सर्ग-61
वनं गते धर्मरते रामे रमयतां वरे।
कौसल्या रुदती चार्ता भर्तारमिदमब्रवीत्॥१॥
प्रजाजनों को आनन्द प्रदान करने वाले पुरुषों में श्रेष्ठ धर्मपरायण श्रीराम के वन में चले जाने पर आर्त होकर रोती हुई कौसल्या ने अपने पति से इस प्रकार कहा – ॥१॥
यद्यपि त्रिषु लोकेषु प्रथितं ते महद् यशः।
सानुक्रोशो वदान्यश्च प्रियवादी च राघवः॥२॥
‘महाराज! यद्यपि तीनों लोकों में आपका महान् यश फैला हुआ है, सब लोग यही जानते हैं किरघुकुलनरेश दशरथ बड़े दयालु, उदार और प्रिय वचन बोलनेवाले हैं॥२॥
कथं नरवरश्रेष्ठ पुत्रौ तौ सह सीतया।
दुःखितौ सुखसंवृद्धौ वने दुःखं सहिष्यतः॥३॥
‘नरेशों में श्रेष्ठ आर्यपुत्र ! तथापि आपने इस बात का विचार नहीं किया कि सुख में पले हुए आपके वे दोनों पुत्र सीता के साथ वनवास का कष्ट कैसे सहन करेंगे॥३॥
सा नूनं तरुणी श्यामा सुकुमारी सुखोचिता।
कथमुष्णं च शीतं च मैथिली विसहिष्यते॥४॥
‘वह सोलह-अठारह वर्षों की सुकुमारी तरुणी मिथिलेशकुमारी सीता, जो सुख भोगने के ही योग्य है, वन में सर्दी-गरमी का दुःख कैसे सहेगी? ॥ ४॥
भुक्त्वाशनं विशालाक्षी सूपदंशान्वितं शुभम्।
वन्यं नैवारमाहारं कथं सीतोपभोक्ष्यते॥५॥
‘विशाललोचना सीता सुन्दर व्यञ्जनों से युक्त सुन्दर स्वादिष्ट अन्न भोजन किया करती थी, अब वह जंगल की तिन्नी के चावल का सूखा भात कैसे खायगी?॥
गीतवादित्रनिर्घोषं श्रुत्वा शुभसमन्विता।
कथं क्रव्यादसिंहानां शब्दं श्रोष्यत्यशोभनम्॥
‘जो माङ्गलिक वस्तुओं से सम्पन्न रहकर सदा गीत और वाद्य की मधुर ध्वनि सुना करती थी, वही जंगल में मांसभक्षी सिंहों का अशोभन (अमङ्गलकारी) शब्द कैसे सुन सकेगी? ॥ ६॥
महेन्द्रध्वजसंकाशः क्व नु शेते महाभुजः।
भुजं परिघसंकाशमुपाधाय महाबलः॥७॥
‘जो इन्द्रध्वज के समान समस्त लोकों के लिये उत्सव प्रदान करने वाले थे, वे महाबली, महाबाहु श्रीराम अपनी परिघ-जैसी मोटी बाँह का तकिया लगाकर कहाँ सोते होंगे? ॥ ७॥
पद्मवर्णं सुकेशान्तं पद्मनिःश्वासमुत्तमम्।
कदा द्रक्ष्यामि रामस्य वदनं पुष्करेक्षणम्॥८॥
‘जिसकी कान्ति कमल के समान है, जिसके ऊपर सुन्दर केश शोभा पाते हैं, जिसकी प्रत्येक साँस से कमल की-सी सुगन्ध निकलती है तथा जिसमें विकसित कमल के सदृश सुन्दर नेत्र सुशोभित होते हैं, श्रीराम के उस मनोहर मुख को मैं कब दे लूँगी? ॥ ८॥
वज्रसारमयं नूनं हृदयं मे न संशयः।
अपश्यन्त्या न तं यद् वै फलतीदं सहस्रधा॥९॥
‘मेरा हृदय निश्चय ही लोहे का बना हुआ है, इसमें संशय नहीं है; क्योंकि श्रीराम को न देखने पर भी मेरे इस हृदय के सहस्रों टुकड़े नहीं हो जाते हैं॥९॥
यत् त्वया करुणं कर्म व्यपोह्य मम बान्धवाः।
निरस्ताः परिधावन्ति सुखार्हाः कृपणा वने॥ १०॥
‘आपने यह बड़ा ही निर्दयतापूर्ण कर्म किया है कि बिना कुछ सोच-विचार किये मेरे बान्धवों को (कैकेयी के कहने से) निकाल दिया है, जिसके कारण वे सुखभोगने के योग्य होने पर भी दीन होकर वन में दौड़ रहे हैं॥ १०॥
यदि पञ्चदशे वर्षे राघवः पुनरेष्यति।
जह्याद् राज्यं च कोशं च भरतो नोपलक्ष्यते॥ ११॥
‘यदि पंद्रहवें वर्ष में श्रीरामचन्द्र पुनः वन से लौटें तो भरत उनके लिये राज्य और खजाना छोड़ देंगे, ऐसी सम्भावना नहीं दिखायी देती॥ ११ ॥
भोजयन्ति किल श्राद्धे केचित् स्वानेव बान्धवान्।
ततः पश्चात् समीक्षन्ते कृतकार्या द्विजोत्तमान्॥ १२॥
तत्र ये गुणवन्तश्च विद्वांसश्च द्विजातयः।
न पश्चात् तेऽभिमन्यन्ते सुधामपि सुरोपमाः॥ १३॥
‘कहते हैं, कुछ लोग श्राद् धमें पहले अपने बान्धवों (दौहित्र आदि)-को ही भोजन करा देते हैं, उसके बाद कृतकृत्य होकर निमन्त्रित श्रेष्ठ ब्राह्मणों की ओर ध्यान देते हैं। परंतु वहाँ जो गुणवान् एवं विद्वान्
देवतुल्य उत्तम ब्राह्मण होते हैं, वे पीछे अमृत भी परोसा गया हो तो उसको स्वीकार नहीं करते हैं। १२-१३॥
ब्राह्मणेष्वपि वृत्तेषु भुक्तशेषं द्विजोत्तमाः।
नाभ्युपेतुमलं प्राज्ञाः शृङ्गच्छेदमिवर्षभाः॥१४॥
‘यद्यपि पहली पंक्ति में भी ब्राह्मण ही भोजन करके उठे होते हैं, तथापि जो श्रेष्ठ और विद्वान् ब्राह्मण हैं,वे अपमान के भय से उस भुक्तशेष अन्न को उसी तरह ग्रहण नहीं कर पाते जैसे अच्छे बैल अपने सींग कटाने को नहीं तैयार होते हैं॥ १४ ॥
एवं कनीयसा भ्रात्रा भुक्तं राज्यं विशाम्पते।
भ्राता ज्येष्ठो वरिष्ठश्च किमर्थं नावमन्यते॥१५॥
‘महाराज! इसी प्रकार ज्येष्ठ और श्रेष्ठ भ्राता अपने छोटे भाईके भोगे हुए राज्यको कैसे ग्रहण करेंगे? वे उसका तिरस्कार (त्याग) क्यों नहीं कर देंगे? ॥ १५॥
न परेणाहृतं भक्ष्यं व्याघ्रः खादितुमिच्छति।
एवमेव नरव्याघ्रः परलीढं न मंस्यते॥१६॥
‘जैसे बाघ गीदड़ आदि दूसरे जन्तुओंके लाये या खाये हुए भक्ष्य पदार्थ (शिकार)-को खाना नहीं चाहता, इसी प्रकार पुरुषसिंह श्रीराम दूसरोंके चाटे (भोगे) हुए राज्य-भोगको नहीं स्वीकार करेंगे। १६॥
हविराज्यं पुरोडाशः कुशा यूपाश्च खादिराः।
नैतानि यातयामानि कुर्वन्ति पुनरध्वरे॥१७॥
‘हविष्य, घृत, पुरोडाश, कुश और खदिर (खैर)के यूप—ये एक यज्ञ के उपयोग में आ जानेपर ‘यातयाम’ (उपभुक्त) हो जाते हैं; इसलिये विद्वान् इनका फिर दूसरे यज्ञ में उपयोग नहीं करते हैं ।। १७॥
तथा ह्यात्तमिदं राज्यं हृतसारां सुरामिव।
नाभिमन्तुमलं रामो नष्टसोममिवाध्वरम्॥१८॥
‘इसी प्रकार निःसार सुरा और भुक्तावशिष्ट यज्ञसम्बन्धी सोमरस की भाँति इस भोगे हुए राज्य को श्रीराम नहीं ग्रहण कर सकते॥ १८ ॥
नैवंविधमसत्कारं राघवो मर्षयिष्यति।
बलवानिव शार्दूलो वालधेरभिमर्शनम्॥१९॥
‘जैसे बलवान् शेर किसी के द्वारा अपनी पूंछ का पकड़ा जाना नहीं सह सकता, उसी प्रकार श्रीराम ऐसे अपमान को नहीं सह सकेंगे॥ १९॥
नैतस्य सहिता लोका भयं कुर्युर्महामृधे।
अधर्मं त्विह धर्मात्मा लोकं धर्मेण योजयेत्॥ २०॥
‘समस्त लोक एक साथ होकर यदि महासमर में आ जायँ तो भी वे श्रीरामचन्द्रजी के मन में भय उत्पन्न नहीं कर सकते, तथापि इस तरह राज्य लेने में अधर्म मानकर उन्होंने इसपर अधिकार नहीं किया। जो धर्मात्मा समस्त जगत् को धर्म में लगाते हैं, वे स्वयं अधर्म कैसे कर सकते हैं? ॥ २० ॥
नन्वसौ काञ्चनैर्बाणैर्महावीर्यो महाभुजः।
युगान्त इव भूतानि सागरानपि निर्दहेत्॥२१॥
‘वे महापराक्रमी महाबाहु श्रीराम अपने सुवर्णभूषित बाणों द्वारा सारे समुद्रों को भी उसी प्रकार दग्ध कर सकते हैं, जैसे संवर्तक अग्निदेव प्रलयकाल में सम्पूर्ण प्राणियों को भस्म कर डालते हैं। २१॥
स तादृशः सिंहबलो वृषभाक्षो नरर्षभः।
स्वयमेव हतः पित्रा जलजेनात्मजो यथा॥२२॥
‘सिंह के समान बल और बैल के समान बड़े-बड़े नेत्रवाला वैसा नरश्रेष्ठ वीर पुत्र स्वयं अपने पिता के ही हाथों द्वारा मारा गया (राज्य से वञ्चित कर दिया गया)। ठीक उसी तरह, जैसे मत्स्य का बच्चा अपने पिता मत्स्य के द्वारा ही खा लिया जाता है।। २२॥
द्विजातिचरितो धर्मः शास्त्रे दृष्टः सनातनैः।
यदि ते धर्मनिरते त्वया पुत्रे विवासिते॥२३॥
‘आपके द्वारा धर्मपरायण पुत्र को देश निकाला दे दिया गया, अतः यह प्रश्न उठता है कि सनातन ऋषियों ने वेद में जिसका साक्षात्कार किया है तथाश्रेष्ठ द्विज जिसे अपने आचरण में लाये हैं, वह धर्म आपकी दृष्टि में सत्य है या नहीं॥ २३॥
गतिरेका पतिर्नार्या द्वितीया गतिरात्मजः।
तृतीया ज्ञातयो राजश्चतुर्थी नैव विद्यते॥२४॥
‘राजन्! नारी के लिये एक सहारा उसका पति है, दूसरा उसका पुत्र है तथा तीसरा सहारा उसके पिता भाई आदि बन्धु-बान्धव हैं, चौथा कोई सहारा उसके लिये नहीं है ॥२४॥
तत्र त्वं मम नैवासि रामश्च वनमाहितः।
न वनं गन्तुमिच्छामि सर्वथा हा हता त्वया॥ २५॥
‘इन सहारों में से आप तो मेरे हैं ही नहीं (क्योंकि आप सौत के अधीन हैं)। दूसरा सहारा श्रीराम हैं, जो वन में भेज दिये गये (और बन्धु-बान्धव भी दूर हैं। अतः तीसरा सहारा भी नहीं रहा)। आपकी सेवा छोड़कर मैं श्रीराम के पास वन में जाना नहीं चाहती हूँ, इसलिये सर्वथा आपके द्वारा मारी ही गयी॥२५॥
हतं त्वया राष्ट्रमिदं सराज्यं हताः स्म सर्वाः सह मन्त्रिभिश्च।
हता सपुत्रास्मि हताश्च पौराः सुतश्च भार्या च तव प्रहृष्टौ॥ २६॥
‘आपने श्रीराम को वन में भेजकर इस राष्ट्र का तथा आस-पास के अन्य राज्यों का भी नाश कर डाला, मन्त्रियों सहित सारी प्रजा का वध कर डाला। आपके द्वारा पुत्रसहित मैं भी मारी गयी और इस नगर के निवासी भी नष्टप्राय हो गये। केवल आपके पुत्र भरत और पत्नी कैकेयी दो ही प्रसन्न हुए हैं’ ॥ २६ ॥
इमां गिरं दारुणशब्दसंहितां
निशम्य रामेति मुमोह दुःखितः।
ततः स शोकं प्रविवेश पार्थिवः
स्वदुष्कृतं चापि पुनस्तथास्मरत्॥२७॥
कौसल्या की यह कठोर शब्दों से युक्त वाणी सुनकर राजा दशरथ को बड़ा दुःख हुआ। वे ‘हा राम!’ कहकर मूर्च्छित हो गये। राजा शोक में डूब गये। फिर उसी समय उन्हें अपने एक पुराने दुष्कर्म का स्मरण हो आया, जिसके कारण उन्हें यह दुःख प्राप्त हुआ था॥ २७॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकषष्टितमः सर्गः॥६१॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आपरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में एकसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६१॥
सर्ग-62
एवं तु क्रुद्धया राजा राममात्रा सशोकया।
श्रावितः परुषं वाक्यं चिन्तयामास दुःखितः॥
शोकमग्न हो कुपित हुई श्रीराम माता कौसल्या ने जब राजा दशरथ को इस प्रकार कठोर वचन सुनाया, तब वे दुःखित होकर बड़ी चिन्ता में पड़ गये॥१॥
चिन्तयित्वा स च नृपो मोहव्याकुलितेन्द्रियः।
अथ दीर्पण कालेन संज्ञामाप परंतपः॥२॥
चिन्तित होने के कारण राजा की सारी इन्द्रियाँ मोह से आच्छन्न हो गयीं। तदनन्तर दीर्घकाल के पश्चात् शत्रुओं को संताप देने वाले राजा दशरथ को चेत हुआ।२॥
स संज्ञामुपलभ्यैव दीर्घमुष्णं च निःश्वसन्।
कौसल्या पार्श्वतो दृष्ट्वा ततश्चिन्तामुपागमत्॥ ३॥
होश में आने पर उन्होंने गरम-गरम लंबी साँस ली और कौसल्या को बगल में बैठी हुई देख वे फिर चिन्ता में पड़ गये॥३॥
तस्य चिन्तयमानस्य प्रत्यभात् कर्म दुष्कृतम्।
यदनेन कृतं पूर्वमज्ञानाच्छब्दवेधिना॥४॥
चिन्ता में पड़े-पड़े ही उन्हें अपने एक दुष्कर्म का स्मरण हो आया, जो इन शब्दवेधी बाण चलाने वाले नरेश के द्वारा पहले अनजान में बन गया था॥४॥
अमनास्तेन शोकेन रामशोकेन च प्रभुः।
द्वाभ्यामपि महाराजः शोकाभ्यामभितप्यते॥५॥
उस शोक से तथा श्रीराम के शोक से भी राजा के मन में बड़ी वेदना हुई। उन दोनों ही शोकों से महाराज संतप्त होने लगे॥५॥
दह्यमानस्तु शोकाभ्यां कौसल्यामाह दुःखितः।
वेपमानोऽञ्जलिं कृत्वा प्रसादार्थमवाङ्मुखः॥६॥
उन दोनों शोकों से दग्ध होते हुए दुःखी राजा दशरथ नीचे मुँह किये थर-थर काँपने लगे और कौसल्या को मनाने के लिये हाथ जोड़कर बोले-॥
प्रसादये त्वां कौसल्ये रचितोऽयं मयाञ्जलिः।
वत्सला चानृशंसा च त्वं हि नित्यं परेष्वपि॥७॥
‘कौसल्ये! मैं तुमसे निहोरा करता हूँ, तुम प्रसन्न हो जाओ। देखो, मैंने ये दोनों हाथ जोड़ लिये हैं। तुम तो दूसरों पर भी सदा वात्सल्य और दया दिखानेवाली हो (फिर मेरे प्रति क्यों कठोर हो गयी?)॥७॥
भर्ता तु खलु नारीणां गुणवान् निर्गुणोऽपि वा।
धर्मं विमृशमानानां प्रत्यक्षं देवि दैवतम्॥८॥
‘देवि! पति गुणवान् हो या गुणहीन, धर्मका विचार करने वाली सती नारियों के लिये वह प्रत्यक्ष देवता है॥
सा त्वं धर्मपरा नित्यं दृष्टलोकपरावरा।
नाहसे विप्रियं वक्तुं दुःखितापि सुदुःखितम्॥९॥
‘तुम तो सदा धर्म में तत्पर रहनेवाली और लोक में भले-बुरे को समझने वाली हो। यद्यपि तुम भी दुःखित हो तथापि मैं भी महान् दुःख में पड़ा हुआ हूँ, अतः तुम्हें मुझसे कठोर वचन नहीं कहना चाहिये’ ॥९॥
तद् वाक्यं करुणं राज्ञः श्रुत्वा दीनस्य भाषितम्।
कौसल्या व्यसृजद् बाष्पं प्रणालीव नवोदकम्॥ १०॥
दुःखी हुए राजा दशरथ के मुख से कहे गये उस करुणाजनक वचन को सुनकर कौसल्या अपने नेत्रों सेआँसू बहाने लगीं, मानो छत की नाली से नूतन (वर्षा का) जल गिर रहा हो॥ १०॥
सा मूर्ध्नि बद्ध्वा रुदती राज्ञः पद्ममिवाञ्जलिम्।
सम्भ्रमादब्रवीत् त्रस्ता त्वरमाणाक्षरं वचः॥११॥
वे अधर्म के भय से रो पड़ी और राजा के जुड़े हुए कमलसदृश हाथों को अपने सिर से सटाकर घबराहट के कारण शीघ्रतापूर्वक एक-एक अक्षर का उच्चारण करती हुई बोलीं- ॥११॥
प्रसीद शिरसा याचे भूमौ निपतितास्मि ते।
याचितास्मि हता देव क्षन्तव्याहं नहि त्वया॥ १२॥
‘देव! मैं आपके सामने पृथ्वी पर पड़ी हूँ। आपके चरणों में मस्तक रखकर याचना करती हूँ, आप प्रसन्न हों। यदि आपने उलटे मुझसे ही याचना की, तब तो मैं मारी गयी। मुझसे अपराध हुआ हो तो भी मैं आपसे क्षमा पाने के योग्य हूँ, प्रहार पाने के नहीं॥ १२॥
नैषा हि सा स्त्री भवति श्लाघनीयेन धीमता।
उभयोर्लोकयोलॊके पत्या या सम्प्रसाद्यते॥१३॥
‘पति अपनी स्त्री के लिये इहलोक और परलोक में भी स्पृहणीय है। इस जगत् में जो स्त्री अपने बुद्धिमान् पति के द्वारा मनायी जाती है, वह कुल-स्त्री कहलाने के योग्य नहीं है॥ १३॥
जानामि धर्मं धर्मज्ञ त्वां जाने सत्यवादिनम्।
पुत्रशोकार्तया तत्तु मया किमपि भाषितम्॥ १४॥
‘धर्मज्ञ महाराज! मैं स्त्री-धर्म को जानती हूँ और । यह भी जानती हूँ कि आप सत्यवादी हैं। इस समय मैंने जो कुछ भी न कहने योग्य बात कह दी है, वह पुत्रशोक से पीड़ित होने के कारण मेरे मुख से निकल गयी है॥ १४॥
शोको नाशयते धैर्यं शोको नाशयते श्रुतम्।
शोको नाशयते सर्वं नास्ति शोकसमो रिपुः॥ १५॥
‘शोक धैर्य का नाश कर देता है। शोक शास्त्रज्ञान को भी लुप्त कर देता है तथा शोक सब कुछ नष्ट कर देता है; अतः शोक के समान दूसरा कोई शत्रु नहीं है।॥ १५ ॥
शक्यमापतितः सोढुं प्रहारो रिपुहस्ततः।
सोढुमापतितः शोकः सुसूक्ष्मोऽपि न शक्यते॥ १६॥
‘शत्रु के हाथ से अपने ऊपर पड़ा हुआ शस्त्रों का प्रहार सह लिया जा सकता है; परंतु दैववश प्राप्त हुआ थोड़ा-सा भी शोक नहीं सहा जा सकता॥ १६ ॥
वनवासाय रामस्य पञ्चरात्रोऽत्र गण्यते।
यः शोकहतहर्षायाः पञ्चवर्षोपमो मम॥१७॥
‘श्रीराम को वन में गये आज पाँच रातें बीत गयीं। मैं यही गिनती रहती हूँ। शोक ने मेरे हर्ष को नष्ट कर दिया है, अतः ये पाँच रात मेरे लिये पाँच वर्षों के समान प्रतीत हुई हैं॥ १७॥
तं हि चिन्तयमानायाः शोकोऽयं हृदि वर्धते।
नदीनामिव वेगेन समुद्रसलिलं महत्॥१८॥
‘श्रीराम का ही चिन्तन करने के कारण मेरे हृदय का यह शोक बढ़ता जा रहा है, जैसे नदियों के वेग से समुद्र का जल बहुत बढ़ जाता है’ ॥ १८॥
एवं हि कथयन्त्यास्तु कौसल्यायाः शुभं वचः।
मन्दरश्मिरभूत् सूर्यो रजनी चाभ्यवर्तत॥१९॥
अथ प्रह्लादितो वाक्यैर्देव्या कौसल्यया नृपः।
शोकेन च समाक्रान्तो निद्राया वशमेयिवान्॥ २०॥
कौसल्या इस प्रकार शुभ वचन कह ही रही थीं कि सूर्य की किरणें मन्द पड़ गयीं और रात्रिकाल आ पहँचा। देवी कौसल्या की इन बातों से राजा को बड़ी प्रसन्नता हुई। साथ ही वे श्रीराम के शोक से भी पीड़ित थे इस हर्ष और शोक की अवस्था में उन्हें नींद आ गयी॥ १९-२०॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे द्विषष्टितमः सर्गः॥६२॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में बासठवाँ सर्ग पूरा हुआ।६२॥
सर्ग-63
प्रतिबुद्धो मुहूर्तेन शोकोपहतचेतनः।
अथ राजा दशरथः स चिन्तामभ्यपद्यत॥१॥
राजा दशरथ दो ही घड़ी के बाद फिर जाग उठे। उस समय उनका हृदय शोक से व्याकुल हो रहा था। वे मन-ही-मन चिन्ता करने लगे॥१॥
रामलक्ष्मणयोश्चैव विवासाद् वासवोपमम्।
आपेदे उपसर्गस्तं तमः सूर्यमिवासुरम्॥२॥
श्रीराम और लक्ष्मण के वन में चले जाने से इन इन्द्रतुल्य तेजस्वी महाराज दशरथ को शोक ने उसी प्रकार धर दबाया था, जैसे राहु का अन्धकार सूर्य को ढक देता है॥२॥
सभार्ये हि गते रामे कौसल्यां कोसलेश्वरः।
विवक्षुरसितापाङ्गी स्मृत्वा दुष्कृतमात्मनः॥३॥
पत्नीसहित श्रीराम के वन में चले जाने पर कोसलनरेश दशरथ ने अपने पुरातन पाप का स्मरण करके कजरारे नेत्रों वाली कौसल्या से कहने का विचार किया॥३॥
स राजा रजनी षष्ठी रामे प्रव्राजिते वनम्।
अर्धरात्रे दशरथः सोऽस्मरद दुष्कृतं कृतम्॥४॥
उस समय श्रीरामचन्द्रजी को वन में गये छठी रात बीत रही थी। जब आधी रात हुई, तब राजा दशरथ को उस पहले के किये हुए दुष्कर्म का स्मरण हुआ॥४॥
स राजा पुत्रशोकार्तः स्मृत्वा दुष्कृतमात्मनः।
कौसल्यां पुत्रशोकार्तामिदं वचनमब्रवीत्॥५॥
पुत्रशोक से पीड़ित हुए महाराज ने अपने उस दुष्कर्म को याद करके पुत्रशोक से व्याकुल हुई कौसल्या से इस प्रकार कहना आरम्भ किया— ॥५॥
यदाचरति कल्याणि शुभं वा यदि वाशुभम्।
तदेव लभते भद्रे कर्ता कर्मजमात्मनः॥६॥
‘कल्याणि! मनुष्य शुभ या अशुभ जो भी कर्म करता है, भद्रे! अपने उसी कर्म के फलस्वरूप सुख या दुःख कर्ता को प्राप्त होते हैं॥ ६॥
गुरुलाघवमर्थानामारम्भे कर्मणां फलम्।
दोषं वा यो न जानाति स बाल इति होच्यते॥७॥
‘जो कर्मों का आरम्भ करते समय उनके फलों की गुरुता या लघुता को नहीं जानता, उनसे होने वाले लाभरूपी गुण अथवा हानिरूपी दोष को नहीं समझता, वह मनुष्य बालक (मूर्ख) कहा जाता है। ७॥
कश्चिदानवणं छित्त्वा पलाशांश्च निषिञ्चति।
पुष्पं दृष्ट्वा फले गृध्नुः स शोचति फलागमे॥८॥
‘कोई मनुष्य पलाश का सुन्दर फूल देखकर मन ही-मन यह अनुमान करके कि इसका फल और भी मनोहर तथा सुस्वादु होगा, फल की अभिलाषा से आम के बगीचे को काटकर वहाँ पलाश के पौधे लगाता और सींचता है, वह फल लगने के समय पश्चात्ताप करता है (क्योंकि उससे अपनी आशा के अनुरूप फल वह नहीं पाता है) ॥८॥
अविज्ञाय फलं यो हि कर्म त्वेवानुधावति।
स शोचेत् फलवेलायां यथा किंशुकसेचकः॥ ९॥
‘जो क्रियमाण कर्म के फल का ज्ञान या विचार न करके केवल कर्म की ओर ही दौड़ता है, उसे उसका फल मिलने के समय उसी तरह शोक होता है, जैसा कि आम काटकर पलाश सींचने वाले को हुआ करता है॥९॥
सोऽहमाम्रवणं छित्त्वा पलाशांश्च न्यषेचयम्।
रामं फलागमे त्यक्त्वा पश्चाच्छोचामि दुर्मतिः॥ १०॥
‘मैंने भी आम का वन काटकर पलाशों को ही सींचा है, इस कर्म के फल की प्राप्ति के समय अब श्रीराम को खोकर मैं पश्चात्ताप कर रहा हूँ। मेरी बुद्धि कैसी खोटी है?॥
लब्धशब्देन कौसल्ये कुमारेण धनुष्मता।
कुमारः शब्दवेधीति मया पापमिदं कृतम्॥११॥
‘कौसल्ये! पिता के जीवनकाल में जब मैं केवल राजकुमार था, एक अच्छे धनुर्धर के रूप में मेरी ख्याति फैल गयी थी। सब लोग यही कहते थे कि ‘राजकुमार दशरथ शब्द-वेधी बाण चलाना जानते हैं।’ इसी ख्याति में पड़कर मैंने यह एक पाप कर डाला था (जिसे अभी बताऊँगा) ॥ ११॥
पतितेनाम्भसाऽऽच्छन्नः पतमानेन चासकृत्।
आबभौ मत्तसारङ्गस्तोयराशिरिवाचलः॥१८॥
‘गिरे हुए और बारंबार गिरते हुए जल से आच्छादित हुआ मतवाला हाथी तरङ्गरहित प्रशान्त समुद्र तथा भीगे पर्वत के समान प्रतीत होता था। १८॥
पाण्डुरारुणवर्णानि स्रोतांसि विमलान्यपि।
सुस्रुवुर्गिरिधातुभ्यः सभस्मानि भुजंगवत्॥१९॥
‘पर्वतों से गिरने वाले स्रोत या झरने निर्मल होने पर भी पर्वतीय धातुओं के सम्पर्क से श्वेत, लाल और भस्मयुक्त होकर सो की भाँति कुटिल गति से बह रहे थे॥ १९॥
तस्मिन्नतिसुखे काले धनुष्मानिषुमान् रथी।
व्यायामकृतसंकल्पः सरयूमन्वगां नदीम्॥२०॥
‘वर्षा ऋतु के उस अत्यन्त सुखद सुहावने समय में मैं धनुष-बाण लेकर रथपर सवार हो शिकार खेलने के लिये सरयू नदी के तटपर गया॥२०॥
निपाने महिषं रात्रौ गजं वाभ्यागतं मृगम्।
अन्यद् वा श्वापदं किंचिज्जिघांसुरजितेन्द्रियः॥ २१॥
मेरी इन्द्रियाँ मेरे वश में नहीं थीं। मैंने सोचा था कि पानी पीने के घाट पर रात के समय जब कोई उपद्रवकारी भैंसा, मतवाला हाथी अथवा सिंह-व्याघ्र आदि दूसरा कोई हिंसक जन्तु आवेगा तो उसे मारूँगा॥ २१॥
अथान्धकारे त्वौषं जले कुम्भस्य पूर्यतः।
अचक्षुर्विषये घोषं वारणस्येव नर्दतः॥२२॥
‘उस समय वहाँ सब ओर अन्धकार छा रहा था। मुझे अकस्मात् पानी में घड़ा भरने की आवाज सुनायी पड़ी। मेरी दृष्टि तो वहाँ तक पहुँचती नहीं थी, किंतु वह आवाज मुझे हाथी के पानी पीते समय होने वाले शब्द के समान जान पड़ी॥ २२॥
ततोऽहं शरमुद्धृत्य दीप्तमाशीविषोपमम्।
शब्दं प्रति गजप्रेप्सुरभिलक्ष्यमपातयम्॥२३॥
‘तब मैंने यह समझकर कि हाथी ही अपनी सूंड में पानी खींच रहा होगा; अतः वही मेरे बाण का निशाना बनेगा। तरकस से एक तीर निकाला और उस शब्द को लक्ष्य करके चला दिया। वह दीप्तिमान् बाण विषधर सर्प के समान भयंकर था॥ २३ ॥
अमुञ्चं निशितं बाणमहमाशीविषोपमम्।
तत्र वागुषसि व्यक्ता प्रादुरासीद् वनौकसः॥ २४॥
हा हेति पततस्तोये बाणाद् व्यथितमर्मणः।
तस्मिन्निपतिते भूमौ वागभूत् तत्र मानुषी॥ २५॥
‘वह उषःकाल की वेला थी। विषैले सर्प के सदृश उस तीखे बाण को मैंने ज्यों ही छोड़ा, त्यों ही वहाँ पानी में गिरते हुए किसी वनवासी का हाहाकार मुझे स्पष्ट रूप से सुनायी दिया। मेरे बाण से उसके मर्म में बड़ी पीड़ा हो रही थी। उस पुरुष के धराशायी हो जाने पर वहाँ यह मानव-वाणी प्रकट हुई—सुनायी देने लगी— ॥ २४-२५ ॥
कथमस्मद्विधे शस्त्रं निपतेच्च तपस्विनि।
प्रविविक्तां नदी रात्रावुदाहारोऽहमागतः॥२६॥
“आह! मेरे-जैसे तपस्वी पर शस्त्र का प्रहार कैसे सम्भव हुआ? मैं तो नदी के इस एकान्त तट पर रात में पानी लेने के लिये आया था॥ २६॥
इषुणाभिहतः केन कस्य वापकृतं मया।
ऋषेर्हि न्यस्तदण्डस्य वने वन्येन जीवतः॥२७॥
कथं नु शस्त्रेण वधो मद्विधस्य विधीयते।
जटाभारधरस्यैव वल्कलाजिनवाससः॥ २८॥
को वधेन ममार्थी स्यात् किं वास्यापकृतं मया।
एवं निष्फलमारब्धं केवलानर्थसंहितम्॥२९॥
“किसने मुझे बाण मारा है? मैंने किसका क्या बिगाड़ा था? मैं तो सभी जीवों को पीड़ा देने की वृत्ति का त्याग करके ऋषि-जीवन बिताता था, वन में रहकर जंगली फल-मूलों से ही जीविका चलाता था। मुझ-जैसे निरपराध मनुष्य का शस्त्र से वध क्यों किया जा रहा है? मैं वल्कल और मृगचर्म पहनने वाला जटाधारी तपस्वी हूँ। मेरा वध करने में किसने अपना क्या लाभ सोचा होगा? मैंने मारने वाले का क्या अपराध किया था? मेरी हत्या का प्रयत्न व्यर्थ ही किया गया ! इससे किसी को कुछ लाभ नहीं होगा, केवल अनर्थ ही हाथ लगेगा॥ २७–२९॥
न क्वचित् साधु मन्येत यथैव गुरुतल्पगम्।
नेमं तथानुशोचामि जीवितक्षयमात्मनः ॥ ३०॥
मातरं पितरं चोभावनुशोचामि मद्धे।
तदेतन्मिथुनं वृद्धं चिरकालभृतं मया॥३१॥
मयि पञ्चत्वमापन्ने कां वृत्तिं वर्तयिष्यति।
वृद्धौ च मातापितरावहं चैकेषुणा हतः॥ ३२॥
केन स्म निहताः सर्वे सुबालेनाकृतात्मना।
“इस हत्यारे को संसार में कहीं भी कोई उसी तरह अच्छा नहीं समझेगा, जैसे गुरुपत्नीगामी को मुझे अपने इस जीवन के नष्ट होने की उतनी चिन्ता नहीं है; मेरे मारे जाने से मेरे माता-पिता को जो कष्ट होगा, उसी के लिये मुझे बारंबार शोक हो रहा है। मैंने इन दोनों वृद्धों का बहुत समय से पालन-पोषण किया है; अब मेरे शरीर के न रहने पर ये किस प्रकार जीवन निर्वाह करेंगे? घातक ने एक ही बाण से मुझे और मेरे बूढ़े माता-पिता को भी मौ तके मुख में डाल दिया। किस विवेकहीन और अजितेन्द्रिय पुरुष ने हम सब लोगों का एक साथ ही वध कर डाला?’ ॥ ३०–३२ १/२॥
तां गिरं करुणं श्रुत्वा मम धर्मानुकांक्षिणः॥ ३३॥
कराभ्यां सशरं चापं व्यथितस्यापतद् भुवि।
‘ये करुणा भरे वचन सुनकर मेरे मन में बड़ी व्यथा हई। कहाँ तो मैं धर्म की अभिलाषा रखने वाला था और कहाँ यह अधर्म का कार्य बन गया। उस समय मेरे हाथों से धनुष और बाण छूटकर पृथ्वी पर गिर पड़े॥
तस्याहं करुणं श्रुत्वा ऋषेर्विलपतो निशि॥ ३४॥
सम्भ्रान्तः शोकवेगेन भृशमासं विचेतनः।
‘रात में विलाप करते हुए ऋषि का वह करुण वचन सुनकर मैं शोक के वेग से घबरा उठा। मेरी चेतना अत्यन्त विलुप्त-सी होने लगी॥ ३४ १/२॥
तं देशमहमागम्य दीनसत्त्वः सुदुर्मनाः ॥ ३५॥
अपश्यमिषुणा तीरे सरय्वास्तापसं हतम्।
अवकीर्णजटाभारं प्रविद्धकलशोदकम्॥३६॥
पांसुशोणितदिग्धाङ्गं शयानं शल्यवेधितम्।
स मामुद्रीक्ष्य नेत्राभ्यां त्रस्तमस्वस्थचेतनम्॥ ३७॥
इत्युवाच वचः क्रूरं दिधक्षन्निव तेजसा
‘मेरे हृदय में दीनता छा गयी, मन बहुत दुःखी हो गया। सरयू के किनारे उस स्थान पर जाकर मैंने देखा —एक तपस्वी बाण से घायल होकर पड़े हैं। उनकी जटाएँ बिखरी हुई हैं, घड़े का जल गिर गया है तथा सारा शरीर धूल और खून में सना हुआ है। वे बाण से बिंधे हुए पड़े थे। उनकी अवस्था देखकर मैं डर गया, मेरा चित्त ठिकाने नहीं था। उन्होंने दोनों नेत्रों से मेरी ओर इस प्रकार देखा, मानो अपने तेज से मुझे भस्म कर देना चाहते हों। वे कठोर वाणीमें यों बोले- ॥ ३५-३७ १/२॥
किं तवापकृतं राजन् वने निवसता मया॥३८॥
जिहीर्षरम्भो गर्वर्थं यदहं ताडितस्त्वया।
“राजन्! वन में रहते हुए मैंने तुम्हारा कौन-सा अपराध किया था, जिससे तुमने मुझे बाण मारा? मैं तो माता-पिता के लिये पानी लेने की इच्छा से यहाँ आया था॥ ३८ १/२॥
एकेन खलु बाणेन मर्मण्यभिहते मयि॥३९॥
द्वावन्धौ निहतौ वृद्धौ माता जनयिता च मे।
“तुमने एक ही बाण से मेरा मर्म विदीर्ण करके मेरे दोनों अन्धे और बूढ़े माता-पिता को भी मार डाला। ३९ १/२॥
तौ नूनं दुर्बलावन्धौ मत्प्रतीक्षौ पिपासितौ॥४०॥
चिरमाशां कृतां कष्टां तृष्णां संधारयिष्यतः।
“वे दोनों बहुत दुबले और अन्धे हैं। निश्चय ही प्यास से पीड़ित होकर वे मेरी प्रतीक्षा में बैठे होंगे। वे देर तक मेरे आगमन की आशा लगाये दुःखदायिनी प्यास लिये बाट जोहते रहेंगे॥ ४० १/२ ।।
न नूनं तपसो वास्ति फलयोगः श्रुतस्य वा॥ ४१॥
पिता यन्मां न जानीते शयानं पतितं भुवि।
“अवश्य ही मेरी तपस्या अथवा शास्त्रज्ञान का कोई फल यहाँ प्रकट नहीं हो रहा है; क्योंकि पिताजी को यह नहीं मालूम है कि मैं पृथ्वी पर गिरकर मृत्युशय्या पर पड़ा हुआ हूँ॥ ४१ १/२॥
जानन्नपि च किं कुर्यादशक्तश्चापरिक्रमः॥ ४२॥
भिद्यमानमिवाशक्तस्त्रातुमन्यो नगो नगम्।
“यदि जान भी लें तो क्या कर सकते हैं; क्योंकि असमर्थ हैं और चल-फिर भी नहीं सकते हैं। जैसे वायु आदि के द्वारा तोड़े जाते हुए वृक्ष को कोई दूसरा वृक्ष नहीं बचा सकता, उसी प्रकार मेरे पिता भी मेरी रक्षा नहीं कर सकते॥ ४२ १/२॥
पितुस्त्वमेव मे गत्वा शीघ्रमाचक्ष्व राघव॥४३॥
न त्वामनुदहेत् क्रुद्धो वनमग्निरिवैधितः।
“अतः रघुकुलनरेश! अब तुम्हीं जाकर शीघ्र ही मेरे पिता को यह समाचार सुना दो। (यदि स्वयं कह दोगे तो) जैसे प्रज्वलित अग्नि समूचे वन को जला डालती है, उस प्रकार वे क्रोध में भरकर तुमको भस्म नहीं करेंगे। ४३ १/२ ॥
इयमेकपदी राजन् यतो मे पितुराश्रमः॥४४॥
तं प्रसादय गत्वा त्वं न त्वा संकुपितः शपेत्।
“राजन् ! यह पगडंडी उधर ही गयी है, जहाँ मेरे पिता का आश्रम है। तुम जाकर उन्हें प्रसन्न करो, जिससे वे कुपित होकर तुम्हें शाप न दें॥ ४४ १/२ ॥
विशल्यं कुरु मां राजन् मर्म मे निशितः शरः॥ ४५॥
रुणद्धि मृदु सोत्सेधं तीरमम्बुरयो यथा।
“राजन् ! मेरे शरीर से इस बाण को निकाल दो। यह तीखा बाण मेरे मर्मस्थान को उसी प्रकार पीड़ा दे रहा है, जैसे नदी के जल का वेग उसके कोमल बालुकामय ऊँचे तट को छिन्न-भिन्न कर देता है’। ४५ १/२॥
सशल्यः क्लिश्यते प्राणैर्विशल्यो विनशिष्यति॥ ४६॥
इति मामविशच्चिन्ता तस्य शल्यापकर्षणे।
दुःखितस्य च दीनस्य मम शोकातुरस्य च॥ ४७॥
लक्षयामास स ऋषिश्चिन्तां मुनिसुतस्तदा।
‘मुनिकुमार की यह बात सुनकर मेरे मन में यह चिन्ता समायी कि यदि बाण नहीं निकालता हूँ तो इन्हें क्लेश होता है और निकाल देता हूँ तो ये अभी प्राणों से भी हाथ धो बैठते हैं। इस प्रकार बाण को निकालने के विषय में मुझ दीन-दुःखी और शोकाकुल दशरथ की इस चिन्ता को उस समय मुनिकुमार ने लक्ष्य किया॥ ४६-४७ १/२॥
ताम्यमानं स मां कृच्छ्रादुवाच परमार्थवित्॥ ४८॥
सीदमानो विवृत्ताङ्गोऽचेष्टमानो गतः क्षयम्।
संस्तभ्य शोकं धैर्येण स्थिरचित्तो भवाम्यहम्॥ ४९॥
‘यथार्थ बात को समझ लेने वाले उन महर्षि ने मुझे अत्यन्त ग्लानि में पड़ा हुआ देख बड़े कष्ट से कहा —’राजन् ! मुझे बड़ा कष्ट हो रहा है। मेरी आँखें चढ़ गयी हैं, अङ्ग-अङ्ग में तड़पन हो रही है। मुझसे कोई चेष्टा नहीं बन पाती। अब मैं मृत्यु के समीप पहुँच गया हूँ, फिर भी धैर्य के द्वारा शोक को रोककर अपने चित्त को स्थिर करता हूँ (अब मेरी बात सुनो) ॥ ४८-४९॥
ब्रह्महत्याकृतं तापं हृदयादपनीयताम्।
न द्विजातिरहं राजन् मा भूत् ते मनसो व्यथा॥ ५०॥
“मुझसे ब्रह्महत्या हो गयी—इस चिन्ता को अपने हृदय से निकाल दो। राजन्! मैं ब्राह्मण नहीं हूँ, इसलिये तुम्हारे मन में ब्राह्मण वध को लेकर कोई व्यथा नहीं होनी चाहिये॥५०॥
शूद्रायामस्मि वैश्येन जातो नरवराधिप।
इतीव वदतः कृच्छ्राद् बाणाभिहतमर्मणः॥५१॥
विघूर्णतो विचेष्टस्य वेपमानस्य भूतले।
तस्य त्वाताम्यमानस्य तं बाणमहमुद्धरम्।
स मामुद्रीक्ष्य संत्रस्तो जहौ प्राणांस्तपोधनः॥ ५२॥
“नरश्रेष्ठ! मैं वैश्य पिता द्वारा शूद्रजातीय माता के गर्भ से उत्पन्न हुआ हूँ।’ बाण से मर्म में आघात पहुँचने के कारण वे बड़े कष्ट से इतना ही कह सके। उनकी आँखें घूम रही थीं। उनसे कोई चेष्टा नहीं बनती थी। वे पृथ्वी पर पड़े-पड़े छटपटा रहे थे और अत्यन्त कष्ट का अनुभव करते थे। उस अवस्था में मैंने उनके शरीर से उस बाण को निकाल दिया। फिर तो अत्यन्त भयभीत हो उन तपोधन ने मेरी ओर देखकर अपने प्राण त्याग दिये॥
जलार्द्रगात्रं तु विलप्य कृच्छ्रे मर्मव्रणं संततमुच्छ्व सन्तम्।
ततः सरय्वां तमहं शयानं समीक्ष्य भद्रे सुभृशं विषण्णः॥५३॥
‘पानी में गिरने के कारण उनका सारा शरीर भीग गया था। मर्म में आघात लगने के कारण बड़े कष्ट से विलाप करके और बारंबार उच्छ्वास लेकर उन्होंने प्राणों का त्याग किया था। कल्याणी कौसल्ये! उस अवस्था में सरयू के तट पर मरे पड़े मुनिपुत्र को देखकर मुझे बड़ा दुःख हुआ’॥ ५३॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्रिषष्टितमः सर्गः ॥६३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में तिरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६३॥
सर्ग-64
वधमप्रतिरूपं तु महर्षेस्तस्य राघवः।
विलपन्नेव धर्मात्मा कौसल्यामिदमब्रवीत्॥१॥
उन महिर् षके अनुचित वध का स्मरण करके धर्मात्मा रघुकुलनरेश ने अपने पुत्र के लिये विलाप करते हुए ही रानी कौसल्या से इस प्रकार कहा-॥ १ ॥
तदज्ञानान्महत्पापं कृत्वा संकुलितेन्द्रियः।
एकस्त्वचिन्तयं बुद्ध्या कथं नु सुकृतं भवेत्॥ २॥
‘देवि! अनजान में यह महान् पाप कर डालने के कारण मेरी सारी इन्द्रियाँ व्याकुल हो रही थीं। मैं अकेला ही बुद्धि लगाकर सोचने लगा, अब किस उपाय से मेरा कल्याण हो? ॥२॥
ततस्तं घटमादाय पूर्णं परमवारिणा।
आश्रमं तमहं प्राप्य यथाख्यातपथं गतः॥३॥
‘तदनन्तर उस घड़े को उठाकर मैंने सरयू के उत्तम जल से भरा और उसे लेकर मुनिकुमार के बताये हुए मार्ग से उनके आश्रम पर गया॥३॥
तत्राहं दुर्बलावन्धौ वृद्धावपरिणायकौ।
अपश्यं तस्य पितरौ लूनपक्षाविव द्विजौ॥४॥
‘वहाँ पहुँचकर मैंने उनके दुबले, अन्धे और बूढ़े माता-पिता को देखा, जिनका दूसरा कोई सहायक नहीं था। उनकी अवस्था पंख कटे हुए दो पक्षियों के समान थी॥४॥
तन्निमित्ताभिरासीनौ कथाभिरपरिश्रमौ।
तामाशां मत्कृते हीनावुपासीनावनाथवत्॥५॥
‘वे अपने पुत्र की ही चर्चा करते हुए उसके आने की आशा लगाये बैठे थे। उस चर्चा के कारण उन्हें कुछ परिश्रम या थकावट का अनुभव नहीं होता था। यद्यपि मेरे कारण उनकी वह आशा धूल में मिल चुकी थी तो भी वे उसी के आसरे बैठे थे। अब वे दोनों सर्वथा अनाथ-से हो गये थे॥ ५॥
शोकोपहतचित्तश्च भयसंत्रस्तचेतनः।
तच्चाश्रमपदं गत्वा भूयः शोकमहं गतः॥६॥
‘मेरा हृदय पहले से ही शोक के कारण घबराया हुआ था। भय से मेरा होश ठिकाने नहीं था। मुनि के आश्रम पर पहुँचकर मेरा वह शोक और भी अधिक हो गया॥६॥
पदशब्दं तु मे श्रुत्वा मुनिर्वाक्यमभाषत।
किं चिरायसि मे पुत्र पानीयं क्षिप्रमानय॥७॥
‘मेरे पैरों की आहट सुनकर वे मुनि इस प्रकार बोले ‘बेटा! देर क्यों लगा रहे हो? शीघ्र पानी ले आओ॥७॥
यन्निमित्तमिदं तात सलिले क्रीडितं त्वया।
उत्कण्ठिता ते मातेयं प्रविश क्षिप्रमाश्रमम्॥८॥
“तात! जिस कारण से तुमने बड़ी देर तक जल में क्रीड़ा की है, उसी कारण को लेकर तुम्हारी यह माता तुम्हारे लिये उत्कण्ठित हो गयी है; अतः शीघ्र ही आश्रम के भीतर प्रवेश करो॥ ८॥
यद् व्यलीकं कृतं पुत्र मात्रा ते यदि वा मया।
न तन्मनसि कर्तव्यं त्वया तात तपस्विना॥९॥
“बेटा! तात! यदि तुम्हारी माता ने अथवा मैंने तुम्हारा कोई अप्रिय किया हो तो उसे तुम्हें अपने मन में नहीं लाना चाहिये; क्योंकि तुम तपस्वी हो॥ ९॥
त्वं गतिस्त्वगतीनां च चक्षुस्त्वं हीनचक्षुषाम्।
समासक्तास्त्वयि प्राणाः कथं त्वं नाभिभाषसे॥ १०॥
‘हम असहाय हैं, तुम्ही हमारे सहायक हो। हम अन्धे हैं, तुम्ही हमारे नेत्र हो। हम लोगों के प्राण तुम्हीं में अटके हुए हैं। बताओ, तुम बोलते क्यों नहीं हो?’ ॥ १०॥
मुनिमव्यक्तया वाचा तमहं सज्जमानया।
हीनव्यञ्जनया प्रेक्ष्य भीतचित्त इवाब्रुवम्॥११॥
‘मुनि को देखते ही मेरे मन में भय-सा समा गया। मेरी जबान लड़खड़ाने लगी। कितने अक्षरों का उच्चारण नहीं हो पाता था। इस प्रकार अस्पष्ट वाणी में मैंने बोलने का प्रयास किया॥११॥
मनसः कर्म चेष्टाभिरभिसंस्तभ्य वाग्बलम्।
आचचक्षे त्वहं तस्मै पुत्रव्यसनजं भयम्॥१२॥
‘मानसिक भय को बाहरी चेष्टाओं से दबाकर मैंने कुछ कहने की क्षमता प्राप्त की और मुनि पर पुत्र की मृत्यु से जो संकट आ पड़ा था, वह उन पर प्रकट करते हुए कहा— ॥१२॥
क्षत्रियोऽहं दशरथो नाहं पुत्रो महात्मनः।
सज्जनावमतं दुःखमिदं प्राप्तं स्वकर्मजम्॥१३॥
“महात्मन्! मैं आपका पुत्र नहीं, दशरथ नाम का एक क्षत्रिय हूँ। मैंने अपने कर्मवश यह ऐसा दुःख पाया है, जिसकी सत्पुरुषों ने सदा निन्दा की है॥ १३॥
भगवंश्चापहस्तोऽहं सरयूतीरमागतः।
जिघांसुः श्वापदं किंचिन्निपाने वागतं गजम्॥ १४॥
“भगवन्! मैं धनुष-बाण लेकर सरयू के तट पर आया था। मेरे आने का उद्देश्य यह था कि कोई जंगली हिंसक पशु अथवा हाथी घाट पर पानी पीने के लिये आवे तो मैं उसे मारूँ ॥१४॥
ततः श्रुतो मया शब्दो जले कुम्भस्य पूर्यतः।
द्विपोऽयमिति मत्वाहं बाणेनाभिहतो मया॥१५॥
“थोड़ी देर बाद मुझे जल में घड़ा भरने का शब्द सुनायी पड़ा। मैंने समझा कोई हाथी आकर पानी पी रहा है, इसलिये उस पर बाण चला दिया॥ १५ ॥
गत्वा तस्यास्ततस्तीरमपश्यमिषुणा हृदि।
विनिर्भिन्नं गतप्राणं शयानं भुवि तापसम्॥१६॥
“फिर सरयू के तट पर जाकर देखा कि मेरा बाण एक तपस्वी की छाती में लगा है और वे मृतप्राय होकर धरती पर पड़े हैं॥ १६॥
ततस्तस्यैव वचनादुपेत्य परितप्यतः।
स मया सहसा बाण उद्धृतो मर्मतस्तदा ॥१७॥
“उस बाण से उन्हें बड़ी पीड़ा हो रही थी, अतः उस समय उन्हीं के कहने से मैंने सहसा वह बाण उनके मर्म-स्थान से निकाल दिया॥१७॥
स चोद्धृतेन बाणेन सहसा स्वर्गमास्थितः।
भगवन्तावुभौ शोचन्नन्धाविति विलप्य च॥ १८॥
“बाण निकलने के साथ ही वे तत्काल स्वर्ग सिधार गये। मरते समय उन्होंने आप दोनों पूजनीय अंधे पिता-माता के लिये बड़ा शोक और विलाप किया था॥ १८॥
अज्ञानाद् भवतः पुत्रः सहसाभिहतो मया।
शेषमेवं गते यत् स्यात् तत् प्रसीदतु मे मुनिः॥ १९॥
“इस प्रकार अनजान में मेरे हाथ से आपके पुत्र का वध हो गया है। ऐसी अवस्था मे मेरे प्रति जो शाप या अनुग्रह शेष हो, उसे देने के लिये आप महर्षि मुझ पर प्रसन्न हों’ ॥ १९॥
स तच्छ्रुत्वा वचः क्रूरं मया तदघशंसिना।
नाशकत् तीव्रमायासं स का भगवानृषिः॥२०॥
‘मैंने अपने मुँह से अपना पाप प्रकट कर दिया था, इसलिये मेरी क्रूरता से भरी हुई वह बात सुनकर भी वे पूज्यपाद महर्षि मुझे कठोर दण्ड-भस्म हो जाने का शाप नहीं दे सके॥२०॥
स बाष्पपूर्णवदनो निःश्वसन् शोकमूर्च्छितः।
मामुवाच महातेजाः कृताञ्जलिमुपस्थितम्॥ २१॥
“उनके मुख पर आँसुओं की धारा बह चली और वे शोक से मूर्च्छित होकर दीर्घ निःश्वास लेने लगे। मैं हाथ जोड़े उनके सामने खड़ा था। उस समय उन महातेजस्वी मुनि ने मुझसे कहा- ॥२१॥
यद्येतदशुभं कर्म न स्म मे कथयेः स्वयम्।
फलेन्मूर्धा स्म ते राजन् सद्यः शतसहस्रधा॥ २२॥
“राजन् ! यदि यह अपना पापकर्म तुम स्वयं यहाँ आकर न बताते तो शीघ्र ही तुम्हारे मस्तक के सैकड़ों-हजारों टुकड़े हो जाते॥ २२ ॥
क्षत्रियेण वधो राजन् वानप्रस्थे विशेषतः।
ज्ञानपूर्वं कृतः स्थानाच्च्यावयेदपि वज्रिणम॥ २३॥
“नरेश्वर! यदि क्षत्रिय जान-बूझकर विशेषतःकिसी वानप्रस्थीका वध कर डाले तो वह वज्रधारी इन्द्र ही क्यों न हो, वह उसे अपने स्थानसे भ्रष्ट कर देता है।
सप्तधा तु भवेन्मूर्धा मुनौ तपसि तिष्ठति।
ज्ञानाद् विसृजतः शस्त्रं तादृशे ब्रह्मवादिनि॥ २४॥
“तपस्या में लगे हुए वैसे ब्रह्मवादी मुनि पर जानबूझकर शस्त्र का प्रहार करने वाले पुरुष के मस्तक के सात टुकड़े हो जाते हैं॥ २४ ॥
अज्ञानाद्धि कृतं यस्मादिदं ते तेन जीवसे।
अपि ह्यकुशलं न स्याद् राघवाणां कुतो भवान्॥ २५॥
“तुमने अनजान में यह पाप किया है, इसीलिये अभीतक जीवित हो। यदि जान-बूझकर किया होता तो समस्त रघुवंशियों का कुल ही नष्ट हो जाता, अकेले तुम्हारी तो बात ही क्या है ?’ ॥ २५ ॥
नय नौ नृप तं देशमिति मां चाभ्यभाषत।
अद्य तं द्रष्टुमिच्छावः पुत्रं पश्चिमदर्शनम्॥२६॥
“उन्होंने मुझसे यह भी कहा—’नरेश्वर! तुम हम दोनों को उस स्थान पर ले चलो, जहाँ हमारा पुत्र मरा पड़ा है। इस समय हम उसे देखना चाहते हैं। यह हमारे लिये उसका अन्तिम दर्शन होगा’॥२६॥
रुधिरेणावसिक्ताङ्गं प्रकीर्णाजिनवाससम्।
शयानं भुवि निःसंज्ञं धर्मराजवशं गतम्॥२७॥
अथाहमेकस्तं देशं नीत्वा तौ भृशदुःखितौ।
अस्पर्शयमहं पुत्रं तं मुनिं सह भार्यया॥२८॥
‘तब मैं अकेला ही अत्यन्त दुःख में पड़े हुए उन दम्पति को उस स्थानपर ले गया, जहाँ उनका पुत्र काल के अधीन होकर पृथ्वी पर अचेत पड़ा था। उसके सारे अङ्ग खून से लथपथ हो रहे थे, मृगचर्म और वस्त्र बिखरे पड़े थे। मैंने पत्नीसहित मुनि को उनके पुत्र के शरीर का स्पर्श कराया॥ २७-२८॥
तौ पुत्रमात्मनः स्पृष्ट्वा तमासाद्य तपस्विनौ।
निपेततः शरीरेऽस्य पिता चैनमुवाच ह॥२९॥
‘वे दोनों तपस्वी अपने उस पुत्र का स्पर्श करके उसके अत्यन्त निकट जाकर उसके शरीर पर गिर पड़े। फिर पिता ने पुत्र को सम्बोधित करके उससे कहा- ॥२९॥
नाभिवादयसे माद्य न च मामभिभाषसे।
किं च शेषे तु भूमौ त्वं वत्स किं कुपितो ह्यसि॥ ३०॥
“बेटा ! आज तुम मुझे न तो प्रणाम करते हो और न मुझसे बोलते ही हो। तुम धरती पर क्यों सो रहे हो? क्या तुम हमसे रूठ गये हो? ॥ ३० ॥
नन्वहं तेऽप्रियः पुत्र मातरं पश्य धार्मिकीम्।
किं च नालिङ्गसे पुत्र सुकुमार वचो वद॥३१॥
“बेटा! यदि मैं तुम्हारा प्रिय नहीं हूँ तो तुम अपनी इस धर्मात्मा माता की ओर तो देखो। तुम इसके हृदय से क्यों नहीं लग जाते हो? वत्स! कुछ तो बोलो॥३१॥
कस्य वा पररात्रेऽहं श्रोष्यामि हृदयङ्गमम्।
अधीयानस्य मधुरं शास्त्रं वान्यद् विशेषतः॥ ३२॥
“अब पिछली रात में मधुर स्वर से शास्त्र या पुराण आदि अन्य किसी ग्रन्थ का विशेष रूप से स्वाध्याय करते हुए किसके मुँह से मैं मनोरम शास्त्रचर्चा सुनूँगा? ॥ ३२॥
को मां संध्यामुपास्यैव स्नात्वा हुतहुताशनः।
श्लाघयिष्यत्युपासीनः पुत्रशोकभर्यादितम्॥ ३३॥
“अब कौन स्नान, संध्योपासना तथा अग्निहोत्र करके मेरे पास बैठकर पुत्रशोक के भय से पीड़ित हुए मुझ बूढ़े को सान्त्वना देता हुआ मेरी सेवा करेगा?॥ ३३॥
कन्दमूलफलं हृत्वा यो मां प्रियमिवातिथिम्।
भोजयिष्यत्यकर्मण्यमप्रग्रहमनायकम्॥३४॥
“अब कौन ऐसा है, जो कन्द, मूल और फल लाकर मुझ अकर्मण्य, अन्नसंग्रह से रहित और अनाथ को प्रिय अतिथि की भाँति भोजन करायेगा॥ ३४॥
इमामन्धां च वृद्धां च मातरं ते तपस्विनीम्।
कथं पुत्र भरिष्यामि कृपणां पुत्रगर्धिनीम्॥३५॥
“बेटा! तुम्हारी यह तपस्विनी माता अन्धी, बूढ़ी, दीन तथा पुत्र के लिये उत्कण्ठित रहने वाली है। मैं (स्वयं अन्धा होकर) इसका भरण-पोषण कैसे करूँगा?॥
तिष्ठ मा मा गमः पुत्र यमस्य सदनं प्रति।
श्वो मया सह गन्तासि जनन्या च समेधितः॥ ३६॥
“पुत्र ! ठहरो, आज यमराज के घर न जाओ। कल मेरे और अपनी माता के साथ चलना॥३६॥
उभावपि च शोकार्तावनाथौ कृपणौ वने।
क्षिप्रमेव गमिष्यावस्त्वया हीनौ यमक्षयम्॥३७॥
“हम दोनों शोक से आर्त, अनाथ और दीन हैं। तुम्हारे न रहने पर हम शीघ्र ही यमलोक की राह लेंगे।
ततो वैवस्वतं दृष्ट्वा तं प्रवक्ष्यामि भारतीम्।
क्षमतां धर्मराजो मे बिभृयात् पितरावयम्॥३८॥
“तदनन्तर सूर्यपुत्र यमराज का दर्शन करके मैं उनसे यह बात कहूँगा-धर्मराज मेरे अपराध को क्षमा करें और मेरे पुत्र को छोड़ दें, जिससे यह अपने माता-पिता का भरण-पोषण कर सके॥ ३८॥
दातुमर्हति धर्मात्मा लोकपालो महायशाः।
ईदृशस्य ममाक्षय्यामेकामभयदक्षिणाम्॥३९॥
“ये धर्मात्मा हैं, महायशस्वी लोकपाल हैं। मुझ जैसे अनाथ को वह एक बार अभय दान दे सकते हैं॥३९॥
अपापोऽसि यथा पुत्र निहतः पापकर्मणा।
तेन सत्येन गच्छाशु ये लोकास्त्वस्त्रयोधिनाम्॥ ४०॥
यां हि शूरा गतिं यान्ति संग्रामेष्वनिर्वितनः।
हतास्त्वभिमुखाः पुत्र गतिं तां परमां व्रज॥४१॥
“बेटा! तुम निष्पाप हो, किंतु एक पापकर्माक्षत्रिय ने तुम्हारा वध किया है, इस कारण मेरे सत्य के प्रभाव से तुम शीघ्र ही उन लोकों में जाओ, जो अस्त्रयोधी शूरवीरों को प्राप्त होते हैं। बेटा! युद्ध में पीठ न दिखाने वाले शूरवीर सम्मुख युद्ध में मारे जाने पर जिस गति को प्राप्त होते हैं, उसी उत्तम गति को तुम भी जाओ॥ ४०-४१॥
यां गतिं सगरः शैब्यो दिलीपो जनमेजयः।
नहुषो धुन्धुमारश्च प्राप्तास्तां गच्छ पुत्रक॥४२॥
‘वत्स! राजा सगर, शैब्य, दिलीप, जनमेजय, नहुष और धुन्धुमार जिस गति को प्राप्त हुए हैं, वही तुम्हें भी मिले॥ ४२ ॥
या गतिः सर्वभूतानां स्वाध्यायात् तपसश्च या।
भूमिदस्याहिताग्नेश्च एकपत्नीव्रतस्य च॥४३॥
गोसहस्रप्रदातॄणां गुरुसेवाभृतामपि।
देहन्यासकृतां या च तां गतिं गच्छ पुत्रक॥४४॥
“स्वाध्याय और तपस्या से समस्त प्राणियों के आश्रयभूत जिस परब्रह्म की प्राप्ति होती है, वही तुम्हें भी प्राप्त हो। वत्स! भूमिदाता, अग्निहोत्री, एकपत्नीव्रती, एक हजार गौओं का दान करने वाले, गुरु की सेवा करने वाले तथा महाप्रस्थान आदि के द्वारा देहत्याग करने वाले पुरुषों को जो गति मिलती है, वही तुम्हें भी प्राप्त हो॥
नहि त्वस्मिन् कुले जातो गच्छत्यकुशलां गतिम्।
स तु यास्यति येन त्वं निहतो मम बान्धवः॥ ४५॥
“हम-जैसे तपस्वियों के इस कुल में पैदा हुआ कोई पुरुष बुरी गति को नहीं प्राप्त हो सकता। बुरी गति तो उसकी होगी, जिसने मेरे बान्धवरूप तुम्हें अकारण मारा है?’ ॥ ४५॥
एवं स कृपणं तत्र पर्यदेवयतासकृत्।
ततोऽस्मै कर्तुमुदकं प्रवृत्तः सह भार्यया॥४६॥
‘इस प्रकार वे दीनभाव से बारम्बार विलाप करने लगे। तत्पश्चात् अपनी पत्नी के साथ वे पुत्र को जलाञ्जलि देने के कार्य में प्रवृत्त हुए॥ ४६॥
स तु दिव्येन रूपेण मुनिपुत्रः स्वकर्मभिः।
स्वर्गमध्यारुहत् क्षिप्रं शक्रेण सह धर्मवित्॥ ४७॥
‘इसी समय वह धर्मज्ञ मुनिकुमार अपने पुण्यकर्मो के प्रभाव से दिव्य रूप धारण करके शीघ्र ही इन्द्र के साथ स्वर्ग को जाने लगा॥४७॥
आबभाषे च तौ वृद्धौ शक्रेण सह तापसः।
आश्वस्य च मुहूर्तं तु पितरं वाक्यमब्रवीत्॥ ४८॥
‘इन्द्रसहित उस तपस्वी ने अपने दोनों बूढ़े पिता माता को एक मुहूर्त तक आश्वासन देते हुए उनसे बातचीत की; फिर वह अपने पिता से बोला—॥ ४८॥
स्थानमस्मि महत् प्राप्तो भवतोः परिचारणात्।
भवन्तावपि च क्षिप्रं मम मूलमुपैष्यथः॥४९॥
“मैं आप दोनों की सेवा से महान् स्थान को प्राप्त हुआ हूँ, अब आप लोग भी शीघ्र ही मेरे पास आ जाइयेगा’ ॥ ४९॥
एवमुक्त्वा तु दिव्येन विमानेन वपुष्मता।
आरुरोह दिवं क्षिप्रं मुनिपुत्रो जितेन्द्रियः॥५०॥
‘यह कहकर वह जितेन्द्रिय मुनिकुमार उस सुन्दर आकार वाले दिव्य विमान से शीघ्र ही देवलोक को चला गया॥५०॥
स कृत्वाथोदकं तूर्णं तापसः सह भार्यया।
मामुवाच महातेजाः कृताञ्जलिमुपस्थितम्॥ ५१॥
‘तदनन्तर पत्नीसहित उन महातेजस्वी तपस्वी मुनि ने तुरंत ही पुत्र को जलाञ्जलि देकर हाथ जोड़े खड़े हुए मुझसे कहा- ॥५१॥
अद्यैव जहि मां राजन् मरणे नास्ति मे व्यथा।
यः शरेणैकपुत्रं मां त्वमकार्षीरपुत्रकम्॥५२॥
“राजन्! तुम आज ही मुझे भी मार डालो; अब मरने में मुझे कष्ट नहीं होगा। मेरे एक ही बेटा था, जिसे तुमने अपने बाण का निशाना बनाकर मुझे पुत्रहीन कर दिया॥५२॥
त्वयापि च यदज्ञानान्निहतो मे स बालकः।
तेन त्वामपि शप्स्येऽहं सुदुःखमतिदारुणम्॥ ५३॥
“तुमने अज्ञानवश जो मेरे बालक की हत्या की है, उसके कारण मैं तुम्हें भी अत्यन्त भयंकर एवं भलीभाँति दुःख देने वाला शाप दूंगा॥ ५३॥
पुत्रव्यसनजं दुःखं यदेतन्मम साम्प्रतम्।
एवं त्वं पुत्रशोकेन राजन् कालं करिष्यसि॥ ५४॥
‘राजन् ! इस समय पुत्र के वियोग से मुझे जैसा कष्ट हो रहा है, ऐसा ही तुम्हें भी होगा। तुम भी पुत्रशोक से ही काल के गाल में जाओगे॥ ५४॥
अज्ञानात्तु हतो यस्मात् क्षत्रियेण त्वया मुनिः।
तस्मात् त्वां नाविशत्याशु ब्रह्महत्या नराधिप॥
त्वामप्येतादृशो भावः क्षिप्रमेव गमिष्यति।
जीवितान्तकरो घोरो दातारमिव दक्षिणाम्॥ ५६॥
“नरेश्वर! क्षत्रिय होकर अनजान में तुमने वैश्यजातीय मुनि का वध किया है, इसलिये शीघ्र ही तुम्हें ब्रह्महत्या का पाप तो नहीं लगेगा तथापि जल्दी ही तुम्हें भी ऐसी ही भयानक और प्राण लेने वाली अवस्था प्राप्त होगी। ठीक उसी तरह, जैसे दक्षिणा देने वाले दाता को उसके अनुरूप फल प्राप्त होता है, ॥ ५५-५६॥
एवं शापं मयि न्यस्य विलप्य करुणं बहु।
चितामारोप्य देहं तन्मिथुनं स्वर्गमभ्ययात्॥५७॥
‘इस प्रकार मुझे शाप देकर वे बहुत देर तक करुणाजनक विलाप करते रहे; फिर वे दोनों पति पत्नी अपने शरीरों को जलती हुई चिता में डालकर स्वर्ग को चले गये॥ ५७॥
तदेतच्चिन्तयानेन स्मृतं पापं मया स्वयम्।
तदा बाल्यात् कृतं देवि शब्दवेध्यनुकर्षिणा॥ ५८॥
‘देवि! इस प्रकार बालस्वभाव के कारण मैंने पहले शब्दवेधी बाण मारकर और फिर उस मुनि के शरीर से बाण को खींचकर जो उनका वधरूपी पाप किया था, वह आज इस पुत्रवियोग की चिन्ता में पड़े हुए मुझे स्वयं ही स्मरण हो आया है॥ ५८॥
तस्यायं कर्मणो देवि विपाकः समुपस्थितः।
अपथ्यैः सह सम्भूक्ते व्याधिरन्नरसे यथा॥५९॥
तस्मान्मामागतं भद्रे तस्योदारस्य तद् वचः।
‘देवि! अपथ्य वस्तुओं के साथ अन्नरस ग्रहण कर लेने पर जैसे शरीर में रोग पैदा हो जाता है, उसी प्रकार यह उस पापकर्म का फल उपस्थित हुआ है। अतः कल्याणि! उन उदार महात्माका शापरूपी वचन इस समय मेरे पास फल देने के लिये आ गया है’ ॥ ५९ १/२॥
इत्युक्त्वा स रुदंस्त्रस्तो भार्यामाह तु भूमिपः॥ ६०॥
यदहं पुत्रशोकेन संत्यजिष्यामि जीवितम्।
चक्षुर्त्यां त्वां न पश्यामि कौसल्ये त्वं हि मां स्पृश॥६१॥
ऐसा कहकर वे भूपाल मृत्यु के भय से त्रस्त हो अपनी पत्नी से रोते हुए बोले-‘कौसल्ये! अब मैं पुत्रशोक से अपने प्राणों का त्याग करूँगा। इस समय मैं तुम्हें अपनी आँखों से देख नहीं पाता हूँ; तुम मेरा स्पर्श करो॥ ६०-६१॥
यमक्षयमनुप्राप्ता द्रक्ष्यन्ति नहि मानवाः।
यदि मां संस्पृशेद् रामः सकृदन्वारभेत वा॥ ६२॥
धनं वा यौवराज्यं वा जीवेयमिति मे मतिः।
‘जो मनुष्य यमलोक में जाने वाले (मरणासन्न) होते हैं, वे अपने बान्धवजनों को नहीं देख पाते हैं।यदि श्रीराम आकर एक बार मेरा स्पर्श करें अथवा यह धन-वैभव और युवराज पद स्वीकार कर लें तो मेरा विश्वास है कि मैं जी सकता हूँ॥ ६२ १/२॥
न तन्मे सदृशं देवि यन्मया राघवे कृतम्॥६३॥
सदृशं तत्तु तस्यैव यदनेन कृतं मयि।
‘देवि! मैंने श्रीराम के साथ जो बर्ताव किया है, वह मेरे योग्य नहीं था; परंतु श्रीराम ने मेरे साथ जो व्यवहार किया है, वह सर्वथा उन्हीं के योग्य है॥ ६३ १/२॥
दुर्वृत्तमपि कः पुत्रं त्यजेद् भुवि विचक्षणः॥ ६४॥
कश्च प्रव्राज्यमानो वा नासूयेत् पितरं सुतः।
‘कौन बुद्धिमान् पुरुष इस भूतलपर अपने दुराचारी पुत्र का भी परित्याग कर सकता है ? (एक मैं हूँ, जिसने अपने धर्मात्मा पुत्र को त्याग दिया) तथा कौन ऐसा पुत्र है, जिसे घर से निकाल दिया जाय और वह पिता को कोसे तक नहीं? (परंतु श्रीराम चुपचाप चले गये उन्होंने मेरे विरुद्ध एक शब्द भी नहीं कहा)। ६४ १/२॥
चक्षुषा त्वां न पश्यामि स्मृतिर्मम विलुप्यते॥ ६५॥
दूता वैवस्वतस्यैते कौसल्ये त्वरयन्ति माम्।
‘कौसल्ये! अब मेरी आँखें तुम्हें नहीं देख पाती हैं, स्मरण-शक्ति भी लुप्त होती जा रही है। उधर देखो, ये यमराज के दूत मुझे यहाँ से ले जाने के लिये उतावले हो उठे हैं॥ ६५ १/२॥
अतस्तु किं दुःखतरं यदहं जीवितक्षये॥६६॥
नहि पश्यामि धर्मज्ञं रामं सत्यपराक्रमम्।
‘इससे बढ़कर दुःख मेरे लिये और क्या हो सकता है कि मैं प्राणान्त के समय सत्यपराक्रमी धर्मज्ञ राम का दर्शन नहीं पा रहा हूँ॥६६ १/२॥
तस्यादर्शनजः शोकः सुतस्याप्रतिकर्मणः॥६७॥
उच्छोषयति वै प्राणान् वारि स्तोकमिवातपः।
‘जिनकी समता करने वाला संसार में दूसरा कोई नहीं है, उन प्रिय पुत्र श्रीराम के न देखने का शोक मेरे प्राणों को उसी तरह सुखाये डालता है, जैसे धूप थोड़े-से जल को शीघ्र सुखा देती है॥६७ १/२ ॥ न
ते मनुष्या देवास्ते ये चारुशुभकुण्डलम्॥ ६८॥
मुखं द्रक्ष्यन्ति रामस्य वर्षे पञ्चदशे पुनः।
‘वे मनुष्य नहीं देवता हैं, जो आपके पंद्रहवें वर्ष वन से लौटने पर श्रीराम का सुन्दर मनोहर कुण्डलों से अलंकृत मुख देखेंगे॥ ६८ १/२॥
पद्मपत्रेक्षणं सुभ्र सुदंष्ट्रं चारुनासिकम्॥६९॥
धन्या द्रक्ष्यन्ति रामस्य ताराधिपसमं मखम्।
‘जो कमल के समान नेत्र, सुन्दर भौहें, स्वच्छ दाँत और मनोहर नासिका से सुशोभित श्रीराम के चन्द्रोपम मुख का दर्शन करेंगे, वे धन्य हैं॥ ६९ १/२ ॥
सदृशं शारदस्येन्दोः फुल्लस्य कमलस्य च॥ ७०॥
सुगन्धि मम रामस्य धन्या द्रक्ष्यन्ति ये मुखम्।
निवृत्तवनवासं तमयोध्यां पुनरागतम्॥ ७१॥
द्रक्ष्यन्ति सुखिनो रामं शुक्रं मार्गगतं यथा।
‘जो मेरे श्रीरामके शरच्चन्द्रसदृश मनोहर और प्रफुल्ल कमलके समान सुवासित मुखका दर्शन करेंगे, वे धन्य हैं। जैसे मूढ़ता आदि अवस्थाओं को त्यागकर अपने उच्च मार्ग में स्थित शुक्र का दर्शन करके लोग सुखी होते हैं, उसी प्रकार वनवास की अवधि पूरी करके पुनः अयोध्या में लौटकर आये हुए श्रीराम को जो लोग देखेंगे वे ही सुखी होंगे॥ ७०-७१ १/२॥
कौसल्ये चित्तमोहेन हृदयं सीदतेतराम्॥७२॥
वेदये न च संयुक्तान् शब्दस्पर्शरसानहम्।
‘कौसल्ये! मेरे चित्त पर मोह छा रहा है, हृदयविदीर्ण-सा हो रहा है, इन्द्रियों से संयोग होने पर भी मुझे शब्द, स्पर्श और रस आदि विषयों का अनुभव नहीं हो रहा है।
चित्तनाशाद् विपद्यन्ते सर्वाण्येवेन्द्रियाणि हि।
क्षीणस्नेहस्य दीपस्य संरक्ता रश्मयो यथा॥ ७३॥
‘जैसे तेल समाप्त हो जाने पर दीपक की अरुण प्रभा विलीन हो जाती है, उसी प्रकार चेतना के नष्ट होने से मेरी सारी इन्द्रियाँ ही नष्ट हो चली हैं॥७३॥
अयमात्मभवः शोको मामनाथमचेतनम्।
संसाधयति वेगेन यथा कूलं नदीरयः॥७४॥
‘जिस प्रकार नदी का वेग अपने ही किनारे को काट गिराता है, उसी प्रकार मेरा अपना ही उत्पन्न किया हुआ शोक मुझे वेगपूर्वक अनाथ और अचेत किये दे रहा है। ७४॥
हा राघव महाबाहो हा ममायासनाशन।
हा पितृप्रिय मे नाथ हा ममासि गतः सुत॥७५॥
‘हा महाबाहु रघुनन्दन! हा मेरे कष्टों को दूर करने वाले श्रीराम ! हा पिता के प्रिय पुत्र! हा मेरे नाथ! हा मेरे बेटे ! तुम कहाँ चले गये? ॥ ७५ ॥
हा कौसल्ये न पश्यामि हा सुमित्रे तपस्विनि।
हा नृशंसे ममामित्रे कैकेयि कुलपांसनि॥७६॥
‘हा कौसल्ये! अब मुझे कुछ नहीं दिखायी देता। हा तपस्विनि सुमित्रे! अब मैं इस लोक से जा रहा हूँ।हा मेरी शत्रु, क्रूर, कुलाङ्गार कैकेयि! (तेरी कुटिल इच्छा पूरी हुई)’॥ ७६॥
इति मातुश्च रामस्य सुमित्रायाश्च संनिधौ।
राजा दशरथः शोचञ्जीवितान्तमुपागमत्॥७७॥
इस प्रकार श्रीराम-माता कौसल्या और सुमित्रा के निकट शोकपूर्ण विलाप करते हुए राजा दशरथ के जीवन का अन्त हो गया॥ ७७॥
तथा तु दीनः कथयन् नराधिपः प्रियस्य पुत्रस्य विवासनातुरः।
गतेऽर्धरात्रे भृशदुःखपीडितस्तदा जहौ प्राणमुदारदर्शनः ॥७८॥
अपने प्रिय पुत्र के वनवास से शोकाकुल हुए राजा दशरथ इस प्रकार दीनतापूर्ण वचन कहते हुए आधी रात बीतते-बीतते अत्यन्त दुःख से पीड़ित हो गये और उसी समय उन उदारदर्शी नरेश ने अपने प्राणों को त्याग दिया॥ ७८॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतुःषष्टितमः सर्गः॥ ६४॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में चौंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६४॥
सर्ग-65
अथ रात्र्यां व्यतीतायां प्रातरेवापरेऽहनि।
वन्दिनः पर्युपातिष्ठस्तत्पार्थिवनिवेशनम्॥१॥
तदनन्तर रात बीतने पर दूसरे दिन सबेरे ही वन्दीजन (महाराज की स्तुति करने के लिये) राजमहल में उपस्थित हुए॥१॥
सूताः परमसंस्कारा मागधाश्चोत्तमश्रुताः।
गायकाः श्रुतिशीलाश्च निगदन्तः पृथक्पृथक्॥ २॥
व्याकरण-ज्ञान से सम्पन्न (अथवा उत्तम अलङ्कारों से विभूषित) सूत, उत्तम रूप से वंशपरम्परा का श्रवण कराने वाले मागध और सङ्गीतशास्त्र का अनुशीलन करने वाले गायक अपने अपने मार्ग के अनुसार पृथक्-पृथक् यशोगान करते हुए वहाँ आये॥२॥
राजानं स्तुवतां तेषामुदात्ताभिहिताशिषाम्।
प्रासादाभोगविस्तीर्णः स्तुतिशब्दो ह्यवर्तत॥३॥
उच्चस्वर से आशीर्वाद देते हुए राजा की स्तुति करने वाले उन सूत-मागध आदि का शब्द राजमहलों के भीतरी भाग में फैलकर गूंजने लगा॥३॥
ततस्तु स्तुवतां तेषां सूतानां पाणिवादकाः।
अपदानान्युदाहृत्य पाणिवादान्यवादयन्॥४॥
वे सूतगण स्तुति कर रहे थे; इतने ही में पाणिवादक (हाथों से ताल देकर गाने वाले) वहाँ आये और राजाओं के बीते हुए अद्भुत कर्मों का बखान करते हुए तालगति के अनुसार तालियाँ बजाने लगे॥४॥
तेन शब्देन विहगाः प्रतिबुद्धाश्च सस्वनुः।
शाखास्थाः पञ्जरस्थाश्च ये राजकुलगोचराः॥
उस शब्द से वृक्षों की शाखाओं पर बैठे हुए तथा राजकुल में ही विचरने वाले पिंजड़े में बंद शुक आदि पक्षी जागकर चहचहाने लगे॥५॥
व्याहृताःपुण्यशब्दाश्च वीणानां चापि निःस्वनाः।
आशीर्गेयं च गाथानां पूरयामास वेश्म तत्॥६॥
शुक आदि पक्षियों तथा ब्राह्मणों के मुख से निकले हुए पवित्र शब्द, वीणाओं के मधुर नाद तथा गाथाओं के आशीर्वादयुक्त गान से वह सारा भवन गूंज उठा॥६॥
ततः शुचिसमाचाराः पर्युपस्थानकोविदाः।
स्त्रीवर्षवरभूयिष्ठा उपतस्थुर्यथापुरा॥७॥
तदनन्तर सदाचारी तथा परिचर्याकुशल सेवक, जिनमें स्त्रियों और खोजों की संख्या अधिक थी, पहले की भाँति उस दिन भी राजभवन में उपस्थित हुए॥७॥
हरिचन्दनसम्पृक्तमुदकं काञ्चनैर्घटैः।
आनिन्युः स्नानशिक्षाज्ञा यथाकालं यथाविधि॥ ८॥
स्नानविधि के ज्ञाता भृत्यजन विधि पूर्वक सोने के घड़ों में चन्दनमिश्रित जल लेकर ठीक समय पर आये॥ ८॥
मङ्गलालम्भनीयानि प्राशनीयान्युपस्करान्।
उपानिन्युस्तथा पुण्याः कुमारीबहुलाः स्त्रियः॥ ९॥
पवित्र आचार-विचार वाली स्त्रियाँ, जिनमें कुमारी कन्याओं की संख्या अधिक थी, मङ्गल के लिये स्पर्श करने योग्य गौ आदि, पीने योग्य गङ्गाजल आदि तथा अन्य उपकरण-दर्पण, आभूषण और वस्त्र आदि ले आयीं॥९॥
सर्वलक्षणसम्पन्नं सर्वं विधिवदर्चितम्।
सर्वं सुगुणलक्ष्मीवत् तदभूदाभिहारिकम्॥१०॥
प्रातःकाल राजाओं के मङ्गल के लिये जो-जो वस्तुएँ लायी जाती हैं, उनका नाम आभिहारिक है। वहाँ लायी गयी सारी आभिहारिक सामग्री समस्त शुभ लक्षणों से सम्पन्न, विधि के अनुरूप, आदर और प्रशंसा के योग्य उत्तम गुण से युक्त तथा शोभायमान थी॥ १०॥
ततः सूर्योदयं यावत् सर्वं परिसमुत्सुकम्।
तस्थावनुपसम्प्राप्तं किंस्विदित्युपशङ्कितम्॥११॥
सूर्योदय होने तक राजा की सेवा के लिये उत्सुक हआ सारा परिजन वर्ग वहाँ आकर खड़ा हो गया। जब उस समय तक राजा बाहर नहीं निकले, तब सबके मन में यह शङ्का हो गयी कि महाराज के न आने का क्या कारण हो सकता है ? ॥ ११ ॥
अथ याः कोसलेन्द्रस्य शयनं प्रत्यनन्तराः।
ताः स्त्रियस्तु समागम्य भर्तारं प्रत्यबोधयन्॥ १२॥
तदनन्तर जो कोसलनरेश दशरथके समीप रहने वाली स्त्रियाँ थीं, वे उनकी शय्या के पास जाकर अपने स्वामी को जगाने लगीं ॥ १२ ॥
अथाप्युचितवृत्तास्ता विनयेन नयेन च।
नह्यस्य शयनं स्पृष्ट्वा किंचिदप्युपलेभिरे ॥१३॥
वे स्त्रियाँ उनका स्पर्श आदि करने के योग्य थीं; अतः विनीतभाव से युक्तिपूर्वक उन्होंने उनकी शय्या का स्पर्श किया। स्पर्श करके भी वे उनमें जीवन का कोई चिह्न नहीं पा सकीं॥ १३॥
ताः स्त्रियः स्वप्नशीलज्ञाश्चेष्टां संचलनादिषु।
ता वेपथुपरीताश्च राज्ञः प्राणेषु शङ्किताः॥१४॥
सोये हुए पुरुष की जैसी स्थिति होती है, उसको भी वे स्त्रियाँ अच्छी तरह समझती थीं; अतः उन्होंने हृदय एवं हाथ के मूलभाग में चलने वाली नाड़ियों की भी परीक्षा की, किंतु वहाँ भी कोई चेष्टा नहीं प्रतीत हुई फिर तो वे काँप उठीं। उनके मन में राजा के प्राणों के निकल जाने की आशङ्का हो गयी॥ १४॥
प्रतिस्रोतस्तृणाग्राणां सदृशं संचकाशिरे।
अथ संदेहमानानां स्त्रीणां दृष्ट्वा च पार्थिवम्।
यत् तदाशङ्कितं पापं तदा जज्ञे विनिश्चयः॥ १५॥
वे जल के प्रवाह के सम्मुख पड़े हुए तिनकों के अग्रभाग की भाँति काँपती हुई प्रतीत होने लगीं। संशय में पड़ी हुई उन स्त्रियों को राजा की ओर देखकर उनकी मृत्यु के विषय में जो शङ्का हुई थी, उसका उस समय उन्हें पूरा निश्चय हो गया।
कौसल्या च सुमित्रा च पुत्रशोकपराजिते।
प्रसुप्ते न प्रबुध्येते यथा कालसमन्विते॥१६॥
पुत्र शोक से आक्रान्त हुई कौसल्या और सुमित्रा उस समय मरी हुई के समान सो गयी थीं और उस समय तक उनकी नींद नहीं खुल पायी थी॥ १६॥
निष्प्रभासा विवर्णा च सन्ना शोकेन संनता।
न व्यराजत कौसल्या तारेव तिमिरावृता॥१७॥
सोयी हुई कौसल्या श्रीहीन हो गयी थीं। उनके शरीर का रंग बदल गया था। वे शोक से पराजित एवं पीड़ित हो अन्धकार से आच्छादित हुई तारिका के समान शोभा नहीं पा रही थीं॥ १७॥
कौसल्यानन्तरं राज्ञः सुमित्रा तदनन्तरम्।
न स्म विभ्राजते देवी शोकाश्रुलुलितानना॥ १८॥
राजा के पास कौसल्या थीं और कौसल्या के समीप देवी सुमित्रा थीं। दोनों ही निद्रामग्न हो जाने के कारण शोभाहीन प्रतीत होती थीं। उन दोनों के मुख पर शोक के आँसू फैले हुए थे॥ १८॥
ते च दृष्ट्वा तदा सुप्ते उभे देव्यौ च तं नृपम्।
सुप्तमेवोद्गतप्राणमन्तःपुरममन्यत॥१९॥
उस समय उन दोनों देवियों को निद्रामग्न देख अन्तःपुर की अन्य स्त्रियों ने यही समझा कि सोते अवस्था में ही महाराज के प्राण निकल गये हैं।॥ १९॥
ततः प्रचुक्रुशुर्दीनाः सस्वरं ता वराङ्गनाः।
करेणेव इवारण्ये स्थानप्रच्युतयूथपाः॥२०॥
फिर तो जैसे जंगल में यूथपति गजराज के अपने वासस्थान से अन्यत्र चले जाने पर हथिनियाँ करुणचीत्कार करने लगती हैं, उसी प्रकार वे अन्तःपुर की सुन्दरी रानियाँ अत्यन्त दुःखी हो उच्चस्वर से आर्तनाद करने लगीं॥ २०॥
तासामाक्रन्दशब्देन सहसोद्गतचेतने।
कौसल्या च सुमित्रा च त्यक्तनिद्रे बभूवतुः॥ २१॥
उनके रोने की आवाज से कौसल्या और सुमित्रा की भी नींद टूट गयी और वे दोनों सहसा जाग उठीं॥ २१॥
कौसल्या च सुमित्रा च दृष्ट्वा स्पृष्ट्वा च पार्थिवम्।
हा नाथेति परिक्रुश्य पेततुर्धरणीतले॥२२॥
कौसल्या और सुमित्रा ने राजा को देखा, उनके शरीर का स्पर्श किया और ‘हा नाथ!’ की पुकार मचाती हुई वे दोनों रानियाँ पृथ्वी पर गिर पड़ीं॥ २२॥
सा कोसलेन्द्रदुहिता चेष्टमाना महीतले।
न भ्राजते रजोध्वस्ता तारेव गगनच्युता॥२३॥
कोसलराजकुमारी कौसल्या धरती पर लोटने और छटपटाने लगीं। उनका धूलि-धूसरित शरीर शोभाहीन दिखायी देने लगा, मानो आकाश से टूटकर गिरी हुई कोई तारा धूल में लोट रही हो॥ २३॥
नृपे शान्तगुणे जाते कौसल्यां पतितां भुवि।
अपश्यंस्ताः स्त्रियः सर्वा हतां नागवधूमिव॥ २४॥
राजा दशरथके शरीरकी उष्णता शान्त हो गयी थी। इस प्रकार उनका जीवन शान्त हो जानेपर भूमिपर अचेत पड़ी हुई कौसल्याको अन्तःपुरकी उन सारी स्त्रियोंने मरी हुई नागिनके समान देखा ॥ २४॥
ततः सर्वा नरेन्द्रस्य कैकेयीप्रमुखाः स्त्रियः।
रुदन्त्यः शोकसंतप्ता निपेतुर्गतचेतनाः॥२५॥
तदनन्तर पीछे आयी हुई महाराज की कैकेयी आदि सारी रानियाँ शोक से संतप्त होकर रोने लगी औरअचेत होकर गिर पड़ीं॥ २५॥
ताभिः स बलवान् नादः क्रोशन्तीभिरनुद्रुतः।
येन स्फीतीकृतो भूयस्तद् गृहं समनादयत्॥२६॥
उन क्रन्दन करती हुई रानियों ने वहाँ पहले से होने वाले प्रबल आर्तनाद को और भी बढ़ा दिया। उस बढ़े हुए आर्तनाद से वह सारा राजमहल पुनः बड़े जोर से गूंज उठा॥
तत् परित्रस्तसम्भ्रान्तपर्युत्सुकजनाकुलम्।
सर्वतस्तुमुलाक्रन्दं परितापार्तबान्धवम्॥२७॥
सद्योनिपतितानन्दं दीनं विक्लवदर्शनम्।
बभूव नरदेवस्य सद्म दिष्टान्तमीयुषः॥ २८॥
कालधर्म को प्राप्त हुए राजा दशरथ का वह भवन डरे, घबराये और अत्यन्त उत्सुक हुए मनुष्यों से भर गया। सब ओर रोने-चिल्लाने का भयंकर शब्द होने लगा। वहाँ राजा के सभी बन्धु-बान्धव शोक-संताप से पीड़ित होकर जुट गये। वह सारा भवन तत्काल आनन्दशून्य हो दीन-दुःखी एवं व्याकुल दिखायी देने लगा।। २७-२८॥
अतीतमाज्ञाय तु पार्थिवर्षभं यशस्विनं तं परिवार्य पत्नयः।
भृशं रुदन्त्यः करुणं सुदुःखिताः प्रगृह्य बाहू व्यलपन्ननाथवत्॥२९॥
उन यशस्वी भूपालशिरोमणि को दिवङ्गत हुआ जान उनकी सारी पत्नियाँ उन्हें चारों ओर से घेरकर अत्यन्त दुःखी हो जोर-जोर से रोने लगी और उनकी दोनों बाँहें पकड़कर अनाथ की भाँति करुण-विलाप करने लगीं॥ २९॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चषष्टितमः सर्गः॥ ६५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में पैंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ।६५॥
सर्ग-66
तमग्निमिव संशान्तमम्बुहीनमिवार्णवम्।
गतप्रभमिवादित्यं स्वर्गस्थं प्रेक्ष्य भूमिपम्॥१॥
कौसल्या बाष्पपूर्णाक्षी विविधं शोककर्शिता।
उपगृह्य शिरो राज्ञः कैकेयीं प्रत्यभाषत॥२॥
बुझी हुई आग, जलहीन समुद्र तथा प्रभाहीन सूर्य की भाँति शोभाहीन हुए दिवङ्गत राजा का शव देखकर कौसल्या के नेत्रों में आँसू भर आये। वे अनेक प्रकार से शोकाकुल होकर राजा के मस्तक को गोद में ले कैकेयी से इस प्रकार बोलीं- ॥ १-२॥
सकामा भव कैकेयी भुक्ष्व राज्यमकण्टकम्।
त्यक्त्वा राजानमेकाना नृशंसे दुष्टचारिणि॥३॥
‘दुराचारिणी क्रूर कैकेयी! ले, तेरी कामना सफल हुई। अब राजा को भी त्यागकर एकाग्रचित्त हो अपना अकण्टक राज्य भोग॥३॥
विहाय मां गतो रामो भर्ता च स्वर्गतो मम।
विपथे सार्थहीनेव नाहं जीवितुमुत्सहे॥४॥
‘राम मुझे छोड़कर वन में चले गये और मेरे स्वामी स्वर्ग सिधारे। अब मैं दुर्गम मार्ग में साथियों से बिछुड़कर असहाय हुई अबला की भाँति जीवित नहीं रह सकती॥
भर्तारं तु परित्यज्य का स्त्री दैवतमात्मनः।
इच्छेज्जीवितुमन्यत्र कैकेय्यास्त्यक्तधर्मणः॥५॥
‘नारीधर्म को त्याग देने वाली कैकेयी के सिवा संसार में दूसरी कौन ऐसी स्त्री होगी जो अपने लिये आराध्य देवस्वरूप पति का परित्याग करके जीना चाहेगी? ॥ ५॥
न लुब्धो बुध्यते दोषान् किंपाकमिव भक्षयन्।
कुब्जानिमित्तं कैकेय्या राघवाणां कुलं हतम्॥
‘जैसे कोई धन का लोभी दूसरों को विष खिला देता है और उससे होने वाले हत्या के दोषों पर ध्यान नहीं देता, उसी प्रकार इस कैकेयी ने कुब्जा के कारण रघुवंशियों के इस कुल का नाश कर डाला॥ ६॥
अनियोगे नियुक्तेन राज्ञा रामं विवासितम्।
सभार्यं जनकः श्रुत्वा परितप्स्यत्यहं यथा॥७॥
‘कैकेयी ने महाराज को अयोग्य कार्य में लगाकर उनके द्वारा पत्नीसहित श्रीराम को वनवास दिलवा दिया। यह समाचार जब राजा जनक सुनेंगे, तब मेरे ही समान उनको भी बड़ा कष्ट होगा।॥ ७॥
स मामनाथां विधवां नाद्य जानाति धार्मिकः।
रामः कमलपत्राक्षो जीवन्नाशमितो गतः॥८॥
‘मैं अनाथ और विधवा हो गयी—यह बात मेरे धर्मात्मा पुत्र कमलनयन श्रीराम को नहीं मालूम है। वे तो यहाँ से जीते-जी अदृश्य हो गये हैं॥८॥
विदेहराजस्य सुता तथा चारुतपस्विनी।
दुःखस्यानुचिता दुःखं वने पर्युद्धिजिष्यति॥९॥
‘पति-सेवारूप मनोहर तप करने वाली विदेहराजकुमारी सीता दुःख भोगने के योग्य नहीं है। वह वन में दुःखका अनुभव करके उद्विग्न हो उठेगी॥ ९॥
नदतां भीमघोषाणां निशासु मृगपक्षिणाम्।
निशम्यमाना संत्रस्ता राघवं संश्रयिष्यति॥१०॥
‘रात के समय भयानक शब्द करने वाले पशुपक्षियों की बोली सुनकर भयभीत हो सीता श्रीराम की ही शरण लेगी- उन्हीं की गोद में जाकर छिपेगी॥ १०॥
वृद्धश्चैवाल्पपुत्रश्च वैदेहीमनुचिन्तयन्।
सोऽपि शोकसमाविष्टो नूनं त्यक्ष्यति जीवितम्॥ ११॥
‘जो बूढ़े हो गये हैं, कन्याएँ मात्र ही जिनकी संतति हैं, वे राजा जनक भी सीता की ही बारम्बार चिन्ता करते हुए शोक में डूबकर अवश्य ही अपने प्राणों का परित्याग कर देंगे॥ ११ ॥
साहमयैव दिष्टान्तं गमिष्यामि पतिव्रता।
इदं शरीरमालिङ्ग्य प्रवेक्ष्यामि हुताशनम्॥१२॥
‘मैं भी आज ही मृत्यु का वरण करूँगी। एक पतिव्रता की भाँति पति के शरीर का आलिङ्गन करके चिता की आग में प्रवेश कर जाऊँगी’ ॥ १२ ॥
तां ततः सम्परिष्वज्य विलपन्तीं तपस्विनीम्।
व्यपनिन्युः सुदुःखार्ता कौसल्यां व्यावहारिकाः॥ १३॥
पति के शरीर को हृदय से लगाकर अत्यन्त दुःख से आर्त हो करुण विलाप करती हुई तपस्विनी कौसल्या को राजकाज देखने वाले मन्त्रियों ने दूसरी स्त्रियों द्वारा वहाँ से हटवा दिया॥ १३ ॥
तैलद्रोण्यां तदामात्याः संवेश्य जगतीपतिम्।
राज्ञः सर्वाण्यथादिष्टाश्चक्रुः कर्माण्यनन्तरम्॥ १४॥
फिर उन्होंने महाराज के शरीर को तेल से भरी हुई नाव में रखकर वसिष्ठ आदि की आज्ञा के अनुसार शव की रक्षा आदि अन्य सब राजकीय कार्यों की सँभाल आरम्भ कर दी॥१४॥
न तु संकालनं राज्ञो विना पुत्रेण मन्त्रिणः।
सर्वज्ञाः कर्तुमीषुस्ते ततो रक्षन्ति भूमिपम्॥१५॥
वे सर्वज्ञ मन्त्री पुत्र के बिना राजा का दाह-संस्कार न कर सके, इसलिये उनके शव की रक्षा करने लगे।
तैलद्रोण्यां शायितं तं सचिवैस्तु नराधिपम्।
हा मृतोऽयमिति ज्ञात्वा स्त्रियस्ताः पर्यदेवयन्॥ १६॥
जब मन्त्रियों ने राजा के शव को तैल की नाव में सुलाया, तब यह जानकर सारी रानियाँ ‘हाय! येमहाराज परलोकवासी हो गये’ ऐसा कहती हुई पुनः विलाप करने लगीं॥ १६॥
बाहूनुच्छ्रित्य कृपणा नेत्रप्रस्रवणैर्मुखैः।
रुदत्यः शोकसंतप्ताः कृपणं पर्यदेवयन्॥१७॥
उनके मुखपर नेत्रों से आँसुओं के झरने झर रहे थे। वे अपनी भुजाओं को ऊपर उठाकर दीनभाव से रोने और शोकसंतप्त हो दयनीय विलाप करने लगीं। १७॥
हा महाराज रामेण सततं प्रियवादिना।
विहीनाः सत्यसंधेन किमर्थं विजहासि नः॥१८॥
वे बोलीं—’हा महाराज! हम सत्यप्रतिज्ञ एवं सदा प्रिय बोलने वाले अपने पुत्र श्रीराम से तो बिछुड़ी ही थीं, अब आप भी क्यों हमारा परित्याग कर रहे हैं?॥ १८॥
कैकेय्या दुष्टभावाया राघवेण विवर्जिताः।
कथं सपत्न्या वत्स्यामः समीपे विधवा वयम्॥ १९॥
‘श्रीराम से बिछुड़कर हम सब विधवाएँ इस दुष्ट विचार वाली सौत कैकेयी के समीप कैसे रहेंगी?॥ १९॥
स हि नाथः स चास्माकं तव च प्रभुरात्मवान्।
वनं रामो गतः श्रीमान् विहाय नृपतिश्रियम्॥ २०॥
‘जो हमारे और आपके भी रक्षक और प्रभु थे,वे मनस्वी श्रीरामचन्द्र राजलक्ष्मी को छोड़कर वन चले गये॥
त्वया तेन च वीरेण विना व्यसनमोहिताः।
कथं वयं निवत्स्यामः कैकेय्या च विदूषिताः॥ २१॥
‘वीरवर श्रीराम और आपके भी न रहने से हमारे ऊपर बड़ा भारी संकट आ गया, जिससे हम मोहित हो रही हैं। अब सौत कैकेयी के द्वारा तिरस्कृत हो हम यहाँ कैसे रह सकेंगी? ॥ २१॥
यया च राजा रामश्च लक्ष्मणश्च महाबलः।
सीतया सह संत्यक्ताः सा कमन्यं न हास्यति॥ २२॥
‘जिसने राजा का तथा सीतासहित श्रीराम और महाबली लक्ष्मण का भी परित्याग कर दिया, वह दूसरे किसका त्याग नहीं करेगी? ॥ २२ ॥
ता बाष्पेण च संवीताः शोकेन विपुलेन च।
व्यचेष्टन्त निरानन्दा राघवस्य वरस्त्रियः॥२३॥
रघुकुलनरेश दशरथ की वे सुन्दरी रानियाँ महान् शोक से ग्रस्त हो आँसू बहाती हुई नाना प्रकार की चेष्टाएँ और विलाप कर रही थीं। उनका आनन्द लुट गया था।
निशा नक्षत्रहीनेव स्त्रीव भर्तृविवर्जिता।
पुरी नाराजतायोध्या हीना राज्ञा महात्मना ॥२४॥
महामना राजा दशरथ से हीन हुई वह अयोध्यापुरी नक्षत्रहीन रात्रि और पतिविहीना नारी की भाँति श्रीहीन हो गयी थी॥ २४॥
बाष्पपर्याकुलजना हाहाभूतकुलाङ्गना।
शून्यचत्वरवेश्मान्ता न बभ्राज यथापुरम्॥ २५॥
नगर के सभी मनुष्य आँसू बहा रहे थे। कुलवती स्त्रियाँ हाहाकार कर रही थीं। चौराहे तथा घरों के द्वार सूने दिखायी देते थे। (वहाँ झाड-बुहार, लीपने-पोतने तथा बलि अर्पण करने आदि की क्रियाएँ नहीं होती थीं।) इस प्रकार वह पुरी पहले की भाँति शोभा नहीं पाती थी॥
गते तु शोकात् त्रिदिवं नराधिपे महीतलस्थासु नृपाङ्गनासु च।
निवृत्तचारः सहसा गतो रविः प्रवृत्तचारा रजनी ह्युपस्थिता ॥२६॥
राजा दशरथ शोक वश स्वर्ग सिधारे और उनकी रानियाँ शोक से ही भूतल पर लोटती रहीं। इस शोक में ही सहसा सूर्य की किरणों का प्रचार बंद हो गया और सूर्यदेव अस्त हो गये। तत्पश्चात् अन्धकार का प्रचार करती हुई रात्रि उपस्थित हुई॥ २६ ॥
ऋते तु पुत्राद् दहनं महीपते रोचयंस्ते सुहृदः समागताः।
इतीव तस्मिन् शयने न्यवेशयन् विचिन्त्य राजानमचिन्त्यदर्शनम्॥२७॥
वहाँ पधारे हुए सुहृदों ने किसी भी पुत्र के बिना राजा का दाह-संस्कार होना नहीं पसंद किया। अब राजा का दर्शन अचिन्त्य हो गया, यह सोचते हुए उन सबने उस तैलपूर्ण कड़ाह में उनके शव को सुरक्षित रख दिया॥२७॥
गतप्रभा द्यौरिव भास्करं विना व्यपेतनक्षत्रगणेव शर्वरी।
पुरी बभासे रहिता महात्मना कण्ठास्रकण्ठाकुलमार्गचत्वरा ॥२८॥
सूर्य के बिना प्रभाहीन आकाश तथा नक्षत्रों के बिना शोभाहीन रात्रि की भाँति अयोध्यापुरी महात्मा राजा दशरथ से रहित हो श्रीहीन प्रतीत होती थी। उसकी सड़कों और चौराहों पर आँसुओं से अवरुद्ध कण्ठवाले मनुष्यों की भीड़ एकत्र हो गयी थी॥ २८॥
नराश्च नार्यश्च समेत्य संघशो विगर्हमाणा भरतस्य मातरम्।
तदा नगर्यां नरदेवसंक्षये बभूवुरार्ता न च शर्म लेभिरे॥२९॥
झुंड-के-झुंड स्त्री और पुरुष एक साथ खड़े होकर भरत-माता कैकेयी की निन्दा करने लगे। उस समय महाराज की मृत्यु से अयोध्यापुरी में रहने वाले सभी लोग शोकाकुल हो रहे थे। कोई भी शान्ति नहीं पाता था। २९॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे षट्षष्टितमः सर्गः॥६६॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में छाछठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥६६॥
सर्ग-67
आक्रन्दिता निरानन्दा सास्रकण्ठजनाविला।
अयोध्यायामवतता सा व्यतीयाय शर्वरी॥१॥
अयोध्या में लोगों की वह रात रोते-कलपते ही बीती। उसमें आनन्द का नाम भी नहीं था। आँसुओं से सब लोगों के कण्ठ भरे हुए थे। दुःख के कारण वह रात सबको बड़ी लम्बी प्रतीत हुई थी॥१॥
व्यतीतायां तु शर्वर्यामादित्यस्योदये ततः।
समेत्य राजकर्तारः सभामीयुर्द्विजातयः॥२॥
जब रात बीत गयी और सूर्योदय हुआ, तब राज्य का प्रबन्ध करने वाले ब्राह्मणलोग एकत्र हो दरबार में आये॥२॥
मार्कण्डेयोऽथ मौद्गल्यो वामदेवश्च कश्यपः।
कात्यायनो गौतमश्च जाबालिश्च महायशाः॥
एते द्विजाः सहामात्यैः पृथग्वाचमुदीरयन्।
वसिष्ठमेवाभिमुखाः श्रेष्ठं राजपुरोहितम्॥४॥
मार्कण्डेय, मौद्गल्य, वामदेव, कश्यप, कात्यायन, गौतम और महायशस्वी जाबालि—ये सभी ब्राह्मणश्रेष्ठ राजपुरोहित वसिष्ठजी के सामने बैठकर मन्त्रियों के साथ अपनी अलग-अलग राय देने लगे॥३-४॥
अतीता शर्वरी दुःखं या नो वर्षशतोपमा।
अस्मिन् पञ्चत्वमापन्ने पुत्रशोकेन पार्थिवे॥५॥
वे बोले—’पुत्रशोक से इन महाराज के स्वर्गवासी होने के कारण यह रात बड़े दुःख से बीती है, जो हमारे लिये सौ वर्षों के समान प्रतीत हुई थी॥५॥
स्वर्गस्थश्च महाराजो रामश्चारण्यमाश्रितः।
लक्ष्मणश्चापि तेजस्वी रामेणैव गतः सह॥६॥
‘महाराज दशरथ स्वर्ग सिधारे, श्रीरामचन्द्रजी वन में रहने लगे और तेजस्वी लक्ष्मण भी श्रीराम के साथ ही चले गये॥६॥
उभौ भरतशत्रुघ्नौ केकयेषु परंतपौ।
पुरे राजगृहे रम्ये मातामहनिवेशने॥७॥
‘शत्रुओं को संताप देने वाले दोनों भाई भरत और शत्रुघ्न केकयदेश के रमणीय राजगृह में नाना के घर में निवास करते हैं ।। ७॥
इक्ष्वाकूणामिहाचैव कश्चिद् राजा विधीयताम्।
अराजकं हि नो राष्ट्रं विनाशं समवाप्नुयात्॥८॥
‘इक्ष्वाकुवंशी राजकुमारों में से किसी को आज ही यहाँ का राजा बनाया जाय; क्योंकि राजा के बिना हमारे इस राज्य का नाश हो जायगा॥ ८॥
नाराजके जनपदे विद्युन्माली महास्वनः।
अभिवर्षति पर्जन्यो महीं दिव्येन वारिणा॥९॥
‘जहाँ कोई राजा नहीं होता, ऐसे जनपद में विद्युन्मालाओं से अलंकृत महान् गर्जन करने वाला मेघ पृथ्वी पर दिव्य जल की वर्षा नहीं करता है॥९॥
नाराजके जनपदे बीजमुष्टिः प्रकीर्यते।
नाराजके पितुः पुत्रो भार्या वा वर्तते वशे॥१०॥
‘जिस जनपद में कोई राजा नहीं, वहाँ के खेतों में मुट्ठी-के-मुट्ठी बीज नहीं बिखेरे जाते। राजा से रहित देश में पुत्र पिता और स्त्री पति के वश में नहीं रहती॥ १०॥
अराजके धनं नास्ति नास्ति भार्याप्यराजके।
इदमत्याहितं चान्यत् कुतः सत्यमराजके॥११॥
‘राजहीन देश में धन अपना नहीं होता है। बिना राजा के राज्य में पत्नी भी अपनी नहीं रह पाती है। राजारहित देश में यह महान् भय बना रहता है। (जब वहाँ पति-पत्नी आदि का सत्य सम्बन्ध नहीं रह सकता,) तब फिर दूसरा कोई सत्य कैसे रह सकता है? ॥ ११॥
नाराजके जनपदे कारयन्ति सभां नराः।
उद्यानानि च रम्याणि हृष्टाः पुण्यगृहाणि च॥ १२॥
‘बिना राजा के राज्य में मनुष्य कोई पञ्चायत-भवन नहीं बनवाते, रमणीय उद्यान का भी निर्माण नहीं करवाते तथा हर्ष और उत्साह के साथ पुण्यगृह (धर्मशाला, मन्दिर आदि) भी नहीं बनवाते हैं। १२ ।।
नाराजके जनपदे यज्ञशीला द्विजातयः।
सत्राण्यन्वासते दान्ता ब्राह्मणः संशितव्रताः॥ १३॥
‘जहाँ कोई राजा नहीं, उस जनपद में स्वभावतः यज्ञ करने वाले द्विज और कठोर व्रत का पालन करने वाले जितेन्द्रिय ब्राह्मण उन बड़े-बड़े यज्ञों का अनुष्ठान नहीं करते, जिनमें सभी ऋत्विज् और सभी यजमान होते हैं।
नाराजके जनपदे महायज्ञेषु यज्वनः।
ब्राह्मणा वसुसम्पूर्णा विसृजन्त्याप्तदक्षिणाः॥ १४॥
‘राजारहित जनपद में कदाचित् महायज्ञों का आरम्भ हो भी तो उनमें धनसम्पन्न ब्राह्मण भी ऋत्विजों को पर्याप्त दक्षिणा नहीं देते (उन्हें भय रहता है कि लोग हमें धनी समझकर लूट न लें)॥१४॥
नाराजके जनपदे प्रहृष्टनटनर्तकाः।
उत्सवाश्च समाजाश्च वर्धन्ते राष्ट्रवर्धनाः ॥१५॥
‘अराजक देश में राष्ट्र को उन्नतिशील बनाने वाले उत्सव, जिनमें नट और नर्तक हर्ष में भरकर अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं, बढ़ने नहीं पाते हैं तथा दूसरे-दूसरे राष्ट्रहितकारी संघ भी नहीं पनपने पाते हैं। १५॥
नाराजके जनपदे सिद्धार्था व्यवहारिणः।
कथाभिरभिरज्यन्ते कथाशीलाः कथाप्रियैः॥ १६॥
‘बिना राजा के राज्य में वादी और प्रतिवादी के विवाद का संतोषजनक निपटारा नहीं हो पाता अथवा व्यापारियों को लाभ नहीं होता। कथा सुनने की इच्छा वाले लोग कथावाचक पौराणिकों की कथाओं से प्रसन्न नहीं होते॥
नाराजके जनपदे तूद्यानानि समागताः।
सायाह्ने क्रीडितुं यान्ति कुमार्यो हेमभूषिताः॥ १७॥
‘राजारहित जनपद में सोने के आभूषणों से विभूषित हुई कुमारियाँ एक साथ मिलकर संध्या के समय उद्यानों में क्रीड़ा करने के लिये नहीं जाती हैं॥ १७॥
नाराजके जनपदे धनवन्तः सुरक्षिताः।
शेरते विवृतद्वाराः कृषिगोरक्षजीविनः॥१८॥
‘बिना राजा के राज्य में धनीलोग सुरक्षित नहीं रह पाते तथा कृषि और गोरक्षा से जीवन-निर्वाह करने वाले वैश्य भी दरवाजा खोलकर नहीं सो पाते हैं।॥ १८॥
नाराजके जनपदे वाहनैः शीघ्रवाहिभिः।
नरा निर्यान्त्यरण्यानि नारीभिः सह कामिनः॥ १९॥
‘राजा से रहित जनपद में कामी मनुष्य नारियों के साथ शीघ्रगामी वाहनों द्वारा वनविहार के लिये नहीं निकलते हैं॥ १९॥
नाराजके जनपदे बद्धघण्टा विषाणिनः।
अटन्ति राजमार्गेषु कुञ्जराः षष्टिहायनाः॥२०॥
‘जहाँ कोई राजा नहीं होता, उस जनपद में साठ वर्ष के दन्तार हाथी घंटे बाँधकर सड़कों पर नहीं घूमते हैं।॥ २०॥
नाराजके जनपदे शरान् संततमस्यताम्।
श्रूयते तलनिर्घोष इष्वस्त्राणामुपासने॥२१॥
‘बिना राजा के राज्य में धनुर्विद्या के अभ्यासकाल में निरन्तर लक्ष्य की ओर बाण चलाने वाले वीरों की प्रत्यञ्चा तथा करतल का शब्द नहीं सुनायी देता है। २१॥
नाराजके जनपदे वणिजो दूरगामिनः।
गच्छन्ति क्षेममध्वानं बहुपण्यसमाचिताः॥२२॥
‘राजा से रहित जनपद में दूर जाकर व्यापार करने वाले वणिक् बेचने की बहुत-सी वस्तुएँ साथ लेकर कुशलपूर्वक मार्ग तै नहीं कर सकते॥ २२ ॥
नाराजके जनपदे चरत्येकचरो वशी।
भावयन्नात्मनाऽऽत्मानं यत्र सायं गृहो मुनिः॥ २३॥
‘जहाँ कोई राजा नहीं होता, उस जनपद में जहाँ संध्या हो वहीं डेरा डाल देने वाला, अपने अन्तःकरण के द्वारा परमात्मा का ध्यान करनेवाला और अकेला ही विचरने वाला जितेन्द्रिय मुनि नहीं घूमता-फिरता है (क्योंकि उसे कोई भोजन देने वाला नहीं होता) ॥ २३॥
नाराजके जनपदे योगक्षेमः प्रवर्तते।
न चाप्यराजके सेना शत्रून् विषहते युधि॥ २४॥
‘अराजक देश में लोगों को अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति और प्राप्त वस्तु की रक्षा नहीं हो पाती। राजा के न रहने पर सेना भी युद्ध में शत्रुओं का सामना नहीं करती॥ २४॥
नाराजके जनपदे हृष्टैः परमवाजिभिः।
नराः संयान्ति सहसा रथैश्च प्रतिमण्डिताः॥ २५॥
‘बिना राजा के राज्य में लोग वस्त्राभूषणों से विभूषित हो हृष्ट-पुष्ट उत्तम घोड़ों तथा रथों द्वारा सहसा यात्रा नहीं करते हैं (क्योंकि उन्हें लुटेरों का भय बना रहता हैं )॥
नाराजके जनपदे नराः शास्त्रविशारदाः।
संवदन्तोपतिष्ठन्ते वनेषूपवनेषु वा ॥२६॥
‘राजा से रहित राज्य में शास्त्रों के विशिष्ट विद्वान् मनुष्य वनों और उपवनों में शास्त्रों की व्याख्या करते हुए नहीं ठहर पाते हैं ॥ २६॥
नाराजके जनपदे माल्यमोदकदक्षिणाः।
देवताभ्यर्चनार्थाय कल्प्यन्ते नियतैर्जनैः॥२७॥
‘जहाँ अराजकता फैल जाती है, उस जनपद में मन को वश में रखने वाले लोग देवताओं की पूजा के लिये फूल, मिठाई और दक्षिणा की व्यवस्था नहीं करते हैं ॥ २७॥
नाराजके जनपदे चन्दनागुरुरूषिताः।
राजपुत्रा विराजन्ते वसन्ते इव शाखिनः॥ २८॥
‘जिस जनपद में कोई राजा नहीं होता है, वहाँचन्दन और अगुरु का लेप लगाये हुए राजकुमार वसन्त-ऋतु के खिले हुए वृक्षों की भाँति शोभा नहीं पाते हैं॥२८॥
यथा ह्यनुदका नद्यो यथा वाप्यतृणं वनम्।
अगोपाला यथा गावस्तथा राष्ट्रमराजकम्॥२९॥
‘जैसे जल के बिना नदियाँ, घास के बिना वन और ग्वालों के बिना गौओं की शोभा नहीं होती, उसी प्रकार राजा के बिना राज्य शोभा नहीं पाता है॥ २९॥
ध्वजो रथस्य प्रज्ञानं धूमो ज्ञानं विभावसोः।
तेषां यो नो ध्वजो राजा स देवत्वमितो गतः॥ ३०॥
‘जैसे ध्वज रथ का ज्ञान कराता है और धूम अग्नि का बोधक होता है, उसी प्रकार राजकाज देखने वाले हमलोगों के अधिकार को प्रकाशित करने वाले जो महाराज थे, वे यहाँ से देवलोक को चले गये॥३०॥
नाराजके जनपदे स्वकं भवति कस्यचित।
मत्स्या इव जना नित्यं भक्षयन्ति परस्परम्॥ ३१॥
‘राजा के न रहने पर राज्य में किसी भी मनुष्य की कोई भी वस्तु अपनी नहीं रह जाती। जैसे मत्स्य एक-दूसरे को खा जाते हैं, उसी प्रकार अराजक देश के लोग सदा एक-दूसरे को खाते-लूटते-खसोटते रहते हैं॥३१॥
ये हि सम्भिन्नमर्यादा नास्तिकाश्छिन्नसंशयाः।
तेऽपि भावाय कल्पन्ते राजदण्डनिपीडिताः॥ ३२॥
‘जो वेद-शास्त्रों की तथा अपनी-अपनी जाति के लिये नियत वर्णाश्रम की मर्यादा को भङ्ग करने वाले नास्तिक मनुष्य पहले राजदण्ड से पीड़ित होकर दबे रहते थे, वे भी अब राजा के न रहने से निःशङ्क होकर अपना प्रभुत्व प्रकट करेंगे॥ ३२॥
यथा दृष्टिः शरीरस्य नित्यमेव प्रवर्तते।
तथा नरेन्द्रो राष्ट्रस्य प्रभवः सत्यधर्मयोः॥३३॥
‘जैसे दृष्टि सदा ही शरीर के हित में प्रवृत्त रहती है, उसी प्रकार राजा राज्य के भीतर सत्य और धर्म का प्रवर्तक होता है॥ ३३॥
राजा सत्यं च धर्मश्च राजा कुलवतां कुलम्।
राजा माता पिता चैव राजा हितकरो नृणाम्॥ ३४॥
‘राजा ही सत्य और धर्म है। राजा ही कुलवानों का कुल है। राजा ही माता और पिता है तथा राजा ही मनुष्यों का हित करने वाला है॥३४॥
यमो वैश्रवणः शक्रो वरुणश्च महाबलः।
विशिष्यन्ते नरेन्द्रेण वृत्तेन महता ततः॥ ३५॥
‘राजा अपने महान् चरित्र के द्वारा यम, कुबेर, इन्द्र और महाबली वरुण से भी बढ़ जाते हैं (यमराज केवल दण्ड देते हैं, कुबेर केवल धन देते हैं, इन्द्र केवल पालन करते हैं और वरुण केवल सदाचार में नियन्त्रित करते हैं; परंतु एक श्रेष्ठ राजा में ये चारों गुण मौजूद होते हैं। अतः वह इनसे बढ़ जाता है) ॥ ३५ ॥
अहो तम इवेदं स्यान्न प्रज्ञायेत किंचन।
राजा चेन्न भवेल्लोके विभजन् साध्वसाधुनी॥ ३६॥
‘यदि संसारमें भले-बुरे का विभाग करने वाला राजा न हो तो यह सारा जगत् अन्धकार से आच्छन्न-सा हो जाय, कुछ भी सूझ न पड़े॥ ३६॥
जीवत्यपि महाराजे तवैव वचनं वयम्।
नातिक्रमामहे सर्वे बेलां प्राप्येव सागरः॥ ३७॥
‘वसिष्ठजी! जैसे उमड़ता हुआ समुद्र अपनी तटभूमि तक पहुँचकर उससे आगे नहीं बढ़ता, उसी प्रकार हम सब लोग महाराज के जीवनकाल में भी केवल आपकी ही बात का उल्लङ्घन नहीं करते थे। ३७॥
स नः समीक्ष्य द्विजवर्य वृत्तं नृपं विना राष्ट्रमरण्यभूतम्।
कुमारमिक्ष्वाकुसुतं तथान्यं त्वमेव राजानमिहाभिषेचय॥ ३८॥
‘अतः विप्रवर! इस समय हमारे व्यवहार को देखकर तथा राजा के अभाव में जंगल बने हुए इस देशपर दृष्टिपात करके आप ही किसी इक्ष्वाकुवंशी राजकुमार को अथवा दूसरे किसी योग्य पुरुष को राजा के पदपर अभिषिक्त कीजिये’॥ ३८॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्तषष्टितमः सर्गः॥ ६७॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में सरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥६७॥
सर्ग-68
तेषां तद् वचनं श्रुत्वा वसिष्ठः प्रत्युवाच ह।
मित्रामात्यजनान् सर्वान् ब्राह्मणांस्तानिदं वचः॥
मार्कण्डेय आदि के ऐसे वचन सुनकर महर्षि वसिष्ठ ने मित्रों, मन्त्रियों और उन समस्त ब्राह्मणों को इस प्रकार उत्तर दिया- ॥१॥
यदसौ मातुलकुले दत्तराज्यः परं सुखी।
भरतो वसति भ्रात्रा शत्रुघ्नेन मुदान्वितः॥२॥
‘राजा दशरथ ने जिनको राज्य दिया है, वे भरत इस समय अपने भाई शत्रुघ्न के साथ मामा के यहाँ बड़े सुख और प्रसन्नता के साथ निवास करते हैं ॥२॥
तच्छीघ्रं जवना दूता गच्छन्तु त्वरितं हयैः।
आनेतुं भ्रातरौ वीरौ किं समीक्षामहे वयम्॥३॥
उन दोनों वीर बन्धुओं को बुलाने के लिये शीघ्र ही तेज चलने वाले दूत घोड़ों पर सवार होकर यहाँ से जायँ, इसके सिवा हमलोग और क्या विचार कर सकते हैं?’ ॥३॥
गच्छन्त्विति ततः सर्वे वसिष्ठं वाक्यमब्रुवन्।
तेषां तद् वचनं श्रुत्वा वसिष्ठो वाक्यमब्रवीत्॥ ४॥
इस पर सबने वसिष्ठजी से कहा—’हाँ, दूत अवश्य भेजे जायँ।’ उनका वह कथन सुनकर वसिष्ठजी ने दूतों को सम्बोधित करके कहा— ॥ ४॥
एहि सिद्धार्थ विजय जयन्ताशोकनन्दन।
श्रयतामितिकर्तव्यं सर्वानेव ब्रवीमि वः॥५॥
‘सिद्धार्थ! विजय! जयन्त! अशोक ! और नन्दन ! । तुम सब यहाँ आओ और तुम्हें जो काम करना है,उसे सुनो। मैं तुम सब लोगोंसे ही कहता हूँ॥ ५॥
पुरं राजगृहं गत्वा शीघ्रं शीघ्रजवैर्हयैः।
त्यक्तशोकैरिदं वाच्यः शासनाद् भरतो मम॥६॥
‘तुमलोग शीघ्रगामी घोड़ों पर सवार होकर तुरंत ही राजगृह नगर को जाओ और शोक का भाव न प्रकट करते हुए मेरी आज्ञा के अनुसार भरत से इस प्रकार कहो॥६॥
पुरोहितस्त्वां कुशलं प्राह सर्वे च मन्त्रिणः।
त्वरमाणश्च निर्याहि कृत्यमात्ययिकं त्वया॥७॥
‘कुमार! पुरोहित जी तथा समस्त मन्त्रियों ने आपसे कुशल-मङ्गल कहा है। अब आप यहाँ से शीघ्र ही चलिये। अयोध्या में आपसे अत्यन्त आवश्यक कार्य है।
मा चास्मै प्रोषितं रामं मा चास्मै पितरं मृतम्।
भवन्तः शंसिषुर्गत्वा राघवाणामितः क्षयम्॥८॥
‘भरत को श्रीरामचन्द्र के वनवास और पिता की मृत्यु का हाल मत बतलाना और इन परिस्थितियों के कारण रघुवंशियों के यहाँ जो कुहराम मचा हुआ है, इसकी चर्चा भी न करना॥ ८॥
कौशेयानि च वस्त्राणि भूषणानि वराणि च।
क्षिप्रमादाय राज्ञश्च भरतस्य च गच्छत॥९॥
‘केकयराज तथा भरत को भेंट देने के लिये रेशमीवस्त्र और उत्तम आभूषण लेकर तुमलोग यहाँ से शीघ्र चल दो’।
दत्तपथ्यशना दूता जग्मुः स्वं स्वं निवेशनम्।
केकयांस्ते गमिष्यन्तो हयानारुह्य सम्मतान्॥ १०॥
केकय देश को जाने वाले वे दूत रास्ते का खर्च ले अच्छे घोड़ों पर सवार हो अपने-अपने घर को गये। १०॥
ततः प्रास्थानिकं कृत्वा कार्यशेषमनन्तरम्।
वसिष्ठेनाभ्यनुज्ञाता दूताः संत्वरितं ययुः॥११॥
तदनन्तर यात्रा सम्बन्धी शेष तैयारी पूरी करके वसिष्ठजी की आज्ञा ले सभी दूत तुरंत वहाँ से प्रस्थित हो गये॥११॥
न्यन्तेनापरतालस्य प्रलम्बस्योत्तरं प्रति।
निषेवमाणास्ते जग्मुर्नदीं मध्येन मालिनीम्॥ १२॥
अपरताल नामक पर्वत के अन्तिम छोर अर्थात दक्षिण भाग और प्रलम्बगिरि के उत्तरभाग में दोनों पर्वतों के बीच से बहने वाली मालिनी नदी के तटपर होते हुए वे दूत आगे बढ़े॥ १२ ॥
ते हास्तिनपुरे गङ्गां तीर्वा प्रत्यङ्मुखा ययुः।
पाञ्चालदेशमासाद्य मध्येन कुरुजाङ्गलम्॥१३॥
हस्तिनापुर में गङ्गा को पार करके वे पश्चिम की ओर गये और पाञ्चाल देश में पहुँचकर कुरुजाङ्गल प्रदेश के बीच से होते हुए आगे बढ़ गये॥१३॥
सरांसि च सुफुल्लानि नदीश्च विमलोदकाः।
निरीक्षमाणा जग्मुस्ते दूताः कार्यवशाद्रुतम्॥ १४॥
मार्ग में सुन्दर फूलों से सुशोभित सरोवरों तथा निर्मल जलवाली नदियों का दर्शन करते हुए वे दूत कार्यवश तीव्र-गति से आगे बढ़ते गये॥१४॥
ते प्रसन्नोदकां दिव्यां नानाविहगसेविताम्।
उपातिजग्मुर्वेगेन शरदण्डां जलाकुलाम्॥१५॥
तदनन्तर वे स्वच्छ जल से सुशोभित, पानी से भरी हुई और भाँति-भाँति के पक्षियों से सेवित दिव्य नदी शरदण्डा के तट पर पहुँचकर उसे वेगपूर्वक लाँघ गये॥ १५॥
निकूलवृक्षमासाद्य दिव्यं सत्योपयाचनम्।
अभिगम्याभिवाद्यं तं कुलिङ्गां प्राविशन् पुरीम्॥ १६॥
शरदण्डा के पश्चिम तट पर एक दिव्य वृक्ष था, जिसपर किसी देवता का आवास था; इसीलिये वहाँ जो याचना की जाती थी, वह सत्य (सफल) होती थी, अतः उसका नाम सत्योपयाचन हो गया था। उस वन्दनीय वृक्ष के निकट पहुँचकर दूतों ने उसकी परिक्रमा की और वहाँ से आगे जाकर उन्होंने कुलिङ्गा नामक पुरी में प्रवेश किया॥
अभिकालं ततः प्राप्य तेजोऽभिभवनाच्च्युताः।
पितृपैतामहीं पुण्यां तेरुरिक्षुमती नदीम्॥१७॥
वहाँसे तेजोऽभिभवन नामक गाँव को पार करते हुए वे अभिकाल नामक गाँव में पहुँचे और वहाँ से आगे बढ़ने पर उन्होंने राजा दशरथ के पिता-पितामहों द्वारा सेवित पुण्यसलिला इक्षुमती नदी को पार किया॥ १७॥
अवेक्ष्याञ्जलिपानांश्च ब्राह्मणान् वेदपारगान्।
ययुर्मध्येन बालीकान् सुदामानं च पर्वतम्॥ १८॥
वहाँ केवल अञ्जलि भर जल पीकर तपस्या करने वाले वेदों के पारगामी ब्राह्मणों का दर्शन करके वे दत बालीक देश के मध्यभाग में स्थित सुदामा नामक पर्वत के पास जा पहुँचे॥ १८ ॥
विष्णोः पदं प्रेक्ष्यमाणा विपाशां चापि शाल्मलीम्।
नदीर्वापीतटाकानि पल्वलानि सरांसि च॥१९॥
पश्यन्तो विविधांश्चापि सिंहान् व्याघ्रान् मृगान् द्विपान्।
ययुः पथातिमहता शासनं भर्तुरीप्सवः॥२०॥
उस पर्वत के शिखर पर स्थित भगवान् विष्णु के चरणचिह्न का दर्शन करके वे विपाशा (व्यास) नदी और उसके तटवर्ती शाल्मली वृक्ष के निकट गये।वहाँ से आगे बढ़ने पर बहुत-सी नदियों, बावड़ियों, पोखरों, छोटे-तालाबों, सरोवरों तथा भाँति-भाँति के वन जन्तुओं—सिंह, व्याघ्र,मृग और हाथियों का दर्शन करते हुए वे दूत अत्यन्त विशाल मार्ग के द्वारा आगे बढ़ने लगे। वे अपने स्वामी की आज्ञा का शीघ्र पालन करनेकी इच्छा रखते थे॥ १९-२० ॥
ते श्रान्तवाहना दूता विकृष्टेन सता पथा।
गिरिव्रजं पुरवरं शीघ्रमासेदुरञ्जसा॥२१॥
उन दूतों के वाहन (घोड़े) चलते-चलते थक गये । थे। वह मार्ग बड़ी दूर का होने पर उपद्रव से रहित था।उसे तै करके सारे दूत शीघ्र ही बिना किसी कष्ट के श्रेष्ठ नगर गिरिव्रज में जा पहुँचे॥ २१॥
भर्तुः प्रियार्थं कुलरक्षणार्थं भर्तुश्च वंशस्य परिग्रहार्थम्।
अहेडमानास्त्वरया स्म दूता रात्र्यां तु ते तत्पुरमेव याताः॥ २२॥
अपने स्वामी (आज्ञा देनेवाले वसिष्ठजी) का प्रिय और प्रजावर्ग की रक्षा करने तथा महाराज दशरथ के वंशपरम्परागत राज्य को भरतजी से स्वीकार कराने के लिये सादर तत्पर हुए वे दूत बड़ी उतावली के साथ चलकर रात में ही उस नगर में जा पहुँचे॥ २२॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टषष्टितमः सर्गः॥६८॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में अरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६८॥
सर्ग-69
यामेव रात्रिं ते दताः प्रविशन्ति स्म तां पुरीम्।
भरतेनापि तां रात्रिं स्वप्नो दृष्टोऽयमप्रियः॥१॥
जिस रात में दूतों ने उस नगर में प्रवेश किया था, उससे पहली रात में भरत ने भी एक अप्रिय स्वप्न देखा था॥
व्युष्टामेव तु तां रात्रिं दृष्ट्वा तं स्वप्नमप्रियम्।
पुत्रो राजाधिराजस्य सुभृशं पर्यतप्यत॥२॥
रात बीतकर प्रायः सबेरा हो चला था तभी उस अप्रिय स्वप्न को देखकर राजाधिराज दशरथ के पुत्र भरत मन-ही-मन बहुत संतप्त हुए॥२॥
तप्यमानं तमाज्ञाय वयस्याः प्रियवादिनः।
आयासं विनयिष्यन्तः सभायां चक्रिरे कथाः॥
उन्हें चिन्तित जान उनके अनेक प्रियवादी मित्रों ने उनका मानसिक क्लेश दूर करने की इच्छा से एक गोष्ठी की और उसमें अनेक प्रकार की बातें करने लगे॥३॥
वादयन्ति तदा शान्तिं लासयन्त्यपि चापरे।
नाटकान्यपरे स्माहुर्हास्यानि विविधानि च॥४॥
कुछ लोग वीणा आदि बजाने लगे। दूसरे लोग उनके खेद की शान्ति के लिये नृत्य कराने लगे। दूसरे मित्रों ने नाना प्रकार के नाटकों का आयोजन किया, जिनमें हास्य रस की प्रधानता थी॥ ४॥
स तैर्महात्मा भरतः सखिभिः प्रियवादिभिः।
गोष्ठीहास्यानि कुर्वद्भिर्न प्राहृष्यत राघवः॥५॥
किंतु रघुकुलभूषण महात्मा भरत उन प्रियवादी मित्रों की गोष्ठी में हास्यविनोद करने पर भी प्रसन्न नहीं हुए॥५॥
तमब्रवीत् प्रियसखो भरतं सखिभिर्वृतम्।
सुहृद्भिः पर्युपासीनः किं सखे नानुमोदसे॥६॥
” तब सुहृदों से घिरकर बैठे हुए एक प्रिय मित्र ने मित्रों के बीच में विराजमान भरत से पूछा-‘सखे! तुम आज प्रसन्न क्यों नहीं होते हो?’॥ ६॥
एवं ब्रुवाणं सुहृदं भरतः प्रत्युवाच ह।
शृणु त्वं यन्निमित्तं मे दैन्यमेतदुपागतम्॥७॥
स्वप्ने पितरमद्राक्षं मलिनं मुक्तमूर्धजम्।
पतन्तमद्रिशिखरात् कलुषे गोमये ह्रदे॥८॥
– इस प्रकार पूछते हुए सुहृद् को भरत ने इस प्रकार उत्तर दिया—’मित्र! जिस कारण से मेरे मन में यह दैन्य आया है, वह बताता हूँ, सुनो। मैंने आज स्वप्न में अपने पिताजी को देखा है। उनका मुख मलिन था; बाल खुले हुए थे और वे पर्वत की चोटी से एक ऐसे गंदे गढे में गिर पड़े थे, जिसमें गोबर भरा हुआ था। ७-८॥
प्लवमानश्च मे दृष्टः स तस्मिन् गोमये ह्रदे।
पिबन्नञ्जलिना तैलं हसन्निव मुहुर्मुहुः॥९॥
‘मैंने उस गोबर के कुण्ड में उन्हें तैरते देखा था। वे अञ्जलि में तेल लेकर पी रहे थे और बारम्बार हँसते हुए-से प्रतीत होते थे॥९॥
ततस्तिलोदनं भुक्त्वा पुनः पुनरधःशिराः।
तैलेनाभ्यक्तसर्वाङ्गस्तैलमेवान्वगाहत॥१०॥
‘फिर उन्होंने तिल और भात खाया। इसके बाद उनके सारे शरीर में तेल लगाया गया और फिर वे सिर नीचे किये तैल में ही गोते लगाने लगे॥१०॥
स्वप्नेऽपि सागरं शुष्कं चन्द्रं च पतितं भुवि।
उपरुद्धां च जगतीं तमसेव समावृताम्॥११॥
‘स्वप्न में ही मैंने यह भी देखा है कि समुद्र सूख गया, चन्द्रमा पृथ्वी पर गिर पड़े हैं, सारी पृथ्वी उपद्रव से ग्रस्त और अन्धकार से आच्छादित-सी हो गयी है।॥ ११॥
औपवाह्यस्य नागस्य विषाणं शकलीकृतम्।
सहसा चापि संशान्ता ज्वलिता जातवेदसः॥ १२॥
‘महाराज की सवारी के काम में आने वाले हाथी का दाँत टूक-टूक हो गया है और पहले से प्रज्वलित होती हुई आग सहसा बुझ गयी है॥ १२॥
अवदीर्णां च पृथिवीं शुष्कांश्च विविधान् द्रुमान्।
अहं पश्यामि विध्वस्तान् सधूमांश्चैव पर्वतान्॥
‘मैंने यह भी देखा है कि पृथ्वी फट गयी है, नाना प्रकार के वृक्ष सूख गये हैं तथा पर्वत ढह गये हैं और उनसे धुआँ निकल रहा है॥ १३॥
पीठे कार्णायसे चैव निषष्ण्णं कृष्णवाससम्।
प्रहरन्ति स्म राजानं प्रमदाः कृष्णपिङ्गलाः॥ १४॥
‘काले लोहे की चौकी पर महाराज दशरथ बैठे हैं। उन्होंने काला ही वस्त्र पहन रखा है और काले एवं पिङ्गलवर्ण की स्त्रियाँ उनके ऊपर प्रहार करती हैं। १४॥
त्वरमाणश्च धर्मात्मा रक्तमाल्यानुलेपनः।
रथेन खरयुक्तेन प्रयातो दक्षिणामुखः॥१५॥
‘धर्मात्मा राजा दशरथ लाल रंग के फूलों की माला पहने और लाल चन्दन लगाये गधे जुते हुए रथ पर बैठकर बड़ी तेजी के साथ दक्षिण दिशाकी ओर गये
प्रहसन्तीव राजानं प्रमदा रक्तवासिनी।
प्रकर्षन्ती मया दृष्टा राक्षसी विकृतानना॥१६॥
‘लाल वस्त्र धारण करने वाली एक स्त्री, जो विकराल मुखवाली राक्षसी प्रतीत होती थी, महाराज को हँसती हई-सी खींचकर लिये जा रही थी। यह दृश्य भी मेरे देखने में आया॥१६॥
एवमेतन्मया दृष्टमिमां रात्रिं भयावहाम्।
अहं रामोऽथवा राजा लक्ष्मणो वा मरिष्यति॥ १७॥
‘इस प्रकार इस भयंकर रात्रि के समय मैंने यह स्वप्न देखा है। इसका फल यह होगा कि मैं, श्रीराम, राजा दशरथ अथवा लक्ष्मण—इनमें से किसी एक की अवश्य मृत्यु होगी॥ १७॥
नरो यानेन यः स्वप्ने खरयुक्तेन याति हि।
अचिरात्तस्य धूम्राग्रं चितायां सम्प्रदृश्यते॥१८॥
एतन्निमित्तं दीनोऽहं न वचः प्रतिपूजये।
शुष्यतीव च मे कण्ठो न स्वस्थमिव मे मनः॥ १९॥
‘जो मनुष्य स्वप्न में गधे जुते हुए रथ से यात्रा करता दिखायी देता है, उसकी चिता का धुआँ शीघ्र ही देखने में आता है। यही कारण है कि मैं दुःखी हो रहा हूँ और आपलोगों की बातों का आदर नहीं करता हूँ। मेरा गला सूखा-सा जा रहा है और मन अस्वस्थ-सा हो चला है॥
न पश्यामि भयस्थानं भयं चैवोपधारये।
भ्रष्टश्च स्वरयोगो मे छाया चापगता मम।
जुगुप्सु इव चात्मानं न च पश्यामि कारणम्॥ २०॥
‘मैं भय का कोई कारण नहीं देखता तो भी भय को प्राप्त हो रहा हूँ। मेरा स्वर बदल गया है तथा मेरी कान्ति भी फीकी पड़ गयी है। मैं अपने-आप से घृणा सी करने लगा हूँ, परंतु इसका कारण क्या है, यह मेरी समझ में नहीं आता ॥ २० ॥
इमां च दुःस्वप्नगतिं निशम्य हि त्वनेकरूपामवितर्कितां पुरा।
भयं महत् तुद् हृदयान्न याति में विचिन्त्य राजानमचिन्त्यदर्शनम्॥२१॥
‘जिनके विषय में मैंने पहले कभी सोचा तक नहीं था, ऐसे अनेक प्रकार के दुःस्वप्नों को देखकर तथा महाराज का दर्शन इस रूप में क्यों हुआ, जिसकी मेरे मन में कोई कल्पना नहीं थी—यह सोचकर मेरे हृदय से महान् भय दूर नहीं हो रहा है’ ॥ २१॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकोनसप्ततितमः सर्गः॥ ६९॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में उनहत्तरवाँ सर्ग पूराहुआ॥ ६९॥
सर्ग-70
भरते ब्रुवति स्वप्नं दूतास्ते क्लान्तवाहनाः।
प्रविश्यासह्यपरिखं रम्यं राजगृहं पुरम्॥१॥
इस प्रकार भरत जब अपने मित्रों को स्वप्न का वृत्तान्त बता रहे थे, उसी समय थके हुए वाहनों वाले वे दूत उस रमणीय राजगृहपुर में प्रविष्ट हुए, जिसकी खाई को लाँघने का कष्ट शत्रुओं के लिये असह्य था॥ १॥
समागम्य च राज्ञा ते राजपुत्रेण चार्चिताः।
राज्ञः पादौ गृहीत्वा च तमूचुर्भरतं वचः॥२॥
नगर में आकर वे दूत केकयदेश के राजा और राजकुमार से मिले तथा उन दोनों ने भी उनका सत्कार किया। फिर वे भावी राजा भरत के चरणों का स्पर्श करके उनसे इस प्रकार बोले- ॥ २॥
पुरोहितस्त्वां कुशलं प्राह सर्वे च मन्त्रिणः।
त्वरमाणश्च निर्याहि कृत्यमात्ययिकं त्वया॥३॥
‘कुमार! पुरोहितजी तथा समस्त मन्त्रियों ने आपसे कुशल-मङ्गल कहा है। अब आप यहाँ से शीघ्र चलिये। अयोध्या में आपसे अत्यन्त आवश्यक कार्य है॥३॥
इमानि च महार्हाणि वस्त्राण्याभरणानि च।
प्रतिगृह्य विशालाक्ष मातुलस्य च दापय॥४॥
‘विशाल नेत्रों वाले राजकुमार! ये बहुमूल्य वस्त्र और आभूषण आप स्वयं भी ग्रहण कीजिये और अपने मामा को भी दीजिये॥४॥
अत्र विंशतिकोट्यस्तु नृपतेर्मातुलस्य ते।
दशकोट्यस्तु सम्पूर्णास्तथैव च नृपात्मज॥५॥
‘राजकुमार! यहाँ जो बहुमूल्य सामग्री लायी गयी है, इसमें बीस करोड़ की लागत का सामान आपके नाना केकेयनरेश के लिये है और पूरे दस करोड़ की लागत का सामान आपके मामा के लिये है’॥ ५ ॥
प्रतिगृह्य तु तत् सर्वं स्वनुरक्तः सुहृज्जने।
दूतानुवाच भरतः कामैः सम्प्रतिपूज्य तान्॥६॥
वे सारी वस्तुएँ लेकर मामा आदि सुहृदों में अनुराग रखने वाले भरत ने उन्हें भेंट कर दीं। तत्पश्चात् इच्छानुसार वस्तुएँ देकर दूतों का सत्कार करने के अनन्तर उनसे इस प्रकार कहा- ॥६॥
कच्चित् स कुशली राजा पिता दशरथो मम।
कच्चिदारोग्यता रामे लक्ष्मणे च महात्मनि॥७॥
‘मेरे पिता महाराज दशरथ सकुशल तो हैं न? महात्मा श्रीराम और लक्ष्मण नीरोग तो हैं न? ॥ ७॥
आर्या च धर्मनिरता धर्मज्ञा धर्मवादिनी।
अरोगा चापि कौसल्या माता रामस्य धीमतः॥ ८॥
‘धर्म को जानने और धर्म की ही चर्चा करने वाली बुद्धिमान् श्रीराम की माता धर्मपरायणा आर्या कौसल्या को तो कोई रोग या कष्ट नहीं है ? ॥ ८॥
कच्चित् सुमित्रा धर्मज्ञा जननी लक्ष्मणस्य या।
शत्रुघ्नस्य च वीरस्य अरोगा चापि मध्यमा॥९॥
‘क्या वीर लक्ष्मण और शत्रुघ्न की जननी मेरी मझली माता धर्मज्ञा सुमित्रा स्वस्थ और सुखी हैं ?।। ९॥
आत्मकामा सदा चण्डी क्रोधना प्राज्ञमानिनी।
अरोगा चापि मे माता कैकेयी किमुवाच ह॥ १०॥
‘जो सदा अपना ही स्वार्थ सिद्ध करना चाहती और अपने को बड़ी बुद्धिमती समझती है, उस उग्र स्वभाव वाली कोपशीला मेरी माता कैकेयी को तो कोई कष्ट नहीं है? उसने क्या कहा है?’ ॥ १० ॥
एवमुक्तास्तु ते दूता भरतेन महात्मना।
ऊचुः सम्प्रश्रितं वाक्यमिदं तं भरतं तदा ॥११॥
महात्मा भरत के इस प्रकार पूछने पर उस समय दूतों ने विनयपूर्वक उनसे यह बात कही- ॥११॥
कुशलास्ते नरव्याघ्र येषां कुशलमिच्छसि।
श्रीश्च त्वां वृणुते पद्मा युज्यतां चापि ते रथः॥ १२॥
‘पुरुषसिंह! आपको जिनका कुशल-मङ्गल अभिप्रेत है, वे सकुशल हैं। हाथ में कमल लिये रहने वाली लक्ष्मी (शोभा) आपका वरण कर रही है। अब यात्रा के लिये शीघ्र ही आपका रथ जुतकर तैयार हो जाना चाहिये’॥ १२ ॥
भरतश्चापि तान् दूतानेवमुक्तोऽभ्यभाषत।
आपृच्छेऽहं महाराजं दूताः संत्वरयन्ति माम्॥ १३॥
उन दूतों के ऐसा कहने पर भरत ने उनसे कहा —’अच्छा मैं महाराज से पूछता हूँ कि दूत मुझसे शीघ्र अयोध्या चलने के लिये कह रहे हैं। आपकी क्या आज्ञा है?’ ॥ १३॥
एवमुक्त्वा तु तान् दूतान् भरतः पार्थिवात्मजः।
दूतैः संचोदितो वाक्यं मातामहमुवाच ह॥१४॥
दूतों से ऐसा कहकर राजकुमार भरत उनसे प्रेरित हो नाना के पास जाकर बोले- ॥ १४ ॥
राजन् पितुर्गमिष्यामि सकाशं दूतचोदितः।
पुनरप्यहमेष्यामि यदा मे त्वं स्मरिष्यसि॥१५॥
‘राजन्! मैं दूतों के कहने से इस समय पिताजी के पास जा रहा हूँ। पुनः जब आप मुझे याद करेंगे, यहाँ आ जाऊँगा’।
भरतेनैवमुक्तस्तु नृपो मातामहस्तदा।
तमुवाच शुभं वाक्यं शिरस्याघ्राय राघवम्॥ १६॥
भरत के ऐसा कहने पर नाना केकयनरेश ने उस समय उन रघुकुलभूषण भरत का मस्तक सूंघकर यह शुभ वचन कहा— ॥ १६॥
गच्छ तातानुजाने त्वां कैकेयी सुप्रजास्त्वया।
मातरं कुशलं ब्रूयाः पितरं च परंतप॥१७॥
‘तात! जाओ, मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ। तुम्हें पाकर कैकेयी उत्तम संतानवाली हो गयी। शत्रुओं को संताप देने वाले वीर! तुम अपनी माता और पिता से यहाँ का कुशल-समाचार कहना॥ १७॥
पुरोहितं च कुशलं ये चान्ये द्विजसत्तमाः।
तौ च तात महेष्वासौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥ १८॥
‘तात! अपने पुरोहितजी से तथा अन्य जो श्रेष्ठ ब्राह्मण हों, उनसे भी मेरा कुशल-मङ्गल कहना। उन महाधनुर्धर दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण से भी यहाँ का कुशल-समाचार सुना देना’ ॥ १८॥
तस्मै हस्त्युत्तमांश्चित्रान् कम्बलानजिनानि च।
सत्कृत्य केकयो राजा भरताय ददौ धनम्॥ १९॥
ऐसा कहकर केकयनरेश ने भरत का सत्कार करके उन्हें बहुत-से उत्तम हाथी, विचित्र कालीन, मृगचर्म और बहुत-सा धन दिये॥ १९॥
अन्तःपुरेऽतिसंवृद्धान् व्याघ्रवीर्यबलोपमान्।
दंष्ट्रायुक्तान् महाकायान् शुनश्चोपायनं ददौ॥ २०॥
जो अन्तःपुर में पाल-पोसकर बड़े किये गये थे, बल और पराक्रम में बाघों के समान थे, जिनकी दाढ़ें बड़ी-बड़ी और काया विशाल थी, ऐसे बहुत-से कुत्ते भी केकयनरेश ने भरत को भेट में दिये॥२०॥
रुक्मनिष्कसहस्रे द्वे षोडशाश्वशतानि च।
सत्कृत्य केकयीपुत्रं केकयो धनमादिशत्॥२१॥
दो हजार सोने की मोहरें और सोलह सौ घोड़े भी दिये। इस प्रकार केकयनरेश ने केकयीकुमार भरत को सत्कारपूर्वक बहुत-सा धन दिया॥ २१॥
तदामात्यानभिप्रेतान् विश्वास्यांश्च गुणान्वितान्।
ददावश्वपतिः शीघ्रं भरतायानुयायिनः॥२२॥
उस समय केकयनरेश अश्वपति ने अपने अभीष्ट, विश्वासपात्र और गुणवान् मन्त्रियों को भरत के साथ जाने के लिये शीघ्र आज्ञा दी॥ २२ ॥
ऐरावतानैन्द्रशिरान् नागान् वै प्रियदर्शनान्।
खरान् शीघ्रान् सुसंयुक्तान् मातुलोऽस्मै धनं ददौ॥ २३॥
भरत के मामा ने उन्हें उपहार में दिये जाने वाले फल के रूप में इरावान् पर्वत और इन्द्रशिर नामक स्थान के आस-पास उत्पन्न होने वाले बहुत-से सुन्दरसुन्दर हाथी तथा तेज चलने वाले सुशिक्षित खच्चर दिये॥२३॥
स दत्तं केकयेन्द्रेण धनं तन्नाभ्यनन्दत।
भरतः केकयीपुत्रो गमनत्वरया तदा॥२४॥
उस समय जाने की जल्दी होने के कारण केकयीपुत्र भरत ने केकयराज के दिये हुए उस धन का अभिनन्दन नहीं किया॥२४॥
बभूव ह्यस्य हृदये चिन्ता सुमहती तदा।
त्वरया चापि दूतानां स्वप्नस्यापि च दर्शनात्॥ २५॥
उस अवसर पर उनके हृदय में बड़ी भारी चिन्ता हो रही थी। इसके दो कारण थे, एक तो दूत वहाँ से चलने की जल्दी मचा रहे थे, दूसरे उन्हें दुःस्वप्न का दर्शन भी हुआ था।
स स्ववेश्माभ्यतिक्रम्य नरनागाश्वसंकुलम्।
प्रपेदे सुमहच्छ्रीमान् राजमार्गमनुत्तमम्॥ २६॥
वे यात्रा की तैयारी के लिये पहले अपने आवास स्थान पर गये। फिर वहाँ से निकलकर मनुष्यों, हाथियों और घोड़ों से भरे हुए परम उत्तम राजमार्ग पर गये। उस समय भरतजी के पास बहुत बड़ी सम्पत्ति जुट गयी थी॥
अभ्यतीत्य ततोऽपश्यदन्तःपुरमनुत्तमम्।
ततस्तद् भरतः श्रीमानाविवेशानिवारितः॥२७॥
सड़क को पार करके श्रीमान् भरत ने राजभवन के परम उत्तम अन्तःपुर का दर्शन किया और उसमें वे बेरोक-टोक घुस गये॥ २७॥
स मातामहमापृच्छ्य मातुलं च युधाजितम्।
रथमारुह्य भरतः शत्रुघ्नसहितो ययौ॥ २८॥
वहाँ नाना, नानी, मामा युधाजित् और मामी से विदा ले शत्रुघ्न सहित रथ पर सवार हो भरत ने यात्रा आरम्भ की॥ २८॥
रथान् मण्डलचक्रांश्च योजयित्वा परः शतम्।
उष्टगोऽश्वखरैर्भृत्या भरतं यान्तमन्वयुः॥ २९॥
गोलाकार पहिये वाले सौ से भी अधिक रथों में ऊँट, बैल, घोड़े और खच्चर जोतकर सेवकों ने जाते हुए भरत का अनुसरण किया॥ २९॥
बलेन गुप्तो भरतो महात्मा सहार्यकस्यात्मसमैरमात्यैः।
आदाय शत्रुघ्नमपेतशत्रुहाद् ययौ सिद्ध इवेन्द्रलोकात्॥३०॥
शत्रुहीन महामना भरत अपनी और मामा की सेना से सुरक्षित हो शत्रुघ्न को अपने साथ रथ पर लेकर नाना के अपने ही समान माननीय मन्त्रियों के साथ मामा के घर से चले; मानो कोई सिद्ध पुरुष इन्द्रलोक से किसी अन्य स्थान के लिये प्रस्थित हुआ हो॥३०॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्ततितमः सर्गः॥ ७०॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में सत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७०॥
सर्ग-71
स प्राङ्मुखो राजगृहादभिनिर्याय वीर्यवान्।
ततः सुदामां द्युतिमान् संतीर्यावेक्ष्य तां नदीम्॥ १॥
ह्रादिनीं दूरपारां च प्रत्यक्स्रोतस्तरङ्गिणीम्।
शतद्रुमतरच्छ्रीमान् नदीमिक्ष्वाकुनन्दनः॥२॥
राजगृह से निकलकर पराक्रमी भरत पूर्वदिशा की ओर चले।* उन तेजस्वी राजकुमार ने मार्ग में सुदामा नदी का दर्शन करके उसे पार किया। तत्पश्चात् इक्ष्वाकुनन्दन श्रीमान् भरत ने, जिसका पाट दूर तक फैला हुआ था, उस ह्रादिनी नदी को लाँघकर पश्चिमाभिमुख बहने वाली शतगु नदी (सतलज) को पार किया॥१-२॥
* अयोध्या से जो पाँच दूत चले थे, वे सीधी राह से राजगृह में आये थे; अतः उनके मार्ग में जो-जो स्थान पड़े थे, वे भरत के मार्ग में नहीं पड़े थे। भरत के साथ रथ और चतुरङ्गिणी सेना थी, अतः उसके निर्वाह के अनुकूल मार्ग से चलकर वे अयोध्या पहुँचे थे। इसलिये इनके मार्ग में सर्वथा नये ग्रामों और स्थानों का उल्लेख मिलता है।
ऐलधाने नदीं तीप्राप्य चापरपर्वतान्।
शिलामाकुर्वतीं ती आग्नेयं शल्यकर्षणम्॥
वहाँ से ऐलधान नामक गाँव में जाकर वहाँ बहने वाली नदी को पार किया। तत्पश्चात् वे अपरपर्वत नामक जनपद में गये। वहाँ शिला नाम की नदी बहती थी, जो अपने भीतर पड़ी हुई वस्तु को शिलास्वरूप बना देती थी। उसे पार करके भरत वहाँ से आग्नेय कोण में स्थित शल्यकर्षण नामक देश में गये, जहाँ शरीर से काँटे को निकालने में सहायता करने वाली ओषधि उपलब्ध होती थी॥३॥
सत्यसंधः शुचिर्भूत्वा प्रेक्षमाणः शिलावहाम्।
अभ्यगात् स महाशैलान् वनं चैत्ररथं प्रति॥४॥
तदनन्तर सत्यप्रतिज्ञ भरत ने पवित्र होकर शिलावहा नामक नदी का दर्शन किया (जो अपनी प्रखर धारा से शिलाखण्डों-बड़ी-बड़ी चट्टानों को भी बहा ले जाने के कारण उक्त नाम से प्रसिद्ध थी)। उस नदी का दर्शन करके वे आगे बढ़ गये और बड़े-बड़े पर्वतों को लाँघते हुए चैत्ररथ नामक वन में जा पहुँचे॥ ४॥
सरस्वतीं च गङ्गां च युग्मेन प्रतिपद्य च।
उत्तरान् वीरमत्स्यानां भारुण्डं प्राविशद् वनम्॥
तत्पश्चात् पश्चिमवाहिनी सरस्वती तथा गङ्गा की धारा-विशेष के सङ्गम से होते हुए उन्होंने वीरमत्स्य देश के उत्तरवर्ती देशों में पदार्पण किया और वहाँ से आगे बढ़कर वे भारुण्ड वन के भीतर गये॥ ५ ॥
वेगिनीं च कुलिङ्गाख्यां ह्रादिनीं पर्वतावृताम्।
यमुनां प्राप्य संतीर्णो बलमाश्वासयत् तदा॥६॥
फिर अत्यन्त वेग से बहने वाली तथा पर्वतों से घिरी होने के कारण अपने प्रखर प्रवाह के द्वारा कलकल नाद करने वाली कुलिङ्गा नदी को पार करके यमुना के तटपर पहुँचकर उन्होंने सेना को विश्राम कराया॥६॥
शीतीकृत्य तु गात्राणि क्लान्तानाश्वास्य वाजिनः।
तत्र स्नात्वा च पीत्वा च प्रायादादाय चोदकम्॥ ७॥
राजपुत्रो महारण्यमनभीक्ष्णोपसेवितम्।
भद्रो भद्रेण यानेन मारुतः खमिवात्यगात्॥८॥
थके हुए घोड़ों को नहलाकर उनके अङ्गों को शीतलता प्रदान करके उन्हें छाया में घास आदि देकर आराम करने का अवसर दे राजकुमार भरत स्वयं भी स्नान और जलपान करके रास्ते के लिये जल साथ ले आगे बढ़े। मङ्गलाचार से युक्त हो माङ्गलिक रथ के द्वारा उन्होंने, जिसमें मनुष्यों का बहुधा आना-जाना या रहना नहीं होता था, उस विशाल वन को उसी प्रकार वेगपूर्वक पार किया, जैसे वायु आकाश को लाँघ जाती है । ७-८॥
भागीरथीं दुष्प्रतरां सोंऽशुधाने महानदीम्।
उपायाद् राघवस्तूर्णं प्राग्वटे विश्रुते पुरे॥९॥
तत्पश्चात् अंशुधान नामक ग्राम के पास महानदी भागीरथी गङ्गा को दुस्तर जानकर रघुनन्दन भरत तुरंत ही प्राग्वट नाम से विख्यात नगर में आ गये॥९॥
स गङ्गां प्राग्वटे तीर्वा समायात् कुटिकोष्टिकाम्।
सबलस्तां स तीथि समगाद् धर्मवर्धनम्॥१०॥
प्राग्वट नगर में गङ्गा को पार करके वे कुटिकोष्टिका नाम वाली नदी के तटपर आये और सेनासहित उसको भी पार करके धर्मवर्धन नामक ग्राम में जा पहुँचे॥ १०॥
तोरणं दक्षिणार्धेन जम्बूप्रस्थं समागमत्।
वरूथं च ययौ रम्यं ग्रामं दशरथात्मजः॥११॥
वहाँ से तोरण ग्राम के दक्षिणार्ध भाग में होते हुए जम्बूप्रस्थ में गये। तदनन्तर दशरथकुमार भरत एक रमणीय ग्राम में गये, जो वरूथ के नाम से विख्यात था॥
तत्र रम्ये वने वासं कृत्वासौ प्राङ्मुखो ययौ।
उद्यानमज्जिहानायाः प्रियका यत्र पादपाः॥ १२॥
वहाँ एक रमणीय वन में निवास करके वे प्रातःकाल पूर्व दिशा की ओर गये। जाते-जाते उज्जिहाना नगरी के उद्यान में पहुँच गये, जहाँ कदम्ब नाम वाले वृक्षों की बहुतायत थी॥ १२॥
स तांस्तु प्रियकान् प्राप्य शीघ्रानास्थाय वाजिनः।
अनुज्ञाप्याथ भरतो वाहिनीं त्वरितो ययौ॥१३॥
उन कदम्बों के उद्यान में पहुँचकर अपने रथ में शीघ्रगामी घोड़ों को जोतकर सेना को धीरे-धीरे आने की आज्ञा दे भरत तीव्रगति से चल दिये॥ १३॥
वासं कृत्वा सर्वतीर्थे तीर्वा चोत्तानिकां नदीम्।
अन्या नदीश्च विविधैः पार्वतीयैस्तुरङ्गमैः॥१४॥
हस्तिपृष्ठकमासाद्य कुटिकामप्यवर्तत।
ततार च नरव्याघ्रो लोहित्ये च कपीवतीम्॥
तत्पश्चात् सर्वतीर्थ नामक ग्राम में एक रात रहकर उत्तानिका नदी तथा अन्य नदियों को भी नाना प्रकार के पर्वतीय घोड़ों द्वारा जुते हुए रथ से पार करके नरश्रेष्ठ भरत जी हस्तिपृष्ठक नामक ग्राम में जा पहुंचे।
वहाँ से आगे जाने पर उन्होंने कुटिका नदी पार की। फिर लोहित्य नामक ग्राम में पहुँचकर कपीवती नामक नदी को पार किया॥१४-१५॥
एकसाले स्थाणुमती विनते गोमती नदीम्।
कलिङ्गनगरे चापि प्राप्य सालवनं तदा ॥१६॥
फिर एकसाल नगर के पास स्थाणुमती और विनतग्राम के निकट गोमती नदी को पार करके वे तुरंत ही कलिङ्गनगर के पास सालवन में जा पहुँचे॥ १६॥
भरतः क्षिप्रमागच्छत् सुपरिश्रान्तवाहनः।
वनं च समतीत्याशु शर्वर्यामरुणोदये॥१७॥
अयोध्यां मनुना राज्ञा निर्मितां स ददर्श ह।
तां पुरी पुरुषव्याघ्रः सप्तरात्रोषितः पथि॥१८॥
वहाँ जाते-जाते भरत के घोड़े थक गये। तब उन्हें विश्राम देकर वे रातों-रात शीघ्र ही सालवन को लाँघ गये और अरुणोदयकाल में राजा मनु की बसायी हुई अयोध्यापुरी का उन्होंने दर्शन किया। पुरुषसिंह भरत मार्ग में सात रातें व्यतीत करके आठवें दिन अयोध्यापुरी का दर्शन कर सके थे॥ १७-१८॥
अयोध्यामग्रतो दृष्ट्वा सारथिं चेदमब्रवीत्।
एषा नातिप्रतीता मे पुण्योद्याना यशस्विनी॥ १९॥
अयोध्या दृश्यते दूरात् सारथे पाण्डुमृत्तिका।
यज्विभिर्गणसम्पन्नैाह्मणैर्वेदपारगैः॥ २०॥
भूयिष्ठमृद्धैराकीर्णा राजर्षिवरपालिता।
सामने अयोध्यापुरी को देखकर वे अपने सारथि से इस प्रकार बोले-‘सूत! पवित्र उद्यानों से सुशोभित यह यशस्विनी नगरी आज मुझे अधिक प्रसन्न नहीं दिखायी देती है। यह वही नगरी है, जहाँ निरन्तर यज्ञ-याग करने वाले गुणवान् और वेदों के पारङ्गत विद्वान् ब्राह्मण निवास करते हैं, जहाँ बहुत-से धनियों की भी बस्ती है तथा राजर्षियों में श्रेष्ठ महाराज दशरथ जिसका पालन करते हैं, वही अयोध्या इस समय दूर से सफेद मिट्टी के ढूह की भाँति दीख रही है। १९-२० १/२ ॥
अयोध्यायां पुरा शब्दः श्रूयते तुमुलो महान्॥ २१॥
समन्तान्नरनारीणां तमद्य न शृणोम्यहम्।
‘पहले अयोध्या में चारों ओर नर-नारियों का महान् तुमुलनाद सुनायी पड़ता था; परंतु आज मैं उसे नहीं सुन रहा हूँ॥ २१ १/२ ॥
उद्यानानि हि सायाह्ने क्रीडित्वोपरतैनरैः॥२२॥
समन्ताद् विप्रधावद्भिः प्रकाशन्ते ममान्यथा।
तान्यद्यानुरुदन्तीव परित्यक्तानि कामिभिः॥ २३॥
‘सायंकाल के समय लोग उद्यानों में प्रवेश करके वहाँ क्रीड़ा करते और उस क्रीड़ा से निवृत्त होकर सब ओर से अपने घरों की ओर दौड़ते थे, अतः उस समय इन उद्यानों की अपूर्व शोभा होती थी, परंतु आज ये मुझे कुछ और ही प्रकार के दिखायी देते हैं। वे ही उद्यान आज कामीजनों से परित्यक्त होकर रोते हुए-से प्रतीत होते हैं।॥ २२-२३॥
अरण्यभूतेव पुरी सारथे प्रतिभाति माम्।
नह्यत्र यानैदृश्यन्ते न गजै च वाजिभिः।
निर्यान्तो वाभियान्तो वा नरमुख्या यथा पुरा॥ २४॥
‘सारथे! यह पुरी मुझे जंगल-सी जान पड़ती है। अब यहाँ पहले की भाँति घोड़ों, हाथियों तथा दूसरी दुसरी सवारियों से आते-जाते हुए श्रेष्ठ मनुष्य नहीं दिखायी दे रहे हैं।॥ २४॥
उद्यानानि पुरा भान्ति मत्तप्रमुदितानि च।
जनानां रतिसंयोगेष्वत्यन्तगुणवन्ति च ॥२५॥
तान्येतान्यद्य पश्यामि निरानन्दानि सर्वशः।
स्रस्तपर्णैरनपथं विक्रोशद्भिरिव द्रमैः॥२६॥
‘जो उद्यान पहले मदमत्त एवं आनन्दमग्न भ्रमरों, कोकिलों और नर-नारियों से भरे प्रतीत होते थे तथा लोगों के प्रेम-मिलन के लिये अत्यन्त गुणकारी (अनुकूल सुविधाओं से सम्पन्न) थे, उन्हीं को आज मैं सर्वथा आनन्द शून्य देख रहा हूँ। वहाँ माग पर वृक्षों के जो पत्ते गिर रहे हैं, उनके द्वारा मानो वे वृक्ष करुण क्रन्दन कर रहे हैं (और उनसे उपलक्षित होने के कारण वे उद्यान आनन्दहीन प्रतीत होते हैं)॥ २५-२६॥
नाद्यापि श्रूयते शब्दो मत्तानां मृगपक्षिणाम्।
सरक्तां मधुरां वाणी कलं व्याहरतां बहु॥२७॥
‘रागयुक्त मधुर कलरव करने वाले मतवाले मृगों और पक्षियों का तुमुल शब्द अभी तक सुनायी नहीं पड़ रहा है।॥ २७॥
चन्दनागुरुसम्पृक्तो धूपसम्मूर्च्छितोऽमलः।
प्रवाति पवनः श्रीमान् किं नु नाद्य यथा पुरा॥ २८॥
‘चन्दन और अगुरु की सुगन्ध से मिश्रित तथा धूप की मनोहर गन्ध से व्याप्त निर्मल मनोरम समीर आज पहले की भाँति क्यों नहीं प्रवाहित हो रहा है? ॥ २८॥
भेरीमृदङ्गवीणानां कोणसंघट्टितः पुनः।
किमद्य शब्दो विरतः सदादीनगतिः पुरा॥२९॥
‘वादनदण्डद्वारा बजायी जानेवाली भेरी, मृदङ्ग और वीणाका जो आघातजनित शब्द होता है, वह पहले अयोध्यामें सदा होता रहता था, कभी उसकी गति अवरुद्ध नहीं होती थी; परंतु आज वह शब्द न जाने क्यों बंद हो गया है ? ॥ २९॥
अनिष्टानि च पापानि पश्यामि विविधानि च।
निमित्तान्यमनोज्ञानि तेन सीदति मे मनः॥३०॥
‘मुझे अनेक प्रकारके अनिष्टकारी, क्रूर और अशुभसूचक अपशकुन दिखायी दे रहे हैं, जिससे मेरा मन खिन्न हो रहा है॥ ३०॥
सर्वथा कुशलं सूत दुर्लभं मम बन्धुषु।
तथा ह्यसति सम्मोहे हृदयं सीदतीव मे॥३१॥
‘सारथे! इससे प्रतीत होता है कि इस समय मेरे बान्धवों को कुशल-मङ्गल सर्वथा दुर्लभ है, तभी तो मोह का कोई कारण न होने पर भी मेरा हृदय बैठा जा रहा है’॥३१॥
विषण्णः श्रान्तहृदयस्त्रस्तः संलुलितेन्द्रियः।
भरतः प्रविवेशाशु पुरीमिक्ष्वाकुपालिताम्॥३२॥
भरत मन-ही-मन बहुत खिन्न थे। उनका हृदय शिथिल हो रहा था। वे डरे हुए थे और उनकी सारी इन्द्रियाँ क्षुब्ध हो उठी थीं, इसी अवस्था में उन्होंने शीघ्रतापूर्वक इक्ष्वाकुवंशी राजाओं द्वारा पालित अयोध्यापुरी में प्रवेश किया॥३२॥
द्वारेण वैजयन्तेन प्राविशच्छ्रान्तवाहनः।
द्वाःस्थैरुत्थाय विजयमुक्तस्तैः सहितो ययौ॥ ३३॥
पुरी के द्वार पर सदा वैजयन्ती पताका फहराने के कारण उस द्वार का नाम वैजयन्त रखा गया था। (यहपुरी के पश्चिम भाग में था।) उस वैजयन्त द्वार से भरत पुरी के भीतर प्रविष्ट हुए। उस समय उनके रथ के घोड़े बहुत थके हुए थे। द्वारपालों ने उठकर कहा —’महाराज की जय हो!’ फिर वे उनके साथ आगे बढ़े॥३३॥
स त्वनेकाग्रहृदयो द्वाःस्थं प्रत्यर्च्य तं जनम्।
सूतमश्वपतेः क्लान्तमब्रवीत् तत्र राघवः ॥ ३४॥
भरत का हृदय एकाग्र नहीं था—वे घबराये हुए थे। अतः उन रघुकुलनन्दन भरत ने साथ आये हुए द्वारपालों को सत्कारपूर्वक लौटा दिया और केकयराज अश्वपति के थके-माँदे सारथि से वहाँ इस प्रकार कहा- ॥ ३४॥
किमहं त्वरयाऽऽनीतः कारणेन विनानघ।
अशुभाशङ्कि हृदयं शीलं च पततीव मे॥ ३५॥
‘निष्पाप सूत! मैं बिना कारण ही इतनी उतावली के साथ क्यों बुलाया गया? इस बात का विचार करके मेरे हृदय में अशुभ की आशङ्का होती है। मेरा दीनतारहित स्वभाव भी अपनी स्थिति से भ्रष्ट-सा हो रहा है॥ ३५॥
श्रुता नु यादृशाः पूर्वं नृपतीनां विनाशने।
आकारांस्तानहं सर्वानिह पश्यामि सारथे॥३६॥
‘सारथे! अबसे पहले मैंने राजाओं के विनाश के जैसे-जैसे लक्षण सुन रखे हैं, उन सभी लक्षणों को आज मैं यहाँ देख रहा हूँ॥ ३६॥
सम्मार्जनविहीनानि परुषाण्युपलक्षये।
असंयतकवाटानि श्रीविहीनानि सर्वशः॥३७॥
बलिकर्मविहीनानि धूपसम्मोदनेन च।
अनाशितकुटुम्बानि प्रभाहीनजनानि च ॥३८॥
अलक्ष्मीकानि पश्यामि कुटुम्बिभवनान्यहम्।
‘मैं देखता हूँ—गृहस्थों के घरों में झाड़ नहीं लगी है। वे रूखे और श्रीहीन दिखायी देते हैं इनकी किवाड़ें खुली हैं। इन घरों में बलिवैश्व देवकर्म नहीं हो रहे हैं। ये धूप की सुगन्ध से वञ्चित हैं। इनमें रहने वाले कुटुम्बीजनों को भोजन नहीं प्राप्त हुआ है तथा ये सारे गृह प्रभाहीन (उदास) दिखायी देते हैं। जान पड़ता है —इनमें लक्ष्मी का निवास नहीं है॥ ३७-३८ १/२॥
अपेतमाल्यशोभानि असम्मृष्टाजिराणि च॥३९॥
देवागाराणि शून्यानि न भान्तीह यथा पुरा।
‘देवमन्दिर फूलों से सजे हुए नहीं दिखायी देते। इनके आँगन झाड़े-बुहारे नहीं गये हैं। ये मनुष्यों से सूने हो रहे हैं, अतएव इनकी पहले-जैसी शोभा नहीं हो रही है। ३९ १/२॥
देवतार्चाः प्रविद्धाश्च यज्ञगोष्ठास्तथैव च ॥४०॥
माल्यापणेषु राजन्ते नाद्य पण्यानि वा तथा।
दृश्यन्ते वणिजोऽप्यद्य न यथापूर्वमत्र वै॥४१॥
ध्यानसंविग्नहृदया नष्टव्यापारयन्त्रिताः।
‘देव प्रतिमाओं की पूजा बंद हो गयी है। यज्ञशालाओं में यज्ञ नहीं हो रहे हैं। फूलों और मालाओं के बाजार में आज बिकने की कोई वस्तुएँ नहीं शोभित हो रही हैं। यहाँ पहले के समान बनिये भी आज नहीं दिखायी देते हैं। चिन्ता से उनका हृदय उद्विग्न जान पड़ता है और अपना व्यापार नष्ट हो जाने के कारण वे संकुचित हो रहे हैं। ४०-४१ १/२॥
देवायतनचैत्येषु दीनाः पक्षिमृगास्तथा ॥४२॥
मलिनं चाश्रुपूर्णाक्षं दीनं ध्यानपरं कृशम्।
सस्त्रीपुंसं च पश्यामि जनमुत्कण्ठितं पुरे॥४३॥
‘देवालयों तथा चैत्य (देव) वृक्षों पर जिनका निवास है, वे पशु-पक्षी दीन दिखायी दे रहे हैं। मैं देखता हूँ, नगर के सभी स्त्री-पुरुषों का मुख मलिन है, उनकी आँखों में आँसू भरे हैं और वे सब-के-सब दीन, चिन्तित, दुर्बल तथा उत्कण्ठित हैं’। ४२-४३॥
इत्येवमुक्त्वा भरतः सूतं तं दीनमानसः।
तान्यनिष्टान्ययोध्यायां प्रेक्ष्य राजगृहं ययौ॥४४॥
सारथि से ऐसा कहकर अयोध्या में होने वाले उन अनिष्टसूचक चिह्नों को देखते हुए भरत मन-ही-मन दुःखी हो राजमहल में गये।। ४४ ॥
तां शून्यशृङ्गाटकवेश्मरथ्यां रजोरुणद्वारकवाटयन्त्राम्।
दृष्ट्वा पुरीमिन्द्रपुरीप्रकाशां दुःखेन सम्पूर्णतरो बभूव॥४५॥
जो अयोध्यापुरी कभी देवराज इन्द्रकी नगरी के समान शोभा पाती थी; उसी के चौराहे, घर और सड़कें आज सूनी दिखायी देती थीं तथा दरवाजों की किवाड़ें धूलि-धूसर हो रही थीं, उसकी ऐसी दुर्दशा देख भरत पूर्णतः दुःख में निमग्न हो गये॥ ४५ ॥
बभूव पश्यन् मनसोऽप्रियाणि यान्यन्यदा नास्य पुरे बभूवुः।
अवाक्शिरा दीनमना न हृष्टः पितुर्महात्मा प्रविवेश वेश्म॥४६॥
उस नगर में जो पहले कभी नहीं हुई थीं, ऐसी अप्रिय बातों को देखकर महात्मा भरत ने अपना मस्तक नीचे को झुका लिया, उनका हर्ष छिन गया और उन्होंने दीन-हृदयसे पिता के भवन में प्रवेश किया॥ ४६॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकसप्ततितमः सर्गः॥ ७१॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में इकहत्तरहवाँ सर्ग पूराहुआ॥७१॥
सर्ग-72
अपश्यंस्तु ततस्तत्र पितरं पितरालये।
जगाम भरतो द्रष्टुं मातरं मातुरालये॥१॥
तदनन्तर पिता के घर में पिता को न देखकर भरत माता का दर्शन करने के लिये अपनी माता के महल में गये॥१॥
अनुप्राप्तं तु तं दृष्ट्वा कैकेयी प्रोषितं सुतम्।
उत्पपात तदा हृष्टा त्यक्त्वा सौवर्णमासनम्॥२॥
अपने परदेश गये हुए पुत्र को घर आया देख उस समय कैकेयी हर्ष से भर गयी और अपने सुवर्णमय आसन को छोड़ उछलकर खड़ी हो गयी॥२॥
स प्रविश्यैव धर्मात्मा स्वगृहं श्रीविवर्जितम्।
भरतः प्रेक्ष्य जग्राह जनन्याश्चरणौ शुभौ॥३॥
धर्मात्मा भरत ने अपने उस घर में प्रवेश करके देखा कि सारा घर श्रीहीन हो रहा है, फिर उन्होंने माता के शुभ चरणों का स्पर्श किया॥३॥
तं मूर्ध्नि समुपाघ्राय परिष्वज्य यशस्विनम्।
अङ्के भरतमारोप्य प्रष्टुं समुपचक्रमे॥४॥
अपने यशस्वी पुत्र भरत को छाती से लगाकर कैकेयी ने उनका मस्तक सँघा और उन्हें गोद में बिठाकर पूछना आरम्भ किया— ॥ ४॥
अद्य ते कतिचिद् रात्र्यश्च्युतस्यार्यकवेश्मनः।
अपि नाध्वश्रमः शीघ्रं रथेनापततस्तव॥५॥
‘बेटा ! तुम्हें अपने नाना के घर से चले आज कितनी रातें व्यतीत हो गयीं? तुम रथ के द्वारा बड़ी शीघ्रता के साथ आये हो। रास्ते में तुम्हें अधिक थकावट तो नहीं हुई? ॥ ५॥
आर्यकस्ते सुकुशली युधाजिन्मातुलस्तव।
प्रवासाच्च सुखं पुत्र सर्वं मे वक्तुमर्हसि॥६॥
‘तुम्हारे नाना सकुशल तो हैं न? तुम्हारे मामा युधाजित् तो कुशल से हैं? बेटा ! जब तुम यहाँ से गये थे, तबसे लेकर अबतक सुख से रहे हो न? ये सारी बातें मुझे बताओ’॥६॥
एवं पृष्टस्तु कैकेय्या प्रियं पार्थिवनन्दनः।
आचष्ट भरतः सर्वं मात्रे राजीवलोचनः॥७॥
कैकेयी के इस प्रकार प्रिय वाणी में पूछने पर दशरथनन्दन कमलनयन भरत ने माता को सब बातें बतायीं ॥ ७॥
अद्य मे सप्तमी रात्रिश्च्युतस्यार्यकवेश्मनः।
अम्बायाः कुशली तातो युधाजिन्मातुलश्च मे॥८॥
(वे बोले-) ‘मा! नाना के घर से चले मेरी यह सातवीं रात बीती है। मेरे नानाजी और मामा युधाजित् भी कुशल से हैं॥ ८॥
यन्मे धनं च रत्नं च ददौ राजा परंतपः।
परिश्रान्तं पथ्यभवत् ततोऽहं पूर्वमागतः॥९॥
राजवाक्यहरैर्दूतैस्त्वर्यमाणोऽहमागतः।
यदहं प्रष्टुमिच्छामि तदम्बा वक्तुमर्हति॥१०॥
‘शत्रुओं को संताप देने वाले केकयनरेश ने मुझे जो धन-रत्न प्रदान किये हैं, उनके भार से मार्ग में सब वाहन थक गये थे, इसलिये मैं राजकीय संदेश लेकर गये हुए दूतों के जल्दी मचाने से यहाँ पहले ही चला आया हूँ। अच्छा माँ, अब मैं जो कुछ पूछता हूँ, उसे तुम बताओ’ ॥ ९-१०॥
शून्योऽयं शयनीयस्ते पर्यङ्को हेमभूषितः।
न चायमिक्ष्वाकुजनः प्रहृष्टः प्रतिभाति मे॥११॥
‘यह तुम्हारी शय्या सुवर्णभूषित पलंग इस समय सूना है, इसका क्या कारण है (आज यहाँ महाराज उपस्थित क्यों नहीं हैं)? ये महाराज के परिजन आज प्रसन्न क्यों नहीं जान पड़ते हैं? ॥ ११॥
राजा भवति भूयिष्ठमहाम्बाया निवेशने।
तमहं नाद्य पश्यामि द्रष्टुमिच्छन्निहागतः॥१२॥
‘महाराज (पिताजी) प्रायः माताजी के ही महल में रहा करते थे, किंतु आज मैं उन्हें यहाँ नहीं देख रहा हूँ। मैं उन्हीं का दर्शन करने की इच्छासे यहाँ आया
पितुर्ग्रहीष्ये पादौ च तं ममाख्याहि पृच्छतः।
आहोस्विदम्बाज्येष्ठायाः कौसल्याया निवेशने॥ १३॥
‘मैं पूछता हूँ, बताओ, पिताजी कहाँ हैं? मैं उनके पैर पकगा। अथवा बड़ी माता कौसल्याके घरमें तो वे नहीं हैं?’ ॥ १३॥
तं प्रत्युवाच कैकेयी प्रियवद घोरमप्रियम्।
अजानन्तं प्रजानन्ती राज्यलोभेन मोहिता॥१४॥
कैकेयी राज्य के लोभ से मोहित हो रही थी। वह राजा का वृत्तान्त न जानने वाले भरत से उस घोर अप्रिय समाचार को प्रिय-सा समझती हुई इस प्रकार बताने लगी- ॥१४॥
या गतिः सर्वभूतानां तां गतिं ते पिता गतः।
राजा महात्मा तेजस्वी यायजूकः सतां गतिः॥ १५॥
‘बेटा ! तुम्हारे पिता महाराज दशरथ बड़े महात्मा, तेजस्वी, यज्ञशील और सत्पुरुषों के आश्रयदाता थे। एक दिन समस्त प्राणियों की जो गति होती है, उसी गति को वे भी प्राप्त हुए हैं’ ॥ १५ ॥
तच्छ्रुत्वा भरतो वाक्यं धर्माभिजनवाञ्छुचिः।
पपात सहसा भूमौ पितृशोकबलार्दितः॥१६॥
हा हतोऽस्मीति कृपणां दीनां वाचमुदीरयन्।
निपपात महाबाहुर्बाहू विक्षिप्य वीर्यवान्॥१७॥
भरत धार्मिक कुल में उत्पन्न हुए थे और उनका हृदय शुद्ध था। माता की बात सुनकर वे पितृशोक से अत्यन्त पीड़ित हो सहसा पृथ्वी पर गिर पड़े और ‘हाय, मैं मारा गया!’ इस प्रकार अत्यन्त दीन और दुःखमय वचन कहकर रोने लगे। पराक्रमी महाबाहु भरत अपनी भुजाओं को बारम्बार पृथ्वी पर पटककर गिरने और लोटने लगे॥ १६-१७ ॥
ततः शोकेन संवीतः पितुर्मरणदुःखितः।
विललाप महातेजा भ्रान्ताकुलितचेतनः॥१८॥
उन महातेजस्वी राजकुमार की चेतना भ्रान्त और व्याकुल हो गयी। वे पिता की मृत्यु से दुःखी और शोक से व्याकुलचित्त होकर विलाप करने लगे—॥ १८॥
एतत् सुरुचिरं भाति पितुर्मे शयनं पुरा।
शशिनेवामलं रात्रौ गगनं तोयदात्यये॥१९॥
तदिदं न विभात्यद्य विहीनं तेन धीमता।
व्योमेव शशिना हीनमप्शुष्क इव सागरः॥२०॥
‘हाय! मेरे पिताजी की जो यह अत्यन्त सुन्दर शय्या पहले शरत्काल की रात में चन्द्रमा से सुशोभित होने वाले निर्मल आकाश की भाँति शोभा पाती थी, वही यह आज उन्हीं बुद्धिमान् महाराज से रहित होकर चन्द्रमा से हीन आकाश और सूखे हुए समुद्र के समान श्रीहीन प्रतीत होती है’।। १९-२० ॥
बाष्पमुत्सृज्य कण्ठेन स्वात्मना परिपीडितः।
प्रच्छाद्य वदनं श्रीमद् वस्त्रेण जयतां वरः॥२१॥
विजयी वीरों में श्रेष्ठ भरत अपने सुन्दर मुख वस्त्र से ढककर अपने कण्ठस्वर के साथ आँसू गिराकर मन ही-मन अत्यन्त पीड़ित हो पृथ्वी पर पड़कर विलाप करने लगे॥ २१॥
तमार्तं देवसंकाशं समीक्ष्य पतितं भुवि।
निकृत्तमिव सालस्य स्कन्धं परशुना वने॥२२॥
माता मातङ्गसंकाशं चन्द्रार्कसदृशं सुतम्।
उत्थापयित्वा शोकार्तं वचनं चेदमब्रवीत्॥२३॥
देवतुल्य भरत शो कसे व्याकुल हो वन में फरसे से काटे गये साखू के तने की भाँति पृथ्वी पर पड़े थे, मतवाले हाथी के समान पुष्ट तथा चन्द्रमा या सूर्य के समान तेजस्वी अपने शोकाकुल पुत्र को इस तरह भूमि पर पड़ा देख माता कैकेयी ने उन्हें उठाया और इस प्रकार कहा— ॥ २२-२३॥
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ किं शेषे राजन्नत्र महायशः।
त्वद्विधा नहि शोचन्ति सन्तः सदसि सम्मताः॥ २४॥
‘राजन् ! उठो! उठो! महायशस्वी कुमार! तुम इस तरह यहाँ धरती पर क्यों पड़े हो? तुम्हारे-जैसे सभाओं में सम्मानित होने वाले सत्पुरुष शोक नहीं किया करते हैं।॥ २४॥
दानयज्ञाधिकारा हि शीलश्रुतितपोनुगा।
बुद्धिस्ते बुद्धिसम्पन्न प्रभेवार्कस्य मन्दिरे॥२५॥
‘बुद्धिसम्पन्न पुत्र! जैसे सूर्यमण्डल में प्रभा निश्चल रूप से रहती है, उसी प्रकार तुम्हारी बुद्धि सुस्थिर है। वह दान और यज्ञ में लगने की अधिकारिणी है; क्योंकि सदाचार और वेदवाक्यों का अनुसरण करने वाली है’॥ २५॥
सरुदित्वा चिरं कालं भूमौ परिविवृत्य च।
जननीं प्रत्युवाचेदं शोकैर्बहुभिरावृतः॥२६॥
भरत पृथ्वी पर लोटते-पोटते बहुत देर तक रोते रहे। तत्पश्चात् अधिकाधिक शोक से आकुल होकर वे माता से इस प्रकार बोले- ॥ २६ ॥
अभिषेक्ष्यति रामं तु राजा यज्ञं नु यक्ष्यते।
इत्यहं कृतसंकल्पो हृष्टो यात्रामयासिषम्॥ २७॥
‘मैंने तो यह सोचा था कि महाराज श्रीराम का राज्याभिषेक करेंगे और स्वयं यज्ञ का अनुष्ठान करेंगे —यही सोचकर मैंने बड़े हर् षके साथ वहाँ से यात्रा की थी॥२७॥
तदिदं ह्यन्यथाभूतं व्यवदीर्णं मनो मम।
पितरं यो न पश्यामि नित्यं प्रियहिते रतम्॥ २८॥
‘किंतु यहाँ आने पर सारी बातें मेरी आशा के विपरीत हो गयीं। मेरा हृदय फटा जा रहा है; क्योंकि सदा अपने प्रिय और हित में लगे रहने वाले पिताजी को मैं नहीं देख रहा हूँ॥२८॥
अम्ब केनात्यगाद् राजा व्याधिना मय्यनागते।
धन्या रामादयः सर्वे यैः पिता संस्कृतः स्वयम्॥२९॥
‘मा! महाराज को ऐसा कौन-सा रोग हो गया था, जिससे वे मेरे आने के पहले ही चल बसे? श्रीराम आदि सब भाई धन्य हैं, जिन्होंने स्वयं उपस्थित रहकर पिताजी का अन्त्येष्टि-संस्कार किया॥२९॥
न नूनं मां महाराजः प्राप्तं जानाति कीर्तिमान्।
उपजिभ्रेत् तु मां मूर्ध्नि तातः संनाम्य सत्वरम्॥ ३०॥
निश्चय ही मेरे पूज्य पिता यशस्वी महाराज को मेरे यहाँ आने का कुछ पता नहीं है, अन्यथा वे शीघ्र ही मेरे मस्तक को झुकाकर उसे प्यार से सूंघते॥ ३० ॥
क्व स पाणिः सुखस्पर्शस्तातस्याक्लिष्टकर्मणः।
यो हि मां रजसा ध्वस्तमभीक्ष्णं परिमार्जति॥ ३१॥
‘हा! अनायास ही महान् कर्म करने वाले मेरे पिता का वह कोमल हाथ कहाँ है, जिसका स्पर्श मेरे लिये बहुत ही सुखदायक था? वे उसी हाथ से मेरे धूलिधूसर शरीर को बारंबार पोंछा करते थे॥ ३१ ॥
यो मे भ्राता पिता बन्धुर्यस्य दासोऽस्मि सम्मतः।
तस्य मां शीघ्रमाख्याहि रामस्याक्लिष्टकर्मणः॥ ३२॥
‘अब जो मेरे भाई, पिता और बन्धु हैं तथा जिनका मैं परम प्रिय दास हूँ, अनायास ही महान् पराक्रम करने वाले उन श्रीरामचन्द्रजी को तुम शीघ्र ही मेरे आने की सूचना दो॥ ३२॥
पिता हि भवति ज्येष्ठो धर्ममार्यस्य जानतः।
तस्य पादौ ग्रहीष्यामि स हीदानीं गतिर्मम॥३३॥
‘धर्म के ज्ञाता श्रेष्ठ पुरुष के लिये बड़ा भाई पिता के समान होता है। मैं उनके चरणों में प्रणाम करूँगा। अब वे ही मेरे आश्रय हैं॥ ३३॥
धर्मविद् धर्मशीलश्च महाभागो दृढव्रतः।
आर्ये किमब्रवीद राजा पिता मे सत्यविक्रमः॥ ३४॥
पश्चिमं साधुसंदेशमिच्छामि श्रोतुमात्मनः।
‘आर्ये! धर्म का आचरण जिनका स्वभाव बन गया था तथा जो बड़ी दृढ़ता के साथ उत्तम व्रत का पालन करते थे, वे मेरे सत्यपराक्रमी और धर्मज्ञ पिता महाराज दशरथ अन्तिम समय में क्या कह गये थे? मेरे लिये जो उनका अन्तिम संदेश हो उसे मैं सुनना चाहता हूँ’॥ ३४ १/२॥
इति पृष्टा यथातत्त्वं कैकेयी वाक्यमब्रवीत्॥ ३५॥
रामेति राजा विलपन् हा सीते लक्ष्मणेति च।
स महात्मा परं लोकं गतो मतिमतां वरः॥ ३६॥
भरत के इस प्रकार पूछने पर कैकेयी ने सब बात ठीक-ठीक बता दी। वह कहने लगी—’बेटा! बुद्धिमानों में श्रेष्ठ तुम्हारे महात्मा पिता महाराजने ‘हा राम! हा सीते! हा लक्ष्मण!’ इस प्रकार विलाप करते हुए परलोक की यात्रा की थी॥ ३५-३६ ।।
इतीमा पश्चिमां वाचं व्याजहार पिता तव।
कालधर्मं परिक्षिप्तः पाशैरिव महागजः॥ ३७॥
‘जैसे पाशों से बँधा हुआ महान् गज विवश हो जाता है, उसी प्रकार कालधर्म के वशीभूत हुए तुम्हारे पिता ने अन्तिम वचन इस प्रकार कहा था- ॥ ३७॥
सिद्धार्थास्तु नरा राममागतं सह सीतया।
लक्ष्मणं च महाबाहुं द्रक्ष्यन्ति पुनरागतम्॥३८॥
‘जो लोग सीता के साथ पुनः लौटकर आये हुए महाबाहु श्रीराम और लक्ष्मण को देखेंगे, वे ही कृतार्थ होंगे।
तच्छ्रुत्वा विषसादैव द्वितीयाप्रियशंसनात्।
विषण्णवदनो भूत्वा भूयः पप्रच्छ मातरम्॥ ३९॥
माता के द्वारा यह दूसरी अप्रिय बात कही जाने पर भरत और भी दुःखी ही हुए। उनके मुखपर विषाद छा गया और उन्होंने पुनः माता से पूछा- ॥३९॥
क्व चेदानीं स धर्मात्मा कौसल्यानन्दवर्धनः।
लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा सीतया च समागतः॥४०॥
मा! माता कौसल्या का आनन्द बढ़ाने वाले धर्मात्मा श्रीरामचन्द्रजी इस अवसर पर भाई लक्ष्मण और सीता के साथ कहाँ चले गये हैं?’ ॥ ४० ॥
तथा पृष्टा यथान्यायमाख्यातुमुपचक्रमे।
मातास्य युगपद्वाक्यं विप्रियं प्रियशंसया॥४१॥
इस प्रकार पूछने पर उनकी माता कैकेयी ने एक साथ ही प्रिय बुद्धि से वह अप्रिय संवाद यथोचित रीति से सुनाना आरम्भ किया— ॥४१॥
स हि राजसुतः पुत्र चीरवासा महावनम्।
दण्डकान् सह वैदेह्या लक्ष्मणानुचरो गतः॥ ४२॥
‘बेटा! राजकुमार श्रीराम वल्कल-वस्त्र धारण करके सीता के साथ दण्डक वन में चले गये हैं। लक्ष्मण ने भी उन्हीं का अनुसरण किया है’ । ४२॥
तच्छ्रुत्वा भरतस्त्रस्तो भ्रातुश्चारित्रशङ्कया।
स्वस्य वंशस्य माहात्म्यात् प्रष्टं समुपचक्रमे॥ ४३॥
यह सुनकर भरत डर गये, उन्हें अपने भाई के चरित्र पर शङ्का हो आयी। (वे सोचने लगे—श्रीराम कहीं धर्म से गिर तो नहीं गये?) अपने वंश की महत्ता (धर्मपरायणता) का स्मरण करके वे कैकेयी से इस प्रकार पूछने लगे- ॥ ४३॥
कच्चिन्न ब्राह्मणधनं हृतं रामेण कस्यचित्।
कच्चिन्नाढ्यो दरिद्रो वा तेनापापो विहिंसितः॥ ४४॥
‘मा! श्रीराम ने किसी कारण वश ब्राह्मण का धन तो नहीं हर लिया था? किसी निष्पाप धनी या दरिद्र की हत्या तो नहीं कर डाली थी? ॥ ४४ ॥
कच्चिन्न परदारान् वा राजपुत्रोऽभिमन्यते।
कस्मात् स दण्डकारण्ये भ्राता रामो विवासितः॥ ४५॥
‘राजकुमार श्रीराम का मन किसी परायी स्त्री की ओर तो नहीं चला गया? किस अपराध के कारण भैया श्रीराम को दण्डकारण्य में जाने के लिये निर्वासित कर दिया गया है?’॥ ४५ ॥
अथास्य चपला माता तत् स्वकर्म यथातथम्।
तेनैव स्त्रीस्वभावेन व्याहर्तुमुपचक्रमे॥ ४६॥
तब चपल स्वभाववाली भरत की माता कैकेयी ने उस विवेकशून्य चञ्चल नारी स्वभाव के कारण ही अपनी करतूत को ठीक-ठीक बताना आरम्भ किया। ४६॥
एवमुक्ता तु कैकेयी भरतेन महात्मना।
उवाच वचनं हृष्टा वृथापण्डितमानिनी॥४७॥
महात्मा भरत के पूर्वोक्त रूप से पूछने पर व्यर्थ ही अपने को बड़ी विदुषी मानने वाली कैकेयी ने बडे हर् षमें भरकर कहा- ॥ ४७॥
न ब्राह्मणधनं किंचिद्धृतं रामेण कस्यचित्।
कश्चिन्नाढ्यो दरिद्रो वा तेनापापो विहिंसितः।
न रामः परदारान् स चक्षुामपि पश्यति॥ ४८॥
‘बेटा! श्रीराम ने किसी कारण वश किञ्चिन्मात्र भी ब्राह्मण के धन का अपहरण नहीं किया है। किसी निरपराध धनी या दरिद्र की हत्या भी उन्होंने नहीं की है। श्रीराम कभी किसी परायी स्त्री पर दृष्टि नहीं डालते हैं। ४८॥
मया तु पुत्र श्रुत्वैव रामस्येहाभिषेचनम्।
याचितस्ते पिता राज्यं रामस्य च विवासनम्॥ ४९॥
बेटा! (उनके वन में जाने का कारण इस प्रकार है)—मैंने सुना था कि अयोध्या में श्रीराम का राज्याभिषेक होने जा रहा है, तब मैंने तुम्हारे पिता से तुम्हारे लिये राज्य और श्रीराम के लिये वनवास की प्रार्थना की॥ ४९॥
स स्ववृत्तिं समास्थाय पिता ते तत् तथाकरोत्।
रामस्त सहसौमित्रिः प्रेषितः सह सीतया॥५०॥
तमपश्यन् प्रियं पुत्रं महीपालो महायशाः।
पुत्रशोकपरिघुनः पञ्चत्वमुपपेदिवान्॥५१॥
‘उन्होंने अपने सत्यप्रतिज्ञ स्वभाव के अनुसार मेरी माँग पूरी की। श्रीराम लक्ष्मण और सीता के साथ वन को भेज दिये गये, फिर अपने प्रिय पुत्र श्रीराम को न देखकर वे महायशस्वी महाराज पुत्रशोक से पीड़ित हो परलोकवासी हो गये। ५०-५१॥
त्वया त्विदानीं धर्मज्ञ राजत्वमवलम्ब्यताम्।
त्वत्कृते हि मया सर्वमिदमेवंविधं कृतम्॥५२॥
‘धर्मज्ञ! अब तुम राजपद स्वीकार करो। तुम्हारे लिये ही मैंने इस प्रकार से यह सब कुछ किया है। ५२॥
मा शोकं मा च संतापं धैर्यमाश्रय पुत्रक।
त्वदधीना हि नगरी राज्यं चैतदनामयम्॥५३॥
‘बेटा! शोक और संताप न करो, धैर्य का आश्रय लो। अब यह नगर और निष्कण्टक राज्य तुम्हारे ही अधीन है॥
तत् पुत्र शीघ्रं विधिना विधिज्ञैर्वसिष्ठमुख्यैः सहितो द्विजेन्द्रैः।
संकाल्य राजानमदीनसत्त्वमात्मानमुामभिषेचयस्व॥५४॥
‘अतः वत्स! अब विधि-विधान के ज्ञाता वसिष्ठ आदि प्रमुख ब्राह्मणों के साथ तुम उदार हृदय वाले महाराज का अन्त्येष्टि-संस्कार करके इस पृथ्वी के राज्य पर अपना अभिषेक कराओ’ ॥ ५४॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे द्विसप्ततितमः सर्गः॥ ७२॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में बहत्तरवाँ सर्ग पूराहुआ। ७२॥
सर्ग-73
श्रुत्वा च स पितुर्वृत्तं भ्रातरौ च विवासितौ।
भरतो दुःखसंतप्त इदं वचनमब्रवीत्॥१॥
पिता के परलोकवास और दोनों भाइयों के वनवास का समाचार सुनकर भरत दुःख से संतप्त हो उठे और इस प्रकार बोले- ॥१॥
किं नु कार्यं हतस्येह मम राज्येन शोचतः।
विहीनस्याथ पित्रा च भ्रात्रा पितृसमेन च॥२॥
‘हाय! तूने मुझे मार डाला। मैं पिता से सदा के लिये बिछुड़ गया और पितृतुल्य बड़े भाई से भी बिलग हो गया। अब तो मैं शोक में डूब रहा हूँ, मुझे यहाँ राज्य लेकर क्या करना है? ॥ २॥
दुःखे मे दुःखमकरोणे क्षारमिवाददाः।
राजानं प्रेतभावस्थं कृत्वा रामं च तापसम्॥३॥
‘तूने राजा को परलोकवासी तथा श्रीराम को तपस्वी बनाकर मुझे दुःख-पर-दुःख दिया है, घाव पर नमक सा छिड़क दिया है॥३॥
कुलस्य त्वमभावाय कालरात्रिरिवागता।
अङ्गारमुपगृह्य स्म पिता मे नावबुद्धवान्॥४॥
‘तू इस कुल का विनाश करने के लिये कालरात्रि बनकर आयी थी। मेरे पिता ने तुझे अपनी पत्नी क्या बनाया, दहकते हुए अङ्गार को हृदय से लगा लिया था; किंतु उस समय यह बात उनकी समझ में नहीं आयी थी॥ ४॥
मृत्युमापादितो राजा त्वया मे पापदर्शिनि।
सुखं परिहृतं मोहात् कुलेऽस्मिन् कुलपांसनि॥
‘पाप पर ही दृष्टि रखनेवाली! कुलकलङ्किनी! तूने मेरे महाराज को काल के गाल में डाल दिया और मोहवश इस कुल का सुख सदा के लिये छीन लिया। ५॥
त्वां प्राप्य हि पिता मेऽद्य सत्यसंधो महायशाः।
तीव्रदुःखाभिसंतप्तो वृत्तो दशरथो नृपः॥६॥
‘तुझे पाकर मेरे सत्यप्रतिज्ञ महायशस्वी पिता महाराज दशरथ इन दिनों दुःसह दुःख से संतप्त होकर प्राण त्यागने को विवश हुए हैं॥ ६॥
विनाशितो महाराजः पिता मे धर्मवत्सलः।
कस्मात् प्रव्राजितो रामः कस्मादेव वनं गतः॥ ७॥
‘बता, तूने मेरे धर्मवत्सल पिता महाराज दशरथ का विनाश क्यों किया? मेरे बड़े भाई श्रीराम को क्यों घर से निकाला और वे भी क्यों (तेरे ही कहने से) वन को चले गये? ॥ ७॥
कौसल्या च सुमित्रा च पुत्रशोकाभिपीडिते।
दुष्करं यदि जीवेतां प्राप्य त्वां जननीं मम॥८॥
‘कौसल्या और सुमित्रा भी मेरी माता कहलाने वाली तुझ कैकेयी को पाकर पुत्रशोक से पीड़ित हो गयीं। अब उनका जीवित रहना अत्यन्त कठिन है॥८॥
नन्वार्योऽपि च धर्मात्मा त्वयि वृत्तिमनुत्तमाम्।
वर्तते गुरुवृत्तिज्ञो यथा मातरि वर्तते॥९॥
‘बड़े भैया श्रीराम धर्मात्मा हैं; गुरुजनों के साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये—इसे वे अच्छी तरह जानते हैं, इसलिये उनका अपनी माता के प्रति जैसा बर्ताव था, वैसा ही उत्तम व्यवहार वे तेरे साथ भी करते थे॥९॥
तथा ज्येष्ठा हि मे माता कौसल्या दीर्घदर्शिनी।
त्वयि धर्मं समास्थाय भगिन्यामिव वर्तते॥१०॥
‘मेरी बड़ी माता कौसल्या भी बड़ी दूरदर्शिनी हैं। वे धर्म का ही आश्रय लेकर तेरे साथ बहिन का-सा बर्ताव करती हैं ॥ १०॥
तस्याः पुत्रं महात्मानं चीरवल्कलवाससम्।
प्रस्थाप्य वनवासाय कथं पापे न शोचसे॥११॥
‘पापिनि! उनके महात्मा पुत्र को चीर और वल्कल पहनाकर तूने वन में रहने के लिये भेज दिया। फिर भी तुझे शोक क्यों नहीं हो रहा है।॥ ११॥
अपापदर्शिनं शूरं कृतात्मानं यशस्विनम्।
प्रव्राज्य चीरवसनं किं नु पश्यसि कारणम्॥ १२॥
‘श्रीराम किसी की बुराई नहीं देखते। वे शूरवीर, पवित्रात्मा और यशस्वी हैं। उन्हें चीर पहनाकर वनवास दे देने में तू कौन-सा लाभ देख रही है ? ॥ १२॥
लुब्धाया विदितो मन्ये न तेऽहं राघवं यथा।
तथा ह्यनर्थो राज्यार्थं त्वयाऽऽनीतो महानयम्॥ १३॥
‘तू लोभिन है। मैं समझता हूँ, इसीलिये तुझे यह पता नहीं है कि मेरा श्रीरामचन्द्रजी के प्रति कैसा भावहै, तभी तूने राज्य के लिये यह महान् अनर्थ कर डाला है॥ १३॥
अहं हि पुरुषव्याघ्रावपश्यन् रामलक्ष्मणौ।
केन शक्तिप्रभावेण राज्यं रक्षितमुत्सहे॥१४॥
‘मैं पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मण को न देखकर किस शक्ति के प्रभाव से इस राज्य की रक्षा कर सकता हूँ ? (मेरे बल तो मेरे भाई ही हैं)॥ १४ ॥
तं हि नित्यं महाराजो बलवन्तं महौजसम्।
उपाश्रितोऽभूद् धर्मात्मा मेरुर्मेरुवनं यथा॥१५॥
‘मेरे धर्मात्मा पिता महाराज दशरथ भी सदा उनमहातेजस्वी बलवान् श्रीराम का ही आश्रय लेते थे । (उन्हीं से अपने लोक-परलोक की सिद्धि की आशा रखते थे), ठीक उसी तरह जैसे मेरु पर्वत अपनी रक्षा के लिये अपने ऊपर उत्पन्न हुए गहन वन का ही आश्रय लेता है (यदि वह दुर्गम वन से घिरा हुआ न हो तो दूसरे लोग निश्चय ही उस पर आक्रमण कर सकते हैं)॥ १५॥
सोऽहं कथमिमं भारं महाधुर्यसमुद्यतम्।
दम्यो धुरमिवासाद्य सहेयं केन चौजसा॥१६॥
‘यह राज्य का भार, जिसे किसी महाधुरंधर ने धारण किया था, मैं कैसे, किस बल से धारण कर सकताहूँ? जैसे कोई छोटा-सा बछड़ा बड़े-बड़े बैलों द्वारा ढोये जाने योग्य महान् भार को नहीं खींच सकता, उसी प्रकार यह राज्य का महान् भार मेरे लिये असह्य है। १६॥
अथवा मे भवेच्छक्तिर्योगैर्बुद्धिबलेन वा।
सकामां न करिष्यामि त्वामहं पुत्रगर्द्धिनीम्॥ १७॥
‘अथवा नाना प्रकार के उपायों तथा बुद्धिबल से मुझमें राज्य के भरण-पोषण की शक्ति हो तो भी केवल अपने बेटे के लिये राज्य चाहने वाली तुझ कैकेयी की मनःकामना पूरी नहीं होने दूंगा॥ १७॥
न मे विकांक्षा जायेत त्यक्तुं त्वां पापनिश्चयाम्।
यदि रामस्य नावेक्षा त्वयि स्यान्मातृवत् सदा॥ १८॥
‘यदि श्रीराम तुझे सदा अपनी माता के समान नहीं देखते होते तो तेरी-जैसी पापपूर्ण विचारवाली माता का त्याग करने में मुझे तनिक भी हिचक नहीं होती। १८॥
उत्पन्ना तु कथं बुद्धिस्तवेयं पापदर्शिनी।
साधुचारित्रविभ्रष्टे पूर्वेषां नो विगर्हिता॥१९॥
‘उत्तम चरित्र से गिरी हुई पापिनि! मेरे पूर्वजों ने जिसकी सदा निन्दा की है, वह पापपर ही दृष्टि रखने वाली बुद्धि तुझमें कैसे उत्पन्न हो गयी? ॥ १९॥
अस्मिन् कुले हि सर्वेषां ज्येष्ठो राज्येऽभिषिच्यते।
अपरे भ्रातरस्तस्मिन् प्रवर्तन्ते समाहिताः॥२०॥
‘इस कुल में जो सबसे बड़ा होता है, उसी का राज्याभिषेक होता है; दूसरे भाई सावधानी के साथ बड़े की आज्ञा के अधीन रहकर कार्य करते हैं॥ २० ॥
न हि मन्ये नृशंसे त्वं राजधर्ममवेक्षसे।
गतिं वा न विजानासि राजवृत्तस्य शाश्वतीम्॥ २१॥
‘क्रूर स्वभाववाली कैकेयि! मेरी समझ में तू राजधर्म पर दृष्टि नहीं रखती है अथवा उसे बिलकुल नहीं जानती। राजाओं के बर्ताव का जो सनातन स्वरूप है, उसका भी तुझे ज्ञान नहीं है ॥२१॥
सततं राजपुत्रेषु ज्येष्ठो राजाभिषिच्यते।
राज्ञामेतत् समं तत् स्यादिक्ष्वाकूणां विशेषतः॥ २२॥
‘राजकुमारों में जो ज्येष्ठ होता है, सदा उसी का राजा के पद पर अभिषेक किया जाता है। सभी राजाओं के यहाँ समान रूप से इस नियम का पालन होता है। इक्ष्वाकुवंशी नरेशों के कुल में इसका विशेष आदर है॥ २२॥
तेषां धर्मैकरक्षाणां कुलचारित्रशोभिनाम्।
अद्य चारित्रशौटीर्यं त्वां प्राप्य विनिवर्तितम्॥ २३॥
‘जिनकी एकमात्र धर्म से ही रक्षा होती आयी है तथा जो कुलोचित सदाचार के पालन से ही सुशोभितहुए हैं, उनका यह चरित्रविषयक अभियान आज तुझे पाकर तेरे सम्बन्ध के कारण दूर हो गया॥ २३॥
तवापि सुमहाभागे जनेन्द्रकुलपूर्वके।
बुद्धिमोहः कथमयं सम्भूतस्त्वयि गर्हितः॥ २४॥
‘महाभागे! तेरा जन्म भी तो महाराज केकयके कुलमें हुआ है, फिर तेरे हृदयमें यह निन्दित बुद्धिमोह कैसे उत्पन्न हो गया? ॥ २४ ॥
न तु कामं करिष्यामि तवाहं पापनिश्चये।
यया व्यसनमारब्धं जीवितान्तकरं मम॥२५॥
‘अरी! तेरा विचार बडा ही पापपूर्ण है। मैं तेरी इच्छा कदापि नहीं पूर्ण करूँगा। तूने मेरे लिये उस विपत् तिकी नींव डाल दी है, जो मेरे प्राण तक ले सकती है॥ २५॥
एष त्विदानीमेवाहमप्रियार्थं तवानघम्।
निवर्तयिष्यामि वनाद भ्रातरं स्वजनप्रियम्॥२६॥
‘यह ले, मैं अभी तेरा अप्रिय करने के लिये तुल गया हूँ। मैं वन से निष्पाप भ्राता श्रीराम को, जो स्वजनों के प्रिय हैं, लौटा लाऊँगा॥ २६॥
निवर्तयित्वा रामं च तस्याहं दीप्ततेजसः।
दासभूतो भविष्यामि सुस्थितेनान्तरात्मना ॥२७॥
श्रीराम को लौटा लाकर उद्दीप्त तेज वाले उन्हीं महापुरुष का दास बनकर स्वस्थचित्त से जीवन व्यतीत करूँगा’॥ २७॥
इत्येवमुक्त्वा भरतो महात्मा प्रियेतरैर्वाक्यगणैस्तुदंस्ताम्।
शोकार्दितश्चापि ननाद भूयः सिंहो यथा मन्दरकन्दरस्थः॥२८॥
ऐसा कहकर महात्मा भरत शोक से पीड़ित हो पुनः जली-कटी बातों से कैकेयी को व्यथित करते हुए उसे जोर-जोरसे फटकारने लगे, मानो मन्दराचल की गुहा में बैठा हुआ सिंह गरज रहा हो॥२८॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्रिसप्ततितमः सर्गः॥ ७३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में तिहत्तरवाँ सर्ग पूराहुआ॥ ७३॥
सर्ग-74
तां तथा गर्हयित्वा तु मातरं भरतस्तदा।
रोषेण महताविष्टः पुनरेवाब्रवीद् वचः॥१॥
इस प्रकार माता की निन्दा करके भरत उस समय महान् रोषावेश से भर गये और फिर कठोर वाणी में कहने लगे- ॥१॥
राज्याद भ्रंशस्व कैकेयि नृशंसे दुष्टचारिणि।
परित्यक्तासि धर्मेण मा मृतं रुदती भव॥२॥
‘दृष्टतापूर्ण बर्ताव करने वाली क्रूरहृदया कैकेयि! तू राज्य से भ्रष्ट हो जा। धर्म ने तेरा परित्याग कर दिया है, अतः अब तू मरे हुए महाराज के लिये रोना मत, (क्योंकि तू पत्नीधर्म से गिर चुकी है) अथवा मुझे मरा हुआ समझकर तू जन्मभर पुत्र के लिये रोया कर॥२॥
किं नु तेऽदूषयद् रामो राजा वा भृशधार्मिकः।
ययोर्मृत्युर्विवासश्च त्वत्कृते तुल्यमागतौ॥ ३॥
‘श्रीराम ने अथवा अत्यन्त धर्मात्मा महाराज (पिताजी) ने तेरा क्या बिगाड़ा था, जिससे एक साथ ही उन्हें तुम्हारे कारण वनवास और मृत्यु का कष्ट भोगना पड़ा? ॥३॥
भ्रूणहत्यामसि प्राप्ता कुलस्यास्य विनाशनात्।
कैकेयि नरकं गच्छ मा च तातसलोकताम्॥४॥
कैकेयि! तूने इस कुल का विनाश करने के कारण भ्रूणहत्या का पाप अपने सिर पर लिया है, इसलिये तू नरक में जा और पिताजी का लोक तुझे न मिले ॥४॥
यत्त्वया हीदृशं पापं कृतं घोरेण कर्मणा।
सर्वलोकप्रियं हित्वा ममाप्यापादितं भयम्॥५॥
‘तूने इस घोर कर्म के द्वारा समस्त लोकों के प्रिय श्रीराम को देशनिकाला देकर जो ऐसा बड़ा पापकिया है, उसने मेरे लिये भी भय उपस्थित कर दिया है॥५॥
त्वत्कृते मे पिता वृत्तो रामश्चारण्यमाश्रितः।
अयशो जीवलोके च त्वयाहं प्रतिपादितः॥६॥
‘तेरे कारण मेरे पिता की मृत्यु हुई, श्रीराम को वन का आश्रय लेना पड़ा और मुझे भी तूने इस जीवजगत् में अपयश का भागी बना दिया॥६॥
मातृरूपे ममामित्रे नृशंसे राज्यकामुके।
न तेऽहमभिभाष्योऽस्मि दुर्वृत्ते पतिघातिनि॥७॥
‘राज्य के लोभ में पड़कर क्रूरतापूर्ण कर्म करने वाली दुराचारिणी पतिघातिनि! तू माता के रूप में मेरी शत्रु है। तुझे मुझसे बात नहीं करनी चाहिये॥७॥
कौसल्या च सुमित्रा च याश्चान्या मम मातरः।
दुःखेन महताविष्टास्त्वां प्राप्य कुलदूषिणीम्॥ ८॥
‘कौसल्या, सुमित्रा तथा जो अन्य मेरी माताएँ हैं, वे सब तुझ कुलकलङ्किनी के कारण महान् दुःख में पड़ गयी हैं॥८॥
न त्वमश्वपतेः कन्या धर्मराजस्य धीमतः।
राक्षसी तत्र जातासि कुलप्रध्वंसिनी पितुः॥९॥
‘तू बुद्धिमान् धर्मराज अश्वपति की कन्या नहीं है। तू उनके कुल में कोई राक्षसी पैदा हो गयी है, जो पिता के वंश का विध्वंस करने वाली है॥९॥
यत् त्वया धार्मिको रामो नित्यं सत्यपरायणः।
वनं प्रस्थापितो वीरः पितापि त्रिदिवं गतः॥ १०॥
यत् प्रधानासि तत् पापं मयि पित्रा विना कृते।
भ्रातृभ्यां च परित्यक्ते सर्वलोकस्य चाप्रिये॥
‘तूने सदा सत्य में तत्पर रहने वाले धर्मात्मा वीर श्रीराम को जो वन में भेज दिया और तेरे कारण जो मेरे पिता स्वर्गवासी हो गये, इन सब कुकृत्यों द्वारा तूने प्रधान रूप से जिस पाप का अर्जन किया है, वह पाप मुझमें आकर अपना फल दिखा रहा है; इसलिये मैं पितृहीन हो गया, अपने दो भाइयों से बिछुड़ गया और समस्त जगत् के लोगों के लिये अप्रिय बन गया॥ १०-११॥
कौसल्यां धर्मसंयुक्तां वियुक्तां पापनिश्चये।
कृत्वा कं प्राप्स्यसे ह्यद्य लोकं निरयगामिनि॥ १२॥
‘पापपूर्ण विचार रखने वाली नरकगामिनी कैकेयि ! धर्मपरायणा माता कौसल्या को पति और पुत्र से वञ्चित करके अब तू किस लोक में जायगी? ॥ १२ ॥
किं नावबुध्यसे क्रूरे नियतं बन्धुसंश्रयम्।
ज्येष्ठं पितृसमं रामं कौसल्यायात्मसम्भवम्॥ १३॥
‘क्रूरहृदये! कौसल्यापुत्र श्रीराम मेरे बड़े भाई और पिता के तुल्य हैं। वे जितेन्द्रिय और बन्धुओं के आश्रयदाता हैं। क्या तू उन्हें इस रूप में नहीं जानती है? ॥ १३॥
अङ्गप्रत्यङ्गजः पुत्रो हृदयाच्चाभिजायते।
तस्मात् प्रियतरो मातुः प्रिया एव तु बान्धवाः॥ १४॥
‘पुत्र माता के अङ्ग-प्रत्यङ्ग और हृदय से उत्पन्न होता है, इसलिये वह माता को अधिक प्रिय होता है।अन्य भाई-बन्धु केवल प्रिय ही होते हैं (किंतु पुत्र प्रियतर होता है) ॥ १४॥
अन्यदा किल धर्मज्ञा सुरभिः सुरसम्मता।
वहमानौ ददर्शोर्त्यां पुत्रौ विगतचेतसौ॥१५॥
‘एक समय की बात है कि धर्म को जानने वाली देव-सम्मानित सुरभि (कामधेनु) ने पृथ्वी पर अपने दो पुत्रों को देखा, जो हल जोतते-जोतते अचेत हो गये थे॥ १५॥
तावर्धदिवसं श्रान्तौ दृष्ट्वा पुत्रौ महीतले।
रुरोद पुत्रशोकेन बाष्पपर्याकुलेक्षणम्॥१६॥
‘मध्याह्न का समय होने तक लगातार हल जोतने से वे बहुत थक गये थे। पृथ्वी पर अपने उन दोनों पुत्रों को ऐसी दुर्दशा में पड़ा देख सुरभि पुत्रशोक से रोने लगी। उसके नेत्रों में आँसू उमड़ आये॥१६॥
अधस्ताद् व्रजतस्तस्याः सुरराज्ञो महात्मनः।
बिन्दवः पतिता गात्रे सूक्ष्माः सुरभिगन्धिनः॥ १७॥
‘उसी समय महात्मा देवराज इन्द्र सुरभि के नीचे से होकर कहीं जा रहे थे। उनके शरीर पर कामधेनु के दो बूंद सुगन्धित आँसू गिर पड़े॥१७॥
निरीक्षमाणस्तां शक्रो ददर्श सुरभिं स्थिताम्।
आकाशे विष्ठितां दीनां रुदतीं भृशदुःखिताम्॥१८॥
‘जब इन्द्र ने ऊपर दृष्टि डाली, तब देखा आकाश में सुरभि खड़ी हैं और अत्यन्त दुःखी हो दीनभाव से रो रही हैं॥ १८॥
तां दृष्ट्वा शोकसंतप्तां वज्रपाणिर्यशस्विनीम्।
इन्द्रः प्राञ्जलिरुद्विग्नः सुरराजोऽब्रवीद् वचः॥ १९॥
‘यशस्विनी सुरभि को शोक से संतप्त हुई देख वज्रधारी देवराज इन्द्र उद्विग्न हो उठे और हाथ जोड़कर बोले- ॥ १९॥
भयं कच्चिन्न चास्मासु कुतश्चिद विद्यते महत्।
कुतोनिमित्तः शोकस्ते ब्रूहि सर्वहितैषिणि॥२०॥
‘सबका हित चाहने वाली देवि! हमलोगों पर कहीं से कोई महान् भय तो नहीं उपस्थित हआ है? बताओ, किस कारण से तुम्हें यह शोक प्राप्त हुआ है ? ॥ २० ॥
एवमुक्ता तु सुरभिः सुरराजेन धीमता।
प्रत्युवाच ततो धीरा वाक्यं वाक्यविशारदा॥ २१॥
‘बुद्धिमान् देवराज इन्द्र के इस प्रकार पूछने पर बोलने में चतुर और धीर स्वभाव वाली सुरभि ने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया- ॥२१॥
शान्तं पापं न वः किंचित् कुतश्चिदमराधिप।
अहं तु मग्नौ शोचामि स्व पत्रौ विषमे स्थितौ॥ २२॥
‘देवेश्वर! पाप शान्त हो। तुमलोगों पर कहीं से कोई भय नहीं है। मैं तो अपने इन दोनों पुत्रों को विषम अवस्था (घोर सङ्कट) में मग्न हुआ देख शोक कर रही हूँ॥ २२ ॥
एतौ दृष्ट्वा कृशौ दीनौ सूर्यरश्मिप्रतापितौ।
वध्यमानौ बलीवर्दी कर्षकेण दरात्मना॥२३॥
‘ये दोनों बैल अत्यन्त दुर्बल और दुःखी हैं, सूर्य की किरणों से बहुत तप गये हैं और ऊपर से वह दुष्ट किसान इन्हें पीट रहा है ॥ २३॥
मम कायात् प्रसूतौ हि दुःखितौ भारपीडितौ।
यौ दृष्ट्वा परितप्येऽहं नास्ति पुत्रसमः प्रियः॥ २४॥
‘मेरे शरीर से इनकी उत्पत्ति हुई है। ये दोनों भार से पीड़ित और दुःखी हैं, इसीलिये इन्हें देखकर मैं शोक से संतप्त हो रही हूँ; क्योंकि पुत्र के समान प्रिय दूसरा कोई नहीं है’॥ २४॥
यस्याः पुत्रसहस्रेस्तु कृत्स्नं व्याप्तमिदं जगत्।
तां दृष्ट्वा रुदतीं शक्रो न सुतान् मन्यते परम्॥ २५॥
‘जिनके सहस्रों पुत्रों से यह सारा जगत् भरा हुआ है, उन्हीं कामधेनु को इस तरह रोती देख इन्द्र ने यह माना कि पुत्र से बढ़कर और कोई नहीं है।॥ २५ ॥
इन्द्रो ह्यश्रुनिपातं तं स्वगात्रे पुण्यगन्धिनम्।
सुरभिं मन्यते दृष्ट्वा भूयसी तामिहेश्वरः॥२६॥
‘देवेश्वर इन्द्र ने अपने शरीर पर उस पवित्र गन्धवाले अश्रुपात को देखकर देवी सुरभि को इस जगत् में सबसे श्रेष्ठ माना॥ २६॥
समाप्रतिमवृत्ताया लोकधारणकाम्यया।
श्रीमत्या गुणमुख्यायाः स्वभावपरिचेष्टया॥२७॥
यस्याः पुत्रसहस्राणि सापि शोचति कामधुक।
किं पुनर्या विना रामं कौसल्या वर्तयिष्यति॥ २८॥
‘जिनका चरित्र समस्त प्राणियों के लिये समान रूप से हितकर और अनुपम है, जो अभीष्ट दान रूप ऐश्वर्यशक्ति से सम्पन्न, सत्यरूप प्रधान गुण से युक्त तथा लोकरक्षा की कामना से कार्य में प्रवृत्त होने वाली हैं और जिनके सहस्रों पुत्र हैं, वे कामधेनु भी जब अपने दो पुत्रों के लिये उनके स्वाभाविक चेष्टा में रत होने पर भी कष्ट पाने के कारण शोक करती हैं तब जिनके एक ही पुत्र है, वे माता कौसल्या श्रीराम के बिना कैसे जीवित रहेंगी? ॥ २७-२८॥
एकपुत्रा च साध्वी च विवत्सेयं त्वया कृता।
तस्मात् त्वं सततं दुःखं प्रेत्य चेह च लप्स्यसे॥ २९॥
‘इकलौते बेटेवाली इन सती-साध्वी कौसल्या का तूने उनके पुत्र से बिछोह करा दिया है, इसलिये तू सदा ही इस लोक और परलोक में भी दुःख ही पायेगी॥ २९॥
अहं त्वपचितिं भ्रातुः पितुश्च सकलामिमाम।
वर्धनं यशसश्चापि करिष्यामि न संशयः॥३०॥
‘मैं तो यह राज्य लौटाकर भाई की पूजा करूँगा और यह सारा अन्त्येष्टिसंस्कार आदि करके पिता का भी पूर्णरूप से पूजन करूँगा तथा निःसंदेह मैं वही कर्म करूँगा, जो (तेरे दिये हुए कलङ्क को मिटाने वाला और) मेरे यश को बढ़ाने वाला हो॥३०॥
आनाय्य च महाबाहुं कोसलेन्द्रं महाबलम्।
स्वयमेव प्रवेक्ष्यामि वनं मुनिनिषेवितम्॥ ३१॥
‘महाबली महाबाहु कोसलनरेश श्रीराम को यहाँ लौटा लाकर मैं स्वयं ही मुनिजनसेवित वन में प्रवेश करूँगा॥
नह्यहं पापसंकल्पे पापे पापं त्वया कृतम्।
शक्तो धारयितुं पौरैरश्रुकण्ठैर्निरीक्षितः॥३२॥
‘पापपूर्ण संकल्प करने वाली पापिनि! पुरवासी मनुष्य आँसू बहाते हुए अवरुद्धकण्ठ हो मुझे देखें और मैं तेरे किये हुए इस पाप का बोझ ढोता रहूँ यह मुझसे नहीं हो सकता ॥ ३२ ॥
सा त्वमग्निं प्रविश वा स्वयं वा विश दण्डकान्।
रज्जुं बद्ध्वाथवा कण्ठे नहि तेऽन्यत् परायणम्॥ ३३॥
‘अब तू जलती आग में प्रवेश कर जा, या स्वयं दण्डकारण्य में चली जा अथवा गले में रस्सी बाँधकर प्राण दे दे, इसके सिवा तेरे लिये दूसरी कोई गति नहीं है॥३३॥
अहमप्यवनीं प्राप्ते रामे सत्यपराक्रमे।
कृतकृत्यो भविष्यामि विप्रवासितकल्मषः॥ ३४॥
‘सत्यपराक्रमी श्रीरामचन्द्रजी जब अयोध्या की भूमि पर पदार्पण करेंगे, तभी मेरा कलङ्क दूर होगा और तभी मैं कृतकृत्य होऊँगा’॥ ३४ ॥
इति नाग इवारण्ये तोमराङ्कशतोदितः।
पपात भुवि संक्रुद्धो निःश्वसन्निव पन्नगः॥ ३५॥
यह कहकर भरत वन में तोमर और अंकुश द्वारा पीडित किये गये हाथी की भाँति मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े और क्रोध में भरकर फुफकारते हुए साँप की भाँति लम्बी साँस खींचने लगे॥ ३५ ॥
संरक्तनेत्रः शिथिलाम्बरस्तथा विधूतसर्वाभरणः परंतपः।
बभूव भूमौ पतितो नृपात्मजः शचीपतेः केतुरिवोत्सवक्षये॥ ३६॥
शत्रुओं को तपाने वाले राजकुमार भरत उत्सव समाप्त होने पर नीचे गिराये गये शचीपति इन्द्र के ध्वज की भाँति उस समय पृथ्वी पर पड़े थे, उनके नेत्र क्रोध से लाल हो गये थे, वस्त्र ढीले पड़ गये थे और सारे आभूषण टूटकर बिखर गये थे॥ ३६॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतुःसप्ततितमः सर्गः॥ ७४॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में चौहत्तरवाँ सर्ग पूराहुआ। ७४॥
सर्ग-75
दीर्घकालात् समुत्थाय संज्ञां लब्ध्वा स वीर्यवान्।
नेत्राभ्यामश्रुपूर्णाभ्यां दीनामुद्रीक्ष्य मातरम्॥१॥
सोऽमात्यमध्ये भरतो जननीमभ्यकुत्सयत्।
बहुत देर के बाद होश में आने पर जब पराक्रमी भरत उठे, तब आँसू भरे नेत्रों से दीन बनी बैठी हुई माता की ओर देखकर मन्त्रियों के बीच में उसकी निन्दा करते हुए बोले- ॥११/२॥
राज्यं न कामये जातु मन्त्रये नापि मातरम्॥२॥
अभिषेकं न जानामि योऽभूद् राज्ञा समीक्षितः।
विप्रकृष्ट ह्यहं देशे शत्रुघ्नसहितोऽभवम्॥३॥
‘मन्त्रिवरो! मैं राज्य नहीं चाहता और न मैंने कभी माता से इसके लिये बातचीत ही की है। महाराज ने जिस अभिषेक का निश्चय किया था, उसका भी मुझे पता नहीं था; क्योंकि उस समय मैं शत्रुघ्न के साथ दूर देश में था॥२-३॥
वनवासं न जानामि रामस्याहं महात्मनः।
विवासनं च सौमित्रेः सीतायाश्च यथाभवत्॥ ४ ॥
‘महात्मा श्रीराम के वनवास और सीता तथा लक्ष्मण के निर्वासन का भी मुझे ज्ञान नहीं है कि वह कब और कैसे हुआ?’॥४॥
तथैव क्रोशतस्तस्य भरतस्य महात्मनः।
कौसल्या शब्दमाज्ञाय सुमित्रां चेदमब्रवीत्॥५॥
महात्मा भरत जब इस प्रकार अपनी माता को कोस रहे थे, उस समय उनकी आवाज को पहचानकर कौसल्या ने सुमित्रा से इस प्रकार कहा— ॥५॥
आगतः क्रूरकार्यायाः कैकेय्या भरतः सुतः।
तमहं द्रष्टमिच्छामि भरतं दीर्घदर्शिनम्॥६॥
‘क्रूर कर्म करने वाली कैकेयी के पुत्र भरत आ गये हैं। वे बड़े दूरदर्शी हैं, अतः मैं उन्हें देखना चाहती॥६॥
एवमुक्त्वा सुमित्रां तां विवर्णवदना कृशा।
प्रतस्थे भरतो यत्र वेपमाना विचेतना॥७॥
सुमित्रा से ऐसा कहकर उदास मुखवाली, दुर्बल और अचेत-सी हुई कौसल्या जहाँ भरत थे, उस स्थान पर जाने के लिये काँपती हुई चलीं॥ ७॥
स तु राजात्मजश्चापि शत्रुघ्नसहितस्तदा।
प्रतस्थे भरतो येन कौसल्याया निवेशनम्॥८॥
उसी समय उधर से राजकुमार भरत भी शत्रुघ्न को साथ लिये उसी मार्ग से चले आ रहे थे, जिससे कौसल्या के भवन में आना-जाना होता था॥ ८॥
ततः शत्रुघ्नभरतौ कौसल्या प्रेक्ष्य दुःखितौ।
पर्यष्वजेतां दुःखार्ता पतितां नष्टचेतनाम्॥९॥
रुदन्तौ रुदती दुःखात् समेत्यार्या मनस्विनी।
भरतं प्रत्युवाचेदं कौसल्या भृशदुःखिता॥१०॥
तदनन्तर शत्रुघ्न और भरत ने दूर से ही देखा कि माता कौसल्या दुःख से व्याकुल और अचेत होकर पृथ्वी पर गिर पड़ी हैं। यह देखकर उन्हें बड़ा दुःख हुआ और वे दौड़कर उनकी गोदी से लग गये तथा
फूट-फूटकर रोने लगे। आर्या मनस्विनी कौसल्या भी दुःख से रो पड़ीं और उन्हें छाती से लगाकर अत्यन्त दुःखित हो भरत से इस प्रकार बोलीं- ॥९-१०॥
इदं ते राज्यकामस्य राज्यं प्राप्तमकण्टकम्।
सम्प्राप्तं बत कैकेय्या शीघ्रं क्रूरेण कर्मणा॥ ११॥
“बेटा ! तुम राज्य चाहते थे न? सो यह निष्कण्टक राज्य तुम्हें प्राप्त हो गया; किंतु खेद यही है कि कैकेयी ने जल्दी के कारण बड़े क्रूर कर्म के द्वारा इसे पाया है।
प्रस्थाप्य चीरवसनं पुत्रं मे वनवासिनम्।
कैकेयी कं गुणं तत्र पश्यति क्रूरदर्शिनी॥१२॥
‘क्रूरतापूर्ण दृष्टि रखनेवाली कैकेयी न जाने इसमें कौन-सा लाभ देखती थी कि उसने मेरे बेटे को चीर वस्त्र पहनाकर वन में भेज दिया और उसे वनवासी बना दिया॥१२॥
क्षिप्रं मामपि कैकेयी प्रस्थापयितुमर्हति।
हिरण्यनाभो यत्रास्ते सुतो मे सुमहायशाः॥१३॥
‘अब कैकेयी को चाहिये कि मुझे भी शीघ्र ही उसी स्थान पर भेज दे, जहाँ इस समय सुवर्णमयी नाभि से सुशोभित मेरे महायशस्वी पुत्र श्रीराम हैं।॥ १३॥
अथवा स्वयमेवाहं सुमित्रानुचरा सुखम्।
अग्निहोत्रं पुरस्कृत्य प्रस्थास्ये यत्र राघवः॥१४॥
‘अथवा सुमित्रा को साथ लेकर और अग्निहोत्र को आगे करके मैं स्वयं ही सुखपूर्वक उस स्थान को प्रस्थान करूँगी, जहाँ श्रीराम निवास करते हैं ॥ १४ ॥
कामं वा स्वयमेवाद्य तत्र मां नेतुमर्हसि।
यत्रासौ पुरुषव्याघ्रस्तप्यते मे सुतस्तपः॥ १५॥
‘अथवा तुम स्वयं ही अपनी इच्छा के अनुसार अब मुझे वहीं पहुँचा दो, जहाँ मेरे पुत्र पुरुषसिंह श्रीराम तप करते हैं॥ १५॥
इदं हि तव विस्तीर्णं धनधान्यसमाचितम्।
हस्त्यश्वरथसम्पूर्ण राज्यं निर्यातितं तया॥१६॥
‘यह धन-धान्य से सम्पन्न तथा हाथी, घोड़े एवं रथों से भरा-पूरा विस्तृत राज्य कैकेयी ने (श्रीराम से छीनकर) तुम्हें दिलाया है’ ॥ १६ ॥
इत्यादिबहुभिर्वाक्यैः क्रूरैः सम्भर्त्तितोऽनघः।
विव्यथे भरतोऽतीव व्रणे तुद्येव सूचिना॥१७॥
इस तरह की बहुत-सी कठोर बातें कहकर जब कौसल्या ने निरपराध भरत की भर्त्सना की, तब उनको बड़ी पीड़ा हुई; मानो किसी ने घाव में सूई चुभो दी हो॥ १७॥
पपात चरणौ तस्यास्तदा सम्भ्रान्तचेतनः।
विलप्य बहुधासंज्ञो लब्धसंज्ञस्तदाभवत्॥१८॥
वे कौसल्या के चरणों में गिर पड़े, उस समय उनके चित्त में बड़ी घबराहट थी। वे बारम्बार विलाप करके अचेत हो गये। थोड़ी देर बाद उन्हें फिर चेत हुआ॥ १८॥
एवं विलपमानां तां प्राञ्जलिर्भरतस्तदा।
कौसल्या प्रत्युवाचेदं शोकैर्बहभिरावृताम्॥१९॥
तब भरत अनेक प्रकार के शोकों से घिरी हुई और पूर्वोक्त रूप से विलाप करती हुई माता कौसल्या से हाथ जोड़कर इस प्रकार बोले- ॥१९॥
आर्ये कस्मादजानन्तं गर्हसे मामकल्मषम्।
विपुलां च मम प्रीतिं स्थितां जानासि राघवे॥ २०॥
‘आर्ये! यहाँ जो कुछ हुआ है, इसकी मुझे बिलकुल जानकारी नहीं थी। मैं सर्वथा निरपराध हूँ, । तो भी आप क्यों मुझे दोष दे रही हैं? आप तो जानती हैं कि श्रीरघुनाथजी में मेरा कितना प्रगाढ़ प्रेम
है॥२०॥
कृतशास्त्रानुगा बुद्धिर्मा भूत् तस्य कदाचन।
सत्यसंधः सतां श्रेष्ठो यस्यार्योऽनुमते गतः॥२१॥
‘जिसकी अनुमति से सत्पुरुषों में श्रेष्ठ, सत्यप्रतिज्ञ, आर्य श्रीरामजी वन में गये हों, उस पापी की बुद्धि कभी गुरु से सीखे हुए शास्त्रों में बताये गये मार्ग का अनुसरण करने वाली न हो॥ २१ ॥
प्रैष्यं पापीयसां यातु सूर्यं च प्रति मेहतु।
हन्तु पादेन गाः सुप्ता यस्यार्योऽनुमते गतः॥ २२॥
‘जिसकी सलाह से बड़े भाई श्रीराम को वन में जाना पड़ा हो, वह अत्यन्त पापियों-हीन जातियों का सेवक हो। सूर्य की ओर मुँह करके मल-मूत्र का त्याग करे और सोयी हुई गौओं को लात से मारे (अर्थात् वह इन पापकर्मो के दुष्परिणाम का भागी हो) ॥ २२ ॥
कारयित्वा महत् कर्म भर्ता भृत्यमनर्थकम्।
अधर्मो योऽस्य सोऽस्यास्तु यस्यार्योऽनुमते गतः॥ २३॥
‘जिसकी सम्मति से भैया श्रीराम ने वन को प्रस्थान किया हो, उसको वही पाप लगे, जो सेवक से भारी काम कराकर उसे समुचित वेतन न देने वाले स्वामी को लगता है॥ २३॥
परिपालयमानस्य राज्ञो भूतानि पुत्रवत्।
ततस्तु द्रुह्यतां पापं यस्यार्योऽनुमते गतः॥२४॥
‘जिसके कहने से आर्य श्रीराम को वन में भेजा गया हो, उसको वही पाप लगे, जो समस्त प्राणियों का पुत्र की भाँति पालन करने वाले राजा से द्रोह करने वाले लोगों को लगता है॥ २४॥
बलिषड्भागमुद्धृत्य नृपस्यारक्षितुः प्रजाः।
अधर्मो योऽस्य सोऽस्यास्तु यस्यार्योऽनुमते गतः॥ २५॥
‘जिसकी अनुमति से आर्य श्रीराम वन में गये हों, वह उसी अधर्म का भागी हो, जो प्रजा से उसकी आय का छठा भाग लेकर भी प्रजा वर्ग की रक्षा न करने वाले राजा को प्राप्त होता है॥ २५॥
संश्रुत्य च तपस्विभ्यः सत्रे वै यज्ञदक्षिणाम्।
तां चापलपतां पापं यस्यार्योऽनुमते गतः॥२६॥
‘जिसकी सलाह से भैया श्रीराम को वन में जाना पड़ा हो, उसे वही पाप लगे, जो यज्ञ में कष्ट सहने वाले ऋत्विजों को दक्षिणा देने की प्रतिज्ञा करके पीछे इनकार कर देने वाले लोगों को लगता है।॥ २६ ॥
हस्त्यश्वरथसम्बाधे युद्धे शस्त्रसमाकुले।
मा स्म कार्षीत् सतां धर्मं यस्यार्योऽनुमते गतः॥ २७॥
‘हाथी, घोड़े और रथों से भरे एवं अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा से व्याप्त संग्राम में सत्पुरुषों के धर्म का पालन न करने वाले योद्धाओं को जो पाप लगता है, वही उस मनुष्य को भी प्राप्त हो, जिसकी सम्मति से आर्य श्रीरामजी को वन में भेजा गया हो॥२७॥
उपदिष्टं सुसूक्ष्मार्थं शास्त्रं यत्नेन धीमता।
स नाशयतु दुष्टात्मा यस्यार्योऽनुमते गतः॥ २८॥
‘जिसकी सलाह से आर्य श्रीराम को वन में प्रस्थान करना पड़ा है, वह दुष्टात्मा बुद्धिमान् गुरु के द्वारा यत्नपूर्वक प्राप्त हुआ शास्त्र के सूक्ष्म विषय का उपदेश भुला दे॥ २८॥
मा च तं व्यूढबाह्नसं चन्द्रभास्करतेजसम्।
द्राक्षीद् राज्यस्थमासीनं यस्यार्योऽनुमते गतः॥ २९॥
‘जिसकी सलाह से बड़े भैया श्रीराम को वन में भेजा गया हो, वह चन्द्रमा और सूर्य के समान तेजस्वी तथा विशाल भुजाओं और कंधों से सुशोभित श्रीरामचन्द्रजी को राज्यसिंहासन पर विराजमान न देख सके—वह राजा श्रीराम के दर्शन से वञ्चित रह जाय॥ २९॥
पायसं कृसरं छागं वृथा सोऽश्नातु निघृणः।
गुरूंश्चाप्यवजानातु यस्यार्योऽनुमते गतः॥३०॥
‘जिसकी सलाह से आर्य श्रीरामचन्द्रजी वन में गये हों, वह निर्दय मनुष्य खीर, खिचड़ी और बकरी के दूध को देवताओं, पितरों एवं भगवान् को निवेदन किये बिना व्यर्थ करके खाय॥ ३०॥
गाश्च स्पृशतु पादेन गुरून् परिवदेत च।
मित्रे द्रुह्येत सोऽत्यर्थं यस्यार्योऽनुमते गतः॥३१॥
‘जिसकी सम्मति से श्रीरामचन्द्रजी को वन में जाना पड़ा हो, वह पापी मनुष्य गौओं के शरीर का पैर से स्पर्श, गुरुजनों की निन्दा तथा मित्र के प्रति अत्यन्त द्रोह करे॥३१॥
विश्वासात् कथितं किंचित् परिवादं मिथः क्वचित्।
विवृणोतु स दुष्टात्मा यस्यार्योऽनुमते गतः॥३२॥
‘जिसके कहने से बड़े भैया श्रीराम वन में गये हों, वह दुष्टात्मा गुप्त रखने के विश्वास पर एकान्त में कहे हुए किसी के दोष को दूसरों पर प्रकट कर दे (अर्थात् उसे विश्वासघात करने का पाप लगे) ॥ ३२॥
अकर्ता चाकृतज्ञश्च त्यक्तात्मा निरपत्रपः।
लोके भवतु विद्रिष्टो यस्यार्योऽनुमते गतः॥३३॥
‘जिसकी अनुमति से आर्य श्रीराम वन में गये हों, वह मनुष्य उपकार न करनेवाला, कृतघ्न, सत्पुरुषों द्वारा परित्यक्त, निर्लज्ज और जगत् में सबके द्वेष का पात्र हो॥
पुत्रैर्दासैश्च भृत्यैश्च स्वगृहे परिवारितः।
स एको मृष्टमश्नातु यस्यार्योऽनुमते गतः॥ ३४॥
‘जिसकी सलाह से आर्य श्रीराम वन में गये हों, वह अपने घर में पुत्रों, दासों और भृत्यों से घिरा रहकर भी अकेले ही मिष्टान्न भोजन करने के पाप का भागी हो॥
अप्राप्य सदृशान् दाराननपत्यः प्रमीयताम्।
अनवाप्य क्रियां धां यस्यार्योऽनुमते गतः॥ ३५॥
‘जिसकी अनुमति से आर्य श्रीराम का वनगमन हुआ हो, वह अपने अनुरूप पत्नी को न पाकर अग्निहोत्रआदि धार्मिक कर्मो का अनुष्ठान किये बिना संतान हीन अवस्था में ही मर जाय॥ ३५॥
माऽऽत्मनः संततिं द्राक्षीत् स्वेषु दारेषु दुःखितः।
आयुःसमग्रमप्राप्य यस्यार्योऽनुमते गतः॥ ३६॥
जिसकी सम्मति से मेरे बड़े भाई श्रीराम वन में गये हों, वह सदा दुःखी रहकर अपनी धर्मपत्नी से होने वाली संतान का मुँह न देखे तथा सम्पूर्ण आयु का उपभोग किये बिना ही मर जाय॥३६॥
राजस्त्रीबालवृद्धानां वधे यत् पापमुच्यते।
भृत्यत्यागे च यत् पापं तत् पापं प्रतिपद्यताम्॥ ३७॥
‘राजा, स्त्री, बालक और वृद्धों का वध करने तथा भृत्यों को त्याग देने में जो पाप होता है, वही पाप उसे भी लगे॥३७॥
लाक्षया मधुमांसेन लोहेन च विषेण च।
सदैव बिभृयाद् भृत्यान् यस्यार्योऽनुमते गतः॥ ३८॥
‘जिसकी सम्मति से श्रीराम का वनगमन हुआ हो, वह सदैव लाह, मधु, मांस, लोहा और विष आदि निषिद्ध वस्तुओं को बेचकर कमाये हुए धन से अपने भरण-पोषण के योग्य कुटुम्बीजनों का पालन करे॥३८॥
संग्रामे समुपोढे च शत्रुपक्षभयंकरे।
पलायमानो वध्येत यस्यार्योऽनुमते गतः॥ ३९॥
जिसकी राय से श्रीराम वन में जाने को विवश हुए हों, वह शत्रुपक्ष को भय देने वाले युद्ध के प्राप्त होने पर उसमें पीठ दिखाकर भागता हुआ मारा जाय॥ ३९॥
कपालपाणिः पृथिवीमटतां चीरसंवृतः।
भिक्षमाणो यथोन्मत्तो यस्यार्योऽनुमते गतः॥ ४०॥
‘जिसकी सम्मति से आर्य श्रीराम वन में गये हों, वह फटे-पुराने, मैले-कुचैले वस्त्र से अपने शरीर को ढककर हाथ में खप्पर ले भीख माँगता हुआ उन्मत्त की भाँति पृथ्वी पर घूमता फिरे॥ ४०॥
मद्यप्रसक्तो भवतु स्त्रीष्वक्षेषु च नित्यशः।
कामक्रोधाभिभूतश्च यस्यार्योऽनुमते गतः॥४१॥
‘जिसकी सलाह से श्रीरामचन्द्रजी को वन में जाना पड़ा हो, वह काम-क्रोध के वशीभूत होकर सदा ही मद्यपान, स्त्रीसमागम और द्यूतक्रीड़ा में आसक्त रहे।४१॥
मास्य धर्मे मनो भूयादधर्मं स निषेवताम्।
अपात्रवर्षी भवतु यस्यार्योऽनुमते गतः॥४२॥
‘जिसकी अनुमति से आर्य श्रीराम वन में गये हों, उसका मन कभी धर्म में न लगे, वह अधर्म का ही सेवन करे और अपात्र को धन दान करे॥ ४२ ॥
संचितान्यस्य वित्तानि विविधानि सहस्रशः।
दस्युभिर्विप्रलुप्यन्तां यस्यार्योऽनुमते गतः॥४३॥
‘जिसकी सलाह से आर्य श्रीराम का वन-गमन हुआ हो, उसके द्वारा सहस्रों की संख्या में संचित किये गये नाना प्रकार के धन-वैभवों को लुटेरे लूट ले जायँ। ४३॥
उभे संध्ये शयानस्य यत् पापं परिकल्प्यते।
तच्च पापं भवेत् तस्य यस्यार्योऽनुमते गतः॥ ४४॥
यदग्निदायके पापं यत् पापं गुरुतल्पगे।
मित्रद्रोहे च यत् पापं तत् पापं प्रतिपद्यताम्॥ ४५॥
‘जिसके कहने से भैया श्रीराम को वन में भेजा गया हो, उसे वही पाप लगे, जो दोनों संध्याओं के समय सोये हुए पुरुष को प्राप्त होता है। आग लगाने वाले मनुष्य को जो पाप लगता है, गुरुपत्नीगामी को जिस पाप की प्राप्ति होती है तथा मित्रद्रोह करने से जो पाप प्राप्त होता है, वही पाप उसे भी लगे॥ ४४-४५ ॥
देवतानां पितॄणां च मातापित्रोस्तथैव च।
मा स्म कार्षीत् स शुश्रूषां यस्यार्योऽनुमते गतः॥ ४६॥
“जिसकी सम्मतिसे आर्य श्रीरामको वनमें जाना पड़ा है, वह देवताओं, पितरों और माता-पिताकी सेवा कभी न करे (अर्थात् उनकी सेवाके पुण्यसे वञ्चित रह जाय) ॥ ४६॥
सतां लोकात् सतां कीर्त्याः सज्जुष्टात् कर्मणस्तथा।
भ्रश्यतु क्षिप्रमद्यैव यस्यार्योऽनुमते गतः॥४७॥
‘जिसकी अनुमति से विवश होकर भैया श्रीराम ने वन में पदार्पण किया है, वह पापी आज ही सत्पुरुषों के लोक से, सत्पुरुषों की कीर्ति से तथा सत्पुरुषों द्वारा सेवित कर्म से शीघ्र भ्रष्ट हो जाय॥ ४७॥
अपास्य मातृशुश्रूषामनर्थे सोऽवतिष्ठताम्।
दीर्घबाहर्महावक्षा यस्यार्योऽनुमते गतः॥४८॥
‘जिसकी सम्मति से बड़ी-बड़ी बाँह और विशाल वक्ष वाले आर्य श्रीराम को वन में जाना पड़ा है, वह माता की सेवा छोड़कर अनर्थ के पथ में स्थित रहे। ४८॥
बहुभृत्यो दरिद्रश्च ज्वररोगसमन्वितः।
समायात् सततं क्लेशं यस्यार्योनुमते गतः॥४९॥
‘जिसकी सलाह से श्रीराम का वनगमन हुआ हो, वह दरिद्र हो, उसके यहाँ भरण-पोषण पाने के योग्य पुत्र आदि की संख्या बहुत अधिक हो तथा वह ज्वररोग से पीड़ित होकर सदा क्लेश भोगता रहे ॥ ४९॥
आशामाशंसमानानां दीनानामूर्ध्वचक्षुषाम्।
अर्थिनां वितथां कुर्याद् यस्यार्योऽनुमते गतः॥ ५०॥
‘जिसकी अनुमति पाकर आर्य श्रीराम वन में गये हों,वह आशा लगाये ऊपर की ओर आँख उठाकर दाता के मुँह की ओर देखने वाले दीन याचकों की आशा को निष्फल कर दे॥५०॥
मायया रमतां नित्यं पुरुषः पिशुनोऽशुचिः।
राज्ञो भीतस्त्वधर्मात्मा यस्यार्योऽनुमते गतः॥ ५१॥
‘जिसके कहने से भैया श्रीराम ने वन को प्रस्थान किया हो, वह पापात्मा पुरुष चुगला, अपवित्र तथा राजा से भयभीत रहकर सदा छल-कपट में ही रचापचा रहे ॥ ५१॥
ऋतुस्नातां सती भार्यामृतुकालानुरोधिनीम्।
अतिवर्तेत दुष्टात्मा यस्यार्योऽनुमते गतः॥५२॥
‘जिसके परामर्श से आर्य का वनमगन हुआ हो, वह दुष्टात्मा ऋतु-स्नानकाल प्राप्त होने के कारण अपने पास आयी हुई सती-साध्वी ऋतुस्नाता पत्नी को ठुकरा दे (उसकी इच्छा न पूर्ण करने के पाप का भागी हो) । ५२॥
विप्रलुप्तप्रजातस्य दुष्कृतं ब्राह्मणस्य यत्।
तदेतत् प्रतिपद्येत यस्यार्योऽनुमते गतः॥५३॥
‘जिसकी सलाह से मेरे बड़े भाई को वन में जाना पड़ा हो, उसको वही पाप लगे, जो (अन्न आदि का दान न करने अथवा स्त्री से द्वेष रखने के कारण) नष्ट हुई संतान वाले ब्राह्मण को प्राप्त होता है॥ ५३॥
ब्राह्मणायोद्यतां पूजां विहन्तु कलुषेन्द्रियः।
बालवत्सां च गां दोग्धु यस्यार्योऽनुमते गतः॥ ५४॥
‘जिसकी राय से आर्य ने वन में पदार्पण किया हो, वह मलिन इन्द्रियवाला पुरुष ब्राह्मण के लिये की जाती हुई पूजा में विघ्न डाल दे और छोटे बछड़े वाली (दस दिन के भीतर की ब्यायी हुई) गाय का दूध दुहे॥ ५४॥
धर्मदारान् परित्यज्य परदारान् निषेवताम्।
त्यक्तधर्मरतिर्मूढो यस्यार्योऽनुमते गतः॥५५॥
‘जिसने आर्य श्रीराम के वनमगन की अनुमति दी हो, वह मूढ़ धर्मपत्नी को छोड़कर परस्त्री का सेवन करे तथा धर्मविषयक अनुराग को त्याग दे॥५५॥
पानीयदूषके पापं तथैव विषदायके।
यत्तदेकः स लभतां यस्यार्योऽनुमते गतः॥५६॥
‘पानी को गन्दा करने वाले तथा दूसरों को जहर देने वाले मनुष्य को जो पाप लगता है, वह सारा पाप अकेला वही प्राप्त करे, जिसकी अनुमति से विवश होकर आर्य श्रीराम को वन में जाना पड़ा है॥५६॥
तृषार्तं सति पानीये विप्रलम्भेन योजयन्।
यत् पापं लभते तत् स्याद् यस्यार्योऽनुमते गतः॥ ५७॥
‘जिसकी सम्मति से आर्य का वनगमन हुआ हो, उसे वही पाप प्राप्त हो, जो पानी होते हुए भी प्यासे को उससे वञ्चित कर देने वाले मनुष्य को लगता है॥ ५७॥
भक्त्या विवदमानेषु मार्गमाश्रित्य पश्यतः।
तेन पापेन युज्येत यस्यार्योऽनुमते गतः॥५८॥
‘जिसकी अनुमति से आर्य श्रीराम वन में गये हों, वह उस पाप का भागी हो, जो परस्पर झगड़ते हुए मनुष्यों में से किसी एक के प्रति पक्षपात रखकर मार्ग में खड़ा हो उनका झगड़ा देखने वाले कलहप्रिय मनुष्य को प्राप्त होता है’ ॥ ५८॥
एवमाश्वासयन्नेव दुःखार्तोऽनुपपात ह।
विहीनां पतिपुत्राभ्यां कौसल्या पार्थिवात्मजः॥ ५९॥
इस प्रकार पति और पुत्र से बिछुड़ी हुई कौसल्या को शपथ के द्वारा आश्वासन देते हुए ही राजकुमार भरत दुःख से व्याकुल होकर पृथ्वी पर गिर पड़े॥ ५९॥
तदा तं शपथैः कष्टैः शपमानमचेतनम्।
भरतं शोकसंतप्तं कौसल्या वाक्यमब्रवीत्॥ ६०॥
उस समय दुष्कर शपथों द्वारा अपनी सफाई देते हुए शोकसंतप्त एवं अचेत भरत से कौसल्या ने इस प्रकार कहा- ॥६०॥
मम दुःखमिदं पुत्र भूयः समुपजायते।
शपथैः शपमानो हि प्राणानुपरुणत्सि मे॥६१॥
‘बेटा! तुम अनेकानेक शपथ खाकर जो मेरे प्राणों को पीड़ा दे रहे हो, इससे मेरा यह दुःख और भी बढ़ता जा रहा है॥ ६१॥
दिष्ट्या न चलितो धर्मादात्मा ते सहलक्षणः।
वत्स सत्यप्रतिज्ञो हि सतां लोकानवाप्स्यसि॥ ६२॥
‘वत्स! सौभाग्य की बात है कि शुभ लक्षणों से सम्पन्न तुम्हारा चित्त धर्म से विचलित नहीं हुआ है। तुम सत्यप्रतिज्ञ हो, इसलिये तुम्हें सत्पुरुषों के लोक प्राप्त होंगे’ ॥ ६२॥
इत्युक्त्वा चाङ्कमानीय भरतं भ्रातृवत्सलम्।
परिष्वज्य महाबाहुं रुरोद भृशदुःखिता॥६३॥
ऐसा कहकर कौसल्या ने भ्रातृभक्त महाबाहु भरत को गोद में खींच लिया और अत्यन्त दुःखी हो उन्हें गले से लगाकर वे फूट-फूटकर रोने लगीं। ६३॥
एवं विलपमानस्य दुःखार्तस्य महात्मनः।
मोहाच्च शोकसंरम्भाद् बभूव लुलितं मनः॥ ६४॥
महात्मा भरत भी दुःख से आर्त होकर विलाप कर रहे थे। उनका मन मोह और शोक के वेग से व्याकुल हो गया था॥ ६४॥
लालप्यमानस्य विचेतनस्य प्रणष्टबुद्धेः पतितस्य भूमौ।
मुहुर्मुहुर्निःश्वसतश्च दीर्घ सा तस्य शोकेन जगाम रात्रिः॥६५॥
पृथ्वी पर पड़े हुए भरत की बुद्धि (विवेकशक्ति) नष्ट हो गयी थी। वे अचेत-से होकर विलाप करते और बारंबार लंबी साँस खींचते थे। इस तरह शोक में ही उनकी वह रात बीत गयी॥६५॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चसप्ततितमः सर्गः॥ ७५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में पचहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७५॥
सर्ग-76
तमेवं शोकसंतप्तं भरतं कैकयीसुतम्।
उवाच वदतां श्रेष्ठो वसिष्ठः श्रेष्ठवागृषिः॥१॥
इस प्रकार शोक से संतप्त हुए केकयी कुमार भरत से वक्ताओं में श्रेष्ठ महर्षि वसिष्ठ ने उत्तम वाणी में कहा॥१॥
अलं शोकेन भद्रं ते राजपुत्र महायशः।
प्राप्तकालं नरपतेः कुरु संयानमुत्तमम्॥२॥
‘महायशस्वी राजकुमार ! तुम्हारा कल्याण हो। यह शोक छोड़ो, क्योंकि इससे कुछ होने-जाने वाला नहीं है। अब समयोचित कर्तव्य पर ध्यान दो। राजा दशरथ के शव को दाहसंस्कार के लिये ले चलने का उत्तम प्रबन्ध करो’ ॥ २॥
वसिष्ठस्य वचः श्रुत्वा भरतो धरणीं गतः।
प्रेतकृत्यानि सर्वाणि कारयामास धर्मवित्॥३॥
वसिष्ठजी का वचन सुनकर धर्मज्ञ भरत ने पृथ्वी पर पड़कर उन्हें साष्टाङ्ग प्रणाम किया और मन्त्रियों द्वारा पिता के सम्पूर्ण प्रेतकर्म का प्रबन्ध करवाया॥३॥
उद्धृत्य तैलसंसेकात् स तु भूमौ निवेशितम्।
आपीतवर्णवदनं प्रसुप्तमिव भूमिपम्॥४॥
राजा दशरथ का शव तेल के कड़ाह से निकालकर भूमि पर रखा गया। अधिक समय तक तेल में पड़े रहने से उनका मुख कुछ पीला हो गया। उसे देखने से ऐसा जान पड़ता था, मानो भूमिपाल दशरथ सो रहे हों॥४॥
संवेश्य शयने चाग्रये नानारत्नपरिष्कृते।
ततो दशरथं पुत्रो विललाप सदःखितः॥५॥
तदनन्तर मृत राजा दशरथ को धो-पोंछकर नानाप्रकार के रत्नों से विभूषित उत्तम शय्या (विमान) पर सुलाकर उनके पुत्र भरत अत्यन्त दुःखी हो विलाप करने लगे— ॥५॥
किं ते व्यवसितं राजन् प्रोषिते मय्यनागते।
विवास्य रामं धर्मज्ञं लक्ष्मणं च महाबलम्॥६॥
‘राजन् ! मैं परदेश में था और आपके पास पहुँचने भी नहीं पाया था, तब तक ही धर्मज्ञ श्रीराम और महाबली लक्ष्मण को वन में भेजकर आपने इस तरह स्वर्ग में जाने का निश्चय कैसे कर लिया?॥६॥
क्व यास्यसि महाराज हित्वेमं दुःखितं जनम्।
हीनं पुरुषसिंहेन रामेणाक्लिष्टकर्मणा॥७॥
‘महाराज! अनायास ही महान् कर्म करने वाले पुरुषसिंह श्रीराम से हीन इस दुःखी सेवक को छोड़ आप कहाँ चले जायेंगे? ॥ ७॥
योगक्षेमं तु तेऽव्यग्रं कोऽस्मिन् कल्पयिता पुरे।
त्वयि प्रयाते स्वस्तात रामे च वनमाश्रिते॥८॥
“तात! आप स्वर्ग को चल दिये और श्रीराम ने वन का आश्रय लिया-ऐसी दशा में आपके इस नगर में निश्चिन्तता-पूर्वक प्रजा के योगक्षेम की व्यवस्था कौन करेगा? ॥ ८॥
विधवा पृथिवी राजंस्त्वया हीना न राजते।
हीनचन्द्रेव रजनी नगरी प्रतिभाति माम्॥९॥
‘राजन् ! आपके बिना यह पृथ्वी विधवा के समान हो गयी है, अतः इसकी शोभा नहीं हो रही है। यह पुरी भी मुझे चन्द्रहीन रात्रि के समान श्रीहीन प्रतीत होती है’।
एवं विलपमानं तं भरतं दीनमानसम्।
अब्रवीद् वचनं भूयो वसिष्ठस्तु महामुनिः॥१०॥
इस प्रकार दीनचित्त होकर विलाप करते हुए भरत से महामुनि वसिष्ठ ने फिर कहा- ॥ १० ॥
प्रेतकार्याणि यान्यस्य कर्तव्यानि विशाम्पतेः।
तान्यव्यग्रं महाबाहो क्रियतामविचारितम्॥११॥
‘महाबाहो! इन महाराज के लिये जो कुछ भी प्रेतकर्म करने हैं, उन्हें बिना विचारे शान्तचित्त होकर करो’ ॥ ११॥
तथेति भरतो वाक्यं वसिष्ठस्याभिपूज्य तत्।
ऋत्विक्पुरोहिताचार्यांस्त्वरयामास सर्वशः॥१२॥
तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर भरत ने वसिष्ठजी की आज्ञा शिरोधार्य की तथा ऋत्विक्, पुरोहित और आचार्य—सबको इस कार्य के लिये जल्दी करने को कहा—
ये त्वग्नयो नरेन्द्रस्य अग्न्यगाराद् बहिष्कृताः।
ऋत्विग्भिर्याजकैश्चैव ते हूयन्ते यथाविधि॥ १३॥
राजा की अग्निशाला से जो अग्नियाँ बाहर निकाली गयी थीं, उनमें ऋत्विजों और याजकों द्वारा विधिपूर्वक हवन किया गया॥ १३॥
शिबिकायामथारोप्य राजानं गतचेतनम्।
बाष्पकण्ठा विमनसस्तमूहः परिचारकाः॥१४॥
तत्पश्चात् महाराज दशरथ के प्राणहीन शरीर को पालकी में बिठाकर परिचारकगण उन्हें श्मशानभूमि को ले चले। उस समय आँसुओं से उनका गला रुंध गया था और मन-ही-मन उन्हें बड़ा दुःख हो रहा था॥१४॥
हिरण्यं च सुवर्णं च वासांसि विविधानि च।
प्रकिरन्तो जना मार्गे नृपतेरग्रतो ययुः ॥१५॥
मार्ग में राजकीय पुरुष राजा के शव के आगे-आगे सोने, चाँदी तथा भाँति-भाँति के वस्त्र लुटाते चलते थे॥
चन्दनागुरुनिर्यासान् सरलं पद्मकं तथा।
देवदारूणि चाहृत्य क्षेपयन्ति तथापरे॥१६॥
गन्धानुच्चावचांश्चान्यांस्तत्र गत्वाथ भूमिपम्।
तत्र संवेशयामासुश्चितामध्ये तमृत्विजः॥१७॥
श्मशानभूमि में पहुँचकर चिता तैयार की जाने लगी, किसी ने चन्दन लाकर रखा तो किसी ने अगर कोई कोई गुग्गुल तथा कोई सरल, पद्मक और देवदारु की लकड़ियाँ ला-लाकर चिता में डालने लगे। कुछ लोगों ने तरह-तरह के सुगन्धित पदार्थ लाकर छोड़े। इसके बाद ऋत्विजों ने राजा के शव को चितापर रखा।
तदा हुताशनं हुत्वा जेपुस्तस्य तदृत्विजः।
जगुश्च ते यथाशास्त्रं तत्र सामानि सामगाः॥ १८॥
उस समय अग्नि में आहुति देकर उनके ऋत्विजों ने वेदोक्त मन्त्रों का जप किया। सामगान करने वाले विद्वान् शास्त्रीय पद्धति के अनुसार साम-श्रुतियों का गायन करने लगे॥१८॥
शिबिकाभिश्च यानैश्च यथार्ह तस्य योषितः।
नगरान्निर्ययुस्तत्र वृद्धैः परिवृतास्तथा॥१९॥
प्रसव्यं चापि तं चक्रुर्ऋत्विजोऽग्निचितं नृपम्।
स्त्रियश्च शोकसंतप्ताः कौसल्याप्रमुखास्तदा। २०॥
(इसके बाद चिता में आग लगायी गयी) तदनन्तर राजा दशरथ की कौसल्या आदि रानियाँ बूढ़े रक्षकों से घिरी हुई यथायोग्य शिबिकाओं तथा रथों पर आरूढ़ होकर नगर से निकलीं तथा शोक से संतप्त हो श्मशानभूमि में आकर अश्वमेधान्त यज्ञों के अनुष्ठाता राजा दशरथ के शव की परिक्रमा करने लगीं। साथ ही ऋत्विजों ने भी उस शव की परिक्रमा की। १९-२० ॥
क्रौञ्चीनामिव नारीणां निनादस्तत्र शुश्रुवे।
आर्तानां करुणं काले क्रोशन्तीनां सहस्रशः॥ २१॥
उस समय वहाँ करुण क्रन्दन करती हुई सहस्रों शोकात रानियों का आर्तनाद कुररियों के चीत्कार के समान सुनायी देता था॥ २१॥
ततो रुदन्त्यो विवशा विलप्य च पुनः पुनः।
यानेभ्यः सरयूतीरमवतेरुनृपाङ्गनाः॥२२॥
दाहकर्म के पश्चात् विवश होकर रोती हुई वे राजरानियाँ बारंबार विलाप करके सवारियों से ही सरयू के तट पर जाकर उतरीं ।। २२॥
कृत्वोदकं ते भरतेन सार्धं नृपाङ्गना मन्त्रिपुरोहिताश्च।
पुरं प्रविश्याश्रुपरीतनेत्रा भूमौ दशाहं व्यनयन्त दुःखम्॥२३॥
भरत के साथ रानियों, मन्त्रियों और पुरोहितों ने भी राजा के लिये जलाञ्जलि दी, फिर सब-के-सब नेत्रों से आँसू बहाते हुए नगर में आये और दस दिनों तक भूमि पर शयन करते हुए उन्होंने बड़े दुःख से अपना समय व्यतीत किया॥ २३॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे षट्सप्ततितमः सर्गः॥ ७६॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में छिहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७६॥
सर्ग-77
ततो दशाहेऽतिगते कृतशौचो नृपात्मजः।
द्वादशेऽहनि सम्प्राप्ते श्राद्धकर्माण्यकारयत्॥१॥
तदनन्तर दशाह व्यतीत हो जाने पर राजकुमार भरत ने ग्यारहवें दिन आत्मशुद्धि के लिये स्नान और एकादशाह श्राद्ध का अनुष्ठान किया, फिर बारहवाँ दिन आने पर उन्होंने अन्य श्राद्ध कर्म (मासिक और सपिण्डीकरण श्राद्ध) किये॥१॥
ब्राह्मणेभ्यो धनं रत्नं ददावन्नं च पुष्कलम्।
वासांसि च महार्हाणि रत्नानि विविधानि च।
वास्तिकं बहु शुक्लं च गाश्चापि बहुशस्तदा॥ २॥
उसमें भरत ने ब्राह्मणों को धन, रत्न, प्रचुर अन्न, बहुमूल्य वस्त्र, नाना प्रकार के रत्न, बहुत-से बकरे, चाँदी और बहुतेरी गौएँ दान कीं॥२॥
दासीर्दासांश्च यानानि वेश्मानि सुमहान्ति च।
ब्राह्मणेभ्यो ददौ पुत्रो राज्ञस्तस्यौदेहिकम्॥ ३॥
राजपुत्र भरत ने राजा के पारलौकिक हित के लिये बहुत-से दास, दासियाँ, सवारियाँ तथा बड़े-बड़े घर भी ब्राह्मणों को दिये॥३॥
ततः प्रभातसमये दिवसे च त्रयोदशे।
विललाप महाबाहुर्भरतः शोकमूर्च्छितः॥४॥
तदनन्तर तेरहवें दिन प्रातःकाल महाबाहु भरत शोक से मूर्च्छित होकर विलाप करने लगे॥४॥
शब्दापिहितकण्ठश्च शोधनार्थमुपागतः।
चितामूले पितुर्वाक्यमिदमाह सुदुःखितः॥५॥
तात यस्मिन् निसृष्टोऽहं त्वया भ्रातरि राघवे।
तस्मिन् वनं प्रव्रजिते शून्ये त्यक्तोऽस्म्यहं त्वया॥ ६॥
उस समय रोने से उनका गला भर आया था, वे पिता के चितास्थान पर अस्थिसंचय के लिये आये और अत्यन्त दुःखी होकर इस प्रकार कहने लगे—’तात !आपने मुझे जिन ज्येष्ठ भ्राता श्रीरघुनाथजी के हाथ में सौंपा था, उनके वन में चले जाने पर आपने मुझे सूने में ही छोड़ दिया (इस समय मेरा कोई सहारा नहीं)॥ ५-६॥
यस्या गतिरनाथायाः पुत्रः प्रव्राजितो वनम्।
तामम्बां तात कौसल्यां त्यक्त्वा त्वं क्व गतो नृप॥७॥
‘तात ! नरेश्वर! जिन अनाथ हुई देवीके एकमात्र आधार पुत्रको आपने वनमें भेज दिया, उन माता कौसल्याको छोड़कर आप कहाँ चले गये?’॥७॥
दृष्ट्वा भस्मारुणं तच्च दग्धास्थि स्थानमण्डलम्।
पितुः शरीरनिर्वाणं निष्टनन् विषसाद ह॥८॥
पिता की चिता का वह स्थानमण्डल भस्म से भरा हुआ था, अत्यन्त दाह के कारण कुछ लाल दिखायी देता था। वहाँ पिता की जली हुई हड्डियाँ बिखरी हुई थीं। पिता के शरीर के निर्वाण का वह स्थान देखकर भरत अत्यन्त विलाप करते हुए शोक में डूब गये॥ ८॥
स तु दृष्ट्वा रुदन् दीनः पपात धरणीतले।
उत्थाप्यमानः शक्रस्य यन्त्रध्वज इवोच्छ्रितः॥९॥
उस स्थान को देखते ही वे दीनभाव से रोकर पृथ्वीपर गिर पड़े। जैसे इन्द्र का यन्त्रबद्ध ऊँचा ध्वजऊपर को उठाये जाते समय खिसककर गिर पड़ा हो॥ ९॥
अभिपेतुस्ततः सर्वे तस्यामात्याः शुचिव्रतम्।
अन्तकाले निपतितं ययातिमृषयो यथा॥१०॥
तब उनके सारे मन्त्री उन पवित्र व्रत वाले भरत के पास आ पहुँचे, जैसे पुण्यों का अन्त होने पर स्वर्ग से गिरे हुए राजा ययाति के पास अष्टक आदि राजर्षि आ गये थे॥
शत्रुघ्नश्चापि भरतं दृष्ट्वा शोकपरिप्लुतम्।
विसंज्ञो न्यपतद् भूमौ भूमिपालमनुस्मरन्॥११॥
भरत को शोक में डूबा हुआ देख शत्रुघ्न भी अपने पिता महाराज दशरथका बारंबार स्मरण करते हुए अचेत होकर पृथ्वी पर गिर पड़े॥११॥
उन्मत्त इव निश्चित्तो विललाप सुदुःखितः।
स्मृत्वा पितुर्गुणाङ्गानि तानि तानि तदा तदा॥ १२॥
वे समय-समयपर अनुभव में आये हुए पिता के लालन-पालनसम्बन्धी उन-उन गुणों का स्मरण करके अत्यन्त दुःखी हो सुध-बुध खोकर उन्मत्त के समान विलाप करने लगे
मन्थराप्रभवस्तीव्र कैकेयीग्राहसंकुलः।
वरदानमयोऽक्षोभ्योऽमज्जयच्छोकसागरः॥१३॥
हाय! मन्थरा से जिसका प्राकट्य हुआ है, कैकेयीरूपी ग्राह से जो व्याप्त है तथा जो किसी प्रकार भी मिटाया नहीं जा सकता, उस वरदानमय शोकरूपी उग्र समुद्र ने हम सब लोगों को अपने भीतर निमग्न कर दिया है।
सुकुमारं च बालं च सततं लालितं त्वया।
क्व तात भरतं हित्वा विलपन्तं गतो भवान्॥ १४॥
‘तात! आपने जिनका सदा लाड़-प्यार किया है तथा जो सुकुमार और बालक हैं, उन रोते-बिलखते हुए भरत को छोड़कर आप कहाँ चले गये? ॥ १४ ॥
ननु भोज्येषु पानेषु वस्त्रेष्वाभरणेषु च।
प्रवारयति सर्वान् नस्तन्नः कोऽद्य करिष्यति॥ १५॥
‘भोजन, पान, वस्त्र और आभूषण-इन सबको अधिक संख्या में एकत्र करके आप हम सब लोगों से अपनी रुचिकी वस्तुएँ ग्रहण करने को कहते थे। अब कौन हमारे लिये ऐसी व्यवस्था करेगा? ॥ १५ ॥
अवदारणकाले तु पृथिवी नावदीर्यते।
विहीना या त्वया राज्ञा धर्मज्ञेन महात्मना॥१६॥
‘आप-जैसे धर्मज्ञ महात्मा राजा से रहित होने पर पृथ्वी को फट जाना चाहिये। इस फटने के अवसर पर भी जो यह फट नहीं रही है, यह आश्चर्यकी बात है। १६॥
पितरि स्वर्गमापन्ने रामे चारण्यमाश्रिते।
किं मे जीवितसामर्थ्य प्रवेक्ष्यामि हुताशनम्॥ १७॥
‘पिता स्वर्गवासी हो गये और श्रीराम वन में चले गये। अब मुझमें जीवित रहने की क्या शक्ति है ? अब तो मैं अग्नि में ही प्रवेश करूँगा॥ १७॥
हीनो भ्रात्रा च पित्रा च शून्यामिक्ष्वाकुपालिताम्।
अयोध्यां न प्रवेक्ष्यामि प्रवेक्ष्यामि तपोवनम्॥ १८॥
‘बड़े भाई और पिता से हीन होकर इक्ष्वाकुवंशी नरेशों-द्वारा पालित इस सूनी अयोध्या में प्रवेश नहीं करूँगा; तपोवन को ही चला जाऊँगा’ ॥ १८॥
तयोर्विलपितं श्रुत्वा व्यसनं चाप्यवेक्ष्य तत्।
भृशमार्ततरा भूयः सर्व एवानुगामिनः॥१९॥
उन दोनों का विलाप सुनकर और उस संकट को देखकर समस्त अनुचर-वर्ग के लोग पुनः अत्यन्त शोक से व्याकुल हो उठे॥ १९॥
ततो विषण्णौ श्रान्तौ च शत्रुघ्नभरतावुभौ।
धरायां स्म व्यचेष्टेतां भग्नशृङ्गाविवर्षभौ॥२०॥
उस समय भरत और शत्रुघ्न दोनों भाई विषादग्रस्त और थकित होकर टूटे सींगों वाले दो बैलों के समान पृथ्वी पर लोट रहे थे॥२०॥
ततः प्रकृतिमान् वैद्यः पितुरेषां पुरोहितः।
वसिष्ठो भरतं वाक्यमुत्थाप्य तमुवाच ह॥२१॥
तदनन्तर दैवी प्रकृति से युक्त और सर्वज्ञ वसिष्ठजी, जो इन श्रीराम आदि के पिता के पुरोहित थे, भरत को उठाकर उनसे इस प्रकार बोले- ॥ २१॥
त्रयोदशोऽयं दिवसः पितुर्वृत्तस्य ते विभो।
सावशेषास्थिनिचये किमिह त्वं विलम्बसे॥ २२॥
‘प्रभो! तुम्हारे पिता के दाह संस्कार हुए यह तेरहवाँ दिन है; अब अस्थिसंचय का जो शेष कार्य है, उसके करने में तुम यहाँ विलम्ब क्यों लगा रहे हो? ॥ २२ ॥
त्रीणि द्वन्द्वानि भूतेषु प्रवृत्तान्यविशेषतः।
तेषु चापरिहार्येषु नैवं भवितुमर्हसि ॥२३॥
‘भूख-प्यास, शोक-मोह तथा जरा-मृत्यु—ये तीन द्वन्द्व सभी प्राणियों में समानरूप से उपलब्ध होते हैं। इन्हें रोकना सर्वथा असम्भव है—ऐसी स्थिति में तुम्हें इस तरह शोकाकुल नहीं होना चाहिये’ ॥ २३॥
सुमन्त्रश्चापि शत्रुघ्नमुत्थाप्याभिप्रसाद्य च।
श्रावयामास तत्त्वज्ञः सर्वभूतभवाभवौ॥२४॥
तत्त्वज्ञ सुमन्त्र ने भी शत्रुघ्न को उठाकर उनके चित्त को शान्त किया तथा समस्त प्राणियों के जन्म और मरण की अनिवार्यता का उपदेश सुनाया॥ २४ ॥
उत्थितौ तौ नरव्याघ्रौ प्रकाशेते यशस्विनौ।
वर्षातपपरिग्लानौ पृथगिन्द्रध्वजाविव॥ २५॥
उस समय उठे हुए वे दोनों यशस्वी नरश्रेष्ठ वर्षा और धूप से मलिन हुए दो अलग-अलग इन्द्रध्वजों के समान प्रकाशित हो रहे थे॥ २५ ॥
अश्रूणि परिमृद्नन्तौ रक्ताक्षौ दीनभाषिणौ।
अमात्यास्त्वरयन्ति स्म तनयौ चापराः क्रियाः॥ २६॥
वे आँसू पोंछते हुए दीनतापूर्ण वाणी में बोलते थे। उन दोनों की आँखें लाल हो गयी थीं तथा मन्त्रीलोग उन दोनों राजकुमारों को दूसरी-दूसरी क्रियाएँ शीघ्र करने के लिये प्रेरित कर रहे थे॥२६॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्तसप्ततितमः सर्गः॥ ७७॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में सतहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ।७७॥
सर्ग-78
अथ यात्रां समीहन्तं शत्रुघ्नो लक्ष्मणानुजः।
भरतं शोकसंतप्तमिदं वचनमब्रवीत्॥१॥
तेरहवें दिन का कार्य पूर्ण करके श्रीरामचन्द्रजी के पास जाने का विचार करते हुए शोकसंतप्त भरत से लक्ष्मण के छोटे भाई शत्रुघ्न ने इस प्रकार कहा-॥ १॥
गतिर्यः सर्वभूतानां दुःखे किं पुनरात्मनः।
स रामः सत्त्वसम्पन्नः स्त्रिया प्रव्राजितो वनम्॥ २॥
‘भैया! जो दुःख के समय अपने तथा आत्मीयजनों के लिये तो बात ही क्या है, समस्त प्राणियों को भी सहारा देनेवाले हैं, वे सत्त्वगुणसम्पन्न श्रीराम एक स्त्री के द्वारा वन में भेज दिये गये (यह कितने खेदकी बात है) ॥ २॥
बलवान् वीर्यसम्पन्नो लक्ष्मणो नाम योऽप्यसौ।
किं न मोचयते रामं कृत्वापि पितृनिग्रहम्॥३॥
‘तथा वे जो बल और पराक्रम से सम्पन्न लक्ष्मण नामधारी शूरवीर हैं, उन्होंने भी कुछ नहीं किया। मैं पूछता हूँ कि उन्होंने पिता को कैद करके भी श्रीराम को इस संकट से क्यों नहीं छुड़ाया? ॥ ३॥
पूर्वमेव तु विग्राह्यः समवेक्ष्य नयानयो।
उत्पथं यः समारूढो नार्या राजा वशं गतः॥४॥
‘जब राजा एक नारी के वश में होकर बुरे मार्ग पर आरूढ़ हो चुके थे, तब न्याय और अन्याय का विचार करके उन्हें पहले ही कैद कर लेना चाहिये था’॥ ४॥
इति सम्भाषमाणे तु शत्रुघ्ने लक्ष्मणानुजे।
प्रारद्वारेऽभूत् तदा कुब्जा सर्वाभरणभूषिता॥५॥
लक्ष्मण के छोटे भाई शत्रुघ्न जब इस प्रकार रोष में भरकर बोल रहे थे, उसी समय कुब्जा समस्त आभूषणों से विभूषित हो उस राजभवन के पूर्व द्वार पर आकर खड़ी हो गयी॥ ५॥
लिप्ता चन्दनसारेण राजवस्त्राणि बिभ्रती।
विविधं विविधैस्तैस्तैर्भूषणैश्च विभूषिता॥६॥
उसके अङ्गों में उत्तमोत्तम चन्दन का लेप लगा हुआ था तथा वह राजरानियों के पहनने योग्य विविध वस्त्र धारण करके भाँति-भाँति के आभूषणों से सज-धजकर वहाँ आयी थी॥६॥
मेखलादामभिश्चित्रैरन्यैश्च वरभूषणैः।
बभासे बहुभिर्बद्धा रज्जुबवेव वानरी॥७॥
करधनी की विचित्र लड़ियों तथा अन्य बहुसंख्यक सुन्दर अलंकारों से अलंकृत हो वह बहुत-सी रस्सियों में बँधी हुई वानरी के समान जान पड़ती थी॥ ७॥
तां समीक्ष्य तदा द्वाःस्थो भृशं पापस्य कारिणीम्।
गृहीत्वाकरुणं कुब्जां शत्रुघ्नाय न्यवेदयत्॥८॥
वही सारी बुराइयों की जड़ थी। वही श्रीराम के वनवासरूपी पाप का मूल कारण थी। उस पर दृष्टि पड़ते ही द्वारपाल ने उसे पकड़ लिया और बड़ी निर्दयता के साथ घसीट लाकर शत्रुघ्न के हाथ में देते हुए कहा- ॥८॥
यस्याः कृते वने रामो न्यस्तदेहश्च वः पिता।
सेयं पापा नृशंसा च तस्याः कुरु यथामति॥९॥
‘राजकुमार! जिसके कारण श्रीराम को वन में निवास करना पड़ा है और आपलोगों के पिता ने शरीर का परित्याग किया है, वह क्रूर कर्म करने वाली पापिनी यही है। आप इसके साथ जैसा बर्ताव उचित समझें करें॥
शत्रुजश्च तदाज्ञाय वचनं भृशदुःखितः।
अन्तःपुरचरान् सर्वानित्युवाच धृतव्रतः॥१०॥
द्वारपाल की बात पर विचार करके शत्रुघ्न का दुःख और बढ़ गया। उन्होंने अपने कर्तव्य का निश्चय किया और अन्तःपुर में रहने वाले सब लोगों को सुनाकर इस प्रकार कहा- ॥१०॥
तीव्रमुत्पादितं दुःखं भ्रातृणां मे तथा पितुः
यथा सेयं नृशंसस्य कर्मणः फलमश्नुताम्॥ ११॥
‘इस पापिनी ने मेरे भाइयों तथा पिता को जैसा दुःसह दुःख पहुँचाया है, अपने उस क्रूर कर्म का वैसा ही फल यह भी भोगे’ ॥ ११ ॥
एवमुक्त्वा च तेनाशु सखीजनसमावृता।
गृहीता बलवत् कुब्जा सा तद् गृहमनादयत्॥ १२॥
ऐसा कहकर शत्रुघ्न ने सखियों से घिरी हुई कुब्जा को तुरंत ही बलपूर्वक पकड़ लिया। वह डर के मारे ऐसा चीखने-चिल्लाने लगी कि वह सारा महल गूंज उठा॥१२॥
ततः सुभृशसंतप्तस्तस्याः सर्वः सखीजनः।
क्रुद्धमाज्ञाय शत्रुघ्नं व्यपलायत सर्वशः॥१३॥
फिर तो उसकी सारी सखियाँ अत्यन्त संतप्त हो उठीं और शत्रुघ्न को कुपित जानकर सब ओर भाग चलीं ॥ १३॥
अमन्त्रयत कृत्स्नश्च तस्याः सर्वः सखीजनः।
यथायं समुपक्रान्तो निःशेषं नः करिष्यति॥१४॥
उसकी सम्पूर्ण सखियों ने एक जगह एकत्र होकर आपस में सलाह की कि ‘जिस प्रकार इन्होंने बलपूर्वक कुब्जा को पकड़ा है, उससे जान पड़ता है, ये हम लोगों में से किसी को जीवित नहीं छोड़ेंगे॥१४॥
सानुक्रोशां वदान्यां च धर्मज्ञां च यशस्विनीम्।
कौसल्यां शरणं यामः सा हि नोऽस्ति ध्रुवा गतिः ॥१५॥
‘अतः हमलोग परम दयालु, उदार, धर्मज्ञ और यशस्विनी महारानी कौसल्या की शरण में चलें। इस समय वे ही हमारी निश्चल गति हैं’॥ १५ ॥
स च रोषेण संवीतः शत्रुघ्नः शत्रुशासनः।
विचकर्ष तदा कुब्जां क्रोशन्तीं पृथिवीतले॥ १६॥
शत्रुओं का दमन करने वाले शत्रुघ्न रोष में भरकर कुब्जा को जमीन पर घसीटने लगे। उस समय वह जोर-जोर से चीत्कार कर रही थी॥१६॥
तस्यां ह्याकृष्यमाणायां मन्थरायां ततस्ततः।
चित्रं बहुविधं भाण्डं पृथिव्यां तद्व्यशीर्यत॥ १७॥
जब मन्थरा घसीटी जा रही थी, उस समय उसके नाना प्रकार के विचित्र आभूषण टूट-टूटकर पृथ्वी पर इधर-उधर विखरे जाते थे॥ १७॥
तेन भाण्डेन विस्तीर्णं श्रीमद् राजनिवेशनम्।
अशोभत तदा भूयः शारदं गगनं यथा॥१८॥
आभूषणों के उन टुकड़ों से वह शोभाशाली विशाल राजभवन नक्षत्रमालाओं से अलंकृत शरत्काल के आकाश की भाँति अधिक सुशोभित हो रहा था॥ १८॥
स बली बलवत् क्रोधाद् गृहीत्वा पुरुषर्षभः।
कैकेयीमभिनिर्भय॑ बभाषे परुषं वचः॥१९॥
बलवान् नरश्रेष्ठ शत्रुघ्न जिस समय रोषपूर्वक मन्थरा को जोर से पकड़कर घसीट रहे थे, उस समय उसे छुड़ाने के लिये कैकेयी उनके पास आयी। तब उन्होंने उसे धिक्कारते हुए उसके प्रति बड़ी कठोर बातें कहीं-उसे रोषपूर्वक फटकारा॥ १९ ॥
तैर्वाक्यैः परुषैर्दुःखैः कैकेयी भृशदुःखिता।
शत्रुघ्नभयसंत्रस्ता पुत्रं शरणमागता॥२०॥
शत्रुघ्न के वे कठोर वचन बड़े ही दुःखदायी थे। उन्हें सुनकर कैकेयी को बहुत दुःख हुआ। वह शत्रुघ्न के भय से थर्रा उठी और अपने पुत्र की शरण में आयी॥२०॥
तं प्रेक्ष्य भरतः क्रुद्धं शत्रुघ्नमिदमब्रवीत्।
अवध्याः सर्वभूतानां प्रमदाः क्षम्यतामिति ॥२१॥
शत्रुघ्न को क्रोध में भरा हुआ देख भरत ने उनसे कहा—’सुमित्राकुमार! क्षमा करो स्त्रियाँ सभी प्राणियों के लिये अवध्य होती हैं ॥ २१॥
हन्यामहमिमां पापां कैकेयीं दुष्टचारिणीम्।
यदि मां धार्मिको रामो नासूयेन्मातृघातकम्॥ २२॥
‘यदि मुझे यह भय न होता कि धर्मात्मा श्रीराम मातृघाती समझकर मुझसे घृणा करने लगेंगे तो मैं भी इस दुष्ट आचरण करने वाली पापिनी कैकेयी को मार डालता॥ २२॥
इमामपि हतां कुब्जां यदि जानाति राघवः।
त्वां च मां चैव धर्मात्मा नाभिभाषिष्यते ध्रुवम्॥ २३॥
‘धर्मात्मा श्रीरघुनाथजी तो इस कुब्जा के भी मारे जाने का समाचार यदि जान लें तो वे निश्चय ही तुमसे और मुझसे बोलना भी छोड़ देंगे’ ॥ २३॥
भरतस्य वचः श्रुत्वा शत्रुघ्नो लक्ष्मणानुजः।
न्यवर्तत ततो दोषात् तां मुमोच च मूर्च्छिताम्॥ २४॥
भरतजी की यह बात सुनकर लक्ष्मण के छोटे भाई शत्रुघ्न मन्थरा के वधरूपी दोष से निवृत्त हो गये और उसे मूर्च्छित अवस्था में ही छोड़ दिया॥ २४ ॥
सा पादमूले कैकेय्या मन्थरा निपपात ह।
निःश्वसन्ती सुदुःखार्ता कृपणं विललाप ह॥ २५॥
मन्थरा कैकेयी के चरणों में गिर पड़ी और लंबी साँस खींचती हुई अत्यन्त दुःख से आर्त हो करुण विलाप करने लगी॥२५॥
शत्रुघ्नविक्षेपविमूढसंज्ञां समीक्ष्य कुब्जां भरतस्य माता।
शनैः समाश्वासयदार्तरूपां क्रौञ्ची विलग्नामिव वीक्षमाणाम्॥ २६॥
शत्रुघ्न के पटकने और घसीटने से आर्त एवं अचेत हुई कुब्जा को देखकर भरत की माता कैकेयी धीरे-धीरे उसे आश्वासन देने होश में लाने की चेष्टा करने लगी। उस समय कुब्जा पिंजड़ें में बँधी हुई क्रौञ्ची की भाँति कातर दृष्टि से उसकी ओर देख रही थी॥ २६ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टसप्ततितमः सर्गः॥ ७८॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में अठहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७८॥
सर्ग-79
ततः प्रभातसमये दिवसेऽथ चतुर्दशे।
समेत्य राजकर्तारो भरतं वाक्यमब्रुवन्॥१॥
तदनन्तर चौदहवें दिन प्रातःकाल समस्त राजकर्मचारी मिलकर भरत से इस प्रकार बोले-॥ १॥
गतो दशरथः स्वर्ग यो नो गुरुतरो गुरुः।
रामं प्रव्राज्य वै ज्येष्ठं लक्ष्मणं च महाबलम्॥२॥
त्वमद्य भव नो राजा राजपुत्रो महायशः।
संगत्या नापराध्नोति राज्यमेतदनायकम्॥३॥
‘महायशस्वी राजकुमार ! जो हमारे सर्वश्रेष्ठ गुरु थे, वे महाराज दशरथ तो अपने ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम तथा महाबली लक्ष्मण को वन में भेजकर स्वयं स्वर्गलोक को चले गये, अब इस राज्य का कोई स्वामी नहीं है; इसलिये अब आप ही हमारे राजा हों। आपके बड़े भाई को स्वयं महाराज ने वनवास की आज्ञा दी और आपको यह राज्य प्रदान किया ! अतः आपका राजा होना न्यायसङ्गत है। इस सङ्गति के कारण ही आप राज्य को अपने अधिकार में लेकर किसी के प्रति कोई अपराध नहीं कर रहे हैं ॥ २-३॥
आभिषेचनिकं सर्वमिदमादाय राघव।
प्रतीक्षते त्वां स्वजनः श्रेणयश्च नृपात्मज॥४॥
‘राजकुमार रघुनन्दन! ये मन्त्री आदि स्वजन, पुरवासी तथा सेठलोग अभिषेक की सब सामग्री लेकर आपकी राह देखते हैं॥४॥
राज्यं गृहाण भरत पितृपैतामहं ध्रुवम्।
अभिषेचय चात्मानं पाहि चास्मान् नरर्षभ॥५॥
‘भरतजी! आप अपने माता-पितामहों के इस राज्य को अवश्य ग्रहण कीजिये। नरश्रेष्ठ! राजा के पद पर अपना अभिषेक कराइये और हमलोगों की रक्षा कीजिये।
आभिषेचनिकं भाण्डं कृत्वा सर्वं प्रदक्षिणम्।
भरतस्तं जनं सर्वं प्रत्युवाच धृतव्रतः॥६॥
यह सुनकर उत्तम व्रत को धारण करने वाले भरत ने अभिषेक के लिये रखी हुई कलश आदि सब सामग्री की प्रदक्षिणा की और वहाँ उपस्थित हुए सब लोगों को इस प्रकार उत्तर दिया- ॥६॥
ज्येष्ठस्य राजता नित्यमुचिता हि कुलस्य नः।
नैवं भवन्तो मां वक्तुमर्हन्ति कुशला जनाः॥७॥
‘सज्जनो! आपलोग बुद्धिमान् हैं, आपको मुझसे ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये। हमारे कुल में सदा ज्येष्ठ पुत्र ही राज्य का अधिकारी होता आया है और यही उचित भी है॥ ७॥
रामः पूर्वो हि नो भ्राता भविष्यति महीपतिः।
अहं त्वरण्ये वत्स्यामि वर्षाणि नव पञ्च च॥ ८॥
‘श्रीरामचन्द्रजी हमलोगों के बड़े भाई हैं, अतः वे ही राजा होंगे। उनके बदले मैं ही चौदह वर्षों तक वन में निवास करूँगा॥८॥
युज्यतां महती सेना चतुरङ्गमहाबला।
आनयिष्याम्यहं ज्येष्ठं भ्रातरं राघवं वनात्॥९॥
‘आपलोग विशाल चतुरङ्गिणी सेना, जो सब प्रकार से सबल हो, तैयार कीजिये। मैं अपने ज्येष्ठ भ्राता श्रीरामचन्द्रजी को वन से लौटा लाऊँगा॥९॥
आभिषेचनिकं चैव सर्वमेतदुपस्कृतम्।
पुरस्कृत्य गमिष्यामि रामहेतोर्वनं प्रति॥१०॥
तत्रैव तं नरव्याघ्रमभिषिच्य पुरस्कृतम्।
आनयिष्यामि वै रामं हव्यवाहमिवाध्वरात्॥ ११॥
‘अभिषेक के लिये संचित हुई इस सारी सामग्री को आगे करके मैं श्रीराम से मिलने के लिये वन में चलूँगा और उन नरश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी का वहीं अभिषेक करके यज्ञ से लायी जाने वाली अग्नि के समान उन्हें आगे करके अयोध्या में ले आऊँगा॥ १०-११॥
न सकामां करिष्यामि स्वामिमां मातृगन्धिनीम्।
वने वत्स्याम्यहं दुर्गे रामो राजा भविष्यति॥१२॥
‘परंतु जिसमें लेशमात्र मातृभाव शेष है, अपनी माता कहलाने वाली इस कैकेयी को मैं कदापि सफल मनोरथ नहीं होने दूंगा। श्रीराम यहाँ के राजा होंगे और मैं दुर्गम वन में निवास करूँगा॥ १२ ॥
क्रियतां शिल्पिभिः पन्थाः समानि विषमाणि च।
रक्षिणश्चानुसंयान्तु पथि दुर्गविचारकाः॥१३॥
‘कारीगर आगे जाकर रास्ता बनायें, ऊँची-नीची भूमि को बराबर करें तथा मार्ग में दुर्गम स्थानों की जानकारी रखने वाले रक्षक भी साथ-साथ चलें’। १३॥
एवं सम्भाषमाणं तं रामहेतोर्नृपात्मजम्।
प्रत्युवाच जनः सर्वः श्रीमद् वाक्यमनुत्तमम्॥ १४॥
श्रीरामचन्द्रजी के लिये ऐसी बातें कहते हुए राजकुमार भरत से वहाँ आये हुए सब लोगों ने इस प्रकार सुन्दर एवं परम उत्तम बात कही- ॥१४॥
एवं ते भाषमाणस्य पद्मा श्रीरुपतिष्ठताम्।
यस्त्वं ज्येष्ठे नृपसुते पृथिवीं दातुमिच्छसि॥१५॥
‘भरतजी! ऐसे उत्तम वचन कहने वाले आपके पास कमलवन में निवास करने वाली लक्ष्मी अवस्थित हों क्योंकि आप राजा के ज्येष्ठ पुत्र श्रीरामको स्वयं ही इस पृथिवीका राज्य लौटा देना चाहते हैं’॥ १५॥
अनुत्तमं तद्वचनं नृपात्मजः प्रभाषितं संश्रवणे निशम्य च।
प्रहर्षजास्तं प्रति बाष्पबिन्दवो निपेतुरार्यानननेत्रसम्भवाः॥१६॥
उन लोगों का कहा हुआ वह परम उत्तम आशीर्वचन जब कान में पड़ा, तब उसे सुनकर राजकुमार भरत को बड़ी प्रसन्नता हुई। उन सबकी ओर देखकर भरत के मुखमण्डल में सुशोभित होने वाले नेत्रों से हर्षजनित आँसुओं की बूंदें गिरने लगीं। १६॥
ऊचुस्ते वचनमिदं निशम्य हृष्टाः सामात्याः सपरिषदो वियातशोकाः।
पन्थानं नरवरभक्तिमान् जनश्च व्यादिष्टस्तव वचनाच्च शिल्पिवर्गः॥१७॥
भरत के मुख से श्रीराम को ले आने की बात सुनकर उस सभा के सभी सदस्यों और मन्त्रियों सहित समस्त राजकर्मचारी हर्ष से खिल उठे। उनका सारा शोक दूर हो गया और वे भरत से बोले—’नरश्रेष्ठ! आपकी आज्ञा के अनुसार राजपरिवार के प्रति भक्तिभाव रखने वाले कारीगरों और रक्षकों को मार्ग ठीक करने के लिये भेज दिया गया है’॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकोनाशीतितमः सर्गः॥ ७९॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में उन्नासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥७९॥
सर्ग-80
अथ भूमिप्रदेशज्ञाः सूत्रकर्मविशारदाः।
स्वकर्माभिरताः शूराः खनका यन्त्रकास्तथा॥ १॥
कान्तिकाः स्थपतयः पुरुषा यन्त्रकोविदाः।
तथा वर्धकयश्चैव मार्गिणो वृक्षतक्षकाः॥२॥
सूपकाराः सुधाकारा वंशचर्मकृतस्तथा।
समर्था ये च द्रष्टारः पुरतश्च प्रतस्थिरे॥३॥
तत्पश्चात् ऊँची-नीची एवं सजल-निर्जल भूमि का ज्ञान रखने वाले, सूत्रकर्म (छावनी आदि बनाने के लिये सूत धारण करने) में कुशल, मार्ग की रक्षा आदि अपने कर्म में सदा सावधान रहने वाले शूर-वीर, भूमि खोदने या सुरङ्ग आदि बनाने वाले, नदी आदि पार करने के लिये तुरंत साधन उपस्थित करनेवाले अथवा जल के प्रवाह को रोकने वाले वेतन भोगी कारीगर, थवई, रथ और यन्त्र आदि बनाने वाले पुरुष, बढ़ई, मार्गरक्षक, पेड़ काटने वाले, रसोइये, चूनेसे पोतने आदि का काम करने वाले, बाँस की चटाई और सूप आदि बनाने वाले, चमड़े का चारजामा आदि बनाने वाले तथा रास्ते की विशेष जानकारी रखने वाले सामर्थ्यशाली पुरुषों ने पहले प्रस्थान किया॥१-३॥
स तु हर्षात् तमुद्देशं जनौघो विपुलः प्रयान्।
अशोभत महावेगः सागरस्येव पर्वणि॥४॥
उस समय मार्ग ठीक करने के लिये एक विशाल जनसमुदाय बड़े हर्ष के साथ वनप्रदेश की ओर अग्रसर हुआ, जो पूर्णिमा के दिन उमड़े हुए समुद्र के महान् वेग की भाँति शोभा पा रहा था॥ ४ ॥
ते स्ववारं समास्थाय वर्मकर्मणि कोविदाः।
करणैर्विविधोपेतैः पुरस्तात् सम्प्रतस्थिरे॥५॥
वे मार्ग-निर्माण में निपुण कारीगर अपना-अपना दल साथ लेकर अनेक प्रकार के औजारों के साथ आगे चल दिये॥५॥
लता वल्लीश्च गुल्मांश्च स्थाणूनश्मन एव च।
जनास्ते चक्रिरे मार्ग छिन्दन्तो विविधान् द्रुमान्॥
वे लोग लताएँ, बेलें, झाड़ियाँ, ठूठे वृक्ष तथा पत्थरों को हटाते और नाना प्रकार के वृक्षों को काटते हुए मार्ग तैयार करने लगे॥६॥
अवृक्षेषु च देशेषु केचिद् वृक्षानरोपयन्।
केचित् कुठारैष्टकैश्च दात्रैश्छिन्दन् क्वचित् क्वचित्॥७॥
जिन स्थानों में वृक्ष नहीं थे, वहाँ कुछ लोगों ने वृक्ष भी लगाये। कुछ कारीगरों ने कुल्हाड़ों, टंकों (पत्थर तोड़ने के औजारों) तथा हँसियों से कहीं-कहीं वृक्षों और घासों को काट-काटकर रास्ता साफ किया।॥ ७॥
अपरे वीरणस्तम्बान् बलिनो बलवत्तराः।
विधमन्ति स्म दुर्गाणि स्थलानि च ततस्ततः॥ ८॥
अपरेऽपूरयन् कूपान् पांसुभिः श्वभ्रमायतम्।
निम्नभागांस्तथैवाशु समांश्चक्रुः समन्ततः॥९॥
अन्य प्रबल मनुष्यों ने जिनकी जड़ें नीचेतक जमी हुई थीं, उन कुश, कास आदि के झुरमुटों को हाथों से ही उखाड़ फेंका। वे जहाँ-तहाँ ऊँचे-नीचे दुर्गम स्थानों को खोद-खोदकर बराबर कर देते थे। दूसरे लोग कुओं और लंबे-चौड़े गड्ढों को धूलों से ही पाट देते थे। जो स्थान नीचे होते, वहाँ सब ओर से मिट्टी डालकर वे उन्हें शीघ्र ही बराबर कर देते थे। ८-९॥
बबन्धर्बन्धनीयांश्च क्षोद्यान् संचुक्षुदुस्तथा।
बिभिदुर्भेदनीयांश्च तांस्तान् देशान् नरास्तदा॥ १०॥
उन्होंने जहाँ पुल बाँधने के योग्य पानी देखा, वहाँ पुल बाँध दिये। जहाँ कँकरीली जमीन दिखायी दी, वहाँ उसे ठोक-पीटकर मुलायम कर दिया और जहाँ पानी बहने के लिये मार्ग बनाना आवश्यक समझा,वहाँ बाँध काट दिया। इस प्रकार विभिन्न देशों में वहाँ की आवश्यकता के अनुसार कार्य किया॥१०॥
अचिरेण तु कालेन परिवाहान् बहूदकान्।
चक्रुर्बहुविधाकारान् सागरप्रतिमान् बहून्॥११॥
छोटे-छोटे सोतो को, जिनका पानी सब ओर बह जाया करता था, चारों ओर से बाँधकर शीघ्र ही अधिक जलवाला बना दिया। इस तरह थोड़े ही समय में उन्होंने भिन्न-भिन्न आकार-प्रकार के बहुत-से सरोवर तैयार कर दिये, जो अगाध जल से भरे होने के कारण समुद्र के समान जान पड़ते थे॥११॥
निर्जलेषु च देशेषु खानयामासुरुत्तमान्।
उदपानान् बहुविधान् वेदिकापरिमण्डितान्॥ १२॥
निर्जल स्थानों में नाना प्रकार के अच्छे-अच्छे कुएँ और बावड़ी आदि बनवा दिये, जो आस-पास बनी हुई वेदिकाओं से अलंकृत थे॥ १२ ॥
ससुधाकुट्टिमतलः प्रपुष्पितमहीरुहः।
मत्तो ष्टद्विजगणः पताकाभिरलंकृतः॥१३॥
चन्दनोदकसंसिक्तो नानाकुसुमभूषितः।
बह्वशोभत सेनायाः पन्थाः सुरपथोपमः॥१४॥
इस प्रकार सेना का वह मार्ग देवताओं के मार्ग की भाँति अधिक शोभा पाने लगा। उसकी भूमिपर चूनासुर्थी और कंकरीट बिछाकर उसे कूट-पीटकर पक्का कर दिया गया था। उसके किनारे-किनारे फूलों से सुशोभित वृक्ष लगाये गये थे। वहाँ के वृक्षों पर मतवाले पक्षी चहक रहे थे। सारे मार्ग को पताकाओं से सजा दिया गया था, उसपर चन्दनमिश्रित जल का छिड़काव किया गया था तथा अनेक प्रकार के फूलों से वह सड़क सजायी गयी थी॥
आज्ञाप्याथ यथाज्ञप्ति युक्तास्तेऽधिकृता नराः।
रमणीयेषु देशेषु बहुस्वादुफलेषु च॥१५॥
यो निवेशस्त्वभिप्रेतो भरतस्य महात्मनः।
भूयस्तं शोभयामासुभूषाभिभूषणोपमम्॥१६॥
मार्ग बन जाने पर जहाँ-तहाँ छावनी आदि बनाने के लिये जिन्हें अधिकार दिया गया था, कार्य में दत्त-चित्त रहने वाले उन लोगों ने भरत की आज्ञा के अनुसार सेवकों को काम करने का आदेश देकर जहाँ स्वादिष्ट फलों की अधिकता थी उन सुन्दर प्रदेशों में छावनियाँ बनवायीं और जो भरत को अभीष्ट था, मार्ग के भूषणरूप उस शिविर को नाना प्रकार के अलंकारों से और भी सजा दिया॥ १५-१६॥
नक्षत्रेषु प्रशस्तेषु मुहूर्तेषु च तद्विदः।
निवेशान् स्थापयामासुर्भरतस्य महात्मनः॥१७॥
वास्तु-कर्म के ज्ञाता विद्वानों ने उत्तम नक्षत्रों और मुहूर्तों में महात्मा भरत के ठहरने के लिये जो-जो स्थान बने थे, उनकी प्रतिष्ठा करवायी॥ १७ ॥
बहुपांसुचयाश्चापि परिखाः परिवारिताः।
तत्रेन्द्रनीलप्रतिमाः प्रतोलीवरशोभिताः॥१८॥
प्रासादमालासंयुक्ताः सौधप्राकारसंवृताः।
पताकाशोभिताः सर्वे सुनिर्मितमहापथाः॥१९॥
विसर्पद्भिरिवाकाशे विटङ्काग्रविमानकैः।
समच्छितैर्निवेशास्ते बभः शक्रपुरोपमाः॥२०॥
मार्ग में बने हए वे निवेश (विश्राम-स्थान) इन्द्रपुरी के समान शोभा पाते थे। उनके चारों ओर खाइयाँ खोदी गयी थीं, धूल-मिट्टी के ऊँचे ढेर लगाये गये थे। खेमों के भीतर इन्द्रनीलमणि की बनी हुई प्रतिमाएँ सजायी गयी थीं। गलियों और सड़कों से उनकी विशेष शोभा होती थी। राजकीय गृहों और देवस्थानों से युक्त वे शिविर चूने पुते हुए प्राकारों (चहारदीवारियों)से घिरे थे। सभी विश्रामस्थान पताकाओं से सुशोभित थे। सर्वत्र बड़ी-बड़ी सड़कों का सुन्दर ढंग से निर्माण किया गया था। विटङ्कों (कबूतरों के रहने के स्थानों-कावकों) और ऊँचे-ऊँचे श्रेष्ठ विमानों के कारण उन सभी शिविरों की बड़ी शोभा हो रही थी॥ १८-२०॥
जाह्नवीं तु समासाद्य विविधद्रुमकाननाम्।
शीतलामलपानीयां महामीनसमाकुलाम्॥२१॥
सचन्द्रतारागणमण्डितं यथा नभः क्षपायाममलं विराजते।
नरेन्द्रमार्गः स तदा व्यराजत क्रमेण रम्यः शुभशिल्पिनिर्मितः॥ २२॥
नाना प्रकार के वृक्षों और वनों से सुशोभित, शीतल निर्मल जल से भरी हुई और बड़े-बड़े मत्स्यों से व्याप्त गङ्गा के किनारे तक बना हुआ वह रमणीय राजमार्ग उस समय बड़ी शोभा पा रहा था। अच्छे कारीगरों ने उसका निर्माण किया था। रात्रि के समय वह चन्द्रमा और तारागणों से मण्डित निर्मल आकाश के समान सुशोभित होता था॥२१-२२।।
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽशीतितमः सर्गः॥८०॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में अस्सीवाँ सर्ग पूरा हुआ।८०॥