सर्ग-41
अथ तस्मिन् निमित्तानि दृष्ट्वा लक्ष्मणपूर्वजः।
सुग्रीवं सम्परिष्वज्य रामो वचनमब्रवीत्॥१॥
सुग्रीव के शरीर में युद्ध के चिह्न देखकर लक्ष्मण के बड़े भाई श्रीराम ने उन्हें हृदय से लगा लिया और इस प्रकार कहा— ॥१॥
असम्मन्त्र्य मया सार्धं तदिदं साहसं कृतम्।
एवं साहसयुक्तानि न कुर्वन्ति जनेश्वराः॥२॥
‘सुग्रीव! तुमने मुझसे सलाह लिये बिना ही यह बड़े साहस का काम कर डाला। राजालोग ऐसे दुःसाहसपूर्ण कार्य नहीं किया करते हैं॥२॥
संशये स्थाप्य मां चेदं बलं चेमं विभीषणम्।
कष्टं कृतमिदं वीर साहसं साहसप्रिय॥३॥
‘साहसप्रिय वीर! तुमने मुझको, इस वानरसेना को और विभीषण को भी संशय में डालकर जो यह साहसपूर्ण कार्य किया है, इससे हमें बड़ा कष्ट हुआ॥ ३॥
इदानीं मा कृथा वीर एवंविधमरिंदम।
त्वयि किंचित्समापन्ने किं कार्यं सीतया मम॥४॥
भरतेन महाबाहो लक्ष्मणेन यवीयसा।
शत्रुघ्नेन च शत्रुघ्न स्वशरीरेण वा पुनः॥५॥
‘शत्रुओं का दमन करने वाले वीर! अब फिर तुम ऐसा दुःसाहस न करना। शत्रुसूदन महाबाहो! यदि तुम्हें कुछ हो गया तो मैं, सीता, भरत, लक्ष्मण, छोटे भाई शत्रुघ्न तथा अपने इस शरीर को भी लेकर क्या करूँगा?॥
त्वयि चानागते पूर्वमिति मे निश्चिता मतिः।
जानतश्चापि ते वीर्यं महेन्द्रवरुणोपम॥६॥
हत्वाहं रावणं युद्धे सपुत्रबलवाहनम्।
अभिषिच्य च लङ्कायां विभीषणमथापि च॥७॥
भरते राज्यमारोप्य त्यक्ष्ये देहं महाबल।
‘महेन्द्र और वरुण के समान महाबली! यद्यपि मैं तुम्हारे बल-पराक्रम को जानता था, तथापि जबतक तुम यहाँ लौटकर नहीं आये थे, उससे पहले मैंने यह निश्चित विचार कर लिया था कि युद्ध में पुत्र, सेना और वाहनों-सहित रावण का वध करके लङ्का के राज्य पर विभीषण का अभिषेक कर दूंगा और अयोध्या का राज्य भरत को देकर अपने इस शरीर को त्याग दूंगा’ ॥ ६-७ १/२॥
तमेवं वादिनं रामं सुग्रीवः प्रत्यभाषत॥८॥
तव भार्यापहर्तारं दृष्ट्वा राघव रावणम्।
मर्षयामि कथं वीर जानन् विक्रममात्मनः॥९॥
ऐसी बातें कहते हुए श्रीराम को सुग्रीव ने यों उत्तर दिया—’वीर रघुनन्दन! अपने पराक्रम का ज्ञान रखते हुए मैं आपकी भार्या का अपहरण करने वाले रावण को देखकर कैसे क्षमा कर सकता था?’॥ ८-९॥
इत्येवं वादिनं वीरमभिनन्द्य च राघवः।
लक्ष्मणं लक्ष्मिसम्पन्नमिदं वचनमब्रवीत्॥१०॥
वीर सुग्रीव ने जब ऐसी बात कही, तब उनका अभिनन्दन करके श्रीरामचन्द्रजी ने शोभासम्पन्न लक्ष्मण से कहा- ॥ १०॥
परिगृह्योदकं शीतं वनानि फलवन्ति च।
बलौघं संविभज्येमं व्यूह्य तिष्ठाम लक्ष्मण॥११॥
‘लक्ष्मण! शीतल जल से भरे हुए जलाशय और फलों से सम्पन्न वन का आश्रय ले हमलोग इस विशाल वानरसेना का विभाग करके व्यूहरचना कर लें और युद्ध के लिये उद्यत हो जायँ॥ ११॥
लोकक्षयकरं भीमं भयं पश्याम्युपस्थितम्।
निबर्हणं प्रवीराणामृक्षवानररक्षसाम्॥१२॥
‘इस समय मैं लोकसंहार की सूचना देने वाला भयानक अपशकुन उपस्थित देखता हूँ, जिससे सिद्ध होता है रीछों, वानरों और राक्षसों के मुख्य-मुख्य वीरों का संहार होगा॥ १२॥
वाता हि परुषं वान्ति कम्पते च वसुंधरा।
पर्वताग्राणि वेपन्ते नदन्ति धरणीधराः॥१३॥
‘प्रचण्ड आँधी चल रही है, पृथ्वी काँपने लगी है, पर्वतों के शिखर हिलने लगे हैं और दिग्गज चीत्कार करते हैं ॥ १३॥
मेघाः क्रव्यादसंकाशाः परुषाः परुषस्वराः।
क्रूराः क्रूरं प्रवर्षन्ते मिश्रं शोणितबिन्दुभिः॥१४॥
‘मेघ हिंसक जीवों के समान क्रूर हो गये हैं। वे कठोर स्वर में विकट गर्जना करते हैं तथा रक्तविन्दुओं से मिले हुए जल की क्रूरतापूर्ण वर्षा कर रहे हैं॥१४॥
रक्तचन्दनसंकाशा संध्या परमदारुणा।
ज्वलच्च निपतत्येतदादित्यादग्निमण्डलम्॥१५॥
‘अत्यन्त दारुण संध्या रक्त-चन्दन के समान लाल दिखायी देती है। सूर्य से यह जलती आग का पुञ्ज गिर रहा है॥ १५॥
आदित्यमभिवाश्यन्ति जनयन्तो महद्भयम्।
दीना दीनस्वरा घोरा अप्रशस्ता मृगद्विजाः॥१६॥
‘निषिद्ध पशु और पक्षी दीन हो दीनतासूचक स्वर में सूर्य की ओर देखते हुए चीत्कार करते हैं, इससे वे बड़े भयंकर लगते और महान् भय उत्पन्न करते हैं।
रजन्यामप्रकाशश्च संतापयति चन्द्रमाः।
कृष्णरक्तांशुपर्यन्तो यथा लोकस्य संक्षये॥१७॥
‘रात में चन्द्रमा का प्रकाश क्षीण हो जाता है। वे शीतलता की जगह संताप देते हैं। उनके किनारे का भाग काला और लाल दिखायी देता है। समस्त लोकों के संहारकाल में चन्द्रमा का जैसा रूप रहता है, वैसा ही इस समय भी देखा जाता है॥ १७॥
ह्रस्वो रूक्षोऽप्रशस्तश्च परिवेषः सुलोहितः।
आदित्यमण्डले नीलं लक्ष्म लक्ष्मण दृश्यते॥१८॥
‘लक्ष्मण! सूर्यमण्डल में छोटा, रूखा, अमङ्गलकारी और अत्यन्त लाल घेरा दिखायी देता है। साथ ही वहाँ काला चिह्न भी दृष्टिगोचर होता है। १८॥
दृश्यन्ते न यथावच्च नक्षत्राण्यभिवर्तते।
युगान्तमिव लोकस्य पश्य लक्ष्मण शंसति॥१९॥
‘लक्ष्मण! ये नक्षत्र अच्छी तरह प्रकाशित नहीं हो रहे हैं—मलिन दिखायी देते हैं। यह अशुभ लक्षण संसार का प्रलय-सा सूचित करता हुआ मेरे सामने प्रकट हो रहा है॥ १९॥
काकाः श्येनास्तथा गृध्रा नीचैः परिपतन्ति च।
शिवाश्चाप्यशुभा वाचः प्रवदन्ति महास्वनाः॥२०॥
‘कौए, बाज और गीध नीचे गिरते हैं—भूतल पर आ-आ बैठते हैं और गीदड़ियाँ बड़े जोर-जोर से अमङ्गलसूचक बोली बोलती हैं॥ २०॥
शैलैः शूलैश्च खड्गैश्च विमुक्तैः कपिराक्षसैः।
भविष्यत्यावृता भूमिमा॑सशोणितकर्दमा॥ २१॥
‘इससे सूचित होता है कि वानरों और राक्षसों द्वारा चलाये गये शिलाखण्डों, शूलों और खड्गों से यह धरती पट जायगी और यहाँ रक्त-मांस की कीच जम जायगी॥
क्षिप्रमद्य दुराधर्षां पुरीं रावणपालिताम्।
अभियाम जवेनैव सर्वतो हरिभिर्वृताः॥२२॥
‘रावण के द्वारा पालित यह लङ्कापुरी शत्रुओं के लिये दुर्जय है, तथापि अब हम शीघ्र ही वानरों के साथ इसपर सब ओर से वेगपूर्वक आक्रमण करें’। २२॥
इत्येवं तु वदन् वीरो लक्ष्मणं लक्ष्मणाग्रजः।
तस्मादवातरच्छीघ्रं पर्वताग्रान्महाबलः॥२३॥
लक्ष्मण से ऐसा कहते हुए वीर महाबली श्रीरामचन्द्रजी उस पर्वत-शिखर से तत्काल नीचे उतर आये॥२३॥
अवतीर्य तु धर्मात्मा तस्माच्छैलात् स राघवः।
परैः परमदुर्धर्षं ददर्श बलमात्मनः॥ २४॥
उस पर्वत से उतरकर धर्मात्मा श्रीरघुनाथजी ने अपनी सेना का निरीक्षण किया, जो शत्रुओं के लिये अत्यन्त दुर्जय थी॥२४॥
संना तु ससुग्रीवः कपिराजबलं महत्।
कालज्ञो राघवः काले संयुगायाभ्यचोदयत्॥२५॥
फिर सुग्रीव की सहायता से कपिराज की उस विशाल सेना को सुसज्जित करके समय का ज्ञान रखने वाले श्रीराम ने ज्योतिषशास्त्रोक्त शुभ समय में उसे युद्ध के लिये कूच करने की आज्ञा दी॥ २५ ॥
ततः काले महाबाहुर्बलेन महता वृतः।
प्रस्थितः पुरतो धन्वी लङ्कामभिमुखः पुरीम्॥२६॥
तदनन्तर महाबाहु धनुर्धर श्रीरघुनाथजी उस विशाल सेना के साथ शुभ मुहूर्त में आगे-आगे लङ्कापुरी की ओर प्रस्थित हुए॥२६॥
तं विभीषणसुग्रीवौ हनूमाञ्जाम्बवान् नलः।
ऋक्षराजस्तथा नीलो लक्ष्मणश्चान्वयुस्तदा।२७॥
उस समय विभीषण, सुग्रीव, हनुमान्, ऋक्षराज जाम्बवान्, नल, नील तथा लक्ष्मण उनके पीछे-पीछे चले॥
ततः पश्चात् सुमहती पृतनक्षवनौकसाम्।
प्रच्छाद्य महती भूमिमनुयाति स्म राघवम्॥२८॥
तत्पश्चात् रीछों और वानरों की वह विशाल सेना बहुत बड़ी भूमि को आच्छादित करके श्रीरघुनाथजी के पीछे-पीछे चली॥ २८॥
शैलशृङ्गाणि शतशः प्रवृद्धांश्च महीरुहान्।
जगृहुः कुञ्जरप्रख्या वानराः परवारणाः॥२९॥
शत्रुओं को आगे बढ़ने से रोकने वाले हाथी के समान विशालकाय वानरों ने सैकड़ों शैलशिखरों और बड़े बड़े वृक्षों को हाथ में ले रखा था॥ २९॥
तौ त्वदीर्पण कालेन भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ।
रावणस्य पुरीं लङ्कामासेदतुररिंदमौ॥३०॥
शत्रुओं का दमन करने वाले वे दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण थोड़ी ही देर में लङ्कापुरी के पास पहुँच गये॥
पताकामालिनी रम्यामुद्यानवनशोभिताम्।
चित्रवप्रां सुदुष्प्रापामुच्चैः प्राकारतोरणाम्॥३१॥
वह रमणीय ध्वजा-पताकाओं से अलंकृत थी। अनेकानेक उद्यान और वन उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। उसके चारों ओर बड़ा ही अद्भुत और ऊँचा परकोटा था। उस परकोटे से मिला हुआ ही नगर का सदर फाटक था। उन परकोटों के कारण लङ्कापुरी में पहँचना किसी के लिये भी अत्यन्त कठिन था॥३१॥
तां सुरैरपि दुर्धर्षां रामवाक्यप्रचोदिताः।
यथानिदेशं सम्पीड्य न्यविशन्त वनौकसः॥३२॥
यद्यपि देवताओं के लिये भी लङ्का पर आक्रमण करना कठिन काम था तो भी श्रीराम की आज्ञा से प्रेरित हो वानर यथास्थान रहकर उस पुरी पर घेरा डालकर उसके भीतर प्रवेश करने लगे॥३२॥
लङ्कायास्तूत्तरद्वारं शैलशृङ्गमिवोन्नतम्।
रामः सहानुजो धन्वी जुगोप च रुरोध च॥३३॥
लङ्का का उत्तर द्वार पर्वतशिखर के समान ऊँचा था। श्रीराम और लक्ष्मण ने धनुष हाथ में लेकर उसका मार्ग रोक लिया और वहीं रहकर वे अपनी सेना की रक्षा करने लगे॥३३॥
लङ्कामुपनिविष्टस्तु रामो दशरथात्मजः।
लक्ष्मणानुचरो वीरः पुरीं रावणपालिताम्॥३४॥
उत्तरद्वारमासाद्य यत्र तिष्ठति रावणः।
नान्यो रामाद्धि तद् द्वारं समर्थः परिरक्षितुम्॥३५॥
दशरथनन्दन वीर श्रीराम लक्ष्मण को साथ ले रावणपालित लङ्कापुरी के पास जा उत्तर द्वार पर पहुँचकर जहाँ स्वयं रावण खड़ा था, वहीं डट गये। श्रीराम के सिवा दूसरा कोई उस द्वार पर अपने सैनिकों की रक्षा करने में समर्थ नहीं हो सकता था। ३४-३५॥
रावणाधिष्ठितं भीमं वरुणेनेव सागरम्।
सायुधै राक्षसैर्भीमैरभिगुप्तं समन्ततः॥३६॥
अस्त्र-शस्त्रधारी भयंकर राक्षसों द्वारा सब ओर से सुरक्षित उस भयानक द्वार पर रावण उसी तरह खड़ा था, जैसे वरुण देवता समुद्र में अधिष्ठित होते हैं। ३६॥
लघूनां त्रासजननं पातालमिव दानवैः।
विन्यस्तानि च योधानां बहूनि विविधानि च॥३७॥
ददर्शायुधजालानि तथैव कवचानि च।
वह उत्तर द्वार अल्प बलशाली पुरुषों के मन में उसी प्रकार भय उत्पन्न करता था, जैसे दानवों द्वारा सुरक्षित पाताल भयदायक जान पड़ता है। उस द्वारके भीतर योद्धाओं के बहुत-से भाँति-भाँति के अस्त्र-शस्त्र और कवच रखे गये थे, जिन्हें भगवान् श्रीराम ने देखा॥
पूर्वं तु द्वारमासाद्य नीलो हरिचमपतिः॥३८॥
अतिष्ठत् सह मैन्देन द्विविदेन च वीर्यवान्।
वानरसेनापति पराक्रमी नील मैन्द और द्विविद के साथ लङ्का के पूर्वद्वार पर जाकर डट गये॥३८ १/२॥
अङ्गदो दक्षिणद्वारं जग्राह सुमहाबलः॥३९॥
ऋषभेण गवाक्षेण गजेन गवयेन च।
महाबली अङ्गद ने ऋषभ, गवाक्ष, गज और गवय के साथ दक्षिण द्वार पर अधिकार जमा लिया। ३९ १/२॥
हनूमान् पश्चिमद्वारं ररक्ष बलवान् कपिः॥४०॥
प्रमाथिप्रघसाभ्यां च वीरैरन्यैश्च संगतः।
प्रमाथी, प्रघस तथा अन्य वानरवीरों के साथ बलवान् कपिश्रेष्ठ हनुमान् ने पश्चिम द्वार का मार्ग रोक लिया॥ ४० १/२॥
मध्यमे च स्वयं गुल्मे सुग्रीवः समतिष्ठत॥४१॥
सह सर्वैर्हरिश्रेष्ठैः सुपर्णपवनोपमैः।
उत्तर और पश्चिम के मध्यभाग में (वायव्यकोण में) जो राक्षससेना की छावनी थी, उसपर गरुड़ और वायु के समान वेगशाली श्रेष्ठ वानरवीरों के साथ सुग्रीव ने आक्रमण किया॥ ४१ १/२॥
वानराणां तु षट्त्रिंशत्कोट्यः प्रख्यातयूथपाः॥४२॥
निपीड्योपनिविष्टाश्च सुग्रीवो यत्र वानरः।
जहाँ वानरराज सुग्रीव थे, वहाँ वानरों के छत्तीस करोड़ विख्यात यूथपति राक्षसों को पीड़ा देते हुए उपस्थित रहते थे॥ ४२ १/२॥
शासनेन तु रामस्य लक्ष्मणः सविभीषणः॥४३॥
द्वारे द्वारे हरीणां तु कोटि कोटीर्यवेशयत्।
श्रीराम की आज्ञा से विभीषणसहित लक्ष्मण ने लङ्का के प्रत्येक द्वार पर एक-एक करोड़ वानरों को नियुक्त कर दिया॥ ४३ १/२॥
पश्चिमेन तु रामस्य सुषेणः सहजाम्बवान्॥४४॥
अदूरान्मध्यमे गुल्मे तस्थौ बहुबलानुगः।
सुषेण और जाम्बवान् बहुत-सी सेना के साथ श्रीरामचन्द्रजी के पीछे थोड़ी ही दूर पर रहकर बीच के मोर्चे की रक्षा करते रहे॥ ४४ १/२ ।।
ते तु वानरशार्दूलाः शार्दूला इव दंष्ट्रिणः।
गृहीत्वा द्रुमशैलाग्रान् हृष्टा युद्धाय तस्थिरे॥४५॥
वे वानरसिंह बाघों के समान बड़े-बड़े दाढ़ों से युक्त थे। वे हर्ष और उत्साह में भरकर हाथों में वृक्ष और पर्वत-शिखर लिये युद्धके लिये डट गये॥ ४५ ॥
सर्वे विकृतलाङ्गलाः सर्वे दंष्ट्रानखायुधाः।
सर्वे विकृतचित्राङ्गाः सर्वे च विकृताननाः॥४६॥
सभी वानरों की पूँछे क्रोध के कारण अस्वाभाविक रूप से हिल रही थीं। दाढ़ें और नख ही उन सबके आयुध थे। उन सबके मुख आदि अङ्गों पर क्रोधरूप विकार के विचित्र चिह्न परिलक्षित होते थे तथा सबके मुख विकट एवं विकराल दिखायी देते थे। ४६॥
दशनागबलाः केचित् केचिद् दशगुणोत्तराः।
केचिन्नागसहस्रस्य बभूवुस्तुल्यविक्रमाः॥४७॥
इनमें से किन्हीं वानरों में दस हाथियों का बल था, कोई उनसे भी दस गुने अधिक बलवान् थे तथा किन्हीं में एक हजार हाथियों के समान बल था॥ ४७॥
सन्ति चौघबलाः केचित् केचिच्छतगुणोत्तराः।
अप्रमेयबलाश्चान्ये तत्रासन् हरियूथपाः॥४८॥
किन्हीं में दस हजार हाथियों की शक्ति थी, कोई इनसे भी सौ गुने बलवान् थे तथा अन्य बहुतेरे वानरयूथपतियों में तो बल का परिमाण ही नहीं था। वे असीम बलशाली थे॥४८॥
अद्भुतश्च विचित्रश्च तेषामासीत् समागमः।
तत्र वानरसैन्यानां शलभानामिवोद्गमः॥४९॥
वहाँ उन वानरसेनाओं का टिड्डीदल के उद्गमके समान अद्भुत एवं विचित्र समागम हुआ था॥४९॥
परिपूर्णमिवाकाशं सम्पूर्णेव च मेदिनी।
लङ्कामुपनिविष्टैश्च सम्पतद्भिश्च वानरैः॥५०॥
लङ्का में उछल-उछलकर आते हुए वानरों से आकाश भर गया था और पुरी में प्रवेश करके खड़े हुए कपिसमूहों से वहाँ की सारी पृथ्वी आच्छादित हो गयी थी॥५०॥
शतं शतसहस्राणां पृतनक्षवनौकसाम्।
लङ्काद्वाराण्युपाजग्मुरन्ये योद्धं समन्ततः॥५१॥
रीछों और वानरों की एक करोड़ सेना तो लङ्का के चारों द्वारों पर आकर डटी थी और अन्य सैनिक सब ओर युद्ध के लिये चले गये थे॥५१॥
आवृतः स गिरिः सर्वैस्तैः समन्तात् प्लवङ्गमैः।
अयुतानां सहस्रं च पुरी तामभ्यवर्तत॥५२॥
समस्त वानरों ने चारों ओर से उस त्रिकूट पर्वत को (जिस पर लङ्का बसी थी) घेर लिया था। सहस्र अयुत (एक करोड़) वानर तो उस पुरी में सभी द्वारों पर लड़ती हुई सेना का समाचार लेने के लिये नगर में सब ओर घूमते रहते थे॥५२॥
वानरैर्बलवद्भिश्च बभूव द्रुमपाणिभिः।
सर्वतः संवृता लङ्का दुष्प्रवेशापि वायुना ॥५३॥
हाथों में वृक्ष लिये बलवान् वानरों द्वारा सब ओर से घिरी हुई लङ्का में वायु के लिये भी प्रवेश पाना कठिन हो गया था॥ ५३॥
राक्षसा विस्मयं जग्मुः सहसाभिनिपीडिताः।
वानरैर्मेघसंकाशैः शक्रतुल्यपराक्रमैः॥५४॥
मेघ के समान काले एवं भयंकर तथा इन्द्रतुल्य पराक्रमी वानरों द्वारा सहसा पीड़ित होने के कारण राक्षसों को बड़ा विस्मय हुआ॥ ५४॥
महाञ्छब्दोऽभवत् तत्र बलौघस्याभिवर्ततः।
सागरस्येव भिन्नस्य यथा स्यात् सलिलस्वनः॥५५॥
जैसे सेतु को विदीर्ण कर अथवा मर्यादा को तोड़कर बहने वाले समुद्र के जल का महान् शब्द होता है, उसी प्रकार वहाँ आक्रमण करती हुई विशाल वानरसेना का महान् कोलाहल हो रहा था॥ ५५ ॥
तेन शब्देन महता सप्राकारा सतोरणा।
लङ्का प्रचलिता सर्वा सशैलवनकानना॥५६॥
उस महान् कोलाहल से परकोटों, फाटकों, पर्वतों, वनों तथा काननोंसहित समूची लङ्कापुरी में हलचल मच गयी॥५६॥
रामलक्ष्मणगुप्ता सा सुग्रीवेण च वाहिनी।
बभूव दुर्धर्षतरा सर्वैरपि सुरासुरैः॥५७॥
श्रीराम, लक्ष्मण और सुग्रीव से सुरक्षित वह विशाल वानरवाहिनी समस्त देवताओं और असुरों के लिये भी अत्यन्त दुर्जय हो गयी थी॥ ५७॥
राघवः संनिवेश्यैवं स्वसैन्यं रक्षसां वधे।
सम्मन्त्र्य मन्त्रिभिः सार्धं निश्चित्य च पुनः पुनः॥५८॥
आनन्तर्यमभिप्रेप्सुः क्रमयोगार्थतत्त्ववित् ।
विभीषणस्यानुमते राजधर्ममनुस्मरन्॥५९॥
अङ्गदं वालितनयं समाहूयेदमब्रवीत्।
इस प्रकार राक्षसों के वध के लिये अपनी सेना को यथास्थान खड़ी करके उसके बाद के कर्तव्य को जानने की इच्छा से श्रीरघुनाथजी ने मन्त्रियों के साथ बारंबार सलाह की और एक निश्चय पर पहुँचकर साम, दान आदि उपायों के क्रमशः प्रयोग से सुलभ होने वाले अर्थतत्त्व के ज्ञाता श्रीराम विभीषण की अनुमति ले राजधर्म का विचार करते हुए वालिपुत्र अङ्गद को बुलाकर उनसे इस प्रकार बोले
गत्वा सौम्य दशग्रीवं ब्रूहि मद्रचनात् कपे॥६०॥
लवयित्वा पुरीं लङ्कां भयं त्यक्त्वा गतव्यथः।
भ्रष्टश्रीकं गतैश्वर्यं मुमूर्षानष्टचेतनम्॥६१॥
‘सौम्य! कपिप्रवर! दशमुख रावण राज्यलक्ष्मी से भ्रष्ट हो गया, अब उसका ऐश्वर्य समाप्त हो चला, वह मरना ही चाहता है, इसलिये उसकी चेतना (विचार-शक्ति) नष्ट हो गयी है। तुम परकोटा लाँघकर लङ्कापुरी में भय छोड़कर जाओ और व्यथारहित हो उससे मेरी ओर से ये बातें कहो— ॥ ६०-६१॥
ऋषीणां देवतानां च गन्धर्वाप्सरसां तथा।
नागानामथ यक्षाणां राज्ञां च रजनीचर॥६२॥
यच्च पापं कृतं मोहादवलिप्तेन राक्षस।
नूनं ते विगतो दर्पः स्वयंभूवरदानजः।
तस्य पापस्य सम्प्राप्ता व्युष्टिरद्य दुरासदा॥६३॥
“निशाचर! राक्षसराज! तुमने मोहवश घमंड में आकर ऋषि, देवता, गन्धर्व, अप्सरा, नाग, यक्ष और राजाओं का बड़ा अपराध किया है। ब्रह्माजी का वरदान पाकर तुम्हें जो अभिमान हो गया था, निश्चय ही उसके नष्ट होने का अब समय आ गया है। तुम्हारे उस पाप का दुःसह फल आज उपस्थित है। ६२-६३॥
यस्य दण्डधरस्तेऽहं दाराहरणकर्शितः।
दण्डं धारयमाणस्तु लङ्काद्वारे व्यवस्थितः॥६४॥
“मैं अपराधियों को दण्ड देने वाला शासक हूँ। तुमने जो मेरी भार्या का अपहरण किया है, इससे मुझे बड़ा कष्ट पहुँचा है; अतः तुम्हें उसका दण्ड देने के लिये मैं लङ्का के द्वार पर आकर खड़ा हूँ॥ ६४ ॥
पदवी देवतानां च महर्षीणां च राक्षस।
राजर्षीणां च सर्वेषां गमिष्यसि युधि स्थिरः॥६५॥
“राक्षस! यदि तुम युद्ध में स्थिरतापूर्वक खड़े रहे तो उन समस्त देवताओं, महर्षियों और राजर्षियों की पदवी को पहुँच जाओगे—उन्हीं की भाँति तुम्हें परलोकवासी होना पड़ेगा॥६५॥
बलेन येन वै सीतां मायया राक्षसाधम।
मामतिक्रमयित्वा त्वं हृतवांस्तन्निदर्शय॥६६॥
“नीच निशाचर! जिस बल के भरोसे तुमने मुझे धोखा देकर माया से सीता का हरण किया है, उसे आज युद्ध के मैदान में दिखाओ॥६६॥
अराक्षसमिमं लोकं कर्तास्मि निशितैः शरैः।
न चेच्छरणमभ्येषि तामादाय तु मैथिलीम्॥६७॥
“यदि तुम मिथिलेशकुमारी को लेकर मेरी शरण में नहीं आये तो मैं अपने तीखे बाणों द्वारा इस संसार को राक्षसों से सूना कर दूंगा॥६७॥
धर्मात्मा राक्षसश्रेष्ठः सम्प्राप्तोऽयं विभीषणः।
लडैश्वर्यमिदं श्रीमान् ध्रुवं प्राप्नोत्यकण्टकम्॥६८॥
“राक्षसों में श्रेष्ठ ये श्रीमान् धर्मात्मा विभीषण भी मेरे साथ यहाँ आये हैं, निश्चय ही लङ्का का निष्कण्टक राज्य इन्हें ही प्राप्त होगा॥ ६८॥
नहि राज्यमधर्मेण भोक्तुं क्षणमपि त्वया।
शक्यं मूर्खसहायेन पापेनाविदितात्मना॥६९॥
“तुम पापी हो। तुम्हें अपने स्वरूप का ज्ञान नहीं है और तुम्हारे संगी-साथी भी मूर्ख हैं; अतः इस प्रकार अधर्मपूर्वक अब तुम एक क्षण भी इस राज्य को नहीं भोग सकोगे॥६९॥
युध्यस्व मा धृतिं कृत्वा शौर्यमालम्ब्य राक्षस।
मच्छरैस्त्वं रणे शान्तस्ततः पूतो भविष्यसि॥७०॥
“राक्षस! शूरता का आश्रय ले धैर्य धारण करके मेरे साथ युद्ध करो। रणभूमि में मेरे बाणों से शान्त (प्राणशून्य) होकर तुम पूत (शुद्ध एवं निष्पाप) हो जाओगे॥ ७० ॥
यद्याविशसि लोकांस्त्रीन् पक्षीभूतो निशाचर।
मम चक्षुःपथं प्राप्य न जीवन् प्रतियास्यसि॥७१॥
“निशाचर ! मेरे दृष्टिपथ में आने के पश्चात् यदि तुम पक्षी होकर तीनों लोकों में उड़ते और छिपते फिरो तो भी अपने घर को जीवित नहीं लौट सकोगे॥ ७१॥
ब्रवीमि त्वां हितं वाक्यं क्रियतामौर्ध्वदेहिकम्।
सुदृष्टा क्रियतां लङ्का जीवितं ते मयि स्थितम्॥७२॥
“अब मैं तुम्हें हित की बात बताता हूँ। तुम अपना श्राद्ध कर डालो—परलोक में सुख देने वाले दान-पुण्य कर लो और लङ्का को जी भरकर देख लो; क्योंकि तुम्हारा जीवन मेरे अधीन हो चुका है”॥७२॥
इत्युक्तः स तु तारेयो रामेणाक्लिष्टकर्मणा।
जगामाकाशमाविश्य मूर्तिमानिव हव्यवाट् ॥७३॥
अनायास ही महान् कर्म करने वाले भगवान् श्रीराम के ऐसा कहने पर ताराकुमार अङ्गद मूर्तिमान् अग्नि की भाँति आकाशमार्ग से चल दिये॥७३॥
सोऽतिपत्य मुहूर्तेन श्रीमान् रावणमन्दिरम्।
ददर्शासीनमव्यग्रं रावणं सचिवैः सह॥७४॥
श्रीमान् अङ्गद एक ही मुहूर्त में परकोटा लाँघकर रावण के राजभवन में जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने मन्त्रियों के साथ शान्तभाव से बैठे हुए रावण को देखा। ७४॥
ततस्तस्याविदूरेण निपत्य हरिपुंगवः।
दीप्ताग्निसदृशस्तस्थावङ्गदः कनकाङ्गदः॥७५॥
वानरश्रेष्ठ अङ्गद सोने के बाजूबंद पहने हुए थे और प्रज्वलित अग्नि के समान प्रकाशित हो रहे थे, वे रावण के निकट पहुँचकर खड़े हो गये॥ ७५ ॥
तद् रामवचनं सर्वमन्यूनाधिकमुत्तमम्।
सामात्यं श्रावयामास निवेद्यात्मानमात्मना॥७६॥
उन्होंने पहले अपना परिचय दिया और मन्त्रियोंसहित रावण को श्रीरामचन्द्रजी की कही हुई सारी उत्तम बातें ज्यों-की-त्यों सुना दीं। न तो एक भी शब्द कम किया और न बढ़ाया। ७६ ॥
दूतोऽहं कोसलेन्द्रस्य रामस्याक्लिष्टकर्मणः।
वालिपुत्रोऽङ्गदो नाम यदि ते श्रोत्रमागतः॥७७॥
वे बोले—’मैं अनायास ही बड़े-बड़े उत्तम कर्म करने वाले कोसलनरेश महाराज श्रीराम का दूत और वाली का पुत्र अङ्गद हूँ। सम्भव है कभी मेरा नाम भी तुम्हारे कानों में पड़ा हो॥७७॥
आह त्वां राघवो रामः कौसल्यानन्दवर्धनः।
निष्पत्य प्रतियुध्यस्व नृशंस पुरुषो भव॥७८॥
‘माता कौसल्या का आनन्द बढ़ाने वाले रघुकुलतिलक श्रीराम ने तुम्हारे लिये यह संदेश दिया है’नृशंस रावण! जरा मर्द बनो और घर से बाहर निकलकर युद्ध में मेरा सामना करो॥ ७८ ॥
हन्तास्मि त्वां सहामात्यं सपुत्रज्ञातिबान्धवम्।
निरुद्विग्नास्त्रयो लोका भविष्यन्ति हते त्वयि॥७९॥
“मैं मन्त्री, पुत्र और बन्धु-बान्धवोंसहित तुम्हारा वध करूँगा; क्योंकि तुम्हारे मारे जाने से तीनों लोकों के प्राणी निर्भय हो जायेंगे॥ ७९ ॥
देवदानवयक्षाणां गन्धर्वोरगरक्षसाम्।
शत्रुमद्योधरिष्यामि त्वामृषीणां च कण्टकम्॥८०॥
“तुम देवता, दानव, यक्ष, गन्धर्व, नाग और राक्षस -सभी के शत्रु हो। ऋषियों के लिये तो कंटकरूप ही हो; अतः आज मैं तुम्हें उखाड़ फेंकूँगा॥ ८०॥
विभीषणस्य चैश्वर्यं भविष्यति हते त्वयि।
न चेत् सत्कृत्य वैदेहीं प्रणिपत्य प्रदास्यसि॥८१॥
“अतः यदि तुम मेरे चरणों में गिरकर आदरपूर्वक सीता को नहीं लौटाओगे तो मेरे हाथ से मारे जाओगे और तुम्हारे मारे जाने पर लङ्का का सारा ऐश्वर्य विभीषण को प्राप्त होगा”॥ ८१॥
इत्येवं परुषं वाक्यं ब्रुवाणे हरिपुङ्गवे।
अमर्षवशमापन्नो निशाचरगणेश्वरः॥ ८२॥
वानरशिरोमणि अङ्गद के ऐसे कठोर वचन कहने पर निशाचरगणों का राजा रावण अत्यन्त अमर्ष से भर गया॥
ततः स रोषमापन्नः शशास सचिवांस्तदा।
गृह्यतामिति दुर्मेधा वध्यतामिति चासकृत्॥८३॥
रोष से भरे हुए रावण ने उस समय अपने मन्त्रियों से बार-बार कहा–’पकड़ लो इस दुर्बुद्धि वानर को और मार डालो’ ॥ ८३॥
रावणस्य वचः श्रुत्वा दीप्ताग्निमिव तेजसा।
जगृहुस्तं ततो घोराश्चत्वारो रजनीचराः॥८४॥
रावण की यह बात सुनकर चार भयंकर निशाचरों ने प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी अङ्गद को पकड़ लिया॥
ग्राहयामास तारेयः स्वयमात्मानमात्मवान्।
बलं दर्शयितुं वीरो यातुधानगणे तदा ॥ ८५॥
आत्मबल से सम्पन्न ताराकुमार अङ्गद ने उस समय राक्षसों को अपना बल दिखाने के लिये स्वयं ही अपने-आपको पकड़ा दिया॥ ८५ ॥
स तान् बाहुद्यासक्तानादाय पतगानिव।
प्रासादं शैलसंकाशमुत्पपाताङ्गदस्तदा॥८६॥
फिर वे पक्षियोंकी तरह अपनी दोनों भुजाओं से जकड़े हुए उन चारों राक्षसों को लिये-दिये ही उछले और उस महल की छत पर, जो पर्वतशिखर के समान ऊँची थी, चढ़ गये॥८६॥
तस्योत्पतनवेगेन निर्धूतास्तत्र राक्षसाः।
भूमौ निपतिताः सर्वे राक्षसेन्द्रस्य पश्यतः॥८७॥
उनके उछलने के वेग से झटका खाकर वे सब राक्षस राक्षसराज रावण के देखते-देखते पृथ्वी पर गिर पड़े। ८७॥
ततः प्रासादशिखरं शैलशृङ्गमिवोन्नतम्।
चक्राम राक्षसेन्द्रस्य वालिपुत्रः प्रतापवान्॥८८॥
तदनन्तर प्रतापी वालिकुमार अङ्गद राक्षसराज के उस महल की चोटी पर, जो पर्वतशिखर के समान ऊँची थी, पैर पटकते हुए घूमने लगे॥ ८८॥
पफाल च तदाक्रान्तं दशग्रीवस्य पश्यतः।
पुरा हिमवतः शृङ्गं वज्रेणेव विदारितम्॥८९॥
उनके पैरों से आक्रान्त होकर वह छत रावण के देखते-देखते फट गयी। ठीक उसी तरह, जैसे पूर्वकाल में वज्र के आघात से हिमालय का शिखर विदीर्ण हो गयाथा॥
भक्त्वा प्रासादशिखरं नाम विश्राव्य चात्मनः।
विनद्य सुमहानादमुत्पपात विहायसा॥९०॥
इस प्रकार महल की छत तोड़कर उन्होंने अपना नाम सुनाते हुए बड़े जोर से सिंहनाद किया और वे आकाशमार्ग से उड़ चले॥९०॥
व्यथयन् राक्षसान् सर्वान् हर्षयंश्चापि वानरान्।
स वानराणां मध्ये तु रामपार्श्वमुपागतः॥९१॥
राक्षसों को पीड़ा देते और समस्त वानरों का हर्ष बढ़ाते हुए वे वानरसेना के बीच श्रीरामचन्द्रजी के पास लौट आये॥९१॥
रावणस्तु परं चक्रे क्रोधं प्रासादधर्षणात्।
विनाशं चात्मनः पश्यन् निःश्वासपरमोऽभवत्॥९२॥
अपने महल के टूटने से रावण को बड़ा क्रोध हुआ, परंतु विनाश की घड़ी आयी देख वह लंबी साँस छोड़ने लगा॥ ९२॥
रामस्तु बहुभिर्हृष्टैर्विनदद्भिः प्लवङ्गमैः।
वृतो रिपुवधाकाङ्क्षी युद्धायैवाभ्यवर्तत॥९३॥
इधर श्रीरामचन्द्रजी हर्ष से भरकर गर्जना करते हुए बहुसंख्यक वानरों से घिरे रहकर युद्ध के लिये ही डटे रहे। वे अपने शत्रु का वध करना चाहते थे॥९३॥
सुषेणस्तु महावीर्यो गिरिकूटोपमो हरिः।
बहुभिः संवृतस्तत्र वानरैः कामरूपिभिः॥९४॥
स तु द्वाराणि संयम्य सुग्रीववचनात् कपिः।
पर्यक्रामत दुर्धर्षो नक्षत्राणीव चन्द्रमाः॥ ९५॥
इसी समय पर्वतशिखर के समान विशालकाय महापराक्रमी दुर्जय वानर वीर सुषेण ने इच्छानुसार रूप धारण करने वाले बहुसंख्यक वानरों के साथ लङ्का के सभी दरवाजों को काबू में कर लिया और सुग्रीव की आज्ञा के अनुसार वे (अपने सैनिकों की रक्षा करने एवं सभी द्वारों का समाचार जानने के लिये) बारी-बारी से उन सब पर विचरने लगे, जैसे चन्द्रमा क्रमशः सब नक्षत्रों पर गमन करते हैं। ९४-९५॥
तेषामक्षौहिणिशतं समवेक्ष्य वनौकसाम्।
लङ्कामुपनिविष्टानां सागरं चाभिवर्तताम्॥९६॥
राक्षसा विस्मयं जग्मुस्त्रासं जग्मुस्तथापरे।
अपरे समरे हर्षाद्धर्षमेवोपपेदिरे॥९७॥
लङ्का पर घेरा डालकर समुद्रतक फैले हुए उन वनवासी वानरों की सौ अक्षौहिणी सेनाओं को देख राक्षसों को बड़ा विस्मय हुआ। बहुत-से निशाचर भयभीत हो गये तथा अन्य कितने ही राक्षस समराङ्गण में हर्ष और उत्साह से भर गये॥ ९६-९७॥
कृत्स्नं हि कपिभिर्व्याप्तं प्राकारपरिखान्तरम्।
ददृशू राक्षसा दीनाः प्राकारं वानरीकृतम्।
हाहाकारमकुर्वन्त राक्षसा भयमागताः॥९८॥
उस समय लङ्का की चहारदीवारी और खाईं सारी की-सारी वानरों से व्याप्त हो रही थी। इस तरह राक्षसों ने चहारदीवारी को जब वानराकार हुई देखा, तब वे दीन-दुःखी और भयभीत हो हाहाकार करने लगे॥९८॥
तस्मिन् महाभीषणके प्रवृत्ते कोलाहले राक्षसराजयोधाः।
प्रगृह्य रक्षांसि महायुधानि युगान्तवाता इव संविचेरुः॥९९॥
वह महाभीषण कोलाहल आरम्भ होने पर राक्षसराज रावण के योद्धा निशाचर बड़े-बड़े आयुध हाथों में लेकर प्रलयकाल की प्रचण्ड वायु के समान सब ओर विचरने लगे॥ ९९॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे एकचत्वारिंशः सर्गः॥४१॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में इकतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।४१॥
सर्ग-42
ततस्ते राक्षसास्तत्र गत्वा रावणमन्दिरम्।
न्यवेदयन् पुरीं रुद्धां रामेण सह वानरैः॥१॥
तदनन्तर उन राक्षसों ने रावण के महल में जाकर यह निवेदन किया कि ‘वानरों के साथ श्रीराम ने लङ्कापुरी को चारों ओर से घेर लिया है’॥१॥
रुद्धां तु नगरीं श्रुत्वा जातक्रोधो निशाचरः।
विधानं द्विगुणं कृत्वा प्रासादं चाप्यरोहत॥२॥
लङ्का के घेरे जाने की बात सुनकर रावण को बड़ा क्रोध हुआ और वह नगर की रक्षा का पहले से भी दुगुना प्रबन्ध करके महल की अटारी पर चढ़ गया। २॥
स ददर्श वृतां लङ्कां सशैलवनकाननाम्।
असंख्येयैर्हरिगणैः सर्वतो युद्धकातिभिः॥३॥
वहीं से उसने देखा कि पर्वत, वन और काननोंसहित सारी लङ्का सब ओर से असंख्य युद्धाभिलाषी वानरों द्वारा घिरी हुई है॥३॥
स दृष्ट्वा वानरैः सर्वैर्वसुधां कपिलीकृताम्।
कथं क्षपयितव्याः स्युरिति चिन्तापरोऽभवत्॥४॥
इस प्रकार समस्त वानरों से आच्छादित वसुधा को कपिल वर्ण की हुई देख वह इस चिन्ता में पड़ गया कि इन सबका विनाश कैसे होगा?॥४॥
स चिन्तयित्वा सुचिरं धैर्यमालम्ब्य रावणः।
राघवं हरियूथांश्च ददर्शायतलोचनः॥५॥
बहुत देर तक चिन्ता करने के पश्चात् धैर्य धारण करके विशाल नेत्रोंवाले रावण ने श्रीराम और वानरसेनाओं की ओर पुनः देखा ॥५॥
राघवः सह सैन्येन मुदितो नाम पुप्लुवे।
लङ्कां ददर्श गुप्तां वै सर्वतो राक्षसैर्वृताम्॥६॥
इधर श्रीरामचन्द्रजी अपनी सेना के साथ प्रसन्नतापूर्वक आगे बढ़े। उन्होंने देखा, लङ्का सब ओर से राक्षसों द्वारा आवृत और सुरक्षित है॥६॥
दृष्ट्वा दाशरथिर्लङ्कां चित्रध्वजपताकिनीम्।
जगाम सहसा सीतां दूयमानेन चेतसा॥७॥
विचित्र ध्वजा-पताकाओं से अलंकृत लङ्कापुरी को देखकर दशरथनन्दन श्रीराम व्यथित चित्त से मन-ही-मन सीता का स्मरण करने लगे- ॥७॥
अत्र सा मृगशावाक्षी मत्कृते जनकात्मजा।
पीड्यते शोकसंतप्ता कृशा स्थण्डिलशायिनी॥८॥
‘हाय! वह मृगशावकनयनी जनकनन्दिनी सीता यहीं मेरे लिये शोकसंतप्त हो पीडा सहन करती है और पृथ्वी की वेदी पर सोती है। सुनता हूँ, बहुत दुर्बल हो गयी है’।
निपीड्यमानां धर्मात्मा वैदेहीमनुचिन्तयन्।
क्षिप्रमाज्ञापयद् रामो वानरान् द्विषतां वधे॥९॥
इस प्रकार राक्षसियों द्वारा पीड़ित विदेहनन्दिनीका बारम्बार चिन्तन करते हुए धर्मात्मा श्रीराम ने तत्काल वानरों को शत्रुभूत राक्षसों का वध करने के लिये आज्ञा दी॥९॥
एवमुक्ते तु वचसि रामेणाक्लिष्टकर्मणा।
संघर्षमाणाः प्लवगाः सिंहनादैरनादयन्॥१०॥
अक्लिष्टकर्मा श्रीराम के इस प्रकार आज्ञा देते ही आगे बढ़ने के लिये परस्पर होड़-सी लगाने वाले वानरों ने अपने सिंहनाद से वहाँ की धरती और आकाश को गुँजा दिया॥१०॥
शिखरैर्विकिरामैतां लङ्कां मुष्टिभिरेव वा।
इति स्म दधिरे सर्वे मनांसि हरियूथपाः॥११॥
वे समस्त वानर-यूथपति अपने मन में यह निश्चय किये खड़े थे कि हमलोग पर्वत-शिखरों की वर्षा करके लङ्का के महलों को चूर-चूर कर देंगे अथवा मुक्कों से ही मार-मारकर ढहा देंगे॥ ११॥
उद्यम्य गिरिशृङ्गाणि महान्ति शिखराणि च।
तरूंश्चोत्पाट्य विविधांस्तिष्ठन्ति हरियूथपाः॥१२॥
वे वानरसेनापति पर्वतों के बड़े-बड़े शिखर उठाकर और नाना प्रकार के वृक्षों को उखाड़कर प्रहार करने के लिये खड़े थे॥ १२॥
प्रेक्षतो राक्षसेन्द्रस्य तान्यनीकानि भागशः।
राघवप्रियकामार्थं लङ्कामारुरुहुस्तदा ॥१३॥
राक्षसराज रावण के देखते-देखते विभिन्न भागों में बँटे हुए वे वानर-सैनिक श्रीरघुनाथजी का प्रिय करने की इच्छा से तत्काल लङ्का के परकोटों पर चढ़ गये॥ १३॥
ते ताम्रवक्त्रा हेमाभा रामार्थे त्यक्तजीविताः।
लङ्कामेवाभ्यवर्तन्त सालभूधरयोधिनः॥१४॥
ताँबे-जैसे लाल मुँह और सुवर्ण की-सी कान्तिवाले वे वानर श्रीरामचन्द्रजी के लिये प्राण निछावर करने को तैयार थे। वे सब-के-सब सालवृक्ष और शैलशिखरों से युद्ध करने वाले थे; इसलिये उन्होंने लङ्का पर ही आक्रमण किया॥१४॥
ते द्रुमैः पर्वताग्रैश्च मुष्टिभिश्च प्लवंगमाः।
प्राकाराग्राण्यसंख्यानि ममन्थुस्तोरणानि च॥१५॥
वे सभी वानर वृक्षों, पर्वत-शिखरों और मुक्कों से असंख्य परकोटों और दरवाजों को तोड़ने लगे॥ १५ ॥
परिखान् पूरयन्तश्च प्रसन्नसलिलाशयान्।
पांसुभिः पर्वताग्रैश्च तृणैः काष्ठैश्च वानराः॥
उन वानरों ने स्वच्छ जल से भरी हुई खाइयोंको धूल, पर्वत-शिखर, घास-फूस और काठों से पाट दिया॥
ततः सहस्रयूथाश्च कोटियूथाश्च यूथपाः।
कोटियूथशताश्चान्ये लङ्कामारुरुहुस्तदा ॥१७॥
फिर तो सहस्र यूथ, कोटि यूथ और सौ कोटि यूथों को साथ लिये अनेक यूथपति उस समय लङ्का के किले पर चढ़ गये॥ १७॥
काञ्चनानि प्रमर्दन्तस्तोरणानि प्लवंगमाः।
कैलासशिखरामाणि गोपुराणि प्रमथ्य च॥१८॥
आप्लवन्तः प्लवन्तश्च गर्जन्तश्च प्लवंगमाः।
लङ्कां तामभिधावन्ति महावारणसंनिभाः॥१९॥
बड़े-बड़े गजराजों के समान विशालकाय वानर सोने के बने हुए दरवाजों को धूल में मिलाते, कैलासशिखर के समान ऊँचे-ऊँचे गोपुरों को भी ढहाते, उछलते-कूदते एवं गर्जते हुए लङ्का पर धावा बोलने लगे॥ १८-१९॥
जयत्युरुबलो रामो लक्ष्मणश्च महाबलः।
राजा जयति सुग्रीवो राघवेणाभिपालितः॥२०॥
इत्येवं घोषयन्तश्च गर्जन्तश्च प्लवंगमाः।
अभ्यधावन्त लङ्कायाः प्राकारं कामरूपिणः॥२१॥
‘अत्यन्त बलशाली श्रीरामचन्द्रजी की जय हो, महाबली लक्ष्मणकी जय हो और श्रीरघुनाथजी के द्वारा सुरक्षित राजा सुग्रीव की भी जय हो’ ऐसी घोषणा करते और गर्जते हुए इच्छानुसार रूप धारण करने वाले वानर लङ्का के परकोटे पर टूट पड़े। २०-२१॥
वीरबाहुः सुबाहुश्च नलश्च पनसस्तथा।
निपीड्योपनिविष्टास्ते प्राकारं हरियूथपाः।
एतस्मिन्नन्तरे चक्रुः स्कन्धावारनिवेशनम्॥२२॥
इसी समय वीरबाहु, सुबाहु, नल और पनस-ये वानरयूथपति लङ्का के परकोटे पर चढ़कर बैठ गये और उसी बीच में उन्होंने वहाँ अपनी सेना का पड़ाव डाल दिया॥ २२॥
पूर्वद्वारं तु कुमुदः कोटिभिर्दशभिर्वृतः।
आवृत्य बलवांस्तस्थौ हरिभिर्जितकाशिभिः॥२३॥
बलवान् कुमुद विजयश्री से सुशोभित होने वाले दस करोड़ वानरों के साथ (ईशानकोण में रहकर) लङ्का के पूर्व द्वार को घेरकर खड़ा हो गया॥ २३॥
सहायार्थे तु तस्यैव निविष्टः प्रघसो हरिः।
पनसश्च महाबाहुर्वानरैरभिसंवृतः॥२४॥
उसीकी सहायता के लिये अन्य वानरों के साथ महाबाहु पनस और प्रघस भी आकर डट गये॥ २४ ॥
दक्षिणद्वारमासाद्य वीरः शतबलिः कपिः।
आवृत्य बलवांस्तस्थौ विंशत्या कोटिभिर्वृतः॥२५॥
वीर शतबलिने (आग्नेयकोण में स्थित हो) दक्षिण द्वार पर आकर बीस करोड़ वानरों के साथ उसे घेर लिया और वहीं पड़ाव डाल दिया॥ २५ ॥
सुषेणः पश्चिमद्वारं गत्वा तारापिता बली।
आवृत्य बलवांस्तस्थौ कोटिकोटिभिरावृतः॥२६॥
तारा के बलवान् पिता सुषेण (नैर्ऋत्यकोण में स्थित हो) कोटि-कोटि वानरों के साथ पश्चिम द्वार पर आक्रमण करके उसे घेरकर खड़े हो गये॥२६॥
उत्तरद्वारमागम्य रामः सौमित्रिणा सह।
आवृत्य बलवांस्तस्थौ सुग्रीवश्च हरीश्वरः॥२७॥
सुमित्राकुमार लक्ष्मणसहित महाबलवान् श्रीराम तथा सुग्रीव उत्तर द्वार को घेरकर खड़े हुए (सुग्रीव पूर्ववर्णन के अनुसार वायव्यकोण में स्थित हो उत्तर द्वारवर्ती श्रीराम की सहायता करते थे।)॥२७॥
१, २, ३, ४–यहाँ जो पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर शब्द आये हैं, वे क्रमशः ईशान, अग्नि, नैर्ऋत्य और वायव्यकोण का लक्ष्य कराने वाले हैं; क्योंकि पहले (४१ वें सर्ग में) पूर्व आदि दरवाजों पर नील आदि यूथपतियों के आक्रमण की बात कह दी गयी है वे कुमुद आदि वानर निकटवर्ती ईशान आदि कोणों में रहकर पूर्वादि द्वारों पर आक्रमण करके नील आदि की सहायता करते थे।
गोलाङ्गलो महाकायो गवाक्षो भीमदर्शना।
वृतः कोट्या महावीर्यस्तस्थौ रामस्य पार्श्वतः॥२८॥
लंगूर जाति के विशालकाय महापराक्रमी वानर गवाक्ष, जो देखने में बड़े भयंकर थे, एक करोड़ वानरों के साथ श्रीरामचन्द्रजी के एक बगल में खड़े हो गये॥ २८॥
ऋक्षाणां भीमकोपानां धूम्रः शत्रुनिबर्हणः।
वृतः कोट्या महावीर्यस्तस्थौ रामस्य पार्श्वतः॥२९॥
इसी तरह महाबली शत्रुसूदन ऋक्षराज धूम्र एक करोड़ भयानक क्रोधी रीछों को साथ लेकर श्रीरामचन्द्रजी के दूसरी ओर खड़े हुए॥२९॥
संनद्धस्तु महावीर्यो गदापाणिर्विभीषणः।
वृतो यत्तैस्तु सचिवैस्तस्थौ यत्र महाबलः॥३०॥
कवच आदि से सुसज्जित महान् पराक्रमी विभीषण हाथ में गदा लिये अपने सावधान मन्त्रियों के साथ वहीं आकर डट गये, जहाँ महाबली श्रीराम विद्यमान थे।
गजो गवाक्षो गवयः शरभो गन्धमादनः।
समन्तात् परिधावन्तो ररक्षुहरिवाहिनीम्॥३१॥
गज, गवाक्ष, गवय, शरभ और गन्धमादन–सब ओर घूम-घूमकर वानर-सेना की रक्षा करने लगे। ३१॥
ततः कोपपरीतात्मा रावणो राक्षसेश्वरः।
निर्याणं सर्वसैन्यानां द्रुतमाज्ञापयत् तदा ॥३२॥
इसी समय अत्यन्त क्रोध से भरे हुए राक्षसराज रावण ने अपनी सारी सेना को तुरंत ही बाहर निकलने की आज्ञा दी॥ ३२॥
एतच्छ्रुत्वा तदा वाक्यं रावणस्य मुखेरितम्।
सहसा भीमनिर्घोषमुक्षुष्टं रजनीचरैः॥३३॥
रावण के मुख से बाहर निकलने का आदेश सुनते ही राक्षसों ने सहसा बड़ी भयानक गर्जना की॥ ३३॥
ततः प्रबोधिता भेर्यश्चन्द्रपाण्डुरपुष्कराः।
हेमकोणैरभिहता राक्षसानां समन्ततः॥३४॥
फिर तो राक्षसों के यहाँ जिनके मुखभाग चन्द्रमा के समान उज्ज्वल थे और जो सोने के डंडे से बजाये या पीटे जाते थे, वे बहुत-से धौंसे एक साथ बज उठे॥
विनेदुश्च महाघोषाः शङ्खाः शतसहस्रशः।
राक्षसानां सुघोराणां मुखमारुतपूरिताः॥ ३५॥
साथ ही भयानक राक्षसों के मुख की वायु से पूरित हो लाखों गम्भीर घोषवाले शङ्ख बजने लगे॥ ३५॥
ते बभुः शुभनीलाङ्गाः सशङ्खा रजनीचराः।
विद्युन्मण्डलसंनद्धाः सबलाका इवाम्बुदाः॥३६॥
आभूषणों की प्रभा से सुशोभित काले शरीर वाले वे निशाचर शङ्ख बजाते समय विद्युत्प्रभा से उद्भासिततथा वकपंक्तियों से युक्त नील मेघों के समान जान पड़ते थे॥
निष्पतन्ति ततः सैन्या हृष्टा रावणचोदिताः।
समये पूर्यमाणस्य वेगा इव महोदधेः॥३७॥
तदनन्तर रावण की प्रेरणा से उसके सैनिक बड़े हर्ष के साथ युद्ध के लिये निकलने लगे, मानो प्रलयकाल में महान् मेघों के जल से भरे जाते हुए समुद्र के वेग आगे बढ़ रहे हों॥३७॥
ततो वानरसैन्येन मुक्तो नादः समन्ततः।
मलयः परितो येन ससानप्रस्थकन्दरः॥३८॥
तत्पश्चात् वानर सैनिकों ने सब ओर बड़े जोर से सिंहनाद किया, जिससे छोटे-बड़े शिखरों और कन्दराओंसहित मलयपर्वत गूंज उठा॥ ३८॥
शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषः सिंहनादस्तरस्विनाम्।
पृथिवीं चान्तरिक्षं च सागरं चाभ्यनादयत्॥३९॥
गजानां बृंहितैः सार्धं हयानां हृषितैरपि।
रथानां नेमिनिर्घोषै रक्षसां वदनस्वनैः॥४०॥
इस प्रकार हाथियों के चिग्घाड़ने, घोड़ों के हिनहिनाने, रथों के पहियों की घर्घराहट एवं राक्षसों के मुख से प्रकट हुई आवाज के साथ ही शङ्ख और दुन्दुभियों के शब्द तथा वेगवान् वानरों के निनाद से पृथ्वी, आकाश और समुद्र निनादित हो उठे॥ ३९-४०॥
एतस्मिन्नन्तरे घोरः संग्रामः समपद्यत।
रक्षसां वानराणां च यथा देवासुरे पुरा॥४१॥
इतने ही में पूर्वकाल में घटित हुए देवासुर-संग्राम की भाँति राक्षसों और वानरों में घोर युद्ध होने लगा। ४१॥
ते गदाभिः प्रदीप्ताभिः शक्तिशूलपरश्वधैः।
निजघ्नुर्वानरान् सर्वान् कथयन्तः स्वविक्रमान्॥४२॥
वे राक्षस दमकती हुई गदाओं तथा शक्ति, शूल और फरसों से समस्त वानरों को मारने एवं अपने पराक्रम की घोषणा करने लगे॥ ४२॥
तथा वृक्षैर्महाकायाः पर्वताग्रैश्च वानराः।
निजघ्नुस्तानि रक्षांसि नखैर्दन्तैश्च वेगिनः॥४३॥
उसी प्रकार वेगशाली विशालकाय वानर भी राक्षसों पर बड़े-बड़े वृक्षों, पर्वत-शिखरों, नखों और दाँतों से चोट करने लगे॥४३॥
राजा जयति सुग्रीव इति शब्दो महानभूत्।४४॥
वानरसेना में ‘वानरराज सुग्रीव की जय हो’ यह महान् शब्द होने लगा। उधर राक्षसलोग भी ‘महाराज रावण की जय हो’ ऐसा कहकर अपने-अपने नाम का उल्लेख करने लगे॥४४॥
राक्षसास्त्वपरे भीमाः प्राकारस्था महीं गतान्।
वानरान् भिन्दिपालैश्च शूलैश्चैव व्यदारयन्॥४५॥
दूसरे बहुत-से भयानक राक्षस जो परकोटे पर चढ़े हुए थे, पृथ्वी पर खड़े हुए वानरों को भिन्दिपालों और शूलों से विदीर्ण करने लगे॥ ४५ ॥
वानराश्चापि संक्रुद्धाः प्राकारस्थान् महीं गताः।
राक्षसान् पातयामासुः खमाप्लुत्य स्वबाहुभिः॥४६॥
तब पृथ्वी पर खड़े हुए वानर भी अत्यन्त कुपित हो उठे और आकाश में उछलकर परकोटे पर बैठे हुए राक्षसों को अपनी बाँहों से पकड़-पकड़कर गिराने लगे॥
स सम्प्रहारस्तुमुलो मांसशोणितकर्दमः।
रक्षसां वानराणां च सम्बभूवाद्भुतोपमः॥४७॥
इस प्रकार राक्षसों और वानरों में बड़ा ही अद्भुत घमासान युद्ध हुआ, जिससे वहाँ रक्त और मांस की कीच जम गयी॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे द्विचत्वारिंशः सर्गः॥४२॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में बयालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।४२॥
सर्ग-43
युध्यतां तु ततस्तेषां वानराणां महात्मनाम्।
रक्षसां सम्बभूवाथ बलरोषः सुदारुणः॥१॥
तदनन्तर परस्पर युद्ध करते हुए महामना वानरों और राक्षसों को एक-दूसरे की सेना को देखकर बड़ा भयंकर रोष हुआ॥१॥
ते हयैः काञ्चनापीडैर्गजैश्चाग्निशिखोपमैः।
रथैश्चादित्यसंकाशैः कवचैश्च मनोरमैः॥२॥
निर्ययू राक्षसा वीरा नादयन्तो दिशो दश।
राक्षसा भीमकर्माणो रावणस्य जयैषिणः॥३॥
सोने के आभूषणों से विभूषित घोड़ों, हाथियों,अग्नि की ज्वाला के समान देदीप्यमान रथों तथा सूर्यतुल्य तेजस्वी मनोरम कवचों से युक्त वे वीर राक्षस दसों दिशाओं को अपनी गर्जना से जाते हुए निकले। भयानक कर्म करने वाले वे सभी निशाचर रावण की विजय चाहते थे।
वानराणामपि चमूर्बहती जयमिच्छताम्।
अभ्यधावत तां सेनां रक्षसां घोरकर्मणाम्॥४॥
भगवान् श्रीराम की विजय चाहने वाले वानरों की उस विशाल सेना ने भी घोर कर्म करने वाले राक्षसों की सेना पर धावा किया॥४॥
एतस्मिन्नन्तरे तेषामन्योन्यमभिधावताम्।
रक्षसां वानराणां च द्वन्द्वयुद्धमवर्तत॥५॥
इसी समय एक-दूसरे पर धावा बोलते हुए राक्षसों और वानरों में द्वन्द्वयुद्ध छिड़ गया॥५॥
अङ्गदेनेन्द्रजित्सार्धं वालिपुत्रेण राक्षसः।
अयुध्यत महातेजास्त्र्यम्बकेण यथान्धकः॥६॥
वालिपुत्र अङ्गद के साथ महातेजस्वी राक्षस इन्द्रजित् उसी तरह भिड़ गया, जैसे त्रिनेत्रधारी महादेवजी के साथ अन्धकासुर लड़ रहा हो॥६॥
प्रजङ्ग्रेन च सम्पातिर्नित्यं दुर्धर्षणो रणे।
जम्बुमालिनमारब्धो हनूमानपि वानरः॥७॥
प्रजङ्घ नामक राक्षस के साथ सदा ही रणदुर्जय वीर सम्पाति ने और जम्बुमाली के साथ वानर वीर हनुमान् जी ने युद्ध आरम्भ किया॥७॥
संगतस्तु महाक्रोधो राक्षसो रावणानुजः।
समरे तीक्ष्णवेगेन शत्रुजेन विभीषणः॥८॥
अत्यन्त क्रोध में भरे हुए रावणानुज राक्षस विभीषण समराङ्गण में प्रचण्ड वेगशाली शत्रुघ्न के साथ उलझ गये॥
तपनेन गजः सार्धं राक्षसेन महाबलः।
निकुम्भेन महातेजा नीलोऽपि समयुध्यत॥९॥
महाबली गज तपन नामक राक्षस के साथ लड़ने लगे। महातेजस्वी नील भी निकुम्भ से जूझने लगे। ९॥
वानरेन्द्रस्तु सुग्रीवः प्रघसेन सुसंगतः।
संगतः समरे श्रीमान् विरूपाक्षेण लक्ष्मणः॥१०॥
वानरराज सुग्रीव प्रघस के साथ और श्रीमान् लक्ष्मण समरभूमि में विरूपाक्ष के साथ युद्ध करने लगे॥
अग्निकेतुः सुदुर्धर्षो रश्मिकेतुश्च राक्षसः।
सुप्तघ्नो यज्ञकोपश्च रामेण सह संगताः॥११॥
दुर्जय वीर अग्निकेतु, रश्मिकेतु, सुप्तघ्न और यज्ञकोप-ये सब राक्षस श्रीरामचन्द्रजी के साथ जूझने लगे॥११॥
वज्रमुष्टिश्च मैन्देन द्विविदेनाशनिप्रभः।
राक्षसाभ्यां सुघोराभ्यां कपिमुख्यौ समागतौ॥१२॥
मैन्द के साथ वज्रमुष्टि और द्विविद के साथ अशनिप्रभ युद्ध करने लगे। इस प्रकार इन दोनों भयानक राक्षसों के साथ वे दोनों कपिशिरोमणि वीर भिड़े हुए थे॥ १२॥
वीरः प्रतपनो घोरो राक्षसो रणदुर्धरः।
समरे तीक्ष्णवेगेन नलेन समयुध्यत॥१३॥
प्रतपन नाम से प्रसिद्ध एक घोर राक्षस था, जिसे रणभूमि में परास्त करना अत्यन्त कठिन था। वह वीर निशाचर समराङ्गण में प्रचण्ड वेगशाली नल के साथ युद्ध करने लगा॥ १३॥
धर्मस्य पुत्रो बलवान् सुषेण इति विश्रुतः।
स विद्युन्मालिना सार्धमयुध्यत महाकपिः॥१४॥
धर्म के बलवान् पुत्र महाकपि सुषेण राक्षस विद्युन्माली के साथ लोहा लेने लगे॥ १४ ॥
वानराश्चापरे घोरा राक्षसैरपरैः सह।
द्वन्दं समीयुः सहसा युद्ध्वा च बहुभिः सह ॥१५॥
इसी प्रकार अन्यान्य भयानक वानर बहुतों के साथ युद्ध करने के पश्चात् दूसरे-दूसरे राक्षसों के साथ सहसा द्वन्द्वयुद्ध करने लगे॥ १५ ॥
तत्रासीत् सुमहद् युद्धं तुमुलं रोमहर्षणम्।
रक्षसां वानराणां च वीराणां जयमिच्छताम्॥१६॥
वहाँ राक्षस और वानरवीर अपनी-अपनी विजय चाहते थे। उनमें बड़ा भयंकर और रोमाञ्चकारी युद्ध होने लगा॥ १६॥
हरिराक्षसदेहेभ्यः प्रभूताः केशशाबलाः।
शरीरसंघाटवहाः प्रसुस्रुः शोणतापगाः॥१७॥
वानरों और राक्षसों के शरीरों से निकलकर बहुत-सी खून की नदियाँ बहने लगीं। उनके सिर के बाल ही वहाँ शैवाल (सेवार) के समान जान पड़ते थे। वे नदियाँ सैनिकों की लाशरूपी काष्ठसमूहों को बहाये लिये जाती थीं॥ १७॥
आजघानेन्द्रजित् क्रुद्धो वज्रेणेव शतक्रतुः।
अङ्गदं गदया वीरं शत्रुसैन्यविदारणम्॥१८॥
जिस प्रकार इन्द्र वज्र से प्रहार करते हैं, उसी तरह इन्द्रजित् मेघनाद ने शत्रुसेना को विदीर्ण करने वाले वीर अङ्गद पर गदा से आघात किया॥१८॥
तस्य काञ्चनचित्राङ्गं रथं साश्वं ससारथिम्।
जघान गदया श्रीमानङ्गदो वेगवान् हरिः॥१९॥
किंतु वेगशाली वानर श्रीमान् अङ्गद ने उसकी गदा हाथ से पकड़ ली और उसी गदा से इन्द्रजित् के सुवर्णजटित रथ को सारथि और घोड़ोंसहित चूर-चूर कर डाला॥ १९॥
सम्पातिस्तु प्रजङ्ग्रेन त्रिभिर्बाणैः समाहतः।
निजघानाश्वकर्णेन प्रजङ्गं रणमूर्धनि॥२०॥
प्रजङ्घ ने सम्पाति को तीन बाणों से घायल कर दिया। तब सम्पाति ने भी अश्वकर्ण नामक वृक्ष से युद्ध के मुहाने पर प्रजङ्घ को मार डाला॥ २० ॥
जम्बुमाली रथस्थस्तु रथशक्त्या महाबलः।
बिभेद समरे क्रुद्धो हनूमन्तं स्तनान्तरे॥२१॥
महाबली जम्बुमाली रथ पर बैठा हुआ था। उसने कुपित होकर समराङ्गण में एक रथ-शक्ति के द्वारा हनुमान जी की छाती पर चोट की॥ २१॥
तस्य तं रथमास्थाय हनूमान् मारुतात्मजः।
प्रममाथ तलेनाशु सह तेनैव रक्षसा॥२२॥
परंतु पवननन्दन हनुमान् उछलकर उसके उस रथ पर चढ़ गये और तुरंत ही थप्पड़ से मारकर उन्होंने उस राक्षस के साथ ही उस रथ को भी चौपट कर दिया (जम्बुमाली मर गया) ॥ २२॥
नदन् प्रतपनो घोरो नलं सोऽभ्यनुधावत।
नलः प्रतपनस्याशु पातयामास चक्षुषी॥२३॥
भिन्नगात्रः शरैस्तीक्ष्णैः क्षिप्रहस्तेन रक्षसा।
दूसरी ओर भयानक राक्षस प्रतपन भीषण गर्जना करके नल की ओर दौड़ा। शीघ्रतापूर्वक हाथ चलाने वाले उस राक्षस ने अपने तीखे बाणों से नल के शरीर को क्षत-विक्षत कर दिया। तब नल ने तत्काल ही उसकी दोनों आँखें निकाल लीं॥
ग्रसन्तमिव सैन्यानि प्रघसं वानराधिपः॥ २४॥
सुग्रीवः सप्तपर्णेन निजघान जवेन च।
उधर राक्षस प्रघस वानरसेना को काल का ग्रास बना रहा था। यह देख वानरराज सुग्रीव ने सप्तपर्णनामक वृक्ष से उसे वेगपूर्वक मार गिराया॥ २४ १/२ ॥
प्रपीड्य शरवर्षेण राक्षसं भीमदर्शनम्॥२५॥
निजघान विरूपाक्षं शरेणैकेन लक्ष्मणः।
लक्ष्मण ने पहले बाणों की वर्षा करके भयंकर दृष्टिवाले राक्षस विरूपाक्ष को बहुत पीड़ा दी। फिर एक बाण से मारकर उसे मौत के घाट उतार दिया। २५ १/२॥
अग्निकेतुश्च दुर्धर्षो रश्मिकेतुश्च राक्षसः।
सुप्तघ्नो यज्ञकोपश्च रामं निर्बिभिदुः शरैः॥२६॥
अग्निकेतु, दुर्जय रश्मिकेतु, सुप्तघ्न और यज्ञकोप नामक राक्षसों ने श्रीरामचन्द्रजी को अपने बाणों से घायल कर दिया॥२६॥
तेषां चतुर्णां रामस्तु शिरांसि समरे शरैः।
क्रुद्धश्चतुर्भिश्चिच्छेद घोरैरग्निशिखोपमैः॥२७॥
तब श्रीराम ने कुपित हो अग्निशिखा के समान भयंकर बाणों द्वारा समराङ्गण में उन चारों के सिर काट लिये॥ २७॥
वज्रमुष्टिस्तु मैन्देन मुष्टिना निहतो रणे।
पपात सरथः साश्वः पुराट्ट इव भूतले॥२८॥
उस युद्धस्थल में मैन्द ने वज्रमुष्टिपर मुक्के का प्रहार किया, जिससे वह रथ और घोड़ोंसहित उसी तरह पृथ्वी पर गिर पड़ा, मानो देवताओं का विमान धराशायी हो गया हो॥२८॥
निकुम्भस्तु रणे नीलं नीलाञ्जनचयप्रभम्।
निर्बिभेद शरैस्तीक्ष्णैः करैर्मेघमिवांशुमान्॥ २९॥
निकुम्भ ने काले कोयले के समूह की भाँति नील वर्णवाले नील को रणक्षेत्र में अपने पैने बाणों द्वारा उसी तरह छिन्न-भिन्न कर दिया, जैसे सूर्यदेव अपनी प्रचण्ड किरणों द्वारा बादलों को फाड़ देते हैं ॥ २९॥
पुनः शरशतेनाथ क्षिप्रहस्तो निशाचरः।
बिभेद समरे नीलं निकुम्भः प्रजहास च॥३०॥
परंतु शीघ्रतापूर्वक हाथ चलाने वाले उस निशाचर ने समराङ्गण में नील को पुनः सौ बाणों से घायल कर दिया। ऐसा करके निकुम्भ जोर-जोर से हँसने लगा॥३०॥
तस्यैव रथचक्रेण नीलो विष्णुरिवाहवे।
शिरश्चिच्छेद समरे निकुम्भस्य च सारथेः॥३१॥
यह देख नील ने उसी के रथ के पहिये से युद्धस्थल में निकुम्भ तथा उसके सारथि का उसी तरह सिर काट लिया, जैसे भगवान् विष्णु संग्रामभूमि में अपने चक्र से दैत्यों के मस्तक उड़ा देते हैं॥३१॥
वज्राशनिसमस्पर्शो द्विविदोऽप्यशनिप्रभम्।
जघान गिरिशृङ्गेण मिषतां सर्वरक्षसाम्॥३२॥
द्विविद का स्पर्श वज्र और अशनि के समान दुःसह था। उन्होंने सब राक्षसों के देखते-देखते अशनिप्रभनामक निशाचरपर एक पर्वतशिखर से प्रहार किया॥ ३२॥
द्विविदं वानरेन्द्रं तु दुमयोधिनमाहवे।
शरैरशनिसंकाशैः स विव्याधाशनिप्रभः॥ ३३॥
तब अशनिप्रभ ने युद्धस्थल में वृक्ष लेकर युद्ध करने वाले वानरराज द्विविद को वज्रतुल्य तेजस्वी बाणों द्वारा घायल कर दिया॥३३॥
स शरैरभिविद्धाङ्गो द्विविदः क्रोधर्मूच्छितः।
सालेन सरथं साश्वं निजघानाशनिप्रभम्॥३४॥
द्विविद का सारा शरीर बाणों से क्षत-विक्षत हो गया था, इससे उन्हें बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने एक सालवृक्ष से रथ और घोड़ोंसहित अशनिप्रभ को मार गिराया॥ ३४॥
विद्युन्माली रथस्थस्तु शरैः काञ्चनभूषणैः।
सुषेणं ताडयामास ननाद च मुहुर्मुहुः॥३५॥
रथ पर बैठे हुए विद्युन्माली ने अपने सुवर्णभूषित बाणों द्वारा सुषेण को बारम्बार घायल किया। फिर वह जोर-जोर से गर्जना करने लगा॥ ३५ ॥
तं रथस्थमथो दृष्ट्वा सुषेणो वानरोत्तमः।
गिरिशृङ्गेण महता रथमाशु न्यपातयत्॥ ३६॥
उसे रथ पर बैठा देख वानरशिरोमणि सुषेण ने एक विशाल पर्वत-शिखर चलाकर उसके रथ को शीघ्र ही चूर-चूर कर डाला ॥ ३६॥
लाघवेन तु संयुक्तो विद्युन्माली निशाचरः।
अपक्रम्य रथात् तूर्णं गदापाणिः क्षितौ स्थितः॥३७॥
निशाचर विद्युन्माली तुरंत ही बड़ी फुर्ती के साथ रथ से नीचे कूद पड़ा और हाथ में गदा लेकर पृथ्वी पर खड़ा हो गया॥३७॥
ततः क्रोधसमाविष्टः सुषेणो हरिपुङ्गवः।
शिलां सुमहतीं गृह्य निशाचरमभिद्रवत्॥ ३८॥
तदनन्तर क्रोध से भरे हुए वानरशिरोमणि सुषेण एक बहुत बड़ी शिला लेकर उस निशाचर की ओर दौड़े। ३८॥
तमापतन्तं गदया विद्युन्माली निशाचरः।
वक्षस्यभिजघानाशु सुषेणं हरिपुङ्गवम्॥३९॥
कपिश्रेष्ठ सुषेण को आक्रमण करते देख निशाचर विद्युन्माली ने तत्काल ही गदा से उनकी छाती पर प्रहार किया॥ ३९॥
गदाप्रहारं तं घोरमचिन्त्य प्लवगोत्तमः।
तां तूष्णीं पातयामास तस्योरसि महामृधे॥४०॥
गदा के उस भीषण प्रहार की कुछ भी परवा न करके वानरप्रवर सुषेण ने उसी पहले वाली शिला को चुपचाप उठा लिया और उस महासमर में उसे विद्युन्माली की छाती पर दे मारा॥ ४०॥
शिलाप्रहाराभिहतो विद्युन्माली निशाचरः।
निष्पिष्टहृदयो भूमौ गतासुर्निपपात ह॥४१॥
शिला के प्रहार से घायल हुए निशाचर विद्युन्माली की छाती चूर-चूर हो गयी और वह प्राणशून्य होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा॥४१॥
एवं तैर्वानरैः शूरैः शूरास्ते रजनीचराः।
द्वन्द्वे विमथितास्तत्र दैत्या इव दिवौकसैः॥४२॥
इस प्रकार वे शूरवीर निशाचर शौर्यसम्पन्न वानरवीरों द्वारा वहाँ द्वन्द्वयुद्ध में उसी तरह कुचल दिये गये जैसे देवताओं द्वारा दैत्य मथ डाले गये थे॥४२॥
भल्लैश्चान्यैर्गदाभिश्च शक्तितोमरसायकैः।
अपविद्धैश्चापि रथैस्तथा सांग्रामिकैर्हयैः॥४३॥
निहतैः कुञ्जरैर्मत्तैस्तथा वानरराक्षसैः।
चक्राक्षयुगदण्डैश्च भग्नैर्धरणिसंश्रितैः॥४४॥
बभूवायोधनं घोरं गोमायुगणसेवितम्।
कबन्धानि समुत्पेतुर्दिक्षु वानररक्षसाम्।
विमर्दे तुमुले तस्मिन् देवासुररणोपमे॥४५॥
उस समय भालों, अन्यान्य बाणों, गदाओं, शक्तियों, तोमरों, सायकों, टूटे और फेंके हुए रथों, फौजी घोड़ों, मरे हुए मतवाले हाथियों, वानरों, राक्षसों, पहियों तथा टूटे हुए जूओं से, जो धरती पर बिखरे पड़े थे, वह युद्धभूमि बड़ी भयानक हो रही थी। गीदड़ों के समुदाय वहाँ सब ओर विचर रहे थे। देवासुर-संग्राम के समान उस भयानक मार-काट में वानरों और राक्षसों के कबन्ध (मस्तकरहित धड़) सम्पूर्ण दिशाओं में उछल रहे थे॥ ४३–४५॥
निहन्यमाना हरिपुङ्गवैस्तदा निशाचराः शोणितगन्धमूर्च्छिताः।
पुनः सुयुद्धं तरसा समाश्रिता दिवाकरस्यास्तमयाभिकातिणः॥४६॥
उस समय उन वानरशिरोमणियों द्वारा मारे जाते हुए निशाचर रक्त की गन्ध से मतवाले हो रहे थे। वे सूर्य के अस्त होने की प्रतीक्षा करते हुए पुनः बड़े वेग से घमासान युद्ध में तत्पर हो गये* ॥ ४६॥
* सूर्यास्त के बाद प्रदोषकाल से लेकर पूरी रातभर राक्षसों का बल अधिक बढ़ा होता है, इसीलिये वे सूर्यास्त होने की प्रतीक्षा कर रहे थे।
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे त्रिचत्वारिंशः सर्गः॥४३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में तैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।४३॥
सर्ग-44
युध्यतामेव तेषां तु तदा वानररक्षसाम्।
रविरस्तं गतो रात्रिः प्रवृत्ता प्राणहारिणी॥१॥
इस प्रकार उन वानर और राक्षसों में युद्ध चल ही रहा था कि सूर्यदेव अस्त हो गये तथा प्राणों का संहार करने वाली रात्रि का आगमन हुआ॥१॥
अन्योन्यं बद्धवैराणां घोराणं जयमिच्छताम्।
सम्प्रवृत्तं निशायुद्धं तदा वानररक्षसाम्॥२॥
वानरों और राक्षसों में परस्पर वैर बँध गया था। दोनों ही पक्षों के योद्धा बड़े भयंकर थे तथा अपनी-अपनी विजय चाहते थे; अतः उस समय उनमें रात्रियुद्ध होने लगा॥२॥
राक्षसोऽसीति हरयो वानरोऽसीति राक्षसाः।
अन्योन्यं समरे जघ्नुस्तस्मिंस्तमसि दारुणे॥३॥
उस दारुण अन्धकार में वानर लोग अपने विपक्षी से पूछते थे, क्या तुम राक्षस हो? और राक्षस लोग भी पूछते थे, क्या तुम वानर हो? इस प्रकार पूछ-पूछकर समराङ्गण में वे एक दूसरे पर प्रहार करते थे॥३॥
हत दारय चैहीति कथं विद्रवसीति च।
एवं सुतुमुलः शब्दस्तस्मिन् सैन्ये तु शुश्रुवे॥४॥
सेना में सब ओर ‘मारो, काटो, आओ तो, क्यों भागे जाते हो’—ये भयंकर शब्द सुनायी दे रहे थे। ४॥
कालाः काञ्चनसंनाहास्तस्मिंस्तमसि राक्षसाः।
सम्प्रदृश्यन्त शैलेन्द्रा दीप्तौषधिवना इव॥५॥
काले-काले राक्षस सुवर्णमय कवचोंसे विभूषित होकर उस अन्धकारमें ऐसे दिखायी देते थे, मानो चमकती हुई ओषधियोंके वनसे युक्त काले पहाड़ हों॥
तस्मिंस्तमसि दुष्पारे राक्षसाः क्रोधमिर्च्छताः।
परिपेतुर्महावेगा भक्षयन्तः प्लवङ्गमान्॥६॥
उस अन्धकार से पार पाना कठिन हो रहा था। उसमें क्रोध से अधीर हुए महान् वेगशाली राक्षसवानरों को खाते हुए उन पर सब ओर से टूट पड़े॥६॥
ते हयान् काञ्चनापीडान् ध्वजांश्चाशीविषोपमान्।
आप्लुत्य दशनैस्तीक्ष्णैर्भीमकोपा व्यदारयन्॥७॥
तब वानरों का कोप बड़ा भयानक हो उठा। वे उछल-उछलकर अपने तीखे दाँतों द्वारा सुनहरे साज से सजे हुए राक्षस-दल के घोड़ों को और विषधर सो के समान दिखायी देने वाले उनके ध्वजों को भी विदीर्ण कर देते थे॥७॥
वानरा बलिनो युद्धेऽक्षोभयन् राक्षसी चमूम्।
कुञ्जरान् कुञ्जरारोहान् पताकाध्वजिनो रथान्॥८॥
चकर्षश्च ददंशुश्च दशनैः क्रोधमूिर्च्छताः।
बलवान् वानरों ने युद्ध में राक्षस-सेना के भीतर हलचल मचा दी। वे सब-के-सब क्रोध से पागल हो रहे थे; अतः हाथियों एवं हाथी सवारों को तथा ध्वजापताका से सुशोभित रथों को भी खींच लेते और दाँतों से काट-काटकर क्षत-विक्षत कर देते थे॥ ८ १/२॥
लक्ष्मणश्चापि रामश्च शरैराशीविषोपमैः॥९॥
दृश्यादृश्यानि रक्षांसि प्रवराणि निजघ्नतुः।
बड़े-बड़े राक्षस कभी प्रकट होकर युद्ध करते थे और कभी अदृश्य हो जाते थे; परंतु श्रीराम और लक्ष्मण विषधर सो के समान अपने बाणों द्वारा दृश्य और अदृश्य सभी राक्षसों को मार डालते थे॥ ९ १/२॥
तुरंगखुरविध्वस्तं रथनेमिसमुत्थितम्॥१०॥
रुरोध कर्णनेत्राणि युध्यतां धरणीरजः।
घोड़ों की टाप से चूर्ण होकर रथ के पहियों से उड़ायी हुई धरती की धूल योद्धाओं के कान और नेत्र बंद कर देती थी॥ १० १/२॥
वर्तमाने तथा घोरे संग्रामे लोमहर्षणे।
रुधिरौघा महाघोरा नद्यस्तत्र विसुस्रुवुः॥११॥
इस प्रकार रोमाञ्चकारी भयंकर संग्राम के छिड़ जाने पर वहाँ रक्त के प्रवाह को बहाने वाली खून की बड़ी भयंकर नदियाँ बहने लगीं॥ ११॥
ततो भेरीमृदङ्गानां पणवानां च निःस्वनः।
शङ्कनेमिस्वनोन्मिश्रः सम्बभूवाद्भुतोपमः॥१२॥
तदनन्तर भेरी, मृदङ्ग और पणव आदि बाजों की ध्वनि होने लगी, जो शङ्खों के शब्द तथा रथ के पहियों की घर्घराहट से मिलकर बड़ी अद्भुत जान पड़ती थी॥१२॥
हतानां स्तनमानानां राक्षसानां च निःस्वनः।
शस्तानां वानराणां च सम्बभूवात्र दारुणः॥१३॥
घायल होकर कराहते हुए राक्षसों और शस्त्रों से क्षत-विक्षत हुए वानरों का आर्तनाद वहाँ बड़ा भयंकर प्रतीत होता था॥ १३॥
हतैर्वानरमुख्यैश्च शक्तिशूलपरश्वधैः।
निहतैः पर्वताकारै राक्षसैः कामरूपिभिः॥१४॥
शस्त्रपुष्पोपहारा च तत्रासीद् युद्धमेदिनी।
दुर्जेया दुर्निवेशा च शोणितास्त्रावकर्दमा॥१५॥
शक्ति, शूल और फरसों से मारे गये मुख्य-मुख्य वानरों तथा वानरों द्वारा काल के गाल में डाले गये इच्छानुसार रूप धारण करने में समर्थ पर्वताकार राक्षसों से उपलक्षित उस युद्धभूमि में रक्त के प्रवाह से कीच हो गयी थी। उसे पहचानना कठिन हो रहा था तथा वहाँ ठहरना तो और मुश्किल हो गया था। ऐसा जान पड़ता था उस भूमिको शस्त्ररूपी पुष्पों का उपहार अर्पित किया गया है।
सा बभूव निशा घोरा हरिराक्षसहारिणी।।
कालरात्रीव भूतानां सर्वेषां दुरतिक्रमा॥१६॥
वानरों और राक्षसों का संहार करने वाली वह भयंकर रजनी कालरात्रि के समान समस्त प्राणियों के लिये दुर्लय हो गयी थी॥१६॥
ततस्ते राक्षसास्तत्र तस्मिंस्तमसि दारुणे।
राममेवाभ्यवर्तन्त संहृष्टाः शरवृष्टिभिः॥१७॥
तदनन्तर उस दारुण अन्धकार में वहाँ वे सब राक्षस हर्ष और उत्साह में भरकर बाणों की वर्षा करते हुए श्रीराम पर ही धावा करने लगे॥१७॥
तेषामापततां शब्दः क्रुद्धानामपि गर्जताम्।
उद्धर्त इव सप्तानां समुद्राणामभूत् स्वनः॥१८॥
उस समय कुपित हो गर्जना करते हुए उन आक्रमणकारी राक्षसों का शब्द प्रलय के समय सातों समुद्रों के महान् कोलाहल-सा जान पड़ता था॥ १८ ॥
तेषां रामः शरैः षड्भिः षड् जघान निशाचरान्।
निमेषान्तरमात्रेण शरैरग्निशिखोपमैः॥१९॥
तब श्रीरामचन्द्रजी ने पलक मारते-मारते अग्निज्वाला के समान छः भयानक बाणों से निम्नाङ्कित छः निशाचरों को घायल कर दिया॥ १९ ॥
यज्ञशत्रुश्च दुर्धर्षो महापार्श्वमहोदरौ।।
वज्रदंष्ट्रो महाकायस्तौ चोभौ शुकसारणौ॥२०॥
उनके नाम इस प्रकार हैं-दुर्धर्ष वीर यज्ञशत्रु, महापार्श्व, महोदर, महाकाय, वज्रदंष्ट्र तथा वे दोनों शुक और सारण॥२०॥
ते तु रामेण बाणौघैः सर्वमर्मसु ताडिताः।
युद्धादपसृतास्तत्र सावशेषायुषोऽभवन्॥२१॥
श्रीराम के बाणसमूहों से सारे मर्मस्थानों में चोट पहुँचने के कारण वे छहों राक्षस युद्ध छोड़कर भाग गये; इसीलिये उनकी आयु शेष रह गयी-जान बच गयी॥ २१॥
निमेषान्तरमात्रेण घोरैरग्निशिखोपमैः।
दिशश्चकार विमलाः प्रदिशश्च महारथः॥२२॥
महारथी श्रीराम ने अग्निशिखा के समान प्रज्वलित भयंकर बाणों द्वारा पलक मारते-मारते सम्पूर्ण दिशाओं और उनके कोणों को निर्मल (प्रकाशपूर्ण) कर दिया॥ २२॥
ये त्वन्ये राक्षसा वीरा रामस्याभिमुखे स्थिताः।
तेऽपि नष्टाः समासाद्य पतङ्गा इव पावकम्॥२३॥
दूसरे भी जो-जो राक्षसवीर श्रीराम के सामने खड़े थे, वे भी उसी प्रकार नष्ट हो गये, जैसे आग में पड़कर पतिंगे जल जाते हैं॥ २३॥
सुवर्णपुलैर्विशिखैः सम्पतद्भिः समन्ततः।
बभूव रजनी चित्रा खद्योतैरिव शारदी॥२४॥
चारों ओर सुवर्णमय पङ्क्षवाले बाण गिर रहे थे। उनकी प्रभासे वह रजनी जुगुनुओं से विचित्र दिखायी देने वाली शरद् ऋतु की रात्रि के समान अद्भुत प्रतीत होती थी॥२४॥
राक्षसानां च निनदैर्भेरीणां चैव निःस्वनैः।
सा बभूव निशा घोरा भूयो घोरतराभवत्॥२५॥
राक्षसों के सिंहनादों और भेरियों की आवाजों से वह भयानक रात्रि और भी भयंकर हो उठी थी॥२५॥
तेन शब्देन महता प्रवृद्धेन समन्ततः।
त्रिकूटः कंदराकीर्णः प्रव्याहरदिवाचलः॥२६॥
सब ओर फैले हुए उस महान् शब्द से प्रतिध्वनित हो कन्दराओं से व्याप्त त्रिकूट पर्वत मानो किसी की बात का उत्तर देता-सा जान पड़ता था॥ २६॥
गोलाङ्गला महाकायास्तमसा तुल्यवर्चसः।
सम्परिष्वज्य बाहुभ्यां भक्षयन् रजनीचरान्॥२७॥
लंगूर जाति के विशालकाय वानर जो अन्धकार के समान काले थे, निशाचरों को दोनों भुजाओं में कसकर मार डालते और उन्हें कुत्ते आदि को खिला देते थे।
अङ्गदस्तु रणे शत्रून् निहन्तुं समुपस्थितः।
रावणिं निजघानाशु सारथिं च हयानपि॥ २८॥
दूसरी ओर अङ्गद रणभूमि में शत्रुओं का संहार करने के लिये आगे बढ़े। उन्होंने रावणपुत्र इन्द्रजित् को घायल कर दिया तथा उसके सारथि और घोड़ों को भी यमलोक पहुँचा दिया॥२८॥
इन्द्रजित् तु रथं त्यक्त्वा हताश्वो हतसारथिः।
अङ्गदेन महाकायस्तत्रैवान्तरधीयत॥२९॥
अङ्गद के द्वारा घोड़े और सारथि के मारे जाने पर महान् कष्ट में पड़ा हुआ इन्द्रजित् रथ को छोड़कर वहीं अन्तर्धान हो गया॥ २९॥
तत् कर्म वालिपुत्रस्य सर्वे देवाः सहर्षिभिः।
तुष्टवुः पूजनार्हस्य तौ चोभौ रामलक्ष्मणौ ॥३०॥
प्रशंसा के योग्य वालिकुमार अङ्गद के उस पराक्रम की ऋषियोंसहित देवताओं तथा दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण ने भी भूरि-भूरि प्रशंसा की॥ ३०॥
प्रभावं सर्वभूतानि विदुरिन्द्रजितो युधि।
ततस्ते तं महात्मानं दृष्ट्वा तुष्टाः प्रधर्षितम्॥३१॥
सम्पूर्ण प्राणी युद्ध में इन्द्रजित् के प्रभाव को जानते थे; अतः अङ्गद के द्वारा उसको पराजित हुआ देख उन महात्मा अंगदपर दृष्टिपात करके सबको बड़ी प्रसन्नता हुई॥ ३१॥
ततः प्रहृष्टाः कपयः ससुग्रीवविभीषणाः।
साधुसाध्विति नेदुश्च दृष्ट्वा शत्रु पराजितम्॥३२॥
शत्रु को पराजित हुआ देख सुग्रीव और विभीषणसहित सब वानर बड़े प्रसन्न हुए और अङ्गद को साधुवाद देने लगे॥ ३२॥
इन्द्रजित् तु तदानेन निर्जितो भीमकर्मणा।
संयुगे वालिपुत्रेण क्रोधं चक्रे सुदारुणम्॥३३॥
युद्धस्थल में भयानक कर्म करने वाले वालिपुत्र अङ्गद से पराजित होकर इन्द्रजित् ने बड़ा भयंकर क्रोध प्रकट किया॥३३॥
सोऽन्तर्धानगतः पापो रावणी रणकर्शितः।
ब्रह्मदत्तवरो वीरो रावणिः क्रोधमूर्च्छितः॥३४॥
अदृश्यो निशितान् बाणान् मुमोचाशनिवर्चसः।
रावणकुमार वीर इन्द्रजित् ब्रह्माजी से वर प्राप्त कर चुका था। युद्ध में अधिक कष्ट पाने के कारण वह पापी रावणपुत्र क्रोध से अचेत-सा हो रहा था; अतः अन्तर्धान-विद्या का आश्रय ले अदृश्य हो उसने वज्र के समान तेजस्वी और तीखे बाण बरसाने आरम्भ किये॥३४ १/२ ॥
रामं च लक्ष्मणं चैव घोरै गमयैः शरैः॥ ३५॥
बिभेद समरे क्रुद्धः सर्वगात्रेषु राक्षसः।
समराङ्गण में कुपित हुए इन्द्रजित् ने घोर सर्पमय बाणों द्वारा श्रीराम और लक्ष्मण को घायल कर दिया। वे दोनों रघुवंशीबन्धु अपने सभी अङ्गों में चोट खाकर क्षत-विक्षत हो रहे थे॥ ३५ १/२॥
मायया संवृतस्तत्र मोहयन् राघवौ युधि॥ ३६॥
अदृश्यः सर्वभूतानां कूटयोधी निशाचरः।
बबन्ध शरबन्धेन भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥३७॥
माया से आवृत हो समस्त प्राणियों के लिये अदृश्य होकर वहाँ कूटयुद्ध करने वाले उस निशाचर ने युद्धस्थल में दोनों रघुवंशी बन्धु श्रीराम और लक्ष्मण को मोह में डालते हुए उन्हें सर्पाकार बाणों के बन्धन में बाँध लिया॥ ३६-३७॥
तौ तेन पुरुषव्याघ्रौ क्रुद्धेनाशीविषैः शरैः।
सहसाभिहतौ वीरौ तदा प्रेक्षन्त वानराः॥३८॥
इस प्रकार क्रोध से भरे हुए इन्द्रजित् ने उन दोनों पुरुषप्रवर वीरों को सहसा सर्पाकार बाणों द्वारा बाँध लिया। उस समय वानरों ने उन्हें नागपाश में बद्ध देखा॥ ३८॥
प्रकाशरूपस्तु यदा न शक्तस्तौ बाधितुं राक्षसराजपुत्रः।
मायां प्रयोक्तुं समुपाजगाम बबन्ध तौ राजसुतौ दुरात्मा॥३९॥
प्रकटरूप से युद्ध करते समय जब राक्षसराजकुमार इन्द्रजित् उन दोनों राजकुमारों को बाधा देने में समर्थ न हो सका, तब उन पर माया का प्रयोग करने को उतारू हो गया और उन दोनों भाइयों को उस दुरात्मा ने बाँध लिया॥ ३९॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे चतुश्चत्वारिंशः सर्गः॥४४॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में चौवालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥४४॥
सर्ग-45
स तस्य गतिमन्विच्छन् राजपुत्रः प्रतापवान्।
दिदेशातिबलो रामो दश वानरयूथपान्॥१॥
तदनन्तर अत्यन्त बलशाली प्रतापी राजकुमार श्रीराम ने इन्द्रजित् का पता लगाने के लिये दस वानरयूथपतियों को आज्ञा दी॥१॥
दौ सुषेणस्य दायादौ नीलं च प्लवगाधिपम्।
अङ्गदं वालिपुत्रं च शरभं च तरस्विनम्॥२॥
द्विविदं च हनूमन्तं सानुप्रस्थं महाबलम्।
ऋषभं चर्षभस्कन्धमादिदेश परंतपः॥३॥
उनमें दो तो सुषेण के पुत्र थे और शेष आठ वानरराज नील, वालिपुत्र अङ्गद, वेगशाली वानर शरभ, द्विविद, हनुमान्, महाबली सानुप्रस्थ, ऋषभ तथा ऋषभस्कन्ध थे। शत्रुओं को संताप देने वाले इन दसों को उसका अनुसंधान करने के लिये आज्ञा दी। २-३॥
ते सम्प्रहृष्टा हरयो भीमानुद्यम्य पादपान्।
आकाशं विविशुः सर्वे मार्गमाणा दिशो दश॥४॥
तब वे सभी वानर भयंकर वृक्ष उठाकर दसों दिशाओं में खोजते हुए बड़े हर्ष के साथ आकाशमार्ग से चले॥
तेषां वेगवतां वेगमिषुभिर्वेगवत्तरैः।
अस्त्रवित् परमास्त्रस्तु वारयामास रावणिः॥५॥
किंतु अस्त्रों के ज्ञाता रावणकुमार इन्द्रजित् ने अत्यन्त वेगशाली बाणों की वर्षा करके अपने उत्तम अस्त्रों द्वारा उन वेगवान् वानरों के वेग को रोक दिया। ५॥
तं भीमवेगा हरयो नाराचैः क्षतविक्षताः।
अन्धकारे न ददृशुर्मेधैः सूर्यमिवावृतम्॥६॥
बाणों से क्षत-विक्षत हो जाने पर भी वे भयानक वेगशाली वानर अन्धकार में मेघों से ढके हुए सूर्य की भाँति इन्द्रजित् को न देख सके॥६॥
रामलक्ष्मणयोरेव सर्वदेहभिदः शरान्।
भृशमावेशयामास रावणिः समितिंजयः॥७॥
तत्पश्चात् युद्धविजयी रावण पुत्र इन्द्रजित् फिर श्रीराम और लक्ष्मण पर ही उनके सम्पूर्ण अङ्गों को विदीर्ण करने वाले बाणों की बारम्बार वर्षा करने लगा॥ ७॥
निरन्तरशरीरौ तु तावुभौ रामलक्ष्मणौ।
क्रुद्धेनेन्द्रजिता वीरौ पन्नगैः शरतां गतैः॥८॥
कुपित हुए इन्द्रजित् ने उन दोनों वीर श्रीराम और लक्ष्मण को बाणरूपधारी सर्पो द्वारा इस तरह बींधा कि उनके शरीर में थोड़ा-सा भी ऐसा स्थान नहीं रह गया, जहाँ बाण न लगे हों॥८॥
तयोः क्षतजमार्गेण सुस्राव रुधिरं बहु।
तावुभौ च प्रकाशेते पुष्पिताविव किंशुकौ॥९॥
उन दोनों के अङ्गों में जो घाव हो गये थे, उनके मार्ग से बहुत रक्त बहने लगा। उस समय वे दोनों भाई खिले हुए दो पलाश-वृक्षों के समान प्रकाशित हो रहे थे॥
ततः पर्यन्तरक्ताक्षो भिन्नाञ्जनचयोपमः।
रावणिर्धातरौ वाक्यमन्तर्धानगतोऽब्रवीत्॥१०॥
इसी समय जिसके नेत्रप्रान्त कुछ लाल थे और शरीर खान से काटकर निकाले गये कोयलों के ढेर की भाँति काला था, वह रावणकुमार इन्द्रजित् अन्तर्धानअवस्था में ही उन दोनों भाइयों से इस प्रकार बोला – ॥ १०॥
युध्यमानमनालक्ष्यं शक्रोऽपि त्रिदशेश्वरः।
द्रष्टमासादितुं वापि न शक्तः किं पुनर्युवाम्॥११॥
‘युद्ध के समय अलक्ष्य हो जाने पर तो मुझे देवराज इन्द्र भी नहीं देख या पा सकता; फिर तुम दोनों की क्या बिसात है ?॥ ११॥
प्रापिताविषुजालेन राघवौ कङ्कपत्रिणा।
एष रोषपरीतात्मा नयामि यमसादनम्॥१२॥
‘मैंने तुम दोनों रघुवंशियों को कंकपत्रयुक्त बाण के जाल में फँसा लिया है। अब रोष से भरकर मैं अभी तुम दोनों को यमलोक भेज देता हूँ’॥ १२ ॥
एवमुक्त्वा तु धर्मज्ञौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ।
निर्बिभेद शितैर्बाणैः प्रजहर्ष ननाद च॥१३॥
ऐसा कहकर वह धर्म के ज्ञाता दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण को पैने बाणों से बींधने लगा और हर्ष का अनुभव करते हुए जोर-जोर से गर्जना करने लगा।१३॥
भिन्नाञ्जनचयश्यामो विस्फार्य विपुलं धनुः।
भूय एव शरान् घोरान् विससर्ज महामृधे॥१४॥
कटे-छटे कोयले की राशि के समान काला इन्द्रजित् फिर अपने विशाल धनुष को फैलाकर उस महासमर में घोर बाणों की वर्षा करने लगा॥१४॥
ततो मर्मसु मर्मज्ञो मज्जयन् निशितान् शरान्।
रामलक्ष्मणयोर्वीरो ननाद च मुहुर्मुहुः॥१५॥
मर्मस्थल को जाननेवाला वह वीर श्रीराम और लक्ष्मण के मर्मस्थानों में अपने पैने बाणों को डुबोता हुआ बारम्बार गर्जना करने लगा॥ १५ ॥
बद्धौ तु शरबन्धेन तावुभौ रणमूर्धनि।
निमेषान्तरमात्रेण न शेकतुरवेक्षितुम्॥१६॥
युद्ध के मुहाने पर बाण के बन्धन से बँधे हुए वे दोनों बन्धु पलक मारते-मारते ऐसी दशा को पहुँच गये कि उनमें आँख उठाकर देखने की भी शक्ति नहीं रह गयी (वास्तव में यह उनकी मनुष्यता का नाट्य करने वाली लीलामात्र थी। वे तो काल के भी काल हैं। उन्हें कौन बाँध सकता था?)॥
ततो विभिन्नसर्वाङ्गौ शरशल्याचितौ कृतौ।
ध्वजाविव महेन्द्रस्य रज्जुमुक्तौ प्रकम्पितौ॥१७॥
इस प्रकार उनके सारे अङ्ग बिंध गये थे। बाणों से व्याप्त हो गये थे। वे रस्सी से मुक्त हुए देवराज इन्द्र के दो ध्वजों के समान कम्पित होने लगे॥१७॥
तौ सम्प्रचलितौ वीरौ मर्मभेदेन कर्शितौ।
निपेततुर्महेष्वासौ जगत्यां जगतीपती॥१८॥
वे महान् धनुर्धर वीर भूपाल मर्मस्थल के भेदन से विचलित एवं कृशकाय हो पृथ्वी पर गिर पड़े॥१८॥
तौ वीरशयने वीरौ शयानौ रुधिरोक्षितौ।।
शरवेष्टितसर्वाङ्गावातौँ परमपीडितौ॥१९॥
युद्धभूमि में वीरशय्या पर सोये हुए वे दोनों वीर रक्त से नहा उठे थे। उनके सारे अङ्गों में बाणरूपधारी नाग लिपटे हुए थे तथा वे अत्यन्त पीड़ित एवं व्यथित हो रहे थे॥
नह्यविद्धं तयोर्गात्रे बभूवाङ्गलमन्तरम्।
नानिर्विण्णं न चाध्वस्तमाकराग्रादजिह्मगैः॥२०॥
उनके शरीर में एक अङ्गल भी जगह ऐसी नहीं थी, जो बाणों से बिंधी न हो तथा हाथों के अग्रभाग तक कोई भी अङ्ग ऐसा नहीं था, जो बाणों से विदीर्ण अथवा क्षुब्ध न हुआ हो॥२०॥
तौ तु क्रूरेण निहतौ रक्षसा कामरूपिणा।
असृक् सुस्रुवतुस्तीवं जलं प्रस्रवणाविव॥ २१॥
जैसे झरने जल गिराते रहते हैं, उसी प्रकार वे दोनों भाई इच्छानुसार रूप धारण करने वाले उस क्रूर राक्षस के बाणों से घायल हो तीव्र वेग से रक्त की धारा बहा रहे थे।
पपात प्रथमं रामो विद्धो मर्मसु मार्गणैः।
क्रोधादिन्द्रजिता येन पुरा शक्रो विनिर्जितः॥२२॥
जिसने पूर्वकाल में इन्द्र को परास्त किया था, उस इन्द्रजित् के क्रोधपूर्वक चलाये हुए बाणों द्वारा मर्मस्थल में आहत होने के कारण पहले श्रीराम ही धराशायी हुए॥२२॥
रुक्मपुकैः प्रसन्नात्रै रजोगतिभिराशुगैः।
नाराचैरर्धनाराचैर्भल्लैरञ्जलिकैरपि।
विव्याध वत्सदन्तैश्च सिंहदंष्ट्रैः क्षुरैस्तथा॥२३॥
इन्द्रजित् ने उन्हें सोने के पंख, स्वच्छ अग्रभाग और धूल के समान गतिवाले (अर्थात् धूल की भाँति छिद्ररहित स्थान में भी प्रवेश करने वाले) शीघ्रगामी नाराच’, अर्धनाराच, भल्ल, अञ्जलिक, वत्सदन्त’, सिंहदंष्ट्रप और क्षुर जाति के बाणों द्वारा घायल कर दिया था॥ २३॥
१. जिसका अग्रभाग सीधा और गोल हो, उस बाण को ‘नाराच’ कहते हैं। २. अर्ध भाग में नाराच की समानता रखने वाले बाण ‘अर्धनाराच’ कहलाते हैं। ३. जिनका अग्रभाग फरसे के समान हो, उस बाण की ‘भल्ल’ संज्ञा है। आधुनिक भाले को भी भल्ल कहते हैं। ४. जिसका मुखभाग दोनों हाथों की अञ्जलि के समान हो, वह बाण ‘अञ्जलिक’ कहा गया है। ५. जिसका अग्रभाग बछड़े के दाँतों के समान दिखायी देता हो, उस बाण की ‘वत्सदन्त’ संज्ञा होती है। ६. सिंह की दाढ़ के समान अग्रभाग वाला बाण। ७. जिसका अग्रभाग क्षुरे की धार के समान हो, उस बाण को ‘क्षुर’ कहते हैं।
स वीरशयने शिश्येऽविज्यमाविध्य कार्मुकम्।
भिन्नमुष्टिपरीणाहं त्रिनतं रुक्मभूषितम्॥२४॥
जिसकी प्रत्यञ्चा चढ़ी हुई थी, किंतु मुट्ठी का बन्धन ढीला पड़ गया था, जो दोनों पार्श्वभाग और मध्यभाग तीनों स्थानों में झुका हुआ तथा सुवर्ण से भूषित था, उस धनुष को त्यागकर भगवान् श्रीराम वीरशय्या पर सोये हुए थे॥२४॥
बाणपातान्तरे रामं पतितं पुरुषर्षभम्।
स तत्र लक्ष्मणो दृष्ट्वा निराशो जीवितेऽभवत्॥२५॥
फेंका हुआ बाण जितनी दूरी पर गिरता है, अपने से उतनी ही दूरी पर धरती पर पड़े हुए पुरुषप्रवर श्रीराम को देखकर लक्ष्मण वहाँ अपने जीवन से निराश हो गये॥ २५॥
रामं कमलपत्राक्षं शरण्यं रणतोषिणम्।
शुशोच भ्रातरं दृष्ट्वा पतितं धरणीतले॥२६॥
सबको शरण देने वाले और युद्ध से संतुष्ट होने वाले अपने भाई कमलनयन श्रीराम को पृथ्वी पर पड़ा देख लक्ष्मण को बड़ा शोक हुआ॥ २६॥
हरयश्चापि तं दृष्ट्वा संतापं परमं गताः।
शोकार्ताश्चुक्रुशुर्घोरमश्रुपूरितलोचनाः॥२७॥
उन्हें उस अवस्था में देखकर वानरों को भी बड़ा संताप हुआ। वे शोक से आतुर हो नेत्रों में आँसू भरकर घोर आर्तनाद करने लगे॥ २७॥
बद्धौ तु तौ वीरशये शयानौ ते वानराः सम्परिवार्य तस्थुः।
समागता वायुसुतप्रमुख्या विषादमार्ताः परमं च जग्मुः ॥२८॥
नागपाश में बँधकर वीरशय्या पर सोये हुए उन दोनों भाइयों को चारों ओर से घेरकर सब वानर खड़े हो गये। वहाँ आये हुए हनुमान् आदि मुख्य-मुख्य वानर व्यथित हो बड़े विषाद में पड़ गये॥ २८॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे पञ्चचत्वारिंशः सर्गः॥४५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में पैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।४५॥
सर्ग-46
ततो द्यां पृथिवीं चैव वीक्षमाणा वनौकसः।
ददृशुः संततौ बाणैर्धातरौ रामलक्ष्मणौ ॥१॥
तदनन्तर जब उपर्युक्त दस वानर पृथ्वी और आकाश की छानबीन करके लौटे, तब उन्होंने दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण को बाणों से बिंधा हुआ देखा॥१॥
वृष्ट्वेवोपरते देवे कृतकर्मणि राक्षसे।
आजगामाथ तं देशं ससुग्रीवो विभीषणः॥२॥
जैसे वर्षा करके देवराज इन्द्र शान्त हो गये हों, उसी प्रकार वह राक्षस इन्द्रजित् जब अपना काम बनाकर बाणवर्षा से विरत हो गया, तब सुग्रीवसहित विभीषण भी उस स्थान पर आये॥२॥
नीलश्च द्विविदो मैन्दः सुषेणः कुमुदोऽङ्गदः।
तूर्णं हनुमता सार्धमन्वशोचन्त राघवौ॥३॥
हनुमान जी के साथ नील, द्विविद, मैन्द, सुषेण, कुमुद और अङ्गद तुरंत ही श्रीरघुनाथजी के लिये शोक करने लगे॥३॥
अचेष्टौ मन्दनिःश्वासौ शोणितेन परिप्लुतौ।
शरजालाचितौ स्तब्धौ शयानौ शरतल्पगौ॥४॥
उस समय वे दोनों भाई खून से लथपथ होकर बाण-शय्या पर पड़े थे। बाणों से उनका सारा शरीर व्याप्त हो रहा था। वे निश्चल होकर धीरे-धीरे साँस ले रहे थे। उनकी चेष्टाएँ बंद हो गयी थीं॥ ४॥
निःश्वसन्तौ यथा सौ निश्चेष्टौ मन्दविक्रमौ।
रुधिरस्रावदिग्धाङ्गौ तपनीयाविव ध्वजौ॥५॥
सर्पो के समान साँस खींचते और निश्चेष्ट पड़े हुए उन दोनों भाइयों का पराक्रम मन्द हो गया था। उनके सारे अङ्ग रक्त बहाकर उसी में सन गये थे। वे दोनों टूटकर गिरे हुए दो सुवर्णमय ध्वजों के समान जान पड़ते थे॥५॥
तौ वीरशयने वीरौ शयानौ मन्दचेष्टितौ।
यूथपैः स्वैः परिवृतौ बाष्पव्याकुललोचनैः॥६॥
वीरशय्या पर सोये हुए मन्द चेष्टावाले वे दोनों वीर आँसूभरे नेत्रोंवाले अपने यूथपतियों से घिरे हुए थे।
राघवौ पतितौ दृष्ट्वा शरजालसमन्वितौ।
बभूवुर्व्यथिताः सर्वे वानराः सविभीषणाः॥७॥
बाणों के जाल से आवृत होकर पृथ्वी पर पड़े हुए उन दोनों रघुवंशी बन्धुओं को देखकर विभीषणसहित सब वानर व्यथित हो उठे॥७॥
अन्तरिक्षं निरीक्षन्तो दिशः सर्वाश्च वानराः।
न चैनं मायया छन्नं ददृशू रावणिं रणे॥८॥
समस्त वानर सम्पूर्ण दिशाओं और आकाश में बारम्बार दृष्टिपात करने पर भी मायाच्छन्न रावणकुमार इन्द्रजित् को रणभूमि में नहीं देख पाते थे॥८॥
तं तु मायाप्रतिच्छन्नं माययैव विभीषणः।
वीक्षमाणो ददर्शाग्रे भ्रातुः पुत्रमवस्थितम्।
तमप्रतिमकर्माणमप्रतिद्वन्द्वमाहवे॥९॥
तब विभीषण ने माया से ही देखना आरम्भ किया। उस समय उन्होंने माया से ही छिपे हुए अपने उस भतीजे को सामने खड़ा देखा, जिसके कर्म अनुपम थे और युद्धस्थल में जिसका सामना करने वाला कोई योद्धा नहीं था॥९॥
ददर्शान्तर्हितं वीरं वरदानाद् विभीषणः।
तेजसा यशसा चैव विक्रमेण च संयुतः॥१०॥
तेज, यश और पराक्रम से युक्त विभीषण ने माया के द्वारा ही वरदान के प्रभाव से छिपे हुए वीर इन्द्रजित् को देख लिया॥ १०॥
इन्द्रजित् त्वात्मनः कर्म तौ शयानौ समीक्ष्य च।
उवाच परमप्रीतो हर्षयन् सर्वराक्षसान्॥११॥
श्रीराम और लक्ष्मण को युद्धभूमि में सोते देख इन्द्रजित् को बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने समस्त राक्षसों का हर्ष बढ़ाते हुए अपने पराक्रम का वर्णन आरम्भ किया- ॥११॥
दूषणस्य च हन्तारौ खरस्य च महाबलौ।
सादितौ मामकैर्बाणैर्धातरौ रामलक्ष्मणौ ॥१२॥
वह देखो, जिन्होंने खर और दूषण का वध किया था, वे दोनों भाई महाबली श्रीराम और लक्ष्मण मेरे बाणों से मारे गये॥१२॥
नेमौ मोक्षयितुं शक्यावेतस्मादिषुबन्धनात्।
सर्वैरपि समागम्य सर्षिसङ्कः सुरासुरैः॥१३॥
‘यदि सारे मुनिसमूहोंसहित समस्त देवता और असुर भी आ जायँ तो वे इस बाण-बन्धन से इन दोनों को छुटकारा नहीं दिला सकते॥१३॥
यत्कृते चिन्तयानस्य शोकार्तस्य पितुर्मम।
अस्पृष्ट्वा शयनं गात्रैस्त्रियामा याति शर्वरी॥१४॥
कृत्स्नेयं यत्कृते लङ्का नदी वर्षास्विवाकुला।
सोऽयं मूलहरोऽनर्थः सर्वेषां शमितो मया॥१५॥
‘जिसके कारण चिन्ता और शोक से पीड़ित हुए मेरे पिता को सारी रात शय्या का स्पर्श किये बिना ही बितानी पड़ती थी तथा जिसके कारण यह सारी लङ्का वर्षाकाल में नदी की भाँति व्याकुल रहा करती थी, हम सबकी जड़ को काटने वाले उस अनर्थ को आज मैंने शान्त कर दिया॥१४-१५ ॥
रामस्य लक्ष्मणस्यैव सर्वेषां च वनौकसाम्।
विक्रमा निष्फलाः सर्वे यथा शरदि तोयदाः॥१६॥
‘जैसे शरद्-ऋतु के सारे बादल पानी न बरसाने के कारण व्यर्थ होते हैं, उसी प्रकार श्रीराम, लक्ष्मण और सम्पूर्ण वानरों के सारे बल-विक्रम निष्फल हो गये’ ॥ १६॥
एवमुक्त्वा तु तान् सर्वान् राक्षसान् परिपश्यतः।
यूथपानपि तान् सर्वांस्ताडयत् स च रावणिः॥१७॥
अपनी ओर देखते हुए उन सब राक्षसों से ऐसा कहकर रावणकुमार इन्द्रजित् ने वानरों के उन समस्त सुप्रसिद्ध यूथपतियों को भी मारना आरम्भ किया। १७॥
नीलं नवभिराहत्य मैन्दं सद्रिविदं तथा।
त्रिभिस्त्रिभिरमित्रघ्नस्तताप परमेषुभिः॥१८॥
उस शत्रुसूदन निशाचर वीर ने नील को नौ बाणों से घायल करके मैन्द और द्विविद को तीन-तीन उत्तम सायकों द्वारा मारकर संतप्त कर दिया॥१८॥
जाम्बवन्तं महेष्वासो विद्ध्वा बाणेन वक्षसि।
हनूमतो वेगवतो विससर्ज शरान् दश॥१९॥
महाधनुर्धर इन्द्रजित् ने जाम्बवान् की छातीमें एक बाणसे गहरी चोट पहुँचाकर वेगशाली हनुमान जी को भी दस बाण मारे॥ १९॥
गवाक्षं शरभं चैव तावप्यमितविक्रमौ।
द्वाभ्यां द्वाभ्यां महावेगो विव्याध युधि रावणिः॥२०॥
रावणकुमार का वेग उस समय बहुत बढ़ा हुआ था। उसने युद्धस्थल में अमित पराक्रमी गवाक्ष और शरभ को भी दो-दो बाण मारकर घायल कर दिया। २०॥
गोलाङ्गलेश्वरं चैव वालिपुत्रमथाङ्गदम्।
विव्याध बहुभिर्बाणैस्त्वरमाणोऽथ रावणिः॥२१॥
तदनन्तर बड़ी उतावली के साथ बाण चलाते हुए रावणकुमार इन्द्रजित् ने पुनः बहुसंख्यक बाणों द्वारा लंगूरों के राजा-(गवाक्ष)-को और वालिपुत्र अङ्गद को भी गहरी चोट पहुँचायी॥ २१॥
तान् वानरवरान् भित्त्वा शरैरग्निशिखोपमैः।
ननाद बलवांस्तत्र महासत्त्वः स रावणिः॥२२॥
इस प्रकार अग्नितुल्य तेजस्वी सायकों से उन मुख्य-मुख्य वानरों को घायल करके महान् धैर्यशाली और बलवान् रावणकुमार वहाँ जोर-जोर से गर्जना करने लगा॥ २२॥
तानर्दयित्वा बाणौघैस्त्रसयित्वा च वानरान्।
प्रजहास महाबाहुर्वचनं चेदमब्रवीत्॥२३॥
अपने बाणसमूहों से उन वानरों को पीड़ित तथा भयभीत करके महाबाहु इन्द्रजित् अट्टहास करने लगा और इस प्रकार बोला— ॥२३॥
शरबन्धेन घोरेण मया बद्धौ चमूमुखे।
सहितौ भ्रातरावेतौ निशामयत राक्षसाः॥२४॥
‘राक्षसो! देख लो, मैंने युद्ध के मुहाने पर भयंकर बाणों के पाश से इन दोनों भाइयों श्रीराम और लक्ष्मण को एक साथ ही बाँध लिया है’ ॥ २४ ॥
एवमुक्तास्तु ते सर्वे राक्षसाः कूटयोधिनः।
परं विस्मयमापन्नाः कर्मणा तेन हर्षिताः॥२५॥
इन्द्रजित् के ऐसा कहने पर कूट-युद्ध करने वाले वे सब राक्षस बड़े चकित हुए और उसके उस कर्म से उन्हें बड़ा हर्ष भी हुआ॥ २५ ॥
विनेदुश्च महानादान् सर्वे ते जलदोपमाः।
हतो राम इति ज्ञात्वा रावणिं समपूजयन्॥२६॥
वे सब-के-सब मेघों के समान गम्भीर स्वर से महान् सिंहनाद करने लगे तथा यह समझकर कि श्रीराम मारे गये, उन्होंने रावणकुमार का बड़ा अभिनन्दन किया॥
निष्पन्दौ तु तदा दृष्ट्वा भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ।
वसुधायां निरुच्छ्वासौ हतावित्यन्वमन्यत॥२७॥
इन्द्रजित् ने भी जब यह देखा कि श्रीराम और लक्ष्मण-दोनों भाई पृथ्वी पर निश्चेष्ट पड़े हैं तथा उनका श्वास भी नहीं चल रहा है, तब उन दोनों को मरा हुआ ही समझा ॥ २७॥
हर्षेण तु समाविष्ट इन्द्रजित् समितिञ्जयः।
प्रविवेश पुरीं लङ्कां हर्षयन् सर्वनैर्ऋतान्॥ २८॥
इससे युद्धविजयी इन्द्रजित् को बड़ा हर्ष हुआ तथा वह समस्त राक्षसों का हर्ष बढ़ाता हुआ लङ्कापुरी में चला गया॥२८॥
रामलक्ष्मणयोर्दृष्ट्वा शरीरे सायकैश्चिते।
सर्वाणि चाङ्गोपाङ्गानि सुग्रीवं भयमाविशत्॥२९॥
श्रीराम और लक्ष्मण के शरीरों तथा सभी अङ्गउपाङ्गों को बाणों से व्याप्त देख सुग्रीव के मन में भय समा गया॥ २९॥
तमुवाच परित्रस्तं वानरेन्द्र विभीषणः।
सबाष्पवदनं दीनं शोकव्याकुललोचनम्॥ ३०॥
अलं त्रासेन सुग्रीव बाष्पवेगो निगृह्यताम्।
उनके मुख पर दीनता छा गयी, आसुओं की धारा बह चली और नेत्र शोक से व्याकुल हो उठे। उस समय अत्यन्त भयभीत हुए वानरराज से विभीषण ने कहा—’सुग्रीव! डरो मत। डरने से कोई लाभ नहीं। आँसुओं का यह वेग रोको॥ ३० १/२॥
एवंप्रायाणि युद्धानि विजयो नास्ति नैष्ठिकः॥
सभाग्यशेषतास्माकं यदि वीर भविष्यति।
मोहमेतौ प्रहास्येते महात्मानौ महाबलौ॥३२॥
पर्यवस्थापयात्मानमनाथं मां च वानर।
सत्यधर्माभिरक्तानां नास्ति मृत्युकृतं भयम्॥३३॥
‘वीर! सभी युद्धों की प्रायः ऐसी ही स्थिति होती है, उनमें विजय निश्चित नहीं हुआ करती। यदि हमलोगों का भाग्य शेष होगा तो ये दोनों महाबली महात्मा अवश्य मूर्छा त्याग देंगे। वानरराज! तुम अपने को और मुझ अनाथ को भी सँभालो। जो लोग सत्य-धर् ममें अनुराग रखते हैं, उन्हें मृत्यु का भय नहीं होता है’ ॥ ३१-३३॥
एवमुक्त्वा ततस्तस्य जलक्लिन्नेन पाणिना।
सुग्रीवस्य शुभे नेत्रे प्रममार्ज विभीषणः॥३४॥
ऐसा कहकर विभीषण ने जल से भीगे हुए हाथ से सुग्रीव के दोनों सुन्दर नेत्र पोंछ दिये॥३४॥
ततः सलिलमादाय विद्यया परिजप्य च।
सुग्रीवनेत्रे धर्मात्मा प्रममार्ज विभीषणः॥ ३५॥
तत्पश्चात् हाथ में जल लेकर उसे मन्त्रपूत करके धर्मात्मा विभीषण ने सुग्रीव के नेत्रों में लगाया॥ ३५ ॥
विमृज्य वदनं तस्य कपिराजस्य धीमतः।
अब्रवीत् कालसम्प्राप्तमसम्भ्रान्तमिदं वचः॥३६॥
फिर बुद्धिमान् वानरराज के भीगे हुए मुख को पोंछकर उन्होंने बिना किसी घबराहट के यह समयोचित बात कही- ॥ ३६॥
न कालः कपिराजेन्द्र वैक्लव्यमवलम्बितुम्।
अतिस्नेहोऽपि कालेऽस्मिन् मरणायोपकल्पते॥३७॥
‘वानरसम्राट् ! यह समय घबराने का नहीं है। ऐसे समय में अधिक स्नेह का प्रदर्शन भी मौत का भय उपस्थित कर देता है॥ ३७॥
तस्मादुत्सृज्य वैक्लव्यं सर्वकार्यविनाशनम्।
हितं रामपुरोगाणां सैन्यानामनुचिन्तय॥ ३८॥
‘इसलिये सब कामों को बिगाड़ देने वाली इस घबराहट को छोड़कर श्रीरामचन्द्रजी जिनके अगुआ अथवा स्वामी हैं, उन सेनाओं के हित का विचार करो॥
अथ वा रक्ष्यतां रामो यावत्संज्ञाविपर्ययः।
लब्धसंज्ञौ हि काकुत्स्थौ भयं नौ व्यपनेष्यतः॥३९॥
‘अथवा जबतक श्रीरामचन्द्रजी को चेत न हो, तब तक इनकी रक्षा करनी चाहिये। होश में आ जाने पर ये दोनों रघुवंशी वीर हमारा सारा भय दूर कर देंगे।
नैतत् किंचन रामस्य न च रामो मुमूर्षति।
नह्येनं हास्यते लक्ष्मीर्दुर्लभा या गतायुषाम्॥४०॥
‘श्रीराम के लिये यह संकट कुछ भी नहीं है। ये मर नहीं सकते हैं; क्योंकि जिनकी आयु समाप्त हो चली है, उनके लिये जो दुर्लभ लक्ष्मी (शोभा) है, वह इनका त्याग नहीं कर रही है॥ ४० ॥
तस्मादाश्वासयात्मानं बलं चाश्वासय स्वकम्।
यावत् सैन्यानि सर्वाणि पुनः संस्थापयाम्यहम्॥४१॥
‘अतः तुम अपने को सँभालो और अपनी सेना को आश्वासन दो। तब तक मैं इस घबरायी हुई सेना को फिर से धैर्य बँधाकर सुस्थिर करता हूँ॥४१॥
एते हि फुल्लनयनास्त्रासादागतसाध्वसाः।
कर्णे कर्णे प्रकथिता हरयो हरिसत्तम॥४२॥
‘कपिश्रेष्ठ! देखो, इन वानरों के मन में भय समा गया है, इसीलिये ये आँखें फाड़-फाड़कर देखते हैं और आपस में कानाफूसी करते हैं॥ ४२॥
मां तु दृष्ट्वा प्रधावन्तमनीकं सम्प्रहर्षितम्।
त्यजन्तु हरयस्त्रासं भुक्तपूर्वामिव स्रजम्॥४३॥
(अतः मैं इन्हें आश्वासन देने जाता हूँ) मुझे हर्षपूर्वक इधर-उधर दौड़ते देख और मेरे द्वारा धैर्य बँधायी हुई सेना को प्रसन्न होती जान ये सभी वानर पहले की भोगी हुई माला की भाँति अपनी सारी भयशङ्का को त्याग दें’॥४३॥
समाश्वास्य तु सुग्रीवं राक्षसेन्द्रो विभीषणः।
विद्रुतं वानरानीकं तत् समाश्वासयत् पुनः॥४४॥
इस प्रकार सुग्रीव को आश्वासन दे राक्षसराज विभीषण ने भागने के लिये उद्यत हुई वानर-सेना को फिर से सान्त्वना दी॥४४॥
इन्द्रजित् तु महामायः सर्वसैन्यसमावृतः।
विवेश नगरी लङ्कां पितरं चाभ्युपागमत्॥४५॥
इधर महामायावी इन्द्रजित् सारी सेना के साथ लङ्कापुरी में लौटा और अपने पिता के पास आया। ४५॥
तत्र रावणमासाद्य अभिवाद्य कृताञ्जलिः।
आचचक्षे प्रियं पित्रे निहतौ रामलक्ष्मणौ॥४६॥
वहाँ रावण के पास पहुँचकर उसने उसे हाथ जोड़कर प्रणाम किया और श्रीराम-लक्ष्मण के मारे जाने का प्रिय संवाद सुनाया॥ ४६॥
उत्पपात ततो हृष्टः पुत्रं च परिषस्वजे।
रावणो रक्षसां मध्ये श्रुत्वा शत्रू निपातितौ॥४७॥
राक्षसों के बीच में अपने दोनों शत्रुओं के मारे जाने का समाचार सुनकर रावण हर्ष से उछल पड़ा और उसने अपने पुत्र को हृदय से लगा लिया॥४७॥
उपाघ्राय च तं मूर्ध्नि पप्रच्छ प्रीतमानसः।
पृच्छते च यथावृत्तं पित्रे तस्मै न्यवेदयत्॥४८॥
यथा तौ शरबन्धेन निश्चेष्टौ निष्प्रभौ कृतौ॥४९॥
फिर उसका मस्तक सूंघकर उसने प्रसन्नचित्त होकर उस घटनाका पूरा विवरण पूछा। पूछने पर इन्द्रजित् ने पिता को सारा वृत्तान्त ज्यों-का-त्यों निवेदन किया और यह बताया कि किस प्रकार बाणों के बन्धन में बाँधकर श्रीराम और लक्ष्मण को निश्चेष्ट एवं निस्तेज किया गया है। ४८-४९॥
स हर्षवेगानुगतान्तरात्मा श्रुत्वा गिरं तस्य महारथस्य।
जहौ ज्वरं दाशरथेः समुत्थं प्रहृष्टवाचाभिननन्द पुत्रम्॥५०॥
महारथी इन्द्रजित् की उस बात को सुनकर रावण की अन्तरात्मा हर्ष के उद्रेक से खिल उठी। दशरथनन्दन श्रीराम की ओर से जो उसे भय और चिन्ता प्राप्त हुई थी, उसे उसने त्याग दिया और प्रसन्नतापूर्ण वचनों द्वारा अपने पुत्र का अभिनन्दन किया॥५०॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे षट्चत्वारिंशः सर्गः॥४६॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में छियालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।४६॥
सर्ग-47
तस्मिन् प्रविष्टे लङ्कायां कृतार्थे रावणात्मजे।
राघवं परिवार्याथ ररक्षुर्वानरर्षभाः॥१॥
रावणकुमार इन्द्रजित् जब अपना काम बनाकर लङ्का में चला गया, तब सभी श्रेष्ठ वानर श्रीरघुनाथजी को चारों ओर से घेरकर उनकी रक्षा करने लगे॥१॥
हनुमानङ्गदो नीलः सुषेणः कुमुदो नलः।
गजो गवाक्षो गवयः शरभो गन्धमादनः॥२॥
जाम्बवानृषभः स्कन्धो रम्भः शतबलिः पृथुः।
व्यूढानीकाश्च यत्ताश्च द्रुमानादाय सर्वतः॥३॥
हनुमान्, अङ्गद, नील, सुषेण, कुमुद, नल, गज, गवाक्ष, गवय, शरभ, गन्धमादन, जाम्बवान्, ऋषभ, स्कन्ध, रम्भ, शतबलि और पृथु–ये सब सावधान हो अपनी सेना की व्यूहरचना करके हाथों में वृक्ष लिये सब ओर से पहरा देने लगे॥२-३॥
वीक्षमाणा दिशः सर्वास्तिर्यगूर्ध्वं च वानराः।
तृणेष्वपि च चेष्टत्सु राक्षसा इति मेनिरे॥४॥
वे सब वानर सम्पूर्ण दिशाओं में ऊपर-नीचे और अगल-बगल में भी देखते रहते थे तथा तिनकों के भी हिल जाने पर यही समझते थे कि राक्षस आ गये॥ ४॥
रावणश्चापि संहृष्टो विसृज्येन्द्रजितं सुतम्।
आजुहाव ततः सीतारक्षणी राक्षसीस्तदा॥५॥
उधर हर्ष से भरे हुए रावण ने भी अपने पुत्र इन्द्रजित् को विदा करके उस समय सीताजी की रक्षा करने वाली राक्षसियों को बुलवाया॥५॥
राक्षस्यस्त्रिजटा चापि शासनात् तमुपस्थिताः।
ता उवाच ततो हृष्टो राक्षसी राक्षसाधिपः॥६॥
आज्ञा पाते ही त्रिजटा तथा अन्य राक्षसियाँ उसके पास आयीं। तब हर्ष में भरे हुए राक्षसराज ने उन राक्षसियों से कहा- ॥ ६॥
हताविन्द्रजिताख्यात वैदेह्या रामलक्ष्मणौ।
पुष्पकं तत्समारोप्य दर्शयध्वं रणे हतौ॥७॥
‘तुम लोग विदेहकुमारी सीता से जाकर कहो कि इन्द्रजित् ने राम और लक्ष्मण को मार डाला। फिर पुष्पकविमान पर सीता को चढ़ाकर रणभूमि में ले जाओ और उन मारे गये दोनों बन्धुओं को उसे दिखा दो॥७॥
यदाश्रयादवष्टब्धा नेयं मामुपतिष्ठते।
सोऽस्या भर्ता सह भ्रात्रा निहतो रणमूर्धनि॥८॥
‘जिसके आश्रय से गर्व में भरकर यह मेरे पास नहीं आती थी, वह इसका पति अपने भाई के साथ युद्ध के मुहाने पर मारा गया॥८॥
निर्विशङ्का निरुद्भिग्ना निरपेक्षा च मैथिली।
मामुपस्थास्यते सीता सर्वाभरणभूषिता॥९॥
‘अब मिथिलेशकुमारी सीता को उसकी अपेक्षा नहीं रहेगी। वह समस्त आभूषणों से विभूषित हो भय और शङ्का को त्यागकर मेरी सेवा में उपस्थित होगी॥९॥
अद्य कालवशं प्राप्तं रणे रामं सलक्ष्मणम्।
अवेक्ष्य विनिवृत्ता सा चान्यां गतिमपश्यती॥१०॥
अनपेक्षा विशालाक्षी मामुपस्थास्यते स्वयम्।
आज रणभूमि में काल के अधीन हुए राम और लक्ष्मण को देखकर वह उनकी ओर से अपना मन हटा लेगी तथा अपने लिये दूसरा कोई आश्रय न देखकर उधर से निराश हो विशाललोचना सीता स्वयं ही मेरे पास चली आयेगी’ ।। १० १/२ ।।
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा रावणस्य दुरात्मनः॥११॥
राक्षस्यस्तास्तथेत्युक्त्वा जग्मुर्वै यत्र पुष्पकम्।
दुरात्मा रावण की वह बात सुनकर वे सब राक्षसियाँ ‘बहुत अच्छा’ कह उस स्थान पर गयीं, जहाँ पुष्पकविमान था॥ ११ १/२॥
ततः पुष्पकमादाय राक्षस्यो रावणाज्ञया॥१२॥
अशोकवनिकास्थां तां मैथिली समुपानयन्।
रावण की आज्ञा से उस पुष्पकविमान को वे राक्षसियाँ अशोकवाटिका में बैठी हुई मिथिलेशकुमारी के पास ले आयीं। १२ १/२॥
तामादाय तु राक्षस्यो भर्तृशोकपराजिताम्॥१३॥
सीतामारोपयामासुर्विमानं पुष्पकं तदा।।
उन राक्षसियों ने पति के शोक से व्याकुल हुई सीता को तत्काल पुष्पकविमान पर चढ़ाया॥१३ १/२॥
ततः पुष्पकमारोप्य सीतां त्रिजटया सह ॥१४॥
जग्मुर्दर्शयितुं तस्यै राक्षस्यो रामलक्ष्मणौ।
रावणश्चारयामास पताकाध्वजमालिनीम्॥१५॥
सीता को पुष्पकविमान पर बिठाकर त्रिजटा-सहित वे राक्षसियाँ उन्हें राम-लक्ष्मण का दर्शन कराने के लिये चलीं। इस प्रकार रावण ने उन्हें ध्वजापताकाओं से अलंकृत लङ्कापुरी के ऊपर विचरण करवाया॥ १४-१५॥
प्राघोषयत हृष्टश्च लङ्कायां राक्षसेश्वरः।
राघवो लक्ष्मणश्चैव हताविन्द्रजिता रणे॥१६॥
इधर हर्ष से भरे हुए राक्षसराज रावण ने लङ्का में सर्वत्र यह घोषणा करा दी कि राम और लक्ष्मण रणभूमि में इन्द्रजित् के हाथ से मारे गये॥ १६॥
विमानेनापि गत्वा तु सीता त्रिजटया सह।
ददर्श वानराणां तु सर्वं सैन्यं निपातितम्॥१७॥
त्रिजटा के साथ उस विमान द्वारा वहाँ जाकर सीता ने रणभूमि में जो वानरों की सेनाएँ मारी गयी थीं, उन सबको देखा॥१७॥
प्रहृष्टमनसश्चापि ददर्श पिशिताशनान्।
वानरांश्चातिदुःखार्तान् रामलक्ष्मणपार्श्वतः॥१८॥
उन्होंने मांसभक्षी राक्षसों को तो भीतर से प्रसन्न देखा और श्रीराम तथा लक्ष्मण के पास खड़े हुए वानरों को अत्यन्त दुःख से पीड़ित पाया॥१८॥
ततः सीता ददर्शोभौ शयानौ शरतल्पगौ।
लक्ष्मणं चैव रामं च विसंज्ञौ शरपीडितौ॥१९॥
तदनन्तर सीता ने बाणशय्या पर सोये हुए दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण को भी देखा, जो बाणों से पीड़ित हो संज्ञाशून्य होकर पड़े थे॥ १९॥
विध्वस्तकवचौ वीरौ विप्रविद्धशरासनौ।
सायकैश्छिन्नसर्वाङौ शरस्तम्बमयौ क्षितौ॥२०॥
उन दोनों वीरों के कवच टूट गये थे, धनुष-बाण अलग पड़े थे, सायकों से सारे अङ्ग छिद गये थे और वे बाणसमूहों के बने हुए पुतलों की भाँति पृथ्वी पर पड़े थे॥
तौ दृष्ट्वा भ्रातरौ तत्र प्रवीरौ पुरुषर्षभौ।
शयानौ पुण्डरीकाक्षौ कुमाराविव पावकी॥२१॥
शरतल्पगतौ वीरौ तथाभूतौ नरर्षभौ।
दुःखार्ता करुणं सीता सुभृशं विललाप ह॥२२॥
जो प्रमुख वीर और समस्त पुरुषों में उत्तम थे, वे दोनों भाई कमलनयन राम और लक्ष्मण अग्निपुत्र कुमार शाख और विशाख की भाँति शरसमूह में सो रहे थे। उन दोनों नरश्रेष्ठ वीरों को उस अवस्था में बाणशय्या पर पड़ा देख दुःख से पीड़ित हुई सीता करुणाजनक स्वर में जोर-जोर से विलाप करने लगीं। २१-२२॥
भर्तारमनवद्याङ्गी लक्ष्मणं चासितेक्षणा।
प्रेक्ष्य पांसुषु चेष्टन्तौ रुरोद जनकात्मजा॥२३॥
निर्दोष अङ्गोंवाली श्यामलोचना जनकनन्दिनी सीता अपने पति श्रीराम और देवर लक्ष्मण को धूल में लोटते देख फूट-फूटकर रोने लगीं॥ २३ ॥
सबाष्पशोकाभिहता समीक्ष्य तौ भ्रातरौ देवसुतप्रभावौ।
वितर्कयन्ती निधनं तयोः सा दुःखान्विता वाक्यमिदं जगाद॥२४॥
उनके नेत्रों से आँसू बह रहे थे और हृदय शोक के आघात से पीड़ित था। देवताओं के तुल्य प्रभावशाली उन दोनों भाइयों को उस अवस्था में देखकर उनके मरण की आशङ्का करती हुई वे दुःख एवं चिन्ता में डूब गयीं और इस प्रकार बोलीं ॥ २४॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे सप्तचत्वारिंशः सर्गः॥४७॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में सैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।४७॥
सर्ग-48
भर्तारं निहतं दृष्ट्वा लक्ष्मणं च महाबलम्।
विललाप भृशं सीता करुणं शोककर्शिता॥१॥
अपने स्वामी श्रीराम को तथा महाबली लक्ष्मण को भी मारा गया देख शोक से पीड़ित हुई सीता बारम्बार करुणाजनक विलाप करने लगीं— ॥१॥
ऊचुर्लाक्षणिका ये मां पुत्रिण्यविधवेति च।
तेऽद्य सर्वे हते रामे ज्ञानिनोऽनृतवादिनः॥२॥
‘सामुद्रिक लक्षणों के ज्ञाता विद्वानों ने मुझे पुत्रवती और सधवा बताया था। आज श्रीराम के मारे जाने से वे सब लक्षण-ज्ञानी पुरुष असत्यवादी हो गये॥२॥
यज्वनो महिषीं ये मामूचुः पत्नी च सत्रिणः।
तेऽद्य सर्वे हते रामे ज्ञानिनोऽनृतवादिनः॥३॥
‘जिन्होंने मुझे यज्ञपरायण तथा विविध सत्रों का संचालन करने वाले राजाधिराज की पत्नी बताया था, आज श्रीराम के मारे जाने से वे सभी लक्षणवेत्ता पुरुष झूठे हो गये॥३॥
वीरपार्थिवपत्नीनां ये विदुर्भर्तृपूजिताम्।
तेऽद्य सर्वे हते रामे ज्ञानिनोऽनृतवादिनः॥४॥
‘जिन लोगों ने लक्षणों द्वारा मुझे वीर राजाओं की पत्नियों में पूजनीय और पति के द्वारा सम्मानित समझा था, आज श्रीराम के न रहने से वे सभी लक्षणज्ञ पुरुष मिथ्यावादी हो गये॥ ४॥
ऊचुः संश्रवणे ये मां द्विजाः कार्तान्तिकाः
शुभाम्। तेऽद्य सर्वे हते रामे ज्ञानिनोऽनृतवादिनः॥५॥
‘ज्योतिषशास्त्र के सिद्धान्त को जानने वाले जिन ब्राह्मणों ने मेरे सामने ही मुझे नित्य मङ्गलमयी कहा था, वे सभी लक्षणवेत्ता पुरुष आज श्रीराम के मारे जाने पर असत्यवादी सिद्ध हो गये॥५॥
इमानि खलु पद्मानि पादयोर्वै कुलस्त्रियः।
आधिराज्येऽभिषिच्यन्ते नरेन्द्रैः पतिभिः सह ॥
‘जिन लक्षणभूत कमलों के हाथ-पैर आदि में होने पर कुलवती स्त्रियाँ अपने पति राजाधिराज के साथ सम्राज्ञी के पद पर अभिषिक्त होती हैं, वे मेरे दोनों पैरों में निश्चित रूप से विद्यमान हैं॥६॥
वैधव्यं यान्ति यैर्नार्योऽलक्षणैर्भाग्यदुर्लभाः।
नात्मनस्तानि पश्यामि पश्यन्ती हतलक्षणा॥७॥
‘जिन अशुभ लक्षणों के कारण सौभाग्य दुर्लभ होता है और स्त्रियाँ विधवा हो जाती हैं, मैं बहुत देखने पर भी अपने अङ्गों में ऐसे लक्षणों को नहीं देख पाती, तथापि मेरे सारे शुभ लक्षण निष्फल हो गये।। ७॥
सत्यनामानि पद्मानि स्त्रीणामुक्तानि लक्षणैः।
तान्यद्य निहते रामे वितथानि भवन्ति मे॥८॥
‘स्त्रियों के हाथ-पैरों में जो कमल के चिह्न होते हैं, उन्हें लक्षणवेत्ता विद्वानों ने अमोघ बताया है। किंतु आज श्रीराम के मारे जाने से वे सारे शुभ लक्षण मेरे लिये व्यर्थ हो गये॥८॥
केशाः सूक्ष्माः समा नीला भ्रवौ चासंहते मम।
वृत्ते चारोमके जड़े दन्ताश्चाविरला मम॥९॥
‘मेरे सिर के बाल महीन, बराबर और काले हैं। भौहें परस्पर जुड़ी हुई नहीं हैं। मेरी पिंडलियाँ (घुटनों से नीचे के भाग) गोल-गोल तथा रोमरहित हैं तथा मेरे दाँत भी परस्पर सटे हुए हैं॥९॥
शले नेत्रे करौ पादौ गुल्फावूरू समौ चितौ।
अनुवृत्तनखाः स्निग्धाः समाश्चाङ्गुलयो मम॥१०॥
‘मेरे नेत्रों के आसपास के भाग, दोनों नेत्र, दोनों हाथ, दोनों पैर, दोनों गुल्फ (तखने) और जाँघे बराबर, विशाल एवं मांसल (पुष्ट) हैं। दोनों हाथों की अँगुलियाँ बराबर एवं चिकनी हैं और उनके नख गोल एवं उतार-चढाववाले हैं।। १०॥
स्तनौ चाविरलौ पीनौ मामको मग्नचूचुकौ।
मग्ना चोत्सेधनी नाभिः पावोरस्कं च मे चितम्॥११॥
‘मेरे दोनों स्तन परस्पर सटे हुए और स्थूल हैं। इनके अग्रभाग भीतर की ओर दबे हुए हैं। मेरी नाभि गहरी और उसके आसपासके भाग ऊँचे हैं। मेरे पार्श्वभाग तथा छाती मांसल हैं॥ ११॥
मम वर्णो मणिनिभो मृदून्यङ्गरुहाणि च।
प्रतिष्ठितां द्वादशभिर्मामूचुः शुभलक्षणाम्॥१२॥
‘मेरी अङ्गकान्ति खरादी हुई मणि के समान उज्ज्वल है। शरीर के रोएँ कोमल हैं तथा पैरों की दसों अँगुलियाँ और दोनों तलवे—ये बारहों पृथ्वी से अच्छी तरह सट जाते हैं। इन सबके कारण लक्षणज्ञों ने मुझे शुभलक्षणा बताया था॥ १२॥
समग्रयवमच्छिद्रं पाणिपादं च वर्णवत्।
मन्दस्मितेत्येव च मां कन्यालाक्षणिका विदुः॥
‘मेरे हाथ-पैर लाल एवं उत्तम कान्ति से युक्त हैं। उनमें जौ की समूची रेखाएँ हैं तथा मेरे हाथों की अँगुलियाँ जब परस्पर सटी होती हैं, उस समय उनमें तनिक भी छिद्र नहीं रह जाता है। कन्या के शुभलक्षणों को जानने वाले विद्वानों ने मुझे मन्द मुसकानवाली बताया था॥ १३ ॥
आधिराज्येऽभिषेको मे ब्राह्मणैः पतिना सह।
कृतान्तकुशलैरुक्तं तत् सर्वं वितथीकृतम्॥१४॥
ज्योतिष के सिद्धान्त को जानने वाले निपुण ब्राह्मणों ने यह बताया था कि मेरा पति के साथ राज्याभिषेक होगा, किंतु आज वे सारी बातें झूठी हो गयीं॥ १४ ॥
शोधयित्वा जनस्थानं प्रवृत्तिमुपलभ्य च।
तीर्त्वा सागरमक्षोभ्यं भ्रातरौ गोष्पदे हतौ॥१५॥
‘इन दोनों भाइयों ने मेरे लिये जनस्थान को छान डाला तथा मेरा समाचार पाकर अक्षोभ्य समुद्र को पार किया, किंतु हाय! इतना सब कर लेने के बाद थोड़ी-सी राक्षस सेना के द्वारा जिसे हराना इनके लिये
गोपद को लाँघने के समान था, वे दोनों मारे गये। १५॥
ननु वारुणमाग्नेयमैन्द्रं वायव्यमेव च।
अस्त्रं ब्रह्मशिरश्चैव राघवौ प्रत्यपद्यत॥१६॥
‘परंतु ये दोनों रघुवंशी बन्धु तो वारुण, आग्नेय, ऐन्द्र, वायव्य और ब्रह्मशिर आदि अस्त्रों को भी जानते थे। मरने से पहले इन्होंने उन अस्त्रों का प्रयोग क्यों नहीं किया? ॥ १६॥
अदृश्यमानेन रणे मायया वासवोपमौ।
मम नाथावनाथाया निहतौ रामलक्ष्मणौ ॥१७॥
‘मुझ अनाथा के रक्षक श्रीराम और लक्ष्मण इन्द्रतुल्य पराक्रमी थे, किंतु इन्द्रजित् ने स्वयं माया से अदृश्य रहकर ही इन्हें रणभूमि में मार डाला है॥ १७॥
नहि दृष्टिपथं प्राप्य राघवस्य रणे रिपुः ।
जीवन् प्रतिनिवर्तेत यद्यपि स्यान्मनोजवः॥१८॥
‘अन्यथा युद्धस्थलमें इन श्रीरघुनाथजीके दृष्टिपथमें आकर कोई भी शत्रु, वह मनके समान वेगशाली क्यों न हो, जीवित नहीं लौट सकता था॥ १८ ॥
न कालस्यातिभारोऽस्ति कृतान्तश्च सुदुर्जयः।
यत्र रामः सह भ्रात्रा शेते युधि निपातितः॥१९॥
‘परंतु काल के लिये कुछ भी अधिक बोझ नहीं है (वह सब कुछ कर सकता है)। उसके लिये दैव को भी जीतना विशेष कठिन नहीं है। इस काल के ही वश में पड़कर आज श्रीराम अपने भाई के साथ मारे जाकर युद्धभूमि में सो रहे हैं॥ १९॥
न शोचामि तथा राम लक्ष्मणं च महारथम्।
नात्मानं जननीं चापि यथा श्वश्रू तपस्विनीम्॥२०॥
सा तु चिन्तयते नित्यं समाप्तव्रतमागतम्।
कदा द्रक्ष्यामि सीतां च लक्ष्मणं च सराघवम्॥२१॥
‘मैं श्रीराम, महारथी लक्ष्मण, अपने और अपनी माता के लिये भी उतना शोक नहीं करती हूँ जितना अपनी तपस्विनी सासुजी के लिये कर रही हूँ। वे तो प्रतिदिन यही सोचती होंगी कि वह दिन कब आयेगा जब कि वनवास का व्रत समाप्त करके वन से लौटे हुए श्रीराम, लक्ष्मण और सीता को मैं देखंगी’। २०-२१॥
परिदेवयमानां तां राक्षसी त्रिजटाब्रवीत्।
मा विषादं कृथा देवि भर्तायं तव जीवति॥२२॥
इस प्रकार विलाप करती हुई सीता से राक्षसी त्रिजटा ने कहा—’देवि! विषाद न करो। तुम्हारे ये पतिदेव जीवित हैं ॥ २२ ॥
कारणनि च वक्ष्यामि महान्ति सदृशानि च।
यथेमौ जीवतो देवि भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥२३॥
‘देवि! मैं तुम्हें कई ऐसे महान् और उचित कारण बताऊँगी, जिनसे यह सूचित होता है कि ये दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण जीवित हैं।॥ २३॥
नहि कोपपरीतानि हर्षपर्युत्सुकानि च।
भवन्ति युधि योधानां मुखानि निहते पतौ॥२४॥
‘युद्ध में स्वामी के मारे जाने पर योद्धाओं के मुँह क्रोध और हर्ष की उत्सुकता से युक्त नहीं रहते (किंतु यहाँ वे दोनों बातें पायी जाती हैं। इसलिये ये दोनों जीवित हैं)॥२४॥
इदं विमानं वैदेहि पुष्पकं नाम नामतः।
दिव्यं त्वां धारयेन नेदं यद्येतौ गतजीवितौ॥२५॥
‘विदेहनन्दिनि! यह पुष्पक नामक विमान दिव्य है। यदि इन दोनों के प्राण चले गये होते तो (वैधव्यावस्था में) यह तुम्हें धारण न करता॥ २५॥
हतवीरप्रधाना हि गतोत्साहा निरुद्यमा।
सेना भ्रमति संख्येष हतकर्णेव नौर्जले॥२६॥
इयं पुनरसम्भ्रान्ता निरुद्विग्ना तपस्विनि।
सेना रक्षति काकुत्स्थौ मया प्रीत्या निवेदितौ॥२७॥
‘इसके सिवा जब प्रधान वीर मारा जाता है, तब उसकी सेना उत्साह और उद्योग से हीन हो युद्धस्थल में उसी तरह मारी-मारी फिरती है, जैसे कर्णधार के नष्ट हो जाने पर नौका जल में ही बहती रहती है। परंतु तपस्विनि! इस सेना में किसी प्रकार की घबराहट या उद्वेग नहीं है। यह इन दोनों राजकुमारों की रक्षा कर रही है। इस प्रकार मैंने प्रेमपूर्वक तुम्हें यह बताया है कि ये दोनों भाई जीवित हैं।। २६-२७॥
सा त्वं भव सुविस्रब्धा अनुमानैः सुखोदयैः ।
अहतौ पश्य काकुत्स्थौ स्नेहादेतद् ब्रवीमि ते॥२८॥
‘इसलिये अब तुम इन भावी सुख की सूचना देने वाले अनुमानों (हेतुओं) से निश्चिन्त हो जाओ विश्वास करो कि ये जीवित हैं। तुम इन दोनों रघुवंशी राजकुमारों को इसी रूप में देखो कि ये मारे नहीं गये हैं। यह बात मैं तुमसे स्नेहवश कह रही हूँ॥२८॥
अनृतं नोक्तपूर्वं मे न च वक्ष्यामि मैथिलि।
चारित्रसुखशीलत्वात् प्रविष्टासि मनो मम॥२९॥
‘मिथिलेशकुमारी! तुम्हारा शील-स्वभाव तुम्हारे निर्मल चरित्र के कारण बड़ा सुखदायक जान पड़ताहै, इसीलिये तुम मेरे मन में घर कर गयी हो। अतएव मैंने तुमसे न तो पहले कभी झूठ कहा है और न
आगे ही कहूँगी॥२९॥
नेमौ शक्यौ रणे जेतुं सेन्ट्रैरपि सुरासुरैः।
तादृशं दर्शनं दृष्ट्वा मया चोदीरितं तव॥३०॥
‘इन दोनों वीरों को रणभूमि में इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता और असुर भी नहीं जीत सकते। वैसा लक्षण देखकर ही मैंने तुमसे ये बातें कही हैं ॥ ३०॥
इदं तु सुमहच्चित्रं शरैः पश्यस्व मैथिलि।
विसंज्ञौ पतितावेतौ नैव लक्ष्मीर्विमुञ्चति॥३१॥
‘मिथिलेशकुमारी! यह महान् आश्चर्य की बात तो देखो। बाणों के लगने से ये अचेत होकर पड़े हैं तो भी लक्ष्मी (शरीर की सहज कान्ति) इनका त्याग नहीं कर रही है॥ ३१॥
प्रायेण गतसत्त्वानां पुरुषाणां गतायुषाम्।
दृश्यमानेषु वक्त्रेषु परं भवति वैकृतम्॥३२॥
‘जिनके प्राण निकल जाते हैं अथवा जिनकी आयु समाप्त हो जाती है, उनके मुखों पर यदि दृष्टिपात किया जाय तो प्रायः वहाँ बड़ी विकृति दिखायी देती है (इन दोनों के मुखों की शोभा ज्यों-की-त्यों बनी हुई है; इसलिये ये जीवित हैं)॥३२॥
त्यज शोकं च दुःखं च मोहं च जनकात्मजे।
रामलक्ष्मणयोरर्थे नाद्य शक्यमजीवितुम्॥३३॥
‘जनककिशोरी! तुम श्रीराम और लक्ष्मण के लिये शोक, दुःख और मोह त्याग दो। ये अब मर नहीं सकते’ ॥ ३३॥
श्रुत्वा तु वचनं तस्याः सीता सुरसुतोपमा।
कृताञ्जलिरुवाचेमामेवमस्त्विति मैथिली॥३४॥
त्रिजटा की यह बात सुनकर देवकन्या के समान सुन्दरी मिथिलेशकुमारी सीता ने हाथ जोड़कर उससे कहा—’बहिन! ऐसा ही हो’ ॥ ३४ ॥
विमानं पुष्पकं तत्तु संनिवर्त्य मनोजवम्।
दीना त्रिजटया सीता लङ्कामेव प्रवेशिता॥३५॥
फिर मन के समान वेगवाले पुष्पकविमान को लौटाकर त्रिजटा दुःखिनी सीता को लङ्कापुरी में ही ले आयी॥ ३५॥
ततस्त्रिजटया सार्धं पुष्पकादवरुह्य सा।
अशोकवनिकामेव राक्षसीभिः प्रवेशिता॥३६॥
तत्पश्चात् त्रिजटा के साथ विमान से उतरने पर राक्षसियों ने उन्हें पुनः अशोकवाटिका में ही पहुँचा दिया॥
प्रविश्य सीता बहुवृक्षखण्डां तां राक्षसेन्द्रस्य विहारभूमिम्।
सम्प्रेक्ष्य संचिन्त्य च राजपुत्रौ परं विषादं समुपाजगाम॥३७॥
बहुसंख्यक वृक्षसमूहों से सुशोभित राक्षसराज की उस विहारभूमि में पहुँचकर सीता ने उसे देखा और उन दोनों राजकुमारों का चिन्तन करके वे महान् शोक में डूब गयीं॥३७॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डेऽष्टचत्वारिंशः सर्गः॥४८॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में अड़तालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥४८॥
सर्ग-49
घोरेण शरबन्धेन बद्धौ दशरथात्मजौ।
निःश्वसन्तौ यथा नागौ शयानौ रुधिरोक्षितौ॥
दशरथकुमार श्रीराम और लक्ष्मण भयंकर सर्पाकार बाण के बन्धन में बँधे हुए-से पड़े थे। वे लहूलुहान हो रहे थे और फुफकारते हुए सो के समान साँस ले रहे थे॥१॥
सर्वे ते वानर श्रेष्ठाः ससुग्रीवमहाबलाः।
परिवार्य महात्मानौ तस्थुः शोकपरिप्लुताः॥२॥
उन दोनों महात्माओं को चारों ओर से घेरकर सुग्रीव आदि सभी श्रेष्ठ महाबली वानर शोक में डूबे खड़े थे।
एतस्मिन्नन्तरे रामः प्रत्यबुध्यत वीर्यवान्।
स्थिरत्वात् सत्त्वयोगाच्च शरैः संदानितोऽपि सन्॥३॥
इसी बीच में पराक्रमी श्रीराम नागपाश से बँधे होने पर भी अपने शरीर की दृढ़ता और शक्तिमत्ता के कारण मूर्छा से जाग उठे॥३॥
ततो दृष्ट्वा सरुधिरं निषण्णं गाढमर्पितम्।
भ्रातरं दीनवदनं पर्यदेवयदातुरः॥४॥
उन्होंने देखा कि भाई लक्ष्मण बाणों से अत्यन्त घायल होकर खून से लथपथ हुए पड़े हैं और उनका चेहरा बहुत उतर गया है; अतः वे आतुर होकर विलाप करने लगे
किं नु मे सीतया कार्यं लब्धया जीवितेन वा।
शयानं योऽद्य पश्यामि भ्रातरं युधि निर्जितम्॥
‘हाय! यदि मुझे सीता मिल भी गयीं तो मैं उन्हें लेकर क्या करूँगा? अथवा इस जीवन को ही रखकर क्या करना है? जब कि आज मैं अपने पराजित हुए भाई को युद्धस्थल में पड़ा हुआ देख रहा हूँ॥५॥
शक्या सीतासमा नारी मर्त्यलोके विचिन्वता।
न लक्ष्मणसमो भ्राता सचिवः साम्परायिकः॥
‘मर्त्यलोक में ढूँढ़ने पर मुझे सीता-जैसी दूसरी स्त्री मिल सकती है; परंतु लक्ष्मण के समान सहायक और युद्धकुशल भाई नहीं मिल सकता॥६॥
परित्यक्ष्याम्यहं प्राणान् वानराणां तु पश्यताम्।
यदि पञ्चत्वमापन्नः सुमित्रानन्दवर्धनः॥७॥
‘सुमित्रा के आनन्द को बढ़ाने वाले लक्ष्मण यदि जीवित न रहे तो मैं वानरों के देखते-देखते अपने प्राणों का परित्याग कर दूंगा॥७॥
किं नु वक्ष्यामि कौसल्यां मातरं किं नु कैकयीम्।
कथमम्बां सुमित्रां च पुत्रदर्शनलालसाम्॥८॥
विवत्सां वेपमानां च वेपन्तीं कुररीमिव।
कथमाश्वासयिष्यामि यदि यास्यामि तं विना॥९॥
‘लक्ष्मण के बिना यदि मैं अयोध्या को लौटूं तो माता कौसल्या और कैकेयी को क्या जवाब दूंगा तथा । अपने पुत्र को देखने के लिये उत्सुक हो बछड़े से बिछुड़ी गाय के समान काँपती और कुररी की भाँति रोती-बिलखती माता सुमित्रा से क्या कहूँगा? उन्हें किस तरह धैर्य बँधाऊँगा? ॥
कथं वक्ष्यामि शत्रुघ्नं भरतं च यशस्विनम्।
मया सह वनं यातो विना तेनाहमागतः॥१०॥
‘मैं यशस्वी भरत और शत्रुघ्न से किस तरह यहकह सकूँगा कि लक्ष्मण मेरे साथ वन को गये थे; किंतु मैं उन्हें वहीं खोकर उनके बिना ही लौट आया
उपालम्भं न शक्ष्यामि सोढ़मम्बासुमित्रया।
इहैव देहं त्यक्ष्यामि नहि जीवितुमुत्सहे॥११॥
‘दोनों माताओंसहित सुमित्रा का उपालम्भ मैं नहीं सह सकूँगा; अतः यहीं इस देह को त्याग दूंगा। अब मुझमें जीवित रहने का उत्साह नहीं है॥ ११॥
धिङ्मां दुष्कृतकर्माणमनार्यं यत्कृते ह्यसौ।
लक्ष्मणः पतितः शेते शरतल्पे गतासुवत्॥१२॥
‘मुझ-जैसे दुष्कर्मी और अनार्य को धिक्कार है, जिसके कारण लक्ष्मण मरे हुए के समान बाणशय्या पर सो रहे हैं॥
त्वं नित्यं सुविषण्णं मामाश्वासयसि लक्ष्मण।
गतासुर्नाद्य शक्तोऽसि मामार्तमभिभाषितुम्॥१३॥
‘लक्ष्मण! जब मैं अत्यन्त विषाद में डूब जाता था, उस समय तुम्हीं सदा मुझे आश्वासन देते थे; परंतु आज तुम्हारे प्राण नहीं रहे, इसलिये आज तुम मुझ दुःखिया से बात करने में भी असमर्थ हो॥ १३॥
येनाद्य बहवो युद्धे निहता राक्षसाः क्षितौ।
तस्यामेवाद्य शूरस्त्वं शेषे विनिहतः शनैः॥१४॥
‘भैया! जिस रणभूमि में आज तुमने बहुत-से राक्षसों को मार गिराया था, उसी में शूरवीर होकर भी तुम बाणों द्वारा मारे जाकर सो रहे हो॥१४॥
शयानः शरतल्पेऽस्मिन् सशोणितपरिस्रुतः।
शरभूतस्ततो भासि भास्करोऽस्तमिव व्रजन्॥१५॥
‘इस बाण-शय्या पर तुम खून से लथपथ होकर पड़े हो और बाणों से व्याप्त होकर अस्ताचल को जाते हुए सूर्य के समान प्रकाशित हो रहे हो॥ १५ ॥
बाणाभिहतमर्मत्वान्न शक्नोषीह भाषितुम्।
रुजा चाब्रुवतो यस्य दृष्टिरागेण सूच्यते॥१६॥
‘बाणों से तुम्हारा मर्मस्थल विदीर्ण हो गया, इसलिये तुम यहाँ बात भी नहीं कर सकते। यद्यपि तुम बोल नहीं रहे हो, तथापि तुम्हारे नेत्रों की लाली से तुम्हारी मार्मिक पीड़ा सूचित हो रही है॥ १६ ॥
यथैव मां वनं यान्तमनुयातो महाद्युतिः।
अहमप्यनुयास्यामि तथैवैनं यमक्षयम्॥१७॥
‘जिस तरह वन की यात्रा करते समय महातेजस्वी लक्ष्मण मेरे पीछे-पीछे चले आये थे, उसी प्रकार मैं भी यमलोक में इनका अनुसरण करूँगा॥ १७ ॥
इष्टबन्धुजनो नित्यं मां च नित्यमनुव्रतः।
इमामद्य गतोऽवस्थां ममानार्यस्य दुर्नयैः ॥१८॥
‘जो मेरे प्रिय बन्धुजन थे और सदा मुझमें अनुराग एवं भक्तिभाव रखते थे, वे ही लक्ष्मण आज मुझ अनार्य की दुर्नीतियों के कारण इस अवस्था को पहुँच गये॥
सुरुष्टेनापि वीरेण लक्ष्मणेन न संस्मरे।
परुषं विप्रियं चापि श्रावितं तु कदाचन ॥१९॥
‘मुझे ऐसा कोई प्रसंग याद नहीं आता, जब कि वीर लक्ष्मण ने अत्यन्त कुपित होने पर भी मुझे कभी कोई कठोर या अप्रिय बात सुनायी हो ॥ १९ ॥
विसस कवेगेन पञ्चबाणशतानि यः।
इष्वस्त्रेष्वधिकस्तस्मात् कार्तवीर्याच्च लक्ष्मणः॥२०॥
‘लक्ष्मण एक ही वेग से पाँच सौ बाणों की वर्षा करते थे; इसलिये धनुर्विद्या में कार्तवीर्य अर्जुन से भी बढ़कर थे॥
अस्त्रैरस्त्राणि यो हन्याच्छक्रस्यापि महात्मनः।
सोऽयमुर्त्या हतः शेते महार्हशयनोचितः॥२१॥
‘जो अपने अस्त्रों द्वारा महात्मा इन्द्र के भी अस्त्रों को काट सकते थे; वे ही बहुमूल्य शय्या पर सोने योग्य लक्ष्मण आज स्वयं मारे जाकर पृथ्वी पर सो रहे हैं।
तत्तु मिथ्या प्रलप्तं मां प्रधक्ष्यति न संशयः।
यन्मया न कृतो राजा राक्षसानां विभीषणः॥२२॥
‘मैं विभीषणको राक्षसों का राजा न बना सका; अतः मेरा वह झूठा प्रलाप मुझे सदा जलाता रहेगा, इसमें संशय नहीं है॥ २२ ॥
अस्मिन् मुहूर्ते सुग्रीव प्रतियातुमितोऽर्हसि।
मत्वा हीनं मया राजन् रावणोऽभिभविष्यति॥२३॥
‘वानरराज सुग्रीव! तुम इसी मुहूर्त में यहाँ से लौट जाओ; क्योंकि मेरे बिना तुम्हें असहाय समझकर रावण तुम्हारा तिरस्कार करेगा॥ २३॥ ।
अङ्गदं तु पुरस्कृत्य ससैन्यं सपरिच्छदम्।
सागरं तर सुग्रीव नीलेन च नलेन च॥२४॥
‘मित्र सुग्रीव! सेना और सामग्रियोंसहित अङ्गद को आगे करके नल और नील के साथ तुम समुद्र के पार चले जाओ॥
कृतं हि सुमहत्कर्म यदन्यैर्दुष्करं रणे।
ऋक्षराजेन तुष्यामि गोलाङ्गलाधिपेन च॥ २५॥
‘मैं लंगूरोंके स्वामी गवाक्ष तथा ऋक्षराज जाम्बवान् से भी बहुत संतुष्ट हूँ। तुम सब लोगोंने युद्धमें वह महान् पुरुषार्थ कर दिखाया है, जो दूसरोंके लिये अत्यन्त दुष्कर था॥ २५॥
अङ्गदेन कृतं कर्म मैन्देन द्विविदेन च।
युद्धं केसरिणा संख्ये घोरं सम्पातिना कृतम्॥२६॥
‘अङ्गद, मैन्द और द्विविद ने भी महान् पराक्रम प्रकट किया है। केसरी और सम्पाति ने भी समराङ्गण में घोर युद्ध किया है॥ २६॥
गवयेन गवाक्षेण शरभेण गजेन च।
अन्यैश्च हरिभिर्युद्धं मदर्थे त्यक्तजीवितैः॥२७॥
‘गवय, गवाक्ष, शरभ, गज तथा अन्य वानरों ने भी मेरे लिये प्राणों का मोह छोड़कर संग्राम किया है। २७॥
न चातिक्रमितुं शक्यं दैवं सुग्रीव मानुषैः।
यत्तु शक्यं वयस्येन सुहृदा वा परं मम ॥२८॥
कृतं सुग्रीव तत् सर्वं भवता धर्मभीरुणा।
मित्रकार्यं कृतमिदं भवद्भिर्वानरर्षभाः॥२९॥
अनुज्ञाता मया सर्वे यथेष्टं गन्तुमर्हथ।
‘किंतु सुग्रीव! मनुष्यों के लिये दैव के विधान को लाँघना असम्भव है। मेरे परम मित्र अथवा उत्तम सुहृद् के नाते तुम-जैसे धर्मभीरु पुरुष के द्वारा जो कुछ किया जा सकता था, वह सब तुमने किया है। वानरशिरोमणियो! तुम सबने मिलकर मित्र के इस कार्य को सम्पन्न किया है। अब मैं आज्ञा देता हूँ तुम सब जहाँ इच्छा हो, वहाँ चले जाओ’ ।। २८-२९ १/२॥
शुश्रुवुस्तस्य ये सर्वे वानराः परिदेवितम्॥३०॥
वर्तयांचक्रिरेऽश्रूणि नेत्रैः कृष्णेतरेक्षणाः॥३१॥
भगवान् श्रीराम का यह विलाप भूरी आँखों वाले जिन-जिन वानरों ने सुना, वे सब अपने नेत्रों से आँसू बहाने लगे॥ ३०-३१॥
ततः सर्वाण्यनीकानि स्थापयित्वा विभीषणः।
आजगाम गदापाणिस्त्वरितं यत्र राघवः॥३२॥
तदनन्तर समस्त सेनाओं को स्थिरतापूर्वक स्थापित करके विभीषण हाथ में गदा लिये तुरंत उस स्थान पर लौट आये, जहाँ श्रीरामचन्द्रजी विद्यमान थे॥ ३२ ॥
तं दृष्ट्वा त्वरितं यान्तं नीलाञ्जनचयोपमम्।
वानरा दुद्रुवुः सर्वे मन्यमानास्तु रावणिम्॥३३॥
काले कोयलों की राशि के समान कृष्ण कान्तिवाले विभीषण को शीघ्रतापूर्वक आते देख सब वानर उन्हें रावणपुत्र इन्द्रजित् समझकर इधर-उधर भागने लगे॥ ३३॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे एकोनपञ्चाशः सर्ग॥४९॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में उनचासवाँ सर्ग पूरा हुआ।४९॥
सर्ग-50
अथोवाच महातेजा हरिराजो महाबलः।
किमियं व्यथिता सेना मूढवातेव नौर्जले॥१॥
उस समय महातेजस्वी महाबली वानरराज सुग्रीव ने पूछा—’वानरो! जैसे जल में बवंडरकी मारी हुई नौका डगमगाने लगती है, उसी प्रकार जो यह हमारी सेना सहसा व्यथित हो उठी है, इसका क्या कारण है?’ ॥१॥
सुग्रीवस्य वचः श्रुत्वा वालिपुत्रोऽङ्गदोऽब्रवीत्।
न त्वं पश्यसि रामं च लक्ष्मणं च महारथम्॥२॥
सुग्रीव की यह बात सुनकर वालिपुत्र अङ्गद ने कहा ‘क्या आप श्रीराम और महारथी लक्ष्मण की दशा नहीं देख रहे हैं? ॥२॥
शरजालाचितौ वीरावुभौ दशरथात्मजौ।
शरतल्पे महात्मानौ शयानौ रुधिरोक्षितौ॥३॥
‘ये दोनों वीर महात्मा दशरथकुमार रक्त से भीगे हुए बाण-शय्या पर पड़े हैं और बाणों के समूह से व्याप्त हो रहे हैं ॥३॥
अथाब्रवीद वानरेन्द्रः सुग्रीवः पुत्रमङ्गदम्।
नानिमित्तमिदं मन्ये भवितव्यं भयेन तु॥४॥
तब वानरराज सुग्रीव ने पुत्र अङ्गद से कहा—’बेटा! मैं ऐसा नहीं मानता कि सेना में अकारण ही भगदड़ मच गयी है। किसी-न-किसी भय के कारण ऐसा होना चाहिये॥ ४॥
विषण्णवदना ह्येते त्यक्तप्रहरणा दिशः।
पलायन्तेऽत्र हरयस्त्रासादुत्फुल्ललोचनाः॥५॥
‘ये वानर उदास मुँह से अपने-अपने हथियार फेंककर सम्पूर्ण दिशाओं में भाग रहे हैं और भय के कारण आँखें फाड़-फाड़कर देख रहे हैं ॥ ५॥
अन्योन्यस्य न लज्जन्ते न निरीक्षन्ति पृष्ठतः।
विप्रकर्षन्ति चान्योन्यं पतितं लङ्घयन्ति च॥६॥
‘पलायन करते समय उन्हें एक दूसरे से लज्जा नहीं होती है। वे पीछे की ओर नहीं देखते हैं। एक-दूसरे को घसीटते हैं और जो गिर जाता है, उसे लाँघकर चल देते हैं (भय के मारे उठाते तक नहीं हैं)’॥६॥
एतस्मिन्नन्तरे वीरो गदापाणिर्विभीषणः।
सुग्रीवं वर्धयामास राघवं च जयाशिषा॥७॥
इसी बीच में वीर विभीषण हाथ में गदा लिये वहाँ आ पहुँचे और उन्होंने विजयसूचक आशीर्वाद देकर सुग्रीव तथा श्रीरघुनाथजी की अभ्युदय-कामना की। ७॥
विभीषणं च सुग्रीवो दृष्ट्वा वानरभीषणम्।
ऋक्षराजं महात्मानं समीपस्थमुवाच ह॥८॥
वानरों को भयभीत करने वाले विभीषण को देखकर सुग्रीव ने अपने पास ही खड़े हुए महात्मा ऋक्षराज जाम्बवान् से कहा- ॥ ८॥
विभीषणोऽयं सम्प्राप्तो यं दृष्ट्वा वानरर्षभाः।
द्रवन्त्यायतसंत्रासा रावणात्मजशङ्कया॥९॥
‘ये विभीषण आये हैं, जिन्हें देखकर वानरशिरोमणियों को यह संदेह हुआ है कि रावण का बेटा इन्द्रजित् आ गया। इसीलिये इनका भय बहुत बढ़ गया है और वे भागे जा रहे हैं॥९॥
शीघ्रमेतान् सुसंत्रस्तान् बहुधा विप्रधावितान्।
पर्यवस्थापयाख्याहि विभीषणमुपस्थितम्॥१०॥
‘तुम शीघ्र जाकर यह बताओ कि इन्द्रजित् नहीं, विभीषण आये हैं। ऐसा कहकर बहुधा भयभीत हो पलायन करते हुए इन सब वानरों को सुस्थिर करो भागने से रोको’ ॥ १०॥
सुग्रीवेणैवमुक्तस्तु जाम्बवानृक्षपार्थिवः।
वानरान् सान्त्वयामास संनिवर्त्य प्रधावतः॥११॥
सुग्रीव के ऐसा कहने पर ऋक्षराज जाम्बवान् ने भागते हुए वानरों को लौटाकर उन्हें सान्त्वना दी। ११॥
ते निवृत्ताः पुनः सर्वे वानरास्त्यक्तसाध्वसाः।
ऋक्षराजवचः श्रुत्वा तं च दृष्ट्वा विभीषणम्॥१२॥
ऋक्षराज की बात सुनकर और विभीषण को अपनी आँखों देखकर वानरों ने भय को त्याग दिया तथा वे सब-के-सब फिर लौट आये॥ १२ ॥
विभीषणस्तु रामस्य दृष्ट्वा गात्रं शरैश्चितम्।
लक्ष्मणस्य तु धर्मात्मा बभूव व्यथितस्तदा॥१३॥
श्रीराम और लक्ष्मण के शरीर को बाणों से व्याप्त हुआ देख धर्मात्मा विभीषण को उस समय बड़ी व्यथा हुई॥ १३॥
जलक्लिन्नेन हस्तेन तयोर्नेत्रे विमृज्य च।
शोकसम्पीडितमना रुरोद विललाप च॥१४॥
उन्होंने जल से भीगे हुए उन दोनों भाइयों के नेत्र पोंछे और मन-ही-मन शोक से पीड़ित हो वे रोने और विलाप करने लगे- ॥१४॥
इमौ तौ सत्त्वसम्पन्नौ विक्रान्तौ प्रियसंयुगौ।
इमामवस्थां गमितौ राक्षसैः कूटयोधिभिः॥१५॥
“हाय ! जिन्हें युद्ध अधिक प्रिय था और जो बलविक्रम से सम्पन्न थे, वे ही ये दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण माया से युद्ध करने वाले राक्षसों द्वारा इस अवस्था को पहुँचा दिये गये॥ १५ ॥
भ्रातृपुत्रेण चैतेन दुष्पुत्रेण दुरात्मना।
राक्षस्या जिह्मया बुद्ध्या वञ्चितावृजुविक्रमौ॥१६॥
‘ये दोनों वीर सरलतापूर्वक पराक्रम प्रकट कर रहे थे। परंतु भाई के इस दुरात्मा कुपुत्र ने अपनी कुटिलराक्षसी बुद्धि के द्वारा इन दोनों के साथ धोखा किया॥ १६॥
शरैरिमावलं विद्धौ रुधिरेण समुक्षितौ।
वसुधायामिमौ सुप्तौ दृश्येते शल्यकाविव॥१७॥
‘इन दोनों के शरीर बाणों द्वारा पूर्णतः छिद गये हैं। ये दोनों भाई खून से नहा उठे हैं और इस अवस्था में पृथ्वी पर सोये हुए ये दोनों राजकुमार काँटों से भरे हुए साही नामक जन्तु के समान दिखायी देते हैं॥ १७॥
ययोर्वीर्यमुपाश्रित्य प्रतिष्ठा काङ्क्षिता मया।
ताविमौ देहनाशाय प्रसुप्तौ पुरुषर्षभौ॥१८॥
‘जिनके बल-पराक्रम का आश्रय लेकर मैंने लङ्का के राज्य पर प्रतिष्ठित होने की अभिलाषा की थी; वे ही दोनों भाई पुरुषशिरोमणि श्रीराम और लक्ष्मण देह-त्याग के लिये सोये हुए हैं॥ १८॥
जीवन्नद्य विपन्नोऽस्मि नष्टराज्यमनोरथः।
प्राप्तप्रतिज्ञश्च रिपुः सकामो रावणः कृतः॥१९॥
‘आज मैं जीते-जी मर गया। मेरा राज्यविषयक मनोरथ नष्ट हो गया। शत्रु रावण ने जो सीता को न लौटाने की प्रतिज्ञा की थी, उसकी वह प्रतिज्ञा पूरी हुई। उसके पुत्र ने उसे सफल मनोरथ बना दिया। १९॥
एवं विलपमानं तं परिष्वज्य विभीषणम्।
सुग्रीवः सत्त्वसम्पन्नो हरिराजोऽब्रवीदिदम्॥२०॥
इस प्रकार विलाप करते हुए विभीषण को हृदय से लगाकर शक्तिशाली वानरराज सुग्रीव ने उनसे यों कहा – ॥२०॥
राज्यं प्राप्स्यसि धर्मज्ञ लङ्कायां नेह संशयः।
रावणः सह पुत्रेण स्वकामं नेह लप्स्यते॥२१॥
‘धर्मज्ञ! तुम्हें लङ्का का राज्य प्राप्त होगा, इसमें संशय नहीं है। पुत्रसहित रावण यहाँ अपनी कामना पूरी नहीं कर सकेगा॥ २१॥
गरुडाधिष्ठितावेतावुभौ राघवलक्ष्मणौ।
त्यक्त्वा मोहं वधिष्येते सगणं रावणं रणे॥२२॥
‘ये दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण मूर्छा त्यागने के पश्चात् गरुड़ की पीठ पर बैठकर रणभूमि में राक्षसगणोंसहित रावण का वध करेंगे’॥ २२ ॥
तमेवं सान्त्वयित्वा तु समाश्वास्य तु राक्षसम्।
सुषेणं श्वशुरं पार्वे सुग्रीवस्तमुवाच ह॥२३॥
राक्षस विभीषण को इस प्रकार सान्त्वना और आश्वासन देकर सुग्रीव ने अपने बगल में खड़े हुए श्वसुर सुषेण से कहा- ॥ २३॥
सह शूरैर्हरिगणैर्लब्धसंज्ञावरिंदमौ।
गच्छ त्वं भ्रातरौ गृह्य किष्किन्धां रामलक्ष्मणौ॥२४॥
‘आप होश में आ जाने पर इन दोनों शत्रुदमन श्रीराम और लक्ष्मण को साथ ले शूरवीर वानरगणों के साथ किष्किन्धा को चले जाइये॥ २४॥
अहं तु रावणं हत्वा सपुत्रं सहबान्धवम्।
मैथिलीमानयिष्यामि शक्रो नष्टामिव श्रियम्॥२५॥
‘मैं रावण को पुत्र और बन्धु-बान्धवोंसहित मारकर उसके हाथ से मिथिलेशकुमारी सीता को उसी प्रकार छीन लाऊँगा, जैसे देवराज इन्द्र अपनी खोयी हुई राजलक्ष्मी को दैत्यों के यहाँ से हर लाये थे’ ॥ २५ ॥
श्रुत्वैतद् वानरेन्द्रस्य सुषेणो वाक्यमब्रवीत्।
देवासुरं महायुद्धमनुभूतं पुरातनम्॥२६॥
वानरराज सुग्रीव की यह बात सुनकर सुषेण ने कहा —’पूर्वकाल में जो देवासुर-महायुद्ध हुआ था, उसे हमने देखा था॥२६॥
तदा स्म दानवा देवान् शरसंस्पर्शकोविदान्।
निजघ्नुः शस्त्रविदुषश्छादयन्तो मुहुर्मुहुः ॥ २७॥
‘उस समय अस्त्र-शस्त्रों के ज्ञाता तथा लक्ष्यवेध में कुशल देवताओं को बारम्बार बाणों से आच्छादित करते हुए दानवों ने बहुत घायल कर दिया था॥ २७॥
तानार्तान् नष्टसंज्ञांश्च गतासुंश्च बृहस्पतिः।
विद्याभिर्मन्त्रयुक्ताभिरोषधीभिश्चिकित्सति॥२८॥
‘उस युद्ध में जो देवता अस्त्र-शस्त्रों से पीड़ित, अचेत और प्राणशून्य हो जाते थे, उन सबकी रक्षा के लिये बृहस्पतिजी मन्त्रयुक्त विद्याओं तथा दिव्य ओषधियों द्वारा उनकी चिकित्सा करते थे॥ २८॥
तान्यौषधान्यानयितुं क्षीरोदं यान्तु सागरम्।
जवेन वानराः शीघ्रं सम्पातिपनसादयः॥२९॥
‘मेरी राय है कि उन ओषधियों को ले आने के लिये सम्पाति और पनस आदि वानर शीघ्र ही वेगपूर्वक क्षीरसागर के तट पर जायें ॥ २९॥
हरयस्तु विजानन्ति पार्वती ते महौषधी।
संजीवकरणी दिव्यां विशल्यां देवनिर्मिताम्॥३०॥
‘सम्पाति आदि वानर वहाँ पर्वत पर प्रतिष्ठित हुई दो प्रसिद्ध महौषधियों को जानते हैं। उनमें से एक का नाम है संजीवकरणी और दूसरी का नाम है विशल्यकरणी। इन दोनों दिव्य ओषधियों का निर्माण साक्षात् ब्रह्माजी ने किया है।
चन्द्रश्च नाम द्रोणश्च क्षीरोदे सागरोत्तमे।
अमृतं यत्र मथितं तत्र ते परमौषधी॥३१॥
तौ तत्र विहितौ देवैः पर्वतौ तौ महोदधौ।
अयं वायुसुतो राजन् हनूमांस्तत्र गच्छतु ॥३२॥
‘सागरों में उत्तम क्षीरसमुद्र के तट पर चन्द्र और द्रोण नामक दो पर्वत हैं, जहाँ पूर्वकाल में अमृत का मन्थन किया गया था। उन्हीं दोनों पर्वतों पर वे श्रेष्ठ ओषधियाँ वर्तमान हैं। महासागर में देवताओं ने ही उन दोनों पर्वतों को प्रतिष्ठित किया था। राजन् ! ये वायुपुत्र हनुमान् उन दिव्य ओषधियों को लाने के लिये वहाँ जायँ’ ॥ ३१-३२॥
एतस्मिन्नन्तरे वायुर्मेघाश्चापि सविद्युतः।
पर्यस्य सागरे तोयं कम्पयन्निव पर्वतान्॥३३॥
ओषधियों को लाने की वार्ता वहाँ चल ही रही थी कि बड़े जोर से वायु प्रकट हुई, मेघों की घटा घिर आयी और बिजलियाँ चमकने लगीं। वह वायु सागर के जल में हलचल मचाकर पर्वतों को कम्पितसी करने लगी॥ ३३॥
महता पक्षवातेन सर्वद्वीपमहाद्रुमाः।
निपेतुर्भग्नविटपाः सलिले लवणाम्भसि॥३४॥
गरुड़ के पंख से उठी हुई प्रचण्ड वायु ने सम्पूर्ण द्वीप के बड़े-बड़े वृक्षों की डालियाँ तोड़ डालीं और उन्हें लवणसमुद्र के जल में गिरा दिया॥ ३४ ॥
अभवन् पन्नगास्त्रस्ता भोगिनस्तत्रवासिनः।
शीघ्रं सर्वाणि यादांसि जग्मुश्च लवणार्णवम्॥३५॥
लङ्कावासी महाकाय सर्प भय से थर्रा उठे। सम्पूर्ण जल-जन्तु शीघ्रतापूर्वक समुद्र के जल में घुस गये॥ ३५॥
ततो मुहूर्ताद् गरुडं वैनतेयं महाबलम्।
वानरा ददृशुः सर्वे ज्वलन्तमिव पावकम्॥३६॥
तदनन्तर दो ही घड़ी में समस्त वानरों ने प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी महाबली विनतानन्दन गरुड़ को वहाँ उपस्थित देखा॥ ३६॥
तमागतमभिप्रेक्ष्य नागास्ते विप्रदुद्रुवुः ।
यैस्तु तौ पुरुषौ बद्धौ शरभूतैर्महाबलैः॥ ३७॥
उन्हें आया देख जिन महाबली नागों ने बाण के रूप में आकर उन दोनों महापुरुषों को बाँध रखा था, वे सब-के-सब वहाँ से भाग खड़े हुए॥ ३७॥
ततः सुपर्णः काकुत्स्थौ स्पृष्ट्वा प्रत्यभिनन्द्य च।
विममर्श च पाणिभ्यां मुखे चन्द्रसमप्रभे॥३८॥
तत्पश्चात् गरुड़ ने उन दोनों रघुवंशी बन्धुओं को स्पर्श करके अभिनन्दन किया और अपने हाथों से उनके चन्द्रमा के समान कान्तिमान् मुखों को पोंछा॥३८॥
वैनतेयेन संस्पृष्टास्तयोः संरुरुहुव्रणाः।
सुवर्णे च तनू स्निग्धे तयोराशु बभूवतुः ॥ ३९॥
गरुड़जी का स्पर्श प्राप्त होते ही श्रीराम और लक्ष्मण के सारे घाव भर गये और उनके शरीर तत्काल ही सुन्दर कान्ति से युक्त एवं स्निग्ध हो गये।३९॥
तेजो वीर्यं बलं चौज उत्साहश्च महागुणाः।
प्रदर्शनं च बुद्धिश्च स्मृतिश्च द्विगुणा तयोः॥४०॥
उनमें तेज, वीर्य, बल, ओज, उत्साह, दृष्टिशक्ति, बुद्धि और स्मरणशक्ति आदि महान् गुण पहले से भी दुगुने हो गये॥ ४०॥
तावुत्थाप्य महातेजा गरुडो वासवोपमौ।
उभौ च सस्वजे हृष्टो रामश्चैनमुवाच ह॥४१॥
फिर महातेजस्वी गरुड़ ने उन दोनों भाइयों को, जो साक्षात् इन्द्र के समान थे, उठाकर हृदय से लगा लिया। तब श्रीरामजी ने प्रसन्न होकर उनसे कहा-॥ ४१॥
भवत्प्रसादाद् व्यसनं रावणिप्रभवं महत्।
उपायेन व्यतिक्रान्तौ शीघ्रं च बलिनौ कृतौ॥४२॥
‘इन्द्रजित् के कारण हमलोगों पर जो महान् संकट आ गया था, उसे हम आपकी कृपा से लाँघ गये। आप विशिष्ट उपाय के ज्ञाता हैं; अतः आपने हम दोनों को शीघ्र ही पूर्ववत् बल से सम्पन्न कर दिया है। ४२॥
यथा तातं दशरथं यथाजं च पितामहम्।
तथा भवन्तमासाद्य हृदयं मे प्रसीदति॥४३॥
जैसे पिता दशरथ और पितामह अज के पास जाने से मेरा मन प्रसन्न हो सकता था, वैसे ही आपको पाकर मेरा हृदय हर्ष से खिल उठा है॥४३॥
को भवान् रूपसम्पन्नो दिव्यस्रगनुलेपनः।
वसानो विरजे वस्त्रे दिव्याभरणभूषितः॥४४॥
‘आप बड़े रूपवान् हैं, दिव्य पुष्पों की माला और दिव्य अङ्गराग से विभूषित हैं। आपने दो स्वच्छ वस्त्र धारण कर रखे हैं तथा दिव्य आभूषण आपकी शोभा बढ़ाते हैं। हम जानना चाहते हैं कि आप कौन हैं?’ (सर्वज्ञ होते हुए भी भगवान् ने मानवभाव का आश्रय लेकर गरुड़ से ऐसा प्रश्न किया) ॥४४॥
तमुवाच महातेजा वैनतेयो महाबलः।
पतत्रिराजः प्रीतात्मा हर्षपर्याकलेक्षणम्॥४५॥
तब महातेजस्वी महाबली पक्षिराज विनतानन्दन गरुड़ ने मन-ही-मन प्रसन्न हो आनन्द के आँसुओं से भरे हुए नेत्रवाले श्रीराम से कहा- ॥ ४५ ॥
अहं सखा ते काकुत्स्थ प्रियः प्राणो बहिश्चरः।
गरुत्मानिह सम्प्राप्तो युवयोः साह्यकारणात्॥४६॥
‘काकुत्स्थ! मैं आपका प्रिय मित्र गरुड़ हूँ। बाहर विचरने वाला आपका प्राण हूँ। आप दोनों की सहायता के लिये ही मैं इस समय यहाँ आया हूँ॥ ४६॥
असुरा वा महावीर्या दानवा वा महाबलाः।
सुराश्चापि सगन्धर्वाः पुरस्कृत्य शतक्रतुम्॥४७॥
नेमं मोक्षयितुं शक्ताः शरबन्धं सुदारुणम्।
‘महापराक्रमी असुर, महाबली दानव, देवता तथा गन्धर्व भी यदि इन्द्र को आगे करके यहाँ आते तो वे भी इस भयंकर सर्पाकार बाण के बन्धन से आपको छुड़ाने में समर्थ नहीं हो सकते थे॥ ४७ १/२॥
मायाबलादिन्द्रजिता निर्मितं क्रूरकर्मणा॥४८॥
एते नागाः काद्रवेयास्तीक्ष्णदंष्ट्रा विषोल्बणाः।
रक्षोमायाप्रभावेण शरभूतास्त्वदाश्रयाः॥४९॥
‘क्ररकर्मा इन्द्रजित् ने माया के बल से जिन नागरूपी बाणों का बन्धन तैयार किया था, वे नाग ये कद्रू के पुत्र ही थे। इनके दाँत बड़े तीखे होते हैं। इन नागों का विष बड़ा भयंकर होता है। ये राक्षस की माया के प्रभाव से बाण बनकर आपके शरीर में लिपट गये थे॥ ४८-४९॥
सभाग्यश्चासि धर्मज्ञ राम सत्यपराक्रम।
लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा समरे रिपुघातिना॥५०॥
‘धर्म के ज्ञाता सत्यपराक्रमी श्रीराम! समराङ्गण में शत्रुओं का संहार करने वाले अपने भाई लक्ष्मण के साथ ही आप बड़े सौभाग्यशाली हैं (जो अनायास ही इस नागपाश से मुक्त हो गये) ॥ ५० ॥
इमं श्रुत्वा तु वृत्तान्तं त्वरमाणोऽहमागतः।
सहसैवावयोः स्नेहात् सखित्वमनुपालयन्॥५१॥
‘मैं देवताओं के मुख से आपलोगों के नागपाश में बँधने का समाचार सुनकर बड़ी उतावली के साथ यहाँ आया हूँ। हम दोनों में जो स्नेह है, उससे प्रेरित हो मित्रधर्म का पालन करता हुआ सहसा आ पहुँचा हूँ।
मोक्षितौ च महाघोरादस्मात् सायकबन्धनात्।
अप्रमादश्च कर्तव्यो युवाभ्यां नित्यमेव हि॥५२॥
‘आकर मैंने इस महाभयंकर बाण-बन्धन से आप दोनों को छुड़ा दिया। अब आपको सदा ही सावधान रहना चाहिये। ५२॥
प्रकृत्या राक्षसाः सर्वे संग्रामे कूटयोधिनः।
शूराणां शुद्धभावानां भवतामार्जवं बलम्॥५३॥
‘समस्त राक्षस स्वभाव से ही संग्राम में कपटपूर्वक युद्ध करने वाले होते हैं, परंतु शुद्धभाव वाले आप-जैसे शूरवीरों का सरलता ही बल है॥ ५३॥
तन्न विश्वसनीयं वो राक्षसानां रणाजिरे।
एतेनैवोपमानेन नित्यं जिह्मा हि राक्षसाः॥५४॥
‘इसलिये इसी दृष्टान्त को सामने रखकर आपको रणक्षेत्र में राक्षसों का कभी विश्वास नहीं करना चाहिये; क्योंकि राक्षस सदा ही कुटिल होते हैं। ५४॥
एवमुक्त्वा तदा रामं सुपर्णः स महाबलः।
परिष्वज्य च सुस्निग्धमाप्रष्टमुपचक्रमे॥५५॥
ऐसा कहकर महाबली गरुड़ ने उस समय परम स्नेही श्रीराम को हृदय से लगाकर उनसे जाने की आज्ञा लेने का विचार किया॥५५॥
सखे राघव धर्मज्ञ रिपूणामपि वत्सल।
अभ्यनुज्ञातुमिच्छामि गमिष्यामि यथासुखम्॥५६॥
वे बोले—’शत्रुओं पर भी दया दिखाने वाले धर्मज्ञ मित्र रघुनन्दन! अब मैं सुखपूर्वक यहाँ से प्रस्थान करूँगा। इसके लिये आपकी आज्ञा चाहता हूँ॥५६॥
न च कौतूहलं कार्यं सखित्वं प्रति राघव।।
कृतकर्मा रणे वीर सखित्वं प्रतिवेत्स्यसि॥५७॥
‘वीर रघुनन्दन! मैंने जो अपने को आपका सखा बताया है, इसके विषय में आपको अपने मन में कोई कौतूहल नहीं रखना चाहिये। आप युद्ध में सफलता प्राप्त कर लेने पर मेरे इस सख्यभाव को स्वयं समझ लेंगे॥ ५७॥
बालवृद्धावशेषां तु लङ्कां कृत्वा शरोर्मिभिः।
रावणं तु रिपुं हत्वा सीतां त्वमुपलप्स्यसे॥५८॥
‘आप समुद्र की लहरों के समान अपने बाणों की परम्परा से लङ्का की ऐसी दशा कर देंगे कि यहाँ केवल बालक और बूढ़े ही शेष रह जायेंगे। इस तरह अपने शत्रु रावण का संहार करके आप सीता को अवश्य प्राप्त कर लेंगे’॥ ५८॥
इत्येवमुक्त्वा वचनं सुपर्णः शीघ्रविक्रमः।
रामं च नीरुजं कृत्वा मध्ये तेषां वनौकसाम्॥५९॥
प्रदक्षिणं ततः कृत्वा परिष्वज्य च वीर्यवान्।
जगामाकाशमाविश्य सुपर्णः पवनो यथा॥६०॥
ऐसी बातें कहकर शीघ्रगामी एवं शक्तिशाली गरुड़ ने श्रीराम को नीरोग करके उन वानरों के बीच में उनकी परिक्रमा की और उन्हें हृदय से लगाकर वे वायु के समान गति से आकाश में चले गये॥ ५९-६० ॥
नीरुजौ राघवौ दृष्ट्वा ततो वानरयूथपाः।
सिंहनादं तदा नेदुर्लाङ्गलं दुधुवुश्च ते॥६१॥
श्रीराम और लक्ष्मण को नीरोग हुआ देख उस समय सारे वानर-यूथपति सिंहनाद करने और पूँछ हिलाने लगे॥ ६१॥
ततो भेरीः समाजजुर्मृदङ्गांश्चाप्यवादयन्।
दध्मुः शङ्खान् सम्प्रहृष्टाः श्वेलन्त्यपि यथापुरम्॥६२॥
फिर तो वानरों ने डंके पीटे, मृदंग बजाये, शङ्खनाद किये और हर्षोल्लास से भरकर पहले की भाँति वे गर्जने और ताल ठोंकने लगे॥६२॥
अपरे स्फोट्य विक्रान्ता वानरा नगयोधिनः।
द्रुमानुत्पाट्य विविधांस्तस्थुः शतसहस्रशः॥६३॥
दूसरे पराक्रमी वानर जो वृक्षों और पर्वतशिखरों को हाथ में लेकर युद्ध करते थे, नाना प्रकार के वृक्ष उखाड़कर लाखों की संख्या में युद्ध के लिये खड़े हो गये॥ ६३॥
विसृजन्तो महानादांस्त्रासयन्तो निशाचरान्।
लङ्कादाराण्युपाजग्मुर्योद्धुकामाः प्लवंगमाः॥६४॥
जोर-जोर से गर्जते और निशाचरों को डराते हुए सारे वानर युद्ध की इच्छा से लङ्का के दरवाजों पर आकर डट गये॥६४॥
तेषां सुभीमस्तुमुलो निनादो बभूव शाखामृगयूथपानाम्।
क्षये निदाघस्य यथा घनानां नादः सुभीमो नदतां निशीथे॥६५॥
उस समय उन वानरयूथपतियों का बड़ा भयंकर एवं तुमुल सिंहनाद सब ओर गूंजने लगा, मानो ग्रीष्म ऋतु के अन्त में आधी रात के समय गर्जते हुए मेघों की गम्भीर गर्जना सब ओर व्याप्त हो रही हो। ६५॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे पञ्चाशः सर्गः॥५०॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में पचासवाँ सर्ग पूरा हुआ।५०॥
सर्ग-51
तेषां तु तुमुलं शब्दं वानराणां महौजसाम्।
नर्दतां राक्षसैः सार्धं तदा शुश्राव रावणः॥१॥
उस समय भीषण गर्जना करते हुए महाबली वानरों का वह तुमुलनाद राक्षसोंसहित रावण ने सुना॥
स्निग्धगम्भीरनिर्घोषं श्रुत्वा तं निनदं भृशम्।
सचिवानां ततस्तेषां मध्ये वचनमब्रवीत्॥२॥
मन्त्रियों के बीच में बैठे हुए रावण ने जब वह स्निग्ध गम्भीर घोष, वह उच्चस्वर से किया हुआ सिंहनाद सुना, तब वह इस प्रकार बोला- ॥२॥
यथासौ सम्प्रहृष्टानां वानराणामुपस्थितः।
बहूनां सुमहान् नादो मेघानामिव गर्जताम्॥३॥
सुव्यक्तं महती प्रीतिरेतेषां नात्र संशयः।
तथाहि विपुलैर्नादैश्चुक्षुभे लवणार्णवः॥४॥
‘इस समय गर्जते हुए मेघों के समान जो अधिक हर्ष में भरे हुए बहुसंख्यक वानरों का यह महान् कोलाहल प्रकट हो रहा है, इससे स्पष्ट जान पड़ता है कि इन सबको बड़ा भारी हर्ष प्राप्त हुआ है। इसमें संशय नहीं है। तभी इस तरह बारम्बार की गयी गर्जनाओं से यह खारे पानी का समुद्र विक्षुब्ध हो उठा है॥३-४॥
तौ तु बद्धौ शरैस्तीक्ष्णैर्धातरौ रामलक्ष्मणौ।
अयं च सुमहान् नादः शङ्कां जनयतीव मे॥५॥
‘परंतु वे दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण तो तीखे बाणों से बँधे हुए हैं। इधर यह महान् हर्षनाद भी हो रहा है, जो मेरे मनमें शङ्का-सी उत्पन्न कर रहा है’।५॥
एवं च वचनं चोक्त्वा मन्त्रिणो राक्षसेश्वरः।
उवाच नैर्ऋतांस्तत्र समीपपरिवर्तिनः॥६॥
मन्त्रियों से ऐसा कहकर राक्षसराज रावण ने अपने पास ही खड़े हुए राक्षसों से कहा- ॥६॥
ज्ञायतां तूर्णमेतेषां सर्वेषां च वनौकसाम्।
शोककाले समुत्पन्ने हर्षकारणमुत्थितम्॥७॥
तुमलोग शीघ्र ही जाकर इस बात का पता लगाओ कि शोक का अवसर उपस्थित होने पर भी इन सब वानरों के हर्ष का कौन-सा कारण प्रकट हो गया है॥ ७॥
तथोक्तास्ते सुसम्भ्रान्ताः प्राकारमधिरुह्य च।
ददृशुः पालितां सेनां सुग्रीवेण महात्मना॥८॥
रावण के इस प्रकार आदेश देने पर वे राक्षस घबराये हुए गये और परकोटे पर चढ़कर महात्मा सुग्रीव के द्वारा पालित वानरसेना की ओर देखने लगे। ८॥
तौ च मुक्तौ सुघोरेण शरबन्धेन राघवौ।
समुत्थितौ महाभागौ विषेदुः सर्वराक्षसाः॥९॥
जब उन्हें मालूम हुआ कि महाभाग श्रीराम और लक्ष्मण उस अत्यन्त भयंकर नागरूपी बाणों के बन्धनसे मुक्त होकर उठ गये हैं, तब समस्त राक्षसों को बड़ा दुःख हुआ॥९॥
संत्रस्तहृदयाः सर्वे प्राकारादवरुह्य ते।
विवर्णा राक्षसा घोरा राक्षसेन्द्रमुपस्थिताः॥१०॥
उनका हृदय भय से थर्रा उठा। वे सब भयानक राक्षस परकोटे से उतरकर उदास हो राक्षसराज रावण की सेवा में उपस्थित हुए॥ १० ॥
तदप्रियं दीनमुखा रावणस्य च राक्षसाः।
कृत्स्नं निवेदयामासुर्यथावद् वाक्यकोविदाः॥११॥
वे बातचीत की कला में कुशल थे। उनके मुख पर दीनता छा रही थी। उन निशाचरों ने वह सारा अप्रिय समाचार रावण को यथावत् रूप से बताया॥११॥
यौ ताविन्द्रजिता युद्धे भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ।
निबद्धौ शरबन्धेन निष्प्रकम्पभुजौ कृतौ ॥१२॥
विमुक्तौ शरबन्धेन दृश्येते तौ रणाजिरे।
पाशानिव गजौ छित्त्वा गजेन्द्रसमविक्रमौ॥१३॥
(वे बोले-) ‘महाराज! कुमार इन्द्रजित् ने जिन राम और लक्ष्मण दोनों भाइयों को युद्धस्थल में नागरूपी बाणों के बन्धन से बाँधकर हाथ हिलाने में भी असमर्थ कर दिया था, वे गजराज के समान पराक्रमी दोनों वीर जैसे हाथी रस्से को तोड़कर स्वतन्त्र हो जायँ, उसी तरह बाणबन्धन से मुक्त हो समराङ्गण में खड़े दिखायी देते हैं । १२-१३॥
तच्छ्रुत्वा वचनं तेषां राक्षसेन्द्रो महाबलः।
चिन्ताशोकसमाक्रान्तो विवर्णवदनोऽभवत्॥१४॥
उनका वह वचन सुनकर महाबली राक्षसराज रावण चिन्ता तथा शोक के वशीभूत हो गया और उसका चेहरा उतर गया॥१४॥
घोरैर्दत्तवरैर्बद्धौ शरैराशीविषोपमैः।
अमोघैः सूर्यसंकाशैः प्रमथ्येन्द्रजिता युधि॥१५॥
तदस्त्रबन्धमासाद्य यदि मुक्तौ रिपू मम।
संशयस्थमिदं सर्वमनुपश्याम्यहं बलम्॥१६॥
(वह मन-ही-मन सोचने लगा-) ‘जो विषधर सर्पो के समान भयंकर, वरदान में प्राप्त हुए और अमोघ थे तथा जिनका तेज सूर्य के समान था, उन्हीं के द्वारा युद्धस्थल में इन्द्रजित् ने जिन्हें बाँध दिया था, वे मेरे दोनों शत्रु यदि उस अस्त्रबन्धन में पड़कर भी उससे छूट गये, तब तो अब मैं अपनी सारी सेना को संशयापन्न ही देखता हूँ॥ १५-१६॥
निष्फलाः खलु संवृत्ताः शराः पावकतेजसः।
आदत्तं यैस्तु संग्रामे रिपूणां जीवितं मम॥१७॥
‘जिन्होंने पहले युद्धस्थल में मेरे शत्रुओं के प्राण ले लिये थे, वे अग्नितुल्य तेजस्वी बाण निश्चय ही आज निष्फल हो गये ॥ १७॥
एवमुक्त्वा तु संक्रुद्धो निःश्वसन्नुरगो यथा।
अब्रवीद् रक्षसां मध्ये धूम्राक्षं नाम राक्षसम्॥१८॥
ऐसा कहकर अत्यन्त कुपित हुआ रावण फुफकारते हुए सर्प के समान जोर-जोर से साँस लेने लगा और राक्षसों के बीच में धूम्राक्ष नामक निशाचर से बोला-॥
बलेन महता युक्तो रक्षसां भीमविक्रम।
त्वं वधायाशु निर्याहि रामस्य सह वानरैः॥१९॥
‘भयानक पराक्रमी वीर! तुम राक्षसों की बहुत बड़ी सेना साथ लेकर वानरोंसहित राम का वध करने के लिये शीघ्र जाओ’ ॥ १९॥
एवमुक्तस्तु धूम्राक्षो राक्षसेन्द्रेण धीमता।
परिक्रम्य ततः शीघ्रं निर्जगाम नृपालयात्॥२०॥
बुद्धिमान् राक्षसराज के इस प्रकार आज्ञा देने पर धूम्राक्ष ने उसकी परिक्रमा की तथा वह तुरंत राजभवन से बाहर निकल गया॥ २०॥
अभिनिष्क्रम्य तद् द्वारं बलाध्यक्षमुवाच ह।
त्वरयस्व बलं शीघ्रं किं चिरेण ययत्सतः॥२१॥
रावण के गृहद्वार पर पहुँचकर उसने सेनापति से कहा —’सेना को उतावली के साथ शीघ्र तैयार करो। युद्ध की इच्छा रखने वाले पुरुष को विलम्ब करने से क्या लाभ?’ ॥२१॥
धूम्राक्षवचनं श्रुत्वा बलाध्यक्षो बलानुगः।
बलमुद्योजयामास रावणस्याज्ञया भृशम्॥२२॥
धूम्राक्ष की बात सुनकर रावण की आज्ञा के अनुसार सेनापति ने जिनके पीछे बहुत बड़ी सेना थी, भारी संख्या में सैनिकों को तैयार कर दिया॥२२॥
ते बद्धघण्टा बलिनो घोररूपा निशाचराः।
विनद्यमानाः संहृष्टा धूम्राक्षं पर्यवारयन्॥२३॥
वे भयानक रूपधारी बलवान् निशाचर प्रास और शक्ति आदि अस्त्रों में घण्टे बाँधकर हर्ष और उत्साह से युक्त हो जोर-जोर से गर्जते हुए आये और धूम्राक्ष को घेरकर खड़े हो गये॥ २३॥ ।
विविधायुधहस्ताश्च शूलमुद्गरपाणयः।
गदाभिः पट्टिशैर्दण्डैरायसैर्मुसलैरपि॥ २४॥
परिधैर्भिन्दिपालैश्च भल्लैः पाशैः परश्वधैः।
निर्ययू राक्षसा घोरा नर्दन्तो जलदा यथा॥२५॥
उनके हाथों में नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्र थे। कुछ लोगों ने अपने हाथों में शूल और मुद्गर ले रखे थे। गदा-पट्टिश, लोहदण्ड, मूसल, परिघ, भिन्दिपाल, भाले, पाश और फरसे लिये बहुतेरे भयानक राक्षस युद्ध के लिये निकले। वे सभी मेघों के समान गम्भीर गर्जना करते थे॥
रथैः कवचिनस्त्वन्ये ध्वजैश्च समलंकृतैः।
सुवर्णजालविहितैः खरैश्च विविधाननैः॥२६॥
हयैः परमशीघ्रश्च गजैश्चैव मदोत्कटैः।
निर्ययु३तव्याघ्रा व्याघ्रा इव दुरासदाः॥२७॥
कितने ही निशाचर ध्वजों से अलंकृत तथा सोने की जाली से आच्छादित रथों द्वारा युद्ध के लिये बाहर आये। वे सब-के-सब कवच धारण किये हुए थे। कितने ही श्रेष्ठ राक्षस नाना प्रकार के मुखवाले गधों,परमशीघ्रगामी घोड़ों तथा मदमत्त हाथियों पर सवार हो दुर्जय व्याघ्रों के समान युद्ध के लिये नगर से बाहर निकले॥ २६-२७॥
वृकसिंहमुखैर्युक्तं खरैः कनकभूषितैः।
आरुरोह रथं दिव्यं धूम्राक्षः खरनिःस्वनः॥ २८॥
धूम्राक्ष के रथ में सोने के आभूषणों से विभूषित ऐसे गधे नधे हुए थे जिनके मुँह भेड़ियों और सिंहों के समान थे। गधे की भाँति रेंकने वाला धूम्राक्ष उस दिव्य रथ पर सवार हुआ॥ २८॥
स निर्यातो महावीर्यो धूम्राक्षो राक्षसैर्वृतः।
हसन् वै पश्चिमद्वाराद्धनूमान् यत्र तिष्ठति ॥ २९॥
इस प्रकार बहुत-से राक्षसों के साथ महापराक्रमी धूम्राक्ष हँसता हुआ पश्चिम द्वार से, जहाँ हनुमान् जी शत्रु का सामना करने के लिये खड़े थे, युद्ध के लिये निकला॥ २९॥
रथप्रवरमास्थाय खरयुक्तं खरस्वनम्।
प्रयान्तं तु महाघोरं राक्षसं भीमदर्शनम्॥३०॥
अन्तरिक्षगताः क्रूराः शकुनाः प्रत्यषेधयन्।
गदहों से जुते और गदहों की-सी आवाज करने वाले उस श्रेष्ठ रथ पर बैठकर युद्ध के लिये जाते हुए महाघोर राक्षस धूम्राक्ष को, जो बड़ा भयानक दिखायी देता था, आकाशचारी क्रूर पक्षियों ने अशुभसूचक बोली बोलकर आगे बढ़ने से मना किया॥३० १/२ ॥
रथशीर्षे महाभीमो गृध्रश्च निपपात ह॥३१॥
ध्वजाग्रे ग्रथिताश्चैव निपेतुः कुणपाशनाः।
रुधिराो महान् श्वेतः कबन्धः पतितो भुवि॥३२॥
उसके रथ के ऊपरी भाग पर एक महाभयानक गीध आ गिरा। ध्वज के अग्रभाग पर बहुत-से मुर्दाखोर पक्षी परस्पर गुंथे हुए-से गिर पड़े। उसी समय एक बहुत बड़ा श्वेत कबन्ध (धड़) खून से लथपथ होकर पृथ्वी पर गिरा ॥ ३१-३२॥
विस्वरं चोत्सृजन्नादान् धूम्राक्षस्य निपातितः।
ववर्ष रुधिरं देवः संचचाल च मेदिनी॥३३॥
वह कबन्ध बड़े जोर-जोर से चीत्कार करता हुआ धूम्राक्ष के पास ही गिरा था। बादल रक्त की वर्षा करने लगे और पृथ्वी डोलने लगी॥ ३३॥
प्रतिलोमं ववौ वायुर्निर्घातसमनिःस्वनः।
तिमिरौघावृतास्तत्र दिशश्च न चकाशिरे॥३४॥
वायु प्रतिकूल दिशा की ओर से बहने लगी। उसमें वज्रपात के समान गड़गड़ाहट पैदा होती थी। सम्पूर्ण दिशाएँ अन्धकार से आच्छन्न हो जाने के कारण प्रकाशित नहीं होती थीं॥ ३४॥
स तूत्पातांस्ततो दृष्ट्वा राक्षसानां भयावहान्।
प्रादुर्भूतान् सुघोरांश्च धूम्राक्षो व्यथितोऽभवत्।
मुमुहू राक्षसाः सर्वे धूम्राक्षस्य पुरःसराः॥३५॥
राक्षसों के लिये भय देने वाले वहाँ प्रकट हुए उन भयंकर उत्पातों को देखकर धूम्राक्ष व्यथित हो उठा और उसके आगे चलने वाले सभी राक्षस अचेत-से हो गये॥
ततः सुभीमो बहुभिर्निशाचरैवृतोऽभिनिष्क्रम्य रणोत्सुको बली।
ददर्श तां राघवबाहुपालितां महौघकल्पां बहु वानरी चमूम्॥३६॥
इस प्रकार बहुसंख्यक निशाचरों से घिरे हुए और युद्ध के लिये उत्सुक रहने वाले महाभयंकर बलवान् राक्षस धूम्राक्ष ने नगर से बाहर निकलकर श्रीरामचन्द्रजी के बाहुबल से सुरक्षित एवं प्रलयकालिक समुद्र के समान विशाल वानरी सेना को देखा॥३६॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे एकपञ्चाशः सर्गः॥५१॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में इक्यावनवाँ सर्ग पूरा हुआ।५१॥
सर्ग-52
धूम्राक्षं प्रेक्ष्य निर्यान्तं राक्षसं भीमविक्रमम्।
विनेदुर्वानराः सर्वे प्रहृष्टा युद्धकाक्षिणः॥१॥
भयंकर पराक्रमी निशाचर धूम्राक्ष को निकलते देख युद्ध की इच्छा रखने वाले समस्त वानर हर्ष और उत्साह से भरकर सिंहनाद करने लगे॥१॥
तेषां सुतुमुलं युद्धं संजज्ञे कपिरक्षसाम्।
अन्योन्यं पादपै?रैर्निजतां शूलमुद्गरैः॥२॥
उस समय उन वानरों और राक्षसों में अत्यन्त भयंकर युद्ध छिड़ गया। वे घोर वृक्षों तथा शूलों और मुद्गरों से एक-दूसरे को चोट पहुँचाने लगे॥२॥
राक्षसैर्वानरा घोरा विनिकृत्ताः समन्ततः।
वानरै राक्षसाश्चापि द्रुमैर्भूमिसमीकृताः॥३॥
राक्षसों ने चारों ओर से घोर वानरों को काटना आरम्भ किया तथा वानरों ने भी राक्षसों को वृक्षों से मार-मारकर धराशायी कर दिया॥३॥
राक्षसास्त्वभिसंक्रुद्धा वानरान् निशितैः शरैः।
विव्यधुर्घोरसंकाशैः कङ्कपत्रैरजिह्मगैः॥४॥
क्रोध से भरे हुए राक्षसों ने अपने कङ्कपत्रयुक्त, सीधे जाने वाले, घोर एवं तीखे बाणों से वानरों को गहरी चोट पहुँचायी॥ ४॥
ते गदाभिश्च भीमाभिः पट्टिशैः कूटमुद्गरैः।
घोरैश्च परिचैश्चित्रैस्त्रिशूलैश्चापि संश्रितैः॥५॥
विदार्यमाणा रक्षोभिर्वानरास्ते महाबलाः।
अमर्षजनितोद्धर्षाश्चक्रुः कर्माण्यभीतवत्॥६॥
राक्षसों द्वारा भयंकर गदाओं, पट्टिशों, कूट, मुद्गरों, घोर परिघों और हाथ में लिये हुए विचित्र त्रिशूलों से विदीर्ण किये जाते हुए वे महाबली वानर अमर्षजनित उत्साह से निर्भय की भाँति महान् कर्म करने लगे। ५-६॥
शरनिर्भिन्नगात्रास्ते शूलनिर्भिन्नदेहिनः।
जगृहस्ते द्रुमांस्तत्र शिलाश्च हरियूथपाः॥७॥
बाणों की चोट से उनके शरीर छिद गये थे। शूलों की मार से देह विदीर्ण हो गयी थी। इस अवस्था में उन वानर-यूथपतियों ने हाथों में वृक्ष और शिलाएँ उठायीं॥
ते भीमवेगा हरयो नर्दमानास्ततस्ततः।
ममन्थू राक्षसान् वीरान् नामानि च बभाषिरे॥८॥
उस समय उनका वेग बड़ा भयंकर था। वे जोरजोर से गर्जना करते हुए जहाँ-तहाँ वीर राक्षसों को पटक-पकटकर मथने लगे और अपने नामों की भी घोषणा करने लगे॥८॥
तद् बभूवाद्भुतं घोरं युद्धं वानररक्षसाम्।
शिलाभिर्विविधाभिश्च बहुशाखैश्च पादपैः॥९॥
नाना प्रकार की शिलाओं और बहुत-सी शाखा वाले वृक्षों के प्रहार से वहाँ वानरों और राक्षसों में घोर एवं अद्भुत युद्ध होने लगा॥९॥
राक्षसा मथिताः केचिद् वानरैर्जितकाशिभिः।
प्रवेमू रुधिरं केचिन्मुखै रुधिरभोजनाः॥१०॥
विजयोल्लास से सुशोभित होने वाले वानरों ने कितने ही राक्षसों को मसल डाला। कितने ही रक्तभोजी राक्षस उनकी मार खाकर अपने मुखों से रक्त वमन करने लगे॥१०॥
पार्वेषु दारिताः केचित् केचिद् राशीकृता द्रुमैः।
शिलाभिश्चूर्णिताः केचित् केचिद् दन्तैर्विदारिताः॥११॥
कुछ राक्षसों की पसलियाँ फाड़ डाली गयीं। कितने ही वृक्षों की चोट खाकर ढेर हो गये, किन्हीं का पत्थरों की चोटों से चूर्ण बन गया और कितने ही दाँतों से विदीर्ण कर दिये गये॥ ११॥
ध्वजैर्विमथितैर्भग्नैः खड्गैश्च विनिपातितैः।
रथैर्विध्वंसितैः केचिद् व्यथिता रजनीचराः॥१२॥
कितनों के ध्वज खण्डित करके मसल डाले गये। तलवारें छीनकर नीचे गिरा दी गयीं और रथ चौपट कर दिये गये। इस प्रकार दुर्दशा में पड़कर बहुत-से राक्षस व्यथित हो गये॥ १२॥
गजेन्द्रैः पर्वताकारैः पर्वताग्रैर्वनौकसाम्।
मथितैर्वाजिभिः कीर्णं सारोहैर्वसुधातलम्॥१३॥
वानरों के चलाये हुए पर्वत-शिखरों से कुचल डाले गये पर्वताकार गजराजों, घोड़ों और घुड़सवारों से वह सारी रणभूमि पट गयी॥१३॥
वानरैर्भीमविक्रान्तैराप्लुत्योत्प्लुत्य वेगितैः।
राक्षसाः करजैस्तीक्ष्णैर्मुखेषु विनिदारिताः॥१४॥
भयानक पराक्रम प्रकट करने वाले वेगशाली वानर उछल-उछलकर अपने पंजों से राक्षसों के मुँह नोच लेते या विदीर्ण कर देते थे॥१४॥
विषण्णवदना भूयो विप्रकीर्णशिरोरुहाः।
मूढाः शोणितगन्धेन निपेतुर्धरणीतले॥१५॥
उन राक्षसों के मुखों पर विषाद छा जाता। उनके बाल सब ओर बिखर जाते और रक्त की गन्ध से मूर्छित हो पृथ्वी पर पड़ जाते थे॥ १५ ॥
अन्ये तु परमक्रुद्धा राक्षसा भीमविक्रमाः।
तलैरेवाभिधावन्ति वज्रस्पर्शसमैर्हरीन्॥१६॥
दूसरे भीषण पराक्रमी राक्षस अत्यन्त क्रुद्ध हो अपने वज्रसदृश कठोर तमाचों से मारते हुए वहाँ वानरों पर धावा करते थे॥ १६॥
वानरैः पातयन्तस्ते वेगिता वेगवत्तरैः।
मुष्टिभिश्चरणैर्दन्तैः पादपैश्चावपोथिताः॥१७॥
प्रतिपक्षी को वेगपूर्वक गिराने वाले उन राक्षसों का बहुत-से अत्यन्त वेगशाली वानरों ने लातों, मुक्कों, दाँतों और वृक्षों की मार से कचूमर निकाल दिया। १७॥
सैन्यं तु विद्रुतं दृष्ट्वा धूम्राक्षो राक्षसर्षभः।
रोषेण कदनं चक्रे वानराणां युयुत्सताम्॥१८॥
अपनी सेना को वानरों द्वारा भगायी गयी देख राक्षसशिरोमणि धूम्राक्ष ने युद्ध की इच्छा से सामने आये हुए वानरों का रोषपूर्वक संहार आरम्भ किया॥ १८॥
प्रासैः प्रमथिताः केचिद् वानराः शोणितस्रवाः।
मुद्गरैराहताः केचित् पतिता धरणीतले॥१९॥
कुछ वानरों को उसने भालों से गाँथ दिया, जिससे वे खून की धारा बहाने लगे। कितने ही वानर उसके मुद्गरों से आहत होकर धरती पर लोट गये॥ १९ ॥
परिषैर्मथिताः केचिद् भिन्दिपालैश्च दारिताः।
पट्टिशैर्मथिताः केचिद् विह्वलन्तो गतासवः॥२०॥
कुछ वानर परिघों से कुचल डाले गये। कुछ भिन्दिपालों से चीर दिये गये और कुछ पट्टिशों से मथे जाकर व्याकुल हो अपने प्राणों से हाथ धो बैठे॥२०॥
केचिद् विनिहता भूमौ रुधिरार्द्रा वनौकसः।
केचिद् विद्राविता नष्टाः संक्रुदै राक्षसैर्युधि॥२१॥
कितने ही वानर राक्षसों द्वारा मारे जाकर खून से लथपथ हो पृथ्वी पर सो गये और कितने ही क्रोध भरे राक्षसों द्वारा युद्धस्थल में खदेड़े जाने पर कहीं भागकर छिप गये॥
विभिन्नहृदयाः केचिदेकपाइँन शायिताः।
विदारितास्त्रिशूलैश्च केचिदान्त्रैर्विनिःसृताः॥२२॥
कितनों के हृदय विदीर्ण हो गये। कितने ही एक करवट से सुला दिये गये तथा कितनों को त्रिशूल से विदीर्ण करके धूम्राक्ष ने उनकी आँतें बाहर निकाल दी॥ २२॥
तत् सुभीमं महद्युद्धं हरिराक्षससंकुलम्।
प्रबभौ शस्त्रबहुलं शिलापादपसंकुलम्॥२३॥
वानरों और राक्षसों से भरा हुआ वह महान् युद्ध बड़ा भयानक प्रतीत होता था। उसमें अस्त्र-शस्त्रों की बहुलता थी तथा शिलाओं और वृक्षों की वर्षा से सारी रणभूमि भर गयी थी॥ २३॥
धनुातन्त्रिमधुरं हिक्कातालसमन्वितम्।
मन्दस्तनितगीतं तद् युद्धगान्धर्वमाबभौ ॥२४॥
वह युद्धरूपी गान्धर्व (संगीत-महोत्सव) अद्भुत प्रतीत होता था। धनुष की प्रत्यञ्चा से जो टंकार-ध्वनि होती थी, वही मानो वीणा का मधुर नाद था, हिचकियाँ ताल का काम देती थीं और मन्दस्वर से घायलों का जो कराहना होता था वही गीत का स्थान ले रहा था॥ २४॥
धूम्राक्षस्तु धनुष्पाणिर्वानरान् रणमूर्धनि।
हसन् विद्रावयामास दिशस्ताञ्छरवृष्टिभिः॥२५॥
इस प्रकार धनुष हाथ में लिये धूम्राक्ष ने युद्ध के मुहाने पर बाणों की वर्षा करके वानरों को हँसते-हँसते सम्पूर्ण दिशाओं में मार भगाया॥ २५ ॥
धूम्राक्षेणार्दितं सैन्यं व्यथितं प्रेक्ष्य मारुतिः।
अभ्यवर्तत संक्रुद्धः प्रगृह्य विपुलां शिलाम्॥२६॥
धूम्राक्ष की मार से अपनी सेना को पीड़ित एवं व्यथित हुई देख पवनकुमार हनुमान जी अत्यन्त कुपित हो उठे और एक विशाल शिला हाथ में ले उसके सामने आये॥२६॥
क्रोधाद् द्विगुणताम्राक्षः पितुस्तुल्यपराक्रमः।
शिलां तां पातयामास धूम्राक्षस्य रथं प्रति॥२७॥
उस समय क्रोध के कारण उनके नेत्र दुगुने लाल हो रहे थे। उनका पराक्रम अपने पिता वायुदेवता के ही समान था। उन्होंने धूम्राक्ष के रथ पर वह विशाल शिला दे मारी॥२७॥
आपतन्तीं शिलां दृष्ट्वा गदामुद्यम्य सम्भ्रमात्।
रथादाप्लुत्य वेगेन वसुधायां व्यतिष्ठत ॥२८॥
उस शिला को रथ की ओर आती देख धूम्राक्ष हड़बड़ी में गदा लिये उठा और वेगपूर्वक रथ से कूदकर पृथ्वी पर खड़ा हो गया॥२८॥
सा प्रमथ्य रथं तस्य निपपात शिला भुवि।
सचक्रकूबरं साश्वं सध्वजं सशरासनम्॥२९॥
वह शिला पहिये, कूबर, अश्व, ध्वज और धनुषसहित उसके रथ को चूर-चूर करके पृथ्वी पर गिर पड़ी॥ २९॥
स भक्त्वा तु रथं तस्य हनूमान् मारुतात्मजः।
रक्षसां कदनं चक्रे सस्कन्धविटपैर्दुमैः॥३०॥
इस प्रकार धूम्राक्ष के रथ को चौपट करके पवनपुत्र हनुमान् ने छोटी-बड़ी डालियोंसहित वृक्षों द्वारा राक्षसों का संहार आरम्भ किया॥३०॥
विभिन्नशिरसो भूत्वा राक्षसा रुधिरोक्षिताः।
द्रुमैः प्रमथिताश्चान्ये निपेतुर्धरणीतले॥३१॥
बहुतेरे राक्षसों के सिर फूट गये और वे रक्त से नहा उठे। दूसरे बहुत-से निशाचर वृक्षों की मार से कुचले जाकर धरती पर लोट गये॥ ३१॥
विद्राव्य राक्षसं सैन्यं हनूमान् मारुतात्मजः।
गिरेः शिखरमादाय धूम्राक्षमभिदुद्रुवे॥३२॥
इस प्रकार राक्षससेना को खदेड़कर पवनकुमार हनुमान् ने एक पर्वत का शिखर उठा लिया और धूम्राक्ष पर धावा किया॥३२॥
तमापतन्तं धूम्राक्षो गदामुद्यम्य वीर्यवान्।
विनर्दमानः सहसा हनूमन्तमभिद्रवत्॥३३॥
उन्हें आते देख पराक्रमी धूम्राक्ष ने भी गदा उठा ली और गर्जना करता हुआ वह सहसा हनुमान जी की ओर दौड़ा॥
तस्य क्रुद्धस्य रोषेण गदां तां बहुकण्टकाम्।
पातयामास धूम्राक्षो मस्तकेऽथ हनूमतः॥ ३४॥
धूम्राक्ष ने कुपित हुए हनुमान जी के मस्तक पर बहुसंख्यक काँटों से भरी हुई वह गदा दे मारी॥ ३४ ॥
ताडितः स तया तत्र गदया भीमवेगया।
स कपिर्मारुतबलस्तं प्रहारमचिन्तयन्॥ ३५॥
धूम्राक्षस्य शिरोमध्ये गिरिशृङ्गमपातयत्।
भयानक वेगवाली उस गदा की चोट खाकर भी वायु के समान बलशाली कपिवर हनुमान् ने वहाँ इस प्रहार को कुछ भी नहीं गिना और धूम्राक्ष के मस्तक पर वह पर्वतशिखर चला दिया॥ ३५ १/२ ॥
स विस्फारितसर्वाङ्गो गिरिशृङ्गेण ताडितः॥३६॥
पपात सहसा भूमौ विकीर्ण इव पर्वतः।
पर्वतशिखर की गहरी चोट खाकर धूम्राक्ष के सारे अङ्ग छिन्न-भिन्न हो गये और वह बिखरे हुए पर्वत की भाँति सहसा पृथ्वी पर गिर पड़ा॥ ३६ १/२॥
धूम्राक्षं निहतं दृष्ट्वा हतशेषा निशाचराः।
त्रस्ताः प्रविविशुर्लङ्कां वध्यमानाः प्लवंगमैः॥३७॥
धूम्राक्ष को मारा गया देख मरने से बचे हुए निशाचर भयभीत हो वानरों की मार खाते हुए लङ्का में घुस गये॥३७॥
स तु पवनसुतो निहत्य शत्रून् क्षतजवहाः सरितश्च संविकीर्य।
रिपुवधजनितश्रमो महात्मा मुदमगमत् कपिभिः सुपूज्यमानः॥३८॥
इस प्रकार शत्रुओं को मारकर और रक्त की धारा बहाने वाली बहुत-सी नदियों को प्रवाहित करके महात्मा पवनकुमार हनुमान् यद्यपि शत्रुवधजनित परिश्रम से थक गये थे, तथापि वानरों द्वारा पूजित एवं प्रशंसित होने से उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई॥ ३८॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे द्विपञ्चाशः सर्गः॥५२॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में बावनवाँ सर्ग पूरा हुआ।५२॥
सर्ग-53
धूम्राक्षं निहतं श्रुत्वा रावणो राक्षसेश्वरः।
क्रोधेन महताऽऽविष्टो निःश्वसन्नुरगो यथा॥१॥
धूम्राक्ष के मारे जाने का समाचार सुनकर राक्षसराज रावण को महान् क्रोध हुआ। वह फुफकारते हुए सर्प के समान जोर-जोर से साँस लेने लगा॥१॥
दीर्घमुष्णं विनिःश्वस्य क्रोधेन कलुषीकृतः।
अब्रवीद् राक्षसं क्रूरं वज्रदंष्ट्र महाबलम्॥२॥
क्रोध से कलुषित हो गर्म-गर्म लम्बी साँस खींचकर उसने क्रूर निशाचर महाबली वज्रदंष्ट्र से कहा— ॥२॥
गच्छ त्वं वीर निर्याहि राक्षसैः परिवारितः।
जहि दाशरथिं रामं सुग्रीवं वानरैः सह ॥३॥
‘वीर! तुम राक्षसों के साथ जाओ और दशरथकुमार राम और वानरोंसहित सुग्रीव को मार डालो’॥३॥
तथेत्युक्त्वा द्रुततरं मायावी राक्षसेश्वरः।
निर्जगाम बलैः सार्धं बहुभिः परिवारितः॥४॥
तब वह मायावी राक्षस ‘बहुत अच्छा’ कहकर बहुत बड़ी सेना के साथ तुरंत युद्ध के लिये चल दिया॥
नागैरश्वैः खरैरुष्टैः संयुक्तः सुसमाहितः।
पताकाध्वजचित्रैश्च बहुभिः समलंकृतः॥५॥
वह हाथी, घोड़े, गदहे और ऊँट आदि सवारियों से युक्त था, चित्तको पूर्णतः एकाग्र किये हुए था और पताका, ध्वजा आदि से विचित्र शोभा पाने वाले बहुत से सेनाध्यक्ष उसकी शोभा बढ़ाते थे॥५॥
ततो विचित्रकेयूरमुकुटेन विभूषितः।
तनुत्रं स समावृत्य सधनुर्निर्ययौ द्रुतम्॥६॥
विचित्र भुजबंद और मुकुट से विभूषित हो कवच धारण करके हाथ में धनुष लिये वह शीघ्र ही निकला॥
पताकालंकृतं दीप्तं तप्तकाञ्चनभूषितम्।
रथं प्रदक्षिणं कृत्वा समारोहच्चमपतिः॥७॥
ध्वजा-पताकाओं से अलंकृत, दीप्तिमान् तथा सोने के साज-बाज से सुसज्जित रथ की परिक्रमा करके सेनापति वज्रदंष्ट्र उस पर आरूढ़ हुआ॥ ७॥
ऋष्टिभिस्तोमरैश्चित्रैः श्लक्ष्णैश्च मुसलैरपि।
भिन्दिपालैश्च चापैश्च शक्तिभिः पट्टिशैरपि॥८ ॥
खड्गैश्चक्रैर्गदाभिश्च निशितैश्च परश्वधैः।
पदातयश्च निर्यान्ति विविधाः शस्त्रपाणयः॥९॥
उसके साथ ऋष्टि, विचित्र तोमर, चिकने मूसल, भिन्दिपाल, धनुष, शक्ति, पट्टिश, खड्ग, चक्र, गदा और तीखे फरसों से सुसज्जित बहुत-से पैदल योद्धा चले। उनके हाथों में अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र शोभा पा रहे थे॥ ८-९॥
विचित्रवाससः सर्वे दीप्ता राक्षसपुङ्गवाः।
गजा महोत्कटाः शूराश्चलन्त इव पर्वताः॥१०॥
विचित्र वस्त्र धारण करने वाले सभी राक्षस वीर अपने तेज से उद्भासित हो रहे थे। शौर्यसम्पन्न मदमत्त गजराज चलते-फिरते पर्वतों के समान जान पड़ते थे।
ते युद्धकुशला रूढास्तोमराङ्कशपाणिभिः।
अन्ये लक्षणसंयुक्ताः शूरारूढा महाबलाः॥११॥
हाथों में तोमर, अंकुश धारण करने वाले महावत जिनकी गर्दन पर सवार थे तथा जो युद्ध की कला में कुशल थे, वे हाथी युद्ध के लिये आगे बढ़े। उत्तम लक्षणों से युक्त जो दूसरे-दूसरे महाबली घोड़े थे, जिनके ऊपर शूरवीर सैनिक सवार थे, वे भी युद्ध के लिये निकले॥११॥
तद् राक्षसबलं सर्वं विप्रस्थितमशोभत।
प्रावृट्काले यथा मेघा नर्दमानाः सविद्युतः॥१२॥
युद्ध के उद्देश्य से प्रस्थित हुई राक्षसों की वह सारी सेना वर्षाकाल में गर्जते हुए बिजलियोंसहित मेघ के समान शोभा पा रही थी॥१२॥
निःसृता दक्षिणद्वारादङ्गदो यत्र यूथपः।
तेषां निष्क्रममाणानामशुभं समजायत॥१३॥
वह सेना लङ्का के दक्षिणद्वार से निकली, जहाँ वानरयूथपति अङ्गद राह रोके खड़े थे। उधर से निकलते ही उन राक्षसों के सामने अशुभसूचक अपशकुन होने लगा॥१३॥
आकाशाद् विघनात् तीव्रा उल्काश्चाभ्यपतंस्तदा।
वमन्तः पावकज्वालाः शिवा घोरा ववाशिरे॥१४॥
मेघरहित आकाश से तत्काल दुःसह उल्कापात होने लगे। भयानक गीदड़ मुँह से आग की ज्वाला उगलते हुए अपनी बोली बोलने लगे॥ १४ ॥
व्याहरन्त मृगा घोरा रक्षसां निधनं तदा।
समापतन्तो योधास्तु प्रास्खलंस्तत्र दारुणम्॥१५॥
घोर पशु ऐसी बोली बोलने लगे, जिससे राक्षसों के संहार की सूचना मिल रही थी। युद्ध के लिये आते हुए योद्धा बुरी तरह लड़खड़ाकर गिर पड़ते थे। इससे उनकी बड़ी दारुण अवस्था हो जाती थी॥ १५ ॥
एतानौत्पातिकान् दृष्ट्वा वज्रदंष्ट्रो महाबलः।
धैर्यमालम्ब्य तेजस्वी निर्जगाम रणोत्सुकः॥१६॥
इन उत्पातसूचक लक्षणों को देखकर भी महाबली वज्रदंष्ट्रने धैर्य नहीं छोड़ा। वह तेजस्वी वीर युद्ध के लिये उत्सुक होकर निकला॥ १६॥
तांस्तु विद्रवतो दृष्ट्वा वानरा जितकाशिनः।
प्रणेदुः सुमहानादान् दिशः शब्देन पूरयन्॥१७॥
तीव्रगति से आते हुए उन राक्षसों को देखकर विजयलक्ष्मी से सुशोभित होने वाले वानर बड़े जोर-जोर से गर्जना करने लगे। उन्होंने अपने सिंहनाद से सम्पूर्ण दिशाओं को गुँजा दिया॥ १७॥
ततः प्रवृत्तं तुमुलं हरीणां राक्षसैः सह।
घोराणां भीमरूपाणामन्योन्यवधकाङ्किणाम्॥१८॥
तदनन्तर भयानक रूप धारण करने वाले घोर वानरों का राक्षसों के साथ तुमुल युद्ध आरम्भ हुआ। दोनों दलों के योद्धा एक-दूसरे का वध करना चाहते थे॥१८॥
निष्पतन्तो महोत्साहा भिन्नदेहशिरोधराः।
रुधिरोक्षितसर्वाङ्गा न्यपतन् धरणीतले॥१९॥
वे बड़े उत्साह से युद्ध के लिये निकलते; परंतु देह और गर्दन कट जाने से पृथ्वी पर गिर पड़ते थे। उस समय उनके सारे अङ्ग रक्त से भीग जाते थे॥ १९ ॥
केचिदन्योन्यमासाद्य शूराः परिघबाहवः।
चिक्षिपुर्विविधान् शस्त्रान् समरेष्वनिवर्तिनः॥२०॥
युद्ध से कभी पीछे न हटने वाले और परिघ-जैसी बाँहों वाले कितने ही शूरवीर एक-दूसरे के निकट पहुँचकर परस्पर नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों का प्रहार करते थे॥
द्रुमाणां च शिलानां च शस्त्राणां चापि निःस्वनः।
श्रूयते सुमहांस्तत्र घोरो हृदयभेदनः॥२१॥
उस युद्धस्थल में प्रयुक्त होने वाले वृक्षों, शिलाओं और शस्त्रों का महान् एवं घोर शब्द जब कानों में पड़ता था, तब वह हृदय को विदीर्ण-सा कर देता था॥ २१॥
रथनेमिस्वनस्तत्र धनुषश्चापि घोरवत्।
शङ्खभेरीमृदङ्गानां बभूव तुमुलः स्वनः॥२२॥
वहाँ रथ के पहियों की घर्घराहट, धनुष की भयानक टंकार तथा शङ्ख, भेरी और मृदङ्गों का शब्द एक में मिलकर बड़ा भयंकर प्रतीत होता था॥ २२॥
केचिदस्त्राणि संत्यज्य बाहुयुद्धमकुर्वत॥२३॥
तलैश्च चरणैश्चापि मुष्टिभिश्च द्रुमैरपि।
जानुभिश्च हताः केचिद् भग्नदेहाश्च राक्षसाः।
शिलाभिश्चूर्णिताः केचिद् वानरैयुद्धदुर्मदैः॥२४॥
कुछ योद्धा अपने हथियार फेंककर बाहुयुद्ध करने लगते थे। थप्पड़ों, लातों, मुक्कों, वृक्षों और घुटनों की मार खाकर कितने ही राक्षसों के शरीर चूर-चूर हो गये थे। रणदुर्मद वानरों ने शिलाओं से मार-मारकर कितने ही राक्षसों का चूरा बना दिया था॥ २३-२४॥
वज्रदंष्ट्रो भृशं बाणै रणे वित्रासयन् हरीन्।
चचार लोकसंहारे पाशहस्त इवान्तकः॥२५॥
उस समय वज्रदंष्ट्र अपने बाणों की मार से वानरों को अत्यन्त भयभीत करता हुआ तीनों लोकों के संहार के लिये उठे हुए पाशधारी यमराज के समान रणभूमि में विचरने लगा॥ २५॥
बलवन्तोऽस्त्रविदुषो नानाप्रहरणा रणे।
जघ्नुर्वानरसैन्यानि राक्षसाः क्रोधर्मूच्छिताः॥२६॥
साथ ही क्रोध से भरे तथा नाना प्रकार के अस्त्रशस्त्र लिये अन्य अस्त्रवेत्ता बलवान् राक्षस भी वानरसेनाओं का रणभूमि में संहार करने लगे॥ २६॥
जम्ने तान् राक्षसान् सर्वान् धृष्टो वालिसुतो रणे।
क्रोधेन द्विगुणाविष्टः संवर्तक इवानलः॥२७॥
किंतु प्रलयकाल में संवर्तक अग्नि जैसे प्राणियों का संहार करती है, उसी तरह वालिपुत्र अङ्गद और भी निर्भय हो दूने क्रोध से भरकर उन सब राक्षसों का वध करने लगे॥ २७॥
तान् राक्षसगणान् सर्वान् वृक्षमुद्यम्य वीर्यवान्।
अङ्गदः क्रोधताम्राक्षः सिंहः क्षुद्रमृगानिव॥२८॥
चकार कदनं घोरं शक्रतुल्यपराक्रमः।
उनकी आँखें क्रोध से लाल हो रही थीं। वे इन्द्र के तुल्य पराक्रमी थे। जैसे सिंह छोटे वन्य-पशुओं को अनायास ही नष्ट कर देता है, उसी तरह पराक्रमी अङ्गद ने एक वृक्ष उठाकर उन समस्त राक्षसगणों का घोर संहार आरम्भ किया॥ २८ १/२॥
अङ्गदाभिहतास्तत्र राक्षसा भीमविक्रमाः॥२९॥
विभिन्नशिरसः पेतुर्निकृत्ता इव पादपाः।
अङ्गद की मार खाकर वे भयानक पराक्रमी राक्षस सिर फट जाने के कारण कटे हुए वृक्षों के समान पृथ्वी पर गिरने लगे॥ २९ १/२॥
रथैश्चित्रैर्ध्वजैरश्वैः शरीरैर्हरिरक्षसाम्॥३०॥
रुधिरौघेण संछन्ना भूमिर्भयकरी तदा।
उस समय रथों, चित्र-विचित्र ध्वजों, घोड़ों, राक्षस और वानरों के शरीरों तथा रक्त की धाराओं से भर जाने के कारण वह रणभूमि बड़ी भयानक जान पड़ती थी॥३० १/२॥
हारकेयूरवस्त्रैश्च शस्त्रैश्च समलंकृता॥३१॥
भूमि ति रणे तत्र शारदीव यथा निशा।
योद्धाओं के हार, केयूर (बाजूबंद), वस्त्र और शस्त्रों से अलंकृत हुई रणभूमि शरत्काल की रात्रि के समान शोभा पाती थी॥ ३१ १/२॥
अङ्गदस्य च वेगेन तद् राक्षसबलं महत्।
प्राकम्पत तदा तत्र पवनेनाम्बुदो यथा॥३२॥
अङ्गद के वेग से वहाँ वह विशाल राक्षससेना उस समय उसी तरह काँपने लगी, जैसे वायु के वेग से मेघ कम्पित हो उठता है॥३२॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे त्रिपञ्चाशः सर्गः॥५३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में तिरपनवाँ सर्ग पूरा हुआ।५३॥
सर्ग-54
स्वबलस्य च घातेन अङ्गदस्य बलेन च।
राक्षसः क्रोधमाविष्टो वज्रदंष्ट्रो महाबलः॥१॥
अङ्गद के पराक्रम से अपनी सेना का संहार होता देख महाबली राक्षस वज्रदंष्ट्र अत्यन्त कुपित हो उठा॥
विस्फार्य च धनुर्घोरं शक्राशनिसमप्रभम्।
वानराणामनीकानि प्राकिरच्छरवृष्टिभिः॥२॥
वह इन्द्र के वज्र के समान तेजस्वी अपना भयंकर धनुष खींचकर वानरों की सेना पर बाणों की वर्षा करने लगा॥२॥
राक्षसाश्चापि मुख्यास्ते रथेषु समवस्थिताः।
नानाप्रहरणाः शूराः प्रायुध्यन्त तदा रणे॥३॥
उसके साथ अन्य प्रधान-प्रधान शूरवीर राक्षस भी रथों पर बैठकर हाथों में तरह-तरह के हथियार लिये संग्रामभूमि में युद्ध करने लगे॥३॥
वानराणां च शूरास्तु ते सर्वे प्लवगर्षभाः।
अयुध्यन्त शिलाहस्ताः समवेताः समन्ततः॥४॥
वानरों में भी जो विशेष शूरवीर थे, वे सभी वानरशिरोमणि सब ओर से एकत्र हो हाथों में शिलाएँ लिये जूझने लगे॥४॥
तत्रायुधसहस्राणि तस्मिन्नायोधने भृशम्।
राक्षसाः कपिमुख्येषु पातयांचक्रिरे तदा॥५॥
उस समय इस रणभूमि में राक्षसों ने मुख्य-मुख्य वानरों पर हजारों अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा की॥५॥
वानराश्चैव रक्षःसु गिरिवृक्षान् महाशिलाः।
प्रवीराः पातयामासुर्मत्तवारणसंनिभाः॥६॥
मतवाले हाथी के समान विशालकाय वीर वानरों ने भी राक्षसों पर अनेकानेक पर्वत, वृक्ष और बड़ी-बड़ी शिलाएँ गिरायीं॥६॥
शूराणां युध्यमानानां समरेष्वनिवर्तिनाम्।
तद् राक्षसगणानां च सुयुद्धं समवर्तत॥७॥
युद्ध में पीठ न दिखाने वाले और उत्साहपूर्वक जूझने वाले शूरवीर वानरों और राक्षसों का वह युद्ध उत्तरोत्तर बढ़ता गया॥७॥
प्रभिन्नशिरसः केचिच्छिन्नैः पादैश्च बाहभिः।
शस्त्रैरर्दितदेहास्तु रुधिरेण समुक्षिताः॥८॥
किन्हीं के सिर फूटे, किन्हीं के हाथ और पैर कट गये और बहुत-से योद्धाओं के शरीर शस्त्रों के आघात से पीड़ित हो रक्त से नहा गये॥ ८॥
हरयो राक्षसाश्चैव शेरते गां समाश्रिताः।
कङ्कगृध्रबलाढ्याश्च गोमायुकुलसंकुलाः॥९॥
वानर और राक्षस दोनों ही धराशायी हो गये। उन पर कङ्क, गीध और कौए टूट पड़े। गीदड़ों की जमातें छा गयीं॥ ९॥
कबन्धानि समुत्पेतुर्भीरूणां भीषणानि वै।
भुजपाणिशिरश्छिन्नाश्छिन्नकायाश्च भूतले॥१०॥
वहाँ जिनके मस्तक कट गये थे, ऐसे धड़ सब ओर उछलने लगे, जो भीरु स्वभाववाले सैनिकों को भयभीत करते थे। योद्धाओं की कटी हुई भुजाएँ, हाथ, सिर तथा शरीर के मध्यभाग पृथ्वी पर पड़े हुए थे। १०॥
वानरा राक्षसाश्चापि निपेतुस्तत्र भूतले।
ततो वानरसैन्येन हन्यमानं निशाचरम्॥११॥
प्राभज्यत बलं सर्वं वज्रदंष्ट्रस्य पश्यतः।
वानर और राक्षस दोनों ही दलों के लोग वहाँ धराशायी हो रहे थे। तत्पश्चात् कुछ ही देर में वानरसैनिकों के प्रहारों से पीड़ित हो सारी निशाचरसेना वज्रदंष्ट्र के देखते-देखते भाग चली॥ ११ १/२॥
राक्षसान् भयवित्रस्तान् हन्यमानान् प्लवंगमैः॥१२॥
दृष्ट्वा स रोषताम्राक्षो वज्रदंष्ट्रः प्रतापवान्।
वानरों की मार से राक्षसों को भयभीत हुआ देख प्रतापी वज्रदंष्ट्र की आँखें क्रोध से लाल हो गयीं॥ १२ १/२॥
प्रविवेश धनुष्पाणिस्त्रासयन् हरिवाहिनीम्॥१३॥
शरैर्विदारयामास कङ्कपत्रैरजिह्मगैः।
वह हाथ में धनुष ले वानरसेना को भयभीत करता हुआ उसके भीतर घुस गया और सीधे जाने वाले कङ्कपत्रयुक्त बाणों द्वारा शत्रुओं को विदीर्ण करने लगा॥
बिभेद वानरांस्तत्र सप्ताष्टौ नव पञ्च च॥१४॥
विव्याध परमवुद्धो वज्रदंष्ट्रः प्रतापवान्।
अत्यन्त क्रोध से भरा हुआ प्रतापी वज्रदंष्ट्र वहाँ एक-एक प्रहार से पाँच, सात, आठ और नौ-नौ वानरों को घायल कर देता था। इस तरह उसने वानरसैनिकों को गहरी चोट पहुँचायी॥ १४ १/२ ॥
त्रस्ताः सर्वे हरिगणाः शरैः संकृत्तदेहिनः।
अङ्गदं सम्प्रधावन्ति प्रजापतिमिव प्रजाः॥१५॥
बाणों से जिनके शरीर छिन्न-भिन्न हो गये थे, वे समस्त वानरगण भयभीत हो अङ्गद की ओर दौड़े, मानो प्रजा प्रजापति की शरण में जा रही हो॥ १५ ॥
ततो हरिगणान् भग्नान् दृष्ट्वा वालिसुतस्तदा।
क्रोधेन वज्रदंष्ट्र तमुदीक्षन्तमुदैक्षत॥१६॥
उस समय वानरों को भागते देख वालिकुमार अङ्गद ने अपनी ओर देखते हुए वज्रदंष्ट्र को क्रोधपूर्वक देखा॥ १६॥
वज्रदंष्ट्रोऽङ्गदश्चोभौ योयुध्येते परस्परम्।
चेरतुः परमक्रुद्धौ हरिमत्तगजाविव॥१७॥
फिर तो वज्रदंष्ट्र और अङ्गद अत्यन्त कुपित हो एक-दूसरे से वेगपूर्वक युद्ध करने लगे। वे दोनों रणभूमि में बाघ और मतवाले हाथी के समान विचर रहे थे॥ १७॥
ततः शतसहस्रेण हरिपुत्रं महाबलम्।
जघान मर्मदेशेषु शरैरग्निशिखोपमैः॥१८॥
उस समय वज्रदंष्ट्र ने महाबली वालिपुत्र अङ्गद के मर्मस्थानों में अग्निशिखा के समान तेजस्वी एक लाख बाण मारे॥१८॥
रुधिरोक्षितसर्वाङ्गो वालिसूनुर्महाबलः।
चिक्षेप वज्रदंष्ट्राय वृक्षं भीमपराक्रमः॥१९॥
इससे उनके सारे अङ्ग लहू-लुहान हो उठे। तब भयानक पराक्रमी महाबली वालिकुमार ने वज्रदंष्ट्र पर एक वृक्ष चलाया॥ १९॥
दृष्ट्वा पतन्तं तं वृक्षमसम्भ्रान्तश्च राक्षसः।
चिच्छेद बहुधा सोऽपि मथितः प्रापतद् भुवि॥२०॥
उस वृक्ष को अपनी ओर आते देखकर भी वज्रदंष्ट्र के मन में घबराहट नहीं हुई। उसने बाण मारकर उस वृक्ष के कई टुकड़े कर दिये। इस प्रकार खण्डित होकर वह वृक्ष पृथ्वी पर गिर पड़ा॥ २० ॥
तं दृष्ट्वा वज्रदंष्ट्रस्य विक्रमं प्लवगर्षभः।
प्रगृह्य विपुलं शैलं चिक्षेप च ननाद च॥२१॥
वज्रदंष्ट्र के उस पराक्रम को देखकर वानरशिरोमणि अङ्गद ने एक विशाल चट्टान लेकर उसके ऊपर दे मारी और बड़े जोर से गर्जना की॥२१॥
तमापतन्तं दृष्ट्वा स रथादाप्लुत्य वीर्यवान्।
गदापाणिरसम्भ्रान्तः पृथिव्यां समतिष्ठत ॥ २२॥
उस चट्टान को आती देख वह पराक्रमी राक्षस बिना किसी घबराहट के रथ से कूद पड़ा और केवल गदा हाथ में लेकर पृथ्वी पर खड़ा हो गया॥२२॥
अङ्गदेन शिला क्षिप्ता गत्वा तु रणमूर्धनि।
सचक्रकूबरं साश्वं प्रममाथ रथं तदा ॥२३॥
अङ्गद की फेंकी हुई वह चट्टान उसके रथ पर पहुँच गयी और युद्ध के मुहाने पर उसने पहिये, कूबर तथा घोड़ोंसहित उस रथ को तत्काल चूर-चूर कर डाला। २३॥
ततोऽन्यच्छिखरं गृह्य विपुलं द्रुमभूषितम्।
वज्रदंष्ट्रस्य शिरसि पातयामास वानरः॥२४॥
तत्पश्चात् वानरवीर अङ्गद ने वृक्षों से अलंकृत दूसरा विशाल शिखर हाथ में लेकर उसे वज्रदंष्ट्र के मस्तक पर दे मारा ॥२४॥
अभवच्छोणितोद्गारी वज्रदंष्टः सुमूर्च्छितः।
मुहूर्तमभवन्मूढो गदामालिङ्ग्य निःश्वसन्॥२५॥
वज्रदंष्ट्र उसकी चोट से मूर्च्छित हो गया और रक्त वमन करने लगा। वह गदा को हृदय से लगाये दो घड़ी तक अचेत पड़ा रहा। केवल उसकी साँस चलती रही॥२५॥
स लब्धसंज्ञो गदया वालिपुत्रमवस्थितम्।
जघान परमक्रुद्धो वक्षोदेशे निशाचरः॥२६॥
होश में आने पर उस निशाचर ने अत्यन्त कुपित हो सामने खड़े हुए वालिपुत्र की छाती में गदा से प्रहार किया॥२६॥
गदां त्यक्त्वा ततस्तत्र मुष्टियुद्धमकुर्वत।
अन्योन्यं जनतस्तत्र तावुभौ हरिराक्षसौ॥२७॥
फिर गदा त्यागकर वह वहाँ मुक्के से युद्ध करने लगा। वे वानर और राक्षस दोनों वीर एक-दूसरे को मुक्कों से मारने लगे॥२७॥
रुधिरोद्गारिणौ तौ तु प्रहारैर्जनितश्रमौ।
बभूवतुः सुविक्रान्तावङ्गारकबुधाविव॥२८॥
दोनों ही बड़े पराक्रमी थे और परस्पर जूझते हुए मङ्गल एवं बुध के समान जान पड़ते थे। आपस के प्रहारों से पीड़ित हो दोनों ही थक गये और मुँह से रक्त वमन करने लगे॥२८॥
ततः परमतेजस्वी अङ्गदः प्लवगर्षभः।
उत्पाट्य वृक्षं स्थितवानासीत् पुष्पफलैर्युतः॥२९॥
तत्पश्चात् परम तेजस्वी वानरशिरोमणि अङ्गद एक वृक्ष उखाड़कर खड़े हो गये। वे वहाँ उस वृक्षसम्बन्धी फल-फूलों के कारण स्वयं भी फल और फूलों से युक्त दिखायी देते थे॥२९॥
जग्राह चार्षभं चर्म खड्गं च विपुलं शुभम्।
किङ्किणीजालसंछन्नं चर्मणा च परिष्कृतम्॥३०॥
उधर वज्रदंष्ट्र ने ऋषभ के चर्म की बनी हुई ढाल और सुन्दर एवं विशाल तलवार ले ली। वह तलवार छोटी-छोटी घण्टियों के जाल से आच्छादित तथा चमड़े की म्यान से सुशोभित थी॥३०॥
चित्रांश्च रुचिरान् मार्गाश्चेरतुः कपिराक्षसौ।
जघ्नतुश्च तदान्योन्यं नर्दन्तौ जयकांक्षिणौ॥३१॥
उस समय परस्पर विजय की इच्छा रखने वाले वे वानर और राक्षस वीर सुन्दर एवं विचित्र पैंतरे बदलने तथा गर्जते हुए एक-दूसरे पर चोट करने लगे॥३१॥
व्रणैः सानैरशोभेतां पुष्पिताविव किंशुकौ।
युध्यमानौ परिश्रान्तौ जानुभ्यामवनीं गतौ॥३२॥
दोनों के घावों से रक्त की धारा बहने लगी, जिससे वे खिले हुए पलाश-वृक्षों के समान शोभा पाने लगे। लड़ते-लड़ते थक जाने के कारण दोनोंने ही पृथ्वी पर घुटने टेक दिये॥ ३२॥
निमेषान्तरमात्रेण अङ्गदः कपिकुञ्जरः।
उदतिष्ठत दीप्ताक्षो दण्डाहत इवोरगः॥३३॥
किंतु पलक मारते-मारते कपिश्रेष्ठ अङ्गद उठकर खड़े हो गये। उनके नेत्र रोष से उद्दीप्त हो उठे थे और वे डंडे की चोट खाये हुए सर्प के समान उत्तेजित हो रहे थे॥
निर्मलेन सुधौतेन खड्गेनास्य महच्छिरः।
जघान वज्रदंष्ट्रस्य वालिसूनुर्महाबलः॥ ३४॥
महाबली बालिकुमार ने अपनी निर्मल एवं तेज धारवाली चमकीली तलवार से वज्रदंष्ट्र का विशाल मस्तक काट डाला॥ ३४॥
रुधिरोक्षितगात्रस्य बभूव पतितं द्विधा।
तच्च तस्य परीताक्षं शुभं खड्गहतं शिरः॥ ३५॥
खून से लथपथ शरीर वाले उस राक्षस का वह खड्ग से कटा हुआ सुन्दर मस्तक, जिसके नेत्र उलट गये थे, धरती पर गिरकर दो टुकड़ों में विभक्त हो गया॥
वज्रदंष्ट्र हतं दृष्ट्वा राक्षसा भयमोहिताः।
त्रस्ता ह्यभ्यद्रवल्लङ्कां वध्यमानाः प्लवङ्गमैः।
विषण्णवदना दीना ह्रिया किंचिदवाङ्मखाः॥३६॥
वज्रदंष्ट्र को मारा गया देख राक्षस भय से अचेत हो गये। वे वानरों की मार खाकर भय के मारे लङ्का में भाग गये। उनके मुख पर विषाद छा रहा था। वे बहुत दुःखी थे और लज्जा के कारण उन्होंने अपना मुँह कुछ नीचा कर लिया था॥ ३६॥
निहत्य तं वज्रधरः प्रतापवान् स वालिसूनुः कपिसैन्यमध्ये।
जगाम हर्षं महितो महाबलः सहस्रनेत्रस्त्रिदशैरिवावृतः॥३७॥
वज्रधारी इन्द्र के समान प्रतापी महाबली वालिकुमार अङ्गद उस निशाचर वज्रदंष्ट्र को मारकर वानरसेना में सम्मानित हो देवताओं से घिरे हुए सहस्र नेत्रधारी इन्द्र के समान बड़े हर्ष को प्राप्त हुए॥ ३७॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे चतुःपञ्चाशः सर्गः॥५४॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में चौवनवाँ सर्ग पूरा हुआ।५४॥
सर्ग-55
वज्रदंष्ट्रं हतं श्रुत्वा वालिपुत्रेण रावणः।
बलाध्यक्षमुवाचेदं कृताञ्जलिमुपस्थितम्॥१॥
वालिपुत्र अङ्गद के हाथ से वज्रदंष्ट्र के मारे जाने का समाचार सुनकर रावण ने हाथ जोड़कर अपने पास खड़े हुए सेनापति प्रहस्त से कहा- ॥१॥
शीघ्रं निर्यान्तुदुर्धर्षा राक्षसा भीमविक्रमाः।
अकम्पनं पुरस्कृत्य सर्वशस्त्रास्त्रकोविदम्॥२॥
‘अकम्पन सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रों के ज्ञाता हैं, अतः उन्हीं को आगे करके भयंकर पराक्रमी दुर्धर्ष राक्षस शीघ्र यहाँ से युद्ध के लिये जायें ॥२॥
एष शास्ता च गोप्ता च नेता च युधि सत्तमः।
भूतिकामश्च मे नित्यं नित्यं च समरप्रियः॥३॥
‘अकम्पन को युद्ध सदा ही प्रिय है। ये सर्वदा मेरी उन्नति चाहते हैं। इन्हें युद्ध में एक श्रेष्ठ योद्धा माना गया है। ये शत्रुओं को दण्ड देने, अपने सैनिकों की रक्षा करने तथा रणभूमि में सेना का संचालन करने में समर्थ हैं ॥३॥
एष जेष्यति काकुत्स्थौ सुग्रीवं च महाबलम्।
वानरांश्चापरान् घोरान् हनिष्यति न संशयः॥४॥
‘अकम्पन दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण को तथा महाबली सुग्रीव को भी परास्त कर देंगे और दूसरे-दूसरे भयानक वानरों का भी संहार कर डालेंगे, इसमें संशय नहीं है’॥४॥
परिगृह्य स तामाज्ञां रावणस्य महाबलः।
बलं सम्प्रेरयामास तदा लघुपराक्रमः॥५॥
रावण की उस आज्ञा को शिरोधार्य करके शीघ्रपराक्रमी महाबली सेनाध्यक्ष ने उस समय युद्ध के लिये सेना भेजी॥५॥
ततो नानाप्रहरणा भीमाक्षा भीमदर्शनाः।
निष्पेतू राक्षसा मुख्या बलाध्यक्षप्रचोदिताः॥६॥
सेनापति से प्रेरित हो भयानक नेत्रोंवाले मुख्य-मुख्य भयंकर राक्षस नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्र लिये नगर से बाहर निकले॥६॥
रथमास्थाय विपुलं तप्तकाञ्चनभूषणम्।
मेघाभो मेघवर्णश्च मेघस्वनमहास्वनः॥७॥
राक्षसैः संवृतो घोरैस्तदा निर्यात्यकम्पनः।
उसी समय तपे हुए सोने से विभूषित विशाल रथ पर आरूढ़ हो घोर राक्षसों से घिरा हुआ अकम्पन भी निकला। वह मेघ के समान विशाल था, मेघ के समान ही उसका रंग था और मेघ के ही तुल्य उसकी गर्जना थी॥ ७ १/२॥
नहि कम्पयितुं शक्यः सुरैरपि महामृधे॥८॥
अकम्पनस्ततस्तेषामादित्य इव तेजसा।
महासमर में देवता भी उसे कम्पित नहीं कर सकते थे, इसीलिये वह अकम्पन नाम से विख्यात था और राक्षसों में सूर्य के समान तेजस्वी था॥ ८ १/२ ॥
तस्य निर्धावमानस्य संरब्धस्य युयुत्सया॥९॥
अकस्माद् दैन्यमागच्छद्धयानां रथवाहिनाम्।
रोषावेश से भरकर युद्ध की इच्छा से धावा करने वाले अकम्पन के रथ में जुते हुए घोड़ों का मन अकस्मात् दीनभाव को प्राप्त हो गया॥९ १/२॥
व्यस्फुरन्नयनं चास्य सव्यं युद्धाभिनन्दिनः॥१०॥
विवर्णो मुखवर्णश्च गद्गदश्चाभवत् स्वनः।
यद्यपि अकम्पन युद्ध का अभिनन्दन करने वाला था, तथापि उस समय उसकी बायीं आँख फड़कने लगी। मुख की कान्ति फीकी पड़ गयी और वाणी गद्गद हो गयी॥
अभवत् सुदिने काले दुर्दिनं रूक्षमारुतम्॥११॥
ऊचुः खगमृगाः सर्वे वाचः क्रूरा भयावहाः।
यद्यपि वह समय सुदिन का था, तथापि सहसा रूखी हवा से युक्त दुर्दिन छा गया। सभी पशु और पक्षी क्रूर एवं भयदायक बोली बोलने लगे॥ ११ १/२॥
स सिंहोपचितस्कन्धः शार्दूलसमविक्रमः॥१२॥
तानुत्पातानचिन्त्यैव निर्जगाम रणाजिरम्।
अकम्पन के कन्धे सिंह के समान पुष्ट थे। उसका पराक्रम व्याघ्र के समान था। वह पूर्वोक्त उत्पातों की कोई परवा न करके रणभूमि की ओर चला॥ १२ १/२॥
तथा निर्गच्छतस्तस्य रक्षसः सह राक्षसैः॥१३॥
बभूव सुमहान् नादः क्षोभयन्निव सागरम्।
जिस समय वह राक्षस दूसरे राक्षसों के साथ लङ्का से निकला, उस समय ऐसा महान् कोलाहल हुआ कि समुद्र में भी हलचल-सी मच गयी॥ १३ १/२॥
तेन शब्देन वित्रस्ता वानराणां महाचमूः॥१४॥
द्रुमशैलप्रहाराणां योद्धं समुपतिष्ठताम्।
तेषां युद्धं महारौद्रं संजज्ञे कपिरक्षसाम्॥१५॥
उस महान् कोलाहल से वानरों की वह विशाल सेना भयभीत हो गयी। युद्ध के लिये उपस्थित हो वृक्षों और शैल-शिखरों का प्रहार करने वाले उन वानरों और राक्षसों में महाभयंकर युद्ध होने लगा॥१४-१५ ॥
रामरावणयोरर्थे समभित्यक्तदेहिनः।
सर्वे ह्यतिबलाः शूराः सर्वे पर्वतसंनिभाः॥१६॥
श्रीराम और रावण के निमित्त आत्मत्याग के लिये उद्यत हुए वे समस्त शूरवीर अत्यन्त बलशाली और पर्वत के समान विशालकाय थे॥ १६ ॥
हरयो राक्षसाश्चैव परस्परजिघांसया।
तेषां विनर्दतां शब्दः संयुगेऽतितरस्विनाम्॥१७॥
शुश्रुवे सुमहान् कोपादन्योन्यमभिगर्जताम्।
वानर तथा राक्षस एक-दूसरे के वध की इच्छा से वहाँ एकत्र हुए थे। वे युद्धस्थल में अत्यन्त वेगशाली थे। कोलाहल करते और एक-दूसरे को लक्ष्य करके क्रोधपूर्वक गर्जते थे। उनका महान् शब्द सुदूरतक सुनायी देता था॥ १७ १/२॥
रजश्चारुणवर्णाभं सुभीममभवद् भृशम्॥१८॥
उद्धृतं हरिरक्षोभिः संरुरोध दिशो दश।
वानरों और राक्षसों द्वारा उड़ायी गयी लाल रंग की धूल बड़ी भयंकर जान पड़ती थी। उसने दसों दिशाओं को आच्छादित कर लिया था॥ १८ १/२॥
अन्योन्यं रजसा तेन कौशेयोद्धतपाण्डुना॥१९॥
संवृतानि च भूतानि ददृशुर्न रणाजिरे।
परस्पर उड़ायी हुई वह धूल हिलते हुए रेशमी वस्त्र के समान पाण्डुवर्ण की दिखायी देती थी। उसके द्वारा समराङ्गण में समस्त प्राणी ढक गये थे। अतः वानर और राक्षस उन्हें देख नहीं पाते थे॥ १९ १/२॥
न ध्वजो न पताका वा चर्म वा तुरगोऽपि वा।२०॥
आयुधं स्यन्दनो वापि ददृशे तेन रेणुना।
उस धूल से आच्छादित होने के कारण ध्वज, पताका, ढाल, घोड़ा, अस्त्र-शस्त्र अथवा रथ कोई भी वस्तु दिखायी नहीं देती थी॥ २० १/२॥
शब्दश्च सुमहांस्तेषां नर्दतामभिधावताम्॥ २१॥
श्रूयते तुमुलो युद्धे न रूपाणि चकाशिरे।
उन गर्जते और दौड़ते हुए प्राणियों का महाभयंकर शब्द युद्धस्थल में सबको सुनायी पड़ता था, परंतु उनके रूप नहीं दिखायी देते थे॥ २१ १/२॥
हरीनेव सुसंरुष्टा हरयो जनुराहवे॥२२॥
राक्षसा राक्षसांश्चापि निजघ्नुस्तिमिरे तदा।
अन्धकार से आच्छादित युद्धस्थल में अत्यन्त कुपित हुए वानर वानरों पर ही प्रहार कर बैठते थे तथा राक्षस राक्षसों को ही मारने लगते थे॥ २२ १/२॥
ते परांश्च विनिघ्नन्तः स्वांश्च वानरराक्षसाः॥२३॥
रुधिराहॊ तदा चक्रुर्महीं पङ्कानुलेपनाम्।
अपने तथा शत्रुपक्ष के योद्धाओं को मारते हुए वानरों तथा राक्षसों ने उस रणभूमि को रक्त की धारा से भिगो दिया और वहाँ कीच मचा दी॥ २३ १/२ ॥
ततस्तु रुधिरौघेण सिक्तं ह्यपगतं रजः॥२४॥
शरीरशवसंकीर्णा बभूव च वसुंधरा।
तदनन्तर रक्त के प्रवाह से सिंच जाने के कारण वहाँ की धूल बैठ गयी और सारी युद्धभूमि लाशों से भर गयी॥२४ १/२॥
द्रुमशक्तिगदाप्रासैः शिलापरिघतोमरैः॥ २५॥
राक्षसा हरयस्तूर्णं जघ्नुरन्योन्यमोजसा।
वानर और राक्षस एक-दूसरेपर वृक्ष, शक्ति, गदा, प्रास, शिला, परिघ और तोमर आदि से बलपूर्वक जल्दी-जल्दी प्रहार करने लगे॥२५ १/२ ॥
बाहुभिः परिघाकारैर्युध्यन्तः पर्वतोपमान्॥२६॥
हरयो भीमकर्माणो राक्षसाञ्जजुराहवे।
भयंकर कर्म करने वाले वानर अपनी परिघ के समान भुजाओं द्वारा पर्वताकार राक्षसों के साथ युद्ध करते हुए रणभूमि में उन्हें मारने लगे॥ २६ १/२ ॥
राक्षसास्त्वभिसंक्रुद्धाः प्रासतोमरपाणयः॥ २७॥
कपीन् निजजिरे तत्र शस्त्रैः परमदारुणैः।
उधर राक्षसलोग भी अत्यन्त कुपित हो हाथों में प्रास और तोमर लिये अत्यन्त भयंकर शस्त्रों द्वारा वानरों का वध करने लगे॥२७ १/२॥
अकम्पनः सुसंक्रुद्धो राक्षसानां चमूपतिः॥२८॥
संहर्षयति तान् सर्वान् राक्षसान् भीमविक्रमान्।
इस समय अधिक रोष से भरा हुआ राक्षस-सेनापति अकम्पन भी भयानक पराक्रम प्रकट करने वाले उन सभी राक्षसों का हर्ष बढ़ाने लगा॥२८ १/२ ॥
हरयस्त्वपि रक्षांसि महाद्रुममहाश्मभिः॥२९॥
विदारयन्त्यभिक्रम्य शस्त्राण्याच्छिद्य वीर्यतः।
वानर भी बलपूर्वक आक्रमण करके राक्षसों के अस्त्र-शस्त्र छीनकर बड़े-बड़े वृक्षों और शिलाओं द्वारा उन्हें विदीर्ण करने लगे॥ २९ १/२॥
एतस्मिन्नन्तरे वीरा हरयः कुमुदो नलः॥३०॥
मैन्दश्च द्विविदः क्रुद्धाश्चक्रुर्वेगमनुत्तमम्।
इसी समय वीर वानर कुमुद, नल, मैन्द और द्विविद ने कुपित हो अपना परम उत्तम वेग प्रकट किया॥३० १/२॥
ते तु वृक्षैर्महावीरा राक्षसानां चमूमुखे॥३१॥
कदनं सुमहच्चक्रुर्लीलया हरिपुंगवाः।
ममन्थू राक्षसान् सर्वे नानाप्रहरणैर्भृशम्॥३२॥
उन महावीर वानरशिरोमणियों ने युद्ध के मुहाने पर वृक्षों द्वारा खेल-खेल में ही राक्षसों का बड़ा भारी संहार किया। उन सबने नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रों द्वारा राक्षसों को भलीभाँति मथ डाला॥३१-३२॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे पञ्चपञ्चाशः सर्गः॥५५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में पचपनवाँ सर्ग पूरा हुआ।५५॥
सर्ग-56
तद् दृष्ट्वा सुमहत् कर्म कृतं वानरसत्तमैः।
क्रोधमाहारयामास युधि तीव्रमकम्पनः॥१॥
उन वानरशिरोमणियों द्वारा किये गये उस महान् पराक्रम को देखकर युद्धस्थल में अकम्पन को बड़ा भारी एवं दुःसह क्रोध हुआ॥१॥
क्रोधमूिर्च्छत तरूपस्तु धुन्वन् परमकार्मुकम्।
दृष्ट्वा तु कर्म शत्रूणां सारथिं वाक्यमब्रवीत्॥२॥
शत्रुओं का कर्म देख रोष से उसका सारा शरीर व्याप्त हो गया और अपने उत्तम धनुष को हिलाते हुए उसने सारथि से कहा- ॥२॥
तत्रैव तावत् त्वरितो रथं प्रापय सारथे।
एते च बलिनो नन्ति सुबहून् राक्षसान् रणे॥३॥
‘सारथे! ये बलवान् वानर युद्ध में बहुतेरे राक्षसों का वध कर रहे हैं, अतः पहले वहीं शीघ्रतापूर्वक मेरा रथ पहुँचाओ॥३॥
एते च बलवन्तो वा भीमकोपाश्च वानराः।
द्रुमशैलप्रहरणास्तिष्ठन्ति प्रमुखे मम॥४॥
‘ये वानर बलवान् तो हैं ही, इनका क्रोध भी बड़ा भयानक है। ये वृक्षों और शिलाओं का प्रहार करते हुए मेरे सामने खड़े हैं॥ ४॥
एतान् निहन्तुमिच्छामि समरश्लाघिनो ह्यहम्।
एतैः प्रमथितं सर्वं रक्षसां दृश्यते बलम्॥५॥
‘ये युद्ध की स्पृहा रखने वाले हैं; अतः मैं इन सबका वध करना चाहता हूँ। इन्होंने सारी राक्षससेना को मथ डाला है। यह साफ दिखायी देता है ॥५॥
ततः प्रचलिताश्वेन रथेन रथिनां वरः।
हरीनभ्यपतद् दूराच्छरजालैरकम्पनः॥६॥
तदनन्तर तेज चलने वाले घोड़ों से जुते हुए रथ के द्वारा रथियों में श्रेष्ठ अकम्पन दूरसे ही बाणसमूहों की वर्षा करता हुआ उन वानरों पर टूट पड़ा॥६॥
न स्थातुं वानराः शेकुः किं पुनर्योधुमाहवे।
अकम्पनशरैर्भग्नाः सर्व एवाभिदुद्रुवुः ॥७॥
अकम्पन के बाणों से घायल हो सभी वानर भाग चले। वे युद्धस्थल में खड़े भी न रह सके; फिर युद्ध करने की तो बात ही क्या है ? ॥ ७॥
तान् मृत्युवशमापन्नानकम्पनशरानुगान्।
समीक्ष्य हनुमान् ज्ञातीनुपतस्थे महाबलः॥८॥
अकम्पन के बाण वानरों के पीछे लगे थे और वे मृत्यु के अधीन होते जाते थे। अपने जाति-भाइयों की यह दशा देखकर महाबली हनुमान् जी अकम्पन के पास आये॥
तं महाप्लवगं दृष्ट्वा सर्वे ते प्लवगर्षभाः।
समेत्य समरे वीराः संहृष्टाः पर्यवारयन्॥९॥
महाकपि हनुमान् जी को आया देख वे समस्त वीर वानरशिरोमणि एकत्र हो हर्षपूर्वक उन्हें चारों ओर से घेरकर खड़े हो गये॥९॥
व्यवस्थितं हनूमन्तं ते दृष्ट्वा प्लवगर्षभाः।
बभूवुर्बलवन्तो हि बलवन्तमुपाश्रिताः॥१०॥
हनुमान जी को युद्ध के लिये डटा हुआ देख वे सभी श्रेष्ठ वानर उन बलवान् वीर का आश्रय ले स्वयं भी बलवान् हो गये॥१०॥
अकम्पनस्तु शैलाभं हनूमन्तमवस्थितम्।
महेन्द्र इव धाराभिः शरैरभिववर्ष ह॥११॥
पर्वत के समान विशालकाय हनुमान् जी को अपने सामने उपस्थित देख अकम्पन उनपर बाणों की फिर वर्षा करने लगा, मानो देवराज इन्द्र जल की धारा बरसा रहे हों।
अचिन्तयित्वा बाणौघान् शरीरे पातितान् कपिः।
अकम्पनवधार्थाय मनो दधे महाबलः॥१२॥
अपने शरीर पर गिराये गये उन बाण-समूहों की परवा न करके महाबली हनुमान् ने अकम्पन को मार डालने का विचार किया॥ १२ ॥
स प्रहस्य महातेजा हनूमान् मारुतात्मजः।
अभिदुद्राव तद्रक्षः कम्पयन्निव मेदिनीम्॥१३॥
फिर तो महातेजस्वी पवनकुमार हनुमान् महान् अट्टहास करके पृथ्वी को कँपाते हुए-से उस राक्षस की ओर दौड़े ॥१३॥
तस्याथ नर्दमानस्य दीप्यमानस्य तेजसा।
बभूव रूपं दुर्धर्षं दीप्तस्येव विभावसोः॥१४॥
उस समय वहाँ गर्जते और तेज से देदीप्यमान होते हुए हनुमान जी का रूप प्रज्वलित अग्नि के समान दुर्धर्ष हो गया था॥ १४॥
आत्मानं त्वप्रहरणं ज्ञात्वा क्रोधसमन्वितः।
शैलमुत्पाटयामास वेगेन हरिपुङ्गवः ॥ १५॥
अपने हाथ में कोई हथियार नहीं है, यह जानकर क्रोध से भरे हुए वानरशिरोमणि हनुमान् ने बड़े वेग से पर्वत उखाड़ लिया॥१५॥
गृहीत्वा सुमहाशैलं पाणिनैकेन मारुतिः।
स विनद्य महानादं भ्रामयामास वीर्यवान्॥१६॥
उस महान् पर्वत को एक ही हाथ से लेकर पराक्रमी पवनकुमार बड़े जोर-जोर से गर्जना करते हुए उसे घुमाने लगे॥१६॥
ततस्तमभिदुद्राव राक्षसेन्द्रमकम्पनम्।
पुरा हि नमुचिं संख्ये वज्रेणेव पुरंदरः॥१७॥
फिर उन्होंने राक्षसराज अकम्पन पर धावा किया, ठीक उसी तरह, जैसे पूर्वकाल में देवेन्द्र ने वज्र लेकर युद्धस्थल में नमुचिपर आक्रमण किया था॥ १७॥
अकम्पनस्तु तद् दृष्ट्वा गिरिशृङ्गं समुद्यतम्।
दूरादेव महाबाणैरर्धचन्द्रैर्व्यदारयत्॥१८॥
अकम्पन ने उस उठे हुए पर्वतशिखर को देख अर्धचन्द्राकार विशाल बाणों के द्वारा उसे दूर से ही विदीर्ण कर दिया॥ १८॥
तं पर्वताग्रमाकाशे रक्षोबाणविदारितम्।
विकीर्णं पतितं दृष्ट्वा हनूमान् क्रोधमूिर्च्छतः॥१९॥
उस राक्षस के बाण से विदीर्ण हो वह पर्वतशिखर आकाश में ही बिखरकर गिर पड़ा। यह देख हनुमान् जी के क्रोध की सीमा न रही॥ १९॥
सोऽश्वकर्णं समासाद्य रोषदर्यान्वितो हरिः।
तूर्णमुत्पाटयामास महागिरिमिवोच्छ्रितम्॥२०॥
फिर रोष और दर्प से उन वानरवीर ने महान् पर्वत के समान ऊँचे अश्वकर्ण नामक वृक्ष के पास जाकर उसे शीघ्रतापूर्वक उखाड़ लिया।॥ २०॥
तं गृहीत्वा महास्कन्धं सोऽश्वकर्णं महाद्युतिः।
प्रगृह्य परया प्रीत्या भ्रामयामास संयुगे॥२१॥
विशाल तने वाले उस अश्वकर्ण को हाथ में लेकर महातेजस्वी हनुमान् ने बड़ी प्रसन्नता के साथ उसे युद्धभूमि में घुमाना आरम्भ किया॥२१॥
प्रधावन्नुरुवेगेन बभञ्ज तरसा गुमान्।
हनूमान् परमक्रुद्धश्चरणैर्दारयन् महीम्॥२२॥
प्रचण्ड क्रोध से भरे हुए हनुमान् ने बड़े वेग से दौड़कर कितने ही वृक्षों को तोड़ डाला और पैरों की धमक से वे पृथ्वी को भी विदीर्ण-सी करने लगे॥ २२ ॥
गजांश्च सगजारोहान् सरथान् रथिनस्तथा।
जघान हनुमान् धीमान् राक्षसांश्च पदातिगान्॥२३॥
सवारोंसहित हाथियों, रथोंसहित रथियों तथा पैदल राक्षसों को भी बुद्धिमान् हनुमान् जी मौत के घाट उतारने लगे॥ २३॥
तमन्तकमिव क्रुद्धं सद्रुमं प्राणहारिणम्।
हनूमन्तमभिप्रेक्ष्य राक्षसा विप्रदुद्रुवुः ॥ २४॥
क्रोध से भरे हुए यमराज की भाँति वृक्ष हाथ में लिये प्राणहारी हनुमान् को देख राक्षस भागने लगे॥ २४॥
तमापतन्तं संक्रुद्धं राक्षसानां भयावहम्।
ददर्शाकम्पनो वीरश्चुक्षोभ च ननाद च॥ २५॥
राक्षसों को भय देने वाले हनुमान् अत्यन्त कुपित होकर शत्रुओं पर आक्रमण कर रहे थे। उस समय वीर अकम्पन ने उन्हें देखा। देखते ही वह क्षोभ से भर गया और जोर-जोर से गर्जना करने लगा॥ २५ ॥
स चतुर्दशभिर्बाणैर्निशितैर्देहदारणैः।
निर्बिभेद महावीर्यं हनूमन्तमकम्पनः ॥२६॥
अकम्पन ने देह को विदीर्ण कर देने वाले चौदह पैने बाण मारकर महापराक्रमी हनुमान् को घायल कर दिया॥ २६॥
स तथा विप्रकीर्णस्तु नाराचैः शितशक्तिभिः।
हनूमान् ददृशे वीरः प्ररूढ इव सानुमान्॥२७॥
इस प्रकार नाराचों और तीखी शक्तियों से छिदे हुए वीर हनुमान् उस समय वृक्षों से व्याप्त पर्वत के समान दिखायी देते थे॥ २७॥
विरराज महावीर्यो महाकायो महाबलः।
पुष्पिताशोकसंकाशो विधूम इव पावकः॥ २८॥
उनका सारा शरीर रक्त से रँग गया था, इसलिये वे महापराक्रमी महाबली और महाकाय हनुमान् खिले हुए अशोक एवं धूमरहित अग्नि के समान शोभा पा रहे थे॥
ततोऽन्यं वृक्षमुत्पाट्य कृत्वा वेगमनुत्तमम्।
शिरस्याभिजघानाशु राक्षसेन्द्रमकम्पनम्॥२९॥
तदनन्तर महान् वेग प्रकट करके हनुमान जी ने एक दूसरा वृक्ष उखाड़ लिया और तुरंत ही उसे राक्षसराज अकम्पन के सिरपर दे मारा ॥ २९ ॥
स वृक्षेण हतस्तेन सक्रोधेन महात्मना।
राक्षसो वानरेन्द्रेण पपात च ममार च॥३०॥
क्रोध से भरे वानरश्रेष्ठ महात्मा हनुमान् के चलाये हुए उस वृक्ष की गहरी चोट खाकर राक्षस अकम्पन पृथ्वी पर गिरा और मर गया॥ ३० ॥
तं दृष्ट्वा निहतं भूमौ राक्षसेन्द्रमकम्पनम्।
व्यथिता राक्षसाः सर्वे क्षितिकम्प इव द्रुमाः॥३१॥
जैसे भूकम्प आने पर सारे वृक्ष काँपने लगते हैं, उसी प्रकार राक्षसराज अकम्पन को रणभूमि में मारा गया देख समस्त राक्षस व्यथित हो उठे॥३१॥
त्यक्तप्रहरणाः सर्वे राक्षसास्ते पराजिताः।
लङ्कामभिययुस्त्रासाद् वानरैस्तैरभिद्रुताः॥ ३२॥
वानरों के खदेड़ने पर वहाँ परास्त हुए वे सब राक्षस अपने अस्त्र-शस्त्र फेंककर डर के मारे लङ्का में भाग गये॥
ते मुक्तकेशाः सम्भ्रान्ता भग्नमानाः पराजिताः।
भयाच्छ्रमजलैरङ्गैः प्रस्रवद्भिर्विदुद्रुवुः ॥ ३३॥
उनके केश खुले हुए थे। वे घबरा गये थे और पराजित होने से उनका घमंड चूर-चूर हो गया था। भय के कारण उनके अङ्गों से पसीने चू रहे थे और इसी अवस्था में वे भाग रहे थे। ३३।।
अन्योन्यं ये प्रमथ्नन्तो विविशुनगरं भयात्।
पृष्ठतस्ते तु सम्मूढाः प्रेक्षमाणा मुहुर्मुहुः॥३४॥
भय के कारण एक-दूसरे को कुचलते हुए वे भागकर लङ्कापुरी में घुस गये। भागते समय वे बारंबार पीछे घूम-घूमकर देखते रहते थे॥ ३४॥
तेषु लङ्कां प्रविष्टेषु राक्षसेषु महाबलाः।
समेत्य हरयः सर्वे हनूमन्तमपूजयन्॥ ३५॥
उन राक्षसों के लङ्का में घुस जाने पर समस्त महाबली वानरों ने एकत्र हो वहाँ हनुमान जी का अभिनन्दन किया॥ ३५ ॥
सोऽपि प्रवृद्धस्तान् सर्वान् हरीन् सम्प्रत्यपूजयत्।
हनूमान् सत्त्वसम्पन्नो यथार्हमनुकूलतः॥३६॥
उन शक्तिशाली हनुमान जी ने भी उत्साहित हो यथायोग्य अनुकूल बर्ताव करते हुए उन समस्त वानरों का समादर किया॥ ३६॥
विनेदुश्च यथाप्राणं हरयो जितकाशिनः।
चकृषुश्च पुनस्तत्र सप्राणानेव राक्षसान्॥३७॥
तत्पश्चात् विजयोल्लास से सुशोभित होने वाले वानरों ने पूरा बल लगाकर उच्च स्वर से गर्जना की और वहाँ जीवित राक्षसों को ही पकड़-पकड़कर घसीटना आरम्भ किया॥ ३७॥
स वीरशोभामभजन्महाकपिः समेत्य रक्षांसि निहत्य मारुतिः।
महासुरं भीमममित्रनाशनं विष्णुर्यथैवोरुबलं चमूमुखे॥ ३८॥
जैसे भगवान् विष्णु ने शत्रुनाशन, महाबली, भयंकर एवं महान् असुर मधुकैटभ आदि का वध करके वीरशोभा (विजयलक्ष्मी)-का वरण किया था, उसी प्रकार महाकपि हनुमान् ने राक्षसों के पास पहुँचकर उन्हें मौत के घाट उतार वीरोचित शोभा को धारण किया॥३८॥
अपूजयन् देवगणास्तदाकपिं स्वयं च रामोऽतिबलश्च लक्ष्मणः।
तथैव सुग्रीवमुखाः प्लवंगमा विभीषणश्चैव महाबलस्तदा॥३९॥
उस समय देवता, महाबली श्रीराम, लक्ष्मण, सुग्रीव आदि वानर तथा अत्यन्त बलशाली विभीषण ने भी कपिवर हनुमान जी का यथोचित सत्कार किया। ३९॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे षट्पञ्चाशः सर्गः॥५६॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में छप्पनवाँ सर्ग पूरा हुआ।५६॥
सर्ग-57
अकम्पनवधं श्रुत्वा क्रुद्धो वै राक्षसेश्वरः।
किंचिद् दीनमुखश्चापि सचिवांस्तानुदैक्षत॥१॥
अकम्पन के वध का समाचार पाकर राक्षसराज रावण को बड़ा क्रोध हुआ। उसके मुख पर कुछ दीनता छा गयी और वह मन्त्रियों की ओर देखने लगा॥१॥
स तु ध्यात्वा मुहूर्तं तु मन्त्रिभिः संविचार्य च।
ततस्तु रावणः पूर्वदिवसे राक्षसाधिपः।
पुरीं परिययौ लङ्कां सर्वान् गुल्मानवेक्षितुम्॥२॥
पहले तो दो घड़ी तक वह कुछ सोचता रहा। फिर उसने मन्त्रियों के साथ विचार किया और उसके बाद दिन के पूर्वभाग में राक्षसराज रावण स्वयं लङ्का के सब मोरचों का निरीक्षण करने के लिये गया॥२॥
तां राक्षसगणैर्गुप्तां गुल्मैर्बहुभिरावृताम्।
ददर्श नगरी राजा पताकाध्वजमालिनीम्॥३॥
राक्षसगणों से सुरक्षित और बहुत-सी छावनियों से घिरी हुई, ध्वजा-पताकाओं से सुशोभित उस नगरी को राजा रावण ने अच्छी तरह देखा॥३॥
रुद्धां तु नगरीं दृष्ट्वा रावणो राक्षसेश्वरः।
उवाचात्महितं काले प्रहस्तं युद्धकोविदम्॥४॥
लङ्कापुरी चारों ओर से शत्रुओं द्वारा घेर ली गयी थी। यह देखकर राक्षसराज रावण ने अपने हितैषी युद्धकलाकोविद प्रहस्त से यह समयोचित बात कही – ॥४॥
पुरस्योपनिविष्टस्य सहसा पीडितस्य ह।
नान्ययुद्धात् प्रपश्यामि मोक्षं युद्धविशारद ॥५॥
‘युद्धविशारद वीर! नगर के अत्यन्त निकट शत्रुओं की सेना छावनी डाले पड़ी है, इसीलिये सारानगर सहसा व्यथित हो उठा है। अब मैं दूसरे किसी के युद्ध करने से इसका छुटकारा होता नहीं देखता हूँ॥ ५॥
अहं वा कुम्भकर्णो वा त्वं वा सेनापतिर्मम।
इन्द्रजिद् वा निकुम्भो वा वहेयुर्भारमीदृशम्॥६॥
‘अब तो इस तरह के युद्ध का भार मैं, कुम्भकर्ण, मेरे सेनापति तुम, बेटा इन्द्रजित् अथवा निकुम्भ ही उठा सकते हैं॥६॥
स त्वं बलमतः शीघ्रमादाय परिगृह्य च।
विजयायाभिनिर्याहि यत्र सर्वे वनौकसः॥७॥
‘अतः तुम शीघ्र ही सेना लेकर विजय के लिये प्रस्थान करो और जहाँ ये सब वानर जुटे हुए हैं, वहाँ जाओ॥७॥
निर्याणादेव तूर्णं च चलिता हरिवाहिनी।
नर्दतां राक्षसेन्द्राणां श्रुत्वा नादं द्रविष्यति॥८॥
‘तुम्हारे निकलते ही सारी वानरसेना तुरंत विचलित हो उठेगी और गर्जते हुए राक्षसशिरोमणियों का सिंहनाद सुनकर भाग खड़ी होगी॥८॥
चपला ह्यविनीताश्च चलचित्ताश्च वानराः।
न सहिष्यन्ति ते नादं सिंहनादमिव द्विपाः॥९॥
‘वानरलोग बड़े चञ्चल, ढीठ और डरपोक होते हैं, जैसे हाथी सिंह की गर्जना नहीं सह सकते, उसी प्रकार वे वानर तुम्हारा सिंहनाद नहीं सह सकेंगे। ९॥
विद्रुते च बले तस्मिन् रामः सौमित्रिणा सह।
अवशस्ते निरालम्बः प्रहस्त वशमेष्यति॥१०॥
‘प्रहस्त! जब वानरसेना भाग जायगी, तब कोई सहारा न रहने के कारण लक्ष्मणसहित श्रीराम विवश होकर तुम्हारे अधीन हो जायँगे॥ १० ॥
आपत्संशयिता श्रेयो नात्र निःसंशयीकृता।
प्रतिलोमानुलोमं वा यत् तु नो मन्यसे हितम्॥११॥
‘युद्ध में मृत्यु संदिग्ध होती है, हो भी सकती है और न भी हो। किंतु ऐसी मृत्यु ही श्रेष्ठ है। (इसके विपरीत) जीवन को बिना संशय (जोखिम)-में डाले (बिना युद्धस्थल के) जो मृत्यु होती है, वह श्रेष्ठ नहीं होती (ऐसा मेरा विचार है)। इसके अनुकूल या प्रतिकूल जो कुछ तुम हमारे लिये हितकर समझते हो, उसे बताओ’ ॥ ११॥
रावणेनैवमुक्तस्तु प्रहस्तो वाहिनीपतिः।
राक्षसेन्द्रमुवाचेदमसुरेन्द्रमिवोशना ॥१२॥
रावण के ऐसा कहने पर सेनापति प्रहस्त ने उस राक्षसराज के समक्ष उसी तरह अपना विचार व्यक्त किया, जैसे शुक्राचार्य असुरराज बलि को अपनी सलाह दिया करते हैं।१२ ॥
राजन् मन्त्रितपूर्वं नः कुशलैः सह मन्त्रिभिः।
विवादश्चापि नो वृत्तः समवेक्ष्य परस्परम्॥
(उसने कहा-) ‘राजन्! हमलोगों ने कुशल मन्त्रियों के साथ पहले भी इस विषयपर विचार किया है। उन दिनों एक-दूसरे के मत की आलोचना करके हमलोगों में विवाद भी खड़ा हो गया था (हमलोग सर्वसम्मति से किसी एक निर्णय पर नहीं पहुँच सके थे) ॥ १३॥
प्रदानेन तु सीतायाः श्रेयो व्यवसितं मया।
अप्रदाने पुनर्युद्धं दृष्टमेव तथैव नः॥१४॥
‘मेरा पहले से ही यह निश्चय रहा है कि सीताजी को लौटा देने से ही हमलोगों का कल्याण होगा और न लौटाने पर युद्ध अवश्य होगा। उस निश्चयके अनुसार ही हमें आज यह युद्ध का संकट दिखायी दिया है॥ १४॥
सोऽहं दानैश्च मानैश्च सततं पूजितस्त्वया।
सान्त्वैश्च विविधैः काले किं न कुर्यां हितं तव॥१५॥
‘परंतु आपने दान, मान और विविध सान्त्वनाओं के द्वारा समय-समय पर सदा ही मेरा सत्कार किया है। फिर मैं आपका हितसाधन क्यों नहीं करूँगा? (अथवा आपके हित के लिये कौन-सा कार्य नहीं कर सकूँगा)॥
नहि मे जीवितं रक्ष्यं पत्रदारधनानि च।
त्वं पश्य मां जुहूषन्तं त्वदर्थे जीवितं युधि॥१६॥
‘मुझे अपने जीवन, स्त्री, पुत्र और धन आदि की रक्षा नहीं करनी है—इनकी रक्षाके लिये मुझे कोई चिन्ता नहीं। आप देखिये कि मैं किस तरह आपके लिये युद्ध की ज्वाला में अपने जीवन की आहुति देता हूँ’॥ १६॥
एवमुक्त्वा तु भर्तारं रावणं वाहिनीपतिः।
उवाचेदं बलाध्यक्षान् प्रहस्तः पुरतः स्थितान्॥१७॥
अपने स्वामी रावण से ऐसा कहकर प्रधान सेनापति प्रहस्त ने अपने सामने खड़े हुए सेनाध्यक्षों से इस प्रकार कहा- ॥ १७॥
समानयत मे शीघ्रं राक्षसानां महाबलम्।
मबाणानां तु वेगेन हतानां च रणाजिरे॥१८॥
अद्य तृप्यन्तु मांसादाः पक्षिणः काननौकसाम्।
‘तुमलोग शीघ्र मेरे पास राक्षसों की विशाल सेना ले आओ। आज मांसाहारी पक्षी समराङ्गण में मेरे बाणों के वेग से मारे गये वानरों के मांस खाकर तृप्त हो जायँ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा बलाध्यक्षा महाबलाः॥१९॥
बलमुद्योजयामासुस्तस्मिन् राक्षसमन्दिरे।
प्रहस्त की यह बात सुनकर महाबली सेनाध्यक्षों ने रावण के उस महल के पास विशाल सेना को युद्ध के लिये तैयार किया॥ १९ १/२॥
सा बभूव मुहूर्तेन भीमैर्नानाविधायुधैः ॥ २०॥
लङ्का राक्षसवीरैस्तैर्गजैरिव समाकुला।
दो ही घड़ी में नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्र लिये हाथी-जैसे भयानक राक्षसवीरों से लङ्कापुरी भर गयी॥
हुताशनं तर्पयतां ब्राह्मणांश्च नमस्यताम्॥२१॥
आज्यगन्धप्रतिवहः सुरभिर्मारुतो ववौ।
कितने ही राक्षस घी की आहुति देकर अग्निदेव को तृप्त करने लगे और ब्राह्मणों को नमस्कार करके आशीर्वाद लेने लगे। उस समय घी की गन्ध लेकर सुगन्धित वायु सब ओर बहने लगी॥ २१ १/२ ।।
स्रजश्च विविधाकारा जगृहुस्त्वभिमन्त्रिताः॥२२॥
संग्रामसज्जाः संहृष्टा धारयन् राक्षसास्तदा।
राक्षसों ने मन्त्रों द्वारा अभिमन्त्रित नाना प्रकार की मालाएँ ग्रहण की और हर्ष एवं उत्साह से युक्त हो युद्धोपयोगी वेश-भूषा धारण की॥ २२ १/२ ।।
सधनुष्काः कवचिनो वेगादाप्लुत्य राक्षसाः॥२३॥
रावणं प्रेक्ष्य राजानं प्रहस्तं पर्यवारयन्।
धनुष और कवच धारण किये राक्षस वेग से उछलकर आगे बढ़े और राजा रावण का दर्शन करते हए प्रहस्त को चारों ओर से घेरकर खड़े हो गये। २३ १/२॥
अथामन्त्र्य तु राजानं भेरीमाहत्य भैरवाम्॥२४॥
आरुरोह रथं युक्तः प्रहस्तः सज्जकल्पितम्।
तदनन्तर राजा की आज्ञा ले भयंकर भेरी बजवाकर कवच आदि धारण कर के युद्ध के लिये उद्यत हुआ प्रहस्त अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित रथ पर आरूढ़ हुआ॥ २४ १/२॥
हयैर्महाजवैर्युक्तं सम्यक्सूतं सुसंयतम्॥ २५॥
महाजलदनिर्घोषं साक्षाच्चन्द्रार्कभास्वरम्।
प्रहस्त के उस रथ में बड़े वेगशाली घोड़े जुते हुए थे, उसका सारथि भी अपने कार्य में कुशल था। वह रथ पूर्णतः सारथि के नियन्त्रण में था। उसके चलने पर महान् मेघों की गर्जना के समान घर्घर-ध्वनि होती थी। वह रथ साक्षात् चन्द्रमा और सूर्य के समान प्रकाशमान था॥
उरगध्वजदुर्धर्षं सुवरूथं स्वपस्करम्॥२६॥
सुवर्णजालसंयुक्तं प्रहसन्तमिव श्रिया।
सर्पाकार या सर्पचिह्नित ध्वज के कारण वह दुर्धर्ष प्रतीत होता था। उस रथ की रक्षा के लिये जो कवच था, वह बहुत ही सुन्दर दिखायी देता था। उसके सारे अङ्ग सुन्दर थे और उसमें अच्छी-अच्छी सामग्रियाँ रखी गयी थीं। उस रथ में सोने की जाली लगी थी। वह अपनी कान्ति से हँसता-सा प्रतीत होता था । (अथवा दूसरे कान्तिमान् पदार्थों का उपहास-सा कर रहा था) ॥ २६ १/२ ॥
ततस्तं रथमास्थाय रावणार्पितशासनः॥२७॥
लङ्काया निर्ययौ तूर्णं बलेन महता वृतः।
उस रथ पर बैठकर रावण की आज्ञा शिरोधार्य करके विशाल सेना से घिरा हुआ प्रहस्त तुरंत लङ्का से बाहर निकला॥ २७ १/२॥
ततो दुन्दुभिनिर्घोषः पर्जन्यनिनदोपमः।
वादित्राणां च निनदः पूरयन्निव मेदिनीम्॥२८॥
उसके निकलते ही मेघ की गम्भीर गर्जना के समान धौंसा बजने लगा। अन्य रणवाद्यों का निनाद भी पृथ्वी को परिपूर्ण करता-सा प्रतीत होने लगा॥२८॥
शुश्रुवे शङ्खशब्दश्च प्रयाते वाहिनीपतौ।
निनदन्तः स्वरान् घोरान् राक्षसा जग्मुरग्रतः॥२९॥
भीमरूपा महाकायाः प्रहस्तस्य पुरःसराः।
सेनापति के प्रस्थानकाल में शङ्खों की ध्वनि भी सुनायी देने लगी। प्रहस्त के आगे चलने वाले भयानक रूपधारी विशालकाय राक्षस भयंकर स्वर से गर्जना करते हुए आगे बढ़े॥२९ १/२॥
नरान्तकः कुम्भहनुर्महानादः समुन्नतः।
प्रहस्तसचिवा ह्येते निर्ययुः परिवार्य तम्॥३०॥
नरान्तक, कुम्भहनु, महानाद और समुन्नत—ये प्रहस्त के चार सचिव उसे चारों ओर से घेरकर निकले॥
व्यूढेनैव सुघोरेण पूर्वद्वारात् स निर्ययौ।
गजयूथनिकाशेन बलेन महता वृतः॥३१॥
प्रहस्त की वह विशाल सेना हाथियों के समूह-सी अत्यन्त भयंकर जान पड़ती थी। उसकी व्यूह-रचना हो चुकी थी। उस व्यूहबद्ध सेना के साथ ही प्रहस्त लङ्का के पूर्वद्वार से निकला॥ ३१॥ ।
सागरप्रतिमौघेन वृतस्तेन बलेन सः।।
प्रहस्तो निर्ययौ क्रुद्धः कालान्तकयमोपमः॥३२॥
समुद्र के समान उस अपार सेना के साथ जब प्रहस्त बाहर निकला, उस समय वह क्रोध से भरे हुए प्रलयकाल के संहारकारी यमराज के समान जान पड़ता था॥
तस्य निर्याणघोषेण राक्षसानां च नर्दताम्।
लङ्कायां सर्वभूतानि विनेदुर्विकृतैः स्वरैः॥ ३३॥
उसके प्रस्थान करते समय जो भेरी आदि बाजों और गर्जते हुए राक्षसों का गम्भीर घोष हुआ, उससे भयभीत हो लङ्का के सब प्राणी विकृत स्वर में चीत्कार करने लगे॥ ३३॥
व्यभ्रमाकाशमाविश्य मांसशोणितभोजनाः।
मण्डलान्यपसव्यानि खगाश्चक्रू रथं प्रति॥३४॥
उस समय बिना बादल के आकाश में उड़कर रक्तमांस का भोजन करने वाले पक्षी मण्डल बनाकर प्रहस्त के रथ की दक्षिणावर्त परिक्रमा करने लगे। ३४॥
वमन्त्यः पावकज्वालाः शिवा घोरा ववाशिरे।
अन्तरिक्षात् पपातोल्का वायुश्च परुष ववौ॥३५॥
भयानक गीदड़ियाँ मुँह से आग की ज्वाला उगलती हुई अशुभसूचक बोली बोलने लगीं। आकाश से उल्कापात होने लगा और प्रचण्ड वायु चलने लगी। ३५॥
अन्योन्यमभिसंरब्धा ग्रहाश्च न चकाशिरे।
मेघाश्च खरनिर्घोषा रथस्योपरि रक्षसः॥ ३६॥
ववषू रुधिरं चास्य सिषिचुश्च पुरःसरान्।
केतुमूर्धनि गृध्रस्तु विलीनो दक्षिणामुखः ॥ ३७॥
नदन्नुभयतः पार्वं समग्रां श्रियमाहरत्।
ग्रह रोषपूर्वक आपस में युद्ध करने लगे, जिससे उनका प्रकाश मन्द पड़ गया तथा मेघ उस राक्षस के रथ के ऊपर गधों की-सी आवाज में गर्जना करने लगे रक्त बरसाने लगे और आगे चलने वाले सैनिकों को खींचने लगे। उसके ध्वज के ऊपर गीध दक्षिण की ओर मुँह करके आ बैठा। उसने दोनों ओर अपनी अशुभ बोली बोलकर उस राक्षसकी सारी शोभासम्पत्ति हर ली॥ ३६-३७ १/२ ।।
सारथेर्बहुशश्चास्य संग्राममवगाहतः॥३८॥
प्रतोदो न्यपतद्धस्तात् सूतस्य हयसादिनः।
संग्रामभूमि में प्रवेश करते समय घोड़े को काबू में रखने वाले उसके सारथि के हाथ से कई बार चाबुक गिर पड़ा॥ ३८ १/२॥
निर्याणश्रीश्च या च स्याद् भास्वरा च सुदुर्लभा॥३९॥
सा ननाश मुहूर्तेन समे च स्खलिता हयाः।
युद्ध के लिये निकलते समय प्रहस्त की जो परम दुर्लभ और प्रकाशमान शोभा थी, वह दो ही घड़ी में नष्ट हो गयी। उसके घोड़े समतल भूमि में भी लड़खड़ाकर गिर पड़े। ३९ १/२॥
प्रहस्तं तं हि निर्यान्तं प्रख्यातगुणपौरुषम्।
युधि नानाप्रहरणा कपिसेनाभ्यवर्तत॥४०॥
जिसके गुण और पौरुष विख्यात थे, वह प्रहस्त ज्यों ही युद्धभूमि में उपस्थित हुआ, त्यों ही शिला, वृक्ष आदि नाना प्रकार के प्रहार-साधनों से सम्पन्न वानरसेना उसका सामना करने के लिये आ गयी।
४०॥
अथ घोषः सुतुमुलो हरीणां समजायत।
वृक्षानारुजतां चैव गुर्वीर्वै गृह्णतां शिलाः॥४१॥
तदनन्तर वृक्षों को तोड़ते और भारी शिलाओं को उठाते हुए वानरों का अत्यन्त भयंकर कोलाहल वहाँ सब ओर छा गया॥४१॥
नदतां राक्षसानां च वानराणां च गर्जताम्।
उभे प्रमुदिते सैन्ये रक्षोगणवनौकसाम्॥४२॥
एक ओर राक्षस सिंहनाद कर रहे थे तो दूसरी ओर वानर गरज रहे थे। उन सबका तुमुल नाद वहाँ फैल गया। राक्षसों और वानरों की वे दोनों सेनाएँ हर्ष और उल्लास से भरी थीं॥ ४२ ॥
वेगितानां समर्थानामन्योन्यवधकाक्षिणाम्।
परस्परं चाह्वयतां निनादः श्रूयते महान्॥४३॥
अत्यन्त वेगशाली, समर्थ तथा एक-दूसरे के वध की इच्छा वाले योद्धा परस्पर ललकार रहे थे। उनका महान् कोलाहल सबको सुनायी देता था॥ ४३॥
ततः प्रहस्तः कपिराजवाहिनीमभिप्रतस्थे विजयाय दुर्मतिः।
विवृद्धवेगां च विवेश तां चमूं यथा मुमूर्षुः शलभो विभावसुम्॥४४॥
इसी समय दुर्बुद्धि प्रहस्त विजयकी अभिलाषा से वानरराज सुग्रीव की सेनाकी ओर बढ़ा और जैसे पतंग मरने के लिये आग पर टूट पड़ता है, उसी प्रकार वह बढ़े हुए वेगवाली उस वानरसेना में घुसने की चेष्टा करने लगा॥४४॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे सप्तपञ्चाशः सर्गः॥५७॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में सत्तावनवाँ सर्ग पूरा हुआ।५७॥
सर्ग-58
ततः प्रहस्तं निर्यान्तं दृष्ट्वा रणकृतोद्यमम्।
उवाच सस्मितं रामो विभीषणमरिंदमः॥१॥
(इसके पूर्व) प्रहस्त को युद्ध की तैयारी करके लङ्का से बाहर निकलते देख शत्रुसूदन श्रीरामचन्द्रजी ने विभीषण से मुसकराकर कहा- ॥१॥
क एष सुमहाकायो बलेन महता वृतः।
आगच्छति महावेगः किंरूपबलपौरुषः॥२॥
आचक्ष्व मे महाबाहो वीर्यवन्तं निशाचरम्।
‘महाबाहो! यह बड़े शरीर और महान् वेगवाला तथा बड़ी भारी सेना से घिरा हुआ कौन योद्धा आ रहा है? इसका रूप, बल और पौरुष कैसा है? इस पराक्रमी निशाचर का मुझे परिचय दो’ ॥ २ १/२॥
राघवस्य वचः श्रुत्वा प्रत्युवाच विभीषणः॥३॥
एष सेनापतिस्तस्य प्रहस्तो नाम राक्षसः।
लङ्कायां राक्षसेन्द्रस्य त्रिभागबलसंवृतः।
वीर्यवानस्त्रविच्छूरः सुप्रख्यातपराक्रमः॥४॥
श्रीरघुनाथजी का वचन सुनकर विभीषण ने इस प्रकार उत्तर दिया—’प्रभो! इस राक्षस का नाम प्रहस्त है। यह राक्षसराज रावण का सेनापति है और लङ्का की एक तिहाई सेना से घिरा हुआ है। इसका पराक्रम भलीभाँति विख्यात है। यह नाना प्रकार के अस्त्रशस्त्रोंका ज्ञाता, बल-विक्रम से सम्पन्न और शूरवीर है’॥३-४॥
ततः प्रहस्तं निर्यान्तं भीमं भीमपराक्रमम्।
गर्जन्तं सुमहाकायं राक्षसैरभिसंवृतम्॥५॥
ददर्श महती सेना वानराणां बलीयसाम्।
अभिसंजातघोषाणां प्रहस्तमभिगर्जताम्॥६॥
इसी समय महाबलवान् वानरों की विशाल सेना ने भी भयानक पराक्रमी, भीषण रूपधारी तथा महाकाय प्रहस्त को बड़े गर्जन-तर्जन के साथ लङ्का से बाहर निकलते देखा। वह बहुसंख्यक राक्षसों से घिरा हुआ था। उसे देखते ही वानरों के दल में भी महान् कोलाहल होने लगा और वे प्रहस्त की ओर देखदेखकर गर्जने लगे॥
खड्गशक्त्यृष्टिशूलाश्च बाणानि मुसलानि च।
गदाश्च परिघाः प्रासा विविधाश्च परश्वधाः॥७॥
धनूंषि च विचित्राणि राक्षसानां जयैषिणाम्।
प्रगृहीतान्यराजन्त वानरानभिधावताम्॥८॥
विजय की इच्छावाले राक्षस वानरों की ओर दौड़े। उनके हाथों में खड्ग, शक्ति, ऋष्टि, शूल, बाण, मूसल, गदा, परिघ, प्रास, नाना प्रकार के फरसे और विचित्र-विचित्र धनुष शोभा पा रहे थे। ७-८॥
जगृहुः पादपांश्चापि पुष्पितांस्तु गिरीस्तथा।
शिलाश्च विपुला दीर्घा योद्धुकामाः प्लवंगमाः॥९॥
तब वानरों ने भी युद्ध की इच्छा से खिले हुए वृक्ष, पर्वत तथा बड़े-बड़े पत्थर उठा लिये॥९॥
तेषामन्योन्यमासाद्य संग्रामः सुमहानभूत्।
बहूनामश्मवृष्टिं च शरवर्षं च वर्षताम्॥१०॥
फिर दोनों पक्षों के बहुसंख्यक वीरों में पत्थरों और बाणों की वर्षा के साथ-साथ आपस में बड़ा भारी संग्राम छिड़ गया॥१०॥
बहवो राक्षसा युद्धे बहून् वानरपुङ्गवान्।
वानरा राक्षसांश्चापि निजघ्नुर्बहवो बहून्॥११॥
उस युद्धस्थल में बहुत-से राक्षसों ने बहुतेरे वानरों का और बहुसंख्यक वानरों ने बहुत-से राक्षसों का संहार कर डाला॥११॥
शूलैः प्रमथिताः केचित् केचित् तु परमायुधैः।
परिघुराहताः केचित् केचिच्छिन्नाः परश्वधैः॥१२॥
वानरों में से कोई शूलों से और कोई चक्रों से मथ डाले गये। कितने ही परिघों की मार से आहत हो गये और कितनों के फरसों से टुकड़े-टुकड़े कर डाले गये॥
निरुच्छ्वासाः पुनः केचित् पतिता जगतीतले।
विभिन्नहृदयाः केचिदिषुसंधानसाधिताः॥१३॥
कितने ही योद्धा साँसरहित हो पृथ्वी पर गिर पड़े और कितने ही बाणों के लक्ष्य बन गये, जिससे उनके हृदय विदीर्ण हो गये॥१३॥
केचिद् द्विधा कृताः खड्गैः स्फुरन्तः पतिता भुवि।
वानरा राक्षसैः शूरैः पार्श्वतश्च विदारिताः॥ १४॥
कितने ही वानर तलवारों की मार से दो टूक होकर पृथ्वी पर गिर पड़े और तड़फड़ाने लगे। कितने ही शूरवीर राक्षसों ने वानरों की पसलियाँ फाड़ डालीं। १४॥
वानरैश्चापि संक्रुद्धै राक्षसौघाः समन्ततः।
पादपैर्गिरिशृङ्गैश्च सम्पिष्टा वसुधातले ॥१५॥
इसी तरह वानरों ने भी अत्यन्त कुपित हो वृक्षों और पर्वत-शिखरों द्वारा सब ओर भूतल पर झुंड-के-झुंड राक्षसों को पीस डाला॥ १५॥
वज्रस्पर्शतलैर्हस्तैर्मुष्टिभिश्च हता भृशम्।
वमन् शोणितमास्येभ्यो विशीर्णदशनेक्षणाः॥१६॥
वानरों के वज्रतुल्य कठोर थप्पड़ों और मुक्कों से भलीभाँति पीटे गये राक्षस मुँह से रक्त वमन करने लगे। उनके दाँत और नेत्र छिन्न-भिन्न होकर बिखर गये॥ १६॥
आर्तस्वनं च स्वनतां सिंहनादं च नर्दताम्।
बभूव तुमुलः शब्दो हरीणां रक्षसामपि॥१७॥
कोई आर्तनाद करते तो कोई सिंहों के समान दहाड़ते थे। इस प्रकार वानरों और राक्षसों का भयंकर कोलाहल वहाँ सब ओर गूंज उठा॥ १७॥
वानरा राक्षसाः क्रुद्धा वीरमार्गमनुव्रताः।
विवृत्तवदनाः क्रूराश्चक्रुः कर्माण्यभीतवत्॥१८॥
क्रोध से भरे हुए वानर और राक्षस वीरोचितमार्ग का अनुसरण करके युद्ध में पीठ नहीं दिखाते थे। वे मुँह बा-बाकर निर्भय के समान क्रूरतापूर्ण कर्म करते थे। १८॥
नरान्तकः कुम्भहनुमहानादः समुन्नतः।
एते प्रहस्तसचिवाः सर्वे जघ्नुर्वनौकसः॥१९॥
नरान्तक, कुम्भहनु, महानाद और समुन्नत—ये प्रहस्त के सारे सचिव वानरों का वध करने लगे॥ १९॥
तेषां निपततां शीघ्रं निजतां चापि वानरान्।
द्विविदो गिरिशृङ्गेण जघानैकं नरान्तकम्॥२०॥
शीघ्रतापूर्वक आक्रमण करते और वानरों को मारते हुए प्रहस्त के सचिवों में से एक को, जिसका नाम नरान्तक था, द्विविद ने एक पर्वत के शिखर से मार डाला॥
दुर्मुखः पुनरुत्थाय कपिः सविपुलद्रुमम्।
राक्षसं क्षिप्रहस्तं तु समुन्नतमपोथयत्॥२१॥
फिर दुर्मुख ने एक विशाल वृक्ष लिये उठकर शीघ्रतापूर्वक हाथ चलाने वाले राक्षस समुन्नत को कुचल डाला॥
जाम्बवांस्तु सुसंक्रुद्धः प्रगृह्य महतीं शिलाम्।
पातयामास तेजस्वी महानादस्य वक्षसि ॥२२॥
तत्पश्चात् अत्यन्त कुपित हुए तेजस्वी जाम्बवान् ने एक बड़ी भारी शिला उठा ली और उसे महानाद की छाती पर दे मारा॥ २२॥
अथ कुम्भहनुस्तत्र तारेणासाद्य वीर्यवान्।
वृक्षेण महता सद्यः प्राणान् संत्याजयद् रणे॥२३॥
बाकी रहा पराक्रमी कुम्भहनु। वह तार नामक वानर से भिड़ा और अन्त में एक विशाल वृक्ष की चपेट में आकर उसे भी रणभूमि में अपने प्राणों से हाथ धोने पड़े॥
अमृष्यमाणस्तत्कर्म प्रहस्तो रथमास्थितः।
चकार कदनं घोरं धनुष्पाणिर्वनौकसाम्॥२४॥
रथ पर बैठे हुए प्रहस्त से वानरों का यह अद्भुत पराक्रम नहीं सहा गया। उसने हाथ में धनुष लेकर वानरों का घोर संहार आरम्भ किया॥२४॥
आवर्त इव संजज्ञे सेनयोरुभयोस्तदा।
क्षुभितस्याप्रमेयस्य सागरस्येव निःस्वनः॥ २५॥
उस समय दोनों सेनाएँ जल के भँवर की भाँति चक्कर काट रही थीं। विक्षुब्ध अपार महासागर की गर्जना के समान उनकी गर्जना सुनायी दे रही थी॥२५॥
महता हि शरौघेण राक्षसो रणदुर्मदः।
अर्दयामास संक्रुद्धो वानरान् परमाहवे॥२६॥
अत्यन्त क्रोध से भरे हुए रणदुर्मद राक्षस प्रहस्त ने अपने बाण-समूहों द्वारा उस महासमर में वानरों को पीड़ित करना आरम्भ किया॥२६॥
वानराणां शरीरैस्तु राक्षसानां च मेदिनी।
बभूवातिचिता घोरैः पर्वतैरिव संवृता॥२७॥
पृथ्वी पर वानरों और राक्षसों की लाशों के ढेर लग गये। उनसे आच्छादित हुई रणभूमि भयानक पर्वतों से ढकी हुई-सी जान पड़ती थी॥ २७॥
सा मही रुधिरौघेण प्रच्छन्ना सम्प्रकाशते।
संछन्ना माधवे मासि पलाशैरिव पुष्पितैः॥२८॥
रक्त के प्रवाह से आच्छादित हुई वह युद्धभूमि वैशाख-मास में खिले हुए पलाश-वृक्षों से ढकी हुई वन्य भूमि-सी सुशोभित होती थी॥ २८ ॥
हतवीरौघवप्रां तु भग्नायुधमहाद्रुमाम्।
शोणितौघमहातोयां यमसागरगामिनीम्॥२९॥
यकृत् प्लीहमहापङ्कां विनिकीर्णान्त्रशैवलाम्।
भिन्नकायशिरोमीनामङ्गावयवशादलाम्॥३०॥
गृध्रहंसवराकी) कङ्कसारससेविताम्।
मेदःफेनसमाकीर्णामार्तस्तनितनिःस्वनाम्॥३१॥
तां कापुरुषदुस्तारां युद्धभूमिमयीं नदीम्।
नदीमिव घनापाये हंससारससेविताम्॥३२॥
राक्षसाः कपिमुख्यास्ते तेरुस्तां दुस्तरां नदीम्।
यथा पद्मरजोध्वस्तां नलिनी गजयूथपाः॥३३॥
मारे गये वीरों की लाशें ही जिसके दोनों तट थे। रक्त का प्रवाह ही जिसकी महान् जलराशि थी। टूटे-फूटे अस्त्र-शस्त्र ही जिसके तटवर्ती विशाल वृक्षों के समान जान पड़ते थे। जो यमलोकरूपी समुद्र से मिली हुई थी। सैनिकों के यकृत् और प्लीहा (हृदय के दाहिने और बायें भाग) जिसके महान् पंक थे। निकली हुई आँतें जहाँ सेवार का काम देती थीं। कटे हुए सिर और धड़ जहाँ मत्स्य-से प्रतीत होते थे। शरीर के छोटे-छोटे अवयव एवं केश जिसमें घास का भ्रम उत्पन्न करते थे। जहाँ गीध ही हंस बनकर बैठे थे। कङ्करूपी सारस जिसका सेवन करते थे। मेदे ही फेन बनकर जहाँ सब ओर फैले थे। पीड़ितों की कराह जिसकी कलकल ध्वनि थी और कायरों के लिये जिसे पार करना अत्यन्त कठिन था,उस युद्ध भूमिरूपिणी नदी को प्रवाहित करके राक्षस और श्रेष्ठ वानर वर्षा के अन्त में हंसों और सारसों से सेवित सरिता की भाँति उस दुस्तर नदी को उसी तरह पार कर रहे थे, जैसे गजयूथपति कमलों के पराग से आच्छादित किसी पुष्करिणी को पार करते हैं॥ २९– ३३॥
ततः सृजन्तं बाणौघान् प्रहस्तं स्यन्दने स्थितम्।
ददर्श तरसा नीलो विधमन्तं प्लवंगमान्॥३४॥
तदनन्तर नील ने देखा, रथ पर बैठा हुआ प्रहस्त बाणसमूहों की वर्षा करके वेगपूर्वक वानरों का संहार कर रहा है॥ ३४॥
उद्धृत इव वायुः खे महदभ्रबलं बलात्।
समीक्ष्याभिद्रुतं युद्धे प्रहस्तो वाहिनीपतिः॥ ३५॥
रथेनादित्यवर्णेन नीलमेवाभिदुद्रुवे।
तब जैसे उठी हुई प्रचण्ड वायु आकाश में महान् मेघों की घटा को छिन्न-भिन्न करके उड़ा देती है, उसी प्रकार नील भी बलपूर्वक राक्षस-सेना का संहार करने लगे। इससे उस युद्धस्थल में राक्षसी-सेना भाग खड़ी हुई। सेनापति प्रहस्त ने जब अपनी सेना की ऐसी दुरवस्था देखी, तब उसने सूर्यतुल्य तेजस्वी रथ के द्वारा नील पर ही धावा किया॥ ३५ १/२॥
स धनुर्धन्विनां श्रेष्ठो विकृष्य परमाहवे॥३६॥
नीलाय व्यसृजद् बाणान् प्रहस्तो वाहिनीपतिः।
धनुषधारियों में श्रेष्ठ और निशाचरों की सेना के नायक प्रहस्त ने उस महासमर में अपने धनुष को खींचकर नील पर बाणों की वर्षा आरम्भ कर दी॥ ३६ १/२ ॥
ते प्राप्य विशिखा नीलं विनिर्भिद्य समाहिताः॥३७॥
महीं जग्मुर्महावेगा रोषिता इव पन्नगाः।
रोष से भरे हुए सो के समान वे महान् वेगशाली बाण नील तक पहुँचकर उन्हें विदीर्ण करके बड़ी सावधानी के साथ धरती में समा गये॥ ३७ १/२ ॥
नीलः शरैरभिहतो निशितैर्व्वलनोपमैः॥ ३८॥
स तं परमदुर्धर्षमापतन्तं महाकपिः।
प्रहस्तं ताडयामास वृक्षमुत्पाट्य वीर्यवान्॥३९॥
प्रहस्त के पैने बाण प्रज्वलित अग्नि के समान जान पड़ते थे। उनकी चोट से नील बहुत घायल हो गये। इस तरह उस परम दुर्जय राक्षस प्रहस्त को अपने ऊपर आक्रमण करते देख बल-विक्रमशाली महाकपि नील ने एक वृक्ष उखाड़कर उसी के द्वारा उस पर आघात किया॥
स तेनाभिहतः क्रुद्धो नर्दन् राक्षसपुंगवः।
ववर्ष शरवर्षाणि प्लवंगानां चमूपतौ॥४०॥
नील की चोट खाकर कुपित हुआ राक्षसशिरोमणि प्रहस्त बड़े जोर से गर्जता हुआ उन वानर-सेनापतिपर बाणों की वर्षा करने लगा॥ ४०॥
तस्य बाणगणानेव राक्षसस्य दुरात्मनः।
अपारयन् वारयितुं प्रत्यगृह्णान्निमीलितः।
यथैव गोवृषो वर्ष शारदं शीघ्रमागतम्॥४१॥
एवमेव प्रहस्तस्य शरवर्षान् दुरासदान्।
निमीलिताक्षः सहसा नीलः सेहे दुरासदान्॥४२॥
उस दुरात्मा राक्षस के बाण-समूहों का निवारण करने में समर्थ न हो सकने पर नील आँख बंद करके उन सब बाणों को अपने अंगों पर ही ग्रहण करने लगे। जैसे साँड़ सहसा आयी हुई शरद्-ऋतु की वर्षा को चुपचाप अपने शरीर पर ही सह लेता है, उसी प्रकार प्रहस्त की उस दुःसह बाणवर्षा को नील चुपचाप नेत्र बंद करके सहन करते रहे ॥ ४१-४२॥
रोषितः शरवर्षेण सालेन महता महान्।
प्रजघान हयान् नीलः प्रहस्तस्य महाबलः॥४३॥
प्रहस्त की बाणवर्षा से कुपित हो महाबली महाकपि नील ने एक विशाल सालवृक्ष के द्वारा उसके घोड़ों को मार डाला॥४३॥
ततो रोषपरीतात्मा धनुस्तस्य दुरात्मनः।
बभञ्ज तरसा नीलो ननाद च पुनः पुनः॥४४॥
तत्पश्चात् रोष से भरे हुए नील ने उस दुरात्मा के धनुष को भी वेगपूर्वक तोड़ दिया और बारंबार वे गर्जना करने लगे॥४४॥
विधनुः स कृतस्तेन प्रहस्तो वाहिनीपतिः।
प्रगृह्य मुसलं घोरं स्यन्दनादवपुप्लुवे॥४५॥
नील के द्वारा धनुषरहित किया गया सेनापति प्रहस्त एक भयानक मूसल हाथ में लेकर अपने रथ से कूद पड़ा॥
तावुभौ वाहिनीमुख्यौ जातवैरौ तरस्विनौ।
स्थितौ क्षतजसिक्ताङ्गौ प्रभिन्नाविव कुञ्जरौ॥४६॥
वे दोनों वीर अपनी-अपनी सेना के प्रधान थे। दोनों ही एक-दूसरे के वैरी और वेगशाली थे। वे मद की धारा बहाने वाले दो गजराजों के समान खून से नहा उठे थे॥
उल्लिखन्तौ सुतीक्ष्णाभिर्दष्ट्राभिरितरेतरम्।
सिंहशार्दूलसदृशौ सिंहशार्दूलचेष्टितौ॥४७॥
दोनों ही अपनी तीखी दाढ़ों से काट-काटकर एक-दूसरे के अंगों को घायल किये देते थे। वे दोनों सिंह और बाघ के समान शक्तिशाली और उन्हीं के समान विजय के लिये सचेष्ट थे॥४७॥
विक्रान्तविजयौ वीरौ समरेष्वनिवर्तिनौ।
काङ्क्षमाणौ यशः प्राप्तुं वृत्रवासवयोरिव॥४८॥
दोनों वीर पराक्रमी, विजयी और युद्ध में कभी पीठ न दिखाने वाले थे तथा वृत्रासुर और इन्द्र के समान युद्ध में यश पाने की अभिलाषा रखते थे॥४८॥
आजघान तदा नीलं ललाटे मुसलेन सः।
प्रहस्तः परमायत्तस्ततः सुस्राव शोणितम्॥४९॥
उस समय परम उद्योगी प्रहस्तने नील के ललाट में मूसल से आघात किया। इससे उनके ललाट से रक्त की धारा बह चली॥४९॥
ततः शोणितदिग्धाङ्गः प्रगृह्य च महातरुम्।
प्रहस्तस्योरसि क्रुद्धो विससर्ज महाकपिः॥५०॥
उनके सारे अंग रक्त से भीग गये। तब क्रोध से भरे हुए महाकपि नील ने एक विशाल वृक्ष उठाकर प्रहस्त की छाती पर दे मारा॥ ५० ॥
तमचिन्त्यप्रहारं स प्रगृह्य मुसलं महत्।
अभिदुद्राव बलिनं बलान्नीलं प्लवङ्गमम्॥५१॥
उस प्रहार की कोई परवा न करके प्रहस्त महान् मूसल हाथ में लिये बलवान् वानर नील की ओर बड़े वेग से दौड़ा॥५१॥
तमुग्रवेगं संरब्धमापतन्तं महाकपिः।
ततः सम्प्रेक्ष्य जग्राह महावेगो महाशिलाम्॥५२॥
उस भयंकर वेगशाली राक्षस को रोष से भरकर आक्रमण करते देख महान् वेगशाली महाकपि नील ने एक बड़ी भारी शिला हाथ में ले ली॥५२॥
तस्य युद्धाभिकामस्य मृधे मुसलयोधिनः।
प्रहस्तस्य शिलां नीलो मूर्ध्नि तूर्णमपातयत्॥५३॥
उस शिला को नील ने रणभूमि में संग्राम की इच्छावाले मूसलयोधी निशाचर प्रहस्त के मस्तक पर तत्काल दे मारा॥
नीलेन कपिमुख्येन विमुक्ता महती शिला।
बिभेद बहुधा घोरा प्रहस्तस्य शिरस्तदा॥५४॥
कपिप्रवर नील के द्वारा चलायी गयी उस भयंकर एवं विशाल शिला ने प्रहस्त के मस्तक को कुचलकर उसके कई टुकड़े कर डाले॥ ५४॥
स गतासुर्गतश्रीको गतसत्त्वो गतेन्द्रियः।
पपात सहसा भूमौ छिन्नमूल इव द्रुमः॥५५॥
उसके प्राण-पखेरू उड़ गये। उसकी कान्ति, उसका बल और उसकी सारी इन्द्रियाँ भी चली गयीं। वह राक्षस जड़ से कटे हुए वृक्ष की भाँति सहसा पृथ्वी पर गिर पड़ा॥ ५५ ॥
विभिन्नशिरसस्तस्य बहु सुस्राव शोणितम्।
शरीरादपि सुस्राव गिरेः प्रस्रवणं यथा॥५६॥
उसके छिन्न-भिन्न हुए मस्तक से और शरीर से भी बहुत खून गिरने लगा, मानो पर्वत से पानी का झरना झर रहा हो॥५६॥
हते प्रहस्ते नीलेन तदकम्प्यं महाबलम्।
राक्षसानामहृष्टानां लङ्कामभिजगाम ह॥५७॥
नील के द्वारा प्रहस्त के मारे जाने पर दुःखी हुए राक्षसों की वह अकम्पनीय विशाल सेना लंका को लौट गयी॥ ५७॥
न शेकुः समवस्थातुं निहते वाहिनीपतौ।
सेतुबन्धं समासाद्य विशीर्णं सलिलं यथा॥५८॥
सेनापति के मारे जाने पर वह सेना ठहर न सकी। जैसे बाँध टूट जाने पर नदी का पानी रुक नहीं पाता॥
हते तस्मिंश्चमूमुख्ये राक्षसास्ते निरुद्यमाः।
रक्षःपतिगृहं गत्वा ध्यानमूकत्वमागताः॥५९॥
प्राप्ताः शोकार्णवं तीव्र विसंज्ञा इव तेऽभवन्॥६०॥
सेनानायक के मारे जाने से वे सारे राक्षस अपना युद्धविषयक उत्साह खो बैठे और राक्षसराज रावण के भवन में जाकर चिन्ता के कारण चुपचाप खड़े हो गये। तीव्र शोक-समुद्र में डूब जाने के कारण वे सब-के-सब अचेत-से हो गये थे॥ ५९-६० ॥
ततस्तु नीलो विजयी महाबलः प्रशस्यमानः सुकृतेन कर्मणा।
समेत्य रामेण सलक्ष्मणेन प्रहृष्टरूपस्तु बभूव यूथपः॥६१॥
तदनन्तर विजयी सेनापति महाबली नील अपने इस महान् कर्म के कारण प्रशंसित होते हुए श्रीराम और लक्ष्मण से आकर मिले और बड़े हर्ष का अनुभव करने लगे॥६१॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डेऽष्टपञ्चाशः सर्गः॥५८॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में अट्ठावनवाँ सर्ग पूरा हुआ।५८॥
सर्ग-59
तस्मिन् हते राक्षससैन्यपाले प्लवंगमानामृषभेण युद्धे।
भीमायुधं सागरवेगतुल्यं विदुद्रुवे राक्षसराजसैन्यम्॥१॥
वानरश्रेष्ठ नील के द्वारा युद्धस्थल में उस राक्षससेनापति प्रहस्त के मारे जाने पर समुद्र के समान वेगशालिनी और भयानक आयुधों से युक्त वह राक्षसराज की सेना भाग चली॥१॥
गत्वा तु रक्षोधिपतेः शशंसुः सेनापतिं पावकसूनुशस्तम्।
तच्चापि तेषां वचनं निशम्य रक्षोधिपः क्रोधवशं जगाम॥२॥
राक्षसों ने निशाचरराज रावण के पास जाकर अग्निपुत्र नील के हाथ से प्रहस्त के मारे जाने का समाचार सुनाया। उनकी वह बात सुनकर राक्षसराज रावण को बड़ा क्रोध हुआ॥२॥
संख्ये प्रहस्तं निहतं निशम्य क्रोधार्दितः शोकपरीतचेताः।
उवाच तान् राक्षसयूथमुख्यानिन्द्रो यथा निर्जरयूथमुख्यान्॥३॥
‘युद्धस्थल में प्रहस्त मारा गया’ यह सुनते ही वह क्रोध से तमतमा उठा; किंतु थोड़ी ही देर में उसका चित्त उसके लिये शोक से व्याकुल हो गया। अतः वह मुख्य-मुख्य देवताओंसे बातचीत करने वाले इन्द्र की भाँति राक्षससेना के मुख्य अधिकारियों से बोला – ॥३॥
नावज्ञा रिपवे कार्या यैरिन्द्रबलसादनः।
सूदितः सैन्यपालो मे सानुयात्रः सकुञ्जरः॥४॥
‘शत्रुओं को नगण्य समझकर उनकी अवहेलना नहीं करनी चाहिये। मैं जिन्हें बहुत छोटा समझता था, उन्हीं शत्रुओं ने मेरे उस सेनापति को सेवकों और हाथियोंसहित मार गिराया, जो इन्द्र की सेना का भी संहार करने में समर्थ था॥४॥
सोऽहं रिपुविनाशाय विजयायाविचारयन्।
स्वयमेव गमिष्यामि रणशीर्षं तदद्भुतम्॥५॥
‘अब मैं शत्रुओं के संहार और अपनी विजय के लिये बिना कोई विचार किये स्वयं ही उस अद्भुत युद्ध के मुहाने पर जाऊँगा॥ ५॥
अद्य तद् वानरानीकं रामं च सहलक्ष्मणम्।
निर्दहिष्यामि बाणौघैर्वनं दीप्तैरिवाग्निभिः।
अद्य संतर्पयिष्यामि पृथिवीं कपिशोणितैः॥६॥
‘जैसे प्रज्वलित आग वन को जला देती है, उसी तरह आज अपने बाणसमूहों से वानरों की सेना तथा लक्ष्मणसहित श्रीराम को मैं भस्म कर डालूँगा? आज वानरों के रक्त से मैं इस पृथ्वी को तृप्त करूँगा’॥६॥
स एवमुक्त्वा ज्वलनप्रकाशं रथं तुरंगोत्तमराजियुक्तम्।
प्रकाशमानं वपुषा ज्वलन्तं समारुरोहामरराजशत्रुः ॥७॥
ऐसा कहकर वह देवराज का शत्रु रावण अग्नि के समान प्रकाशमान रथ पर सवार हुआ। उसके रथ में उत्तम घोड़ों के समूह जुते हुए थे। वह अपने शरीर से भी प्रज्वलित अग्नि के समान उद्भासित हो रहा था।
स शङ्खभेरीपणवप्रणादैरास्फोटितक्ष्वेडितसिंहनादैः।
पुण्यैः स्तवैश्चापि सुपूज्यमान स्तदा ययौ राक्षसराजमुख्यः॥८॥
उसके प्रस्थान करते समय शङ्क, भेरी और पणव आदि बाजे बजने लगे। योद्धालोग ताल ठोकने, गर्जने और सिंहनाद करने लगे। वन्दीजन पवित्र स्तुतियों द्वारा राक्षसराज शिरोमणि रावण की भलीभाँति समाराधना करने लगे। इस प्रकार उसने यात्रा की॥८॥
स शैलजीमूतनिकाशरूपैमांसाशनैः पावकदीप्तनेत्रैः।
बभौ वृतो राक्षसराजमुख्यो भूतैर्वृतो रुद्र इवामरेशः॥९॥
पर्वत और मेघों के समान काले एवं विशालरूपवाले मांसाहारी राक्षसों से, जिनके नेत्र प्रज्वलित अग्नि के समान उद्दीप्त हो रहे थे, घिरा हुआ राक्षस-राजाधिराज रावण भूतगणों से घिरे हुए देवेश्वर रुद्र के समान शोभा पाता था॥९॥
ततो नगर्याः सहसा महौजा निष्क्रम्य तद् वानरसैन्यमुग्रम्।
महार्णवाभ्रस्तनितं ददर्श समुद्यतं पादपशैलहस्तम्॥१०॥
महातेजस्वी रावण ने लङ्कापुरी से सहसा निकलकर महासागर और मेघों के समान गर्जना करने वाली उस भयंकर वानर-सेना को देखा, जो हाथों में पर्वत-शिखर एवं वृक्ष लिये युद्ध के लिये तैयार थी॥ १० ॥
तद् राक्षसानीकमतिप्रचण्डमालोक्य रामो भुजगेन्द्रबाहुः।
विभीषणं शस्त्रभृतां वरिष्ठमुवाच सेनानुगतः पृथुश्रीः॥११॥
उस अत्यन्त प्रचण्ड राक्षससेना को देखकर नागराज शेष के समान भुजावाले, वानर-सेना से घिरे हुए तथा पुष्ट शोभा-सम्पत्ति से युक्त श्रीरामचन्द्रजी ने शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ विभीषण से पूछा— ॥११॥
नानापताकाध्वजछत्रजुष्टं प्रासासिशूलायुधशस्त्रजुष्टम्।
कस्येदमक्षोभ्यमभीरुजुष्टं सैन्यं महेन्द्रोपमनागजुष्टम्॥१२॥
‘जो नाना प्रकार की ध्वजा-पताकाओं और छत्रों से सुशोभित, प्रास, खड्ग और शूल आदि अस्त्रशस्त्रों से सम्पन्न, अजेय, निडर योद्धाओं से सेवित और महेन्द्रपर्वत-जैसे विशालकाय हाथियों से भरी हुई है, ऐसी यह सेना किसकी है?’ ॥ १२ ॥
ततस्तु रामस्य निशम्य वाक्यं विभीषणः शक्रसमानवीर्यः।
शशंस रामस्य बलप्रवेकं महात्मनां राक्षसपुंगवानाम्॥१३॥
इन्द्र के समान बलशाली विभीषण श्रीराम की उपर्युक्त बात सुनकर महामना राक्षसशिरोमणियों के बल एवं सैनिकशक्ति का परिचय देते हुए उनसे बोले – ॥१३॥
योऽसौ गजस्कन्धगतो महात्मा नवोदितार्कोपमताम्रवक्त्रः।
संकम्पयन्नागशिरोऽभ्युपैति ह्यकम्पनं त्वेनमवेहि राजन्॥१४॥
‘राजन्! यह जो महामनस्वी वीर हाथी की पीठ पर बैठा है, जिसका मुख नवोदित सूर्य के समान लाल रंग का है तथा जो अपने भार से हाथी के मस्तक में कम्पन उत्पन्न करता हुआ इधर आ रहा है, इसे आप अकम्पन* समझें॥ १४॥
* यह अकम्पन हनुमान जी के द्वारा मारे गये अकम्पन से भिन्न है।
योऽसौ रथस्थो मृगराजकेतुधुंन्वन् धनुः शक्रधनुःप्रकाशम्।
करीव भात्युग्रविवृत्तदंष्ट्रः स इन्द्रजिन्नाम वरप्रधानः॥१५॥
‘वह जो रथ पर चढ़ा हुआ है, जिसकी ध्वजा पर सिंह का चिह्न है, जिसके दाँत हाथी के समान उग्र और बाहर निकले हुए हैं तथा जो इन्द्रधनुष के समान कान्तिमान् धनुष हिलाता हुआ आ रहा है, उसका नाम इन्द्रजित् है। वह वरदान के प्रभाव से बड़ा प्रबल हो गया है॥ १५॥
यश्चैष विन्ध्यास्तमहेन्द्रकल्पो धन्वी रथस्थोऽतिरथोऽतिवीरः।
विस्फारयंश्चापमतुल्यमानं नाम्नातिकायोऽतिविवृद्धकायः॥१६॥
‘यह जो विन्ध्याचल, अस्ताचल और महेन्द्रगिरि के समान विशालकाय, अतिरथी एवं अतिशय वीर धनुष लिये रथ पर बैठा है तथा अपने अनुपम धनुष को बारंबार खींच रहा है, इसका नाम अतिकाय है। इसकी काया बहुत बड़ी है॥ १६॥
योऽसौ नवार्कोदितताम्रचक्षुरारुह्य घण्टानिनदप्रणादम्।
गजं खरं गर्जति वै महात्मा महोदरो नाम स एष वीरः॥ १७॥
“जिसके नेत्र प्रातःकाल उदित हुए सूर्य के समान लाल हैं तथा जिसकी आवाज घण्टा की ध्वनि से भी उत्कृष्ट है, ऐसे क्रूर स्वभाव वाले गजराज पर आरूढ़ होकर जो जोर-जोर से गर्जना कर रहा है, वह महामनस्वी वीर महोदर नाम से प्रसिद्ध है॥१७॥
योऽसौ हयं काञ्चनचित्रभाण्डमारुह्य संध्याभ्रगिरिप्रकाशम्।
प्रासं समुद्यम्य मरीचिनद्धं पिशाच एषोऽशनितुल्यवेगः॥१८॥
‘जो सायंकालीन मेघ से युक्त पर्वत की-सी आभावाले और सुवर्णमय आभूषणों से विभूषित घोड़े पर चढ़कर चमकीले प्रास (भाले)-को हाथ में लिये इधर आ रहा है, इसका नाम पिशाच है। यह वज्र के समान वेगशाली योद्धा है॥ १८॥
यश्चैष शूलं निशितं प्रगृह्य विद्युत्प्रभं किंकरवज्रवेगम्।
वृषेन्द्रमास्थाय शशिप्रकाशमायाति योऽसौ त्रिशिरा यशस्वी॥१९॥
‘जिसने वज्र के वेग को भी अपना दास बना लिया है और जिससे बिजली की-सी प्रभा छिटकती रहती है, ऐसे तीखे त्रिशूल को हाथ में लिये जो यह चन्द्रमा के समान श्वेत कान्तिवाले साँड़ पर चढ़कर युद्धभूमि में आ रहा है, यह यशस्वी वीर त्रिशिरा* है॥ १९॥
* यह त्रिशिरा जनस्थान में मारे गये त्रिशिरा से भिन्न है। यह रावण का पुत्र है और वह भाई था।
असौ च जीमूतनिकाशरूपः कुम्भः पृथुव्यूढसुजातवक्षाः।
समाहितः पन्नगराजकेतुविस्फारयन् याति धनुर्विधुन्वन्॥२०॥
“जिसका रूप मेघ के समान काला है, जिसकी छाती उभरी हुई, चौड़ी और सुन्दर है, जिसकी ध्वजा पर नागराज वासुकि का चिह्न बना हुआ है तथा जो एकाग्रचित्त हो अपने धनुष को हिलाता और खींचता आ रहा है, वह कुम्भ नामक योद्धा है॥ २० ॥
यश्चैष जाम्बूनदवज्रजुष्टं दीप्तं सधूमं परिघं प्रगृह्य।
आयाति रक्षोबलकेतुभूतो योऽसौ निकुम्भोऽद्भुतघोरकर्मा॥२१॥
‘जो सुवर्ण और वज्र से जटित होने के कारण दीप्तिमान् तथा इन्द्रनीलमणि से मण्डित होने के कारण धूमयुक्त अग्नि-सा प्रकाशित होता है, ऐसे परिघ को हाथ में लेकर जो राक्षससेना की ध्वजा के समान आ रहा है, उसका नाम निकुम्भ है। उसका पराक्रम घोर एवं अद्भुत है॥ २१॥
यश्चैष चापासिशरौघजुष्टं पताकिनं पावकदीप्तरूपम्।
रथं समास्थाय विभात्युदग्रो नरान्तकोऽसौ नगशृङ्गयोधी॥२२॥
‘यह जो धनुष, खड्ग और बाणसमूह से भरे हुए, ध्वजा-पताका से अलंकृत तथा प्रज्वलित अग्नि के समान देदीप्यमान रथ पर आरूढ़ हो अतिशय शोभा पा रहा है, वह ऊँचे कद का योद्धा नरान्तक* है। वह पहाड़ों की चोटियों से युद्ध करता है॥ २२ ॥
* यह नरान्तक रावण का पुत्र है।
यश्चैष नानाविधघोररूपैाघ्रोष्टनागेन्द्रमृगाश्ववक्त्रैः ।
भूतैर्वृतो भाति विवृत्तनेत्रैर्योऽसौ सुराणामपि दर्पहन्ता॥२३॥
यत्रैतदिन्दुप्रतिमं विभाति छत्रं सितं सूक्ष्मशलाकमग्र्यम्।
अत्रैष रक्षोधिपतिर्महात्मा भूतैर्वृतो रुद्र इवावभाति॥२४॥
‘यह जो व्याघ्र, ऊँट, हाथी, हिरन और घोड़े के-से मुँहवाले, चढ़ी हुई आँखवाले तथा अनेक प्रकार के भयंकर रूपवाले भूतों से घिरा हुआ है, जो देवताओं का भी दर्प दलन करने वाला है तथा जिसके ऊपर पूर्ण चन्द्रमा के समान श्वेत एवं पतली कमानी वाला सुन्दर छत्र शोभा पाता है, वही यह राक्षसराज महामना रावण है, जो भूतों से घिरे हुए रुद्रदेव के समान सुशोभित होता है॥ २३-२४॥
असौ किरीटी चलकुण्डलास्यो नगेन्द्रविन्ध्योपमभीमकायः।
महेन्द्रवैवस्वतदर्पहन्ता रक्षोधिपः सूर्य इवावभाति॥२५॥
‘यह सिर पर मुकुट धारण किये है। इसका मुख कानों में हिलते हुए कुण्डलों से अलंकृत है। इसका शरीर गिरिराज हिमालय और विन्ध्याचल के समान विशाल एवं भयंकर है तथा यह इन्द्र और यमराज के भी घमंड को चूर करने वाला है। देखिये, यह राक्षसराज साक्षात् सूर्य के समान प्रकाशित हो रहा है’॥ २५॥
प्रत्युवाच ततो रामो विभीषणमरिंदमः।
अहो दीप्तमहातेजा रावणो राक्षसेश्वरः॥२६॥
तब शत्रुदमन श्रीराम ने विभीषण को इस प्रकार उत्तर दिया—’अहो! राक्षसराज रावण का तेज तो बहुत ही बढ़ा-चढ़ा और देदीप्यमान है॥ २६ ॥
आदित्य इव दुष्प्रेक्ष्यो रश्मिभिर्भाति रावणः।
न व्यक्तं लक्षये ह्यस्य रूपं तेजःसमावृतम्॥२७॥
‘रावण अपनी प्रभा से सूर्य की ही भाँति ऐसी शोभा पा रहा है कि इसकी ओर देखना कठिन हो रहा है।तेजोमण्डल से व्याप्त होने के कारण इसका रूप मुझे स्पष्ट नहीं दिखायी देता॥२७॥
देवदानववीराणां वपुर्नैवंविधं भवेत्।
यादृशं राक्षसेन्द्रस्य वपुरेतद् विराजते॥२८॥
‘इस राक्षसराज का शरीर जैसा सुशोभित हो रहा है, ऐसा तो देवता और दानव वीरों का भी नहीं होगा।
सर्वे पर्वतसंकाशाः सर्वे पर्वतयोधिनः।
सर्वे दीप्तायुधधरा योधास्तस्य महात्मनः॥२९॥
‘इस महाकाय राक्षस के सभी योद्धा पर्वतों के समान विशाल हैं। सभी पर्वतों से युद्ध करने वाले हैं और सब-के-सब चमकीले अस्त्र-शस्त्र लिये हुए हैं। २९॥
विभाति रक्षोराजोऽसौ प्रदीप्तैर्भीमदर्शनैः।
भूतैः परिवृतस्तीक्ष्णैर्देहवद्भिरिवान्तकः॥३०॥
‘जो दीप्तिमान, भयंकर दिखायी देने वाले और तीखे स्वभाववाले हैं, उन राक्षसों से घिरा हुआ यह राक्षसराज रावण देहधारी भूतों से घिरे हुए यमराज के समान जान पड़ता है॥ ३०॥
दिष्ट्यायमद्य पापात्मा मम दृष्टिपथं गतः।
अद्य क्रोधं विमोक्ष्यामि सीताहरणसम्भवम्॥३१॥
‘सौभाग्य की बात है कि यह पापात्मा मेरी आँखों के सामने आ गया। सीताहरण के कारण मेरे मन में जो क्रोध संचित हुआ है, उसे आज इसके ऊपर छोगा’॥ ३१॥
एवमुक्त्वा ततो रामो धनुरादाय वीर्यवान्।
लक्ष्मणानुचरस्तस्थौ समुद्धृत्य शरोत्तमम्॥३२॥
ऐसा कहकर बल-विक्रमशाली श्रीराम धनुष लेकर उत्तम बाण निकालकर युद्ध के लिये डट गये। इस कार्य में लक्ष्मण ने भी उनका साथ दिया॥३२॥
ततः स रक्षोधिपतिर्महात्मा रक्षांसि तान्याह महाबलानि।
द्वारेषु चर्यागृहगोपुरेषु सुनिर्वृतास्तिष्ठत निर्विशङ्काः॥३३॥
तदनन्तर महामना राक्षसराज रावण ने अपने साथ आये हुए उन महाबली राक्षसों से कहा-‘तुमलोग निर्भय और सुप्रसन्न होकर नगर के द्वारों तथा राजमार्ग के मकानों की ड्योढ़ियों पर खड़े हो जाओ॥ ३३॥
इहागतं मां सहितं भवद्भिर्वनौकसश्छिद्रमिदं विदित्वा।
शून्यां पुरी दुष्प्रसहां प्रमथ्य प्रधर्षयेयुः सहसा समेताः॥३४॥
‘क्योंकि वानरलोग मेरे साथ तुम सबको यहाँ आया देख इसे अपने लिये अच्छा मौका समझकर सहसा एकत्र हो मेरी सूनी नगरी में, जिसके भीतर प्रवेश होना दूसरों के लिये बहुत कठिन है, घुस जायेंगे और इसे मथकर चौपट कर डालेंगे’ ॥ ३४॥
विसर्जयित्वा सचिवांस्ततस्तान् गतेषु रक्षःसु यथानियोगम्।
व्यदारयद् वानरसागरौघं महाझषः पूर्णमिवार्णवौघम्॥ ३५॥
इस प्रकार जब अपने मन्त्रियों को विदा कर दिया और वे राक्षस उसकी आज्ञा के अनुसार उन-उन स्थानों पर चले गये, तब रावण जैसे महामत्स्य (तिमिङ्गिल) पूरे महासागर को विक्षुब्ध कर देता है, उसी प्रकार समुद्र-जैसी वानरसेना को विदीर्ण करने लगा॥ ३५॥
तमापतन्तं सहसा समीक्ष्य दीप्तेषुचापं युधि राक्षसेन्द्रम्।
महत् समुत्पाट्य महीधराग्रं दुद्राव रक्षोधिपतिं हरीशः॥३६॥
चमकीले धनुष-बाण लिये राक्षसराज रावण को युद्धस्थल में सहसा आया देख वानरराज सुग्रीव ने एक बड़ा भारी पर्वत-शिखर उखाड़ लिया और उसे लेकर उस निशाचरराज पर आक्रमण किया॥ ३६॥
तच्छैलशृङ्गं बहुवृक्षसानुं प्रगृह्य चिक्षेप निशाचराय।
तमापतन्तं सहसा समीक्ष्य चिच्छेद बाणैस्तपनीयपुकैः ॥ ३७॥
अनेक वृक्षों और शिखरों से युक्त उस महान् शैलशिखर को सुग्रीव ने रावण पर दे मारा। उस शिखर को अपने ऊपर आता देख रावण ने सहसा सुवर्णमय पंखवाले बहुत-से बाण मारकर उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले॥
तस्मिन् प्रवृद्धोत्तमसानुवृक्षे शृङ्गे विदीर्णे पतिते पृथिव्याम्।
महाहिकल्पं शरमन्तकाभं समादधे राक्षसलोकनाथः॥३८॥
उत्तम वृक्ष और शिखरवाला वह महान् शैलशृङ्ग जब विदीर्ण होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा, तब राक्षसलोक के स्वामी रावण ने महान् सर्प और यमराज के समान एक भयंकर बाण का संधान किया। ३८॥
स तं गृहीत्वानिलतुल्यवेगं सविस्फुलिङ्गज्वलनप्रकाशम्।
बाणं महेन्द्राशनितुल्यवेगं चिक्षेप सुग्रीववधाय रुष्टः॥ ३९॥
उस बाण का वेग वायुके समान था। उससे चिनगारियाँ छूटती थीं और प्रज्वलित अग्नि के समान प्रकाश फैलता था। इन्द्र के वज्र की भाँति भयंकर वेगवाले उस बाण को रावण ने रुष्ट होकर सुग्रीव के वध के लिये चलाया॥ ३९॥
स सायको रावणबाहुमुक्तः शक्राशनिप्रख्यवपुःप्रकाशम्।
सुग्रीवमासाद्य बिभेद वेगाद् गुहेरिता क्रौञ्चमिवोग्रशक्तिः॥४०॥
रावण के हाथों से छूटे हुए उस सायक ने इन्द्र के वज्र की भाँति कान्तिमान् शरीरवाले सुग्रीव के पास पहुँचकर उसी तरह वेगपूर्वक उन्हें घायल कर दिया, जैसे स्वामी कार्तिकेय की चलायी हुई भयानक शक्ति ने क्रौञ्चपर्वत को विदीर्ण कर डाला था॥ ४०॥
स सायकार्तो विपरीतचेताः कूजन् पृथिव्यां निपपात वीरः।
तं वीक्ष्य भूमौ पतितं विसंज्ञं नेदुः प्रहृष्टा युधि यातुधानाः॥४१॥
उस बाण की चोट से वीर सुग्रीव अचेत हो गये और आर्तनाद करते हुए पृथ्वी पर गिर पड़े। सुग्रीव को बेहोश हो घूमकर गिरा देख उस युद्धस्थल में आये हुए सब राक्षस बड़े हर्ष के साथ सिंहनाद करने लगे।
४१॥
ततो गवाक्षो गवयः सुषेणस्त्वथर्षभो ज्योतिमुखो नलश्च ।
शैलान् समुत्पाट्य विवृद्धकायाः प्रदुद्रुवुस्तं प्रति राक्षसेन्द्रम्॥४२॥
तब गवाक्ष, गवय, सुषेण, ऋषभ, ज्योतिर्मुख और नल—ये विशालकाय वानर पर्वतशिखरों को उखाड़कर राक्षसराज रावण पर टूट पड़े॥४२॥
तेषां प्रहारान् स चकार मोघान् रक्षोधिपो बाणशतैः शिताग्रैः।
तान् वानरेन्द्रानपि बाणजालैबिभेद जाम्बूनदचित्रपुकैः॥४३॥
ते वानरेन्द्रास्त्रिदशारिबाणै भिन्ना निपेतुर्भुवि भीमकायाः।
परंतु निशाचरों के राजा रावण ने सैकड़ों तीखे बाण छोड़कर उन सबके प्रहारों को व्यर्थ कर दिया और उन वानरेश्वरों को भी सोने के विचित्र पंखवाले बाणसमूहों द्वारा क्षत-विक्षत कर दिया। देवद्रोही रावण के बाणों से घायल हो वे भीमकाय वानरेन्द्रगण धरती पर गिर पड़े॥ ४३२ ॥
ततस्तु तद् वानरसैन्यमुग्रं प्रच्छादयामास स बाणजालैः॥४४॥
ते वध्यमानाः पतिताश्च वीरा नानद्यमाना भयशल्यविद्धाः।
फिर तो रावण ने अपने बाण-समूहों द्वारा उस भयंकर वानरसेना को आच्छादित कर दिया। रावण के बाणों से पीड़ित और डरे हुए वीर वानर उसकी मार खा-खाकर जोर-जोरसे चीत्कार करते हुए धराशायी होने लगे॥
शाखामृगा रावणसायकार्ता जग्मुः शरण्यं शरणं स्म रामम्॥४५॥
ततो महात्मा स धनुर्धनुष्मानादाय रामः सहसा जगाम।
तं लक्ष्मणः प्राञ्जलिरभ्युपेत्य उवाच रामं परमार्थयुक्तम्॥४६॥
रावण के सायकों से पीड़ित हो बहुत-से वानर शरणागतवत्सल भगवान् श्रीराम की शरण में गये। तब धनुर्धर महात्मा श्रीराम सहसा धनुष लेकर आगे बढ़े। उसी समय लक्ष्मणजी ने उनके सामने आकर हाथ जोड़ उनसे ये यथार्थ वचन कहे- ॥ ४५-४६॥
काममार्य सुपर्याप्तो वधायास्य दुरात्मनः।
विधमिष्याम्यहं चैतमनुजानीहि मां विभो॥४७॥
‘आर्य! इस दुरात्मा का वध करने के लिये तो मैं ही पर्याप्त हूँ। प्रभो! आप मुझे आज्ञा दीजिये। मैं इसका नाश करूँगा’॥४७॥
तमब्रवीन्महातेजा रामः सत्यपराक्रमः।
गच्छ यत्नपरश्चापि भव लक्ष्मण संयुगे॥४८॥
उनकी बात सुनकर महातेजस्वी सत्यपराक्रमी श्रीराम ने कहा-‘अच्छा लक्ष्मण! जाओ किंतु संग्राम में विजय पाने के लिये पूर्ण प्रयत्नशील रहना’। ४८॥
रावणो हि महावीर्यो रणेऽद्भुतपराक्रमः।
त्रैलोक्येनापि संक्रुद्धो दुष्प्रसह्यो न संशयः॥४९॥
‘क्योंकि रावण महान् बल-विक्रम से सम्पन्न है। यह युद्ध में अद्भुत पराक्रम दिखाता है। रावण यदि अधिक कुपित होकर युद्ध करने लगे तो तीनों लोकों के लिये इसके वेग को सहन करना कठिन हो जायगा॥ ४९॥
तस्यच्छिद्राणि मार्गस्व स्वच्छिद्राणि च लक्षय।
चक्षुषा धनुषाऽऽत्मानं गोपायस्व समाहितः॥५०॥
‘तुम युद्ध में रावण के छिद्र देखना। उसकी कमजोरियों से लाभ उठाना और अपने छिद्रों पर भी दृष्टि रखना (कहीं शत्रु उनसे लाभ न उठाने पाये)। एकाग्रचित्त हो पूरी सावधानी के साथ अपनी दृष्टि और धनुष से भी आत्मरक्षा करना’ ॥५०॥
राघवस्य वचः श्रुत्वा सम्परिष्वज्य पूज्य च।
अभिवाद्य च रामाय ययौ सौमित्रिराहवे॥५१॥
श्रीरघुनाथजी की यह बात सुनकर सुमित्राकुमार लक्ष्मण उनके हृदय से लग गये और श्रीराम का पूजन एवं अभिवादन करके वे युद्ध के लिये चल दिये।५१॥
स रावणं वारणहस्तबाहुं ददर्श भीमोद्यतदीप्तचापम्।
प्रच्छादयन्तं शरवृष्टिजालैस्तान् वानरान् भिन्नविकीर्णदेहान्॥५२॥
उन्होंने देखा, रावण की भुजाएँ हाथी के शुण्डदण्ड के समान हैं। उसने बड़ा भयंकर एवं दीप्तिमान् धनुष उठा रखा है और बाण-समूहों की वर्षा करके वानरों को ढकता तथा उनके शरीरों को छिन्न-भिन्न किये डालता है॥५२॥
तमालोक्य महातेजा हनूमान् मारुतात्मजः।
निवार्य शरजालानि विदुद्राव स रावणम्॥५३॥
रावण को इस प्रकार पराक्रम करते देख महातेजस्वी पवनपुत्र हनुमान् जी उसके बाणसमूहों का निवारण करते हुए उसकी ओर दौड़े।५३॥
रथं तस्य समासाद्य बाहुमुद्यम्य दक्षिणम्।
त्रासयन् रावणं धीमान् हनूमान् वाक्यमब्रवीत् ॥५४॥
उसके रथ के पास पहुँचकर अपना दायाँ हाथ उठा बुद्धिमान् हनुमान् ने रावण को भयभीत करते हुए कहा — ॥ ५४॥
देवदानवगन्धर्वैर्यक्षैश्च सह राक्षसैः।
अवध्यत्वं त्वया प्राप्तं वानरेभ्यस्तु ते भयम्॥५५॥
‘निशाचर! तुमने देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष और राक्षसों से न मारे जाने का वर प्राप्त कर लिया है; परंतु वानरों से तो तुम्हें भय है ही॥ ५५ ॥
एष मे दक्षिणो बाहुः पञ्चशाखः समुद्यतः।
विधमिष्यति ते देहे भूतात्मानं चिरोषितम्॥५६॥
‘देखो, पाँच अँगुलियों से युक्त यह मेरा दाहिना हाथ उठा हुआ है। तुम्हारे शरीर में चिरकाल से जो जीवात्मा निवास करता है, उसे आज यह इस देह से अलग कर देगा’ ॥५६॥
श्रुत्वा हनूमतो वाक्यं रावणो भीमविक्रमः।
संरक्तनयनः क्रोधादिदं वचनमब्रवीत्॥५७॥
हनुमान जी का यह वचन सुनकर भयानक पराक्रमी रावण के नेत्र क्रोध से लाल हो उठे और उसने रोषपूर्वक कहा- ॥ ५७॥
क्षिप्रं प्रहर निःशङ्कं स्थिरां कीर्तिमवाप्नुहि।
ततस्त्वां ज्ञातविक्रान्तं नाशयिष्यामि वानर॥५८॥
‘वानर! तुम निःशङ्क होकर शीघ्र मेरे ऊपर प्रहार करो और सुस्थिर यश प्राप्त कर लो। तुममें कितना पराक्रम है, यह जान लेने पर ही मैं तुम्हारा नाश करूँगा’॥
रावणस्य वचः श्रुत्वा वायुसूनुर्वचोऽब्रवीत्।
प्रहतं हि मया पूर्वमक्षं तव सुतं स्मर॥५९॥
रावण की बात सुनकर पवनपुत्र हनुमान जी बोले ‘ मैंने तो पहले ही तुम्हारे पुत्र अक्ष को मार डाला है। इस बात को याद तो करो’ ॥ ५९॥
एवमुक्तो महातेजा रावणो राक्षसेश्वरः।
आजघानानिलसुतं तलेनोरसि वीर्यवान्॥६०॥
उनके इतना कहते ही बल-विक्रमसम्पन्न महातेजस्वी राक्षसराज रावण ने उन पवनकुमार की छाती में एक तमाचा जड़ दिया॥६०॥
स तलाभिहतस्तेन चचाल च मुहुर्मुहुः।
स्थितो मुहूर्त तेजस्वी स्थैर्यं कृत्वा महामतिः॥६१॥
आजघान च संक्रुद्धस्तलेनैवामरद्विषम्।
उस थप्पड़ की चोट से हनुमान जी बारंबार इधर-उधर चक्कर काटने लगे; परंतु वे बड़े बुद्धिमान् और तेजस्वी थे, अतः दो ही घड़ी में अपने को सुस्थिर करके खड़े हो गये। फिर उन्होंने भी अत्यन्त कुपित होकर उस देवद्रोही को थप्पड़ से ही मारा॥ ६१२ ॥
ततः स तेनाभिहतो वानरेण महात्मना॥६२॥
दशग्रीवः समाधूतो यथा भूमितलेऽचलः।
उन महात्मा वानर के थप्पड़ की मार खाकर दशमुख रावण उसी तरह काँप उठा, जैसे भूकम्प आने पर पर्वत हिलने लगता है॥ ६२ १/२॥
संग्रामे तं तथा दृष्ट्वा रावणं तलताडितम्॥६३॥
ऋषयो वानराः सिद्धा नेदुर्देवाः सहासुरैः।
संग्रामभूमि में रावण को थप्पड़ खाते देख ऋषि, वानर, सिद्ध, देवता और असुर सभी हर्षध्वनि करने लगे॥६३३ ॥
अथाश्वस्य महातेजा रावणो वाक्यमब्रवीत् ॥६४॥
साधु वानर वीर्येण श्लाघनीयोऽसि मे रिपुः।
तदनन्तर महातेजस्वी रावण ने सँभलकर कहा —’शाबाश वानर! शाबाश, तुम पराक्रम की दृष्टि से मेरे प्रशंसनीय प्रतिद्वन्द्वी हो’। ६४२ ॥
रावणेनैवमुक्तस्तु मारुतिर्वाक्यमब्रवीत्॥६५॥
धिगस्तु मम वीर्यस्य यत् त्वं जीवसि रावण।
रावण के ऐसा कहने पर पवनकुमार हनुमान् ने कहा —’रावण! तू अब भी जीवित है, इसलिये मेरे पराक्रम को धिक्कार है!॥ ६५२ ॥
सकृत् तु प्रहरेदानी दुर्बुद्धे किं विकत्थसे॥६६॥
ततस्त्वां मामको मुष्टिर्नयिष्यति यमक्षयम्।
‘दुर्बुद्धे ! अब तुम एक बार और मुझ पर प्रहार करो। बढ़-बढ़कर बातें क्यों बना रहे हो। तुम्हारे प्रहार के पश्चात् जब मेरा मुक्का पड़ेगा, तब वह तुम्हें तत्काल यमलोक पहुँचा देगा’॥६६॥
ततो मारुतिवाक्येन कोपस्तस्य प्रजज्वले॥६७॥
संरक्तनयनो यत्नान्मुष्टिमावृत्य दक्षिणम्।
पातयामास वेगेन वानरोरसि वीर्यवान्॥६८॥
हनुमान् जी की इस बात से रावण का क्रोध प्रज्वलित हो उठा। उसकी आँखें लाल हो गयीं। उस पराक्रमी राक्षस ने बड़े यत्न से दाहिना मुक्का तानकर हनुमान जी की छाती में वेगपूर्वक प्रहार किया। ६७-६८॥
हनूमान् वक्षसि व्यूढे संचचाल पुनः पुनः।
विह्वलं तु तदा दृष्ट्वा हनूमन्तं महाबलम्॥६९॥
रथेनातिरथः शीघ्रं नीलं प्रति समभ्यगात्।
छाती में चोट लगने पर हनुमान जी पुनः विचलित हो उठे। महाबली हनुमान जी को उस समय विह्वल देख अतिरथी रावण रथ के द्वारा शीघ्र ही नील पर जा चढ़ा॥
राक्षसानामधिपतिर्दशग्रीवः प्रतापवान्॥७०॥
पन्नगप्रतिमैीमैः परमर्माभिभेदनैः।
शरैरादीपयामास नीलं हरिचमूपतिम्॥७१॥
राक्षसों के राजा प्रतापी दशग्रीव ने शत्रुओं के मर्म को विदीर्ण करने वाले सर्पतुल्य भयंकर बाणों द्वारा वानरसेनापति नील को संताप देना आरम्भ किया। ७०-७१॥
स शरौघसमायस्तो नीलो हरिचमूपतिः।
करेणैकेन शैलाग्रं रक्षोधिपतयेऽसृजत्॥७२॥
उसके बाण-समूहों से पीड़ित हुए वानर-सेनापति नील ने उस राक्षसराज पर एक ही हाथ से पर्वत का एक शिखर उठाकर चलाया॥७२॥
हनूमानपि तेजस्वी समाश्वस्तो महामनाः।
विप्रेक्षमाणो युद्धप्सुः सरोषमिदमब्रवीत्॥७३॥
नीलेन सह संयुक्तं रावणं राक्षसेश्वरम्।
अन्येन युध्यमानस्य न युक्तमभिधावनम॥७४॥
इतने ही में तेजस्वी महामना हनुमान जी भी सँभल गये और पुनः युद्ध की इच्छा से रावण की ओर देखने लगे। उस समय राक्षसराज रावण नील के साथ उलझा हुआ था। हनुमान जी ने उससे रोषपूर्वक कहा —’ओ निशाचर! इस समय तुम दूसरे के साथ युद्ध कर रहे हो, अतः अब तुम पर धावा करना मेरे लिये उचित न होगा।
रावणोऽथ महातेजास्तं शृङ्ख सप्तभिः शरैः।
आजघान सुतीक्ष्णाग्रैस्तद् विकीर्णं पपात ह॥७५॥
उधर महातेजस्वी रावण ने नील के चलाये हुए पर्वत-शिखर पर तीखे अग्रभागवाले सात बाण मारे, जिससे वह टूट-फूटकर पृथ्वी पर बिखर गया॥ ७५ ॥
तद् विकीर्णं गिरेः शृङ्गं दृष्ट्वा हरिचमूपतिः।
कालाग्निरिव जज्वाल कोपेन परवीरहा॥७६॥
उस पर्वतशिखर को बिखरा हुआ देख शत्रुवीरों का संहार करने वाले वानर-सेनापति नील प्रलयकाल की अग्नि के समान क्रोध से प्रज्वलित हो उठे॥७६ ॥
सोऽश्वकर्णद्रुमान् शालांश्चूतांश्चापि सुपुष्पितान्।
अन्यांश्च विविधान् वृक्षान् नीलश्चिक्षेप संयुगे॥७७॥
उन्होंने युद्धस्थल में अश्वकर्ण, साल, खिले हुए आम्र तथा अन्य नाना प्रकार के वृक्षों को उखाड़ उखाड़कर रावण पर चलाना आरम्भ किया॥ ७७॥
स तान् वृक्षान् समासाद्य प्रतिचिच्छेद रावणः।
अभ्यवर्षच्च घोरेण शरवर्षेण पावकिम्॥७८॥
रावण ने उन सब वृक्षों को सामने आने पर काट गिराया और अग्निपुत्र नील पर बाणों की भयानक वर्षा की॥
अभिवृष्टः शरौघेण मेघेनेव महाचलः।
ह्रस्वं कृत्वा ततो रूपं ध्वजाग्रे निपपात ह॥७९॥
जैसे मेघ किसी महान् पर्वत पर जल की वर्षा करता है, उसी तरह रावण ने जब नील पर बाणसमूहों की वर्षा की, तब वे छोटा-सा रूप बनाकर रावण की ध्वजा के शिखर पर चढ़ गये॥७९॥
पावकात्मजमालोक्य ध्वजाग्रे समवस्थितम्।
जज्वाल रावणः क्रोधात् ततो नीलो ननाद च॥८०॥
अपनी ध्वजा के ऊपर बैठे हुए अग्निपुत्र नील को देखकर रावण क्रोध से जल उठा और उधर नील जोर-जोर से गर्जना करने लगे॥ ८० ॥
ध्वजाग्रे धनुषश्चाग्रे किरीटाग्रे च तं हरिम्।
लक्ष्मणोऽथ हनूमांश्च रामश्चापि सुविस्मिताः॥८१॥
नील को कभी रावण की ध्वजा पर, कभी धनुष पर और कभी मुकुटपर बैठा देख श्रीराम, लक्ष्मण और हनुमान् जी को भी बड़ा विस्मय हुआ॥ ८१॥
रावणोऽपि महातेजाः कपिलाघवविस्मितः।
अस्त्रमाहारयामास दीप्तमाग्नेयमद्भुतम्॥८२॥
वानर नील की वह फुर्ती देखकर महातेजस्वी रावण को भी बड़ा आश्चर्य हुआ और उसने अद्भुत तेजस्वी आग्नेयास्त्र हाथ में लिया॥ ८२॥
ततस्ते चुक्रुशुर्दृष्टा लब्धलक्षाः प्लवंगमाः।
नीललाघवसम्भ्रान्तं दृष्ट्वा रावणमाहवे॥८३॥
नील की फुर्ती से रावण को घबराया हुआ देख हर्ष का अवसर पाकर सब वानर बड़ी प्रसन्नता के साथ किलकारियाँ भरने लगे॥ ८३॥
वानराणां च नादेन संरब्धो रावणस्तदा।
सम्भ्रमाविष्टहृदयो न किंचित् प्रत्यपद्यत॥८४॥
उस समय वानरों के हर्षनाद से रावण को बड़ा क्रोध हुआ। साथ ही हृदय में घबराहट छा गयी थी, इसलिये वह कर्तव्यका कुछ निश्चय नहीं कर सका।
आग्नेयेनापि संयुक्तं गृहीत्वा रावणः शरम्।
ध्वजशीर्षस्थितं नीलमुदैक्षत निशाचरः॥ ८५॥
तदनन्तर निशाचर रावण ने आग्नेयास्त्र से अभिमन्त्रित बाण हाथ में लेकर ध्वज के अग्रभाग पर बैठे हुए नील को देखा॥ ८५ ॥
ततोऽब्रवीन्महातेजा रावणो राक्षसेश्वरः।
कपे लाघवयुक्तोऽसि मायया परया सह॥८६॥
देखकर महातेजस्वी राक्षसराज रावण ने उनसे कहा —’वानर ! तुम उच्चकोटि की माया के साथ ही अपने भीतर बड़ी फुर्ती भी रखते हो। ८६॥
जीवितं खलु रक्षस्व यदि शक्तोऽसि वानर।
तानि तान्यात्मरूपाणि सृजसि त्वमनेकशः॥८७॥
तथापि त्वां मया मुक्तः सायकोऽस्त्रप्रयोजितः।
जीवितं परिरक्षन्तं जीविताद् भ्रंशयिष्यति॥८८॥
‘वानर! यदि शक्तिशाली हो तो मेरे बाण से अपने जीवन की रक्षा करो। यद्यपि तुम अपने पराक्रम के योग्य ही भिन्न-भिन्न प्रकार के कर्म कर रहे हो तथापि मेरा छोड़ा हुआ दिव्यास्त्र-प्रेरित बाण जीवन-रक्षा की चेष्टा करने पर भी तुम्हें प्राणहीन कर देगा’। ८७-८८॥
एवमुक्त्वा महाबाहू रावणो राक्षसेश्वरः।
संधाय बाणमस्त्रेण चमूपतिमताडयत्॥८९॥
ऐसा कहकर महाबाहु राक्षसराज रावण ने आग्नेयास्त्र-युक्त बाण का संधान करके उसके द्वारा सेनापति नील को मारा॥ ८९॥
सोऽस्त्रमुक्तेन बाणेन नीलो वक्षसि ताडितः।
निर्दह्यमानः सहसा स पपात महीतले॥९०॥
उसके धनुष से छूटे हुए उस बाण ने नील की छाती पर गहरी चोट की। वे उसकी आँच से जलते हुए सहसा पृथ्वी पर गिर पड़े॥९० ॥
पितृमाहात्म्यसंयोगादात्मनश्चापि तेजसा।
जानुभ्यामपतद् भूमौ न तु प्राणैर्वियुज्यत॥९१॥
‘निशाचर! तुमने देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष और राक्षसों से न मारे जाने का वर प्राप्त कर लिया है; परंतु वानरों से तो तुम्हें भय है ही॥ ५५ ॥
एष मे दक्षिणो बाहुः पञ्चशाखः समुद्यतः।
विधमिष्यति ते देहे भूतात्मानं चिरोषितम्॥५६॥
‘देखो, पाँच अँगुलियों से युक्त यह मेरा दाहिना हाथ उठा हुआ है। तुम्हारे शरीर में चिरकाल से जो जीवात्मा निवास करता है, उसे आज यह इस देह से अलग कर देगा’ ॥५६॥
श्रुत्वा हनूमतो वाक्यं रावणो भीमविक्रमः।
संरक्तनयनः क्रोधादिदं वचनमब्रवीत्॥५७॥
हनुमान जी का यह वचन सुनकर भयानक पराक्रमी रावण के नेत्र क्रोध से लाल हो उठे और उसने रोषपूर्वक कहा- ॥ ५७॥
क्षिप्रं प्रहर निःशङ्कं स्थिरां कीर्तिमवाप्नुहि।
ततस्त्वां ज्ञातविक्रान्तं नाशयिष्यामि वानर॥५८॥
‘वानर! तुम निःशङ्क होकर शीघ्र मेरे ऊपर प्रहार करो और सुस्थिर यश प्राप्त कर लो। तुममें कितना यद्यपि नील ने पृथ्वी पर घुटने टेक दिये, तथापि पिता अग्निदेव के माहात्म्य से और अपने तेज के प्रभाव से उनके प्राण नहीं निकले॥ ९१॥
विसंज्ञं वानरं दृष्ट्वा दशग्रीवो रणोत्सुकः।
रथेनाम्बुदनादेन सौमित्रिमभिदुद्रुवे॥९२॥
वानर नील को अचेत हुआ देख रणोत्सुक रावण ने मेघ की गर्जना के समान गम्भीर ध्वनि करने वाले रथ के द्वारा सुमित्राकुमार लक्ष्मण पर धावा किया॥९२॥
आसाद्य रणमध्ये तं वारयित्वा स्थितो ज्वलन्।
धनुर्विस्फारयामास राक्षसेन्द्रः प्रतापवान्॥९३॥
युद्धभूमि में सारी वानरसेना को आगे बढ़ने से रोककर वह लक्ष्मण के पास पहुँच गया और प्रज्वलित अग्नि के समान सामने खड़ा हो प्रतापी राक्षसराज रावण अपने धनुष की टंकार करने लगा। ९३॥
तमाह सौमित्रिरदीनसत्त्वो विस्फारयन्तं धनुरप्रमेयम्।
अवेहि मामद्य निशाचरेन्द्र न वानरांस्त्वं प्रतियोभुमर्हसि ॥९४॥
उस समय अपने अनुपम धनुष को खींचते हुए रावण से उदार शक्तिशाली लक्ष्मण ने कहा —’निशाचरराज! समझ लो, मैं आ गया। अतः अब तुम्हें वानरों के साथ युद्ध नहीं करना चाहिये’॥ ९४ ॥
स तस्य वाक्यं प्रतिपूर्णघोषं ज्याशब्दमुग्रं च निशम्य राजा।
आसाद्य सौमित्रिमुपस्थितं तं रोषान्वितं वाचमुवाच रक्षः॥ ९५॥
लक्ष्मण की यह बात गम्भीर ध्वनि से युक्त थी और उनकी प्रत्यञ्चा से भी भयानक टंकार-ध्वनि हो रही थी। उसे सुनकर युद्ध के लिये उपस्थित हुए सुमित्राकुमार के निकट जा राक्षसों के राजा रावण ने रोषपूर्वक कहा-॥
दिष्टयासि मे राघव दृष्टिमार्ग प्राप्तोऽन्तगामी विपरीतबुद्धिः।
अस्मिन् क्षणे यास्यसि मृत्युलोकं संसाद्यमानो मम बाणजालैः॥ ९६॥
‘रघुवंशी राजकुमार! सौभाग्य की बात है कि तुम मेरी आँखों के सामने आ गये। तुम्हारा शीघ्र ही अन्त होने वाला है, इसीलिये तुम्हारी बुद्धि विपरीत हो गयी है। अब तुम मेरे बाणसमूहों से पीड़ित हो इसी क्षण यमलोक की यात्रा करोगे’॥ ९६॥
तमाह सौमित्रिरविस्मयानो गर्जन्तमुवृत्तशिताग्रदंष्ट्रम्।
राजन् न गर्जन्ति महाप्रभावा विकत्थसे पापकृतां वरिष्ठ॥९७॥
सुमित्राकुमार लक्ष्मण को उसकी बात सुनकर कोई विस्मय नहीं हुआ। उसके दाँत बड़े ही तीखे और उत्कट थे और वह जोर-जोर से गर्जना कर रहा था। उस समय सुमित्राकुमार ने उससे कहा—’राजन्! महान् प्रभावशाली पुरुष तुम्हारी तरह केवल गर्जना नहीं करते हैं (कुछ पराक्रम करके दिखाते हैं)। पापाचारियों में अग्रगण्य रावण! तुम तो झूठे ही डींग हाँकते हो॥९७॥
जानामि वीर्यं तव राक्षसेन्द्र बलं प्रतापं च पराक्रमं च।
अवस्थितोऽहं शरचापपाणिरागच्छ किं मोघविकत्थनेन॥९८॥
‘राक्षसराज! (तुमने सूने घर से जो चोरी-चोरी एक असहाय नारी का अपहरण किया, इसीसे) मैं तुम्हारे बल, वीर्य, प्रताप और पराक्रम को अच्छी तरह जानता हूँ; इसीलिये हाथ में धनुष-बाण लेकर सामने खड़ा हूँ। आओ युद्ध करो। व्यर्थ बातें बनाने से क्या होगा?’ ॥ ९८॥
स एवमुक्तः कुपितः ससर्ज रक्षोधिपः सप्त शरान् सुपुङ्खान्।
ताँल्लक्ष्मणः काञ्चनचित्रपुडैश्चिच्छेद बाणैर्निशिताग्रधारैः॥९९॥
उनके ऐसा कहने पर कुपित हुए राक्षसराज ने उनपर सुन्दर पंखवाले सात बाण छोड़े; परंतु लक्ष्मण ने सोने के बने हुए विचित्र पंखों से सुशोभित और तेज धारवाले बाणों से उन सबको काट डाला॥ ९९॥
तान् प्रेक्षमाणः सहसा निकृत्तान् निकृत्तभोगानिव पन्नगेन्द्रान्।
लङ्केश्वरः क्रोधवशं जगाम ससर्ज चान्यान् निशितान् पृषत्कान्॥१००॥
जैसे बड़े-बड़े सो के शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिये जायँ, उसी प्रकार अपने समस्त बाणों को सहसा खण्डित हुआ देख लङ्कापति रावण क्रोध के वशीभूत हो गया और उसने दूसरे तीखे बाण छोड़े॥ १०० ॥
स बाणवर्षं तु ववर्ष तीव्र रामानुजः कार्मुकसम्प्रयुक्तम्।
क्षुरार्धचन्द्रोत्तमकर्णिभल्लैः शरांश्च चिच्छेद न चुक्षुभे च॥१०१॥
परंतु श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण इससे विचलित नहीं हुए। उन्होंने अपने धनुष से बाणों की भयंकर वर्षा की और क्षुर, अर्धचन्द्र, उत्तम कर्णी तथा भल्ल जाति के बाणों द्वारा रावण के छोड़े हुए उन सब बाणों को काट डाला॥ १०१॥
स बाणजालान्यपि तानि तानि मोघानि पश्यंस्त्रिदशारिराजः।
विसिस्मिये लक्ष्मणलाघवेन पुनश्च बाणान् निशितान् मुमोच॥१०२॥
उन सभी बाणसमूहों को निष्फल हुआ देख राक्षसराज रावण लक्ष्मण की फुर्ती से आश्चर्यचकित रह गया और उन पर पुनः तीखे बाण छोड़ने लगा। १०२॥
स लक्ष्मणश्चापि शिताशिताग्रान् महेन्द्रतुल्योऽशनिभीमवेगान्।
संधाय चापे ज्वलनप्रकाशान् ससर्ज रक्षोधिपतेर्वधाय॥१०३॥
देवराज इन्द्र के समान पराक्रमी लक्ष्मण ने भी रावण के वध के लिये वज्र के समान भयानक वेग और तीखी धारवाले पैने बाणों को, जो अग्नि के समान प्रकाशित हो रहे थे, धनुष पर रखा॥ १०३॥
स तान् प्रचिच्छेद हि राक्षसेन्द्रः शिताशरांल्लक्ष्मणमाजघान।
शरेण कालाग्निसमप्रभेण स्वयंभुदत्तेन ललाटदेशे॥१०४॥
परंतु राक्षसराज ने उन सभी तीखे बाणों को काट डाला और ब्रह्माजी के दिये हुए कालाग्नि के समान तेजस्वी बाण से लक्ष्मणजी के ललाट पर चोट की। १०४॥
स लक्ष्मणो रावणसायकार्तश्चचाल चापं शिथिलं प्रगृह्य।
पुनश्च संज्ञां प्रतिलभ्य कृच्छ्राच्चिच्छेद चापं त्रिदशेन्द्रशत्रोः॥१०५॥
रावण के उस बाण से पीड़ित हो लक्ष्मणजी विचलित हो उठे। उन्होंने हाथ में जो धनुष ले रखा था, उसकी मुट्ठी ढीली पड़ गयी। फिर उन्होंने बड़े कष्ट से होश सँभाला और देवद्रोही रावण के धनुष को काट दिया॥ १०५॥
निकृत्तचापं त्रिभिराजघान बाणैस्तदा दाशरथिः शिताग्रैः।
स सायकार्तो विचचाल राजा कृच्छ्राच्च संज्ञा पुनराससाद॥१०६॥
धनुष कट जाने पर रावण को लक्ष्मण ने तीन बाण मारे, जो बहुत ही तीखे थे। उन बाणों से पीड़ित हो राजा रावण व्याकुल हो गया और बड़ी कठिनाई से वह फिर सचेत हो सका॥ १०६॥
स कृत्तचापः शरताडितश्च मेदागात्रो रुधिरावसिक्तः।
जग्राह शक्तिं स्वयमुग्रशक्तिः स्वयंभुदत्तां युधि देवशत्रुः॥१०७॥
जब धनुष कट गया और बाणों की गहरी चोट खानी पड़ी, तब रावण का सारा शरीर मेदे और रक्त से भीग गया। उस अवस्था में उस भयंकर शक्तिशाली देवद्रोही राक्षस ने युद्धस्थल में ब्रह्माजी की दी हुई शक्ति उठा ली॥ १०७॥
स तां सधूमानलसंनिकाशां वित्रासनां संयति वानराणाम्।
चिक्षेप शक्तिं तरसा ज्वलन्तीं सौमित्रये राक्षसराष्ट्रनाथः॥१०८॥
वह शक्ति धूमयुक्त अग्नि के समान दिखायी देती थी और युद्ध में वानरों को भयभीत करने वाली थी। राक्षसराज के स्वामी रावण ने वह जलती हुई शक्ति बड़े वेग से सुमित्राकुमार पर चलायी॥ १०८॥
तामापतन्तीं भरतानुजोऽस्त्रैजघान बाणैश्च हुताग्निकल्पैः।
तथापि सा तस्य विवेश शक्ति(जान्तरं दाशरथेर्विशालम्॥१०९॥
अपनी ओर आती हुई उस शक्ति पर लक्ष्मण ने अग्नितुल्य तेजस्वी बहुत-से बाणों तथा अस्त्रों का प्रहार किया; तथापि वह शक्ति दशरथकुमार लक्ष्मण के विशाल वक्षःस्थल में घुस गयी॥ १०९॥
स शक्तिमाशक्तिसमाहतः सन् जज्वाल भूमौ स रघुप्रवीरः।
तं विह्वलन्तं सहसाभ्युपेत्य जग्राह राजा तरसा भुजाभ्याम्॥११०॥
रघुकुल के प्रधान वीर लक्ष्मण यद्यपि बड़े शक्तिशाली थे, तथापि उस शक्ति से आहत हो पृथ्वी पर गिर पड़े और जलने से लगे। उन्हें विह्वल हुआ देख राजा रावण सहसा उनके पास जा पहुँचा
और उनको वेगपूर्वक अपनी दोनों भुजाओं से उठाने लगा॥ ११० ॥
हिमवान् मन्दरो मेरुस्त्रैलोक्यं वा सहामरैः।
शक्यं भुजाभ्यामुद्धर्तुं न शक्यो भरतानुजः॥१११॥
जिस रावण में देवताओंसहित हिमालय, मन्दराचल, मेरुगिरि अथवा तीनों लोकों को भुजाओं द्वारा उठा लेने की शक्ति थी, वही भरत के छोटे भाई लक्ष्मण को उठाने में समर्थ न हो सका॥ १११॥
शक्तया ब्राह्मया तु सौमित्रिस्ताडितोऽपि स्तनान्तरे।
विष्णोरमीमांस्यभागमात्मानं प्रत्यनुस्मरत् ॥११२॥
ब्रह्मा की शक्ति से छाती में चोट खाने पर भी लक्ष्मणजी ने भगवान् विष्णु के अचिन्त्य अंशरूप से अपना चिन्तन किया॥ ११२ ॥
ततो दानवदर्पणं सौमित्रिं देवकण्टकः।
तं पीडयित्वा बाहुभ्यां न प्रभुर्लङ्घनेऽभवत्॥११३॥
अतः देवशत्रु रावण दानवों का दर्प चूर्ण करने वाले लक्ष्मण को अपनी दोनों भुजाओं में दबाकर हिलाने में भी समर्थ न हो सका॥ ११३॥
ततः क्रुद्धो वायुसुतो रावणं समभिद्रवत्।
आजघानोरसि क्रुद्धो वज्रकल्पेन मुष्टिना॥११४॥
इसी समय क्रोध से भरे हुए वायुपुत्र हनुमान जी रावण की ओर दौड़े और अपने वज्र-सरीखे मुक्के से रावण की छाती में मारा॥ ११४ ॥
तेन मुष्टिप्रहारेण रावणो राक्षसेश्वरः।
जानुभ्यामगमद् भूमौ चचाल च पपात च॥११५॥
उस मुक्के की मार से राक्षसराज रावण ने धरती पर घुटने टेक दिये। वह काँपने लगा और अन्ततोगत्वा गिर पड़ा॥ ११५ ॥
आस्यैश्च नेत्रैः श्रवणैः पपात रुधिरं बहु।
विघूर्णमानो निश्चेष्टो रथोपस्थ उपाविशत्॥११६॥
उसके मुख, नेत्र और कानों से बहुत-सा रक्त गिरने लगा और वह चक्कर काटता हुआ रथ के पिछले भाग में निश्चेष्ट होकर जा बैठा॥ ११६॥
विसंज्ञो मूर्च्छितश्चासीन्न च स्थानं समालभत्।
विसंज्ञं रावणं दृष्ट्वा समरे भीमविक्रमम्॥११७॥
ऋषयो वानराश्चैव नेदुर्देवाश्च सासुराः।
वह मूर्च्छित होकर अपनी सुध-बुध खो बैठा। वहाँ भी वह स्थिर न रह सका-तड़पता और छटपटाता रहा। समराङ्गण में भयंकर पराक्रमी रावण को अचेत हुआ देख ऋषि, देवता, असुर और वानर हर्षनाद करने लगे।
हनूमानथ तेजस्वी लक्ष्मणं रावणार्दितम्॥११८॥
आनयद् राघवाभ्याशं बाहुभ्यां परिगृह्य तम्।
इसके पश्चात् तेजस्वी हनुमान् रावणपीड़ित लक्ष्मण को दोनों हाथों से उठाकर श्रीरघुनाथजी के निकट ले आये॥ ११८ ॥
वायुसूनोः सुहृत्त्वेन भक्तया परमया च सः।
शत्रूणामप्यकम्प्योऽपि लघुत्वमगमत् कपेः॥११९॥
हनुमान जी के सौहार्द और उत्कट भक्तिभाव के कारण लक्ष्मणजी उनके लिये हलके हो गये। शत्रुओं के लिये तो वे अब भी अकम्पनीय थे-वे उन्हें हिला नहीं सकते थे॥ ११९॥
तं समुत्सृज्य सा शक्तिः सौमित्रिं युधि निर्जितम्।
रावणस्य रथे तस्मिन् स्थानं पुनरुपागमत्॥१२०॥
युद्ध में पराजित हुए लक्ष्मण को छोड़कर वह शक्ति पुनः रावण के रथ पर लौट आयी॥ १२० ॥
रावणोऽपि महातेजाः प्राप्य संज्ञां महाहवे।
आददे निशितान् बाणाञ्जग्राह च महद्धनुः॥१२१॥
थोड़ी देर में होश में आने पर महातेजस्वी रावण ने फिर विशाल धनुष उठाया और मैंने बाण हाथ में लिये॥
आश्वस्तश्च विशल्यश्च लक्ष्मणः शत्रुसूदनः।
विष्णोर्भागममीमांस्यमात्मानं प्रत्यनुस्मरन्॥१२२॥
शत्रुसूदन लक्ष्मणजी भी भगवान् विष्णु के अचिन्तनीय अंशरूप से अपना चिन्तन करके स्वस्थ और नीरोग हो गये॥ १२२ ॥
निपातितमहावीरां वानराणां महाचमूम्।
राघवस्तु रणे दृष्ट्वा रावणं समभिद्रवत्॥१२३॥
वानरों की विशाल वाहिनी के बड़े-बड़े वीर मार गिराये गये, यह देखकर रणभूमि में रघुनाथजी ने रावण पर धावा किया॥ १२३॥
अथैनमनुसंक्रम्य हनूमान् वाक्यमब्रवीत्।
मम पृष्ठं समारुह्य राक्षसं शास्तुमर्हसि ॥१२४॥
विष्णुर्यथा गरुत्मन्तमारुह्यामरवैरिणम्।
उस समय हनूमान् जी ने उनके पास आकर कहा —’प्रभो! जैसे भगवान् विष्णु गरुड़पर चढ़कर दैत्यों का संहार करते हैं, उसी प्रकार आप मेरी पीठ पर चढ़कर इस राक्षस को दण्ड दें’॥ १२४२ ॥
तच्छ्रुत्वा राघवो वाक्यं वायुपुत्रेण भाषितम्॥१२५॥
अथारुरोह सहसा हनूमन्तं महाकपिम्।
पवनकुमार की कही हुई यह बात सुनकर श्रीरघुनाथजी सहसा उन महाकपि हनुमान् की पीठ पर चढ़ गये॥ १२५२ ॥
रथस्थं रावणं संख्ये ददर्श मनुजाधिपः॥ १२६॥
तमालोक्य महातेजाः प्रदुद्राव स रावणम्।
वैरोचनमिव क्रुद्धो विष्णुरभ्युद्यतायुधः॥१२७॥
महाराज श्रीराम ने समराङ्गण में रावण को रथ पर बैठा देखा। उसे देखते ही महातेजस्वी श्रीराम रावण की ओर उसी प्रकार दौड़े, जैसे कुपित हुए भगवान् विष्णु अपना चक्र उठाये विरोचनकुमार बलि पर टूट पड़े थे॥
ज्याशब्दमकरोत् तीव्र वज्रनिष्पेषनिष्ठरम्।
गिरा गम्भीरया रामो राक्षसेन्द्रमुवाच ह॥१२८॥
उन्होंने अपने धनुष की तीव्र टंकार प्रकट की, जो वज्र की गड़गड़ाहट से भी अधिक कठोर थी। इसके बाद श्रीरामचन्द्रजी राक्षसराज रावण से गम्भीर वाणी में बोले- ॥ १२८॥
तिष्ठ तिष्ठ मम त्वं हि कृत्वा विप्रियमीदृशम्।
क्व नु राक्षसशार्दूल गत्वा मोक्षमवाप्स्यसि॥१२९॥
‘राक्षसों में बाघ बने हुए रावण ! खड़ा रह, खड़ा रह। मेरा ऐसा अपराध करके तू कहाँ जाकर प्राणसंकट से छुटकारा पा सकेगा॥ १२९ ॥
यदीन्द्रवैवस्वतभास्करान् वा स्वयंभूवैश्वानरशंकरान् वा।
गमिष्यसि त्वं दशधा दिशो वा तथापि मे नाद्य गतो विमोक्ष्यसे॥१३०॥
‘यदि तू इन्द्र, यम अथवा सूर्य के पास, ब्रह्मा,अग्नि या शंकर के समीप अथवा दसों दिशाओं में भागकर जायगा तो भी अब मेरे हाथ से बच नहीं सकेगा। १३०॥
यश्चैष शक्त्या निहतस्त्वयाद्य गच्छन् विषादं सहसाभ्युपेत्य।
स एष रक्षोगणराज मृत्युः सपुत्रपौत्रस्य तवाद्य युद्धे ॥१३१॥
‘तूने आज अपनी शक्ति के द्वारा युद्ध में जाते हुए जिन लक्ष्मण को आहत किया और जो उस शक्ति की चोट से सहसा मूर्च्छित हो गये थे, उन्हीं के उस तिरस्कार का बदला लेने के लिये आज मैं युद्धभूमि में उपस्थित हुआ हूँ। राक्षसराज! मैं पुत्र-पौत्रोंसहित तेरी मौत बनकर आया हूँ॥ १३१॥
एतेन चात्यद्भुतदर्शनानि शरैर्जनस्थानकृतालयानि।
चतुर्दशान्यात्तवरायुधानि रक्षःसहस्राणि निषूदितानि॥१३२॥
‘रावण! तेरे सामने खड़े हुए इस रघुवंशी राजकुमार ने ही अपने बाणों द्वारा जनस्थाननिवासी उन चौदह हजार राक्षसों का संहार कर डाला था, जो अद्भुत एवं दर्शनीय योद्धा थे और उत्तमोत्तम अस्त्रशस्त्रों से सम्पन्न थे’ ॥ १३२॥
राघवस्य वचः श्रुत्वा राक्षसेन्द्रो महाबलः।
वायुपुत्रं महावेगं वहन्तं राघवं रणे॥१३३॥
रोषेण महताऽऽविष्टः पूर्ववैरमनुस्मरन्।
आजघान शरैर्दीप्तैः कालानलशिखोपमैः॥१३४॥
श्रीरामचन्द्रजी की यह बात सुनकर महाबली राक्षसराज रावण महान् रोष से भर गया। उसे पहले के वैर का स्मरण हो आया और उसने कालाग्नि की शिखा के समान दीप्तिशाली बाणों द्वारा रणभूमि में श्रीरघुनाथजी का वाहन बने हुए महान् वेगशाली वायुपुत्र हनुमान् को अत्यन्त घायल कर दिया। १३३-१३४॥
राक्षसेनाहवे तस्य ताडितस्यापि सायकैः।
स्वभावतेजोयुक्तस्य भूयस्तेजोऽभ्यवर्धत॥१३५॥
युद्धस्थल में उस राक्षस के सायकों से आहत होने पर भी स्वाभाविक तेज से सम्पन्न हनुमान जी का शौर्य और भी बढ़ गया॥ १३५ ॥
ततो रामो महातेजा रावणेन कृतव्रणम्।
दृष्ट्वा प्लवगशार्दूलं क्रोधस्य वशमेयिवान्॥१३६॥
वानरशिरोमणि हनुमान् को रावण ने घायल कर दिया, यह देखकर महातेजस्वी श्रीराम क्रोध के वशीभूत हो गये॥ १३६॥
तस्याभिसंक्रम्य रथं सचक्रं साश्वध्वजच्छत्रमहापताकम्।
ससारथिं साशनिशूलखड्गं रामः प्रचिच्छेद शितैः शराणैः॥१३७॥
फिर तो उन भगवान् श्रीराम ने आक्रमण करके पहिये, घोड़े, ध्वजा, छत्र, पताका, सारथि, अशनि, शूल और खड्गसहित उसके रथ को अपने पैने बाणों से तिल-तिल करके काट डाला॥ १३७॥
अथेन्द्रशत्रु तरसा जघान बाणेन वज्राशनिसंनिभेन।
भुजान्तरे व्यूढसुजातरूपे वज्रेण मेरुं भगवानिवेन्द्रः॥१३८॥
जैसे भगवान् इन्द्र ने वज्र के द्वारा मेरु पर्वत पर आघात किया हो, उसी प्रकार प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने वज्र और अशनि के समान तेजस्वी बाण से इन्द्रशत्रु रावण की विशाल एवं सुन्दर छाती में वेगपूर्वक आघात किया॥
यो वज्रपाताशनिसंनिपातान्न चुक्षुभे नापि चचाल राजा।
स रामबाणाभिहतो भृशार्तश्चचाल चापं च मुमोच वीरः॥१३९॥
जो राजा रावण वज्र और अशनि के आघात से भी कभी क्षुब्ध एवं विचलित नहीं हुआ था, वही वीर उस समय श्रीरामचन्द्रजी के बाणों से घायल हो अत्यन्त आर्त एवं कम्पित हो उठा और उसके हाथ से धनुष छूटकर गिर पड़ा॥१३९॥
तं विह्वलन्तं प्रसमीक्ष्य रामः समाददे दीप्तमथार्धचन्द्रम्।
तेनार्कवर्णं सहसा किरीटं चिच्छेद रक्षोधिपतेर्महात्मा॥१४०॥
रावण को व्याकुल हुआ देख महात्मा श्रीरामचन्द्रजी ने एक चमचमाता हुआ अर्धचन्द्राकार बाण हाथ में लिया और उसके द्वारा राक्षसराज का सूर्य के समान देदीप्यमान मुकुट सहसा काट डाला। १४०॥
तं निर्विषाशीविषसंनिकाशं शान्तार्चिषं सूर्यमिवाप्रकाशम्।
गतश्रियं कृत्तकिरीटकूटमुवाच रामो युधि राक्षसेन्द्रम्॥१४१॥
उस समय धनुष न होने से रावण विषहीन सर्प के समान अपना प्रभाव खो बैठा था। सायंकाल में जिसकी प्रभा शान्त हो गयी हो, उस सूर्यदेव के समान निस्तेज हो गया था तथा मुकुटों का समूह कट जाने से श्रीहीन दिखायी देता था। उस अवस्था में श्रीराम ने युद्धभूमि में राक्षसराज से कहा- ॥ १४१॥
कृतं त्वया कर्म महत् सुभीमं हतप्रवीरश्च कृतस्त्वयाहम्।
तस्मात् परिश्रान्त इति व्यवस्य न त्वां शरैर्मृत्युवशं नयामि॥१४२॥
‘रावण! तुमने आज बड़ा भयंकर कर्म किया है, मेरी सेना के प्रधान-प्रधान वीरों को मार डाला है। इतनेपर भी थका हुआ समझकर मैं बाणों द्वारा तुझे मौत के अधीन नहीं कर रहा हूँ॥ १४२॥
प्रयाहि जानामि रणार्दितस्त्वं प्रविश्य रात्रिंचरराज लङ्काम्।
आश्वस्य निर्याहि रथी च धन्वी तदा बलं प्रेक्ष्यसि मे रथस्थः॥१४३॥
‘निशाचरराज! मैं जानता हूँ तू युद्ध से पीड़ित है इसलिये आज्ञा देता हूँ, जा, लङ्का में प्रवेश करके कुछ देर विश्राम कर ले। फिर रथ और धनुष के साथ निकलना। उस समय रथारूढ़ रहकर तू फिर मेरा बल देखना’॥
स एवमुक्तो हतदर्पहर्षो निकृत्तचापः स हताश्वसूतः।
शरार्दितो भग्नमहाकिरीटो विवेश लङ्कां सहसा स्म राजा॥१४४॥
भगवान् श्रीराम के ऐसा कहने पर राजा रावण सहसा लङ्का में घुस गया। उसका हर्ष और अभिमान मिट्टीमें मिल चुका था, धनुष काट दिया गया था, घोड़े तथा सारथि मार डाले गये थे, महान् किरीट खण्डित हो चुका था और वह स्वयं भी बाणों से बहुत पीड़ित था॥ १४४॥
तस्मिन् प्रविष्टे रजनीचरेन्द्रे महाबले दानवदेवशत्रौ।
हरीन् विशल्यान् सह लक्ष्मणेन चकार रामः परमाहवाग्रे॥१४५॥
देवताओं और दानवों के शत्रु महाबली निशाचरराज रावण के लङ्का में चले जाने पर लक्ष्मणसहित श्रीराम ने उस महायुद्ध के मुहाने पर वानरों के शरीर से बाण निकाले॥
तस्मिन् प्रभग्ने त्रिदशेन्द्रशत्रौ सुरासुरा भूतगणा दिशश्च।
ससागराः सर्षिमहोरगाश्च तथैव भूम्यम्बुचराः प्रहृष्टाः॥१४६॥
देवराज इन्द्र का शत्रु रावण जब युद्धस्थल से भाग गया, तब उसके पराभव का विचार करके देवता, असुर, भूत, दिशाएँ, समुद्र, ऋषिगण, बड़े-बड़े नाग तथा भूचर और जलचर प्राणी भी बहुत प्रसन्न हुए। १४६॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे एकोनषष्टितमः सर्गः॥ ५९॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में उनसठवाँ सर्ग पूरा हुआ।५९॥
सर्ग-60
स प्रविश्य पुरीं लङ्कां रामबाणभयार्दितः।
भग्नदर्पस्तदा राजा बभूव व्यथितेन्द्रियः॥१॥
भगवान् श्रीराम के बाणों और भय से पीड़ित हो राक्षसराज रावण जब लङ्कापुरी में पहुँचा, तब उसका अभिमान चूर-चूर हो गया था। उसकी सारी इन्द्रियाँ व्यथा से व्याकुल थीं॥१॥
मातंग इव सिंहेन गरुडेनेव पन्नगः।
अभिभूतोऽभवद् राजा राघवेण महात्मना॥२॥
जैसे सिंह गजराज को और गरुड़ विशाल नाग को पीड़ित एवं पराजित कर देता है, उसी प्रकार महात्मा रघुनाथजी ने राजा रावण को अभिभूत कर दिया था। २॥
ब्रह्मदण्डप्रतीकानां विधुच्चलितवर्चसाम्।
स्मरन् राघवबाणानां विव्यथे राक्षसेश्वरः॥३॥
भगवान् श्रीराम के बाण ब्रह्मदण्ड के प्रतीक जान पड़ते थे। उनकी दीप्ति चपला के समान चञ्चल थी। उन्हें याद करके राक्षसराज रावण के मन में बड़ी व्यथा हुई॥३॥
स काञ्चनमयं दिव्यमाश्रित्य परमासनम्।
विप्रेक्षमाणो रक्षांसि रावणो वाक्यमब्रवीत्॥४॥
सोने के बने हुए दिव्य एवं श्रेष्ठ सिंहासन पर बैठकर राक्षसों की ओर देखता हुआ रावण उस समय इस प्रकार कहने लगा— ॥४॥
सर्वं तत् खलु मे मोघं यत् तप्तं परमं तपः।
यत् समानो महेन्द्रेण मानुषेण विनिर्जितः॥५॥
‘मैंने जो बहुत बड़ी तपस्या की थी, वह सब अवश्य ही व्यर्थ हो गयी; क्योंकि आज महेन्द्रतुल्य पराक्रमी मुझ रावण को एक मनुष्य ने परास्त कर दिया॥
इदं तद् ब्रह्मणो घोरं वाक्यं मामभ्युपस्थितम्।
मानुषेभ्यो विजानीहि भयं त्वमिति तत्तथा॥६॥
‘ब्रह्माजी ने मुझसे कहा था कि ‘तुम्हें मनुष्यों से भय प्राप्त होगा। इस बात को अच्छी तरह जान लो’। उनका कहा हुआ यह घोर वचन इस समय सफल होकर मेरे समक्ष उपस्थित हुआ है॥६॥
देवदानवगन्धर्वैर्यक्षराक्षसपन्नगैः।
अवध्यत्वं मया प्रोक्तं मानुषेभ्यो न याचितम्॥७॥
‘मैंने तो देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और सोसे ही अवध्य होने का वर माँगा था, अभय होने की वर-याचना नहीं की थी॥७॥
तमिमं मानुषं मन्ये रामं दशरथात्मजम्।
इक्ष्वाकुकुलजातेन अनरण्येन यत् पुरा॥८॥
उत्पत्स्यति हि मदंशपुरुषो राक्षसाधम।
यस्त्वां सपुत्रं सामात्यं सबलं साश्वसारथिम्॥९॥
निहनिष्यति संग्रामे त्वां कुलाधम दुर्मते।
‘पूर्वकाल में इक्ष्वाकुवंशी राजा अनरण्य ने मुझे शाप देते हुए कहा था कि ‘राक्षसाधम! कुलाङ्गार! दुर्मते !मेरे ही वंश में एक ऐसा श्रेष्ठ पुरुष उत्पन्न होगा, जो तुझे पुत्र, मन्त्री, सेना, अश्व और सारथि के सहित समराङ्गण में मार डालेगा।’ मालूम होता है कि अनरण्य ने जिसकी ओर संकेत किया था, यह दशरथकुमार राम वही मनुष्य है॥८-९२ ॥
शप्तोऽहं वेदवत्या च यथा सा धर्षिता पुरा॥१०॥
सेयं सीता महाभागा जाता जनकनन्दिनी।
‘इसके सिवा पूर्वकाल में मुझे वेदवती ने भी शाप दिया था; क्योंकि मैंने उसके साथ बलात्कार किया था। जान पड़ता है वही यह महाभागा जनकनन्दिनी सीता होकर प्रकट हुई है॥ १०॥
उमा नन्दीश्वरश्चापि रम्भा वरुणकन्यका॥
यथोक्तास्तन्मया प्राप्तं न मिथ्या ऋषिभाषितम्।
‘इसी तरह उमा, नन्दीश्वर, रम्भा और वरुणकन्या ने भी जैसा-जैसा कहा था, वैसा ही परिणाम मुझे प्राप्त हुआ है।* सच है ऋषियों की बात कभी झूठी नहीं होती॥ ११ १/२॥
* उमा ने कैलास उठाने के समय भयभीत होने से रावण को शाप दिया था कि ‘तेरी मृत्यु स्त्री के कारण होगी।’ नन्दीश्वर की वानरमूर्ति देखकर रावण हँसा था, इसलिये उन्होंने कहा था—’मेरे समान रूप और पराक्रमवाले ही तेरे कुल का नाश करेंगे।’ रम्भा के निमित्त से नल-कूबर ने और वरुण-कन्या पुञ्जिकस्थला के निमित्त से ब्रह्माजी ने शाप दिया था कि ‘अनिच्छा से किसी स्त्री के साथ सम्भोग करने पर तेरी मृत्यु हो जायगी।’
एतदेव समागम्य यत्नं कर्तुमिहार्हथ॥१२॥
राक्षसाश्चापि तिष्ठन्तु चर्यागोपुरमूर्धसु।
‘ये शाप ही मुझ पर भय अथवा संकट लाने में कारण हुए हैं। इस बात को जानकर अब तुमलोग आये हुए संकट को टालने का प्रयत्न करो। राक्षसलोग राजमार्गों तथा गोपुरों के शिखरों पर उनकी रक्षा के लिये डटे रहें।
स चाप्रतिमगाम्भीर्यो देवदानवदर्पहा॥१३॥
ब्रह्मशापाभिभूतस्तु कुम्भकर्णो विबोध्यताम्।
‘साथ ही जिसके गाम्भीर्य की कहीं तुलना नहीं है, जो देवताओं और दानवों का दर्प दलन करने वाला है तथा ब्रह्माजी के शाप से प्राप्त हुई निद्रा जिसे सदा अभिभूत किये रहती है, उस कुम्भकर्ण को भी जगाया जाय’ ॥ १३ १/२॥
समरे जितमात्मानं प्रहस्तं च निषूदितम्॥१४॥
ज्ञात्वा रक्षोबलं भीममादिदेश महाबलः।
द्वारेषु यत्नः क्रियतां प्राकारश्चाधिरुह्यताम्॥१५॥
निद्रावशसमाविष्टः कुम्भकर्णो विबोध्यताम्।
‘प्रहस्त मारा गया और मैं भी समराङ्गण में परास्त हो गया’ ऐसा जानकर महाबली रावण ने राक्षसों की भयानक सेना को आदेश दिया कि ‘तुमलोग नगर के दरवाजों पर रहकर उनकी रक्षा के लिये यत्न करो। परकोटों पर भी चढ़ जाओ और निद्रा के अधीन हुए कुम्भकर्ण को जगा दो॥ १४-१५ १/२॥
सुखं स्वपिति निश्चिन्तः कामोपहतचेतनः॥
नव सप्त दशाष्टौ च मासान् स्वपिति राक्षसः।
मन्त्रं कृत्वा प्रसुप्तोऽयमितस्तु नवमेऽहनि॥१७॥
(मैं तो दुःखी, चिन्तित और अपूर्ण काम होकर जाग रहा हूँ और) वह राक्षस कामभोग से अचेत हो बड़ी निश्चिन्तता के साथ सुखपूर्वक सो रहा है। वह कभी नौ, कभी सात, कभी दस और कभी आठ मास तक सोता रहता है। यह आज से नौ महीने पहले मुझसे सलाह करके सोया था॥ १६-१७॥
तं तु बोधयत क्षिप्रं कुम्भकर्णं महाबलम्।
स हि संख्ये महाबाहुः ककुदं सर्वरक्षसाम्।
वानरान् राजपुत्रौ च क्षिप्रमेव हनिष्यति॥१८॥
‘अतः तुमलोग महाबली कुम्भकर्ण को शीघ्र जगा दो। महाबाहु कुम्भकर्ण सभी राक्षसों में श्रेष्ठ है। वह युद्धस्थल में वानरों और उन राजकुमारों को भी शीघ्र ही मार डालेगा॥१८॥
एष केतुः परं संख्ये मुख्यो वै सर्वरक्षसाम्।
कुम्भकर्णः सदा शेते मूढो ग्राम्यसुखे रतः॥१९॥
‘समस्त राक्षसों में प्रधान यह कुम्भकर्ण समरभूमि में हमारे लिये सर्वोत्तम विजय-वैजयन्ती के समान है; किंतु खेद की बात है कि वह मूर्ख ग्राम्यसुख में आसक्त होकर सदा सोता रहता है॥ १९॥ ।
रामेणाभिनिरस्तस्य संग्रामेऽस्मिन् सुदारुणे।
भविष्यति न मे शोकः कुम्भकर्णे विबोधिते॥२०॥
‘यदि कुम्भकर्ण को जगा दिया जाय तो इस भयंकर संग्राम में मुझे राम से पराजित होने का शोक नहीं होगा॥ २०॥
किं करिष्याम्यहं तेन शक्रतुल्यबलेन हि।
ईदृशे व्यसने घोरे यो न साह्याय कल्पते॥२१॥
‘यदि इस घोर संकट के समय भी कुम्भकर्ण मेरी सहायता करने में समर्थ नहीं हो रहा है तो इन्द्र के तुल्य बलशाली होने पर भी उससे मेरा प्रयोजन ही क्या है—मैं उसे लेकर क्या करूँगा?’ ॥ २१॥
ते तु तद् वचनं श्रुत्वा राक्षसेन्द्रस्य राक्षसाः।
जग्मुः परमसम्भ्रान्ताः कुम्भकर्णनिवेशनम्॥२२॥
राक्षसराज रावण की वह बात सुनकर समस्त राक्षस बड़ी घबराहट में पड़कर कुम्भकर्ण के घर गये॥ २२॥
ते रावणसमादिष्टा मांसशोणितभोजनाः।
गन्धं माल्यं महद्भक्ष्यमादाय सहसा ययुः ॥२३॥
रक्त-मांस का भोजन करने वाले वे राक्षस रावण की आज्ञा पाकर गन्ध, माल्य तथा खाने-पीने की बहुत-सी सामग्री लिये सहसा कुम्भकर्ण के पास गये॥ २३॥
तां प्रविश्य महाद्वारा सर्वतो योजनायताम्।
कुम्भकर्णगुहां रम्यां पुष्पगन्धप्रवाहिनीम्॥२४॥
कुम्भकर्णस्य निःश्वासादवधूता महाबलाः।
प्रतिष्ठमानाः कृच्छ्रेण यत्नात् प्रविविशुर्गुहाम्॥२५॥
कुम्भकर्ण एक गुफा में रहता था, जो बड़ी ही सुन्दर थी और वहाँ के वातावरण में फूलों की सुगन्ध छायी रहती थी। उसकी लंबाई-चौड़ाई सब ओर से एक-एक योजन की थी तथा उसका दरवाजा बहुत बड़ा था। उसमें प्रवेश करते ही वे महाबली राक्षस कुम्भकर्ण की साँस के वेग से सहसा पीछे को ठेल दिये गये। फिर बड़ी कठिनाई से पैर जमाते हुए वे पूरा प्रयत्न करके उस गुफा के भीतर घुसे॥२४-२५ ॥
तां प्रविश्य गुहां रम्यां रत्नकाञ्चनकुट्टिमाम्।
ददृशुर्नैर्ऋतव्याघ्राः शया भीमविक्रमम्॥२६॥
उस गुफा की फर्श में रत्न और सुवर्ण जड़े गये थे, जिससे उसकी रमणीयता बहुत बढ़ गयी थी। उसके भीतर प्रवेश करके उन श्रेष्ठ राक्षसों ने देखा, भयानक पराक्रमी कुम्भकर्ण सो रहा है ॥ २६ ॥
ते तु तं विकृतं सुप्तं विकीर्णमिव पर्वतम्।
कुम्भकर्णं महानिद्रं समेताः प्रत्यबोधयन्॥२७॥
महानिद्रा में निमग्न हुआ कुम्भकर्ण बिखरे हुए पर्वत के समान विकृतावस्था में सो कर खर्राटे ले रहा था, अतः वे सब राक्षस एकत्र हो उसे जगाने की चेष्टा करने लगे॥२७॥
ऊर्ध्वलोमाञ्चिततनुं श्वसन्तमिव पन्नगम्।
भ्रामयन्तं विनिःश्वासैः शयानं भीमविक्रमम्॥२८॥
उसका सारा शरीर ऊपर उठी हुई रोमावलियों से भरा था। वह सर्प के समान साँस लेता और अपने निःश्वासों से लोगों को चक्कर में डाल देता था। वहाँ सोया हुआ वह राक्षस भयानक बल-विक्रम से सम्पन्न था॥२८॥
भीमनासापुटं तं तु पातालविपुलाननम्।
शयने न्यस्तसर्वाऊँ मेदोरुधिरगन्धिनम्॥२९॥
उसकी नासिका के दोनों छिद्र बड़े भयंकर थे। मुँह पाताल के समान विशाल था। उसने अपना सारा शरीर शय्या पर डाल रखा था और उसकी देह से रक्त और चर्बी की-सी गन्ध प्रकट होती थी॥२९॥
काञ्चनाङ्गदनद्धाऊं किरीटेनार्कवर्चसम्।
ददृशुर्नैर्ऋतव्याघ्रं कुम्भकर्णमरिंदमम्॥३०॥
उसकी भुजाओं में बाजूबन्द शोभा पाते थे। मस्तक पर तेजस्वी किरीट धारण करने के कारण वह सूर्यदेव के समान प्रभापुञ्ज से प्रकाशित हो रहा था। इस रूप में निशाचरश्रेष्ठ शत्रुदमन कुम्भकर्ण को उन राक्षसों ने देखा॥३०॥
ततश्चक्रुर्महात्मानः कुम्भकर्णस्य चाग्रतः।
भूतानां मेरुसंकाशं राशिं परमतर्पणम्॥३१॥
तदनन्तर उन महाकाय निशाचरों ने कुम्भकर्ण के सामने प्राणियों के मेरुपर्वत-जैसे ढेर लगा दिये, जो उसे अत्यन्त तृप्ति प्रदान करने वाले थे॥ ३१॥
मृगाणां महिषाणां च वराहाणां च संचयान्।
चक्रुर्नैर्ऋतशार्दूला राशिमन्नस्य चाद्भुतम्॥ ३२॥
उन श्रेष्ठ राक्षसों ने वहाँ मृगों, भैंसों और सूअरों के समूह खड़े कर दिये तथा अन्न की भी अद्भुत राशि एकत्र कर दी॥ ३२॥
ततः शोणितकुम्भांश्च मांसानि विविधानि च।
पुरस्तात् कुम्भकर्णस्य चक्रुस्त्रिदशशत्रवः॥३३॥
इतना ही नहीं, उन देवद्रोहियों ने कुम्भकर्ण के आगे रक्त से भरे हुए बहुतेरे घड़े और नाना प्रकार के मांस भी रख दिये॥३३॥
लिलिपुश्च परायेन चन्दनेन परंतपम्।
दिव्यैराश्वासयामासुर्माल्यैर्गन्धैश्च गन्धिभिः॥३४॥
धूपगन्धांश्च ससृजुस्तुष्टुवुश्च परंतपम्।
जलदा इव चानेदुर्यातुधानास्ततस्ततः॥ ३५॥
तत्पश्चात् उन्होंने शत्रुसंतापी कुम्भकर्ण के शरीर में बहुमूल्य चन्दन का लेप किया। दिव्य सुगन्धित पुष्प और चन्दन सुघाँये। धूपों की सुगन्ध फैलायी। उस शत्रुदमन वीर की स्तुति की तथा जहाँ-तहाँ खड़े हुए राक्षस मेघों के समान गम्भीर ध्वनि से गर्जना करने लगे॥
शङ्खाश्च पूरयामासुः शशाङ्कसदृशप्रभान्।
तुमुलं युगपच्चापि विनेदुश्चाप्यमर्षिताः॥३६॥
(इतने पर भी जब कुम्भकर्ण नहीं उठा, तब) अमर्ष से भरे हुए राक्षस चन्द्रमा के समान श्वेत रंग के बहुत-से शङ्ख फूंकने तथा एक साथ तुमुल-ध्वनि से गर्जना करने लगे॥ ३६॥
नेदुरास्फोटयामासुश्चिक्षिपुस्ते निशाचराः।
कुम्भकर्णविबोधार्थं चक्रुस्ते विपुलं स्वरम्॥३७॥
वे निशाचर सिंहनाद करने, ताल ठोंकने और कुम्भकर्ण के विभिन्न अङ्गों को झकझोरने लगे। उन्होंने कुम्भकर्ण को जगाने के लिये बड़े जोर-जोर से गम्भीर ध्वनि की॥ ३७॥
सशङ्खभेरीपणवप्रणादं सास्फोटितक्ष्वेलितसिंहनादम्।
दिशो द्रवन्तस्त्रिदिवं किरन्तः श्रुत्वा विहंगाः सहसा निपेतुः॥ ३८॥
शङ्ख, भेरी और पणव बजने लगे। ताल ठोंकने, गर्जने और सिंहनाद का शब्द सब ओर गूंज उठा। वह तुमुल नाद सुनकर पक्षी समस्त दिशाओं की ओर भागने और आकाश में उड़ने लगे। उड़ते-उड़ते वे सहसा पृथ्वी पर गिर पड़ते थे॥ ३८॥
यदा भृशं तैर्निनदैर्महात्मा न कुम्भकर्णो बुबुधे प्रसुप्तः।
ततो भुशुण्डीर्मुसलानि सर्वे रक्षोगणास्ते जगृहुर्गदाश्च ॥ ३९॥
जब उस महान् कोलाहल से भी सोया हुआ विशालकाय कुम्भकर्ण नहीं जग सका, तब उन समस्त राक्षसों ने अपने हाथों में भुशुण्डी, मूसल और गदाएँ ले लीं॥ ३९॥
तं शैलशृङ्गैर्मुसलैर्गदाभिर्वक्षःस्थले मुद्गरमुष्टिभिश्च।
सुखप्रसुप्तं भुवि कुम्भकर्णं रक्षांस्युदग्राणि तदा निजघ्नुः॥४०॥
कुम्भकर्ण भूतल पर ही सुख से सो रहा था। उसी अवस्था में उन प्रचण्ड राक्षसों ने उस समय उसकी छाती पर पर्वतशिखरों, मूसलों, गदाओं, मुद्गरों और मुक्कों से मारना आरम्भ किया॥ ४०॥
तस्य निःश्वासवातेन कुम्भकर्णस्य रक्षसः।
राक्षसाः कुम्भकर्णस्य स्थातुं शेकुर्न चाग्रतः॥४१॥
किंतु राक्षस कुम्भकर्ण की निःश्वास-वायु से प्रेरित हो वे सब निशाचर उसके आगे ठहर नहीं पाते थे।
ततः परिहिता गाढं राक्षसा भीमविक्रमाः।
मृदङ्गपणवान् भेरीः शङ्खकुम्भगणांस्तथा॥४२॥
दश राक्षससाहस्रं युगपत्पर्यवारयत्।
नीलाञ्जनचयाकारं ते तु तं प्रत्यबोधयन्॥४३॥
तदनन्तर अपने वस्त्रों को खूब कसकर बाँध लेने के पश्चात् वे भयानक पराक्रमी राक्षस जिनकी संख्या लगभग दस हजार थी, एक ही समय कुम्भकर्ण को घेरकर खड़े हो गये और काले कोयले के ढेर के समान पड़े हुए उस निशाचर को जगाने का प्रयत्न करने लगे। उन सबने एक साथ मृदंग, पणव, भेरी, शङ्ख और कुम्भ (धौंसे) बजाने आरम्भ किये॥ ४२-४३॥
अभिनन्तो नदन्तश्च न च सम्बुबुधे तदा।
यदा चैनं न शेकुस्ते प्रतिबोधयितुं तदा॥४४॥
ततो गुरुतरं यत्नं दारुणं समुपाक्रमन्।
इस तरह वे राक्षस बाजे बजाते और गर्जते रहे तो भी कुम्भकर्ण की निद्रा नहीं टूटी। जब वे उसे किसी तरह जगान सके, तब उन्होंने पहले से भी भारी प्रयत्न आरम्भ किया॥४४ १/२॥
अश्वानुष्ट्रान् खरान् नागाजघ्नुर्दण्डकशाङ्कशैः॥४५॥
भेरीशङ्खमृदङ्गांश्च सर्वप्राणैरवादयन्।
निजजुश्चास्य गात्राणि महाकाष्ठकटंकरैः॥४६॥
मुद्गरैर्मुसलैश्चापि सर्वप्राणसमुद्यतैः।
तेन नादेन महता लङ्का सर्वा प्रपूरिता।
सपर्वतवना सर्वा सोऽपि नैव प्रबुध्यते॥४७॥
वे घोड़ों, ऊँटों, गदहों और हाथियों को डंडों, कोड़ों तथा अंकुशों से मार-मारकर उसके ऊपर ठेलने लगे। सारी शक्ति लगाकर भेरी, मृदङ्ग और शङ्ख बजाने लगे तथा पूरा बल लगाकर उठाये गये बड़े-बड़े काष्ठों के समूहों, मुद्गरों और मूसलों से भी उसके अङ्गों पर प्रहार करने लगे। उस महान् कोलाहल से पर्वतों और वनोंसहित सारी लङ्का गूंज उठी, परंतु कुम्भकर्ण नहीं जागा, नहीं जागा॥ ४५-४७॥
ततो भेरीसहस्रं तु युगपत् समहन्यत।
मृष्टकाञ्चनकोणानामसक्तानां समन्ततः॥४८॥
तदनन्तर सब ओर सहस्रों धौंसे एक साथ बजाये जाने लगे। वे सब-के-सब लगातार बजते रहे। उन्हें बजाने के लिये जो डंडे थे, वे सुन्दर सुवर्ण के बने हुए थे॥
एवमप्यतिनिद्रस्तु यदा नैव प्रबुध्यते।
शापस्य वशमापन्नस्ततः क्रुद्धा निशाचराः॥४९॥
इतने पर भी शाप के अधीन हुआ वह अतिशय निद्रालु निशाचर नहीं जागा। इससे वहाँ आये हुए सब राक्षसों को बड़ा क्रोध हुआ॥४९॥
ततः कोपसमाविष्टाः सर्वे भीमपराक्रमाः।
तद् रक्षो बोधयिष्यन्तश्चक्रुरन्ये पराक्रमम्॥५०॥
फिर वे रोष से भरे हुए सभी भयानक पराक्रमी निशाचर उस राक्षस को जगाने के लिये पराक्रम करने लगे॥
अन्ये भेरीः समाजघ्नुरन्ये चक्रुर्महास्वनम्।
केशानन्ये प्रलुलुपुः कर्णानन्ये दशन्ति च॥५१॥
कोई धौंसे बजाने लगे, कोई महान् कोलाहल करने लगे, कोई कुम्भकर्ण के सिर के बाल नोचने लगे और कोई दाँतों से उसके कान काटने लगे॥५१॥
उदकुम्भशतानन्ये समसिञ्चन्त कर्णयोः।
न कुम्भकर्णः पस्पन्दे महानिद्रावशं गतः॥५२॥
दूसरे राक्षसों ने उसके दोनों कानों में सौ घड़े पानी डाल दिये तो भी महानिद्रा के वश में पड़ा हुआ कुम्भकर्ण टस-से-मस नहीं हुआ॥५२॥
अन्ये च बलिनस्तस्य कूटमुद्गरपाणयः।
मूर्ध्नि वक्षसि गात्रेषु पातयन् कूटमुद्गरान्॥५३॥
दूसरे बलवान् राक्षस काँटेदार मुद्गर हाथ में लेकर उन्हें उसके मस्तक, छाती तथा अन्य अङ्गों पर गिराने लगे॥ ५३॥
रज्जुबन्धनबद्धाभिः शतघ्नीभिश्च सर्वतः।
वध्यमानो महाकायो न प्राबुध्यत राक्षसः॥५४॥
तत्पश्चात् रस्सियों से बँधी हुई शतघ्नियों द्वारा उस पर सब ओर से चोटें पड़ने लगीं। फिर भी उस महाकाय राक्षस की नींद नहीं टूटी ॥ ५४॥
वारणानां सहस्रं च शरीरेऽस्य प्रधावितम्।
कुम्भकर्णस्तदा बुद्ध्वा स्पर्श परमबुध्यत॥५५॥
इसके बाद उसके शरीर पर हजारों हाथी दौड़ाये गये। तब उसे कुछ स्पर्श मालूम हुआ और वह जाग उठा॥
स पात्यमानैर्गिरिशृङ्गवृक्षरचिन्तयंस्तान् विपुलान् प्रहारान्।
निद्राक्षयात् क्षुद्भयपीडितश्च विजृम्भमाणः सहसोत्पपात॥५६॥
यद्यपि उसके ऊपर पर्वतशिखर और वृक्ष गिराये जाते थे, तथापि उसने उन भारी प्रहारों को कुछ भी नहीं गिना। हाथियों के स्पर्श से जब उसकी नींद टूटी, तब वह भूख के भय से पीड़ित हो अँगड़ाई लेता हुआ सहसा उछलकर खड़ा हो गया॥५६॥
स नागभोगाचलशृङ्गकल्पौ विक्षिप्य बाहू जितवज्रसारौ।
विवृत्य वक्त्रं वडवामुखाभं निशाचरोऽसौ विकृतं जजृम्भे॥५७॥
उसकी दोनों भुजाएँ नागों के शरीर और पर्वतशिखरों के समान जान पड़ती थीं। उन्होंने वज्र की शक्ति को पराजित कर दिया था। उन दोनों बाँहों और मुँह को फैलाकर जब वह निशाचर जम्हाई लेने लगा, उस समय उसका मुख बड़वानल के समान विकराल जान पड़ता था॥ ५७॥
तस्य जाजृम्भमाणस्य वक्त्रं पातालसंनिभम्।
ददृशे मेरुशृङ्गाग्रे दिवाकर इवोदितः॥५८॥
जम्हाई लेते समय कुम्भकर्ण का पाताल-जैसा मुख मेरुपर्वत के शिखर पर उगे हुए सूर्य के समान दिखायी देता था॥ ५८॥
स जृम्भमाणोऽतिबलः प्रबुद्धस्तु निशाचरः।
निःश्वासश्चास्य संजज्ञे पर्वतादिव मारुतः॥५९॥
इस तरह जम्हाई लेता हुआ वह अत्यन्त बलशाली निशाचर जब जगा, तब उसके मुख से जो साँस निकलती थी, वह पर्वत-से चली हुई वायु के समान प्रतीत होती थी॥
रूपमुत्तिष्ठतस्तस्य कुम्भकर्णस्य तद् बभौ।
युगान्ते सर्वभूतानि कालस्येव दिधक्षतः॥६०॥
नींद से उठे हुए कुम्भकर्ण का वह रूप प्रलयकाल में समस्त प्राणियों के संहार की इच्छा रखने वाले काल के समान जान पड़ता था॥ ६०॥
तस्य दीप्ताग्निसदृशे विद्युत्सदृशवर्चसी।
ददृशाते महानेत्रे दीप्ताविव महाग्रहौ॥६१॥
उसकी दोनों बड़ी-बड़ी आँखें प्रज्वलित अग्नि और विद्युत् के समान दीप्तिमती दिखायी देती थीं। वे ऐसी लगती थीं मानो दो महान् ग्रह प्रकाशित हो रहे हों॥ ६१॥
ततस्त्वदर्शयन् सर्वान् भक्ष्यांश्च विविधान् बहून्।
वराहान् महिषांश्चैव बभक्ष स महाबलः॥६२॥
चारयन् सर्वतो दृष्टिं तान् ददर्श निशाचरान्॥६५॥
उस समय उसके नेत्र निद्रा के कारण अप्रसन्नकुछ-कुछ खुले हुए थे और मलिन जान पड़ते थे। उसने सब ओर दृष्टि डालकर वहाँ खड़े हुए निशाचरों को देखा॥६५॥
स सर्वान् सान्त्वयामास नैर्ऋतान् नैर्ऋतर्षभः।
बोधनाद् विस्मितश्चापि राक्षसानिदमब्रवीत् ॥६६॥
निशाचरों में श्रेष्ठ कुम्भकर्ण ने उन सब राक्षसों को सान्त्वना दी और अपने जगाये जाने के कारण विस्मित हो उनसे इस प्रकार पूछा- ॥६६॥
किमर्थमहमादृत्य भवद्भिः प्रतिबोधितः।
कच्चित् सुकुशलं राज्ञो भयं वा नेह किंचन॥६७॥
‘तुमलोगों ने इस प्रकार आदर करके मुझे किसलिये जगाया है? राक्षसराज रावण कुशल से हैं न? यहाँ कोई भय तो नहीं उपस्थित हुआ है ? ॥ ६७॥
अथवा ध्रुवमन्येभ्यो भयं परमुपस्थितम्।
यदर्थमेव त्वरितैर्भवद्भिः प्रतिबोधितः॥६८॥
‘अथवा निश्चय ही यहाँ दूसरों से कोई महान् भय उपस्थित हुआ है, जिसके निवारण के लिये तुमलोगों ने इतनी उतावली के साथ मुझे जगाया है॥ ६८॥
अद्य राक्षसराजस्य भयमुत्पाटयाम्यहम्।
दारयिष्ये महेन्द्रं वा शीतयिष्ये तथानलम्॥६९॥
‘अच्छा तो आज मैं राक्षसराज के भय को उखाड़ फेंकूँगा। महेन्द्र (पर्वत या इन्द्र)-को भी चीर डालूँगा और अग्नि को भी ठंडा कर दूंगा॥ ६९॥
न ह्यल्पकारणे सुप्तं बोधयिष्यति मादृशम्।
तदाख्यातार्थतत्त्वेन मत्प्रबोधनकारणम्॥७०॥
‘मुझ-जैसे पुरुष को किसी छोटे-मोटे कारणवश नींद से नहीं जगाया जायगा। अतः तुमलोग ठीक-ठीक बताओ, मेरे जगाये जाने का क्या कारण है ?’ ॥ ७० ॥
एवं ब्रुवाणं संरब्धं कुम्भकर्णमरिंदमम्।
यूपाक्षः सचिवो राज्ञः कृताञ्जलिरभाषत॥७१॥
शत्रुसूदन कुम्भकर्ण जब रोष में भरकर इस प्रकार पूछने लगा, तब राजा रावण के सचिव यूपाक्ष ने हाथ जोड़कर कहा- ॥ ७१॥
न नो देवकृतं किंचिद् भयमस्ति कदाचन।
मानुषान्नो भयं राजंस्तुमुलं सम्प्रबाधते॥७२॥
‘महाराज! हमें देवताओं की ओर से तो कभी कोई भय हो ही नहीं सकता। इस समय केवल एक मनुष्य से तुमुल भय प्राप्त हुआ है, जो हमें सता रहा है॥७२॥
न दैत्यदानवेभ्यो वा भयमस्ति न नः क्वचित्।
यादृशं मानुषं राजन् भयमस्मानुपस्थितम्॥७३॥
‘राजन्! इस समय एक मनुष्य से हमारे लिये जैसा भय उपस्थित हो गया है, वैसा तो कभी दैत्यों और दानवों से भी नहीं हुआ था॥७३॥ ।
वानरैः पर्वताकारैर्लङ्केयं परिवारिता।
सीताहरणसंतप्ताद् रामान्नस्तुमुलं भयम्॥७४॥
‘पर्वताकार वानरों ने आकर इस लङ्कापुरी को चारों ओर से घेर लिया है। सीताहरण से संतप्त हुए श्रीराम की ओर से हमें तुमुल भय की प्राप्ति हुई है। ७४॥
एकेन वानरेणेयं पूर्वं दग्धा महापुरी।
कुमारो निहतश्चाक्षः सानुयात्रः सकुञ्जरः॥७५॥
‘पहले एक ही वानर ने यहाँ आकर इस महापुरी को जला दिया था और हाथियों तथा साथियोंसहित राजकुमार अक्ष को भी मार डाला था॥ ७५ ॥
स्वयं रक्षोधिपश्चापि पौलस्त्यो देवकण्टकः।
व्रजेति संयुगे मुक्तो रामेणादित्यवर्चसा॥७६॥
‘श्रीराम सूर्य के समान तेजस्वी हैं। उन्होंने देवशत्रु पुलस्त्यकुलनन्दन साक्षात् राक्षसराज रावण को भी युद्ध में हराकर जीवित छोड़ दिया और कहा —’लङ्का को लौट जाओ’ ॥ ७६॥
यन्न देवैः कृतो राजा नापि दैत्यैर्न दानवैः।
कृतः स इह रामेण विमुक्तः प्राणसंशयात्॥७७॥
‘महाराज की जो दशा देवता, दैत्य और दानव भी नहीं कर सके थे, वह राम ने कर दी। उनके प्राण बड़े संकट से बचे हैं’।। ७७॥
स यूपाक्षवचः श्रुत्वा भ्रातुर्युधि पराभवम्।
कुम्भकर्णो विवृत्ताक्षो यूपाक्षमिदमब्रवीत्॥७८॥
युद्ध में भाई की पराजय से सम्बन्ध रखने वाली यूपाक्ष की यह बात सुनकर कुम्भकर्ण आँखें फाड़फाड़कर देखने लगा और यूपाक्ष से इस प्रकार बोला — ॥ ७८॥
सर्वमद्यैव यूपाक्ष हरिसैन्यं सलक्ष्मणम्।
राघवं च रणे जित्वा ततो द्रक्ष्यामि रावणम्॥७९॥
‘यूपाक्ष! मैं अभी सारी वानरसेना को तथा लक्ष्मणसहित राम को भी रणभूमि में परास्त करके रावण का दर्शन करूँगा॥७९॥
राक्षसांस्तर्पयिष्यामि हरीणां मांसशोणितैः।
रामलक्ष्मणयोश्चापि स्वयं पास्यामि शोणितम्॥८०॥
‘आज वानरों के मांस और रक्त से राक्षसों को तृप्त करूँगा और स्वयं भी राम और लक्ष्मण के खून पीऊँगा’॥ ८०॥
तत् तस्य वाक्यं ब्रुवतो निशम्य सगर्वितं रोषविवृद्धदोषम्।
महोदरो नैर्ऋतयोधमुख्यः कृताञ्जलिर्वाक्यमिदं बभाषे॥८१॥
कुम्भकर्ण के बढ़े हुए रोष-दोष से युक्त अहङ्कारपूर्ण वचन सुनकर राक्षस-योद्धाओं में प्रधान महोदर ने हाथ जोड़कर यह बात कही- ॥ ८१॥
रावणस्य वचः श्रुत्वा गुणदोषौ विमृश्य च।
पश्चादपि महाबाहो शत्रून् युधि विजेष्यसि॥८२॥
‘महाबाहो! पहले चलकर महाराज रावण की बात सुन लीजिये। फिर गुण-दोष का विचार करने के पश्चात् युद्ध में शत्रुओं को परास्त कीजियेगा’ ॥ ८२॥
महोदरवचः श्रुत्वा राक्षसैः परिवारितः।
कुम्भकर्णो महातेजाः सम्प्रतस्थे महाबलः॥८३॥
महोदर की यह बात सुनकर राक्षसों से घिरा हुआ महातेजस्वी महाबली कुम्भकर्ण वहाँ से चलने की तैयारी करने लगा॥ ८३॥
सुप्तमुत्थाप्य भीमाक्षं भीमरूपपराक्रमम्।
राक्षसास्त्वरिता जग्मुर्दशग्रीवनिवेशनम्॥८४॥
इस तरह सोये हुए भयानक नेत्र, रूप और पराक्रमवाले कुम्भकर्ण को उठाकर वे राक्षस शीघ्र ही दशमुख रावण के महल में गये॥ ८४ ॥
तेऽभिगम्य दशग्रीवमासीनं परमासने।
ऊचुर्बद्धाञ्जलिपुटाः सर्व एव निशाचराः॥८५॥
दशग्रीव उत्तम सिंहासन पर बैठा हुआ था, उसके पास जा सभी निशाचर हाथ जोड़कर बोले- ॥ ८५ ॥
कुम्भकर्णः प्रबुद्धोऽसौ भ्राता ते राक्षसेश्वर।
कथं तत्रैव निर्यातु द्रक्ष्यसे तमिहागतम्॥८६॥
‘राक्षसेश्वर! आपके भाई कुम्भकर्ण जाग उठे हैं। कहिये, वे क्या करें? सीधे युद्धस्थल में ही पधारें या आप उन्हें यहाँ उपस्थित देखना चाहते हैं? ॥ ८६॥
रावणस्त्वब्रवीद्धृष्टो राक्षसांस्तानुपस्थितान्।
द्रष्टमेनमिहेच्छामि यथान्यायं च पूज्यताम्॥८७॥
तब रावण ने बड़े हर्ष के साथ उन उपस्थित हुए राक्षसों से कहा—’मैं कुम्भकर्ण को यहाँ देखना चाहता हूँ, उनका यथोचित सत्कार किया जाय’ ॥ ८७॥
तथेत्युक्त्वा तु ते सर्वे पुनरागम्य राक्षसाः।
कुम्भकर्णमिदं वाक्यमूचू रावणचोदिताः॥८८॥
तब ‘जो आज्ञा’ कहकर रावण के भेजे हुए वे सब राक्षस पुनः कुम्भकर्ण के पास आ इस प्रकार बोले
द्रष्टुं त्वां काङ्क्षते राजा सर्वराक्षसपुङ्गवः।
गमने क्रियतां बुद्धिर्भ्रातरं सम्प्रहर्षय॥८९॥
‘प्रभो! सर्वराक्षसशिरोमणि महाराज रावण आपको देखना चाहते हैं। अतः आप वहाँ चलने का विचार करें और पधारकर अपने भाई का हर्ष बढ़ावें ॥ ८९॥
कुम्भकर्णस्तु दुर्धर्षो भ्रातुराज्ञाय शासनम्।
कुम्भकर्णः प्रबुद्धोऽसौ भ्राता ते राक्षसेश्वर।
कथं तत्रैव निर्यातु द्रक्ष्यसे तमिहागतम्॥८६॥
‘राक्षसेश्वर! आपके भाई कुम्भकर्ण जाग उठे हैं। कहिये, वे क्या करें? सीधे युद्धस्थल में ही पधारें या आप उन्हें यहाँ उपस्थित देखना चाहते हैं? ॥ ८६॥
रावणस्त्वब्रवीद्धृष्टो राक्षसांस्तानुपस्थितान्।
द्रष्टमेनमिहेच्छामि यथान्यायं च पूज्यताम्॥८७॥
तब रावण ने बड़े हर्ष के साथ उन उपस्थित हुए राक्षसों से कहा—’मैं कुम्भकर्ण को यहाँ देखना चाहता हूँ, उनका यथोचित सत्कार किया जाय’ ॥ ८७॥
तथेत्युक्त्वा तु ते सर्वे पुनरागम्य राक्षसाः।
कुम्भकर्णमिदं वाक्यमूचू रावणचोदिताः॥८८॥
तब ‘जो आज्ञा’ कहकर रावण के भेजे हुए वे सब राक्षस पुनः कुम्भकर्ण के पास आ इस प्रकार बोले
द्रष्टुं त्वां काङ्क्षते राजा सर्वराक्षसपुङ्गवः।
गमने क्रियतां बुद्धिर्भ्रातरं सम्प्रहर्षय॥८९॥
‘प्रभो! सर्वराक्षसशिरोमणि महाराज रावण आपको देखना चाहते हैं। अतः आप वहाँ चलने का विचार करें और पधारकर अपने भाई का हर्ष बढ़ावें ॥ ८९॥
कुम्भकर्णस्तु दुर्धर्षो भ्रातुराज्ञाय शासनम्।
कुम्भकर्णः प्रबुद्धोऽसौ भ्राता ते राक्षसेश्वर।
कथं तत्रैव निर्यातु द्रक्ष्यसे तमिहागतम्॥८६॥
‘राक्षसेश्वर! आपके भाई कुम्भकर्ण जाग उठे हैं। कहिये, वे क्या करें? सीधे युद्धस्थल में ही पधारें या आप उन्हें यहाँ उपस्थित देखना चाहते हैं? ॥ ८६॥
रावणस्त्वब्रवीद्धृष्टो राक्षसांस्तानुपस्थितान्।
द्रष्टमेनमिहेच्छामि यथान्यायं च पूज्यताम्॥८७॥
तब रावण ने बड़े हर्ष के साथ उन उपस्थित हुए राक्षसों से कहा—’मैं कुम्भकर्ण को यहाँ देखना चाहता हूँ, उनका यथोचित सत्कार किया जाय’ ॥ ८७॥
तथेत्युक्त्वा तु ते सर्वे पुनरागम्य राक्षसाः।
कुम्भकर्णमिदं वाक्यमूचू रावणचोदिताः॥८८॥
तब ‘जो आज्ञा’ कहकर रावण के भेजे हुए वे सब राक्षस पुनः कुम्भकर्ण के पास आ इस प्रकार बोले
द्रष्टुं त्वां काङ्क्षते राजा सर्वराक्षसपुङ्गवः।
गमने क्रियतां बुद्धिर्भ्रातरं सम्प्रहर्षय॥८९॥
‘प्रभो! सर्वराक्षसशिरोमणि महाराज रावण आपको देखना चाहते हैं। अतः आप वहाँ चलने का विचार करें और पधारकर अपने भाई का हर्ष बढ़ावें ॥ ८९॥
कुम्भकर्णस्तु दुर्धर्षो भ्रातुराज्ञाय शासनम्।
तथेत्युक्त्वा महावीर्यः शयनादुत्पपात ह॥९०॥
भाई का यह आदेश पाकर महापराक्रमी दुर्जय वीर कुम्भकर्ण ‘बहुत अच्छा’ कहकर शय्या से उठकर खड़ा हो गया॥९०॥
प्रक्षाल्य वदनं हृष्टः स्नातः परमहर्षितः।
पिपासुस्त्वरयामास पानं बलसमीरणम्॥९१॥
उसने बड़े हर्ष और प्रसन्नता के साथ मुँह धोकर स्नान किया और पीने की इच्छा से तुरंत बलवर्धक पेय ले आने की आज्ञा दी॥ ९१॥
ततस्ते त्वरितास्तत्र राक्षसा रावणाज्ञया।
मद्यं भक्ष्यांश्च विविधान् क्षिप्रमेवोपहारयन्॥९२॥
तब रावण के आदेश से वे सब राक्षस तुरंत मद्य तथा नाना प्रकार के भक्ष्य पदार्थ ले आये॥ ९२॥
पीत्वा घटसहस्रे द्वे गमनायोपचक्रमे।
ईषत्समुत्कटो मत्तस्तेजोबलसमन्वितः॥९३॥
कुम्भकर्ण दो हजार घड़े मद्य गटककर चलने को उद्यत हुआ। इससे उसमें कुछ ताजगी आ गयी तथा वह मतवाला, तेजस्वी और शक्तिसम्पन्न हो गया।
कुम्भकर्णो बभौ रुष्टः कालान्तकयमोपमः।
भ्रातुः स भवनं गच्छन् रक्षोबलसमन्वितः।
कुम्भकर्णः पदन्यासैरकम्पयत मेदिनीम्॥९४॥
फिर जब राक्षसों की सेना के साथ कुम्भकर्ण भाई के महल की ओर चला, उस समय वह रोष से भरे हुए प्रलयकाल के विनाशकारी यमराज के समान जान पड़ता था। कुम्भकर्ण अपने पैरों की धमक से सारी पृथ्वी को कम्पित कर रहा था॥९४ ॥
स राजमार्ग वपुषा प्रकाशयन् सहस्ररश्मिर्धरणीमिवांशुभिः।
जगाम तत्राञ्जलिमालया वृतः शतक्रतुर्गेहमिव स्वयंभुवः॥ ९५॥
जैसे सूर्यदेव अपनी किरणों से भूतल को प्रकाशित करते हैं, उसी प्रकार वह अपने तेजस्वी शरीर से राजमार्ग को उद्भासित करता हुआ हाथ जोड़े अपने भाई के महल में गया। ठीक उसी तरह, जैसे देवराज इन्द्र ब्रह्माजी के धाम में जाते हैं। ९५॥
तं राजमार्गस्थममित्रघातिनं वनौकसस्ते सहसा बहिःस्थिताः।
दृष्ट्वाप्रमेयं गिरिशृङ्गकल्पं वितत्रसुस्ते सह यूथपालैः॥ ९६॥
राजमार्ग पर चलते समय शत्रुघाती कुम्भकर्ण पर्वतशिखर के समान जान पड़ता था। नगर के बाहर खड़े हुए वानर सहसा उस विशालकाय राक्षस को देखकर सेनापतियोंसहित सहम गये॥ ९६ ॥
केचिच्छरण्यं शरणं स्म रामं व्रजन्ति केचिद् व्यथिताः पतन्ति।
केचिद् दशश्च व्यथिताः पतन्ति केचिद् भयार्ता भुवि शेरते स्म॥ ९७॥
उनमें से कुछ वानरों ने शरणागतवत्सल भगवान् श्रीराम की शरण ली। कुछ व्यथित होकर गिर पड़े। कोई पीड़ित हो सम्पूर्ण दिशाओं में भाग गये और जहाँ-तहाँ धराशायी हो गये और कितने ही वानर भय से पीड़ित हो धरती पर लेट गये॥९७॥
तमद्रिशृङ्गप्रतिमं किरीटिनं स्पृशन्तमादित्यमिवात्मतेजसा।
वनौकसः प्रेक्ष्य विवृद्धमद्भुतं भयार्दिता दुद्रुविरे यतस्ततः॥ ९८॥
वह पर्वतशिखर के समान ऊँचा था। उसके मस्तक पर मुकुट शोभा देता था। वह अपने तेज से सूर्य का स्पर्श करता-सा जान पड़ता था। उस बढ़े हुए विशालकाय एवं अद्भुत राक्षस को देखकर सभी वनवासी वानर भय से पीड़ित हो इधर-उधर भागने लगे॥९८॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे षष्टितमः सर्गः॥६०॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में साठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥६० ॥