॥श्री गणेशाय नम:॥
॥श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
**************
सम्पूर्ण वाल्मीकि रामायण
[काव्य बीजं सनातनम्]

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

सुग्रीव का दक्षिण दिशा के स्थानों का परिचय देते हुए वहाँ प्रमुख वानर वीरों को भेजना

एकचत्वारिंशः सर्गः

सर्ग-41


ततः प्रस्थाप्य सुग्रीवस्तन्महद्वानरं बलम्।

दक्षिणां प्रेषयामास वानरानभिलक्षितान्॥१॥

इस प्रकार वानरों की बहुत बड़ी सेना को पूर्व दिशा में प्रस्थापित करके सुग्रीव ने दक्षिण दिशाकी ओर चुने हुए वानरों को, जो भलीभाँति परख लिये गये थे, भेजा॥१॥

नीलमग्निसुतं चैव हनूमन्तं च वानरम्।

पितामहसुतं चैव जाम्बवन्तं महौजसम्॥२॥

सुहोत्रं च शरारिं च शरगुल्मं तथैव च।

गजं गवाक्षं गवयं सुषेणं वृषभं तथा॥३॥

मैन्दं च द्विविदं चैव सुषेणं गन्धमादनम्।

उल्कामुखमनङ्गं च हुताशनसुतावुभौ॥४॥

अङ्गदप्रमुखान् वीरान् वीरः कपिगणेश्वरः।

वेगविक्रमसम्पन्नान् संदिदेश विशेषवित्॥५॥

अग्निपुत्र नील, कपिवर हनुमान् जी , ब्रह्माजी के महाबली पुत्र जाम्बवान्, सुहोत्र, शरारि, शरगुल्म, गज, गवाक्ष, गवय, सुषेण* (प्रथम), वृषभ, मैन्द, द्विविद, सुषेण (द्वितीय), गन्धमादन, हुताशन के दो पुत्र उल्कामुख और अनङ्ग (असङ्ग) तथा अङ्गद आदि प्रधान-प्रधान वीरों को, जो महान् वेग और पराक्रम से सम्पन्न थे, विशेषज्ञ वानरराज सुग्रीव ने दक्षिण की ओर जाने की आज्ञा दी॥ २–५॥

* सुषेण दो थे—एक तारा के पिता और दूसरा उनसे भिन्न वानरयूथपति था।

तेषामग्रेसरं चैव बृहबलमथाङ्गदम्।

विधाय हरिवीराणामादिशद दक्षिणां दिशम्॥

महान् बलशाली अङ्गद को उन समस्त वानर वीरों का अगुआ बनाकर उन्हें दक्षिण दिशा में सीता की खोज का भार सौंपा॥६॥

ये केचन समद्देशास्तस्यां दिशि सदर्गमाः।

कपीशः कपिमुख्यानां स तेषां समुदाहरत्॥७॥

उस दिशा में जो कोई भी स्थान अत्यन्त दुर्गम थे, उनका भी कपिराज सुग्रीव ने उन श्रेष्ठ वानरों को परिचय दिया* ॥ ७॥

* यहाँ दक्षिण दिशा का विभाग किष्किन्धा से न करके आर्यावर्त से किया गया है। पूर्व समुद्र से पश्चिम समुद्र और हिमालय से विन्ध्य के भाग को आर्यावर्त कहते हैं। सुग्रीव ने दक्षिण दिशा के जिन स्थानों का परिचय दिया है, उनकी सङ्गति आर्यावर्त से ही दिशा का विभाजन करने पर लगती है।

सहस्रशिरसं विन्ध्यं नानाद्रुमलतायुतम्।

नर्मदां च नदी रम्यां महोरगनिषेविताम्॥८॥

ततो गोदावरी रम्यां कृष्णवेणीं महानदीम्।

वरदां च महाभागां महोरगनिषेविताम्।

मेखलानुत्कलांश्चैव दशार्णनगराण्यपि॥९॥

आब्रवन्तीमवन्तीं च सर्वमेवानुपश्यत।

वे बोले—’वानरो! तुमलोग भाँति-भाँति के वृक्षों और लताओं से सुशोभित सहस्रों शिखरों वाले विन्ध्यपर्वत, बड़े-बड़े नागों से सेवित रमणीय नर्मदा नदी, सुरम्य गोदावरी, महानदी, कृष्णवेणी तथा बड़े

बड़े नागों से सेवित महाभागा वरदा आदि नदियों के तटों पर और मेखल (मेकल), उत्कल एवं दशार्ण देश के नगरों में तथा आब्रवन्ती और अवन्तीपुरी में भी सब जगह सीता की खोज करो॥ ८-९ १/२ ॥

विदर्भानृष्टिकांश्चैव रम्यान् माहिषकानपि॥१०॥

तथा वङ्गान् कलिङ्गांश्च कौशिकांश्च समन्ततः।

अन्वीक्ष्य दण्डकारण्यं सपर्वतनदीगुहम्॥११॥

नदी गोदावरीं चैव सर्वमेवानुपश्यत।

तथैवान्ध्रांश्च पुण्ड्रांश्च चोलान् पाण्ड्यांश्च केरलान्॥१२॥

‘इसी प्रकार विदर्भ, ऋष्टिक, रम्य माहिषक देश, वङ्ग *, कलिङ्ग तथा कौशिक आदि देशों में सब ओर देखभाल करके पर्वत, नदी और गुफाओंसहित समूचे दण्डकारण्य में छानबीन करना। वहाँ जो गोदावरी नदी है, उसमें सब ओर बारंबार देखना। इसी प्रकार आन्ध्र, पुण्ड्र, चोल, पाण्ड्य तथा केरल आदि देशों में भी ढूँढना॥

* अन्य पाठ के अनुसार यहाँ मत्स्य देश समझना चाहिये।

अयोमुखश्च गन्तव्यः पर्वतो धातुमण्डितः।

विचित्रशिखरः श्रीमांश्चित्रपुष्पितकाननः॥१३॥

सुचन्दनवनोद्देशो मार्गितव्यो महागिरिः।

‘तदनन्तर अनेक धातुओं से अलंकृत अयोमुख* (मलय) पर्वत पर भी जाना, उसके शिखर बड़े विचित्र हैं। वह शोभाशाली पर्वत फूले हुए विचित्र काननों से युक्त है। उसके सभी स्थानों में सुन्दर चन्दन के वन हैं। उस महापर्वत मलय पर सीता की अच्छी तरह खोज करना।

* रामायण तिलक के लेखक अयोमुख को मलय-पर्वत का नामान्तर मानते हैं। गोविन्दराज इसे सह्यपर्वत का पर्याय समझते हैं तथा रामायणशिरोमणिकार अयोमुख को इन दोनों से भिन्न स्वतन्त्र पर्वत मानते हैं। यहाँ तिलककार के मत का अनुसरण किया गया है।

ततस्तामापगां दिव्यां प्रसन्नसलिलाशयाम्॥१४॥

तत्र द्रक्ष्यथ कावेरी विहृतामप्सरोगणैः।

‘तत्पश्चात् स्वच्छ जलवाली दिव्य नदी कावेरी को देखना, जहाँ अप्सराएँ विहार करती हैं॥ १४ १/२ ॥

तस्यासीनं नगस्याग्रे मलयस्य महौजसम्॥१५॥

द्रक्ष्यथादित्यसंकाशमगस्त्यमृषिसत्तमम् ।।

‘उस प्रसिद्ध मलयपर्वत के शिखर पर बैठे हुए सूर्य के समान महान् तेज से सम्पन्न मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य का* दर्शन करना ॥ १५ ॥

* यद्यपि पहले पञ्चवटी से उत्तर भाग में अगस्त्य के आश्रम का वर्णन आया है तथापि यहाँ मलयपर्वत पर भी उनका आश्रम था, ऐसा मानना चाहिये। जैसे वाल्मीकि मुनि का आश्रम अनेक स्थानों में था, उसी तरह इनका भी था अथवा ये उसी नाम के कोई दूसरे ऋषि थे।

ततस्तेनाभ्यनुज्ञाताः प्रसन्नेन महात्मना॥१६॥

ताम्रपर्णी ग्राहजुष्टां तरिष्यथ महानदीम्।

‘इसके बाद उन प्रसन्नचित्त महात्मा से आज्ञा लेकर ग्राहों से सेवित महानदी ताम्रपर्णी को पार करना॥ १६ १/२॥

सा चन्दनवनैश्चित्रैः प्रच्छन्नदीपवारिणी॥१७॥

कान्तेव युवती कान्तं समुद्रमवगाहते।

‘उसके द्वीप और जल विचित्र चन्दनवनों से आच्छादित हैं; अतः वह सुन्दर साड़ी से विभूषित युवती प्रेयसी की भाँति अपने प्रियतम समुद्र से मिलती है॥ १७ १/२॥

ततो हेममयं दिव्यं मुक्तामणिविभूषितम्॥१८॥

युक्तं कवाटं पाण्ड्यानां गता द्रक्ष्यथ वानराः।

‘वानरो! वहाँ से आगे बढ़ने पर तुमलोग पाण्ड्यवंशी राजाओं के नगर द्वार पर* लगे हुए सुवर्णमय कपाट का दर्शन करोगे, जो मुक्तामणियों से विभूषित एवं दिव्य है॥

* आधुनिक तंजौर ही प्राचीन पाण्ड्यवंशी नरेशों का नगर है। इस नगर में भी छानबीन करने के लिये सुग्रीव वानरों को आदेश दे रहे हैं।

ततः समुद्रमासाद्य सम्प्रधार्यार्थनिश्चयम्॥१९॥

अगस्त्येनान्तरे तत्र सागरे विनिवेशितः।

चित्रसानुनगः श्रीमान् महेन्द्रः पर्वतोत्तमः॥२०॥

जातरूपमयः श्रीमानवगाढो महार्णवम्।

‘तत्पश्चात् समुद्र के तट पर जाकर उसे पार करने के सम्बन्ध में अपने कर्तव्य का भलीभाँति निश्चय करके उसका पालन करना। महर्षि अगस्त्य ने समुद्र के भीतर एक सुन्दर सुवर्णमय पर्वत को स्थापित किया है, जो महेन्द्रगिरि के नाम से विख्यात है। उसके शिखर तथा वहाँ के वृक्ष विचित्र शोभा से सम्पन्न हैं। वह शोभाशाली पर्वत श्रेष्ठ समुद्र के भीतर गहराई तक घुसा हुआ है।

नानाविधैर्नगैः फुल्लैलताभिश्चोपशोभितम्॥२१॥

देवर्षियक्षप्रवरैरप्सरोभिश्च शोभितम्।

सिद्धचारणसङ्घश्च प्रकीर्णं सुमनोरमम्॥२२॥

तमुपैति सहस्राक्षः सदा पर्वसु पर्वसु।

‘नाना प्रकार के खिले हुए वृक्ष और लताएँ उस पर्वत की शोभा बढ़ाती हैं। देवता, ऋषि, श्रेष्ठ यक्ष और अप्सराओं की उपस्थिति से उसकी शोभा और भी बढ़ जाती है। सिद्धों और चारणों के समुदाय वहाँ सब ओर फैले रहते हैं। इन सबके कारण महेन्द्रपर्वत अत्यन्त मनोरम जान पड़ता है। सहस्र नेत्रधारी इन्द्रप्रत्येक पर्व के दिन उस पर्वत पर पदार्पण करते हैं। २१-२२ १/२॥

द्वीपस्तस्यापरे पारे शतयोजनविस्तृतः॥२३॥

अगम्यो मानुषैदीप्तस्तं मार्गध्वं समन्ततः।

तत्र सर्वात्मना सीता मार्गितव्या विशेषतः॥ २४॥

‘उस समुद्र के उस पार एक द्वीप है, जिसका विस्तार सौ योजन है। वहाँ मनुष्यों की पहुँच नहीं है। वह जो दीप्तिशाली द्वीप है, उसमें चारों ओर पूरा प्रयत्न करके तुम्हें सीता की विशेष रूप से खोज करनी चाहिये।

स हि देशस्तु वध्यस्य रावणस्य दुरात्मनः।

राक्षसाधिपतेर्वासः सहस्राक्षसमद्युतेः॥ २५॥

‘वही देश इन्द्र के समान तेजस्वी दुरात्मा राक्षसराज रावण का, जो हमारा वध्य है, निवास स्थान है॥ २५ ॥

दक्षिणस्य समुद्रस्य मध्ये तस्य तु राक्षसी।

अङ्गारकेति विख्याता छायामाक्षिप्य भोजिनी॥२६॥

‘उस दक्षिण समुद्र के बीच में अङ्गार का नाम से प्रसिद्ध एक राक्षसी रहती है, जो छाया पकड़कर ही प्राणियों को खींच लेती और उन्हें खा जाती है॥२६॥

एवं निःसंशयान् कृत्वा संशयान्नष्टसंशयाः।

मृगयध्वं नरेन्द्रस्य पत्नीममिततेजसः॥२७॥

‘उस लङ्का द्वीप में जो संदिग्ध स्थान हैं, उन सबमें इस तरह खोज करके जब तुम उन्हें संदेहरहित समझ लो और तुम्हारे मन का संशय निकल जाय, तब तुम लङ्का द्वीप को भी लाँघकर आगे बढ़ जाना और अमिततेजस्वी महाराज श्रीराम की पत्नी का अन्वेषण करना॥ २७॥

तमतिक्रम्य लक्ष्मीवान् समुद्रे शतयोजने।

गिरिः पुष्पितको नाम सिद्धचारणसेवितः॥२८॥

‘लङ्का को लाँघकर आगे बढ़ने पर सौ योजन विस्तृत समुद्र में एक पुष्पितक नाम का पर्वत है, जो परम शोभा से सम्पन्न तथा सिद्धों और चारणों से सेवित है।

चन्द्रसूर्यांशुसंकाशः सागराम्बुसमाश्रयः।

भ्राजते विपुलैः शृङ्गरम्बरं विलिखन्निव॥२९॥

‘वह चन्द्रमा और सूर्य के समान प्रकाशमान है तथा समुद्र के जल में गहराई तक घुसा हुआ है। वह अपने विस्तृत शिखरों से आकाश में रेखा खींचता हुआ-सा सुशोभित होता है॥२९॥

तस्यैकं काञ्चनं शृङ्ग सेवते यं दिवाकरः।

श्वेतं राजतमेकं च सेवते यन्निशाकरः।

न तं कृतघ्नाः पश्यन्ति न नृशंसा न नास्तिकाः॥३०॥

“उस पर्वत का एक सुवर्णमय शिखर है, जिसका प्रतिदिन सूर्यदेव सेवन करते हैं। उसी प्रकार इसका एक रजतमय श्वेत-शिखर है, जिसका चन्द्रमा सेवन करते हैं। कृतघ्न, नृशंस और नास्तिक पुरुष उस पर्वत-शिखर को नहीं देख पाते हैं॥ ३० ॥

प्रणम्य शिरसा शैलं तं विमार्गथ वानराः।

तमतिक्रम्य दुर्धर्षं सूर्यवान्नाम पर्वतः॥३१॥

‘वानरो! तुमलोग मस्तक झुकाकर उस पर्वत को प्रणाम करना और वहाँ सब ओर सीता को ढूँढ़ना उस दुर्धर्ष पर्वत को लाँघकर आगे बढ़ने पर सूर्यवान् नामक पर्वत मिलेगा॥

अध्वना दुर्विगाहेन योजनानि चतुर्दश।

ततस्तमप्यतिक्रम्य वैद्युतो नाम पर्वतः॥ ३२॥

‘वहाँ जाने का मार्ग बड़ा दुर्गम है और वह पुष्पितक से चौदह योजन दूर है। सूर्यवान् को लाँघकर जब तुमलोग आगे जाओगे, तब तुम्हें ‘वैद्युत’ नामक पर्वत मिलेगा।

सर्वकामफलैर्वृक्षैः सर्वकालमनोहरैः।

तत्र भुक्त्वा वराहा॑णि मूलानि च फलानि च॥३३॥

मधूनि पीत्वा जुष्टानि परं गच्छत वानराः।

‘वहाँ के वृक्ष सम्पूर्ण मनोवाञ्छित फलों से युक्त और सभी ऋतुओं में मनोहर शोभा से सम्पन्न हैं।वानरो! उनसे सुशोभित वैद्युत पर्वत पर उत्तम फलमूल खाकर और सेवन करने योग्य मधु पीकर तुमलोग आगे जाना॥

तत्र नेत्रमनःकान्तः कुञ्जरो नाम पर्वतः॥३४॥

अगस्त्यभवनं यत्र निर्मितं विश्वकर्मणा।।

‘फिर कुञ्जर नामक पर्वत दिखायी देगा, जो नेत्रों और मन को भी अत्यन्त प्रिय लगने वाला है। उसके ऊपर विश्वकर्मा का बनाया हुआ महर्षि अगस्त्य का* एक सुन्दर भवन है॥ ३४ १/२ ॥

* यह महर्षि अगस्त्य का तीसरा स्थान है।

तत्र योजनविस्तारमुच्छ्रितं दशयोजनम्॥ ३५॥

शरणं काञ्चनं दिव्यं नानारत्नविभूषितम्।

‘कुञ्जर पर्वत पर बना हुआ अगस्त्य का वह दिव्य भवन सुवर्णमय तथा नाना प्रकार के रत्नों से विभूषित है। उसका विस्तार एक योजन का और ऊँचाई दस योजन की है॥ ३५ १/२॥

तत्र भोगवती नाम सर्पाणामालयः पुरी॥ ३६॥

विशालरथ्या दुर्धर्षा सर्वतः परिरक्षिता।।

रक्षिता पन्नगै?रैस्तीक्ष्णदंष्ट्रमहाविषैः॥ ३७॥

‘उसी पर्वत पर सो की निवासभूता एक नगरी है, जिसका नाम भोगवती है (यह पाताल की भोगवती पुरी से भिन्न है)। यह पुरी दुर्जय है। उसकी सड़कें बहुत बड़ी और विस्तृत हैं। वह सब ओर से सुरक्षित है। तीखी दाढ़ वाले महाविषैले भयंकर सर्प उसकी रक्षा करते हैं। ३६-३७॥

सर्पराजो महाघोरो यस्यां वसति वासुकिः।

निर्याय मार्गितव्या च सा च भोगवती पुरी॥३८॥

‘उस भोगवती पुरी में महाभयंकर सर्पराज वासुकि निवास करते हैं (ये योगशक्ति से अनेक रूप धारण करके दोनों भोगवती पुरियों में एक साथ रह सकते हैं)। तुम्हें विशेष रूप से उस भोगवती पुरी में प्रवेश करके वहाँ सीता की खोज करनी चाहिये॥ ३८॥

तत्र चानन्तरोद्देशा ये केचन समावृताः।

तं च देशमतिक्रम्य महानृषभसंस्थितिः॥३९॥

‘उस पुरी में जो गुप्त एवं व्यवधानरहित स्थान हों, उन सब में सीता का अन्वेषण करना चाहिये। उस प्रदेश को लाँघकर आगे बढ़ने पर तुम्हें ऋषभ नामक महान् पर्वत मिलेगा।। ३९॥

सर्वरत्नमयः श्रीमानृषभो नाम पर्वतः।

गोशीर्षकं पद्मकं च हरिश्यामं च चन्दनम्॥४०॥

दिव्यमुत्पद्यते यत्र तच्चैवाग्निसमप्रभम्।

न तु तच्चन्दनं दृष्ट्वा स्प्रष्टव्यं तु कदाचन॥४१॥

‘वह शोभाशाली ऋषभ पर्वत सम्पूर्ण रत्नों से भरा हुआ है। वहाँ गोशीर्षक, पद्मक, हरिश्याम आदि नामों वाला दिव्य चन्दन उत्पन्न होता है। वह चन्दनवृक्ष अग्नि के समान प्रज्वलित होता रहता है। उस चन्दन को देखकर कदापि तुम्हें उसका स्पर्श नहीं करना चाहिये॥

रोहिता नाम गन्धर्वा घोरं रक्षन्ति तदनम्।

तत्र गन्धर्वपतयः पञ्च सूर्यसमप्रभाः॥४२॥

‘क्योंकि ‘रोहित’ नाम वाले गन्धर्व उस घोर वन की रक्षा करते हैं। वहाँ सूर्य के समान कान्तिमान् पाँच गन्धर्वराज रहते हैं॥ ४२॥

शैलूषो ग्रामणीः शिक्षः शुको बभ्रुस्तथैव च।

रविसोमाग्निवपुषां निवासः पुण्यकर्मणाम्॥४३॥

अन्ते पृथिव्या दुर्धर्षास्ततः स्वर्गजितः स्थिताः ।

‘उनके नाम ये हैं—शैलूष, ग्रामणी, शिक्ष (शिग्रु), शुक और बभ्रु। उस ऋषभ से आगे पृथिवी की अन्तिम सीमा पर सूर्य, चन्द्रमा तथा अग्नि के तुल्य तेजस्वी पुण्यकर्मा पुरुषों का निवास स्थान है। अतः वहाँ दुर्धर्ष स्वर्गविजयी (स्वर्ग के अधिकारी) पुरुष ही वास करते हैं। ४३ १/२॥

ततः परं न वः सेव्यः पितृलोकः सुदारुणः॥४४॥

राजधानी यमस्यैषा कष्टेन तमसाऽऽवृता।

‘उससे आगे अत्यन्त भयानक पितृलोक है; वहाँ तुम लोगों को नहीं जाना चाहिये। यह भूमि यमराज की राजधानी है, जो कष्टप्रद अन्धकार से आच्छादित है।

एतावदेव युष्माभिर्वीरा वानरपुंगवाः।

शक्यं विचेतुं गन्तुं वा नातो गतिमतां गतिः॥४५॥

‘वीर वानरपुङ्गवो! बस, दक्षिण दिशा में इतनी ही दूरतक तुम्हें जाना और खोजना है। उससे आगे पहुँचना असम्भव है; क्योंकि उधर जंगम प्राणियों की गति नहीं है।

सर्वमेतत् समालोक्य यच्चान्यदपि दृश्यते।

गतिं विदित्वा वैदेह्याः संनिवर्तितुमर्हथ॥४६॥

‘इन सब स्थानों में अच्छी तरह देख-भाल करके और भी जो स्थान अन्वेषण के योग्य दिखायी दे, वहाँ भी विदेहकुमारी का पता लगाना; तदनन्तर तुम सबको लौट आना चाहिये॥ ४६॥

यश्च मासान्निवृत्तोऽग्रे दृष्टा सीतेति वक्ष्यति।

मत्तुल्यविभवो भोगैः सुखं स विहरिष्यति॥४७॥

‘जो एक मास पूर्ण होने पर सबसे पहले यहाँ आकर यह कहेगा कि ‘मैंने सीताजी का दर्शन किया है’ वह मेरे समान वैभव से सम्पन्न हो भोग्यपदार्थों का अनुभव करता हुआ सुखपूर्वक विहार करेगा॥४७॥

ततः प्रियतरो नास्ति मम प्राणाद् विशेषतः।

कृतापराधो बहुशो मम बन्धुर्भविष्यति॥४८॥

‘उससे बढ़कर प्रिय मेरे लिये दूसरा कोई नहीं होगा। वह मेरे लिये प्राणों से भी बढ़कर प्यारा होगा तथा अनेक बार अपराध किया हो तो भी वह मेरा बन्धु होकर रहेगा॥४८॥

अमितबलपराक्रमा भवन्तो विपुलगुणेषु कुलेषु च प्रसूताः।

मनुजपतिसुतां यथा लभध्वं तदधिगुणं पुरुषार्थमारभध्वम्॥४९॥

‘तुम सबके बल और पराक्रम असीम हैं। तुम विशेष गुणशाली उत्तम कुलों में उत्पन्न हुए हो। राजकुमारी सीता का जिस प्रकार भी पता मिल सके, उसके अनुरूप उच्च कोटि का पुरुषार्थ आरम्भ करो’ ॥ ४९॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे एकचत्वारिंशः सर्गः॥४१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में इकतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥४१॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

सुग्रीव का पश्चिम दिशा के स्थानों का परिचय देते हुए सुषेण आदि वानरों को वहाँ भेजना

द्विचत्वारिंशः सर्गः

सर्ग-42


अथ प्रस्थाप्य स हरीन् सुग्रीवो दक्षिणां दिशम्।

अब्रवीन्मेघसंकाशं सुषेणं नाम वानरम्॥१॥

तारायाः पितरं राजा श्वशुरं भीमविक्रमम्।

अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यमभिगम्य प्रणम्य च॥२॥

महर्षिपुत्रं मारीचमर्चिष्मन्तं महाकपिम्।

वृतं कपिवरैः शूरैर्महेन्द्रसदृशद्युतिम्॥३॥

बुद्धिविक्रमसम्पन्नं वैनतेयसमद्युतिम्।

मरीचिपुत्रान् मारीचानर्चिाल्यान् महाबलान्॥४॥

ऋषिपुत्रांश्च तान् सर्वान् प्रतीचीमादिशद् दिशम्।

द्वाभ्यां शतसहस्राभ्यां कपीनां कपिसत्तमाः॥५॥

सुषेणप्रमुखा यूयं वैदेही परिमार्गथ।

दक्षिण दिशा की ओर वानरों को भेजने के पश्चात् राजा सुग्रीव ने तारा के पिता और अपने श्वशुर ‘सुषेण’ नामक वानर के पास जाकर उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया और कुछ कहना आरम्भ किया। सुषेण मेघ के समान काले और भयंकर पराक्रमी थे। उनके सिवा, महर्षि मरीचि के पुत्र महाकपि अर्चिष्मान् भी वहाँ उपस्थित थे, जो देवराज इन्द्र के समान तेजस्वी तथा शूरवीर श्रेष्ठ वानरों से घिरे हुए थे। उनकी कान्ति विनतानन्दन गरुड़ के समान थी। वे बुद्धि और पराक्रम से सम्पन्न थे। उनके अतिरिक्त मरीचि के पुत्र मारीच नाम वाले वानर भी थे, जो महाबली और ‘अर्चिाल्य’ नाम से प्रसिद्ध थे। । इनके सिवा और भी बहुत-से ऋषिकुमार थे, जो वानररूप में वहाँ विराजमान थे। सुषेण के साथ उन सबको सुग्रीव ने पश्चिम दिशा की ओर जाने की आज्ञा दी और कहा–’कपिवरो! आप सब लोग दो लाख वानरों को साथ ले सुषेणजी की प्रधानता में पश्चिम को जाइये और विदेहनन्दिनी सीता की खोज कीजिये॥ १ –५ १/२॥

सौराष्ट्रान् सहबालीकांश्चन्द्रचित्रांस्तथैव च॥

स्फीताञ्जनपदान् रम्यान् विपुलानि पुराणि च।

पुंनागगहनं कुक्षिं बकुलोद्दालकाकुलम्॥७॥

तथा केतकषण्डांश्च मार्गध्वं हरिपुङ्गवाः।

‘श्रेष्ठ वानरो! सौराष्ट्र, बालीक और चन्द्रचित्र आदि देशों, अन्यान्य समृद्धिशाली एवं रमणीय जनपदों, बड़े-बड़े नगरों तथा पुन्नाग, बकुल और उद्दालक आदि वृक्षों से भरे हुए कुक्षिदेश में एवं केवड़े के वनों में सीता की खोज करो॥६-७ १/२॥

प्रत्यक्स्रोतोवहाश्चैव नद्यः शीतजलाः शिवाः॥८॥

तापसानामरण्यानि कान्तारगिरयश्च ये।

‘पश्चिम की ओर बहने वाली शीतल जल से सुशोभित कल्याणमयी नदियों, तपस्वी जनों के वनों तथा दुर्गम पर्वतों में भी विदेहकुमारी का पता लगाओ। ८१/२॥

तत्र स्थलीमरुप्राया अत्युच्चशिशिराः शिलाः॥

गिरिजालावृतां दुर्गा मार्गित्वा पश्चिमां दिशम्।

ततः पश्चिममागम्य समुद्रं द्रष्टुमर्हथ॥१०॥

तिमिनक्राकुलजलं गत्वा द्रक्ष्यथ वानराः।

‘पश्चिम दिशा में प्रायः मरुभूमि है। अत्यन्त ऊँची और ठंढी शिलाएँ हैं तथा पर्वतमालाओं से घिरे हुए बहुत-से दुर्गम प्रदेश हैं। उन सभी स्थानों में सीता की खोज करते हुए क्रमशः आगे बढ़कर पश्चिम समुद्र तक जाना और वहाँ के प्रत्येक स्थान का निरीक्षण करना। वानरो! समुद्र का जल तिमि नामक मत्स्यों तथा बड़े-बड़े ग्राहों से भरा हुआ है। वहाँ सब ओर देख-भाल करना॥९-१० १/२॥

ततः केतकषण्डेषु तमालगहनेषु च ॥११॥

कपयो विहरिष्यन्ति नारिकेलवनेषु च।

तत्र सीतां च मार्गध्वं निलयं रावणस्य च॥१२॥

‘समुद्र के तट पर केवड़ों के कुञ्जों में, तमाल के काननों में तथा नारियल के वनों में तुम्हारे सैनिक वानर भलीभाँति विचरण करेंगे। वहाँ तुमलोग सीता को खोजना और रावण के निवास स्थान का पता लगाना॥

वेलातलनिविष्टेषु पर्वतेषु वनेषु च।

मुरवीपत्तनं चैव रम्यं चैव जटापुरम्॥१३॥

अवन्तीमङ्गलेपां च तथा चालक्षितं वनम्।

राष्टाणि च विशालानि पत्तनानि ततस्ततः॥१४॥

समुद्रतटवर्ती पर्वतों और वनों में भी उन्हें ढूँढ़ना चाहिये। मुरवीपत्तन (मोरवी) तथा रमणीय जटापुर में, अवन्ती तथा अङ्गलेपापुरी में, अलक्षित वन में और बड़े-बड़े राष्ट्रों एवं नगरों में जहाँ-तहाँ घूमकर पता लगाना॥

* यह अवन्ती पूर्व दिशा के मार्ग में बतायी गयी अवन्ती से भिन्न

सिन्धुसागरयोश्चैव संगमे तत्र पर्वतः।

महान् सोमगिरि म शतशृङ्गो महाद्रुमः॥१५॥

तत्र प्रस्थेषु रम्येषु सिंहाः पक्षगमाः स्थिताः।

तिमिमत्स्यगजांश्चैव नीडान्यारोपयन्ति ते॥१६॥

‘सिंधु-नद और समुद्र के संगमपर सोमगिरि नामक एक महान् पर्वत है, जिसके सौ शिखर हैं। वह पर्वत ऊँचे-ऊँचे वृक्षों से भरा है। उसकी रमणीय चोटियों पर सिंह नामक पक्षी रहते हैं जो तिमि नामवाले विशालकाय मत्स्यों और हाथियों को भी अपने घोंसलों में उठा लाते हैं।

तानि नीडानि सिंहानां गिरिशृङ्गगताश्च ये।

दृप्तास्तृप्ताश्च मातङ्गास्तोयदस्वननिःस्वनाः॥१७॥

विचरन्ति विशालेऽस्मिंस्तोयपूर्णे समन्ततः।

‘सिंह नामक पक्षियों के उन घोंसलों में पहुँचकर उस पर्वत-शिखर पर उपस्थित हुए जो हाथी हैं, वे उस पंखधारी सिंह से सम्मानित होने के कारण गर्व का अनुभव करते और मन-ही-मन संतुष्ट होते हैं। इसीलिये मेघों की गर्जना के समान शब्द करते हुए उस पर्वत के जलपूर्ण विशाल शिखरपर चारों ओर विचरते रहते हैं।

तस्य शृङ्ख दिवस्पर्श काञ्चनं चित्रपादपम्॥१८॥

सर्वमाशु विचेतव्यं कपिभिः कामरूपिभिः।

‘सोमगिरि का गगनचुम्बी शिखर सुवर्णमय है। उसके ऊपर विचित्र वृक्ष शोभा पाते हैं। इच्छानुसार रूप धारण करने वाले वानरों को चाहिये कि वहाँ के सब स्थानों को शीघ्रतापूर्वक अच्छी तरह देख लें। १८ १/२॥

कोटिं तत्र समुद्रस्य काञ्चनीं शतयोजनाम्॥१९॥

दुर्दर्शी पारियात्रस्य गत्वा द्रक्ष्यथ वानराः।

‘वहाँ से आगे समुद्र के बीच में पारियात्र पर्वत का सुवर्णमय शिखर दिखायी देगा, जो सौ योजन विस्तृत है। वानरो! उसका दर्शन दूसरों के लिये अत्यन्त कठिन है। वहाँ जाकर तुम्हें सीता की खोज करनी चाहिये॥

कोट्यस्तत्र चतुर्विंशद् गन्धर्वाणां तरस्विनाम्॥२०॥

वसन्त्यग्निनिकाशानां घोराणां कामरूपिणाम्।

पावकार्चिःप्रतीकाशाः समवेताः समन्ततः॥२१॥

‘पारियात्र पर्वत के शिखर पर इच्छानुसार रूप धारण करने वाले, भयंकर, अग्नितुल्य तेजस्वी तथा वेगशाली चौबीस करोड़ गन्धर्व निवास करते हैं। वे सब-के-सब अग्नि की ज्वाला के समान प्रकाशमान हैं और सब ओर से आकर उस पर्वत पर एकत्र हुए हैं। २०-२१॥

नात्यासादयितव्यास्ते वानरैर्भीमविक्रमैः।

नादेयं च फलं तस्माद् देशात् किंचित् प्लवङ्गमैः॥ २२॥

‘भयंकर पराक्रमी वानरों को चाहिये कि वे उन गन्धर्वो के अधिक निकट न जायँ—उनका कोई अपराध न करें और उस पर्वतशिखर से कोई फल न लें॥ २२॥

दुरासदा हि ते वीराः सत्त्ववन्तो महाबलाः।

फलमूलानि ते तत्र रक्षन्ते भीमविक्रमाः॥२३॥

‘क्योंकि वे भयंकर बल-विक्रम से सम्पन्न धैर्यवान् महाबली वीर गन्धर्व वहाँ के फल-मूलों की रक्षा करते हैं। उन पर विजय पाना बहुत ही कठिन है॥ २३॥

तत्र यत्नश्च कर्तव्यो मार्गितव्या च जानकी।

नहि तेभ्यो भयं किंचित् कपित्वमनुवर्तताम्॥२४॥

‘वहाँ भी जानकी की खोज करनी चाहिये और उनका पता लगाने के लिये पूरा प्रयत्न करना चाहिये। प्राकृत वानर के स्वभाव का अनुसरण करने वाले तुम्हारी सेना के वीरों को उन गन्धर्वो से कोई भय नहीं है॥ २४॥

तत्र वैदर्यवर्णाभो वज्रसंस्थानसंस्थितः।

नानाद्रुमलताकीर्णो वज्रो नाम महागिरिः॥ २५॥

‘पारियात्र पर्वत के पास ही समुद्र में वज्रनाम से प्रसिद्ध एक बहुत ऊँचा पर्वत है, जो नाना प्रकार के वृक्षों और लताओं से व्याप्त दिखायी देता है। वह वज्रगिरि वैदूर्यमणि के समान नील वर्ण का है। वह कठोरता में वज्रमणि (हीरे) के समान है॥२५॥

श्रीमान् समुदितस्तत्र योजनानां शतं समम्।

गुहास्तत्र विचेतव्याः प्रयत्नेन प्लवङ्गमाः॥२६॥

‘वह सुन्दर पर्वत वहाँ सौ योजन के घेरे में प्रतिष्ठित है। उसकी लंबाई और चौड़ाई दोनों बराबर हैं। वानरो! उस पर्वत पर बहुत-सी गुफाएँ हैं। उन सबमें प्रयत्नपूर्वक सीता का अनुसंधान करना चाहिये॥२६॥

चतुर्भागे समुद्रस्य चक्रवान् नाम पर्वतः।

तत्र चक्रं सहस्रारं निर्मितं विश्वकर्मणा ॥२७॥

‘समुद्र के चतुर्थ भाग में चक्रवान् नामक पर्वत है। वहीं विश्वकर्मा ने सहस्रार* चक्र का निर्माण किया था॥ २७॥

* जिसमें एक हजार अरे हों, उसे सहस्रार चक्र कहते हैं।

तत्र पञ्चजनं हत्वा हयग्रीवं च दानवम्।

आजहार ततश्चक्रं शङ्ख च पुरुषोत्तमः ॥२८॥

वहीं से पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु पञ्चजन और हयग्रीव नामक दानवों का वध करके पाञ्चजन्य शङ्क तथा वह सहस्रार सुदर्शन चक्र लाये थे॥२८॥

तस्य सानुषु रम्येषु विशालासु गुहासु च।

रावणः सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्ततः॥२९॥

‘चक्रवान् पर्वत के रमणीय शिखरों और विशाल गुफाओं में भी इधर-उधर वैदेहीसहित रावण का पता लगाना चाहिये॥२९॥

योजनानि चतुःषष्टिर्वराहो नाम पर्वतः।

सुवर्णशृङ्गः सुमहानगाधे वरुणालये॥३०॥

‘उससे आगे समुद्र की अगाध जलराशि में सुवर्णमय शिखरों वाला वराह नामक पर्वत है, जिसका विस्तार चौंसठ योजन की दूरी में है॥३०॥

तत्र प्राग्ज्योतिषं नाम जातरूपमयं पुरम्।

यस्मिन् वसति दुष्टात्मा नरको नाम दानवः॥३१॥

‘वहीं प्राग्ज्योतिष नामक सुवर्णमय नगर है,जिसमें दुष्टात्मा नरक नामक दानव निवास करता है॥ ३१॥

तत्र सानुषु रम्येषु विशालासु गुहासु च।

रावणः सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्ततः॥३२॥

‘उस पर्वत के रमणीय शिखरों पर तथा वहाँ की विशाल गुफाओं में सीतासहित रावण की तलाश करनी चाहिये॥ ३२॥

तमतिक्रम्य शैलेन्द्र काञ्चनान्तरदर्शनम्।

पर्वतः सर्वसौवर्णो धाराप्रस्रवणायुतः॥३३॥

‘जिसका भीतरी भाग सुवर्णमय दिखायी देता है, उस पर्वतराज वराह को लाँघकर आगे बढ़ने पर एक ऐसा पर्वत मिलेगा, जिसका सब कुछ सुवर्णमय है तथा जिसमें लगभग दस सहस्र झरने हैं॥३३॥

तं गजाश्च वराहाश्च सिंहा व्याघ्राश्च सर्वतः।

अभिगर्जन्ति सततं तेन शब्देन दर्पिताः॥३४॥

‘उसके चारों ओर हाथी, सूअर, सिंह और व्याघ्र सदा गर्जना करते हैं और अपनी ही गर्जना की प्रतिध्वनि के शब्द से दर्प में भरकर पुनः दहाड़ने लगते हैं॥ ३४॥

यस्मिन् हरिहयः श्रीमान् महेन्द्रः पाकशासनः।

अभिषिक्तः सुरै राजा मेघो नाम स पर्वतः॥

‘उस पर्वत का नाम है मेघगिरि। जिस पर देवताओं ने हरित रंग के अश्ववाले श्रीमान् पाकशासन इन्द्र को राजा के पद पर अभिषिक्त किया था॥ ३५ ॥

तमतिक्रम्य शैलेन्द्र महेन्द्रपरिपालितम्।

षष्टिं गिरिसहस्राणि काञ्चनानि गमिष्यथ॥३६॥

तरुणादित्यवर्णानि भ्राजमानानि सर्वतः।

जातरूपमयैर्वृक्षैः शोभितानि सुपुष्पितैः॥३७॥

‘देवराज इन्द्रद्वारा सुरक्षित गिरिराज मेघ को लाँघकर जब तुम आगे बढ़ोगे, तब तुम्हें सोने के साठ हजार पर्वत मिलेंगे, जो सब ओर से सूर्य के समान कान्ति से देदीप्यमान हो रहे हैं और सुन्दर फूलों से भरे हुए सुवर्णमय वृक्षों से सुशोभित हैं॥ ३७॥

तेषां मध्ये स्थितो राजा मेरुरुत्तमपर्वतः।

आदित्येन प्रसन्नेन शैलो दत्तवरः पुरा॥३८॥

तेनैवमुक्तः शैलेन्द्रः सर्व एव त्वदाश्रयाः।

मत्प्रसादाद् भविष्यन्ति दिवा रात्रौ च काञ्चनाः॥३९॥

त्वयि ये चापि वत्स्यन्ति देवगन्धर्वदानवाः।

ते भविष्यन्ति भक्ताश्च प्रभया काञ्चनप्रभाः॥४०॥

‘उनके मध्यभाग में पर्वतों का राजा गिरिश्रेष्ठ मेरु विराजमान है, जिसे पूर्वकाल में सूर्यदेव ने प्रसन्न होकर वर दिया था। उन्होंने उस शैलराज से कहा था कि ‘जो दिन-रात तुम्हारे आश्रयमें रहेंगे, वे मेरी कृपा से सुवर्णमय हो जायँगे तथा देवता, दानव, गन्धर्व जो भी तुम्हारे ऊपर निवास करेंगे, वे सुवर्ण के समान कान्तिमान् और मेरे भक्त हो जायँगे’ ॥ ३८– ४०॥

विश्वेदेवाश्च वसवो मरुतश्च दिवौकसः।

आगत्य पश्चिमां संध्यां मेरुमुत्तमपर्वतम्॥४१॥

आदित्यमुपतिष्ठन्ति तैश्च सूर्योऽभिपूजितः।

अदृश्यः सर्वभूतानामस्तं गच्छति पर्वतम्॥४२॥

‘विश्वेदेव, वसु, मरुद्गण तथा अन्य देवता सायंकाल में उत्तम पर्वत मेरुपर आकर सूर्यदेव का उपस्थान करते हैं। उनके द्वारा भलीभाँति पूजित होकर भगवान् सूर्य सब प्राणियों की आँखों से ओझल होकर अस्ताचल को चले जाते हैं॥ ४१-४२॥

योजनानां सहस्राणि दश तानि दिवाकरः।

मुहूर्तार्धेन तं शीघ्रमभियाति शिलोच्चयम्॥४३॥

‘मेरु से अस्ताचल दस हजार योजन की दूरीपर है, किंतु सूर्यदेव आधे मुहूर्त में ही वहाँ पहुँच जाते हैं। ४३॥

शृते तस्य महद्दिव्यं भवनं सूर्यसंनिभम्।

प्रासादगणसम्बाधं विहितं विश्वकर्मणा॥४४॥

‘उसके शिखर पर विश्वकर्मा का बनाया हुआ एक बहुत बड़ा दिव्य भवन है, जो सूर्य के समान दीप्तिमान् दिखायी देता है। वह अनेक प्रासादों से भरा हुआ है॥

शोभितं तरुभिश्चित्रै नापक्षिसमाकुलैः।

निकेतं पाशहस्तस्य वरुणस्य महात्मनः॥४५॥

‘नाना प्रकार के पक्षियों से व्याप्त विचित्र-विचित्र वृक्ष उसकी शोभा बढ़ाते हैं। वह पाशधारी महात्मा वरुण का निवास-स्थान है॥ ४५ ॥

अन्तरा मेरुमस्तं च तालो दशशिरा महान्।

जातरूपमयः श्रीमान् भ्राजते चित्रवेदिकः॥४६॥

‘मेरु और अस्ताचल के बीच एक स्वर्णमय ताड़ का वृक्ष है, जो बड़ा ही सुन्दर और बहुत ही ऊँचा है। उसके दस स्कन्ध (बड़ी शाखाएँ) हैं। उसके नीचे की वेदी बड़ी विचित्र है। इस तरह वह वृक्ष बड़ी शोभा पाता है॥ ४६॥

तेषु सर्वेषु दुर्गेषु सरस्सु च सरित्सु च।

रावणः सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्ततः॥४७॥

‘वहाँ के उन सभी दुर्गम स्थानों, सरोवरों और सरिताओं में इधर-उधर सीतासहित रावण का अनुसंधान करना चाहिये॥४७॥

यत्र तिष्ठति धर्मज्ञस्तपसा स्वेन भावितः।

मेरुसावर्णिरित्येष ख्यातो वै ब्रह्मणा समः॥४८॥

‘मेरुगिरि पर धर्म के ज्ञाता महर्षि मेरुसावर्णि रहते हैं, जो अपनी तपस्या से ऊँची स्थिति को प्राप्त हुए हैं। वे प्रजापति के समान शक्तिशाली एवं विख्यात ऋषि हैं।

प्रष्टव्यो मेरुसावर्णिमहर्षिः सूर्यसंनिभः।

प्रणम्य शिरसा भूमौ प्रवृत्तिं मैथिली प्रति॥४९॥

‘सूर्यतुल्य तेजस्वी महर्षि मेरुसावर्णि के चरणों में पृथ्वी पर मस्तक टेककर प्रणाम करने के अनन्तर तुमलोग उनसे मिथिलेशकुमारी का समाचार पूछना॥ ४९॥

एतावज्जीवलोकस्य भास्करो रजनीक्षये।

कृत्वा वितिमिरं सर्वमस्तं गच्छति पर्वतम्॥५०॥

‘रात्रि के अन्त में (प्रातःकाल) उदित हुए भगवान् सूर्य जीव-जगत् के इन सभी स्थानों को अन्धकाररहित (एवं प्रकाशपूर्ण) करके अन्त में अस्ताचल को चले जाते हैं॥५०॥

एतावद् वानरैः शक्यं गन्तुं वानरपुङ्गवाः।

अभास्करममर्यादं न जानीमस्ततः परम्॥५१॥

‘वानरशिरोमणियो! पश्चिम दिशा में इतनी ही दूर तक वानर जा सकते हैं। उसके आगे न तो सूर्य का प्रकाश है और न किसी देश आदि की सीमा ही। अतः वहाँ से आगे की भूमि के विषय में मुझे कोई जानकारी नहीं है।

अवगम्य तु वैदेहीं निलयं रावणस्य च।

अस्तं पर्वतमासाद्य पूर्णे मासे निवर्तत ॥५२॥

‘अस्ताचलतक जाकर रावण के स्थान और सीता का पता लगाओ तथा एक मास पूर्ण होते ही यहाँ लौट आओ॥

ऊर्ध्वं मासान्न वस्तव्यं वसन् वध्यो भवेन्मम।

सहैव शूरो युष्माभिः श्वशुरो मे गमिष्यति॥५३॥

‘एक महीने से अधिक न ठहरना। जो ठहरेगा, उसे मेरे हाथ से प्राणदण्ड मिलेगा। तुमलोगों के साथ मेरे पूजनीय श्वशुर जी भी जायँगे॥५३॥

श्रोतव्यं सर्वमेतस्य भवद्भिर्दिष्टकारिभिः।

गुरुरेष महाबाहुः श्वशुरो मे महाबलः॥५४॥

‘तुम सब लोग इनकी आज्ञा के अधीन रहकर इनकी सभी बातें ध्यान से सुनना; क्योंकि ये महाबाहु महाबली सुषेण जी मेरे श्वशुर एवं गुरुजन हैं (अतः तुम्हारे लिये भी गुरु की भाँति ही आदरणीय हैं)॥ ५४॥

भवन्तश्चापि विक्रान्ताः प्रमाणं सर्व एव हि।

प्रमाणमेनं संस्थाप्य पश्यध्वं पश्चिमां दिशम्॥५५॥

‘तुम सब लोग भी बड़े पराक्रमी तथा कर्तव्याकर्तव्य के निर्णय में प्रमाणभूत (विश्वसनीय) हो, तथापि इन्हें अपना प्रधान बनाकर तुम पश्चिम दिशा की देखभाल आरम्भ करो॥

दृष्टायां तु नरेन्द्रस्य पत्न्याममिततेजसः।

कृतकृत्या भविष्यामः कृतस्य प्रतिकर्मणा॥५६॥

‘अमित तेजस्वी महाराज श्रीरामकी पत्नी का पता लग जाने पर हम कृतकृत्य हो जायँगे; क्योंकि उन्होंने जो उपकार किया है, उसका बदला इसी तरह चुक सकेगा॥

अतोऽन्यदपि यत्कार्यं कार्यस्यास्य प्रियं भवेत्।

सम्प्रधार्य भवद्भिश्च देशकालार्थसंहितम्॥५७॥

‘अतः इस कार्य के अनुकूल और भी जो कर्तव्य देश, काल और प्रयोजन से सम्बन्ध रखता हो, उसका विचार करके आप लोग उसे भी करें’। ५७॥

ततः सुषेणप्रमुखाः प्लवङ्गाः सुग्रीववाक्यं निपुणं निशम्य।

आमन्त्र्य सर्वे प्लवगाधिपं ते जग्मुर्दिशं तां वरुणाभिगुप्ताम्॥५८॥

सुग्रीव की बातें अच्छी तरह सुनकर सुषेण आदि सब वानर उन वानरराज की अनुमति ले वरुण द्वारा सुरक्षित पश्चिम दिशा की ओर चल दिये॥ ५८॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे द्विचत्वारिंशः सर्गः॥४२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में बयालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥४२॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

सुग्रीव का उत्तर दिशा के स्थानों का परिचय देते हुए शतबलि आदि वानरों को वहाँ भेजना

त्रिचत्वारिंशः सर्गः

सर्ग-43


ततः संदिश्य सुग्रीवः श्वशुरं पश्चिमां दिशम्।

वीरं शतबलिं नाम वानरं वानरेश्वरः॥१॥

उवाच राजा सर्वज्ञः सर्ववानरसत्तमः।

वाक्यमात्महितं चैव रामस्य च हितं तदा ॥२॥

इस प्रकार अपने श्वशुर को पश्चिम दिशा की ओर जाने का संदेश दे सर्वज्ञ, सर्व-वानर-शिरोमणि वानरेश्वर राजा सुग्रीव अपने हितैषी शतबलि नामक वीर वानर से श्रीरामचन्द्रजी के हित की बात बोले-॥ १-२॥

वृतः शतसहस्रेण त्वद्विधानां वनौकसाम्।

वैवस्वतसुतैः सार्धं प्रविष्टः सर्वमन्त्रिभिः॥३॥

दिशं युदीची विक्रान्तां हिमशैलावतंसिकाम्।

सर्वतः परिमार्गध्वं रामपत्नी यशस्विनीम्॥४॥

‘पराक्रमी वीर! तुम अपने ही समान एक लाख वनवासी वानरों को जो यमराज के बेटे हैं, साथ लेकर अपने समस्त मन्त्रियों सहित उस उत्तर दिशा में प्रवेश करो, जो हिमालयरूपी आभूषणों से विभूषित है और वहाँ सब ओर यशस्विनी श्रीरामपत्नी सीता का अन्वेषण करो॥ ३-४॥

अस्मिन् कार्ये विनिर्वृत्ते कृते दाशरथेः प्रिये।

ऋणान्मुक्ता भविष्यामः कृतार्थार्थविदां वराः॥

‘अपने मुख्य प्रयोजन को समझने वाले वीरों में श्रेष्ठ वानरो! यदि हमलोगों के द्वारा दशरथनन्दन भगवान् श्रीराम का यह प्रिय कार्य सम्पन्न हो जाय तो हम उनके उपकार के ऋण से मुक्त और कृतार्थ हो जायँगे॥५॥

कृतं हि प्रियमस्माकं राघवेण महात्मना।

तस्य चेत्प्रतिकारोऽस्ति सफलं जीवितं भवेत्॥

‘महात्मा श्रीरघुनाथजी ने हमलोगों का प्रिय कार्य किया है। उसका यदि कुछ बदला दिया जा सके तो हमारा जीवन सफल हो जाय॥६॥

अर्थिनः कार्यनिर्वृत्तिमकर्तुरपि यश्चरेत्।

तस्य स्यात् सफलं जन्म किं पुनः पूर्वकारिणः॥७॥

‘जिसने कोई उपकार न किया हो, वह भी यदि किसी कार्य के लिये प्रार्थी होकर आया हो तो जो पुरुष उसके कार्य को सिद्ध कर देता है, उसका जन्म भी सफल हो जाता है। फिर जिसने पहले के उपकारी के कार्य को सिद्ध किया हो, उसके जीवन की सफलता के विषय में तो कहना ही क्या है॥७॥

एतां बुद्धिं समास्थाय दृश्यते जानकी यथा।

तथा भवद्भिः कर्तव्यमस्मत्प्रियहितैषिभिः॥८॥

‘इसी विचार का आश्रय लेकर मेरा प्रिय और हित चाहने वाले तुम सब वानरों को ऐसा प्रयत्न करना चाहिये, जिससे जनकनन्दिनी सीता का पता लग जाय॥ ८॥

अयं हि सर्वभूतानां मान्यस्तु नरसत्तमः।

अस्मासु च गतः प्रीतिं रामः परपुरंजयः॥९॥

‘शत्रुओं की नगरी पर विजय पाने वाले ये नरश्रेष्ठ श्रीराम समस्त प्राणियों के लिये माननीय हैं। हमलोगों पर भी इनका बहुत प्रेम है ।।९॥

इमानि बहुदुर्गाणि नद्यः शैलान्तराणि च।

भवन्तः परिमार्गन्तु बुद्धिविक्रमसम्पदा॥१०॥

‘तुम सब लोग बुद्धि और पराक्रम के द्वारा इन अत्यन्त दुर्गम प्रदेशों, पर्वतों और नदियों के तटों पर जा-जाकर सीता की खोज करो॥ १० ॥

तत्र म्लेच्छान् पुलिन्दांश्च शूरसेनांस्तथैव च।

प्रस्थलान् भरतांश्चैव कुरूंश्च सह मद्रकैः॥११॥

काम्बोजयवनांश्चैव शकानां पत्तनानि च।

अन्वीक्ष्य दरदांश्चैव हिमवन्तं विचिन्वथ॥१२॥

‘उत्तर में म्लेच्छ, पुलिन्द, शूरसेन, प्रस्थल, भरत (इन्द्रप्रस्थ और हस्तिनापुर के आस-पास के प्रान्त), कुरु (दक्षिण कुरु-कुरुक्षेत्र के आस-पास की भूमि), मद्र, काम्बोज, यवन, शकों के देशों एवं नगरों में भलीभाँति अनुसंधान करके दरद देश में और हिमालय पर्वत पर ढूँढ़ो॥

लोध्रपद्मकषण्डेषु देवदारुवनेषु च।

रावणः सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्ततः॥१३॥

‘वहाँ लोध्र और पद्मक की झाड़ियों में तथा देवदारु के जंगलों में वैदेहीसहित रावण की खोज करनी चाहिये॥ १३॥

ततः सोमाश्रमं गत्वा देवगन्धर्वसेवितम्।

कालं नाम महासानुं पर्वतं तं गमिष्यथ॥१४॥

‘फिर देवताओं और गन्धर्वो से सेवित सोमाश्रम में होते हुए ऊँचे शिखर वाले काल नामक पर्वत पर जाओ॥

महत्सु तस्य शैलेषु पर्वतेषु गुहासु च।

विचिन्वत महाभागां रामपत्नीमनिन्दिताम्॥

‘उस पर्वत की शाखाभूत अन्य छोटे-बड़े पर्वतों और उन सबकी गुफाओं में सती-साध्वी श्रीरामपत्नी महाभागा सीता का अन्वेषण करो॥ १५ ॥

तमतिक्रम्य शैलेन्द्रं हेमगर्भं महागिरिम्।

ततः सुदर्शनं नाम पर्वतं गन्तुमर्हथ॥१६॥

‘जिसके भीतर सुवर्ण की खान हैं, उस गिरिराज काल को लाँघकर तुम्हें सुदर्शन नामक महान् पर्वत पर जाना चाहिये॥१६॥

ततो देवसखो नाम पर्वतः पतगालयः।

नानापक्षिसमाकीर्णो विविधद्रुमभूषितः॥१७॥

‘उससे आगे बढ़ने पर देवसख नाम वाला पहाड़ मिलेगा, जो पक्षियों का निवास स्थान है। वह भाँतिभाँति के विहंगमों से व्याप्त तथा नाना प्रकार के वृक्षों से विभूषित है॥ १७॥

तस्य काननषण्डेषु निर्झरेषु गुहासु च।

रावणः सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्ततः॥१८॥

‘उसके वन समूहों, निर्झरों और गुफाओं में तुम्हें विदेहकुमारी सीतासहित रावण की खोज करनी चाहिये॥

तमतिक्रम्य चाकाशं सर्वतः शतयोजनम्।

अपर्वतनदीवृक्षं सर्वसत्त्वविवर्जितम्॥१९॥

‘वहाँ से आगे बढ़ने पर एक सुनसान मैदान मिलेगा, जो सब ओर से सौ योजन विस्तृत है। वहाँ नदी,पर्वत, वृक्ष और सब प्रकार के जीव-जन्तुओं का अभाव है।॥ १९॥

तत्तु शीघ्रमतिक्रम्य कान्तारं रोमहर्षणम्।

कैलासं पाण्डुरं प्राप्य हृष्टा यूयं भविष्यथ ॥२०॥

‘रोंगटे खड़े कर देने वाले उस दुर्गम प्रान्त को शीघ्रतापूर्वक लाँघ जाने पर तुम्हें श्वेतवर्ण का कैलास पर्वत मिलेगा। वहाँ पहुँचने पर तुम सब लोग हर्ष से खिल उठोगे॥

तत्र पाण्डुरमेघाभं जाम्बूनदपरिष्कृतम्।

कुबेरभवनं रम्यं निर्मितं विश्वकर्मणा ॥२१॥

‘वहीं विश्वकर्मा का बनाया हुआ कुबेर का रमणीय भवन है, जो श्वेत बादलों के समान प्रतीत होता है। उस भवन को जाम्बूनद नामक सुवर्ण से विभूषित किया गया है।

विशाला नलिनी यत्र प्रभूतकमलोत्पला।

हंसकारण्डवाकीर्णा अप्सरोगणसेविता॥२२॥

‘उसके पास ही एक बहुत बड़ा सरोवर है, जिसमें कमल और उत्पल प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। उसमें हंस और कारण्डव आदि जलपक्षी भरे रहते हैं तथा अप्सराएँ उसमें जल-क्रीड़ा करती हैं।॥ २२॥

तत्र वैश्रवणो राजा सर्वलोकनमस्कृतः।

धनदो रमते श्रीमान् गुह्यकैः सह यक्षराट् ॥ २३॥

‘वहाँ यक्षों के स्वामी विश्रवाकुमार श्रीमान् राजा कुबेर जो समस्त विश्व के लिये वन्दनीय और धन देने वाले हैं, गुह्यकों के साथ विहार करते हैं ॥ २३॥

तस्य चन्द्रनिकाशेषु पर्वतेषु गुहासु च।

रावणः सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्ततः॥२४॥

‘उस कैलास के चन्द्रमा की भाँति उज्ज्वल शाखा पर्वतों पर तथा उनकी गुफाओं में सब ओर घूमफिरकर तुम्हें सीता सहित रावण का अनुसंधान करना चाहिये॥२४॥

क्रौञ्चं तु गिरिमासाद्य बिलं तस्य सुदुर्गमम्।

अप्रमत्तैः प्रवेष्टव्यं दुष्प्रवेशं हि तत् स्मृतम्॥२५॥

‘इसके बाद क्रौञ्चगिरि पर जाकर वहाँ की अत्यन्त दुर्गम विवररूप गुफा में (जो स्कन्द की शक्ति से पर्वत के विदीर्ण होने के कारण बन गयी है) तुम्हें सावधानी के साथ प्रवेश करना चाहिये; क्योंकि उसके भीतर प्रवेश करना अत्यन्त कठिन माना गया है। २५॥

वसन्ति हि महात्मानस्तत्र सूर्यसमप्रभाः।

देवैरभ्यर्थिताः सम्यग् देवरूपा महर्षयः॥ २६॥

‘उस गुफा में सूर्य के समान तेजस्वी महात्मा निवास करते हैं। उन देवस्वरूप महर्षियों की देवतालोग भी अभ्यर्थना करते हैं ॥२६॥

क्रौञ्चस्य तु गुहाश्चान्याः सानूनि शिखराणि च।

निर्दराश्च नितम्बाश्च विचेतव्यास्ततस्ततः॥२७॥

क्रौञ्च पर्वत की और भी बहुत-सी गुफाएँ, अनेकानेक चोटियाँ, शिखर, कन्दराएँ तथा नितम्ब (ढालू प्रदेश) हैं; उन सबमें सब ओर घूम-फिरकर तुम्हें सीता और रावण का पता लगाना चाहिये॥२७॥

अवृक्षं कामशैलं च मानसं विहगालयम्।।

न गतिस्तत्र भूतानां देवानां न च रक्षसाम्॥२८॥

‘वहाँ से आगे वृक्षों से रहित मानस नामक शिखर है, जहाँ शून्य होने के कारण कभी पक्षी तक नहीं जाते हैं। कामदेव की तपस्या का स्थान होने के कारण वह क्रौञ्चशिखर कामशैल के नाम से विख्यात है। वहाँ भूतों, देवताओं तथा राक्षसों का भी कभी जाना नहीं होता है॥२८॥

स च सर्वैर्विचेतव्यः ससानुप्रस्थभूधरः।

क्रौञ्चं गिरिमतिक्रम्य मैनाको नाम पर्वतः॥२९॥

‘शिखरों, घाटियों और शाखापर्वतों सहित समूचे क्रौञ्चपर्वत की तुमलोग छानबीन करना। क्रौञ्चगिरि को लाँघकर आगे बढ़ने पर मैनाक पर्वत मिलेगा॥२९॥

मयस्य भवनं तत्र दानवस्य स्वयंकृतम्।।

मैनाकस्तु विचेतव्यः ससानुप्रस्थकन्दरः॥३०॥

‘वहाँ मयदानव का घर है, जिसे उसने स्वयं ही अपने लिये बनाया है। तुमलोगों को शिखरों, चौरस मैदानों और कन्दराओं सहित मैनाक पर्वत पर भलीभाँति सीताजी की खोज करनी चाहिये॥ ३० ॥

स्त्रीणामश्वमुखीनां तु निकेतस्तत्र तत्र तु।

तं देशं समतिक्रम्य आश्रमं सिद्धसेवितम्॥३१॥

‘वहाँ यत्र-तत्र घोड़े के-से मुँहवाली किन्नरियों के निवासस्थान हैं। उस प्रदेश को लाँघ जाने पर सिद्धसेवित आश्रम मिलेगा॥ ३१॥

सिद्धा वैखानसा यत्र वालखिल्याश्च तापसाः।

वन्दितव्यास्ततः सिद्धास्तपसा वीतकल्मषाः॥३२॥

प्रष्टव्या चापि सीतायाः प्रवृत्तिर्विनयान्वितैः।

‘उसमें सिद्ध, वैखानख तथा वालखिल्य नामक तपस्वी निवास करते हैं। तपस्या से उनके पाप धुल गये हैं। उन सिद्धों को तुमलोग प्रणाम करना और विनीतभाव से सीता का समाचार पूछना॥ ३२ १/२ ॥

हेमपुष्करसंछन्नं तत्र वैखानसं सरः॥३३॥

तरुणादित्यसंकाशैर्हसैर्विचरितं शुभैः।

‘उस आश्रम के पास ‘वैखानस सर’ के नाम से प्रसिद्ध एक सरोवर है, जिसका जल सुवर्णमय कमलों से आच्छादित रहता है। उसमें प्रातःकालिक सूर्य के समान सुनहरे एवं अरुणवर्ण वाले सुन्दर हंस विचरते रहते हैं।

औपवाह्यः कुबेरस्य सार्वभौम इति स्मृतः॥३४॥

गजः पर्येति तं देशं सदा सह करेणुभिः।।

‘कुबेर की सवारी में काम आने वाला सार्वभौमनामक गजराज अपनी हथिनियों के साथ उस देश में सदा घूमता रहता है॥ ३४ १/२।।

तत् सरः समतिक्रम्य नष्टचन्द्रदिवाकरम्।

अनक्षत्रगणं व्योम निष्पयोदमनादितम्॥ ३५॥

‘उस सरोवर को लाँघकर आगे जाने पर सूना आकाश दिखायी देगा। उसमें सूर्य, चन्द्रमा तथा तारों के दर्शन नहीं होंगे। वहाँ न तो मेघों की घटा दिखायी देगी और न उनकी गर्जना ही सुनायी पड़ेगी॥ ३५॥

गभस्तिभिरिवार्कस्य स तु देशः प्रकाश्यते।

विश्राम्यद्भिस्तपःसिद्धैर्देवकल्पैः स्वयंप्रभैः॥३६॥

‘तथापि उस देश में ऐसा प्रकाश छाया होगा, मानो सूर्य की किरणों से ही वह प्रकाशित हो रहा है। वहाँ अपनी ही प्रभा से प्रकाशित तपःसिद्ध देवोपम महर्षि विश्राम करते हैं। उन्हीं की अङ्गप्रभा से उस देश में उजाला छाया रहता है। ३६॥

तं तु देशमतिक्रम्य शैलोदा नाम निम्नगा।

उभयोस्तीरयोस्तस्याः कीचका नाम वेणवः॥३७॥

‘उस प्रदेश को लाँघकर आगे बढ़ने पर ‘शैलोदा’ नामवाली नदी का दर्शन होगा। उसके दोनों तटों पर कीचक (वंशी की-सी ध्वनि करने वाले) बाँस हैं; यह बात प्रसिद्ध है॥ ३७॥

ते नयन्ति परं तीरं सिद्धान् प्रत्यानयन्ति च।

उत्तराः कुरवस्तत्र कृतपुण्यप्रतिश्रयाः॥३८॥

‘वे बाँस ही (साधन बनकर) सिद्ध पुरुषों को शैलोदा के उस पार ले जाते और वहाँ से इस पार ले आते हैं। जहाँ केवल पुण्यात्मा पुरुषों का वास है, वह उत्तर कुरुदेश शैलोदा के तट पर ही है॥ ३८॥

ततः काञ्चनपद्माभिः पद्मिनीभिः कृतोदकाः।

नीलवैदूर्यपत्राढ्या नद्यस्तत्र सहस्रशः॥ ३९॥

‘उत्तर कुरुदेश में नील वैदूर्यमणि के समान हरे-हरे कमलों के पत्तों से सुशोभित सहस्रों नदियाँ बहती हैं, जिनके जल सुवर्णमय पद्मों से अलंकृत अनेकानेक पुष्करिणियों से मिले हुए हैं॥ ३९॥

रक्तोत्पलवनैश्चात्र मण्डिताश्च हिरण्मयैः।

तरुणादित्यसंकाशा भान्ति तत्र जलाशयाः॥४०॥

‘वहाँ के जलाशय लाल और सुनहरे कमलसमूहों से मण्डित होकर प्रातःकाल उदित हुए सूर्य के समान शोभा पाते हैं॥ ४०॥

महार्हमणिपत्रैश्च काञ्चनप्रभकेसरैः।

नीलोत्पलवनैश्चित्रैः स देशः सर्वतो वृतः॥४१॥

‘बहुमूल्य मणियों के समान पत्तों और सुवर्ण के समान कान्तिमान् केसरों वाले विचित्र-विचित्र नीलकमलों के द्वारा वहाँ का प्रदेश सब ओर से सुशोभित होता है॥४१॥

निस्तुलाभिश्च मुक्ताभिर्मणिभिश्च महाधनैः।

उद्धृतपुलिनास्तत्र जातरूपैश्च निम्नगाः॥४२॥

सर्वरत्नमयैश्चित्रैरवगाढा नगोत्तमैः।

जातरूपमयैश्चापि हताशनसमप्रभैः॥४३॥

‘वहाँ की नदियों के तट गोल-गोल मोतियों, बहुमूल्य मणियों और सुवर्णों से सम्पन्न हैं। इतना ही नहीं, उन नदियों के किनारे सम्पूर्ण रत्नों से युक्त विचित्र-विचित्र पर्वत भी विद्यमान हैं, जो उनके जल के भीतर तक घुसे हुए हैं। उन पर्वतों में से कितने ही सुवर्णमय हैं, जिनसे अग्नि के समान प्रकाश फैलता रहता है। ४२-४३॥

नित्यपुष्पफलास्तत्र नगाः पत्ररथाकुलाः।

दिव्यगन्धरसस्पर्शाः सर्वकामान् स्रवन्ति च॥४४॥

‘वहाँ के वृक्षों में सदा ही फल-फूल लगे रहते हैं और उन पर पक्षी चहकते रहते हैं। वे वृक्ष दिव्यगन्ध, दिव्य रस और दिव्य स्पर्श प्रदान करते हैं तथा प्राणियों की सारी मनचाही वस्तुओं की वर्षा करते रहते हैं।४४॥

नानाकाराणि वासांसि फलन्त्यन्ये नगोत्तमाः।

मुक्तावैदूर्यचित्राणि भूषणानि तथैव च।

स्त्रीणां यान्यनुरूपाणि पुरुषाणां तथैव च॥४५॥

‘इनके सिवा दूसरे-दूसरे श्रेष्ठ वृक्ष फलों के रूप में नाना प्रकार के वस्त्र, मोती और वैदूर्यमणिसे जटित आभूषण देते हैं, जो स्त्रियों तथा पुरुषों के भी उपयोग में आने योग्य होते हैं॥ ४५ ॥

सर्वर्तुसुखसेव्यानि फलन्त्यन्ये नगोत्तमाः।

महार्हमणिचित्राणि फलन्त्यन्ये नगोत्तमाः॥४६॥

‘दूसरे उत्तम वृक्ष सभी ऋतुओं में सुखपूर्वक सेवन करने योग्य अच्छे-अच्छे फल देते हैं। अन्यान्य सुन्दर वृक्ष बहुमूल्य मणियों के समान विचित्र फल उत्पन्न करते हैं॥ ४६॥

शयनानि प्रसूयन्ते चित्रास्तरणवन्ति च।

मनःकान्तानि माल्यानि फलन्त्यत्रापरे द्रुमाः॥४७॥

पानानि च महार्हाणि भक्ष्याणि विविधानि च।

स्त्रियश्च गुणसम्पन्ना रूपयौवनलक्षिताः॥४८॥

‘कितने ही अन्य वृक्ष विचित्र बिछौनों से युक्त शय्याओं को ही फलों के रूप में प्रकट करते हैं, मन को प्रिय लगने वाली सुन्दर मालाएँ भी प्रस्तुत करते हैं, बहुमूल्य पेय पदार्थ और भाँति-भाँति के भोजन भी देते हैं तथा रूप और यौवन से प्रकाशित होने वाली सद्गुणवती युवतियों को भी जन्म देते हैं। ४७-४८॥

गन्धर्वाः किन्नराः सिद्धा नागा विद्याधरास्तथा।

रमन्ते सततं तत्र नारीभिर्भास्वरप्रभाः॥४९॥

‘वहाँ सूर्य के समान कान्तिमान् गन्धर्व, किन्नर, सिद्ध, नाग और विद्याधर सदा नारियों के साथ क्रीडा विहार करते हैं। ४९॥

सर्वे सुकृतकर्माणः सर्वे रतिपरायणाः।

सर्वे कामार्थसहिता वसन्ति सह योषितः॥५०॥

‘वहाँ के सब लोग पुण्यकर्मा हैं, सभी अर्थ और काम से सम्पन्न हैं तथा सब लोग काम-क्रीडापरायण होकर युवती स्त्रियों के साथ निवास करते हैं। ५०॥

गीतवादित्रनिर्घोषः सोत्कृष्टहसितस्वनः।

श्रूयते सततं तत्र सर्वभूतमनोरमः॥५१॥

‘वहाँ निरन्तर उत्कृष्ट हास-परिहास की ध्वनि से युक्त गीतवाद्य का मधुर घोष सुनायी देता है, जो समस्त प्राणियों के मन को आनन्द प्रदान करने वाला है॥५१॥

तत्र नामुदितः कश्चिन्नात्र कश्चिदसत्प्रियः।

अहन्यहनि वर्धन्ते गुणास्तत्र मनोरमाः॥५२॥

‘वहाँ कोई भी अप्रसन्न नहीं रहता। किसी की भी बुरे कामों में प्रीति नहीं होती। वहाँ रहने से प्रतिदिन मनोरम गुणों की वृद्धि होती है। ५२॥

समतिक्रम्य तं देशमत्तरः पयसां निधिः।

तत्र सोमगिरि म मध्ये हेममयो महान्॥५३॥

‘उस देश को लाँघकर आगे जाने पर उत्तरदिग्वर्ती समुद्र उपलब्ध होगा। उस समुद्र के मध्यभाग में सोमगिरि नामक एक बहुत ऊँचा सुवर्णमय पर्वत है।५३॥

इन्द्रलोकगता ये च ब्रह्मलोकगताश्च ये।

देवास्तं समवेक्षन्ते गिरिराज दिवं गताः॥५४॥

‘जो लोग स्वर्गलोक में गये हैं, वे तथा इन्द्रलोक और ब्रह्मलोक में रहने वाले देवता उस गिरिराज सोमगिरि का दर्शन करते हैं ॥ ५४॥

स तु देशो विसूर्योऽपि तस्य भासा प्रकाशते।

सूर्यलक्ष्म्याभिविज्ञेयस्तपतेव विवस्वता॥५५॥

‘वह देश सूर्य से रहित है तो भी सोमगिरि की प्रभा से सदा प्रकाशित होता रहता है। तपते हुए सूर्य की प्रभा से जो देश प्रकाशित होते हैं, उन्हीं की भाँति उसे सूर्यदेव की शोभा से सम्पन्न-सा जानना चाहिये॥ ५५॥

भगवांस्तत्र विश्वात्मा शम्भुरेकादशात्मकः।

ब्रह्मा वसति देवेशो ब्रह्मर्षिपरिवारितः॥५६॥

‘वहाँ विश्वात्मा भगवान् विष्णु, एकादश रुद्रों के रूप में प्रकट होने वाले भगवान् शंकर तथा ब्रह्मर्षियों से घिरे हुए देवेश्वर ब्रह्मा जी निवास करते हैं॥५६॥

न कथंचन गन्तव्यं कुरूणामुत्तरेण वः।

अन्येषामपि भूतानां नानुक्रामति वै गतिः॥५७॥

‘तुमलोग उत्तर कुरु के मार्ग से सोमगिरितक जाकर उसकी सीमा से आगे किसी तरह न बढ़ना। तुम्हारी तरह दूसरे प्राणियों की भी वहाँ गति नहीं है।॥ ५७॥

स हि सोमगिरि म देवानामपि दुर्गमः।

तमालोक्य ततः क्षिप्रमुपावर्तितुमर्हथ॥५८॥

‘वह सोमगिरि देवताओं के लिये भी दुर्गम है। अतः उसका दर्शनमात्र करके तुमलोग शीघ्र लौट आना।५८॥

एतावद् वानरैः शक्यं गन्तुं वानरपुंगवाः।

अभास्करममर्यादं न जानीमस्ततः परम्॥५९॥

‘श्रेष्ठ वानरो! बस, उत्तर दिशा में इतनी ही दूर तक तुम सब वानर जा सकते हो। उसके आगे न तो सूर्य का प्रकाश है और न किसी देश आदि की सीमा ही। अतः आगे की भूमि के सम्बन्ध में मैं कुछ नहीं जानता ॥ ५९॥

सर्वमेतद् विचेतव्यं यन्मया परिकीर्तितम्।

यदन्यदपि नोक्तं च तत्रापि क्रियतां मतिः॥६०॥

‘मैंने जो-जो स्थान बताये हैं, उन सबमें सीता की खोज करना और जिन स्थानों का नाम नहीं लिया है, वहाँ भी ढूँढ़ने का ही निश्चित विचार रखना॥ ६०॥

ततः कृतं दाशरथेमहत्प्रियं महत्प्रियं चापि ततो मम प्रियम्।

कृतं भविष्यत्यनिलानलोपमा विदेहजादर्शनजेन कर्मणा॥६१॥

‘अग्नि और वायु के समान तेजस्वी तथा बलशाली वानरो! विदेहनन्दिनी सीता के दर्शन के लिये तुम जो जो कार्य या प्रयास करोगे, उन सबके द्वारा दशरथनन्दन भगवान् श्रीराम का महान् प्रिय कार्य सम्पन्न होगा तथा उसी से मेरा भी प्रिय कार्य पूर्ण हो जायगा॥ ६१॥

ततः कृतार्थाः सहिताः सबान्धवा मयार्चिताः सर्वगुणैर्मनोरमैः।

चरिष्यथोर्वी प्रति शान्तशत्रवः सहप्रिया भूतधराः प्लवंगमाः॥६२॥

‘वानरो! श्रीरामचन्द्रजी का प्रिय कार्य करके जब तुम लौटोगे, तब मैं सर्वगुणसम्पन्न एवं मनोऽनुकूल पदार्थो के द्वारा तुम सब लोगों का सत्कार करूँगा। तत्पश्चात् तुमलोग शत्रुहीन होकर अपने हितैषियों

और बन्धु-बान्धवों सहित कृतार्थ एवं समस्त प्राणियों के आश्रयदाता होकर अपनी प्रियतमाओं के साथ सारी पृथ्वी पर सानन्द विचरण करोगे’।

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे त्रिचत्वारिंशः सर्गः॥४३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में तैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥४३॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

श्रीराम का हनुमान जी को अँगूठी देकर भेजना

चतुश्चत्वारिंशः सर्गः

सर्ग-44


विशेषेण तु सुग्रीवो हनूमत्यर्थमुक्तवान्।

स हि तस्मिन हरिश्रेष्ठे निश्चितार्थोऽर्थसाधने॥

सुग्रीव ने हनुमान् जी के समक्ष विशेष रूप से सीता के अन्वेषण रूप प्रयोजन को उपस्थित किया; क्योंकि उन्हें यह दृढ़ विश्वास था कि वानरश्रेष्ठ हनुमान् जी इस कार्य को सिद्ध कर सकेंगे॥१॥

अब्रवीच्च हनूमन्तं विक्रान्तमनिलात्मजम्।

सुग्रीवः परमप्रीतः प्रभुः सर्ववनौकसाम्॥२॥

समस्त वानरों के स्वामी सुग्रीव ने अत्यन्त प्रसन्न होकर परम पराक्रमी वायुपुत्र हनुमान् से इस प्रकार कहा— ॥२॥

न भूमौ नान्तरिक्षे वा नाम्बरे नामरालये।

नाप्सु वा गतिसङ्गं ते पश्यामि हरिपुंगव॥३॥

‘कपिश्रेष्ठ! पृथ्वी, अन्तरिक्ष, आकाश, देवलोक अथवा जल में भी तुम्हारी गति का अवरोध मैं कभी नहीं देखता हूँ॥३॥

सासुराः सहगन्धर्वाः सनागनरदेवताः।

विदिताः सर्वलोकास्ते ससागरधराधराः॥४॥

‘असुर, गन्धर्व, नाग, मनुष्य, देवता, समुद्र तथा पर्वतों सहित सम्पूर्ण लोकों का तुम्हें ज्ञान है॥ ४॥

गतिर्वेगश्च तेजश्च लाघवं च महाकपे।

पितुस्ते सदृशं वीर मारुतस्य महौजसः॥५॥

‘वीर! महाकपे! सर्वत्र अबाधित गति, वेग, तेज और फुर्ती—ये सभी सद्गुण तुम में अपने महापराक्रमी पिता वायु के ही समान हैं॥ ५॥

तेजसा वापि ते भूतं न समं भुवि विद्यते।

तद यथा लभ्यते सीता तत्त्वमेवानुचिन्तय॥६॥

‘इस भूमण्डल में कोई भी प्राणी तुम्हारे तेज की समानता करने वाला नहीं है; अतः जिस प्रकार सीता की उपलब्धि हो सके, वह उपाय तुम्हीं सोचो। ६॥

त्वय्येव हनुमन्नस्ति बलं बुद्धिः पराक्रमः।

देशकालानुवृत्तिश्च नयश्च नयपण्डित ॥७॥

‘हनुमन् ! तुम नीतिशास्त्र के पण्डित हो एकमात्र तुम्हीं में बल, बुद्धि, पराक्रम, देश-काल का अनुसरण तथा नीतिपूर्ण बर्ताव एक साथ देखे जाते हैं’ ॥७॥

ततः कार्यसमासङ्गमवगम्य हनूमति।

विदित्वा हनुमन्तं च चिन्तयामास राघवः॥८॥

सुग्रीव की बात सुनकर श्रीरामचन्द्रजी को यह ज्ञात हुआ कि इस कार्य की सिद्धि का सम्बन्ध—इसे पूर्ण करने का सारा भार हनुमान् पर ही है। उन्होंने स्वयं भी यह अनुभव किया कि हनुमान् इस कार्य को सफल करने में समर्थ हैं फिर वे इस प्रकार मन-ही मन विचार करने लगे— ॥८॥

सर्वथा निश्चितार्थोऽयं हनमति हरीश्वरः।

निश्चितार्थतरश्चापि हनूमान् कार्यसाधने॥९॥

‘वानरराज सुग्रीव सर्वथा हनुमान् पर ही यह भरोसा किये बैठे हैं कि ये ही निश्चित रूप से हमारे इस प्रयोजन को सिद्ध कर सकते हैं। स्वयं हनुमान् भी अत्यन्त निश्चित रूप से इस कार्य को सिद्ध करने का विश्वास रखते हैं॥९॥

तदेवं प्रस्थितस्यास्य परिज्ञातस्य कर्मभिः।

भर्चा परिगृहीतस्य ध्रुवः कार्यफलोदयः॥१०॥

‘इस प्रकार कार्यों द्वारा जिनकी परीक्षा कर ली गयी है तथा जो सबसे श्रेष्ठ समझे गये हैं, वे हनुमान् अपने स्वामी सुग्रीव के द्वारा सीता की खोज के लिये भेजे जा रहे हैं। इनके द्वारा इस कार्य के फल का उदय (सीता का दर्शन) होना निश्चित है’ ।। १० ।।।

तं समीक्ष्य महातेजा व्यवसायोत्तरं हरिम्।

कृतार्थ इव संहृष्टः प्रहृष्टेन्द्रियमानसः॥११॥

ऐसा विचारकर महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजी कार्यसाधन के उद्योग में सर्वश्रेष्ठ हनुमान जी की ओर दृष्टिपात करके अपने को कृतार्थ-सा मानते हुए प्रसन्न हो गये। उनकी सारी इन्द्रियाँ और मन हर्ष से खिल उठे॥

ददौ तस्य ततः प्रीतः स्वनामाङ्कोपशोभितम्।

अङ्गलीयमभिज्ञानं राजपुत्र्याः परंतपः॥१२॥

तदनन्तर शत्रुओं को संताप देने वाले श्रीराम ने प्रसन्नतापूर्वक अपने नाम के अक्षरों से सुशोभित एक अंगूठी हनुमान जी के हाथ में दी, जो राजकुमारी सीता को पहचान के रूप में अर्पण करने के लिये थी॥ १२॥

अनेन त्वां हरिश्रेष्ठ चिह्नन जनकात्मजा।

मत्सकाशादनुप्राप्तमनुद्विग्नानुपश्यति॥१३॥

अँगूठी देकर वे बोले—कपिश्रेष्ठ! इस चिह्न के द्वारा जनककिशोरी सीता को यह विश्वास हो जायगा कि तुम मेरे पास से ही गये हो। इससे वह भय त्यागकर तुम्हारी ओर देख सकेगी॥१३॥

व्यवसायश्च ते वीर सत्त्वयुक्तश्च विक्रमः।

सग्रीवस्य च संदेशः सिद्धिं कथयतीव मे॥१४॥

‘वीरवर! तुम्हारा उद्योग, धैर्य, पराक्रम और सुग्रीव का संदेश—ये सब मुझे इस बात की सूचना-सी दे रहे हैं कि तुम्हारे द्वारा कार्य की सिद्धि अवश्य होगी’ ॥ १४॥

स तद् गृह्य हरिश्रेष्ठः कृत्वा मूर्ध्नि कृताञ्जलिः।

वन्दित्वा चरणौ चैव प्रस्थितः प्लवगर्षभः॥१५॥

वानरश्रेष्ठ हनुमान् ने वह अँगूठी लेकर उसे मस्तक पर रखा और फिर हाथ जोड़कर श्रीराम के चरणों में प्रणाम करके वे वानरशिरोमणि वहाँ से प्रस्थित हुए॥ १५ ॥

स तत् प्रकर्षन् हरिणां महद् बलं बभूव वीरः पवनात्मजः कपिः।

गताम्बुदे व्योम्नि विशुद्धमण्डलः शशीव नक्षत्रगणोपशोभितः॥१६॥

उस समय वीर-वानर पवनकुमार हनुमान् अपने साथ वानरों की उस विशाल सेना को ले जाते हुए उसी तरह शोभा पाने लगे, जैसे मेघरहित आकाश में विशुद्ध (निर्मल) मण्डल से उपलक्षित चन्द्रमा नक्षत्रसमूहों के साथ सुशोभित होता है॥ १६ ॥

अतिबल बलमाश्रितस्तवाहं हरिवर विक्रम विक्रमैरनल्पैः।

पवनसुत यथाधिगम्यते सा जनकसुता हनुमंस्तथा कुरुष्व॥१७॥

जाते हुए हनुमान् को सम्बोधित करके श्रीरामचन्द्रजी ने फिर कहा—’अत्यन्त बलशाली कपिश्रेष्ठ! मैंने तुम्हारे बल का आश्रय लिया है। पवनकुमार हनुमान् ! जिस प्रकार भी जनकनन्दिनी सीता प्राप्त हो सके, तुम अपने महान् बल-विक्रम से वैसा ही प्रयत्न करो अच्छा, अब जाओ’ ॥ १७ ॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे चतुश्चत्वारिंशः सर्गः॥४४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में चौवालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४४॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

विभिन्न दिशाओं में जाते हुए वानरों का सुग्रीव के समक्ष अपने उत्साहसूचक वचन सुनाना

पञ्चचत्वारिंशः सर्गः

सर्ग-45


सर्वांश्चाहूय सुग्रीवः प्लवगान् प्लवगर्षभः।

समस्तांश्चाब्रवीद् राजा रामकार्यार्थसिद्धये ॥१॥

तदनन्तर वानरशिरोमणि राजा सुग्रीव अन्य समस्त वानरों को बुलाकर श्रीरामचन्द्रजी के कार्य की सिद्धि के लिये उन सबसे बोले- ॥१॥

एवमेतद् विचेतव्यं भवद्भिर्वानरोत्तमैः।

तदुग्रशासनं भर्तुर्विज्ञाय हरिपुंगवाः ॥२॥

शलभा इव संछाद्य मेदिनीं सम्प्रतस्थिरे।

‘कपिवरो! जैसा मैंने बताया है, उसके अनुसार तुम सभी श्रेष्ठ वानरों को इस जगत् में सीता की खोज करनी चाहिये।’ स्वामी की उस कठोर आज्ञा को भलीभाँति समझकर वे सम्पूर्ण श्रेष्ठ वानर टिड्डियों के दल की भाँति पृथ्वी को आच्छादित करके वहाँ से प्रस्थित हुए। २ १/२॥

रामः प्रस्रवणे तस्मिन् न्यवसत् सहलक्ष्मणः॥३॥

प्रतीक्षमाणस्तं मासं सीताधिगमने कृतः।

श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण के साथ उस प्रस्रवण गिरि पर ही ठहरे रहे और सीता का समाचार लाने के लिये जो एक मास की अवधि निश्चित की गयी थी, उसकी प्रतीक्षा करने लगे॥ ३ १/२ ॥

उत्तरां तु दिशं रम्यां गिरिराजसमावृताम्॥४॥

प्रतस्थे सहसा वीरो हरिः शतबलिस्तदा।

उस समय वीर वानर शतबलि ने गिरिराज हिमालय से घिरी हुई रमणीय उत्तर दिशा की ओर शीघ्रतापूर्वक प्रस्थान किया॥ ४ १/२ ॥

पूर्वां दिशं प्रतिययौ विनतो हरियूथपः॥५॥

ताराङ्गदादिसहितः प्लवगः पवनात्मजः।

अगस्त्याचरितामाशां दक्षिणां हरियूथपः॥६॥

पश्चिमां च दिशं घोरां सुषेणः प्लवगेश्वरः।

प्रतस्थे हरिशार्दूलो दिशं वरुणपालिताम्॥७॥

वानर-यूथपति विनत पूर्व दिशा की ओर गये। कपिगणों के अधिपति पवनकुमार वानर हनुमान जी तार और अङ्गद आदि के साथ अगस्त्यसेवित दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थित हुए तथा वानरेश्वर कपिश्रेष्ठ सुषेण ने वरुण द्वारा सुरक्षित घोर पश्चिम दिशा की यात्रा की॥५-७॥

ततः सर्वा दिशो राजा चोदयित्वा यथातथम्।

कपिसेनापतिर्वीरो मुमोद सुखितः सुखम्॥८॥

वानर-सेना के स्वामी वीर राजा सुग्रीव सम्पूर्ण दिशाओं में यथायोग्य वानरों को भेजकर बहुत सुखी हुए और मन-ही-मन हर्ष का अनुभव करने लगे॥ ८॥

एवं संचोदिताः सर्वे राज्ञा वानरयूथपाः।

स्वां स्वां दिशमभिप्रेत्य त्वरिताः सम्प्रतस्थिरे॥९॥

इस तरह राजा की आज्ञा पाकर समस्त वानरयूथपति बड़ी उतावली के साथ अपनी-अपनी दिशा की ओर प्रस्थित हुए॥९॥

नदन्तश्चोन्नदन्तश्च गर्जन्तश्च प्लवंगमाः।

क्ष्वेडन्तो धावमानाश्च विनदन्तो महाबलाः॥ १०॥

एवं संचोदिताः सर्वे राज्ञा वानरयूथपाः।

आनयिष्यामहे सीतां हनिष्यामश्च रावणम्॥ ११॥

अहमेको वधिष्यामि प्राप्तं रावणमाहवे।

ततश्चोन्मथ्य सहसा हरिष्ये जनकात्मजाम्॥ १२॥

वेपमानां श्रमेणाद्य भवद्भिः स्थीयतामिति।

एक एवाहरिष्यामि पातालादपि जानकीम्॥१३॥

विधमिष्याम्यहं वृक्षान् दारयिष्याम्यहं गिरीन्।

धरणी दारयिष्यामि क्षोभयिष्यामि सागरान्॥१४॥

अहं योजनसंख्यायाः प्लवेयं नात्र संशयः।

शतयोजनसंख्यायाः शतं समधिकं ह्यहम्॥१५॥

भूतले सागरे वापि शैलेषु च वनेषु च।

पातालस्यापि वा मध्ये न ममाच्छिद्यते गतिः॥१६॥

वे समस्त महाबली वानर और उनके यूथपति अपने राजा के द्वारा इस प्रकार प्रेरित हो भाँति-भाँति के शब्द करते, उच्च स्वर से गर्जते, दहाड़ते, किलकारियाँ मारते, दौड़ते और कोलाहल करते हुए कहने लगे—’राजन् ! हम सीता को साथ लायेंगे और रावण का वध कर डालेंगे। युद्ध में यदि रावण मेरे सामने आ जाय तो मैं अकेला ही उसे मार गिराऊँगा। तत्पश्चात् उसकी सारी सेना को मथकर कष्ट एवं भय से काँपती हुई जानकी जी को सहसा यहाँ उठा लाऊँगा। आप लोग यहीं ठहरें। मैं अकेला ही पाताल से भी जनककिशोरी को निकाल लाऊँगा, वृक्षों को उखाड़ फेकूँगा, पर्वतों के टुकड़े-टुकड़े कर डालूँगा, पृथ्वी को विदीर्ण कर दूँगा और समुद्रों को भी विक्षुब्ध कर डालूँगा। मैं सौ योजनतक कूद सकता हूँ, इसमें संशय नहीं है। मैं सौ योजन से भी अधिक दूरतक जा सकता हूँ। पृथ्वी, समुद्र, पर्वत, वन और पाताल में भी मेरी गति नहीं रुकती’ ॥ १०–१६॥

इत्येकैकस्तदा तत्र वानरा बलदर्पिताः।

ऊचुश्च वचनं तस्य हरिराजस्य संनिधौ॥१७॥

इस तरह वहाँ वानरराज सुग्रीव के समीप बल के घमंड में भरे हुए वानर उस समय एक-एक करके आते और उनके सामने उपर्युक्त बातें कहते थे॥ १७॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे पञ्चचत्वारिंशः सर्गः॥ ४५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में पैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४५ ॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

सुग्रीव का श्रीरामचन्द्रजी को अपने भूमण्डल-भ्रमण का वृत्तान्त बताना

षट्चत्वारिंशः सर्गः

सर्ग-46


गतेषु वानरेन्द्रेषु रामः सुग्रीवमब्रवीत्।

कथं भवान् विजानीते सर्वं वै मण्डलं भुवः॥

उन समस्त वानरयूथपतियों के चले जाने पर श्रीरामचन्द्रजी ने सुग्रीव से पूछा—’सखे! तुम समस्त भूमण्डल के स्थानों का परिचय कैसे जानते हो?’॥

सुग्रीवश्च ततो राममुवाच प्रणतात्मवान्।

श्रूयतां सर्वमाख्यास्ये विस्तरेण वचो मम॥२॥

तब सुग्रीव ने विनीत होकर श्रीरामचन्द्रजी से कहा —’भगवन्! मैं सब कुछ विस्तार के साथ बता रहा हूँ मेरी बातें सुनिये॥२॥

यदा तु दुन्दुभिं नाम दानवं महिषाकृतिम्।

प्रतिकालयते वाली मलयं प्रति पर्वतम्॥३॥

तदा विवेश महिषो मलयस्य गुहां प्रति।

विवेश वाली तत्रापि मलयं तज्जिघांसया॥४॥

‘जब वाली महिषरूपधारी दानव दुन्दुभि* (उसके पुत्र मायावी) का पीछा कर रहे थे, उस समय वह महिष मलयपर्वत की ओर भागा और उस पर्वत की कन्दरा में घुस गया। यह देख वाली ने उसके वध की इच्छा से उस गुफा के भीतर भी प्रवेश किया। ३-४॥

* यहाँ दुन्दुभि और महिष शब्द से उसके पुत्र मायावी नामक दानव का ही वर्णन हुआ है—ऐसा मानना चाहिये; क्योंकि आगे कही जाने वाली सारी बातें उसीके वृत्तान्त से सम्बन्ध रखती हैं। पिता भैंसे का रूप धारण करता था यही गण उसके पत्र मायावी में भी था। इसलिये उसको भी महिष या महिषाकृति कहना असङ्गत नहीं है।

ततोऽहं तत्र निक्षिप्तो गुहाद्वारि विनीतवत्।

न च निष्क्रामते वाली तदा संवत्सरे गते॥५॥

‘उस समय मैं विनीतभाव से उस गुफा के द्वार पर खड़ा रहा; क्योंकि वाली ने मुझे वहीं रख छोड़ा था। परंतु एक वर्ष व्यतीत हो जाने पर भी वाली उसके भीतर से नहीं निकले॥५॥

ततः क्षतजवेगेन आपुपूरे तदा बिलम्।

तदहं विस्मितो दृष्ट्वा भ्रातुः शोकविषार्दितः॥६॥

‘तदनन्तर वेगपूर्वक बहे हुए रक्त की धारा से उस समय वह सारी गुफा भर गयी। यह देखकर मुझे बड़ा विस्मय हुआ तथा मैं भाई के शोक से व्यथित हो उठा॥६॥

अथाहं गतबुद्धिस्तु सुव्यक्तं निहतो गुरुः।

शिला पर्वतसंकाशा बिलद्वारि मया कृता॥७॥

‘फिर मेरी बुद्धि में यह बात आयी कि अब मेरे बड़े भाई निश्चय ही मारे गये। यह विचार पैदा होते ही मैंने उस गुफा के द्वार पर एक पहाड़-जैसी चट्टान रख दी॥

अशक्नुवन्निष्क्रमितुं महिषो विनशिष्यति।

ततोऽहमागां किष्किन्धां निराशस्तस्य जीविते॥८ ॥

‘सोचा-इस शिला से द्वार बंद हो जाने पर मायावी निकल नहीं सकेगा, भीतर ही घुट-घुटकर मर जायगा। इसके बाद भाई के जीवन से निराश होकर मैं किष्किन्धापुरी में लौट आया॥८॥

राज्यं च सुमहत् प्राप्य तारां च रुमया सह।

मित्रैश्च सहितस्तत्र वसामि विगतज्वरः॥९॥

‘यहाँ विशाल राज्य तथा रुमासहित तारा को पाकर मित्रों के साथ मैं निश्चिन्ततापूर्वक रहने लगा॥९॥

आजगाम ततो वाली हत्वा तं वानरर्षभः।

ततोऽहमददां राज्यं गौरवाद भययन्त्रितः॥१०॥

‘तत्पश्चात् वानरश्रेष्ठ वाली उस दानव का वध करके आ पहुँचे। उनके आते ही मैंने भाई के गौरव से भयभीत हो वह राज्य उन्हें वापस कर दिया॥१०॥

स मां जिघांसर्दष्टात्मा वाली प्रव्यथितेन्द्रियः।

परिकालयते वाली धावन्तं सचिवैः सह ॥११॥

‘परंतु दुष्टात्मा वाली मुझे मार डालना चाहता था, उसकी सारी इन्द्रियाँ यह सोचकर व्यथित हो उठी थीं कि ‘यह मुझे मारने के लिये ही गुफा का द्वार बंद करके भाग आया था।’ मैं अपनी प्राण-रक्षा के लिये मन्त्रियों के साथ भागा और वाली मेरा पीछा करने लगा॥ ११॥

ततोऽहं वालिना तेन सोऽनुबद्धः प्रधावितः।

नदीश्च विविधाः पश्यन् वनानि नगराणि च॥१२॥

आदर्शतलसंकाशा ततो वै पृथिवी मया।

अलातचक्रप्रतिमा दृष्टा गोष्पदवत् कृता॥१३॥

‘वाली मेरे पीछे लगा रहा और मैं जोर-जोर से भागता गया। उसी समय मैंने विभिन्न नदियों, वनों और नगरों को देखते हुए सारी पृथ्वी को गायकी खुरी की भाँति मानकर उसकी परिक्रमा कर डाली। भागते समय मुझे यह पृथ्वी दर्पण और अलातचक्र के समान दिखायी दी॥ १२-१३॥

पूर्वां दिशं ततो गत्वा पश्यामि विविधान् द्रुमान्।

पर्वतान् सदरीन् रम्यान् सरांसि विविधानि च॥१४॥

‘तदनन्तर पूर्व दिशा में जाकर मैंने नाना प्रकार के वृक्ष, कन्दराओं सहित रमणीय पर्वत और भाँतिभाँति के सरोवर देखे॥ १४॥

उदयं तत्र पश्यामि पर्वतं धातमण्डितम्।

क्षीरोदं सागरं चैव नित्यमप्सरसालयम्॥१५॥

‘वहीं नाना प्रकार के धातुओं से मण्डित उदयाचल तथा अप्सराओं के नित्य-निवासस्थान क्षीरोद सागर का भी मैंने दर्शन किया॥१५॥

परिकाल्यमानस्तु तदा वालिनाभिद्रुतो ह्यहम्।

पुनरावृत्य सहसा प्रस्थितोऽहं तदा विभो॥१६॥

‘उस समय वाली पीछा करते रहे और मैं भागता रहा। प्रभो! जब मैं यहाँ फिर लौटकर आया, तब वाली के डर से पुनः सहसा मुझे भागना पड़ा॥१६॥

दिशस्तस्यास्ततो भूयः प्रस्थितो दक्षिणां दिशम्।

विन्ध्यपादपसंकीर्णां चन्दनद्रुमशोभिताम्॥१७॥

‘उस दिशा को छोड़कर मैं फिर दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थित हुआ, जहाँ विन्ध्यपर्वत और नाना प्रकार के वृक्ष भरे हुए हैं तथा चन्दन के वृक्ष जिसकी शोभा बढ़ाते हैं।॥ १७॥

द्रुमशैलान्तरे पश्यन् भूयो दक्षिणतोऽपराम्।

अपरां च दिशं प्राप्तो वालिना समभिद्रतः॥१८॥

‘वृक्षों और पर्वतों की ओट में बारंबार वाली को देखकर मैंने दक्षिण दिशा को छोड़ दिया तथा वाली के खदेड़ने पर पश्चिम दिशा की शरण ली॥ १८॥

स पश्यन् विविधान् देशानस्तं च गिरिसत्तमम्।

प्राप्य चास्तं गिरिश्रेष्ठमुत्तरं सम्प्रधावितः ॥१९॥

वहाँ नाना प्रकार के देशों को देखता हुआ मैं गिरिश्रेष्ठ अस्ताचल तक जा पहँचा। वहाँ पहँचकर मैं पुनः उत्तर दिशा की ओर भागा॥ १९॥

हिमवन्तं च मेरुं च समुद्रं च तथोत्तरम्।

यदा न विन्दे शरणं वालिना समभिद्रुतः॥२०॥

ततो मां बुद्धिसम्पन्नो हनुमान् वाक्यमब्रवीत्।

‘हिमालय, मेरु और उत्तर समुद्र तक पहुँचकर भी जब वाली के पीछा करने के कारण मुझे कहीं शरण नहीं मिली, तब परम बुद्धिमान् हनुमान जी ने मुझसे यह बात कही— ॥ २० १/२॥

इदानीं मे स्मृतं राजन् यथा वाली हरीश्वरः॥

मतङ्गेन तदा शप्तो ह्यस्मिन्नाश्रममण्डले।

प्रविशेद् यदि वै वाली मूर्धास्य शतधा भवेत्॥२२॥

“राजन् ! इस समय मुझे उस घटना का स्मरण हो आया है, जैसा कि मतङ्गमुनि ने उन दिनों वानरराज वाली को शाप दिया था कि ‘यदि वाली इस आश्रममण्डल में प्रवेश करेगा तो उसके मस्तक के सैकड़ों टुकड़े हो जायेंगे’ ॥ २१-२२ ॥

तत्र वासः सुखोऽस्माकं निरुद्विग्नो भविष्यति।

ततः पर्वतमासाद्य ऋष्यमूकं नृपात्मज॥२३॥

न विवेश तदा वाली मतङ्गस्य भयात् तदा।

“अतः वहीं निवास करना हमलोगों के लिये सुखद और निर्भय होगा’। राजकुमार! इस निश्चय के अनुसार हमलोग ऋष्यमूक पर्वत पर आकर रहने लगे। उस समय मतङ्ग ऋषि के भय से वाली ने वहाँ प्रवेश नहीं किया।

एवं मया तदा राजन् प्रत्यक्षमुपलक्षितम्।

पृथिवीमण्डलं सर्वं गुहामस्यागतस्ततः॥ २४॥

‘राजन्! इस प्रकार मैंने उन दिनों समस्त भूमण्डल को प्रत्यक्ष देखा था। उसके बाद ऋष्यमूक की गुफा में आया था’।

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे षट्चत्वारिंशः सर्गः॥४६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में छियालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४६॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

पूर्व आदि तीन दिशाओं में गये हुए वानरों का निराश होकर लौट आना0

सप्तचत्वारिंशः सर्गः

सर्ग-47


दर्शनार्थं तु वैदेह्याः सर्वतः कपिकुञ्जराः।

व्यादिष्टाः कपिराजेन यथोक्तं जग्मुरञ्जसा॥१॥

वानरराज के द्वारा समस्त दिशाओं की ओर जाने की आज्ञा पाकर वे सभी श्रेष्ठ वानर, जिनके लिये जिस ओर जाने का आदेश मिला था उसी ओर विदेहकुमारी सीता का पता लगाने के लिये उत्साहपूर्वक चल दिये॥१॥

ते सरांसि सरित्कक्षानाकाशं नगराणि च।

नदीदुर्गास्तथा देशान् विचिन्वन्ति समन्ततः॥२॥

वे सरोवरों, सरिताओं, लतामण्डपों, खुले स्थानों और नगरों में तथा नदियों के कारण दुर्गम प्रदेशों में सब ओर घूम-फिरकर सीता की खोज करने लगे॥२॥

सुग्रीवेण समाख्याताः सर्वे वानरयूथपाः।

तत्र देशान् विचिन्वन्ति सशैलवनकाननान्॥३॥

सुग्रीव ने जिन्हें आज्ञा दी थी, वे सभी वानरयूथपति अपनी-अपनी दिशाओं के पर्वत, वन और काननोंसहित सम्पूर्ण देशों की छानबीन करने लगे। ३॥

विचित्य दिवसं सर्वे सीताधिगमने धृताः।

समायान्ति स्म मेदिन्यां निशाकालेषु वानराः॥४॥

सीताजी का पता लगाने की निश्चित इच्छा मन में लिये वे सब वानर दिनभर इधर-उधर अन्वेषण करते और रात के समय किसी नियत स्थान पर एकत्र हो जाते थे॥

सर्वर्तुकांश्च देशेषु वानराः सफलद्रुमान्।

आसाद्य रजनीं शय्यां चक्रुः सर्वेष्वहःसु ते॥५॥

सारे दिन भिन्न-भिन्न देशों में घूम-फिरकर वे वानर सभी ऋतुओं में फल देने वाले वृक्षों के पास जाकर रात को वहीं सोया अथवा विश्राम किया करते थे॥

तदहः प्रथमं कृत्वा मासे प्रस्रवणं गताः।

कपिराजेन संगम्य निराशाः कपिकुञ्जराः॥६॥

जाने के दिन को पहला दिन मानकर एक मास पूर्ण होने तक वे श्रेष्ठ वानर निराश हो लौट आये और कपिराज सुग्रीव से मिलकर प्रस्रवणगिरि पर ठहर गये॥६॥

विचित्य तु दिशं पूर्वां यथोक्तां सचिवैः सह।

अदृष्टा विनतः सीतामाजगाम महाबलः॥७॥

महाबली विनत अपने मन्त्रियों के साथ पहले बताये अनुसार पूर्व दिशा में खोज करके वहाँ सीता को न पाकर किष्किन्धा लौट आये॥७॥

दिशमप्युत्तरां सर्वां विविच्य स महाकपिः।

आगतः सह सैन्येन भीतः शतबलिस्तदा॥८॥

महाकपि शतबलि सारी उत्तर दिशा की छानबीन करके भयभीत हो तत्काल सेनासहित किष्किन्धा आ गये॥

सुषेणः पश्चिमामाशां विविच्य सह वानरैः।

समेत्य मासे पूर्णे तु सुग्रीवमुपचक्रमे॥९॥

वानरों सहित सुषेण भी पश्चिम दिशा का अनुसंधान करके वहाँ सीता को न पाकर एक मास पूर्ण होने पर सुग्रीव के पास चले आये॥९॥

तं प्रस्रवणपृष्ठस्थं समासाद्याभिवाद्य च।

आसीनं सह रामेण सुग्रीवमिदमब्रुवन्॥१०॥

प्रस्रवणगिरि पर श्रीरामचन्द्रजी के साथ बैठे हुए सुग्रीव के पास आकर सब वानरों ने उन्हें प्रणाम किया और इस प्रकार कहा— ॥१०॥

विचिताः पर्वताः सर्वे वनानि गहनानि च।

निम्नगाः सागरान्ताश्च सर्वे जनपदाश्च ये॥

गुहाश्च विचिताः सर्वा याश्च ते परिकीर्तिताः।

विचिताश्च महागुल्मा लताविततसंतताः॥१२॥

‘राजन्! हमने समस्त पर्वत, घने जंगल, समुद्रपर्यन्त नदियाँ, सम्पूर्ण देश, आपकी बतायी हुई सारी गुफाएँ तथा लतावितान से व्याप्त हुई झाड़ियाँ भी खोज डालीं॥

गहनेषु च देशेषु दुर्गेषु विषमेषु च।

सत्त्वान्यतिप्रमाणानि विचितानि हतानि च।

ये चैव गहना देशा विचितास्ते पुनः पुनः॥१३॥

‘घने वनों, विभिन्न देशों, दुर्गम स्थानों और ऊँची ऊँची भूमियों में भी ढूँढ़ा है। बड़े-बड़े प्राणियों की भी तलाशी ली और उन्हें मार डाला। जो-जो प्रदेश घने और दुर्गम जान पड़े, वहाँ बारंबार खोज की (किंतु कहीं भी सीताजी का पता न लगा) ॥ १३॥

उदारसत्त्वाभिजनो हनूमान् स मैथिलीं ज्ञास्यति वानरेन्द्र।

दिशं तु यामेव गता तु सीता तामास्थितो वायुसुतो हनूमान्॥१४॥

‘वानरराज! वायुपुत्र हनुमान् परम शक्तिमान् और कुलीन हैं। वे ही मिथिलेशकुमारी का पता लगा सकेंगे; क्योंकि वे उसी दिशा में गये हैं, जिधर सीता गयी हैं’ ॥ १४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे सप्तचत्वारिंशः सर्गः ॥४७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में सैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥४७॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

दक्षिण दिशा में गये हुए वानरों का सीता की खोज आरम्भ करना

अष्टचत्वारिंशः सर्गः

सर्ग-48


सह ताराङ्गदाभ्यां तु सहसा हनुमान् कपिः।

सुग्रीवेण यथोद्दिष्टं गन्तुं देशं प्रचक्रमे॥१॥

उधर तार और अङ्गद के साथ हनुमान् जी सहसा सुग्रीव के बताये हुए दक्षिण दिशा के देशों की ओर चले॥

स तु दूरमुपागम्य सर्वैस्तैः कपिसत्तमैः।

ततो विचित्य विन्ध्यस्य गुहाश्च गहनानि च॥२॥

पर्वताग्रनदीदुर्गान् सरांसि विपुलद्रुमान्।

वृक्षषण्डांश्च विविधान् पर्वतान् वनपादपान्॥

अन्वेषमाणास्ते सर्वे वानराः सर्वतो दिशम्।

न सीतां ददृशुर्वीरा मैथिली जनकात्मजाम्॥४॥

उन सभी श्रेष्ठ वानरों के साथ बहुत दूर का रास्ता तै करके वे विन्ध्याचल पर गये और वहाँ की गुफाओं, जंगलों, पर्वतशिखरों, नदियों, दर्गम स्थानों सरोवरों. बड़े-बड़े वृक्षों, झाड़ियों और भाँति-भाँति के पर्वतों एवं वन्य वृक्षों में सब ओर ढूँढ़ते फिरे; परंतु वहाँ उन समस्त वीर वानरों ने मिथिलेशकुमारी जनकनन्दिनी सीता को कहीं नहीं देखा॥२-४॥

ते भक्षयन्तो मूलानि फलानि विविधान्यपि।

अन्वेषमाणा दुर्धर्षा न्यवसंस्तत्र तत्र ह॥५॥

वे सभी दुर्धर्ष वीर नाना प्रकार के फल-मूल का भोजन करते हुए सीता को खोजते और जहाँ-तहाँ ठहर जाया करते थे।

स तु देशो दुरन्वेषो गुहागहनवान् महान्।

निर्जलं निर्जनं शून्यं गहनं घोरदर्शनम्॥६॥

विन्ध्यपर्वत के आस-पास का महान् देश बहुत-सी गुफाओं तथा घने जंगलों से भरा था। इससे वहाँ जानकी को ढूँढ़ने में बड़ी कठिनाई होती थी। भयंकर दिखायी देने वाले वहाँ के सुनसान जंगल में न तो पानी मिलता था और न कोई मनुष्य ही दिखायी देता था।

तादृशान्यप्यरण्यानि विचित्य भृशपीडिताः।

स देशश्च दुरन्वेष्यो गुहागहनवान् महान्॥७॥

वैसे जंगलों में भी खोज करते समय उन वानरों को अत्यन्त कष्ट सहन करना पड़ा। वह विशाल प्रदेश अनेक गुहाओं और सघन वनों से व्याप्त था। अतः वहाँ अन्वेषण का कार्य बहुत कठिन प्रतीत होता था। ७॥

त्यक्त्वा तु तं ततो देशं सर्वे वै हरियूथपाः।

देशमन्यं दुराधर्षं विविशुश्चाकुतोभयाः॥८॥

तदनन्तर वे समस्त वानर-यूथपति उस देश को छोड़कर दूसरे प्रदेश में घुसे, जहाँ जाना और भी कठिन था तो भी उन्हें कहीं किसी से भय नहीं होता था॥८॥

यत्र वन्ध्यफला वृक्षा विपुष्पाः पर्णवर्जिताः।

निस्तोयाः सरितो यत्र मूलं यत्र सुदुर्लभम्॥९॥

वहाँ के वृक्ष कभी फल नहीं देते थे। उनमें फूल भी नहीं लगते थे और उनकी डालियों में पत्ते भी नहीं थे। वहाँ की नदियों में पानी का नाम नहीं था। कन्द-मूल आदि तो वहाँ सर्वथा दुर्लभ थे॥९॥

न सन्ति महिषा यत्र न मृगा न च हस्तिनः।

शार्दूलाः पक्षिणो वापि ये चान्ये वनगोचराः॥१०॥

उस प्रदेश में न भैंसे थे न हिरन और हाथी न बाघ थे न पक्षी तथा वन में विचरने वाले अन्य प्राणियों का भी वहाँ अभाव था॥ १०॥

न चात्र वृक्षा नौषध्यो न वल्लयो नापि वीरुधः ।

स्निग्धपत्राः स्थले यत्र पद्मिन्यः फुल्लपङ्कजाः॥११॥

प्रेक्षणीयाः सुगन्धाश्च भ्रमरैश्च विवर्जिताः।

वहाँ न पेड़ थे न पौधे, न ओषधियाँ थीं न लता बेलें उस देश की पोखरियों में चिकने पत्तों और खिले हुए फूलों से युक्त कमल भी नहीं थे। इसीलिये न तो वे देखने योग्य थीं, न उनमें सुगन्ध छा रही थी और न वहाँ भौरे ही गुंजार करते थे। ११ १/२॥

कण्डुर्नाम महाभागः सत्यवादी तपोधनः॥१२॥

महर्षिः परमामर्षी नियमैर्दुष्प्रधर्षणः।

पहले वहाँ कण्डु नाम से प्रसिद्ध एक महाभाग सत्यवादी और तपस्या के धनी महर्षि रहते थे, जो बड़े अमर्षशील थे—अपने प्रति किये गये अपराध को सहन नहीं करते थे। शौच-संतोष आदि नियमों का पालन करने के कारण उन महर्षि को कोई तिरस्कृत या पराजित नहीं कर सकता था। १२ १/२॥

तस्य तस्मिन् वने पुत्रो बालको दशवार्षिकः॥१३॥

प्रणष्टो जीवितान्ताय क्रुद्धस्तेन महामुनिः।

उस वन में उनका एक बालक पुत्र, जिसकी अवस्था दस वर्ष की थी, किसी कारण से मर गया। इससे कुपित होकर वे महामुनि उस वन के जीवन का अन्त करने के लिये उद्यत हो गये। १३ १/२॥

तेन धर्मात्मना शप्तं कृत्स्नं तत्र महदनम्॥१४॥

अशरण्यं दुराधर्षं मृगपक्षिविवर्जितम्।

उन धर्मात्मा महर्षि ने उस समूचे विशाल वन को वहाँ शाप दे दिया, जिससे वह आश्रयहीन, दुर्गम तथा पशु-पक्षियों से शून्य हो गया॥ १४ १/२॥

तस्य ते काननान्तांस्तु गिरीणां कन्दराणि च॥१५॥

प्रभवाणि नदीनां च विचिन्वन्ति समाहिताः।

तत्र चापि महात्मानो नापश्यञ्जनकात्मजाम्॥१६॥

हर्तारं रावणं वापि सुग्रीवप्रियकारिणः।

वहाँ सुग्रीव का प्रिय करने वाले उन महामनस्वी वानरों ने उस वन के सभी प्रदेशों, पर्वतों की कन्दराओं तथा नदियों के उद्गमस्थानों में एकाग्रचित्त होकर अनुसंधान किया; परंतु वहाँ भी उन्हें जनकनन्दिनी सीता अथवा उनका अपहरण करने वाले रावण का कुछ पता नहीं चला।

ते प्रविश्य तु तं भीमं लतागुल्मसमावृतम्॥१७॥

ददृशुर्भीमकर्माणमसुरं सुरनिर्भयम्।

तत्पश्चात् लताओं और झाड़ियों से व्याप्त हुए दूसरे किसी भयंकर वन में प्रवेश करके उन हनुमान् आदि वानरों ने भयानक कर्म करने वाले एक असुर को देखा, जिसे देवताओं से कोई भय नहीं था॥ १७ १/२ ।।

तं दृष्ट्वा वानरा घोरं स्थितं शैलमिवासुरम्॥१८॥

गाढं परिहिताः सर्वे दृष्ट्वा तं पर्वतोपमम्।

उस घोर निशाचर को पहाड़ के समान सामने खड़ा देख सभी वानरों ने अपने ढीले-ढाले वस्त्रों को अच्छी तरह कस लिया और सब-के-सब उस पर्वताकार असुर से भिड़ने को तैयार हो गये। १८ १/२॥

सोऽपि तान् वानरान् सर्वान् नष्टाः स्थेत्यब्रवीद् बली॥१९॥

अभ्यधावत संक्रुद्धो मुष्टिमुद्यम्य संगतम्।

उधर वह बलवान् असुर भी उन सब वानरों को देखकर बोला—’अरे, आज तुम सभी मारे गये।’ इतना कहकर वह अत्यन्त कुपित हो बँधा हुआ मुक्का तानकर उनकी ओर दौड़ा॥ १९ १/२॥

तमापतन्तं सहसा वालिपुत्रोऽङ्गदस्तदा॥२०॥

रावणोऽयमिति ज्ञात्वा तलेनाभिजघान ह।

उसे सहसा आक्रमण करते देख वालिपुत्र अङ्गद ने समझा कि यही रावण है; अतः उन्होंने आगे बढ़कर उसे एक तमाचा जड़ दिया॥२० १/२॥

स वालिपुत्राभिहतो वक्त्राच्छोणितमुद्रमन्॥२१॥

असुरो न्यपतद् भूमौ पर्यस्त इव पर्वतः।

ते तु तस्मिन् निरुच्छ्वासे वानरा जितकाशिनः॥२२॥

व्यचिन्वन् प्रायशस्तत्र सर्वं ते गिरिगह्वरम्।

वालिपुत्र के मारने पर वह असुर मुँह से रक्त वमन करता हुआ फटकर गिरे हुए पहाड़ की भाँति पृथ्वी पर जा पड़ा और उसके प्राणपखेरू उड़ गये। तत्पश्चात् विजयोल्लास से सुशोभित होने वाले वानर प्रायः वहाँ की सारी पर्वतीय गुफाओं में अनुसंधान करने लगे॥ २१-२२ १/२ ॥

विचितं तु ततः सर्वं सर्वे ते काननौकसः॥ २३॥

अन्यदेवापरं घोरं विविशुर्गिरिगह्वरम्।।

जब वहाँ के सारे प्रदेश में खोज कर ली गयी, तब उन समस्त वनवासी वानरों ने किसी दूसरी पर्वतीय कन्दरा में प्रवेश किया, जो पहले की अपेक्षा भी भयानक थी॥ २३ १/२ ॥

ते विचित्य पुनः खिन्ना विनिष्पत्य समागताः।

एकान्ते वृक्षमूले तु निषेदुर्दीनमानसाः॥२४॥

उसमें भी ढूँढ़ते-ढूँढ़ते वे थक गये और निराश होकर निकल आये। फिर सब-के-सब एकान्त स्थान में एक वृक्ष के नीचे खिन्नचित्त होकर बैठ गये॥ २४॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डेऽष्टचत्वारिंशः सर्गः॥४८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में अड़तालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥४८॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

अङ्गद और गन्धमादन के आश्वासन देने पर वानरों का पुनःउत्साहपूर्वक अन्वेषण-कार्य में प्रवृत्त होना

एकोनपञ्चाशः सर्गः

सर्ग-49


अथाङ्गदस्तदा सर्वान् वानरानिदमब्रवीत्।

परिश्रान्तो महाप्राज्ञः समाश्वास्य शनैर्वचः॥१॥

तदनन्तर परिश्रम से थके हुए महाबुद्धिमान् अङ्गद सम्पूर्ण वानरों को आश्वासन देकर धीरे-धीरे इस प्रकार कहने लगे— ॥१॥

वनानि गिरयो नद्यो दुर्गाणि गहनानि च।

दरी गिरिगुहाश्चैव विचिताः सर्वमन्ततः॥२॥

तत्र तत्र सहास्माभिर्जानकी न च दृश्यते।।

तथा रक्षोऽपहर्ता च सीतायाश्चैव दुष्कृती॥३॥

‘हमलोगों ने वन, पर्वत, नदियाँ, दुर्गम स्थान, घने जंगल, कन्दरा और गुफाएँ भीतर प्रवेश करके अच्छी तरह देख डाली; परंतु उन स्थानों में हमें न तो जानकी के दर्शन हुए और न उनका अपहरण करने वाला वह पापी राक्षस ही मिला॥ २-३॥

कालश्च नो महान् यातः सुग्रीवश्चोग्रशासनः।

तस्माद् भवन्तः सहिता विचिन्वन्तु समन्ततः॥४॥

‘हमारा समय भी बहुत बीत गया। राजा सुग्रीव का शासन बड़ा भयंकर है। अतः आपलोग मिलकर पुनः सब ओर सीता की खोज आरम्भ करें॥ ४॥

विहाय तन्द्रीं शोकं च निद्रां चैव समुत्थिताम्।

विचिनुध्वं तथा सीतां पश्यामो जनकात्मजाम्॥

‘आलस्य, शोक और आयी हुई निद्रा का परित्याग करके इस प्रकार ढूँढें, जिससे हमें जनककुमारी सीता का दर्शन हो सके॥५॥

अनिर्वेदं च दाक्ष्यं च मनसश्चापराजयम्।

कार्यसिद्धिकराण्याहुस्तस्मादेतद् ब्रवीम्यहम्॥६॥

‘उत्साह, सामर्थ्य और मन में हिम्मत न हारना—ये कार्य की सिद्धि कराने वाले सद्गुण कहे गये हैं; इसीलिये मैं आपलोगों से यह बात कह रहा हूँ॥६॥

अद्यापीदं वनं दुर्गं विचिन्वन्तु वनौकसः।

खेदं त्यक्त्वा पुनः सर्वं वनमेव विचिन्वताम्॥७॥

‘आज भी सारे वानर खेद छोड़कर इस दुर्गम वन में खोज आरम्भ करें और सारे वन को ही छान डालें ॥७॥

अवश्यं कुर्वतां तस्य दृश्यते कर्मणः फलम्।

परं निर्वेदमागम्य नहि नोन्मीलनं क्षमम्॥८॥

‘कर्म में लगे रहने वाले लोगों को उस कर्म का फल अवश्य होता दिखायी देता है; अतः अत्यन्त खिन्न होकर उद्योग को छोड़ बैठना कदापि उचित नहीं है।

सुग्रीवः क्रोधनो राजा तीक्ष्णदण्डश्च वानराः।

भेतव्यं तस्य सततं रामस्य च महात्मनः॥९॥

‘सुग्रीव क्रोधी राजा हैं। उनका दण्ड भी बड़ा कठोर होता है। वानरो! उनसे तथा महात्मा श्रीराम से आपलोगों को सदा डरते रहना चाहिये॥९॥

हितार्थमेतदुक्तं वः क्रियतां यदि रोचते।

उच्यतां हि क्षमं यत् तत् सर्वेषामेव वानराः॥१०॥

‘आपलोगों की भलाई के लिये ही मैंने ये बातें कही हैं। यदि अच्छी लगें तो आप इन्हें स्वीकार करें अथवा वानरो ! जो सबके लिये उचित हो, वह कार्य आप ही लोग बतावें ॥ १०॥

अङ्गदस्य वचः श्रुत्वा वचनं गन्धमादनः।

उवाच व्यक्तया वाचा पिपासाश्रमखिन्नया॥११॥

अङ्गद की यह बात सुनकर गन्धमादन ने प्यास और थकावट से शिथिल हुई स्पष्ट वाणी में कहा— ॥११॥

सदृशं खलु वो वाक्यमङ्गदो यदुवाच ह।

हितं चैवानुकूलं च क्रियतामस्य भाषितम्॥१२॥

‘वानरो! युवराज अङ्गद ने जो बात कही है, वह आपलोगों के योग्य, हितकर और अनुकूल है; अतः सब लोग इनके कथनानुसार कार्य करें॥ १२॥

पुनर्मार्गामहे शैलान् कन्दरांश्च शिलांस्तथा।

काननानि च शून्यानि गिरिप्रस्रवणानि च॥१३॥

‘हमलोग पुनः पर्वतों, कन्दराओं, शिलाओं, निर्जन वनों और पर्वतीय झरनों की खोज करें॥ १३॥

यथोद्दिष्टानि सर्वाणि सुग्रीवेण महात्मना।

विचिन्वन्त वनं सर्वे गिरिदुर्गाणि संगताः॥१४॥

‘महात्मा सुग्रीव ने जिन स्थानों की चर्चा की थी, उन सबमें वन और पर्वतीय दुर्गम प्रदेशों में सब वानर एक साथ होकर खोज आरम्भ करें’॥ १४ ॥

ततः समुत्थाय पुनर्वानरास्ते महाबलाः।

विन्ध्यकाननसंकीर्णां विचेरुदक्षिणां दिशम्॥१५॥

यह सुनकर वे महाबली वानर उठकर खड़े हो गये और विन्ध्य पर्वत के काननों से व्याप्त दक्षिण दिशा में विचरने लगे॥ १५॥

ते शारदाभ्रप्रतिमं श्रीमद्रजतपर्वतम्।

शृङ्गवन्तं दरीवन्तमधिरुह्य च वानराः॥१६॥

सामने शरद्-ऋतुके बादलोंके समान शोभाशाली रजत पर्वत दिखायी दिया, जिसमें अनेक शिखर और कन्दराएँ थीं। वे सब वानर उसपर चढ़कर खोजने लगे॥१६॥

तत्र लोध्रवनं रम्यं सप्तपर्णवनानि च।

विचिन्वन्तो हरिवराः सीतादर्शनकांक्षिणः॥१७॥

सीता के दर्शन की इच्छा रखने वाले वे सभी श्रेष्ठ वानर वहाँ के रमणीय लोध्रवन में और सप्तपर्ण (छितवन) के जंगलों में उनकी खोज करने लगे। १७॥

ततः समुत्थाय पुनर्वानरास्ते महाबलाः।

विन्ध्यकाननसंकीर्णां विचेरुदक्षिणां दिशम्॥१५॥

यह सुनकर वे महाबली वानर उठकर खड़े हो गये और विन्ध्य पर्वत के काननों से व्याप्त दक्षिण दिशा में विचरने लगे॥ १५॥

ते शारदाभ्रप्रतिमं श्रीमद्रजतपर्वतम्।

शृङ्गवन्तं दरीवन्तमधिरुह्य च वानराः॥१६॥

सामने शरद्-ऋतुके बादलों के समान शोभाशाली रजत पर्वत दिखायी दिया, जिसमें अनेक शिखर और कन्दराएँ थीं वे सब वानर उस पर चढ़कर खोजने लगे॥१६॥

तत्र लोध्रवनं रम्यं सप्तपर्णवनानि च।

विचिन्वन्तो हरिवराः सीतादर्शनकांक्षिणः॥१७॥

सीता के दर्शन की इच्छा रखने वाले वे सभी श्रेष्ठ वानर वहाँ के रमणीय लोध्रवन में और सप्तपर्ण (छितवन) के जंगलों में उनकी खोज करने लगे। १७॥

तस्याग्रमधिरूढास्ते श्रान्ता विपुलविक्रमाः।

न पश्यन्ति स्म वैदेहीं रामस्य महिषीं प्रियाम्॥१८॥

उस पर्वत के शिखर पर चढ़े हुए वे महापराक्रमी वानर ढूँढ़ते-ढूँढ़ते थक गये, परंतु श्रीरामचन्द्रजी की प्यारी रानी सीता का दर्शन न पा सके॥ १८ ॥

ते तु दृष्टिगतं दृष्ट्वा तं शैलं बहुकन्दरम्।

अध्यारोहन्त हरयो वीक्षमाणाः समन्ततः॥१९॥

अनेक कन्दराओं वाले उस पर्वत का अच्छी तरह निरीक्षण करके सब ओर दृष्टिपात करने वाले वे वानर उससे नीचे उतर गये॥ १९॥

अवरुह्य ततो भूमिं श्रान्ता विगतचेतसः।

स्थिता मुहूर्तं तत्राथ वृक्षमूलमुपाश्रिताः॥२०॥

पृथ्वी पर उतरकर अधिक थक जाने के कारण अचेत हुए वे सभी वानर वहाँ एक वृक्ष के नीचे गये और दो घड़ी तक वहाँ बैठे रहे ॥ २० ॥

ते मुहूर्तं समाश्वस्ताः किंचिद्भग्नपरिश्रमाः।

पुनरेवोद्यताः कृत्स्ना मार्गितुं दक्षिणां दिशम्॥२१॥

एक मुहूर्ततक सुस्ता लेने पर जब उनकी थकावट कुछ कम हो गयी तब वे पुनः सम्पूर्ण दक्षिण दिशा में खोज के लिये उद्यत हो गये॥ २१॥

हनुमत्प्रमुखास्तावत् प्रस्थिताः प्लवगर्षभाः।

विन्ध्यमेवादितः कृत्वा विचेरुश्च समन्ततः॥२२॥

हनुमान् आदि सभी श्रेष्ठ वानर सीता के अन्वेषण के लिये प्रस्थित हो पहले विन्ध्य पर्वत के ही चारों ओर विचरने लगे॥ २२॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे एकोनपञ्चाशः सर्गः॥४९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में उनचासवाँ सर्ग पूरा हुआ॥४९॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

भूखे-प्यासे वानरों का एक गुफा में घुसकर वहाँ दिव्य वृक्ष, दिव्य सरोवर, दिव्य भवन तथा एक वृद्धा तपस्विनी को देखना और हनुमान जी का उससे उसका परिचय पूछना

पञ्चाशः सर्गः

सर्ग-50


सह ताराङ्गदाभ्यां तु संगम्य हनुमान् कपिः।

विचिनोति च विन्ध्यस्य गुहाश्च गहनानि च॥१॥

हनुमान जी तार और अङ्गद के साथ मिलकर विन्ध्यगिरि की गुफाओं और घने जंगलों में सीताजी को ढूँढने लगे॥१॥

सिंहशार्दूलजुष्टाश्च गुहाश्च परितस्तदा।

विषमेषु नगेन्द्रस्य महाप्रस्रवणेषु च॥२॥

उन्होंने सिंह और बाघों से भरी हुई कन्दराओं तथा उसके आस-पास की भूमि को भी छान डाला। गिरिराज विन्ध्य पर जो बड़े-बड़े झरने और दुर्गम स्थान थे, वहाँ भी अन्वेषण किया॥२॥

आसेदुस्तस्य शैलस्य कोटिं दक्षिणपश्चिमाम्।

तेषां तत्रैव वसतां स कालो व्यत्यवर्तत ॥३॥

घूमते-फिरते वे तीनों वानर उस पर्वत के नैर्ऋत्यकोण वाले शिखर पर जा पहुँचे। वहीं रहते हुए उनका वह समय, जो सुग्रीव ने निश्चित किया था, बीत गया॥३॥

स हि देशो दुरन्वेष्यो गुहागहनवान् महान्।

तत्र वायुसुतः सर्वं विचिनोति स्म पर्वतम्॥४॥

गुफाओं और जंगलों से भरे हुए उस महान् प्रदेश में सीता को ढूँढ़ने का काम बहुत ही कठिन था तो भी वहाँ वायुपुत्र हनुमान् जी सारे पर्वत की छानबीन करने लगे॥ ४॥

परस्परेण रहिता अन्योन्यस्याविदूरतः।

गजो गवाक्षो गवयः शरभो गन्धमादनः॥५॥

मैन्दश्च द्विविदश्चैव हनूमान् जाम्बवानपि।

अङ्गदो युवराजश्च तारश्च वनगोचरः॥६॥

गिरिजालावृतान् देशान् मार्गित्वा दक्षिणां दिशम्।

विचिन्वन्तस्ततस्तत्र ददृशुर्विवृतं बिलम्॥७॥

फिर अलग-अलग एक-दूसरे से थोड़ी ही दूर पर रहकर गज, गवाक्ष, गवय, शरभ, गन्धमादन, मैन्द,द्विविद, हनुमान्, जाम्बवान्, युवराज अङ्गद तथा वनवासी वानर तार—ये दक्षिण दिशा के देशों में जो पर्वतमालाओं से घिरे हुए थे, सीता की खोज करने लगे। खोजते-खोजते उन्हें वहाँ एक गुफा दिखायी दी, जिसका द्वार बंद नहीं था॥ ५–७॥

दुर्गमृक्षबिलं नाम दानवेनाभिरक्षितम्।

क्षुत्पिपासापरीतास्तु श्रान्तास्तु सलिलार्थिनः॥८॥

उसमें प्रवेश करना बहुत कठिन था। वह गुफा ऋक्षबिल नाम से विख्यात थी और एक दानव उसकी रक्षा में रहता था। वानरों को भूख-प्यास सता रही थी। वे बहुत थक गये थे और पानी पीना चाहते थे॥८॥

अवकीर्णं लतावृक्षर्ददृशुस्ते महाबिलम्।

तत्र क्रौञ्चाश्च हंसाश्च सारसाश्चापि निष्क्रमन्॥९॥

जलार्द्राश्चक्रवाकाश्च रक्ताङ्गाः पद्मरेणुभिः।

अतः लता और वृक्षों से  आच्छादित विशाल गुफा की ओर वे देखने लगे। इतने में उसके भीतर से क्रौञ्च, हंस, सारस तथा जल से भीगे हुए चक्रवाक पक्षी, जिनके अङ्ग कमलों के पराग से रक्तवर्ण के हो रहे थे, बाहर निकले॥

ततस्तद् बिलमासाद्य सुगन्धि दुरतिक्रमम्॥१०॥

विस्मयव्यग्रमनसो बभूवुर्वानरर्षभाः।

संजातपरिशङ्कास्ते तद् बिलं प्लवगोत्तमाः॥११॥

तब उस सुगन्धित एवं दुर्लङ्घ्य गुफा के पास जाकर उन सभी श्रेष्ठ वानरों का मन आश्चर्य से चकित हो उठा। उस बिल के अंदर उन्हें जल होने का संदेह हुआ॥

अभ्यपद्यन्त संहृष्टास्तेजोवन्तो महाबलाः।

नानासत्त्वसमाकीर्णं दैत्येन्द्रनिलयोपमम्॥१२॥

दुर्दर्शमिव घोरं च दुर्विगाह्यं च सर्वशः।

वे महाबली और तेजस्वी वानर बड़े हर्ष में भरकर उस गुफा के पास आये, जो नाना प्रकार के जन्तुओं से भरी हुई तथा दैत्यराजों के निवासस्थान पाताल के समान भयंकर प्रतीत होती थी। वह इतनी भयानक थी कि उसकी ओर देखना कठिन जान पड़ता था। उसके भीतर घुसना सर्वथा कष्टसाध्य था॥ १२ १/२॥

ततः पर्वतकूटाभो हनूमान् मारुतात्मजः॥१३॥

अब्रवीद् वानरान् घोरान् कान्तारवनकोविदः।

उस समय पर्वत-शिखर के समान प्रतीत होने वाले पवनपुत्र हनुमान् जी, जो दुर्गम वन के ज्ञाता थे, उन घोर वानरों से बोले- ॥ १३ १/२॥

गिरिजालावृतान् देशान् मार्गित्वा दक्षिणां दिशम्॥१४॥

वयं सर्वे परिश्रान्ता न च पश्याम मैथिलीम्।

‘बन्धुओ! दक्षिण दिशा के देश प्रायः पर्वतमालाओं से घिरे हुए हैं। इनमें मिथिलेशकुमारी सीता को खोजते-खोजते हम सब लोग बहुत थक गये; किंतु कहीं भी हमें उनके दर्शन नहीं हुए। १४ १/२॥

अस्माच्चापि बिलाद्धंसाः क्रौञ्चाश्च सह सारसैः॥१५॥

जलार्द्राश्चक्रवाकाश्च निष्पतन्ति स्म सर्वशः।

नूनं सलिलवानत्र कूपो वा यदि वा ह्रदः॥१६॥

तथा चेमे बिलद्वारे स्निग्धास्तिष्ठन्ति पादपाः।

‘सामने की इस गुफा से हंस, क्रौञ्च, सारस और जल से भीगे हुए चकवे सब ओर निकल रहे हैं। अतः निश्चय ही इसमें पानी का कुआँ अथवा और कोई जलाशय होना चाहिये। तभी इस गुफा के द्वारवर्ती वृक्ष हरे-भरे हैं’॥

इत्युक्तास्तद् बिलं सर्वे विविशुस्तिमिरावृतम्॥१७॥

अचन्द्रसूर्यं हरयो ददृशू रोमहर्षणम्।

हनुमान जी के ऐसा कहने पर वे सभी वानर अन्धकार से भरी हुई गुफा में, जहाँ चन्द्रमा और सूर्य की किरणें भी नहीं पहुँच पाती थीं, घुस गये। भीतर जाकर उन्होंने देखा, वह गुफा रोंगटे खड़े कर देने वाली थी॥ १७ १/२॥

निशाम्य तस्मात् सिंहांश्च तांस्तांश्च मृगपक्षिणः॥१८॥

प्रविष्टा हरिशार्दूला बिलं तिमिरसंवृतम्।

उस बिल से निकलते हुए उन-उन सिंहों, मृगों और पक्षियों को देखकर वे श्रेष्ठ वानर अन्धकार से आच्छादित हुई उस गुफा में प्रवेश करने लगे॥ १८ १/२॥

न तेषां सज्जते दृष्टिर्न तेजो न पराक्रमः॥१९॥

वायोरिव गतिस्तेषां दृष्टिस्तमसि वर्तते।।

उनकी दृष्टि कहीं अटकती नहीं थी। उनका तेज और पराक्रम भी अवरुद्ध नहीं होता था। उनकी गति वायु के समान थी। अन्धकार में भी उनकी दृष्टि काम कर रही थी॥ १९ १/२ ॥

ते प्रविष्टास्तु वेगेन तद् बिलं कपिकुञ्जराः॥२०॥

प्रकाशं चाभिरामं च ददृशुर्देशमुत्तमम्।

वे श्रेष्ठ वानर उस बिल में वेगपूर्वक घुस गये। भीतर जाकर उन्होंने देखा, वह स्थान बहुत ही उत्तम, प्रकाशमान और मनोहर था॥ २० १/२ ॥

ततस्तस्मिन् बिले भीमे नानापादपसंकुले॥२१॥

अन्योन्यं सम्परिष्वज्य जग्मुर्योजनमन्तरम्।।

नाना प्रकार के वृक्षों से भरी हुई उस भयंकर गुफा में वे एक योजन तक एक-दूसरे को पकड़े हुए गये॥ २१ १/२॥

ते नष्टसंज्ञास्तृषिताः सम्भ्रान्ताः सलिलार्थिनः॥२२॥

परिपेतुर्बिले तस्मिन् कंचित् कालमतन्द्रिताः।

प्यास के मारे उनकी चेतना लुप्त-सी हो रही थी। वे जल पीने के लिये उत्सुक होकर घबरा गये थे और कुछ काल तक आलस्यरहित हो उस बिल में लगातार आगे बढ़ते गये॥ २२ १/२॥

ते कृशा दीनवदनाः परिश्रान्ताः प्लवङ्गमाः॥२३॥

आलोकं ददृशीरा निराशा जीविते यदा।

वे वानरवीर जब दुर्बल, खिन्नवदन और श्रान्त होकर जीवन से निराश हो गये, तब उन्हें वहाँ प्रकाश दिखायी दिया॥ २३ १/२॥

ततस्तं देशमागम्य सौम्या वितिमिरं वनम्॥२४॥

ददृशुः काञ्चनान् वृक्षान् दीप्तवैश्वानरप्रभान्।

तदनन्तर उस अन्धकार से प्रकाशपूर्ण देश में आकर उन सौम्य वानरों ने वहाँ अन्धकाररहित वन देखा, जहाँके सभी वृक्ष सुवर्णमय थे और उनसे अग्नि के समान प्रभा निकल रही थी॥ २४ १/२॥

सालास्तालांस्तमालांश्च पुंनागान् वञ्जुलान् धवान्॥२५॥

चम्पकान् नागवृक्षांश्च कर्णिकारांश्च पुष्पितान्।

साल, ताल, तमाल, नागकेसर, अशोक, धव, चम्पा, नागवृक्ष और कनेर—ये सभी वृक्ष फूलों से भरे हुए थे॥

स्तबकैः काञ्चनैश्चित्रै रक्तैः किसलयैस्तथा॥ २६॥

आपीडैश्च लताभिश्च हेमाभरणभूषितान्।

विचित्र सुवर्णमय गुच्छे और लाल-लाल पल्लव मानो उन वृक्षों के मुकुट थे। उनमें लताएँ लिपटी हुई थीं तथा वे अपने फलस्वरूप सुवर्णमय आभूषणों से विभूषित थे। २६ १/२॥

तरुणादित्यसंकाशान् वैदूर्यमयवेदिकान्॥ २७॥

बिभ्राजमानान् वपुषा पादपांश्च हिरण्मयान्।

वे देखने में प्रातःकालिक सूर्य के समान जान पड़ते थे। उनके नीचे वैदूर्यमणि की वेदी बनी थी। वे सुवर्णमय वृक्ष अपने दीप्तिमान् स्वरूप से ही प्रकाशित हो रहे थे॥

नीलवैदूर्यवर्णाश्च पद्मिनीः पतगैर्वृताः॥२८॥

महद्भिः काञ्चनैर्वृक्षैर्वृता बालार्कसंनिभैः।

जातरूपमयैर्मत्स्यैर्महद्भिश्चाथ पङ्कजैः॥ २९॥

नलिनीस्तत्र ददृशुः प्रसन्नसलिलायुताः।

वहाँ नील वैदूर्यमणि की-सी कान्तिवाली पद्मलताएँ दिखायी देती थीं, जो पक्षियों से आवृत थीं। कई ऐसे सरोवर भी देखने में आये, जो बाल सूर्य की-सी आभा वाले विशाल काञ्चनवृक्षों से घिरे हुए थे। उनके भीतर सुनहरे रंग के बड़े-बड़े मत्स्य शोभा पाते थे। वे सरोवर सुवर्णमय कमलों से सुशोभित तथा स्वच्छ जल से भरे हुए थे॥ २८-२९ १/२ ॥

काञ्चनानि विमानानि राजतानि तथैव च॥३०॥

तपनीयगवाक्षाणि मुक्ताजालावृतानि च।

हैमराजतभौमानि वैदूर्यमणिमन्ति च ॥३१॥

ददृशुस्तत्र हरयो गृहमुख्यानि सर्वशः।

वानरों ने वहाँ सब ओर सोने-चाँदी के बने हुए बहुत-से श्रेष्ठ भवन देखे, जिनकी खिड़कियाँ मोती की जालियों से ढकी थीं। उन भवनों में सोने के जंगले लगे हुए थे। सोने-चाँदी के ही विमान भी थे। कोई घर सोने के बने थे तो कोई चाँदी के कितने ही गृह पार्थिव वस्तुओं (ईंट, पत्थर, लकड़ी आदि-) से निर्मित हुए थे। उनमें वैदूर्यमणियाँ भी जड़ी गयी थीं। ३०-३१ १/२॥

पुष्पितान् फलिनो वृक्षान् प्रवालमणिसंनिभान्॥३२॥

काञ्चनभ्रमरांश्चैव मधूनि च समन्ततः।

मणिकाञ्चनचित्राणि शयनान्यासनानि च।३३॥

विविधानि विशालानि ददृशुस्ते समन्ततः।

हैमराजतकांस्यानां भाजनानां च राशयः॥३४॥

अगुरूणां च दिव्यानां चन्दनानां च संचयान्।

शुचीन्यभ्यवहाराणि मूलानि च फलानि च॥३५॥

महार्हाणि च यानानि मधूनि रसवन्ति च।

दिव्यानामम्बराणां च महार्हाणां च संचयान्॥३६॥

कम्बलानां च चित्राणामजिनानां च संचयान्।

तत्र तत्र च विन्यस्तान् दीप्तान् वैश्वानरप्रभान्॥३७॥

ददृशुर्वानराः शुभ्राञ्जातरूपस्य संचयान्।

वहाँ के वृक्षों में फूल और फल लगे थे। वे वृक्ष मूंगे और मणियों के समान चमकीले थे। उनपर सुनहरे रंग के भौरे मड़रा रहे थे। वहाँ के घरों में सब ओर मधु संचित थे। मणि और सुवर्ण से जटित विचित्र पलंग तथा आसन सब ओर सजाकर रखे गये थे, जो अनेक प्रकार के और विशाल थे। वानरों ने उन्हें भी देखा। वहाँ ढेर-के-ढेर सोने, चाँदी और कांस(फूल-) के पात्र रखे गये थे। अगुरु तथा दिव्य चन्दन की राशियाँ सुरक्षित थीं। पवित्र भोजन के सामान तथा फल-मूल भी विद्यमान थे। बहुमूल्य सवारियाँ, सरस मधु, महामूल्यवान् दिव्य वस्त्रों के ढेर, विचित्र कम्बल एवं कालीनों की राशियाँ तथा मृगचर्मो के समूह जहाँ-तहाँ रखे हुए थे। वे सब अग्नि के समान प्रभा से उद्दीप्त हो रहे थे। वानरों ने वहाँ चमकीले सुवर्ण के ढेर भी देखे॥ ३२–३७ १/२॥

तत्र तत्र विचिन्वन्तो बिले तत्र महाप्रभाः॥३८॥

ददृशुर्वानराः शूराः स्त्रियं कांचिददूरतः।

तां च ते ददृशुस्तत्र चीरकृष्णाजिनाम्बराम्॥

तापसी नियताहारां ज्वलन्तीमिव तेजसा।

विस्मिता हरयस्तत्र व्यवतिष्ठन्त सर्वशः।

पप्रच्छ हनुमांस्तत्र कासि त्वं कस्य वा बिलम्॥४०॥

उस गुफा में जहाँ-तहाँ खोज करते हुए उन महातेजस्वी शूरवीर वानरों ने थोड़ी ही दूर पर किसी स्त्री को भी देखा, जो वल्कल और काला मृगचर्म पहनकर नियमित आहार करती तपस्या में संलग्न थी और अपने तेज से दिप रही थी। वानरों ने वहाँ उसे बड़े ध्यान से देखा और आश्चर्यचकित होकर सब ओर खड़े रहे। उस समय हनुमान जी ने उससे पूछा —’देवि! तुम कौन हो और यह किसकी गुफा है?’॥

ततो हनूमान् गिरिसंनिकाशः कृताञ्जलिस्तामभिवाद्य वृद्धाम्।

पप्रच्छ का त्वं भवनं बिलं च रत्नानि चेमानि वदस्व कस्य॥४१॥

पर्वत के समान विशालकाय हनुमान जी ने हाथ जोड़कर उस वृद्धा तपस्विनी को प्रणाम किया और पूछा—’देवि! तुम कौन हो? यह गुफा, ये भवन तथा ये रत्न किसके हैं? यह हमें बताओ’ ।। ४१॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे पञ्चाशः सर्गः॥५०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में पचासवाँ सर्ग पूरा हुआ॥५०॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

हनुमान जी के पूछने पर वृद्धा तापसी का अपना तथा उस दिव्य स्थान का परिचय देकर सब वानरों को भोजन के लिये कहना

एकपञ्चाशः सर्गः

सर्ग-51


इत्युक्त्वा हनुमांस्तत्र चीरकृष्णाजिनाम्बराम्।

अब्रवीत् तां महाभागां तापसी धर्मचारिणीम्॥१॥

इस तरह पूछकर हनुमान जी चीर एवं कृष्ण मृगचर्म धारण करने वाली उस धर्मपरायणा महाभागा तपस्विनी से वहाँ फिर बोले॥१॥

इदं प्रविष्टाः सहसा बिलं तिमिरसंवृतम्।

क्षुत्पिपासापरिश्रान्ताः परिखिन्नाश्च सर्वशः॥२॥

महद् धरण्या विवरं प्रविष्टाः स्म पिपासिताः।

इमांस्त्वेवंविधान् भावान् विविधानद्भुतोपमान्॥३॥

दृष्ट्वा वयं प्रव्यथिताः सम्भ्रान्ता नष्टचेतसः।

कस्यैते काञ्चना वृक्षास्तरुणादित्यसंनिभाः॥४॥

‘देवि! हम सब लोग भूख-प्यास और थकावट से कष्ट पा रहे थे। इसलिये सहसा इस अन्धकारपूर्ण गुफा में घुस आये। भूतल का यह विवर बहुत बड़ा है। हम प्यास से पीड़ित होने के कारण यहाँ आये हैं, किंतु यहाँ के इन ऐसे अद्भुत विविध पदार्थों को देखकर हमारे मन में बड़ी व्यथा हुई है हम यह सोचकर चिन्तित हो उठे हैं कि यह असुरों की माया तो नहीं है, इसीलिये हमारे मन में घबराहट हो रही है। हमारी विवेकशक्ति लुप्त-सी हो गयी है। हम जानना चाहते हैं कि ये बालसूर्य के समान कान्तिमान् सुवर्णमय वृक्ष किसके हैं? ॥२-४॥

शुचीन्यभ्यवहाराणि मूलानि च फलानि च।

काञ्चनानि विमानानि राजतानि गृहाणि च॥५॥

तपनीयगवाक्षाणि मणिजालावृतानि च।

पुष्पिताः फलवन्तश्च पुण्याः सुरभिगन्धयः॥६॥

इमे जाम्बूनदमयाः पादपाः कस्य तेजसा।

‘ये भोजन की पवित्र वस्तुएँ, फल-मूल, सोने के विमान, चाँदी के घर, मणियों की जाली से ढकी हुई सोने की खिड़कियाँ तथा पवित्र सुगन्ध से युक्त एवं फल-फूलों से लदे हुए ये सुवर्णमय पावन वृक्ष किसके तेज से प्रकट हुए हैं?॥

काञ्चनानि च पद्मानि जातानि विमले जले॥७॥

कथं मत्स्याश्च सौवर्णा दृश्यन्ते सह कच्छपैः।

आत्मनस्त्वनुभावाद् वा कस्य चैतत्तपोबलम्॥८॥

अजानतां नः सर्वेषां सर्वमाख्यातुमर्हसि।

‘यहाँ के निर्मल जल में सोने के कमल कैसे उत्पन्न हुए? इन सरोवरों के मत्स्य और कछुए सुवर्णमय कैसे दिखायी देते हैं? यह सब तुम्हारे अपने प्रभाव से हुआ है या और किसी के? यह किसके तपोबल का प्रभाव है? हम सब अनजान हैं; इसलिये पूछते हैं तुम हमें सारी बातें बताने की कृपा करो’ ॥ ७-८ १/२ ॥

एवमुक्ता हनुमता तापसी धर्मचारिणी॥९॥

प्रत्युवाच हनूमन्तं सर्वभूतहिते रता।

हनुमान जी के इस प्रकार पूछने पर समस्त प्राणियों के हित में तत्पर रहने वाली उस धर्मपरायणा तापसी ने उत्तर दिया- ॥९ १/२॥

मयो नाम महातेजा मायावी वानरर्षभ॥१०॥

तेनेदं निर्मितं सर्वं मायया काञ्चनं वनम्।

‘वानरश्रेष्ठ! मायाविशारद महातेजस्वी मय का नाम तुमने सुना होगा। उसी ने अपनी माया के प्रभाव से इस समूचे स्वर्णमय वन का निर्माण किया था॥ १० १/२ ॥

पुरा दानवमुख्यानां विश्वकर्मा बभूव ह॥११॥

येनेदं काञ्चनं दिव्यं निर्मितं भवनोत्तमम्।।

‘मयासुर पहले दानव-शिरोमणियों का विश्वकर्मा था, जिसने इस दिव्य सुवर्णमय उत्तम भवन को बनाया है ॥ १९ १/२॥

स तु वर्षसहस्राणि तपस्तप्त्वा महदने॥१२॥

पितामहाद वरं लेभे सर्वमौशनसं धनम्।

‘उसने एक सहस्र वर्षों तक वन मे घोर तपस्या करके ब्रह्माजी से वरदान के रूप में शुक्राचार्य का सारा शिल्प-वैभव प्राप्त किया था॥ १२ १/२॥

विधाय सर्वं बलवान् सर्वकामेश्वरस्तदा॥१३॥

उवास सुखितः कालं कंचिदस्मिन् महावने।

‘सम्पूर्ण कामनाओं के स्वामी बलवान् मयासुरने यहाँ की सारी वस्तुओं का निर्माण करके इस महान् वन में कुछ कालतक सुखपूर्वक निवास किया था। १३ १/२॥

तमप्सरसि हेमायां सक्तं दानवपुङ्गवम्॥१४॥

विक्रम्यैवाशनिं गृह्य जघानेशः पुरंदरः।

‘आगे चलकर उस दानवराज का हेमा नाम की अप्सरा के साथ सम्पर्क हो गया। यह जानकर देवेश्वर इन्द्र ने हाथ में वज्र ले उसके साथ युद्ध करके उसे मार भगाया॥ १४ १/२॥

इदं च ब्रह्मणा दत्तं हेमायै वनमुत्तमम्॥१५॥

शाश्वतः कामभोगश्च गृहं चेदं हिरण्मयम्।

‘तत्पश्चात् ब्रह्माजी ने यह उत्तम वन, यहाँ का अक्षय काम-भोग तथा यह सोने का भवन हेमा को दे दिया॥

दुहिता मेरुसावर्णेरहं तस्याः स्वयंप्रभा॥१६॥

इदं रक्षामि भवनं हेमाया वानरोत्तम।

‘मैं मेरुसावर्णि की कन्या हूँ। मेरा नाम स्वयंप्रभा है। वानरश्रेष्ठ! मैं उस हेमा के इस भवन की रक्षा करती

मम प्रियसखी हेमा नृत्तगीतविशारदा॥१७॥

तयादत्तवरा चास्मि रक्षामि भवनं महत्।

‘नृत्य और गीत की कला में चतुर हेमा मेरी प्यारी सखी है। उसने मुझसे अपने भवन की रक्षा के लिये प्रार्थना की थी, इसलिये मैं इस विशाल भवन का संरक्षण करती हूँ॥ १७ १/२॥

किं कार्यं कस्य वा हेतोः कान्ताराणि प्रपद्यथ॥१८॥

कथं चेदं वनं दुर्गं युष्माभिरुपलक्षितम्।

‘तुमलोगों का यहाँ क्या काम है? किस उद्देश्य से तुम इन दुर्गम स्थानों में विचरते हो? इस वन में आना तो बहुत कठिन है। तुमने कैसे इसे देख लिया?॥ १८ १/२॥

शुचीन्यभ्यवहाराणि मूलानि च फलानि च।

भुक्त्वा पीत्वा च पानीयं सर्वं मे वक्तुमर्हसि॥१९॥

‘अच्छा, ये शुद्ध भोजन और फल-मूल प्रस्तुत हैं। इन्हें खाकर पानी पी लो फिर मुझसे अपना सारा वृत्तान्त कहो’ ॥ १९॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे एकपञ्चाशः सर्गः॥५१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में इक्यावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥५१॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

तापसी स्वयंप्रभा के पूछने पर वानरों का उसे अपना वृत्तान्त बताना और उसके प्रभाव से गुफा के बाहर निकलकर समुद्रतट पर पहुँचना

द्विपञ्चाशः सर्गः

सर्ग-52


अथ तानब्रवीत् सर्वान् विश्रान्तान् हरियूथपान्।

इदं वचनमेकाना तापसी धर्मचारिणी॥१॥

तत्पश्चात् जब सब वानर-यूथपति खा-पीकर विश्राम कर चुके, तब धर्मका आचरण करने वाली वह एकाग्रहृदया तपस्विनी उन सबसे इस प्रकार बोली- ॥१॥

वानरा यदि वः खेदः प्रणष्टः फलभक्षणात्।

यदि चैतन्मया श्राव्यं श्रोतुमिच्छामि तां कथाम्॥२॥

‘वानरो! यदि फल खाने से तुम्हारी थकावट दूर हो गयी हो और यदि तुम्हारा वृत्तान्त मेरे सुनने योग्य हो तो मैं उसे सुनना चाहती हूँ’॥२॥

तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा हनूमान् मारुतात्मजः।

आर्जवेन यथातत्त्वमाख्यातुमुपचक्रमे ॥३॥

उसकी यह बात सुनकर पवनकुमार हनुमान् जी बड़ी सरलता के साथ यथार्थ बात कहने लगे- ॥३॥

राजा सर्वस्य लोकस्य महेन्द्रवरुणोपमः।

रामो दाशरथिः श्रीमान् प्रविष्टो दण्डकावनम्॥४॥

‘देवि! सम्पूर्ण जगत् के राजा दशरथनन्दन श्रीमान् भगवान् राम, जो देवराज इन्द्र और वरुण के समान तेजस्वी हैं, दण्डकारण्य में पधारे थे॥४॥

लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा वैदेह्या सह भार्यया।

तस्य भार्या जनस्थानाद् रावणेन हृता बलात्॥

‘उनके साथ उनके छोटे भाई लक्ष्मण तथा उनकी धर्मपत्नी विदेहनन्दिनी सीता भी थीं। जनस्थान में आकर रावण ने उनकी स्त्री का बलपूर्वक अपहरण कर लिया॥५॥

वीरस्तस्य सखा राज्ञः सुग्रीवो नाम वानरः।

राजा वानरमुख्यानां येन प्रस्थापिता वयम्॥६॥

अगस्त्यचरितामाशां दक्षिणां यमरक्षिताम्।

सहैभिर्वानरैर्मुख्यैरङ्गदप्रमुखैर्वयम्॥७॥

‘श्रेष्ठ वानरों के राजा वानरजातीय वीरवर सुग्रीव महाराज श्रीरामचन्द्रजी के मित्र हैं, जिन्होंने इन अङ्गद आदि प्रधान वीरों के साथ हमलोगों को सीता की खोज करने के लिये अगस्त्यसेवित और यमराज द्वारा सुरक्षित दक्षिण दिशा में भेजा है॥६-७॥

रावणं सहिताः सर्वे राक्षसं कामरूपिणम्।

सीतया सह वैदेह्या मार्गध्वमिति चोदिताः॥८॥

‘उन्होंने आज्ञा दी थी कि तुम सब लोग एक साथ रहकर विदेहकुमारी सीतासहित उस इच्छानुसार रूप धारण करने वाले राक्षसराज रावण का पता लगाना॥ ८॥

विचित्य तु वनं सर्वं समुद्रं दक्षिणां दिशम्।

वयं बुभुक्षिताः सर्वे वृक्षमूलमुपाश्रिताः॥९॥

‘हमने यहाँ का सारा जंगल छान डाला। अब दक्षिण दिशा में समुद्र के भीतर उनका अन्वेषण करना है। अबतक सीता का कुछ पता नहीं लगा और हमलोग भूख-प्यास से पीड़ित हो गये। अन्त में हम सब-के-सब एक वृक्ष के नीचे थककर बैठ गये॥९॥

विवर्णवदनाः सर्वे सर्वे ध्यानपरायणाः।

नाधिगच्छामहे पारं मग्नाश्चिन्तामहार्णवे॥१०॥

‘हमारे मुख की कान्ति फीकी पड़ गयी। हम सभी चिन्ता में मग्न हो गये। चिन्ता के महासागर में डूबकर हम उसका पार नहीं पा रहे थे॥१०॥

चारयन्तस्ततश्चक्षुर्दृष्टवन्तो महद् बिलम्।

लतापादपसंछन्नं तिमिरेण समावृतम्॥११॥

‘इसी समय चारों ओर दृष्टि दौड़ाने पर हमको यह विशाल गुफा दिखायी पड़ी, जो लता और वृक्षों से ढकी हुई तथा अन्धकार से आच्छन्न थी॥ ११॥

अस्माद्धंसा जलक्लिन्नाः पक्षैः सलिलरेणुभिः।

कुरराः सारसाश्चैव निष्पतन्ति पतत्त्रिणः॥१२॥

‘थोड़ी ही देर में इस गुफा से हंस, कुरर और सारस आदि पक्षी निकले, जिनके पंख जल से भीगे थे और उनमें कीचड़ लगी हुई थी॥ १२ ॥

साध्वत्र प्रविशामेति मया तूक्ताः प्लवङ्गमाः।

तेषामपि हि सर्वेषामनुमानमुपागतम्॥१३॥

‘तब मैंने वानरों से कहा, ‘अच्छा होगा कि हमलोग इसके भीतर प्रवेश करें’। इन सब वानरों को भी यह अनुमान हो गया कि गुफा के भीतर पानी है॥ १३॥

अस्मिन् निपतिताः सर्वेऽप्यथ कार्यत्वरान्विताः।

ततो गाढं निपतिता गृह्य हस्तैः परस्परम्॥१४॥

‘हम सब लोग अपने कार्य की सिद्धि के लिये उतावले थे ही, अतः इस गुफा में कूद पड़े अपने हाथों से एक-दूसरे को दृढ़तापूर्वक पकड़कर हम गुफा में आगे बढ़ने लगे॥ १४ ॥

इदं प्रविष्टाः सहसा बिलं तिमिरसंवृतम्।

एतन्नः कार्यमेतेन कृत्येन वयमागताः॥१५॥

‘इस तरह सहसा हमलोगों ने इस अँधेरी गुफा में प्रवेश किया। यही हमारा कार्य है और इसी कार्य से हम इधर आये हैं॥ १५ ॥

त्वां चैवोपगताः सर्वे परियूना बुभुक्षिताः।

आतिथ्यधर्मदत्तानि मूलानि च फलानि च॥१६॥

अस्माभिरुपयुक्तानि बुभुक्षापरिपीडितैः।

‘भूख से व्याकुल एवं दुर्बल होने के कारण हम सबने तुम्हारी शरण ली। तुमने आतिथ्य-धर्म के अनुसार हमें फल और मूल अर्पित किये और हमने भी भूख से पीड़ित होने के कारण उन्हें भरपेट खाया॥ १६ १/२॥

यत् त्वया रक्षिताः सर्वे म्रियमाणा बुभुक्षया॥१७॥

ब्रूहि प्रत्युपकारार्थं किं ते कुर्वन्तु वानराः।

‘देवि! हम भूख से मर रहे थे। तुमने हम सब लोगों के प्राण बचा लिये। अतः बताओ ये वानर तुम्हारे उपकार का बदला चुकाने के लिये क्या सेवा करें’॥ १७ १/२॥

एवमुक्ता तु सर्वज्ञा वानरैस्तैः स्वयंप्रभा॥१८॥

प्रत्युवाच ततः सर्वानिदं वानरयूथपान्।

स्वयंप्रभा सर्वज्ञ थी। उन वानरों के ऐसा कहने पर उसने उन सभी यूथपतियों को इस प्रकार उत्तर दिया’

सर्वेषां परितुष्टास्मि वानराणां तरस्विनाम्॥१९॥

चरन्त्या मम धर्मेण न कार्यमिह केनचित्।

‘मैं तुम सभी वेगशाली वानरों पर यों ही बहुत संतुष्ट हूँ। धर्मानुष्ठान में लगी रहने के कारण मुझे किसी से कोई प्रयोजन नहीं रह गया है’ ॥ १९ १/२ ॥

एवमुक्तः शुभं वाक्यं तापस्या धर्मसंहितम्॥२०॥

उवाच हनुमान् वाक्यं तामनिन्दितलोचनाम्।

उस तपस्विनी ने जब इस प्रकार धर्मयुक्त उत्तम बात कही, तब हनुमान जी ने निर्दोष दृष्टिवाली उस देवी से यों कहा- ॥२० १/२॥

शरणं त्वां प्रपन्नाः स्मः सर्वे वै धर्मचारिणीम्॥२१॥

यः कृतः समयोऽस्मासु सुग्रीवेण महात्मना।

स तु कालो व्यतिक्रान्तो बिले च परिवर्तताम्॥२२॥

‘देवि! तुम धर्माचरणमें लगी हुई हो। अतः हम सब लोग तुम्हारी शरण में आये हैं। महात्मा सुग्रीव ने हमलोगों के लौटने के लिये जो समय निश्चित किया था, वह इस गुफा के भीतर घूमने में ही बीत गया॥ २१-२२॥

सा त्वमस्माद् बिलादस्मानुत्तारयितुमर्हसि।

तस्मात् सुग्रीववचनादतिक्रान्तान् गतायुषः॥२३॥

त्रातुमर्हसि नः सर्वान् सुग्रीवभयशङ्कितान्।

‘अब तुम कृपा करके हमें इस बिल से बाहर निकाल दो। सुग्रीव के बताये हुए समय को हम लाँघ चुके हैं, इसलिये अब हमारी आयु पूरी हो चुकी है। हम सबके-सब सुग्रीव के भय से डरे हुए हैं। अतः तुम हमारा उद्धार करो॥ २३ १/२॥

महच्च कार्यमस्माभिः कर्तव्यं धर्मचारिणि॥२४॥

तच्चापि न कृतं कार्यमस्माभिरिह वासिभिः।।

‘धर्मचारिणि! हमें जो महान् कार्य करना है, उसे भी हम इस गुफा में रहने के कारण नहीं कर सके हैं’।

एवमुक्ता हनुमता तापसी वाक्यमब्रवीत्॥ २५॥

जीवता दुष्करं मन्ये प्रविष्टेन निवर्तितुम्।

तपसः सुप्रभावेण नियमोपार्जितेन च॥२६॥

सर्वानेव बिलादस्मात् तारयिष्यामि वानरान्।

हनुमान जी के ऐसा कहने पर तापसी बोली—’मैं समझती हूँ जो एक बार इस गुफा में चला आता है, उसका जीते-जी यहाँ से लौटना बहुत कठिन हो जाता है। तथापि नियमों के पालन और तपस्या के उत्तम प्रभाव से मैं तुम सभी वानरों को इस गुफा से बाहर निकाल दूँगी॥

निमीलयत चढूंषि सर्वे वानरपुङ्गवाः॥२७॥

नहि निष्क्रमितुं शक्यमनिमीलितलोचनैः।

‘श्रेष्ठ वानरो! तुम सब लोग अपनी-अपनी आँखें बंद कर लो। आँख बंद किये बिना यहाँ से निकलना असम्भव है’ ॥ २७ १/२॥

ततो निमीलिताः सर्वे सुकुमाराङ्गलैः करैः॥२८॥

सहसा पिदधुदृष्टिं हृष्टा गमनकांक्षया।

यह सुनकर सबने सुकुमार अङ्गलिवाले हाथों से आँखें मूंद लीं। गुफा से बाहर निकलने की इच्छा से प्रसन्न होकर उन सबने सहसा नेत्र बंद कर लिये॥ २८ १/२॥

वानरास्तु महात्मानो हस्तरुद्धमुखास्तदा॥२९॥

निमेषान्तरमात्रेण बिलादुत्तारितास्तया।

इस प्रकार उस समय हाथों से मुँह ढक लेने के कारण उन महात्मा वानरों को स्वयंप्रभा ने पलक मारते-मारते बिल से बाहर निकाल दिया॥ २९ १/२॥

उवाच सर्वांस्तांस्तत्र तापसी धर्मचारिणी॥३०॥

निःसृतान् विषमात् तस्मात् समाश्वास्येदमब्रवीत्।

तत्पश्चात् वहाँ उस धर्मपरायणा तापसी ने उस विषम गुफा से बाहर निकले हुए समस्त वानरों को आश्वासन देकर इस प्रकार कहा- ॥ ३० १/२॥

एष विन्ध्यो गिरिः श्रीमान् नानाद्रुमलतायुतः॥३१॥

एष प्रस्रवणः शैलः सागरोऽयं महोदधिः।

स्वस्ति वोऽस्तु गमिष्यामि भवनं वानरर्षभाः।

इत्युक्त्वा तद् बिलं श्रीमत् प्रविवेश स्वयंप्रभा॥३२॥

‘श्रेष्ठ वानरो! यह रहा नाना प्रकार के वृक्षों और लताओं से व्याप्त शोभाशाली विन्ध्यगिरि। इधर यह प्रस्रवणगिरि है और सामने यह महासागर लहरा रहा है। तुम्हारा कल्याण हो अब मैं अपने स्थान पर जाती हूँ’ ऐसा कहकर स्वयंप्रभा उस सुन्दर गुफा में चली गयी॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे द्विपञ्चाशः सर्गः॥५२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में बावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥५२॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

लौटने की अवधि बीत जाने पर भी कार्य सिद्ध न होने के कारण सुग्रीव के कठोर दण्ड से डरने वाले अङ्गद आदि वानरों का उपवास करके प्राण त्याग देने का निश्चय

त्रिपञ्चाशः सर्गः

सर्ग-53


ततस्ते ददृशुर्घोरं सागरं वरुणालयम्।

अपारमभिगर्जन्तं घोरैरूर्मिभिराकुलम्॥१॥

तदनन्तर उन श्रेष्ठ वानरों ने वरुण की निवासभूमि भयंकर महासागर को देखा, जिसका कहीं पार नहीं था और जो भयानक लहरों से व्याप्त होकर निरन्तर गर्जना कर रहा था॥१॥

मयस्य मायाविहितं गिरिदुर्गं विचिन्वताम्।

तेषां मासो व्यतिक्रान्तो यो राज्ञा समयः कृतः॥२॥

मयासुर के अपनी मायाद् वारा बनाये हुए पर्वत की दुर्गम गुफा में  सीता की खोज करते हुए उन वानरों का वह एक मास बीत गया, जिसे राजा सुग्रीव ने लौटने का समय निश्चित किया था॥२॥

विन्ध्यस्य तु गिरेः पादे सम्प्रपुष्पितपादपे।

उपविश्य महात्मानश्चिन्तामापेदिरे तदा ॥३॥

विन्ध्यगिरि के पार्श्ववर्ती पर्वत पर, जहाँ के वृक्ष फूलों से लदे थे, बैठकर वे सभी महात्मा वानर चिन्ता करने लगे॥३॥

ततः पुष्पातिभाराग्राल्लताशतसमावृतान्।

द्रुमान् वासन्तिकान् दृष्ट्वा बभूवुर्भयशङ्किताः॥४॥

जो वसन्त-ऋतु में फलते हैं, उन आम आदिवृक्षों की डालियों को मञ्जरी एवं फूलों के अधिक भार से झुकी हुई तथा सैकड़ों लता-वेलों से व्याप्त देख वे सभी सुग्रीव के भय से थर्रा उठे (वे शरद् ऋतु में चले थे और शिशिर-ऋतु आ गयी थी इसीलिये उनका भय बढ़ गया था) ॥

ते वसन्तमनुप्राप्तं प्रतिवेद्य परस्परम्।

नष्टसंदेशकालार्था निपेतुर्धरणीतले॥५॥

वे एक-दूसरे को यह बताकर कि अब वसन्त का समय आना चाहता है, राजा के आदेश के अनुसार एक मास के भीतर जो काम कर लेना चाहिये था, वह न कर सकने या उसे नष्ट कर देने के कारण भय के मारे पृथ्वी पर गिर पड़े।

ततस्तान् कपिवृद्धांश्च शिष्टांश्चैव वनौकसः।

वाचा मधुरयाऽऽभाष्य यथावदनुमान्य च॥६॥

स तु सिंहवृषस्कन्धः पीनायतभुजः कपिः।

युवराजो महाप्राज्ञ अङ्गदो वाक्यमब्रवीत्॥७॥

तब जिनके कंधे सिंह और बैल के समान मांसल थे, भुजाएँ बड़ी-बड़ी और मोटी थीं तथा जो बड़े बुद्धिमान् थे, वे युवराज अङ्गद उन श्रेष्ठ वानरों तथा अन्य वनवासी कपियों को यथावत् सम्मान देते हुए मधुर वाणी से सम्बोधित करके बोले— ॥६-७॥

शासनात् कपिराजस्य वयं सर्वे विनिर्गताः।

मासः पूर्णो बिलस्थानां हरयः किं न बुध्यत॥८॥

वयमाश्वयुजे मासि कालसंख्याव्यवस्थिताः।

प्रस्थिताः सोऽपि चातीतः किमतः कार्यमुत्तरम्॥९॥

‘वानरो! हम सब लोग वानरराज की आज्ञा से आश्विन मास बीतते-बीतते एक मास की निश्चित अवधि स्वीकार करके सीता की खोज के लिये निकले थे, किंतु हमारा वह एक मास उस गुफा में ही पूरा हो गया, क्या आपलोग इस बात को नहीं जानते? हम जब चले थे, तब से लौटने के लिये जो मास निर्धारित हुआ था, वह भी बीत गया; अतः अब आगे क्या करना चाहिये?॥

भवन्तः प्रत्ययं प्राप्ता नीतिमार्गविशारदाः।

हितेष्वभिरता भर्तुर्निसृष्टाः सर्वकर्मसु॥१०॥

‘आपलोगों को राजा का विश्वास प्राप्त है। आप नीतिमार्ग में निपुण हैं और स्वामी के हित में तत्पर रहते हैं। इसीलिये आपलोग यथासमय सब कार्यों में नियुक्त किये जाते हैं॥ १०॥

कर्मस्वप्रतिमाः सर्वे दिक्षु विश्रुतपौरुषाः।

मां पुरस्कृत्य निर्याताः पिङ्गाक्षप्रतिचोदिताः॥११॥

इदानीमकृतार्थानां मर्तव्यं नात्र संशयः।

हरिराजस्य संदेशमकृत्वा कः सुखी भवेत्॥१२॥

कार्य सिद्ध करने में आपलोगों की समानता करने वाला कोई नहीं है। आप सभी अपने पुरुषार्थ के लिये सभी दिशाओं में विख्यात हैं। इस समय वानरराज सुग्रीव की आज्ञा से मुझे आगे करके आपलोग जिस कार्य के लिये निकले थे, उसमें आप और हम सफल न हो सके। ऐसी दशा में हमलोगों को अपने प्राणों से  हाथ धोना पड़ेगा, इसमें संशय नहीं है। भला वानरराज के आदेश का पालन न करके कौन सुखी रह सकता है ? ॥ ११-१२ ।।

अस्मिन्नतीते काले तु सुग्रीवेण कृते स्वयम्।

प्रायोपवेशनं युक्तं सर्वेषां च वनौकसाम्॥१३॥

‘स्वयं सुग्रीव ने जो समय निश्चित किया था, उसके बीत जाने पर हम सब वानरों के लिये उपवास करके प्राण त्याग देना ही ठीक जान पड़ता है॥ १३ ॥

तीक्ष्णः प्रकृत्या सुग्रीवः स्वामिभावे व्यवस्थितः।

न क्षमिष्यति नः सर्वानपराधकृतो गतान्॥१४॥

‘सुग्रीव स्वभाव से ही कठोर हैं। फिर इस समय तो वे हमारे राजा के पद पर स्थित हैं। जब हम अपराध करके उनके पास जायँगे, तब वे कभी हमें क्षमा नहीं करेंगे॥ १४॥

अप्रवृत्तौ च सीतायाः पापमेव करिष्यति।

तस्मात् क्षममिहाद्यैव गन्तुं प्रायोपवेशनम्॥१५॥

त्यक्त्वा पुत्रांश्च दारांश्च धनानि च गृहाणि च।

‘उलटे सीता का समाचार न पाने पर हमारा वध ही कर डालेंगे, अतः हमें आज ही यहाँ स्त्री, पुत्र, धनसम्पत्ति और घर-द्वार का मोह छोड़कर मरणान्त उपवास आरम्भ कर देना चाहिये॥ १५ १/२॥

ध्रुवं नो हिंसते राजा सर्वान् प्रतिगतानितः॥१६॥

वधेनाप्रतिरूपेण श्रेयान् मृत्युरिहैव नः।

‘यहाँ से लौटने पर राजा सुग्रीव निश्चय ही हम सबका वध कर डालेंगे। अनुचित वध की अपेक्षा यहीं मर जाना हमलोगों के लिये श्रेयस्कर है॥ १६ १/२॥

न चाहं यौवराज्येन सुग्रीवेणाभिषेचितः॥१७॥

नरेन्द्रेणाभिषिक्तोऽस्मि रामेणाक्लिष्टकर्मणा।

‘सुग्रीव ने युवराज पद पर मेरा अभिषेक नहीं किया है। अनायास ही महान् कर्म करने वाले महाराज श्रीराम ने ही उस पद पर मेरा अभिषेक किया है॥ १७ १/२॥

स पूर्वं बद्धवैरो मां राजा दृष्ट्वा व्यतिक्रमम्॥१८॥

घातयिष्यति दण्डेन तीक्ष्णेन कृतनिश्चयः।

राजा सुग्रीव ने तो पहले से ही मेरे प्रति वैर बाँध रखा है। इस समय आज्ञा-लङ्घनरूप मेरे अपराध को देखकर पूर्वोक्त निश्चय के अनुसार तीखे दण्डद्वारा मुझे मरवा डालेंगे।

किं मे सुहृद्भिर्व्यसनं पश्यद्भिर्जीवितान्तरे।

इहैव प्रायमासिष्ये पुण्ये सागररोधसि॥१९॥

‘जीवन-काल में मेरा व्यसन (राजा के हाथ से मेरा मरण) देखने वाले सुहृदों से मुझे क्या काम है ? यहीं समुद्र के पावन तट पर मैं मरणान्त उपवास करूँगा’। १९॥

एतच्छ्रुत्वा कुमारेण युवराजेन भाषितम्।

सर्वे ते वानरश्रेष्ठाः करुणं वाक्यमब्रुवन्॥२०॥

युवराज वालिकुमार अङ्गद की यह बात सुनकर वे सभी श्रेष्ठ वानर करुणस्वर में बोले— ॥२०॥

तीक्ष्णः प्रकृत्या सुग्रीवः प्रियारक्तश्च राघवः।

समीक्ष्याकृतकार्यांस्तु तस्मिंश्च समये गते॥२१॥

अदृष्टायां च वैदेह्यां दृष्ट्वा चैव समागतान्।

राघवप्रियकामाय घातयिष्यत्यसंशयम्॥२२॥

‘सचमुच सुग्रीव का स्वभाव बड़ा कठोर है। उधर श्रीरामचन्द्रजी अपनी प्रिय पत्नी सीता के प्रति अनुरक्त हैं। सीता को खोजकर लौटने के लिये जो अवधि निश्चित की गयी थी, वह समय व्यतीत हो जाने पर भी यदि हम कार्य किये बिना ही वहाँ उपस्थित होंगे तो उस अवस्था में हमें देखकर और विदेहकुमारी का दर्शन किये बिना ही हमें लौटा हुआ जानकर श्रीरामचन्द्रजी का प्रिय करने की इच्छा से सुग्रीव हमें मरवा डालेंगे, इसमें संशय नहीं है॥ २१-२२॥

न क्षमं चापराद्धानां गमनं स्वामिपार्श्वतः।

प्रधानभूताश्च वयं सुग्रीवस्य समागताः॥२३॥

‘अतः अपराधी पुरुषों का स्वामी के पास लौटकर जाना कदापि उचित नहीं है। हम सुग्रीव के प्रधान सहयोगी या सेवक होने के कारण इधर उनके भेजने से आये थे॥ २३॥

इहैव सीतामन्वीक्ष्य प्रवृत्तिमुपलभ्य वा।

नो चेद् गच्छाम तं वीरं गमिष्यामो यमक्षयम्॥२४॥

‘यदि यहीं सीता का दर्शन करके अथवा उनका समाचार जानकर वीर सुग्रीव के पास नहीं जायेंगे तो अवश्य ही हमें यमलोक में जाना पड़ेगा’॥ २४ ॥

प्लवङ्गमानां तु भयार्दितानां श्रुत्वा वचस्तार इदं बभाषे।

अलं विषादेन बिलं प्रविश्य वसाम सर्वे यदि रोचते वः॥२५॥

भय से पीड़ित हुए उन वानरों का यह वचन सुनकर तार ने कहा—’यहाँ बैठकर विषाद करने से कोई लाभ नहीं है। यदि आपलोगों को ठीक ऊँचे तो हम सब लोग स्वयंप्रभा की उस गुफा में ही प्रवेश करके निवास करें॥ २५॥

इदं हि मायाविहितं सुदुर्गमं प्रभूतपुष्पोदकभोज्यपेयम्।

इहास्ति नो नैव भयं पुरंदरान्न राघवाद् वानरराजतोऽपि वा ॥२६॥

‘यह गुफा माया से निर्मित होने के कारण अत्यन्त दुर्गम है। यहाँ फल-फूल, जल और खाने-पीने की दूसरी वस्तुएँ भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। अतः उसमें हमें न तो देवराज इन्द्र से, न श्रीरामचन्द्रजी से और न वानरराज सुग्रीव से ही भय है’ ॥ २६ ॥

श्रुत्वाङ्गदस्यापि वचोऽनुकूलमूचुश्च सर्वे हरयः प्रतीताः।

यथा न हन्येम तथा विधान मसक्तमद्यैव विधीयतां नः॥२७॥

तारकी कही हुई पूर्वोक्त बात, जो अङ्गद के भी अनुकूल थी, सुनकर सभी वानरों को उसपर विश्वास हो गया। वे सब-के-सब बोल उठे—’बन्धुओ! हमें वैसा कार्य आज ही अविलम्ब करना चाहिये, जिससे हम मारे न जायँ’ ॥ २७॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे त्रिपञ्चाशः सर्गः॥५३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में तिरपनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥५३॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

हनुमान जी का भेदनीति के द्वारा वानरों को अपने पक्ष में करके अङ्गद को अपने साथ चलने के लिये समझाना

चतुःपञ्चाशः सर्गः

सर्ग-54


तथा ब्रुवति तारे तु ताराधिपतिवर्चसि।

अथ मेने हृतं राज्यं हनूमानङ्गदेन तत्॥१॥

तारापति चन्द्रमा के समान तेजस्वी तार के ऐसा कहने पर हनुमान जी ने यह माना कि अब अङ्गद ने वह राज्य (जो अबतक सुग्रीव के अधिकार में था) हर लिया (इस तरह वानरों में फूट पड़ने से बहुत-से वानर अङ्गद का साथ देंगे और बलवान् अङ्गद सुग्रीव को राज्य से वञ्चित कर देंगे—ऐसी सम्भावना का हनुमान जी के मन में उदय हो गया)।

बुद्ध्या ह्यष्टाङ्गया युक्तं चतुर्बलसमन्वितम्।

चतुर्दशगुणं मेने हनूमान् वालिनः सुतम्॥२॥

हनुमान् जी यह अच्छी तरह जानते थे कि वालिकुमार अङ्गद आठ’ गुणवाली बुद्धि से, चार प्रकार के बल से और चौदह गुणों से सम्पन्न हैं॥२॥

१. बुद्धि के आठ गुण ये हैं—सुनने की इच्छा, सुनना, सुनकर ग्रहण करना, ग्रहण करके धारण करना, ऊहापोह करना, अर्थ या तात्पर्य को भलीभाँति समझना तथा तत्त्वज्ञान से सम्पन्न होना।

२. साम, दान, भेद और दण्ड–ये जो शत्रु को वश में करने के चार उपाय नीति-शास्त्र में बताये गये हैं, उन्हीं को यहाँ चार प्रकार का बल कहा गया है। किन्हीं-किन्हीं के मत में बाहुबल, मनोबल, उपायबल और बन्धुबल—ये चार बल हैं।

३. चौदह गुण यों बताये गये हैं—देश-काल का ज्ञान, दृढ़ता, सब प्रकार के क्लेशों को सहन करने की क्षमता, सभी विषयों का ज्ञान प्राप्त करना, चतुरता, उत्साह या बल, मन्त्रणा को गुप्त रखना, परस्पर विरोधी बात न कहना, शूरता, अपनी और शत्रु की शक्ति का ज्ञान, कृतज्ञता, शरणागतवत्सलता, अमर्षशीलता तथा अचञ्चलता (स्थिरता या गम्भीरता)।

आपूर्यमाणं शश्वच्च तेजोबलपराक्रमैः।

शशिनं शुक्लपक्षादौ वर्धमानमिव श्रिया॥३॥

वे तेज, बल और पराक्रम से सदा परिपूर्ण हो रहे हैं। शुक्ल पक्ष के आरम्भ में चन्द्रमा के समान राजकुमार अङ्गद की श्री दिनोदिन बढ़ रही है॥३॥

बृहस्पतिसमं बुद्धया विक्रमे सदृशं पितुः।

शुश्रूषमाणं तारस्य शुक्रस्येव पुरंदरम्॥४॥

ये बुद्धि में बृहस्पति के समान और पराक्रम में अपने पिता वाली के तुल्य हैं। जैसे देवराज इन्द्र बृहस्पति के मुख से नीति की बातें सुनते हैं, उसी प्रकार ये अङ्गद तार की बातें सुनते हैं॥४॥

भर्तुरर्थे परिश्रान्तं सर्वशास्त्रविशारदः।

अभिसंधातुमारेभे हनूमानङ्गदं ततः॥५॥

अपने स्वामी सुग्रीव का कार्य सिद्ध करने में ये परिश्रम (थकावट या शिथिलता) का अनुभव करते हैं। ऐसा विचारकर सम्पूर्ण शास्त्रों के ज्ञान में निपुण हनुमान जी ने अङ्गद को तार आदि वानरों की ओर से फोड़ने का प्रयत्न आरम्भ किया॥५॥

स चतुर्णामुपायानां तृतीयमुपवर्णयन्।

भेदयामास तान् सर्वान् वानरान् वाक्यसम्पदा॥६॥

वे साम, दाम, भेद और दण्ड—इन चार उपायों में से तीसरे का वर्णन करते हुए अपने युक्तियुक्त वाक्य-वैभव के द्वारा उन सभी वानरों को फोड़ने लगे।

तेषु सर्वेषु भिन्नेषु ततोऽभीषयदङ्गदम्।

भीषणैर्विविधैर्वाक्यैः कोपोपायसमन्वितैः॥७॥

जब वे सब वानर फूट गये, तब उन्होंने दण्डरूप चौथे उपाय से युक्त नाना प्रकार के भयदायक वचनों द्वारा अङ्गद को डराना आरम्भ किया— ॥७॥

त्वं समर्थतरः पित्रा युद्धे तारेय वै ध्रुवम्।

दृढं धारयितुं शक्तः कपिराज्यं यथा पिता॥८॥

‘तारानन्दन! तुम युद्ध में अपने पिता के समान ही अत्यन्त शक्तिशाली हो—यह निश्चित रूप से सबको विदित है। जैसे तुम्हारे पिता वानरों का राज्य सँभालते थे, उसी प्रकार तुम भी उसे दृढ़तापूर्वक धारण करने में समर्थ हो॥

नित्यमस्थिरचित्ता हि कपयो हरिपुंगव।

नाज्ञाप्यं विषहिष्यन्ति पुत्रदारं विना त्वया॥९॥

‘किंतु वानरशिरोमणे! ये कपिलोग सदा ही चञ्चलचित्त होते हैं। अपने स्त्री-पुत्रों से अलग रहकर तुम्हारी आज्ञा का पालन करना इनके लिये सह्य नहीं होगा।

त्वां नैते ह्यनुरजेयुः प्रत्यक्षं प्रवदामि ते।

यथायं जाम्बवान् नीलः सुहोत्रश्च महाकपिः॥१०॥

नह्यहं ते इमे सर्वे सामदानादिभिर्गुणैः।

दण्डेन न त्वया शक्याः सुग्रीवादपकर्षितुम्॥११॥

‘मैं तुम्हारे सामने कहता हूँ, ये कोई भी वानर सुग्रीव से विरोध करके तुम्हारे प्रति अनुरक्त नहीं हो सकते। जैसे ये जाम्बवान्, नील और महाकपि सुहोत्र हैं, उसी प्रकार मैं भी हूँ। मैं तथा ये सब लोग साम, दान आदि उपायों द्वारा सुग्रीव से अलग नहीं किये जा सकते। तुम दण्ड के द्वारा भी हम सबको वानरराज से दूर कर सको, यह भी सम्भव नहीं है (अतः सुग्रीव तुम्हारी अपेक्षा प्रबल हैं)॥

विगृह्यासनमप्याहुर्दुर्बलेन बलीयसा।

आत्मरक्षाकरस्तस्मान्न विगृहणीत दुर्बलः॥१२॥

‘दुर्बल के साथ विरोध करके बलवान् पुरुष चुपचाप बैठा रहे, यह तो सम्भव है। परंतु किसी बलवान् से वैर बाँधकर कोई दुर्बल पुरुष कहीं भी सुख से नहीं रह सकता; अतः अपनी रक्षा चाहने वाले दुर्बल पुरुष को बलवान् के साथ विग्रह नहीं करना चाहिये—यह नीतिज्ञ पुरुषों का कथन है॥ १२॥

यां चेमां मन्यसे धात्रीमेतद् बिलमिति श्रुतम्।

एतल्लक्ष्मणबाणानामीषत् कार्यं विदारणम्॥१३॥

‘तुम जो ऐसा मानने लगे हो कि यह गुफा हमें माता के समान अपनी गोद में छिपा लेगी, इसलिये हमारी रक्षा हो जायगी तथा इस बिल की अभेद्यता के विषय में जो तुमने तार के मुँह से कुछ सुना है, यह सब व्यर्थ है; क्योंकि इस गुफा को विदीर्ण कर देना लक्ष्मण के बाणों के लिये बायें हाथ का खेल है (अत्यन्त तुच्छ कार्य है) ॥ १३॥

स्वल्पं हि कृतमिन्द्रेण क्षिपता ह्यशनिं पुरा।

लक्ष्मणो निशितैर्बाणैर्भिन्द्यात् पत्रपुटं यथा॥१४॥

‘पूर्वकाल में यहाँ वज्र का प्रहार करके इन्द्र ने तो इस गुफा को बहुत थोड़ी हानि पहुँचायी थी; परंतु लक्ष्मण अपने पैने बाणों द्वारा इसे पत्ते के दोने की भाँति विदीर्ण कर डालेंगे॥ १४॥

लक्ष्मणस्य च नाराचा बहवः सन्ति तद्विधाः।

वज्राशनिसमस्पर्शा गिरीणामपि दारकाः॥१५॥

‘लक्ष्मण के पास ऐसे बहुत-से नाराच हैं, जिनका हलका-सा स्पर्श भी वज्र और अशनि के समान चोट पहुँचानेवाला है। वे नाराच पर्वतों को भी विदीर्ण कर सकते हैं॥ १५॥

अवस्थानं यदैव त्वमासिष्यसि परंतप।

तदैव हरयः सर्वे त्यक्ष्यन्ति कृतनिश्चयाः॥१६॥

‘शत्रुओं को संताप देने वाले वीर! ज्यों ही तुम इस गुफा में रहना आरम्भ करोगे, त्यों ही ये सब वानर तुम्हें त्याग देंगे; क्योंकि इन्होंने ऐसा करने का निश्चय कर लिया है॥ १६॥

स्मरन्तः पुत्रदाराणां नित्योद्विग्ना बुभुक्षिताः।

खेदिता दुःखशय्याभिस्त्वां करिष्यन्ति पृष्ठतः॥१७॥

‘ये अपने बाल-बच्चों को याद करके सदा उद्विग्न रहेंगे। जब यहाँ इन्हें भूख का कष्ट सहना पड़ेगा और दुःखद शय्या पर सोने या दुरवस्था में रहने के कारण इनके मन में खेद होगा, तब ये तुम्हें पीछे छोड़कर चल देंगे॥ १७॥

स त्वं हीनः सुहृद्भिश्च हितकामैश्च बन्धुभिः।

तृणादपि भृशोद्विग्नः स्पन्दमानाद् भविष्यसि॥१८॥

‘ऐसी दशा में तुम हितैषी बन्धुओं और सुहृदों के सहयोग से वञ्चित हो उड़ते हुए तिनके से भी तुच्छ हो जाओगे और सदा अधिक डरते रहोगे (अथवा हिलते हुए तिनके-से अत्यन्त भयभीत होते रहोगे)। १८॥

न च जातु न हिंस्युस्त्वां घोरा लक्ष्मणसायकाः।

अपवृत्तं जिघांसन्तो महावेगा दुरासदाः॥१९॥

‘लक्ष्मण के बाण घोर, महान् वेगशाली और दुर्जय हैं। श्रीराम के कार्य से विमुख होने पर तुम्हें कदापि मारे बिना नहीं रहेंगे॥ १९॥

अस्माभिस्तु गतं सार्धं विनीतवदुपस्थितम्।

आनुपूर्व्यात्तु सुग्रीवो राज्ये त्वां स्थापयिष्यति॥२०॥

‘हमारे साथ चलकर जब तुम विनीत पुरुष की भाँति उनकी सेवा में उपस्थित होगे, तब सुग्रीव क्रमशः अपने बाद तुम्हीं को राज्य पर बिठायेंगे॥ २० ॥

धर्मराजः पितृव्यस्ते प्रीतिकामो दृढव्रतः।

शुचिः सत्यप्रतिज्ञश्च स त्वां जातु न नाशयेत्॥२१॥

‘तुम्हारे चाचा सुग्रीव धर्म के मार्ग पर चलने वाले राजा हैं। वे सदा तुम्हारी प्रसन्नता चाहने वाले, दृढव्रत, पवित्र और सत्यप्रतिज्ञ हैं अतः कदापि तुम्हारा नाश नहीं कर सकते॥२१॥

प्रियकामश्च ते मातुस्तदर्थं चास्य जीवितम्।

तस्यापत्यं च नास्त्यन्यत् तस्मादङ्गद गम्यताम्॥२२॥

‘अङ्गद! उनके मन में सदा तुम्हारी माता का प्रिय करने की इच्छा रहती है। उनकी प्रसन्नता के लिये ही वे जीवन धारण करते हैं। सुग्रीव के तुम्हारे सिवा कोई दूसरा पुत्र भी नहीं है, इसलिये तुम्हें उनके पास चलना चाहिये’॥ २२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे चतुःपञ्चाशः सर्गः॥५४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में चौवनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥५४॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

अङ्गदसहित वानरों का प्रायोपवेशन

पञ्चपञ्चाशः सर्गः

सर्ग-55


श्रुत्वा हनुमतो वाक्यं प्रश्रितं धर्मसंहितम्।

स्वामिसत्कारसंयुक्तमङ्गदो वाक्यमब्रवीत्॥१॥

हनुमान जी का वचन विनययुक्त, धर्मानुकूल और स्वामी के प्रति सम्मान से युक्त था। उसे सुनकर अङ्गद ने कहा- ॥१॥

स्थैर्यमात्ममनःशौचमानृशंस्यमथार्जवम्।

विक्रमश्चैव धैर्यं च सुग्रीवे नोपपद्यते॥२॥

‘कपिश्रेष्ठ! राजा सुग्रीव में स्थिरता, शरीर और मन की पवित्रता, क्रूरता का अभाव, सरलता, पराक्रम और धैर्य है—यह मान्यता ठीक नहीं जान पड़ती॥२॥

भ्रातुर्येष्ठस्य यो भार्यां जीवतो महिषीं प्रियाम्।

धर्मेण मातरं यस्तु स्वीकरोति जुगुप्सितः॥३॥

कथं स धर्मं जानीते येन भ्रात्रा दुरात्मना।

युद्धायाभिनियुक्तेन बिलस्य पिहितं मुखम्॥४॥

‘जिसने अपने बड़े भाई के जीते-जी उनकी प्यारी महारानी को, जो धर्मतः उसकी माता के समान थी, कुत्सित भावना से ग्रहण कर लिया था, वह धर्म को जानता है, यह कैसे कहा जा सकता है? जिस दुरात्मा ने युद्ध के लिये जाते हुए भाई के द्वारा बिल की रक्षा के कार्य में नियुक्त होने पर भी पत्थर से उसका मुँह बंद कर दिया, वह कैसे धर्मज्ञ माना जा सकता है?॥ ३-४॥

सत्यात् पाणिगृहीतश्च कृतकर्मा महायशाः।

विस्मृतो राघवो येन स कस्य सुकृतं स्मरेत्॥५॥

‘जिन्होंने सत्य को साक्षी देकर उसका हाथ पकड़ा और पहले ही उसका कार्य सिद्ध कर दिया, उन महायशस्वी भगवान् श्रीराम को ही जब उसने भुला दिया, तब दूसरे किसके उपकार को वह याद रख सकता है ? ॥ ५॥

लक्ष्मणस्य भयेनेह नाधर्मभयभीरुणा।

आदिष्टा मार्गितुं सीता धर्मस्तस्मिन् कथं भवेत्॥

‘जिसने अधर्म के भय से डरकर नहीं, लक्ष्मण के ही भयसे भीत हो हमलोगों को सीता की खोज के लिये भेजा है, उसमें धर्म की सम्भावना कैसे हो सकती है? ॥ ६॥

तस्मिन् पापे कृतघ्ने तु स्मृतिभिन्ने चलात्मनि।

आर्यः को विश्वसेज्जातु तत्कुलीनो विशेषतः॥७॥

‘उस पापी, कृतघ्न, स्मरण-शक्ति से हीन और चञ्चलचित्त सुग्रीव पर कोई श्रेष्ठ पुरुष, विशेषतः जो उसके कुल में उत्पन्न हुआ हो, कभी भी किस तरह विश्वास कर सकता है ? ॥ ७॥

राज्ये पुत्रः प्रतिष्ठाप्यः सगुणो निर्गुणोऽपि वा।

कथं शत्रुकुलीनं मां सुग्रीवो जीवयिष्यति॥८॥

‘अपना पुत्र गुणवान् हो या गुणहीन, उसी को राज्य पर बिठाना चाहिये, ऐसी धारणा रखने वाला सुग्रीव मुझ शत्रुकुल में उत्पन्न हुए बालक को कैसे जीवित रहने देगा?॥ ८॥

भिन्नमन्त्रोऽपराद्धश्च भिन्नशक्तिः कथं ह्यहम्।

किष्किन्धां प्राप्य जीवेयमनाथ इव दुर्बलः॥९॥

‘सुग्रीव से अलग रहने का जो मेरा गूढ विचार था, वह आज प्रकट हो गया। साथ ही, उसकी आज्ञा का पालन न करने के कारण मैं अपराधी भी हूँ। इतना ही नहीं, मेरी शक्ति क्षीण हो गयी है। मैं अनाथ के समान दुर्बल हूँ। ऐसी दशा में किष्किन्धा में जाकर कैसे जीवित रह सकूँगा?॥९॥

उपांशुदण्डेन हि मां बन्धनेनोपपादयेत्।

शठः क्रूरो नृशंसश्च सुग्रीवो राज्यकारणात्॥१०॥

‘सुग्रीव शठ, क्रूर और निर्दयी है। वह राज्य के लिये मुझे गुप्तरूप से दण्ड देगा अथवा सदा के लिये मुझे बन्धन में डाल देगा॥१०॥

बन्धनाच्चावसादान्मे श्रेयः प्रायोपवेशनम्।

अनुजानन्तु मां सर्वे गृहं गच्छन्तु वानराः॥११॥

‘इस प्रकार बन्धनजनित कष्ट भोगने की अपेक्षा उपवास करके प्राण दे देना ही मेरे लिये श्रेयस्कर है। अतः सब वानर मुझे यहीं रहने की आज्ञा दें और अपने-अपने घर को चले जायँ॥ ११॥

अहं वः प्रतिजानामि न गमिष्याम्यहं पुरीम्।

इहैव प्रायमासिष्ये श्रेयो मरणमेव मे॥१२॥

‘मैं आपलोगों से प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ कि मैं किष्किन्धापुरी को नहीं जाऊँगा। यहीं मरणान्त उपवास करूँगा। मेरा मर जाना ही अच्छा है॥ १२ ॥

अभिवादनपूर्वं तु राजा कुशलमेव च।

अभिवादनपूर्वं तु राघवौ बलशालिनौ ॥१३॥

‘आपलोग राजा सुग्रीव को प्रणाम करके उनसे मेरा कुशल-समाचार कहियेगा। अपने बल के कारण शोभा पाने वाले दोनों रघुवंशी बन्धुओं से भी मेरा सादर प्रणाम निवेदन करते हुए कुशल-समाचार कह दीजियेगा॥१३॥

वाच्यस्तातो यवीयान् मे सुग्रीवो वानरेश्वरः।

आरोग्यपूर्वं कुशलं वाच्या माता रुमा च मे॥१४॥

‘मेरे छोटे पिता वानरराज सुग्रीव और माता रुमा से भी मेरा आरोग्यपूर्वक कुशल-समाचार बताइयेगा। १४॥

मातरं चैव मे तारामाश्वासयितुमर्हथ।

प्रकृत्या प्रियपुत्रा सा सानुक्रोशा तपस्विनी॥१५॥

‘मेरी माता तारा को भी धैर्य बँधाइयेगा। वह बेचारी स्वभाव से ही दयालु और पुत्र पर प्रेम रखने वाली है। १५॥

विनष्टमिह मां श्रुत्वा व्यक्तं हास्यति जीवितम्।

एतावदुक्त्वा वचनं वृद्धांस्तानभिवाद्य च॥१६॥

विवेश चाङ्गदो भूमौ रुदन् दर्भेषु दुर्मनाः।

‘यहाँ मेरे नष्ट होने का समाचार सुनकर वह निश्चय ही अपने प्राण त्याग देगी।’ इतना कहकर अङ्गद ने उन सभी बड़े-बूढ़े वानरों को प्रणाम किया और धरती पर कुश बिछाकर उदास मुंह से रोते-रोते वे मरणान्त उपवास के लिये बैठ गये॥ १६ १/२॥

तस्य संविशतस्तत्र रुदन्तो वानरर्षभाः॥१७॥

नयनेभ्यः प्रमुमुचुरुष्णं वै वारि दुःखिताः।

सुग्रीवं चैव निन्दन्तः प्रशंसन्तश्च वालिनम्॥१८॥

परिवार्याङ्गदं सर्वे व्यवसन् प्रायमासितुम्।

उनके इस प्रकार बैठनेपर सभी श्रेष्ठ वानर रोने लगे और दुःखी हो नेत्रोंसे गरम-गरम आँसू बहाने लगे। सुग्रीवकी निन्दा और वालीकी प्रशंसा करते हुए उन सबने अङ्गदको सब ओरसे घेरकर आमरण उपवास करनेका निश्चय किया॥ १७-१८ १/२॥

तद् वाक्यं वालिपुत्रस्य विज्ञाय प्लवगर्षभाः॥१९॥

उपस्पृश्योदकं सर्वे प्राङ्मुखाः समुपाविशन्।

दक्षिणाग्रेषु दर्भेषु उदक्तीरं समाश्रिताः॥२०॥

मुमूर्षवो हरिश्रेष्ठा एतत् क्षममिति स्म ह।

वालिकुमार के वचनों पर विचार करके उन वानरशिरोमणियों ने मरना ही उचित समझा और मृत्यु की इच्छा से आचमन करके समुद्र के उत्तर तटपर दक्षिणाग्र कुश बिछाकर वे सब-के-सब पूर्वाभिमुख हो बैठ गये॥

रामस्य वनवासं च क्षयं दशरथस्य च॥२१॥

जनस्थानवधं चैव वधं चैव जटायुषः।

हरणं चैव वैदेह्या वालिनश्च वधं तथा।

रामकोपं च वदतां हरीणां भयमागतम्॥२२॥

श्रीराम के वनवास, राजा दशरथ की मृत्यु, जनस्थानवासी राक्षसों के संहार, विदेहकुमारी सीता के अपहरण, जटायुके मरण, वाली के वध और श्रीराम के क्रोध की चर्चा करते हुए उन वानरों पर एक दूसरा ही भय आ पहुँचा॥ २१-२२॥

स संविशद्भिर्बहुभिर्महीधरो महाद्रिकूटप्रतिमैः प्लवंगमैः।

बभूव संनादितनिर्दरान्तरो भृशं नदद्भिर्जलदैरिवाम्बरम्॥२३॥

महान् पर्वत-शिखरों के समान शरीर वाले वहाँ बैठे हुए बहुसंख्यक वानर भय के मारे जोर-जोर से शब्द करने लगे, जिससे उस पर्वत की कन्दराओं का भीतरी भाग प्रतिध्वनित हो उठा और गर्जते हुए मेघों से युक्त आकाश के समान प्रतीत होने लगा॥ २३॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे पञ्चपञ्चाशः सर्गः॥५५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में पचपनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५५॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

सम्पाति से वानरों को भय, उनके मुख से जटायु के वध की बात सुनकर सम्पाति का दुःखी होना और अपने को नीचे उतारने के लिये वानरों से अनुरोध करना

षट्पञ्चाशः सर्गः

सर्ग-56


उपविष्टास्तु ते सर्वे यस्मिन् प्रायं गिरिस्थले।

हरयो गृध्रराजश्च तं देशमुपचक्रमे॥१॥

सम्पातिर्नाम नाम्ना तु चिरजीवी विहंगमः।

भ्राता जटायुषः श्रीमान् विख्यातबलपौरुषः॥२॥

पर्वत के जिस स्थान पर वे सब वानर आमरण उपवास के लिये बैठे थे, उस प्रदेश में चिरंजीवी पक्षी श्रीमान् गृध्रराज सम्पाति आये। वे जटायु के भाई थे और अपने बल तथा पुरुषार्थ के लिये सर्वत्र प्रसिद्ध थे॥१-२॥

कन्दरादभिनिष्क्रम्य स विन्ध्यस्य महागिरेः।

उपविष्टान् हरीन् दृष्ट्वा हृष्टात्मा गिरमब्रवीत्॥३॥

महागिरि विन्ध्य की कन्दरा से निकलकर सम्पाति ने जब वहाँ बैठे हुए वानरों को देखा, तब उनका हृदय हर्ष से खिल उठा और वे इस प्रकार बोले- ॥३॥

विधिः किल नरं लोके विधानेनानुवर्तते।

यथायं विहितो भक्ष्यश्चिरान्मह्यमुपागतः॥४॥

परम्पराणां भक्षिष्ये वानराणां मृतं मृतम्।

उवाचैतद् वचः पक्षी तान् निरीक्ष्य प्लवंगमान्॥

‘जैसे लोक में पूर्वजन्म के कर्मानुसार मनुष्य को उसके किये का फल स्वतः प्राप्त होता है, उसी प्रकार आज दीर्घकाल के पश्चात् यह भोजन स्वतः मेरे लिये प्राप्त हो गया। अवश्य ही यह मेरे किसी कर्म का फल है इन वानरों में से जो-जो मरता जायगा, उसको मैं क्रमशः भक्षण करता जाऊँगा’ यह बात उस पक्षी ने उन सब वानरों को देखकर कहा॥ ४-५॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा भक्ष्यलुब्धस्य पक्षिणः।

अङ्गदः परमायस्तो हनूमन्तमथाब्रवीत्॥६॥

भोजन पर लुभाये हुए उस पक्षी का यह वचन सुनकर अङ्गद को बड़ा दुःख हुआ और वे हनुमान् जी से बोले

पश्य सीतापदेशेन साक्षाद् वैवस्वतो यमः।

इमं देशमनुप्राप्तो वानराणां विपत्तये॥७॥

‘देखिये, सीता के निमित्त से वानरों को विपत्ति में डालने के लिये साक्षात् सूर्यपुत्र यम इस देश में आ पहुँचे॥

रामस्य न कृतं कार्यं न कृतं राजशासनम्।

हरीणामियमज्ञाता विपत्तिः सहसाऽऽगता॥८॥

हमलोगों ने न तो श्रीरामचन्द्रजी का कार्य किया और न राजा की आज्ञा का पालन ही। इसी बीच वानरों पर यह सहसा अज्ञात विपत्ति आ पड़ी॥८॥

वैदेह्याः प्रियकामेन कृतं कर्म जटायुषा।

गृध्रराजेन यत् तत्र श्रुतं वस्तदशेषतः॥९॥

‘विदेहकुमारी सीता का प्रिय करने की इच्छा से गृध्रराज जटायु ने जो साहसपूर्ण कार्य किया था, वह सब आपलोगों ने सुना ही होगा॥९॥

तथा सर्वाणि भूतानि तिर्यग्योनिगतान्यपि।

प्रियं कुर्वन्ति रामस्य त्यक्त्वा प्राणान् यथा वयम्॥१०॥

‘समस्त प्राणी, वे पशु-पक्षियों की योनि में ही क्यों न उत्पन्न हुए हों, हमारी तरह प्राण देकर भी श्रीरामचन्द्रजी का प्रिय कार्य करते हैं॥ १० ॥

अन्योन्यमुपकुर्वन्ति स्नेहकारुण्ययन्त्रिताः।

ततस्तस्योपकारार्थं त्यजतात्मानमात्मना॥११॥

‘शिष्ट पुरुष स्नेह और करुणा के वशीभूत हो एकदूसरे का उपकार करते हैं, अतः आपलोग भी श्रीराम के उपकार के लिये स्वयं ही अपने शरीर का परित्याग करें॥ ११॥

प्रियं कृतं हि रामस्य धर्मज्ञेन जटायुषा।

राघवार्थे परिश्रान्ता वयं संत्यक्तजीविताः॥१२॥

कान्ताराणि प्रपन्नाः स्म न च पश्याम मैथिलीम्।

‘धर्मज्ञ जटायु ने ही श्रीराम का प्रिय किया है। हमलोग श्रीरघुनाथजी के लिये अपने जीवन का मोह छोड़कर परिश्रम करते हुए इस दुर्गम वन में आये, किंतु मिथिलेशकुमारी का दर्शन न कर सके॥ १२ १/२॥

स सुखी गृध्रराजस्तु रावणेन हतो रणे।

मुक्तश्च सुग्रीवभयाद् गतश्च परमां गतिम्॥१३॥

‘गृध्रराज जटायु ही सुखी हैं, जो युद्ध में रावण के हाथ से मारे गये और परमगति को प्राप्त हुए वे सुग्रीव के भय से मुक्त हैं॥ १३॥

जटायुषो विनाशेन राज्ञो दशरथस्य च।

हरणेन च वैदेह्याः संशयं हरयो गताः॥१४॥

‘राजा दशरथ की मृत्यु, जटायु का विनाश और विदेहकुमारी सीता का अपहरण-इन घटनाओं से इस समय वानरों का जीवन संशय में पड़ गया है॥ १४ ॥

रामलक्ष्मणयोर्वासमरण्ये सह सीतया।

राघवस्य च बाणेन वालिनश्च तथा वधः॥१५॥

रामकोपादशेषाणां रक्षसां च तथा वधम्।

कैकेय्या वरदानेन इदं च विकृतं कृतम्॥१६॥

‘श्रीराम और लक्ष्मण को सीता के साथ वन में निवास करना पड़ा, श्रीरघुनाथजी के बाण से वाली का वध हुआ और अब श्रीराम के कोप से समस्त राक्षसों का संहार होगा ये सारी बुराइयाँ कैकेयी को दिये गये वरदान से ही पैदा हुई हैं’।

तदसुखमनुकीर्तितं वचो भुवि पतितांश्च निरीक्ष्य वानरान्।

भृशचकितमतिर्महामतिः कृपणमुदाहृतवान् स गृध्रराजः॥१७॥

वानरों के द्वारा बारम्बार कहे गये इन दुःखमय वचनों को सुनकर और उन सबको पृथ्वी पर पड़ा हुआ देखकर परम बुद्धिमान् सम्पाति का हृदय अत्यन्त क्षुब्ध हो उठा और वे दीन वाणी में बोलने को उद्यत हुए॥ १७॥

तत् तु श्रुत्वा तथा वाक्यमङ्गदस्य मुखोद्गतम्।

अब्रवीद् वचनं गृध्रस्तीक्ष्णतुण्डो महास्वनः॥१८॥

अङ्गद के मुख से निकले हुए उस वचन को सुनकर तीखी चोंचवाले उस गीध ने उच्च स्वर से इस प्रकार पूछा— ॥१८॥

कोऽयं गिरा घोषयति प्राणैः प्रियतरस्य मे।

जटायुषो वधं भ्रातुः कम्पयन्निव मे मनः॥१९॥

‘यह कौन है, जो मेरे प्राणों से भी बढ़कर प्रिय भाई जटायु के वध की बात कह रहा है। इसे सुनकर मेरा हृदय कम्पित-सा होने लगा है॥ १९॥

कथमासीज्जनस्थाने युद्धं राक्षसगृध्रयोः।

नामधेयमिदं भ्रातुश्चिरस्याद्य मया श्रुतम्॥२०॥

‘जनस्थान में राक्षस का गृध्र के साथ किस प्रकार युद्ध हुआ था? अपने भाई का प्यारा नाम आज बहुत दिनों के बाद मेरे कान में पड़ा है॥२०॥

इच्छेयं गिरिदुर्गाच्च भवद्भिरवतारितुम्।

यवीयसो गुणज्ञस्य श्लाघनीयस्य विक्रमैः॥२१॥

अतिदीर्घस्य कालस्य परितुष्टोऽस्मि कीर्तनात्।

तदिच्छेयमहं श्रोतुं विनाशं वानरर्षभाः॥ २२॥

‘जटायु मुझसे छोटा, गुणज्ञ और पराक्रम के कारण अत्यन्त प्रशंसा के योग्य था। दीर्घकाल के पश्चात् आज उसका नाम सुनकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई। मैं चाहता हूँ कि पर्वत के इस दुर्गम स्थान से आपलोग मुझे नीचे उतार दें। श्रेष्ठ वानरो! मुझे अपने भाई के विनाश का वृत्तान्त सुनने की इच्छा है॥ २१-२२॥

भ्रातुर्जटायुषस्तस्य जनस्थाननिवासिनः।

तस्यैव च मम भ्रातुः सखा दशरथः कथम्॥२३॥

यस्य रामः प्रियः पुत्रो ज्येष्ठो गुरुजनप्रियः।

‘मेरा भाई जटायु तो जनस्थान में रहता था। गुरुजनों के प्रेमी श्रीरामचन्द्रजी जिनके ज्येष्ठ एवं प्रिय पुत्र हैं, वे महाराज दशरथ मेरे भाई के मित्र कैसे हुए? ॥ २३ १/२॥

सूर्यांशुदग्धपक्षत्वान्न शक्नोमि विसर्पितम्।

इच्छेयं पर्वतादस्मादवतर्तुमरिंदमाः॥२४॥

‘शत्रुदमन वीरो! मेरे पंख सूर्य की किरणों से जल गये हैं, इसलिये मैं उड़ नहीं सकता; किंतु इस पर्वत से नीचे उतरना चाहता हूँ’॥ २४॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे षट्पञ्चाशः सर्गः॥५६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में छप्पनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥५६॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

अङ्गद का सम्पाति को जटायु के मारे जाने का वृत्तान्त बताना तथा राम-सुग्रीव की मित्रता एवं वालिवध का प्रसंग सुनाकर अपने आमरण उपवास का कारण निवेदन करना

सप्तपञ्चाशः सर्गः

सर्ग-57


शोकाद् भ्रष्टस्वरमपि श्रुत्वा वानरयूथपाः।

श्रद्दधु व तद्वाक्यं कर्मणा तस्य शङ्किताः॥१॥

शोक के कारण सम्पाति का स्वर विकृत हो गया था। उनकी कही हुई बात सुनकर भी वानरयूथपतियों ने उसपर विश्वास नहीं किया; क्योंकि वे उनके कर्म से शङ्कित थे॥१॥

ते प्रायमुपविष्टास्तु दृष्ट्वा गृध्र प्लवंगमाः।

चक्रुर्बुद्धिं तदा रौद्रां सर्वान् नो भक्षयिष्यति॥२॥

आमरण उपवास के लिये बैठे हुए उन वानरों ने उस समय गीध को देखकर यह भयंकर बात सोची, ‘यह हम सबको खा तो नहीं जायगा॥२॥

सर्वथा प्रायमासीनान् यदि नो भक्षयिष्यति।

कृतकृत्या भविष्यामः क्षिप्रं सिद्धिमितो गताः॥३॥

‘अच्छा, हम तो सब प्रकार से मरणान्त उपवास का व्रत लेकर बैठे ही थे। यदि यह पक्षी हमें खा लेगा तो हमारा काम ही बन जायगा। हमें शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त हो जायगी’॥३॥

एतां बुद्धिं ततश्चक्रुः सर्वे ते हरियूथपाः।

अवतार्य गिरेः शृङ्गाद् गृध्रमाहाङ्गदस्तदा ॥४॥

फिर तो उन समस्त वानर-यूथपतियों ने यही निश्चय किया। उस समय गीध को उस पर्वतशिखर से उतारकर अङ्गद ने कहा- ॥ ४॥

बभूवर्क्षरजो नाम वानरेन्द्रः प्रतापवान्।

ममार्यः पार्थिवः पक्षिन् धार्मिकौ तस्य चात्मजौ॥

सुग्रीवश्चैव वाली च पुत्रौ घनबलावुभौ।

लोके विश्रुतकर्माभूद् राजा वाली पिता मम॥

‘पक्षिराज! पहले एक प्रतापी वानरराज हो गये हैं, जिनका नाम था ऋक्षरजा! राजा ऋक्षरजा मेरे पितामह लगते थे। उनके दो धर्मात्मा पुत्र हुए सुग्रीव और वाली दोनों ही बड़े बलवान् हुए। उनमें से राजा वाली मेरे पिता थे। संसार में अपने पराक्रम के कारण उनकी बड़ी ख्याति थी॥५-६॥

राजा कृत्स्नस्य जगत इक्ष्वाकूणां महारथः।

रामो दाशरथिः श्रीमान् प्रविष्टो दण्डकावनम्॥७॥

लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा वैदेह्या सह भार्यया।

पितुर्निदेशनिरतो धर्मं पन्थानमाश्रितः॥८॥

‘आज से कुछ वर्ष पहले इक्ष्वाकुवंश के महारथी वीर दशरथकुमार श्रीमान् रामचन्द्रजी, जो सम्पूर्णजगत् के राजा हैं, पिता की आज्ञा के पालन में तत्पर हो धर्म-मार्ग का आश्रय ले दण्डकारण्य में आये थे। उनके साथ उनके छोटे भाई लक्ष्मण तथा उनकी धर्मपत्नी विदेहकुमारी सीता भी थीं॥ ८॥

तस्य भार्या जनस्थानाद् रावणेन हृता बलात्।

रामस्य तु पितुर्मित्रं जटायुर्नाम गृध्रराट्॥९॥

ददर्श सीतां वैदेहीं ह्रियमाणां विहायसा।

रावणं विरथं कृत्वा स्थापयित्वा च मैथिलीम्।

परिश्रान्तश्च वृद्धश्च रावणेन हतो रणे॥१०॥

‘जनस्थान में आने पर उनकी पत्नी सीता को रावण ने बलपूर्वक हर लिया। उस समय गृध्रराज जटायु ने, जो उनके पिता के मित्र थे, देखा-रावण आकाशमार्ग से विदेहकुमारी को लिये जा रहा है। देखते ही वे रावण पर टूट पड़े और उसके रथ को नष्ट-भ्रष्ट करके उन्होंने मिथिलेशकुमारी को सुरक्षित रूप से भूमि पर खड़ा कर दिया। किंतु वे वृद्ध तो थे ही। युद्ध करते करते थक गये और अन्ततोगत्वा रणक्षेत्र में रावण के हाथ से मारे गये॥९-१०॥

एवं गृध्रो हतस्तेन रावणेन बलीयसा।

संस्कृतश्चापि रामेण जगाम गतिमुत्तमाम्॥११॥

‘इस प्रकार महाबली रावण के द्वारा जटायु का वध हुआ। स्वयं श्रीरामचन्द्रजी ने उनका दाह-संस्कार किया और वे उत्तम गति (साकेतधाम को) प्राप्त हुए॥११॥

ततो मम पितृव्येण सुग्रीवेण महात्मना।

चकार राघवः सख्यं सोऽवधीत् पितरं मम॥१२॥

‘तदनन्तर श्रीरघुनाथजी ने मेरे चाचा महात्मा सुग्रीव से मित्रता की और उनके कहने से उन्होंने मेरे पिता का वध कर दिया॥१२॥

मम पित्रा निरुद्धो हि सुग्रीवः सचिवैः सह।

निहत्य वालिनं रामस्ततस्तमभिषेचयत्॥१३॥

‘मेरे पिता ने मन्त्रियों सहित सुग्रीव को राज्य-सुख से वञ्चित कर दिया था। इसलिये श्रीरामचन्द्रजी ने मेरे पिता वाली को मारकर सुग्रीव का अभिषेक करवाया। १३॥

स राज्ये स्थापितस्तेन सुग्रीवो वानरेश्वरः।

राजा वानरमुख्यानां तेन प्रस्थापिता वयम्॥१४॥

‘उन्होंने ही सुग्रीव को वाली के राज्य पर स्थापित किया। अब सुग्रीव वानरों के स्वामी हैं। मुख्य-मुख्य वानरों के भी राजा हैं। उन्होंने हमें सीता की खोज के लिये भेजा है॥ १४॥

एवं रामप्रयुक्तास्तु मार्गमाणास्ततस्ततः।

वैदेहीं नाधिगच्छामो रात्रौ सूर्यप्रभामिव॥१५॥

‘इस तरह श्रीराम से प्रेरित होकर हमलोग इधरउधर विदेहकुमारी सीता को खोजते-फिरते हैं, किंतु अबतक उनका पता नहीं लगा। जैसे रात में सूर्य की रभा का दर्शन नहीं होता, उसी प्रकार हमें इस वन में जानकी का दर्शन नहीं हुआ॥ १५ ॥

ते वयं दण्डकारण्यं विचित्य सुसमाहिताः।

अज्ञानात् तु प्रविष्टाः स्म धरण्या विवृतं बिलम्॥१६॥

‘हमलोग अपने मन को एकाग्र करके दण्डकारण्य में भलीभाँति खोज करते हुए अज्ञानवश पृथ्वी के एक खुले हुए विवर में घुस गये॥ १६ ॥

मयस्य मायाविहितं तद् बिलं च विचिन्वताम्।

व्यतीतस्तत्र नो मासो यो राज्ञा समयः कृतः॥१७॥

‘वह विवर मयासुर की माया से निर्मित हुआ है। उसमें खोजते-खोजते हमारा एक मास बीत गया, जिसे राजा सुग्रीव ने हमारे लौटने के लिये अवधि निश्चित किया था॥ १७॥

ते वयं कपिराजस्य सर्वे वचनकारिणः।

कृतां संस्थामतिक्रान्ता भयात् प्रायमुपासिताः॥१८॥

‘हम सब लोग कपिराज सुग्रीव के आज्ञाकारी हैं, किंतु उनके द्वारा नियत की हुई अवधि को लाँघ गये हैं। अतः उन्हीं के भयसे हम यहाँ आमरण उपवास कर रहे हैं॥ १८॥

क्रुद्धे तस्मिंस्तु काकुत्स्थे सुग्रीवे च सलक्ष्मणे।

गतानामपि सर्वेषां तत्र नो नास्ति जीवितम्॥१९॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम, लक्ष्मण और सुग्रीव तीनों हमपर कुपित होंगे। उस दशा में वहाँ लौट जाने के बाद भी हम सबके प्राण नहीं बच सकते’। १९॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे सप्तपञ्चाशः सर्गः॥५७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में सत्तावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५७॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

सम्पाति का अपने पंख जलने की कथा सुनाना, सीता और रावण का पता बताना तथा वानरों की सहायता से समुद्र-तटपर जाकर भाई को जलाञ्जलि देना

अष्टपञ्चाशः सर्गः

सर्ग-58


इत्युक्तः करुणं वाक्यं वानरैस्त्यक्तजीवितैः।

सबाष्पो वानरान् गृध्रः प्रत्युवाच महास्वनः॥१॥

जीवन की आशा त्यागकर बैठे हुए वानरों के मुख से यह करुणाजनक बात सुनकर सम्पाति के नेत्रों में आँसू आ गये। उन्होंने उच्च स्वर से उत्तर दिया- ॥१॥

यवीयान् स मम भ्राता जटायुर्नाम वानराः।

यमाख्यात हतं युद्ध रावणेन बलीयसा॥२॥

‘वानरो! तुम जिसे महाबली रावण के द्वारा युद्ध में मारा गया बता रहे हो, वह जटायु मेरा छोटा भाई था॥

वृद्धभावादपक्षत्वाच्छृण्वंस्तदपि मर्षये।

नहि मे शक्तिरस्त्यद्य भ्रातुर्वैरविमोक्षणे॥३॥

मैं बूढ़ा हुआ मेरे पंख जल गये। इसलिये अब मुझमें अपने भाई के वैर का बदला लेने की शक्ति नहीं रह गयी है। यही कारण है कि यह अप्रिय बात सुनकर भी मैं चुपचाप सहे लेता हूँ॥३॥

पुरा वृत्रवधे वृत्ते स चाहं च जयैषिणौ।

आदित्यमुपयातौ स्वो ज्वलन्तं रश्मिमालिनम्॥४॥

आवृत्याकाशमार्गेण जवेन स्वर्गतौ भृशम्।

मध्यं प्राप्ते तु सूर्ये तु जटायुरवसीदति॥५॥

‘पहले की बात है जब इन्द्र के द्वारा वृत्रासुर का वध हो गया, तब इन्द्र को प्रबल जानकर हम दोनों भाई उन्हें जीतने की इच्छा से पहले आकाशमार्ग के द्वारा बड़े वेग से स्वर्गलोक में गये। इन्द्र को जीतकर लौटते समय हम दोनों ही स्वर्ग को प्रकाशित करने वाले अंशुमाली सूर्य के पास आये। हममें से जटायु सूर्य के मध्याह्नकाल में उनके तेज से शिथिल होने लगा। ४-५॥

तमहं भ्रातरं दृष्ट्वा सूर्यरश्मिभिरर्दितम्।

पक्षाभ्यां छादयामास स्नेहात् परमविह्वलम्॥

भाई को सूर्य की किरणों से पीड़ित और अत्यन्त व्याकुल देख मैंने स्नेहवश अपने दोनों पंखों से उसे ढक लिया॥६॥

निर्दग्धपत्रः पतितो विन्ध्येऽहं वानरर्षभाः।

अहमस्मिन् वसन् भ्रातुः प्रवृत्तिं नोपलक्षये॥७॥

‘वानरशिरोमणियो! उस समय मेरे दोनों पंख जल गये और मैं इस विन्ध्य पर्वत पर गिर पड़ा। यहाँ रहकर मैं कभी अपने भाई का समाचार न पा सका (आज पहले-पहल तुमलोगों के मुख से उसके मारे जाने की बात मालूम हुई है)’॥७॥

जटायुषस्त्वेवमुक्तो भ्रात्रा सम्पातिना तदा।

युवराजो महाप्रज्ञः प्रत्युवाचाङ्गदस्तदा॥८॥

जटायु के भाई सम्पाति के उस समय ऐसा कहने पर परम बुद्धिमान् युवराज अङ्गद ने उनसे इस प्रकार कहा

जटायुषो यदि भ्राता श्रुतं ते गदितं मया।

आख्याहि यदि जानासि निलयं तस्य रक्षसः॥९॥

‘गृध्रराज! यदि आप जटायु के भाई हैं, यदि आपने मेरी कही हुई बातें सुनी हैं और यदि आप उस राक्षस का निवास स्थान जानते हैं तो हमें बताइये॥९॥

अदीर्घदर्शिनं तं वै रावणं राक्षसाधमम्।

अन्तिके यदि वा दूरे यदि जानासि शंस नः॥१०॥

‘वह अदूरदर्शी नीच राक्षस रावण यहाँ से निकट हो या दूर, यदि आप जानते हैं तो हमें उसका पता बता दें॥

ततोऽब्रवीन्महातेजा भ्राता ज्येष्ठो जटायुषः।

आत्मानुरूपं वचनं वानरान् सम्प्रहर्षयन्॥११॥

तब जटायु के बड़े भाई महातेजस्वी सम्पाति ने वानरों का हर्ष बढ़ाते हुए अपने अनुरूप बात कही – ॥ ११॥

निर्दग्धपक्षो गृध्रोऽहं गतवीर्यः प्लवङ्गमाः।

वामात्रेण तु रामस्य करिष्ये साह्यमुत्तमम्॥१२॥

‘वानरो! मेरे पंख जल गये। अब मैं बेपर का गीध हूँ। मेरी शक्ति जाती रही (अतः मैं शरीर से तुम्हारी कोई सहायता नहीं कर सकता, तथापि) वचनमात्र से भगवान् श्रीराम की उत्तम सहायता अवश्य करूँगा।१२॥

जानामि वारुणाँल्लोकान् विष्णोस्त्रविक्रमानपि।

देवासुरविमर्दाश्च ह्यमृतस्य विमन्थनम्॥१३॥

‘मैं वरुण के लोकों को जानता हूँ। वामनावतार के समय भगवान् विष्णु ने जहाँ-जहाँ अपने तीन पग रखे थे, उन स्थानों का भी मुझे ज्ञान है। अमृत-मन्थन तथा देवासुरसंग्राम भी मेरी देखी और जानी हुई घटनाएँ हैं।

रामस्य यदिदं कार्यं कर्तव्यं प्रथमं मया।

जरया च हृतं तेजः प्राणाश्च शिथिला मम॥१४॥

‘यद्यपि वृद्धावस्थाने मेरा तेज हर लिया है और मेरी प्राणशक्ति शिथिल हो गयी है तथापि श्रीरामचन्द्रजी का यह कार्य मुझे सबसे पहले करना है॥ १४॥

तरुणी रूपसम्पन्ना सर्वाभरणभूषिता।

ह्रियमाणा मया दृष्टा रावणेन दुरात्मना॥१५॥

‘एक दिन मैंने भी देखा, दुरात्मा रावण सब प्रकार के गहनों से सजी हुई एक रूपवती युवती को हरकर लिये जा रहा था॥१५॥

क्रोशन्ती रामरामेति लक्ष्मणेति च भामिनी।

भूषणान्यपविध्यन्ती गात्राणि च विधुन्वती॥१६॥

‘वह मानिनी देवी ‘हा राम! हा राम! हा लक्ष्मण’ की रट लगाती हुई अपने गहने फेंकती और अपने शरीर के अवयवों को कम्पित करती हुई छटपटा रही थी॥ १६॥

सूर्यप्रभेव शैलाग्रे तस्याः कौशेयमुत्तमम्।

असिते राक्षसे भाति यथा वा तडिदम्बुदे॥१७॥

‘उसका सुन्दर रेशमी पीताम्बर उदयाचल के शिखर पर फैली हुई सूर्य की प्रभा के समान सुशोभित होता था। वह उस काले राक्षस के समीप बादलों में चमकती हुई बिजली के समान प्रकाशित हो रही थी। १७॥

तां तु सीतामहं मन्ये रामस्य परिकीर्तनात्।

श्रूयतां मे कथयतो निलयं तस्य रक्षसः॥१८॥

‘श्रीराम का नाम लेने से मैं समझता हूँ, वह सीता ही थी अब मैं उस राक्षस के घर का पता बताता हूँ, सुनो॥ १८॥

पुत्रो विश्रवसः साक्षाद् भ्राता वैश्रवणस्य च।

अध्यास्ते नगरी लङ्कां रावणो नाम राक्षसः॥१९॥

‘रावण नामक राक्षस महर्षि विश्रवा का पुत्र और साक्षात् कुबेर का भाई है। वह लङ्का नाम वाली नगरी में निवास करता है॥ १९॥

इतो द्वीपे समुद्रस्य सम्पूर्णे शतयोजने।

तस्मिल्लङ्का पुरी रम्या निर्मिता विश्वकर्मणा॥२०॥

‘यहाँ से पूरे चार सौ कोस के अन्तरपर समुद्र में एक द्वीप है, जहाँ विश्वकर्मा ने अत्यन्त रमणीय लङ्कापुरी का निर्माण किया है॥२०॥

जाम्बूनदमयैरिश्चित्रैः काञ्चनवेदिकैः।

प्रासार्हेमवर्णैश्च महद्भिः सुसमाकृता॥२१॥

‘उसके विचित्र दरवाजे और बड़े-बड़े महल सुवर्ण के बने हुए हैं। उनके भीतर सोने के चबूतरे या वेदियाँ हैं॥ २१॥

प्राकारेणार्कवर्णेन महता च समन्विता।

तस्यां वसति वैदेही दीना कौशेयवासिनी॥२२॥

‘उस नगरी की चहारदीवारी बहुत बड़ी है और सूर्य की भाँति चमकती रहती है। उसी के भीतर पीले रंग की रेशमी साड़ी पहने विदेहकुमारी सीता बड़े दुःख से निवास करती हैं ॥ २२॥

रावणान्तःपुरे रुद्धा राक्षसीभिः सुरक्षिता।

जनकस्यात्मजां राज्ञस्तस्यां द्रक्ष्यथ मैथिलीम्॥२३॥

‘रावण के अन्तःपुर में नजरबंद हैं। बहुत-सी राक्षसियाँ उनके पहरे पर तैनात हैं वहाँ पहुँचने पर तुमलोग राजा जनक की कन्या मैथिली सीता को देख सकोगे॥ २३॥

लङ्कायामथ गुप्तायां सागरेण समन्ततः।

सम्प्राप्य सागरस्यान्तं सम्पूर्णं शतयोजनम्॥२४॥

आसाद्य दक्षिणं तीरं ततो द्रक्ष्यथ रावणम्।

तत्रैव त्वरिताः क्षिप्रं विक्रमध्वं प्लवङ्गमाः॥२५॥

‘लङ्का चारों ओर से समुद्र के द्वारा सुरक्षित है। पूरे सौ योजन समुद्र को पार करके उसके दक्षिण तटपर पहुँचने पर तुमलोग रावण को देख सकोगे। अतः वानरो! समुद्र को पार करने में ही तुरंत शीघ्रतापूर्वक अपने पराक्रम का परिचय दो॥

ज्ञानेन खलु पश्यामि दृष्ट्वा प्रत्यागमिष्यथ।

आद्यः पन्थाः कुलिङ्गानां ये चान्ये धान्यजीविनः॥ २६॥

‘निश्चय ही मैं ज्ञानदृष्टि से देखता हूँ। तुमलोग सीता का दर्शन करके लौट आओगे। आकाश का पहला मार्ग गौरैयों तथा अन्न खाने वाले कबूतर आदि पक्षियों का है॥२६॥

द्वितीयो बलिभोजानां ये च वृक्षफलाशनाः।

भासास्तृतीयं गच्छन्ति क्रौञ्चाश्च कुररैः सह।२७॥

‘उससे ऊपर का दूसरा मार्ग कौओं तथा वृक्षों के फल खाकर रहने वाले दूसरे-दूसरे पक्षियों का है। उससे भी ऊँचा जो आकाश का तीसरा मार्ग है, उससे चील, क्रौञ्च और कुरर आदि पक्षी जाते हैं॥२७॥

श्येनाश्चतुर्थं गच्छन्ति गृध्रा गच्छन्ति पञ्चमम्।

बलवीर्योपपन्नानां रूपयौवनशालिनाम्॥ २८॥

षष्ठस्तु पन्था हंसानां वैनतेयगतिः परा।

वैनतेयाच्च नो जन्म सर्वेषां वानरर्षभाः॥२९॥

‘बाज चौथे और गीध पाँचवें मार्ग से उड़ते हैं। रूप, बल और पराक्रम से सम्पन्न तथा यौवन से सुशोभित होने वाले हंसों का छठा मार्ग है। उनसे भी ऊँची उड़ान गरुड़की है। वानरशिरोमणियो! हम सबका जन्म गरुड़ से ही हुआ है।

गर्हितं तु कृतं कर्म येन स्म पिशिताशिनः।

प्रतिकार्यं च मे तस्य वैरं भ्रातृकृतं भवेत्॥३०॥

‘परंतु पूर्वजन्म में हमसे कोई निन्दित कर्म बन गया था, जिससे इस समय हमें मांसाहारी होना पड़ा है।तुमलोगों की सहायता करके मुझे रावण से अपने भाई के वैर का बदला लेना है॥ ३०॥

इहस्थोऽहं प्रपश्यामि रावणं जानकी तथा।

अस्माकमपि सौपर्णं दिव्यं चक्षुर्बलं तथा॥३१॥

‘मैं यहीं से रावण और जानकी को देखता हूँ। हमलोगों में भी गरुड़ की भाँति दूरतक देखने की दिव्य शक्ति है॥ ३१॥

तस्मादाहारवीर्येण निसर्गेण च वानराः।

आयोजनशतात् साग्राद् वयं पश्याम नित्यशः॥३२॥

‘इसलिये वानरो! हम भोजन जनित बल से तथा स्वाभाविक शक्ति से भी सदा सौ योजन और उससे आगे तक भी देख सकते हैं॥ ३२॥

अस्माकं विहिता वृत्तिनिसर्गेण च दूरतः।

विहिता वृक्षमूले तु वृत्तिश्चरणयोधिनाम्॥३३॥

‘जातीय स्वभाव के अनुसार हमलोगों की जीविकावृत्ति दूरसे देखे गये दूरस्थ भक्ष्यविशेष के द्वारा नियत की गयी है तथा जो कुक्कुट आदि पक्षी हैं, उनकी जीवन-वृत्ति वृक्ष की जड़तक ही सीमित है—वे वहीं तक उपलब्ध होने वाली वस्तु से जीवन-निर्वाह करते हैं॥३३॥

उपायो दृश्यतां कश्चिल्लङ्घने लवणाम्भसः।

अभिगम्य तु वैदेहीं समृद्धार्था गमिष्यथ॥३४॥

‘अब तुम इस खारे पानी के समुद्र को लाँघने का कोई उपाय सोचो। विदेहकुमारी सीता के पास जा सफलमनोरथ होकर किष्किन्धापुरी को लौटोगे॥ ३४॥

समुद्रं नेतुमिच्छामि भवद्भिर्वरुणालयम्।

प्रदास्याम्युदकं भ्रातुः स्वर्गतस्य महात्मनः॥३५॥

‘अब मैं तुम्हारी सहायता से समुद्र के किनारे चलना चाहता हूँ। वहाँ अपने स्वर्गवासी भाई महात्मा जटायु को जलाञ्जलि प्रदान करूँगा’॥ ३५॥

ततो नीत्वा तु तं देशं तीरे नदनदीपतेः।

निर्दग्धपक्षं सम्पातिं वानराः सुमहौजसः॥३६॥

तं पुनः प्रापयित्वा च तं देशं पतगेश्वरम्।

बभूवुर्वानरा हृष्टाः प्रवृत्तिमुपलभ्य ते॥३७॥

यह सुनकर महापराक्रमी वानरों ने जले पंखवाले पक्षिराज सम्पाति को उठाकर समुद्र के किनारे पहुँचा दिया और जलाञ्जलि देने के पश्चात् वे पुनः उनको वहाँ से उठाकर उनके रहने के स्थान पर ले आये। उनके मुख से सीता का समाचार जानकर उन सभी वानरों को बड़ी प्रसन्नता हुई।

इत्याचे श्रीमद्रामायाणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे अष्टपञ्चाशः सर्गः॥५८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में अट्ठावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥५८॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

सम्पाति का अपने पुत्र सुपार्श्व के मुख से सुनी हुई सीता और रावण को देखने की घटना का वृत्तान्त बताना

एकोनषष्टितमः सर्गः

सर्ग-59


ततस्तदमृतास्वादं गृध्रराजेन भाषितम्।

निशम्य वदता हृष्टास्ते वचः प्लवगर्षभाः॥१॥

उस समय वार्तालाप करते हुए गृध्रराज के द्वारा कहे गये उस अमृत के समान स्वादिष्ट मधुर वचन को सुनकर सब वानरश्रेष्ठ हर्ष से खिल उठे॥१॥

जाम्बवान् वानरश्रेष्ठः सह सर्वैः प्लवङ्गमैः।

भूतलात् सहसोत्थाय गृध्रराजानमब्रवीत्॥२॥

वानरों और भालुओं में श्रेष्ठ जाम्बवान् सब वानरों के साथ सहसा भूतल से उठकर खड़े हो गये और गृध्रराज से इस प्रकार पूछने लगे— ॥२॥

क्व सीता केन वा दृष्टा को वा हरति मैथिलीम्।

तदाख्यातु भवान् सर्वं गतिर्भव वनौकसाम्॥३॥

‘पक्षिराज! सीता कहाँ हैं? किसने उन्हें देखा है? और कौन उन मिथिलेशकुमारी को हरकर ले गयाहै? ये सब बातें बताइये और हम सब वनवासी वानरों के आश्रयदाता होइये॥३॥

को दाशरथिबाणानां वज्रवेगनिपातिनाम्।

स्वयं लक्ष्मणमुक्तानां न चिन्तयति विक्रमम्॥४॥

‘कौन ऐसा धृष्ट है, जो वज्र के समान वेगपूर्वक चोट करने वाले दशरथनन्दन श्रीराम के बाणों तथा स्वयं लक्ष्मण के चलाये हुए सायकों के पराक्रम को कुछ नहीं समझता है ?’ ॥ ४॥

स हरीन् प्रतिसम्मुक्तान् सीताश्रुतिसमाहितान्।

पुनराश्वासयन् प्रीत इदं वचनमब्रवीत्॥५॥

उस समय उपवास छोड़कर बैठे और सीताजी का वृत्तान्त सुनने के लिये एकाग्र हुए वानरों को प्रसन्नतापूर्वक पुनः आश्वासन देते हुए सम्पाति ने उनसे यह बात कही- ॥५॥

श्रूयतामिह वैदेह्या यथा मे हरणं श्रुतम्।

येन चापि ममाख्यातं यत्र चायतलोचना॥६॥

‘वानरो! विदेहकुमारी सीता का जिस प्रकार अपहरण हुआ है, विशाललोचना सीता इस समय जहाँ है और जिसने मुझसे यह सब वृत्तान्त कहा है एवं जिस तरह मैंने सुना है, वह सब बताता हूँ, सुनो – ॥६॥

अहमस्मिन् गिरौ दुर्गे बहुयोजनमायते।

चिरान्निपतितो वृद्धः क्षीणप्राणपराक्रमः॥७॥

‘यह दुर्गम पर्वत कई योजनों तक फैला है। दीर्घकाल हुआ, जब मैं इस पर्वत पर गिरा था। मेरी प्राणशक्ति क्षीण हो गयी थी और मैं वृद्ध था॥७॥

तं मामेवंगतं पुत्रः सुपाश्वो नाम नामतः।

आहारेण यथाकालं बिभर्ति पततां वरः॥८॥

‘इस अवस्था में मेरा पुत्र पक्षिप्रवर सुपार्श्व ही यथा समय आहार देकर प्रतिदिन मेरा भरण-पोषण करता है॥८॥

तीक्ष्णकामास्तु गन्धर्वास्तीक्ष्णकोपा भुजङ्गमाः।

मृगाणां तु भयं तीक्ष्णं ततस्तीक्ष्णक्षुधा वयम्॥९॥

‘जैसे गन्धर्वो का कामभाव तीव्र होता है, सर्पो का क्रोध तेज होता है और मृगों को भय अधिक होता है, उसी प्रकार हमारी जाति के लोगों की भूख बड़ी तीव्र होती है॥९॥

स कदाचित् क्षुधार्तस्य ममाहाराभिकांक्षिणः।

गतसूर्येऽहनि प्राप्तो मम पुत्रो ह्यनामिषः॥१०॥

‘एक दिन की बात है मैं भूख से पीड़ित होकर आहार प्राप्त करना चाहता था। मेरा पुत्र मेरे लिये भोजन की तलाश में निकला था, किंतु सूर्यास्त होने के बाद वह खाली हाथ लौट आया, उसे कहीं मांस नहीं मिला॥१०॥

स मयाऽऽहारसंरोधात् पीडितः प्रीतिवर्धनः।

अनुमान्य यथातत्त्वमिदं वचनमब्रवीत्॥११॥

‘भोजन न मिलने से मैंने कठोर बातें सुनाकर अपनी प्रीति बढ़ाने वाले उस पुत्र को बहुत पीड़ा दी, किंतु उसने नम्रतापूर्वक मुझे आदर देते हुए यह यथार्थ बात कही— ॥११॥

अहं तात यथाकालमामिषार्थी खमाप्लुतः।

महेन्द्रस्य गिरे रमावृत्य सुसमाश्रितः॥१२॥

‘तात! मैं यथासमय मांस प्राप्त करने की इच्छा से आकाश में उड़ा और महेन्द्र पर्वत के द्वार को रोककर खड़ा हो गया॥ १२॥

तत्र सत्त्वसहस्राणां सागरान्तरचारिणाम्।

पन्थानमेकोऽध्यवसं संनिरोद्धमवाङ्मुखः॥१३॥

‘वहाँ अपनी चोंच नीची करके मैं समुद्र के भीतर विचरने वाले सहस्रों जन्तुओं के मार्ग को रोकने के लिये अकेला ठहर गया॥१३॥

तत्र कश्चिन्मया दृष्टः सूर्योदयसमप्रभाम्।

स्त्रियमादाय गच्छन् वै भिन्नाञ्जनचयोपमः॥१४॥

‘उस समय मैंने देखा खान से काटकर निकाले हुए कोयले की राशि के समान काला कोई पुरुष एक स्त्री को लेकर जा रहा है। उस स्त्री की कान्ति सूर्योदयकाल की प्रभा के समान प्रकाशित हो रही थी। १४॥

सोऽहमभ्यवहारार्थं तौ दृष्ट्वा कृतनिश्चयः।

तेन साम्ना विनीतेन पन्थानमनुयाचितः॥१५॥

‘उस स्त्री और उस पुरुष को देखकर मैंने उन्हें आपके आहार के लिये लाने का निश्चय किया, किंतु उस पुरुष ने नम्रतापूर्वक मधुर वाणी में मुझसे मार्ग की याचना की।

नहि सामोपपन्नानां प्रहर्ता विद्यते भुवि।

नीचेष्वपि जनः कश्चित् किमङ्ग बत मद्विधः॥१६॥

‘पिताजी! भूतल पर नीच पुरुषों में भी कोई ऐसा नहीं है, जो विनयपूर्वक मीठे वचन बोलने वालों पर प्रहार करे फिर मुझ-जैसा कुलीन पुरुष कैसे कर सकता है?॥

स यातस्तेजसा व्योम संक्षिपन्निव वेगितः।

अथाहं खेचरैर्भूतैरभिगम्य सभाजितः॥१७॥

‘फिर तो वह तेज से आकाश को व्याप्त करता हुआ-सा वेगपूर्वक चला गया। उसके चले जाने पर आकाशचारी प्राणी सिद्ध-चारण आदि ने आकर मेरा बड़ा सम्मान किया।

दिष्ट्या जीवति सीतेति ह्यब्रुवन् मां महर्षयः।

कथंचित् सकलत्रोऽसौ गतस्ते स्वस्त्यसंशयम्॥१८॥

‘वे महर्षि मुझसे बोले—’सौभाग्य की बात है कि सीता जीवित हैं। तुम्हारी दृष्टि पड़ने पर भी स्त्री के साथ आया हुआ वह पुरुष किसी तरह सकुशल बच गया; अतः अवश्य तुम्हारा कल्याण हो’ ।। १८ ॥

एवमुक्तस्ततोऽहं तैः सिद्धैः परमशोभनैः।

स च मे रावणो राजा रक्षसां प्रतिवेदितः॥१९॥

‘उन परम शोभायमान सिद्ध पुरुषों ने मुझसे ऐसा कहा, तत्पश्चात् उन्होंने यह भी बताया कि वह काला पुरुष राक्षसों का राजा रावण था’॥ १९॥

पश्यन् दाशरथेर्भार्यां रामस्य जनकात्मजाम्।

भ्रष्टाभरणकौशेयां शोकवेगपराजिताम्॥२०॥

रामलक्ष्मणयोर्नाम क्रोशन्तीं मुक्तमूर्धजाम्।

एष कालात्ययस्तात इति वाक्यविदां वरः॥२१॥

एतदर्थं समग्रं मे सुपार्श्वः प्रत्यवेदयत् ।

तच्छ्रुत्वापि हि मे बुद्धिर्नासीत् काचित् पराक्रमे॥२२॥

‘तात! दशरथनन्दन श्रीराम की पत्नी जनककिशोरी सीता शोक के वेग से पराजित हो गयी थीं। उनके आभूषण गिर रहे थे और रेशमी वस्त्र भी सिर से खिसक गया था। उनके केश खुले हुए थे और वे श्रीराम तथा लक्ष्मण का नाम ले-लेकर उन्हें पुकार रही थीं। मैं उनकी इस दयनीय दशा को देखता रह गया। यही मेरे विलम्ब से आने का कारण है।’ इस प्रकार बातचीत की कला जानने वालों में श्रेष्ठ सुपार्श्व ने मेरे सामने इन सारी बातों का वर्णन किया। यह सब सुनकर भी मेरे हृदय में पराक्रम कर दिखाने का कोई विचार नहीं उठा॥ २०-२२॥

अपक्षो हि कथं पक्षी कर्म किंचित् समारभेत्।

यत् तु शक्यं मया कर्तुं वाग्बुद्धिगुणवर्तिना॥२३॥

श्रूयतां तत्र वक्ष्यामि भवतां पौरुषाश्रयम्।

‘बिना पंख का पक्षी कैसे कोई पराक्रम कर सकता है? अपनी वाणी और बुद्धि के द्वारा साध्य जो उपकाररूप गुण है, उसे करना मेरा स्वभाव बन गया है। ऐसे स्वभाव से मैं जो कुछ कर सकता हूँ, वह कार्य तुम्हें बता रहा हूँ,सुनो वह कार्य तुमलोगों के पुरुषार्थ से ही सिद्ध होनेवाला है॥ २३ १/२ ॥

वामतिभ्यां हि सर्वेषां करिष्यामि प्रियं हि वः॥२४॥

यद्धि दाशरथेः कार्यं मम तन्नात्र संशयः।

‘मैं वाणी और बुद्धि के द्वारा तुम सब लोगों का प्रिय कार्य अवश्य करूँगा; क्योंकि दशरथनन्दन श्रीराम का जो कार्य है, वह मेरा ही है—इसमें संशय नहीं है। २४ १/२॥

तद् भवन्तो मतिश्रेष्ठा बलवन्तो मनस्विनः॥

प्रहिताः कपिराजेन देवैरपि दुरासदाः।

‘तुम लोग भी उत्तम बुद्धि से युक्त, बलवान्,मनस्वी तथा देवताओं के लिये भी दुर्जय हो। इसीलिये वानरराज सुग्रीव ने तुम्हें इस कार्य के लिये भेजा है। २५ १/२॥

रामलक्ष्मणबाणाश्च विहिताः कङ्कपत्रिणः॥२६॥

त्रयाणामपि लोकानां पर्याप्तास्त्राणनिग्रहे।

‘श्रीराम और लक्ष्मण के कङ्कपत्र से युक्त जो बाण हैं, वे साक्षात् विधाता के बनाये हुए हैं। वे तीनों लोकों का संरक्षण और दमन करने के लिये पर्याप्त शक्ति रखते हैं।

कामं खलु दशग्रीवस्तेजोबलसमन्वितः।

भवतां तु समर्थानां न किंचिदपि दुष्करम्॥ २७॥

‘तुम्हारा विपक्षी दशग्रीव रावण भले ही तेजस्वी और बलवान् है, किंतु तुम-जैसे सामर्थ्यशाली वीरों के लिये उसे परास्त करना आदि कोई भी कार्य दुष्कर नहीं है।

तदलं कालसङ्गेन क्रियतां बुद्धिनिश्चयः।

नहि कर्मसु सज्जन्ते बुद्धिमन्तो भवद्विधाः॥२८॥

‘अतः अब अधिक समय बिताने की आवश्यकता नहीं है। अपनी बुद्धि के द्वारा दृढ निश्चय करके सीता के दर्शन के लिये उद्योग करो; क्योंकि तुम-जैसे बुद्धिमान् लोग कार्यों की सिद्धि में विलम्ब नहीं करते हैं’॥ २८॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे एकोनषष्टितमः सर्गः॥ ५९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में उनसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५९॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

सम्पाति की आत्मकथा

षष्टितमः सर्गः

सर्ग-60


ततः कृतोदकं स्नातं तं गृधं हरियूथपाः।

उपविष्टा गिरौ रम्ये परिवार्य समन्ततः॥१॥

गृध्रराज सम्पाति अपने भाई को जलाञ्जलि देकर जब स्नान कर चुके, तब उस रमणीय पर्वत पर वे समस्त वानरयूथपति उन्हें चारों ओर से घेरकर बैठ गये॥१॥

तमङ्गदमुपासीनं तैः सर्वैर्हरिभिर्वृतम्।

जनितप्रत्ययो हर्षात् सम्पातिः पुनरब्रवीत्॥२॥

उन समस्त वानरों से घिरे हुए अङ्गद उनके पास बैठे थे। सम्पाति ने सबके हृदय में अपनी ओर से विश्वास पैदा कर दिया था। वे हर्षोत्फुल्ल होकर फिर इस प्रकार कहने लगे— ॥२॥

कृत्वा निःशब्दमेकानाः शृण्वन्तु हरयो मम।

तथ्यं संकीर्तयिष्यामि यथा जानामि मैथिलीम्॥३॥

‘सब वानर एकाग्रचित्त एवं मौन होकर मेरी बात सुनो। मैं मिथिलेशकुमारी को जिस प्रकार जानता हूँ, वह सारा प्रसङ्ग ठीक-ठीक बता रहा हूँ॥३॥

अस्य विन्ध्यस्य शिखरे पतितोऽस्मि पुरानघ।

सूर्यतापपरीताङ्गो निर्दग्धः सूर्यरश्मिभिः॥४॥

‘निष्पाप अङ्गद! प्राचीन काल में मैं सूर्य की किरणों से झुलसकर इस विन्ध्यपर्वत के शिखर पर गिरा था। उस समय मेरे सारे अङ्ग सूर्य के प्रचण्ड ताप से संतप्त हो रहेथे॥

लब्धसंज्ञस्तु षडात्राद् विवशो विह्वलन्निव।

वीक्षमाणो दिशः सर्वा नाभिजानामि किंचन॥

‘छः रातें बीतने पर जब मुझे होश हुआ और मैं विवश एवं विह्वल-सा होकर सम्पूर्ण दिशाओं की ओर देखने लगा, तब सहसा किसी भी वस्तु को मैं पहचान न सका॥ ५॥

ततस्तु सागरान् शैलान् नदीः सर्वाः सरांसि च।

वनानि च प्रदेशांश्च निरीक्ष्य मतिरागता॥६॥

‘तदनन्तर धीरे-धीरे समुद्र, पर्वत, समस्त नदी, सरोवर, वन और यहाँ के विभिन्न प्रदेशों पर दृष्टि डाली, तब मेरी स्मरण-शक्ति लौटी॥६॥

हृष्टपक्षिगणाकीर्णः कन्दरोदरकूटवान्।

दक्षिणस्योदधेस्तीरे विन्ध्योऽयमिति निश्चितः॥७॥

‘फिर मैंने निश्चय किया कि यह दक्षिण समुद्र के तट पर स्थित विन्ध्यपर्वत है, जो हर्षोत्फुल्ल विहंगमों के समुदाय से व्याप्त है। यहाँ बहुत-सी कन्दराएँ, गुफाएँ और शिखर हैं॥७॥

आसीच्चात्राश्रमं पुण्यं सुरैरपि सुपूजितम्।

ऋषिर्निशाकरो नाम यस्मिन्नुग्रतपाऽभवत्॥८॥

‘पूर्वकाल में यहाँ एक पवित्र आश्रम था, जिसका देवता भी बड़ा सम्मान करते थे। उस आश्रम में निशाकर (चन्द्रमा) नामधारी एक ऋषि रहते थे, जो बड़े ही उग्र तपस्वी थे॥

अष्टौ वर्षसहस्राणि तेनास्मिन्नृषिणा गिरौ।

वसतो मम धर्मज्ञे स्वर्गते तु निशाकरे॥९॥

‘वे धर्मज्ञ निशाकर मुनि अब स्वर्गवासी हो चुके हैं। उन महर्षि के बिना इस पर्वत पर रहते हुए मेरे आठ हजार वर्ष बीत गये॥९॥

अवतीर्य च विन्ध्याग्रात् कृच्छ्रेण विषमाच्छनैः।

तीक्ष्णदर्भा वसुमती दुःखेन पुनरागतः॥१०॥

‘होश में आने के बाद मैं इस पर्वत के नीचे-ऊँचे शिखर से धीरे-धीरे बड़े कष्ट के साथ भूमि पर उतरा, उस समय ऐसे स्थान पर आ पहुंचा, जहाँ तीखे कुश उगे हुए थे। फिर वहाँ से भी कष्ट सहन करता हुआ आगे बढ़ा ॥ १०॥

तमृषिं द्रष्टकामोऽस्मि दुःखेनाभ्यागतो भृशम्।

जटायुषा मया चैव बहुशोऽधिगतो हि सः॥

‘मैं उन महर्षि का दर्शन करना चाहता था, इसीलिये अत्यन्त कष्ट उठाकर वहाँ गया था। इसके पहले मैं और जटायु दोनों कई बार उनसे मिल चुके थे॥ ११॥

तस्याश्रमपदाभ्याशे ववुर्वाताः सुगन्धिनः।

वृक्षो नापुष्पितः कश्चिदफलो वा न दृश्यते॥१२॥

‘उनके आश्रम के समीप सदा सुगन्धित वायु चलती थी। वहाँ का कोई भी वृक्ष फल अथवा फूल से रहित नहीं देखा जाता था॥ १२॥

उपेत्य चाश्रमं पुण्यं वृक्षमूलमुपाश्रितः।

द्रष्टकामः प्रतीक्षे च भगवन्तं निशाकरम्॥१३॥

‘उस पवित्र आश्रम पर पहुँचकर मैं एक वृक्ष के नीचे ठहर गया और भगवान् निशाकर के दर्शन की इच्छा से उनके आने की प्रतीक्षा करने लगा॥१३॥

अथ पश्यामि दूरस्थमृषिं ज्वलिततेजसम्।

कृताभिषेकं दुर्धर्षमुपावृत्तमुदङ्मुखम्॥१४॥

‘थोड़ी ही देर में महर्षि मुझे दूरसे आते दिखायी दिये। वे अपने तेज से दिप रहे थे और स्नान करके उत्तर की ओर लौटे आ रहे थे। उनका तिरस्कार करना किसी के लिये भी कठिन था॥ १४ ॥

तमृक्षाः सृमरा व्याघ्राः सिंहा नानासरीसृपाः।

परिवार्योपगच्छन्ति दातारं प्राणिनो यथा॥१५॥

‘अनेकानेक रीछ, हरिन, सिंह, बाघ और नाना प्रकार के सर्प उन्हें इस प्रकार घेरे आ रहे थे, जैसे याचना करने वाले प्राणी दाता को घेरकर चलते हैं। १५॥

ततः प्राप्तमृषिं ज्ञात्वा तानि सत्त्वानि वै ययुः।

प्रविष्टे राजनि यथा सर्वं सामात्यकं बलम्॥१६॥

‘ऋषि को आश्रम पर आया जान वे सभी प्राणी लौट गये। ठीक उसी तरह, जैसे राजा के अपने महल में चले जाने पर मन्त्रीसहित सारी सेना अपने-अपने विश्रामस्थान को लौट जाती है॥ १६ ॥

ऋषिस्तु दृष्ट्वा मां तुष्टः प्रविष्टश्चाश्रमं पुनः।

मुहूर्तमात्रान्निर्गम्य ततः कार्यमपृच्छत॥१७॥

‘ऋषि मुझे देखकर बड़े प्रसन्न हुए और अपने आश्रम में प्रवेश करके पुनः दो ही घड़ी में बाहर निकल आये। फिर पास आकर उन्होंने मेरे आने का प्रयोजन पूछा— ॥१७॥

सौम्य वैकल्यतां दृष्ट्वा रोम्णां ते नावगम्यते।

अग्निदग्धाविमौ पक्षौ प्राणाश्चापि शरीरके॥ १८॥

‘वे बोले—’सौम्य! तुम्हारे रोएँ गिर गये और दोनों पंख जल गये हैं। इसका कारण नहीं जान पड़ता। इतने पर भी तुम्हारे शरीर में प्राण टिके हुए हैं॥ १८ ॥

गृध्रौ द्वौ दृष्टपूर्वी मे मातरिश्वसमौ जवे।

गृध्राणां चैव राजानौ भ्रातरौ कामरूपिणौ।१९॥

‘मैंने पहले वायु के समान वेगशाली दो गीधों को देखा है। वे दोनों परस्पर भाई और इच्छानुसार रूप धारण करने वाले थे। साथ ही वे गीधों के राजा भी थे।१९॥

ज्येष्ठोऽवितस्त्वं सम्पाते जटायुरनुजस्तव।

मानुषं रूपमास्थाय गृह्णीतां चरणौ मम॥२०॥

‘सम्पाते! मैं तुम्हें पहचान गया। तुम उन दो भाइयों में से बड़े हो जटायु तुम्हारा छोटा भाई था। तुम दोनों मनुष्यरूप धारण करके मेरा चरण-स्पर्श किया करते थे॥२०॥

किं ते व्याधिसमुत्थानं पक्षयोः पतनं कथम्।

दण्डो वायं धृतः केन सर्वमाख्याहि पृच्छतः॥२१॥

‘यह तुम्हें कौन-सा रोग लग गया है। तुम्हारे दोनों पंख कैसे गिर गये? किसी ने दण्ड तो नहीं दिया है? मैं जो कुछ पूछता हूँ, वह सब तुम स्पष्ट रूप से कहो’॥ २१॥

इत्यार्षे श्रीमद्राणायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे षष्टितमः सर्गः॥६०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में साठवाँ सर्ग पूरा हुआ।६०॥