॥श्री गणेशाय नम:॥
॥श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
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सम्पूर्ण वाल्मीकि रामायण
[काव्य बीजं सनातनम्]

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
सुन्दरकाण्डम्

हनुमान जी के द्वारा प्रमदावन (अशोकवाटिका)-का विध्वंस

एकचत्वारिंशः सर्गः

सर्ग-41

स च वाग्भिः प्रशस्ताभिर्गमिष्यन् पूजितस्तया।

तस्माद् देशादपाक्रम्य चिन्तयामास वानरः॥१॥

सीताजी से उत्तम वचनों द्वारा समादर पाकर वानरवीर हनुमान जी जब वहाँ से जाने लगे, तब उस स्थान से दूसरी जगह हटकर वे इस प्रकार विचार करने लगे— ॥१॥

अल्पशेषमिदं कार्यं दृष्टेयमसितेक्षणा।

त्रीनुपायानतिक्रम्य चतुर्थ इह दृश्यते॥२॥

‘मैंने कजरारे नेत्रोंवाली सीताजी का दर्शन तो कर लिया, अब मेरे इस कार्य का थोड़ा-सा अंश (शत्रु की शक्ति का पता लगाना) शेष रह गया है। इसके लिये चार उपाय हैं—साम, दान, भेद और दण्ड यहाँ साम आदि तीन उपायों को लाँघकर केवल चौथे उपाय (दण्ड)-का प्रयोग ही उपयोगी दिखायी देता है॥२॥

न साम रक्षःसु गुणाय कल्पते न दानमर्थोपचितेषु युज्यते।

न भेदसाध्या बलदर्पिता जनाः पराक्रमस्त्वेष ममेह रोचते॥३॥

‘राक्षसों के प्रति सामनीति का प्रयोग करने से कोई लाभ नहीं होता। इनके पास धन भी बहुत है, अतःइन्हें दान देने का भी कोई उपयोग नहीं है। इसके सिवा, ये बल के अभिमान में चूर रहते हैं, अतः भेदनीति के द्वारा भी इन्हें वश में नहीं किया जा सकता। ऐसी दशा में मुझे यहाँ पराक्रम दिखाना ही उचित जान पड़ता है॥३॥

न चास्य कार्यस्य पराक्रमादृते विनिश्चयः कश्चिदिहोपपद्यते।

हतप्रवीराश्च रणे तु राक्षसाः कथंचिदीयुर्यदिहाद्य मार्दवम्॥४॥

‘इस कार्य की सिद्धि के लिये पराक्रम के सिवा यहाँ और किसी उपाय का अवलम्बन ठीक नहीं जंचता। यदि युद्ध में राक्षसों के मुख्य-मुख्य वीर मारे जायँ तो ये लोग किसी तरह कुछ नरम पड़ सकते हैं॥४॥

कार्ये कर्मणि निर्वृत्ते यो बहून्यपि साधयेत्।

पूर्वकार्याविरोधेन स कार्यं कर्तुमर्हति॥५॥

‘जो पुरुष प्रधान कार्य के सम्पन्न हो जाने पर दूसरे दूसरे बहुत-से कार्यों को भी सिद्ध कर लेता है और पहले के कार्यों में बाधा नहीं आने देता, वही कार्य को सुचारु रूप में कर सकता है॥५॥

न ह्येकः साधको हेतुः स्वल्पस्यापीह कर्मणः।

यो ह्यर्थं बहुधा वेद स समर्थोऽर्थसाधने॥६॥

‘छोटे-से-छोटे कर्म की भी सिद्धि के लिये कोई एक ही साधक हेतु नहीं हुआ करता। जो पुरुष किसी कार्य या प्रयोजन को अनेक प्रकार से सिद्ध करने की कला जानता हो, वही कार्य-साधन में समर्थ हो सकता

इहैव तावत्कृतनिश्चयो ह्यहं व्रजेयमद्य प्लवगेश्वरालयम्।

परात्मसम्मर्दविशेषतत्त्ववित् ततः कृतं स्यान्मम भर्तृशासनम्॥७॥

‘यदि इसी यात्रा में मैं इस बात को ठीक-ठीक समझ लूँ कि अपने और शत्रुपक्ष में युद्ध होने पर कौन प्रबल होगा और कौन निर्बल, तत्पश्चात् भविष्य के कार्य का भी निश्चय करके आज सुग्रीव के पास चलूँ तो मेरे द्वारा स्वामी की आज्ञाका पूर्णरूप से पालन हुआ समझा जायगा॥७॥

कथं नु खल्वद्य भवेत् सुखागतं प्रसह्य युद्धं मम राक्षसैः सह।

तथैव खल्वात्मबलं च सारवत् समानयेन्मां च रणे दशाननः॥८॥

‘परंतु आज मेरा यहाँ तक आना सुखद अथवा शुभ परिणाम का जनक कैसे होगा? राक्षसों के साथ हठात् युद्ध करने का अवसर मुझे कैसे प्राप्त होगा? तथा दशमुख रावण समर में अपनी सेना को और मुझे भी तुलनात्मक दृष्टि से देखकर कैसे यह समझ सकेगा कि कौन सबल है ? ॥ ८॥

ततः समासाद्य रणे दशाननं समन्त्रिवर्गं सबलं सयायिनम्।

हृदि स्थितं तस्य मतं बलं च सुखेन मत्वाहमितः पुनर्ब्रजे॥९॥

‘उस युद्ध में मन्त्री, सेना और सहायकोंसहित रावण का सामना करके मैं उसके हार्दिक अभिप्राय तथा सैनिक-शक्ति का अनायास ही पता लगा लूँगा। उसके बाद यहाँ से जाऊँगा॥९॥

इदमस्य नृशंसस्य नन्दनोपममुत्तमम्।

वनं नेत्रमनःकान्तं नानाद्रुमलतायुतम्॥१०॥

‘इस निर्दयी रावण का यह सुन्दर उपवन नेत्रों को आनन्द देने वाला और मनोरम है। नाना प्रकार के वृक्षों और लताओं से व्याप्त होने के कारण यह नन्दनवन के समान उत्तम प्रतीत होता है॥ १० ॥

इदं विध्वंसयिष्यामि शुष्कं वनमिवानलः।

अस्मिन् भग्ने ततः कोपं करिष्यति स रावणः॥११॥

‘जैसे आग सूखे वन को जला डालती है, उसी प्रकार मैं भी आज इस उपवन का विध्वंस कर डालूँगा। इसके भग्न हो जाने पर रावण अवश्य मुझपर क्रोध करेगा॥

ततो महत्साश्वमहारथद्विपं बलं समानेष्यति राक्षसाधिपः।

त्रिशूलकालायसपट्टिशायुधं ततो महद्युद्धमिदं भविष्यति॥१२॥

‘तत्पश्चात् वह राक्षसराज हाथी, घोड़े तथा विशाल रथों से युक्त और त्रिशूल, कालायस एवं पट्टिश आदि अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित बहुत बड़ी सेना लेकर आयेगा। फिर तो यहाँ महान् संग्राम छिड़ जायगा’ ॥ १२॥

अहं च तैः संयति चण्डविक्रमैः समेत्य रक्षोभिरभङ्गविक्रमः।

निहत्य तद् रावणचोदितं बलं सुखं गमिष्यामि हरीश्वरालयम्॥१३॥

‘उस युद्ध में मेरी गति रुक नहीं सकती। मेरा पराक्रम कुण्ठित नहीं हो सकता। मैं प्रचण्ड पराक्रम दिखाने वाले उन राक्षसों से भिड़ जाऊँगा और रावण की भेजी हुई उस सारी सेना को मौत के घाट उतारकर सुखपूर्वक सुग्रीव के निवासस्थान किष्किन्धापुरी को लौट जाऊँगा’॥ १३॥

ततो मारुतवत् क्रुद्धो मारुतिर्भीमविक्रमः।

ऊरुवेगेन महता द्रुमान् क्षेप्तुमथारभत्॥१४॥

ऐसा सोचकर भयानक पुरुषार्थ प्रकट करने वाले पवनकुमार हनुमान जी क्रोध से भर गये और वायु के समान बड़े भारी वेग से वृक्षों को उखाड़-उखाड़कर फेंकने लगे॥

ततस्तद्धनुमान् वीरो बभञ्ज प्रमदावनम्।

मत्तद्विजसमाघुष्टं नानाद्रुमलतायुतम्॥१५॥

तदनन्तर वीर हनुमान् ने मतवाले पक्षियों के कलरव से मुखरित और नाना प्रकार के वृक्षों एवं लताओं से भरे-पूरे उस प्रमदावन (अन्तःपुर के उपवन)-को उजाड़ डाला॥ १५ ॥

तदनं मथितैर्वृक्षैर्भिन्नैश्च सलिलाशयैः।

चूर्णितैः पर्वताप्रैश्च बभूवाप्रियदर्शनम्॥१६॥

वहाँ के वृक्षों को खण्ड-खण्ड कर दिया जलाशयों को मथ डाला और पर्वत-शिखरों को चूरचूर कर डाला। इससे वह सुन्दर वन कुछ ही क्षणों में अभव्य दिखायी देने लगा॥ १६॥

नानाशकुन्तविरुतैः प्रभिन्नसलिलाशयैः।

तानैः किसलयैः क्लान्तैः क्लान्तद्रुमलतायुतैः॥१७॥

न बभौ तद् वनं तत्र दावानलहतं यथा।

व्याकुलावरणा रेजुर्विह्वला इव ता लताः॥१८॥

नाना प्रकार के पक्षी वहाँ भय के मारे चें-चें करने लगे, जलाशयों के घाट टूट-फूट गये, तामे के समान वृक्षों के लाल-लाल पल्लव मुरझा गये तथा वहाँ के वृक्ष और लताएँ भी रौंद डाली गयीं। इन सब कारणों से वह प्रमदावन वहाँ ऐसा जान पड़ता था, मानो दावानल से झुलस गया हो। वहाँ की लताएँ अपने आवरणों के नष्ट-भ्रष्ट हो जाने से घबरायी हुई स्त्रियों के समान प्रतीत होती थीं।

लतागृहैश्चित्रगृहैश्च सादितै फ्लैर्मृगैरातरवैश्च पक्षिभिः।

शिलागृहैरुन्मथितैस्तथा गृहैः प्रणष्टरूपं तदभून्महद् वनम्॥१९॥

लतामण्डप और चित्रशालाएँ उजाड़ हो गयीं। पाले हुए हिंसक जन्तु, मृग तथा तरह-तरह के पक्षी आर्तनाद करने लगे। प्रस्तरनिर्मित प्रासाद तथा अन्य साधारण गृह भी तहस-नहस हो गये। इससे उस महान् प्रमदावन का सारा रूप-सौन्दर्य नष्ट हो गया।१९॥

सा विह्वलाशोकलताप्रताना वनस्थली शोकलताप्रताना।

जाता दशास्यप्रमदावनस्य कपेर्बलाद्धि प्रमदावनस्य॥२०॥

दशमुख रावण की स्त्रियों की रक्षा करने वाले तथा अन्तःपुर के क्रीडाविहार के लिये उपयोगी उस विशाल कानन की भूमि, जहाँ चंचल अशोक-लताओं के समूह शोभा पाते थे, कपिवर हनुमान जी के बल प्रयोग से श्रीहीन होकर शोचनीय लताओं के विस्तार से युक्त हो गयी (उसकी दुरवस्था देखकर दर्शक के मन में दुःख होता था) ॥ २०॥

ततः स कृत्वा जगतीपतेर्महान् महद् व्यलीकं मनसो महात्मनः।

युयुत्सुरेको बहुभिर्महाबलैः श्रिया ज्वलंस्तोरणमाश्रितः कपिः॥२१॥

इस प्रकार महामना राजा रावणके मन को विशेष कष्ट पहुँचाने वाला कार्य करके अनेक महाबलियों के साथ अकेले ही युद्ध करनेका हौसला लेकर कपिश्रेष्ठ हनुमान् जी प्रमदावन के फाटक पर आ गये। उस समय वे अपने अद्भुत तेज से प्रकाशित हो रहे थे। २१॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे एकचत्वारिंशः सर्गः॥४१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में इकतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥४१॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
सुन्दरकाण्डम्

राक्षसियों के मुख से एक वानर के द्वारा प्रमदावन के विध्वंस का समाचार सुनकर रावण का किंकर नामक राक्षसों को भेजना और हनुमान जी के द्वारा उन सबका संहार

द्विचत्वारिंशः सर्गः

सर्ग-42

ततः पक्षिनिनादेन वृक्षभङ्गस्वनेन च।

बभूवुस्त्राससम्भ्रान्ताः सर्वे लङ्कानिवासिनः॥१॥

उधर पक्षियों के कोलाहल और वृक्षों के टूटने की आवाज सुनकर समस्त लंकानिवासी भय से घबरा उठे॥१॥

विद्रुताश्च भयत्रस्ता विनेदुर्मूगपक्षिणः।

रक्षसां च निमित्तानि क्रूराणि प्रतिपेदिरे॥२॥

पशु और पक्षी भयभीत होकर भागने तथा आर्तनाद करने लगे। राक्षसों के सामने भयंकर अपशकुन प्रकट होने लगे॥२॥

ततो गतायां निद्रायां राक्षस्यो विकृताननाः।

तद् वनं ददृशुर्भग्नं तं च वीरं महाकपिम्॥३॥

प्रमदावन में सोयी हुई विकराल मुखवाली राक्षसियों की निद्रा टूट गयी। उन्होंने उठने पर उस वन को उजड़ा हुआ देखा। साथ ही उनकी दृष्टि उन वीर महाकपि हनुमान जी पर भी पड़ी॥३॥

स ता दृष्ट्वा महाबाहुर्महासत्त्वो महाबलः।

चकार सुमहद्रूपं राक्षसीनां भयावहम्॥४॥

महाबली, महान् साहसी एवं महाबाहु हनुमान् जी ने जब उन राक्षसियों को देखा, तब उन्हें डराने वाला विशाल रूप धारण कर लिया॥४॥

ततस्तु गिरिसंकाशमतिकायं महाबलम्।

राक्षस्यो वानरं दृष्ट्वा पप्रच्छुर्जनकात्मजाम्॥५॥

पर्वत के समान बड़े शरीरवाले महाबली वानर को देखकर वे राक्षसियाँ जनकनन्दिनी सीता से पूछने लगीं – ॥ ५॥

कोऽयं कस्य कुतो वायं किंनिमित्तमिहागतः।

कथं त्वया सहानेन संवादः कृत इत्युत॥६॥

आचक्ष्व नो विशालाक्षि मा भूत्ते सुभगे भयम्।

संवादमसितापाङ्गि त्वया किं कृतवानयम्॥७॥

‘विशाललोचने! यह कौन है? किसका है? और कहाँ से किसलिये यहाँ आया है ? इसने तुम्हारे साथ क्यों बातचीत की है? कजरारे नेत्रप्रान्तवाली सुन्दरि! ये सब बातें हमें बताओ तुम्हें डरना नहीं चाहिये। इसने तुम्हारे साथ क्या बातें की थीं?’॥६-७॥

अथाब्रवीत् तदा साध्वी सीता सर्वाङ्गशोभना।

रक्षसां कामरूपाणां विज्ञाने का गतिर्मम॥८॥

तब सर्वांगसुन्दरी साध्वी सीता ने कहा —’इच्छानुसार रूप धारण करने वाले राक्षसों को समझने या पहचानने का मेरे पास क्या उपाय है? ॥८॥

यूयमेवास्य जानीत योऽयं यद् वा करिष्यति।

अहिरेव ह्यहेः पादान् विजानाति न संशयः॥९॥

‘तुम्हीं जानो यह कौन है और क्या करेगा? साँप के पैरों को साँप ही पहचानता है, इसमें संशय नहीं है।

अहमप्यतिभीतास्मि नैव जानामि को ह्ययम्।

वेद्मि राक्षसमेवैनं कामरूपिणमागतम्॥१०॥

‘मैं भी इसे देखकर बहुत डरी हुई हूँ। मुझे नहीं मालूम कि यह कौन है? मैं तो इसे इच्छानुसार रूप धारण करके आया हुआ कोई राक्षस ही समझती हूँ’॥१०॥

वैदेह्या वचनं श्रुत्वा राक्षस्यो विद्रुता द्रुतम्।

स्थिताः काश्चिद्गताः काश्चिद् रावणाय निवेदितुम्॥११॥

विदेहनन्दिनी सीता की यह बात सुनकर राक्षसियाँ बड़े वेग से भागीं। उनमें से कुछ तो वहीं खड़ी हो गयीं और कुछ रावण को सूचना देने के लिये चली गयीं॥ ११॥

रावणस्य समीपे तु राक्षस्यो विकृताननाः।

विरूपं वानरं भीमं रावणाय न्यवेदिषुः॥१२॥

रावण के समीप जाकर उन विकराल मुखवाली राक्षसियों ने रावण को यह सूचना दी कि कोई विकटरूपधारी भयंकर वानर प्रमदावन में आ पहुँचा है॥ १२॥

अशोकवनिकामध्ये राजन् भीमवपुः कपिः।

सीतया कृतसंवादस्तिष्ठत्यमितविक्रमः॥१३॥

वे बोलीं-‘राजन्! अशोकवाटिका में एक वानर आया है, जिसका शरीर बड़ा भयंकर है। उसने सीता से बातचीत की है। वह महापराक्रमी वानर अभी वहीं मौजूद है॥ १३॥

न च तं जानकी सीता हरिं हरिणलोचना।

अस्माभिर्बहुधा पृष्टा निवेदयितुमिच्छति॥१४॥

‘हमने बहुत पूछा तो भी जनककिशोरी मृगनयनी सीता उस वानर के विषय में हमें कुछ बताना नहीं चाहती हैं॥ १४॥

वासवस्य भवेद् दूतो दूतो वैश्रवणस्य वा।

प्रेषितो वापि रामेण सीतान्वेषणकाङ्ख्या॥१५॥

‘सम्भव है वह इन्द्र या कुबेर का दूत हो अथवा श्रीराम ने ही उसे सीता की खोज के लिये भेजा हो॥ १५॥

तेनैवाद्धृतरूपेण यत्तत्तव मनोहरम्।

नानामृगगणाकीर्णं प्रमृष्टं प्रमदावनम्॥१६॥

‘अद्भुत रूप धारण करने वाले उस वानर ने आपके मनोहर प्रमदावन को, जिसमें नाना प्रकार के पशु-पक्षी रहा करते थे, उजाड़ दिया॥१६॥

न तत्र कश्चिदुद्देशो यस्तेन न विनाशितः।

यत्र सा जानकी देवी स तेन न विनाशितः॥१७॥

‘प्रमदावन का कोई भी ऐसा भाग नहीं है, जिसको उसने नष्ट न कर डाला हो। केवल वह स्थान, जहाँ जानकी देवी रहती हैं, उसने नष्ट नहीं किया है॥१७॥

जानकीरक्षणार्थं वा श्रमाद् वा नोपलक्ष्यते।

अथवा कः श्रमस्तस्य सैव तेनाभिरक्षिता॥१८॥

‘जानकीजी की रक्षा के लिये उसने उस स्थान को बचा दिया है या परिश्रम से थककर—यह निश्चित रूप से नहीं जान पड़ता है। अथवा उसे परिश्रम तो क्या हुआ होगा? उसने उस स्थान को बचाकर सीता की ही रक्षा की है॥ १८॥

चारुपल्लवपत्राढ्यं यं सीता स्वयमास्थिता।

प्रवृद्धः शिंशपावृक्षः स च तेनाभिरक्षितः॥१९॥

‘मनोहर पल्लवों और पत्तों से भरा हुआ वह विशाल अशोक वृक्ष, जिसके नीचे सीता का निवास है, उसने सुरक्षित रख छोड़ा है॥ १९॥

तस्योग्ररूपस्योग्रं त्वं दण्डमाज्ञातुमर्हसि।

सीता सम्भाषिता येन वनं तेन विनाशितम्॥२०॥

‘जिसने सीता से वार्तालाप किया और उस वन को उजाड़ डाला, उस उग्र रूपधारी वानर को आप कोई कठोर दण्ड देने की आज्ञा प्रदान करें॥ २०॥

मनःपरिगृहीतां तां तव रक्षोगणेश्वर।

कः सीतामभिभाषेत यो न स्यात् त्यक्तजीवितः॥२१॥

‘राक्षसराज! जिन्हें आपने अपने हृदय में स्थान दिया है, उन सीता देवी से कौन बातें कर सकता है? जिसने अपने प्राणों का मोह नहीं छोड़ा है, वह उनसे वार्तालाप कैसे कर सकता है ?’ ॥ २१॥

राक्षसीनां वचः श्रुत्वा रावणो राक्षसेश्वरः।

चिताग्निरिव जज्वाल कोपसंवर्तितेक्षणः॥२२॥

राक्षसियों की यह बात सुनकर राक्षसों का राजा रावण प्रज्वलित चिता की भाँति क्रोध से जल उठा। उसके नेत्र रोष से घूमने लगे॥ २२॥

तस्य क्रुद्धस्य नेत्राभ्यां प्रापतन्नश्रुबिन्दवः।

दीप्ताभ्यामिव दीपाभ्यां सार्चिषः स्नेहबिन्दवः॥२३॥

क्रोध में भरे हुए रावण की आँखों से आँसू की बूंदें टपकने लगीं, मानो जलते हुए दो दीपकों से आग की लपटों के साथ तेल की बूंदें झर रही हों॥२३॥

आत्मनः सदृशान् वीरान् किंकरान्नाम राक्षसान्।

व्यादिदेश महातेजा निग्रहार्थं हनूमतः॥२४॥

उस महातेजस्वी निशाचर ने हनुमान जी को कैद करने के लिये अपने ही समान वीर किंकर नामधारी राक्षसों को जाने की आज्ञा दी॥ २४॥

तेषामशीतिसाहस्रं किंकराणां तरस्विनाम्।

निर्ययुर्भवनात् तस्मात् कूटमुद्गरपाणयः॥२५॥

राजा की आज्ञा पाकर अस्सी हजार वेगवान् किंकर हाथों में कूट और मुद्गर लिये उस महल से बाहर निकले ॥ २५॥

महोदरा महादंष्ट्रा घोररूपा महाबलाः।

युद्धाभिमनसः सर्वे हनूमद्ग्रहणोन्मुखाः॥२६॥

उनकी दाढ़ें विशाल, पेट बड़ा और रूप भयानक था। वे सब-के-सब महान् बली, युद्ध के अभिलाषी और हनुमान जी को पकड़ने के लिये उत्सुक थे॥ २६॥

ते कपिं तं समासाद्य तोरणस्थमवस्थितम्।

अभिपेतुर्महावेगाः पतंगा इव पावकम्॥२७॥

प्रमदावन के फाटक पर खड़े हुए उन वानरवीर के पास पहुँचकर वे महान् वेगशाली निशाचर उनपर चारों ओर से इस प्रकार झपटे, जैसे फतिंगे आग पर टूट पड़े हों ॥ २७॥

ते गदाभिर्विचित्राभिः परिघैः काञ्चनाङ्गदैः।

आजग्मुर्वानरश्रेष्ठं शरैरादित्यसंनिभैः॥ २८॥

वे विचित्र गदाओं, सोने से मढ़े हुए परिघों और सूर्य के समान प्रज्वलित बाणों के साथ वानरश्रेष्ठ हनुमान् पर चढ़ आये॥२८॥

मुद्गरैः पट्टिशैः शूलैः प्रासतोमरपाणयः।

परिवार्य हनूमन्तं सहसा तस्थुरग्रतः॥२९॥

हाथ में प्रास और तोमर लिये मुद्गर, पट्टिश और शूलों से सुसज्जित हो वे सहसा हनुमान् को चारों ओर से घेरकर उनके सामने खड़े हो गये॥ २९ ॥

हनूमानपि तेजस्वी श्रीमान् पर्वतसंनिभः।

क्षितावाविद्ध्य लाङ्गलं ननाद च महाध्वनिम्॥३०॥

तब पर्वत के समान विशाल शरीरवाले तेजस्वी श्रीमान् हनुमान् भी अपनी पूँछ को पृथ्वी पर पटककर बड़े जोर से गर्जने लगे॥३०॥

स भूत्वा तु महाकायो हनूमान् मारुतात्मजः।

पुच्छमास्फोटयामास लङ्कां शब्देन पूरयन्॥३१॥

पवनपुत्र हनुमान् अत्यन्त विशाल शरीर धारण करके अपनी पूँछ फटकारने और उसके शब्द से लङ्का को प्रतिध्वनित करने लगे॥ ३१॥

तस्यास्फोटितशब्देन महता चानुनादिना।

पेतुर्विहङ्गा गगनादुच्चैश्चेदमघोषयत्॥३२॥

उनकी पूँछ फटकारने का गम्भीर घोष बहुत दूर तक गूंज उठता था। उससे भयभीत हो पक्षी आकाश से गिर पड़ते थे। उस समय हनुमान जी ने उच्च स्वर से इस प्रकार घोषणा की— ॥३२॥

जयत्यतिबलो रामो लक्ष्मणश्च महाबलः।

राजा जयति सुग्रीवो राघवेणाभिपालितः॥३३॥

दासोऽहं कोसलेन्द्रस्य रामस्याक्लिष्टकर्मणः।

हनूमान् शत्रुसैन्यानां निहन्ता मारुतात्मजः॥३४॥

न रावणसहस्रं मे युद्धे प्रतिबलं भवेत्।

शिलाभिश्च प्रहरतः पादपैश्च सहस्रशः॥ ३५॥

अर्दयित्वा पुरी लङ्कामभिवाद्य च मैथिलीम्।

समृद्धार्थो गमिष्यामि मिषतां सर्वरक्षसाम्॥३६॥

‘अत्यन्त बलवान् भगवान् श्रीराम तथा महाबली लक्ष्मण की जय हो। श्रीरघुनाथजी के द्वारा सुरक्षित राजा सुग्रीव की भी जय हो। मैं अनायास ही महान् पराक्रम करने वाले कोसलनरेश श्रीरामचन्द्रजी का दास हूँ। मेरा नाम हनुमान् है। मैं वायु का पुत्र तथा शत्रुसेना का संहार करने वाला हूँ। जब मैं हजारों वृक्ष और पत्थरों से प्रहार करने लगूंगा, उस समय सहस्रों रावण मिलकर भी युद्ध में मेरे बल की समानता अथवा मेरा सामना नहीं कर सकते। मैं लङ्कापुरी को तहस नहस कर डालूँगा और मिथिलेशकुमारी सीता को प्रणाम करने के अनन्तर सब राक्षसों के देखते-देखते अपना कार्य सिद्ध करके जाऊँगा’।

तस्य संनादशब्देन तेऽभवन् भयशङ्किताः।

ददृशुश्च हनूमन्तं संध्यामेघमिवोन्नतम्॥३७॥

हनुमान जी की इस गर्जना से समस्त राक्षसों पर भय एवं आतङ्क छा गया। उन सबने हनुमान जी को देखा। वे संध्या-काल के ऊँचे मेघ के समान लाल एवं विशालकाय दिखायी देते थे॥ ३७॥

स्वामिसंदेशनिःशङ्कास्ततस्ते राक्षसाः कपिम्।

चित्रैः प्रहरणैर्भीमैरभिपेतुस्ततस्ततः॥३८॥

हनुमान जी ने अपने स्वामी का नाम लेकर स्वयं ही अपना परिचय दे दिया था, इसलिये राक्षसों को उन्हें पहचानने में कोई संदेह नहीं रहा। वे नाना प्रकार के भयंकर अस्त्र-शस्त्रों का प्रहार करते हुए चारों ओर से उन पर टूट पड़े॥ ३८॥

स तैः परिवृतः शूरैः सर्वतः स महाबलः।

आससादायसं भीमं परिघं तोरणाश्रितम्॥३९॥

उन शूरवीर राक्षसों द्वारा सब ओर से घिर जाने पर महाबली हनुमान् ने फाटक पर रखा हुआ एक भयंकर लोहे का परिघ उठा लिया॥ ३९॥

स तं परिघमादाय जघान रजनीचरान्।

सपन्नगमिवादाय स्फुरन्तं विनतासुतः॥४०॥

जैसे विनतानन्दन गरुड़ ने छटपटाते हुए सर्प को पंजों में दाब रखा हो, उसी प्रकार उस परिघ को हाथ में लेकर हनुमान जी ने उन निशाचरों का संहार आरम्भ किया॥

विचचाराम्बरे वीरः परिगृह्य च मारुतिः।

सूदयामास वज्रेण दैत्यानिव सहस्रदृक्॥४१॥

वीर पवनकुमार उस परिघ को लेकर आकाश में विचरने लगे। जैसे सहस्रनेत्रधारी इन्द्र अपने वज्र से दैत्यों का वध करते हैं, उसी प्रकार उन्होंने उस परिघ से सामने आये हुए समस्त राक्षसों को मार डाला॥ ४१॥

स हत्वा राक्षसान् वीरः किंकरान् मारुतात्मजः।

युद्धाकाङ्क्षी महावीरस्तोरणं समवस्थितः॥४२॥

उन किंकर नामधारी राक्षसों का वध करके महावीर पवनपुत्र हनुमान जी युद्ध की इच्छा से पुनः उस फाटक पर खड़े हो गये॥ ४२ ॥

ततस्तस्माद् भयान्मुक्ताः कतिचित्तत्र राक्षसाः।

निहतान् किंकरान् सर्वान् रावणाय न्यवेदयन्॥४३॥

तदनन्तर वहाँ उस भय से मुक्त हुए कुछ राक्षसों ने जाकर रावण को यह समाचार निवेदन किया कि समस्त किंकर नामक राक्षस मार डाले गये॥ ४३॥

स राक्षसानां निहतं महाबलं निशम्य राजा परिवृत्तलोचनः।

समादिदेशाप्रतिमं पराक्रमे प्रहस्तपुत्रं समरे सुदुर्जयम्॥४४॥

राक्षसों की उस विशाल सेना को मारी गयी सुनकर राक्षसराज रावण की आँखें चढ़ गयीं और उसने प्रहस्त के पुत्र को जिसके पराक्रम की कहीं तुलना नहीं थी तथा युद्ध में जिसे परास्त करना नितान्त कठिन था, हनुमान जी का सामना करने के लिये भेजा। ४४॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे द्विचत्वारिंशः सर्गः॥४२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में बयालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।४२॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
सुन्दरकाण्डम्

हनुमान जी के द्वारा चैत्यप्रासाद का विध्वंस तथा उसके रक्षकों का वध

त्रिचत्वारिंशः सर्गः

सर्ग-43

ततः स किंकरान् हत्वा हनूमान् ध्यानमास्थितः।

वनं भग्नं मया चैत्यप्रासादो न विनाशितः॥१॥

इधर किंकरों का वध करके हनुमान जी यह सोचने लगे कि ‘मैंने वन को तो उजाड़ दिया, परंतु इस चैत्य* प्रासाद को नष्ट नहीं किया है॥१॥

* लङ्का में राक्षसों के कुलदेवता का जो स्थान था, उसी का नाम ‘चैत्यप्रासाद’ रखा गया था।

तस्मात् प्रासादमद्यैवमिमं विध्वंसयाम्यहम्।

इति संचिन्त्य हनुमान् मनसादर्शयन् बलम्॥२॥

चैत्यप्रासादमुत्प्लुत्य मेरुशृङ्गमिवोन्नतम्।

आरुरोह हरिश्रेष्ठो हनूमान् मारुतात्मजः॥३॥

‘अतः आज इस चैत्यप्रासाद का भी विध्वंस किये देता हूँ। मन-ही-मन ऐसा विचारकर पवनपुत्र वानरश्रेष्ठ हनुमान जी अपने बल का प्रदर्शन करते हुए मेरुपर्वत के शिखर की भाँति ऊँचे उस चैत्यप्रासाद पर उछलकर चढ़ गये’ ॥२-३॥

आरुह्य गिरिसंकाशं प्रासादं हरियूथपः।

बभौ स सुमहातेजाः प्रतिसूर्य इवोदितः॥४॥

उस पर्वताकार प्रासाद पर चढ़कर महातेजस्वी वानर-यूथपति हनुमान् तुरंत के उगे हुए दूसरे सूर्य की भाँति शोभा पाने लगे॥ ४॥

सम्प्रधृष्य तु दुर्धर्षश्चैत्यप्रासादमुन्नतम्।

हनूमान् प्रज्वलँल्लक्ष्म्या पारियात्रोपमोऽभवत्॥५॥

उस ऊँचे प्रासाद पर आक्रमण करके दुर्धर्ष वीर हनुमान जी अपनी सहज शोभा से उद्भासित होते हुए पारियात्र पर्वत के समान प्रतीत होने लगे॥५॥

स भूत्वा सुमहाकायः प्रभावान् मारुतात्मजः।

धृष्टमास्फोटयामास लङ्कां शब्देन पूरयन्॥६॥

वे तेजस्वी पवनकुमार विशाल शरीर धारण करके लङ्का को प्रतिध्वनित करते हुए धृष्टतापूर्वक उस प्रासाद को तोड़ने-फोड़ने लगे॥६॥

तस्यास्फोटितशब्देन महता श्रोत्रघातिना।

पेतुर्विहंगमास्तत्र चैत्यपालाश्च मोहिताः॥७॥

जोर-जोर से होने वाला वह तोड़-फोड़ का शब्द कानों से टकराकर उन्हें बहरा किये देता था। इससे मूर्च्छित हो वहाँ के पक्षी और प्रासादरक्षक भी पृथ्वी पर गिर पड़े॥७॥

अस्त्रविज्जयतां रामो लक्ष्मणश्च महाबलः।

राजा जयति सुग्रीवो राघवेणाभिपालितः॥८॥

दासोऽहं कोसलेन्द्रस्य रामस्याक्लिष्टकर्मणः।

हनूमान् शत्रुसैन्यानां निहन्ता मारुतात्मजः॥९॥

न रावणसहस्रं मे युद्धे प्रतिबलं भवेत्।

शिलाभिश्च प्रहरतः पादपैश्च सहस्रशः॥१०॥

धर्षयित्वा पुरीं लङ्कामभिवाद्य च मैथिलीम्।

समृद्धार्थो गमिष्यामि मिषतां सर्वरक्षसाम्॥११॥

उस समय हनुमान जी ने पुनः यह घोषणा की’अस्त्रवेत्ता भगवान् श्रीराम तथा महाबली लक्ष्मण की जय हो। श्रीरघुनाथजी के द्वारा सुरक्षित राजा सुग्रीव की भी जय हो मैं अनायास ही महान् पराक्रम करने वाले कोसलनरेश श्रीरामचन्द्रजी का दास हूँ। मेरा नाम हनुमान् है। मैं वायु का पुत्र तथा शत्रुसेना का संहार करने वाला हूँ। जब मैं हजारों वृक्षों और पत्थरों से प्रहार करने लगूंगा, उस समय सहस्रों रावण मिलकर भी युद्ध में मेरे बल की समानता अथवा मेरा सामना नहीं कर सकते। मैं लङ्कापुरी को तहस-नहस कर डालूँगा और मिथिलेशकुमारी सीता को प्रणाम करने के अनन्तर सब राक्षसों के देखते-देखते अपना कार्य सिद्ध करके जाऊँगा’॥ ८–११॥

एवमुक्त्वा महाकायश्चैत्यस्थो हरियूथपः।

ननाद भीमनिर्बादो रक्षसां जनयन् भयम्॥१२॥

ऐसा कहकर चैत्यप्रासाद पर खड़े हुए विशालकाय वानरयूथपति हनुमान् राक्षसों के मन में भय उत्पन्न करते हुए भयानक आवाज में गर्जना करने लगे।१२॥

तेन नादेन महता चैत्यपालाः शतं ययुः।

गृहीत्वा विविधानस्त्रान् प्रासान् खड्गान् परश्वधान्॥१३॥

उस भीषण गर्जना से प्रभावित हो सैकड़ों प्रासादरक्षक नाना प्रकार के प्रास, खड्ग और फर से लिये वहाँ आये॥१३॥

विसृजन्तो महाकाया मारुतिं पर्यवारयन्।

ते गदाभिर्विचित्राभिः परिघैः काञ्चनाङ्गदैः॥१४॥

आजग्मुर्वानरश्रेष्ठं बाणैश्चादित्यसंनिभैः।

उन विशालकाय राक्षसों ने उन सब अस्त्रों का प्रहार करते हुए वहाँ पवनकुमार हनुमान् जी को घेर लिया। विचित्र गदाओं, सोने के पत्र जड़े हुए परिघों और सूर्यतुल्य तेजस्वी बाणों से सुसज्जित हो वे सब-के सब उन वानरश्रेष्ठ हनुमान् पर चढ़ आये॥ १४ १/२ ॥

आवर्त इव गङ्गायास्तोयस्य विपुलो महान्॥ १५॥

परिक्षिप्य हरिश्रेष्ठं स बभौ रक्षसां गणः।

वानरश्रेष्ठ हनुमान् को चारों ओर से घेरकर खड़ा हुआ राक्षसों का वह महान् समुदाय गङ्गाजी के जल में उठे हुए बड़े भारी भँवर के समान जान पड़ता था। १५ १/२॥

ततो वातात्मजः क्रुद्धो भीमरूपं समास्थितः॥१६॥

प्रासादस्य महांस्तस्य स्तम्भं हेमपरिष्कृतम्।

उत्पाटयित्वा वेगेन हनूमान् मारुतात्मजः॥१७॥

ततस्तं भ्रामयामास शतधारं महाबलः।

तत्र चाग्निः समभवत् प्रासादश्चाप्यदह्यत॥१८॥

तब राक्षसों को इस प्रकार आक्रमण करते देख पवनकुमार हनुमान् ने कुपित हो बड़ा भयंकर रूप धारण किया। उन महावीर ने उस प्रासाद के एक सुवर्णभूषित खंभे को, जिसमें सौ धारें थीं, बड़े वेग से उखाड़ लिया। उखाड़कर उन महाबली वीर ने उसे घुमाना आरम्भ किया। घुमाने पर उससे आग प्रकट हो गयी, जिससे वह प्रासाद जलने लगा॥ १६–१८॥

दह्यमानं ततो दृष्ट्वा प्रासादं हरियूथपः।

स राक्षसशतं हत्वा वज्रणेन्द्र इवासुरान्॥१९॥

अन्तरिक्षस्थितः श्रीमानिदं वचनमब्रवीत्।

प्रासाद को जलते देख वानरयूथपति हनुमान् ने वज्र से असुरों का संहार करने वाले इन्द्र की भाँति उन सैकड़ों राक्षसों को उस खंभे से ही मार डाला और आकाश में खड़े होकर उन तेजस्वी वीर ने इस प्रकार कहा- ॥ १९ १/२॥

मादृशानां सहस्राणि विसृष्टानि महात्मनाम्॥२०॥

बलिनां वानरेन्द्राणां सुग्रीववशवर्तिनाम्।।

‘राक्षसो! सुग्रीव के वश में रहने वाले मेरे-जैसे सहस्रों विशालकाय बलवान् वानरश्रेष्ठ सब ओर भेजे गये हैं॥ २० १/२॥

अटन्ति वसुधां कृत्स्नां वयमन्ये च वानराः॥२१॥

दशनागबलाः केचित् केचिद् दशगुणोत्तराः।

केचिन्नागसहस्रस्य बभूवुस्तुल्यविक्रमाः॥२२॥

‘हम तथा दूसरे सभी वानर समूची पृथ्वी पर घूम रहे हैं। किन्हीं में दस हाथियों का बल है तो किन्हीं में सौ हाथियों का कितने ही वानर एक सहस्र हाथियों के समान बल-विक्रम से सम्पन्न हैं ॥ २१—२॥

सन्ति चौघबलाः केचित् सन्ति वायुबलोपमाः।

अप्रमेयबलाः केचित् तत्रासन् हरियूथपाः॥२३॥

‘किन्हीं का बल जल के महान् प्रवाह की भाँति असह्य है। कितने ही वायु के समान बलवान् हैं और कितने ही वानर-यूथपति अपने भीतर असीम बल धारण करते हैं॥ २३॥

ईदृग्विधैस्तु हरिभिर्वृतो दन्तनखायुधैः।

शतैः शतसहस्रैश्च कोटिभिश्चायुतैरपि॥२४॥

आगमिष्यति सुग्रीवः सर्वेषां वो निषूदनः।

‘दाँत और नख ही जिनके आयुध हैं ऐसे अनन्त बलशाली सैकड़ों, हजारों, लाखों और करोड़ों वानरों से घिरे हुए वानरराज सुग्रीव यहाँ पधारेंगे. जो तुम सब निशाचरों का संहार करने में समर्थ हैं॥ २४ १/२॥

नेयमस्ति पुरी लङ्का न यूयं न च रावणः।

यस्य त्विक्ष्वाकुवीरेण बद्धं वैरं महात्मना॥२५॥

‘अब न तो यह लङ्कापुरी रहेगी, न तुम लोग रहोगे और न वह रावण ही रह सकेगा, जिसने इक्ष्वाकुवंशी वीर महात्मा श्रीराम के साथ वैर बाँध रखा है’ ॥ २५ ॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे त्रिचत्वारिंशः सर्गः॥४३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में तैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।४३॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
सुन्दरकाण्डम्

प्रहस्त-पुत्र जम्बुमाली का वध

चतुश्चत्वारिंशः सर्गः

सर्ग-44

संदिष्टो राक्षसेन्द्रेण प्रहस्तस्य सुतो बली।

जम्बुमाली महादंष्ट्रो निर्जगाम धनुर्धरः॥१॥

राक्षसराज रावण की आज्ञा पाकर प्रहस्त का बलवान् पुत्र जम्बुमाली, जिसकी दाढ़ें बहुत बड़ी थीं, हाथ में धनुष लिये राजमहल से बाहर निकला।

रक्तमाल्याम्बरधरः स्रग्वी रुचिरकुण्डलः।

महान् विवृत्तनयनश्चण्डः समरदुर्जयः॥२॥

वह लाल रंग के फूलों की माला और लाल रंग के ही वस्त्र पहने हुए था। उसके गले में हार और कानों में सुन्दर कुण्डल शोभा दे रहे थे। उसकी आँखें घूम रही थीं। वह विशालकाय, क्रोधी और संग्राम में दुर्जय था॥२॥

धनुः शक्रधनुःप्रख्यं महद् रुचिरसायकम्।

विस्फारयाणो वेगेन वज्राशनिसमस्वनम्॥३॥

उसका धनुष इन्द्रधनुष के समान विशाल था। उसके द्वारा छोड़े जाने वाले बाण भी बड़े सुन्दर थे। जब वह वेग से उस धनुष को खींचता, तब उससे वज्र और अशनि के समान गड़गड़ाहट पैदा होती थी॥३॥

तस्य विस्फारघोषेण धनुषो महता दिशः।

प्रदिशश्च नभश्चैव सहसा समपूर्यत॥४॥

उस धनुष की महती टंकार-ध्वनि से सम्पूर्ण दिशाएँ, विदिशाएँ और आकाश सभी सहसा गूंज उठे॥ ४ ॥

रथेन खरयुक्तेन तमागतमुदीक्ष्य सः।

हनूमान् वेगसम्पन्नो जहर्ष च ननाद च॥५॥

वह गधे जुते हुए रथ पर बैठकर आया था। उसे देखकर वेगशाली हनुमान जी बड़े प्रसन्न हुए और जोर-जोर से गर्जना करने लगे॥५॥

तं तोरणविटङ्कस्थं हनूमन्तं महाकपिम्।

जम्बुमाली महातेजा विव्याध निशितैः शरैः॥

महातेजस्वी जम्बुमाली ने महाकपि हनुमान जी को फाटक के छज्जे पर खड़ा देख उन्हें तीखे बाणों से बींधना आरम्भ कर दिया॥६॥

अर्धचन्द्रेण वदने शिरस्येकेन कर्णिना।

बाह्वोर्विव्याध नाराचैर्दशभिस्तु कपीश्वरम्॥७॥

उसने अर्द्धचन्द्र नामक बाण से उनके मुखपर, कर्णी नामक एक बाण से मस्तक पर और दस नाराचों से उन कपीश्वर की दोनों भुजाओं पर गहरी चोट की॥ ७॥

तस्य तच्छुशुभे तानं शरेणाभिहतं मुखम्।

शरदीवाम्बुजं फुल्लं विद्धं भास्कररश्मिना॥८॥

उसके बाण से घायल हुआ हनुमान जी का लाल मुँह शरद् ऋतु में सूर्य की किरणों से विद्ध हो खिले हुए लाल कमल के समान शोभा पा रहा था॥ ८॥

तत्तस्य रक्तं रक्तेन रञ्जितं शुशुभे मुखम्।

यथाऽऽकाशे महापद्मं सिक्तं काञ्चनबिन्दुभिः॥९॥

रक्त से रञ्जित हुआ उनका वह रक्तवर्ण का मुख ऐसी शोभा पा रहा था, मानो आकाश में लाल रंग के विशाल कमल को सुवर्णमय जल की बूंदों से सींच दिया गया हो उस पर सोने का पानी चढ़ा दिया गया हो॥९॥

चुकोप बाणाभिहतो राक्षसस्य महाकपिः।

ततः पार्वेऽतिविपुलां ददर्श महतीं शिलाम्॥१०॥

तरसा तां समुत्पाट्य चिक्षेप जववद् बली।

राक्षस जम्बुमाली के बाणों की चोट खाकर महाकपि हनुमान जी कुपित हो उठे। उन्होंने अपने पास ही पत्थर की एक बहुत बड़ी चट्टान पड़ी देखी और उसे वेग से उठाकर उन बलवान् वीर ने बड़े जोर से उस राक्षस की ओर फेंका॥ १० १/२॥

तां शरैर्दशभिः क्रुद्धस्ताडयामास राक्षसः॥११॥

विपन्नं कर्म तद् दृष्ट्वा हनूमांश्चण्डविक्रमः।

सालं विपुलमुत्पाट्य भ्रामयामास वीर्यवान्॥१२॥

किंतु क्रोध में भरे उस राक्षस ने दस बाण मारकर उस प्रस्तर-शिला को तोड़-फोड़ डाला। अपने उस कर्म को व्यर्थ हुआ देख प्रचण्ड पराक्रमी और बलशाली हनुमान् ने एक विशाल साल का वृक्ष उखाड़कर उसे घुमाना आरम्भ किया॥ ११-१२ ॥

भ्रामयन्तं कपिं दृष्ट्वा सालवृक्षं महाबलम्।

चिक्षेप सुबहून् बाणाञ्जम्बुमाली महाबलः॥१३॥

उन महान् बलशाली वानरवीर को साल का वृक्ष घुमाते देख महाबली जम्बुमाली ने उनके ऊपर बहुत से बाणों की वर्षा की॥१३॥

सालं चतुर्भिश्चिच्छेद वानरं पञ्चभिर्भुजे।

उरस्येकेन बाणेन दशभिस्तु स्तनान्तरे॥१४॥

उसने चार बाणों से सालवृक्ष को काट गिराया, पाँच से हनुमान जी की भुजाओं में, एक बाण से उनकी छाती में और दस बाणों से उनके दोनों स्तनों के मध्यभाग में चोट पहुँचायी॥ १४ ॥

स शरैः पूरिततनुः क्रोधेन महता वृतः।

तमेव परिघं गृह्य भ्रामयामास वेगितः॥१५॥

बाणों से हनुमान जी का सारा शरीर भर गया। फिर तो उन्हें बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने उसी परिघ को उठाकर उसे बड़े वेग से घुमाना आरम्भ किया॥ १५ ॥

अतिवेगोऽतिवेगेन भ्रामयित्वा बलोत्कटः।

परिघं पातयामास जम्बुमालेमहोरसि॥१६॥

अत्यन्त वेगवान् और उत्कट बलशाली हनुमान् ने बड़े वेग से घुमाकर उस परिघ को जम्बुमाली की विशाल छाती पर दे मारा ॥ १६॥

तस्य चैव शिरो नास्ति न बाहू जानुनी न च।

न धनुर्न रथो नाश्वास्तत्रादृश्यन्त नेषवः॥१७॥

फिर तो न उसके मस्तक का पता लगा और न दोनों भुजाओं तथा घुटनों का ही। न धनुष बचा न रथ, न वहाँ घोड़े दिखायी दिये और न बाण ही॥ १७॥

स हतस्तरसा तेन जम्बुमाली महारथः।

पपात निहतो भूमौ चूर्णिताङ्ग इव द्रुमः॥१८॥

उस परिघ से वेगपूर्वक मारा गया महारथी जम्बुमाली चूर-चूर हुए वृक्ष की भाँति पृथ्वी पर गिर पड़ा॥ १८॥

जम्बुमालिं सुनिहतं किंकरांश्च महाबलान्।

चुक्रोध रावणः श्रुत्वा क्रोधसंरक्तलोचनः॥१९॥

जम्बुमाली तथा महाबली किंकरों के मारे जाने का समाचार सुनकर रावण को बड़ा क्रोध हुआ। उसकी आँखें रोष से रक्तवर्ण की हो गयीं॥ १९ ॥

स रोषसंवर्तितताम्रलोचनः प्रहस्तपुत्रे निहते महाबले।

अमात्यपुत्रानतिवीर्यविक्रमान् समादिदेशाशु निशाचरेश्वरः॥२०॥

महाबली प्रहस्तपुत्र जम्बुमाली के मारे जाने पर निशाचरराज रावण के नेत्र रोष से लाल होकर घूमने लगे। उसने तुरंत ही अपने मन्त्री के पुत्रों को, जो बड़े बलवान् और पराक्रमी थे, युद्ध के लिये जाने की आज्ञा दी॥ २०॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे चतुश्चत्वारिंशः सर्गः॥४४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में चौवालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥४४॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
सुन्दरकाण्डम्

मन्त्री के सात पुत्रों का वध

पञ्चचत्वारिंशः सर्गः

सर्ग-45

ततस्ते राक्षसेन्द्रेण चोदिता मन्त्रिणः सुताः।

निर्ययुर्भवनात् तस्मात् सप्त सप्तार्चिवर्चसः॥१॥

राक्षसों के राजा रावण की आज्ञा पाकर मन्त्री के सात बेटे,जो अग्नि के समान तेजस्वी थे, उस राजमहल से बाहर निकले॥१॥

महबलपरीवारा धनुष्मन्तो महाबलाः।

कृतास्त्रास्त्रविदां श्रेष्ठाः परस्परजयैषिणः॥२॥

उनके साथ बहुत बड़ी सेना थी। वे अत्यन्त बलवान, धनुर्धर, अस्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ तथा परस्पर होड़ लगाकर शत्रुपर विजय पाने की इच्छा रखने वाले थे॥२॥

हेमजालपरिक्षिप्तैर्ध्वजवद्भिः पताकिभिः।

तोयदस्वननिर्घोषैर्वाजियुक्तैर्महारथैः ॥ ३॥

तप्तकाञ्चनचित्राणि चापान्यमितविक्रमाः।

विस्फारयन्तः संहृष्टास्तडिद्वन्त इवाम्बुदाः॥४॥

उनके घोड़े जुते हुए विशाल रथ सोने की जाली से ढके हुए थे। उन पर ध्वजा-पताकाएँ फहरा रही थींऔर उनके पहियों के चलने से मेघों की गम्भीर गर्जना के समान ध्वनि होती थी। ऐसे रथों पर सवार हो

वे अमित पराक्रमी मन्त्रिकुमार तपाये हुए सोने से चित्रित अपने धनुषों की टङ्कार करते हुए बड़े हर्ष और उत्साह के साथ आगे बढ़े। उस समय वे सब के-सब विद्युत्सहित मेघ के समान शोभा पाते थे॥ ३-४॥

जनन्यस्तास्ततस्तेषां विदित्वा किंकरान् हतान्।

बभूवुः शोकसम्भ्रान्ताः सबान्धवसुहृज्जनाः॥

तब, पहले जो किंकर नामक राक्षस मारे गये थे, उनकी मृत्यु का समाचार पाकर इन सबकी माताएँ अमङ्गल की आशङ्का से भाई-बन्धु और सुहृदोसहित शोक से घबरा उठीं॥ ५॥

ते परस्परसंघर्षात् तप्तकाञ्चनभूषणाः।

अभिपेतुर्हनूमन्तं तोरणस्थमवस्थितम्॥६॥

तपाये हुए सोने के आभूषणों से विभूषित वे सातों वीर परस्पर होड़-सी लगाकर फाटक पर खड़े हुए हनुमान् जी पर टूट पड़े॥६॥

सृजन्तो बाणवृष्टिं ते रथगर्जितनिःस्वनाः।

प्रावृट्काल इवाम्भोदा विचेरुर्नैर्ऋताम्बुदाः॥७॥

जैसे वर्षाकाल में मेघ वर्षा करते हुए विचरते हैं, उसी प्रकार वे राक्षसरूपी बादल बाणों की वर्षा करते हुए वहाँ विचरण करने लगे रथों की घर्घराहट ही उनकी गर्जना थी॥७॥

अवकीर्णस्ततस्ताभिर्हनूमान् शरवृष्टिभिः।

अभवत् संवृताकारः शैलराडिव वृष्टिभिः॥८॥

तदनन्तर राक्षसों द्वारा की गयी उस बाण-वर्षा से हनुमान जी उसी तरह आच्छादित हो गये, जैसे कोई गिरिराज जल की वर्षा से ढक गया हो॥८॥

स शरान् वञ्चयामास तेषामाशुचरः कपिः।

रथवेगांश्च वीराणां विचरन् विमलेऽम्बरे॥९॥

उस समय निर्मल आकाशमें शीघ्रतापूर्वक विचरते हुए कपिवर हनुमान् उन राक्षसवीरोंके बाणों तथा रथके वेगोंको व्यर्थ करते हुए अपने-आपको बचाने लगे॥९॥

स तैः क्रीडन् धनुष्मद्भिर्कोम्नि वीरः प्रकाशते।

धनुष्मद्भिर्यथा मेघैर्मारुतः प्रभुरम्बरे॥१०॥

जैसे व्योममण्डल में शक्तिशाली वायुदेव इन्द्रधनुषयुक्त मेघों के साथ क्रीडा करते हैं, उसी प्रकार वीर पवनकुमार उन धनुर्धर वीरों के साथ खेलसा करते हुए आकाश में अद्भुत शोभा पा रहे थे। १०॥

स कृत्वा निनदं घोरं त्रासयंस्तां महाचमूम्।

चकार हनुमान् वेगं तेषु रक्षःसु वीर्यवान्॥११॥

पराक्रमी हनुमान् ने राक्षसों की उस विशाल वाहिनीको भयभीत करते हुए घोर गर्जना की और उन राक्षसों पर बड़े वेग से आक्रमण किया॥११॥

तलेनाभिहनत् कांश्चित् पादैः कांश्चित् परंतपः।

मुष्टिभिश्चाहनत् कांश्चिन्नखैः कांश्चिद् व्यदारयत्॥१२॥

शत्रुओं को संताप देने वाले उन वानरवीर ने किन्हीं को थप्पड़ से ही मार गिराया, किन्हीं को पैरों से कुचल डाला, किन्हीं का घूसों से काम तमाम किया और किन्हीं को नखों से फाड़ डाला॥ १२॥

प्रममाथोरसा कांश्चिदूरुभ्यामपरानपि।

केचित् तस्यैव नादेन तत्रैव पतिता भुवि॥१३॥

कुछ लोगों को छाती से दबाकर उनका कचूमर निकाल दिया और किन्हीं-किन्हीं को दोनों जाँघों से दबोचकर मसल डाला। कितने ही निशाचर उनकी गर्जना से ही प्राणहीन होकर वहीं पृथ्वी पर गिर पड़े। १३॥

ततस्तेष्ववसन् नेषु भूमौ निपतितेषु च।

तत्सैन्यमगमत् सर्वं दिशो दश भयादितम्॥१४॥

इस प्रकार जब मन्त्री के सारे पुत्र मारे जाकर धराशायी हो गये, तब उनकी बची-खुची सारी सेना भयभीत होकर दसों दिशाओं में भाग गयी॥१४॥

विनेदुर्विस्वरं नागा निपेतुर्भुवि वाजिनः।

भग्ननीडध्वजच्छत्रैर्भूश्च कीर्णाभवद् रथैः॥१५॥

उस समय हाथी वेदना के मारे बुरी तरह से चिग्घाड़ रहे थे, घोड़े धरती पर मरे पड़े थे तथा जिनके बैठक,ध्वज और छत्र आदि खण्डित हो गये थे, ऐसे टूटे हुए रथों से समूची रणभूमि पट गयी थी॥ १५ ॥

स्रवता रुधिरेणाथ स्रवन्त्यो दर्शिताः पथि।

विविधैश्च स्वनैर्लङ्का ननाद विकृतं तदा ॥१६॥

मार्ग में खून की नदियाँ बहती दिखायी दी तथा लङ्कापुरी राक्षसों के विविध शब्दों के कारण मानो उस समय विकृत स्वर से चीत्कार कर रही थी॥ १६ ॥

स तान् प्रवृद्धान् विनिहत्य राक्षसान् महाबलश्चण्डपराक्रमः कपिः।

युयुत्सुरन्यैः पुनरेव राक्षसैस्तदेव वीरोऽभिजगाम तोरणम्॥१७॥

प्रचण्ड पराक्रमी और महाबली वानरवीर हनुमान् जी उन बढ़े-चढ़े राक्षसों को मौत के घाट उतारकर दूसरे राक्षसों के साथ युद्ध करने की इच्छा से फिर उसी फाटक पर जा पहुँचे॥१७॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे पञ्चचत्वारिंशः सर्गः॥४५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में पैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।४५॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
सुन्दरकाण्डम्

रावण के पाँच सेनापतियों का वध

षट्चत्वारिंशः सर्गः

सर्ग-46

हतान् मन्त्रिसुतान् बुद्ध्वा वानरेण महात्मना।

रावणः संवृताकारश्चकार मतिमुत्तमाम्॥१॥

महात्मा हनुमान जी के द्वारा मन्त्री के पुत्र भी मारे गये—यह जानकर रावण ने भयभीत होने पर भी अपने आकार को प्रयत्नपूर्वक छिपाया और उत्तम बुद्धिका आश्रय ले आगे के कर्तव्य का निश्चय किया॥१॥

स विरूपाक्षयूपाक्षौ दुर्धरं चैव राक्षसम्।

प्रघसं भासकर्णं च पञ्च सेनाग्रनायकान्॥२॥

संदिदेश दशग्रीवो वीरान् नयविशारदान्।

हनूमद्ग्रहणेऽव्यग्रान् वायुवेगसमान् युधि॥३॥

दशग्रीव ने विरूपाक्ष, यूपाक्ष, दुर्धर, प्रघस और भासकर्ण—इन पाँच सेनापतियों को, जो बड़े वीर, नीतिनिपुण, धैर्यवान् तथा युद्ध में वायु के समान वेगशाली थे, हनुमान जी को पकड़ने के लिये आज्ञा दी॥ २-३॥

यात सेनाग्रगाः सर्वे महाबलपरिग्रहाः।

सवाजिरथमातङ्गाः स कपिः शास्यतामिति॥४॥

उसने कहा—’सेना के अग्रगामी वीरो! तुम लोग घोड़े, रथ और हाथियोंसहित बड़ी भारी सेना साथ लेकर जाओ और उस वानर को बलपूर्वक पकड़कर उसे अच्छी तरह शिक्षा दो॥ ४॥

यत्तैश्च खलु भाव्यं स्यात् तमासाद्य वनालयम्।

कर्म चापि समाधेयं देशकालाविरोधितम्॥५॥

‘उस वनचारी वानर के पास पहुँचकर तुम सब लोगों को सावधान और अत्यन्त प्रयत्नशील हो जाना चाहिये तथा काम वही करना चाहिये, जो देश और काल के अनुरूप हो॥५॥

न ह्यहं तं कपिं मन्ये कर्मणा प्रति तर्कयन्।

सर्वथा तन्महद् भूतं महाबलपरिग्रहम्॥६॥

‘जब मैं उसके अलौकिक कर्म को देखते हुए उसके स्वरूपपर विचार करता हूँ, तब वह मुझे वानर नहीं जान पड़ता है। वह सर्वथा कोई महान् प्राणी है, जो महान् बल से सम्पन्न है॥ ६॥

वानरोऽयमिति ज्ञात्वा नहि शुद्ध्यति मे मनः।

नैवाहं तं कपिं मन्ये यथेयं प्रस्तुता कथा॥७॥

‘यह वानर है’ ऐसा समझकर मेरा मन उसकी ओर से शुद्ध (विश्वस्त) नहीं हो रहा है। यह जैसा प्रसङ्ग उपस्थित है या जैसी बातें चल रही हैं, उन्हें देखते हुए मैं उसे वानर नहीं मानता हूँ॥७॥

भवेदिन्द्रेण वा सृष्टमस्मदर्थं तपोबलात्।

सनागयक्षगन्धर्वदेवासुरमहर्षयः॥८॥

युष्माभिः प्रहितैः सर्वैर्मया सह विनिर्जिताः।

तैरवश्यं विधातव्यं व्यलीकं किंचिदेव नः॥९॥

‘सम्भव है इन्द्र ने हमलोगों का विनाश करने के लिये अपने तपोबल से इसकी सृष्टि की हो। मेरी आज्ञा से तुम सब लोगों ने मेरे साथ रहकर नागोंसहित यक्षों, गन्धर्वो, देवताओं, असुरों और महर्षियों को भी अनेक बार पराजित किया है; अतः वे अवश्य हमारा कुछ अनिष्ट करना चाहेंगे॥ ८-९॥

तदेव नात्र संदेहः प्रसह्य परिगृह्यताम्।

यात सेनाग्रगाः सर्वे महाबलपरिग्रहाः॥१०॥

सवाजिरथमातङ्गाः स कपिः शास्यतामिति।

‘अतः यह उन्हीं का रचा हुआ प्राणी है, इसमें संदेह नहीं। तुमलोग उसे हठपूर्वक पकड़ ले आओ। मेरी सेना के अग्रगामी वीरो! तुम हाथी, घोड़े और रथोंसहित बड़ी भारी सेना साथ लेकर जाओ और उस वानर को अच्छी तरह शिक्षा दो॥ १० १/२ ॥

नावमन्यो भवद्भिश्च कपि/रपराक्रमः॥११॥

दृष्टा हि हरयः पूर्वे मया विपुलविक्रमाः।

‘वानर समझकर तुम्हें उसकी अवहेलना नहीं करनी चाहिये; क्योंकि वह धीर और पराक्रमी है। मैंने पहले बड़े-बड़े पराक्रमी वानर और भालू देखे हैं। ११ १/२॥

वाली च सह सुग्रीवो जाम्बवांश्च महाबलः॥१२॥

नीलः सेनापतिश्चैव ये चान्ये द्रिविदादयः।

‘जिनके नाम इस प्रकार हैं-वाली, सुग्रीव, महाबली जाम्बवान्, सेनापति नील तथा द्विविद आदि अन्य वानर ।। १२ १/२॥

नैव तेषां गतिर्भीमा न तेजो न पराक्रमः॥१३॥

न मतिर्न बलोत्साहो न रूपपरिकल्पनम्।

‘किंतु उनका वेग ऐसा भयंकर नहीं है और न उनमें ऐसा तेज, पराक्रम, बुद्धि, बल, उत्साह तथा रूप धारण करने की शक्ति ही है॥ १३ १/२ ॥

महत्सत्त्वमिदं ज्ञेयं कपिरूपं व्यवस्थितम्॥१४॥

प्रयत्नं महदास्थाय क्रियतामस्य निग्रहः।

‘वानर के रूप में यह कोई बड़ा शक्तिशाली जीव प्रकट हुआ है, ऐसा जानना चाहिये अतः तुमलोग महान् प्रयत्न करके उसे कैद करो॥१४ १/२॥

कामं लोकास्त्रयः सेन्द्राः ससुरासुरमानवाः॥१५॥

भवतामग्रतः स्थातुं न पर्याप्ता रणाजिरे।

‘भले ही इन्द्रसहित देवता, असुर, मनुष्य एवं तीनों लोक उतर आयें, वे रणभूमि में तुम्हारे सामने ठहर नहीं सकते॥१५ १/२॥

तथापि तु नयज्ञेन जयमाकाङ्क्षता रणे॥१६॥

आत्मा रक्ष्यः प्रयत्नेन युद्धसिद्धिर्हि चञ्चला।

‘तथापि समराङ्गण में विजय की इच्छा रखने वाले नीतिज्ञ पुरुष को यत्नपूर्वक अपनी रक्षा करनी चाहिये; क्योंकि युद्ध में सफलता अनिश्चित होती है’॥ १६ १/२॥

ते स्वामिवचनं सर्वे प्रतिगृह्य महौजसः॥१७॥

समुत्पेतुर्महावेगा हुताशसमतेजसः।

रथैश्च मत्तै गैश्च वाजिभिश्च महाजवैः॥१८॥

शस्त्रैश्च विविधैस्तीक्ष्णैः सर्वैश्चोपहिता बलैः।

स्वामी की आज्ञा स्वीकार करके वे सब-के-सब अग्नि के समान तेजस्वी, महान् वेगशाली और अत्यन्त बलवान् राक्षस तेज चलने वाले घोड़ों, मतवाले हाथियों तथा विशाल रथों पर बैठकर युद्ध के लिये चल दिये। वे सब प्रकार के तीखे शस्त्रों और सेनाओं से सम्पन्न थे॥ १७-१८ १/२ ॥

ततस्तु ददृशुर्वीरा दीप्यमानं महाकपिम्॥१९॥

रश्मिमन्तमिवोद्यन्तं स्वतेजोरश्मिमालिनम्।

तोरणस्थं महावेगं महासत्त्वं महाबलम्॥२०॥

महामतिं महोत्साहं महाकायं महाभुजम्।

आगे जाने पर उन वीरों ने देखा, महाकपि हनुमान् जी फाटकपर खड़े हैं और अपनी तेजोमयी किरणों से मण्डित हो उदयकाल के सूर्य की भाँति देदीप्यमान हो रहे हैं। उनकी शक्ति, बल, वेग, बुद्धि, उत्साह, शरीर और भुजाएँ सभी महान् थीं॥ १९-२० १/२ ॥

तं समीक्ष्यैव ते सर्वे दिक्षु सर्वास्ववस्थिताः॥२१॥

तैस्तैः प्रहरणैर्भीमैरभिपेतुस्ततस्ततः।

उन्हें देखते ही वे सब राक्षस, जो सभी दिशाओं में खड़े थे, भयंकर अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा करते हुए चारों ओर से उन पर टूट पड़े॥ २१ १/२ ॥

तस्य पञ्चायसास्तीक्ष्णाः सिताः पीतमुखाः

शराः। शिरस्युत्पलपत्राभा दुर्धरेण निपातिताः॥२२॥

निकट पहुँचने पर पहले दुर्धर ने हनुमान जी के मस्तक पर लोहे के बने हुए पाँच बाण मारे। वे सभी बाण मर्मभेदी और पैनी धारवाले थे। उनके अग्रभाग पर सोने का पानी दिया गया था। जिससे वे पीतमुख दिखायी देते थे। वे पाँचों बाण उनके सिर पर प्रफुल्लकमलदल के समान शोभा पा रहे थे॥ २२ ॥

स तैः पञ्चभिराविद्धः शरैः शिरसि वानरः।

उत्पपात नदन् व्योम्नि दिशो दश विनादयन्॥२३॥

मस्तक में उन पाँच बाणों से गहरी चोट खाकर वानरवीर हनुमान जी अपनी भीषण गर्जना से दसों दिशाओं को प्रतिध्वनित करते हुए आकाश में ऊपर की ओर उछल पड़े ॥ २३॥

ततस्तु दुर्धरो वीरः सरथः सज्जकार्मुकः।

किरन् शरशतै कैरभिपेदे महाबलः॥२४॥

तब रथ में बैठे हुए महाबली वीर दुर्धर ने धनुष चढ़ाये कई सौ बाणों की वर्षा करते हुए उनका पीछा किया॥

स कपिर्वारयामास तं व्योम्नि शरवर्षिणम्।

वृष्टिमन्तं पयोदान्ते पयोदमिव मारुतः॥२५॥

आकाश में खड़े हुए उन वानरवीर ने बाणों की वर्षा करते हुए दुर्धर को अपने हुंकारमात्र से उसी प्रकार रोक दिया, जैसे वर्षा-ऋतु के अन्त में वृष्टि करने वाले बादल को वायु रोक देती है।॥ २५॥

अद्यमानस्ततस्तेन दर्धरेणानिलात्मजः।

चकार निनदं भूयो व्यवर्धत च वीर्यवान्॥२६॥

जब दुर्धर अपने बाणों से अधिक पीड़ा देने लगा, तब वे परम पराक्रमी पवनकुमार पुनः विकट गर्जना करने और अपने शरीर को बढ़ाने लगे॥ २६ ॥

स दूरं सहसोत्पत्य दुर्धरस्य रथे हरिः।

निपपात महावेगो विधुद्राशिर्गिराविव॥२७॥

तत्पश्चात् वे महावेगशाली वानरवीर बहुत दूर तक ऊँचे उछलकर सहसा दुर्धर के रथ पर कूद पड़े, मानो किसी पर्वत पर बिजली का समूह गिर पड़ा हो ॥ २७॥

ततः स मथिताष्टाश्वं रथं भग्नाक्षकूबरम्।

विहाय न्यपतद् भूमौ दुर्धरस्त्यक्तजीवितः॥ २८॥

उनके भार से रथ के आठों घोड़ों का कचूमर निकल गया, धुरी और कूबर टूट गये तथा दुर्धर प्राणहीन हो उस रथ को छोड़कर पृथ्वी पर गिर पड़ा॥ २८॥

तं विरूपाक्षयूपाक्षौ दृष्ट्वा निपतितं भुवि।

तौ जातरोषौ दुर्धर्षावुत्पेततुररिंदमौ॥ २९॥

दुर्धर को धराशायी हुआ देख शत्रुओं का दमन करने वाले दुर्धर्ष वीर विरूपाक्ष और यूपाक्ष को बड़ा क्रोध हुआ। वे दोनों आकाश में उछले॥ २९॥

स ताभ्यां सहसोत्प्लुत्य विष्ठितो विमलेऽम्बरे।

मुद्गराभ्यां महाबाहुर्वक्षस्यभिहतः कपिः॥३०॥

उन दोनों ने सहसा उछलकर निर्मल आकाश में खड़े हुए महाबाहु कपिवर हनुमान जी की छाती में मुद्गरों से प्रहार किया॥ ३० ॥

तयोर्वेगवतोर्वेगं निहत्य स महाबलः।

निपपात पुनर्भूमौ सुपर्ण इव वेगितः॥ ३१॥

उन दोनों वेगवान् वीरों के वेग को विफल करके महाबली हनुमान जी वेगशाली गरुड़ के समान पुनः पृथ्वी पर कूद पड़े॥ ३१॥

स सालवृक्षमासाद्य समुत्पाट्य च वानरः।

तावुभौ राक्षसौ वीरौ जघान पवनात्मजः॥३२॥

वहाँ वानरशिरोमणि पवनकुमार ने एक साल-वृक्ष के पास जाकर उसे उखाड़ लिया और उसी के द्वारा उन दोनों राक्षसवीरों को मार डाला॥ ३२॥

ततस्तांस्त्रीन् हतान् ज्ञात्वा वानरेण तरस्विना।

अभिपेदे महावेगः प्रहस्य प्रघसो बली॥३३॥

भासकर्णश्च संक्रुद्धः शूलमादाय वीर्यवान्।

एकतः कपिशार्दूलं यशस्विनमवस्थितौ ॥ ३४॥

उन वेगशाली वानरवीर के द्वारा उन तीनों राक्षसों को मारा गया देख महान् वेग से युक्त बलवान् वीर प्रघस – हँसता हुआ उनके पास आया। दूसरी ओर से पराक्रमी वीर भासकर्ण भी अत्यन्त क्रोध में भरकर शूल हाथ में लिये वहाँ आ पहुँचा। वे दोनों यशस्वी कपिश्रेष्ठ हनुमान जी के निकट एक ही ओर खड़े हो गये। ३३-३४॥

पट्टिशेन शिताग्रेण प्रघसः प्रत्यपोथयत्।

भासकर्णश्च शूलेन राक्षसः कपिकुञ्जरम्॥३५॥

प्रघस ने तेज धारवाले पट्टिशसे तथा राक्षस भासकर्ण ने शूल से कपिकुञ्जर हनुमान जी पर प्रहारकिया॥ ३५॥

स ताभ्यां विक्षतैर्गात्रैरसृग्दिग्धतनूरुहः।

अभवद् वानरः क्रुद्धो बालसूर्यसमप्रभः॥ ३६॥

उन दोनों के प्रहारों से हनुमान जी के शरीर में कई जगह घाव हो गये और उनके शरीर की रोमावली रक्त से रँग गयी। उस समय क्रोध में भरे हुए वानरवीर हनुमान् प्रातःकाल के सूर्य की भाँति अरुण कान्ति से प्रकाशित हो रहे थे॥३६॥

समुत्पाट्य गिरेः शृङ्गं समृगव्यालपादपम्।

जघान हनुमान् वीरो राक्षसौ कपिकुञ्जरः।

गिरिशृङ्गसुनिष्पिष्टौ तिलशस्तौ बभूवतुः॥ ३७॥

तब मृग, सर्प और वृक्षोंसहित एक पर्वत-शिखर को उखाड़कर कपिश्रेष्ठ वीर हनुमान् ने उन दोनों राक्षसों पर दे मारा। पर्वत-शिखर के आघात से वे दोनों पिस गये और उनके शरीर तिल के समान खण्डखण्ड हो गये॥ ३७॥

ततस्तेष्ववसन्नेषु सेनापतिषु पञ्चसु।

बलं तदवशेषं तु नाशयामास वानरः॥ ३८॥

इस प्रकार उन पाँचों सेनापतियों के नष्ट हो जाने पर हनुमान् जी ने उनकी बची-खुची सेना का भी संहारआरम्भ किया॥३८॥

अश्वैरश्वान् गजैर्नागान् योधैर्योधान् रथै रथान्।

स कपि शयामास सहस्राक्ष इवासुरान्॥३९॥

जैसे देवराज इन्द्र असुरों का विनाश करते हैं, उसी प्रकार उन वानरवीर ने घोड़ों से घोड़ों का, हाथियों से हाथियों का, योद्धाओं से योद्धाओं का और रथों से रथों का संहार कर डाला॥ ३९॥

हयैर्नागैस्तुरंगैश्च भग्नाक्षैश्च महारथैः ।

हतैश्च राक्षसैर्भूमी रुद्धमार्गा समन्ततः॥४०॥

मरे हुए हाथियों और तीव्रगामी घोड़ों से, टूटी हुई धुरीवाले विशाल रथों से तथा मारे गये राक्षसों की लाशों से वहाँ की सारी भूमि चारों ओर से इस तरह पट गयी थी कि आने-जाने का रास्ता बंद हो गया था। ४०॥

ततः कपिस्तान् ध्वजिनीपतीन् रणे निहत्य वीरान् सबलान् सवाहनान्।

तथैव वीरः परिगृह्य तोरणं कृतक्षणः काल इव प्रजाक्षये॥४१॥

इस प्रकार सेना और वाहनोंसहित उन पाँचों वीर सेनापतियों को रणभूमि में मौत के घाट उतारकरमहावीर वानर हनुमान् जी पुनः युद्ध के लिये अवसर पाकर पहले की ही भाँति फाटक पर जाकर खड़े हो गये। उस समय वे प्रजा का संहार करने के लिये उद्यत हुए काल के समान जान पड़ते थे। ४१॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे षट्चत्वारिंशः सर्गः॥४६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में छियालीसवाँ सर्ग पूराहुआ॥ ४६॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
सुन्दरकाण्डम्

रावणपुत्र अक्षकुमार का पराक्रम और वध

सप्तचत्वारिंशः सर्गः

सर्ग-47

सेनापतीन् पञ्च स तु प्रमापितान् हनूमता सानुचरान् सवाहनान्।

निशम्य राजा समरोद्धतोन्मुखं कुमारमक्षं प्रसमैक्षताक्षम्॥१॥

हनुमान जी के द्वारा अपने पाँच सेनापतियों को सेवकों और वाहनोंसहित मारा गया सुनकर राजा रावण ने अपने सामने बैठे हुए पुत्र अक्षकुमार की ओर देखा, जो युद्ध में उद्धत और उसके लिये उत्कण्ठित रहनेवाला था॥१॥

स तस्य दृष्टयर्पणसम्प्रचोदितः प्रतापवान् काञ्चनचित्रकार्मुकः।

समुत्पपाताथ सदस्युदीरितो द्विजातिमुख्यैर्ह विषेव पावकः॥२॥

पिता के दृष्टिपातमात्र से प्रेरित हो वह प्रतापी वीर युद्ध के लिये उत्साहपूर्वक उठा। उसका धनुष सुवर्णजटित होने के कारण विचित्र शोभा धारण करता था। जैसे श्रेष्ठ ब्राह्मणों द्वारा यज्ञशाला में हविष्य की आहुति देने पर अग्निदेव प्रज्वलित हो उठते हैं, उसी प्रकार वह भी सभा में उठकर खड़ा हो गया॥२॥

ततो महान् बालदिवाकरप्रभं प्रतप्तजाम्बूनदजालसंततम्।

रथं समास्थाय ययौ स वीर्यवान् महाहरिं तं प्रति नैर्ऋतर्षभः॥३॥

वह महापराक्रमी राक्षसशिरोमणि अक्ष प्रातःकालीन सूर्य के समान कान्तिमान् तथा तपाये हुए सुवर्ण के जाल से आच्छादित रथ पर आरूढ़ हो उन महाकपि हनुमान जी के पास चल दिया॥३॥

ततस्तपःसंग्रहसंचयार्जितं प्रतप्तजाम्बूनदजालचित्रितम्।

पताकिनं रत्नविभूषितध्वजं मनोजवाष्टाश्ववरैः सुयोजितम्॥४॥

सुरासुराधृष्यमसङ्गचारिणं तडित्प्रभं व्योमचरं समाहितम्।

सतूणमष्टासिनिबद्धबन्धुरं यथाक्रमावेशितशक्तितोमरम्॥५॥

विराजमानं प्रतिपूर्णवस्तुना सहेमदाम्ना शशिसूर्यवर्चसा।

दिवाकराभं रथमास्थितस्ततः स निर्जगामामरतुल्यविक्रमः॥६॥

वह रथ उसे बड़ी भारी तपस्याओं के संग्रह से प्राप्त हुआ था। उसमें तपे हुए जाम्बूनद (सुवर्ण)-की जाली जड़ी हुई थी। पताका फहरा रही थी। उसका ध्वजदण्ड रत्नों से विभूषित था। उसमें मन के समान वेगवाले आठ घोड़े अच्छी तरह जुते हुए थे। देवता और असुर कोई भी उस रथ को नष्ट नहीं कर सकते थे। उसकी गति कहीं रुकती नहीं थी। वह बिजली के समान प्रकाशित होता और आकाश में भी चलता था। उस रथ को सब सामग्रियों से सुसज्जित किया गया था। उसमें तरकस रखे गये थे। आठ तलवारों के बँधे रहने से वह और भी सुन्दर दिखायी देता था। उसमें यथास्थान शक्ति और तोमर आदि अस्त्र-शस्त्र क्रम से रखे गये थे। चन्द्रमा और सूर्य के समान दीप्तिमान् तथा सोने की रस्सी से युक्त युद्ध के समस्त उपकरणों से सुशोभित उस सूर्यतुल्य तेजस्वी रथ पर बैठकर देवताओं के तुल्य पराक्रमी अक्षकुमार राजमहल से बाहर निकला॥ ४–६॥

स पूरयन् खं च महीं च साचलां तुरङ्गमातङ्गमहारथस्वनैः।

बलैः समेतैः सहतोरणस्थितं समर्थमासीनमुपागमत् कपिम्॥७॥

घोड़े, हाथी और बड़े-बड़े रथों की भयंकर आवाज से पर्वतोंसहित पृथ्वी तथा आकाश को जाता हुआ वह बड़ी भारी सेना साथ लेकर वाटिका के द्वार पर बैठे हुए शक्तिशाली वीर वानर हनुमान् जी के पास जा पहुँचा॥७॥

स तं समासाद्य हरिं हरीक्षणो युगान्तकालाग्निमिव प्रजाक्षये।

अवस्थितं विस्मितजातसम्भ्रमं समैक्षताक्षो बहुमानचक्षुषा॥८॥

सिंह के समान भयंकर नेत्रवाले अक्षने वहाँ पहुँचकर लोकसंहार के समय प्रज्वलित हुई प्रलयाग्नि के समान स्थित और विस्मय एवं सम्भ्रम में पड़े हुए हनुमान् जी को अत्यन्त गर्वभरी दृष्टि से देखा ॥८॥ स

तस्य वेगं च कपेर्महात्मनः पराक्रमं चारिषु रावणात्मजः।

विचारयन् स्वं च बलं महाबलो युगक्षये सूर्य इवाभिवर्धत॥९॥

उन महात्मा कपिश्रेष्ठ के वेग तथा शत्रुओं के प्रति उनके पराक्रमका और अपने बल का भी विचार करके वह महाबली रावणकुमार प्रलयकाल के सूर्य की भाँति बढ़ने लगा॥९॥

स जातमन्युः प्रसमीक्ष्य विक्रम स्थितः स्थिरः संयति दुर्निवारणम्।

समाहितात्मा हनुमन्तमाहवे प्रचोदयामास शितैः शरैस्त्रिभिः॥१०॥

हनुमान जी के पराक्रम पर दृष्टिपात करके उसे क्रोध आ गया। अतः स्थिरतापूर्वक स्थित हो उसने एकाग्रचित्त से तीन तीखे बाणों द्वारा रणदुर्जय हनुमान् जी को युद्ध के लिये प्रेरित किया॥१०॥

ततः कपिं तं प्रसमीक्ष्य गर्वितं जितश्रमं शत्रुपराजयोचितम्।

अवैक्षताक्षः समुदीर्णमानसं सबाणपाणिः प्रगृहीतकार्मुकः॥११॥

तदनन्तर हाथ में धनुष और बाण लिये अक्ष ने यह जानकर कि ‘ये खेद या थकावट को जीत चुके हैं, शत्रुओं को पराजित करने की योग्यता रखते हैं और युद्ध के लिये इनके मन का उत्साह बढ़ा हुआ है; इसीलिये ये गर्वीले दिखायी देते हैं, उनकी ओर दृष्टिपात किया॥ ११॥

स हेमनिष्काङ्गदचारुकुण्डलः समाससादाशुपराक्रमः कपिम्।

तयोर्बभूवाप्रतिमः समागमः सुरासुराणामपि सम्भ्रमप्रदः॥१२॥

गले में सुवर्ण के निष्क (पदक), बाँहों में बाजूबंद और कानों में मनोहर कुण्डल धारण किये वह शीघ्रपराक्रमी रावणकुमार हनुमान जी के पास आया। उस समय उन दोनों वीरों में जो टक्कर हुई, उसकी कहीं तुलना नहीं थी। उनका युद्ध देवताओं और असुरों के मन में भी घबराहट पैदा कर देने वाला था॥ १२॥

ररास भूमिर्न तताप भानुमान् ववौ न वायुः प्रचचाल चाचलः।

कपेः कुमारस्य च वीर्यसंयुगं ननाद च द्यौरुदधिश्च चुक्षुभे॥१३॥

कपिश्रेष्ठ हनुमान् और अक्षकुमार का वह संग्राम देखकर भूतल के सारे प्राणी चीख उठे। सूर्य का ताप कम हो गया। वायु की गति रुक गयी। पर्वत हिलने लगे। आकाश में भयंकर शब्द होने लगा और समुद्र में तूफान आ गया॥ १३॥

स तस्य वीरः सुमुखान् पतत्रिणः सुवर्णपुङ्खान् सविषानिवोरगान्।

समाधिसंयोगविमोक्षतत्त्वविच्छरानथ त्रीन् कपिमूर्च्यताडयत्॥१४॥

अक्षकुमार निशाना साधने, बाण को धनुष पर चढ़ाने और उसे लक्ष्य की ओर छोड़ने में बड़ा प्रवीण था। उस वीर ने विषधर सोके समान भयंकर, सुवर्णमय पंखों से युक्त, सुन्दर अग्रभागवाले तथा पत्रयुक्त तीन बाण हनुमान जी के मस्तक में मारे॥ १४ ॥

स तैः शरैर्मूर्ध्नि समं निपातितैः क्षरन्नसृग्दिग्धविवृत्तनेत्रः।

नवोदितादित्यनिभः शरांशुमान् व्यराजतादित्य इवांशुमालिकः॥१५॥

उन तीनों की चोट हनुमान् जी के माथे में एक साथ ही लगी, इससे खून की धारा गिरने लगी। वे उस रक्त से नहा उठे और उनकी आँखें घूमने लगीं। उस समय बाणरूपी किरणों से युक्त हो वे तुरंत के उगे हुए अंशुमाली सूर्य के समान शोभा पाने लगे॥ १५ ॥

ततः प्लवङ्गाधिपमन्त्रिसत्तमः समीक्ष्य तं राजवरात्मजं रणे।

उदग्रचित्रायुधचित्रकार्मुकं जहर्ष चापूर्यत चाहवोन्मुखः॥१६॥

तदनन्तर वानरराज के श्रेष्ठ मन्त्री हनुमान् जी राक्षसराज रावण के राजकुमार अक्ष को अति उत्तम विचित्र आयुध एवं अद्भुत धनुष धारण किये देख हर्ष और उत्साह से भर गये और युद्ध के लिये उत्कण्ठित हो अपने शरीर को बढ़ाने लगे॥ १६॥

स मन्दराग्रस्थ इवांशुमाली विवृद्धकोपो बलवीर्यसंवृतः।

कुमारमक्षं सबलं सवाहनं ददाह नेत्राग्निमरीचिभिस्तदा ॥१७॥

हनुमान जी का क्रोध बहुत बढ़ा हुआ था। वे बल और पराक्रम से सम्पन्न थे, अतः मन्दराचल के शिखर पर प्रकाशित होने वाले सूर्यदेव के समान वे अपनी नेत्राग्निमयी किरणों से उस समय सेना और सवारियोंसहित राजकुमार अक्ष को दग्ध-सा करने लगे॥ १७॥

ततः स बाणासनशक्रकार्मुकः शरप्रवर्षो युधि राक्षसाम्बुदः।

शरान् मुमोचाशु हरीश्वराचले बलाहको वृष्टिमिवाचलोत्तमे॥१८॥

तब जैसे बादल श्रेष्ठ पर्वत पर जल बरसाता है, उसी प्रकार युद्धस्थल में अपने शरासनरूपी इन्द्रधनुष से युक्त वह राक्षसरूपी मेघ बाणवर्षी होकर कपिश्रेष्ठ हनुमान् रूपी पर्वत पर बड़े वेग से बाणों की वृष्टि करने लगा॥ १८॥

कपिस्ततस्तं रणचण्डविक्रम प्रवृद्धतेजोबलवीर्यसायकम्।

कुमारमक्षं प्रसमीक्ष्य संयुगे ननाद हर्षाद् घनतुल्यनिःस्वनः॥१९॥

रणभूमि में अक्षकुमार का पराक्रम बड़ा प्रचण्ड दिखायी देता था। उसके तेज, बल, पराक्रम और बाण सभी बढ़े-चढ़े थे। युद्धस्थल में उसकी ओर दृष्टिपात करके हनुमान जी ने हर्ष और उत्साह में भरकर मेघ के समान भयानक गर्जना की॥ १९॥

स बालभावाद् युधि वीर्यदर्पितः प्रवृद्धमन्युः क्षतजोपमेक्षणः।

समाससादाप्रतिमं रणे कपिं गजो महाकूपमिवावृतं तृणैः॥२०॥

समराङ्गण में बल के घमंड में भरे हुए अक्षकुमार को उनकी गर्जना सुनकर बड़ा क्रोध हुआ। उसकी आँखें रक्त के समान लाल हो गयीं। वह अपने बालोचित अज्ञान के कारण अनुपम पराक्रमी हनुमान् जी का सामना करने के लिये आगे बढ़ा। ठीक उसी तरह, जैसे कोई हाथी तिनकों से ढके हुए विशाल कूप की ओर अग्रसर होता है॥ २०॥

स तेन बाणैः प्रसभं निपातितैश्चकार नादं घननादनिःस्वनः।

समुत्सहेनाशु नभः समारुजन् भुजोरुविक्षेपणघोरदर्शनः॥२१॥

उसके बलपूर्वक चलाये हुए बाणों से विद्ध होकर हनुमान जी ने तुरंत ही उत्साहपूर्वक आकाश को विदीर्ण करते हुए-से मेघ के समान गम्भीर स्वर से भीषण गर्जना की। उस समय दोनों भुजाओं और जाँघों को चलाने के कारण वे बड़े भयंकर दिखायी देते थे॥ २१॥

तमुत्पतन्तं समभिद्रवद् बली स राक्षसानां प्रवरः प्रतापवान्।

रथी रथश्रेष्ठतरः किरन् शरैः पयोधरः शैलमिवाश्मवृष्टिभिः॥ २२॥

उन्हें आकाशमें उछलते देख रथियोंमें श्रेष्ठ और रथपर चढ़े हुए उस बलवान्, प्रतापी एवं राक्षसशिरोमणि वीरने बाणोंकी वर्षा करते हुए उनका पीछा किया। उस समय वह ऐसा जान पड़ता था मानो कोई मेघ किसी पर्वतपर ओले और पत्थरोंकी वर्षा कर रहा हो ॥ २२॥

स ताञ्छरांस्तस्य हरिर्विमोक्षयंश्चचार वीरः पथि वायुसेविते।

शरान्तरे मारुतवद् विनिष्पतन् मनोजवः संयति भीमविक्रमः॥२३॥

उस युद्धस्थल में मन के समान वेगवाले वीर हनुमान् जी भयंकर पराक्रम प्रकट करने लगे। वे अक्षकुमार के उन बाणों को व्यर्थ करते हुए वायु के पथ पर विचरते और दो बाणों के बीच से हवा की भाँति निकल जाते थे॥ २३॥

तमात्तबाणासनमाहवोन्मुखं खमास्तृणन्तं विविधैः शरोत्तमैः।

अवैक्षताक्षं बहुमानचक्षुषा जगाम चिन्तां स च मारुतात्मजः ॥२४॥

अक्षकुमार हाथ में धनुष लिये युद्ध के लिये उन्मुख हो नाना प्रकारके उत्तम बाणोंद्वारा आकाश को आच्छादित किये देता था। पवनकुमार हनुमान ने उसे बड़े आदर की दृष्टि से देखा और वे मन-ही-मन कुछ सोचने लगे॥ २४॥

ततः शरैर्भिन्नभुजान्तरः कपिः कुमारवर्येण महात्मना नदन्।

महाभुजः कर्मविशेषतत्त्वविद् विचिन्तयामास रणे पराक्रमम्॥ २५॥

इतने ही में महामना वीर अक्षकुमार ने अपने बाणों द्वारा कपिश्रेष्ठ हनुमान जी की दोनों भुजाओं के मध्यभाग–छाती में गहरा आघात किया। वे महाबाहु वानरवीर समयोचित कर्तव्यविशेष को ठीक-ठीक जानते थे; अतः वे रणक्षेत्र में उस चोट को सहकर सिंहनाद करते हुए उसके पराक्रम के विषयमें इस प्रकार विचार करने लगे- ॥ २५ ॥

अबालवद् बालदिवाकरप्रभः करोत्ययं कर्म महन्महाबलः।

न चास्य सर्वाहवकर्मशालिनः प्रमापणे मे मतिरत्र जायते॥ २६॥

‘यह महाबली अक्षकुमार बालसूर्य के समान तेजस्वी है और बालक होकर भी बड़ों के समान महान् कर्म कर रहा है। युद्धसम्बन्धी समस्त कर्मों में कुशल होने के कारण अद्भुत शोभा पाने वाले इस वीर को यहाँ मार डालने की मेरी इच्छा नहीं हो रही है।॥ २६॥

अयं महात्मा च महांश्च वीर्यतः समाहितश्चातिसहश्च संयुगे।

असंशयं कर्मगुणोदयादयं सनागयज्ञैर्मुनिभिश्च पूजितः ॥ २७॥

‘यह महामनस्वी राक्षसकुमार बल-पराक्रम की दृष्टि से महान् है। युद्ध में सावधान एवं एकाग्रचित्त है तथा शत्रु के वेग को सहन करने में अत्यन्त समर्थ है। अपने कर्म और गुणों की उत्कृष्टता के कारण यह नागों, यक्षों और मुनियों के द्वारा भी प्रशंसित हुआ होगा, इसमें संशय नहीं है।। २७॥

पराक्रमोत्साहविवृद्धमानसःसमीक्षते मां प्रमुखोऽग्रतः स्थितः।

पराक्रमो ह्यस्य मनांसि कम्पयेत् सुरासुराणामपि शीघ्रकारिणः॥२८॥

‘पराक्रम और उत्साह से इसका मन बढ़ा हुआ है। यह युद्ध के मुहाने पर मेरे सामने खड़ा हो मुझे ही देख रहा है। शीघ्रतापूर्वक युद्ध करने वाले इस वीर का पराक्रम देवताओं और असुरों के हृदय को भी कम्पित कर सकता है॥ २८॥

न खल्वयं नाभिभवेदुपेक्षितः पराक्रमो ह्यस्य रणे विवर्धते।

प्रमापणं ह्यस्य ममाद्य रोचते न वर्धमानोऽग्निरुपेक्षितुं क्षमः ॥ २९॥

‘किंतु यदि इसकी उपेक्षा की गयी तो यह मुझे परास्त किये बिना नहीं रहेगा; क्योंकि संग्राम में इसका पराक्रम बढ़ता जा रहा है। अतः अब इसे मार डालना ही मुझे अच्छा जान पड़ता है। बढ़ती हुई आग की उपेक्षा करना कदापि उचित नहीं है’ ।। २९ ॥

इति प्रवेगं तु परस्य तर्कयन् स्वकर्मयोगं च विधाय वीर्यवान्।

चकार वेगं तु महाबलस्तदा मतिं च चक्रेऽस्य वधे तदानीम्॥३०॥

इस प्रकार शत्रु के वेग का विचार कर उसके प्रतीकार के लिये अपने कर्तव्य का निश्चय करके महान् बल और पराक्रम से सम्पन्न हनुमान् जी ने उस समय अपना वेग बढ़ाया और उस शत्रु को मार डालने का विचार किया॥ ३० ।।

स तस्य तानष्ट वरान् महाहयान् समाहितान् भारसहान् विवर्तने।

जघान वीरः पथि वायुसेविते तलप्रहारैः पवनात्मजः कपिः॥३१॥

तत्पश्चात् आकाश में विचरते हुए वीर वानर पवनकुमार ने थप्पड़ों की मार से अक्षकुमार के उन आठों उत्तम और विशाल घोड़ों को, जो भार सहन करने में समर्थ और नाना प्रकार के पैंतरे बदलने की कला में सुशिक्षित थे, यमलोक पहुँचा दिया॥३१॥

ततस्तलेनाभिहतो महारथः स तस्य पिङ्गाधिपमन्त्रिनिर्जितः।

स भग्ननीडः परिवृत्तकूबरः पपात भूमौ हतवाजिरम्बरात्॥३२॥

तदनन्तर वानरराज सुग्रीव के मन्त्री हनुमान जी ने अक्षकुमार के उस विशाल रथ को भी अभिभूत कर दिया, उन्होंने हाथ से ही पीटकर रथ की बैठक तोड़ डाली और उसके हरसे को उलट दिया। घोड़े तो पहले ही मर चुके थे, अतः वह महान् रथ आकाश से पृथ्वी पर गिर पड़ा॥ ३२॥

स तं परित्यज्य महारथो रथं सकार्मुकः खड्गधरः खमुत्पतन्।

ततोऽभियोगादृषिरुग्रवीर्यवान् विहाय देहं मरुतामिवालयम्॥३३॥

उस समय महारथी अक्षकुमार धनुष और तलवार ले रथ छोड़कर अन्तरिक्ष में ही उड़ने लगा। ठीक वैसे ही, जैसे कोई उग्रशक्ति से सम्पन्न महर्षि योगमार्ग से शरीर त्यागकर स्वर्गलोक की ओर चला जा रहा हो॥ ३३॥

कपिस्ततस्तं विचरन्तमम्बरे पतत्त्रिराजानिलसिद्धसेविते।

समेत्य तं मारुतवेगविक्रमः क्रमेण जग्राह च पादयोर्दृढम्॥३४॥

तब वायु के समान वेग और पराक्रमवाले कपिवर हनुमान जी ने पक्षिराज गरुड़, वायु तथा सिद्धों से सेवित व्योममार्ग में विचरते हुए उस राक्षस के पास पहुँचकर क्रमशः उसके दोनों पैर दृढ़तापूर्वक पकड़ लिये॥३४॥

स तं समाविध्य सहस्रशः कपिमहोरगं गृह्य इवाण्डजेश्वरः।

मुमोच वेगात् पितृतुल्यविक्रमो महीतले संयति वानरोत्तमः॥ ३५॥

फिर तो अपने पिता वायु देवता के तुल्य पराक्रमी वानर-शिरोमणि हनुमान् ने जिस प्रकार गरुड़ बड़ेबड़े सर्पो को घुमाते हैं, उसी तरह उसे हजारों बार घुमाकर बड़े वेग से उस युद्ध-भूमि में पटक दिया॥ ३५॥

स भग्नबाहरुकटीपयोधरः क्षरन्नसृनिर्मथितास्थिलोचनः।

सम्भिन्नसंधिः प्रविकीर्णबन्धनो हतः क्षितौ वायुसुतेन राक्षसः॥ ३६॥

नीचे गिरते ही उसकी भुजा, जाँघ, कमर और छाती के टुकड़े-टुकड़े हो गये, खून की धारा बहने लगी, शरीर की हड्डियाँ चूर-चूर हो गयीं, आँखें बाहर निकल आयीं, अस्थियों के जोड़ टूट गये और नसनाड़ियों के बन्धन शिथिल हो गये। इस तरह वह राक्षस पवनकुमार हनुमान जी के हाथ से मारा गया। ३६॥

महाकपिभूमितले निपीड्य तं चकार रक्षोऽधिपतेर्महद्भयम्।

महर्षिभिश्चक्रचरैः समागतैः समेत्य भूतैश्च सयक्षपन्नगैः।

सुरैश्च सेन्द्र शजातविस्मयैहते कुमारे स कपिर्निरीक्षितः॥ ३७॥

अक्षकुमार को पृथ्वी पर पटककर महाकपि हनुमान् जी ने राक्षसराज रावण के हृदय में बहुत बड़ा भय उत्पन्न कर दिया। उसके मारे जाने पर नक्षत्रमण्डल में विचरने वाले महर्षियों, यक्षों, नागों, भूतों तथा इन्द्रसहित देवताओं ने वहाँ एकत्र होकर बड़े विस्मय के साथ हनुमान जी का दर्शन किया॥ ३७॥

निहत्य तं वज्रिसुतोपमं रणे कुमारमक्षं क्षतजोपमेक्षणम्।

तदेव वीरोऽभिजगाम तोरणं कृतक्षणः काल इव प्रजाक्षये॥ ३८॥

युद्ध में इन्द्रपुत्र जयन्त के समान पराक्रमी और लाल-लाल आँखों वाले अक्षकुमार का काम तमाम करके वीरवर हनुमान जी प्रजा के संहार के लिये उद्यत हुए काल की भाँति पुनः युद्ध की प्रतीक्षा करते हुए वाटिका के उसी द्वार पर जा पहुँचे॥ ३८॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे सप्तचत्वारिंशः सर्गः॥४७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में सैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।४७॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
सुन्दरकाण्डम्

इन्द्रजित् और हनुमान जी का युद्ध, उसके दिव्यास्त्र के बन्धन में बँधकर हनुमान् जी का रावण के दरबार में उपस्थित होना

अष्टचत्वारिंशः सर्गः

सर्ग-48


ततस्तु रक्षोऽधिपतिर्महात्मा हनूमताक्षे निहते कुमारे।

मनः समाधाय स देवकल्पं समादिदेशेन्द्रजितं सरोषः॥१॥

तदनन्तर हनुमान जी के द्वारा अक्षकुमार के मारे जाने पर राक्षसों का स्वामी महाकाय रावण अपने मन को किसी तरह सुस्थिर करके रोष से जल उठा और देवताओं के तुल्य पराक्रमी कुमार इन्द्रजित् (मेघनाद)-को इस प्रकार आज्ञा दी— ॥१॥

त्वमस्त्रविच्छस्त्रभृतां वरिष्ठः सुरासुराणामपि शोकदाता।

सुरेषु सेन्द्रेषु च दृष्टकर्मा पितामहाराधनसंचितास्त्रः॥२॥

‘बेटा! तुमने ब्रह्माजी की आराधना करके अनेक प्रकार के अस्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया है। तुम अस्त्रवेत्ता, शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ तथा देवताओं और असुरों को भी शोक प्रदान करने वाले हो। इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओं के समुदाय में तुम्हारा पराक्रम देखा गया है।॥ २॥

त्वदस्त्रबलमासाद्य ससुराः समरुद्गणाः।

न शेकुः समरे स्थातुं सुरेश्वरसमाश्रिताः॥३॥

‘इन्द्र के आश्रय में रहने वाले देवता और मरुद्गण भी समरभूमि में तुम्हारे अस्त्र-बल का सामना होने पर टिक नहीं सके हैं॥३॥

न कश्चित् त्रिषु लोकेषु संयुगे न गतश्रमः।

भुजवीर्याभिगुप्तश्च तपसा चाभिरक्षितः।

देशकालप्रधानश्च त्वमेव मतिसत्तमः॥४॥

‘तीनों लोकों में तुम्हारे सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जो युद्ध से थकता न हो। तुम अपने बाहुबल से तो सुरक्षित हो ही, तपस्या के बल से भी पूर्णतः निरापद हो। देश-काल का ज्ञान रखने वालों में प्रधान और बुद्धि की दृष्टि से भी सर्वश्रेष्ठ तुम्हीं हो॥४॥

न तेऽस्त्यशक्यं समरेषु कर्मणां न तेऽस्त्यकार्यं मतिपूर्वमन्त्रणे।

न सोऽस्ति कश्चित् त्रिषु संग्रहेषु न वेद यस्तेऽस्त्रबलं बलं च॥५॥

‘युद्ध में तुम्हारे वीरोचित कर्मो के द्वारा कुछ भी असाध्य नहीं है। शास्त्रानुकूल बुद्धिपूर्वक राजकार्य का विचार करते समय तुम्हारे लिये कुछ भी असम्भव नहीं है। तुम्हारा कोई भी विचार ऐसा नहीं होता, जो कार्य का साधक न हो। त्रिलोकी में एक भी ऐसा वीर नहीं है, जो तुम्हारी शारीरिक शक्ति और अस्त्र-बल को न जानता हो॥ ५ ॥

ममानुरूपं तपसो बलं च ते पराक्रमश्चास्त्रबलं च संयुगे।

न त्वां समासाद्य रणावमर्दै मनः श्रमं गच्छति निश्चितार्थम्॥६॥

‘तुम्हारा तपोबल, युद्धविषयक पराक्रम और अस्त्र-बल मेरे ही समान है। युद्धस्थल में तुमको पाकर मेरा मन कभी खेद या विषाद को नहीं प्राप्त होता; क्योंकि इसे यह निश्चित विश्वास रहता है कि विजय तुम्हारे पक्ष में होगी॥६॥

निहताः किंकराः सर्वे जम्बुमाली च राक्षसः।

अमात्यपुत्रा वीराश्च पञ्च सेनाग्रगामिनः॥७॥

‘देखो, किंकर नामवाले समस्त राक्षस मार डाले गये। जम्बुमाली नाम का राक्षस भी जीवित न रह सका, मन्त्रीके सातों वीर पुत्र तथा मेरे पाँच सेनापति भी काल के गाल में चले गये॥७॥

बलानि सुसमृद्धानि साश्वनागरथानि च।

सहोदरस्ते दयितः कुमारोऽक्षश्च सूदितः।

न तु तेष्वेव मे सारो यस्त्वय्यरिनिषूदन॥८॥

“उनके साथ ही हाथी, घोड़े और रथोंसहित मेरी बहुत-सी बल-वीर्य से सम्पन्न सेनाएँ भी नष्ट हो गयीं और तुम्हारा प्रिय बन्धु कुमार अक्ष भी मार डाला गया। शत्रुसूदन! मुझमें जो तीनों लोकों पर विजय पाने की शक्ति है, वह तुम्ही में है। पहले जो लोग मारे गये हैं, उनमें वह शक्ति नहीं थी (इसलिये तुम्हारी विजय निश्चित है) ॥ ८॥

इदं च दृष्ट्वा निहतं महद् बलं कपेः प्रभावं च पराक्रमं च।

त्वमात्मनश्चापि निरीक्ष्य सारं कुरुष्व वेगं स्वबलानुरूपम्॥९॥

‘इस प्रकार अपनी विशाल सेना का संहार और उस वानर का प्रभाव एवं पराक्रम देखकर तुम अपने बल का भी विचार कर लो; फिर अपनी शक्ति के अनुसार उद्योग करो॥९॥

बलावमर्दस्त्वयि संनिकृष्टे यथा गते शाम्यति शान्तशत्रौ।

तथा समीक्ष्यात्मबलं परं च समारभस्वास्त्रभृतां वरिष्ठ॥१०॥

‘शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ वीर ! तुम्हारे सब शत्रु शान्त हो चुके हैं। तुम अपने और पराये बल का विचार करके ऐसा प्रयत्न करो, जिससे युद्धभूमि के निकट तुम्हारे पहुँचते ही मेरी सेना का विनाश रुक जाय॥१०॥

न वीर सेना गणशो च्यवन्ति न वज्रमादाय विशालसारम्।

न मारुतस्यास्ति गतिप्रमाणं न चाग्निकल्पः करणेन हन्तुम्॥११॥

‘वीरवर! तुम्हें अपने साथ सेना नहीं ले जानी चाहिये; क्योंकि वे सेनाएँ समूह-की-समूह या तो भाग जाती हैं या मारी जाती हैं। इसी तरह अधिक तीक्ष्णता और कठोरता से युक्त वज्र लेकर भी जाने की कोई आवश्यकता नहीं है (क्योंकि उसके ऊपर वह भी व्यर्थ सिद्ध हो चुका है)। उस वायुपुत्र हनुमान् की गति अथवा शक्ति का कोई माप-तौल या सीमा नहीं है। वह अग्नि-तुल्य तेजस्वी वानर किसी साधन विशेष से नहीं मारा जा सकता॥ ११॥

तमेवमर्थं प्रसमीक्ष्य सम्यक् स्वकर्मसाम्याद्धि समाहितात्मा।

स्मरंश्च दिव्यं धनुषोऽस्य वीर्य व्रजाक्षतं कर्म समारभस्व॥१२॥

‘इन सब बातों का अच्छी तरह विचार करके प्रतिपक्षी में अपने समान ही पराक्रम समझकर तुम अपने चित्त को एकाग्र कर लो–सावधान हो जाओ। अपने इस धनुष के दिव्य प्रभाव को याद रखते हुए

आगे बढ़ो और ऐसा पराक्रम करके दिखाओ, जो खाली न जाय॥

न खल्वियं मतिश्रेष्ठ यत्त्वां सम्प्रेषयाम्यहम्।

इयं च राजधर्माणां क्षत्रस्य च मतिर्मता॥१३॥

‘उत्तम बुद्धिवाले वीर! मैं तुम्हें जो ऐसे संकट में भेज रहा हूँ, यह यद्यपि (स्नेह की दृष्टि से) उचित नहीं है, तथापि मेरा यह विचार राजनीति और क्षत्रियधर्म के अनुकूल है॥ १३॥

नानाशस्त्रेषु संग्रामे वैशारद्यमरिंदम।

अवश्यमेव बोद्धव्यं काम्यश्च विजयो रणे॥१४॥

‘शत्रुदमन! वीर पुरुष को संग्राम में नाना प्रकार के शस्त्रों की कुशलता अवश्य प्राप्त करनी चाहिये, साथ ही युद्ध में विजय पाने की भी अभिलाषा रखनी चाहिये’ ॥ १४॥

ततः पितुस्तद्वचनं निशम्य प्रदक्षिणं दक्षसुतप्रभावः।

चकार भर्तारमतित्वरेण रणाय वीरः प्रतिपन्नबुद्धिः ॥१५॥

अपने पिता राक्षसराज रावण के इस वचन को सुनकर देवताओं के समान प्रभावशाली वीर मेघनाद ने युद्ध के लिये निश्चित विचार करके जल्दी से अपने स्वामी रावण की परिक्रमा की॥ १५ ॥

ततस्तैः स्वगणैरिष्टैरिन्द्रजित् प्रतिपूजितः।

युद्धोद्धतकृतोत्साहः संग्रामं सम्प्रपद्यत॥१६॥

तत्पश्चात् सभा में बैठे हुए अपने दल के प्रिय राक्षसों द्वारा भूरि-भूरि प्रशंसित हो इन्द्रजित् विकट युद्ध के लिये मन में उत्साह भरकर संग्रामभूमि की ओर जाने को उद्यत हुआ॥ १६॥

श्रीमान् पद्मविशालाक्षो राक्षसाधिपतेः सुतः।

निर्जगाम महातेजाः समुद्र इव पर्वणि॥१७॥

उस समय प्रफुल्ल कमलदल के समान विशाल नेत्रोंवाला राक्षसराज रावण का पुत्र महातेजस्वी श्रीमान् इन्द्रजित् पर्व के दिन उमड़े हुए समुद्र के समान विशेष हर्ष और उत्साह से पूर्ण हो राजमहल से बाहर निकला॥

स पक्षिराजोपमतुल्यवेगैाश्चतुर्भिः स तु तीक्ष्णदंष्ट्रैः।

रथं समायुक्तमसह्यवेगः समारुरोहेन्द्रजिदिन्द्रकल्पः॥१८॥

जिसका वेग शत्रुओं के लिये असह्य था, वह इन्द्र के समान पराक्रमी मेघनाद पक्षिराज गरुड़ के समान तीव्र गति तथा तीखे दाढ़ों वाले चार सिंहों से जुते हुए उत्तम रथ पर आरूढ़ हुआ॥ १८॥

स रथी धन्विनां श्रेष्ठः शस्त्रज्ञोऽस्त्रविदां वरः।

रथेनाभिययौ क्षिप्रं हनूमान् यत्र सोऽभवत्॥१९॥

अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञाता, अस्त्रवेत्ताओं में अग्रगण्य और धनुर्धरों में श्रेष्ठ वह रथी वीर रथ के द्वारा शीघ्र उस स्थान पर गया, जहाँ हनुमान् जी उसकी प्रतीक्षा में बैठे थे॥ १९॥

स तस्य रथनिर्घोषं ज्यास्वनं कार्मकस्य च।

निशम्य हरिवीरोऽसौ सम्प्रहृष्टतरोऽभवत्॥२०॥

उसके रथ की घर्घराहट और धनुष की प्रत्यञ्चा का गम्भीर घोष सुनकर वानरवीर हनुमान् जी अत्यन्त हर्ष और उत्साह से भर गये॥२०॥

इन्द्रजिच्चापमादाय शितशल्यांश्च सायकान्।

हनमन्तमभिप्रेत्य जगाम रणपण्डितः॥२१॥

इन्द्रजित् युद्ध की कला में प्रवीण था। वह धनुष और तीखे अग्रभागवाले सायकों को लेकर हनुमान जी को लक्ष्य करके आगे बढ़ा॥ २१॥

तस्मिंस्ततः संयति जातहर्षे रणाय निर्गच्छति बाणपाणौ।

दिशश्च सर्वाः कलुषा बभूवु{गाश्च रौद्रा बहुधा विनेदुः ॥ २२॥

हृदय में हर्ष और उत्साह तथा हाथों में बाण लेकर वह ज्यों ही युद्ध के लिये निकला, त्यों ही सम्पूर्ण दिशाएँ मलिन हो गयीं और भयानक पशु नाना प्रकार से आर्तनाद करने लगे॥ २२॥

समागतास्तत्र तु नागयक्षा महर्षयश्चक्रचराश्च सिद्धाः।

नभः समावृत्य च पक्षिसङ्घा विनेदुरुच्चैः परमप्रहृष्टाः॥२३॥

उस समय वहाँ नाग, यक्ष, महर्षि और नक्षत्रमण्डल में विचरने वाले सिद्धगण भी आ गये। साथ ही पक्षियों के समुदाय भी आकाश को आच्छादित करके अत्यन्त हर्ष में भरकर उच्च स्वर से चहचहाने लगे। २३॥

आयान्तं स रथं दृष्ट्वा तूर्णमिन्द्रध्वजं कपिः।

ननाद च महानादं व्यवर्धत च वेगवान्॥२४॥

इन्द्राकार चिह्नवाली ध्वजा से सुशोभित रथ पर बैठकर शीघ्रतापूर्वक आते हुए मेघनाद को देखकर वेगशाली वानर-वीर हनुमान् ने बड़े जोर से गर्जना की और अपने शरीर को बढ़ाया॥२४॥

इन्द्रजित् स रथं दिव्यमाश्रितश्चित्रकार्मुकः।

धनुर्विस्फारयामास तडिदूर्जितनिःस्वनम्॥ २५॥

उस दिव्य रथ पर बैठकर विचित्र धनुष धारण करने वाले इन्द्रजित् ने बिजली की गड़गड़ाहट के समान टंकार करने वाले अपने धनुष को खींचा॥ २५ ॥

ततः समेतावतितीक्ष्णवेगौ महाबलौ तौ रणनिर्विशङ्कौ।

कपिश्च रक्षोऽधिपतेस्तनूजः सुरासुरेन्द्राविव बद्धवैरौ॥ २६॥

फिर तो अत्यन्त दुःसह वेग और महान् बल से सम्पन्न हो युद्ध में निर्भय होकर आगे बढ़ने वाले वे दोनों वीर कपिवर हनुमान् तथा राक्षसराजकुमार मेघनाद परस्पर वैर बाँधकर देवराज इन्द्र और दैत्यराज बलि की भाँति एक-दूसरे से भिड़ गये॥२६॥

स तस्य वीरस्य महारथस्य धनुष्मतः संयति सम्मतस्य।

शरप्रवेगं व्यहनत् प्रवृद्धश्चचार मार्गे पितुरप्रमेयः॥ २७॥

अप्रमेय शक्तिशाली हनुमान जी विशाल शरीर धारण करके अपने पिता वायु के मार्ग पर विचरने और युद्ध में सम्मानित होने वाले उस धनुर्धर महारथी राक्षसवीर के बाणों के महान् वेग को व्यर्थ करने लगे। २७॥

ततः शरानायततीक्ष्णशल्यान् सुपत्रिणः काञ्चनचित्रपुङ्खान्।

मुमोच वीरः परवीरहन्ता सुसंततान् वज्रसमानवेगान्॥२८॥

इतने ही में शत्रुवीरों का संहार करने वाले इन्द्रजित् ने बड़ी और तीखी नोक तथा सुन्दर परों वाले, सोने की विचित्र पंखों से सुशोभित और वज्र के समान वेगशाली बाणों को लगातार छोड़ना आरम्भ किया॥ २८ ॥

ततः स तत्स्यन्दननिःस्वनं च मृदङ्गभेरीपटहस्वनं च।

विकृष्यमाणस्य च कार्मुकस्य निशम्य घोषं पुनरुत्पपात॥२९॥

उस समय उसके रथ की घर्घराहट, मृदङ्ग, भेरी और पटह आदि बाजों के शब्द एवं खींचे जाते हुए धनुष की टंकार सुनकर हनुमान जी फिर ऊपर की ओर उछले॥२९॥

शराणामन्तरेष्वाशु व्यावर्तत महाकपिः।

हरिस्तस्याभिलक्ष्यस्य मोक्षयल्लक्ष्यसंग्रहम्॥३०॥

ऊपर जाकर वे महाकपि वानरवीर लक्ष्य बेधने में प्रसिद्ध मेघनाद के साधे हुए निशाने को व्यर्थ करते हुए उसके छोड़े हुए बाणों के बीच से शीघ्रतापूर्वक निकलकर अपने को बचाने लगे॥ ३०॥

शराणामग्रतस्तस्य पुनः समभिवर्तत।

प्रसार्य हस्तौ हनुमानुत्पपातानिलात्मजः॥३१॥

वे पवनकुमार हनुमान् बारंबार उसके बाणों के सामने आकर खड़े हो जाते और फिर दोनों हाथ फैलाकर बात-की-बात में उड़ जाते थे॥ ३१॥

तावुभौ वेगसम्पन्नौ रणकर्मविशारदौ।

सर्वभूतमनोग्राहि चक्रतुर्युद्धमुत्तमम्॥३२॥

वे दोनों वीर महान् वेग से सम्पन्न तथा युद्ध करने की कला में चतुर थे। वे सम्पूर्ण भूतों के चित्त को आकर्षित करने वाला उत्तम युद्ध करने लगे॥ ३२॥

हनूमतो वेद न राक्षसोऽन्तरं न मारुतिस्तस्य महात्मनोऽन्तरम्।

परस्परं निर्विषहौ बभूवतुः समेत्य तौ देवसमानविक्रमौ॥३३॥

वह राक्षस हनुमान जी पर प्रहार करने का अवसर नहीं पाता था और पवनकुमार हनुमान जी भी उस महामनस्वी वीर को धर दबाने का मौका नहीं पाते थे। देवताओं के समान पराक्रमी वे दोनों वीर परस्पर भिड़कर एक-दूसरे के लिये दुःसह हो उठे थे॥ ३३॥

ततस्तु लक्ष्ये स विहन्यमाने शरेष्वमोघेषु च सम्पतत्सु।

जगाम चिन्तां महतीं महात्मा समाधिसंयोगसमाहितात्मा॥३४॥

लक्ष्यवेध के लिये चलाये हुए मेघनाद के वे अमोघ बाण भी जब व्यर्थ होकर गिर पड़े, तब लक्ष्य पर बाणों का संधान करने में सदा एकाग्रचित्त रहने वाले उस महामनस्वी वीर को बड़ी चिन्ता हुई॥ ३४॥

ततो मतिं राक्षसराजसूनुश्चकार तस्मिन् हरिवीरमुख्ये।

अवध्यतां तस्य कपेः समीक्ष्य कथं निगच्छेदिति निग्रहार्थम्॥ ३५॥

उन कपिश्रेष्ठ को अवध्य समझकर राक्षसराजकुमार मेघनाद वानरवीरों में प्रमुख हनुमान् जी के विषय में यह विचार करने लगा कि ‘इन्हें किसी तरह कैद कर लेना चाहिये, परंतु ये मेरी पकड़ में आ कैसे सकते हैं?’ ॥ ३५॥

ततः पैतामहं वीरः सोऽस्त्रमस्त्रविदां वरः।

संदधे सुमहातेजास्तं हरिप्रवरं प्रति॥ ३६॥

फिर तो अस्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ उस महातेजस्वी वीर ने उन कपिश्रेष्ठ को लक्ष्य करके अपने धनुषपर ब्रह्माजी के दिये हुए अस्त्र का संधान किया॥ ३६॥

अवध्योऽयमिति ज्ञात्वा तमस्त्रेणास्त्रतत्त्ववित्।

निजग्राह महाबाहुं मारुतात्मजमिन्द्रजित्॥ ३७॥

अस्त्रतत्त्व के ज्ञाता इन्द्रजित् ने महाबाहु पवनकुमार को अवध्य जानकर उन्हें उस अस्त्र से बाँध लिया॥ ३७॥

तेन बद्धस्ततोऽस्त्रेण राक्षसेन स वानरः।

अभवन्निर्विचेष्टश्च पपात च महीतले॥३८॥

राक्षस द्वारा उस अस्त्र से बाँध लिये जाने पर वानरवीर हनुमान जी निश्चेष्ट होकर पृथ्वी पर गिर पड़े॥ ३८॥

ततोऽथ बुद्ध्वा स तदस्त्रबन्धं प्रभोः प्रभावाद् विगताल्पवेगः।

पितामहानुग्रहमात्मनश्च विचिन्तयामास हरिप्रवीरः॥३९॥

अपने को ब्रह्मास्त्र से बँधा हुआ जानकर भी उन्हीं भगवान् ब्रह्मा के प्रभाव से हनुमान् जी को थोड़ी-सी भी पीड़ा का अनुभव नहीं हुआ। वे प्रमुख वानरवीर अपने ऊपर ब्रह्माजी के महान् अनुग्रह का विचार करने लगे॥ ३९॥

ततः स्वायम्भुवैमन्त्रैर्ब्रह्मास्त्रं चाभिमन्त्रितम्।

हनूमांश्चिन्तयामास वरदानं पितामहात्॥४०॥

जिन मन्त्रों के देवता साक्षात् स्वयम्भू ब्रह्मा हैं, उनसे अभिमन्त्रित हुए उस ब्रह्मास्त्र को देखकर हनुमान जी को पितामह ब्रह्मा से अपने लिये मिले हुए वरदान का स्मरण हो आया (ब्रह्माजी ने उन्हें वर दिया था कि मेरा अस्त्र तुम्हें एक ही मुहूर्त में अपने बन्धन से मुक्त कर देगा) ॥ ४०॥

न मेऽस्य बन्धस्य च शक्तिरस्ति विमोक्षणे लोकगुरोः प्रभावात्।

इत्येवमेवं विहितोऽस्त्रबन्धो मयाऽऽत्मयोनेरनुवर्तितव्यः॥४१॥

फिर वे सोचने लगे ‘लोकगुरु ब्रह्मा के प्रभाव से मुझमें इस अस्त्र के बन्धन से छुटकारा पाने की शक्ति नहीं है—ऐसा मानकर ही इन्द्रजित् ने मुझे इस प्रकार बाँधा है, तथापि मुझे भगवान् ब्रह्मा के सम्मानार्थ इस अस्त्रबन्धन का अनुसरण करना चाहिये’ ॥ ४१॥

स वीर्यमस्त्रस्य कपिर्विचार्य पितामहानुग्रहमात्मनश्च।

विमोक्षशक्तिं परिचिन्तयित्वा पितामहाज्ञामनुवर्तते स्म॥४२॥

कपिश्रेष्ठ हनुमान जी ने उस अस्त्र की शक्ति, अपने ऊपर पितामह की कृपा तथा अपने में उसके बन्धन से छूट जाने की सामर्थ्य—इन तीनों पर विचार करके अन्त में ब्रह्माजी की आज्ञा का ही अनुसरण किया। ४२॥

अस्त्रेणापि हि बद्धस्य भयं मम न जायते।

पितामहमहेन्द्राभ्यां रक्षितस्यानिलेन च॥४३॥

उनके मन में यह बात आयी कि ‘इस अस्त्र से बँध जाने पर भी मुझे कोई भय नहीं है; क्योंकि ब्रह्मा, इन्द्र और वायुदेवता तीनों मेरी रक्षा करते हैं। ४३॥

ग्रहणे चापि रक्षोभिर्महन्मे गुणदर्शनम्।

राक्षसेन्द्रेण संवादस्तस्माद् गृह्णन्तु मां परे॥४४॥

राक्षसों द्वारा पकड़े जाने में भी मुझे महान् लाभ ही दिखायी देता है; क्योंकि इससे मुझे राक्षसराज रावण के साथ बातचीत करने का अवसर मिलेगा। अतः शत्रु मुझे पकड़कर ले चलें’॥ ४४ ॥

स निश्चितार्थः परवीरहन्ता समीक्ष्यकारी विनिवृत्तचेष्टः।

परैः प्रसह्याभिगतैर्निगृह्य ननाद तैस्तैः परिभय॑मानः॥४५॥

ऐसा निश्चय करके विचारपूर्वक कार्य करने वाले शत्रुवीरों के संहारक हनुमान जी निश्चेष्ट हो गये। फिर तो सभी शत्रु निकट आकर उन्हें बलपूर्वक पकड़ने और डाँट बताने लगे। उस समय हनुमान् जी , मानो कष्ट पा रहे हों, इस प्रकार चीखते और कटकटाते थे॥४५॥

ततस्ते राक्षसा दृष्ट्वा विनिश्चेष्टमरिंदमम्।

बबन्धुः शणवल्कैश्च द्रुमचीरैश्च संहतैः॥४६॥

राक्षसों ने देखा, अब यह हाथ-पैर नहीं हिलाता, तब वे शत्रुहन्ता हनुमान् जी को सुतरी और वृक्षों के वल्कल को बटकर बनाये गये रस्सों से बाँधने लगे। ४६॥

स रोचयामास परैश्च बन्धं प्रसह्य वीरैरभिगर्हणं च।

कौतूहलान्मां यदि राक्षसेन्द्रो द्रष्टुं व्यवस्येदिति निश्चितार्थः॥४७॥

शत्रुवीरों ने जो उन्हें हठपूर्वक बाँधा और उनका तिरस्कार किया, यह सब कुछ उस समय उन्हें अच्छा लगा। उनके मन में यह निश्चित विचार हो गया था कि ऐसी अवस्था में राक्षसराज रावण सम्भवतः कौतूहलवश मुझे देखने की इच्छा करेगा (इसीलिये वे सब कुछ सह रहे थे) ॥ ४७॥

स बद्धस्तेन वल्केन विमुक्तोऽस्त्रेण वीर्यवान्।

अस्त्रबन्धः स चान्यं हि न बन्धमनुवर्तते॥४८॥

वल्कल के रस्से से बँध जाने पर पराक्रमी हनुमान् ब्रह्मास्त्र के बन्धन से मुक्त हो गये; क्योंकि उस अस्त्र का  बन्धन किसी दूसरे बन्धन के साथ नहीं रहता॥ ४८॥

अथेन्द्रजित् तं द्रुमचीरबद्धं विचार्य वीरः कपिसत्तमं तम्।

विमुक्तमस्त्रेण जगाम चिन्तामन्येन बद्धोऽप्यनुवर्ततेऽस्त्रम्॥४९॥

अहो महत् कर्म कृतं निरर्थं न राक्षसैर्मन्त्रगतिर्विमृष्टा।

पुनश्च नास्त्रे विहतेऽस्त्रमन्यत् प्रवर्तते संशयिताः स्म सर्वे॥५०॥

वीर इन्द्रजित् ने जब देखा कि यह वानरशिरोमणि तो केवल वृक्षों के वल्कल से बँधा है, दिव्यास्त्र के बन्धन से मुक्त हो चुका है, तब उसे बड़ी चिन्ता हुई। वह सोचने लगा—’दूसरी वस्तुओं से बँधा हुआ

होने पर भी यह अस्त्र-बन्धन में बँधे हुए की भाँति बर्ताव कर रहा है। ओह ! इन राक्षसों ने मेरा किया हुआ बहुत बड़ा काम चौपट कर दिया। इन्होंने मन्त्र की शक्ति पर विचार नहीं किया। यह अस्त्र जब एक बार व्यर्थ हो जाता है, तब पुनः दूसरी बार इसका प्रयोग नहीं हो सकता अब तो विजयी होकर भी हम सब लोग संशय में पड़ गये॥

अस्त्रेण हनुमान् मुक्तो नात्मानमवबुध्यते।

कृष्यमाणस्तु रक्षोभिस्तैश्च बन्धैर्निपीडितः॥५१॥

हन्यमानस्ततः क्रूरै राक्षसैः कालमुष्टिभिः।

समीपं राक्षसेन्द्रस्य प्राकृष्यत स वानरः॥५२॥

हनुमान् जी यद्यपि अस्त्र के बन्धन से मुक्त हो गये थे तो भी उन्होंने ऐसा बर्ताव किया, मानो वे इस बात को जानते ही न हों। क्रूर राक्षस उन्हें बन्धनों से पीड़ा देते और कठोर मुक्कों से मारते हुए खींचकर ले चले। इस तरह वे वानरवीर राक्षसराज रावण के पास पहुँचाये गये॥

अथेन्द्रजित् तं प्रसमीक्ष्य मुक्तमस्त्रेण बद्धं द्रुमचीरसूत्रैः।

व्यदर्शयत् तत्र महाबलं तं हरिप्रवीरं सगणाय राज्ञे॥५३॥

तब इन्द्रजित् ने उन महाबली वानरवीर को ब्रह्मास्त्र से मुक्त तथा वृक्ष के वल्कलों की रस्सियों से बँधा देख उन्हें वहाँ सभासद्गणोंसहित राजा रावण को दिखाया॥ ५३॥

तं मत्तमिव मातङ्गं बद्धं कपिवरोत्तमम्।

राक्षसा राक्षसेन्द्राय रावणाय न्यवेदयन्॥५४॥

मतवाले हाथी के समान बँधे हुए उन वानरशिरोमणि को राक्षसों ने राक्षसराज रावण की सेवा में समर्पित कर दिया॥ ५४॥

कोऽयं कस्य कुतो वापि किं कार्यं कोऽभ्युपाश्रयः।

इति राक्षसवीराणां दृष्ट्वा संजज्ञिरे कथाः॥५५॥

उन्हें देखकर राक्षसवीर आपस में कहने लगे—’यह कौन है ? किसका पुत्र या सेवक है? कहाँ से आया है? यहाँ इसका क्या काम है? तथा इसे सहारा देने वाला कौन है ? ॥ ५५ ॥

हन्यतां दह्यतां वापि भक्ष्यतामिति चापरे।

राक्षसास्तत्र संक्रुद्धाः परस्परमथाब्रवन्॥५६॥

कुछ दूसरे राक्षस जो अत्यन्त क्रोध से भरे थे, परस्पर इस प्रकार बोले-‘इस वानर को मार डालो, जला डालो या खा डालो’ ॥ ५६॥

अतीत्य मार्ग सहसा महात्मा स तत्र रक्षोऽधिपपादमूले।

ददर्श राज्ञः परिचारवृद्धान् गृहं महारत्नविभूषितं च॥५७॥

महात्मा हनुमान जी सारा रास्ता तै करके जब सहसा राक्षसराज रावण के पास पहुँच गये, तब उन्होंने उसके चरणों के समीप बहुत-से बड़े-बूढ़े सेवकों को और बहुमूल्य रत्नों से विभूषित सभाभवन को भी देखा॥

स ददर्श महातेजा रावणः कपिसत्तमम्।

रक्षोभिर्विकृताकारैः कृष्यमाणमितस्ततः॥५८॥

उस समय महातेजस्वी रावण ने विकट आकार वाले राक्षसों के द्वारा इधर-उधर घसीटे जाते हुए कपिश्रेष्ठ हनुमान जी को देखा॥ ५८॥

राक्षसाधिपतिं चापि ददर्श कपिसत्तमः।

तेजोबलसमायुक्तं तपन्तमिव भास्करम्॥५९॥

कपिश्रेष्ठ हनुमान् ने भी राक्षसराज रावण को तपते हुए सूर्य के समान तेज और बल से सम्पन्न देखा॥ ५९॥

स रोषसंवर्तितताम्रदृष्टिर्दशाननस्तं कपिमन्ववेक्ष्य।

अथोपविष्टान् कुलशीलवृद्धान् समादिशत् तं प्रति मुख्यमन्त्रीन्॥६०॥

हनुमान जी को देखकर दशमुख रावण की आँखें रोष से चञ्चल और लाल हो गयीं। उसने वहाँ बैठे हुए कुलीन, सुशील और मुख्य मन्त्रियों को उनसे परिचय पूछने के लिये आज्ञा दी॥६० ॥

यथाक्रमं तैः स कपिश्च पृष्टः कार्यार्थमर्थस्य च मूलमादौ।

निवेदयामास हरीश्वरस्य दूतः सकाशादहमागतोऽस्मि॥६१॥

उन सबने पहले क्रमशः कपिवर हनुमान् से उनका कार्य, प्रयोजन तथा उसके मूल कारण के विषय में पूछा तब उन्होंने यह बताया कि ‘मैं वानरराज सुग्रीव के पास से उनका दूत होकर आया हूँ’॥ ६१॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डेऽष्टचत्वारिंशः सर्गः॥४८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में अड़तालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४८॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
सुन्दरकाण्डम्

रावण के प्रभावशाली स्वरूप को देखकर हनुमान जी के मन में अनेक प्रकार के विचारों का उठना

एकोनपञ्चाशः सर्गः

सर्ग-49

ततः स कर्मणा तस्य विस्मितो भीमविक्रमः।

हनूमान् क्रोधताम्राक्षो रक्षोऽधिपमवैक्षत ॥१॥

इन्द्रजित् के उस नीतिपूर्ण कर्म से विस्मित तथा रावण के सीताहरण आदि कर्मों से कुपित हो रोष से लाल आँखें किये भयंकर पराक्रमी हनुमान जी ने राक्षसराज रावण की ओर देखा॥१॥

भ्राजमानं महार्हेण काञ्चनेन विराजता।

मुक्ताजालवृतेनाथ मुकुटेन महाद्युतिम्॥२॥

वह महातेजस्वी राक्षसराज सोने के बने हुए बहुमूल्य एवं दीप्तिमान् मुकुट से, जिसमें मोतियों का काम किया हुआ था, उद्भासित हो रहा था॥२॥

वज्रसंयोगसंयुक्तैर्महार्हमणिविग्रहैः ।

हैमैराभरणैश्चित्रैर्मनसेव प्रकल्पितैः॥३॥

उसके विभिन्न अङ्गों में सोने के विचित्र आभूषण ऐसे सुन्दर लगते थे मानो मानसिक संकल्प द्वारा बनाये गये हों। उनमें हीरे तथा बहुमूल्य मणिरत्न जड़े हुए थे, उन आभूषणों से रावण की अद्भुत शोभा होती थी॥३॥

महार्हक्षौमसंवीतं रक्तचन्दनरूषितम्।

स्वनुलिप्तं विचित्राभिर्विविधाभिश्च भक्तिभिः॥४॥

बहुमूल्य रेशमी वस्त्र उसके शरीर की शोभा बढ़ा रहे थे। वह लाल चन्दन से चर्चित था और भाँतिभाँति की विचित्र रचनाओं से युक्त सुन्दर अङ्गरागों से उसका सारा अङ्ग सुशोभित हो रहा था॥४॥

विचित्रं दर्शनीयैश्च रक्ताक्षैर्भीमदर्शनैः।

दीप्ततीक्ष्णमहादंष्ट्र प्रलम्बं दशनच्छदैः॥५॥

उसकी आँखें देखने योग्य लाल-लाल और भयावनी थीं; उनसे और चमकीली तीखी एवं बड़ीबड़ी दाढ़ों तथा लंबे-लंबे ओठों के कारण उसकी विचित्र शोभा होती थी॥

शिरोभिर्दशभिर्वीरो भ्राजमानं महौजसम्।

नानाव्यालसमाकीर्णैः शिखरैरिव मन्दरम्॥६॥

वीर हनुमान जी ने देखा, अपने दस मस्तकों से सुशोभित महाबली रावण नाना प्रकार के सोसे भरे हुए अनेक शिखरों द्वारा शोभा पाने वाले मन्दराचल के समान प्रतीत हो रहा है॥६॥

नीलाञ्जनचयप्रख्यं हारेणोरसि राजता।

पूर्णचन्द्राभवक्त्रेण सबालार्कमिवाम्बुदम्॥७॥

उसका शरीर काले कोयले के ढेर की भाँति काला था और वक्षःस्थल चमकीले हार से विभूषित था। वह पूर्ण चन्द्र के समान मनोरम मुखद्वारा प्रातःकाल के सूर्य से युक्त मेघ की भाँति शोभा पा रहा था॥ ७॥

बाहुभिर्बद्धकेयूरैश्चन्दनोत्तमरूषितैः।

भ्राजमानाङ्गदैर्भीमैः पञ्चशीरिवोरगैः॥८॥

जिनमें केयूर बँधे थे, उत्तम चन्दन का लेप हुआ था और चमकीले अङ्गद शोभा दे रहे थे, उन भयंकर भुजाओं से सुशोभित रावण ऐसा जान पड़ता था, मानो । पाँच सिरवाले अनेक साँसे सेवित हो रहा हो॥ ८॥

महति स्फाटिके चित्रे रत्नसंयोगचित्रिते।

उत्तमास्तरणास्तीर्णे सूपविष्टं वरासने॥९॥

वह स्फटिकमणि के बने हुए विशाल एवं सुन्दर सिंहासन पर, जो नाना प्रकार के रत्नों के संयोग से चित्रित, विचित्र तथा सुन्दर बिछौनों से आच्छादित था, बैठा हुआ था।

अलंकृताभिरत्यर्थं प्रमदाभिः समन्ततः।

वालव्यजनहस्ताभिरारात्समुपसेवितम्॥१०॥

वस्त्र और आभूषणों से खूब सजी हुई बहुत-सी युवतियाँ हाथ में चँवर लिये सब ओर से आस-पास खड़ी हो उसकी सेवा करती थीं॥ १० ॥

दुर्धरेण प्रहस्तेन महापाइँन रक्षसा।

मन्त्रिभिर्मन्त्रतत्त्वज्ञैर्निकुम्भेन च मन्त्रिणा॥११॥

उपोपविष्टं रक्षोभिश्चतुर्भिर्बलदर्पितम्।

कृत्स्नं परिवृतं लोकं चतुर्भिरिव सागरैः॥१२॥

मन्त्र-तत्त्व को जानने वाले दुर्धर, प्रहस्त, महापार्श्व तथा निकुम्भ—ये चार राक्षसजातीय मन्त्री उसके पास बैठे थे। उन चारों राक्षसों से घिरा हुआ बलाभिमानी रावण चार समुद्रों से घिरे हुए समस्त भूलोक की भाँति शोभा पा रहा था॥ ११-१२ ॥

मन्त्रिभिर्मन्त्रतत्त्वज्ञैरन्यैश्च शुभदर्शिभिः।

आश्वास्यमानं सचिवैः सुरैरिव सुरेश्वरम्॥१३॥

जैसे देवता देवराज इन्द्र को सान्त्वना देते हैं, उसी प्रकार मन्त्र-तत्त्व के ज्ञाता मन्त्री तथा दूसरे-दूसरे शुभचिन्तक सचिव उसे आश्वासन दे रहे थे॥ १३ ॥

अपश्यद् राक्षसपतिं हनूमानतितेजसम्।

वेष्टितं मेरुशिखरे सतोयमिव तोयदम्॥१४॥

इस प्रकार हनुमान जी ने मन्त्रियों से घिरे हुए अत्यन्त तेजस्वी, सिंहासनारूढ़ राक्षसराज रावण को मेरुशिखर पर विराजमान सजल जलधर के समान देखा॥ १४ ॥

स तैः सम्पीड्यमानोऽपि रक्षोभिर्भीमविक्रमैः।

विस्मयं परमं गत्वा रक्षोऽधिपमवैक्षत॥१५॥

उन भयानक पराक्रमी राक्षसों से पीड़ित होने पर भी हनुमान् जी अत्यन्त विस्मित होकर राक्षसराज रावण को बड़े गौर से देखते रहे॥ १५॥

भ्राजमानं ततो दृष्ट्वा हनुमान् राक्षसेश्वरम्।

मनसा चिन्तयामास तेजसा तस्य मोहितः॥१६॥

उस दीप्तिशाली राक्षसराज को अच्छी तरह देखकर उसके तेज से मोहित हो हनुमान् जी मन-ही-मन इस प्रकार विचार करने लगे- ॥१६॥

अहो रूपमहो धैर्यमहो सत्त्वमहो द्युतिः।

अहो राक्षसराजस्य सर्वलक्षणयुक्तता॥१७॥

‘अहो! इस राक्षसराज का रूप कैसा अद्भुत है! कैसा अनोखा धैर्य है। कैसी अनुपम शक्ति है! और कैसा आश्चर्यजनक तेज है! इसका सम्पूर्ण राजोचित लक्षणों से सम्पन्न होना कितने आश्चर्यकी बात है!॥ १७॥

यद्यधर्मो न बलवान् स्यादयं राक्षसेश्वरः।

स्यादयं सुरलोकस्य सशक्रस्यापि रक्षिता॥१८॥

‘यदि इसमें प्रबल अधर्म न होता तो यह राक्षसराज रावण इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवलोक का संरक्षक हो सकता था॥ १८॥

अस्य क्रूरैर्नृशंसैश्च कर्मभिर्लोककुत्सितैः।

सर्वे बिभ्यति खल्वस्माल्लोकाः सामरदानवाः॥१९॥

अयं ह्युत्सहते क्रुद्धः कर्तुमेकार्णवं जगत्।

इति चिन्तां बहुविधामकरोन्मतिमान् कपिः।

दृष्ट्वा राक्षसराजस्य प्रभावममितौजसः॥ २०॥

‘इसके लोकनिन्दित क्रूरतापूर्ण निष्ठुर कर्मो के कारण देवताओं और दानवोंसहित सम्पूर्ण लोक इससे भयभीत रहते हैं। यह कुपित होने पर समस्त जगत् को एकार्णव में निमग्न कर सकता है संसार में

प्रलय मचा सकता है।’ अमित तेजस्वी राक्षसराज के प्रभाव को देखकर वे बुद्धिमान् वानरवीर ऐसी अनेक प्रकार की चिन्ताएँ करते रहे ॥ १९-२०॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे एकोनपञ्चाशः सर्गः॥४९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में उनचासवाँ सर्ग पूरा हुआ।४९॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
सुन्दरकाण्डम्

रावण का प्रहस्त के द्वारा हनुमान जी सेलङ्का में आने का कारण पुछवाना और हनुमान् का अपने को श्रीराम का दूत बताना

पञ्चाशः सर्गः

सर्ग-50


तमुद्रीक्ष्य महाबाहुः पिङ्गाक्षं पुरतः स्थितम्।

रोषेण महताऽऽविष्टो रावणो लोकरावणः॥१॥

समस्त लोकों को रुलाने वाला महाबाहु रावण भूरी आँखों वाले हनुमान जी को सामने खड़ा देख महान् रोष से भर गया॥१॥

शङ्काहतात्मा दध्यौ स कपीन्द्रं तेजसा वृतम्।

किमेष भगवान् नन्दी भवेत् साक्षादिहागतः॥

येन शप्तोऽस्मि कैलासे मया प्रहसिते पुरा।

सोऽयं वानरमर्तिः स्यात्किंस्विद बाणोऽपि वासुरः॥३॥

साथ ही तरह-तरह की आशङ्काओं से उसका दिल बैठ गया। अतः वह तेजस्वी वानरराज के विषय में विचार करने लगा—’क्या इस वानर के रूप में साक्षात् भगवान् नन्दी यहाँ पधारे हुए हैं, जिन्होंने पूर्वकाल में कैलास पर्वत पर जब कि मैंने उनका उपहास किया था, मुझे शाप दे दिया था? वे ही तो वानर का स्वरूप धारण करके यहाँ नहीं आये हैं? अथवा इस रूप में बाणासुर का आगमन तो नहीं हुआ है ?’ ॥ २-३॥

स राजा रोषताम्राक्षः प्रहस्तं मन्त्रिसत्तमम्।

कालयुक्तमुवाचेदं वचो विपुलमर्थवत्॥४॥

इस तरह तर्क-वितर्क करते हुए राजा रावण ने क्रोध से लाल आँखें करके मन्त्रिवर प्रहस्त से समयानुकूल गम्भीर एवं अर्थयुक्त बात कही— ॥ ४॥

दुरात्मा पृच्छ्यतामेष कुतः किं वास्य कारणम्।

वनभङ्गे च कोऽस्यार्थो राक्षसानां च तर्जने॥५॥

‘अमात्य! इस दुरात्मा से पूछो तो सही, यह कहाँ से आया है? इसके आने का क्या कारण है? प्रमदावन को उजाड़ने तथा राक्षसों को मारने में इसका क्या उद्देश्य था? ॥ ५॥

मत्पुरीमप्रधृष्यां वै गमने किं प्रयोजनम्।

आयोधने वा कं कार्यं पृच्छयतामेष दुर्मतिः॥६॥

‘मेरी दुर्जय पुरी में जो इसका आना हुआ है, इसमें इसका क्या प्रयोजन है? अथवा इसने जो राक्षसों के साथ युद्ध छेड़ दिया है, उसमें इसका क्या उद्देश्य है? ये सारी बातें इस दुर्बुद्धि वानर से पूछो’॥ ६॥

रावणस्य वचः श्रुत्वा प्रहस्तो वाक्यमब्रवीत्।

समाश्वसिहि भद्रं ते न भीः कार्या त्वया कपे॥७॥

रावण की बात सुनकर प्रहस्त ने हनुमान् जी से कहा —’वानर ! तुम घबराओ न, धैर्य रखो। तुम्हारा भला हो। तुम्हें डरने की आवश्यकता नहीं है॥७॥

यदि तावत् त्वमिन्द्रेण प्रेषितो रावणालयम्।

तत्त्वमाख्याहि मा ते भूद् भयं वानर मोक्ष्यसे॥८ ॥

‘यदि तुम्हें इन्द्र ने महाराज रावण की नगरी में भेजा है तो ठीक-ठीक बता दो। वानर ! डरो न। छोड़ दिये जाओगे॥ ८॥

यदि वैश्रवणस्य त्वं यमस्य वरुणस्य च।

चारुरूपमिदं कृत्वा प्रविष्टो नः पुरीमिमाम्॥९॥

‘अथवा यदि तुम कुबेर, यम या वरुण के दूत हो और यह सुन्दर रूप धारण करके हमारी इस पुरी में घुस आये हो तो यह भी बता दो॥९॥

विष्णुना प्रेषितो वापि दूतो विजयकाक्षिणा।

नहि ते वानरं तेजो रूपमात्रं तु वानरम्॥१०॥

‘अथवा विजय की अभिलाषा रखने वाले विष्णु ने तुम्हें दूत बनाकर भेजा है? तुम्हारा तेज वानरों का-सा नहीं है केवल रूप मात्र वानरका है॥ १० ॥

तत्त्वतः कथयस्वाद्य ततो वानर मोक्ष्यसे।

अनृतं वदतश्चापि दुर्लभं तव जीवितम्॥११॥

‘वानर! इस समय सच्ची बात कह दो, फिर तुम छोड़ दिये जाओगे। यदि झूठ बोलोगे तो तुम्हारा जीना असम्भव हो जायगा॥११॥

अथवा यन्निमित्तस्ते प्रवेशो रावणालये।

एवमुक्तो हरिवरस्तदा रक्षोगणेश्वरम्॥१२॥

अब्रवीन्नास्मि शक्रस्य यमस्य वरुणस्य च।

धनदेन न मे सख्यं विष्णुना नास्मि चोदितः॥१३॥

‘अथवा और सब बातें छोड़ो। तुम्हारा इस रावण के नगर में आने का क्या उद्देश्य है ? यही बता दो।’ प्रहस्त के इस प्रकार पूछने पर उस समय वानरश्रेष्ठ हनुमान् ने राक्षसों के स्वामी रावण से कहा —’मैं इन्द्र, यम अथवा वरुण का दूत नहीं हूँ। कुबेर के साथ भी मेरी मैत्री नहीं है और भगवान् विष्णु ने भी मुझे यहाँ नहीं भेजा है॥ १२-१३॥

जातिरेव मम त्वेषा वानरोऽहमिहागतः।

दर्शने राक्षसेन्द्रस्य तदिदं दुर्लभं मया॥१४॥

वनं राक्षसराजस्य दर्शनार्थं विनाशितम्।

ततस्ते राक्षसाः प्राप्ता बलिनो युद्धकाङ्क्षिणः॥

रक्षणार्थं च देहस्य प्रतियुद्धा मया रणे।

‘मैं जन्म से ही वानर हूँ और राक्षस रावण से मिलने के उद्देश्य से ही मैंने उनके इस दुर्लभ वन को उजाड़ा है। इसके बाद तुम्हारे बलवान् राक्षस युद्ध की इच्छा से मेरे पास आये और मैंने अपने शरीर की रक्षा के लिये रणभूमि में उनका सामना किया। १४-१५ १/२॥

अस्त्रपाशैर्न शक्योऽहं बद्धं देवासुरैरपि॥१६॥

पितामहादेष वरो ममापि हि समागतः।

‘देवता अथवा असुर भी मुझे अस्त्र अथवा पाश से बाँध नहीं सकते। इसके लिये मुझे भी ब्रह्माजी से वरदान मिल चुका है। १६ १/२ ॥

राजानं द्रष्टुकामेन मयास्त्रमनुवर्तितम्॥१७॥

विमुक्तोऽप्यहमस्त्रेण राक्षसैस्त्वभिवेदितः।

‘राक्षसराज को देखने की इच्छा से ही मैंने अस्त्र से बँधना स्वीकार किया है। यद्यपि इस समय मैं अस्त्र से मुक्त हूँ तथापि इन राक्षसों ने मुझे बँधा समझकर ही यहाँ लाकर तुम्हें सौंपा है॥ १७ १/२॥

केनचिद् रामकार्येण आगतोऽस्मि तवान्तिकम्॥१८॥

दूतोऽहमिति विज्ञाय राघवस्यामितौजसः।

श्रूयतामेव वचनं मम पथ्यमिदं प्रभो॥१९॥

‘भगवान् श्रीरामचन्द्रजी का कुछ कार्य है, जिसके लिये मैं तुम्हारे पास आया हूँ। प्रभो! मैं अमित तेजस्वी श्रीरघुनाथजी का दूत हूँ, ऐसा समझकर मेरे इस हितकारी वचन को अवश्य सुनो’ ।। १८-१९॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे पञ्चाशः सर्गः॥५०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में पचासवाँ सर्ग पूरा हुआ।५०॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
सुन्दरकाण्डम्

हनुमान जी का श्रीराम के प्रभाव का वर्णन करते हुए रावण को समझाना

एकपञ्चाशः सर्गः

सर्ग-51


तं समीक्ष्य महासत्त्वं सत्त्ववान् हरिसत्तमः।

वाक्यमर्थवदव्यग्रस्तमुवाच दशाननम्॥१॥

महाबली दशमुख रावण की ओर देखते हुए शक्तिशाली वानरशिरोमणि हनुमान् ने शान्तभाव से यह अर्थयुक्त बात कही- ॥१॥

अहं सुग्रीवसंदेशादिह प्राप्तस्तवान्तिके।

राक्षसेश हरीशस्त्वां भ्राता कुशलमब्रवीत्॥२॥

‘राक्षसराज! मैं सुग्रीव का संदेश लेकर यहाँ तुम्हारे पास आया हूँ। वानरराज सुग्रीव तुम्हारे भाई हैं। इसी नाते उन्होंने तुम्हारा कुशल-समाचार पूछा है॥२॥

भ्रातुः श्रृणु समादेशं सुग्रीवस्य महात्मनः।

धर्मार्थसहितं वाक्यमिह चामुत्र च क्षमम्॥३॥

‘अब तुम अपने भाई महात्मा सुग्रीव का संदेशधर्म और अर्थयुक्त वचन, जो इहलोक और परलोक में भी लाभदायक है, सुनो॥३॥

राजा दशरथो नाम रथकुञ्जरवाजिमान्।

पितेव बन्धुर्लोकस्य सुरेश्वरसमद्युतिः॥४॥

‘अभी हाल में ही दशरथनाम से प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं, जो पिताकी भाँति प्रजा के हितैषी, इन्द्र के समान तेजस्वी तथा रथ, हाथी, घोड़े आदि से सम्पन्न थे॥ ४॥

ज्येष्ठस्तस्य महाबाहुः पुत्रः प्रियतरः प्रभुः।

पितुर्निदेशान्निष्क्रान्तः प्रविष्टो दण्डकावनम्॥

लक्ष्मणेन सह भ्राता सीतया सह भार्यया।

रामो नाम महातेजा धन॑ पन्थानमाश्रितः॥६॥

‘उनके परम प्रिय ज्येष्ठ पुत्र महातेजस्वी, प्रभावशाली महाबाहु श्रीरामचन्द्रजी पिता की आज्ञा से धर्ममार्ग का आश्रय लेकर अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ दण्डकारण्य में आये थे॥५-६॥

तस्य भार्या जनस्थाने भ्रष्टा सीतेति विश्रुता।

वैदेहस्य सुता राज्ञो जनकस्य महात्मनः॥७॥

‘सीता विदेहदेश के राजा महात्मा जनक की पुत्री हैं। जनस्थान में आने पर श्रीरामपत्नी सीता कहीं खो गयी हैं॥

मार्गमाणस्तु तां देवीं राजपुत्रः सहानुजः।

ऋष्यमूकमनुप्राप्तः सुग्रीवेण च संगतः॥८॥

‘राजकुमार श्रीराम अपने भाई के साथ उन्हीं सीतादेवी की खोज करते हुए ऋष्यमूक पर्वत पर आये और सुग्रीव से मिले॥८॥

तस्य तेन प्रतिज्ञातं सीतायाः परिमार्गणम्।

सुग्रीवस्यापि रामेण हरिराज्यं निवेदितुम्॥९॥

‘सुग्रीव ने उनसे सीता को ढूँढ़ निकालने की प्रतिज्ञा की और श्रीराम ने सुग्रीव को वानरों का राज्य दिलाने का वचन दिया॥९॥

ततस्तेन मृधे हत्वा राजपुत्रेण वालिनम्।

सुग्रीवः स्थापितो राज्ये हयृक्षाणां गणेश्वरः॥१०॥

‘तत्पश्चात् राजकुमार श्रीरामचन्द्रजी ने युद्ध में वाली को मारकर सुग्रीव को किष्किन्धा के राज्य पर स्थापित कर दिया। इस समय सुग्रीव वानरों और भालुओं के समुदाय के स्वामी हैं॥ १० ॥

त्वया विज्ञातपूर्वश्च वाली वानरपुङ्गवः।

स तेन निहतः संख्ये शरेणैकेन वानरः॥११॥

‘वानरराज वाली को तो तुम पहले से ही जानते हो। उस वानरवीर को युद्धभूमि में श्रीराम ने एक ही बाण से मार गिराया था॥११॥

स सीतामार्गणे व्यग्रः सुग्रीवः सत्यसंगरः।

हरीन् सम्प्रेषयामास दिशः सर्वा हरीश्वरः॥१२॥

‘अब सत्यप्रतिज्ञ सुग्रीव सीता को खोज निकालने के लिये व्यग्र हो उठे हैं। उन वानरराज ने समस्त दिशाओं में वानरों को भेजा है।॥ १२॥

तां हरीणां सहस्राणि शतानि नियुतानि च।

दिक्षु सर्वासु मार्गन्ते ह्यधश्चोपरि चाम्बरे॥१३॥

‘इस समय सैकड़ों, हजारों और लाखों वानर सम्पूर्ण दिशाओं तथा आकाश और पाताल में भी सीताजी की खोज कर रहे हैं॥ १३॥

वैनतेयसमाः केचित् केचित् तत्रानिलोपमाः।

असङ्गगतयः शीघ्रा हरिवीरा महाबलाः॥१४॥

‘उन वानरवीरों में से कोई गरुड़ के समान वेगवान् हैं तो कोई वायु के समान। उनकी गति कहीं नहीं रुकती। वे कपिवीर शीघ्रगामी और महान् बली हैं। १४॥

अहं तु हनुमान्नाम मारुतस्यौरसः सुतः।

सीतायास्तु कृते तूर्णं शतयोजनमायतम्॥१५॥

समुद्रं लङ्गयित्वैव त्वां दिदृक्षुरिहागतः।

भ्रमता च मया दृष्टा गृहे ते जनकात्मजा॥१६॥

‘मेरा नाम हनुमान् है। मैं वायुदेवता का औरस पुत्र हूँ। सीता का पता लगाने और तुमसे मिलने के लिये सौ योजनविस्तृत समुद्र को लाँघकर तीव्र गतिसे यहाँ आया हूँ। घूमते-घूमते तुम्हारे अन्तःपुर में मैंने जनकनन्दिनी सीता को देखा है॥ १५-१६॥

तद् भवान् दृष्टधर्मार्थस्तपःकृतपरिग्रहः।

परदारान् महाप्राज्ञ नोपरोढुं त्वमर्हसि ॥१७॥

‘महामते! तुम धर्म और अर्थ के तत्त्व को जानते हो। तुमने बड़े भारी तप का संग्रह किया है। अतः दूसरे की स्त्री को अपने घर में रोक रखना तुम्हारे लिये कदापि उचित नहीं है॥१७॥

नहि धर्मविरुद्धेषु बह्वपायेषु कर्मसु।

मूलघातिषु सज्जन्ते बुद्धिमन्तो भवद्विधाः॥१८॥

‘धर्मविरुद्ध कार्यों में बहुत-से अनर्थ भरे रहते हैं। वे कर्ता का जड़मूल से नाश कर डालते हैं। अतः तुम जैसे बुद्धिमान् पुरुष ऐसे कार्यों में नहीं प्रवृत्त होते॥ १८॥

कश्च लक्ष्मणमुक्तानां रामकोपानुवर्तिनाम्।

शराणामग्रतः स्थातुं शक्तो देवासुरेष्वपि॥१९॥

‘देवताओं और असुरों में भी कौन ऐसा वीर है, जो श्रीरामचन्द्रजी के क्रोध करने के पश्चात् लक्ष्मण के छोड़े हुए बाणों के सामने ठहर सके॥ १९॥

न चापि त्रिषु लोकेषु राजन् विद्येत कश्चन।

राघवस्य व्यलीकं यः कृत्वा सुखमवाप्नुयात्॥२०॥

‘राजन् ! तीनों लोकों में एक भी ऐसा प्राणी नहीं है, जो भगवान् श्रीराम का अपराध करके सुखी रह सके॥२०॥

तत् त्रिकालहितं वाक्यं धर्म्यमर्थानुयायि च।

मन्यस्व नरदेवाय जानकी प्रतिदीयताम्॥२१॥

‘इसलिये मेरी धर्म और अर्थ के अनुकूल बात, जो तीनों कालों में हितकर है, मान लो और जानकीजी को श्रीरामचन्द्रजी के पास लौटा दो॥२१॥

दृष्टा हीयं मया देवी लब्धं यदिह दुर्लभम्।

उत्तरं कर्म यच्छेषं निमित्तं तत्र राघवः॥ २२॥

‘मैंने इन देवी सीता का दर्शन कर लिया। जो दुर्लभ वस्तु थी, उसे यहाँ पा लिया इसके बाद जो कार्य शेष है, उसके साधन में श्रीरघुनाथजी ही निमित्त हैं।२२॥

लक्षितेयं मया सीता तथा शोकपरायणा।

गृहे यां नाभिजानासि पञ्चास्यामिव पन्नगीम्॥२३॥

‘मैंने यहाँ सीता की अवस्था को लक्ष्य किया है। वे निरन्तर शोक में डूबी रहती हैं। सीता तुम्हारे घर में पाँच फनवाली नागिन के समान निवास करती हैं, जिन्हें तुम नहीं जानते हो॥२३॥

नेयं जरयितुं शक्या सासुरैरमरैरपि।

विषसंस्पृष्टमत्यर्थं भुक्तमन्नमिवौजसा॥२४॥

‘जैसे अत्यन्त विषमिश्रित अन्न को खाकर कोई उसे बलपूर्वक नहीं पचा सकता, उसी प्रकार सीताजी को अपनी शक्ति से पचा लेना देवताओं और असुरों के लिये भी असम्भव है॥ २४॥

तपःसंतापलब्धस्ते सोऽयं धर्मपरिग्रहः।

न स नाशयितुं न्याय्य आत्मप्राणपरिग्रहः॥२५॥

‘तुमने तपस्या का कष्ट उठाकर धर्म के फलस्वरूप जो यह ऐश्वर्य का संग्रह किया है तथा शरीर और प्राणों को चिरकालतक धारण करने की शक्ति प्राप्त की है, उसका विनाश करना उचित नहीं ॥ २५ ॥

अवध्यतां तपोभिर्यां भवान् समनुपश्यति।

आत्मनः सासुरैर्देवैर्हेतुस्तत्राप्ययं महान्॥२६॥

‘तुम तपस्या के प्रभाव से देवताओं और असुरों द्वारा जो अपनी अवध्यता देख रहे हो, उसमें भी तपस्याजनित यह धर्म ही महान् कारण है (अथवा उस अवध्यता के होते हुए भी तुम्हारे वध का दूसरा महान् कारण उपस्थित है) ॥२६॥

सुग्रीवो न च देवोऽयं न यक्षो न च राक्षसः।

मानुषो राघवो राजन् सुग्रीवश्च हरीश्वरः।

तस्मात् प्राणपरित्राणं कथं राजन् करिष्यसि॥२७॥

‘राक्षसराज! सुग्रीव और श्रीरामचन्द्रजी न तो देवता हैं, न यक्ष हैं और न राक्षस ही हैं। श्रीरघुनाथजी मनुष्य हैं और सुग्रीव वानरों के राजा। अतः उनके हाथ से तुम अपने प्राणों की रक्षा कैसे करोगे? ॥ २७॥

न तु धर्मोपसंहारमधर्मफलसंहितम्।

तदेव फलमन्वेति धर्मश्चाधर्मनाशनः॥२८॥

‘जो पुरुष प्रबल अधर्म के फल से बँधा हुआ है,उसे धर्म का फल नहीं मिलता। वह उस अधर्मफल को ही पाता है। हाँ, यदि उस अधर्म के बाद किसी प्रबल धर्म का अनुष्ठान किया गया हो तो वह पहले के अधर्म का नाशक होता है* ॥ २८॥

* जैसा कि श्रुति का वचन है-‘धर्मेण पापमपनुदति।’ अर्थात् धर्म से मनुष्य अपने पाप को दूर करता है। स्मृतियों में बताये गये प्रायश्चित्त कृच्छ्रव्रत आदि भी इसी बात के समर्थक हैं।

प्राप्तं धर्मफलं तावद् भवता नात्र संशयः।

फलमस्याप्यधर्मस्य क्षिप्रमेव प्रपत्स्यसे॥ २९॥

‘तुमने पहले जो धर्म किया था, उसका पूरा-पूरा फल तो यहाँ पा लिया, अब इस सीताहरणरूपी अधर्म का फल भी तुम्हें शीघ्र ही मिलेगा॥२९॥

जनस्थानवधं बुद्ध्वा वालिनश्च वधं तथा।

रामसुग्रीवसख्यं च बुद्ध्यस्व हितमात्मनः॥३०॥

‘जनस्थान के राक्षसों का संहार, वाली का वध और श्रीराम तथा सुग्रीव की मैत्री—इन तीनों कार्यों को अच्छी तरह समझ लो। उसके बाद अपने हित का विचार करो॥३०॥

कामं खल्वहमप्येकः सवाजिरथकुञ्जराम्।

लङ्कां नाशयितुं शक्तस्तस्यैष तु न निश्चयः॥३१॥

‘यद्यपि मैं अकेला ही हाथी, घोड़े और रथोंसहित समूची लङ्का का नाश कर सकता हूँ, तथापि श्रीरघुनाथजी का ऐसा विचार नहीं है उन्होंने मुझे इस कार्य के लिये आज्ञा नहीं दी है॥ ३१॥

रामेण हि प्रतिज्ञातं हयृक्षगणसंनिधौ।

उत्सादनममित्राणां सीता यैस्तु प्रधर्षिता॥३२॥

“जिन लोगों ने सीता का तिरस्कार किया है, उन शत्रुओं का स्वयं ही संहार करने के लिये श्रीरामचन्द्रजी ने वानरों और भालुओं के सामने प्रतिज्ञा की है॥३२॥

अपकुर्वन् हि रामस्य साक्षादपि पुरंदरः।

न सुखं प्राप्नुयादन्यः किं पुनस्त्वद्विधो जनः॥३३॥

‘भगवान् श्रीराम का अपराध करके साक्षात् इन्द्र भी सुख नहीं पा सकते, फिर तुम्हारे-जैसे साधारण लोगों की तो बात ही क्या है ? ॥ ३३॥

यां सीतेत्यभिजानासि येयं तिष्ठति ते गृहे।

कालरात्रीति तां विद्धि सर्वलङ्काविनाशिनीम्॥३४॥

‘जिनको तुम सीता के नाम से जानते हो और जो इस समय तुम्हारे अन्तःपुर में मौजूद हैं, उन्हें सम्पूर्ण लङ्का का विनाश करने वाली कालरात्रि समझो॥ ३४ ॥

तदलं कालपाशेन सीताविग्रहरूपिणा।

स्वयं स्कन्धावसक्तेन क्षेममात्मनि चिन्त्यताम्॥३५॥

‘सीता का शरीर धारण करके तुम्हारे पास काल की फाँसी आ पहुँची है, उसमें स्वयं गला फँसाना ठीक नहीं है; अतः अपने कल्याण की चिन्ता करो॥ ३५॥

सीतायास्तेजसा दग्धां रामकोपप्रदीपिताम्।

दह्यमानामिमां पश्य पुरीं साट्टप्रतोलिकाम्॥३६॥

‘देखो, अट्टालिकाओं और गलियोंसहित यह लङ्कापुरी सीताजी के तेज और श्रीराम की क्रोधाग्नि से जलकर भस्म होने जा रही है (बचा सको तो बचाओ) ॥ ३६॥

स्वानि मित्राणि मन्त्रींश्च ज्ञातीन् भ्रातृन् सुतान्हितान्।

भोगान् दारांश्च लङ्कां च मा विनाशमुपानय॥३७॥

‘इन मित्रों, मन्त्रियों, कुटुम्बीजनों, भाइयों, पुत्रों, हितकारियों, स्त्रियों, सुख-भोग के साधनों तथा समूची लङ्का को मौत के मुख में न झोंको॥ ३७॥

सत्यं राक्षसराजेन्द्र शृणुष्व वचनं मम।

रामदासस्य दूतस्य वानरस्य विशेषतः॥३८॥

‘राक्षसों के राजाधिराज! मैं भगवान् श्रीराम का दास हूँ, दूत हूँ और विशेषतः वानर हूँ। मेरी सच्ची बात सुनो—॥

सर्वांल्लोकान् सुसंहृत्य सभूतान् सचराचरान्।

पुनरेव तथा स्रष्टुं शक्तो रामो महायशाः॥ ३९॥

‘महायशस्वी श्रीरामचन्द्रजी चराचर प्राणियोंसहित सम्पूर्ण लोकों का संहार करके फिर उनका नये सिरे से निर्माण करने की शक्ति रखते हैं॥३९॥

देवासुरनरेन्द्रेषु यक्षरक्षोरगेषु च।

विद्याधरेषु नागेषु गन्धर्वेषु मृगेषु च॥४०॥

सिद्धेषु किंनरेन्द्रेषु पतत्रिषु च सर्वतः।

सर्वत्र सर्वभूतेषु सर्वकालेषु नास्ति सः॥४१॥

यो रामं प्रति युध्येत विष्णुतुल्यपराक्रमम्।

‘भगवान् श्रीराम श्रीविष्णु के तुल्य पराक्रमी हैं। देवता, असुर, मनुष्य, यक्ष, राक्षस, सर्प, विद्याधर, नाग, गन्धर्व, मृग, सिद्ध, किंनर, पक्षी एवं अन्य समस्त प्राणियों में कहीं किसी समय कोई भी ऐसा नहीं है, जो श्रीरघुनाथजी के साथ लोहा ले सके। ४०-४१ १/२॥

सर्वलोकेश्वरस्येह कृत्वा विप्रियमीदृशम्।

रामस्य राजसिंहस्य दुर्लभं तव जीवितम्॥४२॥

‘सम्पूर्ण लोकों के अधीश्वर राजसिंह श्रीराम का ऐसा महान् अपराध करके तुम्हारा जीवित रहना कठिन है॥

देवाश्च दैत्याश्च निशाचरेन्द्र गन्धर्वविद्याधरनागयक्षाः।

रामस्य लोकत्रयनायकस्य स्थातुं न शक्ताः समरेषु सर्वे॥४३॥

‘निशाचरराज! श्रीरामचन्द्रजी तीनों लोकों के स्वामी हैं। देवता, दैत्य, गन्धर्व, विद्याधर, नाग तथा यक्ष-ये सब मिलकर भी युद्ध में उनके सामने नहीं टिक सकते॥ ४३॥

ब्रह्मा स्वयम्भूश्चतुराननो वारुद्रस्त्रिनेत्रस्त्रिपुरान्तको वा।

इन्द्रो महेन्द्रः सुरनायको वा स्थातुं न शक्ता युधि राघवस्य॥४४॥

‘चार मुखोंवाले स्वयम्भू ब्रह्मा, तीन नेत्रोंवाले त्रिपुरनाशक रुद्र अथवा देवताओं के स्वामी महान् ऐश्वर्यशाली इन्द्र भी समराङ्गण में श्रीरघुनाथजी के सामने नहीं ठहर सकते ॥४४॥

स सौष्ठवोपेतमदीनवादिनः कपेनिशम्याप्रतिमोऽप्रियं वचः।

दशाननः कोपविवृत्तलोचनः समादिशत् तस्य वधं महाकपेः॥४५॥

वीरभाव से निर्भयतापूर्वक भाषण करने वाले महाकपि हनुमान जी की बातें बड़ी सुन्दर एवं युक्तियुक्त थीं, तथापि वे रावण को अप्रिय लगीं। उन्हें सुनकर अनुपम शक्तिशाली दशानन रावण ने क्रोध से आँखें तरेरकर सेवकों को उनके वध के लिये आज्ञा दी॥ ४५ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे एकपञ्चाशः सर्गः॥५१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में इक्यावनवाँ सर्ग पूरा हुआ।५१॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
सुन्दरकाण्डम्

विभीषण का दूत के वध को अनुचित बताकर उसे दूसरा कोई दण्ड देने के लिये कहना तथा रावण का उनके अनरोध को स्वीकार कर लेना

द्विपञ्चाशः सर्गः

सर्ग-52


स तस्य वचनं श्रुत्वा वानरस्य महात्मनः।

आज्ञापयद् वधं तस्य रावणः क्रोधमूर्च्छितः॥१॥

वानरशिरोमणि महात्मा हनुमान जी का वचन सुनकर क्रोध से तमतमाये हुए रावण ने अपने सेवकों को आज्ञा दी—’इस वानर का वध कर डालो’ ॥१॥

वधे तस्य समाज्ञप्ते रावणेन दुरात्मना।

निवेदितवतो दौत्यं नानुमेने विभीषणः॥२॥

दुरात्मा रावण ने जब उनके वध की आज्ञा दी, तब विभीषण भी वहीं थे। उन्होंने उस आज्ञा का अनुमोदन नहीं किया; क्योंकि हनुमान जी अपने को सुग्रीव एवं श्रीराम का दूत बता चुके थे॥२॥

तं रक्षोऽधिपतिं क्रुद्धं तच्च कार्यमुपस्थितम्।

विदित्वा चिन्तयामास कार्यं कार्यविधौ स्थितः॥

एक ओर राक्षसराज रावण क्रोध से भरा हुआ था, दूसरी ओर वह दूत के वध का कार्य उपस्थित था। यह सब जानकर यथोचित कार्य के सम्पादन में लगे हुए विभीषण ने समयोचित कर्तव्य का निश्चय किया॥३॥

निश्चितार्थस्ततः साम्ना पूज्यं शत्रुजिदग्रजम्।

उवाच हितमत्यर्थं वाक्यं वाक्यविशारदः॥४॥

निश्चय हो जाने पर वार्तालापकुशल विभीषण ने पूजनीय ज्येष्ठ भ्राता शत्रुविजयी रावण से शान्तिपूर्वक यह हितकर वचन कहा— ॥४॥

क्षमस्व रोषं त्यज राक्षसेन्द्र प्रसीद मे वाक्यमिदं शृणुष्व।

वधं न कुर्वन्ति परावरज्ञा दूतस्य सन्तो वसुधाधिपेन्द्राः॥५॥

‘राक्षसराज! क्षमा कीजिये, क्रोध को त्याग दीजिये, प्रसन्न होइये और मेरी यह बात सुनिये। ऊँच-नीच का ज्ञान रखने वाले श्रेष्ठ राजालोग दूत का वध नहीं करते

राजन् धर्मविरुद्धं च लोकवृत्तेश्च गर्हितम्।

तव चासदृशं वीर कपेरस्य प्रमापणम्॥६॥

‘वीर महाराज! इस वानर को मारना धर्म के विरुद्ध और लोकाचार की दृष्टि से भी निन्दित है आप-जैसे वीर के लिये तो यह कदापि उचित नहीं है॥६॥

धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च राजधर्मविशारदः।

परावरज्ञो भूतानां त्वमेव परमार्थवित्॥७॥

गृह्यन्ते यदि रोषेण त्वादृशोऽपि विचक्षणाः।

ततः शास्त्रविपश्चित्त्वं श्रम एव हि केवलम्॥८॥

‘आप धर्म के ज्ञाता, उपकार को मानने वाले और राजधर्म के विशेषज्ञ हैं, भले-बुरे का ज्ञान रखने वाले और परमार्थ के ज्ञाता हैं। यदि आप-जैसे विद्वान् भी रोष के वशीभूत हो जायँ तब तो समस्त शास्त्रों का पाण्डित्य प्राप्त करना केवल श्रम ही होगा॥ ७-८॥

तस्मात् प्रसीद शत्रुघ्न राक्षसेन्द्र दुरासद।

युक्तायुक्तं विनिश्चित्य दूतदण्डो विधीयताम्॥९॥

‘अतः शत्रुओं का संहार करने वाले दुर्जय राक्षसराज! आप प्रसन्न होइये और उचित अनुचित का विचार करके दूत के योग्य किसी दण्ड का विधान कीजिये’ ॥९॥

विभीषणवचः श्रुत्वा रावणो राक्षसेश्वरः।

कोपेन महताऽऽविष्टो वाक्यमुत्तरमब्रवीत्॥१०॥

विभीषण की बात सुनकर राक्षसों का स्वामी रावण महान् कोप से भरकर उन्हें उत्तर देता हुआ बोला—॥

न पापानां वधे पापं विद्यते शत्रुसूदन।

तस्मादिमं वधिष्यामि वानरं पापकारिणम्॥११॥

‘शत्रुसूदन! पापियों का वध करने में पाप नहीं है। इस वानर ने वाटिका का विध्वंस तथा राक्षसों का वध करके पाप किया है। इसलिये अवश्य ही इसका वध करूँगा’ ॥ ११॥

अधर्ममूलं बहुदोषयुक्तमनार्यजुष्टं वचनं निशम्य।

उवाच वाक्यं परमार्थतत्त्वं विभीषणो बुद्धिमतां वरिष्ठः॥१२॥

रावण का वचन अनेक दोषों से युक्त और पाप का मूल था। वह श्रेष्ठ पुरुषों के योग्य नहीं था। उसे सुनकर बुद्धिमानों में श्रेष्ठ विभीषण ने उत्तम कर्तव्य का निश्चय कराने वाली बात कही- ॥ १२ ॥

प्रसीद लङ्केश्वर राक्षसेन्द्र धर्मार्थतत्त्वं वचनं शृणुष्व।

दूता न वध्याः समयेषु राजन् सर्वेषु सर्वत्र वदन्ति सन्तः॥१३॥

‘लङ्केश्वर ! प्रसन्न होइये। राक्षसराज! मेरे धर्म और अर्थतत्त्व से युक्त वचन को ध्यान देकर सुनिये। राजन्! सत्पुरुषों का  कथन है कि दूत कहीं किसी समय भी वध करने योग्य नहीं होते॥ १३॥

असंशयं शत्रुरयं प्रवृद्धः कृतं ह्यनेनाप्रियमप्रमेयम्।

न दूतवध्यां प्रवदन्ति सन्तो दूतस्य दृष्टा बहवो हि दण्डाः ॥१४॥

‘इसमें संदेह नहीं कि यह बहुत बड़ा शत्रु है; क्योंकि इसने वह अपराध किया है जिसकी कहीं तुलना नहीं है, तथापि सत्पुरुष दूत का वध करना उचित नहीं बताते हैं। दूत के लिये अन्य प्रकार के बहुत-से दण्ड देखे गये हैं॥ १४ ॥

वैरूप्यमङ्गेषु कशाभिघातो मौण्ड्यं तथा लक्षणसंनिपातः।

एतान् हि दूते प्रवदन्ति दण्डान् वधस्तु दूतस्य न नः श्रुतोऽस्ति॥१५॥

‘किसी अङ्ग को भङ्ग या विकृत कर देना, कोड़े से पिटवाना, सिर मुड़वा देना तथा शरीर में कोई चिह्न दाग देना—ये ही दण्ड दूत के लिये उचित बताये गये हैं। उसके लिये वध का दण्ड तो मैंने कभी नहीं सुना है॥

कथं च धर्मार्थविनीतबुद्धिः परावरप्रत्ययनिश्चितार्थः।

भवद्विधः कोपवशे हि तिष्ठेत् कोपं न गच्छन्ति हि सत्त्ववन्तः॥१६॥

‘आपकी बुद्धि धर्म और अर्थ की शिक्षा से युक्त है। आप ऊँच-नीच का विचार करके कर्तव्य का निश्चय करने वाले हैं। आप-जैसा नीतिज्ञ पुरुष कोप के अधीन कैसे हो सकता है? क्योंकि शक्तिशाली पुरुष क्रोध नहीं करते हैं।

न धर्मवादे न च लोकवृत्ते न शास्त्रबुद्धिग्रहणेषु वापि।

विद्येत कश्चित्तव वीर तुल्यस्त्वं ह्युत्तमः सर्वसुरासुराणाम्॥१७॥

‘वीर! धर्म की व्याख्या करने, लोकाचार का पालन करने अथवा शास्त्रीय सिद्धान्त को समझने में आपके समान दूसरा कोई नहीं है। आप सम्पूर्ण देवताओं और असुरों में श्रेष्ठ हैं ॥ १७॥

पराक्रमोत्साहमनस्विनां च सुरासुराणामपि दुर्जयेन।

त्वयाप्रमेयेण सुरेन्द्रसङ्घा जिताश्च युद्धेष्वसकृन्नरेन्द्राः॥१८॥

‘पराक्रम और उत्साह से सम्पन्न जो मनस्वी देवता और असुर हैं, उनके लिये भी आपपर विजय पाना अत्यन्त कठिन है। आप अप्रमेय शक्तिशाली हैं। आपने अनेक युद्धों में बारंबार देवेश्वरों तथा नरेशों को पराजित किया है॥ १८॥

इत्थंविधस्यामरदैत्यशत्रोः शूरस्य वीरस्य तवाजितस्य।

कुर्वन्ति वीरा मनसाप्यलीकं प्राणैर्विमुक्ता न तु भोः पुरा ते॥१९॥

‘देवताओं और दैत्यों से भी शत्रुता रखने वाले ऐसे आप अपराजित शूरवीर का पहले कभी शत्रुपक्षी वीर मन से भी पराभव नहीं कर सके हैं। जिन्होंने सिर उठाया, वे तत्काल प्राणों से हाथ धो बैठे॥ १९ ॥

न चाप्यस्य कपे ते कंचित् पश्याम्यहं गुणम्।

तेष्वयं पात्यतां दण्डो यैरयं प्रेषितः कपिः॥२०॥

‘इस वानर को मारने में मुझे कोई लाभ नहीं दिखायी देता। जिन्होंने इसे भेजा है, उन्हीं को यह प्राणदण्ड दिया जाय॥२०॥

साधुर्वा यदि वासाधुः परैरेष समर्पितः।

ब्रुवन् परार्थं परवान् न दूतो वधमर्हति ॥२१॥

‘यह भला हो या बुरा, शत्रुओं  ने इसे भेजा है; अतः यह उन्हीं के स्वार्थ की बात करता है। दूत सदा पराधीन होता है, अतः वह वध के योग्य नहीं होता है॥२१॥

अपि चास्मिन् हते नान्यं राजन् पश्यामि खेचरम्।

इह यः पुनरागच्छेत् परं पारं महोदधेः ॥२२॥

‘राजन्! इसके मारे जाने पर मैं दूसरे किसी ऐसे आकाशचारी प्राणी को नहीं देखता, जो शत्रु के समीप से महासागर के इस पार फिर आ सके (ऐसी दशा में शत्रु की गति-विधि का आपको पता नहीं लग सकेगा) ॥ २२॥

तस्मान्नास्य वधे यत्नः कार्यः परपुरंजय।

भवान् सेन्द्रेषु देवेषु यत्नमास्थातुमर्हति ॥२३॥

‘अतः शत्रुनगरी पर विजय पाने वाले महाराज! आपको इस दूत के वध के लिये कोई प्रयत्न नहीं करना चाहिये। आप तो इस योग्य हैं कि इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओं पर चढ़ाई कर सकें॥२३॥

अस्मिन् विनष्टे नहि भूतमन्यं पश्यामि यस्तौ नरराजपुत्रौ।

युद्धाय युद्धप्रिय दुर्विनीतावुद्योजयेद् वै भवता विरुद्धौ ॥२४॥

‘युद्धप्रेमी महाराज! इसके नष्ट हो जाने पर मैं दूसरे किसी प्राणी को ऐसा नहीं देखता, जो आपसे विरोध करने वाले उन दोनों स्वतन्त्र प्रकृति के राजकुमारों को युद्ध के लिये तैयार कर सके॥२४॥

पराक्रमोत्साहमनस्विनां च सुरासुराणामपि दुर्जयेन।

त्वया मनोनन्दन नैर्ऋतानां युद्धाय निर्नाशयितुं न युक्तम्॥२५॥

‘राक्षसों के हृदय को आनन्दित करने वाले वीर! आप देवताओं और दैत्यों के लिये भी दुर्जय हैं; अतः पराक्रम और उत्साह से भरे हुए हृदयवाले इन राक्षसों के मन में जो युद्ध करने का हौसला बढ़ा हुआ है, उसे नष्ट कर देना आपके लिये कदापि उचित नहीं है॥ २५॥

हिताश्च शूराश्च समाहिताश्च कुलेषु जाताश्च महागुणेषु।

मनस्विनः शस्त्रभृतां वरिष्ठाः कोपप्रशस्ताः सुभृताश्च योधाः॥२६॥

तदेकदेशेन बलस्य तावत् केचित् तवादेशकृतोऽद्य यान्तु।

तौ राजपुत्रावुपगृह्य मूढौ परेषु ते भावयितुं प्रभावम्॥२७॥

‘मेरी राय तो यह है कि उन विरह-दुःख से विकलचित्त राजकुमारों को कैद करके शत्रुओं पर आपका प्रभाव डालने– दबदबा जमाने के लिये आपकी आज्ञा से थोड़ी-सी सेना के साथ कुछ ऐसे योद्धा यहाँ से यात्रा करें, जो हितैषी, शूरवीर, सावधान, अधिक गुणवाले, महान् कुल में उत्पन्न, मनस्वी, शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ, अपने रोष और जोश के लिये प्रशंसित तथा अधिक वेतन देकर अच्छी तरह पाले-पोसे गये हों’ ॥ २६-२७॥

निशाचराणामधिपोऽनुजस्य विभीषणस्योत्तमवाक्यमिष्टम्।

जग्राह बुद्ध्या सुरलोकशत्रुमहाबलो राक्षसराजमुख्यः॥२८॥

अपने छोटे भाई विभीषण के इस उत्तम और प्रिय वचन को सुनकर निशाचरों के स्वामी तथा देवलोक के शत्रु महाबली राक्षसराज रावण ने बुद्धि से सोच विचारकर उसे स्वीकार कर लिया॥२८॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे द्विपञ्चाशः सर्गः॥५२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में बावनवाँ सर्ग पूरा हुआ।५२॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
सुन्दरकाण्डम्

राक्षसों का हनुमान जी की पूँछ में आग लगाकर उन्हें नगर में घुमाना

त्रिपञ्चाशः सर्गः

सर्ग-53


तस्य तद् वचनं श्रुत्वा दशग्रीवो महात्मनः।

देशकालहितं वाक्यं भ्रातुरुत्तरमब्रवीत्॥१॥

छोटे भाई महात्मा विभीषण की बात देश और काल के लिये उपयुक्त एवं हितकर थी। उसको सुनकर दशानन ने इस प्रकार उत्तर दिया- ॥१॥

सम्यगुक्तं हि भवता दूतवध्या विगर्हिता।

अवश्यं तु वधायान्यः क्रियतामस्य निग्रहः॥२॥

‘विभीषण! तुम्हारा कहना ठीक है। वास्तव में दूत के वध की बड़ी निन्दा की गयी है; परंतु वध के अतिरिक्त दूसरा कोई दण्ड इसे अवश्य देना चाहिये।

कपीनां किल लाङ्गलमिष्टं भवति भूषणम्।

तदस्य दीप्यतां शीघ्रं तेन दग्धेन गच्छतु॥३॥

‘वानरों को अपनी पूंछ बड़ी प्यारी होती है। वही इनका आभूषण है। अतः जितना जल्दी हो सके, इसकी पूँछ जला दो। जली पूँछ लेकर ही यह यहाँ से जाय॥३॥

ततः पश्यन्त्वमुं दीनमङ्गवैरूप्यकर्शितम्।

सुमित्रज्ञातयः सर्वे बान्धवाः ससुहृज्जनाः॥४॥

‘वहाँ इसके मित्र, कुटुम्बी, भाई-बन्धु तथा हितैषी सुहृद् इसे अङ्ग-भङ्ग के कारण पीड़ित एवं दीन अवस्था में देखें ॥४॥

आज्ञापयद् राक्षसेन्द्रः पुरं सर्वं सचत्वरम्।

लाङ्गलेन प्रदीप्तेन रक्षोभिः परिणीयताम्॥५॥

फिर राक्षसराज रावण ने यह आज्ञा दी कि ‘राक्षसगण इसकी पूँछ में आग लगाकर इसे सड़कों और चौराहोंसहित समूचे नगर में घुमावें ॥५॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राक्षसाः कोपकर्कशाः।

वेष्टन्ते तस्य लाङ्गलं जीर्णैः कार्पासिकैः पटैः॥

स्वामी का यह आदेश सुनकर क्रोध के कारण कठोरतापूर्ण बर्ताव करने वाले राक्षस हनुमान जी की पूँछ में पुराने सूती कपड़े लपेटने लगे॥६॥

संवेष्टयमाने लाङ्गले व्यवर्धत महाकपिः।

शुष्कमिन्धनमासाद्य वनेष्विव हुताशनम्॥७॥

जब उनकी पूँछ में वस्त्र लपेटा जाने लगा, उस समय वनों में सूखी लकड़ी पाकर भभक उठने वाली आग की भाँति उन महाकपि का शरीर बढ़कर बहुत बड़ा हो गया।

तैलेन परिषिच्याथ तेऽग्निं तत्रोपपादयन्।

लाङ्गलेन प्रदीप्तेन राक्षसांस्तानताडयत्॥८॥

रोषामर्षपरीतात्मा बालसूर्यसमाननः।

राक्षसों ने वस्त्र लपेटने के पश्चात् उनकी पूँछ पर तेल छिड़क दिया और आग लगा दी। तब हनुमान् जी का हृदय रोष से भर गया। उनका मुख प्रातःकाल के सूर्य की भाँति अरुण आभा से उद्भासित हो उठा और वे अपनी जलती हुई पूँछ से ही राक्षसों को पीटने लगे॥ ८ १/२॥

स भूयः संगतैः क्रूरै राक्षसैर्हरिपुङ्गवः॥९॥

सहस्त्रीबालवृद्धाश्च जग्मुः प्रीतिं निशाचराः।

तब क्रूर राक्षसोंने मिलकर पुनः उन वानरशिरोमणिको कसकर बाँध दिया। यह देख स्त्रियों, बालकों और वृद्धोंसहित समस्त निशाचर बड़े प्रसन्न हुए॥९ १/२॥

निबद्धः कृतवान् वीरस्तत्कालसदृशीं मतिम्॥१०॥

कामं खलु न मे शक्ता निबद्धस्यापि राक्षसाः।

छित्त्वा पाशान् समुत्पत्य हन्यामहमिमान् पुनः॥

तब वीरवर हनुमान जी बँधे-बँधे ही उस समय के योग्य विचार करने लगे—’यद्यपि मैं बँधा हुआ हूँ तो भी इन राक्षसों का मुझपर जोर नहीं चल सकता। इन बन्धनों को तोड़कर मैं ऊपर उछल जाऊँगा और पुनः इन्हें मार सकूँगा॥ १०-११॥

यदि भर्तृहितार्थाय चरन्तं भर्तृशासनात्।

निबध्नन्ते दुरात्मानो न तु मे निष्कृतिः कृता॥१२॥

‘मैं अपने स्वामी श्रीराम के हित के लिये विचर रहा हूँ तो भी ये दुरात्मा राक्षस यदि अपने राजा के आदेश से मुझे बाँध रहे हैं तो इससे मैं जो कुछ कर चुका हूँ, उसका बदला नहीं पूरा हो सका है॥ १२ ॥

सर्वेषामेव पर्याप्तो राक्षसानामहं युधि।

किं तु रामस्य प्रीत्यर्थं विषहिष्येऽहमीदृशम्॥१३॥

‘मैं युद्धस्थल में अकेला ही इन समस्त राक्षसों का संहार करने में पूर्णतः समर्थ हूँ, किंतु इस समय श्रीरामचन्द्रजी की प्रसन्नता के लिये मैं ऐसे बन्धन को चुपचाप सह लूँगा॥१३॥

लङ्का चारयितव्या मे पुनरेव भवेदिति।

रात्रौ नहि सुदृष्टा मे दुर्गकर्मविधानतः॥१४॥

“ऐसा करने से मुझे पुनः समूची लङ्का में विचरने और इसके निरीक्षण करने का अवसर मिलेगा; क्योंकि रात में घूमने के कारण मैंने दुर्ग रचना की विधि पर दृष्टि रखते हुए इसका अच्छी तरह अवलोकन नहीं किया था॥ १४॥

अवश्यमेव द्रष्टव्या मया लङ्का निशाक्षये।

कामं बध्नन्तु मे भूयः पुच्छस्योद्दीपनेन च॥१५॥

पीडां कुर्वन्ति रक्षांसि न मेऽस्ति मनसः श्रमः।

‘अतः सबेरा हो जाने पर मुझे अवश्य ही लङ्का देखनी है। भले ही ये राक्षस मुझे बारंबार बाँधे और पूँछ में आग लगाकर पीड़ा पहुँचायें। मेरे मन में इसके कारण तनिक भी कष्ट नहीं होगा’ ॥ १५ १/२॥

ततस्ते संवृताकारं सत्त्ववन्तं महाकपिम्॥१६॥

परिगृह्य ययुर्हृष्टा राक्षसाः कपिकुञ्जरम्।

शङ्कभेरीनिनादैश्च घोषयन्तः स्वकर्मभिः॥१७॥

राक्षसाः क्रूरकर्माणश्चारयन्ति स्म तां पुरीम्।

तदनन्तर वे क्रूरकर्मा राक्षस अपने दिव्य आकार को छिपाये रखने वाले सत्त्वगुणशाली महान् वानरवीर कपिकुञ्जर हनुमान जी को पकड़कर बड़े हर्ष के साथ ले चले और शङ्ख एवं भेरी बजाकर उनके (रावण-द्रोह आदि) अपराधों की घोषणा करते हुए उन्हें लङ्कापुरी में सब ओर घुमाने लगे॥ १६-१७ १/२॥

अन्वीयमानो रक्षोभिर्ययौ सुखमिरंदमः॥१८॥

हनूमांश्चारयामास राक्षसानां महापुरीम्।

अथापश्यद् विमानानि विचित्राणि महाकपिः॥

शत्रुदमन हनुमान जी बड़ी मौज से आगे बढ़ने लगे। समस्त राक्षस उनके पीछे-पीछे चल रहे थे। महाकपि हनुमान् जी राक्षसों की उस विशाल पुरी में विचरते हुए उसे देखने लगे। उन्होंने वहाँ बड़े विचित्र विमान देखे ॥ १८-१९॥

संवृतान् भूमिभागांश्च सुविभक्तांश्च चत्वरान्।

रथ्याश्च गृहसम्बाधाः कपिः शृङ्गाटकानि च॥२०॥

तथा रथ्योपरथ्याश्च तथैव च गृहान्तरान्।

परकोटे से घिरे हुए कितने ही भूभाग, पृथक्-पृथक् बने हुए सुन्दर चबूतरे, घनीभूत गृहपंक्तियों से घिरी हुई सड़कें, चौराहे, छोटी-बड़ी गलियाँ और घरों के मध्यभाग—इन सबको वे बड़े गौर से देखने लगे॥ २० १/२॥

चत्वरेषु चतुष्केषु राजमार्गे तथैव च ॥ २१॥

घोषयन्ति कपिं सर्वे चार इत्येव राक्षसाः।

सब राक्षस उन्हें चौराहों पर, चार खंभेवाले मण्डपों में तथा सड़कों पर घुमाने और जासूस कहकर उनका परिचय देने लगे॥ २१ १/२॥

स्त्रीबालवृद्धा निर्जग्मुस्तत्र तत्र कुतूहलात्॥२२॥

तं प्रदीपितलाङ्गलं हनूमन्तं दिदृक्षवः।।

भिन्न-भिन्न स्थानों में जलती पूंछवाले हनुमान जी को देखनेके लिये वहाँ बहुत-से बालक, वृद्ध और स्त्रियाँ कौतूहलवश घर से बाहर निकल आती थीं। २२ १/२॥

दीप्यमाने ततस्तस्य लाङ्गलागे हनूमतः॥२३॥

राक्षस्यस्ता विरूपाक्ष्यः शंसुर्देव्यास्तदप्रियम्।

हनुमान जी की पूँछ में जब आग लगायी जा रही थी, उस समय भयंकर नेत्रोंवाली राक्षसियों ने सीतादेवी के पास जाकर उनसे यह अप्रिय समाचार कहा— ॥ २३ १/२॥

यस्त्वया कृतसंवादः सीते ताम्रमुखः कपिः॥२४॥

लाङ्गलेन प्रदीप्तेन स एष परिणीयते।

‘सीते! जिस लाल मुँहवाले बन्दर ने तुम्हारे साथ बातचीत की थी, उसकी पूँछ में आग लगाकर उसे सारे नगर में घुमाया जा रहा है’ ॥ २४ १/२॥

श्रुत्वा तद् वचनं क्रूरमात्मापहरणोपमम्॥ २५॥

वैदेही शोकसंतप्ता हुताशनमुपागमत्।

अपने अपहरण की ही भाँति दुःख देने वाली यह क्रूरतापूर्ण बात सुनकर विदेहनन्दिनी सीता शोक से संतप्त हो उठीं और मन-ही-मन अग्निदेव की उपासना करने लगीं॥ २५ १/२॥

मङ्गलाभिमुखी तस्य सा तदासीन्महाकपेः॥२६॥

उपतस्थे विशालाक्षी प्रयता हव्यवाहनम्।

उस समय विशाललोचना पवित्रहृदया सीता महाकपि हनुमान जी के लिये मङ्गलकामना करती हुई अग्निदेव की उपासना में संलग्न हो गयीं और इस प्रकार बोलीं- ॥२६ १/२॥

यद्यस्ति पतिशुश्रूषा यद्यस्ति चरितं तपः।

यदि वा त्वेकपत्नीत्वं शीतो भव हनूमतः॥ २७॥

‘अग्निदेव! यदि मैंने पति की सेवा की है और यदि मुझमें कुछ भी तपस्या तथा पातिव्रत्य का बल है तो तुम हनुमान के लिये शीतल हो जाओ॥२७॥

यदि किंचिदनुक्रोशस्तस्य मय्यस्ति धीमतः।

यदि वा भाग्यशेषो मे शीतो भव हनूमतः॥ २८॥

‘यदि बुद्धिमान् भगवान् श्रीराम के मन में मेरे प्रति किंचिन्मात्र भी दया है अथवा यदि मेरा सौभाग्य शेष है तो तुम हनुमान् के लिये शीतल हो जाओ॥२८॥

यदि मां वृत्तसम्पन्नां तत्समागमलालसाम्।

स विजानाति धर्मात्मा शीतो भव हनूमतः॥२९॥

‘यदि धर्मात्मा श्रीरघुनाथजी मुझे सदाचार से सम्पन्न और अपने से मिलने के लिये उत्सुक जानते हैं तो तुम हनुमान् के लिये शीतल हो जाओ॥२९॥

यदि मां तारयेदार्यः सुग्रीवः सत्यसंगरः।

अस्माद् दुःखाम्बुसंरोधाच्छीतो भव हनूमतः॥३०॥

‘यदि सत्यप्रतिज्ञ आर्य सुग्रीव इस दुःख के महासागर से मेरा उद्धार कर सकें तो तुम हनुमान् के लिये शीतल हो जाओ’ ॥ ३०॥

ततस्तीक्ष्णार्चिरव्यग्रः प्रदक्षिणशिखोऽनलः।

जज्वाल मृगशावाक्ष्याः शंसन्निव शुभं कपेः॥३१॥

मृगनयनी सीता के इस प्रकार प्रार्थना करने पर तीखी लपटोंवाले अग्निदेव मानो उन्हें हनुमान के मङ्गल की सूचना देते हुए शान्तभाव से जलने लगे। उनकी शिखा प्रदक्षिण-भाव से उठने लगी॥३१॥

हनूमज्जनकश्चैव पुच्छानलयुतोऽनिलः।

ववौ स्वास्थ्यकरो देव्याः प्रालेयानिलशीतलः॥

हनुमान् के पिता वायुदेवता भी उनकी पूँछ में लगी हुई आग से युक्त हो बर्फीली हवा के समान शीतल और देवी सीता के लिये स्वास्थ्यकारी (सुखद) होकर बहने लगे॥ ३२॥

दह्यमाने च लाङ्गले चिन्तयामास वानरः।

प्रदीप्तोऽग्निरयं कस्मान्न मां दहति सर्वतः॥३३॥

उधर पूँछ में आग लगायी जाने पर हनुमान जी सोचने लगे—’अहो! यह आग सब ओरसे प्रज्वलित होने पर भी मुझे जलाती क्यों नहीं है ? ॥ ३३॥

दृश्यते च महाज्वालः करोति च न मे रुजम्।

शिशिरस्येव सम्पातो लाङ्गलाग्रे प्रतिष्ठितः॥ ३४॥

‘इसमें इतनी ऊँची ज्वाला उठती दिखायी देती है, तथापि यह आग मुझे पीड़ा नहीं दे रही है। मालूम होता है मेरी पूँछ के अग्रभाग में बर्फ का ढेर-सा रख दिया गया है॥ ३४॥

अथ वा तदिदं व्यक्तं यद् दृष्टं प्लवता मया।

रामप्रभावादाश्चर्यं पर्वतः सरितां पतौ॥ ३५॥

‘अथवा उस दिन समुद्र को लाँघते समय मैंने सागर में श्रीरामचन्द्रजी के प्रभाव से पर्वत के प्रकट होने की जो आश्चर्यजनक घटना देखी थी, उसी तरह आज यह अग्नि की शीतलता भी व्यक्त हुई है॥ ३५ ॥

यदि तावत् समुद्रस्य नाकस्य च धीमतः।

रामार्थं सम्भ्रमस्तादृक् किमग्निर्न करिष्यति॥ ३६॥

‘यदि श्रीराम के उपकार के लिये समुद्र और बुद्धिमान् मैनाक के मन में वैसी आदरपूर्ण उतावली देखी गयी तो क्या अग्निदेव उन भगवान् के उपकार के लिये शीतलता नहीं प्रकट करेंगे? ॥ ३६॥

सीतायाश्चानृशंस्येन तेजसा राघवस्य च।

पितुश्च मम सख्येन न मां दहति पावकः॥३७॥

‘निश्चय ही भगवती सीता की दया, श्रीरघुनाथजी के तेज तथा मेरे पिता की मैत्री के प्रभाव से अग्निदेव मुझे जला नहीं रहे हैं ॥ ३७॥

भूयः स चिन्तयामास मुहूर्तं कपिकुञ्जरः।

कथमस्मद्विधस्येह बन्धनं राक्षसाधमैः॥३८॥

प्रतिक्रियास्य युक्ता स्यात् सति मह्यं पराक्रमे।

तदनन्तर कपिकुञ्जर हनुमान् ने पुनः एक मुहूर्त तक इस प्रकार विचार किया ‘मेरे-जैसे पुरुष का यहाँ इन नीच निशाचरो द्वारा बाँधा जाना कैसे उचित हो सकता है ? पराक्रम रहते हुए मुझे अवश्य इसका प्रतीकार करना चाहिये’ ॥ ३८ १/२॥

ततश्छित्त्वा च तान् पाशान् वेगवान् वै महाकपिः॥३९॥

उत्पपाताथ वेगेन ननाद च महाकपिः।

यह सोचकर वे वेगशाली महाकपि हनुमान् (जिन्हें राक्षसों ने पकड़ रखा था) उन बन्धनों को तोड़कर बड़े वेग से ऊपर को उछले और गर्जना करने लगे (उस समय भी उनका शरीर रस्सियों में बँधा हुआ ही था) ॥ ३९ १/२॥

पुरद्वारं ततः श्रीमान् शैलशृङ्गमिवोन्नतम्॥४०॥

विभक्तरक्षःसम्बाधमाससादानिलात्मजः।

उछलकर वे श्रीमान् पवनकुमार पर्वत-शिखर के समान ऊँचे नगरद्वार पर जा पहुंचे, जहाँ राक्षसों की भीड़ नहीं थी॥ ४० १/२॥

स भूत्वा शैलसंकाशः क्षणेन पुनरात्मवान्॥४१॥

ह्रस्वतां परमां प्राप्तो बन्धनान्यवशातयत्।

विमुक्तश्चाभवच्छ्रीमान् पुनः पर्वतसंनिभः॥४२॥

पर्वताकार होकर भी वे मनस्वी हनुमान् पुनः क्षणभर में बहुत ही छोटे और पतले हो गये। इस प्रकार उन्होंने अपने सारे बन्धनों को निकाल फेंका। उन बन्धनों से मुक्त होते ही तेजस्वी हनुमान जी फिर पर्वत के समान विशालकाय हो गये॥ ४१-४२॥

वीक्षमाणश्च ददृशे परिघं तोरणाश्रितम्।

स तं गृह्य महाबाहुः कालायसपरिष्कृतम्।

रक्षिणस्तान् पुनः सर्वान् सूदयामास मारुतिः॥४३॥

उस समय उन्होंने जब इधर-उधर दृष्टि डाली, तब उन्हें फाटक के सहारे रखा हुआ एक परिघ दिखायी दिया। काले लोहे के बने हुए उस परिघ को लेकर महाबाहु पवनपुत्र ने वहाँ के समस्त रक्षकों को फिर मार गिराया॥४३॥

स तान् निहत्वा रणचण्डविक्रमः समीक्षमाणः पुनरेव लङ्काम्।

प्रदीप्तलाङ्गलकृतार्चिमाली प्रकाशितादित्य इवार्चिमाली॥४४॥

उन राक्षसों को मारकर रणभूमि में प्रचण्ड पराक्रम प्रकट करने वाले हनुमान जी पुनः लङ्कापुरी का निरीक्षण करने लगे। उस समय जलती हुई पूँछ से जो ज्वालाओं की माला-सी उठ रही थी, उससे अलंकृत हुए वे वानरवीर तेजःपुञ्ज से देदीप्यमान सूर्यदेव के समान प्रकाशित हो रहे थे॥४४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे त्रिपञ्चाशः सर्गः॥५३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में तिरपनवाँ सर्ग पूरा हुआ।५३॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
सुन्दरकाण्डम्

लङ्कापुरी का दहन और राक्षसों का विलाप

चतुःपञ्चाशः सर्गः

सर्ग-54


वीक्षमाणस्ततो लङ्कां कपिः कृतमनोरथः।

वर्धमानसमुत्साहः कार्यशेषमचिन्तयत्॥१॥

हनुमान जी के सभी मनोरथ पूर्ण हो गये थे। उनका उत्साह बढ़ता जा रहा था। अतः वे लङ्का का निरीक्षण करते हुए शेष कार्य के सम्बन्ध में विचार करने लगे— ॥१॥

किं नु खल्ववशिष्टं मे कर्तव्यमिह साम्प्रतम्।

यदेषां रक्षसां भूयः संतापजननं भवेत्॥२॥

‘अब इस समय लङ्का में मेरे लिये कौन-सा ऐसा कार्य बाकी रह गया है, जो इन राक्षसों को अधिक संताप देने वाला हो॥२॥

वनं तावत्प्रमथितं प्रकृष्टा राक्षसा हताः।

बलैकदेशः क्षपितः शेषं दुर्गविनाशनम्॥३॥

‘प्रमदावन को तो मैंने पहले ही उजाड़ दिया था, बड़े-बड़े राक्षसों को भी मौत के घाट उतार दिया और रावण की सेना के भी एक अंशका संहार कर डाला। अब दुर्ग का विध्वंस करना शेष रह गया॥३॥

दुर्गे विनाशिते कर्म भवेत् सुखपरिश्रमम्।

अल्पयत्नेन कार्येऽस्मिन् मम स्यात् सफलः श्रमः॥४॥

‘दुर्ग का विनाश हो जाने पर मेरे द्वारा समुद्र-लङ्घन आदि कर्म के लिये किया गया प्रयास सुखद एवं सफल होगा। मैंने सीताजी की खोज के लिये जो परिश्रम किया है, वह थोड़े-से ही प्रयत्न द्वारा सिद्ध होने वाले लङ्कादहन से सफल हो जायगा॥४॥

यो ह्ययं मम लाङ्गले दीप्यते हव्यवाहनः।

अस्य संतर्पणं न्याय्यं कर्तुमेभिर्गृहोत्तमैः॥५॥

‘मेरी पूँछ में जो ये अग्निदेव देदीप्यमान हो रहे हैं इन्हें इन श्रेष्ठ गृहों की आहुति देकर तृप्त करना न्यायसंगत जान पड़ता है’ ॥ ५॥

ततः प्रदीप्तलाङ्गलः सविद्युदिव तोयदः।

भवनाग्रेषु लङ्काया विचचार महाकपिः॥६॥

ऐसा सोचकर जलती हुई पूँछ के कारण बिजलीसहित मेघ की भाँति शोभा पाने वाले कपिश्रेष्ठ हनुमान् जी लङ्का के महलों पर घूमने लगे॥६॥

गृहाद् गृहं राक्षसानामुद्यानानि च वानरः।

वीक्षमाणो ह्यसंत्रस्तः प्रासादांश्च चचार सः॥७॥

वे वानरवीर राक्षसों के एक घर से दूसरे घर पर पहुँचकर उद्यानों और राजभवनों को देखते हुए निर्भय होकर विचरने लगे॥७॥

अवप्लुत्य महावेगः प्रहस्तस्य निवेशनम्।

अग्निं तत्र विनिक्षिप्य श्वसनेन समो बली॥८॥

ततोऽन्यत् पुप्लुवे वेश्म महापार्श्वस्य वीर्यवान्।

मुमोच हनुमानग्निं कालानलशिखोपमम्॥९॥

घूमते-घूमते वायु के समान बलवान् और महान् वेगशाली हनुमान् उछलकर प्रहस्त के महल पर जा पहुँचे और उसमें आग लगाकर दूसरे घर पर कूद पड़े। वह महापार्श्व का निवासस्थान था पराक्रमी हनुमान् ने उसमें भी कालाग्नि की लपटों के समान प्रज्वलित होने वाली आग फैला दी॥८-९॥

वज्रदंष्ट्रस्य च तथा पुप्लुवे स महाकपिः।

शुकस्य च महातेजाः सारणस्य च धीमतः॥१०॥

तत्पश्चात् वे महातेजस्वी महाकपि क्रमशः वज्रदंष्ट्र, शुक और बुद्धिमान् सारण के घरों पर कूदे और उनमें आग लगाकर आगे बढ़ गये॥१०॥

तथा चेन्द्रजितो वेश्म ददाह हरियूथपः।

जम्बुमालेः सुमालेश्च ददाह भवनं ततः॥११॥

इसके बाद वानरयूथपति हनुमान् ने इन्द्रविजयी मेघनाद का घर जलाया। फिर जम्बुमाली और सुमाली के घरों को फूंक दिया॥ ११॥

रश्मिकेतोश्च भवनं सूर्यशत्रोस्तथैव च।

ह्रस्वकर्णस्य दंष्ट्रस्य रोमशस्य च रक्षसः॥१२॥

युद्धोन्मत्तस्य मत्तस्य ध्वजग्रीवस्य रक्षसः।

विद्युज्जिह्वस्य घोरस्य तथा हस्तिमुखस्य च॥१३॥

करालस्य विशालस्य शोणिताक्षस्य चैव हि।

कुम्भकर्णस्य भवनं मकराक्षस्य चैव हि॥१४॥

नरान्तकस्य कुम्भस्य निकुम्भस्य दुरात्मनः।

यज्ञशत्रोश्च भवनं ब्रह्मशत्रोस्तथैव च॥१५॥

तदनन्तर रश्मिकेतु, सूर्यशत्रु, ह्रस्वकर्ण, दंष्ट्र, राक्षसरोमश, रणोन्मत्त मत्त, ध्वजग्रीव, भयानक विद्युज्जिह्व, हस्तिमुख, कराल, विशाल, शोणिताक्ष, कुम्भकर्ण, मकराक्ष, नरान्तक, कुम्भ, दुरात्मा निकुम्भ, यज्ञशत्रु और ब्रह्मशत्रु आदि राक्षसों के घरों में जा-जाकर उन्होंने आग लगायी॥ १२–१५॥

वर्जयित्वा महातेजा विभीषणगृहं प्रति।

क्रममाणः क्रमेणैव ददाह हरिपुङ्गवः॥१६॥

उस समय महातेजस्वी कपिश्रेष्ठ हनुमान् ने केवल विभीषण का घर छोड़कर अन्य सब घरों में क्रमशः पहुँचकर उन सबमें आग लगा दी॥१६॥

तेषु तेषु महार्हेषु भवनेषु महायशाः।

गृहेष्वृद्धिमतामृद्धिं ददाह कपिकुञ्जरः॥१७॥

महायशस्वी कपिकुञ्जर पवनकुमार ने विभिन्न बहुमूल्य भवनों में जा-जाकर समृद्धिशाली राक्षसों के घरों की सारी सम्पत्ति जलाकर भस्म कर डाली।१७॥

सर्वेषां समतिक्रम्य राक्षसेन्द्रस्य वीर्यवान्।

आससादाथ लक्ष्मीवान् रावणस्य निवेशनम्॥१८॥

सबके घरों को लाँघते हुए शोभाशाली पराक्रमी हनुमान् राक्षसराज रावण के महल पर जा पहुँचे॥ १८॥

ततस्तस्मिन् गृहे मुख्ये नानारत्नविभूषिते।

मेरुमन्दरसंकाशे नानामङ्गलशोभिते॥१९॥

प्रदीप्तमग्निमुत्सृज्य लाङ्गलाग्रे प्रतिष्ठितम्।

ननाद हनुमान् वीरो युगान्तजलदो यथा॥२०॥

वही लङ्का के सब महलों में श्रेष्ठ, भाँति-भाँति के रत्नों से विभूषित, मेरुपर्वत के समान ऊँचा और नाना प्रकार के माङ्गलिक उत्सवों से सुशोभित था। अपनी पूँछ के अग्रभाग में प्रतिष्ठित हुई प्रज्वलित अग्नि को उस महल में छोड़कर वीरवर हनुमान् प्रलयकाल के मेघ की भाँति भयानक गर्जना करने लगे॥ १९-२० ॥

श्वसनेन च संयोगादतिवेगो महाबलः।

कालाग्निरिव जज्वाल प्रावर्धत हुताशनः॥२१॥

हवा का सहारा पाकर वह प्रबल आग बड़े वेग से बढ़ने लगी और कालाग्नि के समान प्रज्वलित हो उठी॥

प्रदीप्तमग्निं पवनस्तेषु वेश्मसु चारयन्।

तानि काञ्चनजालानि मुक्तामणिमयानि च॥२२॥

भवनानि व्यशीर्यन्त रत्नवन्ति महान्ति च।

तानि भग्नविमानानि निपेतुर्वसुधातले॥२३॥

वायु उस प्रज्वलित अग्नि को सभी घरों में फैलाने लगी। सोने की खिड़कियों से सुशोभित, मोती और मणियों द्वारा निर्मित तथा रत्नों से विभूषित ऊँचे-ऊँचे प्रासाद एवं सतमह ले भवन फट-फटकर पृथ्वी पर गिरने लगे॥ २२-२३॥

भवनानीव सिद्धानामम्बरात् पुण्यसंक्षये।

संजज्ञे तुमुलः शब्दो राक्षसानां प्रधावताम्॥२४॥

स्वे स्वे गृहपरित्राणे भग्नोत्साहोज्झितश्रियाम्।

वे गिरते हुए भवन पुण्य का क्षय होने पर आकाश से नीचे गिरने वाले सिद्धों के घरों के समान जान पड़ते थे। उस समय राक्षस अपने-अपने घरों को बचाने— उनकी आग बुझाने के लिये इधर-उधर दौड़ने लगे। उनका उत्साह जाता रहा और उनकी श्री नष्ट हो गयी थी। उन सबका तुमुल आर्तनाद चारों ओर गूंजने लगा॥ २४ १/२॥

नूनमेषोऽग्निरायातः कपिरूपेण हा इति॥२५॥

क्रन्दन्त्यः सहसा पेतुः स्तनंधयधराः स्त्रियः।

वे कहते थे—’हाय! यह वानर के रूप में साक्षात् अग्निदेवता ही आ पहुँचा है।’ कितनी ही स्त्रियाँ गोद में बच्चे लिये सहसा क्रन्दन करती हुई नीचे गिर पड़ीं॥

काश्चिदग्निपरीताङ्ग्यो हर्येभ्यो मुक्तमूर्धजाः॥ २६॥

पतन्त्योरेजिरेऽभ्रेभ्यः सौदामन्य इवाम्बरात्।

कुछ राक्षसियों के सारे अङ्ग आग की लपेट में आ गये, वे बाल बिखेरे अट्टालिकाओं से नीचे गिर पड़ीं। गिरते समय वे आकाश में स्थित मेघों से गिरनेवाली बिजलियों के समान प्रकाशित होती थीं॥ २६ १/२॥

वज्रविद्रुमवैदूर्यमुक्तारजतसंहतान्॥२७॥

विचित्रान् भवनाद्धातून् स्यन्दमानान् ददर्श सः।

हनुमान जी ने देखा, जलते हुए घरोंसे हीरा, मूंगा, नीलम, मोती तथा सोने, चाँदी आदि विचित्र-विचित्र धातुओं की राशि पिघल-पिघलकर बही जा रही है। २७ १/२॥

नाग्निस्तृप्यति काष्ठानां तृणानां च यथा तथा॥२८॥

हनूमान् राक्षसेन्द्राणां वधे किंचिन्न तृप्यति।

न हनूमद्रिशस्तानां राक्षसानां वसुन्धरा ॥२९॥

जैसे आग सूखे काठ और तिनकों को जलाने से कभी तृप्त नहीं होती, उसी प्रकार हनुमान् बड़े-बड़े राक्षसों के वध करने से तनिक भी तृप्त नहीं होते थे और हनुमान जी के मारे हुए राक्षसों को अपनी गोद में धारण करने से इस वसुन्धरा का भी जी नहीं भरता था॥ २८-२९॥

हनूमता वेगवता वानरेण महात्मना।

लङ्कापुरं प्रदग्धं तद् रुद्रेण त्रिपुरं यथा॥३०॥

जैसे भगवान् रुद्र ने पूर्वकाल में त्रिपुर को दग्ध किया था, उसी प्रकार वेगशाली वानरवीर महात्मा हनुमान् जी ने लङ्कापुरी को जला दिया॥३०॥

ततः स लङ्कापुरपर्वताग्रे समुत्थितो भीमपराक्रमोऽग्निः।

प्रसार्य चूडावलयं प्रदीप्तो हनूमता वेगवतोपसृष्टः॥३१॥

तत्पश्चात् लङ्कापुरी के पर्वत-शिखरपर आग लगी, वहाँ अग्निदेव का बड़ा भयानक पराक्रम प्रकट हुआ। वेगशाली हनुमान जी की लगायी हुई वह आग चारों ओर अपने ज्वाला-मण्डल को फैलाकर बड़े जोरसे प्रज्वलित हो उठी॥ ३१॥

युगान्तकालानलतुल्यरूपः समारुतोऽग्निर्ववृधे दिवस्पृक्।

विधूमरश्मिर्भवनेषु सक्तो रक्षःशरीराज्यसमर्पितार्चिः॥ ३२॥

हवा का सहारा पाकर वह आग इतनी बढ़ गयी कि उसका रूप प्रलयकालीन अग्नि के समान दिखायी देने लगा। उसकी ऊँची लपटें मानो स्वर्गलोक का स्पर्श कर रही थीं। लङ्का के भवनों में लगी हुई उस आग की ज्वाला में धूम का नाम भी नहीं था। राक्षसों के शरीररूपी घी की आहुति पाकर उसकी ज्वालाएँ उत्तरोत्तर बढ़ रही थीं॥३२॥

आदित्यकोटीसदृशः सुतेजा लङ्कां समस्तां परिवार्य तिष्ठन्।

शब्दैरनेकैरशनिप्ररूढ़भिन्दन्निवाण्डं प्रबभौ महाग्निः॥३३॥

समूची लङ्कापुरी को अपनी लपटों में लपेटकर फैली हुई वह प्रचण्ड आग करोड़ों सूर्यों के समान प्रज्वलित हो रही थी। मकानों और पर्वतों के फटने आदि से होने वाले नाना प्रकार के धड़ाकों के शब्द बिजली की कड़क को भी मात करते थे, उस समय वह विशाल अग्नि ब्रह्माण्ड को फोड़ती हुई-सी प्रकाशित हो रही थी॥

तत्राम्बरादग्निरतिप्रवृद्धो रूक्षप्रभः किंशुकपुष्पचूडः।।

निर्वाणधूमाकुलराजयश्च नीलोत्पलाभाः प्रचकाशिरेऽभ्राः॥ ३४॥

वहाँ धरती से आकाश तक फैली हुई अत्यन्त बढ़ीचढ़ी आग की प्रभा बड़ी तीखी प्रतीत होती थी। उसकी लपटें टेसू के फूल की भाँति लाल दिखायी देती थीं। नीचे से जिनका सम्बन्ध टूट गया था, वे आकाश में फैली हुई धूम-पंक्तियाँ नील कमल के समान रंगवाले मेघों की भाँति प्रकाशित हो रही थीं। ३४॥

वज्री महेन्द्रस्त्रिदशेश्वरो वा साक्षाद् यमो वा वरुणोऽनिलो वा।

रौद्रोऽग्निरर्को धनदश्च सोमो न वानरोऽयं स्वयमेव कालः॥ ३५॥

किं ब्रह्मणः सर्वपितामहस्य लोकस्य धातुश्चतुराननस्य।

इहागतो वानररूपधारी रक्षोपसंहारकरः प्रकोपः॥ ३६॥

किं वैष्णवं वा कपिरूपमेत्य रक्षोविनाशाय परं सुतेजः।

अचिन्त्यमव्यक्तमनन्तमेकं स्वमायया साम्प्रतमागतं वा॥ ३७॥

इत्येवमूचुर्बहवो विशिष्टा रक्षोगणास्तत्र समेत्य सर्वे।

सप्राणिसङ्घा सगृहां सवृक्षां दग्धां पुरी तां सहसा समीक्ष्य॥३८॥

प्राणियों के समुदाय, गृह और वृक्षोंसहित समस्त लङ्कापुरी को सहसा दग्ध हुई देख बड़े-बड़े राक्षसझुंड-के-झुंड एकत्र हो गये और वे सब-के-सब परस्पर इस प्रकार कहने लगे—’यह देवताओं का राजा वज्रधारी इन्द्र अथवा साक्षात् यमराज तो नहीं है? वरुण, वायु, रुद्र, अग्नि, सूर्य, कुबेर या चन्द्रमा में से तो कोई नहीं है? यह वानर नहीं साक्षात् काल ही है। क्या सम्पूर्ण जगत् के पितामह चतुर्मुख ब्रह्माजी का प्रचण्ड कोप ही वानर का रूप धारण करके राक्षसों का संहार करनेके लिये यहाँ उपस्थित हुआ है? अथवा भगवान् विष्णु का महान् तेज जो अचिन्त्य, अव्यक्त, अनन्त और अद्वितीय है, अपनी माया से वानर का शरीर ग्रहण करके राक्षसों के विनाश के लिये तो इस समय नहीं आया है ?’॥ ३५ -३८॥

ततस्तु लङ्का सहसा प्रदग्धा सराक्षसा साश्वरथा सनागा।

सपक्षिसङ्घा समृगा सवृक्षा रुरोद दीना तुमुलं सशब्दम्॥ ३९॥

इस प्रकार घोड़े, हाथी, रथ, पशु, पक्षी, वृक्ष तथा कितने ही राक्षसोंसहित लङ्कापुरी सहसा दग्ध हो गयी। वहाँ के निवासी दीनभाव से तुमुल नाद करते हुए फूट-फूटकर रोने लगे॥ ३९॥

हा तात हा पुत्रक कान्त मित्र हा जीवितेशाङ्ग हतं सुपुण्यम्।

रक्षोभिरेवं बहुधा ब्रुवद्भिः शब्दः कृतो घोरतरः सुभीमः॥४०॥

वे बोले—’हाय रे बप्पा! हाय बेटा! हा स्वामिन् ! हा मित्र! हा प्राणनाथ! हमारे सब पुण्य नष्ट हो गये।’ इस तरह भाँति-भाँति से विलाप करते हुए राक्षसों ने बड़ा भयंकर एवं घोर आर्तनाद किया॥ ४० ॥

हुताशनज्वालसमावृता सा हतप्रवीरा परिवृत्तयोधा।

हनूमतः क्रोधबलाभिभूता बभूव शापोपहतेव लङ्का॥४१॥

हनुमान जी के क्रोध-बल से अभिभूत हुई लङ्कापुरी आग की ज्वाला से घिर गयी थी। उसके प्रमुख-प्रमुख वीर मार डाले गये थे। समस्त योद्धा तितर-बितर और उद्विग्न हो गये थे। इस प्रकार वह पुरी शाप से आक्रान्त हुई-सी जान पड़ती थी॥४१॥

ससम्भ्रमं त्रस्तविषण्णराक्षसां समुज्ज्वलज्ज्वालहुताशनाङ्किताम्।

ददर्श लङ्कां हनुमान् महामनाः स्वयंभुरोषोपहतामिवावनिम्॥४२॥

महामनस्वी हनुमान् ने लङ्कापुरी को स्वयम्भू ब्रह्माजी के रोष से नष्ट हुई पृथ्वी के समान देखा। वहाँ के समस्त राक्षस बड़ी घबराहट में पड़कर त्रस्त और विषादग्रस्त हो गये थे। अत्यन्त प्रज्वलित ज्वाला-मालाओं से अलंकृत अग्निदेव ने उसपर अपनी छाप लगा दी थी॥४२॥

भक्त्वा वनं पादपरत्नसंकुलं हत्वा तु रक्षांसि महान्ति संयुगे।

दग्ध्वा पुरी तां गृहरत्नमालिनी तस्थौ हनूमान् पवनात्मजः कपिः॥४३॥

पवनकुमार वानरवीर हनुमान जी उत्तमोत्तम वृक्षों से भरे हुए वन को उजाड़कर, युद्ध में बड़े-बड़े राक्षसों को मारकर तथा सुन्दर महलों से सुशोभित लङ्कापुरी को जलाकर शान्त हो गये॥४३॥

स राक्षसांस्तान् सुबहूंश्च हत्वा वनं च भक्त्वा बहुपादपं तत्।

विसृज्य रक्षोभवनेषु चाग्निं जगाम रामं मनसा महात्मा॥४४॥

महात्मा हनुमान् बहुत-से राक्षसों का वध और बहुसंख्यक वृक्षों से भरे हुए प्रमदावन का विध्वंस करके निशाचरों के घरों में आग लगाकर मन-ही-मन श्रीरामचन्द्रजी का स्मरण करने लगे॥४४॥

ततस्तु तं वानरवीरमुख्यं महाबलं मारुततुल्यवेगम्।

महामतिं वायुसुतं वरिष्ठं प्रतुष्टवुर्देवगणाश्च सर्वे॥४५॥

तदनन्तर सम्पूर्ण देवताओं ने वानरवीरों में प्रधान, महाबलवान्, वायु के समान वेगवान्, परम बुद्धिमान् और वायुदेवता के श्रेष्ठ पुत्र हनुमान जी का स्तवन किया॥४५॥

देवाश्च सर्वे मुनिपुङ्गवाश्च गन्धर्वविद्याधरपन्नगाश्च।

भूतानि सर्वाणि महान्ति तत्र जग्मुः परां प्रीतिमतुल्यरूपाम्॥४६॥

उनके इस कार्य से सभी देवता, मुनिवर, गन्धर्व, विद्याधर, नाग तथा सम्पूर्ण महान् प्राणी अत्यन्त प्रसन्न हुए। उनके उस हर्ष की कहीं तुलना नहीं थी॥ ४६॥

भक्त्वा वनं महातेजा हत्वा रक्षांसि संयुगे।

दग्ध्वा लङ्कापुरीं भीमां रराज स महाकपिः॥४७॥

महातेजस्वी महाकपि पवनकुमार प्रमदावन को उजाड़कर, युद्ध में राक्षसों को मारकर और भयंकर लङ्कापुरी को जलाकर बड़ी शोभा पाने लगे॥४७॥

गृहाग्र्यशृङ्गाग्रतले विचित्रे प्रतिष्ठितो वानरराजसिंहः।

प्रदीप्तलालकृतार्चिमाली व्यराजतादित्य इवार्चिमाली॥४८॥

श्रेष्ठ भवनों के विचित्र शिखरपर खड़े हुए वानरराजसिंह हनुमान् अपनी जलती पूँछ से उठती हुई ज्वाला-मालाओं से अलंकृत हो तेजःपुञ्ज से देदीप्यमान सूर्यदेव के समान प्रकाशित होने लगे। ४८॥

लङ्कां समस्तां सम्पीड्य लाङ्गलाग्निं महाकपिः।

निर्वापयामास तदा समुद्रे हरिपुङ्गवः॥४९॥

इस प्रकार सारी लङ्कापुरी को पीड़ा दे वानरशिरोमणि महाकपि हनुमान् ने उस समय समुद्र के जल में अपनी पूँछ की आग बुझायी॥ ४९ ॥

ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः।

दृष्ट्वा लङ्कां प्रदग्धां तां विस्मयं परमं गताः॥५०॥

तत्पश्चात् लङ्कापुरी को दग्ध हुई देख देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षि बड़े विस्मित हुए॥५०॥

तं दृष्ट्वा वानरश्रेष्ठं हनूमन्तं महाकपिम्।

कालाग्निरिति संचिन्त्य सर्वभूतानि तत्रसुः॥५१॥

उस समय वानरश्रेष्ठ महाकपि हनुमान् को देख ‘ये कालाग्नि हैं’ ऐसा मानकर समस्त प्राणी भय से थर्रा उठे॥५१॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे चतुःपञ्चाशः सर्गः॥५४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में चौवनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥५४॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
सुन्दरकाण्डम्

सीताजी के लिये हनुमान् जी की चिन्ता और उसका निवारण

पञ्चपञ्चाशः सर्गः

सर्ग-55


संदीप्यमानां वित्रस्तां त्रस्तरक्षोगणां पुरीम्।

अवेक्ष्य हनुमाँल्लङ्कां चिन्तयामास वानरः॥१॥

वानरवीर हनुमान जी ने जब देखा कि सारी लङ्कापुरी जल रही है, वहाँ के निवासियों पर त्रास छा गया है और राक्षसगण अत्यन्त भयभीत हो गये हैं, तब उनके मन में सीता के दग्ध होने की आशङ्का से बड़ी चिन्ता हुई॥१॥

तस्याभूत् सुमहांस्त्रासः कुत्सा चात्मन्यजायत।

लङ्कां प्रदहता कर्म किंस्वित् कृतमिदं मया॥२॥

साथ ही उनपर महान् त्रास छा गया और उन्हें अपने प्रति घृणा-सी होने लगी। वे मन-ही-मन कहने लगे—’हाय! मैंने लङ्का को जलाते समय यह कैसा कुत्सित कर्म कर डाला? ॥२॥

धन्याः खलु महात्मानो ये बुद्ध्या कोपमुत्थितम्।

निरुन्धन्ति महात्मानो दीप्तमग्निमिवाम्भसा॥३॥

‘जो महामनस्वी महात्मा पुरुष उठे हुए कोप को अपनी बुद्धि के द्वारा उसी प्रकार रोक देते हैं, जैसे साधारण लोग जल से प्रज्वलित अग्नि को शान्त कर देते हैं, वे ही इस संसार में धन्य हैं॥३॥

क्रुद्धः पापं न कुर्यात् कः क्रुद्धो हन्याद् गुरूनपि।

क्रुद्धः परुषया वाचा नरः साधूनधिक्षिपेत्॥४॥

‘क्रोध से भर जाने पर कौन पुरुष पाप नहीं करता? क्रोध के वशीभूत हुआ मनुष्य गुरुजनों की भी हत्या कर सकता है। क्रोधी मानव साधु पुरुषों पर भी कटुवचनों द्वारा आक्षेप करने लगता है॥४॥

वाच्यावाच्यं प्रकुपितो न विजानाति कर्हिचित्।

नाकार्यमस्ति क्रुद्धस्य नावाच्यं विद्यते क्वचित्॥

‘अधिक कुपित हुआ मनुष्य कभी इस बात का विचार नहीं करता कि मुँह से क्या कहना चाहिये और क्या नहीं? क्रोधी के लिये कोई ऐसा बुरा काम नहीं, जिसे वह न कर सके और कोई ऐसी बुरी बात नहीं, जिसे वह मुँह से न निकाल सके॥५॥

यः समुत्पतितं क्रोधं क्षमयैव निरस्यति।

यथोरगस्त्वचं जीर्णां स वै पुरुष उच्यते॥६॥

‘जो हृदय में उत्पन्न हुए क्रोध को क्षमा के द्वारा उसी तरह निकाल देता है, जैसे साँप अपनी पुरानी केंचुल को छोड़ देता है, वही पुरुष कहलाता है॥६॥

धिगस्तु मां सुदुर्बुद्धिं निर्लज्जं पापकृत्तमम्।

अचिन्तयित्वा तां सीतामग्निदं स्वामिघातकम्॥७॥

‘मेरी बुद्धि बड़ी खोटी है, मैं निर्लज्ज और महान् पापाचारी हूँ। मैंने सीता की रक्षा का कोई विचार न करके लङ्का में आग लगा दी और इस तरह अपने स्वामी की ही हत्या कर डाली। मुझे धिक्कार है॥७॥

यदि दग्धा त्वियं सर्वा नूनमार्यापि जानकी।

दग्धा तेन मया भर्तुर्हतं कार्यमजानता॥८॥

‘यदि यह सारी लङ्का जल गयी तो आर्या जानकी भी निश्चय ही उसमें दग्ध हो गयी होंगी। ऐसा करके मैंने अनजान में अपने स्वामी का सारा काम ही चौपट कर डाला॥८॥

यदर्थमयमारम्भस्तत्कार्यमवसादितम्।

मया हि दहता लङ्कां न सीता परिरक्षिता॥९॥

‘जिस कार्य की सिद्धि के लिये यह सारा उद्योग किया गया था, वह कार्य ही मैंने नष्ट कर दिया; क्योंकि लङ्का जलाते समय मैंने सीता की रक्षा नहीं की॥९॥

ईषत्कार्यमिदं कार्यं कृतमासीन्न संशयः।

तस्य क्रोधाभिभूतेन मया मूलक्षयः कृतः॥१०॥

‘इसमें संदेह नहीं कि यह लङ्का-दहन एक छोटा सा कार्य शेष रह गया था, जिसे मैंने पूर्ण किया; परंतु क्रोध से पागल होने के कारण मैंने श्रीरामचन्द्रजी के कार्य की तो जड़ ही काट डाली॥ १०॥

विनष्टा जानकी व्यक्तं न ह्यदग्धः प्रदृश्यते।

लङ्कायाः कश्चिदुद्देशः सर्वा भस्मीकृता पुरी॥११॥

‘लङ्का का कोई भी भाग ऐसा नहीं दिखायी देता, जहाँ आग न लगी हो। सारी पुरी ही मैंने भस्म कर डाली है, अतः जानकी नष्ट हो गयी, यह बात स्वतः स्पष्ट हो जाती है॥११॥

यदि तद्विहतं कार्यं मया प्रज्ञाविपर्ययात्।

इहैव प्राणसंन्यासो ममापि ह्यद्य रोचते॥१२॥

‘यदि अपनी विपरीत बुद्धि के कारण मैंने सारा काम चौपट कर दिया तो यहीं आज मेरे प्राणों का भी विसर्जन हो जाना चाहिये। यही मुझे अच्छा जान पड़ता है॥ १२॥

किमग्नौ निपताम्यद्य आहोस्विद् वडवामुखे।

शरीरमिह सत्त्वानां दद्मि सागरवासिनाम्॥१३॥

‘क्या मैं अब जलती आग में कूद पड़ें या वडवानल के मुख में? अथवा समुद्र में निवास करने वाले जल-जन्तुओं को ही यहाँ अपना शरीर समर्पित कर दूँ॥ १३॥

कथं नु जीवता शक्यो मया द्रष्टुं हरीश्वरः।

तौ वा पुरुषशार्दूलौ कार्यसर्वस्वघातिना॥१४॥

‘जब मैंने सारा कार्य ही नष्ट कर दिया, तब अब जीते-जी कैसे वानरराज सुग्रीव अथवा उन दोनों पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मण का दर्शन कर सकता हूँ या उन्हें अपना मुँह दिखा सकता हूँ? ॥ १४ ॥

मया खलु तदेवेदं रोषदोषात् प्रदर्शितम्।

प्रथितं त्रिषु लोकेषु कपित्वमनवस्थितम्॥१५॥

‘मैंने रोष के दोष से तीनों लोकों में विख्यात इस वानरोचित चपलता का ही यहाँ प्रदर्शन किया है। १५॥

धिगस्तु राजसं भावमनीशमनवस्थितम्।

ईश्वरेणापि यद् रागान्मया सीता न रक्षिता॥१६॥

‘यह राजस भाव कार्य-साधन में असमर्थ और अव्यवस्थित है, इसे धिक्कार है; क्योंकि इस रजोगुणमूलक क्रोध के ही कारण समर्थ होते हुए भी मैंने सीता की रक्षा नहीं की॥१६॥

विनष्टायां तु सीतायां तावुभौ विनशिष्यतः।

तयोर्विनाशे सुग्रीवः सबन्धुर्विनशिष्यति॥१७॥

‘सीता के नष्ट हो जाने से वे दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण भी नष्ट हो जायँगे। उन दोनों का नाश होने पर बन्धु-बान्धवोंसहित सुग्रीव भी जीवित नहीं रहेंगे। १७॥

एतदेव वचः श्रुत्वा भरतो भ्रातृवत्सलः।

धर्मात्मा सहशत्रुघ्नः कथं शक्ष्यति जीवितुम्॥१८॥

‘फिर इसी समाचार को सुन लेने पर भ्रातृवत्सल धर्मात्मा भरत और शत्रुघ्न भी कैसे जीवन धारण कर सकेंगे?॥ १८॥

इक्ष्वाकुवंशे धर्मिष्ठे गते नाशमसंशयम्।

भविष्यन्ति प्रजाः सर्वाः शोकसंतापपीडिताः॥१९॥

‘इस प्रकार धर्मनिष्ठ इक्ष्वाकुवंश के नष्ट हो जाने पर सारी प्रजा भी शोक-संताप से पीड़ित हो जायगी, इसमें संशय नहीं है॥ १९॥

तदहं भाग्यरहितो लुप्तधर्मार्थसंग्रहः।

रोषदोषपरीतात्मा व्यक्तं लोकविनाशनः॥२०॥

‘अतः सीता की रक्षा न करने के कारण मैंने धर्म और अर्थ के संग्रह को नष्ट कर दिया, अतएव मैं बड़ा भाग्यहीन हूँ। मेरा हृदय रोषदोष के वशीभूत हो गया है, इसलिये मैं अवश्य ही समस्त लोक का विनाशक हो गया हूँ—मुझे सम्पूर्ण जगत् के विनाश के पाप का भागी होना पड़ेगा’॥ २०॥

इति चिन्तयतस्तस्य निमित्तान्युपपेदिरे।

पूर्वमप्युपलब्धानि साक्षात् पुनरचिन्तयत्॥ २१॥

इस प्रकार चिन्ता में पड़े हुए हनुमान जी को कई शुभ शकुन दिखायी पड़े, जिनके अच्छे फलों का वे पहले भी प्रत्यक्ष अनुभव कर चुके थे; अतः वे फिर इस प्रकार सोचने लगे— ॥२१॥

अथ वा चारुसर्वाङ्गी रक्षिता स्वेन तेजसा।

न नशिष्यति कल्याणी नाग्निरग्नौ प्रवर्तते॥२२॥

‘अथवा सम्भव है सर्वाङ्गसुन्दरी सीता अपने ही तेज से सुरक्षित हों। कल्याणी जनकनन्दिनी का नाश कदापि नहीं होगा; क्योंकि आग आग को नहीं जलाती है॥ २२॥

नहि धर्मात्मनस्तस्य भार्याममिततेजसः।

स्वचरित्राभिगुप्तां तां स्पष्टमर्हति पावकः॥२३॥

‘सीता अमित तेजस्वी धर्मात्मा भगवान् श्रीराम की पत्नी हैं। वे अपने चरित्र के बल से—पातिव्रत्य के प्रभाव से सुरक्षित हैं। आग उन्हें छू भी नहीं सकती। २३॥

नूनं रामप्रभावेण वैदेह्याः सुकृतेन च।

यन्मां दहनकायं नादहद्धव्यवाहनः॥२४॥

‘अवश्य श्रीराम के प्रभाव तथा विदेहनन्दिनी सीता के पुण्यबल से ही यह दाहक अग्नि मुझे नहीं जला सकी है॥२४॥

त्रयाणां भरतादीनां भ्रातॄणां देवता च या।

रामस्य च मनःकान्ता सा कथं विनशिष्यति॥२५॥

‘फिर जो भरत आदि तीनों भाइयों की आराध्य देवी और श्रीरामचन्द्रजी की हृदयवल्लभा हैं, वे आग से कैसे नष्ट हो सकेंगी॥२५॥

यद् वा दहनकर्मायं सर्वत्र प्रभुरव्ययः।

न मे दहति लाङ्गलं कथमार्यां प्रधक्ष्यति ॥२६॥

‘यह दाहक एवं अविनाशी अग्नि सर्वत्र अपना प्रभाव रखती है, सबको जला सकती है, तो भी यह जिनके प्रभाव से मेरी पूँछ को नहीं जला पाती है, उन्हीं साक्षात् माता जानकी को कैसे जला सकेगी?’ ॥ २६॥

पुनश्चाचिन्तयत् तत्र हनूमान् विस्मितस्तदा।

हिरण्यनाभस्य गिरे लमध्ये प्रदर्शनम्॥२७॥

उस समय हनुमान जी ने वहाँ विस्मित होकर पुनः उस घटना को स्मरण किया, जब कि समुद्र के जल में उन्हें मैनाक पर्वत का दर्शन हुआ था॥ २७॥

तपसा सत्यवाक्येन अनन्यत्वाच्च भर्तरि।

असौ विनिर्दहेदग्निं न तामग्निः प्रधक्ष्यति ॥२८॥

वे सोचने लगे—’तपस्या, सत्यभाषण तथा पति में अनन्य भक्ति के कारण आर्या सीता ही अग्नि को जला सकती हैं, आग उन्हें नहीं जला सकती’ ॥ २८॥

स तथा चिन्तयंस्तत्र देव्या धर्मपरिग्रहम्।

शुश्राव हनुमांस्तत्र चारणानां महात्मनाम्॥२९॥

इस प्रकार भगवती सीता की धर्मपरायणता का विचार करते हुए हनुमान जी ने वहाँ महात्मा चारणों के मुख से निकली हुई ये बातें सुनीं— ॥ २९॥

अहो खलु कृतं कर्म दुर्विगाहं हनूमता।

अग्निं विसृजता तीक्ष्णं भीमं राक्षससद्मनि॥३०॥

‘अहो! हनुमान जी ने राक्षसों के घरों में दुःसह एवं भयंकर आग लगाकर बड़ा ही अद्भुत और दुष्कर कार्य किया है॥

प्रपलायितरक्षःस्त्रीबालवृद्धसमाकुला।

जनकोलाहलाध्माता क्रन्दन्तीवाद्रिकन्दरैः॥३१॥

दग्धेयं नगरी लङ्का साट्टप्राकारतोरणा।

जानकी न च दग्धेति विस्मयोऽद्भुत एव नः॥

‘घर में से भागे हुए राक्षसों, स्त्रियों, बालकों और वृद्धों से भरी हुई सारी लङ्का जन-कोलाहल से परिपूर्ण हो चीत्कार करती हुई-सी जान पड़ती है। पर्वत की कन्दराओं, अटारियों, परकोटों और नगर के फाटकोंसहित यह सारी लङ्का नगरी दग्ध हो गयी; परंतु सीता पर आँच नहीं आयी। यह हमारे लिये बड़ी अद्भुत और आश्चर्य की बात है’ ॥ ३१-३२॥

इति शुश्राव हनुमान् वाचं ताममृतोपमाम्।

बभूव चास्य मनसो हर्षस्तत्कालसम्भवः॥३३॥

हनुमान जी ने जब चारणों के कहे हुए ये अमृत के समान मधुर वचन सुने, तब उनके हृदय में तत्काल हर्षोल्लास छा गया॥ ३३॥

स निमित्तैश्च दृष्टार्थैः कारणैश्च महागुणैः।

ऋषिवाक्यैश्च हनुमानभवत् प्रीतमानसः॥३४॥

अनेक बार के प्रत्यक्ष अनुभव किये हुए शुभ शकुनों, महान् गुणदायक कारणों तथा चारणों के कहे हुए पूर्वोक्त वचनों द्वारा सीताजी के जीवित होने का निश्चय करके हनुमान् जी के मन में बड़ी प्रसन्नता हुई॥३४॥

ततः कपिः प्राप्तमनोरथार्थस्तामक्षतां राजसुतां विदित्वा।

प्रत्यक्षतस्तां पुनरेव दृष्ट्वा प्रतिप्रयाणाय मतिं चकार ॥ ३५॥

राजकुमारी सीता को कोई क्षति नहीं पहुँची है, यह जानकर कपिवर हनुमान जी ने अपना सम्पूर्ण मनोरथ सफल समझा और पुनः उनका प्रत्यक्ष दर्शन करके लौट जाने का विचार किया॥ ३५ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे पञ्चपञ्चाशः सर्गः॥५५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में पचपनवाँ सर्ग पूरा हुआ।५५॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
सुन्दरकाण्डम्

हनुमान जी का पुनः सीताजी से मिलकर लौटना और समुद्र को लाँघना

षट्पञ्चाशः सर्गः

सर्ग-56


ततस्तु शिंशपामूले जानकी पर्यवस्थिताम्।

अभिवाद्याब्रवीद् दिष्ट्या पश्यामि त्वामिहाक्षताम्॥१॥

तदनन्तर हनुमान जी अशोक वृक्ष के नीचे बैठी हुई जानकीजी के पास गये और उन्हें प्रणाम करके बोले —’आर्ये! सौभाग्य की बात है कि इस समय मैं आपको सकुशल देख रहा हूँ’॥१॥

ततस्तं प्रस्थितं सीता वीक्षमाणा पुनः पुनः।

भर्तुः स्नेहान्विता वाक्यं हनूमन्तमभाषत॥२॥

सीता अपने पति के स्नेह में डूबी हुई थीं वे हनुमान् जी को प्रस्थान करने के लिये उद्यत जान उन्हें बारम्बार देखती हुई बोलीं- ॥२॥

यदि त्वं मन्यसे तात वसैकाहमिहानघ।

क्वचित् सुसंवृते देशे विश्रान्तः श्वो गमिष्यसि॥३॥

‘तात! निष्पाप वानरवीर! यदि तुम उचित समझो तो एक दिन और यहाँ किसी गुप्त स्थान में ठहर जाओ, आज विश्राम करके कल चले जाना॥३॥

मम चैवाल्पभाग्यायाः सांनिध्यात् तव वानर।

शोकस्यास्याप्रमेयस्य मुहूर्तं स्यादपि क्षयः॥४॥

‘वानरप्रवर! तुम्हारे निकट रहने से मुझ मन्दभागिनी का अपार शोक भी थोड़ी देर के लिये कम हो जायगा॥४॥

गते हि हरिशार्दूल पुनः सम्प्राप्तये त्वयि।

प्राणेष्वपि न विश्वासो मम वानरपुङ्गव॥५॥

‘कपिश्रेष्ठ! वानरशिरोमणे! जब तुम चले जाओगे, तब फिर तुम्हारे आने तक मेरे प्राण रहेंगे या नहीं, इसका कोई विश्वास नहीं है॥५॥

अदर्शनं च ते वीर भूयो मां दारयिष्यति।

दुःखाद् दुःखतरं प्राप्तां दुर्मनःशोककर्शिताम्॥६॥

‘वीर! मुझ पर दुःख-पर-दुःख पड़ते गये हैं। मैं मानसिक शोक से दिन-दिन दुर्बल होती जा रही हूँ। अब तुम्हारा दर्शन न होना मेरे हृदय को और भी विदीर्ण करता रहेगा॥६॥

अयं च वीर संदेहस्तिष्ठतीव ममाग्रतः।

सुमहत्सु सहायेषु हर्युक्षेषु महाबलः॥७॥

कथं नु खलु दुष्पारं संतरिष्यति सागरम्।

तानि हयृक्षसैन्यानि तौ वा नरवरात्मजौ॥८॥

‘वीर! मेरे सामने यह संदेह अभी तक बना ही हुआ है कि बड़े-बड़े वानरों और रीछों के सहायक होने पर भी महाबली सुग्रीव इस दुर्लङ्घय समुद्र को कैसे पार करेंगे? उनकी सेना के वे वानर और भालू तथा वे दोनों राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण भी इस महासागर को कैसे लाँघ सकेंगे?॥

त्रयाणामेव भूतानां सागरस्यापि लङ्घने।

शक्तिः स्याद् वैनतेयस्य तव वा मारुतस्य वा॥९॥

‘तीन ही प्राणियों में इस समुद्र को लाँघने की शक्ति है —तुम में, गरुड़ में अथवा वायु देवता में॥९॥

तदत्र कार्यनिर्बन्धे समुत्पन्ने दुरासदे।

किं पश्यसि समाधानं त्वं हि कार्यविशारदः॥१०॥

‘इस कार्यसम्बन्धी दुष्कर प्रतिबन्ध के उपस्थित होने पर तुम्हें क्या समाधान दिखायी देता है ? बताओ, क्योंकि तुम कार्यकुशल हो॥ १० ॥

काममस्य त्वमेवैकः कार्यस्य परिसाधने।

पर्याप्तः परवीरघ्न यशस्यस्ते फलोदयः॥११॥

‘शत्रुवीरों का संहार करने वाले कपिश्रेष्ठ! इसमें संदेह नहीं कि इस कार्य को सिद्ध करने में तुम अकेले ही पूर्ण समर्थ हो; परंतु तुम्हारे द्वारा जो विजयरूप फल की प्राप्ति होगी, उससे तुम्हारा ही यश बढ़ेगा, भगवान् श्रीराम का नहीं॥ ११॥

बलैस्तु संकुलां कृत्वा लङ्कां परबलार्दनः।

मां नयेद् यदि काकुत्स्थस्तत् तस्य सदृशं भवेत्॥१२॥

‘परंतु शत्रुसेना को पीड़ा देने वाले श्रीरामचन्द्रजी यदि लङ्का को अपनी सेना से पददलित करके मुझे यहाँ से ले चलें तो वह उनके योग्य पराक्रम होगा। १२॥

तद् यथा तस्य विक्रान्तमनुरूपं महात्मनः।

भवत्याहवशूरस्य तथा त्वमुपपादय॥१३॥

‘अतः तुम ऐसा उपाय करो, जिससे युद्धवीर महात्मा श्रीरामचन्द्रजी का उनके योग्य पराक्रम प्रकट हो’॥ १३॥

तदर्थोपहितं वाक्यं प्रश्रितं हेतुसंहितम्।

निशम्य हनुमान् वीरो वाक्यमुत्तरमब्रवीत्॥१४॥

सीताजी की यह बात स्नेहयुक्त तथा विशेष अभिप्राय से भरी हुई थी। इसे सुनकर वीर हनुमान् ने इस प्रकार उत्तर दिया— ॥१४॥

देवि हयृक्षसैन्यानामीश्वरः प्लवतां वरः।

सुग्रीवः सत्त्वसम्पन्नस्तवार्थे कृतनिश्चयः॥१५॥

‘देवि! वानर और भालुओं की सेनाओं के स्वामी कपिश्रेष्ठ सुग्रीव बड़े शक्तिशाली पुरुष हैं। वे तुम्हारे उद्धार के लिये प्रतिज्ञा कर चुके हैं॥ १५॥

स वानरसहस्राणां कोटीभिरभिसंवृतः।

क्षिप्रमेष्यति वैदेहि सुग्रीवः प्लवगाधिपः॥१६॥

‘विदेहनन्दिनि! अतः वे वानरराज सुग्रीव सहस्रों कोटि वानरों से घिरे हुए तुरंत यहाँ आयेंगे॥१६॥

तौ च वीरौ नरवरौ सहितौ रामलक्ष्मणौ।

आगम्य नगरी लङ्कां सायकैर्विधमिष्यतः॥१७॥

‘साथ ही वे दोनों वीर नरश्रेष्ठ श्रीराम और लक्ष्मण भी एक साथ आकर अपने सायकों से इस लङ्कापुरी का विध्वंस कर डालेंगे॥ १७॥

सगणं राक्षसं हत्वा नचिराद् रघुनन्दनः।

त्वामादाय वरारोहे स्वां पुरीं प्रति यास्यति॥१८॥

‘वरारोहे! राक्षसराज रावण को उसके सैनिकोंसहित काल के गालमें डालकर श्रीरघुनाथजी आपको साथ ले शीघ्र ही अपनी पुरी को पधारेंगे॥ १८॥

समाश्वसिहि भद्रं ते भव त्वं कालकाङ्किणी।

क्षिप्रं द्रक्ष्यसि रामेण निहतं रावणं रणे॥१९॥

‘इसलिये आप धैर्य धारण करें। आपका भला हो आप समय की प्रतीक्षा करें। रावण शीघ्र ही रणभूमि में श्रीराम के हाथ से मारा जायगा, यह आप अपनी आँखों देखेंगी॥

निहते राक्षसेन्द्रे च सपुत्रामात्यबान्धवे।

त्वं समेष्यसि रामेण शशाङ्केनेव रोहिणी॥२०॥

‘पुत्र, मन्त्री और भाई-बन्धुओंसहित राक्षसराज रावण के मारे जाने पर आप श्रीरामचन्द्रजी के साथ उसी प्रकार मिलेंगी, जैसे रोहिणी चन्द्रमा से मिलती है॥२०॥

क्षिप्रमेष्यति काकुत्स्थो हयृक्षप्रवरैर्युतः।

यस्ते युधि विजित्यारीञ्छोकं व्यपनयिष्यति॥२१॥

‘वानरों और भालुओं के प्रमुख वीरों के साथ श्रीरामचन्द्रजी शीघ्र ही यहाँ पधारेंगे और युद्ध में शत्रुओं को जीतकर आपका सारा शोक दूर कर देंगे’ ॥ २१॥

एवमाश्वास्य वैदेहीं हनूमान् मारुतात्मजः।

गमनाय मतिं कृत्वा वैदेहीमभ्यवादयत्॥२२॥

विदेहनन्दिनी सीता को इस प्रकार आश्वासन दे वहाँ से जाने का विचार करके पवनकुमार हनुमान् ने उन्हें प्रणाम किया॥२२॥

राक्षसान् प्रवरान् हत्वा नाम विश्राव्य चात्मनः।

समाश्वास्य च वैदेहीं दर्शयित्वा परं बलम्॥२३॥

नगरीमाकुलां कृत्वा वञ्चयित्वा च रावणम्।

दर्शयित्वा बलं घोरं वैदेहीमभिवाद्य च॥ २४॥

प्रतिगन्तुं मनश्चक्रे पुनर्मध्येन सागरम्।

वे बड़े-बड़े राक्षसों को मारकर अपने महान् बल का परिचय दे वहाँ ख्याति प्राप्त कर चुके थे। उन्होंने सीता को आश्वासन दे, लङ्कापुरी को व्याकुल करके, रावण को चकमा देकर, उसे अपना भयानक बल दिखा, वैदेही को प्रणाम करके पुनः समुद्र के बीच से होकर लौट जाने का विचार किया॥ २३-२४ १/२ ॥

ततः स कपिशार्दूलः स्वामिसंदर्शनोत्सुकः॥२५॥

आरुरोह गिरिश्रेष्ठमरिष्टमरिमर्दनः।

(अब यहाँ उनके लिये कोई कार्य बाकी नहीं रह गया था; अतः) अपने स्वामी श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन के लिये उत्सुक हो वे शत्रुमर्दन कपिश्रेष्ठ हनुमान् पर्वतों में उत्तम अरिष्टगिरि पर चढ़ गये॥ २५ १/२॥

तुङ्गपद्मकजुष्टाभिर्नीलाभिर्वनराजिभिः ॥२६॥

सोत्तरीयमिवाम्भोदैः शृङ्गान्तरविलम्बिभिः।

ऊँचे-ऊँचे पद्मकों-पद्म के समान वर्णवाले वृक्षों से सेवित नीली वनश्रेणियाँ मानो उस पर्वत का परिधान वस्त्र थीं। शिखरों पर लटके हुए श्याम मेघ उसके लिये उत्तरीय वस्त्र-(चादर-)से प्रतीत होते थे॥ २६ १/२॥

बोध्यमानमिव प्रीत्या दिवाकरकरैः शुभैः॥२७॥

उन्मिषन्तमिवोधूतैर्लोचनैरिव धातुभिः।

तोयौघनिःस्वनैर्मन्द्रैः प्राधीतमिव पर्वतम्॥२८॥

सूर्य की कल्याणमयी किरणें प्रेमपूर्वक उसे जगाती सी जान पड़ती थीं। नाना प्रकार के धातु मानो उसके खुले हुए नेत्र थे, जिनसे वह सब कुछ देखता हुआ सा स्थित था। पर्वतीय नदियों की जलराशि के गम्भीर घोष से ऐसा लगता था, मानो वह पर्वत सस्वर वेदपाठ कर रहा हो॥२७-२८॥

प्रगीतमिव विस्पष्टं नानाप्रस्रवणस्वनैः।

देवदारुभिरुचूतैरूव॑बाहुमिव स्थितम्॥ २९॥

अनेकानेक झरनों के कलकल नाद से वह अरिष्टगिरि स्पष्टतया गीत-सा गा रहा था। ऊँचे-ऊँचे देवदारुवृक्षों के कारण मानो हाथ ऊपर उठाये खड़ा था॥ २९॥

प्रपातजलनिर्घोषैः प्राक्रुष्टमिव सर्वतः।

वेपमानमिव श्यामैः कम्पमानैः शरदनैः॥३०॥

सब ओर जल-प्रपातों की गम्भीर ध्वनि से व्याप्त होने के कारण चिल्लाता या हल्ला मचाता-सा जान पड़ता था। झूमते हुए सरकंडों के श्याम वनों से वह काँपता-सा प्रतीत होता था॥३०॥

वेणुभिर्मारुतोद्धृतैः कूजन्तमिव कीचकैः।

निःश्वसन्तमिवामर्षाद घोरैराशीविषोत्तमैः॥३१॥

वायु के झोंके खाकर हिलते और मधुरध्वनि करते बाँसों से उपलक्षित होने वाला वह पर्वत मानो बाँसुरी बजा रहा था। भयानक विषधर सो के फुकार से लंबी साँस खींचता-सा जान पड़ता था॥ ३१॥

नीहारकृतगम्भीरैया॑यन्तमिव गह्वरैः।

मेघपादनिभैः पादैः प्रक्रान्तमिव सर्वतः॥३२॥

कुहरे के कारण गहरी प्रतीत होने वाली निश्चल गुफाओं द्वारा वह ध्यान-सा कर रहा था। उठते हुए मेघों के समान शोभा पाने वाले पार्श्ववर्ती पर्वतों द्वारा सब ओर विचरता-सा प्रतीत होता था॥ ३२ ॥

जृम्भमाणमिवाकाशे शिखरैरभ्रमालिभिः।

कूटैश्च बहुधा कीर्णं शोभितं बहुकन्दरैः॥३३॥

मेघमालाओं से अलंकृत शिखरों द्वारा वह आकाश में अंगड़ाई-सी ले रहा था। अनेकानेक शृङ्गों से व्याप्त तथा बहुत-सी कन्दराओं से सुशोभित था॥३३॥

सालतालैश्च कर्णैश्च वंशैश्च बहुभिर्वृतम्।

लतावितानैर्विततैः पुष्पवद्भिरलंकृतम्॥३४॥

साल, ताल, कर्ण और बहुसंख्यक बाँस के वृक्ष उसे सब ओर से घेरे हुए थे। फूलों के भारसे लदे और फैले हुए लता-वितान उस पर्वत के अलंकार थे॥ ३४॥

नानामृगगणैः कीर्णं धातुनिष्यन्दभूषितम्।

बहुप्रस्रवणोपेतं शिलासंचयसंकटम्॥३५॥

नाना प्रकार के पशु वहाँ सब ओर भरे हुए थे। विविध धातुओं के पिघलने से उसकी बड़ी शोभा हो रही थी। वह पर्वत बहुसंख्यक झरनों से विभूषित तथा राशि-राशि शिलाओं से भरा हुआ था॥ ३५॥

महर्षियक्षगन्धर्वकिंनरोरगसेवितम्।

लतापादपसम्बाधं सिंहाधिष्ठितकन्दरम्॥३६॥

महर्षि, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर और नागगण वहाँ निवास करते थे। लताओं और वृक्षों द्वारा वह सब ओर से आच्छादित था। उसकी कन्दराओं में सिंह दहाड़ रहे थे।

व्याघ्रादिभिः समाकीर्णं स्वादुमूलफलद्रुमम्।

आरुरोहानिलसुतः पर्वतं प्लवगोत्तमः॥ ३७॥

रामदर्शनशीघ्रण प्रहर्षेणाभिचोदितः।

व्याघ्र आदि हिंसक जन्तु भी वहाँ सब ओर फैले हुए थे। स्वादिष्ट फलों से लदे हुए वृक्ष और मधुर कन्द-मूल आदि की वहाँ बहुतायत थी। ऐसे रमणीय पर्वत पर वानरशिरोमणि पवनकुमार हनुमान जी श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन की शीघ्रता और अत्यन्त हर्ष से प्रेरित होकर चढ़ गये॥ ३७ १/२॥

तेन पादतलक्रान्ता रम्येषु गिरिसानुषु॥ ३८॥

सघोषाः समशीर्यन्त शिलाश्चूर्णीकृतास्ततः।

उस पर्वत के रमणीय शिखरों पर जो शिलाएँ थीं, वे उनके पैरों के आघात से भारी आवाज के साथ चूर-चूर होकर बिखर जाती थीं॥ ३८ १/२॥

स तमारुह्य शैलेन्द्रं व्यवर्धत महाकपिः॥३९॥

दक्षिणादुत्तरं पारं प्रार्थयँल्लवणाम्भसः।

उस शैलराज अरिष्ट पर आरूढ़ हो महाकपि हनुमान जी ने समुद्र के दक्षिण तट से उत्तर तटपर जाने की इच्छा से अपने शरीर को बहुत बड़ा बना लिया॥ ३९ १/२॥

अधिरुह्य ततो वीरः पर्वतं पवनात्मजः॥४०॥

ददर्श सागरं भीमं भीमोरगनिषेवितम्।

उस पर्वत पर आरूढ़ होने के पश्चात् वीरवर पवनकुमार ने भयानक साँसे सेवित उस भीषण महासागर की ओर दृष्टिपात किया॥ ४० १/२॥

स मारुत इवाकाशं मारुतस्यात्मसम्भवः॥४१॥

प्रपेदे हरिशार्दूलो दक्षिणादुत्तरां दिशम्।

वायुदेवता के औरस पुत्र कपिश्रेष्ठ हनुमान् जैसे वायु आकाश में तीव्रगति से प्रवाहित होती है, उसी प्रकार दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर बड़े वेग से (उछलकर) चले॥ ४१ १/२॥

स तदा पीडितस्तेन कपिना पर्वतोत्तमः॥४२॥

ररास विविधैर्भूतैः प्राविशद् वसुधातलम्।

कम्पमानैश्च शिखरैः पतद्भिरपि च द्रुमैः॥४३॥

हनुमान जी के पैरों का दबाव पड़ने के कारण उस श्रेष्ठ पर्वत से बड़ी भयंकर आवाज हुई और वह अपने काँपते हुए शिखरों, टूटकर गिरते हुए वृक्षों तथा भाँति-भाँति के प्राणियों सहित तत्काल धरती में धंस गया॥

तस्योरुवेगोन्मथिताः पादपाः पुष्पशालिनः।

निपेतुर्भूतले भग्नाः शक्रायुधहता इव॥४४॥

उनके महान् वेग से कम्पित हो फूलों से लदे हुए बहुसंख्यक वृक्ष इस प्रकार पृथ्वी पर गिर पड़े, मानो उन्हें वज्र मार गया हो॥४४॥

कन्दरोदरसंस्थानां पीडितानां महौजसाम्।

सिंहानां निनदो भीमो नभो भिन्दन् हि शुश्रुवे॥४५॥

उस समय उस पर्वत की कन्दराओं में रहकर दबे हुए महाबली सिंहों का भयंकर नाद आकाश को फाड़ता हुआ-सा सुनायी दे रहा था॥ ४५ ॥

त्रस्तव्याविद्धवसना व्याकुलीकृतभूषणाः।

विद्याधर्यः समुत्पेतुः सहसा धरणीधरात्॥४६॥

भयके कारण जिनके वस्त्र ढीले पड़ गये थे और आभूषण उलट-पलट गये थे, वे विद्याधरियाँ सहसा उस पर्वतसे ऊपरकी ओर उड़ चलीं॥ ४६॥

अतिप्रमाणा बलिनो दीप्तजिह्वा महाविषाः।

निपीडितशिरोग्रीवा व्यवेष्टन्त महाहयः॥४७॥

बड़े-बड़े आकार और चमकीली जीभवाले महाविषैले बलवान् सर्प अपने फन तथा गले को दबाकर कुण्डलाकार हो गये॥४७॥

किंनरोरगगन्धर्वयक्षविद्याधरास्तथा।

पीडितं तं नगवरं त्यक्त्वा गगनमास्थिताः॥४८॥

किन्नर, नाग, गन्धर्व, यक्ष और विद्याधर उस धंसते हुए पर्वत को छोड़कर आकाश में स्थित हो गये॥४८॥

स च भूमिधरः श्रीमान् बलिना तेन पीडितः।

सवृक्षशिखरोदनः प्रविवेश रसातलम्॥४९॥

बलवान् हनुमान जी के वेग से दबकर वह शोभाशाली महीधर वृक्षों और ऊँचे शिखरोंसहित रसातल में चला गया॥ ४९॥

दशयोजनविस्तारस्त्रिंशद्योजनमुच्छ्रितः।

धरण्यां समतां यातः स बभूव धराधरः॥५०॥

अरिष्ट पर्वत तीस योजन ऊँचा और दस योजन चौड़ा था। फिर भी उनके पैरों से दबकर भूमि के बराबर हो गया॥५०॥

स लिलयिषुर्भामं सलीलं लवणार्णवम्।

कल्लोलास्फालवेलान्तमुत्पपात नभो हरिः॥५१॥

जिसकी ऊँची-ऊँची तरङ्गे उठकर अपने किनारों का चुम्बन करती थीं, उस खारे पानी के भयानक समुद्र को लीलापूर्वक लाँघ जाने की इच्छा से हनुमान् जी आकाश में उड़ चले॥५१॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे षट्पञ्चाशः सर्गः ॥५६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में छप्पनवाँ सर्ग पूरा हुआ।५६॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
सुन्दरकाण्डम्

हनुमान जी का समद्र को लाँघकर जाम्बवान् और अङ्गद आदि सुहृदों से मिलना

सप्तपञ्चाशः सर्गः

सर्ग-57


आप्लुत्य च महावेगः पक्षवानिव पर्वतः।

भुजङ्गयक्षगन्धर्वप्रबुद्धकमलोत्पलम्॥१॥

स चन्द्रकुमुदं रम्यं सार्ककारण्डवं शुभम्।

तिष्यश्रवणकादम्बमभ्रशैवलशाद्रलम्॥२॥

पुनर्वसुमहामीनं लोहिताङ्गमहाग्रहम्।

ऐरावतमहाद्वीपं स्वातीहंसविलासितम्॥३॥

वातसंघातजालोमिचन्द्रांशुशिशिराम्बुमत्।

हनूमानपरिश्रान्तः पुप्लुवे गगनार्णवम्॥४॥

पङ्खधारी पर्वत के समान महान् वेगशाली हनुमान् जी बिना थके-माँदे उस सुन्दर एवं रमणीय आकाशरूपी समुद्र को पार करने लगे, जिसमें नाग, यक्ष और गन्धर्व खिले हुए कमल और उत्पल के समान थे। चन्द्रमा कुमुद और सूर्य जलकुक्कुट के समान थे। पुष्य और श्रवण नक्षत्र कलहंस तथा बादल सेवार और घास के तुल्य थे। पुनर्वसु विशाल मत्स्य और मंगल बड़े भारी ग्राह के सदृश थे। ऐरावत हाथी वहाँ महान् द्वीप-सा प्रतीत होता था। वह आकाशरूपी समुद्र स्वाती रूपी हंस के विलास से सुशोभित था तथा वायुसमूहरूप तरङ्गों और चन्द्रमा की किरणरूप शीतल जल से भरा हुआ था॥१ –४॥

ग्रसमान इवाकाशं ताराधिपमिवोल्लिखन्।

हरन्निव सनक्षत्रं गगनं सार्कमण्डलम्॥५॥

अपारमपरिश्रान्तश्चाम्बुधिं समगाहत।

हनूमान् मेघजालानि विकर्षन्निव गच्छति॥६॥

हनुमान जी आकाश को अपना ग्रास बनाते हुए, चन्द्रमण्डल को नखों से खरोंचते हुए, नक्षत्रों तथा सूर्यमण्डलसहित अन्तरिक्ष को समेटते हुए और बादलों के समूह को खींचते हुए-से अनायास ही अपार महासागर के पार चले जा रहे थे॥५-६॥

पाण्डुरारुणवर्णानि नीलमाञ्जिष्ठकानि च।

हरितारुणवर्णानि महाभ्राणि चकाशिरे॥७॥

उस समय आसमान में सफेद, लाल, नीले, मंजीठ के रंगके, हरे और अरुण वर्ण के बड़े-बड़े मेघ शोभा पा रहे थे॥७॥

प्रविशन्नभ्रजालानि निष्क्रमंश्च पुनः पुनः।

प्रकाशश्चाप्रकाशश्च चन्द्रमा इव दृश्यते॥८॥

वे कभी उन मेघ-समूहों में प्रवेश करते और कभी बाहर निकलते थे। बारम्बार ऐसा करते हुए हनुमान् जी छिपते और प्रकाशित होते हुए चन्द्रमा के समान दृष्टिगोचर हो रहे थे॥८॥

विविधाभ्रघनापन्नगोचरो धवलाम्बरः।

दृश्यादृश्यतनुर्वीरस्तथा चन्द्रायतेऽम्बरे॥९॥

नाना प्रकार के मेघों की घटाओं के भीतर होकर जाते हुए धवलाम्बरधारी वीरवर हनुमान जी का शरीर कभी दीखता था और कभी अदृश्य हो जाता था; अतः वे आकाश में बादलों की आड़ में छिपते और प्रकाशित होते चन्द्रमा के समान जान पड़ते थे॥९॥

ताायमाणो गगने स बभौ वायुनन्दनः।

दारयन् मेघवृन्दानि निष्पतंश्च पुनः पुनः॥१०॥

बारम्बार मेघ-समूहों को विदीर्ण करने और उनमें होकर निकलने के कारण वे पवनकुमार हनुमान् आकाश में गरुड़ के समान प्रतीत होते थे॥ १० ॥

नदन् नादेन महता मेघस्वनमहास्वनः।

प्रवरान् राक्षसान् हत्वा नाम विश्राव्य चात्मनः॥११॥

आकुलां नगरीं कृत्वा व्यथयित्वा च रावणम्।

अर्दयित्वा महावीरान् वैदेहीमभिवाद्य च॥१२॥

आजगाम महातेजाः पुनर्मध्येन सागरम्।

इस प्रकार महातेजस्वी हनुमान् अपने महान् सिंहनाद से मेघों की गम्भीर गर्जना को भी मात करते हुए आगे बढ़ रहे थे। वे प्रमुख राक्षसों को मारकर अपना नाम प्रसिद्ध कर चुके थे। बड़े-बड़े वीरों को रौंदकर उन्होंने लङ्कानगरी को व्याकुल तथा रावण को व्यथित कर दिया था। तत्पश्चात् विदेहनन्दिनी सीता को नमस्कार करके वे चले और तीव्र गति से पुनः समुद्र के मध्यभाग में आ पहुँचे॥ ११-१२ १/२॥

पर्वतेन्द्रं सुनाभं च समुपस्पृश्य वीर्यवान्॥१३॥

ज्यामुक्त इव नाराचो महावेगोऽभ्युपागमत्।

वहाँ पर्वतराज सुनाभ (मैनाक)-का स्पर्श करके वे पराक्रमी एवं महान् वेगशाली वानरवीर धनुष से छूटे हुए बाण की भाँति आगे बढ़ गये॥ १३ १/२ ॥

स किंचिदारात् सम्प्राप्तः समालोक्य महागिरिम्॥१४॥

महेन्द्रं मेघसंकाशं ननाद स महाकपिः।

उत्तर तट के कुछ निकट पहुँचने पर महागिरि महेन्द्र पर दृष्टि पड़ते ही उन महाकपि ने मेघ के समान बड़े जोर से गर्जना की॥ १४ १/२॥

स पूरयामास कपिर्दिशो दश समन्ततः॥१५॥

नदन् नादेन महता मेघस्वनमहास्वनः।

उस समय मेघ की भाँति गम्भीर स्वर से बड़ी भारी गर्जना करके उन वानरवीर ने सब ओर से दसों दिशाओं को कोलाहलपूर्ण कर दिया॥ १५ १/२॥

स तं देशमनुप्राप्तः सुहृद्दर्शनलालसः॥१६॥

ननाद सुमहानादं लागलं चाप्यकम्पयत्।

फिर वे अपने मित्रों को देखने के लिये उत्सुक होकर उनके विश्रामस्थान की ओर बढ़े और पूँछ हिलाने एवं जोर-जोर से सिंहनाद करने लगे॥ १६ १/२॥

तस्य नानद्यमानस्य सुपर्णाचरिते पथि॥१७॥

फलतीवास्य घोषेण गगनं सार्कमण्डलम्।

जहाँ गरुड़ चलते हैं, उसी मार्ग पर बारम्बार सिंहनाद करते हुए हनुमान जी के गम्भीर घोष से सूर्यमण्डलसहित आकाश मानो फटा जा रहा था। १७ १/२॥

ये तु तत्रोत्तरे कूले समुद्रस्य महाबलाः॥१८॥

पूर्वं संविष्ठिताः शूरा वायुपुत्रदिदृक्षवः।

महतो वायुनुन्नस्य तोयदस्येव निःस्वनम्।

शुश्रुवुस्ते तदा घोषमूरुवेगं हनूमतः॥१९॥

उस समय वायुपुत्र हनुमान् के दर्शन की इच्छा से जो शूरवीर महाबली वानर समुद्र के उत्तर तट पर पहले से ही बैठे थे, उन्होंने वायु से टकराये हुए महान् मेघ की गर्जना के समान हनुमान जी का जोर-जोर से सिंहनाद सुना॥ १८-१९॥

ते दीनमनसः सर्वे शुश्रुवुः काननौकसः।

वानरेन्द्रस्य निर्घोषं पर्जन्यनिनदोपमम्॥२०॥

अनिष्ट की आशङ्का से जिनके मन में दीनता छा गयी थी, उन समस्त वनवासी वानरों ने उन वानरश्रेष्ठ हनुमान् का मेघ-गर्जना के समान सिंहनाद सुना। २०॥

निशम्य नदतो नादं वानरास्ते समन्ततः।

बभूवुरुत्सुकाः सर्वे सुहृद्दर्शनकाङ्क्षिणः॥२१॥

गर्जते हुए पवनकुमार का वह सिंहनाद सुनकर सब ओर बैठे हुए वे समस्त वानर अपने सुहृद् हनुमान् जी को देखने की अभिलाषा से उत्कण्ठित हो गये॥ २१॥

जाम्बवान् स हरिश्रेष्ठः प्रीतिसंहृष्टमानसः।

उपामन्त्र्य हरीन् सर्वानिदं वचनमब्रवीत्॥२२॥

वानर-भालुओं में श्रेष्ठ जाम्बवान् के मन में बड़ी प्रसन्नता हुई। वे हर्षसे खिल उठे और सब वानरों को निकट बुलाकर इस प्रकार बोले- ॥ २२॥

सर्वथा कृतकार्योऽसौ हनूमान् नात्र संशयः।

न ह्यस्याकृतकार्यस्य नाद एवंविधो भवेत्॥२३॥

‘इसमें संदेह नहीं कि हनुमान जी सब प्रकार से अपना कार्य सिद्ध करके आ रहे हैं। कृतकार्य हुए बिना इनकी ऐसी गर्जना नहीं हो सकती॥ २३॥

तस्य बाहूरुवेगं च निनादं च महात्मनः।

निशम्य हरयो हृष्टाः समुत्पेतुर्यतस्ततः॥२४॥

महात्मा हनुमान जी की भुजाओं और जाँघों का महान् वेग देख तथा उनका सिंहनाद सुन सभी वानर हर्ष में भरकर इधर-उधर उछलने-कूदने लगे॥ २४ ॥

ते नगाग्रान्नगाग्राणि शिखराच्छिखराणि च।

प्रहृष्टाः समपद्यन्त हनूमन्तं दिदृक्षवः॥२५॥

हनुमान जी को देखने की इच्छा से वे प्रसन्नतापूर्वक एक वृक्ष से दूसरे वृक्षों पर तथा एक शिखर से दूसरे शिखरों पर चढ़ने लगे॥ २५ ॥

ते प्रीताः पादपाग्रेषु गृह्य शाखामवस्थिताः।

वासांसि च प्रकाशानि समाविध्यन्त वानराः॥२६॥

वृक्षों की सबसे ऊँची शाखापर खड़े होकर वे प्रीतियुक्त वानर अपने स्पष्ट दिखायी देने वाले वस्त्र हिलाने लगे॥ २६॥

गिरिगह्वरसंलीनो यथा गर्जति मारुतः।

एवं जगर्ज बलवान् हनूमान् मारुतात्मजः॥२७॥

जैसे पर्वत की गुफाओं में अवरुद्ध हुई वायु बड़े जोर से शब्द करती है, उसी प्रकार बलवान् पवनकुमार हनुमान् ने गर्जना की॥ २७॥

तमभ्रघनसंकाशमापतन्तं महाकपिम्।

दृष्ट्वा ते वानराः सर्वे तस्थुः प्राञ्जलयस्तदा॥२८॥

मेघों की घटा के समान पास आते हुए महाकपि हनुमान् को देखकर वे सब वानर उस समय हाथ जोड़कर खड़े हो गये॥ २८॥

ततस्तु वेगवान् वीरो गिरेर्गिरिनिभः कपिः।

निपपात गिरेस्तस्य शिखरे पादपाकुले॥२९॥

तत्पश्चात् पर्वतके समान विशाल शरीरवाले वेगशाली वीर वानर हनुमान् जो अरिष्ट पर्वतसे उछलकर चले थे, वृक्षोंसे भरे हुए महेन्द्र गिरिके शिखरपर कूद पड़े।

हर्षेणापूर्यमाणोऽसौ रम्ये पर्वतनिर्झरे।

छिन्नपक्ष इवाकाशात् पपात धरणीधरः॥३०॥

हर्ष से भरे हुए हनुमान जी पर्वत के रमणीय झरने के निकट पंख कटे हुए पर्वत के समान आकाश से नीचे आ गये॥ ३०॥

ततस्ते प्रीतमनसः सर्वे वानरपुङ्गवाः।

हनूमन्तं महात्मानं परिवार्योपतस्थिरे॥३१॥

उस समय वे सभी श्रेष्ठ वानर प्रसन्नचित्त हो महात्मा हनुमान जी को चारों ओर से घेरकर खड़े हो गये॥३१॥

परिवार्य च ते सर्वे परां प्रीतिमुपागताः।

प्रहृष्टवदनाः सर्वे तमागतमुपागमन्॥३२॥

उपायनानि चादाय मूलानि च फलानि च।

प्रत्यर्चयन् हरिश्रेष्ठं हरयो मारुतात्मजम्॥३३॥

उन्हें घेरकर खड़े होने से उन सबको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे सब वानर प्रसन्नमुख होकर तुरंत के आये हुए पवनकुमार कपिश्रेष्ठ हनुमान् के पास भाँति-भाँति की भेंट-सामग्री तथा फल-मूल लेकर आये और उनका स्वागत-सत्कार करने लगे। ३२-३३॥

विनेदुर्मुदिताः केचित् केचित् किलकिलां तथा।

हृष्टाः पादपशाखाश्च आनिन्युर्वानरर्षभाः॥३४॥

कोई आनन्दमग्न होकर गर्जने लगे, कोई किलकारियाँ भरने लगे और कितने ही श्रेष्ठ वानर हर्ष से भरकर हनुमान जी के बैठने के लिये वृक्षों की शाखाएँ तोड़ लाये॥

हनूमांस्तु गुरून् वृद्धाञ्जाम्बवत्प्रमुखांस्तदा।

कुमारमङ्गदं चैव सोऽवन्दत महाकपिः॥ ३५॥

महाकपि हनुमान जी ने जाम्बवान् आदि वृद्ध गुरुजनों तथा कुमार अङ्गद को प्रणाम किया॥ ३५ ॥ स

ताभ्यां पूजितः पूज्यः कपिभिश्च प्रसादितः।

दृष्टा देवीति विक्रान्तः संक्षेपेण न्यवेदयत्॥३६॥

फिर जाम्बवान् और अङ्गद ने भी आदरणीय हनुमान जी का आदर-सत्कार किया तथा दूसरे-दूसरे वानरों ने भी उनका सम्मान करके उनको संतुष्ट किया। तत्पश्चात् उन पराक्रमी वानरवीर ने संक्षेप में निवेदन किया—’मुझे सीतादेवी का दर्शन हो गया। ३६॥

निषसाद च हस्तेन गृहीत्वा वालिनः सुतम्।

रमणीये वनोद्देशे महेन्द्रस्य गिरेस्तदा ॥ ३७॥

हनूमानब्रवीत् पृष्टस्तदा तान् वानरर्षभान्।

अशोकवनिकासंस्था दृष्टा सा जनकात्मजा॥३८॥

तदनन्तर वालिकुमार अङ्गद का हाथ अपने हाथ में लेकर हनुमान् जी महेन्द्रगिरि के रमणीय वनप्रान्त में जा बैठे और सबके पूछने पर उन वानरशिरोमणियों से इस प्रकार बोले- ‘जनकनन्दिनी सीता लङ्का के अशोकवन में निवास करती हैं। वहीं मैंने उनका दर्शन किया है’।

रक्ष्यमाणा सुघोराभी राक्षसीभिरनिन्दिता।

एकवेणीधरा बाला रामदर्शनलालसा॥३९॥

उपवासपरिश्रान्ता मलिना जटिला कृशा।

‘अत्यन्त भयंकर आकारवाली राक्षसियाँ उनकी रखवाली करती हैं। साध्वी सीता बड़ी भोली-भाली हैं। वे एक वेणी धारण किये वहाँ रहती हैं और श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन के लिये बहुत ही उत्सुक हैं। उपवास के कारण बहुत थक गयी हैं, दुर्बल और मलिन हो रही हैं तथा उनके केश जटा के रूप में परिणत हो गये हैं’॥ ३९ १/२॥

ततो दृष्टेति वचनं महार्थममृतोपमम्॥४०॥

निशम्य मारुतेः सर्वे मुदिता वानराभवन्।

उस समय ‘सीता का दर्शन हो गया’ यह वचन वानरों को अमृत के समान प्रतीत हुआ। यह उनके महान् प्रयोजन की सिद्धि का सूचक था। हनुमान् जी के मुख से यह शुभ संवाद सुनकर सब वानर बड़े प्रसन्न हुए॥

क्ष्वेडन्त्यन्ये नदन्त्यन्ये गर्जन्त्यन्ये महाबलाः॥४१॥

चक्रुः किलकिलामन्ये प्रतिगर्जन्ति चापरे।

कोई हर्षनाद और कोई सिंहनाद करने लगे। दूसरे महाबली वानर गर्जने लगे। कितने ही किलकारियाँ भरने लगे और दूसरे वानर एक की गर्जना के उत्तर में स्वयं भी गर्जना करने लगे॥ ४१ १/२॥

केचिदुच्छ्रितलाङ्गलाः प्रहृष्टाः कपिकुञ्जराः॥४२॥

आयताञ्चितदीर्घाणि लाङ्गलानि प्रविव्यधुः।

बहुत-से कपिकुञ्जर हर्ष से उल्लसित हो अपनी पूँछ ऊपर उठाकर नाचने लगे। कितने ही अपनी लम्बी और मोटी पूँछे घुमाने या हिलाने लगे॥ ४२ १/२॥

अपरे तु हनूमन्तं श्रीमन्तं वानरोत्तमम्॥४३॥

आप्लुत्य गिरिशृङ्गेषु संस्पृशन्ति स्म हर्षिताः।

कितने ही वानर हर्षोल्लास से भरकर छलाँगे भरते हुए पर्वत-शिखरों पर वानरशिरोमणि श्रीमान् हनुमान् को छूने लगे॥ ४३ १/२ ॥

उक्तवाक्यं हनूमन्तमङ्गदस्तु तदाब्रवीत्॥४४॥

सर्वेषां हरिवीराणां मध्ये वाचमनुत्तमाम्।

हनुमान जी की उपर्युक्त बात सुनकर अङ्गद ने उस समय समस्त वानरवीरों के बीच में यह परम उत्तम बात कही-|| ४४ १/२॥

सत्त्वे वीर्ये न ते कश्चित् समो वानर विद्यते॥४५॥

यदवप्लुत्य विस्तीर्णं सागरं पुनरागतः।

‘वानरश्रेष्ठ! बल और पराक्रम में तुम्हारे समान कोई नहीं है; क्योंकि तुम इस विशाल समुद्र को लाँघकर फिर इस पार लौट आये॥ ४५ १/२॥

जीवितस्य प्रदाता नस्त्वमेको वानरोत्तम॥४६॥

त्वत्प्रसादात् समेष्यामः सिद्धार्था राघवेण ह।

‘कपिशिरोमणे! एकमात्र तुम्हीं हमलोगों के जीवनदाता हो। तुम्हारे प्रसाद से ही हम सब लोग सफलमनोरथ होकर श्रीरामचन्द्रजी से मिलेंगे॥ ४६ १/२॥

अहो स्वामिनि ते भक्तिरहो वीर्यमहो धृतिः॥४७॥

दिष्ट्या दृष्टा त्वया देवी रामपत्नी यशस्विनी।

दिष्ट्या त्यक्ष्यति काकुत्स्थः शोकं सीतावियोगजम्॥४८॥

‘अपने स्वामी श्रीरघुनाथजी के प्रति तुम्हारी भक्ति अद्भुत है। तुम्हारा पराक्रम और धैर्य भी आश्चर्यजनक है। बड़े सौभाग्य की बात है कि तुम श्रीरामचन्द्रजी की यशस्विनी पत्नी सीतादेवी का दर्शन कर आये, अब भगवान् श्रीराम सीता के वियोग से उत्पन्न हुए शोक को त्याग देंगे, यह भी सौभाग्य का ही विषय है’ ॥ ४७-४८॥

ततोऽङ्गदं हनूमन्तं जाम्बवन्तं च वानराः।

परिवार्य प्रमुदिता भेजिरे विपुलाः शिलाः॥४९॥

उपविष्टा गिरेस्तस्य शिलासु विपुलासु ते।

श्रोतुकामाः समुद्रस्य लङ्घनं वानरोत्तमाः॥५०॥

दर्शनं चापि लङ्कायाः सीताया रावणस्य च।

तस्थुः प्राञ्जलयः सर्वे हनूमददनोन्मुखाः॥५१॥

तत्पश्चात् सभी श्रेष्ठ वानर समुद्रलङ्घन, लङ्का,रावण एवं सीता के दर्शन का समाचार सुनने के लिये एकत्र हुए तथा अङ्गद, हनुमान् और जाम्बवान् को चारों ओर से घेरकर पर्वत की बड़ी-बड़ी शिलाओं पर आनन्दपूर्वक बैठ गये। वे सब-के-सब हाथ जोड़े हुए थे और उन सबकी आँखें हनुमान् जी के मुख पर लगी थीं॥ ४९-५१॥

तस्थौ तत्राङ्गदः श्रीमान् वानरैर्बहुभिर्वृतः।

उपास्यमानो विबुधैर्दिवि देवपतिर्यथा॥५२॥

जैसे देवराज इन्द्र स्वर्ग में देवताओं द्वारा सेवित होकर बैठते हैं, उसी प्रकार बहुतेरे वानरों से घिरे हुए श्रीमान् अङ्गद वहाँ बीच में विराजमान हुए॥५२॥

हनूमता कीर्तिमता यशस्विना तथाङ्गदेनाङ्गदनद्धबाहुना।

मुदा तदाध्यासितमुन्नतं महन्महीधराग्रं ज्वलितं श्रियाभवत्॥५३॥

कीर्तिमान् एवं यशस्वी हनुमान जी तथा बाँहों में भुजबंद धारण किये अङ्गद के प्रसन्नतापूर्वक बैठने से वह ऊँचा एवं महान् पर्वतशिखर दिव्य कान्ति से प्रकाशित हो उठा॥ ५३॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे सप्तपञ्चाशः सर्गः॥५७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में सत्तावनवाँ सर्ग पूरा हुआ।५७॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
सुन्दरकाण्डम्

जाम्बवान् के पूछने पर हनुमान जी का अपनी लङ्का यात्रा का सारा वृत्तान्त सुनाना

अष्टपञ्चाशः सर्गः

सर्ग-58


ततस्तस्य गिरेः शृङ्गे महेन्द्रस्य महाबलाः।

हनुमत्प्रमुखाः प्रीतिं हरयो जग्मुरुत्तमाम्॥१॥

तदनन्तर हनुमान् आदि महाबली वानर महेन्द्रगिरि के शिखर पर परस्पर मिलकर बड़े प्रसन्न हुए॥१॥

प्रीतिमत्सूपविष्टेषु वानरेषु महात्मसु।

तं ततः प्रतिसंहृष्टः प्रीतियुक्तं महाकपिम्॥२॥

जाम्बवान् कार्यवृत्तान्तमपृच्छदनिलात्मजम्।

कथं दृष्टा त्वया देवी कथं वा तत्र वर्तते॥३॥

तस्यां चापि कथं वृत्तः क्रूरकर्मा दशाननः।

तत्त्वतः सर्वमेतन्नः प्रब्रूहि त्वं महाकपे॥४॥

जब सभी महामनस्वी वानर वहाँ प्रसन्नतापूर्वक बैठ गये, तब हर्ष में भरे हुए जाम्बवान् ने उन पवनकुमार महाकपि हनुमान् से प्रेमपूर्वक कार्यसिद्धि का समाचार पूछा—’महाकपे! तुमने देवी सीता को कैसे देखा? वे वहाँ किस प्रकार रहती हैं? और क्रूरकर्मा दशानन उनके प्रति कैसा बर्ताव करता है? ये सब बातें तुम हमें ठीक-ठीक बताओ॥ २–४॥

सम्मानिता कथं देवी किं च सा प्रत्यभाषत।

श्रुतार्थाश्चिन्तयिष्यामो भूयः कार्यविनिश्चयम्॥

‘तुमने देवी सीता को किस प्रकार ढूँढ निकाला और उन्होंने तुमसे क्या कहा? इन सब बातों को सुनकर हमलोग आगे के कार्यक्रम का निश्चित रूप से विचार करेंगे॥

यश्चार्थस्तत्र वक्तव्यो गतैरस्माभिरात्मवान्।

रक्षितव्यं च यत्तत्र तद् भवान् व्याकरोतु नः॥

‘वहाँ किष्किन्धा में चलने पर हमलोगों को कौन-सी बात कहनी चाहिये और किस बात को गुप्त रखना चाहिये? तुम बुद्धिमान् हो, इसलिये तुम्हीं इन सब बातों पर प्रकाश डालो’॥ ६॥

स नियुक्तस्ततस्तेन सम्प्रहृष्टतनूरुहः।

नमस्यन शिरसा देव्यै सीतायै प्रत्यभाषत॥७॥

जाम्बवान् के इस प्रकार पूछने पर हनुमान जी के शरीर में रोमाञ्च हो आया। उन्होंने सीतादेवी को मनही-मन मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और इस प्रकार कहा- ॥७॥

प्रत्यक्षमेव भवतां महेन्द्राग्रात् खमाप्लुतः।

उदधेर्दक्षिणं पारं काङ्खमाणः समाहितः॥८॥

‘मैं आपलोगों के सामने ही समुद्र के दक्षिण तट पर जाने की इच्छा से सावधान हो महेन्द्रपर्वत के शिखर से आकाश में उछला था॥ ८॥

गच्छतश्च हि मे घोरं विघ्नरूपमिवाभवत्।

काञ्चनं शिखरं दिव्यं पश्यामि सुमनोहरम्॥९॥

स्थितं पन्थानमावृत्य मेने विघ्नं च तं नगम्।

‘आगे बढ़ते ही मैंने देखा एक परम मनोहर दिव्य सुवर्णमय शिखर प्रकट हुआ है, जो मेरी राह रोककर खड़ा है। वह मेरी यात्रा के लिये भयानक विघ्न-सा प्रतीत हुआ। मैंने उसे मूर्तिमान् विघ्न ही माना॥ ९ १/२॥

उपसंगम्य तं दिव्यं काञ्चनं नगमुत्तमम्॥१०॥

कृता मे मनसा बुद्धिर्भेत्तव्योऽयं मयेति च।

‘उस दिव्य उत्तम सुवर्णमय पर्वत के निकट पहुँचने पर मैंने मन-ही-मन यह विचार किया कि मैं इसे विदीर्ण कर डालूँ॥ १० १/२॥

प्रहतस्य मया तस्य लाङ्गलेन महागिरेः॥११॥

शिखरं सूर्यसंकाशं व्यशीर्यत सहस्रधा।

‘फिर तो मैंने अपनी पूँछ से उसपर प्रहार किया। उसकी टक्कर लगते ही उस महान् पर्वत के सूर्यतुल्य तेजस्वी शिखर के सहस्रों टुकड़े हो गये॥ ११ १/२॥

व्यवसायं च तं बुद्ध्वा स होवाच महागिरिः॥१२॥

पुत्रेति मधुरां वाणीं मनः प्रह्लादयन्निव।

पितृव्यं चापि मां विद्धि सखायं मातरिश्वनः॥

‘मेरे उस निश्चय को समझकर महागिरि मैनाक ने मन को आह्लादित-सा करते हुए मधुर वाणी में ‘पुत्र’ कहकर मुझे पुकारा और कहा—’मुझे अपना चाचा समझो। मैं तुम्हारे पिता वायुदेवता का मित्र हूँ॥ १२-१३॥

मैनाकमिति विख्यातं निवसन्तं महोदधौ।

पक्षवन्तः पुरा पुत्र बभूवुः पर्वतोत्तमाः॥१४॥

‘मेरा नाम मैनाक है और मैं यहाँ महासागर में निवास करता हूँ। बेटा! पूर्वकाल में सभी श्रेष्ठ पर्वत पङ्खधारी हुआ करते थे॥१४॥

छन्दतः पृथिवीं चेरुर्बाधमानाः समन्ततः।

श्रुत्वा नगानां चरितं महेन्द्रः पाकशासनः॥१५॥

वज्रेण भगवान् पक्षौ चिच्छेदैषां सहस्रशः।

अहं तु मोचितस्तस्मात् तव पित्रा महात्मना।१६॥

‘वे समस्त प्रजा को पीड़ा देते हुए अपनी इच्छा के अनुसार सब ओर विचरते रहते थे। पर्वतों का ऐसा आचरण सुनकर पाकशासन भगवान् इन्द्र ने वज्र से इन सहस्रों पर्वतों के पङ काट डाले; परंतु उस समय तुम्हारे महात्मा पिता ने मुझे इन्द्र के हाथ से बचा लिया॥१५-१६॥

मारुतेन तदा वत्स प्रक्षिप्तो वरुणालये।

राघवस्य मया साह्ये वर्तितव्यमरिंदम॥१७॥

रामो धर्मभृतां श्रेष्ठो महेन्द्रसमविक्रमः।

‘बेटा ! उस समय वायुदेवता ने मुझे समुद्र में लाकर डाल दिया था (जिससे मेरे पङ्ख बच गये); अतः शत्रुदमन वीर! मुझे श्रीरघुनाथजी की सहायता के कार्य में अवश्य तत्पर होना चाहिये; क्योंकि भगवान् श्रीराम धर्मात्माओं में श्रेष्ठ तथा इन्द्रतुल्य पराक्रमी हैं’। १७ १/२॥

एतच्छ्रुत्वा मया तस्य मैनाकस्य महात्मनः॥१८॥

कार्यमावेद्य च गिरेरुद्धतं वै मनो मम।

तेन चाहमनुज्ञातो मैनाकेन महात्मना॥१९॥

‘महामना मैनाक की यह बात सुनकर मैंने अपना कार्य उन्हें बताया और उनकी आज्ञा लेकर फिर मेरा मन वहाँ से आगे जाने को उत्साहित हुआ। महाकाय मैनाक ने उस समय मुझे जाने की आज्ञा दे दी। १८-१९॥

स चाप्यन्तर्हितः शैलो मानुषेण वपुष्मता।

शरीरेण महाशैलः शैलेन च महोदधौ॥२०॥

‘वह महान् पर्वत भी अपने मानवशरीर से तो अन्तर्हित हो गया; परंतु पर्वतरूप से महासागर में ही स्थित रहा ॥ २०॥

उत्तमं जवमास्थाय शेषमध्वानमास्थितः।

ततोऽहं सुचिरं कालं जवेनाभ्यगमं पथि॥२१॥

‘फिर मैं उत्तम वेग का आश्रय ले शेष मार्ग पर आगे बढ़ा और दीर्घकालतक बड़े वेग से उस पथ पर चलता रहा॥ २१॥

ततः पश्याम्यहं देवीं सुरसां नागमातरम्।

समुद्रमध्ये सा देवी वचनं चेदमब्रवीत्॥ २२॥

‘तत्पश्चात् बीच समुद्र में मुझे नागमाता सुरसादेवी का दर्शन हुआ। देवी सुरसा मुझसे इस प्रकार बोलीं-॥

मम भक्ष्यः प्रदिष्टस्त्वममरैर्हरिसत्तम।

ततस्त्वां भक्षयिष्यामि विहितस्त्वं हि मे सुरैः॥२३॥

‘कपिश्रेष्ठ! देवताओं ने तुम्हें मेरा भक्ष्य बताया है, इसलिये मैं तुम्हारा भक्षण करूँगी; क्योंकि सारे देवताओंने आज तुम्हें ही मेरा आहार नियत किया है’ ॥२३॥

एवमुक्तः सुरसया प्राञ्जलिः प्रणतः स्थितः।

विवर्णवदनो भूत्वा वाक्यं चेदमुदीरयम्॥२४॥

‘सुरसा के ऐसा कहने पर मैं हाथ जोड़कर विनीतभाव से उसके सामने खड़ा हो गया और उदास मुख होकर यों बोला— ॥२४॥

रामो दाशरथिः श्रीमान् प्रविष्टो दण्डकावनम्।

लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा सीतया च परंतपः॥२५॥

‘देवि! शत्रुओं को संताप देने वाले दशरथनन्दन श्रीमान् राम अपने भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता के साथ दण्डकारण्य में आये थे॥२५॥

तस्य सीता हृता भार्या रावणेन दुरात्मना।

तस्याः सकाशं दूतोऽहं गमिष्ये रामशासनात्॥२६॥

‘वहाँ दुरात्मा रावण ने उनकी पत्नी सीता को हर लिया। मैं इस समय श्रीरामचन्द्रजी की आज्ञा से दूत होकर उन्हीं सीतादेवी के पास जा रहा हूँ॥२६॥

कर्तुमर्हसि रामस्य साहाय्यं विषये सती।

अथवा मैथिलीं दृष्ट्वा रामं चाक्लिष्टकारिणम्॥२७॥

आगमिष्यामि ते वक्त्रं सत्यं प्रतिशृणोमि ते।

‘तुम भी श्रीरामचन्द्रजी के ही राज्य में रहती हो, इसलिये तुम्हें उनकी सहायता करनी चाहिये। अथवा मैं मिथिलेशकुमारी सीता तथा अनायास ही महान् कर्म करने वाले श्रीरामचन्द्रजी का दर्शन करके तुम्हारे मुख में आ जाऊँगा, यह तुमसे सच्ची प्रतिज्ञा करके कहता हूँ’॥ २७ १/२ ॥

एवमुक्ता मया सा तु सुरसा कामरूपिणी ॥२८॥

अब्रवीन्नातिवर्तेत कश्चिदेष वरो मम।

‘मेरे ऐसा कहने पर इच्छानुसार रूप धारण करने वाली सुरसा बोली—’मुझे यह वर मिला हुआ है कि मेरे आहार के रूप में निकट आया हुआ कोई भी प्राणी मुझे टालकर आगे नहीं जा सकता’ ॥ २८ १/२॥

एवमुक्तः सुरसया दशयोजनमायतः॥२९॥

ततोऽर्धगुणविस्तारो बभूवाहं क्षणेन तु।

मत्प्रमाणाधिकं चैव व्यादितं तु मुखं तया॥३०॥

‘जब सुरसा ने ऐसा कहा—उस समय मेरा शरीर दस योजन बड़ा था, किंतु एक ही क्षण में मैं उससे ड्योढ़ा बड़ा हो गया। तब सुरसा ने भी अपने मुँह को मेरे शरीर की अपेक्षा अधिक फैला लिया॥ २९-३०॥

तद् दृष्ट्वा व्यादितं त्वास्यं ह्रस्वं ह्यकरवं पुनः।

तस्मिन् मुहूर्ते च पुनर्बभूवाङ्गुष्ठसम्मितः॥३१॥

‘उसके फैले हुए मुँह को देखकर मैंने फिर अपने स्वरूप को छोटा कर लिया। उसी मुहूर्त में मेरा शरीर अँगूठे के बराबर हो गया॥ ३१॥

अभिपत्याशु तद्वक्त्रं निर्गतोऽहं ततः क्षणात् ।

अब्रवीत् सुरसा देवी स्वेन रूपेण मां पुनः॥३२॥

‘फिर तो मैं सुरसा के मुँह में शीघ्र ही घुस गया और तत्क्षण बाहर निकल आया। उस समय सुरसा देवी ने अपने दिव्य रूप में स्थित होकर मुझसे कहा—॥३२॥

अर्थसिद्धौ हरिश्रेष्ठ गच्छ सौम्य यथासुखम्।

समानय च वैदेहीं राघवेण महात्मना॥३३॥

‘सौम्य! कपिश्रेष्ठ! अब तुम कार्यसिद्धि के लिये सुखपूर्वक यात्रा करो और विदेहनन्दिनी सीता को महात्मा रघुनाथजी से मिलाओ॥३३॥

सुखी भव महाबाहो प्रीतास्मि तव वानर।

ततोऽहं साधुसाध्वीति सर्वभूतैः प्रशंसितः॥ ३४॥

‘महाबाहु वानर! तुम सुखी रहो। मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूँ।’ उस समय सभी प्राणियों ने ‘साधु-साधु’ कहकर मेरी भूरि-भूरि प्रशंसा की॥ ३४॥

ततोऽन्तरिक्षं विपुलं प्लुतोऽहं गरुडो यथा।

छाया मे निगृहीता च न च पश्यामि किंचन॥३५॥

‘तत्पश्चात् मैं गरुड़ की भाँति उस विशाल आकाश में फिर उड़ने लगा। उस समय किसी ने मेरी परछाईं पकड़ ली, किंतु मैं किसी को देख नहीं पाता था॥ ३५॥

सोऽहं विगतवेगस्तु दिशो दश विलोकयन्।

न किंचित् तत्र पश्यामि येन मे विहता गतिः॥३६॥

‘छाया पकड़ी जाने से मेरा वेग अवरुद्ध हो गया, अतः मैं दसों दिशाओं की ओर देखने लगा; परंतु जिसने मेरी गति रोक दी थी, ऐसा कोई प्राणी मुझे वहाँ नहीं दिखायी दिया॥ ३६॥

अथ मे बुद्धिरुत्पन्ना किंनाम गमने मम।

ईदृशो विघ्न उत्पन्नो रूपमत्र न दृश्यते॥३७॥

‘तब मेरे मन में यह चिन्ता हुई कि मेरी यात्रा में ऐसा कौन-सा विघ्न पैदा हो गया, जिसका यहाँ रूप नहीं दिखायी दे रहा है॥ ३७॥

अधोभागे तु मे दृष्टिः शोचतः पतिता तदा।

तत्राद्राक्षमहं भीमां राक्षसी सलिलेशयाम्॥३८॥

‘इसी सोच में पड़े-पड़े मैंने जब नीचे की ओर दृष्टि डाली, तब मुझे एक भयानक राक्षसी दिखायी दी, जो जल में निवास करती थी॥ ३८॥

प्रहस्य च महानादमुक्तोऽहं भीमया तया।

अवस्थितमसम्भ्रान्तमिदं वाक्यमशोभनम्॥३९॥

‘उस भीषण निशाचरी ने बड़े जोर से अट्टहास करके निर्भय खड़े हुए मुझसे गरज-गरजकर यह अमङ्गलजनक बात कही— ॥३९॥

क्वासि गन्ता महाकाय क्षुधिताया ममेप्सितः।

भक्षः प्रीणय मे देहं चिरमाहारवर्जितम्॥४०॥

‘विशालकाय वानर! कहाँ जाओगे? मैं भूखी हुई हूँ। तुम मेरे लिये मनोवाञ्छित भोजन हो। आओ, चिरकाल से निराहार पड़े हुए मेरे शरीर और प्राणों को तृप्त करो’ ॥ ४०॥

बाढमित्येव तां वाणी प्रत्यगृह्णामहं ततः।

आस्यप्रमाणादधिकं तस्याः कायमपूरयम्॥४१॥

‘तब मैंने बहुत अच्छा’ कहकर उसकी बात मान ली और अपने शरीर को उसके मुख के प्रमाण से बहुत अधिक बढ़ा लिया॥ ४१॥

तस्याश्चास्यं महद् भीमं वर्धते मम भक्षणे।

न तु मां सा नु बुबुधे मम वा विकृतं कृतम्॥४२॥

‘परंतु उसका विशाल और भयानक मुख भी मुझे भक्षण करने के लिये बढ़ने लगा। उसने मुझे या मेरे प्रभाव को नहीं जाना तथा मैंने जो छल किया था, वह भी उसकी समझ में नहीं आया॥ ४२ ॥

ततोऽहं विपुलं रूपं संक्षिप्य निमिषान्तरात्।

तस्या हृदयमादाय प्रपतामि नभःस्थलम्॥४३॥

‘फिर तो पलक मारते-मारते मैंने अपने विशाल रूप को अत्यन्त छोटा बना लिया और उसका कलेजा निकालकर आकाश में उड़ गया॥४३॥

सा विसृष्टभुजा भीमा पपात लवणाम्भसि।

मया पर्वतसंकाशा निकृत्तहृदया सती॥४४॥

‘मेरे द्वारा कलेजे के काट लिये जाने पर पर्वत के समान भयानक शरीरवाली वह दुष्टा राक्षसी अपनी दोनों बाँहें शिथिल हो जाने के कारण समुद्र के जल में गिर पड़ी॥४४॥

शृणोमि खगतानां च वाचः सौम्या महात्मनाम्।

राक्षसी सिंहिका भीमा क्षिप्रं हनुमता हता॥

‘उस समय मुझे आकाशचारी सिद्ध महात्माओं की यह सौम्य वाणी सुनायी दी—’अहो! इस सिंहिका नामवाली भयानक राक्षसी को हनुमान जी ने शीघ्र ही मार डाला’ ॥ ४५ ॥

तां हत्वा पुनरेवाहं कृत्यमात्ययिकं स्मरन्।

गत्वा च महदध्वानं पश्यामि नगमण्डितम्॥४६॥

दक्षिणं तीरमुदधेर्लङ्का यत्र गता पुरी।

‘उसे मारकर मैंने फिर अपने उस आवश्यक कार्यपर ध्यान दिया, जिसकी पूर्ति में अधिक विलम्ब हो चुका था। उस विशाल मार्ग को समाप्त करके मैंने पर्वतमालाओं से मण्डित समुद्र का वह दक्षिण किनारा देखा, जहाँ लङ्कापुरी बसी हुई है॥ ४६ १/२॥

अस्तं दिनकरे याते रक्षसां निलयं पुरीम्॥४७॥

प्रविष्टोऽहमविज्ञातो रक्षोभिर्भीमविक्रमैः।

‘सूर्यदेव के अस्ताचल को चले जाने पर मैंने राक्षसों की निवासस्थानभूता लङ्कापुरी में प्रवेश किया, किंतु वे भयानक पराक्रमी राक्षस मेरे विषयमें कुछ भी जान न सके॥ ४७ १/२॥

तत्र प्रविशतश्चापि कल्पान्तघनसप्रभा॥४८॥

अट्टहासं विमुञ्चन्ती नारी काप्युत्थिता पुरः।

‘मेरे प्रवेश करते ही प्रलयकाल के मेघ की भाँति काली कान्तिवाली एक स्त्री अट्टहास करती हुई मेरे सामने खड़ी हो गयी॥ ४८ १/२॥

जिघांसन्तीं ततस्तां तु ज्वलदग्निशिरोरुहाम्॥४९॥

सव्यमुष्टिप्रहारेण पराजित्य सुभैरवाम्।

प्रदोषकाले प्रविशं भीतयाहं तयोदितः॥५०॥

‘उसके सिर के बाल प्रज्वलित अग्नि के समान दिखायी देते थे। वह मुझे मार डालना चाहती थी। यह देख मैंने बायें हाथ के मुक्के से प्रहार करके उस भयंकर निशाचरी को परास्त कर दिया और प्रदोषकाल में पुरी के भीतर प्रविष्ट हुआ। उस समय उस डरी हुई निशाचरी ने मुझसे इस प्रकार कहा— ॥ ४९-५०॥

अहं लङ्कापुरी वीर निर्जिता विक्रमेण ते।

यस्मात् तस्माद् विजेतासि सर्वरक्षांस्यशेषतः॥५१॥

‘वीर! मैं साक्षात् लङ्कापुरी हूँ। तुमने अपने पराक्रम से मुझे जीत लिया है, इसलिये तुम समस्त राक्षसों पर पूर्णतः विजय प्राप्त कर लोगे’॥५१॥

तत्राहं सर्वरात्रं तु विचरञ्जनकात्मजाम्।

रावणान्तःपुरगतो न चापश्यं सुमध्यमाम्॥५२॥

‘वहाँ सारी रात नगर में घर-घर घूमने और रावण के अन्तःपुरमें पहुँचने पर भी मैंने सुन्दर कटिप्रदेशवाली जनकनन्दिनी सीता को नहीं देखा॥५२॥

ततः सीतामपश्यंस्तु रावणस्य निवेशने।

शोकसागरमासाद्य न पारमुपलक्षये॥५३॥

‘रावण के महल में सीता को न देखने पर मैं शोकसागर में डूब गया। उस समय मुझे उस शोक का कहीं पार नहीं दिखायी देता था॥५३॥

शोचता च मया दृष्टं प्राकारेणाभिसंवृतम्।

काञ्चनेन विकृष्टेन गृहोपवनमुत्तमम्॥५४॥

‘सोच में पड़े-पड़े ही मैंने एक उत्तम गृहोद्यान देखा, जो सोने के बने हुए सुन्दर परकोटे से घिरा हुआ था॥ ५४॥

सप्राकारमवप्लुत्य पश्यामि बहुपादपम्।

अशोकवनिकामध्ये शिंशपापादपो महान्॥५५॥

‘तब उस परकोटे को लाँघकर मैंने उस गृहोद्यान को देखा, जो बहुसंख्यक वृक्षों से भरा हुआ था। उस अशोकवाटिका के बीच में मुझे एक बहुत ऊँचा अशोक-वृक्ष दिखायी दिया॥५५॥

तमारुह्य च पश्यामि काञ्चनं कदलीवनम्।

अदूराच्छिंशपावृक्षात् पश्यामि वरवर्णिनीम्॥५६॥

‘उसपर चढ़कर मैंने सुवर्णमय कदलीवन देखा तथा उस अशोक-वृक्ष के पास ही मुझे सर्वाङ्गसुन्दरी सीताजी का दर्शन हुआ॥५६॥

श्यामां कमलपत्राक्षीमुपवासकृशाननाम्।

तदेकवासःसंवीतां रजोध्वस्तशिरोरुहाम्॥५७॥

वे सदा सोलह वर्ष की-सी अवस्था में युक्त दिखायी देती है। उनके नेत्र प्रफुल्ल कमलदल के समान सुन्दर हैं। सीताजी उपवास करने के कारण अत्यन्त दुर्बल हो गयी हैं और उनकी यह दुर्बलता उनका मुख देखते ही स्पष्ट हो जाती है। वे एक ही वस्त्र पहनी हुई हैं और उनके केश धूल से धूसर हो गये हैं॥ ५७॥

शोकसंतापदीनाङ्गी सीतां भर्तृहिते स्थिताम्।

राक्षसीभिर्विरूपाभिः क्रूराभिरभिसंवृताम्॥५८॥

मांसशोणितभक्ष्याभिर्व्याघ्रीभिर्हरिणीं यथा।

‘उनके सारे अङ्ग शोक-संताप से दीन दिखायी देते हैं। वे अपने स्वामी के हित-चिन्तन में तत्पर हैं। रक्तमांस का भोजन करने वाली क्रूर एवं कुरूप राक्षसियाँ उन्हें चारों ओर से घेरकर उनकी रखवाली करती हैं। ठीक उसी तरह जैसे बहुत-सी बाघिनें किसी हरिणी को घेरे हुए खड़ी हों॥ ५८ १/२ ॥

सा मया राक्षसीमध्ये तय॑माना मुहुर्मुहुः॥५९॥

एकवेणीधरा दीना भर्तृचिन्तापरायणा।

भूमिशय्या विवर्णाङ्गी पद्मिनीव हिमागमे॥६०॥

‘मैंने देखा, वे राक्षसियों के बीचमें बैठी थीं और राक्षसियाँ उन्हें बारम्बार धमका रही थीं। वे सिरपर एक ही वेणी धारण किये दीनभाव से अपने पति के चिन्तन में तल्लीन हो रही थीं। धरती ही उनकी शय्या है। जैसे हेमन्त-ऋतु आने पर कमलिनी सूखकर श्रीहीन हो जाती है, उसी प्रकार उनके सारे अङ्ग कान्तिहीन हो गये हैं। ५९-६० ॥

रावणाद् विनिवृत्तार्था मर्तव्ये कृतनिश्चया।

कथंचिन्मृगशावाक्षी तूर्णमासादिता मया॥६१॥

‘रावण की ओर से उनका हार्दिक भाव सर्वथा दूर है। वे मरने का निश्चय कर चुकी हैं। उसी अवस्था में मैं किसी तरह शीघ्रतापूर्वक मृगनयनी सीता के पास पहुँच सका॥ ६१॥

तां दृष्ट्वा तादृशीं नारी रामपत्नी यशस्विनीम्।

तत्रैव शिंशपावृक्षे पश्यन्नहमवस्थितः॥६२॥

‘वैसी अवस्था में पड़ी हुई उन यशस्विनी नारी श्रीरामपत्नी सीता को अशोक-वृक्ष के नीचे बैठी देख मैं भी उस वृक्ष पर स्थित हो गया और उन्हें वहीं से निहारने लगा॥ ६२॥

ततो हलहलाशब्दं काञ्चीनूपुरमिश्रितम्।

शृणोम्यधिकगम्भीरं रावणस्य निवेशने॥६३॥

‘इतने ही में रावण के महल में करधनी और नूपुरों की झनकार से मिला हुआ अधिक गम्भीर कोलाहल सुनायी पड़ा॥ ६३॥

ततोऽहं परमोद्विग्नः स्वरूपं प्रत्यसंहरम्।

अहं च शिंशपावृक्षे पक्षीव गहने स्थितः॥६४॥

‘फिर तो मैंने अत्यन्त उद्विग्न होकर अपने स्वरूप को समेट लिया-छोटा बना लिया और पक्षी के समान उस गहन शिंशपा (अशोक) वृक्ष में छिपा बैठा रहा॥६४॥

ततो रावणदाराश्च रावणश्च महाबलः।

तं देशमनुसम्प्राप्तो यत्र सीताभवत् स्थिता॥६५॥

‘इतने ही में रावण की स्त्रियाँ और महाबली रावणये सब-के-सब उस स्थान पर आ पहुँचे, जहाँ सीतादेवी विराजमान थीं॥६५॥

तं दृष्ट्वाथ वरारोहा सीता रक्षोगणेश्वरम्।

संकुच्योरू स्तनौ पीनौ बाहुभ्यां परिरभ्य च॥

‘राक्षसों के स्वामी रावण को देखते ही सुन्दर कटिप्रदेशवाली सीता अपनी जाँघों को सिकोड़कर और उभरे हुए दोनों स्तनों को भुजाओं से ढककर बैठ गयीं॥

वित्रस्तां परमोद्विग्नां वीक्ष्यमाणामितस्ततः।

त्राणं कंचिदपश्यन्तीं वेपमानां तपस्विनीम्॥६७॥

तामुवाच दशग्रीवः सीतां परमदुःखिताम्।

अवाक्शिराः प्रपतितो बहुमन्यस्व मामिति॥६८॥

‘वे अत्यन्त भयभीत और उद्विग्न होकर इधर-उधर देखने लगीं। उन्हें कोई भी अपना रक्षक नहीं दिखायी देता था। भय से काँपती हुई अत्यन्त दुःखिनी तपस्विनी सीता के सामने जा दशमुख रावण नीचे सिर किये उनके चरणों में गिर पड़ा और इस प्रकार बोला ‘विदेहकुमारी! मैं तुम्हारा सेवक हूँ। तुम मुझे अधिक आदर दो’॥ ६७-६८॥

यदि चेत्त्वं तु मां दर्पान्नाभिनन्दसि गर्विते।

द्विमासानन्तरं सीते पास्यामि रुधिरं तव॥६९॥

‘(इतने पर भी अपने प्रति उनकी उपेक्षा देख वह कुपित होकर बोला—) ‘गर्वीली सीते! यदि तू घमंड में आकर मेरा अभिनन्दन नहीं करेगी तो आज से दो महीने के बाद मैं तेरा खून पी जाऊँगा’॥ ६९॥

एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य रावणस्य दुरात्मनः।

उवाच परमक्रुद्धा सीता वचनमुत्तमम्॥७०॥

‘दुरात्मा रावण की यह बात सुनकर सीता ने अत्यन्त कुपित हो यह उत्तम वचन कहा— ॥ ७० ॥

राक्षसाधम रामस्य भार्याममिततेजसः।

इक्ष्वाकुवंशनाथस्य स्नुषां दशरथस्य च॥७१॥

अवाच्यं वदतो जिह्वा कथं न पतिता तव।

‘नीच निशाचर! अमित तेजस्वी भगवान् श्रीराम की पत्नी और इक्ष्वाकुकुल के स्वामी महाराज दशरथ की पुत्रवधू से यह न कहने योग्य बात कहते समय तेरी जीभ क्यों नहीं गिर गयी? ॥ ७१ १/२॥

किंस्विदीर्य तवानार्य यो मां भर्तुरसंनिधौ॥७२॥

अपहृत्यागतः पाप तेनादृष्टो महात्मना।

‘दुष्ट पापी! तुझमें क्या पराक्रम है? मेरे पतिदेव जब निकट नहीं थे, तब तू उन महात्मा की दृष्टि से छिपकर चोरी-चोरी मुझे हर लाया॥ ७२ १/२ ॥

न त्वं रामस्य सदृशो दास्येऽप्यस्य न युज्यसे॥७३॥

अजेयः सत्यवाक् शूरो रणश्लाघी च राघवः।

‘तू भगवान् श्रीराम की समानता नहीं कर सकता। तू तो उनका दास होने योग्य भी नहीं है। श्रीरघुनाथजी सर्वथा अजेय, सत्यभाषी, शूरवीर और युद्धके अभिलाषी एवं प्रशंसक हैं’। ७३ १/२॥

जानक्या परुषं वाक्यमेवमुक्तो दशाननः॥७४॥

जज्वाल सहसा कोपाच्चितास्थ इव पावकः।

विवृत्य नयने क्रूरे मुष्टिमुद्यम्य दक्षिणम्॥ ७५॥

मैथिली हन्तुमारब्धः स्त्रीभिर्हाहाकृतं तदा।

स्त्रीणां मध्यात् समुत्पत्य तस्य भार्या दुरात्मनः॥७६॥

वरा मन्दोदरी नाम तया स प्रतिषेधितः।

उक्तश्च मधुरां वाणीं तया स मदनार्दितः॥७७॥

‘जनकनन्दिनी के ऐसी कठोर बात कहने पर दशमुख रावण चिता में लगी हुई आग की भाँति सहसा क्रोध से जल उठा और अपनी क्रूर आँखें फाड़फाड़कर देखता हुआ दाहिना मुक्का तानक मिथिलेशकुमारी को मारने के लिये तैयार हो गया। यह देख उस समय वहाँ खड़ी हुई स्त्रियाँ हाहाकार करने लगीं। इतने ही में उन स्त्रियों के बीच से उस दुरात्माकी सुन्दरी भार्या मन्दोदरी झपटकर आगे आयी और उसने रावण को ऐसा करने से रोका। साथ ही उस कामपीड़ित निशाचर से मधुर वाणी में कहा- ॥ ७४ -७७॥

सीतया तव किं कार्यं महेन्द्रसमविक्रम।

मया सह रमस्वाद्य मद्विशिष्टा न जानकी॥ ७८॥

‘महेन्द्र के समान पराक्रमी राक्षसराज! सीता से तुम्हें क्या काम है? आज मेरे साथ रमण करो। जनकनन्दिनी सीता मुझसे अधिक सुन्दरी नहीं है। ७८॥

देवगन्धर्वकन्याभिर्यक्षकन्याभिरेव च।

सार्धं प्रभो रमस्वेति सीतया किं करिष्यसि॥७९॥

‘प्रभो! देवताओं, गन्धर्वो और यक्षों की कन्याएँ हैं, इनके साथ रमण करो; सीता को लेकर क्या करोगे?’॥ ७९॥

ततस्ताभिः समेताभिर्नारीभिः स महाबलः।

उत्थाप्य सहसा नीतो भवनं स्वं निशाचरः॥८०॥

‘तदनन्तर वे सब स्त्रियाँ मिलकर उस महाबली निशाचर रावण को सहसा वहाँ से उठाकर अपने महल में ले गयीं॥ ८०॥

याते तस्मिन् दशग्रीवे राक्षस्यो विकृताननाः।

सीतां निर्भर्त्सयामासुर्वाक्यैः क्रूरैः सुदारुणैः॥८१॥

‘दशमुख रावण के चले जाने पर विकराल मुखवाली राक्षसियाँ अत्यन्त दारुण क्रूरतापूर्ण वचनों द्वारा सीता को डराने-धमकाने लगीं। ८१॥

तृणवद् भाषितं तासां गणयामास जानकी।

गर्जितं च तथा तासां सीतां प्राप्य निरर्थकम्॥८२॥

‘परंतु जानकी ने उनकी बातों को तिनके के समान तुच्छ समझा। उनका सारा गर्जन-तर्जन सीता के पास पहुँचकर व्यर्थ हो गया॥ ८२॥

वृथा गर्जितनिश्चेष्टा राक्षस्यः पिशिताशनाः।

रावणाय शशंसुस्ताः सीताव्यवसितं महत्॥८३॥

‘इस प्रकार गर्जना और सारी चेष्टाओं के व्यर्थ हो जाने पर उन मांसभक्षिणी राक्षसियों ने रावण के पास जाकर उसे सीताजी का महान् निश्चय कह सुनाया। ८३॥

ततस्ताः सहिताः सर्वा विहताशा निरुद्यमाः।

परिक्लिश्य समस्तास्ता निद्रावशमुपागताः॥८४॥

‘फिर वे सब-की-सब उन्हें अनेक प्रकार से कष्ट दे हताश तथा उद्योगशून्य हो निद्रा के वशीभूत होकर सो गयीं॥ ८४॥

तासु चैव प्रसुप्तासु सीता भर्तृहिते रता।

विलप्य करुणं दीना प्रशुशोच सुदुःखिता॥

‘उन सबके सो जाने पर पति के हित में तत्पर रहने वाली सीताजी करुणापूर्वक विलापकर अत्यन्त दीन और दुःखी हो शोक करने लगीं। ८५ ॥

तासां मध्यात् समुत्थाय त्रिजटा वाक्यमब्रवीत्।

आत्मानं खादत क्षिप्रं न सीतामसितेक्षणाम्॥

जनकस्यात्मजां साध्वीं स्नुषां दशरथस्य च।

‘उन राक्षसियों के बीच से त्रिजटा नामवाली राक्षसी उठी और अन्य निशाचरियों से इस प्रकार बोली —’अरी! तुम सब अपने-आपको ही जल्दी-जल्दी खा जाओ, कजरारे नेत्रोंवाली सीता को नहीं; ये राजा दशरथ की पुत्रवधू और जनक की लाड़ली सतीसाध्वी सीता इस योग्य नहीं हैं। ८६ १/२॥

स्वप्नो ह्यद्य मया दृष्टो दारुणो रोमहर्षणः॥८७॥

रक्षसां च विनाशाय भर्तुरस्या जयाय च।

‘आज अभी मैंने बड़ा भयंकर तथा रोंगटे खड़े कर देने वाला स्वप्न देखा है; वह राक्षसों के विनाश तथा इन सीतादेवी के पति की विजय का सूचक है॥ ८७ १/२॥

अलमस्मान् परित्रातुं राघवाद् राक्षसीगणम्॥८८॥

अभियाचाम वैदेहीमेतद्धि मम रोचते।

‘ये सीता ही श्रीरघुनाथजी के रोष से हमारी और इन सब राक्षसियों की रक्षा करने में समर्थ हैं; अतः हमलोग विदेहनन्दिनी से अपने अपराधों के लिये क्षमायाचना करें—यही मुझे अच्छा लगता है॥ ८८ १/२॥

यदि ह्येवंविधः स्वप्नो दुःखितायाः प्रदृश्यते॥८९॥

सा दुःखैर्विविधैर्मुक्ता सुखमाप्नोत्यनुत्तमम्।

‘यदि किसी दुःखिनी के विषय में ऐसा स्वप्न देखा जाता है तो वह अनेक विध दुःखों से छूटकर परम उत्तम सुख पाती है॥ ८९ १/२॥

प्रणिपातप्रसन्ना हि मैथिली जनकात्मजा॥९०॥

अलमेषा परित्रातुं राक्षस्यो महतो भयात्।।

‘राक्षसियो! केवल प्रणाम करनेमात्र से मिथिलेशकुमारी जानकी प्रसन्न हो जायँगी और ये महान् भय से मेरी रक्षा करेंगी’ ॥ ९० १/२ ।।

ततः सा ह्रीमती बाला भर्तुर्विजयहर्षिता॥९१॥

अवोचद् यदि तत् तथ्यं भवेयं शरणं हि वः।

‘तब लज्जावती बाला सीता पति की विजय की सम्भावना से प्रसन्न हो बोलीं-‘यदि यह बात सच होगी तो मैं अवश्य तुमलोगों की रक्षा करूँगी’ ॥ ९१ १/२॥

तां चाहं तादृशीं दृष्ट्वा सीताया दारुणां दशाम्॥९२॥

चिन्तयामास विश्रान्तो न च मे निर्वृतं मनः।

सम्भाषणार्थे च मया जानक्याश्चिन्तितो विधिः॥९३॥

‘कुछ विश्राम के पश्चात् मैं सीता की वैसी दारुण दशा देखकर बड़ी चिन्ता में पड़ गया। मेरे मन को  शान्ति नहीं मिलती थी। फिर मैंने जानकीजी के साथ वार्तालाप करने के लिये एक उपाय सोचा॥ ९२-९३॥

इक्ष्वाकुकुलवंशस्तु स्तुतो मम पुरस्कृतः।

श्रुत्वा तु गदितां वाचं राजर्षिगणभूषिताम्॥९४॥

प्रत्यभाषत मां देवी बाष्पैः पिहितलोचना।

‘पहले मैंने इक्ष्वाकुवंशकी प्रशंसा की राजर्षियों की स्तुति से विभूषित मेरी वह वाणी सुनकर देवी सीता के नेत्रों में आँसू भर आया और वे मुझसे बोलीं- ॥ ९४ १/२ ॥

कस्त्वं केन कथं चेह प्राप्तो वानरपुङ्गव॥९५॥

का च रामेण ते प्रीतिस्तन्मे शंसितुमर्हसि।

‘कपिश्रेष्ठ! तुम कौन हो? किसने तुम्हें भेजा है? यहाँ कैसे आये हो? और भगवान् श्रीराम के साथ तुम्हारा कैसा प्रेम है? यह सब मुझे बताओ’ ॥ ९५ १/२॥

तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा अहमप्यब्रुवं वचः॥९६॥

देवि रामस्य भर्तुस्ते सहायो भीमविक्रमः।

सुग्रीवो नाम विक्रान्तो वानरेन्द्रो महाबलः॥९७॥

‘उनका वह वचन सुनकर मैंने भी कहा—’देवि! तुम्हारे पतिदेव श्रीराम के सहायक एक भयंकर पराक्रमी बलविक्रम सम्पन्न महाबली वानरराज हैं, जिनका नाम सुग्रीव है ॥ ९६-९७॥

तस्य मां विद्धि भृत्यं त्वं हनूमन्तमिहागतम्।

भर्ना सम्प्रहितस्तुभ्यं रामेणाक्लिष्टकर्मणा॥९८॥

उन्हीं का मुझे सेवक समझो मेरा नाम हनुमान् है। अनायास ही महान् कर्म करने वाले तुम्हारे पति श्रीराम ने मुझे भेजा है इसलिये मैं यहाँ आया हूँ॥ ९८॥

इदं तु पुरुषव्याघ्रः श्रीमान् दाशरथिः स्वयम्।

अङ्गलीयमभिज्ञानमदात् तुभ्यं यशस्विनि॥९९॥

‘यशस्विनि! पुरुषसिंह दशरथनन्दन साक्षात् श्रीमान् राम ने पहचानके लिये यह अंगूठी तुम्हें दी है॥ ९९ ॥

तदिच्छामि त्वयाज्ञप्तं देवि किं करवाण्यहम्।

रामलक्ष्मणयोः पार्वं नयामि त्वां किमुत्तरम्॥१००॥

‘देवि! मैं चाहता हूँ कि आप मुझे आज्ञा दें कि मैं आपकी क्या सेवा करूँ? आप कहें तो मैं अभी आपको श्रीराम और लक्ष्मण के पास पहुँचा दूं। इस विषय में आपका क्या उत्तर है?’ ॥ १०० ॥

एतच्छ्रुत्वा विदित्वा च सीता जनकनन्दिनी।

आह रावणमुत्पाट्य राघवो मां नयत्विति॥१०१॥

‘मेरी यह बात सुनकर और सोच-समझकर जनकनन्दिनी सीता ने कहा—’मेरी इच्छा है कि श्रीरघुनाथजी रावण का संहार करके मुझे यहाँ से ले चलें ॥ १०१॥

प्रणम्य शिरसा देवीमहमार्यामनिन्दिताम्।

राघवस्य मनोह्लादमभिज्ञानमयाचिषम्॥१०२॥

‘तब मैंने उन सती-साध्वी देवी आर्या सीता को सिर झुकाकर प्रणाम किया और कोई ऐसी पहचान माँगी, जो श्रीरघुनाथजी के मन को आनन्द प्रदान करने वाली हो॥

अथ मामब्रवीत् सीता गृह्यतामयमुत्तमः।

मणिर्येन महाबाहू रामस्त्वां बहु मन्यते॥१०३॥

‘मेरे माँगने पर सीताजी ने कहा—’लो, यह उत्तम चूडामणि है, जिसे पाकर महाबाहु श्रीराम तुम्हारा विशेष आदर करेंगे’॥ १०३॥

इत्युक्त्वा तु वरारोहा मणिप्रवरमुत्तमम्।

प्रायच्छत् परमोद्विग्ना वाचा मां संदिदेश ह॥१०४॥

“ऐसा कहकर सुन्दरी सीता ने मुझे वह परम उत्तम चूडामणि दी और अत्यन्त उद्विग्न होकर वाणी द्वारा अपना संदेश कहा॥ १०४॥

ततस्तस्यै प्रणम्याहं राजपुत्र्यै समाहितः।

प्रदक्षिणं परिक्राममिहाभ्युद्गतमानसः॥१०५॥

‘तब मन-ही-मन यहाँ आने के लिये उत्सुक हो एकाग्रचित्त होकर मैंने राजकुमारी सीता को प्रणाम किया और उनकी दक्षिणावर्त परिक्रमा की॥ १०५ ॥

उत्तरं पुनरेवाह निश्चित्य मनसा तदा।

हनूमन् मम वृत्तान्तं वक्तुमर्हसि राघवे॥१०६॥

यथा श्रुत्वैव नचिरात् तावुभौ रामलक्ष्मणौ।

सुग्रीवसहितौ वीरावुपेयातां तथा कुरु॥१०७॥

“उस समय उन्होंने मन से कुछ निश्चय करके पुनः मुझे उत्तर दिया—’हनुमन् ! तुम श्रीरघुनाथजी को मेरा सारा वृत्तान्त सुनाना और ऐसा प्रयत्न करना, जिससे सुग्रीवसहित वे दोनों वीरबन्धु श्रीराम और लक्ष्मण मेरा हाल सुनते ही अविलम्ब यहाँ आ जायें। १०६-१०७॥

यदन्यथा भवेदेतद् द्वौ मासौ जीवितं मम।

न मां द्रक्ष्यति काकुत्स्थो म्रिये साहमनाथवत्॥१०८॥

‘यदि इसके विपरीत हुआ तो दो महीने तक मेरा जीवन और शेष है। उसके बाद श्रीरघुनाथजी मुझे नहीं देख सकेंगे मैं अनाथ की भाँति मर जाऊँगी’। १०८॥

तच्छ्रुत्वा करुणं वाक्यं क्रोधो मामभ्यवर्तत।

उत्तरं च मया दृष्टं कार्यशेषमनन्तरम्॥१०९॥

‘उनका यह करुणाजनक वचन सुनकर राक्षसों के प्रति मेरा क्रोध बहुत बढ़ गया। फिर मैंने शेष बचे हुए भावी कार्य पर विचार किया॥ १०९॥

ततोऽवर्धत मे कायस्तदा पर्वतसंनिभः।

युद्धाकानी वनं तस्य विनाशयितुमारभे॥११०॥

‘तदनन्तर मेरा शरीर बढ़ने लगा और तत्काल पर्वत के समान हो गया। मैंने युद्ध की इच्छा से रावण के उस वन को उजाड़ना आरम्भ किया॥ ११० ॥

तद् भग्नं वनखण्डं तु भ्रान्तत्रस्तमृगद्रिजम्।

प्रतिबुद्ध्य निरीक्षन्ते राक्षस्यो विकृताननाः॥१११॥

‘जहाँ के पशु और पक्षी घबराये और डरे हुए थे, उस उजड़े हुए वनखण्ड को वहाँ सोकर उठी हुई विकराल मुखवाली राक्षसियों ने देखा॥ १११॥

मां च दृष्ट्वा वने तस्मिन् समागम्य ततस्ततः।

ताः समभ्यागताः क्षिप्रं रावणायाचचक्षिरे॥११२॥

‘उस वन में मुझे देखकर वे सब इधर-उधरसे जुट गयीं और तुरंत रावण के पास जाकर उन्होंने वनविध्वंस का सारा समाचार कहा- ॥ ११२ ।।

राजन् वनमिदं दुर्गं तव भग्नं दुरात्मना।

वानरेण ह्यविज्ञाय तव वीर्यं महाबल॥११३॥

‘महाबली राक्षसराज! एक दुरात्मा वानर ने आपके बल-पराक्रम को कुछ भी न समझकर इस दुर्गम प्रमदावन को उजाड़ डाला है॥ ११३॥

तस्य दुर्बुद्धिता राजंस्तव विप्रियकारिणः।

वधमाज्ञापय क्षिप्रं यथासौ न पुनव्रजेत्॥११४॥

‘महाराज! यह उसकी दुर्बुद्धि ही है, जो उसने आपका अपराध किया। आप शीघ्र ही उसके वधकी आज्ञा दें, जिससे वह फिर बचकर चला न जाय॥ ११४॥

तच्छ्रुत्वा राक्षसेन्द्रेण विसृष्टा बहुदुर्जयाः।

राक्षसाः किंकरा नाम रावणस्य मनोऽनुगाः॥११५॥

‘यह सुनकर राक्षसराज ने अपने मन के अनुकूल चलने वाले किंकर नामक राक्षसों को भेजा, जिनपर विजय पाना अत्यन्त कठिन था॥ ११५ ॥

तेषामशीतिसाहस्रं शूलमुद्गरपाणिनाम्।

मया तस्मिन् वनोद्देशे परिघेण निषूदितम्॥

‘वे हाथों में शूल और मुद्गर लेकर आये थे। उनकी संख्या अस्सी हजार थी; परंतु मैंने उस वनप्रान्त में एक परिघ से ही उन सबका संहार कर डाला॥ ११६॥

तेषां तु हतशिष्टा ये ते गता लघुविक्रमाः।

निहतं च मया सैन्यं रावणायाचचक्षिरे॥११७॥

‘उनमें जो मरने से बच गये, वे जल्दी-जल्दी पैर बढ़ाते हुए भाग गये। उन्होंने रावण को मेरे द्वारा सारी सेना के मारे जाने का समाचार बताया॥ ११७ ॥

ततो मे बुद्धिरुत्पन्ना चैत्यप्रासादमुत्तमम्।

तत्रस्थान् राक्षसान् हत्वा शतं स्तम्भेन वै पुनः॥११८॥

ललामभूतो लङ्काया मया विध्वंसितो रुषा।

‘तत्पश्चात् मेरे मन में एक नया विचार उत्पन्न हुआ और मैंने क्रोधपूर्वक वहाँ के उत्तम चैत्यप्रासाद को, जो लङ्का का सबसे सुन्दर भवन था तथा जिसमें सौ खम्भे लगे हुए थे, वहाँ के राक्षसों का संहार करके तोड़-फोड़ डाला॥ ११८ १/२ ॥

ततः प्रहस्तस्य सुतं जम्बुमालिनमादिशत्॥११९॥

राक्षसैर्बहभिः सार्धं घोररूपैर्भयानकैः।

तब रावण ने घोर रूपवाले भयानक राक्षसों के साथ जिनकी संख्या बहुत अधिक थी, प्रहस्त के बेटे जम्बुमाली को युद्ध के लिये भेजा॥ ११९ १/२ ॥

तमहं बलसम्पन्नं राक्षसं रणकोविदम्॥१२०॥

परिघेणातिघोरेण सूदयामि सहानुगम्।

‘वह राक्षस बड़ा बलवान् तथा युद्ध की कला में कुशल था तो भी मैंने अत्यन्त घोर परिघ से मारकर सेवकोंसहित उसे काल के गाल में डाल दिया॥ १२० १/२॥

तच्छ्रुत्वा राक्षसेन्द्रस्तु मन्त्रिपुत्रान् महाबलान्॥१२१॥

पदातिबलसम्पन्नान् प्रेषयामास रावणः।

परिघेणैव तान् सर्वान् नयामि यमसादनम्॥१२२॥

‘यह सुनकर राक्षसराज रावण ने पैदल सेना के साथ अपने मन्त्री के पुत्रों को भेजा, जो बड़े बलवान् थे; किंतु मैंने परिघ से ही उन सबको यमलोक भेज दिया॥ १२१-१२२ ॥

मन्त्रिपुत्रान् हतान् श्रुत्वा समरे लघुविक्रमान्।

पञ्च सेनाग्रगान् शूरान् प्रेषयामास रावणः॥१२३॥

‘समराङ्गण में शीघ्रतापूर्वक पराक्रम प्रकट करनेवाले मन्त्रिकुमारों को मारा गया सुनकर रावण ने पाँच शूरवीर सेनापतियों को भेजा ॥ १२३॥

तानहं सहसैन्यान् वै सर्वानेवाभ्यसूदयम्।

ततः पुनर्दशग्रीवः पुत्रमक्षं महाबलम्॥१२४॥

बहुभी राक्षसैः सार्धं प्रेषयामास संयुगे।

‘उन सबको भी मैंने सेनासहित मौत के घाट उतार दिया। तब दशमुख रावण ने अपने पुत्र महाबली अक्षकुमार को बहुसंख्यक राक्षसों के साथ युद्ध के लिये भेजा॥ १२४ १/२॥

तं तु मन्दोदरीपुत्रं कुमारं रणपण्डितम्॥१२५॥

सहसा खं समुद्यन्तं पादयोश्च गृहीतवान्।

तमासीनं शतगुणं भ्रामयित्वा व्यपेषयम्॥१२६॥

‘मन्दोदरी का वह पुत्र युद्ध की कला में बड़ा प्रवीण था। वह आकाश में उड़ रहा था। उसी समय मैंने सहसा उसके दोनों पैर पकड़ लिये और सौ बार घुमाकर उसे पृथ्वी पर पटक दिया। इस तरह वहाँ पड़े हुए कुमार अक्ष को मैंने पीस डाला। १२५-१२६॥

तमक्षमागतं भग्नं निशम्य स दशाननः।

ततश्चेन्द्रजितं नाम द्वितीयं रावणः सुतम्॥१२७॥

व्यादिदेश सुसंक्रुद्धो बलिनं युद्धदुर्मदम्।

‘अक्षकुमार युद्धभूमिमें आया और मारा गया—यह सुनकर दशमुख रावणने अत्यन्त कुपित हो अपने दूसरे पुत्र इन्द्रजित् को, जो बड़ा ही रणदुर्मद और बलवान् था, भेजा॥ १२७ १/२ ॥

तच्चाप्यहं बलं सर्वं तं च राक्षसपुङ्गवम्॥१२८॥

नष्टौजसं रणे कृत्वा परं हर्षमुपागतः।

‘उसके साथ आयी हुई सारी सेना को और उस राक्षस-शिरोमणि को भी युद्ध में हतोत्साह करके मुझे बड़ा हर्ष हुआ॥ १२८ १/२ ॥

महतापि महाबाहुः प्रत्ययेन महाबलः॥१२९॥

प्रहितो रावणेनैष सह वीरैर्मदोद्धतैः।

‘रावण ने इस महाबली महाबाहु वीर को अनेक मदमत्त वीरों के साथ बड़े विश्वास से भेजा था॥ १२९ १/२॥

सोऽविषह्यं हि मां बुद्ध्वा स्वसैन्यं चावमर्दितम्॥१३०॥

ब्रह्मणोऽस्त्रेण स तु मां प्रबद्ध्वा चातिवेगिनः।

रज्जुभिश्चापि बध्नन्ति ततो मां तत्र राक्षसाः॥ १३१॥

‘इन्द्रजित् ने देखा, मेरी सारी सेना कुचल डाली गयी, तब उसने समझ लिया कि इस वानर का सामना करना असम्भव है। अतः उसने बड़े वेग से ब्रह्मास्त्र चलाकर मुझे बाँध लिया। फिर तो वहाँ राक्षसों ने मुझे रस्सियों से भी बाँधा ॥ १३०-१३१॥

रावणस्य समीपं च गृहीत्वा मामुपागमन्।

दृष्ट्वा सम्भाषितश्चाहं रावणेन दुरात्मना।१३२॥

पृष्टश्च लङ्कागमनं राक्षसानां च तं वधम्।

तत्सर्वं च रणे तत्र सीतार्थमुपजल्पितम्॥१३३॥

‘इस तरह मुझे पकड़कर वे सब रावण के समीप ले आये। दुरात्मा रावण ने मुझे देखकर वार्तालाप आरम्भ किया और पूछा—’तू लङ्का में क्यों आया? तथा राक्षसों का वध तूने क्यों किया ?’ मैंने वहाँ उत्तर दिया, ‘यह सब कुछ मैंने सीताजी के लिये किया है’॥ १३२-१३३॥

तस्यास्तु दर्शनाकाङ्क्षी प्राप्तस्त्वद्भवनं विभो।

मारुतस्यौरसः पुत्रो वानरो हनुमानहम्॥१३४॥

रामदूतं च मां विद्धि सुग्रीवसचिवं कपिम्।

सोऽहं दौत्येन रामस्य त्वत्सकाशमिहागतः॥१३५॥

‘प्रभो! जनकनन्दिनी के दर्शन की इच्छा से ही मैं तुम्हारे महल में आया हूँ। मैं वायुदेवता का औरस पुत्र हूँ,जाति का वानर हूँ और हनुमान् मेरा नाम है। मुझे श्रीरामचन्द्रजी का दूत और सुग्रीव का मन्त्री समझो। श्रीरामचन्द्रजी का दूतकार्य करने के लिये ही मैं यहाँ तुम्हारे पास आया हूँ॥

शृणु चापि समादेशं यदहं प्रब्रवीमि ते।

राक्षसेश हरीशस्त्वां वाक्यमाह समाहितम्॥१३६॥

‘तुम मेरे स्वामी का संदेश, जो मैं तुम्हें बता रहा हूँ, सुनो। राक्षसराज! वानरराज सुग्रीव ने तुमसे एकाग्रतापूर्वक जो बात कही है, उस पर ध्यान दो॥ १३६॥

सुग्रीवश्च महाभागः स त्वां कौशलमब्रवीत्।

धर्मार्थकामसहितं हितं पथ्यमुवाच ह॥१३७॥

‘महाभाग सुग्रीव ने तुम्हारी कुशल पूछी है और तुम्हें सुनाने के लिये यह धर्म, अर्थ एवं काम से युक्त हितकर तथा लाभदायक बात कही है— ॥ १३७॥

वसतो ऋष्यमूके मे पर्वते विपुलद्रुमे।

राघवो रणविक्रान्तो मित्रत्वं समुपागतः॥१३८॥

‘जब मैं बहुसंख्यक वृक्षों से हरे-भरे ऋष्यमूक पर्वत पर निवास करता था, उन दिनों रण में महान् पराक्रम प्रकट करने वाले रघुनाथजी ने मेरे साथ मित्रता स्थापित की थी॥ १३८॥

तेन मे कथितं राजन् भार्या मे रक्षसा हृता।

तत्र साहाय्यहेतोर्मे समयं कर्तुमर्हसि ॥१३९॥

‘राजन् ! उन्होंने मुझे बताया कि ‘राक्षस रावण ने मेरी पत्नी को हर लिया है। उसके उद्धार के कार्य में सहायता करने के लिये तुम मेरे सामने प्रतिज्ञा करो’॥

वालिना हृतराज्येन सुग्रीवेण सह प्रभुः।

चक्रेऽग्निसाक्षिकं सख्यं राघवः सहलक्ष्मणः॥१४०॥

‘वाली ने जिनका राज्य छीन लिया था, उन सुग्रीव के साथ (अर्थात् मेरे साथ) लक्ष्मणसहित भगवान् श्रीराम ने अग्नि को साक्षी बनाकर मित्रता की है॥ १४०॥

तेन वालिनमाहत्य शरेणैकेन संयुगे।

वानराणां महाराजः कृतः सम्प्लवतां प्रभुः॥१४१॥

‘श्रीरघुनाथजी ने युद्धस्थल में एक ही बाण से वाली को मारकर सुग्रीव को (मुझको) उछलने कूदने वाले वानरों का महाराज बना दिया है॥ १४१॥

तस्य साहाय्यमस्माभिः कार्यं सर्वात्मना त्विह।

तेन प्रस्थापितस्तुभ्यं समीपमिह धर्मतः॥१४२॥

‘अतः हमलोगों को सम्पूर्ण हृदय से उनकी सहायता करनी है। यही सोचकर सुग्रीव ने धर्मानुसार मुझे तुम्हारे पास भेजा है॥ १४२॥

क्षिप्रमानीयतां सीता दीयतां राघवस्य च।

यावन्न हरयो वीरा विधमन्ति बलं तव॥१४३॥

‘उनका कहना है कि तुम तुरंत सीता को ले आओ और जबतक वीर वानर तुम्हारी सेना का संहार नहीं करते हैं तभीतक उन्हें श्रीरघुनाथजी को सौंप दो॥ १४३॥

वानराणां प्रभावोऽयं न केन विदितः पुरा।

देवतानां सकाशं च ये गच्छन्ति निमन्त्रिताः॥१४४॥

‘कौन ऐसा वीर है जिसे वानरों का यह प्रभाव पहले से ही ज्ञात नहीं है। ये वे ही वानर हैं, जो युद्ध के लिये निमन्त्रित होकर देवताओं के पास भी उनकी सहायता के लिये जाते हैं’ ॥ १४४ ॥

इति वानरराजस्त्वामाहेत्यभिहितो मया।

मामैक्षत ततो रुष्टश्चक्षुषा प्रदहन्निव॥१४५॥

‘इस प्रकार वानरराज सुग्रीव ने तुमसे संदेश कहा है। मेरे इतना कहते ही रावण ने रुष्ट होकर मुझे इस तरह देखा, मानो अपनी दृष्टि से मुझे दग्ध कर डालेगा॥

तेन वध्योऽहमाज्ञप्तो रक्षसा रौद्रकर्मणा।।

मत्प्रभावमविज्ञाय रावणेन दुरात्मना॥१४६॥

‘भयंकर कर्म करने वाले दुरात्मा राक्षस रावण ने मेरे प्रभाव को न जानकर अपने सेवकों को आज्ञा दे दी कि इस वानर का (मेरा) वध कर दिया जाय॥ १४६॥

ततो विभीषणो नाम तस्य भ्राता महामतिः।

तेन राक्षसराजश्च याचितो मम कारणात्॥१४७॥

‘तब उसके परम बुद्धिमान् भाई विभीषण ने मेरे लिये राक्षसराज रावण से प्रार्थना करते हुए कहा- ॥

नैवं राक्षसशार्दूल त्यज्यतामेष निश्चयः।

राजशास्त्रव्यपेतो हि मार्गः संलक्ष्यते त्वया॥१४८॥

‘राक्षसशिरोमणे! ऐसा करना उचित नहीं है। आप अपने इस निश्चय को त्याग दीजिये। आपकी दृष्टि इस समय राजनीति के विरुद्ध मार्ग पर जा रही है। १४८ ॥

दूतवध्या न दृष्टा हि राजशास्त्रेषु राक्षस।

दूतेन वेदितव्यं च यथाभिहितवादिना॥१४९॥

‘राक्षसराज! राजनीति-सम्बन्धी शास्त्रों में कहीं भी दूत के वध का विधान नहीं है। दूत तो वही कहता है, जैसा कहने के लिये उसे बताया गया होता है। उसका कर्तव्य है कि वह अपने स्वामी के अभिप्राय का ज्ञान करा दे॥

सुमहत्यपराधेऽपि दूतस्यातुलविक्रम।

विरूपकरणं दृष्टं न वधोऽस्ति हि शास्त्रतः॥१५०॥

‘अनुपम पराक्रमी वीर! दूतका महान् अपराध होने पर भी शास्त्र में उसके वध का दण्ड नहीं देखा गया है। उसके किसी अङ्ग को विकृत कर देनामात्र ही बताया गया है’ ॥ १५० ॥

विभीषणेनैवमुक्तो रावणः संदिदेश तान्।

राक्षसानेतदेवाद्य लाङ्गलं दह्यतामिति ॥१५१॥

‘विभीषण के ऐसा कहने पर रावण ने उन राक्षसों को आज्ञा दी—अच्छा तो आज इसकी यह पूँछ ही जला दो’ ॥ १५१॥

ततस्तस्य वचः श्रुत्वा मम पुच्छं समन्ततः।

वेष्टितं शणवल्कैश्च पट्टैः कार्पासकैस्तथा॥१५२॥

‘उसकी यह आज्ञा सुनकर राक्षसोंने मेरी पूँछमें सब ओरसे सुतरीकी रस्सियाँ तथा रेशमी और सूती कपड़े लपेट दिये॥ १५२॥

राक्षसाः सिद्धसंनाहास्ततस्ते चण्डविक्रमाः।

तदादीप्यन्त मे पुच्छं हनन्तः काष्ठमुष्टिभिः॥१५३॥

‘इस प्रकार बाँध देने के पश्चात् उन प्रचण्ड पराक्रमी राक्षसों ने काठके डंडों और मुक्कों से मारते हुए मेरी पूँछ में आग लगा दी॥ १५३॥

बद्धस्य बहुभिः पाशैर्यन्त्रितस्य च राक्षसैः।

न मे पीडाभवत् काचिद् दिदृक्षोर्नगरी दिवा॥१५४॥

‘मैं दिन में लङ्कापुरी को अच्छी तरह देखना चाहता था, इसलिये राक्षसों द्वारा बहुत-सी रस्सियों से बाँधे और कसे जाने पर भी मुझे कोई पीड़ा नहीं हुई। १५४॥

ततस्ते राक्षसाः शूरा बद्धं मामग्निसंवृतम्।

अघोषयन् राजमार्गे नगरद्वारमागताः॥१५५॥

‘तत्पश्चात् नगर द्वार पर आकर वे शूरवीर राक्षस पूँछ में लगी हुई आग से घिरे और बँधे हुए मुझको सड़क पर घुमाते हुए सब ओर मेरे अपराध की घोषणा करने लगे॥ १५५॥

ततोऽहं सुमहद्रूपं संक्षिप्य पुनरात्मनः।

विमोचयित्वा तं बन्धं प्रकृतिस्थः स्थितः पुनः॥१५६॥

‘इतने ही में अपने उस विशाल रूप को संकुचित करके मैंने अपने-आपको उस बन्धन से छुड़ा लिया और फिर स्वाभाविक रूप में आकर मैं वहाँ खड़ा हो गया॥ १५६॥

आयसं परिघं गृह्य तानि रक्षांस्यसूदयम्।

ततस्तन्नगरद्वारं वेगेन प्लुतवानहम्॥ १५७॥

‘फिर फाटक पर रखे हुए एक लोहे के परिघ को उठाकर मैंने उन सब राक्षसों को मार डाला। इसके बाद बड़े वेग से कूदकर मैं उस नगर द्वार पर चढ़ गया॥ १५७॥

पुच्छेन च प्रदीप्तेन तां पुरी साट्टगोपुराम्।

दहाम्यहमसम्भ्रान्तो युगान्ताग्निरिव प्रजाः॥१५८॥

‘तत्पश्चात् समस्त प्रजा को दग्ध करने वाली प्रलयाग्नि के समान मैं बिना किसी घबराहट के अट्टालिका और गोपुरसहित उस पुरी को अपनी जलती हुई पूँछ की आग से जलाने लगा॥ १५८॥

विनष्टा जानकी व्यक्तं न ह्यदग्धः प्रदृश्यते।

लङ्कायाः कश्चिदुद्देशः सर्वा भस्मीकृता पुरी॥१५९॥

दहता च मया लङ्कां दग्धा सीता न संशयः।

रामस्य च महत्कार्यं मयेदं विफलीकृतम्॥१६०॥

‘फिर मैंने सोचा ‘लङ्का का कोई भी स्थान ऐसा नहीं दिखायी देता है, जो जला हुआ न हो, सारी नगरी जलकर भस्म हो गयी है। अतः अवश्य ही जानकीजी भी नष्ट हो गयी होंगी। इसमें संदेह नहीं कि लङ्का को जलाते-जलाते मैंने सीताजी को भी जला दिया और इस प्रकार भगवान् श्रीराम के इस महान् कार्य को मैंने निष्फल कर दिया’॥ १५९-१६० ॥

इति शोकसमाविष्टश्चिन्तामहमुपागतः।

ततोऽहं वाचमश्रौषं चारणानां शुभाक्षराम्॥१६१॥

जानकी न च दग्धेति विस्मयोदन्तभाषिणाम्।

‘इस तरह शोकाकुल होकर मैं बड़ी चिन्ता में पड़ गया। इतने ही में आश्चर्ययुक्त वृत्तान्त का वर्णन करने वाले चारणों की शुभ अक्षरों से विभूषित यह वाणी मेरे कानों में पड़ी कि जानकीजी इस आग से नहीं जली हैं॥ १६१ १/२॥

ततो मे बुद्धिरुत्पन्ना श्रुत्वा तामद्भुतां गिरम्॥१६२॥

अदग्धा जानकीत्येव निमित्तैश्चोपलक्षितम्।

दीप्यमाने तु लाङ्गले न मां दहति पावकः॥१६३॥

हृदयं च प्रहृष्टं मे वाताः सुरभिगन्धिनः।

‘उस अद्भुत वाणी को सुनकर मेरे मन में यह विचार उत्पन्न हुआ—’शुभ शकुनों से भी यही जान पड़ता है कि जानकीजी नहीं जली हैं; क्योंकि पूँछ में आग लग जाने पर भी अग्निदेव मुझे जला नहीं रहे हैं। मेरे हृदय में महान् हर्ष भरा हुआ है और उत्तम सुगन्ध से युक्त मन्द-मन्द वायु चल रही है’ ॥ १६२-१६३ १/२ ।।

तैर्निमित्तैश्च दृष्टाथैः कारणैश्च महागुणैः॥१६४॥

ऋषिवाक्यैश्च दृष्टार्थैरभवं हृष्टमानसः।

‘जिनके फलों का मुझे प्रत्यक्ष अनुभव हो चुका था, उन उत्तम शकुनों, महान् गुणशाली कारणों तथा ऋषियों (चारणों) की प्रत्यक्ष देखी हुई बातोंसे भी सीताजी के सकुशल होने का विश्वास करके मेरा मन हर्ष से भर गया॥१६४ १/२ ॥

पुनर्दृष्टा च वैदेही विसृष्टश्च तया पुनः॥१६५॥

ततः पर्वतमासाद्य तत्रारिष्टमहं पुनः।

प्रतिप्लवनमारेभे युष्मदर्शनकाङ्ख्या॥१६६॥

‘तत्पश्चात् मैंने पुनः विदेहनन्दिनी का दर्शन किया और फिर उनसे विदा लेकर मैं अरिष्ट पर्वत पर आ गया। वहीं से आपलोगों के दर्शन की इच्छा से मैंने प्रतिप्लवन (दुबारा आकाश में उड़ना) आरम्भ किया॥

ततः श्वसनचन्द्रार्कसिद्धगन्धर्वसेवितम्।

पन्थानमहमाक्रम्य भवतो दृष्टवानिह ॥१६७॥

‘तत्पश्चात् वायु, चन्द्रमा, सूर्य, सिद्ध और गन्धर्वो से सेवित मार्ग का आश्रय ले यहाँ पहुँचकर मैंने आपलोगों का दर्शन किया है॥ १६७॥

राघवस्य प्रसादेन भवतां चैव तेजसा।

सुग्रीवस्य च कार्यार्थं मया सर्वमनुष्ठितम्॥१६८॥

‘श्रीरामचन्द्रजी की कृपा और आपलोगों के प्रभाव से मैंने सुग्रीव के कार्य की सिद्धि के लिये सब कुछ किया है॥ १६८॥

एतत् सर्वं मया तत्र यथावदुपपादितम्।

तत्र यन्न कृतं शेषं तत् सर्वं क्रियतामिति॥१६९॥

‘यह सारा कार्य मैंने वहाँ यथोचित रूप से सम्पन्न किया है। जो कार्य नहीं किया है अथवा जो शेष रह गया है, वह सब आपलोग पूर्ण करें’॥ १६९॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे अष्टपञ्चाशः सर्गः॥५८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में अट्ठावनवाँ सर्ग पूरा हुआ।५८॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
सुन्दरकाण्डम्

हनुमान जी का सीता की दुरवस्था बताकर वानरों को लङ्का पर आक्रमण करने के लिये उत्तेजित करना

एकोनषष्टितमः सर्गः

सर्ग-59


एतदाख्याय तत् सर्वं हनूमान् मारुतात्मजः।

भूयः समुपचक्राम वचनं वक्तुमुत्तरम्॥१॥

यह सब वृत्तान्त बताकर पवनकुमार हनुमान् जी ने पुनः उत्तम बातें कहनी आरम्भ की— ॥१॥

सफलो राघवोद्योगः सुग्रीवस्य च सम्भ्रमः।

शीलमासाद्य सीताया मम च प्रीणितं मनः॥२॥

‘कपिवरो! श्रीरामचन्द्रजी का उद्योग और सुग्रीव का उत्साह सफल हुआ। सीताजी का उत्तम शील-स्वभाव (पातिव्रत्य) देखकर मेरा मन अत्यन्त संतुष्ट हुआ

आर्यायाः सदृशं शीलं सीतायाः प्लवगर्षभाः।

तपसा धारयेल्लोकान् क्रुद्धा वा निर्दहेदपि॥३॥

‘वानरशिरोमणियो! जिस नारी का शील-स्वभाव आर्या सीता के समान होगा, वह अपनी तपस्यासेसम्पूर्ण लोकों को धारण कर सकती है अथवा कुपित होने पर तीनों लोकों को जला सकती है॥३॥

सर्वथातिप्रकृष्टोऽसौ रावणो राक्षसेश्वरः।

यस्य तां स्पृशतो गात्रं तपसा न विनाशितम्॥४॥

‘राक्षसराज रावण सर्वथा महान् तपोबल से सम्पन्न जान पड़ता है। जिसका अङ्ग सीता का स्पर्श करते समय उनकी तपस्या से नष्ट नहीं हो गया॥४॥

न तदग्निशिखा कुर्यात् संस्पृष्टा पाणिना सती।

जनकस्य सुता कुर्याद् यत् क्रोधकलुषीकृता॥

‘हाथ से छू जाने पर आगकी लपट भी वह काम नहीं कर सकती, जो क्रोध दिलाने पर जनकनन्दिनी सीता कर सकती हैं॥५॥

जाम्बवत्प्रमुखान् सर्वाननुज्ञाप्य महाकपीन्।

अस्मिन् नेवंगते कार्ये भवतां च निवेदिते।

न्याय्यं स्म सह वैदेह्या द्रष्टं तौ पार्थिवात्मजौ॥

‘इस कार्य में मुझे जहाँ तक सफलता मिली है, वह सब इस रूप में मैंने आपलोगों को बता दिया। अब जाम्बवान् आदि सभी महाकपियों की सम्मति लेकर हम (सीता को रावण के कारावास से लौटाकर) सीता के साथ ही श्रीरामचन्द्रजी और लक्ष्मण का दर्शन करें, यही न्यायसङ्गत जान पड़ता है॥६॥

अहमेकोऽपि पर्याप्तः सराक्षसगणां पुरीम्।

तां लङ्कां तरसा हन्तुं रावणं च महाबलम्॥७॥

किं पुनः सहितो वीरैर्बलवद्भिः कृतात्मभिः।

कृतास्त्रैः प्लवगैः शक्तैर्भवद्भिर्विजयैषिभिः॥८॥

‘मैं अकेला भी राक्षसगणोंसहित समस्त लङ्कापुरी का वेगपूर्वक विध्वंस करने तथा महाबली रावण को मार डालने के लिये पर्याप्त हूँ। फिर यदि सम्पूर्ण अस्त्रों को जानने वाले आप-जैसे वीर, बलवान्, शुद्धात्मा, शक्तिशाली और विजयाभिलाषी वानरों की सहायता मिल जाय, तब तो कहना ही क्या है॥ ७-८॥

अहं तु रावणं युद्धे ससैन्यं सपुरःसरम्।

सहपुत्रं वधिष्यामि सहोदरयुतं युधि॥९॥

‘युद्धस्थल में सेना, अग्रगामी सैनिक, पुत्र और सगे भाइयोंसहित रावण का तो मैं ही वध कर डालूँगा।९॥

ब्राह्ममस्त्रं च रौद्रं च वायव्यं वारुणं तथा।

यदि शक्रजितोऽस्त्राणि दुर्निरीक्ष्याणि संयुगे।

तान्यहं निहनिष्यामि विधमिष्यामि राक्षसान्॥१०॥

‘यद्यपि इन्द्रजित् के ब्राह्म अस्त्र, रौद्र, वायव्य तथा वारुण आदि अस्त्र युद्ध में दुर्लक्ष्य होते हैं किसी की दृष्टि में नहीं आते हैं, तथापि मैं ब्रह्माजी के वरदान से उनका निवारण कर दूंगा और राक्षसों का संहार कर डालूँगा॥१०॥

भवतामभ्यनुज्ञातो विक्रमो मे रुणद्धि तम्।

मयातुला विसृष्टा हि शैलवृष्टिर्निरन्तरा॥११॥

देवानपि रणे हन्यात् किं पुनस्तान् निशाचरान्।

‘यदि आपलोगों की आज्ञा मिल जाय तो मेरा पराक्रम रावण को कुण्ठित कर देगा। मेरे द्वारा लगातार बरसाये जाने वाले पत्थरों की अनुपम वृष्टि रणभूमि में देवताओं को भी मौत के घाट उतार देगी; फिर उन निशाचरों की तो बात ही क्या है ? ॥ ११ १/२॥

भवतामननुज्ञातो विक्रमो मे रुणद्धि माम्॥१२॥

सागरोऽप्यतियाद् वेलां मन्दरः प्रचलेदपि।

न जाम्बवन्तं समरे कम्पयेदरिवाहिनी॥१३॥

‘आपलोगों की आज्ञा न होने के कारण ही मेरा पुरुषार्थ मुझे रोक रहा है। समुद्र अपनी मर्यादा को लाँघ जाय और मन्दराचल अपने स्थान से हट जाय, परंतु समराङ्गण में शत्रुओं की सेना जाम्बवान् को विचलित कर दे, यह कभी सम्भव नहीं है॥ १२-१३॥

सर्वराक्षससङ्घानां राक्षसा ये च पूर्वजाः।

अलमेकोऽपि नाशाय वीरो वालिसुतः कपिः॥१४॥

‘सम्पूर्ण राक्षसों और उनके पूर्वजों को भी यमलोक पहुँचाने के लिये वाली के वीर पुत्र कपिश्रेष्ठ अङ्गद अकेले ही काफी हैं॥ १४॥

प्लवगस्योरुवेगेन नीलस्य च महात्मनः।

मन्दरोऽप्यवशीर्येत किं पुनर्युधि राक्षसाः॥१५॥

‘वानरवीर महात्मा नील के महान् वेग से मन्दराचल भी विदीर्ण हो सकता है; फिर युद्ध में राक्षसों का नाश करना उनके लिये कौन बड़ी बात है ? ॥ १५ ॥

सदेवासुरयक्षेषु गन्धर्वोरगपक्षिषु।

मैन्दस्य प्रतियोद्धारं शंसत द्विविदस्य वा॥१६॥

‘तुम सब-के-सब बताओ तो सही-देवता, असुर, यक्ष, गन्धर्व, नाग और पक्षियों में भी कौन ऐसा वीर है, जो मैन्द अथवा द्विविद के साथ लोहा ले सके?॥ १६॥

अश्विपुत्रौ महावेगावेतौ प्लवगसत्तमौ।

एतयोः प्रतियोद्धारं न पश्यामि रणाजिरे॥१७॥

‘ये दोनों वानरशिरोमणि महान् वेगशाली तथा अश्विनीकुमारों के पुत्र हैं। समराङ्गण में इन दोनों का सामना करने वाला मुझे कोई नहीं दिखायी देता॥ १७॥

मयैव निहता लङ्का दग्धा भस्मीकृता पुरी।

राजमार्गेषु सर्वेषु नाम विश्रावितं मया॥१८॥

‘मैंने अकेले ही लङ्कावासियों को मार गिराया, नगरमें आग लगा दी और सारी पुरी को जलाकर भस्म कर दिया। इतना ही नहीं, वहाँ की सब सड़कों पर मैंने अपने नाम का डंका पीट दिया॥१८॥

जयत्यतिबलो रामो लक्ष्मणश्च महाबलः।

राजा जयति सुग्रीवो राघवेणाभिपालितः॥१९॥

अहं कोसलराजस्य दासः पवनसम्भवः।।

हनुमानिति सर्वत्र नाम विश्रावितं मया॥२०॥

‘अत्यन्त बलशाली श्रीराम और महाबली लक्ष्मण की जय हो। श्रीरघुनाथजी के द्वारा सुरक्षित राजा सुग्रीव की भी जय हो। मैं कोसलनरेश श्रीरामचन्द्रजी का दास और वायुदेवता का पुत्र हूँ। हनुमान् मेरा नाम है-इस प्रकार सर्वत्र अपने नाम की घोषणा कर दी है। १९-२०॥

अशोकवनिकामध्ये रावणस्य दुरात्मनः।

अधस्ताच्छिंशपामूले साध्वी करुणमास्थिता॥२१॥

‘दुरात्मा रावण की अशोकवाटिका के मध्यभाग में एक अशोक-वृक्ष के नीचे साध्वी सीता बड़ी दयनीय अवस्था में रहती हैं॥ २१॥

राक्षसीभिः परिवृता शोकसंतापकर्शिता।

मेघरेखापरिवृता चन्द्ररेखेव निष्प्रभा॥२२॥

‘राक्षसियों से घिरी हुई होने के कारण वे शोकसंताप से दुर्बल होती जा रही हैं। बादलों की पंक्ति से घिरी हुई चन्द्रलेखा की भाँति श्रीहीन हो गयी हैं॥ २२॥

अचिन्तयन्ती वैदेही रावणं बलदर्पितम्।

पतिव्रता च सुश्रोणी अवष्टब्धा च जानकी॥२३॥

‘सुन्दर कटिप्रदेशवाली विदेहनन्दिनी जानकी पतिव्रता हैं। वे बल के घमंड में भरे रहने वाले रावण को कुछ भी नहीं समझती हैं तो भी उसी की कैद में पड़ी हैं॥ २३॥

अनुरक्ता हि वैदेही रामे सर्वात्मना शुभा।

अनन्यचित्ता रामेण पौलोमीव पुरन्दरे॥२४॥

‘कल्याणी सीता श्रीराम में सम्पूर्ण हृदय से अनुरक्त हैं, जैसे शची देवराज इन्द्र में अनन्य प्रेम रखती हैं, उसी प्रकार सीता का चित्त अनन्यभाव से श्रीराम के ही चिन्तन में लगा हुआ है॥ २४॥

तदेकवासःसंवीता रजोध्वस्ता तथैव च।

सा मया राक्षसीमध्ये तय॑माना मुहर्मुहुः॥ २५॥

राक्षसीभिर्विरूपाभिर्दृष्टा हि प्रमदावने।

एकवेणीधरा दीना भर्तृचिन्तापरायणा॥२६॥

‘वे एक ही साड़ी पहने धूलि-धूसरित हो रही हैं। राक्षसियों के बीच में रहती हैं और उन्हें बारंबार उनकी डाँट-फटकार सुननी पड़ती है। इस अवस्था में कुरूप राक्षसियों से घिरी हुई सीता को मैंने प्रमदावन में देखा है। वे एक ही वेणी धारण किये दीनभाव से केवल अपने पतिदेव के चिन्तन में लगी रहती हैं॥ २५-२६॥

अधःशय्या विवर्णाङ्गी पद्मिनीव हिमोदये।

रावणाद् विनिवृत्तार्था मर्तव्यकृतनिश्चया॥२७॥

‘वे नीचे भूमि पर सोती हैं। हेमन्त ऋतु में कमलिनी की भाँति उनके अङ्गों की कान्ति फीकी पड़ गयी है। रावण से उनका कोई प्रयोजन नहीं है। वे मरने का निश्चय किये बैठी हैं।॥ २७॥

कथंचिन्मृगशावाक्षी विश्वासमुपपादिता।

ततः सम्भाषिता चैव सर्वमर्थं प्रकाशिता॥ २८॥

‘उन मृगनयनी सीता को  मैंने बड़ी कठिनाई से किसी तरह अपना विश्वास दिलाया। तब उनसे बातचीत का अवसर मिला और सारी बातें मैं उनके समक्ष रख सका॥

रामसुग्रीवसख्यं च श्रुत्वा प्रीतिमुपागता।

नियतः समुदाचारो भक्तिभर्तरि चोत्तमा॥२९॥

‘श्रीराम और सुग्रीव की मित्रता की बात सुनकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। सीताजी में सुदृढ़ सदाचार (पातिव्रत्य) विद्यमान है। अपने पति के प्रति उनके हृदय में उत्तम भक्ति है॥ २९॥

यन्न हन्ति दशग्रीवं स महात्मा दशाननः।

निमित्तमात्रं रामस्तु वधे तस्य भविष्यति॥३०॥

‘सीता स्वयं ही जो रावण को नहीं मार डालती हैं, इससे जान पड़ता है कि दशमुख रावण महात्मा है तपोबल से सम्पन्न होने के कारण शाप पाने के अयोग्य है (तथापि सीताहरण के पाप से वह नष्टप्राय ही है)। श्रीरामचन्द्रजी उसके वध में केवल निमित्तमात्र होंगे। ३०॥

सा प्रकृत्यैव तन्वङ्गी तद्वियोगाच्च कर्शिता।

प्रतिपत्पाठशीलस्य विद्येव तनुतां गता॥३१॥

‘भगवती सीता एक तो स्वभावसे ही दुबली-पतली हैं, दूसरे श्रीरामचन्द्रजी के वियोग से और भी कृश हो गयी हैं। जैसे प्रतिपदा के दिन स्वाध्याय करने वाले विद्यार्थी की विद्या क्षीण हो जाती है, उसी प्रकार उनका शरीर भी अत्यन्त दुर्बल हो गया है॥ ३१॥

एवमास्ते महाभागा सीता शोकपरायणा।

यदत्र प्रतिकर्तव्यं तत् सर्वमुपकल्प्यताम्॥३२॥

‘इस प्रकार महाभागा सीता सदा शोक में डूबी रहती हैं। अतः इस समय जो प्रतीकार करना हो, वह सब आपलोग करें’॥ ३२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे एकोनषष्टितमः सर्गः॥५९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में उनसठवाँ सर्ग पूरा हुआ।५९॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
सुन्दरकाण्डम्

अङ्गद का लङ्का को जीतकर सीता को ले आने का उत्साहपूर्ण विचार और जाम्बवान् के द्वारा उसका निवारण

षष्टितमः सर्गः

सर्ग-60


तस्य तद् वचनं श्रुत्वा वालिसूनुरभाषत।

अश्विपुत्रौ महावेगौ बलवन्तौ प्लवंगमौ॥१॥

हनुमान जी की यह बात सुनकर बालिपुत्र अङ्गद ने कहा—’अश्विनीकुमार के पुत्र ये मैन्द और द्विविद दोनों वानर अत्यन्त वेगशाली और बलवान् हैं॥१॥

पितामहवरोत्सेकात् परमं दर्पमास्थितौ।

अश्विनोर्माननार्थं हि सर्वलोकपितामहः॥२॥

सर्वावध्यत्वमतुलमनयोर्दत्तवान् पुरा।

वरोत्सेकेन मत्तौ च प्रमथ्य महतीं चमूम्॥३॥

सुराणाममृतं वीरौ पीतवन्तौ महाबलौ।

‘पूर्वकाल में ब्रह्माजी का वर मिलने से इनका अभिमान बढ़ गया और ये बड़े घमण्ड में भर गये थे। सम्पूर्णलोकों के पितामह ब्रह्माजी ने अश्विनीकुमारों का मान रखने के लिये पहले इन दोनों को यह अनुपम वरदान दिया था कि तुम्हें कोई भी मार नहीं सकता। उस वर के अभिमान से मत्त हो इन दोनों महाबली वीरों ने देवताओं की विशाल सेना को मथकर अमृत पी लिया था॥२-३ १/२॥

एतावेव हि संक्रुद्धौ सवाजिरथकुञ्जराम्॥४॥

लङ्कां नाशयितुं शक्तौ सर्वे तिष्ठन्तु वानराः।

‘ये ही दोनों यदि क्रोध में भर जायँ तो हाथी, घोड़े और रथोंसहित समूची लङ्का का नाश कर सकते हैं। भले ही और सब वानर बैठे रहें॥ ४ १/२॥

अहमेकोऽपि पर्याप्तः सराक्षसगणां पुरीम्॥५॥

तां लङ्कां तरसा हन्तुं रावणं च महाबलम्।

किं पुनः सहितो वीरैर्बलवद्भिः कृतात्मभिः॥६॥

कृतास्त्रैः प्लवगैः शक्तैर्भवद्भिर्विजयैषिभिः।

“मैं अकेला भी राक्षसगणोंसहित समस्त लङ्कापुरी का वेगपूर्वक विध्वंस करने तथा महाबली रावण को मार डालने के लिये पर्याप्त हूँ। फिर यदि सम्पूर्ण अस्त्रों को जानने वाले आप-जैसे वीर, बलवान्, शुद्धात्मा, शक्तिशाली और विजयाभिलाषी वानरों की सहायता मिल जाय, तब तो कहना ही क्या है? ॥ ५-६ १/२॥

वायुसूनोर्बलेनैव दग्धा लङ्केति नः श्रुतम्॥७॥

दृष्टा देवी न चानीता इति तत्र निवेदितुम्।

न युक्तमिव पश्यामि भवद्भिः ख्यातपौरुषैः॥८॥

‘वायुपुत्र हनुमान जी ने अकेले जाकर अपने पराक्रम से ही लङ्का को फूंक डाला—यह बात हम सबलोगों ने सुन ही ली। आप-जैसे ख्यातनामा पुरुषार्थी वीरों के रहते हुए मुझे भगवान् श्रीराम के सामने यह निवेदन करना उचित नहीं जान पड़ता कि ‘हमने सीतादेवी का दर्शन तो किया, किंतु उन्हें ला नहीं सके’ ॥ ७-८॥

नहि वः प्लवने कश्चिन्नापि कश्चित् पराक्रमे।

तुल्यः सामरदैत्येषु लोकेषु हरिसत्तमाः॥९॥

‘वानरशिरोमणियो! देवताओं और दैत्योंसहित सम्पूर्ण लोकों में कोई भी ऐसा वीर नहीं है, जो दूरतक की छलाँग मारने और पराक्रम दिखाने में आपलोगों की समानता कर सके॥९॥

जित्वा लङ्कां सरक्षौघां हत्वा तं रावणं रणे।

सीतामादाय गच्छामः सिद्धार्था हृष्टमानसाः॥

‘अतः निशाचरसमुदायसहित लङ्का को जीतकर, युद्ध में रावण का वध करके, सीता को साथ ले, सफल-मनोरथ एवं प्रसन्नचित्त होकर हमलोग श्रीरामचन्द्रजी के पास चलें॥ १० ॥

तेष्वेवं हतवीरेषु राक्षसेषु हनूमता।

किमन्यदत्र कर्तव्यं गृहीत्वा याम जानकीम्॥११॥

‘जब हनुमान जी ने राक्षसों के प्रमुख वीरों को मार डाला है, ऐसी परिस्थिति में हमारा इसके सिवा और क्या कर्तव्य हो सकता है कि हम जनकनन्दिनी सीता को साथ लेकर ही चलें॥११॥

रामलक्ष्मणयोर्मध्ये न्यस्याम जनकात्मजाम्।

किं व्यलीकैस्तु तान् सर्वान् वानरान्वानरर्षभान्॥१२॥

वयमेव हि गत्वा तान् हत्वा राक्षसपुङ्गवान्।

राघवं द्रष्टुमर्हामः सुग्रीवं सहलक्ष्मणम्॥१३॥

‘कपिवरो! हम जनककिशोरी को ले चलकर श्रीराम और लक्ष्मण के बीच में खड़ी कर दें। किष्किन्धा में जुटे हुए उन सब वानरों को कष्ट देने की क्या आवश्यकता है। हमलोग ही लङ्का में चलकर वहाँ के मुख्य-मुख्य राक्षसों का वध कर डालें, उसके बाद लौटकर श्रीराम, लक्ष्मण तथा सुग्रीव का दर्शन करें’॥ १२-१३॥

तमेवं कृतसंकल्पं जाम्बवान् हरिसत्तमः।

उवाच परमप्रीतो वाक्यमर्थवदर्थवित्॥१४॥

अङ्गद का ऐसा संकल्प जानकर वानर-भालुओं में श्रेष्ठ और अर्थतत्त्व के ज्ञाता जाम्बवान् ने अत्यन्त प्रसन्न होकर यह सार्थक बात कही- ॥ १४ ॥

नैषा बुद्धिर्महाबुद्धे यद् ब्रवीषि महाकपे।

विचेतुं वयमाज्ञप्ता दक्षिणां दिशमुत्तमाम्॥१५॥

नानेतुं कपिराजेन नैव रामेण धीमता।

‘महाकपे! तुम बड़े बुद्धिमान् हो तथापि इस समय जो कुछ कह रहे हो, यह बुद्धिमानी की बात नहीं है; क्योंकि वानरराज सुग्रीव तथा परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीराम ने हमें उत्तम दक्षिण दिशा में केवल सीता को खोजने की आज्ञा दी है, साथ ले आने की नहीं॥ १५ १/२॥

कथंचिन्निर्जितां सीतामस्माभिर्नाभिरोचयेत्॥१६॥

राघवो नृपशार्दूलः कुलं व्यपदिशन् स्वकम्।

‘यदि हमलोग किसी तरह सीता को जीतकर उनके पास ले भी चलें तो नृपश्रेष्ठ श्रीराम अपने कुल के व्यवहार का स्मरण करते हुए हमारे इस कार्य को पसंद नहीं करेंगे। १६ १/२॥

प्रतिज्ञाय स्वयं राजा सीताविजयमग्रतः॥१७॥

सर्वेषां कपिमुख्यानां कथं मिथ्या करिष्यति।

‘राजा श्रीरामने सभी प्रमुख वानरवीरों के सामने स्वयं ही सीता को जीतकर लाने की प्रतिज्ञा की है, उसे वे मिथ्या कैसे करेंगे? ॥ १७ १/२ ॥

विफलं कर्म च कृतं भवेत् तुष्टिर्न तस्य च॥१८॥

वृथा च दर्शितं वीर्यं भवेद् वानरपुङ्गवाः।

‘अतः वानरशिरोमणियो! ऐसी अवस्था में हमारा किया-कराया कार्य निष्फल हो जायगा। भगवान् श्रीराम को संतोष भी नहीं होगा और हमारा पराक्रम दिखाना भी व्यर्थ सिद्ध होगा॥ १८ १/२ ॥

तस्माद् गच्छाम वै सर्वे यत्र रामः सलक्ष्मणः।

सुग्रीवश्च महातेजाः कार्यस्यास्य निवेदने॥१९॥

‘इसलिये हम सब लोग इस कार्य की सूचना देने के लिये वहीं चलें, जहाँ लक्ष्मणसहित भगवान् श्रीराम और महातेजस्वी सुग्रीव विद्यमान हैं॥ १९ ॥

न तावदेषा मतिरक्षमा नो यथा भवान् पश्यति राजपुत्र।

यथा तु रामस्य मतिर्निविष्टा तथा भवान् पश्यतु कार्यसिद्धिम्॥२०॥

‘राजकुमार! तुम जैसा देखते या सोचते हो, यह विचार हमलोगों के योग्य ही है हम इसे न कर सकें, ऐसी बात नहीं है; तथापि इस विषय में भगवान् श्रीराम का जैसा निश्चय हो, उसी के अनुसार तुम्हें कार्यसिद्धि पर दृष्टि रखनी चाहिये’ ॥ २०॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे षष्टितमः सर्गः॥६०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में साठवाँ सर्ग पूरा हुआ।६०॥