सर्ग-61
दृष्ट्वाऽऽश्रमपदं शून्यं रामो दशरथात्मजः।
रहितां पर्णशालां च प्रविद्धान्यासनानि च॥१॥
अदृष्ट्वा तत्र वैदेहीं संनिरीक्ष्य च सर्वशः।
उवाच रामः प्राक्रुश्य प्रगृह्य रुचिरौ भुजौ॥२॥
दशरथनन्दन श्रीराम ने देखा कि आश्रम के सभी स्थान सीता से सूने हैं तथा पर्णशाला में भी सीता नहीं हैं और बैठनेके आसन इधर-उधर फेंके पड़े हैं। तब उन्होंने पुनः वहाँ के सभी स्थानों का निरीक्षण किया और चारों ओर ढूँढ़ने पर भी जब विदेहकुमारी का कहीं पता नहीं लगा, तब श्रीरामचन्द्रजी अपनी दोनों सुन्दर भुजाएँ ऊपर उठाकर सीता का नाम ले जोर जोर से पुकार करके लक्ष्मण से बोले- ॥ १-२॥ ।
क्व नु लक्ष्मण वैदेही कं वा देशमितो गता।
केनाहृता वा सौमित्रे भक्षिता केन वा प्रिया॥३॥
‘भैया लक्ष्मण! विदेहराजकुमारी कहाँ हैं ? यहाँ से किस देश में चली गयीं? सुमित्रानन्दन! मेरी प्रिया सीता को कौन हर ले गया? अथवा किस राक्षस ने खा डाला? ॥३॥
वृक्षणावार्य यदि मां सीते हसितुमिच्छसि।
अलं ते हसितेनाद्य मां भजस्व सुदुःखितम्॥४॥
(फिर वे सीता को सम्बोधित करके बोले-) ‘सीते! यदि तुम वृक्षों की आड़ में अपने को छिपाकर मुझसे हँसी करना चाहती हो तो इस समय यह हँसी ठीक नहीं है। मैं बहुत दुःखी हो रहा हूँ, तुम मेरे पास आ जाओ॥४॥
यैः परिक्रीडसे सीते विश्वस्तैमूंगपोतकैः।
एते हीनास्त्वया सौम्ये ध्यायन्त्यस्राविलेक्षणाः॥
‘सौम्य स्वभाववाली सीते! जिन विश्वस्त मृगछौनों के साथ तुम खेला करती थी, वे आज तुम्हारे बिना दुःखी हो आँखों में आँसू भरकर चिन्तामग्न हो गये हैं’॥ ५ ॥
सीतया रहितोऽहं वै नहि जीवामि लक्ष्मण।
वृतं शोकेन महता सीताहरणजेन माम्॥६॥
परलोके महाराजो नूनं द्रक्ष्यति मे पिता।
‘लक्ष्मण! सीता से रहित होकर मैं जीवित नहीं रह सकता। सीताहरणजनित महान् शोक ने मुझे चारों ओर से घेर लिया है। निश्चय ही अब परलोक में मेरे पिता महाराज दशरथ मुझे देखेंगे॥ ६ १/२॥
कथं प्रतिज्ञां संश्रुत्य मया त्वमभियोजितः॥७॥
अपूरयित्वा तं कालं मत्सकाशमिहागतः।।
वे मुझे उपालम्भ देते हुए कहेंगे—’मैंने तो तुम्हें वनवास के लिये आज्ञा दी थी और तुमने भी वहाँ रहने की प्रतिज्ञा कर ली थी। फिर उतने समय तक वहाँ रहकर उस प्रतिज्ञा को पूर्ण किये बिना ही तुम यहाँ मेरे पास कैसे चले आये? ॥ ७ १/२ ॥
कामवृत्तमनार्यं वा मृषावादिनमेव च॥८॥
धिक् त्वामिति परे लोके व्यक्तं वक्ष्यति मे पिता।
‘तुम-जैसे स्वेच्छाचारी, अनार्य और मिथ्यावादी को धिक्कार है। यह बात परलोक में पिताजी मुझसे अवश्य कहेंगे’।। ८ १/२॥
विवशं शोकसंतप्तं दीनं भग्नमनोरथम्॥९॥
मामिहोत्सृज्य करुणं कीर्तिनरमिवानृजुम्।
क्व गच्छसि वरारोहे मा मोत्सृज सुमध्यमे॥ १०॥
‘वरारोहे ! सुमध्यमे! सीते! मैं विवश, शोकसंतप्त, दीन, भग्नमनोरथ हो करुणाजनक अवस्था में पड़ गया हूँ। जैसे कुटिल मनुष्य को कीर्ति त्याग देती है, उसी प्रकार तुम मुझे यहाँ छोड़कर कहाँ चली जा रही हो? मुझे न छोड़ो, न छोड़ो॥९-१०॥
त्वया विरहितश्चाहं त्यक्ष्ये जीवितमात्मनः।
इतीव विलपन् रामः सीतादर्शनलालसः॥११॥
न ददर्श सुदुःखार्तो राघवो जनकात्मजाम्।
‘तुम्हारे वियोग में मैं अपने प्राण त्याग दूंगा।’ इस प्रकार अत्यन्त दुःख से आतुर हो विलाप करते हुए रघुकुल-नन्दन श्रीराम सीता के दर्शनके लिये अत्यन्त उत्कण्ठित हो गये, किंतु वे जनकनन्दिनी उन्हें दिखायी न पड़ीं॥
अनासादयमानं तं सीतां शोकपरायणम्॥१२॥
पङ्कमासाद्य विपुलं सीदन्तमिव कुञ्जरम्।
लक्ष्मणो राममत्यर्थमुवाच हितकाम्यया॥१३॥
जैसे कोई हाथी किसी बड़ी भारी दलदल में फँसकर कष्ट पा रहा हो, उसी प्रकार सीता को नपाकर अत्यन्त शोक में डूबे हुए श्रीराम से उनके हित की कामना रखकर लक्ष्मण यों बोले- ॥ १२-१३॥
मा विषादं महाबुद्धे कुरु यत्नं मया सह।
इदं गिरिवरं वीर बहुकन्दरशोभितम्॥१४॥
प्रियकाननसंचारा वनोन्मत्ता च मैथिली।
सा वनं वा प्रविष्टा स्यान्नलिनी वा सुपुष्पिताम्॥ १५॥
सरितं वापि सम्प्राप्ता मीनवञ्जलसेविताम्।
वित्रासयितुकामा वा लीना स्यात् कानने क्वचित्॥१६॥
जिज्ञासमाना वैदेही त्वां मां च पुरुषर्षभ।
‘महामते! आप विषाद न करें; मेरे साथ जानकी को ढूँढ़ने का प्रयत्न करें। वीरवर! यह सामने जो ऊँचा पहाड़ दिखायी देता है, अनेक कन्दराओं से सुशोभित है। मिथिलेशकुमारी को वन में घूमना प्रिय लगता है, वे वन की शोभा देखकर हर्ष से उन्मत्त हो उठती हैं; अतः वन में गयी होंगी, अथवा सुन्दर कमल के फूलों से भरे हुए इस सरोवर के या मत्स्य तथा वेतसलतासे सुशोभित सरिता के तट पर जा पहुँची होंगी। अथवा पुरुषप्रवर! हमलोगों को डराने की इच्छा से हम दोनों उन्हें खोज पाते हैं कि नहीं, इस जिज्ञासा से कहीं वन में ही छिप गयी होंगी॥ १४–१६ १/२॥
तस्या ह्यन्वेषणे श्रीमन् क्षिप्रमेव यतावहे ॥१७॥
वनं सर्वं विचिनुवो यत्र सा जनकात्मजा।
‘अतः श्रीमन् ! वनमें जहाँ-जहाँ जानकीके होनेकी सम्भावना हो, उन सभी स्थानोंपर हम दोनों शीघ्र ही उनकी खोजके लिये प्रयत्न करें॥ १७ १/२ ।।
मन्यसे यदि काकुत्स्थ मा स्म शोके मनः कृथाः॥१८॥
एवमुक्तः स सौहार्दाल्लक्ष्मणेन समाहितः।
सह सौमित्रिणा रामो विचेतुमुपचक्रमे॥१९॥
‘रघुनन्दन! यदि आपको मेरी यह बात ठीक लगे तो आप शोक छोड़ दें।’ लक्ष्मण के द्वारा इस प्रकार सौहार्दपूर्वक समझाये जाने पर श्रीरामचन्द्रजी सावधान हो गये और उन्होंने सुमित्राकुमार के साथ सीता को खोजना आरम्भ किया॥ १८-१९॥
तौ वनानि गिरीश्चैव सरितश्च सरांसि च।
निखिलेन विचिन्वन्तौ सीतां दशरथात्मजौ॥ २०॥
तस्य शैलस्य सानूनि शिलाश्च शिखराणि च।
निखिलेन विचिन्वन्तौ नैव तामभिजग्मतुः॥ २१॥
दशरथ के वे दोनों पुत्र सीता की खोज करते हुए वनों में, पर्वतो पर, सरिताओं और सरोवरों के किनारे घूम-घूमकर पूरी चेष्टा के साथ अनुसंधान में लगे रहे। उस पर्वत की चोटियों, शिलाओं और शिखरों पर उन्होंने अच्छी तरह जानकी को ढूँढ़ा; किंतु कहीं भी उनका पता नहीं लगा॥ २०-२१॥
विचित्य सर्वतः शैलं रामो लक्ष्मणमब्रवीत्।
नेह पश्यामि सौमित्रे वैदेही पर्वते शुभाम्॥२२॥
पर्वत के चारों ओर खोजकर श्रीरामचन्द्रजी ने लक्ष्मण से कहा—’सुमित्रानन्दन! इस पर्वतपर तो मैं सुन्दरी वैदेही को नहीं देख पाता हूँ’ ॥ २२ ॥
ततो दुःखाभिसंतप्तो लक्ष्मणो वाक्यमब्रवीत्।
विचरन् दण्डकारण्यं भ्रातरं दीप्ततेजसम्॥२३॥
तब दुःख से संतप्त हुए लक्ष्मण ने दण्डकारण्य में घूमते-घूमते अपने उद्दीप्त तेजस्वी भाई से इस प्रकार
कहाप्राप्स्यसे त्वं महाप्राज्ञ मैथिली जनकात्मजाम्।
यथा विष्णुर्महाबाहुर्बलिं बद्ध्वा महीमिमाम्॥ २४॥
‘महामते! जैसे महाबाहु भगवान् विष्णु ने राजा बलि को बाँधकर यह पृथ्वी प्राप्त कर ली थी, उसी प्रकार आप भी मिथिलेशकुमारी जानकी को पा जायँगे’।
एवमुक्तस्तु वीरेण लक्ष्मणेन स राघवः।
उवाच दीनया वाचा दुःखाभिहतचेतनः॥ २५॥
वीर लक्ष्मण के ऐसा कहने पर दुःख से व्याकुलचित्त हुए श्रीरघुनाथजी ने दीन वाणी में कहा— ॥ २५ ॥
वनं सुविचितं सर्वं पद्मिन्यः फुल्लपङ्कजाः।
गिरिश्चायं महाप्राज्ञ बहकन्दरनिर्झरः।
नहि पश्यामि वैदेहीं प्राणेभ्योऽपि गरीयसीम्॥ २६॥
‘महाप्राज्ञ लक्ष्मण! मैंने सारा वन खोज डाला। विकसित कमलों से भरे हुए सरोवर भी देख लिये तथा अनेक कन्दराओं और झरनों से सुशोभित इस पर्वत को भी सब ओर से छान डाला; परंतु मुझे अपने प्राणों से भी प्यारी वैदेही कहीं दिखायी नहीं पड़ी’॥ २६॥
एवं स विलपन् रामः सीताहरणकर्षितः।
दीनः शोकसमाविष्टो मुहूर्तं विह्वलोऽभवत्॥ २७॥
इस प्रकार सीता-हरण के कष्ट से पीडित हो विलाप करते हुए श्रीरामचन्द्रजी दीन और शोकमग्न हो दो घड़ी तक अत्यन्त व्याकुलता में पड़े रहे॥२७॥
स विह्वलितसर्वाङ्गो गतबुद्धिर्विचेतनः ।
निषसादातुरो दीनो निःश्वस्याशीतमायतम्॥ २८॥
उनका सारा अङ्ग विह्वल (शिथिल) हो गया, बुद्धि काम नहीं दे रही थी, चेतना लुप्त-सी होती जा रही थी। वे गरम-गरम लंबी साँस खींचते हुए दीन और आतुर होकर विषाद में डूब गये॥२८॥
बहुशः स तु निःश्वस्य रामो राजीवलोचनः।
हा प्रियेति विचुक्रोश बहुशो बाष्पगद्गदः॥ २९॥
बारंबार उच्छ्वास लेकर कमलनयन श्रीराम आँसुओं से गद्गद वाणी में ‘हा प्रिये!’ कहकर बहुत रोने-विलखने लगे॥ २९॥
तं सान्त्वयामास ततो लक्ष्मणः प्रियबान्धवम्।
बहुप्रकारं शोकार्तः प्रश्रितः प्रश्रिताञ्जलिः॥ ३०॥
तब शोक से पीड़ित हुए लक्ष्मण ने विनीतभाव से हाथ जोड़कर अपने प्रिय भाई को अनेक प्रकार से सान्त्वना दी।
अनादृत्य तु तद् वाक्यं लक्ष्मणोष्ठपुटच्युतम्।
अपश्यंस्तां प्रियां सीतां प्राक्रोशत् स पुनः पुनः॥ ३१॥
लक्ष्मण के ओष्ठपुटों से निकली हुई इस बात का आदर न करके श्रीरामचन्द्रजी अपनी प्यारी पत्नी सीता को न देखने के कारण उन्हें बारंबार पुकारने और रोने लगे॥ ३१॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे एकषष्टितमः सर्गः॥६१॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में इकसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥६१॥
सर्ग-62
सीतामपश्यन् धर्मात्मा शोकोपहतचेतनः।
विललाप महाबाहू रामः कमललोचनः॥१॥
सीता को न देखकर शोक से व्याकुलचित्त हुए धर्मात्मा महाबाहु कमलनयन श्रीराम विलाप करने लगे॥१॥
पश्यन्निव च तां सीतामपश्यन्मन्मथार्दितः।
उवाच राघवो वाक्यं विलापाश्रयदुर्वचम्॥२॥
रघुनाथजी सीता के प्रति अधिक प्रेम के कारण उनके वियोग में कष्ट पा रहे थे। वे उन्हें न देखकर भी देखते हुए के समान ऐसी बात कहने लगे, जो विलाप का आश्रय होने से गद्गदकण्ठ के कारण कठिनता से बोली जा रही थी— ॥२॥
त्वमशोकस्य शाखाभिः पुष्पप्रियतरा प्रिये।
आवृणोषि शरीरं ते मम शोकविवर्धनी॥३॥
‘प्रिये! तुम्हें फूल अधिक प्रिय हैं, इसलिये खिली हुई अशोक की शाखाओं से अपने शरीर को छिपाती हो और मेरा शोक बढ़ा रही हो॥३॥
कदलीकाण्डसदृशौ कदल्या संवृतावुभौ।
ऊरू पश्यामि ते देवि नासि शक्ता निगुहितुम्॥ ४॥
‘देवि! मैं केले के तनों के तुल्य और कदलीदल से ही छिपे हुए तुम्हारे दोनों ऊरुओं (जाँघों) को देख रहा हूँ। तुम उन्हें छिपा नहीं सकती॥ ४॥
कर्णिकारवनं भद्रे हसन्ती देवि सेवसे।
अलं ते परिहासेन मम बाधावहेन वै॥५॥
‘भद्रे! देवि! तुम हँसती हुई कनेर-पुष्पों की वाटिका का सेवन करती हो। बंद करो इस परिहास को, इससे मुझे बड़ा कष्ट हो रहा है॥५॥
विशेषेणाश्रमस्थाने हासोऽयं न प्रशस्यते।
अवगच्छामि ते शीलं परिहासप्रियं प्रिये॥६॥
आगच्छ त्वं विशालाक्षि शून्योऽयमुटजस्तव।
‘विशेषतः आश्रम के स्थान में यह हास-परिहास अच्छा नहीं बताया जाता है। प्रिये! मैं जानता हूँ, तुम्हारा स्वभाव परिहासप्रिय है। विशाललोचने! आओ तुम्हारी यह पर्णशाला सूनी है’॥ ६ १/२॥
सुव्यक्तं राक्षसैः सीता भक्षिता वा हृतापि वा। ७॥
न हि सा विलपन्तं मामुपसम्प्रेति लक्ष्मण।
(फिर भ्रम दूर होने पर वे सुमित्राकुमार से बोले-) ‘लक्ष्मण! अब तो भलीभाँति स्पष्ट हो गया कि राक्षसों ने सीता को खा लिया अथवा हर लिया; क्योंकि मैं विलाप कर रहा हूँ और वह मेरे पास नहीं आ रही है।। ७ १/२॥
एतानि मृगयथानि साश्रुनेत्राणि लक्ष्मण॥८॥
शंसन्तीव हि मे देवीं भक्षितां रजनीचरैः।
‘लक्ष्मण! ये जो मृगसमूह हैं, ये भी अपने नेत्रों में आँसू भरकर मानो मुझसे यही कह रहे हैं कि देवी सीता को निशाचर खा गये॥ ८ १/२॥
हा ममार्ये क्व यातासि हा साध्वि वरवर्णिनि॥
हा सकामाद्य कैकेयी देवि मेऽद्य भविष्यति।
‘हा मेरी आर्ये! (आदरणीये!) तुम कहाँ चली गयी? हा साध्वि! हा वरवर्णिनि! तुम कहाँ गयी? हा देवि! आज कैकेयी सफलमनोरथ हो जायगी॥ ९ १/२॥
सीतया सह निर्यातो विना सीतामुपागतः॥१०॥
कथं नाम प्रवेक्ष्यामि शून्यमन्तःपुरं मम।
‘सीता के साथ अयोध्या से निकला था। यदि सीता के बिना ही वहाँ लौटा तो अपने सूने अन्तःपुर में कैसे प्रवेश करूँगा॥ १० १/२ ॥
निर्वीर्य इति लोको मां निर्दयश्चेति वक्ष्यति॥ ११॥
कातरत्वं प्रकाशं हि सीतापनयनेन मे।
‘सारा संसार मुझे पराक्रमहीन और निर्दय कहेगा। सीता के अपहरण से मेरी कायरता ही प्रकाश में आयेगी॥ ११ १/२॥
निवृत्तवनवासश्च जनकं मिथिलाधिपम्॥१२॥
कुशलं परिपृच्छन्तं कथं शक्ष्ये निरीक्षितुम्।
‘जब वनवास से लौटने पर मिथिलानरेश जनक मुझसे कुशल पूछने आयेंगे, उस समय मैं कैसे उनकी ओर देख सकूँगा? ॥ १२ १/२॥
विदेहराजो नूनं मां दृष्ट्वा विरहितं तया॥१३॥
सुताविनाशसंतप्तो मोहस्य वशमेष्यति।
‘मुझे सीता से रहित देख विदेहराज जनक अपनी पुत्री के विनाश से संतप्त हो निश्चय ही मूर्च्छित हो जायँगे॥
अथवा न गमिष्यामि पुरीं भरतपालिताम्॥१४॥
स्वर्गोऽपि हि तया हीनः शून्य एव मतो मम।
‘अथवा अब मैं भरत द्वारा पालित अयोध्यापुरी को नहीं जाऊँगा। जानकी के बिना मुझे स्वर्ग भी सूना ही जान पड़ेगा॥ १४ १/२॥
तन्मामुत्सृज्य हि वने गच्छायोध्यापुरीं शुभाम्॥ १५॥
न त्वहं तां विना सीतां जीवेयं हि कथंचन।
‘इसलिये अब तुम मुझे वन में ही छोड़कर सुन्दर अयोध्यापुरी को लौट जाओ। मैं तो अब सीता के बिना किसी तरह जीवित नहीं रह सकता॥ १५ १/२ ॥
गाढमाश्लिष्य भरतो वाच्यो मद्रचनात् त्वया॥ १६॥
अनुज्ञातोऽसि रामेण पालयेति वसुंधराम्।
‘भरत का गाढ़ आलिङ्गन करके तुम उनसे मेरा संदेश कह देना, ‘कैकेयीनन्दन! तुम सारी पृथ्वी का पालन करो, इसके लिये राम ने तुम्हें आज्ञा दे दी है’। १६ १/२॥
अम्बा च मम कैकेयी सुमित्रा च त्वया विभो॥ १७॥
कौसल्या च यथान्यायमभिवाद्या ममाज्ञया।
रक्षणीया प्रयत्नेन भवता सूक्तचारिणा॥१८॥
‘विभो! मेरी माता कौसल्या, कैकेयी तथा सुमित्रा को प्रतिदिन यथोचित रीति से प्रणाम करते हुए उन सबकी रक्षा करना और सदा उनकी आज्ञा के अनुसार चलना,’ यह तुम्हारे लिये मेरी आज्ञा है॥ १७-१८॥
सीतायाश्च विनाशोऽयं मम चामित्रसूदन।
विस्तरेण जनन्या मे विनिवेद्यस्त्वया भवेत्॥ १९॥
‘शत्रुसूदन ! मेरी माता के समक्ष सीता के विनाश का यह समाचार विस्तारपूर्वक कह सुनाना’ ॥ १९॥
इति विलपति राघवे तु दीने वनमुपगम्य तया विना सुकेश्या।
भयविकलमुखस्तु लक्ष्मणोऽपि व्यथितमना भृशमातुरो बभूव॥२०॥
सुन्दर केशवाली सीता के विरह में भगवान् श्रीराम वन के भीतर जाकर जब इस तरह दीनभाव से विलाप करने लगे, तब लक्ष्मण के भी मुखपर भयजनित व्याकुलता के चिह्न दिखायी देने लगे। उनका मन व्यथित हो उठा और वे अत्यन्त घबरा गये॥ २० ॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे द्विषष्टितमः सर्गः॥६२॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में बासठवाँ सर्ग पूरा हुआ।६२॥
सर्ग-63
स राजपुत्रः प्रियया विहीनः शोकेन मोहेन च पीड्यमानः।
विषादयन् भ्रातरमार्तरूपो भूयो विषादं प्रविवेश तीव्रम्॥१॥
अपनी प्रिया सीता से रहित हो राजकुमार श्रीराम शोक और मोह से पीड़ित होने लगे। वे स्वयं तो पीड़ित थे ही, अपने भाई लक्ष्मण को भी विषाद में डालते हुए पुनः तीव्र शोक में मग्न हो गये॥१॥
स लक्ष्मणं शोकवशाभिपन्नं शोके निमग्नो विपुले तु रामः।
उवाच वाक्यं व्यसनानुरूपमुष्णं विनिःश्वस्य रुदन् सशोकम्॥२॥
लक्ष्मण शोक के अधीन हो रहे थे, उनसे महान् शोक में डूबे हुए श्रीराम दुःख के साथ रोते हुए गरम उच्छ्वास लेकर अपने ऊपर पड़े हुए संकट के अनुरूप वचन बोले- ॥२॥
न मद्विधो दुष्कृतकर्मकारी मन्ये द्वितीयोऽस्ति वसुंधरायाम्।
शोकानुशोको हि परम्पराया मामेति भिन्दन् हृदयं मनश्च॥३॥
‘सुमित्रानन्दन! मालूम होता है, मेरे-जैसा पापकर्म करने वाला मनुष्य इस पृथ्वी पर दूसरा कोई नहीं है; क्योंकि एक के बाद दूसरा शोक मेरे हृदय (प्राण) और मन को विदीर्ण करता हुआ लगातार मुझपर आता जा रहा है॥३॥
पूर्वं मया नूनमभीप्सितानि पापानि कर्माण्यसकृत्कृतानि।
तत्रायमद्यापतितो विपाको दुःखेन दुःखं यदहं विशामि॥४॥
‘निश्चय ही पूर्वजन्म में मैंने अपनी इच्छा के अनुसार बारंबार बहुत-से पापकर्म किये हैं; उन्हीं में से कुछ कर्मों का यह परिणाम आज प्राप्त हुआ है, जिससे मैं एक दुःख से दूसरे दुःख में पड़ता जा रहा हूँ॥ ४॥
राज्यप्रणाशः स्वजनैर्वियोगः पितुर्विनाशो जननीवियोगः।
सर्वाणि मे लक्ष्मण शोकवेग मापूरयन्ति प्रविचिन्तितानि॥५॥
‘पहले तो मैं राज्य से वञ्चित हुआ; फिर मेरा स्वजनों से वियोग हुआ। तत्पश्चात् पिताजी का परलोकवास हुआ, फिर माता से भी मुझे बिछुड़ जाना पड़ा। लक्ष्मण! ये सारी बातें जब मुझे याद आती हैं, तब मेरे शोक के वेग को बढ़ा देती हैं।॥ ५ ॥
सर्वं तु दुःखं मम लक्ष्मणेदं शान्तं शरीरे वनमेत्य क्लेशम्।
सीतावियोगात् पुनरप्युदीर्णं काष्ठरिवाग्निः सहसोपदीप्तः॥६॥
‘लक्ष्मण! वन में आकर क्लेश का अनुभव करके भी यह सारा दुःख सीता के समीप रहने से मेरे शरीर में ही शान्त हो गया था, परंतु सीता के वियोग से वह फिर उद्दीप्त हो उठा है, जैसे सूखे काठ का संयोग पाकर आग सहसा प्रज्वलित हो उठती है॥६॥
सा नूनमार्या मम राक्षसेन ह्यभ्याहृता खं समुपेत्य भीरुः।
अपस्वरं सुस्वरविप्रलापा भयेन विक्रन्दितवत्यभीक्ष्णम्॥७॥
‘हाय! मेरी श्रेष्ठ स्वभाववाली भीरु पत्नी को अवश्य ही राक्षस ने आकाशमार्ग से हर लिया। उस समय सुमधुर स्वर में विलाप करने वाली सीता भय के मारे बारंबार विकृत स्वर में क्रन्दन करने लगी होगी। ७॥
तौ लोहितस्य प्रियदर्शनस्य सदोचितावुत्तमचन्दनस्य।
वृत्तौ स्तनौ शोणितपङ्कदिग्धौ नूनं प्रियाया मम नाभिपातः॥८॥
‘मेरी प्रिया के वे दोनों गोल-गोल स्तन, जो सदा लाल चन्दन से चर्चित होने योग्य थे, निश्चय ही रक्त की कीच में सन गये होंगे। हाय! इतने पर भी मेरे शरीर का पतन नहीं होता॥ ८॥
तच्छ्लक्ष्णसुव्यक्तमृदुप्रलापं तस्या मुखं कुञ्चितकेशभारम्।
रक्षोवशं नूनमुपागताया न भ्राजते राहुमुखे यथेन्दुः॥९॥
‘राक्षस के वश में पड़ी हुई मेरी प्रिया का वह मुख जो स्निग्ध एवं सुस्पष्ट मधुर वार्तालाप करने वाला तथा काले-काले घुघराले केशों के भार से सुशोभित था, वैसे ही श्रीहीन हो गया होगा, जैसे राहु के मुख में पड़ा हुआ चन्द्रमा शोभा नहीं पाता है॥९॥
तां हारपाशस्य सदोचितान्तां ग्रीवां प्रियाया मम सुव्रतायाः।
रक्षांसि नूनं परिपीतवन्ति शून्ये हि भित्त्वा रुधिराशनानि॥१०॥
‘हाय! उत्तम व्रत का पालन करने वाली मेरी प्रियतमा का कण्ठ हर समय हार से सुशोभित होनेयोग्य था, किंतु रक्तभोजी राक्षसों ने सूने वन में अवश्य उसे फाड़कर उसका रक्त पिया होगा॥ १० ॥
मया विहीना विजने वने सा रक्षोभिराहृत्य विकृष्यमाणा।
नूनं विनादं कुररीव दीना सा मुक्तवत्यायतकान्तनेत्रा॥११॥
‘मेरे न रहने के कारण निर्जन वन में राक्षसों ने उसे ले-लेकर घसीटा होगा और विशाल एवं मनोहर नेत्रोंवाली वह जानकी अत्यन्त दीनभाव से कुररीकी भाँति विलाप करती रही होगी॥ ११॥
अस्मिन् मया सार्धमुदारशीला शिलातले पूर्वमुपोपविष्टा।
कान्तस्मिता लक्ष्मण जातहासा त्वामाह सीता बहुवाक्यजातम्॥१२॥
‘लक्ष्मण! यह वही शिलातल है, जिस पर उदार स्वभाववाली सीता पहले एक दिन मेरे साथ बैठी हुई थी। उसकी मुसकान कितनी मनोहर थी, उस समय उसने हँस-हँसकर तुमसे भी बहुत-सी बातें कही थीं।
गोदावरीयं सरितां वरिष्ठा प्रिया प्रियाया मम नित्यकालम्।
अप्यत्र गच्छेदिति चिन्तयामि नैकाकिनी याति हि सा कदाचित्॥१३॥
‘सरिताओं में श्रेष्ठ यह गोदावरी मेरी प्रियतमा को सदा ही प्रिय रही है। सोचता हूँ, शायद वह इसी के तटपर गयी हो, किंतु अकेली तो वह कभी वहाँ नहीं जाती थी॥
पद्मानना पद्मपलाशनेत्रा पद्मानि वानेतुमभिप्रयाता।
तदप्ययुक्तं नहि सा कदाचिन्मया विना गच्छति पङ्कजानि॥१४॥
‘उसका मुख और विशाल नेत्र प्रफुल्ल कमलों के समान सुन्दर हैं, सम्भव है, वह कमलपुष्प लाने के लिये ही गोदावरी तट पर गयी हो, परंतु यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि वह मुझे साथ लिये बिना कभी कमलों के पास नहीं जाती थी॥ १४ ॥
कामं त्विदं पुष्पितवृक्षषण्डं नानाविधैः पक्षिगणैरुपेतम्।
वनं प्रयाता नु तदप्ययुक्तमेकाकिनी सातिबिभेति भीरुः॥१५॥
‘हो सकता है कि वह इन पुष्पित वृक्षसमूहों से युक्त और नाना प्रकार के पक्षियों से सेवित वन में भ्रमण के लिये गयी हो; परंतु यह भी ठीक नहीं लगता; क्योंकि वह भीरु तो अकेली वन में जाने से बहुत डरती थी॥
आदित्य भो लोककृताकृतज्ञ लोकस्य सत्यानृतकर्मसाक्षिन्।
मम प्रिया सा क्व गता हृता वा शंसस्व मे शोकहतस्य सर्वम्॥१६॥
‘सूर्यदेव! संसार में किसने क्या किया और क्या नहीं किया—इसे तुम जानते हो; लोगों के सत्य-असत्य (पुण्य और पाप) कर्मो के तुम्ही साक्षी हो। मेरी प्रिया सीता कहाँ गयी अथवा उसे किसने हर लिया, यह सब मुझे बताओ; क्योंकि मैं उसके शोक से पीड़ित हूँ॥१६॥
लोकेषु सर्वेषु न नास्ति किंचिद् यत् ते न नित्यं विदितं भवेत् तत्।
शंसस्व वायो कुलपालिनीं तां मृता हृता वा पथि वर्तते वा॥१७॥
“वायुदेव! समस्त विश्व में ऐसी कोई बात नहीं है, जो तुम्हें सदा ज्ञात न रहती हो। मेरी कुलपालिका सीता कहाँ है, यह बता दो वह मर गयी, हर ली गयी अथवा मार्ग में ही है’ ॥ १७॥
इतीव तं शोकविधेयदेहं रामं विसंज्ञं विलपन्तमेव।
उवाच सौमित्रिरदीनसत्त्वो न्याय्ये स्थितः कालयुतं च वाक्यम्॥१८॥
इस प्रकार शोक के अधीन होकर जब श्रीरामचन्द्रजी संज्ञाशून्य हो विलाप करने लगे, तब उनकी ऐसी अवस्था देख न्यायोचित मार्ग पर स्थित रहने वाले उदारचित्त सुमित्राकुमार लक्ष्मण ने उनसे यह समयोचित बात कही- ॥ १८ ॥
शोकं विसृज्याद्य धृतिं भजस्व सोत्साहता चास्तु विमार्गणेऽस्याः।
उत्साहवन्तो हि नरा न लोके सीदन्ति कर्मस्वतिदुष्करेषु॥१९॥
‘आर्य! आप शोक छोड़कर धैर्य धारण करें; सीता की खोज के लिये मन में उत्साह रखें; क्योंकि उत्साही मनुष्य जगत् में अत्यन्त दुष्कर कार्य आ पड़ने पर भी कभी दुःखी नहीं होते हैं ॥ १९॥
इतीव सौमित्रिमुदग्रपौरुषं ब्रुवन्तमार्तो रघुवंशवर्धनः।
न चिन्तयामास धृतिं विमुक्तवान् पुनश्च दुःखं महदभ्युपागमत्॥२०॥
बढ़े हुए पुरुषार्थवाले सुमित्राकुमार लक्ष्मण जब इस प्रकार की बातें कह रहे थे, उस समय रघुकुल की वृद्धि करने वाले श्रीराम ने आर्त होकर उनके कथन के औचित्य पर कोई ध्यान नहीं दिया। उन्होंने धैर्य छोड़ दिया और वे पुनः महान् दुःख में पड़ गये॥ २० ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे त्रिषष्टितमः सर्गः॥६३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में तिरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ।
सर्ग-64
स दीनो दीनया वाचा लक्ष्मणं वाक्यमब्रवीत्।
शीघ्रं लक्ष्मण जानीहि गत्वा गोदावरी नदीम्॥
अपि गोदावरी सीता पद्मान्यानयितुं गता।
तदनन्तर दीन हुए श्रीरामचन्द्रजी ने दीन वाणी में लक्ष्मण से कहा—’लक्ष्मण! तुम शीघ्र ही गोदावरी नदी के तट पर जाकर पता लगाओ। सीता कमल लाने के लिये तो नहीं चली गयीं ॥ १ १/२ ।।
एवमुक्तस्तु रामेण लक्ष्मणः पुनरेव हि ॥२॥
नदी गोदावरी रम्यां जगाम लघुविक्रमः।
श्रीराम की ऐसी आज्ञा पाकर लक्ष्मण शीघ्र गति से पुनः रमणीय गोदावरी नदी के तट पर गये॥२ १/२॥
तां लक्ष्मणस्तीर्थवती विचित्वा राममब्रवीत्॥३॥
नैनां पश्यामि तीर्थेषु क्रोशतो न शृणोति मे।
अनेक तीर्थों (घाटों)-से युक्त गोदावरी के तट पर खोजकर लक्ष्मण पुनः लौट आये और श्रीराम से बोले -‘भैया! मैं गोदावरी के घाटों पर सीता को नहीं देख पाता हूँ; जोर-जोर से पुकारने पर भी वे मेरी बात नहीं सुनती हैं॥ ३ १/२॥
कं नु सा देशमापन्ना वैदेही क्लेशनाशिनी ॥४॥
नहि तं वेद्मि वै राम यत्र सा तनुमध्यमा।
‘श्रीराम! क्लेशों का नाश करने वाली विदेहराजकुमारी न जाने किस देश में चली गयीं। भैया श्रीराम! जहाँ कृश कटिप्रदेशवाली सीता गयी हैं, उस स्थान को मैं नहीं जानता’ ॥ ४ १/२ ॥
लक्ष्मणस्य वचः श्रुत्वा दीनः संतापमोहितः॥
रामः समभिचक्राम स्वयं गोदावरी नदीम्।
लक्ष्मण की यह बात सुनकर दीन एवं संताप से मोहित हुए श्रीरामचन्द्रजी स्वयं ही गोदावरी नदी के तट पर गये॥ ५ १/२॥
स तामुपस्थितो रामः क्व सीतेत्येवमब्रवीत्॥६॥
भूतानि राक्षसेन्द्रेण वधार्हेण हृतामपि।
न तां शशंसू रामाय तथा गोदावरी नदी॥७॥
वहाँ पहुँचकर श्रीराम ने पूछा-‘सीता कहाँ है?’ परंतु वध के योग्य राक्षसराज रावण द्वारा हरी गयी सीता के विषय में समस्त भूतों में से किसी ने कुछ नहीं कहा। गोदावरी नदी ने भी श्रीरामको कोई उत्तर नहीं दिया॥६-७॥
ततः प्रचोदिता भूतैः शंस चास्मै प्रियामिति।
न च सा ह्यवदत् सीतां पृष्टा रामेण शोचता॥८॥
तदनन्तर वन के समस्त प्राणियों ने उन्हें प्रेरित किया कि ‘तुम श्रीराम को उनकी प्रिया का पता बता दो!’ किंतु शोकमग्न श्रीराम के पूछने पर भी गोदावरी ने सीता का पता नहीं बताया॥ ८॥
रावणस्य च तद्रूपं कर्मापि च दुरात्मनः।
ध्यात्वा भयात् तु वैदेहीं सा नदी न शशंस ह॥ ९॥
दुरात्मा रावण के उस रूप और कर्म को याद करके भय के मारे गोदावरी नदी ने वैदेही के विषय में श्रीराम से कुछ नहीं कहा॥९॥
निराशस्तु तया नद्या सीताया दर्शने कृतः।
उवाच रामः सौमित्रिं सीतादर्शनकर्शितः॥१०॥
सीता के दर्शन के विषय में जब नदी ने उन्हें पूर्ण निराश कर दिया, तब सीता को न देखने से कष्ट में पड़े हुए श्रीराम सुमित्राकुमार से इस प्रकार बोले- ॥ १० ॥
एषा गोदावरी सौम्य किंचिन्न प्रतिभाषते।
किं नु लक्ष्मण वक्ष्यामि समेत्य जनकं वचः॥ ११॥
मातरं चैव वैदेह्या विना तामहमप्रियम्।
‘सौम्य लक्ष्मण ! यह गोदावरी नदी तो मुझे कोई उत्तर ही नहीं देती है। अब मैं राजा जनक से मिलने पर उन्हें क्या जवाब दूंगा? जानकी के बिना उसकी माता से मिलकर भी मैं उनसे यह अप्रिय बात कैसे सुनाऊँगा?॥
या मे राज्यविहीनस्य वने वन्येन जीवतः ॥ १२॥
सर्वं व्यपानयच्छोकं वैदेही क्व नु सा गता।
‘राज्यहीन होकर वन में जंगली फल-मूलों से निर्वाह करते समय भी जो मेरे साथ रहकर मेरे सभी दुःखों को दूर किया करती थी, वह विदेहराजकुमारी कहाँ चली गयी? ॥ १२ १/२ ॥
ज्ञातिवर्गविहीनस्य वैदेहीमप्यपश्यतः॥१३॥
मन्ये दीर्घा भविष्यन्ति रात्रयो मम जाग्रतः।
‘बन्धु-बान्धवों से तो मेरा बिछोह हो ही गया था, अब सीता के दर्शन से भी मुझे वञ्चित होना पड़ा; उसकी चिन्ता में निरन्तर जागते रहने के कारण अब मेरी सभी रातें बहुत बड़ी हो जायँगी॥ १३ १/२ ।।
मन्दाकिनी जनस्थानमिमं प्रस्रवणं गिरिम्॥१४॥
सर्वाण्यनुचरिष्यामि यदि सीता हि लभ्यते।
‘मन्दाकिनी नदी, जनस्थान तथा प्रस्रवण पर्वतइन सभी स्थानों पर मैं बारंबार भ्रमण करूँगा शायद वहाँ सीता का पता चल जाय॥ १४ १/२॥
एते महामृगा वीर मामीक्षन्ते पुनः पुनः॥१५॥
वक्तुकामा इह हि मे इङ्गितान्युपलक्षये।
‘वीर लक्ष्मण! ये विशाल मृग मेरी ओर बारंबार देख रहे हैं, मानो यहाँ ये मुझसे कुछ कहना चाहते हैं। मैं इनकी चेष्टाओं को समझ रहा हूँ’॥ १५ १/२ ॥
तांस्तु दृष्ट्वा नरव्याघ्रो राघवः प्रत्युवाच ह॥१६॥
क्व सीतेति निरीक्षन् वै बाष्पसंरुद्धया गिरा।
एवमुक्ता नरेन्द्रेण ते मृगाः सहसोत्थिताः॥१७॥
दक्षिणाभिमुखाः सर्वे दर्शयन्तो नभःस्थलम्।
तदनन्तर उन सबकी ओर देखकर पुरुषसिंह श्रीरामचन्द्रजी ने उनसे कहा—’बताओ, सीता कहाँ हैं?’ उन मृगों की ओर देखते हुए राजा श्रीराम ने जब अश्रुगद्गद वाणी से इस प्रकार पूछा, तब वे मृग सहसा उठकर खड़े हो गये और ऊपर की ओर देखकर आकाशमार्ग की ओर लक्ष्य कराते हुए सब-के-सब दक्षिण दिशा की ओर मुँह किये दौड़े ॥ १६-१७ १/२॥
मैथिली ह्रियमाणा सा दिशं यामभ्यपद्यत॥१८॥
तेन मार्गेण गच्छन्तो निरीक्षन्ते नराधिपम्।
मिथिलेशकुमारी सीता हरी जाकर जिस दिशा की ओर गयी थीं, उसी ओर के मार्ग से जाते हुए वे मृग राजा श्रीरामचन्द्रजी की ओर मुड़-मुड़कर देखते रहते थे॥ १८ १/२॥
येन मार्गं च भूमिं च निरीक्षन्ते स्म ते मृगाः॥ १९॥
पुनर्नदन्तो गच्छन्ति लक्ष्मणेनोपलक्षिताः।
तेषां वचनसर्वस्वं लक्षयामास चेङ्गितम्॥२०॥
वे मृग आकाश मार्ग और भूमि दोनों की ओर देखते और गर्जना करते हुए पुनः आगे बढ़ते थे। लक्ष्मण ने उनकी इस चेष्टा को लक्ष्य किया। वे जो कुछ कहना चाहते थे, उसका सारसर्वस्वरूप जो उनकी चेष्टा थी, उसे उन्होंने अच्छी तरह समझ लिया॥ १९-२०॥
उवाच लक्ष्मणो धीमान् ज्येष्ठं भ्रातरमार्तवत्।
क्व सीतेति त्वया पृष्टा यथेमे सहसोत्थिताः॥ २१॥
दर्शयन्ति क्षितिं चैव दक्षिणां च दिशं मृगाः।
साधु गच्छावहे देव दिशमेतां च नैर्ऋतीम्॥ २२॥
यदि तस्यागमः कश्चिदार्या वा साथ लक्ष्यते।
तदनन्तर बुद्धिमान् लक्ष्मण ने आर्त-से होकर अपने बड़े भाई से इस प्रकार कहा—’आर्य! जब आपने पूछा कि सीता कहाँ हैं, तब ये मृग सहसा उठकर खड़े हो गये और पृथ्वी तथा दक्षिण की ओर हमारा
लक्ष्य कराने लगे हैं; अतः देव! यही अच्छा होगा कि हमलोग इस नैर्ऋत्य दिशा की ओर चलें। सम्भव है, इधर जाने से सीता का कोई समाचार मिल जाय अथवा आर्या सीता स्वयं ही दृष्टिगोचर हो जायँ’ ॥ २१-२२ १/२॥
बाढमित्येव काकुत्स्थः प्रस्थितो दक्षिणां दिशम्॥ २३॥
लक्ष्मणानुगतः श्रीमान् वीक्षमाणो वसुंधराम्।
तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर श्रीमान् रामचन्द्रजी लक्ष्मण को साथ ले पृथ्वी की ओर ध्यान से देखते हुए दक्षिण दिशा की ओर चल दिये।। २३ १/२।।
एवं सम्भाषमाणौ तावन्योन्यं भ्रातरावुभौ ॥२४॥
वसुंधरायां पतितपुष्पमार्गमपश्यताम्।
वे दोनों भाई आपस में इसी प्रकार की बातें करते हुए ऐसे मार्ग पर जा पहुँचे, जहाँ भूमि पर कुछ फूल गिरे दिखायी देते थे॥२४ १/२॥
पुष्पवृष्टिं निपतितां दृष्ट्वा रामो महीतले॥२५॥
उवाच लक्ष्मणं वीरो दुःखितो दुःखितं वचः।
पृथ्वी पर फूलों की उस वर्षा को देखकर वीर श्रीराम ने दुःखी हो लक्ष्मण से यह दुःखभरा वचन कहा— ॥ २५ १/२॥
अभिजानामि पुष्पाणि तानीमानीह लक्ष्मण॥ २६॥
अपिनद्धानि वैदेह्या मया दत्तानि कानने।
‘लक्ष्मण ! मैं इन फूलों को पहचानता हूँ। ये वे ही फूल यहाँ गिरे हैं, जिन्हें वन में मैंने विदेहनन्दिनी को दिया था और उन्होंने अपने केशों में लगा लिया था। २६ १/२॥
मन्ये सूर्यश्च वायुश्च मेदिनी च यशस्विनी॥ २७॥
अभिरक्षन्ति पुष्पाणि प्रकुर्वन्तो मम प्रियम्।
‘मैं समझता हूँ, सूर्य, वायु और यशस्विनी पृथ्वी ने मेरा प्रिय करने के लिये ही इन फूलों को सुरक्षित रखा है’ ॥ २७ १/२॥
एवमुक्त्वा महाबाहुर्लक्ष्मणं पुरुषर्षभम्॥२८॥
उवाच रामो धर्मात्मा गिरिं प्रस्रवणाकुलम्।
पुरुषप्रवर लक्ष्मण से ऐसा कहकर धर्मात्मा महाबाहु श्रीराम ने झरनों से भरे हुए प्रस्रवण गिरि से कहा- ॥ २८ १/२॥
कच्चित् क्षितिभृतां नाथ दृष्टा सर्वाङ्गसुन्दरी॥ २९॥
रामा रम्ये वनोद्देशे मया विरहिता त्वया।
‘पर्वतराज! क्या तुमने इस वन के रमणीय प्रदेश में मुझसे बिछुड़ी हुई सर्वाङ्गसुन्दरी रमणी सीता को देखा है?’ ॥ २९ १/२ ॥
क्रुद्धोऽब्रवीद् गिरिं तत्र सिंहः क्षुद्रमृगं यथा॥ ३०॥
तां हेमवर्णां हेमाङ्गी सीतां दर्शय पर्वत।
यावत् सानूनि सर्वाणि न ते विध्वंसयाम्यहम्॥ ३१॥
तदनन्तर जैसे सिंह छोटे मृग को देखकर दहाड़ता है, उसी प्रकार वे कुपित हो वहाँ उस पर्वत से बोले —’पर्वत ! जबतक मैं तुम्हारे सारे शिखरों का विध्वंस नहीं कर डालता हूँ, इसके पहले ही तुम उस काञ्चन की-सी काया-कान्तिवाली सीता का मुझे दर्शन करा दो’ ।। ३०-३१॥
एवमुक्तस्तु रामेण पर्वतो मैथिली प्रति।
दर्शयन्निव तां सीतां नादर्शयत राघवे॥३२॥
श्रीराम के द्वारा मैथिली के लिये ऐसा कहे जाने पर उस पर्वत ने सीता को दिखाता हुआ-सा कुछ चिह्न प्रकट कर दिया। श्रीरघुनाथजी के समीप वह सीता को साक्षात् उपस्थित न कर सका।॥ ३२॥
ततो दाशरथी राम उवाच च शिलोच्चयम्।
मम बाणाग्निनिर्दग्धो भस्मीभूतो भविष्यसि॥
असेव्यः सर्वतश्चैव निस्तृणद्रुमपल्लवः ।
तब दशरथनन्दन श्रीराम ने उस पर्वत से कहा —’अरे! तू मेरे बाणों की आग से जलकर भस्मीभूत हो जायगा। किसी भी ओर से तू सेवन के योग्य नहीं रह जायगा। तेरे तृण, वृक्ष और पल्लव नष्ट हो जायँगे’।
इमां वा सरितं चाद्य शोषयिष्यामि लक्ष्मण॥३४॥
यदि नाख्याति मे सीतामद्य चन्द्रनिभाननाम्।
(इसके बाद वे सुमित्राकुमार से बोले-) ‘लक्ष्मण! यदि यह नदी आज मुझे चन्द्रमुखी सीता का पता नहीं बताती है तो मैं अब इसे भी सुखा डालूँगा’ ॥ ३४ १/२॥
एवं प्ररुषितो रामो दिधक्षन्निव चक्षुषा॥ ३५॥
ददर्श भूमौ निष्क्रान्तं राक्षसस्य पदं महत्।
ऐसा कहकर रोष में भरे हुए श्रीरामचन्द्रजी उसकी ओर इस तरह देखने लगे, मानो अपनी दृष्टि द्वारा उसे जलाकर भस्म कर देना चाहते हैं। इतने ही में उस ङ्केपर्वत और गोदावरी के समीप की भूमि पर राक्षस का विशाल पदचिह्न उभरा हुआ दिखायी दिया॥ ३५ १/२॥
त्रस्ताया रामकांक्षिण्याः प्रधावन्त्या इतस्ततः॥
राक्षसेनानुसृप्ताया वैदेह्याश्च पदानि तु।
साथ ही राक्षस ने जिनका पीछा किया था और जो श्रीराम की अभिलाषा रखकर रावण के भय से संत्रस्त हो इधर-उधर भागती फिरी थीं, उन विदेहराजकुमारी सीता के चरणचिह्न भी वहाँ दिखायी दिये॥ ३६ ३ ॥
स समीक्ष्य परिक्रान्तं सीताया राक्षसस्य च ॥३७॥
भग्नं धनुश्च तूणी च विकीर्णं बहुधा रथम्।
सम्भ्रान्तहृदयो रामः शशंस भ्रातरं प्रियम्॥३८॥
सीता और राक्षस के पैरों के निशान, टूटे धनुष, तरकस और छिन्न-भिन्न होकर अनेक टुकड़ों में बिखरे हुए रथ को देखकर श्रीरामचन्द्रजी का हृदय घबरा उठा। वे अपने प्रिय भ्राता सुमित्राकुमार से बोले – ॥ ३७-३८॥
पश्य लक्ष्मण वैदेह्या कीर्णाः कनकबिन्दवः।
भूषणानां हि सौमित्रे माल्यानि विविधानि च॥ ३९॥
‘लक्ष्मण! देखो, ये सीता के आभूषणों में लगे हुए सोने के घुघुरू बिखरे पड़े हैं। सुमित्रानन्दन! उसके नाना प्रकार के हार भी टूटे पड़े हैं॥ ३९॥
तप्तबिन्दुनिकाशैश्च चित्रैः क्षतजबिन्दुभिः।
आवृतं पश्य सौमित्रे सर्वतो धरणीतलम्॥४०॥
‘सुमित्राकुमार! देखो, यहाँ की भूमि सब ओर से सुवर्ण की बूंदों के समान ही विचित्र रक्तबिन्दुओं से रँगी दिखायी देती है॥ ४०॥
मन्ये लक्ष्मण वैदेही राक्षसैः कामरूपिभिः।
भित्त्वा भित्त्वा विभक्ता वा भक्षिता वा भविष्यति॥४१॥
‘लक्ष्मण! मुझे तो ऐसा मालूम होता है कि इच्छानुसार रूप धारण करने वाले राक्षसों ने यहाँ सीता के टुकड़े-टुकड़े करके उसे आपस में बाँटा और खाया होगा।
तस्या निमित्तं सीताया द्वयोर्विवदमानयोः।
बभूव युद्धं सौमित्रे घोरं राक्षसयोरिह॥४२॥
‘सुमित्रानन्दन! सीता के लिये परस्पर विवाद करने वाले दो राक्षसों में यहाँ घोर युद्ध भी हुआ है। ४२॥
मुक्तामणिचितं चेदं रमणीयं विभूषितम्।
धरण्यां पतितं सौम्य कस्य भग्नं महद् धनुः॥ ४३॥
‘सौम्य! तभी तो यहाँ यह मोती और मणियों से जटित एवं विभूषित किसी का अत्यन्त सुन्दर और विशाल धनुष खण्डित होकर पृथ्वी पर पड़ा है। यह किसका धनुष हो सकता है ? ॥ ४३॥
राक्षसानामिदं वत्स सुराणामथवापि वा।
तरुणादित्यसंकाशं वैदूर्यगलिकाचितम्॥४४॥
‘वत्स! पता नहीं, यह राक्षसों का है या देवताओं का यह प्रातःकाल के सूर्य की भाँति प्रकाशित हो रहा है तथा इसमें वैदूर्यमणि (नीलम) के टुकड़े जड़े हुए हैं॥४४॥
विशीर्णं पतितं भूमौ कवचं कस्य काञ्चनम्।
छत्रं शतशलाकं च दिव्यमाल्योपशोभितम्॥ ४५॥
भग्नदण्डमिदं सौम्य भूमौ कस्य निपातितम्।
‘सौम्य! उधर पृथ्वी पर टूटा हुआ एक सोने का कवच पड़ा है, न जाने वह किसका है? दिव्य मालाओं से सुशोभित यह सौ कमानियों वाला छत्र किसका है? इसका डंडा टूट गया है और यह धरती पर गिरा दिया गया है॥ ४५ १/२ ॥
काञ्चनोरश्छदाश्चेमे पिशाचवदनाः खराः॥ ४६॥
भीमरूपा महाकायाः कस्य वा निहता रणे।
‘इधर ये पिशाचों के समान मुखवाले भयंकर रूपधारी गधे मरे पड़े हैं। इनका शरीर बहुत ही विशाल रहा है। इन सबकी छाती में सोने के कवच बँधे हैं। ये युद्ध में मारे गये जान पड़ते हैं। पता नहीं ये किसके थे॥
दीप्तपावकसंकाशो द्युतिमान् समरध्वजः॥४७॥
अपविद्धश्च भग्नश्च कस्य साङ्गामिको रथः।
‘तथा संग्राम में काम देने वाला यह किसका रथ पड़ा है ? इसे किसी ने उलटा गिराकर तोड़ डाला है। समराङ्गण में स्वामी को सूचित करने वाली ध्वजा भी इसमें लगी थी। यह तेजस्वी रथ प्रज्वलित अग्नि के समान दमक रहा है॥ ४७ १/२॥
रथाक्षमात्रा विशिखास्तपनीयविभूषणाः॥४८॥
कस्येमे निहता बाणाः प्रकीर्णा घोरदर्शनाः।
‘ये भयंकर बाण, जो यहाँ टुकड़े-टुकड़े होकर बिखरे पड़े हैं, किसके हैं? इनकी लंबाई और मोटाई रथ के धुरे के समान प्रतीत होती है। इनके फल-भाग टूट गये हैं तथा ये सुवर्ण से विभूषित हैं। ४८ १/२ ॥
शरावरौ शरैः पूर्णौ विध्वस्तौ पश्य लक्ष्मण॥ ४९॥
प्रतोदाभीषहस्तोऽयं कस्य वा सारथिर्हतः।
‘लक्ष्मण! उधर देखो, ये बाणों से भरे हुए दो तरकस पड़े हैं, जो नष्ट कर दिये गये हैं। यह किसका सारथि मरा पड़ा है, जिसके हाथ में चाबुक और लगाम अभी तक मौजूद हैं॥ ४९ १/२ ॥
पदवी पुरुषस्यैषा व्यक्तं कस्यापि रक्षसः॥५०॥
वैरं शतगुणं पश्य मम तैर्जीवितान्तकम्।
सुघोरहृदयैः सौम्य राक्षसैः कामरूपिभिः॥५१॥
‘सौम्य! यह अवश्य ही किसी राक्षस का पदचिह्न दिखायी देता है। इन अत्यन्त क्रूर हृदय वाले कामरूपी राक्षसों के साथ मेरा वैर सौगुना बढ़ गया है। देखो, यह वैर उनके प्राण लेकर ही शान्त होगा। ५०-५१॥
हृता मृता वा वैदेही भक्षिता वा तपस्विनी।
न धर्मस्त्रायते सीतां ह्रियमाणां महावने॥५२॥
‘अवश्य ही तपस्विनी विदेहराजकुमारी हर ली गयी, मृत्यु को प्राप्त हो गयी अथवा राक्षसों ने उसे खा लिया। इस विशाल वन में हरी जाती हुई सीता की रक्षा धर्म भी नहीं कर रहा है॥५२॥
भक्षितायां हि वैदेह्यां हृतायामपि लक्ष्मण।
के हि लोके प्रियं कर्तुं शक्ताः सौम्य ममेश्वराः॥ ५३॥
‘सौम्य लक्ष्मण! जब विदेहनन्दिनी राक्षसों का ग्रास बन गयी अथवा उनके द्वारा हर ली गयी और कोई सहायक नहीं हुआ, तब इस जगत् में कौन ऐसे पुरुष हैं, जो मेरा प्रिय करने में समर्थ हों॥ ५३॥
कर्तारमपि लोकानां शूरं करुणवेदिनम्।
अज्ञानादवमन्येरन् सर्वभूतानि लक्ष्मण॥५४॥
‘लक्ष्मण! जो समस्त लोकों की सृष्टि, पालन और संहार करने वाले ‘त्रिपुर-विजय’ आदि शौर्य से सम्पन्न महेश्वर हैं, वे भी जब अपने करुणामय स्वभाव के कारण चुप बैठे रहते हैं, तब सारे प्राणी उनके ऐश्वर्य को न जानने से उनका तिरस्कार करने लग जाते हैं ॥ ५४॥
मृदुं लोकहिते युक्तं दान्तं करुणवेदिनम्।
निर्वीर्य इति मन्यन्ते नूनं मां त्रिदशेश्वराः॥५५॥
‘मैं लोकहित में तत्पर, युक्तचित्त, जितेन्द्रिय तथा जीवों पर करुणा करने वाला हूँ, इसीलिये ये इन्द्र आदि देवेश्वर निश्चय ही मुझे निर्बल मान रहे हैं (तभी तो इन्होंने सीता की रक्षा नहीं की है)॥ ५५ ॥
मां प्राप्य हि गुणो दोषः संवृत्तः पश्य लक्ष्मण।
अद्यैव सर्वभूतानां रक्षसामभवाय च॥५६॥
संहृत्यैव शशिज्योत्स्नां महान् सूर्य इवोदितः।
संहृत्यैव गुणान् सर्वान् मम तेजः प्रकाशते॥ ५७॥
‘लक्ष्मण! देखो तो सही, यह दयालुता आदि गुण मेरे पास आकर दोष बन गया (तभी तो मुझे निर्बल मानकर मेरी स्त्री का अपहरण किया गया है। अतः अब मुझे पुरुषार्थ ही प्रकट करना होगा)। जैसे प्रलयकाल में उदित हुआ महान् सूर्य चन्द्रमा की ज्योत्स्ना (चाँदनी) का संहार करके प्रचण्ड तेज से प्रकाशित हो उठता है, उसी प्रकार अब मेरा तेज आज ही समस्त प्राणियों तथा राक्षसों का अन्त करने के लिये मेरे उन कोमल स्वभाव आदि गुणों को समेटकर प्रचण्डरूप में प्रकाशित होगा, यह भी तुम देखो। ५६-५७॥
नैव यक्षा न गन्धर्वा न पिशाचा न राक्षसाः।
किंनरा वा मनुष्या वा सुखं प्राप्स्यन्ति लक्ष्मण॥ ५८॥
‘लक्ष्मण! अब न तो यक्ष, न गन्धर्व, न पिशाच, न राक्षस, न किन्नर और न मनुष्य ही चैन से रहने पायेंगे॥ ५८॥
ममास्त्रबाणसम्पूर्णमाकाशं पश्य लक्ष्मण।
असम्पातं करिष्यामि ह्यद्य त्रैलोक्यचारिणाम॥ ५९॥
‘सुमित्रानन्दन! देखना, थोड़ी ही देर में आकाश को मैं अपने चलाये हुए बाणों से भर दूंगा और तीनलोकों में विचरने वाले प्राणियों को हिलने-डुलने भी न दूंगा॥ ५९॥
संनिरुद्धग्रहगणमावारितनिशाकरम्।
विप्रणष्टानलमरुद्भास्करद्युतिसंवृतम्॥६०॥
विनिर्मथितशैलाग्रं शुष्यमाणजलाशयम्।
ध्वस्तद्रुमलतागुल्मं विप्रणाशितसागरम्॥६१॥
त्रैलोक्यं त करिष्यामि संयक्तं कालकर्मणा।
‘ग्रहों की गति रुक जायगी, चन्द्रमा छिप जायगा, अग्नि, मरुद्गण तथा सूर्य का तेज नष्ट हो जायगा, सब कुछ अन्धकार से आच्छन्न हो जायगा, पर्वतों के शिखर मथ डाले जायँगे, सारे जलाशय (नदी-सरोवर आदि) सूख जायेंगे, वृक्ष, लता और गुल्म नष्ट हो जायँगे और समुद्रों का भी नाश कर दिया जायगा। इस तरह मैं सारी त्रिलोकी में ही काल की विनाशलीला आरम्भ कर दूंगा॥
न ते कुशलिनी सीतां प्रदास्यन्ति ममेश्वराः॥ ६२॥
अस्मिन् मुहूर्ते सौमित्रे मम द्रक्ष्यन्ति विक्रमम्।
‘सुमित्रानन्दन! यदि देवेश्वरगण इसी मुहूर्त में मुझे सीता देवी को सकुशल नहीं लौटा देंगे तो वे मेरा पराक्रम देखेंगे॥ ६२ १/२ ॥
नाकाशमुत्पतिष्यन्ति सर्वभूतानि लक्ष्मण॥६३॥
मम चापगुणोन्मुक्तैर्बाणजालैर्निरन्तरम्।।
‘लक्ष्मण! मेरे धनुष की प्रत्यञ्चा से छूटे हुए बाणसमूहों द्वारा आकाश के ठसाठस भर जाने के कारण उसमें कोई प्राणी उड़ नहीं सकेंगे॥६३ १/२ ॥
मर्दितं मम नाराचैर्ध्वस्तभ्रान्तमृगद्विजम्॥६४॥
समाकुलममर्यादं जगत् पश्याद्य लक्ष्मण।
‘सुमित्रानन्दन! देखो, आज मेरे नाराचों से रौंदा जाकर यह सारा जगत् व्याकुल और मर्यादारहित हो जायगा। यहाँ के मृग और पक्षी आदि प्राणी नष्ट एवं उद्भ्रान्त हो जायेंगे॥६४ १/२॥
आकर्णपूणैरिषुभिर्जीवलोकदुरावरैः॥६५॥
करिष्ये मैथिलीहेतोरपिशाचमराक्षसम्।
‘धनुष को कान तक खींचकर छोड़े गये मेरे बाणों को रोकना जीवजगत् के लिये बहुत कठिन होगा। मैं सीता के लिये उन बाणों द्वारा इस जगत् के समस्त पिशाचों और राक्षसों का संहार कर डालूँगा॥ ६५ १/२॥
मम रोषप्रयुक्तानां विशिखानां बलं सुराः॥६६॥
द्रक्ष्यन्त्यद्य विमुक्तानाममर्षाद् दूरगामिनाम्।
‘रोष और अमर्षपूर्वक छोड़े गये मेरे फलरहित दूरगामी बाणों का बल आज देवतालोग देखेंगे॥ ६६ १/२॥
नैव देवा न दैतेया न पिशाचा न राक्षसाः॥६७॥
भविष्यन्ति मम क्रोधात् त्रैलोक्ये विप्रणाशिते।
‘मेरे क्रोध से त्रिलोकी का विनाश हो जाने पर न देवता रह जायँगे न दैत्य, न पिशाच रहने पायेंगे न राक्षस॥ ६७ १/२॥
देवदानवयक्षाणां लोका ये रक्षसामपि॥६८॥
बहुधा निपतिष्यन्ति बाणौघैः शकलीकृताः।
‘देवताओं, दानवों, यक्षों और राक्षसों के जो लोक हैं, वे मेरे बाणसमूहों से टुकड़े-टुकड़े होकर बारंबार नीचे गिरेंगे॥ ६८ १/२ ॥
निर्मर्यादानिमाल्लोकान् करिष्याम्यद्य सायकैः॥ ६९॥
हृतां मृतां वा सौमित्रे न दास्यन्ति ममेश्वराः।
‘सुमित्रानन्दन! यदि देवेश्वरगण मेरी हरी या मरी हुई सीता को लाकर मुझे नहीं देंगे तो आज मैं अपने सायकों की मार से इन तीनों लोकों को मर्यादा से भ्रष्ट कर दूंगा॥ ६९ १/२॥
तथारूपां हि वैदेहीं न दास्यन्ति यदि प्रियाम्॥ ७०॥
नाशयामि जगत् सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम्।
यावद् दर्शनमस्या वै तापयामि च सायकैः॥ ७१॥
‘यदि वे मेरी प्रिया विदेहराजकुमारी को मुझे उसी रूप में वापस नहीं लौटायेंगे तो मैं चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकी का नाश कर डालूँगा। जबतक सीता का दर्शन न होगा, तब तक मैं अपने सायकों से समस्त संसार को संतप्त करता रहूँगा’। ७०-७१॥
इत्युक्त्वा क्रोधताम्राक्षः स्फुरमाणोष्ठसम्पुटः।
वल्कलाजिनमाबद्धय जटाभारमबन्धयत्॥७२॥
ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजी के नेत्र क्रोध से लाल हो गये, होठ फड़कने लगे। उन्होंने वल्कल और मृगचर्म को अच्छी तरह कसकर अपने जटाभार को भी बाँध लिया॥७२॥
तस्य क्रुद्धस्य रामस्य तथाभूतस्य धीमतः।
त्रिपुरं जनुषः पूर्वं रुद्रस्येव बभौ तनुः॥७३॥
उस समय क्रोध में भरकर उस तरह संहार के लिये उद्यत हुए भगवान् श्रीराम का शरीर पूर्वकाल में त्रिपुर का संहार करने वाले रुद्र के समान प्रतीत होता था॥७३॥
लक्ष्मणादथ चादाय रामो निष्पीड्य कार्मुकम्।
शरमादाय संदीप्तं घोरमाशीविषोपमम्॥७४॥
संदधे धनुषि श्रीमान् रामः परपुरञ्जयः।।
युगान्ताग्निरिव क्रुद्ध इदं वचनमब्रवीत्॥७५॥
उस समय लक्ष्मण के हाथ से धनुष लेकर श्रीरामचन्द्रजी ने उसे दृढ़तापूर्वक पकड़ लिया और एक विषधर सर्प के समान भयंकर और प्रज्वलित बाण लेकर उसे उस धनुषपर रखा। तत्पश्चात् शत्रुनगरी पर विजय पाने वाले श्रीराम प्रलयाग्नि के समान कुपित हो इस प्रकार बोले- ॥ ७४-७५ ॥
यथा जरा यथा मृत्युर्यथा कालो यथा विधिः।
नित्यं न प्रतिहन्यन्ते सर्वभूतेषु लक्ष्मण।
तथाहं क्रोधसंयुक्तो न निवार्योऽस्म्यसंशयम्॥ ७६॥
‘लक्ष्मण ! जैसे बुढ़ापा, जैसे मृत्यु, जैसे काल और जैसे विधाता सदा समस्त प्राणियों पर प्रहार करते हैं, किंतु उन्हें कोई रोक नहीं पाता है, उसी प्रकार निस्संदेह क्रोध में भर जाने पर मेरा भी कोई निवारण नहीं कर सकता ॥ ७६॥
पुरेव मे चारुदतीमनिन्दितां दिशन्ति सीतां यदि नाद्य मैथिलीम्।
सदेवगन्धर्वमनुष्यपन्नगं जगत् सशैलं परिवर्तयाम्यहम्॥७७॥
‘यदि देवता आदि आज पहले की ही भाँति मनोहर दाँतोंवाली अनिन्द्यसुन्दरी मिथिलेशकुमारी सीता को मुझे लौटा नहीं देंगे तो मैं देवता, गन्धर्व, मनुष्य, नाग और पर्वतोंसहित सारे संसार को उलट दूंगा’ ।।७७ ॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे चतुःषष्टितमः सर्गः॥६४॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में चौंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ।६४॥
सर्ग-65
तप्यमानं तदा रामं सीताहरणकर्शितम्।
लोकानामभवे युक्तं सांवर्तकमिवानलम्॥१॥
वीक्षमाणं धनुः सज्यं निःश्वसन्तं पुनः पुनः।
दग्धुकामं जगत् सर्वं युगान्ते च यथा हरम्॥२॥
अदृष्टपूर्वं संक्रुद्धं दृष्ट्वा रामं स लक्ष्मणः।
अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यं मुखेन परिशुष्यता॥३॥
सीताहरण के शोक से पीड़ित हुए श्रीराम जब उस समय संतप्त हो प्रलयकालिक अग्नि के समान समस्त लोकों का संहार करने को उद्यत हो गये और धनुष की डोरी चढ़ाकर बारंबार उसकी ओर देखने लगे तथा लंबी साँस खींचने लगे, साथ ही कल्पान्तकाल में रुद्रदेव की भाँति समस्त संसार को दग्ध कर देने की इच्छा करने लगे, तब जिन्हें इस रूप में पहले कभी देखा नहीं गया था, उन अत्यन्त कुपित हुए श्रीराम की ओर देखकर लक्ष्मण हाथ जोड़ सूखे हुए मुँह से इस प्रकार बोले- ॥१-३॥
पुरा भूत्वा मृदुर्दान्तः सर्वभूतहिते रतः।
न क्रोधवशमापन्नः प्रकृतिं हातुमर्हसि ॥४॥
‘आर्य! आप पहले कोमल स्वभाव से युक्त, जितेन्द्रिय और समस्त प्राणियों के हित में तत्पर रहे हैं।अब क्रोध के वशीभूत होकर अपनी प्रकृति (स्वभाव) का परित्याग न करें॥४॥
चन्द्रे लक्ष्मीः प्रभा सूर्ये गतिर्वायौ भुवि क्षमा।
एतच्च नियतं नित्यं त्वयि चानुत्तमं यशः॥५॥
‘चन्द्रमा में शोभा, सूर्य में प्रभा, वायु में गति और पृथ्वी में क्षमा जैसे नित्य विराजमान रहती है, उसी प्रकार आप में सर्वोत्तम यश सदा प्रकाशित होता है।
एकस्य नापराधेन लोकान् हन्तुं त्वमर्हसि।
ननु जानामि कस्यायं भग्नः सांग्रामिको रथः॥
‘आप किसी एक के अपराध से समस्त लोकों का संहार न करें। मैं यह जानने की चेष्टा करता हूँ कि यह टूटा हुआ युद्धोपयोगी रथ किसका है॥६॥
केन वा कस्य वा हेतोः सयुगः सपरिच्छदः।
खरनेमिक्षतश्चायं सिक्तो रुधिरबिन्दुभिः॥७॥
देशो निर्वृत्तसंग्रामः सुघोरः पार्थिवात्मज।
एकस्य तु विमर्दोऽयं न द्वयोर्वदतां वर॥८॥
नहि वृत्तं हि पश्यामि बलस्य महतः पदम्।
नैकस्य तु कृते लोकान् विनाशयितुमर्हसि॥९॥
‘अथवा किसने किस उद्देश्य से जूए तथा अन्य उपकरणों सहित इस रथ को तोड़ा है? इसका भी पता लगाना है। राजकुमार ! यह स्थान घोड़ों की खुरों और थके पहियों से खुदा हुआ है। साथ ही खून की बूदों से सिंच उठा है। इससे सिद्ध होता है कि यहाँ बड़ा भयंकर संग्राम हुआ था, परंतु यह संग्राम-चिह्न किसी एक ही रथी का है, दो का नहीं। वक्ताओं में श्रेष्ठ श्रीराम! मैं यहाँ किसी विशाल सेना का पदचिह्न नहीं देख रहा हूँ; अतः किसी एक ही के अपराध के कारण आपको समस्त लोकों का विनाश नहीं करना चाहिये॥७–९॥
युक्तदण्डा हि मृदवः प्रशान्ता वसुधाधिपाः।
सदा त्वं सर्वभूतानां शरण्यः परमा गतिः॥१०॥
‘क्योंकि राजालोग अपराध के अनुसार ही उचित दण्ड देने वाले, कोमल स्वभाव वाले और शान्त होते हैं। आप तो सदा ही समस्त प्राणियों को शरण देने वाले तथा उनकी परम गति हैं॥ १० ॥
को नु दारप्रणाशं ते साधु मन्येत राघव।
सरितः सागराः शैला देवगन्धर्वदानवाः॥११॥
नालं ते विप्रियं कर्तुं दीक्षितस्येव साधवः।
‘रघुनन्दन! आपकी स्त्री का विनाश या अपहरण कौन अच्छा समझेगा? जैसे यज्ञ में दीक्षित हुए पुरुष का साधु स्वभाववाले ऋत्विज् कभी अप्रिय नहीं कर सकते, उसी प्रकार सरिताएँ, समुद्र, पर्वत, देवता, गन्धर्व और दानव-ये कोई भी आपके प्रतिकूल आचरण नहीं कर सकते॥११ १/२ ॥
येन राजन् हृता सीता तमन्वेषितुमर्हसि॥१२॥
मदः द्वितीयो धनुष्पाणिः सहायैः परमर्षिभिः।
‘राजन्! जिसने सीता का अपहरण किया है, उसी का अन्वेषण करना चाहिये। आप मेरे साथ धनुष हाथ में लेकर बड़े-बड़े ऋषियों की सहायता से उसका पता लगावें॥ १२ १/२॥
समुद्रं वा विचेष्यामः पर्वतांश्च वनानि च ॥१३॥
गुहाश्च विविधा घोराः पद्मिन्यो विविधास्तथा।
देवगन्धर्वलोकांश्च विचेष्यामः समाहिताः॥ १४॥
यावन्नाधिगमिष्यामस्तव भार्यापहारिणम्।
न चेत् साम्ना प्रदास्यन्ति पत्नी ते त्रिदशेश्वराः।
कोसलेन्द्र ततः पश्चात् प्राप्तकालं करिष्यसि॥ १५॥
‘हम सब लोग एकाग्रचित्त हो समुद्र में खोजेंगे, पर्वतों और वनों में ढूँढेंगे, नाना प्रकार की भयंकर गुफाओं और भाँति-भाँति के सरोवरों को छान डालेंगे तथा देवताओं और गन्धर्वो के लोकों में भी तलाश करेंगे। जबतक आपकी पत्नी का अपहरण करने वाले दुरात्मा का पता नहीं लगा लेंगे, तब तक हम अपना यह प्रयत्न जारी रखेंगे। कोसलनरेश! यदि हमारे शान्तिपूर्ण बर्ताव से देवेश्वरगण आपकी पत्नी का पता नहीं देंगे तो उस अवसर के अनुरूप कार्य आप कीजियेगा॥
शीलेन साम्ना विनयेन सीतां नयेन न प्राप्स्यसि चेन्नरेन्द्र।
ततः समुत्सादय हेमपुखैमहेन्द्रवज्रप्रतिमैः शरौघैः॥१६॥
‘नरेन्द्र! यदि अच्छे शील-स्वभाव, सामनीति, विनय और न्याय के अनुसार प्रयत्न करने पर भी आपको सीता का पता न मिले, तब आप सुवर्णमय पंखवाले महेन्द्र के वज्रतुल्य बाणसमूहों से समस्त लोकों का संहार कर डालें’॥ १६॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे पञ्चषष्टितमः सर्गः॥६५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में पैंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ।६५॥
सर्ग-66
तं तथा शोकसंतप्तं विलपन्तमनाथवत्।
मोहेन महता युक्तं परिधूनमचेतसम्॥१॥
ततः सौमित्रिराश्वस्य मुहूर्तादिव लक्ष्मणः।
रामं सम्बोधयामास चरणौ चाभिपीडयन्॥२॥
श्रीरामचन्द्रजी शोक से संतप्त हो अनाथ की तरह विलाप करने लगे। वे महान् मोह से युक्त और अत्यन्त दुर्बल हो गये। उनका चित्त स्वस्थ नहीं था। उन्हें इस अवस्था में देखकर सुमित्राकुमार लक्ष्मण ने दो घड़ी तक आश्वासन दिया फिर वे उनका पैर दबाते हुए उन्हें समझाने लगे- ॥ १-२॥
महता तपसा चापि महता चापि कर्मणा।
राजा दशरथेनासील्लब्धोऽमृतमिवामरैः॥३॥
‘भैया! हमारे पिता महाराज दशरथ ने बड़ी तपस्या और महान् कर्म का अनुष्ठान करके आपको पुत्ररूप में प्राप्त किया, जैसे देवताओं ने महान् प्रयास से अमृत पा लिया था॥३॥
तव चैव गुणैर्बद्धस्त्वद्वियोगान्महीपतिः।
राजा देवत्वमापन्नो भरतस्य यथा श्रुतम्॥४॥
‘आपने भरत के मुँह से जैसा सुना था, उसके अनुसार भूपाल महाराज दशरथ आपके ही गुणों से बँधे हुए थे और आपका ही वियोग होने से देवलोक को प्राप्त हुए ॥ ४॥
यदि दुःखमिदं प्राप्तं काकुत्स्थ न सहिष्यसे।
प्राकृतश्चाल्पसत्त्वश्च इतरः कः सहिष्यति॥५॥
‘ककुत्स्थकुलभूषण ! यदि अपने ऊपर आये हुए इस दुःख को आप ही धैर्यपूर्वक नहीं सहेंगे तो दूसरा कौन साधारण पुरुष, जिसकी शक्ति बहुत थोड़ी है, सह सकेगा? ॥ ५॥
आश्वसिहि नरश्रेष्ठ प्राणिनः कस्य नापदः।
संस्पृशन्त्यग्निवद् राजन् क्षणेन व्यपयान्ति च॥
‘नरश्रेष्ठ! आप धैर्य धारण करें। संसार में किस प्राणी पर आपत्तियाँ नहीं आतीं। राजन्! आपत्तियाँ अग्नि की भाँति एक क्षण में स्पर्श करतीं और दूसरे ही क्षण में दूर हो जाती हैं॥६॥
दुःखितो हि भवाँल्लोकांस्तेजसा यदि धक्ष्यते।
आर्ताः प्रजा नरव्याघ्र क्व नु यास्यन्ति निर्वृतिम्॥ ७॥
‘पुरुषसिंह! यदि आप दुःखी होकर अपने तेज से समस्त लोकों को दग्ध कर डालेंगे तो पीड़ित हुई प्रजा किसकी शरण में जाकर सुख और शान्ति पायेगी। ७॥
लोकस्वभाव एवैष ययातिनहषात्मजः।
गतः शक्रेण सालोक्यमनयस्तं समस्पृशत्॥८॥
‘यह लोक का स्वभाव ही है कि यहाँ सब पर दुःख-शोक आता-जाता रहता है। नहुषपुत्र ययाति इन्द्र के समान लोक (देवेन्द्रपद) को प्राप्त हुए थे; किंतु वहाँ भी अन्यायमूलक दुःख उनका स्पर्श किये बिना न रहा॥८॥
महर्षिर्यो वसिष्ठस्तु यः पितुर्नः पुरोहितः।
अह्ना पुत्रशतं जज्ञे तथैवास्य पुनर्हतम्॥९॥
‘हमारे पिता के पुरोहित जो महर्षि वसिष्ठजी हैं, उन्हें एक ही दिन में सौ पुत्र प्राप्त हुए और फिर एक ही दिन वे सब-के-सब विश्वामित्र के हाथ से मारे गये॥
या चेयं जगतो माता सर्वलोकनमस्कृता।
अस्याश्च चलनं भूमेर्दृश्यते कोसलेश्वर ॥१०॥
‘कोसलेश्वर! यह जो विश्ववन्दिता जगन्माता पृथ्वी है, इसका भी हिलना-डुलना देखा जाता है। १०॥
यौ धर्मी जगतो नेत्रौ यत्र सर्वं प्रतिष्ठितम्।
आदित्यचन्द्रौ ग्रहणमभ्युपेतौ महाबलौ॥११॥
‘जो धर्म के प्रवर्तक और संसार के नेत्र हैं, जिनके आधार पर ही सारा जगत् टिका हुआ है, वे महाबली सूर्य और चन्द्रमा भी राहु के द्वारा ग्रहण को प्राप्त होते हैं॥११॥
सुमहान्त्यपि भूतानि देवाश्च पुरुषर्षभ।
न दैवस्य प्रमुञ्चन्ति सर्वभूतानि देहिनः॥१२॥
‘पुरुषप्रवर! बड़े-बड़े भूत और देवता भी दैव (प्रारब्ध-कर्म) की अधीनता से मुक्त नहीं हो पाते हैं; फिर समस्त देहधारी प्राणियों के लिये तो कहना ही क्या है॥ १२॥
शक्रादिष्वपि देवेषु वर्तमानौ नयानयौ।
श्रूयेते नरशार्दूल न त्वं शोचितुमर्हसि॥१३॥
‘नरश्रेष्ठ! इन्द्र आदि देवताओं को भी नीति और अनीति के कारण सुख और दुःख की प्राप्ति होती सुनी जाती है; इसलिये आपको शोक नहीं करना चाहिये। १३॥
मृतायामपि वैदेह्यां नष्टायामपि राघव।
शोचितुं नार्हसे वीर यथान्यः प्राकृतस्तथा॥१४॥
‘वीर रघुनन्दन! विदेहराजकुमारी सीता यदि मर जायँ या नष्ट हो जायँ तो भी आपको दूसरे गँवार मनुष्यों की तरह शोक-चिन्ता नहीं करनी चाहिये। १४॥
त्वद्विधा नहि शोचन्ति सततं सर्वदर्शनाः।
सुमहत्स्वपि कृच्छ्रेषु रामानिर्विण्णदर्शनाः ॥१५॥
‘श्रीराम! आप-जैसे सर्वज्ञ पुरुष बड़ी-से-बड़ी विपत्ति आने पर भी कभी शोक नहीं करते हैं। वे निर्वेद (खेद) रहित हो अपनी विचारशक्ति को नष्ट नहीं होने देते॥ १५॥
तत्त्वतो हि नरश्रेष्ठ बुद्ध्या समनुचिन्तय।
बुद्धया युक्ता महाप्राज्ञा विजानन्ति शुभाशुभे॥ १६॥
‘नरश्रेष्ठ! आप बुद्धि के द्वारा तात्त्विक विचार कीजिये क्या करना चाहिये और क्या नहीं; क्या उचित है और क्या अनुचित—इसका निश्चय कीजिये; क्योंकि बुद्धियुक्त महाज्ञानी पुरुष ही शुभ और अशुभ (कर्तव्य-अकर्तव्य एवं उचित-अनुचित) को अच्छी तरह जानते हैं ॥ १६॥
अदृष्टगुणदोषाणामध्रुवाणां तु कर्मणाम्।
नान्तरेण क्रियां तेषां फलमिष्टं च वर्तते ॥१७॥
‘जिनके गुण-दोष देखे या जाने नहीं गये हैं तथा जो अध्रुव हैं—फल देकर नष्ट हो जानेवाले हैं, ऐसे कर्मों का शुभाशुभ फल उन्हें आचरण में लाये बिना नहीं प्राप्त होता है॥ १७॥
मामेवं हि पुरा वीर त्वमेव बहुशोक्तवान्।
अनुशिष्याद्धि को नु त्वामपि साक्षाद् बृहस्पतिः॥ १८॥
‘वीर ! पहले आप ही अनेक बार इस तरह की बातें कहकर मुझे समझा चुके हैं, आपको कौन सिखा सकता है। साक्षात् बृहस्पति भी आपको उपदेश देने की शक्ति नहीं रखते हैं॥ १८॥
बुद्धिश्च ते महाप्राज्ञ देवैरपि दुरन्वया।
शोकेनाभिप्रसुप्तं ते ज्ञानं सम्बोधयाम्यहम्॥१९॥
‘महाप्राज्ञ ! देवताओं के लिये भी आपकी बुद्धि का पता पाना कठिन है। इस समय शोक के कारण आपका ज्ञान सोया खोया-सा जान पड़ता है। इसलिये मैं उसे जगा रहा हूँ॥ १९ ॥
दिव्यं च मानुषं चैवमात्मनश्च पराक्रमम्।
इक्ष्वाकुवृषभावेक्ष्य यतस्व द्विषतां वधे॥२०॥
‘इक्ष्वाकुकुलशिरोमणे! अपने देवोचित तथा मानवोचित पराक्रम को देखकर उसका अवसर के अनुरूप उपयोग करते हुए आप शत्रुओं के वध का प्रयत्न कीजिये॥२०॥
किं ते सर्वविनाशेन कृतेन पुरुषर्षभ।
तमेव तु रिपुं पापं विज्ञायोद्धर्तुमर्हसि ॥२१॥
‘पुरुषप्रवर! समस्त संसार का विनाश करने से आपको क्या लाभ होगा? उस पापी शत्रु का पता लगाकर उसी को उखाड़ फेंकने का प्रयत्न करना चाहिये’ ॥ २१॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे षट्षष्टितमः सर्गः॥६६॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में छाछठवाँ सर्ग पूरा हुआ।६६॥
सर्ग-67
पूर्वजोऽप्युक्तमात्रस्तु लक्ष्मणेन सुभाषितम्।
सारग्राही महासारं प्रतिजग्राह राघवः॥१॥
भगवान् श्रीरामचन्द्रजी सब वस्तुओं का सार ग्रहण करने वाले हैं। अवस्था में बड़े होने पर भी उन्होंने लक्ष्मण के कहे हुए अत्यन्त सारगर्भित उत्तम वचनों को सुनकर उन्हें स्वीकार किया॥१॥
स निगृह्य महाबाहुः प्रवृद्धं रोषमात्मनः।
अवष्टभ्य धनुश्चित्रं रामो लक्ष्मणमब्रवीत्॥२॥
तदनन्तर महाबाहु श्रीराम ने अपने बढ़े हुए रोष को रोका और उस विचित्र धनुष को उतारकर लक्ष्मण से कहा-॥२॥
किं करिष्यावहे वत्स क्व वा गच्छाव लक्ष्मण।
केनोपायेन पश्यावः सीतामिह विचिन्तय॥३॥
‘वत्स! अब हमलोग क्या करें? कहाँ जायँ ? लक्ष्मण ! किस उपाय से हमें सीता का पता लगे? यहाँ इसका विचार करो’ ॥३॥
तं तथा परितापार्तं लक्ष्मणो वाक्यमब्रवीत्।
इदमेव जनस्थानं त्वमन्वेषितुमर्हसि ॥४॥
तब लक्ष्मण ने इस प्रकार संतापपीड़ित हुए श्रीराम से कहा—’भैया! आपको इस जनस्थान में ही सीता की खोज करनी चाहिये॥ ४॥
राक्षसैर्बहुभिः कीर्णं नानाद्रुमलतायुतम्।
सन्तीह गिरिदुर्गाणि निर्दराः कन्दराणि च॥५॥
‘नाना प्रकार के वृक्ष और लताओं से युक्त यह सघन वन अनेक राक्षसों से भरा हुआ है। इसमें पर्वत के ऊपर बहुत-से दुर्गम स्थान, फटे हुए पत्थर और कन्दराएँ हैं।॥ ५॥
गुहाश्च विविधा घोरा नानामृगगणाकुलाः।
आवासाः किंनराणां च गन्धर्वभवनानि च॥६॥
‘वहाँ भाँति-भाँति की भयंकर गुफाएँ हैं, जो नाना प्रकार के मृगगणों से भरी रहती हैं। यहाँ के पर्वतपर किन्नरों के आवास स्थान और गन्धर्वो के भवन भी हैं।
तानि युक्तो मया सार्धं समन्वेषितुमर्हसि।
त्वद्विधा बुद्धिसम्पन्ना महात्मानो नरर्षभाः॥७॥
आपत्सु न प्रकम्पन्ते वायुवेगैरिवाचलाः।
‘मेरे साथ चलकर आप उन सभी स्थानों में एकाग्रचित्त हो सीता की खोज करें। जैसे पर्वत वायु के वेग से कम्पित नहीं होते हैं, उसी प्रकार आप-जैसे बुद्धिमान् महात्मा नरश्रेष्ठ आपत्तियों में विचलित नहीं होते हैं’। ७ १/२॥
इत्युक्तस्तद् वनं सर्वं विचचार सलक्ष्मणः॥८॥
क्रुद्धो रामः शरं घोरं संधाय धनुषि क्षुरम्।
उनके ऐसा कहने पर लक्ष्मणसहित श्रीरामचन्द्रजी रोषपूर्वक अपने धनुषपर क्षुर नामक भयंकर बाण चढ़ाये वहाँ सारे वन में विचरण करने लगे॥ ८ १/२॥
ततः पर्वतकूटाभं महाभागं द्विजोत्तमम्॥९॥
ददर्श पतितं भूमौ क्षतजार्दै जटायुषम्।
तं दृष्ट्वा गिरिशृङ्गाभं रामो लक्ष्मणमब्रवीत्॥ १०॥
थोड़ी ही दूर आगे जाने पर उन्हें पर्वतशिखर के समान विशाल शरीर वाले पक्षिराज महाभाग जटायु दिखायी पड़े जो खून से लथपथ हो पृथ्वी पर पड़े थे। पर्वत-शिखर के समान प्रतीत होने वाले उन गृध्रराज को देखकर श्रीराम लक्ष्मण से बोले- ॥९-१०॥
अनेन सीता वैदेही भक्षिता नात्र संशयः।
गृध्ररूपमिदं व्यक्तं रक्षो भ्रमति काननम्॥११॥
लक्ष्मण! यह गृध्र के रूप में अवश्य ही कोई राक्षस जान पड़ता है, जो इस वन में घूमता रहता है। निःसंदेह इसी ने विदेहराजकुमारी सीता को खा लिया होगा॥ ११॥
भक्षयित्वा विशालाक्षीमास्ते सीतां यथासुखम्।
एनं वधिष्ये दीप्ताग्रैः शरैोरैरजिह्मगैः॥१२॥
‘विशाललोचना सीता को खाकर यह यहाँ सुखपूर्वक बैठा हुआ है। मैं प्रज्वलित अग्र भाग वाले तथा सीधे जाने वाले अपने भयंकर बाणों से इसका वध करूँगा’।
इत्युक्त्वाभ्यपतद् द्रष्टुं संधाय धनुषि क्षुरम्।
क्रुद्धो रामः समुद्रान्तां चालयन्निव मेदिनीम्॥ १३॥
ऐसा कहकर क्रोध में भरे हुए श्रीराम धनुष पर बाण चढ़ाये समुद्रपर्यन्त पृथ्वी को कम्पित करते हुए उसे देखने के लिये आगे बढ़े॥ १३॥
तं दीनदीनया वाचा सफेनं रुधिरं वमन्।
अभ्यभाषत पक्षी स रामं दशरथात्मजम्॥१४॥
इसी समय पक्षी जटायु अपने मुँह से फेनयुक्त रक्त वमन करते हुए अत्यन्त दीन-वाणी में दशरथनन्दन श्रीराम से बोले- ॥ १४॥
यामोषधीमिवायुष्मन्नन्वेषसि महावने।
सा देवी मम च प्राणा रावणेनोभयं हृतम्॥१५॥
‘आयुष्मन् ! इस महान् वन में तुम जिसे ओषधि के समान ढूँढ़ रहे हो, उस देवी सीता को तथा मेरे इन प्राणों को भी रावण ने हर लिया।॥ १५॥
त्वया विरहिता देवी लक्ष्मणेन च राघव।
ह्रियमाणा मया दृष्टा रावणेन बलीयसा॥१६॥
‘रघुनन्दन! तुम्हारे और लक्ष्मण के न रहने पर महाबली रावण आया और देवी सीता को हरकर ले जाने लगा। उस समय मेरी दृष्टि सीता पर पड़ी॥१६॥
सीतामभ्यवपन्नोऽहं रावणश्च रणे प्रभो।
विध्वंसितरथच्छत्रः पतितो धरणीतले॥१७॥
‘प्रभो! ज्यों ही मेरी दृष्टि पड़ी, मैं सीता की सहायता के लिये दौड़ पड़ा। रावण के साथ मेरा युद्ध हुआ। मैंने उस युद्ध में रावण के रथ और छत्र आदि सभी साधन नष्ट कर दिये और वह भी घायल होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा॥ १७॥
एतदस्य धनुर्भग्नमेते चास्य शरास्तथा।
अयमस्य रणे राम भग्नः सांग्रामिको रथः॥ १८॥
‘श्रीराम! यह रहा उसका टूटा हुआ धनुष, ये हैं उसके खण्डित हुए बाण और यह है उसका युद्धोपयोगी रथ, जो युद्ध में मेरे द्वारा तोड़ डाला गया है।॥ १८॥
अयं तु सारथिस्तस्य मत्पक्षनिहतो भुवि।
परिश्रान्तस्य मे पक्षौ छित्त्वा खड्गेन रावणः॥ १९॥
सीतामादाय वैदेहीमुत्पपात विहायसम्।
रक्षसा निहतं पूर्वं मां न हन्तुं त्वमर्हसि ॥२०॥
‘यह रावण का सारथि है, जिसे मैंने अपने पंखों से मार डाला था। जब मैं युद्ध करते-करते थक गया, तब रावण ने तलवार से मेरे दोनों पंख काट डाले और वह विदेहकुमारी सीता को लेकर आकाश में उड़ गया। मैं उस राक्षस के हाथ से पहले ही मार डाला गया हूँ, अब तुम मुझे न मारो’ ॥ १९-२० ॥
रामस्तस्य तु विज्ञाय सीतासक्तां प्रियां कथाम्।
गृध्रराजं परिष्वज्य परित्यज्य महद् धनुः ॥ २१॥
निपपातावशो भूमौ रुरोद सहलक्ष्मणः।
द्विगुणीकृततापा रामो धीरतरोऽपि सन्॥२२॥
सीता से सम्बन्ध रखने वाली यह प्रिय वार्ता सुनकर श्रीरामचन्द्रजी ने अपना महान् धनुष फेंक दिया और गृध्रराज जटायु को गले से लगाकर वे शोक से विवश हो पृथ्वी पर गिर पड़े और लक्ष्मण के साथ ही रोने लगे। अत्यन्त धीर होने पर भी श्रीराम ने उस समय दूने दुःख का अनुभव किया॥ २१-२२ ॥
एकमेकायने कृच्छ्रे निःश्वसन्तं मुहुर्मुहुः।
समीक्ष्य दुःखितो रामः सौमित्रिमिदमब्रवीत्॥ २३॥
असहाय हो एकमात्र ऊर्ध्वश्वास की संकटपूर्ण अवस्था में पड़कर बारंबार लंबी साँस खींचते हुए जटायु की ओर देखकर श्रीराम को बड़ा दुःख हुआ। उन्होंने सुमित्राकुमार से कहा- ॥२३॥
राज्यं भ्रष्टं वने वासः सीता नष्टा मृतो द्विजः।
ईदृशीयं ममालक्ष्मीदहेदपि हि पावकम्॥२४॥
‘लक्ष्मण! मेरा राज्य छिन गया, मुझे वनवास मिला (पिताजी की मृत्यु हुई), सीता का अपहरण हुआ और ये मेरे परम सहायक पक्षिराज भी मर गये। ऐसा जो मेरा यह दुर्भाग्य है, यह तो अग्नि को भी जलाकर भस्म कर सकता है॥ २४ ॥
सम्पूर्णमपि चेदद्य प्रतरेयं महोदधिम्।
सोऽपि नूनं ममालक्ष्म्या विशुष्येत् सरितां पतिः॥ २५॥
‘यदि आज मैं भरे हुए महासागर को तैरने लगूं तो मेरे दुर्भाग्य की आँच से वह सरिताओं का स्वामी समुद्र भी निश्चय ही सूख जायगा॥ २५ ॥
नास्त्यभाग्यतरो लोके मत्तोऽस्मिन् स चराचरे।
येनेयं महती प्राप्ता मया व्यसनवागुरा॥ २६॥
‘इस चराचर जगत् में मुझसे बढ़कर भाग्यहीन दूसरा कोई नहीं है, जिस अभाग्य के कारण मुझे इस विपत्ति के बड़े भारी जाल में फँसना पड़ा है॥ २६ ॥
अयं पितुर्वयस्यो मे गृध्रराजो महाबलः।
शेते विनिहतो भूमौ मम भाग्यविपर्ययात्॥२७॥
‘ये महाबली गृध्रराज जटायु मेरे पिताजी के मित्र थे, किंतु आज मेरे दुर्भाग्यवश मारे जाकर इस समय पृथ्वी पर पड़े हैं’ ॥ २७॥
इत्येवमुक्त्वा बहुशो राघवः सहलक्ष्मणः।
जटायुषं च पस्पर्श पितृस्नेहं निदर्शयन्॥२८॥
इस प्रकार बहुत-सी बातें कहकर लक्ष्मणसहित श्रीरघुनाथजी ने जटायु के शरीर पर हाथ फेरा और पिता के प्रति जैसा स्नेह होना चाहिये, वैसा ही उनके प्रति प्रदर्शित किया॥ २८॥
निकृत्तपक्षं रुधिरावसिक्तं तं गृध्रराजं परिगृह्य राघवः।
क्व मैथिली प्राणसमा गतेति विमुच्य वाचं निपपात भूमौ ॥२९॥
पङ्ख कट जाने के कारण गृध्रराज जटायु लहू-लुहान हो रहे थे। उसी अवस्था में उन्हें गले से लगाकर श्रीरघुनाथजी ने पूछा—’तात! मेरी प्राणों के समान प्रिया मिथिलेशकुमारी सीता कहाँ चली गयी?’ इतनी ही बात मुँह से निकालकर वे पृथ्वी पर गिर पड़े। २९॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे सप्तषष्टितमः सर्गः॥६७॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में सरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ।६७॥
सर्ग-68
रामः प्रेक्ष्य तु तं गृधं भुवि रौद्रेण पातितम्।
सौमित्रिं मित्रसम्पन्नमिदं वचनमब्रवीत्॥१॥
भयंकर राक्षस रावण ने जिसे पृथ्वी पर मार गिराया था, उस गृध्रराज जटायु की ओर दृष्टि डालकर भगवान् श्रीराम मित्रोचित गुण से सम्पन्न सुमित्राकुमार लक्ष्मण से बोले- ॥१॥
ममायं नूनमर्थेषु यतमानो विहंगमः।
राक्षसेन हतः संख्ये प्राणांस्त्यजति मत्कृते॥२॥
‘भाई! यह पक्षी अवश्य मेरा ही कार्य सिद्ध करने के लिये प्रयत्नशील था, किंतु उस राक्षस के द्वारा युद्ध में मारा गया। यह मेरे ही लिये अपने प्राणों का परित्याग कर रहा है।
अतिखिन्नः शरीरेऽस्मिन् प्राणो लक्ष्मण विद्यते।
तथा स्वरविहीनोऽयं विक्लवं समुदीक्षते॥३॥
‘लक्ष्मण! इस शरीर के भीतर इसके प्राणों को बड़ी वेदना हो रही है, इसीलिये इसकी आवाज बंद होती जा रही है तथा यह अत्यन्त व्याकुल होकर देख रहा है।
जटायो यदि शक्नोषि वाक्यं व्याहरितुं पुनः।
सीतामाख्याहि भद्रं ते वधमाख्याहि चात्मनः॥ ४॥
(लक्ष्मण से ऐसा कहकर श्रीराम उस पक्षी से बोले -) ‘जटायो! यदि आप पुनः बोल सकते हों तो आपका भला हो, बताइये, सीता की क्या अवस्था है ? और आपका वध किस प्रकार हुआ? ॥ ४॥
किंनिमित्तो जहारार्यां रावणस्तस्य किं मया।
अपराधं तु यं दृष्ट्वा रावणेन हृता प्रिया॥५॥
‘जिस अपराध को देखकर रावण ने मेरी प्रिय भार्या का अपहरण किया है, वह अपराध क्या है? और मैंने उसे कब किया? किस निमित्त को लेकर रावण ने आर्या सीता का हरण किया है ? ॥ ५॥
कथं तच्चन्द्रसंकाशं मुखमासीन्मनोहरम्।
सीतया कानि चोक्तानि तस्मिन् काले द्विजोत्तम॥ ६॥
‘पक्षिप्रवर! सीता का चन्द्रमा के समान मनोहर मुख कैसा हो गया था? तथा उस समय सीता ने क्या-क्या बातें कही थीं?॥६॥
कथंवीर्यः कथंरूपः किंकर्मा स च राक्षसः।
क्व चास्य भवनं तात ब्रूहि मे परिपृच्छतः॥७॥
‘तात! उस राक्षस का बल-पराक्रम तथा रूप कैसा है? वह क्या काम करता है? और उसका घर कहाँ है? मैं जो कुछ पूछ रहा हूँ, वह सब बताइये’ ॥७॥
तमुद्रीक्ष्य स धर्मात्मा विलपन्तमनाथवत्।
वाचा विक्लवया राममिदं वचनमब्रवीत्॥८॥
इस तरह अनाथ की भाँति विलाप करते हुए श्रीराम की ओर देखकर धर्मात्मा जटायु ने लड़खड़ाती जबान से यों कहना आरम्भ किया— ॥८॥
सा हृता राक्षसेन्द्रेण रावणेन दुरात्मना।
मायामास्थाय विपुलां वातदुर्दिनसंकुलाम्॥९॥
‘रघुनन्दन! दुरात्मा राक्षसराज रावण ने विपुल माया का आश्रय ले आँधी-पानी की सृष्टि करके (घबराहट की अवस्था में) सीता का हरण किया था। ९॥
परिक्लान्तस्य मे तात पक्षौ छित्त्वा निशाचरः।
सीतामादाय वैदेही प्रयातो दक्षिणामुखः॥१०॥
‘तात ! जब मैं उससे लड़ता-लड़ता थक गया, उस अवस्था में मेरे दोनों पंख काटकर वह निशाचर विदेहनन्दिनी सीता को साथ लिये यहाँ से दक्षिण दिशा की ओर गया था॥ १०॥
उपरुध्यन्ति मे प्राणा दृष्टिभ्रमति राघव।
पश्यामि वृक्षान् सौवर्णानुशीरकृतमूर्धजान्॥ ११॥
‘रघुनन्दन! अब मेरे प्राणों की गति बंद हो रही है, दृष्टि घूम रही है और समस्त वृक्ष मुझे सुनहरे रंग के दिखायी देते हैं। ऐसा जान पड़ता है कि उन वृक्षों पर खश के केश जमे हुए हैं॥ ११॥
येन याति मुहूर्तेन सीतामादाय रावणः।
विप्रणष्टं धनं क्षिप्रं तत्स्वामी प्रतिपद्यते॥१२॥
विन्दो नाम मुहूर्तोऽसौ न च काकुत्स्थ सोऽबुधत्
त्वत्प्रियां जानकी हृत्वा रावणो राक्षसेश्वरः।
झषवद बडिशं गृह्य क्षिप्रमेव विनश्यति॥१३॥
‘रावण सीता को जिस मुहूर्त में ले गया है, उसमें खोया हुआ धन शीघ्र ही उसके स्वामी को मिल जाता है। काकुत्स्थ! वह ‘विन्द’ नामक मुहूर्त था, किंतु उस राक्षस को इसका पता नहीं था। जैसे मछली मौत के लिये ही बंसी पकड़ लेती है, उसी प्रकार वह भी सीता को ले जाकर शीघ्र ही नष्ट हो जायगा॥ १२-१३॥
न च त्वया व्यथा कार्या जनकस्य सुतां प्रति।
वैदेह्या रंस्यसे क्षिप्रं हत्वा तं रणमूर्धनि॥१४॥
‘अतः अब तुम जनकनन्दिनी के लिये अपने मन में खेद न करो। संग्राम के मुहाने पर उस निशाचर का वध करके तुम शीघ्र ही पुनः विदेहराजकुमारी के साथ विहार करोगे’॥ १४॥
असम्मूढस्य गृध्रस्य रामं प्रत्यनुभाषतः।
आस्यात् सुस्राव रुधिरं म्रियमाणस्य सामिषम्॥
गृध्रराज जटायु यद्यपि मर रहे थे तो भी उनके मन पर मोह या भ्रम नहीं छाया था (उनके होशहवास ठीक थे)। वे श्रीरामचन्द्रजी को उनकी बात का उत्तर दे ही रहे थे कि उनके मुख से मांसयुक्त रुधिर निकलने लगा॥ १५ ॥
पुत्रो विश्रवसः साक्षाद् भ्राता वैश्रवणस्य च।
इत्युक्त्वा दुर्लभान् प्राणान् मुमोच पतगेश्वरः॥ १६॥
वे बोले—’रावण विश्रवा का पुत्र और कुबेर का सगा भाई है’ इतना कहकर उन पक्षिराज ने दुर्लभ प्राणों का परित्याग कर दिया॥ १६ ॥
ब्रूहि ब्रूहीति रामस्य ब्रुवाणस्य कृताञ्जलेः।
त्यक्त्वा शरीरं गृध्रस्य प्राणा जग्मुर्विहायसम्॥ १७॥
श्रीरामचन्द्रजी हाथ जोड़े कह रहे थे, ‘कहिये, कहिये, कुछ और कहिये!’ किंतु उस समय गृध्रराज के प्राण उनका शरीर छोड़कर आकाश में चले गये॥ १७॥
स निक्षिप्य शिरो भूमौ प्रसार्य चरणौ तथा।
विक्षिप्य च शरीरं स्वं पपात धरणीतले॥१८॥
उन्होंने अपना मस्तक भूमि पर डाल दिया, दोनों पैर फैला दिये और अपने शरीर को भी पृथ्वी पर ही डालते हुए वे धराशायी हो गये॥१८॥
तं गृधं प्रेक्ष्य ताम्राक्षं गतासुमचलोपमम्।
रामः सुबहुभिर्दुःखैर्दीनः सौमित्रिमब्रवीत्॥१९॥
गृध्रराज जटायु की आँखें लाल दिखायी देती थीं। प्राण निकल जाने से वे पर्वत के समान अविचल हो गये। उन्हें इस अवस्था में देखकर बहुत-से दुःखों से दुःखी हुए श्रीरामचन्द्रजी ने सुमित्राकुमार से कहा-॥ १९॥
बहनि रक्षसां वासे वर्षाणि वसता सुखम्।
अनेन दण्डकारण्ये विशीर्णमिह पक्षिणा॥२०॥
‘लक्ष्मण! राक्षसों के निवास स्थान इस दण्डकारण्य में बहुत वर्षों तक सुखपूर्वक रहकर इन पक्षिराज ने यहीं अपने शरीर का त्याग किया है॥२०॥
अनेकवार्षिको यस्तु चिरकालसमुत्थितः।।
सोऽयमद्य हतः शेते कालो हि दुरतिक्रमः॥२१॥
‘इनकी अवस्था बहुत वर्षों की थी। इन्होंने सुदीर्घ काल तक अपना अभ्युदय देखा है; किंतु आज इस वृद्धावस्था में उस राक्षस के द्वारा मारे जाकर ये पृथ्वी पर सो रहे हैं; क्योंकि काल का उल्लङ्घन करना सबके ही लिये कठिन है॥२१॥
पश्य लक्ष्मण गृध्रोऽयमुपकारी हतश्च मे।
सीतामभ्यवपन्नो हि रावणेन बलीयसा॥ २२॥
‘लक्ष्मण! देखो, ये जटायु मेरे बड़े उपकारी थे, किंतु आज मारे गये। सीता की रक्षा के लिये युद्ध में प्रवृत्त होने पर अत्यन्त बलवान् रावण के हाथ से इनका वध हुआ है॥ २२॥
गृध्रराज्यं परित्यज्य पितृपैतामहं महत्।
मम हेतोरयं प्राणान् मुमोच पतगेश्वरः॥२३॥
“बाप-दादों के द्वारा प्राप्त हुए गीधों के विशाल राज्य का त्याग करके इन पक्षिराज ने मेरे ही लिये अपने प्राणों की आहुति दी है॥ २३॥
सर्वत्र खलु दृश्यन्ते साधवो धर्मचारिणः।
शूराः शरण्याः सौमित्रे तिर्यग्योनिगतेष्वपि॥ २४॥
‘शूर, शरणागतरक्षक, धर्मपरायण श्रेष्ठ पुरुष सभी जगह देखे जाते हैं। पशु-पक्षी की योनियों में भी उनका अभाव नहीं है॥२४॥
सीताहरणजं दुःखं न मे सौम्य तथागतम्।
यथा विनाशो गृध्रस्य मत्कृते च परंतप॥२५॥
‘सौम्य! शत्रुओं को संताप देने वाले लक्ष्मण! इस समय मुझे सीता के हरण का उतना दुःख नहीं है, जितना कि मेरे लिये प्राणत्याग करने वाले जटायु की मृत्यु से हो रहा है।॥ २५ ॥
राजा दशरथः श्रीमान् यथा मम महायशाः।
पूजनीयश्च मान्यश्च तथायं पतगेश्वरः॥२६॥
‘महायशस्वी श्रीमान् राजा दशरथ जैसे मेरे माननीय और पूज्य थे, वैसे ही ये पक्षिराज जटायु भी हैं।॥ २६॥
सौमित्रे हर काष्ठानि निर्मथिष्यामि पावकम्।
गृध्रराजं दिधक्ष्यामि मत्कृते निधनं गतम्॥ २७॥
‘सुमित्रानन्दन! तुम सूखे काष्ठ ले आओ, मैं मथकर आग निकालूँगा और मेरे लिये मृत्यु को प्राप्त हुए इन गृध्रराज का दाह-संस्कार करूँगा॥२७॥
नाथं पतगलोकस्य चितिमारोपयाम्यहम्।
इमं धक्ष्यामि सौमित्रे हतं रौद्रेण रक्षसा॥२८॥
‘सुमित्राकुमार! उस भयंकर राक्षस के द्वारा मारे गये इन पक्षिराज को मैं चिता पर चढ़ाऊँगा और इनका दाह-संस्कार करूँगा’ ॥ २८॥
या गतिर्यज्ञशीलानामाहिताग्नेश्च या गतिः।
अपरावर्तिनां या च या च भूमिप्रदायिनाम्॥ २९॥
मया त्वं समनुज्ञातो गच्छ लोकाननुत्तमान्।
गृध्रराज महासत्त्व संस्कृतश्च मया व्रज॥३०॥
(फिर वे जटायु को सम्बोधित करके बोले-) ‘महान् बलशाली गृध्रराज! यज्ञ करने वाले, अग्निहोत्री, युद्ध में पीठ न दिखाने वाले और भूमिदान करने वाले पुरुषों को जिस गति की—जिन उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है, मेरी आज्ञा से उन्हीं सर्वोत्तम लोकों में तुम भी जाओ। मेरे द्वारा दाह-संस्कार किये जाने पर तुम्हारी सद्गति हो’।
एवमुक्त्वा चितां दीप्तामारोप्य पतगेश्वरम्।
ददाह रामो धर्मात्मा स्वबन्धुमिव दुःखितः॥ ३१॥
ऐसा कहकर धर्मात्मा श्रीरामचन्द्रजी ने दुःखित हो पक्षिराज के शरीर को चिता पर रखा और उसमें आग लगाकर अपने बन्धु की भाँति उनका दाह-संस्कार किया।
रामोऽथ सहसौमित्रिर्वनं गत्वा स वीर्यवान्।
स्थूलान् हत्वा महारोहीननुतस्तार तं द्विजम्॥ ३२॥
रोहिमांसानि चोद्धृत्य पेशीकृत्वा महायशाः।
शकुनाय ददौ रामो रम्ये हरितशादले॥३३॥
तदनन्तर लक्ष्मणसहित पराक्रमी श्रीराम वन में जाकर मोटे-मोटे महारोही (कन्दमूल विशेष) काट लाये और उन्हें जटायु के लिये अर्पित करने के उद्देश्य से उन्होंने पृथ्वी पर कुश बिछाये। महायशस्वी श्रीराम ने रोही के गूदे निकालकर उनका पिण्ड बनाया और उन सुन्दर हरित कुशाओं पर जटायु को पिण्डदान किया॥ ३२-३३॥
यत् तत् प्रेतस्य मर्त्यस्य कथयन्ति द्विजातयः।
तत् स्वर्गगमनं पित्र्यं तस्य रामो जजाप ह॥३४॥
ब्राह्मणलोग परलोकवासी मनुष्य को स्वर्ग की प्राप्ति कराने के उद्देश्यसे जिन पितृसम्बन्धी मन्त्रों का जप आवश्यक बतलाते हैं, उन सबका भगवान् श्रीराम ने जप किया॥३४॥
ततो गोदावरी गत्वा नदी नरवरात्मजौ।
उदकं चक्रतुस्तस्मै गृध्रराजाय तावुभौ ॥ ३५॥
तदनन्तर उन दोनों राजकुमारों ने गोदावरी नदी के तट पर जाकर उन गृध्रराज के लिये जलाञ्जलि दी॥ ३५॥
शास्त्रदृष्टेन विधिना जलं गृध्राय राघवौ।
स्नात्वा तौ गृध्रराजाय उदकं चक्रतुस्तदा ॥ ३६॥
रघुकुल के उन दोनों महापुरुषों ने गोदावरी में नहाकर शास्त्रीय विधि से उन गृध्रराज के लिये उस समय जलाञ्जलि का दान किया॥३६॥
स गृध्रराजः कृतवान् यशस्करं सुदुष्करं कर्म रणे निपातितः।
महर्षिकल्पेन च संस्कृतस्तदा जगाम पुण्यां गतिमात्मनः शुभाम्॥३७॥
महर्षितुल्य श्रीराम के द्वारा दाहसंस्कार होने के कारण गृध्रराज जटायु को आत्मा का कल्याण करने वाली परम पवित्र गति प्राप्त हुई। उन्होंने रणभूमि में अत्यन्त दुष्कर और यशोवर्धक पराक्रम प्रकट किया था। परंतु अन्त में रावण ने उन्हें मार गिराया॥३७॥
कृतोदकौ तावपि पक्षिसत्तमे स्थिरां च बुद्धिं प्रणिधाय जग्मतुः।
प्रवेश्य सीताधिगमे ततो मनो वनं सुरेन्द्राविव विष्णुवासवौ॥ ३८॥
तर्पण करने के पश्चात् वे दोनों भाई पक्षिराज जटायु में पितृतुल्य सुस्थिरभाव रखकर सीता की खोज के कार्य में मन लगा देवेश्वर विष्णु और इन्द्र की भाँति वन में आगे बढ़े॥ ३८॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डेऽष्टषष्टितमः सर्गः॥ ६८॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में अड़सठवाँ सर्ग पूरा हुआ।६८॥
सर्ग-69
कृत्वैवमुदकं तस्मै प्रस्थितौ राघवौ तदा।
अवेक्षन्तौ वने सीतां जग्मतुः पश्चिमां दिशम्॥
इस प्रकार जटायु के लिये जलाञ्जलि दान करके वे दोनों रघुवंशी बन्धु उस समय वहाँ से प्रस्थित हुए और वन में सीता की खोज करते हुए पश्चिम दिशा (नैर्ऋत्य कोण) की ओर गये॥१॥
तां दिशं दक्षिणां गत्वा शरचापासिधारिणौ।
अविप्रहतमैक्ष्वाकौ पन्थानं प्रतिपेदतुः॥२॥
धनुष, बाण और खड्ग धारण किये वे दोनों इक्ष्वाकुवंशी वीर उस दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर आगे बढ़ते हुए एक ऐसे मार्ग पर जा पहुँचे, जिसपर लोगों का आना-जाना नहीं होता था॥ २॥
गुल्मैर्वृक्षैश्च बहुभिर्लताभिश्च प्रवेष्टितम्।
आवृतं सर्वतो दुर्गं गहनं घोरदर्शनम्॥३॥
वह मार्ग बहुत-से वृक्षों, झाड़ियों और लता बेलों द्वारा सब ओर से घिरा हुआ था। वह बहुत ही दुर्गम, गहन और देखने में भयंकर था॥३॥
व्यतिक्रम्य तु वेगेन गृहीत्वा दक्षिणां दिशम्।
सुभीमं तन्महारण्यं व्यतियातौ महाबलौ॥४॥
उसे वेगपूर्वक लाँघकर वे दोनों महाबली राजकुमार दक्षिण दिशा का आश्रय ले उस अत्यन्त भयानक और विशाल वन से आगे निकल गये॥४॥
ततः परं जनस्थानात् त्रिकोशं गम्य राघवौ।
क्रौञ्चारण्यं विविशतुर्गहनं तौ महौजसौ॥५॥
तदनन्तर जनस्थान से तीन कोस दूर जाकर वे महाबली श्रीराम और लक्ष्मण क्रौञ्चारण्य नाम से प्रसिद्ध गहन वन के भीतर गये॥५॥
नानामेघघनप्रख्यं प्रहृष्टमिव सर्वतः।
नानावणैः शुभैः पुष्पैगपक्षिगणैर्युतम्॥६॥
वह वन अनेक मेघों के समूह की भाँति श्याम प्रतीत होता था। विविध रंग के सुन्दर फूलों से सुशोभित होने के कारण वह सब ओर से हर्षोत्फुल्ल-सा जान पड़ता था। उसके भीतर बहुत-से पशु-पक्षी निवास करते थे॥६॥
दिदृक्षमाणौ वैदेहीं तद् वनं तौ विचिक्यतुः।
तत्र तत्रावतिष्ठन्तौ सीताहरणदुःखितौ॥७॥
सीता का पता लगाने की इच्छा से वे दोनों उस वन में उनकी खोज करने लगे। जहाँ-तहाँ थक जाने पर वे विश्राम के लिये ठहर जाते थे। विदेहनन्दिनी के अपहरण से उन्हें बड़ा दुःख हो रहा था।॥ ७॥
ततः पूर्वेण तो गत्वा त्रिक्रोशं भ्रातरौ तदा।
क्रौञ्चारण्यमतिक्रम्य मतङ्गाश्रममन्तरे॥८॥
तत्पश्चात् वे दोनों भाई तीन कोस पूर्व जाकर क्रौञ्चारण्य को पार करके मतङ्ग मुनि के आश्रम के पास गये॥८॥
दृष्ट्वा तु तद् वनं घोरं बहुभीममृगद्विजम्।
नानावृक्षसमाकीर्णं सर्वं गहनपादपम्॥९॥
वह वन बड़ा भयंकर था। उसमें बहुत-से भयानक पशु और पक्षी निवास करते थे। अनेक प्रकार के वृक्षों से व्याप्त वह सारा वन गहन वृक्षावलियों से भरा था॥९॥
ददृशाते गिरौ तत्र दरी दशरथात्मजौ।
पातालसमगम्भीरां तमसा नित्यसंवृताम्॥१०॥
वहाँ पहुँचकर उन दशरथराजकुमारों ने वहाँ के पर्वत पर एक गुफा देखी, जो पाताल के समान गहरी थी। वह सदा अन्धकार से आवृत रहती थी॥१०॥
आसाद्य च नरव्याघ्रौ दर्यास्तस्याविदूरतः।
ददर्शतुर्महारूपां राक्षसी विकृताननाम्॥११॥
उसके समीप जाकर उन दोनों नरश्रेष्ठ वीरों ने एक विशालकाय राक्षसी देखी, जिसका मुख बड़ा विकराल था॥
भयदामल्पसत्त्वानां बीभत्सां रौद्रदर्शनाम्।
लम्बोदरी तीक्ष्णदंष्ट्रां कराली परुषत्वचम्॥१२॥
वह छोटे-छोटे जन्तुओं को भय देने वाली तथा देखने में बड़ी भयंकर थी। उसकी सूरत देखकर घृणा होती थी। उसके लंबे पेट, तीखी दाढ़ें और कठोर त्वचा थी। वह बड़ी विकराल दिखायी देती थी॥ १२॥
भक्षयन्तीं मृगान् भीमान् विकटां मुक्तमूर्धजाम्।
अवैक्षतां तु तौ तत्र भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥१३॥
भयानक पशुओं को भी पकड़कर खा जाती थी। उसका आकार विकट था और बाल खुले हुए थे। उस कन्दरा के समीप दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण ने उसे देखा॥१३॥
सा समासाद्य तौ वीरौ व्रजन्तं भ्रातुरग्रतः।
एहि रस्यावहेत्युक्त्वा समालम्भत लक्ष्मणम्॥ १४॥
वह राक्षसी उन दोनों वीरों के पास आयी और अपने भाई के आगे-आगे चलते हुए लक्ष्मण की ओर देखकर बोली—’आओ हम दोनों रमण करें।’ ऐसा कहकर उसने लक्ष्मण का हाथ पकड़ लिया॥ १४ ॥
उवाच चैनं वचनं सौमित्रिमुपगुह्य च।
अहं त्वयोमुखी नाम लाभस्ते त्वमसि प्रियः॥ १५॥
इतना ही नहीं, उसने सुमित्राकुमार को अपनी भुजाओं में कस लिया और इस प्रकार कहा—’मेरा नाम अयोमुखी है। मैं तुम्हें भार्यारूप से मिल गयी तो समझ लो, बहुत बड़ा लाभ हुआ और तुम मेरे प्यारे पति हो’ ॥ १५॥
नाथ पर्वतदुर्गेषु नदीनां पुलिनेषु च।
आयुश्चिरमिदं वीर त्वं मया सह रंस्यसे॥१६॥
‘प्राणनाथ! वीर! यह दीर्घकाल तक स्थिर रहने वाली आयु पाकर तुम पर्वत की दुर्गम कन्दराओं में तथा नदियों के तटों पर मेरे साथ सदा रमण करोगे’ ॥ १६॥
एवमुक्तस्तु कुपितः खड्गमुद्धृत्य लक्ष्मणः।
कर्णनासस्तनं तस्या निचकर्तारिसूदनः॥१७॥
राक्षसी के ऐसा कहने पर शत्रुसूदन लक्ष्मण क्रोध से जल उठे। उन्होंने तलवार निकालकर उसके कान, नाक और स्तन काट डाले॥१७॥
कर्णनासे निकृत्ते तु विस्वरं विननाद सा।
यथागतं प्रदुद्राव राक्षसी घोरदर्शना॥१८॥
नाक और कान के कट जानेपर वह भयंकर राक्षसी जोर-जोरसे चिल्लाने लगी और जहाँ से आयी थी, उधर ही भाग गयी॥ १८॥
तस्यां गतायां गहनं व्रजन्तौ वनमोजसा।
आसेदतरमित्रघ्नौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥१९॥
उसके चले जाने पर वे दोनों भाई शक्तिशाली श्रीराम और लक्ष्मण बड़े वेग से चलकर एक गहन वन में जा पहुँचे॥ १९॥
लक्ष्मणस्तु महातेजाः सत्त्ववाञ्छीलवाञ्छुचिः।
अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यं भ्रातरं दीप्ततेजसम्॥ २०॥
उस समय महातेजस्वी, धैर्यवान् , सुशील एवं पवित्र आचार-विचार वाले लक्ष्मण ने हाथ जोड़कर अपने तेजस्वी भ्राता श्रीरामचन्द्रजी से कहा- ॥ २० ॥
स्पन्दते मे दृढं बाहुरुद्भिग्नमिव मे मनः।
प्रायशश्चाप्यनिष्टानि निमित्तान्युपलक्षये॥२१॥
तस्मात् सज्जीभवार्य त्वं कुरुष्व वचनं मम।
ममैव हि निमित्तानि सद्यः शंसन्ति सम्भ्रमम्॥ २२॥
‘आर्य! मेरी बायीं बाँह जोर-जोर से फड़क रही है और मन उद्विग्न-सा हो रहा है। मुझे बार-बार बुरे शकुन दिखायी देते हैं, इसलिये आप भय का सामना करने के लिये तैयार हो जाइये। मेरी बात मानिये ये जो बुरे शकुन हैं, वे केवल मुझे ही तत्काल प्राप्त होने वाले भय की सूचना देते हैं॥ २१-२२॥
एष वञ्जुलको नाम पक्षी परमदारुणः।
आवयोर्विजयं यद्धे शंसन्निव विनर्दति॥२३॥
(इसके साथ एक शुभ शकुन भी हो रहा है) यह जो वञ्जुल नामक अत्यन्त दारुण पक्षी है, यह युद्ध में हम दोनों की विजय सूचित करता हुआ-सा जोर जोर से बोल रहा है’ ॥ २३॥
तयोरन्वेषतोरेवं सर्वं तद् वनमोजसा।
संजज्ञे विपुलः शब्दः प्रभञ्जन्निव तद वनम्॥ २४॥
इस प्रकार बलपूर्वक उस सारे वन में वे दोनों भाई जब सीता की खोज कर रहे थे, उसी समय वहाँ बड़े जोर का शब्द हुआ, जो उस वन का विध्वंस करता हुआ-सा प्रतीत होता था। २४ ।।
संवेष्टितमिवात्यर्थं गहनं मातरिश्वना।
वनस्य तस्य शब्दोऽभूद् वनमापूरयन्निव॥२५॥
उस वन में जोर-जोर से आँधी चलने लगी। वह सारा वन उसकी लपेट में आ गया। वन में उस शब्द की जो प्रतिध्वनि उठी, उससे वह सारा वनप्रान्त गूंज उठा। २५॥
तं शब्दं कांक्षमाणस्तु रामः खड्गी सहानुजः।
ददर्श सुमहाकायं राक्षसं विपुलोरसम्॥२६॥
भाई के साथ तलवार हाथ में लिये भगवान् श्रीराम उस शब्द का पता लगाना ही चाहते थे कि एक चौड़ी छाती वाले विशालकाय राक्षस पर उनकी दृष्टि पड़ी॥ २६॥
आसेदतुश्च तद्रक्षस्तावुभौ प्रमुखे स्थितम्।
विवृद्धमशिरोग्रीवं कबन्धमुदरेमुखम्॥२७॥
उन दोनों भाइयों ने उस राक्षस को अपने सामने खड़ा पाया। वह देखने में बहुत बड़ा था; किंतु उसके न मस्तक था न गला। कबन्ध (धड़मात्र) ही उसका स्वरूप था और उसके पेट में ही मुँह बना हुआ था।
रोमभिर्निशितैस्तीक्ष्णैर्महागिरिमिवोच्छ्रितम्।
नीलमेघनिभं रौद्रं मेघस्तनितनिःस्वनम्॥२८॥
उसके सारे शरीर में पैने और तीखे रोयें थे। वह महान् पर्वत के समान ऊँचा था। उसकी आकृति बड़ी भयंकर थी। वह नील मेघ के समान काला था और मेघ के समान ही गम्भीर स्वर में गर्जना करता था। २८॥
अग्निज्वालानिकाशेन ललाटस्थेन दीप्यता।
महापक्षेण पिङ्गेन विपुलेनायतेन च ॥ २९॥
एकेनोरसि घोरेण नयनेन सुदर्शिना।
महादंष्ट्रोपपन्नं तं लेलिहानं महामुखम्॥३०॥
उसकी छाती में ही ललाट था और ललाट में एक ही लंबी-चौड़ी तथा आग की ज्वाला के समान दहकती हुई भयंकर आँख थी, जो अच्छी तरह देख सकती थी। उसकी पलक बहुत बड़ी थी और वह आँख भूरे रंग की थी। उस राक्षस की दाढ़ें बहुत बड़ी थीं तथा वह अपनी लपलपाती हुई जीभ से अपने विशाल मुख को बारंबार चाट रहा था। २९-३०॥
भक्षयन्तं महाघोरानृक्षसिंहमृगद्विजान्।
घोरौ भुजौ विकुर्वाणमुभौ योजनमायतौ॥३१॥
कराभ्यां विविधान् गृह्य ऋक्षान् पक्षिगणान् मृगान्।
आकर्षन्तं विकर्षन्तमनेकान् मृगयूथपान्॥३२॥
अत्यन्त भयंकर रीछ, सिंह, हिंसक पशु और पक्षी -ये ही उसके भोजन थे। वह अपनी एक-एक योजन लंबी दोनों भयानक भुजाओं को दूर तक फैला देता और उन दोनों हाथों से नाना प्रकार के अनेकों भालू, पक्षी, पशु तथा मृगों के यूथपतियों को पकड़कर खींच लेता था। उनमें से जो उसे भोजन के लिये अभीष्ट नहीं होते, उन जन्तुओं को वह उन्हीं हाथों से पीछे ढकेल देता था॥ ३१-३२ ।।
स्थितमावृत्य पन्थानं तयोर्धात्रोः प्रपन्नयोः।
अथ तं समतिक्रम्य क्रोशमात्रं ददर्शतुः॥३३॥
महान्तं दारुणं भीमं कबन्धं भुजसंवृतम्।
कबन्धमिव संस्थानादतिघोरप्रदर्शनम्॥३४॥
दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण जब उसके निकट पहुँचे, तब वह उनका रास्ता रोककर खड़ा हो गया। तब वे दोनों भाई उससे दूर हट गये और बड़े गौर से उसे देखने लगे। उस समय वह एक कोस लंबा जान पड़ा। उस राक्षस की आकृति केवल कबन्ध (धड़) के ही रूप में थी, इसलिये वह कबन्ध कहलाता था। वह विशाल, हिंसापरायण, भयंकर तथा दो बड़ी-बड़ी भुजाओं से युक्त था और देखने में अत्यन्त घोर प्रतीत होता था॥ ३३-३४॥
स महाबाहुरत्यर्थं प्रसार्य विपुलौ भुजौ।
जग्राह सहितावेव राघवौ पीडयन् बलात्॥ ३५॥
उस महाबाहु राक्षस ने अपनी दोनों विशाल भुजाओं को फैलाकर उन दोनों रघुवंशी राजकुमारों को बलपूर्वक पीड़ा देते हुए एक साथ ही पकड़ लिया। ३५॥
खड्गिनौ दृढधन्वानौ तिग्मतेजो महाभुजौ।
भ्रातरौ विवशं प्राप्तौ कृष्यमाणौ महाबलौ॥
दोनों के हाथों में तलवारें थीं, दोनों के पास मजबूत धनुष थे और वे दोनों भाई प्रचण्ड तेजस्वी, विशाल भुजाओं से युक्त तथा महान् बलवान् थे तो भी उस राक्षस के द्वारा खींचे जाने पर विवशता का अनुभव करने लगे॥ ३६॥
तत्र धैर्याच्च शूरस्तु राघवो नैव विव्यथे।
बाल्यादनाश्रयाच्चैव लक्ष्मणस्त्वभिविव्यथे॥ ३७॥
उस समय वहाँ शूरवीर रघुनन्दन श्रीराम तो धैर्य के कारण व्यथित नहीं हुए, परंतु बालबुद्धि होने तथा धैर्य का आश्रय न लेने के कारण लक्ष्मण के मन में बड़ी व्यथा हुई॥३७॥
उवाच च विषण्णः सन् राघवं राघवानुजः।
पश्य मां विवशं वीर राक्षसस्य वशंगतम्॥३८॥
तब श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण विषादग्रस्त हो श्रीरघुनाथजी से बोले—’वीरवर! देखिये, मैं राक्षस के वश में पड़कर विवश हो गया हूँ॥ ३८॥
मयैकेन तु निर्युक्तः परिमुच्यस्व राघव।
मां हि भूतबलिं दत्त्वा पलायस्व यथासुखम्॥ ३९॥
‘रघुनन्दन! एकमात्र मुझे ही इस राक्षस को भेंट देकर आप स्वयं इसके बाहुबन्धन से मुक्त हो जाइये। इस भूत को मेरी ही बलि देकर आप सुखपूर्वक यहाँ से निकल भागिये।। ३९॥
अधिगन्तासि वैदेहीमचिरेणेति मे मतिः।
प्रतिलभ्य च काकुत्स्थ पितृपैतामहीं महीम्॥ ४०॥
तत्र मां राम राज्यस्थः स्मर्तुमर्हसि सर्वदा।
‘मेरा विश्वास है कि आप शीघ्र ही विदेहराजकुमारी को प्राप्त कर लेंगे। ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम! वनवास से लौटने पर पिता-पितामहों की भूमिको अपने अधिकार में लेकर जब आप राजसिंहासन पर विराजमान होइयेगा, तब वहाँ सदा मेरा भी स्मरण करते रहियेगा’ ॥ ४० १/२॥
लक्ष्मणेनैवमुक्तस्तु रामः सौमित्रिमब्रवीत्॥४१॥
मा स्म त्रासं वृथा वीर नहि त्वादृग् विषीदति।
लक्ष्मण के ऐसा कहने पर श्रीराम ने उन सुमित्राकुमार से कहा—’वीर! तुम भयभीत न होओ तुम्हारे-जैसे शूरवीर इस तरह विषाद नहीं करते हैं’। ४१ १/२॥
एतस्मिन्नन्तरे क्रूरो भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ॥४२॥
तावुवाच महाबाहुः कबन्धो दानवोत्तमः।
इसी बीच में क्रूर हृदय वाले दानवशिरोमणि महाबाहु कबन्ध ने उन दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण से कहा – ॥ ४२ १/२॥
कौ युवां वृषभस्कन्धौ महाखड्गधनुर्धरौ॥४३॥
घोरं देशमिमं प्राप्तौ दैवेन मम चाक्षुषौ।।
वदतं कार्यमिह वां किमर्थं चागतौ युवाम्॥४४॥
‘तुम दोनों कौन हो? तुम्हारे कंधे बैल के समान ऊँचे हैं। तुमने बड़ी-बड़ी तलवारें और धनुष धारण कर रखे हैं। इस भयंकर देश में तुम दोनों किसलिये आये हो? यहाँ तुम्हारा क्या कार्य है? बताओ भाग्य से ही तुम दोनों मेरी आँखों के सामने पड़ गये॥ ४३-४४॥
इमं देशमनुप्राप्तौ क्षुधार्तस्येह तिष्ठतः।
सबाणचापखड्गौ च तीक्ष्णशृङ्गाविवर्षभौ॥ ४५॥
मां तूर्णमनुसम्प्राप्तौ दुर्लभं जीवितं हि वाम्।
‘मैं यहाँ भूख से पीड़ित होकर खड़ा था और तुम स्वयं धनुष-बाण और खड्ग लिये तीखे सींगवाले दो बैलों के समान तुरंत ही इस स्थान पर मेरे निकट आ पहुँचे। अतः अब तुम दोनों का जीवित रहना कठिन है’॥ ४५ १/२॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा कबन्धस्य दुरात्मनः॥ ४६॥
उवाच लक्ष्मणं रामो मुखेन परिशुष्यता।
कृच्छ्रात् कृच्छ्रतरं प्राप्य दारुणं सत्यविक्रम॥ ४७॥
व्यसनं जीवितान्ताय प्राप्तमप्राप्य तां प्रियाम्।
दुरात्मा कबन्ध की ये बातें सुनकर श्रीराम ने सूखे मुखवाले लक्ष्मण से कहा—’सत्यपराक्रमी वीर! कठिन-से-कठिन असह्य दुःख को पाकर हम दुःखी थे ही, तबतक पुनः प्रियतमा सीता के प्राप्त होने से पहले ही हम दोनों पर यह महान् संकट आ गया, जो जीवन का अन्त कर देने वाला है॥ ४६-४७ १/२ ॥
कालस्य सुमहद् वीर्यं सर्वभूतेषु लक्ष्मण॥४८॥
त्वां च मां च नरव्याघ्र व्यसनैः पश्य मोहितौ।
नहि भारोऽस्ति दैवस्य सर्वभूतेषु लक्ष्मण ॥४९॥
‘नरश्रेष्ठ लक्ष्मण! काल का महान् बल सभी प्राणियों पर अपना प्रभाव डालता है। देखो न, तुम और मैं दोनों ही काल के दिये हुए अनेकानेक संकटों से मोहित हो रहे हैं। सुमित्रानन्दन! दैव अथवा काल के लिये सम्पूर्ण प्राणियों पर शासन करना भाररूप (कठिन) नहीं है। ४८-४९ ॥
शूराश्च बलवन्तश्च कृतास्त्राश्च रणाजिरे।
कालाभिपन्नाः सीदन्ति यथा वालुकसेतवः॥ ५०॥
‘जैसे बालू के बने हुए पुल पानी के आघात से ढह जाते हैं, उसी प्रकार बड़े-बड़े शूरवीर, बलवान् और अस्त्रवेत्ता पुरुष भी समराङ्गण में काल के वशीभूत हो कष्ट में पड़ जाते हैं’॥५०॥
इति ब्रुवाणो दृढसत्यविक्रमो महायशा दाशरथिः प्रतापवान्।
अवेक्ष्य सौमित्रिमुदग्रविक्रमः स्थिरां तदा स्वां मतिमात्मनाकरोत्॥५१॥
ऐसा कहकर सुदृढ़ एवं सत्यपराक्रम वाले महान् बल-विक्रम से सम्पन्न महायशस्वी प्रतापशाली दशरथनन्दन श्रीराम ने सुमित्राकुमार की ओर देखकर उस समय स्वयं ही अपनी बुद्धि को सुस्थिर कर लिया॥५१॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे एकोनसप्ततितमः सर्गः॥ ६९॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में उनहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ।६९॥
सर्ग-70
तौ तु तत्र स्थितौ दृष्ट्वा भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ।
बाहुपाशपरिक्षिप्तौ कबन्धो वाक्यमब्रवीत्॥१॥
अपने बाहुपाश से घिरकर वहाँ खड़े हुए उन दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण की ओर देखकर कबन्ध ने कहा— ॥१॥
तिष्ठतः किं नु मां दृष्ट्वा क्षुधार्तं क्षत्रियर्षभौ।
आहारार्थं तु संदिष्टौ दैवेन हतचेतनौ॥२॥
‘क्षत्रियशिरोमणि राजकुमारो! मुझे भूख से पीड़ित देखकर भी खड़े क्यों हो? (मेरे मुँह में चले आओ) क्योंकि दैव ने मेरे भोजन के लिये ही तुम्हें यहाँ भेजा है। इसीलिये तुम दोनों की बुद्धि मारी गयी है’ ॥२॥
तच्छ्रुत्वा लक्ष्मणो वाक्यं प्राप्तकालं हितं तदा।
उवाचार्तिसमापन्नो विक्रमे कृतनिश्चयः॥३॥
यह सुनकर पीड़ित हुए लक्ष्मण ने उस समय पराक्रम का ही निश्चय करके यह समयोचित एवं हितकर बात कही- ॥३॥
त्वां च मां च पुरा तूर्णमादत्ते राक्षसाधमः।
तस्मादसिभ्यामस्याशु बाहू छिन्दावहे गुरू॥४॥
‘भैया! यह नीच राक्षस मुझको और आपको तुरंत मुँह में ले ले, इसके पहले ही हमलोग अपनी तलवारों से इसकी बड़ी-बड़ी बाँहें शीघ्र ही काट डालें॥४॥
भीषणोऽयं महाकायो राक्षसा भुजविक्रमः।
लोकं ह्यतिजितं कृत्वा ह्यावां हन्तुमिहेच्छति॥
‘यह महाकाय राक्षस बड़ा भीषण है। इसकी भुजाओं में ही इसका सारा बल और पराक्रम निहित है। यह समस्त संसार को सर्वथा पराजित-सा करके अब हमलोगों को भी यहाँ मार डालना चाहता है।
निश्चेष्टानां वधो राजन् कुत्सितो जगतीपतेः।
क्रतुमध्योपनीतानां पशूनामिव राघव॥६॥
‘राजन्! रघुनन्दन! यज्ञ में लाये गये पशुओं के समान निश्चेष्ट प्राणियों का वध राजा के लिये निन्दित बताया गया है (इसलिये हमें इसके प्राण नहीं लेने चाहिये, केवल भुजाओं का ही उच्छेद कर देना चाहिये)’॥६॥
एतत् संजल्पितं श्रुत्वा तयोः क्रुद्धस्तु राक्षसः।
विदार्यास्यं ततो रौद्रं तौ भक्षयितुमारभत्॥७॥
उन दोनों की यह बातचीत सुनकर उस राक्षस को बड़ा क्रोध हुआ और वह अपना भयंकर मुख फैलाकर उन्हें खा जाने को उद्यत हो गया॥७॥
ततस्तौ देशकालज्ञौ खड्गाभ्यामेव राघवौ।
अच्छिन्दन्तां सुसंहृष्टौ बाहू तस्यांसदेशतः॥८॥
इतने में ही देश-काल (अवसर) का ज्ञान रखने वाले उन दोनों रघुवंशी राजकुमारों ने अत्यन्त हर्ष में भरकर तलवारों से ही उसकी दोनों भुजाएँ कंधों से काट गिरायीं॥ ८॥
दक्षिणो दक्षिणं बाहुमसक्तमसिना ततः।
चिच्छेद रामो वेगेन सव्यं वीरस्तु लक्ष्मणः॥९॥
भगवान् श्रीराम उसके दाहिने भाग में खड़े थे। उन्होंने अपनी तलवार से उसकी दाहिनी बाँह बिना किसी रुकावट के वेगपूर्वक काट डाली तथा वाम भाग में खड़े वीर लक्ष्मण ने उसकी बायीं भुजा को तलवार से उड़ा दिया॥९॥
स पपात महाबाहुश्छिन्नबाहुर्महास्वनः।
खं च गां च दिशश्चैव नादयञ्जलदो यथा॥ १०॥
भुजाएँ कट जाने पर वह महाबाहु राक्षस मेघ के समान गम्भीर गर्जना करके पृथ्वी, आकाश तथा दिशाओं को जाता हुआ धरती पर गिर पड़ा॥१०॥
स निकृत्तौ भुजौ दृष्ट्वा शोणितौघपरिप्लुतः।
दीनः पप्रच्छ तौ वीरौ कौ युवामिति दानवः॥ ११॥
अपनी भुजाओं को कटी हुई देख खून से लथपथ हुए उस दानव ने दीन वाणी में पूछा—’वीरो! तुम दोनों कौन हो?’ ॥ ११॥
इति तस्य ब्रुवाणस्य लक्ष्मणः शुभलक्षणः।
शशंस तस्य काकुस्त्थं कबन्धस्य महाबलः॥ १२॥
कबन्ध के इस प्रकार पूछने पर शुभ लक्षणों वाले महाबली लक्ष्मण ने उसे श्रीरामचन्द्रजी का परिचय देना आरम्भ किया— ॥१२॥
अयमिक्ष्वाकुदायादो रामो नाम जनैः श्रुतः।
तस्यैवावरजं विद्धि भ्रातरं मां च लक्ष्मणम्॥ १३॥
‘ये इक्ष्वाकुवंशी महाराज दशरथ के पुत्र हैं और लोगों में श्रीराम नाम से विख्यात हैं। मुझे इन्हीं का छोटा भाई समझो मेरा नाम लक्ष्मण है॥ १३ ॥
मात्रा प्रतिहते राज्ये रामः प्रताजितो वनम्।
मया सह चरत्येष भार्यया च महद् वनम्॥१४॥
अस्य देवप्रभावस्य वसतो विजने वने।
रक्षसापहृता भार्या यामिच्छन्ताविहागतौ॥१५॥
‘माता कैकेयी के द्वारा जब इनका राज्याभिषेक रोक दिया गया, तब ये पिता की आज्ञा से वन में चले आये और मेरे तथा अपनी पत्नी के साथ इस विशाल वन में विचरण करने लगे। इस निर्जन वन में रहते हुए इन देवतुल्य प्रभावशाली श्रीरघुनाथजी की पत्नी को किसी राक्षस ने हर लिया है। उन्हीं का पता लगाने की इच्छा से हमलोग यहाँ आये हैं॥ १४-१५ ॥
त्वं तु को वा किमर्थं वा कबन्धसदृशो वने।
आस्येनोरसि दीप्तेन भग्नजङ्घो विचेष्टसे॥१६॥
‘तुम कौन हो? और कबन्ध के समान रूप धारण करके क्यों इस वन में पड़े हो? छाती के नीचे चमकता हुआ मुँह और टूटी हुई जंघा (पिण्डली) लिये तुम किस कारण इधर-उधर लुढ़कते फिरते हो?’ ॥ १६॥
एवमुक्तः कबन्धस्तु लक्ष्मणेनोत्तरं वचः।
उवाच वचनं प्रीतस्तदिन्द्रवचनं स्मरन्॥ १७॥
लक्ष्मणके ऐसा कहनेपर कबन्धको इन्द्रकी कही हुई बातका स्मरण हो आया। अतः उसने बड़ी प्रसन्नताके साथ लक्ष्मणको उनकी बातका उत्तर दिया— ॥१७॥
स्वागतं वां नरव्याघ्रौ दिष्ट्या पश्यामि वामहम्।
दिष्ट्या चेमौ निकृत्तौ मे युवाभ्यां बाहुबन्धनौ॥ १८॥
‘पुरुषसिंह वीरो! आप दोनों का स्वागत है। बड़े भाग्य से मुझे आपलोगों का दर्शन मिला है। ये मेरी दोनों भुजाएँ मेरे लिये भारी बन्धन थीं। सौभाग्य की बात है कि आपलोगों ने इन्हें काट डाला॥१८॥
विरूपं यच्च मे रूपं प्राप्तं ह्यविनयाद् यथा।
तन्मे शृणु नरव्याघ्र तत्त्वतः शंसतस्तव॥१९॥
‘नरश्रेष्ठ श्रीराम ! मुझे जो ऐसा कुरूप रूप प्राप्त हुआ है, यह मेरी ही उद्दण्डता का फल है। यह सब कैसे हुआ, वह प्रसङ्ग आपको मैं ठीक-ठीक बता रहा हूँ। आप मुझसे सुनें’॥ १९॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे सप्ततितमः सर्गः॥७०॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में सत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ।७०॥
सर्ग-71
पुरा राम महाबाहो महाबलपराक्रमम्।
रूपमासीन्ममाचिन्त्यं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्॥१॥
‘महाबाहु श्रीराम! पूर्वकाल में मेरा रूप महान् बलपराक्रम से सम्पन्न, अचिन्त्य तथा तीनों लोकों में विख्यात था॥१॥
यथा सूर्यस्य सोमस्य शक्रस्य च यथा वपुः।
सोऽहं रूपमिदं कृत्वा लोकवित्रासनं महत्॥२॥
ऋषीन् वनगतान् राम त्रासयामि ततस्ततः।
‘सूर्य, चन्द्रमा और इन्द्र का शरीर जैसा तेजस्वी है, वैसा ही मेरा भी था। ऐसा होने पर भी मैं लोगों को भयभीत करने वाले इस अत्यन्त भयंकर राक्षसरूप को धारण करके इधर-उधर घूमता और वन में रहने वाले ऋषियों को डराया करता था॥ २ १/२॥
ततः स्थूलशिरा नाम महर्षिः कोपितो मया ॥३॥
स चिन्वन् विविधं वन्यं रूपेणानेन धर्षितः।
तेनाहमुक्तः प्रेक्ष्यैवं घोरशापाभिधायिना॥४॥
अपने इस बर्ताव से एक दिन मैंने स्थूलशिरा नामक महर्षि को कुपित कर दिया। वे नाना प्रकार के जंगली फल-मूल आदि का संचय कर रहे थे, उसी समय मैंने उन्हें इस राक्षसरूप से डरा दिया। मुझे ऐसे विकट रूप में देखकर उन्होंने घोर शाप देते हुए कहा—॥ ३-४॥
एतदेवं नृशंसं ते रूपमस्तु विगर्हितम्।
स मया याचितः क्रुद्धः शापस्यान्तो भवेदिति॥
अभिशापकृतस्येति तेनेदं भाषितं वचः।
‘दुरात्मन् ! आज से सदा के लिये तुम्हारा यही क्रूर और निन्दित रूप रह जाय।’ यह सुनकर मैंने उन कुपित महर्षि से प्रार्थना की—’भगवन् ! इस अभिशाप (तिरस्कार) जनित शाप का अन्त होना चाहिये।’ तब उन्होंने इस प्रकार कहा- ॥ ५२ ॥
यदा छित्त्वा भुजौ रामस्त्वां दहेद् विजने वने॥ ६॥
तदा त्वं प्राप्स्यसे रूपं स्वमेव विपुलं शुभम्।
श्रिया विराजितं पुत्रं दनोस्त्वं विद्धि लक्ष्मण॥ ७॥
‘जब श्रीराम (और लक्ष्मण) तुम्हारी दोनों भुजाएँ काटकर तुम्हें निर्जन वन में जलायेंगे, तब तुम पुनः अपने उसी परम उत्तम, सुन्दर और शोभासम्पन्न रूप को प्राप्त कर लोगे।’ लक्ष्मण! इस प्रकार तुम मुझे एक दुराचारी दानव समझो। ६-७॥
इन्द्रकोपादिदं रूपं प्राप्तमेवं रणाजिरे।
अहं हि तपसोग्रेण पितामहमतोषयम्॥८॥
दीर्घमायुः स मे प्रादात् ततो मां विभ्रमोऽस्पृशत् ।
दीर्घमायुर्मया प्राप्तं किं मां शक्रः करिष्यति॥ ९॥
‘मेरा जो यह ऐसा रूप है, यह समराङ्गण में इन्द्र के क्रोध से प्राप्त हुआ है। मैंने पूर्वकाल में राक्षस होने के पश्चात् घोर तपस्या करके पितामह ब्रह्माजी को संतुष्ट किया और उन्होंने मुझे दीर्घजीवी होने का वर दिया। इससे मेरी बुद्धि में यह भ्रम या अहंकार उत्पन्न हो गया कि मुझे तो दीर्घकालतक बनी रहनेवाली आयु प्राप्त हुई है; फिर इन्द्र मेरा क्या कर लेंगे? ॥ ८-९॥
इत्येवं बुद्धिमास्थाय रणे शक्रमधर्षयम्।
तस्य बाहुप्रमुक्तेन वज्रेण शतपर्वणा॥१०॥
सक्थिनी च शिरश्चैव शरीरे सम्प्रवेशितम्।
‘ऐसे विचार का आश्रय लेकर एक दिन मैंने युद्ध में देवराजपर आक्रमण किया। उस समय इन्द्र ने मुझपर सौ धारोंवाले वज्र का प्रहार किया। उनके छोड़े हुए उस वज्र से मेरी जाँघे और मस्तक मेरे ही शरीर में घुस गये॥ १० १/२॥
स मया याच्यमानः सन् नानयद् यमसादनम्॥ ११॥
पितामहवचः सत्यं तदस्त्विति ममाब्रवीत्।
‘मैंने बहुत प्रार्थना की, इसलिये उन्होंने मुझे यमलोक नहीं पठाया और कहा—’पितामह ब्रह्माजी ने जो तुम्हें दीर्घजीवी होने के लिये वरदान दिया है, वह सत्य हो’ ॥ ११ १/२॥
अनाहारः कथं शक्तो भग्नसक्थिशिरोमुखः॥ १२॥
वज्रेणाभिहतः कालं सुदीर्घमपि जीवितुम्।
‘तब मैंने कहा-देवराज! आपने अपने वज्र की मार से मेरी जाँघे, मस्तक और मुँह सभी तोड़ डाले। अब मैं कैसे आहार ग्रहण करूँगा और निराहार रहकर किस प्रकार सुदीर्घकालतक जीवित रह सकूँगा?॥
स एवमुक्तः शक्रो मे बाहू योजनमायतौ॥१३॥
तदा चास्यं च मे कुक्षौ तीक्ष्णदंष्ट्रमकल्पयत् ।
‘मेरे ऐसा कहने पर इन्द्र ने मेरी भुजाएँ एक-एक योजन लंबी कर दी एवं तत्काल ही मेरे पेट में तीखे दाढ़ों वाला एक मुख बना दिया॥ १३ १/२॥
सोऽहं भुजाभ्यां दीर्घाभ्यां संक्षिप्यास्मिन् वनेचरान्॥१४॥
सिंहदीपिमृगव्याघ्रान् भक्षयामि समन्ततः।
‘इस प्रकार मैं विशाल भुजाओं द्वारा वन में रहने वाले सिंह, चीते, हरिन और बाघ आदि जन्तुओं को सब ओर से समेटकर खाया करता था॥ १४ १/२॥
स तु मामब्रवीदिन्द्रो यदा रामः सलक्ष्मणः॥ १५॥
छेत्स्यते समरे बाहू तदा स्वर्गं गमिष्यसि।
‘इन्द्र ने मुझे यह भी बतला दिया था कि जब लक्ष्मणसहित श्रीराम तुम्हारी भुजाएँ काट देंगे, उस समय तुम स्वर्ग में जाओगे॥ १५ १/२ ॥
अनेन वपुषा तात वनेऽस्मिन् राजसत्तम॥१६॥
यद् यत् पश्यामि सर्वस्य ग्रहणं साधु रोचये।
‘तात! राजशिरोमणे! इस शरीर से इस वन के भीतर मैं जो-जो वस्तु देखता हूँ, वह सब ग्रहण कर लेना मुझे ठीक लगता है॥ १६ १/२ ॥
अवश्यं ग्रहणं रामो मन्येऽहं समुपैष्यति॥१७॥
इमां बुद्धिं पुरस्कृत्य देहन्यासकृतश्रमः।
‘इन्द्र तथा मुनि के कथनानुसार मुझे यह विश्वास था कि एक दिन श्रीराम अवश्य मेरी पकड़ में आ जायेंगे। इसी विचार को सामने रखकर मैं इस शरीर को त्याग देने के लिये प्रयत्नशील था॥ १७ १/२॥
स त्वं रामोऽसि भद्रं ते नाहमन्येन राघव॥१८॥
शक्यो हन्तुं यथा तत्त्वमेवमुक्तं महर्षिणा।
‘रघुनन्दन! अवश्य ही आप श्रीराम हैं। आपका कल्याण हो मैं आपके सिवा दूसरे किसी से नहीं मारा जा सकता था। यह बात महर्षि ने ठीक ही कही थी॥ १८ १/२॥
अहं हि मतिसाचिव्यं करिष्यामि नरर्षभ॥१९॥
मित्रं चैवोपदेक्ष्यामि युवाभ्यां संस्कृतोऽग्निना।
‘नरश्रेष्ठ! आप दोनों जब अग्नि के द्वारा मेरा दाहसंस्कार कर देंगे, उस समय मैं आपकी बौद्धिक सहायता करूँगा। आप दोनों के लिये एक अच्छे मित्र का पता बताऊँगा’ ॥ १९ १/२॥
एवमुक्तस्तु धर्मात्मा दनुना तेन राघवः॥२०॥
इदं जगाद वचनं लक्ष्मणस्य च पश्यतः।
उस दानव के ऐसा कहने पर धर्मात्मा श्रीरामचन्द्रजी ने लक्ष्मण के सामने उससे यह बात कही- ॥ २० १/२॥
रावणेन हृता भार्या सीता मम यशस्विनी॥२१॥
निष्क्रान्तस्य जनस्थानात् सह भ्रात्रा यथासुखम्।
नाममात्रं तु जानामि न रूपं तस्य रक्षसः॥ २२॥
‘कबन्ध! मेरी यशस्विनी भार्या सीता को रावण हर ले गया है। उस समय मैं अपने भाई लक्ष्मण के साथ सुखपूर्वक जनस्थान के बाहर चला गया था। मैं उस राक्षस का नाम मात्र जानता हूँ। उसकी शकल-सूरत से परिचित नहीं हूँ॥ २१-२२॥
निवासं वा प्रभावं वा वयं तस्य न विद्महे।
शोकार्तानामनाथानामेवं विपरिधावताम्॥२३॥
कारुण्यं सदृशं कर्तुमुपकारेण वर्तताम्।
‘वह कहाँ रहता है और कैसा उसका प्रभाव है, इस बात से हमलोग सर्वथा अनभिज्ञ हैं। इस समय सीता का शोक हमें बड़ी पीड़ा दे रहा है। हम असहाय होकर इसी तरह सब ओर दौड़ रहे हैं। तुम हमारे ऊपर समुचित करुणा करने के लिये इस विषय में हमारा कुछ उपकार करो॥ २३ १/२ ॥
काष्ठान्यानीय भग्नानि काले शुष्काणि कुञ्जरैः॥ २४॥
धक्ष्यामस्त्वां वयं वीर श्वभ्रे महति कल्पिते।
‘वीर! फिर हमलोग हाथियों द्वारा तोड़े गये सूखे काठ लाकर स्वयं खोदे हुए एक बहुत बड़े गड्डे में तुम्हारे शरीर को रखकर जला देंगे॥ २४ १/२ ॥
स त्वं सीतां समाचक्ष्व येन वा यत्र वा हृता॥ २५॥
कुरु कल्याणमत्यर्थं यदि जानासि तत्त्वतः।
‘अतः अब तुम हमें सीता का पता बताओ। इस समय वह कहाँ है? तथा उसे कौन कहाँ ले गया है? यदि ठीक-ठीक जानते हो तो सीता का समाचार बताकर हमारा अत्यन्त कल्याण करो’ । २५ १/२॥
एवमुक्तस्तु रामेण वाक्यं दनुरनुत्तमम्॥ २६॥
प्रोवाच कुशलो वक्ता वक्तारमपि राघवम्।
श्रीरामचन्द्रजी के ऐसा कहने पर बातचीत में कुशल उस दानव ने उन प्रवचनपटु रघुनाथजी से यह परम उत्तम बात कही- ॥ २६ १/२ ॥
दिव्यमस्ति न मे ज्ञानं नाभिजानामि मैथिलीम्॥ २७॥
यस्तां वक्ष्यति तं वक्ष्ये दग्धः स्वं रूपमास्थितः।
योऽभिजानाति तद्रक्षस्तद् वक्ष्ये राम तत्परम्॥ २८॥
‘श्रीराम! इस समय मुझे दिव्य ज्ञान नहीं है, इसलिये मैं मिथिलेशकुमारी के विषय में कुछ भी नहीं जानता। जब मेरे इस शरीर का दाह हो जायगा, तब मैं अपने पूर्व स्वरूप को प्राप्त होकर किसी ऐसे व्यक्ति का पता बता सकूँगा, जो सीता के विषय में आपको कुछ बतायेगा तथा जो उस उत्कृष्ट राक्षस को भी जानता होगा, ऐसे पुरुष का आपको परिचय दूंगा। २७-२८॥
अदग्धस्य हि विज्ञातुं शक्तिरस्ति न मे प्रभो।
राक्षसं तु महावीर्यं सीता येन हृता तव ॥ २९॥
‘प्रभो! जब तक मेरे इस शरीर का दाह नहीं होगा तबतक मुझमें यह जानने की शक्ति नहीं आ सकती कि वह महापराक्रमी राक्षस कौन है, जिसने आपकी सीता का अपहरण किया है॥ २९॥
विज्ञानं हि महद् भ्रष्टं शापदोषेण राघव।
स्वकृतेन मया प्राप्तं रूपं लोकविगर्हितम्॥३०॥
‘रघुनन्दन! शाप-दोष के कारण मेरा महान् विज्ञान नष्ट हो गया है। अपनी ही करतूत से मुझे यह लोकनिन्दित रूप प्राप्त हुआ है॥ ३० ॥
किं तु यावन्न यात्यस्तं सविता श्रान्तवाहनः।
तावन्मामवटे क्षिप्त्वा दह राम यथाविधि॥३१॥
‘किंतु श्रीराम! जबतक सूर्यदेव अपने वाहनों के थक जाने पर अस्त नहीं हो जाते, तभी तक मुझे गड्डे में डालकर शास्त्रीय विधि के अनुसार मेरा दाह-संस्कार कर दीजिये॥३१॥
दग्धस्त्वयाहमवटे न्यायेन रघुनन्दन।
वक्ष्यामि तं महावीर यस्तं वेत्स्यति राक्षसम्॥ ३२॥
‘महावीर रघुनन्दन! आपके द्वारा विधिपूर्वक गड्ढे में मेरे शरीर का दाह हो जाने पर मैं ऐसे महापुरुष का परिचय दूंगा, जो उस राक्षस को जानते होंगे॥३२॥
तेन सख्यं च कर्तव्यं न्याय्यवृत्तेन राघव।
कल्पयिष्यति ते वीर साहाय्यं लघुविक्रम॥३३॥
‘शीघ्र पराक्रम प्रकट करने वाले वीर रघुनाथजी! न्यायोचित आचार वाले उन महापुरुष के साथ आपको मित्रता कर लेनी चाहिये। वे आपकी सहायता करेंगे।
नहि तस्यास्त्यविज्ञातं त्रिषु लोकेषु राघव।
सर्वान् परिवृतो लोकान् पुरा वै कारणान्तरे॥ ३४॥
‘रघुनन्दन! उनके लिये तीनों लोकोंमें कुछ भी अज्ञात नहीं है; क्योंकि किसी कारणवश वे पहले समस्त लोकोंमें चक्कर लगा चुके हैं ॥ ३४ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे एकसप्ततितमः सर्गः॥ ७१॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में इकहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७१॥
सर्ग-72
एवमुक्तौ तु तौ वीरौ कबन्धेन नरेश्वरौ।
गिरिप्रदरमासाद्य पावकं विससर्जतुः॥१॥
कबन्ध के ऐसा कहने पर उन दोनों वीर नरेश्वर श्रीराम और लक्ष्मण ने उसके शरीर को एक पर्वत के गड्ढे में डालकर उसमें आग लगा दी॥१॥
लक्ष्मणस्तु महोल्काभिर्खलिताभिः समन्ततः।
चितामादीपयामास सा प्रजज्वाल सर्वतः॥२॥
लक्ष्मण ने जलती हुई बड़ी-बड़ी लुकारियों के द्वारा चारों ओर से उसकी चिता में आग लगायी; फिर तो वह सब ओर से प्रज्वलित हो उठी॥२॥
तच्छरीरं कबन्धस्य घृतपिण्डोपमं महत्।
मेदसा पच्यमानस्य मन्दं दहत पावकः॥३॥
चिता में जलते हुए कबन्ध का विशाल शरीर चर्बियों से भरा होने के कारण घी के लोदे के समान प्रतीत होता था। चिता की आग उसे धीरे-धीरे जलाने लगी॥३॥
सविधूय चितामाशु विधूमोऽग्निरिवोत्थितः।
अरजे वाससी बिभ्रन्माल्यं दिव्यं महाबलः॥४॥
तदनन्तर वह महाबली कबन्ध तुरंत ही चिता को हिलाकर दो निर्मल वस्त्र और दिव्य पुष्पों का हार धारण किये धूमरहित अग्नि के समान उठ खड़ा हुआ॥४॥
ततश्चिताया वेगेन भास्वरो विरजाम्बरः।
उत्पपाताशु संहृष्टः सर्वप्रत्यङ्गभूषणः॥५॥
विमाने भास्वरे तिष्ठन् हंसयुक्ते यशस्करे।
प्रभया च महातेजा दिशो दश विराजयन्॥६॥
सोऽन्तरिक्षगतो वाक्यं कबन्धो राममब्रवीत्।
फिर वेगपूर्वक चिता से ऊपर को उठा और शीघ्र ही एक तेजस्वी विमान पर जा बैठा। निर्मल वस्त्रों से विभूषित हो वह बड़ा तेजस्वी दिखायी देता था। उसके मन में हर्ष भरा हुआ था तथा समस्त अङ्गप्रत्यङ्ग में दिव्य आभूषण शोभा दे रहे थे। हंसों से जुते हुए उस यशस्वी विमान पर बैठा हुआ महान् तेजस्वी कबन्ध अपनी प्रभा से दसों दिशाओं को प्रकाशित करने लगा और अन्तरिक्ष में स्थित हो श्रीराम से इस प्रकार बोला— ॥५-६ १/२ ॥
शृणु राघव तत्त्वेन यथा सीतामवाप्स्यसि॥७॥
राम षड् युक्तयो लोके याभिः सर्वं विमृश्यते।
परिमृष्टो दशान्तेन दशाभागेन सेव्यते॥८॥
‘रघुनन्दन! आप जिस प्रकार सीता को पा सकेंगे, वह ठीक-ठीक बता रहा हूँ, सुनिये। श्रीराम! लोक में छः युक्तियाँ हैं, जिनसे राजाओं द्वारा सब कुछ प्राप्त किया जाता है (उन युक्तियों तथा उपायों के नाम हैं -संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और समाश्रय*)। जो मनुष्य दुर्दशा से ग्रस्त होता है, वह दूसरे किसी दुर्दशाग्रस्त पुरुष से ही सेवा या सहायता प्राप्त करता है (यह नीति है) ॥ ७-८॥
दशाभागगतो हीनस्त्वं हि राम सलक्ष्मणः।
यत्कृते व्यसनं प्राप्तं त्वया दारप्रधर्षणम्॥९॥
‘श्रीराम! लक्ष्मणसहित आप बुरी दशा के शिकार हो रहे हैं; इसीलिये आपलोग राज्य से वञ्चित हैं तथा उस बुरी दशा के कारण ही आपको अपनी भार्या के अपहरण का महान् दुःख प्राप्त हुआ है॥९॥
तदवश्यं त्वया कार्यः स सुहृत् सुहृदां वर।
अकृत्वा नहि ते सिद्धिमहं पश्यामि चिन्तयन्॥ १०॥
‘अतः सुहृदों में श्रेष्ठ रघुनन्दन! आप अवश्य ही उस पुरुष को अपना सुहृद् बनाइये, जो आपकी ही भाँति दुर्दशा में पड़ा हुआ हो (इस प्रकार आप सुहृद् का आश्रय लेकर समाश्रय नीति को अपनाइये)। मैं बहुत सोचने पर भी ऐसा किये बिना आपकी सफलता नहीं देखता हूँ॥१०॥
श्रूयतां राम वक्ष्यामि सुग्रीवो नाम वानरः।
भ्रात्रा निरस्तः क्रुद्धेन वालिना शक्रसूनुना॥११॥
‘श्रीराम! सुनिये, मैं ऐसे पुरुष का परिचय दे रहा हूँ, उनका नाम है सुग्रीव वे जाति के वानर हैं। उन्हें उनके भाई इन्द्रकुमार वाली ने कुपित होकर घर से निकाल दिया है॥ ११॥
ऋष्यमूके गिरिवरे पम्पापर्यन्तशोभिते।
निवसत्यात्मवान् वीरश्चतुर्भिः सह वानरैः॥ १२॥
‘वे मनस्वी वीर सुग्रीव इस समय चार वानरों के साथ उस गिरिवर ऋष्यमूक पर निवास करते हैं, जो पम्पासरोवर तक फैला हुआ है॥ १२॥
वानरेन्द्रो महावीर्यस्तेजोवानमितप्रभः।
सत्यसंधो विनीतश्च धृतिमान् मतिमान् महान्॥ १३॥
दक्षः प्रगल्भो द्युतिमान् महाबलपराक्रमः।
‘वे वानरों के राजा महापराक्रमी सुग्रीव तेजस्वी, अत्यन्त कान्तिमान्, सत्यप्रतिज्ञ, विनयशील, धैर्यवान्, बुद्धिमान्, महापुरुष, कार्यदक्ष, निर्भीक, दीप्तिमान् तथा महान् बल और पराक्रम से सम्पन्न हैं॥ १३ १/२॥
भ्रात्रा विवासितो वीर राज्यहेतोर्महात्मना॥१४॥
स ते सहायो मित्रं च सीतायाः परिमार्गणे।
भविष्यति हि ते राम मा च शोके मनः कृथाः॥
‘वीर श्रीराम! उनके महामना भाई वाली ने सारे राज्य को अपने अधिकार में कर लेने के लिये उन्हें राज्य से बाहर निकाल दिया है; अतः वे सीता की खोज के लिये आपके सहायक और मित्र होंगे।
इसलिये आप अपने मन को शोक में न डालिये॥ १४-१५॥
भवितव्यं हि तच्चापि न तच्छक्यमिहान्यथा।
कर्तुमिक्ष्वाकुशार्दूल कालो हि दुरतिक्रमः॥१६॥
‘इक्ष्वाकुवंशी वीरों में श्रेष्ठ श्रीराम! जो होनहार है, उसे कोई भी पलट नहीं सकता। काल का विधान सभी के लिये दुर्लङ्घ्य होता है (अतः आप पर जो कुछ भी बीत रहा है, इसे काल या प्रारब्ध का विधान समझकर आपको धैर्य धारण करना चाहिये) ॥१६॥
गच्छ शीघ्रमितो वीर सुग्रीवं तं महाबलम्।
वयस्यं तं कुरु क्षिप्रमितो गत्वाद्य राघव॥१७॥
‘वीर रघुनाथजी! आप यहाँ से शीघ्र ही महाबली सुग्रीव के पास जाइये और जाकर तुरंत उन्हें अपना मित्र बना लीजिये॥१७॥
अद्रोहाय समागम्य दीप्यमाने विभावसौ।
न च ते सोऽवमन्तव्यः सुग्रीवो वानराधिपः॥ १८॥
‘प्रज्वलित अग्नि को साक्षी बनाकर परस्पर द्रोह न करने के लिये मैत्री स्थापित कीजिये और ऐसा करने के बाद आपको कभी उन वानरराज सुग्रीव का अपमान नहीं करना चाहिये॥ १८॥
कृतज्ञः कामरूपी च सहायार्थी च वीर्यवान्।
शक्तौ ह्यद्य युवां कर्तुं कार्यं तस्य चिकीर्षितम्॥ १९॥
‘वे इच्छानुसार रूप धारण करने वाले, पराक्रमी और कृतज्ञ हैं तथा इस समय स्वयं ही अपने लिये एक सहायक ढूँढ़ रहे हैं। उनका जो अभीष्ट कार्य है उसे सिद्ध करने में आप दोनों भाई समर्थ हैं॥ १९॥
कृतार्थो वाकृतार्थो वा तव कृत्यं करिष्यति।
स ऋक्षरजसः पुत्रः पम्पामटति शङ्कितः॥२०॥
‘सुग्रीव का मनोरथ पूर्ण हो या न हो, वे आपका कार्य अवश्य सिद्ध करेंगे। वे ऋक्षरजा के क्षेत्रज पुत्र हैं और वाली से शङ्कित रहकर पम्पासरोवर के तट पर भ्रमण करते हैं ॥ २०॥
भास्करस्यौरसः पुत्रो वालिना कृतकिल्बिषः।
संनिधायायुधं क्षिप्रमृष्यमूकालयं कपिम्॥२१॥
कुरु राघव सत्येन वयस्यं वनचारिणम्।
‘उन्हें सूर्यदेव का औरस पुत्र कहा गया है। उन्होंने वाली का अपराध किया है (इसीलिये वे उससे डरते हैं)। रघुनन्दन ! अग्नि के समीप हथियार रखकर शीघ्र ही सत्य की शपथ खाकर ऋष्यमूकनिवासी वनचारी वानर सुग्रीव को आप अपना मित्र बना लीजिये॥ २१ १/२॥
स हि स्थानानि कात्स्न्येन सर्वाणि कपिकुञ्जरः॥ २२॥
नरमांसाशिनां लोके नैपुण्यादधिगच्छति।
‘कपिश्रेष्ठ सुग्रीव संसार में नरमांसभक्षी राक्षसों के जितने स्थान हैं, उन सबको पूर्णरूप से निपुणतापूर्वक जानते हैं ॥ २२ १/२॥
न तस्याविदितं लोके किंचिदस्ति हि राघव॥ २३॥
यावत् सूर्यः प्रतपति सहस्रांशुः परंतप।
‘रघुनन्दन! शत्रुदमन! सहस्रों किरणों वाले सूर्यदेव जहाँ तक तपते हैं, वहाँ तक संसार में कोई ऐसा स्थान या वस्तु नहीं है, जो सुग्रीव के लिये अज्ञात हो॥ २३ १/२॥
स नदीर्विपुलान् शैलान् गिरिदुर्गाणि कन्दरान्॥ २४॥
अन्विष्य वानरैः सार्धं पत्नीं तेऽधिगमिष्यति।
‘वे वानरों के साथ रहकर समस्त नदियों, बड़े-बड़े पर्वतों, पहाड़ी दुर्गम स्थानों और कन्दराओं में भी खोज कराकर आपकी पत्नी का पता लगा लेंगे॥ २४ १/२॥
वानरांश्च महाकायान् प्रेषयिष्यति राघव॥२५॥
दिशो विचेतुं तां सीतां त्वद्वियोगेन शोचतीम्।
अन्वेष्यति वरारोहां मैथिली रावणालये॥२६॥
‘राघव! वे आपके वियोग में शोक करती हुई सीता की खोज के लिये सम्पूर्ण दिशाओं में विशालकाय वानरों को भेजेंगे, तथा रावण के घर से भी सुन्दर अङ्गोंवाली मिथिलेशकुमारी को ढूँढ़ निकालेंगे। २५-२६॥
स मेरुशृङ्गाग्रगतामनिन्दितां प्रविश्य पातालतलेऽपि वाश्रिताम्।
प्लवङ्गमानामृषभस्तव प्रियां निहत्य रक्षांसि पुनः प्रदास्यति॥२७॥
‘आपकी प्रिया सती-साध्वी सीता मेरुशिखर के अग्रभाग पर पहुँचायी गयी हों या पाताल में प्रवेश करके रखी गयी हों, वानरशिरोमणि सुग्रीव समस्त राक्षसों का वध करके उन्हें पुनः आपके पास ला देंगे’॥ २७॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे द्विसप्ततितमः सर्गः॥७२॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में बहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ।७२॥
सर्ग-73
दर्शयित्वा तु रामाय सीतायाः परिमार्गणे।
वाक्यमन्वर्थमर्थज्ञः कबन्धः पुनरब्रवीत्॥१॥
श्रीराम को सीता की खोज का उपाय दिखाकर अर्थवेत्ता कबन्ध ने उनसे पुनः यह प्रयोजनयुक्त बात कही— ॥१॥
एष राम शिवः पन्था यत्रैते पुष्पिता द्रुमाः।
प्रतीची दिशमाश्रित्य प्रकाशन्ते मनोरमाः॥२॥
‘श्रीराम! यहाँ से पश्चिम दिशा का आश्रय लेकर जहाँ ये फूलों से भरे हुए मनोरम वृक्ष शोभा पा रहे हैं, यही आपके जाने लायक सुखद मार्ग है॥२॥
जम्बूप्रियालपनसा न्यग्रोधप्लक्षतिन्दुकाः।
अश्वत्थाः कर्णिकाराश्च चूताश्चान्ये च पादपाः॥३॥
धन्वना नागवृक्षाश्च तिलका नक्तमालकाः।
नीलाशोकाः कदम्बाश्च करवीराश्च पुष्पिताः॥ ४॥
अग्निमुख्या अशोकाश्च सुरक्ताः पारिभद्रकाः।
तानारुह्याथवा भूमौ पातयित्वा च तान् बलात्॥
फलान्यमृतकल्पानि भक्षयित्वा गमिष्यथः।
‘जामुन, प्रियाल (चिरौंजी), कटहल, बड़, पाकड़, तेंदू, पीपल, कनेर, आम तथा अन्य वृक्ष, धव, नागकेसर, तिलक, नक्तमाल, नील, अशोक, कदम्ब, खिले हुए करवीर, भिलावा, अशोक, लाल चन्दन तथा मन्दार—ये वृक्ष मार्ग में पड़ेंगे। आप दोनों भाई इनकी डालियों को बलपूर्वक भूमिपर झुकाकर अथवा इन वृक्षों पर चढ़कर इनके अमृततुल्य मधुर फलों का आहार करते हुए यात्रा कीजियेगा॥ ३–५ १/२॥
तदतिक्रम्य काकुत्स्थ वनं पुष्पितपादपम्॥६॥
नन्दनप्रतिमं चान्यत् कुरवस्तूत्तरा इव।
सर्वकालफला यत्र पादपा मधुरस्रवाः॥७॥
‘काकुत्स्थ! खिले हुए वृक्षों से सुशोभित उस वन को लाँघकर आपलोग एक दूसरे वन में प्रवेश कीजियेगा, जो नन्दनवन के समान मनोहर है। उस वन के वृक्ष उत्तर कुरुवर्ष के वृक्षों की भाँति मधु की धारा बहाने वाले हैं तथा उनमें सभी ऋतुओं में सदा फल लगे रहते हैं॥ ६-७॥
सर्वे च ऋतवस्तत्र वने चैत्ररथे यथा।
फलभारनतास्तत्र महाविटपधारिणः॥८॥
‘चैत्ररथ वन की भाँति उस मनोहर कानन में सभी ऋतुएँ निवास करती हैं। वहाँ के वृक्ष बड़ी-बड़ी शाखा धारण करने वाले तथा फलों के भार से झुके हुए हैं॥ ८॥
शोभन्ते सर्वतस्तत्र मेघपर्वतसंनिभाः।
तानारुह्याथवा भूमौ पातयित्वाथवा सुखम्॥९॥
फलान्यमृतकल्पानि लक्ष्मणस्ते प्रदास्यति।
‘वे वहाँ सब ओर मेघों और पर्वतों के समान शोभा पाते हैं। लक्ष्मण उन वृक्षों पर चढ़कर अथवा सुखपूर्वक उन्हें पृथ्वी पर झुकाकर उनके अमृततुल्य मधुर फल आपको देंगे॥९ १/२ ॥
चङ्कमन्तौ वरान् शैलान् शैलाच्छैलं वनाद् वनम्॥ १०॥
ततः पुष्करिणीं वीरौ पम्पां नाम गमिष्यथः।
‘इस प्रकार सुन्दर पर्वतों पर भ्रमण करते हुए आप दोनों भाई एक पहाड़ से दूसरे पहाड़ पर तथा एक वन से दूसरे वन में पहुँचेंगे और इस तरह अनेक पर्वतों तथा वनों को लाँघते हुए आप दोनों वीर पम्पा नामक पुष्करिणी के तटपर पहुँच जायेंगे॥ १० १/२॥
अशर्करामविभ्रंशां समतीर्थामशैवलाम्॥११॥
राम संजातवालूकां कमलोत्पलशोभिताम्।
‘श्रीराम! वहाँ कंकड़ का नाम नहीं है। उसके तट पर पैर फिसलने लायक कीचड़ आदि नहीं है। उसके घाट की भूमि सब ओर से बराबर है-ऊँची नीची या ऊबड़-खाबड़ नहीं है। उस पुष्करिणी में सेवार का सर्वथा अभाव है। उसके भीतर की भूमि वालुकापूर्ण है। कमल और उत्पल उस सरोवर की शोभा बढ़ाते हैं । ११ १/२॥
तत्र हंसाः प्लवाः क्रौञ्चाः कुरराश्चैव राघव॥ १२॥
वल्गुस्वरा निकूजन्ति पम्पासलिलगोचराः।
नोद्विजन्ते नरान् दृष्ट्वा वधस्याकोविदाः शुभाः॥ १३॥
‘रघुनन्दन! वहाँ पम्पा के जल में विचरने वाले हंस, कारण्डव, क्रौञ्च और कुरर सदा मधुर स्वर में कूजते रहते हैं। वे मनुष्यों को देखकर उद्विग्न नहीं होते हैं। क्योंकि किसी मनुष्य के द्वारा किसी पक्षी का वध भी हो सकता है, ऐसे भय का उन्हें अनुभव नहीं है। ये सभी पक्षी बड़े सुन्दर हैं ॥ १२-१३॥
घृतपिण्डोपमान् स्थूलांस्तान् द्विजान् भक्षयिष्यथः।
रोहितान् वक्रतुण्डांश्च नलमीनांश्च राघव॥ १४॥
पम्पायामिषुभिर्मत्स्यास्तत्र राम वरान् हतान्।
निस्त्वक्पक्षानयस्तप्तानकृशानैककण्टकान्॥ १५॥
तव भक्त्या समायुक्तो लक्ष्मणः सम्प्रदास्यति।
‘बाणों के अग्रभाग से जिनके छिलके छुड़ा दिये गये हैं, अतएव जिनमें एक भी काँटा नहीं रह गया है, जो घी के लोदे के समान चिकने तथा आर्द्र हैं सूखे नहीं हैं, जिन्हें लोहमय बाणों के अग्रभाग में गूंथकर आग में सेका और पकाया गया है, ऐसे फल-मूल के ढेर वहाँ भक्ष्य पदार्थ के रूप में उपलब्ध होंगे। आपके प्रति भक्तिभाव से सम्पन्न लक्ष्मण आपको वे भक्ष्य पदार्थ अर्पित करेंगे। आप दोनों भाई उन पदार्थों को लेकर उस सरोवर के मोटे-मोटे सुप्रसिद्ध जलचर पक्षियों तथा श्रेष्ठ रोहित (रोहू), वक्रतुण्ड और नलमीन आदि मत्स्यों को थोड़ा-थोड़ा करके खिलाइयेगा (इससे आपका मनोरञ्जन होगा) ॥ १४-१५ १/२॥
भृशं तान् खादतो मत्स्यान् पम्पायाः पुष्पसंचये॥ १६॥
पद्मगन्धि शिवं वारि सुखशीतमनामयम्।
उद्धृत्य स तदाक्लिष्टं रूप्यस्फटिकसंनिभम्॥ १७॥
अथ पुष्करपर्णेन लक्ष्मणः पाययिष्यति।।
‘जिस समय आप पम्पासरोवर की पुष्पराशि के समीप मछलियों को भोजन कराने की क्रीड़ा में अत्यन्त संलग्न होंगे, उस समय लक्ष्मण उस सरोवर का कमल की गन्ध से सुवासित, कल्याणकारी, सुखद, शीतल, रोगनाशक, क्लेशहारी तथा चाँदी और स्फटिकमणि के समान स्वच्छ जल कमल के पत्ते में निकालकर लायेंगे और आपको पिलायेंगे॥ १६-१७ १/२॥
स्थूलान् गिरिगुहाशय्यान् वानरान् वनचारिणः॥ १८॥
सायाले विचरन् राम दर्शयिष्यति लक्ष्मणः।
‘श्रीराम! सायंकाल में आपके साथ विचरते हुए लक्ष्मण आपको उन मोटे-मोटे वनचारी वानरों का दर्शन करायेंगे, जो पर्वतों की गुफाओं में सोते और रहते हैं॥ १८ १/२॥
अपां लोभादुपावृत्तान् वृषभानिव नर्दतः॥१९॥
स्थूलान् पीतांश्च पम्पायां द्रक्ष्यसि त्वं नरोत्तम।
‘नरश्रेष्ठ! वे वानर पानी पीने के लोभ से पम्पा के तट पर आकर साँड़ों के समान गर्जते हैं। उनके शरीर मोटे और रंग पीले होते हैं। आप उन सबको वहाँ देखेंगे॥ १९ १/२॥
सायाह्ने विचरन् राम विटपी माल्यधारिणः॥ २०॥
शिवोदकं च पम्पायां दृष्ट्वा शोकं विहास्यसि।
‘श्रीराम! सायंकाल में चलते समय आप बड़ी-बड़ी शाखावाले, पुष्पधारी वृक्षों तथा पम्पा के शीतल जल का दर्शन करके अपना शोक त्याग देंगे॥ २० १/२॥
सुमनोभिश्चितास्तत्र तिलका नक्तमालकाः॥ २१॥
उत्पलानि च फुल्लानि पङ्कजानि च राघव।
‘रघुनन्दन! वहाँ फूलों से भरे हुए तिलक और नक्तमाल के वृक्ष शोभा पाते हैं तथा जल के भीतर उत्पल और कमल फूले हुए दिखायी देते हैं॥ २१ १/२॥
न तानि कश्चिन्माल्यानि तत्रारोपयिता नरः॥ २२॥
न च वै म्लानतां यान्ति न च शीर्यन्ति राघव।
‘रघुनन्दन! कोई भी मनुष्य वहाँ उन फूलों को उतारकर धारण नहीं करता है। (क्योंकि वहाँ तक किसी की पहुँच ही नहीं हो पाती है) पम्पासरोवर के फूल न तो मुरझाते हैं और न झरते ही हैं ॥ २२ १/२ ॥
मतङ्गशिष्यास्तत्रासन्नृषयः सुसमाहिताः॥२३॥
तेषां भाराभितप्तानां वन्यमाहरतां गुरोः।
ये प्रपेतुर्महीं तूर्णं शरीरात् स्वेदबिन्दवः॥२४॥
तानि माल्यानि जातानि मुनीनां तपसा तदा।
स्वेदबिन्दुसमुत्थानि न विनश्यन्ति राघव॥२५॥
‘कहते हैं, वहाँ पहले मतंग मुनि के शिष्य ऋषिगण निवास करते थे, जिनका चित्त सदा एकाग्र एवं शान्त रहता था। वे अपने गुरु मतंग मुनि के लिये जब जंगली फल-मूल ले आते और उनके भार से थक जाते, तब उनके शरीर से पृथ्वी पर पसीनों की जो बूंदें गिरती थीं, वे ही उन मुनियों की तपस्या के प्रभाव से तत्काल फूल के रूप में परिणत हो जाती थीं। राघव! पसीनों की बूंदों से उत्पन्न होने के कारण वे फूल नष्ट नहीं होते हैं॥ २३–२५॥
तेषां गतानामद्यापि दृश्यते परिचारिणी।
श्रमणी शबरी नाम काकुत्स्थ चिरजीविनी॥ २६॥
त्वां तु धर्मे स्थिता नित्यं सर्वभूतनमस्कृतम्।
दृष्ट्वा देवोपमं राम स्वर्गलोकं गमिष्यति॥२७॥
‘वे सब-के-सब ऋषि तो अब चले गये; किंतु उनकी सेवा में रहने वाली तपस्विनी शबरी आज भी वहाँ दिखायी देती है। काकुत्स्थ! शबरी चिरजीवनी होकर सदा धर्म के अनुष्ठान में लगी रहती है। श्रीराम! आप समस्त प्राणियों के लिये नित्य वन्दनीय और देवता के तुल्य हैं। आपका दर्शन करके शबरी स्वर्गलोक (साकेतधाम) को चली जायगी॥ २६-२७॥
ततस्तद्राम पम्पायास्तीरमाश्रित्य पश्चिमम्।
आश्रमस्थानमतुलं गुह्यं काकुत्स्थ पश्यसि॥ २८॥
‘ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम! तदनन्तर आप पम्पा के पश्चिम तट पर जाकर एक अनुपम आश्रम देखेंगे, जो (सर्वसाधारणकी पहुँच के बाहर होने के कारण) गुप्त है॥२८॥
न तत्राक्रमितुं नागाः शक्नुवन्ति तदाश्रमे।
ऋषेस्तस्य मतङ्गस्य विधानात् तच्च काननम्॥ २९॥
‘उस आश्रम पर तथा उस वन में मतंग मुनि के प्रभाव से हाथी कभी आक्रमण नहीं कर सकते॥२९॥
मतङ्गवनमित्येव विश्रुतं रघुनन्दन।
तस्मिन् नन्दनसंकाशे देवारण्योपमे वने॥३०॥
नानाविहगसंकीर्णे रंस्यसे राम निर्वृतः।
‘रघुनन्दन! वहाँ का जंगल मतंगवन के नाम से प्रसिद्ध है। उस नन्दनतुल्य मनोहर और देववन के समान सुन्दर वन में नाना प्रकार के पक्षी भरे रहते हैं। श्रीराम! आप वहाँ बड़ी प्रसन्नता के साथ सानन्द विचरण करेंगे।
ऋष्यमूकस्तु पम्पायाः पुरस्तात् पुष्पितद्रुमः॥ ३१॥
सुदुःखारोहणश्चैव शिशुनागाभिरक्षितः।
उदारो ब्रह्मणा चैव पूर्वकालेऽभिनिर्मितः॥ ३२॥
‘पम्पासरोवर के पूर्वभाग में ऋष्यमूक पर्वत है, जहाँ के वृक्ष फूलों से सुशोभित दिखायी देते हैं। उसके ऊपर चढ़ने में बड़ी कठिनाई होती है, क्योंकि वह छोटे-छोटे सो अथवा हाथियों के बच्चों द्वारा सब ओर से सुरक्षित है। ऋष्यमूक पर्वत उदार (अभीष्ट फल को देने वाला) है। पूर्वकाल में साक्षात् ब्रह्माजी ने उसका निर्माण किया और उसे औदार्य आदि गुणों से सम्पन्न बनाया॥ ३१-३२॥
शयानः पुरुषो राम तस्य शैलस्य मूर्धनि।
यत् स्वप्नं लभते वित्तं तत् प्रबुद्धोऽधिगच्छति॥ ३३॥
यस्त्वेनं विषमाचारः पापकर्माधिरोहति।
तत्रैव प्रहरन्त्येनं सुप्तमादाय राक्षसाः॥ ३४॥
‘श्रीराम! उस पर्वत के शिखर पर सोया हुआ पुरुष सपने में जिस सम्पत्ति को पाता है उसे जागने पर भी प्राप्त कर लेता है। जो पापकर्मी तथा विषम बर्ताव करने वाला पुरुष उस पर्वत पर चढ़ता है, उसे इस पर्वतशिखरपर ही सो जाने पर राक्षस लोग उठाकर उसके ऊपर प्रहार करते हैं। ३३-३४॥
तत्रापि शिशुनागानामाक्रन्दः श्रूयते महान्।
क्रीडतां राम पम्पायां मतङ्गाश्रमवासिनाम्॥ ३५॥
श्रीराम! मतंग मुनि के आश्रम के आस-पास के वन में रहने और पम्पासरोवर में क्रीडा करने वाले छोटे-छोटे हाथियों के चिग्घाड़ने का महान् शब्द उस पर्वत पर भी सुनायी देता है॥ ३५ ॥
सक्ता रुधिरधाराभिः संहत्य परमद्विपाः।
प्रचरन्ति पृथक्कीर्णा मेघवर्णास्तरस्विनः॥३६॥
ते तत्र पीत्वा पानीयं विमलं चारु शोभनम्।
अत्यन्तसुखसंस्पर्श सर्वगन्धसमन्वितम्॥३७॥
निर्वृत्ताः संविगाहन्ते वनानि वनगोचराः।
‘जिनके गण्डस्थलों पर कुछ लाल रंग की मद की धाराएँ बहती हैं, वे वेगशाली और मेघ के समान काले बड़े-बड़े गजराज झुंड-के-झुंड एक साथ होकर दूसरी जातिवाले हाथियों से पृथक् हो वहाँ विचरते रहते हैं। वन में विचरने वाले वे हाथी जब पम्पासरोवर का निर्मल, मनोहर, सुन्दर, छूने में अत्यन्त सुखद तथा सब प्रकार की सुगन्ध से सुवासित जल पीकर लौटते हैं, तब उन वनों में प्रवेश करते हैं। ३६-३७ १/२ ॥
ऋक्षांश्च दीपिनश्चैव नीलकोमलकप्रभान्॥ ३८॥
रुरूनपेतानजयान् दृष्ट्वा शोकं प्रहास्यसि।
‘रघुनन्दन! वहाँ रीछों, बाघों और नील कोमल कान्तिवाले मनुष्यों को देखकर भागने वाले तथा दौड़ लगाने में किसी से पराजित न होने वाले मृगों को देखकर आप अपना सारा शोक भूल जायँगे॥ ३८ १/२॥
राम तस्य तु शैलस्य महती शोभते गुहा॥३९॥
शिलापिधाना काकुत्स्थ दुःखं चास्याः प्रवेशनम्।
‘श्रीराम! उस पर्वत के ऊपर एक बहुत बड़ी गुफा शोभा पाती है, जिसका द्वार पत्थर से ढका है। उसके भीतर प्रवेश करने में बड़ा कष्ट होता है॥ ३९ १/२ ॥
तस्या गुहायाः प्राग्द्वारे महान् शीतोदको ह्रदः॥४०॥
बहुमूलफलो रम्यो नानानगसमाकुलः।
‘उस गुफा के पूर्वद्वार पर शीतल जल से भरा हुआ एक बहुत बड़ा कुण्ड है। उसके आस-पास बहुत-से फल और मूल सुलभ हैं तथा वह रमणीय ह्रद नाना प्रकार के वृक्षों से व्याप्त है॥ ४० १/२ ॥
तस्यां वसति धर्मात्मा सुग्रीवः सह वानरैः॥४१॥
कदाचिच्छिखरे तस्य पर्वतस्यापि तिष्ठति।
‘धर्मात्मा सुग्रीव वानरों के साथ उसी गुफा में निवास करते हैं। वे कभी-कभी उस पर्वत के शिखर पर भी रहते हैं ॥ ४१ १/२॥
कबन्धस्त्वनुशास्यैवं तावुभौ रामलक्ष्मणौ॥४२॥
स्रग्वी भास्करवर्णाभः खे व्यरोचत वीर्यवान्।
इस प्रकार श्रीराम और लक्ष्मण दोनों भाइयों को सब बातें बताकर सूर्य के समान तेजस्वी और पराक्रमी कबन्ध दिव्य पुष्पों की माला धारण किये आकाश में प्रकाशित होने लगा॥ ४२ १/२॥
तं तु खस्थं महाभागं तावुभौ रामलक्ष्मणौ ॥ ४३॥
प्रस्थितौ त्वं व्रजस्वेति वाक्यमचतुरन्तिके।
उस समय वे दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण वहाँ से प्रस्थान करने के लिये उद्यत हो आकाश में खड़े हुए महाभाग कबन्ध से उसके निकट खड़े होकर बोले —’अब तुम परम धाम को जाओ’ ॥ ४३ १/२ ॥
गम्यतां कार्यसिद्ध्यर्थमिति तावब्रवीत् स च॥ ४४॥
सुप्रीतौ तावनुज्ञाप्य कबन्धः प्रस्थितस्तदा॥४५॥
कबन्धने भी उन दोनों भाइयों से कहा—’आपलोग भी अपने कार्य की सिद्धि के लिये यात्रा करें।’ ऐसा कहकर परम प्रसन्न हुए उन दोनों बन्धुओं से आज्ञा ले कबन्ध ने तत्काल प्रस्थान किया॥४४-४५॥
स तत् कबन्धः प्रतिपद्य रूपं वृतः श्रिया भास्वरसर्वदेहः।
निदर्शयन् राममवेक्ष्य खस्थः सख्यं कुरुष्वेति तदाभ्युवाच॥४६॥
कबन्ध अपने पहले रूप को पाकर अद्भुत शोभा से सम्पन्न हो गया। उसका सारा शरीर सूर्य-तुल्य प्रभा से प्रकाशित हो उठा। वह राम की ओर देखकर उन्हें पम्पासरोवर का मार्ग दिखाता हुआ आकाश में ही स्थित होकर बोला—’आप सुग्रीव के साथ मित्रता अवश्य करें’॥ ६२॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे त्रिसप्ततितमः सर्गः॥७३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में तिहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ।७३॥
सर्ग-74
तौ कबन्धेन तं मागं पम्पाया दर्शितं वने।
आतस्थतुर्दिशं गृह्य प्रतीची नृवरात्मजौ॥१॥
तदनन्तर राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण कबन्ध के बताये हुए पम्पासरोवर के मार्ग का आश्रय ले पश्चिम दिशा की ओर चल दिये॥१॥
तौ शैलेष्वाचितानेकान् क्षौद्रपुष्पफलद्रुमान्।
वीक्षन्तौ जग्मतुर्द्रष्टुं सुग्रीवं रामलक्ष्मणौ॥२॥
दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण पर्वतों पर फैले हुए बहुत-से वृक्षों को, जो फूल, फल और मधु से सम्पन्न थे, देखते हुए सुग्रीव से मिलने के लिये आगे बढ़े॥ २॥
कृत्वा तु शैलपृष्ठे तु तौ वासं रघुनन्दनौ।
पम्पायाः पश्चिमं तीरं राघवावुपतस्थतुः॥३॥
रात में एक पर्वत-शिखर पर निवास करके रघुकुल का आनन्द बढ़ाने वाले वे दोनों रघुवंशी बन्धु पम्पासरोवर के पश्चिम तट पर जा पहुँचे॥३॥
तौ पुष्करिण्याः पम्पायास्तीरमासाद्य पश्चिमम्।
अपश्यतां ततस्तत्र शबर्या रम्यमाश्रमम्॥४॥
पम्पानामक पुष्करिणी के पश्चिम तट पर पहुँचकर उन दोनों भाइयों ने वहाँ शबरी का रमणीय आश्रम देखा॥
तौ तमाश्रममासाद्य द्रुमैर्बहुभिरावृतम्।
सुरम्यमभिवीक्षन्तौ शबरीमभ्युपेयतुः॥५॥
उसकी शोभा निहारते हुए वे दोनों भाई बहुसंख्यक वृक्षों से घिरे हुए उस सुरम्य आश्रम पर जाकर शबरी से मिले॥५॥
तौ दृष्ट्वा तु तदा सिद्धा समुत्थाय कृताञ्जलिः।
पादौ जग्राह रामस्य लक्ष्मणस्य च धीमतः॥६॥
शबरी सिद्ध तपस्विनी थी। उन दोनों भाइयों को आश्रम पर आया देख वह हाथ जोड़कर खड़ी हो गयी तथा उसने बुद्धिमान् श्रीराम और लक्ष्मण के चरणों में प्रणाम किया॥६॥
पाद्यमाचमनीयं च सर्वं प्रादाद यथाविधि।
तामुवाच ततो रामः श्रमणी धर्मसंस्थिताम्॥७॥
फिर पाद्य, अर्घ्य और आचमनीय आदि सब सामग्री समर्पित की और विधिवत् उनका सत्कार किया। तत्पश्चात् श्रीरामचन्द्रजी उस धर्मपरायणा तपस्विनी से बोले- ॥७॥
कच्चित्ते निर्जिता विघ्नाः कच्चित्ते वर्धते तपः।
कच्चित्ते नियतः कोप आहारश्च तपोधने॥८॥
‘तपोधने ! क्या तुमने सारे विघ्नों पर विजय पा ली? क्या तुम्हारी तपस्या बढ़ रही है? क्या तुमने क्रोध और आहार को काबू में कर लिया है ? ॥ ८॥
कच्चित्ते नियमाः प्राप्ताः कच्चित्ते मनसः सुखम्।
कच्चित्ते गुरुशुश्रूषा सफला चारुभाषिणि॥९॥
‘तुमने जिन नियमों को स्वीकार किया है, वे निभ तो जाते हैं न? तुम्हारे मन में सुख और शान्ति है न? चारुभाषिणि! तुमने जो गुरुजनों की सेवा की है, वह पूर्णरूप से सफल हो गयी है न?’ ॥९॥
रामेण तापसी पृष्टा सा सिद्धा सिद्धसम्मता।
शशंस शबरी वृद्धा रामाय प्रत्यवस्थिता॥१०॥
श्रीरामचन्द्रजी के इस प्रकार पूछने पर वह सिद्ध तपस्विनी बूढ़ी शबरी, जो सिद्धों के द्वारा सम्मानित थी, उनके सामने खड़ी होकर बोली- ॥१०॥
अद्य प्राप्ता तपःसिद्धिस्तव संदर्शनान्मया।
अद्य मे सफलं जन्म गुरवश्च सुपूजिताः॥११॥
‘रघुनन्दन! आज आपका दर्शन मिलने से ही मुझे अपनी तपस्या में सिद्धि प्राप्त हुई है। आज मेरा जन्म सफल हुआ और गुरुजनों की उत्तम पूजा भी सार्थक हो गयी॥११॥
अद्य मे सफलं तप्तं स्वर्गश्चैव भविष्यति।
त्वयि देववरे राम पूजिते पुरुषर्षभ॥१२॥
‘पुरुषप्रवर श्रीराम! आप देवेश्वर का यहाँ सत्कार हुआ, इससे मेरी तपस्या सफल हो गयी और अब मुझे आपके दिव्य धाम की प्राप्ति भी होगी ही॥ १२॥
तवाहं चक्षुषा सौम्य पूता सौम्येन मानद।
गमिष्याम्यक्षयांल्लोकांस्त्वत्प्रसादादरिंदम॥१३॥
‘सौम्य! मानद! आपकी सौम्य दृष्टि पड़ने से मैं परम पवित्र हो गयी। शत्रुदमन! आपके प्रसाद से ही अब मैं अक्षय लोकों में जाऊँगी॥१३॥
चित्रकूटं त्वयि प्राप्ते विमानैरतुलप्रभैः।
इतस्ते दिवमारूढा यानहं पर्यचारिषम्॥१४॥
‘जब आप चित्रकूट पर्वत पर पधारे थे, उसी समय मेरे गुरुजन, जिनकी मैं सदा सेवा किया करती थी, अतुल कान्तिमान् विमान पर बैठकर यहाँ से दिव्य-लोक को चले गये॥ १४॥
तैश्चाहमुक्ता धर्मज्ञैर्महाभागैर्महर्षिभिः।
आगमिष्यति ते रामः सुपुण्यमिममाश्रमम्॥१५॥
स ते प्रतिग्रहीतव्यः सौमित्रिसहितोऽतिथिः।
तं च दृष्ट्वा वरांल्लोकानक्षयांस्त्वं गमिष्यसि ॥
‘उन धर्मज्ञ महाभाग महर्षियों ने जाते समय मुझसे कहा था कि तेरे इस परम पवित्र आश्रमपर श्रीरामचन्द्रजी पधारेंगे और लक्ष्मण के साथ तेरे अतिथि होंगे। तुम उनका यथावत् सत्कार करना। उनका दर्शन करके तू श्रेष्ठ एवं अक्षय लोकों में जायगी॥ १५-१६॥
एवमुक्ता महाभागैस्तदाहं पुरुषर्षभ।
मया तु संचितं वन्यं विविधं पुरुषर्षभ॥१७॥
तवार्थे पुरुषव्याघ्र पम्पायास्तीरसम्भवम्।
‘पुरुषप्रवर! उन महाभाग महात्माओं ने मुझसे उस समय ऐसी बात कही थी। अतः पुरुषसिंह! मैंने आपके लिये पम्पातटपर उत्पन्न होने वाले नाना प्रकार के जंगली फल-मूलों का संचय किया है’॥ १७ १/२॥
एवमुक्तः स धर्मात्मा शबर्या शबरीमिदम्॥१८॥
राघवः प्राह विज्ञाने तां नित्यमबहिष्कृताम्।
शबरी (जाति से वर्णबाह्य होने पर भी) विज्ञान में बहिष्कृत नहीं थी—उसे परमात्मा के तत्त्व का नित्य ज्ञान प्राप्त था। उसकी पूर्वोक्त बातें सुनकर धर्मात्मा श्रीराम ने उससे कहा- ॥ १८ १/२॥
दनोः सकाशात् तत्त्वेन प्रभावं ते महात्मनाम्॥ १९॥
श्रुतं प्रत्यक्षमिच्छामि संद्रष्टुं यदि मन्यसे।
‘तपोधने! मैंने कबन्ध के मुख से तुम्हारे महात्मा गुरुजनों का यथार्थ प्रभाव सुना है। यदि तुम स्वीकार करो तो मैं उनके उस प्रभाव को प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ’॥ १९ १/२॥
एतत्तु वचनं श्रुत्वा रामवक्त्रविनिःसृतम्॥२०॥
शबरी दर्शयामास तावुभौ तदनं महत्।
श्रीराम के मुख से निकले हुए इस वचन को सुनकर शबरी ने उन दोनों भाइयों को उस महान् वन का दर्शन कराते हुए कहा- ॥ २० १/२॥
पश्य मेघघनप्रख्यं मृगपक्षिसमाकुलम्॥२१॥
मतङ्गवनमित्येव विश्रुतं रघुनन्दन।
‘रघुनन्दन ! मेघों की घटा के समान श्याम और नाना प्रकार के पशु-पक्षियों से भरे हुए इस वन की ओर दृष्टिपात कीजिये। यह मतंगवन के नाम से ही विख्यात है॥ २१ १/२ ॥
इह ते भावितात्मानो गुरवो मे महाद्युते।
जुहवांचक्रिरे नीडं मन्त्रवन्मन्त्रपूजितम्॥२२॥
‘महातेजस्वी श्रीराम ! यहीं वे मेरे भावितात्मा (शुद्ध अन्तःकरण वाले एवं परमात्मचिन्तनपरायण) गुरुजन निवास करते थे। इसी स्थान पर उन्होंने गायत्रीमन्त्र के जप से विशुद्ध हुए अपने देहरूपी पञ्जर को मन्त्रोच्चारणपूर्वक अग्नि में होम दिया था॥ २२ ॥
इयं प्रत्यक्स्थली वेदी यत्र ते मे सुसत्कृताः।
पुष्पोपहारं कुर्वन्ति श्रमादुद्धेपिभिः करैः॥२३॥
‘यह प्रत्यक्स्थली नामवाली वेदी है, जहाँ मेरे द्वारा भलीभाँति पूजित हुए वे महर्षि वृद्धावस्था के कारण श्रम से काँपते हुए हाथों द्वारा देवताओं को फूलों की बलि चढ़ाया करते थे॥२३॥
तेषां तपःप्रभावेण पश्याद्यापि रघूत्तम।
द्योतयन्ती दिशः सर्वाः श्रिया वेद्यतुलप्रभा॥ २४॥
‘रघुवंशशिरोमणे! देखिये, उनकी तपस्या के प्रभाव से आज भी यह वेदी अपने तेज के द्वारा सम्पूर्ण दिशाओं को प्रकाशित कर रही है। इस समय भी इसकी प्रभा अतुलनीय है॥ २४॥
अशक्नुवद्भिस्तैर्गन्तुमुपवासश्रमालसैः।
चिन्तितेनागतान् पश्य समेतान् सप्त सागरान्॥ २५॥
‘उपवास करने से दुर्बल होने के कारण जब वे चलने-फिरने में असमर्थ हो गये, तब उनके चिन्तनमात्र से वहाँ सात समुद्रों का जल प्रकट हो गया। वह सप्तसागर तीर्थ आज भी मौजूद है। उसमें सातों समुद्रों के जल मिले हुए हैं, उसे चलकर देखिये॥२५॥
कृताभिषेकैस्तैय॑स्ता वल्कलाः पादपेष्विह।
अद्यापि न विशुष्यन्ति प्रदेशे रघुनन्दन॥२६॥
‘रघुनन्दन! उसमें स्नान करके उन्होंने वृक्षों पर जो वल्कल वस्त्र फैला दिये थे, वे इस प्रदेश में अब तक सूखे नहीं हैं॥२६॥
देवकार्याणि कुर्वद्भिर्यानीमानि कृतानि वै।
पुष्पैः कुवलयैः सार्धं म्लानत्वं न तु यान्ति वै॥ २७॥
‘देवताओं की पूजा करते हुए मेरे गुरुजनों ने कमलों के साथ अन्य फूलों की जो मालाएँ बनायी थीं, वे आज भी मुरझायी नहीं हैं ॥ २७॥
कृत्स्नं वनमिदं दृष्टं श्रोतव्यं च श्रुतं त्वया।
तदिच्छाम्यभ्यनुज्ञाता त्यक्ष्याम्येतत् कलेवरम्॥ २८॥
‘भगवन् ! आपने सारा वन देख लिया और यहाँ के सम्बन्ध में जो बातें सुनने योग्य थीं, वे भी सुन लीं। अब मैं आपकी आज्ञा लेकर इस देह का परित्याग करना चाहती हूँ॥२८॥
तेषामिच्छाम्यहं गन्तुं समीपं भावितात्मनाम्।
मुनीनामाश्रमो येषामहं च परिचारिणी॥२९॥
‘जिनका यह आश्रम है और जिनके चरणों की मैं दासी रही हूँ, उन्हीं पवित्रात्मा महर्षियों के समीप अब मैं जाना चाहती हूँ’॥ २९॥
धर्मिष्ठं तु वचः श्रुत्वा राघवः सहलक्ष्मणः।
प्रहर्षमतुलं लेभे आश्चर्यमिति चाब्रवीत्॥३०॥
शबरी के धर्मयुक्त वचन सुनकर लक्ष्मणसहित श्रीराम को अनुपम प्रसन्नता प्राप्त हुई। उनके मुँह से निकल पड़ा, ‘आश्चर्य है !’ ॥ ३० ॥
तामुवाच ततो रामः शबरी संशितव्रताम्।
अर्चितोऽहं त्वया भद्रे गच्छ कामं यथासुखम्॥ ३१॥
तदनन्तर श्रीराम ने कठोर व्रत का पालन करने वाली शबरी से कहा—’भद्रे! तुमने मेरा बड़ा सत्कार किया। अब तुम अपनी इच्छा के अनुसार आनन्दपूर्वक अभीष्ट लोक की यात्रा करो’ ॥ ३१॥
इत्येवमुक्ता जटिला चीरकृष्णाजिनाम्बरा।
अनुज्ञाता तु रामेण हुत्वाऽऽत्मानं हुताशने ॥ ३२॥
ज्वलत्पावकसंकाशा स्वर्गमेव जगाम ह।
दिव्याभरणसंयुक्ता दिव्यमाल्यानुलेपना॥३३॥
दिव्याम्बरधरा तत्र बभूव प्रियदर्शना।
विराजयन्ती तं देशं विद्युत्सौदामनी यथा॥३४॥
श्रीरामचन्द्रजी के इस प्रकार आज्ञा देने पर मस्तक पर जटा और शरीर पर चीर एवं काला मृगचर्म धारण करने वाली शबरी ने अपने को आग में होमकर प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी शरीर प्राप्त किया। वह दिव्य वस्त्र, दिव्य आभूषण, दिव्य फूलों की माला और दिव्य अनुलेपन धारण किये बड़ी मनोहर दिखायी देने लगी तथा सुदाम पर्वत पर प्रकट होने वाली बिजली के समान उस प्रदेश को प्रकाशित करती हुई स्वर्ग (साकेत) लोक को ही चली गयी। ३२-३४॥
यत्र ते सुकृतात्मानो विहरन्ति महर्षयः।
तत् पुण्यं शबरी स्थानं जगामात्मसमाधिना॥ ३५॥
उसने अपने चित्त को एकाग्र करके उस पुण्यधाम की यात्रा की, जहाँ उसके वे गुरुजन पुण्यात्मा महर्षि विहार करते थे॥ ३५ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे चतुःसप्ततितमः सर्गः॥ ७४॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में चौहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ। ७४॥
सर्ग-75
दिवं तु तस्यां यातायां शबर्यां स्वेन तेजसा।
लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा चिन्तयामास राघवः॥१॥
चिन्तयित्वा तु धर्मात्मा प्रभावं तं महात्मनाम्।
हितकारिणमेकाग्रं लक्ष्मणं राघवोऽब्रवीत्॥२॥
अपने तेज से प्रकाशित होने वाली शबरी के दिव्यलोक में चले जाने पर भाई लक्ष्मणसहित धर्मात्मा श्रीरघुनाथजी ने उन महात्मा महर्षियों के प्रभाव का चिन्तन किया। चिन्तन करके अपने हित में संलग्न रहने वाले एकाग्रचित्त लक्ष्मण से श्रीराम ने इस प्रकार कहा— ॥१-२॥
दृष्टो मयाऽऽश्रमः सौम्य बह्वाश्चर्यः कृतात्मनाम्।
विश्वस्तमृगशार्दूलो नानाविहगसेवितः॥३॥
‘सौम्य! मैंने उन पुण्यात्मा महर्षियों का यह पवित्र आश्रम देखा। यहाँ बहुत-सी आश्चर्यजनक बातें हैं। हरिण और बाघ एक-दूसरे पर विश्वास करते हैं। नाना प्रकार के पक्षी इस आश्रम का सेवन करते हैं। ३॥
सप्तानां च समुद्राणां तेषां तीर्थेषु लक्ष्मण।
उपस्पृष्टं च विधिवत् पितरश्चापि तर्पिताः॥४॥
प्रणष्टमशुभं यन्नः कल्याणं समुपस्थितम्।
तेन त्वेतत् प्रहृष्टं मे मनो लक्ष्मण सम्प्रति॥५॥
‘लक्ष्मण! यहाँ जो सातों समुद्रों के जल से भरे हुए तीर्थ हैं, उनमें हमने विधिपूर्वक स्नान तथा पितरों का तर्पण किये हैं। इससे हमारा सारा अशुभ नष्ट हो गया और अब हमारे कल्याण का समय उपस्थित हुआ है। सुमित्राकुमार! इससे इस समय मेरे मन में अधिक प्रसन्नता हो रही है। ४-५॥
हृदये मे नरव्याघ्र शुभमाविर्भविष्यति।
तदागच्छ गमिष्यावः पम्पां तां प्रियदर्शनाम्॥६॥
‘नरश्रेष्ठ! अब मेरे हृदय में कोई शुभ संकल्प उठने वाला है इसलिये आओ, अब हम दोनों परम सुन्दर पम्पासरोवर के तट पर चलें॥६॥
ऋष्यमूको गिरिर्यत्र नातिदूरे प्रकाशते।
यस्मिन् वसति धर्मात्मा सुग्रीवोंऽशुमतः सुतः॥ ७॥
‘वहाँ से थोड़ी ही दूर पर वह ऋष्यमूक पर्वत शोभा पाता है, जिस पर सूर्यपुत्र धर्मात्मा सुग्रीव निवास करते हैं॥७॥
नित्यं वालिभयात् त्रस्तश्चतुर्भिः सह वानरैः।
अहं त्वरे च तं द्रष्टुं सुग्रीवं वानरर्षभम्॥८॥
तदधीनं हि मे कार्यं सीतायाः परिमार्गणम्।
‘वाली के भय से सदा डरे रहने के कारण वे चार वानरों के साथ उस पर्वत पर रहते हैं। मैं वानरश्रेष्ठ सुग्रीव से मिलने के लिये उतावला हो रहा हूँ; क्योंकि सीता के अन्वेषण का कार्य उन्हीं के अधीन है’॥ ८ १/२॥
इति ब्रुवाणं तं वीरं सौमित्रिरिदमब्रवीत्॥९॥
गच्छावस्त्वरितं तत्र ममापि त्वरते मनः।
इस प्रकार की बात कहते हुए वीर श्रीराम से सुमित्राकुमार लक्ष्मण ने यों कहा—’भैया! हम दोनों को शीघ्र ही वहाँ चलना चाहिये। मेरा मन भी चलने के लिये उतावला हो रहा है’ ॥९ १/२॥
आश्रमात्तु ततस्तस्मान्निष्क्रम्य स विशाम्पतिः॥ १०॥
आजगाम ततः पम्पां लक्ष्मणेन सह प्रभुः।
समीक्षमाणः पुष्पाढ्यं सर्वतो विपुलद्रुमम्॥११॥
तदनन्तर प्रजापालक भगवान् श्रीराम लक्ष्मण के साथ उस आश्रम से निकलकर सब ओर फूलों से लदे हुए नाना प्रकार के वृक्षों की शोभा निहारते हुए पम्पासरोवर के तट पर आये॥ १०-११॥
कोयष्टिभिश्चार्जुनकैः शतपत्रैश्च कीरकैः।
एतैश्चान्यैश्च बहुभिर्नादितं तद् वनं महत्॥ १२॥
वह विशाल वन टिट्टिभों, मोरों, कठफोड़वों, तोतों तथा अन्य बहुत-से पक्षियों के कलरवों से गूंज रहा था॥ १२॥
स रामो विविधान् वृक्षान् सरांसि विविधानि च।
पश्यन् कामाभिसंतप्तो जगाम परमं ह्रदम्॥ १३॥
श्रीराम के मन में सीताजी से मिलने की तीव्र लालसा जाग उठी थी, इससे संतप्त हो वे नाना प्रकार के वृक्षों और भाँति-भाँति के सरोवरों की शोभा देखते हुए उस उत्तम जलाशय के पास गये॥ १३॥
स तामासाद्य वै रामो दूरात् पानीयवाहिनीम्।
मतङ्गसरसं नाम ह्रदं समवगाहत॥१४॥
पम्पा नाम से प्रसिद्ध वह सरोवर पीने योग्य स्वच्छ जल बहाने वाला था। श्रीराम दूर देश से चलकर उसके तट पर आये। आकर उन्होंने मतंगसरस नामक कुण्ड में स्नान किया॥१४॥
तत्र जग्मतुरव्यग्रौ राघवौ हि समाहितौ।
स तु शोकसमाविष्टो रामो दशरथात्मजः॥१५॥
विवेश नलिनी रम्यां पंकजैश्च समावृताम्।
वे दोनों रघुवंशी वीर वहाँ शान्त और एकाग्रचित्त होकर पहुँचे थे। सीता के शोक से व्याकुल हुए दशरथनन्दन श्रीराम ने उस रमणीय पुष्करिणी पम्पा में प्रवेश किया, जो कमलों से व्याप्त थी॥ १५ १/२॥
तिलकाशोक’नागबकुलोद्दालकाशिनीम्॥१६॥
रम्योपवनसम्बाधां पद्मसम्पीडितोदकाम्।
स्फटिकोपमतोयां तां श्लक्ष्णवालुकसंतताम्॥ १७॥
मत्स्यकच्छपसम्बाधां तीरस्थद्रुमशोभिताम्।
सखीभिरिव संयुक्तां लताभिरनुवेष्टिताम्॥१८॥
किंनरोरगगन्धर्वयक्षराक्षससेविताम्।
नानाद्रुमलताकीर्णां शीतवारिनिधिं शुभाम्॥ १९॥
उसके तट पर तिलक, अशोक, नागकेसर, वकुल तथा लिसोड़े के वृक्ष उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। भाँतिभाँति के रमणीय उपवनों से वह घिरी हुई थी। उसका जल कमलपुष्पों से आच्छादित था और स्फटिक मणि के समान स्वच्छ दिखायी देता था। जल के नीचे स्वच्छ वालु का फैली हुई थी। मत्स्य और कच्छप उसमें भरे हुए थे। तटवर्ती वृक्ष उसकी शोभा बढ़ाते थे। सब ओर लताओं द्वारा आवेष्टित होने के कारण वह सखियों से संयुक्त-सी प्रतीत होती थी। किन्नर, नाग, गन्धर्व, यक्ष और राक्षस उसका सेवन करते थे। भाँति-भाँति के वृक्ष और लताओं से व्याप्त हुई पम्पा शीतल जल की सुन्दर निधि प्रतीत होती थी॥ १६–१९॥
पद्मसौगन्धिकैस्तानां शुक्लां कुमुदमण्डलैः।
नीलां कुवलयोद्घाटैर्बहुवर्णां कुथामिव॥२०॥
अरुण कमलों से वह ताम्रवर्ण की, कुमुद-कुसुमों के समूह से शुक्लवर्ण की तथा नील कमलों के समुदाय से नीलवर्ण की दिखायी देने के कारण बहुरंगे कालीन के समान शोभा पाती थी॥ २०॥
अरविन्दोत्पलवतीं पद्मसौगन्धिकायुताम्।
पुष्पिताम्रवणोपेतां बर्हिणो ष्टनादिताम्॥ २१॥
उस पुष्करिणी में अरविन्द और उत्पल खिले थे। पद्म और सौगन्धिक जाति के पुष्प शोभा पाते थे। मौर लगी हुई अमराइयों से वह घिरी हुई थी तथा मयूरों के केकानाद वहाँ गूंज रहे थे॥२१॥
स तां दृष्ट्वा ततः पम्पां रामः सौमित्रिणा सह।
विललाप च तेजस्वी रामो दशरथात्मजः॥२२॥
सुमित्राकुमार लक्ष्मणसहित श्रीराम ने जब उस मनोहर पम्पा को देखा, तब उनके हृदय में सीता की वियोग-व्यथा उद्दीप्त हो उठी; अतः वे तेजस्वी दशरथनन्दन श्रीराम वहाँ विलाप करने लगे॥ २२॥
तिलकैर्बीजपूरैश्च वटैः शुक्लद्रुमैस्तथा।
पुष्पितैः करवीरैश्च पुंनागैश्च सुपुष्पितैः॥२३॥
मालतीकुन्दगुल्मैश्च भण्डीरैर्निचुलैस्तथा।
अशोकैः सप्तपर्णैश्च कतकैरतिमुक्तकैः॥२४॥
अन्यैश्च विविधैर्वृक्षैः प्रमदामिव शोभिताम्।
अस्यास्तीरे तु पूर्वोक्तः पर्वतो धातुमण्डितः॥ २५॥
ऋष्यमूक इति ख्यातश्चित्रपुष्पितपादपः।
तिलक, बिजौरा, वट, लोध, खिले हुए करवीर, पुष्पित नागकेसर, मालती, कुन्द, झाड़ी, भंडीर (बरगद), वञ्जुल, अशोक, छितवन, कतक, माधवी लता तथा अन्य नाना प्रकार के वृक्षों से सुशोभित हुई पम्पा भाँति-भाँति की वस्त्रभूषाओं से सजी हुई युवती के समान जान पड़ती थी। उसी के तट पर विविध धातुओं से मण्डित पूर्वोक्त ऋष्यमूक नाम से विख्यात पर्वत सुशोभित था। उसके ऊपर फूलों से भरे हुए विचित्र वृक्ष शोभा दे रहे थे॥ २३– २५ १/२॥
हरिर्चाक्षरजोनाम्नः पुत्रस्तस्य महात्मनः॥२६॥
अध्यास्ते तु महावीर्यः सुग्रीव इति विश्रुतः।
ऋक्षरजा नामक महात्मा वानर के पुत्र कपिश्रेष्ठ महापराक्रमी सुग्रीव वहीं निवास करते थे॥ २६ १/२॥
सुग्रीवमभिगच्छ त्वं वानरेन्द्रं नरर्षभ॥२७॥
इत्युवाच पुनर्वाक्यं लक्ष्मणं सत्यविक्रमः।
कथं मया विना सीतां शक्यं लक्ष्मण जीवितुम्॥ २८॥
उस समय सत्यपराक्रमी श्रीराम ने पुनः लक्ष्मण से कहा—’नरश्रेष्ठ लक्ष्मण! तुम वानरराज सुग्रीव के पास चलो, मैं सीता के बिना कैसे जीवित रह सकता हूँ। २७-२८॥
इत्येवमुक्त्वा मदनाभिपीडितः स लक्ष्मणं वाक्यमनन्यचेतनः।
विवेश पम्पां नलिनीमनोरमां तमुत्तमं शोकमुदीरयाणः॥ २९॥
ऐसा कहकर सीता के दर्शन की कामना से पीड़ित तथा उनके प्रति अनन्य अनुराग रखने वाले श्रीराम उस महान् शोक को प्रकट करते हुए उस मनोरम पुष्करिणी पम्पा में उतरे॥ २९॥
क्रमेण गत्वा प्रविलोकयन् वनं ददर्श पम्पां शुभदर्शकाननाम्।
अनेकनानाविधपक्षिसंकुलां विवेश रामः सह लक्ष्मणेन॥३०॥
वन की शोभा देखते हुए क्रमशः वहाँ जाकर लक्ष्मणसहित श्रीराम ने पम्पा को देखा। उसके समीपवर्ती कानन बड़े सुन्दर और दर्शनीय थे। अनेक प्रकार के झुंड-के-झुंड पक्षी वहाँ सब ओर भरे हुए थे। भाईसहित श्रीरघुनाथजी ने पम्पा के जल में प्रवेश किया॥३०॥
इत्याचे श्रीमद्रामायाणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे पञ्चसप्ततितमः सर्गः॥ ७५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में पचहत्तरवाँ सर्ग पूराहुआ। ७५॥
॥अरण्यकाण्डं सम्पूर्णम्॥