॥श्री गणेशाय नम:॥
॥श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
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सम्पूर्ण वाल्मीकि रामायण
[काव्य बीजं सनातनम्]

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

सम्पाति का निशाकर मुनि को अपने पंख के जलने का कारण बताना

एकषष्टितमः सर्गः

सर्ग-61


ततस्तद् दारुणं कर्म दुष्करं सहसा कृतम्।

आचचक्षे मुनेः सर्वं सूर्यानुगमनं तथा॥१॥

‘उनके इस प्रकार पूछने पर मैंने बिना सोचे-समझे सूर्य का अनुगमनरूप जो दुष्कर एवं दारुण कार्य किया था, वह सब उन्हें बताया॥१॥

भगवन् व्रणयुक्तत्वाल्लज्जया चाकुलेन्द्रियः।

परिश्रान्तो न शक्नोमि वचनं परिभाषितुम्॥२॥

‘मैंने कहा—’भगवन् ! मेरे शरीर में घाव हो गया है तथा मेरी इन्द्रियाँ लज्जा से व्याकुल हैं, इसलिये अधिक कष्ट पाने के कारण मैं अच्छी तरह बात भी नहीं कर सकता॥

अहं चैव जटायुश्च संघर्षाद् गर्वमोहितौ।

आकाशं पतितौ दूराज्जिज्ञासन्तौ पराक्रमम्॥३॥

‘मैं और जटायु दोनों ही गर्व से मोहित हो रहे थे; अतः अपने पराक्रम की थाह लगाने के लिये हम दोनों दूर तक पहुँचने के उद्देश्य से उड़ने लगे॥३॥

कैलासशिखरे बद्ध्वा मुनीनामग्रतः पणम्।

रविः स्यादनुयातव्यो यावदस्तं महागिरिम्॥४॥

‘कैलास पर्वत के शिखर पर मुनियों के सामने हम दोनों ने यह शर्त बदी थी कि सूर्य जब तक अस्ताचल पर जायँ, उसके पहले ही हम दोनों को उनके पास पहुँच जाना चाहिये।

अप्यावां युगपत् प्राप्तावपश्याव महीतले।

रथचक्रप्रमाणानि नगराणि पृथक् पृथक्॥५॥

‘यह निश्चय करके हम साथ ही आकाश में जा पहुँचे। वहाँ से पृथ्वी के भिन्न-भिन्न नगर में हम रथ के पहिये के बराबर दिखायी देते थे॥५॥

क्वचिद् वादित्रघोषश्च क्वचिद् भूषणनिःस्वनः।

गायन्तीः स्माङ्गना बह्वीः पश्यावो रक्तवाससः॥

‘ऊपर के लोकों में कहीं वाद्यों का मधुर घोष हो रहा था, कहीं आभूषणों की झनकारें सुनायी पड़ती थीं और कहीं लाल रंग की साड़ी पहने बहुत-सी सुन्दरियाँ गीत गा रही थीं, जिन्हें हम दोनों ने अपनी आँखों देखा था।

तूर्णमुत्पत्य चाकाशमादित्यपदमास्थितौ।

आवामालोकयावस्तद् वनं शादलसंस्थितम्॥७॥

‘उससे भी ऊँचे उड़कर हम तुरंत सूर्यके मार्ग पर जा पहुँचे। वहाँ से नीचे दृष्टि डालकर जब दोनों ने देखा, तब यहाँ के जंगल हरी-हरी घास की तरह दिखायी देते थे॥७॥

उपलैरिव संछन्ना दृश्यते भूः शिलोच्चयैः।

आपगाभिश्च संवीता सूत्रैरिव वसुंधरा॥८॥

‘पर्वतों के कारण यह भूमि ऐसी जान पड़ती थी,मानो इस पर पत्थर बिछाये गये हों और नदियों से ढकी हुई भूमि ऐसी लगती थी, मानो उसमें सूत के धागे लपेटे गये हों॥८॥

हिमवांश्चैव विन्ध्यश्च मेरुश्च सुमहागिरिः।।

भूतले सम्प्रकाशन्ते नागा इव जलाशये॥९॥

तीव्रः स्वेदश्च खेदश्च भयं चासीत् तदावयोः।

समाविशत मोहश्च ततो मूर्छा च दारुणा॥१०॥

‘भूतल पर हिमालय, मेरु और विन्ध्य आदि बड़े बड़े पर्वत तालाब में खड़े हुए हाथियों के समान प्रतीत होते थे। उस समय हम दोनों भाइयों के शरीर से बहुत पसीना निकलने लगा। हमें बड़ी थकावट मालूम हुई फिर तो हमारे ऊपर भय, मोह और भयानक मूर्छा ने अधिकार जमा लिया॥

न च दिग् ज्ञायते याम्या न चाग्नेयी न वारुणी।

युगान्ते नियतो लोको हतो दग्ध इवाग्निना॥११॥

‘उस समय न दक्षिण दिशा का ज्ञान होता था, न अग्निकोण अथवा पश्चिम आदि दिशा का ही यद्यपि यह जगत् नियमित रूप से स्थित था, तथापि उस समय मानो युगान्तकाल में अग्नि से दग्ध हो गया हो, इस प्रकार नष्टप्राय दिखायी देता था॥११॥

मनश्च मे हतं भूयश्चक्षुः प्राप्य तु संश्रयम्।

यत्नेन महता ह्यस्मिन् मनः संधाय चक्षुषी॥१२॥

यत्नेन महता भूयो भास्करः प्रतिलोकितः।

तुल्यपृथ्वीप्रमाणेन भास्करः प्रतिभाति नौ॥

‘मेरा मन नेत्ररूपी आश्रय को पाकर उसके साथ ही हतप्राय हो गया—सूर्य के तेज से उसकी दर्शन-शक्ति लुप्त हो गयी। तदनन्तर महान् प्रयास करके मैंने पुनः मन और नेत्रों को सूर्यदेव में लगाया। इस प्रकार विशेष प्रयत्न करने पर फिर सूर्यदेव का दर्शन हुआ। वे हमें पृथ्वी के बराबर ही जान पड़ते थे॥ १२-१३॥

जटायुर्मामनापृच्छय निपपात महीं ततः।

तं दृष्ट्वा तूर्णमाकाशादात्मानं मुक्तवानहम्॥ १४॥

‘जटायु मुझसे पूछे बिना ही पृथ्वी पर उतर पड़ा। उसे नीचे जाते देख मैंने भी तुरंत अपने-आपको आकाश से नीचे की ओर छोड़ दिया॥१४॥

पक्षाभ्यां च मया गुप्तो जटायुर्न प्रदह्यत।

प्रमादात् तत्र निर्दग्धः पतन् वायुपथादहम्॥१५॥

आशङ्के तं निपतितं जनस्थाने जटायुषम्।

अहं तु पतितो विन्ध्ये दग्धपक्षो जडीकृतः॥१६॥

‘मैंने अपने दोनों पंखों से जटायु को ढक लिया था, इसलिये वह जल न सका। मैं ही असावधानी के कारण वहाँ जल गया। वायु के पथ से नीचे गिरते समय मुझे ऐसा संदेह हुआ कि जटायु जनस्थान में गिरा है; परंतु मैं इस विन्ध्यपर्वत पर गिरा था। मेरे दोनों पंख जल गये थे, इसलिये यहाँ जडवत् हो गया॥१५-१६॥

राज्याच्च हीनो भ्रात्रा च पक्षाभ्यां विक्रमेण च।

सर्वथा मर्तुमेवेच्छन् पतिष्ये शिखराद् गिरेः॥१७॥

‘राज्य से भ्रष्ट हुआ, भाई से बिछुड़ गया और पंख तथा पराक्रम से भी हाथ धो बैठा। अब मैं सर्वथा मरने की ही इच्छा से इस पर्वत शिखर से नीचे गिरूँगा’॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे एकषष्टितमः सर्गः॥६१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में इकसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥६१॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

निशाकर मुनि का सम्पाति को सान्त्वना देते हुए उन्हें भावी श्रीरामचन्द्रजी के कार्य में सहायता देने के लिये जीवित रहने का आदेश देना

द्विषष्टितमः सर्गः

सर्ग-62


एवमुक्त्वा मुनिश्रेष्ठमरुदं भृशदुःखितः।

अथ ध्यात्वा मुहूर्तं च भगवानिदमब्रवीत्॥१॥

‘वानरो! उन मुनिश्रेष्ठ से ऐसा कहकर मैं बहुत दुःखी हो विलाप करने लगा। मेरी बात सुनकर थोड़ी देर तक ध्यान करने के बाद महर्षि भगवान् निशाकर बोले- ॥१॥

पक्षौ च ते प्रपक्षौ च पुनरन्यौ भविष्यतः।

चक्षुषी चैव प्राणाश्च विक्रमश्च बलं च ते॥२॥

‘सम्पाते! चिन्ता न करो। तुम्हारे छोटे और बड़े दोनों तरह के पंख फिर नये निकल आयेंगे। आँखें भी ठीक हो जायँगी तथा खोयी हुई प्राणशक्ति, बल और पराक्रम-सब लौट आयेंगे॥२॥

पुराणे सुमहत्कार्यं भविष्यं हि मया श्रुतम्।

दृष्टं मे तपसा चैव श्रुत्वा च विदितं मम॥३॥

‘मैंने पुराण में आगे होने वाले अनेक बड़े-बड़े कार्यों की बात सुनी है। सुनकर तपस्या के द्वारा भी मैंने उन सब बातों को प्रत्यक्ष किया और जाना है। ३॥

राजा दशरथो नाम कश्चिदिक्ष्वाकुवर्धनः।

तस्य पुत्रो महातेजा रामो नाम भविष्यति॥४॥

‘इक्ष्वाकुवंश की कीर्ति बढ़ाने वाले कोई दशरथ नाम से प्रसिद्ध राजा होंगे। उनके एक महातेजस्वी पुत्र होंगे, जिनकी श्रीराम के नाम से प्रसिद्धि होगी॥४॥

अरण्यं च सह भ्रात्रा लक्ष्मणेन गमिष्यति।

तस्मिन्नर्थे नियुक्तः सन् पित्रा सत्यपराक्रमः॥५॥

‘सत्यपराक्रमी श्रीरामचन्द्रजी अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ वनमें जायँगे; इसके लिये उन्हें पिता की ओर से आज्ञा प्राप्त होगी॥५॥

नैर्ऋतो रावणो नाम तस्य भार्यां हरिष्यति।

राक्षसेन्द्रो जनस्थाने अवध्यः सुरदानवैः ॥६॥

‘वनवास-कालमें जनस्थानमें रहते समय उनकी पत्नी सीताको राक्षसोंका राजा रावण नामक असुर हर ले जायगा। वह देवताओं और दानवोंके लिये भी अवध्य होगा॥६॥

सा च कामैः प्रलोभ्यन्ती भक्ष्यैर्भोज्यैश्च मैथिली।

न भोक्ष्यति महाभागा दुःखमग्ना यशस्विनी॥७॥

‘मिथिलेशकुमारी सीता बड़ी ही यशस्विनी और सौभाग्यवती होगी। यद्यपि राक्षसराज की ओर से उसको तरह-तरह के भोगों और भक्ष्य-भोज्य आदि पदार्थों का प्रलोभन दिया जायगा, तथापि वह उन्हें स्वीकार नहीं करेगी और निरन्तर अपने पति के लिये चिन्तित होकर दुःख में डूबी रहेगी॥७॥

परमान्नं च वैदेह्या ज्ञात्वा दास्यति वासवः।

यदन्नममृतप्रख्यं सुराणामपि दुर्लभम्॥८॥

‘सीता राक्षस का अन्न नहीं ग्रहण करती—यह मालूम होने पर देवराज इन्द्र उसके लिये अमृत के समान खीर, जो देवताओं को दुर्लभ है, निवेदन करेंगे॥८॥

तदन्नं मैथिली प्राप्य विज्ञायेन्द्रादिदं त्विति।

अग्रमुद्धृत्य रामाय भूतले निर्वपिष्यति॥९॥

‘उस अन्न को  इन्द्र का दिया हुआ जानकर जानकी उसे स्वीकार कर लेगी और सबसे पहले उसमें से अग्रभाग निकालकर श्रीरामचन्द्रजी के उद्देश्य से पृथ्वी पर रखकर अर्पण करेगी॥९॥

यदि जीवति मे भर्ता लक्ष्मणो वापि देवरः।

देवत्वं गच्छतोर्वापि तयोरन्नमिदं त्विति॥१०॥

‘उस समय वह इस प्रकार कहेगी—’मेरे पति भगवान् श्रीराम तथा देवर लक्ष्मण यदि जीवित हों अथवा देवभाव को प्राप्त हो गये हों, यह अन्न उनके लिये समर्पित है’॥ १०॥

एष्यन्ति प्रेषितास्तत्र रामदूताः प्लवङ्गमाः।

आख्येया राममहिषी त्वया तेभ्यो विहङ्गम॥११॥

‘सम्पाते! रघुनाथजी के भेजे हुए उनके दूत वानर यहाँ सीता का पता लगाते हुए आयेंगे। उन्हें तुम श्रीराम की महारानी सीता का पता बताना ॥ ११॥

सर्वथा तु न गन्तव्यमीदृशः क्व गमिष्यसि।

देशकालौ प्रतीक्षस्व पक्षौ त्वं प्रतिपत्स्यसे॥१२॥

‘यहाँ से किसी तरह कभी दूसरी जगह न जाना। ऐसी दशा में तुम जाओगे भी कहाँ। देश और काल की प्रतीक्षा करो तुम्हें फिर नये पंख प्राप्त हो जायँगे॥ १२॥

उत्सहेयमहं कर्तुमद्यैव त्वां सपक्षकम्।

इहस्थस्त्वं हि लोकानां हितं कार्यं करिष्यसि॥१३॥

‘यद्यपि मैं आज ही तुम्हें पंखयुक्त कर सकता हूँ; फिर भी इसलिये ऐसा नहीं करता कि यहाँ रहने पर तुम संसार के लिये हितकर कार्य कर सकोगे॥ १३ ॥

त्वयापि खलु तत् कार्यं तयोश्च नृपपुत्रयोः।

ब्राह्मणानां गुरूणां च मुनीनां वासवस्य च॥१४॥

‘तुम भी उन दोनों राजकुमारों के कार्य में सहायता करना। वह कार्य केवल उन्हीं का नहीं, समस्त ब्राह्मणों, गुरुजनों, मुनियों और देवराज इन्द्र का भी है॥ १४॥

इच्छाम्यहमपि द्रष्टुं भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ।

नेच्छे चिरं धारयितुं प्राणांस्त्यक्ष्ये कलेवरम्।

महर्षिस्त्वब्रवीदेवं दृष्टतत्त्वार्थदर्शनः ॥१५॥

‘यहाँ से किसी तरह कभी दूसरी जगह न जाना। ऐसी दशा में तुम जाओगे भी कहाँ। देश और काल की प्रतीक्षा करो तुम्हें फिर नये पंख प्राप्त हो जायँगे॥ १२॥

उत्सहेयमहं कर्तुमद्यैव त्वां सपक्षकम्।

इहस्थस्त्वं हि लोकानां हितं कार्यं करिष्यसि॥१३॥

‘यद्यपि मैं आज ही तुम्हें पंखयुक्त कर सकता हूँ; फिर भी इसलिये ऐसा नहीं करता कि यहाँ रहने पर तुम संसार के लिये हितकर कार्य कर सकोगे॥ १३ ॥

त्वयापि खलु तत् कार्यं तयोश्च नृपपुत्रयोः।

ब्राह्मणानां गुरूणां च मुनीनां वासवस्य च॥१४॥

‘तुम भी उन दोनों राजकुमारों के कार्य में सहायता करना। वह कार्य केवल उन्हीं का नहीं, समस्त ब्राह्मणों, गुरुजनों, मुनियों और देवराज इन्द्र का भी है॥ १४॥

इच्छाम्यहमपि द्रष्टुं भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ।

नेच्छे चिरं धारयितुं प्राणांस्त्यक्ष्ये कलेवरम्।

महर्षिस्त्वब्रवीदेवं दृष्टतत्त्वार्थदर्शनः ॥१५॥

‘यद्यपि मैं भी उन दोनों भाइयों का दर्शन करना चाहता हूँ; परंतु अधिक कालतक इन प्राणों को धारण करने की इच्छा नहीं है। अतः वह समय आने से पहले ही मैं प्राणों को त्याग दूंगा’ ऐसा उन तत्त्वदर्शी महर्षि ने मुझे कहा था’।

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे द्विषष्टितमः सर्गः॥६२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में बासठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥६२॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

सम्पाति का पंखयुक्त होकर वानरों को उत्साहित करके उड़ जाना और वानरों का वहाँ से दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान करना

त्रिषष्टितमः सर्गः

सर्ग-63


एतैरन्यैश्च बहुभिर्वाक्यैर्वाक्यविशारदः।

मां प्रशस्याभ्यनुज्ञाप्य प्रविष्टः स स्वमालयम्॥

‘बातचीत की कला में चतुर महर्षि निशाकर ने ये तथा और भी बहुत-सी बातें कहकर मुझे समझाया और श्रीरामकार्य में सहायक बनने के कारण मेरे सौभाग्य की सराहना की। तत्पश्चात् मेरी अनुमति लेकर वे अपने आश्रम के भीतर चले गये॥१॥

कन्दरात् तु विसर्पित्वा पर्वतस्य शनैः शनैः ।

अहं विन्ध्यं समारुह्य भवतः प्रतिपालये॥२॥

‘तदनन्तर कन्दरा से धीरे-धीरे निकलकर मैं विन्ध्य पर्वत के शिखर पर चढ़ आया और तबसे तुम लोगों के आने की बाट देख रहा हूँ॥२॥

अद्य त्वेतस्य कालस्य वर्षं साग्रशतं गतम्।

देशकालप्रतीक्षोऽस्मि हृदि कृत्वा मुनेर्वचः॥ ३॥

‘मुनि से बातचीत के बाद आजतक जो समय बीता है, इसमें आठ* हजार से अधिक वर्ष निकल गये। मुनि के कथन को हृदय में धारण करके मैं देशकाल की प्रतीक्षा कर रहा हूँ॥३॥

* यहाँ मूल में साग्रशतम् (सौ वर्ष से अधिक) समय बीतने की बात कही गयी है; परंतु साठवें सर्ग के नवें श्लोक में आठ सहस्र वर्ष बीतने की चर्चा आयी है। अतः दोनों की एक वाक्यता के लिये यहाँ शत शब्द को आठ सहस्र वर्ष का उपलक्षण मानना चाहिये।

महाप्रस्थानमासाद्य स्वर्गते तु निशाकरे।

मां निर्दहति संतापो वितर्बहुभिर्वृतम्॥४॥

‘निशाकर मुनि महाप्रस्थान करके जब स्वर्गलोक को चले गये, तभी से मैं अनेक प्रकार के तर्क-वितर्को से घिर गया। संताप की आग मुझे रात दिन जलाती रहती है॥ ४॥

उदितां मरणे बुद्धिं मुनिवाक्यैर्निवर्तये।

बुद्धिर्या तेन मे दत्ता प्राणानां रक्षणे मम॥५॥

सा मेऽपनयते दुःखं दीप्तेवाग्निशिखा तमः।

‘मेरे मन में कई बार प्राण त्यागने की इच्छा हुई, किंतु मुनि के वचनों को याद करके मैं उस संकल्प को टालता आया हूँ। उन्होंने मुझे प्राणों को रखने के लिये जो बुद्धि (सम्मति) दी थी, वह मेरे दुःख को उसी प्रकार दूर कर देती है, जैसे जलती हुई अग्निशिखा अन्धकार को॥ ५ १/२॥

बुध्यता च मया वीर्यं रावणस्य दुरात्मनः॥६॥

पुत्रः संतर्जितो वाग्भिर्न त्राता मैथिली कथम्।

‘दुरात्मा रावण में कितना बल है, इसे मैं जानता हूँ इसलिये मैंने कठोर वचनों द्वारा अपने पुत्र को डाँटा था कि तूने मिथिलेशकुमारी सीता की रक्षा क्यों नहीं की। ६ १/२॥

तस्या विलपितं श्रुत्वा तौ च सीतावियोजितौ॥७॥

न मे दशरथस्नेहात् पुत्रेणोत्पादितं प्रियम्।

‘सीता का विलाप सुनकर और उनसे बिछुड़े हुए श्रीराम तथा लक्ष्मण का परिचय पाकर तथा राजा दशरथ के प्रति मेरे स्नेह का स्मरण करके भी मेरे पुत्रने जो सीता की रक्षा नहीं की, अपने इस बर्ताव से उसने मुझे प्रसन्न नहीं किया—मेरा प्रिय कार्य नहीं होने दिया’ ॥ ७ १/२॥

तस्य त्वेवं ब्रुवाणस्य संहतैर्वानरैः सह ॥८॥

उत्पेततुस्तदा पक्षौ समक्षं वनचारिणाम्।

वहाँ एकत्र होकर बैठे हुए वानरों के साथ सम्पाति इस प्रकार बातें कर ही रहे थे कि उन वनचारी वानरों के समक्ष उसी समय उनके दो नये पंख निकल आये॥ ८ १/२॥

स दृष्ट्वा स्वां तनुं पक्षरुद्गतैररुणच्छदैः॥९॥

प्रहर्षमतुलं लेभे वानरांश्चेदमब्रवीत्।

अपने शरीर को नये निकले हुए लाल रंग के पंखों से संयुक्त हुआ देख सम्पाति को अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ। वे वानरों से इस प्रकार बोले- ॥९ १/२ ॥

निशाकरस्य राजर्षेः प्रसादादमितौजसः॥१०॥

आदित्यरश्मिनिर्दग्धौ पक्षौ पुनरुपस्थितौ।

‘कपिवरो! अमिततेजस्वी राजर्षि निशाकर के प्रसाद से सूर्य-किरणों द्वारा दग्ध हुए मेरे दोनों पंख फिर उत्पन्न हो गये॥ १० १/२॥

यौवने वर्तमानस्य ममासीद् यः पराक्रमः॥११॥

तमेवाद्यावगच्छामि बलं पौरुषमेव च।

‘युवावस्था में मेरा जैसा पराक्रम और बल था, वैसे ही बल और पुरुषार्थ का इस समय मैं अनुभव कर रहा हूँ॥ ११ १/२॥

सर्वथा क्रियतां यत्नः सीतामधिगमिष्यथ॥१२॥

पक्षलाभो ममायं वः सिद्धिप्रत्ययकारकः।

‘वानरो! तुम सब प्रकार से यत्न करो। निश्चय ही तुम्हें सीता का दर्शन प्राप्त होगा। मुझे पंखों का प्राप्त होना तुम लोगों की कार्य-सिद्धि का विश्वास दिलाने वाला है’।

इत्युक्त्वा तान् हरीन् सर्वान् सम्पातिः पतगोत्तमः॥१३॥

उत्पपात गिरेः शृङ्गाज्जिज्ञासुः खगमो गतिम्।

उन समस्त वानरों से ऐसा कहकर पक्षियों में श्रेष्ठ सम्पाति अपने आकाश-गमन की शक्ति का परिचय पाने के लिये उस पर्वतशिखर से उड़ गये॥ १३ १/२॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा प्रतिसंहृष्टमानसाः।।

बभूवुर्हरिशार्दूला विक्रमाभ्युदयोन्मुखाः॥१४॥

उनकी वह बात सुनकर उन श्रेष्ठ वानरोंका हृदय प्रसन्नतासे खिल उठा। वे पराक्रमसाध्य अभ्युदयके लिये उद्यत हो गये॥ १४॥

अथ पवनसमानविक्रमाः प्लवगवराः प्रतिलब्धपौरुषाः।

अभिजिदभिमुखां दिशं ययु र्जनकसुतापरिमार्गणोन्मुखाः॥१५॥

तदनन्तर वायु के समान पराक्रमी वे श्रेष्ठ वानर अपने भूले हुए पुरुषार्थ को फिरसे पा गये और जनकनन्दिनी सीता की खोज के लिये उत्सुक हो अभिजित् नक्षत्र से युक्त दक्षिण दिशा की ओर चल दिये॥ १५॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे त्रिषष्टितमः सर्गः॥६३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में तिरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६३॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

समुद्र की विशालता देखकर विषाद में पड़े हुए वानरों को आश्वासन दे अङ्गद का उनसे पृथक्-पृथक् समुद्र-लङ्घन के लिये उनकी शक्ति पूछना

चतुःषष्टितमः सर्गः

सर्ग-64


आख्याता गृध्रराजेन समुत्प्लुत्य प्लवङ्गमाः।

संगताः प्रीतिसंयुक्ता विनेदुः सिंहविक्रमाः॥१॥

गृध्रराज सम्पाति के इस प्रकार कहने पर सिंह के समान पराक्रमी सभी वानर बड़े प्रसन्न हुए और परस्पर मिलकर उछल-उछलकर गर्जने लगे॥१॥

सम्पातेर्वचनं श्रुत्वा हरयो रावणक्षयम्।

हृष्टाः सागरमाजग्मुः सीतादर्शनकांक्षिणः॥२॥

सम्पाति की बातों से रावण के निवास स्थान तथा उसके भावी विनाश की सूचना मिली थी। उन्हें सुनकर हर्ष से भरे हुए वे सभी वानर सीताजी के दर्शन की इच्छा मन में लिये समुद्र के तटपर आये॥२॥

अभिगम्य तु तं देशं ददृशुर्भीमविक्रमाः।

कृत्स्नं लोकस्य महतः प्रतिबिम्बमवस्थितम्॥३॥

उन भयंकर पराक्रमी वानरों ने उस देश में पहुंचकर समुद्र को देखा, जो इस विराट् विश्व के सम्पूर्ण प्रतिबिम्ब की भाँति स्थित था॥३॥

दक्षिणस्य समुद्रस्य समासाद्योत्तरां दिशम्।

संनिवेशं ततश्चक्रुर्हरिवीरा महाबलाः॥४॥

दक्षिण समुद्र के उत्तर तट पर जाकर उन महाबली वानर वीरों ने डेरा डाला॥४॥

प्रसुप्तमिव चान्यत्र क्रीडन्तमिव चान्यतः।

क्वचित् पर्वतमात्रैश्च जलराशिभिरावृतम्॥५॥

वह समुद्र कहीं तो तरङ्गहीन एवं शान्त होने के कारण सोया हुआ-सा जान पड़ता था। अन्यत्र जहाँ थोड़ी-थोड़ी लहरें उठ रही थीं, वहाँ वह क्रीडा करता-सा प्रतीत होता था और दूसरे स्थलों में जहाँ उत्ताल तरङ्ग उठती थीं, वहाँ पर्वत के बराबर जलराशियों से आवृत दिखायी देता था॥ ५॥

संकुलं दानवेन्द्रश्च पातालतलवासिभिः।

रोमहर्षकरं दृष्ट्वा विषेदुः कपिकुञ्जराः॥६॥

वह सारा समुद्र पातालनिवासी दानवराजों से व्याप्त था। उस रोमाञ्चकारी महासागर को देखकर वे समस्त श्रेष्ठ वानर बड़े विषाद में पड़ गये॥६॥

आकाशमिव दुष्पारं सागरं प्रेक्ष्य वानराः।

विषेदुः सहिताः सर्वे कथं कार्यमिति ब्रुवन्॥७॥

आकाश के समान दुर्लङ्घय समुद्र पर दृष्टिपात करके वे सब वानर ‘अब कैसे करना चाहिये’ ऐसा कहते हुए एक साथ बैठकर चिन्ता करने लगे॥ ७॥

विषण्णां वाहिनीं दृष्ट्वा सागरस्य निरीक्षणात्।

आश्वासयामास हरीन् भयार्तान् हरिसत्तमः॥८॥

उस महासागर का दर्शन करके सारी वानर-सेना को विषाद में डूबी हुई देख कपिश्रेष्ठ अङ्गद उन भयातुर वानरों को आश्वासन देते हुए बोले- ॥८॥

न विषादे मनः कार्यं विषादो दोषवत्तरः।

विषादो हन्ति पुरुषं बालं क्रुद्ध इवोरगः॥९॥

‘वीरो! तुम्हें अपने मन को विषाद में नहीं डालना चाहिये; क्योंकि विषाद में बहुत बड़ा दोष है। जैसे क्रोध में भरा हुआ साँप अपने पास आये हुए बालक को काट खाता है, उसी प्रकार विषाद पुरुष का नाश कर डालता है॥९॥

यो विषादं प्रसहते विक्रमे समुपस्थिते।

तेजसा तस्य हीनस्य पुरुषार्थो न सिद्ध्यति॥१०॥

‘जो पराक्रमका अवसर आने पर विषादग्रस्त हो जाता है, उसके तेज का नाश होता है। उस तेजोहीन पुरुष का पुरुषार्थ नहीं सिद्ध होता है’ ॥ १० ॥

तस्यां रात्र्यां व्यतीतायामङ्गदो वानरैः सह।

हरिवृद्धैः समागम्य पुनर्मन्त्रममन्त्रयत्॥११॥

उस रात्रि के बीत जाने पर बड़े-बड़े वानरों के साथ मिलकर अङ्गद ने पुनः विचार आरम्भ किया।॥ ११॥

सा वानराणां ध्वजिनी परिवार्याङ्गदं बभौ।

वासवं परिवार्येव मरुतां वाहिनी स्थिता॥१२॥

उस समय अङ्गद को घेरकर बैठी हुई वानरों की वह सेना इन्द्र को घेरकर स्थित हुई देवताओं की विशाल वाहिनी के समान शोभा पाती थी॥ १२॥

कोऽन्यस्तां वानरी सेनां शक्तः स्तम्भयितुं भवेत् ।

अन्यत्र वालितनयादन्यत्र च हनूमतः॥१३॥

वालिपुत्र अङ्गद तथा पवनकुमार हनुमान जी को छोड़कर दूसरा कौन वीर उस वानरसेनाको सुस्थिर रख सकता था॥१३॥

ततस्तान् हरिवृद्धांश्च तच्च सैन्यमरिंदमः।

अनुमान्याङ्गदः श्रीमान् वाक्यमर्थवदब्रवीत्॥१४॥

शत्रुवीरों का दमन करने वाले श्रीमान् अङ्गद ने उन बड़े-बूढ़े वानरों का सम्मान करके उनसे यह अर्थयुक्त बात कही— ॥ १४॥

क इदानीं महातेजा लवयिष्यति सागरम्।

कः करिष्यति सुग्रीवं सत्यसंधमरिंदमम्॥१५॥

‘सज्जनो! तुमलोगोंमें कौन ऐसा महातेजस्वी वीर है जो इस समय समुद्रको लाँघ जायगा और शत्रुदमन सुग्रीवको सत्यप्रतिज्ञ बनायेगा॥ १५ ॥

को वीरो योजनशतं लङ्घयेत प्लवङ्गमः।

इमांश्च यूथपान् सर्वान् मोचयेत् को महाभयात्॥१६॥

‘कौन वीर वानर सौ योजन समुद्र को लाँघ सकेगा? और कौन इन समस्त यूथपतियों को महान् भय से मुक्त कर देगा? ॥ १६॥

कस्य प्रसादाद् दारांश्च पुत्रांश्चैव गृहाणि च।

इतो निवृत्ताः पश्येम सिद्धार्थाः सुखिनो वयम्॥१७॥

किसके प्रसाद से हमलोग सफल मनोरथ एवं सुखी होकर यहाँ से लौटेंगे और घर-द्वार तथा स्त्री पुत्रों का मुँह देख सकेंगे॥ १७ ॥

कस्य प्रसादाद् रामं च लक्ष्मणं च महाबलम्।

अभिगच्छेम संहृष्टाः सुग्रीवं च वनौकसम्॥१८॥

‘किसके प्रसाद से हमलोग हर्षोत्फुल्ल होकर श्रीराम, महाबली लक्ष्मण तथा वानरवीर सुग्रीव के पास चल सकेंगे॥१८॥

यदि कश्चित् समर्थो वः सागरप्लवने हरिः।

स ददात्विह नः शीघ्रं पुण्यामभयदक्षिणाम्॥१९॥

‘यदि तुमलोगों में से कोई वानरवीर समुद्र को लाँघ जाने में समर्थ हो तो वह शीघ्र ही हमें यहाँ परम पवित्र अभय दान दे’ ॥ १९॥

अङ्गदस्य वचः श्रुत्वा न कश्चित् किंचिदब्रवीत्।

स्तिमितेवाभवत् सर्वा सा तत्र हरिवाहिनी॥२०॥

अङ्गद की यह बात सुनकर कोई कुछ नहीं बोला। वह सारी वानर-सेना वहाँ जडवत् स्थिर रही॥ २० ॥

पुनरेवाङ्गदः प्राह तान् हरीन् हरिसत्तमः।

सर्वे बलवतां श्रेष्ठा भवन्तो दृढविक्रमाः।

व्यपदेशकुले जाताः पूजिताश्चाप्यभीक्ष्णशः॥२१॥

तब वानरश्रेष्ठ अङ्गद ने पुनः उन सबसे कहा’बलवानों में श्रेष्ठ वानरो! तुम सब लोग दृढ़तापूर्वक पराक्रम प्रकट करने वाले हो। तुम्हारा जन्म कलङ्करहित उत्तम कुल में हुआ है। इसके लिये तुम्हारी बारम्बार प्रशंसा हो चुकी है ।। २१॥

नहि वो गमने भङ्गः कदाचित् कस्यचिद् भवेत्।

ब्रुवध्वं यस्य या शक्तिः प्लवने प्लवगर्षभाः॥२२॥

‘श्रेष्ठ वानरो! तुमलोगों में कभी किसी की भी गति कहीं नहीं रुकती। इसलिये समुद्र को लाँघने में जिसकी जितनी शक्ति हो, वह उसे बतावे’॥ २२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे चतुःषष्टितमः सर्गः॥६४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में चौंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६४॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

 जाम्बवान् और अङ्गद की बातचीत तथा जाम्बवान् का हनुमान्जी को प्रेरित करने के लिये उनके पास जाना

पञ्चषष्टितमः सर्गः

सर्ग-65


अथाङ्गदवचः श्रुत्वा ते सर्वे वानरर्षभाः।

स्वं स्वं गतौ समुत्साहमचुस्तत्र यथाक्रमम्॥१॥

अङ्गद की यह बात सुनकर वे सभी श्रेष्ठ वानर लम्बी छलाँग मारने के सम्बन्ध में अपने-अपने उत्साह का–शक्ति का क्रमशः परिचय देने लगे॥१॥

गजो गवाक्षो गवयः शरभो गन्धमादनः।

मैन्दश्च द्विविदश्चैव सुषेणो जाम्बवांस्तथा ॥२॥

गज, गवाक्ष, गवय, शरभ, गन्धमादन, मैन्द, द्विविद, सुषेण और जाम्बवान्—इन सबने अपनी अपनी शक्ति का वर्णन किया॥२॥

आबभाषे गजस्तत्र प्लवेयं दशयोजनम्।

गवाक्षो योजनान्याह गमिष्यामीति विंशतिम्॥

इनमें से गजने कहा—’मैं दस योजन की छलाँग मार सकता हूँ।’ गवाक्ष बोले—’मैं बीस योजन तक चला जाऊँगा’॥३॥

शरभो वानरस्तत्र वानरांस्तानुवाच ह।

त्रिंशतं तु गमिष्यामि योजनानां प्लवङ्गमाः॥४॥

इसके बाद वहाँ शरभ नामक वानर ने उन कपिवरों से कहा—’वानरो! मैं तीस योजन तक एक छलाँग में चला जाऊँगा’॥ ४॥

ऋषभो वानरस्तत्र वानरांस्तानुवाच ह।

चत्वारिंशद् गमिष्यामि योजनानां न संशयः॥

तदनन्तर कपिवर ऋषभ ने उन वानरों से कहा—’मैं चालीस योजन तक चला जाऊँगा, इसमें संशय नहीं

वानरांस्तु महातेजा अब्रवीद् गन्धमादनः।

योजनानां गमिष्यामि पञ्चाशत्तु न संशयः॥६॥

तत्पश्चात् महातेजस्वी गन्धमादन ने उन वानरों से कहा—’इसमें संदेह नहीं कि मैं पचास योजन तक एक छलाँग में चला जाऊँगा’॥६॥

मैन्दस्तु वानरस्तत्र वानरांस्तानुवाच ह।

योजनानां परं षष्टिमहं प्लवितुमुत्सहे॥७॥

इसके बाद वहाँ वानर-वीर मैन्द उन वानरों से बोले – ‘मैं साठ योजन तक एक छलाँग में कूद जाने का उत्साह रखता हूँ’॥ ७॥

ततस्तत्र महातेजा द्विविदः प्रत्यभाषत।

गमिष्यामि न संदेहः सप्ततिं योजनान्यहम्॥८॥

तदनन्तर महातेजस्वी द्विविद बोले—’मैं सत्तर योजन तक चला जाऊँगा, इसमें संदेह नहीं है’।॥ ८॥

सुषेणस्तु महातेजाः सत्त्ववान् कपिसत्तमः।

अशीतिं प्रतिजानेऽहं योजनानां पराक्रमे॥९॥

इसके बाद धैर्यशाली कपिश्रेष्ठ महातेजस्वी सुषेण बोले—’मैं एक छलाँग में असी योजन तक जाने की  प्रतिज्ञा करता हूँ’॥९॥

तेषां कथयतां तत्र सर्वांस्ताननुमान्य च।

ततो वृद्धतमस्तेषां जाम्बवान् प्रत्यभाषत॥१०॥

इस प्रकार कहने वाले सब वानरों का सम्मान करके ऋक्षराज जाम्बवान्, जो सबसे बूढ़े थे, बोले- ॥ १०॥

पूर्वमस्माकमप्यासीत् कश्चिद् गतिपराक्रमः।

ते वयं वयसः पारमनुप्राप्ताः स्म साम्प्रतम्॥११॥

किं तु नैवं गते शक्यमिदं कार्यमुपेक्षितुम्।

यदर्थं कपिराजश्च रामश्च कृतनिश्चयौ॥१२॥

साम्प्रतं कालमस्माकं या गतिस्तां निबोधत।

नवतिं योजनानां तु गमिष्यामि न संशयः॥१३॥

‘पहले युवावस्था में मेरे अंदर भी दूर तक छलाँग मारने की कुछ शक्ति थी। यद्यपि अब मैं उस अवस्था को पार कर चुका हूँ तो भी जिस कार्य के लिये वानरराज सुग्रीव तथा भगवान् श्रीराम दृढ़ निश्चय कर चुके हैं, उसकी मेरे द्वारा उपेक्षा नहीं की जा सकती। इस समय मेरी जो गति है, उसे आपलोग सुनें मैं एक छलाँग में नब्बे योजन तक चला जाऊँगा, इसमें संशय नहीं है’।

तांश्च सर्वान् हरिश्रेष्ठाजाम्बवानिदमब्रवीत्।

न खल्वेतावदेवासीद् गमने मे पराक्रमः॥१४॥

मया वैरोचने यज्ञे प्रभविष्णुः सनातनः।

प्रदक्षिणीकृतः पूर्वं क्रममाणस्त्रिविक्रमम्॥१५॥

ऐसा कहकर जाम्बवान् उन समस्त श्रेष्ठ वानरों से पुनः इस प्रकार बोले—’पूर्वकाल में मेरे अंदर इतनी ही दूर तक चलने की शक्ति नहीं थी। पहले राजा बलि के यज्ञ में सर्वव्यापी एवं सबके कारणभूत

सनातन भगवान् विष्णु जब तीन पग भूमि नापने के लिये अपने पैर बढ़ा रहे थे, उस समय मैंने उनके उस विराट स्वरूप की थोड़े ही समय में परिक्रमा कर ली थी॥ १४-१५ ॥

स इदानीमहं वृद्धः प्लवने मन्दविक्रमः।

यौवने च तदासीन्मे बलमप्रतिमं परम॥१६॥

‘इस समय तो मैं बूढ़ा हो गया, अतः छलाँग मारने की मेरी शक्ति बहुत कम हो गयी है; किंतु युवावस्था में मेरे भीतर वह महान् बल था, जिसकी कहीं तुलना नहीं है॥१६॥

सम्प्रत्येतावदेवाद्य शक्यं मे गमने स्वतः।

नैतावता च संसिद्धिः कार्यस्यास्य भविष्यति॥१७॥

‘आजकल तो मुझमें स्वतः चलने की इतनी ही शक्ति है, परंतु इतनी ही गति से समुद्रलङ्घन रूप इस वर्तमान कार्य की सिद्धि नहीं हो सकती’ ।। १७॥

अथोत्तरमुदारार्थमब्रवीदङ्गदस्तदा।

अनुमान्य तदा प्राज्ञो जाम्बवन्तं महाकपिः॥१८॥

तदनन्तर बुद्धिमान् महाकपि अङ्गद ने उस समय जाम्बवान् का विशेष आदर करके यह उदारतापूर्ण बात कही- ॥ १८॥

अहमेतद् गमिष्यामि योजनानां शतं महत्।

निवर्तने तु मे शक्तिः स्यान्न वेति न निश्चितम्॥१९॥

‘मैं इस महासागर के सौ योजन की विशाल दूरी को लाँघ जाऊँगा, किंतु उधर से लौटने में मेरी ऐसी ही शक्ति रहेगी या नहीं, यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता’ ॥ १९॥

तमुवाच हरिश्रेष्ठं जाम्बवान् वाक्यकोविदः।

ज्ञायते गमने शक्तिस्तव हर्युक्षसत्तम॥२०॥

तब बातचीत कला में चतुर जाम्बवान् ने कपिश्रेष्ठ अङ्गद से कहा—’रीछों और वानरों में श्रेष्ठ युवराज! तुम्हारी गमन शक्ति से हम लोग भलीभाँति परिचित हैं॥२०॥

कामं शतसहस्रं वा नह्येष विधिरुच्यते।

योजनानां भवान् शक्तो गन्तुं प्रतिनिवर्तितुम्॥

‘भले ही, तुम एक लाख योजन तक चले जाओ, तथापि तुम सबके स्वामी हो, अतः तुम्हें भेजना हमारे लिये उचित नहीं है। तुम लाखों योजन जाने और वहाँ से लौटने में समर्थ हो॥ २१॥

नहि प्रेषयिता तात स्वामी प्रेष्यः कथंचन।

भवतायं जनः सर्वः प्रेष्यः प्लवगसत्तम॥२२॥

‘किंतु तात! वानरशिरोमणे! जो सबको भेजनेवाला स्वामी है, वह किसी तरह प्रेष्य (आज्ञापालक) नहीं हो सकता। ये सब लोग तुम्हारे सेवक हैं, तुम इन्हींमेंसे किसीको भेजो॥२२॥

भवान् कलत्रमस्माकं स्वामिभावे व्यवस्थितः।

स्वामी कलत्रं सैन्यस्य गतिरेषा परंतप॥२३॥

‘तुम कलत्र (स्त्री की भाँति रक्षणीय) हो, (जैसे नारी पति के हृदय की स्वामिनी होती है, उसी प्रकार)तुम हमारे स्वामी के पद पर प्रतिष्ठित हो। परंतप! – स्वामी सेना के लिये कलत्र (स्त्री) के समान संरक्षणीय होता है यही लोक की मान्यता है॥ २३ ॥

अपि वै तस्य कार्यस्य भवान् मूलमरिंदम।

तस्मात् कलत्रवत् तात प्रतिपाल्यः सदा भवान्॥२४॥

‘शत्रुदमन! तात! तुम्हीं उस कार्य के मूल हो, अतः सदा कलत्र की भाँति तुम्हारा पालन करना उचित है। २४॥

मूलमर्थस्य संरक्ष्यमेष कार्यविदां नयः।

मूले हि सति सिध्यन्ति गुणाः सर्वे फलोदयाः॥२५॥

‘कार्य के मूल की रक्षा करनी चाहिये। यही कार्य के तत्त्व को जानने वाले विद्वानों की नीति है; क्योंकि मूल के रहने पर ही सभी गुण सफल सिद्ध होते हैं। २५॥

तद् भवानस्य कार्यस्य साधनं सत्यविक्रम।

वुद्धिविक्रमसम्पन्नो हेतुरत्र परंतप॥२६॥

‘अतः सत्यपराक्रमी शत्रुदमन वीर! तुम्हीं इस कार्य के साधन तथा बुद्धि और पराक्रम से सम्पन्न हेतु हो॥२६॥

गुरुश्च गुरुपुत्रश्च त्वं हि नः कपिसत्तम।

भवन्तमाश्रित्य वयं समर्था ह्यर्थसाधने॥२७॥

‘कपिश्रेष्ठ! तुम्ही हमारे गुरु और गुरुपुत्र हो। तुम्हारा आश्रय लेकर ही हम सब लोग कार्यसाधन में समर्थ हो सकते हैं’ ॥ २७॥

उक्तवाक्यं महाप्राज्ञं जाम्बवन्तं महाकपिः।

प्रत्युवाचोत्तरं वाक्यं वालिसूनुरथाङ्गदः॥२८॥

जब परम बुद्धिमान् जाम्बवान् पूर्वोक्त बात कह चुके, तब महाकपि वालिकुमार अङ्गद ने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया- ॥२८॥

यदि नाहं गमिष्यामि नान्यो वानरपुङ्गवः।

पुनः खल्विदमस्माभिः कार्य प्रायोपवेशनम्॥२९॥

‘यदि मैं नहीं जाऊँगा और दूसरा कोई भी श्रेष्ठ वानर जाने को तैयार न होगा, तब फिर हमलोगों को निश्चितरूप से मरणान्त उपवास ही करना चाहिये। २९॥

नह्यकृत्वा हरिपतेः संदेशं तस्य धीमतः।

तत्रापि गत्वा प्राणानां न पश्ये परिरक्षणम्॥३०॥

‘बुद्धिमान् वानरराज सुग्रीव के आदेश का पालन किये बिना यदि हम लोग किष्किन्धा को लौट चलें तो वहाँ जाकर भी हमें अपने प्राणों की रक्षा का कोई उपाय नहीं दिखायी देता॥ ३० ॥

स हि प्रसादे चात्यर्थकोपे च हरिरीश्वरः।

अतीत्य तस्य संदेशं विनाशो गमने भवेत्॥३१॥

‘वे हमपर कृपा करने और अत्यन्त कुपित होकर हमें दण्ड देने में भी समर्थ हैं। उनकी आज्ञा का उल्लङ्घन करके जाने पर हमारा विनाश अवश्यम्भावी है॥३१॥

तत्तथा ह्यस्य कार्यस्य न भवत्यन्यथा गतिः।

तद् भवानेव दृष्टार्थः संचिन्तयितुमर्हति ॥ ३२॥

‘अतः जिस उपाय से इस सीता दर्शनरूपी कार्य की सिद्धि में कोई रुकावट न पड़े, उसका आप ही विचार करें; क्योंकि आपको सब बातों का अनुभव है’। ३२॥

सोऽङ्गदेन तदा वीरः प्रत्युक्तः प्लवगर्षभः।

जाम्बवानुत्तमं वाक्यं प्रोवाचेदं ततोऽङ्गदम्॥३३॥

उस समय अङ्गद के ऐसा कहने पर वीर वानरशिरोमणि जाम्बवान् ने उनसे यह उत्तम बात कही – ॥ ३३॥

तस्य ते वीर कार्यस्य न किंचित् परिहास्यते।

एष संचोदयाम्येनं यः कार्यं साधयिष्यति॥३४॥

‘वीर! तुम्हारे इस कार्य में कोई किंचित् भी त्रुटि नहीं आने पायेगी। अब मैं ऐसे वीर को प्रेरित कर रहा हूँ, जो इस कार्य को सिद्ध कर सकेगा’ ॥ ३४॥

ततः प्रतीतं प्लवतां वरिष्ठमेकान्तमाश्रित्य सुखोपविष्टम्।

संचोदयामास हरिप्रवीरो हरिप्रवीरं हनुमन्तमेव॥ ३५॥

ऐसा कहकर वानरों और भालुओं के वीर यूथपति जाम्बवान् ने वानरसेना के श्रेष्ठ वीर हनुमान जी को ही प्रेरित किया, जो एकान्त में जाकर मौज से बैठे हुए थे। उन्हें किसी बात की चिन्ता नहीं थी और वे दूरतक की छलाँग मारने वालों में सबसे श्रेष्ठ थे॥ ३५ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे पञ्चषष्टितमः सर्गः ॥६५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में पैंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥६५॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

जाम्बवान् का हनुमानजी को उनकी उत्पत्ति कथा सुनाकर समुद्रलङ्घन के लिये उत्साहित करना

षट्षष्टितमः सर्गः

सर्ग-66


अनेकशतसाहस्री विषण्णां हरिवाहिनीम्।

जाम्बवान् समुदीक्ष्यैवं हनूमन्तमथाब्रवीत्॥१॥

लाखों वानरों की सेना को इस तरह विषाद में पड़ी देख जाम्बवान् ने हनुमान जी से कहा- ॥१॥

वीर वानरलोकस्य सर्वशास्त्रविदां वर।

तूष्णीमेकान्तमाश्रित्य हनूमन् किं न जल्पसि॥२॥

‘वानरजगत् के वीर तथा सम्पूर्ण शास्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ हनुमान् ! तुम एकान्त में आकर चुपचाप क्यों बैठे हो? कुछ बोलते क्यों नहीं? ॥ २॥

हनूमन् हरिराजस्य सुग्रीवस्य समो ह्यसि।

रामलक्ष्मणयोश्चापि तेजसा च बलेन च॥३॥

‘हनूमन्! तुम तो वानरराज सुग्रीव के समान पराक्रमी हो तथा तेज और बल में श्रीराम और लक्ष्मण के तुल्य हो॥३॥

अरिष्टनेमिनः पुत्रो वैनतेयो महाबलः।

गरुत्मानिव विख्यात उत्तमः सर्वपक्षिणाम्॥४॥

‘कश्यपजी के महाबली पुत्र और समस्त पक्षियों में श्रेष्ठ जो विनतानन्दन गरुड़ हैं, उन्हींके समान तुम भी विख्यात शक्तिशाली एवं तीव्रगामी हो॥४॥

बहुशो हि मया दृष्टः सागरे स महाबलः।

भुजङ्गानुद्धरन् पक्षी महाबाहुर्महाबलः॥५॥

‘महाबली महाबाहु पक्षिराज गरुड़ को मैंने समुद्र में कई बार देखा है, जो बड़े-बड़े सो को वहाँ से निकाल लाते हैं॥५॥

पक्षयोर्यद् बलं तस्य भुजवीर्यबलं तव।

विक्रमश्चापि वेगश्च न ते तेनापहीयते॥६॥

‘उनके दोनों पंखों में जो बल है, वही बल, वही पराक्रम तुम्हारी इन दोनों भुजाओं में भी है। इसीलिये तुम्हारा वेग और विक्रम भी उनसे कम नहीं है॥६॥

बलं बुद्धिश्च तेजश्च सत्त्वं च हरिपुङ्गव।

विशिष्टं सर्वभूतेषु किमात्मानं न सज्जसे॥७॥

‘वानरशिरोमणे! तुम्हारा बल, बुद्धि, तेज और धैर्य भी समस्त प्राणियों में सबसे बढ़कर है फिर तुम अपने-आपको ही समुद्र लाँघने के लिये क्यों नहीं तैयार करते? ॥ ७॥

अप्सराऽप्सरसां श्रेष्ठा विख्याता पुञ्जिकस्थला।

अञ्जनेति परिख्याता पत्नी केसरिणो हरेः॥८॥

विख्याता त्रिषु लोकेषु रूपेणाप्रतिमा भुवि।

अभिशापादभूत् तात कपित्वे कामरूपिणी॥९॥

दुहिता वानरेन्द्रस्य कुञ्जरस्य महात्मनः।

(वीरवर! तुम्हारे प्रादुर्भाव की कथा इस प्रकार है -) पुञ्जिकस्थला नाम से विख्यात जो अप्सरा है, वह समस्त अप्सराओं में अग्रगण्य है। तात! एक समय शापवश वह कपियोनि में अवतीर्ण हुई। उस समय वह वानरराज महामनस्वी कुञ्जर की पुत्री इच्छानुसार रूप धारण करने वाली थी। इस भूतल पर उसके रूप की समानता करने वाली दूसरी कोई स्त्री नहीं थी। वह तीनों लोकों में विख्यात थी उसका नाम अञ्जना था। वह वानरराज केसरी की पत्नी हुई। ८-९ १/२॥

मानुषं विग्रहं कृत्वा रूपयौवनशालिनी॥१०॥

विचित्रमाल्याभरणा कदाचित् क्षौमधारिणी।

अचरत् पर्वतस्याग्रे प्रावृडम्बुदसंनिभे॥११॥

‘एक दिन की बात है, रूप और यौवन से सुशोभित होने वाली अञ्जना मानवी स्त्री का शरीर धारण करके वर्षा काल के मेघ की भाँति श्याम कान्तिवाले एक पर्वत-शिखर पर विचर रही थी। उसके अङ्गों पर रेशमी साड़ी शोभा पाती थी। वह फूलों के विचित्र आभूषणों से विभूषित थी॥ १०-११॥

तस्या वस्त्रं विशालाक्ष्याः पीतं रक्तदशं शुभम्।

स्थितायाः पर्वतस्याग्रे मारुतोऽपाहरच्छनैः॥१२॥

‘उस विशाललोचना बाला का सुन्दर वस्त्र तो पीले रंग का था, किंतु उसके किनारे का रंग लाल था। वह पर्वत के शिखर पर खड़ी थी। उसी समय वायुदेवता ने उसके उस वस्त्र को धीरे से हर लिया॥ १२ ॥

स ददर्श ततस्तस्या वृत्तावूरू सुसंहतौ।

स्तनौ च पीनौ सहितौ सुजातं चारु चाननम्॥१३॥

‘तत्पश्चात् उन्होंने उसकी परस्पर सटी हुई गोलगोल जाँघों, एक-दूसरे से लगे हुए पीन उरोजों तथा मनोहर मुख को भी देखा ॥ १३॥

तां बलादायतश्रोणी तनुमध्यां यशस्विनीम्।

दृष्ट्वैव शुभसर्वाङ्गीं पवनः काममोहितः॥१४॥

उसके नितम्ब ऊँचे और विस्तृत थे। कटिभाग बहुत ही पतला था। उसके सारे अङ्ग परम सुन्दर थे। इस प्रकार बलपूर्वक यशस्विनी अञ्जना के अङ्गों का अवलोकन करके पवन देवता काम से मोहित हो गये॥

स तां भुजाभ्यां दीर्घाभ्यां पर्यष्वजत मारुतः।

मन्मथाविष्टसर्वाङ्गो गतात्मा तामनिन्दिताम्॥

‘उनके सम्पूर्ण अङ्गों में कामभाव का आवेश हो गया। मन अञ्जना में ही लग गया। उन्होंने उस अनिन्द्य सुन्दरी को अपनी दोनों विशाल भुजाओं में भरकर हृदय से लगा लिया॥ १५ ॥

सा तु तत्रैव सम्भ्रान्ता सुव्रता वाक्यमब्रवीत्।

एकपत्नीव्रतमिदं को नाशयितुमिच्छति॥१६॥

‘अञ्जना उत्तम व्रत का पालन करने वाली सती नारी थी। अतः उस अवस्था में पड़कर वह वहीं घबरा उठी और बोली—’कौन मेरे इस पातिव्रत्य का नाश करना चाहता है’? ॥ १६ ॥

अञ्जनाया वचः श्रुत्वा मारुतः प्रत्यभाषत।

न त्वां हिंसामि सुश्रोणि मा भूत् ते मनसो भयम्॥१७॥

अञ्जना की बात सुनकर पवनदेव ने उत्तर दिया —’सुश्रोणि! मैं तुम्हारे एक पत्नी-व्रत का नाश नहीं कर रहा हूँ। अतः तुम्हारे मन से यह भय दूर हो जाना चाहिये॥ १७॥

मनसास्मि गतो यत् त्वां परिष्वज्य यशस्विनि।

वीर्यवान् बुद्धिसम्पन्नस्तव पुत्रो भविष्यति॥१८॥

‘यशस्विनि! मैंने अव्यक्त रूप से तुम्हारा आलिङ्गन करके मानसिक संकल्प के द्वारा तुम्हारे साथ समागम किया है। इससे तुम्हें बल-पराक्रम से सम्पन्न एवं बुद्धिमान् पुत्र प्राप्त होगा॥ १८ ॥

महासत्त्वो महातेजा महाबलपराक्रमः।

लङ्घने प्लवने चैव भविष्यति मया समः॥१९॥

‘वह महान् धैर्यवान्, महातेजस्वी, महाबली, महापराक्रमी तथा लाँघने और छलाँग मारने में मेरे समान होगा’॥ १९॥

एवमुक्ता ततस्तुष्टा जननी ते महाकपे।

गुहायां त्वां महाबाहो प्रजज्ञे प्लवगर्षभ॥२०॥

महाकपे! वायुदेव के ऐसा कहने पर तुम्हारी माता प्रसन्न हो गयीं। महाबाहो! वानरश्रेष्ठ! फिर उन्होंने तुम्हें एक गुफा में जन्म दिया॥२०॥

अभ्युत्थितं ततः सूर्यं बालो दृष्ट्वा महावने।

फलं चेति जिघृक्षुस्त्वमुत्प्लुत्याभ्युत्पतो दिवम्॥२१॥

‘बाल्यावस्था में एक विशाल वन के भीतर एक दिन उदित हुए सूर्य को देखकर तुमने समझा कि यह भी कोई फल है; अतः उसे लेने के लिये तुम सहसा आकाश में उछल पड़े॥२१॥

शतानि त्रीणि गत्वाथ योजनानां महाकपे।

तेजसा तस्य निर्धूतो न विषादं गतस्ततः॥२२॥

‘महाकपे! तीन सौ योजन ऊँचे जाने के बाद सूर्य के तेज से आक्रान्त होने पर भी तुम्हारे मन में खेद या चिन्ता नहीं हुई॥२२॥

त्वामप्युपगतं तूर्णमन्तरिक्षं महाकपे।

क्षिप्तमिन्द्रेण ते वज्रं कोपाविष्टेन तेजसा॥२३॥

‘कपिप्रवर! अन्तरिक्ष में जाकर जब तुरंत ही तुम सूर्य के पास पहुँच गये, तब इन्द्र ने कुपित होकर तुम्हारे ऊपर तेज से प्रकाशित वज्र का प्रहार किया। २३॥

तदा शैलाग्रशिखरे वामो हनुरभज्यत।

ततो हि नामधेयं ते हनुमानिति कीर्तितम्॥२४॥

‘उस समय उदयगिरि के शिखर पर तुम्हारे हनु (ठोड़ी) का बायाँ भाग वज्र की चोट से खण्डित हो गया। तभी से तुम्हारा नाम हनुमान् पड़ गया॥ २४॥

ततस्त्वां निहतं दृष्ट्वा वायुर्गन्धवहः स्वयम्।

त्रैलोक्यं भृशसंक्रुद्धो न ववौ वै प्रभञ्जनः॥२५॥

‘तुम पर प्रहार किया गया है, यह देखकर गन्धवाहक वायुदेवता को बड़ा क्रोध हुआ। उन प्रभञ्जनदेव ने तीनों लोकों में प्रवाहित होना छोड़ दिया॥२५॥

सम्भ्रान्ताश्च सुराः सर्वे त्रैलोक्ये क्षुभिते सति।

प्रसादयन्ति संक्रुद्धं मारुतं भुवनेश्वराः॥२६॥

‘इससे सम्पूर्ण देवता घबरा गये; क्योंकि वायु के अवरुद्ध हो जाने से तीनों लोकों में खलबली मच गयी थी। उस समय समस्त लोकपाल कुपित हुए वायुदेव को मनाने लगे॥ २६ ॥

प्रसादिते च पवने ब्रह्मा तुभ्यं वरं ददौ।

अशस्त्रवध्यतां तात समरे सत्यविक्रम॥२७॥

‘सत्यपराक्रमी तात! पवनदेवके प्रसन्न होने पर ब्रह्माजी ने तुम्हारे लिये यह वर दिया कि तुम समराङ्गण में किसी भी अस्त्र-शस्त्र के द्वारा मारे नहीं जा सकोगे॥२७॥

वज्रस्य च निपातेन विरुजं त्वां समीक्ष्य च।

सहस्रनेत्रः प्रीतात्मा ददौ ते वरमुत्तमम्॥२८॥

स्वच्छन्दतश्च मरणं तव स्यादिति वै प्रभो।

‘प्रभो! वज्र के प्रहार से भी तुम्हें पीड़ित न देखकर सहस्र नेत्रधारी इन्द्र के मन में बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने तुम्हारे लिये यह उत्तम वर दिया—’मृत्यु तुम्हारी इच्छा के अधीन होगी-तुम जब चाहोगे, तभी मर सकोगे, अन्यथा नहीं’ ॥ २८ १/२॥

स त्वं केसरिणः पुत्रः क्षेत्रजो भीमविक्रमः॥२९॥

मारुतस्यौरसः पुत्रस्तेजसा चापि तत्समः।

‘इस प्रकार तुम केसरी के क्षेत्रज पुत्र हो। तुम्हारा पराक्रम शत्रुओं के लिये भयंकर है। तुम वायुदेव के औरस पुत्र हो, इसलिये तेज की दृष्टि से भी उन्हीं के समान हो॥ २९ १/२॥

त्वं हि वायुसुतो वत्स प्लवने चापि तत्समः॥३०॥

वयमद्य गतप्राणा भवानस्मासु साम्प्रतम्।

दाक्ष्यविक्रमसम्पन्नः कपिराज इवापरः॥३१॥

‘वत्स! तुम पवन के पुत्र हो, अतः छलाँग मारने में भी उन्हीं के तुल्य हो। हमारी प्राणशक्ति अब चली गयी। इस समय तुम्हीं हमलोगों में दूसरे वानरराज की भाँति चातुर्य एवं पौरुष से सम्पन्न हो॥३०-३१॥

त्रिविक्रमे मया तात सशैलवनकानना।

त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवी परिक्रान्ता प्रदक्षिणम्॥३२॥

‘तात! भगवान् वामन ने त्रिलोकी को नापने के लिये जब पैर बढ़ाया था, उस समय मैंने पर्वत, वन और काननोंसहित समूची पृथ्वी की इक्कीस बार प्रदक्षिणा की थी॥ ३२॥

तथा चौषधयोऽस्माभिः संचिता देवशासनात्।

निर्मथ्यममृतं याभिस्तदानीं नो महबलम्॥३३॥

‘समुद्र-मन्थन के समय देवताओं की आज्ञा से हमने उन ओषधियों का संचय किया था, जिनके द्वारा अमृत को मथकर निकालना था। उन दिनों हममें महान् बल था॥ ३३॥

स इदानीमहं वृद्धः परिहीनपराक्रमः।

साम्प्रतं कालमस्माकं भवान् सर्वगुणान्वितः॥३४॥

‘अब तो मैं बूढ़ा हो गया हूँ। मेरा पराक्रम घट गया है। इस समय हमलोगों में तुम्हीं सब प्रकार के गुणों से सम्पन्न हो॥३४॥

तद् विजृम्भस्व विक्रान्त प्लवतामुत्तमो ह्यसि।

त्वदीर्यं द्रष्टकामा हि सर्वा वानरवाहिनी॥३५॥

‘अतः पराक्रमी वीर! तुम अपने असीम बल का विस्तार करो। छलाँग मारने वालों में तुम सबसे श्रेष्ठ हो। यह सारी वानरसेना तुम्हारे बल-पराक्रम को देखना चाहती है॥ ३५॥

उत्तिष्ठ हरिशार्दूल लवयस्व महार्णवम्।

परा हि सर्वभूतानां हनुमन् या गतिस्तव॥३६॥

‘वानरश्रेष्ठ हनुमान् ! उठो और इस महासागर को लाँघ जाओ; क्योंकि तुम्हारी गति सभी प्राणियों से बढ़कर है॥ ३६॥

विषण्णा हरयः सर्वे हनुमन् किमुपेक्षसे।

विक्रमस्व महावेग विष्णुस्त्रीन् विक्रमानिव॥३७॥

‘हनुमन्! समस्त वानर चिन्ता में पड़े हैं तुम क्यों इनकी उपेक्षा करते हो? महान् वेगशाली वीर! जैसे भगवान् विष्णु ने त्रिलोकी को नापने के लिये तीन पग बढ़ाये थे, उसी प्रकार तुम भी अपने पैर बढ़ाओ’। ३७॥

ततः कपीनामृषभेण चोदितः प्रतीतवेगः पवनात्मजः कपिः।

प्रहर्षयंस्तां हरिवीरवाहिनीं चकार रूपं महदात्मनस्तदा ॥३८॥

इस प्रकार वानरों और भालुओं में श्रेष्ठ जाम्बवान् की प्रेरणा पाकर कपिवर पवनकुमार हनुमान् को अपने महान् वेग पर विश्वास हो आया। उन्होंने वानर वीरों की उस सेना का हर्ष बढ़ाते हुए उस समय अपना विराट् रुप प्रकट किया॥ ३८॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे षट्षष्टितमः सर्गः॥६६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में छाछठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥६६॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

हनुमान जी का समुद्र लाँघने के लिये उत्साह प्रकट करना, जाम्बवान् के द्वारा उनकी प्रशंसा तथा वेगपूर्वक छलाँग मारने के लिये हनुमान जी का महेन्द्र पर्वत पर चढ़ना

सप्तषष्टितमः सर्गः

सर्ग-67


तं दृष्ट्वा जृम्भमाणं ते क्रमितुं शतयोजनम्।

वेगेनापूर्यमाणं च सहसा वानरोत्तमम्॥१॥

सहसा शोकमुत्सृज्य प्रहर्षेण समन्विताः।

विनेदुस्तुष्टवुश्चापि हनूमन्तं महाबलम्॥२॥

सौ योजन के समुद्र को लाँघने के लिये वानरश्रेष्ठ हनुमान जी को सहसा बढ़ते और वेग से परिपूर्ण होते देख सब वानर तुरंत शोक छोड़कर अत्यन्त हर्ष से भर गये और महाबली हनुमान जी की स्तुति करते हुए जोर-जोर से गर्जना करने लगे॥ १-२॥

प्रहृष्टा विस्मिताश्चापि ते वीक्षन्ते समन्ततः।

त्रिविक्रमं कृतोत्साहं नारायणमिव प्रजाः॥३॥

वे उनके चारों ओर खड़े हो प्रसन्न एवं चकित होकर उन्हें इस प्रकार देखने लगे, जैसे उत्साहयुक्त नारायणावतार वामनजी को समस्त प्रजा ने देखा था।३॥

संस्तूयमानो हनुमान् व्यवर्धत महाबलः।

समाविद्ध्य च लाङ्गेलं हर्षाद् बलमुपेयिवान्॥४॥

अपनी प्रशंसा सुनकर महाबली हनुमान् ने शरीर को और भी बढ़ाना आरम्भ किया। साथ ही हर्ष के साथ अपनी पूँछ को बारम्बार घुमाकर अपने महान् बल का स्मरण किया॥४॥

तस्य संस्तूयमानस्य वृद्वैर्वानरपुङ्गवैः।

तेजसाऽऽपूर्यमाणस्य रूपमासीदनुत्तमम्॥५॥

बड़े-बूढ़े वानरशिरोमणियों के मुख से अपनी प्रशंसा सुनते और तेज से परिपूर्ण होते हुए हनुमान् जी का रूप उस समय बड़ा ही उत्तम प्रतीत होता था॥५॥

यथा विजृम्भते सिंहो विवृते गिरिगह्वरे।

मारुतस्यौरसः पुत्रस्तथा सम्प्रति जृम्भते॥६॥

जैसे पर्वत की विस्तृत कन्दरा में सिंह अंगड़ाई लेता है, उसी प्रकार वायुदेवता के औरस पुत्र ने उस समय अपने शरीर को अंगड़ाई ले-लेकर बढ़ाया॥६॥

अशोभत मुखं तस्य जृम्भमाणस्य धीमतः।

अम्बरीषोपमं दीप्तं विधूम इव पावकः॥७॥

जंभाई लेते समय बुद्धिमान् हनुमान जी का दीप्तिमान् मुख जलते हुए भाड़ तथा धूमरहित अग्नि के समान शोभा पा रहा था।। ७॥

हरीणामुत्थितो मध्यात् सम्प्रहृष्टतनूरुहः।

अभिवाद्य हरीन् वृद्धान् हनूमानिदमब्रवीत्॥८॥

वे वानरों के बीच से उठकर खड़े हो गये। उनके सम्पूर्ण शरीर में रोमाञ्च हो आया। उस अवस्था में हनुमान जी ने बड़े-बूढ़े वानरों को प्रणाम करके इस प्रकार कहा- ॥८॥

आरुजन् पर्वताग्राणि हुताशनसखोऽनिलः।

बलवानप्रमेयश्च वायुराकाशगोचरः॥९॥

‘आकाश में विचरने वाले वायुदेवता बड़े बलवान् हैं। उनकी शक्ति की कोई सीमा नहीं है। वे अग्निदेव के सखा हैं और अपने वेग से बड़े-बड़े पर्वत-शिखरों को भी तोड़ डालते हैं॥९॥

तस्याहं शीघ्रवेगस्य शीघ्रगस्य महात्मनः।

मारुतस्यौरसः पुत्रः प्लवनेनास्मि तत्समः ॥१०॥

अत्यन्त शीघ्र वेग से चलने वाले उन शीघ्रगामी महात्मा वायु का मैं औरस पुत्र हूँ और छलाँग मारने में उन्हीं के समान हूँ॥ १०॥

उत्सहेयं हि विस्तीर्णमालिखन्तमिवाम्बरम्।

मेरुं गिरिमसङ्गेन परिगन्तुं सहस्रशः॥११॥

‘कई सहस्र योजनों तक फैले हुए मेरुगिरि की, जो आकाश के बहुत बड़े भाग को ढके हुए है और उसमें रेखा खींचता-सा जान पड़ता है, मैं बिना विश्राम लिये सहस्रों बार परिक्रमा कर सकता हूँ॥ ११ ॥

बाहुवेगप्रणुन्नेन सागरेणाहमुत्सहे।

समाप्लावयितुं लोकं सपर्वतनदीह्रदम्॥१२॥

‘अपनी भुजाओं के वेग से समुद्र को विक्षुब्ध करके उसके जल से मैं पर्वत, नदी और जलाशयों सहित सम्पूर्ण जगत् को आप्लावित कर सकता हूँ॥ १२॥

ममोरुजङ्घावेगेन भविष्यति समुत्थितः।

समुत्थितमहाग्राहः समुद्रो वरुणालयः॥१३॥

‘वरुणका निवास स्थान यह महासागर मेरी जाँघों और पिंडलियों के वेग से विक्षुब्ध हो उठेगा और इसके भीतर रहने वाले बड़े-बड़े ग्राह ऊपर आ जायँगे॥ १३॥

पन्नगाशनमाकाशे पतन्तं पक्षिसेवितम्।

वैनतेयमहं शक्तः परिगन्तुं सहस्रशः॥१४॥

‘समस्त पक्षी जिनकी सेवा करते हैं, वे सर्पभोजी विनतानन्दन गरुड़ आकाश में उड़ते हों तो भी मैं हजारों बार उनके चारों ओर घूम सकता हूँ॥ १४ ॥

उदयात् प्रस्थितं वापि ज्वलन्तं रश्मिमालिनम्।

अनस्तमितमादित्यमहं गन्तुं समुत्सहे॥१५॥

ततो भूमिमसंस्पृष्ट्वा पुनरागन्तुमुत्सहे।

प्रवेगेनैव महता भीमेन प्लवगर्षभाः॥१६॥

‘श्रेष्ठ वानरो! उदयाचल से चलकर अपने तेज से प्रज्वलित होते हुए सूर्यदेव को मैं अस्त होने से पहले ही छू सकता हूँ और वहाँ से पृथ्वी तक आकर यहाँ पैर रखे बिना ही पुनः उनके पास तक बड़े भयंकर वेग से जा सकता हूँ॥१५-१६॥

उत्सहेयमतिक्रान्तुं सर्वानाकाशगोचरान्।

सागरान् शोषयिष्यामि दारयिष्यामि मेदिनीम्॥१७॥

पर्वतांश्चूर्णयिष्यामि प्लवमानः प्लवङ्गमः।

हरिष्याम्युरुवेगेन प्लवमानो महार्णवम्॥१८॥

‘आकाशचारी समस्त ग्रह-नक्षत्र आदि को लाँघकर आगे बढ़ जाने का उत्साह रखता हूँ। मैं चाहूँ तो समुद्रों को सोख लूँगा, पृथ्वी को विदीर्ण कर दूंगा और कूदकूदकर पर्वतों को चूर-चूर कर डालूँगा; क्योंकि मैं दूर तक की छलाँगें मारने वाला वानर हूँ। महान् वेग से महासागर को फाँदता हुआ मैं अवश्य उसके पार पहुँच जाऊँगा॥

लतानां विविधं पुष्पं पादपानां च सर्वशः।

अनुयास्यति मामद्य प्लवमानं विहायसा॥१९॥

‘आज आकाश में वेगपूर्वक जाते समय लताओं और वृक्षों के नाना प्रकार के फूल मेरे साथ-साथ उड़ते जायँगे॥ १९॥

भविष्यति हि मे पन्थाः स्वातेः पन्था इवाम्बरे।

चरन्तं घोरमाकाशमुत्पतिष्यन्तमेव च ॥२०॥

द्रक्ष्यन्ति निपतन्तं च सर्वभूतानि वानराः।

‘बहुत-से फूल बिखरे होने के कारण मेरा मार्ग आकाश में अनेक नक्षत्रपुञ्जों से सुशोभित स्वातिमार्ग (छायापथ) के समान प्रतीत होगा। वानरो! आज समस्त प्राणी मुझे भयंकर आकाश में सीधे जाते हुए, ऊपर उछलते हुए और नीचे उतरते हुए देखेंगे॥ २० १/२॥

महामेरुप्रतीकाशं मां द्रक्ष्यध्वं प्लवङ्गमाः॥२१॥

दिवमावृत्य गच्छन्तं ग्रसमानमिवाम्बरम्।

विधमिष्यामि जीमूतान् कम्पयिष्यामि पर्वतान्।

सागरं शोषयिष्यामि प्लवमानः समाहितः॥२२॥

‘कपिवरो! तुम देखोगे, मैं महागिरि मेरु के समान विशाल शरीर धारण करके स्वर्ग को ढकता और आकाश को निगलता हुआ-सा आगे बढुंगा, बादलों को छिन्न-भिन्न कर डालूँगा, पर्वतों को हिला दूंगा और एकचित्त हो छलाँग मारकर आगे बढ़ने पर समुद्र को भी सुखा दूंगा॥ २१-२२ ॥

वैनतेयस्य वा शक्तिर्मम वा मारुतस्य वा।

ऋते सुपर्णराजानं मारुतं वा महाबलम्।

न तद् भूतं प्रपश्यामि यन्मां प्लुतमनुव्रजेत्॥२३॥

‘विनतानन्दन गरुड में, मुझमें अथवा वायुदेवता में ही समुद्र को लाँघ जाने की शक्ति है। पक्षिराज गरुडअथवा महाबली वायुदेवता के सिवा और किसी प्राणी को मैं ऐसा नहीं देखता जो यहाँ से छलाँग मारने पर मेरे साथ जा सके॥२३॥

निमेषान्तरमात्रेण निरालम्बनमम्बरम्।

सहसा निपतिष्यामि घनाद विद्युदिवोत्थिता॥२४॥

‘मेघ से उत्पन्न हुई विद्युत् की भाँति मैं पलक मारते-मारते सहसा निराधार आकाश में उड़ जाऊँगा। २४॥

भविष्यति हि मे रूपं प्लवमानस्य सागरम्।

विष्णोः प्रक्रममाणस्य तदा त्रीन् विक्रमानिव॥२५॥

“समुद्र को लाँघते समय मेरा वही रूप प्रकट होगा, जो तीनों पगों को बढ़ाते समय वामनरूपधारी भगवान् विष्णु का हुआ था॥ २५ ॥

बुद्ध्या चाहं प्रपश्यामि मनश्चेष्टा च मे तथा।

अहं द्रक्ष्यामि वैदेहीं प्रमोदध्वं प्लवङ्गमाः॥२६॥

‘वानरो! मैं बुद्धि से जैसा देखता या सोचता हूँ, मेरे मन की चेष्टा भी उसके अनुरूप ही होती है। मुझे निश्चय जान पड़ता है कि मैं विदेहकुमारी का दर्शन करूँगा, अतः अब तुम लोग खुशियाँ मनाओ॥ २६॥

मारुतस्य समो वेगे गरुडस्य समो जवे।

अयतं योजनानां तु गमिष्यामीति मे मतिः॥२७॥

‘मैं वेग में वायुदेवता तथा गरुड के समान हूँ। मेरा तो ऐसा विश्वास है कि इस समय मैं दस हजार योजन तक जा सकता हूँ॥ २७॥

वासवस्य सवज्रस्य ब्रह्मणो वा स्वयम्भुवः।

विक्रम्य सहसा हस्तादमृतं तदिहानये॥२८॥

लङ्कां वापि समुत्क्षिप्य गच्छेयमिति मे मतिः।

‘वज्रधारी इन्द्र अथवा स्वयम्भू ब्रह्माजी के हाथ से भी मैं बलपूर्वक अमृत छीनकर सहसा यहाँ ला सकता हूँ। समूची लङ्का को भी भूमि से उखाड़कर हाथ पर उठाये चल सकता हूँ ऐसा मेरा विश्वास है’॥ २८ १/२॥

तमेवं वानरश्रेष्ठं गर्जन्तममितप्रभम्॥२९॥

प्रहृष्टा हरयस्तत्र समुदैक्षन्त विस्मिताः।

अमिततेजस्वी वानरश्रेष्ठ हनुमान् जी जब इस प्रकार गर्जना कर रहे थे, उस समय सम्पूर्ण वानर अत्यन्त हर्ष में भरकर चकितभाव से उनकी ओर देख रहे थे॥ २९ १/२॥

तच्चास्य वचनं श्रुत्वा ज्ञातीनां शोकनाशनम्॥३०॥

उवाच परिसंहृष्टो जाम्बवान् प्लवगेश्वरः।

हनुमान जी की बातें भाई-बन्धुओं के शोक को नष्ट करनेवाली थीं। उन्हें सुनकर वानर-सेनापति जाम्बवान् को बड़ी प्रसन्नता हुई वे बोले- ॥ ३० १/२॥

वीर केसरिणः पुत्र वेगवन् मारुतात्मज॥३१॥

ज्ञातीनां विपुलः शोकस्त्वया तात प्रणाशितः।

‘वीर! केसरीके सुपुत्र! वेगशाली पवनकुमार ! तात! तुमने अपने बन्धुओं का महान् शोक नष्ट कर दिया॥ ३१ १/२॥

तव कल्याणरुचयः कपिमुख्याः समागताः॥

मङ्गलान्यर्थसिद्ध्यर्थं करिष्यन्ति समाहिताः।

‘यहाँ आये हुए सभी श्रेष्ठ वानर तुम्हारे कल्याण की कामना करते हैं। अब ये कार्य की सिद्धि के उद्देश्य से एकाग्रचित्त हो तुम्हारे लिये मङ्गलकृत्यस्वस्तिवाचन आदि का अनुष्ठान करेंगे॥ ३२ १/२॥

ऋषीणां च प्रसादेन कपिवृद्धमतेन च॥३३॥

गुरूणां च प्रसादेन सम्प्लव त्वं महार्णवम्।

‘ऋषियों के प्रसाद, वृद्ध वानरों की अनुमति तथा गुरुजनों की कृपा से तुम इस महासागर के पार हो जाओ॥ ३३ १/२॥

स्थास्यामश्चैकपादेन यावदागमनं तव॥३४॥

त्वद्गतानि च सर्वेषां जीवनानि वनौकसाम्।

‘जब तक तुम लौटकर यहाँ आओगे, तब तक हम तुम्हारी प्रतीक्षा में एक पैर से खड़े रहेंगे; क्योंकि हम सब वानरों का जीवन तुम्हारे ही अधीन है’॥ ३४ १/२॥

ततश्च हरिशार्दूलस्तानुवाच वनौकसः॥ ३५॥

कोऽपि लोके न मे वेगं प्लवने धारयिष्यति।

तदनन्तर कपिश्रेष्ठ हनुमान् ने उन वनवासी वानरों से कहा—’जब मैं यहाँ से छलाँग मारूँगा, उस समय संसार में कोई भी मेरे वेग को धारण नहीं कर सकेगा। ३५ १/२॥

एतानीह नगस्यास्य शिलासंकटशालिनः॥ ३६॥

शिखराणि महेन्द्रस्य स्थिराणि च महान्ति च।

येषु वेगं गमिष्यामि महेन्द्रशिखरेष्वहम्॥ ३७॥

नानाद्रुमविकीर्णेषु धातुनिष्पन्दशोभिषु।

‘शिलाओं के समूह से शोभा पाने वाले केवल इस महेन्द्र पर्वत के ये शिखर ही ऊँचे-ऊँचे और स्थिर हैं, जिनपर नाना प्रकार के वृक्ष फैले हुए हैं तथा गैरिक आदि धातुओं के समुदाय शोभा दे रहे हैं। इन महेन्द्रशिखरों पर ही वेगपूर्वक पैर रखकर मैं यहाँ से छलाँग मारूँगा॥ ३६-३७ १/२॥

एतानि मम वेगं हि शिखराणि महान्ति च॥३८॥

प्लवतो धारयिष्यन्ति योजनानामितः शतम्।

‘यहाँ से सौ योजन के लिये छलाँग मारते समय महेन्द्र पर्वत के ये महान् शिखर ही मेरे वेग को धारण कर सकेंगे’॥ ३८ १/२॥

ततस्तु मारुतप्रख्यः स हरिर्मारुतात्मजः।

आरुरोह नगश्रेष्ठं महेन्द्रमरिमर्दनः॥३९॥

यों कहकर वायु के समान महापराक्रमी शत्रुमर्दन पवन कुमार हनुमान जी पर्वतों में श्रेष्ठ महेन्द्रपर चढ़ गये॥ ३९॥

वृतं नानाविधैः पुष्पैमुंगसेवितशादलम्।

लताकुसुमसम्बाधं नित्यपुष्पफलद्रुमम्॥४०॥

वह पर्वत नाना प्रकार के पुष्पयुक्त वृक्षों से भरा हुआ था, वन्य पशु वहाँ की हरी-हरी घास चर रहे थे, लताओं और फूलों से वह सघन जान पड़ता था और वहाँ के वृक्षों में सदा ही फल-फूल लगे रहते थे। ४०॥

सिंहशार्दूलसहितं मत्तमातङ्गसेवितम्।

मत्तद्विजगणोद्घष्टं सलिलोत्पीडसंकुलम्॥४१॥

महेन्द्र पर्वत के वनों में सिंह और बाघ भी निवास करते थे, मतवाले गजराज विचरते थे, मदमत्त पक्षियों के समूह सदा कलरव किया करते थे तथा जल के स्रोतों और झरनों से वह पर्वत व्याप्त दिखायी देता था॥४१॥

महद्भिरुच्छ्रितं शृङ्गैर्महेन्द्रं स महाबलः।

विचचार हरिश्रेष्ठो महेन्द्रसमविक्रमः॥४२॥

बड़े-बड़े शिखरों से ऊँचे प्रतीत होने वाले महेन्द्र पर्वत पर आरूढ़ हो इन्द्रतुल्य पराक्रमी महाबली कपिश्रेष्ठ हनुमान् वहाँ इधर-उधर टहलने लगे॥ ४२ ॥

पादाभ्यां पीडितस्तेन महाशैलो महात्मना।

ररास सिंहाभिहतो महान् मत्त इव द्विपः॥४३॥

महाकाय हनुमान जी के दोनों पैरों से दबा हुआ वह महान् पर्वत सिंह से आक्रान्त हुए महान् मदमत्त गजराज की भाँति चीत्कार-सा करने लगा (वहाँ रहने वाले प्राणियों का शब्द ही मानो उसका आर्त चीत्कार था) ॥ ४३॥

मुमोच सलिलोत्पीडान् विप्रकीर्णशिलोच्चयः।

वित्रस्तमृगमातङ्गः प्रकम्पितमहाद्रुमः॥४४॥

उसके शिलासमूह इधर-उधर बिखर गये। उससे नये-नये झरने फूट निकले। वहाँ रहने वाले मृग और हाथी भय से थर्रा उठे और बड़े-बड़े वृक्ष झोंके खाकर झूमने लगे॥४४॥

नानागन्धर्वमिथुनैः पानसंसर्गकर्कशैः।

उत्पतद्भिर्विहंगैश्च विद्याधरगणैरपि॥४५॥

त्यज्यमानमहासानुः संनिलीनमहोरगः।

शैलशृङ्गशिलोत्पातस्तदाभूत् स महागिरिः॥

मधुपान के संसर्ग से उद्धत चित्तवाले अनेकानेक गन्धर्वो के जोड़े, विद्याधरों के समुदाय और उड़ते हुए पक्षी भी उस पर्वत के विशाल शिखरों को छोड़कर जाने लगे। बड़े-बड़े सर्प बिलों में छिप गये तथा उसपर्वत के शिखरों से बड़ी-बड़ी शिलाएँ टूट-टूटकर गिरने लगीं। इस प्रकार वह महान् पर्वत बड़ी दुरवस्था में पड़ गया॥ ४५-४६॥

निःश्वसद्भिस्तदा तैस्तु भुजगैरर्धनिःसृतैः।

सपताक इवाभाति स तदा धरणीधरः॥४७॥

बिलों से अपने आधे शरीर को बाहर निकालकर लम्बी साँस खींचते हुए सो से उपलक्षित होनेवाला वह महान् पर्वत उस समय अनेकानेक पताकाओं से अलंकृत-सा प्रतीत होता था॥ ४७॥

ऋषिभिस्त्राससम्भ्रान्तैस्त्यज्यमानः शिलोच्चयः।

सीदन् महति कान्तारे सार्थहीन इवाध्वगः॥४८॥

भय से घबराये हुए ऋषि-मुनि भी उस पर्वत को छोड़ने लगे। जैसे विशाल दुर्गम वन में अपने साथियों से बिछुड़ा हुआ एक राही भारी विपत्ति में फँस जाता है, यही दशा उस महान् पर्वत महेन्द्रकी हो रही थी॥४८॥

स वेगवान् वेगसमाहितात्मा हरिप्रवीरः परवीरहन्ता।

मनः समाधाय महानुभावोजगाम लङ्कां मनसा मनस्वी॥४९॥

शत्रुवीरों का संहार करने वाले वानरसेना के श्रेष्ठ वीर वेगशाली महामनस्वी महानुभाव हनुमान् जी का मन वेगपूर्वक छलाँग मारने की योजना में लगा हुआ था। उन्होंने चित्त को एकाग्र करके मन-ही-मन लङ्का का स्मरण किया। ४९॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे सप्तषष्टितमः सर्गः॥६७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में सरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥६॥

॥ किष्किन्धाकाण्डं सम्पूर्णम्॥