी॥ ३५ १/२॥
मरणं वापि निश्चित्य शत्रूणां वा पराजयम्॥३६॥
इति कृत्वा मतिं वीराः संजग्मुः संयुगार्थिनः।
आज या तो हम शत्रुओं को परास्त कर देंगे, या स्वयं ही मृत्यु की गोद में सदा के लिये सो जायेंगे ऐसा निश्चय करके वे वीर राक्षस युद्ध के लिये आगे बढ़े॥
जगर्जुश्च प्रणेदुश्च चिक्षिपुश्चापि सायकान्॥
३७॥ जगृहुश्च महात्मानो निर्यान्तो युद्धदुर्मदाः।
वे युद्धदुर्मद महामनस्वी निशाचर गर्जते, सिंहनाद करते, बाण हाथ में लेते और उन्हें शत्रुओं पर छोड़ देते थे॥
क्ष्वेडितास्फोटितानां वै संचचालेव मेदिनी॥ ३८॥
रक्षसां सिंहनादैश्च संस्फोटितमिवाम्बरम्।
उन राक्षसों के गर्जने, ताल ठोंकने और सिंहनाद करने से पृथ्वी कम्पित-सी होने लगी और आकाश फटने-सा लगा॥ ३८ १/२॥
तेऽभिनिष्क्रम्य मुदिता राक्षसेन्द्रा महाबलाः॥
ददृशुर्वानरानीकं समुद्यतशिलानगम्।
उन महाबली राक्षसशिरोमणि वीरों ने प्रसन्नतापूर्वक नगर की सीमा से बाहर निकलकर देखा, वानरों की सेना पर्वत-शिखर और बड़े-बड़े वृक्ष उठाये युद्ध के लिये तैयार खड़ी है॥ ३९ १/२ ॥
हरयोऽपि महात्मानो ददृशू राक्षसं बलम्॥४०॥
हस्त्यश्वरथसम्बाधं किङ्किणीशतनादितम्।
नीलजीमूतसंकाशं समुद्यतमहायुधम्॥४१॥
महामना वानरों ने भी राक्षससेना पर दृष्टिपात किया। वह हाथी, घोड़े और रथों से भरी थी, सैकड़ों-हजारों घुघुरुओं की रुनझुन से निनादित थी, काले मेघों की घटा-जैसी दिखायी देती थी और हाथों में बड़े-बड़े आयुध लिये हुए थी॥ ४०-४१॥
दीप्तानलरविप्रख्यैर्नैर्ऋतैः सर्वतो वृतम्।
तद् दृष्ट्वा बलमायातं लब्धलक्षाः प्लवङ्गमाः॥४२॥
समुद्यतमहाशैलाः सम्प्रणेदुर्मुहुर्मुहुः।
अमृष्यमाणा रक्षांसि प्रतिनर्दन्त वानराः॥४३॥
प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के समान तेजस्वी राक्षसों ने उसे सब ओर से घेर रखा था। निशाचरों की उस सेना को आती देख वानर प्रहार करने का अवसर पाकर महान् पर्वतशिखर उठाये बारंबार गर्जना करने लगे। वे राक्षसों का सिंहनाद सहन न करने के कारण बदले में जोर-जोर से दहाड़ने लगे थे॥ ४२-४३॥
ततः समुत्कृष्टरवं निशम्य रक्षोगणा वानरयूथपानाम्।
अमृष्यमाणाः परहर्षमुग्रं महाबला भीमतरं प्रणेदुः॥४४॥
वानरयूथपतियों का वह उच्च स्वर से किया हुआ गर्जन-तर्जन सुनकर भयंकर एवं महान् बल से सम्पन्न राक्षसगण शत्रुओं का हर्ष सहन न कर सके; अतः स्वयं भी अत्यन्त भीषण सिंहनाद करने लगे॥४४॥
ते राक्षसबलं घोरं प्रविश्य हरियूथपाः।
विचेरुरुद्यतैः शैलैर्नगाः शिखरिणो यथा॥४५॥
तब वानर-यूथपति राक्षसों की उस भयंकर सेना में घुस गये और शैलशृङ्ग उठाये शिखरों वाले पर्वतों की भाँति वहाँ विचरण करने लगे॥ ४५ ॥
केचिदाकाशमाविश्य केचिदुर्व्या प्लवङ्गमाः।
रक्षःसैन्येषु संक्रुद्धाः केचिद् द्रुमशिलायुधाः॥४६॥
द्रुमांश्च विपुलस्कन्धान् गृह्य वानरपुङ्गवाः।
वृक्षों और शिलाओं को आयुध के रूप में धारण किये वानर योद्धा राक्षस सैनिकों पर अत्यन्त कुपित हो आकाश में उड़-उड़कर विचरने लगे। कितने ही वानरशिरोमणि वीर मोटी-मोटी शाखाओं-वाले वृक्षों को हाथ में लेकर पृथ्वी पर विचरण करने लगे। ४६ १/२॥
तद् युद्धमभवद् घोरं रक्षोवानरसंकुलम्॥४७॥
ते पादपशिलाशैलैश्चक्रुर्वृष्टिमनूपमाम्।
बाणौघैर्वार्यमाणाश्च हरयो भीमविक्रमाः॥४८॥
उस समय राक्षसों और वानरों के उस युद्ध ने बड़ा भयंकर रूप धारण किया। राक्षसों ने बाणसमूहों की वर्षा द्वारा जब वानरों को आगे बढ़ने से रोका, उस समय वे भयंकर पराक्रमी वानर उन-पर वृक्षों, शिलाओं तथा शैल-शिखरों की अनुपम वृष्टि करने लगे॥ ४७-४८॥
सिंहनादान् विनेदुश्च रणे राक्षसवानराः।
शिलाभिश्चूर्णयामासुर्यातुधानान् प्लवङ्गमाः॥४९॥
निर्जनुः संयुगे क्रुद्धाः कवचाभरणावृतान्।
राक्षस और वानर दोनों ही वहाँ रणक्षेत्र में सिंहों के समान दहाड़ रहे थे। कुपित हुए वानरों ने कवचों और आभूषणों से विभूषित बहुतेरे राक्षसों को युद्धस्थल में शिलाओं की मार से कुचल दिया—मार डाला॥ ४९ १/२॥
केचिद् रथगतान् वीरान् गजवाजिगतानपि॥५०॥
निर्जनुः सहसाऽऽप्लुत्य यातुधानान् प्लवङ्गमाः।
कितने ही वानर रथ, हाथी और घोड़े पर बैठे हुए वीर राक्षसों को भी सहसा उछलकर मार डालते थे॥
शैलशृङ्गान्विताङ्गास्ते मुष्टिभिर्वान्तलोचनाः॥५१॥
चेलुः पेतुश्च नेदुश्च तत्र राक्षसपुङ्गवाः।
वहाँ प्रधान-प्रधान राक्षसों के शरीर पर्वत-शिखरों से आच्छादित हो गये थे। वानरों के मुक्कों की मार खाकर कितनों की आँखें बाहर निकल आयी थीं। वे निशाचर भागते, गिरते-पड़ते और चीत्कार करते थे॥ ५१ १/२॥
राक्षसाश्च शरैस्तीक्ष्णैर्बिभिदुः कपिकुञ्जरान्॥५२॥
शूलमुद्गरखड्गैश्च जप्नुः प्रासैश्च शक्तिभिः।
राक्षसों ने भी पैने बाणों से कितने ही वानरशिरोमणियों को विदीर्ण कर दिया था तथा शूलों, मुद्गरों, खड्गों, प्रासों और शक्तियों से बहुतों को मार गिराया था॥
अन्योन्यं पातयामासुः परस्परजयैषिणः॥५३॥
रिपुशोणितदिग्धाङ्गास्तत्र वानरराक्षसाः।
शत्रुओं के रक्त जिनके शरीरों में लिपटे हुए थे, वे वानर और राक्षस वहाँ परस्पर विजय पाने की इच्छा से एक-दूसरे को धराशायी कर रहे थे॥ ५३ १/२ ॥
ततः शैलैश्च खड्गैश्च विसृष्टैर्हरिराक्षसैः॥५४॥
मुहूर्तेनावृता भूमिरभवच्छोणितोक्षिता।
थोड़ी ही देर में वह युद्धभूमि वानरों और राक्षसों द्वारा चलाये गये पर्वत-शिखरों तथा तलवारों से आच्छादित हो रक्त के प्रवाह से सिंच उठी॥५४ १/२ ॥
विकीर्णैः पर्वताकारै रक्षोभिरभिमर्दितैः।
आसीद् वसुमती पूर्णा तदा युद्धमदान्वितैः॥५५॥
युद्ध के मद से उन्मत्त हुए पर्वताकार राक्षस जो शिलाओं की मार से कुचल दिये गये थे, सब ओर बिखरे पड़े थे। उनसे वहाँ की सारी भूमि पट गयी थी॥ ५५॥
आक्षिप्ताः क्षिप्यमाणाश्च भग्नशैलाश्च वानराः।
पुनरङ्गैस्तदा चक्रुरासन्ना युद्धमद्भुतम्॥५६॥
राक्षसों ने जिनके युद्ध के साधनभूत शैल-शिखरों को तोड़-फोड़ डाला था, वे वानर उनके प्रहारों से विचलित किये जाने पर उन राक्षसों के अत्यन्त निकट जा अपने हाथ-पैर आदि अङ्गों द्वारा ही अद्भुत युद्ध करने लगे॥५६॥
वानरान् वानरैरेव जघ्नुस्ते नैर्ऋतर्षभाः।
राक्षसान् राक्षसैरेव जनुस्ते वानरा अपि॥५७॥
राक्षसों के प्रधान-प्रधान वीर वानरों को पकड़कर उन्हें दूसरे वानरों पर पटक देते थे। इसी प्रकार वानर भी राक्षसों से ही राक्षसोंको मार रहे थे॥ ५७॥
आक्षिप्य च शिलाः शैलाञ्जनुस्ते राक्षसास्तदा।
तेषां चाच्छिद्य शस्त्राणि जजू रक्षांसि वानराः॥५८॥
उस समय राक्षस अपने शत्रुओं के हाथ से शिलाओं और शैल-शिखरों को छीनकर उन्हीं से उन पर प्रहार करने लगे तथा वानर भी राक्षसों के हथियार छीनकर उन्हीं के द्वारा उनका वध करने लगे॥५८॥
निर्जनुः शैलशृङ्गैश्च बिभिदुश्च परस्परम्।
सिंहनादान् विनेदुश्च रणे राक्षसवानराः॥५९॥
इस तरह राक्षस और वानर दोनों ही दलों के योद्धा एक-दूसरे को पर्वत-शिखर से मारने, अस्त्र-शस्त्रों से विदीर्ण करने तथा रणभूमि में सिंहों के समान दहाड़ने लगे॥ ५९॥
छिन्नवर्मतनुत्राणा राक्षसा वानरैर्हताः।
रुधिरं प्रसृतास्तत्र रससारमिव द्रुमाः॥६०॥
राक्षसों की शरीर-रक्षा के साधनभूत कवच आदि छिन्न-भिन्न हो गये। वानरों की मार खाकर वे अपने शरीर से उसी प्रकार रक्त बहाने लगे, जैसे वृक्ष अपने तनों से गोंद बहाया करते हैं॥६०॥
रथेन च रथं चापि वारणेनापि वारणम्।
हयेन च हयं केचिन्निर्जनुर्वानरा रणे॥६१॥
कितने ही वानर रणभूमि में रथ से रथ को, हाथी से हाथी को और घोड़े से घोड़े को मार गिराते थे॥ ६१॥
क्षुरप्रैरर्धचन्द्रैश्च भल्लैश्च निशितैः शरैः।
राक्षसा वानरेन्द्राणां बिभिदुः पादपान् शिलाः॥६२॥
वानर-यूथपतियों के चलाये हुए वृक्षों और शिलाओं को निशाचर योद्धा तीखे क्षुरप्र, अर्धचन्द्र और भल्ल नामक बाणों से तोड़-फोड़ डालते थे। ६२॥
विकीर्णाः पर्वतास्तैश्च द्रुमच्छिन्नैश्च संयुगे।
हतैश्च कपिरक्षोभिर्दुर्गमा वसुधाभवत्॥६३॥
टूट-फूटकर गिरे हुए पर्वतों, कटे हुए वृक्षों तथा राक्षसों और वानरों की लाशों से पट जाने के कारण उस भूमि में चलना-फिरना कठिन हो गया॥ ६३॥
ते वानरा गर्वितहृष्टचेष्टाः संग्राममासाद्य भयं विमुच्य।
युद्धं स्म सर्वे सह राक्षसैस्ते नानायुधाश्चक्रुरदीनसत्त्वाः॥६४॥
वानरों की सारी चेष्टाएँ गर्व से भरी हुई तथा हर्ष और उत्साह से युक्त थीं। उनके हृदय में दीनता नहीं थी तथा उन्होंने राक्षसों के ही नाना प्रकार के आयुध छीनकर हस्तगत कर लिये थे, अतः वे सब संग्राम में पहुंचकर राक्षसों के साथ भय छोड़कर युद्ध कर रहे थे॥६४ ॥
तस्मिन् प्रवृत्ते तुमुले विमर्दै प्रहृष्यमाणेषु वलीमुखेषु।
निपात्यमानेषु च राक्षसेषु महर्षयो देवगणाश्च नेदुः॥६५॥
इस प्रकार जब भयंकर मारकाट मची हुई थी, वानर प्रसन्न थे और राक्षसों की लाशें गिर रही थीं, उस समय महर्षि तथा देवगण हर्षनाद करने लगे। ६५॥
ततो हयं मारुततुल्यवेगमारुह्य शक्तिं निशितां प्रगृह्य।
नरान्तको वानरसैन्यमुग्रं महार्णवं मीन इवाविवेश॥६६॥
तदनन्तर वायु के समान तीव्र वेगवाले घोड़े पर सवार हो हाथ में तीखी शक्ति लिये नरान्तक वानरों की भयंकर सेना में उसी तरह घुसा, जैसे कोई मत्स्य महासागर में प्रवेश कर रहा हो॥६६॥
स वानरान् सप्त शतानि वीरः प्रासेन दीप्तेन विनिर्बिभेद।
एकः क्षणेनेन्द्ररिपुर्महात्मा जघान सैन्यं हरिपुङ्गवानाम्॥६७॥
उस महाकाय इन्द्रद्रोही वीर निशाचर ने चमचमाते हुए भाले से अकेले ही सात सौ वानरों को चीर डाला और क्षणभर में वानर-यूथपतियों की एक बहुत बड़ी सेना का संहार कर डाला॥ ६७॥
ददृशुश्च महात्मानं हयपृष्ठप्रतिष्ठितम्।
चरन्तं हरिसैन्येषु विद्याधरमहर्षयः॥६८॥
घोड़े की पीठ पर बैठे हुए उस महामनस्वी वीर को विद्याधरों और महर्षियों ने वानरों की सेना में विचरते देखा॥
स तस्य ददृशे मार्गो मांसशोणितकर्दमः।
पतितैः पर्वताकारैर्वानरैरभिसंवृतः॥६९॥
वह जिस मार्ग से निकल जाता, वही धराशायी हुए पर्वताकार वानरों से ढका दिखायी देता था और वहाँ रक्त एवं मांस की कीच मच जाती थी॥ ६९॥
यावद् विक्रमितुं बुद्धिं चक्रुः प्लवगपुङ्गवाः।
तावदेतानतिक्रम्य निर्बिभेद नरान्तकः॥७०॥
वानरों के प्रधान-प्रधान वीर जबतक पराक्रम करने का विचार करते, तबतक ही नरान्तक इन सबको लाँघकर भाले की मार से घायल कर देता था। ७०॥
ज्वलन्तं प्रासमुद्यम्य संग्रामाग्रे नरान्तकः।
ददाह हरिसैन्यानि वनानीव विभावसुः॥७१॥
जैसे दावानल सूखे जंगलों को जलाता है, उसी प्रकार प्रज्वलित प्रास लिये नरान्तक युद्ध के मुहाने पर वानर-सेनाओं को दग्ध करने लगा। ७१॥
यावदुत्पाटयामासुर्वृक्षान् शैलान् वनौकसः।
तावत् प्रासहताः पेतुर्वज्रकृत्ता इवाचलाः॥७२॥
वानरलोग जबतक वृक्ष और पर्वत-शिखरों को उखाड़ते, तबतक ही उसके भाले की चोट खाकर वज्र के मारे हुए पर्वत की भाँति ढह जाते थे॥७२॥
दिक्षु सर्वासु बलवान् विचचार नरान्तकः।
प्रमृद्नन् सर्वतो युद्धे प्रावृट्काले यथानिलः॥७३॥
जैसे वर्षाकाल में प्रचण्ड वायु सब ओर वृक्षों को तोड़ती-उखाड़ती हुई विचरती है, उसी प्रकार बलवान् नरान्तक रणभूमि में वानरों को रौंदता हुआ सम्पूर्ण दिशाओं में विचरने लगा॥७३॥
न शेकुर्धावितुं वीरा न स्थातुं स्पन्दितुं भयात्।
उत्पतन्तं स्थितं यान्तं सर्वान् विव्याध वीर्यवान्॥७४॥
वानर-वीर भयके मारे न तो भाग पाते थे, न खड़े रह पाते थे और न उनसे दूसरी ही कोई चेष्टा करते बनती थी। पराक्रमी नरान्तक उछलते हुए, पड़े हुए और जाते हुए सभी वानरों पर भाले की चोट कर देता था॥ ७४॥
एकेनान्तककल्पेन प्रासेनादित्यतेजसा।
भग्नानि हरिसैन्यानि निपेतुर्धरणीतले॥७५॥
उसका प्रास (भाला) अपनी प्रभा से सूर्य के समान उद्दीप्त हो रहा था और यमराज के समान भयंकर जान पड़ता था। उस एक ही भाले की मार से घायल होकर झुंड-के-झुंड वानर धरती पर सो गये॥ ७५ ॥
वज्रनिष्पेषसदृशं प्रासस्याभिनिपातनम्।
न शेकुर्वानराः सोढुं ते विनेदुर्महास्वनम्॥७६॥
वज्र के आघात को भी मात करने वाले उस प्रास के दारुण प्रहार को वानर नहीं सह सके। वे जोर-जोर से चीत्कार करने लगे॥७६॥
पततां हरिवीराणां रूपाणि प्रचकाशिरे।
वज्रभिन्नाग्रकूटानां शैलानां पततामिव॥७७॥
वहाँ गिरते हुए वानर-वीरों के रूप उन पर्वतों के समान दिखायी देते थे, जो वज्र के आघात से शिखरों के विदीर्ण हो जाने से धराशायी हो रहे हों। ७७॥
ये तु पूर्वं महात्मानः कुम्भकर्णेन पातिताः।
ते स्वस्था वानरश्रेष्ठाः सुग्रीवमुपतस्थिरे॥७८॥
पहले कुम्भकर्ण ने जिन्हें रणभूमि में गिरा दिया था, वे महामनस्वी श्रेष्ठ वानर उस समय स्वस्थ होसुग्रीव की सेवा में उपस्थित हुए। ७८ ॥
प्रेक्षमाणः स सुग्रीवो ददृशे हरिवाहिनीम्।
नरान्तकभयत्रस्तां विद्रवन्तीं यतस्ततः॥७९॥
सुग्रीव ने जब सब ओर दृष्टिपात किया, तब देखा कि वानरों की सेना नरान्तक से भयभीत होकर इधर-उधर भाग रही है॥७९॥
विद्रुतां वाहिनीं दृष्ट्वा स ददर्श नरान्तकम्।
गृहीतप्रासमायान्तं हयपृष्ठप्रतिष्ठितम्॥८०॥
सेना को भागती देख उन्होंने नरान्तक पर भी दृष्टि डाली, जो घोड़े की पीठ पर बैठकर हाथ में भाला लिये आ रहा था॥ ८०॥
दृष्ट्वोवाच महातेजाः सुग्रीवो वानराधिपः।
कुमारमङ्गदं वीरं शक्रतुल्यपराक्रमम्॥८१॥
उसे देखकर महातेजस्वी वानरराज सुग्रीव ने इन्द्रतुल्य पराक्रमी वीर कुमार अङ्गद से कहा- ॥ ८१॥
गच्छैनं राक्षसं वीरं योऽसौ तुरगमास्थितः।
क्षोभयन्तं हरिबलं क्षिप्रं प्राणैर्वियोजय॥८२॥
‘बेटा! वह जो घोड़े पर बैठा हुआ वानर-सेना में हलचल मचा रहा है, उस वीर राक्षस का सामना करने के लिये जाओ और उसके प्राणों का शीघ्र ही अन्त कर दो’॥
स भर्तुर्वचनं श्रुत्वा निष्पपाताङ्गदस्तदा।
अनीकान्मेघसंकाशादंशुमानिव वीर्यवान्॥८३॥
स्वामी की यह आज्ञा सुनकर पराक्रमी अङ्गद उस समय मेघों की घटा के समान प्रतीत होने वाली वानरसेना से उसी तरह निकले, जैसे सूर्यदेव बादलों के ओट से प्रकट हो रहे हों॥ ८३॥
शैलसंघातसंकाशो हरीणामुत्तमोऽङ्गदः।
रराजाङ्गदसंनद्धः सधातुरिव पर्वतः॥८४॥
वानरों में श्रेष्ठ अङ्गद शैल-समूह के समान विशालकाय थे। वे अपनी बाँहों में बाजूबंद धारण किये हुए थे, इसलिये सुवर्ण आदि धातुओं से युक्त पर्वत के समान शोभा पाते थे॥ ८४ ॥
निरायुधो महातेजाः केवलं नखदंष्ट्रवान्।
नरान्तकमभिक्रम्य वालिपुत्रोऽब्रवीद् वचः॥८५॥
वालिपुत्र अङ्गद महातेजस्वी थे। उनके पास कोई हथियार नहीं था। केवल नख और दाढ़ ही उनके अस्त्र-शस्त्र थे। वे नरान्तक के पास पहुँचकर इस प्रकार बोले- ॥ ८५॥
तिष्ठ किं प्राकृतैरेभिर्हरिभिस्त्वं करिष्यसि।
अस्मिन् वज्रसमस्पर्श प्रासंक्षिप्र ममोरसि॥८६॥
‘ओ निशाचर! ठहर जा। इन साधारण बंदरों को मारकर तू क्या करेगा? तेरे भाले की चोट वज्र के समान असह्य है; किंतु जरा इसे मेरी इस छाती पर तो मार’ ॥ ८६॥
अङ्गदस्य वचः श्रुत्वा प्रचुक्रोध नरान्तकः।
संदश्य दशनैरोष्ठं निःश्वस्य च भुजंगवत्।
अभिगम्याङ्गदं क्रुद्धो वालिपुत्रं नरान्तकः॥८७॥
अङ्गद की यह बात सुनकर नरान्तक को बड़ा क्रोध हुआ। वह कुपित हो, दाँतों से ओठ दबा सर्प की भाँति लंबी साँस ले, वालिपुत्र अङ्गद के पास आकर खड़ा हो गया॥८७॥
स प्रासमाविध्य तदाङ्गदाय समुज्ज्वलन्तं सहसोत्ससर्ज।
स वालिपुत्रोरसि वज्रकल्पे बभूव भग्नो न्यपतच्च भूमौ॥ ८८॥
उसने उस चमकते हुए भाले को घुमाकर सहसा उसे अङ्गदपर दे मारा। वालिपुत्र अङ्गद का वक्षःस्थल वज्र के समान कठोर था। नरान्तक का भाला उस पर टकराकर टूट गया और जमीन पर जा पड़ा॥८८॥
तं प्रासमालोक्य तदा विभग्नं सुपर्णकृत्तोरगभोगकल्पम्।
तलं समुद्यम्य स वालिपुत्रस्तुरंगमस्याभिजघान मूर्ध्नि॥८९॥
उस भाले को गरुड़ के द्वारा खण्डित किये गये सर्प के शरीर की भाँति टूक-टूक होकर पड़ा देख वालिपुत्र अङ्गद ने हथेली ऊँची करके नरान्तक के घोड़े के मस्तक पर बड़े जोर से थप्पड़ मारा ॥ ८९ ॥
निमग्नपादः स्फुटिताक्षितारो निष्क्रान्तजिह्वोऽचलसंनिकाशः।
स तस्य वाजी निपपात भूमौ तलप्रहारेण विकीर्णमूर्धा ॥९०॥
उस प्रहार से घोड़े का सिर फट गया, पैर नीचेको धंस गये, आँखें फूट गयीं और जीभ बाहर निकल आयी। वह पर्वताकार अश्व प्राणहीन होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा।
नरान्तकः क्रोधवशं जगाम हतं तुरंगं पतितं समीक्ष्य।
स मुष्टिमुद्यम्य महाप्रभावो जघान शीर्षे युधि वालिपुत्रम्॥९१॥
घोड़े को मरकर पृथ्वी पर पड़ा देख नरान्तक के क्रोध की सीमा न रही। उस महाप्रभावशाली निशाचर ने युद्धस्थल में मुक्का तानकर वालिकुमार के मस्तक पर मारा॥
अथाङ्गदो मुष्टिविशीर्णमूर्धा सुस्राव तीव्र रुधिरं भृशोष्णम्।
मुहुर्विजज्वाल मुमोह चापि संज्ञां समासाद्य विसिस्मिये च॥९२॥
मुक्के की मार से अङ्गद का सिर फूट गया। उससे वेगपूर्वक गर्म-गर्म रक्त की धारा बहने लगी। उनके माथे में बड़ी जलन हुई। वे मूर्च्छित हो गये और थोड़ी देर में जब होश हुआ, तब उस राक्षस की शक्ति देखकर आश्चर्यचकित हो उठे॥ ९२॥
अथाङ्गदो मृत्युसमानवेगं संवर्त्य मुष्टिं गिरिशृङ्गकल्पम्।
निपातयामास तदा महात्मा नरान्तकस्योरसि वालिपुत्रः॥९३॥
फिर अङ्गदने पर्वत-शिखर के समान अपना मुक्का ताना, जिसका वेग मृत्यु के समान था। फिर उन महात्मा वालिकुमार ने उससे नरान्तक की छाती में प्रहार किया।
स मुष्टिनिर्भिन्ननिमग्नवक्षा ज्वाला वमन् शोणितदिग्धगात्रः।
नरान्तको भूमितले पपात यथाचलो वज्रनिपातभग्नः॥९४॥
मुक्के के आघात से नरान्तक का हृदय विदीर्ण हो गया। वह मुँह से आग की ज्वाला-सी उगलने लगा। उसके सारे अङ्ग लहूलुहान हो गये और वह वज्र के मारे हुए पर्वत की भाँति पृथ्वी पर गिर पड़ा॥ ९४ ॥
तदान्तरिक्षे त्रिदशोत्तमानां वनौकसां चैव महाप्रणादः।
बभूव तस्मिन् निहतेऽग्रयवीर्ये नरान्तके वालिसुतेन संख्ये॥ ९५॥
वालिकुमार के द्वारा युद्धस्थल में उत्तम पराक्रमी नरान्तक के मारे जाने पर उस समय आकाश में देवताओं ने और भूतल पर वानरों ने बड़े जोर से हर्षनाद किया॥९५॥
अथाङ्गदो राममनःप्रहर्षणं सुदुष्करं तं कृतवान् हि विक्रमम्।
विसिस्मिये सोऽप्यथ भीमकर्मा पुनश्च युद्धे स बभूव हर्षितः॥ ९६॥
अङ्गद ने श्रीरामचन्द्रजी के मन को अत्यन्त हर्ष प्रदान करने वाला वह परम दुष्कर पराक्रम किया था। उससे श्रीरामचन्द्रजी को भी बड़ा विस्मय हुआ। तत्पश्चात् भीषण कर्म करने वाले अङ्गद पुनः युद्ध के लिये हर्ष और उत्साह से भर गये॥९६॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे एकोनसप्ततितमः सर्गः॥६९॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में उनहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ।६९॥
सर्ग-70
नरान्तकं हतं दृष्ट्वा चुक्रुशुर्नैर्ऋतर्षभाः।
देवान्तकस्त्रिमूर्धा च पौलस्त्यश्च महोदरः॥१॥
नरान्तक को मारा गया देख देवान्तक, पुलस्त्यकुलनन्दन त्रिशिरा और महोदर—ये श्रेष्ठ राक्षस हाहाकार करने लगे॥१॥
आरूढो मेघसंकाशं वारणेन्द्रं महोदरः।
वालिपुत्रं महावीर्यमभिदुद्राव वेगवान्॥२॥
महोदर ने मेघ के समान गजराज पर बैठकर महापराक्रमी अङ्गद के ऊपर बड़े वेग से धावा किया॥ २॥
भ्रातृव्यसनसंतप्तस्तदा देवान्तको बली।
आदाय परिघं घोरमदं समभिद्रवत्॥३॥
भाई के मारे जाने से संतप्त हुए बलवान् देवान्तक ने भयानक परिघ हाथ में लेकर अङ्गद पर आक्रमण किया॥३॥
रथमादित्यसंकाशं युक्तं परमवाजिभिः।
आस्थाय त्रिशिरा वीरो वालिपुत्रमथाभ्यगात्॥४॥
इस प्रकार वीर त्रिशिरा उत्तम घोड़ों से जुते हुए सूर्यतुल्य तेजस्वी रथ पर बैठकर वालिकुमार का सामना करने के लिये आया॥४॥
स त्रिभिर्देवदर्पनै राक्षसेन्ट्रैरभिद्रुतः।
वृक्षमुत्पाटयामास महाविटपमङ्गदः॥५॥
देवान्तकाय तं वीरश्चिक्षेप सहसाङ्गदः।
महावृक्षं महाशाखं शक्रो दीप्तामिवाशनिम्॥६॥
देवताओं का दर्प दलन करने वाले उन तीनों निशाचरपतियों के आक्रमण करने पर वीर अङ्गद ने विशाल शाखाओं से युक्त एक वृक्ष को उखाड़ लिया और जैसे इन्द्र प्रज्वलित वज्र का प्रहार करते हैं, उसी प्रकार उन वालिकुमार ने बड़ी-बड़ी शाखाओं से युक्त उस महान् वृक्ष को सहसा देवान्तक पर दे मारा॥ ५-६॥
त्रिशिरास्तं प्रचिच्छेद शरैराशीविषोपमैः ।
स वृक्षं कृत्तमालोक्य उत्पपात तदाङ्गदः॥७॥
स ववर्ष ततो वृक्षान् शिलाश्च कपिकुञ्जरः।
तान् प्रचिच्छेद संक्रुद्धस्त्रिशिरा निशितैः शरैः॥८॥
परंतु त्रिशिरा ने विषधर सर्पो के समान भयंकर बाण मारकर उस वृक्ष के टुकड़े-टुकड़े कर दिये। वृक्ष को खण्डित हुआ देख कपिकुञ्जर अङ्गद तत्काल आकाश में उछले और त्रिशिरा पर वृक्षों तथा शिलाओं की वर्षा करने लगे; किंतु क्रोध से भरे हुए त्रिशिरा ने पैने बाणों द्वारा उनको भी काट गिराया। ७-८॥
परिघाग्रेण तान् वृक्षान् बभञ्ज स महोदरः।
त्रिशिराश्चाङ्गदं वीरमभिदुद्राव सायकैः॥९॥
महोदर ने अपने परिघ के अग्रभाग से उन वृक्षों को तोड़-फोड़ डाला। तत्पश्चात् सायकों की वर्षा करते हुए त्रिशिरा ने वीर अङ्गद पर धावा किया॥९॥
गजेन समभिद्रुत्य वालिपुत्रं महोदरः।
जघानोरसि संक्रुद्धस्तोमरैर्वज्रसंनिभैः॥१०॥
साथ ही कुपित हुए महोदर ने हाथी के द्वारा आक्रमण करके वालिकुमार की छाती में वज्रतुल्य तोमरों का प्रहार किया॥१०॥
देवान्तकश्च संक्रुद्धः परिघेण तदाङ्गदम्।
उपगम्याभिहत्याशु व्यपचक्राम वेगवान्॥११॥
इसी प्रकार देवान्तक भी अङ्गद के निकट आ अत्यन्त क्रोधपूर्वक परिघ के द्वारा उन्हें चोट पहुँचाकर तुरंत वेगपूर्वक वहाँ से दूर हट गया॥ ११ ॥
स त्रिभिर्नैर्ऋतश्रेष्ठैर्युगपत् समभिद्रुतः।
न विव्यथे महातेजा वालिपुत्रः प्रतापवान्॥१२॥
उन तीनों प्रमुख निशाचरों ने एक साथ ही धावा किया था, तो भी महातेजस्वी और प्रतापी वालिकुमार अङ्गद के मन में तनिक भी व्यथा नहीं हुई॥ १२॥
स वेगवान् महावेगं कृत्वा परमदुर्जयः।
तलेन समभिद्रुत्य जघानास्य महागजम्॥१३॥
वे अत्यन्त दुर्जय और बड़े वेगशाली थे। उन्होंने महान् वेग प्रकट करके महोदर के महान् गजराजपर आक्रमण किया और उसके मस्तक पर जोर से थप्पड़ मारा ॥ १३॥
तस्य तेन प्रहारेण नागराजस्य संयुगे।
पेततुर्नयने तस्य विननाश स कुञ्जरः॥१४॥
युद्धस्थल में उनके उस प्रहार से गजराज की दोनों आँखें निकलकर पृथ्वी पर गिर गयीं और वह तत्काल मर गया॥१४॥
विषाणं चास्य निष्कृष्य वालिपुत्रो महाबलः।
देवान्तकमभिद्रुत्य ताडयामास संयुगे॥१५॥
फिर महाबली वालिकुमार ने उस हाथी का एक दाँत उखाड़ लिया और युद्धस्थल में दौड़कर उसी के द्वारा देवान्तक पर चोट की॥ १५ ॥
स विह्वलस्तु तेजस्वी वातोद्धृत इव द्रुमः।
लाक्षारससवर्णं च सुस्राव रुधिरं महत्॥१६॥
तेजस्वी देवान्तक उस प्रहार से व्याकुल हो गया और वायु के हिलाये हुए वृक्ष की भाँति काँपने लगा। उसके शरीर से महावर के समान रंगवाला रक्त का महान् प्रवाह बह चला ॥१६॥
अथाश्वास्य महातेजाः कृच्छ्राद् देवान्तको बली।
आविध्य परिघं वेगादाजघान तदाङ्गदम्॥१७॥
तत्पश्चात् महातेजस्वी बलवान् देवान्तक ने बड़ी कठिनाई से अपने को सँभालकर परिघ उठाया और उसे वेगपूर्वक घुमाकर अङ्गद पर दे मारा॥ १७ ॥
परिघाभिहतश्चापि वानरेन्द्रात्मजस्तदा।
जानुभ्यां पतितो भूमौ पुनरेवोत्पपात ह॥१८॥
उस परिघ की चोट खाकर वानर राजकुमार अङ्गद ने भूमि पर घुटने टेक दिये। फिर तुरंत ही उठकर वे ऊपर की ओर उछले॥१८॥
तमुत्पतन्तं त्रिशिरास्त्रिभिर्बाणैरजिह्मगैः।
घोरैर्हरिपतेः पुत्रं ललाटेऽभिजघान ह॥१९॥
उछलते समय त्रिशिरा ने तीन सीधे जाने वाले भयंकर बाणों द्वारा वानर राजकुमार के ललाट में गहरी चोट पहुँचायी॥
ततोऽङ्गदं परिक्षिप्तं त्रिभिर्नैर्ऋतपुङ्गवैः।
हनूमानथ विज्ञाय नीलश्चापि प्रतस्थतुः॥२०॥
तदनन्तर अङ्गद को तीन प्रमुख निशाचरों से घिरा हुआ जान हनुमान् और नील भी उनकी सहायता के लिये अग्रसर हुए॥ २०॥
ततश्चिक्षेप शैलाग्रं नीलस्त्रिशिरसे तदा।
तद् रावणसुतो धीमान् बिभेद निशितैः शरैः॥२१॥
उस समय नील ने त्रिशिरा पर एक पर्वत-शिखर चलाया; किंतु उस बुद्धिमान् रावणपुत्र ने तीखे बाण मारकर उसे तोड़-फोड़ डाला॥२१॥
तद्बाणशतनिर्भिन्नं विदारितशिलातलम्।
सविस्फुलिङ्गं सज्वालं निपपात गिरेः शिरः॥२२॥
उसके सैकड़ों बाणों से विदीर्ण होकर उसकी एक-एक शिला बिखर गयी और वह पर्वत-शिखर आग की चिनगारियों तथा ज्वाला के साथ पृथ्वी पर गिर पड़ा ॥ २२॥
स विजृम्भितमालोक्य हर्षाद् देवान्तको बली।
परिघेणाभिदुद्राव मारुतात्मजमाहवे॥२३॥
अपने भाई का पराक्रम बढ़ता देख बलवान् देवान्तक को बड़ा हर्ष हुआ और उसने परिघ लेकर युद्धस्थल में हनुमान जी पर धावा किया॥ २३॥
तमापतन्तमुत्पत्य हनूमान् कपिकुञ्जरः।
आजघान तदा मूनि वज्रकल्पेन मुष्टिना ॥ २४॥
उसे आते देख कपिकुञ्जर हनुमान् जी ने उछलकर अपने वज्र-सरीखे मुक्के से उसके सिर पर मारा ॥ २४॥
शिरसि प्राहरद् वीरस्तदा वायुसुतो बली।
नादेनाकम्पयच्चैव राक्षसान् स महाकपिः॥ २५ ॥
बलवान् वायुकुमार महाकपि हनुमान जी ने उस समय देवान्तक के मस्तक पर प्रहार किया और अपनी भीषण गर्जना से राक्षसों को कम्पित कर दिया॥ २५ ॥
स मुष्टिनिष्पिष्टविभिन्नमूर्धा निर्वान्तदन्ताक्षिविलम्बिजिह्वः।
देवान्तको राक्षसराजसूनुर्गतासुरुवा॒ सहसा पपात॥२६॥
उनके मुष्टि-प्रहार से देवान्तक का मस्तक फट गया और पिस उठा। दाँत, आँखें और लंबी जीभ बाहर निकल आयीं तथा वह राक्षस राजकुमार प्राणशून्य होकर सहसा पृथ्वी पर गिर पड़ा॥२६॥
तस्मिन् हते राक्षसयोधमुख्ये महाबले संयति देवशत्रौ।
क्रुद्धस्त्रिशीर्षा निशितास्त्रमुग्रं ववर्ष नीलोरसि बाणवर्षम्॥२७॥
राक्षस-योद्धाओं में प्रधान महाबली देवद्रोही देवान्तक के युद्ध में मारे जाने पर त्रिशिरा को बड़ा क्रोध हुआ और उसने नील की छाती पर पैने बाणों की भयंकर वर्षा आरम्भ कर दी॥ २७॥
महोदरस्तु संक्रुद्धः कुञ्जरं पर्वतोपमम्।
भूयः समधिरुह्याशु मन्दरं रश्मिवानिव॥२८॥
तदनन्तर अत्यन्त क्रोध से भरा हुआ महोदर पुनः शीघ्र ही एक पर्वताकार हाथी पर सवार हुआ, मानो सूर्यदेव मन्दराचल पर आरूढ़ हुए हों॥ २८॥
ततो बाणमयं वर्षं नीलस्योपर्यपातयत्।
गिरौ वर्षं तडिच्चक्रचापवानिव तोयदः॥ २९॥
हाथी पर चढ़कर उसने नील के ऊपर बाणों की विकट वर्षा की, मानो इन्द्रधनुष एवं विद्युन्मण्डल से युक्त मेघ किसी पर्वत पर जल की वर्षा कर रहा हो॥
ततः शरौत्रैरभिवृष्यमाणो विभिन्नगात्रः कपिसैन्यपालः।
नीलो बभूवाथ विसृष्टगात्रो विष्टम्भितस्तेन महाबलेन॥३०॥
बाण-समूहों की निरन्तर वर्षा होने से वानरसेनापति नील के सारे अङ्ग क्षत-विक्षत हो गये। उनका शरीर शिथिल हो गया। इस प्रकार महाबली महोदर ने उन्हें मूर्च्छित करके उनके बल-विक्रम को कुण्ठित कर दिया॥
ततस्तु नीलः प्रतिलब्धसंज्ञः शैलं समुत्पाट्य सवृक्षखण्डम्।
ततः समुत्पत्य महोग्रवेगो महोदरं तेन जघान मूर्ध्नि॥३१॥
तत्पश्चात् होश में आने पर नील ने वृक्ष-समूहों से युक्त एक शैल-शिखर को उखाड़ लिया। उनका वेग बड़ा भयंकर था। उन्होंने उछलकर उस वृक्ष को महोदर के मस्तक पर दे मारा॥३१॥
ततः स शैलाभिनिपातभग्नो महोदरस्तेन महाद्विपेन।
व्यामोहितो भूमितले गतासुः पपात वज्राभिहतो यथाद्रिः॥३२॥
उस पर्वत-शिखर के आघात से महोदर उस महान् गजराज के साथ ही चूर-चूर हो गया और मूर्च्छित एवं प्राणशून्य हो वज्र के मारे हुए पर्वत की भाँति पृथ्वी पर गिर पड़ा॥ ३२॥
पितृव्यं निहतं दृष्ट्वा त्रिशिराश्चापमाददे।
हनूमन्तं च संक्रुद्धो विव्याध निशितैः शरैः॥३३॥
पिता के भाई को मारा गया देख त्रिशिरा के क्रोध की सीमा न रही। उसने धनुष हाथ में ले लिया और हनुमान जी को पैने बाणों से बींधना आरम्भ किया। ३३॥
स वायुसूनुः कुपितश्चिक्षेप शिखरं गिरेः।
त्रिशिरास्तच्छरैस्तीक्ष्णैर्बिभेद बहुधा बली॥ ३४॥
तब पवनकुमार ने कुपित होकर उस राक्षस के ऊपर पर्वत का शिखर चलाया, परंतु बलवान् त्रिशिरा ने अपने तीखे सायकों से उसके कई टुकड़े कर डाले॥
तद् व्यर्थं शिखरं दृष्ट्वा द्रुमवर्षं तदा कपिः।
विससर्ज रणे तस्मिन् रावणस्य सुतं प्रति॥ ३५॥
उस पर्वतशिखर के प्रहार को व्यर्थ हुआ देख कपिवर हनुमान् ने उस रणभूमि में रावणपुत्र त्रिशिरा के ऊपर वृक्षों की वर्षा आरम्भ की॥ ३५॥
तमापतन्तमाकाशे द्रुमवर्षं प्रतापवान्।
त्रिशिरा निशितैर्बाणैश्चिच्छेद च ननाद च॥३६॥
किंतु प्रतापी त्रिशिरा ने आकाश में होने वाली वृक्षों की उस वृष्टि को अपने पैने बाणों से छिन्न-भिन्न कर दिया और बड़े जोर से गर्जना की॥ ३६॥
हनूमांस्तु समुत्पत्य हयं त्रिशिरसस्तदा।
विददार नखैः क्रुद्धो नागेन्द्रं मृगराडिव॥३७॥
तब हनुमान जी कूदकर त्रिशिरा के पास जा पहुँचे और जैसे कुपित सिंह गजराज को अपने पंजों से चीर डालता है, उसी प्रकार रोष से भरे हुए उन पवनकुमार ने त्रिशिरा के घोड़े को अपने नखों से विदीर्ण कर डाला॥ ३७॥
अथ शक्तिं समासाद्य कालरात्रिमिवान्तकः।
चिक्षेपानिलपुत्राय त्रिशिरा रावणात्मजः॥३८॥
यह देख रावणकुमार त्रिशिराने शक्ति हाथ में ली, मानो यमराज ने कालरात्रि को साथ ले लिया हो, वह शक्ति लेकर उसने पवनकुमार हनुमान् पर चलायी॥ ३८॥
दिवः क्षिप्तामिवोल्कां तां शक्तिं क्षिप्तामसङ्गताम्।
गृहीत्वा हरिशार्दूलो बभञ्ज च ननाद च॥३९॥
जैसे आकाश से उल्कापात हुआ हो, उसी प्रकार वह शक्ति, जिसकी गति कहीं कुण्ठित नहीं होती थी, चली; परंतु वानरश्रेष्ठ हनुमान जी ने उसे अपने शरीर में लगने से पहले ही हाथ से पकड़ लिया और तोड़ डाला, तोड़ने के बाद उन्होंने भयंकर गर्जना की॥३९॥
तां दृष्ट्वा घोरसंकाशां शक्तिं भग्नां हनूमता।
प्रहृष्टा वानरगणा विनेदुर्जलदा यथा॥४०॥
हनुमान जी ने वह भयानक शक्ति तोड़ दी, यह देख वानरवृन्द अत्यन्त हर्ष से उल्लसित हो मेघों के समान गम्भीर गर्जना करने लगे॥ ४०॥
ततः खड्गं समुद्यम्य त्रिशिरा राक्षसोत्तमः।
निचखान तदा खड्गं वानरेन्द्रस्य वक्षसि॥४१॥
तब राक्षसशिरोमणि त्रिशिरा ने तलवार उठायी और कपिश्रेष्ठ हनुमान जी की छाती पर उसकी भरपूर चोट की॥४१॥
खड्गप्रहाराभिहतो हनूमान् मारुतात्मजः।
आजघान त्रिमूर्धानं तलेनोरसि वीर्यवान्॥४२॥
तलवार की चोट से घायल हो पराक्रमी पवनकुमार हनुमान् ने त्रिशिरा की छाती में एक तमाचा जड़ दिया।
स तलाभिहतस्तेन स्रस्तहस्तायुधो भुवि।
निपपात महातेजास्त्रिशिरास्त्यक्तचेतनः॥४३॥
उनका थप्पड़ लगते ही महातेजस्वी त्रिशिरा अपनी चेतना खो बैठा। उसके हाथ से हथियार खिसक गया और वह स्वयं भी पृथ्वी पर गिर पड़ा॥४३॥
स तस्य पततः खड्गं तमाच्छिद्य महाकपिः।
ननाद गिरिसंकाशस्त्रासयन् सर्वराक्षसान्॥४४॥
गिरते समय उस राक्षस के खड्ग को छीनकर पर्वताकार महाकपि हनुमान जी सब राक्षसों को भयभीत करते हुए जोर-जोर से गर्जना करने लगे। ४४॥
अमृष्यमाणस्तं घोषमुत्पपात निशाचरः।
उत्पत्य च हनूमन्तं ताडयामास मुष्टिना॥४५॥
उनकी वह गर्जना उस निशाचर से सही नहीं गयी, अतः वह सहसा उछलकर खड़ा हो गया। उठते ही उसने हनुमान् जी को एक मुक्का मारा।। ४५॥
तेन मुष्टिप्रहारेण संचुकोप महाकपिः।
कुपितश्च निजग्राह किरीटे राक्षसर्षभम्॥४६॥
उसके मुक्के की चोट खाकर महाकपि हनुमान् जी को बड़ा क्रोध हुआ। कुपित होने पर उन्होंने उस राक्षस का मुकुटमण्डित मस्तक पकड़ लिया॥ ४६॥
स तस्य शीर्षाण्यसिना शितेन किरीटजुष्टानि सकुण्डलानि।
क्रुद्धः प्रचिच्छेद सुतोऽनिलस्य त्वष्टः सुतस्येव शिरांसि शक्रः॥४७॥
फिर तो जैसे पूर्वकाल में इन्द्र ने त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप के तीनों मस्तकों को वज्र से काट गिराया था, उसी प्रकार कुपित हुए पवनपुत्र हनुमान् ने रावणपुत्र त्रिशिरा के किरीट और कुण्डलोंसहित तीनों मस्तकों को तीखी तलवार से काट डाला॥ ४७॥
तान्यायतामाण्यगसंनिभानि प्रदीप्तवैश्वानरलोचनानि।
पेतुः शिरांसीन्द्ररिपोः पृथिव्यां ज्योतींषि मुक्तानि यथार्कमार्गात्॥४८॥
उन मस्तकों की सभी इन्द्रियाँ विशाल थीं। उनकी आँखें प्रज्वलित अग्नि के समान उद्दीप्त हो रही थीं। उस इन्द्रद्रोही त्रिशिरा के वे तीनों सिर उसी प्रकार पृथ्वी पर गिरे, जैसे आकाश से तारे टूटकर गिरते हैं। ४८॥
तस्मिन् हते देवरिपौ त्रिशीर्षे हनूमता शक्रपराक्रमेण।
नेदुः प्लवंगाः प्रचचाल भूमी रक्षांस्यथो दुद्रुविरे समन्तात्॥४९॥
देवद्रोही त्रिशिरा जब इन्द्रतुल्य पराक्रमी हनुमान् जी के हाथ से मारा गया, तब समस्त वानर हर्षनाद करने लगे, धरती काँपने लगी तथा राक्षस चारों दिशाओं की ओर भाग चले॥ ४९ ॥
हतं त्रिशिरसं दृष्ट्वा तथैव च महोदरम्।
हतौ प्रेक्ष्य दुराधर्षों देवान्तकनरान्तकौ॥५०॥
चुकोप परमामर्षी मत्तो राक्षसपुङ्गवः।
जग्राहार्चिष्मतीं चापि गदां सर्वायसीं तदा ॥५१॥
त्रिशिरा तथा महोदर को मारा गया देख और दुर्जय वीर देवान्तक एवं नरान्तक को भी काल के गाल में गया हुआ जान अत्यन्त अमर्षशील राक्षसशिरोमणि मत्त (महापार्श्व) कुपित हो उठा। उसने एक तेजस्विनी गदा हाथ में ली, जो सम्पूर्णतः लोहे की बनी हुई थी॥
हेमपट्टपरिक्षिप्तां मांसशोणितफेनिलाम्।
विराजमानां विपुलां शत्रुशोणिततर्पिताम्॥५२॥
उसपर सोने का पत्र जड़ा हुआ था। युद्धस्थल में पहुँचने पर वह शत्रुओं के रक्त और मांस में सन जाती थी। उसका आकार विशाल था। वह सुन्दर शोभा से सम्पन्न तथा शत्रुओं के रक्त से तृप्त होने वाली थी॥ ५२॥
तेजसा सम्प्रदीप्तायां रक्तमाल्यविभूषिताम्।
ऐरावतमहापद्मसार्वभौमभयावहाम्॥५३॥
उसका अग्रभाग तेज से प्रज्वलित होता था। वह लाल रंगके फूलों से सजायी गयी थी तथा ऐरावत, पुण्डरीक और सार्वभौम नामक दिग्गजों को भी भयभीत करने वाली थी॥ ५३॥
गदामादाय संक्रुद्धो मत्तो राक्षसपुङ्गवः।
हरीन् समभिदुद्राव युगान्ताग्निरिव ज्वलन्॥५४॥
उस गदा को हाथ में लेकर क्रोध से भरा हुआ राक्षसशिरोमणि मत्त (महापार्श्व) प्रलयकाल की अग्नि के समान प्रज्वलित हो उठा और वानरों की ओर दौड़ा॥ ५४॥
अथर्षभः समुत्पत्य वानरो रावणानुजम्।
मत्तानीकमुपागम्य तस्थौ तस्याग्रतो बली॥५५॥
तब ऋषभ नामक बलवान् वानर उछलकर रावण के छोटे भाई मत्तानीक (महापार्श्व)-के पास आ पहुँचे और उसके सामने खड़े हो गये॥ ५५ ॥
तं पुरस्तात् स्थितं दृष्ट्वा वानरं पर्वतोपमम्।
आजघानोरसि क्रुद्धो गदया वज्रकल्पया॥५६॥
पर्वताकार वानरवीर ऋषभ को सामने खड़ा देख कुपित हुए महापार्श्व ने अपनी वज्रतुल्य गदा से उनकी छाती पर प्रहार किया॥५६॥
स तयाभिहतस्तेन गदया वानरर्षभः।
भिन्नवक्षाः समाधूतः सुस्राव रुधिरं बहु॥५७॥
उसकी उस गदा के आघात से वानरशिरोमणि ऋषभका वक्षःस्थल क्षत-विक्षत हो गया। वे काँप उठे और अधिक मात्रा में खन की धारा बहाने लगे। ५७॥
स सम्प्राप्य चिरात् संज्ञामृषभो वानरेश्वरः।
क्रुद्धो विस्फुरमाणौष्ठो महापार्श्वमुदैक्षत॥५८॥
बहुत देर के बाद होशमें आने पर वानरराज ऋषभ कुपित हो उठे और महापार्श्वकी ओर देखने लगे। उस समय उनके ओठ फड़क रहे थे। ५८॥
स वेगवान् वेगवदभ्युपेत्य तं राक्षसं वानरवीरमुख्यः।
संवर्त्य मुष्टिं सहसा जघान बाह्वन्तरे शैलनिकाशरूपः॥५९॥
वानरवीरों में प्रधान ऋषभ का रूप पर्वत के समान जान पड़ता था। वे बड़े वेगशाली थे। उन्होंने वेगपूर्वक उस राक्षस के पास पहुँचकर मुक्का ताना और सहसा उसकी छाती पर प्रहार किया॥ ५९॥
स कृत्तमूलः सहसेव वृक्षः क्षितौ पपात क्षतजोक्षिताङ्गः।
तां चास्य घोरां यमदण्डकल्पां गदां प्रगृह्याशु तदा ननाद॥६०॥
फिर तो महापार्श्व जड़ से कटे हुए वृक्ष की भाँति सहसा पृथ्वी पर गिर पड़ा। उसके सारे अङ्ग रक्त से नहा उठे। इधर ऋषभ उस निशाचर की यमदण्ड के समान भयंकर गदा को शीघ्र ही हाथ में लेकर जोर-जोर से गर्जना करने लगे॥६०॥
मुहूर्तमासीत् स गतासुकल्पः प्रत्यागतात्मा सहसा सुरारिः।
उत्पत्य संध्याभ्रसमानवर्णस्तं वारिराजात्मजमाजघान॥६१॥
देवद्रोही महापार्श्व दो घड़ी तक मुर्दे की भाँति पड़ा रहा। फिर होश में आने पर वह सहसा उछलकर खड़ा हो गया। उसका रक्तरञ्जित शरीर संध्याकाल के बादलों के समान लाल दिखायी देता था। उसने वरुणपुत्र ऋषभको गहरी चोट पहुँचायी॥ ६१॥
स मूर्च्छितो भूमितले पपात मुहूर्तमुत्पत्य पुनः ससंज्ञः।
तामेव तस्याद्रिवराद्रिकल्पां गदां समाविध्य जघान संख्ये॥६२॥
उस चोट से ऋषभ मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। दो घड़ी के बाद होश में आने पर वे पुनः उछलकर सामने आ गये और उन्होंने युद्धस्थल में महापार्श्व की उसी गदा को, जो किसी पर्वतराज की चट्टान के समान जान पड़ती थी, घुमाकर उस निशाचर पर दे मारा ॥ ६२॥
सा तस्य रौद्रा समुपेत्य देहं रौद्रस्य देवाध्वरविप्रशत्रोः।
बिभेद वक्षः क्षतजं च भूरि सुस्राव धात्वम्भ इवाद्रिराजः॥६३॥
उसकी उस भयंकर गदा ने देवता, यज्ञ और ब्राह्मण से शत्रुता रखने वाले उस रौद्र-राक्षस के शरीर पर चोट करके उसके वक्षःस्थल को विदीर्ण कर दिया। फिर तो जैसे पर्वतराज हिमालय गेरु आदि धातुओं से मिला हुआ जल बहाता है, उसी प्रकार वह भी अधिक मात्रा में रक्त बहाने लगा।
अभिदुद्राव वेगेन गदां तस्य महात्मनः।
तां गृहीत्वा गदां भीमामाविध्य च पुनः पुनः॥६४॥
मत्तानीकं महात्मा स जघान रणमूर्धनि।
उस समय उस राक्षस ने महामना ऋषभ के हाथ से अपनी गदा लेने के लिये उन पर धावा किया; किंतु ऋषभ ने उस भयानक गदा को हाथ में लेकर बारंबार घुमाया और बड़े वेग से महापार्श्व पर आक्रमण किया। इस तरह उन महामनस्वी वानर-वीर ने युद्ध के मुहाने पर उस निशाचर की जीवन-लीला समाप्त कर दी थी॥ ६४ १/२॥
स स्वया गदया भग्नो विशीर्णदशनेक्षणः॥
निपपात तदा मत्तो वज्राहत इवाचलः।
अपनी ही गदा की चोट खाकर महापार्श्व के दाँत टूट गये और आँखें फूट गयीं। वह वज्र के मारे हुए पर्वत-शिखर की भाँति तत्काल धराशायी हो गया। ६५ १/२॥
विशीर्णनयने भूमौ गतसत्त्वे गतायुषि।
पतिते राक्षसे तस्मिन् विद्रुतं राक्षसं बलम्॥६६॥
जिसकी आँखें नष्ट और चेतना विलुप्त हो गयी थी, वह राक्षस महापार्श्व जब गतायु होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा, तब राक्षसों की सेना सब ओर भाग चली॥ ६६॥
तस्मिन् हते भ्रातरि रावणस्य तन्नैर्ऋतानां बलमर्णवाभम्।
त्यक्तायुधं केवलजीविता दुद्राव भिन्नार्णवसंनिकाशम्॥६७॥
रावण के भाई महापार्श्व का वध हो जाने पर राक्षसों की वह समुद्र के समान विशाल सेना हथियार फेंककर केवल जान बचाने के लिये सब ओर भागने लगी, मानो महासागर फूटकर सब ओर बहने लगा हो॥६७॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे सप्ततितमः सर्गः॥७०॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में सत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥७०॥
सर्ग-71
स्वबलं व्यथितं दृष्ट्वा तुमुलं लोमहर्षणम्।
भ्रातूंश्च निहतान् दृष्ट्वा शक्रतुल्यपराक्रमान्॥१॥
पितृव्यौ चापि संदृश्य समरे संनिपातितौ।
युद्धोन्मत्तं च मत्तं च भ्रातरौ राक्षसोत्तमौ॥२॥
चुकोप च महातेजा ब्रह्मदत्तवरो युधि।
अतिकायोऽद्रिसंकाशो देवदानवदर्पहा॥३॥
अतिकाय ने देखा, शत्रुओं के रोंगटे खड़े कर देने वाली मेरी भयंकर सेना व्यथित हो उठी है, इन्द्र के तुल्य पराक्रमी मेरे भाइयों का संहार हो गया है तथा मेरे चाचा—दोनों भाई युद्धोन्मत्त (महोदर) और मत्त (महापार्श्व) भी समराङ्गण में मार गिराये गये हैं, तब उस महातेजस्वी निशाचर को बड़ा क्रोध हुआ। उसे ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त हो चुका था। अतिकाय पर्वत के समान विशालकाय तथा देवता और दानवों के दर्प का दलन करने वाला था॥ १-३॥
स भास्करसहस्रस्य संघातमिव भास्वरम्।
रथमारुह्य शक्रारिरभिदुद्राव वानरान्॥४॥
वह इन्द्र का शत्रु था। उसने सहस्रों सूर्यो के समूह की भाँति देदीप्यमान तेजस्वी रथ पर आरूढ़ होकर वानरों पर धावा किया॥४॥
स विस्फार्य तदा चापं किरीटी मृष्टकुण्डलः।
नाम संश्रावयामास ननाद च महास्वनम्॥५॥
उसके मस्तक पर किरीट और कानों में शुद्ध सुवर्ण के बने हुए कुण्डल झलमला रहे थे। उसने धनुष की टङ्कार करके अपना नाम सुनाया और बड़े जोर से गर्जना की॥५॥
तेन सिंहप्रणादेन नामविश्रावणेन च।
ज्याशब्देन च भीमेन त्रासयामास वानरान्॥६॥
उस सिंहनाद से, अपने नाम की घोषणा से और प्रत्यञ्चा की भयानक टङ्कार से उसने वानरों को भयभीत कर दिया॥६॥
ते दृष्ट्वा देहमाहात्म्यं कुम्भकर्णोऽयमुत्थितः।
भयार्ता वानराः सर्वे संश्रयन्ते परस्परम्॥७॥
उसके शरीर की विशालता देखकर वे वानर ऐसा मानने लगे कि यह कुम्भकर्ण ही फिर उठकर खड़ा हो गया। यह सोचकर सब वानर भय से पीड़ित हो एक-दूसरे का सहारा लेने लगे॥७॥
ते तस्य रूपमालोक्य यथा विष्णोस्त्रिविक्रमे।
भयाद् वानरयोधास्ते विद्रवन्ति ततस्ततः॥८॥
त्रिविक्रम-अवतार के समय बढ़े हुए भगवान् विष्णु के विराट रूप की भाँति उसका शरीर देखकर वे वानर-सैनिक भय के मारे इधर-उधर भागने लगे॥८॥
तेऽतिकायं समासाद्य वानरा मूढचेतसः।
शरण्यं शरणं जग्मुर्लक्ष्मणाग्रजमाहवे॥९॥
अतिकाय के निकट जाते ही वानरों के चित्त पर मोह छा गया। वे युद्धस्थल में लक्ष्मण के बड़े भाई शरणागतवत्सल भगवान् श्रीराम की शरण में गये॥९॥
ततोऽतिकायं काकुत्स्थो रथस्थं पर्वतोपमम्।
ददर्श धन्विनं दूराद् गर्जन्तं कालमेघवत्॥१०॥
रथ पर बैठे हुए पर्वताकार अतिकाय को श्रीरामचन्द्रजी ने भी देखा। वह हाथ में धनुष लिये कुछ दूरपर प्रलयकाल के मेघ की भाँति गर्जना कर रहा था॥ १०॥
स तं दृष्ट्वा महाकायं राघवस्तु सुविस्मितः।
वानरान् सान्त्वयित्वा च विभीषणमुवाच ह॥११॥
उस महाकाय निशाचर को देखकर श्रीरामचन्द्रजी को भी बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने वानरों को सान्त्वना देकर विभीषण से पूछा- ॥११॥
कोऽसौ पर्वतसंकाशो धनुष्मान् हरिलोचनः।
युक्ते हयसहस्रेण विशाले स्यन्दने स्थितः॥१२॥
‘विभीषण! हजार घोड़ों से जुते हुए विशाल रथ पर बैठा हुआ वह पर्वताकार निशाचर कौन है ? उसके हाथ में धनुष है और आँखें सिंह के समान तेजस्विनी दिखायी देती हैं॥ १२॥
य एष निशितैः शूलैः सुतीक्ष्णैः प्रासतोमरैः।
अर्चिष्मद्भिर्वृतो भाति भूतैरिव महेश्वरः॥१३॥
‘यह भूतों से घिरे हुए भूतनाथ महादेवजी के समान तीखे शूल तथा अत्यन्त तेज धारवाले तेजस्वी प्रासों और तोमरों से घिरकर अद्भुत शोभा पा रहा है॥ १३॥
कालजिह्वाप्रकाशाभिर्य एषोऽभिविराजते।
आवृतो रथशक्तीभिर्विद्युद्भिरिव तोयदः॥१४॥
‘इतना ही नहीं, कालकी जिह्वा के समान प्रकाशित होने वाली रथशक्तियों से घिरा हुआ यह वीर निशाचर विद्युन्मालाओं से आवृत मेघ के समान प्रकाशित हो रहा है॥ १४॥
धनूंषि चास्य सज्जानि हेमपृष्ठानि सर्वशः।
शोभयन्ति रथश्रेष्ठं शक्रचापमिवाम्बरम्॥१५॥
‘जिनके पृष्ठभाग में सोने मढ़े हुए हैं, ऐसे अनेकानेक सुसज्जित धनुष उसके श्रेष्ठ रथ की सब ओर से उसी तरह शोभा बढ़ा रहे हैं, जैसे इन्द्रधनुष आकाश को सुशोभित करता है॥ १५॥
य एष रक्षःशार्दूलो रणभूमिं विराजयन्।
अभ्येति रथिनां श्रेष्ठो रथेनादित्यवर्चसा॥१६॥
‘यह राक्षसों में सिंह के समान पराक्रमी और रथियों में श्रेष्ठ वीर अपने सूर्यतुल्य तेजस्वी रथ के द्वारा रणभूमि की शोभा बढ़ाता हुआ मेरे सामने आ रहा है। १६॥
ध्वजशृङ्गप्रतिष्ठेन राहुणाभिविराजते।
सूर्यरश्मिप्रभैर्बाणैर्दिशो दश विराजयन्॥१७॥
‘इसके ध्वज के शिखर पर पताका में राहु का चिह्न अङ्कित है, जिससे रथ की बड़ी शोभा हो रही है। यह सूर्य की किरणों के समान चमकीले बाणों से दसों दिशाओं को प्रकाशित कर रहा है॥ १७॥
त्रिनतं मेघनिर्हादं हेमपृष्ठमलंकृतम्।
शतक्रतुधनुःप्रख्यं धनुश्चास्य विराजते॥१८॥
‘इसके धनुष का पृष्ठभाग सोने से मढ़ा हुआ तथा पुष्प आदि से अलंकृत है। वह आदि, मध्य और अन्ततीन स्थानों में झुका हुआ है। उसकी प्रत्यञ्चा से मेघों की गर्जना के समान टंकार-ध्वनि प्रकट होती है। इस निशाचर का धनुष इन्द्र-धनुष के समान शोभा पाता है।
सध्वजः सपताकश्च सानुकर्षो महारथः।
चतुःसादिसमायुक्तो मेघस्तनितनिःस्वनः॥१९॥
‘इसका विशाल रथ ध्वजा, पताका और अनुकर्ष (रथ के नीचे लगे हुए आधारभूत काष्ठ)-से युक्त, चार सारथियों से नियन्त्रित और मेघ की गर्जना के समान घर्घराहट पैदा करने वाला है॥ १९॥
विंशतिर्दश चाष्टौ च तूणास्य रथमास्थिताः।
कार्मुकाणि च भीमानि ज्याश्च काञ्चनपिङ्गलाः॥२०॥
‘इसके रथ पर बीस तरकस, दस भयंकर धनुष और आठ सुनहरे एवं पिङ्गलवर्ण की प्रत्यञ्चाएँ रखी हुई हैं ॥ २० ॥
द्वौ च खड्गौ च पार्श्वस्थौ प्रदीप्तौ पार्श्वशोभितौ।
चतुर्हस्तत्सरुयुतौ व्यक्तहस्तदशायतौ॥२१॥
‘दोनों बगल में दो चमकीली तलवारें शोभा पा रही हैं, जिनकी मूंठे चार हाथ की और लंबाई दस हाथ की है॥ २१॥
रक्तकण्ठगुणो धीरो महापर्वतसंनिभः।
कालः कालमहावक्त्रो मेघस्थ इव भास्करः॥२२॥
‘गले में लाल रंग की माला धारण किये महान् पर्वत के समान आकारवाला यह धीर-वीर निशाचर काले रंग का दिखायी देता है। इसका विशाल मुख काल के मुख के समान भयंकर है तथा यह मेघों की ओट में स्थित हुए सूर् यके समान प्रकाशित होता है। २२॥
काञ्चनाङ्गदनद्धाभ्यां भुजाभ्यामेष शोभते।
शृङ्गाभ्यामिव तुङ्गाभ्यां हिमवान् पर्वतोत्तमः॥२३॥
‘इसकी बाँहों में सोने के बाजूबंद बँधे हुए हैं। उन भुजाओं के द्वारा यह विशालकाय निशाचर दो ऊँचे शिखरों से युक्त गिरिराज हिमालय के समान शोभा पाता है॥ २३॥
कुण्डलाभ्यामुभाभ्यां च भाति वक्त्रं सुभीषणम्।
पुनर्वस्वन्तरगतं परिपूर्णो निशाकरः॥२४॥
‘इसका अत्यन्त भीषण मुखमण्डल दोनों कुण्डलों से मण्डित हो पुनर्वसु नामक दो नक्षत्रों के बीच स्थित हुए परिपूर्ण चन्द्रमा के समान सुशोभित हो रहा है॥२४॥
आचक्ष्व मे महाबाहो त्वमेनं राक्षसोत्तमम्।
यं दृष्ट्वा वानराः सर्वे भयार्ता विद्रुता दिशः॥२५॥
‘महाबाहो! तुम मुझे इस श्रेष्ठ राक्षस का परिचय दो, जिसे देखते ही सब वानर भयभीत हो सम्पूर्ण दिशाओं की ओर भाग चले हैं ॥२५॥
स पृष्टो राजपुत्रेण रामेणामिततेजसा।
आचचक्षे महातेजा राघवाय विभीषणः॥२६॥
अमित तेजस्वी राजकुमार श्रीराम के इस प्रकार पूछने पर महातेजस्वी विभीषण ने रघुनाथजी से इस प्रकार कहा— ॥२६॥
दशग्रीवो महातेजा राजा वैश्रवणानुजः।
भीमकर्मा महात्मा हि रावणो राक्षसेश्वरः॥२७॥
तस्यासीद् वीर्यवान् पुत्रो रावणप्रतिमो बले।
वृद्धसेवी श्रुतिधरः सर्वास्त्रविदुषां वरः॥ २८॥
‘भगवन्! जो कुबेर का छोटा भाई, महातेजस्वी, महाकाय, भयानक कर्म करने वाला तथा राक्षसों का स्वामी दशमुख राजा रावण है, उसके एक बड़ा पराक्रमी पुत्र उत्पन्न हुआ, जो बल में रावण के ही समान है। वह वृद्ध पुरुषों का सेवन करने वाला, वेदशास्त्रों का ज्ञाता तथा सम्पूर्ण अस्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ है। २७-२८॥
अश्वपृष्ठे नागपृष्ठे खड्गे धनुषि कर्षणे।
भेदे सान्त्वे च दाने च नये मन्त्रे च सम्मतः॥२९॥
‘हाथी-घोड़ों की सवारी करने, तलवार चलाने, धनुष पर बाणों का संधान करने, प्रत्यञ्चा खींचने, लक्ष्य बेधने, साम और दान का प्रयोग करने तथा न्याययुक्त बर्ताव एवं मन्त्रणा देने में वह सबके द्वारा सम्मानित है॥ २९॥
यस्य बाहुं समाश्रित्य लङ्का भवति निर्भया।
तनयं धान्यमालिन्या अतिकायमिमं विदुः॥३०॥
‘उसी के बाहुबल का आश्रय लेकर लङ्कापुरी सदा निर्भय रहती आयी है। वही यह वीर निशाचर है। यह रावणकी दूसरी पत्नी धान्यमालिनी का पुत्र है। इसे लोग अतिकाय के नाम से जानते हैं॥३०॥
एतेनाराधितो ब्रह्मा तपसा भावितात्मना।
अस्त्राणि चाप्यवाप्तानि रिपवश्च पराजिताः॥३१॥
‘तपस्या से विशुद्ध अन्तःकरण वाले इस अतिकाय ने दीर्घकाल तक ब्रह्माजी की आराधना की थी। इसने ब्रह्माजी से अनेक दिव्यास्त्र प्राप्त किये हैं और उनके द्वारा बहुत-से शत्रुओं को पराजित किया है॥३१॥
सुरासुरैरवध्यत्वं दत्तमस्मै स्वयंभुवा।
एतच्च कवचं दिव्यं रथश्च रविभास्वरः॥३२॥
‘ब्रह्माजी ने इसे देवताओं और असुरों से न मारे जाने का वरदान दिया है। ये दिव्य कवच और सूर्य के समान तेजस्वी रथ भी उन्हीं के दिये हुए हैं।॥ ३२ ॥
एतेन शतशो देवा दानवाश्च पराजिताः।
रक्षितानि च रक्षांसि यक्षाश्चापि निषूदिताः॥३३॥
‘इसने देवता और दानवों को सैकड़ों बार पराजित किया है, राक्षसों की रक्षा की है और यक्षों को मार भगाया है॥३३॥
वज्रं विष्टम्भितं येन बाणैरिन्द्रस्य धीमता।
पाशः सलिलराजस्य युद्धे प्रतिहतस्तथा॥३४॥
‘इस बुद्धिमान् राक्षस ने अपने बाणों द्वारा इन्द्र के वज्र को भी कुण्ठित कर दिया है तथा युद्ध में जल के स्वामी वरुण के पाश को भी सफल नहीं होने दिया है॥
एषोऽतिकायो बलवान् राक्षसानामथर्षभः।
स रावणसुतो धीमान् देवदानवदर्पहा॥३५॥
‘राक्षसों में श्रेष्ठ यह बुद्धिमान् रावणकुमार अतिकाय बड़ा बलवान् तथा देवताओं और दानवों के दर्प को भी दलन करने वाला है॥ ३५ ॥
तदस्मिन् क्रियतां यत्नः क्षिप्रं पुरुषपुङ्गव।
पु ततोऽतिकायो बलवान् प्रविश्य हरिवाहिनीम्।
विस्फारयामास धनुर्ननाद च पुनः पुनः॥ ३७॥
विभीषण और भगवान् श्रीराम में इस प्रकार बातें हो ही रही थीं कि बलवान् अतिकाय वानरों की सेना में घुस आया और बारम्बार गर्जना करता हुआ अपने धनुष पर टंकार देने लगा॥ ३७॥
तं भीमवपुषं दृष्ट्वा रथस्थं रथिनां वरम्।
अभिपेतुर्महात्मानः प्रधाना ये वनौकसः॥ ३८॥
कुमुदो दिविदो मैन्दो नीलः शरभ एव च।
पादपैर्गिरिशृङ्गैश्च युगपत् समभिद्रवन्॥३९॥
रथियों में श्रेष्ठ और भयंकर शरीरवाले उस राक्षस को रथ पर बैठकर आते देख कुमुद, द्विविद, मैन्द, नील और शरभ आदि जो प्रधान-प्रधान महामनस्वी वानर थे, वे वृक्ष तथा पर्वतशिखर धारण किये एक साथ ही उस पर टूट पड़े॥ ३८-३९॥
तेषां वृक्षांश्च शैलांश्च शरैः कनकभूषणैः।
अतिकायो महातेजाश्चिच्छेदास्त्रविदां वरः॥४०॥
परंतु अस्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ महातेजस्वी अतिकाय ने अपने सुवर्णभूषित बाणों से वानरों के चलाये हुए वृक्षों और पर्वत-शिखरों को काट गिराया॥ ४०॥
तांश्चैव सर्वान् स हरीन् शरैः सर्वायसैबली।
विव्याधाभिमुखान् संख्ये भीमकायो निशाचरः॥४१॥
साथ ही उस बलवान् और भीमकाय निशाचर ने युद्धस्थल में सामने आये हुए उन समस्त वानरों को लोहे के बाणों से बांध डाला॥ ४१॥
तेऽर्दिता बाणवर्षेण भिन्नगात्राः पराजिताः।
न शेकुरतिकायस्य प्रतिकर्तुं महाहवे॥४२॥
उसकी बाणवर्षा से आहत हो सबके शरीर क्षतविक्षत हो गये। सबने हार मान ली और कोई भी उस महासमर में अतिकाय का सामना करने में समर्थ न हो सके॥४२॥
तत् सैन्यं हरिवीराणां त्रासयामास राक्षसः।
मृगयूथमिव क्रुद्धो हरियौवनदर्पितः॥४३॥
जैसे जवानी के जोश से भरा हुआ कुपित सिंह मृगों के झुण्ड को भयभीत कर देता है, उसी प्रकार वह राक्षस वानरवीरों की उस सेना को त्रास देने लगा। ४३॥
स राक्षसेन्द्रो हरियूथमध्ये नायुध्यमानं निजघान कंचित्।
उत्पत्य रामं स धनुःकलापी सगर्वितं वाक्यमिदं बभाषे॥४४॥
वानरों के झुण्ड में विचरते हुए राक्षसराज अतिकाय ने किसी भी ऐसे योद्धा को नहीं मारा, जो उसके साथ युद्ध न कर रहा हो। धनुष और तरकस धारण किये वह निशाचर उछलकर श्रीराम के पास आ गया तथा बड़े गर्व से इस प्रकार बोला— ॥४४॥
रथे स्थितोऽहं शरचापपाणिर्न प्राकृतं कंचन योधयामि।
यस्यास्ति शक्तिर्व्यवसाययुक्तो ददातु मे शीघ्रमिहाद्य युद्धम्॥४५॥
‘मैं धनुष और बाण लेकर रथ पर बैठा हूँ। किसी साधारण प्राणी से युद्ध करने का मेरा विचार नहीं है। जिसके अंदर शक्ति हो, साहस और उत्साह हो, वह शीघ्र यहाँ आकर मुझे युद्ध का अवसर दे’॥ ४५ ॥
तत् तस्य वाक्यं ब्रुवतो निशम्य चुकोप सौमित्रिरमित्रहन्ता।
अमृष्यमाणश्च समुत्पपात जग्राह चापं च ततः स्मयित्वा॥४६॥
उसके ये अहंकारपूर्ण वचन सुनकर शत्रुहन्ता सुमित्राकुमार लक्ष्मण को बड़ा क्रोध हुआ। उसकी बातों को सहन न कर सकने के कारण वे आगे बढ़ आये और किंचित् मुसकराकर उन्होंने अपना धनुष उठाया॥
क्रुद्धः सौमित्रिरुत्पत्य तूणादाक्षिप्य सायकम्।
पुरस्तादतिकायस्य विचकर्ष महद्धनुः॥४७॥
कुपित हुए लक्ष्मण उछलकर आगे आये और तरकस से बाण खींचकर अतिकाय के सामने आ अपने विशाल धनुष को खींचने लगे॥४७॥
पूरयन् स महीं सर्वामाकाशं सागरं दिशः।
ज्याशब्दो लक्ष्मणस्योग्रस्त्रासयन् रजनीचरान्॥४८॥
लक्ष्मण के धनुष की प्रत्यञ्चा का वह शब्द बड़ा भयंकर था। वह सारी पृथ्वी, आकाश, समुद्र तथा सम्पूर्ण दिशाओं में गूंज उठा और निशाचरों को त्रास देने लगा॥
सौमित्रेश्चापनि?षं श्रुत्वा प्रतिभयं तदा।
विसिस्मिये महातेजा राक्षसेन्द्रात्मजो बली॥४९॥
सुमित्राकुमार के धनुष की वह भयानक टंकार सुनकर उस समय महातेजस्वी बलवान् राक्षसराजकुमार अतिकाय को बड़ा विस्मय हुआ॥ ४९॥
तदातिकायः कुपितो दृष्ट्वा लक्ष्मणमुत्थितम्।
आदाय निशितं बाणमिदं वचनमब्रवीत्॥५०॥
लक्ष्मण को अपना सामना करने के लिये उठा देख अतिकाय रोष से भर गया और तीखा बाण हाथ में लेकर इस प्रकार बोला— ॥५०॥
बालस्त्वमसि सौमित्रे विक्रमेष्वविचक्षणः।
गच्छ किं कालसंकाशं मां योधयितुमिच्छसि॥५१॥
‘सुमित्राकुमार! तुम अभी बालक हो। पराक्रम करने में कुशल नहीं हो, अतः लौट जाओ। मैं तुम्हारे लिये काल के समान हूँ। मुझसे जूझने की इच्छा क्यों करते हो? ॥ ५१॥
नहि मद्बाहुसृष्टानां बाणानां हिमवानपि।
सोढुमुत्सहते वेगमन्तरिक्षमथो मही॥५२॥
‘मेरे हाथ से छूटे हुए बाणों का वेग गिरिराज हिमालय भी नहीं सह सकता। पृथ्वी और आकाश भी उसे नहीं सहन कर सकते॥५२॥
सुखप्रसुप्तं कालाग्निं विबोधयितुमिच्छसि।
न्यस्य चापं निवर्तस्व प्राणान्न जहि मद्गतः॥५३॥
‘तुम सुख से सोयी (शान्त) हुई प्रलयाग्नि को क्यों जगाना (प्रज्वलित करना) चाहते हो? धनुष को यहीं छोड़कर लौट जाओ। मुझसे भिड़कर अपने प्राणों का परित्याग न करो॥ ५३॥
अथवा त्वं प्रतिस्तब्धो न निवर्तितुमिच्छसि।
तिष्ठ प्राणान् परित्यज्य गमिष्यसि यमक्षयम्॥५४॥
‘अथवा तुम बड़े अहंकारी हो, इसीलिये लौटना नहीं चाहते। अच्छा, खड़े रहो। अभी अपने प्राणों से हाथ धोकर यमलोक की यात्रा करोगे॥ ५४॥
पश्य मे निशितान् बाणान् रिपुदर्पनिषूदनान्।
ईश्वरायुधसंकाशांस्तप्तकाञ्चनभूषणान्॥५५॥
‘शत्रुओं का दर्प चूर्ण करने वाले मेरे इन तीखे बाणों को, जो तपे हुए सुवर्ण से भूषित हैं, देखो; ये भगवान् शंकर के त्रिशूल की समानता करते हैं॥ ५५ ॥
एष ते सर्पसंकाशो बाणः पास्यति शोणितम्।
मृगराज इव क्रुद्धो नागराजस्य शोणितम्।
इत्येवमुक्त्वा संक्रुद्धः शरं धनुषि संदधे॥५६॥
‘जैसे कुपित हुआ सिंह गजराज का खून पीता है, उसी प्रकार यह सर्प के समान भयंकर बाण तुम्हारे रक्त का पान करेगा।’ ऐसा कहकर अतिकाय ने अत्यन्त कुपित हो अपने धनुष पर बाण का संधान किया॥५६॥
श्रुत्वातिकायस्य वचः सरोषं सगर्वितं संयति राजपुत्रः।
स संचुकोपातिबलो मनस्वी उवाच वाक्यं च ततो महार्थम्॥५७॥
युद्धस्थल में अतिकायके रोष और गर्व से भरे हुए इस वचन को सुनकर अत्यन्त बलशाली एवं मनस्वी राजकुमार लक्ष्मण को बड़ा क्रोध हुआ। वे यह महान् अर्थ से युक्त वचन बोले- ॥५७॥
न वाक्यमात्रेण भवान् प्रधानो न कत्थनात् सत्पुरुषा भवन्ति।
मयि स्थिते धन्विनि बाणपाणौ निदर्शयस्वात्मबलं दुरात्मन्॥५८॥
‘दुरात्मन्! केवल बातें बनाने से तू बड़ा नहीं हो सकता। सिर्फ डींग हाँकने से कोई श्रेष्ठ पुरुष नहीं होते। मैं हाथ में धनुष और बाण लेकर तेरे सामने खड़ा हूँ। तू अपना सारा बल मुझे दिखा॥ ५८॥
कर्मणा सूचयात्मानं न विकस्थितुमर्हसि।
पौरुषेण तु यो युक्तः स तु शूर इति स्मृतः॥५९॥
‘पराक्रम के द्वारा अपनी वीरता का परिचय दे। झूठी शेखी बघारना तेरे लिये उचित नहीं है। शूर वही माना गया है, जिसमें पुरुषार्थ हो॥ ५९॥
सर्वायुधसमायुक्तो धन्वी त्वं रथमास्थितः।
शरैर्वा यदि वाप्यस्त्रैर्दर्शयस्व पराक्रमम्॥६०॥
‘तेरे पास सब तरहके हथियार मौजूद हैं। तू धनुष लेकर रथ पर बैठा हुआ है; अतः बाणों अथवा अन्य अस्त्र-शस्त्रों के द्वारा पहले अपना पराक्रम दिखा ले॥६०॥
ततः शिरस्ते निशितैः पातयिष्याम्यहं शरैः।
मारुतः कालसम्पक्वं वृन्तात् तालफलं यथा॥६१॥
‘उसके बाद मैं अपने तीखे बाणों से तेरा मस्तक उसी तरह काट गिराऊँगा, जैसे वायु कालक्रम से पके हुए ताड़ के फल को उसके वृन्त (बौंडी)-से नीचे गिरा देती है॥ ६१॥
अद्य ते मामका बाणास्तप्तकाञ्चनभूषणाः।
पास्यन्ति रुधिरं गात्राद् बाणशल्यान्तरोत्थितम्॥६२॥
‘आज तपे हुए सुवर्ण से विभूषित मेरे बाण अपनी नोंक-द्वारा किये गये छिद्र से निकले हुए तेरे शरीर के रक्त का पान करेंगे॥ ६२॥
बालोऽयमिति विज्ञाय न चावज्ञातुमर्हसि।
बालो वा यदि वा वृद्धो मृत्युं जानीहि संयुगे॥६३॥
‘तू मुझे बालक जानकर मेरी अवहेलना न कर। मैं बालक होऊँ अथवा वृद्ध, संग्राम में तो तू मुझे अपना काल ही समझ ले॥ ६३॥
बालेन विष्णुना लोकास्त्रयः क्रान्तास्त्रिविक्रमैः।
लक्ष्मणस्य वचः श्रुत्वा हेतुमत् परमार्थवत्।
अतिकायः प्रचुक्रोध बाणं चोत्तममाददे॥६४॥
‘वामनरूपधारी भगवान् विष्णु देखने में बालक ही थे; किंतु अपने तीन ही पगों से उन्होंने समूची त्रिलोकी नाप ली थी।’ लक्ष्मण की वह परम सत्य और युक्तियुक्त बात सुनकर अतिकाय के क्रोध की सीमा न रही। उसने एक उत्तम बाण अपने हाथ में ले लिया॥ ६४॥
ततो विद्याधरा भूता देवा दैत्या महर्षयः।
गुह्यकाश्च महात्मानस्तद् युद्धं द्रष्टुमागमन्॥६५॥
तदनन्तर विद्याधर, भूत, देवता, दैत्य, महर्षि तथा महामना गुह्यकगण उस युद्ध को देखने के लिये आये॥
ततोऽतिकायः कुपितश्चापमारोप्य सायकम्।
लक्ष्मणाय प्रचिक्षेप संक्षिपन्निव चाम्बरम्॥६६॥
उस समय अतिकाय ने कुपित हो धनुष पर वह उत्तम बाण चढ़ाया और आकाश को अपना ग्रास बनाते हुए-से उसे लक्ष्मण पर चला दिया॥६६॥
तमापतन्तं निशितं शरमाशीविषोपमम्।
अर्धचन्द्रेण चिच्छेद लक्ष्मणः परवीरहा॥६७॥
किंतु शत्रुवीरों का संहार करने वाले लक्ष्मण ने एक अर्धचन्द्राकार बाण के द्वारा अपनी ओर आते हुए उसविषधर सर्प के तुल्य भयंकर एवं तीखे बाण को काट डाला॥६७॥
तं निकृत्तं शरं दृष्ट्वा कृत्तभोगमिवोरगम्।
अतिकायो भृशं क्रुद्धः पञ्च बाणान् समादधे॥६८॥
जैसे सर्प का फन कट जाय, उसी प्रकार उस बाणको खण्डित हुआ देख अत्यन्त कुपित हुए अतिकाय ने पाँच बाणों को धनुष पर रखा॥ ६८॥
तान् शरान् सम्प्रचिक्षेप लक्ष्मणाय निशाचरः।
तानप्राप्तान् शितैर्बाणैश्चिच्छेद भरतानुजः॥६९॥
फिर उस निशाचर ने लक्ष्मण पर ही वे पाँचों बाण चला दिये। वे बाण उनके समीप अभी आने भी नहीं पाये थे कि लक्ष्मण ने तीखे सायकों से उनके टुकड़े-टुकड़े कर डाले॥ ६९॥
स तान् छित्त्वा शितैर्बाणैर्लक्ष्मणः परवीरहा।
आददे निशितं बाणं ज्वलन्तमिव तेजसा॥७०॥
शत्रुवीरों का संहार करने वाले लक्ष्मण ने अपने पैने सायकों से उन बाणों का खण्डन करने के पश्चात् एक तेज बाण हाथ में लिया, जो अपने तेज से प्रज्वलित-सा हो रहा था॥ ७० ॥
तमादाय धनुःश्रेष्ठे योजयामास लक्ष्मणः।
विचकर्ष च वेगेन विससर्ज च सायकम्॥७१॥
उसे लेकर लक्ष्मण ने अपने श्रेष्ठ धनुष पर रखा, उसकी प्रत्यञ्चा को खींचा और बड़े वेग से वह सायक अतिकाय पर छोड़ दिया। ७१॥
पूर्णायतविसृष्टेन शरेण नतपर्वणा।
ललाटे राक्षसश्रेष्ठमाजघान स वीर्यवान्॥७२॥
धनुष को पूर्णरूप से खींचकर छोड़े गये तथा झुकी हुई गाँठवाले उस बाण के द्वारा पराक्रमी लक्ष्मण ने राक्षसश्रेष्ठ अतिकाय के ललाट में गहरा आघात किया॥
स ललाटे शरो मग्नस्तस्य भीमस्य रक्षसः।
ददृशे शोणितेनाक्तः पन्नगेन्द्र इवाचले॥७३॥
वह बाण उस भयानक राक्षस के ललाट में धंस गया और रक्त से भीगकर पर्वत से सटे हुए किसी नागराज के समान दिखायी देने लगा॥७३॥
राक्षसः प्रचकम्पेऽथ लक्ष्मणेषु प्रपीडितः।
रुद्रबाणहतं घोरं यथा त्रिपुरगोपुरम्॥७४॥
चिन्तयामास चाश्वास्य विमृश्य च महाबलः।
लक्ष्मण के बाण से अत्यन्त पीड़ित हो वह राक्षस काँप उठा। ठीक उसी तरह, जैसे भगवान् रुद्र के बाणों से आहत हो त्रिपुर का भयंकर गोपुर हिल उठा था। फिर थोड़ी ही देर में सँभलकर महाबली अतिकाय बड़ी चिन्ता में पड़ गया और कुछ सोचविचारकर बोला— ॥७४ १/२॥
साधु बाणनिपातेन श्लाघनीयोऽसि मे रिपुः॥७५॥
विधायैवं विदार्यास्यं नियम्य च महाभुजौ।
स रथोपस्थमास्थाय रथेन प्रचचार ह॥७६॥
‘शाबाश! इस प्रकार अमोघ बाण का प्रयोग करने के कारण तुम मेरे स्पृहणीय शत्रु हो।’ मुँह फैलाकर ऐसा कहने के पश्चात् अतिकाय अपनी दोनों विशाल भुजाओं को काबू में करके रथ के पिछले भाग में बैठकर उस रथ के द्वारा ही आगे बढ़ा।७५-७६॥
एवं त्रीन् पञ्च सप्तेति सायकान् राक्षसर्षभः।
आददे संदधे चापि विचकर्षोत्ससर्ज च॥७७॥
उस राक्षसशिरोमणि वीर ने क्रमशः एक, तीन, पाँच और सात सायकों को लेकर उन्हें धनुष पर चढ़ाया और वेगपूर्वक खींचकर चला दिया॥ ७७॥
ते बाणाः कालसंकाशा राक्षसेन्द्रधनुश्च्युताः।
हेमपुङ्खा रविप्रख्याश्चक्रुर्दीप्तमिवाम्बरम्॥७८॥
उस राक्षसराज के धनुष से छूटे हुए उन सुवर्णभूषित, सूर्यतुल्य तेजस्वी तथा काल के समान भयंकर बाणों ने आकाश को प्रकाश से पूर्ण-सा कर दिया॥ ७८॥
ततस्तान् राक्षसोत्सृष्टान् शरौघान् राघवानुजः।
असम्भ्रान्तः प्रचिच्छेद निशितैर्बहुभिः शरैः॥७९॥
परंतु रघुनाथजी के छोटे भाई लक्ष्मण ने बिना किसी घबराहट के उस निशाचर द्वारा चलाये हुए उन बाणसमूहों को तेज धारवाले बहुसंख्यक सायकों द्वारा काट गिराया॥ ७९ ॥
तान् शरान् युधि सम्प्रेक्ष्य निकृत्तान् रावणात्मजः।
चुकोप त्रिदशेन्द्रारिर्जग्राह निशितं शरम्॥८०॥
उन बाणों को कटा हुआ देख इन्द्रद्रोही रावणकुमार को बड़ा क्रोध हुआ और उसने एक तीखा बाण हाथ में लिया॥ ८०॥
स संधाय महातेजास्तं बाणं सहसोत्सृजत्।
तेन सौमित्रिमायान्तमाजघान स्तनान्तरे॥८१॥
उसे धनुष पर रखकर उस महातेजस्वी वीर ने सहसा छोड़ दिया और उसके द्वारा सामने आते हुए सुमित्राकुमार की छाती में आघात किया॥ ८१॥
अतिकायेन सौमित्रिस्ताडितो युधि वक्षसि।
सुस्राव रुधिरं तीव्र मदं मत्त इव द्विपः॥८२॥
अतिकाय के उस बाण की चोट खाकर सुमित्राकुमार युद्धस्थल में अपने वक्षःस्थल से तीव्रगति से रक्त बहाने लगे, मानो कोई मतवाला हाथी मस्तक से मद की वर्षा कर रहा हो॥ ८२॥
स चकार तदात्मानं विशल्यं सहसा विभुः।
जग्राह च शरं तीक्ष्णमस्त्रेणापि समाददे॥८३॥
फिर सामर्थ्यशाली लक्ष्मण ने सहसा अपनी छाती से उस बाण को निकाल दिया और एक तीखा सायक हाथ में लेकर उसे दिव्यास्त्र से संयोजित किया॥ ८३॥
आग्नेयेन तदास्त्रेण योजयामास सायकम्।
स जज्वाल तदा बाणो धनुष्यस्य महात्मनः॥८४॥
उस समय अपने उस सायक को उन्होंने आग्नेयास्त्र से अभिमन्त्रित किया। अभिमन्त्रित होते ही महात्मा लक्ष्मण के धनुष पर रखा हुआ वह बाण तत्काल प्रज्वलित हो उठा॥ ८४॥
अतिकायोऽतितेजस्वी रौद्रमस्त्रं समाददे।
तेन बाणं भुजङ्गाभं हेमपुङ्खमयोजयत्॥ ८५॥
उधर अत्यन्त तेजस्वी अतिकाय ने भी रौद्रास्त्र को एक सुवर्णमय पंखवाले सर्पाकार बाण पर समायोजित किया॥ ८५॥
तदस्त्रं ज्वलितं घोरं लक्ष्मणः शरमाहितम्।
अतिकायाय चिक्षेप कालदण्डमिवान्तकः॥८६॥
इतने ही में लक्ष्मण ने दिव्यास्त्र की शक्ति से सम्पन्न उस प्रज्वलित एवं भयंकर बाण को अतिकाय के ऊपर चलाया, मानो यमराज ने अपने कालदण्ड का प्रयोग किया हो॥८६॥
आग्नेयास्त्राभिसंयुक्तं दृष्ट्वा बाणं निशाचरः।
उत्ससर्ज तदा बाणं रौद्रं सूर्यास्त्रयोजितम्॥८७॥
आग्नेयास्त्र से अभिमन्त्रित हुए उस बाण को अपनी ओर आते देख निशाचर अतिकाय ने तत्काल ही अपने भयंकर बाण को सूर्यास्त्र से अभिमन्त्रित करके चलाया॥ ८७॥
तावुभावम्बरे बाणावन्योन्यमभिजघ्नतुः।
तेजसा सम्प्रदीप्तायौ क्रुद्धाविव भुजङ्गमौ॥ ८८॥
तावन्योन्यं विनिर्दह्य पेततुः पृथिवीतले॥८९॥
उन दोनों सायकों के अग्रभाग तेज से प्रज्वलित हो रहे थे। आकाश में पहुँचकर वे दोनों कुपित हुए दो सर्पो की भाँति आपस में टकरा गये और एक-दूसरे को दग्ध करके पृथ्वी पर गिर पड़े॥ ८८-८९॥
निरर्चिषौ भस्मकृतौ न भ्राजेते शरोत्तमौ।
तावुभौ दीप्यमानौ स्म न भ्राजेते महीतले॥९०॥
वे दोनों ही बाण उत्तम कोटि के थे और अपनी दीप्ति से प्रकाशित हो रहे थे, तथापि एक-दूसरे के तेज से भस्म होकर अपना-अपना तेज खो बैठे। इसलिये भूतल पर निष्प्रभ होने के कारण उनकी शोभा नहीं हो रही थी॥
ततोऽतिकायः संक्रुद्धस्त्वाष्ट्रमैषीकमुत्सृजत्।
ततश्चिच्छेद सौमित्रिरस्त्रमैन्द्रेण वीर्यवान्॥९१॥
तदनन्तर अतिकाय ने अत्यन्त कुपित हो त्वष्टा देवता के मन्त्र से अभिमन्त्रित करके एक सींक का बाण छोड़ा; परंतु पराक्रमी लक्ष्मण ने उस अस्त्र को ऐन्द्रास्त्र से काट दिया॥९१॥
ऐषीकं निहतं दृष्ट्वा कुमारो रावणात्मजः।
याम्येनास्त्रेण संक्रुद्धो योजयामास सायकम्॥९२॥
ततस्तदस्त्रं चिक्षेप लक्ष्मणाय निशाचरः।
वायव्येन तदस्त्रेण निजघान स लक्ष्मणः॥९३॥
सींक के बाण को नष्ट हुआ देख रावणपुत्र कुमार अतिकाय के क्रोध की सीमा न रही। उस राक्षस ने एक सायक को याम्यास्त्र से अभिमन्त्रित किया और उसे लक्ष्मण को लक्ष्य करके चला दिया; परंतु लक्ष्मण ने वायव्यास्त्र द्वारा उसको भी नष्ट कर दिया॥ ९२-९३॥
अथैनं शरधाराभिर्धाराभिरिव तोयदः।
अभ्यवर्षत संक्रुद्धो लक्ष्मणो रावणात्मजम्॥९४॥
तत्पश्चात् जैसे मेघ जल की धारा बरसाता है, उसी प्रकार अत्यन्त कुपित हुए लक्ष्मण ने रावणकुमार अतिकाय पर बाणधारा की वर्षा आरम्भ कर दी॥ ९४॥
तेऽतिकायं समासाद्य कवचे वज्रभूषिते।
भग्नाग्रशल्याः सहसा पेतुर्बाणा महीतले॥९५॥
अतिकाय ने एक दिव्य कवच बाँध रखा था, जिसमें हीरे जड़े हुए थे। लक्ष्मण के बाण अतिकाय तक पहुँचकर उसके कवच से टकराते और नोक टूट जाने के कारण सहसा पृथ्वी पर गिर पड़ते थे॥ ९५॥
तान्मोघानभिसम्प्रेक्ष्य लक्ष्मणः परवीरहा।
अभ्यवर्षत बाणानां सहस्रेण महायशाः॥९६॥
उन बाणों को असफल हुआ देख शत्रुवीरों का संहार करने वाले महायशस्वी लक्ष्मण ने पुनः सहस्रों बाणों की वर्षा की॥९६॥
स वृष्यमाणो बाणौधैरतिकायो महाबलः।
अवध्यकवचः संख्ये राक्षसो नैव विव्यथे॥९७॥
महाबली अतिकायका कवच अभेद्य था, इसलिये युद्धस्थल में बाण-समूहों की वर्षा होने पर भी वह राक्षस व्यथित नहीं होता था॥ ९७॥
शरं चाशीविषाकारं लक्ष्मणाय व्यपासृजत्।
स तेन विद्धः सौमित्रिर्मर्मदेशे शरेण ह॥९८॥
उसने लक्ष्मण पर विषधर सर्प के समान भयंकर बाण चलाया। उस बाण से सुमित्राकुमार के मर्मस्थल में चोट पहुँची। ९८ ॥
मुहूर्तमानं निःसंज्ञो ह्यभवच्छत्रुतापनः।
ततः संज्ञामुपालभ्य चतुर्भिः सायकोत्तमैः॥९९॥
निजघान हयान् संख्ये सारथिं च महाबलः।
ध्वजस्योन्मथनं कृत्वा शरररिंदमः॥१००॥
अतः शत्रुओं को संताप देने वाले लक्ष्मण दो घड़ी तक अचेत अवस्था में पड़े रहे। फिर होश में आने पर उन महाबली शत्रुदमन वीर ने बाणों की वर्षा से शत्रु के रथ की ध्वजा को नष्ट कर दिया और चार उत्तम सायकों से रणभूमि में उसके घोड़ों तथा सारथि को भी यमलोक पहुँचा दिया॥९९-१०० ॥
असम्भ्रान्तः स सौमित्रिस्तान् शरानभिलक्षितान्।
मुमोच लक्ष्मणो बाणान् वधार्थं तस्य रक्षसः॥१०१॥
न शशाक रुजं कर्तुं युधि तस्य नरोत्तमः।
तत्पश्चात् सम्भ्रमरहित नरश्रेष्ठ सुमित्राकुमार लक्ष्मण ने उस राक्षस के वध के लिये जाँचे-बूझे हुए बहुत-से अमोघ बाण छोड़े, तथापि वे समराङ्गण में उस निशाचर के शरीर को वेध न सके॥ १०१ १/२ ॥
अथैनमभ्युपागम्य वायुर्वाक्यमुवाच ह॥१०२॥
ब्रह्मदत्तवरो ह्येष अवध्यकवचावृतः।
ब्राह्मणास्त्रेण भिन्ध्येनमेष वध्यो हि नान्यथा।
अवध्य एष ह्यन्येषामस्त्राणां कवची बली॥१०३॥
तदनन्तर वायुदेवता ने उनके पास आकर कहा —’सुमित्रानन्दन! इस राक्षस को ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त हुआ है। यह अभेद्यकवच से ढका हुआ है। अतः इसको ब्रह्मास्त्र से विदीर्ण कर डालो; अन्यथा यह नहीं मारा जा सकेगा। यह कवचधारी बलवान् निशाचर अन्य अस्त्रों के लिये अवध्य है॥ १०२-१०३॥
ततस्तु वायोर्वचनं निशम्य सौमित्रिरिन्द्रप्रतिमानवीर्यः।
समादधे बाणमथोग्रवेगं तद्ब्राह्ममस्त्रं सहसा नियुज्य॥१०४॥
लक्ष्मण इन्द्र के समान पराक्रमी थे। उन्होंने वायुदेवता का उपर्युक्त वचन सुनकर एक भयंकर वेगवाले बाण को सहसा ब्रह्मास्त्र से अभिमन्त्रित करके धनुष पर रखा॥ १०४॥
तस्मिन् वरास्त्रे तु नियुज्यमाने
ब्रह्मदत्तवरो ह्येष अवध्यकवचावृतः।
ब्राह्मणास्त्रेण भिन्ध्येनमेष वध्यो हि नान्यथा।
अवध्य एष ह्यन्येषामस्त्राणां कवची बली॥ १०३॥
तदनन्तर वायुदेवता ने उनके पास आकर कहा —’सुमित्रानन्दन! इस राक्षस को ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त हुआ है। यह अभेद्यकवच से ढका हुआ है। अतः इसको ब्रह्मास्त्र से विदीर्ण कर डालो; अन्यथा यह नहीं मारा जा सकेगा। यह कवचधारी बलवान् निशाचर अन्य अस्त्रों के लिये अवध्य है॥ १०२-१०३॥
ततस्तु वायोर्वचनं निशम्य सौमित्रिरिन्द्रप्रतिमानवीर्यः।
समादधे बाणमथोग्रवेगं तद्ब्राह्ममस्त्रं सहसा नियुज्य॥१०४॥
लक्ष्मण इन्द्र के समान पराक्रमी थे। उन्होंने वायुदेवता का उपर्युक्त वचन सुनकर एक भयंकर वेगवाले बाण को सहसा ब्रह्मास्त्र से अभिमन्त्रित करके धनुष पर रखा॥ १०४॥
तस्मिन् वरास्त्रे तु नियुज्यमाने सुपर्णवज्रोत्तमचित्रपुङ्ख तदातिकायः समरे ददर्श॥१०७॥
लक्ष्मण के चलाये हुए उस बाण का वेग बहुत बढ़ा हुआ था। उसके पंख गरुड़ के समान थे और उनमें हीरे जड़े हुए थे; इसलिये उनकी विचित्र शोभा होती थी। अतिकाय ने समराङ्गण में उस बाण को उस समय वायु के समान भयंकर वेग से अपनी ओर आते देखा। १०७॥
तं प्रेक्षमाणः सहसातिकायो जघान बाणैर्निशितैरनेकैः।
स सायकस्तस्य सुपर्णवेगस्तथातिवेगेन जगाम पार्श्वम्॥१०८॥
उसे देखकर अतिकाय ने सहसा उसके ऊपर बहुत-से पैने बाण चलाये तो भी वह गरुड़ के समान वेगशाली सायक बड़े वेग से उसके पास जा पहुंचा।
तमागतं प्रेक्ष्य तदातिकायो बाणं प्रदीप्तान्तककालकल्पम्।
जघान शक्त्यृष्टिगदाकुठारैः शूलैः शरैश्चाप्यविपन्नचेष्टः॥१०९॥
प्रलयङ्कर काल के समान प्रज्वलित हुए उस बाण को अत्यन्त निकट आया देखकर भी अतिकाय की युद्धविषयक चेष्टा नष्ट नहीं हुई। उसने शक्ति, ऋष्टि, गदा, कुठार, शूल तथा बाणों द्वारा उसे नष्ट करने का प्रयत्न किया॥१०९॥
तान्यायुधान्यद्भुतविग्रहाणि मोघानि कृत्वा स शरोऽग्निदीप्तः।
प्रगृह्य तस्यैव किरीटजुष्टं तदातिकायस्य शिरो जहार॥११०॥
परंतु अग्नि के समान प्रज्वलित हुए उस बाण ने उन अद्भुत अस्त्रों को व्यर्थ करके अतिकाय के मुकुटमण्डित मस्तक को धड़ से अलग कर दिया। ११०॥
तच्छिरः सशिरस्त्राणं लक्ष्मणेषुप्रमर्दितम्।।
पपात सहसा भूमौ शृङ्गं हिमवतो यथा॥१११॥
लक्ष्मण के बाण से कटा हुआ राक्षस का वह शिरस्त्राणसहित मस्तक हिमालय के शिखर की भाँति सहसा पृथ्वी पर जा पड़ा॥ १११॥
तं भूमौ पतितं दृष्ट्वा विक्षिप्ताम्बरभूषणम्।
बभूवुर्व्यथिताः सर्वे हतशेषा निशाचराः॥११२॥
उसके वस्त्र और आभूषण सब ओर बिखर गये। उसे धरती पर पड़ा देख मरने से बचे हुए समस्त निशाचर व्यथित हो उठे॥ ११२॥
ते विषण्णमुखा दीनाः प्रहारजनितश्रमाः।
विनेदुरुच्चैर्बहवः सहसा विस्वरैः स्वरैः॥११३॥
उनके मुख पर विषाद छा गया। उन पर जो मार पड़ी थी, उससे थक जाने के कारण वे और भी दुःखी हो गये थे। अतः वे बहुसंख्यक राक्षस सहसा विकृत स्वर में जोर-जोर से रोने-चिल्लाने लगे॥ ११३ ॥
ततस्तत्परितं याता निरपेक्षा निशाचराः।
पुरीमभिमुखा भीता द्रवन्तो नायके हते॥११४॥
सेनानायक के मारे जाने पर निशाचरों का युद्ध विषयक उत्साह नष्ट हो गया, अतः वे भयभीत हो तुरंत ही लङ्कापुरी की ओर भाग चले॥ ११४ ॥
प्रहर्षयुक्ता बहवस्तु वानराः प्रफुल्लपद्मप्रतिमाननास्तदा।
अपूजयल्लक्ष्मणमिष्टभागिनं हते रिपौ भीमबले दुरासदे॥११५॥
इधर उस भयंकर बलशाली दुर्जय शत्रु के मारे जाने पर बहुसंख्यक वानर हर्ष और उत्साह से भर गये। उनके मुख प्रफुल्ल कमलों के समान खिल उठे और वे अभीष्ट विजय के भागी वीरवर लक्ष्मण की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे॥ ११५ ॥
अतिबलमतिकायमभ्रकल्पं युधि विनिपात्य स लक्ष्मणः प्रहृष्टः।
त्वरितमथ तदा स रामपाक् कपिनिवहैश्च सुपूजितो जगाम॥११६॥
युद्धस्थल में अत्यन्त बलशाली और मेघ के समान विशाल अतिकाय को धराशायी करके लक्ष्मण बड़े प्रसन्न हुए। वे उस समय वानर-समूहों से सम्मानित हो तुरंत ही श्रीरामचन्द्रजी के पास गये॥ ११६ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे एकसप्ततितमः सर्गः॥७१॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में इकहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ।७१॥
सर्ग-72
अतिकायं हतं श्रुत्वा लक्ष्मणेन महात्मना ।
उद्वेगमगमद् राजा वचनं चेदमब्रवीत् ॥ १ ॥
महान आत्मा लक्ष्मण को राजा द्वारा मारा गया सुनकर, राजा रावण परेशान हो गया और इस प्रकार बोला:
धूम्राक्षः परमामर्षी सर्वशस्त्रभृतां वरः ।
अकम्पनः प्रहस्तश्च कुंभकर्णस्तथैव च ॥ २ ॥
एते महाबला वीरा राक्षसा युद्धकाङ्क्षिणः ।
जेतारः परसैन्यानां परैर्नित्यापराजिताः ॥ ३ ॥
परम निर्भय धूम्राक्ष , अकम्पन, प्रहस्त और कुम्भकर्ण, सभी शस्त्रों में श्रेष्ठ- ये महाबली वीर राक्षस सदैव युद्ध के लिए उत्सुक रहते थे। वह अपने शत्रुओं की सभी सेनाओं को जीत लेता था और अपने विरोधियों से कभी पराजित नहीं होता था। २-३
ससैन्यास्ते हता रामेणाक्लिष्टकर्मणा ।
राक्षसाः सुमहाकाया नानाशस्त्रविशारदाः ॥ ४ ॥
लेकिन बिना किसी हिचकिचाहट के महान कर्म करने वाले राम ने अपनी सेना के साथ इन दैत्य और वीर राक्षसों को नष्ट कर दिया। ॥४॥
अन्ये च बहवः शूरा महात्मानो निपातिताः ।
प्रख्यातबलवीर्येण पुत्रेणेन्द्रजिता मम ॥ ५ ॥
तौ भ्रातरौ तदा बद्धौ घोरैर्दत्तवरैः शरैः ।
यन्न शक्यं सुरैः सर्वैः असुरैर्वा महाबलैः ॥ ६ ॥
मोक्तुं तद् बंधनं घोरं यक्षगन्धर्वपन्नगैः ।
तन्न जाने प्रभावैर्वा मायया मोहनेन वा ॥ ७ ॥
उनके द्वारा और भी कई उदार शूरवीर राक्षसों को मार डाला गया। मेरे पुत्र इन्द्रजीत ने, जिसका बल और पराक्रम सर्वत्र विख्यात है, उन दोनों भाइयों को वरदान रूपी भयंकर सर्प द्वारा बाणों से बाँध दिया। उस भयानक बंधन को सभी देवता और महाबली असुर भी नहीं तोड़ सके। यक्षों , गंधर्वों और नागों के लिए भी उस बंधन से बचना असंभव था , फिर भी राम और लक्ष्मण दोनों भाई उस बाण-बंधन से मुक्त हो गए। यह ज्ञात नहीं है कि इसका क्या प्रभाव था , यह कैसे जादू था या किस प्रकार की आकर्षण औषधि आदि का उपयोग किया गया था ; जिससे वे उस बंधन से छूट गए। ५-७
शरबंधाद् विमुक्तौ तौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ।
ये योधा निर्गताः शूरा राक्षसा मम शासनात् ॥ ८ ॥
ते सर्वे निहता युद्धे वानरैः सुमहाबलैः ।
मेरे आदेश पर राक्षसों से लड़ने के लिए निकले सभी शूरवीरों और योद्धाओं को युद्ध के मैदान में शक्तिशाली बंदरों ने मार डाला । ॥८ १/२॥
तं न पश्याम्यहं युद्धे योऽद्य रामं सलक्ष्मणम् ॥ ९ ॥
शासयेत् सबलं वीरं ससुग्रीवं विभीषणम् ।
मुझे आज ऐसा कोई वीर दिखाई नहीं देता जो युद्ध में सुग्रीव के साथ लक्ष्मण और सेना के साथ-साथ वीर विभीषण को राम के साथ नष्ट कर दे। ॥९ १/२॥
अहो सुबलवान् रामो महदस्त्रबलं च वै ॥ १० ॥
यस्य विक्रममासाद्य राक्षसा निधनं गताः ।
ओह ! राम बहुत बलवान हैं , निश्चय ही उनके शस्त्र और बल महान हैं , जिनके बल और कीर्तिमानों का अनगिनत राक्षसों ने सामना किया है। ॥१० १/२॥
तं मन्ये राघवं वीरं नारायणमनामयम् ॥ ११ ॥
तद्भयाद्धि पुरी लङ्का पिहितद्वारतोरणा ।
मैं उन वीर राघवों को व्याधि और शोक से रहित नारायण का रूप मानता हूँ , क्योंकि उनके भय से लंका के सब द्वार और द्वार सदा बन्द रहते हैं। ॥११ १/२॥
अप्रमत्तैश्च सर्वत्र गुल्मे रक्ष्या पुरी त्वियम् ॥ १२ ॥
अशोकवनिका चैव यत्र सीताभिरक्ष्यते ।
हे राक्षसों! आप लोग हर समय सावधान रहें और अपने सैनिकों और अशोक शिविर के साथ इस शहर की रक्षा करें जहाँ सीता को रखा गया है। ॥१२ १/२॥
निष्क्रामो वा प्रवेशो वा ज्ञातव्यः सर्वथैव नः ॥ १३ ॥
यत्र यत्र भवेद् गुल्मस्तत्रतत्र पुनः पुनः ।
सर्वतश्चापि तिष्ठध्वं स्वैः स्वैः परिवृता बलैः ॥ १४ ॥
अशोक - आंगन में कौन प्रवेश कर रहा है और कौन बाहर जा रहा है, इसकी जानकारी हमें हमेशा मिलनी चाहिए । जहां-जहां सिपाहियों के डेरे हों, उन पर लगातार नजर रखना , अपने सिपाहियों के साथ सब तरफ नजर रखना। १३-१४
द्रष्टव्यं च पदं तेषां वानराणां निशाचराः ।
प्रदोषे वाऽर्धरात्रे वा प्रत्यूषे वापि सर्वशः ॥ १५ ॥
रात के उल्लू! भोर , मध्यरात्रि और भोर में बंदरों के आने-जाने पर नजर रखें । ॥१५॥
नावज्ञा तत्र कर्तव्या वानरेषु कदाचन ।
द्विषतां बलमुद्युक्तं आपतत् किं स्थितं यथा ॥ १६ ॥
बंदरों की कभी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए और हमेशा इस बात पर नजर रखनी चाहिए कि दुश्मन की सेना युद्ध के लिए उद्यम कर रही है या नहीं। क्या यह हमला नहीं कर रहा है या यह वहीं खड़ा है जहां यह पहले था ? ॥१६॥
ततस्ते राक्षसाः सर्वे श्रुत्वा लङ्काधिपस्य तत् ।
वचनं सर्वमातिष्ठन् यथावत् तु महाबलाः ॥ १७ ॥
लंकापति का यह आदेश सुनकर सब पराक्रमी दैत्य इन सब बातों का विधिपूर्वक पालन करने लगे। ॥१७॥
तान् सर्वान् हि समादिश्य रावणो राक्षसाधिपः ।
मन्युशल्यं वहन् दीनः प्रविवेश स्वमालयम् ॥ १८ ॥
उन सभी को उपरोक्त आदेश देकर, राक्षसों का राजा रावण, एक गरीब भाई के साथ दुख और क्रोध के रूप में कांटों का बोझ अपने दिल में लेकर अपने महल में चला गया । ॥१८॥
ततः स संदीपितकोपवह्निः
निशाचराणामधिपो महाबलः ।
तदेव पुत्रव्यसनं विचिन्तयन्
मुहुर्मुहुश्चैव तदा व्यनिःश्वसन् ॥ १९ ॥
रात में रहने वाले शक्तिशाली राजा रावण के क्रोध की आग भड़क उठी। अपने बेटे की मौत को याद करते हुए भी वह बार-बार गहरी सांसें ले रहा था। ॥१९॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमद्युद्धकाण्डे द्विसप्ततितमः सर्गः ॥ ७२ ॥
इस प्रकार श्री वाल्मीकि द्वारा रचित आर्ष रामायण में युद्धकांड का बहत्तरवाँ श्लोक पूरा हुआ। ॥७२॥
सर्ग-73
ततो हतान् राक्षसपुङ्गवांस्तान्
देवान्तकादित्रिशिरोतिकायान् ।
रक्षोगणास्तत्र हतावशिष्टाH
te रावणाय त्वरितं शशंसुः ॥ १ ॥
युद्ध के मैदान में कसेबसे पढ़ने वाले रात के निवासी तुरंत रावण के पास गए और देवंतक , त्रिशिरा और अतिकाय जैसे महान राक्षसों की हत्या की खबर सुनी । ॥१॥
ततो हतांस्तान् सहसा निशम्य
राजा महाबाष्पपरिप्लुताक्षः ।
पुत्रक्षयं भ्रातृवधं च घोरं
विचिन्त्य राजा विपुलं प्रदध्यौ ॥ २ ॥
उनके वध की कथा सुनकर राजा रावण की आंखों में अक्सर आंसू भर आते थे। अपने बेटे और भाई के भीषण वध के विचार ने उसे बहुत चिंतित कर दिया। २
ततस्तु राजानमुदीक्ष्य दीनं
शोकार्णवे संपरिपुप्लुवानम् ।
रथर्षभो राक्षसराजसूनुः
तमिन्द्रजिद् वाक्यमिदं बभाषे ॥ ३ ॥
राजा रावण को दुःखसागर में डूबा हुआ और दुखी होता देखकर सारथीश्रेष्ठ इन्द्रजीत ने दैत्यों के राजकुमार ने यह कथा कही-॥३॥
न तात मोहं प्रतिगन्तुमर्हसे
यत्रेन्द्रजित् जीवति नैर्ऋतेश ।
नेन्द्रारिबाणाभिहतो हि कश्चित्
प्राणान् समर्थः समरेऽभिपातुम् ॥ ४ ॥
इतना ही! राक्षसराज! जब तक इन्द्रजीत जीवित है, हमें चिन्ता और मोह नहीं करना चाहिए। इस इन्द्रशत्रु के बाणों से आहत होकर कोई भी युद्ध में अपने प्राण नहीं बचा सकता। ४
पश्याद्य रामं सह लक्ष्मणेन
मद्बाणनिर्भिन्नविकीर्णदेहम् ।
गतायुषं भूमितले शयानं
शितैः शरैराचितसर्वगात्रम् ॥ ५ ॥
देख , आज मैं राम और लक्ष्मण के शरीर को बाणों से काटकर तीखे बाणों से भर दूंगा, और वे मरकर सदा के लिये पृय्वी पर लेट जाएंगे। ॥५॥
इमां प्रतिज्ञां शृणु शक्रशत्रोः
सुनिश्चितां पौरुषदैवयुक्ताम् ।
अद्यैव रामं सह लक्ष्मणेन
सन्तर्पयिष्यामि शरैरमोघैः ॥ ६ ॥
, जो मेरे पुरुषार्थ और दैवीय कृपा (ब्रह्मा की कृपा) से भी सिद्ध होता है - मैं आज अपने अक्षय बाणों से राम को लक्ष्मण सहित पूर्ण रूप से तृप्त कर दूंगा - उनकी युद्ध जैसी प्यास बुझा दूंगा। ६
अद्येन्द्रवैवस्वतविष्णुरुद्र
साध्याश्च वैश्वानरचन्द्रसूर्याः ।
द्रक्ष्यन्तु मे विक्रममप्रमेयं
विष्णोरिवोग्रं बलियज्ञवाटे ॥ ७ ॥
आज इंद्र , यम , विष्णु , रुद्र , साध्य , अग्नि , सूर्य और चंद्रमा यज्ञ मंडप में भगवान विष्णु के भयानक रिकॉर्ड की तरह मेरे अपार कौशल के साक्षी होंगे। ७
स एवमुक्त्वा त्रिदशेन्द्रशत्रुः
आपृच्छ्य राजानमदीनसत्त्वः ।
समारुरोहानिलतुल्यवेगं
रथं खरश्रेष्ठसमाधियुक्तम् ॥ ८ ॥
इसलिए इंद्र के शत्रु उदार इंद्रजीत ने राजा रावण से आदेश लिया और हथियारों से लैस और हवा के समान तेज गधों के साथ एक रथ पर सवार हो गए । ॥८॥
तमास्थाय महातेजा रथं हरिरथोपमम् ।
जगाम सहसा तत्र यत्र युद्धमरिन्दमः ॥ ९ ॥
उसका रथ इन्द्र के रथ जैसा दिखाई देता था। उस पर सवार होकर शत्रु का दमन करने वाला शक्तिशाली रात्रिवासी अचानक उस स्थान पर पहुँच गया जहाँ युद्ध चल रहा था। ॥९॥
तं प्रस्थितं महात्मानं अनुजग्मुर्महाबलाः ।
संहर्षमाणा बहवो धनुःप्रवरपाणयः ॥ १० ॥
उस महामना वीर को प्रस्थान करते देखकर अनेक बलशाली दैत्य हाथ में उत्तम धनुष लिये हर्ष और उत्साह से उसके पीछे-पीछे चल दिये। ॥१०॥
गजस्कन्धगताः केचित् केचित् प्रवरवाजिभिः ।
व्याघ्रवृश्चिकमार्जार खरोष्ट्रैश्च भुजंगमैः ॥ ११ ॥
वराहैः श्वापदैः सिंहैः जंबुकैः पर्वतोपमैः ।
काकहंसमयूरैश्च राक्शसा भीमविक्रमाः ॥ १३ ॥
कोई हाथी पर सवार था तो कोई बढ़िया घोड़ों पर। उनके अतिरिक्त व्याघ्र , बिच्छू , बकरी , गदहे , ऊँट , सर्प , सूअर , अन्य भयंकर पशु , सिंह , पर्वतीय गीदड़ , कौवे , हंस तथा मोर के वाहनों पर सवार भयानक पराक्रमी दैत्य युद्ध के लिए वहाँ आए। ११-१२
प्रासपट्टीशनिस्त्रिंश परश्वध गदाधराः ।
भुशुण्डिमुद्गरायष्टि शतघ्नीपरिघायुधाः ॥ १३ ॥
वे घास , भाले , तलवारें , कुल्हाड़ियाँ , गदाएँ , भाले , हथौड़े , लाठियाँ , गुलेल और भाले जैसे हथियारों से लैस थे । ॥१३॥
स शङ्खनिनदैः पूर्णैः भेरीणां चापि निस्वनैः ।
जगाम त्रिदशेन्द्रारिः राजिं वेगेन वीर्यवान् ॥ १४ ॥
शंखों की ध्वनि के साथ मिश्रित नगाड़ों की भयानक ध्वनि हर जगह सुनाई दे रही थी उस कोलाहलपूर्ण ध्वनि के साथ, इंद्र के विश्वासघाती शक्तिशाली इंद्रजीत ने बड़े वेग के साथ युद्ध के मैदान के लिए प्रस्थान किया। ॥१४॥
स शङ्खशशिवर्णेन छत्रेण रिपुसूदनः ।
रराज प्रतिपूर्णेन नभश्चन्द्रमसा यथा ॥ १५ ॥
शत्रुओं का नाश करने वाला इंद्रजीत पूर्णिमा के समान रंग के शंख और खुले सफेद छत्र से सुशोभित था। ॥१५॥
वीज्यमानो ततो वीरो हैमैर्हेमविभूषणः ।
चारुचामरमुख्यैश्च मुख्यः सर्वधनुष्मताम् ॥ १६ ॥
सोने के गहनों से विभूषित और धनुर्धारियों में श्रेष्ठ वह वीर रात्रिवासी दोनों ओर सुन्दर सुनहरी ढालों से आच्छादित था। ॥१६॥
स तु दृष्ट्वा विनिर्यांतं बलेन महता वृतम् ।
राक्षसाधिपति श्रीमान् रावणं पुत्रमब्रवीत् ॥ १७ ॥
अपने पुत्र इंद्रजीत को एक विशाल सेना से घिरे इंद्रजीत के लिए प्रस्थान करते देख, राक्षसों के राजा रावण ने उससे कहा:
त्वमप्रतिरथः पुत्र त्वया वै वासवो जितः ।
किं पुनर्मानुषं धृष्यं निहैष्यसि राघवम् ॥ १८ ॥
बेटा! कोई प्रतिद्वंद्वी रथ नहीं है जो आपकी बराबरी कर सके। तुमने तो इन्द्र देवता को भी हरा दिया है। तो आपके लिए एक आसानी से जीतने योग्य व्यक्ति को हराना क्या बड़ी बात है ? तुम राघव को अवश्य मारोगे। १८
तथोक्तो राक्षसेंद्रेण प्रत्यगृह्णन् महाशिषः ।
ततस्त्विन्द्रजिता लङ्का सूर्यप्रतिमतेजसा ॥ १९ ॥
रराजा प्रतिवीरेण द्यौरिवार्केण भास्वता ।
जब दैत्यों के राजा ने ऐसा कहा तो इंद्रजीत ने सिर झुकाकर उनका महान वरदान स्वीकार कर लिया। फिर जैसे सूर्य के कारण आकाश सुन्दर होता है, वैसे ही शक्तिशाली और सूर्य के समान इन्द्रजीत के कारण लंकापुरी शोभित होने लगी। ॥१९ १/२॥
स संप्राप्य महातेजा युद्धभूमिमरिन्दमः ॥ २० ॥
स्थापयामास रक्षांसि रथं प्रति समन्ततः।
पराक्रमी शत्रुदामा इंद्रजीत युद्ध के मैदान में पहुँचे और अपने रथ के चारों तरफ राक्षसों को खड़ा कर दिया। ॥२० १/२॥
ततस्तु हुतभोक्तारं हुतभुक्सदृशप्रभः ॥ २१ ॥
जुहुवे राक्षसश्रेष्ठो मंत्रवन्मन्त्रसत्तमैः ।
स हविर्लाजसंस्कारैः माल्यगन्धपुरस्कृतैः ॥ २२ ॥
जुहुवे पावकं तत्र राक्षसेन्द्रः प्रतापवान् ।
तब उसने मध्य रात्रि में अपने रथ से उतरकर पृथ्वी पर अग्नि का स्थापन किया और अग्निरूपी प्राणियों के द्वारा अग्निदेव की उपासना की। तब पराक्रमी दैत्यराज ने विधि के अनुसार उत्तम मन्त्रों का उच्चारण करते हुए हविष्य को हविष्य में अर्पित किया। ॥२१-२२ १/२॥
शस्त्राणि शरपत्राणि समिधोऽथ बिभीतकाः ॥ २३ ॥
लोहितानि च वासांसि स्रुवं कार्ष्णायसं तथा ।
उस समय अग्नि वेदी के चारों ओर फैलाने के लिए कुश अर्थात दर्भ के अस्त्र-शस्त्र बनाए जाते थे। मकबरे बेहेड़ा की लकड़ी से बने थे। लाल रंग के कपड़े का इस्तेमाल किया गया था और अभिचार्य यज्ञ में इस्तेमाल होने वाला स्वरवा लोहे का बना था। २३ १/२
स तत्राग्निं समास्तीर्य शरपत्रैः सतोमरैः ॥ २४ ॥
छागस्य कृष्णवर्णस्य गलं जग्राह जीवतः ।
वहाँ उसने तोमर सहित अस्त्र-रूपी दरभों (काँसे के पत्ते) को आग के चारों ओर फैला दिया और जलाने के लिए एक काले जीवित बकरे का गला पकड़ लिया। ॥२४ १/२॥
सकृदेव समिद्धस्य विधूमस्य महार्चिषः ॥ २५ ॥
बभूवुस्तानि लिङ्गानि विजयं यान्यदर्शयन् ।
उस एक बार के यज्ञ से अग्नि प्रज्वलित हुई। धुआं नहीं था और बड़ी लपटें थीं। उस समय उस अग्नि से वे सब चिह्न प्रकट हुए , जिन्होंने उसे भूतकाल की रणभूमि में विजय दिलाई थी। २५ १/२
प्रदक्षिणावर्तशिखः तप्तकाञ्चनसंनिभः ॥ २६ ॥
हविस्तत् प्रतिजग्राह पावकः स्वयमास्थितः ।
अग्नि देव की शिखा दक्षिण दिशा की ओर दिखाई देने लगी। उसका वर्ण जलते हुए सोने के समान सुन्दर था। इस रूप में वे स्वयं प्रकट हुए और उनके द्वारा दी गई भेंट को ग्रहण किया। ॥२६ १/२॥
सोऽस्त्रमाहारयामास ब्राह्ममस्त्रविशारदः ॥ २७ ॥
धनुश्चात्मरथं चैव सर्वं तत्राभ्यमंत्रयत् ।
तत्पश्चात् शस्त्रों के स्वामी इन्द्रजीत ने ब्रह्मास्त्र का आह्वान किया और अपने धनुष तथा रथ को सिद्ध ब्रह्मास्त्र मंत्र से मुग्ध कर दिया। ॥२७ १/२॥
तस्मिन् आहूयमानेऽस्त्रे हूयमाने च पावके ।
सार्क ग्रहेन्दुनक्षत्रैर्वितत्रास नभःस्थलम् ॥ २८ ॥
, चंद्रमा , ग्रह और सितारों सहित अंतरिक्ष जगत के सभी प्राणी भयभीत हो गए। ॥२८॥
स पावकं पावकदीप्ततेजा
हुत्वा महेन्द्रप्रतिमप्रभावः ।
सचापबाणासिरथाश्वसूतः
खेऽन्तर्दधेत्मानमचिन्त्यवीर्यः ॥ २९ ॥
जिनका तेज अग्नि के समान प्रज्वलित था और जिनका देवराज इन्द्र के समान अतुलनीय प्रभाव था, अगम्य पराक्रमी इन्द्रजीत ने अग्नि में आहुति देकर धनुष , बाण , रथ , तलवार , घोड़े और सारथी से हमें आकाश में अदृश्य कर दिया । २९
ततो हयरथाकीर्णं पताकाध्वजशोभितम् ।
निर्ययौ राक्षसबलं नर्दमानं युयुत्सया ॥ ३० ॥
युद्ध की इच्छा से गर्जना करने वाले पताकाओं और पताकाओं से विभूषित घोड़ों और रथों से घिरे हुए दैत्यों की सेना में चला गया। ॥३०॥
ते शरैर्बहुभिश्चित्रैः तीक्ष्णवेगैरलंकृतैः ।
तोमरैरङ्कुशैश्चापि वानरान् जघ्नुराहवे ॥ ३१ ॥
सोने से विभूषित , असहनीय गति वाले राक्षस थे और युद्ध के मैदान में अजीब और कीमती तीरों , भालों और कुल्हाड़ियों से बंदरों पर हमला करते थे। ॥३१॥
रावणिस्तु सुसंक्रुद्धः तान् निरीक्ष्य निशाचरान् ।
हृष्टा भवन्तो युध्यन्तु वानराणां जिघांसया ॥ ३२ ॥
रावण का पुत्र इंद्रजीत शत्रु से बहुत क्रोधित था। उसने रात में रहने वालों को देखा और कहा, "आप लोग बंदरों को मारने के लिए खुशी और उत्साह से लड़ते हैं। ॥३२॥
ततस्ते राक्षसाः सर्वे गर्जन्तो जयकाङ्क्षिणः ।
अभ्यवर्षंस्ततो घोरान् वानरान् शरवृष्टिभिः ॥ ३३ ॥
उनके ऐसा प्रेरित करने पर विजय चाहने वाले सभी दैत्य जोर से गर्जना करने लगे और वानरों पर बाणों की वर्षा करने लगे। ॥३३॥
स तु नालीकनाराचैः गदाभिर्मुसलैरपि ।
रक्षोभिः संवृतः संख्ये वानरान् विचकर्ष ह ॥ ३४ ॥
राक्षसों से घिरे हुए, इंद्रजीत ने बंदरों को भाले , तीर , क्लब और भाले जैसे हथियारों से नष्ट करना शुरू कर दिया। ॥३४॥
ते वध्यमानाः समरे वानराः पादपायुधाः ।
अभ्यवर्षन सहसा रावणिं शैलपादपैः ॥ ३५ ॥
युद्धभूमि में उसके अस्त्र-शस्त्रों से घायल हो रहे वानर , जो वृक्षों को शस्त्र बना रहे थे , अचानक चट्टानों, चोटियों और वृक्षों पर वर्षा करने लगे। ॥३५॥
इन्द्रजित्तु तदा क्रुद्धो महातेजा महाबलः ।
वानराणां शरीराणि व्यधमद् रावणात्मजः ॥ ३६ ॥
रावण के पराक्रमी पुत्र इंद्रजीत ने क्रोधित होकर वानरों के शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। ॥३६॥
शरेणैकेन च हरीन् नव पञ्च च सप्त च ।
चिच्छेद समरे क्रुद्धो राक्षसान् संप्रहर्षयन् ॥ ३७ ॥
इन्द्रजीत ने रणभूमि में दैत्यों का हर्ष बढ़ाते हुए क्रोध में भरकर एक-एक बाण से पाँच , सात और नौ वानरों को मार डाला। ॥३७॥
स शरैः सूर्यसंकाशैः शातकुंभविभूषणैः ।
वानरान् समरे वीरः प्रममाथ सुदुर्जयः ॥ ३८ ॥
उस अजेय वीर ने रणभूमि में सोने से विभूषित सूर्य के समान तेजस्वी अपने बाणों से वानरों को कुचल दिया। ॥३८॥
ते भिन्नगात्राः समरे वानराः शरपीडिताः ।
पेतुर्मथितसङ्कल्पाः सुरैरिव महासुराः ॥ ३९ ॥
इंद्रजीत के बाणों से पीड़ित वानरों के शरीर युद्ध के मैदान में देवताओं द्वारा पीड़ित महान असुरों की तरह छिन्न-भिन्न हो गए। उनकी जीत की उम्मीद टूट गई और वे बेहोश होकर धरती पर गिर पड़े। ३९
तं तपन्तमिवादित्यं घोरैर्बाणगभस्तिभिः ।
अभ्यधावन्त संक्रुद्धाः संयुगे वानरर्षभाः ॥ ४० ॥
उस समय प्रमुख वानरों ने रणभूमि में बाणों के रूप में भयानक किरणों से सूर्य के समान तप्त इन्द्रजीत पर आक्रमण किया। ॥४०॥
ततस्तु वानराः सर्वे भिन्नदेहा विचेतसः ।
व्यथिता विद्रवन्ति स्म रुधिरेण समुक्षिताः ॥ ४१ ॥
परन्तु उसके बाणों से घायल होकर सब वानर मूर्छित हो गये और रक्तरंजित होकर तड़प-तड़प कर इधर-उधर भागने लगे। ४१
रामस्यार्थे पराक्रम्य वानरास्त्यक्तजीविताः ।
नर्दन्तस्तेऽनिवृत्तास्तु समरे सशिलायुधाः ॥ ४२ ॥
वानरों ने श्री राम के लिए अपने प्राणों की मोह त्याग दी थी। वे वीरतापूर्वक गर्जना करते थे और युद्ध के मैदान से पीछे न हटते हुए हाथों में पत्थर लेकर युद्ध के मैदान में फिसल जाते थे। ॥४२॥
ते द्रुमैः पर्वताग्रैश्च शिलाभिश्च प्लवंगमाः ।
अभ्यवर्षन्त समरे रावणिं समवस्थिताः ॥ ४३ ॥
युद्ध के मैदान में खड़े वानरों ने रावण पर वृक्षों , पर्वत चोटियों और पत्थरों की वर्षा शुरू कर दी । ॥४३॥
तं द्रुमाणां शिलानां च वर्षं प्राणहरं महत् ।
व्यपोहत महातेजा रावणिः समितिञ्जयः ॥ ४४ ॥
पेड़ों और पत्थरों की भारी बारिश राक्षसों को मारने वाली थी , लेकिन रावण के पराक्रमी पुत्र विजेता ने अपने बाणों से उसे भगा दिया। ॥४४॥
ततः पावकसंकाशैः शरैराशीविषोपमैः ।
वानराणामनीकानि बिभेद समरे प्रभुः ॥ ४५ ॥
तब पराक्रमी वीर ने रणभूमि में विषैले सर्पों के समान भयंकर और तेजस्वी बाणों से वानरों को चीरना प्रारम्भ किया। ॥४५॥
अष्टादशशरैस्तीक्ष्णैः स विद्ध्वा गन्धमादनम् ।
विव्याध नवभिश्चैव नलं दूरादवस्थितम् ॥ ४६ ॥
उन्होंने गंधमादन को अठारह तीखे बाणों से घायल किया और दूर खड़े नल पर नौ बाण मारे। ४६
सप्तभिस्तु महावीर्यो मैन्दं मर्मविदारणैः ।
पञ्चभिर्विशिखैश्चैव गजं विव्याध संयुगे ॥ ४७ ॥
इसके बाद बलशाली इन्द्रजीत ने सात भुजाओं वाले सायकों तथा गज द्वारा पाँच बाणों से मंडला को बींध डाला। ४७
जाम्बवन्तं तु दशभिः नीलं त्रिंशद्भिरेव च ।
सुग्रीवं ऋषभं चैव सोऽङ्गदं द्विविदं तथा ॥ ४८ ॥
घोरैर्दत्तवरैस्तीक्ष्णैः निष्प्राणानकरोत् तदा ।
फिर उसने जाम्बवान को दस बाणों से और नील को तीस बाणों से घायल कर दिया। फिर उसने सुग्रीव , ऋषभ , अंगद और द्विविद को बहुत से तीखे और भयानक बाणों से मारा। ॥४८ १/२॥
अन्यानपि तदा मुख्यान् वानरान् बहुभिः शरैः ॥ ४९ ॥
अर्दयामास संक्रुद्धः कालाग्निरिव मूर्च्छितः ।
चारों ओर फैली हुई प्रलय की आग के समान क्रोध से भरे हुए इन्द्रजीत ने अन्य श्रेष्ठ वानरों को भी बहुत से बाणों से पीड़ित किया। ॥४९ १/२॥
स शरैः सूर्यसंकाशैः सुमुक्तैः शीघ्रगामिभिः ॥ ५० ॥
वानराणामनीकानि निर्ममन्थ महारणे ।
उस महासमर में रावण के राजकुमार ने अपने द्रुतगामी बाणों से वानरों की सेना को विचलित (मंथन) किया, जो सूर्य के समान तेजस्वी थे और जिन्हें उन्होंने उत्तम ढंग से छोड़ दिया।
आकुलां वानरीं सेनां शरजालेन पीडिताम् ॥ ५१ ॥
हृष्टः स परया प्रीत्या ददर्श क्षतजोक्षिताम् ।
उसके बाणों से वानर सेना भयभीत हो गई। और मैं खून से नहा कर बाहर चला गया। उन्होंने शत्रु की दुर्दशा को बड़े हर्ष और प्रसन्नता के साथ देखा। ॥५१ १/२॥
पुनरेव महातेजा राक्षसेन्द्रात्मजो बली ॥ ५२ ॥
संसृज्य बाणवर्षं च शस्त्रवर्षं च दारुणम् ।
ममर्द वानरानीकं परितस्त्विन्द्रजिद् बली ॥ ५३ ॥
वह दैत्य राजकुमार इंद्रजीत अत्यंत तेजस्वी , प्रभावशाली और बलवान था। उन्होंने चारों ओर से बाणों तथा अन्य अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा कर पुनः वानर सेना को कुचल डाला। ॥५२-५३॥
स्वसैन्यमुत्सृज्य समेत्य तूर्णं
महाहवे वानरवाहिनीषु ।
अदृश्यमानः शरजालमुग्रं
ववर्ष नीलाम्बुधरो यथाऽम्बु ॥ ५४ ॥
तत्पश्चात् उस महासंग्राम में वह तुरन्त ही अपनी सेना के ऊपरी भाग से ऊपर (आकाश के) भाग में चला गया और स्वयं आकाश में अदृश्य होकर भयानक बाणों की वर्षा करने लगा , जैसे काला मेघ जल की वर्षा करता है। ५४
ते शक्रजिद्बाणविशीर्णदेहा
मायाहता विस्वरमुन्नदन्तः ।
रणे निपेतुर्हरयोऽद्रिकल्पा
यथेन्द्रवज्राभिहता नगेन्द्राः ॥ ५५ ॥
जिस प्रकार इन्द्र के वज्र से बड़े-बड़े पर्वत धराशायी हो जाते हैं, उसी प्रकार रणभूमि में छलपूर्वक इन्द्रजीत के बाणों से मारे गये पर्वत के वानर शरीर के क्षत-विक्षत हो जाने से विकृत स्वर में रोते हुए पृथ्वी पर गिर पड़े। ५५
ते केवलं सन्ददृशुः शिताग्रान्
बाणान् रणे वानरवाहिनीषु ।
मायानिगूढं च सुरेन्द्रशत्रुं
न चात्र तं राक्षसमप्यपश्यन् ॥ ५६ ॥
युद्ध के मैदान में वानर सेना पर गिरे तीखे बाणों को ही वानर देख सकते थे। वे प्रेम में छिपे विश्वासघाती राक्षस को कहीं नहीं देख सकते थे। ॥५६॥
ततः स रक्षोधिपतिर्महात्मा
सर्वा दिशो बाणगणैः शिताग्रैः ।
प्रच्छादयामास रविप्रकाशैः
विदारयामास च वानरेन्द्रान् ॥ ५७ ॥
उस समय विशाल दैत्यराज ने सूर्य के समान तेज धार वाले बाणों से सभी दिशाओं को आच्छादित कर दिया और वानर सेनापति को घायल कर दिया। ॥५७॥
स शूलनिस्त्रिंशपरश्वधानि
व्याविध्य दीप्तानलसप्रभाणि ।
सविस्फुलिङ्गोज्ज्वलपावकानि
ववर्ष तीव्रं प्लवगेन्द्रसैन्ये ॥ ५८ ॥
में वज्र के साथ प्रज्वलित आग की तरह चमकने वाले भालों , तलवारों और कुल्हाड़ियों की वर्षा करने लगा । ॥५८॥
ततो ज्वलनसंकाशैः बाणैर्वानरयूथपाः ।
ताडिताः शक्रजिद्बाणैः प्रफुल्ला इव किंशुकाः ॥ ५९ ॥
इन्द्रजीत के चलाये हुए उग्र बाणों से आहत सभी वानर-नेता रक्त से नहाये हुए खिले हुए ताड़ के वृक्षों के समान दिखाई देने लगे। ॥५९॥
तेऽन्योन्यमभिसर्पन्तो निनदन्तश्च विस्वरम् ।
राक्षसेन्द्रास्त्रनिर्भिन्ना निपेतुर्वानरर्षभाः ॥ ६० ॥
दैत्यराज इन्द्रजीत के बाणों से आहत श्रेष्ठ वानर एक-दूसरे के सामने गिर पड़े और विकराल स्वर में चिल्लाने लगे। ॥६०॥
उदीक्षमाणा गगनं केचिन्नेत्रेषु ताडिताः ।
शरैर्विविशुरन्योन्यं पेतुश्च जगतीतले ॥ ६१ ॥
बहुत से बन्दर आकाश की ओर ताक रहे थे। उसी समय बाण उनकी आंखों में लगे और वे आपस में टकराकर पृथ्वी पर गिर पड़े। ६१
हनुमन्तं च सुग्रीवं अङ्गदं गन्धमादनम् ।
जाम्बवन्तं सुषेणं च वेगदर्शिनमेव च ॥ ६२ ॥
मैन्दं च द्विविदं नीलं गवाक्षं गवयं तथा ।
केसरिं हरिलोमानं विद्युद्दंष्ट्रं च वानरम् ॥ ६३ ॥
सूर्याननं ज्योतिमुखं तथा दधिमुखं हरिम् ।
पावकाक्षं नलं चैव कुमुदं चैव वानरम् ॥ ६४ ॥
प्रासैः शूलैः शितैर्बाणैः इन्द्रजिन्मंत्रसंहितैः ।
विव्याध हरिशार्दूलान् सर्वांस्तान् राक्षसोत्तमः ॥ ६५ ॥
के प्रमुख इंद्रजीत ने हनुमान , सुग्रीव , अंगद , गंधमादन , जाम्बवान , सुषेण , वेगदर्शी , मैंदा , द्विविद , नील , गवक्ष , गवय , केसरी , हरिलुभ , विद्युदंष्ट्र , सूर्यनाण , ज्योतिर्मुख , दधिमुख , पावकक्ष को मारने के लिए दिव्य मंत्रों का प्रयोग किया । नल, कुमुद आदि सब श्रेष्ठ वानरों को घायल कर दिया । ॥६२-६५॥
स वै गदाभिर्हरियूथमुख्यान्
निर्भिद्य बाणैस्तपनीयवर्णैः ।
ववर्ष रामं शरवृष्टिजालैः
सलक्ष्मणं भास्कररश्मिकल्पैः ॥ ६६ ॥
उन्होंने अपनी गदा और स्वर्ण बाणों से वानर नेताओं को घायल कर दिया और राम और लक्ष्मण पर सूर्य की किरणों के समान चमकने वाले बाणों की वर्षा करने लगे। ॥६६॥
स बाणवर्षैरभिवृष्यमाणो
धारानिपातानिव तानचिन्त्य ।
समीक्षमाणः परमाद्भुतश्री
रामस्तदा लक्ष्मणमित्युवाच ॥ ६७ ॥
परम अद्भुत सौन्दर्य से सम्पन्न उस बाणों की वर्षा के लक्ष्य बने श्री राम ने उन बाणों की परवाह न करते हुए, जो जल की धाराओं के समान गिर रहे थे, लक्ष्मण की ओर देखा और कहा-॥६७॥
असौ पुनर्लक्ष्मण राक्षसेन्द्रो
ब्रह्मास्त्रमाश्रित्य सुरेन्द्रशत्रुः ।
निपातयित्वा हरिसैन्यमस्मान्
शितैः शरैरर्दयति प्रसक्तम् ॥ ६८ ॥
लक्ष्मण! वह अब राक्षस राजा इंद्रजीत द्वारा प्राप्त ब्रह्मास्त्र की मदद से वानर सेना को हराने के बाद तीखे बाणों से उन दोनों को पीड़ा दे रहा है। ॥६८॥
स्वयंभुवा दत्तवरो महात्मा
समास्थितोऽन्तर्हितभीमकायः ।
कथं नु शक्यो युधि नष्टदेहो
निहन्तुमद्येन्द्रजिदुद्यतास्त्रः ॥ ६९ ॥
भगवान ब्रह्मा का वरदान प्राप्त करने के बाद, इस महान दिमाग वाले नायक, जो हमेशा सतर्क रहते हैं, ने अपने भयानक शरीर को अदृश्य बना दिया है। युद्ध में इस इन्द्रजीत का शरीर दिखाई नहीं देता, परन्तु यह अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग करता रहा है ; ऐसी स्थिति में हम इसे कैसे मार सकते हैं ? ६९
मन्ये स्वयंभूर्भगवानचिन्त्यः
तस्यैतदस्त्रं प्रभवश्च योऽस्य ।
बाणावपातं त्वमिहाद्य धीमन्
मया सहाव्यग्रमनाः सहस्व ॥ ७० ॥
स्वयंभू भगवान ब्रह्मा का रूप अकल्पनीय है। वे ही इस संसार के मूल कारण हैं। मैं समझ गया कि यह उनका शस्त्र है, सो बुद्धिमान सौमित्र! तुम हृदय में निर्भय होकर मेरे साथ यहाँ गुप्त रूप से खड़े रहो और इन बाणों के प्रहारों को सहन करो। ७०
प्रच्छादयत्येष हि राक्षसेन्द्रः
सर्वा दिशः सायकवृष्टिजालैः ।
एतच्च सर्वं पतिताग्र्यशूरं
न भ्राजते वानरराजसैन्यम् ॥ ७१ ॥
यह राक्षस राजा इंद्रजीत अभी भी बाणों की वर्षा कर रहा है और सभी दिशाओं को आच्छादित कर रहा है। वानरों के राजा सुग्रीव की पूरी सेना , जिसके प्रमुख शूरवीर पराजित हो चुके हैं, अब सुंदर नहीं लगती। ॥७१॥
आवां तु दृष्ट्वा पतितौ विसञ्ज्ञौ
निवृत्तयुद्धौ गतहर्षरोषौ ।
ध्रुवं प्रवेक्ष्यत्यमरारिवासं
असौ समादाय रणाग्रलक्ष्मीम् ॥ ७२ ॥
जब हम बिना हर्ष और क्रोध के युद्ध से निवृत्त होकर मूर्छित हो जाएँगे, तब यह दैत्य युद्ध के आरम्भ में ही विजय और धन पाकर अवश्य ही लंका को लौटेगा। ॥७२॥
ततस्तु ताविन्द्रजितोऽस्त्रजालैः
बभूवतुस्तत्र तदा विशस्तौ ।
स चापि तौ तत्र विषादयित्वा
ननाद हर्षाद् युधि राक्षसेन्द्रः ॥ ७३ ॥
तब दोनों भाई, श्री राम और लक्ष्मण, इंद्रजीत के बाणों से घायल हो गए। दैत्यराज ने युद्ध में उन्हें पराजित कर बड़े हर्ष से गर्जना की। ॥७३॥
ततस्तदा वानरसैन्यमेवं
रामं च संख्ये सह लक्ष्मणेन ।
विषादयित्वा सहसा विवेश
पुरीं दशग्रीवभुजाभिगुप्ताम् ।
संस्तूयमानः स तु यातुधानैः
पित्रे च सर्वं हृषितोऽभ्युवाच ॥ ७४ ॥
इस प्रकार लक्ष्मण और वानरों की सेना सहित श्री राम को युद्ध में पराजित करने के बाद, इंद्रजीत दशमुख रावण की भुजाओं की रक्षा करते हुए अचानक लंकापुरी के लिए रवाना हो गए। उस समय सभी रात्रिचर उनकी प्रशंसा कर रहे थे। वहाँ जाकर उसने प्रसन्नतापूर्वक अपने पिता को अपनी विजय का सारा समाचार सुनाया। ७४
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमद्युद्धकाण्डे त्रिसप्ततितमः सर्गः ॥ ७३ ॥
इस प्रकार श्री वाल्मीकि द्वारा रचित प्रथम काव्य आर्ष रामायण में युद्धकांड का तिहत्तरवाँ श्लोक पूरा हुआ। ॥७३॥
सर्ग-74
तयोस्तदा सादितयो रणाग्रे
मुमोह सैन्यं हरियूथपानाम् ।
सुग्रीवनीलाङ्गदजाम्बवन्तो
न चापि किञ्चित् प्रतिपेदिरे ते ॥ १ ॥
जब वे दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण युद्ध के मैदान में गिर पड़े , तो वानर सेनापतियों की सेना में हड़कंप मच गया। उस समय सुग्रीव , नील , अंगद और जाम्बवान का भी कोई पता नहीं था। १
ततो विषण्णं समवेक्ष्य सर्वं
विभीषणो बुद्धिमतां वरिष्ठः ।
उवाच शाखामृगराजवीरान्
आश्वासयन्नप्रतिमैर्वचोभिः ॥ २ ॥
उस समय सबको विषाद में डूबा देख बुद्धिमानों में श्रेष्ठ विभीषण ने वीर सैनिकों को वानरों के राजा का आश्वासन दिया और सुंदर वाणी में कहाः॥२॥
मा भैष्ट नास्त्यत्र विषादकालो
यदार्यपुत्रौ ह्यवशौ विषण्णौ ।
स्वयंभुवो वाक्यमथोद् वहन्तौ
यत् सादिताविन्द्रजितास्त्रजालैः ॥ ३ ॥
बंदर वीर! हमें डरना नहीं चाहिए। यहाँ विषाद का कोई अवसर नहीं है , क्योंकि आर्य के इन दोनों पुत्रों ने ब्रह्मा के वचन का सम्मान और पालन करते हुए स्वयं शस्त्र नहीं उठाया था , इसलिए इंद्रजीत ने उन दोनों को अपने अस्त्रों से ढक दिया। तो ये दोनों भाई केवल उदास हैं , मूर्छित हैं। उनकी जान को कोई खतरा नहीं है। ३
तस्मै तु दत्तं परमास्त्रमेतत्
स्वयंभुवा ब्राह्मममोघवीर्यम्म् ।
तन्मानयन्तौ युधि राजपुत्रौ
निपातितौ कोऽत्र विषादकालः ॥ ४ ॥
स्वयंभू ब्रह्मा ने यह महान अस्त्र इंद्रजीत को दिया। यह लोकप्रिय रूप से ब्रह्मास्त्र के रूप में जाना जाता है और इसकी शक्ति अथाह है। ये दोनों राजकुमार अपने समदार - अपनी मर्यादाओं की रक्षा करते हुए युद्ध में शहीद हुए हैं , तो इसमें खेद की क्या बात है ? ४
ब्राह्ममस्त्रं ततो धीमान् मानयित्वा तु मारुतिः ।
विभीषणवचः श्रुत्वा हनुमानिदमब्रवीत् ॥ ५ ॥
विभीषण के वचन सुनकर पवनपुत्र बुद्धिमान हनुमान ने ब्रह्मास्त्र का सम्मान किया और उनसे कहा:
अस्मिन् अस्त्रहते सैन्ये वानराणां तरस्विनाम् ।
यो यो धारयते प्राणांन् तं तमाश्वासयावहै ॥ ६ ॥
दानव राजा! इस शस्त्र से घायल हुए वेगवान वानर सैनिकों में जो अभी जीवित हैं , वे जाकर उन्हें आश्वासन दें। ॥६॥
तावुभौ युगपद् वीरौ हनुमद् राक्षसोत्तमौ ।
उल्काहस्तौ तदा रात्रौ रणशीर्षे विचेरतुः ॥ ७ ॥
रात का समय था और राक्षसों के प्रमुख हनुमान और विभीषण दोनों हाथों में मशाल लेकर युद्ध के मैदान में एक साथ चलने लगे। ॥७॥
भिन्नलाङ्गूलहस्तोरु पादाङ्गुलिशिरोधरैः ।
स्रवद्भिः क्षतजं गात्रैः प्रस्रवद्भिः समन्ततः ॥ ८ ॥
पतितैः पर्वताकारैः वानरैः अभिसंवृताम् ।
शस्त्रैश्च पतितैर्दीप्तैः ददृशाते वसुंधराम् ॥ ९ ॥
पहाड़ के बंदरों के गिरने से पूरी भूमि चारों ओर से भर गई थी, जिनकी पूंछ , हाथ , पैर , जांघ , उंगलियां और गर्दन कटी हुई थी और इसलिए उनके शरीर से खून बह रहा था। वह भी वहीं पड़े चमकीले हथियारों से ढका हुआ था। हनुमान और विभीषण ने इस राज्य में युद्ध के मैदान का अवलोकन किया। ८-९
सुग्रीवं अङ्गदं नीलं शरभं गन्धमादनम् ।
गवाक्षं च सुषेणं च वेगदर्शिनमेव च ॥ १० ॥
मैन्दं नलं ज्योतिमुखं द्विविदं पनसं तथा ।
एतांश्चान्यांस्ततो वीरौ ददृशाते हतान् रणे ॥ ११ ॥
सुग्रीव , अंगद , नील , शरभ , गन्धमादन , जाम्बवान , सुसेन , वेगदर्शी , मैन्द , नल , ज्योतिर्मुख और द्विविद को युद्ध में घायल पड़ा देखा। १०-११
सप्तषष्टिर्हताः कोट्यो वानराणां तरस्विनाम् ।
अह्नः पञ्चमशेषेणः वल्लभेन स्वयंभुवः ॥ १२ ॥
ब्रह्मा देवताओं के प्रिय अस्त्र ब्रह्मास्त्र ने दिन के चार प्रहरों में अड़सठ करोड़ वानरों का संहार किया था। जब केवल पाँचवाँ भाग - संध्या - रह गया था, तब ब्रह्मास्त्र का प्रयोग बंद हो गया था। ॥१२॥
सागरौघनिभं भीमं दृष्ट्वा बाणार्दितं बलम् ।
मार्गते जाम्बवन्तं स हनुमान् सविभीषणः ॥ १३ ॥
समुद्र के समान विशाल और भयानक वानर सेना को बाणों से आहत देखकर हनुमान और विभीषण जाम्बवान की खोज करने लगे। ॥१३॥
स्वभावजरया युक्तं वृद्धं शरशतैश्चितम् ।
प्रजापतिसुतं वीरं शाम्यन्तमिव पावकम् ॥ १४ ॥
दृष्ट्वा तं अभिसङ्क्रम्य पौलस्त्यो वाक्यमब्रवीत् ।
कच्चिदार्य शरैस्तीक्ष्णैः न प्राणा ध्वंसितास्तव ॥ १५ ॥
ब्रह्मा के पुत्र वीर जाम्बवान स्वाभाविक रूप से वृद्ध थे और उनके शरीर में सैकड़ों बाण चुभ गए। उन्हें देखकर विभीषण तुरंत उनके पास गए और बोले- आर्य! क्या इन तीखे बाणों के प्रहार से हमारे प्राण नहीं निकल गए थे ? १४-१५
विभीषणवचः श्रुत्वा जाम्बवान् ऋक्षपुङ्गवः ।
कृच्छ्रादभ्युद्गिरन् वाक्यं इदं वचनमब्रवीत् ॥ १६ ॥
विभीषण के इन वचनों को सुनकर, जाम्बवान् ने बड़ी कठिनाई से इन शब्दों का उच्चारण किया और इस प्रकार बोला:
नैर्ऋतेन्द्र महावीर्य स्वरेण त्वाऽभिलक्षये ।
विद्धगात्रः शितैर्बाणैः न त्वां पश्यामि चक्षुषा ॥ १७ ॥
पराक्रमी राक्षसराज! मैं आपको केवल स्वर से पहचान रहा हूं। मेरे सारे अंग तीखे बाणों से छिद गए हैं , इसलिए मैं अपनी आँखें खोलकर आपको नहीं देख सकता। १७
अञ्जना सुप्रजा येन मातरिश्वा च सुव्रत ।
हनुमान् वानरश्रेष्ठः प्राणान् धारयते क्वचित् ॥ १८ ॥
उत्तम व्रतों के पालक विभीषण ! बताओ , जिन्हें अंजनादेवी ने श्रेष्ठ पुत्र को जन्म दिया और वायुदेव श्रेष्ठ पुत्र के पिता थे , क्या वानरों में श्रेष्ठ हनुमान जीवित नहीं हैं ? ॥१८॥
श्रुत्वा जाम्बवतो वाक्यं उवाचेदं विभीषणः ।
आर्यपुत्रावतिक्रम्य कस्मात् पृच्छसि मारुतिम् ॥ १९ ॥
जाम्बवान् का यह प्रश्न सुनकर विभीषण ने पूछा- ऋक्षराज! आप दोनों महाराज कुमारों के बजाय केवल पवन कुमार हनुमान के बारे में ही क्यों पूछ रहे हैं? ॥१९॥
नैव राजनि सुग्रीवे नाङ्गदे नापि राघवे ।
आर्य सन्दर्शितः स्नेहो यथा वायुसुते परः ॥ २० ॥
आर्य ! उन्होंने राजा सुग्रीव , अंगद और भगवान राघव के प्रति स्नेह नहीं दिखाया है क्योंकि पवनपुत्र हनुमान के प्रति उनका गहरा प्रेम स्पष्ट है। ॥२०॥
विभीषणवचः श्रुत्वा जाम्बवान् वाक्यमब्रवीत् ।
शृणु नैर्ऋतशार्दूल यस्मात् पृच्छामि मारुतिम् ॥ २१ ॥
विभीषण के इन वचनों को सुनकर जाम्बवान् ने कहा, 'राक्षसों के राजा! सुनो , मैं बताता हूँ कि मैं पवन कुमार हनुमान के बारे में क्यों पूछ रहा हूँ। ॥२१॥
अस्मिन् जीवति वीरे तु हतमप्यहतं बलम् ।
हनुमत्युज्झितप्राणे जीवन्तोऽपि मृता वयम् ॥ २२ ॥
यदि वीर पर हनुमान जीवित हैं, तो यह मृत सेना भी जीवित है - यह समझना चाहिए, और यदि उनके प्राण चले गए, तो हम लोग जीवित होते हुए भी मृत के समान हैं। २२
धरते मारुतिस्तात मारुतप्रतिमो यदि ।
वैश्वानरसमो वीर्ये जीविताशा ततो भवेत् ॥ २३ ॥
पिता ! पवन कुमार हनुमान, जो पवन के समान तेज और अग्नि के समान शक्तिशाली हैं, यदि जीवित हैं, तो हम सभी के पुनरुत्थान की आशा कर सकते हैं। ॥२३॥
ततो वृद्धमुपागम्य नियमेनाभ्यवादयत् ।
गृह्य जाम्बवतः पादौ हनुमान् मारुतात्मजः ॥ २४ ॥
वृद्ध जाम्बवान के ऐसा कहने पर पवनपुत्र हनुमान जी उनके पास पहुँचे और उनके दोनों पैर पकड़कर उन्हें प्रणाम किया। ॥२४॥
श्रुत्वा हनुमतो वाक्यं तथापि व्यथितेन्द्रियः ।
पुनर्जातमिवात्मानं मन्यते स्मर्क्षपुङ्गवः ॥ २५ ॥
हनुमान के वचन सुनकर, उस समय ऋक्षराज जाम्बवान , जिनकी इंद्रियाँ बाणों से पीड़ित थीं , ने सोचा कि उनका पुनर्जन्म हुआ है। २५
ततोऽब्रवीन्महातेजा हनुमन्तं स जाम्बवान् ।
आगच्छ हरिशार्दूल वानरांस्त्रातुमर्हसि ॥ २६ ॥
तब तेजोमय जाम्बवान् ने हनुमान से कहा, 'हे वानर सिंह! हां! समस्त वानरों की रक्षा करो। ॥२६॥
नान्यो विक्रमपर्याप्तः त्वमेषां परमः सखा ।
त्वत्पराक्रमकालोऽयं नान्यं पश्यामि कञ्चन ॥ २७ ॥
आपके सिवा और कोई भी शक्ति से परिपूर्ण नहीं है। आप सबके परम सहायक हैं। यह समय आपका है। मैं किसी और को यह सही करते हुए नहीं देखता। २७
ऋक्षवानरवीराणां अनीकानि प्रहर्षय ।
विशल्यौ कुरु चाप्येतौ सादितौ रामलक्ष्मणौ ॥ २८ ॥
आप रीछों और वानर योद्धाओं की सेना को आनंद देते हैं और इन दोनों भाइयों- रामलक्ष्मण को उनके शरीर से बाणों से निकालकर, जो बाणों से पीड़ित थे, ठीक कर देते हैं। २८
गत्वा परममध्वानं उपर्युपरि सागरम् ।
हिमवन्तं नगश्रेष्ठं हनुमन् गन्तुमर्हसि ॥ २९ ॥
हनुमान! आपको उच्चतम हिमालय तक पहुंचने के लिए समुद्र के चरम से ऊपर उड़ना होगा और बहुत दूर की सड़क पार करनी होगी। ॥२९॥
ततः काञ्चनमत्युच्चं ऋषभं पर्वतोत्तमम् ।
कैलासशिखरं चापि द्रक्ष्यस्यरिनिषूदन ॥ ३० ॥
शत्रुसूदन ! एक बार वहाँ आप बहुत ऊँचे सुनहरे पर्वत ऋषभ और कैलास शिखर को देखेंगे। ॥३०॥
तयोः शिखरयोर्मध्ये प्रदीप्तमतुलप्रभम् ।
सर्वौषधियुतं वीर द्रक्ष्यसि ओषधिपर्वतम् ॥ ३१ ॥
नायक! उन दो चोटियों के बीच औषधियों का पहाड़ दिखाई देगा ; जो बहुत चमकीला है। इसकी चमक ऐसी है कि इसकी तुलना किसी और से नहीं की जा सकती। वह पर्वत समस्त औषधियों से युक्त है। ३१
तस्य वानरशार्दूल चतस्रो मूर्ध्नि संभवाः ।
द्रक्ष्यस्योषधयो दीप्ता दीपयन्तीः दिशो दश ॥ ३२ ॥
वानर सिंह! इसके शिखर पर आपको चार औषधियाँ निकलती हुई दिखाई देंगी ; जो अपने प्रकाश से सही दिशाओं को आलोकित करते रहते हैं। ॥३२॥
मृतसञ्जीवनीं चैव विशल्यकरणीमपि ।
सावर्ण्यकरणीं चैव सन्धानीं च महौशधीम् ॥ ३३ ॥
उनके नाम इस प्रकार हैं: मृतसंजीवनी , विशाल्यकरणी , सुवर्णकरणी और संधानी। ॥३३॥
ताः सर्वा हनुमन् गृह्य क्षिप्रं आगन्तुमर्हसि ।
आश्वासय हरीन् प्राणैः योज्य गन्धवहात्मज ॥ ३४ ॥
हनुमान! पवन कुमार! तुम उन सब औषधियों को लेकर शीघ्र लौट आओ और वानरों को जीवनदान देकर आश्वस्त करो। ॥३४॥
श्रुत्वा जाम्बवतो वाक्यं हनुमान् मारुतात्मजः ।
आपूर्यत बलोद्धर्षैः वायुवेगैरिवार्णवः ॥ ३५ ॥
वायनन्दन हनुमानजी असीम बल से ऐसे भर गये जैसे वायु के वेग से समुद्र भर जाता है । ॥३५॥
स पर्वततटाग्रस्थः पीडयन् पर्वतोत्तमम् ।
हनुमान् दृश्यते वीरो द्वितीय इव पर्वतः ॥ ३६ ॥
वीर हनुमान एक पहाड़ की चोटी पर खड़े हो गए और उस महान पर्वत को अपने पैरों से दबाया और दूसरे पर्वत के रूप में प्रकट हुए। ३६
हरिपादविनिर्भग्नो निषसाद स पर्वतः ।
न शशाक तदाऽऽत्मानं वोढुं भृशनिपीडितः ॥ ३७ ॥
हनुमान के पैरों के भार से पीड़ित होकर वह पर्वत भूमि में धंस गया। दबाव के कारण वह अपने शरीर को भी नहीं संभाल पा रहा था। ॥३७॥
तस्य पेतुर्नगा भूमौ हरिवेगाच्च जज्वलुः ।
शृङ्गाणि च व्यशीर्यन्त पीडितस्य हनूमता ॥ ३८ ॥
उस पर्वत के वृक्ष हनुमान के भार से पीड़ित होकर अपने वेग से भूमि पर गिर पड़े और बहुत से वृक्ष जलने लगे। उसी समय उस पर्वत की चोटियाँ भी हिल-डुल कर गिरने लगीं। ३८
तस्मिन् संपीड्यमाने तु भग्नद्रुमशिलातले ।
न शेकुर्वानराः स्थातुं घूर्णमाने नगोत्तमे ॥ ३९ ॥
जब हनुमान ने उसे दबाया तो उत्तम पर्वत हिलने लगा। उसके ऊपर के पेड़ और चट्टानें टूटकर गिर रही थीं , इसलिए बंदर वहां नहीं रह सकते थे। ॥३९॥
सा घूर्णितमहाद्वारा प्रभग्नगृहगोपुरा ।
लङ्का त्रासाकुला रात्रौ प्रवृत्तेवाभवत् तदा ॥ ४० ॥
लंका के विशाल और ऊंचे द्वार हिलने लगे। मकान और दरवाजे गिर गए। उस रात पूरा शहर डर के मारे नाचता हुआ प्रतीत हो रहा था। ४०
पृथिवीधरसंकाशो निपीड्य पृथिवीधरम् ।
पृथिवीं क्षोभयामास सार्णवां मारुतत्मजः ॥ ४१ ॥
पर्वतारोही पवनकुमार हनुमान ने उस पर्वत को दबाकर पृथ्वी और समुद्र में भी हलचल मचा दी। ४१
आरुरोह तदा तस्माद् हरिर्मलयपर्वतम् ।
मेरुमन्दरसंकाशं नानाप्रस्रवणाकुलम् ॥ ४२ ॥
फिर वे चले गए और मेरु और मंदराचल जैसे ऊँचे मलय पर्वत पर चढ़ गए। पर्वत नाना प्रकार के झरनों से आच्छादित था। ॥४२॥
नानाद्रुमलताकीर्णं विकासिकमलोत्पलम् ।
सेवितं देवगन्धर्वैः षष्टियोजनमुच्छ्रितम् ॥ ४३ ॥
वहाँ नाना प्रकार के वृक्ष और लताएँ फैली हुई थीं। कमल और कुमुदे खिले हुए थे। देवता और गन्धर्व उस पर्वत को खा रहे थे और वह साठ योजन ऊँचा था। ४३
विद्याधरैर्मुनिगणैः अप्सरोभिर्निषेवितम् ।
नानामृगगणाकीर्णं बहुकन्दरशोभितम् ॥ ४४ ॥
विद्याधर , ऋषि और अप्सराएँ भी वहाँ निवास करती थीं। अनेक प्रकार के मृग चारों ओर फैले हुए थे और बहुत से हिरण भी पर्वत की शोभा बढ़ाते थे। ४४
सर्वानाकुलयंस्तत्र यक्षगन्धर्वकिन्नरान् ।
हनुमान् मेघसंकाशो ववृधे मारुतात्मजः ॥ ४५ ॥
पवनपुत्र हनुमान वहां रहने वाले सभी यक्षों , गंधर्वों और किन्नरों को परेशान करते हुए बादल की तरह बढ़ने लगे । ॥४५॥
पद्भ्यां तु शैलमापीड्य वडवामुखवन् मुखम् ।
विवृत्योग्रं ननादोच्चैः त्रासयन् रजनीचरा ॥ ४६ ॥
उन्होंने पर्वत को दोनों पैरों से दबाया और कठफोड़वे की भाँति अपना भयानक मुख फैला दिया, रात के जीवों को भयभीत कर दिया और जोर से गर्जना की। ॥४६॥
तस्य नानद्यमानस्य श्रुत्वा निनदमद्भुतम् ।
लङ्कास्था राक्षसव्याघ्रा न शेकुः स्पन्दितुं क्वचित्त् ॥ ४७ ॥
जोर से और बार-बार गर्जना करने वाले हनुमान की महान गर्जना सुनकर, लंका में सर्वश्रेष्ठ राक्षसों को डर के मारे स्थानांतरित नहीं किया जा सकता था। ॥४७॥
नमस्कृत्वा समुद्राय मारुतिर्भीमविक्रमः ।
राघवार्थे परं कर्म समीहत परन्तपः ॥ ४८ ॥
अत्यंत शक्तिशाली और शत्रुओं को संताप देने वाले पवनपुत्र हनुमान ने समुद्र को प्रणाम किया और रघु के लिए महान प्रयास करने का निश्चय किया। ॥४८॥
स पुच्छमुद्यम्य भुजङ्गकल्पं
विनम्य पृष्ठं श्रवणे निकुच्य ।
विवृत्य वक्त्रं वडवामुखाभं
आपुप्लुवे व्योम्नि स चण्डवेगः ॥ ४९ ॥
उन्होंने अपनी टेढ़ी-मेढ़ी पूंछ उठाई , अपनी पीठ झुकाई , अपने दोनों कानों को ढँक लिया, और आग की तरह अपना मुँह फैलाते हुए, प्रचंड वेग से आकाश में उड़ गए। ॥४९॥
स वृक्षखण्डांस्तरसा जहार
शैलान् शिलाः प्राकृतवानरांश्च ।
बाहूरुवेगोद्धतसंप्रणुन्नाः
ते क्षीणवेगाः सलिले निपेतुः ॥ ५० ॥
अनेक वृक्षों , पर्वत शिखरों , शिलाओं और वहाँ रहने वाले साधारण वानरों को भी उड़ा दिया । भुजाओं और जाँघों के वेग से फेंके जाने पर जब उनका वेग शान्त हो गया, तब वृक्ष और वृक्ष समुद्र के जल में गिर पड़े। ५०
सतौ प्रसार्योरगभोगकल्पौ
भूजौ भुजङ्गारिनिकाशवीर्यः ।
जगाम मेरुं नगराजमग्र्यं दिशः
प्रकर्षन्निव वायुसूनुः ॥ ५१ ॥
अपनी भुजाओं को फैलाकर, जो सर्पों की तरह दिखती थी, पवनपुत्र हनुमान, एक गरुड़ के समान पराक्रमी, सबसे महान पर्वत, हिमालय की ओर सभी दिशाओं में निकल गए। ॥५१॥
स सागरं घूर्णितवीचिमालं
तदम्भसा भ्रामितसर्वसत्त्वम् ।
समीक्षमाणः सहसा जगाम
चक्रं यथा विष्णुकराग्रमुक्तम् ॥ ५२ ॥
जिस समुद्र की लहरें उठ रही थीं और जिसके जल से सारे जलजन्तु इधर-उधर बह रहे थे, उस समुद्र को देखकर हनुमानजी सहसा भगवान विष्णु के हाथ से छूटे हुए चक्र की भाँति आगे बढ़े॥ ५२
स पर्वतान् पक्षि गणान् सरांसि
नदीस्तटाकानि पुरोत्तमानि ।
स्फीतान् जनान्तानपि संप्रवीक्ष्य
जगाम वेगात् पितृतुल्यवेगः ॥ ५३ ॥
उनकी गति उनके पिता पवन के समान थी। उन्होंने कई पहाड़ , पक्षी , झीलें , नदियाँ , झीलें , शहर और समृद्ध देश देखे और बहुत तेजी से आगे बढ़ने लगे। ॥५३॥
आदित्यपथमाश्रित्य जगाम स गतश्रमः ।
हनुमांस्त्वरितो वीरः पितुतुल्यपराक्रमः ॥ ५४ ॥
वीर हनुमान अपने पिता के समान ही पराक्रमी और तेज थे। वे सूर्य के मार्ग का आश्रय लेकर बिना थके आगे बढ़ रहे थे। ॥५४॥
जवेन महता युक्तो मारुतिर्वातरंहसा ।
जगाम हरिशार्दूलो दिशः शब्देन पूरयन् ॥ ५५ ॥
वानर सिंह पवन कुमार हनुमान बड़े तेज के धनी थे। वे सभी दिशाओं में शोर मचाते हुए हवा की तरह तेजी से आगे बढ़े। ॥५५॥
स्मरन् जाम्बवतो वाक्यं मारुतिर्भीमविक्रमः ।
ददर्श सहसा चापि हिमवन्तं महाकपिः ॥ ५६ ॥
महाकपि हनुमान का बल अत्यंत दुर्जेय था। उन्हें जाम्बवान की बातें याद आ गईं और अचानक पहुँचकर उन्होंने हिमालय को देखा। ॥५६॥
नानाप्रस्रवणोपेतं बहुकन्दरनिर्झरम् ।
श्वेताभ्रचयसंकाशैः शिखरैश्चारुदर्शनैः ।
शोभितं विविधैर्वृक्षैः अगमत् पर्वतोत्तमम् ॥ ५७ ॥
कई तरह के स्रोत हैं। कई कंदरा (गुफाएं) और निर्जर इसे सुशोभित करते हैं। वह प्रतापी पर्वत श्वेत मेघों के समूह के समान सुन्दर शिखरों तथा नाना प्रकार के वृक्षों से सुशोभित था। हनुमान उस पर्वत पर पहुंचे। ५७
स तं समासाद्य महानगेन्द्रं
अतिप्रवृद्धोत्तमहेमशृङ्गम् ।
ददर्श पुण्यानि महाश्रमाणि
सुरर्षिसङ्घोत्तमसेवितानि ॥ ५८ ॥
उस महान पर्वतराज की सबसे ऊंची चोटी सुनहरी दिख रही थी। जब वे वहाँ पहुँचे, तो हनुमान ने परम पवित्र आश्रम देखा , जिसमें देवर्षियों का श्रेष्ठ समुदाय निवास करता था। ॥५८॥
स ब्रह्मकोशं रजतालयं च
शक्रालयं रुद्रशरप्रमोक्षम् ।
हयाननं ब्रह्मशिरश्च दीप्तं
ददर्श वैवस्वतकिङ्करांश्च ॥ ५९ ॥
उस पर्वत पर उन्होंने हिरण्यगर्भ भगवान ब्रह्मा का स्थान , उनके दूसरे रूप रजतनाभि का स्थान , इंद्र का निवास स्थान , वह स्थान जहां रुद्रदेव ने खड़े होकर त्रिपुरासुर , भगवान हयग्रीव के निवास और भगवान ब्रह्मास्त्र के चमकदार स्थान पर बाण चलाया , ये सभी दिव्य स्थान। उसी समय यमराज के सेवक भी प्रकट हुए। ५९
वज्रालयं वैश्रवणालयं च
सूर्यप्रभं सूर्यनिबंधनं च ।
ब्रह्मासनं शङ्करकार्मुकं च
ददर्श नाभिं च वसुंधरायाः ॥ ६० ॥
, कुबेर की सूर्य जैसी तेजोमय स्थिति और बारह सूर्यों का समावेश उन्हें दिखाई देने लगा। उन्होंने चार मुख वाले ब्रह्मा , शंकर के धनुष और वसुंधरा की नाभि की स्थिति भी देखी । ६०
कैलासमग्र्यं हिमवच्छिलां च
तं वै वृषं काञ्चनशैलमग्र्यम् ।
सन्दीप्तसर्वौषधिसंप्रदीप्तं
ददर्श सर्वौषधिपर्वतेन्द्रम् ॥ ६१ ॥
फिर उन्होंने महान कैलास पर्वत , हिमालय-शिला , शिव के वाहन वृषभ और स्वर्ण ऋषभ को देखा। इसके बाद उनकी दृष्टि उत्तम औषधियों के महान पर्वत पर पड़ी , जो सभी प्रकार की तेजोमय औषधियों से शोभायमान था। ६१
स तं समीक्ष्यानलरश्मिदीप्तं
विसिस्मिष्मिये वासवदूतसूनुः ।
आवृत्य तं चौषधिपर्वतेन्द्रं
तत्रौषधीनां विचयं चकार ॥ ६२ ॥
अग्नि के समान चमकते उस पर्वत को देखकर पवन कुमार हनुमान चकित रह गए। वे औषधियों से भरे उस गिरिराज पर झपट पड़े और उक्त चारों औषधियों की खोज करने लगे। ६२
स योजनसहस्राणि समतीत्य महाकपिः ।
दिव्यौषधिधरं शैलं व्यचरन्मारुतात्मजः ॥ ६३ ॥
पवनपुत्र महावानर हनुमान हजारों योजन की यात्रा करके वहाँ आए थे और दिव्य औषधियों से युक्त उस शिला शिखर पर विचरण कर रहे थे। ॥६३॥
महौषध्यस्ततः सर्वाः तस्मिन् पर्वतसत्तमे ।
विज्ञायार्थिनमायान्तं ततो जग्मुरदर्शनम् ॥ ६४ ॥
उस खूबसूरत पहाड़ पर रहने वाली सभी जड़ी-बूटियाँ, यह जानकर कि कोई उन्हें लेने आ रहा है , तुरंत गायब हो गईं। ॥६४॥
स ता महात्मा हनुमानपश्यन्
चुकोप कोपाच्च भृशं ननाद ।
अमृष्यमाणोऽग्निसमानचक्षुः
महीधरेन्द्रं तमुवाच वाक्यम् ॥ ६५ ॥
उस औषधि को न देखकर महात्मा हनुमान क्रोधित हो गए और क्रोध के मारे जोर-जोर से दहाड़ने लगे। दवाएं छिपाना उनके लिए असहनीय हो गया। उसके नेत्र अग्नि के समान लाल हो गए और वह उस पर्वतराज से इस प्रकार बोला-॥६५॥
किमेतदेवं सुविनिश्चितं ते
यद् राघवे नासि कृतानुकम्पः ।
पश्याद्य मद्बाहुबलाभिभूतो
विकीर्णमात्मानमथो नगेन्द्र ॥ ६६ ॥
नागेंद्र! तुमने किस बल से यह निश्चय किया है कि तुम राघवों पर भी दया नहीं कर सकते ? आज मेरी बाँहों से हारकर तुम अपने को सर्वत्र बिखरा हुआ देखते हो। ॥६६॥
स तस्य शृङ्गं सनगं सनागं
सकाञ्चनं धातुसहस्रजुष्टम् ।
विकीर्णकूटं ज्वलिताग्रसानुं
प्रगृह्य वेगात् सहसोन्ममाथ ॥ ६७ ॥
उस पर्वत शिखर को पकड़ लिया और उखाड़ फेंका जो वृक्षों , हाथियों , स्वर्ण तथा अन्य हजारों प्रकार की धातुओं से भरा हुआ था। तेजी से उखड़ने के कारण इसकी अधिकांश चोटियां बिखर गईं। उस पर्वत का ऊपरी भाग उसके प्रकाश से प्रज्वलित जान पड़ता था। ६७
स तं समुत्पाट्य खमुत्पपात
वित्रास्य लोकान् ससुरासुरेन्द्रान् ।
संस्तूयमानः खचरैरनेकैः
जगाम वैगाद् गरुडोग्रवेगः ॥ ६८ ॥
हनुमान जी उसे अपने साथ लेकर देवताओं और दैत्यों सहित समस्त लोकों को भयभीत करते हुए गरुड़ के समान बड़े वेग से आकाश में उड़ गए। तब भी अनेक देवगण उनकी स्तुति कर रहे थे। ॥६८॥
स भास्कराध्वानमनुप्रपन्नः
तं भास्कराभं शिखरं प्रगृह्य ।
बभौ तदा भास्करसंनिकाशो
रवेः समीपे प्रतिभास्कराभः ॥ ६९ ॥
हनुमान ने सूर्य के समान दीप्तिमान शिखर को धारण कर सूर्य के मार्ग का अनुसरण किया था। उस समय वे सूर्य देव के समीप खड़े थे और उसी तेज के शरीर से वे दूसरे सूर्य के समान प्रकट हुए। ॥६९॥
स तेन शैलेन भृशं रराज
शैलोपमो गन्धवहात्मजस्तु ।
सहस्रधारेण सपावकेन
चक्रेण खे विष्णुरिवार्पितेन ॥ ७० ॥
वायुदेवी के पुत्र हनुमान पर्वत के समान प्रतीत होते थे। उस पर्वत शिखर से वह भगवान विष्णु के समान शोभायमान , सहस्त्र भुजाओं से विभूषित और अग्नि की ज्वालाओं से युक्त चक्र धारण किए हुए था। ॥७०॥
तं वानराः प्रेक्ष्य तदा विनेदुः
स तानपि प्रेक्ष्य मुदा ननाद ।
तेषां समुत्कृष्टरवं निशम्य
लङ्कालया भीमतरं विनेदुः ॥ ७१ ॥
फिर भी सभी बंदरों ने उन्हें पीछे देखा तो जोर-जोर से दहाड़ने लगे। वे भी उन सबको देखकर बड़े हर्ष से गर्जने लगे। उन सबका कोलाहल सुनकर लंकावासी रात्रि के उल्लू और भी भयानक रूप से चिल्लाने लगे। ॥७१॥
ततो महात्मा निपपात तस्मिन्
शैलोत्तमे वानरसैन्यमध्ये ।
हर्युत्तमेभ्यः शिरसाभिवाद्य
विभीषणं तत्र च सस्वजे सः ॥ ७२ ॥
तब हनुमान श्रेष्ठ त्रिकुटा पर्वत से नीचे कूदे और वानर सेना के बीच में आ गए, वानरों में श्रेष्ठ को प्रणाम किया और विभीषण को गले लगा लिया। ॥७२॥
तावप्युभौ मानुषराजपुत्रौ
तं गन्धमाघ्राय महौषधीनाम् ।
बभूवतुस्तत्र तदा विशल्या
वुत्तस्थुरन्ये च हरिप्रवीराः ॥ ७३ ॥
सर्वे विशल्या विरुजः क्षणेन
हरिप्रवीरा निहताश्च ये स्युः ।
गन्धेन तासां प्रवरौषधीनां
सुप्ता निशान्तेष्विव संप्रबुद्धाः ॥ ७४ ॥
तत्पश्चात् उस महासौधि की सुगंध का सेवन करने से श्रीराम और लक्ष्मण दोनों मानव राजकुमार स्वस्थ हो गए। उनके शरीर से तीरों को निकाल दिया गया और उनके घाव ठीक हो गए। इस प्रकार अन्य प्रमुख वानर-नायक जो वहाँ मारे गए थे, एक क्षण में उठे, उन सभी महान दवाओं की सभी गंधों से ठीक हो गए, जैसे रात के अंत में आत्माएँ नींद से जाग उठती हैं। उसके शरीर से बाण निकल गए और उसके सारे कष्ट मिट गए। ७३-७४
यदाप्रभृति लङ्कायां युध्यन्ते कपिराक्षसाः ।
तदाप्रभृति मानार्थमाज्ञया रावणस्य च ॥ ७५ ॥
ये हन्यन्ते रणे तत्र राक्षसाः कपिकुञ्जरैः ।
हता हतास्तु क्षिप्यन्ते सर्व एव तु सागरे ॥ ७६ ॥
जब से लंका में वानरों और राक्षसों का युद्ध शुरू हुआ , तब से युद्ध के मैदान में मारे गए सभी राक्षसों को रावण के आदेश के अनुसार मरते ही समुद्र में फेंक दिया गया । ऐसा इसलिए किया गया ताकि बंदरों को पता न चले कि कई राक्षस मारे जा चुके हैं। ७५-७६
ततो हरिर्गन्धवहात्मजस्तु
तमोषधीशैलमुदग्रवेगः ।
निनाय वेगाद्धिमवन्तमेव
पुनश्च रामेण समाजगाम ॥ ७७ ॥
तब पवनपुत्र हनुमान, जो बहुत तेज थे, फिर से औषधियों के पहाड़ को हिमालय तक ले गए और फिर वापस आकर श्री रामचंद्र से मिले। ॥७७॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमद्युद्धकाण्डे चतुस्सप्ततितमः सर्गः ॥ ७४ ॥
इस प्रकार श्री वाल्मीकि द्वारा रचित प्रथम काव्य आर्ष रामायण में युद्धकांड का चौहत्तरवाँ श्लोक पूरा हुआ। ॥७४॥
सर्ग-75
ततोऽब्रवीन्महातेजाः सुग्रीवो वानराधिपः ।
अर्थ्यं विज्ञापयंश्चापि हनुमन्तमिदं वचः ॥ १ ॥
तब वानरराज सुग्रीव ने अगले कर्तव्य की सूचना देने के लिए हनुमान से कहा:॥१॥
यतो हतः कुंभकर्णः कुमाराश्च निषूदिताः ।
न इदानीमुपनिर्हारं रावणो दातुमर्हति ॥ २ ॥
कुंभकर्ण मारा गया। चूंकि राक्षस राजा के पुत्र भी मारे गए थे, अब रावण लंकापुरी की रक्षा के लिए कुछ नहीं कर सकता। २
ये ये महाबलाः सन्ति लघवश्च प्लवंगमाः ।
लङ्कामभिपतन्त्वाशु गृह्योल्काः प्लवगर्षभाः ॥ ३ ॥
अतएव हमारी सेना के सब शूरवीर और तीक्ष्ण वानर हाथों में मशाल लेकर शीघ्रता से लंकापुरी पर आक्रमण करें। ३
ततोऽस्तं गत आदित्ये रौद्रे तस्मिन् निशामुखे ।
लङ्कां अभिमुखाः सोल्का जग्मुस्ते प्लवगर्षभाः ॥ ४ ॥
सुग्रीव की आज्ञानुसार सूर्यास्त के समय, भयानक भोर में, सभी श्रेष्ठ वानर हाथों में मशाल लेकर लंका की ओर चल पड़े। ॥४॥
उल्काहस्तैर्हरिगणैः सर्वतः समभिद्रुताः ।
आरक्षस्था विरूपाक्षाः सहसा विप्रदुद्रुवुः ॥ ५ ॥
उल्कापिंडों के वानरों ने जब चारों ओर से आक्रमण किया , तब द्वारपाल के दैत्य भाग खड़े हुए। ॥५॥
गोपुराट्टप्रतोलीषु चर्यासु विविधासु च ।
प्रासादेषु च संहृष्टाः ससृजुस्ते हुताशनम् ॥ ६ ॥
टावरों , महलों , सड़कों , गलियों और महलों में आग लगा दी । ॥६॥
तेषां गृहसहस्राणि ददाह हुतभुक् तदा ।
प्रासादाः पर्वताकाराः पतन्ति धरणीतले ॥ ७ ॥
बंदरों द्वारा लगाई गई आग से हजारों घर जलकर खाक हो गए। पहाड़ी महल ढहने लगे। ॥७॥
अगरुर्दह्यते तत्र परं चैव सुचंदनम् ।
मौक्तिका मणयः स्निग्धा वज्रं चापि प्रवालकम् ॥ ८ ॥
जल रहा अगुरू कहाँ उत्तम चन्दन कहाँ ! मोती , कीमती पत्थर , हीरे और मूंगे जलाए गए। ॥८॥
क्षौमं च दह्यते तत्र कौशेयं चापि शोभनम् ।
आविकं विविधं चौर्णं काञ्चनं भाण्डमायुधम् ॥ ९ ॥
कशौम (याव या सन या सनी के रेशों से बने) कपड़े भी वहाँ जलाए गए थे और सुंदर रेशमी कपड़े भी। भेड़ के बालों से बने कम्बल , तरह-तरह के ऊनी कपड़े , सोने के गहने और हथियार भी जला दिए गए। ९
नानाविकृतसंस्थानं वाजिभाण्डपरिच्छदम् ।
गजग्रैवेयकक्ष्याश्च रथभाण्डाश्च संस्कृतान् ॥ १० ॥
घोड़े के आभूषण , जीन आदि सामान , जो अनेक प्रकार के और विषम आकार के होते थे , जल रहे थे। हाथी के गले के आभूषण , उसे बाँधने की रस्सियाँ, और रथ के उपकरण, जो सुन्दर बनाए गए थे , सब आग में जल गए। १०
तनुत्राणि च योधानां हस्त्यश्वानां च वर्म च ।
खड्गा धनूंषि ज्याबाणाः तोमराङ्कुशशक्तयः ॥ ११ ॥
रोमजं वालजं चर्म व्याघ्रजं चाण्डजं बहु ।
मुक्तामणिविचित्रांश्च प्रासादांश्च समन्ततः ॥ १२ ॥
विविधानस्त्रसंघातान् अग्निर्दहति तत्र वै ।
योद्धाओं के कवच , हाथियों और घोड़ों के कवच , खड्ग , धनुष , धनुष , धनुष, धनुष , बाण , अंकुश , शक्तियाँ , रोमज (कंबली आदि) , वलज (चवरी आदि), सीटों के लिए बाघ की खाल , अंदाज (कस्तूरी आदि)। ) , मोती और रत्नों से जड़े हुए विचित्र महल और नाना प्रकार के महल, चारों ओर फैली आग से सब भस्म हो रहे थे। ११-१२ १/२
नानाविधान् गृहान् चित्रान् ददाह हुतभूक् तदा ॥ १३ ॥
आवासान् राक्षसानां च सर्वेषां गृहगृध्नुनाम् ।
हेमचित्रतनुत्राणां स्रग्भांडाम्बरधारिणाम् ॥ १४ ॥
उस समय अग्निदेव नाना प्रकार के विचित्र घरों को जलाने लगे। सोने के अजीब सी शंख धारण किए हुए और हार , आभूषण और वस्त्रों से विभूषित , घर से जुड़े हुए सभी राक्षसों के निवास आग की लपटों में पाए गए। १३-१४
सीधुपानचलाक्षाणां मदविह्वलगामिनाम् ।
कान्तालम्बितवस्त्राणां शत्रुसञ्जातमन्युनाम् ॥ १५ ॥
गदाशूलासिहस्तानां खादतां पिबतामपि ।
शयनेषु महार्हेषु प्रसुप्तानां प्रियैः सह ॥ १६ ॥
त्रस्तानां गच्छतां तूर्णं पुत्रानादाय सर्वतः ।
तेषां शतसहस्राणि तदा लङ्कानिवासिनाम् ॥ १७ ॥
अदहत् पावकस्तत्र जज्वाल च पुनः पुनः ।
मतवालेपन से जिनकी आँखें चौंधिया गई थीं , जो मतवालेपन से लड़खड़ा रहे थे , जिनके वस्त्र उनकी प्रिय स्त्रियों के पास थे , जो खाने-पीने में मग्न थीं , जो प्राणों के संग बहुमूल्य बिछौने पर सोती थीं , और जो आग से घबराकर पकड़े हुए थे उनके बेटे उनके दिल के करीब हैं चारों ओर तीव्र पकड़ वेग से भाग रहे लाखों लंकावासी उस समय जलकर राख हो गये । वह आग वहां बार-बार भड़क उठी। १५-१७ १/२
सारवन्ति महार्हाणि गंभीरगुणवन्ति च ॥ १८ ॥
हेमचन्द्रार्धचन्द्राणि चन्द्रशालोन्नतानि च ।
तत्र चित्रगवाक्षाणि साधिष्ठानानि सर्वशः ॥ १९ ॥
मणिविद्रुमचित्राणि स्पृशन्तीव दिवाकरम् ।
क्रौञ्चबर्हिणवीणानां भूषणानां च निस्वनैः ॥ २० ॥
नादितान्यचला भानि वेश्मान्यग्निर्ददाह सः ।
जो बहुत मजबूत और मूल्यवान था , गंभीर गुणों से संपन्न था , कई देवों , प्राचीरों , आंतरिक घरों , प्रवेश द्वारों और उपद्वारों के माध्यम से दुर्गम दिखाई देता था , जो सुनहरे अर्धचंद्र या पूर्णिमा के आकार में बना होता था , अटारी से बहुत ऊंचा दिखाई देता था , अजीब खिड़कियां जो सुंदरता में इजाफा करती थीं ; जिसमें सभी सोने और बैठने के लिए बिस्तर और आसनों से सुसज्जित थे , जो अपनी ऊंचाई के कारण सूर्य देव को छूते हुए प्रतीत होते थे ; जिसमें झुकना और मोरों की पुकार , वीणा की मधुर ध्वनि और रत्नों की खड़खड़ाहट सुनाई दी, और पहाड़ पर दिखाई देने वाले सभी घर धधकती आग से भस्म हो गए। ॥१८-२० १/२॥
ज्वलनेन परीतानि तोरणानि चकाशिरे ॥ २१ ॥
विद्युद्भिरिव नद्धानि मेघजालानि धर्मगे ।
आग से घिरी हुई लंका के बाहरी द्वार ऐसे चमक रहे थे जैसे ग्रीष्मकाल में बिजली की माला पहने मेघ हों। ॥२१ १/२॥
ज्वलनेन परीतानि गृहाणि प्रचकाशिरे ॥ २२ ॥
दावाग्निदीप्तानि यथा शिखराणि महागिरेः ।
आग की लपटों से घिरी लंकापुरी के घर आग से जलते विशाल पर्वतों के शिखरों के समान जान पड़ते थे। ॥२२ १/२॥
विमानेषु प्रसुप्ताश्च दह्यमाना वराङ्गनाः ॥ २३ ॥
त्यक्ताभरणसंयोगा हा हेत्युच्चैर्विचुक्रुशुः ।
सातवीं मंजिल की इमारत में सो रही सुंदरी जब आग से जली तो उसने अपने सारे आभूषण फेंक दिए और जोर-जोर से चिल्लाने लगी। ॥२३ १/२॥
तत्र चाग्निपरीतानि निपेतुर्भवनान्यपि ॥ २४ ॥
वज्रिवज्रहतानीव शिखराणि महागिरेः।
वहाँ के बहुत से भवन इस प्रकार ढह रहे थे जैसे इन्द्र के वज्र के प्रहार से पर्वत की बड़ी-बड़ी चोटियाँ ढह गयी हों। ॥२४ १/२॥
तानि निर्दह्यमानानि दूरतः प्रचकाशिरे ॥ २५ ॥
हिमवत् शिखराणीव दह्यमानानि सर्वशः ।
ऐसा लग रहा था मानो चारों तरफ हिमालय की चोटियां जल रही हों। ॥२५ १/२॥
हर्म्याग्रैः दह्यमानैश्च ज्वालाप्रज्वलितैरपि ॥ २६ ॥
रात्रौ सा दृश्यते लङ्का पुष्पितैरिव किंशुकैः ।
टावरों की जलती हुई चोटियाँ आग की लपटों में घिर गईं। रात्रि के समय उनके सम्मुख प्रकट हुई लंकापुरी खिले हुए कमल पुष्पों से सुशोभित प्रतीत हो रही थी। ॥२६ १/२॥
हस्त्यध्यक्षैः गजैर्मुक्तैः मुक्तैश्च तुरगैरपि ।
बभूव लङ्का लोकान्ते भ्रान्तग्राह इवार्णवः ॥ २७ ॥
हाथियों के अध्यक्ष ने हाथियों का त्याग कर दिया था और अश्व अध्यक्ष ने भी घोड़ों का त्याग कर दिया था। वे इधर-उधर भाग रहे थे ; इसलिए, लंकापुरी प्रलय के दौरान खोए हुए गतिमान ग्रहों से भरे समुद्र की तरह दिखती थी। २७
अश्वं मुक्तं गजो दृष्ट्वा क्वचिद् भीतोऽपसर्पति ।
भीतो भीतं गजं दृष्ट्वा क्वचिद् अश्वो निवर्तते ॥ २८ ॥
कहाँ हाथी परित्यक्त घोड़े को देखकर डर कर भाग जाता और कहाँ घोड़ा डरे हुए हाथी को देखकर भाग जाता। ॥२८॥
लङ्कायां दह्यमानायां शुशुभे स महोदधिः ।
छायासंसक्तसलिलो लोहितोद इवार्णवः ॥ २९ ॥
जब लंकापुरी जल रही थी, तब समुद्र अग्नि की लपटों में प्रतिबिम्बित हो रहा था , जिससे वह लाल जल से लाल समुद्र जैसा प्रतीत हो रहा था। ॥२९॥
सा बभूव मुहूर्तेन हरिभिर्दीपिता पुरी ।
लोकस्यास्य क्षये घोरे प्रदीप्तेव वसुंधरा ॥ ३० ॥
लंकापुरी, जिसे बंदरों ने आग लगा दी थी, एक पल में ऐसा प्रतीत हुआ जैसे दुनिया के महान विनाश के समय जला दिया गया हो। ॥३०॥
नारीजनस्य धूमेन व्याप्तस्योच्चैर्विनेदुषः ।
स्वनो ज्वलनतप्तस्य शुश्रुवे दशयोजनम् ॥ ३१ ॥
राख से ढकी और आग से झुलसी लंका की महिलाओं का करुण क्रंदन सौ योजन दूर तक सुना जा सकता था। ॥३१॥
प्रदग्धकायानपरान् राक्षसान् निर्गतान् बहिः ।
सहसा हि उत्पतन्ति स्म हरयोऽथ युयुत्सवः ॥ ३२ ॥
जिन राक्षसों के शरीर जल गए थे और जो शहर से बाहर गिर रहे थे , उन राक्षसों पर अचानक लड़ने की इच्छा रखने वाले बंदरों ने हमला कर दिया। ॥३२॥
उद्घुष्टं वानराणां च राक्षसानां च निस्वनम् ।
दिशो दश समुद्रं च पृथिवीं च व्यनादयत् ॥ ३३ ॥
वानरों की गर्जना और राक्षसों की चीत्कार से समुद्र और पृथ्वी सब दिशाओं में गर्जना कर रहे थे । ॥३३॥
विशल्यौ तु महात्मानौ तावुभौ रामलक्ष्मणौ ।
असंभ्रान्तौ जगृहतुः ते उभे धनुषी वरे ॥ ३४ ॥
इस बीच, महात्मा श्री राम और लक्ष्मण, दोनों भाइयों ने, जो बाणों से उबर चुके थे, बिना किसी हिचकिचाहट के अपना सर्वश्रेष्ठ धनुष उठा लिया। ॥३४॥
ततो विष्फारयामास रामस्च धनुरुत्तमम् ।
बभूव तुमुलः शब्दो राक्षसानां भयावहः ॥ ३५ ॥
उस समय श्री राम ने अपना सर्वश्रेष्ठ धनुष खींचा , जिससे एक भयानक वज्र प्रकट हुआ जो राक्षसों को डराने वाला था। ॥३५॥
अशोभत तदा रामो धनुर्विस्फारयन् महत् ।
भगवानिव संक्रुद्धो भवो वेदमयं धनुः ॥ ३६ ॥
अपने विशाल धनुष को खींचते समय उतने ही सुंदर थे, जितने कि भगवान शिव थे, जब वे त्रिपुरासुर से क्रोधित थे और अपने वैदिक धनुष को गरज रहे थे । ॥३६॥
उद्घुयष्टं वानराणां च राक्षसानां च निस्वनम् ।
ज्याशब्दस्तावुभौ शब्दौ अवति रामस्य शुश्रुवे ॥ ३७ ॥
वानरों की गर्जना और राक्षसों का कोलाहल - ये दोनों ही शब्द श्री राम के धनुष की गड़गड़ाहट से ऊपर उठते सुनाई दे रहे थे। ॥३७॥
वानरोद्घुयष्टघोषश्च राक्षसानां च निस्वनः ।
ज्याशब्दश्चापि रामस्य त्रयं व्याप दिशो दश ॥ ३८ ॥
वानरों का गर्जना , राक्षसों का कोलाहल और श्री रामजी के धनुष की गड़गड़ाहट- ये तीन प्रकार के शब्द चारों दिशाओं में व्याप्त हो रहे थे। ॥३८॥
तस्य कार्मुकनिर्मुक्तैः शरैस्तत् पुरगोपुरम् ।
कैलासशृङ्गप्रतिमं विकीर्णं अभवद्भुवि ॥ ३९ ॥
भगवान राम के धनुष से छूटे हुए बाणों ने लंकापुरी के नगर द्वारों को, जो कैलास के शिखर के समान ऊँचे थे, चकनाचूर कर दिया और उन्हें जमीन पर बिखेर दिया। ॥३९॥
ततो रामशरान् दृष्ट्वा विमानेषु गृहेषु च ।
सन्नाहो राक्षसेन्द्राणां तुमुलः समपद्यत ॥ ४० ॥
श्री राम के बाणों को सात मंजिला मकान सहित अन्य घरों पर गिरते देख दैत्यों ने युद्ध की भयानक तैयारी की। ॥४०॥
तेषां सन्नह्यमानानां सिंहनादं च कुर्वताम् ।
शर्वरी राक्षसेन्द्राणां रौद्रीव समपद्यत ॥ ४१ ॥
वह रात्रि उन दैत्यों के लिए अन्धकारमय रात्रि के समान हो गई जो कमर कस कर और कवच गर्जना करते हुए युद्ध के लिए तैयार हो रहे थे। ॥४१॥
आदिष्टा वानरेन्द्रास्ते सुग्रीवेण महात्मना ।
आसन्नद्वारमासाद्य युध्यध्वं च प्लवंगमाः ॥ ४२ ॥
उस समय महात्मा सुग्रीव ने प्रमुख वानरों को आदेश दियाः “हे वानर वीरों! तुम सब अपने निकटतम द्वार पर जाकर युद्ध करो। ॥४२॥
यश्च वो वितथं कुर्यात् तत्र तत्राप्युपस्थितः ।
स हन्तव्योऽभि संप्लुत्य राजशासनदूषकः ॥ ४३ ॥
तुम में से जो कोई मेरी आज्ञा का पालन न करे, चाहे वह युद्ध के मैदान में कहीं भी उपस्थित हो, युद्ध से विमुख होकर भाग जाए, तुम सब उसे पकड़कर मार डालो, क्योंकि वह राजा की आज्ञा का उल्लंघन करनेवाला ठहरेगा । ४३
तेषु वानरमुख्येषु दीप्तोल्कोज्ज्वलपाणिषु ।
स्थितेषु द्वारमासाद्य रावणं क्रोध आविशत् ॥ ४४ ॥
जब प्रमुख वानर सुग्रीव की आज्ञा का पालन करते हुए हाथों में जलती हुई मशालें लेकर नगर द्वार पर गए और वहीं खड़े हो गए, तो रावण को बहुत क्रोध आया। ॥४४॥
तस्य जृम्भितविक्षेपाद् व्यामिश्रा वै दिशो दश ।
रूपवानिव रुद्रस्य मन्युर्गात्रेष्वदृश्यत ॥ ४५ ॥
जब उसने अंगों को आलस्य से हिलाया तो सही दिशा भ्रमित हो गई। वह कालरुद्र के शरीर में मूर्तिमान क्रोध के रूप में प्रकट हुए। ॥४५॥
स निकुंभं च कुंभं च कुंभकर्णात्मजावुभौ ।
प्रेषयामास संक्रुद्धो राक्षसैर्बहुभिः सह ॥ ४६ ॥
क्रोध से भरे हुए रावण ने कुंभकर्ण के दो पुत्रों कुंभ और निकुंभ को कई राक्षसों के साथ भेजा। ॥४६॥
यूपाक्षः शोणिताक्षश्च प्रजङ्घः कम्पनस्तथा ।
निर्ययुः कौम्भकर्णिभ्यां सह रावणशासनात् ॥ ४७ ॥
रावण की आज्ञा से युपक्ष , शोणितक्ष , प्रजंग और अकंपन कुम्भकर्ण के दोनों पुत्रों के साथ युद्ध करने के लिए निकले। ॥४७॥
शशास चैव तान् सर्वान् राक्षसान् सुमहाबलान् ।
नादयन् गच्छतात्रैव सिंहनादं च नादयन् ॥ ४८ ॥
उस समय सिंह के समान दहाड़ने वाले रावण ने समस्त बलवान दैत्यों को आदेश दियाः तुम लोग इसी रात युद्ध को जाते हो। ॥४८॥
ततस्तु चोदितास्तेन राक्षसा ज्वलितायुधाः ।
लङ्काया निर्ययुर्वीराः प्रणदन्तः पुनः पुनः ॥ ४९ ॥
दैत्यराज की आज्ञा पाकर वे वीर दैत्य हाथ में चमकते अस्त्र-शस्त्र लेकर बार-बार गर्जना करते हुए लंकापुरी से बाहर निकल आए। ४९
रक्षसां भूषणस्थाभिः भाभिः स्वाभिश्च सर्वशः ।
चक्रुस्ते सप्रभं व्योम हरयश्चाग्निभिः सह ॥ ५० ॥
राक्षसों ने अपने आभूषणों और अपने प्रभास और वानरों के साथ आकाश को मशालों से प्रकाश से भर दिया। ५०
तत्र ताराधिपस्याभा ताराणां च तथैव च ।
तयोराभरणाभा च ज्वलिता द्यामभासयन् ॥ ५१ ॥
चंद्रमा , तारों और दोनों सेनाओं के आभूषणों की चमक से आकाश प्रकाशित हो गया था । ॥५१॥
चन्द्राभा भूषणाभा च गृहाणां ज्वलतां च भा ।
हरिराक्षससैन्यानि भ्राजयामास सर्वतः ॥ ५२ ॥
चांदनी , आभूषणों की चमक और चमकदार ग्रहों की चमक ने सभी तरफ राक्षसों और बंदरों की सेनाओं को प्रकाशित किया। ॥५२॥
तत्र चार्ध प्रदीप्तानां गृहाणां सागरः पुनः ।
भाभिः संसक्तपातालः चलोर्मिः शुशुभेऽधिकम् ॥ ५३ ॥
लंका में अधजले घरों के प्रतिबिम्ब से चंचल लहरदार समुद्र और भी सुन्दर हो गया था। ॥५३॥
पताकाध्वजसंयुक्तं उत्तमासिपरश्वधम् ।
भीमाश्वरथमातङ्गं नानापत्तिसमाकुलम् ॥ ५४ ॥
दीप्तशूलगदाखड्ग प्रासतोमरकार्मुकम् ।
तद् राक्षसबलं घोरं भीमविक्रमपौरुषम् ॥ ५५ ॥
दैत्यों की वह दुर्जेय सेना ध्वजों और पताकाओं से सुशोभित थी। सैनिकों के हाथों में बड़े-बड़े खड्ड और परशु चमक रहे थे। वह भयानक घोड़ों , रथों, हाथियों और भाँति-भाँति के पैदल सैनिकों से भरा हुआ था । चमकीली कीलों , गदाओं , तलवारों , भालों , तरकस और धनुषों से सुसज्जित सेना ने अदम्य कीर्तिमान और वीरता का परिचय दिया। ५४-५५
ददृशो ज्वलितप्रासं किङ्किणीशतनादितम् ।
हेमजालाचितभुजं व्यावेष्टितपरश्वधम् ॥ ५६ ॥
व्याघूर्णितमहाशस्त्रं बाणसंसक्तकार्मुकम् ।
गन्धमाल्यमधूत्सेक संमोदितमहानिलम् ॥ ५७ ॥
घोरं शूरजनाकीर्णं महाम्बुधरनिस्वनम् ।
उस सेना में भाले चमक रहे थे। सैकड़ों चीखें सुनी जा सकती थीं। सैनिकों की भुजाओं पर सोने के आभूषण बंधे हुए थे। वे उन भुजाओं के द्वारा बड़े-बड़े अस्त्रों को झुलाते हुए परशु को चला रहे थे । धनुष पर बाण लगे हुए थे। चंदन , माला और मधु की प्रचुरता से वातावरण में अतुलनीय सुगंध व्याप्त हो गई । वह सेना शूरवीरों से भरी हुई थी, और बड़े मेघ के समान सिंहों के गरजने से बुलाई हुई भयानक दिखाई पड़ती थी। ५६-५७ १/२
तद् दृष्ट्वा बलमायान्तं राक्षसानां दुरासदम् ॥ ५८ ॥
सञ्चचाल प्लवंगानां बलमुच्चैर्ननाद च ।
दैत्यों की अजेय सेना को आता देखकर वानर सेना आगे बढ़ी और जोर-जोर से गर्जना करने लगी। ॥५८ १/२॥
जवेनाप्लुत्य च पुनः तद् बलं रक्षसां महत् ॥ ५९ ॥
अभ्ययात् प्रत्यरिबलं पतङ्गा इव पावकम् ।
और पतंगों की तरह आग में झुलसते हुए शत्रु सेना पर आ गिरी । ॥५९ १/२॥
तेषां भुजपरामर्श व्यामृष्टपरिघाशनि ॥ ६० ॥
राक्षसानां बलं श्रेष्ठं भूयः परमशोभत ।
सिपाहियों की भुजाओं की चाल, जहाँ घेरा तथा वज्रपात होते थे , दैत्यों की श्रेष्ठ सेना अत्यन्त सुन्दर थी। ॥६० १/२॥
तत्रोन्मत्ता इवोत्पेतुः हरयोऽथ युयुत्सवः ॥ ६१ ॥
तरुशैलैरभिघ्नन्तो मुष्टिभिश्च निशाचरान् ।
वहाँ बंदर, जो युद्ध करना चाहते थे, पागल हो गए और निशाचरों पर हमला कर दिया, उन्हें पेड़ों , पत्थरों और मुक्के से मार डाला। ॥६१ १/२॥
तथैवापततां तेषां हरीणां निशितैः शरैः ॥ ६२ ॥
शिरांसि सहसा जह्रू राक्षसा भीमविक्रमाः ।
इसी प्रकार भयंकर पराक्रमी रात्रि प्रहरी अपने तीखे बाणों से सामने आने वाले वानरों के सिरों को काटने लगे। ॥६२ १/२॥
दशनै र्हतकर्णाश्च मुष्टिभिर्भिन्नमस्तकाः ।
शिलाप्रहारभग्नाङ्गा विचेरुस्तत्र राक्षसाः ॥ ६३ ॥
बंदरों ने भी निशाचरों के कानों को अपने दांतों से तोड़ दिया और उनके सिरों को अपने हिरनों से फाड़ डाला। इसी अवस्था में वहां राक्षस विचरण कर रहे थे। ॥६३॥
तथैवाप्यपरे तेषां कपीनामसिभिः शितैः ।
प्रवीरानभितो जघ्नू घोररूपा निशाचराः ॥ ६४ ॥
इसी प्रकार भयंकर रूप धारण करने वाले रात्रिचरों ने अपनी तीक्ष्ण तलवारों से एक-एक करके प्रमुख वानरों को घायल कर दिया। ॥६४॥
घ्नन्तमन्यं जघानान्यः पातयन्तमपातयत् ।
गर्हमाणं जगर्हान्यो दशन्तमपरोऽदशत् ॥ ६५ ॥
जब एक योद्धा दूसरे को मारता है, तो दूसरा आकर उसे मार डालता है। इसी प्रकार एक योद्धा दूसरे से पराजित होगा। जो एक को दोषी ठहराता था, वह दूसरे को दोषी ठहराता था, और जो कोई एक को दांत से काटता था, दूसरा आकर उसे डसता था। ॥६५॥
देहीत्यन्यो ददात्यन्यो ददामीत्यपरः पुनः ।
किं क्लेशयसि तिष्ठेति तत्रान्योन्यं बभाषिरे ॥ ६६ ॥
एक ने आकर कहा कि मुझे युद्ध दो, जबकि दूसरा उसे युद्ध का अवसर दे रहा था ; तब तीसरा कहता था कि तुम क्यों तड़पते हो ? मैं इसके साथ युद्ध में हूँ। इस तरह वे आपस में बातें कर रहे थे। ६६
विप्रलम्भितशस्त्रं च विमुक्तकवचायुधम् ।
समुद्यतमहाप्रासं मुष्टिशूलासिसङ्कुलम् ॥ ६७ ॥
प्रावर्तत महारौद्रं युद्धं वानररक्षसाम् ।
वानरान् दश सप्तेति राक्षसा जघ्नुराहवे ॥ ६८ ॥
राक्षसान् दश सप्तेति वानराश्चाभ्यपातयन् ।
उस समय वानरों और दैत्यों में घोर युद्ध होने लगा। अस्त्र-शस्त्र गिर रहे थे , ढाल और अस्त्र-शस्त्र टूट रहे थे , बड़े-बड़े भाले उठ रहे थे , साथ ही लाठियाँ , तलवारें , भाले और भाले भी उठ रहे थे। उस रणभूमि में राक्षस एक समय में दस-सात वानरों का वध कर रहे थे। और वानर दस-दस या सात-सात राक्षसों को कुचल रहे थे। ॥६७-६८ १/२॥
विप्रलम्भितवस्त्रं च विमुक्तकवचध्वजम् ।
बलं राक्षसमालम्ब्य वानराः पर्यवारयन् ॥ ६९ ॥
दैत्यों के वस्त्र ढीले हो गये , उनकी ढालें और पताकाएँ टूट गयीं और वानरों ने दैत्यों को चारों ओर से घेर लिया। ॥६९॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमद्युद्धकाण्डे पञ्चसप्ततितमः सर्गः ॥ ७५ ॥
इस प्रकार श्री वाल्मीकि द्वारा रचित प्रथम काव्य आर्ष रामायण में युद्धकांड का पचहत्तरवाँ श्लोक पूरा हुआ। ॥७५॥
सर्ग-76
प्रवृत्ते सङ्कुले तस्मिन् घोरे वीरजनक्षये ।
अङ्गदः कम्पनं वीरं आससाद रणोत्सुकः ॥ १ ॥
जब वीरों का नाश करने के लिये वह भीषण संग्राम चल रहा था, तब युद्ध के लिये आतुर अंगद वीरसंगठन से मिलने आये। ॥१॥
आहूय सोऽङ्गदं कोपात् ताडयामास वेगितः ।
गदया कम्पनः पूर्वं स चचाल भृशाहतः ॥ २ ॥
कंपाना ने गुस्से में अंगद को चुनौती दी और बड़ी तेजी के साथ पहली गदा से उस पर वार किया। वे बुरी तरह घायल हो गए और बेहोश होकर गिर पड़े। ॥२॥
स संज्ञां प्राप्य तेजस्वी चिक्षेप शिखरं गिरेः ।
अर्दितश्च प्रहारेण कम्पनः पतितो भुवि ॥ ३ ॥
जब वे शुद्धिवार लौटे तो तेजस्वी वीर अंगद ने एक पर्वत की चोटी उठाकर दैत्य पर फेंक दी। उन प्रहारों के शिकार लोग धरती पर गिर पड़े हैं-उसके जीवन के पंख उड़ गए हैं। ॥३॥
ततस्तु कम्पनं दृष्ट्वा शोणिताक्षो हतं रणे ।
रथेनाभ्यपतत् क्षिप्रं तत्राङ्गदमभीतवत् ॥ ४ ॥
कन्बन को युद्ध में मारा गया देखकर शोणितक्ष रथ पर चढ़ गया और तुरंत निडर हो गया और अंगद पर हमला कर दिया। ४
सो ऽङ्गदं निशितैर्बाणैः तदा विव्याध वेगितः ।
शरीरदारणैस्तीक्ष्णैः कालाग्निसमविग्रहैः ॥ ५ ॥
उन्होंने अंगद को उसी समय शरीर को चीरने में समर्थ काले अग्नि-रूपी आकाश के तीखे बाणों से घायल कर दिया। ५
क्षुरक्षुरप्रनाराचैः वत्सदन्तैः शिलीमुखैः ।
कर्णिशल्यविपाठैश्च बहुभिर्निशितैः शरैः ॥ ६ ॥
अङ्गदः प्रतिविद्धाङ्गो वालिपुत्रः प्रतापवान् ।
धनुरग्रं रथं बाणान् ममर्द तरसा बली ॥ ७ ॥
क्षुर , क्षुरप्र , नारच , वत्सदंत , शिलिमुख , करणी, शल्य और विपथ नामक अनेक तीखे बाणों से बलीपुत्र अंगद के सभी अंग छिन्न-भिन्न हो गए , तब महाबली वीर ने भयानक धनुष, रथ और रथ को बड़े वेग से नष्ट कर दिया । दानव के तीर । ६-७
शोणिताक्षस्ततः क्षिप्रं असिचर्म समाददे ।
उत्पपात दिवं क्रुद्धो वेगवान् अविचारयन् ॥ ८ ॥
तब तेज-तर्रार रात्रि में रहने वाला शोणितक्ष क्रोधित हो गया और उसने तुरंत ही अपनी ढाल और तलवार उठा ली और बिना सोचे-समझे अपने रथ से नीचे कूद गया। ॥८॥
तं क्षिप्रतरमाप्लुत्य परामृश्याङ्गदो बली ।
करेण तस्य तं खड्गं समाच्छिद्य ननाद च ॥ ९ ॥
तब बलवान अंगद ने झट से लपककर उसे पकड़ लिया, तलवार उसके हाथ में खींच ली और जोर से गर्जना करने लगा। ॥९॥
तस्यांसफलके खड्गं निजघान ततोऽङ्गदः ।
यज्ञोपवीतवच्चैनं चिच्छेद कपिकुञ्जरः ॥ १० ॥
तब कपिकुंजर अंगद ने अपनी तलवार से उसके कंधे पर वार किया और उसके शरीर को इस तरह काट डाला मानो उसने कोई पवित्र यज्ञ किया हो। ॥१०॥
तं प्रगृह्य महाखड्गं विनद्य च पुनः पुनः ।
वालिपुत्रोऽभिदुद्राव रणशीर्षे परानरीन् ॥ ११ ॥
तब वलीपुत्र ने विशाल तलवार लेकर बार-बार गरज कर युद्ध के मैदान में अन्य शत्रुओं पर आक्रमण किया। ।११।
प्रजङ्घसहितो वीरो यूपाक्षस्तु ततो बली ।
रथेनाभिययौ क्रुद्धो वालिपुत्रं महाबलम् ॥ १२ ॥
इस बीच, बलवान वीर युपक्ष, जो प्रजंगों को अपने साथ ले गया था, क्रोधित हो गया और उसने अपने रथ से शक्तिशाली वलीकुमार पर हमला कर दिया। ॥१२॥
आयसीं तु गदां गृह्य स वीरः कनकाङ्गदः ।
शोणिताक्षः समाविध्य तमेवानुपपात ह ॥ १३ ॥
तब वीर शोणितक्ष ने, जो सुनहरी बाजूबंद पहने हुए था, अपनी लोहे की गदा उठाई और अंगद के पीछे हो लिया। ॥१३॥
प्रजङ्घस्तु महावीरो यूपाक्षसहितो बली ।
गदयाभिययौ क्रुद्धो वालिपुत्रं महाबलम् ॥ १४ ॥
तब पराक्रमी महावीर प्रजंग, युपक्ष के साथ, क्रोधित हो गए और शक्तिशाली वलीपुत्र पर गदा लेकर आ गए। ॥१४॥
तयोर्मध्ये कपिश्रेष्ठः शोणिताक्षप्रजङ्घयोः ।
विशाखयोर्मध्यगतः पूर्णचन्द्र इवाबभौ ॥ १५ ॥
वानरश्रेष्ठ अंगद को दो विशाखा नक्षत्रों के बीच पूर्णिमा के समान सुशोभित करना चाहिए वह सुंदर होता। ॥१५॥
अङ्गदं परिरक्षान्तौ मैन्दो द्विविद एव च ।
तस्य तस्थातुरभ्याशे परस्परदिदृक्षया ॥ १६ ॥
इस बीच मैन्द और द्विविद अंगद की रक्षा के लिए उनके पास खड़े हो गए। वे दोनों अपने सही विरोधी योद्धा की तलाश कर रहे थे। ॥१६॥
अभिपेतुर्महाकायाः प्रतियत्ता महाबलाः ।
राक्षसा वानरान् रोषाद् असिचर्मगदाधराः ॥ १७ ॥
, बाण और गदा से लैस अनेक पराक्रमी दैत्यों ने क्रोधित होकर वानरों पर आक्रमण कर दिया। ॥१७॥
त्रयाणां वानरेन्द्राणां त्रिभी राक्षसपुङ्गवैः ।
संसक्तानां महद् युद्धं अभवद् रोमहर्षणम् ॥ १८ ॥
ये तीनों वानर-सेनापति तीन प्रमुख राक्षसों के साथ युद्ध में लगे हुए थे। उस समय उनके बीच घोर युद्ध छिड़ गया। ॥१८॥
ते तु वृक्षान् समादाय सम्प्रचिक्षिपुराहवे ।
खड्गेन प्रतिचिक्षेप तान् प्रजङ्घो महाबलः ॥ १९ ॥
उन तीन वानरों ने युद्ध के मैदान में एक पेड़ ले लिया और उसे युद्ध में निशाचरों पर फेंक दिया ; लेकिन पराक्रमी पजंगा ने अपनी तलवार से सभी पेड़ों को काट डाला। ॥१९॥
रथानश्वान् द्रुमान् शैलान् प्रचिक्षिपुराहवे ।
शरौधैः प्रतिचिच्छेद तान् यूपाक्षो महाबलः ॥ २० ॥
तब उन्होंने रणभूमि में दैत्यों के रथों और घोड़ों पर वृक्षों और पर्वत-शिखरों की वर्षा की, पर पराक्रमी युपक्ष ने अपने बाणों से उन्हें चकनाचूर कर दिया। ॥२०॥
सृष्टान् द्विविदमैन्दाभ्यां द्रुमानुत्पाट्य वीर्यवान् ।
बभञ्ज गदया मध्ये शोणिताक्षः प्रतापवान् ॥ २१ ॥
मैंदा और द्विविदा ने जिन पेड़ों को उखाड़कर राक्षसों पर फेंका था, वे सभी शक्तिशाली और प्रतापी शोणितक्ष ने गदा से आधे-अधूरे तोड़ दिए थे। २१
उद्यम्य विपुलं खड्गं परमर्मविदारणम् ।
प्रजङ्घो वालिपुत्राय अभिदुद्राव वेगितः ॥ २२ ॥
तब प्रजंग ने एक विशाल तलवार उठाई, जो उसके शत्रुओं के हृदय को चीरती हुई निकली और बाली के पुत्र अंगद पर आक्रमण कर दिया। ॥२२॥
तमभ्याशगतं दृष्ट्वा वानरेन्द्रो महाबलः ।
आजघानाश्वकर्णेन द्रुमेणातिबलस्तदा ॥ २३ ॥
बाहुं चास्य सनिस्त्रिंशं आजघान स मुष्टिना ।
वालिपुत्रस्य घातेन स पपात क्षितावसिः ॥ २४ ॥
उसे पास आते देख महापराक्रमी वानर राजा अंगद ने अश्वकर्ण नामक वृक्ष से उसका वध कर दिया। वहीं, जिनके पास तलवारें थीं, उन्होंने उनके हाथ में वार कर दिया। वलिपुत्र के उस प्रहार से तलवार ढीली होकर भूमि पर गिर पड़ी। ॥२३-२४॥
तं दृष्ट्वा पतितं भूमौ खड्गं मुसलसन्निभम् ।
मुष्टिं संवर्तयामास वज्रकल्पं महाबलः ॥ २५ ॥
भाले के समान तलवार को भूमि पर गिरा देखकर बलवान प्रजंग ने वज्र के समान मुक्का लहराना प्रारम्भ किया। ॥२५॥
ललाटे स महावीर्यं अङ्गदं वानरर्षभम् ।
आजघान महातेजाः स मुहूर्तं चचाल ह ॥ २६ ॥
तेजस्वी रात्रि-निवासी ने शक्तिशाली वानर अंगद के माथे पर मुक्का मारा , जिससे उसे एक पल के लिए चक्कर आ गया। ॥२६॥
स संज्ञां प्राप्य तेजस्वी वालिपुत्रः प्रतापवान् ।
प्रजङ्घस्य शिरः कायात् पातयामास मुष्टिना ॥ २७ ॥
इसके बाद, जब उन्होंने अपनी पवित्रता को पुनः प्राप्त किया, तो तेजस्वी और प्रतापी वलीकुमार ने प्रजंग पर इतना जोर से प्रहार किया कि उनका सिर उनके सिर से अलग हो गया। ॥२७॥
स यूपाक्षोऽश्रुपूर्णाक्षः पितृव्ये निहते रणे ।
अवरुह्य रथात् क्षिप्रं क्षीणेषुः खड्गमाददे ॥ २८ ॥
युपक्ष की आंखों में आंसू आ गए जब उसने देखा कि उसके चाचा चुलता प्रजांग युद्ध के मैदान में मारे गए हैं। उसके बाण नष्ट होते ही वह तुरंत रथ से उतर गया और अपनी तलवार हाथ में ले ली। २८
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य यूपाक्षं द्विविदस्त्वरन् ।
आजघानोरसि क्रुद्धो जाग्राह च बलाद् बली ॥ २९ ॥
युपक्ष को आक्रमण करता देख महाबली वीर द्विविद क्रोधित हो गया और बड़ी तलवार से उसकी छाती पर प्रहार कर उसे बलपूर्वक पकड़ लिया। ॥२९॥
गृहीतं भ्रातरं दृष्ट्वा शोणिताक्षो महाबलः ।
आजघान महातेजा वक्षसि द्विविदं ततः ॥ ३० ॥
अपने भाई को पकड़ा हुआ देखकर, पराक्रमी और तेजस्वी शोणितक्ष ने द्विविद की छाती पर गदा से प्रहार किया। ॥३०॥
स गदाभिहतस्तेन चचाल च महाबलः ।
उद्यतां च पुनस्तस्य जहार द्विविदो गदाम् ॥ ३१ ॥
शोणितक्ष के प्रहार से पराक्रमी द्विविद विचलित हो गया। जब उन्होंने फिर गदा उठाई तो द्विविदा ने झट से उसे छीन लिया। ॥३१॥
एतस्मिण् अंतरे मैन्दो द्विविदाभ्याशमागमत् ।
यूपाक्षं ताडयामास तलेनोरसि वीर्यवान् ॥ ३२ ॥
इतने में पराक्रमी मैंदही द्विविदा के पास आया और युपक्ष की छाती पर एक थप्पड़ जड़ दिया। ॥३२॥
तौ शोणिताक्षयूपाक्षौ प्लवङ्गाभ्यां तरस्विनौ ।
चक्रुतुः समरे तीव्रं आकर्षोत्पाटनं भृशम् ॥ ३३ ॥
, युद्ध के मैदान में बड़े वेग से फिसलने, गिरने और एक दूसरे को मारने लगे। ॥३३॥
द्विविदः शोणिताक्षं तु विददार नखैर्मुखे ।
निष्पिपेष च वीर्येण क्षितावाविध्य वीर्यवान् ॥ ३४ ॥
पराक्रमी द्विविद ने अपने पंजों से शोणितक्ष के चेहरे पर प्रहार किया और बलपूर्वक मारकर उसे जमीन पर पटक दिया। ॥३४॥
यूपाक्षमभिसङ्क्रुद्धो मैन्दो वानरपुंगवः ।
पीडयामास बाहुभ्यां स पपात हतः क्षितौ ॥ ३५ ॥
तब वानरों के प्रधान मैंदा ने क्रोध में आकर युपक्ष को अपनी भुजाओं से इस प्रकार लपेट लिया कि वह निर्जीव होकर भूमि पर गिर पड़ा। ॥३५॥
हतप्रवीरा व्यथिता राक्षसेन्द्रचमूस्तथा ।
जगामाभिमुखी सा तु कुम्भकर्णसुतो यतः ॥ ३६ ॥
जब इन प्रमुख वीरों की मृत्यु हो गई, तो राक्षस राजा की सेना व्यथित हो गई और वहाँ भाग गई जहाँ कुंभकर्ण का पुत्र लड़ रहा था। ॥३६॥
आपतन्तीं च वेगेन कुम्भस्तां सान्त्वयच्चमूम् ।
अथोत्कृष्टं महावीर्यैः लब्धलक्षैः प्लवङ्गमैः ॥ ३७ ॥
कुम्भा ने भागती हुई सेना को सांत्वना दी। दूसरी ओर शक्तिशाली वानर युद्ध में विजयी होने के कारण जोर-जोर से गर्जना करने लगे। ॥३७॥
निपातितमहावीरां दृष्ट्वा रक्षश्चमूं तदा ।
कुम्भः प्रचक्रे तेजस्वी रणे कर्म सुदुष्करम् ॥ ३८ ॥
राक्षस सेना के महान वीरों को मरा हुआ देखकर तेजस्वी कुम्भ युद्धभूमि में अत्यन्त कठिन कर्म करने लगे। ॥३८॥
स धनुर्धन्विनां श्रेष्ठः प्रगृह्य सुसमाहितः ।
मुमोचाशीविषप्रख्यान् शरान् देहविदारणान् ॥ ३९ ॥
वह धनुर्धारियों में सर्वश्रेष्ठ था और युद्ध में अपना दिमाग बेहद केंद्रित रखता था। उन्होंने अपना धनुष उठाया और शरीर को विदीर्ण करने में समर्थ तथा सर्पों के समान विषैले बाणों की वर्षा करने लगे। ॥३९॥
तस्य तच्छुशुभे भूयः सशरं धनुरुत्तमम् ।
विद्युदैरावतार्चिष्माद् द्वितीयेन्द्रधनुर्यथा ॥ ४० ॥
बाणों से युक्त उनका श्रेष्ठ धनुष बिजली और ऐरावत के तेज वाले किसी अन्य इन्द्रधनुष से भी अधिक सुन्दर था। ॥४०॥
आकर्णाकृष्टमुक्तेन जघान द्विविदं तदा ।
तेन हाटकपुङ्खेन पत्रिणा पत्रवाससा ॥ ४१ ॥
धनुष की ओर खींचे गए सोने के पंखों से ढके पत्तेदार बाण से द्विविदा को घायल कर दिया । ॥४१॥
सहसाभिहतस्तेन विप्रमुक्तपदः स्फुरन् ।
निपपात त्रिकूटाभो विह्वलः प्लवगोत्तमः ॥ ४२ ॥
उसके बाण से घायल त्रिकुटा पर्वत के समान विशाल वानरश्रेष्ठ द्विविदा भ्रमित हो गया और पैर फैलाकर भूमि पर गिर पड़ा। ॥४२॥
मैन्दस्तु भ्रातरं तत्र भग्नं दृष्ट्वा महाहवे ।
अभिदुद्राव वेगेन प्रगृह्य विपुलां शिलाम् ॥ ४३ ॥
अपने भाई को युद्ध में घायल देखकर मैंद ने एक बड़ा सा पत्थर उठाया और तेजी से भागा। ॥४३॥
तां शिलां तु प्रचिक्षेप राक्षसाय महाबलः ।
बिभेद तां शिलां कुम्भः प्रसन्नैः पञ्चभिः शरैः ॥ ४४ ॥
पराक्रमी नायक ने पत्थर को राक्षस पर फेंका लेकिन कुंभ ने उसे पांच चमकदार बाणों से चकनाचूर कर दिया। ॥४४॥
सन्धाय चान्यं सुमुखं शरमाशीविषोपमम् ।
आजघान महातेजा वक्षसि द्विविदाग्रजम् ॥ ४५ ॥
फिर उसने एक विषधर सर्प के समान भयंकर और सुन्दर बाण चलाया, जिससे महाबली योद्धा ने द्विविदा के बड़े भाई की छाती में प्रहार किया। ॥४५॥
स तु तेन प्रहारेण मैन्दो वानरयूथपः ।
मर्मण्यभिहतस्तेन पपात भुवि मूर्च्छितः ॥ ४६ ॥
उसका वार वानर सेनापति मैंदा के हृदय में लगा और वह मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़ा। ॥४६॥
अङ्गदो मातुलौ दृष्ट्वा मथितौ तु महाबलौ ।
अभिदुद्राव वेगेन कुम्भमुद्यतकार्मुकम् ॥ ४७ ॥
मैन्द और द्विविद अंगद के मामा थे। उन दोनों वीरों को घायल देखकर अंगद धनुष लेकर खड़े हो गये और बड़े वेग से टूट पड़े। ॥४७॥
तमापतन्तं विव्याध कुम्भः पञ्चभिरायसैः ।
त्रिभिश्चान्यैः शितैर्बाणैः मातङ्गमिव तोमरैः
सोऽङ्गदं विविधैर्बाणैः कुम्भो विव्याध वीर्यवान् ॥ ४८ ॥
उन्हें आते देख कुम्भ ने लोहे के बने पाँच बाणों से उन्हें घायल कर दिया। फिर तीन और तीखे बाण मारे गए। जिस प्रकार महावत मत्त हाथी को अंकुश से मार डालता है , उसी प्रकार बलवान कुम्भ अंगद को अनेक बाणों से बाँध देता है। ४८
अकुण्ठधारैर्निशितैः तीक्ष्णैः कनकभूषणैः ।
अङ्गदः प्रतिविद्धाङ्गो वालिपुत्रो न कम्पते ॥ ४९ ॥
बाली के पुत्र अंगद का पूरा शरीर तीखे और तीखे बाणों से छिन्न-भिन्न हो जाने पर भी, जिनकी धारें खराब नहीं हुई थीं, और जो सोने से विभूषित थे, वे भी नहीं कांपे। ॥४९॥
शिलापादपवर्षाणि तस्य मूर्ध्नि ववर्ष ह ।
स प्रचिच्छेद तान् सर्वान् बिभेद च पुनः शिलाः ॥ ५० ॥
कुम्भकर्णात्मजः श्रीमान् वालिपुत्रसमीरितान् ।
उन्होंने राक्षस के सिर पर पत्थर और पेड़ बरसाने शुरू कर दिए , लेकिन कुंभकर्ण कुमार श्रीमन कुंभ ने वलिपुत्र द्वारा छोड़े गए सभी पेड़ों को तोड़ दिया और पत्थरों को तोड़ दिया। ॥५० १/२॥
आपतन्तं च सम्प्रेक्ष्य कुम्भो वानरयूथपम् ॥ ५१ ॥
भ्रुवौ विव्याध बाणाभ्यां उल्काभ्यामिव कुञ्जरम् ।
तब वनयुथपति अंगद को अपनी ओर आते देख कुम्भ ने उनकी भौहों में दो बाणों से ऐसा प्रहार किया , मानो दो उल्काओं से हाथी मारा गया हो। ५१ १/२
तस्य सुस्राव रुधिरं पिहिते चास्य लोचने ॥ ५२ ॥
अङ्गदः पाणिना नेत्रे पिधाय रुधिरोक्षिते ।
सालमासन्नमेकेन परिजग्राह पाणिना ॥ ५३ ॥
सम्पीड्योरसि सस्कन्धं करेणाभिनिवेश्य च ।
किञ्चिदभ्यवनम्यैनं उन्ममाथ यथा गजः ॥ ५४ ॥
अंगद की भौंहों से खून बहने लगा और आंखें बंद हो गईं। फिर उसने एक हाथ से अपनी दोनों रक्तरंजित आँखों को ढँक लिया और दूसरे हाथ से पास खड़े एक छाल के पेड़ को पकड़ लिया। फिर उसने अपनी छाती से दबा कर शाखाओं सहित पेड़ को झुका दिया और एक हाथ से उखाड़ दिया। ५२-५४
तमिन्द्रकेतुप्रतिमं वृक्षं मन्दरसन्निभम् ।
समुत्सृजत वेगेन पश्यतां सर्वरक्षसाम् ॥ ५५ ॥
पेड़ इंद्रधनुष या मंदिर जितना लंबा था। अंगद ने सभी राक्षसों के सामने बड़े वेग से उसे घड़े में फेंक दिया। ॥५५॥
स बिभेद शितैर्बाणैः सप्तभिः कायभेदनैः ।
अङ्गदो विव्यथेऽभीक्ष्णं ससाद च मुमोह च ॥ ५६ ॥
लेकिन कुंभा ने सात तीखे बाणों से छाल को टुकड़े-टुकड़े कर दिया, जिससे शरीर फट गया , जिससे अंगद को बहुत पीड़ा हुई। वे घायल हो गए , इसलिए गिरकर बेहोश हो गए। ॥५६॥
अङ्गदं पतितं दृष्ट्वा सीदन्तमिव सागरे ।
दुरासदं हरिश्रेष्ठा राघवाय न्यवेदयन् ॥ ५७ ॥
अजेय वीर अंगद को समुद्र में डूबते हुए भूमि पर पड़े देखकर वानरश्रेष्ठ ने यह समाचार भगवान रघुनाथ को सुनाया। ॥ ५७॥
रामस्तु व्यथितं श्रुत्वा वालिपुत्रं महाहवे ।
व्यादिदेश हरिश्रेष्ठान् जाम्बवत्प्रमुखांस्ततः ॥ ५८ ॥
जब श्री राम ने सुना कि बाली का पुत्र अंगद महान युद्ध में मूर्छित हो गया है, तो उन्होंने जाम्बवान जैसे प्रमुख वानर वीरों को युद्ध में जाने का आदेश दिया। ॥५८॥
ते तु वानरशार्दूलाः श्रुत्वा रामस्य शासनम् ।
अभिपेतुः सुसङ्क्रुद्धाः कुम्भमुद्यतकार्मुकम् ॥ ५९ ॥
श्री रामचन्द्र का आदेश सुनकर महावानर वीर को बहुत क्रोध आया और वह धनुष लिए खड़े कुम्भ पर टूट पड़ा। ५९
ततो द्रुमशिलाहस्ताः कोपसंरक्तलोचनाः ।
रिरक्षिषन्तोऽभ्यपतन् अङ्गदं वानरर्षभाः ॥ ६० ॥
वे सभी प्रमुख वानर अंगद की रक्षा करना चाहते थे। इसलिए क्रोध में लाल आँखें लिए वह हाथ में एक पेड़ और एक पत्थर लेकर राक्षस की ओर दौड़ा। ६०
जाम्बवांश्च सुषेणश्च वेगदर्शी च वानरः ।
कुम्भकर्णात्मजं वीरं क्रुद्धाः समभिदुद्रुवुः ॥ ६१ ॥
जाम्बवंत , सुषेण और वेगदर्शी ने क्रोधित होकर बहादुर कुंभकर्ण पर हमला कर दिया। ॥६१॥
समीक्ष्यापततस्तांस्तु वानरेन्द्रान् महाबलान् ।
आववार शरौघेण नगेनेव जलाशयम् ॥ ६२ ॥
उन महायज्ञ वानरों को उत्पातियों पर आक्रमण करते देखकर कुम्भ ने अपने बाणों से उन सबको उसी प्रकार रोक लिया , जैसे मार्ग में खड़ा हुआ पर्वत जल की धारा को रोक लेता है। ६२
तस्य बाणपथं प्राप्य न शोकुररपि वीक्षितुम् ।
वानरेन्द्रा महात्मानो वेलामिव महोदधिः ॥ ६३ ॥
उनके बाणों के मार्ग में आ जाने से महामना वानरुथपति दूर ही रह गये और उनकी ओर आँख उठा कर भी न देख सके। जिस प्रकार समुद्र अपने तटों को नहीं तोड़ सकता , ठीक उसी प्रकार। ६३
तांस्तु दृष्ट्वा हरिगणान् शरवृष्टिभिरर्दितान् ।
अङ्गदं पृष्ठतः कृत्वा भ्रातृजं प्लवगेश्वरः ॥ ६४ ॥
अभिदुद्राव सुग्रीवः कुम्भकर्णात्मजं रणे ।
शैलसानुचरं नागं वेगवानिव केसरी ॥ ६५ ॥
कुम्भ के बाणों की वर्षा से पीड़ित वानरों के उन सभी समूहों को देखकर, वानर राजा सुग्रीव ने अपने भतीजे अंगद के साथ अपनी पीठ पर कुम्भकर्ण-कुमार पर हमला किया , जैसे एक तेज शेर एक पहाड़ की चोटी पर घूमते हुए हाथी पर हमला करता है। ६४-६५
उत्पाट्य च महावृक्षान् अश्वकर्णादिकान् बहून् ।
अन्यांश्च विविधान् वृक्षान् चिक्षेप च महाकपिः ॥ ६६ ॥
महान वानर सुग्रीव, अश्वकर्ण और अन्य लोगों ने बड़े पेड़ों और अन्य पेड़ों को काटकर राक्षस पर फेंक दिया। ॥६६॥
तां छादयन्तीमाकाशं वृक्षवृष्टिं दुरासदाम् ।
कुम्भकर्णात्मजः श्रीमान् चिच्छेद स्वशरैः शितैः ॥ ६७ ॥
वृक्षों की वर्षा आकाश को ढँक रही थी। बचना अत्यंत कठिन होता जा रहा था ; लेकिन श्री कुम्भकर्णपुत्र ने अपने तीखे बाणों से सारे वृक्षों को काट डाला। ॥६७॥
अभिलक्ष्येण तीव्रेण कुम्भेन निशितैः शरैः ।
आचितास्ते द्रुमा रेजुर्यथा घोराः शतघ्नयः ।
द्रुमवर्षं तु तच्छिन्नं दृष्ट्वा कुम्भेन वीर्यवान् ॥ ६८ ॥
से घिरा हुआ वह वृक्ष भयानक शतावरी के समान सुशोभित था। कुम्भद्वारा द्वारा उस वृक्ष वृष्टि को तोड़े जाने को देखकर महापराक्रमी पराक्रमी वानरराज सुग्रीव व्यथित नहीं हुए। ॥६८॥
वानराधिपतिः श्रीमान् महासत्त्वो न विव्यथे ।
स विध्यमानः सहसा सहमानश्च तान् शरान् ॥ ६९ ॥
कुम्भस्य धनुराक्षिप्य बभञ्जेन्द्रधनुष्प्रभम् ।
अवप्लुत्य ततः शीघ्रं कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ॥ ७० ॥
अब्रवीत् कुपितः कुम्भं भग्नशृङ्गमिव द्विपम् ।
उन्होंने खाया और उसके बाणों की मार झेली, अचानक उसके रथ पर चढ़ गए, और कुंभ के इंद्रधनुष-चमकदार धनुष को पकड़कर, उसे टुकड़े-टुकड़े कर दिया। इसके तुरंत बाद वह वहां से नीचे कूद गया। यह दुष्ट कर्म करके उसने टूटे दाँतवाले हाथी के समान कुपित कुम्भ को बुलाया-॥६९-७० १/२॥
निकुम्भाग्रज वीर्यं ते बाणवेगं तदद्भु्तम् ॥ ७१ ॥
सन्नतिश्च प्रभावश्च तव वा रावणस्य वा ।
प्रह्लादबलिवृत्रघ्न कुबेरवरुणोपम ॥ ७२ ॥
निकुम्भ के बड़े भाई कुम्भ! तेरा पराक्रम और तेरे तीरों की फुर्ती अद्भुत है। शील या प्रवृत्ति और राक्षसों में प्रभाव या तो आपके स्थान पर है या रावण में। आप प्रह्लाद , बलि , इन्द्र , कुबेर और वरुण के समान हैं। ७१-७२
एकस्त्वमनुजातोऽसि पितरं बलवत्तरम् ।
त्वामेवैकं महाबाहुं शूलहस्तमरिन्दमम् ॥ ७३ ॥
त्रिदशा नातिवर्तन्ते जितेन्द्रियमिवाधयः ।
विक्रमस्व महाबुद्धे कर्माणि मम पश्य च ॥ ७४ ॥
तूने ही अपने पराक्रमी पिता का अनुसरण किया है। जिस प्रकार इंद्रियाँ पुरुष को मानसिक पीड़ा से अभिभूत नहीं करती हैं , उसी प्रकार देवता शक्तिशाली तुला महाबाहु वीर को नहीं हरा सकते हैं, जो केवल शत्रुओं को वश में करते हैं। महाराज! शक्ति को प्रकट करो और अब मेरी शक्ति को देखो। ७३-७४
वरदानात् पितृव्यस्ते सहते देवदानवान् ।
कुम्भकर्णस्तु वीर्येण सहते च सुरासुरान् ॥ ७५ ॥
तुम्हारा पितृ रावण वरदान के प्रभाव से ही देवताओं और दैत्यों के वेग को सह रहा है। तुम्हारे पिता कुम्भकर्ण अपने बल और पराक्रम से देवताओं और राक्षसों से युद्ध कर रहे थे । (किंतु आप वरदान और पराक्रम दोनों से संपन्न हैं।)॥७५॥
धनुषीन्द्रजितस्तुल्यः प्रतापे रावणस्य च ।
त्वमद्य रक्षसां लोके श्रेष्ठोऽसि बलवीर्यतः ॥ ७६ ॥
आप धनुर्विद्या में इंद्रजीत के समान और शक्ति में रावण के समान हैं। अब आप ही बल और पराक्रम की दृष्टि से दैत्यों से श्रेष्ठ हैं। ॥७६॥
महाविमर्दं समरे मया सह तवाद्भुणतम् ।
अद्य भूतानि पश्यन्तु शक्रशम्बरयोरिव ॥ ७७ ॥
आज समस्त प्राणी युद्धभूमि में इन्द्र और शम्बरासुर के समान मेरे साथ तुम्हारा अद्भुत महायुद्ध देख रहे हैं। ७७
कृतमप्रतिमं कर्म दर्शितं चास्त्रकौशलम् ।
पातिता हरिवीराश्च त्वया वै भीमविक्रमाः ॥ ७८ ॥
आपने एक ऐसा कारनामा किया है जो बेजोड़ है। आपने अपना हथियार कौशल दिखाया है। आपसे युद्ध करके यह भयानक पराक्रमी वानर वीर परास्त हो गया। ७८
उपालम्भभयाच्चैव नासि वीर मया हतः ।
कृतकर्मपरिश्रान्तो विश्रान्तः पश्य मे बलम् ॥ ७९ ॥
नायक! मैंने अब तक तुम्हें क्यों नहीं मारा है, इसका कारण लोगों के उत्थान का भय है- लोग मुझे धिक्कारते कि सुग्रीव ने कुम्भ को ऐसी अवस्था में मारा है कि वह इतने वीरों से लड़ते-लड़ते थक गया है, इसलिए अब तुम थोड़ा विश्राम करो और फिर मेरी ताकत देखो । ७९
तेन सुग्रीववाक्येन सावमानेन मानितः ।
अग्नेराज्याहुतस्येव तेजस्तस्याभ्यवर्धत ॥ ८० ॥
सुग्रीव के इन अपमानजनक वचनों से सम्मानित होकर कुम्भ का तेज घी का प्रसाद ग्रहण करने वाले अग्निदेव के समान बढ़ गया। ॥८०॥
ततः कुम्भस्तु सुग्रीवं बाहुभ्यां जगृहे तदा ।
गजाविवातीतमदौ निश्वसन्तौ मुहुर्मुहुः ॥ ८१ ॥
अन्योन्यगात्रग्रथितौ घर्षन्तावितरेतरम् ।
सधूमां मुखतो ज्वालां विसृजन्तौ परिश्रमात् ॥ ८२ ॥
तब कुम्भ ने सुग्रीव को दोनों भुजाओं से पकड़ लिया। तब वे दोनों वीर मतवाले हाथियों की भाँति गहरी साँसें लेते हुए आपस में लड़ने लगे। वे दोनों एक-दूसरे को रगड़ने लगे, और उनके मुँह उनके परिश्रम के कारण धुएँ की आग की तरह जलने लगे। ॥८१-८२॥
तयोः पादाभिघाताच्च निमग्ना चाभवन्मही ।
व्याघूर्णिततरङ्गश्च चुक्षुभे वरुणालयः ॥ ८३ ॥
दोनों के पैरों के आघात से जमीन थरथराने लगी। वरूणालय अपनी तरंगित लहरों के साथ ज्वार-भाटे के समान था। ८३
ततः कुम्भं समुत्क्षिप्य सुग्रीवो लवणाम्भसि ।
पातयामास वेगेन दर्शयन् उदधेस्तलम् ॥ ८४ ॥
इसी बीच सुग्रीव ने कुम्भ को उठाकर बड़े वेग से समुद्र में फेंक दिया। उसमें गिरने के बाद कुम्भा को समुद्र के एकदम तल को देखना पड़ा। ८४
ततः कुम्भनिपातेन जलराशिः समुत्थितः ।
विन्ध्यमन्दरसंकाशो विससर्प समन्ततः ॥ ८५ ॥
कुम्भ के गिरने से पानी की एक विशाल मात्रा ऊपर उठी जो विंध्य और मंदराचल की तरह महसूस हुई और हर जगह फैल गई। ॥८५॥
ततः कुम्भः समुत्पत्य सुग्रीवमभिपात्य च ।
आजघानोरसि क्रुद्धो वज्रवेगेन मुष्टिना ॥ ८६ ॥
तब कुम्भा ने फिर छलांग लगाई और गुस्से में वज्र के समान मुक्के से सुग्रीव की छाती पर प्रहार किया। ॥८६॥
तस्य चर्म च पुस्फोट संजज्ञे चापि शोणितम् ।
तस्य मुष्टिर्महावेगः प्रतिजघ्नेऽस्थिमण्डले ॥ ८७ ॥
वानर राजा का कवच टूट गया और उसकी छाती से खून बहने लगा। उसकी बड़ी, तेज़ मुक्का बड़े वेग से सुग्रीव की हड्डियों में लगी थी। ॥८७॥
तदा वेगेन तत्रासीत् तेजः प्रज्वलितं मुहुः ।
वज्रनिष्पेषसंजाता ज्वाला मेरोर्यथा गिरेः ॥ ८८ ॥
उसकी गति से वहाँ एक बड़ी ज्वाला जल उठी , मानो मेरु पर्वत के शिखर से वज्र के आघात से अग्नि प्रकट हुई हो। ॥८८॥
स तत्राभिहतस्तेन सुग्रीवो वानरर्षभः ।
मुष्टिं संवर्तयामास वज्रकल्पं महाबलः ॥ ८९ ॥
अर्चिः सहस्रविकच रविमण्डलवर्चसम् ।
स मुष्टिं पातयामास कुम्भस्योरसि वीर्यवान् ॥ ९० ॥
जब कुम्भ के द्वार से बलवान वानरों के राजा सुग्रीव इस प्रकार घायल हुए, तो उन्होंने अपना वज्र-सा मुक्का उठाया और कुम्भ की छाती पर बलपूर्वक प्रहार किया। उस मुट्ठी का तेज हजारों किरणों से प्रकाशित सूर्य के समान था। ॥८९-९०॥
स तु तेन प्रहारेण विह्वलो भृशपीडितः ।
निपपात तदा कुम्भो गतार्चिरिव पावकः ॥ ९१ ॥
इस आघात से कुम्भ को बहुत पीड़ा हुई। वह व्याकुल होकर बुझी हुई आग के समान नीचे गिर पड़ता है। ॥९१॥
मुष्टिनाभिहतस्तेन निपपाताशु राक्षसः ।
लोहिताङ्ग इवाकाशाद् दीप्तरश्मिर्यदृच्छया ॥ ९२ ॥
सुग्रीव के मुक्के के प्रहार से वह दैत्य पृथ्वी पर गिर पड़ा, जैसे आकाश से मंगल अचानक गिर पड़े। ॥९२॥
कुम्भस्य पततो रूपं भग्नस्योरसि मुष्टिना ।
बभौ रुद्राभिपन्नस्य यथा रूपं गवां पतेः ॥ ९३ ॥
जिसकी छाती को मुक्के से कुचला गया था। जब जलपात्र गिरने लगा, तो ऐसा प्रतीत हुआ जैसे सूर्य रुद्र से अभिभूत हो। ॥९३॥
तस्मिन् हते भीमपराक्रमेण
प्लवङ्गमानामृषभेण युद्धे ।
मही सशैला सवना चचाल
भयं च रक्षांस्यधिकं विवेश ॥ ९४ ॥
जब बलवान वानर राजा सुग्रीव ने बुलबुल को युद्ध में मार डाला, तब पर्वतों और वनों सहित सारी पृथ्वी कटने लगी, और राक्षसों के हृदय भयभीत हो उठे। ॥९४॥
इत्यार्षे श्रीमद् रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमद् युद्धकाण्डे षट्सप्ततितमः सर्गः ॥ ७६ ॥
इस प्रकार श्री वाल्मीकि द्वारा रचित प्रथम काव्य आर्ष रामायण में युद्धकांड का छिहत्तरवाँ श्लोक पूरा हुआ। ॥७६॥
सर्ग-77
निकुम्भो भ्रातरं दृष्ट्वा सुग्रीवेण निपातितम् ।
प्रदहन्निव कोपेन वानरेन्द्रमुदैक्षत ॥ १ ॥
अपने भाई कुम्भ को सुग्रीव द्वारा मारा गया देखकर निकुम्भ ने वानरराज की ओर ऐसे देखा जैसे वह अपने क्रोध से उन्हें भस्म कर देगा। ॥१॥
ततः स्रग्दामसन्नद्धं दत्तपञ्चाङ्गुलं शुभम् ।
आददे परिघं वीरो महेन्द्रशिखरोपमम् ॥ २ ॥
उस पराक्रमी वीर ने महेन्द्र पर्वत के शिखर के समान सुंदर और विशाल परिधि को हाथ में लिया, जो मालाओं से सुशोभित था और जिसमें पाँच इंच चौड़ी लोहे की चादर बिछी हुई थी। २
हेमपट्टपरिक्षिप्तं वज्रविद्रुमभूषितम् ।
यमदण्डोपमं भीमं रक्षसां भयनाशनम् ॥ ३ ॥
यह भी परिधि के चारों ओर सोने की पत्ती से जड़ा हुआ था और हीरे-मोती से सजाया गया था। वह घेरा यमदंड के समान भयंकर और राक्षसों के भय का नाश करने वाला था। ३
तमाविध्य महातेजाः शक्रध्वजसमौजसम् ।
निननाद विवृत्तास्यो निकुम्भो भीम विक्रमः ॥ ४ ॥
शक्तिशाली राक्षस निकुंभ, जो उस इंद्रधनुष के समान चमकीला था, ने अपना मुंह फैलाया और जोर से गर्जना की। ॥४॥
उरोगतेन निष्केण भुजस्थैरङ्गदैरपि ।
कुण्डलाभ्यां च चित्राभ्यां मालया च सचित्रया ॥ ५ ॥
निकुम्भो भूषणैर्भाति तेन स्म परिघेण च ।
यथेन्द्रधनुषा मेघः सविद्युत् स्तनयित्नुिमान् ॥ ६ ॥
उनके सीने पर गोल्ड मेडल था। बाजूबंदों ने भुजाओं को सुशोभित किया। कानों में अजीब कुंडल झिलमिला रहे थे और गले में अजीब-सी मालाएं झिलमिला रही थीं। उन सब अलंकारों और उन परिक्रमाओं से वज्र और बिजलियों से विभूषित निकुंभ इन्द्रधनुष से सुशोभित था । ५-६
परिघाग्रेण पुस्फोट वातग्रन्थिर्महात्मनः ।
प्रजज्वाल सघोषश्च विधूम इव पावकः ॥ ७ ॥
उस विशाल दैत्य की परिधि के सामने का भाग सात महावायुओं से टकराया, टूटकर धुआँ रहित अग्नि के समान प्रचंड गर्जना के साथ जल रहा था। ॥७॥
नगर्या विटपावत्या गन्धर्वभवनोत्तमैः ।
सतारगणनक्षत्रं सचन्द्रं समहाग्रहम् ।
निकुम्भपरिघाघूर्णं भ्रमतीव नभस्स्थलम् ॥ ८ ॥
निकुंभ की परिधि के घूमने से विटपावती (अलकापुरी) के शहर सहित पूरे आकाश, गंधर्वों की बेहतरीन इमारतों , सितारों , नक्षत्रों , चंद्रमा और ग्रहों को ऐसा प्रतीत होता है जैसे वे घूम रहे हों। ॥८॥
दुरासदश्च संजज्ञे परिघाभरणप्रभः ।
कपीनां स निकुम्भाग्निः युगान्ताग्निरिवोत्थितः ॥ ९ ॥
निकुंभ नाम की अग्नि, जिसकी कांति परिधि और आभूषण थी , और जिसके लिए क्रोध का ईंधन था, प्रलयकाल की अग्नि के समान उत्पन्न हुई और अत्यंत अजेय हो गई। ॥९॥
राक्षसा वानराश्चापि न शेकुः स्पन्दितुं भयात् ।
हनुमांस्तु विवृत्योरः तस्थौ प्रमुखतो बली ॥ १० ॥
उस समय दैत्य और वानर भय के मारे हिल भी नहीं सकते थे। केवल महाबली हनुमान ही अपनी छाती खोलकर राक्षस के सामने खड़े हो गए। १०
परिघोपमबाहुस्तु परिघं भास्करप्रभम् ।
बली बलवतस्तस्य पातयामास वक्षसि ॥ ११ ॥
निकुंभ की भुजाएँ परिधि में समान थीं। उस महाबली राक्षस ने उसे पराक्रमी वीर हनुमान की छाती पर फेंक दिया, जिनकी परिधि सूर्य के समान तेज थी। । ११
स्थिरे तस्योरसि व्यूढे परिघः शतधा कृतः ।
विशीर्यमाणः सहसा उल्काशतमिवाम्बरे ॥ १२ ॥
हनुमान की छाती बहुत मजबूत और विशाल थी। टकराते ही परिधि सैकड़ों टुकड़ों में टूटकर फैल गई (हर जगह) मानो सौ उल्काएं आकाश से एक साथ गिर रही हों। ॥१२॥
स तु तेन प्रहारेण विचचाल महाकपिः ।
परिघेण समाधूतो यथाभूमिचलेऽचलः ॥ १३ ॥
महाकपि हनुमान उस परिधि से आहत हुए और उस आघात से विचलित नहीं हुए , जैसे भूकंप आने पर भी पर्वत नहीं टूटता। १३
स तथाभिहतस्तेन हनुमान् प्लवगोत्तमः ।
मुष्टिं संवर्तयामास बलेनातिमहाबलः ॥ १४ ॥
इस प्रकार महान और शक्तिशाली वानरश्रेष्ठ हनुमान ने परिघ का वार लेकर हिंसक रूप से अपनी मुट्ठी घुमा ली। १४
तमुद्यम्य महातेजा निकुम्भोरसि वीर्यवान् ।
अभिचिक्षेप वेगेन वेगवान् वायुविक्रमः ॥ १५ ॥
वे बहुत तेजस्वी , पराक्रमी , तेज और वायु के समान बल वाले थे। उन्होंने अपनी मुट्ठी घुमाई और निकुंभ की छाती पर अत्यंत वेग से प्रहार किया। ॥१५॥
ततः पुस्फोट वर्मास्य प्रसुस्राव च शोणितम् ।
मुष्टिना तेन संजज्ञे ज्वाला विद्युदिवोत्थिता ॥ १६ ॥
उस मुक्के के प्रहार से उसका कवच वहीं टूट गया, और उसके सीने से खून बहने लगा ; मानो बादलों में बिजली चमकी हो। ॥१६॥
स तु तेन प्रहारेण निकुम्भो विचचाल ह ।
स्वस्थश्चापि निजग्राह हनुमन्तं महाबलम् ॥ १७ ॥
निकुंभ के वार से विचलित होने के बाद, उसने खुद को संयमित किया और पराक्रमी हनुमान को पकड़ लिया। ॥१७॥
विचुक्रुशुश्च तदा सङ्ख्ये भीमं लङ्कानिवासिनः ।
निकुम्भेनोद्यतं दृष्ट्वा हनुमन्तं महाबलम् ॥ १८ ॥
उस समय, लंका में रहने वाले राक्षसों ने युद्ध के मैदान में निकुंभ द्वारा पराक्रमी हनुमान का अपहरण किया देखकर, एक भयानक आवाज में जीत का संकेत देने लगे। ॥१८॥
स तदा ह्रियमाणोऽपि हनूमांस्तेन रक्षसा ।
आजघानानिलसुतो वज्रकल्पेन मुष्टिना ॥ १९ ॥
दैत्य द्वारा इस प्रकार अपहरण किए जाने के बाद भी, पवनपुत्र हनुमान ने अपने वज्र के समान मुक्के से उस पर प्रहार किया। ॥१९॥
आत्मानं मोचयित्वाऽथ क्षितावभ्यवपद्यत ।
हनुमानुन्ममाथाशु निकुम्भं मारुतात्मजः ॥ २० ॥
तब वे उसके हाथ से छूटकर भूमि पर खड़े हो गए। उसके तुरंत बाद, वायुपुत्र हनुमान ने निकुंभ को जमीन पर पटक दिया। ॥२०॥
निक्षिप्य परमायत्तो निकुम्भं निष्पिपेष ह ।
उत्पत्य चास्य वेगेन पपातोरसि वीर्यवान् ॥ २१ ॥
परिगृह्य च बाहुभ्यां परिवृत्य शिरोधराम् ।
उत्पाटयामास शिरो भैरवं नदतो महत् ॥ २२ ॥
तब वेगवान वीर ने बड़े प्रयत्न से निकुम्भ को पृथ्वी पर पटक दिया और बहुत मरोड़ा। तब वे फुर्ती से कूदकर उसकी छाती पर चढ़ गए, और दोनों हाथों से उसकी गर्दन मरोड़कर उसका सिर फोड़ डाला। गर्दन मरोड़ते ही राक्षस ने एक भयानक चीख निकाली। २१-२२
अथ विनदति सादिते निकुम्भे
पवनसुतेन रणे बभूव युद्धम् ।
दशरथसुतराक्षसेन्द्रसून्वोः
भृशतरमागतरोषयोः सुभीमम् ॥ २३ ॥
जब गरजते हुए निकुंभ को वायुपुत्र हनुमान ने युद्ध के मैदान में मार डाला , तो श्री राम और मकरक्ष के बीच एक भयंकर युद्ध हुआ, जो एक दूसरे से बहुत क्रोधित थे। ॥२३॥
व्यपेते तु जीवे निकुम्भस्य हृष्टा
विनेदुः प्लवङ्गा दिशः सस्वनुश्च ।
चचालेव चोर्वी पफातेव साद्यौः
बलं राक्षसानां भयं चाविवेश ॥ २४ ॥
जब निकुंभ मरा तो सारे वानर हर्ष से गर्जने लगे। पूरी दिशा शोर से भर जाती है। पृथ्वी मानो हिल रही है , आकाश फटने लगा है और दैत्यों की सेना में भय व्याप्त हो गया है। ॥२४॥
इत्यार्षे श्रीमद् रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमद् युद्धकाण्डे सप्तसप्ततितमः सर्गः ॥ ७७ ॥
इस प्रकार श्री वाल्मीकि द्वारा रचित प्रथम काव्य आर्ष रामायण के युद्धकांड का सत्यहत्तरवा पद पूरा हुआ। ॥७७॥
सर्ग-78
निकुम्भं च हतं श्रुत्वा कुम्भं च विनिपातितम् ।
रावणः परमामर्षी प्रजज्वालानलो यथा ॥ १ ॥
यह सुनकर कि निकुंभ और कुंभ मारे गए, रावण इतना क्रोधित हुआ कि वह आग की लपटों में फट गया। १
नैर्ऋतः क्रोधशोकाभ्यां द्वाभ्यां तु परिमूर्च्छितः ।
खरपुत्रं विशालाक्षं मकराक्षमचोदयत् ॥ २ ॥
रावण ने क्रोध और शोक दोनों से व्याकुल होकर महान नेत्र वाले खरपुत्र मकराक्ष से कहा-॥२॥
गच्छ पुत्र मयाऽऽज्ञप्तो बलेनाभिसमन्वितः ।
राघवं लक्ष्मणं चैव जहि तांश्च वनौकसौ ॥ ३ ॥
बेटा! मेरी आज्ञा से विशाल सेना लेकर जाओ और दोनों भाइयों राघव और लक्ष्मण को वानरों सहित मार डालो। ॥३॥
रावणस्य वचः श्रुत्वा शूरमानी खरात्मजः ।
बाढमित्यब्रवीद् धृष्टो मकाराक्षो निशाचरः ॥ ४ ॥
सोऽभिवाद्य दशग्रीवं कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् ।
निर्जगाम गृहाच्छुभ्राद् रावणस्याज्ञया बली ॥ ५ ॥
रावण का यह वचन सुनकर खर का पुत्र मकरक्ष, जो उसे योद्धा समझता था, प्रसन्न होकर बोला- बहुत अच्छा! तब पराक्रमी योद्धा ने रावण की परिक्रमा की, उसे प्रणाम किया और उसकी आज्ञा लेकर वह उज्ज्वल महल से चला गया। ४-५
समीपस्थं बलाध्यक्षं खरपुत्रोऽब्रवीद् वचः ।
रथमानीयतां तूर्णं सैन्यं त्वानीयतां त्वरात् ॥ ६ ॥
लगभग सेनापति खड़ा हो गया। खर के पुत्र ने उससे कहा - सेनापति ! जल्दी से अपना रथ निकालो और सेना को बुलाओ। ॥६॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा बलाध्यक्षो निशाचरः ।
स्यन्दनं च बलं चैव समीपं प्रत्यपादयत् ॥ ७ ॥
मगरमच्छ की बात सुनकर निशाचर सेनापति अपना रथ और सेना लेकर उसके पास खड़ा हो गया। ॥७॥
प्रदक्षिणं रथं कृत्वा आरुरोह निशाचरः ।
सूतं संचोदयामास शीघ्रं मे रथमावह ॥ ८ ॥
तब मगरमच्छ ने रथ की परिक्रमा की और उस पर चढ़ गया और सारथी को आदेश दिया कि वह रथ को शीघ्र ले जाए। ॥८॥
अथ तान् राक्षसान् सर्वान् मकराक्षोऽब्रवीदिदम् ।
यूयं सर्वे प्रयुध्यध्वं पुरस्तान्मम राक्षसाः ॥ ९ ॥
इसके बाद मगरमच्छ की आंखों वाले ने सभी राक्षसों से कहा, 'हे रात में रहने वालों! तुम लोग मुझसे आगे रहकर युद्ध करो। ॥९॥
अहं राक्षसराजेन रावणेन महात्मना ।
आज्ञप्तः समरे हन्तुं तावुभौ रामलक्ष्मणौ ॥ १० ॥
मुझे राक्षसों के राजा महान रावण द्वारा युद्ध के मैदान में राम और लक्ष्मण दोनों को मारने का आदेश दिया गया है। ॥१०॥
अद्य रामं वधिष्यामि लक्ष्मणं च निशाचराः ।
शाखामृगं च सुग्रीवं वानरांश्च शरोत्तमैः ॥ ११ ॥
हे राक्षसों! आज मैं अपने उत्तम तीखे बाणों से राम , लक्ष्मण , वानरों के राजा सुग्रीव तथा अन्य वानरों को मार डालूँगा। ।११।
अद्य शूलनिपातैश्च वानराणां महाचमूम् ।
प्रदहिष्यामि सम्प्राप्तां शुष्केन्धनमिवानलः ॥ १२ ॥
जैसे अग्नि सूखी लकड़ी को जला देती है , वैसे ही आज मैं भालों के प्रहार से सामने आने वाली वानरों की विशाल सेना को भस्म कर दूंगा। ॥१२॥
मकराक्षस्य तच्छ्रुत्वा वचनं ते निशाचराः ।
सर्वे नानायुधोपेता बलवन्तः समागताः ॥ १३ ॥
मगरमच्छ के इस वचन को सुनकर नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित सभी बलवान निशाचर प्राणी युद्ध के लिए सतर्क हो गए। ॥१३॥
ते कामरूपिणः सर्वे दंष्ट्रिणः पिङ्गलेक्षणाः ।
मातङ्गा इव नर्दन्तो ध्वस्तकेशा भयावहाः ॥ १४ ॥
परिवार्य महाकाया महाकायं खरात्मजम् ।
अभिजग्मुस्ततो हृष्टाः चालयन्तो वसुन्धराम् ॥ १५ ॥
वे सभी स्वभाव से सनकी और क्रूर थे। उसकी दाढ़ी बड़ी थी और उसकी आँखों का रंग सांवला था। उनके बाल चारों तरफ (पिंजरे में) बिखरे हुए थे इसलिए वे बहुत डरावने लग रहे थे। वे हाथियों की भाँति चिल्लाते हुए विशाल रात्रि अश्व के पुत्र मकराक्ष को चारों ओर से घेर लेते हैं, पृथ्वी को हिलाते हुए बड़े हर्ष में रणभूमि की ओर बढ़ते हैं। १४-१५
शङ्खभेरीसहस्राणां आहतानां समन्ततः ।
क्ष्वेलितास्फोटितानां च ततः शब्दो महानभूत् ॥ १६ ॥
चारों ओर हजारों नरसिंगे बज रहे थे। हजारों डंके पीट रहे थे। उसके साथ योद्धाओं की गर्जना और छ: प्रहारों की ध्वनि मिली हुई थी। ऐसे में जमकर हंगामा हुआ। ॥१६॥
प्रभ्रष्टोऽथ करात् तस्य प्रतोदः सारथेस्तदा ।
पपात सहसा दैवाद् ध्वजस्तस्य च रक्षसः ॥ १७ ॥
मगरमच्छ के सारथि के हाथ से चाबुक गिर गया और दैत्य की ध्वजा सहसा नष्ट हो गई। ॥१७॥
तस्य ते रथसंयुक्ता हया विक्रमवर्जिताः ।
चरणैराकुलैर्गत्वा दीनाः सास्रमुखा ययुः ॥ १८ ॥
उनके रथ में लगे घोड़े अलिखित हो गए - वे अपनी विभिन्न विचित्र चालों को भूल गए। पहले तो वह कुछ दूर तक लड़खड़ाता हुआ लड़खड़ाता हुआ कदम लेकर चला , फिर ठीक-ठाक चलने लगा। लेकिन अंदर ही अंदर वह बहुत दुखी थे। उसके मुख से आँसुओं की धाराएँ बह रही थीं। १८
प्रवाति पवनस्तस्मिन् सपांसुः खरदारुणः ।
निर्याणे तस्य रौद्रस्य मकराक्षस्य दुर्मतेः ॥ १९ ॥
दुष्ट बुद्धि के उस भयानक राक्षस - मगरमच्छ - की यात्रा के दौरान धूल से भरी एक भयंकर और प्रचंड हवा चल रही थी। ॥१९॥
तानि दृष्ट्वा निमित्तानि राक्षसा वीर्यवत्तमाः ।
अचिन्त्य निर्गताः सर्वे यत्र तौ रामलक्ष्मणौ ॥ २० ॥
इन सभी दुर्भाग्य के बावजूद, शक्तिशाली राक्षस ने उन्हें अनदेखा कर दिया और उन सभी जगहों पर गया जहां राम और लक्ष्मण मौजूद थे। ॥२०॥
घनगजमहिषाङ्गतुल्यवर्णाः
समरमुखेष्वसकृद् गदासिभिन्नाः ।
अहमहमिति युद्धकौशलास्ते
रजनिचराः परिबभ्रमुर्मुहस्ते ॥ २१ ॥
उन दैत्यों के अंग मेघ , हाथी और लाल की तरह काले थे। युद्ध के प्रारम्भ में उन्हें गदा और तलवार से कई बार घायल किया गया। उनके स्थान पर युद्ध कौशल था। वे रात में इधर-उधर घूमते हुए कहते थे कि पहले मैं लड़ूंगा , पहले मैं लड़ूंगा। २१
इत्यार्षे श्रीमद् रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमद् युद्धकाण्डे अष्टसप्ततितमः सर्गः ॥ ७८ ॥
इस प्रकार श्री वाल्मीकि द्वारा रचित प्रथम काव्य आर्ष रामायण के युद्धकाण्ड का अठहत्तरवाँ श्लोक पूरा हुआ। ॥७८॥
सर्ग-79
निर्गतं मकाराक्षं ते दृष्ट्वा वानरपुंगवाः ।
आप्लुत्य सहसा सर्वे योद्धुकामा व्यवस्थिताः ॥ १ ॥
मुख्य वानरों ने मगरमच्छ को नगर से निकलते देखा तो वे सब एक साथ कूद पड़े और लड़ने के लिए खड़े हो गये। ॥१॥
ततः प्रवृत्तं सुमहत् तद् युद्धं लोमहर्षणम् ।
निशाचरैः प्लवङ्गानां देवानां दानवैरिव ॥ २ ॥
बाद में, वानरों ने निशाचरों के साथ एक महान युद्ध लड़ा , जो एक देव-दानव युद्ध की तरह था। २
वृक्षशूलनिपातैश्च शिलापरिघपातनैः ।
अन्योन्यं मर्दयन्ति स्म तदा कपिनिशाचराः ॥ ३ ॥
वृक्षों , कीलों , गदाओं और छल्लों की मार से एक दूसरे को पीटने लगे । ३
शक्तिखड्ग गदाकुन्तैः तोमरैश्च निशाचराः ।
पट्टिशैर्भिन्दिपालैश्च बाणपातैः समन्ततः ॥ ४ ॥
पाशमुद्गगरदण्डैश्च निर्घातैश्चापरैः तथा ।
कदनं कपिसिंहानां चक्रुस्ते रजनीचराः ॥ ५ ॥
निशाचरगण ने शक्ति , खड्ग , गदा , भाला , तोमर , पट्टिश , भिण्डीपाल , बाणपहर , पाश , मुदगर , दंड तथा नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों के प्रभाव से सर्वत्र वानरवीरों का संहार करना प्रारम्भ कर दिया । ४-५
बाणौघैरर्दिताश्चापि खरपुत्रेण वानराः ।
सम्भ्रान्तमनसः सर्वे दुद्रुवुर्भयपीडिताः ॥ ६ ॥
खरपुत्र मकरक्ष ने अपने बाणों से वानरों को बुरी तरह घायल कर दिया। उनके मन में बहुत भय उत्पन्न हो गया और वे सबका भय सहते हुए इधर-उधर भागने लगे। ६
तान् दृष्ट्वा राक्षसाः सर्वे द्रवमाणान् वनौकसः ।
नेदुस्ते सिंहवद् दृप्ता राक्षसा जितकाशिनः ॥ ७ ॥
सब वानरों को दौड़ता देख विजयी हर्ष से विभूषित सभी दैत्य सिंह के समान गर्जना करने लगे। ॥७॥
विद्रवत्सु तदा तेषु वानरेषु समन्ततः ।
रामस्तान् वारयामास शरवर्षेण राक्षसान् ॥ ८ ॥
जब वे वानर इधर-उधर भागने लगे तब श्रीरामचन्द्र ने बाणों की वर्षा करके राक्षसों को आगे बढ़ने से रोक दिया। ८
वारितान् राक्षसान् दृष्ट्वा मकराक्षो निशाचरः ।
क्रोधानलसमाविष्टो वचनं चेदमब्रवीत् ॥ ९ ॥
राक्षसों को संयमित देखकर निशाचर मकरक्ष क्रोधित हो गया और इस प्रकार बोला-॥९॥
तिष्ठ राम मया सार्धं द्वन्द्वयुद्धं ददामि ते ।
त्याजयिष्यामि ते प्राणान् धनुर्मुक्तैः शितैः शरैः ॥ १० ॥
राम अ! रुको , मेरे साथ तुम्हारा द्वंद्व युद्ध होगा। आज मैं अपने धनुष के तीखे बाणों से तुम्हारे प्राण हर लूंगा। ॥१०॥
यत्तदा दण्डकारण्ये पितरं हतवान् मम ।
मदग्रतः स्वकर्मस्थं दृष्ट्वा रोषोऽभिवर्धते ॥ ११ ॥
जिस दिन से आपने दण्डकारण्य में मेरे पिता का वध किया है , उसी दिन से आप राक्षसों को मारने के कार्य में लगे हुए हैं। इस रूप में आपका स्मरण करने से मेरा क्रोध और बढ़ गया है। ।११।
दह्यन्ते भृशमङ्गानि दुरात्मन् मम राघव ।
यन्मयाऽसि न दृष्टस्त्वं तस्मिन् काले महावने ॥ १२ ॥
दुरात्मा राघव! उस समय जब विशाल दंडक वन में मैंने आपको नहीं देखा तो मेरा शरीर अत्यंत क्रोध से जल रहा था। ॥१२॥
दिष्ट्यासि दर्शनं राम मम त्वं प्राप्तवानिह ।
काङ्क्षितोऽसि क्षुधार्तस्य सिंहस्येवेतरो मृगः ॥ १३ ॥
लेकिन राम! यह सौभाग्य की बात है कि आप आज मेरे सामने आए हैं। जिस प्रकार एक भूखा सिंह अन्य वन-पशुओं के लिए लालायित रहता है, उसी प्रकार मैं भी तुम्हें पाने के लिए लालायित रहता हूँ। १३
अद्य मद् बाणवेगेन प्रेतराड्विषयं गतः ।
ये त्वया निहताः शूराः सह तैश्च वसिष्यसि ॥ १४ ॥
तुझे उन्हीं शूरवीर रात्रिवासियों के साथ यमराज में निवास करना पड़ेगा, जो आपके हाथों मारे गए हैं। ॥१४॥
बहुनात्र किमुक्तेन शृणु राम वचो मम ।
पश्यन्तु सकला लोकाः त्वां मां चैव रणाजिरे ॥ १५ ॥
राम अ! यहाँ ज्यादा बोलने की क्या बात है ? मुझे जो कहना है उसे सुनो! सभी लोग इस युद्ध के मैदान में खड़े होंगे और केवल आपको और मुझे देखेंगे - अपना और मेरा युद्ध देखें। ॥१५॥
अस्त्रैर्वा गदया वापि बाहुभ्यां वा रणाजिरे ।
अभ्यस्तं येन वा राम वर्तताम् तेन वा मृधम् ॥ १६ ॥
राम अ! मैं आज रणक्षेत्र में अस्त्र-शस्त्रों से , गदाओं से या दोनों भुजाओं से तुम से युद्ध करूँगा- जिनके द्वारा तुम विद्या ग्रहण करोगे। ॥१६॥
मकराक्षवचः शृत्वा रामो दशरथात्मजः ।
अब्रवीत् प्रहसन् वाक्यं उत्तरोत्तरवादिनम् ॥ १७ ॥
मगरमच्छ की बातें सुनकर, दशरथ के पुत्र भगवान राम ज़ोर से हँसे और एक-एक करके उसे मारने वाले राक्षस से कहा:
कत्थसे किं वृथा रक्षो बहून्यसदृशानि तु ।
न रणे शक्यते जेतुं विना युद्धेन वाग्बलात् ॥ १८ ॥
निशाचर! तुम क्यों व्यर्थ शेखी बघार रहे हो? आपके मुख से बहुत सी बातें कही जा रही हैं , जो वीर पुरुषों के अनुकूल नहीं हैं। बिना लड़े सूखी बकबक से लड़ाई नहीं जीती जा सकती। १८
चतुर्दशसहस्राणि रक्षसां त्वत्पिता च यः ।
त्रिशिरा दूषणश्चापि दण्डके निहता मया ॥ १९ ॥
स्वाशिताश्चापि मांसेन गृध्रगोमायुवायसाः ।
भविष्यन्त्यद्य वै पाप तीक्ष्णतुण्डनखाङ्कुशाः ॥ २० ॥
पापी राक्षस! यह ठीक है कि दंडकारण में मैंने आपके पिता खर को चौदह हजार राक्षसों के साथ-साथ त्रिशिरा और दूषण को भी मार डाला। उस समय बहुत से गिद्ध , लोमड़ियां और तेज चोंच और पंजों वाले कौवे उनके मांस से संतुष्ट थे, और अब वे तुम्हारे मांस से पेट भरेंगे। १९-२०
राघवेणैवमुक्तस्तु मकराक्षो महाबलः ।
बाणौघानमुचत् तस्मै राघवाय रणाजिरे ॥ २१ ॥
राघवों के ऐसा कहने पर पराक्रमी मकरक्ष रणभूमि में उन पर बाणों की वर्षा करने लगा। ॥२१॥
तान् शरान् शरवर्षेण रामश्चिच्छेद नैकधा ।
निपेतुर्भुवि विच्छिन्ना रुक्मपुङ्खाः सहस्रशः ॥ २२ ॥
लेकिन श्री राम ने स्वयं बाणों की वर्षा की और राक्षस के बाणों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। टूटे हुए सुनहरे पंखों वाले हजारों बाण पृथ्वी पर गिरे। २२
तद् युद्धमभवत् तत्र समेत्यान्योन्यमोजसा ।
खरराक्षसपुत्रस्य सूनोर्दशरथस्य च ॥ २३ ॥
दशरथ के पुत्र भगवान राम और राक्षस खर के पुत्र मकरक्ष एक दूसरे के पास पहुंचे और हिंसक रूप से लड़ने लगे। ॥२३॥
जीमूतयोरिवाकाशे शब्दो ज्यातलयोरिव ।
धनुर्मुक्तः स्वनोऽन्योयं श्रूयते च रणाजिरे ॥ २४ ॥
उनकी बाँहों और हाथों के घर्षण से युद्ध में परस्पर मिले हुए धनुषों से निकले वज्र की ध्वनि आकाश में दो मेघों के गरजने के समान सुनाई देती थी। २४
देवदानवगन्धर्वाः किन्नराश्च महोरगाः ।
अन्तरिक्षगताः सर्वे द्रष्टुकामास्तदद्भुातम् ॥ २५ ॥
देवता , दैत्य , गन्धर्व , किन्नर और बड़े-बड़े सर्प-ये सभी उस अद्भुत युद्ध को देखने के लिए अंतरिक्ष में आकर खड़े हो गए। ॥२५॥
विद्धमन्योन्यगात्रेषु द्विगुणं वर्धते बलम् ।
कृतप्रतिकृतान्योन्यं कुरुतां तौ रणाजिरे ॥ २६ ॥
दोनों के शरीर बाणों से छिद गए थे , फिर भी उनका बल दोगुना हो रहा था। दोनों टैंक में युद्ध कर रहे थे, एक दूसरे के हथियारों में छेद कर रहे थे। २६
राममुक्तांस्तु बाणौघान् राक्षसस्त्वच्छिनद् रणे ।
रक्षोमुक्तांस्तु रामो वै नैकधा प्राच्छिनच्छरैः ॥ २७ ॥
रणभूमि के बीच में श्री रामचन्द्र द्वारा छोड़े गये बाणों को असुर छेद रहा था और श्री राम असुर द्वारा छोड़े गये बाणों को अपने बाणों से चूर-चूर कर रहे थे। ॥२७॥
बाणौघवितताः सर्वा दिशश्च प्रदिशस्तथा ।
सञ्छन्ना वसुधा चैव समन्तान्न प्रकाशते ॥ २८ ॥
सारी दिशा और दिशा बाणों से आच्छादित हो गई, और सारी पृथ्वी आच्छादित हो गई। आसपास कुछ नजर नहीं आ रहा था। ॥२८॥
ततः क्रुद्धो महाबाहुः धनुश्चिच्छेद रक्षसः ।
अष्टाभिरथ नाराचैः सूतं विव्याध राघवः ॥ २९ ॥
तब महाबाहु राम ने क्रोध में आकर रणभूमि में दैत्य के धनुष को भेद दिया और आठ बाणों से उसके सारथी को मार डाला। ॥२९॥
भित्त्वा रथं शरै रामो हत्वा अश्वानपातयत् ।
विरथो वसुधास्थः स मकराक्षो निशाचरः ॥ ३० ॥
तब राम ने अनेक बाणों से रथ को चकनाचूर कर दिया और घोड़ों को मार डाला। जब वह रथहीन हो गया तो निशाचर मगरमच्छ जमीन पर खड़ा हो गया। ॥३०॥
तत्तिष्ठद् वसुधां रक्षः शूलं जग्राह पाणिना ।
त्रासनं सर्वभूतानां युगान्ताग्निसमप्रभम् ॥ ३१ ॥
पृथ्वी पर खड़े होकर, दानव ने एक भाला धारण किया , जो प्रलयकाल की अग्नि के समान उज्ज्वल था और सभी प्राणियों के लिए भयानक था। ॥३१॥
विभ्राम्य तु महच्छूलं रुद्रदत्तं भयंकरम् ।
जाज्वल्यमानमाकाशे संहारास्त्रमिवापरम् ॥ ३२ ॥
यह भगवान शिव द्वारा दिया गया एक बहुत ही दुर्लभ और महान भाला था , जो अत्यंत भयानक था। यह दूसरी आपदा की तरह आसमान में भड़क गया। ॥३२॥
यं दृष्ट्वा देवताः सर्वा भयार्ता विद्रुता दिशः ।
विभ्राम्य च महच्छूलं प्रज्वलंतं निशाचरः ॥ ३३ ॥
स क्रोधात् प्राहिणोत् तस्मै राघवाय महाहवे ।
उसे देखकर सभी देवता भयभीत हो गए और सभी दिशाओं में भाग गए। कोकिला ने बड़े जलते हुए भाले को घुमाया और गुस्से में उसे महात्मा राघव पर फेंक दिया। ३३ १/२॥
तमापतन्तं ज्वलितं खरपुत्रकराच्च्युतम् ॥ २४ ॥
बाणैश्चस्तुर्भिराकाशे शूलं चिच्छेद राघवः ।
भयंकर मकराक्ष के हाथ से छूटा हुआ धधकता भाला अपनी ओर आता देखकर राघवों ने चार बाण चलाकर उसे आकाश में बींध दिया। ३४ १/२॥
स भिन्नो नैकधा शूलो दिव्यहाटकमण्डितः ।
व्यशीर्यत महोल्केव रामबाणार्दितो भुवि ॥ ३५ ॥
दिव्य स्वर्ण से विभूषित वह भाला राम के बाणों से कई टुकड़ों में बिखर गया और पृथ्वी पर एक विशाल उल्का की तरह बिखर गया। ॥३५॥
तच्छूलं निहतं दृष्ट्वा रामेणाक्लिष्टकर्मणा ।
सधुसाध्विति भूतानि व्याहरन्ति नभोगताः ॥ ३६ ॥
अचानक ऐसा महान कार्य करने वाले श्री राम के द्वारा भाले को तोड़ दिये जाने पर आकाश के सभी प्राणी उनकी स्तुति करने लगे। ॥३६॥
तं दृष्ट्वा निहतं शूलं मकराक्षो निशाचरः ।
मुष्टिमुद्यम्य काकुत्स्थं तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥ ३७ ॥
भाले को टुकड़े-टुकड़े होते देख, निशाचर मगरमच्छ ने अपनी मुट्ठी उठाई और काकुत्स्थ राम से कहा: 'ओह! खड़ा है! खड़ा है। ॥३७॥
स तं दृष्ट्वा पतन्तं तु प्रहस्य रघुनन्दनः ।
पावकास्त्रं ततो रामः सन्दधे तु शरासने ॥ ३८ ॥
उसे आक्रमण करता देख रघुनन्दन हँसे और धनुष पर अस्त्र चला दिया। ॥३८॥
तेनास्त्रेण हतं रक्षः काकुत्स्थेन तदा रणे ।
सञ्छिन्नहृदयं तत्र पपात च ममार च ॥ ३९ ॥
और उस अस्त्र से उन्होंने तुरंत ही रणभूमि में दैत्य का वध कर दिया। बाण के प्रहार से दैत्य का हृदय विदीर्ण हो गया और वह गिर पड़ा और मर गया। ॥३९॥
दृष्ट्वा ते राक्षसाः सर्वे मकराक्षस्य पातनम् ।
लङ्कामेव प्रधावन्त रामबाणभयार्दिताः ॥ ४० ॥
मकराक्ष को पराजित होता देख सभी दैत्य रामबाण के भय से लंका भाग गए। ॥४०॥
दशरथनृपपुत्रबाणवेगै
रजनिचरं निहतं खरात्मजं तम् ।
प्रददृशुरथ देवताः प्रहृष्टा
गिरिमिव वज्रहतं यथा विकीर्णम् ॥ ४१ ॥
देवताओं ने देखा कि जिस प्रकार वज्र के प्रहार से पर्वत टूट कर बिखर जाता है , उसी प्रकार दशरथ कुमार श्री राम के तीव्र बाणों से खर के पुत्र निशाचर मकरक्ष का वध हो गया । इससे वह बहुत खुश हुआ। ४१
इत्यार्षे श्रीमद् रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमद् युद्धकाण्डे एकोनाशीतितमः सर्गः ॥ ७९ ॥
इस प्रकार श्री वाल्मीकि द्वारा रचित प्रथम काव्य आर्ष रामायण के युद्धकाण्ड का उनासीवाँ श्लोक पूरा हुआ। ॥७९॥
सर्ग-80
मकराक्षं हतं श्रुत्वा रावणः समितिञ्जयः ।
क्रोधेन महताविष्टो दन्तान् कटकटाय्य च ॥ १ ॥
मकराक्ष के मारे जाने की बात सुनकर विजेता रावण बहुत क्रोधित हुआ और अपने दाँत पीसने लगा। ॥१॥
कुपितश्च तदा तत्र किं कार्यमिति चिन्तयन् ।
आदिदेशाथ सङ्क्रुद्धो रणायेन्द्रजितं सुतम् ॥ २ ॥
क्रोधित होकर निशाचर चिंतित हुआ कि उस समय वहां क्या किया जाए। वह बहुत क्रोधित हुआ और उसने अपने पुत्र इंद्रजीत को युद्ध में जाने का आदेश दिया। २
जहि वीर महावीर्यौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ।
अदृश्यो दृश्यमानो वा सर्वथा त्वं बलाधिकः ॥ ३ ॥
उन्होंने कहा, 'हीरो! तुम पराक्रमी राम और लक्ष्मण , दो भाइयों को, अदृश्य रहकर या प्रत्यक्ष रूप से मार डालते हो ; क्योंकि तू शक्ति से भी महान है। ॥३॥
त्वमप्रतिमकर्माणं इंद्रं जयसि संयुगे ।
किं पुनर्मानुषौ दृष्ट्वा न वधिष्यसि संयुगे ॥ ४ ॥
आप युद्ध में अतुलनीय पराक्रमी इन्द्र को पराजित करते हैं , तो आप उन दोनों व्यक्तियों को रणभूमि में सामने लाकर क्यों नहीं मार डालते ? ॥४॥
तथोक्तो राक्षसेन्द्रेण प्रतिगृह्य पितुर्वचः ।
यज्ञभूमौ स विधिवत् पावकं जुहवेन्द्रजित् ॥ ५ ॥
जब राक्षसों के राजा रावण ने ऐसा कहा, तो इंद्रजीत ने अपने पिता की आज्ञा का पालन किया और यज्ञ स्थल पर जाकर विधि के अनुसार अग्नि स्थापित की और उसमें बलि दी। ॥५॥
जुह्वतश्चापि तत्राग्निं रक्तोष्णीषधराः स्त्रियः ।
आजग्मुस्तत्र सम्भ्रान्ता राक्षस्यो यत्र रावणिः ॥ ६ ॥
जब वह अग्नि में हवन कर रहा था, तो कई महिलाएं लाल कपड़े पहने हुए उस स्थान पर डर गईं, जहां वह रावण का पुत्र हवन कर रहा था। ॥६॥
शस्त्राणि शरपत्राणि समिधोऽथ बिभीतकाः ।
लोहितानि च वासांसि स्रुवं कार्ष्णायसं तथा ॥ ७ ॥
उनकी तलवार और अन्य हथियार भी तीर के रूप में काम करते थे। लकड़ी की अगरबत्ती , लाल कपड़ा और लोहे का स्ट्रवा था - इन सभी चीजों का इस्तेमाल किया जाता था। ॥७॥
सर्वतोऽग्निं समास्तीर्य शरपत्रैः सतोमरैः ।
छागस्य सर्वकृष्णस्य गलं जग्राह जीवतः ॥ ८ ॥
उसने अपने भाले सहित अस्त्र-शस्त्र रूपी बाणों को आग के चारों ओर फैला रखा था। तब उन्होंने जीवित काले बकरे का गला पकड़ा और उसे आग में जला दिया। ॥८॥
सकृद्धोमसमिद्धस्य विधूमस्य महार्चिषः ।
बभूवुस्तानि लिङ्गानि विजयं दर्शयन्ति च ॥ ९ ॥
उस होम से आग प्रज्वलित हुई थी, जो एक ही बार में किया गया था , कोई धुआं नहीं था और बड़ी-बड़ी लपटें उठ रही थीं। उस अग्नि से विजय के सारे लक्षण प्रकट हो रहे थे। ९
प्रदक्षिणावर्तशिखः तप्तहाटकसन्निभः ।
हविस्तत् प्रतिजग्राह पावकः स्वयमुत्थितः ॥ १० ॥
उस समय, अग्नि के देवता, जो जलते हुए सोने की तरह चमक रहे थे, प्रकट हुए और भेंट स्वीकार की। इसकी लपटें दक्षिण की ओर निकलीं। ॥१०॥
हुत्वाग्निं तर्पयित्वाथ देवदानवराक्षसान् ।
आरुरोह रथश्रेष्ठं अन्तर्धानगतं शुभम् ॥ ११ ॥
अग्नि में यज्ञ करके देवताओं , राक्षसों और राक्षसों को संतुष्ट करने के बाद, इंद्रजीत ने लुप्त होने की शक्ति से संपन्न एक सुंदर रथ पर चढ़ा। ।११।
स वाजिभिश्चतुर्भिस्तु बाणैस्तु निशितैर्युतः ।
आरोपितमहाचापः शुशुभे स्यन्दनोत्तमः ॥ १२ ॥
यह एक बहुत ही सुंदर रथ था जिसमें चार घोड़े , तीखे बाण और अंदर एक विशाल धनुष रखा हुआ था। ॥१२॥
जाज्वल्यमानो वपुषा तपनीयपरिच्छदः ।
मृगैश्चन्द्रार्धचन्द्रैश्च स रथः समलङ्कृतः ॥ १३ ॥
उसका सारा सामान सोने का बना था जिससे रथ ऐसा प्रतीत होता था मानो वह अपने स्वरूप में जल रहा हो। इस पर मृग , अर्धचन्द्र और पूर्णिमा उत्कीर्ण हैं , जिससे इसकी सजावट आकर्षक लगती है। १३
जाम्बूनदमहाकम्बुः दीप्तपावकसन्निभः ।
बभूवेन्द्रजितः केतुः वैदूर्यसमलङ्कृतः ॥ १४ ॥
इन्द्रजीत की ध्वजा प्रज्वलित अग्नि के समान चमकीली थी। वह सोने के बड़े-बड़े छल्ले से जड़ा हुआ था और नीलम से सुशोभित था। ॥१४॥
तेन चादित्यकल्पेन ब्रह्मास्त्रेण च पालितः ।
स बभूव दुराधर्षो रावणिः सुमहाबलः ॥ १५ ॥
उसके पास सूर्य के समान तेजस्वी रथ था और ब्रह्मास्त्र से रक्षित शक्तिशाली रावण दूसरों के लिए अजेय हो गया था। ॥१५॥
सोऽभिनिर्याय नगराद् इन्द्रजित् समितिञ्जयः ।
हुत्वाग्निं राक्षसैर्मन्त्रैः अन्तर्धानगतोऽब्रवीत् ॥ १६ ॥
युद्धविजेता इन्द्रजीत ने नगर छोड़ दिया, निर्ऋति देवी के मन्त्रों द्वारा अग्नि में आहुति दी और अदृश्य होने की शक्ति से संपन्न होकर इस प्रकार बोला:॥१६॥
अद्य हत्वा रणे यौ तौ मिथ्या प्रव्राजितौ वने ।
जयं पित्रे प्रदास्यामि रावणाय रणेऽधिकम् ॥ १७ ॥
मैं आज युद्ध के मैदान में उन दो भाइयों - राम और लक्ष्मण को मारकर अपने पिता रावण को उत्कृष्ट विजय प्रदान करूँगा जो व्यर्थ ही वन में आ गए हैं (या झूठे तपस्वी बाण चला रहे हैं)। ॥१७॥
अद्य निर्वानरामुर्वीं हत्वा रामं च लक्ष्मणम् ।
करिष्ये परमां प्रीतिं इत्युक्त्वान्तरधीयत ॥ १८ ॥
आज मैं राम-लक्ष्मण का वध करके तथा पृथ्वी को वानर-मुक्त करके अपने पिता को परम तृप्ति दूँगा। तो वह अदृश्य हो गया। ॥१८॥
आपपाताथ सङ्क्रुद्धो दशग्रीवेण चोदितः ।
तीक्ष्णकार्मुकनाराचैः तीक्ष्णस्त्विन्द्ररिपू रणे ॥ १९ ॥
तब दस मुख वाले रावण के उकसाने पर इंद्र का शत्रु इंद्रजीत क्रोधित होकर रणभूमि में आ गया। उनके हाथ में धनुष और तेज भाला था। ॥१९॥
स ददर्श महावीर्यो नागौ त्रिशिरसाविव ।
सृजन्ताविषुजालानि वीरौ वानरमध्यगौ ॥ २० ॥
युद्ध के मैदान में पहुँचकर, रात का निवासी बंदरों के बीच खड़ा हो गया और उसने देखा कि शक्तिशाली वीर राम और लक्ष्मण तीन सिर वाले साँपों की तरह बाणों की वर्षा कर रहे हैं। ॥२०॥
इमौ ताविति सञ्चिन्त्य सज्यं कृत्वा च कार्मुकम् ।
सन्ततानेषुधाराभिः पर्जन्य इव वृष्टिमान् ॥ २१ ॥
इन्द्रजीत ने यह समझकर कि वे दोनों हैं, प्रत्याच को अपने धनुष पर चढ़ा लिया और अपने बाणों की धार से समस्त दिशाओं को इस प्रकार भर दिया, जैसे मेघ जल बरसाते हों। ॥२१॥
स तु वैहायसरथो युधि तौ रामलक्ष्मणौ ।
अचक्षुर्विषये तिष्ठन् विव्याध निशितैः सऱैः ॥ २२ ॥
उनका रथ आकाश में था और राम और लक्ष्मण युद्ध के मैदान में बैठे थे। दैत्य उनकी दृष्टि से अदृश्य हो गया और तीखे बाणों से उन्हें बींधने लगा। ॥२२॥
तौ तस्य शरवेगेन परीतौ रामलक्ष्मणौ ।
धनुषी सशरे कृत्वा दिव्यमस्त्रं प्रचक्रतुः ॥ २३ ॥
उसके बाणों की गति से व्याकुल राम और लक्ष्मण ने भी अपने धनुष पर बाण चलाकर दिव्य अस्त्र प्रकट किए। ॥२३॥
प्रच्छादयन्तौ गगनं शरजालैर्महाबलौ ।
तमस्त्रैः सूर्यसङ्काशैः नैव पस्पर्शतुः शरैः ॥ २४ ॥
उन पराक्रमी भाइयों ने आकाश को सूर्य के समान तेजस्वी बाणों से आच्छादित कर दिया और अपने बाणों से इस इन्द्रजीत को स्पर्श नहीं किया। ॥२४॥
स हि धूमान्धकारं च चक्रे प्रच्छादयन्नभः ।
दिशश्चान्तर्दधे श्रीमान् नीहारतमसा वृताः ॥ २५ ॥
उस तेजोमय दैत्य माया ने धुएँ से प्रेरित अन्धकार उत्पन्न किया और आकाश को ढक लिया। उसी समय कोहरे के अंधेरे ने दिशाओं को ढक लिया। ॥२५॥
नैव ज्यातलनिर्घोषो न च नेमिखुरस्वनः ।
शुश्रुवे चरतस्तस्य न च रूपं प्रकाशते ॥ २६ ॥
उसके रथ की खड़खड़ाहट सुनाई नहीं देती थी , पहियों की चरचराहट और घोड़ों के खुरों की आवाज सुनाई नहीं देती थी, और राक्षस का रूप हर जगह नहीं देखा जाता था। २६
घनान्धकारे तिमिरे शरवर्षमिवाद्भुनतम् ।
स ववर्ष महाबाहुः नाराच शरवृष्टिभिः ॥ २७ ॥
जहां उसकी दृष्टि काम नहीं कर रही थी, वहां पत्थरों की अद्भुत बारिश की तरह नाराच नामक बाणों की बारिश शुरू कर दी। ॥२७॥
स रामं सूर्यसङ्काशैः शरैर्दत्तवरैः भृशम् ।
विव्याध समरे क्रुद्धः सर्वगात्रेषु रावणिः ॥ २८ ॥
रणभूमि में कुपित हुए रावण कुमार ने वरदान में प्राप्त सूर्य के समान तेजस्वी बाणों से श्री राम के पूरे शरीर पर आघात किया। ॥२८॥
तौ हन्यमानौ नाराचैः धाराभिरिव पर्वतौ ।
हेमपुङ्खान् नरव्याघ्रौ तिग्मान् मुमुचतुः शरान् ॥ २९ ॥
वे दोनों वीर भाले से इस प्रकार आहत हो रहे थे, जैसे दो पर्वतों पर जलधाराएँ बरस रही हों। उसी अवस्था में दोनों वीर स्वर्ण पंखे से विभूषित तीखे बाण चलाने लगे। ॥२९॥
अन्तरिक्षे समासाद्य रावणिं कङ्कपत्रिणः ।
निकृत्य पतगा भूमौ पेतुस्ते शोणिताप्लुताः ॥ ३० ॥
वे कंकरीले बाण आकाश में पहुँचे और रावणकुमार इन्द्रजीत को क्षत-विक्षत करके रक्त से भीगी हुई पृथ्वी पर गिर पड़े। ३०
अतिमात्रं शरौघेण दीप्यमानौ नरोत्तमौ ।
तानिषून् पततो भल्लैः अनेकैर्विचकर्ततुः ॥ ३१ ॥
दोनों श्रेष्ठ योद्धा, बाणों से सुशोभित, साइकों को काट रहे थे जो उन पर कई वार कर रहे थे। ३१
यतो हि ददृशाते तौ शरान् निपततान् शितान् ।
ततस्तु तौ दाशरथी ससृजातेऽस्त्रमुत्तमम् ॥ ३२ ॥
दशरथकुमार और रामलक्ष्मण नामक दोनों भाई जिस ओर से तीखे बाण आते दिखाई दे रहे थे, उसी दिशा में अपने श्रेष्ठ अस्त्र-शस्त्र चला रहे थे। ॥३२॥
रावणिस्तु दिशः सर्वा रथेनातिरतोऽपतत् ।
विव्याध तौ दाशरथी लध्वस्त्रो निशितैः शरैः ॥ ३३ ॥
रावण का वीर पुत्र इंद्रजीत अपने रथ के साथ सभी दिशाओं में दौड़ रहा था और बड़ी फुर्ती से अपने अस्त्र-शस्त्र चला रहा था। उन्होंने अपने तीखे बाणों से दोनों दशरथों को घायल कर दिया। ॥३३॥
तेनातिविद्धौ तौ वीरौ रुक्मपुङ्खैः सुसंहतैः ।
बभूवतुर्दाशरथी पुष्पिताविव किंशुकौ ॥ ३४ ॥
दो वीर दशरथ, जो उनके मजबूत सुनहरे पंखों वाले बाणों से गंभीर रूप से घायल हो गए थे, वे रक्तरंजित और खिले हुए कमल के पेड़ प्रतीत हुए। ॥३४॥
नास्य वेगगतिं कश्चिन् न च रूपं धनुः शरान् ।
न चास्य विदितं किञ्चित् सूर्यस्येवाभ्रसम्प्लवे ॥ ३५ ॥
इन्द्रजीत की तीव्र गति , रूप , धनुष और बाण किसी को दिखाई नहीं दे रहे थे । उसके बारे में कोई कुछ भी नहीं जान सकता था, जैसे बादलों की संगति में छिपा हुआ सूर्य। ३५
तेन विद्धाश्च हरयो निहताश्च गतासवः ।
बभूवुः शतशस्तत्र पतिता धरणीतले ॥ ३६ ॥
उसके द्वारा घायल हुए और कितने ही वानर मारे गए थे और सौ योद्धा पृथ्वी पर गिरकर मर गए थे। ॥३६॥
लक्ष्मणस्तु ततः क्रुद्धो भ्रातरं वाक्यमब्रवीत् ।
ब्राह्ममस्त्रं प्रयोक्ष्यामि वधार्थं सर्वरक्षसाम् ॥ ३७ ॥
तब लक्ष्मण बहुत क्रोधित हुए और अपने भाई से कहा, आर्य! अब मैं सभी राक्षसों को नष्ट करने के लिए ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करूंगा। ॥३७॥
तमुवाच ततो रामो लक्ष्मणं शुभलक्षणम् ।
नैकस्य हेतो रक्षांसि पृथिव्यां हन्तुमर्हसि ॥ ३८ ॥
उनके इन वचनों को सुनकर श्री राम ने शुभ लक्षणों से संपन्न लक्ष्मण से कहा: संसार के सभी राक्षसों को एक कारण से मारना आपके लिए उचित नहीं है। ॥३८॥
अयुध्यमानं प्रच्छन्नं प्राञ्जलिं शरणागतम् ।
पलायमानं मत्तं वा न हन्तुं त्वमिहार्हसि ॥ ३९ ॥
तस्यैव तु वधे यत्नंन करिष्यामि महाभुज ।
आदेक्ष्यावो महावेगान् अस्त्रानाशीविषोपमान् ॥ ४० ॥
महाबाहो! जो युद्ध नहीं कर रहा है , जो छिप गया है , जिसने हाथ जोड़कर आत्मसमर्पण कर दिया है , जो युद्ध से भाग रहा है , या जो पागल है, उसे आपको नहीं मारना चाहिए । अब मैं उस इन्द्रजीत को मारने का प्रयत्न कर रहा हूँ। आइए , जहरीले सांपों जैसे घातक और बेहद तेज हथियारों के साथ प्रयोग करते हैं। ३९-४०
तमेनं मायिनं क्षुद्रं अन्तर्हितरथं बलात् ।
राक्षसं निहनिष्यन्ति दृष्ट्वा वानरयूथपाः ॥ ४१ ॥
यह मायावी राक्षस बड़ा नीच है। उसने अदृश्य होने की शक्ति से अपने रथ को अदृश्य बना दिया है। यदि तुम इसे देखोगे तो वानर सेनापति अवश्य ही इस राक्षस को मार डालेगा। ॥४१॥
यद्येष भूमिं विशते दिवं वा
रसातलं वापि नभस्तलं वा ।
एवं विगूढोऽपि ममास्त्रदग्धः
पतिष्यते भूमितले गतासुः ॥ ४२ ॥
यदि वह पृथ्वी पर बस गया है , स्वर्ग में चला गया है , रसातल में प्रवेश कर गया है या आकाश में रह गया है, तो भी वह निश्चित रूप से जमीन पर गिर जाएगा, मेरे हथियारों से जल जाएगा और बेजान हो जाएगा। ॥४२॥
इत्येवमुक्त्वा वचनं महार्थं
रघुप्रवीरः प्लवगर्षभैर्वृतः ।
वधाय रौद्रस्य नृशंसकर्मणः तदा महात्मा त्वरितं निरीक्षते ॥ ४३ ॥
इस प्रकार बड़े मनोभाव से ऐसा कहकर रघुवंश के प्रमुख वीर महात्मा श्री राम श्रेष्ठ वानरों से घिरे हुए उस क्रूर और भयानक राक्षस को देखने के लिए तुरंत चारों ओर देखने लगे। ॥४३॥
इत्यार्षे श्रीमद् रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमद् युद्धकाण्डे अशीतितमः सर्गः ॥ ८० ॥
इस प्रकार श्री वाल्मीकि द्वारा रचित प्रथम काव्य आर्ष रामायण में युद्धकांड का अठासीवां श्लोक पूरा हुआ। ॥८०॥