॥श्री गणेशाय नम:॥
॥श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
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सम्पूर्ण वाल्मीकि रामायण
[काव्य बीजं सनातनम्]

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(सगर की आज्ञा से अंशुमान् का रसातल में जाकर घोड़े को ले आना और अपने चाचाओं के निधन का समाचार सुनाना)

एकचत्वारिंशः सर्गः 

सर्ग-41

पुत्रांश्चिरगतान् ज्ञात्वा सगरो रघुनन्दन।

नप्तारमब्रवीद राजा दीप्यमानं स्वतेजसा॥१॥

रघुनन्दन ! ‘पुत्रों को गये बहुत दिन हो गये’—ऐसा जानकर राजा सगरने अपने पौत्र अंशुमान से, जो अपने तेज से देदीप्यमान हो रहा था, इस प्रकार कहा – ॥१॥

शूरश्च कृतविद्यश्च पूर्वैस्तुल्योऽसि तेजसा।

पितॄणां गतिमन्विच्छ येन चाश्वोऽपवाहितः॥ २॥

‘वत्स! तुम शूरवीर, विद्वान् तथा अपने पूर्वजों के तुल्य तेजस्वी हो तुम भी अपने चाचाओं के पथ का अनुसरण करो और उस चोर का पता लगाओ, जिसने मेरे यज्ञ-सम्बन्धी अश्व का अपहरण कर लिया है।२॥

अन्तीमानि सत्त्वानि वीर्यवन्ति महान्ति च।

तेषां तु प्रतिघातार्थं सासिं गृह्णीष्व कार्मुकम्॥ ३॥

‘देखो, पृथ्वी के भीतर बड़े-बड़े बलवान् जीव रहते हैं; अतः उनसे टक्कर लेने के लिये तुम तलवार और धनुष भी लेते जाओ॥३॥

अभिवाद्याभिवाद्यांस्त्वं हत्वा विघ्नकरानपि।

सिद्धार्थः संनिवर्तस्व मम यज्ञस्य पारगः ॥ ४॥

‘जो वन्दनीय पुरुष हों, उन्हें प्रणाम करना और जो तुम्हारे मार्ग में विघ्न डालने वाले हों, उनको मार डालना ऐसा करते हुए सफल मनोरथ होकर लौटो और मेरे इस यज्ञ को पूर्ण कराओ’ ॥ ४॥

एवमुक्तोंऽशुमान् सम्यक् सगरेण महात्मना।

धनुरादाय खड्गं च जगाम लघुविक्रमः॥५॥

महात्मा सगर के ऐसा कहनेपर शीघ्रतापूर्वक पराक्रम कर दिखाने वाला वीरवर अंशुमान धनुष और तलवार लेकर चल दिया॥५॥

स खातं पितृभिर्मार्गमन्तभॊमं महात्मभिः।

रापद्यत नरश्रेष्ठ तेन राज्ञाभिचोदितः॥६॥

नरश्रेष्ठ! उसके महामनस्वी चाचाओं ने पृथ्वी के भीतर जो मार्ग बना दिया था, उसी पर वह राजा सगर से प्रेरित होकर गया॥६॥

देवदानवरक्षोभिः पिशाचपतगोरगैः।

पूज्यमानं महातेजा दिशागजमपश्यत॥७॥

वहाँ उस महातेजस्वी वीर ने एक दिग्गज को देखा, जिसकी देवता, दानव, राक्षस, पिशाच, पक्षी और नाग–सभी पूजा कर रहे थे॥७॥

स तं प्रदक्षिणं कृत्वा पृष्ट्वा चैव निरामयम्।

पितॄन् स परिपप्रच्छ वाजिहर्तारमेव च ॥८॥

उसकी परिक्रमा करके कुशल-मंगल पूछकर अंशुमान ने उस दिग्गज से अपने चाचाओं का समाचार तथा अश्व चुराने वाले का पता पूछा॥ ८॥

दिशागजस्तु तच्छ्रुत्वा प्रत्युवाच महामतिः।

आसमञ्ज कृतार्थस्त्वं सहाश्वः शीघ्रमेष्यसि॥ ९॥

उसका प्रश्न सुनकर परम बुद्धिमान् दिग्गज ने इस प्रकार उत्तर दिया—’असमंज-कुमार! तुम अपना कार्य सिद्ध करके घोड़े सहित शीघ्र लौट आओगे’। ९॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा सर्वानेव दिशागजान्।

यथाक्रमं यथान्यायं प्रष्टुं समुपचक्रमे॥१०॥

उसकी यह बात सुनकर अंशुमान्ने क्रमशः सभी दिग्गजों से न्यायानुसार उक्त प्रश्न पूछना आरम्भ किया॥१०॥

तैश्च सर्वैर्दिशापालैर्वाक्यज्ञैर्वाक्यकोविदैः।

पूजितः सहयश्चैवागन्तासीत्यभिचोदितः॥११॥

वाक्य के मर्म को समझने तथा बोलने में कुशल उन समस्त दिग्गजों ने अंशुमान का सत्कार किया और यह शुभ कामना प्रकट की कि तुम घोड़े सहित लौट आओगे॥

तेषां तद् वचनं श्रुत्वा जगाम लघुविक्रमः।

भस्मराशीकृता यत्र पितरस्तस्य सागराः॥१२॥

उनका यह आशीर्वाद सुनकर अंशुमान शीघ्रतापूर्वक पैर बढ़ाता हुआ उस स्थानपर जा पहुँचा, जहाँ उसके चाचा सगरपुत्र राखके ढेर हुए पड़े थे॥१२॥

स दुःखवशमापन्नस्त्वसमञ्जसुतस्तदा।

चुक्रोश परमार्तस्तु वधात् तेषां सुदुःखितः॥ १३॥

उनके वध से असमंज पुत्र अंशुमान को बड़ा दुःख हुआ। वह शोक के वशीभूत हो अत्यन्त आर्तभाव से फूट-फूटकर रोने लगा॥ १३॥

यज्ञियं च हयं तत्र चरन्तमविदूरतः।

ददर्श पुरुषव्याघ्रो दुःखशोकसमन्वितः॥१४॥

दुःख-शोक में डूबे हुए पुरुषसिंह अंशुमान ने अपने यज्ञ-सम्बन्धी अश्व को भी वहाँ पास ही चरते देखा॥ १४॥

स तेषां राजपुत्राणां कर्तुकामो जलक्रियाम्।

स जलार्थी महातेजा न चापश्यज्जलाशयम्॥ १५॥

महातेजस्वी अंशुमान ने उन राजकुमारोंको जलाञ्जलि देनेके लिये जलकी इच्छा की; किंतु वहाँ कहीं भी कोई जलाशय नहीं दिखायी दिया॥ १५ ॥

विसार्य निपुणां दृष्टिं ततोऽपश्यत् खगाधिपम्।

पितृणां मातुलं राम सुपर्णमनिलोपमम्॥१६॥

श्रीराम! तब उसने दूरतक की वस्तुओं को देखने में समर्थ अपनी दृष्टि को फैलाकर देखा। उस समय उसे वायु के समान वेगशाली पक्षिराज गरुड़ दिखायी दिये, जो उसके चाचाओं (सगरपुत्रों) के मामा थे।॥ १६ ॥

स चैनमब्रवीद वाक्यं वैनतेयो महाबलः।।

मा शुचः पुरुषव्याघ्र वधोऽयं लोकसम्मतः॥ १७॥

महाबली विनतानन्दन गरुड़ ने अंशुमान से कहा —’पुरुषसिंह! शोक न करो। इन राजकुमारों का वध सम्पूर्ण जगत् के मंगलके लिये हुआ है॥ १७॥

कपिलेनाप्रमेयेण दग्धा हीमे महाबलाः।

सलिलं नार्हसि प्राज्ञ दातुमेषां हि लौकिकम्॥ १८॥

‘विद्वन्! अनन्त प्रभावशाली महात्मा कपिलने इन महाबली राजकुमारोंको दग्ध किया है। इनके लिये तुम्हें लौकिक जलकी अञ्जलि देना उचित नहीं है। १८॥

गंगा हिमवतो ज्येष्ठा दुहिता पुरुषर्षभ।

तस्यां कुरु महाबाहो पितॄणां सलिलक्रियाम्॥ १९॥

‘नरश्रेष्ठ! महाबाहो! हिमवान् की जो ज्येष्ठ पुत्री गंगाजी हैं, उन्हीं के जल से अपने इन चाचाओं का तर्पण करो॥ १९॥

भस्मराशीकृतानेतान् प्लावयेल्लोकपावनी।

तया क्लिन्नमिदं भस्म गंगया लोककान्तया।

षष्टिं पुत्रसहस्राणि स्वर्गलोकं गमिष्यति॥२०॥

‘जिस समय लोक पावनी गंगा राख के ढेर होकर गिरे हुए उन साठ हजार राजकुमारों को अपने जल से आप्लावित करेंगी, उसी समय उन सबको स्वर्ग लोक में पहुँचा देंगी। लोककमनीया गंगा के जल से भीगी हुई यह भस्मराशि इन सबको स्वर्गलोक में भेज देगी॥ २० ॥

निर्गच्छाश्वं महाभाग संगृह्य पुरुषर्षभ।

यज्ञं पैतामहं वीर निर्वर्तयितुमर्हसि ॥२१॥

‘महाभाग! पुरुषप्रवर ! वीर! अब तुम घोड़ा लेकर जाओ और अपने पितामहका यज्ञ पूर्ण करो’ ॥ २१॥

सुपर्णवचनं श्रुत्वा सोंऽशुमानतिवीर्यवान्।

त्वरितं हयमादाय पुनरायान्महातपाः॥२२॥

गरुड़की यह बात सुनकर अत्यन्त पराक्रमी महातपस्वी अंशुमान घोड़ा लेकर तुरंत लौट आया।

ततो राजानमासाद्य दीक्षितं रघुनन्दन।

न्यवेदयद् यथावृत्तं सुपर्णवचनं तथा ॥२३॥

रघुनन्दन ! यज्ञ में दीक्षित हुए राजा के पास आकर उसने सारा समाचार निवेदन किया और गरुड़ की बतायी हुई बात भी कह सुनायी॥ २३॥

तच्छ्रुत्वा घोरसंकाशं वाक्यमंशुमतो नृपः।

यज्ञं निवर्तयामास यथाकल्पं यथाविधि ॥ २४॥

अंशुमान के मुख से यह भयंकर समाचार सुनकर राजा सगर ने कल्पोक्त नियम के अनुसार अपना यज्ञ विधिवत् पूर्ण किया॥२४॥

स्वपुरं त्वगमच्छ्रीमानिष्टयज्ञो महीपतिः।

गंगायाश्चागमे राजा निश्चयं नाध्यगच्छत॥ २५॥

यज्ञ समाप्त करके पृथ्वी पति महाराज सगर अपनी राजधानी को लौट आये, वहाँ आनेपर उन्होंने गंगाजी को ले आने के विषय में बहुत विचार किया; किंतु वे किसी निश्चय पर न पहुँच सके॥२५॥

अगत्वा निश्चयं राजा कालेन महता महान्।

त्रिंशद्वर्षसहस्राणि राज्यं कृत्वा दिवं गतः॥ २६॥

दीर्घकाल तक विचार करने पर भी उन्हें कोई निश्चित उपाय नहीं सूझा और तीस हजार वर्षां तक राज्य करके वे स्वर्गलोक को चले गये॥ २६ ॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकचत्वारिंशः सर्गः॥४१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में इकतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥४१॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(अंशुमान और भगीरथ की तपस्या, ब्रह्माजी का भगीरथ को अभीष्ट वर देना, गंगा जी को धारण करनेके लिये भगवान् शङ्कर को राजी करना)

द्विचत्वारिंशः सर्गः 

सर्ग-42

कालधर्मं गते राम सगरे प्रकृतीजनाः।

राजानं रोचयामासुरंशुमन्तं सुधार्मिकम्॥१॥

श्रीराम ! सगर की मृत्यु हो जाने पर प्रजाजनों ने परम धर्मात्मा अंशुमान को राजा बनाने की रुचि प्रकट की॥१॥

स राजा सुमहानासीदंशुमान् रघुनन्दन।

तस्य पुत्रो महानासीद् दिलीप इति विश्रुतः॥२॥

रघुनन्दन! अंशुमान बड़े प्रतापी राजा हुए उनके पुत्र का नाम दिलीप था। वह भी एक महान् पुरुष था॥२॥

तस्मै राज्यं समादिश्य दिलीपे रघुनन्दन।

हिमवच्छिखरे रम्ये तपस्तेपे सुदारुणम्॥३॥

रघुकुल को आनन्दित करनेवाले वीर! अंशुमान दिलीप को राज्य देकर हिमालय के रमणीय शिखर पर चले गये और वहाँ अत्यन्त कठोर तपस्या करने लगे॥३॥

द्वात्रिंशच्छतसाहस्रं वर्षाणि सुमहायशाः।

तपोवनगतो राजा स्वर्गं लेभे तपोधनः॥४॥

महान् यशस्वी राजा अंशुमान ने उस तपोवन में जाकर बत्तीस हजार वर्षों तक तप किया तपस्या के धन से सम्पन्न हुए उस नरेश ने वहीं शरीर त्यागकर स्वर्ग लोक प्राप्त किया॥४॥

दिलीपस्तु महातेजाः श्रुत्वा पैतामहं वधम्।

दुःखोपहतया बुद्धया निश्चयं नाध्यगच्छत॥५॥

अपने पितामहों के वध का वृत्तान्त सुनकर महा तेजस्वी दिलीप भी बहुत दुःखी रहते थे। अपनी बुद्धि से बहुत सोचने-विचारने के बाद भी वे किसी निश्चय पर नहीं पहुँच सके॥५॥

कथं गंगावतरणं कथं तेषां जलक्रिया।

तारयेयं कथं चैतानिति चिन्तापरोऽभवत्॥६॥

वे सदा इसी चिन्ता में डूबे रहते थे कि किस प्रकार पृथ्वी पर गंगाजी का उतरना सम्भव होगा? कैसे गंगाजल द्वारा उन्हें जलाञ्जलि दी जायेगी और किस प्रकार मैं अपने उन पितरों का उद्धार कर सकूँगा॥

तस्य चिन्तयतो नित्यं धर्मेण विदितात्मनः।

पुत्रो भगीरथो नाम जज्ञे परमधार्मिकः॥७॥

प्रतिदिन इन्हीं सब चिन्ताओं में पड़े हुए राजा दिलीप को, जो अपने धर्माचरण से बहुत विख्यात थे, भगीरथ नामक एक परम धर्मात्मा पुत्र प्राप्त हुआ। ७॥

दिलीपस्तु महातेजा यज्ञैर्बहुभिरिष्टवान्।

त्रिंशद्वर्षसहस्राणि राजा राज्यमकारयत्॥८॥

महातेजस्वी दिलीप ने बहुत-से यज्ञों का अनुष्ठान तथा तीस हजार वर्षां तक राज्य किया॥८॥

अगत्वा निश्चयं राजा तेषामुद्धरणं प्रति।

व्याधिना नरशार्दूल कालधर्ममुपेयिवान्॥९॥

पुरुषसिंह! उन पितरों के उद्धार के विषय में किसी निश्चय को न पहुँचकर राजा दिलीप रोग से पीड़ित हो मृत्युको प्राप्त हो गये॥९॥

इन्द्रलोकं गतो राजा स्वार्जितेनैव कर्मणा।

राज्ये भगीरथं पुत्रमभिषिच्य नरर्षभः॥१०॥

पुत्र भगीरथ को राज्यपर अभिषिक्त करके नरश्रेष्ठ राजा दिलीप अपने किये हुए पुण्यकर्म के प्रभाव से इन्द्रलोक में गये॥ १०॥

भगीरथस्तु राजर्षिर्धार्मिको रघुनन्दन।

अनपत्यो महाराजः प्रजाकामः स च प्रजाः॥११॥

मन्त्रिष्वाधाय तद् राज्यं गंगावतरणे रतः।

तपो दीर्घ समातिष्ठद् गोकर्णे रघुनन्दन॥१२॥

रघुनन्दन! धर्मात्मा राजर्षि महाराज भगीरथ के कोई संतान नहीं थी। वे संतान-प्राप्ति की इच्छा रखते थे तो भी प्रजा और राज्य की रक्षा का भार मन्त्रियों पर रखकर गंगाजी को पृथ्वी पर उतारनेके प्रयत्न में लग गये और गोकर्ण तीर्थ में बड़ी भारी तपस्या करने लगे। ११-१२॥

ऊर्ध्वबाहुः पञ्चतपा मासाहारो जितेन्द्रियः।

तस्य वर्षसहस्राणि घोरे तपसि तिष्ठतः॥१३॥

अतीतानि महाबाहो तस्य राज्ञो महात्मनः।

महाबाहो! वे अपनी दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर पञ्चाग्निका सेवन करते और इन्द्रियों को काबू में रखकर एक-एक महीने पर आहार ग्रहण करते थे। इस प्रकार घोर तपस्या में लगे हुए महात्मा राजा भगीरथ के एक हजार वर्ष व्यतीत हो गये॥ १३ १/२ ॥

सुप्रीतो भगवान् ब्रह्मा प्रजानां प्रभुरीश्वरः॥ १४॥

ततः सुरगणैः सार्धमुपागम्य पितामहः।

भगीरथं महात्मानं तप्यमानमथाब्रवीत्॥१५॥

इससे प्रजाओं के स्वामी भगवान् ब्रह्मा जी उनपर बहुत प्रसन्न हुए। पितामह ब्रह्मा ने देवताओं के साथ वहाँ आकर तपस्या में लगे हुए महात्मा भगीरथ से इस प्रकार कहा— ॥१४-१५ ॥

भगीरथ महाराज प्रीतस्तेऽहं जनाधिप।

तपसा च सुतप्तेन वरं वरय सुव्रत॥१६॥

‘महाराज भगीरथ! तुम्हारी इस उत्तम तपस्या से मैं बहुत प्रसन्न हूँ। श्रेष्ठ व्रत का पालन करनेवाले नरेश्वर ! तुम कोई वर माँगो’ ॥ १६॥

तमुवाच महातेजाः सर्वलोकपितामहम्।

भगीरथो महाबाहुः कृताञ्जलिपुटः स्थितः॥ १७॥

तब महातेजस्वी महाबाहु भगीरथ हाथ जोड़कर उनके सामने खड़े हो गये और उन सर्वलोकपितामह रह्मासे इस प्रकार बोले- ॥१७॥

यदि मे भगवान् प्रीतो यद्यस्ति तपसःफलम्।

सगरस्यात्मजाः सर्वे मत्तः सलिलमाप्नुयुः॥१८॥

‘भगवन्! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं और यदि इस तपस्या का कोई उत्तम फल है तो सगर के सभी पुत्रों को मेरे हाथ से गंगाजी का जल प्राप्त हो॥१८॥

गंगायाः सलिलक्लिन्ने भस्मन्येषां महात्मनाम्।

स्वर्गं गच्छेयुरत्यन्तं सर्वे च प्रपितामहाः॥१९॥

‘इन महात्माओं की भस्मराशि के गंगाजीके जल से भीग जाने पर मेरे उन सभी प्रपितामहों को अक्षय स्वर्ग लोक मिले॥१९॥

देव याचे ह संतत्यै नावसीदेत् कुलं च नः।

इक्ष्वाकूणां कुले देव एष मेऽस्तु वरः परः॥ २०॥

‘देव! मैं संतति के लिये भी आपसे प्रार्थना करता हूँ। हमारे कुल की परम्परा कभी नष्ट न हो। भगवन् ! मेरे द्वारा माँगा हुआ उत्तम वर सम्पूर्ण इक्ष्वाकुवंश के लिये लागू होना चाहिये’ ॥ २० ॥

उक्तवाक्यं तु राजानं सर्वलोकपितामहः।

प्रत्युवाच शुभां वाणी मधुरां मधुराक्षराम्॥२१॥

राजा भगीरथ के ऐसा कहनेपर सर्वलोकपितामह ब्रह्माजी ने मधुर अक्षरों वाली परम कल्याणमयी मीठी वाणी में कहा- ॥ २१॥

मनोरथो महानेष भगीरथ महारथ।

एवं भवतु भद्रं ते इक्ष्वाकुकुलवर्धन॥ २२॥

‘इक्ष्वाकुवंशकी वृद्धि करनेवाले महारथी भगीरथ! तुम्हारा कल्याण हो तुम्हारा यह महान् मनोरथ इसी रूप में पूर्ण हो ॥ २२॥

इयं हैमवती ज्येष्ठा गंगा हिमवतः सुता।

तां वै धारयितुं राजन् हरस्तत्र नियुज्यताम्॥ २३॥

‘राजन्! ये हैं हिमालय की ज्येष्ठ पुत्री हैमवती गंगाजी इनको धारण करने के लिये भगवान् शङ्कर को तैयार करो॥ २३॥

गंगायाः पतनं राजन् पृथिवी न सहिष्यते।

तां वै धारयितुं राजन् नान्यं पश्यामि शूलिनः॥ २४॥

‘महाराज! गंगाजी के गिरने का वेग यह पृथ्वी नहीं सह सकेगी। मैं त्रिशूलधारी भगवान् शङ्कर के सिवा और किसी को ऐसा नहीं देखता, जो इन्हें धारण कर सके’ ॥ २४॥

तमेवमुक्त्वा राजानं गंगां चाभाष्य लोककृत्।

जगाम त्रिदिवं देवैः सर्वैः सह मरुद्गणैः॥२५॥

राजा से ऐसा कहकर लोकस्रष्टा ब्रह्माजी ने भगवती गंगा से भी भगीरथ पर अनुग्रह करने के लिये कहा। इसके बाद वे सम्पूर्ण देवताओं तथा मरुद्गणों के साथ स्वर्गलोक को चले गये॥ २५ ॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे द्विचत्वारिंशः सर्गः॥४२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में बयालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।४२॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(भगीरथ की तपस्या, भगवान् शङ्कर का गंगा को अपने सिर पर धारण करना, भगीरथ के पितरों का उद्धार)

त्रिचत्वारिंशः सर्गः 

सर्ग-43

देवदेवे गते तस्मिन् सोऽङ्गुष्ठाग्रनिपीडिताम्।

कृत्वा वसुमतीं राम वत्सरं समुपासत॥१॥

श्रीराम! देवाधिदेव ब्रह्माजी के चले जाने पर राजा भगीरथ पृथ्वी पर केवल अँगूठे के अग्रभाग को टिकाये हुए खड़े हो एक वर्ष तक भगवान् शङ्कर की उपासना में लगे रहे॥१॥

अथ संवत्सरे पूर्णे सर्वलोकनमस्कृतः।

उमापतिः पशुपती राजानमिदमब्रवीत्॥२॥

वर्ष पूरा होने पर सर्वलोकवन्दित उमावल्लभ भगवान् पशुपति ने प्रकट होकर राजा से इस प्रकार कहा— ॥२॥

प्रीतस्तेऽहं नरश्रेष्ठ करिष्यामि तव प्रियम्।

शिरसा धारयिष्यामि शैलराजसुतामहम्॥३॥

‘नरश्रेष्ठ! मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हारा प्रिय कार्य अवश्य करूँगा। मैं गिरिराजकुमारी गंगा देवी को अपने मस्तक पर धारण करूँगा’ ॥ ३॥

ततो हैमवती ज्येष्ठा सर्वलोकनमस्कृता।

तदा सातिमहद्रूपं कृत्वा वेगं च दुःसहम्॥४॥

आकाशादपतद् राम शिवे शिवशिरस्युत।

श्रीराम! शङ्करजी की स्वीकृति मिल जाने पर हिमालय की ज्येष्ठ पुत्री गंगाजी, जिनके चरणों में सारा संसार मस्तक झुकाता है, बहुत बड़ा रूप धारण करके अपने वेग को दुस्सह बनाकर आकाश से भगवान् शङ्कर के शोभायमान मस्तक पर गिरीं ॥ ४ १/२॥

अचिन्तयच्च सा देवी गंगा परमदुर्धरा॥५॥

विशाम्यहं हि पातालं स्रोतसा गृह्य शङ्करम्।

उस समय परम दुर्धर गंगादेवी ने यह सोचा था कि मैं अपने प्रखर प्रवाह के साथ शङ्करजी को लिये-दिये पाताल में घुस जाऊँगी॥ ५ १/२॥

तस्यावलेपनं ज्ञात्वा क्रुद्धस्तु भगवान् हरः॥६॥

तिरोभावयितुं बुद्धिं चक्रे त्रिनयनस्तदा।

उनके इस अहंकार को जानकर त्रिनेत्रधारी भगवान् हर कुपित हो उठे और उन्होंने उस समय गंगा को अदृश्य कर देने का विचार किया॥ ६ १/२ ।।

सा तस्मिन् पतिता पुण्या पुण्ये रुद्रस्य मूर्धनि॥ ७॥

हिमवत्प्रतिमे राम जटामण्डलगह्वरे।

सा कथंचिन्महीं गन्तुं नाशक्नोद् यत्नमास्थिता॥ ८॥

पुण्यस्वरूपा गंगा भगवान् रुद्र के पवित्र मस्तक पर गिरीं। उनका वह मस्तक जटामण्डलरूपी गुफा से सुशोभित हिमालय के समान जान पड़ता था। उसपर गिरकर विशेष प्रयत्न करने पर भी किसी तरह वे पृथ्वी पर न जा सकीं॥ ७-८॥

नैव सा निर्गमं लेभे जटामण्डलमन्ततः।

तत्रैवाबभ्रमद् देवी संवत्सरगणान् बहून्॥९॥

भगवान् शिव के जटा-जाल में उलझकर किनारे आकर भी गंगादेवी वहाँ से निकलने का मार्ग न पा सकीं और बहुत वर्षों तक उस जटाजूट में ही भटकती रहीं॥९॥

तामपश्यत् पुनस्तत्र तपः परममास्थितः।

स तेन तोषितश्चासीदत्यन्तं रघुनन्दन॥१०॥

रघुनन्दन! भगीरथ ने देखा, गंगा जी भगवान् शङ्कर के जटामण्डल में अदृश्य हो गयी हैं; तब वे पुनः वहाँ भारी तपस्या में लग गये। उस तपस्या द्वारा उन्होंने भगवान् शिव को बहुत संतुष्ट कर लिया। १०॥

विससर्ज ततो गंगां हरो बिन्दुसरः प्रति।

तस्यां विसृज्यमानायां सप्त स्रोतांसि जज्ञिरे॥ ११॥

तब महादेवजी ने गंगाजी को बिन्दुसरोवर में ले जाकर छोड़ दिय, वहाँ छूटते ही उनकी सात धाराएँ हो गयीं॥११॥

हलादिनी पावनी चैव नलिनी च तथैव च।

तिस्रः प्राची दिशं जग्मुर्गङ्गाः शिवजलाः शुभाः॥ १२॥

ह्लादिनी, पावनी और नलिनी—ये कल्याणमय जल से सुशोभित गंगा की तीन मंगलमयी धाराएँ पूर्व दिशा की ओर चली गयीं॥ १२ ॥

सुचक्षुश्चैव सीता च सिन्धुश्चैव महानदी।

तिस्रश्चैता दिशं जग्मुः प्रतीची तु दिशं शुभाः॥ १३॥

सुचक्षु, सीता और महानदी सिन्धु–ये तीन शुभ धाराएँ पश्चिम दिशा की ओर प्रवाहित हुईं। १३॥

सप्तमी चान्वगात् तासां भगीरथरथं तदा।

भगीरथोऽपि राजर्षिर्दिव्यं स्यन्दनमास्थितः॥ १४॥

प्रायादग्रे महातेजा गंगा तं चाप्यनुव्रजत्।

गगनाच्छंकरशिरस्ततो धरणिमागता॥१५॥

उनकी अपेक्षा जो सातवीं धारा थी, वह महाराज भगीरथ के रथ के पीछे-पीछे चलने लगी। महातेजस्वी राजर्षि भगीरथ भी दिव्य रथपर आरूढ़ हो आगे-आगे चले और गंगा उन्हीं के पथ का अनुसरण करने लगीं। इस प्रकार वे आकाश से भगवान् शङ्कर के मस्तक पर और वहाँ से इस पृथ्वी पर आयी थीं॥ १४-१५ ॥

असर्पत जलं तत्र तीव्रशब्दपुरस्कृतम्।

मत्स्यकच्छपसङ्घश्च शिंशुमारगणैस्तथा॥१६॥

पतद्भिः पतितैश्चैव व्यरोचत वसुंधरा।

गंगाजी की वह जलराशि महान् कलकल नाद के साथ तीव्र गति से प्रवाहित हुई। मत्स्य, कच्छप औरशिंशुमार (सूंस) झुंड-के-झुंड उसमें गिरने लगे। उन गिरे हुए जलजन्तुओं से वसुन्धरा की बड़ी शोभा हो रही थी॥ १६ १/२॥

ततो देवर्षिगन्धर्वा यक्षसिद्धगणास्तथा॥१७॥

व्यलोकयन्त ते तत्र गगनाद् गां गतां तदा।

विमानैर्नगराकारैर्हयैर्गजवरैस्तदा ॥१८॥

तदनन्तर देवता, ऋषि, गन्धर्व, यक्ष और सिद्धगण नगर के समान आकार वाले विमानों, घोड़ों तथा गजराजों पर बैठकर आकाश से पृथ्वी पर गयी हुई गंगाजी की शोभा निहारने लगे॥१७-१८॥

पारिप्लवगताश्चापि देवतास्तत्र विष्ठिताः।

तदद्भुतमिमं लोके गंगावतरमुत्तमम्॥१९॥

दिदृक्षवो देवगणाः समीयुरमितौजसः।

देवता लोग आश्चर्यचकित होकर वहाँ खड़े थे। जगत् में गंगावतरण के इस अद्भुत एवं उत्तम दृश्य को देखने की इच्छा से अमित तेजस्वी देवताओं का समूह वहाँ जुटा हुआ था। १९ १/२॥

सम्पतद्भिः सुरगणैस्तेषां चाभरणौजसा॥२०॥

शतादित्यमिवाभाति गगनं गततोयदम्।

तीव्र गति से आते हुए देवताओं तथा उनके दिव्य आभूषणों के प्रकाश से वहाँ का मेघरहित निर्मल आकाश इस तरह प्रकाशित हो रहा था, मानो उसमें सैकड़ों सूर्य उदित हो गये हों॥ २० १/२॥

शिंशुमारोरगगणैर्मीनैरपि च चञ्चलैः ॥२१॥

विद्युद्भिरिव विक्षिप्तैराकाशमभवत् तदा।

शिंशुमार, सर्प तथा चञ्चल मत्स्यसमूहों के उछलने से गंगाजी के जल से ऊपर का आकाश ऐसा जान पड़ता था, मानो वहाँ चञ्चल चपलाओं का प्रकाश सब ओर व्याप्त हो रहा हो। २१ १/२॥

पाण्डुरैः सलिलोत्पीडैः कीर्यमाणैः सहस्रधा॥ २२॥

शारदाभ्रेरिवाकीर्णं गगनं हंससम्प्लवैः।

वायु आदि से सहस्रों टुकड़ों में बँटे हुए फेन आकाश में सब ओर फैल रहे थे मानो शरद् ऋतु के श्वेत बादल अथवा हंस उड़ रहे हों॥ २२ १/२ ॥

क्वचिद् द्रुततरं याति कुटिलं क्वचिदायतम्॥ २३॥

विनतं क्वचिदुद्भूतं क्वचिद् याति शनैः शनैः ।

सलिलेनैव सलिलं क्वचिदभ्याहतं पुनः॥ २४॥

गंगा जी की वह धारा कहीं तेज, कहीं टेढ़ी और कहीं चौड़ी होकर बहती थी। कहीं बिलकुल नीचे की ओर गिरती और कहीं ऊँचे की ओर उठी हुई थी। कहीं समतल भूमिपर वह धीरे-धीरे बहती थी और कहीं-कहीं अपने ही जल से उसके जल में बारम्बार टक्करें लगती रहती थीं। २३-२४॥

मुहुरूर्ध्वपथं गत्वा पपात वसुधां पुनः।

तच्छंकरशिरोभ्रष्टं भ्रष्टं भूमितले पुनः॥२५॥

व्यरोचत तदा तोयं निर्मलं गतकल्मषम्।

गंगा का वह जल बार-बार ऊँचे मार्गपर उठता और पुनः नीची भूमि पर गिरता था। आकाश से भगवान्शङ्कर के मस्तक पर तथा वहाँ से फिर पृथ्वी पर गिरा हुआ वह निर्मल एवं पवित्र गंगाजल उस समय बड़ी शोभा पा रहा था॥

तत्रर्षिगणगन्धर्वा वसुधातलवासिनः॥२६॥

भवांगपतितं तोयं पवित्रमिति पस्पृशुः।

उस समय भूतलनिवासी ऋषि और गन्धर्व यह सोचकर कि भगवान् शङ्कर के मस्तक से गिरा हुआ यह जल बहुत पवित्र है, उसमें आचमन करने लगे। २६ १/२॥

शापात् प्रपतिता ये च गगनाद् वसुधातलम्॥ २७॥

कृत्वा तत्राभिषेकं ते बभूवुर्गतकल्मषाः।

धूतपापाः पुनस्तेन तोयेनाथ शुभान्विताः॥२८॥

पुनराकाशमाविश्य स्वाँल्लोकान् प्रतिपेदिरे।

जो शापभ्रष्ट होकर आकाश से पृथ्वीपर आ गये थे, वे गंगा के जल में स्नान करके निष्पाप हो गये तथा उस जल से पाप धुल जाने के कारण पुनः शुभ पुण्य से संयुक्त हो आकाश में पहुँचकर अपने लोकों को पा गये॥

मुमुदे मुदितो लोकस्तेन तोयेन भास्वता॥२९॥

कृताभिषेको गंगायां बभूव गतकल्मषः।

उस प्रकाशमान जल के सम्पर्क से आनन्दित हुए सम्पूर्ण जगत् को सदा के लिये बड़ी प्रसन्नता हुई। सब लोग गंगा में स्नान करके पापहीन हो गये॥ २९ १/२॥

भगीरथो हि राजर्षिदिव्यं स्यन्दनमास्थितः॥ ३०॥

प्रायादग्रे महाराजस्तं गंगा पृष्ठतोऽन्वगात्।

(हम पहले बता आये हैं कि) राजर्षि महाराज भगीरथ दिव्य रथपर आरूढ़ हो आगे-आगे चल रहे थे और गंगाजी उनके पीछे-पीछे जा रही थीं॥ ३० १/२॥

देवाः सर्षिगणाः सर्वे दैत्यदानवराक्षसाः॥३१॥

गन्धर्वयक्षप्रवराः सकिंनरमहोरगाः।

सर्पाश्चाप्सरसो राम भगीरथरथानुगाः॥३२॥

गंगामन्वगमन् प्रीताः सर्वे जलचराश्च ये।

श्रीराम! उस समय समस्त देवता, ऋषि, दैत्य, दानव, राक्षस, गन्धर्व, यक्षप्रवर, किन्नर, बड़े-बड़े नाग, सर्प तथा अप्सरा—ये सब लोग बड़ी प्रसन्नताके साथ राजा भगीरथ के रथ के पीछे गंगाजी के साथ-साथ चल रहे थे। सब प्रकार के जलजन्तु भी गंगाजी की उस जलराशि के साथ सानन्द जा रहे थे॥ ३१-३२ १/२॥

यतो भगीरथो राजा ततो गंगा यशस्विनी॥३३॥

जगाम सरितां श्रेष्ठा सर्वपापप्रणाशिनी।

जिस ओर राजा भगीरथ जाते, उसी ओर समस्त पापों का नाश करनेवाली सरिताओंमें श्रेष्ठ यशस्विनी गंगा भी जाती थीं॥ ३३ १/२ ॥

ततो हि यजमानस्य जोरद्भुतकर्मणः॥ ३४॥

गंगा सम्प्लावयामास यज्ञवाटं महात्मनः।

उस समय मार्ग में अद्भुत पराक्रमी महामना राजा जह्नु यज्ञ कर रहे थे, गंगा जी अपने जल-प्रवाह से उनके यज्ञमण्डप को बहा ले गयीं॥ ३४ १/२॥

तस्यावलेपनं ज्ञात्वा क्रुद्धो जनुश्च राघव॥ ३५॥

अपिबत् तु जलं सर्वं गंगायाः परमाद्भुतम्।

रघुनन्दन ! राजा जगु इसे गंगाजी का गर्व समझकर कुपित हो उठे; फिर तो उन्होंने गंगाजी के उस समस्त जलको पी लिया। यह संसार के लिये बड़ी अद्भुत बात हुई॥ ३५ १/२॥

ततो देवाः सगन्धर्वा ऋषयश्च सुविस्मिताः॥

पूजयन्ति महात्मानं जलुं पुरुषसत्तमम्।

तब देवता, गन्धर्व तथा ऋषि अत्यन्त विस्मित होकर पुरुषप्रवर महात्मा जलु की स्तुति करने लगे। ३६ १/२॥

गंगां चापि नयन्ति स्म दुहितृत्वे महात्मनः॥ ३७॥

ततस्तुष्टो महातेजाः श्रोत्राभ्यामसृजत् प्रभुः।

तस्माज्जनुसुता गंगा प्रोच्यते जाह्नवीति च॥ ३८॥

उन्होंने गंगाजी को उन महात्मा नरेश की कन्या बना दिया। (अर्थात् उन्हें यह विश्वास दिलाया कि गंगाजी को प्रकट करके आप इनके पिता कहलायेंगे।) इससे सामर्थ्यशाली महातेजस्वी जलु बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने अपने कानों के छिद्रोंद् वारा गंगाजी को पुनः प्रकट कर दिया, इसलिये गंगा जलु की पुत्री एवं जाह्नवी कहलाती हैं। ३७-३८॥

जगाम च पुनर्गङ्गा भगीरथरथानुगा।

सागरं चापि सम्प्राप्ता सा सरित्प्रवरा तदा ॥ ३९॥

रसातलमुपागच्छत् सिद्धयर्थं तस्य कर्मणः।

वहाँ से गंगा फिर भगीरथ के रथका अनुसरण करती हुई चलीं,उस समय सरिताओं में श्रेष्ठ जाह्नवी समुद्र तक जा पहुँची और राजा भगीरथ के पितरों के उद्धाररूपी कार्यकी सिद्धि के लिये रसातल में गयीं॥ ३९ १/२॥

भगीरथोऽपि राजर्षिर्गङ्गामादाय यत्नतः॥४०॥

पितामहान् भस्मकृतानपश्यद् गतचेतनः।

राजर्षि भगीरथ भी यत्नपूर्वक गंगाजीको साथ ले वहाँ गये। उन्होंने शापसे भस्म हए अपने पितामहोंको अचेत-सा होकर देखा॥ ४० १/२ ॥

अथ तद्भस्मनां राशिं गंगासलिलमुत्तमम्।

प्लावयत् पूतपाप्मानः स्वर्गं प्राप्ता रघूत्तम॥ ४१॥

रघुकुल के श्रेष्ठ वीर! तदनन्तर गंगा के उस उत्तम जल ने सगर-पुत्रों की उस भस्मराशि को आप्लावित कर दिया और वे सभी राजकुमार निष्पाप होकर स्वर्ग में पहुँच गये॥ ४१॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे त्रिचत्वारिंशः सर्गः॥४३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में तैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।४३॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(ब्रह्माजी का भगीरथ को पितरों के तर्पण की आज्ञा देना, गंगावतरण के उपाख्यान की महिमा)

चतुश्चत्वारिंशः सर्गः 

सर्ग-44

स गत्वा सागरं राजा गंगयानुगतस्तदा।

प्रविवेश तलं भूमेर्यत्र ते भस्मसात्कृताः॥१॥

भस्मन्यथाप्लुते राम गंगायाः सलिलेन वै।

सर्वलोकप्रभुर्ब्रह्मा राजानमिदमब्रवीत्॥२॥

श्रीराम! इस प्रकार गंगाजी को साथ लिये राजा भगीरथ ने समुद्र तक जाकर रसातल में, जहाँ उनके पूर्वज भस्म हुए थे, प्रवेश किया वह भस्मराशि जब गंगाजी के जलसे आप्लावित हो गयी, तब सम्पूर्ण लोकों के स्वामी भगवान् ब्रह्मा ने वहाँ पधार कर राजा से इस प्रकार कहा- ॥ १-२॥

तारिता नरशार्दूल दिवं याताश्च देववत्। ।

षष्टिः पुत्रसहस्राणि सगरस्य महात्मनः॥३॥

‘नरश्रेष्ठ! महात्मा राजा सगर के साठ हजार पुत्रों का तुमने उद्धार कर दिया। अब वे देवताओं की भाँति स्वर्गलोक में जा पहुँचे॥३॥

सागरस्य जलं लोके यावत्स्थास्यति पार्थिव।

सगरस्यात्मजाः सर्वे दिवि स्थास्यन्ति देववत्॥ ४॥

‘भूपाल! इस संसा रमें जब तक सागर का जल मौजूद रहेगा; तब तक सगर के सभी पुत्र देवताओं की भाँति स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित रहेंगे॥४॥

इयं च दुहिता ज्येष्ठा तव गंगा भविष्यति।

त्वत्कृतेन च नाम्नाथ लोके स्थास्यति विश्रुता॥

‘ये गंगा तुम्हारी भी ज्येष्ठ पुत्री होकर रहेंगी और तुम्हारे नाम पर रखे हुए भागीरथी नाम से इस जगत् में विख्यात होंगी॥५॥

गंगा त्रिपथगा नाम दिव्या भागीरथीति च।

त्रीन् पथो भावयन्तीति तस्मात् त्रिपथगा स्मृता॥ ६॥

‘त्रिपथगा, दिव्या और भागीरथी—इन तीनों नामों से गंगाकी प्रसिद्धि होगी। ये आकाश, पृथ्वी और गंगा को यहाँ लाने की इच्छा की; परंतु वे इस पृथ्वी पर उन्हें लाने की प्रतिज्ञा पूरी न कर सके॥९-१० ॥

दिलीपेन महाभाग तव पित्रातितेजसा।

पुनर्न शकिता नेतुं गंगां प्रार्थयतानघ॥११॥

‘निष्पाप महाभाग! तुम्हारे अत्यन्त तेजस्वी पिता दिलीप भी गंगाको यहाँ लानेकी इच्छा करके भी इस कार्यमें सफल न हो सके॥११॥

सा त्वया समतिक्रान्ता प्रतिज्ञा पुरुषर्षभ।

प्राप्तोऽसि परमं लोके यशः परमसम्मतम्॥१२॥

‘पुरुषप्रवर! तुमने गंगा को भूतलपर लाने की वह प्रतिज्ञा पूर्ण कर ली इससे संसार में तुम्हें परम उत्तम एवं महान् यश की प्राप्ति हुई है॥ १२ ॥

तच्च गंगावतरणं त्वया कृतमरिंदम।

अनेन च भवान् प्राप्तो धर्मस्यायतनं महत्॥ १३॥

शत्रुदमन! तुमने जो गंगाजी को पृथ्वी पर उतारने का कार्य पूरा किया है, इससे उस महान् ब्रह्मलोक पर अधिकार प्राप्त कर लिया है, जो धर्म का आश्रय है।

प्लावयस्व त्वमात्मानं नरोत्तम सदोचिते।

सलिले पुरुषश्रेष्ठ शुचिः पुण्यफलो भव॥१४॥

‘नरश्रेष्ठ! पुरुषप्रवर! गंगा जी का जल सदा ही स्नान के योग्य है तुम स्वयं भी इसमें स्नान करो और पवित्र होकर पुण्य का फल प्राप्त करो॥१४॥

पितामहानां सर्वेषां कुरुष्व सलिलक्रियाम्।

स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि स्वं लोकं गम्यतां नृप॥ १५॥

‘नरेश्वर ! तुम अपने सभी पितामहों का तर्पण करो तुम्हारा कल्याण हो अब मैं अपने लोक को जाऊँगा तुम भी अपनी राजधानीको लौट जाओ’ ॥ १५ ॥

इत्येवमुक्त्वा देवेशः सर्वलोकपितामहः।

यथागतं तथागच्छद देवलोकं महायशाः॥१६॥

ऐसा कहकर सर्वलोकपितामह महायशस्वी देवेश्वर ब्रह्माजी जैसे आये थे, वैसे ही देवलोक को लौट गये॥१६॥

भगीरथस्तु राजर्षिः कृत्वा सलिलमुत्तमम्।

यथाक्रमं यथान्यायं सागराणां महायशाः॥१७॥

कृतोदकः शुची राजा स्वरं प्रविवेश ह।

समृद्धार्थो नरश्रेष्ठ स्वराज्यं प्रशशास ह॥१८॥

नरश्रेष्ठ! महायशस्वी राजर्षि राजा भगीरथ भी गंगाजीके उत्तम जल से क्रमशः सभी सगर-पुत्रों का विधिवत् तर्पण करके पवित्र हो अपने नग रको चले गये। इस प्रकार सफल मनोरथ होकर वे अपने राज्य का शासन करने लगे॥ १७-१८॥

प्रमुमोद च लोकस्तं नृपमासाद्य राघव।

नष्टशोकः समृद्धार्थो बभूव विगतज्वरः॥१९॥

रघुनन्दन! अपने राजाको पुनः सामने पाकर प्रजावर्गको बड़ी प्रसन्नता हुई। सबका शोक जाता रहा। सबके मनोरथ पूर्ण हुए और चिन्ता दूर हो गयी॥ १९॥

एष ते राम गंगाया विस्तरोऽभिहितो मया।

स्वस्ति प्राप्नुहि भद्रं ते संध्याकालोऽतिवर्तते॥२०॥

श्रीराम! यह गंगाजी की कथा मैंने तुम्हें विस्तार के साथ कह सुनायी तुम्हारा कल्याण हो अब जाओ, मंगलमय संध्यावन्दन आदिका सम्पादन करो। देखो, संध्याकाल बीता जा रहा है॥ २० ॥

धन्यं यशस्यमायुष्यं पत्र्यं स्वर्ग्यमथापि च।

यः श्रावयति विप्रेषु क्षत्रियेष्वितरेषु च ॥ २१॥

प्रीयन्ते पितरस्तस्य प्रीयन्ते दैवतानि च।

इदमाख्यानमायुष्यं गंगावतरणं शुभम्॥२२॥

यह गंगावतरण का मंगलमय उपाख्यान आयु बढ़ाने वाला है। धन, यश, आयु, पुत्र और स्वर्ग की प्राप्ति कराने वाला है। जो ब्राह्मणों, क्षत्रियों तथा दूसरे वर्ण के लोगों को भी यह कथा सुनाता है, उसके ऊपर देवता और पितर प्रसन्न होते हैं । २१-२२॥

यः शृणोति च काकुत्स्थ सर्वान् कामानवाप्नुयात्। 

सर्वे पापाः प्रणश्यन्ति आयुः कीर्तिश्च वर्धते॥ २३॥

ककुत्स्थकुलभूषण! जो इसका श्रवण करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओं को प्राप्त कर लेता है उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और आयु की वृद्धि एवं कीर्ति का विस्तार होता है॥ २३॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे चतुश्चत्वारिंशः सर्गः॥४४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में चौवालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।४४॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(देवताओं और दैत्यों द्वारा क्षीर-समुद्र मन्थन, भगवान् रुद्र द्वारा हालाहल विषकापान,देवासुर-संग्राम में दैत्यों का संहार)

पञ्चचत्वारिंशः सर्गः 

सर्ग-45

विश्वामित्रवचः श्रुत्वा राघवः सहलक्ष्मणः।

विस्मयं परमं गत्वा विश्वामित्रमथाब्रवीत्॥१॥

विश्वामित्रजी की बातें सुनकर लक्ष्मण सहित श्रीरामचन्द्रजी को बड़ा विस्मय हुआ वे मुनि से इस प्रकार बोले- ॥१॥

अत्यद्भुतमिदं ब्रह्मन् कथितं परमं त्वया।

गंगावतरणं पुण्यं सागरस्यापि पूरणम्॥२॥

‘ब्रह्मन्! आपने गंगाजी के स्वर्ग से उतरने और समुद्र के भरने की यह बड़ी उत्तम और अत्यन्त अद्भुत कथा सुनायी॥२॥

क्षणभूतेव नौरात्रिः संवृत्तेयं परंतप।

इमां चिन्तयतोः सर्वां निखिलेन कथां तव॥३॥

‘काम-क्रोधादि शत्रुओं को संताप देने वाले महर्षे! आपकी कही हुई इस सम्पूर्ण कथा पर पूर्ण रूप से विचार करते हुए हम दोनों भाइयों की यह रात्रि एक क्षण के समान बीत गयी है॥३॥

तस्य सा शर्वरी सर्वा मम सौमित्रिणा सह।

जगाम चिन्तयानस्य विश्वामित्र कथां शुभाम्॥ ४॥

‘विश्वामित्र जी! लक्ष्मण के साथ इस शुभ कथा पर विचार करते हुए ही मेरी यह सारी रात बीती है’। ४॥

ततः प्रभाते विमले विश्वामित्रं तपोधनम्।

उवाच राघवो वाक्यं कृताह्निकमरिंदमः॥५॥

तत्पश्चात् निर्मल प्रभातकाल उपस्थित होने पर तपोधन विश्वामित्र जी जब नित्य कर्म से निवृत्त हो चुके, तब शत्रुदमन श्रीरामचन्द्रजी ने उनके पास जाकर कहा- ॥५॥

गता भगवती रात्रिः श्रोतव्यं परमं श्रुतम्।

तराम सरितां श्रेष्ठां पुण्यां त्रिपथगां नदीम्॥६॥

‘मुने! यह पूजनीया रात्रि चली गयी सुनने योग्य सर्वोत्तम कथा मैंने सुन ली,अब हम लोग सरिताओं में श्रेष्ठ पुण्यसलिला त्रिपथगामिनी नदी गंगाजी के उस पार चलें॥६॥

नौरेषा हि सुखास्तीर्णा ऋषीणां पुण्यकर्मणाम्।

भगवन्तमिह प्राप्तं ज्ञात्वा त्वरितमागता॥७॥

‘सदा पुण्यकर्म में तत्पर रहने वाले ऋषियों की यह नाव उपस्थित है। इस पर सुखद आसन बिछा है। आप परमपूज्य महर्षि को यहाँ उपस्थित जानकर ऋषियों की भेजी हुई यह नाव बड़ी तीव्र गति से यहाँ आयी है’ ॥ ७॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राघवस्य महात्मनः।

संतारं कारयामास सर्षिसङ्घस्य कौशिकः॥८॥

महात्मा रघुनन्दन का यह वचन सुनकर विश्वामित्र जी ने पहले ऋषियों सहित श्रीराम-लक्ष्मण को पार कराया॥ ८॥

उत्तरं तीरमासाद्य सम्पूज्यर्षिगणं ततः।

गंगाकूले निविष्टास्ते विशालां ददृशुः पुरीम्॥९॥

तत्पश्चात् स्वयं भी उत्तर तट पर पहुँचकर उन्होंने वहाँ रहने वाले ऋषियों का सत्कार किया। फिर सब लोग गंगाजी के किनारे ठहरकर विशाला नामक पुरी की शोभा देखने लगे॥९॥

ततो मुनिवरस्तूर्णं जगाम सहराघवः।

विशाला नगरी रम्यां दिव्यां स्वर्गोपमां तदा॥ १०॥

तदनन्तर श्रीराम-लक्ष्मण को साथ ले मुनिवर विश्वामित्र तुरंत उस दिव्य एवं रमणीय नगरी विशालाकी ओर चल दिये, जो अपनी सुन्दर शोभा से स्वर्ग के समान जान पड़ती थी॥ १०॥

उस समय परम बुद्धिमान् श्रीराम ने हाथ जोड़कर उस उत्तम विशाला पुरी के विषय में महामुनि विश्वामित्र से पूछा- ॥११॥

कतमो राजवंशोऽयं विशालायां महामुने।

श्रोतुमिच्छामि भद्रं ते परं कौतूहलं हि मे ॥१२॥

‘महामुने! आपका कल्याण हो मैं यह सुनना चाहता हूँ कि विशाला में कौन-सा राजवंश राज्य कर रहा है ? इसके लिये मुझे बड़ी उत्कण्ठा है’ ॥ १२॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा रामस्य मुनिपुंगवः।

आख्यातुं तत्समारेभे विशालायाः पुरातनम्॥ १३॥

श्रीराम का यह वचन सुनकर मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र ने विशाला पुरी के प्राचीन इतिहासका वर्णन आरम्भ किया— ॥ १३॥

श्रूयतां राम शक्रस्य कथां कथयतः श्रुताम्।

अस्मिन् देशे हि यद् वृत्तं शृणु तत्त्वेन राघव॥ १४॥

“रघुकुलनन्दन श्रीराम! मैंने इन्द्र के मुखसे विशाला-पुरी के वैभव का प्रतिपादन करने वाली जो कथा सुनी है, उसे बता रहा हूँ, सुनो। इस देश में जो वृत्तान्त घटित हुआ है, उसे यथार्थ रूप से श्रवण करो॥ १४॥

पूर्वं कृतयुगे राम दितेः पुत्रा महाबलाः।

अदितेश्च महाभागा वीर्यवन्तः सुधार्मिकाः॥ १५॥

‘श्रीराम! पहले सत्ययुग में दिति के पुत्र दैत्य बड़े बलवान् थे और अदिति के परम धर्मात्मा पुत्र महाभाग देवता भी बड़े शक्तिशाली थे॥ १५ ॥

ततस्तेषां नरव्याघ्र बुद्धिरासीन्महात्मनाम्।

अमरा विजराश्चैव कथं स्यामो निरामयाः॥ १६॥

‘पुरुषसिंह! उन महामना दैत्यों और देवताओं के मनमें यह विचार हुआ कि हम कैसे अजर-अमर और नीरोग हों? ॥ १६॥

तेषां चिन्तयतां तत्र बुद्धिरासीद विपश्चिताम्।

क्षीरोदमथनं कृत्वा रसं प्राप्स्याम तत्र वै॥१७॥

‘इस प्रकार चिन्तन करते हुए उन विचारशील देवताओं और दैत्यों की बुद्धि में यह बात आयी कि हमलोग यदि क्षीर सागर का मन्थन करें तो उसमें निश्चय ही अमृतमय रस प्राप्त कर लेंगे॥१७॥

ततो निश्चित्य मथनं योक्त्रं कृत्वा च वासुकिम्।

मन्थानं मन्दरं कृत्वा ममन्थुरमितौजसः॥१८॥

‘समुद्रमन्थन का निश्चय करके उन अमिततेजस्वी देवताओं और दैत्यों ने वासुकि नाग को रस्सी और मन्दराचल को मथानी बनाकर क्षीर-सागर को मथना आरम्भ कया॥१८॥

अथ वर्षसहस्रेण योकत्रसर्पशिरांसि च। ।

वमन्तोऽतिविषं तत्र ददंशुर्दशनैः शिलाः॥१९॥

‘तदनन्तर एक हजार वर्ष बीतने पर रस्सी बने हुए सर्प के बहुसंख्यक मुख अत्यन्त विष उगलते हुए वहाँ मन्दराचल की शिलाओं को अपने दाँतों से डंसने लगे॥ १९॥

उत्पपाताग्निसंकाशं हालाहलमहाविषम्।

तेन दग्धं जगत् सर्वं सदेवासुरमानुषम्॥२०॥

‘अतः उस समय वहाँ अग्नि के समान दाहक हालाहल नामक महाभयंकर विष ऊपर को उठा। उसने देवता, असुर और मनुष्यों सहित सम्पूर्ण जगत् को दग्ध करना आरम्भ किया॥ २०॥

अथ देवा महादेवं शङ्करं शरणार्थिनः।

जग्मुः पशुपतिं रुद्रं त्राहि त्राहीति तुष्टवुः ॥२१॥

‘यह देख देवता लोग शरणार्थी होकर सबका कल्याण करने वाले महान् देवता पशुपति रुद्र की शरण में गये और त्राहि-त्राहि की पुकार लगाकर उनकी स्तुति करने लगे॥ २१॥

एवमुक्तस्ततो देवैर्देवदेवेश्वरः प्रभुः।

प्रादुरासीत् ततोऽत्रैव शङ्खचक्रधरो हरिः॥ २२॥

‘देवताओं के इस प्रकार पुकारने पर देवदेवेश्वर भगवान् शिव वहाँ प्रकट हुए फिर वहीं शङ्ख चक्रधारी भगवान् श्रीहरि भी उपस्थित हो गये॥ २२ ॥

उवाचैनं स्मितं कृत्वा रुद्रं शूलधरं हरिः।

दैवतैर्मथ्यमाने तु यत्पूर्वं समुपस्थितम्॥२३॥

तत् त्वदीयं सुरश्रेष्ठ सुराणामग्रतो हि यत्।

अग्रपूजामिह स्थित्वा गृहाणेदं विषं प्रभो॥२४॥

‘श्रीहरिने त्रिशूलधारी भगवान् रुद्र से मुसकराकर कहा—’सुरश्रेष्ठ ! देवताओं के समुद्रमन्थन करने पर जो वस्तु सबसे पहले प्राप्त हुई है, वह आपका भाग है; क्योंकि आप सब देवताओं में अग्रगण्य हैं। प्रभो! अग्रपूजा के रूप में प्राप्त हुए इस विष को आप यहीं खड़े होकर ग्रहण करें’॥ २३-२४ ॥

इत्युक्त्वा च सुरश्रेष्ठस्तत्रैवान्तरधीयत।

देवतानां भयं दृष्ट्वा श्रुत्वा वाक्यं तु शाङ्गिणः॥ २५॥

हालाहलं विषं घोरं संजग्राहामृतोपमम्।

देवान् विसृज्य देवेशो जगाम भगवान् हरः॥२६॥

‘ऐसा कहकर देवशिरोमणि विष्णु वहीं अन्तर्धान हो गये। देवताओं का भय देखकर और भगवान् विष्णु की पूर्वोक्त बात सुनकर देवेश्वर भगवान् रुद्र ने उस घोर हालाहल विष को अमृत के समान मानकर अपने कण्ठ में धारण कर लिया तथा देवताओं को विदा करके वे अपने स्थान को चले गये॥ २५-२६ ॥

ततो देवासुराः सर्वे ममन्थू रघुनन्दन।

प्रविवेशाथ पातालं मन्थानः पर्वतोत्तमः॥२७॥

‘रघुनन्दन! तत्पश्चात् देवता और असुर सब मिलकर क्षीरसागर का मन्थन करने लगे उस समय मथानी बना हुआ उत्तम पर्वत मन्दर पाताल में घुस गया॥२७॥

ततो देवाः सगन्धर्वास्तुष्टवुर्मधुसूदनम्।

त्वं गतिः सर्वभूतानां विशेषेण दिवौकसाम्॥ २८॥

पालयास्मान् महाबाहो गिरिमुद्धर्तुमर्हसि।

‘तब देवता और गन्धर्व भगवान् मधुसूदन की स्तुति करने लगे—’महाबाहो! आप ही सम्पूर्ण प्राणियों की गति हैं विशेषतः देवताओं के अवलम्बन तो आप ही हैं आप हमारी रक्षा करें और इस पर्वत को उठावें’। २८ १/२॥

इति श्रुत्वा हृषीकेशः कामठं रूपमास्थितः॥ २९॥

पर्वतं पृष्ठतः कृत्वा शिश्ये तत्रोदधौ हरिः।

‘यह सुनकर भगवान् हृषीकेश ने कच्छप का रूप धारण कर लिया और उस पर्वत को अपनी पीठ पर रखकर वे श्रीहरि वहीं समुद्र के भीतर सो गये॥ २९ १/२॥

पर्वताग्रं तु लोकात्मा हस्तेनाक्रम्य केशवः॥ ३०॥

देवानां मध्यतः स्थित्वा ममन्थ पुरुषोत्तमः।

‘फिर विश्वात्मा पुरुषोत्तम भगवान् केशव उस पर्वत शिखर को हाथ से पकड़कर देवताओंके बीचमें खड़े हो स्वयं भी समुद्रका मन्थन करने लगे॥ ३० १/२॥

अथ वर्षसहस्रेण आयुर्वेदमयः पुमान्॥३१॥

उदतिष्ठत् सुधर्मात्मा सदण्डः सकमण्डलुः।

पूर्वं धन्वन्तरि म अप्सराश्च सुवर्चसः॥ ३२॥

‘तदनन्तर एक हजार वर्ष बीतने पर उस क्षीरसागर से एक आयुर्वेदमय धर्मात्मा पुरुष प्रकट हुए, जिनके एक हाथ में दण्ड और दूसरे में कमण्डलु था। उनका नाम धन्वन्तरि था। उनके प्राकट्य के बाद सागर से सुन्दर कान्तिवाली बहुत-सी अप्सराएँ प्रकट हुईं। ३१-३२॥

अप्सु निर्मथनादेव रसात् तस्माद् वरस्त्रियः।

उत्पेतुर्मनुजश्रेष्ठ तस्मादप्सरसोऽभवन्॥ ३३॥

‘नरश्रेष्ठ! मन्थन करने से ही अप् (जल) में उसके रस से वे सुन्दरी स्त्रियाँ उत्पन्न हुई थीं, इसलिये अप्सरा कहलायीं॥ ३३॥

षष्टिः कोट्योऽभवंस्तासामप्सराणां सुवर्चसाम्।

असंख्येयास्तु काकुत्स्थ यास्तासां परिचारिकाः॥ ३४॥

‘काकुत्स्थ! उन सुन्दर कान्तिवाली अप्सराओं की संख्या साठ करोड़ थी और जो उनकी परिचारिकाएँ थीं, उनकी गणना नहीं की जा सकती। वे सब असंख्य थीं॥ ३४॥

न ताः स्म प्रतिगृह्णन्ति सर्वे ते देवदानवाः।

अप्रतिग्रहणादेव ता वै साधारणाः स्मृताः॥ ३५॥

‘उन अप्सराओं को समस्त देवता और दानव कोई भी अपनी पत्नी’ रूप से ग्रहण न कर सके, इसलिये वे साधारणा (सामान्या) मानी गयीं॥ ३५॥

वरुणस्य ततः कन्या वारुणी रघुनन्दन।

उत्पपात महाभागा मार्गमाणा परिग्रहम्॥३६॥

‘रघुनन्दन! तदनन्तर वरुण की कन्या वारुणी, जो सुरा की अभिमानिनी देवी थी, प्रकट हुई और अपने को स्वीकार करने वाले पुरुषकी खोज करने लगी॥ ३६॥

दितेः पुत्रा न तां राम जगृहुर्वरुणात्मजाम्।

अदितेस्तु सुता वीर जगृहुस्तामनिन्दिताम्॥ ३७॥

‘वीर श्रीराम! दैत्योंने उस वरुण कन्या सुरा को नहीं ग्रहण किया, परंतु अदिति के पुत्रों ने इस अनिन्द्यसुन्दरी को ग्रहण कर लिया॥३७॥

असुरास्तेन दैतेयाः सुरास्तेनादितेः सुताः।

हृष्टाः प्रमुदिताश्चासन् वारुणीग्रहणात् सुराः॥ ३८॥

‘सुरा से रहित हो नेके कारण ही दैत्य ‘असुर’ कहलाये और सुरा-सेवन के कारण ही अदिति के पुत्रों की ‘सुर’ संज्ञा हुई। वारुणी को ग्रहण करने से देवता लोग हर्ष से उत्फुल्ल एवं आनन्दमग्न हो गये। ३८॥

उच्चैःश्रवा हयश्रेष्ठो मणिरत्नं च कौस्तुभम्।

उदतिष्ठन्नरश्रेष्ठ तथैवामृतमुत्तमम्॥ ३९॥

‘नरश्रेष्ठ! तदनन्तर घोड़ों में उत्तम उच्चैःश्रवा, मणिरत्न कौस्तुभ तथा परम उत्तम अमृत का प्राकट्य हुआ॥ ३९॥

अथ तस्य कृते राम महानासीत् कुलक्षयः।

अदितेस्तु ततः पुत्रा दितिपुत्रानयोधयन्॥४०॥

‘श्रीराम! उस अमृत के लिये देवताओं और असुरों के कुल का महान् संहार हुआ। अदिति के पुत्र दिति के पुत्रों के साथ युद्ध करने लगे॥ ४० ॥

एकतामगमन् सर्वे असुरा राक्षसैः सह।

युद्धमासीन्महाघोरं वीर त्रैलोक्यमोहनम्॥४१॥

समस्त असुर राक्षसों के साथ मिलकर एक हो गये। वीर! देवताओं के साथ उनका महाघोर संग्राम होने लगा, जो तीनों लोकों को मोह में डालने वाला था॥४१॥

यदा क्षयं गतं सर्वं तदा विष्णुर्महाबलः।

अमृतं सोऽहरत् तूर्णं मायामास्थाय मोहिनीम्॥ ४२॥

‘जब देवताओं और असुरों का वह सारा समूह क्षीण हो चला, तब महाबली भगवान् विष्णु ने मोहिनी माया का आश्रय लेकर तुरंत ही अमृत का अपहरण कर लिया॥ ४२॥

ये गताभिमुखं विष्णुमक्षरं पुरुषोत्तमम्।

सम्पिष्टास्ते तदा युद्धे विष्णुना प्रभविष्णुना॥ ४३॥

‘जो दैत्य बलपूर्वक अमृत छीन लाने के लिये अविनाशी पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु के सामने गये, उन्हें प्रभावशाली भगवान् विष्णु ने उस समय युद्ध में पीस डाला॥ ४३॥

अदितेरात्मजा वीरा दितेः पुत्रान् निजजिरे।

अस्मिन् घोरे महायुद्धे दैतेयादित्ययो शम्॥ ४४॥

‘देवताओं और दैत्यों के उस घोर महायुद्ध में अदिति के वीर पुत्रों ने दिति के पुत्रों का विशेष संहार किया॥४४॥

निहत्य दितिपुत्रांस्तु राज्यं प्राप्य पुरंदरः।

शशास मुदितो लोकान् सर्षिसङ्घान् सचारणान्॥ ४५॥

‘दैत्यों का वध करने के पश्चात् त्रिलोकी का राज्य पाकर देवराज इन्द्र बड़े प्रसन्न हुए और ऋषियों तथा चारणों सहित समस्त लोकों का शासन करने लगे’। ४५॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे पञ्चचत्वारिंशः सर्गः॥४५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में पैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।४५॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(दिति का कश्यपजी से इन्द्र हन्ता पुत्र की प्राप्ति के लिये कुशप्लव में तप, इन्द्र का उनके गर्भ के सात टुकड़े कर डालना)

षट्चत्वारिंशः सर्गः 

सर्ग-46

हतेषु तेषु पुत्रेषु दितिः परमदुःखिता।

मारीचं कश्यपं नाम भर्तारमिदमब्रवीत्॥१॥

अपने उन पुत्रों के मारे जाने पर दिति को बड़ा दुःख हुआ,वे अपने पति मरीचिनन्दन कश्यप के पास जाकर बोलीं- ॥१॥

हतपुत्रास्मि भगवंस्तव पुत्रौर्महाबलैः।

शक्रहन्तारमिच्छामि पुत्रं दीर्घतपोर्जितम्॥२॥

‘भगवन्! आपके महाबली पुत्र देवताओं ने मेरे पुत्रों को मार डाला; अतः मैं दीर्घकाल की तपस्या से उपार्जित एक ऐसा पुत्र चाहती हूँ जो इन्द्र का वध करने में समर्थ हो॥२॥

साहं तपश्चरिष्यामि गर्भं मे दातुमर्हसि।

ईश्वरं शक्रहन्तारं त्वमनुज्ञातुमर्हसि॥३॥

‘मैं तपस्या करूँगी, आप इसके लिये मुझे आज्ञा दें और मेरे गर्भ में ऐसा पुत्र प्रदान करें जो सब कुछ करने में समर्थ तथा इन्द्र का वध करने वाला हो’ ॥ ३॥

तस्यास्तद वचनं श्रुत्वा मारीचः कश्यपस्तदा।

प्रत्युवाच महातेजा दितिं परमदुःखिताम्॥४॥

उसकी यह बात सुनकर महातेजस्वी मरीचनन्दन कश्यप ने उस परम दुःखिनी दिति को इस प्रकार उत्तर दिया- ॥४॥

एवं भवतु भद्रं ते शुचिर्भव तपोधने।

जनयिष्यसि पुत्रं त्वं शक्रहन्तारमाहवे॥५॥

‘तपोधने! ऐसा ही हो तुम शौचाचार का पालन करो तुम्हारा भला हो तुम ऐसे पुत्र को जन्म दोगी, जो युद्ध में इन्द्र को मार सके॥५॥

पूर्णे वर्षसहस्रे तु शुचिर्यदि भविष्यसि।

पुत्रं त्रैलोक्यहन्तारं मत्तस्त्वं जनयिष्यसि॥६॥

‘यदि पूरे एक सहस्र वर्ष तक पवित्रतापूर्वक रह सकोगी तो तुम मुझसे त्रिलोकीनाथ इन्द्र का वधकरने में समर्थ पुत्र प्राप्त कर लोगी’ ॥ ६॥

एवमुक्त्वा महातेजाः पाणिना सम्ममार्ज ताम्।

तामालभ्य ततः स्वस्ति इत्युक्त्वा तपसे ययौ॥ ७॥

ऐसा कहकर महातेजस्वी कश्यप ने दिति के शरीरपर हाथ फेरा फिर उनका स्पर्श करके कहा —’तुम्हारा कल्याण हो।’ ऐसा कहकर वे तपस्याके लिये चले गये॥७॥

गते तस्मिन् नरश्रेष्ठ दितिः परमहर्षिता।

कुशप्लवं समासाद्य तपस्तेपे सुदारुणम्॥८॥

नरश्रेष्ठ ! उनके चले जाने पर दिति अत्यन्त हर्ष और उत्साह में भरकर कुशप्लव नामक तपोवन में आयीं और अत्यन्त कठोर तपस्या करने लगीं॥ ८॥

तपस्तस्यां हि कुर्वत्यां परिचर्यां चकार ह।

सहस्राक्षो नरश्रेष्ठ परया गुणसम्पदा॥९॥

पुरुषप्रवर श्रीराम! दिति के तपस्या करते समय सहस्रलोचन इन्द्र विनय आदि उत्तम गुणसम्पत्ति से युक्त हो उनकी सेवा-टहल करने लगे॥९॥

अग्निं कुशान् काष्ठमपः फलं मूलं तथैव च।

न्यवेदयत् सहस्राक्षो यच्चान्यदपि कांक्षितम्॥

सहस्राक्ष इन्द्र अपनी मौसी दिति के लिये अग्नि, कुशा, काष्ठ, जल, फल, मूल तथा अन्यान्य अभिलषित वस्तुओं को ला-लाकर देते थे॥ १०॥

गात्रसंवाहनैश्चैव श्रमापनयनैस्तथा।

शक्रः सर्वेषु कालेषु दितिं परिचचार ह॥११॥

इन्द्र मौसी की शारीरिक सेवाएँ करते, उनके पैर दबाकर उनकी थकावट मिटाते तथा ऐसी ही अन्य आवश्यक सेवाओं द्वारा वे हर समय दिति की परिचर्या करते थे॥११॥

पूर्णे वर्षसहस्रे सा दशोने रघुनन्दन।

दितिः परमसंहृष्टा सहस्राक्षमथाब्रवीत्॥१२॥

रघुनन्दन! जब सहस्र वर्ष पूर्ण होने में कुल दस वर्ष बाकी रह गये, तब एक दिन दितिने अत्यन्त हर्षमें भरकर सहस्रलोचन इन्द्रसे कहा- ॥ १२ ॥

तपश्चरन्त्या वर्षाणि दश वीर्यवतां वर।

अवशिष्टानि भद्रं ते भ्रातरं द्रक्ष्यसे ततः॥१३॥

‘बलवानों में श्रेष्ठ वीर! अब मेरी तपस्याके केवल दस वर्ष और शेष रह गये हैं तुम्हारा भला हो दस वर्ष बाद तुम अपने होने वाले भाई को देख सकोगे॥ १३॥

यमहं त्वत्कृते पुत्र तमाधास्ये जयोत्सुकम्।

त्रैलोक्यविजयं पुत्र सह भोक्ष्यसि विज्वर ॥१४॥

‘बेटा! मैंने तुम्हारे विनाश के लिये जिस पुत्र की याचना की थी, वह जब तुम्हें जीतने के लिये उत्सुक होगा, उस समय मैं उसे शान्त कर दूंगी-तुम्हारे प्रति उसे वैर-भाव से रहित तथा भ्रातृ-स्नेह से युक्त बना दूंगी फिर तुम उसके साथ रहकर उसी के द्वारा की हुई त्रिभुवन-विजय का सुख निश्चिन्त होकर भोगना॥ १४॥

याचितेन सुरश्रेष्ठ पित्रा तव महात्मना।

वरो वर्षसहस्रान्ते मम दत्तः सुतं प्रति॥१५॥

‘सुरश्रेष्ठ! मेरे प्रार्थना करने पर तुम्हारे महात्मा पिता ने एक हजार वर्ष के बाद पुत्र होने का मुझे वर दिया है’ ॥ १५॥

इत्युक्त्वा च दितिस्तत्र प्राप्ते मध्यं दिनेश्वरे।

निद्रयापहृता देवी पादौ कृत्वाथ शीर्षतः ॥१६॥

ऐसा कहकर दिति नींद से अचेत हो गयीं। उस समय सूर्यदेव आकाश के मध्य भाग में आ गये थे दोपहरका समय हो गया था,देवी दिति आसनपर बैठी-बैठी झपकी लेने लगीं। सिर झुक गया और केश पैरों से जा लगे,इस प्रकार निद्रावस्था में उन्होंने पैरों को सिर से लगा लिया॥ १६ ॥

दृष्ट्वा तामशुचिं शक्रः पादयोः कृतमूर्धजाम्।

शिरःस्थाने कृतौ पादौ जहास च मुमोद च॥ १७॥

उन्होंने अपने केशों को पैरों पर डाल रखा था सिरको टिकाने के लिये दोनों पैरों को ही आधार बना लिया था। यह देख दिति को अपवित्र हुई जान इन्द्र हँसे और बड़े प्रसन्न हुए॥ १७॥

तस्याः शरीरविवरं प्रविवेश पुरंदरः।

गर्भं च सप्तधा राम चिच्छेद परमात्मवान्॥१८॥

श्रीराम! फिर तो सतत सावधान रहने वाले इन्द्र माता दिति के उदर में प्रविष्ट हो गये और उसमें स्थित हुए गर्भ के उन्होंने सात टुकड़े कर डाले॥ १८ ॥

भिद्यमानस्ततो गर्भो वज्रेण शतपर्वणा।

रुरोद सुस्वरं राम ततो दितिरबुध्यत॥१९॥

श्रीराम! उनके द्वारा सौ पर्वोवाले वज्र से विदीर्ण किये जाते समय वह गर्भस्थ बालक जोर-जोर से रोने लगा इससे दिति की निद्रा टूट गयी–वे जागकर उठ बैठीं॥ १९॥

मा रुदो मा रुदश्चेति गर्भं शक्रोऽभ्यभाषत।

बिभेद च महातेजा रुदन्तमपि वासवः॥२०॥

तब इन्द्र ने उस रोते हुए गर्भ से कहा—’भाई! मत रो, मत रो’ परंतु महातेजस्वी इन्द्र ने रोते रहने पर भी उस गर्भ के टुकड़े कर ही डाले॥२०॥

न हन्तव्यं न हन्तव्यमित्येव दितिरब्रवीत्।

निष्पपात ततः शक्रो मातुर्वचनगौरवात्॥२१॥

उस समय दिति ने कहा—’इन्द्र ! बच्चे को न मारो, न मारो।’ माता के वचन का गौरव मानकर इन्द्र सहसा उदर से निकल आये॥२१॥

प्राञ्जलिर्वज्रसहितो दितिं शक्रोऽभ्यभाषत।

अशुचिर्देवि सुप्तासि पादयोः कृतमूर्धजा॥ २२॥

तदन्तरमहं लब्ध्वा शक्रहन्तारमाहवे।

अभिन्दं सप्तधा देवि तन्मे त्वं क्षन्तुमर्हसि ॥२३॥

फिर वज्र सहित इन्द्र ने हाथ जोड़कर दिति से कहा —’देवि! तुम्हारे सिरके बाल पैरों से लगे थे इस प्रकार तुम अपवित्र अवस्था में सोयी थीं,यही छिद्र पाकर मैंने इस ‘इन्द्रहन्ता’ बालक के सात टुकड़े कर डाले हैं इसलिये माँ! तुम मेरे इस अपराध को क्षमा करो’ ।। २२-२३॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे षट्चत्वारिंशः सर्गः॥ ४६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में छियालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(दिति का अपने पुत्रों को मरुद्गण बनाकर देवलोक में रखने के लिये इन्द्र से अनुरोध, इक्ष्वाकु-पुत्र विशाल द्वारा विशाला नगरी का निर्माण)

सप्तचत्वारिंशः सर्गः 

सर्ग-47

सप्तधा तु कृते गर्भे दितिः परमदुःखिता।

सहस्राक्षं दुराधर्षं वाक्यं सानुनयाब्रवीत्॥१॥

इन्द्र द्वारा अपने गर्भ के सात टुकड़े कर दिये जाने पर देवी दिति को बड़ा दुःख हुआ वे दुर्द्धर्ष वीर सहस्राक्ष इन्द्र से अनुनयपूर्वक बोलीं- ॥ १॥

ममापराधाद् गर्भोऽयं सप्तधा शकलीकृतः।

नापराधो हि देवेश तवात्र बलसूदन॥२॥

‘देवेश! बलसूदन! मेरे ही अपराध से इस गर्भ के सात टुकड़े हुए हैं इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है। २॥

प्रियं त्वत्कृतमिच्छामि मम गर्भविपर्यये।

मरुतां सप्त सप्तानां स्थानपाला भवन्तु ते॥३॥

‘इस गर्भ को नष्ट करनेके निमित्त तुमने जो क्रूरतापूर्ण कर्म किया है, वह तुम्हारे और मेरे लिये भी जिस तरह प्रिय हो जाय—जैसे भी उसका परिणाम तुम्हारे और मेरे लिये सुखद हो जाय, वैसा उपाय मैं करना चाहती हूँ। मेरे गर्भ के वे सातों खण्ड सात व्यक्ति होकर सातों मरुद्गणों के स्थानों का पालन करने वाले हो जायँ॥ ३॥

वातस्कन्धा इमे सप्त चरन्तु दिवि पुत्रक।

मारुता इति विख्याता दिव्यरूपा ममात्मजाः॥ ४॥

‘बेटा! ये मेरे दिव्य रूपधारी पुत्र ‘मारुत’ नाम से प्रसिद्ध होकर आकाश में जो सुविख्यात सात वातस्कन्ध* हैं, उनमें विचरें॥४॥

* आवह, प्रवह, संवह, उद्वह, विवह, परिवह और परावहये सात मरुत् हैं, इन्हीं को सात वातस्कन्ध कहते हैं।

ब्रह्मलोकं चरत्वेक इन्द्रलोकं तथापरः।

दिव्यवायुरिति ख्यातस्तृतीयोऽपि महायशाः॥

(ऊपर जो सात मरुत् बताये गये हैं, वे सातसात के गण हैं, इस प्रकार उनचास मरुत् समझने चाहिये )इनमें से जो प्रथम गण है, वह ब्रह्मलोक में विचरे, दूसरा इन्द्रलोक में विचरण करे तथा तीसरा महायशस्वी मरुद्गण दिव्य वायु के नामसे विख्यात हो अन्तरिक्ष में बहा करे॥५॥

चत्वारस्तु सुरश्रेष्ठ दिशो वै तव शासनात्।

संचरिष्यन्ति भद्रं ते कालेन हि ममात्मजाः॥६॥

त्वत्कृतेनैव नाम्ना वै मारुता इति विश्रुताः।

‘सुरश्रेष्ठ! तुम्हारा कल्याण हो मेरे शेष चार पुत्रों के गण तुम्हारी आज्ञा से समयानुसार सम्पूर्ण दिशाओं में संचार करेंगे तुम्हारे ही रखे हुए नाम से (तुमने जो ‘मा रुदः’ कहकर उन्हें रोने से मना किया था, उसी ‘मा रुदः’ इस वाक्य से) वे सब-के-सब मारुत कहलायेंगे। मारुत नाम से ही उनकी प्रसिद्धि होगी’ ॥ ६ १/२॥

तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा सहस्राक्षः पुरंदरः॥७॥

उवाच प्राञ्जलिर्वाक्यमतीदं बलसूदनः।

दिति का वह वचन सुनकर बल दैत्य को मारने वाले सहस्राक्ष इन्द्र ने हाथ जोड़कर यह बात कही— ॥ ७ १/२॥

सर्वमेतद यथोक्तं ते भविष्यति न संशयः॥८॥

विचरिष्यन्ति भद्रं ते देवरूपास्तवात्मजाः।

‘मा ! तुम्हारा कल्याण हो तुमने जैसा कहा है, वह सब वैसा ही होगा; इसमें संशय नहीं है। तुम्हारे ये पुत्र देवरूप होकर विचरेंगे’॥ ८ १/२ ॥

एवं तौ निश्चयं कृत्वा मातापुत्रौ तपोवने॥९॥

जग्मतुस्त्रिदिवं राम कृतार्थाविति नः श्रुतम्।

श्रीराम ! उस तपोवन में ऐसा निश्चय करके वे दोनों माता-पुत्र—दिति और इन्द्र कृतकृत्य हो स्वर्गलोक को चले गये—ऐसा हमने सुन रखा है॥९ १/२॥

एष देशः स काकुत्स्थ महेन्द्राध्युषितः पुरा॥ १०॥

दितिं यत्र तपःसिद्धामेवं परिचचार सः।

काकुत्स्थ! यही वह देश है, जहाँ पूर्वकाल में रहकर देवराज इन्द्र ने तपःसिद्ध दिति की परिचर्या की थी॥ १० १/२॥

इक्ष्वाकोस्तु नरव्याघ्र पुत्रः परमधार्मिकः॥११॥

अलम्बुषायामुत्पन्नो विशाल इति विश्रुतः।

तेन चासीदिह स्थाने विशालेति पुरी कृता॥ १२॥

पुरुषसिंह! पूर्वकाल में महाराज इक्ष्वाकु के एक परम धर्मात्मा पुत्र थे, जो विशाल नाम से प्रसिद्ध हुए। उनका जन्म अलम्बुषा के गर्भ से हुआ था। उन्होंने इस स्थान पर विशाला नाम की पुरी बसायी थी॥ ११-१२॥

विशालस्य सुतो राम हेमचन्द्रो महाबलः।

सुचन्द्र इति विख्यातो हेमचन्द्रादनन्तरः॥१३॥

श्रीराम! विशाल के पुत्रका नाम था हेमचन्द्र, जो बड़े बलवान् थे। हेमचन्द्र के पुत्र सुचन्द्र नाम से विख्यात हुए॥ १३॥

सुचन्द्रतनयो राम धूम्राश्व इति विश्रुतः।

धूम्राश्वतनयश्चापि सृञ्जयः समपद्यत॥१४॥

श्रीरामचन्द्र! सुचन्द्र के पुत्र धूम्राश्व और धूम्राश्व के पुत्र संजय हुए॥ १४॥

सृञ्जयस्य सुतः श्रीमान् सहदेवः प्रतापवान्।

कुशाश्वः सहदेवस्य पुत्रः परमधार्मिकः॥१५॥

संजय के प्रतापी पुत्र श्रीमान् सहदेव हुए। सहदेव के परम धर्मात्मा पुत्र का नाम कुशाश्व था॥ १५ ॥

कुशाश्वस्य महातेजाः सोमदत्तः प्रतापवान्।

सोमदत्तस्य पुत्रस्तु काकुत्स्थ इति विश्रुतः॥ १६॥

कुशाश्वके महातेजस्वी पुत्र प्रतापी सोमदत्त हुए और सोमदत्तके पुत्र काकुत्स्थ नामसे विख्यात हुए।१६॥

तस्य पुत्रो महातेजाः सम्प्रत्येष पुरीमिमाम्।

आवसत् परमप्रख्यः सुमति म दुर्जयः॥१७॥

काकुत्स्थ के महातेजस्वी पुत्र सुमति नाम से प्रसिद्ध हैं; जो परम कान्तिमान् एवं दुर्जय वीर हैं वे ही इस समय इस पुरी में निवास करते हैं।॥ १७॥

इक्ष्वाकोस्तु प्रसादेन सर्वे वैशालिका नृपाः।

दीर्घायुषो महात्मानो वीर्यवन्तः सुधार्मिकाः॥ १८॥

महाराज इक्ष्वाकु के प्रसाद से विशाला के सभी नरेश दीर्घायु, महात्मा, पराक्रमी और परम धार्मिक होते आये हैं॥ १८॥

इहाद्य रजनीमेकां सुखं स्वप्स्यामहे वयम्।

श्वः प्रभाते नरश्रेष्ठ जनकं द्रष्टुमर्हसि ॥१९॥

नरश्रेष्ठ! आज एक रात हम लोग यहीं सुखपूर्वक शयन करेंगे; फिर कल प्रातःकाल यहाँ से चलकर तुम मिथिला में राजा जनक का दर्शन करोगे॥ १९॥

सुमतिस्तु महातेजा विश्वामित्रमुपागतम्।

श्रुत्वा नरवर श्रेष्ठः प्रत्यागच्छन्महायशाः॥२०॥

नरेशों में श्रेष्ठ, महातेजस्वी, महायशस्वी राजा सुमति विश्वामित्रजी को पुरी के समीप आया हुआ सुनकर उनकी अगवानी के लिये स्वयं आये॥ २० ॥

पूजां च परमां कृत्वा सोपाध्यायः सबान्धवः।

प्राञ्जलिः कुशलं पृष्ट्वा विश्वामित्रमथाब्रवीत्॥ २१॥

अपने पुरोहित और बन्धु-बान्धवों के साथ राजा ने विश्वामित्रजी की उत्तम पूजा करके हाथ जोड़ उनका कुशल-समाचार पूछा और उनसे इस प्रकार कहा -॥

धन्योऽस्म्यनगृहीतोऽस्मि यस्य मे विषयं मने।

सम्प्राप्तो दर्शनं चैव नास्ति धन्यतरो मम॥२२॥

‘मुने! मैं धन्य हूँ। आपका मुझ पर बड़ा अनुग्रह है; क्योंकि आपने स्वयं मेरे राज्य में पधारकर मुझे दर्शन दिया। इस समय मुझसे बढ़कर धन्य पुरुष दूसरा कोई नहीं है’ ॥ २२॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे सप्तचत्वारिंशः सर्गः॥४७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में सैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।४७॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(मुनियों सहित श्रीराम का मिथिलापुरी में पहुँचना, विश्वामित्रजी का उनसे अहल्या को शाप प्राप्त होने की कथा सुनाना)

अष्टचत्वारिंशः सर्गः 

सर्ग-48

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पृष्ट्वा तु कुशलं तत्र परस्परसमागमे।

कथान्ते सुमतिर्वाक्यं व्याजहार महामुनिम्॥१॥

वहाँ परस्पर समागम के समय एक-दूसरे का कुशल-मंगल पूछकर बातचीत के अन्त में राजा सुमति ने महामुनि विश्वामित्र से कहा- ॥१॥

इमौ कुमारौ भद्रं ते देवतुल्यपराक्रमौ।

गजसिंहगती वीरौ शार्दूलवृषभोपमौ॥२॥

‘ब्रह्मन्! आपका कल्याण हो ये दोनों कुमारदेवताओं के तुल्य पराक्रमी जान पड़ते हैं। इनकी चाल-ढाल हाथी और सिंह की गति के समान है। ये दोनों वीर सिंह और साँड़ के समान प्रतीत होते हैं।२॥

पद्मपत्रविशालाक्षौ खड्गतूणधनुर्धरौ।

अश्विनाविव रूपेण समुपस्थितयौवनौ॥३॥

इनके बड़े-बड़े नेत्र विकसित कमलदल के समान शोभा पाते हैं। ये दोनों तलवार, तरकस और धनुषधारण किये हुए हैं। अपने सुन्दर रूप के द्वारा दोनों अश्विनीकुमारों को लज्जित करते हैं तथा युवावस्था के निकट आ पहुँचे हैं॥

यदृच्छयैव गां प्राप्तौ देवलोकादिवामरौ।

कथं पद्भ्यामिह प्राप्तौ किमर्थं कस्य वा मुने॥ ४॥

‘इन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता है, मानो दो देवकुमार दैवेच्छावश देवलोक से पृथ्वी पर आ गये हों। मुने! ये दोनों किसके पुत्र हैं और कैसे, किसलिये यहाँ पैदल ही आये हैं ? ॥ ४॥

भूषयन्ताविमं देशं चन्द्रसूर्याविवाम्बरम्।

परस्परेण सदृशौ प्रमाणेङ्गितचेष्टितैः ॥५॥

‘जैसे चन्द्रमा और सूर्य आकाश की शोभा बढ़ाते । हैं, उसी प्रकार ये दोनों कुमार इस देश को सुशोभित कर रहे हैं। शरीरकी ऊँचाई, मनोभावसूचक संकेत तथा चेष्टा (बोलचाल) में ये दोनों एक-दूसरे के समान हैं॥५॥

किमर्थं च नरश्रेष्ठौ सम्प्राप्तौ दुर्गमे पथि।

वरायुधधरौ वीरौ श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः॥६॥

‘श्रेष्ठ आयुध धारण करने वाले ये दोनों नरश्रेष्ठ वीर इस दुर्गम मार्ग में किसलिये आये हैं? यह मैं यथार्थरूप से सुनना चाहता हूँ’॥६॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा यथावृत्तं न्यवेदयत्।

सिद्धाश्रमनिवासं च राक्षसानां वधं यथा।

विश्वामित्रवचः श्रुत्वा राजा परमविस्मितः॥७॥

सुमति का यह वचन सुनकर विश्वामित्रजी ने उन्हें सब वृत्तान्त यथार्थ रूप से निवेदन किया। सिद्धाश्रम में निवास और राक्षसों के वध का प्रसंग भी यथावत्

रूपसे कह सुनाया। विश्वामित्रजी की बात सुनकर राजा सुमति को बड़ा विस्मय हुआ॥७॥

अतिथी परमं प्राप्तौ पुत्रौ दशरथस्य तौ।

पूजयामास विधिवत् सत्काराहौँ महाबलौ॥८॥ ।

उन्होंने परम आदरणीय अतिथि के रूप में आये हुए उन दोनों महाबली दशरथ-पुत्रों का विधि पूर्वक आतिथ्य-सत्कार किया॥ ८॥

ततः परमसत्कारं सुमतेः प्राप्य राघवौ।

उष्य तत्र निशामेकां जग्मतुर्मिथिलां ततः॥९॥

सुमति से उत्तम आदर-सत्कार पाकर वे दोनों रघुवंशी कुमार वहाँ एक रात रहे और सबेरे उठकर मिथिला की ओर चल दिये॥९॥

तां दृष्ट्वा मुनयः सर्वे जनकस्य पुरीं शुभाम्।

साधु साध्विति शंसन्तो मिथिलां समपूजयन्॥ १०॥

मिथिला में पहुँचकर जनकपुरी की सुन्दर शोभा देख सभी महर्षि साधु-साधु कहकर उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे॥ १० ॥

मिथिलोपवने तत्र आश्रमं दृश्य राघवः।

पुराणं निर्जनं रम्यं पप्रच्छ मुनिपुंगवम्॥११॥

मिथिला के उपवनमें एक पुराना आश्रम था, जो अत्यन्त रमणीय होकर भी सूनसान दिखायी देता था। उसे देखकर श्रीरामचन्द्रजी ने मुनिवर विश्वामित्रजी से पूछा- ॥११॥

इदमाश्रमसंकाशं किं न्विदं मुनिवर्जितम्।

श्रोतुमिच्छामि भगवन् कस्यायं पूर्व आश्रमः॥१२॥

‘भगवन्! यह कैसा स्थान है, जो देखने में तो आश्रम-जैसा है; किंतु एक भी मुनि यहाँ दृष्टिगोचर नहीं होते हैं। मैं यह सुनना चाहता हूँ कि पहले यह आश्रम किसका था?’ ॥ १२ ॥

तच्छ्रुत्वा राघवेणोक्तं वाक्यं वाक्यविशारदः।

प्रत्युवाच महातेजा विश्वामित्रो महामुनिः॥१३॥

श्रीरामचन्द्रजी का यह प्रश्न सुनकर प्रवचन कुशल महातेजस्वी महामुनि विश्वामित्र ने इस प्रकार उत्तर दिया— ॥१३॥

हन्त ते कथयिष्यामि शृणु तत्त्वेन राघव।

यस्यैतदाश्रमपदं शप्तं कोपान्महात्मनः॥१४॥

‘रघुनन्दन! पूर्वकाल में यह जिस महात्मा का आश्रम था और जिन्होंने क्रोधपूर्वक इसे शाप दे दिया था, उनका तथा उनके इस आश्रम का सब वृत्तान्त तुम से कहता हूँ तुम यथार्थ रूप से इसको सुनो। १४॥

गौतमस्य नरश्रेष्ठ पूर्वमासीन्महात्मनः।

आश्रमो दिव्यसंकाशः सुरैरपि सुपूजितः ॥१५॥

‘नरश्रेष्ठ! पूर्वकाल में यह स्थान महात्मा गौतम का आश्रम था। उस समय यह आश्रम बड़ा ही दिव्य जान पड़ता था। देवता भी इसकी पूजा एवं प्रशंसा किया करते थे॥१५॥

स चात्र तप आतिष्ठदहल्यासहितः पुरा।

वर्षपूगान्यनेकानि राजपुत्र महायशः॥१६॥

‘महायशस्वी राजपुत्र! पूर्वकाल में महर्षि गौतम अपनी पत्नी अहल्या के साथ रहकर यहाँ तपस्या करते थे। उन्होंने बहुत वर्षों तक यहाँ तप किया था। १६॥

तस्यान्तरं विदित्वा च सहस्राक्षः शचीपतिः।

मुनिवेषधरो भूत्वा अहल्यामिदमब्रवीत्॥१७॥

‘एक दिन जब महर्षि गौतम आश्रम पर नहीं थे, उपयुक्त अवसर समझकर शचीपति इन्द्र गौतम मुनि का वेष धारण किये वहाँ आये और अहल्या से इस प्रकार बोले- ॥ १७॥

ऋतुकालं प्रतीक्षन्ते नार्थिनः सुसमाहिते।

संगमं त्वहमिच्छामि त्वया सह सुमध्यमे॥१८॥

“सदा सावधान रहने वाली सुन्दरी! रति की इच्छा रखने वाले प्रार्थी पुरुष ऋतुकाल की प्रतीक्षा नहीं करते हैं सुन्दर कटिप्रदेशवाली सुन्दरी ! मैं (इन्द्र) तुम्हारे साथ समागम करना चाहता हूँ’॥ १८ ॥

मुनिवेषं सहस्राक्षं विज्ञाय रघुनन्दन।

मतिं चकार दुर्मेधा देवराजकुतूहलात्॥१९॥

‘रघुनन्दन ! महर्षि गौतम का वेष धारण करके आये हुए इन्द्र को पहचानकर भी उस दुर्बुद्धि नारी ने ‘अहो! देवराज इन्द्र मुझे चाहते हैं’ इस कौतूहल वश उनके साथ समागम का निश्चय करके वह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया॥

अथाब्रवीत् सुरश्रेष्ठं कृतार्थेनान्तरात्मना।

कृतार्थास्मि सुरश्रेष्ठ गच्छ शीघ्रमितः प्रभो॥ २०॥

आत्मानं मां च देवेश सर्वथा रक्ष गौतमात्।

‘रति के पश्चात् उसने देवराज इन्द्र से संतुष्टचित्त होकर कहा–’सुरश्रेष्ठ! मैं आपके समागम से कृतार्थ हो गयी। प्रभो! अब आप शीघ्र यहाँ से चले जाइये। देवेश्वर! महर्षि गौतम के कोप से आप अपनी और मेरी भी सब प्रकार से रक्षा कीजिये’ ।। २० १/२॥

इन्द्रस्तु प्रहसन् वाक्यमहल्यामिदमब्रवीत्॥२१॥

सुश्रोणि परितुष्टोऽस्मि गमिष्यामि यथागतम्।

‘तब इन्द्र ने अहल्या से हँसते हुए कहा—’सुन्दरी ! मैं भी संतुष्ट हो गया अब जैसे आया था, उसी तरह चला जाऊँगा’ ॥ २१ १/२ ॥

एवं संगम्य तु तदा निश्चक्रामोटजात् ततः॥ २२॥

स सम्भ्रमात् त्वरन् राम शङ्कितो गौतमं प्रति।

‘श्रीराम! इस प्रकार अहल्या से समागम करके इन्द्र जब उस कुटी से बाहर निकले, तब गौतम के आ जाने की आशङ्का से बड़ी उतावली के साथ वेगपूर्वक भागने का प्रयत्न करने लगे। २२ १/२॥

गौतमं स ददर्शाथ प्रविशन्तं महामुनिम्॥२३॥

देवदानवदुर्धर्षं तपोबलसमन्वितम्।

तीर्थोदकपरिक्लिन्नं दीप्यमानमिवानलम्॥२४॥

गृहीतसमिधं तत्र सकुशं मुनिपुंगवम्।

‘इतने ही में उन्होंने देखा, देवताओं और दानवों के लिये भी दुर्धर्ष, तपोबलसम्पन्न महामुनि गौतम हाथ में समिधा लिये आश्रम में प्रवेश कर रहे हैं। उनका शरीर तीर्थ के जल से भीगा हुआ है और वे प्रज्वलित अग्नि के समान उद्दीप्त हो रहे हैं। २३-२४ १/२ ॥

दृष्ट्वा सुरपतिस्त्रस्तो विषण्णवदनोऽभवत्॥२५॥

अथ दृष्ट्वा सहस्राक्षं मुनिवेषधरं मुनिः।

दुर्वृत्तं वृत्तसम्पन्नो रोषाद् वचनमब्रवीत्॥२६॥

‘उनपर दृष्टि पड़ते ही देवराज इन्द्र भय से थर्रा उठे। उनके मुखपर विषाद छा गया। दुराचारी इन्द्र को मुनि का वेष धारण किये देख सदाचारसम्पन्न मुनिवर गौतमजी ने रोष भरकर कहा- ॥ २५-२६ ॥

मम रूपं समास्थाय कृतवानसि दुर्मते।

अकर्तव्यमिदं यस्माद विफलस्त्वं भविष्यसि॥ २७॥

“दुर्मते! तूने मेरा रूप धारण करके यह न करने योग्य पापकर्म किया है, इसलिये तू विफल (अण्डकोषों से रहित) हो जायगा’ ॥ २७॥

गौतमेनैवमुक्तस्य सुरोषेण महात्मना।

पेततुर्वृषणी भूमौ सहस्राक्षस्य तत्क्षणात्॥ २८॥

‘रोष में भरे हुए महात्मा गौतम के ऐसा कहते ही सहस्राक्ष इन्द्र के दोनों अण्डकोष उसी क्षण पृथ्वीपर गिर पड़े॥२८॥

तथा शप्त्वा च वै शक्रं भार्यामपि च शप्तवान्।

इह वर्षसहस्राणि बहूनि निवसिष्यसि ॥ २९॥

वातभक्षा निराहारा तप्यन्ती भस्मशायिनी।

अदृश्या सर्वभूतानामाश्रमेऽस्मिन् वसिष्यसि॥ ३०॥

इन्द्र को इस प्रकार शाप देकर गौतम ने अपनी पत्नी को भी शाप दिया—’दुराचारिणी! तू भी यहाँ कई हजार वर्षों तक केवल हवा पीकर या उपवास करके कष्ट उठाती हुई राख में पड़ी रहेगी। समस्त प्राणियों से अदृश्य रहकर इस आश्रम में निवास करेगी।

यदा त्वेतद् वनं घोरं रामो दशरथात्मजः।

आगमिष्यति दुर्धर्षस्तदा पूता भविष्यसि॥३१॥

तस्यातिथ्येन दुर्वृत्ते लोभमोहविवर्जिता।।

मत्सकाशं मुदा युक्ता स्वं वपुर्धारयिष्यसि॥३२॥

जब दुर्धर्ष दशरथ-कुमार राम इस घोर वन में पदार्पण करेंगे, उस समय तू पवित्र होगी। उनका आतिथ्य-सत्कार करने से तेरे लोभ-मोह आदि दोष दूर हो जायँगे और तू प्रसन्नतापूर्वक मेरे पास पहुँचकर अपना पूर्व शरीर धारण कर लेगी’ ॥ २९३२॥

एवमुक्त्वा महातेजा गौतमो दुष्टचारिणीम्।

इममाश्रममुत्सृज्य सिद्धचारणसेविते।

हिमवच्छिखरे रम्ये तपस्तेपे महातपाः ॥ ३३॥

‘अपनी दुराचारिणी पत्नी से ऐसा कहकर महातेजस्वी, महातपस्वी गौतम इस आश्रम को छोड़कर चले गये और सिद्धों तथा चारणों से सेवित हिमालयके रमणीय शिखर पर रहकर तपस्या करने लगे’ ॥ ३३॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डेऽष्टचत्वारिंशः सर्गः॥४८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में अड़तालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥४८॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(पितृ देवताओं द्वारा इन्द्र को भेड़े के अण्डकोष से युक्त करना तथा भगवान् श्रीराम के द्वारा अहल्या का उद्धार एवं उन दोनों दम्पति के द्वारा इनका सत्कार)

एकोनपञ्चाशः सर्गः 

सर्ग-49


अफलस्तु ततः शक्रो देवानग्निपुरोगमान्।

अब्रवीत् त्रस्तनयनः सिद्धगन्धर्वचारणान्॥१॥

तदनन्तर इन्द्र अण्डकोष से रहित होकर बहुत डर गये। उनके नेत्रों में त्रास छा गया। वे अग्नि आदि देवताओं, सिद्धों, गन्धर्वो और चारणों से इस प्रकार बोले- ॥१॥

कुर्वता तपसो विनं गौतमस्य महात्मनः।

क्रोधमुत्पाद्य हि मया सुरकार्यमिदं कृतम्॥ २॥

‘देवताओ! महात्मा गौतम की तपस्या में विघ्न डालने के लिये मैंने उन्हें क्रोध दिलाया है। ऐसा करके मैंने यह देवताओं का कार्य ही सिद्ध किया है। २॥

अफलोऽस्मि कृतस्तेन क्रोधात् सा च निराकृता।

शापमोक्षेण महता तपोऽस्यापहृतं मया॥३॥

‘मनि ने क्रोधपूर्वक भारी शाप देकर मुझे अण्डकोष से रहित कर दिया और अपनी पत्नी का भी परित्याग कर दिया। इससे मेरे द्वारा उनकी तपस्या का अपहरण हुआ है॥

तन्मां सुरवराः सर्वे सर्षिसङ्गाः सचारणाः।

सरकार्यकरं यूयं सफलं कर्तुमर्हथ॥४॥

‘यदि मैं उनकी तपस्या में विघ्न नहीं डालता तो वे देवताओं का राज्य ही छीन लेते अतः ऐसा करके मैंने देवताओं का ही कार्य सिद्ध किया है। इसलिये श्रेष्ठ देवताओ! तुम सब लोग, ऋषिसमुदाय और चारणगण मिलकर मुझे अण्डकोष से युक्त करने का प्रयत्न करो’ ॥ ४॥

शतक्रतोर्वचः श्रुत्वा देवाः साग्निपुरोगमाः।

पितृदेवानुपेत्याहुः सर्वे सह मरुद्गणैः॥५॥

इन्द्रका यह वचन सुनकर मरुद्गणों सहित अग्नि आदि समस्त देवता कव्यवाहन आदि पितृदेवताओं के पास जाकर बोले- ॥ ५॥

अयं मेषः सवृषणः शक्रो ह्यवृषणः कृतः।

मेषस्य वृषणौ गृह्य शक्रायाशु प्रयच्छत॥६॥

‘पितृगण ! यह आपका भेड़ा अण्डकोष से युक्त है और इन्द्र अण्डकोष रहित कर दिये गये हैं। अतः इस भेड़े के दोनों अण्डकोषों को लेकर आप शीघ्र ही इन्द्र को अर्पित कर दें॥६॥

अफलस्तु कृतो मेषः परां तुष्टिं प्रदास्यति।

भवतां हर्षणार्थं च ये च दास्यन्ति मानवाः।

अक्षयं हि फलं तेषां यूयं दास्यथ पुष्कलम्॥७॥

‘अण्डकोष से रहित किया हुआ यह भेड़ा इसी स्थान में आप लोगों को परम संतोष प्रदान करेगा। अतः जो मनुष्य आपलोगों की प्रसन्नता के लिये अण्डकोषरहित भेड़ा दान करेंगे, उन्हें आप लोग उस दान का उत्तम एवं पूर्ण फल प्रदान करेंगे’ ॥ ७॥

अग्नेस्तु वचनं श्रुत्वा पितृदेवाः समागताः।

उत्पाट्य मेषवृषणौ सहस्राक्षे न्यवेशयन्॥८॥

अग्नि की यह बात सुनकर पितृदेवताओं ने एकत्र हो भेड़े के अण्डकोषों को उखाड़कर इन्द्र के शरीर में उचित स्थान पर जोड़ दिया॥ ८॥

तदाप्रभृति काकुत्स्थ पितृदेवाः समागताः।

अफलान् भुञ्जते मेषान् फलैस्तेषामयोजयन्॥

ककुत्स्थनन्दन श्रीराम! तभी से वहाँ आये हए समस्त पितृ-देवता अण्डकोषरहित भेड़ों को ही उपयोग में लाते हैं और दाताओं को उनके दान जनित फलों के भागी बनाते हैं॥९॥

इन्द्रस्तु मेषवृषणस्तदाप्रभृति राघव।

गौतमस्य प्रभावेण तपसा च महात्मनः॥१०॥

रघुनन्दन! उसी समय से महात्मा गौतम के तपस्याजनित प्रभाव से इन्द्र को भेड़ों के अण्डकोष धारण करने पड़े॥१०॥

तदागच्छ महातेज आश्रमं पुण्यकर्मणः।

तारयैनां महाभागामहल्यां देवरूपिणीम्॥११॥

महातेजस्वी श्रीराम! अब तुम पुण्यकर्मा महर्षि गौतम के इस आश्रम पर चलो और इन देवरूपिणी महाभागा अहल्या का उद्धार करो॥ ११॥

विश्वामित्रवचः श्रुत्वा राघवः सहलक्ष्मणः।

विश्वामित्रं पुरस्कृत्य आश्रमं प्रविवेश ह॥१२॥

विश्वामित्रजी का यह वचन सुनकर लक्ष्मणसहित श्रीराम ने उन महर्षि को आगे करके उस आश्रम में प्रवेश किया॥ १२॥

ददर्श च महाभागां तपसा द्योतितप्रभाम्।

लोकैरपि समागम्य दुर्निरीक्ष्यां सुरासुरैः ॥ १३॥

वहाँ जाकर उन्होंने देखा—महासौभाग्यशालिनी अहल्या अपनी तपस्या से देदीप्यमान हो रही हैं। इस लोक के मनुष्य तथा सम्पूर्ण देवता और असुर भी वहाँ आकर उन्हें देख नहीं सकते थे॥१३॥

प्रयत्नान्निर्मितां धात्रा दिव्यां मायामयीमिव।

धूमेनाभिपरीतांगी दीप्तामग्निशिखामिव॥१४॥

सतुषारावृतां साभ्रां पूर्णचन्द्रप्रभामिव।

मध्येऽम्भसो दुराधर्षां दीप्ता सूर्यप्रभामिव॥१५॥

उनका स्वरूप दिव्य था। विधाता ने बड़े प्रयत्न से उनके अंगों का निर्माण किया था। वे मायामयी-सी प्रतीत होती थीं। धूम से घिरी हुई प्रज्वलित अग्निशिखा-सी जान पड़ती थीं। ओले और बादलों से ढकी हुई पूर्ण चन्द्रमा की प्रभा-सी दिखायी देती थीं तथा जल के भीतर उद्भासित होने वाली सूर्य की दुर्धर्ष प्रभा के समान दृष्टिगोचर होती थीं॥ १४-१५ ॥

सा हि गौतमवाक्येन दुर्निरीक्ष्या बभूव ह।

त्रयाणामपि लोकानां यावद् रामस्य दर्शनम्।

शापस्यान्तमुपागम्य तेषां दर्शनमागता॥१६॥

गौतम के शापवश श्रीरामचन्द्रजी का दर्शन होने से पहले तीनों लोकों  के किसी भी प्राणी के लिये उनका दर्शन होना कठिन था। श्रीराम का दर्शन मिल जाने से जब उनके शाप का अन्त हो गया, तब वे उन सबको दिखायी देने लगीं।

राघवौ तु तदा तस्याः पादौ जगृहतुर्मुदा।

स्मरन्ती गौतमवचः प्रतिजग्राह सा हि तौ॥१७॥

पाद्यमर्थ्य तथाऽऽतिथ्यं चकार सुसमाहिता।

प्रतिजग्राह काकुत्स्थो विधिदृष्टेन कर्मणा॥१८॥

उस समय श्रीराम और लक्ष्मण ने बड़ी प्रसन्नता के साथ अहल्या के दोनों चरणोंका स्पर्श किया। महर्षिगौतम के वचनों का स्मरण करके अहल्या ने बड़ी सावधानी के साथ उन दोनों भाइयों को आदरणीय अतिथि के रूपमें अपनाया और पाद्य, अर्घ्य आदि अर्पित करके उनका आतिथ्य-सत्कार किया। श्रीरामचन्द्रजी ने शास्त्रीय विधि के अनुसार अहल्या का वह आतिथ्य ग्रहण किया॥ १७-१८ ॥

पुष्पवृष्टिर्महत्यासीद् देवदुन्दुभिनिःस्वनैः।

गन्धर्वाप्सरसां चैव महानासीत् समुत्सवः ॥१९॥

उस समय देवताओं की दुन्दुभि बज उठी। साथ ही आकाश से फूलों की बड़ी भारी वर्षा होने लगी। गन्धर्वो और अप्सराओं द्वारा महान् उत्सव मनाया जाने लगा॥ १९॥

साधु साध्विति देवास्तामहल्यां समपूजयन्।

तपोबलविशुद्धांगी गौतमस्य वशानुगाम्॥२०॥

महर्षि गौतम के अधीन रहने वाली अहल्या अपनी तपःशक्ति से विशुद्ध स्वरूप को प्राप्त हुईं—यह देख सम्पूर्ण देवता उन्हें साधुवाद देते हुए उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे॥ २०॥

गौतमोऽपि महातेजा अहल्यासहितः सुखी।

रामं सम्पूज्य विधिवत् तपस्तेपे महातपाः॥२१॥

महातेजस्वी, महातपस्वी गौतम भी अहल्या को अपने साथ पाकर सुखी हो गये। उन्होंने श्रीराम की विधिवत् पूजा करके तपस्या आरम्भ की॥ २१॥

रामोऽपि परमां पूजां गौतमस्य महामुनेः।

सकाशाद् विधिवत् प्राप्य जगाम मिथिलां ततः॥२२॥

महामुनि गौतम की ओर से विधिपूर्वक उत्तम पूजा -आदर-सत्कार पाकर श्रीराम भी मुनिवर विश्वामित्रजी के साथ मिथिलापुरी को चले गये॥ २२ ॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकोनपञ्चाशः सर्गः॥४९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में उनचासवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४९॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(श्रीराम आदि का मिथिला-गमन, राजा जनक द्वारा विश्वामित्र का सत्कार तथा उनका श्रीराम और लक्ष्मण के विषय में जिज्ञासा करना एवं परिचय पाना)

पञ्चाशः सर्गः 

सर्ग-50


ततः प्रागुत्तरां गत्वा रामः सौमित्रिणा सह।

विश्वामित्रं पुरस्कृत्य यज्ञवाटमुपागमत्॥१॥

तदनन्तर लक्ष्मण सहित श्रीराम विश्वामित्रजी को – आगे करके महर्षि गौतम के आश्रम से ईशान कोण की ओर चले और मिथिला नरेश के यज्ञमण्डप में जा पहुँचे॥१॥

रामस्तु मुनिशार्दूलमुवाच सहलक्ष्मणः।

साध्वी यज्ञसमृद्धिर्हि जनकस्य महात्मनः ॥ २॥

वहाँ लक्ष्मण सहित श्रीरामने मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र से कहा—’महाभाग! महात्मा जनक के यज्ञका समारोह तो बड़ा सुन्दर दिखायी दे रहा है।

बहूनीह सहस्राणि नानादेशनिवासिनाम्।

ब्राह्मणानां महाभाग वेदाध्ययनशालिनाम्॥३॥

यहाँ नाना देशोंके निवासी सहस्रों ब्राह्मण जुटे हुए हैं, जो वेदोंके स्वाध्यायसे शोभा पा रहे हैं॥२-३॥

ऋषिवाटाश्च दृश्यन्ते शकटीशतसंकुलाः।

देशो विधीयतां ब्रह्मन् यत्र वत्स्यामहे वयम्॥४॥

‘ऋषियों के बाड़े सैकड़ों छकड़ों से भरे दिखायी दे रहे हैं। ब्रह्मन्! अब ऐसा कोई स्थान निश्चित कीजिये, जहाँ हम लोग भी ठहरें’॥ ४॥

रामस्य वचनं श्रुत्वा विश्वामित्रो महामुनिः।

निवासमकरोद देशे विविक्ते सलिलान्विते॥५॥

श्रीरामचन्द्रजी का यह वचन सुनकर महामुनि विश्वामित्र ने एकान्त स्थान में डेरा डाला, जहाँ पानी का सुभीता था॥५॥

विश्वामित्रमनुप्राप्तं श्रुत्वा नृपवरस्तदा।

शतानन्दं पुरस्कृत्य पुरोहितमनिन्दितः॥६॥

अनिन्द्य (उत्तम) आचार-विचार वाले नृपश्रेष्ठ महाराज जनक ने जब सुना कि विश्वामित्रजी पधारे हैं, तब वे तुरंत अपने पुरोहित शतानन्द को आगे करके [अर्घ्य लिये विनीत भाव से उनका स्वागत करने को चल दिये]॥

ऋत्विजोऽपि महात्मानस्त्वय॑मादाय सत्वरम्।

प्रत्युज्जगाम सहसा विनयेन समन्वितः॥७॥

विश्वामित्राय धर्मेण ददौ धर्मपुरस्कृतम्।

उनके साथ अर्घ्य लिये महात्मा ऋत्विज भी शीघ्रतापूर्वक चले। राजा ने विनीत भाव से सहसा आगे बढ़कर महर्षिकी अगवानी की तथा धर्मशास्त्र के अनुसार विश्वामित्र को धर्मयुक्त अर्घ्य समर्पित किया॥७ १/२॥

प्रतिगृह्य तु तां पूजां जनकस्य महात्मनः॥८॥

पप्रच्छ कुशलं राज्ञो यज्ञस्य च निरामयम्।

महात्मा राजा जनक की वह पूजा ग्रहण करके मुनि ने उनका कुशल-समाचार पूछा तथा उनके यज्ञ की निर्बाध स्थिति के विषय में जिज्ञासा की॥ ८ १/२॥

स तांश्चाथ मुनीन् पृष्ट्वा सोपाध्यायपुरोधसः॥९॥

यथार्हमृषिभिः सर्वैः समागच्छत् प्रहृष्टवत्।

राजा के साथ जो मुनि, उपाध्याय और पुरोहित आये थे, उनसे भी कुशल-मंगल पूछकर विश्वामित्र जी बड़े हर्ष के साथ उन सभी महर्षियों से यथा योग्य मिले॥ ९ १/२॥

अथ राजा मुनिश्रेष्ठं कृताञ्जलिरभाषत॥१०॥

आसने भगवानास्तां सहैभिर्मुनिपुंगवैः।

इसके बाद राजा जनक ने मुनिवर विश्वामित्र से हाथ जोड़कर कहा—’भगवन्! आप इन मुनीश्वरों के साथ आसन पर विराजमान होइये’ ॥ १० १/२॥

जनकस्य वचः श्रुत्वा निषसाद महामुनिः॥११॥

पुरोधा ऋत्विजश्चैव राजा च सहमन्त्रिभिः।

आसनेषु यथान्यायमुपविष्टाः समन्ततः॥१२॥

यह बात सुनकर महामुनि विश्वामित्र आसन पर बैठ गये। फिर पुरोहित, ऋत्विज् तथा मन्त्रियों सहित राजा भी सब ओर यथायोग्य आसनों पर विराजमान हो गये।

दृष्ट्वा स नृपतिस्तत्र विश्वामित्रमथाब्रवीत्।

अद्य यज्ञसमृद्धिर्मे सफला दैवतैः कृता॥१३॥

तत्पश्चात् राजा जनक ने विश्वामित्रजी की ओर देखकर कहा—’भगवन्! आज देवताओं ने मेरे यज्ञ की आयोजना सफल कर दी।। १३ ।।

अद्य यज्ञफलं प्राप्तं भगवदर्शनान्मया।

धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यस्य मे मुनिपुंगवः॥१४॥

यज्ञोपसदनं ब्रह्मन् प्राप्तोऽसि मुनिभिः सह।

‘आज पूज्य चरणों के दर्शन से मैंने यज्ञ का फल पा लिया। ब्रह्मन्! आप मुनियों में श्रेष्ठ हैं आपने इतने महर्षियों के साथ मेरे यज्ञमण्डप में पदार्पण किया, – इससे मैं धन्य हो गया। यह मेरे ऊपर आपका बहुत बड़ा अनुग्रह है॥ १४ १/२॥

द्वादशाहं तु ब्रह्मर्षे दीक्षामाहुर्मनीषिणः॥ १५॥

ततो भागार्थिनो देवान् द्रष्टमर्हसि कौशिक।

‘ब्रह्मर्षे! मनीषी ऋत्विजों का कहना है कि ‘मेरी यज्ञ दीक्षा के बारह दिन ही शेष रह गये हैं,अतः कुशिकनन्दन! बारह दिनों के बाद यहाँ भाग ग्रहण करने के लिये आये हुए देवताओं का दर्शन कीजियेगा’।

इत्युक्त्वा मुनिशार्दूलं प्रहृष्टवदनस्तदा ॥१६॥

पुनस्तं परिपप्रच्छ प्राञ्जलिः प्रयतो नृपः।

मुनिवर विश्वामित्र से ऐसा कहकर उस समय प्रसन्नमुख हुए जितेन्द्रिय राजा जनक ने पुनः उनसे हाथ जोड़कर पूछा— ॥ १६ १/२ ॥

इमौ कुमारौ भद्रं ते देवतुल्यपराक्रमौ॥१७॥

गजतुल्यगती वीरौ शार्दूलवृषभोपमौ।

पद्मपत्रविशालाक्षौ खड्गतूणीधनुर्धरौ।

अश्विनाविव रूपेण समुपस्थितयौवनौ॥१८॥

‘महामुने! आपका कल्याण हो देवताके समान पराक्रमी और सुन्दर आयुध धारण करने वाले ये दोनों वीर राजकुमार जो हाथी के समान मन्दगति से चलते हैं, सिंह और साँड़ के समान जान पड़ते हैं, प्रफुल्ल कमल दल के समान सुशोभित हैं, तलवार, तरकस और धनुष धारण किये हुए हैं, अपने मनोहर रूप से अश्विनीकुमारों को भी लज्जित कर रहे हैं, जिन्होंने अभी-अभी यौवनावस्था में प्रवेश किया है तथा

यदृच्छयेव गां प्राप्तौ देवलोकादिवामरौ।

कथं पद्भ्यामिह प्राप्तौ किमर्थं कस्य वा मुने॥ १९॥

वरायुधधरौ वीरौ कस्य पुत्रौ महामुने।

भूषयन्ताविमं देशं चन्द्रसूर्याविवाम्बरम्॥२०॥

परस्परस्य सदृशौ प्रमाणेङ्गितचेष्टितैः।

काकपक्षधरौ वीरौ श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ २१॥

जो स्वेच्छानुसार देवलोक से उतरकर पृथ्वी पर आये हुए दो देवताओं के समान जान पड़ते हैं, किसके पुत्र हैं? और यहाँ कैसे, किसलिये अथवा किस उद्देश्य से पैदल ही पधारे हैं? जैसे चन्द्रमा और सूर्य आकाश की शोभा बढ़ाते हैं, उसी प्रकार ये अपनी उपस्थिति से इस देश को विभूषित कर रहे हैं। ये दोनों एक-दूसरे से बहुत मिलते-जुलते हैं। इनके शरीर की ऊँचाई, संकेत और चेष्टाएँ प्रायः एक-सी हैं। मैं इन दोनों काकपक्षधारी वीरों का परिचय एवं वृत्तान्त यथार्थरूप से सुनना चाहता हूँ’॥ १७–२१॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा जनकस्य महात्मनः।

न्यवेदयदमेयात्मा पुत्रौ दशरथस्य तौ॥२२॥

महात्मा जनक का यह प्रश्न सुनकर अमित आत्मबल से सम्पन्न विश्वामित्रजी ने कहा—’राजन् ! ये दोनों महाराज दशरथ के पुत्र हैं’ ॥ २२ ॥

सिद्धाश्रमनिवासं च राक्षसानां वधं तथा।

तत्रागमनमव्यग्रं विशालायाश्च दर्शनम्॥२३॥

अहल्यादर्शनं चैव गौतमेन समागमम्।

महाधनुषि जिज्ञासां कर्तुमागमनं तथा॥२४॥

इसके बाद उन्होंने उन दोनों के सिद्धाश्रम में निवास, राक्षसों के वध, बिना किसी घबराहट के मिथिला तक आगमन, विशालापुरी के दर्शन, अहल्या के साक्षात्कार तथा महर्षि गौतम के साथ समागम आदि का विस्तारपूर्वक वर्णन किया। फिर अन्त में यह भी बताया कि ‘ये आपके यहाँ रखे हुए महान् धनुष के सम्बन्ध में कुछ जानने की इच्छा से यहाँ तक आये हैं’। २३-२४॥

एतत् सर्वं महातेजा जनकाय महात्मने।

निवेद्य विररामाथ विश्वामित्रो महामुनिः॥२५॥

महात्मा राजा जनक से ये सब बातें निवेदन करके महातेजस्वी महामुनि विश्वामित्र चुप हो गये॥ २५ ॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे पञ्चाशः सर्गः॥५०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में पचासवाँ सर्ग पूरा हुआ। ५०॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(शतानन्द को अहल्या के उद्धार का समाचार बताना,शतानन्द द्वारा श्रीराम का अभिनन्दन करते हुए विश्वामित्रजी के पूर्वचरित्र का वर्णन)

एकपञ्चाशः सर्गः 

सर्ग-51


तस्य तद् वचनं श्रुत्वा विश्वामित्रस्य धीमतः।

हृष्टरोमा महातेजाः शतानन्दो महातपाः॥१॥

परम बुद्धिमान् विश्वामित्रजी की वह बात सुनकर महातेजस्वी महातपस्वी शतानन्दजी के शरीर में रोमाञ्च हो आया॥१॥

गौतमस्य सुतो ज्येष्ठस्तपसा द्योतितप्रभः।

रामसंदर्शनादेव परं विस्मयमागतः॥२॥

वे गौतम के ज्येष्ठ पुत्र थे तपस्या से उनकी कान्ति प्रकाशित हो रही थी वे श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन मात्र से ही बड़े विस्मित हुए॥२॥

एतौ निषण्णौ सम्प्रेक्ष्य शतानन्दो नृपात्मजौ।

सुखासीनौ मुनिश्रेष्ठं विश्वामित्रमथाब्रवीत्॥३॥

उन दोनों राजकुमारों को सुखपूर्वक बैठे देख शतानन्दने मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्रजी से पूछा- ॥ ३॥

अपि ते मुनिशार्दूल मम माता यशस्विनी।

दर्शिता राजपुत्राय तपोदीर्घमुपागता॥४॥

‘मुनिप्रवर! मेरी यशस्विनी माता अहल्या बहुत दिनों से तपस्या कर रही थीं। क्या आपने राजकुमार श्रीराम को उनका दर्शन कराया? ॥ ४॥

अपि रामे महातेजा मम माता यशस्विनी।

वन्यैरुपाहरत् पूजां पूजार्हे सर्वदेहिनाम्॥५॥

‘क्या मेरी महातेजस्विनी एवं यशस्विनी माता अहल्याने वन में होने वाले फल-फूल आदि से समस्त देहधारियों के लिये पूजनीय श्रीरामचन्द्रजी का पूजन (आदर-सत्कार) किया था? ॥ ५ ॥

अपि रामाय कथितं यद् वृत्तं तत् पुरातनम्।

मम मातुर्महातेजो देवेन दुरनुष्ठितम्॥६॥

‘महातेजस्वी मुने! क्या आपने श्रीराम से वह प्राचीन वृत्तान्त कहा था, जो मेरी माता के प्रति देवराज इन्द्र द्वारा किये गये छल-कपट एवं दुराचार द्वारा घटित हुआ था?॥

अपि कौशिक भद्रं ते गुरुणा मम संगता।

मम माता मुनिश्रेष्ठ रामसंदर्शनादितः॥७॥

‘मुनिश्रेष्ठ कौशिक! आपका कल्याण हो क्या श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन आदि के प्रभाव से मेरी माता शापमुक्त हो पिताजी से जा मिलीं? ॥ ७॥

अपि मे गुरुणा रामः पूजितः कुशिकात्मज।

इहागतो महातेजाः पूजां प्राप्य महात्मनः॥८॥

‘कुशिकनन्दन! क्या मेरे पिता ने श्रीराम का पूजन किया था? क्या उन महात्मा की पूजा ग्रहण करके ये महातेजस्वी श्रीराम यहाँ पधारे हैं? ॥ ८ ॥

अपि शान्तेन मनसा गुरुर्मे कुशिकात्मज।

इहागतेन रामेण पूजितेनाभिवादितः॥९॥

‘विश्वामित्रजी! क्या यहाँ आकर मेरे माता पिता द्वारा सम्मानित हुए श्रीराम ने मेरे पूज्य पिता का शान्त चित्त से अभिवादन किया था?’ ॥९॥

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य विश्वामित्रो महामुनिः।

प्रत्युवाच शतानन्दं वाक्यज्ञो वाक्यकोविदम्॥ १०॥

शतानन्द का यह प्रश्न सुनकर बोलने की कला जानने वाले महामुनि विश्वामित्र ने बातचीत करने में कुशल शतानन्द को इस प्रकार उत्तर दिया- ॥ १० ॥

नातिक्रान्तं मुनिश्रेष्ठ यत्कर्तव्यं कृतं मया।

संगता मुनिना पत्नी भार्गवेणेव रेणुका॥११॥

‘मुनिश्रेष्ठ! मैंने कुछ उठा नहीं रखा है मेरा जो कर्तव्य था, उसे मैंने पूरा किया। महर्षि गौतम से उनकी पत्नी अहल्या उसी प्रकार जा मिली हैं, जैसे भृगुवंशी जमदग्नि से रेणुका मिली है’ ॥ ११ ॥

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य विश्वामित्रस्य धीमतः।

शतानन्दो महातेजा रामं वचनमब्रवीत्॥१२॥

बुद्धिमान् विश्वामित्र की यह बात सुनकर महातेजस्वी शतानन्द ने श्रीरामचन्द्रजी से यह बात कही – ॥१२॥

स्वागतं ते नरश्रेष्ठ दिष्ट्या प्राप्तोऽसि राघव।

विश्वामित्रं पुरस्कृत्य महर्षिमपराजितम्॥१३॥

‘नरश्रेष्ठ! आपका स्वागत है। रघुनन्दन! मेरा अहोभाग्य जो आपने किसी से पराजित न होनेवाले महर्षि विश्वामित्र को आगे करके यहाँ तक पधारने का कष्ट उठाया॥ १३॥

अचिन्त्यकर्मा तपसा ब्रह्मर्षिरमितप्रभः।

विश्वामित्रो महातेजा वेम्येनं परमां गतिम्॥ १४॥

‘महर्षि विश्वामित्र के कर्म अचिन्त्य हैं। ये तपस्या से ब्रह्मर्षिपद को प्राप्त हुए हैं। इनकी कान्ति असीम है और ये महातेजस्वी हैं। मैं इनको जानता हूँ। ये जगत् के परम आश्रय (हितैषी) हैं॥१४॥

नास्ति धन्यतरो राम त्वत्तोऽन्यो भुवि कश्चन।

गोप्ता कुशिकपुत्रस्ते येन तप्तं महत्तपः॥१५॥

‘श्रीराम! इस पृथ्वी पर आपसे बढ़कर धन्यातिधन्य पुरुष दूसरा कोई नहीं है; क्योंकि कुशिकनन्दन विश्वामित्र आपके रक्षक हैं, जिन्होंने बड़ी भारी तपस्या की है।

श्रूयतां चाभिधास्यामि कौशिकस्य महात्मनः।

यथाबलं यथातत्त्वं तन्मे निगदतः शृणु॥१६॥

‘मैं महात्मा कौशिकके बल और स्वरूपका यथार्थ वर्णन करता हूँ। आप ध्यान देकर मुझसे यह सब सुनिये॥१६॥

राजाऽऽसीदेष धर्मात्मा दीर्घकालमरिंदमः।

धर्मज्ञः कृतविद्यश्च प्रजानां च हिते रतः॥१७॥

‘ये विश्वामित्र पहले एक धर्मात्मा राजा थे,इन्होंने शत्रुओं के दमनपूर्वक दीर्घकाल तक राज्य किया था ये धर्मज्ञ और विद्वान् होने के साथ ही प्रजावर्ग के हित साधन में तत्पर रहते थे॥ १७॥

प्रजापतिसुतस्त्वासीत् कुशो नाम महीपतिः।

कुशस्य पुत्रो बलवान् कुशनाभः सुधार्मिकः॥ १८॥

‘प्राचीनकाल में कुश नाम से प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं। वे प्रजापति के पुत्र थे। कुश के बलवान् पुत् रका नाम कुशनाभ हुआ। वह बड़ा ही धर्मात्मा था॥ १८ ॥

कुशनाभसुतस्त्वासीद् गाधिरित्येव विश्रुतः।

गाधेः पुत्रो महातेजा विश्वामित्रो महामुनिः॥

‘कुशनाभ के पुत्र गाधि नाम से विख्यात थे। उन्हीं गाधि के महातेजस्वी पुत्र ये महामुनि विश्वामित्र हैं। १९॥

विश्वामित्रो महातेजाः पालयामास मेदिनीम्।

बहवर्षसहस्राणि राजा राज्यमकारयत्॥२०॥

‘महातेजस्वी राजा विश्वामित्र ने कई हजार वर्षां तक इस पृथ्वी का पालन तथा राज्य का शासन किया। २०॥

कदाचित् तु महातेजा योजयित्वा वरूथिनीम्।

अक्षौहिणीपरिवृतः परिचक्राम मेदिनीम्॥२१॥

‘एक समयकी बात है महातेजस्वी राजा विश्वामित्र सेना एकत्र करके एक अक्षौहिणी सेनाके साथ पृथ्वीपर विचरने लगे॥२१॥

नगराणि च राष्ट्राणि सरितश्च महागिरीन्।

आश्रमान् क्रमशो राजा विचरन्नाजगाम ह॥२२॥

वसिष्ठस्याश्रमपदं नानापुष्पलताद्रुमम्।

नानामृगगणाकीर्णं सिद्धचारणसेवितम्॥२३॥

‘वे अनेकानेक नगरों, राष्ट्रों, नदियों, बड़े-बड़े पर्वतों और आश्रमों में क्रमशः विचरते हुए महर्षिवसिष्ठ के आश्रम पर आ पहुँचे, जो नाना प्रकार के फूलों, लताओं और वृक्षों से शोभा पा रहा था। नाना प्रकार के मृग (वन्यपशु) वहाँ सब ओर फैले हुए थे तथा सिद्ध और चारण उस आश्रम में निवास करते थे॥ २२-२३॥

देवदानवगन्धर्वैः किंनरैरुपशोभितम्।

प्रशान्तहरिणाकीर्णं द्विजसङ्घनिषेवितम्॥२४॥

ब्रह्मर्षिगणसंकीर्णं देवर्षिगणसेवितम्।

‘देवता, दानव, गन्धर्व और किन्नर उसकी शोभा बढाते थे। शान्त मृग वहाँ भरे रहते थे। बहत-से ब्राह्मणों, ब्रह्मर्षियों और देवर्षियोंके समुदाय उसका सेवन करते थे॥ २४ १/२॥

तपश्चरणसंसिद्धैरग्निकल्पैर्महात्मभिः॥ २५॥

सततं संकुलं श्रीमद्ब्रह्मकल्पैर्महात्मभिः ।

अब्भक्षैर्वायुभक्षैश्च शीर्णपर्णाशनैस्तथा॥२६॥

फलमूलाशनैर्दान्तैर्जितदोषैर्जितेन्द्रियैः।

ऋषिभिर्वालखिल्यैश्च जपहोमपरायणैः॥२७॥

अन्यैर्वैखानसैश्चैव समन्तादुपशोभितम्।

वसिष्ठस्याश्रमपदं ब्रह्मलोकमिवापरम्।

ददर्श जयतां श्रेष्ठो विश्वामित्रो महाबलः॥ २८॥

‘तपस्या से सिद्ध हुए अग्नि के समान तेजस्वी महात्मा तथा ब्रह्मा के समान महामहिम महात्मा सदा उस आश्रम में भरे रहते थे। उनमें से कोई जल पीकर रहता था तो कोई हवा पीकर। कितने ही महात्मा फल-मूल खाकर अथवा सूखे पत्ते चबाकर रहते थे। राग आदि दोषों को जीतकर मन और इन्द्रियों पर काबू रखने वाले बहुत-से ऋषि जप-होम में लगे रहते थे। वालखिल्य मुनिगण तथा अन्यान्य वैखानस महात्मासब ओर से उस आश्रम की शोभा बढ़ाते थे। इन सब विशेषताओं के कारण महर्षि वसिष्ठ का वह आश्रम दूसरे ब्रह्मलोक के समान जान पड़ता था। विजयी वीरों में श्रेष्ठ महाबली विश्वामित्र ने उसका दर्शन किया’ ॥ २५–२८॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकपञ्चाशः सर्गः॥५१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में इक्यावनवाँ सर्ग पूरा हुआ।५१॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(महर्षि वसिष्ठ द्वारा विश्वामित्र का सत्कार और कामधेनु को अभीष्ट वस्तुओं की सृष्टि करने का आदेश)

द्विपञ्चाशः सर्गः 

सर्ग-52


तं दृष्ट्वा परमप्रीतो विश्वामित्रो महाबलः।

प्रणतो विनयाद वीरो वसिष्ठं जपतां वरम्॥१॥

‘जप करनेवालों में श्रेष्ठ वसिष्ठ का दर्शन करके महाबली वीर विश्वामित्र बड़े प्रसन्न हुए और विनयपूर्वक उन्होंने उनके चरणों में प्रणाम किया॥१॥

स्वागतं तव चेत्युक्तो वसिष्ठेन महात्मना।

आसनं चास्य भगवान् वसिष्ठो व्यादिदेश ह॥ २॥

‘तब महात्मा वसिष्ठ ने कहा—’राजन्! तुम्हारा स्वागत है।’ ऐसा कहकर भगवान् वसिष्ठ ने उन्हें बैठने के लिये आसन दिया॥२॥

उपविष्टाय च तदा विश्वामित्राय धीमते।

यथान्यायं मुनिवरः फलमूलमुपाहरत्॥३॥

‘जब बुद्धिमान् विश्वामित्र आसन पर विराजमान हुए, तब मुनिवर वसिष्ठ ने उन्हें विधिपूर्वक फलमूल का उपहार अर्पित किया॥३॥

प्रतिगृह्य तु तां पूजां वसिष्ठाद् राजसत्तमः।

तपोऽग्निहोत्रशिष्येषु कुशलं पर्यपृच्छत॥४॥

विश्वामित्रो महातेजा वनस्पतिगणे तदा।

सर्वत्र कुशलं प्राह वसिष्ठो राजसत्तमम्॥५॥

‘वसिष्ठजी से वह आतिथ्य-सत्कार ग्रहण करके राजशिरोमणि महातेजस्वी विश्वामित्र ने उनके तप, अग्निहोत्र, शिष्यवर्ग और लता-वृक्ष आदिका कुशल समाचार पूछा, फिर वसिष्ठजी ने उन नृपश्रेष्ठ से सबके सकुशल होने की बात बतायी॥ ४-५॥

सुखोपविष्टं राजानं विश्वामित्रं महातपाः।

पप्रच्छ जपतां श्रेष्ठो वसिष्ठो ब्रह्मणः सुतः॥६॥

‘फिर जप करनेवालोंमें श्रेष्ठ ब्रह्मकुमार महातपस्वी वसिष्ठने वहाँ सुखपूर्वक बैठे हुए राजा विश्वामित्रसे इस प्रकार पूछा- ॥६॥

कच्चित्ते कुशलं राजन् कच्चिद् धर्मेण रञ्जयन्।

प्रजाः पालयसे राजन् राजवृत्तेन धार्मिक॥७॥

‘राजन् ! तुम सकुशल तो हो न? धर्मात्मा नरेश! क्या तुम धर्मपूर्वक प्रजा को प्रसन्न रखते हुए राजोचित रीति-नीति से प्रजावर्ग का पालन करते हो?॥७॥

कच्चित्ते सम्भृता भृत्याः कच्चित् तिष्ठन्ति शासने।

कच्चित्ते विजिताः सर्वे रिपवो रिपुसूदन॥८॥

‘शत्रुसूदन! क्या तुमने अपने भृत्यों का अच्छी तरह भरण-पोषण किया है? क्या वे तुम्हारी आज्ञा के अधीन रहते हैं? क्या तुमने समस्त शत्रुओं पर विजय पा ली है?॥

कच्चिद् बलेषु कोशेषु मित्रेषु च परंतप।

कुशलं ते नरव्याघ्र पुत्रपौत्रे तथानघ॥९॥

‘शत्रुओं को संताप देने वाले पुरुषसिंह निष्पाप नरेश! क्या तुम्हारी सेना, कोश, मित्रवर्ग तथा पुत्रपौत्र आदि सब सकुशल हैं ?’ ॥९॥

सर्वत्र कुशलं राजा वसिष्ठं प्रत्युदाहरत्।

विश्वामित्रो महातेजा वसिष्ठं विनयान्वितम्॥ १०॥

‘तब महातेजस्वी राजा विश्वामित्र ने विनयशील महर्षि वसिष्ठ को उत्तर दिया—’हाँ भगवन् ! मेरे यहाँ सर्वत्र कुशल है?’ ॥ १०॥

कृत्वा तौ सुचिरं कालं धर्मिष्ठौ ताः कथास्तदा।

मुदा परमया युक्तौ प्रीयेतां तौ परस्परम्॥११॥

‘तत्पश्चात् वे दोनों धर्मात्मा पुरुष बड़ी प्रसन्नताके साथ बहुत देरतक परस्पर वार्तालाप करते रहे। उस समय एकका दूसरेके साथ बड़ा प्रेम हो गया॥ ११ ॥

 ततो वसिष्ठो भगवान् कथान्ते रघुनन्दन।

विश्वामित्रमिदं वाक्यमुवाच प्रहसन्निव॥१२॥

‘रघुनन्दन! बातचीत करने के पश्चात् भगवान् वसिष्ठ ने विश्वामित्र से हँसते हुए-से इस प्रकार कहा – ॥१२॥

आतिथ्यं कर्तुमिच्छामि बलस्यास्य महाबल।

तव चैवाप्रमेयस्य यथार्ह सम्प्रतीच्छ मे॥१३॥

‘महाबली नरेश! तुम्हारा प्रभाव असीम है मैं तुम्हारा और तुम्हारी इस सेना का यथा योग्य आतिथ्यसत्कार करना चाहता हूँ तुम मेरे इस अनुरोध को स्वीकार करो॥ १३॥

सत्क्रियां हि भवानेतां प्रतीच्छतु मया कृताम्।

राजंस्त्वमतिथिश्रेष्ठः पूजनीयः प्रयत्नतः॥१४॥

‘राजन्! तुम अतिथियों में श्रेष्ठ हो, इसलिये यत्नपूर्वक तुम्हारा सत्कार करना मेरा कर्तव्य है अतः मेरे द्वारा किये गये इस सत्कार को तुम ग्रहण करो’ ॥ १४॥

एवमुक्तो वसिष्ठेन विश्वामित्रो महामतिः।

कृतमित्यब्रवीद् राजा पूजावाक्येन मे त्वया॥ १५॥

‘वसिष्ठ के ऐसा कहने पर महाबुद्धिमान् राजा विश्वामित्र ने कहा—’मुने! आपके सत्कारपूर्ण वचनों से ही मेरा पूर्ण सत्कार हो गया॥ १५ ॥

फलमूलेन भगवन् विद्यते यत् तवाश्रमे।

पाद्येनाचमनीयेन भगवदर्शनेन च ॥१६॥

‘भगवन् ! आपके आश्रम पर जो विद्यमान हैं, उन फल-मूल, पाद्य और आचमनीय आदि वस्तुओं से मेरा भलीभाँति आदर-सत्कार हुआ है। सबसे बढ़कर जो आपका दर्शन हुआ, इसी से मेरी पूजा हो गयी।१६॥

सर्वथा च महाप्राज्ञ पूजाहेण सुपूजितः।

नमस्तेऽस्तु गमिष्यामि मैत्रेणेक्षस्व चक्षुषा॥१७॥

‘महाज्ञानी महर्षे! आप सर्वथा मेरे पूजनीय हैं तो भी आपने मेरा भलीभाँति पूजन किया आपको नमस्कार है अब मैं यहाँ से जाऊँगा। आप मैत्रीपूर्ण दृष्टि से मेरी ओर देखिये’ ॥ १७॥

एवं ब्रुवन्तं राजानं वसिष्ठं पुनरेव हि।

न्यमन्त्रयत धर्मात्मा पुनः पुनरुदारधीः॥१८॥

ऐसा कहते हुए राजा विश्वामित्र से उदारचेता धर्मात्मा वसिष्ठ ने निमन्त्रण स्वीकार करने के लिये बारम्बार आग्रह किया॥ १८ ॥

बाढमित्येव गाधेयो वसिष्ठं प्रत्युवाच ह।

यथाप्रियं भगवतस्तथास्तु मुनिपुंगव॥१९॥

तब गाधिनन्दन विश्वामित्र ने उन्हें उत्तर देते हुए कहा—’बहुत अच्छा,मुझे आपकी आज्ञा स्वीकार है। मुनिप्रवर! आप मेरे पूज्य हैं आपकी जैसी रुचि हो—आपको जो प्रिय लगे, वही हो’ ॥ १९॥

एवमुक्तस्तथा तेन वसिष्ठो जपतां वरः।

आजुहाव ततः प्रीतः कल्माषीं धूतकल्मषाम्॥ २०॥

‘राजा के ऐसा कहने पर जप करने वालों में श्रेष्ठ मुनिवर वसिष्ठ बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने अपनी उस चितकबरी होम-धेनु को बुलाया, जिसके पाप (अथवा मैल) धुल गये थे (वह कामधेनु थी) ॥ २० ॥

एह्येहि शबले क्षिप्रं शृणु चापि वचो मम।

सबलस्यास्य राजर्षेः कर्तुं व्यवसितोऽस्म्यहम्।

भोजनेन महार्हेण सत्कारं संविधत्स्व मे॥२१॥

(उसे बुलाकर ऋषिने कहा-) शबले! शीघ्र आओ, आओ और मेरी यह बात सुनो—मैंने सेनासहित इन राजर्षि का महाराजाओं के योग्य उत्तम भोजन आदिके द्वारा आतिथ्य-सत्कार करने का निश्चय किया है तुम मेरे इस मनोरथ को सफल करो॥ २१॥

यस्य यस्य यथाकामं षड्रसेष्वभिपूजितम्।

तत् सर्वं कामधुग् दिव्ये अभिवर्ष कृते मम॥ २२॥

‘षड्रस भोजनों मेंसे जिसको जो-जो पसंद हो, उसके लिये वह सब प्रस्तुत कर दो। दिव्य कामधेनो! आज मेरे कहने से इन अतिथियों के लिये अभीष्ट वस्तुओं की वर्षा करो॥ २२॥

रसेनान्नेन पानेन लेह्यचोष्येण संयुतम्।

अन्नानां निचयं सर्वं सृजस्व शबले त्वर ॥२३॥

‘शबले! सरस पदार्थ, अन्न, पान, लेह्य (चटनी आदि) और चोष्य (चूसने की वस्तु) से युक्त भाँतिभाँति के अन्नों की ढेरी लगा दो। सभी आवश्यक वस्तुओं की सृष्टि कर दो,शीघ्रता करो—विलम्ब न होने पावे’ ॥ २३॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे द्विपञ्चाशः सर्गः॥५२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में बावनवाँ सर्ग पूरा हुआ।५२॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

 (विश्वामित्र का वसिष्ठ से उनकी कामधेनु को माँगना और उनका देने से अस्वीकार करना)

त्रिपञ्चाशः सर्गः 

सर्ग-53


एवमुक्ता वसिष्ठेन शबला शत्रुसूदन।

विदधे कामधुक् कामान् यस्य यस्येप्सितं यथा॥

‘शत्रुसूदन! महर्षि वसिष्ठ के ऐसा कहनेपर चितकबरे रंग की उस कामधेनु ने जिसकी जैसी इच्छा थी, उसके लिये वैसी ही सामग्री जुटा दी॥१॥

इथून् मधूंस्तथा लाजान् मैरेयांश्च वरासवान्।

पानानि च महार्हाणि भक्ष्यांश्चोच्चावचानपि॥ २॥

‘ईख, मधु, लावा, मैरेय, श्रेष्ठ आसव, पानक रस आदि नाना प्रकार के बहुमूल्य भक्ष्य-पदार्थ प्रस्तुत कर दिये॥२॥

उष्णाढ्यस्यौदनस्यात्र राशयः पर्वतोपमाः।

मृष्टान्यन्नानि सूपांश्च दधिकुल्यास्तथैव च ॥३॥

‘गरम-गरम भात के पर्वत के सदृश ढेर लग गये मिष्टान्न (खीर) और दाल भी तैयार हो गयी। दूध, दही और घीकी तो नहरें बह चलीं॥३॥

नानास्वादुरसानां च खाण्डवानां तथैव च।

भोजनानि सुपूर्णानि गौडानि च सहस्रशः॥४॥

‘भाँति-भाँति के सुस्वादु रस, खाण्डव तथा नाना प्रकार के भोजनों से भरी हुई चाँदी की सहस्रों थालियाँ सज गयीं॥ ४॥

सर्वमासीत् सुसंतुष्टं हृष्टपुष्टजनायुतम्।

विश्वामित्रबलं राम वसिष्ठेन सुतर्पितम्॥५॥

‘श्रीराम! महर्षि वसिष्ठ ने विश्वामित्रजी की सारी सेना के लोगों को भलीभाँति तृप्त किया। उस सेना में बहुत-से हृष्ट-पुष्ट सैनिक थे। उन सबको वह दिव्य भोजन पाकर बड़ा संतोष हुआ॥५॥

विश्वामित्रो हि राजर्षिर्हृष्टपुष्टस्तदाभवत्।

सान्तःपुरवरो राजा सब्राह्मणपुरोहितः॥६॥

‘राजर्षि विश्वामित्र भी उस समय अन्तःपुर की रानियों, ब्राह्मणों और पुरोहितों के साथ बहुत ही हृष्टपुष्ट हो गये॥६॥

सामात्यो मन्त्रिसहितः सभृत्यः पूजितस्तदा।

युक्तः परमहर्षेण वसिष्ठमिदमब्रवीत्॥७॥

‘अमात्य, मन्त्री और भृत्योंसहित पूजित हो वे बहुत प्रसन्न हुए और वसिष्ठजी से इस प्रकार बोले

पूजितोऽहं त्वया ब्रह्मन् पूजाहेण सुसत्कृतः।

श्रूयतामभिधास्यामि वाक्यं वाक्यविशारद॥८॥

‘ब्रह्मन् ! आप स्वयं मेरे पूजनीय हैं तो भी आपने मेरा पूजन किया, भलीभाँति स्वागत-सत्कार किया, बातचीत करने में कुशल महर्षे ! अब मैं एक बात कहता हूँ, उसे सुनिये॥८॥

गवां शतसहस्रेण दीयतां शबला मम।

रत्नं हि भगवन्नेतद रत्नहारी च पार्थिवः॥९॥

तस्मान्मे शबलां देहि ममैषा धर्मतो द्विज।

‘भगवन्! आप मुझसे एक लाख गौएँ लेकर यह चितकबरी गाय मुझे दे दीजिये; क्योंकि यह गौ रत्नरूप है और रत्न लेने का अधिकारी राजा होता है। ब्रह्मन् ! मेरे इस कथनपर ध्यान देकर मुझे यह शबला गौ दे दीजिये; क्योंकि यह धर्मतः मेरी ही वस्तु है’। ९१/२॥

एवमुक्तस्तु भगवान् वसिष्ठो मुनिपुंगवः ॥१०॥

विश्वामित्रेण धर्मात्मा प्रत्युवाच महीपतिम्।

‘विश्वामित्र के ऐसा कहने पर धर्मात्मा मुनिवर भगवान् वसिष्ठ राजा को उत्तर देते हुए बोले- ॥ १० १/२॥

नाहं शतसहस्रेण नापि कोटिशतैर्गवाम्॥११॥

राजन् दास्यामि शबलां राशिभी रजतस्य वा।

न परित्यागमयं मत्सकाशादरिंदम॥१२॥

‘शत्रुओं का दमन करने वाले नरेश्वर! मैं एक लाख या सौ करोड़ अथवा चाँदी के ढेर लेकर भी बदले में इस शबला गौ को नहीं दूंगा। यह मेरे पास से अलग होने योग्य नहीं है॥ १२॥

शाश्वती शबला मह्यं कीर्तिरात्मवतो यथा।

अस्यां हव्यं च कव्यं च प्राणयात्रा तथैव च॥१३॥

‘जैसे मनस्वी पुरुष की अक्षय कीर्ति कभी उससे अलग नहीं रह सकती, उसी प्रकार यह सदा मेरे साथ सम्बन्ध रखने वाली शबला गौ मुझसे पृथक् नहीं रह सकती। मेरा हव्य-कव्य और जीवन-निर्वाह इसी पर निर्भर है॥ १३॥

आयत्तमग्निहोत्रं च बलि.मस्तथैव च।

स्वाहाकारवषट्कारौ विद्याश्च विविधास्तथा॥ १४॥

‘मेरे अग्निहोत्र, बलि, होम, स्वाहा, वषट्कार और भाँति-भाँति की विद्याएँ इस कामधेनु के ही अधीन हैं। १४॥

आयत्तमत्र राजर्षे सर्वमेतन्न संशयः।

सर्वस्वमेतत् सत्येन मम तुष्टिकरी तथा॥१५॥

कारणैर्बहभी राजन् न दास्ये शबलां तव।

‘राजर्षे ! मेरा यह सब कुछ इस गौके ही अधीन है, इसमें संशय नहीं है, मैं सच कहता हूँ—यह गौ ही मेरा सर्वस्व है और यही मुझे सब प्रकार से संतुष्ट करने वाली है। राजन् ! बहुत-से ऐसे कारण हैं, जिनसे बाध्य होकर मैं यह शबला गौ आपको नहीं दे सकता’ ॥ १५ १/२॥

वसिष्ठेनैवमुक्तस्तु विश्वामित्रोऽब्रवीत् तदा॥ १६॥

संरब्धतरमत्यर्थं वाक्यं वाक्यविशारदः।

‘वसिष्ठजी के ऐसा कहने पर बोलने में कुशल विश्वामित्र अत्यन्त क्रोधपूर्वक इस प्रकार बोले—॥ १६ १/२॥

हैरण्यकक्षप्रैवेयान् सुवर्णाङ्कशभूषितान्॥१७॥

ददामि कुञ्जराणां ते सहस्राणि चतुर्दश।

‘मुने! मैं आपको चौदह हजार ऐसे हाथी दे रहा हूँ, जिनके कसने वाले रस्से, गले के आभूषण और अंकुश भी सोने के बने होंगे और उन सबसे वे हाथी विभूषित होंगे॥ १७ १/२॥

हैरण्यानां रथानां च श्वेताश्वानां चतुर्युजाम्॥ १८॥

ददामि ते शतान्यष्टौ किंकिणीकविभूषितान्।

हयानां देशजातानां कुलजानां महौजसाम्।

सहस्रमेकं दश च ददामि तव सुव्रत॥१९॥

नानावर्णविभक्तानां वयःस्थानां तथैव च।

ददाम्येकां गवां कोटिं शबला दीयतां मम॥ २०॥

‘उत्तम व्रत का पालन करने वाले मुनीश्वर! इनके सिवा मैं आठ सौ सुवर्णमय रथ प्रदान करूँगा; जिनमें शोभा के लिये सोने के घुघुरू लगे होंगे और हर एक रथ में चार-चार सफेद रंग के घोड़े जुते हुए होंगे तथा अच्छी जाति और उत्तम देश में उत्पन्न महातेजस्वी ग्यारह हजार घोड़े भी आपकी सेवा में अर्पित करूँगा। इतना ही नहीं, नाना प्रकार के रंगवाली नयी अवस्था की एक करोड़ गौएँ भी दूंगा, परंतु यह शबला गौ मुझे दे दीजिये॥ १८-२०॥

यावदिच्छसि रत्नानि हिरण्यं वा द्विजोत्तम।

तावद् ददामि ते सर्वं दीयतां शबला मम॥२१॥

‘द्विजश्रेष्ठ! इनके अतिरिक्त भी आप जितने रत्न या सुवर्ण लेना चाहें, वह सब आपको देनेके लिये मैं तैयार हूँ; किंतु यह चितकबरी गाय मुझे दे दीजिये’।२१॥

एवमुक्तस्तु भगवान् विश्वामित्रेण धीमता।

न दास्यामीति शबलां प्राह राजन् कथंचन॥ २२॥

‘बुद्धिमान् विश्वामित्र के ऐसा कहने पर भगवान् वसिष्ठ बोले—’राजन्! मैं यह चितकबरी गाय तुम्हें किसी तरह भी नहीं दूंगा॥ २२ ॥

एतदेव हि मे रत्नमेतदेव हि मे धनम्।

एतदेव हि सर्वस्वमेतदेव हि जीवितम्॥२३॥

‘यही मेरा रत्न है, यही मेरा धन है, यही मेरा सर्वस्व है और यही मेरा जीवन है॥ २३ ॥

दर्शश्च पौर्णमासश्च यज्ञाश्चैवाप्तदक्षिणाः।

एतदेव हि मे राजन् विविधाश्च क्रियास्तथा॥ २४॥

‘राजन् ! मेरे दर्श, पौर्णमास, प्रचुर दक्षिणावाले यज्ञ तथा भाँति-भाँति के पुण्यकर्म—यह गौ ही है। इसी पर ही मेरा सब कुछ निर्भर है॥ २४ ॥

अतोमूलाः क्रियाः सर्वा मम राजन् न संशयः।

बहुना किं प्रलापेन न दास्ये कामदोहिनीम्॥ २५॥

‘नरेश्वर ! मेरे सारे शुभ कर्मों का मूल यही है, इसमें संशय नहीं है, बहुत व्यर्थ बात करने से क्या लाभ मैं इस कामधेनु को कदापि नहीं दूंगा’ ॥ २५ ॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे त्रिपञ्चाशः सर्गः॥५३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में तिरपनवाँ सर्ग पूरा हुआ।५३॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(विश्वामित्र का वसिष्ठजी की गौ को बलपूर्वक ले जाना, गौका दुःखी होकर वसिष्ठजी से इसका कारण पूछना, विश्वामित्रजी की सेना का संहार करना)

चतुःपञ्चाशः सर्गः 

सर्ग-54


कामधेनुं वसिष्ठोऽपि यदा न त्यजते मुनिः।

तदास्य शबलां राम विश्वामित्रोऽन्वकर्षत॥१॥

‘श्रीराम! जब वसिष्ठ मुनि किसी तरह भी उस कामधेनु गौको देने के लिये तैयार न हुए, तब राजा विश्वामित्र उस चितकबरे रंग की धेनु को बलपूर्वक घसीट ले चले॥१॥

नीयमाना तु शबला राम राज्ञा महात्मना।

दुःखिता चिन्तयामास रुदन्ती शोककर्शिता॥ २॥

‘रघुनन्दन! महामनस्वी राजा विश्वामित्र के द्वारा इस प्रकार ले जायी जाती हुई वह गौ शोकाकुल हो मन-ही-मन रो पड़ी और अत्यन्त दुःखित हो विचार करने लगी- ॥२॥

परित्यक्ता वसिष्ठेन किमहं सुमहात्मना।

याहं राजभृतैर्दीना ह्रियेय भृशदुःखिता॥३॥

‘अहो! क्या महात्मा वसिष्ठ ने मुझे त्याग दिया है, जो ये राजा के सिपाही मुझ दीन और अत्यन्तदुःखिया गौ को इस तरह बलपूर्वक लिये जा रहे हैं? ॥३॥

किं मयापकृतं तस्य महर्षे वितात्मनः।

यन्मामनागसं दृष्ट्वा भक्तां त्यजति धार्मिकः॥४॥

‘पवित्र अन्तःकरण वाले उन महर्षि का मैंने क्या अपराध किया है कि वे धर्मात्मा मुनि मुझे निरपराध और अपना भक्त जानकर भी त्याग रहे हैं?’ ॥ ४॥

इति संचिन्तयित्वा तु निःश्वस्य च पुनः पुनः।

जगाम वेगेन तदा वसिष्ठं परमौजसम्॥५॥

निर्धूय तांस्तदा भृत्यान् शतशः शत्रुसूदन।

‘शत्रुसूदन! यह सोचकर वह गौ बारम्बार लंब साँस लेने लगी और राजा के उन सैकड़ों सेवकों को झटककर उस समय महातेजस्वी वसिष्ठ मुनि के पास बड़े वेग से जा पहुँची॥ ५ १/२ ॥

जगामानिलवेगेन पादमूलं महात्मनः॥६॥

शबला सा रुदन्ती च क्रोशन्ती चेदमब्रवीत्।

वसिष्ठस्याग्रतः स्थित्वा रुदन्ती मेघनिःस्वना॥ ७॥

‘वह शबला गौ वायु के समान वेग से उन महात्मा के चरणों के समीप गयी और उनके सामने खड़ी हो मेघ के समान गम्भीर स्वर से रोती-चीत्कार करती हुई उनसे इस प्रकार बोली- ॥६-७॥

भगवन् किं परित्यक्ता त्वयाहं ब्रह्मणः सुत।

यस्माद् राजभटा मां हि नयन्ते त्वत्सकाशतः॥ ८॥

‘भगवन् ! ब्रह्मकुमार! क्या आपने मुझे त्याग दिया,जो ये राजा के सैनिक मुझे आपके पास से दूर लिये जा रहे हैं?’ ॥ ८॥

एवमुक्तस्तु ब्रह्मर्षिरिदं वचनमब्रवीत्।

शोकसंतप्तहृदयां स्वसारमिव दुःखिताम्॥९॥

‘उसके ऐसा कहने पर ब्रह्मर्षि वसिष्ठ शोक से संतप्त हृदयवाली दुःखिया बहिन के समान उस गौ से इस प्रकार बोले- ॥९॥

न त्वां त्यजामि शबले नापि मेऽपकृतं त्वया।

एष त्वां नयते राजा बलान्मत्तो महाबलः॥१०॥

‘शबले! मैं तुम्हारा त्याग नहीं करता तुमने मेरा कोई अपराध नहीं किया है,ये महाबली राजा अपने बल से मतवाले होकर तुमको मुझसे छीनकर ले जा रहे हैं॥ १०॥

नहि तुल्यं बलं मह्यं राजा त्वद्य विशेषतः।

बली राजा क्षत्रियश्च पृथिव्याः पतिरेव च॥ ११॥

‘मेरा बल इनके समान नहीं है विशेषतःआजकल ये राजा के पदपर प्रतिष्ठित हैं। राजा, क्षत्रिय तथा इस पृथ्वी के पालक होने के कारण ये बलवान् हैं।॥ ११॥

इयमक्षौहिणी पूर्णा गजवाजिरथाकुला।

हस्तिध्वजसमाकीर्णा तेनासौ बलवत्तरः॥१२॥

‘इनके पास हाथी, घोड़े और रथों से भरी हुई यह अक्षौहिणी सेना है, जिसमें हाथियों के हौदों पर लगे हुए ध्वज सब ओर फहरा रहे हैं। इस सेना के कारण भी ये मुझसे प्रबल हैं’ ॥ १२॥

एवमुक्ता वसिष्ठेन प्रत्युवाच विनीतवत्।

वचनं वचनज्ञा सा ब्रह्मर्षिमतुलप्रभम्॥१३॥

‘वसिष्ठजी के ऐसा कहने पर बातचीत के मर्म को समझने वाली उस कामधेनु ने उन अनुपम तेजस्वी ब्रह्मर्षि से यह विनययुक्त बात कही- ॥१३॥

न बलं क्षत्रियस्याहुर्ब्राह्मणा बलवत्तराः।

ब्रह्मन् ब्रह्मबलं दिव्यं क्षात्राच्च बलवत्तरम्॥ १४॥

“ब्रह्मन् ! क्षत्रिय का बल कोई बल नहीं है ब्राह्मण ही क्षत्रिय आदि से अधिक बलवान् होते हैं। ब्राह्मणका बल दिव्य है। वह क्षत्रिय-बल से अधिक प्रबल होता है।

अप्रमेयं बलं तुभ्यं न त्वया बलवत्तरः।

विश्वामित्रो महावीर्यस्तेजस्तव दुरासदम्॥१५॥

“आपका बल अप्रमेय है। महापराक्रमी विश्वामित्र आपसे अधिक बलवान् नहीं हैं। आपका तेज दुर्धर्ष है॥ १५ ॥

नियुक्ष्व मां महातेजस्त्वं ब्रह्मबलसम्भृताम्।

तस्य दर्पं बलं यत्नं नाशयामि दुरात्मनः॥१६॥

“महातेजस्वी महर्षे! मैं आपके ब्रह्मबल से परिपुष्ट हुई हूँ अतः आप केवल मुझे आज्ञा दे दीजिये। मैं इस दुरात्मा राजा के बल, प्रयत्न और अभिमान को अभी चूर्ण किये देती हूँ’॥ १६ ॥

इत्युक्तस्तु तया राम वसिष्ठस्तु महायशाः।

सृजस्वेति तदोवाच बलं परबलार्दनम्॥१७॥

‘श्रीराम! कामधेनु के ऐसा कहने पर महायशस्वी वसिष्ठ ने कहा—’इस शत्रु-सेना को नष्ट करने वाले सैनिकों की सृष्टि करो’ ॥ १७॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा सुरभिः सासृजत् तदा।

तस्या हुंभारवोत्सृष्टाः पहलवाः शतशो नृप। १८॥

‘राजकुमार ! उनका वह आदेश सुनकर उस गौने उस समय वैसा ही किया। उसके हुंकार करते ही सैकड़ों पह्नव जाति के वीर पैदा हो गये॥१८॥

नाशयन्ति बलं सर्वं विश्वामित्रस्य पश्यतः।

स राजा परमक्रुद्धः क्रोधविस्फारितेक्षणः॥१९॥

वे सब विश्वामित्र के देखते-देखते उनकी सारी सेना का नाश करने लगे। इससे राजा विश्वामित्र को बड़ा क्रोध हुआ वे रोष से आँखें फाड़-फाड़कर देखने लगे॥ १९॥

पहलवान् नाशयामास शस्त्रैरुच्चावचैरपि।

विश्वामित्रार्दितान् दृष्ट्वा पलवान् शतशस्तदा॥ २०॥

भूय एवासृजद् घोरान् शकान् यवनमिश्रितान्।

तैरासीत् संवृता भूमिः शकैर्यवनमिश्रितैः॥२१॥

‘उन्होंने छोटे-बड़े कई तरह के अस्त्रों का प्रयोग करके उन पहलवों का संहार कर डाला विश्वामित्र द्वारा उन सैकड़ों पहलवों को पीड़ित एवं नष्ट हुआ देख उस समय उस शबला गौ ने पुनः यवन मिश्रित शक जाति के भयंकर वीरों को उत्पन्न किया उन यवन मिश्रित शकों से वहाँ की सारी पृथ्वी भर गयी॥ २०-२१॥

प्रभावद्भिर्महावीहेमकिंजल्कसंनिभैः।

तीक्ष्णासिपट्टिशधरैर्हेमवर्णाम्बरावृतैः॥२२॥

निर्दग्धं तबलं सर्वं प्रदीप्तैरिव पावकैः।

ततोऽस्त्राणि महातेजा विश्वामित्रो मुमोच ह।

तैस्ते यवनकाम्बोजा बर्बराश्चाकुलीकृताः॥ २३॥

‘वे वीर महापराक्रमी और तेजस्वी थे। उनके शरीरकी कान्ति सुवर्ण तथा केसर के समान थी। वे सुनहरे वस्त्रों से अपने शरीर को ढंके हुए थे। उन्होंने हाथों में तीखे खड्ग और पट्टिश ले रखे थे। प्रज्वलित अग्नि के समान उद्भासित होने वाले उन वीरों ने विश्वामित्र की सारी सेना को भस्म करना आरम्भ किया, तब महातेजस्वी विश्वामित्र ने उन पर बहुत-से अस्त्र छोड़े उन अस्त्रों की चोट खाकर वे यवन, काम्बोज और बर्बर जाति के योद्धा व्याकुल हो उठे’ ।। २२-२३॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे चतुःपञ्चाशः सर्गः॥५४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आपरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में चौवनवाँ सर्ग पूरा हुआ। ५४॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(अपने सौ पुत्रों और सारी सेना के नष्ट हो जाने पर विश्वामित्र का तपस्या करके दिव्यास्त्र पाना, वसिष्ठजी का ब्रह्मदण्ड लेकर उनके सामने खड़ा होना)

पञ्चपञ्चाशः सर्गः 

सर्ग-55


ततस्तानाकुलान् दृष्ट्वा विश्वामित्रास्त्रमोहितान्।

वसिष्ठश्चोदयामास कामधुक् सृज योगतः॥१॥

‘विश्वामित्र के अस्त्रों से घायल होकर उन्हें व्याकुल हुआ देख वसिष्ठजी ने फिर आज्ञा दी—’कामधेनो! अब योग बल से दूसरे सैनिकों की सृष्टि करो’ ॥ १॥

तस्या हुंकारतो जाताः काम्बोजा रविसंनिभाः।

ऊधसश्चाथ सम्भूता बर्बराः शस्त्रपाणयः॥२॥

‘तब उस गौ ने फिर हुंकार किया उसके हुंकार से सूर्य के समान तेजस्वी काम्बोज उत्पन्न हुए थन से शस्त्रधारी बर्बर प्रकट हुए॥२॥

योनिदेशाच्च यवनाः शकृद्देशाच्छकाः स्मृताः।

रोमकूपेषु म्लेच्छाश्च हारीताः सकिरातकाः॥ ३॥

‘योनि देश से यवन और शकृद्देश (गोबर के स्थान) से शक उत्पन्न हुए। रोमकूपों से म्लेच्छ, हारीत और किरात प्रकट हुए॥३॥

तैस्तन्निषूदितं सर्वं विश्वामित्रस्य तत्क्षणात्।

सपदातिगजं साश्वं सरथं रघुनन्दन॥४॥

‘रघुनन्दन! उन सब वीरों ने पैदल, हाथी, घोड़े और रथसहित विश्वामित्र की सारी सेना का तत्काल संहार कर डाला॥४॥

दृष्ट्वा निषूदितं सैन्यं वसिष्ठेन महात्मना।

विश्वामित्रसुतानां तु शतं नानाविधायुधम्॥५॥

अभ्यधावत् सुसंक्रुद्धं वसिष्ठं जपतां वरम्।

हंकारेणैव तान् सर्वान् निर्ददाह महानृषिः॥६॥

‘महात्मा वसिष्ठ द्वारा अपनी सेना का संहार हुआ देख विश्वामित्र के सौ पुत्र अत्यन्त क्रोध में भर गये और नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्र लेकर जप करने वालों में श्रेष्ठ वसिष्ठमुनि पर टूट पड़े,तब उन महर्षि ने हुंकार मात्र से उन सबको जलाकर भस्म कर डाला॥ ५-६॥

ते साश्वरथपादाता वसिष्ठेन महात्मना।

भस्मीकृता मुहूर्तेन विश्वामित्रसुतास्तथा॥७॥

‘महात्मा वसिष्ठ द्वारा विश्वामित्र के वे सभी पुत्र दो ही घड़ी में घोड़े, रथ और पैदल सैनिकों सहित जलाकर भस्म कर डाले गये॥७॥

दृष्टा विनाशितान् सर्वान् बलं च सुमहायशाः।

सव्रीडं चिन्तयाविष्टो विश्वामित्रोऽभवत् तदा॥ ८॥

‘अपने समस्त पुत्रों तथा सारी सेना का विनाश हुआ देख महायशस्वी विश्वामित्र लज्जित हो बड़ी चिन्ता में पड़ गये॥ ८॥

समुद्र इव निर्वेगो भग्नद्रष्ट्र इवोरगः।

उपरक्त इवादित्यः सद्यो निष्प्रभतां गतः॥९॥

‘समुद्र के समान उनका सारा वेग शान्त हो गया जिसके दाँत तोड़ लिये गये हों उस सर्प के समान तथा राहुग्रस्त सूर्य की भाँति वे तत्काल ही निस्तेज हो गये॥

हतपुत्रबलो दीनो लूनपक्ष इव द्विजः।

हतसर्वबलोत्साहो निर्वेदं समपद्यत॥१०॥

‘पुत्र और सेना दोनों के मारे जाने से वे पंख कटे हुए पक्षी के समान दीन हो गये। उनका सारा बल और उत्साह नष्ट हो गया। वे मन-ही-मन बहुत खिन्न हो उठे॥ १० ॥

स पुत्रमेकं राज्याय पालयेति नियुज्य च।

पृथिवीं क्षत्रधर्मेण वनमेवाभ्यपद्यत॥११॥

‘उनके एक ही पुत्र बचा था, उसको उन्होंने राजा के पदपर अभिषिक्त करके राज्य की रक्षा के लिये नियुक्त कर दिया और क्षत्रिय-धर्म के अनुसार पृथ्वी के पालन की आज्ञा देकर वे वन में चले गये॥ ११ ॥

स गत्वा हिमवत्पार्वे किंनरोरगसेवितम्।

महादेवप्रसादार्थं तपस्तेपे महातपाः॥१२॥

‘हिमालयके पार्श्वभाग में, जो किन्नरों और नागों से सेवित प्रदेश है, वहाँ जाकर महादेवजी की प्रसन्नता के लिये महान् तपस्या का आश्रय ले वे तपमें ही संलग्न हो गये॥ १२॥

केनचित् त्वथ कालेन देवेशो वृषभध्वजः।

दर्शयामास वरदो विश्वामित्रं महामुनिम्॥ १३॥

‘कुछ काल के पश्चात् वरदायक देवेश्वर भगवान् वृषभध्वज (शिव) ने महामुनि विश्वामित्र को दर्शन दिया और कहा- ॥ १३॥

किमर्थं तप्यसे राजन् ब्रूहि यत् ते विवक्षितम्।

वरदोऽस्मि वरो यस्ते कांक्षितः सोऽभिधीयताम्॥ १४॥

“राजन् ! किसलिये तप करते हो? बताओ क्या कहना चाहते हो? मैं तुम्हें वर देने के लिये आया हूँ तुम्हें जो वर पाना अभीष्ट हो, उसे कहो’ ॥ १४॥

एवमुक्तस्तु देवेन विश्वामित्रो महातपाः।

प्रणिपत्य महादेवं विश्वामित्रोऽब्रवीदिदम्॥

‘महादेवजी के ऐसा कहने पर महातपस्वी विश्वामित्र ने उन्हें प्रणाम करके इस प्रकार कहा-॥ १५॥

यदि तुष्टो महादेव धनुर्वेदो ममानघ।

सांगोपांगोपनिषदः सरहस्यः प्रदीयताम्॥१६॥

“निष्पाप महादेव! यदि आप संतुष्ट हों तो अंग, उपांग, उपनिषद् और रहस्यों सहित धनुर्वेद मुझे प्रदान कीजिये॥

यानि देवेषु चास्त्राणि दानवेषु महर्षिषु।

गन्धर्वयक्षरक्षःसु प्रतिभान्तु ममानघ॥१७॥

तव प्रसादाद् भवतु देवदेव ममेप्सितम्।

“अनघ! देवताओं, दानवों, महर्षियों, गन्धर्वो, यक्षों तथा राक्षसों के पास जो-जो अस्त्र हों, वे सब आपकी कृपा से मेरे हृदय में स्फुरित हो जायँ। देवदेव! यही मेरा मनोरथ है, जो मुझे प्राप्त होना चाहिये। १७ १/२॥

एवमस्त्विति देवेशो वाक्यमुक्त्वा गतस्तदा। १८॥

प्राप्य चास्त्राणि देवेशाद् विश्वामित्रो महाबलः।

दर्पण महता युक्तो दर्पपूर्णोऽभवत् तदा॥१९॥

‘तब ‘एवमस्तु’ कहकर देवेश्वर भगवान् शङ्कर वहाँ से चले गये। देवेश्वर महादेव से वे अस्त्र पाकर महाबली विश्वामित्र को बड़ा घमंड हो गया वे अभिमान में भर गये॥ १८-१९॥

विवर्धमानो वीर्येण समुद्र इव पर्वणि।

हतं मेने तदा राम वसिष्ठमृषिसत्तमम्॥२०॥

‘जैसे पूर्णिमा को समुद्र बढ़ने लगता है, उसी प्रकार वे पराक्रम द्वारा अपने को बहुत बढ़ा-चढ़ा मानने लगे। श्रीराम! उन्होंने मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ को उस समय मरा हुआ ही समझा ॥ २० ॥

ततो गत्वाऽऽश्रमपदं मुमोचास्त्राणि पार्थिवः।

यैस्तत् तपोवनं नाम निर्दग्धं चास्त्रतेजसा॥२१॥

फिर तो वे पृथ्वीपति विश्वामित्र वसिष्ठ के आश्रम पर जाकर भाँति-भाँति के अस्त्रों का प्रयोग करने लगे। जिनके तेज से वह सारा तपोवन दग्ध होने लगा॥ २१॥

उदीर्यमाणमस्त्रं तद् विश्वामित्रस्य धीमतः।

दृष्ट्वा विप्रद्रुता भीता मुनयः शतशो दिशः॥ २२॥

‘बुद्धिमान् विश्वामित्र के उस बढ़ते हुए अस्त्रतेज को देखकर वहाँ रहने वाले सैकड़ों मुनि भयभीत हो सम्पूर्ण दिशाओं में भाग चले॥ २२ ॥

वसिष्ठस्य च ये शिष्या ये च वै मृगपक्षिणः।

विद्रवन्ति भयाद भीता नानादिग्भ्यः सहस्रशः॥ २३॥

‘वसिष्ठजी के जो शिष्य थे, जो वहाँ के पशु और पक्षी थे, वे सहस्रों प्राणी भयभीत हो नाना दिशाओं की ओर भाग गये॥२३॥

वसिष्ठस्याश्रमपदं शून्यमासीन्महात्मनः।

मुहूर्तमिव निःशब्दमासीदीरिणसंनिभम्॥ २४॥

‘महात्मा वसिष्ठ का वह आश्रम सूना हो गया। दो ही घड़ी में ऊसर भूमि के समान उस स्थान पर सन्नाटा छा गया॥२४॥

वदतो वै वसिष्ठस्य मा भैरिति मुहर्महः।

नाशयाम्यद्य गाधेयं नीहारमिव भास्करः॥२५॥

‘वसिष्ठजी बार-बार कहने लगे—’डरो मत, मैं अभी इस गाधिपुत्र को नष्ट किये देता हूँ ठीक उसी तरह, जैसे सूर्य कुहासे को मिटा देता है’ ॥ २५ ॥

एवमुक्त्वा महातेजा वसिष्ठो जपतां वरः।

विश्वामित्रं तदा वाक्यं सरोषमिदमब्रवीत्॥२६॥

‘जपनेवालों में श्रेष्ठ महातेजस्वी वसिष्ठ ऐसा कहकर उस समय विश्वामित्रजी से रोषपूर्वक बोले

आश्रमं चिरसंवृद्धं यद् विनाशितवानसि।

दुराचारो हि यन्मूढस्तस्मात् त्वं न भविष्यसि॥ २७॥

“अरे! तूने चिरकाल से पाले-पोसे तथा हरे-भरे किये हुए इस आश्रम को नष्ट कर दिया-उजाड़ डाला, इसलिये तू दुराचारी और विवेकशून्य है और इस पाप के कारण तू कुशल से नहीं रह सकता’। २७॥

इत्युक्त्वा परमक्रुद्धो दण्डमुद्यम्य सत्वरः।

विधूम इव कालाग्निर्यमदण्डमिवापरम्॥२८॥

‘ऐसा कहकर वे अत्यन्त क्रुद्ध हो धूमरहित कालाग्नि के समान उद्दीप्त हो उठे और दूसरे यमदण्ड के समान भयंकर डंडा हाथ में उठाकर तुरंत उनका सामना करने के लिये तैयार हो गये’ ॥ २८॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे पञ्चपञ्चाशः सर्गः॥५५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में पचपनवाँ सर्ग पूरा हुआ।५५॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(विश्वामित्र द्वारा वसिष्ठजी पर नाना प्रकार के दिव्यास्त्रों का प्रयोग,वसिष्ठ द्वारा ब्रह्मदण्ड से ही उनका शमन,विश्वामित्र का ब्राह्मणत्व की प्राप्ति के लिये तप करने का निश्चय)

षट्पञ्चाशः सर्गः 

सर्ग-56


एवमुक्तो वसिष्ठेन विश्वामित्रो महाबलः।

आग्नेयमस्त्रमुद्दिश्य तिष्ठ तिष्ठति चाब्रवीत्॥१॥

वसिष्ठजी के ऐसा कहने पर महाबली विश्वामित्र आग्नेयास्त्र लेकर बोले-‘अरे खड़ा रह, खड़ा रह’॥१॥

ब्रह्मदण्डं समुद्यम्य कालदण्डमिवापरम्।

वसिष्ठो भगवान् क्रोधादिदं वचनमब्रवीत्॥२॥

उस समय द्वितीय कालदण्ड के समान ब्रह्मदण्ड को उठाकर भगवान् वसिष्ठ ने क्रोधपूर्वक इस प्रकार कहा -२॥

क्षत्रबन्धो स्थितोऽस्म्येष यद् बलं तद् विदर्शय।

नाशयाम्यद्य ते दर्प शस्त्रस्य तव गाधिज॥३॥

‘क्षत्रियाधम! ले, यह मैं खड़ा हूँ तेरे पास जो बल हो, उसे दिखा। गाधिपुत्र! आज तेरे अस्त्रशस्त्रों के ज्ञान का घमंड मैं अभी धूल में मिला दूंगा। ३॥

क्व च ते क्षत्रियबलं क्व च ब्रह्मबलं महत्।

पश्य ब्रह्मबलं दिव्यं मम क्षत्रियपांसन॥४॥

‘क्षत्रियकुलकलङ्क ! कहाँ तेरा क्षात्रबल और कहाँ महान् ब्रह्मबल। मेरे दिव्य ब्रह्मबल को देख ले’ ॥ ४ ॥

तस्यास्त्रं गाधिपुत्रस्य घोरमाग्नेयमुत्तमम्।

ब्रह्मदण्डेन तच्छान्तमग्नेर्वेग इवाम्भसा॥५॥

गाधिपुत्र विश्वामित्र का वह उत्तम एवं भयंकर आग्नेयास्त्र वसिष्ठजी के ब्रह्मदण्ड से उसी प्रकार शान्त हो गया, जैसे पानी पड़ने से जलती हुई आग का वेग॥

वारुणं चैव रौद्रं च ऐन्द्रं पाशुपतं तथा।

ऐषीकं चापि चिक्षेप कुपितो गाधिनन्दनः॥६॥

तब गाधिपुत्र विश्वामित्र ने कुपित होकर वारुण, रौद्र, ऐन्द्र, पाशुपत और ऐषीक नामक अस्त्रों का प्रयोग किया।

मानवं मोहनं चैव गान्धर्वं स्वापनं तथा।

जृम्भणं मादनं चैव संतापनविलापने॥७॥

शोषणं दारणं चैव वज्रमस्त्रं सुदुर्जयम्।

ब्रह्मपाशं कालपाशं वारुणं पाशमेव च॥८॥

पिनाकमस्त्रं दयितं शुष्काइँ अशनी तथा।

दण्डास्त्रमथ पैशाचं क्रौञ्चमस्त्रं तथैव च॥९॥

धर्मचक्रं कालचक्रं विष्णुचक्रं तथैव च।

वायव्यं मथनं चैव अस्त्रं हयशिरस्तथा ॥१०॥

शक्तिद्वयं च चिक्षेप कङ्कालं मुसलं तथा।

वैद्याधरं महास्त्रं च कालास्त्रमथ दारुणम्॥ ११॥

त्रिशूलमस्त्रं घोरं च कापालमथ कङ्कणम्।

एतान्यस्त्राणि चिक्षेप सर्वाणि रघुनन्दन ॥१२॥

रघुनन्दन! उसके पश्चात् क्रमशः मानव, मोहन, गान्धर्व, स्वापन, जृम्भण, मादन, संतापन, विलापन, शोषण, विदारण, सुदुर्जय वज्रास्त्र, ब्रह्मपाश, कालपाश, वारुणपाश, परमप्रिय पिनाकास्त्र, सूखी गीली दो प्रकारकी अशनि, दण्डास्त्र, पैशाचास्त्र, क्रौञ्चास्त्र, धर्मचक्र, कालचक्र, विष्णुचक्र, वायव्यास्त्र, मन्थनास्त्र, हयशिरा, दो प्रकार की शक्ति, कङ्काल, मूसल, महान् वैद्याधरास्त्र, दारुण कालास्त्र, भयंकर त्रिशूलास्त्र, कापालास्त्र और कङ्कणास्त्र—ये सभी अस्त्र उन्होंने वसिष्ठजी के ऊपर चलाये। ७– १२॥

वसिष्ठे जपतां श्रेष्ठे तदद्भुतमिवाभवत्।

तानि सर्वाणि दण्डेन ग्रसते ब्रह्मणः सुतः॥१३॥

जपने वालों में श्रेष्ठ महर्षि वसिष्ठ पर इतने अस्त्रों का प्रहार वह एक अद्भुत-सी घटना थी, परंतु ब्रह्मा के पुत्र वसिष्ठजी ने उन सभी अस्त्रों को केवल अपने डंडे से ही नष्ट कर दिया॥१३॥

तेषु शान्तेषु ब्रह्मास्त्रं क्षिप्तवान् गाधिनन्दनः।

तदस्त्रमुद्यतं दृष्ट्वा देवाः साग्निपुरोगमाः॥१४॥

देवर्षयश्च सम्भ्रान्ता गन्धर्वाः समहोरगाः।

त्रैलोक्यमासीत् संत्रस्तं ब्रह्मास्त्रे समुदीरिते॥ १५॥

उन सब अस्त्रों के शान्त हो जाने पर गाधिनन्दन विश्वामित्र ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया ब्रह्मास्त्र को उद्यत देख अग्नि आदि देवता, देवर्षि, गन्धर्व और बड़े-बड़े नाग भी दहल गये, ब्रह्मास्त्र के ऊपर उठते ही तीनों लोकों के प्राणी थर्रा उठे॥१४-१५॥

तदप्यस्त्रं महाघोरं ब्राह्मं ब्राह्मण तेजसा।

वसिष्ठो ग्रसते सर्वं ब्रह्मदण्डेन राघव॥१६॥

राघव! वसिष्ठजी ने अपने ब्रह्म तेज के प्रभाव से उस महाभयंकर ब्रह्मास्त्र को भी ब्रह्मदण्ड के द्वारा ही शान्त कर दिया॥१६॥

ब्रह्मास्त्रं ग्रसमानस्य वसिष्ठस्य महात्मनः।

त्रैलोक्यमोहनं रौद्रं रूपमासीत् सुदारुणम्॥१७॥

उस ब्रह्मास्त्र को शान्त करते समय महात्मा वसिष्ठ का वह रौद्ररूप तीनों लोकों को मोह में डालने वाला और अत्यन्त भयंकर जान पड़ता था। १७॥

रोमकूपेषु सर्वेषु वसिष्ठस्य महात्मनः ।

मरीच्य इव निष्पेतुरग्ने माकुलार्चिषः॥१८॥

महात्मा वसिष्ठ के समस्त रोमकूपों में से किरणों की भाँति धूमयुक्त आग की लपटें निकलने लगीं॥ १८॥

प्राज्वलद् ब्रह्मदण्डश्च वसिष्ठस्य करोद्यतः।

विधूम इव कालाग्नेर्यमदण्ड इवापरः॥१९॥

वसिष्ठजी के हाथ में उठा हुआ द्वितीय यमदण्ड के समान वह ब्रह्मदण्ड धूमरहित कालाग्नि के समान प्रज्वलित हो रहा था॥ १९ ॥

ततोऽस्तुवन् मुनिगणा वसिष्ठं जपतां वरम्।

अमोघं ते बलं ब्रह्मस्तेजो धारय तेजसा॥२०॥

उस समय समस्त मुनिगण मन्त्र जपने वालों में श्रेष्ठ वसिष्ठ मुनि की स्तुति करते हुए बोले—’ब्रह्मन् ! आपका बल अमोघ है। आप अपने तेज को अपनी ही शक्ति से समेट लीजिये॥ २० ॥

निगृहीतस्त्वया ब्रह्मन् विश्वामित्रो महाबलः।

अमोघं ते बलं श्रेष्ठ लोकाः सन्तु गतव्यथाः॥ २१॥

‘महाबली विश्वामित्र आपसे पराजित हो गये। मुनिश्रेष्ठ! आपका बल अमोघ है। अब आप शान्त हो जाइये, जिससे लोगोंकी व्यथा दूर हो’ ॥ २१॥

एवमुक्तो महातेजाः शमं चक्रे महाबलः।

विश्वामित्रो विनिकृतो विनिःश्वस्येदमब्रवीत्॥ २२॥

महर्षियों के ऐसा कहने पर महातेजस्वी महाबली वसिष्ठजी शान्त हो गये और पराजित विश्वामित्र लम्बी साँस खींचकर यों बोले- ॥ २२ ॥

धिग् बलं क्षत्रियबलं ब्रह्मतेजोबलं बलम्।

एकेन ब्रह्मदण्डेन सर्वास्त्राणि हतानि मे ॥२३॥

‘क्षत्रिय के बल को धिक्कार है। ब्रह्मतेज से प्राप्त होने वाला बल ही वास्तव में बल है; क्योंकि आज एक ब्रह्मदण्ड ने मेरे सभी अस्त्र नष्ट कर दिये॥२३॥

तदेतत् प्रसमीक्ष्याहं प्रसन्नेन्द्रियमानसः।

तपो महत् समास्थास्ये यद् वै ब्रह्मत्वकारणम्॥ २४॥

‘इस घटना को प्रत्यक्ष देखकर अब मैं अपने मन और इन्द्रियों को निर्मल करके उस महान् तप का अनुष्ठान करूँगा, जो मेरे लिये ब्राह्मणत्व की प्राप्ति का कारण होगा’ ॥ २४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे षट्पञ्चाशः सर्गः॥५६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में छप्पनवाँ सर्ग पूरा हुआ।५६॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(विश्वामित्र की तपस्या, राजा त्रिशंकु का यज्ञ के लिये वसिष्ठजी से प्रार्थना करना,उनके इन्कार करने पर उन्हीं के पुत्रों की शरण में जाना)

सप्तपञ्चाशः सर्गः 

सर्ग-57


ततः संतप्तहृदयः स्मरन्निग्रहमात्मनः।

विनिःश्वस्य विनिःश्वस्य कृतवैरो महात्मना॥१॥

स दक्षिणां दिशं गत्वा महिष्या सह राघव।

तताप परमं घोरं विश्वामित्रो महातपाः॥२॥

श्रीराम! तदनन्तर विश्वामित्र अपनी पराजय को याद करके मन-ही-मन संतप्त होने लगे। महात्मा वसिष्ठ के साथ वैर बाँधकर महातपस्वी विश्वामित्र बारम्बार लम्बी साँस खींचते हुए अपनी रानी के साथ दक्षिण दिशा में जाकर अत्यन्त उत्कृष्ट एवं भयंकर तपस्या करने लगे॥ १-२॥

फलमूलाशनो दान्तश्चचार परमं तपः।

अथास्य जज्ञिरे पुत्राः सत्यधर्मपरायणाः॥३॥

हविष्पन्दो मधुष्पन्दो दृढनेत्रो महारथः।

वहाँ मन और इन्द्रियों को वश में करके वे फलमूल का आहार करते तथा उत्तम तपस्या में लगे रहते थे। वहीं उनके हविष्पन्द, मधुष्पन्द, दृढनेत्र और महारथ नामक चार पुत्र उत्पन्न हुए, जो सत्य और धर्म में तत्पर रहने वाले थे॥ ३ १/२ ॥

पूर्णे वर्षसहस्रे तु ब्रह्मा लोकपितामहः॥४॥

अब्रवीन्मधुरं वाक्यं विश्वामित्रं तपोधनम्।

जिता राजर्षिलोकास्ते तपसा कुशिकात्मज॥५॥

अनेन तपसा त्वां हि राजर्षिरिति विद्महे।

एक हजार वर्ष पूरे हो जानेपर लोकपितामह ब्रह्माजी ने तपस्या के धनी विश्वामित्र को दर्शन देकर मधुर वाणी में कहा—’कुशिकनन्दन! तुमने तपस्या के द्वारा राजर्षियों के लोकों पर विजय पायी है। इस तपस्या के प्रभाव से हम तुम्हें सच्चा राजर्षि समझते हैं’॥ ४-५ १/२॥

एवमुक्त्वा महातेजा जगाम सह दैवतैः॥६॥

त्रिविष्टपं ब्रह्मलोकं लोकानां परमेश्वरः।

यह कहकर सम्पूर्ण लोकों के स्वामी ब्रह्माजी देवताओं के साथ स्वर्गलोक होते हुए ब्रह्मलोक को चले गये॥ ६ १/२॥

विश्वामित्रोऽपि तच्छत्वा ह्रिया किंचिदवाङ्मखः॥ ७॥

दुःखेन महताविष्टः समन्युरिदमब्रवीत्।

तपश्च सुमहत् तप्तं राजर्षिरिति मां विदुः ॥८॥

देवाः सर्षिगणाः सर्वे नास्ति मन्ये तपः फलम्।

उनकी बात सुनकर विश्वामित्र का मुख लज्जा से कुछ झुक गया। वे बड़े दुःख से व्यथित हो दीनतापूर्वक मन-ही-मन यों कहने लगे—’अहो! मैंने इतना बड़ा तप किया तो भी ऋषियों सहित सम्पूर्ण देवता मुझे राजर्षि ही समझते हैं मालूम होता है, इस तपस्या का कोई फल नहीं हुआ’। ७-८ १/२॥

एवं निश्चित्य मनसा भूय एव महातपाः॥९॥

तपश्चचार धर्मात्मा काकुत्स्थ परमात्मवान्।

श्रीराम! मन में ऐसा सोचकर अपने मन को वश में रखने वाले महातपस्वी धर्मात्मा विश्वामित्र पुनः भारी तपस्या में लग गये॥९ १/२॥

एतस्मिन्नेव काले तु सत्यवादी जितेन्द्रियः॥ १०॥

त्रिशङ्करिति विख्यात इक्ष्वाकुकुलवर्धनः।

इसी समय इक्ष्वाकुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले एक सत्यवादी और जितेन्द्रिय राजा राज्य करते थे। उनका नाम था त्रिशंकु ॥ १० १/२ ॥

तस्य बुद्धिः समुत्पन्ना यजेयमिति राघव॥११॥

गच्छेयं स्वशरीरेण देवतानां परां गतिम्।

रघुनन्दन! उनके मन में यह विचार हुआ कि ‘मैं ऐसा कोई यज्ञ करूँ, जिससे अपने इस शरीर के साथ ही देवताओं की परम गति—स्वर्गलोक को जा पहुँचूँ’ ॥

वसिष्ठं स समाहृय कथयामास चिन्तितम्॥१२॥

अशक्यमिति चाप्युक्तो वसिष्ठेन महात्मना।।

तब उन्होंने वसिष्ठजी को बुलाकर अपना यह विचार उन्हें कह सुनाया। महात्मा वसिष्ठ ने उन्हें बताया कि ‘ऐसा होना असम्भव है’ ।। १२ १/२।।

प्रत्याख्यातो वसिष्ठेन स ययौ दक्षिणां दिशम्॥ १३॥

ततस्तत्कर्मसिद्ध्यर्थं पुत्रांस्तस्य गतो नृपः।

जब वसिष्ठ ने उन्हें कोरा उत्तर दे दिया, तब वे राजा उस कर्म की सिद्धि के लिये दक्षिण दिशा में उन्हीं के पुत्रों के पास चले गये। १३ १/२ ।।

वासिष्ठा दीर्घतपसस्तपो यत्र हि तेपिरे॥१४॥

त्रिशङ्कस्तु महातेजाः शतं परमभास्वरम्।।

वसिष्ठपुत्रान् ददृशे तप्यमानान् मनस्विनः॥१५॥

वसिष्ठजी के वे पुत्र जहाँ दीर्घकाल से तपस्या में प्रवृत्त होकर तप करते थे, उस स्थानपर पहुँचकर महातेजस्वी त्रिशंकु ने देखा कि मन को वश में रखने वाले वे सौ परमतेजस्वी वसिष्ठकुमार तपस्या में संलग्न हैं॥

सोऽभिगम्य महात्मानः सर्वानेव गुरोः सुतान्।

अभिवाद्यानुपूर्वेण ह्रिया किंचिदवाङ्मुखः॥१६॥

अब्रवीत् स महात्मानः सर्वानेव कृताञ्जलिः।

उन सभी महात्मा गुरुपुत्रों के पास जाकर उन्होंने क्रमशः उन्हें प्रणाम किया और लज्जा से अपने मुख को कुछ नीचा किये हाथ जोड़कर उन सब महात्माओं से कहा- ॥ १६ १/२ ॥

शरणं वः प्रपन्नोऽहं शरण्यान् शरणं गतः॥ १७॥

प्रत्याख्यातो हि भद्रं वो वसिष्ठेन महात्मना।

यष्टकामो महायज्ञं तदनुज्ञातुमर्हथ॥१८॥

‘गुरुपुत्रो! आप शरणागतवत्सल हैं। मैं आप लोगों की शरण में आया हूँ, आपका कल्याण हो। महात्मा वसिष्ठ ने मेरा यज्ञ कराना अस्वीकार कर दिया है। मैं एक महान् यज्ञ करना चाहता हूँ। आप लोग उसके लिये आज्ञा दें॥१७-१८॥

गुरुपुत्रानहं सर्वान् नमस्कृत्य प्रसादये।

शिरसा प्रणतो याचे ब्राह्मणांस्तपसि स्थितान्॥ १९॥

ते मां भवन्तः सिद्ध्यर्थं याजयन्तु समाहिताः।

सशरीरो यथाहं वै देवलोकमवाप्नुयाम्॥२०॥

‘मैं समस्त गुरुपुत्रों को नमस्कार करके प्रसन्न करना चाहता हूँ। आप लोग तपस्या में संलग्न रहने वाले ब्राह्मण हैं। मैं आपके चरणों में मस्तक रखकर यह याचना करता हूँ कि आप लोग

एकाग्रचित्त हो मुझसे मेरी अभीष्टसिद्धि के लिये ऐसा कोई यज्ञ करावें, जिससे मैं इस शरीर के साथ ही देवलोक में जा सकूँ॥ १९-२०॥

प्रत्याख्यातो वसिष्ठेन गतिमन्यां तपोधनाः।

गुरुपुत्रानृते सर्वान् नाहं पश्यामि कांचन॥२१॥

‘तपोधनो! महात्मा वसिष्ठ के अस्वीकार कर देने पर अब मैं अपने लिये समस्त गुरुपुत्रों की शरण में जाने के सिवा दूसरी कोई गति नहीं देखता॥ २१ ॥

इक्ष्वाकूणां हि सर्वेषां पुरोधाः परमा गतिः।

तस्मादनन्तरं सर्वे भवन्तो दैवतं मम॥२२॥

‘समस्त इक्ष्वाकुवंशियों के लिये पुरोहित वसिष्ठजी ही परमगति हैं। उनके बाद आप सब लोग ही मेरे परम देवता हैं’॥ २२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे सप्तपञ्चाशः सर्गः॥५७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में सत्तावनवाँ सर्ग पूरा हुआ।५७॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(वसिष्ठ ऋषि के पुत्रों का त्रिशंकु को शाप-प्रदान, उनके शाप से चाण्डाल हुए त्रिशंकु का विश्वामित्रजी की शरण में जाना)

अष्टपञ्चाशः सर्गः 

सर्ग-58


ततस्त्रिशङ्कोर्वचनं श्रुत्वा क्रोधसमन्वितम्।

ऋषिपुत्रशतं राम राजानमिदमब्रवीत्॥१॥

प्रत्याख्यातोऽसि दुर्मेधो गुरुणा सत्यवादिना।

तं कथं समतिक्रम्य शाखान्तरमुपेयिवान्॥२॥

रघुनन्दन! राजा त्रिशंकु का यह वचन सुनकर वसिष्ठ मुनि के वे सौ पुत्र कुपित हो उनसे इस प्रकार बोले- ‘दुर्बुद्धे ! तुम्हारे सत्यवादी गुरु ने जब तुम्हें मना कर दिया है, तब तुमने उनका उल्लङ्घन करके दूसरी शाखा का आश्रय कैसे लिया? ॥ १-२॥

इक्ष्वाकूणां हि सर्वेषां पुरोधाः परमा गतिः।

न चातिक्रमितुं शक्यं वचनं सत्यवादिनः॥३॥

‘समस्त इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रियों के लिये पुरोहित वसिष्ठजी ही परमगति हैं। उन सत्यवादी महात्मा की बात को कोई अन्यथा नहीं कर सकता॥३॥

अशक्यमिति सोवाच वसिष्ठो भगवानृषिः।

तं वयं वै समाहर्तुं क्रतुं शक्ताः कथंचन॥४॥

‘जिस यज्ञ कर्म को उन भगवान् वसिष्ठमुनि ने असम्भव बताया है, उसे हम लोग कैसे कर सकते हैं॥४॥

बालिशस्त्वं नरश्रेष्ठ गम्यतां स्वपुरं पुनः।

याजने भगवान् शक्तस्त्रैलोक्यस्यापि पार्थिव॥

अवमानं कथं कर्तुं तस्य शक्ष्यामहे वयम्।

‘नरश्रेष्ठ ! तुम अभी नादान हो, अपने नगर को लौट जाओ। पृथ्वीनाथ! भगवान् वसिष्ठ तीनों लोकों का यज्ञ कराने में समर्थ हैं, हम लोग उनका अपमान कैसे कर सकेंगे’॥ ५ १/२॥

तेषां तद् वचनं श्रुत्वा क्रोधपर्याकुलाक्षरम्॥६॥

स राजा पुनरेवैतानिदं वचनमब्रवीत्।

प्रत्याख्यातो भगवता गुरुपुत्रैस्तथैव हि ॥७॥

अन्यां गतिं गमिष्यामि स्वस्ति वोऽस्तु तपोधनाः।

गुरुपुत्रों का वह क्रोधयुक्त वचन सुनकर राजा त्रिशंकु ने पुनः उनसे इस प्रकार कहा—’तपोधनो! भगवान् वसिष्ठ ने तो मुझे ठुकरा ही दिया था, आप गुरुपुत्र गण भी मेरी प्रार्थना नहीं स्वीकार कर रहे हैं; अतः आपका कल्याण हो, अब मैं दूसरे किसी की शरण में जाऊँगा’॥

ऋषिपुत्रास्तु तच्छ्रुत्वा वाक्यं घोराभिसंहितम्॥ ८ ॥

शेपुः परमसंक्रुद्धाश्चण्डालत्वं गमिष्यसि।

इत्युक्त्वा ते महात्मानो विविशुः स्वं स्वमाश्रमम्॥ ९॥

त्रिशंकु का यह घोर अभिसंधिपूर्ण वचन सुनकर महर्षि के पुत्रों ने अत्यन्त कुपित हो उन्हें शाप दे दिया —’अरे! जा तू चाण्डाल हो जायगा।’ ऐसा कहकर वे महात्मा अपने-अपने आश्रम में प्रविष्ट हो गये॥ ८-९॥

अथ रात्र्यां व्यतीतायां राजा चण्डालतां गतः।

नीलवस्त्रधरो नीलः पुरुषो ध्वस्तमूर्धजः॥१०॥

चित्यमाल्यांगरागश्च आयसाभरणोऽभवत्।

तदनन्तर रात व्यतीत होते ही राजा त्रिशंकु चाण्डाल हो गये। उनके शरीर का रंग नीला हो गया। कपड़े भी नीले हो गये। प्रत्येक अंग में रुक्षता आ गयी। सिर के बाल छोटे-छोटे हो गये। सारे शरीर में चिता की राख-सी लिपट गयी। विभिन्न अंगों में यथास्थान लोहे के गहने पड़ गये॥ १० १/२ ॥

तं दृष्ट्वा मन्त्रिणः सर्वे त्यज्य चण्डालरूपिणम्॥ ११॥

प्राद्रवन सहिता राम पौरा येऽस्यानुगामिनः।

एको हि राजा काकुत्स्थ जगाम परमात्मवान्॥ १२॥

दह्यमानो दिवारानं विश्वामित्रं तपोधनम्।

श्रीराम! अपने राजा को चाण्डाल के रूप में देखकर सब मन्त्री और पुरवासी जो उनके साथ आये थे, उन्हें छोड़कर भाग गये। ककुत्स्थनन्दन! वे धीरस्वभाव नरेश दिन-रात चिन्ता की आग में जलने लगे और अकेले ही तपोधन विश्वामित्र की शरण में गये॥११-१२ १/२॥

विश्वामित्रस्तु तं दृष्ट्वा राजानं विफलीकृतम्॥ १३॥

चण्डालरूपिणं राम मुनिः कारुण्यमागतः।

कारुण्यात् स महातेजा वाक्यं परमधार्मिकः॥ १४॥

इदं जगाद भद्रं ते राजानं घोरदर्शनम्।

किमागमनकार्यं ते राजपुत्र महाबल॥१५॥

अयोध्याधिपते वीर शापाच्चण्डालतां गतः।

श्रीराम ! विश्वामित्र ने देखा राजा का जीवन निष्फल हो गया है। उन्हें चाण्डाल के रूपमें देखकर उन महातेजस्वी परम धर्मात्मा मुनि के हृदय में करुणा भर आयी। वे दया से द्रवित होकर भयंकर दिखायी देने वाले राजा त्रिशंकु से इस प्रकार बोले—’महाबली राजकुमार! तुम्हारा भला हो, यहाँ किस काम से तुम्हारा आना हुआ है। वीर अयोध्यानरेश! जान पड़ता है तुम शाप से चाण्डाल भाव को प्राप्त हुए हो’॥ १३–१५ १/२॥

अथ तदाक्यमाकर्ण्य राजा चण्डालतां गतः॥ १६॥

अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यं वाक्यज्ञो वाक्यकोविदम्।

विश्वामित्र की बात सुनकर चाण्डालभाव को प्राप्त हुए और वाणी के तात्पर्य को समझने वाले राजा त्रिशंकु ने हाथ जोड़कर वाक्यार्थ कोविद विश्वामित्र मुनि से इस प्रकार कहा— ॥ १६ १/२ ॥

प्रत्याख्यातोऽस्मि गुरुणा गुरुपुत्रैस्तथैव च॥ १७॥

अनवाप्यैव तं कामं मया प्राप्तो विपर्ययः।

‘महर्षे! मुझे गुरु तथा गुरुपुत्रों ने ठुकरा दिया। मैं जिस मनोऽभीष्ट वस्तु को पाना चाहता था, उसे न पाकर इच्छा के विपरीत अनर्थ का भागी हो गया। १७ १/२॥

सशरीरो दिवं यायामिति मे सौम्यदर्शन॥१८॥

मया चेष्टं क्रतुशतं तच्च नावाप्यते फलम्।

‘सौम्यदर्शन मुनीश्वर! मैं चाहता था कि इसी शरीर से स्वर्ग को जाऊँ, परंतु यह इच्छा पूर्ण न हो सकी। मैंने सैकड़ों यज्ञ किये हैं; किंतु उनका भी कोई फल नहीं मिल रहा है॥ १८ १/२॥

अनृतं नोक्तपूर्वं मे न च वक्ष्ये कदाचन ॥१९॥

कृच्छ्रेष्वपि गतः सौम्य क्षत्रधर्मेण ते शपे।

‘सौम्य! मैं क्षत्रिय धर्म की शपथ खाकर आपसे कहता हूँ कि बड़े-से-बड़े सङ्कट में पड़ने पर भी न तो पहले कभी मैंने मिथ्या भाषण किया है और न भविष्य में ही कभी करूँगा। १९ १/२॥

यज्ञैर्बहुविधैरिष्टं प्रजा धर्मेण पालिताः॥२०॥

गुरवश्च महात्मानः शीलवृत्तेन तोषिताः।

धर्मे प्रयतमानस्य यज्ञं चाहर्तुमिच्छतः॥ २१॥

परितोषं न गच्छन्ति गुरवो मुनिपुंगव।

दैवमेव परं मन्ये पौरुषं तु निरर्थकम्॥२२॥

‘मैंने नाना प्रकार के यज्ञों का अनुष्ठान किया, प्रजाजनों की धर्मपूर्वक रक्षा की और शील एवं सदाचार के द्वारा महात्माओं तथा गुरुजनों को संतुष्ट रखने का प्रयास किया। इस समय भी मैं यज्ञ करना चाहता था; अतः मेरा यह प्रयत्न धर्म के लिये ही था। मुनिप्रवर! तो भी मेरे गुरुजन मुझ पर संतुष्ट न हो सके। यह देखकर मैं दैव को ही बड़ा मानता हूँ पुरुषार्थ तो निरर्थक जान पड़ता है। २०–२२ ॥

दैवेनाक्रम्यते सर्वं दैवं हि परमा गतिः।

तस्य मे परमार्तस्य प्रसादमभिकांक्षतः।

कर्तुमर्हसि भद्रं ते दैवोपहतकर्मणः॥२३॥

‘दैव सबपर आक्रमण करता है। दैव ही सबकी परमगति है। मुने! मैं अत्यन्त आर्त होकर आपकी कृपा चाहता हूँ। दैव ने मेरे पुरुषार्थ को दबा दिया है। आपका भला हो। आप मुझपर अवश्य कृपा करें।२३॥

नान्यां गतिं गमिष्यामि नान्यच्छरणमस्ति मे।

दैवं पुरुषकारेण निवर्तयितुमर्हसि ॥२४॥

‘अब मैं आपके सिवा दूसरे किसी की शरण में नहीं जाऊँगा। दूसरा कोई मुझे शरण देने वाला है भी नहीं। आप ही अपने पुरुषार्थ से मेरे दुर्दैव को पलट सकते हैं ॥२४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डेऽष्टपञ्चाशः सर्गः॥५८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में अट्ठावनवाँ सर्ग पूरा हुआ ।५८॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(विश्वामित्र का त्रिशंकु का यज्ञ कराने के लिये ऋषिमुनियों को आमन्त्रित करना और उनकी बात न मानने वाले महोदय तथा ऋषिपुत्रों को शाप देकर नष्ट करना)

एकोनषष्टितमः सर्गः

सर्ग-59


उक्तवाक्यं तु राजानं कृपया कुशिकात्मजः।

अब्रवीन्मधुरं वाक्यं साक्षाच्चण्डालतां गतम्॥

[शतानन्दजी कहते हैं- श्रीराम!] साक्षात् चाण्डाल के स्वरूप को प्राप्त हुए राजा त्रिशंकु के पूर्वोक्त वचन को सुनकर कुशिकनन्दन विश्वामित्रजी ने दया से द्रवित होकर उनसे मधुर वाणीमें कहा— ॥१॥

इक्ष्वाको स्वागतं वत्स जानामि त्वां सुधार्मिकम्।

शरणं ते प्रदास्यामि मा भैषीनूपपुंगव॥२॥

‘वत्स! इक्ष्वाकुकुलनन्दन! तुम्हारा स्वागत है, मैं जानता हूँ, तुम बड़े धर्मात्मा हो। नृपप्रवर! डरो मत, मैं तुम्हें शरण दूंगा॥२॥

अहमामन्त्रये सर्वान् महर्षीन् पुण्यकर्मणः।

यज्ञसाह्यकरान् राजंस्ततो यक्ष्यसि निर्वृतः॥३॥

‘राजन्! तुम्हारे यज्ञ में सहायता करने वाले समस्त पुण्यकर्मा महर्षियों को मैं आमन्त्रित करता हूँ फिर तुम आनन्दपूर्वक यज्ञ करना॥३॥

गुरुशापकृतं रूपं यदिदं त्वयि वर्तते।

अनेन सह रूपेण सशरीरो गमिष्यसि॥४॥

हस्तप्राप्तमहं मन्ये स्वर्गं तव नराधिप।

यस्त्वं कौशिकमागम्य शरण्यं शरणागतः॥५॥

‘गुरु के शाप से तुम्हें जो यह नवीन रूप प्राप्त हुआ है इसके साथ ही तुम सदेह स्वर्गलोक को जाओगे। नरेश्वर! तुम जो शरणागतवत्सल विश्वामित्र की शरण में आ गये, इससे मैं यह समझता हूँ कि स्वर्गलोक तुम्हारे हाथ में आ गया है’॥ ४-५॥

एवमुक्त्वा महातेजाः पुत्रान् परमधार्मिकान्।

व्यादिदेश महाप्राज्ञान् यज्ञसम्भारकारणात्॥६॥

ऐसा कहकर महातेजस्वी विश्वामित्र ने अपने परम धर्मपरायण महाज्ञानी पुत्रों को यज्ञ की सामग्री जुटाने की आज्ञा दी॥६॥

सर्वान् शिष्यान् समाहूय वाक्यमेतदुवाच ह।

सर्वानृषीन् सवासिष्ठानानयध्वं ममाज्ञया॥७॥

सशिष्यान् सुहृदश्चैव सर्विजः सुबहुश्रुतान्।

तत्पश्चात् समस्त शिष्यों को बुलाकर उनसे यह बात कही—’तुम लोग मेरी आज्ञा से अनेक विषयों के ज्ञाता समस्त ऋषि-मुनियों को, जिनमें वसिष्ठ के पुत्र भी सम्मिलित हैं, उनके शिष्यों, सुहृदों तथा ऋत्विजों सहित बुला लाओ॥ ७ १/२॥

यदन्यो वचनं ब्रूयान्मवाक्यबलचोदितः॥८॥

तत् सर्वमखिलेनोक्तं ममाख्येयमनादृतम्।

‘जिसे मेरा संदेश देकर बुलाया गया हो वह अथवा दूसरा कोई यदि इस यज्ञ के विषय में कोई अवहेलनापूर्ण बात कहे तो तुम लोग वह सब पूरा-पूरा मुझसे आकर कहना’ ॥ ८ १/२॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा दिशो जग्मुस्तदाज्ञया॥

आजग्मुरथ देशेभ्यः सर्वेभ्यो ब्रह्मवादिनः।

ते च शिष्याः समागम्य मुनिं ज्वलिततेजसम्॥ १०॥

ऊचुश्च वचनं सर्वं सर्वेषां ब्रह्मवादिनाम्।

उनकी आज्ञा मानकर सभी शिष्य चारों दिशाओं में चले गये। फिर तो सब देशों से ब्रह्मवादी मुनि आने लगे। विश्वामित्र के वे शिष्य उन प्रज्वलित तेज वाले महर्षि के पास सबसे पहले लौट आये और समस्त ब्रह्मवादियों ने जो बातें कही थीं, उन्हें सबने विश्वामित्रजी से कह सुनाया।

श्रुत्वा ते वचनं सर्वे समायान्ति द्विजातयः॥११॥

सर्वदेशेषु चागच्छन् वर्जयित्वा महोदयम्।।

वे बोले—’गुरुदेव! आपका आदेश या संदेश सुनकर प्रायः सम्पूर्ण देशों में रहने वाले सभी ब्राह्मण आ रहे हैं। केवल महोदय नामक ऋषि तथा वसिष्ठपुत्रों को छोड़कर सभी महर्षि यहाँ आने के लिये प्रस्थान कर चुके हैं। ११ १/२॥

वासिष्ठं यच्छतं सर्वं क्रोधपर्याकुलाक्षरम्॥१२॥

यथाह वचनं सर्वं शृणु त्वं मुनिपुंगव।

‘मुनिश्रेष्ठ! वसिष्ठ के जो सौ पुत्र हैं, उन सबने क्रोधभरी वाणी में जो कुछ कहा है, वह सब आप सुनिये॥ १२ १/२॥

क्षत्रियो याजको यस्य चण्डालस्य विशेषतः॥ १३॥

कथं सदसि भोक्तारो हविस्तस्य सुरर्षयः।

ब्राह्मणा वा महात्मानो भुक्त्वा चाण्डालभोजनम्॥१४॥

कथं स्वर्गं गमिष्यन्ति विश्वामित्रेण पालिताः।

‘वे कहते हैं—जो विशेषतः चण्डाल है और जिसका यज्ञ कराने वाला आचार्य क्षत्रिय है, उसके यज्ञ में देवर्षि अथवा महात्मा ब्राह्मण हविष्य का भोजन कैसे कर सकते हैं? अथवा चण्डाल का अन्न खाकर विश्वामित्र से पालित हुए ब्राह्मण स्वर्ग में कैसे जा सकेंगे?’ ॥ १३-१४ १/२ ॥

एतद् वचननैष्ठर्यमूचुः संरक्तलोचनाः॥१५॥

वासिष्ठा मुनिशार्दूल सर्वे सहमहोदयाः।

‘मुनिप्रवर! महोदय के साथ वसिष्ठ के सभी पुत्रों ने क्रोध से लाल आँखें करके ये उपर्युक्त निष्ठुरतापूर्ण बातें कही थीं’॥ १५ १/२ ॥

तेषां तद् वचनं श्रुत्वा सर्वेषां मुनिपुंगवः ॥१६॥

क्रोधसंरक्तनयनः सरोषमिदमब्रवीत्।

उन सबकी वह बात सुनकर मुनिवर विश्वामित्र के दोनों नेत्र क्रोध से लाल हो गये और वे रोषपूर्वक इस प्रकार बोले- ॥ १६ १/२॥

यद् दूषयन्त्यदुष्टं मां तप उग्रं समास्थितम्॥१७॥

भस्मीभूता दुरात्मानो भविष्यन्ति न संशयः।

‘मैं उग्र तपस्या में लगा हूँ और दोष या दुर्भावना से रहित हूँ तो भी जो मुझ पर दोषारोपण करते हैं, वे दुरात्मा भस्मीभूत हो जायँगे, इसमें संशय नहीं है। १७ १/२॥

अद्य ते कालपाशेन नीता वैवस्वतक्षयम्॥१८॥

सप्तजातिशतान्येव मृतपाः सम्भवन्तु ते।।

श्वमांसनियताहारा मुष्टिका नाम निघृणाः॥१९॥

‘आज कालपाश से बँधकर वे यमलोक में पहँचा दिये गये। अब ये सात सौ जन्मोंतक मुर्दो की रखवाली करने वाली, निश्चितरूप से कुत्ते का मांस खाने वाली मुष्टिक नामक प्रसिद्ध निर्दय चण्डालजाति में जन्म ग्रहण करें॥ १८-१९॥

विकृताश्च विरूपाश्च लोकाननुचरन्त्विमान्।

महोदयश्च दुर्बुद्धिर्मामदूष्यं ह्यदूषयत्॥२०॥

दूषितः सर्वलोकेषु निषादत्वं गमिष्यति।

प्राणातिपातनिरतो निरनुक्रोशतां गतः॥ २१॥

दीर्घकालं मम क्रोधाद् दुर्गतिं वर्तयिष्यति।

‘वे लोग विकृत एवं विरूप होकर इन लोकों में विचरें, साथ ही दुर्बुद्धि महोदय भी, जिसने मुझ दोषहीन को भी दूषित किया है, मेरे क्रोध से दीर्घकाल तक सब लोगों में निन्दित, दूसरे प्राणियों की हिंसा में तत्पर और दयाशून्य निषादयोनि को प्राप्त करके दुर्गति भोगेगा’। २०-२१ १/२॥

एतावदुक्त्वा वचनं विश्वामित्रो महातपाः।

विरराम महातेजा ऋषिमध्ये महामुनिः॥ २२॥

ऋषियों के बीच में ऐसा कहकर महातपस्वी, महातेजस्वी एवं महामुनि विश्वामित्र चुप हो गये। २२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकोनषष्टितमः सर्गः॥५९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में उनसठवाँ सर्ग पूरा हुआ। ५९॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

 (ऋषियोंद्वारा यज्ञ का आरम्भ, त्रिशंकु का सशरीर स्वर्गगमन, इन्द्र द्वारा स्वर्ग से उनके गिराये जाने पर क्षुब्ध हुए विश्वामित्र का नूतन देवसर्ग के लिये उद्योग)

षष्टितमः सर्गः 

सर्ग-60


तपोबलहतान् ज्ञात्वा वासिष्ठान् समहोदयान्।

ऋषिमध्ये महातेजा विश्वामित्रोऽभ्यभाषत॥१॥

[शतानन्दजी कहते हैं- श्रीराम!] महोदयसहित वसिष्ठ के पुत्रों को अपने तपोबल से नष्ट हुआ जानमहातेजस्वी विश्वामित्र ने ऋषियों के बीच में इस प्रकार कहा- ॥१॥

अयमिक्ष्वाकुदायादस्त्रिशङ्करिति विश्रुतः।

धर्मिष्ठश्च वदान्यश्च मां चैव शरणं गतः॥२॥

‘मुनिवरो! ये इक्ष्वाकुवंश में उत्पन्न राजा त्रिशंकु हैं। ये विख्यात नरेश बड़े ही धर्मात्मा और दानी रहे हैं तथा इस समय मेरी शरण में आये हैं॥२॥

स्वेनानेन शरीरेण देवलोकजिगीषया।

यथायं स्वशरीरेण देवलोकं गमिष्यति॥३॥

तथा प्रवर्त्यतां यज्ञो भवद्भिश्च मया सह।

‘इनकी इच्छा है कि मैं अपने इसी शरीर से देवलोक पर अधिकार प्राप्त करूँ। अतः आपलोग मेरे साथ रहकर ऐसे यज्ञ का अनुष्ठान करें, जिससे इन्हें इस शरीर से ही देवलोक की प्राप्ति हो सके’॥ ३

१/२॥

विश्वामित्रवचः श्रुत्वा सर्व एव महर्षयः॥४॥

ऊचुः समेताः सहसा धर्मज्ञा धर्मसंहितम्।

अयं कुशिकदायादो मुनिः परमकोपनः॥५॥

यदाह वचनं सम्यगेतत् कार्यं न संशयः।

विश्वामित्रजी की यह बात सुनकर धर्म को जानने वाले सभी महर्षियों ने सहसा एकत्र होकर आपस में धर्मयुक्त परामर्श किया—’ब्राह्मणो! कुशिक के पुत्र विश्वामित्र मुनि बड़े क्रोधी हैं ये जो बात कह रहे हैं, उसका ठीक तरह से पालन करना चाहिये, इसमें संशय नहीं है॥ ४-५ १/२॥

अग्निकल्पो हि भगवान् शापं दास्यति रोषतः॥

तस्मात् प्रवर्त्यतां यज्ञः सशरीरो यथा दिवि।

गच्छेदिक्ष्वाकुदायादो विश्वामित्रस्य तेजसा॥ ७॥

‘ये भगवान् विश्वामित्र अग्नि के समान तेजस्वी हैं। यदि इनकी बात नहीं मानी गयी तो ये रोषपूर्वक शाप दे देंगे। इसलिये ऐसे यज्ञ का आरम्भ करना चाहिये, जिससे विश्वामित्र के तेज से ये इक्ष्वाकुनन्दन त्रिशंकु सशरीर स्वर्गलोक में जा सकें’॥६-७॥

ततः प्रवर्त्यतां यज्ञः सर्वे समधितिष्ठत।

एवमुक्त्वा महर्षयः संजह्वस्ताः क्रियास्तदा ॥८॥

इस तरह विचार करके उन्होंने सर्वसम्मति से यह निश्चय किया कि ‘यज्ञ आरम्भ किया जाय।’ ऐसा निश्चय करके महर्षियों ने उस समय अपना-अपना कार्य आरम्भ किया॥ ८॥

याजकश्च महातेजा विश्वामित्रोऽभवत् क्रतौ।

ऋत्विजश्चानुपूर्येण मन्त्रवन्मन्त्रकोविदाः॥९॥

चक्रुः सर्वाणि कर्माणि यथाकल्पं यथाविधि।

महातेजस्वी विश्वामित्र स्वयं ही उस यज्ञमें याजक (अध्वर्यु) हुए। फिर क्रमशः अनेक मन्त्रवेत्ता ब्राह्मण ऋत्विज् हुए; जिन्होंने कल्पशास्त्रके अनुसार विधि एवं मन्त्रोच्चारणपूर्वक सारे कार्य सम्पन्न किये॥९ १/२॥

ततः कालेन महता विश्वामित्रो महातपाः॥१०॥

चकारावाहनं तत्र भागार्थं सर्वदेवताः।

नाभ्यागमंस्तदा तत्र भागार्थं सर्वदेवताः॥११॥

तदनन्तर बहुत समयतक यत्नपूर्वक मन्त्रपाठ करके महातपस्वी विश्वामित्र ने अपना-अपना भाग ग्रहण करने के लिये सम्पूर्ण देवताओं का आवाहन किया; परंतु उस समय वहाँ भाग लेने के लिये वे सब देवता नहीं आये॥१०-११॥

ततः कोपसमाविष्टो विश्वामित्रो महामुनिः।

स्रुवमुद्यम्य सक्रोधस्त्रिशङ्कमिदमब्रवीत्॥१२॥

इससे महामुनि विश्वामित्र को बड़ा क्रोध आया और उन्होंने स्रुवा उठाकर रोष के साथ राजा त्रिशंकु से इस प्रकार कहा- ॥ १२॥

पश्य मे तपसो वीर्यं स्वार्जितस्य नरेश्वर।

एष त्वां स्वशरीरेण नयामि स्वर्गमोजसा ॥१३॥

‘नरेश्वर! अब तुम मेरे द्वारा उपार्जित तपस्या का बल देखो। मैं अभी तुम्हें अपनी शक्ति से सशरीर स्वर्गलोक में पहुँचाता हूँ॥ १३॥

दुष्प्रापं स्वशरीरेण स्वर्गं गच्छ नरेश्वर।

स्वार्जितं किंचिदप्यस्ति मया हि तपसः फलम्॥ १४॥

राजंस्त्वं तेजसा तस्य सशरीरो दिवं व्रज।

‘राजन्! आज तुम अपने इस शरीर के साथ ही दुर्लभ स्वर्गलोक को जाओ। नरेश्वर! यदि मैंने तपस्या का कुछ भी फल प्राप्त किया है तो उसके प्रभाव से तुम सशरीर स्वर्गलोक को जाओ’॥ १४ १/२॥

उक्तवाक्ये मुनौ तस्मिन् सशरीरो नरेश्वरः॥ १५॥

दिवं जगाम काकुत्स्थ मुनीनां पश्यतां तदा।

श्रीराम ! विश्वामित्र मुनि के इतना कहते ही राजा त्रिशंकु सब मुनियों के देखते-देखते उस समय अपने शरीर के साथ ही स्वर्गलोक को चले गये॥ १५ १/२॥

स्वर्गलोकं गतं दृष्ट्वा त्रिशङ्कं पाकशासनः॥१६॥

सह सर्वैः सुरगणैरिदं वचनमब्रवीत्।

त्रिशंकु को स्वर्गलोक में पहुँचा हुआ देख समस्त देवताओं के साथ पाकशासन इन्द्र ने उनसे इस प्रकार कहा- ॥ १६ १/२॥

त्रिशङ्को गच्छ भूयस्त्वं नासि स्वर्गकृतालयः॥ १७॥

गुरुशापहतो मूढ पत भूमिमवाक्शिराः।

‘मूर्ख त्रिशंकु ! तू फिर यहाँ से लौट जा, तेरे लिये स्वर्ग में स्थान नहीं है। तू गुरु के शाप से नष्ट हो चुका है, अतः नीचे मुँह किये पुनः पृथ्वी पर गिर जा’ ॥ १७ १/२॥

एवमुक्तो महेन्द्रेण त्रिशङ्करपतत् पुनः॥१८॥

विक्रोशमानस्त्राहीति विश्वामित्रं तपोधनम्।

इन्द्र के इतना कहते ही राजा त्रिशंकु तपोधन विश्वामित्र को पुकार कर ‘त्राहि-त्राहि’ की रट लगाते हुए पुनः स्वर्ग से नीचे गिरे॥ १८ १/२॥

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य क्रोशमानस्य कौशिकः॥ १९॥

रोषमाहारयत् तीव्र तिष्ठ तिष्ठति चाब्रवीत्।

चीखते-चिल्लाते हुए त्रिशंकु की वह करुण पुकार सुनकर कौशिक मुनि को बड़ा क्रोध हुआ। वे त्रिशंकु से बोले– ‘राजन् ! वहीं ठहर जा, वहीं ठहरजा’ (उनके ऐसा कहने पर त्रिशंकु बीच में ही लटके रह गये) ॥ १९ १/२॥

ऋषिमध्ये स तेजस्वी प्रजापतिरिवापरः॥२०॥

सृजन् दक्षिणमार्गस्थान् सप्तर्षीनपरान् पुनः।

नक्षत्रवंशमपरमसृजत् क्रोधमूर्च्छितः॥२१॥

तत्पश्चात् तेजस्वी विश्वामित्र ने ऋषिमण्डली के बीच दूसरे प्रजापति के समान दक्षिण मार्ग के लिये नये सप्तर्षियों की सृष्टि की तथा क्रोध से भरकर उन्होंने नवीन नक्षत्रों का भी निर्माण कर डाला॥ २०-२१॥

दक्षिणां दिशमास्थाय ऋषिमध्ये महायशाः।

सृष्ट्वा नक्षत्रवंशं च क्रोधेन कलुषीकृतः॥२२॥

अन्यमिन्द्रं करिष्यामि लोको वा स्यादनिन्द्रकः।

दैवतान्यपि स क्रोधात् स्रष्टं समुपचक्रमे॥२३॥

वे महायशस्वी मुनि क्रोध से कलुषित हो दक्षिण दिशा में ऋषिमण्डली के बीच नूतन नक्षत्रमालाओं की सृष्टि करके यह विचार करने लगे कि ‘मैं दूसरे इन्द्र की सृष्टि करूँगा अथवा मेरे द्वारा रचित स्वर्गलोक बिना इन्द्र के ही रहेगा।’ ऐसा निश्चय करके उन्होंने क्रोधपूर्वक नूतन देवताओं की सृष्टि प्रारम्भ की॥ २२-२३॥

ततः परमसम्भ्रान्ताः सर्षिसङ्गाः सुरासुराः।

विश्वामित्रं महात्मानमूचुः सानुनयं वचः॥२४॥ ।

इससे समस्त देवता, असुर और ऋषि-समुदाय बहुत घबराये और सभी वहाँ आकर महात्मा विश्वामित्र से विनयपूर्वक बोले- ॥२४॥

अयं राजा महाभाग गुरुशापपरिक्षतः।

सशरीरो दिवं यातुं नार्हत्येव तपोधन॥ २५॥

‘महाभाग! ये राजा त्रिशंकु गुरु के शाप से अपना पुण्य नष्ट करके चाण्डाल हो गये हैं; अतः तपोधन ! ये सशरीर स्वर्ग में जाने के कदापि अधिकारी नहीं हैं’।

तेषां तद् वचनं श्रुत्वा देवानां मुनिपुंगवः।

अब्रवीत् सुमहद् वाक्यं कौशिकः सर्वदेवताः॥ २६॥

उन देवताओं की यह बात सुनकर मुनिवर कौशिक ने सम्पूर्ण देवताओं से परमोत्कृष्ट वचन कहा – |॥ २६॥

सशरीरस्य भद्रं वस्त्रिशङ्कोरस्य भूपतेः।

आरोहणं प्रतिज्ञातं नानृतं कर्तुमुत्सहे॥ २७॥

‘देवगण! आपका कल्याण हो मैंने राजा त्रिशंक को सदेह स्वर्ग भेजनेकी प्रतिज्ञा कर ली है। अतः उसे मैं झूठी नहीं कर सकता॥ २७॥

स्वर्गोऽस्तु सशरीरस्य त्रिशङ्कोरस्य शाश्वतः।

नक्षत्राणि च सर्वाणि मामकानि ध्रुवाण्यथ॥ २८॥

यावल्लोका धरिष्यन्ति तिष्ठन्त्वेतानि सर्वशः।

यत् कृतानि सुराः सर्वे तदनुज्ञातुमर्हथ॥२९॥

‘इन महाराज त्रिशंकु को सदा स्वर्गलोक का सुख प्राप्त होता रहे। मैंने जिन नक्षत्रों का निर्माण किया है, वे सब सदा मौजूद रहें। जब तक संसार रहे, तब तक ये सभी वस्तुएँ, जिनकी मेरे द्वारा सृष्टि हुई है, सदा बनी रहें। देवताओ! आप सब लोग इन बातों का अनुमोदन करें’॥

एवमुक्ताः सुराः सर्वे प्रत्यूचुर्मुनिपुंगवम्।

एवं भवतु भद्रं ते तिष्ठन्त्वेतानि सर्वशः॥ ३०॥

गगने तान्यनेकानि वैश्वानरपथाद बहिः।

नक्षत्राणि मुनिश्रेष्ठ तेषु ज्योतिःषु जाज्वलन्॥ ३१॥

अवाक्शिरास्त्रिशङ्कुश्च तिष्ठत्वमरसंनिभः ।

अनुयास्यन्ति चैतानि ज्योतींषि नृपसत्तमम्॥

कृतार्थं कीर्तिमन्तं च स्वर्गलोकगतं यथा।

उनके ऐसा कहने पर सब देवता मुनिवर विश्वामित्र से बोले—’महर्षे! ऐसा ही हो ये सभी वस्तुएँ बनी रहें और आपका कल्याण हो। मुनिश्रेष्ठ ! आपके रचे हुए अनेक नक्षत्र आकाश में वैश्वानर पथ से बाहर प्रकाशित होंगे और उन्हीं ज्योतिर्मय नक्षत्रों के बीच में सिर नीचा किये त्रिशंक भी प्रकाशमान रहेंगे। वहाँ इनकी स्थिति देवताओं के समान होगी और ये सभी नक्षत्र इन कृतार्थ एवं यशस्वी नृपश्रेष्ठ का स्वर्गीय पुरुष की भाँति अनुसरण करते रहेंगे’।

विश्वामित्रस्तु धर्मात्मा सर्वदेवैरभिष्टतः॥३३॥

ऋषिमध्ये महातेजा बाढमित्येव देवताः।

इसके बाद सम्पूर्ण देवताओं ने ऋषियों के बीचमें ही महातेजस्वी धर्मात्मा विश्वामित्र मुनि की स्तुति की, इससे प्रसन्न होकर उन्होंने ‘बहुत अच्छा’ कहकर देवताओं का अनुरोध स्वीकार कर लिया॥३३ १/२॥

ततो देवा महात्मानो ऋषयश्च तपोधनाः।

जग्मुर्यथागतं सर्वे यज्ञस्यान्ते नरोत्तम ॥ ३४॥

नरश्रेष्ठ श्रीराम! तदनन्तर यज्ञ समाप्त होने पर सब देवता और तपोधन महर्षि जैसे आये थे, उसी प्रकार अपने-अपने स्थान को लौट गये॥३४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे षष्टितमः सर्गः॥६०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में साठवाँ सर्ग पूरा हुआ।६०॥