सर्ग-61
विश्वामित्रो महातेजाः प्रस्थितान् वीक्ष्य तानृषीन्।
अब्रवीन्नरशार्दूल सर्वांस्तान् वनवासिनः॥१॥
[शतानन्दजी कहते हैं-] पुरुषसिंह श्रीराम ! यज्ञ में आये हुए उन सब वनवासी ऋषियों को वहाँ से जाते देख महातेजस्वी विश्वामित्र ने उनसे कहा-॥ १॥
महाविघ्नः प्रवृत्तोऽयं दक्षिणामास्थितो दिशम्।
दिशमन्यां प्रपत्स्यामस्तत्र तप्स्यामहे तपः॥२॥
‘महर्षियो! इस दक्षिण दिशामें रहने से हमारी तपस्या में महान् विघ्न आ पड़ा है; अतः अब हम दूसरी दिशा में चले जायँगे और वहीं रहकर तपस्या करेंगे॥२॥
पश्चिमायां विशालायां पुष्करेषु महात्मनः।
सुखं तपश्चरिष्यामः सुखं तद्धि तपोवनम्॥३॥
‘विशाल पश्चिम दिशा में जो महात्मा ब्रह्माजी के तीन पुष्कर हैं, उन्हीं के पास रहकर हम सुखपूर्वक तपस्या करेंगे; क्योंकि वह तपोवन बहुत ही सुखद है’॥३॥
एवमुक्त्वा महातेजाः पुष्करेषु महामुनिः।
तप उग्रं दुराधर्षं तेपे मूलफलाशनः॥४॥
ऐसा कहकर वे महातेजस्वी महामुनि पुष्कर में चले गये और वहाँ फल-मूल का भोजन करके उग्र एवं दुर्जय तपस्या करने लगे॥ ४॥
एतस्मिन्नेव काले तु अयोध्याधिपतिर्महान्।
अम्बरीष इति ख्यातो यष्टुं समुपचक्रमे ॥५॥
इन्हीं दिनों अयोध्या के महाराज अम्बरीष एक यज्ञ की तैयारी करने लगे॥ ५ ॥
तस्य वै यजमानस्य पशुमिन्द्रो जहार ह।
प्रणष्टे तु पशौ विप्रो राजानमिदमब्रवीत्॥६॥
जब वे यज्ञ में लगे हुए थे, उस समय इन्द्र ने उनके यज्ञपशु को चुरा लिया। पशु के खो जाने पर पुरोहितजी ने राजा से कहा- ॥६॥
पशुरभ्याहृतो राजन् प्रणष्टस्तव दुर्नयात्।
अरक्षितारं राजानं जन्ति दोषा नरेश्वर ॥७॥
‘राजन् ! जो पशु यहाँ लाया गया था, वह आपकी दुर्नीतिके कारण खो गया। नरेश्वर! जो राजा यज्ञपशु की रक्षा नहीं करता, उसे अनेक प्रकार के दोष नष्ट कर डालते हैं॥ ७॥
प्रायश्चित्तं महद्ध्येतन्नरं वा पुरुषर्षभ।
आनयस्व पशुं शीघ्रं यावत् कर्म प्रवर्तते॥८॥
‘पुरुषप्रवर! जबतक कर्म का आरम्भ होता है,उसके पहले ही खोये हुए पशु की खोज कराकर उसे शीघ्र यहाँ ले आओ अथवा उसके प्रतिनिधि रूप से किसी पुरुष पशु को खरीद लाओ। यही इस पाप का महान् प्रायश्चित्त है’।
उपाध्यायवचः श्रुत्वा स राजा पुरुषर्षभः।
अन्वियेष महाबुद्धिः पशं गोभिः सहस्रशः॥९॥
पुरोहित की यह बात सुनकर महाबुद्धिमान् पुरुषश्रेष्ठ राजा अम्बरीष ने हजारों गौओं के मूल्यपर खरीदने के लिये एक पुरुष का अन्वेषण किया॥९॥
देशाञ्जनपदांस्तांस्तान् नगराणि वनानि च।
आश्रमाणि च पुण्यानि मार्गमाणो महीपतिः॥ १०॥
स पुत्रसहितं तात सभार्यं रघुनन्दन।
भृगुतुंगे समासीनमृचीकं संददर्श ह॥११॥
तात रघुनन्दन! विभिन्न देशों, जनपदों, नगरों, वनों तथा पवित्र आश्रमों में खोज करते हुए राजा अम्बरीषभृगुतुंग पर्वत पर पहुँचे और वहाँ उन्होंने पत्नी तथा पुत्रों के साथ बैठे हुए ऋचीक मुनि का दर्शन किया। १०-११॥
तमुवाच महातेजाः प्रणम्याभिप्रसाद्य च।
महर्षिं तपसा दीप्तं राजर्षिरमितप्रभः॥१२॥
अमित कान्तिमान् एवं महातेजस्वी राजर्षि अम्बरीष ने तपस्या से उद्दीप्त होनेवाले महर्षि ऋचीक को प्रणाम किया और उन्हें प्रसन्न करके कहा॥१२॥
पृष्ट्वा सर्वत्र कुशलम्चीकं तमिदं वचः।
गवां शतसहस्रेण विक्रीणीषे सुतं यदि॥१३॥
पशोरर्थे महाभाग कृतकृत्योऽस्मि भार्गव।
पहले तो उन्होंने ऋचीक मुनि से उनकी सभी वस्तुओं के विषय में कुशल-समाचार पूछा, उसके बाद इस प्रकार कहा—’महाभाग भृगुनन्दन! यदि आप एक लाख गौएँ लेकर अपने एक पुत्र को पशु बनाने के लिये बेचें तो मैं कृतकृत्य हो जाऊँगा॥ १३ १/२॥
सर्वे परिगता देशा यज्ञियं न लभे पशुम्॥१४॥
दातुमर्हसि मूल्येन सतमेकमितो मम।
‘मैं सारे देशों में घूम आया; परंतु कहीं भी यज्ञोपयोगी पशु नहीं पा सका अतः आप उचितमूल्य लेकर यहाँ मुझे अपने एक पुत्र को दे दीजिये’। १४ १/२॥
एवमुक्तो महातेजा ऋचीकस्त्वब्रवीद् वचः॥१५॥
नाहं ज्येष्ठं नरश्रेष्ठ विक्रीणीयां कथंचन।
उनके ऐसा कहने पर महातेजस्वी ऋचीक बोले —’नरश्रेष्ठ! मैं अपने ज्येष्ठ पुत्र को तो किसी तरह नहीं बेचूँगा’ ॥ १५ १/२ ॥
ऋचीकस्य वचः श्रुत्वा तेषां माता महात्मनाम्॥ १६॥
उवाच नरशार्दूलमम्बरीषमिदं वचः।
ऋचीक मुनि की बात सुनकर उन महात्मा पुत्रों की माता ने पुरुषसिंह अम्बरीष से इस प्रकार कहा- ॥१६१/२॥
अविक्रेयं सुतं ज्येष्ठं भगवानाह भार्गवः॥१७॥
ममापि दयितं विद्धि कनिष्ठं शुनकं प्रभो।
तस्मात् कनीयसं पुत्रं न दास्ये तव पार्थिव॥ १८॥
‘प्रभो! भगवान् भार्गव कहते हैं कि ज्येष्ठ पुत्र कदापि बेचने योग्य नहीं है; परंतु आपको मालूम होना चाहिये जो सबसे छोटा पुत्र शुनक है, वह मुझे भी बहुत ही प्रिय है अतःपृथ्वीनाथ! मैं अपना छोटा पुत्र आपको कदापि नहीं दूंगी॥ १७-१८॥
प्रायेण हि नरश्रेष्ठ ज्येष्ठाः पितृषु वल्लभाः।
मातॄणां च कनीयांसस्तस्माद् रक्ष्ये कनीयसम्॥ १९॥
‘नरश्रेष्ठ! प्रायः जेठे पुत्र पिताओं को प्रिय होते हैंऔर छोटे पुत्र माताओं को, अतः मैं अपने कनिष्ठ पुत्र की अवश्य रक्षा करूँगी’ ॥ १९॥
उक्तवाक्ये मुनौ तस्मिन् मुनिपल्यां तथैव च।
शुनःशेपः स्वयं राम मध्यमो वाक्यमब्रवीत्॥ २०॥
श्रीराम! मुनि और उनकी पत्नी के ऐसा कहनेप र मझले पुत्र शुनःशेप ने स्वयं कहा- ॥ २० ॥
पिता ज्येष्ठमविक्रेयं माता चाह कनीयसम्।
विक्रेयं मध्यमं मन्ये राजपुत्र नयस्व माम्॥२१॥
‘राजपुत्र! पिता ने ज्येष्ठ को और माता ने कनिष्ठ पुत्र को बेचने के लिये अयोग्य बतलाया है, अतः मैं समझता हूँ इन दोनों की दृष्टि में मझला पुत्र ही बेचने के योग्य है, इसलिये तुम मुझे ही ले चलो’ ॥ २१॥
अथ राजा महाबाहो वाक्यान्ते ब्रह्मवादिनः।
हिरण्यस्य सुवर्णस्य कोटिभी रत्नराशिभिः॥ २२॥
गवां शतसहस्रेण शुनःशेपं नरेश्वरः।
गृहीत्वा परमप्रीतो जगाम रघुनन्दन॥२३॥
महाबाहु रघुनन्दन! ब्रह्मवादी मझले पुत्र के ऐसा कहने पर राजा अम्बरीष बड़े प्रसन्न हुए और एक करोड़ स्वर्णमुद्रा, रत्नों के ढेर तथा एक लाख गौओं के बदले शुनःशेप को लेकर वे घर की ओर चले॥ २२-२३॥
अम्बरीषस्तु राजर्षी रथमारोप्य सत्वरः।
शुनःशेपं महातेजा जगामाशु महायशाः ॥ २४॥
महातेजस्वी महायशस्वी राजर्षि अम्बरीष शुनःशेप को रथपर बिठाकर बड़ी उतावली के साथ तीव्र गति से चले॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकषष्टितमः सर्गः॥६१॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में एकसठवाँ सर्ग पूरा हुआ।६१॥
सर्ग-62
शुनःशेपं नरश्रेष्ठ गृहीत्वा तु महायशाः।
व्यश्रमत् पुष्करे राजा मध्याह्ने रघुनन्दन॥१॥
[ शतानन्दजी बोले-] नरश्रेष्ठ रघुनन्दन ! महायशस्वी राजा अम्बरीष शुनःशेप को साथ लेकर दोपहर के समय पुष्कर तीर्थ में आये और वहाँ विश्राम करने लगे॥१॥
तस्य विश्रममाणस्य शुनःशेपो महायशाः।
पुष्करं ज्येष्ठमागम्य विश्वामित्रं ददर्श ह॥२॥
तप्यन्तमृषिभिः सार्धं मातुलं परमातुरः।
विषण्णवदनो दीनस्तृष्णया च श्रमेण च॥३॥
पपाताड़े मुने राम वाक्यं चेदमुवाच ह।
श्रीराम! जब वे विश्राम करने लगे, उस समय महायशस्वी शुनःशेप ज्येष्ठ पुष्कर में आकर ऋषियों के साथ तपस्या करते हुए अपने मामा विश्वामित्र से मिला। वह अत्यन्त आतुर एवं दीन हो रहा था। उसके मुख पर विषाद छा गया था। वह भूख-प्यास और परिश्रम से दीन हो मुनि की गोद में गिर पड़ा और इस प्रकार बोला- ॥ २-३ १/२॥
न मेऽस्ति माता न पिता ज्ञातयो बान्धवाः कुतः॥ ४॥
त्रातुमर्हसि मां सौम्य धर्मेण मुनिपुंगव।
‘सौम्य! मुनिपुंगव! न मेरे माता हैं, न पिता, फिर भाई-बन्धु कहाँ से हो सकते हैं। (मैं असहाय हूँ अतः) आप ही धर्म के द्वारा मेरी रक्षा कीजिये॥ ४ १/२॥
त्राता त्वं हि नरश्रेष्ठ सर्वेषां त्वं हि भावनः॥५॥
राजा च कृतकार्यः स्यादहं दीर्घायुरव्ययः।।
स्वर्गलोकमुपाश्नीयां तपस्तप्त्वा ह्यनुत्तमम्॥६॥
‘नरश्रेष्ठ! आप सबके रक्षक तथा अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति कराने वाले हैं। ये राजा अम्बरीष कृतार्थ हो जायँ और मैं भी विकार रहित दीर्घायु होकर सर्वोत्तम तपस्या करके स्वर्गलोक प्राप्त कर लूँ—ऐसी कृपा कीजिये॥५-६॥
स मे नाथो ह्यनाथस्य भव भव्येन चेतसा।
पितेव पुत्रं धर्मात्मंस्त्रातुमर्हसि किल्बिषात्॥७॥
” ‘धर्मात्मन् ! आप अपने निर्मलचित्त से मुझ अनाथ के नाथ (असहाय के संरक्षक) हो जायँ। जैसे पिता अपने पुत्र की रक्षा करता है, उसी प्रकार आप मुझे इस पापमूलक विपत्ति से बचाइये’ ॥ ७॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा विश्वामित्रो महातपाः।
सान्त्वयित्वा बहविधं पुत्रानिदमुवाच ह॥८॥
शुनःशेप की वह बात सुनकर महातपस्वी विश्वामित्र उसे नाना प्रकार से सान्त्वना दे अपने पुत्रों से इस प्रकार बोले- ॥८॥
यत्कृते पितरः पुत्राञ्जनयन्ति शुभार्थिनः।
परलोकहितार्थाय तस्य कालोऽयमागतः॥९॥
‘बच्चो! शुभकी अभिलाषा रखने वाले पिता जिस पारलौकिक हित के उद्देश्य से पुत्रों को जन्म देते हैं, उसकी पूर्ति का यह समय आ गया है॥९॥
अयं मुनिसुतो बालो मत्तः शरणमिच्छति।
अस्य जीवितमात्रेण प्रियं कुरुत पुत्रकाः॥१०॥
‘पुत्रो! यह बालक मुनिकुमार मुझसे अपनी रक्षा चाहता है, तुम लोग अपना जीवनमात्र देकर इसका प्रिय करो॥
सर्वे सुकृतकर्माणः सर्वे धर्मपरायणाः।
पशुभूता नरेन्द्रस्य तृप्तिमग्नेः प्रयच्छत॥११॥
‘तुम सब-के-सब पुण्यात्मा और धर्मपरायण हो, अतः राजा के यज्ञ में पशु बनकर अग्निदेव को तृप्ति प्रदान करो॥११॥
नाथवांश्च शुनःशेपो यज्ञश्चाविघ्नतो भवेत्।
देवतास्तर्पिताश्च स्युर्मम चापि कृतं वचः॥१२॥
‘इससे शुनःशेप सनाथ होगा, राजा का यज्ञ भी बिना किसी विघ्न-बाधा के पूर्ण हो जायगा, देवता भी तृप्त होंगे और तुम्हारे द्वारा मेरी आज्ञा का पालन भी हो जायगा’ ॥ १२ ॥
मुनेस्तद् वचनं श्रुत्वा मधुच्छन्दादयः सुताः।
साभिमानं नरश्रेष्ठ सलीलमिदमब्रुवन्॥१३॥
‘नरश्रेष्ठ! विश्वामित्र मुनि का वह वचन सुनकर उनके मधुच्छन्द आदि पुत्र अभिमान और अवहेलनापूर्वक इस प्रकार बोले- ॥१३॥
कथमात्मसुतान् हित्वा त्रायसेऽन्यसुतं विभो।
अकार्यमिव पश्यामः श्वमांसमिव भोजने॥१४॥
‘प्रभो! आप अपने बहुत-से पुत्रों को त्यागकर दूसरे के एक पुत्रकी रक्षा कैसे करते हैं? जैसे पवित्र भोजन में कुत्तेका मांस पड़ जाय तो वह अग्राह्य हो जाता है, उसी प्रकार जहाँ अपने पुत्रों की रक्षा आवश्यक हो, वहाँ दूसरे के पुत्र की रक्षा के कार्य को हम अकर्त्तव्य की कोटि में ही देखते हैं’ ॥ १४ ॥
तेषां तद् वचनं श्रुत्वा पुत्राणां मुनिपुंगवः।
क्रोधसंरक्तनयनो व्याहर्तुमुपचक्रमे॥१५॥
उन पुत्रोंका वह कथन सुनकर मुनिवर विश्वामित्र के नेत्र क्रोध से लाल हो गये। वे इस प्रकार कहने लगे— ॥१५॥
निःसाध्वसमिदं प्रोक्तं धर्मादपि विगर्हितम्।
अतिक्रम्य तु मद्वाक्यं दारुणं रोमहर्षणम्॥१६॥
श्वमांसभोजिनः सर्वे वासिष्ठा इव जातिषु।
पूर्णं वर्षसहस्रं तु पृथिव्यामनुवत्स्यथ ॥१७॥
‘अरे! तुम लोगों ने निर्भय होकर ऐसी बात कही है, जो धर्म से रहित एवं निन्दित है। मेरी आज्ञा का उल्लङ्घन करके जो यह दारुण एवं रोमाञ्चकारी बात तुमने मुँह से निकाली है, इस अपराध के कारण
तुम सब लोग भी वसिष्ठके पुत्रों की भाँति कुत्ते का मांस खाने वाली मुष्टिक आदि जातियों में जन्म लेकर पूरे एक हजार वर्षां तक इस पृथ्वी पर रहोगे’।१६-१७॥
कृत्वा शापसमायुक्तान् पुत्रान् मुनिवरस्तदा।
शुनःशेपमुवाचार्तं कृत्वा रक्षां निरामयाम्॥१८॥
इस प्रकार अपने पुत्रों को शाप देकर मुनिवर विश्वामित्र ने उस समय शोकार्त शुनःशेप की निर्विघ्न रक्षा करके उससे इस प्रकार कहा— ॥१८॥
पवित्रपाशैराबद्धो रक्तमाल्यानुलेपनः।
वैष्णवं यूपमासाद्य वाग्भिरग्निमुदाहर॥१९॥
इमे च गाथे दे दिव्ये गायेथा मुनिपुत्रक।
अम्बरीषस्य यज्ञेऽस्मिंस्ततः सिद्धिमवाप्स्यसि॥ २०॥
‘मुनिकुमार! अम्बरीष के इस यज्ञ में जब तुम्हें कुश आदि के पवित्र पाशों से बाँधकर लाल फूलों की माला और लाल चन्दन धारण करा दिया जाय, उस समय तुम विष्णुदेवता-सम्बन्धी यूप के पास जाकर वाणी द्वारा अग्नि की (इन्द्र और विष्णु की) स्तुति करना और इन दो दिव्य गाथाओं का गान करना। इससे तुम मनोवांछित सिद्धि प्राप्त कर लोगे’॥ १९-२०॥
शुनःशेपो गृहीत्वा ते द्वे गाथे सुसमाहितः।
त्वरया राजसिंहं तमम्बरीषमुवाच ह॥२१॥
शुनःशेप ने एकाग्रचित्त होकर उन दोनों गाथाओं को ग्रहण किया और राजसिंह अम्बरीष के पास जाकर उनसे शीघ्रतापूर्वक कहा- ॥२१॥
राजसिंह महाबुद्धे शीघ्रं गच्छावहे वयम्।
निवर्तयस्व राजेन्द्र दीक्षां च समुदाहर॥२२॥
‘राजेन्द्र! परम बुद्धिमान् राजसिंह! अब हम दोनों शीघ्र चलें। आप यज्ञ की दीक्षा लें और यज्ञकार्य सम्पन्न करें’॥ २२॥
तद् वाक्यमृषिपुत्रस्य श्रुत्वा हर्षसमन्वितः।
जगाम नृपतिः शीघ्रं यज्ञवाटमतन्द्रितः ॥२३॥
ऋषिकुमार का वह वचन सुनकर राजा अम्बरीष आलस्य छोड़ हर्ष से उत्फुल्ल हो शीघ्रतापूर्वक यज्ञशाला में गये॥ २३॥
सदस्यानुमते राजा पवित्रकृतलक्षणम्।
पशुं रक्ताम्बरं कृत्वा यूपे तं समबन्धयत्॥ २४॥
वहाँ सदस्य की अनुमति ले राजा अम्बरीष ने शुनःशेप को कुश के पवित्र पाश से बाँधकर उसे पशु के लक्षण से सम्पन्न कर दिया और यज्ञ-पशु को लाल वस्त्र पहिनाकर यूप में बाँध दिया॥ २४ ॥
स बद्धो वाग्भिरग्र्याभिरभितुष्टाव वै सुरौ।
इन्द्रमिन्द्रानुजं चैव यथावन्मुनिपुत्रकः॥ २५॥
बँधे हुए मुनिपुत्र शुनःशेप ने उत्तम वाणीद् वारा इन्द्र और उपेन्द्र इन दोनों देवताओं की यथावत् स्तुति की। २५॥
ततः प्रीतः सहस्राक्षो रहस्यस्तुतितोषितः।
दीर्घमायुस्तदा प्रादाच्छुनःशेपाय वासवः॥२६॥
उस रहस्यभूत स्तुति से संतुष्ट होकर सहस्र नेत्रधारी इन्द्र बड़े प्रसन्न हुए। उस समय उन्होंने शुनःशेप को दीर्घायु प्रदान की॥२६॥
स च राजा नरश्रेष्ठ यज्ञस्य च समाप्तवान्।
फलं बहुगुणं राम सहस्राक्षप्रसादजम्॥२७॥
नरश्रेष्ठ श्रीराम! राजा अम्बरीष ने भी देवराज इन्द्र की कृपा से उस यज्ञ का बहुगुणसम्पन्न उत्तम फल प्राप्त किया॥२७॥
विश्वामित्रोऽपि धर्मात्मा भूयस्तेपे महातपाः।
पुष्करेषु नरश्रेष्ठ दशवर्षशतानि च ॥२८॥
पुरुषप्रवर! इसके बाद महातपस्वी धर्मात्मा विश्वामित्र ने भी पुष्कर तीर्थ में पुनः एक हजार वर्षों तक तीव्र तपस्या की॥२८॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे द्विषष्टितमः सर्गः॥६२॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें बासठवाँ सर्ग पूरा हुआ। ६२॥
सर्ग-63
पूर्णे वर्षसहस्रे तु व्रतस्नातं महामुनिम्।
अभ्यगच्छन् सुराः सर्वे तपः फलचिकीर्षवः॥
[शतानन्दजी कहते हैं- श्रीराम!] जब एक हजार वर्ष पूरे हो गये, तब उन्होंने व्रत की समाप्ति का स्नान किया। स्नान कर लेने पर महामुनि विश्वामित्र के पास सम्पूर्ण देवता उन्हें तपस्या का फल देने की इच्छा से आये॥
अब्रवीत् सुमहातेजा ब्रह्मा सुरुचिरं वचः।
ऋषिस्त्वमसि भद्रं ते स्वार्जितैः कर्मभिः शुभैः॥ २॥
उस समय महातेजस्वी ब्रह्माजी ने मधुर वाणीमें कहा- ‘मुने! तुम्हारा कल्याण हो। अब तुम अपने द्वारा उपार्जित शुभ कर्मों के प्रभाव से ऋषि हो गये’। २॥
तमेवमुक्त्वा देवेशस्त्रिदिवं पुनरभ्यगात्।
विश्वामित्रो महातेजा भूयस्तेपे महत् तपः॥३॥
उनसे ऐसा कहकर देवेश्वर ब्रह्माजी पुनः स्वर्ग को चले गये। इधर महातेजस्वी विश्वामित्र पुनः बड़ी भारी तपस्या में लग गये॥३॥
ततः कालेन महता मेनका परमाप्सराः।
पुष्करेषु नरश्रेष्ठ स्नातुं समुपचक्रमे ॥४॥
नरश्रेष्ठ! तदनन्तर बहुत समय व्यतीत होने पर परम सुन्दरी अप्सरा मेनका पुष्कर में आयी और वहाँ स्नान की तैयारी करने लगी॥४॥
तां ददर्श महातेजा मेनकां कुशिकात्मजः।
रूपेणाप्रतिमां तत्र विद्युतं जलदे यथा॥५॥
महातेजस्वी कुशिकनन्दन विश्वामित्र ने वहाँ उस मेनका को देखा। उसके रूप और लावण्य की कहीं तुलना नहीं थी। जैसे बादल में बिजली चमकती हो, उसी प्रकार वह पुष्कर के जल में शोभा पा रही थी॥
कन्दर्पदर्पवशगो मुनिस्तामिदमब्रवीत्।
अप्सरः स्वागतं तेऽस्तु वस चेह ममाश्रमे॥६॥
उसे देखकर विश्वामित्र मुनि काम के अधीन हो गये और उससे इस प्रकार बोले—’अप्सरा! तेरा स्वागत है, तू मेरे इस आश्रम में निवास कर॥६॥
अनुगृह्णीष्व भद्रं ते मदनेन विमोहितम्।।
इत्युक्ता सा वरारोहा तत्र वासमथाकरोत्॥७॥
‘तेरा भला हो, मैं काम से मोहित हो रहा हूँ। मुझ पर कृपा कर ‘ उनके ऐसा कहने पर सुन्दर कटिप्रदेश वाली मेनका वहाँ निवास करने लगी॥ ७॥
तपसो हि महाविघ्नो विश्वामित्रमुपागमत्।
तस्यां वसन्त्यां वर्षाणि पञ्च पञ्च च राघव॥ ८॥
विश्वामित्राश्रमे सौम्ये सुखेन व्यतिचक्रमः।
इस प्रकार तपस्या का बहुत बड़ा विघ्न विश्वामित्रजी के पास स्वयं उपस्थित हो गया। रघुनन्दन! मेनका को विश्वामित्रजी के उस सौम्य आश्रम पर रहते हुए दस वर्ष बड़े सुख से बीते॥ ८ १/२॥
अथ काले गते तस्मिन् विश्वामित्रो महामुनिः॥ ९॥
सव्रीड इव संवृत्तश्चिन्ताशोकपरायणः।
इतना समय बीत जाने पर महामुनि विश्वामित्र लज्जित-से हो गये, चिन्ता और शोक में डूब गये॥९ १/२॥
बुद्धिर्मुनेः समुत्पन्ना सामर्षा रघुनन्दन॥१०॥
सर्वं सुराणां कर्मैतत् तपोऽपहरणं महत्।
रघुनन्दन! मुनि के मन में रोषपूर्वक यह विचार उत्पन्न हुआ कि ‘यह सब देवताओं की करतूत है। उन्होंने हमारी तपस्या का अपहरण करने के लिये यह महान् प्रयास किया है। १० १/२ ॥
अहोरात्रापदेशेन गताः संवत्सरा दश॥११॥
काममोहाभिभूतस्य विनोऽयं प्रत्युपस्थितः।
‘मैं कामजनित मोह से ऐसा आक्रान्त हो गया कि मेरे दस वर्ष एक दिन-रात के समान बीत गये। यह मेरी तपस्या में बहुत बड़ा विघ्न उपस्थित हो गया’ । । ११ १/२॥
स निःश्वसन् मुनिवरः पश्चात्तापेन दुःखितः॥ १२॥
ऐसा विचारकर मुनिवर विश्वामित्र लम्बी साँस खींचते हुए पश्चात्ताप से दुःखित हो गये॥ १२ ॥
भीतामप्सरसं दृष्ट्वा वेपन्तीं प्राञ्जलिं स्थिताम्।
मेनकां मधुरैर्वाक्यैर्विसृज्य कुशिकात्मजः॥१३॥
उत्तरं पर्वतं राम विश्वामित्रो जगाम ह।
उस समय मेनका अप्सरा भयभीत हो थर-थर काँपती हुई हाथ जोड़कर उनके सामने खड़ी हो गयी। उसकी ओर देखकर कुशिकनन्दन विश्वामित्र ने मधुर वचनों द्वारा उसे विदा कर दिया और स्वयं वे उत्तर पर्वत (हिमवान्) पर चले गये। १३ १/२॥
स कृत्वा नैष्ठिकी बुद्धिं जेतुकामो महायशाः॥ १४॥
कौशिकीतीरमासाद्य तपस्तेपे दुरासदम्।
वहाँ उन महायशस्वी मुनि ने निश्चयात्मक बुद्धि का आश्रय ले कामदेव को जीतने के लिये कौशिकी-तट पर जाकर दुर्जय तपस्या आरम्भ की॥ १४ १/२ ॥
तस्य वर्षसहस्राणि घोरं तप उपासतः॥१५॥
उत्तरे पर्वते राम देवतानामभूद् भयम्।
श्रीराम! वहाँ उत्तर पर्वत पर एक हजार वर्षांतक घोर तपस्या में लगे हुए विश्वामित्र से देवताओं को बड़ा भय हुआ॥ १५ १/२॥
आमन्त्रयन् समागम्य सर्वे सर्षिगणाः सुराः॥ १६॥
महर्षिशब्दं लभतां साध्वयं कुशिकात्मजः।
सब देवता और ऋषि परस्पर मिलकर सलाह करने लगे—’ये कुशिकनन्दन विश्वामित्र महर्षिकी पदवी प्राप्त करें, यही इनके लिये उत्तम बात होगी’। १६ १/२॥
देवतानां वचः श्रुत्वा सर्वलोकपितामहः ॥१७॥
अब्रवीन्मधुरं वाक्यं विश्वामित्रं तपोधनम्।
महर्षे स्वागतं वत्स तपसोग्रेण तोषितः॥१८॥
महत्त्वमृषिमुख्यत्वं ददामि तव कौशिक।
देवताओं की बात सुनकर सर्वलोकपितामह ब्रह्माजी तपोधन विश्वामित्र के पास जा मधुर वाणी में बोले —’महर्षे! तुम्हारा स्वागत है वत्स कौशिक! मैं तुम्हारी उग्र तपस्या से बहुत संतुष्ट हूँ और तुम्हें महत्ता एवं ऋषियों में श्रेष्ठता प्रदान करता हूँ’॥ १७-१८ १/२॥
ब्रह्मणस्तु वचः श्रुत्वा विश्वामित्रस्तपोधनः॥ १९॥
प्राञ्जलिः प्रणतो भूत्वा प्रत्युवाच पितामहम्।
ब्रह्मर्षिशब्दमतुलं स्वार्जितैः कर्मभिः शुभैः॥ २०॥
यदि मे भगवन्नाह ततोऽहं विजितेन्द्रियः।
ब्रह्माजी का यह वचन सुनकर तपोधन विश्वामित्र हाथ जोड़ प्रणाम करके उनसे बोले-‘भगवन् ! यदि अपने द्वारा उपार्जित शुभ कर्मो के फल से मुझे आप ब्रह्मर्षि का अनुपम पद प्रदान कर सकें तो मैं अपने को जितेन्द्रिय समशृंगा’ ॥ १९-२० १/२ ॥
तमुवाच ततो ब्रह्मा न तावत् त्वं जितेन्द्रियः॥ २१॥
यतस्व मुनिशार्दूल इत्युक्त्वा त्रिदिवं गतः।
तब ब्रह्माजी ने उनसे कहा—’मुनिश्रेष्ठ! अभी तुम जितेन्द्रिय नहीं हुए हो इसके लिये प्रयत्न करो।’ ऐसा कहकर वे स्वर्गलोकको चले गये। २१ १/२ ॥
विप्रस्थितेषु देवेषु विश्वामित्रो महामुनिः॥२२॥
ऊर्ध्वबाहुर्निरालम्बो वायुभक्षस्तपश्चरन्।
देवताओं के चले जाने पर महामुनि विश्वामित्र ने पुनः घोर तपस्या आरम्भ की वे दोनों भुजाएँ ऊपर उठाये बिना किसी आधार के खड़े होकर केवल वायु पीकर रहते हुए तप में संलग्न हो गये। २२ १/२ ॥
घर्मे पञ्चतपा भूत्वा वर्षास्वाकाशसंश्रयः॥२३॥
शिशिरे सलिलेशायी रात्र्यहानि तपोधनः।
एवं वर्षसहस्रं हि तपो घोरमुपागमत्॥२४॥
गर्मी के दिनों में पञ्चाग्नि का सेवन करते, वर्षाकाल में खुले आकाश के नीचे रहते और जाड़े के समय रात-दिन पानी में खड़े रहते थे। इस प्रकार उन तपोधन ने एक हजार वर्षां तक घोर तपस्या की॥ २३-२४॥
तस्मिन् संतप्यमाने तु विश्वामित्रे महामुनौ।
संतापः सुमहानासीत् सुराणां वासवस्य च॥ २५॥
महामुनि विश्वामित्र के इस प्रकार तपस्या करते समय देवताओं और इन्द्र के मन में बड़ा भारी संताप हुआ॥
रम्भामप्सरसं शक्रः सर्वैः सह मरुद्गणैः।
उवाचात्महितं वाक्यमहितं कौशिकस्य च॥ २६॥
समस्त मरुद्गणों सहित इन्द्र ने उस समय रम्भा अप्सरा से ऐसी बात कही, जो अपने लिये हितकर और विश्वामित्र के लिये अहितकर थी॥ २६ ॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे त्रिषष्टितमः सर्गः॥६३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में तिरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ। ६३॥
सर्ग-64
सुरकार्यमिदं रम्भे कर्तव्यं सुमहत् त्वया।
लोभनं कौशिकस्येह काममोहसमन्वितम्॥१॥
(इन्द्र बोले-) रम्भे! देवताओं का एक बहुत बड़ा कार्य उपस्थित हुआ है। इसे तुम्हें ही पूरा करना है। तू महर्षि विश्वामित्र को इस प्रकार लुभा, जिससे वे काम और मोह के वशीभूत हो जायँ ॥ १॥
तथोक्ता साप्सरा राम सहस्राक्षेण धीमता।
वीडिता प्राञ्जलिर्वाक्यं प्रत्युवाच सुरेश्वरम्॥ २॥
श्रीराम! बुद्धिमान् इन्द्र के ऐसा कहनेपर वह अप्सरा लज्जित हो हाथ जोड़कर देवेश्वर इन्द्र से बोली- ॥२॥
अयं सुरपते घोरो विश्वामित्रो महामुनिः।
क्रोधमत्स्रक्ष्यते घोरं मयि देव न संशयः॥३॥
‘सुरपते! ये महामुनि विश्वामित्र बड़े भयंकर हैं। देव! इसमें संदेह नहीं कि ये मुझपर भयानक क्रोध का प्रयोग करेंगे॥ ३॥
ततो हि मे भयं देव प्रसादं कर्तुमर्हसि।
एवमुक्तस्तया राम सभयं भीतया तदा॥४॥
तामुवाच सहस्राक्षो वेपमानां कृताञ्जलिम्।
मा भैषी रम्भे भद्रं ते कुरुष्व मम शासनम्॥५॥
‘अतः देवेश्वर! मुझे उनसे बड़ा डर लगता है,आप मुझपर कृपा करें।’ श्रीराम! डरी हुई रम्भा के इस प्रकार भयपूर्वक कहने पर सहस्र नेत्रधारी इन्द्र हाथ जोड़कर खड़ी और थर-थर काँपती हुई रम्भा से
इस प्रकार बोले—’रम्भे! तू भय न कर, तेरा भला हो, तू मेरी आज्ञा मान ले॥४-५॥
कोकिलो हृदयग्राही माधवे रुचिरद्रुमे।
अहं कन्दर्पसहितः स्थास्यामि तव पार्श्वतः॥६॥
‘वैशाख मास में जब कि प्रत्येक वृक्ष नवपल्लवों से परम सुन्दर शोभा धारण कर लेता है, अपनी मधुर काकली से सबके हृदय को खींचने वाले कोकिल और कामदेव के साथ मैं भी तेरे पास रहूँगा॥६॥
त्वं हि रूपं बहुगुणं कृत्वा परमभास्वरम्।
तमृर्षि कौशिकं भद्रे भेदयस्व तपस्विनम्॥७॥
‘भद्रे ! तू अपने परम कान्तिमान् रूप को हाव-भाव आदि विविध गुणों से सम्पन्न करके उसके द्वारा विश्वामित्र मुनि को तपस्या से विचलित कर दे’ ॥ ७॥
सा श्रुत्वा वचनं तस्य कृत्वा रूपमनुत्तमम्।
लोभयामास ललिता विश्वामित्रं शुचिस्मिता॥ ८॥
देवराज का यह वचन सुनकर उस मधुर मुसकान वाली सुन्दरी अप्सरा ने परम उत्तम रूप बनाकर विश्वामित्र को लुभाना आरम्भ किया॥ ८॥
कोकिलस्य तु शुश्राव वल्गु व्याहरतः स्वनम्।
सम्प्रहृष्टेन मनसा स चैनामन्ववैक्षत॥९॥
विश्वामित्र ने मीठी बोली बोलने वाले कोकिल की मधुर काकली सुनी। उन्होंने प्रसन्नचित्त होकर जब उस ओर दृष्टिपात किया, तब सामने रम्भा खड़ी दिखायी दी॥९॥
अथ तस्य च शब्देन गीतेनाप्रतिमेन च।
दर्शनेन च रम्भाया मुनिः संदेहमागतः॥१०॥
कोकिल के कलरव, रम्भा के अनुपम गीत और अप्रत्याशित दर्शन से मुनि के मन में संदेह हो गया। १०॥
सहस्राक्षस्य तत्सर्वं विज्ञाय मुनिपुंगवः।
रम्भां क्रोधसमाविष्टः शशाप कुशिकात्मजः॥ ११॥
देवराज का वह सारा कुचक्र उनकी समझ में आ गया। फिर तो मुनिवर विश्वामित्र ने क्रोध में भरकर रम्भा को शाप देते हुए कहा- ॥ ११॥
यन्मां लोभयसे रम्भे कामक्रोधजयैषिणम्।
दशवर्षसहस्राणि शैली स्थास्यसि दुर्भगे॥१२॥
‘दुर्भगे रम्भे! मैं काम और क्रोध पर विजय पाना चाहता हूँ और तू आकर मुझे लुभाती है। अतः इस अपराध के कारण तू दस हजार वर्षां तक पत्थर की प्रतिमा बनकर खड़ी रहेगी॥ १२॥ ।
ब्राह्मणः सुमहातेजास्तपोबलसमन्वितः।
उद्धरिष्यति रम्भे त्वां मत्क्रोधकलुषीकृताम्॥ १३॥
‘रम्भे! शाप का समय पूरा हो जाने के बाद एक महान् तेजस्वी और तपोबलसम्पन्न ब्राह्मण (ब्रह्माजी के पुत्र वसिष्ठ) मेरे क्रोध से कलुषित तेरा उद्धार करेंगे’।
एवमुक्त्वा महातेजा विश्वामित्रो महामुनिः।
अशक्नुवन् धारयितुं कोपं संतापमात्मनः॥१४॥
ऐसा कहकर महातेजस्वी महामुनि विश्वामित्र अपना क्रोध न रोक सकने के कारण मन-ही-मन संतप्त हो उठे॥ १४॥
तस्य शापेन महता रम्भा शैली तदाभवत्।
वचः श्रुत्वा च कन्दर्पो महर्षेः स च निर्गतः॥
मुनि के उस महाशाप से रम्भा तत्काल पत्थर की प्रतिमा बन गयी। महर्षि का वह शापयुक्त वचन सुनकर कन्दर्प और इन्द्र वहाँ से खिसक गये॥ १५ ॥
कोपेन च महातेजास्तपोऽपहरणे कृते।
इन्द्रियैरजितै राम न लेभे शान्तिमात्मनः॥१६॥
श्रीराम! क्रोध से तपस्या का क्षय हो गया और इन्द्रियाँ अभी तक काबू में न आ सकीं, यह विचारकर उन महातेजस्वी मुनि के चित्त को शान्ति नहीं मिलती थी॥ १६॥
बभूवास्य मनश्चिन्ता तपोऽपहरणे कृते।
नैवं क्रोधं गमिष्यामि न च वक्ष्ये कथंचन॥१७॥
तपस्या का अपहरण हो जाने पर उनके मन में यह विचार उत्पन्न हुआ कि ‘अब से न तो क्रोध करूँगा और न किसी भी अवस्था में मुँह से कुछ बोलूँगा। १७॥
अथवा नोच्छ्वसिष्यामि संवत्सरशतान्यपि।
अहं हि शोषयिष्यामि आत्मानं विजितेन्द्रियः॥ १८॥
‘अथवा सौ वर्षों तक मैं श्वास भी न लूँगा। इन्द्रियों को जीतकर इस शरीर को सुखा डालूँगा॥१८॥
तावद् यावद्धि मे प्राप्तं ब्राह्मण्यं तपसार्जितम्।
अनुच्छ्वसन्नभुजानस्तिष्ठेयं शाश्वतीः समाः॥ १९॥
‘जब तक अपनी तपस्या से उपार्जित ब्राह्मणत्व मुझे प्राप्त न होगा, तब तक चाहे अनन्त वर्ष बीत जायँ, मैं बिना खाये-पीये खड़ा रहूँगा और साँस तक न लूँगा। १९॥
नहि मे तप्यमानस्य क्षयं यास्यन्ति मूर्तयः।
एवं वर्षसहस्रस्य दीक्षां स मुनिपुंगवः।
चकाराप्रतिमां लोके प्रतिज्ञां रघुनन्दन॥२०॥
‘तपस्या करते समय मेरे शरीर के अवयव कदापि नष्ट नहीं होंगे।’ रघुनन्दन! ऐसा निश्चय करके मुनिवर विश्वामित्र ने पुनः एक हजार वर्षां तक तपस्या करने के लिये दीक्षा ग्रहण की। उन्होंने जो प्रतिज्ञा की थी, उसकी संसार में कहीं तुलना नहीं है।॥ २०॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे चतुःषष्टितमः सर्गः॥६४॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में चौंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ।६४॥
सर्ग-65
अथ हैमवतीं राम दिशं त्यक्त्वा महामुनिः।
पूर्वां दिशमनुप्राप्य तपस्तेपे सुदारुणम्॥१॥
(शतानन्दजी कहते हैं-)श्रीराम! पूर्वोक्त प्रतिज्ञा के अनन्तर महामुनि विश्वामित्र उत्तर दिशा को त्यागकर पूर्व दिशा में चले गये और वहीं रहकर अत्यन्त कठोर तपस्या करने लगे॥१॥
मौनं वर्षसहस्रस्य कृत्वा व्रतमनुत्तमम्।
चकाराप्रतिमं राम तपः परमदुष्करम्॥२॥
रघुनन्दन ! एक सहस्र वर्षों तक परम उत्तम मौनव्रत धारण करके वे परम दुष्कर तपस्या में लगे रहे। उनके उस तप की कहीं तुलना न थी॥२॥
पूर्णे वर्षसहस्रे तु काष्ठभूतं महामुनिम्।
विनर्बहुभिराधूतं क्रोधो नान्तरमाविशत्॥३॥
एक हजार वर्ष पूर्ण होने तक वे महामुनि काष्ठ की भाँति निश्चेष्ट बने रहे। बीच-बीच में उन पर बहुत-से विघ्नों का आक्रमण हुआ, परंतु क्रोध उनके भीतर नहीं घुसने पाया॥३॥
स कृत्वा निश्चयं राम तप आतिष्ठताव्ययम्।
तस्य वर्षसहस्रस्य व्रते पूर्णे महाव्रतः॥४॥
भोक्तुमारब्धवानन्नं तस्मिन् काले रघूत्तम।
इन्द्रो द्विजातिर्भूत्वा तं सिद्धमन्नमयाचत॥५॥
श्रीराम! अपने निश्चय पर अटल रहकर उन्होंने अक्षय तप का अनुष्ठान किया। उनका एक सहस्र वर्षों का व्रत पूर्ण होने पर वे महान् व्रतधारी महर्षि व्रत समाप्त करके अन्न ग्रहण करने को उद्यत हुए। रघुकुलभूषण! इसी समय इन्द्र ने ब्राह्मण के वेष में आकर उनसे तैयार अन्न की याचना की॥ ४-५॥
तस्मै दत्त्वा तदा सिद्धं सर्वं विप्राय निश्चितः।
निःशेषितेऽन्ने भगवानभुक्त्वैव महातपाः॥६॥
तब उन्होंने वह सारा तैयार किया हुआ भोजन उस ब्राह्मण को देनेका निश्चय करके दे डाला। उस । अन्न में से कुछ भी शेष नहीं बचा। इसलिये वे महातपस्वी भगवान् विश्वामित्र बिना खाये-पीये ही रह गये॥६॥
न किंचिदवदद् विप्रं मौनव्रतमुपास्थितः।।
तथैवासीत् पुनर्मोनमनुच्छ्वासं चकार ह॥७॥
फिर भी उन्होंने उस ब्राह्मण से कुछ कहा नहीं। अपने मौन-व्रत का यथार्थ रूप से पालन किया। इसके बाद पुनः पहले की ही भाँति श्वासोच्छ्वास से रहित मौन-व्रत का अनुष्ठान आरम्भ किया॥७॥
अथ वर्षसहस्रं च नोच्छ्वसन् मुनिपुंगवः।
तस्यानुच्छ्वसमानस्य मूर्ध्नि धूमो व्यजायत॥८॥
पूरे एक हजार वर्षां तक उन मुनिश्रेष्ठ ने साँस तक नहीं ली। इस तरह साँस न लेने के कारण उनके मस्तक से धुआँ उठने लगा॥८॥
त्रैलोक्यं येन सम्भ्रान्तमातापितमिवाभवत्।
ततो देवर्षिगन्धर्वाः पन्नगोरगराक्षसाः॥९॥
मोहितास्तपसा तस्य तेजसा मन्दरश्मयः।
कश्मलोपहताः सर्वे पितामहमथाब्रुवन्॥१०॥
उससे तीनों लोकों के प्राणी घबरा उठे, सभी संतप्त-से होने लगे। उस समय देवता, ऋषि, गन्धर्व, नाग, सर्प और राक्षस सब मुनि की तपस्या से मोहित हो गये। उनके तेज से सब की कान्ति फीकी पड़ गयी। वे सब-के-सब दुःख से व्याकुल हो पितामह ब्रह्माजी से बोले- ॥ ९-१० ॥
बहुभिः कारणैर्देव विश्वामित्रो महामुनिः।
लोभितः क्रोधितश्चैव तपसा चाभिवर्धते॥११॥
‘देव! अनेक प्रकार के निमित्तों द्वारा महामुनि विश्वामित्र को लोभ और क्रोध दिलाने की चेष्टा की गयी; किंतु वे अपनी तपस्या के प्रभाव से निरन्तर आगे बढ़ते जा रहे हैं।॥ ११॥
नह्यस्य वृजिनं किंचिद् दृश्यते सूक्ष्ममप्युत।
न दीयते यदि त्वस्य मनसा यदभीप्सितम्॥१२॥
विनाशयति त्रैलोक्यं तपसा सचराचरम्।
व्याकुलाश्च दिशः सर्वा न च किंचित् प्रकाशते॥१३॥
‘हमें उनमें कोई छोटा-सा भी दोष नहीं दिखायी देता। यदि इन्हें इनकी मनचाही वस्तु नहीं दी गयी तो ये अपनी तपस्या से चराचर प्राणियोंसहित तीनोंलोकों का नाश कर डालेंगे। इस समय सारी दिशाएँ धूम से आच्छादित हो गयी हैं, कहीं कुछ भी सूझता नहीं है।
सागराः क्षुभिताः सर्वे विशीर्यन्ते च पर्वताः। प्र
कम्पते च वसुधा वायुर्वातीह संकुलः॥१४॥
‘समुद्र क्षुब्ध हो उठे हैं, सारे पर्वत विदीर्ण हुए जाते हैं, धरती डगमग हो रही है और प्रचण्ड आँधी चलने लगी है॥ १४॥
ब्रह्मन् न प्रतिजानीमो नास्तिको जायते जनः।
सम्मूढमिव त्रैलोक्यं सम्प्रक्षुभितमानसम्॥१५॥
‘ब्रह्मन् ! हमें इस उपद्रव के निवारण का कोई उपाय नहीं समझमें आता है। सब लोग नास्तिक की भाँति कर्मानुष्ठान से शून्य हो रहे हैं। तीनों लोकों के प्राणियों का मन क्षुब्ध हो गया है। सभी किंकर्तव्यविमूढ़-से हो रहे हैं।॥ १५ ॥
भास्करो निष्प्रभश्चैव महर्षेस्तस्य तेजसा।
बुद्धिं न कुरुते यावन्नाशे देव महामुनिः॥१६॥
तावत् प्रसादो भगवन्नग्निरूपो महाद्युतिः।
‘महर्षि विश्वामित्र के तेज से सूर्य की प्रभा फीकी पड़ गयी है। भगवन्! ये महाकान्तिमान् मुनि अग्निस्वरूप हो रहे हैं देव! महामुनि विश्वामित्र जबतक जगत् के विनाश का विचार नहीं करते तब तक ही इन्हें प्रसन्न कर लेना चाहिये। १६ १/२ ॥
कालाग्निना यथा पूर्वं त्रैलोक्यं दह्यतेऽखिलम्॥ १७॥
देवराज्यं चिकीर्षत दीयतामस्य यन्मनः।
‘जैसे पूर्वकाल में प्रलयकालिक अग्नि ने सम्पूर्ण त्रिलोकी को दग्ध कर डाला था, उसी प्रकार ये भी सबको जलाकर भस्म कर देंगे। यदि ये देवताओं का राज्य प्राप्त करना चाहें तो वह भी इन्हें दे दिया जाय इनके मन में जो भी अभिलाषा हो, उसे पूर्ण किया जाय॥
ततः सुरगणाः सर्वे पितामहपुरोगमाः॥१८॥
विश्वामित्रं महात्मानं वाक्यं मधुरमब्रुवन्।
तदनन्तर ब्रह्मा आदि सब देवता महात्मा विश्वामित्र के पास जाकर मधुर वाणी में बोले- ॥ १८ १/२॥
ब्रह्मर्षे स्वागतं तेऽस्तु तपसा स्म सुतोषिताः॥ १९॥
ब्राह्मण्यं तपसोग्रेण प्राप्तवानसि कौशिक।
‘ब्रह्मर्षे! तुम्हारा स्वागत है, हम तुम्हारी तपस्या से बहुत संतुष्ट हुए हैं। कुशिकनन्दन! तुमने अपनी उग्र तपस्या से ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया। १९ १/२ ॥
दीर्घमायुश्च ते ब्रह्मन् ददामि समरुद्गणः॥ २०॥
स्वस्ति प्राप्नुहि भद्रं ते गच्छ सौम्य यथासुखम्।
‘ब्रह्मन्! मरुद्गणों सहित मैं तुम्हें दीर्घायु प्रदान करता हूँ। तुम्हारा कल्याण हो सौम्य! तुम मंगल के भागी बनो और तुम्हारी जहाँ इच्छा हो वहाँ सुखपूर्वक जाओ’ ॥ २० १/२॥
पितामहवचः श्रुत्वा सर्वेषां त्रिदिवौकसाम्॥ २१॥
कृत्वा प्रणामं मुदितो व्याजहार महामुनिः।
पितामह ब्रह्माजी की यह बात सुनकर महामुनि विश्वामित्र ने अत्यन्त प्रसन्न होकर सम्पूर्ण देवताओं को प्रणाम किया और कहा— ॥ २१ १/२ ॥
ब्राह्मण्यं यदि मे प्राप्तं दीर्घमायुस्तथैव च ॥ २२॥
ॐकारोऽथ वषट्कारो वेदाश्च वरयन्तु माम्।
क्षत्रवेदविदां श्रेष्ठो ब्रह्मवेदविदामपि॥२३॥
ब्रह्मपुत्रो वसिष्ठो मामेवं वदतु देवताः। ।
यद्येवं परमः कामः कृतो यान्तु सुरर्षभाः॥२४॥
‘देवगण! यदि मुझे (आपकी कृपा से) ब्राह्मणत्व मिल गया और दीर्घ आयु की भी प्राप्ति हो गयी तो ॐकार, वषट्कार और चारों वेद स्वयं आकर मेरा वरण करें। इसके सिवा जो क्षत्रिय-वेद (धनुर्वेद आदि) तथा ब्रह्मवेद (ऋक् आदि चारों वेद) के ज्ञाताओं में भी सबसे श्रेष्ठ हैं, वे ब्रह्मपुत्र वसिष्ठ स्वयं आकर मुझसे ऐसा कहें (कि तुम ब्राह्मण हो गये), यदि ऐसा हो जाय तो मैं समझूगा कि मेरा उत्तम
मनोरथ पूर्ण हो गया। उस अवस्था में आप सभी श्रेष्ठ देवगण यहाँ से जा सकते हैं ॥ २२–२४॥
ततः प्रसादितो देवैर्वसिष्ठो जपतां वरः।
सख्यं चकार ब्रह्मर्षिरेवमस्त्विति चाब्रवीत्॥
तब देवताओं ने मन्त्रजप करने वालों में श्रेष्ठ वसिष्ठ मुनि को प्रसन्न किया। इसके बाद ब्रह्मर्षि वसिष्ठने ‘एवमस्तु’ कहकर विश्वामित्र का ब्रह्मर्षि होना स्वीकार कर लिया और उनके साथ मित्रता स्थापित कर ली॥ २५॥
ब्रह्मर्षिस्त्वं न संदेहः सर्वं सम्पद्यते तव।
इत्युक्त्वा देवताश्चापि सर्वा जग्मुर्यथागतम्॥ २६॥
‘मुने! तुम ब्रह्मर्षि हो गये, इसमें संदेह नहीं है। तुम्हारा सब ब्राह्मणोचित संस्कार सम्पन्न हो गया।’ ऐसा कहकर सम्पूर्ण देवता जैसे आये थे वैसे लौट गये॥ २६॥
विश्वामित्रोऽपि धर्मात्मा लब्ध्वा ब्राह्मण्यमुत्तमम्।
पूजयामास ब्रह्मर्षि वसिष्ठं जपतां वरम्॥२७॥
इस प्रकार उत्तम ब्राह्मणत्व प्राप्त करके धर्मात्मा विश्वामित्रजी ने भी मन्त्र-जप करने वालों में श्रेष्ठ ब्रह्मर्षि वसिष्ठ का पूजन किया॥२७॥
कृतकामो महीं सर्वां चचार तपसि स्थितः।
एवं त्वनेन ब्राह्मण्यं प्राप्तं राम महात्मना॥२८॥
इस तरह अपना मनोरथ सफल करके तपस्या में लगे रहकर ही ये सम्पूर्ण पृथ्वी पर विचरने लगे। श्रीराम! इस प्रकार कठोर तपस्या करके इन महात्मा ने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया॥२८॥
एष राम मुनिश्रेष्ठ एष विग्रहवांस्तपः।
एष धर्मः परो नित्यं वीर्यस्यैष परायणम्॥२९॥
रघुनन्दन! ये विश्वामित्रजी समस्त मुनियों में श्रेष्ठ । हैं, ये तपस्या के मूर्तिमान् स्वरूप हैं, उत्तम धर्म के साक्षात् विग्रह हैं और पराक्रम की परम निधि हैं। २९॥
एवमुक्त्वा महातेजा विरराम द्विजोत्तमः।
शतानन्दवचः श्रुत्वा रामलक्ष्मणसंनिधौ॥३०॥
जनकः प्राञ्जलिर्वाक्यमुवाच कुशिकात्मजम्।
ऐसा कहकर महातेजस्वी विप्रवर शतानन्दजी चुप हो गये। शतानन्दजी के मुख से यह कथा सुनकर महाराज जनक ने श्रीराम और लक्ष्मण के समीप विश्वामित्रजी से हाथ जोड़कर कहा- ॥ ३० १/२॥
धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यस्य मे मुनिपुंगव॥ ३१॥
यज्ञं काकुत्स्थसहितः प्राप्तवानसि कौशिक।
पावितोऽहं त्वया ब्रह्मन् दर्शनेन महामुने॥३२॥
‘मुनिप्रवर कौशिक! आप ककुत्स्थकुलनन्दन श्रीराम और लक्ष्मण के साथ मेरे यज्ञ में पधारे, इससे मैं धन्य हो गया। आपने मुझपर बड़ी कृपा की महामुने! ब्रह्मन् ! आपने दर्शन देकर मुझे पवित्र कर दिया॥
गुणा बहुविधाः प्राप्तास्तव संदर्शनान्मया।
विस्तरेण च वै ब्रह्मन् कीर्त्यमानं महत्तपः॥ ३३॥
श्रुतं मया महातेजो रामेण च महात्मना।
सदस्यैः प्राप्य च सदः श्रुतास्ते बहवो गुणाः॥ ३४॥
‘आपके दर्शन से मुझे बड़ा लाभ हुआ, अनेक प्रकार के गुण उपलब्ध हुए। ब्रह्मन् ! आज इस सभा में आकर मैंने महात्मा राम तथा अन्य सदस्यों के साथ आपके महान् तेज (प्रभाव) का वर्णन सुना है, बहुत-से गुण सुने हैं ब्रह्मन्! शतानन्दजी ने आपके महान् तप का वृत्तान्त विस्तारपूर्वक बताया है। ३३-३४॥
अप्रमेयं तपस्तुभ्यमप्रमेयं च ते बलम्।
अप्रमेया गुणाश्चैव नित्यं ते कुशिकात्मज॥ ३५॥
‘कुशिकनन्दन! आपकी तपस्या अप्रमेय है, आपका बल अनन्त है तथा आपके गुण भी सदा ही माप और संख्यासे परे हैं॥ ३५ ॥
तृप्तिराश्चर्यभूतानां कथानां नास्ति मे विभो।
कर्मकालो मनिश्रेष्ठ लम्बते रविमण्डलम्॥३६॥
‘प्रभो! आपकी आश्चर्यमयी कथाओं के श्रवण से मुझे तृप्ति नहीं होती है; किंतु मुनिश्रेष्ठ! यज्ञ का समय हो गया है, सूर्यदेव ढलने लगे हैं। ३६ ॥
श्वः प्रभाते महातेजो द्रष्टुमर्हसि मां पुनः।
स्वागतं जपतां श्रेष्ठ मामनुज्ञातुमर्हसि ॥ ३७॥
‘जप करने वालों में श्रेष्ठ महातेजस्वी मुने! आपका स्वागत है, कल प्रातःकाल फिर मुझे दर्शन दें, इस समय मुझे जाने की आज्ञा प्रदान करें’॥ ३७॥
एवमुक्तो मुनिवरः प्रशस्य पुरुषर्षभम्।
विससर्जाशु जनकं प्रीतं प्रीतमनास्तदा॥३८॥
राजा के ऐसा कहने पर मुनिवर विश्वामित्रजी मनही-मन बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने प्रीतियुक्त नरश्रेष्ठ राजा जनक की प्रशंसा करके शीघ्र ही उन्हें विदा कर दिया॥ ३८॥
एवमुक्त्वा मुनिश्रेष्ठं वैदेहो मिथिलाधिपः।
प्रदक्षिणं चकाराशु सोपाध्यायः सबान्धवः॥ ३९॥
उस समय मिथिलापति विदेहराज जनक ने मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र से पूर्वोक्त बात कहकर अपने उपाध्याय और बन्धु-बान्धवों के साथ उनकी शीघ्र ही परिक्रमा की फिर वहाँ से वे चल दिये॥ ३९ ॥
विश्वामित्रोऽपि धर्मात्मा सहरामः सलक्ष्मणः।
स्ववासमभिचक्राम पूज्यमानो महात्मभिः॥४०॥
तत्पश्चात् धर्मात्मा विश्वामित्र भी महात्माओं से पूजित होकर श्रीराम और लक्ष्मण के साथ अपने विश्राम-स्थान पर लौट आये॥ ४०॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे पञ्चषष्टितमः सर्गः॥६५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में पैंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ। ६५॥
सर्ग-66
ततः प्रभाते विमले कृतकर्मा नराधिपः।
विश्वामित्रं महात्मानमाजुहाव सराघवम्॥१॥
तमर्चयित्वा धर्मात्मा शास्त्रदृष्टेन कर्मणा।
राघवौ च महात्मानौ तदा वाक्यमुवाच ह॥२॥
तदनन्तर दूसरे दिन निर्मल प्रभातकाल आने पर धर्मात्मा राजा जनक ने अपना नित्य नियम पूरा करके श्रीराम और लक्ष्मण सहित महात्मा विश्वामित्रजी को बुलाया और शास्त्रीय विधि के अनुसार मुनि तथा उन दोनों महामनस्वी राजकुमारों का पूजन करके इस प्रकार कहा- ॥ १-२॥
भगवन् स्वागतं तेऽस्तु किं करोमि तवानघ। ।
भवानाज्ञापयतु मामाज्ञाप्यो भवता ह्यहम्॥३॥
‘भगवन् ! आपका स्वागत है निष्पाप महर्षे! आप मुझे आज्ञा दीजिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ; क्योंकि मैं आपका आज्ञापालक हूँ’॥३॥
एवमुक्तः स धर्मात्मा जनकेन महात्मना।
प्रत्युवाच मुनिश्रेष्ठो वाक्यं वाक्यविशारदः॥४॥
महात्मा जनक के ऐसा कहनेपर बोलने में कुशल धर्मात्मा मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र ने उनसे यह बात कही – || ४॥
पुत्रौ दशरथस्येमौ क्षत्रियौ लोकविश्रुतौ।
द्रष्टुकामौ धनुःश्रेष्ठं यदेतत्त्वयि तिष्ठति ॥५॥
‘महाराज! राजा दशरथ के ये दोनों पत्र विश्वविख्यात क्षत्रिय वीर हैं और आपके यहाँ जो यह श्रेष्ठ धनुष रखा है, उसे देखनेकी इच्छा रखते हैं।
एतद् दर्शय भद्रं ते कृतकामौ नृपात्मजौ।
दर्शनादस्य धनुषो यथेष्टं प्रतियास्यतः॥६॥
‘आपका कल्याण हो, वह धनुष इन्हें दिखा दीजिये। इससे इनकी इच्छा पूरी हो जायगी फिर ये दोनों राजकुमार उस धनुष के दर्शन मात्र से संतुष्ट हो इच्छानुसार अपनी राजधानी को लौट जायँगे’ ॥६॥
एवमुक्तस्तु जनकः प्रत्युवाच महामुनिम्।
श्रूयतामस्य धनुषो यदर्थमिह तिष्ठति॥७॥
मुनिके ऐसा कहने पर राजा जनक महामुनि विश्वामित्र से बोले—’मुनिवर! इस धनुष का वृत्तान्त सुनिये। जिस उद्देश्य से यह धनुष यहाँ रखा गया, वह सब बताता हूँ॥ ७॥
देवरात इति ख्यातो निमेज्येष्ठो महीपतिः।
न्यासोऽयं तस्य भगवन् हस्ते दत्तो महात्मनः॥८॥
‘भगवन् ! निमि के ज्येष्ठ पुत्र राजा देवरात के नाम से विख्यात थे। उन्हीं महात्मा के हाथ में यह धनुष धरोहर के रूपमें दिया गया था॥८॥
दक्षयज्ञवधे पूर्वं धनुरायम्य वीर्यवान्।
विध्वंस्य त्रिदशान् रोषात् सलीलमिदमब्रवीत्॥
यस्माद् भागार्थिनो भागं नाकल्पयत मे सुराः।
वरांगानि महार्हाणि धनुषा शातयामि वः॥१०॥
‘कहते हैं, पूर्वकाल में दक्षयज्ञ-विध्वंस के समय परम पराक्रमी भगवान् शङ्कर ने खेल-खेल में ही रोष पूर्वक इस धनुष को उठाकर यज्ञ-विध्वंस के पश्चात् देवताओं से कहा—’देवगण ! मैं यज्ञ में भाग प्राप्त करना चाहता था, किंतु तुम लोगों ने नहीं दिया। इसलिये इस धनुष से मैं तुम सब लोगों के परम पूजनीय श्रेष्ठ अंग-मस्तक काट डालूँगा’ ॥ ९-१० ॥
ततो विमनसः सर्वे देवा वै मुनिपुंगव।
प्रसादयन्त देवेशं तेषां प्रीतोऽभवद् भवः॥११॥
‘मुनिश्रेष्ठ ! यह सुनकर सम्पूर्ण देवता उदास हो गये और स्तुतिके द्वारा देवाधिदेव महादेवजीको प्रसन्न करने लगे। अन्तमें उनपर भगवान् शिव प्रसन्न हो गये॥ ११॥
प्रीतियुक्तस्तु सर्वेषां ददौ तेषां महात्मनाम्।
तदेतद् देवदेवस्य धनूरत्नं महात्मनः॥१२॥
न्यासभूतं तदा न्यस्तमस्माकं पूर्वजे विभौ।
‘प्रसन्न होकर उन्होंने उन सब महामनस्वी देवताओं को यह धनुष अर्पण कर दिया। वही यह देवाधिदेव महात्मा भगवान् शङ्कर का धनुष-रत्न है, जो मेरे पूर्वज महाराज देवरात के पास धरोहर के रूपमें रखा गया था॥ १२ १/२॥
अथ मे कृषतः क्षेत्रं लांगलादुत्थिता ततः॥१३॥
क्षेत्रं शोधयता लब्धा नाम्ना सीतेति विश्रुता।
भूतलादुत्थिता सा तु व्यवर्धत ममात्मजा॥१४॥
‘एक दिन मैं यज्ञ के लिये भूमिशोधन करते समय खेत में हल चला रहा था। उसी समय हल के अग्रभागसे जोती गयी भूमि (हराई या सीता) से एक कन्या प्रकट हुई। सीता (हलद्वारा खींची गयी रेखा) से उत्पन्न होने के कारण उसका नाम सीता रखा गया। पृथ्वी से प्रकट हुई वह मेरी कन्या क्रमशः बढ़कर सयानी हुई। १३-१४ ।।
वीर्यशल्केति मे कन्या स्थापितेयमयोनिजा।
भूतलादुत्थितां तां तु वर्धमानां ममात्मजाम्॥ १५॥
वरयामासुरागत्य राजानो मुनिपुंगव।
‘अपनी इस अयोनिजा कन्या के विषय में मैंने यह निश्चय किया कि जो अपने पराक्रम से इस धनुष को चढ़ा देगा, उसी के साथ मैं इसका ब्याह करूँगा। इस तरह इसे वीर्यशुल्का (पराक्रमरूप शुल्कवाली) बनाकर अपने घर में रख छोड़ा है। मुनिश्रेष्ठ! भूतल से प्रकट होकर दिनों-दिन बढ़ने वाली मेरी पुत्री सीता को कई राजाओं ने यहाँ आकर माँगा॥ १५ १/२॥
तेषां वरयतां कन्यां सर्वेषां पृथिवीक्षिताम्॥१६॥
वीर्यशुल्केति भगवन् न ददामि सुतामहम्।
‘परंतु भगवन् ! कन्या का वरण करने वाले उन सभी राजाओं को मैंने यह बता दिया कि मेरी कन्या वीर्यशुल्का है। (उचित पराक्रम प्रकट करने पर ही कोई पुरुष उसके साथ विवाह करने का अधिकारी हो सकता है।) यही कारण है कि मैंने आजतक किसी को अपनी कन्या नहीं दी॥ १६ १/२ ॥
ततः सर्वे नृपतयः समेत्य मुनिपुंगव॥१७॥
मिथिलामप्युपागम्य वीर्यं जिज्ञासवस्तदा।
‘मुनिपुंगव! तब सभी राजा मिलकर मिथिला में आये और पूछने लगे कि राजकुमारी सीता को प्राप्त करने के लिये कौन-सा पराक्रम निश्चित किया गया
तेषां जिज्ञासमानानां शैवं धनुरुपाहृतम्॥१८॥
न शेकुर्ग्रहणे तस्य धनुषस्तोलनेऽपि वा ।
‘मैंने पराक्रम की जिज्ञासा करने वाले उन राजाओं के सामने यह शिवजी का धनुष रख दिया; परंतु वे लोग इसे उठाने या हिलाने में भी समर्थ न हो सके॥ १८ १/२॥
तेषां वीर्यवतां वीर्यमल्पं ज्ञात्वा महामुने॥१९॥
प्रत्याख्याता नृपतयस्तन्निबोध तपोधन।
‘महामुने! उन पराक्रमी नरेशों की शक्ति बहुत थोड़ी जानकर मैंने उन्हें कन्या देने से इनकार कर दिया। तपोधन! इसके बाद जो घटना घटी, उसे भी आप सुन लीजिये॥ १९ १/२ ॥
ततः परमकोपेन राजानो मुनिपुंगव॥२०॥
अरुन्धन मिथिलां सर्वे वीर्यसंदेहमागताः।
‘मुनिप्रवर! मेरे इनकार करने पर ये सब राजा अत्यन्त कुपित हो उठे और अपने पराक्रम के विषय में संशयापन्न हो मिथिला को चारों ओर से घेरकर खड़े हो गये॥ २० १/२॥
आत्मानमवधूतं मे विज्ञाय नृपपुंगवाः॥२१॥
रोषेण महताविष्टाः पीडयन् मिथिलां पुरीम्।
‘मेरे द्वारा अपना तिरस्कार हुआ मानकर उन श्रेष्ठ नरेशों ने अत्यन्त रुष्ट हो मिथिलापुरी को सब ओर से पीड़ा देना प्रारम्भ कर दिया॥ २१ १/२॥
ततः संवत्सरे पूर्णे क्षयं यातानि सर्वशः॥२२॥
साधनानि मुनिश्रेष्ठ ततोऽहं भृशदुःखितः।।
‘मुनिश्रेष्ठ! पूरे एक वर्षतक वे घेरा डाले रहे। इस बीच में युद्ध के सारे साधन क्षीण हो गये इससे मुझेबड़ा दुःख हुआ। २२ १/२ ॥
ततो देवगणान् सर्वांस्तपसाहं प्रसादयम्॥२३॥
ददुश्च परमप्रीताश्चतुरंगबलं सुराः।
‘तब मैंने तपस्या के द्वारा समस्त देवताओं को प्रसन्न करने की चेष्टा की। देवता बहुत प्रसन्न हुएऔर उन्होंने मुझे चतुरंगिणी सेना प्रदान की॥ २३ १/२॥
ततो भग्ना नृपतयो हन्यमाना दिशो ययुः ॥२४॥
अवीर्या वीर्यसंदिग्धाः सामात्याः पापकारिणः।
‘फिर तो हमारे सैनिकों की मार खाकर वे सभी पापाचारी राजा, जो बलहीन थे अथवा जिनके बलवान् होने में संदेह था, मन्त्रियों सहित भागकर विभिन्न दिशाओं में चले गये॥ २४ १/२॥
तदेतन्मुनिशार्दूल धनुः परमभास्वरम्॥२५॥
रामलक्ष्मणयोश्चापि दर्शयिष्यामि सुव्रत।
‘मुनिश्रेष्ठ! यही वह परम प्रकाशमान धनुष है। उत्तम व्रत का पालन करने वाले महर्षे! मैं उसे श्रीराम और लक्ष्मण को भी दिखाऊँगा॥ २५ १/२ ॥
यद्यस्य धनुषो रामः कुर्यादारोपणं मुने।
सुतामयोनिजां सीतां दद्यां दाशरथेरहम्॥ २६॥
‘मुने! यदि श्रीराम इस धनुष की प्रत्यञ्चा चढ़ा दें तो मैं अपनी अयोनिजा कन्या सीता को इन दशरथ कुमार के हाथमें दे दूँ’ ॥२६॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे षट्षष्टितमः सर्गः॥६६॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में छाछठवाँ सर्ग पूरा हुआ।६६॥
सर्ग-67
जनकस्य वचः श्रुत्वा विश्वामित्रो महामुनिः।
धनुर्दर्शय रामाय इति होवाच पार्थिवम्॥१॥
जनक की यह बात सुनकर महामुनि विश्वामित्र बोले—’राजन्! आप श्रीराम को अपना धनुष दिखाइये॥
ततः स राजा जनकः सचिवान् व्यादिदेश ह।
धनुरानीयतां दिव्यं गन्धमाल्यानुलेपितम्॥२॥
तब राजा जनक ने मन्त्रियों को आज्ञा दी—’चन्दन और मालाओं से सुशोभित वह दिव्य धनुष यहाँ ले आओ’ ॥२॥
जनकेन समादिष्टाः सचिवाः प्राविशन् पुरम्।
तद्धनुः पुरतः कृत्वा निर्जग्मुरमितौजसः॥३॥
राजा जनक की आज्ञा पाकर वे अमित तेजस्वी मन्त्री नगर में गये और उस धनुष को आगे करके पुरी से बाहर निकले॥३॥
नृणां शतानि पञ्चाशद् व्यायतानां महात्मनाम्।
मञ्जूषामष्टचक्रां तां समूहस्ते कथंचन॥४॥
वह धनुष आठ पहियों वाली लोहे की बहुत बड़ी संदूक में रखा गया था। उसे मोटे-ताजे पाँच हजार महामनस्वी वीर किसी तरह ठेलकर वहाँ तक ला सके॥४॥
तामादाय सुमञ्जूषामायसी यत्र तद्धनुः।
सुरोपमं ते जनकमूचुर्नृपतिमन्त्रिणः॥५॥
लोहे की वह संदूक, जिसमें धनुष रखा गया था, लाकर उन मन्त्रियों ने देवोपम राजा जनक से कहा -||
इदं धनुर्वरं राजन् पूजितं सर्वराजभिः।
मिथिलाधिप राजेन्द्र दर्शनीयं यदीच्छसि॥६॥
‘राजन्! मिथिलापते! राजेन्द्र! यह समस्त राजाओं द्वारा सम्मानित श्रेष्ठ धनुष है,यदि आप इन दोनों राजकुमारों को दिखाना चाहते हैं तो दिखाइये’।
तेषां नृपो वचः श्रुत्वा कृताञ्जलिरभाषत।
विश्वामित्रं महात्मानं तावुभौ रामलक्ष्मणौ॥७॥
उनकी बात सुनकर राजा जनक ने हाथ जोड़कर महात्मा विश्वामित्र तथा दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण से कहा- ॥७॥
– इदं धनुर्वरं ब्रह्मञ्जनकैरभिपूजितम्।
राजभिश्च महावीरशक्तैः पूरितं तदा॥८॥
‘ब्रह्मन्! यही वह श्रेष्ठ धनुष है, जिसका जनकवंशी नरेशों ने सदा ही पूजन किया है तथा जो इसे उठाने में समर्थ न हो सके, उन महापराक्रमी नरेशों ने भी इसका पूर्वकाल में सम्मान किया है॥८॥
नैतत् सुरगणाः सर्वे सासुरा न च राक्षसाः।
गन्धर्वयक्षप्रवराः सकिन्नरमहोरगाः॥९॥
‘इसे समस्त देवता, असुर, राक्षस, गन्धर्व, बड़े बड़े यक्ष, किन्नर और महानाग भी नहीं चढ़ा सके हैं॥९॥
क्व गतिर्मानुषाणां च धनुषोऽस्य प्रपूरणे।
आरोपणे समायोगे वेपने तोलने तथा॥१०॥
‘फिर इस धनुष को खींचने, चढ़ाने, इसपर बाण संधान करने, इसकी प्रत्यञ्चापर टङ्कार देने तथा इसे उठाकर इधर-उधर हिलाने में मनुष्यों की कहाँ शक्ति है? ॥ १०॥
तदेतद् धनुषां श्रेष्ठमानीतं मुनिपुंगव।
दर्शयैतन्महाभाग अनयो राजपुत्रयोः॥११॥
‘मुनिप्रवर! यह श्रेष्ठ धनुष यहाँ लाया गया है। महाभाग! आप इसे इन दोनों राजकुमारों को दिखाइये॥
विश्वामित्रः सरामस्तु श्रुत्वा जनकभाषितम्।
वत्स राम धनुः पश्य इति राघवमब्रवीत्॥१२॥
श्रीरामसहित विश्वामित्र ने जनकका वह कथन सुनकर रघुनन्दन से कहा—’वत्स राम! इस धनुष को देखो’ ॥ १२॥
महर्षेर्वचनाद् रामो यत्र तिष्ठति तद्धनुः ।
मञ्जूषां तामपावृत्य दृष्टा धनुरथाब्रवीत्॥१३॥
महर्षि की आज्ञा से श्रीरामने जिसमें वह धनुष था उस संदूक को खोलकर उस धनुष को देखा और कहा – || १३॥
इदं धनुर्वरं दिव्यं संस्पृशामीह पाणिना।
यत्नवांश्च भविष्यामि तोलने पूरणेऽपि वा। १४॥
‘अच्छा अब मैं इस दिव्य एवं श्रेष्ठ धनुष में हाथ लगाता हूँ मैं इसे उठाने और चढ़ाने का भी प्रयत्न करूँगा’॥ १४॥
बाढमित्यब्रवीद् राजा मुनिश्च समभाषत।
लीलया स धनुर्मध्ये जग्राह वचनान्मुनेः॥ १५॥
पश्यतां नृसहस्राणां बहूनां रघुनन्दनः।
आरोपयत् स धर्मात्मा सलीलमिव तद्धनुः॥१६॥
तब राजा और मुनि ने एक स्वर से कहा—’हाँ, ऐसा ही करो।’ मुनि की आज्ञा से रघुकुलनन्दन धर्मात्मा श्रीराम ने उस धनुष को बीच से पकड़कर लीलापूर्वक उठा लिया और खेल-सा करते हुए उसपर प्रत्यञ्चा चढ़ा दी। उस समय कई हजार मनुष्यों की दृष्टि उनपर लगी थी॥ १५-१६॥
आरोपयित्वा मौर्वी च पूरयामास तद्धनुः।
तद् बभञ्ज धनुर्मध्ये नरश्रेष्ठो महायशाः॥१७॥
प्रत्यञ्चा चढ़ाकर महायशस्वी नरश्रेष्ठ श्रीराम ने ज्यों ही उस धनुष को कान तक खींचा त्यों ही वह बीच से ही टूट गया॥१७॥
तस्य शब्दो महानासीन्निर्घातसमनिःस्वनः।
भूमिकम्पश्च सुमहान् पर्वतस्येव दीर्यतः॥ १८॥
टूटते समय उससे वज्रपात के समान बड़ी भारी आवाज हुई। ऐसा जान पड़ा मानो पर्वत फट पड़ा हो। उस समय महान् भूकम्प आ गया॥ १८ ॥
निपेतुश्च नराः सर्वे तेन शब्देन मोहिताः।
वर्जयित्वा मुनिवरं राजानं तौ च राघवौ॥१९॥
मुनिवर विश्वामित्र, राजा जनक तथा रघुकुलभूषण दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण को छोड़कर शेष जितने लोग वहाँ खड़े थे, वे सब धनुष टूटने के उस भयंकर शब्द से मूर्च्छित होकर गिर पड़े॥ १९ ॥
प्रत्याश्वस्ते जने तस्मिन् राजा विगतसाध्वसः।
उवाच प्राञ्जलिर्वाक्यं वाक्यज्ञो मुनिपुंगवम्॥ २०॥
थोड़ी देर में जब सबको चेत हुआ, तब निर्भय हुए राजा जनक ने, जो बोलने में कुशल और वाक्य के मर्म को समझने वाले थे, हाथ जोड़कर मुनिवर विश्वामित्र से कहा- ॥२०॥
भगवन् दृष्टवीर्यो मे रामो दशरथात्मजः।
अत्यद्भुतमचिन्त्यं च अतर्कितमिदं मया॥२१॥
‘भगवन्! मैंने दशरथनन्दन श्रीराम का पराक्रम आज अपनी आँखों देख लिया महादेवजी के धनुष को चढ़ाना—यह अत्यन्त अद्भुत, अचिन्त्य और अतर्कित घटना है॥
जनकानां कुले कीर्तिमाहरिष्यति मे सुता।
सीता भर्तारमासाद्य रामं दशरथात्मजम्॥२२॥
‘मेरी पुत्री सीता दशरथकुमार श्रीराम को पतिरूपमें प्राप्त करके जनकवंश की कीर्ति का विस्तार करेगी।२२॥
मम सत्या प्रतिज्ञा सा वीर्यशुल्केति कौशिक।
सीता प्राणैर्बहमता देया रामाय मे सुता॥२३॥
‘कुशिकनन्दन! मैंने सीता को वीर्यशुल्का (पराक्रमरूपी शुल्कसे ही प्राप्त होनेवाली) बताकर जो प्रतिज्ञा की थी, वह आज सत्य एवं सफल हो गयी। सीता मेरे लिये प्राणों से भी बढ़कर है। अपनी यह पुत्री मैं श्रीराम को समर्पित करूँगा॥ २३ ॥
भवतोऽनुमते ब्रह्मन् शीघ्रं गच्छन्तु मन्त्रिणः।
मम कौशिक भद्रं ते अयोध्यां त्वरिता रथैः॥ २४॥
राजानं प्रश्रितैर्वाक्यैरानयन्तु पुरं मम।
प्रदानं वीर्यशुल्कायाः कथयन्तु च सर्वशः॥ २५॥
ब्रह्मन् ! कुशिकनन्दन! आपका कल्याण हो यदि आपकी आज्ञा हो तो मेरे मन्त्री रथ पर सवार होकर बड़ी उतावली के साथ शीघ्र ही अयोध्या को जायँ और विनय युक्त वचनोंद् वारा महाराज दशरथ को मेरे नगर में लिवा लायें। साथ ही यहाँ का सब समाचार बताकर यह निवेदन करें कि जिसके लिये पराक्रमका ही शुल्क नियत किया गया था, उस जनककुमारी सीता का विवाह श्रीरामचन्द्रजी के साथ होने जा रहा है।। २४-२५ ॥
मुनिगुप्तौ च काकुत्स्थौ कथयन्तु नृपाय वै।
प्रीतियुक्तं तु राजानमानयन्तु सुशीघ्रगाः॥२६॥
‘ये लोग महाराज दशरथ से यह भी कह दें कि आपके दोनों पुत्र श्रीराम और लक्ष्मण विश्वामित्रजी के द्वारा सुरक्षित हो मिथिला में पहुँच गये हैं। इस प्रकार प्रीतियुक्त हुए राजा दशरथ को ये शीघ्रगामी सचिव जल्दी यहाँ बुला लायें’॥ २६॥ ।
कौशिकस्तु तथेत्याह राजा चाभाष्य मन्त्रिणः।
अयोध्यां प्रेषयामास धर्मात्मा कृतशासनान्।
यथावृत्तं समाख्यातुमानेतुं च नृपं तथा॥२७॥
विश्वामित्र ने ‘तथास्तु’ कहकर राजा की बात का समर्थन किया तब धर्मात्मा राजा जनक ने अपनी आज्ञा का पालन करने वाले मन्त्रियों को समझा बुझाकर यहाँ का ठीक-ठीक समाचार महाराज दशरथ को बताने और उन्हें मिथिलापुरी में ले आने के लिये भेज दिया॥ २७॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे सप्तषष्टितमः सर्गः॥६७॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में सरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ।६७॥
सर्ग-68
जनकेन समादिष्टा दूतास्ते क्लान्तवाहनाः।
त्रिरात्रमुषिता मार्गे तेऽयोध्यां प्राविशन् पुरीम्॥
राजा जनक की आज्ञा पाकर उनके दूत अयोध्या के लिये प्रस्थित हुए। रास्ते में वाहनों के थक जाने के कारण तीन रात विश्राम करके चौथे दिन वे अयोध्यापुरी में जा पहुँचे॥१॥
ते राजवचनाद् गत्वा राजवेश्म प्रवेशिताः।
ददृशुर्देवसंकाशं वृद्धं दशरथं नृपम्॥२॥
राजा की आज्ञा से उनका राजमहल में प्रवेश हुआ,वहाँ जाकर उन्होंने देवतुल्य तेजस्वी बूढ़े महाराज दशरथ का दर्शन किया॥२॥
बद्धाञ्जलिपुटाः सर्वे दूता विगतसाध्वसाः।
राजानं प्रश्रितं वाक्यमब्रुवन् मधुराक्षरम्॥३॥
मैथिलो जनको राजा साग्निहोत्रपुरस्कृतः।
मुहुर्मुहुर्मधुरया स्नेहसंरक्तया गिरा॥४॥
कुशलं चाव्ययं चैव सोपाध्यायपुरोहितम्।
जनकस्त्वां महाराज पृच्छते सपुरःसरम्॥५॥
उन सभी दूतों ने दोनों हाथ जोड़ निर्भय हो राजा से मधुर वाणी में यह विनययुक्त बात कही—’महाराज! मिथिलापति राजा जनक ने अग्निहोत्र की अग्नि को सामने रखकर स्नेहयुक्त मधुर वाणी में सेवकों सहित आपका तथा आपके उपाध्याय और पुरोहितों का बारम्बार कुशल-मंगल पूछा है॥ ३–५॥
पृष्ट्वा कुशलमव्यग्रं वैदेहो मिथिलाधिपः।
कौशिकानुमते वाक्यं भवन्तमिदमब्रवीत्॥६॥
‘इस प्रकार व्यग्रतारहित कुशल पूछकर मिथिलापति विदेहराजने महर्षि विश्वामित्रकी आज्ञासे आपको यह संदेश दिया है॥६॥
पूर्वं प्रतिज्ञा विदिता वीर्यशुल्का ममात्मजा।
राजानश्च कृतामर्षा निर्वीर्या विमुखीकृताः॥७॥
‘राजन् ! आपको मेरी पहले की हुई प्रतिज्ञाका हाल मालूम होगा। मैंने अपनी पुत्री के विवाह के लिये पराक्रम का ही शुल्क नियत किया था। उसे सुनकर कितने ही राजा अमर्ष में भरे हुए आये; किंतु यहाँ पराक्रमहीन सिद्ध हुए और विमुख होकर घर लौट गये॥७॥
सेयं मम सुता राजन् विश्वामित्रपुरस्कृतैः।
यदृच्छयागतै राजन् निर्जिता तव पुत्रकैः॥८॥
‘नरेश्वर! मेरी इस कन्या को विश्वामित्रजी के साथ अकस्मात् घूमते-फिरते आये हुए आपके पुत्र श्रीराम ने अपने पराक्रम से जीत लिया है॥८॥
तच्च रत्नं धनुर्दिव्यं मध्ये भग्नं महात्मना।
रामेण हि महाबाहो महत्यां जनसंसदि॥९॥
‘महाबाहो! महात्मा श्रीराम ने महान् जनसमुदाय के मध्य मेरे यहाँ रखे हुए रत्नस्वरूप दिव्य धनुष को बीच से तोड़ डाला है॥९॥
अस्मै देया मया सीता वीर्यशुल्का महात्मने।
प्रतिज्ञां तर्तुमिच्छामि तदनुज्ञातुमर्हसि॥१०॥
‘अतः मैं इन महात्मा श्रीरामचन्द्रजी को अपनी वीर्यशुल्का कन्या सीता प्रदान करूँगा। ऐसा करके मैं अपनी प्रतिज्ञा से पार होना चाहता हूँ। आप इसके लिये मुझे आज्ञा देने की कृपा करें॥ १० ॥
सोपाध्यायो महाराज पुरोहितपुरस्कृतः।
शीघ्रमागच्छ भद्रं ते द्रष्टुमर्हसि राघवौ॥११॥
‘महाराज! आप अपने गुरु एवं पुरोहित के साथ यहाँ शीघ्र पधारें और अपने दोनों पुत्र रघुकुलभूषण श्रीराम और लक्ष्मण को देखें। आपका भला हो॥ ११॥
प्रतिज्ञां मम राजेन्द्र निर्वर्तयितुमर्हसि।
पुत्रयोरुभयोरेव प्रीतिं त्वमुपलप्स्यसे॥१२॥
‘राजेन्द्र ! यहाँ पधार कर आप मेरी प्रतिज्ञा पूर्ण करें। यहाँ आने से आपको अपने दोनों पुत्रों के विवाहजनित आनन्द की प्राप्ति होगी॥ १२ ॥
एवं विदेहाधिपतिर्मधुरं वाक्यमब्रवीत्।
विश्वामित्राभ्यनुज्ञातः शतानन्दमते स्थितः॥१३॥
‘राजन्! इस तरह विदेहराज ने आपके पास यह मधुर संदेश भेजा था। इसके लिये उन्हें विश्वामित्रजी की आज्ञा और शतानन्दजी की सम्मति भी प्राप्त हुई थी’ ॥ १३॥
दूतवाक्यं तु तच्छ्रुत्वा राजा परमहर्षितः।
वसिष्ठं वामदेवं च मन्त्रिणश्चैवमब्रवीत्॥१४॥
संदेशवाहक मन्त्रियों का यह वचन सुनकर राजा दशरथ बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने महर्षि वसिष्ठ, वामदेव तथा अन्य मन्त्रियों से कहा- ॥१४॥
गुप्तः कुशिकपुत्रेण कौसल्यानन्दवर्धनः।
लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा विदेहेषु वसत्यसौ॥ १५॥
‘कुशिकनन्दन विश्वामित्र से सुरक्षित हो कौसल्या का आनन्दवर्धन करने वाले श्रीराम अपने छोटे भाई लक्ष्मण के साथ विदेह देश में निवास करते हैं।॥ १५॥
दृष्टवीर्यस्तु काकुत्स्थो जनकेन महात्मना।
सम्प्रदानं सुतायास्तु राघवे कर्तुमिच्छति॥१६॥
‘वहाँ महात्मा राजा जनकने ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामके पराक्रमको प्रत्यक्ष देखा है। इसलिये वे अपनी पुत्री सीताका विवाह रघुकुलरत्न रामके साथ करना चाहते हैं॥ १६॥
यदि वो रोचते वृत्तं जनकस्य महात्मनः।
पुरी गच्छामहे शीघ्रं मा भूत् कालस्य पर्ययः॥१७॥
‘यदि आप लोगों की रुचि एवं सम्मति हो तो हमलोग शीघ्र ही महात्मा जनक की मिथिलापुरी को चलें इसमें विलम्ब न हो’ ॥ १७ ॥
मन्त्रिणो बाढमित्याहुः सह सर्वैर्महर्षिभिः।
सुप्रीतश्चाब्रवीद् राजा श्वो यात्रेति च मन्त्रिणः॥ १८॥
यह सुनकर समस्त महर्षियों सहित मन्त्रियों ने ‘बहुत अच्छा’ कहकर एक स्वर से चलने की सम्मति दी। राजा बड़े प्रसन्न हुए और मन्त्रियों से बोले—’कल सबेरे ही यात्रा कर देनी चाहिये’ ॥ १८ ॥
मन्त्रिणस्तु नरेन्द्रस्य रात्रिं परमसत्कृताः।
ऊषुः प्रमुदिताः सर्वे गुणैः सर्वैः समन्विताः॥ १९॥
महाराज दशरथ के सभी मन्त्री समस्त सद्गुणों से सम्पन्न थे। राजा ने उनका बड़ा सत्कार किया। अतः बारात चलने की बात सुनकर उन्होंने बड़े आनन्द से वह रात्रि व्यतीत की॥ १९॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डेऽष्टषष्टितमः सर्गः॥ ६८॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में अड़सठवाँ सर्ग पूरा हुआ।६८॥
सर्ग-69
ततो रात्र्यां व्यतीतायां सोपाध्यायः सबान्धवः।
राजा दशरथो हृष्टः सुमन्त्रमिदमब्रवीत्॥१॥
तदनन्तर रात्रि व्यतीत होने पर उपाध्याय और बन्धुबान्धवों सहित राजा दशरथ हर्ष में भरकर सुमन्त्र से इस प्रकार बोले- ॥१॥
अद्य सर्वे धनाध्यक्षा धनमादाय पुष्कलम्।
व्रजन्त्वग्रे सुविहिता नानारत्नसमन्विताः॥२॥
‘आज हमारे सभी धनाध्यक्ष (खजांची) बहुत-सा धन लेकर नाना प्रकार के रत्नों से सम्पन्न हो सबसे आगे चलें। उनकी रक्षाके लिये हर तरह की सुव्यवस्था होनी चाहिये॥२॥
चतुरंगबलं चापि शीघ्रं निर्यातु सर्वशः।
ममाज्ञासमकालं च यानं युग्यमनुत्तमम्॥३॥
‘सारी चतुरंगिणी सेना भी यहाँ से शीघ्र ही कूचकर दे। अभी मेरी आज्ञा सुनते ही सुन्दर-सुन्दर पालकियाँ और अच्छे-अच्छे घोड़े आदि वाहन तैयार होकर चल दें॥
वसिष्ठो वामदेवश्च जाबालिरथ कश्यपः।
मार्कण्डेयस्तु दीर्घायुर्ऋषिः कात्यायनस्तथा ॥४॥
एते द्विजाः प्रयान्त्वग्रे स्यन्दनं योजयस्व मे।
यथा कालात्ययो न स्याद् दूता हि त्वरयन्ति माम्॥५॥
‘वसिष्ठ, वामदेव, जाबालि, कश्यप, दीर्घजीवी मार्कण्डेय मुनि तथा कात्यायन—ये सभी ब्रह्मर्षि आगे-आगे चलें। मेरा रथ भी तैयार करो देर नहीं होनी चाहिये। राजा जनक के दूत मुझे जल्दी करने के लिये प्रेरित कर रहे हैं’॥ ४-५॥ ।
वचनाच्च नरेन्द्रस्य सेना च चतुरंगिणी।
राजानमृषिभिः सार्धं व्रजन्तं पृष्ठतोऽन्वयात्॥६॥
राजा की इस आज्ञा के अनुसार चतुरंगिणी सेना तैयार हो गयी और ऋषियों के साथ यात्रा करते हुए महाराज दशरथ के पीछे-पीछे चली॥६॥
गत्वा चतुरहं मार्गं विदेहानभ्युपेयिवान्।
राजा च जनकः श्रीमान् श्रुत्वा पूजामकल्पयत्॥ ७॥
चार दिन का मार्ग तय करके वे सब लोग विदेहदेश में जा पहुँचे। उनके आगमन का समाचार सुनकर श्रीमान् राजा जनक ने स्वागत-सत्कार की तैयारी की।
ततो राजानमासाद्य वृद्धं दशरथं नृपम्।
मुदितो जनको राजा प्रहर्षं परमं ययौ॥८॥
तत्पश्चात् आनन्दमग्न हुए राजा जनक बूढ़े महाराज दशरथ के पास पहुँचे उनसे मिलकर उन्हें बड़ा हर्ष हुआ॥
उवाच वचनं श्रेष्ठो नरश्रेष्ठं मुदान्वितम्।
स्वागतं ते नरश्रेष्ठ दिष्ट्या प्राप्तोऽसि राघव॥९॥
राजाओं में श्रेष्ठ मिथिलानरेश ने आनन्दमग्न हुए पुरुषप्रवर राजा दशरथ से कहा—’नरश्रेष्ठ रघुनन्दन ! आपका स्वागत है,मेरे बड़े भाग्य, जो आप यहाँ पधारे॥९॥
पुत्रयोरुभयोः प्रीतिं लप्स्यसे वीर्यनिर्जिताम्।
दिष्ट्या प्राप्तो महातेजा वसिष्ठो भगवानृषिः॥ १०॥
सह सर्वैर्द्धिजश्रेष्ठैर्देवैरिव शतक्रतुः।
‘आप यहाँ अपने दोनों पुत्रों की प्रीति प्राप्त करेंगे, जो उन्होंने अपने पराक्रम से जीतकर पायी है। महातेजस्वी भगवान् वसिष्ठ मुनि ने भी हमारे सौभाग्य से ही यहाँ पदार्पण किया है। ये इन सभी श्रेष्ठ ब्राह्मणों के साथ वैसी ही शोभा पा रहे हैं, जैसे देवताओं के साथ इन्द्र सुशोभित होते हैं। १० १/२॥
दिष्ट्या मे निर्जिता विघ्ना दिष्ट्या मे पूजितं कुलम्॥११॥
राघवैः सह सम्बन्धाद् वीर्यश्रेष्ठैर्महाबलैः।
‘सौभाग्यसे मेरी सारी विघ्न-बाधाएँ पराजित हो गयीं। रघुकुल के महापुरुष महान् बल से सम्पन्न और पराक्रम में सबसे श्रेष्ठ होते हैं। इस कुल के साथ सम्बन्ध होने के कारण आज मेरे कुल का सम्मान बढ़ गया॥ ११ १/२॥
श्वः प्रभाते नरेन्द्र त्वं संवर्तयितुमर्हसि॥१२॥
यज्ञस्यान्ते नरश्रेष्ठ विवाहमृषिसत्तमैः।
‘नरश्रेष्ठ नरेन्द्र! कल सबेरे इन सभी महर्षियों के साथ उपस्थित हो मेरे यज्ञ की समाप्ति के बाद आप श्रीराम के विवाह का शुभकार्य सम्पन्न करें’॥ १२ १/२॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा ऋषिमध्ये नराधिपः॥ १३॥
वाक्यं वाक्यविदां श्रेष्ठः प्रत्युवाच महीपतिम्।
ऋषियों की मण्डली में राजा जनक की यह बात सुनकर बोलने की कला जानने वाले विद्वानों में श्रेष्ठ एवं वाक्यमर्मज्ञ महाराज दशरथ ने मिथिलानरेश को इस प्रकार उत्तर दिया- ॥ १३ १/२॥
प्रतिग्रहो दातृवशः श्रुतमेतन्मया पुरा॥१४॥
यथा वक्ष्यसि धर्मज्ञ तत् करिष्यामहे वयम्।
‘धर्मज्ञ! मैंने पहले से यह सुन रखा है कि प्रतिग्रह दाता के अधीन होता है अतः आप जैसा कहेंगे, हम वैसा ही करेंगे’। १४ १/२ ॥
तद् धर्मिष्ठं यशस्यं च वचनं सत्यवादिनः॥१५॥
श्रुत्वा विदेहाधिपतिः परं विस्मयमागतः।
सत्यवादी राजा दशरथ का वह धर्मानुकूल तथा यशोवर्धक वचन सुनकर विदेहराज जनक को बड़ा विस्मय हुआ॥ १५ १/२ ॥
ततः सर्वे मुनिगणाः परस्परसमागमे॥१६॥
हर्षेण महता युक्तास्तां रात्रिमवसन् सुखम्।
तदनन्तर सभी महर्षि एक-दूसरे से मिलकर बहुत प्रसन्न हुए और सबने बड़े सुख से वह रात बितायी। १६ १/२॥
अथ रामो महातेजा लक्ष्मणेन समं ययौ॥ १७॥
विश्वामित्रं पुरस्कृत्य पितुः पादावुपस्पृशन्।
इधर महातेजस्वी श्रीराम विश्वामित्रजी को आगे करके लक्ष्मण के साथ पिताजी के पास गये और उनके चरणों का स्पर्श किया। १७ १/२ ॥
राजा च राघवौ पुत्रौ निशाम्य परिहर्षितः॥१८॥
उवास परमप्रीतो जनकेनाभिपूजितः।
राजा दशरथ ने भी जनक के द्वारा आदर-सत्कार पाकर बड़ी प्रसन्नता का अनुभव किया तथा अपने दोनों रघुकुल-रत्न पुत्रों को सकुशल देखकर उन्हें अपार हर्ष हुआ। वे रात में बड़े सुख से वहाँ रहे॥ १८ १/२॥
जनकोऽपि महातेजाः क्रिया धर्मेण तत्त्ववित्।
यज्ञस्य च सुताभ्यां च कृत्वा रात्रिमुवास ह॥ १९॥
महातेजस्वी तत्त्वज्ञ राजा जनक ने भी धर्म के अनुसार यज्ञ कार्य सम्पन्न किया तथा अपनी दोनों कन्याओं के लिये मंगलाचार का सम्पादन करके सुख से वह रात्रि व्यतीत की॥१९॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकोनसप्ततितमः सर्गः॥६९॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में उनहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ।६९॥
सर्ग-70
ततः प्रभाते जनकः कृतकर्मा महर्षिभिः ।
उवाच वाक्यं वाक्यज्ञः शतानन्दं पुरोहितम्॥१॥
तदनन्तर जब सबेरा हुआ और राजा जनक महर्षियों के सहयोग से अपना यज्ञ-कार्य सम्पन्न कर चुके, तब वे वाक्यमर्मज्ञ नरेश अपने पुरोहित शतानन्दजी से इस प्रकार बोले- ॥१॥ ।
भ्राता मम महातेजा वीर्यवानतिधार्मिकः।
कुशध्वज इति ख्यातः पुरीमध्यवसच्छुभाम्॥२॥
वार्याफलकपर्यन्तां पिबन्निक्षुमती नदीम्।
सांकाश्यां पुण्यसंकाशां विमानमिव पुष्पकम्॥ ३॥
‘ब्रह्मन्! मेरे महातेजस्वी और पराक्रमी भाई कुशध्वज जो अत्यन्त धर्मात्मा हैं, इस समय इक्षुमती नदी का जल पीते हुए उसके किनारे बसी हुई कल्याणमयी सांकाश्या नगरी में निवास करते हैं। उसके चारों ओर के परकोटों की रक्षा के लिये शत्रुओं के निवारण में समर्थ बड़े-बड़े यन्त्र लगाये गये हैं। वह पुरी पुष्पक विमान के समान विस्तृत तथा पुण्य से उपलब्ध होने वाले स्वर्गलोक के सदृश सुन्दर है॥२-३॥
तमहं द्रष्टुमिच्छामि यज्ञगोप्ता स मे मतः।
प्रीतिं सोऽपि महातेजा इमां भोक्ता मया सह॥ ४॥
‘वहाँ रहने वाले अपने भाई को इस शुभ अवसरपर मैं यहाँ उपस्थित देखना चाहता हूँ; क्योंकि मेरी दृष्टि में वे मेरे इस यज्ञ के संरक्षक हैं। महातेजस्वी कुशध्वज भी मेरे साथ श्रीसीताराम के विवाह सम्बन्धी इस मंगल समारोह का सुख उठावेंगे’॥ ४॥
एवमुक्ते तु वचने शतानन्दस्य संनिधौ।
आगताः केचिदव्यग्रा जनकस्तान् समादिशत्॥
राजा के इस प्रकार कहने पर शतानन्दजी के समीप कुछ धीर स्वभाव के पुरुष आये और राजा जनक ने उन्हें पूर्वोक्त आदेश सुनाया॥५॥
शासनात् तु नरेन्द्रस्य प्रययुः शीघ्रवाजिभिः।
समानेतुं नरव्याघ्रं विष्णुमिन्द्राज्ञया यथा॥६॥
राजा की आज्ञा से वे श्रेष्ठ दूत तेज चलने वाले घोड़ों पर सवार हो पुरुषसिंह कुशध्वज को बुला लाने के लिये चल दिये। मानो इन्द्र की आज्ञा से उनके दूत भगवान् विष्णु को बुलाने जा रहे हों॥६॥
सांकाश्यां ते समागम्य ददृशुश्च कुशध्वजम्।
न्यवेदयन् यथावृत्तं जनकस्य च चिन्तितम्॥७॥
सांकाश्यामें पहुँचकर उन्होंने कुशध्वजसे भेंट की और मिथिलाका यथार्थ समाचार एवं जनकका अभिप्राय भी निवेदन किया॥७॥
तवृत्तं नृपतिः श्रुत्वा दूतश्रेष्ठैर्महाजवैः।
आज्ञया तु नरेन्द्रस्य आजगाम कुशध्वजः॥८॥
उन महावेगशाली श्रेष्ठ दूतों के मुख से मिथिला का सारा वृत्तान्त सुनकर राजा कुशध्वज महाराज जनक की आज्ञा के अनुसार मिथिला में आये॥८॥
स ददर्श महात्मानं जनकं धर्मवत्सलम्।
सोऽभिवाद्य शतानन्दं जनकं चातिधार्मिकम्॥
राजाहँ परमं दिव्यमासनं सोऽध्यरोहत।
वहाँ उन्होंने धर्मवत्सल महात्मा जनक का दर्शन किया फिर शतानन्दजी तथा अत्यन्त धार्मिक जनक को प्रणाम करके वे राजा के योग्य परम दिव्य सिंहासन पर विराजमान हुए ॥ ९ १/२ ॥
उपविष्टावुभौ तौ तु भ्रातरावमितद्युती॥१०॥
प्रेषयामासतुर्वीरौ मन्त्रि श्रेष्ठं सुदामनम्।।
गच्छ मन्त्रिपते शीघ्रमिक्ष्वाकुममितप्रभम्॥११॥
आत्मजैः सह दुर्धर्षमानयस्व समन्त्रिणम्।
सिंहासन पर बैठे हुए उन दोनों अमिततेजस्वी वीरबन्धुओं ने मन्त्रिप्रवर सुदामन को भेजा और कहा —’मन्त्रिवर! आप शीघ्र ही अमिततेजस्वी इक्ष्वाकु कुलभूषण महाराज दशरथ के पास जाइये और पुत्रों तथा मन्त्रियों सहित उन दुर्जय नरेश को यहाँ बुला लाइये’ ॥ १०-११ १/२॥
औपकार्यां स गत्वा तु रघूणां कुलवर्धनम्॥ १२॥
ददर्श शिरसा चैनमभिवाद्येदमब्रवीत्।
आज्ञा पाकर मन्त्री सुदामन महाराज दशरथ के खेमे में जाकर रघुकुलकी कीर्ति बढ़ाने वाले उननरेश से मिले और मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम करने के पश्चात् इस प्रकार बोले- ॥ १२ १/२॥
अयोध्याधिपते वीर वैदेहो मिथिलाधिपः॥१३॥
स त्वां द्रष्टं व्यवसितः सोपाध्यायपुरोहितम्।
‘वीर अयोध्यानरेश! मिथिलापति विदेहराज जनक इस समय उपाध्याय और पुरोहित सहित आपका दर्शन करना चाहते हैं ॥ १३ १/२ ॥
मन्त्रि श्रेष्ठवचः श्रुत्वा राजा सर्षिगणस्तथा॥१४॥
सबन्धुरगमत् तत्र जनको यत्र वर्तते।
मन्त्रिवर सुदामन की बात सुनकर राजा दशरथ ऋषियों और बन्धु-बान्धवों के साथ उस स्थानपर गये जहाँ राजा जनक विद्यमान थे॥ १४ १/२॥
राजा च मन्त्रिसहितः सोपाध्यायः सबान्धवः॥ १५॥
वाक्यं वाक्यविदां श्रेष्ठो वैदेहमिदमब्रवीत्।
मन्त्री, उपाध्याय और भाई-बन्धुओं सहित राजा दशरथ, जो बोलने की कला जानने वाले विद्वानों में श्रेष्ठथे, विदेहराज जनक से इस प्रकार बोले- ॥ १५ १/२॥
विदितं ते महाराज इक्ष्वाकुकुलदैवतम्॥१६॥
वक्ता सर्वेषु कृत्येषु वसिष्ठो भगवानृषिः।
‘महाराज! आपको तो विदित ही होगा कि इक्ष्वाकुकुल के देवता ये महर्षि वसिष्ठजी हैं। हमारे यहाँ सभी कार्यों में ये भगवान् वसिष्ठ मुनि ही कर्तव्य का उपदेश करते हैं और इन्हीं की आज्ञा का पालन किया जाता है। १६ १/२ ।।
विश्वामित्राभ्यनुज्ञातः सह सर्वैर्महर्षिभिः॥१७॥
एष वक्ष्यति धर्मात्मा वसिष्ठो मे यथाक्रमम्।
‘यदि सम्पूर्ण महर्षियों सहित विश्वामित्रजी की आज्ञा हो तो ये धर्मात्मा वसिष्ठ ही पहले मेरी कुल परम्परा का क्रमशः परिचय देंगे’ ।। १७ १/२॥
तूष्णीभूते दशरथे वसिष्ठो भगवानृषिः॥१८॥
उवाच वाक्यं वाक्यज्ञो वैदेहं सपुरोधसम्।
यों कहकर जब राजा दशरथ चुप हो गये, तब वाक्यवेत्ता भगवान् वसिष्ठ मुनि पुरोहित सहित विदेहराज से इस प्रकार बोले- ॥ १८ १/२॥
अव्यक्तप्रभवो ब्रह्मा शाश्वतो नित्य अव्ययः॥
तस्मान्मरीचिः संजज्ञे मरीचेः कश्यपः सुतः।
विवस्वान् कश्यपाज्जज्ञे मनुर्वैवस्वतः स्मृतः॥ २०॥
‘ब्रह्माजी की उत्पत्ति का कारण अव्यक्त है—ये स्वयम्भू हैं, नित्य, शाश्वत और अविनाशी हैं। उनसे मरीचि की उत्पत्ति हुई मरीचि के पुत्र कश्यप हैं, कश्यप से विवस्वान् का और विवस्वान् से वैवस्वत मनु का जन्म हुआ॥ १९-२० ॥
मनुः प्रजापतिः पूर्वमिक्ष्वाकुश्च मनोः सुतः।
तमिक्ष्वाकुमयोध्यायां राजानं विद्धि पूर्वकम्॥ २१॥
‘मनु पहले प्रजापति थे, उनसे इक्ष्वाकु नामक पुत्र हुआ। उन इक्ष्वाकु को ही आप अयोध्याके प्रथम राजा समझें॥ २१॥
इक्ष्वाकोस्तु सुतः श्रीमान् कुक्षिरित्येव विश्रुतः।
कुक्षेरथात्मजः श्रीमान् विकक्षिरुदपद्यत॥२२॥
‘इक्ष्वाकु के पुत्र का नाम कुक्षि था। वे बड़े तेजस्वी थे। कुक्षि से विकुक्षि नामक कान्तिमान् पुत्र का जन्म हुआ॥ २२॥
विकुक्षेस्तु महातेजा बाणः पुत्रः प्रतापवान्।
बाणस्य तु महातेजा अनरण्यः प्रतापवान्॥२३॥
‘विकुक्षि के पुत्र महातेजस्वी और प्रतापी बाण हुए। बाण के पुत्र का नाम अनरण्य था। वे भी बड़े तेजस्वी और प्रतापी थे॥ २३॥
अनरण्यात् पृथुर्जज्ञे त्रिशङ्कस्तु पृथोरपि।
त्रिशङ्कोरभवत् पुत्रो धुन्धुमारो महायशाः॥२४॥
‘अनरण्यसे पृथु और पृथुसे त्रिशंकुका जन्म हुआ।
त्रिशंकुके पुत्र महायशस्वी धुन्धुमार थे॥२४॥
धुन्धुमारान्महातेजा युवनाश्वो महारथः।
युवनाश्वसुतश्चासीन्मान्धाता पृथिवीपतिः॥ २५॥
‘धुन्धुमार से महातेजस्वी महारथी युवनाश्व का जन्म हुआ। युवनाश्व के पुत्र मान्धाता हुए, जो समस्त भूमण्डल के स्वामी थे॥ २५ ॥
मान्धातुस्तु सुतः श्रीमान् सुसन्धिरुदपद्यत।
सुसन्धेरपि पुत्रौ द्वौ ध्रुवसन्धिः प्रसेनजित्॥२६॥
‘मान्धाता से सुसन्धि नामक कान्तिमान् पुत्र का जन्म हुआ। सुसन्धि के भी दो पुत्र हुए-ध्रुवसन्धि और प्रसेनजित्॥ २६॥
यशस्वी ध्रुवसन्धेस्तु भरतो नाम नामतः।
भरतात् तु महातेजा असितो नाम जायत॥२७॥
‘ध्रुवसन्धि से भरत नामक यशस्वी पुत्र का जन्म हुआ। भरत से महातेजस्वी असित की उत्पत्ति हुई। २७॥
यस्यैते प्रतिराजान उदपद्यन्त शत्रवः।
हैहयास्तालजङ्घाश्च शूराश्च शशबिन्दवः॥ २८॥
‘राजा असित के साथ हैहय, तालजङ्घ और शशबिन्दु-इन तीन राजवंशों के लोग शत्रुता रखने लगे थे॥२८॥
तांश्च स प्रतियुध्यन् वै युद्धे राजा प्रवासितः।
हिमवन्तमुपागम्य भार्याभ्यां सहितस्तदा ॥२९॥
‘युद्ध में इन तीनों शत्रुओं का सामना करते हुए राजा असित प्रवासी हो गये। वे अपनी दो रानियों के साथ हिमालय पर आकर रहने लगे॥ २९ ॥
असितोऽल्पबलो राजा कालधर्ममुपेयिवान्।
ढे चास्य भार्ये गर्भिण्यौ बभूवतुरिति श्रुतिः॥ ३०॥
‘राजा असित के पास बहुत थोड़ी सेना शेष रह गयी थी। वे हिमालय पर ही मृत्यु को प्राप्त हो गये। उस समय उनकी दोनों रानियाँ गर्भवती थीं, ऐसा सुना गया है॥ ३०॥
एका गर्भविनाशार्थं सपत्न्यै सगरं ददौ।।
‘उनमें से एक रानी ने अपनी सौत का गर्भ नष्ट करने के लिये उसे विष युक्त भोजन दे दिया। ३० १/२॥
ततः शैलवरे रम्ये बभूवाभिरतो मुनिः॥३१॥
भार्गवश्च्यवनो नाम हिमवन्तमुपाश्रितः।
तत्र चैका महाभागा भार्गवं देववर्चसम्॥ ३२॥
ववन्दे पद्मपत्राक्षी कांक्षन्ती सुतमुत्तमम्।
तमृषिं साभ्युपागम्य कालिन्दी चाभ्यवादयत्॥
‘उस समय उस रमणीय एवं श्रेष्ठ पर्वत पर भृगुकुल में उत्पन्न हुए महामुनि च्यवन तपस्या में लगे हुए थे। हिमालय पर ही उनका आश्रम था। उन दोनों रानियों में से एक (जिसे जहर दिया गया था)
कालिन्दी नाम से प्रसिद्ध थी। विकसित कमलदल के समान नेत्रों वाली महाभागा कालिन्दी एक उत्तम पुत्र पाने की इच्छा रखती थी। उसने देवतुल्य तेजस्वी भृगुनन्दन च्यवन के पास जाकर उन्हें प्रणाम किया। ३१-३३॥
स तामभ्यवदद् विप्रः पुत्रेप्सुं पुत्रजन्मनि।
तव कुक्षौ महाभागे सुपुत्रः सुमहाबलः॥३४॥
महावीर्यो महातेजा अचिरात् संजनिष्यति।
गरेण सहितः श्रीमान् मा शुचः कमलेक्षणे॥ ३५॥
‘उस समय ब्रह्मर्षि च्यवन ने पुत्रकी अभिलाषा रखने वाली कालिन्दी से पुत्र-जन्म के विषयमें कहा’महाभागे! तुम्हारे उदर में एक महान् बलवान्, महातेजस्वी और महापराक्रमी उत्तम पुत्र है, वह कान्तिमान् बालक थोड़े ही दिनों में गर (जहर) के साथ उत्पन्न होगा। अतः कमललोचने! तुम पुत्र के लिये चिन्ता न करो’॥
च्यवनं च नमस्कृत्य राजपुत्री पतिव्रता।
पत्या विरहिता तस्मात् पुत्रं देवी व्यजायत॥३६॥
‘वह विधवा राजकुमारी कालिन्दी बड़ी पतिव्रता थी। महर्षि च्यवन को नमस्कार करके वह देवी अपने आश्रम पर लौट आयी। फिर समय आने पर उसने एक पुत्र को जन्म दिया॥ ३६॥
सपत्न्या तु गरस्तस्यै दत्तो गर्भजिघांसया।
सह तेन गरेणैव संजातः सगरोऽभवत्॥३७॥
‘उसकी सौत ने उसके गर्भ को नष्ट कर देने के लिये जो गर (विष) दिया था, उसके साथ ही उत्पन्न होने के कारण वह राजकुमार ‘सगर’ नाम से विख्यात हुआ॥ ३७॥
सगरस्यासमञ्जस्तु असमञ्जादथांशुमान्।
दिलीपोंऽशुमतः पुत्रो दिलीपस्य भगीरथः॥ ३८॥
‘सगर के पुत्र असमंज और असमंज के पुत्र अंशुमान हुए। अंशुमान के पुत्र दिलीप और दिलीप के पुत्र भगीरथ हुए॥ ३८॥
भगीरथात् ककुत्स्थश्च ककुत्स्थाच्च रघुस्तथा।
रघोस्तु पुत्रस्तेजस्वी प्रवृद्धः पुरुषादकः॥३९॥
‘भगीरथ से ककुत्स्थ और ककुत्स्थ से रघु का जन्म हुआ। रघु के तेजस्वी पुत्र प्रवृद्ध हुए, जो शाप से राक्षस हो गये थे॥ ३९॥
कल्माषपादोऽप्यभवत् तस्माज्जातस्तु शङ्खणः।
सुदर्शनः शङ्खणस्य अग्निवर्णः सुदर्शनात्॥ ४०॥
‘वे ही कल्माषपाद नाम से भी प्रसिद्ध हुए थे। उनसे शङ्खण नामक पुत्र का जन्म हुआ था। शङ्खण के पुत्र सुदर्शन और सुदर्शन के अग्निवर्ण हुए॥ ४०॥
शीघ्रगस्त्वग्निवर्णस्य शीघ्रगस्य मरुः सुतः।
मरोः प्रशुश्रुकस्त्वासीदम्बरीषः प्रशुश्रुकात्॥ ४१॥
‘अग्निवर्ण के शीघ्रग और शीघ्रग के पुत्र मरु थे। मरु से प्रशुश्रुक और प्रशुश्रुक से अम्बरीष की उत्पत्ति हुई॥
अम्बरीषस्य पुत्रोऽभून्नहुषश्च महीपतिः।
नहुषस्य ययातिस्तु नाभागस्तु ययातिजः॥४२॥
नाभागस्य बभूवाज अजाद् दशरथोऽभवत्।
अस्माद् दशरथाज्जातौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ॥ ४३॥
‘अम्बरीष के पुत्र राजा नहुष हुए। नहुष के ययाति और ययाति के पुत्र नाभाग थे। नाभाग के अज हुए,अज से दशरथका जन्म हुआ। इन्हीं महाराज दशरथ से ये दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण उत्पन्न हुए हैं। ४२-४३॥
आदिवंशविशुद्धानां राज्ञां परमधर्मिणाम्।
इक्ष्वाकुकुलजातानां वीराणां सत्यवादिनाम्॥ ४४॥
‘इक्ष्वाकुकुल में उत्पन्न हुए राजाओं का वंश आदि काल से ही शुद्ध रहा है। ये सब-के-सब परम धर्मात्मा, वीर और सत्यवादी होते आये हैं। ४४ ॥
रामलक्ष्मणयोरर्थे त्वत्सुते वरये नृप।
सदृशाभ्यां नरश्रेष्ठ सदृशे दातुमर्हसि ॥४५॥
‘नरश्रेष्ठ ! नरेश्वर ! इसी इक्ष्वाकुकुल में उत्पन्न हुए श्रीराम और लक्ष्मण के लिये मैं आपकी दो कन्याओं का वरण करता हूँ। ये आपकी कन्याओं के योग्य हैं और आपकी कन्याएँ इनके योग्य। अतः आप इन्हें कन्यादान करें’॥ ४५ ॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे सप्ततितमः सर्गः॥७०॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में सत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ।७०॥
सर्ग-71
एवं ब्रुवाणं जनकः प्रत्युवाच कृताञ्जलिः।
श्रोतुमर्हसि भद्रं ते कुलं नः परिकीर्तितम्॥१॥
प्रदाने हि मुनिश्रेष्ठ कुलं निरवशेषतः।
वक्तव्यं कुलजातेन तन्निबोध महामते॥२॥
महर्षि वसिष्ठ जब इस प्रकार इक्ष्वाकुवंश का परिचय दे चुके, तब राजा जनक ने हाथ जोड़कर उनसे कहा—’मुनिश्रेष्ठ! आपका भला हो। अब हम भी अपने कुल का परिचय दे रहे हैं, सुनिये। महामते! कुलीन पुरुष के लिये कन्यादान के समय अपने कुल का पूर्ण रूपेण परिचय देना आवश्यक है; अतः आप सुनने की कृपा करें॥ १-२॥
राजाभूत् त्रिषु लोकेषु विश्रुतः स्वेन कर्मणा।
निमिः परमधर्मात्मा सर्वसत्त्ववतां वरः॥३॥
‘प्राचीन काल में निमि नामक एक परम धर्मात्मा राजा हुए हैं, जो सम्पूर्ण धैर्यशाली महापुरुषों में श्रेष्ठ तथा अपने पराक्रम से तीनों लोकों में विख्यात थे॥३॥
तस्य पुत्रो मिथिर्नाम जनको मिथिपुत्रकः।।
प्रथमो जनको राजा जनकादप्युदावसुः॥४॥
‘उनके मिथि नामक एक पुत्र हुआ। मिथि के पुत्र का नाम जनक हुआ। ये ही हमारे कुल में पहले जनक हुए हैं (इन्हीं के नाम पर हमारे वंश का प्रत्येक राजा ‘जनक’ कहलाता है)। जनक से उदावसु का जन्म हुआ॥४॥
उदावसोस्तु धर्मात्मा जातो वै नन्दिवर्धनः।
नन्दिवर्धसुतः शूरः सुकेतुर्नाम नामतः॥५॥
‘उदावसुसे धर्मात्मा नन्दिवर्धन उत्पन्न हुए।
नन्दिवर्धनके शूरवीर पुत्रका नाम सुकेतु हुआ॥ ५॥
सुकेतोरपि धर्मात्मा देवरातो महाबलः।
देवरातस्य राजर्षे—हद्रथ इति स्मृतः॥६॥
‘सुकेतु के भी देवरात नामक पुत्र हुआ। देवरात महान् बलवान् और धर्मात्मा थे। राजर्षि देवरात के बृहद्रथ नाम से प्रसिद्ध एक पुत्र हुआ॥६॥
बृहद्रथस्य शूरोऽभून्महावीरः प्रतापवान्।
महावीरस्य धृतिमान् सुधृतिः सत्यविक्रमः॥७॥
‘बृहद्रथके पुत्र महावीर हुए, जो शूर और प्रतापी थे। महावीर के सुधृति हुए, जो धैर्यवान् और सत्यपराक्रमी थे॥७॥
सुधृतेरपि धर्मात्मा धृष्टकेतुः सुधार्मिकः।
धृष्टकेतोश्च राजर्षेर्हर्यश्व इति विश्रुतः॥८॥
‘सुधृति के भी धर्मात्मा धृष्टकेतु हुए, जो परम धार्मिक थे।राजर्षि धृष्टकेतु का पुत्र हर्यश्व नाम से विख्यात हुआ॥ ८॥
हर्यश्वस्य मरुः पुत्रो मरोः पुत्रः प्रतीन्धकः।
प्रतीन्धकस्य धर्मात्मा राजा कीर्तिरथः सुतः॥९॥
‘हर्यश्व के पुत्र मरु, मरु के पुत्र प्रतीन्धक तथा प्रतीन्धक के पुत्र धर्मात्मा राजा कीर्तिरथ हुए॥९॥
पुत्रः कीर्तिरथस्यापि देवमीढ इति स्मृतः।
देवमीढस्य विबुधो विबुधस्य महीध्रकः॥१०॥
‘कीर्तिरथ के पुत्र देवमीढ नाम से विख्यात हुए। देवमीढ के विबुध और विबुध के पुत्र महीध्रक हुए॥ १०॥
महीध्रकसुतो राजा कीर्तिरातो महाबलः।
कीर्तिरातस्य राजर्षेर्महारोमा व्यजायत॥११॥
‘महीध्रक के पुत्र महाबली राजा कीर्तिरात हुए। राजर्षि कीर्तिरात के महारोमा नामक पुत्र उत्पन्न हुआ॥
महारोम्णस्तु धर्मात्मा स्वर्णरोमा व्यजायत।
स्वर्णरोम्णस्तु राजर्षेईस्वरोमा व्यजायत॥१२॥
‘महारोमा से धर्मात्मा स्वर्णरोमा का जन्म हुआ। राजर्षि स्वर्णरोमा से ह्रस्वरोमा उत्पन्न हुए॥ १२ ॥
तस्य पुत्रद्वयं राज्ञो धर्मज्ञस्य महात्मनः।
ज्येष्ठोऽहमनुजो भ्राता मम वीरः कुशध्वजः॥ १३॥
‘धर्मज्ञ महात्मा राजा ह्रस्वरोमा के दो पुत्र उत्पन्न हए, जिनमें ज्येष्ठ तो मैं ही हूँ और कनिष्ठ मेरा छोटा भाई वीर कुशध्वज है॥१३॥
मां तु ज्येष्ठं पिता राज्ये सोऽभिषिच्य पिता मम।
कुशध्वजं समावेश्य भारं मयि वनं गतः॥१४॥
‘मेरे पिता मुझ ज्येष्ठ पुत्र को राज्य पर अभिषिक्त करके कुशध्वज का सारा भार मुझे सौंपकर वन में चले गये॥
वृद्धे पितरि स्वर्याते धर्मेण धुरमावहम्।
भ्रातरं देवसंकाशं स्नेहात् पश्यन् कुशध्वजम्॥
‘वृद्ध पिता के स्वर्गगामी हो जानेपर अपने देवतुल्य भाई कुशध्वज को स्नेह-दृष्टि से देखता हुआ मैं इस राज्यका भार धर्म के अनुसार वहन करने लगा॥ १५ ॥
कस्यचित्त्वथ कालस्य सांकाश्यादागतः पुरात्।
सुधन्वा वीर्यवान् राजा मिथिलामवरोधकः॥
‘कुछ काल के अनन्तर पराक्रमी राजा सुधन्वा ने सांकाश्य नगर से आकर मिथिला को चारों ओर से घेर लिया॥१६॥
स च मे प्रेषयामास शैवं धनुरनुत्तमम्।
सीता च कन्या पद्माक्षी मह्यं वै दीयतामिति॥ १७॥
‘उसने मेरे पास दूत भेजकर कहलाया कि ‘तुम शिवजी के परम उत्तम धनुष तथा अपनी कमलनयनी कन्या सीता को मेरे हवाले कर दो’ ॥ १७ ॥
तस्याप्रदानान्महर्षे युद्धमासीन्मया सह।
स हतोऽभिमुखो राजा सुधन्वा तु मया रणे॥ १८॥
‘महर्षे! मैंने उसकी माँग पूरी नहीं की इसलिये मेरे साथ उसका युद्ध हुआ। उस संग्राम में सम्मुखयुद्ध करता हुआ राजा सुधन्वा मेरे हाथ से मारा गया। १८॥
निहत्य तं मुनिश्रेष्ठ सुधन्वानं नराधिपम्।
सांकाश्ये भ्रातरं शूरमभ्यषिञ्चं कुशध्वजम्॥
‘मुनिश्रेष्ठ! राजा सुधन्वा का वध करके मैंने सांकाश्य नगर के राज्य पर अपने शूरवीर भ्राता कुशध्वज को अभिषिक्त कर दिया। १९॥
कनीयानेष मे भ्राता अहं ज्येष्ठो महामुने।
ददामि परमप्रीतो वध्वौ ते मुनिपुंगव॥२०॥
‘महामुने! ये मेरे छोटे भाई कुशध्वज हैं और मैं इनका बड़ा भाई हूँ। मुनिवर! मैं बड़ी प्रसन्नता के साथ आपको दो बहुएँ प्रदान करता हूँ॥ २० ॥
सीतां रामाय भद्रं ते ऊर्मिलां लक्ष्मणाय वै।
वीर्यशुल्कां मम सुतां सीतां सुरसुतोपमाम्॥२१॥
द्वितीयामूर्मिलां चैव त्रिर्वदामि न संशयः।
ददामि परमप्रीतो वध्वौ ते मुनिपुंगव॥ २२॥
‘आपका भला हो ! मैं सीता को श्रीराम के लिये और ऊर्मिला को लक्ष्मणके लिये समर्पित करता हूँ। पराक्रम ही जिसको पाने का शुल्क (शर्त) था, उस देवकन्या के समान सुन्दरी अपनी प्रथम पुत्री सीता को श्रीराम के लिये तथा दूसरी पुत्री ऊर्मिला को लक्ष्मण के लिये दे रहा हूँ। मैं इस बात को तीन बार दुहराता हूँ, इसमें संशय नहीं है। मुनिप्रवर ! मैं परम प्रसन्न होकर आपको दो बहुएँ दे रहा हूँ’ ॥ २१-२२ ॥
रामलक्ष्मणयो राजन् गोदानं कारयस्व ह।
पितृकार्यं च भद्रं ते ततो वैवाहिकं कुरु॥२३॥
(वसिष्ठजीसे ऐसा कहकर राजा जनक ने महाराज दशरथ से कहा-) ‘राजन्! अब आप श्रीराम और लक्ष्मण के मंगल के लिये इनसे गोदान करवाइये, आपका कल्याण हो। नान्दीमुख श्राद्ध का कार्य भी सम्पन्न कीजिये। इसके बाद विवाह का कार्य आरम्भ कीजियेगा॥ २३॥
मघा ह्यद्य महाबाहो तृतीयदिवसे प्रभो।
फल्गुन्यामुत्तरे राजेस्तस्मिन् वैवाहिकं कुरु।
रामलक्ष्मणयोरर्थे दानं कार्यं सुखोदयम्॥२४॥
‘महाबाहो! प्रभो! आज मघा नक्षत्र है राजन् ! आज के तीसरे दिन उत्तरा-फाल्गुनी नक्षत्र में वैवाहिक कार्य कीजियेगा। आज श्रीराम और लक्ष्मण के अभ्युदय के लिये (गो, भूमि, तिल और सुवर्ण आदि का) दान कराना चाहिये; क्योंकि वह भविष्य में सुख देने वाला होता है’ ॥ २४॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकसप्ततितमः सर्गः ॥७१॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में इकहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ ।७१॥
सर्ग-72
तमुक्तवन्तं वैदेहं विश्वामित्रो महामुनिः।
उवाच वचनं वीरं वसिष्ठसहितो नृपम्॥१॥
विदेहराज जनक जब अपनी बात समाप्त कर चुके, तब वसिष्ठ सहित महामुनि विश्वामित्र उन वीर नरेश से इस प्रकार बोले- ॥१॥
अचिन्त्यान्यप्रमेयाणि कुलानि नरपुंगव।
इक्ष्वाकूणां विदेहानां नैषां तुल्योऽस्ति कश्चन॥ २॥
‘नरश्रेष्ठ ! इक्ष्वाकु और विदेह दोनों ही राजाओं के वंश अचिन्तनीय हैं। दोनों के ही प्रभाव की कोई सीमा नहीं है। इन दोनों की समानता करने वाला दूसरा कोई राजवंश नहीं है॥२॥
सदृशो धर्मसम्बन्धः सदृशो रूपसम्पदा।
रामलक्ष्मणयो राजन् सीता चोर्मिलया सह॥३॥
‘राजन्! इन दोनों कुलों में जो यह धर्म-सम्बन्ध स्थापित होने जा रहा है, सर्वथा एक-दूसरे के योग्य है। रूप-वैभव की दृष्टि से भी समान योग्यता का है; क्योंकि ऊर्मिला सहित सीता श्रीराम और लक्ष्मण के अनुरूप है॥३॥
वक्तव्यं च नरश्रेष्ठ श्रूयतां वचनं मम।
भ्राता यवीयान् धर्मज्ञ एष राजा कुशध्वजः॥४॥
अस्य धर्मात्मनो राजन् रूपेणाप्रतिमं भुवि।
सुताद्वयं नरश्रेष्ठ पत्न्यर्थं वरयामहे ॥५॥
भरतस्य कुमारस्य शत्रुघ्नस्य च धीमतः।
वरये ते सुते राजंस्तयोरर्थे महात्मनोः॥६॥
‘नरश्रेष्ठ! इसके बाद मुझे भी कुछ कहना है; आप मेरी बात सुनिये। राजन्! आपके छोटे भाई जो ये धर्मज्ञ राजा कुशध्वज बैठे हैं, इन धर्मात्मा नरेश के भी दो कन्याएँ हैं, जो इस भूमण्डल में अनुपम सुन्दरी हैं। नरश्रेष्ठ! भूपाल! मैं आपकी उन दोनों कन्याओं का कुमार भरत और बुद्धिमान् शत्रुघ्न इन दोनों महामनस्वी राजकुमारों के लिये इनकी धर्मपत्नी बनाने के उद्देश्य से वरण करता हूँ॥ ४–६॥
पुत्रा दशरथस्येमे रूपयौवनशालिनः।
लोकपालसमाः सर्वे देवतुल्यपराक्रमाः॥७॥
‘राजा दशरथ के ये सभी पुत्र रूप और यौवन से सुशोभित, लोकपालों के समान तेजस्वी तथा देवताओं के तुल्य पराक्रमी हैं।॥ ७॥
उभयोरपि राजेन्द्र सम्बन्धेनानुबध्यताम्।
इक्ष्वाकुकुलमव्यग्रं भवतः पुण्यकर्मणः॥८॥
‘राजेन्द्र ! इन दोनों भाइयों (भरत और शत्रुघ्न) को भी कन्यादान करके आप इस समस्त इक्ष्वाकुकुल को अपने सम्बन्ध से बाँध लीजिये। आप पुण्यकर्मा पुरुष हैं; आपके चित्त में व्यग्रता नहीं आनी चाहिये (अर्थात् आप यह सोचकर व्यग्र न हों कि ऐसे महान् सम्राट् के साथ मैं एक ही समय चार वैवाहिक सम्बन्धों का निर्वाह कैसे कर सकता हूँ।)’ ॥ ८॥
विश्वामित्रवचः श्रुत्वा वसिष्ठस्य मते तदा।
जनकः प्राञ्जलिर्वाक्यमुवाच मुनिपुंगवौ॥९॥
वसिष्ठजी की सम्मति के अनुसार विश्वामित्रजी का यह वचन सुनकर उस समय राजा जनक ने हाथ जोड़कर उन दोनों मुनिवरों से कहा- ॥९॥
कुलं धन्यमिदं मन्ये येषां तौ मुनिपुंगवौ।
सदृशं कुलसम्बन्धं यदाज्ञापयतः स्वयम्॥१०॥
‘मुनिपुंगवो! मैं अपने इस कुल को धन्य मानता हूँ, जिसे आप दोनों इक्ष्वाकुवंश के योग्य समझकर इसके साथ सम्बन्ध जोड़ने के लिये स्वयं आज्ञा दे रहे हैं।
एवं भवतु भद्रं वः कुशध्वजसुते इमे।
पत्न्यौ भजेतां सहितौ शत्रुघ्नभरतावुभौ ॥११॥
‘आपका कल्याण हो आप जैसा कहते हैं, ऐसा ही हो ये सदा साथ रहने वाले दोनों भाई भरत और शत्रुघ्न कुशध्वजकी इन दोनों कन्याओं (में से एकएक) को अपनी-अपनी धर्मपत्नी के रूपमें ग्रहण करें॥११॥
एकाला राजपुत्रीणां चतसृणां महामुने।
पाणीन् गृह्णन्तु चत्वारो राजपुत्रा महाबलाः॥ १२॥
‘महामुने! ये चारों महाबली राजकुमार एक ही दिन हमारी चारों राजकुमारियों का पाणिग्रहण करें। १२॥
उत्तरे दिवसे ब्रह्मन् फल्गुनीभ्यां मनीषिणः।
वैवाहिकं प्रशंसन्ति भगो यत्र प्रजापतिः॥१३॥
‘ब्रह्मन्! अगले दो दिन फाल्गुनी नामक नक्षत्रों से युक्त हैं। इनमें (पहले दिन तो पूर्वा फाल्गुनी है और) दूसरे दिन (अर्थात् परसों) उत्तरा फाल्गुनी नामक नक्षत्र होगा, जिसके देवता प्रजापति भग (तथा अर्यमा) हैं। मनीषी पुरुष उस नक्षत्र में वैवाहिक कार्य करना बहुत उत्तम बताते हैं ॥ १३॥
एवमुक्त्वा वचः सौम्यं प्रत्युत्थाय कृताञ्जलिः।
उभौ मुनिवरौ राजा जनको वाक्यमब्रवीत्॥ १४॥
इस प्रकार सौम्य (मनोहर) वचन कहकर राजा जनक उठकर खड़े हो गये और उन दोनों मुनिवरों से हाथ जोड़कर बोले- ॥ १४ ॥
परो धर्मः कृतो मह्यं शिष्योऽस्मि भवतोस्तथा।
इमान्यासनमुख्यानि आस्यतां मुनिपुंगवौ॥ १५॥
‘आपलोगोंने कन्याओं का विवाह निश्चित करके मेरे लिये महान् धर्मका सम्पादन कर दिया; मैं आप दोनों का शिष्य हूँ। मुनिवरो! इन श्रेष्ठ आसनों पर आप दोनों विराजमान हों॥ १५॥
यथा दशरथस्येयं तथायोध्या पुरी मम।
प्रभुत्वे नास्ति संदेहो यथार्ह कर्तुमर्हथ॥१६॥
‘आपके लिये जैसी राजा दशरथ की अयोध्या है, वैसी ही यह मेरी मिथिलापुरी भी है। आपका इस पर पूरा अधिकार है, इसमें संदेह नहीं; अतः आप हमें यथायोग्य आज्ञा प्रदान करते रहें’॥१६॥
तथा ब्रुवति वैदेहे जनके रघुनन्दनः।
राजा दशरथो हृष्टः प्रत्युवाच महीपतिम्॥१७॥
विदेहराज जनक के ऐसा कहने पर रघुकुल का आनन्द बढ़ाने वाले राजा दशरथ ने प्रसन्न होकर उन मिथिला नरेश को इस प्रकार उत्तर दिया- ॥ १७ ॥
युवामसंख्येयगुणौ भ्रातरौ मिथिलेश्वरौ।
ऋषयो राजसङ्घाश्च भवद्भयामभिपूजिताः॥१८॥
‘मिथिलेश्वर! आप दोनों भाइयों के गुण असंख्य हैं; आप लोगों ने ऋषियों तथा राज समूहों का भलीभाँति सत्कार किया है॥ १८॥
स्वस्ति प्राप्नुहि भद्रं ते गमिष्यामः स्वमालयम्।
श्राद्धकर्माणि विधिवद्विधास्य इति चाब्रवीत्॥ १९॥
‘आपका कल्याण हो, आप मंगल के भागी हों अब हम अपने विश्रामस्थान को जायँगे। वहाँ जाकर मैं विधिपूर्वक नान्दीमुखश्राद्ध का कार्य सम्पन्न करूँगा।’ यह बात भी राजा दशरथ ने कही॥ १९ ॥
तमापृष्ट्वा नरपतिं राजा दशरथस्तदा।
मुनीन्द्रौ तौ पुरस्कृत्य जगामाशु महायशाः॥ २०॥
तदनन्तर मिथिला नरेश की अनुमति ले महायशस्वी राजा दशरथ मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र और वसिष्ठ को आगे करके तुरंत अपने आवास स्थान पर चले गये॥ २० ॥
स गत्वा निलयं राजा श्राद्धं कृत्वा विधानतः।
प्रभाते काल्यमुत्थाय चक्रे गोदानमुत्तमम्॥ २१॥
डेरे पर जाकर राजा दशरथ ने (अपराह्नकालमें) विधिपूर्वक आभ्युदयिक श्राद्ध सम्पन्न किया। तत्पश्चात् (रात बीतने पर) प्रातःकाल उठकर राजा ने तत्कालोचित उत्तम गोदान-कर्म किया॥ २१॥
गवां शतसहस्रं च ब्राह्मणेभ्यो नराधिपः।
एकैकशो ददौ राजा पुत्रानुद्दिश्य धर्मतः॥ २२॥
राजा दशरथ ने अपने एक-एक पुत्र के मंगल के लिये धर्मानुसार एक-एक लाख गौएँ ब्राह्मणों को दान ‘आपका कल्याण हो, आप मंगल के भागी हों अब हम अपने विश्रामस्थान को जायँगे। वहाँ जाकर मैं विधिपूर्वक नान्दीमुखश्राद्ध का कार्य सम्पन्न करूँगा।’ यह बात भी राजा दशरथ ने कही॥ १९ ॥
तमापृष्ट्वा नरपतिं राजा दशरथस्तदा।
मुनीन्द्रौ तौ पुरस्कृत्य जगामाशु महायशाः॥ २०॥
तदनन्तर मिथिलानरेश की अनुमति ले महायशस्वी राजा दशरथ मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र और वसिष्ठ को आगे करके तुरंत अपने आवासस्थान पर चले गये॥ २० ॥
स गत्वा निलयं राजा श्राद्धं कृत्वा विधानतः।
प्रभाते काल्यमुत्थाय चक्रे गोदानमुत्तमम्॥ २१॥
डेरे पर जाकर राजा दशरथ ने (अपराह्नकाल में) विधिपूर्वक आभ्युदयिक श्राद्ध सम्पन्न किया। तत्पश्चात् (रात बीतनेपर) प्रातःकाल उठकर राजाने तत्कालोचित उत्तम गोदान-कर्म किया॥ २१॥
गवां शतसहस्रं च ब्राह्मणेभ्यो नराधिपः।
एकैकशो ददौ राजा पुत्रानुद्दिश्य धर्मतः॥ २२॥
राजा दशरथ ने अपने एक-एक पुत्र के मंगल के लिये धर्मानुसार एक-एक लाख गौएँ ब्राह्मणों को दान की॥ २२॥
सुवर्णशृङ्ग्यः सम्पन्नाः सवत्साः कांस्यदोहनाः।
गवां शतसहस्राणि चत्वारि पुरुषर्षभः॥२३॥
वित्तमन्यच्च सुबहु द्विजेभ्यो रघुनन्दनः।
ददौ गोदानमुद्दिश्य पुत्राणां पुत्रवत्सलः॥२४॥
उन सबके सींग सोने से मढ़े हुए थे। उन सबके साथ बछड़े और काँसे के दुग्धपात्र थे। इस प्रकार पुत्रवत्सल रघुकुलनन्दन पुरुषशिरोमणि राजा दशरथ ने चार लाख गौओं का दान किया तथा और भी बहुत-सा धन पुत्रों के लिये गोदान के उद्देश्य से ब्राह्मणों को दिया॥ २३-२४॥
स सुतैः कृतगोदानैर्वृतः सन्नृपतिस्तदा।
लोकपालैरिवाभाति वृतः सौम्यः प्रजापतिः॥ २५॥
गोदान-कर्म सम्पन्न करके आये हुए पुत्रों से घिरे हुए राजा दशरथ उस समय लोकपालों से घिरकर बैठे हुए शान्तस्वभाव प्रजापति ब्रह्मा के समान शोभा पा रहे थे॥ २५ ॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे द्विसप्ततितमः सर्गः ॥७२॥
श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में बहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ। ७२॥
सर्ग-73
यस्मिंस्तु दिवसे राजा चक्रे गोदानमुत्तमम्।
तस्मिंस्तु दिवसे वीरो युधाजित् समुपेयिवान्॥ १॥
पुत्रः केकयराजस्य साक्षाद्भरतमातुलः।
दृष्ट्वा पृष्ट्वा च कुशलं राजानमिदमब्रवीत्॥२॥
राजा दशरथ ने जिस दिन अपने पुत्रों के विवाह के निमित्त उत्तम गोदान किया, उसी दिन भरत के सगे मामा केकय राजकुमार वीर युधाजित् वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने महाराज का दर्शन करके कुशल-मंगल पूछा और इस प्रकार कहा- ॥ १-२॥
केकयाधिपती राजा स्नेहात् कुशलमब्रवीत्।
येषां कुशलकामोऽसि तेषां सम्प्रत्यनामयम्॥३॥
स्वस्रीयं मम राजेन्द्र द्रष्टकामो महीपतिः।
तदर्थमुपयातोऽहमयोध्यां रघुनन्दन॥४॥
‘रघुनन्दन! केकयदेश के महाराज ने बड़े स्नेह के साथ आपका कुशल-समाचार पूछा है और आप भी हमारे यहाँ के जिन-जिन लोगों की कुशलवार्ता जानना चाहते होंगे, वे सब इस समय स्वस्थ और सानन्द हैं। राजेन्द्र! केकयनरेश मेरे भान्जे भरत को देखना चाहते हैं अतः इन्हें लेने के लिये ही मैं अयोध्या आया था।
श्रुत्वा त्वहमयोध्यायां विवाहार्थं तवात्मजान्।
मिथिलामुपयातांस्तु त्वया सह महीपते॥५॥
त्वरयाभ्युपयातोऽहं द्रष्टुकामः स्वसुः सुतम्।
‘परंतु पृथ्वीनाथ! अयोध्या में यह सुनकर कि “आपके सभी पुत्र विवाह के लिये आपके साथ मिथिला पधारे हैं, मैं तुरंत यहाँ चला आया; क्योंकि मेरे मन में अपनी बहिन के बेटे को देखने की बड़ी लालसा थी’॥ ५ १/२॥
अथ राजा दशरथः प्रियातिथिमुपस्थितम्॥६॥
दृष्ट्वा परमसत्कारैः पूजनार्हमपूजयत्।
महाराज दशरथ ने अपने प्रिय अतिथि को उपस्थित देख बड़े सत्कार के साथ उनकी आवभगत की; क्योंकि वे सम्मान पाने के ही योग्य थे॥ ६ १/२॥
ततस्तामुषितो रात्रिं सह पुत्रैर्महात्मभिः॥७॥
प्रभाते पुनरुत्थाय कृत्वा कर्माणि तत्त्ववित् ।
ऋषींस्तदा पुरस्कृत्य यज्ञवाटमुपागमत्॥८॥
तदनन्तर अपने महामनस्वी पुत्रों के साथ वह रात व्यतीत करके वे तत्त्वज्ञ नरेश प्रातःकाल उठे और नित्यकर्म करके ऋषियों को आगे किये जनक की यज्ञशाला में जा पहुँचे॥ ७-८॥
युक्ते मुहूर्ते विजये सर्वाभरणभूषितैः।।
भ्रातृभिः सहितो रामः कृतकौतुकमंगलः॥९॥
वसिष्ठं पुरतः कृत्वा महर्षीनपरानपि।
वसिष्ठो भगवानेत्य वैदेहमिदमब्रवीत्॥१०॥
तत्पश्चात् विवाह के योग्य विजय नामक मुहूर्त आने पर दूल्हे के अनुरूप समस्त वेश-भूषा से अलंकृत हुए भाइयों के साथ श्रीरामचन्द्रजी भी वहाँ आये। वे विवाहकालोचित मंगलाचार पूर्ण कर चुके थे तथा वसिष्ठ मुनि एवं अन्यान्य महर्षियों को आगे करके उस मण्डप में पधारे थे। उस समय भगवान् वसिष्ठ ने विदेहराज जनक के पास जाकर इस प्रकार कहा- ॥ ९-१०॥
राजा दशरथो राजन् कृतकौतुकमंगलैः।
पुत्रैर्नरवर श्रेष्ठो दातारमभिकाङ्क्षते॥११॥
‘राजन्! नरेशों में श्रेष्ठ महाराज दशरथ अपने पुत्रों का वैवाहिक सूत्र-बन्धन रूप मंगलाचार सम्पन्न करके उन सबके साथ पधारे हैं और भीतर आने के लिये दाता के आदेश की प्रतीक्षा कर रहे हैं ॥ ११॥
दातृप्रतिग्रहीतृभ्यां सर्वार्थाः सम्भवन्ति हि।
स्वधर्मं प्रतिपद्यस्व कृत्वा वैवाह्यमुत्तमम्॥१२॥
‘क्योंकि दाता और प्रतिग्रहीता (दान ग्रहण करने वाले) का संयोग होने पर ही समस्त दानधर्मो का सम्पादन सम्भव होता है; अतः आप विवाह कालोपयोगी शुभ कर्मों का अनुष्ठान करके उन्हें बुलाइये और कन्यादान रूप स्वधर्म का पालन कीजिये’ ॥ १२॥
इत्युक्तः परमोदारो वसिष्ठेन महात्मना।
प्रत्युवाच महातेजा वाक्यं परमधर्मवित्॥१३॥
महात्मा वसिष्ठ के ऐसा कहने पर परम उदार, परम धर्मज्ञ और महातेजस्वी राजा जनक ने इस प्रकार उत्तर दिया- ॥१३॥
कः स्थितः प्रतिहारो मे कस्याज्ञां सम्प्रतीक्षते।
स्वगृहे को विचारोऽस्ति यथा राज्यमिदं तव॥ १४॥
कृतकौतुकसर्वस्वा वेदिमूलमुपागताः।
मम कन्या मुनिश्रेष्ठ दीप्ता बढेरिवार्चिषः॥ १५॥
‘मुनिश्रेष्ठ! महाराज के लिये मेरे यहाँ कौन-सा पहरेदार खड़ा है। वे किसके आदेश की प्रतीक्षा करते हैं। अपने घर में आने के लिये कैसा सोच-विचार है? यह जैसे मेरा राज्य है, वैसे ही आपका है। मेरी
कन्याओं का वैवाहिक सूत्र-बन्धन रूप मंगलकृत्य सम्पन्न हो चुका है। अब वे यज्ञवेदी के पास आकर बैठी हैं और अग्नि की प्रज्वलित शिखाओं के समान प्रकाशित हो रही हैं॥ १४-१५॥
सद्योऽहं त्वत्प्रतीक्षोऽस्मि वेद्यामस्यां प्रतिष्ठितः ।
अविनं क्रियतां सर्वं किमर्थं हि विलम्ब्यते॥ १६॥
‘इस समय तो मैं आपकी ही प्रतीक्षामें वेदीपर बैठा । हूँ। आप निर्विघ्नतापूर्वक सब कार्य पूर्ण कीजिये। विलम्ब किसलिये करते हैं?’ ॥ १६ ॥
तद् वाक्यं जनकेनोक्तं श्रुत्वा दशरथस्तदा।
प्रवेशयामास सुतान् सर्वानृषिगणानपि॥१७॥
वसिष्ठजी के मुख से राजा जनक की कही हुई बात सुनकर महाराज दशरथ उस समय अपने पुत्रों और सम्पूर्ण महर्षियों को महल के भीतर ले आये॥१७॥
ततो राजा विदेहानां वसिष्ठमिदमब्रवीत्।
कारयस्व ऋषे सर्वामृषिभिः सह धार्मिक॥१८॥
रामस्य लोकरामस्य क्रियां वैवाहिकी प्रभो।
तदनन्तर विदेहराज ने वसिष्ठजी से इस प्रकार कहा —’धर्मात्मा महर्षे! प्रभो! आप ऋषियों को साथ लेकर लोकाभिराम श्रीराम के विवाह की सम्पूर्ण क्रिया कराइये’॥ १८ १/२॥
तथेत्युक्त्वा तु जनकं वसिष्ठो भगवानृषिः॥१९॥
विश्वामित्रं पुरस्कृत्य शतानन्दं च धार्मिकम्।
प्रपामध्ये तु विधिवद् वेदिं कृत्वा महातपाः॥२०॥
अलंचकार तां वेदिं गन्धपुष्पैः समन्ततः।
सुवर्णपालिकाभिश्च चित्रकुम्भैश्च साङ्करैः॥ २१॥
अङ्कराढ्यैः शरावैश्च धूपपात्रैः सधूपकैः।
शङ्खपात्रैः सुवैः स्रग्भिः पात्रैरादिपूजितैः॥२२॥
लाजपूर्णैश्च पात्रीभिरक्षतैरपि संस्कृतैः।
दर्भै: समैः समास्तीर्य विधिवन्मन्त्रपूर्वकम्॥ २३॥
अग्निमाधाय तं वेद्यां विधिमन्त्रपुरस्कृतम्।
जुहावाग्नौ महातेजा वसिष्ठो मुनिपुंगवः॥२४॥
तब जनकजी से ‘बहुत अच्छा’ कहकर महातपस्वी भगवान् वसिष्ठ मुनि ने विश्वामित्र और धर्मात्मा शतानन्दजी को आगे करके विवाह-मण्डप के मध्यभाग में विधिपूर्वक वेदी बनायी और गन्ध तथा फूलों के द्वारा उसे चारों ओर से सुन्दर रूप में सजाया। साथ ही बहुत-सी सुवर्ण-पालिकाएँ, यवके अंकुरों से युक्त चित्रितकलश, अंकुर जमाये हुए सकोरे, धूपयुक्त धूपपात्र, शङ्खपात्र, सुवा, मुक्, अर्घ्य आदि पूजनपात्र, लावा (खीलों) से भरे हुए पात्र तथा धोये हुए अक्षत आदि समस्त सामग्रियों को भी यथास्थान रख दिया। तत्पश्चात् महातेजस्वी मुनिवर वसिष्ठजी ने बराबर-बराबर कुशों को वेदी के चारों ओर बिछाकर मन्त्रोच्चारण करते हुए विधिपूर्वक अग्नि-स्थापन किया और विधि को प्रधानता देते हुए मन्त्रपाठपूर्वक प्रज्वलित अग्नि में हवन किया। १९–२४ ॥
ततः सीतां समानीय सर्वाभरणभूषिताम्।
समक्षमग्नेः संस्थाप्य राघवाभिमुखे तदा ॥२५॥
अब्रवीज्जनको राजा कौसल्यानन्दवर्धनम्।
इयं सीता मम सुता सहधर्मचरी तव॥२६॥
प्रतीच्छ चैनां भद्रं ते पाणिं गृह्णीष्व पाणिना।
पतिव्रता महाभागा छायेवानुगता सदा॥२७॥
तदनन्तर राजा जनक ने सब प्रकार के आभूषणों से विभूषित सीता को ले आकर अग्नि के समक्ष श्रीरामचन्द्रजी के सामने बिठा दिया और माता कौसल्या का आनन्द बढ़ाने वाले उन श्रीराम से कहा —’रघुनन्दन! तुम्हारा कल्याण हो। यह मेरी पुत्री सीता तुम्हारी सहधर्मिणी के रूप में उपस्थित है; इसे स्वीकार करो और इसका हाथ अपने हाथ में लो। यह परम पतिव्रता, महान् सौभाग्यवती और छाया की भाँति सदा तुम्हारे पीछे चलनेवाली होगी’। २५– २७॥
इत्युक्त्वा प्राक्षिपद् राजा मन्त्रपूतं जलं तदा।
साधुसाध्विति देवानामृषीणां वदतां तदा ॥२८॥
यह कहकर राजा ने श्रीराम के हाथ में मन्त्र से पवित्र हुआ संकल्प का जल छोड़ दिया। उस समय देवताओं और ऋषियों के मुख से जनक के लिये साधुवाद सुनायी देने लगा॥ २८॥
देवदुन्दुभिनिर्घोषः पुष्पवर्षो महानभूत्।
एवं दत्त्वा सुतां सीतां मन्त्रोदकपुरस्कृताम्॥ २९॥
अब्रवीज्जनको राजा हर्षेणाभिपरिप्लुतः।
लक्ष्मणागच्छ भद्रं ते ऊर्मिलामुद्यतां मया॥३०॥
प्रतीच्छ पाणिं गृह्णीष्व मा भूत् कालस्य पर्ययः।
देवताओं के नगाड़े बजने लगे और आकाश से फूलों की बड़ी भारी वर्षा हुई। इस प्रकार मन्त्र और संकल्प के जल के साथ अपनी पुत्री सीता का दान करके हर्षमग्न हुए राजा जनक ने लक्ष्मण से कहा —’लक्ष्मण! तुम्हारा कल्याण हो, आओ, मैं ऊर्मिला को तुम्हारी सेवा में दे रहा हूँ। इसे स्वीकार करो इसका हाथ अपने हाथ में लो इसमें विलम्ब नहीं होना चाहिये’ ॥ २९-३० १/२॥
तमेवमुक्त्वा जनको भरतं चाभ्यभाषत ॥३१॥
गृहाण पाणिं माण्डव्याः पाणिना रघुनन्दन।
लक्ष्मण से ऐसा कहकर जनक ने भरत से कहा”रघुनन्दन! माण्डवी का हाथ अपने हाथ में लो’ ॥ ३१ १/२॥
शत्रुघ्नं चापि धर्मात्मा अब्रवीन्मिथिलेश्वरः॥ ३२॥
श्रुतकीर्तेर्महाबाहो पाणिं गृह्णीष्व पाणिना।
सर्वे भवन्तः सौम्याश्च सर्वे सुचरितव्रताः॥३३॥
पत्नीभिः सन्तु काकुत्स्था मा भूत् कालस्य पर्ययः।
फिर धर्मात्मा मिथिलेश ने शत्रुघ्न को सम्बोधित करके कहा—’महाबाहो! तुम अपने हाथ से श्रुतकीर्ति का पाणिग्रहण करो। तुम चारों भाई शान्तस्वभाव हो, तुम सबने उत्तम व्रत का भलीभाँति आचरण किया है। ककुत्स्थकुल के भूषणरूप तुम चारों भाई पत्नी से संयुक्त हो जाओ, इस कार्य में विलम्ब नहीं होना चाहिये’ ॥ ३२-३३ १/२॥
जनकस्य वचः श्रुत्वा पाणीन् पाणिभिरस्पृशन्॥ ३४॥
चत्वारस्ते चतसृणां वसिष्ठस्य मते स्थिताः।
अग्निं प्रदक्षिणं कृत्वा वेदिं राजानमेव च ॥ ३५॥
ऋषींश्चापि महात्मानः सहभार्या रघूद्रहाः।
यथोक्तेन ततश्चक्रुर्विवाहं विधिपूर्वकम्॥३६॥
” राजा जनक का यह वचन सुनकर उन चारों राजकुमारों ने चारों राजकुमारियों के हाथ अपने हाथ में लिये। फिर वसिष्ठजी की सम्मति से उन रघुकुलरत्न महामनस्वी राजकुमारों ने अपनी-अपनी पत्नी के साथ अग्नि, वेदी, राजा दशरथ तथा ऋषि-मुनियों की परिक्रमा की और वेदोक्त विधि के अनुसार वैवाहिक कार्य पूर्ण किया॥३४-३६॥
पुष्पवृष्टिर्महत्यासीदन्तरिक्षात् सुभास्वरा।
दिव्यदुन्दुभिनिर्घोषैर्गीतवादित्रनिःस्वनैः॥ ३७॥
ननृतुश्चाप्सरःसङ्घा गन्धर्वाश्च जगुः कलम्।
विवाहे रघुमुख्यानां तदद्भुतमदृश्यत॥३८॥
उस समय आकाश से फूलों की बड़ी भारी वर्षा हुई, जो सुहावनी लगती थी, दिव्य दुन्दुभियों की गम्भीर ध्वनि, दिव्य गीतों के मनोहर शब्द और दिव्य वाद्यों के मधुर घोष के साथ झुंड-की-झुंड अप्सराएँ नृत्य करने लगीं और गन्धर्व मधुर गीत गाने लगे। उन रघुवंशशिरोमणि राजकुमारों के विवाह में वह अद्भुत दृश्य दिखायी दिया॥ ३७-३८॥
ईदृशे वर्तमाने तु तूर्योद्युष्टनिनादिते।
त्रिरग्निं ते परिक्रम्य ऊहुर्भार्या महौजसः॥३९॥
शहनाई आदि बाजों के मधुर घोष से गूंजते हुए उस वर्तमान विवाहोत्सव में उन महातेजस्वी राजकुमारों ने अग्नि की तीन बार परिक्रमा करके पत्नियों को स्वीकार करते हुए विवाह कर्म सम्पन्न किया॥ ३९ ॥
अथोपकार्यं जग्मुस्ते सभार्या रघुनन्दनाः।
राजाप्यनुययौ पश्यन् सर्षिसङ्गः सबान्धवः॥ ४०॥
तदनन्तर रघुकुल को आनन्द प्रदान करने वाले वे चारों भाई अपनी पत्नियों के साथ जनवासे में चले गये। राजा दशरथ भी ऋषियों और बन्धु-बान्धवों के साथ पुत्रों और पुत्र-वधुओं को देखते हुए उनके पीछे पीछे गये॥ ४०॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे त्रिसप्ततितमः सर्गः॥७३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में तिहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ।७३॥
सर्ग-74
अथ रात्र्यां व्यतीतायां विश्वामित्रो महामुनिः।
आपृष्ट्वा तौ च राजानौ जगामोत्तरपर्वतम्॥१॥
तदनन्तर जब रात बीती और सबेरा हुआ, तब महामुनि विश्वामित्र राजा जनक और महाराज दशरथ दोनों राजाओं से पूछकर उनकी स्वीकृति ले उत्तरपर्वतपर (हिमालय की शाखाभूत पर्वतपर, जहाँ कौशिकी के तटपर उनका आश्रम था, वहाँ) चले गये॥१॥
विश्वामित्रे गते राजा वैदेहं मिथिलाधिपम्।
आपृष्ट्वैव जगामाशु राजा दशरथः पुरीम्॥२॥
विश्वामित्रजी के चले जाने पर महाराज दशरथ भी विदेहराज मिथिला नरेश से अनुमति लेकर ही शीघ्र अपनी पुरी अयोध्या को जाने के लिये तैयार हो गये। २॥
अथ राजा विदेहानां ददौ कन्याधनं बहु।
गवां शतसहस्राणि बहूनि मिथिलेश्वरः॥३॥
कम्बलानां च मुख्यानां क्षौमान् कोट्यम्बराणि च।
हस्त्यश्वरथपादातं दिव्यरूपं स्वलंकृतम्॥४॥
उस समय विदेहराज जनक ने अपनी कन्याओं के निमित्त दहेज में बहुत अधिक धन दिया। उन मिथिला-नरेश ने कई लाख गौएँ, कितनी ही अच्छी अच्छी कालीने तथा करोड़ों की संख्या में रेशमी और सूती वस्त्र दिये, भाँति-भाँति के गहनों से सजे हुए बहुत-से दिव्य हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिक भेंट किये॥३-४॥
ददौ कन्याशतं तासां दासीदासमनुत्तमम्।
हिरण्यस्य सुवर्णस्य मुक्तानां विद्रुमस्य च॥५॥
अपनी पुत्रियों के लिये सहेली के रूप में उन्होंने सौ सौ कन्याएँ तथा उत्तम दास-दासियाँ अर्पित की। इन सबके अतिरिक्त राजा ने उन सबके लिये एक करोड़ स्वर्णमुद्रा, रजतमुद्रा, मोती तथा मूंगे भी दिये॥५॥
ददौ राजा सुसंहृष्टः कन्याधनमनुत्तमम्।
दत्त्वा बहुविधं राजा समनुज्ञाप्य पार्थिवम्॥६॥
प्रविवेश स्वनिलयं मिथिलां मिथिलेश्वरः।
राजाप्ययोध्याधिपतिः सह पुत्रैर्महात्मभिः॥७॥
ऋषीन् सर्वान् पुरस्कृत्य जगाम सबलानुगः।
इस प्रकार मिथिलापति राजा जनक ने बड़े हर्ष के साथ उत्तमोत्तम कन्याधन (दहेज) दिया। नाना प्रकार की वस्तुएँ दहेज में देकर महाराज दशरथ की आज्ञा ले वे पुनः मिथिलानगर के भीतर अपने महल में लौट आये। उधर अयोध्यानरेश राजा दशरथ भी सम्पूर्ण महर्षियों को आगे करके अपने महात्मा पुत्रों, सैनिकों तथा सेवकों के साथ अपनी राजधानी की ओर प्रस्थित हुए॥६-७ १/२॥
गच्छन्तं तु नरव्याघ्रं सर्षिसङ्गं सराघवम्॥८॥
घोरास्त पक्षिणो वाचो व्याहरन्ति समन्ततः।
भौमाश्चैव मृगाः सर्वे गच्छन्ति स्म प्रदक्षिणम्॥
उस समय ऋषि-समूह तथा श्रीरामचन्द्रजी के साथ यात्रा करते हुए पुरुषसिंह महाराज दशरथके चारों ओर भयंकर बोली बोलने वाले पक्षी चहचहाने लगे और भूमिपर विचरने वाले समस्त मृग उन्हें दाहिने रखकर जाने लगे॥ ८-९॥
तान् दृष्ट्वा राजशार्दूलो वसिष्ठं पर्यपृच्छत।
असौम्याः पक्षिणो घोरा मृगाश्चापि प्रदक्षिणाः॥ १०॥
किमिदं हृदयोत्कम्पि मनो मम विषीदति।
उन सबको देखकर राजसिंह दशरथने वसिष्ठजी से पूछा-‘मुनिवर ! एक ओर तो ये भयंकर पक्षी घोर शब्द कर रहे हैं और दूसरी ओर ये मृग हमें दाहिनी ओर करके जा रहे हैं; यह अशुभ और शुभ दो प्रकार का शकुन कैसा? यह मेरे हृदय को कम्पित किये देता है मेरा मन विषाद में डूबा जाता है’ ॥ १० १/२॥
राज्ञो दशरथस्यैतच्छ्रुत्वा वाक्यं महानृषिः॥११॥
उवाच मधुरां वाणीं श्रूयतामस्य यत् फलम्।
उपस्थितं भयं घोरं दिव्यं पक्षिमुखाच्च्युतम्॥ १२॥
मृगाः प्रशमयन्त्येते संतापस्त्यज्यतामयम्।
राजा दशरथ का यह वचन सुनकर महर्षि वसिष्ठ ने । मधुर वाणी में कहा—’राजन्! इस शकुन का जो फल है, उसे सुनिये-आकाश में पक्षियों के मुख से जो बात निकल रही है, वह बताती है कि इस समय कोई घोर भय उपस्थित होने वाला है, परंतु हमें दाहिने रखकर जाने वाले ये मृग उस भय के शान्त हो जाने की सूचना दे रहे हैं; इसलिये आप यह चिन्ता छोड़िये’ ॥ ११-१२ १/२॥
तेषां संवदतां तत्र वायुः प्रादुर्बभूव ह॥१३॥
कम्पयन् मेदिनी सर्वां पातयंश्च महाद्रुमान्।
तमसा संवृतः सूर्यः सर्वे नावेदिषुर्दिशः॥१४॥
भस्मना चावृतं सर्वं सम्मूढमिव तबलम्।
इन लोगों में इस प्रकार बातें हो ही रही थीं कि वहाँ बड़े जोरों की आँधी उठी, वह सारी पृथ्वी को कँपाती हुई बड़े-बड़े वृक्षों को धराशायी करने लगी,सूर्य अन्धकार से आच्छन्न हो गये। किसी को दिशाओं का भान न रहा धूल से ढक जाने के कारण वह सारी सेना मूर्च्छित-सी हो गयी॥ १३-१४ १/२ ॥
वसिष्ठ ऋषयश्चान्ये राजा च ससुतस्तदा ॥ १५॥
ससंज्ञा इव तत्रासन् सर्वमन्यद्विचेतनम्।
तस्मिंस्तमसि घोरे तु भस्मच्छन्नेव सा चमूः॥ १६॥
उस समय केवल वसिष्ठ मुनि, अन्यान्य ऋषियों तथा पुत्रों सहित राजा दशरथ को ही चेत रह गया था, शेष सभी लोग अचेत हो गये थे। उस घोर अन्धकार में राजा की वह सेना धूल से आच्छादित-सी हो गयी थी॥ १५-१६॥
ददर्श भीमसंकाशं जटामण्डलधारिणम्।
भार्गवं जामदग्नयेयं राजा राजविमर्दनम्॥१७॥
कैलासमिव दुर्धर्षं कालाग्निमिव दुःसहम्।
ज्वलन्तमिव तेजोभिर्दुर्निरीक्ष्यं पृथग्जनैः॥ १८॥
स्कन्धे चासज्ज्य परशुं धनुर्विद्युद्गणोपमम्।
प्रगृह्य शरमुग्रं च त्रिपुरनं यथा शिवम्॥१९॥
उस समय राजा दशरथ ने देखा क्षत्रिय राजाओं का मान-मर्दन करने वाले भृगुकुलनन्दन जमदग्नि कुमार परशुराम सामने से आ रहे हैं। वे बडे भयानक-से दिखायी देते थे। उन्होंने मस्तक पर बड़ी बड़ी जटाएँ धारण कर रखी थीं। वे कैलास के समान दुर्जय और कालाग्नि के समान दुःसह प्रतीत होते थे। तेजोमण्डल द्वारा जाज्वल्यमान-से हो रहे थे। साधारण लोगों के लिये उनकी ओर देखना भी कठिन था। वे कंधे पर फरसा रखे और हाथ में विद्युद्गणों के समान दीप्तिमान् धनुष एवं भयंकर बाण लिये त्रिपुरविनाशक भगवान् शिव के समान जान पड़ते थे॥ १७–१९॥
तं दृष्ट्वा भीमसंकाशं ज्वलन्तमिव पावकम्।
वसिष्ठप्रमुखा विप्रा जपहोमपरायणाः॥२०॥
संगता मुनयः सर्वे संजजल्पुरथो मिथः।
प्रज्वलित अग्नि के समान भयानक-से प्रतीत होने वाले परशुराम को उपस्थित देख जप और होम में तत्पर रहने वाले वसिष्ठ आदि सभी ब्रह्मर्षि एकत्र हो परस्पर इस प्रकार बातें करने लगे— ॥ २० १/२॥
कच्चित् पितृवधामर्षी क्षत्रं नोत्सादयिष्यति॥ २१॥
पूर्वं क्षत्रवधं कृत्वा गतमन्युर्गतज्वरः।
क्षत्रस्योत्सादनं भूयो न खल्वस्य चिकीर्षितम्॥ २२॥
‘क्या अपने पिता के वध से अमर्ष के वशीभूत हो ये क्षत्रियों का संहार नहीं कर डालेंगे? पूर्वकाल में क्षत्रियों का वध करके इन्होंने अपना क्रोध उतार लिया है, अब इनकी बदला लेने की चिन्ता दूर हो चुकी है। अतः फिर क्षत्रियों का संहार करना इनके लिये अभीष्ट नहीं है, यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है’। २१-२२॥
एवमुक्त्वाय॑मादाय भार्गवं भीमदर्शनम्।
ऋषयो राम रामेति मधुरं वाक्यमब्रुवन्॥२३॥
ऐसा कहकर ऋषियों ने भयंकर दिखायी देने वाले भृगुनन्दन परशुराम को अर्घ्य लेकर दिया और ‘राम! राम!’ कहकर उनसे मधुर वाणी में बातचीत की। २३॥
प्रतिगृह्य तु तां पूजामृषिदत्तां प्रतापवान्।
रामं दाशरथिं रामो जामदग्नयोऽभ्यभाषत। २४॥
ऋषियों की दी हुई उस पूजा को स्वीकार करके प्रतापी जमदग्निपुत्र परशुरामने दशरथनन्दन श्रीराम से इस प्रकार कहा॥२४॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे चतुःसप्ततितमः सर्गः॥ ७४॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में चौहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ।७४॥
सर्ग-75
राम दाशरथे वीर वीर्यं ते श्रूयतेऽद्भुतम्।
धनुषो भेदनं चैव निखिलेन मया श्रुतम्॥१॥
‘दशरथनन्दन श्रीराम! वीर! सुना जाता है कि तुम्हारा पराक्रम अद्भुत है। तुम्हारे द्वारा शिव-धनुष के तोड़े जाने का सारा समाचार भी मेरे कानों में पड़ चुका है।
तदद्भुतमचिन्त्यं च भेदनं धनुषस्तथा।
तच्छ्रत्वाहमनुप्राप्तो धनुर्गृह्यापरं शुभम्॥२॥
‘उस धनुष का तोड़ना अद्भुत और अचिन्त्य है; उसके टूटने की बात सुनकर मैं एक दूसरा उत्तम धनुष लेकर आया हूँ॥२॥
तदिदं घोरसंकाशं जामदग्न्यं महद्धनुः।
पूरयस्व शरेणैव स्वबलं दर्शयस्व च॥३॥
‘यह है वह जमदग्निकुमार परशुराम का भयंकर और विशाल धनुष, तुम इसे खींचकर इसके ऊपर बाण चढ़ाओ और अपना बल दिखाओ॥३॥
तदहं ते बलं दृष्ट्वा धनुषोऽप्यस्य पूरणे।
द्वन्द्वयुद्धं प्रदास्यामि वीर्यश्लाघ्यमहं तव॥४॥
‘इस धनुष के चढ़ाने में भी तुम्हारा बल कैसा है ? यह देखकर मैं तुम्हें ऐसा द्वन्द्वयुद्ध प्रदान करूँगा, जो तुम्हारे पराक्रम के लिये स्पृहणीय होगा’ ॥ ४॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राजा दशरथस्तदा।
विषण्णवदनो दीनः प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत्॥
परशुरामजी का वह वचन सुनकर उस समय राजा दशरथ के मुखपर विषाद छा गया, वे दीनभाव से हाथ जोड़कर बोले- ॥५॥
क्षत्ररोषात् प्रशान्तस्त्वं ब्राह्मणश्च महातपाः।
बालानां मम पुत्राणामभयं दातुमर्हसि॥६॥
भार्गवाणां कुले जातः स्वाध्यायव्रतशालिनाम्।
सहस्राक्षे प्रतिज्ञाय शस्त्रं प्रक्षिप्तवानसि॥७॥
‘ब्रह्मन् ! आप स्वाध्याय और व्रत से शोभा पाने वाले भृगुवंशी ब्राह्मणों के कुल में उत्पन्न हुए हैं और स्वयं भी महान् तपस्वी और ब्रह्मज्ञानी हैं; क्षत्रियों पर अपना रोष प्रकट करके अब शान्त हो चुके हैं; इसलिये मेरे बालक पुत्रों को आप अभयदान देने की कृपा करें; क्योंकि आपने इन्द्र के समीप प्रतिज्ञा करके शस्त्र का परित्याग कर दिया है।
स त्वं धर्मपरो भूत्वा कश्यपाय वसुंधराम्।
दत्त्वा वनमुपागम्य महेन्द्रकृतकेतनः॥८॥
‘इस तरह आप धर्म में तत्पर हो कश्यपजी को पृथ्वी का दान करके वन में आकर महेन्द्र पर्वत पर आश्रम बनाकर रहते हैं॥८॥
मम सर्वविनाशाय सम्प्राप्तस्त्वं महामुने।
न चैकस्मिन् हते रामे सर्वे जीवामहे वयम्॥९॥
‘महामुने! (इस प्रकार शस्त्रत्यागकी प्रतिज्ञा करके भी) आप मेरा सर्वनाश करने के लिये कैसे आ गये? (यदि कहें—मेरा रोष तो केवल रामपर है तो) एकमात्र राम के मारे जाने पर ही हम सब लोग अपने जीवन का परित्याग कर देंगे’ ॥९॥
ब्रुवत्येवं दशरथे जामदग्न्यः प्रतापवान्।
अनादृत्य तु तद्वाक्यं राममेवाभ्यभाषत॥१०॥
राजा दशरथ इस प्रकार कहते ही रह गये; परंतु प्रतापी परशुराम ने उनके उन वचनों की अवहेलना करके राम से ही बातचीत जारी रखी॥ १० ॥
इमे द्वे धनुषी श्रेष्ठे दिव्ये लोकाभिपूजिते।
दृढे बलवती मुख्ये सुकृते विश्वकर्मणा ॥११॥
वे बोले—’रघुनन्दन! ये दो धनुष सबसे श्रेष्ठ और दिव्य थे। सारा संसार इन्हें सम्मान की दृष्टिसे देखता था। साक्षात् विश्वकर्मा ने इन्हें बनाया था, ये बड़े प्रबल और दृढ़ थे॥ ११॥
अनुसृष्टं सुरैरेकं त्र्यम्बकाय युयुत्सवे।
त्रिपुरगं नरश्रेष्ठ भग्नं काकुत्स्थ यत्त्वया॥१२॥
‘नरश्रेष्ठ! इनमें से एक को देवताओं ने त्रिपुरासुर से युद्ध करने के लिये भगवान् शङ्कर को दे दिया था। ककुत्स्थनन्दन ! जिससे त्रिपुर का नाश हुआ था, वह वही धनुष था; जिसे तुमने तोड़ डाला है॥ १२॥
इदं द्वितीयं दुर्धर्षं विष्णोर्दत्तं सुरोत्तमैः ।
तदिदं वैष्णवं राम धनुः परपुरंजयम्॥१३॥
‘और दूसरा दुर्धर्ष धनुष यह है, जो मेरे हाथमें है। इसे श्रेष्ठ देवताओं ने भगवान् विष्णु को दिया था। श्रीराम! शत्रुनगरी पर विजय पाने वाला वही यह वैष्णव धनुष है॥१३॥
समानसारं काकुत्स्थ रौद्रेण धनुषा त्विदम्।
तदा तु देवताः सर्वाः पृच्छन्ति स्म पितामहम्॥ १४॥
शितिकण्ठस्य विष्णोश्च बलाबलनिरीक्षया।
‘ककुत्स्थनन्दन! यह भी शिवजी के धनुष के समान ही प्रबल है। उन दिनों समस्त देवताओं ने भगवान् शिव और विष्णु के बलाबल की परीक्षा के लिये पितामह ब्रह्माजी से पूछा था कि ‘इन दोनों देवताओं में कौन अधिक बलशाली है’ ॥ १४ १/२॥
अभिप्रायं तु विज्ञाय देवतानां पितामहः॥१५॥
विरोधं जनयामास तयोः सत्यवतां वरः।।
‘देवताओं के इस अभिप्राय को जानकर सत्यवादियों में श्रेष्ठ पितामह ब्रह्माजी ने उन दोनों देवताओं (शिव और विष्णु) में विरोध उत्पन्न कर दिया॥ १५ १/२॥
विरोधे तु महद् युद्धमभवद् रोमहर्षणम्॥१६॥
शितिकण्ठस्य विष्णोश्च परस्परजयैषिणोः।
‘विरोध पैदा होने पर एक-दूसरे को जीतने की इच्छावाले शिव और विष्णु में बड़ा भारी युद्ध हुआ,जो रोंगटे खड़े कर देनेवाला था॥ १६ १/२॥
तदा तु जृम्भितं शैवं धनुर्भीमपराक्रमम्॥१७॥
हुंकारेण महादेवः स्तम्भितोऽथ त्रिलोचनः।
‘उस समय भगवान् विष्णुने हुङ्कार मात्र से शिवजीके भयंकर बलशाली धनुष को शिथिल तथा त्रिनेत्रधारी महादेवजी को भी स्तम्भित कर दिया। १७ १/२ ॥
देवैस्तदा समागम्य सर्षिसङ्गः सचारणैः॥१८॥
याचितौ प्रशमं तत्र जग्मतुस्तौ सुरोत्तमौ।
‘तब ऋषिसमूहों तथा चारणों सहित देवताओं ने आकर उन दोनों श्रेष्ठ देवताओं से शान्ति के लिये याचना की; फिर वे दोनों वहाँ शान्त हो गये॥ १८ १/२॥
जृम्भितं तद् धनुर्दृष्ट्वा शैवं विष्णुपराक्रमैः॥ १९॥
अधिकं मेनिरे विष्णुं देवाः सर्षिगणास्तथा।
‘भगवान् विष्णु के पराक्रम से शिवजी के उस धनुष को शिथिल हुआ देख ऋषियों सहित देवताओं ने भगवान् विष्णु को श्रेष्ठ माना॥ १९ १/२ ।।
धनू रुद्रस्तु संक्रुद्धो विदेहेषु महायशाः॥२०॥
देवरातस्य राजर्षेर्ददौ हस्ते ससायकम्।
‘तदनन्तर कुपित हुए महायशस्वी रुद्र ने बाण सहित अपना धनुष विदेह देश के राजर्षि देवरात के हाथ में दे दिया॥ २० १/२॥
इदं च वैष्णवं राम धनुः परपुरंजयम्॥ २१॥
ऋचीके भार्गवे प्रादाद् विष्णुः स न्यासमुत्तमम्।
‘श्रीराम! शत्रुनगरी पर विजय पाने वाले इस वैष्णव धनुष को भगवान् विष्णु ने भृगुवंशी ऋचीक मुनि को उत्तम धरोहर के रूप में दिया था॥ २१ १/२ ॥
ऋचीकस्तु महातेजाः पुत्रस्याप्रतिकर्मणः॥२२॥
पितर्मम ददौ दिव्यं जमदग्नेर्महात्मनः।
‘फिर महातेजस्वी ऋचीक ने प्रतीकार (प्रतिशोध)की भावना से रहित अपने पुत्र एवं मेरे पिता महात्मा जमदग्नि के अधिकार में यह दिव्य धनुष दे दिया॥ २२ १/२॥
न्यस्तशस्त्रे पितरि मे तपोबलसमन्विते॥२३॥
अर्जुनो विदधे मृत्युं प्राकृतां बुद्धिमास्थितः।
‘तपोबल से सम्पन्न मेरे पिता जमदग्नि अस्त्र शस्त्रों का परित्याग करके जब ध्यानस्थ होकर बैठे थे, उस समय प्राकृत बुद्धि का आश्रय लेने वाले कृतवीर्यकुमार अर्जुन ने उनको मार डाला॥ २३ १/२॥
वधमप्रतिरूपं तु पितुः श्रुत्वा सुदारुणम्।।
क्षत्रमुत्सादयं रोषाज्जातं जातमनेकशः॥२४॥
‘पिता के इस अत्यन्त भयंकर वधका, जो उनके योग्य नहीं था, समाचार सुनकर मैंने रोषपूर्वक बारंबार उत्पन्न हुए क्षत्रियों का अनेक बार संहार किया ॥२४॥
पृथिवीं चाखिलां प्राप्य कश्यपाय महात्मने।
यज्ञस्यान्तेऽददं राम दक्षिणां पुण्यकर्मणे॥२५॥
‘श्रीराम ! फिर सारी पृथ्वीपर अधिकार करके मैंने एक यज्ञ किया और उस यज्ञके समाप्त होने पर पुण्यकर्मा महात्मा कश्यप को दक्षिणा रूप से यह सारी पृथ्वी दे डाली॥ २५॥
दत्त्वा महेन्द्रनिलयस्तपोबलसमन्वितः।
श्रुत्वा तु धनुषो भेदं ततोऽहं द्रुतमागतः ॥ २६॥
‘पृथ्वी का दान करके मैं महेन्द्र पर्वत पर रहने लगा और वहाँ तपस्या करके तपोबल से सम्पन्न हुआ। वहाँ से शिवजी के धनुष के तोड़े जाने का समाचार सुनकर मैं शीघ्रतापूर्वक यहाँ आया हूँ॥ २६ ॥
तदेवं वैष्णवं राम पितृपैतामहं महत्।
क्षत्रधर्मं पुरस्कृत्य गृह्णीष्व धनुरुत्तमम्॥ २७॥
योजयस्व धनुःश्रेष्ठे शरं परपुरंजयम्।
यदि शक्तोऽसि काकुत्स्थ द्वन्द्वं दास्यामि ते ततः॥ २८॥
‘श्रीराम! इस प्रकार यह महान् वैष्णव धनुष मेरे पिता-पितामहों के अधिकार में रहता चला आया है; अब तुम क्षत्रिय धर्म को सामने रखकर यह उत्तम धनुष हाथ में लो और इस श्रेष्ठ धनुष पर एक ऐसा बाण चढ़ाओ, जो शत्रु नगरी पर विजय पाने में समर्थ हो; यदि तुम ऐसा कर सके तो मैं तुम्हें द्वन्द्व-युद्ध का अवसर दूंगा॥ २७-२८॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे पञ्चसप्ततितमः सर्गः ॥ ७५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में पचहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ।७५॥
सर्ग-76
श्रुत्वा तु जामदग्न्यस्य वाक्यं दाशरथिस्तदा।
गौरवाद्यन्त्रितकथः पितू राममथाब्रवीत्॥१॥
दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्र जी अपने पिता के गौरव का ध्यान रखकर संकोचवश वहाँ कुछ बोल नहीं रहे थे, परंतु जमदग्निकुमार परशुरामजी की उपर्युक्त बात सुनकर उस समय वे मौन न रह सके। उन्होंने परशुरामजी से कहा
कृतवानसि यत् कर्म श्रुतवानस्मि भार्गव।
अनुरुध्यामहे ब्रह्मन् पितुरानृण्यमास्थितः॥२॥
‘भृगुनन्दन! ब्रह्मन्! आपने पिता के ऋण से ऊऋण होने की—पिता के मारने वाले का वध करके वैर का बदला चुकाने की भावना लेकर जो क्षत्रिय-संहाररूपी कर्म किया है, उसे मैंने सुना है और हमलोग आपके उस कर्म का अनुमोदन भी करते हैं (क्योंकि वीर पुरुष वैर का प्रतिशोध लेते ही हैं) ॥२॥
वीर्यहीनमिवाशक्तं क्षत्रधर्मेण भार्गव।
अवजानासि मे तेजः पश्य मेऽद्य पराक्रमम्॥३॥
‘भार्गव! मैं क्षत्रियधर्म से युक्त हूँ (इसीलिये आप ब्राह्मण-देवता के समक्ष विनीत रहकर कुछ बोल नहीं रहा हूँ) तो भी आप मुझे पराक्रमहीन और असमर्थसा मानकर मेरा तिरस्कार कर रहे हैं। अच्छा, अब मेरा तेज और पराक्रम देखिये’॥३॥
इत्युक्त्वा राघवः क्रुद्धो भार्गवस्य वरायुधम्।
शरं च प्रतिजग्राह हस्ताल्लघुपराक्रमः॥४॥
ऐसा कहकर शीघ्र पराक्रम करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीने कुपित हो परशुरामजीके हाथसे वह उत्तम धनुष और बाण ले लिया (साथ ही उनसे अपनी वैष्णवी शक्तिको भी वापस ले लिया) ॥ ४॥
आरोप्य स धनू रामः शरं सज्यं चकार ह।
जामदग्न्यं ततो रामं रामः क्रुद्धोऽब्रवीदिदम्॥
उस धनुषको चढ़ाकर श्रीरामने उसकी प्रत्यञ्चापर बाण रखा, फिर कुपित होकर उन्होंने जमदग्निकुमारपरशुरामजी से इस प्रकार कहा- ॥५॥
ब्राह्मणोऽसीति पूज्यो मे विश्वामित्रकृतेन च।
तस्माच्छक्तो न ते राम मोक्तुं प्राणहरं शरम्॥६॥
‘(भृगुनन्दन) राम! आप ब्राह्मण होने के नाते मेरे पूज्य हैं तथा विश्वामित्रजी के साथ भी आपका सम्बन्ध है—इन सब कारणों से मैं इस प्राण-संहारक बाण को आपके शरीर पर नहीं छोड़ सकता॥६॥
इमां वा त्वद्गतिं राम तपोबलसमर्जितान्।
लोकानप्रतिमान् वापि हनिष्यामीति मे मतिः॥ ७॥
न ह्ययं वैष्णवो दिव्यः शरः परपुरंजयः।
मोघः पतति वीर्येण बलदर्पविनाशनः॥८॥
‘राम! मेरा विचार है कि आपको जो सर्वत्र शीघ्रतापूर्वक आने-जाने की शक्ति प्राप्त हुई है उसे अथवा आपने अपने तपोबल से जिन अनुपम पुण्यलोकों को प्राप्त किया है उन्हीं को नष्ट कर डालूँ; क्योंकि अपने पराक्रम से विपक्षी के बलके घमंड को चूर कर देनेवाला यह दिव्य वैष्णव बाण, जो शत्रुओं की नगरी पर विजय दिलाने वाला है, कभी निष्फल नहीं जाता है’ ।। ७-८॥
वरायुधधरं रामं द्रष्टुं सर्षिगणाः सुराः।
पितामहं पुरस्कृत्य समेतास्तत्र सर्वशः॥९॥
उस समय उस उत्तम धनुष और बाण को धारण करके खड़े हुए श्रीरामचन्द्रजी को देखने के लिये सम्पूर्ण देवता और ऋषि ब्रह्माजी को आगे करके वहाँ एकत्र हो गये॥९॥
गन्धर्वाप्सरसश्चैव सिद्धचारणकिन्नराः।
यक्षराक्षसनागाश्च तद् द्रष्टुं महदद्भुतम्॥१०॥
गन्धर्व, अप्सराएँ, सिद्ध, चारण, किन्नर, यक्ष, राक्षस और नाग भी उस अत्यन्त अद्भुत दृश्य को देखने के लिये वहाँ आ पहुँचे॥ १० ॥
जडीकृते तदा लोके रामे वरधनुर्धरे।
निर्वीर्यो जामदग्न्योऽसौ रामो राममुदैक्षत॥११॥
जब श्रीरामचन्द्रजी ने वह श्रेष्ठ धनुष हाथ में ले लिया, उस समय सब लोग आश्चर्य से जडवत् हो गये। (परशुरामजी का वैष्णव तेज निकलकर श्रीरामचन्द्रजी में मिल गया इसलिये) वीर्यहीन हुए जमदग्निकुमार राम ने दशरथनन्दन श्रीराम की ओर देखा॥११॥
तेजोभिर्गतवीर्यत्वाज्जामदग्न्यो जडीकृतः।
रामं कमलपत्राक्षं मन्दं मन्दमुवाच ह॥१२॥
तेज निकल जाने से वीर्यहीन हो जाने के कारण जडवत् बने हुए जमदग्निकुमार परशुराम ने कमलनयन श्रीराम से धीरे-धीरे कहा- ॥ १२॥
काश्यपाय मया दत्ता यदा पूर्वं वसुंधरा।
विषये मे न वस्तव्यमिति मां काश्यपोऽब्रवीत्॥ १३॥
‘रघुनन्दन! पूर्वकाल में मैंने कश्यपजी को जब यह पृथिवी दान की थी, तब उन्होंने मुझसे कहा था कि ‘तुम्हें मेरे राज्य में नहीं रहना चाहिये’॥ १३॥
सोऽहं गुरुवचः कुर्वन् पृथिव्यां न वसे निशाम्।
तदाप्रभृति काकुत्स्थ कृता मे काश्यपस्य ह॥ १४॥
‘ककुत्स्थकुलनन्दन! तभी से अपने गुरु कश्यपजी की इस आज्ञा का पालन करता हुआ मैं कभी रात में पृथिवी पर नहीं निवास करता हूँ; क्योंकि यह बात सर्वविदित है कि मैंने कश्यप के सामने रात को पृथिवी पर न रहने की प्रतिज्ञा कर रखी है। १४॥
तामिमां मद्गतिं वीर हन्तुं नार्हसि राघव।
मनोजवं गमिष्यामि महेन्द्रं पर्वतोत्तमम्॥१५॥
‘इसलिये वीर राघव! आप मेरी इस गमनशक्ति को नष्ट न करें मैं मनके समान वेग से अभी महेन्द्र नाम क श्रेष्ठ पर्वत पर चला जाऊँगा॥ १५ ॥
लोकास्त्वप्रतिमा राम निर्जितास्तपसा मया।
जहि ताञ्छरमुख्येन मा भूत् कालस्य पर्ययः॥ १६॥
‘परंतु श्रीराम! मैंने अपनी तपस्या से जिन अनुपम लोकों पर विजय पायी है, उन्हीं को आप इस श्रेष्ठ बाण से नष्ट कर दें; अब इसमें विलम्ब नहीं होना चाहिये॥१६॥
अक्षय्यं मधुहन्तारं जानामि त्वां सुरेश्वरम्।
धनुषोऽस्य परामर्शात् स्वस्ति तेऽस्तु परंतप॥ १७॥
‘शत्रुओं को संताप देने वाले वीर! आपने जो इस धनुष को चढ़ा दिया, इससे मुझे निश्चितरूप से ज्ञात हो गया कि आप मधु दैत्य को मारने वाले अविनाशी देवेश्वर विष्णु हैं। आपका कल्याण हो॥१७॥
एते सुरगणाः सर्वे निरीक्षन्ते समागताः।
त्वामप्रतिमकर्माणमप्रतिद्वन्द्वमाहवे॥१८॥
‘ये सब देवता एकत्र होकर आपकी ओर देख रहे हैं। आपके कर्म अनुपम हैं; युद्धमें आपका सामना करने वाला दूसरा कोई नहीं है॥ १८॥
न चेयं मम काकुत्स्थ व्रीडा भवितुमर्हति।
त्वया त्रैलोक्यनाथेन यदहं विमुखीकृतः॥१९॥ ।
‘ककुत्स्थकुलभूषण! आपके सामने जो मेरी असमर्थता प्रकट हुई—यह मेरे लिये लज्जाजनक नहीं हो सकती; क्योंकि आप त्रिलोकीनाथ श्रीहरि ने मुझे पराजित किया है॥ १९॥
शरमप्रतिमं राम मोक्तुमर्हसि सुव्रत।
शरमोक्षे गमिष्यामि महेन्द्रं पर्वतोत्तमम्॥२०॥
‘उत्तम व्रत का पालन करने वाले श्रीराम ! अब आप अपना अनुपम बाण छोड़िये; इसके छूटने के बाद ही मैं श्रेष्ठ महेन्द्र पर्वत पर जाऊँगा’॥ २०॥
तथा ब्रुवति रामे तु जामदग्न्ये प्रतापवान्।
रामो दाशरथिः श्रीमांश्चिक्षेप शरमुत्तमम्॥२१॥
जमदग्निनन्दन परशुरामजी के ऐसा कहने पर प्रतापी दशरथनन्दन श्रीमान् रामचन्द्रजी ने वह उत्तम बाण छोड़ दिया॥ २१॥
स हतान् दृश्य रामेण स्वाँल्लोकांस्तपसार्जितान्।
जामदग्न्यो जगामाशु महेन्द्रं पर्वतोत्तमम्॥ २२॥
अपनी तपस्या द्वारा उपार्जित किये हुए पुण्यलोकों को श्रीरामचन्द्रजी के चलाये हुए उस बाण से नष्ट हुआ देखकर परशुरामजी शीघ्र ही उत्तम महेन्द्र पर्वत पर चले गये॥ २२ ॥
ततो वितिमिराः सर्वा दिशश्चोपदिशस्तथा।
सुराः सर्षिगणा रामं प्रशशंसुरुदायुधम्॥२३॥
उनके जाते ही समस्त दिशाओं तथा उपदिशाओं का अन्धकार दूर हो गया। उस समय ऋषियों सहित देवता उत्तम आयुधधारी श्रीराम की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे।
रामं दाशरथिं रामो जामदग्न्यः प्रपूजितः।
ततः प्रदक्षिणीकृत्य जगामात्मगतिं प्रभुः॥ २४॥
तदनन्तर दशरथनन्दन श्रीराम ने जमदग्निकुमार परशुराम का पूजन किया। उनसे पूजित हो प्रभावशाली परशुराम दशरथकुमार श्रीराम की परिक्रमा करके अपने स्थान को चले गये॥२४॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे षट्सप्ततितमः सर्गः॥ ७६॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में छिहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥७६॥
सर्ग-77
गते रामे प्रशान्तात्मा रामो दाशरथिर्धनुः ।
वरुणायाप्रमेयाय ददौ हस्ते महायशाः॥१॥
जमदग्निकुमार परशुरामजी के चले जाने पर महायशस्वी दशरथनन्दन श्रीराम ने शान्तचित्त होकर अपार शक्तिशाली वरुण के हाथ में वह धनुष दे दिया।१॥
अभिवाद्य ततो रामो वसिष्ठप्रमुखानुषीन्।
पितरं विकलं दृष्ट्वा प्रोवाच रघुनन्दनः॥२॥
तत्पश्चात् वसिष्ठ आदि ऋषियों को प्रणाम करके रघुनन्दन श्रीराम ने अपने पिता को विकल देखकर उनसे कहा- ॥२॥
जामदग्न्यो गतो रामः प्रयातु चतुरंगिणी।
अयोध्याभिमुखी सेना त्वया नाथेन पालिता॥
‘पिताजी! जमदग्निकुमार परशुराम जी चले गये।अब आपके अधिनायकत्व में सुरक्षित यह चतुरंगिणी सेना अयोध्या की ओर प्रस्थान करे’ ॥३॥
रामस्य वचनं श्रुत्वा राजा दशरथः सुतम्।
बाहुभ्यां सम्परिष्वज्य मूर्युपाघ्राय राघवम्॥ ४॥
गतो राम इति श्रुत्वा हृष्टः प्रमुदितो नृपः।
पुनर्जातं तदा मेने पुत्रमात्मानमेव च ॥५॥
श्रीराम का यह वचन सुनकर राजा दशरथ ने अपने पुत्र रघुनाथजी को दोनों भुजाओं से खींचकर छाती से लगा लिया और उनका मस्तक सूंघा। ‘परशुरामजी चले गये’ यह सुनकर राजा दशरथ को बड़ा हर्ष हुआ, वे आनन्दमग्न हो गये। उस समय उन्होंने अपना और अपने पुत्र का पुनर्जन्म हुआ माना॥४-५॥
चोदयामास तां सेनां जगामाशु ततः पुरीम्।
पताकाध्वजिनीं रम्यां तूर्योद्घष्टनिनादिताम्॥६॥
तदनन्तर उन्होंने सेना को नगर की ओर कूच करने की आज्ञा दी और वहाँ से चलकर बड़ी शीघ्रता के साथ वे अयोध्यापुरी में जा पहुँचे। उस समय उस पुरी में सब ओर ध्वजा-पताकाएँ फहरा
रही थीं। सजावट से नगर की रमणीयता बढ़ गयी थी और भाँति-भाँति के वाद्यों की ध्वनि से सारी अयोध्या गूंज उठी थी॥६॥
सिक्तराजपथारम्यां प्रकीर्णकुसुमोत्कराम्।
राजप्रवेशसुमुखैः पौरैर्मङ्गलपाणिभिः॥७॥
सम्पूर्णां प्राविशद् राजा जनौधैः समलंकृताम्।
पौरैः प्रत्युद्गतो दूरं द्विजैश्च पुरवासिभिः॥८॥
सड़कों पर जलका छिड़काव हुआ था, जिससे पुरी की सुरम्य शोभा बढ़ गयी थी। यत्र-तत्र ढेर-के ढेर फूल बिखेरे गये थे। पुरवासी मनुष्य हाथों में मांगलिक वस्तुएँ लेकर राजा के प्रवेश मार्ग पर प्रसन्नमुख होकर खड़े थे। इन सबसे भरी-पूरी तथा भारी जनसमुदाय से अलंकृत हुई अयोध्यापुरी में राजा ने प्रवेश किया। नागरिकों तथा पुरवासी ब्राह्मणों ने दूर तक आगे जाकर महाराज की अगवानी की थी॥ ७-८॥
पुत्रैरनुगतः श्रीमान् श्रीमद्भिश्च महायशाः।
प्रविवेश गृहं राजा हिमवत्सदृशं प्रियम्॥९॥
अपने कान्तिमान् पुत्रों के साथ महायशस्वी श्रीमान् राजा दशरथ ने अपने प्रिय राजभवन में, जो हिमालय के समान सुन्दर एवं गगनचुम्बी था, प्रवेश किया॥९॥
ननन्द स्वजनै राजा गृहे कामैः सुपूजितः।
कौसल्या च सुमित्रा च कैकेयी च सुमध्यमा॥ १०॥
वधप्रतिग्रहे युक्ता याश्चान्या राजयोषितः।
राजमहल में स्वजनों द्वारा मनोवाञ्छित वस्तुओं से परम पूजित हो राजा दशरथ ने बड़े आनन्द का अनुभव किया। महारानी कौसल्या, सुमित्रा, सुन्दर कटिप्रदेश वाली कैकेयी तथा जो अन्य राजपत्नियाँ थीं, वे सब बहुओं को उतारने के कार्य में जुट गयीं। १० १/२॥
ततः सीतां महाभागामूर्मिलां च यशस्विनीम्॥११॥
कुशध्वजसुते चोभे जगृहुर्नुपयोषितः।
मंगलालापनैर्हो मैः शोभिताः क्षौमवाससः॥१२॥
तदनन्तर राजपरिवार की उन स्त्रियों ने परम सौभाग्यवती सीता, यशस्विनी ऊर्मिला तथा कुशध्वजकी दोनों कन्याओं—माण्डवी और श्रुतकीर्ति को सवारी से उतारा और मंगल गीत गाती हुई सब वधुओं को घरमें ले गयीं। वे प्रवेशकालिक होमकर्म से सुशोभित तथा रेशमी साड़ियों से अलंकृत थीं॥ ११-१२॥
देवतायतनान्याशु सर्वास्ताः प्रत्यपूजयन्।
अभिवाद्याभिवाद्यांश्च सर्वा राजसुतास्तदा॥ १३॥
रेमिरे मुदिताः सर्वा भर्तृभिर्मुदिता रहः।
उन सबने देवमन्दिरों में ले जाकर उन बहुओं से देवताओं का पूजन करवाया। तदनन्तर नव-वधूरूप में आयी हुई उन सभी राजकुमारियों ने वन्दनीय सास ससुर आदि के चरणों में प्रणाम किया और अपने अपने पति के साथ एकान्त में रहकर वे सब-की-सब बड़े आनन्द से समय व्यतीत करने लगीं। १३ १/२॥
कृतदाराः कृतास्त्राश्च सधनाः ससुहृज्जनाः॥ १४॥
शुश्रूषमाणाः पितरं वर्तयन्ति नरर्षभाः।
कस्यचित्त्वथ कालस्य राजा दशरथः सुतम्॥
भरतं कैकयीपुत्रमब्रवीद् रघुनन्दनः।
श्रीराम आदि पुरुषश्रेष्ठ चारों भाई अस्त्रविद्या में निपुण और विवाहित होकर धन और मित्रों के साथ रहते हुए पिताकी सेवा करने लगे। कुछ काल के बाद रघुकुलनन्दन राजा दशरथ ने अपने पुत्र कैकेयीकुमार भरत से कहा— ॥१४-१५ १/२ ॥
अयं केकयराजस्य पुत्रो वसति पुत्रक॥१६॥
त्वां नेतुमागतो वीरो युधाजिन्मातुलस्तव।
‘बेटा! ये तुम्हारे मामा केकयराजकुमार वीर युधाजित् तुम्हें लेने के लिये आये हैं और कई दिनों से यहाँ ठहरे हुए हैं ॥ १६ १/२॥
श्रुत्वा दशरथस्यैतद् भरतः कैकयीसुतः॥१७॥
गमनायाभिचक्राम शत्रुघ्नसहितस्तदा।
दशरथजी की यह बात सुनकर कैकेयीकुमार भरत ने उस समय शत्रुघ्न के साथ मामा के यहाँ जाने का विचार किया। १७ १/२॥
आपृच्छ्य पितरं शूरो रामं चाक्लिष्टकारिणम्॥ १८॥
मातृश्चापि नरश्रेष्ठः शत्रुघ्नसहितो ययौ।
वे नरश्रेष्ठ शूरवीर भरत अपने पिता राजा दशरथ, अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीराम तथा सभी माताओं से पूछकर उनकी आज्ञा ले शत्रुघ्नसहित वहाँसे चल दिये॥ १८१/२॥
युधाजित् प्राप्य भरतं सशत्रुघ्र प्रहर्षितः॥१९॥
स्वपुरं प्राविशद् वीरः पिता तस्य तुतोष ह।
शत्रुघ्नसहित भरत को साथ लेकर वीर युधाजित् ने बड़े हर्ष के साथ अपने नगर में प्रवेश किया, इससे उनके पिताको बड़ा संतोष हुआ॥ १९ १/२॥
गते च भरते रामो लक्ष्मणश्च महाबलः॥२०॥
पितरं देवसंकाशं पूजयामासतुस्तदा।
भरत के चले जाने पर महाबली श्रीराम और लक्ष्मण उन दिनों अपने देवोपम पिताकी सेवा-पूजा में संलग्न रहने लगे॥ २० १/२॥
पितुराज्ञां पुरस्कृत्य पौरकार्याणि सर्वशः॥२१॥
चकार रामः सर्वाणि प्रियाणि च हितानि च।
पिताकी आज्ञा शिरोधार्य करके वे नगरवासियों के सब काम देखने तथा उनके समस्त प्रिय तथा हितकर कार्य करने लगे। २१ १/२ ।।
मातृभ्यो मातृकार्याणि कृत्वा परमयन्त्रितः॥ २२॥
गुरूणां गुरुकार्याणि काले कालेऽन्ववैक्षत।
वे अपने को बड़े संयम में रखते थे और समय समय पर माताओं के लिये उनके आवश्यक कार्य पूर्ण करके गुरुजनों के भारी-से-भारी कार्यों को भी सिद्ध करने का ध्यान रखते थे॥ २२ १/२॥
एवं दशरथः प्रीतो ब्राह्मणा नैगमास्तथा ॥२३॥
रामस्य शीलवृत्तेन सर्वे विषयवासिनः।
उनके इस बर्ताव से राजा दशरथ, वेदवेत्ता ब्राह्मण तथा वैश्यवर्ग बड़े प्रसन्न रहते थे; श्रीरामके उत्तम शील और सद्-व्यवहारसे उस राज्यके भीतर निवास करनेवाले सभी मनुष्य बहुत संतुष्ट रहते थे। २३१/२॥
तेषामतियशा लोके रामः सत्यपराक्रमः॥२४॥
स्वयंभूरिव भूतानां बभूव गुणवत्तरः।
राजा के उन चारों पुत्रों में सत्यपराक्रमी श्रीराम ही लोक में अत्यन्त यशस्वी तथा महान् गुणवान् हुए ठीक उसी तरह जैसे समस्त भूतों में स्वयम्भू ब्रह्मा ही अत्यन्त यशस्वी और महान् गुणवान् हैं ।। २४ १/२॥
रामश्च सीतया सार्धं विजहार बहूनृतून्॥ २५॥
मनस्वी तद्गतमनास्तस्या हृदि समर्पितः।
श्रीरामचन्द्रजी सदा सीता के हृदयमन्दिर में विराजमान रहते थे तथा मनस्वी श्रीराम का मन भी सीता में ही लगा रहता था; श्रीराम ने सीता के साथ अनेक ऋतुओं तक विहार किया। २५ १/२ ॥
प्रिया तु सीता रामस्य दाराः पितृकृता इति॥ २६॥
गुणाद्रूपगुणाच्चापि प्रीतिर्भूयोऽभिवर्धते।
तस्याश्च भर्ता द्विगुणं हृदये परिवर्तते॥२७॥
सीता श्रीराम को बहुत ही प्रिय थीं; क्योंकि वे अपने पिता राजा जनक द्वारा श्रीराम के हाथ में पत्नी-रूप से समर्पित की गयी थीं। सीता के पातिव्रत्य आदि गुण से तथा उनके सौन्दर्य गुण से भी श्रीराम का उनके प्रति अधिकाधिक प्रेम बढ़ता रहता था; इसी प्रकार सीता के हृदय में भी उनके पति श्रीराम अपने गुण और सौन्दर्य के कारण द्विगुण प्रीतिपात्र बनकर रहते थे। २६-२७॥
अन्तर्गतमपि व्यक्तमाख्याति हृदयं हृदा।
तस्य भूयो विशेषेण मैथिली जनकात्मजा।
देवताभिः समा रूपे सीता श्रीरिव रूपिणी॥ २८॥
जनकनन्दिनी मिथिलेश कुमारी सीता श्रीराम के हार्दिक अभिप्राय को भी अपने हृदय से ही और अधिकरूप से जान लेती थीं तथा स्पष्टरूप से बता भी देती थीं। वे रूप में देवांगनाओं के समान थीं और मूर्तिमती लक्ष्मी-सी प्रतीत होती थीं॥२८॥
तया स राजर्षिसुतोऽभिकामया समेयिवानुत्तमराजकन्यया।
अतीव रामः शुशुभे मुदान्वितो विभुः श्रिया विष्णुरिवामरेश्वरः॥२९॥
श्रेष्ठ राजकुमारी सीता श्रीराम की ही कामना रखती थीं और श्रीराम भी एकमात्र उन्हीं को चाहते थे; जैसे लक्ष्मी के साथ देवेश्वर भगवान् विष्णु की शोभा होती है, उसी प्रकार उन सीतादेवी के साथ राजर्षि दशरथकुमार श्रीराम परम प्रसन्न रहकर बड़ी शोभा पाने लगे॥२९॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे सप्तसप्ततितमः सर्गः॥ ७७॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें सतहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७७॥