सर्ग-41
तस्मिंस्तु पुरुषव्याघ्र निष्क्रामति कृताञ्जलौ।
आर्तशब्दो हि संजज्ञे स्त्रीणामन्तःपुरे महान्॥१॥
पुरुषसिंह श्रीराम ने माताओं सहित पिता के लिये दूर से ही हाथ जोड़ रखे थे, उसी अवस्था में जब वे रथ द्वारा नगर से बाहर निकलने लगे, उस समय रनवास की रानियों में बड़ा हाहाकार मच गया॥१॥
अनाथस्य जनस्यास्य दुर्बलस्य तपस्विनः।
यो गतिः शरणं चासीत् स नाथः क्व नु गच्छति॥२॥
वे रोती हुई कहने लगीं—’हाय! जो हम अनाथ, दुर्बल और शोचनीय जनों की गति (सब सुखों की प्राप्ति कराने वाले) और शरण (समस्त आपत्तियों से रक्षा करने वाले) थे, वे हमारे नाथ (मनोरथ पूर्ण करने वाले) श्रीराम कहाँ चले जा रहे हैं? ॥ २॥
न क्रुध्यत्यभिशस्तोऽपि क्रोधनीयानि वर्जयन्।
क्रुद्वान् प्रसादयन् सर्वान् समदुःखः क्व गच्छति॥३॥
‘जो किसी के द्वारा झूठा कलंक लगाये जाने पर भी क्रोध नहीं करते थे, क्रोध दिलाने वाली बातें नहीं कहते थे और रूठे हुए सभी लोगों को मनाकर प्रसन्न कर लेते थे, वे दूसरों के दुःख में समवेदना प्रकट करने वाले राम कहाँ जा रहे हैं? ॥ ३॥
कौसल्यायां महातेजा यथा मातरि वर्तते।
तथा यो वर्ततेऽस्मासु महात्मा क्व नु गच्छति॥ ४॥
‘जो महातेजस्वी महात्मा श्रीराम अपनी माता कौसल्याके साथ जैसा बर्ताव करते थे, वैसा ही बर्ताव हमारे साथ भी करते थे, वे कहाँ चले जा रहे हैं? ॥ ४॥
कैकेय्या क्लिश्यमानेन राज्ञा संचोदितो वनम्।
परित्राता जनस्यास्य जगतः क्व नु गच्छति॥५॥
‘कैकेयी के द्वारा क्लेश में डाले गये महाराज के वन जाने के लिये कहने पर हमलोगों की अथवा समस्त जगत् की रक्षा करने वाले श्रीरघुवीर कहाँ चले जा रहे हैं? ॥ ५॥
अहो निश्चेतनो राजा जीवलोकस्य संक्षयम्।
धर्म्यं सत्यव्रतं रामं वनवासे प्रवत्स्यति॥६॥
‘अहो! ये राजा बड़े बुद्धिहीन हैं, जो कि जीवजगत् के आश्रयभूत, धर्मपरायण, सत्यव्रती श्रीराम को वनवास के लिये देश निकाला दे रहे हैं ॥६॥
इति सर्वा महिष्यस्ता विवत्सा इव धेनवः।
रुरुदुश्चैव दुःखार्ताः सस्वरं च विचुक्रुशुः॥७॥
इस प्रकार वे सब-की-सब रानियाँ बछड़ों से बिछुड़ी हुई गौओं की तरह दुःख से आर्त होकर रोने और उच्चस्वर से क्रन्दन करने लगीं॥७॥
स तमन्तःपुरे घोरमार्तशब्दं महीपतिः।
पुत्रशोकाभिसंतप्तः श्रुत्वा चासीत् सुदुःखितः॥
अन्तःपुर में वह घोर आर्तनाद सुनकर पुत्रशोक से संतप्त हुए महाराज दशरथ बहुत दुःखी हो गये॥८॥
नाग्निहोत्राण्यहूयन्त नापचन् गृहमेधिनः।
अकुर्वन् न प्रजाः कार्यं सूर्यश्चान्तरधीयत॥९॥
व्यसृजन् कवलान् नागा गावो वत्सान् न पाययन्।
पुत्रां प्रथमजं लब्ध्वा जननी नाभ्यनन्दत ॥१०॥
उस दिन अग्निहोत्र बंद हो गया, गृहस्थों के घर भोजन नहीं बना, प्रजाओं ने कोई काम नहीं किया, सूर्यदेव अस्ताचल को चले गये, हाथियों ने मुँह में लिया हुआ चारा छोड़ दिया, गौओं ने बछड़ों को दूध नहीं पिलाया और पहले-पहल पुत्र को जन्म देकर भी कोई माता प्रसन्न नहीं हुई॥९-१० ॥
त्रिशङ्कर्लोहिताङ्गश्च बृहस्पतिबुधावपि।
दारुणाः सोममभ्येत्य ग्रहाः सर्वे व्यवस्थिताः॥ ११॥
त्रिशंकु, मङ्गल, गुरु, बुध तथा अन्य समस्त ग्रह शुक्र, शनि आदि रात में वक्रगति से चन्द्रमा के पास पहुँचकर दारुण (क्रूरकान्तियुक्त) होकर स्थित हो गये॥
नक्षत्राणि गता षि ग्रहाश्च गततेजसः।
विशाखाश्च सधमाश्च नभसि प्रचकाशिरे॥ १२॥
नक्षत्रों की कान्ति फीकी पड़ गयी और ग्रह निस्तेज हो गये। वे सब-के-सब आकाश में विपरीत मार्गपर स्थित हो धूमाच्छन्न प्रतीत हो रहे थे॥ १२ ॥
कालिकानिलवेगेन महोदधिरिवोत्थितः।
रामे वनं प्रव्रजिते नगरं प्रचचाल तत्॥१३॥
आकाश में छायी हुई मेघमाला वायु के वेग से उमड़े हुए समुद्र के समान प्रतीत होती थी। श्रीराम के वन को जाते समय वह सारा नगर जोर-जोर से हिलने लगा (वहाँ भूकम्प आ गया) ॥ १३॥
दिशः पर्याकुलाः सर्वास्तिमिरेणेव संवृताः।
न ग्रहो नापि नक्षत्रं प्रचकाशे न किंचन॥१४॥
समस्त दिशाएँ व्याकुल हो उठीं, उनमें अन्धकार सा छा गया। न कोई ग्रह प्रकाशित होता था, न नक्षत्र॥
अकस्मान्नागरः सर्वो जनो दैन्यमुपागमत्।
आहारे वा विहारे वा न कश्चिदकरोन्मनः॥ १५॥
सहसा सारे नागरिक दीन-दशा को प्राप्त हो गये। किसी ने भी आहार या विहार में मन नहीं लगाया॥ १५॥
शोकपर्यायसंतप्तः सततं दीर्घमुच्छ्वसन्।
अयोध्यायां जनः सर्वश्चुक्रोश जगतीपतिम्॥ १६॥
अयोध्यावासी सब लोग शोकपरम्परा से संतप्त हो निरन्तर लंबी साँस खींचते हुए राजा दशरथ को कोसने लगे॥१६॥
बाष्पपर्याकुलमुखो राजमार्गगतो जनः।
न हृष्टो लभ्यते कश्चित् सर्वः शोकपरायणः॥ १७॥
सड़क पर निकला हुआ कोई भी मनुष्य प्रसन्न नहीं दिखायी देता था। सबका मुख आँसुओं से भीगा हुआ था और सभी शोकमग्न हो रहे थे॥१७॥
न वाति पवनः शीतो न शशी सौम्यदर्शनः।
न सूर्यस्तपते लोकं सर्वं पर्याकुलं जगत्॥१८॥
शीतल वायु नहीं चलती थी। चन्द्रमा सौम्य नहीं दिखायी देता था। सूर्य भी जगत् को उचित मात्रा में ताप या प्रकाश नहीं दे रहा था। सारा संसार ही व्याकुल हो उठा था॥ १८॥
अनर्थिनः सुताः स्त्रीणां भर्तारो भ्रातरस्तथा।
सर्वे सर्वं परित्यज्य राममेवान्वचिन्तयन्॥१९॥
बालक माँ-बाप को भूल गये। पतियों को स्त्रियों की याद नहीं आती थी और भाई भाई का स्मरण नहीं करते थे—सभी सब कुछ छोड़कर केवल श्रीराम का ही चिन्तन करने लगे॥ १९॥
ये तु रामस्य सुहृदः सर्वे ते मूढचेतसः।
शोकभारेण चाक्रान्ताः शयनं नैव भेजिरे॥२०॥
जो श्रीराम के मित्र थे, वे सब तो और भी अपनी सुध-बुध खो बैठे थे। शोक के भार से आक्रान्त होने के कारण वे रात में सोये तक नहीं॥ २० ॥
ततस्त्वयोध्या रहिता महात्मना पुरन्दरेणेव मही सपर्वता।
चचाल घोरं भयशोकदीपिता सनागयोधाश्वगणा ननाद च॥२१॥
इस प्रकार सारी अयोध्यापुरी श्रीराम से रहित होकर भय और शोक से प्रज्वलित-सी होकर उसी प्रकार घोर हलचल में पड़ गयी, जैसे देवराज इन्द्र से रहित हुई मेरु-पर्वतसहित यह पृथ्वी डगमगाने लगती है। हाथी, घोड़े और सैनिकों सहित उस नगरी में भयंकर आर्तनाद होने लगा।
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकचत्वारिंशः सर्गः॥ ४१॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में इकतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥४१॥
सर्ग-42
यावत् तु निर्यतस्तस्य रजोरूपमदृश्यत।
नैवेक्ष्वाकुवरस्तावत् संजहारात्मचक्षुषी॥१॥
वन की ओर जाते हुए श्रीराम के रथ की धूल जबतक दिखायी देती रही, तब तक इक्ष्वाकुवंश के स्वामी राजा दशरथ ने उधर से अपनी आँखें नहीं हटायीं॥१॥
यावद् राजा प्रियं पुत्रं पश्यत्यत्यन्तधार्मिकम्।
तावद् व्यवर्धतेवास्य धरण्यां पुत्रदर्शने॥२॥
वे महाराज अपने अत्यन्त धार्मिक प्रिय पुत्र को जबतक देखते रहे, तबतक पुत्र को देखने के लिये उनका शरीर मानो पृथ्वी पर बढ़ रहा था—वे ऊँचे उठ-उठकर उनकी ओर निहार रहे थे॥२॥
न पश्यति रजोऽप्यस्य यदा रामस्य भूमिपः।
तदार्तश्च निषण्णश्च पपात धरणीतले॥३॥
जब राजा को श्रीराम के रथ की धूल भी नहीं दिखायी देने लगी, तब वे अत्यन्त आर्त और विषादग्रस्त हो पृथ्वी पर गिर पड़े॥३॥
तस्य दक्षिणमन्वागात् कौसल्या बाहुमङ्गना।
परं चास्यान्वगात् पार्वं कैकेयी सा सुमध्यमा॥ ४॥
उस समय उन्हें सहारा देने के लिये उनकी धर्मपत्नी कौसल्या देवी दाहिनी बाँह के पास आयीं और सुन्दरी कैकेयी उनके वामभाग में जा पहुँचीं॥ ४॥
तां नयेन च सम्पन्नो धर्मेण विनयेन च।
उवाच राजा कैकेयीं समीक्ष्य व्यथितेन्द्रियः॥५॥
कैकेयी को देखते ही नय, विनय और धर्म से सम्पन्न राजा दशरथ की समस्त इन्द्रियाँ व्यथित हो उठीं; वे बोल उठे— ॥५॥
कैकेयि मामकाङ्गानि मा स्पाक्षीः पापनिश्चये।
नहि त्वां द्रष्टुमिच्छामि न भार्या न च बान्धवी॥ ६॥
‘पापपूर्ण विचार रखने वाली कैकेयि! तू मेरे अङ्गों का स्पर्श न कर मैं तुझे देखना नहीं चाहता। तू न तो मेरी भार्या है और न बान्धवी॥ ६॥
ये च त्वामनुजीवन्ति नाहं तेषां न ते मम।
केवलार्थपरां हि त्वां त्यक्तधर्मां त्यजाम्यहम्॥ ७॥
‘जो तेरा आश्रय लेकर जीवन-निर्वाह करते हैं, मैं उनका स्वामी नहीं हूँ और वे मेरे परिजन नहीं हैं। तूने केवल धन में आसक्त होकर धर्मका त्याग किया है, इसलिये मैं तेरा परित्याग करता हूँ॥७॥
अगृह्णां यच्च ते पाणिमग्निं पर्यणयं च यत्।
अनुजानामि तत् सर्वमस्मिंल्लोके परत्र च॥८॥
‘मैंने जो तेरा पाणिग्रहण किया है और तुझे साथ लेकर अग्निकी परिक्रमा की है, तेरे साथ का वह सारा सम्बन्ध इस लोक और परलोक के लिये भी त्याग देता हूँ॥ ८॥
भरतश्चेत् प्रतीतः स्याद् राज्यं प्राप्यैतदव्ययम्।
यन्मे स दद्यात् पित्रर्थं मा मां तद्दत्तमागमत्॥९॥
‘तेरा पुत्र भरत भी यदि इस विघ्न-बाधा से रहित राज्य को पाकर प्रसन्न हो तो वह मेरे लिये श्राद्ध में जो कुछ पिण्ड या जल आदि दान करे, वह मुझे प्राप्त न हो’ ॥ ९॥
अथ रेणुसमुद्ध्वस्तं समुत्थाप्य नराधिपम्।
न्यवर्तत तदा देवी कौसल्या शोककर्शिता॥ १०॥
तदनन्तर शोक से कातर हुई कौसल्या देवी उस समय धरती पर लोटने के कारण धूल से व्याप्त हुए महाराज को उठाकर उनके साथ राजभवन की ओर लौटीं ॥ १०॥
हत्वेव ब्राह्मणं कामात् स्पृष्ट्वाग्निमिव पाणिना।
अन्वतप्यत धर्मात्मा पुत्रं संचिन्त्य राघवम्॥ ११॥
जैसे कोई जान-बूझकर स्वेच्छापूर्वक ब्राह्मण की हत्या कर डाले अथवा हाथ से प्रज्वलित अग्नि का स्पर्श कर ले और ऐसा करके संतप्त होता रहे, उसी प्रकार धर्मात्मा राजा दशरथ अपने ही दिये हुए वरदान के कारण वन में गये हुए श्रीराम का चिन्तन करके अनुतप्त हो रहे थे॥११॥
निवृत्यैव निवृत्यैव सीदतो रथवर्त्मसु।
राज्ञो नातिबभौ रूपं ग्रस्तस्यांशुमतो यथा॥१२॥
राजा दशरथ बारंबार पीछे लौटकर रथ के मार्गो पर देखने का कष्ट उठाते थे। उस समय उनका रूप राहुग्रस्त सूर्य की भाँति अधिक शोभा नहीं पाता था। १२॥
विललाप स दुःखार्तः प्रियं पुत्रमनुस्मरन्।
नगरान्तमनुप्राप्तं बुद्ध्वा पुत्रमथाब्रवीत्॥१३॥
वे अपने प्रिय पुत्र का बारंबार स्मरण करके दुःख से आतुर हो विलाप करने लगे। वे बेटे को नगर की सीमा पर पहुँचा हुआ समझकर इस प्रकार कहने लगे – ॥१३॥
वाहनानां च मुख्यानां वहतां तं ममात्मजम्।
पदानि पथि दृश्यन्ते स महात्मा न दृश्यते॥१४॥
‘हाय! मेरे पुत्र को वन की ओर ले जाते हुए श्रेष्ठ वाहनों (घोड़ों) के पदचिह्न तो मार्ग में दिखायी देते हैं; परंतु उन महात्मा श्रीराम का दर्शन नहीं हो रहा है। १४॥
यः सुखेनोपधानेषु शेते चन्दनरूषितः।
वीज्यमानो महार्हाभिः स्त्रीभिर्मम सतोत्तमः॥ १५॥
स नूनं क्वचिदेवाद्य वृक्षमूलमुपाश्रितः।
काष्ठं वा यदि वाश्मानमुपधाय शयिष्यते॥१६॥
‘जो मेरे श्रेष्ठ पुत्र श्रीराम चन्दन से चर्चित हो तकियों का सहारा लेकर उत्तम शय्याओं पर सुख से सोते थे और उत्तम अलंकारों से विभूषित सुन्दरी स्त्रियाँ जिन्हें व्यजन डुलाती थीं, वे निश्चय ही आज कहीं वृक्ष की जड़का आश्रय ले अथवा किसी काठ या पत्थर को सिर के नीचे रखकर भूमिपर ही शयन करेंगे॥१५-१६ ॥
उत्थास्यति च मेदिन्याः कृपणः पांसुगुण्ठितः।
विनिःश्वसन प्रस्रवणात् करेणूनामिवर्षभः॥ १७॥
‘फिर अङ्गों में धूल लपेटे दीन की भाँति लंबी साँस खींचते हुए वे उस शयन-भूमि से उसी प्रकार उठेंगे, जैसे किसी झरने के पास से गजराज उठता है॥
द्रक्ष्यन्ति नूनं पुरुषा दीर्घबाहं वनेचराः।
राममुत्थाय गच्छन्तं लोकनाथमनाथवत्॥१८॥
‘निश्चय ही वन में रहने वाले मनुष्य लोकनाथ महाबाहु श्रीराम को वहाँ से अनाथ की भाँति उठकर जाते हुए देखेंगे॥ १८॥
सा नूनं जनकस्येष्टा सुता सुखसदोचिता।
कण्टकाक्रमणक्लान्ता वनमद्य गमिष्यति॥
‘जो सदा सुख भोगने के ही योग्य है, वह जनक की प्यारी पुत्री सीता आज अवश्य ही काँटों पर पैर पड़ने से व्यथा का अनुभव करती हुई वन को जायगी। १९॥
अनभिज्ञा वनानां सा नूनं भयमुपैष्यति।
श्वपदानर्दितं श्रुत्वा गम्भीरं रोमहर्षणम्॥२०॥
‘वह वन के कष्टों से अनभिज्ञ है। वहाँ व्याघ्र आदि हिंसक जन्तुओं का गम्भीर तथा रोमाञ्चकारी गर्जनतर्जन सुनकर निश्चय ही भयभीत हो जायगी॥ २० ॥
सकामा भव कैकेयि विधवा राज्यमावस।
नहि तं पुरुषव्याघ्रं विना जीवितुमुत्सहे॥२१॥
‘अरी कैकेयी! तू अपनी कामना सफल कर ले और विधवा होकर राज्य भोग। मैं पुरुषसिंह श्रीराम के बिना जीवित नहीं रह सकता’ ॥ २१॥
इत्येवं विलपन् राजा जनौघेनाभिसंवृतः।
अपस्नात इवारिष्टं प्रविवेश गृहोत्तमम्॥२२॥
इस प्रकार विलाप करते हुए राजा दशरथ ने मरघट से नहाकर आये हुए पुरुष की भाँति मनुष्यों की भारी भीड़ से घिरकर अपने शोकपूर्ण उत्तम भवन में प्रवेश किया।॥ २२ ॥
शून्यचत्वरवेश्मान्तां संवृतापणवेदिकाम्।
क्लान्तदुर्बलदुःखार्ती नात्याकीर्णमहापथाम्॥ २३॥
तामवेक्ष्य पुरीं सर्वां राममेवानुचिन्तयन्।
विलपन् प्राविशद् राजा गृहं सूर्य इवाम्बुदम्॥ २४॥
उन्होंने देखा, अयोध्यापुरी के प्रत्येक घर का बाहरी चबूतरा और भीतरी भाग भी सूना हो रहा है। (क्योंकि उन घरों के सब लोग श्रीराम के पीछे चले गये थे।) बाजार-हाट बंद है। जो लोग नगर में हैं, वे
भी अत्यन्त क्लान्त, दुर्बल और दुःख से आतुर हो रहे हैं तथा बड़ी-बड़ी सड़कों पर भी अधिक आदमी जाते-आते नहीं दिखायी देते हैं। सारे नगर की यह अवस्था देखकर श्रीराम के लिये ही चिन्ता और विलाप करते हुए राजा उसी तरह महल के भीतर गये,जैसे सूर्य मेघों की घटा में छिप जाते हैं॥ २३-२४ ॥
महाह्रदमिवाक्षोभ्यं सुपर्णेन हृतोरगम्।
रामेण रहितं वेश्म वैदेह्या लक्ष्मणेन च ॥ २५॥
श्रीराम, लक्ष्मण और सीता से रहित वह राजभवन उस महान् अक्षोभ्य जलाशय के समान जान पड़ता था, जिसके भीतर के नाग को गरुड़ उठा ले गये हों। २५॥
अथ गद्गदशब्दस्तु विलपन् वसुधाधिपः।
उवाच मृदु मन्दार्थं वचनं दीनमस्वरम्॥२६॥
उस समय विलाप करते हुए राजा दशरथ ने गद्गद वाणी में द्वारपालों से यह मधुर, अस्पष्ट, दीनतायुक्त और स्वाभाविक स्वर से रहित बात कही— ॥२६॥
कौसल्याया गृहं शीघ्रं राममातुर्नयन्तु माम्।
नह्यन्यत्र ममाश्वासो हृदयस्य भविष्यति॥२७॥
‘मुझे शीघ्र ही श्रीराम-माता कौसल्या के घरमें पहुँचा दो; क्योंकि मेरे हृदय को और कहीं शान्ति नहीं मिल सकती’ ॥ २७॥
इति ब्रुवन्तं राजानमनयन् द्वारदर्शिनः।
कौसल्याया गृहं तत्र न्यवेस्यत विनीतवत्॥ २८॥
ऐसी बात कहते हुए राजा दशरथ को द्वारपालों ने बड़ी विनय के साथ रानी कौसल्या के भवन में पहुँचाया और पलंगपर सुला दिया॥२८॥
ततस्तत्र प्रविष्टस्य कौसल्याया निवेशनम्।
अधिरुह्यापि शयनं बभूव लुलितं मनः॥२९॥
वहाँ कौसल्या के भवन में प्रवेश करके पलंगपर आरूढ़ हो जाने पर भी राजा दशरथ का मन चञ्चल एवं मलिन ही रहा॥ २९॥
पुत्रद्वयविहीनं च स्नुषया च विवर्जितम्।
अपश्यद् भवनं राजा नष्टचन्द्रमिवाम्बरम्॥३०॥
दोनों पुत्र और पुत्रवधू सीता से रहित वह भवन राजा को चन्द्रहीन आकाश की भाँति श्रीहीन दिखायी देने लगा॥३०॥
तच्च दृष्ट्वा महाराजो भुजमुद्यम्य वीर्यवान्।
उच्चैःस्वरेण प्राक्रोशद्धा राम विजहासि नौ॥ ३१॥
सुखिता बत तं कालं जीविष्यन्ति नरोत्तमाः।
परिष्वजन्तो ये रामं द्रक्ष्यन्ति पुनरागतम्॥३२॥
उसे देखकर पराक्रमी महाराज ने एक बाँह ऊपर उठाकर उच्चस्वर से विलाप करते हुए कहा—’हा राम! तुम हम दोनों माता-पिता को त्याग दे रहे हो। जो नरश्रेष्ठ चौदह वर्षों की अवधितक जीवित रहेंगे और अयोध्या में पुनः लौटे हुए श्रीराम को हृदय से लगाकर देखेंगे, वे ही वास्तव में सुखी होंगे’। ३१-३२॥
अथ रात्र्यां प्रपन्नायां कालरात्र्यामिवात्मनः।
अर्धरात्रे दशरथः कौसल्यामिदमब्रवीत्॥ ३३॥
तदनन्तर अपनी कालरात्रि के समान वह रात्रि आने पर राजा दशरथ ने आधी रात होने पर कौसल्या से इस प्रकार कहा- ॥३३॥
न त्वां पश्यामि कौसल्ये साधु मां पाणिना स्पृश।
रामं मेऽनुगता दृष्टिरद्यापि न निवर्तते॥३४॥
‘कौसल्ये! मेरी दृष्टि श्रीराम के ही साथ चली गयी और वह अब तक नहीं लौटी है; अतः मैं तुम्हें देख नहीं पाता हूँ। एक बार अपने हाथ से मेरे शरीर का स्पर्श तो करो’॥
तं राममेवानुविचिन्तयन्तं समीक्ष्य देवी शयने नरेन्द्रम्।
उपोपविश्याधिकमार्तरूपा विनिश्वसन्तं विललाप कृच्छ्रम्॥ ३५॥
शय्यापर पड़े हुए महाराज दशरथ को श्रीराम का ही चिन्तन करते और लंबी साँस खींचते देख देवी कौसल्या अत्यन्त व्यथित हो उनके पास आ बैठी और बड़े कष्ट से विलाप करने लगीं ॥ ३५ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे द्विचत्वारिंशः सर्गः॥ ४२॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में बयालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥४२॥
सर्ग-43
ततः समीक्ष्य शयने सन्नं शोकेन पार्थिवम्।
कौसल्या पुत्रशोकार्ता तमुवाच महीपतिम्॥१॥
शय्या पर पड़े हुए राजा को पुत्रशोक से व्याकुल देख पुत्र के ही शोक से पीड़ित हुई कौसल्या ने उन महाराज से कहा- ॥१॥
राघवे नरशार्दूले विषं मुक्त्वाहिजिह्मगा।
विचरिष्यति कैकेयी निर्मुक्तेव हि पन्नगी॥२॥
‘नरश्रेष्ठ श्रीराम पर अपना विष उँडेलकर टेढ़ी चाल से चलने वाली कैकेयी केंचुल छोड़कर नूतन शरीर से प्रकट हुई सर्पिणी की भाँति अब स्वच्छन्द विचरेगी॥२॥
विवास्य रामं सुभगा लब्धकामा समाहिता।
त्रासयिष्यति मां भूयो दुष्टाहिरिव वेश्मनि॥३॥
‘जैसे घर में रहने वाला दुष्ट सर्प बारंबार भय देता रहता है, उसी प्रकार श्रीरामचन्द्र को वनवास देकर सफलमनोरथ हुई सुभगा कैकेयी सदा सावधान होकर मुझे त्रास देती रहेगी॥३॥
अथास्मिन् नगरे रामश्चरन् भैक्षं गृहे वसेत्।
कामकारो वरं दातुमपि दासं ममात्मजम्॥४॥
‘यदि श्रीराम इस नगर में भीख माँगते हुए भी घर में रहते अथवा मेरे पुत्र को कैकेयी का दास भी बना दिया गया होता तो वैसा वरदान मुझे भी अभीष्ट होता (क्योंकि उस दशा में मुझे भी श्रीराम का दर्शन होता रहता। श्रीराम के वनवास का वरदान तो कैकेयी ने मुझे दुःख देने के लिये ही माँगा है।) ॥ ४॥
पातयित्वा तु कैकेय्या रामं स्थानाद् यथेष्टतः।
प्रविद्धो रक्षसां भागः पर्वणीवाहिताग्निना॥५॥
‘कैकेयी ने अपनी इच्छा के अनुसार श्रीराम को उनके स्थान से भ्रष्ट करके वैसा ही किया है, जैसे किसी अग्निहोत्री ने पर्व के दिन देवताओं को उनके भाग से वञ्चित करके राक्षसों को वह भाग अर्पित कर दिया हो॥५॥
नागराजगतिर्वीरो महाबाहुर्धनुर्धरः।
वनमाविशते नूनं सभार्यः सहलक्ष्मणः॥६॥
‘गजराज के समान मन्द गति से चलने वाले वीर महाबाहु धनुर्धर श्रीराम निश्चय ही अपनी पत्नी और लक्ष्मण के साथ वन में प्रवेश कर रहे होंगे॥६॥
वने त्वदृष्टदुःखानां कैकेय्यनुमते त्वया।
त्यक्तानां वनवासाय कान्यावस्था भविष्यति॥ ७॥
‘महाराज! जिन्होंने जीवन में कभी दुःख नहीं देखे थे, उन श्रीराम, लक्ष्मण और सीता को आपने कैकेयी की बातों में आकर वन में भेज दिया। अब उन बेचारों की वनवास के कष्ट भोगने के सिवा और क्या अवस्था होगी?॥
ते रत्नहीनास्तरुणाः फलकाले विवासिताः।
कथं वत्स्यन्ति कृपणाः फलमूलैः कृताशनाः॥ ८ ॥
‘रत्नतुल्य उत्तम वस्तुओं से वञ्चित वे तीनों तरुण सुखरूप फल भोगने के समय घर से निकाल दिये गये। अब वे बेचारे फल-मूल का भोजन करके कैसे रह सकेंगे? ॥ ८॥
अपीदानीं स कालः स्यान्मम शोकक्षयः शिवः।
सहभार्यं सह भ्रात्रा पश्येयमिह राघवम्॥९॥
क्या अब फिर मेरे शोक को नष्ट करने वाला वह शुभ समय आयेगा, जब मैं सीता और लक्ष्मण के साथ वन से लौटे हुए श्रीराम को देखूगी? ॥ ९॥
श्रुत्वैवोपस्थितौ वीरौ कदायोध्या भविष्यति।
यशस्विनी हृष्टजना सूच्छ्रितध्वजमालिनी॥१०॥
‘कब वह शुभ अवसर प्राप्त होगा जब कि ‘वीर श्रीराम और लक्ष्मण वन से लौट आये’ यह सुनते ही यशस्विनी अयोध्यापुरी के सब लोग हर्ष से उल्लसित हो उठेगे और घर-घर फहराये गये ऊँचे-ऊँचे ध्वजसमूह पुरी की शोभा बढ़ाने लगेंगे॥ १० ॥
कदा प्रेक्ष्य नरव्याघ्रावरण्यात् पुनरागतौ।
भविष्यति पुरी हृष्टा समुद्र इव पर्वणि॥११॥
‘नरश्रेष्ठ श्रीराम और लक्ष्मण को पुनः वन से आया हुआ देख यह अयोध्यापुरी पूर्णिमा के उमड़ते हुए समुद्र की भाँति कब हर्षोल्लास से परिपूर्ण होगी?॥ ११॥
कदायोध्यां महाबाहुः पुरीं वीरः प्रवेक्ष्यति।
पुरस्कृत्य रथे सीतां वृषभो गोवधूमिव॥१२॥
‘जैसे साँड़ गाय को आगे करके चलता है, उसी प्रकार वीर महाबाहु श्रीराम रथ पर सीता को आगे करके कब अयोध्यापुरी में प्रवेश करेंगे? ॥ १२ ॥
कदा प्राणिसहस्राणि राजमार्गे ममात्मजौ।
लाजैरवकरिष्यन्ति प्रविशन्तावरिंदमौ॥१३॥
‘कब यहाँ के सहस्रों मनुष्य पुरी में प्रवेश करते और राजमार्ग पर चलते हुए मेरे दोनों शत्रुदमन पुत्रों पर लावा (खील)-की वर्षा करेंगे? ॥ १३॥
प्रविशन्तौ कदायोध्यां द्रक्ष्यामि शुभकुण्डलौ।
उदग्रायुधनिस्त्रिंशौ सशृङ्गाविव पर्वतौ॥१४॥
‘उत्तम आयुध एवं खड्ग लिये शिखरयुक्त पर्वतों के समान प्रतीत होने वाले श्रीराम और लक्ष्मण सुन्दर कुण्डलों से अलंकृत हो कब अयोध्यापुरी में प्रवेश करते हुए मेरे नेत्रों के समक्ष प्रकट होंगे? ॥
१४॥
कदा सुमनसः कन्या द्विजातीनां फलानि च।
प्रदिशन्त्यः पुरीं हृष्टाः करिष्यन्ति प्रदक्षिणम्॥ १५॥
‘कब ब्राह्मणों की कन्याएँ हर्षपूर्वक फूल और फल अर्पण करती हुई अयोध्यापुरी की परिक्रमा करेंगी? ॥ १५॥
कदा परिणतो बुद्धया वयसा चामरप्रभाः।
अभ्युपैष्यति धर्मात्मा सुवर्ष इव लालयन्॥१६॥
‘कब ज्ञान में बढ़े-चढ़े और अवस्था में देवताओं के समान तेजस्वी धर्मात्मा श्रीराम उत्तम वर्षा की भाँति जनसमुदाय का लालन करते हुए यहाँ पधारेंगे?॥ १६॥
निःसंशयं मया मन्ये पुरा वीर कदर्यया।
पातुकामेषु वत्सेषु मातृणां शातिताः स्तनाः॥ १७॥
‘वीर! इसमें संदेह नहीं कि पूर्व जन्म में मुझ नीच आचार-विचारवाली नारी ने बछड़ों के दूध पीने के लिये उद्यत होते ही उनकी माताओं के स्तन काट दिये होंगे॥१७॥
साहं गौरिव सिंहेन विवत्सा वत्सला कृता।
कैकेय्या पुरुषव्याघ्र बालवत्सेव गौर्बलात्॥ १८॥
‘पुरुषसिंह ! जैसे किसी सिंह ने छोटे-से बछड़े वालीवत्सला गौ को बलपूर्वक बछड़े से हीन कर दिया हो, उसी प्रकार कैकेयी ने मुझे बलात् अपने बेटे से विलग कर दिया है।॥ १८॥
नहि तावद्गुणैर्जुष्टं सर्वशास्त्रविशारदम्।
एकपुत्रा विना पुत्रमहं जीवितुमुत्सहे ॥१९॥
‘जो उत्तम गुणों से युक्त और सम्पूर्ण शास्त्रों में प्रवीण हैं, उन अपने पुत्र श्रीराम के बिना मैं इकलौते बेटेवाली माँ जीवित नहीं रह सकती॥ १९ ॥
न हि मे जीविते किंचित् सामर्थ्यमिह कल्प्यते।
अपश्यन्त्याः प्रियं पुत्रं लक्ष्मणं च महाबलम्॥ २०॥
‘अब प्यारे पुत्र श्रीराम और महाबली लक्ष्मण को देखे बिना मुझमें जीवित रहने की कुछ भी शक्ति नहीं है॥ २०॥
अयं हि मां दीपयतेऽद्य वह्निस्तनूजशोकप्रभवो महाहितः।
महीमिमां रश्मिभिरुत्तमप्रभो यथा निदाघे भगवान् दिवाकरः॥२१॥
‘जैसे ग्रीष्म ऋतु में उत्कृष्ट प्रभावाले भगवान् सूर्य अपनी किरणों द्वारा इस पृथ्वी को अधिक ताप देते हैं, उसी प्रकार यह पुत्रशोकजनित महान् अहितकारक अग्नि आज मुझे जलाये दे रही है’ ॥ २१॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्रिचत्वारिंशः सर्गः॥४३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में तैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥४३॥
सर्ग-44
विलपन्ती तथा तां तु कौसल्यां प्रमदोत्तमाम्।
इदं धर्मे स्थिता धन॑ सुमित्रा वाक्यमब्रवीत्॥१॥
नारियों में श्रेष्ठ कौसल्या को इस प्रकार विलाप करती देख धर्मपरायणा सुमित्रा यह धर्मयुक्त बात बोली- ॥१॥
तवार्ये सद्गुणैर्युक्तः स पुत्रः पुरुषोत्तमः।
किं ते विलपितेनैवं कृपणं रुदितेन वा ॥२॥
‘आर्ये! तुम्हारे पुत्र श्रीराम उत्तम गुणों से युक्त और पुरुषों में श्रेष्ठ हैं। उनके लिये इस प्रकार विलाप करना और दीनतापूर्वक रोना व्यर्थ है, इस तरह रोने-धोने से क्या लाभ? ॥२॥
यस्तवार्ये गतः पुत्रस्त्यक्त्वा राज्यं महाबलः।
साधु कुर्वन् महात्मानं पितरं सत्यवादिनम्॥३॥
शिष्टैराचरिते सम्यक्शश्वत् प्रेत्य फलोदये।
रामो धर्मे स्थितः श्रेष्ठो न स शोच्यः कदाचन। ४॥
‘बहिन! जो राज्य छोड़कर अपने महात्मा पिता को भलीभाँति सत्यवादी बनाने के लिये वन में चले गये हैं, वे तुम्हारे महाबली श्रेष्ठ पुत्र श्रीराम उस उत्तम धर्म में स्थित हैं, जिसका सत्पुरुषों ने सर्वदा और सम्यक् प्रकार से पालन किया है तथा जो परलोक में भी सुखमय फल प्रदान करने वाला है। ऐसे धर्मात्मा के लिये कदापि शोक नहीं करना चाहिये॥ ३-४ ॥
वर्तते चोत्तमां वृत्तिं लक्ष्मणोऽस्मिन् सदानघः।
दयावान् सर्वभूतेषु लाभस्तस्य महात्मनः॥५॥
‘निष्पाप लक्ष्मण समस्त प्राणियों के प्रति दयालु हैं। वे सदा श्रीराम के प्रति उत्तम बर्ताव करते हैं, अतः उन महात्मा लक्ष्मण के लिये यह लाभ की ही बात है।
अरण्यवासे यद् दुःखं जानन्त्येव सुखोचिता।
अनुगच्छति वैदेही धर्मात्मानं तवात्मजम्॥६॥
‘विदेहनन्दिनी सीता भी जो सुख भोगने के ही योग्य है, वनवास के दुःखों को भलीभाँति सोच-समझकर ही तुम्हारे धर्मात्मा पुत्र का अनुसरण करती है॥६॥
कीर्तिभूतां पताकां यो लोके भ्रमयति प्रभुः।
धर्मः सत्यव्रतपरः किं न प्राप्तस्तवात्मजः॥७॥
‘जो प्रभु संसार में अपनी कीर्तिमयी पताका फहरा रहे हैं और सदा सत्यव्रत के पालन में तत्पर रहते हैं, उन धर्मस्वरूप तुम्हारे पुत्र श्रीराम को कौन-सा श्रेय प्राप्त नहीं हुआ है॥ ७॥
व्यक्तं रामस्य विज्ञाय शौचं माहात्म्यमुत्तमम्।
न गात्रमंशुभिः सूर्यः संतापयितुमर्हति ॥८॥
‘श्रीराम की पवित्रता और उत्तम माहात्म्य को जानकर निश्चय ही सूर्य अपनी किरणों द्वारा उनके शरीर को संतप्त नहीं कर सकते॥८॥
शिवः सर्वेषु कालेषु काननेभ्यो विनिःसृतः।
राघवं युक्तशीतोष्णः सेविष्यति सुखोऽनिलः॥ ९॥
‘सभी समयों में वनों से निकली हई उचित सरदी और गरमी से युक्त सुखद एवं मङ्गलमय वायु श्रीरघुनाथजी की सेवा करेगी॥९॥
शयानमनघं रात्रौ पितेवाभिपरिष्वजन्।
घर्मघ्नः संस्पृशन् शीतश्चन्द्रमा ह्लादयिष्यति॥ १०॥
‘रात्रिकाल में धूप का कष्ट दूर करने वाले शीतल चन्द्रमा सोते हुए निष्पाप श्रीराम का अपने किरणरूपी करों से आलिङ्गन और स्पर्श करके उन्हें आह्लाद प्रदान करेंगे॥१०॥
ददौ चास्त्राणि दिव्यानि यस्मै ब्रह्मा महौजसे।
दानवेन्द्रं हतं दृष्ट्वा तिमिध्वजसुतं रणे॥११॥
‘श्रीराम के द्वारा रणभूमि में तिमिध्वज (शम्बर)-के पुत्र दानवराज सुबाहु को मारा गया देख विश्वामित्रजी ने उन महातेजस्वी वीरको बहुत-से दिव्यास्त्र प्रदान किये थे॥११॥
स शूरः पुरुषव्याघ्रः स्वबाहुबलमाश्रितः।
असंत्रस्तो शरण्येऽसौ वेश्मनीव निवत्स्यते॥ १२॥
‘वे पुरुषसिंह श्रीराम बड़े शूरवीर हैं। वे अपने ही बाहुबल का आश्रय लेकर जैसे महल में रहते थे, उसी तरह वन में भी निडर होकर रहेंगे॥ १२॥
यस्येषुपथमासाद्य विनाशं यान्ति शत्रवः।
कथं न पृथिवी तस्य शासने स्थातुमर्हति॥१३॥
‘जिनके बाणों का लक्ष्य बनकर सभी शत्रु विनाशको प्राप्त होते हैं, उनके शासन में यह पृथ्वी और यहाँ के प्राणी कैसे नहीं रहेंगे? ॥ १३ ॥
या श्रीः शौर्यं च रामस्य या च कल्याणसत्त्वता।
निवृत्तारण्यवासः स्वं क्षिप्रं राज्यमवाप्स्यति॥ १४॥
‘श्रीराम की जैसी शारीरिक शोभा है, जैसा पराक्रम है और जैसी कल्याणकारिणी शक्ति है, उससे जान पड़ता है कि वे वनवास से लौटकर शीघ्र ही अपना राज्य प्राप्त कर लेंगे॥१४॥
सूर्यस्यापि भवेत् सूर्यो ह्यग्नेरग्नः प्रभोः प्रभुः।
श्रियाः श्रीश्च भवेदग्र्या कीर्त्याः कीर्तिः क्षमाक्षमा॥१५॥
दैवतं देवतानां च भूतानां भूतसत्तमः।
तस्य के ह्यगुणा देवि वने वाप्यथवा पुरे॥१६॥
‘देवि! श्रीराम सूर्य के भी सूर्य (प्रकाशक) और अग्नि के भी अग्नि (दाहक) हैं। वे प्रभु के भी प्रभु, लक्ष्मी की भी उत्तम लक्ष्मी और क्षमा की भी क्षमा हैं। इतना ही नहीं वे देवताओं के भी देवता तथा भूतों के भी उत्तम भूत हैं। वे वन में रहें या नगर में, उनके लिये कौन-से चराचर प्राणी दोषावह हो सकते हैं। १५-१६॥
पृथिव्या सह वैदेह्या श्रिया च पुरुषर्षभः।
क्षिप्रं तिसृभिरेताभिः सह रामोऽभिषेक्ष्यते॥१७॥
‘पुरुषशिरोमणि श्रीराम शीघ्र ही पृथ्वी, सीता और लक्ष्मी—इन तीनों के साथ राज्य पर अभिषिक्त होंगे। १७॥
दुःख विसृजत्यश्रु निष्क्रामन्तमुदीक्ष्य यम्।
अयोध्यायां जनः सर्वः शोकवेगसमाहतः॥१८॥
कुशचीरधरं वीरं गच्छन्तमपराजितम्।
सीतेवानुगता लक्ष्मीस्तस्य किं नाम दुर्लभम्॥ १९॥
जिनको नगर से निकलते देख अयोध्या का सारा जनसमुदाय शोक के वेग से आहत हो नेत्रों से दुःखके आँसू बहा रहा है, कुश और चीर धारण करके वन को जाते हुए जिन अपराजित नित्यविजयी वीर के पीछे-पीछे सीता के रूप में साक्षात् लक्ष्मी ही गयी है, उनके लिये क्या दुर्लभ है ? ॥ १८-१९॥
धनुर्ग्रहवरो यस्य बाणखड्गास्त्रभृत् स्वयम्।
लक्ष्मणो व्रजति ह्यग्रे तस्य किं नाम दुर्लभम्॥ २०॥
‘जिनके आगे धनुर्धारियों में श्रेष्ठ लक्ष्मण स्वयं बाण और खड्ग आदि अस्त्र लिये जा रहे हैं, उनके लिये जगत् में कौन-सी वस्तु दुर्लभ है ? ॥ २० ॥
निवृत्तवनवासं तं द्रष्टासि पुनरागतम्।
जहि शोकं च मोहं च देवि सत्यं ब्रवीमि ते॥ २१॥
‘देवि! मैं तुमसे सत्य कहती हूँ। तुम वनवास की अवधि पूर्ण होने पर यहाँ लौटे हुए श्रीराम को फिर देखोगी, इसलिये तुम शोक और मोह छोड़ दो॥ २१॥
शिरसा चरणावेतौ वन्दमानमनिन्दिते।
पुनर्द्रक्ष्यसि कल्याणि पुत्रं चन्द्रमिवोदितम्॥ २२॥
‘कल्याणि! अनिन्दिते! तुम नवोदित चन्द्रमा के समान अपने पुत्र को पुनः अपने चरणों में मस्तक रखकर प्रणाम करते देखोगी॥ २२॥
पुनः प्रविष्टं दृष्ट्वा तमभिषिक्तं महाश्रियम्।
समुत्स्रक्ष्यसि नेत्राभ्यां शीघ्रमानन्दजं जलम्॥ २३॥
‘राजभवन में प्रविष्ट होकर पुनः राजपद पर अभिषिक्त हुए अपने पुत्र को बड़ी भारी राजलक्ष्मी से सम्पन्न देखकर तुम शीघ्र ही अपने नेत्रों से आनन्द के आँसू बहाओगी॥ २३॥
मा शोको देवि दुःखं वा न रामे दृष्यतेऽशिवम्।
क्षिप्रं द्रक्ष्यसि पुत्रं त्वं ससीतं सहलक्ष्मणम्॥ २४॥
‘देवि! श्रीराम के लिये तुम्हारे मन में शोक और दुःख नहीं होना चाहिये; क्योंकि उनमें कोई अशुभ बात नहीं दिखायी देती। तुम सीता और लक्ष्मण के साथ अपने पुत्र श्रीराम को शीघ्र ही यहाँ उपस्थित देखोगी॥२४॥
त्वयाऽशेषो जनश्चायं समाश्वास्यो यतोऽनघे।
कमिदानीमिदं देवि करोषि हृदि विक्लवम्॥ २५॥
‘पापरहित देवि! तुम्हें तो इन सब लोगों को धैर्य बँधाना चाहिये, फिर स्वयं ही इस समय अपने हृदय में इतना दुःख क्यों करती हो? ॥ २५ ॥
नार्हा त्वं शोचितुं देवि यस्यास्ते राघवः सुतः।
नहि रामात् परो लोके विद्यते सत्पथे स्थितः॥ २६॥
‘देवि! तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये; क्योंकि तुम्हें रघुकुलनन्दन राम-जैसा बेटा मिला है। श्रीराम से बढ़कर सन्मार्ग में स्थिर रहने वाला मनुष्य संसार में दूसरा कोई नहीं है॥ २६॥
अभिवादयमानं तं दृष्ट्वा ससुहृदं सुतम्।
मृदाश्र मोक्ष्यसे क्षिप्रं मेघरेखेव वार्षिकी॥२७॥
‘जैसे वर्षाकाल के मेघों की घटा जल की वृष्टि करती है, उसी प्रकार तुम सुहृदोंसहित अपने पुत्र श्रीराम को अपने चरणों में प्रणाम करते देख शीघ्र ही आनन्दपूर्वक आँसुओं की वर्षा करोगी॥२७॥
पुत्रस्ते वरदः क्षिप्रमयोध्यां पुनरागतः।
कराभ्यां मृदुपीनाभ्यां चरणौ पीडयिष्यति॥ २८॥
‘तुम्हारे वरदायक पुत्र पुनः शीघ्र ही अयोध्या में आकर अपने मोटे-मोटे कोमल हाथों द्वारा तुम्हारे दोनों पैरों को दबायँगे॥ २८॥
अभिवाद्य नमस्यन्तं शूरं ससुहृदं सुतम्।
मुदाझैः प्रोक्षसे पुत्रं मेघराजिरिवाचलम्॥ २९॥
‘जैसे मेघमाला पर्वत को नहलाती है, उसी प्रकार तुम अभिवादन करके नमस्कार करते हुए सुहृदोंसहित अपने शूरवीर पुत् रका आनन्द के आँसुओं से अभिषेक करोगी’ ॥ २९॥
आश्वासयन्ती विविधैश्च वाक्यैः क्योपचारे कुशलानवद्या।
रामस्य तां मातरमेवमुक्त्वा देवी सुमित्रा विरराम रामा॥ ३०॥
बातचीत करने में कुशल, दोषरहित तथा रमणीय रूपवाली देवी सुमित्रा इस प्रकार तरह-तरह की बातों से श्रीराम माता कौसल्या को आश्वासन देती हुई उपर्युक्त बातें कहकर चुप हो गयीं॥३०॥
निशम्य तल्लक्ष्मणमातृवाक्यं रामस्य मातुर्नरदेवपत्न्याः ।
सद्यः शरीरे विननाश शोकः शरद्गतो मेघ इवाल्पतोयः॥३१॥
लक्ष्मण की माता का वह वचन सुनकर महाराज दशरथ की पत्नी तथा श्रीराम की माता कौसल्या का सारा शोक उनके शरीर (मन) में ही तत्काल विलीन हो गया। ठीक उसी तरह, जैसे शरद् ऋतु का थोड़े जलवाला बादल शीघ्र ही छिन्न-भिन्न हो जाता है। ३१॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतुश्चत्वारिंशः सर्गः॥ ४४॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में चौवालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥४४॥
सर्ग-45
अनुरक्ता महात्मानं रामं सत्यपराक्रमम्।
अनुजग्मुः प्रयान्तं तं वनवासाय मानवाः॥१॥
उधर सत्यपराक्रमी महात्मा श्रीराम जब वन की ओर जाने लगे, उस समय उनके प्रति अनुराग रखने वाले बहुत-से अयोध्यावासी मनुष्य वन में निवास करने के लिये उनके पीछे-पीछे चल दिये॥ १॥
निवर्तितेऽतीव बलात् सुहृद्धर्मेण राजनि।
नैव ते संन्यवर्तन्त रामस्यानुगता रथम्॥२॥
जिसके जल्दी लौटने की कामना की जाय, उस स्वजन को दूर तक नहीं पहुँचाना चाहिये’–इत्यादि रूप से बताये गये सुहृद्धर्म के अनुसार जब राजा दशरथ बलपूर्वक लौटा दिये गये, तब भी जो श्रीरामजी के रथ के पीछे-पीछे लगे हुए थे, वे अयोध्यावासी अपने घर की ओर नहीं लौटे॥२॥
अयोध्यानिलयानां हि पुरुषाणां महायशाः।
बभूव गुणसम्पन्नः पूर्णचन्द्र इव प्रियः॥३॥
क्योंकि अयोध्यावासी पुरुषों के लिये सद्गुणसम्पन्न महायशस्वी श्रीराम पूर्ण चन्द्रमा के समान प्रिय हो गये थे॥
स याच्यमानः काकुत्स्थस्ताभिः प्रकृतिभिस्तदा।
कुर्वाणः पितरं सत्यं वनमेवान्वपद्यत॥४॥
उन प्रजाजनों ने श्रीराम से घर लौट चलने के लिये बहुत प्रार्थना की; किंतु वे पिता के सत्य की रक्षा करने के लिये वन की ओर ही बढ़ते गये॥४॥
अवेक्षमाणः सस्नेहं चक्षुषा प्रपिबन्निव।
उवाच रामः सस्नेहं ताः प्रजाः स्वाः प्रजा इव॥
वे प्रजाजनों को इस प्रकार स्नेहभरी दृष्टि से देख रहे थे मानो नेत्रों से उन्हें पी रहे हों। उस समय श्रीराम ने अपनी संतान के समान प्रिय उन प्रजाजनों से स्नेहपूर्वक कहा— ॥ ५॥
या प्रीतिर्बहुमानश्च मय्ययोध्यानिवासिनाम्।
मत्प्रियार्थं विशेषेण भरते सा विधीयताम्॥६॥
‘अयोध्यानिवासियों का मेरे प्रति जो प्रेम और आदर है, वह मेरी ही प्रसन्नता के लिये भरत के प्रति और अधिक रूप में होना चाहिये॥६॥
स हि कल्याणचारित्रः कैकेय्यानन्दवर्धनः।
करिष्यति यथावद् वः प्रियाणि च हितानि च॥ ७॥
‘उनका चरित्र बड़ा ही सुन्दर और सबका कल्याण करने वाला है। कैकेयी का आनन्द बढ़ाने वाले भरत आप लोगों का यथावत् प्रिय और हित करेंगे॥७॥
ज्ञानवृद्धो वयोबालो मृदुर्वीर्यगुणान्वितः।
अनुरूपः स वो भर्ता भविष्यति भयापहः॥८॥
‘वे अवस्था में छोटे होने पर भी ज्ञान में बड़े हैं। पराक्रमोचित गुणों से सम्पन्न होने पर भी स्वभाव के बड़े कोमल हैं। वे आपलोगों के लिये योग्य राजा होंगे और प्रजा के भय का निवारण करेंगे॥८॥
स हि राजगुणैर्युक्तो युवराजः समीक्षितः।
अपि चापि मया शिष्टैः कार्यं वो भर्तृशासनम्॥ ९॥
‘वे मुझसे भी अधिक राजोचित गुणों से युक्त हैं, इसीलिये महाराज ने उन्हें युवराज बनाने का निश्चय किया है; अतः आपलोगों को अपने स्वामी भरत की आज्ञा का सदा पालन करना चाहिये॥९॥
न संतप्येद् यथा चासौ वनवासं गते मयि।
महाराजस्तथा कार्यो मम प्रियचिकीर्षया॥१०॥
‘मेरे वन में चले जाने पर महाराज दशरथ जिस प्रकार भी शोक से संतप्त न होने पायें, इस बात के लिये आपलोग सदा चेष्टा रखें। मेरा प्रिय करने की इच्छा से आपको मेरी इस प्रार्थना पर अवश्य ध्यान देना चाहिये’॥
यथा यथा दाशरथिर्धर्ममेवाश्रितो भवेत।
तथा तथा प्रकृतयो रामं पतिमकामयन्॥११॥
दशरथनन्दन श्रीराम ने ज्यों-ज्यों धर्म का आश्रय लेने के लिये ही दृढ़ता दिखायी, त्यों-ही-त्यों प्रजाजनों के मन में उन्हीं को अपना स्वामी बनाने की इच्छा प्रबल होती गयी॥
बाष्पेण पिहितं दीनं रामः सौमित्रिणा सह।
चकर्षेव गुणैर्बद्धं जनं पुरनिवासिनम्॥१२॥
समस्त पुरवासी अत्यन्त दीन होकर आँसू बहा रहे थे और लक्ष्मणसहित श्रीराम मानो अपने गुणों में बाँधकर उन्हें खींचे लिये जा रहे थे॥ १२ ॥
ते द्विजास्त्रिविधं वृद्धा ज्ञानेन वयसौजसा।
वयःप्रकम्पशिरसो दूरादूचुरिदं वचः॥१३॥
उनमें बहुत-से ब्राह्मण थे, जो ज्ञान, अवस्था और तपोबल–तीनों ही दृष्टियों से बड़े थे। वृद्धावस्था के कारण कितनों के तो सिर काँप रहे थे। वे दूर से ही इस प्रकार बोले- ॥१३॥
वहन्तो जवना रामं भो भो जात्यास्तुरंगमाः।
निवर्तध्वं न गन्तव्यं हिता भवत भर्तरि ॥१४॥
‘अरे! ओ तेज चलने वाले अच्छी जाति के घोड़ो!तुम बड़े वेगशाली हो और श्रीराम को वन की ओर लिये जा रहे हो, लौटो! अपने स्वामी के हितैषी बनो! तुम्हें वन में नहीं जाना चाहिये॥ १४ ॥
कर्णवन्ति हि भूतानि विशेषेण तुरङ्गमाः।
यूयं तस्मान्निवर्तध्वं याचनां प्रतिवेदिताः॥१५॥
‘यों तो सभी प्राणियों के कान होते हैं, परंतु घोड़ों के कान बड़े होते हैं; अतः तुम्हें हमारी याचना का ज्ञान तो हो ही गया होगा; इसलिये घर की ओर लौट चलो॥ १५॥
धर्मतः स विशुद्धात्मा वीरः शुभदृढव्रतः।
उपवाह्यस्तु वो भर्ता नापवाह्यः पुराद् वनम्॥ १६॥
‘तुम्हारे स्वामी श्रीराम विशुद्धात्मा, वीर और उत्तम व्रत का दृढ़ता से पालन करने वाले हैं, अतः तुम्हें इनका उपवहन करना चाहिये—इन्हें बाहर से नगर के समीप ले चलना चाहिये। नगर से वन की ओर इनका अपवहन करना—इन्हें ले जाना तुम्हारे लिये कदापि उचित नहीं है’ ॥ १६॥
एवमार्तप्रलापांस्तान् वृद्धान् प्रलपतो द्विजान्।
अवेक्ष्य सहसा रामो रथादवततार ह॥१७॥
वृद्ध ब्राह्मणों को इस प्रकार आर्तभाव से प्रलाप करते देख श्रीरामचन्द्रजी सहसा रथ से नीचे उतर गये॥
पद्भ्यामेव जगामाथ ससीतः सहलक्ष्मणः।
संनिकृष्टपदन्यासो रामो वनपरायणः॥१८॥
वे सीता और लक्ष्मण के साथ पैदल ही चलने लगे। ब्राह्मणों का साथ न छूटे, इसके लिये वे अपना पैर बहुत निकट रखते थे-लंबे डग से नहीं चलते थे। वन में पहुँचना ही उनकी यात्रा का परम लक्ष्य था।॥ १८॥
द्विजातीन् हि पदातींस्तान् रामश्चारित्रवत्सलः।
न शशाक घृणाचक्षुः परिमोक्तुं रथेन सः॥१९॥
श्रीरामचन्द्रजी के चरित्र में वात्सल्य-गुण की प्रधानता थी। उनकी दृष्टि में दया भरी हुई थी; इसलिये वे रथ के द्वारा चलकर उन पैदल चलने वाले ब्राह्मणों को पीछे छोड़ने का साहस न कर सके॥ १९॥
गच्छन्तमेव तं दृष्ट्वा रामं सम्भ्रान्तमानसाः।
ऊचुः परमसंतप्ता रामं वाक्यमिदं द्विजाः॥२०॥
श्रीराम को अब भी वन की ओर ही जाते देख वे ब्राह्मण मन-ही-मन घबरा उठे और अत्यन्त संतप्त होकर उनसे इस प्रकार बोले- ॥ २०॥
ब्राह्मण्यं कृत्स्नमेतत् त्वां ब्रह्मण्यमनुगच्छति।
द्विजस्कन्धाधिरूढास्त्वामग्नयोऽप्यनुयान्त्वमी॥ २१॥
‘रघुनन्दन! तुम ब्राह्मणों के हितैषी हो, इसीसे यह सारा ब्राह्मण-समाज तुम्हारे पीछे-पीछे चल रहा है। इन ब्राह्मणों के कंधों पर चढ़कर अग्निदेव भी तुम्हारा अनुसरण कर रहे हैं॥ २१॥
वाजपेयसमुत्थानि च्छत्राण्येतानि पश्य नः।
पृष्ठतोऽनुप्रयातानि मेघानिव जलात्यये॥ २२॥
‘वर्षा बीतने पर शरद् ऋतु में दिखायी देने वाले सफेद बादलों के समान हमारे इन श्वेत छत्रों की ओर देखो, जो तुम्हारे पीछे-पीछे चल पड़े हैं। ये हमें वाजपेय-यज्ञ में प्राप्त हुए थे॥ २२॥ ।
अनवाप्तातपत्रस्य रश्मिसंतापितस्य ते।
एभिश्छायां करिष्यामः स्वैश्छत्रैर्वाजपेयकैः॥ २३॥
‘तुम्हें राजकीय श्वेतच्छत्र नहीं प्राप्त हुआ, अतएव तुम सूर्यदेव की किरणों से संतप्त हो रहे हो। इस अवस्था में हम वाजपेय-यज्ञ में प्राप्त हुए इन अपने छत्रों द्वारा तुम्हारे लिये छाया करेंगे॥ २३ ॥
या हि नः सततं बुद्धिर्वेदमन्त्रानुसारिणी।
त्वत्कृते सा कृता वत्स वनवासानुसारिणी॥२४॥
‘वत्स! हमारी जो बुद्धि सदा वेदमन्त्रों के पीछे चलती थी—उन्हीं के चिन्तन में लगी रहती थी, वही तुम्हारे लिये वनवास का अनुसरण करने वाली हो गयी है।॥ २४॥
हृदयेष्ववतिष्ठन्ते वेदा ये नः परं धनम्।
वत्स्यन्त्यपि गृहेष्वेव दाराश्चारित्ररक्षिताः॥२५॥
‘जो हमारे परम धन वेद हैं, वे हमारे हृदयों में स्थित हैं। हमारी स्त्रियाँ अपने चरित्रबल से सुरक्षित रहकर घरों में ही रहेंगी॥२५॥
पुनर्न निश्चयः कार्यस्त्वद्गतौ सुकृता मतिः।
त्वयि धर्मव्यपेक्षे तु किं स्याद् धर्मपथे स्थितम्॥ २६॥
‘अब हमें अपने कर्तव्य के विषय में पुनः कुछ निश्चय नहीं करना है। हमने तुम्हारे साथ जाने का विचार स्थिर कर लिया है। तो भी हमें इतना अवश्य कहना है कि ‘जब तुम ही ब्राह्मण की आज्ञा के पालनरूपी धर्म की ओर से निरपेक्ष हो जाओगे, तब दूसरा कौन प्राणी धर्ममार्ग पर स्थित रह सकेगा। २६॥
याचितो नो निवर्तस्व हंसशुक्लशिरोरुहैः ।
शिरोभिर्निभृताचार महीपतनपांसुलैः॥२७॥
‘सदाचार का पोषण करने वाले श्रीराम! हमारे सिर के बाल पककर हंस के समान सफेद हो गये हैं और पृथ्वी पर पड़कर साष्टाङ्ग प्रणाम करने से इनमें धूल भर गयी है। हम अपने ऐसे मस्तकों को झुकाकर तुमसे याचना करते हैं कि तुम घर को लौट चलो (वे तत्त्वज्ञ ब्राह्मण यह जानते थे कि श्रीराम साक्षात् भगवान् विष्णु हैं। इसीलिये उनका श्रीराम के प्रति प्रणाम करना दोष की बात नहीं है)।
बहूनां वितता यज्ञा द्विजानां य इहागताः।
तेषां समाप्तिरायत्ता तव वत्स निवर्तने ॥२८॥
(इतने पर भी जब श्रीराम नहीं रुके, तब वे ब्राह्मण । बोले-) वत्स! जो लोग यहाँ आये हैं, इनमें बहुत। से ऐसे ब्राह्मण हैं, जिन्होंने यज्ञ आरम्भ कर दियाहै;अब इनके यज्ञोंकी समाप्ति तुम्हारे लौटनेपर ही निर्भर है॥
भक्तिमन्तीह भूतानि जङ्गमाजङ्गमानि च।
याचमानेषु तेषु त्वं भक्तिं भक्तेषु दर्शय॥ २९॥
‘संसार के स्थावर और जङ्गम सभी प्राणी तुम्हारे प्रति भक्ति रखते हैं। वे सब तुमसे लौट चलने की प्रार्थना कर रहे हैं। अपने उन भक्तों पर तुम अपना स्नेह दिखाओ॥
अनुगन्तुमशक्तास्त्वां मूलैरुद्धतवेगिनः।
उन्नता वायुवेगेन विक्रोशन्तीव पादपाः॥३०॥
‘ये वृक्ष अपनी जड़ों के कारण अत्यन्त वेगहीन हैं, इसी से तुम्हारे पीछे नहीं चल सकते; परंतु वायु के वेग से इनमें जो सनसनाहट पैदा होती है, उनके द्वारा ये ऊँचे वृक्ष मानो तुम्हें पुकार रहे हैं तुमसे लौट चलने की प्रार्थना कर रहे हैं॥ ३० ॥
निश्चेष्टाहारसंचारा वृक्षकस्थाननिश्चिताः।
पक्षिणोऽपि प्रयाचन्ते सर्वभूतानुकम्पिनम्॥३१॥
‘जो सब प्रकार की चेष्टा छोड़ चुके हैं, चारा चुगने के लिये भी कहीं उड़कर नहीं जाते हैं और निश्चित रूप से वृक्ष के एक स्थान पर ही पड़े रहते हैं, वे पक्षी भी तुमसे लौट चलने के लिये प्रार्थना कर रहे हैं; क्योंकि तुम समस्त प्राणियों पर कृपा करने वाले हो’ ॥ ३१॥
एवं विक्रोशतां तेषां द्विजातीनां निवर्तने।
ददृशे तमसा तत्र वारयन्तीव राघवम्॥३२॥
इस प्रकार श्रीराम से लौटने के लिये पुकार मचाते हुए उन ब्राह्मणों पर मानो कृपा करने के लिये मार्ग में तमसा नदी दिखायी दी, जो अपने तिर्यक्-प्रवाह (तिरछी धारा) से श्रीरघुनाथजी को रोकती हुई-सी प्रतीत होती थी॥ ३२॥
ततः सुमन्त्रोऽपि रथाद् विमुच्य श्रान्तान् हयान् सम्परिवर्त्य शीघ्रम्।
पीतोदकांस्तोयपरिप्लुताङ्गानचारयद् वै तमसाविदूरे॥३३॥
वहाँ पहुँचने पर सुमन्त्र ने भी थके हुए घोड़ों को शीघ्र ही रथ से खोलकर उन सबको टहलाया, फिर पानी पिलाया और नहलाया, तत्पश्चात् तमसा के निकट ही चरने के लिये छोड़ दिया॥३३॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चचत्वारिंशः सर्गः॥ ४५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में पैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ। ४५॥
सर्ग-46
ततस्तु तमसातीरं रम्यमाश्रित्य राघवः।
सीतामुद्रीक्ष्य सौमित्रिमिदं वचनमब्रवीत्॥१॥
तदनन्तर तमसा के रमणीय तट का आश्रय लेकर श्रीराम ने सीता की ओर देखकर सुमित्राकुमार लक्ष्मण से इस प्रकार कहा- ॥१॥
इयमद्य निशा पूर्वा सौमित्रे प्रहिता वनम्।
वनवासस्य भद्रं ते न चोत्कण्ठितुमर्हसि ॥२॥
‘सुमित्रानन्दन! तुम्हारा कल्याण हो। हमलोग जो वन की ओर प्रस्थित हुए हैं, हमारे उस वनवास की आज यह पहली रात प्राप्त हुई है; अतः अब तुम्हें नगर के लिये उत्कण्ठित नहीं होना चाहिये॥२॥
पश्य शून्यान्यरण्यानि रुदन्तीव समन्ततः।
यथानिलयमायद्भिर्निलीनानि मृगद्विजैः॥३॥
‘इन सूने वनों की ओर तो देखो, इनमें वन्य पशु पक्षी अपने-अपने स्थान पर आकर अपनी बोली बोल रहे हैं। उनके शब्द से सारी वनस्थली व्याप्त हो गयी है, मानो ये सारे वन हमें इस अवस्था में देखकर खिन्न हो सब ओर से रो रहे हैं॥३॥
अद्यायोध्या तु नगरी राजधानी पितुर्मम।
सस्त्रीपुंसा गतानस्मान् शोचिष्यति न संशयः॥ ४॥
‘आज मेरे पिता की राजधानी अयोध्या नगरी वन में आये हुए हमलोगों के लिये समस्त नर-नारियों सहित शोक करेगी, इसमें संशय नहीं है॥ ४॥
अनुरक्ता हि मनुजा राजानं बहुभिर्गुणैः।
त्वां च मां च नरव्याघ्र शत्रुघ्नभरतौ तथा॥५॥
‘पुरुषसिंह! अयोध्या के मनुष्य बहुत-से सद्गुणों के कारण महाराज में, तुममें, मुझमें तथा भरत और शत्रुघ्न में भी अनुरक्त हैं ॥ ५ ॥
पितरं चानुशोचामि मातरं च यशस्विनीम्।
अपि नान्धौ भवेतां नौ रुदन्तौ तावभीक्ष्णशः॥
‘इस समय मुझे पिता और यशस्विनी माता के लिये बड़ा शोक हो रहा है; कहीं ऐसा न हो कि वे निरन्तर रोते रहने के कारण अंधे हो जायँ॥ ६॥
भरतः खलु धर्मात्मा पितरं मातरं च मे।
धर्मार्थकामसहितैर्वाक्यैराश्वासयिष्यति॥७॥
‘परंतु भरत बड़े धर्मात्मा हैं अवश्य ही वे धर्म, अर्थ और काम–तीनों के अनुकूल वचनों द्वारा पिताजी को और मेरी माता को भी सान्त्वना देंगे॥७॥
भरतस्यानृशंसत्वं संचिन्त्याहं पुनः पुनः।
नानुशोचामि पितरं मातरं च महाभुज॥८॥
‘महाबाहो! जब मैं भरतके कोमल स्वभावका बार-बार स्मरण करता हूँ, तब मुझे माता-पिताके लिये अधिक चिन्ता नहीं होती॥ ८॥
त्वया कार्यं नरव्याघ्र मामनुव्रजता कृतम्।
अन्वेष्टव्या हि वैदेह्या रक्षणार्थं सहायता॥९॥
‘नरश्रेष्ठ लक्ष्मण! तुमने मेरे साथ आकर बड़ा ही महत्त्वपूर्ण कार्य किया है; क्योंकि तुम न आते तोमुझे विदेहकुमारी सीताकी रक्षाके लिये कोई सहायक ढूँढ़ना पड़ता॥९॥
अद्भिरेव हि सौमित्रे वत्स्याम्यद्य निशामिमाम्।
एतद्धि रोचते मह्यं वन्येऽपि विविधे सति॥१०॥
‘सुमित्रानन्दन! यद्यपि यहाँ नाना प्रकार के जंगली फल-मूल मिल सकते हैं तथापि आज की यह रात मैं केवल जल पीकर ही बिताऊँगा। यही मुझे अच्छा जान पड़ता है’ ॥ १०॥
एवमुक्त्वा तु सौमित्रिं सुमन्त्रमपि राघवः।
अप्रमत्तस्त्वमश्वेषु भव सौम्येत्युवाच ह ॥११॥
लक्ष्मण से ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजी ने सुमन्त्र से भी कहा—’सौम्य ! अब आप घोड़ों की रक्षा पर ध्यान दें, उनकी ओर से असावधान न हों’ ॥ ११॥
सोऽश्वान् सुमन्त्रः संयम्य सूर्येऽस्तं समुपागते।
प्रभूतयवसान् कृत्वा बभूव प्रत्यनन्तरः॥१२॥
सुमन्त्र ने सूर्यास्त हो जानेपर घोड़ों को लाकर बाँध दिया और उनके आगे बहुत-सा चारा डालकर वे श्रीराम के पास आ गये॥ १२ ॥
उपास्य तु शिवां संध्यां दृष्ट्वा रात्रिमुपागताम्।
रामस्य शयनं चक्रे सूतः सौमित्रिणा सह ॥१३॥
फिर (वर्णानुकूल) कल्याणमयी संध्योपासना करके रात आयी देख लक्ष्मणसहित सुमन्त्र ने श्रीरामचन्द्रजी के शयन करने योग्य स्थान और आसन ठीक किया॥१३॥
तां शय्यां तमसातीरे वीक्ष्य वृक्षदलैर्वृताम्।
रामः सौमित्रिणा सार्धं सभार्यः संविवेश ह॥ १४॥
तमसा के तट पर वृक्ष के पत्तों से बनी हुई वह शय्या देखकर श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण और सीता के साथ उसपर बैठे॥१४॥
सभार्यं सम्प्रसुप्तं तु श्रान्तं सम्प्रेक्ष्य लक्ष्मणः।
कथयामास सूताय रामस्य विविधान् गुणान्॥ १५॥
थोड़ी देर में सीतासहित श्रीराम को थककर सोया हुआ देख लक्ष्मण सुमन्त्र से उनके नाना प्रकार के गुणों का वर्णन करने लगे॥ १५॥
जाग्रतोरेव तां रात्रिं सौमित्रेरुदितो रविः।
सूतस्य तमसातीरे रामस्य ब्रुवतो गुणान्॥१६॥
सुमन्त्र और लक्ष्मण तमसा के किनारे श्रीराम के गुणों की चर्चा करते हुए रातभर जागते रहे। इतने ही में सूर्योदय का समय निकट आ पहुँचा॥ १६ ॥
गोकुलाकुलतीरायास्तमसाया विदूरतः।
अवसत् तत्र तां रात्रिं रामः प्रकृतिभिः सह॥ १७॥
तमसा का वह तट गौओं के समुदाय से भरा हुआ था। श्रीरामचन्द्रजी ने प्रजाजनों के साथ वहीं रात्रि में निवास किया। वे प्रजाजनों से कुछ दूर पर सोये थे॥ १७॥
उत्थाय च महातेजाः प्रकृतीस्ता निशाम्य च।
अब्रवीद् भ्रातरं रामो लक्ष्मणं पुण्यलक्षणम्॥ १८॥
महातेजस्वी श्रीराम तड़के ही उठे और प्रजाजनों को सोते देख पवित्र लक्षणों वाले भाई लक्ष्मण से इस प्रकार बोले- ॥१८॥
अस्मद्व्यपेक्षान् सौमित्रे निळपेक्षान् गृहेष्वपि।
वृक्षमूलेषु संसक्तान् पश्य लक्ष्मण साम्प्रतम्॥ १९॥
‘सुमित्राकुमार लक्ष्मण! इन पुरवासियों की ओर देखो, ये इस समय वृक्षों की जड़ से सटकर सो रहे हैं। इन्हें केवल हमारी चाह है। ये अपने घरों की ओर से भी पूर्ण निरपेक्ष हो गये हैं॥ १९॥
यथैते नियमं पौराः कुर्वन्त्यस्मन्निवर्तने।
अपि प्राणान् न्यसिष्यन्ति न तु त्यक्ष्यन्ति निश्चयम्॥२०॥
‘हमें लौटा ले चलने के लिये ये जैसा उद्योग कर रहे हैं, इससे जान पड़ता है, ये अपना प्राण त्याग देंगे; किंतु अपना निश्चय नहीं छोड़ेंगे॥ २० ॥
यावदेव तु संसुप्तास्तावदेव वयं लघु।
रथमारुह्य गच्छामः पन्थानमकुतोभयम्॥२१॥
‘अतः जबतक ये सो रहे हैं तभीतक हमलोग रथ पर सवार होकर शीघ्रतापूर्वक यहाँ से चल दें। फिर हमें इस मार्गपर और किसी के आने का भय नहीं रहेगा॥ २१॥
अतो भूयोऽपि नेदानीमिक्ष्वाकुपुरवासिनः।
स्वपेयुरनुरक्ता मा वृक्षमूलेषु संश्रिताः॥२२॥
‘अयोध्यावासी हमलोगों के अनुरागी हैं। जब हम यहाँ से निकल चलेंगे, तब उन्हें फिर अब इस प्रकार वृक्षों की जड़ों से सटकर नहीं सोना पड़ेगा॥ २२॥
पौरा ह्यात्मकृताद् दुःखाद् विप्रमोच्या नृपात्मजैः ।
न तु खल्वात्मना योज्या दुःखेन पुरवासिनः॥ २३॥
‘राजकुमारों का यह कर्तव्य है कि वे पुरवासियों को अपने द्वारा होने वाले दुःख से मुक्त करें, न कि अपना दुःख देकर उन्हें और दुःखी बना दें’॥ २३॥
अब्रवील्लक्ष्मणो रामं साक्षाद् धर्ममिव स्थितम्।
रोचते मे तथा प्राज्ञ क्षिप्रमारुह्यतामिति ॥ २४॥
यह सुनकर लक्ष्मण ने साक्षात् धर्म के समान विराजमान भगवान् श्रीराम से कहा—’परम बुद्धिमान् आर्य! मुझे आपकी राय पसंद है। शीघ्र ही रथ पर सवार होइये’ ॥२४॥
अथ रामोऽब्रवीत् सूतं शीघ्रं संयुज्यतां रथः।
गमिष्यामि ततोऽरण्यं गच्छ शीघ्रमितः प्रभो॥
तब श्रीराम ने सुमन्त्र से कहा—’प्रभो! आप जाइये और शीघ्र ही रथ जोतकर तैयार कीजिये फिर मैं जल्दी ही यहाँ से वन की ओर चलूँगा’ ॥ २५ ॥
सूतस्ततः संत्वरितः स्यन्दनं तैर्हयोत्तमैः।
योजयित्वा तु रामस्य प्राञ्जलिः प्रत्यवेदयत्॥ २६॥
आज्ञा पाकर सुमन्त्र ने उन उत्तम घोड़ों को तुरंत ही रथ में जोत दिया और श्रीराम के पास हाथ जोड़कर निवेदन किया- ॥ २६॥
अयं युक्तो महाबाहो रथस्ते रथिनां वर।
त्वरयाऽऽरोह भद्रं ते ससीतः सहलक्ष्मणः॥२७॥
‘महाबाहो! रथियों में श्रेष्ठ वीर! आपका कल्याण हो आपका यह रथ जुता हुआ तैयार है अब सीता और लक्ष्मण के साथ शीघ्र इस पर सवार होइये’॥ २७॥
तं स्यन्दनमधिष्ठाय राघवः सपरिच्छदः।
शीघ्रगामाकुलावर्ती तमसामतरन्नदीम्॥२८॥
श्रीरामचन्द्रजी सबके साथ रथ पर बैठकर तीव्रगति से बहने वाली भँवरों से भरी हुई तमसा नदी के उस पार गये॥ २८॥
स संतीर्य महाबाहुः श्रीमान् शिवमकण्टकम्।
प्रापद्यत महामार्गमभयं भयदर्शिनाम्॥२९॥
नदी को पार करके महाबाहु श्रीमान् राम ऐसे महान् मार्ग पर जा पहुँचे जो कल्याणप्रद, कण्टकरहित तथा सर्वत्र भय देखने वालों के लिये भी भय से रहित था। २९॥
मोहनार्थं तु पौराणां सूतं रामोऽब्रवीद् वचः।
उदमखः प्रयाहि त्वं रथमारुह्य सारथे॥३०॥
मुहूर्तं त्वरितं गत्वा निवर्तय रथं पुनः।
यथा न विद्युः पौरा मां तथा कुरु समाहितः॥ ३१॥
उस समय श्रीराम ने पुरवासियों को भुलावा देने के लिये सुमन्त्र से यह बात कही—’सारथे! (हम लोग तो यहीं उतर जाते हैं;) परंतु आप रथ पर आरूढ़ होकरपहले उत्तर दिशा की ओर जाइये। दो घड़ी तक तीव्रगति से उत्तर जाकर फिर दूसरे मार्ग से रथ को यहीं लौटा लाइये। जिस तरह भी पुरवासियों को मेरा पता न चले, वैसा एकाग्रतापूर्वक प्रयत्न कीजिये’। ३०-३१॥
रामस्य तु वचः श्रुत्वा तथा चक्रे च सारथिः।
प्रत्यागम्य च रामस्य स्यन्दनं प्रत्यवेदयत्॥ ३२॥
श्रीरामजीका यह वचन सुनकर सारथिने वैसा ही किया और लौटकर पुनः श्रीरामकी सेवामें रथ उपस्थित कर दिया॥ ३२॥
तौ सम्प्रयुक्तं तु रथं समास्थितौ तदा ससीतौ रघुवंशवर्धनौ।
प्रचोदयामास ततस्तुरंगमान् स सारथिर्येन पथा तपोवनम्॥३३॥
तत्पश्चात् सीतासहित श्रीराम और लक्ष्मण, जो रघुवंश की वृद्धि करने वाले थे, लौटाकर लाये गये उस रथ पर चढ़े तदनन्तर सारथि ने घोड़ों को उस मार्गपर बढ़ा दिया, जिससे तपोवन में पहुँचा जा सकता था॥ ३३॥
ततः समास्थाय रथं महारथः ससारथिर्दाशरथिर्वनं ययौ।
उदमखं तं तु रथं चकार प्रयाणमाङ्गल्यनिमित्तदर्शनात्॥ ३४॥
तदनन्तर सारथिसहित महारथी श्रीराम ने यात्राकालिक मङ्गलसूचक शकुन देखने के लिये पहले तो उस रथ को उत्तराभिमुख खड़ा किया; फिर वे उस रथ पर आरूढ़ होकर वन की ओर चल दिये। ३४॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे षट्चत्वारिंशः सर्गः॥ ४६॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में छियालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४६॥
सर्ग-47
प्रभातायां तु शर्वर्यां पौरास्ते राघवं विना।
शोकोपहतनिश्चेष्टा बभूवुर्हतचेतसः॥१॥
इधर रात बीतने पर जब सबेरा हुआ, तब अयोध्यावासी मनुष्य श्रीरघुनाथजी को न देखकर अचेत हो गये। शोक से व्याकुल होने के कारण उनसे कोई भी चेष्टा करते न बनी॥१॥
शोकजाश्रुपरिघुना वीक्षमाणास्ततस्ततः।
आलोकमपि रामस्य न पश्यन्ति स्म दुःखिताः॥ २॥
वे शोकजनित आँसू बहाते हुए अत्यन्त खिन्न हो गये तथा इधर-उधर उनकी खोज करने लगे। परंतु उन दुःखी पुरवासियों को श्रीराम किधर गये, इस बातका पता देने वाला कोई चिह्नतक नहीं दिखायी दिया॥२॥
ते विषादातवदना रहितास्तेन धीमता।
कृपणाः करुणा वाचो वदन्ति स्म मनीषिणः॥ ३॥
बुद्धिमान् श्रीराम से विलग होकर वे अत्यन्त दीन हो गये। उनके मुख पर विषादजनित वेदना स्पष्ट दिखायी देती थी। वे मनीषी पुरवासी करुणा भरे वचन बोलते हुए विलाप करने लगे- ॥३॥
धिगस्तु खलु निद्रां तां ययापहतचेतसः।
नाद्य पश्यामहे रामं पृथूरस्कं महाभुजम्॥४॥
‘हाय! हमारी उस निद्रा को धिक्कार है, जिससे अचेत हो जाने के कारण हम उस समय विशाल वक्ष वाले महाबाहु श्रीराम के दर्शन से वञ्चित हो गये हैं॥४॥
कथं रामो महाबाहुः स तथावितथक्रियः।
भक्तं जनमभित्यज्य प्रवासं तापसो गतः॥५॥
‘जिनकी कोई भी क्रिया कभी निष्फल नहीं होती,वे तापस वेषधारी महाबाहु श्रीराम हम भक्तजनों को छोड़कर परदेश (वन) में कैसे चले गये? ॥ ५ ॥
यो नः सदा पालयति पिता पुत्रानिवौरसान्।
कथं रघूणां स श्रेष्ठस्त्यक्त्वा नो विपिनं गतः॥ ६॥
‘जैसे पिता अपने औरस पुत्रों का पालन करता है, उसी प्रकार जो सदा हमारी रक्षा करते थे, वे ही रघुकुलश्रेष्ठ श्रीराम आज हमें छोड़कर वन को क्यों चले गये? ॥ ६॥
इहैव निधनं याम महाप्रस्थानमेव वा।
रामेण रहितानां नो किमर्थं जीवितं हितम्॥७॥
‘अब हमलोग यहीं प्राण दे दें या मरने का निश्चय करके उत्तर दिशा की ओर चल दें। श्रीराम से रहित होकर हमारा जीवन-धारण किसलिये हितकर हो सकता है ? ॥ ७॥
सन्ति शुष्काणि काष्ठानि प्रभूतानि महान्ति च।
तैः प्रज्वाल्य चितां सर्वे प्रविशामोऽथवा वयम्॥ ८॥
‘अथवा यहाँ बहुत-से बड़े-बड़े सूखे काठ पड़े हैं, उनसे चिता जलाकर हम सब लोग उसी में प्रवेश कर जायँ॥ ८॥
किं वक्ष्यामो महाबाहुरनसूयः प्रियंवदः।
नीतः स राघवोऽस्माभिरिति वक्तुं कथं क्षमम्॥
(यदि हमसे कोई श्रीराम का वृत्तान्त पूछेगा तो हम उसे क्या उत्तर देंगे?) क्या हम यह कहेंगे कि जो किसी के दोष नहीं देखते और सबसे प्रिय वचन बोलते हैं, उन महाबाहु श्रीरघुनाथजी को हमने वन में पहुँचा दिया है ? हाय! यह अयोग्य बात हमारे मुँह से कैसे निकल सकती है ? ॥९॥
सा नूनं नगरी दीना दृष्ट्वास्मान् राघवं विना।
भविष्यति निरानन्दा सस्त्रीबालवयोऽधिका॥१०॥
‘श्रीराम के बिना हमलोगों को लौटा हुआ देखकर स्त्री, बालक और वृद्धोंसहित सारी अयोध्यानगरी निश्चय ही दीन और आनन्दहीन हो जायगी॥ १० ॥
निर्यातास्तेन वीरेण सह नित्यं महात्मना।
विहीनास्तेन च पुनः कथं द्रक्ष्याम तां पुरीम्॥११॥
‘हमलोग वीरवर महात्मा श्रीराम के साथ सर्वदा निवास करने के लिये निकले थे अब उनसे बिछुड़कर हम अयोध्यापुरी को कैसे देख सकेंगे’॥ ११॥
इतीव बहुधा वाचो बाहुमुद्यम्य ते जनाः।
विलपन्ति स्म दुःखार्ता हृतवत्सा इवाग्रयगाः॥ १२॥
इस प्रकार अनेक तरह की बातें कहते हुए वे समस्त पुरवासी अपनी भुजा उठाकर विलाप करने लगे। वे बछड़ों से बिछुड़ी हुई अग्रगामिनी गौओं की भाँति दुःख से व्याकुल हो रहे थे॥ १२॥
ततो मार्गानुसारेण गत्वा किंचित् ततः क्षणम्।
मार्गनाशाद् विषादेन महता समभिप्लुताः॥१३॥
फिर रास्ते पर रथ की लीक देखते हुए सब-के-सब कुछ दूर तक गये; किंतु क्षणभर में मार्गका चिह्न न मिलने के कारण वे महान् शोक में डूब गये॥१३॥
रथमार्गानुसारेण न्यवर्तन्त मनस्विनः।
किमिदं किं करिष्यामो दैवेनोपहता इति॥१४॥
उस समय यह कहते हुए कि ‘यह क्या हुआ? अब हम क्या करें? दैव ने हमें मार डाला’ वे मनस्वी पुरुष रथ की लीक का अनुसरण करते हुए अयोध्या की ओर लौट पड़े॥ १४ ॥
तदा यथागतेनैव मार्गेण क्लान्तचेतसः।
अयोध्यामगमन् सर्वे पुरीं व्यथितसज्जनाम्॥ १५॥
उनका चित्त क्लान्त हो रहा था। वे सब जिस मार्ग से गये थे, उसी से लौटकर अयोध्यापुरी में जा पहुँचे, जहाँ के सभी सत्पुरुष श्रीराम के लिये व्यथित थे॥ १५॥
आलोक्य नगरी तां च क्षयव्याकुलमानसाः।
आवर्तयन्त तेऽणि नयनैः शोकपीडितैः॥१६॥
उस नगरी को देखकर उनका हृदय दुःख से व्याकुल हो उठा। वे अपने शोकपीड़ित नेत्रों द्वारा आँसुओं की वर्षा करने लगे॥१६॥
एषा रामेण नगरी रहिता नातिशोभते।
आपगा गरुडेनेव ह्रदादुद्धृतपन्नगा॥१७॥
(वे बोले-) जिसके गहरे कुण्ड से वहाँ का नाग गरुड़ के द्वारा निकाल लिया गया हो, वह नदी जैसे शोभाहीन हो जाती है, उसी प्रकार श्रीराम से रहित हुई यह अयोध्यानगरी अब अधिक शोभा नहीं पाती है’।
चन्द्रहीनमिवाकाशं तोयहीनमिवार्णवम्।
अपश्यन् निहतानन्दं नगरं ते विचेतसः॥ १८॥
उन्होंने देखा, सारा नगर चन्द्रहीन आकाश और जलहीन समुद्र के समान आनन्दशून्य हो गया है। पुरी की यह दुरवस्था देख वे अचेत-से हो गये॥ १८ ॥
ते तानि वेश्मानि महाधनानि दुःखेन दुःखोपहता विशन्तः।
नैव प्रजग्मुः स्वजनं परं वा निरीक्ष्यमाणाः प्रविनष्टहर्षाः॥१९॥
उनके हृदय का सारा उल्लास नष्ट हो चुका था। वे दुःख से पीड़ित हो उन महान् वैभवसम्पन्न गृहों में बड़े क्लेश के साथ प्रविष्ट हो सबको देखते हुए भी अपने और पराये की पहचान न कर सके॥ १९॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्तचत्वारिंशः सर्गः॥ ४७॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में सैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥४७॥
सर्ग-48
तेषामेवं विषण्णानां पीडितानामतीव च।
बाष्पविप्लुतनेत्राणां सशोकानां मुमूर्षया॥१॥
अभिगम्य निवृत्तानां रामं नगरवासिनाम्।
उद्गतानीव सत्त्वानि बभूवुरमनस्विनाम्॥२॥
इस प्रकार जो विषादग्रस्त, अत्यन्त पीड़ित,शोकमग्न तथा प्राण त्याग देने की इच्छा से युक्त हो नेत्रों से आँसू बहा रहे थे, श्रीरामचन्द्रजी के साथ जाकर भी जो उन्हें लिये बिना लौट आये थे और इसीलिये जिनका चित्त ठिकाने नहीं था, उन नगरवासियों की ऐसी दशा हो रही थी मानो उनके प्राण निकल गये हों॥ १-२॥
स्वं स्वं निलयमागम्य पुत्रदारैः समावृताः।
अश्रूणि मुमुचुः सर्वे बाष्पेण पिहिताननाः॥३॥
वे सब अपने-अपने घर में आकर पत्नी और पुत्रों से घिरे हुए आँसू बहाने लगे। उनके मुख अश्रुधारा से आच्छादित थे॥३॥
न चाहृष्यन् न चामोदन् वणिजो न प्रसारयन्।
न चाशोभन्त पण्यानि नापचन् गृहमेधिनः॥४॥
उनके शरीर में हर्ष का कोई चिह्न नहीं दिखायी देता था तथा मन में भी आनन्द का अभाव ही था। वैश्यों ने अपनी दुकानें नहीं खोली। क्रय-विक्रय की वस्तुएँ बाजारों में फैलायी जाने पर भी उनकी शोभा नहीं हुई (उन्हें लेने के लिये ग्राहक नहीं आये)। उस दिन गृहस्थों के घर में चूल्हे नहीं जले—रसोई नहीं बनी॥ ४॥
नष्टं दृष्ट्वा नाभ्यनन्दन् विपुलं वा धनागमम्।
पुत्रं प्रथमजं लब्ध्वा जननी नाप्यनन्दत॥५॥
खोयी हुई वस्तु मिल जाने पर भी किसी को प्रसन्नता नहीं हुई, विपुल धन-राशि प्राप्त हो जाने पर भी किसी ने उसका अभिनन्दन नहीं किया। जिसने प्रथम बार पुत्र को जन्म दिया था, वह माता भी आनन्दित नहीं हुई॥ ५॥
गृहे गृहे रुदत्यश्च भर्तारं गृहमागतम्।
व्यगर्हयन्त दुःखार्ता वाग्भिस्तोत्नैरिव द्विपान्॥ ६॥
प्रत्येक घर की स्त्रियाँ अपने पतियों को श्रीराम के बिना ही लौटकर आये देख रो पड़ीं और दुःख से आतुर हो कठोर वचनों द्वारा उन्हें कोसने लगीं, मानो महावत अंकुशों से हाथियों को मार रहे हों॥६॥
किं नु तेषां गृहैः कार्यं किं दारैः किं धनेन वा।
पुत्रैर्वापि सुखैर्वापि ये न पश्यन्ति राघवम्॥७॥
वे बोलीं—’जो लोग श्रीराम को नहीं देखते, उन्हें घर-द्वार, स्त्री-पुत्र, धन-दौलत और सुख-भोगों से क्या प्रयोजन है? ॥ ७॥
एकः सत्पुरुषो लोके लक्ष्मणः सह सीतया।
योऽनुगच्छति काकुत्स्थं रामं परिचरन् वने॥८॥
‘संसार में एकमात्र लक्ष्मण ही सत्पुरुष हैं, जो सीता के साथ श्रीराम की सेवा करने के लिये उनके पीछे-पीछे वन में जा रहे हैं।॥ ८॥
आपगाः कृतपुण्यास्ताः पद्मिन्यश्च सरांसि च।
येषु यास्यति काकुत्स्थो विगाह्य सलिलं शुचि॥
‘उन नदियों, कमलमण्डित बावड़ियों तथा सरोवरों ने अवश्य ही बहुत पुण्य किया होगा, जिनके पवित्र जल में स्नान करके श्रीरामचन्द्रजी आगे जायँगे॥९॥
शोभयिष्यन्ति काकुत्स्थमटव्यो रम्यकाननाः।
आपगाश्च महानूपाः सानुमन्तश्च पर्वताः॥१०॥
‘जिनमें रमणीय वृक्षावलियाँ शोभा पाती हैं, वेसुन्दर वनश्रेणियाँ, बड़े कछारवाली नदियाँ और शिखरों से सम्पन्न पर्वत श्रीराम की शोभा बढ़ायेंगे॥ १०॥
काननं वापि शैलं वा यं रामोऽनुगमिष्यति।
प्रियातिथिमिव प्राप्तं नैनं शक्ष्यन्त्यनर्चितुम्॥ ११॥
‘श्रीराम जिस वन अथवा पर्वत पर जायँगे, वहाँ उन्हें अपने प्रिय अतिथि की भाँति आया हुआ देख वे वन और पर्वत उनकी पूजा किये बिना नहीं रह सकेंगे॥
विचित्रकुसुमापीडा बहुमञ्जरिधारिणः।
राघवं दर्शयिष्यन्ति नगा भ्रमरशालिनः॥१२॥
‘विचित्र फूलों के मुकुट पहने और बहुत-सी मञ्जरियाँ धारण किये भ्रमरों से सुशोभित वृक्ष वन में श्रीरामचन्द्रजी को अपनी शोभा दिखायेंगे॥ १२ ॥
अकाले चापि मुख्यानि पुष्पाणि च फलानि च।
दर्शयिष्यन्त्यनुक्रोशाद् गिरयो राममागतम्॥ १३॥
‘वहाँ के पर्वत अपने यहाँ पधारे हुए श्रीराम को अत्यन्त आदर के कारण असमय में भी उत्तम-उत्तम फूल और फल दिखायेंगे (भेंट करेंगे) ॥ १३ ॥
प्रस्रविष्यन्ति तोयानि विमलानि महीधराः।
विदर्शयन्तो विविधान् भूयश्चित्रांश्च निर्झरान्॥ १४॥
‘वे पर्वत बारंबार नाना प्रकार के विचित्र झरने दिखाते हुए श्रीराम के लिये निर्मल जल के स्रोत बहायेंगे॥
पादपाः पर्वताग्रेषु रमयिष्यन्ति राघवम्।
यत्र रामो भयं नात्र नास्ति तत्र पराभवः॥१५॥
स हि शूरो महाबाहुः पुत्रो दशरथस्य च।
पुरा भवति नोऽदूरादनुगच्छाम राघवम्॥१६॥
‘पर्वत-शिखरों पर लहलहाते हुए वृक्ष श्रीरघुनाथजी का मनोरंजन करेंगे। जहाँ श्रीराम हैं वहाँ न तो कोई भय है और न किसी के द्वारा पराभव ही हो सकता है; क्योंकि दशरथनन्दन महाबाहु श्रीराम बड़े शूरवीर हैं। अतः जबतक वे हमलोगों से बहुत दूर नहीं निकल जाते, इसके पहले ही हमें उनके पास पहुँचकर पीछे लग जाना चाहिये।
पादच्छाया सुखं भर्तुस्तादृशस्य महात्मनः।
स हि नाथो जनस्यास्य स गतिः स परायणम्॥ १७॥
‘उनके-जैसे महात्मा एवं स्वामी के चरणों की छाया ही हमारे लिये परम सुखद है। वे ही हमारे रक्षक, गति और परम आश्रय हैं।॥ १७॥
वयं परिचरिष्यामः सीतां यूयं च राघवम्।
इति पौरस्त्रियोभर्तृन् दुःखार्तास्तत्तदब्रुवन्॥१८॥
‘हम स्त्रियाँ सीताजी की सेवा करेंगी और तुम सब लोग श्रीरघुनाथजी की सेवा में लगे रहना।’ इस प्रकार पुरवासियों की स्त्रियाँ दुःख से आतुर हो अपने पतियों से उपर्युक्त बातें कहने लगीं॥ १८॥
युष्माकं राघवोऽरण्ये योगक्षेमं विधास्यति।
सीता नारीजनस्यास्य योगक्षेमं करिष्यति॥१९॥
(वे पुनः बोलीं-) ‘वन में श्रीरामचन्द्रजी आपलोगों का योगक्षेम सिद्ध करेंगे और सीताजी हम नारियों के योगक्षेम का निर्वाह करेंगी॥ १९ ॥
को न्वनेनाप्रतीतेन सोत्कण्ठितजनेन च।
सम्प्रीयेतामनोज्ञेन वासेन हृतचेतसा॥२०॥
‘यहाँ का निवास प्रीति और प्रतीति से रहित है। यहाँ के सब लोग श्रीराम के लिये उत्कण्ठित रहते हैं। किसी को यहाँ का रहना अच्छा नहीं लगता तथा यहाँ रहने से मन अपनी सुध-बुध खो बैठता है। भला, ऐसे निवाससे किसको प्रसन्नता होगी? ॥ २० ॥
कैकेय्या यदि चेद् राज्यं स्यादधर्म्यमनाथवत् ।
न हि नो जीवितेनार्थः कुतः पुत्रैः कुतो धनैः॥
‘यदि इस राज्य पर कैकेयी का अधिकार हो गया तो यह अनाथ-सा हो जायगा। इसमें धर्म की मर्यादा नहीं रहने पायेगी। ऐसे राज्य में तो हमें जीवित रहने की ही आवश्यकता नहीं जान पड़ती, फिर यहाँ धन और पुत्रों से क्या लेना है ? ॥ २१॥
यया पुत्रश्च भर्ता च त्यक्तावैश्वर्यकारणात्।
कं सा परिहरेदन्यं कैकेयी कलपांसनी॥२२॥
‘जिसने राज्य-वैभव के लिये अपने पुत्र और पति को त्याग दिया, वह कुलकलङ्किनी कैकेयी दूसरे किसका त्याग नहीं करेगी? ॥ २२ ॥
नहि प्रव्रजिते रामे जीविष्यति महीपतिः।
कैकेय्या न वयं राज्ये भृतका हि वसेमहि।
जीवन्त्या जातु जीवन्त्यः पुत्रैरपि शपामहे ॥ २३॥
‘हम अपने पुत्रों की शपथ खाकर कहती हैं कि जबतक कैकेयी जीवित रहेगी, तबतक हम जीते-जी कभी उसके राज्य में नहीं रह सकेंगी, भले ही यहाँ हमारा पालन-पोषण होता रहे (फिर भी हम यहाँ रहना नहीं चाहेंगी) ॥२३॥
या पुत्रं पार्थिवेन्द्रस्य प्रवासयति निघृणा।
कस्तां प्राप्य सुखं जीवेदधर्म्या दुष्टचारिणीम्॥ २४॥
‘जिस निर्दय स्वभाववाली नारी ने महाराज के पुत्र को राज्यसे बाहर निकलवा दिया है, उस अधर्म परायणा दुराचारिणी कैकेयी के अधिकार में रहकर कौन सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर सकता है ? ॥२४॥
उपद्रुतमिदं सर्वमनालम्भमनायकम्।
कैकेय्यास्तु कृते सर्वं विनाशमुपयास्यति॥२५॥
‘कैकेयी के कारण यह सारा राज्य अनाथ एवं यज्ञरहित होकर उपद्रव का केन्द्र बन गया है, अतः एक दिन सबका विनाश हो जायगा॥ २५ ॥
नहि प्रव्रजिते रामे जीविष्यति महीपतिः।
मृते दशरथे व्यक्तं विलोपस्तदनन्तरम्॥२६॥
‘श्रीरामचन्द्रजी के वनवासी हो जाने पर महाराज दशरथ जीवित नहीं रहेंगे। साथ ही यह भी स्पष्ट है कि राजा दशरथ की मृत्यु के पश्चात् इस राज्य का लोप हो जायगा॥२६॥
ते विषं पिबतालोड्य क्षीणपुण्याः सुदुःखिताः।
राघवं वानुगच्छध्वमश्रुतिं वापि गच्छत॥२७॥
‘इसलिये अब तुमलोग यह समझ लो कि अब हमारे पुण्य समाप्त हो गये। यहाँ रहकर हमें अत्यन्त दुःख ही भोगना पड़ेगा। ऐसी दशा में या तो जहर घोलकर पी जाओ या श्रीराम का अनुसरण करो
अथवा किसी ऐसे देश में चले चलो, जहाँ कैकेयी का नाम भी न सुनायी पड़े॥२७॥
मिथ्याप्रव्राजितो रामः सभार्यः सहलक्ष्मणः।
भरते संनिबद्धाः स्मः सौनिके पशवो यथा॥ २८॥
‘झूठे वर की कल्पना करके पत्नी और लक्ष्मण के साथ श्रीराम को देश निकाला दे दिया गया और हमें भरत के साथ बाँध दिया गया। अब हमारी दशा कसाई के घर बँधे हुए पशुओं के समान हो गयी है। २८॥
पूर्णचन्द्राननः श्यामो गूढजत्रुररिंदमः।
आजानुबाहुः पद्माक्षो रामो लक्ष्मणपूर्वजः॥२९॥
पूर्वाभिभाषी मधुरः सत्यवादी महाबलः।
सौम्यश्च सर्वलोकस्य चन्द्रवत् प्रियदर्शनः॥ ३०॥
‘लक्ष्मण के ज्येष्ठ भ्राता श्रीराम का मुख पूर्ण चन्द्रमा के समान मनोहर है। उनके शरीर की कान्ति श्याम, गले की हँसली मांस से ढकी हुई, भुजाएँ घुटनों तक लंबी और नेत्र कमल के समान सुन्दर हैं। । वे सामने आने पर पहले ही बातचीत छेड़ते हैं तथा मीठे और सत्य वचन बोलते हैं। श्रीराम शत्रुओं का दमन करने वाले और महान बलवान हैं। समस्त जगत् के लिये सौम्य (कोमल स्वभाव वाले) हैं। उनका दर्शन चन्द्रमा के समान प्यारा है॥ २९-३०॥
नूनं पुरुषशार्दूलो मत्तमातङ्गविक्रमः।
शोभयिष्यत्यरण्यानि विचरन् स महारथः॥ ३१॥
‘निश्चय ही मतवाले गजराज के समान पराक्रमी पुरुषसिंह महारथी श्रीराम भूतल पर विचरते हुए वनस्थलियों की शोभा बढ़ायेंगे’ ॥ ३१॥
तास्तथा विलपन्त्यस्तु नगरे नागरस्त्रियः।
चुक्रुशुर्दुःखसंतप्ता मृत्योरिव भयागमे॥ ३२॥
नगर में नागरिकों की स्त्रियाँ इस प्रकार विलाप करती हुई दुःख से संतप्त हो इस तरह जोर-जोर से रोने लगीं, मानो उन पर मृत्यु का भय आ गया हो॥ ३२॥
इत्येवं विलपन्तीनां स्त्रीणां वेश्मसु राघवम्।
जगामास्तं दिनकरो रजनी चाभ्यवर्तत॥३३॥
अपने-अपने घरों में श्रीराम के लिये स्त्रियाँ इस प्रकार दिनभर विलाप करती रहीं। धीरे-धीरे सूर्यदेव अस्ताचल को चले गये और रात हो गयी॥ ३३॥
नष्टज्वलनसंतापा प्रशान्ताध्यायसत्कथा।
तिमिरेणानुलिप्तेव तदा सा नगरी बभौ ॥ ३४॥
उस समय किसी के घर में अग्निहोत्र के लिये भी आग नहीं जली। स्वाध्याय और कथा-वार्ता भी नहीं हुई। सारी अयोध्यापुरी अन्धकार से पुती हुई-सी प्रतीत होती थी॥
उपशान्तवणिक्पण्या नष्टहर्षा निराश्रया।
अयोध्या नगरी चासीन्नष्टतारमिवाम्बरम्॥ ३५॥
बनियों की दुकानें बंद होने के कारण वहाँ चहल पहल नहीं थी, सारी पुरी की हँसी-खुशी छिन गयी थी, श्रीरामरूपी आश्रय से रहित अयोध्यानगरी जिसके तारे छिप गये हों, उस आकाश के समान श्रीहीन जान पड़ती थी॥ ३५॥
तदा स्त्रियो रामनिमित्तमातुरा यथा सुते भ्रातरि वा विवासिते।
विलप्य दीना रुरुदुर्विचेतसः सुतैर्हि तासामधिकोऽपि सोऽभवत्॥३६॥
उस समय नगरवासिनी स्त्रियाँ श्रीराम के लिये इस तरह शोकातुर हो रही थीं, मानो उनके सगे बेटे या भाई को देश निकाला दे दिया गया हो। वे अत्यन्त दीनभाव से विलाप करके रोने लगी और रोते-रोते अचेत हो गयीं; क्योंकि श्रीराम उनके लिये पुत्रों (तथा भाइयों)-से भी बढ़कर थे॥३६॥
प्रशान्तगीतोत्सवनृत्यवादना विभ्रष्टहर्षा पिहितापणोदया।
तदा ह्ययोध्या नगरी बभूव सा महार्णवः संक्षपितोदको यथा॥ ३७॥
वहाँ गाने, बजाने और नाचने के उत्सव बंद हो गये, सबका उत्साह जाता रहा, बाजार की दुकानें नहीं खुलीं, इन सब कारणों से उस समय अयोध्यानगरी जलहीन समुद्र के समान सूनसान लग रही थी॥ ३७॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टचत्वारिंशः सर्गः॥ ४८॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में अड़तालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥४८॥
सर्ग-49
रामोऽपि रात्रिशेषेण तेनैव महदन्तरम्।
जगाम पुरुषव्याघ्रः पितुराज्ञामनुस्मरन्॥१॥
उधर पुरुषसिंह श्रीराम भी पिता की आज्ञा का बारंबार स्मरण करते हुए उस शेष रात्रि में ही बहुत दूर निकल गये॥
तथैव गच्छतस्तस्य व्यपायाद रजनी शिवा।
उपास्य तु शिवां संध्यां विषयानत्यगाहत॥२॥
उसी तरह चलते-चलते उनकी वह कल्याणमयी रजनी भी व्यतीत हो गयी। सबेरा होने पर मङ्गलमयी संध्योपासना करके वे विभिन्न जनपदों को लाँघते हुए चल दिये॥२॥
ग्रामान् विकृष्टसीमान्तान् पुष्पितानि वनानि च।
पश्यन्नतिययौ शीघ्रं शनैरिव हयोत्तमैः॥३॥
जिनकी सीमा के पास की भूमि जोत दी गयी थी, उन ग्रामों तथा फूलों से सुशोभित वनों को देखते हुए वे उन उत्तम घोड़ों द्वारा शीघ्रतापूर्वक आगे बढ़े जा रहे थे तथापि सुन्दर दृश्यों के देखने में तन्मय रहने के कारण उन्हें उस रथ की गति धीमी-सी ही जान पड़ती थी॥
शृण्वन् वाचो मनुष्याणां ग्रामसंवासवासिनाम्।
राजानं धिग् दशरथं कामस्य वशमास्थितम्॥ ४॥
मार्ग में जो बड़े और छोटे गाँव मिलते थे, उनमें निवास करने वाले मनुष्यों की निम्नाङ्कित बातें उनके कानों में पड़ रही थीं—’अहो! काम के वश में पड़े हुए राजा दशरथ को धिक्कार है !॥ ४॥
हा नृशंसाद्य कैकेयी पापा पापानुबन्धिनी।
तीक्ष्णा सम्भिन्नमर्यादा तीक्ष्णकर्मणि वर्तते॥५॥
‘हाय! हाय! पापशीला, पापासक्त, क्रूर तथा धर्ममर्यादा का त्याग करने वाली कैकेयी को तो दया छू भी नहीं गयी है, वह क्रूर अब निष्ठुर कर् ममें ही लगी रहती है॥५॥
या पुत्रमीदृशं राज्ञः प्रवासयति धार्मिकम।
वनवासे महाप्राज्ञं सानुक्रोशं जितेन्द्रियम्॥६॥
‘जिसने महाराज के ऐसे धर्मात्मा, महाज्ञानी, दयालु और जितेन्द्रिय पुत्र को वनवास के लिये घर से निकलवा दिया है॥६॥
कथं नाम महाभागा सीता जनकनन्दिनी।
सदा सुखेष्वभिरता दुःखान्यनुभविष्यति॥७॥
‘जनकनन्दिनी महाभागा सीता, जो सदा सुखों में ही रत रहती थीं, अब वनवास के दुःख कैसे भोग सकेंगी?
अहो दशरथो राजा निःस्नेहः स्वसुतं प्रति।
प्रजानामनघं रामं परित्यक्तुमिहेच्छति॥८॥
‘अहो! क्या राजा दशरथ अपने पुत्र के प्रति इतने स्नेहहीन हो गये, जो प्रजाओं के प्रति कोई अपराध न करने वाले श्रीरामचन्द्रजी का यहाँ परित्याग कर देना चाहते हैं’॥ ८॥
एता वाचो मनुष्याणां ग्रामसंवासवासिनाम्।
शृण्वन्नतिययौ वीरः कोसलान् कोसलेश्वरः॥ ९॥
छोटे-बड़े गाँवों में रहने वाले मनुष्यों की ये बातें सुनते हुए वीर कोसलपति श्रीराम कोसल जनपद की सीमा लाँघकर आगे बढ़ गये॥९॥
ततो वेदश्रुतिं नाम शिववारिवहां नदीम्।
उत्तीर्याभिमुखः प्रायादगस्त्याध्युषितां दिशम्॥ १०॥
तदनन्तर शीतल एवं सुखद जल बहाने वाली वेदश्रुति नामक नदी को पार करके श्रीरामचन्द्रजी अगस्त्यसेवित दक्षिण दिशा की ओर बढ़ गये॥ १० ॥
गत्वा तु सुचिरं कालं ततः शीतवहां नदीम्।
गोमतीं गोयुतानूपामतरत् सागरङ्गमाम्॥११॥
दीर्घकाल तक चलकर उन्होंने समुद्रगामिनी गोमती नदी को पार किया, जो शीतल जल का स्रोत बहाती थी। उसके कछार में बहुत-सी गौएँ विचरती थीं। ११॥
गोमतीं चाप्यतिक्रम्य राघवः शीघ्रगैर्हयैः।
मयूरहंसाभिरुतां ततार स्यन्दिकां नदीम्॥१२॥
शीघ्रगामी घोड़ों द्वारा गोमती नदी को लाँघ करके श्रीरघुनाथजी ने मोरों और हंसों के कलरवों से व्याप्त स्यन्दि का नामक नदी को भी पार किया॥ १२॥
स महीं मनुना राज्ञा दत्तामिक्ष्वाकवे पुरा।
स्फीतां राष्ट्रवृतां रामो वैदेहीमन्वदर्शयत्॥१३॥
वहाँ जाकर श्रीराम ने धन-धान्य से सम्पन्न और अनेक अवान्तर जनपदों से घिरी हुई भूमिका सीता को दर्शन कराया, जिसे पूर्वकाल में राजा मनु ने इक्ष्वाकु को दिया था॥ १३॥
सूत इत्येव चाभाष्य सारथिं तमभीक्ष्णशः।
हंसमत्तस्वरः श्रीमानुवाच पुरुषोत्तमः॥१४॥
फिर श्रीमान् पुरुषोत्तम श्रीराम ने ‘सूत!’ कहकर सारथि को बारंबार सम्बोधित किया और मदमत्त हंस के समान मधुर स्वर में इस प्रकार कहा— ॥१४॥
कदाहं पुनरागम्य सरय्वाः पुष्पिते वने।
मृगयां पर्यटिष्यामि मात्रा पित्रा च संगतः॥१५॥
‘सूत ! मैं कब पुनः लौटकर माता-पिता से मिलूँगा और सरयू के पार्श्ववर्ती पुष्पित वन में मृगया के लिये भ्रमण करूँगा?॥ १५॥
नात्यर्थमभिकांक्षामि मृगयां सरयूवने।
रतिद्देषातुला लोके राजर्षिगणसम्मता॥१६॥
‘मैं सरयू के वन में शिकार खेलने की बहुत अधिक अभिलाषा नहीं रखता। यह लोक में एक प्रकार की अनुपम क्रीड़ा है, जो राजर्षियों के समुदाय को अभिमत है॥ १६॥
राजर्षीणां हि लोकेऽस्मिन् रत्यर्थं मृगया वने।
काले कृतां तां मनुजैर्धन्विनामभिकांक्षिताम्॥ १७॥
‘इस लोक में वन में जाकर शिकार खेलना राजर्षियों की क्रीड़ा के लिये प्रचलित हुआ था। अतः मनुपुत्रों द्वारा उस समय की गयी यह क्रीड़ा अन्य धनुर्धरों को भी अभीष्ट हुई’ ॥ १७॥
स तमध्वानमैक्ष्वाकः सूतं मधुरया गिरा।
तं तमर्थमभिप्रेत्य ययौ वाक्यमुदीरयन्॥१८॥
इक्ष्वाकुनन्दन श्रीरामचन्द्रजी विभिन्न विषयों को लेकर सूत से मधुर वाणी में उपयुक्त बातें कहते हुए उस मार्ग पर बढ़ते चले गये॥ १८ ॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकोनपञ्चाशः सर्गः॥ ४९॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में उनचासवाँ सर्ग पूरा हुआ॥४९॥
सर्ग-50
विशालान् कोसलान् रम्यान् यात्वा लक्ष्मणपूर्वजः।
अयोध्यामुन्मुखो धीमान् प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत्॥ १॥
इस प्रकार विशाल और रमणीय कोसलदेशकी सीमाको पार करके लक्ष्मणके बड़े भाई बुद्धिमान् श्रीरामचन्द्रजीने अयोध्याकी ओर अपना मुख किया और हाथ जोड़कर कहा- ॥१॥
आपृच्छे त्वां पुरिश्रेष्ठे काकुत्स्थपरिपालिते।
दैवतानि च यानि त्वां पालयन्त्यावसन्ति च॥ २॥
‘ककुत्स्थवंशी राजाओं से परिपालित परीशिरोमणि अयोध्ये! मैं तुमसे तथा जो-जो देवता तुम्हारी रक्षा करते और तुम्हारे भीतर निवास करते हैं, उनसे भी वन में जाने की आज्ञा चाहता हूँ॥२॥
निवृत्तवनवासस्त्वामनृणो जगतीपतेः।
पुनर्द्रक्ष्यामि मात्रा च पित्रा च सह संगतः॥३॥
‘वनवास की अवधि पूरी करके महाराज के ऋण से उऋण हो मैं पुनः लौटकर तुम्हारा दर्शन करूँगा और अपने माता-पिता से भी मिलूँगा’ ॥ ३॥
ततो रुचिरताम्राक्षो भुजमुद्यम्य दक्षिणम्।
अश्रुपूर्णमुखो दीनोऽब्रवीज्जानपदं जनम्॥४॥
इसके बाद सुन्दर एवं अरुण नेत्र वाले श्रीराम ने दाहिनी भुजा उठाकर नेत्रों से आँसू बहाते हुए दुःखी होकर जनपद के लोगों से कहा- ॥ ४॥
अनुक्रोशो दया चैव यथार्ह मयि वः कृतः।
चिरं दुःखस्य पापीयो गम्यतामर्थसिद्धये ॥५॥
‘आपने मुझपर बड़ी कृपा की और यथोचित दया दिखायी। मेरे लिये आपलोगों ने बहुत देर तक कष्टसहन किया। इस तरह आपका देर तक दुःख में पड़े रहना अच्छा नहीं है; इसलिये अब आपलोग अपना अपना कार्य करने के लिये जाइये ॥५॥
तेऽभिवाद्य महात्मानं कृत्वा चापि प्रदक्षिणम्।
विलपन्तो नरा घोरं व्यतिष्ठंश्च क्वचित् क्वचित्॥६॥
यह सुनकर उन मनुष्यों ने महात्मा श्रीराम को प्रणाम करके उनकी परिक्रमा की और घोर विलाप करते हुए वे जहाँ-तहाँ खड़े हो गये॥६॥
तथा विलपतां तेषामतृप्तानां च राघवः।
अचक्षुर्विषयं प्रायाद् यथार्कः क्षणदामुखे॥७॥
उनकी आँखें अभी श्रीराम के दर्शन से तृप्त नहीं हुई थीं और वे पूर्वोक्त रूप से विलाप कर ही रहे थे, इतने में श्रीरघुनाथजी उनकी दृष्टि से ओझल हो गये, जैसे सूर्य प्रदोषकाल में छिप जाते हैं॥७॥ ततो
धान्यधनोपेतान् दानशीलजनान् शिवान्।
अकुतश्चिद्भयान् रम्यांश्चैत्ययूपसमावृतान्॥८॥
उद्यानाम्रवणोपेतान् सम्पन्नसलिलाशयान्।
तुष्टपुष्टजनाकीर्णान् गोकुलाकुलसेवितान्॥९॥
रक्षणीयान् नरेन्द्राणां ब्रह्मघोषाभिनादितान्।
रथेन पुरुषव्याघ्रः कोसलानत्यवर्तत ॥१०॥
इसके बाद पुरुषसिंह श्रीराम रथ के द्वारा ही उस कोसल जनपद को लाँघ गये, जो धन-धान्य से सम्पन्न और सुखदायक था। वहाँ के सब लोग दानशील थे। उस जनपद में कहीं से कोई भय नहीं था। वहाँ के भूभाग रमणीय एवं चैत्य-वृक्षों तथा यज्ञ-सम्बन्धी यूपों से व्याप्त थे। बहुत-से उद्यान और आमों के वन उस जनपद की शोभा बढ़ाते थे। वहाँ जल से भरे हुए बहुत-से जलाशय सुशोभित थे। सारा जनपद हृष्ट-पुष्ट मनुष्यों से भरा था; गौओं के समूहों से व्याप्त और सेवित था। वहाँ के ग्रामों की बहुत-से नरेश रक्षा करते थे तथा वहाँ वेदमन्त्रों की ध्वनि गूंजती रहती थी॥ ८ -१०॥
मध्येन मुदितं स्फीतं रम्योद्यानसमाकुलम्।
राज्यं भोज्यं नरेन्द्राणां ययौ धृतिमतां वरः॥ ११॥
कोसलदेश से आगे बढ़ने पर धैर्यवानों में श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी मध्यमार्ग से ऐसे राज्य में होकर निकले, जो सुख-सुविधा से युक्त, धन-धान्य से सम्पन्न, रमणीय उद्यानों से व्याप्त तथा सामन्त नरेशों के उपभोग में आने वाला था॥ ११॥
तत्र त्रिपथगां दिव्यां शीततोयामशैवलाम्।
ददर्श राघवो गङ्गां रम्यामृषिनिषेविताम्॥१२॥
उस राज्य में श्रीरघुनाथजी ने त्रिपथगामिनी दिव्य नदी गङ्गा का दर्शन किया, जो शीतल जल से भरी हुई, सेवारों से रहित तथा रमणीय थीं। बहुत-से महर्षि उनका सेवन करते थे॥ १२ ॥
आश्रमैरविदूरस्थैः श्रीमद्भिः समलंकृताम्।
कालेऽप्सरोभिर्हृष्टाभिः सेविताम्भोह्रदां शिवाम्॥ १३॥
उनके तट पर थोड़ी-थोड़ी दूर पर बहुत-से सुन्दर आश्रम बने थे, जो उन देवनदी की शोभा बढ़ाते थे। समय-समय पर हर्ष भरी अप्सराएँ भी उतरकर उनके जलकुण्ड का सेवन करती हैं। वे गङ्गा सबका कल्याण करने वाली हैं॥ १३॥
देवदानवगन्धर्वैः किंनरैरुपशोभिताम्।
नागगन्धर्वपत्नीभिः सेवितां सततं शिवाम्॥१४॥
देवता, दानव, गन्धर्व और किन्नर उन शिवस्वरूपा भागीरथी की शोभा बढ़ाते हैं। नागों और गन्धर्वो की पत्नियाँ उनके जल का सदा सेवन करती हैं।॥ १४॥
देवाक्रीडशताकीर्णा देवोद्यानयुतां नदीम्।
देवार्थमाकाशगतां विख्यातां देवपद्मिनीम्॥१५॥
गङ्गा के दोनों तटों पर देवताओं के सैकड़ों पर्वतीय क्रीड़ास्थल हैं। उनके किनारे देवताओं के बहुत-से उद्यान भी हैं। वे देवताओं की क्रीड़ा के लिये आकाश में भी विद्यमान हैं और वहाँ देवपद्मिनी के रूप में विख्यात हैं॥
जलाघाताट्टहासोग्रां फेननिर्मलहासिनीम्।
क्वचिद् वेणीकृतजलां क्वचिदावर्तशोभिताम्॥ १६॥
प्रस्तरखण्डों से गङ्गा के जल के टकराने से जो शब्द होता है, वही मानो उनका उग्र अट्टहास है। जल से जो फेन प्रकट होता है, वही उन दिव्य नदी का निर्मल हास है। कहीं तो उनका जल वेणी के आकार का है और कहीं वे भँवरों से सुशोभित होती हैं॥ १६॥
क्वचित् स्तिमितगम्भीरां क्वचिद् वेगसमाकुलाम्।
क्वचिद् गम्भीरनिर्घोषां क्वचिद् भैरवनिःस्वनाम्॥१७॥
कहीं उनका जल निश्चल एवं गहरा है। कहीं वे महान् वेगसे व्याप्त हैं। कहीं उनके जलसे मृदङ्ग आदिके समान गम्भीर घोष प्रकट होता है और कहीं वज्रपात आदिके समान भयंकर नाद सुनायी पड़ता है॥ १७॥
देवसंघाप्लुतजलां निर्मलोत्पलसंकुलाम्।
क्वचिदाभोगपुलिनां क्वचिन्निर्मलवालुकाम्॥ १८॥
उनके जलमें देवताओं के समुदाय गोते लगाते हैं। कहीं-कहीं उनका जल नील कमलों अथवा कुमुदों से आच्छादित होता है। कहीं विशाल पुलिन का दर्शन होता है तो कहीं निर्मल बालुका-राशिका॥ १८॥
हंससारससंघुष्टां चक्रवाकोपशोभिताम्।
सदामत्तैश्च विहगैरभिपन्नामनिन्दिताम्॥१९॥
हंसों और सारसों के कलरव वहाँ गूंजते रहते हैं। चकवे उन देवनदी की शोभा बढ़ाते हैं। सदा मदमत्त रहने वाले विहंगम उनके जलपर मँडराते रहते हैं। वे उत्तम शोभा से सम्पन्न हैं॥ १९॥
क्वचित् तीररुहैर्वृक्षर्मालाभिरिव शोभिताम्।
क्वचित् फुल्लोत्पलच्छन्नां क्वचित् पद्मवनाकुलाम्॥२०॥
कहीं तटवर्ती वृक्ष मालाकार होकर उनकी शोभा बढ़ाते हैं। कहीं तो उनका जल खिले हुए उत्पलों से आच्छादित है और कहीं कमलवनों से व्याप्त॥ २० ॥
क्वचित् कुमुदखण्डैश्च कुड्मलैरुपशोभिताम्।
नानापुष्परजोध्वस्तां समदामिव च क्वचित्॥ २१॥
कहीं कुमुदसमूह तथा कहीं कलिकाएँ उन्हें सुशोभित करती हैं। कहीं नाना प्रकार के पुष्पों के परागों से व्याप्त होकर वे मदमत्त नारी के समान प्रतीत होती हैं।
व्यपेतमलसंघातां मणिनिर्मलदर्शनाम।
दिशागजैर्वनगजैर्मत्तैश्च वरवारणैः ॥२२॥
देवराजोपवाय॑श्च संनादितवनान्तराम्।
वे मलसमूह (पापराशि) दूर कर देती हैं। उनका जल इतना स्वच्छ है कि मणि के समान निर्मल दिखायी देता है। उनके तटवर्ती वन का भीतरी भाग मदमत्त दिग्गजों, जंगली हाथियों तथा देवराज की सवारी में आने वाले श्रेष्ठ गजराजों से कोलाहलपूर्ण बना रहता है।
प्रमदामिव यत्नेन भूषितां भूषणोत्तमैः॥२३॥
फलपुष्पैः किसलयैर्वृतां गुल्मैर्दिजैस्तथा।
विष्णुपादच्युतां दिव्यामपापां पापनाशिनीम्॥ २४॥
वे फलों, फूलों, पल्लवों, गुल्मों तथा पक्षियों से आवृत होकर उत्तम आभूषणों से यत्नपूर्वक विभूषित हुई युवती के समान शोभा पाती हैं। उनका प्राकट्य भगवान् विष्णु के चरणों से हुआ है। उनमें पाप का लेश भी नहीं है। वे दिव्य नदी गङ्गा जीवों के समस्त पापों का नाश कर देने वाली हैं॥ २३-२४॥
शिंशुमारैश्च नक्रैश्च भुजंगैश्च समन्विताम्।
शंकरस्य जटाजूटाद् भ्रष्टां सागरतेजसा ॥ २५॥
समुद्रमहिषीं गङ्गां सारसक्रौञ्चनादिताम्।
आससाद महाबाहुः शृङ्गवेरपुरं प्रति॥२६॥
उनके जल में राँस, घड़ियाल और सर्प निवास करते हैं। सगरवंशी राजा भगीरथ के तपोमय तेज से जिनका शंकरजी के जटाजूट से अवतरण हुआ था, जो समुद्र की रानी हैं तथा जिनके निकट सारस और क्रौञ्च पक्षी कलरव करते रहते हैं, उन्हीं देवनदी गङ्गा के पास महाबाहु श्रीरामजी पहुँचे। गङ्गा की वह धारा शृङ्गवेरपुर में बह रही थी॥ २५-२६॥
तामूर्मिकलिलावर्तामन्ववेक्ष्य महारथः।
सुमन्त्रमब्रवीत् सूतमिहैवाद्य वसामहे ॥२७॥
जिनके आवर्त (भँवरें) लहरों से व्याप्त थे, उन गङ्गाजी का दर्शन करके महारथी श्रीराम ने सारथि सुमन्त्र से कहा- ‘सूत! आज हम लोग यहीं रहेंगे’। २७॥
अविदूरादयं नद्या बहुपुष्पप्रवालवान्।
सुमहानिङ्गदीवृक्षो वसामोऽत्रैव सारथे॥२८॥
‘सारथे! गङ्गाजी के समीप ही जो यह बहुत-से फूलों और नये-नये पल्लवों से सुशोभित महान् इङ्गदी का वृक्ष है, इसीके नीचे आज रात में हम निवास करेंगे॥ २८॥
प्रेक्षामि सरितां श्रेष्ठां सम्मान्यसलिलां शिवाम्।
देवमानवगन्धर्वमृगपन्नगपक्षिणाम्॥२९॥
‘जिनका जल देवताओं, मनुष्यों, गन्धर्वो, सो, पशुओं तथा पक्षियों के लिये भी समादरणीय है, उन कल्याणस्वरूपा, सरिताओं में श्रेष्ठ गङ्गाजी का भी मुझे यहाँ से दर्शन होता रहेगा’ ॥ २९॥
लक्ष्मणश्च सुमन्त्रश्च बाढमित्येव राघवम्।
उक्त्वा तमिङ्गदीवृक्षं तदोपययतुर्हयैः॥ ३०॥
तब लक्ष्मण और सुमन्त्र भी श्रीरामचन्द्रजी से बहुत अच्छा कहकर अश्वों द्वारा उस इंगुदी-वृक्ष के समीप गये॥
रामोऽभियाय तं रम्यं वृक्षमिक्ष्वाकुनन्दनः।
रथादवतरत् तस्मात् सभार्यः सहलक्ष्मणः॥३१॥
उस रमणीय वृक्ष के पास पहुँचकर इक्ष्वाकुनन्दन श्रीराम अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ रथ से उतर गये॥ ३१॥
सुमन्त्रोऽप्यवतीर्याथ मोचयित्वा हयोत्तमान्।
वृक्षमूलगतं राममुपतस्थे कृताञ्जलिः॥३२॥
फिर सुमन्त्र ने भी उतरकर उत्तम घोड़ों को खोल दिया और वृक्ष की जड़पर बैठे हुए श्रीरामचन्द्रजी के पास जाकर वे हाथ जोड़कर खड़े हो गये॥ ३२॥
तत्र राजा गुहो नाम रामस्यात्मसमः सखा।
निषादजात्यो बलवान् स्थपतिश्चेति विश्रुतः॥ ३३॥
शृङ्गवेरपुर में गुह नाम का राजा राज्य करता था। वह श्रीरामचन्द्रजी का प्राणों के समान प्रिय मित्र था। उसका जन्म निषादकुल में हुआ था। वह शारीरिक शक्ति और सैनिक शक्ति की दृष्टि से भी बलवान् था तथा वहाँ के निषादों का सुविख्यात राजा था॥ ३३॥
स श्रुत्वा पुरुषव्याघ्रं रामं विषयमागतम्।
वृद्धैः परिवृतोऽमात्यैातिभिश्चाप्युपागतः॥ ३४॥
उसने जब सुना कि पुरुषसिंह श्रीराम मेरे राज्यमें पधारे हैं, तब वह बूढ़े मन्त्रियों और बन्धु-बान्धवों से घिरा हुआ वहाँ आया॥ ३४॥
ततो निषादाधिपतिं दृष्ट्वा दूरादुपस्थितम्।
सह सौमित्रिणा रामः समागच्छद् गुहेन सः॥ ३५॥
निषादराज को दूर से आया हुआ देख श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण के साथ आगे बढ़कर उससे मिले॥ ३५ ॥
तमार्तः सम्परिष्वज्य गुहो राघवमब्रवीत्।
यथायोध्या तथेदं ते राम किं करवाणि ते॥३६॥
ईदृशं हि महाबाहो कः प्राप्स्यत्यतिथिं प्रियम्।
श्रीरामचन्द्रजी को वल्कल आदि धारण किये देख गुह को बड़ा दुःख हुआ। उसने श्रीरघुनाथजी को हृदय से लगाकर कहा—’श्रीराम! आपके लिये जैसे अयोध्या का राज्य है, उसी प्रकार यह राज्य भी है। बताइये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ? महाबाहो! आप-जैसा प्रिय अतिथि किसको सुलभ होगा?’ ॥ ३६ १/२॥
ततो गुणवदन्नाद्यमुपादाय पृथग्विधम्॥३७॥
अर्घ्य चोपानयच्छीघ्रं वाक्यं चेदमुवाच ह।
स्वागतं ते महाबाहो तवेयमखिला मही॥ ३८॥
वयं प्रेष्या भवान् भर्ता साधु राज्यं प्रशाधि नः।
भक्ष्यं भोज्यं च पेयं च लेह्यं चैतदुपस्थितम्।
शयनानि च मुख्यानि वाजिनां खादनं च ते॥
फिर भाँति-भाँति का उत्तम अन्न लेकर वह सेवा में उपस्थित हुआ। उसने शीघ्र ही अर्घ्य निवेदन किया और इस प्रकार कहा—’महाबाहो! आपका स्वागत है। यह सारी भूमि, जो मेरे अधिकार में है, आपकी ही है। हम आपके सेवक हैं और आप हमारे स्वामी, आज से आप ही हमारे इस राज्य का भलीभाँति शासन करें। यह भक्ष्य (अन्न आदि), भोज्य (खीर आदि), पेय(पानकरस आदि) तथा लेह्य (चटनी आदि) आपकी सेवा में उपस्थित है, इसे स्वीकार करें। ये उत्तमोत्तम शय्याएँ हैं तथा आपके घोड़ों के खाने के लिये चने और घास आदि भी प्रस्तुत हैं—ये सब सामग्री ग्रहण करें’॥ ३७–३९॥
गुहमेवं ब्रुवाणं तु राघवः प्रत्युवाच ह।
अर्चिताश्चैव हृष्टाश्च भवता सर्वदा वयम्॥४०॥
पद्भ्यामभिगमाच्चैव स्नेहसंदर्शनेन च।
गुह के ऐसा कहने पर श्रीरामचन्द्रजी ने उसे इस प्रकार उत्तर दिया—’सखे! तुम्हारे यहाँ तक पैदल आने और स्नेह दिखाने से ही हमारा सदा के लिये भलीभाँति पूजन-स्वागत-सत्कार हो गया। तुमसे मिलकर हमें बड़ी प्रसन्नता हुई है’। ४० १/२ ॥
भुजाभ्यां साधुवृत्ताभ्यां पीडयन् वाक्यमब्रवीत्॥४१॥
दिष्ट्या त्वां गुह पश्यामि ह्यरोगं सह बान्धवैः।
अपि ते कुशलं राष्ट्र मित्रेषु च वनेषु च॥४२॥
फिर श्रीराम ने अपनी दोनों गोल-गोल भुजाओं से गुह का अच्छी तरह आलिङ्गन करते हुए कहा -‘गुह! सौभाग्य की बात है कि मैं आज तुम्हें बन्धुबान्धवों के साथ स्वस्थ एवं सानन्द देख रहा हूँ। बताओ, तुम्हारे राज्य में, मित्रों के यहाँ तथा वनों में सर्वत्र कुशल तो है? ॥ ४१-४२॥
यत् त्विदं भवता किंचित् प्रीत्या समुपकल्पितम्।
सर्वं तदनुजानामि नहि वर्ते प्रतिग्रहे॥४३॥
‘तुमने प्रेमवश यह जो कुछ सामग्री प्रस्तुत की है, इसे स्वीकार करके मैं तुम्हें वापिस ले जाने की आज्ञा देता हूँ; क्योंकि इस समय दूसरों की दी हुई कोई भी वस्तु मैं ग्रहण नहीं करता-अपने उपयोग में नहीं लाता॥
कुशचीराजिनधरं फलमूलाशनं च माम्।
विद्धि प्रणिहितं धर्मे तापसं वनगोचरम्॥४४॥
‘वल्कल और मृगचर्म धारण करके फल-मूल का आहार करता हूँ और धर्म स्थित रहकर तापस वेश में वन के भीतर ही विचरता हूँ। इन दिनों तुम मुझे इसी नियम में स्थित जानो॥४४॥
अश्वानां खादनेनाहमर्थी नान्येन केनचित् ।
एतावतात्र भवता भविष्यामि सुपूजितः॥४५॥
‘इन सामग्रियों में जो घोड़ों के खाने-पीने की वस्तु है, उसी की इस समय मुझे आवश्यकता है, दूसरी किसी वस्तु की नहीं। घोड़ों को खिला-पिला देने मात्र से तुम्हारे द्वारा मेरा पूर्ण सत्कार हो जायगा।॥ ४५ ॥
एते हि दयिता राज्ञः पितुर्दशरथस्य मे।
एतैः सुविहितैरश्वैर्भविष्याम्यहमर्चितः॥४६॥
‘ये घोड़े मेरे पिता महाराज दशरथ को बहुत प्रिय हैं। इनके खाने-पीने का सुन्दर प्रबन्ध कर देने से मेरा भलीभाँति पूजन हो जायगा’ ॥ ४६॥
अश्वानां प्रतिपानं च खादनं चैव सोऽन्वशात्।
गुहस्तत्रैव पुरुषांस्त्वरितं दीयतामिति॥४७॥
तब गुह ने अपने सेवकों को उसी समय यह आज्ञा दी कि तुम घोड़ों के खाने-पीने के लिये आवश्यक वस्तुएँ शीघ्र लाकर दो॥ ४७॥
ततश्चीरोत्तरासङ्गः संध्यामन्वास्य पश्चिमाम्।
जलमेवाददे भोज्यं लक्ष्मणोनाहृतं स्वयम्॥४८॥
तत्पश्चात् वल्कल का उत्तरीय-वस्त्र धारण करने वाले श्रीराम ने सायंकाल की संध्योपासना करके भोजन के नाम पर स्वयं लक्ष्मण का लाया हुआ केवल जलमात्र पी लिया॥ ४८॥
तस्य भूमौ शयानस्य पादौ प्रक्षाल्य लक्ष्मणः।
सभार्यस्य ततोऽभ्येत्य तस्थौ वृक्षमुपाश्रितः॥ ४९॥
फिर पत्नीसहित श्रीराम भूमि पर ही तृण की शय्या बिछाकर सोये। उस समय लक्ष्मण उनके दोनों चरणों को धो-पोंछकर वहाँ से कुछ दूर पर हट आये और एक वृक्ष का सहारा लेकर बैठ गये॥४९॥
गुहोऽपि सह सूतेन सौमित्रिमनुभाषयन्।
अन्वजाग्रत् ततो राममप्रमत्तो धनुर्धरः॥५०॥
गुह भी सावधानी के साथ धनुष धारण करके सुमन्त्र के साथ बैठकर सुमित्राकुमार लक्ष्मण से बातचीत करता हुआ श्रीराम की रक्षा के लिये रातभर जागता रहा। ५०॥
तथा शयानस्य ततो यशस्विनो मनस्विनो दाशरथेर्महात्मनः।
अदृष्टदुःखस्य सुखोचितस्य सा तदा व्यतीता सुचिरेण शर्वरी॥५१॥
इस प्रकार सोये हुए यशस्वी मनस्वी दशरथनन्दन महात्मा श्रीराम की, जिन्होंने कभी दुःख नहीं देखा था तथा जो सुख भोगने के ही योग्य थे, वह रात उस समय (नींद न आने के कारण) बहुत देर के बाद व्यतीत हुई।
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चाशः सर्गः॥५०॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में पचासवाँ सर्ग पूरा हुआ।५०॥
सर्ग-51
तं जाग्रतमदम्भेन भ्रातुराय लक्ष्मणम्।
गुहः संतापसंतप्तो राघवं वाक्यमब्रवीत्॥१॥
लक्ष्मण को अपने भाई के लिये स्वाभाविक अनुराग से जागते देख निषादराज गुह को बड़ा संताप हुआ। उसने रघुकुलनन्दन लक्ष्मण से कहा- ॥१॥
इयं तात सुखा शय्या त्वदर्थमुपकल्पिता।
प्रत्याश्वसिहि साध्वस्यां राजपुत्र यथासुखम्॥ २॥
‘तात! राजकुमार! तुम्हारे लिये यह आराम देने वाली शय्या तैयार है, इस पर सुखपूर्वक सोकर भलीभाँति विश्राम कर लो॥२॥
उचितोऽयं जनः सर्वः क्लेशानां त्वं सुखोचितः।
गुप्त्यर्थं जागरिष्यामः काकुत्स्थस्य वयं निशाम्॥ ३॥
‘यह (मैं) सेवक तथा इसके साथ के सब लोग वनवासी होने के कारण सब प्रकार के क्लेश सहन करने के योग्य हैं (क्योंकि हम सबको कष्ट सहने का अभ्यास है), परंतु तुम सुख में ही पले हो, अतः उसी के योग्य हो (इसलिये सो जाओ)। हम सब लोग श्रीरामचन्द्रजी की रक्षा के लिये रातभर जागते रहेंगे॥३॥
नहि रामात् प्रियतमो ममास्ते भुवि कश्चन।
ब्रवीम्येव च ते सत्यं सत्येनैव च ते शपे॥४॥
‘मैं सत्य की ही शपथ खाकर तुमसे सत्य कहता हूँ कि इस भूतल पर मुझे श्रीराम से बढ़कर प्रिय दूसरा कोई नहीं है॥४॥
अस्य प्रसादादाशंसे लोकेऽस्मिन् सुमहद् यशः।
धर्मावाप्तिं च विपुलामर्थकामौ च पुष्कलौ॥५॥
‘इन श्रीरघुनाथजी के प्रसाद से ही मैं इस लोक में महान् यश, विपुल धर्म-लाभ तथा प्रचुर अर्थ एवं भोग्य वस्तु पाने की आशा करता हूँ॥ ५॥
सोऽहं प्रियसखं रामं शयानं सह सीतया।
रक्षिष्यामि धनुष्पाणिः सर्वथा ज्ञातिभिः सह ॥ ६॥
अतः मैं अपने बन्धु-बान्धवों के साथ हाथ में धनुष लेकर सीतासहित सोये हुए प्रियसखा श्रीराम की सब प्रकार से रक्षा करूँगा॥६॥
न मेऽस्त्यविदितं किंचिद वनेऽस्मिंश्चरतः सदा।
चतुरङ्ग ह्यतिबलं सुमहत् संतरेमहि ॥७॥
‘इस वन में सदा विचरते रहने के कारण मुझसे यहाँ की कोई बात छिपी नहीं है। हमलोग यहाँ शत्रु की अत्यन्त शक्तिशालिनी विशाल चतुरङ्गिणी सेना को भी अनायास ही जीत लेंगे’॥ ७॥
लक्ष्मणस्तु तदोवाच रक्ष्यमाणास्त्वयानघ।
नात्र भीता वयं सर्वे धर्ममेवानुपश्यता॥८॥
कथं दाशरथौ भूमौ शयाने सह सीतया।
शक्या निद्रा मया लब्धं जीवितं वा सुखानि वा॥ ९॥
यह सुनकर लक्ष्मण ने कहा—’निष्पाप निषादराज ! तुम धर्म पर ही दृष्टि रखते हुए हमारी रक्षा करते हो,इसलिये इस स्थान पर हम सब लोगों के लिये कोई भय नहीं है। फिर भी जब महाराज दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र सीता के साथ भूमि पर शयन कर रहे हैं, तब मेरे लिये उत्तम शय्यापर सोकर नींद लेना, जीवनधारण के लिये स्वादिष्ट अन्न खाना अथवा दूसरे-दूसरे सुखों को भोगना कैसे सम्भव हो सकता है ? ॥ ८-९॥
यो न देवासुरैः सर्वैः शक्यः प्रसहितुं युधि।
तं पश्य सुखसंसुप्तं तृणेषु सह सीतया॥१०॥
‘देखो! सम्पूर्ण देवता और असुर मिलकर भी युद्ध में जिनके वेग को नहीं सह सकते, वे ही श्रीराम इस समय सीता के साथ तिनकों के ऊपर सुखसे सो रहे हैं॥ १०॥
यो मन्त्रतपसा लब्धो विविधैश्च पराक्रमैः।
एको दशरथस्यैष पुत्रः सदृशलक्षणः॥११॥
अस्मिन् प्रव्रजिते राजा न चिरं वर्तयिष्यति।
विधवा मेदिनी नूनं क्षिप्रमेव भविष्यति॥१२॥
‘गायत्री आदि मन्त्रों के जप, कृच्छ्रचान्द्रायण आदि तप तथा नाना प्रकार के पराक्रम (यज्ञानुष्ठान आदि प्रयत्न) करने से जो महाराज दशरथ को अपने समान उत्तम लक्षणों से युक्त ज्येष्ठ पुत्र के रूप में प्राप्त हुए हैं, उन्हीं इन श्रीराम के वन में आ जाने से अब राजा दशरथ अधिक कालतक जीवन धारण नहीं कर सकेंगे। जान पड़ता है, निश्चय ही यह पृथ्वी अब शीघ्र विधवा हो जायगी॥ ११-१२ ॥
विनद्य सुमहानादं श्रमेणोपरताः स्त्रियः।
निर्घोषोपरतं तात मन्ये राजनिवेशनम्॥१३॥
‘तात! रनिवासकी स्त्रियाँ बड़े जोर से आर्तनाद करके अधिक श्रम के कारण अब चुप हो गयी होंगी। मैं समझता हूँ, राजभवन का हाहाकार और चीत्कार अब शान्त हो गया होगा॥ १३ ॥
कौसल्या चैव राजा च तथैव जननी मम।
नाशंसे यदि जीवन्ति सर्वे ते शर्वरीमिमाम्॥ १४॥
‘महारानी कौसल्या, राजा दशरथ तथा मेरी माता सुमित्रा—ये सब लोग आज की राततक जीवित रहेंगे या नहीं, यह मैं नहीं कह सकता॥ १४ ॥
जीवेदपि हि मे माता शत्रुघ्नस्यान्ववेक्षया।
तद् दुःखं यदि कौसल्या वीरसूर्विनशिष्यति॥ १५॥
‘शत्रुघ्न की बाट देखने के कारण सम्भव है मेरी माता जीवित रह जाय, परंतु यदि वीरजननी कौसल्या श्रीराम के विरह में नष्ट हो जायँगी तो यह हमलोगों के लिये बड़े दुःखकी बात होगी॥ १५॥
अनुरक्तजनाकीर्णा सुखालोकप्रियावहा।
राजव्यसनसंसृष्टा सा पुरी विनशिष्यति ॥१६॥
‘जिसमें श्रीराम के अनुरागी मनुष्य भरे हुए हैं तथा जो सदा सुखका दर्शनरूप प्रिय वस्तु की प्राप्ति कराने वाली रही है, वह अयोध्यापुरी राजा दशरथ के निधनजनित दुःख से युक्त होकर नष्ट हो जायगी॥ १६॥
कथं पुत्रं महात्मानं ज्येष्ठपुत्रमपश्यतः।
शरीरं धारयिष्यन्ति प्राणा राज्ञो महात्मनः॥ १७॥
‘अपने ज्येष्ठ पुत्र महात्मा श्रीराम को न देखने पर महामना राजा दशरथ के प्राण उनके शरीर में कैसे टिके रह सकेंगे॥१७॥
विनष्टे नृपतौ पश्चात् कौसल्या विनशिष्यति।
अनन्तरं च मातापि मम नाशमुपैष्यति॥१८॥
‘महाराज के नष्ट होने पर देवी कौसल्या भी नष्ट हो जायँगी। तदनन्तर मेरी माता सुमित्रा भी नष्ट हुए बिना नहीं रहेंगी॥ १८॥
अतिक्रान्तमतिक्रान्तमनवाप्य मनोरथम्।
राज्ये राममनिक्षिप्य पिता मे विनशिष्यति॥१९॥
(महाराज की इच्छा थी कि श्रीराम को राज्य पर अभिषिक्त करूँ) अपने उस मनोरथ को न पाकर श्रीराम को राज्यपर स्थापित किये बिना ही ‘हाय! मेरा सब कुछ नष्ट हो गया, नष्ट हो गया’ ऐसा कहते हुए मेरे पिताजी अपने प्राणों का परित्याग कर देंगे॥ १९ ॥
सिद्धार्थाः पितरं वृत्तं तस्मिन् काले घुपस्थिते।
प्रेतकार्येषु सर्वेषु संस्करिष्यन्ति राघवम्॥२०॥
‘उनकी उस मृत्यु का समय उपस्थित होने पर जो लोग रहेंगे और मेरे मरे हुए पिता रघुकुलशिरोमणि दशरथ का सभी प्रेतकार्यों में संस्कार करेंगे, वे ही सफल मनोरथ और भाग्यशाली हैं॥ २०॥
रम्यचत्वरसंस्थानां संविभक्तमहापथाम्।
हर्म्यप्रासादसम्पन्नां गणिकावरशोभिताम्॥२१॥
रथाश्वगजसम्बाधां तूर्यनादनिनादिताम्।
सर्वकल्याणसम्पूर्णां हृष्टपुष्टजनाकुलाम्॥ २२॥
आरामोद्यानसम्पन्नां समाजोत्सवशालिनीम्।
सुखिता विचरिष्यन्ति राजधानी पितुर्मम॥२३॥
‘(यदि पिताजी जीवित रहे तो) रमणीय चबूतरों और चौराहों के सुन्दर स्थानों से युक्त, पृथक्-पृथक् बने हुए विशाल राजमार्गों से अलंकृत, धनिकों की अट्टालिकाओं और देवमन्दिरों एवं राजभवनों से सम्पन्न, श्रेष्ठ वाराङ्गनाओंसे सुशोभित, रथों, घोड़ों और हाथियों के आवागमन से भरी हुई, विविध वाद्यों की ध्वनियों से निनादित, समस्त कल्याणकारी वस्तुओं से भरपूर, हृष्ट-पुष्ट मनुष्यों से सेवित, पुष्पवाटिकाओं और उद्यानों से विभूषित तथा सामाजिक उत्सवों से सुशोभित हुई मेरे पिता की राजधानी अयोध्यापुरी में जो लोग विचरेंगे, वास्तव में वे ही सुखी हैं॥ २१–२३॥
अपि जीवेद् दशरथो वनवासात् पुनर्वयम्।
प्रत्यागम्य महात्मानमपि पश्याम सुव्रतम्॥२४॥
‘क्या मेरे पिता महाराज दशरथ हमलोगों के लौटने तक जीवित रहेंगे? क्या वनवास से लौटकर उन उत्तम व्रतधारी महात्मा का हम फिर दर्शन कर सकेंगे?॥
अपि सत्यप्रतिज्ञेन सार्धं कुशलिना वयम्।
निवृत्ते वनवासेऽस्मिन्नयोध्यां प्रविशेमहि ॥ २५॥
‘क्या वनवास की इस अवधि के समाप्त होने पर हमलोग सत्यप्रतिज्ञ श्रीराम के साथ कुशलपूर्वक अयोध्यापुरी में प्रवेश कर सकेंगे?’ ॥ २५ ॥
परिदेवयमानस्य दुःखार्तस्य महात्मनः।
तिष्ठतो राजपुत्रस्य शर्वरी सात्यवर्तत ॥२६॥
इस प्रकार दुःख से आर्त होकर विलाप करते हुए महामना राजकुमार लक्ष्मण को वह सारी रात जागते ही बीती॥२६॥
तथा हि सत्यं ब्रुवति प्रजाहिते नरेन्द्रसूनौ गुरुसौहृदाद् गुहः।
मुमोच बाष्पं व्यसनाभिपीडितो ज्वरातुरो नाग इव व्यथातुरः॥२७॥
प्रजा के हित में संलग्न रहने वाले राजकुमार लक्ष्मण जब बड़े भाई के प्रति सौहार्दवश उपर्युक्त रूप से यथार्थ बात कह रहे थे, उस समय उसे सुनकर निषादराज गुह दुःख से पीड़ित हो उठा और व्यथा से व्याकुल हो ज्वरसे आतुर हुए हाथी की भाँति आँसू बहाने लगा। २७॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकपञ्चाशः सर्गः॥ ५१॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में इक्यावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥५१॥
सर्ग-52
प्रभातायां तु शर्वर्यां पृथुवक्षा महायशाः।
उवाच रामः सौमित्रिं लक्ष्मणं शुभलक्षणम्॥१॥
जब रात बीती और प्रभात हुआ, उस समय विशाल वक्षवाले महायशस्वी श्रीरामने शुभलक्षणसम्पन्न सुमित्राकुमार लक्ष्मणसे इस प्रकार कहा- ॥१॥
भास्करोदयकालोऽसौ गता भगवती निशा।
असौ सुकृष्णो विहगः कोकिलस्तात कूजति॥ २॥
‘तात! भगवती रात्रि व्यतीत हो गयी अब सूर्योदय का समय आ पहुँचा है। वह अत्यन्त कालेरंग का पक्षी कोकिल कुहू कुहू बोल रहा है। २॥
बर्हिणानां च निर्घोषः श्रूयते नदतां वने।
तराम जाह्नवीं सौम्य शीघ्रगां सागरङ्गमाम्॥३॥
‘वन में अव्यक्त शब्द करने वाले मयूरों की केकावाणी भी सुनायी देती है; अतः सौम्य! अब हमें तीव्र गति से बहने वाली समुद्रगामिनी गङ्गाजी के पार उतरना चाहिये’॥
विज्ञाय रामस्य वचः सौमित्रिर्मित्रनन्दनः।
गुहमामन्त्र्य सूतं च सोऽतिष्ठद् भ्रातुरग्रतः॥४॥
मित्रों को आनन्दित करने वाले सुमित्राकुमार लक्ष्मण ने श्रीरामचन्द्रजी के कथन का अभिप्राय समझकर गुह और सुमन्त्र को बुलाकर पार उतरने की व्यवस्था करने के लिये कहा और स्वयं वे भाई के सामने आकर खड़े हो गये।
स तु रामस्य वचनं निशम्य प्रतिगृह्य च।
स्थपतिस्तूर्णमाहूय सचिवानिदमब्रवीत्॥५॥
श्रीरामचन्द्रजी का वचन सुनकर उनका आदेश शिरोधार्य करके निषादराज ने तुरंत अपने सचिवों को बुलाया और इस प्रकार कहा- ॥५॥
अस्यवाहनसंयुक्तां कर्णग्राहवतीं शुभाम्।
सुप्रतारां दृढां तीर्थे शीघ्रं नावमुपाहर॥६॥
‘तुम घाटपर शीघ्र ही एक ऐसी नाव ले आओ, जो मजबूत होने के साथ ही सुगमतापूर्वक खेने योग्य हो, उसमें डाँड़ लगा हुआ हो, कर्णधार बैठा हो तथा वह नाव देखने में सुन्दर हो’॥ ६॥
तं निशम्य गुहादेशं गुहामात्यो गतो महान्।
उपोह्य रुचिरां नावं गुहाय प्रत्यवेदयत्॥७॥
निषादराज गुह का वह आदेश सुनकर उसका महान् मन्त्री गया और एक सुन्दर नाव घाट पर पहुँचाकर उसने गुह को इसकी सूचना दी॥७॥
ततः स प्राञ्जलिर्भूत्वा गुहो राघवमब्रवीत्।
उपस्थितेयं नौर्देव भूयः किं करवाणि ते॥८॥
तब गुह ने हाथ जोड़कर श्रीरामचन्द्रजी से कहा —’देव! यह नौका उपस्थित है; बताइये, इस समय आपकी और क्या सेवा करूँ? ॥ ८॥
तवामरसुतप्रख्य तर्तुं सागरगामिनीम्।
नौरियं पुरुषव्याघ्र शीघ्रमारोह सुव्रत॥९॥
‘देवकुमार के समान तेजस्वी तथा उत्तम व्रतकापालन करने वाले पुरुषसिंह श्रीराम ! समुद्रगामिनी गङ्गानदी को पार करने के लिये आपकी सेवा में यह नाव आ गयी है, अब आप शीघ्र इस पर आरूढ़ होइये’ ॥९॥
अथोवाच महातेजा रामो गुहमिदं वचः।
कृतकामोऽस्मि भवता शीघ्रमारोप्यतामिति॥ १०॥
तब महातेजस्वी श्रीराम गुह से इस प्रकार बोले ‘सखे! तुमने मेरा सारा मनोरथ पूर्ण कर दिया,अब शीघ्र ही सब सामान नाव पर चढ़ाओ’ ॥ १०॥
ततः कलापान् संनह्य खड्गौ बध्वा च धन्विनौ।
जग्मतुर्येन तां गङ्गां सीतया सह राघवौ॥११॥
यह कहकर श्रीराम और लक्ष्मण ने कवच धारण करके तरकस एवं तलवार बाँधी तथा धनुष लेकर वे दोनों भाई जिस मार्ग से सब लोग घाटपर जाया करते थे, उसी से सीता के साथ गङ्गाजी के तट पर गये॥ ११॥
राममेवं तु धर्मज्ञमुपागत्य विनीतवत्।
किमहं करवाणीति सूतः प्राञ्जलिरब्रवीत्॥ १२॥
उस समय धर्म के ज्ञाता भगवान् श्रीराम के पास जाकर सारथि सुमन्त्र ने विनीतभाव से हाथ जोड़कर पूछा-‘प्रभो! अब मैं आपकी क्या सेवा करूँ?’॥ १२॥
ततोऽब्रवीद् दाशरथिः सुमन्त्रं स्पृशन् करेणोत्तमदक्षिणेन।
सुमन्त्र शीघ्रं पुनरेव याहि राज्ञः सकाशे भव चाप्रमत्तः॥१३॥
तब दशरथनन्दन श्रीराम ने सुमन्त्र को उत्तम दाहिने हाथ से स्पर्श करते हुए कहा—’सुमन्त्रजी! अब आप शीघ्र ही पुनः महाराज के पास लौट जाइये और वहाँ सावधान होकर रहिये’ ॥ १३॥
निवर्तस्वेत्युवाचैनमेतावद्धि कृतं मम।
रथं विहाय पद्भ्यां तु गमिष्यामो महावनम्॥ १४॥
उन्होंने फिर कहा—’इतनी दूरतक महाराज की आज्ञा से मैंने रथ द्वारा यात्रा की है, अब हमलोग रथ छोड़कर पैदल ही महान् वन की यात्रा करेंगे; अतः आप लौट जाइये’ ॥ १४॥
आत्मानं त्वभ्यनुज्ञातमवेक्ष्यार्तः स सारथिः।
सुमन्त्रः पुरुषव्याघ्रमैक्ष्वाकमिदमब्रवीत्॥१५॥
अपने को घर लौटने की आज्ञा प्राप्त हुई देख सारथि सुमन्त्र शोक से व्याकुल हो उठे और इक्ष्वाकुनन्दन पुरुषसिंह श्रीराम से इस प्रकार बोले- ॥ १५॥
नातिक्रान्तमिदं लोके पुरुषेणेह केनचित्।
तव सभ्रातृभार्यस्य वासः प्राकृतवद् वने॥१६॥
‘रघुनन्दन! जिसकी प्रेरणा से आपको भाई और पत्नी के साथ साधारण मनुष्यों की भाँति वन में रहने को विवश होना पड़ा है, उस दैव का इस संसार में किसी भी पुरुष ने उल्लङ्घन नहीं किया॥१६॥
न मन्ये ब्रह्मचर्ये वा स्वधीते वा फलोदयः।
मार्दवार्जवयोऽपि त्वां चेद् व्यसनमागतम्॥ १७॥
‘जब आप-जैसे महान् पुरुष पर यह संकट आ गया, तब मैं समझता हूँ कि ब्रह्मचर्य-पालन, वेदों के स्वाध्याय, दयालुता अथवा सरलता में भी किसी फल की सिद्धि नहीं है॥ १७॥
सह राघव वैदेह्या भ्रात्रा चैव वने वसन्।
त्वं गतिं प्राप्स्यसे वीर त्रील्लोकांस्तु जयन्निव॥ १८॥
‘वीर रघुनन्दन! (इस प्रकार पिता के सत्य की रक्षा के लिये) विदेहनन्दिनी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ वन में निवास करते हुए आप तीनों लोकों पर विजय प्राप्त करने वाले महापुरुष नारायण की भाँति उत्कर्ष (महान् यश) प्राप्त करेंगे॥ १८ ॥
वयं खलु हता राम ये त्वया ह्युपवञ्चिताः।
कैकेय्या वशमेष्यामः पापाया दुःखभागिनः॥ १९॥
‘श्रीराम! निश्चय ही हमलोग हर तरह से मारे गये; क्योंकि आपने हम पुरवासियों को अपने साथ न ले जाकर अपने दर्शनजनित सुख से वञ्चित कर दिया। अब हम पापिनी कैकेयी के वश में पड़ेंगे और दुःख भोगते रहेंगे’॥ १९॥
इति ब्रुवन्नात्मसमं सुमन्त्रः सारथिस्तदा।
दृष्ट्वा दूरगतं रामं दुःखार्तो रुरुदे चिरम्॥२०॥
आत्मा के समान प्रिय श्रीरामचन्द्रजी से ऐसी बात कहकर उन्हें दूर जाने को उद्यत देख सारथि सुमन्त्र दुःख से व्याकुल होकर देर तक रोते रहे ॥ २०॥ ।
ततस्तु विगते बाष्पे सूतं स्पृष्ट्वोदकं शुचिम्।
रामस्तु मधुरं वाक्यं पुनः पुनरुवाच तम्॥२१॥
आँसुओं का प्रवाह रुकने पर आचमन करके पवित्र हुए सारथि से श्रीरामचन्द्रजी ने बारंबार मधुर वाणी में कहा- ॥२१॥
इक्ष्वाकूणां त्वया तुल्यं सुहृदं नोपलक्षये।
यथा दशरथो राजा मां न शोचेत् तथा कुरु॥ २२॥
‘सुमन्त्रजी! मेरी दृष्टि में इक्ष्वाकुवंशियों का हित करने वाला सुहृद् आपके समान दूसरा कोई नहीं है। आप ऐसा प्रयत्न करें, जिससे महाराज दशरथ को मेरे लिये शोक न हो॥ २२॥
शोकोपहतचेताश्च वृद्धश्च जगतीपतिः।
कामभारावसन्नश्च तस्मादेतद् ब्रवीमि ते॥२३॥
‘पृथिवीपति महाराज दशरथ एक तो बूढ़े हैं, दूसरे उनका सारा मनोरथ चूर-चूर हो गया है; इसलिये उनका हृदय शोक से पीड़ित है। यही कारण है कि मैं आपको उनकी सँभाल के लिये कहता हूँ॥२३॥
यद् यथा ज्ञापयेत् किंचित् स महात्मा महीपतिः।
कैकेय्याः प्रियकामार्थं कार्यं तदविकांक्षया॥ २४॥
‘वे महामनस्वी महाराज कैकेयी का प्रिय करने की इच्छा से आपको जो कुछ जैसी भी आज्ञा दें, उसका आप आदरपूर्वक पालन करें-यही मेरा अनुरोध है॥ २४॥
एतदर्थं हि राज्यानि प्रशासति नराधिपाः।
यदेषां सर्वकृत्येषु मनो न प्रतिहन्यते॥ २५॥
‘राजा लोग इसीलिये राज्य का पालन करते हैं कि किसी भी कार्य में इनके मन की इच्छा-पूर्ति में विघ्न न डाला जाय॥२५॥
यद् यथा स महाराजो नालीकमधिगच्छति।
न च ताम्यति शोकेन सुमन्त्र कुरु तत् तथा॥ २६॥
समन्त्रजी! जिस किसी भी कार्य में जिस किसी तरह भी महाराज को अप्रिय बात से खिन्न होने का अवसर न आवे तथा वे शोक से दुबले न हों, वह आपको उसी प्रकार करना चाहिये॥ २६ ॥
अदृष्टदुःखं राजानं वृद्धमार्यं जितेन्द्रियम्।
ब्रूयास्त्वमभिवाद्यैव मम हेतोरिदं वचः॥२७॥
‘जिन्होंने कभी दुःख नहीं देखा है, उन आर्य, जितेन्द्रिय और वृद्ध महाराज को मेरी ओर से प्रणाम करके यह बात कहियेगा॥ २७॥
न चाहमनुशोचामि लक्ष्मणो न च शोचति।
अयोध्यायाश्च्युताश्चेति वने वत्स्यामहेति वा॥ २८॥
‘हम लोग अयोध्या से निकल गये अथवा हमें वन में रहना पड़ेगा, इस बात को लेकर न तो मैं कभी शोक करता हूँ और न लक्ष्मण को ही इसका शोक है। २८॥
चतुर्दशसु वर्षेषु निवृत्तेषु पुनः पुनः।
लक्ष्मणं मां च सीतां च द्रक्ष्यसे शीघ्रमागतान्॥ २९॥
‘चौदह वर्ष समाप्त होने पर हम पुनः शीघ्र ही लौट आयेंगे और उस समय आप मुझे, लक्ष्मण को और सीता को भी फिर देखेंगे॥ २९॥
एवमुक्त्वा तु राजानं मातरं च सुमन्त्र मे।
अन्याश्च देवीः सहिताः कैकेयीं च पुनः पुनः॥ ३०॥
“सुमन्त्रजी! महाराज से ऐसा कहकर आप मेरी माता से, उनके साथ बैठी हुई अन्य देवियों (माताओं) से तथा कैकेयी से भी बारंबार मेरा कुशल-समाचार कहियेगा॥३०॥
आरोग्यं ब्रूहि कौसल्यामथ पादाभिवन्दनम्।
सीताया मम चार्यस्य वचनाल्लक्ष्मणस्य च॥ ३१॥
‘माता कौसल्या से कहियेगा कि तुम्हारा पुत्र स्वस्थ एवं प्रसन्न है। इसके बाद सीता की ओर से, मुझ ज्येष्ठ पुत्र की ओर से तथा लक्ष्मण की ओर से भी माता की चरण वन्दना कह दीजियेगा॥३१॥
ब्रूयाश्चापि महाराजं भरतं क्षिप्रमानय।
आगतश्चापि भरतः स्थाप्यो नृपमते पदे॥३२॥
तदनन्तर मेरी ओर से महाराज से भी यह निवेदन कीजियेगा कि आप भरत को शीघ्र ही बुलवा लें और जब वे आ जायँ, तब अपने अभीष्ट युवराज पद पर उनका अभिषेक कर दें॥३२॥
भरतं च परिष्वज्य यौवराज्येऽभिषिच्य च।
अस्मत्संतापजं दुःखं न त्वामभिभविष्यति॥३३॥
‘भरत को छाती से लगाकर और युवराज के पद पर अभिषिक्त करके आपको हमलोगों के वियोग से होने वाला दुःख दबा नहीं सकेगा॥३३॥
भरतश्चापि वक्तव्यो यथा राजनि वर्तसे।
तथा मातृषु वर्तेथाः सर्वास्वेवाविशेषतः॥ ३४॥
‘भरत से भी हमारा यह संदेश कह दीजियेगा कि महाराज के प्रति जैसा तुम्हारा बर्ताव है, वैसा ही समानरूप से सभी माताओं के प्रति होना चाहिये। ३४॥
यथा च तव कैकेयी सुमित्रा चाविशेषतः।
तथैव देवी कौसल्या मम माता विशेषतः॥ ३५॥
‘तुम्हारी दृष्टि में कैकेयी का जो स्थान है, वही समान रूप से सुमित्रा और मेरी माता कौसल्या का भी होना उचित है, इन सबमें कोई अन्तर न रखना॥ ३५॥
तातस्य प्रियकामेन यौवराज्यमवेक्षता।
लोकयोरुभयोः शक्यं नित्यदा सुखमेधितुम्॥ ३६॥
‘पिताजीका प्रिय करने की इच्छा से युवराज पद को स्वीकार करके यदि तुम राजकाज की देखभाल करते रहोगे तो इहलोक और परलोक में सदा ही सुख पाओगे’।
निवर्त्यमानो रामेण सुमन्त्रः प्रतिबोधितः।
तत्सर्वं वचनं श्रुत्वा स्नेहात् काकुत्स्थमब्रवीत्॥३७॥
श्रीरामचन्द्रजी ने सुमन्त्र को लौटाते हुए जब इस प्रकार समझाया, तब उनकी सारी बातें सुनकर वे श्रीराम से स्नेहपूर्वक बोले- ॥ ३७॥
यदहं नोपचारेण ब्रूयां स्नेहादविक्लवम्।
भक्तिमानिति तत् तावद् वाक्यं त्वं क्षन्तुमर्हसि॥ ३८॥
कथं हि त्वद्धिहीनोऽहं प्रतियास्यामि तां पुरीम्।
तव तात वियोगेन पुत्रशोकातुरामिव॥ ३९॥
तात! सेवक का स्वामी के प्रति जो सत्कारपूर्ण बर्ताव होना चाहिये, उसका यदि मैं आपसे बात करते समय पालन न कर सकूँ, यदि मेरे मुख से स्नेहवश कोई धृष्टतापूर्ण बात निकल जाय तो ‘यह
मेरा भक्त है’ ऐसा समझकर आप मुझे क्षमा कीजियेगा। जो आपके वियोग से पुत्रशोक से आतुर हुई माता की भाँति संतप्त हो रही है, उस अयोध्यापुरी में मैं आपको साथ लिये बिना कैसे लौटकर जा सकूँगा? ॥ ३८-३९॥
सराममपि तावन्मे रथं दृष्ट्वा तदा जनः।
विना रामं रथं दृष्ट्वा विदीर्येतापि सा पुरी॥४०॥
‘आते समय लोगों ने मेरे रथ में श्रीराम को विराजमान देखा था, अब इस रथ को श्रीराम से रहित देखकर उन लोगों का और उस अयोध्यापुरी का भी हृदय विदीर्ण हो जायगा॥ ४० ॥
दैन्यं हि नगरी गच्छेद् दृष्ट्वा शून्यमिमं रथम्।
सूतावशेषं स्वं सैन्यं हतवीरमिवाहवे॥४१॥
‘जैसे युद्ध में अपने स्वामी वीर रथी के मारे जाने पर जिसमें केवल सारथि शेष रह गया हो ऐसे रथ को देखकर उसकी अपनी सेना अत्यन्त दयनीय अवस्था में पड़ जाती है, उसी प्रकार मेरे इस रथ को आपसे सूना देखकर सारी अयोध्या नगरी दीन दशा को प्राप्त हो जायगी॥४१॥
दूरेऽपि निवसन्तं त्वां मानसेनाग्रतः स्थितम्।
चिन्तयन्तोऽद्य नूनं त्वां निराहाराः कृताः प्रजाः॥ ४२॥
‘आप दूर रहकर भी प्रजा के हृदय में निवास करने के कारण सदा उसके सामने ही खड़े रहते हैं। निश्चय ही इस समय प्रजावर्ग के सब लोगों ने आपका ही चिन्तन करते हुए खाना-पीना छोड़ दिया होगा। ४२॥
दृष्टं तद् वै त्वया राम यादृशं त्वत्प्रवासने।
प्रजानां संकुलं वृत्तं त्वच्छोकक्लान्तचेतसाम्॥ ४३॥
‘श्रीराम! जिस समय आप वन को आने लगे, उस समय आपके शोक से व्याकुलचित्त हुई प्रजा ने जैसा आर्तनाद एवं क्षोभ प्रकट किया था, उसे तो आपने देखा ही था॥४३॥
आर्तनादो हि यः पौरैरुन्मुक्तस्त्वत्प्रवासने।
सरथं मां निशाम्यैव कुर्युः शतगुणं ततः॥४४॥
‘आपके अयोध्या से निकलते समय पुरवासियों ने जैसा आर्तनाद किया था, आपके बिना मुझे खाली रथ लिये लौटा देख वे उससे भी सौगुना हाहाकार करेंगे॥
अहं किं चापि वक्ष्यामि देवीं तव सुतो मया।
नीतोऽसौ मातुलकुलं संतापं मा कृथा इति॥
असत्यमपि नैवाहं ब्रूयां वचनमीदृशम्।
कथमप्रियमेवाहं ब्रूयां सत्यमिदं वचः॥ ४६॥
‘क्या मैं महारानी कौसल्या से जाकर कहँगा कि मैंने आपके बेटे को मामा के घर पहुँचा दिया है ? इसलिये आप संताप न करें, यह बात प्रिय होने पर भी असत्य है, अतः ऐसा असत्य वचन भी मैं कभी नहीं कह सकता। फिर यह अप्रिय सत्य भी कैसे सुना सकूँगा कि मैं आपके पुत्र को वन में पहुँचा आया। ४५-४६॥
मम तावन्नियोगस्थास्त्वबन्धुजनवाहिनः।
कथं रथं त्वया हीनं प्रवाह्यन्ति हयोत्तमाः॥४७॥
‘ये उत्तम घोड़े मेरी आज्ञा के अधीन रहकर आपके बन्धुजनों का भार वहन करते हैं (आपके बन्धुजनों से हीन रथ का ये वहन नहीं करते हैं), ऐसी दशा में आपसे सूने रथ को ये कैसे खींच सकेंगे?॥४७॥
तन्न शक्ष्याम्यहं गन्तुमयोध्यां त्वदृतेऽनघ।
वनवासानुयानाय मामनुज्ञातुमर्हसि ॥४८॥
‘अतः निष्पाप रघुनन्दन! अब मैं आपके बिना अयोध्या लौटकर नहीं जा सकूँगा। मुझे भी वन में चलने की ही आज्ञा दीजिये॥४८॥
यदि मे याचमानस्य त्यागमेव करिष्यसि।
सरथोऽग्निं प्रवेक्ष्यामि त्यक्तमात्र इह त्वया॥ ४९॥
‘यदि इस तरह याचना करनेपर भी आप मुझे त्याग ही देंगे तो मैं आपके द्वारा परित्यक्त होकर यहाँ रथसहित अग्निमें प्रवेश कर जाऊँगा॥४९॥
भविष्यन्ति वने यानि तपोविघ्नकराणि ते।
रथेन प्रतिबाधिष्ये तानि सर्वाणि राघव॥५०॥
‘रघुनन्दन! वन में आपकी तपस्या में विघ्न डालने वाले जो-जो जन्तु उपस्थित होंगे, मैं इस रथ के द्वारा उन सबको दूर भगा दूंगा॥ ५० ॥
त्वत्कृतेन मया प्राप्तं रथचर्याकृतं सुखम्।
आशंसे त्वत्कृतेनाहं वनवासकृतं सुखम्॥५१॥
श्रीराम! आपकी कृपा से मुझे आपको रथ पर बिठाकर यहाँ तक लाने का सुख प्राप्त हुआ। अब आपके ही अनुग्रह से मैं आपके साथ वन में रहने का सुख भी पाने की आशा करता हूँ॥५१॥
प्रसीदेच्छामि तेऽरण्ये भवितुं प्रत्यनन्तरः।
प्रीत्याभिहितमिच्छामि भव मे प्रत्यनन्तरः॥५२॥
‘आप प्रसन्न होकर आज्ञा दीजिये। मैं वन में आपके पास ही रहना चाहता हूँ। मेरी इच्छा है कि आप प्रसन्नतापूर्वक कह दें कि तुम वन में मेरे साथ ही रहो॥५२॥
इमेऽपि च हया वीर यदि ते वनवासिनः।
परिचर्यां करिष्यन्ति प्राप्स्यन्ति परमां गतिम्॥ ५३॥
‘वीर! ये घोड़े भी यदि वन में रहते समय आपकी सेवा करेंगे तो इन्हें परमगति की प्राप्ति होगी॥ ५३॥
तव शुश्रूषणं मूर्ना करिष्यामि वने वसन्।
अयोध्यां देवलोकं वा सर्वथा प्रजहाम्यहम्॥ ५४॥
‘प्रभो! मैं वन में रहकर अपने सिरसे (सारे शरीर से) आपकी सेवा करूँगा और इस सुख के आगे अयोध्या तथा देवलोक का भी सर्वथा त्याग कर दूँगा।
नहि शक्या प्रवेष्टं सा मयायोध्या त्वया विना।
राजधानी महेन्द्रस्य यथा दुष्कृतकर्मणा ॥५५॥
‘जैसे सदाचारहीन प्राणी इन्द्र की राजधानी स्वर्ग में नहीं प्रवेश कर सकता, उसी प्रकार आपके बिना मैं अयोध्यापुरी में नहीं जा सकता॥ ५५ ॥
वनवासे क्षयं प्राप्ते ममैष हि मनोरथः।
यदनेन रथेनैव त्वां वहेयं पुरी पुनः॥५६॥
‘मेरी यह अभिलाषा है कि जब वनवास की अवधि समाप्त हो जाय, तब फिर इसी रथ पर बिठाकर आपको अयोध्यापुरी में ले चलूँ॥५६॥
चतुर्दश हि वर्षाणि सहितस्य त्वया वने।
क्षणभूतानि यास्यन्ति शतसंख्यानि चान्यथा॥ ५७॥
‘वनमें आपके साथ रहने से ये चौदह वर्ष मेरे लिये चौदह क्षणों के समान बीत जायँगे। अन्यथा चौदह सौ वर्षों के समान भारी जान पड़ेंगे॥५७॥
भृत्यवत्सल तिष्ठन्तं भर्तृपुत्रगते पथि।
भक्तं भृत्यं स्थितं स्थित्या न मा त्वं हातुमर्हसि॥ ५८॥
‘अतः भक्तवत्सल! आप मेरे स्वामी के पुत्र हैं। आप जिस पथ पर चल रहे हैं, उसी पर आपकी सेवा के लिये साथ चलने को मैं भी तैयार खड़ा हूँ। मैं आपके प्रति भक्ति रखता हूँ, आपका भृत्य हूँ और भृत्यजनोचित मर्यादा के भीतर स्थित हूँ; अतः आप मेरा परित्याग न करें’। ५८॥
एवं बहविधं दीनं याचमानं पुनः पुनः।
रामो भृत्यानुकम्पी तु सुमन्त्रमिदमब्रवीत्॥५९॥
इस तरह अनेक प्रकार से दीन वचन कहकर बारंबार याचना करने वाले सुमन्त्र से सेवकों पर कृपा करने वाले श्रीराम ने इस प्रकार कहा- ॥ ५९॥
जानामि परमां भक्तिमहं ते भर्तृवत्सल।
शृणु चापि यदर्थं त्वां प्रेषयामि पुरीमितः॥६०॥
‘सुमन्त्रजी! आप स्वामी के प्रति स्नेह रखने वाले हैं। मुझमें आपकी जो उत्कृष्ट भक्ति है, उसे मैं जानता हूँ; फिर भी जिस कार्य के लिये मैं आपको यहाँ से अयोध्यापुरी में भेज रहा हूँ, उसे सुनिये॥६०॥
नगरीं त्वां गतं दृष्ट्वा जननी मे यवीयसी।
कैकेयी प्रत्ययं गच्छेदिति रामो वनं गतः॥६१॥
‘जब आप नगर को लौट जायँगे, तब आपको देखकर मेरी छोटी माता कैकेयी को यह विश्वास हो जायगा कि राम वन को चले गये॥ ६१॥
विपरीते तुष्टिहीना वनवासं गते मयि।
राजानं नातिशङ्केत मिथ्यावादीति धार्मिकम्॥ ६२॥
‘इसके विपरीत यदि आप नहीं गये तो उसे संतोष नहीं होगा। मेरे वनवासी हो जाने पर भी वह धर्मपरायण महाराज दशरथ के प्रति मिथ्यावादी होने का संदेह करे, ऐसा मैं नहीं चाहता॥६२॥
एष मे प्रथमः कल्पो यदम्बा मे यवीयसी।
भरतारक्षितं स्फीतं पुत्रराज्यमवाप्स्यते॥६३॥
‘आपको भेजने में मेरा मुख्य उद्देश्य यही है कि मेरी छोटी माता कैकेयी भरत द्वारा सुरक्षित समृद्धिशाली राज्य को हस्तगत कर ले॥६३॥
मम प्रियार्थं राज्ञश्च सुमन्त्र त्वं पुरीं व्रज।
संदिष्टश्चापि यानर्थांस्तांस्तान् ब्रूयास्तथा तथा॥ ६४॥
‘सुमन्त्रजी! मेरा तथा महाराज का प्रिय करने के लिये आप अयोध्यापुरी को अवश्य पधारिये और आपको जिनके लिये जो संदेश दिया गया है, वह सब वहाँ जाकर उन लोगों से कह दीजिये’॥ ६४॥
इत्युक्त्वा वचनं सूतं सान्त्वयित्वा पुनः पुनः।
गुहं वचनमक्लीबो रामो हेतुमदब्रवीत्॥६५॥
ऐसा कहकर श्रीराम ने सुमन्त्र को बारंबार सान्त्वना दी। इसके बाद उन्होंने गुह से उत्साहपूर्वक यह युक्तियुक्त बात कही— ॥६५॥
नेदानीं गुह योग्योऽयं वासो मे सजने वने।
अवश्यमाश्रमे वासः कर्तव्यस्तद्गतो विधिः॥ ६६॥
‘निषादराज गुह! इस समय मेरे लिये ऐसे वन में रहना उचित नहीं है, जहाँ जनपद के लोगों का आनाजाना अधिक होता हो, अब अवश्य मुझे निर्जन वन के आश्रम में ही वास करना होगा। इसके लिये जटा धारण आदि आवश्यक विधि का मुझे पालन करना चाहिये॥
सोऽहं गृहीत्वा नियमं तपस्विजनभूषणम्।
हितकामः पितुर्भूयः सीताया लक्ष्मणस्य च॥ ६७॥
जटाः कृत्वा गमिष्यामि न्यग्रोधक्षीरमानय।
तत्क्षीरं राजपुत्राय गुहः क्षिप्रमुपाहरत्॥६८॥
‘अतः फल-मूल का आहार और पृथ्वी पर शयन आदि नियमों को ग्रहण करके मैं सीता और लक्ष्मण की अनुमति लेकर पिता का हित करने की इच्छा से सिर पर तपस्वी जनों के आभूषण रूप जटा धारण करके यहाँ से वन को जाऊँगा। मेरे केशों को जटा का रूप देने के लिये तुम बड़ का दूध ला दो।’ गुहने तुरंत ही बड़ का दूध लाकर श्रीराम को दिया। ६७-६८॥
लक्ष्मणस्यात्मनश्चैव रामस्तेनाकरोज्जटाः।
दीर्घबाहर्नरव्याघ्रो जटिलत्वमधारयत्॥६९॥
श्रीराम ने उसके द्वारा लक्ष्मण की तथा अपनी जटाएँ बनायीं महाबाहु पुरुषसिंह श्रीराम तत्काल जटाधारी हो गये॥ ६९॥
तौ तदा चीरसम्पन्नौ जटामण्डलधारिणौ।
अशोभेतामृषिसमौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥७०॥
उस समय वे दोनों भाई श्रीराम-लक्ष्मण वल्कल वस्त्र और जटामण्डल धारण करके ऋषियों के समान शोभा पाने लगे॥ ७० ॥
ततो वैखानसं मार्गमास्थितः सहलक्ष्मणः।
व्रतमादिष्टवान् रामः सहायं गुहमब्रवीत्॥७१॥
तदनन्तर वानप्रस्थमार्ग का आश्रय लेकर लक्ष्मणसहित श्रीराम ने वानप्रस्थोचित व्रत को ग्रहण किया। तत्पश्चात् वे अपने सहायक गुह से बोले—॥ ७१॥
अप्रमत्तो बले कोशे दुर्गे जनपदे तथा।
भवेथा गुह राज्यं हि दुरारक्षतमं मतम्॥७२॥
‘निषादराज! तुम सेना, खजाना, किला और राज्य के विषय में सदा सावधान रहना; क्योंकि राज्य की रक्षा का काम बड़ा कठिन माना गया है’। ७२॥
ततस्तं समनुज्ञाप्य गुहमिक्ष्वाकुनन्दनः।
जगाम तूर्णमव्यग्रः सभार्यः सहलक्ष्मणः॥७३॥
गुह को इस प्रकार आज्ञा देकर उससे विदा ले इक्ष्वाकुकुलनन्दन श्रीरामचन्द्रजी पत्नी और लक्ष्मण के साथ तुरंत ही वहाँ से चल दिये। उस समय उनके चित्त में तनिक भी व्यग्रता नहीं थी॥७३॥
स तु दृष्ट्वा नदीतीरे नावमिक्ष्वाकुनन्दनः।
तितीर्घः शीघ्रगां गङ्गामिदं वचनमब्रवीत्॥७४॥
नदी के तट पर लगी हुई नाव को देखकर इक्ष्वाकुनन्दन श्रीराम ने शीघ्रगामी गङ्गानदी के पार जाने की इच्छा से लक्ष्मण को सम्बोधित करके कहा – || ७४॥
आरोह त्वं नरव्याघ्र स्थितां नावमिमां शनैः।
सीतां चारोपयान्वक्षं परिगृह्य मनस्विनीम्॥७५॥
‘पुरुषसिंह! यह सामने नाव खड़ी है। तुम मनस्विनी सीता को पकड़कर धीरे से उस पर बिठा दो, फिर स्वयं भी नाव पर बैठ जाओ’ ॥ ७५ ॥
स भ्रातुः शासनं श्रुत्वा सर्वमप्रतिकूलयन्।
आरोप्य मैथिली पूर्वमारुरोहात्मवांस्ततः॥७६॥
भाई का यह आदेश सुनकर मन को वश में रखने वाले लक्ष्मण ने पूर्णतः उसके अनुकूल चलते हुए पहले मिथिलेशकुमारी श्रीसीता को नावपर बिठाया, फिर स्वयं भी उसपर आरूढ़ हुए॥ ७६ ॥
अथारुरोह तेजस्वी स्वयं लक्ष्मणपूर्वजः।
ततो निषादाधिपतिर्नुहो ज्ञातीनचोदयत्॥७७॥
सबके अन्त में लक्ष्मण के बड़े भाई तेजस्वी श्रीराम स्वयं नौका पर बैठे। तदनन्तर निषादराज गुह ने अपने भाई-बन्धुओं को नौका खेने का आदेश दिया॥ ७७॥
राघवोऽपि महातेजा नावमारुह्य तां ततः।
ब्रह्मवत्क्षत्रवच्चैव जजाप हितमात्मनः॥ ७८ ॥
महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजी भी उस नाव पर आरूढ़ होने के पश्चात् अपने हित के उद्देश्य से ब्राह्मण और क्षत्रिय के जपने योग्य ‘दैवी नाव’ इत्यादि वैदिक मन्त्र का जप करने लगे। ७८॥
आचम्य च यथाशास्त्रं नदीं तां सह सीतया।
प्रणमत्प्रीतिसंतुष्टो लक्ष्मणश्च महारथः॥७९॥
फिर शास्त्रविधि के अनुसार आचमन करके सीता के साथ उन्होंने प्रसन्नचित्त होकर गङ्गाजी को प्रणाम किया महारथी लक्ष्मण ने भी उन्हें मस्तक झुकाया॥७९॥
अनुज्ञाय सुमन्त्रं च सबलं चैव तं गुहम्।
आस्थाय नावं रामस्तु चोदयामास नाविकान्॥ ८०॥
इसके बाद श्रीराम ने सुमन्त्र को तथा सेनासहित गुह को भी जाने की आज्ञा दे नाव पर भलीभाँति बैठकर मल्लाहों को उसे चलाने का आदेश दिया॥ ८०॥
ततस्तैश्चालिता नौका कर्णधारसमाहिता।
शुभस्फ्यवेगाभिहता शीघ्रं सलिलमत्यगात्॥ ८१॥
तदनन्तर मल्लाहों ने नाव चलायी। कर्णधार सावधान होकर उसका संचालन करता था। वेग से सुन्दर डाँड़ चलाने के कारण वह नाव बड़ी तेजी से पानीपर बढ़ने लगी।। ८१॥
मध्यं तु समनुप्राप्य भागीरथ्यास्त्वनिन्दिता।
वैदेही प्राञ्जलिर्भूत्वा तां नदीमिदमब्रवीत्॥८२॥
भागीरथी की बीच धारा में पहुँचकर सती साध्वी विदेहनन्दिनी सीता ने हाथ जोड़कर गङ्गाजी से यह प्रार्थना की— ॥ ८२॥
पुत्रो दशरथस्यायं महाराजस्य धीमतः।
निदेशं पालयत्वेनं गले त्वदभिरक्षितः॥८३॥
‘देवि गङ्गे! ये परम बुद्धिमान् महाराज दशरथ के पुत्र हैं और पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये वन में जा रहे हैं। ये आपसे सुरक्षित होकर पिता की इस आज्ञा का पालन कर सकें—ऐसी कृपा कीजिये॥ ८३॥
चतुर्दश हि वर्षाणि समग्राण्युष्य कानने।
भ्रात्रा सह मया चैव पुनः प्रत्यागमिष्यति॥८४॥
‘वन में पूरे चौदह वर्षों तक निवास करके ये मेरे तथा अपने भाई के साथ पुनः अयोध्यापुरी को लौटेंगे। ८४॥
ततस्त्वां देवि सुभगे क्षेमेण पुनरागता।
यक्ष्ये प्रमुदिता गङ्गे सर्वकामसमृद्धिनी॥८५॥
‘सौभाग्यशालिनी देवि गङ्गे ! उस समय वन से पुनः कुशलपूर्वक लौटने पर सम्पूर्ण मनोरथों से सम्पन्न हुई मैं बड़ी प्रसन्नता के साथ आपकी पूजा करूँगी॥ ८५॥
त्वं हि त्रिपथगे देवि ब्रह्मलोकं समक्षसे।
भार्या चोदधिराजस्य लोकेऽस्मिन् सम्प्रदृश्यसे॥ ८६॥
‘स्वर्ग, भूतल और पाताल–तीनों मार्गो पर विचरनेवाली देवि! तुम यहाँ से ब्रह्मलोकतक फैली हुई हो और इस लोक में समुद्रराज की पत्नी के रूप में दिखायी देती हो। ८६॥
सा त्वां देवि नमस्यामि प्रशंसामि च शोभने।
प्राप्तराज्ये नरव्याघ्र शिवेन पुनरागते॥८७॥
‘शोभाशालिनी देवि! पुरुषसिंह श्रीराम जब पुनः वन से सकुशल लौटकर अपना राज्य प्राप्त कर लेंगे, तब मैं सीता पुनः आपको मस्तक झुकाऊँगी और आपकी स्तुति करूँगी॥ ८७॥
गवां शतसहस्रं च वस्त्राण्यन्नं च पेशलम्।
ब्राह्मणेभ्यः प्रदास्यामि तव प्रियचिकीर्षया॥ ८८॥
‘इतना ही नहीं, मैं आपका प्रिय करने की इच्छा से ब्राह्मणों को एक लाख गौएँ, बहुत-से वस्त्र तथा उत्तमोत्तम अन्न प्रदान करूँगी॥ ८८ ॥
सुराघटसहस्रेण मांसभूतौदनेन च।
यक्ष्ये त्वां प्रीयतां देवि पुरीं पुनरुपागता॥८९॥
‘देवि! पुनः अयोध्यापुरी में लौटने पर मैं सहस्रों देवदुर्लभ पदार्थों से तथा राजकीय भाग से रहित पृथ्वी, वस्त्र और अन्न के द्वारा भी आपकी पूजा करूँगी। आप मुझ पर प्रसन्न हों* ॥ ८९॥
* इस श्लोक में आये हुए ‘सुराघटसहस्रेण’ की व्युत्पत्ति इस प्रकार है-‘सुरेषु देवेषु न घटन्ते न सन्तीत्यर्थः, तेषां सहस्रं तेन सहस्रसंख्याकसुरदुर्लभपदार्थेनेत्यर्थः।’ ‘मांसभूतौदनेन’ की व्युत्पत्ति इस प्रकार समझनी चाहिये—’मांसभूतौदनेन मा नास्ति अंसो राजभागो यस्यां सा एव भूः पृथ्वी च उतं वस्त्रं च ओदनं च एतेषां समाहारः, तेन च त्वां यक्ष्ये।’
यानि त्वत्तीरवासीनि दैवतानि च सन्ति हि।
तानि सर्वाणि यक्ष्यामि तीर्थान्यायतनानि च॥ ९०॥
‘आपके किनारे जो-जो देवता, तीर्थ और मन्दिर हैं, उन सबका मैं पूजन करूँगी॥९० ॥
पुनरेव महाबाहुर्मया भ्रात्रा च संगतः।
अयोध्यां वनवासात् तु प्रविशत्वनघोऽनघे॥ ९१॥
‘निष्पाप गङ्गे! ये महाबाहु पापरहित मेरे पतिदेव मेरे तथा अपने भा ईके साथ वनवास से लौटकर पुनः अयोध्या नगरी में प्रवेश करें’॥ ९१॥
तथा सम्भाषमाणा सा सीता गङ्गामनिन्दिता।
दक्षिणा दक्षिणं तीरं क्षिप्रमेवाभ्युपागमत्॥ ९२॥
पति के अनुकूल रहने वाली सती-साध्वी सीता इस प्रकार गङ्गाजी से प्रार्थना करती हुई शीघ्र ही दक्षिण तट पर जा पहुँचीं॥ ९२॥
तीरं तु समनुप्राप्य नावं हित्वा नरर्षभः।
प्रातिष्ठत सह भ्रात्रा वैदेह्या च परंतपः॥९३॥
किनारे पहुँचकर शत्रुओं को संताप देने वाले नरश्रेष्ठ श्रीराम ने नाव छोड़ दी और भाई लक्ष्मण तथा विदेहनन्दिनी सीता के साथ आगे को प्रस्थान किया। ९३॥
अथाब्रवीन्महाबाहुः सुमित्रानन्दवर्धनम्।
भव संरक्षणार्थाय सजने विजनेऽपि वा ॥१४॥
अवश्यं रक्षणं कार्यं मद्विधैर्विजने वने।
अग्रतो गच्छ सौमित्रे सीता त्वामनुगच्छतु ॥९५॥
पृष्ठतोऽनुगमिष्यामि सीतां त्वां चानुपालयन्।
अन्योन्यस्य हि नो रक्षा कर्तव्या पुरुषर्षभ॥९६॥
तदनन्तर महाबाहु श्रीराम सुमित्रानन्दन लक्ष्मण से बोले—’सुमित्राकुमार! अब तुम सजन या निर्जन वन में सीता की रक्षा के लिये सावधान हो जाओ। हमजैसे लोगों को निर्जन वन में नारी की रक्षा अवश्य करनी चाहिये। अतः तुम आगे-आगे चलो, सीता तुम्हारे पीछे-पीछे चलें और मैं सीता की तथा तुम्हारी रक्षा करता हुआ सबसे पीछे चलूँगा। पुरुषप्रवर ! हमलोगों को एक-दूसरे की रक्षा करनी चाहिये॥ ९४-९६॥
न हि तावदतिक्रान्तासुकरा काचन क्रिया।
अद्य दुःखं तु वैदेही वनवासस्य वेत्स्यति॥९७॥
‘अबतक कोई भी दुष्कर कार्य समाप्त नहीं हुआ है—इस समय से ही कठिनाइयों का सामना आरम्भ हुआ है। आज विदेहकुमारी सीता को वनवास के वास्तविक कष्ट का अनुभव होगा॥९७॥
प्रणष्टजनसम्बाधं क्षेत्रारामविवर्जितम्।
विषमं च प्रपातं च वनमद्य प्रवेक्ष्यति॥९८॥
‘अब ये ऐसे वन में प्रवेश करेंगी, जहाँ मनुष्यों के आने-जाने का कोई चिह्न नहीं दिखायी देगा, न धान आदि के खेत होंगे, न टहलने के लिये बगीचे। जहाँ ऊँची-नीची भूमि होगी और गड्ढे मिलेंगे, जिसमें गिरने का भय रहेगा’ ॥ ९८॥
श्रुत्वा रामस्य वचनं प्रतस्थे लक्ष्मणोऽग्रतः।
अनन्तरं च सीताया राघवो रघुनन्दनः॥९९॥
श्रीरामचन्द्रजी का यह वचन सुनकर लक्ष्मण आगे बढ़े। उनके पीछे सीता चलने लगीं तथा सीता के पीछे रघुकुलनन्दन श्रीराम थे॥ ९९॥
गतं तु गङ्गापरपारमाशु रामं सुमन्त्रः सततं निरीक्ष्य।
अध्वप्रकर्षाद् विनिवृत्तदृष्टिमुमोच बाष्पं व्यथितस्तपस्वी॥१००॥
श्रीरामचन्द्रजी शीघ्र गङ्गाजी के उस पार पहुँचकर जबतक दिखायी दिये तब तक सुमन्त्र निरन्तर उन्हीं की ओर दृष्टि लगाये देखते रहे। जब वन के मार्ग में बहुत दूर निकल जाने के कारण वे दृष्टि से ओझल हो गये, तब तपस्वी सुमन्त्र के हृदय में बड़ी व्यथा हुई। वे नेत्रों से आँसू बहाने लगे॥ १०० ॥
स लोकपालप्रतिमप्रभावस्तीर्वा महात्मा वरदो महानदीम्।
ततः समृद्धान् शुभसस्यमालिनः क्रमेण वत्सान् मुदितानुपागमत्॥१०१॥
लोकपालों के समान प्रभावशाली वरदायक महात्मा श्रीराम महानदी गङ्गा को पार करके क्रमशः समृद्धिशाली वत्सदेश (प्रयाग)-में जा पहुँचे, जो सुन्दर धन-धान्य से सम्पन्न था। वहाँ के लोग बड़े हृष्टपुष्ट थे॥ १०१॥
तौ तत्र हत्वा चतुरो महामृगान् वराहमृश्यं पृषतं महारुरुम्।
आदाय मेध्यं त्वरितं बुभुक्षितौ – वासाय काले ययतुर्वनस्पतिम्॥१०२॥
वहाँ उन दोनों भाइयों ने मृगया-विनोद के लिये वराह, ऋष्य, पृषत् और महारुरु—इन चार महामृगों पर बाणों का प्रहार किया। तत्पश्चात् जब उन्हें भूख लगी, तब पवित्र कन्द-मूल आदि लेकर सायंकाल के समय ठहरने के लिये (वे सीताजी के साथ) एक वृक्ष के नीचे चले गये॥ १०२ ॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे द्विपञ्चाशः सर्गः॥५२॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में बावनवाँ सर्ग पूरा हुआ।५२॥
सर्ग-53
स तं वृक्षं समासाद्य संध्यामन्वास्य पश्चिमाम्।
रामो रमयतां श्रेष्ठ इति होवाच लक्ष्मणम्॥१॥
उस वृक्ष के नीचे पहुँचकर आनन्द प्रदान करने वालों में श्रेष्ठ श्रीराम ने सायंकाल की संध्योपासना करके लक्ष्मण से इस प्रकार कहा- ॥१॥
अद्येयं प्रथमा रात्रिर्याता जनपदाद् बहिः।
या समन्त्रेण रहिता तां नोत्कण्ठितुमर्हसि ॥२॥
‘सुमित्रानन्दन! आज हमें अपने जनपद से बाहर यह पहली रात प्राप्त हुई है। जिसमें सुमन्त्र हमारे साथ नहीं हैं। इस रात को पाकर तुम्हें नगर की सुख सुविधाओं के लिये उत्कण्ठित नहीं होना चाहिये॥२॥
जागर्तव्यमतन्द्रिभ्यामद्यप्रभृति रात्रिषु।
योगक्षेमौ हि सीताया वर्तेते लक्ष्मणावयोः॥३॥
“लक्ष्मण! आज से हम दोनों भाइयों को आलस्य छोड़कर रात में जागना होगा; क्योंकि सीता के योग क्षेम हम दोनों के ही अधीन हैं॥३॥
रात्रिं कथंचिदेवेमां सौमित्रे वर्तयामहे।
अपवर्तामहे भूमावास्तीर्य स्वयमर्जितैः॥४॥
‘सुमित्रानन्दन! यह रात हमलोग किसी तरह बितायँगे और स्वयं संग्रह करके लाये हुए तिनकों और पत्तों की शय्या बनाकर उसे भूमिपर बिछाकर उस पर किसी तरह सो लेंगे’॥ ४॥
स तु संविश्य मेदिन्यां महार्हशयनोचितः।
इमाः सौमित्रये रामो व्याजहार कथाः शुभाः॥
जो बहुमूल्य शय्यापर सोने के योग्य थे, वे श्रीराम भूमि पर ही बैठकर सुमित्राकुमार लक्ष्मण से ये शुभ बातें कहने लगे— * ॥ ५॥
* श्लोक ६ से लेकर २६ तक श्रीरामचन्द्रजीने जो बातें कही हैं, वे लक्ष्मणकी परीक्षाके लिये तथा उन्हें अयोध्या लौटानेके लिये कही गयी हैं; वास्तवमें उनकी ऐसी मान्यता नहीं थी। यही बात यहाँ सभी व्याख्याकारोंने स्वीकार की है।
ध्रुवमद्य महाराजो दुःखं स्वपिति लक्ष्मण।
कृतकामा तु कैकेयी तुष्टा भवितुमर्हति॥६॥
‘लक्ष्मण! आज महाराज निश्चय ही बड़े दुःख से सो रहे होंगे; परंतु कैकेयी सफल मनोरथ होने के कारण बहुत संतुष्ट होगी॥ ६॥
सा हि देवी महाराजं कैकेयी राज्यकारणात्।
अपि न च्यावयेत् प्राणान् दृष्ट्वा भरतमागतम्॥
‘कहीं ऐसा न हो कि रानी कैकेयी भरत को आया देख राज्य के लिये महाराज को प्राणों से भी वियुक्त कर दे॥७॥
अनाथश्च हि वृद्धश्च मया चैव विना कृतः।
किं करिष्यति कामात्मा कैकेय्या वशमागतः॥ ८॥
‘महाराज का कोई रक्षक न होने के कारण वे इस समय अनाथ हैं, बूढ़े हैं और उन्हें मेरे वियोग का सामना करना पड़ा है। उनकी कामना मन में ही रह गयी तथा वे कैकेयी के वश में पड़ गये हैं; ऐसी दशा में वे बेचारे अपनी रक्षा के लिये क्या करेंगे? ॥ ८॥
इदं व्यसनमालोक्य राज्ञश्च मतिविभ्रमम्।
काम एवार्थधर्माभ्यां गरीयानिति मे मतिः॥९॥
‘अपने ऊपर आये हुए इस संकट को और राजा की मतिभ्रान्ति को देखकर मुझे ऐसा मालूम होता है कि अर्थ और धर्म की अपेक्षा काम का ही गौरव अधिक है॥९॥
को ह्यविद्वानपि पुमान् प्रमदायाः कृते त्यजेत्।
छन्दानुवर्तिनं पुत्रं तातो मामिव लक्ष्मण ॥१०॥
‘लक्ष्मण ! पिताजी ने जिस तरह मुझे त्याग दिया है, उस प्रकार अत्यन्त अज्ञ होने पर भी कौन ऐसा पुरुष होगा, जो एक स्त्री के लिये अपने आज्ञाकारी पुत् का परित्याग कर दे?॥ १०॥
सुखी बत सुभार्यश्च भरतः केकयीसुतः।
मुदितान् कोसलानेको यो भोक्ष्यत्यधिराजवत्॥ ११॥
‘कैकेयीकुमार भरत ही सुखी और सौभाग्यवती स्त्री के पति हैं, जो अकेले ही हृष्ट-पुष्ट मनुष्यों से भरे हुए कोसल देश का सम्राट् की भाँति पालन करेंगे। ११॥
स हि राज्यस्य सर्वस्य सुखमेकं भविष्यति।
ताते तु वयसातीते मयि चारण्यमाश्रिते॥१२॥
‘पिताजी अत्यन्त वृद्ध हो गये हैं और मैं वन में चला आया हूँ, ऐसी दशा में केवल भरत ही समस्त राज्य के श्रेष्ठ सुख का उपभोग करेंगे॥ १२॥
अर्थधर्मी परित्यज्य यः काममनुवर्तते।
एवमापद्यते क्षिप्रं राजा दशरथो यथा॥१३॥
‘सच है, जो अर्थ और धर्म का परित्याग करके केवल काम का अनुसरण करता है, वह उसी प्रकार शीघ्र ही आपत्ति में पड़ जाता है, जैसे इस समय महाराज दशरथ पड़े हैं॥ १३॥
मन्ये दशरथान्ताय मम प्रव्राजनाय च।
कैकेयी सौम्य सम्प्राप्ता राज्याय भरतस्य च॥ १४॥
‘सौम्य! मैं समझता हूँ कि महाराज दशरथ के प्राणों का अन्त करने, मुझे देश निकाला देने और भरत को राज्य दिलाने के लिये ही कैकेयी इस राजभवन में आयी थी॥१४॥
अपीदानीं तु कैकेयी सौभाग्यमदमोहिता।
कौसल्यां च सुमित्रां च सा प्रबाधेत मत्कृते॥ १५॥
‘इस समय भी सौभाग्य के मद से मोहित हुई कैकेयी मेरे कारण कौसल्या और सुमित्रा को कष्ट पहुँचा सकती है॥ १५ ॥
मातास्मत्कारणाद् देवी सुमित्रा दुःखमावसेत्।
अयोध्यामित एव त्वं काले प्रविश लक्ष्मण॥ १६॥
‘हमलोगों के कारण तुम्हारी माता सुमित्रादेवी को बड़े दुःख के साथ वहाँ रहना पड़ेगा; अतः लक्ष्मण! तुम यहीं से कल प्रातःकाल अयोध्या को लौट जाओ। १६॥
अहमेको गमिष्यामि सीतया सह दण्डकान्।
अनाथाया हि नाथस्त्वं कौसल्याया भविष्यसि॥ १७॥
‘मैं अकेला ही सीता के साथ दण्डक वन को जाऊँगा। तुम वहाँ मेरी असहाय माता कौसल्या के सहायक हो जाओगे॥ १७॥
क्षुद्रकर्मा हि कैकेयी द्वेषादन्यायमाचरेत्।
परिदद्याद्धि धर्मज्ञ गरं ते मम मातरम्॥१८॥
‘धर्मज्ञ लक्ष्मण! कैकेयी के कर्म बड़े खोटे हैं। वह द्वेषवश अन्याय भी कर सकती है। तुम्हारी और मेरी माता को जहर भी दे सकती है॥ १८॥
नूनं जात्यन्तरे तात स्त्रियः पुत्रैर्वियोजिताः।
जनन्या मम सौमित्रे तदद्यैतदुपस्थितम्॥१९॥
“तात सुमित्राकुमार! निश्चय ही पूर्वजन्म में मेरी माता ने कुछ स्त्रियों का उनके पुत्रों से वियोग कराया होगा, उसी पाप का यह पुत्र-बिछोहरूप फल आज उन्हें प्राप्त हुआ है॥ १९॥
मया हि चिरपुष्टेन दुःखसंवर्धितेन च।
विप्रयुज्यत कौसल्या फलकाले धिगस्तु माम्॥ २०॥
‘मेरी माता ने चिरकाल तक मेरा पालन-पोषण किया और स्वयं दुःख सहकर मुझे बड़ा किया। अब जब पुत्र से प्राप्त होने वाले सुखरूपी फल के भोगने का अवसर आया, तब मैंने माता कौसल्या को अपने से बिलग कर दिया मुझे धिक्कार है !॥ २० ॥
मा स्म सीमन्तिनी काचिज्जनयेत् पुत्रमीदृशम्।
सौमित्रे योऽहमम्बाया दद्मि शोकमनन्तकम्॥
‘सुमित्रानन्दन! कोई भी सौभाग्यवती स्त्री कभी ऐसे पुत्र को जन्म न दे, जैसा मैं हूँ; क्योंकि मैं अपनी माता को अनन्त शोक दे रहा हूँ॥ २१॥
मन्ये प्रीतिविशिष्टा सा मत्तो लक्ष्मण सारिका।
यत्तस्याः श्रूयते वाक्यं शुक पादमरेर्दश ॥२२॥
‘लक्ष्मण! मैं तो ऐसा मानता हूँ कि माता कौसल्या में मुझसे अधिक प्रेम उनकी पाली हुई वह सारिका ही करती है; क्योंकि उसके मुख से माँ को सदा यह बात सुनायी देती है कि ‘ऐ तोते! तू शत्रु के पैर को काट खा’ (अर्थात् हमें पालने वाली माता कौसल्या के शत्रु के पाँव को चोंच मार दे। वह पक्षिणी होकर माता का इतना ध्यान रखती है और मैं उनका पुत्र होकर भी उनके लिये कुछ नहीं कर पाता)॥ २२॥
शोचन्त्याश्चाल्पभाग्याया न किंचिदुपकुर्वता।
पुत्रेण किमपुत्राया मया कार्यमरिंदम॥२३॥
‘शत्रुदमन! जो मेरे लिये शोकमग्न रहती है, मन्दभागिनी-सी हो रही है और पुत्र का कोई फल न पाने के कारण निपूती-सी हो गयी है, उस मेरी माता को कुछ भी उपकार न करने वाले मुझ-जैसे पुत्र से क्या प्रयोजन है ? ॥ २३॥
अल्पभाग्या हि मे माता कौसल्या रहिता मया।
शेते परमदुःखार्ता पतिता शोकसागरे॥२४॥
‘मुझसे बिछुड़ जाने के कारण माता कौसल्या वास्तव में मन्दभागिनी हो गयी है और शोक के समुद्र में पड़कर अत्यन्त दुःख से आतुर हो उसी में शयन करती है।
एको ह्यहमयोध्यां च पृथिवीं चापि लक्ष्मण।
तरेयमिषुभिः क्रुद्धो ननु वीर्यमकारणम्॥२५॥
‘लक्ष्मण! यदि मैं कुपित हो जाऊँ तो अपने बाणों द्वारा अकेला ही अयोध्यापुरी तथा समस्त भूमण्डल को निष्कण्टक बनाकर अपने अधिकार में कर लूँ; परंतु पारलौकिक हित-साधन में बल-पराक्रम कारण नहीं होता है (इसीलिये मैं ऐसा नहीं कर रहा हूँ।) ॥ २५ ॥
अधर्मभयभीतश्च परलोकस्य चानघ।
तेन लक्ष्मण नाद्याहमात्मानमभिषेचये॥२६॥
‘निष्पाप लक्ष्मण ! मैं अधर्म और परलोक के डर से डरता हूँ; इसीलिये आज अयोध्या के राज्यपर अपना अभिषेक नहीं कराता हूँ॥२६॥
एतदन्यच्च करुणं विलप्य विजने बहु।
अश्रुपूर्णमुखो दीनो निशि तूष्णीमुपाविशत्॥ २७॥
यह तथा और भी बहुत-सी बातें कहकर श्रीराम ने उस निर्जन वन में करुणाजनक विलाप किया। तत्पश्चात् वे उस रात में चुपचाप बैठ गये। उस समय उनके मुखपर आँसुओं की धारा बह रही थी और दीनता छा रही थी॥
विलापोपरतं रामं गतार्चिषमिवानलम्।
समुद्रमिव निर्वेगमाश्वासयत लक्ष्मणः॥२८॥
विलाप से निवृत्त होने पर श्रीराम ज्वालारहित अग्नि और वेगशून्य समुद्र के समान शान्त प्रतीत होते थे। उस समय लक्ष्मण ने उन्हें आश्वासन देते हुए कहा – ॥२८॥
ध्रुवमद्य पुरी राम अयोध्याऽऽयधिनां वर।
निष्प्रभा त्वयि निष्क्रान्ते गतचन्द्रेव शर्वरी॥ २९॥
‘अस्त्रधारियों में श्रेष्ठ श्रीराम! आपके निकल आने से निश्चय ही आज अयोध्यापुरी चन्द्रहीन रात्रि के समान निस्तेज हो गयी॥ २९॥
नैतदौपयिकं राम यदिदं परितप्यसे।
विषादयसि सीतां च मां चैव पुरुषर्षभ॥३०॥
‘पुरुषोत्तम श्रीराम! आप जो इस तरह संतप्त हो रहे हैं, यह आपके लिये कदापि उचित नहीं है। आप ऐसा करके सीता को और मुझको भी खेद में डाल रहे हैं।॥ ३०॥
न च सीता त्वया हीना न चाहमपि राघव।
मुहूर्तमपि जीवावो जलान्मत्स्याविवोद्धृतौ॥ ३१॥
‘रघुनन्दन! आपके बिना सीता और मैं दोनों दो घड़ी भी जीवित नहीं रह सकते। ठीक उसी तरह, जैसे जल से निकाले हुए मत्स्य नहीं जीते हैं॥ ३१॥
नहि तातं न शत्रुघ्नं न सुमित्रां परंतप।
द्रष्टमिच्छेयमद्याहं स्वर्गं चापि त्वया विना॥३२॥
‘शत्रुओं को ताप देने वाले रघुवीर! आपके बिना आज मैं न तो पिताजी को, न भाई शत्रुघ्न को, न माता सुमित्रा को और न स्वर्गलोक को ही देखना चाहता
ततस्तत्र समासीनौ नातिदूरे निरीक्ष्य ताम्।
न्यग्रोधे सुकृतां शय्यां भेजाते धर्मवत्सलौ॥३३॥
तदनन्तर वहाँ बैठे हुए धर्मवत्सल सीता और श्रीराम ने थोड़ी ही दूरपर वटवृक्ष के नीचे लक्ष्मण द्वारा सुन्दर ढंग से निर्मित हुई शय्या देखकर उसीका आश्रय लिया (अर्थात् वे दोनों वहाँ जाकर सो गये।) ॥ ३३॥
स लक्ष्मणस्योत्तमपुष्कलं वचो निशम्य चैवं वनवासमादरात्।
समाः समस्ता विदधे परंतपः प्रपद्य धर्मं सुचिराय राघवः॥३४॥
शत्रुओं को संताप देने वाले रघुनाथजी ने इस प्रकार वनवास के प्रति आदरपूर्वक कहे हुए लक्ष्मण के अत्यन्त उत्तम वचनों को सुनकर स्वयं भी दीर्घकाल के लिये वनवास रूप धर्म को स्वीकार करके सम्पूर्ण वर्षों तक लक्ष्मण को अपने साथ वन में रहने की अनुमति दे दी॥
ततस्तु तस्मिन् विजने महाबलौ महावने राघववंशवर्धनौ।
न तौ भयं सम्भ्रममभ्युपेयतुर्यथैव सिंहौ गिरिसानुगोचरौ॥ ३५॥
तदनन्तर उस महान् निर्जन वन में रघुवंश की वृद्धि करने वाले वे दोनों महाबली वीर पर्वतशिखर पर विचरने वाले दो सिंहों के समान कभी भय और उद्वेग को नहीं प्राप्त हुए।
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्रिपञ्चाशः सर्गः॥५३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में तिरपनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥५३॥
सर्ग-54
ते तु तस्मिन् महावृक्षे उषित्वा रजनी शुभाम्।
विमलेऽभ्युदिते सूर्ये तस्माद् देशात् प्रतस्थिरे॥
उस महान् वृक्ष के नीचे वह सुन्दर रात बिताकर वे सब लोग निर्मल सूर्योदयकाल में उस स्थान से आगे को प्रस्थित हुए॥१॥
यत्र भागीरथीं गङ्गां यमुनाभिप्रवर्तते।
जग्मुस्तं देशमुद्दिश्य विगाह्य सुमहद् वनम्॥२॥
जहाँ भागीरथी गङ्गा से यमुना मिलती हैं, उस स्थान पर जाने के लिये वे महान् वन के भीतर से होकर यात्रा करने लगे॥२॥
ते भूमिभागान् विविधान् देशांश्चापि मनोहरान्।
अदृष्टपूर्वान् पश्यन्तस्तत्र तत्र यशस्विनः॥३॥
वे तीनों यशस्वी यात्री मार्ग में जहाँ-तहाँ जो पहले कभी देखने में नहीं आये थे, ऐसे अनेक प्रकार के भूभाग तथा मनोहर प्रदेश देखते हुए आगे बढ़ रहे थे। ३॥
यथा क्षेमेण सम्पश्यन् पुष्पितान् विविधान् दुमान्।
निर्वृत्तमात्रे दिवसे रामः सौमित्रिमब्रवीत्॥४॥
सुखपूर्वक आराम से उठते-बैठते यात्रा करते हुए उन तीनों ने फूलों से सुशोभित भाँति-भाँति के वृक्षों का दर्शन किया। इस प्रकार जब दिन प्रायः समाप्त हो चला, तब श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा- ॥४॥
प्रयागमभितः पश्य सौमित्रे धूममुत्तमम्।
अग्नेर्भगवतः केतुं मन्ये संनिहितो मुनिः॥५॥
‘सुमित्रानन्दन! वह देखो, प्रयाग के पास भगवान् अग्निदेव की ध्वजारूप उत्तम धूम उठ रहा है। मालूम होता है, मुनिवर भरद्वाज यहीं हैं।॥ ५॥
नूनं प्राप्ताः स्म सम्भेदं गङ्गायमुनयोर्वयम्।
तथाहि श्रूयते शब्दो वारिणोरिघर्षजः॥६॥
‘निश्चय ही हमलोग गङ्गा-यमुना के सङ्गम के पास आ पहुँचे हैं; क्योंकि दो नदियों के जलों के परस्पर टकराने से जो शब्द प्रकट होता है, वह सुनायी दे रहा है॥६॥
दारूणि परिभिन्नानि वनजैरुपजीविभिः ।
छिन्नाश्चाप्याश्रमे चैते दृश्यन्ते विविधा द्रुमाः॥ ७॥
‘वन में उत्पन्न हुए फल-मूल और काष्ठ आदि से जीविका चलाने वाले लोगों ने जो लकड़ियाँ काटी हैं, वे दिखायी देती हैं तथा जिनकी लकड़ियाँ काटी गयी हैं, वे नाना प्रकार के वृक्ष भी आश्रम के समीप दृष्टिगोचर हो रहे हैं’ ॥ ७॥
धन्विनौ तौ सुखं गत्वा लम्बमाने दिवाकरे।
गङ्गायमुनयोः संधौ प्रापतुर्निलयं मुनेः॥८॥
इस प्रकार बातचीत करते हुए वे दोनों धनुर्धर वीर श्रीराम और लक्ष्मण सूर्यास्त होते-होते गङ्गा-यमुना के सङ्गम के समीप मुनिवर भरद्वाज के आश्रम पर जा पहुँचे॥८॥
रामस्त्वाश्रममासाद्य त्रासयन् मृगपक्षिणः।
गत्वा मुहूर्तमध्वानं भरद्वाजमुपागमत्॥९॥
श्रीरामचन्द्रजी आश्रम की सीमा में पहुँचकर अपने धनुर्धर वेश के द्वारा वहाँ के पशु-पक्षियों को डराते हुएदो ही घड़ी में तै करने योग्य मार्ग से चलकर भरद्वाज मुनि के समीप जा पहुँचे॥९॥
ततस्त्वाश्रममासाद्य मुनेर्दर्शनकांक्षिणौ।
सीतयानुगतौ वीरौ दूरादेवावतस्थतुः॥१०॥
आश्रममें पहुँचकर महर्षिके दर्शनकी इच्छावाले सीतासहित वे दोनों वीर कुछ दूरपर ही खड़े हो गये।
स प्रविश्य महात्मानमृषि शिष्यगणैर्वृतम्।
संशितव्रतमेकाग्रं तपसा लब्धचक्षुषम्॥११॥
हुताग्निहोत्रं दृष्ट्वैव महाभागः कृताञ्जलिः।
रामः सौमित्रिणा सार्धं सीतया चाभ्यवादयत्॥ १२॥
(दूर खड़े हो महर्षि के शिष्य से अपने आगमन की सूचना दिलवाकर भीतर आने की अनुमति प्राप्त कर लेने के बाद) पर्णशाला में प्रवेश करके उन्होंने तपस्या के प्रभाव से तीनों कालों की सारी बातें देखने की दिव्य दृष्टि प्राप्त कर लेने वाले एकाग्रचित्त तथा तीक्ष्ण व्रतधारी महात्मा भरद्वाज ऋषिका दर्शन किया, जो अग्निहोत्र करके शिष्यों से घिरे हुए आसन पर विराजमान थे। महर्षि को देखते ही लक्ष्मण और सीतासहित महाभाग श्रीराम ने हाथ जोड़कर उनके चरणों में प्रणाम किया॥ ११-१२ ॥
न्यवेदयत चात्मानं तस्मै लक्ष्मणपूर्वजः।
पुत्रौ दशरथस्यावां भगवन् रामलक्ष्मणौ ॥१३॥
भार्या ममेयं कल्याणी वैदेही जनकात्मजा।
मां चानुयाता विजनं तपोवनमनिन्दिता॥१४॥
तत्पश्चात् लक्ष्मण के बड़े भाई श्रीरघुनाथजी ने उनसे इस प्रकार अपना परिचय दिया—’भगवन् ! हम दोनों राजा दशरथ के पुत्र हैं। मेरा नाम राम और इनका लक्ष्मण है तथा ये विदेहराज जनक की पुत्री और मेरी कल्याणमयी पत्नी सती साध्वी सीता हैं, जो निर्जन तपोवन में भी मेरा साथ देने के लिये आयी हैं। १३-१४॥
पित्रा प्रव्राज्यमानं मां सौमित्रिरनुजः प्रियः।
अयमन्वगमद् भ्राता वनमेव धृतव्रतः॥१५॥
‘पिता की आज्ञा से मुझे वन की ओर आते देख ये । मेरे प्रिय अनुज भाई सुमित्राकुमार लक्ष्मण भी वन में ही रहने का व्रत लेकर मेरे पीछे-पीछे चले आये हैं। १५॥
पित्रा नियुक्ता भगवन् प्रवेक्ष्यामस्तपोवनम्।
धर्ममेवाचरिष्यामस्तत्र मूलफलाशनाः॥१६॥
‘भगवन्! इस प्रकार पिता की आज्ञा से हम तीनों तपोवन में जायँगे और वहाँ फल-मूल का आहार करते हुए धर्म का ही आचरण करेंगे’ ।। १६ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राजपुत्रस्य धीमतः।
उपानयत धर्मात्मा गामर्थ्यमुदकं ततः॥१७॥
परम बुद्धिमान् राजकुमार श्रीराम का वह वचन सुनकर धर्मात्मा भरद्वाज मुनि ने उनके लिये आतिथ्यसत्कार के रूप में एक गौ तथा अर्घ्य-जल समर्पित किये॥१७॥
नानाविधानन्नरसान् वन्यमूलफलाश्रयान्।
तेभ्यो ददौ तप्ततपा वासं चैवाभ्यकल्पयत्॥ १८॥
उन तपस्वी महात्माने उन सबको नाना प्रकार के अन्न, रस और जंगली फल-मूल प्रदान किये। साथ ही उनके ठहरने के लिये स्थान की भी व्यवस्था की॥ १८॥
मृगपक्षिभिरासीनो मुनिभिश्च समन्ततः।
राममागतमभ्यर्च्य स्वागतेनागतं मुनिः॥१९॥
प्रतिगृह्य तु ताम मुपविष्टं स राघवम्।
भरद्वाजोऽब्रवीद् वाक्यं धर्मयुक्तमिदं तदा ॥२०॥
महर्षि के चारों ओर मृग, पक्षी और ऋषि-मुनि बैठेथे और उनके बीच में वे विराजमान थे। उन्होंने अपने आश्रमपर अतिथि रूप में पधारे हुए श्रीराम का स्वागतपूर्वक सत्कार किया। उनके उस सत्कार को ग्रहण करके श्रीरामचन्द्रजी जब आसन पर विराजमान हुए, तब भरद्वाजजी ने उनसे यह धर्मयुक्त वचन कहा ॥
चिरस्य खलु काकुत्स्थ पश्याम्यहमुपागतम्।
श्रुतं तव मया चैव विवासनमकारणम्॥२१॥
‘ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम! मैं इस आश्रम पर दीर्घकाल से तुम्हारे शुभागमन की प्रतीक्षा कर रहा हूँ । (आज मेरा मनोरथ सफल हुआ है)। मैंने यह भी सुना है कि तुम्हें अकारण ही वनवास दे दिया गया है॥ २१॥
अवकाशो विविक्तोऽयं महानद्योः समागमे।
पुण्यश्च रमणीयश्च वसत्विह भवान् सुखम्॥ २२॥
‘गङ्गा और यमुना-इन दोनों महानदियों के संगम के पास का यह स्थान बड़ा ही पवित्र और एकान्त है। यहाँ की प्राकृतिक छटा भी मनोरम है, अतः तुम यहीं सुखपूर्वक निवास करो’ ।। २२॥
एवमुक्तस्तु वचनं भरद्वाजेन राघवः।
प्रत्युवाच शुभं वाक्यं रामः सर्वहिते रतः॥२३॥
भरद्वाज मुनि के ऐसा कहने पर समस्त प्राणियों के हित में तत्पर रहने वाले रघुकुलनन्दन श्रीराम ने इन शुभ वचनों के द्वारा उन्हें उत्तर दिया- ॥२३॥
भगवन्नित आसन्नः पौरजानपदो जनः।
सुदर्शमिह मां प्रेक्ष्य मन्येऽहमिममाश्रमम्॥२४॥
आगमिष्यति वैदेहीं मां चापि प्रेक्षको जनः।
अनेन कारणेनाहमिह वासं न रोचये॥२५॥
‘भगवन्! मेरे नगर और जनपद के लोग यहाँ से बहुत निकट पड़ते हैं, अतः मैं समझता हूँ कि यहाँ मुझसे मिलना सुगम समझकर लोग इस आश्रम पर मुझे और सीता को देखने के लिये प्रायः आते-जाते रहेंगे; इस कारण यहाँ निवास करना मुझे ठीक नहीं जान पड़ता॥
एकान्ते पश्य भगवन्नाश्रमस्थानमुत्तमम्।
रमते यत्र वैदेही सुखार्दा जनकात्मजा॥२६॥
‘भगवन! किसी एकान्त प्रदेश में आश्रम के योग्य उत्तम स्थान देखिये (सोचकर बताइये), जहाँ सुख भोगने के योग्य विदेहराजकुमारी जानकी प्रसन्नतापूर्वक रह सकें’॥ २६॥
एतच्छ्रुत्वा शुभं वाक्यं भरद्वाजो महामुनिः।
राघवस्य तु तद् वाक्यमर्थग्राहकमब्रवीत्॥२७॥
श्रीरामचन्द्रजी का यह शुभ वचन सुनकर महामुनि भरद्वाजजी ने उनके उक्त उद्देश्य की सिद्धि का बोध कराने वाली बात कही— ॥२७॥
दशक्रोश इतस्तात गिरिर्यस्मिन् निवत्स्यसि।
महर्षिसेवितः पुण्यः पर्वतः शुभदर्शनः॥ २८॥
‘तात! यहाँ से दस कोस (अन्य व्याख्या के अनुसार ३० कोस)* की दूरी पर एक सुन्दर और महर्षियों द्वारा सेवित परम पवित्र पर्वत है, जिस पर तुम्हें निवास करना होगा॥ २८॥
* रामायणशिरोमणिकार दस कोस का अर्थ तीस कोस करते हैं और ‘दश च दश च दश च’ ऐसी व्युत्पत्ति करके एक शेष के नियमानुसार एक ही दश का प्रयोग होने पर भी उसे ३० संख्या का बोधक मानते हैं। प्रयाग से चित्रकूट की दूरी लगभग २८ कोस मानी जाती है, जो उपर्युक्त संख्या से मिलती-जुलती ही है। आधुनिक माप के अनुसार प्रयाग से चित्रकूट ८० मील है। इस हिसाब से चालीस कोस की दूरी हुई। परंतु पहले का क्रोशमान आधुनिक मान से कुछ बड़ा रहा होगा, तभी यह अन्तर है।
गोलाङ्गलानुचरितो वानरर्भनिषेवितः।
चित्रकूट इति ख्यातो गन्धमादनसंनिभः॥२९॥
‘उस पर बहुत-से लंगूर विचरते रहते हैं। वहाँ वानर और रीछ भी निवास करते हैं। वह पर्वत चित्रकूट नाम से विख्यात है और गन्धमादन के समान मनोहरहै॥२९॥
यावता चित्रकूटस्य नरः शृङ्गाण्यवेक्षते।
कल्याणानि समाधत्ते न पापे कुरुते मनः॥३०॥
‘जब मनुष्य चित्रकूट के शिखरों का दर्शन कर लेता है, तब कल्याणकारी पुण्य कर्मों का फल पा लेता है और कभी पाप में मन नहीं लगाता है॥३०॥
ऋषयस्तत्र बहवो विहृत्य शरदां शतम्।
तपसा दिवमारूढाः कपालशिरसा सह ॥३१॥
वहाँ बहुत-से ऋषि, जिनके सिर के बाल वृद्धावस्था के कारण खोपड़ी की भाँति सफेद हो गये थे, तपस्या द्वारा सैकड़ों वर्षों तक क्रीड़ा करके स्वर्गलोक को चले गये हैं।
प्रविविक्तमहं मन्ये तं वासं भवतः सुखम्।
इह वा वनवासाय वस राम मया सह ॥ ३२॥
‘उसी पर्वत को मैं तुम्हारे लिये एकान्तवास के योग्य और सुखद मानता हूँ अथवा श्रीराम! तुम वनवास के उद्देश्य से मेरे साथ इस आश्रम पर ही रहो’ ॥ ३२ ॥
स रामं सर्वकामैस्तं भरद्वाजः प्रियातिथिम्।
सभार्यं सह च भ्रात्रा प्रतिजग्राह हर्षयन्॥३३॥
ऐसा कहकर भरद्वाजजी ने पत्नी और भ्रातासहित प्रिय अतिथि श्रीराम का हर्ष बढ़ाते हुए सब प्रकार की मनोवाञ्छित वस्तुओं द्वारा उन सबका आतिथ्य सत्कार किया॥ ३३॥
तस्य प्रयागे रामस्य तं महर्षिमुपेयुषः।
प्रपन्ना रजनी पुण्या चित्राः कथयतः कथाः॥ ३४॥
प्रयाग में श्रीरामचन्द्रजी महर्षि के पास बैठकर विचित्र बातें करते रहे, इतने में ही पुण्यमयी रात्रि का आगमन हुआ॥ ३४॥
सीतातृतीयः काकुत्स्थः परिश्रान्तः सुखोचितः।
भरद्वाजाश्रमे रम्ये तां रात्रिमवसत् सुखम्॥३५॥
वे सुख भोगने योग्य होने पर भी परिश्रम से बहुत थक गये थे, इसलिये भरद्वाज मुनि के उस मनोहर आश्रम में श्रीराम ने लक्ष्मण और सीता के साथ सुखपूर्वक वह रात्रि व्यतीत की॥ ३५ ॥
प्रभातायां तु शर्वर्यां भरद्वाजमुपागमत्।
उवाच नरशार्दूलो मुनिं ज्वलिततेजसम्॥३६॥
तदनन्तर जब रात बीती और प्रातःकाल हुआ, तब पुरुषसिंह श्रीराम प्रज्वलित तेज वाले भरद्वाज मुनि के पास गये और बोले- ॥ ३६॥
शर्वरीं भगवन्नद्य सत्यशील तवाश्रमे।
उषिताः स्मोऽह वसतिमनुजानातु नो भवान्॥ ३७॥
‘भगवन्! आप स्वभावतः सत्य बोलने वाले हैं। आज हमलोगों ने आपके आश्रम में बड़े आराम से रात बितायी है, अब आप हमें आगे के गन्तव्य-स्थान पर जाने के लिये आज्ञा प्रदान करें’॥ ३७॥
रात्र्यां तु तस्यां व्युष्टायां भरद्वाजोऽब्रवीदिदम्।
मधुमूलफलोपेतं चित्रकूटं व्रजेति ह॥ ३८॥
वासमौपयिकं मन्ये तव राम महाबल।
रात बीतने और सबेरा होने पर श्रीराम के इस प्रकार पूछने पर भरद्वाजजी ने कहा–’महाबली श्रीराम! तुम मधुर फल-मूल से सम्पन्न चित्रकूट पर्वत पर जाओ। मैं उसी को तुम्हारे लिये उपयुक्त निवास स्थान मानता हु॥
नानानगगणोपेतः किन्नरोरगसेवितः॥ ३९॥
मयूरनादाभिरतो गजराजनिषेवितः।।
गम्यतां भवता शैलश्चित्रकूटः स विश्रुतः॥ ४०॥
‘वह सुविख्यात चित्रकूट पर्वत नाना प्रकार के वृक्षों से हरा-भरा है। वहाँ बहुत-से किन्नर और सर्प निवास करते हैं। मोरों के कलरवों से वह और भी रमणीय प्रतीत होता है। बहुत-से गजराज उस पर्वत का सेवन करते हैं तुम वहीं चले जाओ। ३९-४०॥
पुण्यश्च रमणीयश्च बहुमूलफलायुतः।
तत्र कुञ्जरयूथानि मृगयूथानि चैव हि ॥४१॥
विचरन्ति वनान्तेषु तानि द्रक्ष्यसि राघव।
सरित्प्रस्रवणप्रस्थान् दरीकन्दरनिर्झरान्।
चरतः सीतया सार्धं नन्दिष्यति मनस्तव॥४२॥
‘वह पर्वत परम पवित्र, रमणीय तथा बहुसंख्यक फल-मूलों से सम्पन्न है। वहाँ झुंड-के-झुंड हाथी और हिरन वन के भीतर विचरते रहते हैं। रघुनन्दन! तुम । उन सबको प्रत्यक्ष देखोगे। मन्दाकिनी नदी,
अनेकानेक जलस्रोत, पर्वतशिखर, गुफा, कन्दरा और झरने भी तुम्हारे देख नेमें आयेंगे। वह पर्वत सीता के साथ विचरते हुए तुम्हारे मन को आनन्द प्रदान करेगा॥ ४१-४२॥
प्रहृष्टकोयष्टिभकोकिलस्वनैविनोदयन्तं च सुखं परं शिवम्।
मृगैश्च मत्तैर्बहुभिश्च कुञ्जरैः सुरम्यमासाद्य समावसाश्रयम्॥४३॥
‘हर्ष में भरे हुए टिट्टिभ और कोकिलों के कलरवों द्वारा वह पर्वत यात्रियों का मनोरञ्जन-सा करता है। वह परम सुखद एवं कल्याणकारी है, मदमत्त मृगों और बहुसंख्यक मतवाले हाथियों ने उसकी रमणीयता को और बढ़ा दिया है तुम उसी पर्वत पर जाकर डेरा डालो और उसमें निवास करो’ । ४३॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतुःपञ्चाशः सर्गः॥ ५४॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में चौवनवाँ सर्ग पूरा हुआ।५४॥
सर्ग-55
उषित्वा रजनीं तत्र राजपुत्रावरिंदमौ।
महर्षिमभिवाद्याथ जग्मतुस्तं गिरिं प्रति॥१॥
उस आश्रम में रातभर रहकर शत्रुओं का दमन करने वाले वे दोनों राजकुमार महर्षि को प्रणाम करके चित्रकूट पर्वत पर जाने को उद्यत हुए॥१॥
तेषां स्वस्त्ययनं चैव महर्षिः स चकार ह।
प्रस्थितान् प्रेक्ष्य तांश्चैव पिता पुत्रानिवौरसान्॥ २॥
उन तीनों को प्रस्थान करते देख महर्षि ने उनके लिये उसी प्रकार स्वस्तिवाचन किया जैसे पिता अपने औरस पुत्रों को यात्रा करते देख उनके लिये मङ्गलसूचक आशीर्वाद देता है॥२॥
ततः प्रचक्रमे वक्तुं वचनं स महामुनिः।
भरद्वाजो महातेजा रामं सत्यपराक्रमम्॥३॥
तदनन्तर महातेजस्वी महामुनि भरद्वाज ने सत्य पराक्रमी श्रीराम से इस प्रकार कहना आरम्भ किया
गङ्गायमुनयोः संधिमासाद्य मनुजर्षभौ।
कालिन्दीमनुगच्छेतां नदी पश्चान्मुखाश्रिताम्॥ ४॥
‘नरश्रेष्ठ! तुम दोनों भाई गङ्गा और यमुना के संगम पर पहुँचकर जिनमें पश्चिममुखी होकर गङ्गा मिली हैं, उन महानदी यमुना के निकट जाना॥ ४॥
अथासाद्य तु कालिन्दी प्रतिस्रोतःसमागताम्।
तस्यास्तीर्थं प्रचरितं प्रकामं प्रेक्ष्य राघव।
तत्र यूयं प्लवं कृत्वा तरतांशुमती नदीम्॥५॥
‘रघुनन्दन! तदनन्तर गङ्गाजी के जल के वेग से अपने प्रवाह के प्रतिकूल दिशा में मुड़ी हुई यमुना के पास पहुँचकर लोगों के आने-जाने के कारण उनके पदचिह्नों से चिह्नित हुए अवतरण-प्रदेश (पार उतरने के लिये उपयोगी घाट) को अच्छी तरह देखभालकर वहाँ जाना और एक बेड़ा बनाकर उसी के द्वारा सूर्यकन्या यमुना के उस पार उतर जाना॥५॥
ततो न्यग्रोधमासाद्य महान्तं हरितच्छदम्।
परीतं बहुभिर्वृक्षः श्यामं सिद्धोपसेवितम्॥६॥
तस्मिन् सीताञ्जलिं कृत्वा प्रयुञ्जीताशिषां क्रियाम्।
समासाद्य च तं वृक्षं वसेद् वातिक्रमेत वा॥५॥
‘तत्पश्चात् आगे जाने पर एक बहुत बड़ा बरगद का वृक्ष मिलेगा, जिसके पत्ते हरे रंग के हैं। वह चारों ओर से बहुसंख्यक दूसरे वृक्षों द्वारा घिरा हुआ है। उस वृक्ष का नाम श्यामवट है। उसकी छाया के नीचे बहुत-से सिद्ध पुरुष निवास करते हैं। वहाँ पहुँचकर सीता दोनों हाथ जोड़कर उस वृक्ष से आशीर्वाद की याचना करें। यात्री की इच्छा हो तो उस वृक्ष के पास जाकर कुछ कालतक वहाँ निवास करे अथवा वहाँ से आगे बढ़ जाय॥६-७॥
क्रोशमात्रं ततो गत्वा नीलं प्रेक्ष्य च काननम्।
सल्लकीबदरीमिश्रं रम्यं वंशैश्च यामुनैः॥८॥
‘श्यामवट से एक कोस दूर जाने पर तुम्हें नीलवन का दर्शन होगा; वहाँ सल्लकी (चीड़) और बेर के भी पेड़ मिले हुए हैं। यमुना के तट पर उत्पन्न हुए बाँसों के कारण वह और भी रमणीय दिखायी देता है॥ ८॥
स पन्थाश्चित्रकूटस्य गतस्य बहुशो मया।
रम्यो मार्दवयुक्तश्च दावैश्चैव विवर्जितः॥९॥
‘यह वही स्थान है जहाँ से चित्रकूट को रास्ता जाता है। मैं उस मार्ग से कई बार गया हूँ। वहाँ की भूमि कोमल और दृश्य रमणीय है। उधर कभी दावानल का भय नहीं होता है’॥९॥
इति पन्थानमादिश्य महर्षिः संन्यवर्तत।
अभिवाद्य तथेत्युक्त्वा रामेण विनिवर्तितः॥ १०॥
इस प्रकार मार्ग बताकर जब महर्षि भरद्वाज लौटने लगे, तब श्रीराम ने ‘तथास्तु’ कहकर उनके चरणों में प्रणाम किया और कहा–’अब आप आश्रम को लौट जाइये’॥ १०॥
उपावृत्ते मुनौ तस्मिन् रामो लक्ष्मणमब्रवीत्।
कृतपुण्याः स्म भद्रं ते मुनिर्यन्नोऽनुकम्पते॥११॥
उन महर्षि के लौट जाने पर श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा —’सुमित्रानन्दन ! तुम्हारा कल्याण हो। ये मुनि हमारे ऊपर जो इतनी कृपा रखते हैं, इससे जान पड़ता है कि हमलोगों ने पहले कभी महान् पुण्य किया है’।
इति तौ पुरुषव्याघ्रौ मन्त्रयित्वा मनस्विनौ।
सीतामेवाग्रतः कृत्वा कालिन्दी जग्मतुर्नदीम्॥ १२॥
इस प्रकार बातचीत करते हुए वे दोनों मनस्वी पुरुषसिंह सीता को ही आगे करके यमुना नदी के तटपर गये॥ १२॥
अथासाद्य तु कालिन्दी शीघ्रस्रोतस्विनी नदीम।
चिन्तामापेदिरे सद्यो नदीजलतितीर्षवः॥१३॥
वहाँ कालिन्दी का स्रोत बड़ी तीव्रगति से प्रवाहित हो रहा था; वहाँ पहुँचकर वे इस चिन्ता में पड़े कि कैसे नदी को पार किया जाय; क्योंकि वे तुरंत ही यमुनाजी के जल को पार करना चाहते थे॥१३॥
तौ काष्ठसंघाटमथो चक्रतुः सुमहाप्लवम्।
शुष्कर्वंशैः समाकीर्णमुशीरैश्च समावृतम्॥१४॥
ततो वैतसशाखाश्च जम्बुशाखाश्च वीर्यवान्।
चकार लक्ष्मणश्छित्त्वा सीतायाः सुखमासनम्॥ १५॥
फिर उन दोनों भाइयों ने जंगल के सूखे काठ बटोरकर उन्हीं के द्वारा एक बहुत बड़ा बेड़ा तैयार किया। वह बेड़ा सूखे बाँसों से व्याप्त था और उसके ऊपर खस बिछाया गया था। तदनन्तर पराक्रमी लक्ष्मण ने बेंत और जामुन की टहनियों को काटकर सीता के बैठने के लिये एक सुखद आसन तैयार किया। १४-१५॥
तत्र श्रियमिवाचिन्त्यां रामो दाशरथिः प्रियाम्।
ईषत्स लज्जमानां तामध्यारोपयत प्लवम्॥१६॥
पार्श्वे तत्र च वैदेह्या वसने भूषणानि च।।
प्लवे कठिनकाजं च रामश्चक्रे समाहितः॥१७॥
दशरथनन्दन श्रीराम ने लक्ष्मी के समान अचिन्त्य ऐश्वर्यवाली अपनी प्रिया सीता को जो कुछ लज्जित सी हो रही थीं, उस बेड़े पर चढ़ा दिया और उनके बगल में वस्त्र एवं आभूषण रख दिये; फिर श्रीराम ने बड़ी सावधानी के साथ खन्ती (कुदारी) और बकरे के चमड़े से मढ़ी हुई पिटारी को भी बेड़ेपर ही रखा। १६-१७॥
आरोप्य सीतां प्रथमं संघाटं परिगृह्य तौ।
ततः प्रतेरतुर्यत्तौ प्रीतौ दशरथात्मजौ॥१८॥
इस प्रकार पहले सीता को चढ़ाकर वे दोनों भाई दशरथकुमार श्रीराम और लक्ष्मण उस बेड़े को पकड़कर खेने लगे। उन्होंने बड़े प्रयत्न और प्रसन्नता के साथ नदी को पार करना आरम्भ किया। १८॥
कालिन्दीमध्यमायाता सीता त्वेनामवन्दत।
स्वस्ति देवि तरामि त्वां पारयेन्मे पतिव्रतम्॥ १९॥
यमुना की बीच धारा में आनेपर सीता ने उन्हें प्रणाम किया और कहा–’देवि! इस बेड़े द्वारा मैं आपके पार जा रही हूँ। आप ऐसी कृपा करें, जिससे हमलोग सकुशल पार हो जायँ और मेरे पतिदेव अपनी वनवासविषयक प्रतिज्ञा को निर्विघ्न पूर्ण करें॥ १९॥
यक्ष्ये त्वां गोसहस्रेण सुराघटशतेन च।
स्वस्ति प्रत्यागते रामे पुरीमिक्ष्वाकुपालिताम्॥ २०॥
‘इक्ष्वाकुवंशी वीरों द्वारा पालित अयोध्यापुरी में श्रीरघुनाथजी के सकुशल लौट आने पर मैं आपके किनारे एक सहस्र गौओं का दान करूँगी और सैकड़ों देवदुर्लभ पदार्थ अर्पित करके आपकी पूजा सम्पन्न करूँगी’ ॥२०॥
कालिन्दीमथ सीता तु याचमाना कृताञ्जलिः।
तीरमेवाभिसम्प्राप्ता दक्षिणं वरवर्णिनी॥२१॥
इस प्रकार सुन्दरी सीता हाथ जोड़कर यमुनाजी से प्रार्थना कर रही थीं, इतने ही में वे दक्षिण तटपर जा पहुँचीं॥
ततः प्लवेनांशुमती शीघ्रगामूर्मिमालिनीम्।
तीरजैर्बहुभिर्वृक्षैः संतेरुर्यमुना नदीम्॥२२॥
इस तरह उन तीनों ने उसी बेड़े द्वारा बहुसंख्यक तटवर्ती वृक्षों से सुशोभित और तरङ्गमालाओं से अलंकृत शीघ्रगामिनी सूर्य-कन्या यमुना नदी को पार किया॥ २२॥
ते तीर्णाः प्लवमुत्सृज्य प्रस्थाय यमुनावनात्।
श्यामं न्यग्रोधमासेदुः शीतलं हरितच्छदम्॥२३॥
पार उतरकर उन्होंने बेड़े को तो वहीं तट पर छोड़ दिया और यमुना-तटवर्ती वन से प्रस्थान करके वे हरे हरे पत्तों से सुशोभित शीतल छाया वाले श्यामवट के पास जा पहुँचे।। २३॥
न्यग्रोधं समुपागम्य वैदेही चाभ्यवन्दत।
नमस्तेऽस्तु महावृक्ष पारयेन्मे पतिव्रतम्॥२४॥
वट के समीप पहुँचकर विदेहनन्दिनी सीता ने उसे मस्तक झुकाया और इस प्रकार कहा—’महावृक्ष! आपको नमस्कार है। आप ऐसी कृपा करें, जिससे मेरे पतिदेव अपने वनवास-विषयक व्रत को पूर्ण करें॥ २४॥
कौसल्यां चैव पश्येम सुमित्रां च यशस्विनीम्।
इति सीताञ्जलिं कृत्वा पर्यगच्छन्मनस्विनी॥ २५॥
‘तथा हमलोग वन से सकुशल लौटकर माता कौसल्या तथा यशस्विनी सुमित्रा देवी का दर्शन कर सकें।’ इस प्रकार कहकर मनस्विनी सीता ने हाथ जोड़े हुए उस वृक्ष की परिक्रमा की॥ २५ ॥
अवलोक्य ततः सीतामायाचन्तीमनिन्दिताम्।
दयितां च विधेयां च रामो लक्ष्मणमब्रवीत्॥ २६॥
सदा अपनी आज्ञा के अधीन रहने वाली प्राणप्यारी सती-साध्वी सीता को श्यामवट से आशीर्वाद की याचना करती देख श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा—॥ २६॥
सीतामादाय गच्छ त्वमग्रतो भरतानुज।
पृष्ठतोऽनुगमिष्यामि सायुधो द्विपदां वर ॥२७॥
‘भरत के छोटे भाई नरश्रेष्ठ लक्ष्मण! तुम सीता को साथ लेकर आगे-आगे चलो और मैं धनुष धारण किये पीछे से तुमलोगों की रक्षा करता हुआ चलूँगा। २७॥
यद् यत् फलं प्रार्थयते पुष्पं वा जनकात्मजा।
तत् तत् प्रयच्छ वैदेह्या यत्रास्या रमते मनः॥ २८॥
‘विदेहकुलनन्दिनी जनकदुलारी सीता जो-जो फल या फूल माँगें अथवा जिस वस्तु को पाकर इनका मन प्रसन्न रहे, वह सब इन्हें देते रहो’ ॥ २८॥
एकैकं पादपं गुल्मं लतां वा पुष्पशालिनीम्।
अदृष्टरूपां पश्यन्ती रामं पप्रच्छ साऽबला॥२९॥
अबला सीता एक-एक वृक्ष, झाड़ी अथवा पहले की न देखी हुई पुष्पशोभित लता को देखकर उसके विषय में श्रीरामचन्द्रजी से पूछती थीं॥ २९॥
रमणीयान् बहुविधान् पादपान् कुसुमोत्करान्।
सीतावचनसंरब्ध आनयामास लक्ष्मणः॥३०॥
तथा लक्ष्मण सीता के कथनानुसार तुरंत ही भाँतिभाँति के वृक्षों की मनोहर शाखाएँ और फूलों के गुच्छे ला-लाकर उन्हें देते थे॥३०॥
विचित्रवालुकजलां हंससारसनादिताम्।
रेमे जनकराजस्य सुता प्रेक्ष्य तदा नदीम्॥३१॥
उस समय जनकराजकिशोरी सीता विचित्र वालुका और जलराशि से सुशोभित तथा हंस और सारसों के कलनाद से मुखरित यमुना नदी को देखकर बहुत प्रसन्न होती थीं॥३१॥
क्रोशमात्रं ततो गत्वा भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ।
बहून् मेध्यान् मृगान् हत्वा चेरतुर्यमुनावने ॥३२॥
इस तरह एक कोस की यात्रा करके दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण (प्राणियों के हित के लिये) मार्ग में मिले हुए हिंसक पशुओं का वध करते हुए यमुनातटवर्ती वन में विचरने लगे॥ ३२॥
विहृत्य ते बर्हिणपूगनादिते शुभे वने वारणवानरायुते।
समं नदीवप्रमुपेत्य सत्वरं निवासमाजग्मुरदीनदर्शनाः॥३३॥
उदार दृष्टिवाले वे सीता, लक्ष्मण और श्रीराम मोरों के झुंडों की मीठी बोली से गूंजते तथा हाथियों और वानरों से भरे हुए उस सुन्दर वन में घूम-फिरकर शीघ्र ही यमुनानदी के समतल तटपर आ गये और रात में उन्होंने वहीं निवास किया॥ ३३॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चपञ्चाशः सर्गः॥५५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में पचपनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५५॥
सर्ग-56
अथ रात्र्यां व्यातीतायामवसुप्तमनन्तरम्।
प्रबोधयामास शनैर्लक्ष्मणं रघुपुङ्गवः॥१॥
तदनन्तर रात्रि व्यतीत होने पर रघुकुल-शिरोमणि श्रीराम ने अपने जागने के बाद वहाँ सोये हुए लक्ष्मण को धीरे से जगाया (और इस प्रकार कहा -)॥१॥
सौमित्रे शृणु वन्यानां वल्गु व्याहरतां स्वनम्।
सम्प्रतिष्ठामहे कालः प्रस्थानस्य परंतप॥२॥
‘शत्रुओं को संताप देने वाले सुमित्राकुमार! मीठी बोली बोलने वाले शुक-पिक आदि जंगली पक्षियों का कलरव सुनो। अब हमलोग यहाँ से प्रस्थान करें; क्योंकि प्रस्थान के योग्य समय आ गया है’ ॥ २॥
प्रसुप्तस्तु ततो भ्रात्रा समये प्रतिबोधितः।
जहौ निद्रां च तन्द्रां च प्रसक्तं च परिश्रमम्॥३॥
सोये हुए लक्ष्मण ने अपने बड़े भाई द्वारा ठीक समय पर जगा दिये जाने पर निद्रा, आलस्य तथा राह चलने की थकावट को दूर कर दिया॥३॥
तत उत्थाय ते सर्वे स्पृष्ट्वा नद्याः शिवं जलम्।
पन्थानमृषिभिर्जुष्टं चित्रकूटस्य तं ययुः॥४॥
फिर सब लोग उठे और यमुना नदी के शीतल जल में स्नान आदि करके ऋषि-मुनियों द्वारा सेवित चित्रकूट के उस मार्ग पर चल दिये॥४॥
ततः सम्प्रस्थितः काले रामः सौमित्रिणा सह।
सीतां कमलपत्राक्षीमिदं वचनमब्रवीत्॥५॥
उस समय लक्ष्मण के साथ वहाँ से प्रस्थित हुए श्रीराम ने कमलनयनी सीता से इस प्रकार कहा-॥
आदीप्तानिव वैदेहि सर्वतः पुष्पितान् नगान्।
स्वैः पुष्पैः किंशुकान् पश्य मालिनः शिशिरात्यये॥६॥
‘विदेहराजनन्दिनी! इस वसन्त-ऋतु में सब ओर से खिले हुए इन पलाश-वृक्षों को तो देखो। ये अपने ही पुष्पों से पुष्पमालाधारी-से प्रतीत होते हैं और उन फूलों की अरुण प्रभा के कारण प्रज्वलित होते-से दिखायी देते हैं॥६॥
पश्य भल्लातकान् बिल्वान् नरैरनुपसेवितान्।
फलपुष्पैरवनतान् नूनं शक्ष्याम जीवितुम्॥७॥
‘देखो, ये भिलावे और बेल के पेड़ अपने फूलों और फलों के भार से झुके हुए हैं। दूसरे मनुष्यों का यहाँ तक आना सम्भव न होने से ये उनके द्वारा उपयोग में नहीं लाये गये हैं; अतः निश्चय ही इन फलों से हम जीवन निर्वाह कर सकेंगे’ ॥७॥
पश्य द्रोणप्रमाणानि लम्बमानानि लक्ष्मण।
मधूनि मधुकारीभिः सम्भृतानि नगे नगे॥८॥
(फिर लक्ष्मण से कहा-) लक्ष्मण! देखो, यहाँ के एक-एक वृक्ष में मधुमक्खियों द्वारा लगाये और पुष्ट किये गये मधु के छत्ते कैसे लटक रहे हैं। इन सब में एक-एक द्रोण (लगभग सोलह सेर) मधु भरा हुआ है॥८॥
एष क्रोशति नत्यूहस्तं शिखी प्रतिकूजति।
रमणीये वनोद्देशे पुष्पसंस्तरसंकटे॥९॥
‘वन का यह भाग बड़ा ही रमणीय है, यहाँ फूलों की वर्षा-सी हो रही है और सारी भूमि पुष्पों से आच्छादित दिखायी देती है। इस वनप्रान्त में यह चातक ‘पी कहाँ’ ‘पी कहाँ’ की रट लगा रहा है। उधर वह मोर बोल रहा है, मानो पपीहे की बात का उत्तर दे रहा हो॥९॥
मातङ्गयूथानुसृतं पक्षिसंघानुनादितम्।
चित्रकूटमिमं पश्य प्रवृद्धशिखरं गिरिम्॥१०॥
‘यह रहा चित्रकूट पर्वत—इसका शिखर बहुत ऊँचा है। झुंड-के-झुंड हाथी उसी ओर जा रहे हैं और वहाँ बहुत-से पक्षी चहक रहे हैं॥१०॥
समभूमितले रम्ये द्रुमैर्बहुभिरावृते।
पुण्ये रंस्यामहे तात चित्रकूटस्य कानने॥११॥
‘तात! जहाँ की भूमि समतल है और जो बहुत-से वृक्षों से भरा हुआ है, चित्रकूट के उस पवित्र कानन में हमलोग बड़े आनन्द से विचरेंगे’ ॥ ११॥
ततस्तौ पादचारेण गच्छन्तौ सह सीतया।
रम्यमासेदतुः शैलं चित्रकूटं मनोरमम्॥१२॥
सीता के साथ दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण पैदल ही यात्रा करते हुए यथासमय रमणीय एवं मनोरम पर्वत चित्रकूट पर जा पहुँचे॥ १२॥
तं तु पर्वतमासाद्य नानापक्षिगणायुतम्।
बहुमूलफलं रम्यं सम्पन्नसरसोदकम्॥१३॥
वह पर्वत नाना प्रकार के पक्षियों से परिपूर्ण था। वहाँ फल-मूलों की बहतायत थी और स्वादिष्ट जल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होता था। उस रमणीय शैल के समीप जाकर श्रीराम ने कहा- ॥१३॥
मनोज्ञोऽयं गिरिः सौम्य नानाद्रुमलतायुतः।
बहुमूलफलो रम्यः स्वाजीवः प्रतिभाति मे॥ १४॥
‘सौम्य! यह पर्वत बड़ा मनोहर है नाना प्रकार के वृक्ष और लताएँ इसकी शोभा बढ़ाती हैं। यहाँ फलमूल भी बहुत हैं; यह रमणीय तो है ही मुझे जान पड़ता है कि यहाँ बड़े सुख से जीवन-निर्वाह हो सकता है॥ १४॥
मुनयश्च महात्मानो वसन्त्यस्मिन् शिलोच्चये।
अयं वासो भवेत् तात वयमत्र वसेमहि ॥१५॥
‘इस पर्वत पर बहुत-से महात्मा मुनि निवास करते हैं। तात! यही हमारा वासस्थान होने योग्य है। हम यहीं निवास करेंगे’ ॥ १५ ॥
इति सीता च रामश्च लक्ष्मणश्च कृताञ्जलिः।
अभिगम्याश्रमं सर्वे वाल्मीकिमभिवादयन्॥
ऐसा निश्चय करके सीता, श्रीराम और लक्ष्मण ने हाथ जोड़कर महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में प्रवेश किया और सबने उनके चरणों में मस्तक झुकाया। १६॥
तान् महर्षिः प्रमुदितः पूजयामास धर्मवित्।
आस्यतामिति चोवाच स्वागतं तं निवेद्य च। १७॥
धर्म को जानने वाले महर्षि उनके आगमन से बहुत प्रसन्न हुए और ‘आप लोगोंका स्वागत है आइये,बैठिये।’ ऐसा कहते हुए उन्होंने उनका आदर सत्कार किया॥१७॥
ततोऽब्रवीन्महाबाहुर्लक्ष्मणं लक्ष्मणाग्रजः।
संनिवेद्य यथान्यायमात्मानमृषये प्रभुः॥१८॥
तदनन्तर महाबाहु भगवान् श्रीराम ने महर्षि को अपना यथोचित परिचय दिया और लक्ष्मण से कहा – ॥१८॥
लक्ष्मणानय दारूणि दृढानि च वराणि च।
कुरुष्वावसथं सौम्य वासे मेऽभिरतं मनः॥१९॥
‘सौम्य लक्ष्मण! तुम जंगल से अच्छी-अच्छी मजबूत लकड़ियाँ ले आओ और रहने के लिये एक कुटी तैयार करो। यहीं निवास करने को मेरा जी चाहता है’ ॥ १९॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा सौमित्रिर्विविधान् द्रुमान्।
आजहार ततश्चक्रे पर्णशालामरिंदमः॥ २०॥
श्रीराम की यह बात सुनकर शत्रुदमन लक्ष्मण अनेक प्रकार के वृक्षों की डालियाँ काट लाये और उनके द्वारा एक पर्णशाला तैयार की॥ २० ॥
तां निष्ठितां बद्धकटां दृष्ट्वा रामः सुदर्शनाम्।
शुश्रूषमाणमेकाग्रमिदं वचनमब्रवीत्॥२१॥
वह कुटी बाहर-भीतर से लकड़ी की ही दीवार से सुस्थिर बनायी गयी थी और उसे ऊपरसे छा दिया गया था, जिससे वर्षा आदि का निवारण हो। वह देखने में बड़ी सुन्दर लगती थी। उसे तैयार हुई देखकर एकाग्रचित्त होकर अपनी बात सुनने वाले लक्ष्मण से श्रीराम ने इस प्रकार कहा— ॥२१॥
ऐणेयं मांसमाहृत्य शालां यक्ष्यामहे वयम्।
कर्तव्यं वास्तुशमनं सौमित्रे चिरजीविभिः॥२२॥
‘सुमित्राकुमार! हम गजकन्द का गूदा लेकर उसी से पर्णशाला के अधिष्ठाता देवताओं का पूजन करेंगे;* क्योंकि दीर्घ जीवन की इच्छा करने वाले पुरुषों को वास्तुशान्ति अवश्य करनी चाहिये॥ २२ ॥
* यहाँ ‘ऐणेयं मांसम्’ का अर्थ है-गजकन्द नामक कन्द विशेष का गूदा। इस प्रसंग में मांस परक अर्थ नहीं लेना चाहिये; क्योंकि ऐसा अर्थ लेने पर ‘हित्वा मुनिवदामिषम्’ (२। २० । २९), ‘फलानि मूलानि च भक्षयन् वने’ (२। ३४। ५९) तथा ‘धर्ममेवाचरिष्यामस्तत्र मूलफलाशनाः’ (२। ५४। १६) इत्यादि रूप से की हुई श्रीराम की प्रतिज्ञाओं से विरोध पड़ेगा। इन वचनों में निरामिष रहने और फल-मूल खाकर धर्माचरण करने की ही बात कही गयी है। ‘रामो द्विर्नाभिभाषते’ (श्रीराम दो तरह की बात नहीं कहते हैं, एक बार जो कह दिया, वह अटल है) इस कथन के अनुसार श्रीराम की प्रतिज्ञा टलने वाली नहीं है।
मृगं हत्वाऽऽनय क्षिप्रं लक्ष्मणेह शुभेक्षण।
कर्तव्यः शास्त्रदृष्टो हि विधिर्धर्ममनुस्मर ॥२३॥
‘कल्याणदर्शी लक्ष्मण! तुम ‘गजकन्द’ नामक कन्द को* उखाड़कर या खोदकर शीघ्र यहाँ ले आओ; क्योंकि शास्त्रोक्त विधि का अनुष्ठान हमारे लिये अवश्य-कर्तव्य है। तुम धर्म का ही सदा चिन्तन किया करो’ ॥ २३॥
* मदनपाल-निघण्टुके अनुसार ‘मृग’ का अर्थ गजकन्द है।
भ्रातुर्वचनमाज्ञाय लक्ष्मणः परवीरहा।
चकार च यथोक्तं हि तं रामः पुनरब्रवीत्॥२४॥
भाई की इस बात को समझकर शत्रुवीरों का वध करने वाले लक्ष्मण ने उनके कथनानुसार कार्य किया। तब श्रीराम ने पुनः उनसे कहा- ॥२४॥
ऐणेयं श्रपयस्वैतच्छालां यक्ष्यामहे वयम्।
त्वर सौम्यमुहूर्तोऽयं ध्रुवश्च दिवसो ह्ययम्॥ २५॥
‘लक्ष्मण! इस गजकन्द को पकाओ। हम पर्णशाला के अधिष्ठाता देवताओं का पूजन करेंगे। जल्दी करो यह सौम्यमुहूर्त है और यह दिन भी ‘ध्रुव’* संज्ञक है (अतः इसी में यह शुभ कार्य होना चाहिये)’ ॥ २५॥
* ‘उत्तरात्रयरोहिण्यो भास्करश्च ध्रुवं स्थिरम्।’ (मुहूर्तचिन्तामणि)
अर्थात तीनों उत्तरा और रोहिणी नक्षत्र तथा रविवार—ये ‘ध्रुव’ एवं ‘स्थिर’ संज्ञक हैं। इसमें गृहशान्ति या वास्तुशान्ति आदि कार्य अच्छे माने गये हैं।
स लक्ष्मणः कृष्णमृगं हत्वा मेध्यं प्रतापवान्।
अथ चिक्षेप सौमित्रिः समिद्धे जातवेदसि ॥२६॥
प्रतापी सुमित्राकुमार लक्ष्मण ने पवित्र और काले छिलके वाले गजकन्द को उखाड़कर प्रज्वलित आग में डाल दिया॥ २६॥
तत् तु पक्वं समाज्ञाय निष्टप्तं छिन्नशोणितम्।
लक्ष्मणः पुरुषव्याघ्रमथ राघवमब्रवीत्॥२७॥
रक्तविकार का नाश करनेवाले* उस गजकंद को भलीभाँति पका हुआ जानकर लक्ष्मण ने पुरुषसिंह श्रीरघुनाथजी से कहा- ॥२७॥
* ‘छिन्नशोणितम्’ की व्युत्पत्ति इस प्रकार है-‘छिन्नं शोणितं रक्तविकाररूपं रोगजातं येन सः तम्।’ ‘गजकन्द’ रोगविकारका नाशक है’ यह वैद्यक में प्रसिद्ध है। मदनपालनिघण्टुके ‘षड्दोषादिकुष्ठहन्ता’ आदि वचन से भी यह चर्मदोष तथा कुष्ठ आदि रक्तविकार का नाशक सिद्ध होता है।
अयं सर्वः समस्ताङ्गः शृतः कृष्णमृगो मया।
देवता देवसंकाश यजस्व कुशलो ह्यसि॥२८॥
‘देवोपम तेजस्वी श्रीरघुनाथजी! यह काले छिलके वाला गजकन्द, जो बिगड़े हुए सभी अङ्गों को ठीक करनेवाला है,* मेरे द्वारा सम्पूर्णतः पका दिया गया है। अब आप वास्तुदेवताओं का यजन कीजिये; क्योंकि आप इस कर्म में कुशल हैं।॥ २८॥
* ‘समस्ताङ्गः’ की व्युत्पत्ति यों समझनी चाहिये—’सम्यग् भवन्ति अस्तानि अङ्गानि येन सः।’
रामः स्नात्वा तु नियतो गुणवाञ्जपकोविदः।
संग्रहेणाकरोत् सर्वान् मन्त्रान् सत्रावसानिकान्॥ २९॥
सद्गुणसम्पन्न तथा जपकर्म के ज्ञाता श्रीरामचन्द्रजी ने स्नान करके शौच-संतोषादि नियमों के पालनपूर्वक संक्षेप से उन सभी मन्त्रों का पाठ एवं जप किया, जिनसे वास्तुयज्ञ की पूर्ति हो जाती है।॥ २९॥
इष्ट्वा देवगणान् सर्वान् विवेशावसथं शुचिः।
बभूव च मनोह्लादो रामस्यामिततेजसः ॥ ३०॥
समस्त देवताओं का पूजन करके पवित्र भाव से श्रीराम ने पर्णकुटी में प्रवेश किया। उस समय अमिततेजस्वी श्रीराम के मन में बड़ा आह्लाद हुआ॥ ३० ॥
वैश्वदेवबलिं कृत्वा रौद्रं वैष्णवमेव च।
वास्तुसंशमनीयानि मङ्गलानि प्रवर्तयन्॥३१॥
तत्पश्चात् बलिवैश्वदेव कर्म, रुद्रयाग तथा वैष्णवयाग करके श्रीराम ने वास्तुदोष की शान्ति के लिये मङ्गलपाठ किया॥ ३१॥
जपं च न्यायतः कृत्वा स्नात्वा नद्यां यथाविधि।
पापसंशमनं रामश्चकार बलिमुत्तमम्॥३२॥
नदी में विधिपूर्वक स्नान करके न्यायतः गायत्री आदि मन्त्रों का जप करने के अनन्तर श्रीराम ने पञ्चसूना आदि दोषों की शान्ति के लिये उत्तम बलिकर्म सम्पन्न किया॥ ३२॥
वेदिस्थलविधानानि चैत्यान्यायतनानि च।
आश्रमस्यानुरूपाणि स्थापयामास राघवः॥३३॥
रघुनाथजी ने अपनी छोटी-सी कुटी के अनुरूप ही वेदिस्थलों (आठ दिक्पालों के लिये बलि-समर्पण के स्थानों), चैत्यों (गणेश आदि के स्थानों) तथा आयतनों (विष्णु आदि देवों के स्थानों) का निर्माण एवं स्थापना की॥ ३३॥
तां वृक्षपर्णच्छदनां मनोज्ञां यथाप्रदेशं सुकृतां निवाताम्।
वासाय सर्वे विविशुः समेताः सभां यथा देवगणाः सुधर्माम्॥३४॥
वह मनोहर कुटी उपयुक्त स्थान पर बनी थी। उसे वृक्षों के पत्तों से छाया गया था और उसके भीतर प्रचण्ड वायु से बचने का पूरा प्रबन्ध था। सीता, लक्ष्मण और श्रीराम सबने एक साथ उसमें निवास के लिये प्रवेश किया। ठीक वैसे ही, जैसे देवतालोग सुधर्मा सभा में प्रवेश करते हैं। ३४॥
सुरम्यमासाद्य तु चित्रकूटं नदीं च तां माल्यवती सुतीर्थाम्।
ननन्द हृष्टो मृगपक्षिजुष्टां जहौ च दुःखं पुरविप्रवासात्॥ ३५॥
चित्रकूट पर्वत बड़ा ही रमणीय था। वहाँ उत्तमतीर्थों (तीर्थस्थान, सीढ़ी और घाटों) से सुशोभित माल्यवती (मन्दाकिनी) नदी बह रही थी, जिसका बहुत-से पशुपक्षी सेवन करते थे। उस पर्वत
और नदी का सांनिध्य पाकर श्रीरामचन्द्रजी को बड़ा हर्ष और आनन्द हुआ। वे नगर से दूर वन में आने के कारण होने वाले कष्ट को भूल गये॥ ३५ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे षट्पञ्चाशः सर्गः॥५६॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में छप्पनवाँ सर्ग पूरा हुआ। ५६॥
सर्ग-57
कथयित्वा तु दुःखार्तः सुमन्त्रेण चिरं सह।
रामे दक्षिणकूलस्थे जगाम स्वगृहं गुहः॥१॥
इधर, जब श्रीराम गङ्गा के दक्षिण तट पर उतर गये, तब गुह दुःख से व्याकुल हो सुमन्त्र के साथ बड़ी देरतक बातचीत करता रहा। इसके बाद वह सुमन्त्र को साथ ले अपने घर को चला गया॥१॥
भरद्वाजाभिगमनं प्रयागे च सभाजनम्।
आ गिरेर्गमनं तेषां तत्रस्थैरभिलक्षितम्॥२॥
श्रीरामचन्द्रजी का प्रयाग में भरद्वाज के आश्रम पर जाना, मुनि के द्वारा सत्कार पाना तथा चित्रकूट पर्वत पर पहुँचना—ये सब वृत्तान्त शृङ्गवेर के निवासी गुप्तचरों ने देखे और लौटकर गुह को इन बातों से अवगत कराया॥२॥
अनुज्ञातः सुमन्त्रोऽथ योजयित्वा हयोत्तमान्।
अयोध्यामेव नगरी प्रययौ गाढदुर्मनाः॥३॥
इन सब बातों को जानकर सुमन्त्र गुह से विदा ले अपने उत्तम घोड़ों को रथ में जोतकर अयोध्या की ओर ही लौट पड़े। उस समय उनके मन में बड़ा दुःख हो रहा था॥
स वनानि सुगन्धीनि सरितश्च सरांसि च।
पश्यन् यत्तो ययौ शीघ्रं ग्रामाणि नगराणि च॥ ४॥
वे मार्ग में सुगन्धित वनों, नदियों, सरोवरों, गाँवों और नगरों को देखते हुए बड़ी सावधानी के साथ शीघ्रतापूर्वक जा रहे थे॥४॥
ततः सायाह्नसमये द्वितीयेऽहनि सारथिः।
अयोध्यां समनुप्राप्य निरानन्दां ददर्श ह॥५॥
शृङ्गवेरपुर से लौटने के दूसरे दिन सायंकाल में अयोध्या पहुँचकर उन्होंने देखा, सारी पुरी आनन्दशून्य हो गयी है॥५॥
स शून्यामिव निःशब्दां दृष्ट्वा परमदुर्मनाः।
सुमन्त्रश्चिन्तयामास शोकवेगसमाहतः॥६॥
वहाँ कहीं एक शब्द भी सुनायी नहीं देता था। सारी पुरी ऐसी नीरव थी, मानो मनुष्यों से सूनी हो गयी हो। अयोध्या की ऐसी दशा देखकर सुमन्त्र के मन में बड़ा दुःख हुआ। वे शोक के वेग से पीड़ित हो इस प्रकार चिन्ता करने लगे- ॥६॥
कच्चिन्न सगजा साश्वा सजना सजनाधिपा।
रामसंतापदुःखेन दग्धा शोकाग्निना पुरी॥७॥
‘कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि श्रीराम के विरहजनित संताप के दुःख से व्यथित हो हाथी, घोड़े, मनुष्य और महाराजसहित सारी अयोध्यापुरी शोकाग्नि से दग्ध हो गयी हो ॥ ७॥
इति चिन्तापरः सूतो वाजिभिः शीघ्रयायिभिः।
नगरद्वारमासाद्य त्वरितः प्रविवेश ह॥८॥
इसी चिन्ता में पड़े हुए सारथि सुमन्त्र ने शीघ्रगामी घोड़ों द्वारा नगर द्वार पर पहुँचकर तुरंत ही पुरी के भीतर प्रवेश किया।॥ ८॥
सुमन्त्रमभिधावन्तः शतशोऽथ सहस्रशः।
क्व राम इति पृच्छन्तः सूतमभ्यद्रवन् नराः॥९॥
सुमन्त्र को देखकर सैकड़ों और हजारों पुरवासी मनुष्य दौड़े आये और ‘श्रीराम कहाँ हैं?’ यह पूछते हुए उनके रथ के साथ-साथ दौड़ने लगे॥९॥
तेषां शशंस गङ्गायामहमापृच्छ्य राघवम्।
अनुज्ञातो निवृत्तोऽस्मि धार्मिकेण महात्मना॥ १०॥
ते तीर्णा इति विज्ञाय बाष्पपूर्णमुखा नराः।
अहो धिगिति निःश्वस्य हा रामेति विचुक्रुशुः॥ ११॥
उस समय सुमन्त्र ने उन लोगों से कहा—’सज्जनो! मैं गङ्गाजी के किनारे तक श्रीरघुनाथजी के साथ गया था। वहाँ से उन धर्मनिष्ठ महात्मा ने मुझे लौट जाने की आज्ञा दी। अतः मैं उनसे बिदा लेकर यहाँ लौट आया हूँ। वे तीनों व्यक्ति गङ्गा के उस पार चले गये’ यह जानकर सब लोगों के मुख पर आँसुओं की धाराएँ बह चलीं। ‘अहो! हमें धिक्कार है।’ ऐसा कहकर वे लंबी साँसें खींचते और ‘हा राम!’ की पुकार मचाते हुए जोर-जोर से करुणक्रन्दन करने लगे। १०-११॥
शुश्राव च वचस्तेषां वृन्दं वृन्दं च तिष्ठताम्।
हताः स्म खलु ये नेह पश्याम इति राघवम्॥ १२॥
सुमन्त्र ने उनकी बातें सुनीं। वे झुंड-के-झुंड खड़े होकर कह रहे थे—’हाय! निश्चय ही हमलोग मारे गये; क्योंकि अब हम यहाँ श्रीरामचन्द्रजी को नहीं देख पायेंगे॥ १२॥
दानयज्ञविवाहेषु समाजेषु महत्सु च।
न द्रक्ष्यामः पुनर्जातु धार्मिकं राममन्तरा॥१३॥
‘दान, यज्ञ, विवाह तथा बड़े-बड़े सामाजिक उत्सवों के समय अब हम कभी धर्मात्मा श्रीराम को अपने बीच में खड़ा हुआ नहीं देख सकेंगे॥ १३॥
किं समर्थं जनस्यास्य किं प्रियं किं सुखावहम्।
इति रामेण नगरं पित्रेव परिपालितम्॥१४॥
‘अमुक पुरुष के लिये कौन-सी वस्तु उपयोगी है? क्या करने से उसका प्रिय होगा? और कैसे किसकिस वस्तु से उसे सुख मिलेगा, इत्यादि बातों का विचार करते हुए श्रीरामचन्द्रजी पिता की भाँति इस नगर का पालन करते थे’॥ १४॥
वातायनगतानां च स्त्रीणामन्वन्तरापणम्।
राममेवाभितप्तानां शुश्राव परिदेवनाम्॥१५॥
बाजार के बीच से निकलते समय सारथि के कानों में स्त्रियों के रोने की आवाज सुनायी दी, जो महलों की खिड़कियों में बैठकर श्रीराम के लिये ही संतप्त हो विलाप कर रहीं थीं॥ १५॥
स राजमार्गमध्येन सुमन्त्रः पिहिताननः।
यत्र राजा दशरथस्तदेवोपययौ गृहम्॥१६॥
राजमार्ग के बीच से जाते हुए सुमन्त्र ने कपड़े से अपना मुँह ढक लिया। वे रथ लेकर उसी भवन की ओर गये, जहाँ राजा दशरथ मौजूद थे॥ १६ ।।
सोऽवतीर्य रथाच्छीघ्रं राजवेश्म प्रविश्य च।
कक्ष्याः सप्ताभिचक्राम महाजनसमाकुलाः॥ १७॥
राजमहल के पास पहुँचकर वे शीघ्र ही रथ से उतर पड़े और भीतर प्रवेश करके बहुत-से मनुष्यों से भरी हुई सात ड्योढ़ियों को पार कर गये॥१७॥
हम्यैर्विमानैः प्रासादैरवेक्ष्याथ समागतम्।
हाहाकारकृता नार्यो रामादर्शनकर्शिताः॥१८॥
धनियों की अट्टालिकाओं, सतमंजिले मकानों तथा राजभवनों में बैठी हुईं स्त्रियाँ सुमन्त्र को लौटा हुआ देख श्रीराम के दर्शन से वञ्चित होने के दुःख से दुर्बल हो हाहाकर कर उठीं ॥ १८॥
आयतैर्विमलैनॆत्रैरश्रुवेगपरिप्लुतैः।
अन्योन्यमभिवीक्षन्तेऽव्यक्तमार्ततराः स्त्रियः॥ १९॥
उनके कज्जल आदि से रहित बड़े-बड़े नेत्र आँसुओं के वेग में डूबे हुए थे। वे स्त्रियाँ अत्यन्त आर्त होकर अव्यक्तभाव से एक-दूसरी की ओर देख रही थीं॥
ततो दशरथस्त्रीणां प्रासादेभ्यस्ततस्ततः।
रामशोकाभितप्तानां मन्दं शुश्राव जल्पितम्॥ २०॥
तदनन्तर राजमहलों में जहाँ-तहाँ से श्रीराम के शोक से संतप्त हुई राजा दशरथ की रानियों के मन्दस्वर में कहे गये वचन सुनायी पड़े॥ २० ॥
सह रामेण निर्यातो विना राममिहागतः।
सूतः किं नाम कौसल्यां क्रोशन्तीं प्रतिवक्ष्यति॥ २१॥
‘ये सारथि सुमन्त्र श्रीराम के साथ यहाँ से गये थे और उनके बिना ही यहाँ लौटे हैं, ऐसी दशा में करुण क्रन्दन करती हुई कौसल्या को ये क्या उत्तर देंगे? ॥ २१॥
यथा च मन्ये दुर्जीवमेवं न सुकरं ध्रुवम्।
आच्छिद्य पुत्रे निर्याते कौसल्या यत्र जीवति॥ २२॥
‘मैं समझती हूँ, जैसे जीवन दुःखजनित है, निश्चय ही उसी प्रकार इसका नाश भी सुकर नहीं है; तभी तो न्यायतः प्राप्त हुए अभिषेक को त्यागकर पुत् रके वन में चले जाने पर भी कौसल्या अभी तक जीवित हैं। २२॥
सत्यरूपं तु तद् वाक्यं राजस्त्रीणां निशामयन्।
प्रदीप्त इव शोकेन विवेश सहसा गृहम्॥ २३॥
रानियों की वह सच्ची बात सुनकर शोक से दग्ध से होते हुए सुमन्त्र ने सहसा राजभवन में प्रवेश किया॥२३॥
स प्रविश्याष्टमीं कक्ष्यां राजानं दीनमातुरम्।
पुत्रशोकपरियूनमपश्यत् पाण्डुरे गृहे ॥२४॥
आठवीं ड्योढ़ी में प्रवेश करके उन्होंने देखा, राजा एक श्वेत भवन में बैठे और पुत्रशोक से मलिन, दीन एवं आतुर हो रहे हैं॥ २४॥
अभिगम्य तमासीनं राजानमभिवाद्य च।
सुमन्त्रो रामवचनं यथोक्तं प्रत्यवेदयत्॥२५॥
सुमन्त्र ने वहाँ बैठे हुए महाराज के पास जाकर उन्हें प्रणाम किया और उन्हें श्रीरामचन्द्रजी की कही हुई बातें ज्यों-की-त्यों सुना दीं॥ २५ ॥
स तूष्णीमेव तच्छ्रुत्वा राजा विद्रुतमानसः।
मूर्च्छितो न्यपतद् भूमौ रामशोकाभिपीडितः॥ २६॥
राजा ने चुपचाप ही वह सुन लिया, सुनकर उनका हृदय द्रवित (व्याकुल) हो गया। फिर वे श्रीराम के शोक से अत्यन्त पीड़ित हो मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े॥२६॥
ततोऽन्तःपुरमाविद्धं मूर्च्छिते पृथिवीपतौ।
उच्छ्रित्य बाहू चुक्रोश नृपतौ पतिते क्षितौ॥२७॥
महाराज के मूर्च्छित हो जाने पर सारा अन्तःपुर दुःख से व्यथित हो उठा। राजा के पृथ्वी पर गिरते ही सब लोग दोनों बाहें उठाकर जोर-जोर से चीत्कार करने लगे॥ २७॥
सुमित्रया तु सहिता कौसल्या पतितं पतिम्।
उत्थापयामास तदा वचनं चेदमब्रवीत्॥ २८॥
उस समय कौसल्या ने सुमित्रा की सहायता से अपने गिरे हुए पति को उठाया और इस प्रकार कहा-॥ २८॥
इमं तस्य महाभाग दूतं दुष्करकारिणः।
वनवासादनुप्राप्तं कस्मान्न प्रतिभाषसे॥२९॥
‘महाभाग! ये सुमन्त्रजी दुष्कर कर्म करने वाले श्रीराम के दूत होकर उनका संदेश लेकर वनवास से लौटे हैं आप इनसे बात क्यों नहीं करते हैं? ॥ २९ ॥
अद्येममनयं कृत्वा व्यपत्रपसि राघव।।
उत्तिष्ठ सुकृतं तेऽस्तु शोके न स्यात् सहायता॥ ३०॥
‘रघुनन्दन! पुत्रको वनवास दे देना अन्याय है। यह अन्याय करके आप लज्जित क्यों हो रहे हैं? उठिये, आपको अपने सत्य के पालन का पुण्य प्राप्त हो जब आप इस तरह शोक करेंगे, तब आपके सहायकों का समुदाय भी आपके साथ ही नष्ट हो जायगा॥ ३० ॥
देव यस्या भयाद् रामं नानुपृच्छसि सारथिम्।
नेह तिष्ठति कैकेयी विश्रब्धं प्रतिभाष्यताम्॥ ३१॥
‘देव! आप जिसके भय से सुमन्त्रजी से श्रीराम का समाचार नहीं पूछ रहे हैं, वह कैकेयी यहाँ मौजूद नहीं है; अतः निर्भय होकर बात कीजिये’ ॥ ३१॥
सा तथोक्त्वा महाराज कौसल्या शोकलालसा।
धरण्यां निपपाताशु बाष्पविप्लुतभाषिणी॥३२॥
महाराज से ऐसा कहकर कौसल्या का गला भर आया। आँसुओं के कारण उनसे बोला नहीं गया और वे शोक से व्याकुल होकर तुरंत ही पृथ्वी पर गिर पड़ीं॥ ३२॥
विलपन्ती तथा दृष्ट्वा कौसल्यां पतितां भुवि।
पतिं चावेक्ष्य ताः सर्वाः समन्ताद् रुरुदुः स्त्रियः॥
इस प्रकार विलाप करती हुई कौसल्या को भूमिपर पड़ी देख और अपने पति की मूर्च्छित दशा पर दृष्टिपात करके सभी रानियाँ उन्हें चारों ओर से घेरकर रोने लगीं॥ ३३॥
ततस्तमन्तःपुरनादमुत्थितं समीक्ष्य वृद्धास्तरुणाश्च मानवाः।
स्त्रियश्च सर्वा रुरुदुः समन्ततः पुरं तदासीत् पुनरेव संकुलम्॥ ३४॥
अन्तःपुर से उठे हुए उस आर्तनाद को देख सुनकर नगर के बूढ़े और जवान पुरुष रो पड़े। सारी स्त्रियाँ भी रोने लगीं। वह सारा नगर उस समय सब ओर से पुनः शोक से व्याकुल हो उठा॥ ३४॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्तपञ्चाशः सर्गः॥ ५७॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में सत्तावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥५७॥
सर्ग-58
प्रत्याश्वस्तो यदा राजा मोहात् प्रत्यागतस्मृतिः।
तदाजुहाव तं सूतं रामवृत्तान्तकारणात्॥१॥
मूर्छा दूर होने पर जब राजा को चेत हुआ तब सुस्थिर चित्त होकर उन्होंने श्रीराम का वृत्तान्त सुनने के लिये सारथि सुमन्त्र को सामने बुलाया॥१॥
तदा सूतो महाराजं कृताञ्जलिरुपस्थितः।
राममेवानुशोचन्तं दुःखशोकसमन्वितम्॥२॥
उस समय सुमन्त्र श्रीराम के ही शोक और चिन्ता में निरन्तर डूबे रहने वाले दुःख-शोक से व्याकुल महाराज दशरथ के पास हाथ जोड़कर खड़े हो गये॥२॥
वृद्धं परमसंतप्तं नवग्रहमिव द्विपम्।
विनिःश्वसन्तं ध्यायन्तमस्वस्थमिव कुञ्जरम्॥ ३॥
राजा तु रजसा सूतं ध्वस्ताङ्गं समुपस्थितम्।
अश्रुपूर्णमुखं दीनमुवाच परमार्तवत्॥४॥
जैसे जंगल से तुरंत पकड़कर लाया हुआ हाथी अपने यूथपति गजराज का चिन्तन करके लंबी साँस खींचता और अत्यन्त संतप्त तथा अस्वस्थ हो जाता है, उसी प्रकार बूढ़े राजा दशरथ श्रीराम के लिये अत्यन्त संतप्त हो लंबी साँस खींचकर उन्हीं का ध्यान करते हुए अस्वस्थ-से हो गये थे। राजा ने देखा, सारथि का सारा शरीर धूल से भर गया है। यह सामने खड़ा है इसके मुख पर आँसुओं की धारा बह रही है और यह अत्यन्त दीन दिखायी देता है। उस अवस्था में राजा ने अत्यन्त आर्त होकर उससे पूछा-॥
क्व नु वत्स्यति धर्मात्मा वृक्षमूलमुपाश्रितः।
सोऽत्यन्तसुखितः सूत किमशिष्यति राघवः॥
‘सूत! धर्मात्मा श्रीराम वृक्ष की जड़का सहारा ले कहाँ निवास करेंगे? जो अत्यन्त सुख में पले थे, वे मेरे लाडले राम वहाँ क्या खायेंगे? ॥ ५॥
दुःखस्यानुचितो दुःखं सुमन्त्र शयनोचितः।
भूमिपालात्मजो भूमौ शेते कथमनाथवत्॥६॥
‘सुमन्त्र! जो दुःख भोगने के योग्य नहीं हैं, उन्हीं श्रीराम को भारी दुःख प्राप्त हुआ है। जो राजोचित शय्यापर शयन करने योग्य हैं, वे राजकुमार श्रीराम अनाथ की भाँति भूमि पर कैसे सोते होंगे?॥६॥
यं यान्तमनुयान्ति स्म पदातिरथकुञ्जराः।
स वत्स्यति कथं रामो विजनं वनमाश्रितः॥७॥
‘जिनके यात्रा करते समय पीछे-पीछे पैदलों, रथियों और हाथी सवारों की सेना चलती थी, वे ही श्रीराम निर्जन वन में पहुँचकर वहाँ कैसे निवास करेंगे?॥
व्यालैर्मृगैराचरितं कृष्णसर्पनिषेवितम्।
कथं कुमारौ वैदेह्या सार्धं वनमुपाश्रितौ॥८॥
‘जहाँ अजगर और व्याघ्र-सिंह आदि हिंसक पशु विचरते हैं तथा काले सर्प जिसका सेवन करते हैं, उसी वनका आश्रय लेने वाले मेरे दोनों कुमार सीता के साथ वहाँ कैसे रहेंगे? ॥ ८॥
सुकुमार्या तपस्विन्या सुमन्त्र सह सीतया।
राजपुत्रौ कथं पादैरवरुह्य रथाद् गतौ॥९॥
‘सुमन्त्र! परम सुकुमारी तपस्विनी सीता के साथ वे दोनों राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण रथ से उतरकर पैदल कैसे गये होंगे?॥९॥
सिद्धार्थः खलु सूत त्वं येन दृष्टौ ममात्मजौ।
वनान्तं प्रविशन्तौ तावश्विनाविव मन्दरम्॥१०॥
‘सारथे! तुम कृतकृत्य हो गये; क्योंकि जैसे दोनों अश्विनीकुमार मन्दराचल के वन में जाते हैं, उसी प्रकार वन के भीतर प्रवेश करते हुए मेरे दोनों पुत्रों को तुमने अपनी आँखों से देखा है॥ १०॥
किमुवाच वचो रामः किमुवाच च लक्ष्मणः।
सुमन्त्र वनमासाद्य किमुवाच च मैथिली॥११॥
‘सुमन्त्र! वन में पहुँचकर श्रीराम ने तुमसे क्या कहा? लक्ष्मण ने भी क्या कहा? तथा मिथिलेशकुमारी सीता ने क्या संदेश दिया? ॥११॥
आसितं शयितं भुक्तं सूत रामस्य कीर्तय।
जीविष्याम्ययमेतेन ययातिरिव साधुषु॥१२॥
‘सूत! तुम श्रीराम के बैठने, सोने और खाने-पीने से सम्बन्ध रखने वाली बातें बताओ। जैसे स्वर्ग से गिरे हुए राजा ययाति सत्पुरुषों के बीच में उपस्थित होने पर सत्संग के प्रभाव से पुनः सुखी हो गये थे, उसी प्रकार तुम-जैसे साधुपुरुष के मुख से पुत्र का वृत्तान्त सुनने से मैं सुखपूर्वक जीवन धारण कर सकूँगा’ ॥ १२ ॥
इति सूतो नरेन्द्रेण चोदितः सज्जमानया।
उवाच वाचा राजानं स बाष्पपरिबद्धया॥१३॥
महाराज के इस प्रकार पूछने पर सारथि सुमन्त्र ने आँसुओं से रूंधी हुई गद्गद वाणी द्वारा उनसे कहा- ॥
अब्रवीन्मे महाराज धर्ममेवानुपालयन्।
अञ्जलिं राघवः कृत्वा शिरसाभिप्रणम्य च॥ १४॥
सूत मद्वचनात् तस्य तातस्य विदितात्मनः।
शिरसा वन्दनीयस्य वन्द्यौ पादौ महात्मनः॥ १५॥
सर्वमन्तःपुरं वाच्यं सूत मद्रचनात् त्वया।
आरोग्यमविशेषेण यथार्हमभिवादनम्॥१६॥
‘महाराज! श्रीरामचन्द्रजी ने धर्म का ही निरन्तर पालन करते हुए दोनों हाथ जोड़कर और मस्तक झुकाकर कहा है—’सूत! तुम मेरी ओर से आत्मज्ञानी तथा वन्दनीय मेरे महात्मा पिता के दोनों चरणों में प्रणाम कहना तथा अन्तःपुर में सभी माताओं को मेरे आरोग्य का समाचार देते हुए उनसे विशेष रूप से मेरा यथोचित प्रणाम निवेदन करना॥ १४–१६ ॥
माता च मम कौसल्या कुशलं चाभिवादनम्।
अप्रमादं च वक्तव्या ब्रूयाश्चैनामिदं वचः॥१७॥
धर्मनित्या यथाकालमग्न्यगारपरा भव।
देवि देवस्य पादौ च देववत् परिपालय॥१८॥
‘इसके बाद मेरी माता कौसल्या से मेरा प्रणाम करके बताना कि ‘मैं कुशल से हूँ और धर्मपालन में सावधान रहता हूँ।’ फिर उनको मेरा यह संदेश सुनाना कि ‘माँ! तुम सदा धर्म में तत्पर रहकर यथा समय अग्निशाला के सेवन (अग्निहोत्र-कार्य) में संलग्न रहना। देवि! महाराज को देवता के समान मानकर उनके चरणों की सेवा करना।
अभिमानं च मानं च त्यक्त्वा वर्तस्व मातृषु।
अनुराजानमार्यां च कैकेयीमम्ब कारय॥१९॥
‘अभिमान’ और मान को त्यागकर सभी माताओं के प्रति समान बर्ताव करना उनके साथ हिल-मिलकर रहना। अम्बे! जिसमें राजा का अनुराग है, उस कैकेयी को भी श्रेष्ठ मानकर उसका सत्कार करना।१९॥
१. मुख्य पटरानी होने का अहङ्कार। २. अपने बड़प्पन के घमंड में आकर दूसरों के तिरस्कार करने की भावना।
कुमारे भरते वृत्तिर्वर्तितव्या च राजवत्।
अप्यज्येष्ठा हि राजानो राजधर्ममनुस्मर ॥२०॥
‘कुमार भरत के प्रति राजोचित बर्ताव करना। राजा छोटी उम्र के हों तो भी वे आदरणीय ही होते हैं इस राजधर्म को याद रखना’ ॥ २० ॥
भरतः कुशलं वाच्यो वाच्यो मद्रचनेन च।
सर्वास्वेव यथान्यायं वृत्तिं वर्तस्व मातृषु॥२१॥
‘कुमार भरत से भी मेरा कुशल-समाचार बताकर उनसे मेरी ओर से कहना—’भैया! तुम सभी माताओं के प्रति न्यायोचित बर्ताव करते रहना॥ २१॥
वक्तव्यश्च महाबाहुरिक्ष्वाकुकुलनन्दनः।
पितरं यौवराज्यस्थो राज्यस्थमनुपालय॥ २२॥
‘इक्ष्वाकुकुल का आनन्द बढ़ाने वाले महाबाहु भरत से यह भी कहना चाहिये कि युवराज पद पर अभिषिक्त होने के बाद भी तुम राज्यसिंहासन पर ।विराजमान पिताजी की रक्षा एवं सेवा में संलग्न रहना। २२॥
अतिक्रान्तवया राजा मा स्मैनं व्यपरोरुधः।
कुमारराज्ये जीवस्व तस्यैवाज्ञाप्रवर्तनात्॥२३॥
‘राजा बहुत बूढ़े हो गये हैं—ऐसा मानकर तुम उनका विरोध न करना-उन्हें राजसिंहासन से न उतारना। युवराज-पद पर ही प्रतिष्ठित रहकर उनकी आज्ञा का पालन करते हुए ही जीवन-निर्वाह करना॥ २३॥
अब्रवीच्चापि मां भूयो भृशमश्रूणि वर्तयन्।
मातेव मम माता ते द्रष्टव्या पुत्रगर्धिनी ॥ २४॥
इत्येवं मां महाबाहुब्रुवन्नेव महायशाः।
रामो राजीवपत्राक्षो भृशमश्रूण्यवर्तयत्॥२५॥
‘फिर उन्होंने नेत्रों से बहुत आँसू बहाते हुए मुझसे भरत से कहने के लिये ही यह संदेश दिया—’भरत! मेरी पुत्रवत्सला माता को अपनी ही माता के समान समझना।’ मुझसे इतना ही कहकर महाबाहु महायशस्वी कमलनयन श्रीराम बड़े वेग से आँसुओं की वर्षा करने लगे।
लक्ष्मणस्तु सुसंक्रुद्धो निःश्वसन् वाक्यमब्रवीत्।
केनायमपराधेन राजपुत्रो विवासितः॥२६॥
‘परंतु लक्ष्मण उस समय अत्यन्त कुपित हो लंबी साँस खींचते हुए बोले—’सुमन्त्रजी! किस अपराध के करण महाराज ने इन राजकुमार श्रीराम को देश निकाला दे दिया है ? ॥ २६ ॥
राज्ञा तु खलु कैकेय्या लघु चाश्रुत्य शासनम्।
कृतं कार्यमकार्यं वा वयं येनाभिपीडिताः॥२७॥
‘राजा ने कैकेयी का आदेश सुनकर झट से उसे पूर्ण करने की प्रतिज्ञा कर ली। उनका यह कार्य उचित हो या अनुचित, परंतु हमलोगों को उसके कारण कष्ट भोगना ही पड़ता है॥२७॥
यदि प्रताजितो रामो लोभकारणकारितम्।
वरदाननिमित्तं वा सर्वथा दुष्कृतं कृतम्॥२८॥
‘श्रीराम को वनवास देना कैकेयी के लोभ के कारण हुआ हो अथवा राजा के दिये हुए वरदान के कारण, मेरी दृष्टि में यह सर्वथा पाप ही किया गया है॥२८॥
इदं तावद् यथाकाममीश्वरस्य कृते कृतम्।
रामस्य तु परित्यागे न हेतुमुपलक्षये॥२९॥
‘यह श्रीराम को वनवास देने का कार्य राजा की स्वेच्छाचारिता के कारण किया गया हो अथवा ईश्वर की प्रेरणा से, परंतु मुझे श्रीराम के परित्याग का कोई समुचित कारण नहीं दिखायी देता है॥ २९॥
असमीक्ष्य समारब्धं विरुद्धं बुद्धिलाघवात्।
जनयिष्यति संक्रोशं राघवस्य विवासनम्॥३०॥
‘बुद्धि की कमी अथवा तुच्छता के कारण उचित अनुचित का विचार किये बिना ही जो यह राम वनवासरूपी शास्त्रविरुद्ध कार्य आरम्भ किया गया है, यह अवश्य ही निन्दा और दुःख का जनक होगा। ३०॥
अहं तावन्महाराजे पितत्वं नोपलक्षये।
भ्राता भर्ता च बन्धुश्च पिता च मम राघवः॥ ३१॥
‘मुझे इस समय महाराज में पिता का भाव नहीं दिखायी देता। अब तो रघुकुलनन्दन श्रीराम ही मेरे भाई, स्वामी, बन्धु-बान्धव तथा पिता हैं ॥ ३१॥
सर्वलोकप्रियं त्यक्त्वा सर्वलोकहिते रतम्।
सर्वलोकोऽनुरज्येत कथं चानेन कर्मणा॥३२॥
‘जो सम्पूर्ण लोकों के हित में तत्पर होने के कारण सब लोगों के प्रिय हैं, उन श्रीराम का परित्याग करके राजा ने जो यह क्रूरतापूर्ण पापकृत्य किया है, इसके कारण अब सारा संसार उनमें कैसे अनुरक्त रह सकता है? (अब उनमें राजोचित गुण कहाँ रह गया है?) ॥ ३२॥
सर्वप्रजाभिरामं हि रामं प्रव्रज्य धार्मिकम्।
सर्वलोकविरोधेन कथं राजा भविष्यति॥३३॥
‘जिनमें समस्त प्रजाका मन रमता है, उन धर्मात्मा श्रीराम को देशनिकाला देकर समस्त लोकों का विरोध करने के कारण अब वे कैसे राजा हो सकेंगे? ॥ ३३॥
जानकी तु महाराज निःश्वसन्ती तपस्विनी।
भूतोपहतचित्तेव विष्ठिता विस्मृता स्थिता ॥ ३४॥
‘महाराज! तपस्विनी जनकनन्दिनी सीता तो लंबी साँस खींचती हुई इस प्रकार निश्चेष्ट खड़ी थीं, मानो उनमें किसी भूत का आवेश हो गया हो। वे भूली-सी जान पड़ती थीं॥ ३४॥
अदृष्टपूर्वव्यसना राजपुत्री यशस्विनी।
तेन दुःखेन रुदती नैव मां किंचिदब्रवीत्॥ ३५॥
“उन यशस्विनी राजकुमारी ने पहले कभी ऐसा संकट नहीं देखा था। वे पति के ही दुःख से दुःखी होकर रो रही थीं। उन्होंने मुझसे कुछ भी नहीं कहा॥ ३५॥
उदीक्षमाणा भर्तारं मुखेन परिशुष्यता।
मुमोच सहसा बाष्पं प्रयान्तमुपवीक्ष्य सा॥३६॥
‘मुझे इधर आने के लिये उद्यत देख वे सूखे मुंह से पति की ओर देखती हुई सहसा आँसू बहाने लगी थीं॥
तथैव रामोऽश्रुमुखः कृताञ्जलिः स्थितोऽब्रवील्लक्ष्मणबाहुपालितः।
तथैव सीता रुदती तपस्विनी निरीक्षते राजरथं तथैव माम्॥३७॥
‘इसी प्रकार लक्ष्मण की भुजाओं से सुरक्षित श्रीराम उस समय हाथ जोड़े खड़े थे। उनके मुखपर आँसुओं की धारा बह रही थी। मनस्विनी सीता भी रोती हुई कभी आपके इस रथ की ओर देखती थीं और कभी मेरी ओर’ ॥ ३७॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टपञ्चाशः सर्गः॥५८॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में अट्ठावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥५८॥
सर्ग-59
मम त्वश्वा निवृत्तस्य न प्रावर्तन्त वर्त्मनि।
उष्णमश्रु विमुञ्चन्तो रामे सम्प्रस्थिते वनम्॥१॥
उभाभ्यां राजपुत्राभ्यामथ कृत्वाहमञ्जलिम्।
प्रस्थितो रथमास्थाय तदुःखमपि धारयन्॥२॥
सुमन्त्र ने कहा-‘जब श्रीरामचन्द्रजी वन की ओर प्रस्थित हुए, तब मैंने उन दोनों राजकुमारों को हाथ जोड़कर प्रणाम किया और उनके वियोग के दुःख को हृदय में धारण करके रथ पर आरूढ़ हो उधर से लौटा। लौटते समय मेरे घोड़े नेत्रों से गरम-गरम आँसू बहाने लगे रास्ता चलने में उनका मन नहीं लगता था। १-२॥
गुहेन सार्धं तत्रैव स्थितोऽस्मि दिवसान् बहून्।
आशया यदि मां रामः पुनः शब्दापयेदिति॥३॥
‘मैं गृह के साथ कई दिनों तक वहाँ इस आशा से ठहरा रहा कि सम्भव है, श्रीराम फिर मुझे बुला लें। ३॥
विषये ते महाराज महाव्यसनकर्शिताः।
अपि वृक्षाः परिम्लानाः सपुष्पाङ्करकोरकाः॥४॥
‘महाराज! आपके राज्य में वृक्ष भी इस महान् संकट से कृशकाय हो गये हैं, फूल, अंकुर और कलियों सहित मुरझा गये हैं॥ ४॥
उपतप्तोदका नद्यः पल्वलानि सरांसि च।
परिशुष्कपलाशानि वनान्युपवनानि च ॥५॥
‘नदियों, छोटे जलाशयों तथा बड़े सरोवरों के जल गरम हो गये हैं। वनों और उपवनों के पत्ते सूख गये हैं॥
न च सर्पन्ति सत्त्वानि व्याला न प्रचरन्ति च।
रामशोकाभिभूतं तन्निष्कूजमभवद् वनम्॥६॥
‘वन के जीव-जन्तु आहार के लिये भी कहीं नहीं जाते हैं। अजगर आदि सर्प भी जहाँ-के-तहाँ पड़े हैं, आगे नहीं बढ़ते हैं। श्रीराम के शोक से पीड़ित हुआ वह सारा वन नीरव-सा हो गया है॥६॥
लीनपुष्करपत्राश्च नद्यश्च कलुषोदकाः।
संतप्तपद्माः पद्मिन्यो लीनमीनविहंगमाः॥७॥
‘नदियों के जल मलिन हो गये हैं। उनमें फैले हुए कमलों के पत्ते गल गये हैं। सरोवरों के कमल भी सूख गये हैं। उनमें रहने वाले मत्स्य और पक्षी भी नष्टप्राय हो गये हैं॥ ७॥
जलजानि च पुष्पाणि माल्यानि स्थलजानि च।
नातिभान्त्यल्पगन्धीनि फलानि च यथापुरम्॥ ८॥
‘जल में उत्पन्न होने वाले पुष्प तथा स्थल से पैदा होने वाले फूल भी बहुत थोड़ी सुगन्ध से युक्त होने के कारण अधिक शोभा नहीं पाते हैं तथा फल भी पूर्ववत् नहीं दृष्टिगोचर होते हैं॥८॥
अत्रोद्यानानि शून्यानि प्रलीनविहगानि च।
न चाभिरामानारामान् पश्यामि मनुजर्षभ॥९॥
‘नरश्रेष्ठ! अयोध्या के उद्यान भी सूने हो गये हैं, उनमें रहने वाले पक्षी भी कहीं छिप गये हैं। यहाँ के बगीचे भी मुझे पहले की भाँति मनोहर नहीं दिखायी देते हैं॥९॥
प्रविशन्तमयोध्यायां न कश्चिदभिनन्दति।
नरा राममपश्यन्तो निःश्वसन्ति मुहुर्मुहुः ॥१०॥
‘अयोध्या में प्रवेश करते समय मुझसे किसी ने प्रसन्न होकर बात नहीं की। श्रीराम को न देखकर लोग बारंबार लंबी साँसें खींचने लगे॥१०॥
देव राजरथं दृष्ट्वा विना राममिहागतम्।
दूरादश्रुमुखः सर्वो राजमार्गे गतो जनः॥११॥
‘देव! सड़क पर आये हुए सब लोग राजा का रथ श्रीराम के बिना ही यहाँ लौट आया है, यह देखकर दूर से ही आँसू बहाने लगे थे॥ ११॥
हम्र्यैर्विमानैः प्रासादैरवेक्ष्य रथमागतम्।
हाहाकारकृता नार्यो रामादर्शनकर्शिताः॥१२॥
‘अट्टालिकाओं, विमानों और प्रासादों पर बैठी हुई स्त्रियाँ वहाँ से रथ को सूना ही लौटा देखकर श्रीराम को न देखने के कारण व्यथित हो उठीं और हाहाकार करने लगीं॥ १२॥
आयतैर्विमलैर्नेर श्रुवेगपरिप्लुतैः।
अन्योन्यमभिवीक्षन्तेऽव्यक्तमार्ततराः स्त्रियः॥ १३॥
‘उनके कज्जल आदि से रहित बड़े-बड़े नेत्र आँसुओंके वेग में डूबे हुए थे। वे स्त्रियाँ अत्यन्त आर्त होकर अव्यक्त भाव से एक-दूसरी की ओर देख रही थीं॥
नामित्राणां न मित्राणामदासीनजनस्य च।
अहमार्ततया कंचिद् विशेषं नोपलक्षये॥१४॥
‘शत्रुओं, मित्रों तथा उदासीन (मध्यस्थ) मनुष्यों को भी मैंने समान रूप से दुःखी देखा है। किसी के शोक में मुझे कुछ अन्तर नहीं दिखायी दिया है॥१४॥
अप्रहृष्टमनुष्या च दीननागतुरंगमा।
आर्तस्वरपरिम्लाना विनिःश्वसितनिःस्वना॥ १५॥
निरानन्दा महाराज रामप्रव्राजनातुरा।
कौसल्या पुत्रहीनेव अयोध्या प्रतिभाति मे॥
‘महाराज! अयोध्या के मनुष्यों का हर्ष छिन गया है। वहाँके घोड़े और हाथी भी बहुत दुःखी हैं। सारी पुरी आर्तनाद से मलिन दिखायी देती है। लोगों की लंबी-लंबी साँसें ही इस नगरी का उच्छ्वास बन गयी हैं। यह अयोध्यापुरी श्रीराम के वनवास से व्याकुल हुई पुत्रवियोगिनी कौसल्या की भाँति मुझे आनन्दशून्य प्रतीत हो रही है’ ॥ १५-१६॥
सूतस्य वचनं श्रुत्वा वाचा परमदीनया।
बाष्पोपहतया सूतमिदं वचनमब्रवीत्॥१७॥
सुमन्त्र के वचन सुनकर राजा ने उनसे अश्रु-गद्गद परम दीन वाणी में कहा- ॥ १७॥
कैकेय्या विनियुक्तेन पापाभिजनभावया।
मया न मन्त्रकुशलैर्वृद्धैः सह समर्थितम्॥१८॥
‘सूत! जो पापी कुल और पापपूर्ण देश में उत्पन्न हुई है तथा जिसके विचार भी पाप से भरे हैं, उस कैकेयी के कहने में आकर मैंने सलाह देने में कुशल वृद्ध पुरुषों के साथ बैठकर इस विषय में कोई परामर्श भी नहीं किया॥१८॥
न सुहृद्भिर्न चामात्यैर्मन्त्रयित्वा सनैगमैः।
मयायमर्थः सम्मोहात् स्त्रीहेतोः सहसा कृतः॥ १९॥
‘सुहृदों, मन्त्रियों और वेदवेत्ताओं से सलाह लिये बिना ही मैंने मोहवश केवल एक स्त्री की इच्छा पूर्ण करने के लिये सहसा यह अनर्थमय कार्य कर डाला॥ १९॥
भवितव्यतया नूनमिदं वा व्यसनं महत्।
कुलस्यास्य विनाशाय प्राप्तं सूत यदृच्छया॥ २०॥
‘सुमन्त्र! होनहारवश यह भारी विपत्ति निश्चय ही इस कुलका विनाश करने के लिये अकस्मात् आ पहुँची है॥२०॥
सूत यद्यस्ति ते किंचिन्मयापि सुकृतं कृतम्।
त्वं प्रापयाशु मां रामं प्राणाः संत्वरयन्ति माम्॥ २१॥
‘सारथे! यदि मैंने तुम्हारा कभी कुछ थोड़ा-सा भी उपकार किया हो तो तुम मुझे शीघ्र ही श्रीराम के पास पहँचा दो। मेरे प्राण मुझे श्रीराम के दर्शन के लिये शीघ्रता करने की प्रेरणा दे रहे हैं॥ २१॥
यद्यद्यापि ममैवाज्ञा निवर्तयतु राघवम्।
न शक्ष्यामि विना रामं मुहूर्तमपि जीवितुम्॥ २२॥
‘यदि आज भी इस राज्य में मेरी ही आज्ञा चलती हो तो तुम मेरे ही आदेश से जाकर श्रीराम को वन से लौटा ले आओ; क्योंकि अब मैं उनके बिना दो घड़ी भी जीवित नहीं रह सकूँगा॥ २२ ॥
अथवापि महाबाहुर्गतो दूरं भविष्यति।
मामेव रथमारोप्य शीघ्रं रामाय दर्शय॥ २३॥
‘अथवा महाबाहु श्रीराम तो अब दूर चले गये होंगे, इसलिये मुझे ही रथ पर बिठाकर ले चलो और । शीघ्र ही राम का दर्शन कराओ॥ २३॥
वृत्तदंष्ट्रो महेष्वासः क्वासौ लक्ष्मणपूर्वजः।
यदि जीवामि साध्वेनं पश्येयं सीतया सह ॥ २४॥
‘कुन्दकली के समान श्वेत दाँतोंवाले, लक्ष्मण के बड़े भाई महाधनुर्धर श्रीराम कहाँ हैं? यदि सीता के साथ भली-भाँति उनका दर्शन कर लूँ, तभी मैं जीवित रह सकता हूँ॥२४॥
लोहिताक्षं महाबाहुमामुक्तमणिकुण्डलम्।
रामं यदि न पश्येयं गमिष्यामि यमक्षयम्॥ २५॥
‘जिनके लाल नेत्र और बड़ी-बड़ी भुजाएँ हैं तथा जो मणियों के कुण्डल धारण करते हैं, उन श्रीराम को यदि मैं नहीं देखूगा तो अवश्य यमलोक को चला जाऊँगा॥२५॥
अतो नु किं दुःखतरं योऽहमिक्ष्वाकुनन्दनम्।
इमामवस्थामापन्नो नेह पश्यामि राघवम्॥२६॥
‘इससे बढ़कर दुःखकी बात और क्या होगी कि मैं इस मरणासन्न अवस्था में पहुँचकर भी इक्ष्वाकुकुलनन्दन राघवेन्द्र श्रीराम को यहाँ नहीं देख रहा हूँ॥२६॥
हा राम रामानुज हा हा वैदेहि तपस्विनि।
न मां जानीत दुःखेन म्रियमाणमनाथवत्॥२७॥
‘हा राम! हा लक्ष्मण! हा विदेहराजकुमारी तपस्विनी सीते! तुम्हें पता नहीं होगा कि मैं किस प्रकार दुःख से अनाथकी भाँति मर रहा हूँ’॥२७॥
स तेन राजा दुःखेन भृशमर्पितचेतनः।
अवगाढः सुदुष्पारं शोकसागरमब्रवीत्॥२८॥
राजा उस दुःख से अत्यन्त अचेत हो रहे थे, अतः वे उस परम दुर्लङ्ग्य शोकसमुद्र में निमग्न होकर बोले -||
रामशोकमहावेगः सीताविरहपारगः।
श्वसितोर्मिमहावर्तो बाष्पवेगजलाविलः॥२९॥
बाहविक्षेपमीनोऽसौ विक्रन्दितमहास्वनः।
प्रकीर्णकेशशैवालः कैकेयीवडवामुखः ॥३०॥
ममाश्रुवेगप्रभवः कुब्जावाक्यमहाग्रहः।
वरवेलो नृशंसाया रामप्रव्राजनायतः॥३१॥
यस्मिन् बत निमग्नोऽहं कौसल्ये राघवं विना।
दुस्तरो जीवता देवि मयायं शोकसागरः॥ ३२॥
‘देवि कौसल्ये! मैं श्रीराम के बिना जिस शोकसमुद्र में डूबा हुआ हूँ, उसे जीते-जी पार करना मेरे लिये अत्यन्त कठिन है। श्रीराम का शोक ही उस समुद्र का महान् वेग है। सीता का बिछोह ही उसका दूसरा छोर है। लंबी-लंबी साँसें उसकी लहरें और बड़ी-बड़ी भँवरें हैं। आँसुओं का वेगपूर्वक उमड़ा हुआ प्रवाह ही उसका मलिन जल है। मेरा हाथ पटकना ही उसमें उछलती हुई मछलियों का विलास है। करुण-क्रन्दन ही उसकी महान् गर्जना है। ये बिखरे हुए केश ही उसमें उपलब्ध होने वाले सेवार हैं। कैकेयी बड़वानल है। वह शोक-समुद्र मेरी वेगपूर्वक होनेवाली अश्रुवर्षा की उत्पत्ति का मूल कारण है। मन्थरा के कुटिलतापूर्ण वचन ही उस समुद्र के बड़े-बड़े ग्राह हैं। क्रूर कैकेयी के माँगे हुए दो वर ही उसके दो तट हैं तथा श्रीराम का वनवास ही उस शोक-सागर का महान् विस्तार है॥ २९–३२॥
अशोभनं योऽहमिहाद्य राघवं दिदृक्षमाणो न लभे सलक्ष्मणम्।
इतीव राजा विलपन् महायशाः पपात तूर्णं शयने स मूर्च्छितः॥३३॥
‘मैं लक्ष्मणसहित श्रीराम को देखना चाहता हूँ, परंतु इस समय उन्हें यहाँ देख नहीं पाता हूँ—यह मेरे बहुत बड़े पाप का फल है।’ इस तरह विलाप करते हुए महायशस्वी राजा दशरथ तुरंत ही मूर्च्छित होकर शय्या पर गिर पड़े॥ ३३॥
इति विलपति पार्थिवे प्रणष्टे करुणतरं द्विगुणं च रामहेतोः।
वचनमनुनिशम्य तस्य देवी भयमगमत् पुनरेव राममाता॥३४॥
श्रीरामचन्द्रजी के लिये इस प्रकार विलाप करते हुए राजा दशरथ के मूर्च्छित हो जाने पर उनके उस अत्यन्त करुणाजनक वचन को सुनकर राममाता देवी कौसल्या को पुनः दुगुना भय हो गया॥३४॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकोनषष्टितमः सर्गः॥ ५९॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में उनसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५९॥
सर्ग-60
ततो भूतोपसृष्टेव वेपमाना पुनः पुनः।
धरण्यां गतसत्त्वेव कौसल्या सूतमब्रवीत्॥१॥
तदनन्तर जैसे उनमें भूत का आवेश हो गया हो, इस प्रकार कौसल्या देवी बारंबार काँपने लगीं और अचेत-सी होकर पृथ्वी पर गिर पड़ीं। उसी अवस्था में उन्होंने सारथि से कहा- ॥१॥
नय मां यत्र काकुत्स्थः सीता यत्र च लक्ष्मणः।
तान् विना क्षणमप्यद्य जीवितुं नोत्सहे ह्यहम्॥ २॥
‘सुमन्त्र! जहाँ श्रीराम हैं, जहाँ सीता और लक्ष्मण हैं, वहीं मुझे भी पहुँचा दो। मैं उनके बिना अब एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकती॥२॥
निवर्तय रथं शीघ्रं दण्डकान् नय मामपि।
अथ तान् नानुगच्छामि गमिष्यामि यमक्षयम्॥ ३॥
‘जल्दी रथ लौटाओ और मुझे भी दण्डकारण्य में ले चलो। यदि मैं उनके पास न जा सकी तो यमलोक की यात्रा करूँगी’ ॥३॥
बाष्पवेगोपहतया स वाचा सज्जमानया।
इदमाश्वासयन् देवीं सूतः प्राञ्जलिरब्रवीत्॥४॥
देवी कौसल्या की बात सुनकर सारथि सुमन्त्र ने हाथ जोड़कर उन्हें समझाते हुए आँसुओं के वेग से अवरुद्ध हुई गद्गदवाणी में कहा- ॥४॥
त्यज शोकं च मोहं च सम्भ्रमं दुःखजं तथा।
व्यवधूय च संतापं वने वत्स्यति राघवः॥५॥
‘महारानी! यह शोक, मोह और दुःखजनित व्याकुलता छोड़िये। श्रीरामचन्द्रजी इस समय सारा संताप भूलकर वन में निवास करते हैं॥५॥
लक्ष्मणश्चापि रामस्य पादौ परिचरन् वने।
आराधयति धर्मज्ञः परलोकं जितेन्द्रियः॥६॥
‘धर्मज्ञ एवं जितेन्द्रिय लक्ष्मण भी उस वन में श्रीरामचन्द्रजी के चरणों की सेवा करते हुए अपना परलोक बना रहे हैं॥६॥
विजनेऽपि वने सीता वासं प्राप्य गृहेष्विव।
विस्रम्भं लभतेऽभीता रामे विन्यस्तमानसा॥७॥
‘सीता का मन भगवान् श्रीराम में ही लगा हुआ है। इसलिये निर्जन वन में रहकर भी घर की ही भाँति प्रेम एवं प्रसन्नता पाती तथा निर्भय रहती हैं॥ ७॥
नास्या दैन्यं कृतं किंचित् ससूक्ष्ममपि लक्ष्यते।
उचितेव प्रवासानां वैदेही प्रतिभाति मे॥८॥
‘वन में रहने के कारण उनके मन में कुछ थोड़ा-सा भी दुःख नहीं दिखायी देता। मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है, मानो विदेहराजकुमारी सीता को परदेश में रहने का पहले से ही अभ्यास हो॥ ८॥
नगरोपवनं गत्वा यथा स्म रमते परा।
तथैव रमते सीता निर्जनेषु वनेष्वपि॥९॥
‘जैसे यहाँ नगर के उपवन में जाकर वे पहले घूमा करती थीं, उसी प्रकार निर्जन वन में भी सीता सानन्द विचरती हैं॥ ९॥
बालेव रमते सीताबालचन्द्रनिभानना।
रामा रामे ह्यदीनात्मा विजनेऽपि वने सती॥१०॥
‘पूर्ण चन्द्रमा के समान मनोहर मुखवाली रमणीशिरोमणि उदारहृदया सती-साध्वी सीता उस निर्जन वन में भी श्रीराम के समीप बालिका के समान खेलती और प्रसन्न रहती हैं॥ १० ॥
तद्गतं हृदयं यस्यास्तदधीनं च जीवितम्।
अयोध्या हि भवेदस्या रामहीना तथा वनम्॥ ११॥
‘उनका हृदय श्रीराम में ही लगा हुआ है। उनका जीवन भी श्रीराम के ही अधीन है, अतः राम के बिना अयोध्या भी उनके लिये वन के समान ही होगी (और श्रीराम के साथ रहने पर वे वन में भी अयोध्या के समान ही सुख का अनुभव करेंगी) ॥ ११॥
परिपृच्छति वैदेही ग्रामांश्च नगराणि च।
गतिं दृष्ट्वा नदीनां च पादपान् विविधानपि॥ १२॥
‘विदेहनन्दिनी सीता मार्ग में मिलने वाले गाँवों, नगरों, नदियों के प्रवाहों और नाना प्रकार के वृक्षों को देखकर उनका परिचय पूछा करती हैं।॥ १२॥
रामं वा लक्ष्मणं वापि दृष्ट्वा जानाति जानकी।
अयोध्या क्रोशमात्रे तु विहारमिव साश्रिता॥ १३॥
‘श्रीराम और लक्ष्मण को अपने पास देखकर जानकी को यही जान पड़ता है कि मैं अयोध्या से एक कोस की दूरी पर मानो घूमने-फिरने के लिये ही आयी हैं॥ १३॥
इदमेव स्मराम्यस्याः सहसैवोपजल्पितम्।
कैकेयीसंश्रितं जल्पं नेदानी प्रतिभाति माम्॥ १४॥
‘सीता के सम्बन्ध में मुझे इतना ही स्मरण है। उन्होंने कैकेयी को लक्ष्य करके जो सहसा कोई बात कह दी थी, वह इस समय मुझे याद नहीं आ रही है’।
ध्वंसयित्वा तु तद् वाक्यं प्रमादात् पर्युपस्थितम्।
लादनं वचनं सूतो देव्या मधुरमब्रवीत्॥१५॥
इस प्रकार भूल से निकली हुई कैकेयी विषयक उस बात को पलटकर सारथि सुमन्त्र ने देवी कौसल्या के हृदय को आह्लाद प्रदान करने वाला मधुर वचन कहा – ॥१५॥
अध्वना वातवेगेन सम्भ्रमेणातपेन च।
न विगच्छति वैदेह्याश्चन्द्रांशुसदृशी प्रभा॥१६॥
‘मार्ग में चलने की थकावट, वायु के वेग, भयदायक वस्तुओं को देखने के कारण होने वाली घबराहट तथा धूप से भी विदेहराजकुमारीकी चन्द्रकिरणों के समान कमनीय कान्ति उनसे दूर नहीं होती है॥ १६ ॥
सदृशं शतपत्रस्य पूर्णचन्द्रोपमप्रभम्।
वदनं तद् वदान्याया वैदेह्या न विकम्पते॥१७॥
‘उदारहृदया सीता का विकसित कमल के समान सुन्दर तथा पूर्ण चन्द्रमा के समान आनन्ददायक कान्ति से युक्त मुख कभी मलिन नहीं होता है॥ १७॥
अलक्तरसरक्ताभावलक्तरसवर्जितौ।
अद्यापि चरणौ तस्याः पद्मकोशसमप्रभौ॥१८॥
‘जिनमें महावर के रंग नहीं लग रहे हैं, सीता के वे दोनों चरण आज भी महावर के समान ही लाल तथा कमलकोश के समान कान्तिमान् हैं।॥ १८॥
नूपुरोत्कृष्टलीलेव खेलं गच्छति भामिनी।
इदानीमपि वैदेही तद्रागान्यस्तभूषणा ॥१९॥
‘श्रीरामचन्द्रजी के प्रति अनुराग के कारण उन्हीं की प्रसन्नता के लिये जिन्होंने आभूषणों का परित्याग नहीं किया है, वे विदेहराजकुमारी भामिनी सीता इस समय भी अपने नूपुरों की झनकार से हंसों के कलनाद का तिरस्कार-सा करती हुई लीलाविलासयुक्त गति से चलती हैं॥ १९॥
गजं वा वीक्ष्य सिंह वा व्याघ्रं वा वनमाश्रिता।
नाहारयति संत्रासं बाहू रामस्य संश्रिता॥२०॥
‘वे श्रीरामचन्द्रजी के बाहुबल का भरोसा करके वन में रहती हैं और हाथी, बाघ अथवा सिंह को भी देखकर कभी भय नहीं मानती हैं।॥ २० ॥
न शोच्यास्ते न चात्मा ते शोच्यो नापि जनाधिपः।
इदं हि चरितं लोके प्रतिष्ठास्यति शाश्वतम्॥ २१॥
‘अतः आप श्रीराम, लक्ष्मण अथवा सीता के लिये शोक न करें, अपने और महाराज के लिये भी चिन्ता छोड़ें। श्रीरामचन्द्रजी का यह पावन चरित्र संसार में सदा ही स्थिर रहेगा॥ २१॥
विधूय शोकं परिहृष्टमानसा महर्षियाते पथि सुव्यवस्थिताः।
वने रता वन्यफलाशनाः पितुः शुभां प्रतिज्ञा प्रतिपालयन्ति ते॥२२॥
‘वे तीनों ही शोक छोड़कर प्रसन्नचित्त हो महर्षियों के मार्ग पर दृढ़तापूर्वक स्थित हैं और वन में रहकर फल-मूल का भोजन करते हुए पिता की उत्तम प्रतिज्ञा का पालन कर रहे हैं’ ॥ २२ ॥
तथापि सूतेन सुयुक्तवादिना निवार्यमाणा सुतशोककर्शिता।
न चैव देवी विरराम कूजितात् प्रियेति पुत्रेति च राघवेति च॥२३॥
इस प्रकार युक्तियुक्त वचन कहकर सारथि सुमन्त्र ने पुत्रशोक से पीड़ित हुई कौसल्या को चिन्ता करने और रोने से रोका तो भी देवी कौसल्या विलाप से विरत न हुईं । वे ‘हा प्यारे !’ ‘हा पुत्र!’ और ‘हा रघुनन्दन!’ की रट लगाती हुई करुण क्रन्दन करती ही रहीं॥ २३॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे षष्टितमः सर्गः॥६०॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्डमें साठवाँ सर्ग पूरा हुआ। ६०॥