सर्ग-61
ततो जाम्बवतो वाक्यमगृह्णन्त वनौकसः।
अङ्गदप्रमुखा वीरा हनूमांश्च महाकपिः॥१॥
तदनन्तर अङ्गद आदि सभी वीर वानरों और महाकपि हनुमान् ने भी जाम्बवान् की बात मान ली॥१॥
प्रीतिमन्तस्ततः सर्वे वायुपुत्रपुरःसराः।
महेन्द्राग्रात् समुत्पत्य पुप्लुवुः प्लवगर्षभाः॥२॥
फिर वे सब श्रेष्ठ वानर पवनपुत्र हनुमान् को आगे करके मन-ही-मन प्रसन्नता का अनुभव करते हुए महेन्द्रगिरि के शिखर से उछलते-कूदते चल दिये॥२॥
मेरुमन्दरसंकाशा मत्ता इव महागजाः।
छादयन्त इवाकाशं महाकाया महाबलाः॥३॥
वे मेरु पर्वत के समान विशालकाय और बड़े-बड़े मदमत्त गजराजों के समान महाबली वानर आकाश को आच्छादित करते हुए-से जा रहे थे॥३॥
सभाज्यमानं भूतैस्तमात्मवन्तं महाबलम्।
हनूमन्तं महावेगं वहन्त इव दृष्टिभिः॥४॥
उस समय सिद्ध आदि भूतगण अत्यन्त वेगशाली महाबली बुद्धिमान् हनुमान जी की भूरि-भूरि प्रशंसा कर रहे थे और अपलक नेत्रोंसे उनकी ओर इस तरह देख रहे थे, मानो अपनी दृष्टियोंद्वारा ही उन्हें ढो रहे हों।
राघवे चार्थनिर्वृत्तिं कर्तुं च परमं यशः।
समाधाय समृद्धार्थाः कर्मसिद्धिभिरुन्नताः॥५॥
प्रियाख्यानोन्मुखाः सर्वे सर्वे युद्धाभिनन्दिनः।
सर्वे रामप्रतीकारे निश्चितार्था मनस्विनः॥६॥
श्रीरघुनाथजी के कार्य की सिद्धि करने का उत्तम यश पाकर उन वानरों का मनोरथ सफल हो गया था। उस कार्य की सिद्धि हो जाने से उनका उत्साह बढ़ा हुआ था। वे सभी भगवान् श्रीराम को प्रिय संवाद सुनाने के लिये उत्सुक थे। सभी युद्ध का अभिनन्दन करने वाले थे। श्रीरामचन्द्रजी के द्वारा रावण का पराभव हो—ऐसा सबने निश्चय कर लिया था तथा वे सब-के-सब मनस्वी वीर थे॥५-६॥
प्लवमानाः खमाप्लुत्य ततस्ते काननौकसः।
नन्दनोपममासेदुर्वनं द्रुमशतायुतम्॥७॥
आकाश में छलाँग मारते हुए वे वनवासी वानर सैकड़ों वृक्षों से भरे हुए एक सुन्दर वन में जा पहुँचे, जो नन्दनवन के समान मनोहर था॥७॥
यत् तन्मधुवनं नाम सुग्रीवस्याभिरक्षितम्।
अधृष्यं सर्वभूतानां सर्वभूतमनोहरम्॥८॥
उसका नाम मधुवन था। सुग्रीव का वह मधुवन सर्वथा सुरक्षित था। समस्त प्राणियों में से कोई भी उसको हानि नहीं पहुंचा सकता था। उसे देखकर सभी प्राणियों का मन लुभा जाता था॥ ८॥
यद् रक्षति महावीरः सदा दधिमुखः कपिः।
मातुलः कपिमुख्यस्य सुग्रीवस्य महात्मनः॥९॥
कपिश्रेष्ठ महात्मा सुग्रीव के मामा महावीर दधिमुख नामक वानर सदा उस वन की रक्षा करते थे॥९॥
ते तद् वनमुपागम्य बभूवुः परमोत्कटाः।
वानरा वानरेन्द्रस्य मनःकान्तं महावनम्॥१०॥
वानरराज सुग्रीव के उस मनोरम महावन के पास पहुँचकर वे सभी वानर वहाँ का मधु पीने और फलखाने आदि के लिये अत्यन्त उत्कण्ठित हो गये। १०॥
ततस्ते वानरा हृष्टा दृष्ट्वा मधुवनं महत्।
कुमारमभ्ययाचन्त मधूनि मधुपिङ्गलाः॥११॥
तब हर्ष से भरे हुए तथा मधु के समान पिङ्गल वर्णवाले उन वानरों ने उस महान् मधुवन को देखकर कुमार अङ्गद से मधुपान करने की आज्ञा माँगी॥११॥
ततः कुमारस्तान् वृद्धाञ्जाम्बवत्प्रमुखान् कपीन्।
अनुमान्य ददौ तेषां निसर्ग मधुभक्षणे॥१२॥
उस समय कुमार अङ्गद ने जाम्बवान् आदि बड़े बूढ़े वानरों की अनुमति लेकर उन सबको मधु पीने की आज्ञा दे दी॥ १२॥
ते निसृष्टाः कुमारेण धीमता वालिसूनुना।
हरयः समपद्यन्त द्रुमान् मधुकराकुलान्॥१३॥
बुद्धिमान् वालिपुत्र राजकुमार अङ्गद की आज्ञा पाकर वे वानर भौंरों के झुंड से भरे हुए वृक्षों पर चढ़ गये॥ १३॥
भक्षयन्तः सुगन्धीनि मूलानि च फलानि च।
जग्मुः प्रहर्षं ते सर्वे बभूवुश्च मदोत्कटाः॥१४॥
वहाँके सुगन्धित फल-मूलों का भक्षण करते हुए उन सबको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे सभी मद से उन्मत्त हो गये॥ १४॥
ततश्चानुमताः सर्वे सुसंहृष्टा वनौकसः।
मुदिताश्च ततस्ते च प्रनृत्यन्ति ततस्ततः॥१५॥
युवराज की अनुमति मिल जाने से सभी वानरों को बड़ा हर्ष हुआ। वे आनन्दमग्न होकर इधर-उधर नाचने लगे॥ १५॥
गायन्ति केचित् प्रहसन्ति केचिन्नृत्यन्ति केचित् प्रणमन्ति केचित्।
पतन्ति केचित् प्रचरन्ति केचित् प्लवन्ति केचित् प्रलपन्ति केचित्॥१६॥
कोई गाते, कोई हँसते, कोई नाचते, कोई नमस्कार करते, कोई गिरते-पड़ते, कोई जोर-जोर से चलते, कोई उछलते-कूदते और कोई प्रलाप करते थे॥१६॥
परस्परं केचिदुपाश्रयन्ति परस्परं केचिदतिब्रुवन्ति।
द्रुमाद् द्रुमं केचिदभिद्रवन्ति क्षितौ नगाग्रान्निपतन्ति केचित्॥१७॥
कोई एक-दूसरे के पास जाकर मिलते, कोई आपस में विवाद करते, कोई एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष पर दौड़ जाते और कोई वृक्षों की डालियों से पृथ्वी पर कूद पड़ते थे॥
महीतलात् केचिदुदीर्णवेगा महाद्रुमाग्राण्यभिसम्पतन्ति।
गायन्तमन्यः प्रहसन्नुपैति हसन्तमन्यः प्ररुदन्नुपैति॥१८॥
कितने ही प्रचण्ड वेगवाले वानर पृथ्वी से दौड़कर बड़े-बड़े वृक्षों की चोटियों तक पहुँच जाते थे। कोई गाता तो दूसरा उसके पास हँसता हुआ जाता था। कोई हँसते हुए के पास जोर-जोर से रोता हुआ पहुँचता था॥ १८॥
तुदन्तमन्यः प्रणदन्नुपैति समाकुलं तत् कपिसैन्यमासीत्।
न चात्र कश्चिन्न बभूव मत्तो न चात्र कश्चिन्न बभूव दृप्तः॥१९॥
कोई दूसरे को पीड़ा देता तो दूसरा उसके पास बड़े जोर से गर्जना करता हुआ आता था। इस प्रकार वह सारी वानरसेना मदोन्मत्त होकर उसके अनुरूप चेष्टाकर रही थी। वानरों के उस समुदाय में कोई भी ऐसा नहीं था, जो मतवाला न हो गया हो और कोई भी ऐसा नहीं था, जो दर्प से भर न गया हो॥ १९॥
ततो वनं तत् परिभक्ष्यमाणं द्रुमांश्च विध्वंसितपत्रपुष्पान्।
समीक्ष्य कोपाद् दधिवक्त्रनामा निवारयामास कपिः कपीस्तान्॥२०॥
तदनन्तर मधुवन के फल-मूल आदि का भक्षण होता और वहाँ के वृक्षों के पत्तों एवं फूलों को नष्ट किया जाता देख दधिमुख नामक वानर को बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने उन वानरों को वैसा करने से रोका॥२०॥
स तैः प्रवृद्धैः परिभय॑मानो वनस्य गोप्ता हरिवृद्धवीरः।
चकार भूयो मतिमुग्रतेजा वनस्य रक्षां प्रति वानरेभ्यः॥२१॥
जिन पर अधिक नशा चढ़ गया था, उन बड़े-बड़े वानरों ने वन की रक्षा करने वाले उस वृद्ध वानरवीर को उलटे डाँट बतानी शुरू की, तथापि उग्र तेजस्वी दधिमुख ने पुनः उन वानरों से वन की रक्षा करने का विचार किया॥२१॥
उवाच कांश्चित् परुषाण्यभीत मसक्तमन्यांश्च तलैर्जघान।
समेत्य कैश्चित् कलहं चकार तथैव साम्नोपजगाम कांश्चित्॥२२॥
उन्होंने निर्भय होकर किन्हीं-किन्हीं को कड़ी बातें सुनायीं। कितनों को थप्पड़ों से मारा। बहुतों के साथ भिड़कर झगड़ा किया और किन्हीं-किन्हीं के प्रति शान्तिपूर्ण उपाय से ही काम लिया॥ २२ ॥
स तैर्मदादप्रतिवार्यवेगैबलाच्च तेन प्रतिवार्यमाणैः।
प्रधर्षणे त्यक्तभयैः समेत्य प्रकृष्यते चाप्यनवेक्ष्य दोषम्॥२३॥
मद के कारण जिनके वेग को रोकना असम्भव हो गया था, उन वानरों को जब दधिमुख बलपूर्वक रोकने की चेष्टा करने लगे, तब वे सब मिलकर उन्हें बलपूर्वक इधर-उधर घसीटने लगे। वनरक्षक पर आक्रमण करने से राजदण्ड प्राप्त होगा, इसकी ओर उनकी दृष्टि नहीं गयी। अतएव वे सब निर्भय होकर उन्हें इधर-उधर खींचने लगे॥ २३॥
नस्तुदन्तो दशनैर्दशन्तस्तलैश्च पादैश्च समापयन्तः।
मदात् कपिं ते कपयः समन्तान्महावनं निर्विषयं च चक्रुः ॥२४॥
मद के प्रभाव से वे वानर कपिवर दधिमुख को नखों से बकोटने, दाँतों से काटने और थप्पड़ों तथा लातों से मार-मारकर अधमरा करने लगे। इस प्रकार उन्होंने उस विशाल वन को सब ओर से फल आदि से शून्य कर दिया॥२४॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे एकषष्टितमः सर्गः॥६१॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में इकसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥६१॥
सर्ग-62
तानुवाच हरिश्रेष्ठो हनूमान् वानरर्षभः।
अव्यग्रमनसो यूयं मधु सेवत वानराः॥१॥
अहमावर्जयिष्यामि युष्माकं परिपन्थिनः।
उस समय वानरशिरोमणि कपिवर हनुमान् ने अपने साथियों से कहा—’वानरो! तुम सब लोग बेखट के मधु का पान करो। मैं तुम्हारे विरोधियों को रोकूँगा’॥
श्रुत्वा हनूमतो वाक्यं हरीणां प्रवरोऽङ्गदः॥२॥
प्रत्युवाच प्रसन्नात्मा पिबन्तु हरयो मधु।
अवश्यं कृतकार्यस्य वाक्यं हनुमतो मया॥३॥
अकार्यमपि कर्तव्यं किमळं पुनरीदृशम्।।
हनुमान् जी की बात सुनकर वानरप्रवर अङ्गद ने भी प्रसन्नचित्त होकर कहा—’वानरगण अपनी इच्छा के अनुसार मधुपान करें। हनुमान जी इस समय कार्य सिद्ध करके लौटे हैं, अतः इनकी बात स्वीकार करने के योग्य न हो तो भी मुझे अवश्य माननी चाहिये। फिर ऐसी बात के लिये तो कहना ही क्या है?’ ॥ २-३ १/२॥
अङ्गदस्य मुखाच्छ्रुत्वा वचनं वानरर्षभाः॥४॥
साधु साध्विति संहृष्टा वानराः प्रत्यपूजयन्।
अङ्गद के मुख से ऐसी बात सुनकर सभी श्रेष्ठ वानर हर्ष से खिल उठे और ‘साधु-साधु’ कहते हुए उनकी प्रशंसा करने लगे॥ ४ १/२ ॥
पूजयित्वाङ्गदं सर्वे वानरा वानरर्षभम्॥५॥
जग्मुर्मधुवनं यत्र नदीवेग इव द्रुमम्।
वानरशिरोमणि अङ्गद की प्रशंसा करके वे सब वानर जहाँ मधुवन था, उस मार्ग पर उसी तरह दौड़े गये, जैसे नदी के जल का वेग तटवर्ती वृक्ष की ओर जाता है॥ ५ १/२॥
ते प्रविष्टा मधुवनं पालानाक्रम्य शक्तितः॥६॥
अतिसर्गाच्च पटवो दृष्ट्वा श्रुत्वा च मैथिलीम्।
पपुः सर्वे मधु तदा रसवत् फलमाददुः॥७॥
मिथिलेशकुमारी सीता को हनुमान जी तो देखकर आये थे और अन्य वानरों ने उन्हीं के मुख से यह सुन लिया था कि वे लङ्का में हैं, अतः उन सबका उत्साह बढ़ा हुआ था। इधर युवराज अङ्गद का आदेश भी मिल गया था, इसलिये वे सामर्थ्यशाली सभी वानर वनरक्षकों पर पूरी शक्ति से आक्रमण करके मधुवन में घुस गये और वहाँ इच्छानुसार मधु पीने तथा रसीले फल खाने लगे॥६-७॥
उत्पत्य च ततः सर्वे वनपालान् समागतान्।
ते ताडयन्तः शतशः सक्ता मधुवने तदा॥८॥
रोकने के लिये अपने पास आये हुए रक्षकों को वे सब वानर सैकड़ों की संख्या में जुटकर उछलउछलकर मारते थे और मधुवन के मधु पीने एवं फल खाने में लगे हुए थे॥८॥
मधूनि द्रोणमात्राणि बाहुभिः परिगृह्य ते।
पिबन्ति कपयः केचित् सङ्घशस्तत्र हृष्टवत्॥९॥
कितने ही वानर झुंड-के-झुंड एकत्र हो वहाँ अपनी भुजाओं द्वारा एक-एक द्रोण* मधु से भरे हुए छत्तों को पकड़ लेते और सहर्ष पी जाते थे॥९॥
* आठ आढक या बत्तीस सेर के माप को ‘द्रोण’ कहते हैं। यह प्राचीन काल में प्रचलित था।
घ्नन्ति स्म सहिताः सर्वे भक्षयन्ति तथापरे।
केचित् पीत्वापविध्यन्ति मधूनि मधुपिङ्गलाः॥१०॥
मधूच्छिष्टेन केचिच्च जघ्नुरन्योन्यमुत्कटाः।
अपरे वृक्षमूलेषु शाखा गृह्य व्यवस्थिताः॥११॥
मधु के समान पिङ्गल वर्णवाले वे सब वानर एक साथ होकर मधु के छत्तों को पीटते, दूसरे वानर उस मधु को पीते और कितने ही पीकर बचे हुए मधु को फेंक देते थे। कितने ही मदमत्त हो एक-दूसरे को मोम से मारते थे और कितने ही वानर वृक्षों के नीचे डालियाँ पकड़कर खड़े हो गये थे॥ १०-११॥
अत्यर्थं च मदग्लानाः पर्णान्यास्तीर्य शेरते।
उन्मत्तवेगाः प्लवगा मधुमत्ताश्च हृष्टवत्॥१२॥
कितने ही वानर मद के कारण अत्यन्त ग्लानि का अनुभव कर रहे थे। उनका वेग उन्मत्त पुरुषों के समान देखा जाता था। वे मधु पी-पीकर मतवाले हो गये थे, अतः बड़े हर्ष के साथ पत्ते बिछाकर सो गये॥ १२॥
क्षिपन्त्यपि तथान्योन्यं स्खलन्ति च तथापरे।
केचित् क्ष्वेडान् प्रकुर्वन्ति केचित् कूजन्ति हृष्टवत्॥१३॥
कोई एक-दूसरे पर मधु फेंकते, कोई लड़खड़ाकर गिरते, कोई गरजते और कोई हर्ष के साथ पक्षियों की भाँति कलरव करते थे॥१३॥
हरयो मधुना मत्ताः केचित् सुप्ता महीतले।
धृष्टाः केचिद्धसन्त्यन्ये केचित् कुर्वन्ति चेतरत्॥१४॥
मधु से मतवाले हुए कितने ही वानर पृथ्वी पर सो गये थे। कुछ ढीठ वानर हँसते और कुछ रोदन करते थे॥१४॥
कृत्वा केचिद् वदन्त्यन्ये केचिद् बुध्यन्ति चेतरत्।
येऽप्यत्र मधुपालाः स्युः प्रेष्या दधिमुखस्य तु॥१५॥
तेऽपि तैर्वानरै मैः प्रतिषिद्धा दिशो गताः।
जानुभिश्च प्रघृष्टाश्च देवमार्गं च दर्शिताः॥१६॥
कुछ वानर दूसरा काम करके दूसरा बताते थे और कुछ उस बात का दूसरा ही अर्थ समझते थे। उस वन में जो दधिमुख के सेवक मधु की रक्षा में नियुक्त थे, वे भी उन भयंकर वानरों द्वारा रोके या पीटे जाने पर सभी दिशाओं में भाग गये। उनमें से कई रखवालों को अङ्गद के दलवालोंने जमीन पर पटककर घुटनों से खूब रगड़ा और कितनों को पैर पकड़कर आकाश में उछाल दिया था अथवा उन्हें पीठ के बल गिराकर आकाश दिखा दिया था॥१५-१६॥
अब्रुवन् परमोद्विग्ना गत्वा दधिमुखं वचः।
हनूमता दत्तवरैर्हतं मधुवनं बलात्।
वयं च जानुभिर्घष्टा देवमार्गं च दर्शिताः॥१७॥
वे सब सेवक अत्यन्त उद्विग्न हो दधिमुख के पास जाकर बोले—’प्रभो! हनुमान जी के बढ़ावा देने से उनके दल के सभी वानरों ने बलपूर्वक मधुवन का विध्वंस कर डाला, हमलोगों को गिराकर घुटनों से रगड़ा और हमें पीठ के बल पटककर आकाश का दर्शन करा दिया’ ॥ १७॥
तदा दधिमुखः क्रुद्धो वनपस्तत्र वानरः।
हतं मधुवनं श्रुत्वा सान्त्वयामास तान् हरीन्॥१८॥
तब उस वन के प्रधान रक्षक दधिमुख नामक वानर मधुवन के विध्वंस का समाचार सुनकर वहाँ कुपित हो उठे और उन वानरों को सान्त्वना देते हुए बोले-॥
एतागच्छत गच्छामो वानरानतिदर्पितान्।
बलेनावारयिष्यामि प्रभुञ्जानान् मधूत्तमम्॥१९॥
‘आओ-आओ, चलें इन वानरों के पास। इनका घमंड बहुत बढ़ गया है। मधुवन के उत्तम मधु को लूटकर खाने वाले इन सबको मैं बलपूर्वक रोदूंगा’।
श्रुत्वा दधिमुखस्येदं वचनं वानरर्षभाः।
पुनर्वीरा मधुवनं तेनैव सहिता ययुः॥२०॥
दधिमुख का यह वचन सुनकर वे वीर कपिश्रेष्ठ पुनः उन्हीं के साथ मधुवन को गये॥ २० ॥
मध्ये चैषां दधिमुखः सुप्रगृह्य महातरुम्।
समभ्यधावन् वेगेन सर्वे ते च प्लवंगमाः॥२१॥
इनके बीच में खड़े हुए दधिमुख ने एक विशाल वृक्ष हाथ में लेकर बड़े वेग से हनुमान जी के दलपर धावा किया। साथ ही वे सब वानर भी उन मधु पीने वाले वानरों पर टूट पड़े॥२१॥
ते शिलाः पादपांश्चैव पाषाणानपि वानराः।
गृहीत्वाभ्यागमन् क्रुद्धा यत्र ते कपिकुञ्जराः॥२२॥
क्रोध से भरे हुए वे वानर शिला, वृक्ष और पाषाण लिये उस स्थान पर आये, जहाँ वे हनुमान् आदि कपिश्रेष्ठ मधु का सेवन कर रहे थे॥ २२ ॥
बलान्निवारयन्तश्च आसेदुर्हरयो हरीन्।
संदष्टौष्ठपुटाः क्रुद्धा भर्त्सयन्तो मुहुर्मुहुः॥ २३॥
अपने ओठों को दाँतों से दबाते और क्रोधपूर्वक बारंबार धमकाते हुए ये सब वानर उन वानरों को बलपूर्वक रोकने के लिये उनके पास आ पहुँचे॥२३॥
अथ दृष्ट्वा दधिमुखं क्रुद्धं वानरपुङ्गवाः।
अभ्यधावन्त वेगेन हनुमत्प्रमुखास्तदा ॥२४॥
दधिमुख को कुपित हुआ देख हनुमान् आदि सभी श्रेष्ठ वानर उस समय बड़े वेग से उनकी ओर दौड़े। २४॥
सवृक्षं तं महाबाहुमापतन्तं महाबलम्।
वेगवन्तं विजग्राह बाहुभ्यां कुपितोऽङ्गदः॥२५॥
वृक्ष लेकर आते हुए वेगशाली महाबली महाबाहु दधिमुख को कुपित हुए अङ्गद ने दोनों हाथों से पकड़ लिया॥
मदान्धो न कृपां चक्रे आर्यकोऽयं ममेति सः।
अथैनं निष्पिपेषाशु वेगेन वसुधातले॥२६॥
वे मधु पीकर मदान्ध हो रहे थे, अतः ‘ये मेरे नाना हैं’ ऐसा समझकर उन्होंने उनपर दया नहीं दिखायी। वे तुरंत बड़े वेग से पृथ्वी पर पटककर उन्हें रगड़ने लगे॥२६॥
स भग्नबाहूरुमुखो विह्वलः शोणितोक्षितः।
प्रमुमोह महावीरो मुहूर्तं कपिकुञ्जरः॥ २७॥
उनकी भुजाएँ, जाँघे और मुँह सभी टूट-फूट गये। वे खून से नहा गये और व्याकुल हो उठे। वे महावीर कपिकुञ्जर दधिमुख वहाँ दो घड़ी तक मूर्च्छित पड़े रहे॥ २७॥
स कथंचिद विमुक्तस्तैर्वानरैर्वानरर्षभः।
उवाचैकान्तमागत्य स्वान् भृत्यान् समुपागतान्॥२८॥
उन वानरों के हाथ से किसी तरह छुटकारा मिलने पर वानरश्रेष्ठ दधिमुख एकान्त में आये और वहाँ एकत्र हुए अपने सेवकों से बोले- ॥२८॥
एतागच्छत गच्छामो भर्ता नो यत्र वानरः।
सुग्रीवो विपुलग्रीवः सह रामेण तिष्ठति ॥२९॥
‘आओ-आओ, अब वहाँ चलें, जहाँ हमारे स्वामी मोटी गर्दन वाले सुग्रीव श्रीरामचन्द्रजी के साथ विराजमान हैं॥ २९॥
सर्वं चैवाङ्गदे दोषं श्रावयिष्याम पार्थिवे।
अमर्षी वचनं श्रुत्वा घातयिष्यति वानरान्॥३०॥
‘राजा के पास चलकर सारा दोष अङ्गद के माथे मढ़ देंगे। सुग्रीव बड़े क्रोधी हैं। मेरी बात सुनकर वे इन सभी वानरों को मरवा डालेंगे॥३०॥
इष्टं मधुवनं ह्येतत् सुग्रीवस्य महात्मनः।
पितृपैतामहं दिव्यं देवैरपि दुरासदम्॥३१॥
‘महात्मा सुग्रीव को यह मधुवन बहुत ही प्रिय है। यह उनके बाप-दादों का दिव्य वन है। इसमें प्रवेश करना देवताओं के लिये भी कठिन है॥३१॥
स वानरानिमान् सर्वान् मधुलुब्धान् गतायुषः।
घातयिष्यति दण्डेन सुग्रीवः ससुहृज्जनान्॥३२॥
‘मधु के लोभी इन सभी वानरों की आयु समाप्त हो चली है। सुग्रीव इन्हें कठोर दण्ड देकर इनके सुहृदोंसहित इन सबको मरवा डालेंगे॥ ३२ ॥
वध्या ह्येते दुरात्मानो नृपाज्ञापरिपन्थिनः।
अमर्षप्रभवो रोषः सफलो मे भविष्यति॥३३॥
‘राजा की आज्ञाका उल्लङ्घन करने वाले ये दुरात्मा राजद्रोही वानर वध के ही योग्य हैं। इनका वध होने पर ही मेरा अमर्षजनित रोष सफल होगा’॥३३॥
एवमुक्त्वा दधिमुखो वनपालान् महाबलः।
जगाम सहसोत्पत्य वनपालैः समन्वितः॥३४॥
वनके रक्षकों से ऐसा कहकर उन्हें साथ ले महाबली दधिमुख सहसा उछलकर आकाशमार्ग से चले॥ ३४॥
निमेषान्तरमात्रेण स हि प्राप्तो वनालयः।
सहस्रांशुसुतो धीमान् सुग्रीवो यत्र वानरः॥ ३५॥
और पलक मारते-मारते वे उस स्थान पर जा पहुँचे, जहाँ बुद्धिमान् सूर्यपुत्र वानरराज सुग्रीव विराजमान थे॥ ३५॥
रामं च लक्ष्मणं चैव दृष्ट्वा सुग्रीवमेव च।
समप्रतिष्ठां जगतीमाकाशान्निपपात ह॥३६॥
श्रीराम, लक्ष्मण और सुग्रीव को दूर से ही देखकर वे आकाश से समतल भूमि पर कूद पड़े ॥ ३६॥
स निपत्य महावीरः सर्वैस्तैः परिवारितः।
हरिर्दधिमुखः पालैः पालानां परमेश्वरः॥३७॥
स दीनवदनो भूत्वा कृत्वा शिरसि चाञ्जलिम्।
सुग्रीवस्याशु तौ मूर्जा चरणौ प्रत्यपीडयत्॥३८॥
वनरक्षकों के स्वामी महावीर वानर दधिमुख पृथ्वी पर उतरकर उन रक्षकों से घिरे हुए उदास मुख किये सुग्रीव के पास गये और सिरपर अञ्जलि बाँधे उनके चरणों में मस्तक झुकाकर उन्होंने प्रणाम किया॥ ३७-३८॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे द्विषष्टितमः सर्गः॥६२॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में बासठवाँ सर्ग पूरा हुआ।६२॥
सर्ग-63
ततो मूर्जा निपतितं वानरं वानरर्षभः।
दृष्ट्वैवोद्रिग्नहृदयो वाक्यमेतदुवाच ह॥१॥
वानर दधिमुखको माथा टेक प्रणाम करते देख वानरशिरोमणि सुग्रीव का हृदय उद्विग्न हो उठा। वे उनसे इस प्रकार बोले- ॥१॥
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ कस्मात् त्वं पादयोः पतितो मम।
अभयं ते प्रदास्यामि सत्यमेवाभिधीयताम्॥२॥
‘उठो-उठो! तुम मेरे पैरों पर कैसे पड़े हो? मैं तुम्हें अभयदान देता हूँ। तुम सच्ची बात बताओ॥२॥
किं सम्भ्रमाद्धितं कृत्स्नं ब्रूहि यद् वक्तुमर्हसि।
कच्चिन्मधुवने स्वस्ति श्रोतुमिच्छामि वानर ॥३॥
‘कहो, किसके भयसे यहाँ आये हो। जो पूर्णतः हितकर बात हो, उसे बताओ; क्योंकि तुम सब कुछ कहने के योग्य हो। मधुवन में कुशल तो है न? वानर! मैं तुम्हारे मुखसे यह सब सुनना चाहता हूँ’॥३॥
स समाश्वासितस्तेन सुग्रीवेण महात्मना।
उत्थाय स महाप्राज्ञो वाक्यं दधिमुखोऽब्रवीत्॥४॥
महात्मा सुग्रीव के इस प्रकार आश्वासन देने पर महाबुद्धिमान् दधिमुख खड़े होकर बोले- ॥४॥
नैवर्लरजसा राजन् न त्वया न च वालिना।
वनं निसृष्टपूर्वं ते नाशितं तत्तु वानरैः॥५॥
‘राजन्! आपके पिता ऋक्षरजाने, वाली ने और आपने भी पहले कभी जिस वन के मनमाने उपभोग के लिये किसी को आज्ञा नहीं दी थी, उसीका हनुमान् आदि वानरों ने आज नाश कर दिया॥५॥
न्यवारयमहं सर्वान् सहैभिर्वनचारिभिः।
अचिन्तयित्वा मां हृष्टा भक्षयन्ति पिबन्ति च॥६॥
‘मैंने इन वनरक्षक वानरों के साथ उन सबको रोकने की बहुत चेष्टा की, परंतु वे मुझे कुछ भी न समझकर बड़े हर्ष के साथ फल खाते और मधु पीते हैं।
एभिः प्रधर्षणायां च वारितं वनपालकैः।।
मामप्यचिन्तयन् देव भक्षयन्ति वनौकसः॥७॥
‘देव! इन हनुमान् आदि वानरोंने जब मधुवन में लूट मचाना आरम्भ किया, तब हमारे इन वनरक्षकों ने उन सबको रोकने की चेष्टा की; परंतु वे वानर इनको और मुझे भी कुछ नहीं गिनते हुए वहाँ के फल आदि का भक्षण कर रहे हैं॥७॥
शिष्टमत्रापविध्यन्ति भक्षयन्ति तथापरे।
निवार्यमाणास्ते सर्वे भ्रकुटिं दर्शयन्ति हि॥८॥
‘दूसरे, वानर वहाँ खाते-पीते तो हैं ही, उनके सामने जो कुछ बच जाता है, उसे उठाकर फेंक देते हैं और जब हमलोग रोकते हैं, तब वे सब हमें टेढ़ी भौंहें दिखाते हैं॥ ८॥
इमे हि संरब्धतरास्तदा तैः सम्प्रधर्षिताः।।
निवार्यन्ते वनात् तस्मात् क्रुद्धैर्वानरपुङ्गवैः॥९॥
‘जब ये रक्षक उनपर अधिक कुपित हुए, तब उन्होंने इन पर आक्रमण कर दिया। इतना ही नहीं, क्रोध से भरे हुए उन वानरपुङ्गवों ने इन रक्षकों को उस वन से बाहर निकाल दिया॥९॥
ततस्तैर्बहुभिर्वीरैर्वानरैर्वानरर्षभाः।
संरक्तनयनैः क्रोधाद्धरयः सम्प्रधर्षिताः॥१०॥
‘बाहर निकालकर उन बहुसंख्यक वीर वानरों ने क्रोध से लाल आँखें करके वन की रक्षा करने वाले इन श्रेष्ठ वानरों को धर दबाया॥१०॥
पाणिभिर्निहताः केचित् केचिज्जानुभिराहताः।
प्रकृष्टाश्च तदा कामं देवमार्गं च दर्शिताः॥११॥
‘किन्हीं को थप्पड़ों से मारा, किन्हीं को घुटनों से रगड़ दिया, बहुतों को इच्छानुसार घसीटा और कितनों को पीठ के बल पटककर आकाश दिखा दिया॥११॥
एवमेते हताः शूरास्त्वयि तिष्ठति भर्तरि।
कृत्स्नं मधुवनं चैव प्रकामं तैश्च भक्ष्यते॥१२॥
‘प्रभो! आप-जैसे स्वामी के रहते हुए ये शूरवीर वनरक्षक उनके द्वारा इस तरह मारे-पीटे गये हैं और वे अपराधी वानर अपनी इच्छा के अनुसार सारे मधुवन का उपभोग कर रहे हैं ॥ १२॥
एवं विज्ञाप्यमानं तं सुग्रीवं वानरर्षभम्।
अपृच्छत् तं महाप्राज्ञो लक्ष्मणः परवीरहा॥१३॥
वानरशिरोमणि सुग्रीव को जब इस प्रकार मधुवन के लूटे जाने का वृत्तान्त बताया जा रहा था, उस समय शत्रुवीरों का संहार करने वाले परम बुद्धिमान् लक्ष्मण ने उनसे पूछा- ॥१३॥
किमयं वानरो राजन् वनपः प्रत्युपस्थितः।
किं चार्थमभिनिर्दिश्य दुःखितो वाक्यमब्रवीत्॥१४॥
‘राजन्! वन की रक्षा करने वाला यह वानर यहाँ किसलिये उपस्थित हुआ है? और किस विषय की ओर संकेत करके इसने दुःखी होकर बात की है?’॥
एवमुक्तस्तु सुग्रीवो लक्ष्मणेन महात्मना।
लक्ष्मणं प्रत्युवाचेदं वाक्यं वाक्यविशारदः॥१५॥
महात्मा लक्ष्मण के इस प्रकार पूछने पर बातचीत करने में कुशल सुग्रीव ने यों उत्तर दिया- ॥ १५ ॥
आर्य लक्ष्मण सम्प्राह वीरो दधिमुखः कपिः।
अङ्गदप्रमुखैवीरैर्भक्षितं मधु वानरैः॥१६॥
‘आर्य लक्ष्मण! वीर वानर दधिमुख ने मुझसे यह कहा है कि ‘अङ्गद आदि वीर वानरों ने मधुवन का सारा मधु खा-पी लिया है’ ॥ १६॥
नैषामकृतकार्याणामीदृशः स्याद् व्यतिक्रमः।
वनं यदभिपन्नास्ते साधितं कर्म तद् ध्रुवम्॥१७॥
‘इसकी बात सुनकर मुझे यह अनुमान होता है कि वे जिस कार्य के लिये गये थे, उसे अवश्य ही उन्होंने पूरा कर लिया है। तभी उन्होंने मधुवन पर आक्रमण किया है। यदि वे अपना कार्य सिद्ध करके न आये होते तो उनके द्वारा ऐसा अपराध नहीं बना होता—वे मेरे मधुवन को लूटने का साहस नहीं कर सकते थे। १७॥
वारयन्तो भृशं प्राप्ताः पाला जानुभिराहताः।
तथा न गणितश्चायं कपिर्दधिमुखो बली॥१८॥
पतिर्मम वनस्यायमस्माभिः स्थापितः स्वयम्।
दृष्टा देवी न संदेहो न चान्येन हनूमता॥१९॥
‘जब रक्षक उन्हें बारंबार रोकने के लिये आये, तब उन्होंने इन सबको पटककर घुटनों से रगड़ा है तथा इन बलवान् वानर दधिमुख को भी कुछ नहीं समझा है। ये ही मेरे उस वन के मालिक या प्रधान रक्षक हैं। मैंने स्वयं ही इन्हें इस कार्य में नियुक्त किया है (फिर भी उन्होंने इनकी बात नहीं मानी है)। इससे जान पड़ता है, उन्होंने देवी सीता का दर्शन अवश्य कर लिया। इसमें कोई संदेह नहीं है। यह काम और किसी का नहीं, हनुमान जी का ही है (उन्होंने ही सीता का दर्शन किया है)।
न ह्यन्यः साधने हेतुः कर्मणोऽस्य हनूमतः।
कार्यसिद्धिहनुमति मतिश्च हरिपुङ्गवे॥२०॥
व्यवसायश्च वीर्यं च श्रुतं चापि प्रतिष्ठितम्।
‘इस कार्य को सिद्ध करने में हनुमान जी के सिवा और कोई कारण बना हो, ऐसा सम्भव नहीं है। वानरशिरोमणि हनुमान् में ही कार्य-सिद्धि की शक्ति और बुद्धि है। उन्हीं में उद्योग, पराक्रम और शास्त्रज्ञान भी प्रतिष्ठित है॥
जाम्बवान् यत्र नेता स्यादङ्गदश्च महाबलः॥२१॥
हनूमांश्चाप्यधिष्ठाता न तत्र गतिरन्यथा।
‘जिस दल के नेता जाम्बवान् और महाबली अङ्गद हों तथा अधिष्ठाता हनुमान् हों, उस दल को विपरीत परिणाम- असफलता मिले, यह सम्भव नहीं है। २१ १/२॥
अङ्गदप्रमुखैरैिर्हतं मधुवनं किल ॥२२॥
विचित्य दक्षिणामाशामागतैर्हरिपुङ्गवैः।
आगतैश्चाप्रधृष्यं तद्धतं मधुवनं हि तैः॥२३॥
धर्षितं च वनं कृत्स्नमुपयुक्तं तु वानरैः।
पातिता वनपालास्ते तदा जानुभिराहताः॥२४॥
एतदर्थमयं प्राप्तो वक्तुं मधुरवागिह।
नाम्ना दधिमुखो नाम हरिः प्रख्यातविक्रमः॥२५॥
‘दक्षिण दिशा से सीताजी का पता लगाकर लौटे हुए अङ्गद आदि वीर वानरपुङ्गवों ने उस मधुवन पर प्रहार किया है, जिसे पददलित करना किसी के लिये भी असम्भव था। उन्होंने मधुवन को नष्ट किया, उजाड़ा और सब वानरों ने मिलकर समूचे वन का मनमाने ढंग से उपभोग किया। इतना ही नहीं, उन्होंने वन के रक्षकों को भी दे मारा और उन्हें अपने घुटनों से मारमारकर घायल किया। इसी बात को बताने के लिये ये विख्यात पराक्रमी वानर दधिमुख, जो बड़े मधुरभाषी हैं यहाँ आये हैं।। २२–२५ ॥
दृष्टा सीता महाबाहो सौमित्रे पश्य तत्त्वतः।
अभिगम्य यथा सर्वे पिबन्ति मधु वानराः॥२६॥
‘महाबाहु सुमित्रानन्दन! इस बात को आप ठीक समझें कि अब सीता का पता लग गया; क्योंकि वे सभी वानर उस वन में जाकर मधु पी रहे हैं॥२६॥
न चाप्यदृष्ट्वा वैदेहीं विश्रुताः पुरुषर्षभ।
वनं दत्तवरं दिव्यं धर्षयेयुर्वनौकसः॥ २७॥
‘पुरुषप्रवर! विदेहनन्दिनी का दर्शन किये बिना उस दिव्य वन का, जो देवताओं से मेरे पूर्वज को वरदान के रूप में प्राप्त हुआ है, वे विख्यात वानर कभी विध्वंस नहीं कर सकते थे’॥ २७॥
ततः प्रहृष्टो धर्मात्मा लक्ष्मणः सहराघवः।
श्रुत्वा कर्णसुखां वाणीं सुग्रीववदनाच्च्युताम्॥२८॥
प्राहृष्यत भृशं रामो लक्ष्मणश्च महायशाः।
सुग्रीव के मुख से निकली हुई कानों को सुख देने वाली यह बात सुनकर धर्मात्मा लक्ष्मण श्रीरामचन्द्रजी के साथ बहुत प्रसन्न हुए। श्रीराम के हर्ष की सीमा न रही और महायशस्वी लक्ष्मण भी हर्ष से खिल उठे॥ २८ १/२॥
श्रुत्वा दधिमुखस्यैवं सुग्रीवस्तु प्रहृष्य च॥२९॥
वनपालं पुनर्वाक्यं सुग्रीवः प्रत्यभाषत।
दधिमुख की उपर्युक्त बात सुनकर सुग्रीव को बड़ा हर्ष हुआ। उन्होंने अपने वनरक्षक को फिर इस प्रकार उत्तर दिया- ॥ २९ १/२ ॥
प्रीतोऽस्मि सोऽहं यद्भक्तं वनं तैः कृतकर्मभिः॥३०॥
धर्षितं मर्षणीयं च चेष्टितं कृतकर्मणाम्।
गच्छ शीघ्रं मधुवनं संरक्षस्व त्वमेव हि।
शीघ्रं प्रेषय सर्वांस्तान् हनूमत्प्रमुखान् कपीन्॥३१॥
‘मामा! अपना कार्य सिद्ध करके लौटे हुए उन वानरों ने जो मेरे मधुवन का उपभोग किया है, उससे मैं बहुत प्रसन्न हुआ हूँ; अतः तुम्हें भी कृतकृत्य होकर आये हुए उन कपियों की ढिठाई तथा उद्दण्डतापूर्ण चेष्टाओं को क्षमा कर देना चाहिये। अब शीघ्र जाओ और तुम्हीं उस मधुवन की रक्षा करो। साथ ही हनुमान् आदि सब वानरों को जल्दी यहाँ भेजो॥ ३०-३१॥
इच्छामि शीघ्रं हनुमत्प्रधानान्शाखामृगांस्तान् मृगराजदोन्।
प्रष्टुं कृतार्थान् सह राघवाभ्यां श्रोतुं च सीताधिगमे प्रयत्नम्॥३२॥
‘मैं सिंह के समान दर्प से भरे हुए उन हनुमान् आदि वानरों से शीघ्र मिलना चाहता हूँ और इन दोनों रघुवंशी बन्धुओं के साथ मैं उन कृतार्थ होकर लौटे हुए वीरों से यह पूछना तथा सुनना चाहता हूँ कि सीता की प्राप्ति के लिये क्या प्रयत्न किया जाय॥ ३२॥
प्रीतिस्फीताक्षौ सम्प्रहृष्टौ कुमारौ दृष्ट्वा सिद्धार्थौ वानराणां च राजा।
अङ्गैः प्रहृष्टैः कार्यसिद्धिं विदित्वा बाह्वोरासन्नामतिमात्रं ननन्द ॥३३॥
वे दोनों राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण पूर्वोक्त समाचार से अपने को सफलमनोरथ मानकर हर्ष से पुलकित हो गये थे। उनकी आँखें प्रसन्नता से खिल उठी थीं। उन्हें इस तरह प्रसन्न देख तथा अपने हर्षोत्फुल्ल अङ्गों से कार्यसिद्धि को हाथों में आयी हुई जान वानरराज सुग्रीव अत्यन्त आनन्द में निमग्न हो गये॥३३॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे त्रिषष्टितमः सर्गः॥६३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में तिरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ।६३॥
सर्ग-64
सुग्रीवेणैवमुक्तस्तु हृष्टो दधिमुखः कपिः।
राघवं लक्ष्मणं चैव सुग्रीवं चाभ्यवादयत्॥१॥
सुग्रीव के ऐसा कहने पर प्रसन्नचित्त वानर दधिमुख ने श्रीराम, लक्ष्मण और सुग्रीव को प्रणाम किया॥१॥
स प्रणम्य च सुग्रीवं राघवौ च महाबलौ।
वानरैः सहितः शूरैर्दिवमेवोत्पपात ह॥२॥
सुग्रीव तथा उन महाबली रघुवंशी बन्धुओं को प्रणाम करके वे शूरवीर वानरों के साथ आकाशमार्ग से उड़ चले॥
स यथैवागतः पूर्वं तथैव त्वरितं गतः।
निपत्य गगनाद् भूमौ तद् वनं प्रविवेश ह॥३॥
जैसे पहले आये थे, उतनी ही शीघ्रता से वे वहाँ जा पहुँचे और आकाश से पृथ्वी पर उतरकर उन्होंने उस मधुवन में प्रवेश किया॥३॥
स प्रविष्टो मधुवनं ददर्श हरियूथपान्।
विमदानुद्धतान् सर्वान् मेहमानान् मधूदकम्॥४॥
मधुवन में प्रविष्ट होकर उन्होंने देखा कि समस्त वानर-यूथपति जो पहले उद्दण्ड हो रहे थे, अब मदरहित हो गये हैं—इनका नशा उतर गया है और ये मधुमिश्रित जल का मेहन (मूत्रेन्द्रिय द्वारा त्याग) कर रहे हैं॥४॥
स तानुपागमद् वीरो बद्ध्वा करपुटाञ्जलिम्।
उवाच वचनं श्लक्ष्णमिदं हृष्टवदङ्गदम्॥५॥
वीर दधिमुख उनके पास गये और दोनों हाथों की अञ्जलि बाँध अङ्गद से हर्षयुक्त मधुर वाणी में इस प्रकार बोले- ॥५॥
सौम्य रोषो न कर्तव्यो यदेभिः परिवारणम्।
अज्ञानाद् रक्षिभिः क्रोधाद् भवन्तः प्रतिषेधिताः॥६॥
‘सौम्य ! इन रक्षकों ने जो अज्ञानवश आपको रोका था, क्रोधपूर्वक आपलोगों को मधु पीने से मना किया था, इसके लिये आप अपने मन में क्रोध न करें॥६॥
श्रान्तो दूरादनुप्राप्तो भक्षयस्व स्वकं मधु।
युवराजस्त्वमीशश्च वनस्यास्य महाबल॥७॥
‘आपलोग दूर से थके-माँदे आये हैं, अतः फल खाइये और मधु पीजिये। यह सब आपकी ही सम्पत्ति है। महाबली वीर! आप हमारे युवराज और इस वन के स्वामी हैं॥७॥
मौात् पूर्वं कृतो रोषस्तद् भवान् क्षन्तुमर्हति।
यथैव हि पिता तेऽभूत् पूर्वं हरिगणेश्वरः॥८॥
तथा त्वमपि सुग्रीवो नान्यस्तु हरिसत्तम।
‘कपिश्रेष्ठ! मैंने पहले मूर्खतावश जो रोष प्रकट किया था, उसे आप क्षमा करें; क्योंकि पूर्वकाल में जैसे आपके पिता वानरों के राजा थे, उसी प्रकार आप और सुग्रीव भी हैं। आपलोगों के सिवा दूसरा कोई हमारा स्वामी नहीं है। ८ १/२ ॥
आख्यातं हि मया गत्वा पितृव्यस्य तवानघ॥९॥
इहोपयानं सर्वेषामेतेषां वनचारिणाम्।
भवदागमनं श्रुत्वा सहैभिर्वनचारिभिः॥१०॥
प्रहृष्टो न तु रुष्टोऽसौ वनं श्रुत्वा प्रधर्षितम्।
‘निष्पाप युवराज! मैंने यहाँ से जाकर आपके चाचा सुग्रीव से इन सब वानरों के यहाँ पधारने का हाल कहा था। इन वानरों के साथ आपका आगमन सुनकर वे बहुत प्रसन्न हुए। इस वनके विध्वंस का समाचार सुनकर भी उन्हें रोष नहीं हुआ॥९-१० १/२॥
प्रहृष्टो मां पितृव्यस्ते सुग्रीवो वानरेश्वरः॥११॥
शीघ्रं प्रेषय सर्वांस्तानिति होवाच पार्थिवः।
‘आपके चाचा वानरराज सुग्रीव ने बड़े हर्ष के साथ मुझसे कहा है कि उन सबको शीघ्र यहाँ भेजो’ ॥ ११ १/२॥
श्रुत्वा दधिमुखस्यैतद् वचनं श्लक्ष्णमङ्गदः॥१२॥
अब्रवीत् तान् हरिश्रेष्ठो वाक्यं वाक्यविशारदः।
दधिमुख की यह बात सुनकर बातचीत करने में कुशल कपिश्रेष्ठ अङ्गद ने उन सबसे मधुर वाणी में कहा-॥
शङ्के श्रुतोऽयं वृत्तान्तो रामेण हरियूथपाः॥१३॥
अयं च हर्षादाख्याति तेन जानामि हेतुना।
तत् क्षमं नेह नः स्थातुं कृते कार्ये परंतपाः॥१४॥
‘वानरयूथपतियो! जान पड़ता है भगवान् श्रीराम ने हमलोगों के लौटने का समाचार सुन लिया; क्योंकि ये बहुत प्रसन्न होकर वहाँ की बात सुना रहे हैं। इसी से मुझे ऐसा ज्ञात होता है। अतः शत्रुओं को संताप देने वाले वीरो! कार्य पूरा हो जाने पर अब हमलोगों को यहाँ अधिक नहीं ठहरना चाहिये॥१३-१४ ॥
पीत्वा मधु यथाकामं विक्रान्ता वनचारिणः।
किं शेषं गमनं तत्र सुग्रीवो यत्र वानरः॥१५॥
‘पराक्रमी वानर इच्छानुसार मधु पी चुके। अब यहाँ कौन-सा कार्य शेष है। इसलिये वहीं चलना चाहिये, जहाँ वानरराज सुग्रीव हैं॥ १५ ॥
सर्वे यथा मां वक्ष्यन्ति समेत्य हरिपुङ्गवाः।
तथास्मि कर्ता कर्तव्ये भवद्भिः परवानहम्॥
‘वानरपुङ्गवो! आप सब लोग मिलकर मुझसे जैसा कहेंगे, मैं वैसा ही करूँगा; क्योंकि कर्तव्य के विषय में मैं आपलोगों के अधीन हूँ॥१६॥
नाज्ञापयितुमीशोऽहं युवराजोऽस्मि यद्यपि।
अयुक्तं कृतकर्माणो यूयं धर्षयितुं बलात्॥१७॥
‘यद्यपि मैं युवराज हूँ तो भी आपलोगों पर हुक्म नहीं चला सकता। आपलोग बहुत बड़ा कार्य पूरा करके आये हैं, अतः बलपूर्वक आप पर शासन चलाना कदापि उचित नहीं है’ ॥ १७॥
ब्रुवतश्चाङ्गदस्यैवं श्रुत्वा वचनमुत्तमम्।
प्रहृष्टमनसो वाक्यमिदमूचुर्वनौकसः॥१८॥
उस समय इस तरह बोलते हुए अङ्गद का उत्तम वचन सुनकर सब वानरों का चित्त प्रसन्न हो गया और वे इस प्रकार बोले- ॥१८॥
एवं वक्ष्यति को राजन् प्रभुः सन् वानरर्षभ।
ऐश्वर्यमदमत्तो हि सर्वोऽहमिति मन्यते॥१९॥
‘राजन् ! कपिश्रेष्ठ ! स्वामी होकर भी अपने अधीन रहने वाले लोगों से कौन इस तरह की बात करेगा? प्रायः सब लोग ऐश्वर्य के मद से उन्मत्त हो अहंकारवश अपने को ही सर्वोपरि मानने लगते हैं। १९॥
तव चेदं सुसदृशं वाक्यं नान्यस्य कस्यचित्।
सन्नतिर्हि तवाख्याति भविष्यच्छुभयोग्यताम्॥२०॥
‘आपकी यह बात आपके ही योग्य है। दूसरे किसी के मुँह से प्रायः ऐसी बात नहीं निकलती। यह नम्रता आपकी भावी शुभयोग्यता का परिचय दे रही है॥ २० ॥
सर्वे वयमपि प्राप्तास्तत्र गन्तुं कृतक्षणाः।
स यत्र हरिवीराणां सुग्रीवः पतिरव्ययः॥२१॥
‘हम सब लोग भी जहाँ वानरवीरों के अविनाशी पति सुग्रीव विराजमान हैं, वहाँ चलने के लिये उत्साहित हो यहाँ आपके समीप आये हैं ॥ २१॥
त्वया ह्यनुक्तैर्हरिभि व शक्यं पदात् पदम्।
क्वचिद् गन्तुं हरिश्रेष्ठ ब्रूमः सत्यमिदं तु ते॥२२॥
‘वानरश्रेष्ठ! आपकी आज्ञा प्राप्त हुए बिना हम वानरगण कहीं एक पग भी नहीं जा सकते, यह आपसे सच्ची बात कहते हैं’॥ २२॥
एवं तु वदतां तेषामङ्गदः प्रत्यभाषत।
साधु गच्छाम इत्युक्त्वा खमुत्पेतुर्महाबलाः॥२३॥
वे वानरगण जब ऐसी बातें कहने लगे, तब अङ्गद बोले—’बहुत अच्छा, अब हमलोग चलें।’ इतना कहकर वे महाबली वानर आकाश में उड़ चले॥ २३॥
उत्पतन्तमनूत्पेतुः सर्वे ते हरियूथपाः।
कृत्वाऽऽकाशं निराकाशं यन्त्रोत्क्षिप्ता इवोपलाः॥२४॥
आगे-आगे अङ्गद और उनके पीछे वे समस्त वानरयूथपति उड़ने लगे। वे आकाश को आच्छादित करके गुलेल से फेंके गये पत्थरों की भाँति तीव्रगति से जा रहे थे॥२४॥
अङ्गदं पुरतः कृत्वा हनूमन्तं च वानरम्।
तेऽम्बरं सहसोत्पत्य वेगवन्तः प्लवङ्गमाः॥२५॥
विनदन्तो महानादं घना वातेरिता यथा।
अङ्गद और वानरवीर हनुमान् को आगे करके सभी वेगवान् वानर सहसा आकाश में उछलकर वायु से उड़ाये गये बादलों की भाँति बड़े जोर-जोर से गर्जना करते हुए किष्किन्धा के निकट जा पहुँचे॥ २५ १/२॥
अङ्गदे समनुप्राप्ते सुग्रीवो वानरेश्वरः॥२६॥
उवाच शोकसंतप्तं रामं कमललोचनम्।
अङ्गद के निकट पहुँचते ही वानरराज सुग्रीव ने शोकसंतप्त कमलनयन श्रीराम से कहा- ॥ २६ १/२॥
समाश्वसिहि भद्रं ते दृष्टा देवी न संशयः॥२७॥
नागन्तुमिह शक्यं तैरतीतसमयैरिह।
‘प्रभो! धैर्य धारण कीजिये। आपका कल्याण हो। सीता देवी का पता लग गया है, इसमें संशय नहीं है; क्योंकि कृतकार्य हुए बिना दिये हुए समय की अवधि को बिताकर ये वानर कदापि यहाँ नहीं आ सकते थे॥
अङ्गदस्य प्रहर्षाच्च जानामि शुभदर्शन॥२८॥
न मत्सकाशमागच्छेत् कृत्ये हि विनिपातिते।
युवराजो महाबाहुः प्लवतामङ्गदो वरः॥२९॥
‘शुभदर्शन श्रीराम! अङ्गद की अत्यन्त प्रसन्नता से भी मुझे इसी बात की सूचना मिल रही है। यदि काम बिगाड़ दिया गया होता तो वानरों में श्रेष्ठ युवराज महाबाहु अङ्गद मेरे पास कदापि लौटकर नहीं आते॥ २८-२९॥
यद्यप्यकृतकृत्यानामीदृशः स्यादुपक्रमः।
भवेत् तु दीनवदनो भ्रान्तविप्लुतमानसः॥३०॥
‘यद्यपि कार्य सिद्ध न होने पर भी इस तरह लोगों का अपने घर लौटना देखा गया है, तथापि उस दशा में अङ्गद के मुखपर उदासी छायी होती और उनके चित्त में घबराहट के कारण उथल-पुथल मची होती॥
३०॥
पितृपैतामहं चैतत् पूर्वकैरभिरक्षितम्।
न मे मधुवनं हन्याददृष्ट्वा जनकात्मजाम्॥३१॥
‘मेरे बाप-दादों के इस मधुवन का, जिसकी पूर्वजों ने भी सदा रक्षा की है, कोई जनककिशोरी का दर्शन किये बिना विध्वंस नहीं कर सकता था॥ ३१॥
कौसल्या सुप्रजा राम समाश्वसिहि सुव्रत।
दृष्टा देवी न संदेहो न चान्येन हनूमता॥३२॥
‘उत्तम व्रत का पालन करने वाले श्रीराम! आपको पाकर माता कौसल्या उत्तम संतान की जननी हुई हैं। आप धैर्य धारण कीजिये। इसमें कोई संदेह नहीं कि देवी सीता का दर्शन हो गया किसी और ने नहीं, हनुमान जी ने ही उनका दर्शन किया है॥ ३२ ॥
नान्यः कर्मणो हेतुः साधनेऽस्य हनूमतः।
हनूमतीह सिद्धिश्च मतिश्च मतिसत्तम॥३३॥
व्यवसायश्च शौर्यं च श्रुतं चापि प्रतिष्ठितम्।
जाम्बवान् यत्र नेता स्यादङ्गदश्च हरीश्वरः॥३४॥
हनूमांश्चाप्यधिष्ठाता न तत्र गतिरन्यथा।
‘मतिमानों में श्रेष्ठ रघुनन्दन! इस कार्य को सिद्ध करने में हनुमान जी के सिवा और कोई कारण बना हो, ऐसा सम्भव नहीं है। वानरशिरोमणि हनुमान् में ही कार्यसिद्धि की शक्ति और बुद्धि है। उन्हीं में उद्योग, पराक्रम और शास्त्रज्ञान भी प्रतिष्ठित है। जिस दल के नेता जाम्बवान् और महाबली अङ्गद हों तथा अधिष्ठाता हनुमान् हों, उस दल को विपरीत परिणाम -असफलता मिले, यह सम्भव नहीं है।
मा भूश्चिन्तासमायुक्तः सम्प्रत्यमितविक्रम॥३५॥
यदा हि दर्पितोदग्राः संगताः काननौकसः।
नैषामकृतकार्याणामीदृशः स्यादुपक्रमः॥३६॥
वनभङ्गेन जानामि मधूनां भक्षणेन च।
‘अमित पराक्रमी श्रीराम! अब आप चिन्ता न करें। ये वनवासी वानर जो इतने अहंकार में भरे हुए आ रहे हैं, कार्य सिद्ध हुए बिना इनका इस तरह आना सम्भव नहीं था। इनके मधु पीने और वन उजाड़ने से भी मुझे ऐसा ही प्रतीत होता है’ ॥ ३५-३६ १/२॥
ततः किलकिलाशब्दं शुश्रावासन्नमम्बरे॥ ३७॥
हनूमत्कर्मदृप्तानां नदतां काननौकसाम्।
किष्किन्धामुपयातानां सिद्धिं कथयतामिव॥३८॥
वे इस प्रकार कह ही रहे थे कि उन्हें आकाश में निकट से वानरों की किलकारियाँ सुनायी दीं। हनुमान् जी के पराक्रमपर गर्व करके किष्किन्धा के पास आ गर्जना करने वाले वे वनवासी वानर मानो सिद्धि की सूचना दे रहे थे॥ ३७-३८॥
ततः श्रुत्वा निनादं तं कपीनां कपिसत्तमः।
आयताञ्चितलाङ्गलः सोऽभवद्हृष्टमानसः॥३९॥
उन वानरोंका वह सिंहनाद सुनकर कपिश्रेष्ठ सुग्रीव का हृदय हर्ष से खिल उठा। उन्होंने अपनी पूँछ लंबी एवं ऊँची कर दी॥ ३९॥
आजग्मुस्तेऽपि हरयो रामदर्शनकाङ्गिणः।
अङ्गदं पुरतः कृत्वा हनूमन्तं च वानरम्॥४०॥
इतने में ही श्रीरामचन्द्रजीके दर्शन की इच्छा से अङ्गद और वानरवीर हनुमान् को आगे करके वे सब वानर वहाँ आ पहुँचे॥ ४०॥
तेऽङ्गदप्रमुखा वीराः प्रहृष्टाश्च मुदान्विताः।
निपेतुर्हरिराजस्य समीपे राघवस्य च॥४१॥
वे अङ्गद आदि वीर आनन्द और उत्साह से भरकर वानरराज सुग्रीव तथा रघुनाथजी के समीप आकाश से नीचे उतरे॥४१॥
हनूमांश्च महाबाहुः प्रणम्य शिरसा ततः।
नियतामक्षतां देवीं राघवाय न्यवेदयत्॥४२॥
महाबाहु हनुमान् ने श्रीरघुनाथजी के चरणों में मस्तक रखकर प्रणाम किया और उन्हें यह बताया कि ‘देवी सीता पातिव्रत्य के कठोर नियमों का पालन करती हुई शरीर से सकुशल हैं’॥४२॥
दृष्टा देवीति हनुमददनादमृतोपमम्।
आकर्ण्य वचनं रामो हर्षमाप सलक्ष्मणः॥४३॥
‘मैंने देवी सीता का दर्शन किया है’ हनुमान जी के मुख से यह अमृत के समान मधुर वचन सुनकर लक्ष्मणसहित श्रीराम को बड़ी प्रसन्नता हुई॥४३॥
निश्चितार्थं ततस्तस्मिन् सुग्रीवं पवनात्मजे।
लक्ष्मणः प्रीतिमान् प्रीतं बहुमानादवैक्षत॥४४॥
पवनपुत्र हनुमान् के विषय में सुग्रीव ने पहले से ही निश्चय कर लिया था कि उन्हीं के द्वारा कार्य सिद्ध हुआ है। इसलिये प्रसन्न हुए लक्ष्मण ने प्रीतियुक्त सुग्रीव की ओर बड़े आदर से देखा॥४४॥
प्रीत्या च परयोपेतो राघवः परवीरहा।
बहुमानेन महता हनूमन्तमवैक्षत॥४५॥
शत्रुवीरों का संहार करनेवाले श्रीरघुनाथजी ने परम प्रीति और महान् सम्मान के साथ हनुमान जी की ओर देखा॥४५॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे चतुःषष्टितमः सर्गः॥६४॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में चौंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ।६४॥
सर्ग-65
ततः प्रस्रवणं शैलं ते गत्वा चित्रकाननम्।
प्रणम्य शिरसा रामं लक्ष्मणं च महाबलम्॥१॥
युवराजं पुरस्कृत्य सुग्रीवमभिवाद्य च।
प्रवृत्तिमथ सीतायाः प्रवक्तुमुपचक्रमुः॥२॥
तदनन्तर विचित्र काननों से सुशोभित प्रस्रवण पर्वत पर जाकर युवराज अङ्गद को आगे करके श्रीराम, महाबली लक्ष्मण तथा सुग्रीव को मस्तक झुकाकर प्रणाम करने के अनन्तर सब वानरों ने सीता का समाचार बताना आरम्भ किया- ॥ १-२॥
रावणान्तःपुरे रोधं राक्षसीभिश्च तर्जनम्।
रामे समनुरागं च यथा च नियमः कृतः॥३॥
एतदाख्याय ते सर्वं हरयो रामसंनिधौ।
वैदेहीमक्षतां श्रुत्वा रामस्तूत्तरमब्रवीत्॥४॥
‘सीता देवी रावण के अन्तःपुर में रोक रखी गयी हैं। राक्षसियाँ उन्हें धमकाती रहती हैं। श्रीराम के प्रति उनका अनन्य अनुराग है। रावण ने सीता के जीवित रहने के लिये केवल दो मास की अवधि दे रखी है।इस समय विदेह-कुमारी को कोई क्षति नहीं पहुँची है –वे सकुशल हैं।’ श्रीरामचन्द्रजी के निकट ये सब बातें बताकर वे वानर चुप हो गये। विदेहकुमारी के सकुशल होने का वृत्तान्त सुनकर श्रीराम ने आगे की बात पूछते हुए कहा— ॥३-४॥
क्व सीता वर्तते देवी कथं च मयि वर्तते।
एतन्मे सर्वमाख्यात वैदेहीं प्रति वानराः॥५॥
‘वानरो! देवी सीता कहाँ हैं? मेरे प्रति उनका कैसा भाव है ? विदेहकुमारी के विषय में ये सारी बातें मुझसे कहो’ ॥ ५॥
रामस्य गदितं श्रुत्वा हरयो रामसंनिधौ।
चोदयन्ति हनूमन्तं सीतावृत्तान्तकोविदम्॥६॥
श्रीरामचन्द्रजी का यह कथन सुनकर वे वानर श्रीराम के निकट सीता के वृत्तान्त को अच्छी तरह जानने वाले हनुमान जी को उत्तर देने के लिये प्रेरित करने लगे॥६॥
श्रुत्वा तु वचनं तेषां हनूमान् मारुतात्मजः।
प्रणम्य शिरसा देव्यै सीतायै तां दिशं प्रति॥७॥
उन वानरों की बात सुनकर पवनपुत्र हनुमान जी ने पहले देवी सीता के उद्देश्य से दक्षिण दिशा की ओर मस्तक झुकाकर प्रणाम किया॥७॥
उवाच वाक्यं वाक्यज्ञः सीताया दर्शनं यथा।
तं मणिं काञ्चनं दिव्यं दीप्यमानं स्वतेजसा॥८॥
दत्त्वा रामाय हनुमांस्ततः प्राञ्जलिरब्रवीत्।
फिर बातचीतकी कला को जानने वाले उन वानरवीर ने सीताजी का दर्शन जिस प्रकार हुआ था, वह सारा वृत्तान्त कह सुनाया। तत्पश्चात् अपने तेज से प्रकाशित होने वाली उस दिव्य काञ्चनमणि को भगवान् श्रीराम के हाथ में देकर हनुमान जी हाथ जोड़कर बोले- ॥ ८ १/२॥
समुद्रं लवयित्वाहं शतयोजनमायतम्॥९॥
अगच्छं जानकी सीतां मार्गमाणो दिदृक्षया।
‘प्रभो! मैं जनकनन्दिनी सीता के दर्शन की इच्छा से उनका पता लगाता हुआ सौ योजन विस्तृत समुद्र को लाँघकर उसके दक्षिण किनारे पर जा पहुँचा॥ ९ १/२॥
तत्र लङ्केति नगरी रावणस्य दुरात्मनः॥१०॥
दक्षिणस्य समुद्रस्य तीरे वसति दक्षिणे।
‘वहीं दुरात्मा रावण की नगरी लङ्का है। वह समुद्र के दक्षिण तट पर ही बसी हुई है॥ १० १/२॥
तत्र सीता मया दृष्टा रावणान्तःपुरे सती॥११॥
त्वयि संन्यस्य जीवन्ती रामा राम मनोरथम्।
दृष्टा मे राक्षसीमध्ये तय॑माना मुहुर्मुहुः॥१२॥
राक्षसीभिर्विरूपाभी रक्षिता प्रमदावने।
‘श्रीराम! लङ्का में पहुँचकर मैंने रावण के अन्तःपुर में प्रमदावन के भीतर राक्षसियों के बीच में बैठी हुई सतीसाध्वी सुन्दरी देवी सीता का दर्शन किया। वे अपनी सारी अभिलाषाओं को आप में ही केन्द्रित करके किसी तरह जीवन धारण कर रही हैं। विकराल रूपवाली राक्षसियाँ उनकी रखवाली करती हैं और बारंबार उन्हें डाँटती-फटकारती रहती हैं॥ ११-१२ १/२॥
दुःखमापद्यते देवी त्वया वीर सुखोचिता॥१३॥
रावणान्तःपुरे रुद्वा राक्षसीभिः सुरक्षिता।
एकवेणीधरा दीना त्वयि चिन्तापरायणा॥१४॥
‘वीरवर! देवी सीता आपके साथ सुख भोगनेके योग्य हैं, परंतु इस समय बड़े दुःखसे दिन बिता रही हैं। उन्हें रावणके अन्तःपुरमें रोक रखा गया है और वे राक्षसियोंके पहरेमें रहती हैं। सिरपर एक वेणी धारण किये दुःखी हो सदा आपकी चिन्तामें डूबी रहती हैं॥ १३-१४॥
अधःशय्या विवर्णाङ्गी पद्मिनीव हिमागमे।
रावणाद् विनिवृत्तार्था मर्तव्यकृतनिश्चया॥१५॥
‘वे नीचे भूमि पर सोती हैं जैसे जाड़े के दिनों में पाला पड़ने के कारण कमलिनी सूख जाती है, उसी प्रकार उनके अङ्गों की कान्ति फीकी पड़ गयी है। रावण से उनका कोई प्रयोजन नहीं है। उन्होंने प्राण त्याग देने का निश्चय कर लिया है॥ १५ ॥
देवी कथंचित् काकुत्स्थ त्वन्मना मार्गिता मया।
इक्ष्वाकुवंशविख्यातिं शनैः कीर्तयतानघ॥१६॥
सा मया नरशार्दूल शनैर्विश्वासिता तदा।
ततः सम्भाषिता देवी सर्वमर्थं च दर्शिता॥१७॥
‘ककुत्स्थकुलभूषण! उनका मन निरन्तर आप में ही लगा रहता है। निष्पाप नरश्रेष्ठ ! मैंने बड़ा प्रयत्न करके किसी तरह महारानी सीता का पता लगाया और धीरे-धीरे इक्ष्वाकुवंश की कीर्ति का वर्णन करते हुए किसी प्रकार उनके हृदय में अपने प्रति विश्वास उत्पन्न किया। तत्पश्चात् देवी से वार्तालाप करके मैंने यहाँ की सब बातें उन्हें बतलायीं॥ १६-१७॥
रामसुग्रीवसख्यं च श्रुत्वा हर्षमुपागता।
नियतः समुदाचारो भक्तिश्चास्याः सदा त्वयि॥१८॥
‘आपकी सुग्रीव के साथ मित्रता का समाचार सुनकर उन्हें बड़ा हर्ष हुआ। उनका उच्चकोटि का आचार-विचार (पातिव्रत्य) सुदृढ़ है। वे सदा आप में ही भक्ति रखती हैं॥ १८॥
एवं मया महाभाग दृष्टा जनकनन्दिनी।
उग्रेण तपसा युक्ता त्वद्भक्त्या पुरुषर्षभ॥१९॥
‘महाभाग! पुरुषोत्तम! इस प्रकार जनकनन्दिनी को मैंने आपकी भक्ति से प्रेरित होकर कठोर तपस्या करते देखा है॥ १९॥
अभिज्ञानं च मे दत्तं यथावृत्तं तवान्तिके।
चित्रकूटे महाप्राज्ञ वायसं प्रति राघव॥२०॥
‘महामते! रघुनन्दन! चित्रकूटमें आपके पास देवी के रहते समय एक कौए को लेकर जो घटना घटित हुई थी, उस वृत्तान्त को उन्होंने पहचान के रूप में मुझसे कहा था॥ २० ॥
विज्ञाप्यः पुनरप्येष रामो वायुसुत त्वया।
अखिलेन यथा दृष्टमिति मामाह जानकी॥२१॥
अयं चास्मै प्रदातव्यो यत्नात् सुपरिरक्षितः।
‘जानकीजी ने आते समय मुझसे कहा —’वायुनन्दन! तुम यहाँ जैसी मेरी हालत देख चुके हो, वह सब भगवान् श्रीराम को बताना और इस मणि को बड़े यत्न से सुरक्षित रूप में ले जाकर उनके हाथ में देना ॥ २१ १/२॥
ब्रुवता वचनान्येवं सुग्रीवस्योपशृण्वतः॥२२॥
एष चूडामणिः श्रीमान् मया ते यत्नरक्षितः।
मनःशिलायास्तिलकं तत् स्मरस्वेति चाब्रवीत्॥२३॥
एष निर्यातितः श्रीमान् मया ते वारिसम्भवः।
एनं दृष्ट्वा प्रमोदिष्ये व्यसने त्वामिवानघ॥२४॥
‘ऐसे समय में देना, जब कि सुग्रीव भी निकट बैठकर तुम्हारी कही हुई बातें सुन रहे हों। साथ ही मेरी ये बातें भी उनसे निवेदन करना—’प्रभो! आपकी दी हुई यह कान्तिमती चूड़ामणि मैंने बड़े यत्न से सुरक्षित रखी थी। जल से प्रकट हुए इस दीप्तिमान् रत्न को मैंने आपकी सेवा में लौटाया है। निष्पाप रघुनन्दन! संकट के समय इसे देखकर मैं उसी प्रकार आनन्दमग्न हो जाती थी, जैसे आपके दर्शन से आनन्दित होती हूँ। आपने मेरे ललाट में जो मैनसिल का तिलक लगाया था, इसको स्मरण कीजिये’ ये बातें जानकीजी ने कही थीं॥ २२–२४॥
जीवितं धारयिष्यामि मासं दशरथात्मज।
ऊर्ध्वं मासान्न जीवेयं रक्षसां वशमागता॥२५॥
‘उन्होंने यह भी कहा—’दशरथनन्दन! मैं एक मास और जीवन धारण करूँगी। उसके बाद राक्षसों के वश में पड़कर प्राण त्याग दूंगी—किसी तरह जीवित नहीं रह सकूँगी’ ॥ २५ ॥
इति मामब्रवीत् सीता कृशाङ्गी धर्मचारिणी।
रावणान्तःपुरे रुद्धा मृगीवोत्फुल्ललोचना॥२६॥
‘इस प्रकार दुबले-पतले शरीरवाली धर्मपरायणा सीता ने मुझे आपसे कहने के लिये यह संदेश दिया था। वे रावण के अन्तःपुर में कैद हैं और भय के मारे आँख फाड़-फाड़कर इधर-उधर देखने वाली हरिणी के समान वे सशङ्क दृष्टि से सब ओर देखा करती हैं। २६॥
एतदेव मयाऽऽख्यातं सर्वं राघव यद् यथा।
सर्वथा सागरजले संतारः प्रविधीयताम्॥२७॥
‘रघुनन्दन! यही वहाँका वृत्तान्त है, जो सब-का सब मैंने आपकी सेवा में निवेदन कर दिया। अब सब प्रकार से समुद्र को पार करने का प्रयत्न कीजिये।२७॥
तौ जाताश्वासौ राजपुत्रौ विदित्वा तच्चाभिज्ञानं राघवाय प्रदाय।
देव्या चाख्यातं सर्वमेवानुपूर्व्याद् वाचा सम्पूर्णं वायुपुत्रः शशंस॥२८॥
राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण को कुछ आश्वासन मिल गया, ऐसा जानकर तथा वह पहचान श्रीरघुनाथजी के हाथ में देकर वायुपुत्र हनुमान् ने देवी सीता की कही हुई सारी बातें क्रमशः अपनी वाणी द्वारा पूर्ण रूप से कह सुनायीं॥ २८॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे पञ्चषष्टितमः सर्गः॥६५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें पैंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ।६५॥
सर्ग-66
एवमुक्तो हनुमता रामो दशरथात्मजः।
तं मणिं हृदये कृत्वा रुरोद सहलक्ष्मणः॥
हनुमान जी के ऐसा कहने पर दशरथनन्दन उस मणि को अपनी छाती से लगाकर रोने लगे साथ ही लक्ष्मण भी रो पड़े॥१॥
तं तु दृष्ट्वा मणिश्रेष्ठं राघवः शोककर्शितः।
नेत्राभ्यामश्रुपूर्णाभ्यां सुग्रीवमिदमब्रवीत्॥२॥
उस श्रेष्ठ मणि की ओर देखकर शोक से व्याकुल हुए श्रीरघुनाथजी अपने दोनों नेत्रों में आँसू भरकर सुग्रीव से इस प्रकार बोले- ॥२॥
यथैव धेनुः स्रवति स्नेहाद् वत्सस्य वत्सला।
तथा ममापि हृदयं मणिश्रेष्ठस्य दर्शनात्॥३॥
‘मित्र! जैसे वत्सला धेनु अपने बछड़े के स्नेह से थनों से दूध झरने लगती है, उसी प्रकार इस उत्तम मणि को देखकर आज मेरा हृदय भी द्रवीभूत हो रहा है॥३॥
मणिरत्नमिदं दत्तं वैदेह्याः श्वशुरेण मे।
वधूकाले यथा बद्धमधिकं मूर्ध्नि शोभते॥४॥
‘मेरे श्वशुर राजा जनक ने विवाह के समय वैदेही को यह मणिरत्न दिया था, जो उसके मस्तक पर आबद्ध होकर बड़ी शोभा पाता था॥४॥
अयं हि जलसम्भूतो मणिः प्रवरपूजितः।
यज्ञे परमतुष्टेन दत्तः शक्रेण धीमता॥५॥
‘जल से प्रकट हुई यह मणि श्रेष्ठ देवताओं द्वारा पूजित है। किसी यज् ञमें बहुत संतुष्ट हुए बुद्धिमान् इन्द्र ने राजा जनक को यह मणि दी थी॥५॥
इमं दृष्ट्वा मणिश्रेष्ठं तथा तातस्य दर्शनम्।
अद्यास्म्यवगतः सौम्य वैदेहस्य तथा विभोः॥६॥
‘सौम्य! इस मणिरत्न का दर्शन करके आज मुझे मानो अपने पूज्य पिता का और विदेहराज महाराज जनक का भी दर्शन मिल गया हो, ऐसा अनुभव हो रहा है॥६॥
अयं हि शोभते तस्याः प्रियाया मूर्ध्नि मे मणिः।
अद्यास्य दर्शनेनाहं प्राप्तां तामिव चिन्तये॥७॥
‘यह मणि सदा मेरी प्रिया सीताके सीमन्त पर शोभा पाती थी। आज इसे देखकर ऐसा जान पड़ता है मानो सीता ही मुझे मिल गयी॥७॥
किमाह सीता वैदेही ब्रूहि सौम्य पुनः पुनः।
परासुमिव तोयेन सिञ्चन्ती वाक्यवारिणा॥८॥
‘सौम्य पवनकुमार! जैसे बेहोश हुए मनुष्य को होश में लाने के लिये उसपर जल के छींटे दिये जाते हैं, उसी प्रकार विदेहनन्दिनी सीता ने मूर्छित हुए-से मुझ राम को अपने वाक्यरूपी शीतल जल से सींचते हुए क्या-क्या कहा है ? यह बारंबार बताओ’ ॥ ८॥
इतस्तु किं दुःखतरं यदिमं वारिसम्भवम्।
मणिं पश्यामि सौमित्रे वैदेहीमागतां विना॥९॥
(अब वे लक्ष्मण से बोले-) ‘सुमित्रानन्दन! सीता के यहाँ आये बिना ही जो जल से उत्पन्न हुई इस मणि को मैं देख रहा हूँ। इससे बढ़कर दुःखकी बात और क्या हो सकती है’ ॥९॥
चिरं जीवति वैदेही यदि मासं धरिष्यति।
क्षणं वीर न जीवेयं विना तामसितेक्षणाम्॥१०॥
(फिर वे हनुमान जी से बोले-) ‘वीर पवनकुमार! यदि विदेहनन्दनी सीता एक मास तक जीवन धारण कर लेगी, तब तो वह बहुत समयतक जी रही है। मैं तो कजरारे नेत्रोंवाली जानकी के बिना अब एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकता॥ १० ॥
नय मामपि तं देशं यत्र दृष्टा मम प्रिया।
न तिष्ठेयं क्षणमपि प्रवृत्तिमुपलभ्य च॥११॥
‘तुमने जहाँ मेरी प्रिया को देखा है, उसी देश में मुझे भी ले चलो। उसका समाचार पाकर अब मैं एक क्षण भी यहाँ नहीं रुक सकता॥ ११॥
कथं सा मम सुश्रोणी भीरुभीरुः सती तदा।
भयावहानां घोराणां मध्ये तिष्ठति रक्षसाम्॥१२॥
‘हाय! मेरी सती-साध्वी सुमध्यमा सीता बड़ी भीरु है। वह उन घोर रूपधारी भयंकर राक्षसों के बीच में कैसे रहती होगी? ॥ १२॥
शारदस्तिमिरोन्मुक्तो नूनं चन्द्र इवाम्बुदैः।
आवृतो वदनं तस्या न विराजति साम्प्रतम्॥१३॥
‘निश्चय ही अन्धकार से मुक्त किंतु बादलों से ढके हुए शरत्कालीन चन्द्रमा के समान सीता का मुख इस समय शोभा नहीं पा रहा होगा॥ १३॥
किमाह सीता हनुमंस्तत्त्वतः कथयस्व मे।
एतेन खलु जीविष्ये भेषजेनातुरो यथा॥१४॥
‘हनुमन्! मुझे ठीक-ठीक बताओ, सीता ने क्या क्या कहा है ? जैसे रोगी दवा लेने से जीता है, उसी प्रकार मैं सीता के इस संदेश-वाक्य को सुनकर ही जीवन धारण करूँगा॥१४॥
मधुरा मधुरालापा किमाह मम भामिनी।
मद्विहीना वरारोहा हनुमन् कथयस्व मे।
दुःखाद् दुःखतरं प्राप्य कथं जीवति जानकी॥१५॥
‘हनुमन्! मुझसे बिछुड़ी हुई मेरी सुन्दर कटिप्रदेशवाली मधुरभाषिणी सुन्दरी प्रियतमा जनकनन्दिनी सीता ने मेरे लिये कौन-सा संदेश दिया है? वह दुःख-पर-दुःख उठाकर भी कैसे जीवन धारण कर रही है ?’ ॥ १५ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे षट्षष्टितमः सर्गः॥६६॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में छाछठवाँ सर्ग पूरा हुआ।६६॥
सर्ग-67
एवमुक्तस्तु हनुमान् राघवेण महात्मना।
सीताया भाषितं सर्वं न्यवेदयत राघवे॥१॥
महात्मा श्रीरघुनाथजी के ऐसा कहने पर श्रीहनुमान् जी ने सीताजी की कही हुई सब बातें उनसे निवेदन कर दीं॥१॥
इदमुक्तवती देवी जानकी पुरुषर्षभ।
पूर्ववृत्तमभिज्ञानं चित्रकूटे यथातथम्॥२॥
वे बोले—’पुरुषोत्तम! जानकी देवी ने पहले चित्रकूट पर बीती हुई एक घटना का यथावत् रूप से वर्णन किया था। उसे उन्होंने पहचान के तौर पर इस प्रकार कहा था॥२॥
सुखसुप्ता त्वया सार्धं जानकी पूर्वमुत्थिता।
वायसः सहसोत्पत्य विददार स्तनान्तरम्॥३॥
‘पहले चित्रकूट में कभी जानकी देवी आपके साथ सुखपूर्वक सोयी थीं। वे सोकर आपसे पहले उठ गयीं। उस समय किसी कौए ने सहसा उड़कर उनकी छाती में चोंच मार दी॥ ३॥
पर्यायेण च सुप्तस्त्वं देव्यङ्के भरताग्रज।
पुनश्च किल पक्षी स देव्या जनयति व्यथा॥४॥
‘भरताग्रज! आपलोग बारी-बारी से एक-दूसरे के अङ्क में सिर रखकर सोते थे। जब आप देवी के अङ्क में मस्तक रखकर सोये थे, उस समय पुनः उसी पक्षी ने आकर देवी को कष्ट देना आरम्भ किया॥४॥
ततः पुनरुपागम्य विददार भृशं किल।
ततस्त्वं बोधितस्तस्याः शोणितेन समुक्षितः॥५॥
‘कहते हैं उसने फिर आकर जोर से चोंच मार दी। तब देवी के शरीर से रक्त बहने लगा और उससे भीग जाने के कारण आप जग उठे॥५॥
वायसेन च तेनैवं सततं बाध्यमानया।
बोधितः किल देव्या त्वं सुखसुप्तः परंतप॥६॥
‘शत्रुओं को संताप देने वाले रघुनन्दन! उस कौए ने जब लगातार इस तरह पीड़ा दी, तब देवी सीता ने सुख से सोये हुए आपको जगा दिया॥६॥
तां च दृष्ट्वा महाबाहो दारितां च स्तनान्तरे।
आशीविष इव क्रुद्धस्ततो वाक्यं त्वमूचिवान्॥७॥
‘महाबाहो! उनकी छाती में घाव हुआ देख आप विषधर सर्प के समान कुपित हो उठे और इस प्रकार बोले- ॥७॥
नखाग्रैः केन ते भीरु दारितं वै स्तनान्तरम्।
कः क्रीडति सरोषेण पञ्चवक्त्रेण भोगिना॥८॥
‘भीरु! किसने अपने नखों के अग्रभाग से तुम्हारी छाती में घाव कर दिया है? कौन कुपित हुए पाँच मुँहवाले सर्प के साथ खेल रहा है?’॥८॥
निरीक्षमाणः सहसा वायसं समुदैक्षथाः।
नखैः सरुधिरैस्तीक्ष्णैस्तामेवाभिमुखं स्थितम्॥
‘ऐसा कहकर आपने जब सहसा इधर-उधर दृष्टि डाली, तब उस कौए को देखा। उसके तीखे पंजे खून में रँगे हुए थे और वह सीता देवी की ओर मुँह करके ही कहीं बैठा था॥९॥
सुतः किल स शक्रस्य वायसः पततां वरः।
धरान्तरगतः शीघ्रं पवनस्य गतौ समः॥१०॥
सुना है, उड़ने वालों में श्रेष्ठ वह कौआ साक्षात् इन्द्र का पुत्र था, जो उन दिनों पृथ्वी पर विचर रहा था। वह वायुदेवता के समान शीघ्रगामी था॥ १० ॥
ततस्तस्मिन् महाबाहो कोपसंवर्तितेक्षणः।
वायसे त्वं व्यधाः क्रूरां मतिं मतिमतां वर॥११॥
‘मतिमानों में श्रेष्ठ महाबाहो! उस समय आपके नेत्र क्रोध से घूमने लगे और आपने उस कौए को कठोर दण्ड देने का विचार किया॥ ११॥
स दर्भसंस्तराद् गृह्य ब्रह्मास्त्रेण न्ययोजयः।
स दीप्त इव कालाग्निर्जज्वालाभिमुखं खगम्॥१२॥
‘आपने अपनी चटाई में से एक कुशा निकालकर हाथ में ले लिया और उसे ब्रह्मास्त्र से अभिमन्त्रित किया। फिर तो वह कुश प्रलयकाल की अग्नि के समान प्रज्वलित हो उठा। उसका लक्ष्य वह कौआ ही था॥ १२॥
स त्वं प्रदीप्तं चिक्षेप दर्भ तं वायसं प्रति।
ततस्तु वायसं दीप्तः स दर्भोऽनुजगाम ह॥१३॥
‘आपने उस जलते हुए कुश को कौए की ओर छोड़ दिया। फिर तो वह दीप्तिमान् दर्भ उस कौए का पीछा करने लगा॥१३॥
भीतैश्च सम्परित्यक्तः सुरैः सर्वैश्च वायसः।
त्रील्लोकान् सम्परिक्रम्य त्रातारं नाधिगच्छति॥१४॥
‘आपके भय से डरे हुए समस्त देवताओं ने भी उस कौए को त्याग दिया। वह तीनों लोकों मे चक्कर लगाता फिरा, किंतु कहीं भी उसे कोई रक्षक नहीं मिला। १४॥
पुनरप्यागतस्तत्र त्वत्सकाशमरिंदम।
त्वं तं निपतितं भूमौ शरण्यः शरणागतम्॥१५॥
वधार्हमपि काकुत्स्थ कृपया परिपालयः।
‘शत्रुदमन श्रीराम! सब ओर से निराश होकर वह कौआ फिर वहीं आपकी शरण में आया। शरण में आकर पृथ्वी पर पड़े हुए उस कौए को आपने शरण में ले लिया; क्योंकि आप शरणागतवत्सल हैं। यद्यपि वह वध के योग्य था तो भी आपने कृपापूर्वक उसकी रक्षा की॥
मोघमस्त्रं न शक्यं तु कर्तुमित्येव राघव॥१६॥
भवांस्तस्याक्षि काकस्य हिनस्ति स्म स दक्षिणम्।
‘रघुनन्दन! उस ब्रह्मास्त्र को व्यर्थ नहीं किया जा सकता था, इसलिये आपने उस कौए की दाहिनी आँख फोड़ डाली॥ १६ १/२ ॥
राम त्वां स नमस्कृत्य राज्ञो दशरथस्य च॥१७॥
विसृष्टस्तु तदा काकः प्रतिपेदे स्वमालयम्।
‘श्रीराम! तदनन्तर आपसे विदा ले वह कौआ भूतलपर आपको और स्वर्ग में राजा दशरथ को नमस्कार करके अपने घर को चला गया। १७ १/२॥
एवमस्त्रविदां श्रेष्ठः सत्त्ववाञ्छीलवानपि॥१८॥
किमर्थमस्त्रं रक्षःसु न योजयसि राघव।
(सीता कहती हैं-) ‘रघुनन्दन! इस प्रकार अस्त्र-वेत्ताओं में श्रेष्ठ, शक्तिशाली और शीलवान् होते हुए भी आप राक्षसों पर अपने अस्त्र का प्रयोग क्यों नहीं करते हैं ? ॥ १८ १/२॥
न दानवा न गन्धर्वा नासुरा न मरुद्गणाः॥१९॥
तव राम रणे शक्तास्तथा प्रतिसमासितुम्।
‘श्रीराम! दानव, गन्धर्व, असुर और देवता कोई भी समराङ्गण में आपका सामना नहीं कर सकते॥ १९ १/२॥
तव वीर्यवतः कश्चिन्मयि यद्यस्ति सम्भ्रमः॥२०॥
क्षिप्रं सुनिशितैर्बाणैर्हन्यतां युधि रावणः।
‘आप बल-पराक्रम से सम्पन्न हैं। यदि मेरे प्रति आपका कुछ भी आदर है तो आप शीघ्र ही अपने तीखे बाणों से रणभूमि में रावण को मार डालिये॥ २० १/२॥
भ्रातुरादेशमाज्ञाय लक्ष्मणो वा परंतपः॥ २१॥
स किमर्थं नरवरो न मां रक्षति राघवः।
‘हनुमन्! अथवा अपने भाई की आज्ञा लेकर शत्रुओं को संताप देने वाले रघुकुलतिलक नरश्रेष्ठ लक्ष्मण क्यों नहीं मेरी रक्षा करते हैं? ॥ २१ १/२ ॥
शक्तौ तौ पुरुषव्याघ्रौ वाय्वग्निसमतेजसौ॥ २२॥
सुराणामपि दुर्धर्षों किमर्थं मामुपेक्षतः।
‘वे दोनों पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मण वायु तथा अग्नि के तुल्य तेजस्वी एवं शक्तिशाली हैं, देवताओं के लिये भी दुर्जय हैं; फिर किसलिये मेरी उपेक्षा कर रहे हैं? ॥ २२ १/२॥
ममैव दुष्कृतं किंचिन्महदस्ति न संशयः॥ २३॥
समर्थौ सहितौ यन्मां न रक्षेते परंतपौ।
‘इसमें संदेह नहीं कि मेरा ही कोई ऐसा महान् पाप है, जिसके कारण वे दोनों शत्रुसंतापी वीर एक साथ रहकर समर्थ होते हुए मेरी रक्षा नहीं कर रहे हैं’। २३ १/२॥
वैदेह्या वचनं श्रुत्वा करुणं साधुभाषितम्॥२४॥
पुनरप्यहमारू तामिदं वचनमब्रुवम्।
‘रघुनन्दन! विदेहनन्दिनी का करुणाजनक उत्तम वचन सुनकर मैंने पुनः आर्या सीता से यह बात कही-॥
त्वच्छोकविमुखो रामो देवि सत्येन ते शपे॥२५॥
रामे दुःखाभिभूते च लक्ष्मणः परितप्यते।
‘देवि! मैं सत्य की शपथ खाकर कहता हूँ कि श्रीरामचन्द्रजी तुम्हारे शोक के कारण ही सब कार्यों से विरत हो रहे हैं। श्रीराम के दुःखी होने से लक्ष्मण भी संतप्त हो रहे हैं। २५ १/२॥
कथंचिद् भवती दृष्टा न कालः परिशोचितुम्॥२६॥
अस्मिन् मुहूर्ते दुःखानामन्तं द्रक्ष्यसि भामिनि।
‘किसी तरह आपका दर्शन हो गया (आपके निवास-स्थान का पता लग गया), अतः अब शोक करने का अवसर नहीं है। भामिनि! आप इसी मुहूर्त में अपने सारे दुःखों का अन्त हुआ देखेंगी॥ २६ १/२ ॥
तावुभौ नरशार्दूलौ राजपुत्रौ परंतपौ॥२७॥
त्वदर्शनकृतोत्साहौ लङ्कां भस्मीकरिष्यतः।
‘शत्रुओं को संताप देनेवाले वे दोनों नरश्रेष्ठ राजकुमार आपके दर्शन के लिये उत्साहित हो लङ्कापुरी को जलाकर भस्म कर देंगे॥ २७ १/२ ॥
हत्वा च समरे रौद्रं रावणं सहबान्धवम्॥ २८॥
राघवस्त्वां वरारोहे स्वपुरी नयिता ध्रुवम्।
‘वरारोहे ! समराङ्गण में रौद्र राक्षस रावण को बन्धुबान्धवोंसहित मारकर रघुनाथजी अवश्य ही आपको अपनी पुरी में ले जायेंगे॥ २८ १/२॥
यत् तु रामो विजानीयादभिज्ञानमनिन्दिते॥२९॥
प्रीतिसंजननं तस्य प्रदातुं तत् त्वमर्हसि।
‘सती-साध्वी देवि! अब आप मुझे कोई ऐसी पहचान दीजिये, जिसे श्रीरामचन्द्रजी जानते हों और जो उनके मन को प्रसन्न करने वाला हो॥ २९ १/२॥
साभिवीक्ष्य दिशः सर्वा वेण्युद्ग्रथनमुत्तमम्॥३०॥
मुक्त्वा वस्त्राद् ददौ मह्यं मणिमेतं महाबल।
‘महाबली वीर! तब उन्होंने चारों ओर देखकर वेणी में बाँधने योग्य इस उत्तम मणि को अपने वस्त्र से खोलकर मुझे दे दिया। ३० १/२ ॥
प्रतिगृह्य मणिं दोर्थ्यां तव हेतो रघुप्रिय॥३१॥
शिरसा सम्प्रणम्यैनामहमागमने त्वरे।
‘रघुवंशियों के प्रियतम श्रीराम! आपके लिये इस मणि को दोनों हाथों में लेकर मैंने सीतादेवी को मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और यहाँ आने के लिये मैं उतावला हो उठा॥३१ १/२॥
गमने च कृतोत्साहमवेक्ष्य वरवर्णिनी॥३२॥
विवर्धमानं च हि मामुवाच जनकात्मजा।
अश्रुपूर्णमुखी दीना बाष्पगद्गदभाषिणी॥३३॥
ममोत्पतनसम्भ्रान्ता शोकवेगसमाहता।
मामुवाच ततः सीता सभाग्योऽसि महाकपे॥३४॥
यद् द्रक्ष्यसि महाबाहुं रामं कमललोचनम्।
लक्ष्मणं च महाबाहुं देवरं मे यशस्विनम्॥ ३५॥
‘लौटने के लिये उत्साहित हो मुझे अपने शरीर को बढ़ाते देख सुन्दरी जनकनन्दिनी सीता बहुत दुःखी हो गयीं। उनके मुख पर आँसुओं की धारा बह चली। मेरी उछलने की तैयारी से वे घबरा गयीं और शोक के वेग से आहत हो उठीं। उस समय उनका स्वर अश्रुगद्गद हो गया था। वे मुझसे कहने लगीं—’महाकपे! तुम बड़े सौभाग्यशाली हो, जो मेरे महाबाहु प्रियतम कमलनयन श्रीराम को तथा मेरे यशस्वी देवर महाबाहु लक्ष्मणको भी अपनी आँखों से देखोगे’ ॥ ३२–३५॥
सीतयाप्येवमुक्तोऽहमब्रुवं मैथिली तथा।
पृष्ठमारोह मे देवि क्षिप्रं जनकनन्दनि॥३६॥
यावत्ते दर्शयाम्यद्य ससुग्रीवं सलक्ष्मणम्।
राघवं च महाभागे भर्तारमसितेक्षणे॥३७॥
‘सीताजी के ऐसा कहने पर मैंने उन मिथिलेशकुमारी से कहा—’देवि! जनकनन्दिनी! आप शीघ्र मेरी पीठ पर चढ़ जाइये। महाभागे! श्यामलोचने! मैं अभी सुग्रीव और लक्ष्मणसहित आपके पतिदेव श्रीरघुनाथजी का आपको दर्शन कराता हूँ’॥ ३६-३७॥
साब्रवीन्मां ततो देवी नैष धर्मो महाकपे।
यत्ते पृष्ठं सिषेवेऽहं स्ववशा हरिपुङ्गव॥३८॥
‘यह सुनकर सीतादेवी मुझसे बोलीं-‘महाकपे! वानरशिरोमणे! मेरा यह धर्म नहीं है कि मैं अपने वश में होती हुई भी स्वेच्छा से तुम्हारी पीठ का आश्रय लूँ॥ ३८॥
पुरा च यदहं वीर स्पृष्टा गात्रेषु रक्षसा।
तत्राहं किं करिष्यामि कालेनोपनिपीडिता॥३९॥
गच्छ त्वं कपिशार्दूल यत्र तौ नृपतेः सुतौ।
‘वीर! पहले जो राक्षस रावण के द्वारा मेरे अङ्गों का स्पर्श हो गया, उस समय वहाँ मैं क्या कर सकती थी? मुझे तो काल ने ही पीड़ित कर रखा था। अतः वानरप्रवर! जहाँ वे दोनों राजकुमार हैं, वहाँ तुम जाओ’ ॥ ३९ १/२॥
इत्येवं सा समाभाष्य भूयः संदेष्टमास्थिता॥४०॥
हनूमन् सिंहसंकाशौ तावुभौ रामलक्ष्मणौ।
सुग्रीवं च सहामात्यं सर्वान् ब्रूया अनामयम्॥४१॥
‘ऐसा कहकर वे फिर मुझे संदेश देने लगीं —’हनुमन् ! सिंह के समान पराक्रमी उन दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण से, मन्त्रियोंसहित सुग्रीव से तथा अन्य सब लोगों से भी मेरा कुशल-समाचार कहना और उनका पूछना॥
यथा च स महाबाहुर्मी तारयति राघवः।
अस्माद्दुःखाम्बुसंरोधात् तत् त्वमाख्यातुमर्हसि॥४२॥
‘तुम वहाँ ऐसी बात कहना, जिससे महाबाहु रघुनाथजी इस दुःखसागर से मेरा उद्धार करें॥ ४२ ॥
इदं च तीव्र मम शोकवेगं रक्षोभिरेभिः परिभर्त्सनं च।
ब्रूयास्तु रामस्य गतः समीपं शिवश्च तेऽध्वास्तु हरिप्रवीर॥४३॥
‘वानरों के प्रमुख वीर! मेरे इस तीव्र शोक-वेग को तथा इन राक्षसों द्वारा जो मुझे डराया-धमकाया जाता है, इसको भी उन श्रीरामचन्द्रजी के पास जाकर कहना। तुम्हारा मार्ग मङ्गलमय हो’ ॥ ४३॥
एतत् तवार्या नृप संयता सा सीता वचः प्राह विषादपूर्वम्।
एतच्च बुद्ध्वा गदितं यथा त्वं श्रद्धत्स्व सीतां कुशलां समग्राम्॥४४॥
‘नरेश्वर! आपकी प्रियतमा संयमशीला आर्या सीता ने बड़े विषाद के साथ ये सारी बातें कहीं हैं। मेरी कही हुई इन सब बातों पर विचार करके आप विश्वास करें कि सतीशिरोमणि सीता सकुशल हैं’। ४४॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे सप्तषष्टितमः सर्गः॥६७॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में सरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ।६७॥
सर्ग-68
अथाहमुत्तरं देव्या पुनरुक्तः ससम्भ्रमम्।
तव स्नेहान्नरव्याघ्र सौहार्दादनुमान्य च॥१॥
‘पुरुषसिंह रघुनन्दन! आपके प्रति स्नेह और सौहार्द के कारण देवी सीता ने मेरा सत्कार करके जाने के लिये उतावले हुए मुझसे पुनः यह उत्तम बात कही— ॥१॥
एवं बहुविधं वाच्यो रामो दाशरथिस्त्वया।
यथा मां प्राप्नुयाच्छीघ्रं हत्वा रावणमाहवे॥२॥
‘पवनकुमार! तुम दशरथनन्दन भगवान् श्रीराम से अनेक प्रकार से ऐसी बातें कहना, जिससे वे समराङ्गण में शीघ्र ही रावण का वध करके मुझे प्राप्त कर लें॥२॥
यदि वा मन्यसे वीर वसैकाहमरिंदम।
कस्मिंश्चित् संवृते देशे विश्रान्तः श्वो गमिष्यसि ॥३॥
‘शत्रुओं का दमन करने वाले वीर! यदि तुम ठीक समझो तो यहाँ किसी गुप्त स्थान में एक दिन के लिये ठहर जाओ। आज विश्राम करके कल सबेरे यहाँ से चले जाना॥३॥
मम चाप्यल्पभाग्यायाः सांनिध्यात् तव वानर।
अस्य शोकविपाकस्य मुहूर्तं स्याद् विमोक्षणम्॥४॥
‘वानर! तुम्हारे निकट रहने से मुझ मन्द-भागिनी को इस शोकविपाक से थोड़ी देर के लिये भी छुटकारा मिल जाय॥४॥
गते हि त्वयि विक्रान्ते पुनरागमनाय वै।
प्राणानामपि संदेहो मम स्यान्नात्र संशयः॥५॥
‘तुम पराक्रमी वीर हो। जब पुनः आने के लिये यहाँ से चले जाओगे, तब मेरे प्राणों के लिये भी संदेह उपस्थित हो जायगा। इसमें संशय नहीं है॥५॥
तवादर्शनजः शोको भूयो मां परितापयेत्।
दुखाद् दुःखपराभूतां दुर्गतां दुःखभागिनीम्॥६॥
‘तुम्हें न देखने से होने वाला शोक दुःख-पर-दुःख उठाने से पराभव तथा दुर्गति में पड़ी हुई मुझ दुःखिया को और भी संताप देता रहेगा॥६॥
अयं च वीर संदेहस्तिष्ठतीव ममाग्रतः।
सुमहांस्त्वत्सहायेषु हर्युक्षेषु हरीश्वर ॥७॥
कथं नु खलु दुष्पारं तरिष्यन्ति महोदधिम्।
तानि हयृक्षसैन्यानि तौ वा नरवरात्मजौ॥८॥
‘वीर! वानरराज! मेरे सामने यह महान् संदेह-सा खड़ा हो गया है कि तुम जिनके सहायक हो, उन वानरों और भालुओं के होते हुए भी रीछों और वानरों की वे सेनाएँ तथा वे दोनों राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण इस अपार पारावार को कैसे पार करेंगे? ॥ ७-८॥
त्रयाणामेव भूतानां सागरस्यास्य लङ्घने।
शक्तिः स्याद् वैनतेयस्य वायोर्वा तव चानघ॥९॥
‘निष्पाप पवनकुमार! तीन ही भूतों में इस समुद्र को लाँघने की शक्ति देखी जाती है—विनतानन्दन गरुड़ में, वायुदेवता में और तुम में॥९॥
तदस्मिन् कार्यनिर्योगे वीरैवं दुरतिक्रमे।
किं पश्यसि समाधानं ब्रूहि कार्यविदां वर ॥१०॥
‘वीर! जब इस प्रकार इस कार्य का साधन दुष्कर हो गया है, तब इसकी सिद्धि के लिये तुम कौन-सा समाधान (उपाय) देखते हो। कार्यसिद्धि के उपाय जानने वालों में तुम श्रेष्ठ हो, अतः मेरी बात का उत्तर दो॥१०॥
काममस्य त्वमेवैकः कार्यस्य परिसाधने।
पर्याप्तः परवीरघ्न यशस्यस्ते बलोदयः॥११॥
‘विपक्षी वीरों का नाश करने वाले कपिश्रेष्ठ! इसमें संदेह नहीं कि इस कार्य की सिद्धि के लिये तुम अकेले ही बहुत हो, तथापि तुम्हारे बल का यह उद्रेक तुम्हारे लिये ही यश की वृद्धि करने वाला होगा (श्रीराम के लिये नहीं)॥ ११॥
बलैः समग्रैर्यदि मां हत्वा रावणमाहवे।
विजयी स्वपुरी रामो नयेत् तत् स्याद् यशस्करम्॥१२॥
‘यदि श्रीराम अपनी सम्पूर्ण सेना के साथ यहाँ आकर युद्ध में रावण को मार डालें और विजयी होकर मुझे अपनी पुरी को ले चलें तो यह उनके लिये यश की वृद्धि करने वाला होगा॥ १२ ॥
यथाहं तस्य वीरस्य वनादुपधिना हृता।
रक्षसा तद्भयादेव तथा नार्हति राघवः॥१३॥
‘जिस प्रकार राक्षस रावण ने वीरवर भगवान् श्रीराम के भय से ही उनके सामने न जाकर छलपूर्वक वन से मेरा अपहरण किया था, उस तरह श्रीरघुनाथजी को मुझे नहीं प्राप्त करना चाहिये (वे रावण को मारकर ही मुझे ले चलें)॥१३॥
बलैस्तु संकुलां कृत्वा लङ्कां परबलार्दनः।
मां नयेद् यदि काकुत्स्थस्तत् तस्य सदृशं भवेत्॥१४॥
‘शत्रुसेना का संहार करने वाले ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम यदि अपने सैनिकों द्वारा लङ्का को पददलित करके मुझे अपने साथ ले जायँ तो यह उनके योग्य पराक्रम होगा॥१४॥
तद् यथा तस्य विक्रान्तमनुरूपं महात्मनः।
भवत्याहवशूरस्य तथा त्वमुपपादय॥१५॥
‘महात्मा श्रीराम संग्राम में शौर्य प्रकट करने वाले हैं, अतः जिस प्रकार उनके अनुरूप पराक्रम प्रकट हो सके, वैसा ही उपाय तुम करो’ ॥ १५॥
तदर्थोपहितं वाक्यं प्रश्रितं हेतुसंहितम्।
यथाहं तस्य वीरस्य वनादुपधिना हृता।
रक्षसा तद्भयादेव तथा नार्हति राघवः॥१३॥
‘जिस प्रकार राक्षस रावण ने वीरवर भगवान् श्रीराम के भय से ही उनके सामने न जाकर छलपूर्वक वन से मेरा अपहरण किया था, उस तरह श्रीरघुनाथजी को मुझे नहीं प्राप्त करना चाहिये (वे रावण को मारकर ही मुझे ले चलें)॥१३॥
बलैस्तु संकुलां कृत्वा लङ्कां परबलार्दनः।
मां नयेद् यदि काकुत्स्थस्तत् तस्य सदृशं भवेत्॥१४॥
‘शत्रुसेना का संहार करने वाले ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम यदि अपने सैनिकों द्वारा लङ्का को पददलित करके मुझे अपने साथ ले जायँ तो यह उनके योग्य पराक्रम होगा॥१४॥
तद् यथा तस्य विक्रान्तमनुरूपं महात्मनः।
भवत्याहवशूरस्य तथा त्वमुपपादय॥१५॥
‘महात्मा श्रीराम संग्राम में शौर्य प्रकट करने वाले हैं, अतः जिस प्रकार उनके अनुरूप पराक्रम प्रकट हो सके, वैसा ही उपाय तुम करो’ ॥ १५॥
तदर्थोपहितं वाक्यं प्रश्रितं हेतुसंहितम्।
निशम्याहं ततः शेषं वाक्यमुत्तरमब्रवम्॥१६॥
‘सीतादेवी के उस अभिप्राययुक्त, विनयपूर्ण और युक्तिसंगत वचन को सुनकर अन्त में मैंने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया- ॥१६॥
देवि हर्यक्षसैन्यानामीश्वरः प्लवतां वरः।
सुग्रीवः सत्त्वसम्पन्नस्त्वदर्थे कृतनिश्चयः॥१७॥
‘देवि! वानर और भालुओं की सेना के स्वामी कपिश्रेष्ठ सुग्रीव बड़े शक्तिशाली हैं। वे आपका उद्धार करने के लिये दृढ़ निश्चय कर चुके हैं।॥ १७ ॥
तस्य विक्रमसम्पन्नाः सत्त्ववन्तो महाबलाः।
मनःसंकल्पसदृशा निदेशे हरयः स्थिताः॥१८॥
‘उनके पास पराक्रमी, शक्तिशाली और महाबली वानर हैं, जो मन के संकल्प के समान तीव्र गति से चलते हैं। वे सब-के-सब सदा उनकी आज्ञा के अधीन रहते हैं॥ १८॥
येषां नोपरि नाधस्तान्न तिर्यक् सज्जते गतिः।
न च कर्मसु सीदन्ति महत्स्वमिततेजसः॥१९॥
‘नीचे, ऊपर और अगल-बगल में कहीं भी उनकी गति नहीं रुकती है। वे अमिततेजस्वी वानर बड़े-से बड़े कार्य आ पड़ने पर भी कभी शिथिल नहीं होते हैं॥ १९॥
असकृत् तैर्महाभागैर्वानरैर्बलसंयुतैः।
प्रदक्षिणीकृता भूमिर्वायुमार्गानुसारिभिः॥२०॥
‘वायुमार्ग (आकाश)-का अनुसरण करने वाले उन महाभाग बलवान् वानरों ने अनेक बार इस पृथ्वी की परिक्रमा की है॥ २०॥
मदिशिष्टाश्च तुल्याश्च सन्ति तत्र वनौकसः।
मत्तः प्रत्यवरः कश्चिन्नास्ति सुग्रीवसंनिधौ॥२१॥
‘वहाँ मुझसे बढ़कर तथा मेरे समान शक्तिशाली बहुत-से वानर हैं। सुग्रीव के पास कोई ऐसा वानर नहीं है, जो मुझसे किसी बात में कम हो॥२१॥
अहं तावदिह प्राप्तः किं पुनस्ते महाबलाः।
नहि प्रकृष्टाः प्रेष्यन्ते प्रेष्यन्ते हीतरे जनाः॥२२॥
‘जब मैं ही यहाँ आ गया, तब फिर उन महाबली वानरों के आने में क्या संदेह हो सकता है? आप जानती होंगी कि दूत या धावन बनाकर वे ही लोग भेजे जाते हैं, जो निम्नश्रेणी के होते हैं। अच्छी श्रेणी के लोग नहीं भेजे जाते॥२२॥
तदलं परितापेन देवि मन्युरपैतु ते।
एकोत्पातेन ते लङ्कामेष्यन्ति हरियूथपाः॥२३॥
‘अतः देवि! अब संताप करने की आवश्यकता नहीं है। आपका मानसिक दुःख दूर हो जाना चाहिये। वे वानरयूथपति एक ही छलाँग में लङ्का में पहुँच जायँगे ॥ २३॥
मम पृष्ठगतौ तौ च चन्द्रसूर्याविवोदितौ।
त्वत्सकाशं महाभागे नृसिंहावागमिष्यतः॥२४॥
‘महाभागे! वे पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मण भी उदयाचल पर उदित होने वाले चन्द्रमा और सूर्य की भाँति मेरी पीठ पर बैठकर आपके पास आ जायेंगे। २४॥
अरिजं सिंहसंकाशं क्षिप्रं द्रक्ष्यसि राघवम्।
लक्ष्मणं च धनुष्मन्तं लङ्कादारमुपागतम्॥२५॥
‘आप शीघ्र ही देखेंगी कि सिंह के समान पराक्रमी शत्रुनाशक श्रीराम और लक्ष्मण हाथ में धनुष लिये लङ्का के द्वार पर आ पहुँचे हैं ॥ २५॥
नखदंष्ट्रायुधान् वीरान् सिंहशार्दूलविक्रमान्।
वानरान् वारणेन्द्राभान् क्षिप्रं द्रक्ष्यसि संगतान्॥२६॥
‘नख और दाढ़ें ही जिनके आयुध हैं, जो सिंह और बाघ के समान पराक्रमी हैं तथा बड़े-बड़े गजराजों के समान जिनकी विशाल काया है, उन वीर वानरों को आप शीघ्र ही यहाँ एकत्र हुआ देखेंगी।
२६॥
शैलाम्बुदनिकाशानां लङ्कामलयसानुषु।
नर्दतां कपिमुख्यानां नचिराच्छ्रोष्यसे स्वनम्॥२७॥
‘लङ्कावर्ती मलयपर्वत के शिखरों पर पहाड़ों और मेघों के समान विशाल शरीर वाले प्रधान-प्रधान वानर आकर गर्जना करेंगे और आप शीघ्र ही उनका सिंहनाद सुनेंगी॥ २७॥
निवृत्तवनवासं च त्वया सार्धमरिंदमम्।
अभिषिक्तमयोध्यायां क्षिप्रं द्रक्ष्यसि राघवम्॥२८॥
‘आपको जल्दी ही यह देखने का भी सौभाग्य प्राप्त होगा कि शत्रुओं का दमन करने वाले श्रीरघुनाथजी वनवास की अवधि पूरी करके आपके साथ अयोध्या में जाकर वहाँ के राज्य पर अभिषिक्त हो गये हैं’॥ २८॥
ततो मया वाग्भिरदीनभाषिणी शिवाभिरिष्टाभिरभिप्रसादिता।
उवाह शान्तिं मम मैथिलात्मजा तवातिशोकेन तथातिपीडिता॥२९॥
‘आपके अत्यन्त शोक से बहुत ही पीड़ित होने पर भी जिनकी वाणी में कभी दीनता नहीं आने पाती, उन मिथिलेशकुमारी को जब मैंने प्रिय एवं मङ्गलमय वचनों द्वारा सान्त्वना देकर प्रसन्न किया, तब उनके मन को कुछ शान्ति मिली’ ॥ २९॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे अष्टषष्टितमः सर्गः॥६८॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में अड़सठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥६८॥
॥ सुन्दरकाण्डं सम्पूर्णम्॥