॥श्री गणेशाय नम:॥
॥श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
**************
सम्पूर्ण वाल्मीकि रामायण
[काव्य बीजं सनातनम्]

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अरण्यकाण्डम्

मारीच का रावण को विनाश का भय दिखाकर पुनः समझाना

एकचत्वारिंशः सर्गः

सर्ग-41


आज्ञप्तो रावणेनेत्थं प्रतिकूलं च राजवत्।

अब्रवीत् परुषं वाक्यं निःशङ्को राक्षसाधिपम्॥

रावण ने जब राजा की भाँति उसे ऐसी प्रतिकूल आज्ञा दी, तब मारीच ने निःशङ्क होकर उस राक्षसराज से कठोर वाणी में कहा- ॥१॥

केनायमुपदिष्टस्ते विनाशः पापकर्मणा।

सपुत्रस्य सराज्यस्य सामात्यस्य निशाचर ॥२॥

‘निशाचर! किस पापी ने तुम्हें पुत्र, राज्य और मन्त्रियों सहित तुम्हारे विनाश का यह मार्ग बताया है?॥

कस्त्वया सुखिना राजन् नाभिनन्दति पापकृत्।

केनेदमुपदिष्टं ते मृत्युद्वारमुपायतः॥३॥

‘राजन्! कौन ऐसा पापाचारी है, जो तुम्हें सुखी देखकर प्रसन्न नहीं हो रहा है ? किसने युक्ति से तुम्हें मौत के द्वार पर जाने की यह सलाह दी है ? ॥ ३॥

शत्रवस्तव सुव्यक्तं हीनवीर्या निशाचर।

इच्छन्ति त्वां विनश्यन्तमुपरुद्धं बलीयसा॥४॥

‘निशाचर! आज यह बात स्पष्ट रूप से ज्ञात हो गयी कि तुम्हारे दुर्बल शत्रु तुम्हें किसी बलवान् से भिड़ाकर नष्ट होते देखना चाहते हैं।॥ ४॥

केनेदमुपदिष्टं ते क्षुद्रेणाहितबुद्धिना।

यस्त्वामिच्छति नश्यन्तं स्वकृतेन निशाचर ॥५॥

‘राक्षसराज! तुम्हारे अहित का विचार रखने वाले किस नीच ने तुम्हें यह पाप करने का उपदेश दिया है ? जान पड़ता है कि वह तुम्हें अपने ही कुकर्म से नष्ट होते देखना चाहता है॥ ५ ॥

वध्याः खलु न वध्यन्ते सचिवास्तव रावण।

ये त्वामुत्पथमारूढं न निगृह्णन्ति सर्वशः॥६॥

‘रावण! निश्चय ही वध के योग्य तुम्हारे वे मन्त्री हैं, जो कुमार्ग पर आरूढ़ हुए तुम-जैसे राजा को सब प्रकार से रोक नहीं रहे हैं; किंतु तुम उनका वध नहीं करते हो॥

अमात्यैः कामवृत्तो हि राजा कापथमाश्रितः।

निग्राह्यः सर्वथा सद्भिः स निग्राह्यो न गृह्यसे॥ ७॥

‘अच्छे मन्त्रियों को चाहिये कि जो राजा स्वेच्छाचारी होकर कुमार्ग पर चलने लगे, उसे सब प्रकार से वे रोकें। तुम भी रोकने के ही योग्य हो; फिर भी वे मन्त्री तुम्हें रोक नहीं रहे हैं।॥ ७॥

धर्ममर्थं च कामं च यशश्च जयतां वर।

स्वामिप्रसादात् सचिवाः प्राप्नुवन्ति निशाचर॥ ८॥

‘विजयी वीरों में श्रेष्ठ निशाचर! मन्त्री अपने स्वामी राजा की कृपा से ही धर्म, अर्थ, काम और यश पाते हैं।। ८॥

विपर्यये तु तत्सर्वं व्यर्थं भवति रावण।

व्यसनं स्वामिवैगुण्यात् प्राप्नुवन्तीतरे जनाः॥९॥

‘रावण! यदि स्वामी की कृपा न हो तो सब व्यर्थ हो जाता है। राजा के दोष से दूसरे लोगों को भी कष्ट भोगना पड़ता है॥९॥

राजमूलो हि धर्मश्च यशश्च जयतां वर।

तस्मात् सर्वास्ववस्थासु रक्षितव्या नराधिपाः॥ १०॥

‘विजयशीलों में श्रेष्ठ राक्षसराज! धर्म और यश की प्राप्ति का मूल कारण राजा ही है; अतः सभी अवस्थाओं में राजा की रक्षा करनी चाहिये॥ १० ॥

राज्यं पालयितुं शक्यं न तीक्ष्णेन निशाचर।

न चातिप्रतिकूलेन नाविनीतेन राक्षस॥११॥

‘रात्रि में विचरने वाले राक्षस! जिसका स्वभाव अत्यन्त तीखा हो, जो जनता के अत्यन्त प्रतिकूल चलने वाला और उद्दण्ड हो, ऐसे राजा से राज्य की रक्षा नहीं हो सकती॥ ११ ॥

ये तीक्ष्णमन्त्राः सचिवा भुज्यन्ते सह तेन वै।

विषमेषु रथाः शीघ्रं मन्दसारथयो यथा॥१२॥

‘जो मन्त्री तीखे उपाय का उपदेश करते हैं, वे अपनी सलाह मानने वाले उस राजा के साथ ही दुःख भोगते हैं, जैसे जिनके सारथि मूर्ख हों, ऐसे रथ नीची-ऊँची भूमि में जाने पर सारथियों के साथ ही संकट में पड़ जाते हैं ॥ १२॥

बहवः साधवो लोके युक्तधर्ममनुष्ठिताः।

परेषामपराधेन विनष्टाः सपरिच्छदाः॥१३॥

‘उपयुक्त धर्म का अनुष्ठान करने वाले बहुत-से साधुपुरुष इस जगत् में दूसरों के अपराध से परिवारसहित नष्ट हो गये हैं ॥ १३॥

स्वामिना प्रतिकूलेन प्रजास्तीक्ष्णेन रावण।

रक्ष्यमाणा न वर्धन्ते मेषा गोमायुना यथा॥१४॥

‘रावण! प्रतिकूल बर्ताव और तीखे स्वभाव वाले राजा से रक्षित होने वाली प्रजा उसी तरह वृद्धि को नहीं प्राप्त होती है, जैसे गीदड़ या भेड़िये से पालित होने वाली भेड़ें॥ १४॥

अवश्यं विनशिष्यन्ति सर्वे रावण राक्षसाः।

येषां त्वं कर्कशो राजा दुर्बुद्धिरजितेन्द्रियः॥ १५॥

‘रावण! जिनके तुम क्रूर, दुर्बुद्धि और अजितेन्द्रिय राजा हो, वे सब राक्षस अवश्य ही नष्ट हो जायेंगे। १५॥

तदिदं काकतालीयं घोरमासादितं मया।

अत्र त्वं शोचनीयोऽसि ससैन्यो विनशिष्यसि॥ १६॥

‘काकतालीय न्याय के अनुसार मुझे तुमसे अकस्मात् ही यह घोर दुःख प्राप्त हो गया। इस विषय में मुझे तुम ही शोक के योग्य जान पड़ते हो; क्योंकि सेनासहित तुम्हारा नाश हो जायगा॥१६॥

मां निहत्य तु रामोऽसावचिरात् त्वां वधिष्यति।

अनेन कृतकृत्योऽस्मि म्रिये चाप्यरिणा हतः॥ १७॥

‘श्रीरामचन्द्रजी मुझे मारकर तुम्हारा भी शीघ्र ही वध कर डालेंगे। जब दोनों ही तरह से मेरी मृत्यु निश्चित है, तब श्रीराम के हाथ से होने वाली जो यह मृत्यु है, इसे पाकर मैं कृतकृत्य हो जाऊँगा; क्योंकि शत्रु के द्वारा युद्ध में मारा जाकर प्राणत्याग करूँगा (तुम-जैसे राजा के हाथ से बलपूर्वक प्राणदण्ड पाने का कष्ट नहीं भोगूंगा) ॥ १७॥

दर्शनादेव रामस्य हतं मामवधारय।

आत्मानं च हतं विद्धि हृत्वा सीतां सबान्धवम्॥ १८॥

‘राजन्! यह निश्चित समझो कि श्रीराम के सामने जाकर उनकी दृष्टि पड़ते ही मैं मारा जाऊँगा और यदि तुमने सीता का हरण किया तो तुम अपने को भी बन्धु-बान्धवोंसहित मरा हुआ ही मानो॥ १८॥

आनयिष्यसि चेत् सीतामाश्रमात् सहितो मया।

नैव त्वमपि नाहं वै नैव लङ्का न राक्षसाः॥१९॥

‘यदि तुम मेरे साथ जाकर श्रीराम के आश्रम से सीता का अपहरण करोगे, तब न तो तुम जीवित बचोगे और न मैं ही न लंकापुरी रहने पायेगी और न वहाँ के निवासी राक्षस ही॥ १९ ॥

निवार्यमाणस्तु मया हितैषिणा न मृष्यसे वाक्यमिदं निशाचर।

परेतकल्पा हि गतायुषो नरा हितं न गृह्णन्ति सुहृद्भिरीरितम्॥२०॥

‘निशाचर! मैं तुम्हारा हितैषी हूँ, इसीलिये तुम्हें पापकर्म से रोक रहा हूँ; किंतु तुम्हें मेरी बात सहन नहीं होती है। सच है जिनकी आयु समाप्त हो जाती है, वे मरणासन्न पुरुष अपने सुहृदों की कही हुई हितकर बातें नहीं स्वीकार करते हैं ॥ २० ॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे एकचत्वारिंशः सर्गः॥ ४१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में इकतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥४१॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अरण्यकाण्डम्

मारीच का सुवर्णमय मृगरूप धारण करके श्रीराम के आश्रम पर जाना और सीता का उसे देखना

द्विचत्वारिंशः सर्गः

सर्ग-42


एवमुक्त्वा तु परुषं मारीचो रावणं ततः।

गच्छावेत्यब्रवीद् दीनो भयाद रात्रिंचरप्रभोः॥

रावण से इस प्रकार कठोर बातें कहकर उस निशाचरराज के भय से दुःखी हुए मारीच ने कहा —’चलो चलें॥१॥

दृष्टश्चाहं पुनस्तेन शरचापासिधारिणा।

मद्धोद्यतशस्त्रेण निहतं जीवितं च मे॥२॥

‘मेरे वध के लिये जिनका हथियार सदा उठा ही रहता है, उन धनुष-बाण और तलवार धारण करने वाले श्रीरामचन्द्रजी ने यदि फिर मुझे देख लिया तो मेरे जीवन का अन्त निश्चित है॥२॥

नहि रामं पराक्रम्य जीवन् प्रतिनिवर्तते।

वर्तते प्रतिरूपोऽसौ यमदण्डहतस्य ते॥३॥

‘श्रीरामचन्द्रजी के साथ पराक्रम दिखाकर कोई जीवित नहीं लौटता है। तुम यमदण्ड से मारे गये हो (इसीलिये उनसे भिड़ने की बात सोचते हो)। वे श्रीरामचन्द्रजी तुम्हारे लिये यमदण्ड के ही समान हैं। ३॥

किं नु कर्तुं मया शक्यमेवं त्वयि दुरात्मनि।

एष गच्छाम्यहं तात स्वस्ति तेऽस्तु निशाचर ॥४॥

‘परंतु जब तुम इस प्रकार दुष्टतापर उतारू हो गये, तब मैं क्या कर सकता हूँ लो, यह मैं चलता हूँ। तात निशाचर ! तुम्हारा कल्याण हो’ ॥ ४॥

प्रहृष्टस्त्वभवत् तेन वचनेन स राक्षसः।

परिष्वज्य सुसंश्लिष्टमिदं वचनमब्रवीत्॥५॥

मारीच के उस वचन से राक्षस रावण को बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने उसे कसकर हृदय से लगा लिया और इस प्रकार कहा— ॥५॥

एतच्छौटीर्ययुक्तं ते मच्छन्दवशवर्तिनः।

इदानीमसि मारीचः पूर्वमन्यो हि राक्षसः॥६॥

‘यह तुमने वीरता की बात कही है; क्योंकि अब तुम मेरी इच्छा के वशवर्ती हो गये हो। इस समय तुम वास्तव में मारीच हो। पहले तुममें किसी दूसरे राक्षस का आवेश हो गया था॥६॥

आरुह्यतामयं शीघ्रं खगो रत्नविभूषितः।

मया सह रथो युक्तः पिशाचवदनैः खरैः॥७॥

‘यह रत्नों से विभूषित मेरा आकाशगामी रथ तैयार है, इसमें पिशाचों के-से मुखवाले गधे जुते हुए हैं, इसपर मेरे साथ जल्दी से बैठ जाओ॥७॥

प्रलोभयित्वा वैदेहीं यथेष्टं गन्तुमर्हसि।

तां शून्ये प्रसभं सीतामानयिष्यामि मैथिलीम्॥ ८॥

‘(तुम्हारे जिम्मे एक ही काम है) विदेहकुमारी सीता के मन में अपने लिये लोभ उत्पन्न कर दो। उसे लुभाकर तुम जहाँ चाहो जा सकते हो। आश्रम सूना हो जाने पर मैं मिथिलेशकुमारी सीता को जबरदस्ती उठा लाऊँगा’॥ ८॥

ततस्तथेत्युवाचैनं रावणं ताटकासुतः।

ततो रावणमारीचौ विमानमिव तं रथम्॥९॥

आरुह्याययतुः शीघ्रं तस्मादाश्रममण्डलात्।

तब ताटकाकुमार मारीच ने रावण से कहा —’तथास्तु’ ऐसा ही हो। तदनन्तर रावण और मारीच दोनों उस विमानाकार रथ पर बैठकर शीघ्र ही उस आश्रममण्डल से चल दिये॥ ९ १/२ ॥

तथैव तत्र पश्यन्तौ पत्तनानि वनानि च॥१०॥

गिरीश्च सरितः सर्वा राष्ट्राणि नगराणि च।

समेत्य दण्डकारण्यं राघवस्याश्रमं ततः॥११॥

ददर्श सहमारीचो रावणो राक्षसाधिपः।

मार्ग में पहले की ही भाँति अनेकानेक पत्तनों, वनों, पर्वतों, समस्त नदियों, राष्ट्रों तथा नगरों को देखते हुए दोनों ने दण्डकारण्य में प्रवेश किया और वहाँ मारीचसहित राक्षसराज रावण ने श्रीरामचन्द्रजी का आश्रम देखा॥ १०-११ १/२॥

अवतीर्य रथात् तस्मात् ततः काञ्चनभूषणात्॥ १२॥

हस्ते गृहीत्वा मारीचं रावणो वाक्यमब्रवीत्।

तब उस सुवर्णभूषित रथ से उतरकर रावण ने मारीच का हाथ अपने हाथ में ले उससे कहा- ॥ १२ १/२॥

एतद् रामाश्रमपदं दृश्यते कदलीवृतम्॥१३॥

क्रियतां तत् सखे शीघ्रं यदर्थं वयमागताः।

‘सखे! यह केलों से घिरा हुआ राम का आश्रम दिखायी दे रहा है। अब शीघ्र ही वह कार्य करो, जिसके लिये हमलोग यहाँ आये हैं’ ॥ १३ १/२ ।।

स रावणवचः श्रुत्वा मारीचो राक्षसस्तदा ॥१४॥

मृगो भूत्वाऽऽश्रमद्वारि रामस्य विचचार ह।

रावण की बात सुनकर राक्षस मारीच उस समय मृग का रूप धारण करके श्रीराम के आश्रम के द्वार पर विचरने लगा।

स तु रूपं समास्थाय महदद्भुतदर्शनम्॥१५॥

मणिप्रवरशृङ्गाग्रः सितासितमुखाकृतिः।

रक्तपद्मोत्पलमुख इन्द्रनीलोत्पलश्रवाः॥१६॥

किंचिदभ्युन्नतग्रीव इन्द्रनीलनिभोदरः।

मधूकनिभपार्श्वश्च कञ्जकिञ्जल्कसंनिभः॥ १७॥

उस समय उसने देखने में बड़ा ही अद्भुत रूप धारण कर रखा था। उसके सींगों के ऊपरी भागइन्द्रनील नामक श्रेष्ठ मणि के बने हुए जान पड़ते थे, मुखमण्डलपर सफेद और काले रंग की बूंदें थीं, मुख का रंग लाल कमल के समान था। उसके कान नीलकमल के तुल्य थे और गरदन कुछ ऊँची थी, उदर का भाग इन्द्रनीलमणि की कान्ति धारण कर रहा था। पार्श्वभाग महुए के फूल के समान श्वेतवर्ण के थे, शरीर का सुनहरा रंग कमल के केसर की भाँति सुशोभित होता था॥ १५–१७॥

वैदूर्यसंकाशखुरस्तनुजङ्घः सुसंहतः।

इन्द्रायुधसवर्णेन पुच्छेनोर्ध्वं विराजितः॥१८॥

उसके खुर वैदूर्यमणि के समान, पिंडलियाँ पतली और पूँछ ऊपर से इन्द्रधनुष के रंगकी थी, जिससे उसका संगठित शरीर विशेष शोभा पा रहा था॥ १८ ॥

मनोहरस्निग्धवर्णो रत्नैर्नानाविधैर्वृतः।

क्षणेन राक्षसो जातो मृगः परमशोभनः॥१९॥

उसकी देह की कान्ति बड़ी ही मनोहर और चिकनी थी। वह नाना प्रकार की रत्नमयी बँदकियों से विभूषित दिखायी देता था। राक्षस मारीच क्षणभर में ही परम शोभाशाली मृग बन गया॥१९॥

वनं प्रज्वलयन् रम्यं रामाश्रमपदं च तत्।

मनोहरं दर्शनीयं रूपं कृत्वा स राक्षसः॥२०॥

प्रलोभनार्थं वैदेह्या नानाधातुविचित्रितम्।

विचरन् गच्छते सम्यक् शादलानि समन्ततः॥

सीता को लुभाने के लिये विविध धातुओं से चित्रित मनोहर एवं दर्शनीय रूप बनाकर वह निशाचर उस रमणीय वन तथा श्रीराम के उस आश्रम को प्रकाशित करता हुआ सब ओर उत्तम घासों को चरने और विचरने लगा॥ २०-२१॥

रौप्यैर्बिन्दुशतैश्चित्रं भूत्वा च प्रियदर्शनः।

विटपीनां किसलयान् भक्षयन् विचचार ह॥ २२॥

सैकड़ों रजतमय विन्दुओं से युक्त विचित्र रूप धारण करके वह मृग बड़ा प्यारा दिखायी देता था। वह वृक्षों के कोमल पल्लवों को खाता हुआ इधर-उधर विचरने लगा॥ २२॥

कदलीगृहकं गत्वा कर्णिकारानितस्ततः।

समाश्रयन् मन्दगतिं सीतासंदर्शनं ततः॥२३॥

केले के बगीचे में जाकर वह कनेरों के कुञ्ज में जा पहुँचा। फिर जहाँ सीता की दृष्टि पड़ सके, ऐसे स्थान में जाकर मन्दगति का आश्रय ले इधर-उधर घूमने लगा॥ २३॥

राजीवचित्रपृष्ठः स विरराज महामृगः।

रामाश्रमपदाभ्याशे विचचार यथासुखम्॥२४॥

उसका पृष्ठभाग कमल के केसर की भाँति सुनहरे रंग का होने के कारण विचित्र दिखायी देता था, इससे उस महान् मृग की बड़ी शोभा हो रही थी। श्रीरामचन्द्रजी के आश्रम के निकट ही वह अपनी मौज से घूम रहा था॥ २४॥

पुनर्गत्वा निवृत्तश्च विचचार मृगोत्तमः ।

गत्वा मुहूर्तं त्वरया पुनः प्रतिनिवर्तते॥२५॥

वह श्रेष्ठ मृग कुछ दूर जाकर फिर लौट आता था और वहीं घूमने लगता था। दो घड़ी के लिये कहीं चला जाता और फिर बड़ी उतावली के साथ लौट आता था॥ २५॥

विक्रीडंश्च क्वचिद् भूमौ पुनरेव निषीदति।

आश्रमद्वारमागम्य मृगयूथानि गच्छति॥२६॥

वह कहीं खेलता, कूदता और पुनः भूमि पर ही बैठ जाता था, फिर आश्रम के द्वार पर आकर मृगों के झुंड के पीछे-पीछे चल देता॥ २६॥

मृगयूथैरनुगतः पुनरेव निवर्तते।

सीतादर्शनमाकांक्षन् राक्षसो मृगतां गतः ॥२७॥

तत्पश्चात् झुंड-के-झुंड मृगों को साथ लिये फिर लौट आता था। उस मृगरूपधारी राक्षस के मन में केवल यह अभिलाषा थी कि किसी तरह सीता की दृष्टि मुझ पर पड़ जाय॥ २७॥

परिभ्रमति चित्राणि मण्डलानि विनिष्पतन्।

समुद्रीक्ष्य च सर्वे तं मृगा येऽन्ये वनेचराः॥२८॥

उपगम्य समाघ्राय विद्रवन्ति दिशो दश।

सीता के समीप आते समय वह विचित्र मण्डल(पैंतरे) दिखाता हुआ चारों ओर चक्कर लगाता था। उस वन में विचरने वाले जो दूसरे मृग थे, वे सब उसे देखकर पास आते और उसे सूंघकर दसों दिशाओं में भाग जाते थे।

राक्षसः सोऽपि तान् वन्यान् मृगान् मृगवधे रतः॥ २९॥

प्रच्छादनार्थं भावस्य न भक्षयति संस्पृशन्।

राक्षस मारीच यद्यपि मृगों के वध में ही तत्पर रहता था तथापि उस समय अपने भाव को छिपाने के लिये उन वन्य मृगों का स्पर्श करके भी उन्हें खाता नहीं था॥ २९ १/२॥

तस्मिन् नेव ततः काले वैदेही शुभलोचना॥ ३०॥

कुसुमापचये व्यग्रा पादपानत्यवर्तत।

कर्णिकारानशोकांश्च चूतांश्च मदिरेक्षणा॥ ३१॥

उसी समय मदभरे सुन्दर नेत्रोंवाली विदेहनन्दिनी सीता, जो फूल चुनने में लगी हुई थीं, कनेर, अशोक और आम के वृक्षों को लाँघती हुई उधर आ निकलीं।

कुसुमान्यपचिन्वन्ती चचार रुचिरानना।

अनर्हा वनवासस्य सा तं रत्नमयं मृगम्॥३२॥

मुक्तामणिविचित्राङ्गं ददर्श परमाङ्गना।

फूलों को चुनती हुई वे वहीं विचरने लगीं। उनका मुख बड़ा ही सुन्दर था। वे वनवास का कष्ट भोगने के योग्य नहीं थीं। परम सुन्दरी सीता ने उस रत्नमय मृग को देखा, जिसका अङ्ग-प्रत्यङ्ग मुक्तामणियों से चित्रित-सा जान पड़ता था॥ ३२ १/२॥

तं वै रुचिरदन्तोष्ठं रूप्यधातुतनूरुहम्॥३३॥

विस्मयोत्फुल्लनयना सस्नेहं समुदैक्षत।

उसके दाँत और ओठ बड़े सुन्दर थे तथा शरीर के रोएँ चाँदी एवं ताँबे आदि धातुओं के बने हुए जान पड़ते थे। उसके ऊपर दृष्टि पड़ते ही सीताजी की आँखें आश्चर्य से खिल उठीं और वे बड़े स्नेह से उसकी ओर निहारने लगीं। ३३ १/२ ॥

स च तां रामदयितां पश्यन् मायामयो मृगः॥ ३४॥

विचचार ततस्तत्र दीपयन्निव तद् वनम्।

वह मायामय मृग भी श्रीराम की प्राणवल्लभा सीता को देखता और उस वन को प्रकाशित-सा करता हुआ वहीं विचरने लगा॥ ३४ १/२॥

अदृष्टपूर्वं दृष्ट्वा तं नानारत्नमयं मृगम्।

विस्मयं परमं सीता जगाम जनकात्मजा॥ ३५॥

सीता ने वैसा मृग पहले कभी नहीं देखा था। वह नाना प्रकार के रत्नों का ही बना जान पड़ता था। उसे देखकर जनककिशोरी सीता को बड़ा विस्मय हुआ। ३५॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे द्विचत्वारिंशः सर्गः॥४२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में बयालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥४२॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अरण्यकाण्डम्

कपटमृग को देखकर लक्ष्मण का संदेह, सीता का उस मृग को ले आने के लिये श्रीराम को प्रेरित करना, लक्ष्मण को सीता की रक्षा का भार सौंप राम का मृग के लिये जाना

त्रिचत्वारिंशः सर्गः

सर्ग-43


सा तं सम्प्रेक्ष्य सुश्रोणी कुसुमानि विचिन्वती।

हेमराजतवर्णाभ्यां पार्वाभ्यामुपशोभितम्॥१॥

प्रहृष्टा चानवद्याङ्गी मृष्टहाटकवर्णिनी।।

भर्तारमपि चक्रन्द लक्ष्मणं चैव सायुधम्॥२॥

वह मृग सोने और चाँदी के समान कान्तिवाले पार्श्व-भागों से सुशोभित था। शुद्ध सुवर्ण के समान कान्ति तथा निर्दोष अङ्गोंवाली सुन्दरी सीता फूल चुनते-चुनते ही उस मृग को देखकर मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुईं और अपने पति श्रीराम तथा देवर लक्ष्मण को हथियार लेकर आने के लिये पुकारने लगीं॥ १-२॥

आहूयाहूय च पुनस्तं मृगं साधु वीक्षते।

आगच्छागच्छ शीघ्रं वै आर्यपुत्र सहानुज॥३॥

वे बार-बार उन्हें पुकारती और फिर उस मृग को अच्छी तरह देखने लगती थीं। वे बोलीं, ‘आर्यपुत्र ! अपने भाई के साथ आइये, शीघ्र आइये’ ॥३॥

तावाहूतौ नरव्याघ्रौ वैदेह्या रामलक्ष्मणौ।

वीक्षमाणौ तु तं देशं तदा ददृशतुगम्॥४॥

विदेहकुमारी सीता के द्वारा पुकारे जाने पर नरश्रेष्ठ श्रीराम और लक्ष्मण वहाँ आये और उस स्थान पर सब ओर दृष्टि डालते हुए उन्होंने उस समय उस मृग को देखा॥४॥

शङ्कमानस्तु तं दृष्ट्वा लक्ष्मणो वाक्यमब्रवीत्।

तमेवैनमहं मन्ये मारीचं राक्षसं मृगम्॥५॥

उसे देखकर लक्ष्मण के मन में संदेह हुआ और वे बोले—’भैया! मैं तो समझता हूँ कि इस मृग के रूप में वह मारीच नाम का राक्षस ही आया है॥ ५॥

चरन्तो मृगयां हृष्टाः पापेनोपाधिना वने।

अनेन निहता राम राजानः कामरूपिणा॥६॥

‘श्रीराम! स्वेच्छानुसार रूप धारण करने वाले इस पापी ने कपट-वेष बनाकर वन में शिकार खेलने के लिये आये हुए कितने ही हर्षोत्फुल्ल नरेशों का वध किया है।

अस्य मायाविदो माया मृगरूपमिदं कृतम्।

भानुमत् पुरुषव्याघ्र गन्धर्वपुरसंनिभम्॥७॥

‘पुरुषसिंह! यह अनेक प्रकार की मायाएँ जानता है। इसकी जो माया सुनी गयी है, वही इस प्रकाशमान मृगरूप में परिणत हो गयी है। यह गन्धर्वनगर के समान देखने भर के लिये ही है (इसमें वास्तविकता नहीं है)॥

मृगो ह्येवंविधो रत्नविचित्रो नास्ति राघव।

जगत्यां जगतीनाथ मायैषा हि न संशयः॥८॥

‘रघुनन्दन! पृथ्वीनाथ! इस भूतलपर कहीं भी ऐसा विचित्र रत्नमय मृग नहीं है; अतः निःसंदेह यह माया ही है’॥८॥

एवं ब्रुवाणं काकुत्स्थं प्रतिवार्य शुचिस्मिता।

उवाच सीता संहृष्टा छद्मना हृतचेतना॥९॥

मारीच के छल से जिनकी विचारशक्ति हर ली गयी थी, उन पवित्र मुसकानवाली सीता ने उपर्युक्त बातें कहते हुए लक्ष्मण को रोककर स्वयं ही बड़े हर्ष के साथ कहा

आर्यपुत्राभिरामोऽसौ मृगो हरति मे मनः।।

आनयैनं महाबाहो क्रीडार्थं नो भविष्यति॥१०॥

‘आर्यपुत्र ! यह मृग बड़ा ही सुन्दर है। इसने मेरे मन को हर लिया है। महाबाहो! इसे ले आइये। यह हमलोगों के मन-बहलाव के लिये रहेगा॥१०॥

इहाश्रमपदेऽस्माकं बहवः पुण्यदर्शनाः।

मृगाश्चरन्ति सहिताश्चमराः सृमरास्तथा॥११॥

ऋक्षाः पृषतसङ्घाश्च वानराः किन्नरास्तथा।

विहरन्ति महाबाहो रूपश्रेष्ठा महाबलाः॥१२॥

न चान्यः सदृशो राजन् दृष्टः पूर्वं मृगो मया।

तेजसा क्षमया दीप्त्या यथायं मृगसत्तमः॥१३॥

‘राजन्! महाबाहो! यद्यपि हमारे इस आश्रम पर बहुत-से पवित्र एवं दर्शनीय मृग एक साथ आकर चरते हैं तथा सृमर (काली पूँछवाली चवँरी गाय), चमर (सफेद पूँछवाली चवँरी गाय), रीछ, चितकबरे मृगों के झुंड, वानर तथा सुन्दर रूपवाले महाबली किन्नर भी विचरण करते हैं, तथापि आज के पहले मैंने दूसरा कोई ऐसा तेजस्वी, सौम्य और दीप्तिमान् मृग नहीं देखा था, जैसा कि यह श्रेष्ठ मृग दिखायी दे रहा है॥ ११–१३॥

नानावर्णविचित्राङ्गो रत्नभूतो ममाग्रतः।

द्योतयन् वनमव्यग्रं शोभते शशिसंनिभः॥१४॥

‘नाना प्रकार के रंगों से युक्त होने के कारण इसके अङ्ग विचित्र जान पड़ते हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो यह अङ्गों का ही बना हुआ हो। मेरे आगे निर्भय एवं शान्तभाव से स्थित होकर इस वन को प्रकाशित करता हुआ यह चन्द्रमा के समान शोभा पा रहा है॥१४॥

अहो रूपमहो लक्ष्मीः स्वरसम्पच्च शोभना।

मृगोऽद्भुतो विचित्राङ्गो हृदयं हरतीव मे॥१५॥

‘इसका रूप अद्भुत है। इसकी शोभा अवर्णनीय है। इसकी स्वरसम्पत्ति (बोली) बड़ी सुन्दर है। विचित्र अङ्गों से सुशोभित यह अद्भुत मृग मेरे मन को मोहे लेता है॥ १५ ॥

यदि ग्रहणमभ्येति जीवन् नेव मृगस्तव।

आश्चर्यभूतं भवति विस्मयं जनयिष्यति॥१६॥

‘यदि यह मृग जीते-जी ही आपकी पकड़ में आ जाय तो एक आश्चर्य की वस्तु होगा और सबके हृदय में विस्मय उत्पन्न कर देगा॥ १६ ॥

समाप्तवनवासानां राज्यस्थानां च नः पुनः।

अन्तःपुरे विभूषार्थो मृग एष भविष्यति॥१७॥

‘जब हमारे वनवास की अवधि पूरी हो जायगी और हम पुनः अपना राज्य पा लेंगे, उस समय यह मृग हमारे अन्तःपुर की शोभा बढ़ायेगा॥ १७॥

भरतस्यार्यपुत्रस्य श्वश्रूणां मम च प्रभो।

मृगरूपमिदं दिव्यं विस्मयं जनयिष्यति॥१८॥

‘प्रभो! इस मृग का यह दिव्य रूप भरत के, आपके, मेरी सासुओं के और मेरे लिये भी विस्मयजनक होगा।

जीवन्न यदि तेऽभ्येति ग्रहणं मृगसत्तमः।

अजिनं नरशार्दूल रुचिरं तु भविष्यति॥१९॥

‘पुरुषसिंह ! यदि कदाचित् यह श्रेष्ठ मृग जीते-जी पकड़ा न जा सके तो इसका चमड़ा ही बहुत सुन्दर होगा॥ १९॥

निहतस्यास्य सत्त्वस्य जाम्बूनदमयत्वचि।

शष्पबृस्यां विनीतायामिच्छाम्यहमुपासितुम्॥ २०॥

‘घास-फूसकी बनी हुई चटाई पर इस मरे हुए मृग का सुवर्णमय चमड़ा बिछाकर मैं इस पर आपके साथ बैठना चाहती हूँ॥ २० ॥

कामवृत्तमिदं रौद्रं स्त्रीणामसदृशं मतम्।

वपुषा त्वस्य सत्त्वस्य विस्मयो जनितो मम॥ २१॥

‘यद्यपि स्वेच्छा से प्रेरित होकर अपने पति को ऐसे काम में लगाना यह भयंकर स्वेच्छाचार है और साध्वी स्त्रियों के लिये उचित नहीं माना गया है तथापि इस जन्तु के शरीर ने मेरे हृदय में विस्मय उत्पन्न कर दिया है (इसीलिये मैं इसको पकड़ लाने के लिये अनुरोध करती हूँ)’ ॥ २१॥

तेन काञ्चनरोम्णा तु मणिप्रवरशृङ्गिणा।

तरुणादित्यवर्णेन नक्षत्रपथवर्चसा॥२२॥

बभूव राघवस्यापि मनो विस्मयमागतम्।

इति सीतावचः श्रुत्वा दृष्ट्वा च मृगमद्भुतम्॥ २३॥

लोभितस्तेन रूपेण सीतया च प्रचोदितः।

उवाच राघवो हृष्टो भ्रातरं लक्ष्मणं वचः॥२४॥

सुनहरी रोमावली, इन्द्रनील मणि के समान सींग, उदयकाल के सूर्य की-सी कान्ति तथा नक्षत्रलोक की भाँति विन्दुयुक्त तेज से सुशोभित उस मृग को देखकर श्रीरामचन्द्रजी का मन भी विस्मित हो उठा। सीता की पूर्वोक्त बात को सुनकर, उस मृग के अद्भुत रूप को देखकर, उसके उस रूपपर लुभाकर और सीता से प्रेरित होकर हर्ष से भरे हुए श्रीराम ने अपने भाई लक्ष्मण से कहा- ॥ २२–२४॥

पश्य लक्ष्मण वैदेह्याः स्पृहामुल्लसितामिमाम्।

रूपश्रेष्ठतया ह्येष मृगोऽद्य न भविष्यति॥२५॥

‘लक्ष्मण! देखो तो सही, विदेहनन्दिनी सीता के मन में इस मृग को पाने के लिये कितनी प्रबल इच्छाजाग उठी है ? वास्तव में इसका रूप है भी बहुत ही सुन्दर। अपने रूप की इस श्रेष्ठता के कारण ही यह मृग आज जीवित नहीं रह सकेगा॥ २५ ॥

न वने नन्दनोद्देशे न चैत्ररथसंश्रये।

कुतः पृथिव्यां सौमित्रे योऽस्य कश्चित् समो मृगः॥२६॥

‘सुमित्रानन्दन! देवराज इन्द्र के नन्दन वन में और कुबेर के चैत्ररथ वन में भी कोई ऐसा मृग नहीं होगा, जो इसकी समानता कर सके। फिर पृथ्वी पर तो हो ही कहाँ से सकता है॥२६॥

प्रतिलोमानुलोमाश्च रुचिरा रोमराजयः।

शोभन्ते मृगमाश्रित्य चित्राः कनकबिन्दुभिः॥ २७॥

‘टेढ़ी और सीधी रुचिर रोमावलियाँ इस मृग के शरीर का आश्रय ले सुनहरे विन्दुओं से चित्रित हो बड़ी शोभा पा रही हैं ॥ २७॥

पश्यास्य जृम्भमाणस्य दीप्तामग्निशिखोपमाम्।

जिह्वां मुखान्निःसरन्तीं मेघादिव शतहदाम्॥ २८॥

‘देखो न, जब यह जंभाई लेता है, तब इसके मुख से प्रज्वलित अग्निशिखा के समान दमकती हुई जिह्वा बाहर निकल आती है और मेघ से प्रकट हुई बिजली के समान चमकने लगती है॥ २८॥

मसारगल्वर्कमुखः शङ्खमुक्तानिभोदरः।

कस्य नामानिरूप्योऽसौ न मनो लोभयेन्मृगः॥ २९॥

‘इसका मुख-सम्पुट इन्द्रनीलमणि के बने हुए चषक (पानपात्र) के समान जान पड़ता है, उदर ङ्केशार और मोती के समान सफेद है। यह अवर्णनीय मृग किसके मन को नहीं लुभा लेगा॥ २९॥

कस्य रूपमिदं दृष्ट्वा जाम्बूनदमयप्रभम्।

नानारत्नमयं दिव्यं न मनो विस्मयं व्रजेत्॥३०॥

‘नाना प्रकार के रत्नों से विभूषित इसके सुनहरी प्रभावाले दिव्य रूप को देखकर किसके मन में विस्मय नहीं होगा।

मांसहेतोरपि मृगान् विहारार्थं च धन्विनः।

घ्नन्ति लक्ष्मण राजानो मृगयायां महावने॥३१॥

‘लक्ष्मण! राजालोग बड़े-बड़े वनों में मृगया खेलते समय मांस (मृगचर्म) के लिये और शिकार खेलने का शौक पूरा करने के लिये भी धनुष हाथ में लेकर मृगों को मारते हैं॥ ३१॥

धनानि व्यवसायेन विचीयन्ते महावने।

धातवो विविधाश्चापि मणिरत्नसुवर्णिनः॥३२॥

‘मृगया के उद्योग से ही राजालोग विशाल वन में धन का भी संग्रह करते हैं; क्योंकि वहाँ मणि, रत्नऔर सुवर्ण आदि से युक्त नाना प्रकार की धातुएँ उपलब्ध होती हैं ॥ ३२॥

तत् सारमखिलं नृणां धनं निचयवर्धनम्।

मनसा चिन्तितं सर्वं यथा शुक्रस्य लक्ष्मण॥ ३३॥

‘लक्ष्मण! कोश की वृद्धि करने वाला वह वन्य धन मनुष्यों के लिये अत्यन्त उत्कृष्ट होता है। ठीक उसी तरह, जैसे ब्रह्मभाव को प्राप्त हुए पुरुष के लिये मन के चिन्तनमात्र से प्राप्त हुई सारी वस्तुएँ अत्यन्त उत्तम बतायी गयी हैं॥ ३३॥

अर्थी येनार्थकृत्येन संव्रजत्यविचारयन्।

तमर्थमर्थशास्त्रज्ञाः प्राहुरर्थ्याः सुलक्ष्मण ॥ ३४॥

‘लक्ष्मण! अर्थी मनुष्य जिस अर्थ (प्रयोजन) का सम्पादन करने के लिये उसके प्रति आकृष्ट हो बिना विचारे ही चल देता है, उस अत्यन्त आवश्यक प्रयोजन को ही अर्थसाधन में चतुर एवं अर्थशास्त्र के ज्ञाता विद्वान् ‘अर्थ’ कहते हैं॥ ३४॥

एतस्य मृगरत्नस्य पराये काञ्चनत्वचि।

उपवेक्ष्यति वैदेही मया सह सुमध्यमा॥ ३५॥

‘इस रत्नस्वरूप श्रेष्ठ मृग के बहुमूल्य सुनहरे चमड़े पर सुन्दरी विदेहराजनन्दिनी सीता मेरे साथ बैठेगी॥ ३५ ॥

न कादली न प्रियकी न प्रवेणी न चाविकी।

भवेदेतस्य सदृशी स्पर्शेऽनेनेति मे मतिः॥ ३६॥

‘कदली (कोमल ऊँचे चितकबरे और नीलाग्ररोम वाले मृगविशेष), प्रियक (कोमल ऊँचे चिकने और घने रोम वाले मृगविशेष), प्रवेण (विशेष प्रकार के बकरे) और अवि (भेड़) की त्वचा भी स्पर्श करने में इस काञ्चन मृग के छाले के समान कोमल एवं सुखद नहीं हो सकती, ऐसा मेरा विश्वास है।॥ ३६॥

एष चैव मृगः श्रीमान् यश्च दिव्यो नभश्चरः।

उभावेतौ मृगौ दिव्यौ तारामृगमहीमृगौ॥ ३७॥

‘यह सुन्दर मृग और वह जो दिव्य आकाशचारी मृग (मृगशिरा नक्षत्र) है, ये दोनों ही दिव्य मृग हैं। इनमें से एक तारामृग और दूसरा महीमृग है॥ ३७॥ १. नक्षत्रलोक में विचरने वाला मृग (मृगशिरा नक्षत्र)। २. दूसरा पृथ्वी पर विचरने वाला काञ्चन मृग।

यदि वायं तथा यन्मां भवेद् वदसि लक्ष्मण।

मायैषा राक्षसस्येति कर्तव्योऽस्य वधो मया॥ ३८॥

‘लक्ष्मण! तुम मुझसे जैसा कह रहे हो यदि वैसा ही यह मृग हो, यदि यह राक्षस की माया ही हो तो भी मुझे उसका वध करना ही चाहिये॥ ३८॥

एतेन हि नृशंसेन मारीचेनाकृतात्मना।

वने विचरता पूर्वं हिंसिता मुनिपुंगवाः॥३९॥

‘क्योंकि अपवित्र (दुष्ट) चित्तवाले इस क्रूरकर्मा मारीच ने वन में विचरते समय पहले अनेकानेक श्रेष्ठ मुनियों की हत्या की है॥ ३९ ॥

उत्थाय बहवोऽनेन मृगयायां जनाधिपाः।

निहताः परमेष्वासास्तस्माद् वध्यस्त्वयं मृगः॥ ४०॥

‘इसने मृगया के समय प्रकट होकर बहुत-से महाधनुर्धर नरेशों का वध किया है, अतः इस मृग के रूप में इसका भी वध अवश्य करने योग्य है॥ ४० ॥

पुरस्तादिह वातापिः परिभूय तपस्विनः।

उदरस्थो द्विजान् हन्ति स्वगर्भोऽश्वतरीमिव॥ ४१॥

‘इसी वन में पहले वातापि नामक राक्षस रहता था, जो तपस्वी महात्माओं का तिरस्कार करके कपटपूर्ण उपाय से उनके पेट में पहुँच जाता और जैसे खच्चरी को अपने ही गर्भ का बच्चा नष्ट कर देता है, उसी प्रकार उन ब्रह्मर्षियों को नष्ट कर देता था॥४१॥

स कदाचिच्चिराल्लोभादाससाद महामुनिम्।

अगस्त्यं तेजसा युक्तं भक्ष्यस्तस्य बभूव ह॥ ४२॥

‘वह वातापि एक दिन दीर्घकाल के पश्चात् लोभवश तेजस्वी महामुनि अगस्त्यजी के पास जा पहुँचा और (श्राद्धकाल में) उनका आहार बन गया। उनके पेट में पहुँच गया॥ ४२॥

समुत्थाने च तद्पं कर्तुकामं समीक्ष्य तम्।

उत्स्मयित्वा तु भगवान् वातापिमिदमब्रवीत्॥ ४३॥

‘श्राद्ध के अन्त में जब वह अपना राक्षसरूप प्रकट करने की इच्छा करने लगा—उनका पेट फाड़कर निकल आने को उद्यत हुआ, तब उस वातापि को लक्ष्य करके भगवान् अगस्त्य मुसकराये और उससे इस प्रकार बोले- ॥ ४३॥

त्वयाविगण्य वातापे परिभूताश्च तेजसा।

जीवलोके द्विजश्रेष्ठास्तस्मादसि जरां गतः॥४४॥

‘वातापे! तुमने बिना सोचे-विचारे इस जीव-जगत् में बहुत-से श्रेष्ठ ब्राह्मणों को अपने तेज से तिरस्कृत किया है, उसी पाप से अब तुम पच गये’ ॥ ४४ ॥

तद् रक्षो न भवेदेव वातापिरिव लक्ष्मण।

मद्विधं योऽतिमन्येत धर्मनित्यं जितेन्द्रियम्॥४५॥

‘लक्ष्मण! जो सदा धर्म में तत्पर रहने वाले मुझ-जैसे जितेन्द्रिय पुरुष का भी अतिक्रमण करे, उस मारीच नामक राक्षस को भी वातापि के समान ही नष्ट हो जाना चाहिये॥ ४५ ॥

भवेद्धतोऽयं वातापिरगस्त्येनेव मा गतः।

इह त्वं भव संनद्धो यन्त्रितो रक्ष मैथिलीम्॥ ४६॥

‘जैसे वातापि अगस्त्य के द्वारा नष्ट हुआ, उसी प्रकार यह मारीच अब मेरे सामने आकर अवश्य ही मारा जायगा। तुम अस्त्र और कवच आदि से सुसज्जित हो जाओ और यहाँ सावधानी के साथ मिथिलेशकुमारी की रक्षा करो॥ ४६॥

अस्यामायत्तमस्माकं यत् कृत्यं रघुनन्दन।

अहमेनं वधिष्यामि ग्रहीष्याम्यथवा मृगम्॥४७॥

‘रघुनन्दन ! हमलोगों का जो आवश्यक कर्तव्य है, वह सीता की रक्षा के ही अधीन है। मैं इस मृग को मार डालूँगा अथवा इसे जीता ही पकड़ लाऊँगा॥४७॥

यावद् गच्छामि सौमित्रे मृगमानयितुं द्रुतम्।

पश्य लक्ष्मण वैदेह्या मृगत्वचि गतां स्पृहाम्॥ ४८॥

‘सुमित्राकुमार लक्ष्मण! देखो, इस मृग का चर्म हस्तगत करने के लिये विदेहनन्दिनी को कितनी उत्कण्ठा हो रही है, इसलिये इस मृग को ले आने के लिये मैं तुरंत ही जा रहा हूँ॥ ४८॥

त्वचा प्रधानया ह्येष मृगोऽद्य न भविष्यति।

अप्रमत्तेन ते भाव्यमाश्रमस्थेन सीतया॥४९॥

यावत् पृषतमेकेन सायकेन निहन्म्यहम्।

हत्वैतच्चर्म चादाय शीघ्रमेष्यामि लक्ष्मण॥५०॥

‘इस मृग को मारने का प्रधान हेतु है, इसके चमड़े को प्राप्त करना। आज इसी के कारण यह मृग जीवित नहीं रह सकेगा। लक्ष्मण! तुम आश्रम पर रहकर सीता के साथ सावधान रहना–सावधानी के साथ तब तक इसकी रक्षा करना, जबतक कि मैं एक ही बाण से इस चितकबरे मृग को मार नहीं डालता हूँ। मारने के पश्चात् इसका चमड़ा लेकर मैं शीघ्र लौट आऊँगा॥ ४९-५०॥

प्रदक्षिणेनातिबलेन पक्षिणा जटायुषा बुद्धिमता च लक्ष्मण।

भवाप्रमत्तः प्रतिगृह्य मैथिली प्रतिक्षणं सर्वत एव शङ्कितः॥५१॥

‘लक्ष्मण! बुद्धिमान् पक्षी गृध्रराज जटायु बड़े ही बलवान् और सामर्थ्यशाली हैं। उनके साथ ही यहाँ सदा सावधान रहना। मिथिलेशकुमारी सीता को अपने संरक्षण में लेकर प्रतिक्षण सब दिशाओं में रहने वाले राक्षसों की ओर से चौकन्ने रहना’ ॥५१॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे त्रिचत्वारिंशः सर्गः॥४३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में तैंतालीसवाँ सर्ग पूराहुआ॥४३॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अरण्यकाण्डम्

श्रीराम के द्वारा मारीच का वध और उसके द्वारा सीता और लक्ष्मण के पुकारने का शब्द सुनकर श्रीराम की चिन्ता

चतुश्चत्वारिंशः सर्गः

सर्ग-44


तथा तु तं समादिश्य भ्रातरं रघुनन्दनः।

बबन्धासिं महातेजा जाम्बूनदमयत्सरुम्॥१॥

लक्ष्मण को इस प्रकार आदेश देकर रघुकुल का आनन्द बढ़ाने वाले महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजी ने सोने की गूंठवाली तलवार कमर में बाँध ली॥ १॥

ततस्त्रिविनतं चापमादायात्मविभूषणम्।

आबध्य च कपालौ द्वौ जगामोदग्रविक्रमः॥२॥

तत्पश्चात् महापराक्रमी रघुनाथजी तीन स्थानों में झुके हुए अपने आभूषण रूप धनुष को हाथ में ले पीठ पर दो तरकस बाँधकर वहाँ से चल दिये॥२॥

तं वन्यराजो राजेन्द्रमापतन्तं निरीक्ष्य वै।

बभूवान्तर्हितस्त्रासात् पुनः संदर्शनेऽभवत्॥३॥

राजाधिराज श्रीराम को आते देख वह वन्य मृगों का राजा काञ्चनमृग भय के मारे छिप गया, किंतु फिर तुरंत ही उनके दृष्टिपथ में आ गया॥३॥

बद्धासिर्धनुरादाय प्रदुद्राव यतो मृगः।

तं स्म पश्यति रूपेण द्योतयन्तमिवाग्रतः॥४॥

अवेक्ष्यावेक्ष्य धावन्तं धनुष्पाणिर्महावने।

अतिवृत्तमिवोत्पाताल्लोभयानं कदाचन॥५॥

शङ्कितं तु समुद्घान्तमुत्पतन्तमिवाम्बरम्।

दृश्यमानमदृश्यं च वनोद्देशेषु केषुचित्॥६॥

छिन्नाभैरिव संवीतं शारदं चन्द्रमण्डलम्।

मुहूर्तादेव ददृशे मुहर्दूरात् प्रकाशते॥७॥

तब तलवार बाँधे और धनुष लिये श्रीराम जिस ओर वह मृग था, उसी ओर दौड़े। धनुर्धर श्रीराम ने देखा, वह अपने रूप से सामने की दिशा को प्रकाशित सी कर रहा था। उस महान् वन में वह पीछे की ओर देख-देखकर आगे की ओर भाग रहा था। कभी छलाँगें मारकर बहुत दूर निकल जाता और कभी इतना निकट दिखायी देता कि हाथ से पकड़ लेने का लोभ पैदा कर देता था। कभी डरा हुआ, कभी घबराया हुआ और कभी आकाश में उछलता हुआ दीख पड़ता था। कभी वन के किन्हीं स्थानों में छिपकर अदृश्य हो जाता था, मानो शरद्-ऋतु का चन्द्रमण्डल मेघखण्डों से आवृत हो गया हो। एक ही मुहूर्त में वह निकट दिखायी देता और पुनः बहुत दूर के स्थान चमक उठता था॥ ४–७॥

दर्शनादर्शनेनैव सोऽपाकर्षत राघवम्।

स दूरमाश्रमस्यास्य मारीचो मृगतां गतः॥८॥

इस तरह प्रकट होता और छिपता हुआ वह मृगरूपधारी मारीच श्रीरघुनाथजी को उनके आश्रम से बहुत दूर खींच ले गया॥ ८॥

आसीत् क्रुद्धस्तु काकुत्स्थो विवशस्तेन मोहितः।

अथावतस्थे सुश्रान्तश्छायामाश्रित्य शादले॥९॥

उस समय उससे मोहित और विवश होकर श्रीराम कुछ कुपित हो उठे और थककर एक जगह छाया का आश्रय ले हरी-हरी घासवाली भूमिपर खड़े हो गये। ९॥

स तमुन्मादयामास मृगरूपो निशाचरः।

मृगैः परिवृतोऽथान्यैरदूरात् प्रत्यदृश्यत॥१०॥

इस मृगरूपधारी निशाचर ने उन्हें उन्मत्त-सा कर दिया था। थोड़ी ही देर में वह दूसरे मृगों से घिरा हुआ पास ही दिखायी दिया॥१०॥

ग्रहीतुकामं दृष्ट्वा तं पुनरेवाभ्यधावत।

तत्क्षणादेव संत्रासात् पुनरन्तर्हितोऽभवत्॥११॥

श्रीराम मुझे पकड़ना चाहते हैं, यह देखकर वह फिर भागा और भय के मारे पुनः तत्काल ही अदृश्य हो गया॥११॥

पुनरेव ततो दूराद् वृक्षखण्डाद् विनिःसृतः।

दृष्ट्वा रामो महातेजास्तं हन्तुं कृतनिश्चयः॥१२॥

तदनन्तर वह पुनः दूरवर्ती वृक्ष-समूह से होकर निकला। उसे देखकर महातेजस्वी श्रीराम ने मार डालने का निश्चय किया॥ १२ ॥

भूयस्तु शरमुद्धृत्य कुपितस्तत्र राघवः।

सूर्यरश्मिप्रतीकाशं ज्वलन्तमरिमर्दनम्॥ १३॥

संधाय सुदृढे चापे विकृष्य बलवबली।

तमेव मृगमुद्दिश्य श्वसन्तमिव पन्नगम्॥१४॥

मुमोच ज्वलितं दीप्तमस्त्रं ब्रह्मविनिर्मितम्।

तब वहाँ क्रोध में भरे हुए बलवान् राघवेन्द्र श्रीराम ने तरकस से सूर्य की किरणों के समान तेजस्वी एक प्रज्वलित एवं शत्रु-संहारक बाण निकालकर उसे अपने सुदृढ़ धनुष पर रखा और उस धनुष को जोर से खींचकर उस मृग को ही लक्ष्य करके फुफकारते सर्प के समान सनसनाता हुआ वह प्रज्वलित एवं तेजस्वी बाण, जिसे ब्रह्माजी ने बनाया था, छोड़ दिया॥ १३-१४॥

शरीरं मृगरूपस्य विनिर्भिद्य शरोत्तमः ॥१५॥

मारीचस्यैव हृदयं बिभेदाशनिसंनिभः।

वज्र के समान तेजस्वी उस उत्तम बाण ने मृगरूपधारी मारीच के शरीर को चीरकर उसके हृदय को भी विदीर्ण कर दिया। १५ १/२ ॥

तालमात्रमथोत्प्लुत्य न्यपतत् स भृशातुरः॥१६॥

व्यनदद् भैरवं नादं धरण्यामल्पजीवितः।

“उसकी चोट से अत्यन्त आतुर हो वह राक्षस ताड़ के बराबर उछलकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। उसका जीवन समाप्त हो चला। वह पृथ्वी पर पड़ा-पड़ा भयंकर गर्जना करने लगा॥ १६ १/२॥

म्रियमाणस्तु मारीचो जहौ तां कृत्रिमा तनुम्॥ १७॥

स्मृत्वा तद्वचनं रक्षो दध्यौ केन तु लक्ष्मणम्।

इह प्रस्थापयेत् सीता तां शून्ये रावणो हरेत्॥ १८॥

मरते समय मारीच ने अपने उस कृत्रिम शरीर को त्याग दिया। फिर रावण के वचन का स्मरण करके उस राक्षस ने सोचा, किस उपाय से सीता लक्ष्मण को यहाँ भेज दे और सूने आश्रम से रावण उसे हर ले

जाय॥

स प्राप्तकालमाज्ञाय चकार च ततः स्वनम्।

सदृशं राघवस्येव हा सीते लक्ष्मणेति च॥१९॥

रावण के बताये हुए उपाय को काम में लाने का अवसर आ गया है—यह समझकर उसने श्रीरामचन्द्रजी के ही समान स्वर में ‘हा सीते! हा लक्ष्मण !’ कहकर पुकारा।।

तेन मर्मणि निर्विद्धं शरेणानुपमेन हि।

मृगरूपं तु तत् त्यक्त्वा राक्षसं रूपमास्थितः॥ २०॥

श्रीराम के अनुपम बाण से उसका मर्म विदीर्ण हो गया था, अतः उस मृगरूप को त्यागकर उसने राक्षसरूप धारण कर लिया॥२०॥

चक्रे स सुमहाकायं मारीचो जीवितं त्यजन्।

तं दृष्ट्वा पतितं भूमौ राक्षसं भीमदर्शनम्॥२१॥

रामो रुधिरसिक्ताङ्गं चेष्टमानं महीतले।

जगाम मनसा सीतां लक्ष्मणस्य वचः स्मरन्॥ २२॥

प्राणत्याग करते समय मारीच ने अपने शरीर को बहुत बड़ा बना लिया था। भयंकर दिखायी देने वाले उस राक्षस को भूमिपर पड़कर खून से लथपथ हो धरती पर लोटते और छटपटाते देख श्रीराम को लक्ष्मण की कही हुई बात याद आ गयी और वे मन ही-मन सीता की चिन्ता करने लगे॥ २१-२२ ॥

मारीचस्य तु मायैषा पूर्वोक्तं लक्ष्मणेन तु।

तत् तथा ह्यभवच्चाद्य मारीचोऽयं मया हतः॥ २३॥

वे सोचने लगे, ‘अहो! जैसा लक्ष्मण ने पहले कहा था, उसके अनुसार यह वास्तव में मारीच की माया ही थी। लक्ष्मण की बात ठीक निकली। आज मेरे द्वारा यह मारीच ही मारा गया॥२३॥

हा सीते लक्ष्मणेत्येवमाक्रुश्य तु महास्वनम्।

ममार राक्षसः सोऽयं श्रुत्वा सीता कथं भवेत्॥ २४॥

लक्ष्मणश्च महाबाहुः कामवस्थां गमिष्यति।

‘परंतु यह राक्षस उच्च स्वर से ‘हा सीते! हा लक्ष्मण!’ की पुकार करके मरा है। उसके उस शब्दको सुनकर सीता की कैसी अवस्था हो जायगी और महाबाहु लक्ष्मण की भी क्या दशा होगी?’ ॥ २४ १/२॥

इति संचिन्त्य धर्मात्मा रामो हृष्टतनूरुहः॥२५॥

तत्र रामं भयं तीव्रमाविवेश विषादजम्।

राक्षसं मृगरूपं तं हत्वा श्रुत्वा च तत्स्वनम्॥ २६॥

ऐसा सोचकर धर्मात्मा श्रीराम के रोंगटे खड़े हो गये। उस समय वहाँ मृगरूपधारी उस राक्षस को मारकर और उसके उस शब्द को सुनकर श्रीराम के मन में विषादजनित तीव्र भय समा गया॥ २५-२६ ॥

निहत्य पृषतं चान्यं मांसमादाय राघवः।

त्वरमाणो जनस्थानं ससाराभिमुखं तदा ॥२७॥

उस लोकविलक्षण मृग का वध करके तपस्वी के उपभोग में आने योग्य फल-मूल आदि लेकर श्रीराम तत्काल ही जनस्थान के निकटवर्ती पञ्चवटी में स्थित अपने आश्रम की ओर बड़ी उतावली के साथ चले॥ २७॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे चतुश्चत्वारिंशः सर्गः॥ ४४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में चौवालीसवाँ सर्ग पूराहुआ॥४४॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अरण्यकाण्डम्

सीता के मार्मिक वचनों से प्रेरित होकर लक्ष्मण का श्रीराम के पास जाना

पञ्चचत्वारिंशः सर्गः

सर्ग-45


आर्तस्वरं तु तं भर्तुर्विज्ञाय सदृशं वने।

उवाच लक्ष्मणं सीता गच्छ जानीहि राघवम्॥

उस समय वन में जो आर्तनाद हुआ, उसे अपने पति के स्वर से मिलता-जुलता जान श्रीसीताजी लक्ष्मण से बोलीं—’भैया! जाओ, श्रीरघुनाथजी की सुधि लो—उनका समाचार जानो॥१॥

नहि मे जीवितं स्थाने हृदयं वावतिष्ठते।

क्रोशतः परमार्तस्य श्रुतः शब्दो मया भृशम्॥ २॥

‘उन्होंने बड़े आर्तस्वर से हमलोगों को पुकारा है। मैंने उनका वह शब्द सुना है। वह बहुत उच्च स्वर से बोला गया था। उसे सुनकर मेरे प्राण और मन अपने स्थान पर नहीं रह गये हैं-मैं घबरा उठी हूँ॥२॥

आक्रन्दमानं तु वने भ्रातरं त्रातुमर्हसि।

तंक्षिप्रमभिधाव त्वं भ्रातरं शरणैषिणम्॥३॥

रक्षसां वशमापन्नं सिंहानामिव गोवृषम्।

न जगाम तथोक्तस्तु भ्रातुराज्ञाय शासनम्॥४॥

‘तुम्हारे भाई वन में आर्तनाद कर रहे हैं। वे कोई शरण-रक्षा का सहारा चाहते हैं। तुम उन्हें बचाओ। ङ्के जल्दी ही अपने भाई के पास दौड़े हुए जाओ। जैसे कोई साँड सिंहों के पंजे में फँस गया हो, उसी प्रकार वे राक्षसों के वश में पड़ गये हैं, अतः जाओ।’ सीताके ऐसा कहने पर भी भाई के आदेश का विचार करके लक्ष्मण नहीं गये॥ ३-४॥

तमुवाच ततस्तत्र क्षुभिता जनकात्मजा।

सौमित्रे मित्ररूपेण भ्रातुस्त्वमसि शत्रुवत्॥५॥

यस्त्वमस्यामवस्थायां भ्रातरं नाभिपद्यसे।

इच्छसि त्वं विनश्यन्तं रामं लक्ष्मण मत्कृते॥६॥

उनके इस व्यवहार से वहाँ जनककिशोरी सीता क्षुब्ध हो उठीं और उनसे इस प्रकार बोलीं—’सुमित्राकुमार! तुम मित्र रूप में अपने भाई के शत्रु ही जान पड़ते हो, इसीलिये तुम इस संकट की अवस्था में भी भाई के पास नहीं पहुंच रहे हो। लक्ष्मण ! मैं जानती हूँ, तुम मुझ पर अधिकार करने के लिये इस समय श्रीराम का विनाश ही चाहते हो॥ ५-६॥

लोभात्तु मत्कृते नूनं नानुगच्छसि राघवम्।

व्यसनं ते प्रियं मन्ये स्नेहो भ्रातरि नास्ति ते॥७॥

‘मेरे लिये तुम्हारे मन में लोभ हो गया है, निश्चय ही इसीलिये तुम श्रीरघुनाथजी के पीछे नहीं जा रहे हो। मैं समझती हूँ, श्रीराम का संकटमें पड़ना ही तुम्हें प्रिय है। तुम्हारे मन में अपने भाई के प्रति स्नेह नहीं है॥७॥

तेन तिष्ठसि विस्रब्धं तमपश्यन् महाद्युतिम्।

किं हि संशयमापन्ने तस्मिन्निह मया भवेत्॥८॥

कर्तव्यमिह तिष्ठन्त्या यत्प्रधानस्त्वमागतः।

‘यही कारण है कि तुम उन महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजी को देखने न जाकर यहाँ निश्चिन्त खड़े हो। हाय! जो मुख्यतः तुम्हारे सेव्य हैं, जिनकी रक्षा और सेवा के लिये तुम यहाँ आये हो, यदि उन्हीं के प्राण संकट में पड़ गये तो यहाँ मेरी रक्षा से क्या होगा?’ ॥ ८ १/२॥

एवं ब्रुवाणां वैदेहीं बाष्पशोकसमन्विताम्॥९॥

अब्रवील्लक्ष्मणस्त्रस्तां सीतां मृगवधूमिव।

‘विदेहकमारी सीताजी की दशा भयभीत हई हरिणी के समान हो रही थी। उन्होंने शोकमग्न होकर आँसू बहाते हुए जब उपर्युक्त बातें कहीं, तब लक्ष्मण उनसे इस प्रकार बोले- ॥ ९ १/२॥

पन्नगासुरगन्धर्वदेवदानवराक्षसैः॥१०॥

अशक्यस्तव वैदेहि भर्ता जेतुं न संशयः।

‘विदेहनन्दिनि! आप विश्वास करें, नाग, असुर, गन्धर्व, देवता, दानव तथा राक्षस-ये सब मिलकर भी आपके पति को परास्त नहीं कर सकते, मेरे इस कथन में संशय नहीं है॥ १० १/२॥

देवि देवमनुष्येषु गन्धर्वेषु पतत्रिषु॥११॥

राक्षसेषु पिशाचेषु किन्नरेषु मृगेषु च।

दानवेषु च घोरेषु न स विद्येत शोभने॥१२॥

यो रामं प्रतियुध्येत समरे वासवोपमम्।

अवध्यः समरे रामो नैवं त्वं वक्तमर्हसि॥१३॥

‘देवि! शोभने! देवताओं, मनुष्यों, गन्धर्वो, पक्षियों, राक्षसों, पिशाचों, किन्नरों, मृगों तथा घोर दानवों में भी ऐसा कोई वीर नहीं है, जो समराङ्गण में इन्द्र के समान पराक्रमी श्रीराम का सामना कर सके। भगवान् श्रीराम युद्ध में अवध्य हैं, अतएव आपको ऐसी बात ही नहीं कहनी चाहिये॥ ११–१३॥

न त्वामस्मिन् वने हातुमुत्सहे राघवं विना।

अनिवार्यं बलं तस्य बलैर्बलवतामपि॥१४॥

त्रिभिर्लोकैः समुदितैः सेश्वरैः सामरैरपि।

हृदयं निर्वृतं तेऽस्तु संतापस्त्यज्यतां तव॥१५॥

‘श्रीरामचन्द्रजी की अनुपस्थिति में इस वन के भीतर मैं आपको अकेली नहीं छोड़ सकता। सैनिक-बल से सम्पन्न बड़े-बड़े राजा अपनी सारी सेनाओं के द्वारा भी श्रीराम के बल को कुण्ठित नहीं कर सकते। देवताओं तथा इन्द्र आदि के साथ मिले हुए तीनों लोक भी यदि आक्रमण करें तो वे श्रीराम के बल का वेग नहीं रोक सकते; अतः आपका हृदय शान्त हो। आप संताप छोड़ दें॥१४-१५ ॥

आगमिष्यति ते भर्ता शीघ्रं हत्वा मृगोत्तमम्।

न स तस्य स्वरो व्यक्तं न कश्चिदपि दैवतः॥ १६॥

गन्धर्वनगरप्रख्या माया तस्य च रक्षसः।

‘आपके पतिदेव उस सुन्दर मृग को मारकर शीघ्र ही लौट आयेंगे। वह शब्द जो आपने सुना था, अवश्य ही उनका नहीं था। किसी देवता ने कोई शब्द प्रकट किया हो, ऐसी बात भी नहीं है। वह तो उस राक्षस की गन्धर्वनगर के समान झूठी माया ही थी॥ १६ १/२

न्यासभूतासि वैदेहि न्यस्ता मयि महात्मना॥ १७॥

रामेण त्वं वरारोहे न त्वां त्यक्तुमिहोत्सहे।

‘सुन्दरि! विदेहनन्दिनि! महात्मा श्रीरामचन्द्रजी ने मुझपर आपकी रक्षा का भार सौंपा है। इस समय आप मेरे पास उनकी धरोहर के रूप में हैं। अतः आपको मैं यहाँ अकेली नहीं छोड़ सकता॥ १७ १/२॥

कृतवैराश्च कल्याणि वयमेतैर्निशाचरैः॥१८॥

खरस्य निधने देवि जनस्थानवधं प्रति।।

‘कल्याणमयी देवि! जिस समय खर का वध किया गया, उस समय जनस्थान निवासी दूसरे बहुत-से राक्षस भी मारे गये थे, इस कारण इन निशाचरों ने हमारे साथ वैर बाँध लिया है॥ १८ १/२ ॥

राक्षसा विविधा वाचो व्याहरन्ति महावने॥१९॥

हिंसाविहारा वैदेहि न चिन्तयितुमर्हसि।

‘विदेहनन्दिनि! प्राणियों की हिंसा ही जिनका क्रीड़ा-विहार या मनोरञ्जन है, वे राक्षस ही इस विशाल वन में नाना प्रकार की बोलियाँ बोला करते हैं; अतः आपको चिन्ता नहीं करनी चाहिये’॥ १९ १/२॥

लक्ष्मणेनैवमुक्ता तु क्रुद्धा संरक्तलोचना॥२०॥

अब्रवीत् परुषं वाक्यं लक्ष्मणं सत्यवादिनम्।

लक्ष्मण के ऐसा कहने पर सीता को बड़ा क्रोध हुआ, उनकी आँखें लाल हो गयीं और वे सत्यवादी लक्ष्मण से कठोर बातें कहने लगीं- ॥ २० १/२॥

अनार्याकरुणारम्भ नृशंस कुलपांसन॥२१॥

अहं तव प्रियं मन्ये रामस्य व्यसनं महत्।

रामस्य व्यसनं दृष्ट्वा तेनैतानि प्रभाषसे॥२२॥

‘अनार्य! निर्दयी! क्रूरकर्मा! कुलाङ्गार! मैं तुझे खूब समझती हूँ। श्रीराम किसी भारी विपत्ति में पड़ जायँ, यही तुझे प्रिय है। इसीलिये तू राम पर संकट आया देखकर भी ऐसी बातें बना रहा है॥ २१-२२॥

नैव चित्रं सपनेषु पापं लक्ष्मण यद् भवेत्।

त्वद्विधेषु नृशंसेषु नित्यं प्रच्छन्नचारिषु॥२३॥

‘लक्ष्मण! तेरे-जैसे क्रूर एवं सदा छिपे हुए शत्रुओं के मन में इस तरह का पापपूर्ण विचार होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है॥ २३॥

सुदुष्टस्त्वं वने राममेकमेकोऽनुगच्छसि।

मम हेतोः प्रतिच्छन्नः प्रयुक्तो भरतेन वा॥२४॥

‘तू बड़ा दुष्ट है, श्रीराम को अकेले वन में आते देख मुझे प्राप्त करने के लिये ही अपने भाव को छिपाकर तू भी अकेला ही उनके पीछे-पीछे चला आया है, अथवा यह भी सम्भव है कि भरत ने ही तुझे भेजा हो॥

तन्न सिध्यति सौमित्रे तवापि भरतस्य वा।

कथमिन्दीवरश्यामं रामं पद्मनिभेक्षणम्॥२५॥

उपसंश्रित्य भर्तारं कामयेयं पृथग्जनम्।

‘परंतु सुमित्राकुमार! तेरा या भरत का वह मनोरथ सिद्ध नहीं हो सकता। नीलकमल के समान श्यामसुन्दर कमलनयन श्रीराम को पतिरूप में पाकर मैं दूसरे किसी क्षुद्र पुरुष की कामना कैसे कर सकती हूँ? ॥ २५॥

समक्षं तव सौमित्रे प्राणांस्त्यक्ष्याम्यसंशयम्॥ २६॥

रामं विना क्षणमपि नैव जीवामि भूतले।

‘सुमित्राकुमार! मैं तेरे सामने ही निःसंदेह अपने प्राण त्याग दूंगी, किंतु श्रीराम के बिना एक क्षण भी इस भूतलपर जीवित नहीं रह सकूँगी’ ॥ २६ १/२॥

इत्युक्तः परुषं वाक्यं सीतया रोमहर्षणम्॥२७॥

अब्रवील्लक्ष्मणः सीतां प्राञ्जलिः स जितेन्द्रियः।

उत्तरं नोत्सहे वक्तुं दैवतं भवती मम॥२८॥

सीता ने जब इस प्रकार कठोर तथा रोंगटे खड़े कर देने वाली बात कही, तब जितेन्द्रिय लक्ष्मण हाथ जोड़कर उनसे बोले—’देवि! मैं आपकी बातका जवाब नहीं दे सकता; क्योंकि आप मेरे लिये आराधनीया देवी के समान हैं॥ २७-२८॥

वाक्यमप्रतिरूपं तु न चित्रं स्त्रीषु मैथिलि।

स्वभावस्त्वेष नारीणामेषु लोकेषु दृश्यते॥२९॥

‘मिथिलेशकुमारी! ऐसी अनुचित और प्रतिकूल बातें मुँह से निकालना स्त्रियों के लिये आश्चर्य की बात नहीं है; क्योंकि इस संसार में नारियों का ऐसा स्वभाव बहुधा देखा जाता है।॥ २९॥

विमुक्तधर्माश्चपलास्तीक्ष्णा भेदकराः स्त्रियः।

न सहे हीदृशं वाक्यं वैदेहि जनकात्मजे॥३०॥

श्रोत्रयोरुभयोर्मध्ये तप्तनाराचसंनिभम्।

‘स्त्रियाँ प्रायः विनय आदि धर्मोंसे रहित, चञ्चल, कठोर तथा घरमें फूट डालनेवाली होती हैं। विदेहकुमारी जानकी! आपकी यह बात मेरे दोनों कानोंमें तपाये हुए लोहेके समान लगी है। मैं ऐसी बात सह नहीं सकता। ३० १/२ ॥

उपशृण्वन्तु मे सर्वे साक्षिणो हि वनेचराः॥३१॥

न्यायवादी यथा वाक्यमुक्तोऽहं परुषं त्वया।

धिक् त्वामद्य विनश्यन्तीं यन्मामेवं विशङ्कसे॥ ३२॥

स्त्रीत्वाद् दुष्टस्वभावेन गुरुवाक्ये व्यवस्थितम्।

ङ्केाच्छामि काकुत्स्थः स्वस्ति तेऽस्तु वरानने ३३॥

‘इस वन में विचरने वाले सभी प्राणी साक्षी होकर मेरा कथन सुनें। मैंने न्याययुक्त बात कही है तो भी आपने मेरे प्रति ऐसी कठोर बात अपने मुँह से निकाली है। निश्चय ही आज आपकी बुद्धि मारी गयी है। आप नष्ट होना चाहती हैं। धिक्कार है आपको, जो आप मुझपर ऐसा संदेह करती हैं। मैं बड़े भाई की आज्ञा का पालन करने में दृढ़तापूर्वक तत्पर हूँ और आप केवल नारी होने के कारण साधारण स्त्रियों के दुष्ट स्वभाव को अपनाकर मेरे प्रति ऐसी आशङ्का करती हैं। अच्छा अब मैं वहीं जाता हूँ, जहाँ भैया श्रीराम गये हैं। सुमुखि! आपका कल्याण हो॥ ३१-३३॥

रक्षन्तु त्वां विशालाक्षि समग्रा वनदेवताः।

निमित्तानि हि घोराणि यानि प्रादुर्भवन्ति मे।

अपि त्वां सह रामेण पश्येयं पुनरागतः॥ ३४॥

‘विशाललोचने! वन के सम्पूर्ण देवता आपकी रक्षा करें; क्योंकि इस समय मेरे सामने जो बड़े भयंकर अपशकुन प्रकट हो रहे हैं, उन्होंने मुझे संशय में डाल दिया है। क्या मैं श्रीरामचन्द्रजी के साथ लौटकर पुनः आपको सकुशल देख सकूँगा?’ ॥ ३४॥

लक्ष्मणेनैवमुक्ता तु रुदती जनकात्मजा।

प्रत्युवाच ततो वाक्यं तीव्रबाष्पपरिप्लुता॥ ३५॥

लक्ष्मण के ऐसा कहने पर जनककिशोरी सीता रोने लगीं। उनके नेत्रों से आँसुओं की तीव्र धारा बह चली। वे उन्हें इस प्रकार उत्तर देती हुई बोलीं- ॥ ३५ ॥

गोदावरी प्रवेक्ष्यामि हीना रामेण लक्ष्मण।

आबन्धिष्येऽथवा त्यक्ष्ये विषमे देहमात्मनः॥ ३६॥

पिबामि वा विषं तीक्ष्णं प्रवेक्ष्यामि हताशनम।

न त्वहं राघवादन्यं कदापि पुरुषं स्पृशे॥३७॥

‘लक्ष्मण! मैं श्रीराम से बिछुड़ जाने पर गोदावरी नदी में समा जाऊँगी अथवा गले में फाँसी लगा लूँगी अथवा पर्वत के दुर्गम शिखर पर चढ़कर वहाँ से अपने शरीर को नीचे डाल दूँगी या तीव्र विष पान कर लूँगी अथवा जलती आग में प्रवेश कर जाऊँगी, परंतु श्रीरघुनाथजी के सिवा दूसरे किसी पुरुष का कदापि स्पर्श नहीं करूँगी’ ॥ ३६-३७॥

इति लक्ष्मणमाश्रुत्य सीता शोकसमन्विता।

पाणिभ्यां रुदती दुःखादुदरं प्रजघान ह॥३८॥

लक्ष्मण के सामने यह प्रतिज्ञा करके शोकमग्न होकर रोती हुई सीता अधिक दुःख के कारण दोनों हाथों से अपने उदरपर आघात करने लगी छाती पीटने लगीं॥ ३८॥

तामार्तरूपां विमना रुदन्ती सौमित्रिरालोक्य विशालनेत्राम्।

आश्वासयामास न चैव भर्तुस्तं भ्रातरं किंचिदुवाच सीता॥३९॥

विशाललोचना सीता को आर्त होकर रोती देख सुमित्राकुमार लक्ष्मण ने मन-ही-मन उन्हें सान्त्वना दी, परंतु सीता उस समय अपने देवर से कुछ नहीं बोलीं॥

ततस्तु सीतामभिवाद्य लक्ष्मणः कृताञ्जलिः किंचिदभिप्रणम्य।

अवेक्षमाणो बहुशः स मैथिली जगाम रामस्य समीपमात्मवान्॥४०॥

तब मन को वश में रखने वाले लक्ष्मण ने दोनों हाथ जोड़ कुछ झुककर मिथिलेशकुमारी सीता को प्रणाम किया और बारंबार उनकी ओर देखते हुए वे श्रीरामचन्द्रजी के पास चल दिये॥ ४०॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे पञ्चचत्वारिंशः सर्गः॥ ४५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में पैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥४५॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अरण्यकाण्डम्

रावण का साधुवेष में सीता के पास जाकर उनका परिचय पूछना और सीता का आतिथ्य के लिये उसे आमन्त्रित करना

षट्चत्वारिंशः सर्गः

सर्ग-46


तया परुषमुक्तस्तु कुपितो राघवानुजः।

स विकांक्षन भृशं रामं प्रतस्थे नचिरादिव॥१॥

सीता के कठोर वचन कहने पर कुपित हुए लक्ष्मण श्रीराम से मिलने की विशेष इच्छा रखकर शीघ्र ही वहाँ से चल दिये॥१॥

तदासाद्य दशग्रीवः क्षिप्रमन्तरमास्थितः।

अभिचक्राम वैदेही परिव्राजकरूपधृक्॥२॥

लक्ष्मण के चले जाने पर रावण को मौका मिल गया, अतः वह संन्यासी का वेष धारण करके शीघ्र ही विदेहकुमारी सीता के समीप गया॥२॥

श्लक्ष्णकाषायसंवीतः शिखी छत्री उपानही।

वामे चांसेऽवसज्याथ शुभे यष्टिकमण्डलू॥३॥

वह शरीर पर साफ-सुथरा गेरुए रंग का वस्त्र लपेटे हुए था। उसके मस्तक पर शिखा, हाथ में छाता और पैरों में जूते थे। उसने बायें कंधे पर डंडा रखकर उसमें कमण्डलु लटका रखा था॥३॥

परिव्राजकरूपेण वैदेहीमन्ववर्तत।

तामाससादातिबलो भ्रातृभ्यां रहितां वने॥४॥

अत्यन्त बलवान् रावण उस वन में परिव्राजक का रूप धारण करके श्रीराम और लक्ष्मण दोनों बन्धुओं से रहित हुई अकेली विदेहकुमारी सीता के पास गया॥४॥

रहितां सूर्यचन्द्राभ्यां संध्यामिव महत्तमः।

तामपश्यत् ततो बालां राजपुत्रीं यशस्विनीम्॥

रोहिणीं शशिना हीनां ग्रहवद् भृशदारुणः।

जैसे सूर्य और चन्द्रमा से हीन हुई संध्या के पास महान् अंधकार उपस्थित हो, उसी प्रकार वह सीता के निकट गया। तदनन्तर जैसे चन्द्रमा से रहित हुई रोहिणी पर अत्यन्त दारुण ग्रह मंगल या शनैश्चर की दृष्टि पड़े, उसी प्रकार उस अतिशय क्रूर रावण ने उस भोली-भाली यशस्विनी राजकुमारी की ओर देखा॥ ५ १/२॥

तमुग्रं पापकर्माणं जनस्थानगता द्रुमाः॥६॥

संदृश्य न प्रकम्पन्ते न प्रवाति च मारुतः।

शीघ्रस्रोताश्च तं दृष्ट्वा वीक्षन्तं रक्तलोचनम्॥ ७॥

स्तिमितं गन्तुमारेभे भयाद् गोदावरी नदी।

उस भयंकर पापाचारी को आया देख जनस्थान के वृक्षों ने हिलना बंद कर दिया और हवा का वेग रुक गया। लाल नेत्रों वाले रावण को अपनी ओर दृष्टिपात करते देख तीव्र गति से बहने वाली गोदावरी नदी भय के मारे धीरे-धीरे बहने लगी। ६-७ १/२ ॥

रामस्य त्वन्तरं प्रेप्सुर्दशग्रीवस्तदन्तरे ॥८॥

उपतस्थे च वैदेहीं भिक्षुरूपेण रावणः।

राम से बदला लेने का अवसर ढूँढ़ने वाला दशमुख रावण उस समय भिक्षु रूप से विदेहकुमारी सीता के पास पहुँचा॥ ८ १/२॥

अभव्यो भव्यरूपेण भर्तारमनुशोचतीम्॥९॥

अभ्यवर्तत वैदेहीं चित्रामिव शनैश्चरः।

उस समय विदेहराजकुमारी सीता अपने पति के लिये शोक और चिन्ता में डूबी हुई थीं। उसी अवस्था में अभव्य रावण भव्य रूप धारण करके उनके सामने उपस्थित हुआ, मानो शनैश्चर ग्रह चित्रा के सामने जा पहुँचा हो॥

सहसा भव्यरूपेण तृणैः कूप इवावृतः॥१०॥

ङ्केअतिष्ठत् प्रेक्ष्य वैदेही रामपत्नी यशस्विनीम ।

जैसे कुआँ तिनकों से ढका हुआ हो, उसी प्रकार भव्य रूप से अपनी अभव्यता को छिपाकर रावण सहसा वहाँ जा पहुंचा और यशस्विनी रामपत्नी वैदेही को देखकर खड़ा हो गया॥ १०२ ।।

तिष्ठन् सम्प्रेक्ष्य च तदा पत्नी रामस्य रावणः॥ ११॥

शुभां रुचिरदन्तोष्ठी पूर्णचन्द्रनिभाननाम्।

आसीनां पर्णशालायां बाष्पशोकाभिपीडिताम्॥ १२॥

उस समय रावण वहाँ खड़ा-खड़ा रामपत्नी सीता को देखने लगा। वे बड़ी सुन्दरी थीं। उनके दाँत और ओठ भी सुन्दर थे, मुख पूर्ण चन्द्रमा की शोभा को छीने लेता था। वे पर्णशाला में बैठी हुई शोक से पीड़ित हो आँसू बहा रही थीं। ११-१२ ।।

स तां पद्मपलाशाक्षीं पीतकौशेयवासिनीम्।

अभ्यगच्छत वैदेहीं हृष्टचेता निशाचरः॥१३॥

वह निशाचर प्रसन्नचित्त हो रेशमी पीताम्बर से सुशोभित कमलनयनी विदेहकुमारी के सामने गया॥

दृष्ट्वा कामशराविद्धो ब्रह्मघोषमुदीरयन्।

अब्रवीत् प्रश्रितं वाक्यं रहिते राक्षसाधिपः॥ १४॥

उन्हें देखते ही कामदेव के बाणों से घायल हो राक्षसराज रावण वेदमन्त्र का उच्चारण करने लगा और उस एकान्त स्थान में विनीतभाव से उनसे कुछ कहने को उद्यत हुआ॥ १४ ॥

तामुत्तमां त्रिलोकानां पद्महीनामिव श्रियम्।

विभ्राजमानां वपुषा रावणः प्रशशंस ह ॥१५॥

त्रिलोकसुन्दरी सीता अपने शरीर से कमल से रहित कमलालया लक्ष्मी की भाँति शोभा पा रही थीं। रावण उनकी प्रशंसा करता हुआ बोला- ॥ १५ ॥

रौप्यकाञ्चनवर्णाभे पीतकौशेयवासिनि।

कमलानां शुभां मालां पद्मिनीव च बिभ्रती॥ १६॥

‘उत्तम सुवर्ण की-सी कान्तिवाली तथा रेशमी पीताम्बर धारण करने वाली सुन्दरी! (तुम कौन हो?) तुम्हारे मुख, नेत्र, हाथ और पैर कमलों के समान हैं, अतः तुम पद्मिनी (पुष्करिणी) की भाँति कमलों की सुन्दर-सी माला धारण करती हो ॥१६॥

हीः श्रीः कीर्तिः शुभा लक्ष्मीरप्सरा वा शुभानने।

भूतिर्वा त्वं वरारोहे रतिर्वा स्वैरचारिणी॥१७॥

‘शुभानने! तुम श्री, ह्री, कीर्ति, शुभस्वरूपा लक्ष्मी अथवा अप्सरा तो नहीं हो? अथवा वरारोहे ! तुम भूति या स्वेच्छापूर्वक विहार करने वाली कामदेव की पत्नी रति तो नहीं हो? ॥ १७॥

समाः शिखरिणः स्निग्धाः पाण्डुरा दशनास्तव।

विशाले विमले नेत्रे रक्तान्ते कृष्णतारके॥१८॥

विशालं जघनं पीनमूरू करिकरोपमौ।

तुम्हारे दाँत बराबर हैं। उनके अग्रभाग कुन्द की कलियों के समान शोभा पाते हैं। वे सब-के-सब चिकने और सफेद हैं। तुम्हारी दोनों आँखें बड़ी-बड़ी और निर्मल हैं। उनके दोनों कोये लाल हैं और पुतलियाँ काली हैं। कटि का अग्रभाग विशाल एवं मांसल है। दोनों जाँधे हाथी की (ड़के समान शोभा पाती हैं ।। १८ १/२॥

एतावुपचितौ वृत्तौ संहतौ सम्प्रगल्भितौ॥१९॥

पीनोन्नतमुखौ कान्तौ स्निग्धतालफलोपमौ।

मणिप्रवेकाभरणौ रुचिरौ ते पयोधरौ॥२०॥

‘तुम्हारे ये दोनों स्तन पुष्ट, गोलाकार, परस्पर सटे हुए, प्रगल्भ, मोटे, उठे हुए मुखवाले, कमनीय, चिकने ताड़फल के समान आकार वाले, परम सुन्दर और श्रेष्ठ मणिमय आभूषणों से विभूषित हैं। १९-२० ॥

चारुस्मिते चारुदति चारुनेत्रे विलासिनि।

मनो हरसि मे रामे नदीकूलमिवाम्भसा ॥ २१॥

‘सुन्दर मुसकान, रुचिर दन्तावली और मनोहर नेत्रवाली विलासिनी रमणी! तुम अपने रूप-सौन्दर्य से मेरे मन को वैसे ही हरे लेती हो, जैसे नदी जल के द्वारा अपने तट का अपहरण करती है।॥ २१॥

करान्तमितमध्यासि सुकेशे संहतस्तनि।

नैव देवी न गन्धर्वी न यक्षी न च किंनरी॥२२॥

‘तुम्हारी कमर इतनी पतली है कि मुट्ठी में आ जाय। केश चिकने और मनोहर हैं। दोनों स्तन एक दूसरे से सटे हुए हैं। सुन्दरी! देवता, गन्धर्व, यक्ष और किन्नर जाति की स्त्रियों में भी कोई तुम-जैसी नहीं है। २२॥

नैवंरूपा मया नारी दृष्टपूर्वा महीतले।

रूपमग्रयं च लोकेषु सौकुमार्यं वयश्च ते॥२३॥

इह वासश्च कान्तारे चित्तमुन्माथयन्ति मे।

सा प्रतिक्राम भद्रं ते न त्वं वस्तुमिहार्हसि ॥२४॥

‘पृथ्वी पर तो ऐसी रूपवती नारी मैंने आज से पहले कभी देखी ही नहीं थी। कहाँ तो तुम्हारा यह तीनों लोकों में सबसे सुन्दर रूप, सुकुमारता और नयी अवस्था और कहाँ इस दुर्गम वन में निवास! ये सब

बातें ध्यान में आते ही मेरे मन को मथे डालती हैं। तुम्हारा कल्याण हो। यहाँ से चली जाओ। तुम यहाँ रहने के योग्य नहीं हो॥

राक्षसानामयं वासो घोराणां कामरूपिणाम्।

प्रासादाग्राणि रम्याणि नगरोपवनानि च ॥ २५॥

सम्पन्नानि सुगन्धीनि युक्तान्याचरितुं त्वया।

‘यह तो इच्छानुसार रूप धारण करने वाले भयंकर राक्षसों के रहने की जगह है। तुम्हें तो रमणीय राजमहलों, समृद्धिशाली नगरों और सुगन्धयुक्त उपवनों में निवास करना और विचरना चाहिये॥ २५ १/२॥

वरं माल्यं वरं गन्धं वरं वस्त्रं च शोभने॥२६॥

भर्तारं च वरं मन्ये त्वद्युक्तमसितेक्षणे।

‘शोभने! वही पुरुष श्रेष्ठ है, वही गन्ध उत्तम है और वही वस्त्र सुन्दर है, जो तुम्हारे उपयोग में आये। कजरारे नेत्रोंवाली सुन्दरि! मैं उसी को श्रेष्ठ पति मानता हूँ, जिसे तुम्हारा सुखद संयोग प्राप्त हो॥ २६ १/२॥

का त्वं भवसि रुद्राणां मरुतां वा शुचिस्मिते॥ २७॥

वसूनां वा वरारोहे देवता प्रतिभासि मे।

‘पवित्र मुसकान और सुन्दर अङ्गोंवाली देवि! तुम कौन हो? मुझे तो तुम रुद्रों, मरुद्गणों अथवा वसुओं से सम्बन्ध रखने वाली देवी जान पड़ती हो॥

नेह गच्छन्ति गन्धर्वा न देवा न च किन्नराः॥ २८॥

राक्षसानामयं वासः कथं तु त्वमिहागता।

‘यहाँ गन्धर्व, देवता तथा किन्नर नहीं आते-जाते हैं। यह राक्षसों का निवास स्थान है, फिर तुम कैसे यहाँ आ गयी॥ २८ १/२॥

इह शाखामृगाः सिंहा दीपिव्याघ्रमृगा वृकाः॥ २९॥

ऋक्षास्तरक्षवः कङ्काः कथं तेभ्यो न बिभ्यसे।

‘यहाँ वानर, सिंह, चीते, व्याघ्र, मृग, भेड़िये, रीछ, शेर और कंक (गीध आदि पक्षी) रहते हैं। तुम्हें इनसे भय क्यों नहीं हो रहा है? ॥ २९ १/२॥

मदान्वितानां घोराणां कुञ्जराणां तरस्विनाम्॥ ३०॥

कथमेका महारण्ये न बिभेषि वरानने।

‘वरानने! इस विशाल वन के भीतर अत्यन्त वेगशाली और भयंकर मदमत्त गजराजों के बीच अकेली रहती हुई तुम भयभीत कैसे नहीं होती हो? ॥ ३० १/२॥

कासि कस्य कुतश्च त्वं किं निमित्तं च दण्डकान्॥३१॥

एका चरसि कल्याणि घोरान् राक्षससेवितान्।

‘कल्याणमयी देवि! बताओ, तुम कौन हो? किसकी हो? और कहाँ से आकर किस कारण इस राक्षससेवित घोर दण्डकारण्य में अकेली विचरण करती हो?’ ॥ ३१ १/२॥

इति प्रशस्ता वैदेही रावणेन महात्मना॥३२॥

द्विजातिवेषेण हि तं दृष्ट्वा रावणमागतम्।

सर्वैरतिथिसत्कारैः पूजयामास मैथिली॥३३॥

वेशभूषा से महात्मा बनकर आये हुए रावण ने जब विदेहकुमारी सीता की इस प्रकार प्रशंसा की, तब ब्राह्मण वेष में वहाँ पधारे हुए रावण को देखकर मैथिली ने अतिथि-सत्कार के लिये उपयोगी सभी सामग्रियों द्वारा उसका पूजन किया। ३२-३३॥

उपानीयासनं पूर्वं पाद्येनाभिनिमन्त्र्य च।

अब्रवीत् सिद्धमित्येव तदा तं सौम्यदर्शनम्॥ ३४॥

पहले बैठने के लिये आसन दे, पाद्य (पैर धोने के लिये जल) निवेदन किया। तदनन्तर ऊपर से सौम्य दिखायी देने वाले उस अतिथि को भोजन के लिये निमन्त्रण देते हुए कहा—’ब्रह्मन्! भोजन तैयार है, ग्रहण कीजिये॥

द्विजातिवेषेण समीक्ष्य मैथिली समागतं पात्रकुसुम्भधारिणम्।

अशक्यमुद्देष्टमुपायदर्शनान्यमन्त्रयद् ब्राह्मणवत् तथागतम्॥ ३५॥

वह ब्राह्मण के वेष में आया था, कमण्डलु और गेरुआ वस्त्र धारण किये हुए था। ब्राह्मण-वेष में आये हुए अतिथि की उपेक्षा असम्भव थी। उसकी वेशभूषा में ब्राह्मणत्व का निश्चय कराने वाले चिह्न दिखायी देते थे, अतः उस रूप में आये हुए उस रावण को देखकर मैथिली ने ब्राह्मण के योग्य सत्कार करने के लिये ही उसे निमन्त्रित किया॥ ३५ ॥

इयं बृसी ब्राह्मण काममास्यतामिदं च पाद्यं प्रतिगृह्यतामिति।

इदं च सिद्धं वनजातमुत्तमं त्वदर्थमव्यग्रमिहोपभुज्यताम्॥३६॥

वे बोलीं—’ब्राह्मण! यह चटाई है, इस पर इच्छानुसार बैठ जाइये। यह पैर धोने के लिये जल है, इसे ग्रहण कीजिये और यह वन में ही उत्पन्न हुआ उत्तम फल-मूल आपके लिये ही तैयार करके रखा गया है, यहाँ शान्तभाव से उसका उपभोग कीजिये’। ३६॥

निमन्त्र्यमाणः प्रतिपूर्णभाषिणीं नरेन्द्रपत्नी प्रसमीक्ष्य मैथिलीम्।

प्रसह्य तस्या हरणे दृढं मनः समर्पयामास वधाय रावणः॥ ३७॥

‘अतिथि के लिये सब कुछ तैयार है’ ऐसा कहकर । सीता ने जब उसे भोजन के लिये निमन्त्रित किया, तब रावण ने ‘सर्वं सम्पन्नम्’ कहने वाली राजरानी मैथिली की ओर देखा और अपने ही वध के लिये उसने हठपूर्वक सीता का हरण करने के निमित्त मन में दृढ़ निश्चय कर लिया॥ ३७॥

ततः सुवेषं मृगयागतं पतिं प्रतीक्षमाणा सहलक्ष्मणं तदा।

निरीक्षमाणा हरितं ददर्श तन्महद् वनं नैव तु रामलक्ष्मणौ ॥३८॥

तदनन्तर सीता शिकार खेलने के लिये गये हुए लक्ष्मणसहित अपने सुन्दर वेषधारी पति श्रीरामचन्द्रजी की प्रतीक्षा करने लगीं। उन्होंने चारों ओर दृष्टि दौड़ायी, किंतु उन्हें सब ओर हराभरा विशाल वन ही दिखायी दिया, श्रीराम और लक्ष्मण नहीं दीख पड़े॥ ३८॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे षट्चत्वारिंशः सर्गः॥४६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में छियालीसवाँ सर्ग पूराहुआ॥ ४६॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अरण्यकाण्डम्

सीता का रावण को अपना और पति का परिचय देकर वन में आने का कारण बताना, रावण का उन्हें अपनी पटरानी बनाने की इच्छा प्रकट करना और सीता का उसे फटकारना

सप्तचत्वारिंशः सर्गः

सर्ग-47


रावणेन तु वैदेही तदा पृष्टा जिहीर्षुणा।

परिव्राजकरूपेण शशंसात्मानमात्मना॥१॥

सीता को हरने की इच्छा से परिव्राजक (संन्यासी)का रूप धारण करके आये हुए रावण ने उस समय जब विदेहराजकुमारी से इस प्रकार पूछा, तब उन्होंने स्वयं ही अपना परिचय दिया॥१॥

ब्राह्मणश्चातिथिश्चैष अनुक्तो हि शपेत माम्।

इति ध्यात्वा मुहूर्तं तु सीता वचनमब्रवीत्॥२॥

वे दो घड़ी तक इस विचार में पड़ी रहीं कि ये ब्राह्मण और अतिथि हैं, यदि इनकी बात का उत्तर न दिया जाय तो ये मुझे शाप दे देंगे। यह सोचकर सीता ने इस प्रकार कहना आरम्भ किया— ॥२॥

दुहिता जनकस्याहं मैथिलस्य महात्मनः।

सीता नाम्नास्मि भद्रं ते रामस्य महिषी प्रिया॥

‘ब्रह्मन्! आपका भला हो। मैं मिथिलानरेश महात्मा जनक की पुत्री और अवधनरेश श्रीरामचन्द्रजी की प्यारी रानी हूँ। मेरा नाम सीता है। ३॥

उषित्वा द्वादश समा इक्ष्वाकूणां निवेशने।

भुजाना मानुषान् भोगान् सर्वकामसमृद्धिनी॥ ४॥

‘विवाह के बाद बारह वर्षों तक इक्ष्वाकुवंशी महाराज दशरथ के महल में रहकर मैंने अपने पति के साथ सभी मानवोचित भोग भोगे हैं। मैं वहाँ सदा मनोवाञ्छित सुख-सुविधाओं से सम्पन्न रही हूँ॥ ४॥

तत्र त्रयोदशे वर्षे राजाऽमन्त्रयत प्रभुः।।

अभिषेचयितं रामं समेतो राजमन्त्रिभिः॥५॥

‘तेरहवें वर्ष के प्रारम्भ में सामर्थ्यशाली महाराज दशरथ ने राजमन्त्रियों से मिलकर सलाह की और श्रीरामचन्द्रजी का युवराजपद पर अभिषेक करने का निश्चय किया॥५॥

तस्मिन् सम्भ्रियमाणे तु राघवस्याभिषेचने।

कैकेयी नाम भर्तारं ममार्या याचते वरम्॥६॥

‘जब श्रीरघुनाथजी के राज्याभिषेक की सामग्री जुटायी जाने लगी, उस समय मेरी सास कैकेयी ने अपने पति से वर माँगा॥ ६॥

परिगृह्य तु कैकेयी श्वशुरं सुकृतेन मे।

मम प्रव्राजनं भर्तुर्भरतस्याभिषेचनम्॥७॥

द्वावयाचत भर्तारं सत्यसंधं नृपोत्तमम्।

‘कैकेयी ने मेरे श्वशुर को पुण्य की शपथ दिलाकर वचनबद्ध कर लिया, फिर अपने सत्यप्रतिज्ञ पति उन राजशिरोमणि से दो वर माँगे—मेरे पति के लिये वनवास और भरत के लिये राज्याभिषेक॥ ७ १/२॥

नाद्य भोक्ष्ये न च स्वप्स्ये न पास्ये न कदाचन॥ ८॥

एष मे जीवितस्यान्तो रामो यदभिषिच्यते।

‘कैकेयी हठपूर्वक कहने लगीं यदि आज श्रीराम का अभिषेक किया गया तो मैं न तो खाऊँगी, न पीऊँगी और न कभी सोऊँगी ही। यही मेरे जीवन का अन्त होगा। ८ १/२॥

इति ब्रुवाणां कैकेयीं श्वशुरो मे स पार्थिवः॥

अयाचतार्थैरन्वथैर्न च याच्यां चकार सा।

‘ऐसी बात कहती हुई कैकेयी से मेरे श्वशुर महाराज दशरथ ने यह याचना की कि ‘तुम सब प्रकार की उत्तम वस्तुएँ ले लो; किंतु श्रीराम के अभिषेक में विघ्न न डालो।’ किंतु कैकेयी ने  उनकी वह याचना सफल नहीं की।

मम भर्ता महातेजा वयसा पञ्चविंशकः॥१०॥

अष्टादश हि वर्षाणि मम जन्मनि गण्यते।।

‘उस समय मेरे महातेजस्वी पति की अवस्था पचीस साल से ऊपर की थी और मेरे जन्मकाल से लेकर वनगमन काल तक मेरी अवस्था वर्षगणना के अनुसार अठारह साल की हो गयी थी॥ १० ॥

रामेति प्रथितो लोके सत्यवान् शीलवान् शुचिः॥ ११॥

विशालाक्षो महाबाहुः सर्वभूतहिते रतः।

‘श्रीराम जगत् में सत्यवादी, सुशील और पवित्र रूप से विख्यात हैं। उनके नेत्र बड़े-बड़े और भुजाएँ विशाल हैं। वे समस्त प्राणियों के हित में तत्पर रहते हैं।

कामार्तश्च महाराजः पिता दशरथः स्वयम्॥ १२॥

कैकेय्याः प्रियकामार्थं तं रामं नाभ्यषेचयत्।

“उनके पिता महाराज दशरथ ने स्वयं काम पीड़ित होने के कारण कैकेयी का प्रिय करने की इच्छा से श्रीराम का अभिषेक नहीं किया॥१२ १/२॥

अभिषेकाय तु पितुः समीपं राममागतम्॥१३॥

कैकेयी मम भर्तारमित्युवाच द्रुतं वचः।

‘श्रीरामचन्द्रजी जब अभिषेक के लिये पिता के समीप आये, तब कैकेयी ने मेरे उन पतिदेव से तुरंत यह बात कही॥ १३ १/२॥

तव पित्रा समाज्ञप्तं ममेदं शृणु राघव॥१४॥

भरताय प्रदातव्यमिदं राज्यमकण्टकम्।

त्वया तु खलु वस्तव्यं नव वर्षाणि पञ्च च॥ १५॥

वने प्रव्रज काकुत्स्थ पितरं मोचयानृतात् ।

‘रघुनन्दन! तुम्हारे पिता ने जो आज्ञा दी है, इसे मेरे मुँह से सुनो। यह निष्कण्टक राज्य भरत को दिया जायगा, तुम्हें तो चौदह वर्षों तक वन में ही निवास करना होगा। काकुत्स्थ! तुम वन को जाओ और पिता को असत्य के बन्धन से छुड़ाओ॥१४-१५ १/२॥

तथेत्युवाच तां रामः कैकेयीमकुतोभयः॥१६॥

चकार तद्वचः श्रुत्वा भर्ता मम दृढव्रतः।

‘किसी से भी भय न मानने वाले श्रीराम ने कैकेयी की वह बात सुनकर कहा—’बहुत अच्छा’। उन्होंने उसे स्वीकार कर लिया। मेरे स्वामी दृढ़तापूर्वक अपनी प्रतिज्ञा का पालन करने वाले हैं॥ १६ १/२॥

दद्यान्न प्रतिगृह्णीयात् सत्यं ब्रूयान्न चानृतम्॥ १७॥

एतद् ब्राह्मण रामस्य व्रतं धृतमनुत्तमम्।

‘श्रीराम केवल देते हैं, किसी से कुछ लेते नहीं। वे सदा सत्य बोलते हैं, झूठ नहीं। ब्राह्मण! यह श्रीरामचन्द्रजी का सर्वोत्तम व्रत है, जिसे उन्होंने धारण कर रखा है॥ १७ १/२॥

तस्य भ्राता तु वैमात्रो लक्ष्मणो नाम वीर्यवान्॥ १८॥

रामस्य पुरुषव्याघ्रः सहायः समरेऽरिहा ।

स भ्राता लक्ष्मणो नाम ब्रह्मचारी दृढव्रतः॥१९॥

‘श्रीराम के सौतेले भाई लक्ष्मण बड़े पराक्रमी हैं। समरभूमि में शत्रुओं का संहार करने वाले पुरुषसिंह लक्ष्मण श्रीराम के सहायक हैं, बन्धु हैं, ब्रह्मचारी और उत्तम व्रत का दृढ़तापूर्वक पालन करने वाले हैं। १८-१९॥

अन्वगच्छद् धनुष्पाणिः प्रव्रजन्तं मया सह।

जटी तापसरूपेण मया सह सहानुजः॥२०॥

प्रविष्टो दण्डकारण्यं धर्मनित्यो दृढव्रतः।

‘श्रीरघुनाथजी मेरे साथ जब वन में आने लगे, तब लक्ष्मण भी हाथ में धनुष लेकर उनके पीछे हो लिये। इस प्रकार मेरे और अपने छोटे भाई के साथ श्रीराम इस दण्डकारण्य में आये हैं। वे दृढ़प्रतिज्ञ तथा नित्यनिरन्तर धर्म में तत्पर रहने वाले हैं और सिरपर जटा धारण किये तपस्वी के वेश में यहाँ रहते हैं॥ २० १/२ ॥

ते वयं प्रच्युता राज्यात् कैकेय्यास्तु कृते त्रयः॥ २१॥

विचराम द्विजश्रेष्ठ वनं गम्भीरमोजसा।

समाश्वस मुहूर्तं तु शक्यं वस्तुमिह त्वया॥ २२॥

आगमिष्यति मे भर्ता वन्यमादाय पुष्कलम्।

‘द्विजश्रेष्ठ! इस प्रकार हम तीनों कैकेयी के कारण राज्य से वञ्चित हो इस गम्भीर वन में अपने ही बल के भरोसे विचरते हैं। आप यहाँ ठहर सकें तो दो घड़ी विश्राम करें। अभी मेरे स्वामी प्रचुरमात्रा में जंगली फल-मूल लेकर आते होंगे॥ २१-२२ १/२॥

रुरून् गोधान् वराहांश्च हत्वाऽऽदायामिषं बहु॥ २३॥

स त्वं नाम च गोत्रं च कुलमाचक्ष्व तत्त्वतः।

एकश्च दण्डकारण्ये किमर्थं चरसि द्विज॥ २४॥

‘रुरु, गोह और जंगली सूअर आदि हिंसक पशुओं का वध करके तपस्वी जनों के उपभोग में आने योग्य बहुत-सा फल-मूल लेकर वे अभी आयँगे (उस समय आपका विशेष सत्कार होगा)। ब्रह्मन् ! । अब आप भी अपने नाम-गोत्र और कुल का ठीक ठीक परिचय दीजिये। आप अकेले इस दण्डकारण्य में किसलिये विचरते हैं!’ ॥ २३-२४ ॥

एवं ब्रुवत्यां सीतायां रामपत्न्यां महाबलः।

प्रत्युवाचोत्तरं तीव्र रावणो राक्षसाधिपः॥ २५॥

श्रीरामपत्नी सीता के इस प्रकार पूछने पर महाबली राक्षसराज रावण ने अत्यन्त कठोर शब्दों में उत्तर दिया

येन वित्रासिता लोकाः सदेवासुरमानुषाः।

अहं स रावणो नाम सीते रक्षोगणेश्वरः॥२६॥

‘सीते! जिसके नाम से देवता, असुर और मनुष्योंसहित तीनों लोक थर्रा उठते हैं, मैं वही राक्षसों का राजा रावण हूँ॥ २६॥

त्वां तु काञ्चनवर्णाभां दृष्ट्वा कौशेयवासिनीम्।

रतिं स्वकेषु दारेषु नाधिगच्छाम्यनिन्दिते॥ २७॥

‘अनिन्द्यसुन्दरि ! तुम्हारे अङ्गों की कान्ति सुवर्ण के समान है, जिनपर रेशमी साड़ी शोभा पा रही है। तुम्हें देखकर अब मेरा मन अपनी स्त्रियों की ओर नहीं जाता है।॥ २७॥

बह्वीनामुत्तमस्त्रीणामाहृतानामितस्ततः।

सर्वासामेव भद्रं ते ममाग्रमहिषी भव॥२८॥

‘मैं इधर-उधर से बहुत-सी सुन्दरी स्त्रियों को हर लाया हूँ। उन सबमें तुम मेरी पटरानी बनो। तुम्हारा भला हो॥ २८॥

लङ्का नाम समुद्रस्य मध्ये मम महापुरी।

सागरेण परिक्षिप्ता निविष्टा गिरिमूर्धनि॥२९॥

‘मेरी राजधानी का नाम लङ्का है। वह महापुरी समुद्र के बीच में एक पर्वत के शिखर पर बसी हुई है। समुद्र ने उसे चारों ओर से घेर रखा है॥२९॥

तत्र सीते मया सार्धं वनेषु विचरिष्यसि।

न चास्य वनवासस्य स्पृहयिष्यसि भामिनि॥ ३०॥

‘सीते! वहाँ रहकर तुम मेरे साथ नाना प्रकार के वनों में विचरण करोगी। भामिनि ! फिर तुम्हारे मन में इस वनवास की इच्छा कभी नहीं होगी॥ ३० ॥

पञ्च दास्यः सहस्राणि सर्वाभरणभूषिताः।

सीते परिचरिष्यन्ति भार्या भवसि मे यदि॥३१॥

‘सीते! यदि तुम मेरी भार्या हो जाओगी तो सब प्रकार के आभूषणों से विभूषित पाँच हजार दासियाँ सदा तुम्हारी सेवा किया करेंगी’ ॥ ३१ ॥

रावणेनैवमुक्ता तु कुपिता जनकात्मजा।

प्रत्युवाचानवद्याङ्गी तमनादृत्य राक्षसम्॥३२॥

रावण के ऐसा कहने पर निर्दोष अङ्गोंवाली जनकनन्दिनी सीता कुपित हो उठीं और राक्षस का तिरस्कार करके उसे यों उत्तर देने लगीं- ॥३२॥

महागिरिमिवाकम्प्यं महेन्द्रसदृशं पतिम्।

महोदधिमिवाक्षोभ्यमहं राममनुव्रता॥३३॥

‘मेरे पतिदेव भगवान् श्रीराम महान् पर्वत के समान अविचल हैं, इन्द्र के तुल्य पराक्रमी हैं और महासागर के समान प्रशान्त हैं, उन्हें कोई क्षुब्ध नहीं कर सकता। मैं तन-मन-प्राण से उन्हीं का अनुसरण करने वाली तथा उन्हीं की अनुरागिणी हूँ॥ ३३॥

सर्वलक्षणसम्पन्नं न्यग्रोधपरिमण्डलम्।

सत्यसंधं महाभागमहं राममनूव्रता॥३४॥

‘श्रीरामचन्द्रजी समस्त शुभ लक्षणों से सम्पन्न, वटवृक्ष की भाँति सबको अपनी छाया में आश्रय देने वाले, सत्यप्रतिज्ञ और महान् सौभाग्यशाली हैं। मैं उन्हीं की अनन्य अनुरागिणी हूँ॥ ३४॥

महाबाहुं महोरस्कं सिंहविक्रान्तगामिनम्।

नृसिंहं सिंहसंकाशमहं राममनुव्रता॥ ३५॥

‘उनकी भुजाएँ बड़ी-बड़ी और छाती चौड़ी है। वे सिंह के समान पाँव बढ़ाते हुए बड़े गर्व के साथ चलते हैं और सिंह के ही समान पराक्रमी हैं। मैं उन पुरुषसिंह श्रीराम में ही अनन्य भक्ति रखने वाली हूँ। ३५॥

पूर्णचन्द्राननं रामं राजवत्सं जितेन्द्रियम्।

पृथुकीर्तिं महाबाहुमहं राममनुव्रता॥३६॥

‘राजकुमार श्रीराम का मुख पूर्ण चन्द्रमा के समान मनोहर है। वे जितेन्द्रिय हैं और उनका यश महान् है। उन महाबाहु श्रीराम में ही दृढ़तापूर्वक मेरा मन लगा हुआ है॥ ३६॥

त्वं पुनर्जम्बुकः सिंहीं मामिहेच्छसि दुर्लभाम्।

नाहं शक्या त्वया स्प्रष्टमादित्यस्य प्रभा यथा॥ ३७॥

‘पापी निशाचर ! तू सियार है और मैं सिंहिनी हूँ। मैं तेरे लिये सर्वथा दुर्लभ हूँ। क्या तू यहाँ मुझे प्राप्त करने की इच्छा रखता है। अरे! जैसे सूर्य की प्रभा पर कोई हाथ नहीं लगा सकता, उसी प्रकार तू मुझे छू भी नहीं सकता॥ ३७॥

पादपान् काञ्चनान् नूनं बहून् पश्यसि मन्दभाक्।

राघवस्य प्रियां भार्यां यस्त्वमिच्छसि राक्षस॥ ३८॥

‘अभागे राक्षस! तेरा इतना साहस! तू श्रीरघुनाथजी की प्यारी पत्नी का अपहरण करना चाहता है! निश्चय ही तुझे बहुत-से सोने के वृक्ष दिखायी देने लगे हैं—अब तू मौत के निकट जा पहुँचा है॥ ३८॥

क्षुधितस्य च सिंहस्य मृगशत्रोस्तरस्विनः।

आशीविषस्य वदनाद् दंष्ट्रामादातुमिच्छसि॥ ३९॥

मन्दरं पर्वतश्रेष्ठं पाणिना हर्तुमिच्छसि।

कालकूटं विषं पीत्वा स्वस्तिमान् गन्तुमिच्छसि॥ ४०॥

अक्षि सूच्या प्रमृजसि जिह्वया लेढि च क्षुरम्।

राघवस्य प्रियां भार्यामधिगन्तुं त्वमिच्छसि॥ ४१॥

‘तू श्रीराम की प्यारी पत्नी को हस्तगत करना चाहता है। जान पड़ता है, अत्यन्त वेगशाली मृगवैरी भूखे सिंह और विषधर सर्प के मुख से उनके दाँत तोड़ लेना चाहता है, पर्वतश्रेष्ठ मन्दराचल को हाथ से उठाकर ले जाने की इच्छा करता है, कालकूट विष को पीकर कुशलपूर्वक लौट जाने की अभिलाषा रखता है तथा आँख को सूई से पोंछता और छुरे को जीभसे चाटता है।

अवसज्य शिलां कण्ठे समुद्रं तर्तुमिच्छसि।

सूर्याचन्द्रमसौ चोभौ पाणिभ्यां हर्तुमिच्छसि॥ ४२॥

यो रामस्य प्रियां भार्यां प्रधर्षयितुमिच्छसि।

‘क्या तू अपने गले में पत्थर बाँधकर समुद्र को पार करना चाहता है? सूर्य और चन्द्रमा दोनों को अपने दोनों हाथों से हर लाने की इच्छा करता है? जो श्रीरामचन्द्रजी की प्यारी पत्नी पर बलात् करने को उतारू हुआ है॥ ४२ १/२॥

अग्निं प्रज्वलितं दृष्ट्वा वस्त्रेणाहर्तुमिच्छसि॥ ४३॥

कल्याणवृत्तां यो भार्यां रामस्याहर्तुमिच्छसि।

‘यदि तू कल्याणमय आचार का पालन करने वाली श्रीराम की भार्या का अपहरण करना चाहता है तो अवश्य ही जलती हुई आग को देखकर भी तू उसे कपड़े में बाँधकर ले जाने की इच्छा करता है॥ ४३ १/२॥

अयोमुखानां शूलानामग्रे चरितुमिच्छसि।

रामस्य सदृशीं भार्यां योऽधिगन्तुं त्वमिच्छसि॥ ४४॥

‘अरे तू श्रीराम की भार्या को, जो सर्वथा उन्हीं के योग्य है, हस्तगत करना चाहता है, तो निश्चय ही लोहमय मुखवाले शूलों की नोक पर चलने की अभिलाषा करता है॥४४॥

यदन्तरं सिंहसृगालयोर्वने यदन्तरं स्यन्दनिकासमुद्रयोः।

सुराग्रयसौवीरकयोर्यदन्तरं तदन्तरं दाशरथेस्तवैव च ॥ ४५ ॥

‘वन में रहने वाले सिंह और सियार में, समुद्र और छोटी नदी में तथा अमृत और काँजी में जो अन्तर है, वही अन्तर दशरथनन्दन श्रीराम में और तुझमें है॥ । ४५॥

यदन्तरं काञ्चनसीसलोहयोर्यदन्तरं चन्दनवारिपङ्कयोः।

यदन्तरं हस्तिबिडालयोर्वने तदन्तरं दाशरथेस्तवैव च॥४६॥

‘सोने और सीसे में, चन्दनमिश्रित जल और कीचड़ में तथा वन में रहने वाले हाथी और बिलाव में जो अन्तर है, वही अन्तर दशरथनन्दन श्रीराम और तुझमें है॥ ४६॥

यदन्तरं वायसवैनतेययोर्यदन्तरं मद्गुमयूरयोरपि।

यदन्तरं हंसकगृध्रयोर्वने तदन्तरं दाशरथेस्तवैव च॥४७॥

‘गरुड़ और कौए में, मोर और जलकाक में तथा वनवासी हंस और गीध में जो अन्तर है, वही अन्तर दशरथनन्दन श्रीराम और तुझमें है॥ ४७॥

तस्मिन् सहस्राक्षसमप्रभावे रामे स्थिते कार्मुकबाणपाणौ।

हृतापि तेऽहं न जरां गमिष्ये आज्यं यथा मक्षिकयावगीर्णम्॥४८॥

‘जिस समय सहस्र नेत्रधारी इन्द्र के समान प्रभावशाली श्रीरामचन्द्रजी हाथ में धनुष और बाण लेकर खड़े हो जायँगे, उस समय तू मेरा अपहरण करके भी मुझे पचा नहीं सकेगा, ठीक उसी तरह जैसे मक्खी घी पीकर उसे पचा नहीं सकती’ ॥ ४८॥

इतीव तद्वाक्यमदुष्टभावा सुदुष्टमुक्त्वा रजनीचरं तम्।

गात्रप्रकम्पाद् व्यथिता बभूव वातोद्धता सा कदलीव तन्वी॥४९॥

सीता के मन में कोई दुर्भाव नहीं था तो भी उस राक्षस से यह अत्यन्त दुःखजनक बात कहकर सीता रोष से काँपने लगीं। शरीर के कम्पन से कृशाङ्गी सीता हवा से हिलायी गयी कदली के समान व्यथित हो उठीं॥ ४९॥

तां वेपमानामुपलक्ष्य सीतां स रावणो मृत्युसमप्रभावः।

कुलं बलं नाम च कर्म चात्मनः समाचचक्षे भयकारणार्थम् ॥५०॥

सीता को काँपती देख मौत के समान प्रभाव रखने वाला रावण उनके मन में भय उत्पन्न करने के लिये अपने कुल, बल, नाम और कर्म का परिचय देने लगा॥५०॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे सप्तचत्वारिंशः सर्गः॥ ४७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में सैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ। ४७॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अरण्यकाण्डम्

रावण के द्वारा अपने पराक्रम का वर्णन और सीता द्वारा उसको कड़ी फटकार

अष्टचत्वारिंशः सर्गः

सर्ग-48


एवं ब्रुवत्यां सीतायां संरब्धः परुषं वचः।

ललाटे भ्रकुटिं कृत्वा रावणः प्रत्युवाच ह॥१॥

सीता के ऐसा कहने पर रावण रोष में भर गया और ललाट में भौहें टेढ़ी करके वह कठोर वाणी में बोला – ॥१॥

भ्राता वैश्रवणस्याहं सापत्नो वरवर्णिनि।

रावणो नाम भद्रं ते दशग्रीवः प्रतापवान्॥२॥

‘सुन्दरि! मैं कुबेर का सौतेला भाई परम प्रतापी दशग्रीव रावण हूँ। तुम्हारा भला हो॥२॥

यस्य देवाः सगन्धर्वाः पिशाचपतगोरगाः।

विद्रवन्ति सदा भीता मृत्योरिव सदा प्रजाः॥३॥

येन वैश्रवणो भ्राता वैमात्राः कारणान्तरे।

द्वन्द्वमासादितः क्रोधाद् रणे विक्रम्य निर्जितः॥ ४॥

‘जैसे प्रजा मौत के भय से सदा डरती रहती है, उसी प्रकार देवता, गन्धर्व, पिशाच, पक्षी और नाग सदा जिससे भयभीत होकर भागते हैं, जिसने किसी कारणवश अपने सौतेले भाई कुबेर के साथ द्वन्द्वयुद्ध किया और क्रोधपूर्वक पराक्रम करके रणभूमि में उन्हें परास्त कर दिया था, वही रावण मैं हूँ। ३-४॥

मद्भयार्तः परित्यज्य स्वमधिष्ठानमृद्धिमत्।

कैलास पर्वतश्रेष्ठमध्यास्ते नरवाहनः॥५॥

‘मेरे ही भय से पीड़ित हो नरवाहन कुबेर ने अपनी समृद्धिशालिनी पुरी लङ्का का परित्याग करके इस समय पर्वतश्रेष्ठ कैलास की शरण ली है॥ ५॥

यस्य तत् पुष्पकं नाम विमानं कामगं शुभम्।

वीर्यादावर्जितं भद्रे येन यामि विहायसम्॥६॥

‘भद्रे! उनका सुप्रसिद्ध पुष्पक नामक सुन्दर विमान, जो इच्छा के अनुसार चलने वाला है, मैंने पराक्रम से जीत लिया है और उसी विमान के द्वारा मैं आकाश में विचरता हूँ॥६॥

मम संजातरोषस्य मुखं दृष्ट्वैव मैथिलि।

विद्रवन्ति परित्रस्ताः सुराः शक्रपुरोगमाः॥७॥

‘मिथिलेशकुमारी! जब मुझे रोष चढ़ता है, उस समय इन्द्र आदि सब देवता मेरा मुँह देखकर ही भय से थर्रा उठते हैं और इधर-उधर भाग जाते हैं। ७॥

यत्र तिष्ठाम्यहं तत्र मारुतो वाति शङ्कितः।

तीव्रांशुः शिशिरांशुश्च भयात् सम्पद्यते दिवि॥ ८॥

‘जहाँ मैं खड़ा होता हूँ, वहाँ हवा डरकर धीरे-धीरे चलने लगती है। मेरे भय से आकाश में प्रचण्ड किरणों वाला सूर्य भी चन्द्रमा के समान शीतल हो जाता है॥८॥

निष्कम्पपत्रास्तरवो नद्यश्च स्तिमितोदकाः।

भवन्ति यत्र तत्राहं तिष्ठामि च चरामि च॥९॥

‘जिस स्थान पर मैं ठहरता या भ्रमण करता हूँ, वहाँ वृक्षों के पत्ते तक नहीं हिलते और नदियों का पानी स्थिर हो जाता है॥९॥

मम पारे समुद्रस्य लङ्का नाम पुरी शुभा।

सम्पूर्णा राक्षसैोरैर्यथेन्द्रस्यामरावती॥१०॥

‘समुद्र के उस पार लङ्का नामक मेरी सुन्दर पुरी है, जो इन्द्र की अमरावती के समान मनोहर तथा घोरराक्षसों से भरी हुई है॥ १० ॥

प्राकारेण परिक्षिप्ता पाण्डुरेण विराजिता।

हेमकक्ष्या पुरी रम्या वैदूर्यमयतोरणा ॥११॥

‘उसके चारों ओर बनी हुई सफेद चहारदिवारी उस पुरी की शोभा बढ़ाती है। लङ्कापुरी के महलों के दालान, फर्श आदि सोने के बने हैं और उसके बाहरी दरवाजे वैदूर्यमय हैं। वह पुरी बहुत ही रमणीय है।

११॥

हस्त्यश्वरथसम्बाधा तूर्यनादविनादिता।

सर्वकामफलैर्वृक्षैः संकुलोद्यानभूषिता॥१२॥

‘हाथी, घोड़े और रथों से वहाँ की सड़कें भरी रहती हैं। भाँति-भाँति के वाद्यों की ध्वनि गूंजा करती है। सब प्रकार के मनोवाञ्छित फल देने वाले वृक्षों से लङ्कापुरी व्याप्त है। नाना प्रकार के उद्यान उसकी शोभा बढ़ाते हैं॥ १२॥

तत्र त्वं वस हे सीते राजपुत्रि मया सह।

न स्मरिष्यसि नारीणां मानुषीणां मनस्विनि॥ १३॥

‘राजकुमारी सीते! तुम मेरे साथ उस पुरी में चलकर निवास करो। मनस्विनि! वहाँ रहकर तुम मानवी स्त्रियों को भूल जाओगी॥ १३ ॥

भुञ्जाना मानुषान् भोगान् दिव्यांश्च वरवर्णिनि।

न स्मरिष्यसि रामस्य मानुषस्य गतायुषः ॥१४॥

‘सुन्दरि! लङ्का में दिव्य और मानुष-भोगों का उपभोग करती हुई तुम उस मनुष्य राम का कभी स्मरण नहीं करोगी, जिसकी आयु अब समाप्त हो चली है॥ १४॥

स्थापयित्वा प्रियं पुत्रं राज्ये दशरथो नृपः।

मन्दवीर्यस्ततो ज्येष्ठः सुतः प्रस्थापितो वनम्॥

तेन किं भ्रष्टराज्येन रामेण गतचेतसा।

करिष्यसि विशालाक्षि तापसेन तपस्विना॥१६॥

‘विशाललोचने! राजा दशरथ ने अपने प्यारे पुत्र को राज्य पर बिठाकर जिस अल्पपराक्रमी ज्येष्ठ पुत्र को वन में भेज दिया, उस राज्यभ्रष्ट, बुद्धिहीन एवं तपस्या में लगे हुए तापस राम को लेकर क्या करोगी? ॥ १५-१६॥

रक्ष राक्षसभर्तारं कामय स्वयमागतम्।

न मन्मथशराविष्टं प्रत्याख्यातुं त्वमर्हसि ॥१७॥

‘यह राक्षसों का स्वामी स्वयं तुम्हारे द्वार पर आया है, तुम इसकी रक्षा करो, इसे मन से चाहो यह कामदेव के बाणों से पीड़ित है। इसे ठुकराना तुम्हारे लिये उचित नहीं है॥ १७॥

प्रत्याख्याय हि मां भीरु पश्चात्तापं गमिष्यसि।

चरणेनाभिहत्येव पुरूरवसमर्वशी॥१८॥

‘भीरु ! मुझे ठुकराकर तुम उसी तरह पश्चात्ताप करोगी, जैसे पुरूरवा को लात मारकर उर्वशी पछतायी थी॥ १८॥

अङ्गल्या न समो रामो मम युद्धे स मानुषः।

तव भाग्येन सम्प्राप्तं भजस्व वरवर्णिनि॥१९॥

‘सुन्दरि! युद्ध में मनुष्यजातीय राम मेरी एक अङ्गुलि के बराबर भी नहीं है। तुम्हारे भाग्य से मैं आ गया हूँ। तुम मुझे स्वीकार करो’॥ १९ ॥

एवमुक्ता तु वैदेही क्रुद्धा संरक्तलोचना।

अब्रवीत् परुषं वाक्यं रहिते राक्षसाधिपम्॥२०॥

रावण के ऐसा कहने पर विदेहकुमारी सीता के नेत्र क्रोध से लाल हो गये। उन्होंने उस एकान्त स्थान में राक्षसराज रावण से कठोर वाणी में कहा- ॥ २० ॥

कथं वैश्रवणं देवं सर्वदेवनमस्कृतम्।

भ्रातरं व्यपदिश्य त्वमशुभं कर्तुमिच्छसि॥२१॥

‘अरे! भगवान् कुबेर तो सम्पूर्ण देवताओं के वन्दनीय हैं। तू उन्हें अपना भाई बताकर ऐसा पापकर्म कैसे करना चाहता है ? ॥ २१॥

अवश्यं विनशिष्यन्ति सर्वे रावण राक्षसाः।

येषां त्वं कर्कशो राजा दुर्बुद्धिरजितेन्द्रियः॥ २२॥

‘रावण! जिनका तुझ-जैसा क्रूर, दुर्बुद्धि और अजितेन्द्रिय राजा है, वे सब राक्षस अवश्य ही नष्ट हो जायँगे॥ २२॥

अपहृत्य शची भार्यां शक्यमिन्द्रस्य जीवितुम्।

नहि रामस्य भार्यां मामानीय स्वस्तिमान् भवेत्॥ २३॥

‘इन्द्रकी पत्नी शची का अपहरण करके सम्भव है कोई जीवित रह जाय; किंतु रामपत्नी मुझ सीता का हरण करके कोई कुशल से नहीं रह सकता॥ २३ ॥

जीवेच्चिरं वज्रधरस्य पश्चाच्छची प्रधृष्याप्रतिरूपरूपाम्।

न मादृशीं राक्षस धर्षयित्वा पीतामृतस्यापि तवास्ति मोक्षः॥२४॥

‘राक्षस! वज्रधारी इन्द्र की अनुपम रूपवती भार्या शची का तिरस्कार करके सम्भव है कोई उसके बाद भी चिरकाल तक जीवित रह जाय; परंतु मेरी-जैसी स्त्री का अपमान करके तू अमृत पी ले तो भी तुझे जीते-जी छुटकारा नहीं मिल सकता’ ॥ २४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डेऽष्टचत्वारिंशः सर्गः॥४८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में अड़तालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥४८॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अरण्यकाण्डम्

रावण द्वारा सीता का अपहरण, सीता का विलाप और उनके द्वारा जटायु का दर्शन

एकोनपञ्चाशः सर्गः

सर्ग-49


सीताया वचनं श्रुत्वा दशग्रीवः प्रतापवान्।

हस्ते हस्तं समाहत्य चकार सुमहद् वपुः॥१॥

सीता के इस वचन को सुनकर प्रतापी दशमुखरावण ने अपने हाथ पर हाथ मारकर शरीर को बहुत बड़ा बना लिया॥

स मैथिली पुनर्वाक्यं बभाषे वाक्यकोविदः।

नोन्मत्तया श्रुतौ मन्ये मम वीर्यपराक्रमौ॥२॥

वह बातचीत करने की कला जानता था। उसने मिथिलेशकुमारी सीता से फिर इस प्रकार कहना आरम्भ किया—’मेरी समझ में तुम पागल हो गयी हो, इसीलिये तुमने मेरे बल और पराक्रम की बातें अनसुनी कर दी हैं।

उदहेयं भुजाभ्यां तु मेदिनीमम्बरे स्थितः।

आपिबेयं समुद्रं च मृत्युं हन्यां रणे स्थितः॥३॥

‘अरी! मैं आकाश में खड़ा हो इन दोनों भुजाओं से ही सारी पृथ्वी को उठा ले जा सकता हूँ। समुद्र को पी सकता हूँ और युद्ध में स्थित हो मौत को भी मार सकता हूँ॥

अर्कं तुद्यां शरैस्तीक्ष्णैर्विभिन्द्यां हि महीतलम्।

कामरूपेण उन्मत्ते पश्य मां कामरूपिणम्॥४॥

‘काम तथा रूप से उन्मत्त रहने वाली नारी! यदि चाहूँ तो अपने तीखे बाणों से सूर्य को भी व्यथित कर दूँ और इस भूतल को भी विदीर्ण कर डालूँ। मैं इच्छानुसार रूप धारण करने में समर्थ हूँ तुम मेरी ओर देखो’॥ ४॥

एवमुक्तवतस्तस्य रावणस्य शिखिप्रभे।

क्रुद्धस्य हरिपर्यन्ते रक्ते नेत्रे बभूवतुः॥५॥

ऐसा कहते-कहते क्रोध से भरे हुए रावण की आँखें, जिनके प्रान्तभाग काले थे, जलती आग के समान लाल हो गयीं॥५॥

सद्यः सौम्यं परित्यज्य तीक्ष्णरूपं स रावणः।

स्वं रूपं कालरूपाभं भेजे वैश्रवणानुजः॥६॥

कुबेर के छोटे भाई रावण ने तत्काल अपने सौम्य रूप को त्यागकर तीखा एवं काल के समान विकराल अपना स्वाभाविक रूप धारण कर लिया॥६॥

संरक्तनयनः श्रीमांस्तप्तकाञ्चनभूषणः।

क्रोधेन महताविष्टो नीलजीमूतसंनिभः॥७॥

उस समय श्रीमान् रावण के सभी नेत्र लाल हो रहे थे। वह पक्के सोने के आभूषणों से अलंकृत था और महान् क्रोध से आविष्ट हो नीलमेघ के समान काला दिखायी देने लगा॥७॥

दशास्यो विंशतिभुजो बभूव क्षणदाचरः।

स परिव्राजकच्छद्म महाकायो विहाय तत्॥८॥

वह विशालकाय निशाचर परिव्राजक के उस छद्मवेश को त्यागकर दस मुखों और बीस भुजाओं से संयुक्त हो गया॥८॥

प्रतिपेदे स्वकं रूपं रावणो राक्षसाधिपः।

रक्ताम्बरधरस्तस्थौ स्त्रीरत्नं प्रेक्ष्य मैथिलीम्॥९॥

उस समय राक्षसराज रावण ने अपने सहज रूप को ग्रहण कर लिया और लाल रंग के वस्त्र पहनकर वह स्त्री-रत्न सीता की ओर देखता हुआ खड़ा हो गया। ९॥

स तामसितकेशान्तां भास्करस्य प्रभामिव।

वसनाभरणोपेतां मैथिली रावणोऽब्रवीत्॥१०॥

काले केशवाली मैथिली वस्त्राभूषणों से विभूषित हो सूर्य की प्रभा-सी जान पड़ती थीं। रावण ने उनसे कहा – ॥ १०॥

त्रिषु लोकेषु विख्यातं यदि भर्तारमिच्छसि।

मामाश्रय वरारोहे तवाहं सदृशः पतिः॥११॥

‘वरारोहे ! यदि तुम तीनों लोकों में विख्यात पुरुष को अपना पति बनाना चाहती हो तो मेरा आश्रय लो। मैं ही तुम्हारे योग्य पति हूँ॥ ११॥

मां भजस्व चिराय त्वमहं श्लाघ्यः पतिस्तव।

नैव चाहं क्वचिद् भद्रे करिष्ये तव विप्रियम्॥ १२॥

‘भद्रे! मुझे सुदीर्घकाल के लिये स्वीकार करो। मैं तुम्हारे लिये स्पृहणीय एवं प्रशंसनीय पति होऊँगा तथा कभी तुम्हारे मन के प्रतिकूल कोई बर्ताव नहीं करूँगा॥

त्यज्यतां मानुषो भावो मयि भावः प्रणीयताम्।

राज्याच्च्यतमसिद्धार्थं रामं परिमितायुषम्॥१३॥

कैर्गुणैरनुरक्तासि मूढे पण्डितमानिनि।।

‘मनुष्य राम के विषय में जो तुम्हारा अनुराग है, उसे त्याग दो और मुझसे स्नेह करो। अपने को पण्डित (बुद्धिमती) मानने वाली मूढ़ नारी! जो राज्य से भ्रष्ट है, जिसका मनोरथ सफल नहीं हुआ तथा जिसकी आयु सीमित है, उस राम में किन गुणों के कारण तुम अनुरक्त हो॥१३ १/२॥

यः स्त्रियो वचनाद् राज्यं विहाय ससुहृज्जनम्॥ १४॥

अस्मिन् व्यालानुचरिते वने वसति दुर्मतिः।

‘जो एक स्त्री के कहने से सुहृदोंसहित सारे राज्य का त्याग करके इस हिंसक जन्तुओं से सेवित वन में निवास करता है, उसकी बुद्धि कैसी खोटी है ? (वह सर्वथा मूढ़ है)’ ॥ १४ १/२॥

इत्युक्त्वा मैथिली वाक्यं प्रियाहाँ प्रियवादिनीम्॥ १५॥

अभिगम्य सुदुष्टात्मा राक्षसः काममोहितः।

जग्राह रावणः सीतां बुधः खे रोहिणीमिव॥ १६॥

जो प्रिय वचन सुनने के योग्य और सबसे प्रिय वचन बोलने वाली थीं, उन मिथिलेशकुमारी सीता से ऐसा अप्रिय वचन कहकर काम से मोहित हुए उस अत्यन्त दुष्टात्मा राक्षस रावण ने निकट जाकर

(माता के समान आदरणीया) सीता को पकड़ लिया, मानो बुधने आकाश में अपनी माता रोहिणी को पकड़ने का दुस्साहस किया हो* ॥ १५-१६ ॥

* यहाँ अभूतोपमालंकार है। बुध चन्द्रमाके पुत्र हैं और रोहिणी चन्द्रमाकी पत्नी। बुधने न तो कभी रोहिणीको पकड़ा है और न वे ऐसा कर ही सकते हैं। यहाँ यह दिखाया गया है कि यदि कदाचित् बुध कामवश अपनी माता रोहिणीको पकड़ लें तो वह जैसा घोर पाप होगा, वही पाप रावणने सीताको पकड़नेके कारण किया था।

वामेन सीतां पद्माक्षीं मूर्धजेषु करेण सः।

ऊर्वोस्तु दक्षिणेनैव परिजग्राह पाणिना॥१७॥

उसने बायें हाथ से कमलनयनी सीता के केशोंसहित मस्तक को पकड़ा तथा दाहिना हाथ उनकी दोनों जाँघों के नीचे लगाकर उसके द्वारा उन्हें उठा लिया। १७॥

तं दृष्ट्वा गिरिशृङ्गाभं तीक्ष्णदंष्ट्रं महाभुजम्।

प्राद्रवन् मृत्युसंकाशं भयार्ता वनदेवताः॥१८॥

उस समय तीखी दाढ़ों और विशाल भुजाओं से युक्त पर्वतशिखर के समान प्रतीत होने वाले उसकाल के समान विकराल राक्षस को देखकर वन के समस्त देवता भयभीत होकर भाग गये॥ १८॥

स च मायामयो दिव्यः खरयुक्तः खरस्वनः।

प्रत्यदृश्यत हेमाङ्गो रावणस्य महारथः॥१९॥

इतने ही में गधों से जुता हुआ और गधों के समान ही शब्द करने वाला रावण का वह विशाल सुवर्णमय मायानिर्मित दिव्य रथ वहाँ दिखायी दिया॥ १९ ॥

ततस्तां परुषैर्वाक्यैरभितर्ध्य महास्वनः।

अंकेनादाय वैदेहीं रथमारोपयत् तदा॥२०॥

रथ के प्रकट होते ही जोर-जोर से गर्जना करने वाले रावण ने कठोर वचनों द्वारा विदेहनन्दिनी सीता को डाँटा और पूर्वोक्त रूप से गोद में उठाकर तत्काल रथपर बिठा दिया॥२०॥

सा गृहीतातिचुक्रोश रावणेन यशस्विनी।

रामेति सीता दुःखार्ता रामं दूरं गतं वने ॥२१॥

रावण के द्वारा पकड़ी जाने पर यशस्विनी सीता दुःख से व्याकुल हो गयीं और वन में दूर गये हुए श्रीरामचन्द्रजी को ‘हे राम!’ कहकर जोर-जोर से पुकारने लगीं॥ २१॥

तामकामां स कामार्तः पन्नगेन्द्रवधूमिव।

विचेष्टमानामादाय उत्पपाताथ रावणः॥२२॥

सीता के मन में रावण की कामना नहीं थी—वे उसकी ओर से सर्वथा विरक्त थीं और उसकी कैद से अपने को छुड़ाने के लिये चोट खायी हुई नागिन की तरह उस रथ पर छटपटा रही थीं। उसी अवस्था में कामपीड़ित राक्षस उन्हें लेकर आकाश में उड़ चला॥ २२॥

ततः सा राक्षसेन्द्रेण ह्रियमाणा विहायसा।

भृशं चक्रोश मत्तेव भ्रान्तचित्ता यथातुरा॥२३॥

राक्षसराज जब सीता को हरकर आकाशमार्ग से ले जाने लगा, उस समय उनका चित्त भ्रमित हो उठा।वे पगली-सी हो गयीं और दुःख से आतुर-सी होकर जोर-जोर से विलाप करने लगीं- ॥२३॥

हा लक्ष्मण महाबाहो गुरुचित्तप्रसादक।

ह्रियमाणां न जानीषे रक्षसा कामरूपिणा॥२४॥

‘हा महाबाहु लक्ष्मण! तुम गुरुजनों के मन को प्रसन्न करने वाले हो। इस समय इच्छानुसार रूप धारण करने वाला राक्षस मुझे हरकर लिये जाता है, किंतु तुम्हें इसका पता नहीं है।॥ २४ ॥

जीवितं सुखमर्थं च धर्महेतोः परित्यजन्।

ह्रियमाणामधर्मेण मां राघव न पश्यसि ॥२५॥

‘हा रघुनन्दन! आपने धर्म के लिये प्राणों का मोह, शरीर का सुख तथा राज्य-वैभव सब कुछ छोड़ दिया है। यह राक्षस मुझे अधर्मपूर्वक हरकर लिये जा रहा है, परंतु आप नहीं देखते हैं॥ २५ ॥

ननु नामाविनीतानां विनेतासि परंतप।

कथमेवंविधं पापं न त्वं शाधि हि रावणम्॥ २६॥

‘शत्रुओं को संताप देनेवाले आर्यपुत्र! आप तो कुमार्ग पर चलने वाले उद्दण्ड पुरुषों को दण्ड देकर उन्हें राह पर लाने वाले हैं, फिर ऐसे पापी रावण को क्यों नहीं दण्ड देते हैं।२६॥

न तु सद्योऽविनीतस्य दृश्यते कर्मणः फलम्।

कालोऽप्यङ्गीभवत्यत्र सस्यानामिव पक्तये॥ २७॥

‘उद्दण्ड पुरुष के उद्दण्डतापूर्ण कर्म का फल तत्काल मिलता नहीं दिखायी देता है; क्योंकि इसमें काल भी सहकारी कारण होता है, जैसे कि खेती के पकने के लिये तदनुकूल समय की अपेक्षा होती है। २७॥

त्वं कर्म कृतवानेतत् कालोपहतचेतनः।

जीवितान्तकरं घोरं रामाद् व्यसनमाप्नुहि ॥२८॥

‘रावण! तेरे सिर पर काल नाच रहा है। उसी ने तेरी विचारशक्ति को नष्ट कर दी है, इसीलिये तूने ऐसा पापकर्म किया है। तुझे श्रीराम से वह भयंकर संकट प्राप्त हो, जो तेरे प्राणों का अन्त कर डाले॥ २८॥

हन्तेदानीं सकामा त कैकेयी बान्धवैः सह।

ह्रियेयं धर्मकामस्य धर्मपत्नी यशस्विनः॥२९॥

‘हाय! इस समय कैकेयी अपने बन्धुबान्धवोंसहित सफलमनोरथ हो गयी; क्योंकि धर्मकी अभिलाषा रखनेवाले यशस्वी श्रीरामकी धर्मपत्नी होकर भी मैं एक राक्षसद्वारा हरी जा रही हूँ॥२९॥

आमन्त्रये जनस्थाने कर्णिकारांश्च पुष्पितान्।

क्षिप्रं रामाय शंसध्वं सीतां हरति रावणः॥३०॥

‘मैं जनस्थान में खिले हुए कनेर वृक्षों से प्रार्थना करती हूँ, तुमलोग शीघ्र ही श्रीराम से कहना कि सीता को रावण हर ले जा रहा है॥ ३० ॥

हंससारससंघुष्टां वन्दे गोदावरी नदीम्।

क्षिप्रं रामाय शंस त्वं सीतां हरति रावणः॥३१॥

‘हंसों और सारसों के कलरवों से मुखरित हुई गोदावरी नदी को मैं प्रणाम करती हूँ। माँ! तुम श्रीराम से शीघ्र ही कह देना, सीता को रावण हर ले जा रहा है॥३१॥

दैवतानि च यान्यस्मिन् वने विविधपादपे।

नमस्करोम्यहं तेभ्यो भर्तुः शंसत मां हृताम्॥ ३२॥

‘इस वन के विभिन्न वृक्षों पर निवास करने वाले जो-जो देवता हैं, उन सबको मैं नमस्कार करती हूँ। आप सब लोग शीघ्र ही मेरे स्वामी को सूचना दे दें कि आपकी स्त्री को राक्षस हर ले गया॥३२॥

यानि कानिचिदप्यत्र सत्त्वानि विविधानि च।

सर्वाणि शरणं यामि मृगपक्षिगणानि वै॥३३॥

ह्रियमाणां प्रियां भर्तुः प्राणेभ्योऽपि गरीयसीम्।

विवशा ते हृता सीता रावणेनेति शंसत॥३४॥

‘यहाँ पशु-पक्षी आदि जो कोई भी नाना प्रकार के प्राणी रहते हों, उन सबकी मैं शरण लेती हूँ। वे मेरे स्वामी श्रीरामचन्द्रजी से कहें कि जो आपको प्राणों से भी बढ़कर प्रिय थी, वह सीता हरी गयी। आपकी सीता को असहाय अवस्था में रावण हर ले गया। ३३-३४॥

विदित्वा तु महाबाहुरमुत्रापि महाबलः।

आनेष्यति पराक्रम्य वैवस्वतहृतामपि॥ ३५॥

‘महाबाहु श्रीराम बड़े बलवान् हैं। वे मुझे परलोक में भी गयी हुई जान लें तो यमराज के द्वारा अपहृत होने पर भी मुझको पराक्रमपूर्वक वहाँ से लौटा लायेंगे’ ॥ ३५ ॥

सा तदा करुणा वाचो विलपन्ती सुदुःखिता।

वनस्पतिगतं गृधं ददर्शायतलोचना॥ ३६॥

उस समय अत्यन्त दुःखी हो करुणाजनक बातें कहकर विलाप करती हुई विशाललोचना सीता ने एक वृक्ष पर बैठे हुए गृध्रराज जटायु को देखा॥ ३६ ॥

सा तमुद्रीक्ष्य सुश्रोणी रावणस्य वशंगता।

समाक्रन्दद् भयपरा दुःखोपहतया गिरा॥३७॥

रावण के वश में पड़ जाने के कारण सुन्दरी सीता अत्यन्त भयभीत हो रही थीं। जटायु को देखकर वे दुःखभरी वाणी में करुण क्रन्दन करने लगीं- ॥३७॥

जटायो पश्य मामार्य ह्रियमाणामनाथवत्।

अनेन राक्षसेन्द्रेणाकरुणं पापकर्मणा ॥ ३८॥

‘आर्य जटायो! देखिये, यह पापाचारी राक्षसराज अनाथ की भाँति मुझे निर्दयतापूर्वक हरकर लिये जा रहा है॥

नैष वारयितुं शक्यस्त्वया क्रूरो निशाचरः।

सत्ववाञ्जितकाशी च सायुधश्चैव दुर्मतिः॥ ३९॥

‘परंतु आप इस क्रूर निशाचर को रोक नहीं सकते; क्योंकि यह बलवान् है, अनेक युद्धों में विजय पाने के कारण इसका दुस्साहस बढ़ा हुआ है। इसके हाथों में हथियार है और इसके मन में दुष्टता भी भरी हुई है।

रामाय तु यथातत्त्वं जटायो हरणं मम।

लक्ष्मणाय च तत् सर्वमाख्यातव्यमशेषतः॥४०॥

‘आर्य जटायो! जिस प्रकार मेरा अपहरण हुआ है, यह सब समाचार आप श्रीराम और लक्ष्मण से ज्यों का-ज्यों पूर्णरूप से बता दीजियेगा’ ॥ ४० ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे एकोनपञ्चाशः सर्गः॥ ४९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में उनचासवाँ सर्ग पूरा हुआ।४९॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अरण्यकाण्डम्

जटायु का रावण को सीताहरण के दुष्कर्म से निवृत्त होने के लिये समझाना और अन्त में युद्ध के लिये ललकारना

पञ्चाशः सर्गः

सर्ग-50


तं शब्दमवसुप्तस्तु जटायुरथ शुश्रुवे।

निरैक्षद् रावणं क्षिप्रं वैदेहीं च ददर्श सः॥१॥

जटायु उस समय सो रहे थे। उसी अवस्था में उन्होंने सीता की वह करुण पुकार सुनी। सुनते ही तुरंत आँख खोलकर उन्होंने विदेहनन्दिनी सीता तथा रावण को देखा॥

ततः पर्वतशृङ्गाभस्तीक्ष्णतुण्डः खगोत्तमः।

वनस्पतिगतः श्रीमान् व्याजहार शुभां गिरम्॥ २॥

पक्षियों में श्रेष्ठ श्रीमान् जटायु का शरीर पर्वतशिखर के समान ऊँचा था और उनकी चोंच बड़ी ही तीखी थी। वे पेड़ पर बैठे-ही-बैठे रावण को लक्ष्य करके यह शुभ वचन बोले- ॥२॥

दशग्रीव स्थितो धर्मे पुराणे सत्यसंश्रयः।

भ्रातस्त्वं निन्दितं कर्म कर्तुं नार्हसि साम्प्रतम्॥ ३॥

जटायुर्नाम नाम्नाहं गृध्रराजो महाबलः।

‘दशमुख रावण! मैं प्राचीन (सनातन) धर्म में स्थित, सत्यप्रतिज्ञ और महाबलवान् गृध्रराज हूँ। मेरा नाम जटायु है। भैया! इस समय मेरे सामने तुम्हें ऐसा निन्दित कर्म नहीं करना चाहिये॥ ३ १/२ ॥

राजा सर्वस्य लोकस्य महेन्द्रवरुणोपमः॥४॥

लोकानां च हिते युक्तो रामो दशरथात्मजः।

‘दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजी सम्पूर्ण जगत् के स्वामी, इन्द्र और वरुण के समान पराक्रमी तथा सब लोगों के हित में संलग्न रहने वाले हैं। ४ १/२॥

तस्यैषा लोकनाथस्य धर्मपत्नी यशस्विनी॥५॥

सीता नाम वरारोहा यां त्वं हर्तुमिहेच्छसि।

‘ये उन्हीं जगदीश्वर श्रीराम की यशस्विनी धर्मपत्नी हैं। इन सुन्दर शरीरवाली देवी का नाम सीता है, जिन्हें तुम हरकर ले जाना चाहते हो॥ ५ १/२ ॥

कथं राजा स्थितो धर्मे परदारान् परामृशेत्॥६॥

रक्षणीया विशेषेण राजदारा महाबल।

निवर्तय गतिं नीचां परदाराभिमर्शनात्॥७॥

‘अपने धर्म में स्थित रहने वाला कोई भी राजा भला परायी स्त्री का स्पर्श कैसे कर सकता है? महाबली रावण! राजाओं की स्त्रियों की तो सभी को विशेष रूप से रक्षा करनी चाहिये। परायी स्त्री के स्पर्श से जो नीच गति प्राप्त होनेवाली है, उसे अपने-आपसे दूर हटा दो॥

न तत् समाचरेद् धीरो यत् परोऽस्य विगर्हयेत्।

यथाऽऽत्मनस्तथान्येषां दारा रक्ष्या विमर्शनात्॥ ८॥

‘धीर (बुद्धिमान्) वह कर्म न करे जिसकी दूसरे लोग निन्दा करें। जैसे पराये पुरुषों के स्पर्श से अपनी स्त्री की रक्षा की जाती है, उसी प्रकार दूसरों की स्त्रियों की भी रक्षा करनी चाहिये॥८॥

अर्थं वा यदि वा कामं शिष्टाः शास्त्रेष्वनागतम्।

व्यवस्यन्त्यनुराजानं धर्मं पौलस्त्यनन्दन॥९॥

‘पुलस्त्यकुलनन्दन ! जिनकी शास्त्रों में चर्चा नहीं है ऐसे धर्म, अर्थ अथवा काम का भी श्रेष्ठ पुरुष केवल राजा की देखादेखी आचरण करने लगते हैं (अतःराजा को अनुचित या अशास्त्रीय कर्म में प्रवृत्त नहीं होना चाहिये) ॥९॥

राजा धर्मश्च कामश्च द्रव्याणां चोत्तमो निधिः।

धर्मः शुभं वा पापं वा राजमूलं प्रवर्तते॥१०॥

‘राजा धर्म और काम का प्रवर्तक तथा द्रव्यों की उत्तम निधि है, अतः धर्म, सदाचार अथवा पापइन की प्रवृत्ति का मूल कारण राजा ही है॥ १० ॥

पापस्वभावश्चपलः कथं त्वं रक्षसां वर।

ऐश्वर्यमभिसम्प्राप्तो विमानमिव दुष्कृती॥११॥

‘राक्षसराज! जब तुम्हारा स्वभाव ऐसा पापपूर्ण है और तुम इतने चपल हो, तब पापी को देवताओं के विमान की भाँति तुम्हें यह ऐश्वर्य कैसे प्राप्त हो गया?॥

कामस्वभावो यःसोऽसौ न शक्यस्तं प्रमार्जितुम्।

नहि दुष्टात्मनामार्यमावसत्यालये चिरम्॥१२॥

‘जिसके स्वभाव में काम की प्रधानता है, उसके उस स्वभाव का परिमार्जन नहीं किया जा सकता; क्योंकि दुष्टात्माओं के घर में दीर्घकाल के बाद भी पुण्य का आवास नहीं होता॥ १२ ॥

विषये वा पुरे वा ते यदा रामो महाबलः।

नापराध्यति धर्मात्मा कथं तस्यापराध्यसि॥१३॥

‘जब महाबली धर्मात्मा श्रीराम तुम्हारे राज्य अथवा नगर में कोई अपराध नहीं करते हैं, तब तुम उनका अपराध कैसे कर रहे हो? ॥ १३॥

यदि शूर्पणखाहेतोर्जनस्थानगतः खरः।

अतिवृत्तो हतः पूर्वं रामेणाक्लिष्टकर्मणा॥१४॥

अत्र ब्रूहि यथातत्त्वं को रामस्य व्यतिक्रमः।

यस्य त्वं लोकनाथस्य हृत्वा भार्यां गमिष्यसि॥ १५॥

‘यदि पहले शूर्पणखा का बदला लेने के लिये चढ़कर आये हुए अत्याचारी खर का अनायास ही महान् कर्म करने वाले श्रीराम ने वध किया तो तुम्हीं । ठीक-ठीक बताओ कि इसमें श्रीराम का क्या अपराध है, जिससे तुम उन जगदीश्वर की पत्नी को हर ले जाना चाहते हो?॥

क्षिप्रं विसृज वैदेहीं मा त्वा घोरेण चक्षुषा।

दहेद् दहनभूतेन वृत्रमिन्द्राशनिर्यथा॥१६॥

‘रावण! अब शीघ्र ही विदेहकुमारी सीता को छोड़ दो जिससे श्रीरामचन्द्रजी अपनी अग्नि के समान भयंकर दृष्टि से  तुम्हें जलाकर भस्म न कर डालें। जैसे इन्द्र का वज्र वृत्रासुर का विनाश कर डाला था, उसी प्रकार श्रीराम की रोषपूर्ण दृष्टि दग्ध कर डालेगी। १६॥

सर्पमाशीविषं बद्ध्वा वस्त्रान्ते नावबुध्यसे।

ग्रीवायां प्रतिमुक्तं च कालपाशं न पश्यसि॥ १७॥

‘तुमने अपने कपड़े में विषधर सर्प को बाँध लिया है, फिर भी इस बात को समझ नहीं पाते हो। तुमने अपने गले में मौत की फाँसी डाल ली है, फिर भी यह तुम्हें सूझ नहीं रहा है॥ १७॥

स भारः सौम्य भर्तव्यो यो नरं नावसादयेत्।

तदन्नमपि भोक्तव्यं जीर्यते यदनामयम्॥१८॥

‘सौम्य! पुरुष को उतना ही बोझ उठाना चाहिये, जो उसे शिथिल न कर दे और वही अन्न भोजन करना चाहिये, जो पेट में जाकर पच जाय, रोग न पैदा करे॥

यत् कृत्वा न भवेद् धर्मो न कीर्तिर्न यशो ध्रुवम्।

शरीरस्य भवेत् खेदः कस्तत् कर्म समाचरेत्॥ १९॥

‘जो कार्य करने से न तो धर्म होता हो, न कीर्ति बढ़ती हो और न अक्षय यश ही प्राप्त होता हो, उल्टे शरीर को खेद हो रहा हो, उस कर्म का अनुष्ठान कौन करेगा? ॥ १९॥

षष्टिवर्षसहस्राणि जातस्य मम रावण।

पितृपैतामहं राज्यं यथावदनुतिष्ठतः॥२०॥

‘रावण! बाप-दादों से प्राप्त इस पक्षियों के राज्य का विधिवत् पालन करते हुए मुझे जन्म से लेकर अबतक साठ हजार वर्ष बीत गये॥ २०॥

वृद्धोऽहं त्वं युवा धन्वी सरथः कवची शरी।

न चाप्यादाय कुशली वैदेहीं मे गमिष्यसि॥

‘अब मैं बूढ़ा हो गया हूँ और तुम नवयुवक हो (मेरे पास कोई युद्ध का साधन नहीं है, किंतु) तुम्हारे पास धनुष, कवच, बाण तथा रथ सब कुछ है, फिर भी तुम सीताको लेकर कुशलपूर्वक नहीं जा सकोगे॥

न शक्तस्त्वं बलाद्धा वैदेहीं मम पश्यतः।

हेतुभिर्यायसंयुक्तैर्बुवां वेदश्रुतीमिव॥२२॥

‘मेरे देखते-देखते तुम विदेहनन्दिनी सीता का बलपूर्वक अपहरण नहीं कर सकते; ठीक उसी तरह जैसे कोई न्यायसङ्गत हेतुओं से सत्य सिद्ध हुई वैदिक श्रुति को अपनी युक्तियों के बलपर पलट नहीं सकता।

युध्यस्व यदि शूरोऽसि मुहूर्तं तिष्ठ रावण।

शयिष्यसे हतो भूमौ यथा पूर्वं खरस्तथा ॥२३॥

‘रावण! यदि शूरवीर हो तो युद्ध करो। मेरे सामने दो घड़ी ठहर जाओ; फिर जैसे पहले खर मारा गया था, उसी प्रकार तुम भी मेरे द्वारा मारे जाकर सदा के लिये सो जाओगे॥ २३॥

असकृत्संयुगे येन निहता दैत्यदानवाः।

न चिराच्चीरवासास्त्वां रामो युधि वधिष्यति॥ २४॥

‘जिन्होंने युद्ध में अनेक बार दैत्यों और दानवों का वध किया है, वे चीरवस्त्रधारी भगवान् श्रीराम तुम्हारा भी शीघ्र ही युद्धभूमि में विनाश करेंगे॥२४॥

किं नु शक्यं मया कर्तुं गतौ दूरं नृपात्मजौ।

क्षिप्रं त्वं नश्यसे नीच तयोर्भातो न संशयः॥ २५॥

‘इस समय मैं क्या कर सकता हूँ, वे दोनों राजकुमार बहुत दूर चले गये हैं। नीच! (यदि मैं उन्हें बुलाने जाऊँ तो) तुम उन दोनों से भयभीत होकर शीघ्र ही भाग जाओगे (आँखों से ओझल हो जाओगे), इसमें संशय नहीं है॥ २५ ॥


नहि मे जीवमानस्य नयिष्यसि शुभामिमाम्।

सीतां कमलपत्राक्षीं रामस्य महिषीं प्रियाम्॥ २६॥

‘कमल के समान नेत्रोंवाली ये शुभलक्षणा सीता श्रीरामचन्द्रजी की प्यारी पटरानी हैं। इन्हें मेरे जीते-जी तुम नहीं ले जाने पाओगे॥ २६ ॥

अवश्यं त् मया कार्यं प्रियं तस्य महात्मनः।

जीवितेनापि रामस्य तथा दशरथस्य च ॥ २७॥

‘मुझे अपने प्राण देकर भी महात्मा श्रीराम तथा राजा दशरथ का प्रिय कार्य अवश्य करना होगा। २७॥

तिष्ठ तिष्ठ दशग्रीव मुहूर्तं पश्य रावण।

वृन्तादिव फलं त्वां तु पातयेयं रथोत्तमात्।

युद्धातिथ्यं प्रदास्यामि यथाप्राणं निशाचर॥ २८॥

‘दशमुख रावण! ठहरो, ठहरो! केवल दो घड़ी रुक जाओ, फिर देखो, जैसे डंठल से फल गिरता है, उसी प्रकार तुम्हें इस उत्तम रथ से नीचे गिराये देता हूँ। निशाचर! अपनी शक्ति के अनुसार युद्ध में मैं तुम्हारा पूरा आतिथ्य-सत्कार करूँगा–तुम्हें भलीभाँति भेंट पूजा दूंगा’ ॥ २८॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे पञ्चाशः सर्गः॥५०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में पचासवाँ सर्ग पूरा हुआ।५०॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अरण्यकाण्डम्

जटायु तथा रावण का घोर युद्ध और रावण के द्वारा जटायु का वध

एकपञ्चाशः सर्गः

सर्ग-51


इत्युक्तः क्रोधताम्राक्षस्तप्तकाञ्चनकुण्डलः।

राक्षसेन्द्रोऽभिदुद्राव पतगेन्द्रममर्षणः॥१॥

जटायु के ऐसा कहने पर राक्षसराज रावण क्रोध से आँखें लाल किये अमर्ष में भरकर उन पक्षिराज की ओर दौड़ा। उस समय उसके कानों में तपाये हुए सोने के कुण्डल झलमला रहे थे॥१॥

स सम्प्रहारस्तुमुलस्तयोस्तस्मिन् महामृधे।

बभूव वातो तयोर्मेघयोर्गगने यथा॥२॥

उस महासमर में उन दोनों का एक-दूसरे पर भयंकर प्रहार होने लगा, मानो आकाश में वायु से उड़ाये गये दो मेघखण्ड आपस में टकरा गये हों॥२॥

तद् बभूवाद्भुतं युद्धं गृध्रराक्षसयोस्तदा।

सपक्षयोर्माल्यवतोर्महापर्वतयोरिव॥३॥

उस समय गृध्र और राक्षस में वह बड़ा अद्भुत युद्ध होने लगा, मानो दो पंखधारी माल्यवान् * पर्वत एक दूसरे से भिड़ गये हों॥३॥

* माल्यवान् पर्वत दो माने गये हैं, एक तो दण्डकारण्य में किष्किन्धा के समीप है और दूसरा मेरुपर्वत के निकट बताया गया है। ये दोनों पर्वत परस्पर इतने दूर हैं कि इनमें संघर्ष की कोई सम्भावना नहीं हो सकती। इसलिये ‘सपक्ष’ (पंखधारी) विशेषण दिया गया है। पाँखवाले पर्वत कदाचित् उड़कर एक-दूसरे के समीप पहुँच सकते हैं।

ततो नालीकनाराचैस्तीक्ष्णाग्रैश्च विकर्णिभिः ।

अभ्यवर्षन्महाघोरैर्गृध्रराजं महाबलम्॥४॥

रावण ने महाबली गृध्रराज जटायुपर नालीक, नाराच तथा तीखे अग्रभागवाले विकर्णी नामक महाभयंकर अस्त्रों की वर्षा आरम्भ कर दी॥ ४॥

स तानि शरजालानि गृध्रः पत्ररथेश्वरः।

जटायुः प्रतिजग्राह रावणास्त्राणि संयुगे॥५॥

पक्षिराज गृध्रजातीय जटायु ने युद्ध में रावण के उन बाणसमूहों तथा अन्य अस्त्रों का आघात सह लिया। ५॥

तस्य तीक्ष्णनखाभ्यां तु चरणाभ्यां महाबलः।

चकार बहुधा गात्रे व्रणान् पतगसत्तमः॥६॥

साथ ही उन महाबली पक्षिशिरोमणि ने अपने तीखे नखोंवाले पंजों से मार-मारकर रावण के शरीर में बहुत से घाव कर दिये॥६॥

अथ क्रोधाद दशग्रीवो जग्गाह दशा मागणाना

मृत्युदण्डनिभान् घोरान् शत्रोर्निधनकांक्षया॥७॥

तब दशग्रीव ने क्रोध में भरकर अपने शत्रु को मार डालने की इच्छा से दस बाण हाथ में लिये, जो कालदण्ड के समान भयंकर थे॥७॥

स तैर्बाणैर्महावीर्यः पूर्णमुक्तैरजिह्मगैः।

बिभेद निशितैस्तीक्ष्णैर्गुरूं घोरैः शिलीमुखैः॥ ८॥

महापराक्रमी रावण ने धनुष को पूर्णतः खींचकर छोड़े गये उन सीधे जाने वाले तीखे, पैने और भयंकर बाणों द्वारा, जिनके मुखपर शल्य (काँटे) लगे हुए थे। गृध्रराज को क्षत-विक्षत कर दिया॥ ८॥

स राक्षसरथे पश्यञ्जानकी बाष्पलोचनाम्।

अचिन्तयित्वा बाणांस्तान् राक्षसं समभिद्रवत्॥ ९॥

जटायु ने देखा, जनकनन्दिनी सीता राक्षस के रथ पर बैठी हैं और नेत्रों से आँसू बहा रही हैं। उन्हें देखकर गृध्रराज अपने शरीर में लगते हुए उन बाणों की परवा न करके सहसा उस राक्षस पर टूट पड़े॥९॥

ततोऽस्य सशरं चापं मुक्तामणिविभूषितम्।

चरणाभ्यां महातेजा बभञ्ज पतगोत्तमः ॥१०॥

महातेजस्वी पक्षिराज जटायु ने मोती-मणियों से विभूषित, बाणसहित रावण के धनुष को अपने दोनों पैरों से मारकर तोड़ दिया॥१०॥

ततोऽन्यद् धनुरादाय रावणः क्रोधमूर्च्छितः।

ववर्ष शरवर्षाणि शतशोऽथ सहस्रशः॥११॥

फिर तो रावण क्रोध से भर गया और दूसरा धनुष हाथ में लेकर उसने सैकड़ों-हजारों बाणों की झड़ी लगा दी॥ ११॥

शरैरावारितस्तस्य संयुगे पतगेश्वरः।

कुलायमभिसम्प्राप्तः पक्षिवच्च बभौ तदा॥ १२॥

उस समय उस युद्धस्थल में गृध्रराज के चारों ओर बाणों का जाल-सा तन गया। वे उस समय घोंसले में बैठे हुए पक्षी के समान प्रतीत होने लगे॥ १२ ॥

स तानि शरजालानि पक्षाभ्यां तु विधूय ह।

चरणाभ्यां महातेजा बभञ्जास्य महद् धनुः॥ १३॥

तब महातेजस्वी जटायु ने अपने दोनों पंखों से ही उन बाणों को उड़ा दिया और पंजों की मार से पुनः उसके धनुष के टुकड़े-टुकड़े कर डाले॥१३॥

तच्चाग्निसदृशं दीप्तं रावणस्य शरावरम्।

पक्षाभ्यां च महातेजा व्यधुनोत् पतगेश्वरः॥ १४॥

रावणका कवच अग्नि के समान प्रज्वलित हो रहा था। महातेजस्वी पक्षिराज ने उसे भी पंखों से ही मारकर छिन्न-भिन्न कर दिया॥१४॥

काञ्चनोरश्छदान् दिव्यान् पिशाचवदनान् खरान्।

तांश्चास्य जवसम्पन्नाञ्जघान समरे बली॥१५॥

तत्पश्चात् उन बलवान् वीर ने समराङ्गण में पिशाच के-से मुखवाले उन वेगशाली गधों को भी, जिनकी छाती पर सोने के कवच बँधे हुए थे, मार डाला॥ १५ ॥

अथ त्रिवेणुसम्पन्नं कामगं पावकार्चिषम्।

मणिसोपानचित्राङ्गं बभञ्ज च महारथम्॥१६॥

तदनन्तर अग्नि की भाँति दीप्तिमान्, मणिमय सोपान से विचित्र अङ्गोंवाले तथा इच्छानुसार चलने वाले उसके त्रिवेणुसम्पन्न* विशाल रथ को भी तोड़-फोड़ डाला॥१६॥

* त्रिवेणु रथ का वह अङ्ग है, जो जूए को धारण करता है। इसका पर्याय है युगन्धर।

पूर्णचन्द्रप्रतीकाशं छत्रं च व्यजनैः सह।

पातयामास वेगेन ग्राहिभी राक्षसैः सह ॥१७॥

सारथेश्चास्य वेगेन तुण्डेन च महच्छिरः।

पुनर्व्यपहनच्छ्रीमान् पक्षिराजो महाबलः॥१८॥

इसके बाद पूर्ण चन्द्रमा की भाँति सुशोभित छत्र और चवँर को भी उन्हें धारण करने वाले राक्षसों के साथ ही वेगपूर्वक मार गिराया। फिर उन महाबली तेजस्वी पक्षिराज ने बड़े वेग से चोंच मारकर रावण के सारथि का विशाल मस्तक भी धड़ से अलग कर दिया॥ १७-१८॥

स भग्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः।

अङ्केनादाय वैदेहीं पपात भुवि रावणः॥१९॥

इस प्रकार जब धनुष टूटा, रथ चौपट हुआ, घोड़े मारे गये और सारथि भी काल के गाल में चला गया, तब रावण सीता को गोद में लिये-लिये पृथ्वी पर गिर पड़ा॥

दृष्ट्वा निपतितं भूमौ रावणं भग्नवाहनम्।

साधु साध्विति भूतानि गृध्रराजमपूजयन्॥२०॥

रथ टूट जाने से रावण को धरती पर पड़ा देख सब प्राणी ‘साधु-साधु’ कहकर गृध्रराज की प्रशंसा करने लगे॥

परिश्रान्तं तु तं दृष्ट्वा जरया पक्षियूथपम्।

उत्पपात पुनहष्टो मैथिली गृह्य रावणः॥२१॥

वृद्धावस्था के कारण पक्षिराज को थका हुआ देख रावण को बड़ा हर्ष हुआ और वह मैथिली को लिये हुए फिर आकाश में उड़ चला॥ २१॥

तं प्रहृष्टं निधायाङ्के रावणं जनकात्मजाम्।

गच्छन्तं खड्गशेषं च प्रणष्टहतसाधनम्॥२२॥

गृध्रराजः समुत्पत्य रावणं समभिद्रवत्।

समावार्य महातेजा जटायुरिदमब्रवीत्॥२३॥

जनककिशोरी को गोद में लेकर जब रावण प्रसन्नतापूर्वक जाने लगा, उस समय उसके अन्य सब साधन तो नष्ट हो गये थे, किंतु एक तलवार उसके पास शेष रह गयी थी। उसे जाते देख महातेजस्वी गृध्रराज जटायु उड़कर रावण की ओर दौड़े और उसे रोककर इस प्रकार बोले-॥ २२-२३॥

वज्रसंस्पर्शबाणस्य भार्यां रामस्य रावण।

अल्पबुद्धे हरस्येनां वधाय खलु रक्षसाम्॥२४॥

‘मन्दबुद्धि रावण! जिनके बाणों का स्पर्श वज्र के समान है, उन श्रीराम की इन धर्मपत्नी सीता को तुम अवश्य राक्षसों के वध के लिये ही लिये जा रहे हो॥

समित्रबन्धुः सामात्यः सबलः सपरिच्छदः।

विषपानं पिबस्येतत् पिपासित इवोदकम्॥२५॥

‘जैसे प्यासा मनुष्य जल पी रहा हो, उसी प्रकार तुम मित्र, बन्धु, मन्त्री, सेना तथा परिवारसहित यह विषपान कर रहे हो॥२५॥

अनुबन्धमजानन्तः कर्मणामविचक्षणाः।

शीघ्रमेव विनश्यन्ति यथा त्वं विनशिष्यसि॥ २६॥

‘अपने कर्मों का परिणाम न जानने वाले अज्ञानीजन जैसे शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार तुम भी विनाश के गर्त में गिरोगे॥२६॥

बद्धस्त्वं कालपाशेन क्व गतस्तस्य मोक्ष्यसे।

वधाय बडिशं गृह्य सामिषं जलजो यथा॥२७॥

‘तुम कालपाश में बँध गये हो। कहाँ जाकर उससे छुटकारा पाओगे? जैसे जल में उत्पन्न होने वाला मत्स्य मांसयुक्त बंसी को अपने वध के लिये ही निगल जाता है, उसी प्रकार तुम भी अपने मौत के लिये ही सीता का अपहरण करते हो॥२७॥

नहि जातु दुराधर्षों काकुत्स्थौ तव रावण।

धर्षणं चाश्रमस्यास्य क्षमिष्येते तु राघवौ॥ २८॥

‘रावण! ककुत्स्थकुलभूषण रघुकुलनन्दन श्रीराम और लक्ष्मण दोनों भाई दुर्धर्ष वीर हैं। वे तुम्हारे द्वारा अपने आश्रम पर किये गये इस अपमानजनक अपराध को कभी क्षमा नहीं करेंगे॥२८॥

यथा त्वया कृतं कर्म भीरुणा लोकगर्हितम्।

तस्कराचरितो मार्गो नैष वीरनिषेवितः॥२९॥

‘तुम कायर और डरपोक हो। तुमने जैसा लोकनिन्दित कर्म किया है, यह चोरों का मार्ग है। वीर पुरुष ऐसे मार्ग का आश्रय नहीं लेते हैं॥ २९॥

युद्ध्यस्व यदि शूरोऽसि मुहूर्तं तिष्ठ रावण।

शयिष्यसे हतो भूमौ यथा भ्राता खरस्तथा॥ ३०॥

‘रावण! यदि शूरवीर हो तो दो घड़ी और ठहरो और मुझसे युद्ध करो। फिर तो तुम भी उसी प्रकार मरकर पृथ्वी पर सो जाओगे, जैसे तुम्हारा भाई खर सोया था॥३०॥

परेतकाले पुरुषो यत् कर्म प्रतिपद्यते।

विनाशायात्मनोऽधर्म्यं प्रतिपन्नोऽसि कर्म तत्॥ ३१॥

‘विनाश के समय पुरुष जैसा कर्म करता है, तुमने भी अपने विनाश के लिये वैसे ही अधर्मपूर्ण कर्म को अपनाया है॥ ३१॥

पापानुबन्धो वै यस्य कर्मणः को नु तत् पुमान्।

कर्वीत लोकाधिपतिः स्वयंभूर्भगवानपि॥३२॥

‘जिस कर्म को करने से कर्ता का पाप के फल से सम्बन्ध होता है, उस कर्म को कौन पुरुष निश्चित रूप से कर सकता है। लोकपाल इन्द्र तथा भगवान् स्वयम्भू (ब्रह्मा) भी वैसा कर्म नहीं कर सकते’ ॥ ३२॥

एवमुक्त्वा शुभं वाक्यं जटायुस्तस्य रक्षसः।

निपपात भृशं पृष्ठे दशग्रीवस्य वीर्यवान्॥३३॥

तं गृहीत्वा नखैस्तीक्ष्णैर्विददार समन्ततः।

अधिरूढो गजारोहो यथा स्याद् दुष्टवारणम्॥३४॥

इस प्रकार उत्तम वचन कहकर पराक्रमी जटायु उस राक्षस दशग्रीव की पीठ पर बड़े वेग से जा बैठे और उसे पकड़कर अपने तीखे नखों द्वारा चारों ओर से चीरने लगे। मानो कोई हाथीवान् किसी दुष्ट हाथी के ऊपर सवार होकर उसे अंकुश से छेद रहा हो॥ ३३-३४॥

विददार नखैरस्य तुण्डं पृष्ठे समर्पयन्।

केशांश्चोत्पाटयामास नखपक्षमुखायुधः॥ ३५॥

नख, पाँख और चोंच—ये ही जटायु के हथियार थे। वे नखों से खरोंचते थे, पीठपर चोंच मारते थे और बाल पकड़कर उखाड़ लेते थे॥ ३५॥

स तथा गृध्रराजेन क्लिश्यमानो मुहर्मुहुः।

अमर्षस्फुरितोष्ठः सन् प्राकम्पत च राक्षसः॥ ३६॥

इस प्रकार जब गृध्रराज ने बारंबार क्लेश पहुँचाया,  तब राक्षस रावण काँप उठा। क्रोध के मारे उसके ओठ फड़कने लगे॥ ३६॥

सम्परिष्वज्य वैदेहीं वामेनाङ्केन रावणः।

तलेनाभिजघाना जटायुं क्रोधमूर्च्छितः॥ ३७॥

उस समय क्रोध से भरे रावण ने विदेहनन्दिनी सीता को बायीं गोद में करके अत्यन्त पीड़ित हो जटायु पर तमाचे का प्रहार किया॥ ३७॥

जटायुस्तमतिक्रम्य तुण्डेनास्य खगाधिपः।

वामबाहून् दश तदा व्यपाहरदरिंदमः ॥ ३८॥

परंतु उस वार को बचाकर शत्रुदमन गृध्रराज जटायु ने अपनी चोंच से मार-मारकर रावण की दसों बायीं भुजाओं को उखाड़ लिया।॥ ३८ ॥

संछिन्नबाहोः सद्यो वै बाहवः सहसाभवन्।

विषज्वालावलीयुक्ता वल्मीकादिव पन्नगाः॥ ३९॥

उन बाँहों के कट जाने पर बाँबी से प्रकट होने वाले विष की ज्वाला-मालाओं से युक्त सर्पो की भाँति तुरंत दूसरी नयी भुजाएँ सहसा उत्पन्न हो गयीं॥ ३९॥

ततः क्रोधाद् दशग्रीवः सीतामुत्सृज्य वीर्यवान्।

मुष्टिभ्यां चरणाभ्यां च गृध्रराजमपोथयत्॥ ४०॥

तब पराक्रमी दशानन ने सीता को तो छोड़ दिया और गृध्रराज को क्रोधपूर्वक मुक्कों और लातों से मारना आरम्भ किया॥४०॥

ततो मुहूर्तं संग्रामो बभूवातुलवीर्ययोः।

राक्षसानां च मुख्यस्य पक्षिणां प्रवरस्य च॥ ४१॥

उस समय उन दोनों अनुपम पराक्रमी वीर राक्षसराज रावण और पक्षिराज जटायु में दो घड़ी तक घोर संग्राम होता रहा ॥ ४१॥

तस्य व्यायच्छमानस्य रामस्यार्थे स रावणः।

पक्षौ पादौ च पाश्वौ च खड्गमुद्धृत्य सोऽच्छिनत्॥४२॥

तदनन्तर रावण ने तलवार निकाली और श्रीरामचन्द्रजी के लिये पराक्रम करने वाले जटायु के दोनों पंख, पैर तथा पार्श्वभाग काट डाले॥४२॥

स च्छिन्नपक्षः सहसा रक्षसा रौद्रकर्मणा।

निपपात महागृध्रो धरण्यामल्पजीवितः॥४३॥

भयंकर कर्म करने वाले उस राक्षस के द्वारा सहसा पंख काट लिये जाने पर महागृध्र जटायु पृथ्वी पर गिर पड़े। अब वे थोड़ी ही देर के मेहमान थे। ४३॥

तं दृष्ट्वा पतितं भूमौ क्षतजा जटायुषम्।

अभ्यधावत वैदेही स्वबन्धुमिव दुःखिता॥४४॥

अपने बान्धव के समान जटायु को खून से लथपथ होकर पृथ्वी पर पड़ा देख सीता दुःख से व्याकुल हो उनकी ओर दौड़ी॥ ४४॥

तं नीलजीमूतनिकाशकल्पं सपाण्डुरोरस्कमुदारवीर्यम्।

ददर्श लङ्काधिपतिः पृथिव्यां जटायुषं शान्तमिवाग्निदावम्॥४५॥

जटायु के शरीर की कान्ति नीले मेघ के समान काली थी। उनकी छाती का रंग श्वेत था। वे बड़े पराक्रमी थे, तो भी उस समय बुझे हुए दावानल के समान पृथ्वी पर पड़ गये। लङ्कापति रावण ने उन्हें इस अवस्था में देखा॥४५॥

ततस्तु तं पत्ररथं महीतले निपातितं रावणवेगमर्दितम्।

पुनश्च संगृह्य शशिप्रभानना रुरोद सीता जनकात्मजा तदा॥४६॥

तदनन्तर रावण के वेग से रौंदे जाकर धराशायी हुए जटायु को पकड़कर चन्द्रमुखी जनकनन्दिनी सीता पुनः उस समय वहाँ रोने लगीं॥ ४६॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे एकपञ्चाशः सर्गः॥५१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में इक्यावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥५१॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अरण्यकाण्डम्

रावण द्वारा सीता का अपहरण

द्विपञ्चाशः सर्गः

सर्ग-52


सा तु ताराधिपमुखी रावणेन निरीक्ष्य तम्।

गृध्रराजं विनिहतं विललाप सुदुःखिता॥१॥

रावण के द्वारा मारे गये गृध्रराज की ओर देखकर चन्द्रमुखी सीता अत्यन्त दुःखी होकर विलाप करने लगीं- ॥१॥

निमित्तं लक्षणं स्वप्नं शकुनिस्वरदर्शनम्।

अवश्यं सुखदुःखेषु नराणां परिदृश्यते॥२॥

‘मनुष्यों को सुख-दुःख की प्राप्ति के सूचक लक्षण, स्वप्न, पक्षियों के स्वर तथा उनके दायें-बायें दर्शन आदि शुभाशुभ निमित्त अवश्य दिखायी देते हैं॥२॥

न नूनं राम जानासि महद्व्यसनमात्मनः।।

धावन्ति नूनं काकुत्स्थ मदर्थं मृगपक्षिणः॥३॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम! मेरे अपहरण की सूचना देने के लिये निश्चय ही ये मृग और पक्षी अशुभसूचक मार्ग से दौड़ रहे हैं, परंतु उनके द्वारा सूचित होने पर भी अपने इस महान् संकट को अवश्य

ही आप नहीं जानते हैं (क्योंकि जानने पर आप इसकी उपेक्षा नहीं कर सकते थे) ॥३॥

अयं हि कृपया राम मां त्रातुमिह संगतः।

शेते विनिहतो भूमौ ममाभाग्याद् विहंगमः॥४॥

‘हा राम! मेरा कैसा अभाग्य है कि जो कृपा करके मुझे बचाने के लिये यहाँ आये थे, वे पक्षिप्रवर जटायु इस निशाचर द्वारा मारे जाकर पृथ्वी पर पड़े हैं।

त्राहि मामद्य काकुत्स्थ लक्ष्मणेति वराङ्गना।

सुसंत्रस्ता समाक्रन्दच्छृण्वतां तु यथान्तिके॥५॥

‘हे राम! हे लक्ष्मण! अब आप ही दोनों मेरी रक्षा करें।’ यों कहकर अत्यन्त डरी हुई सुन्दरी सीता इस प्रकार क्रन्दन करने लगी, जिससे निकटवर्ती देवता और मनुष्य सुन सकें॥५॥

तां क्लिष्टमाल्याभरणां विलपन्तीमनाथवत्।

अभ्यधावत वैदेहीं रावणो राक्षसाधिपः॥६॥

उनके पुष्पहार और आभूषण मसलकर छिन्नभिन्न हो गये थे। वे अनाथ की भाँति विलाप कर रही थीं। उसी अवस्था में राक्षसराज रावण उन विदेहकुमारी सीता की ओर दौड़ा॥६॥

तां लतामिव वेष्टन्तीमालिङ्गन्तीं महाद्रुमान्।

मुञ्च मुञ्चेति बहुशः प्राप तां राक्षसाधिपः॥७॥

वे लिपटी हुई लता की भाँति बड़े-बड़े वृक्षों से लिपट जातीं और बारंबार कहतीं—’मुझे इस संकट से छुड़ाओ, छुड़ाओ।’ इतने ही में वह निशाचरराज उनके पास जा पहुँचा॥ ७॥

क्रोशन्तीं राम रामेति रामेण रहितां वने।

जीवितान्ताय केशेषु जग्राहान्तकसंनिभः॥८॥

प्रधर्षितायां वैदेह्यां बभूव सचराचरम्।

जगत् सर्वममर्यादं तमसान्धेन संवृतम्॥९॥

वन में श्रीराम से रहित होकर सीता को राम-राम की रट लगाती देख उस काल के समान विकराल राक्षस ने अपने ही विनाश के लिये उनके केश पकड़ लिये। सीता का इस प्रकार तिरस्कार होने पर समस्त चराचरजगत् मर्यादारहित तथा अन्धकार से आच्छन्नसा हो गया॥

न वाति मारुतस्तत्र निष्प्रभोऽभून दिवाकरः।

दृष्ट्वा सीतां परामृष्टां देवो दिव्येन चक्षुषा॥१०॥

कृतं कार्यमिति श्रीमान् व्याजहार पितामहः।

वहाँ वायु की गति रुक गयी और सूर्य की भी प्रभा फीकी पड़ गयी। श्रीमान् पितामह ब्रह्माजी दिव्यदृष्टि से विदेहनन्दिनी का वह राक्षस के द्वारा केशाकर्षणरूप अपमान देखकर बोले—’बस अब कार्य सिद्ध हो गया’ ॥ १० १/२ ॥

प्रहृष्टा व्यथिताश्चासन् सर्वे ते परमर्षयः॥११॥

दृष्ट्वा सीतां परामृष्टां दण्डकारण्यवासिनः।

रावणस्य विनाशं च प्राप्तं बुद्ध्वा यदृच्छया॥ १२॥

सीता के  केशों का खींचा जाना देखकर दण्डकारण्य में निवास करने वाले वे सब महर्षि मन ही-मन व्यथित हो उठे। साथ ही अकस्मात् रावण का विनाश निकट आया जान उनको बड़ा हर्ष हुआ॥ ११-१२॥

स तु तां राम रामेति रुदती लक्ष्मणेति च।

जगामादाय चाकाशं रावणो राक्षसेश्वरः॥१३॥

बेचारी सीता ‘हा राम! हा राम’ कहकर रो रही थीं। लक्ष्मण को भी पुकार रही थीं। उसी अवस्था में  राक्षसों का राजा रावण उन्हें लेकर आकाशमार्ग से चल दिया॥१३॥

तप्ताभरणवर्णाङ्गी पीतकौशेयवासिनी।

रराज राजपुत्री तु विद्युत्सौदामनी यथा॥१४॥

तपाये हुए सोने के आभूषणों से उनका सारा अङ्ग विभूषित था। वे पीले रंग की रेशमी साड़ी पहने हुए थीं। अतः उस समय राजकुमारी सीता सुदाम पर्वत से प्रकट हुई विद्युत् के समान प्रकाशित हो रही थीं। १४॥

उद्धृतेन च वस्त्रेण तस्याः पीतेन रावणः।

अधिकं परिबभ्राज गिरिर्दीप्त इवाग्निना॥१५॥

उनके फहराते हुए पीले वस्त्र से उपलक्षित रावण दावानल से उद्भासित होने वाले पर्वत के समान अधिक शोभा पाने लगा॥ १५॥

तस्याः परमकल्याण्यास्ताम्राणि सुरभीणि च।

पद्मपत्राणि वैदेह्या अभ्यकीर्यन्त रावणम्॥१६॥

उन परम कल्याणी विदेहकुमारी के अङ्गों में जो कमलपुष्प थे, उनके किंचित् अरुण और सुगन्धित दल बिखर-बिखरकर रावण पर गिरने लगे॥ १६॥

तस्याः कौशेयमुद्धृतमाकाशे कनकप्रभम्।

बभौ चादित्यरागेण ताम्रमभ्रमिवातपे॥१७॥

आकाश में उड़ता हुआ उनका सुवर्ण के समान कान्तिमान् रेशमी पीताम्बर संध्याकाल में सूर्य की किरणों से रँगे हुए ताम्रवर्ण के मेघखण्ड की भाँति शोभा पाता था॥ १७॥

तस्यास्तद् विमलं वक्त्रमाकाशे रावणाङ्कगम्।

न रराज विना रामं विनालमिव पङ्कजम्॥१८॥

आकाश में रावण के अङ्क में स्थित सीता का निर्मल मुख श्रीराम के बिना नालरहित कमल की भाँति शोभित नहीं होता था॥ १८॥

बभूव जलदं नीलं भित्त्वा चन्द्र इवोदितः।

सुललाटं सुकेशान्तं पद्मगर्भाभमव्रणम्॥१९॥

शुक्लैः सुविमलैर्दन्तैः प्रभावद्भिरलंकृतम्।

तस्याः सुनयनं वक्त्रमाकाशे रावणाङ्कगम्॥ २०॥

सुन्दर ललाट और मनोहर केशों से युक्त कमल के भीतरी भाग के समान कान्तिमान्, चेचक आदि के दाग से रहित, श्वेत, निर्मल और दीप्तिमान् दाँतों से अलंकृत तथा सुन्दर नेत्रों से सुशोभित सीता का मुख आकाश में रावण के अङ्क में ऐसा जान पड़ता था मानो मेघों की काली घटा का भेदन करके चन्द्रमा उदित हुआ हो॥

रुदितं व्यपमृष्टास्रं चन्द्रवत् प्रियदर्शनम्।

सुनासं चारुताम्रोष्ठमाकाशे हाटकप्रभम्॥ २१॥

राक्षसेन्द्रसमाधूतं तस्यास्तद् वदनं शुभम्।

शुशुभे न विना रामं दिवा चन्द्र इवोदितः॥२२॥

चन्द्रमा के समान प्यारा दिखायी देने वाला सीता का वह सुन्दर मुख तुरंत का रोया हुआ था। उसके आँसू पोंछ दिये गये थे। उसकी सुघड़ नासिका तथा ताँबे जैसे लाल-लाल मनोहर ओठ थे। आकाश में वह अपनी सुनहरी प्रभा बिखेर रहा था तथा राक्षसराज के वेगपूर्वक चलने से उसमें कम्पन हो रहा था। इस प्रकार वह मनोहर मुख भी श्रीराम के बिना उस समय दिन में उगे हुए चन्द्रमा के समान शोभाहीन प्रतीत होता था॥

सा हेमवर्णा नीलाऊं मैथिली राक्षसाधिपम्।

शुशुभे काञ्चनी काञ्ची नीलं गजमिवाश्रिता॥ २३॥

मिथिलेशकुमारी सीता का श्रीअङ्ग सुवर्ण के समान दीप्तिमान् था और राक्षसराज रावण का शरीर बिलकुल काला था। उसकी गोद में वे ऐसी जान पड़ती थीं मानो काले हाथी को सोने की करधनी पहना दी गयी हो ॥२३॥

सा पद्मपीता हेमाभा रावणं जनकात्मजा।

विद्युद् घनमिवाविश्य शुशुभे तप्तभूषणा ॥ २४॥

कमल के केसर की भाँति पीली एवं सुनहरी कान्तिवाली जनककुमारी सीता तपे हुए सोने के आभूषण धारण किये रावण की पीठपर वैसी ही शोभा पा रही थीं, जैसे मेघमाला का आश्रय लेकर बिजली चमक रही हो॥ २४॥

तस्या भूषणघोषेण वैदेह्या राक्षसेश्वरः।

बभूव विमलो नीलः सघोष इव तोयदः॥ २५॥

विदेहनन्दिनी के आभूषणों की झनकार से राक्षसराज रावण गर्जना करते हुए निर्मल नील मेघ के समान प्रतीत होता था॥ २५ ॥

उत्तमाङ्गच्युता तस्याः पुष्पवृष्टिः समन्ततः।

सीताया ह्रियमाणायाः पपात धरणीतले॥२६॥

हरकर ले जायी जाती हुई सीता के सिर से उनके केशों में गुंथे हुए फूल बिखरकर सब ओर पृथ्वी पर गिर रहे थे॥२६॥

सा तु रावणवेगेन पुष्पवृष्टिः समन्ततः।

समाधूता दशग्रीवं पुनरेवाभ्यवर्तत॥२७॥

चारों ओर होने वाली वह फूलों की वर्षा रावण के वेग से उठी हुई वायु के द्वारा प्रेरित हो फिर उस दशानन पर ही आकर पड़ती थी॥२७॥

अभ्यवर्तत पुष्पाणां धारा वैश्रवणानुजम्।

नक्षत्रमाला विमला मेरुं नगमिवोन्नतम्॥२८॥

कुबेर के छोटे भाई रावण के ऊपर जब वह फूलों की धारा गिरती थी, उस समय ऊँचे मेरुपर्वत पर उतरने वाली निर्मल नक्षत्रमाला की भाँति शोभा पाती थी॥२८॥

चरणान्नूपुरं भ्रष्टं वैदेह्या रत्नभूषितम्।

विद्युन्मण्डलसंकाशं पपात धरणीतले॥२९॥

विदेहनन्दिनी का रत्नजटित नूपुर उनके एक चरण से खिसककर विद्युन्मण्डल के समान पृथ्वी पर गिर पड़ा॥ २९॥

तरुप्रवालरक्ता सा नीलाङ्गं राक्षसेश्वरम्।

प्रशोभयत वैदेही गजं कक्ष्येव काञ्चनी॥३०॥

वृक्षों के नूतन पल्लवों के समान किंचित् अरुण वर्णवाली सीता उस काले-कलूटे राक्षसराज को उसी प्रकार सुशोभित कर रही थीं जैसे हाथी को कसने वाला सुनहरा रस्सा उसकी शोभा बढ़ाता हो। ३०॥

तां महोल्कामिवाकाशे दीप्यमानां स्वतेजसा।

जहाराकाशमाविश्य सीतां वैश्रवणानुजः॥३१॥

आकाश में अपने तेज से बहुत बड़ी उल्का के समान प्रकाशित होने वाली सीता को रावण आकाशमार्ग का ही आश्रय ले हर ले गया॥३१॥

तस्यास्तान्यग्निवर्णानि भूषणानि महीतले।

सघोषाण्यवशीर्यन्त क्षीणास्तारा इवाम्बरात्॥ ३२॥

जानकी के शरीर पर अग्नि के समान प्रकाशमान् आभूषण थे। वे उस समय खन-खन की आवाज करते हुए एक-एक करके गिरने लगे, मानो आकाश से ताराएँ टूट-टूटकर पृथ्वी पर गिर रही हों। ३२॥

तस्याः स्तनान्तराद् भ्रष्टो हारस्ताराधिपद्युतिः।

वैदेह्या निपतन् भाति गङ्गेव गगनच्युता॥३३॥

उन विदेहनन्दिनी सीता के स्तनों के बीच से खिसककर गिरता हुआ चन्द्रमा के समान उज्ज्वलहार गगनमण्डल से उतरती हुई गङ्गा के समान प्रतीत हुआ॥३३॥

उत्पातवाताभिरता नानाद्विजगणायुताः।

मा भैरिति विधूताग्रा व्याजहरिव पादपाः॥३४॥

रावण के वेग से उत्पन्न हुई उत्पातसूचक वायु के झकोरों से हिलते हुए वृक्षों पर नाना प्रकार के पक्षी कोलाहल कर रहे थे। उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था मानो वे वृक्ष अपने सिरों को हिला-हिलाकर संकेत करते हुए सीता से कह रहे हैं कि ‘तुम डरो मत’॥ ३४॥

नलिन्यो ध्वस्तकमलास्त्रस्तमीनजलेचराः।

सखीमिव गतोत्साहां शोचन्तीव स्म मैथिलीम्॥ ३५॥

जिनके कमल सूख गये थे और मत्स्य आदि जलचर जीव डर गये थे, वे पुष्करिणियाँ उत्साहहीन हुई मिथिलेशकुमारी सीता को मानो अपनी सखी मानकर उनके लिये शोक कर रही थीं॥ ३५ ॥

समन्तादभिसम्पत्य सिंहव्याघ्रमृगद्विजाः।

अन्वधावंस्तदा रोषात् सीताच्छायानुगामिनः॥ ३६॥

उस सीताहरण के समय रावण पर रोष-सा करके सिंह, व्याघ्र, मृग और पक्षी सब ओर से सीता की परछाहीं का अनुसरण करते हुए दौड़ रहे थे॥ ३६॥

जलप्रपातास्रमुखाः शृङ्गैरुच्छ्रितबाहुभिः।

सीतायां ह्रियमाणायां विक्रोशन्तीव पर्वताः॥ ३७॥

जब सीता हरी जाने लगी, उस समय वहाँके पर्वत झरनोंके रूपमें आँसू बहाते हुए, ऊँचे शिखरोंके रूपमें अपनी भुजाएँ ऊपर उठाकर मानो जोर-जोरसे चीत्कार कर रहे थे॥ ३७॥

ह्रियमाणां तु वैदेहीं दृष्ट्वा दीनो दिवाकरः।

प्रविध्वस्तप्रभः श्रीमानासीत् पाण्डुरमण्डलः॥ ३८॥

सीता का हरण होता देख श्रीमान् सूर्यदेव दुःखी हो गये। उनकी प्रभा नष्ट-सी हो गयी तथा उनका मण्डल पीला पड़ गया॥ ३८॥ ।

नास्ति धर्मः कुतः सत्यं नार्जवं नानृशंसता।

यत्र रामस्य वैदेहीं सीतां हरति रावणः॥३९॥

इति भूतानि सर्वाणि गणशः पर्यदेवयन्।

वित्रस्तका दीनमुखा रुरुदुर्भुगपोतकाः॥४०॥

हाय! हाय! जब श्रीरामचन्द्रजी की धर्मपत्नी विदेहनन्दिनी सीता को रावण हरकर लिये जा रहा है, तब यही कहना पड़ता है कि ‘संसार में धर्म नहीं है, सत्य भी कहाँ है? सरलता और दया का भी सर्वथा लोप हो गया है।’ इस प्रकार वहाँ झुंड-के-झुंड एकत्र हो सब प्राणी विलाप कर रहे थे। मृगों के बच्चे भयभीत हो दीनमुख से रो रहे थे॥ ३९-४० ॥

उदीक्ष्योगीक्ष्य नयनर्भयादिव विलक्षणैः।

सुप्रवेपितगात्राश्च बभूवुर्वनदेवताः॥४१॥

विक्रोशन्तीं दृढं सीतां दृष्ट्वा दुःखं तथा गताम्।

श्रीराम को जोर-जोर से पुकारती और वैसे भारी दुःख में पड़ी हुई सीता को अपनी विलक्षण आँखों से बारंबार देख-देखकर भय के मारे वनदेवताओं के अङ्ग थर-थर काँपने लगे॥ ४१ १/२॥

तां तु लक्ष्मण रामेति क्रोशन्तीं मधुरस्वराम्॥ ४२॥

अवेक्षमाणां बहुशो वैदेहीं धरणीतलम्।

स तामाकुलकेशान्तां विप्रमृष्टविशेषकाम्।

जहारात्मविनाशाय दशग्रीवो मनस्विनीम्॥४३॥

विदेहनन्दिनी मधुर स्वर में ‘हा राम, हा लक्ष्मण’ की पुकार करती हुई बारंबार भूतल की ओर देख रही थीं। उनके केश खुलकर सब ओर फैल गये थे और ललाट की बेंदी मिट गयी थी। वैसी अवस्था में दशग्रीव रावण अपने ही विनाश के लिये मनस्विनी सीता को लिये जा रहा था॥ ४२-४३।।

ततस्तु सा चारुदती शुचिस्मिता विनाकृता बन्धुजनेन मैथिली।

अपश्यती राघवलक्ष्मणावुभौ विवर्णवक्त्रा भयभारपीडिता॥४४॥

उस समय मनोहर दाँत और पवित्र मुसकानवाली मिथिलेशकुमारी सीता, जो अपने बन्धुजनों से बिछुड़ गयी थीं, दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण को न देखकर भय के भार से व्यथित हो उठीं। उनके मुखमण्डल की कान्ति फीकी पड़ गयी॥ ४४ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे द्विपञ्चाशः सर्गः॥५२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में बावनवाँ सर्ग पूरा हुआ।५२॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अरण्यकाण्डम्

सीता का रावण को धिक्कारना

त्रिपञ्चाशः सर्गः

सर्ग-53


खमुत्पतन्तं तं दृष्ट्वा मैथिली जनकात्मजा।

दुःखिता परमोद्विग्ना भये महति वर्तिनी॥१॥

रावण को आकाश में उड़ते देख मिथिलेशकुमारी जानकी दुःखमग्न हो अत्यन्त उद्विग्न हो रही थीं। वे बहुत बड़े भय में पड़ गयी थीं॥१॥

रोषरोदनताम्राक्षी भीमाक्षं राक्षसाधिपम्।

रुदती करुणं सीता ह्रियमाणा तमब्रवीत्॥२॥

रोष और रोदन के कारण उनकी आँखें लाल हो गयी थीं। हरी जाती हुई सीता करुणाजनक स्वर में रोती हुई उस भयंकर नेत्रवाले राक्षसराज से इस प्रकार बोलीं

न व्यपत्रपसे नीच कर्मणानेन रावण।

ज्ञात्वा विरहितां यो मां चोरयित्वा पलायसे॥३॥

‘ओ नीच रावण! क्या तुझे अपने इस कुकर्म से लज्जा नहीं आती है, जो मुझे स्वामी से रहित अकेली और असहाय जानकर चुराये लिये भागा जाता है? ॥

त्वयैव नूनं दुष्टात्मन् भीरुणा हर्तुमिच्छता।

ममापवाहितो भर्ता मृगरूपेण मायया॥४॥

‘दुष्टात्मन्! तू बड़ा कायर और डरपोक है। निश्चय ही मुझे हर ले जाने की इच्छा से तूने ही माया द्वारा मृगरूप में उपस्थित हो मेरे स्वामी को आश्रम से दूर हटा दिया था।

यो हि मामुद्यतस्त्रातुं सोऽप्ययं विनिपातितः।

गृध्रराजः पुराणोऽसौ श्वशुरस्य सखा मम॥५॥

‘मेरे श्वशुर के सखा वे जो बूढ़े जटायु मेरी रक्षा करने के लिये उद्यत हुए थे, उनको भी तूने मार गिराया॥

परमं खलु ते वीर्यं दृश्यते राक्षसाधम।

विश्राव्य नामधेयं हि युद्धे नास्मि जिता त्वया॥

ईदृशं गर्हितं कर्म कथं कृत्वा न लज्जसे।

स्त्रियाश्चाहरणं नीच रहिते च परस्य च॥७॥

‘नीच राक्षस! अवश्य तुझमें बड़ा भारी बल दिखायी देता है (क्योंकि-तू बूढ़े पक्षी को भी मार गिराता है!), तूने अपना नाम बताकर श्रीरामलक्ष्मण के साथ युद्ध करके मुझे नहीं जीता है। ओ नीच! जहाँ कोई रक्षक न हो—ऐसे स्थान पर जाकर परायी स्त्री के अपहरण-जैसा निन्दित कर्म करके तू लज्जित कैसे नहीं होता है ? ॥

कथयिष्यन्ति लोकेषु पुरुषाः कर्म कुत्सितम्।

सुनृशंसमधर्मिष्ठं तव शौटीर्यमानिनः॥८॥

‘तू तो अपने को बड़ा शूर-वीर मानता है, परंतु संसार के सभी वीर पुरुष तेरे इस कर्म को घृणित, क्रूरतापूर्ण और पापरूप ही बतायेंगे॥ ८॥

धिक् ते शौर्यं च सत्त्वं च यत्त्वया कथितं तदा।

कुलाक्रोशकरं लोके धिक ते चारित्रमीदृशम्॥

‘तूने पहले स्वयं ही जिसका बड़े ताव से वर्णन किया था, तेरे उस शौर्य और बल को धिक्कार है! कुल में कलङ्क लगाने वाले तेरे ऐसे चरित्र को संसार में सदा धिक्कार ही प्राप्त होगा॥९॥

किं शक्यं कर्तुमेवं हि यज्जवेनैव धावसि।

मुहूर्तमपि तिष्ठ त्वं न जीवन् प्रतियास्यसि॥१०॥

‘किंतु इस समय क्या किया जा सकता है? क्योंकि तू बड़े वेग से भागा जा रहा है। अरे! दो घड़ी भी तो ठहर जा, फिर यहाँ से जीवित नहीं लौट सकेगा।

नहि चक्षुःपथं प्राप्य तयोः पार्थिवपुत्रयोः।

ससैन्योऽपि समर्थस्त्वं मुहूर्तमपि जीवितुम्॥११॥

“उन दोनों राजकुमारों के दृष्टिपथ में आ जाने पर तू सेना के साथ हो तो भी दो घड़ी भी जीवित नहीं रह सकता ॥ ११॥

न त्वं तयोः शरस्पर्श सोढुं शक्तः कथंचन।

वने प्रज्वलितस्येव स्पर्शमग्नेर्विहंगमः॥१२॥

‘जैसे कोई आकाशचारी पक्षी वन में प्रज्वलित हुए दावानल का स्पर्श सहन करने में समर्थ नहीं होता, उसी प्रकार तू मेरे पति और उनके भाई दोनों के बाणों का स्पर्श किसी तरह सह नहीं सकता॥ १२ ॥

साधु कृत्वाऽऽत्मनः पथ्यं साधु मां मुञ्च रावण।

मत्प्रधर्षणसंक्रुद्धो भ्रात्रा सह पतिर्मम॥१३॥

विधास्यति विनाशाय त्वं मां यदि न मुञ्चसि।

‘रावण! यदि तू मुझे छोड़ नहीं देता है तो मेरे तिरस्कार से कुपित हुए मेरे पतिदेव अपने भाई के साथ चढ़ आयेंगे और तेरे विनाश का उपाय करेंगे, अतः तू अच्छी तरह अपनी भलाई सोच ले और मुझे छोड़ दे। यही तेरे लिये अच्छा होगा॥ १३ १/२ ॥

येन त्वं व्यवसायेन बलान्मां हर्तुमिच्छसि॥१४॥

व्यवसायस्तु ते नीच भविष्यति निरर्थकः।।

‘नीच! तू जिस संकल्प या अभिप्राय से बलपूर्वक मेरा हरण करना चाहता है, तेरा वह अभिप्राय व्यर्थ होगा। १४ १/२॥

नह्यहं तमपश्यन्ती भर्तारं विबुधोपमम्॥१५॥

उत्सहे शत्रुवशगा प्राणान् धारयितुं चिरम्।

‘मैं अपने देवोपम पति का दर्शन न पाने पर शत्रु के अधीनता में अधिक कालतक अपने प्राणों को नहीं धारण कर सकूँगी॥ १५ १/२ ॥

न नूनं चात्मनः श्रेयः पथ्यं वा समवेक्षसे॥१६॥

मृत्युकाले यथा मर्यो विपरीतानि सेवते।

मुमूर्पूणां तु सर्वेषां यत् पथ्यं तन्न रोचते॥१७॥

‘निश्चय ही तू अपने कल्याण और हित का विचार नहीं करता है। जैसे मरने के समय मनुष्य स्वास्थ्य के विरोधी पदार्थों का सेवन करने लगता है, वही दशा तेरी है। प्रायः सभी मरणासन्न मनुष्यों को पथ्य (हितकारक सलाह या भोजन) नहीं रुचता है॥ १६-१७॥

पश्यामीह हि कण्ठे त्वां कालपाशावपाशितम्।

यथा चास्मिन् भयस्थाने न बिभेषि निशाचर ॥ १८॥

‘निशाचर! मैं देखती हूँ, तेरे गले में काल की फाँसी पड़ चुकी है, इसी से इस भय के स्थान पर भी तू निर्भय बना हुआ है।॥ १८॥

व्यक्तं हिरण्मयांस्त्वं हि सम्पश्यसि महीरुहान्।

नदीं वैतरणी घोरां रुधिरौघविवाहिनीम्॥१९॥

खड्गपत्रवनं चैव भीमं पश्यसि रावण।।

तप्तकाञ्चनपुष्पां च वैदूर्यप्रवरच्छदाम्॥२०॥

द्रक्ष्यसे शाल्मलीं तीक्ष्णामायसैः कण्टकैश्चिताम्।

‘रावण! अवश्य ही तू सुवर्णमय वृक्षों को देख रहा है, रक्त का स्रोत बहाने वाली भयंकर वैतरणी नदी का दर्शन कर रहा है, भयानक असिपत्र-वन को भी देखना चाहता है तथा जिसमें तपाये हुए सुवर्ण के

समान फूल तथा श्रेष्ठ वैदूर्यमणि (नीलम) के समान पत्ते हैं और जिसमें लोहे के काँटे चिने गये हैं, उस तीखी शाल्मलिका भी अब तू शीघ्र ही दर्शन करेगा। १९-२० १/२॥

नहि त्वमीदृशं कृत्वा तस्यालीकं महात्मनः॥ २१॥

धारितुं शक्ष्यसि चिरं विषं पीत्वेव निघृण।

बद्धस्त्वं कालपाशेन दुर्निवारेण रावण॥२२॥

‘निर्दयी निशाचर! तू महात्मा श्रीराम का ऐसा महान् अपराध करके विषपान किये हुए मनुष्य की भाँति अधिक कालतक जीवन धारण नहीं कर सकेगा। रावण! तू अटल कालपाश से बँध गया है॥ २१-२२ ॥

क्व गतो लप्स्यसे शर्म मम भर्तुर्महात्मनः।

निमेषान्तरमात्रेण विना भ्रातरमाहवे॥ २३॥

राक्षसा निहता येन सहस्राणि चतुर्दश।

कथं स राघवो वीरः सर्वास्त्रकुशलो बली॥ २४॥

न त्वां हन्याच्छरैस्तीक्ष्णैरिष्टभार्यापहारिणम्।

‘मेरे महात्मा पति से बचकर तू कहाँ जाकर शान्ति पा सकेगा। जिन्होंने अपने भाई लक्ष्मण की सहायता लिये बिना ही युद्ध में पलक मारते-मारते चौदह हजार राक्षसों का विनाश कर डाला, वे सम्पूर्ण अस्त्रों का प्रयोग करने में कुशल बलवान् वीर रघुनाथजी अपनी प्यारी पत्नी का अपहरण करने वाले तुझ-जैसे पापी को तीखे बाणों द्वारा क्यों नहीं कालके गाल में भेज देंगे’। २३-२४ १/२॥

एतच्चान्यच्च परुषं वैदेही रावणाङ्कगा।

भयशोकसमाविष्टा करुणं विललाप ह॥२५॥

रावण के चंगुल में फँसी हुई विदेहराजकुमारी सीता भय और शोक से व्याकुल हो ये तथा और भी बहुत से कठोर वचन सुनाकर करुण-स्वर में विलाप करने लगीं। २५ ॥

तदा भृशात् बहु चैव भाषिणीं विलापपूर्वं करुणं च भामिनीम्।

जहार पापस्तरुणीं विचेष्टतीं नृपात्मजामागतगात्रवेपथुः॥२६॥

अत्यन्त दुःख से आतुर हो विलापपूर्वक बहुत-सी करुणाजनक बातें कहती और छूटने के लिये नाना प्रकार की चेष्टा करती हुई तरुणी भामिनी राजकुमारी सीता को वह पापी निशाचर हर ले गया। उस समय अधिक बोझ के कारण उसका शरीर काँप रहा था। २६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे त्रिपञ्चाशः सर्गः॥५३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में तिरपनवाँ सर्ग पूरा हुआ।५३॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अरण्यकाण्डम्

सीता का पाँच वानरों के बीच अपने भूषण और वस्त्र को गिराना, रावण का सीता को अन्तःपुर में रखना

चतुष्पञ्चाशः सर्गः

सर्ग-54


ह्रियमाणा तु वैदेही कंचिन्नाथमपश्यती।

ददर्श गिरिशृङ्गस्थान् पञ्च वानरपुङ्गवान्॥१॥

रावण के द्वारा हरी जाती हुई विदेहनन्दिनी सीता को उस समय कोई भी अपना सहायक नहीं दिखायी देता था। मार्ग में उन्होंने एक पर्वत के शिखर पर पाँच श्रेष्ठ वानरों को बैठे देखा॥१॥

तेषां मध्ये विशालाक्षी कौशेयं कनकप्रभम्।

उत्तरीयं वरारोहा शुभान्याभरणानि च॥२॥

मुमोच यदि रामाय शंसेयुरिति भामिनी।

वस्त्रमुत्सृज्य तन्मध्ये निक्षिप्तं सहभूषणम्॥३॥

तब सुन्दर अङ्गोंवाली विशाललोचना भामिनी सीता ने यह सोचकर कि शायद ये भगवान् श्रीराम को कुछ समाचार कह सकें, अपने सुनहरे रंग की रेशमी चादर उतारी और उसमें वस्त्र और आभूषण रखकर उसे उनके बीच में फेंक दिया॥ २-३॥

सम्भ्रमात् तु दशग्रीवस्तत्कर्म च न बुद्धवान्।

पिङ्गाक्षास्तां विशालाक्षी नेत्रैरनिमिषैरिव॥४॥

विक्रोशन्तीं तदा सीतां ददृशुर्वानरोत्तमाः।

रावण बड़ी घबराहट में था, इसलिये सीता के इस कार्य को वह न जान सका। वे भूरी आँखों वाले श्रेष्ठ वानर उस समय उच्च स्वर से विलाप करती हुई विशाल-लोचना सीता की ओर एकटक नेत्रों से देखने लगे॥ ४ १/२॥

स च पम्पामतिक्रम्य लङ्कामभिमुखः पुरीम्॥५॥

जगाम मैथिलीं गृह्य रुदतीं राक्षसेश्वरः।।

राक्षसराज रावण पम्पासरोवर को लाँघकर रोती हुई मैथिली सीता को साथ लिये लङ्कापुरी की ओर चल दिया॥ ५ १/२॥

तां जहार सुसंहृष्टो रावणो मृत्युमात्मनः॥६॥

उत्सङ्गेनैव भुजगीं तीक्ष्णदंष्ट्रां महाविषाम्।

निशाचर रावण बड़े हर्ष में भरकर सीता के रूप में अपनी मौत को ही हरकर लिये जा रहा था। उसने वैदेही के रूप में तीखे दाढ़वाली महाविषैली नागिन को ही अपनी गोद में उठा रखा था॥ ६ १/२॥

वनानि सरितः शैलान् सरांसि च विहायसा॥७॥

स क्षिप्रं समतीयाय शरश्चापादिव च्युतः।

वह धनुष से छूटे हुए बाण की तरह तीव्र गति से चलकर आकाशमार्ग से अनेकानेक वनों, नदियों, पर्वतों और सरोवरों को तुरंत लाँघ गया॥७ १/२॥

तिमिनक्रनिकेतं तु वरुणालयमक्षयम्॥८॥

सरितां शरणं गत्वा समतीयाय सागरम्।

उसने तिमि नामक मत्स्यों और नाकों के निवासस्थान एवं वरुण के अक्षय गृह समुद्र को भी, जो समस्त नदियों का आश्रय है, पार कर लिया। ८ १/२॥

सम्भ्रमात् परिवृत्तोर्मी रुद्धमीनमहोरगः॥९॥

वैदेह्यां ह्रियमाणायां बभूव वरुणालयः।

विदेहनन्दिनी जगन्माता जानकी का अपहरण होते समय वरुणालय समुद्र को बड़ी घबराहट हुई। उससे उसकी उठती हुई लहरें शान्त हो गयीं। उसके भीतररहने वाली मछलियों और बड़े-बड़े सर्पो की गति रुकगयी॥९ १/२ ॥

अन्तरिक्षगता वाचः ससृजुश्चारणास्तदा॥१०॥

एतदन्तो दशग्रीव इति सिद्धास्तथाब्रुवन्।

उस समय आकाश में विचरने वाले चारण यों बोले —’अब दशग्रीव रावण का यह अन्तकाल निकट आ पहुँचा है’ तथा सिद्धों ने भी यही बात दुहरायी॥ १० १/२॥

स तु सीतां विचेष्टन्तीमतेनादाय रावणः॥११॥

प्रविवेश पुरीं लङ्कां रूपिणीं मृत्युमात्मनः।।

सीता छटपटा रही थीं। रावण ने अपनी साकारमृत्यु की भाँति उन्हें अङ्क में लेकर लङ्कापुरी में प्रवेश किया॥ ११ १/२॥

सोऽभिगम्य पुरीं लङ्कां सुविभक्तमहापथाम्॥ १२॥

संरूढकक्ष्यां बहुलां स्वमन्तःपुरमाविशत्।

वहाँ पृथक्-पृथक् विशाल राजमार्ग बने हुए थे। पुरी के द्वारपर बहुत-से राक्षस इधर-उधर फैले हुए थे तथा उस नगरी का विस्तार बहुत बड़ा था। उसमें जाकर रावण ने अपने अन्तःपुर में प्रवेश किया॥ १२ १/२॥

तत्र तामसितापाङ्गीं शोकमोहसमन्विताम्॥१३॥

निदधे रावणः सीतां मयो मायामिवासुरीम्।

कजरारे नेत्रप्रान्तवाली सीता शोक और मोह में डूबी हुई थीं। रावण ने उन्हें अन्तःपुर में रख दिया, मानो मयासुर ने मूर्तिमती आसुरी माया को वहाँ स्थापित कर दिया हो* ॥ १३ १/२॥

*रामायणतिलक नामक व्याख्या के विद्वान् लेखक ने यह बताया है कि यहाँ जो सीता की माया से उपमा दी गयी है, उसके द्वारा यह अभिप्राय व्यक्त किया गया है कि मायामयी सीता ही लङ्का में आयी थीं; मुख्य सीता तो अग्नि में प्रविष्ट हो चुकी थीं। इसीलिये रावण इन्हें ला सका। मायारूपिणी होने के कारण ही रावण को इनके स्वरूपका ज्ञान न हो सका।

अब्रवीच्च दशग्रीवः पिशाची?रदर्शनाः॥१४॥

यथा नैनां पुमान् स्त्री वा सीतां पश्यत्यसम्मतः।

इसके बाद दशग्रीव ने  भयंकर आकारवाली पिशाचिनों को बुलाकर कहा—'(तुम सब सावधानी के साथ सीता की रक्षा करो।) कोई भी स्त्री या पुरुष मेरी आज्ञा के बिना सीता को देखने या इनसे मिलने न पाये॥ १४ १/२॥

मुक्तामणिसुवर्णानि वस्त्राण्याभरणानि च॥ १५॥

यद् यदिच्छेत् तदैवास्या देयं मच्छन्दतो यथा।

‘उन्हें मोती, मणि, सुवर्ण, वस्त्र और आभूषण आदि जिस-जिस वस्तु की इच्छा हो, वह तुरंत दी जाय इसके लिये मेरी खुली आज्ञा है। १५ १/२ ॥

या च वक्ष्यति वैदेहीं वचनं किंचिदप्रियम्॥ १६॥

अज्ञानाद् यदि वा ज्ञानान्न तस्या जीवितं प्रियम्।

‘तुमलोगों में से जो कोई भी जानकर या बिना जाने विदेहकुमारी सीता से कोई अप्रिय बात कहेगी, मैं समशृंगा, उसे अपनी जिंदगी प्यारी नहीं है’ ॥ १६ १/२॥

तथोक्त्वा राक्षसीस्तास्तु राक्षसेन्द्रः प्रतापवान्॥ १७॥

निष्क्रम्यान्तःपुरात् तस्मात् किं कृत्यमिति चिन्तयन्।

ददर्शाष्टौ महावीर्यान् राक्षसान् पिशिताशनान्॥ १८॥

राक्षसियों को वैसी आज्ञा देकर प्रतापी राक्षसराज ‘अब आगे क्या करना चाहिये’ यह सोचता हुआ अन्तःपुर से बाहर निकला और कच्चे मांस का आहार करने वाले आठ महापराक्रमी राक्षसों से तत्काल मिला॥

स तान् दृष्ट्वा महावीर्यो वरदानेन मोहितः।

उवाच तानिदं वाक्यं प्रशस्य बलवीर्यतः॥१९॥

उनसे मिलकर ब्रह्माजी के वरदान से मोहित हुए महापराक्रमी रावण ने उसके बल और वीर्य की प्रशंसा करके उनसे इस प्रकार कहा- ॥१९॥

नानाप्रहरणाः क्षिप्रमितो गच्छत सत्वराः।

जनस्थानं हतस्थानं भूतपूर्वं खरालयम्॥२०॥

‘वीरो! तुमलोग नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्र साथ लेकर शीघ्र ही जनस्थान को, जहाँ पहले खर रहता था, जाओ। वह स्थान इस समय उजाड़ पड़ा है। २०॥

तत्रास्यतां जनस्थाने शून्ये निहतराक्षसे।

पौरुषं बलमाश्रित्य त्रासमुत्सृज्य दूरतः॥२१॥

‘वहाँ के सभी राक्षस मार डाले गये हैं। उस सूने जनस्थान में तुमलोग अपने ही बल-पौरुष का भरोसा करके भय को दूर हटाकर रहो॥ २१॥

बहुसैन्यं महावीर्यं जनस्थाने निवेशितम्।

सदूषणखरं युद्धे निहतं रामसायकैः॥ २२॥

‘मैंने वहाँ बहुत बड़ी सेना के साथ महापराक्रमी खर और दूषण को बसा रखा था, किंतु वे सब-के सब युद्ध में राम के बाणों से मारे गये॥ २२॥

ततः क्रोधो ममापूर्वो धैर्यस्योपरि वर्धते।

वैरं च सुमहज्जातं रामं प्रति सुदारुणम्॥२३॥

‘इससे मेरे मन में अपूर्व क्रोध जाग उठा है और वह धैर्य की सीमा से ऊपर उठकर बढ़ने लगा है; इसीलिये राम के साथ मेरा बड़ा भारी और भयंकर वैर ठन गया है।

निर्यातयितुमिच्छामि तच्च वैरं महारिपोः।

नहि लप्स्याम्यहं निद्रामहत्वा संयुगे रिपुम्॥२४॥

‘मैं अपने महान् शत्रु से उस वैर का बदला लेना चाहता हूँ। उस शत्रु को संग्राम में मारे बिना मैं चैन से सो नहीं सकूँगा॥२४॥

तं त्विदानीमहं हत्वा खरदूषणघातिनम्।

रामं शर्मोपलप्स्यामि धनं लब्ध्वेव निर्धनः॥२५॥

‘राम ने खर और दूषण का वध किया है, अतः मैं भी इस समय उन्हें मारकर जब बदला चुका लूँगा, तभी मुझे शान्ति मिलेगी। जैसे निर्धन मनुष्य धन पाकर संतुष्ट होता है, उसी प्रकार मैं राम का वध करके शान्ति पा सकूँगा॥ २५॥

जनस्थाने वसद्भिस्तु भवद्भी राममाश्रिता।

प्रवृत्तिरुपनेतव्या किं करोतीति तत्त्वतः॥२६॥

‘जनस्थान में रहकर तुमलोग रामचन्द्र का समाचार जानो और वे कब क्या कर रहे हैं, इसका ठीक-ठीक पता लगाते रहो और जो कुछ मालूम हो, उसकी सूचना मेरे पास भेज दिया करो॥२६॥

अप्रमादाच्च गन्तव्यं सर्वैरेव निशाचरैः।

कर्तव्यश्च सदा यत्नो राघवस्य वधं प्रति॥२७॥

‘तुम सभी निशाचर सावधानी के साथ वहाँ जाना और राम के वध के लिये सदा प्रयत्न करते रहना॥ २७॥

युष्माकं तु बलं ज्ञातं बहुशो रणमूर्धनि।

अतश्चास्मिञ्जनस्थाने मया यूयं निवेशिताः॥ २८॥

‘मुझे अनेक बार युद्धके मुहाने पर तुमलोगों के बल का परिचय मिल चुका है। इसीलिये इस जनस्थान में मैंने तुम्हीं लोगों को रखने का निश्चय किया है’ ॥२८॥

ततः प्रियं वाक्यमुपेत्य राक्षसा महार्थमष्टावभिवाद्य रावणम्।

विहाय लङ्कां सहिताः प्रतस्थिरे यतो जनस्थानमलक्ष्यदर्शनाः॥२९॥

रावण की यह महान् प्रयोजन से भरी हुई प्रिय बातें सुनकर वे आठों राक्षस उसे प्रणाम करके अदृश्य हो एक साथ ही लङ्का को छोड़कर जनस्थान की ओर प्रस्थित हो गये॥ २९॥

ततस्तु सीतामुपलभ्य रावणः सुसम्प्रहृष्टः परिगृह्य मैथिलीम्।

प्रसज्य रामेण च वैरमुत्तमं बभूव मोहान्मुदितः स रावणः॥३०॥

तदनन्तर मिथिलेशकुमारी सीताको पाकर उन्हें राक्षसियों की देख-रेख में सौंपकर रावण को बड़ा हर्ष हुआ। श्रीराम के साथ भारी वैर ठानकर वह राक्षस मोहवश आनन्द मानने लगा॥ ३० ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे चतुष्पञ्चाशः सर्गः॥५४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में चौवनवाँ सर्ग पूरा हुआ।५४॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अरण्यकाण्डम्

रावण का सीता को अपने अन्तःपुर का दर्शन कराना और अपनी भार्या बन जाने के लिये समझाना

पञ्चपञ्चाशः सर्गः

सर्ग-55


संदिश्य राक्षसान् घोरान् रावणोऽष्टौ महाबलान्।

आत्मानं बुद्धिवैक्लव्यात् कृत्कृत्यममन्यत॥१॥

इस प्रकार आठ महाबली भयंकर राक्षसों को जनस्थान में जाने की आज्ञा दे रावण ने विपरीत बुद्धि के कारण अपने को कृतकृत्य माना॥१॥

स चिन्तयानो वैदेहीं कामबाणैः प्रपीडितः।

प्रविवेश गृहं रम्यं सीतां द्रष्टमभित्वरन्॥२॥

वह विदेहकुमारी सीता का स्मरण करके कामबाणों से अत्यन्त पीड़ित हो रहा था; अतः उन्हें देखने के लिये उसने बड़ी उतावली के साथ अपने रमणीय अन्तःपुर में प्रवेश किया॥२॥

स प्रविश्य तु तद्देश्म रावणो राक्षसाधिपः।

अपश्यद् राक्षसीमध्ये सीतां दुःखपरायणाम्॥

अश्रुपूर्णमुखीं दीनां शोकभारावपीडिताम्।

वायुवेगैरिवाक्रान्तां मज्जन्तीं नावमर्णवे॥४॥

मृगयूथपरिभ्रष्टां मृगी श्वभिरिवावृताम्।

उस भवन में प्रवेश करके राक्षसों के राजा रावण ने देखा कि सीता राक्षसियों के बीच में बैठकर दुःख में डूबी हुई हैं। उनके मुख पर आँसुओं की धारा बह रही है और वे शोक के दुस्सह भार से अत्यन्त पीड़ित एवं दीन हो वायु के वेग से आक्रान्त हो समुद्र में डूबती हुई नौका के समान जान पड़ती हैं। मृगों के यूथ से बिछुड़कर कुत्तों से घिरी हुई अकेली हरिणी के समान दिखायी देती हैं। ३-४ १/२॥

अधोगतमुखीं सीतां तामभ्येत्य निशाचरः॥५॥

तां तु शोकवशाद् दीनामवशां राक्षसाधिपः।

सबलाद् दर्शयामास गृहं देवगृहोपमम्॥६॥

शोकवश दीन और विवश हो नीचे मुँह किये बैठी हुई सीता के पास पहुँचकर राक्षसों के राजा निशाचर रावण ने उन्हें जबर्दस्ती अपने देवगृह के समान सुन्दर भवन का दर्शन कराया॥ ५-६॥

हर्म्यप्रासादसम्बाधं स्त्रीसहस्रनिषेवितम्।

नानापक्षिगणैर्जुष्टं नानारत्नसमन्वितम्॥७॥

वह ऊँचे-ऊँचे महलों और सातमंजिले मकानों से भरा हुआ था। उसमें सहस्रों स्त्रियाँ निवास करती थीं। झुंड-के-झुंड नाना जाति के पक्षी वहाँ कलरव करते थे। नाना प्रकार के रत्न उस अन्तःपुर की शोभा बढ़ाते थे॥७॥

दान्तकैस्तापनीयैश्च स्फाटिकै राजतैस्तथा।

वज्रवैदूर्यचित्रैश्च स्तम्भैदृष्टिमनोरमैः॥८॥

उसमें बहुत-से मनोहर खंभे लगे थे, जो हाथीदाँत, पक्के सोने, स्फटिकमणि, चाँदी, हीरा और वैदूर्यमणि (नीलम) से जटित होने के कारण बड़े विचित्र दिखायी देते थे॥८॥

दिव्यदुन्दुभिनिर्घोषं तप्तकाञ्चनभूषणम्।

सोपानं काञ्चनं चित्रमारुरोह तया सह ॥९॥

उस महल में दिव्य दुन्दुभियों का मधुर घोष होता रहता था। उस अन्तःपुर को तपाये हुए सुवर्ण के आभूषणों से सजाया गया था। रावण सीता को साथ लेकर सोने की बनी हुई विचित्र सीढ़ीपर चढ़ा॥९॥

दान्तका राजताश्चैव गवाक्षाः प्रियदर्शनाः।

हेमजालावृताश्चासंस्तत्र प्रासादपङ्क्तयः॥१०॥

वहाँ हाथीदाँत और चाँदी की बनी हुई खिड़कियाँ थीं, जो बड़ी सुहावनी दिखायी देती थीं। सोने की जालियों से ढकी हुई प्रासादमालाएँ भी दृष्टिगोचर होती थीं॥ १०॥

सुधामणिविचित्राणि भूमिभागानि सर्वशः।

दशग्रीवः स्वभवने प्रादर्शयत मैथिलीम्॥११॥

उस महल में जो भूभाग (फर्श) थे, वे सुर्थी चूना के पक्के बनाये गये थे और उनमें मणियाँ जड़ी गयी थीं, जिनसे वे सब-के-सब विचित्र दिखायी देते थे। दशग्रीव ने अपने महल की वे सारी वस्तुएँ मैथिलीको दिखायीं॥ ११॥

दीर्घिकाः पुष्करिण्यश्च नानापुष्पसमावृताः।

रावणो दर्शयामास सीतां शोकपरायणाम्॥ १२॥

रावण ने बहुत-सी बावड़ियाँ और भाँति-भाँति के फूलों से आच्छादित बहुत-सी पोखरियाँ भी सीता को दिखायीं। सीता वह सब देखकर शोक में डूब गयीं। १२॥

दर्शयित्वा तु वैदेहीं कृत्स्नं तद्भवनोत्तमम्।

उवाच वाक्यं पापात्मा सीतां लोभितुमिच्छया॥ १३॥

वह पापात्मा निशाचर विदेहनन्दिनी सीता को अपना सारा सुन्दर भवन दिखाकर उन्हें लुभाने की इच्छा से इस प्रकार बोला— ॥१३॥

दश राक्षसकोट्यश्च द्वाविंशतिरथापराः।

वर्जयित्वा जरावृद्धान् बालांश्च रजनीचरान्॥ १४॥

तेषां प्रभुरहं सीते सर्वेषां भीमकर्मणाम्।

सहस्रमेकमेकस्य मम कार्यपुरःसरम्॥१५॥

‘सीते! मेरे अधीन बत्तीस करोड़ राक्षस हैं। यह संख्या बूढ़े और बालक निशाचरों को छोड़कर बतायी गयी है। भयंकर कर्म करने वाले इन सभी राक्षसों का मैं ही स्वामी हूँ। अकेले मेरी सेवा में एक हजार राक्षस रहते हैं ॥ १४-१५ ॥

यदिदं राज्यतन्त्रं मे त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम्।

जीवितं च विशालाक्षि त्वं मे प्राणैर्गरीयसी॥ १६॥

‘विशाललोचने! मेरा यह सारा राज्य और जीवन तुम पर ही अवलम्बित है (अथवा यह सब कुछ तुम्हारे चरणों में समर्पित है)। तुम मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय हो॥१६॥

बह्वीनामुत्तमस्त्रीणां मम योऽसौ परिग्रहः।

तासां त्वमीश्वरी सीते मम भार्या भव प्रिये॥ १७॥

‘सीते! मेरा अन्तःपुर मेरी बहुत-सी सुन्दरी भार्याओं से भरा हुआ है, तुम उन सबकी स्वामिनी बनो—प्रिये! मेरी भार्या बन जाओ॥ १७ ॥

साधु किं तेऽन्यथाबुद्ध्या रोचयस्व वचो मम।

भजस्व माभितप्तस्य प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥१८॥

‘मेरे इस हितकर वचन को  मान लो—इसे पसंद करो; इससे विपरीत विचार को मन में लाने से तुम्हें क्या लाभ होगा? मुझे अङ्गीकार करो। मैं पीड़ित हूँ, मुझपर कृपा करो॥ १८॥

परिक्षिप्ता समुद्रेण लङ्केयं शतयोजना।

नेयं धर्षयितुं शक्या सेन्ट्रैरपि सुरासुरैः॥१९॥

‘समुद्र से घिरी हुई इस लङ्का के राज्य का विस्तार सौ योजन है। इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता और असुर मिलकर भी इसे ध्वस्त नहीं कर सकते॥१९॥

न देवेषु न यक्षेषु न गन्धर्वेषु नर्षिषु।

अहं पश्यामि लोकेषु यो मे वीर्यसमो भवेत्॥ २०॥

‘देवताओं, यक्षों, गन्धर्वो तथा ऋषियों में भी मैं किसी को ऐसा नहीं देखता, जो पराक्रम में मेरी समानता कर सके॥ २० ॥

राज्यभ्रष्टेन दीनेन तापसेन पदातिना।

किं करिष्यसि रामेण मानुषेणाल्पतेजसा॥२१॥

‘राम तो राज्य से भ्रष्ट, दीन, तपस्वी, पैदल चलने वाले और मनुष्य होने के कारण अल्प तेजवाले हैं, उन्हें लेकर क्या करोगी? ॥ २१॥

भजस्व सीते मामेव भर्ताहं सदृशस्तव।

यौवनं त्वध्रुवं भीरु रमस्वेह मया सह ॥ २२॥

‘सीते! मुझको ही अपनाओ ! मैं तुम्हारे योग्य पति हूँ। भीरु ! जवानी सदा रहने वाली नहीं है, अतः यहाँ रहकर मेरे साथ रमण करो॥ २२ ॥

दर्शने मा कृथा बुद्धिं राघवस्य वरानने।

कास्य शक्तिरिहागन्तुमपि सीते मनोरथैः॥२३॥

‘वरानने! सीते! अब तुम राम के दर्शन का विचार छोड़ दो। इस राम में इतनी शक्ति कहाँ है कि यहाँ तक आने का मनोरथ भी कर सके॥ २३॥

न शक्यो वायुराकाशे पाशैर्बद्धु महाजवः।

दीप्यमानस्य वाप्यग्नेर्ग्रहीतुं विमलाः शिखाः॥ २४॥

‘आकाश में महान् वेग से बहने वाली वायु को रस्सियों में नहीं बाँधा जा सकता अथवा प्रज्वलित अग्नि की निर्मल ज्वालाओं को हाथों से नहीं पकड़ा जा सकता॥ २४॥

त्रयाणामपि लोकानां न तं पश्यामि शोभने।

विक्रमेण नयेद् यस्त्वां मद्बाहुपरिपालिताम्॥ २५॥

‘शोभने ! मैं तीनों लोकों में किसी ऐसे वीर को नहीं देखता, जो मेरी भुजाओं से सुरक्षित तुमको पराक्रम करके यहाँ से ले जा सके॥ २५ ॥

लङ्कायाः सुमहद्राज्यमिदं त्वमनुपालय।

त्वत्प्रेष्या मद्विधाश्चैव देवाश्चापि चराचरम्॥ २६॥

‘लङ्का के इस विशाल राज्य का  तुम्ही पालन करो। मुझ-जैसे राक्षस, देवता तथा सम्पूर्ण चराचर जगत् तुम्हारे सेवक बनकर रहेंगे॥ २६ ॥

अभिषेकजलक्लिन्ना तुष्टा च रमयस्व च।

दुष्कृतं यत्पुरा कर्म वनवासेन तद्गतम्॥२७॥

यच्च ते सुकृतं कर्म तस्येह फलमाप्नहि।

‘स्नान के जल से आर्द्र (अथवा लङ्का के राज्यपर अपना अभिषेक कराकर उसके जल से आर्द्र) होकर संतुष्ट हो तुम अपने-आपको क्रीड़ाविनोद में लगाओ। तुम्हारा पहले का जो दुष्कर्म था, वह वनवास का कष्ट देकर समाप्त हो गया। अब जो तुम्हारा पुण्यकर्म शेष है, उसका फल यहाँ भोगो॥ २७॥

इह सर्वाणि माल्यानि दिव्यगन्धानि मैथिलि। २८॥

भूषणानि च मुख्यानि तानि सेव मया सह।

‘मिथिलेशकुमारी! तुम मेरे साथ यहाँ रहकर सब प्रकार के पुष्पहार, दिव्य गन्ध और श्रेष्ठ आभूषण आदि का सेवन करो॥ २८ १/२ ॥

पुष्पकं नाम सुश्रोणि भ्रातुर्वैश्रवणस्य मे॥२९॥

विमानं सूर्यसंकाशं तरसा निर्जितं रणे।

विशालं रमणीयं च तद्विमानं मनोजवम्॥३०॥

तत्र सीते मया सार्धं विहरस्व यथासुखम्।

‘सुन्दर कटिप्रदेशवाली सुन्दरि! वह सूर्य के समान प्रकाशित होने वाला पुष्पकविमान मेरे भाई कुबेर का था। उसे मैंने बलपूर्वक जीता है। यह अत्यन्त रमणीय, विशाल तथा मन के समान वेग से चलने वाला है। सीते! तुम उसके ऊपर मेरे साथ बैठकर सुखपूर्वक विहार करो॥ २९-३० १/२ ॥

वदनं पद्मसंकाशं विमलं चारुदर्शनम्॥३१॥

शोकार्तं तु वरारोहे न भ्राजति वरानने।

‘वरारोहे सुमुखि! तुम्हारा यह कमल के समान सुन्दर निर्मल और मनोहर दिखायी देने वाला मुख शोक से पीड़ित होने के कारण शोभा नहीं पा रहा है’। ३१ १/२॥

एवं वदति तस्मिन् सा वस्त्रान्तेन वराङ्गना॥ ३२॥

पिधायेन्दुनिभं सीता मन्दमश्रूण्यवर्तयत्।

जब रावण ऐसी बातें कहने लगा, तब परमसुन्दरी सीता देवी चन्द्रमा के समान मनोहर अपने मुख को आँचल से ढककर धीरे-धीरे आँसू बहाने लगीं॥ ३२ १/२॥

ध्यायन्ती तामिवास्वस्थां सीतां चिन्ताहतप्रभाम्॥ ३३॥

उवाच वचनं वीरो रावणो रजनीचरः।

सीता शोक से अस्वस्थ-सी हो रही थीं, चिन्ता से उनकी कान्ति नष्ट-सी हो गयी थी और वे भगवान राम का ध्यान करने लगी थीं। उस अवस्था में उनसे वह वीर निशाचर रावण इस प्रकार बोला— ॥ ३३ १/२॥

अलं व्रीडेन वैदेहि धर्मलोपकृतेन ते॥३४॥

आर्षोऽयं देवि निष्पन्दो यस्त्वामभिभविष्यति।

‘विदेहनन्दिनि ! अपने पति के त्याग और परपुरुष के अङ्गीकार से जो धर्मलोप की आशङ्का होती है, उसके कारण तुम्हें यहाँ लज्जा नहीं होनी चाहिये, इस तरहकी लाज व्यर्थ है। देवि! तुम्हारे साथ जो मेरा स्नेह सम्बन्ध होगा, यह आर्ष धर्मशास्त्रोंद् वारा* समर्थित है॥ ३४ १/२॥

* ऐसा कहकर रावण देवी सीता को धोखा देना चाहता है। वास्तव में ऐसे पापपूर्ण कृत्यों का समर्थन धर्मशास्त्रों में कहीं नहीं है। कमारी कन्या का बलपर्वक अपहरण शास्त्रों में राक्षसविवाह कहा गया है; किंतु वह भी निन्द्य ही माना गया है, यहाँ तो वह भी नहीं है। विवाहिता सती साध्वी का अपहरण घोर पाप माना गया है। इसी पाप से सोने की लङ्का मिट्टी में मिल गयी और रावण दल-बल-कुल-परिवारसहित नष्ट हो गया।

एतौ पादौ मया स्निग्धौ शिरोभिः परिपीडितौ॥ ३५॥

प्रसादं कुरु मे क्षिप्रं वश्यो दासोऽहमस्मि ते।

‘तुम्हारे इन कोमल एवं चिकने चरणों पर मैं अपने ये दसों मस्तक रख रहा हूँ। अब शीघ्र मुझपर कृपा करो। मैं सदा तुम्हारे अधीन रहनेवाला दास हूँ॥ ३५ १/२॥

इमाः शून्या मया वाचः शुष्यमाणेन भाषिताः॥

न चापि रावणः कांचिन्मूर्ना स्त्री प्रणमेत ह।

‘मैंने कामाग्नि से संतप्त होकर ये बातें कही हैं। ये शून्य (निष्फल) न हों, ऐसी कृपा करो; क्योंकि  रावण किसी स्त्री को सिर झुकाकर प्रणाम नहीं करता, (केवल) तुम्हारे सामने इसका मस्तक झुका है’॥ ३६ १/२॥

एवमुक्त्वा दशग्रीवो मैथिली जनकात्मजाम्।

कृतान्तवशमापन्नो ममेयमिति मन्यते॥ ३७॥

मिथिलेशकुमारी जानकी से ऐसा कहकर काल के वशीभूत हुआ रावण मन-ही-मन मानने लगा कि ‘यह अब मेरे अधीन हो गयी’ ॥ ३७॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे पञ्चपञ्चाशः सर्गः॥५५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में पचपनवाँ सर्ग पूरा हुआ।५५॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अरण्यकाण्डम्

सीता का श्रीराम के प्रति अपना अनन्य अनुराग दिखाकर रावण को फटकारना तथा रावण की आज्ञा से राक्षसियों का उन्हें अशोकवाटिका में ले जाकर डराना

षट्पञ्चाशः सर्गः

सर्ग-56


सा तथोक्ता तु वैदेही निर्भया शोककर्शिता।

तृणमन्तरतः कृत्वा रावणं प्रत्यभाषत॥१॥

रावण के ऐसा कहने पर शोक से कष्ट पाती हुई विदेह-राजकुमारी सीता बीच में तिनके की ओट करके उस निशाचर से निर्भय होकर बोलीं- ॥१॥

राजा दशरथो नाम धर्मसेतुरिवाचलः।

सत्यसंधः परिज्ञातो यस्य पुत्रः स राघवः॥२॥

रामो नाम स धर्मात्मा त्रिषु लोकेषु विश्रुतः।

दीर्घबाहुर्विशालाक्षो दैवतं स पतिर्मम॥ ३॥

‘महाराज दशरथ धर्म के अचल सेतु के समान थे। वे अपनी सत्यप्रतिज्ञता के लिये सर्वत्र विख्यात थे। । उनके पुत्र जो रघुकुलभूषण श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे भी अपने धर्मात्मापन के लिये तीनों लोकों में प्रसिद्ध हैं, उनकी भुजाएँ लंबी और आँखें बड़ी-बड़ी हैं। वे ही मेरे आराध्य देवता और पति हैं॥ २-३॥

इक्ष्वाकूणां कुले जातः सिंहस्कन्धो महाद्युतिः।

लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा यस्ते प्राणान् वधिष्यति॥ ४॥

‘उनका जन्म इक्ष्वाकुकुल में हुआ है। उनके कंधे सिंह के समान और तेज महान् है। वे अपने भाई लक्ष्मण के साथ आकर तेरे प्राणों का विनाश कर डालेंगे॥४॥

प्रत्यक्षं यद्यहं तस्य त्वया वै धर्षिता बलात्।

शयिता त्वं हतः संख्ये जनस्थाने यथा खरः॥

‘यदि तू उनके सामने बलपूर्वक मेरा अपहरण करता तो अपने भाई खर की तरह जनस्थान के युद्धस्थल में ही मारा जाकर सदा के लिये सो जाता॥

य एते राक्षसाः प्रोक्ता घोररूपा महाबलाः।

राघवे निर्विषाः सर्वे सुपर्णे पन्नगा यथा॥६॥

‘तूने जो इन घोर रूपधारी महाबली राक्षसों की चर्चा की है, श्रीराम के पास जाते ही इन सबका विष उतर जायगा; ठीक उसी तरह जैसे गरुड़ के पास सारे सर्प विष के प्रभाव से रहित हो जाते हैं॥६॥

तस्य ज्याविप्रमुक्तास्ते शराः काञ्चनभूषणाः।

शरीरं विधमिष्यन्ति गङ्गाकूलमिवोर्मयः॥७॥

‘जैसे बढ़ी हुई गङ्गा की लहरें अपने कगारों को काट गिराती हैं, उसी प्रकार श्रीराम के धनुष की डोरी से छूटे हुए सुवर्णभूषित बाण तेरे शरीर को छिन्न-भिन्न कर डालेंगे॥७॥

असुरैर्वा सुरैर्वा त्वं यद्यवध्योऽसि रावण।

उत्पाद्य सुमहद् वैरं जीवंस्तस्य न मोक्ष्यसे॥८॥

‘रावण! तू असुरों अथवा देवताओं से यदि अवध्य है तो सम्भव है वे तुझे न मार सकें; किंतु भगवान् श्रीराम के साथ यह महान् वैर ठानकर तू किसी तरह जीवित नहीं छूट सकेगा॥८॥

स ते जीवितशेषस्य राघवोऽन्तकरो बली।

पशो!पगतस्येव जीवितं तव दुर्लभम्॥९॥

‘श्रीरघुनाथजी बड़े बलवान् हैं। वे तेरे शेष जीवन का अन्त कर डालेंगे। यूप में बँधे हुए पशु की भाँति तेरा जीवन दुर्लभ हो जायगा॥९॥

यदि पश्येत् स रामस्त्वां रोषदीप्तेन चक्षुषा।

रक्षस्त्वमद्य निर्दग्धो यथा रुद्रेण मन्मथः॥१०॥

‘राक्षस! यदि श्रीरामचन्द्रजी अपनी रोषभरी दृष्टि से तुझे देख लें तो तू अभी उसी तरह जलकर खाक हो जायगा जैसे भगवान् शङ्कर ने कामदेव को भस्म किया था॥ १०॥

यश्चन्द्र नभसो भूमौ पातयेन्नाशयेत वा।

सागरं शोषयेद वापि स सीतां मोचयेदिह ॥११॥

‘जो चन्द्रमा को आकाश से पृथ्वी पर गिराने या नष्ट करने की शक्ति रखते हैं अथवा जो समुद्र को भी सुखा सकते हैं, वे भगवान् श्रीराम यहाँ पहुँचकर सीता को भी छुड़ा सकते हैं।॥ ११॥

गतासुस्त्वं गतश्रीको गतसत्त्वो गतेन्द्रियः।

लङ्का वैधव्यसंयुक्ता त्वत्कृतेन भविष्यति॥१२॥

‘तू समझ ले कि तेरे प्राण अब चले गये। तेरी राज्यलक्ष्मी नष्ट हो गयी। तेरे बल और इन्द्रियों का भी नाश हो गया तथा तेरे ही पाप के कारण तेरी यह लङ्का भी अब विधवा हो जायगी॥ १२ ॥

न ते पापमिदं कर्म सुखोदकं भविष्यति।

याहं नीता विनाभावं पतिपार्वात् त्वया बलात्॥ १३॥

‘तेरा यह पापकर्म तुझे भविष्य में सुख नहीं भोगने देगा; क्योंकि तूने मुझे बलपूर्वक पति के पास से दूर हटाया है॥ १३॥

स हि देवरसंयुक्तो मम भर्ता महाद्युतिः।

निर्भयो वीर्यमाश्रित्य शून्ये वसति दण्डके॥ १४॥

‘मेरे स्वामी महान् तेजस्वी हैं और मेरे देवर के साथ अपने ही पराक्रमका भरोसा करके सूने दण्डकारण्य में निर्भयतापूर्वक निवास करते हैं ॥ १४ ॥

स ते वीर्यं बलं दर्पमुत्सेकं च तथाविधम्।

अपनेष्यति गात्रेभ्यः शरवर्षेण संयुगे॥१५॥

‘वे युद्ध में बाणों की वर्षा करके तेरे शरीर से बल, पराक्रम, घमंड तथा ऐसे उच्छृङ्खल आचरण को भी निकाल बाहर करेंगे॥ १५॥

यदा विनाशो भूतानां दृश्यते कालचोदितः।

तदा कार्ये प्रमाद्यन्ति नराः कालवशं गताः॥ १६॥

जब काल की प्रेरणा से प्राणियों का विनाश निकट आता है, उस समय मृत्यु के अधीन हुए जीव प्रत्येक कार्य में प्रमाद करने लगते हैं॥ १६॥

मां प्रधृष्य स ते कालः प्राप्तोऽयं राक्षसाधम।

आत्मनो राक्षसानां च वधायान्तःपुरस्य च॥ १७॥

‘अधम निशाचर ! मेरा अपहरण करने के कारण तेरे लिये भी वही काल आ पहुँचा है। तेरे अपने लिये, सारे राक्षसों के लिये तथा इस अन्तःपुर के लिये भी विनाश की घडी निकट आ गयी है।। १७॥

न शक्या यज्ञमध्यस्था वेदिः मुग्भाण्डमण्डिता।

द्विजातिमन्त्रसम्पूता चण्डालेनावमर्दितुम्॥१८॥

‘यज्ञशाला के बीच की वेदी पर, जो द्विजातियों के मन्त्रद्वारा पवित्र की गयी होती है तथा जिसे सुक्, सुवा आदि यज्ञपात्र सुशोभित करते हैं, चाण्डाल अपना पैर नहीं रख सकता॥ १८॥

तथा धर्मनित्यस्य धर्मपत्नी दृढव्रता।

त्वया स्प्रष्टं न शक्याहं राक्षसाधम पापिना॥ १९॥

‘उसी प्रकार मैं नित्य धर्मपरायण भगवान् श्रीराम की धर्मपत्नी हूँ तथा दृढ़तापूर्वक पातिव्रत्यधर्म का पालन करती हूँ (अतः यज्ञवेदी के समान हूँ) और राक्षसाधम! तू महापापी है (अतः चाण्डाल के तुल्य है); इसलिये मेरा स्पर्श नहीं कर सकता। १९॥

क्रीडन्ती राजहंसेन पद्मषण्डेषु नित्यशः।

हंसी सा तृणमध्यस्थं कथं द्रक्ष्येत मद्गुकम्॥ २०॥

‘जो सदा कमल के समूहों में राजहंस के साथ क्रीड़ा करती है, वह हंसी तृणों में रहने वाले जलकाक की ओर कैसे दृष्टिपात करेगी॥ २० ॥

इदं शरीरं निःसंज्ञं बन्ध वा घातयस्व वा।

नेदं शरीरं रक्ष्यं मे जीवितं वापि राक्षस ॥२१॥

‘राक्षस! तू इस संज्ञाशून्य जड शरीर को बाँधकर रख ले या काट डाल। मैं स्वयं ही इस शरीर और जीवन को नहीं रखना चाहती॥ २१॥

न तु शक्यमपक्रोशं पृथिव्यां दातुमात्मनः।

एवमुक्त्वा तु वैदेही क्रोधात् सुपरुषं वचः॥ २२॥

रावणं जानकी तत्र पुनर्नोवाच किंचन।

‘मैं इस भूतल पर अपने लिये निन्दा या कलङ्क देने वाला कोई कार्य नहीं कर सकती।’ रावण से क्रोधपूर्वक यह अत्यन्त कठोर वचन कहकर विदेहकुमारी जानकी चुप हो गयीं; वे वहाँ फिर कुछ नहीं बोलीं ॥ २२ १/२ ॥

सीताया वचनं श्रुत्वा परुषं रोमहर्षणम्॥ २३॥

प्रत्युवाच ततः सीतां भयसंदर्शनं वचः।

सीता का वह कठोर वचन रोंगटे खड़े कर देने वाला था। उसे सुनकर रावण ने उनसे भय दिखाने वाली बात कही- ॥२३ १/२॥

शृणु मैथिलि मद्वाक्यं मासान् द्वादश भामिनि॥ २४॥

कालेनानेन नाभ्येषि यदि मां चारुहासिनि।

ततस्त्वां प्रातराशार्थं सूदाश्छेत्स्यन्ति लेशशः॥ २५॥

‘मनोहर हास्यवाली भामिनि! मिथिलेशकुमारी! मेरी बात सुन लो। मैं तुम्हें बारह महीने का समय देता हूँ। इतने समय में यदि तुम स्वेच्छापूर्वक मेरे पास नहीं आओगी तो मेरे रसोइये सबेरे का कलेवा तैयार करने के लिये तुम्हारे शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर डालेंगे’॥

इत्युक्त्वा परुषं वाक्यं रावणः शत्रुरावणः।

राक्षसीश्च ततः क्रुद्ध इदं वचनमब्रवीत्॥२६॥

सीता से ऐसी कठोर बात कहकर शत्रुओं को रुलाने वाला रावण कुपित हो राक्षसियों से इस प्रकार बोला- ॥२६॥

शीघ्रमेव हि राक्षस्यो विरूपा घोरदर्शनाः।

दर्पमस्यापनेष्यन्तु मांसशोणितभोजनाः॥२७॥

‘अपने विकराल रूप के कारण भयङ्कर दिखायी देने वाली तथा रक्त-मांस का आहार करने वाली राक्षसियो! तुम लोग शीघ्र ही इस सीता का अहंकार दूर करो’ ॥ २७॥

वचनादेव तास्तस्य सुघोरा घोरदर्शनाः।

कृतप्राञ्जलयो भूत्वा मैथिली पर्यवारयन्॥ २८॥

रावण के इतना कहते ही वे भयंकर दिखायी देने वाली अत्यन्त घोर राक्षसियाँ हाथ जोड़े मैथिली को चारों ओर से घेरकर खड़ी हो गयीं॥ २८॥

स ताः प्रोवाच राजासौ रावणो घोरदर्शनाः।

प्रचल्य चरणोत्कर्दारयन्निव मेदिनीम्॥२९॥

तब राजा रावण अपने पैरों के धमाके से पृथ्वी को विदीर्ण करता हुआ-सा दो-चार पग चलकर उन भयानक राक्षसियों से बोला— ॥ २९॥

अशोकवनिकामध्ये मैथिली नीयतामिति।

तत्रेयं रक्ष्यतां गूढं युष्माभिः परिवारिता॥३०॥

‘निशाचरियो! तुमलोग मिथिलेशकुमारी सीता को अशोकवाटिका में ले जाओ और चारों ओर से घेरकर वहाँ गूढ़ भाव से इसकी रक्षा करती रहो॥ ३० ॥

तत्रैनां तर्जनैोरैः पुनः सान्त्वैश्च मैथिलीम्।

आनयध्वं वशं सर्वा वन्यां गजवधूमिव॥३१॥

‘वहाँ पहले तो भयंकर गर्जन-तर्जन करके इसे डराना; फिर मीठे-मीठे वचनों से समझा-बुझाकर जंगल की हथिनी की भाँति इस मिथिलेशकुमारी को तुम सब लोग वश में लाने की चेष्टा करना’ ॥ ३१॥

इति प्रतिसमादिष्टा राक्षस्यो रावणेन ताः।

अशोकवनिकां जग्मुर्मैथिली परिगृह्य तु॥३२॥

रावण के इस प्रकार आदेश देने पर वे राक्षसियाँ मैथिली को साथ लेकर अशोकवाटिका में चली गयीं।

सर्वकामफलैर्वृक्षैर्नानापुष्पफलैर्वृताम्।

सर्वकालमदैश्चापि द्विजैः समुपसेविताम्॥३३॥

वह वाटिका समस्त कामनाओं को फलरूप में प्रदान करने वाले कल्पवृक्षों तथा भाँति-भाँति के फल फूलवाले दूसरे-दूसरे वृक्षों से भी भरी थी तथा हर समय मदमत्त रहने वाले पक्षी उसमें निवास करते थे। ३३॥

सा तु शोकपरीताङ्गी मैथिली जनकात्मजा।

राक्षसीवशमापन्ना व्याघ्रीणां हरिणी यथा॥ ३४॥

परंतु वहाँ जाने पर मिथिलेशकुमारी जानकी के अङ्ग-अङ्ग में शोक व्याप्त हो गया। राक्षसियों के वश में पड़कर उनकी दशा बाघिनों के बीच में घिरी हुई हरिणी के समान हो गयी थी॥ ३४॥

शोकेन महता ग्रस्ता मैथिली जनकात्मजा।

न शर्म लभते भीरुः पाशबद्धा मृगी यथा॥३५॥

महान् शोक से ग्रस्त हुई मिथिलेशनन्दिनी जानकी जाल में फँसी हुई मृगी के समान भयभीत हो क्षणभर के लिये भी चैन नहीं पाती थीं॥ ३५ ॥

न विन्दते तत्र तु शर्म मैथिली विरूपनेत्राभिरतीव तर्जिता।

पतिं स्मरन्ती दयितं च देवरं विचेतनाभूद् भयशोकपीडिता॥३६॥

विकराल रूप और नेत्रोंवाली राक्षसियों की अत्यन्त डाँट-फटकार सुनने के कारण मिथिलेशकुमारीसीता को वहाँ शान्ति नहीं मिली। वे भय और शोक से पीड़ित हो प्रियतम पति और देवर का स्मरण करती हुई अचेत-सी हो गयीं॥ ३६॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे षट्पञ्चाशः सर्गः ॥५६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में छप्पनवाँ सर्ग पूरा हुआ।५६॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अरण्यकाण्डम्

ब्रह्माजी की आज्ञा से देवराज इन्द्र का निद्रासहित लङ्का में जाकर सीता को दिव्य खीर अर्पित करना और उनसे विदा लेकर लौटना

प्रक्षिप्तः सर्गः

सर्ग-प्रक्षिप्तः


प्रवेशितायां सीतायां लङ्कां प्रति पितामहः।

तदा प्रोवाच देवेन्द्र परितुष्टं शतक्रतुम्॥१॥

जब सीता का लङ्का में प्रवेश हो गया, तब पितामह ब्रह्माजी ने संतुष्ट हुए देवराज इन्द्र से इस प्रकार कहा – ॥१॥

त्रैलोक्यस्य हितार्थाय रक्षसामहिताय च।

लङ्कां प्रवेशिता सीता रावणेन दुरात्मना॥२॥

‘देवराज! तीनों लोकों के हित और राक्षसों के विनाश के लिये दुरात्मा रावण ने सीता को लङ्का में पहुँचा दिया॥२॥

पतिव्रता महाभागा नित्यं चैव सुखैधिता।

अपश्यन्ती च भर्तारं पश्यन्ती राक्षसीजनम्॥३॥

राक्षसीभिः परिवृता भर्तृदर्शनलालसा।

‘पतिव्रता महाभागा जानकी सदा सुख में ही पली हैं। इस समय वे अपने पति के दर्शन से वंचित हो गयी हैं और राक्षसियों से घिरी रहने के कारण सदा उन्हीं को अपने सामने देखती हैं। उनके हृदय में अपने पति के दर्शन की तीव्र लालसा बनी हुई है॥ ३ १/२॥

निविष्टा हि पुरी लङ्का तीरे नदनदीपतेः॥४॥

कथं ज्ञास्यति तां रामस्तत्रस्थां तामनिन्दिताम्।

‘लङ्कापुरी समुद्र के तट पर बसी हुई है। वहाँ रहती हुई सती-साध्वी सीता का पता श्रीरामचन्द्रजी को कैसे लगेगा॥ ४ १/२॥

दुःखं संचिन्तयन्ती सा बहुशः परिदुर्लभा॥५॥

प्राणयात्रामकुर्वाणा प्राणांस्त्यक्ष्यत्यसंशयम्।

स भूयः संशयो जातः सीतायाः प्राणसंक्षये॥ ६॥

‘सीता दुःख के साथ नाना प्रकार की चिन्ताओं में डूबी रहती हैं। पति के लिये इस समय वे अत्यन्त दुर्लभ हो गयी हैं। प्राणयात्रा (भोजन) नहीं करती हैं; अतः ऐसी दशा में निःसंदेह वे अपने प्राणों का परित्याग कर देंगी। सीता के प्राणों का क्षय हो जाने पर हमारे उद्देश्य की सिद्धि में पुनः पूर्ववत् संदेह उपस्थित हो जायगा॥५-६॥

स त्वं शीघ्रमितो गत्वा सीतां पश्य शुभाननाम्।

प्रविश्य नगरी लङ्कां प्रयच्छ हविरुत्तमम्॥७॥

‘अतः तुम शीघ्र ही यहाँसे जाकर लङ्कापुरी में प्रवेश करके सुमुखी सीता से मिलो और उन्हें उत्तम हविष्य प्रदान करो’ ॥ ७॥

एवमुक्तोऽथ देवेन्द्रः पुरीं रावणपालिताम्।

आगच्छन्निद्रया सार्धं भगवान् पाकशासनः॥८॥

ब्रह्माजी के ऐसा कहने पर पाकशासन भगवान् इन्द्र निद्रा को साथ लेकर रावण द्वारा पालित लङ्कापुरी में आये॥८॥

निद्रां चोवाच गच्छ त्वं राक्षसान् सम्प्रमोहय।

सा तथोक्ता मघवता देवी परमहर्षिता॥९॥

देवकार्यार्थसिद्ध्यर्थं प्रामोहयत राक्षसान्।

वहाँ आकर इन्द्र ने निद्रा से कहा—’तुम राक्षसों को मोहित करो।’ इन्द्र से ऐसी आज्ञा पाकर देवी निद्रा बहुत प्रसन्न हुईं। देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिये उन्होंने राक्षसों को मोह (निद्रा) में डाल दिया। ९ १/२॥

एतस्मिन्नन्तरे देवः सहस्राक्षः शचीपतिः॥१०॥

आससाद वनस्थां तां वचनं चेदमब्रवीत्।

इसी बीच में सहस्र नेत्रधारी शचीपति देवराज इन्द्र अशोकवाटिका में बैठी हुई सीता के पास गये और इस प्रकार बोले- ॥ १० १/२॥

देवराजोऽस्मि भद्रं ते इह चास्मि शुचिस्मिते॥ ११॥

अहं त्वां कार्यसिद्ध्यर्थं राघवस्य महात्मनः।

साहाय्यं कल्पयिष्यामि मा शुचो जनकात्मजे॥ १२॥

‘पवित्र मुसकानवाली देवि! आपका भला हो। मैं देवराज इन्द्र यहाँ आपके पास आया हूँ। जनककिशोरी! मैं आपके उद्धारकार्य की सिद्धि के लिये महात्मा श्रीरघुनाथजी की सहायता करूँगा, अतः आप शोक न करें।। ११-१२॥

मत्प्रसादात् समुद्रं स तरिष्यति बलैः सह।

मयैवेह च राक्षस्यो मायया मोहिताः शुभे॥१३॥

‘वे मेरे प्रसाद से बड़ी भारी सेना के साथ समुद्र को पार करेंगे। शुभे! मैंने ही यहाँ इन राक्षसियों को अपनी माया से मोहित किया है॥ १३॥

तस्मादन्नमिदं सीते हविष्यान्नमहं स्वयम्।

स त्वां संगृह्य वैदेहि आगतः सह निद्रया॥१४॥

‘विदेहनन्दिनी सीते! इसलिये मैं स्वयं ही यह भोजन—यह हविष्यान्न लेकर निद्रा के साथ तुम्हारे पास आया हूँ॥ १४॥

एतदत्स्यसि मद्धस्तान्न त्वां बाधिष्यते शुभे।

क्षुधा तृषा च रम्भोरु वर्षाणामयुतैरपि॥१५॥

‘शुभे! रम्भोरु ! यदि मेरे हाथ से इस हविष्य को लेकर खा लोगी तो तुम्हें हजारों वर्षों तक भूख और प्यास नहीं सतायेगी’ ॥ १५ ॥

एवमुक्ता तु देवेन्द्रमुवाच परिशङ्किता।

कथं जानामि देवेन्द्रं त्वामिहस्थं शचीपतिम्॥

देवराज के ऐसा कहने पर शङ्कित हुई सीता ने उनसे कहा—’मुझे कैसे विश्वास हो कि आप शचीपति देवराज इन्द्र ही यहाँ पधारे हैं ? ॥ १६ ॥

देवलिङ्गानि दृष्टानि रामलक्ष्मणसंनिधौ।

तानि दर्शय देवेन्द्र यदि त्वं देवराट् स्वयम्॥ १७॥

‘देवेन्द्र! मैंने श्रीराम और लक्ष्मण के समीप देवताओं के लक्षण अपनी आँखों देखे हैं। यदि आप साक्षात् देवराज हैं तो उन लक्षणों को दिखाइये’। १७॥

सीताया वचनं श्रुत्वा तथा चक्रे शचीपतिः।

पृथिवीं नास्पृशत् पद्भ्यामनिमेषेक्षणानि च॥ १८॥

अरजोऽम्बरधारी च न म्लानकुसुमस्तथा।

तं ज्ञात्वा लक्षणैः सीता वासवं परिहर्षिता॥ १९॥

सीता की यह बात सुनकर शचीपति इन्द्र ने वैसा ही किया। उन्होंने अपने पैरों से पृथ्वी का स्पर्श नहीं किया आकाश में निराधार खड़े रहे। उनकी आँखों की पलकें नहीं गिरती थीं। उन्होंने जो वस्त्र धारण किया था, उस पर धूल का स्पर्श नहीं होता था। उनके कण्ठ में जो पुष्पमाला थी, उसके पुष्प कुम्हलाते नहीं थे। देवोचित लक्षणों से इन्द्र को पहचानकर सीता बहुत प्रसन्न हुईं॥ १८-१९॥

उवाच वाक्यं रुदती भगवन् राघवं प्रति।

सह भ्रात्रा महाबाहुर्दिष्ट्या मे श्रुतिमागतः॥२०॥

वे भगवान् श्रीराम के लिये रोती हुई बोलीं —’भगवन् ! सौभाग्य की बात है कि आज भाईसहित महाबाहु श्रीराम का नाम मेरे कानों में पड़ा है॥२०॥

यथा मे श्वशुरो राजा यथा च मिथिलाधिपः।

तथा त्वामद्य पश्यामि सनाथो मे पतिस्त्वया॥ २१॥

‘मेरे लिये जैसे मेरे श्वशुर महाराज दशरथ तथा पिता मिथिलानरेश जनक हैं, उसी रूप में मैं आज आपको देखती हूँ। मेरे पति आपके द्वारा सनाथ हैं। २१॥

तवाज्ञया च देवेन्द्र पयोभूतमिदं हविः।

अशिष्यामि त्वया दत्तं रघूणां कुलवर्धनम्॥ २२॥

‘देवेन्द्र ! आपकी आज्ञा से मैं यह पायसरूप हविष्य (दूध की बनी हुई खीर), जिसे आपने दिया है, खाऊँगी। यह रघुकुल की वृद्धि करने वाला हो’ ॥ २२ ॥

इन्द्रहस्ताद् गृहीत्वा तत् पायसं सा शुचिस्मिता।

न्यवेदयत भत्रै सा लक्ष्मणाय च मैथिली॥२३॥

इन्द्र के हाथ से उस खीर को लेकर उन पवित्र मुसकान वाली मैथिली ने मन-ही-मन पहले उसे अपने स्वामी श्रीराम और देवर लक्ष्मण को निवेदन किया और इस प्रकार कहा- ॥ २३॥

यदि जीवति मे भर्ता सह भ्रात्रा महाबलः।

इदमस्तु तयोर्भक्त्या तदाश्नात् पायसं स्वयम्॥ २४॥

‘यदि मेरे महाबली स्वामी अपने भाई के साथ जीवित हैं तो यह भक्तिभाव से  उन दोनों के लिये समर्पित है।’ इतना कहने के पश्चात् उन्होंने स्वयं उस खीर को खाया॥२४॥

इतीव तत् प्राश्य हविर्वरानना ङ्केजही क्षधातुःखसमुन्नवं च त ।

इन्द्रात् प्रवृत्तिम् उपलभ्य जानकी काकुत्स्थयोः प्रीतमना बभूव॥ २५॥

इस प्रकार उस हविष्य को खाकर सुन्दर मुखवाली जानकी ने भूख-प्यास के कष्ट को त्याग दिया और इन्द्र के मुख से श्रीराम तथा लक्ष्मण का समाचार पाकर वे जनकनन्दिनी मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुईं ॥ २५ ॥

स चापि शक्रस्त्रिदिवालयं तदा प्रीतो ययौ राघवकार्यसिद्धये।

आमन्त्र्य सीतां स ततो महात्मा जगाम निद्रासहितः स्वमालयम्॥ २६॥

तब निद्रासहित महात्मा देवराज इन्द्र भी प्रसन्न हो सीता से विदा लेकर श्रीरामचन्द्रजी के कार्य की सिद्धि के लिये अपने निवासस्थान देवलोक को चले गये। २६॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे प्रक्षिप्तः सर्गः॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में प्रक्षिप्त सर्ग पूरा हुआ।

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अरण्यकाण्डम्

श्रीराम का लौटना, मार्ग में अपशकुन देखकर चिन्तित होना तथा लक्ष्मण से सीता पर सङ्कट आने की आशङ्का करना

सप्तपञ्चाशः सर्गः

सर्ग-57


राक्षसं मृगरूपेण चरन्तं कामरूपिणम्।

निहत्य रामो मारीचं तूर्णं पथि न्यवर्तत॥१॥

इधर मृगरूप से विचरते हुए उस इच्छानुसार रूप धारण करने वाले राक्षस मारीच का वध करके श्रीरामचन्द्रजी तुरंत ही आश्रम के मार्ग पर लौटे॥१॥

तस्य संत्वरमाणस्य द्रष्टकामस्य मैथिलीम्।

क्रूरस्वनोऽथ गोमायुर्विननादास्य पृष्ठतः॥२॥

वे सीता को देखने के लिये जल्दी-जल्दी पैर बढ़ाते हुए आ रहे थे। इतने ही में पीछे की ओर से एक सियारिन बड़े कठोर स्वर में चीत्कार करने लगी॥२॥

स तस्य स्वरमाज्ञाय दारुणं रोमहर्षणम्।

चिन्तयामास गोमायोः स्वरेण परिशङ्कितः॥३॥

गीदड़ी के उस स्वर से श्रीरामचन्द्रजी के मन में कुछ शङ्का हुई। उसका स्वर बड़ा ही भयंकर तथा रोंगटे खड़े कर देने वाला था। उसका अनुभव करके वे बड़ी चिन्ता में पड़ गये॥३॥

अशुभं बत मन्येऽहं गोमायुर्वाश्यते यथा।

स्वस्ति स्यादपि वैदेह्या राक्षसैर्भक्षणं विना॥४॥

वे मन-ही-मन कहने लगे—’यह सियारिन जैसी बोली बोल रही है, इससे तो मुझे मालूम हो रहा है कि कोई अशुभ घटना घटित हो गयी। क्या विदेहनन्दिनी सीता कुशल से होंगी? उन्हें राक्षस तो नहीं खा गये?॥

मारीचेन तु विज्ञाय स्वरमालक्ष्य मामकम्।

विक्रुष्टं मृगरूपेण लक्ष्मणः शृणुयाद् यदि॥५॥

‘मृगरूपधारी मारीच ने जान-बूझकर मेरे स्वर का अनुसरण करते हुए जो आर्त-पुकार की थी, वह इसलिये कि शायद इसे लक्ष्मण सुन सकें॥५॥

स सौमित्रिः स्वरं श्रुत्वा तां च हित्वाथ मैथिलीम्।

तयैव प्रहितः क्षिप्रं मत्सकाशमिहैष्यति॥६॥

‘सुमित्रानन्दन लक्ष्मण वह स्वर सुनते ही सीता के ही भेजने पर उसे अकेली छोड़कर तुरंत मेरे पास यहाँ पहुँचने के लिये चल देंगे॥६॥

राक्षसैः सहितैनूनं सीताया ईप्सितो वधः।

काञ्चनश्च मृगो भूत्वा व्यपनीयाश्रमात्तु माम्॥ ७॥

दूरं नीत्वाथ मारीचो राक्षसोऽभूच्छराहतः।

हा लक्ष्मण हतोऽस्मीति यदाक्यं व्याजहार ह॥ ८॥

‘राक्षस लोग तो सब-के-सब मिलकर सीता का वध अवश्य कर देना चाहते हैं। इसी उद्देश्य से यह मारीच राक्षस सोने का मृग बनकर मुझे आश्रम से दूर हटा ले आया था और मेरे बाणों से आहत होने पर जो उसने आर्तनाद करते हुए कहा था कि ‘हा लक्ष्मण! मैं मारा गया’ इसमें भी उसका वही उद्देश्य छिपा था॥ ७-८॥

अपि स्वस्ति भवेद् द्वाभ्यां रहिताभ्यां मया वने।

जनस्थाननिमित्तं हि कृतवैरोऽस्मि राक्षसैः॥९॥

‘वन में हम दोनों भाइयों के आश्रम से अलग हो जाने पर क्या सीता सकुशल वहाँ रह सकेंगी? जनस्थान में जो राक्षसों का संहार हुआ है, उसके कारण सारे राक्षस मुझसे वैर बाँधे ही हुए हैं॥९॥

निमित्तानि च घोराणि दृश्यन्तेऽद्य बहूनि च।

इत्येवं चिन्तयन् रामः श्रुत्वा गोमायुनिःस्वनम्॥ १०॥

निवर्तमानस्त्वरितो जगामाश्रममात्मवान्।

‘आज बहुत-से भयङ्कर अपशकुन भी दिखायी देते हैं।’ सियारिन की बोली सुनकर इस प्रकार चिन्ता करते हुए मन को वश में रखने वाले श्रीराम तुरंत लौटकर आश्रम की ओर चले॥१० १/२॥

आत्मनश्चापनयनं मृगरूपेण रक्षसा॥११॥

आजगाम जनस्थानं राघवः परिशङ्कितः।

मृगरूपधारी राक्षस के द्वारा अपने को आश्रम से दूर हटाने की घटना पर विचार करके श्रीरघुनाथजी शङ्कित हृदय से जनस्थान को आये॥ ११ १/२ ॥

तं दीनमानसं दीनमासेदुर्मृगपक्षिणः॥१२॥

सव्यं कृत्वा महात्मानं घोरांश्च ससृजुः स्वरान्।

उनका मन बहुत दुःखी था। वे दीन हो रहे थे। उसी अवस्था में वन के मृग और पक्षी उन्हें बाँयें रखते हुए वहाँ आये और भयङ्कर स्वर में अपनी बोली बोलने लगे॥

तानि दृष्ट्वा निमित्तानि महाघोराणि राघवः।

न्यवर्तताथ त्वरितो जवेनाश्रममात्मनः॥१३॥

उन महाभयङ्कर अपशकुनों को देखकर श्रीरामचन्द्रजी तुरंत ही बड़े वेग से अपने आश्रम की ओर लौटे॥ १३॥

ततो लक्ष्मणमायान्तं ददर्श विगतप्रभम्।

ततोऽविदूरे रामेण समीयाय स लक्ष्मणः॥१४॥

इतने ही में उन्हें लक्ष्मण आते दिखायी दिये। उनकी कान्ति फीकी पड़ गयी थी। थोड़ी ही देर में निकट आकर लक्ष्मण श्रीरामचन्द्रजी से मिले ॥ १४ ।।

विषण्णः सन् विषण्णेन दुःखितो दुःखभागिना।

स जगहेऽथ तं भ्राता दृष्ट्वा लक्ष्मणमागतम्॥

विहाय सीतां विजने वने राक्षससेविते।

दुःख और विषाद में डूबे हुए लक्ष्मण ने दुःखी और विषादग्रस्त श्रीरामचन्द्रजी से भेंट की। उस समय राक्षसों से सेवित निर्जन वन में सीता को अकेली छोड़कर आये हुए लक्ष्मण को देख भाई श्रीराम ने उनकी निन्दा की॥ १५ १/२ ॥

गृहीत्वा च करं सव्यं लक्ष्मणं रघुनन्दनः॥१६॥

उवाच मधुरोदर्कमिदं परुषमार्तवत्।

लक्ष्मण का बायाँ हाथ पकड़कर रघुनन्दन आर्त से हो गये और पहले कठोर तथा अन्त में मधुर वाणी द्वारा इस प्रकार बोले- ॥ १६ १/२ ॥

अहो लक्ष्मण गडं ते कृतं यत् त्वं विहाय ताम्॥ १७॥

सीतामिहागतः सौम्य कच्चित् स्वस्ति भवेदिति।

‘अहो सौम्य लक्ष्मण! यह तुमने बहुत बुरा किया, जो सीता को अकेली छोड़कर यहाँ चले आये। क्या वहाँ सीता सकुशल होगी? ॥ १७ १/२॥

न मेऽस्ति संशयो वीर सर्वथा जनकात्मजा॥ १८॥

विनष्टा भक्षिता वापि राक्षसैर्वनचारिभिः।

‘वीर! मुझे इस बात में संदेह नहीं है कि वन में विचरने वाले राक्षसों ने जनककुमारी सीता को या तो सर्वथा नष्ट कर दिया होगा या वे उन्हें खा गये होंगे॥

अशुभान्येव भूयिष्ठं यथा प्रादुर्भवन्ति मे ॥१९॥

अपि लक्ष्मण सीतायाः सामग्रयं प्राप्नुयामहे।

जीवन्त्याः पुरुषव्याघ्र सुताया जनकस्य वै॥ २०॥

‘क्योंकि मेरे आस-पास बहुत-से अपशकुन हो रहे हैं। पुरुषसिंह लक्ष्मण ! क्या हमलोग जीती-जागती हुई जनकदुलारी सीता को पूर्णतः स्वस्थ एवं सकुशल पा सकेंगे? ॥ १९-२०॥

यथा वै मृगसंघाश्च गोमायुश्चैव भैरवम्।

वाश्यन्ते शकुनाश्चापि प्रदीप्तामभितो दिशम्।

अपि स्वस्ति भवेत् तस्या राजपुत्र्या महाबल॥ २१॥

‘महाबली लक्ष्मण ! ये मृगों के झुंड (दाहिनी ओर से आकर) जैसा अमङ्गल सूचित कर रहे हैं, ये गीदड़ जिस तरह भैरवनाद कर रहे हैं तथा जलती-सी प्रतीत होने वाली सम्पूर्ण दिशाओं में पक्षी जिस तरह की बोली बोल रहे हैं—इन सबसे यही अनुमान होता है कि राजकुमारी सीता शायद ही कुशल से हों॥ २१॥

इदं हि रक्षो मृगसंनिकाशं प्रलोभ्य मां दूरमनुप्रयातम्।

हतं कथंचिन्महता श्रमेण स राक्षसोऽभून्नियमाण एव॥२२॥

‘यह राक्षस मृग के समान रूप धारण करके मुझे लुभाकर दूर चला आया था। महान् परिश्रम करके जब मैंने इसे किसी तरह मारा, तब यह मरते ही राक्षस हो गया॥

मनश्च मे दीनमिहाप्रहृष्टं चक्षुश्च सव्यं कुरुते विकारम्।

असंशयं लक्ष्मण नास्ति सीता हृता मृता वा पथि वर्तते वा॥२३॥

‘लक्ष्मण! अतः मेरा मन अत्यन्त दीन और अप्रसन्न हो रहा है। मेरी बायीं आँख फड़क रही है, इससे जान पड़ता है, निःसंदेह आश्रम पर सीता नहीं है। उसे कोई हर ले गया, वह मारी गयी अथवा (किसी राक्षस के साथ) मार्ग में होगी’ ॥ २३॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे सप्तपञ्चाशः सर्गः॥५७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में सत्तावनवाँ सर्ग पूरा हुआ। ५७॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अरण्यकाण्डम्

मार्ग में अनेक प्रकार की आशङ् का करते हुए लक्ष्मणसहित श्रीराम का आश्रम में आना और वहाँ सीता को न पाकर व्यथित होना

अष्टपञ्चाशः सर्गः

सर्ग-58


 स दृष्ट्वा लक्ष्मणं दीनं शून्यं दशरथात्मजः।

पर्यपृच्छत धर्मात्मा वैदेहीमागतं विना॥१॥

लक्ष्मण को दीन, संतोषशून्य तथा सीता को साथ लिये बिना आया देख धर्मात्मा दशरथनन्दन श्रीराम ने पूछा- ॥१॥

प्रस्थितं दण्डकारण्यं या मामनुजगाम ह।

क्व सा लक्ष्मण वैदेही यां हित्वा त्वमिहागतः॥ २॥

‘लक्ष्मण! जो दण्डकारण्य की ओर प्रस्थित होने पर अयोध्या से मेरे पीछे-पीछे चली आयी तथा जिसे तुम अकेली छोड़कर यहाँ आ गये, वह विदेहराजकुमारी सीता इस समय कहाँ है? ॥२॥

राज्यभ्रष्टस्य दीनस्य दण्डकान् परिधावतः।

क्व सा दुःखसहाया मे वैदेही तनुमध्यमा॥३॥

‘मैं राज्य से भ्रष्ट और दीन होकर दण्डकारण्य में चक्कर लगा रहा हूँ। इस दुःख में जो मेरी सहायिका हुई, वह तनुमध्यमा (सूक्ष्म कटिप्रदेश वाली) विदेहराजकुमारी कहाँ है ? ॥ ३॥

यां विना नोत्सहे वीर मुहूर्तमपि जीवितुम्।

क्व सा प्राणसहाया मे सीता सुरसुतोपमा॥४॥

‘वीर ! जिसके बिना मैं दो घड़ी भी जीवित नहीं रह सकता तथा जो मेरे प्राणों की सहचरी है, वह देवकन्या के समान सुन्दरी सीता इस समय कहाँ है?॥

पतित्वममराणां हि पृथिव्याश्चापि लक्ष्मण।

विना तां तपनीयाभां नेच्छेयं जनकात्मजाम्॥५॥

‘लक्ष्मण! तपाये हुए सोने के समान कान्तिवाली जनकनन्दिनी सीता के बिना मैं पृथ्वी का राज्य और देवताओं का आधिपत्य भी नहीं चाहता॥ ५ ॥

कच्चिज्जीवति वैदेही प्राणैः प्रियतरा मम।

कच्चित् प्रव्राजनं वीर न मे मिथ्या भविष्यति॥

‘वीर! जो मुझे प्राणों से भी बढ़कर प्रिय है, वह विदेहराजकुमारी सीता क्या अब जीवित होगी? मेरा वन में आना सीता को खो देने के कारण व्यर्थ तो नहीं हो जायगा?॥६॥

सीतानिमित्तं सौमित्रे मृते मयि गते त्वयि।

कच्चित् सकामा कैकेयी सुखिता सा भविष्यति॥

‘सुमित्रानन्दन ! सीता के नष्ट हो जाने के कारण जब मैं मर जाऊँगा और तुम अकेले ही अयोध्या को लौटोगे, उस समय क्या माता कैकेयी सफलमनोरथ एवं सुखी होगी?॥

सपुत्रराज्यां सिद्धार्थां मृतपुत्रा तपस्विनी।

उपस्थास्यति कौसल्या कच्चित् सौम्येन कैकयीम्॥८॥

‘जिसका इकलौता पुत्र मैं मर जाऊँगा, वह तपस्विनी माता कौसल्या क्या पुत्र और राज्य से सम्पन्न तथा कृतकृत्य हुई कैकेयी की सेवा में विनीतभाव से उपस्थित होगी? ॥ ८॥

यदि जीवति वैदेही गमिष्याम्याश्रमं पुनः।

संवृत्ता यदि वृत्ता सा प्राणांस्त्यक्ष्यामि लक्ष्मण॥

‘लक्ष्मण! यदि विदेहनन्दिनी सीता जीवित होगी, तभी मैं फिर आश्रम में पैर रखंगा। यदि सदाचारपरायणा मैथिली मर गयी होगी तो मैं भी प्राणों का परित्याग कर दूंगा॥ ९॥

यदि मामाश्रमगतं वैदेही नाभिभाषते।

पुरः प्रहसिता सीता विनशिष्यामि लक्ष्मण॥ १०॥

‘लक्ष्मण! यदि आश्रम में जाने पर विदेहराजकुमारी सीता हँसते हुए मुख से सामने आकर मुझसे बात नहीं करेगी तो मैं जीवित नहीं रहूँगा॥ १० ॥

ब्रूहि लक्ष्मण वैदेही यदि जीवति वा न वा।

त्वयि प्रमत्ते रक्षोभिर्भक्षिता वा तपस्विनी॥११॥

‘लक्ष्मण! बोलो तो सही! वैदेही जीवित है या नहीं? तुम्हारे असावधान होने के कारण राक्षस उस तपस्विनी को खा तो नहीं गये? ॥ ११ ॥

सुकुमारी च बाला च नित्यं चादुःखभागिनी।

मद्वियोगेन वैदेही व्यक्तं शोचति दुर्मनाः॥१२॥

‘जो सुकुमारी है, बाला (भोली-भाली) है तथा जिसने वनवास के पहले दुःख का अनुभव नहीं किया था, वह वैदेही आज मेरे वियोग से व्यथित-चित्त होकर अवश्य ही शोक कर रही होगी॥१२॥

सर्वथा रक्षसा तेन जिह्मेन सुदुरात्मना।।

वदता लक्ष्मणेत्युच्चैस्तवापि जनितं भयम्॥१३॥

उस कुटिल एवं दुरात्मा राक्षस ने उच्च स्वर से ‘हा लक्ष्मण!’ ऐसा पुकारकर तुम्हारे मन में भी सर्वथा भय उत्पन्न कर दिया।१३।।

श्रुतश्च मन्ये वैदेह्या स स्वरः सदृशो मम।

त्रस्तया प्रेषितस्त्वं च द्रष्टुं मां शीघ्रमागतः॥१४॥

‘जान पड़ता है, वैदेही ने भी मेरे स्वर से मिलताजुलता उस राक्षस का स्वर सुन लिया और भयभीत होकर तुम्हें भेज दिया और तुम भी शीघ्र ही मुझे देखने के लिये चले आये॥ १४ ॥

सर्वथा तु कृतं कष्टं सीतामुत्सृजता वने।

प्रतिकर्तुं नृशंसानां रक्षसां दत्तमन्तरम्॥१५॥

‘जो भी हो तुमने वन में सीता को अकेली छोड़कर सर्वथा दुःखद कार्य कर डाला। क्रूर कर्म करने वाले राक्षसों को बदला लेने का अवसर दे दिया। १५॥

दुःखिताः खरघातेन राक्षसाः पिशिताशनाः।

तैः सीता निहता घोरैर्भविष्यति न संशयः॥१६॥

‘मांसभक्षी निशाचर मेरे हाथों खर के मारे जाने से बहुत दुःखी थे। उन घोर राक्षसों ने सीता को मार डाला होगा, इसमें संशय नहीं है॥ १६ ॥

अहोऽस्मि व्यसने मग्नः सर्वथा रिपुनाशन।

किं त्विदानीं करिष्यामि शङ्के प्राप्तव्यमीदृशम्॥ १७॥

‘शत्रुनाशन ! मैं सर्वथा संकट के समुद्र में डूब गया हूँ। ऐसे दुःख का अवश्य ही अनुभव करना पड़ेगा ऐसी शङ्का हो रही है। अतः अब मैं क्या करूँ?’॥१७॥

इति सीतां वरारोहां चिन्तयन्नेव राघवः।

आजगाम जनस्थानं त्वरया सहलक्ष्मणः॥१८॥

इस प्रकार सुन्दरी सीता के विषय में चिन्ता करते हुए ही लक्ष्मणसहित श्रीरघुनाथजी तुरंत जनस्थान में आये॥ १८॥

विगर्हमाणोऽनुजमार्तरूपं क्षुधाश्रमेणैव पिपासया च।

विनिःश्वसन् शुष्कमुखो विषण्णः प्रतिश्रयं प्राप्य समीक्ष्य शून्यम्॥१९॥

अपने दुःखी अनुज लक्ष्मण को कोसते एवं भूखप्यास तथा परिश्रम से लंबी साँस खींचते हुए सूखे मुँहवाले श्रीरामचन्द्रजी आश्रम के निकटवर्ती स्थान पर आकर उसे सूना देख विषाद में डूब गये॥ १९ ॥

स्वमाश्रमं स प्रविगाह्य वीरो विहारदेशाननुसृत्य कांश्चित्।

एतत्तदित्येव निवासभूमौ प्रहृष्टरोमा व्यथितो बभूव ॥ २०॥

वीर श्रीराम ने आश्रम में प्रवेश करके उसे भी सूना देख कुछ ऐसे स्थलों में अनुसंधान किया, जो सीता के विहारस्थान थे। उन्हें भी सूना पाकर उस क्रीड़ाभूमि में यही वह स्थान है, जहाँ मैंने अमुक प्रकार की क्रीड़ा की थी, ऐसा स्मरण करके उनके शरीर में रोमाञ्च हो आया और वे व्यथा से पीड़ित हो गये॥ २० ॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डेऽष्टपञ्चाशः सर्गः ॥५८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में अट्ठावनवाँ सर्ग पूरा हुआ।५८॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अरण्यकाण्डम्

श्रीराम और लक्ष्मण की बातचीत

एकोनषष्टितमः सर्गः

सर्ग-59


अथाश्रमादुपावृत्तमन्तरा रघुनन्दनः।

परिपप्रच्छ सौमित्रिं रामो दुःखादिदं वचः॥१॥

(आश्रम में आने से पहले मार्ग में श्रीराम और लक्ष्मण ने परस्पर जो बातें की थीं, उन्हें पुनः विस्तार के साथ बता रहे हैं—) सीता के कथनानुसार आश्रम से अपने पास आये हुए सुमित्राकुमार लक्ष्मण से मार्ग में भी रघुकुलनन्दन श्रीराम ने बड़े दुःख से यह बात पूछी— ॥१॥

तमुवाच किमर्थं त्वमागतोऽपास्य मैथिलीम्।

यदा सा तव विश्वासाद् वने विरहिता मया॥२॥

‘लक्ष्मण! जब मैंने तुम्हारे विश्वास पर ही वन में सीताको छोड़ा था, तब तुम उसे अकेली छोड़कर क्यों चले आये? ॥ २॥

दृष्ट्वैवाभ्यागतं त्वां मे मैथिलीं त्यज्य लक्ष्मण।

शङ्कमानं महत् पापं यत्सत्यं व्यथितं मनः ॥ ३॥

‘लक्ष्मण ! मिथिलेशकुमारी को छोड़कर तुम जो मेरे पास आये हो, तुम्हें देखते ही जिस महान् अनिष्ट की आशङ्का करके मेरा मन व्यथित हो रहा था, वह सत्य जान पड़ने लगा है॥३॥

ङ्के स्फुरते नयन सव्यं बाहाचा हदयं च मे।

दृष्ट्वा लक्ष्मण दूरे त्वां सीताविरहितं पथि॥४॥

‘लक्ष्मण ! मेरी बायीं आँख और बायीं भुजा फड़क रही है। तुम्हें आश्रम से दूर सीता के बिना ही मार्ग पर आते देख मेरा हृदय भी धक-धक कर रहा है’ ॥ ४॥

एवमुक्तस्तु सौमित्रिर्लक्ष्मणः शुभलक्षणः।

भूयो दुःखसमाविष्टो दुःखितं राममब्रवीत्॥५॥

श्रीरामचन्द्रजी के ऐसा कहने पर उत्तम लक्षणों से सम्पन्न सुमित्राकुमार लक्ष्मण अत्यन्त दुःखी होकर अपने शोकग्रस्त भाई श्रीराम से बोले- ॥५॥

न स्वयं कामकारेण तां त्यक्त्वाहमिहागतः।

प्रचोदितस्तयैवोग्रैस्त्वत्सकाशमिहागतः॥६॥

‘भैया! मैं स्वयं अपनी इच्छा से उन्हें छोड़कर नहीं आया हूँ। उन्हीं के कठोर वचनों से प्रेरित होकर मुझे आपके पास आना पड़ा है॥६॥

आर्येणेव परिक्रुष्टं लक्ष्मणेति सुविस्वरम्।

परित्राहीति यद्वाक्यं मैथिल्यास्तच्छ्रुतिं गतम्॥ ७॥

‘आपके ही समान स्वर में किसी ने जोर से पुकारा, ‘लक्ष्मण! मुझे बचाओ।’ यह वाक्य मिथिलेशकुमारी के कानों में भी पड़ा ॥७॥

सा तमार्तस्वरं श्रुत्वा तव स्नेहेन मैथिली।

गच्छ गच्छेति मामाशु रुदती भयविक्लवा॥८॥

‘उस आर्तनाद को सुनकर मैथिली आपके प्रति स्नेह के कारण भय से व्याकुल हो गयीं और रोती हुई मुझसे तुरंत बोलीं—’जाओ, जाओ’ ॥ ८॥

प्रचोद्यमानेन मया गच्छेति बहुशस्तया।

प्रत्युक्ता मैथिली वाक्यमिदं तत् प्रत्ययान्वितम्॥ ९॥

‘जब बारंबार उन्होंने ‘जाओ’ कहकर मुझे प्रेरित किया, तब उन्हें विश्वास दिलाते हुए मैंने मैथिली से यह बात कही— ॥९॥

न तत् पश्याम्यहं रक्षो यदस्य भयमावहेत्।

निर्वृता भव नास्त्येतत् केनाप्येतदुदाहृतम्॥१०॥

‘देवि! मैं ऐसे किसी राक्षस को नहीं देखता, जो भगवान् श्रीराम को भी भय में डाल सके। आप शान्त रहें, यह भैया की आवाज नहीं है। किसी दूसरे ने इस तरह की पुकार की है॥ १० ॥

विगर्हितं च नीचं च कथमार्योऽभिधास्यति।

त्राहीति वचनं सीते यस्त्रायेत् त्रिदशानपि॥११॥

‘सीते! जो देवताओं की भी रक्षा कर सकते हैं, वे मेरे बड़े भाई ‘मुझे बचाओ’ ऐसा निन्दित (कायरतापूर्ण) वचन कैसे कहेंगे? ॥ ११ ॥

किंनिमित्तं तु केनापि भ्रातुरालम्ब्य मे स्वरम्।

विस्वरं व्याहृतं वाक्यं लक्ष्मण त्राहि मामिति॥ १२॥

‘किसी दूसरे ने किसी बुरे उद्देश्य से मेरे भैया के स्वर की नकल करके ‘लक्ष्मण! मुझे बचाओ’ यह बात जोर से कही है॥ १२॥

राक्षसेनेरितं वाक्यं त्रासात् त्राहीति शोभने।

न भवत्या व्यथा कार्या कुनारीजनसेविता॥१३॥

‘शोभने! उस राक्षस ने ही भय के कारण (मुझे बचाओ) यह बात मुँह से निकाली है। आपको व्यथित नहीं होना चाहिये। ऐसी व्यथा को नीच श्रेणी की स्त्रियाँ ही अपने मन में स्थान देती हैं॥ १३॥

अलं विक्लवतां गन्तुं स्वस्था भव निरुत्सुका।

न चास्ति त्रिषु लोकेषु पुमान् यो राघवं रणे॥ १४॥

जातो वा जायमानो वा संयुगे यः पराजयेत्।

अजेयो राघवो युद्धे देवैः शक्रपुरोगमैः॥१५॥

‘तुम व्याकुल मत होओ, स्वस्थ हो जाओ, चिन्ता छोड़ो। तीनों लोकों में ऐसा कोई पुरुष न तो उत्पन्न हुआ है, न हो रहा है और न होगा ही, जो युद्ध में श्रीरघुनाथजी को परास्त कर सके। संग्राम में इन्द्र आदि देवता भी श्रीराम को नहीं जीत सकते’ ।। १४-१५ ।।

एवमुक्ता तु वैदेही परिमोहितचेतना।

उवाचाश्रूणि मुञ्चन्ती दारुणं मामिदं वचः॥ १६॥

मेरे ऐसा कहने पर विदेहराजकुमारी की चेतना मोह से आच्छन्न हो गयी। वे आँसू बहाती हुई मुझसे अत्यन्त कठोर वचन बोलीं- ॥ १६ ॥

भावो मयि तवात्यर्थं पाप एव निवेशितः।

विनष्टे भ्रातरि प्राप्तुं न च त्वं मामवाप्स्यसे॥ १७॥

‘लक्ष्मण ! तेरे मन में मेरे लिये अत्यन्त पापपूर्ण भाव भरा है। तू अपने भाई के मरने पर मुझे प्राप्त करना चाहता है, परंतु मुझे पा नहीं सकेगा॥ १७ ॥

संकेताद् भरतेन त्वं रामं समनुगच्छसि।

क्रोशन्तं हि यथात्यर्थं नैनमभ्यवपद्यसे॥१८॥

‘तू भरत के इशारे से अपने स्वार्थ के लिये श्रीरामचन्द्रजी के पीछे-पीछे आया है। तभी तो वे जोर जोर से चिल्ला रहे हैं और तू उनके पास जाता तक नहीं है।

रिपुः प्रच्छन्नचारी त्वं मदर्थमनुगच्छसि।

राघवस्यान्तरं प्रेप्सुस्तथैनं नाभिपद्यसे॥१९॥

‘तू अपने भाई का छिपा हुआ शत्रु है। मेरे लिये ही श्रीराम का अनुसरण करता है और श्रीराम के छिद्र ढूँढ़ रहा है तभी तो संकट के समय उनके पास जाने का नाम नहीं लेता है’ ॥१९॥

एवमुक्तस्तु वैदेह्या संरब्धो रक्तलोचनः।

क्रोधात् प्रस्फुरमाणोष्ठ आश्रमादभिनिर्गतः॥२०॥

‘विदेहकुमारी के ऐसा कहने पर मैं रोष से भर गया। । मेरी आँखें लाल हो गयीं और क्रोध से मेरे होंठ फड़कने लगे। इस अवस्था में मैं आश्रम से निकल आया’ ॥ २०॥

एवं ब्रुवाणं सौमित्रिं रामः संतापमोहितः।

अब्रवीद् दुष्कृतं सौम्य तां विना त्वमिहागतः॥ २१॥

लक्ष्मण की ऐसी बात सुनकर श्रीरामचन्द्रजी संताप से मोहित हो गये और उनसे बोले—’सौम्य! तुमने बड़ा बुरा किया, जो तुम सीता को छोड़कर यहाँ चले आये॥ २१॥

जानन्नपि समर्थं मां रक्षसामपवारणे।

अनेन क्रोधवाक्येन मैथिल्या निर्गतो भवान्॥ २२॥

‘मैं राक्षसों का निवारण करने में समर्थ हूँ, यह जानते हए भी तुम मैथिली के क्रोधयुक्त वचन से उत्तेजित होकर निकल पड़े॥ २२॥

नहि ते परितुष्यामि त्यक्त्वा यदसि मैथिलीम्।

क्रुद्धायाः परुषं श्रुत्वा स्त्रिया यत् त्वमिहागतः॥२३॥

‘क्रोध में भरी हुई नारी के कठोर वचन को सुनकर जो तुम मिथिलेशकुमारीको छोड़कर यहाँ चले आये, इससे मैं तुम्हारे ऊपर संतुष्ट नहीं हूँ॥२३॥

सर्वथा त्वपनीतं ते सीतया यत् प्रचोदितः।

क्रोधस्य वशमागम्य नाकरोः शासनं मम॥२४॥

‘सीता से प्रेरित होकर क्रोध के वशीभूत हो तुमने मेरे आदेश का पालन नहीं किया; यह सर्वथा तुम्हारा अन्याय है॥२४॥

असौ हि राक्षसः शेते शरेणाभिहतो मया।

मृगरूपेण येनाहमाश्रमादपवाहितः॥ २५॥

‘जिसने मृगरूप धारण करके मुझे आश्रम से दूर हटा दिया, वह राक्षस मेरे बाणों से घायल होकर सदा के लिये सो रहा है।॥ २५ ॥

विकृष्य चापं परिधाय सायकं सलीलबाणेन च ताडितो मया।

मार्गी तनुं त्यज्य च विक्लवस्वरो बभूव केयूरधरः स राक्षसः॥२६॥

‘धनुष खींचकर उस बाण का संधान करके मैंने लीलापूर्वक चलाये हुए बाणों से ज्यों ही उस मृग को मारा, त्यों ही वह मृग के शरीर का परित्याग करके बाँहों में बाजूबंद धारण करने वाला राक्षस बन गया। उसके स्वर में बड़ी व्याकुलता आ गयी थी॥ २६॥

शराहतेनैव तदार्तया गिरा स्वरं ममालम्ब्य सुदूरसुश्रवम्।

उदाहृतं तद् वचनं सुदारुणं त्वमागतो येन विहाय मैथिलीम्॥२७॥

‘बाण से आहत होने पर ही उसने आर्तवाणी में मेरे स्वर की नकल करके बहुत दूरतक सुनायी देने वाला वह अत्यन्त दारुण वचन कहा था, जिससे तुम मिथिलेशकुमारी सीता को छोड़कर यहाँ चले आये हो’ ॥ २७॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे एकोनषष्टितमः सर्गः॥ ५९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में उनसठवाँ सर्ग पूरा हुआ।५९॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अरण्यकाण्डम्

श्रीराम का विलाप करते हुए वृक्षों और पशुओं से सीता का पता पूछना, भ्रान्त होकर रोना और बारंबार उनकी खोज करना

षष्टितमः सर्गः

सर्ग-60


भृशमाव्रजमानस्य तस्याधो वामलोचनम्।

प्रास्फुरच्चास्खलद् रामो वेपथुश्चास्य जायते॥

आश्रम की ओर आते समय श्रीराम की बायीं आँख की नीचे वाली पलक जोर-जोर से फड़कने लगी। श्रीराम चलते-चलते लड़खड़ा गये और उनके शरीर में कम्प होने लगा॥१॥

उपालक्ष्य निमित्तानि सोऽशुभानि मुहुर्मुहुः।

अपि क्षेमं तु सीताया इति वै व्याजहार ह॥२॥

बारंबार इन अपशकुनों को देखकर वे कहने लगे —क्या सीता सकुशल होगी?॥ २॥

त्वरमाणो जगामाथ सीतादर्शनलालसः।

शून्यमावसथं दृष्ट्वा बभूवोद्विग्नमानसः॥३॥

सीता को देखने के लिये उत्कण्ठित हो वे बड़ी उतावली के साथ आश्रम पर गये। वहाँ कुटिया सूनी देख उनका मन अत्यन्त उद्विग्न हो उठा॥३॥

उद्भ्रमन्निव वेगेन विक्षिपन् रघुनन्दनः।

तत्र तत्रोटजस्थानमभिवीक्ष्य समन्ततः॥४॥

ददर्श पर्णशालां च सीतया रहितां तदा।

श्रिया विरहितां ध्वस्तां हेमन्ते पद्मिनीमिव॥५॥

रघुनन्दन बड़े वेग से इधर-उधर चक्कर लगाने और हाथ-पैर चलाने लगे। उन्होंने वहाँ जहाँ-तहाँ बनी हुई एक-एक पर्णशाला को चारों ओर से देख डाला, किंतु उस समय उसे सीता से सूनी ही पाया। जैसे हेमन्तऋतु में कमलिनी हिम से ध्वस्त हो श्रीहीन हो जाती है, । उसी प्रकार प्रत्येक पर्णशाला शोभाशून्य हो गयी थी॥ ४-५॥

रुदन्तमिव वृक्षैश्च ग्लानपुष्पमृगद्विजम्।

श्रिया विहीनं विध्वस्तं संत्यक्तं वनदैवतैः॥६॥

वह स्थान वृक्षों (की सनसनाहट) के द्वारा मानो रो रहा था, फूल मुरझा गये थे, मृग और पक्षी मन मारे बैठे थे। वहाँ की सम्पूर्ण शोभा नष्ट हो गयी थी। सारी कुटी उजाड़ दिखायी देती थी। वन के देवता भी उस स्थान को छोड़कर चले गये थे॥६॥

विप्रकीर्णाजिनकुशं विप्रविद्धबृसीकटम्।

दृष्ट्वा शून्योटजस्थानं विललाप पुनः पुनः॥७॥

सब ओर मृगचर्म और कुश बिखरे हुए थे। चटाइयाँ अस्त-व्यस्त पड़ी थीं। पर्णशाला को सूनी देख भगवान् श्रीराम बारंबार विलाप करने लगे—॥ ७॥

हृता मृता वा नष्टा वा भक्षिता वा भविष्यति।

निलीनाप्यथवा भीरुरथवा वनमाश्रिता॥८॥

‘हाय ! सीता को किसी ने हर तो नहीं लिया। उसकी मृत्यु तो नहीं हो गयी अथवा वह खो तो नहीं गयी या किसी राक्षस ने उसे खा तो नहीं लिया। वह भीरु कहीं छिप तो नहीं गयी है अथवा फल-फूल लाने के लिये वन के भीतर तो नहीं चली गयी॥ ८॥

गता विचेतुं पुष्पाणि फलान्यपि च वा पुनः।

अथवा पद्मिनी याता जलार्थं वा नदीं गता॥९॥

‘सम्भव है, फल-फूल लाने के लिये ही गयी हो या जल लाने के लिये किसी पुष्करिणी अथवा नदी के तट पर गयी हो’ ॥ ९॥

यत्नान्मृगयमाणस्तु नाससाद वने प्रियाम्।

शोकरक्तेक्षणः श्रीमानुन्मत्त इव लक्ष्यते॥१०॥

श्रीरामचन्द्रजी ने प्रयत्नपूर्वक अपनी प्रिय पत्नी सीता को वन में चारों ओर ढूँढा, किंतु कहीं भी उनका पता न लगा। शोक के कारण श्रीमान् राम की आँखें लाल हो गयीं। वे उन्मत्त के समान दिखायी देने लगे। १०॥

वृक्षाद् वृक्षं प्रधावन् स गिरीश्चापि नदीनदम्।

बभ्राम विलपन् रामः शोकपङ्कार्णवप्लुतः॥ ११॥

एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष के पास दौड़ते हुए वे पर्वतों, नदियों और नदों के किनारे घूमने लगे। शोक से समुद्र में डूबे हुए श्रीरामचन्द्रजी विलाप करते-करते वृक्षों से पूछने लगे— ॥ ११॥

अस्ति कच्चित्त्वया दृष्टा सा कदम्बप्रिया प्रिया।

कदम्ब यदि जानीषे शंस सीतां शुभाननाम्॥ १२॥

स्निग्धपल्लवसंकाशां पीतकौशेयवासिनीम्।

शंसस्व यदि सा दृष्टा बिल्व बिल्वोपमस्तनी॥ १३॥

‘कदम्ब! मेरी प्रिया सीता तुम्हारे पुष्प से बहुत प्रेम करती थी, क्या वह यहाँ है? क्या तुमने उसे देखा है? यदि जानते हो तो उस शुभानना सीता का पता बताओ। उसके अङ्ग सुस्निग्ध पल्लवों के समान कोमल हैं तथा शरीर पर पीले रंग की रेशमी साड़ी शोभा पाती है। बिल्व! मेरी प्रिया के स्तन तुम्हारे ही समान हैं। यदि तुमने उसे देखा हो तो बताओ॥ १२-१३॥

अथवार्जुन शंस त्वं प्रियां तामनिप्रियाम्।

जनकस्य सुता तन्वी यदि जीवति वा न वा॥ १४॥

‘अथवा अर्जुन! तुम्हारे फूलों पर मेरी प्रिया का विशेष अनुराग था, अतः तुम्हीं उसका कुछ समाचार बताओ। कृशाङ्गी जनककिशोरी जीवित है या नहीं।

ककुभः ककुभोरुं तां व्यक्तं जानाति मैथिलीम्।

लतापल्लवपुष्पाढ्यो भाति ह्येष वनस्पतिः॥ १५॥

भ्रमरैरुपगीतश्च यथा द्रुमवरो ह्यसि।

एष व्यक्तं विजानाति तिलकस्तिलकप्रियाम्॥ १६॥

यह ककुभ* अपने ही समान ऊरुवाली मिथिलेशकुमारी को अवश्य जानता होगा; क्योंकि यह वनस्पति लता, पल्लव तथा फूलों से सम्पन्न हो बड़ी शोभा पा रहा है। ककुभ! तुम सब वृक्षों में श्रेष्ठ हो, क्योंकि ये भ्रमर तुम्हारे समीप आकर अपने झंकारों द्वारा तुम्हारा यशोगान करते हैं। (तुम्हीं सीता का पता बताओ, अहो! यह भी कोई उत्तर नहीं दे रहा है।) यह तिलक वृक्ष अवश्य सीता के विषय में जानता होगा; क्योंकि मेरी प्रिया सीता को भी तिलक से प्रेम था॥१५-१६॥

* रामायण के व्याख्याकारों से किसी ने ककुभ का अर्थ मरुवक लिखा है और किसी ने अर्जुनविशेष, किंतु कोषों में यह कुटज का पर्याय बताया गया है।

अशोक शोकापनुद शोकोपहतचेतनम्।

त्वन्नामानं कुरु क्षिप्रं प्रियासंदर्शनेन माम्॥१७॥

‘अशोक! तुम शोक दूर करने वाले हो। इधर मैं शोक से अपनी चेतना खो बैठा हूँ। मुझे मेरी प्रियतमा का दर्शन कराकर शीघ्र ही अपने-जैसे नामवाला बना दो—मुझे अशोक (शोकहीन) कर

दो॥ १७॥

यदि ताल त्वया दृष्टा पक्वतालोपमस्तनी।

कथयस्व वरारोहां कारुण्यं यदि ते मयि॥१८॥

‘ताल वृक्ष! तुम्हारे पके हुए फल के समान स्तनवाली सीता को यदि तुमने देखा हो तो बताओ। यदि मुझ पर तुम्हें दया आती हो तो उस सुन्दरी के विषय में अवश्य कुछ कहो।। १८॥

यदि दृष्टा त्वया जम्बो जाम्बूनदसमप्रभा।

प्रियां यदि विजानासि निःशङ्क कथयस्व मे॥ १९॥

‘जामुन ! जाम्बूनद (सुवर्ण) के समान कान्तिवाली मेरी प्रिया यदि तुम्हारी दृष्टि में पड़ी हो, यदि तुम उसके विषय में कुछ जानते हो तो निःशङ्क होकर मुझे बताओ॥ १९॥

अहो त्वं कर्णिकाराद्य पुष्पितः शोभसे भृशम्।

कर्णिकारप्रियां साध्वीं शंस दृष्टा यदि प्रिया॥ २०॥

‘कनेर! आज तो फूलों के लगने से तुम्हारी बड़ी शोभा हो रही है। अहो! मेरी प्रिया साध्वी सीता को तुम्हारे ये पुष्प बहुत पसंद थे। यदि तुमने उसे कहीं देखा हो तो मुझसे कहो’ ॥ २० ॥

चूतनीपमहासालान् पनसान् कुरवान् धवान्।

दाडिमानपि तान् गत्वा दृष्ट्वा रामो महायशाः॥ २१॥

बकुलानथ पुन्नागांश्चन्दनान् केतकांस्तथा।

पृच्छन् रामो वने भ्रान्त उन्मत्त इव लक्ष्यते॥ २२॥

इसी प्रकार आम, कदम्ब, विशाल शाल, कटहल, कुरव, धव और अनार आदि वृक्षों को भी देखकर महायशस्वी श्रीरामचन्द्रजी उनके पास गये और वकुल, पुन्नाग, चन्दन तथा केवड़े आदि के वृक्षों से भी पूछते फिरे। उस समय वे वन में पागल की तरह इधर-उधर भटकते दिखायी देते थे॥२१-२२॥

अथवा मृगशावाक्षीं मृग जानासि मैथिलीम।

मृगविप्रेक्षणी कान्ता मृगीभिः सहिता भवेत्॥ २३॥

अपने सामने हरिणको देखकर वे बोले—’मृग! अथवा तुम्ही बताओ! मृगनयनी मैथिली को जानते हो। मेरी प्रिया की दृष्टि भी तुम हरिणों की-सी है, अतः सम्भव है, वह हरिणियों के ही साथ हो ॥ २३॥

गज सा गजनासोरुर्यदि दृष्टा त्वया भवेत्।

तां मन्ये विदितां तुभ्यमाख्याहि वरवारण॥२४॥

‘श्रेष्ठ गजराज! तुम्हारी सँड़ के समान ही जिसके दोनों ऊरु हैं, उस सीता को सम्भवतः तुमने देखा होगा। मालूम होता है, तुम्हें उसका पता विदित है, अतः बताओ! वह कहाँ है? ॥ २४॥

शार्दूल यदि सा दृष्टा प्रिया चन्द्रनिभानना।

मैथिली मम विस्रब्धः कथयस्व न ते भयम्॥ २५॥

‘व्याघ्र ! यदि तुमने मेरी प्रिया चन्द्रमुखी मैथिली को देखा हो तो निःशङ्क होकर बता दो, मुझसे तुम्हें कोई भय नहीं होगा’ ॥ २५॥

किं धावसि प्रिये नूनं दृष्टासि कमलेक्षणे।

वृक्षराच्छाद्य चात्मानं किं मां न प्रतिभाषसे॥ २६॥

(इतने ही में उनको भ्रम हुआ कि सीता उधर भागकर छिप रही है, तब वे बोले-) ‘प्रिये! क्यों भागी जा रही हो। कमललोचने! निश्चय ही मैंने तुम्हें देख लिया है। तुम वृक्षों की ओट में अपने-आपको छिपाकर मुझसे बात क्यों नहीं करती हो? ॥ २६ ॥

तिष्ठ तिष्ठ वरारोहे न तेऽस्ति करुणा मयि।

नात्यर्थं हास्यशीलासि किमर्थं मामपेक्षसे॥२७॥

‘वरारोहे ! ठहरो, ठहरो। क्या तुम्हें मुझपर दया नहीं आती है। अधिक हास-परिहास करने का तुम्हारा स्वभाव तो नहीं था, फिर किसलिये मेरी उपेक्षा करती हो? ॥ २७॥

पीतकौशेयकेनासि सूचिता वरवर्णिनि।

धावन्त्यपि मया दृष्टा तिष्ठ यद्यस्ति सौहृदम्॥ २८॥

‘सुन्दरि! पीली रेशमी साड़ीसे ही, तुम कहाँ हो– यह सूचना मिल जाती है। भागी जाती हो तो भी मैंने तुम्हें देख लिया है। यदि मेरे प्रति स्नेह एवं सौहार्द हो तो खड़ी हो जाओ’ ॥ २८॥

नैव सा नूनमथवा हिंसिता चारुहासिनी।

कृच्छं प्राप्तं न मां नूनं यथोपेक्षितुमर्हति॥२९॥

(फिर भ्रम दूर होने पर बोले-) ‘अथवा निश्चय ही वह नहीं है। उस मनोहर मुसकानवाली सीता को राक्षसों ने मार डाला, अन्यथा इस तरह संकटमें पड़े हुए की (मेरी) वह कदापि उपेक्षा नहीं कर सकती थी॥ २९॥

व्यक्तं सा भक्षिता बाला राक्षसैः पिशिताशनैः।

विभज्याङ्गानि सर्वाणि मया विरहिता प्रिया॥३०॥

‘स्पष्ट जान पड़ता है कि मांसभक्षी राक्षसों ने मुझसे बिछुड़ी हुई मेरी भोली-भाली प्रिया मैथिली को उसके सारे अङ्ग बाँटकर खा लिया॥ ३०॥

नूनं तच्छुभदन्तोष्ठं सुनासं शुभकुण्डलम्।

पूर्णचन्द्रनिभं ग्रस्तं मुखं निष्प्रभतां गतम्॥३१॥

‘सुन्दर दाँत, मनोहर ओष्ठ, सुघड़ नासिका से युक्त तथा रुचिर कुण्डलों से अलंकृत वह पूर्ण चन्द्रमा के समान अभिराम मुख राक्षसों का ग्रास बनकर निश्चय ही अपनी प्रभा खो बैठा होगा॥३१॥

सा हि चम्पकवर्णाभा ग्रीवा ग्रैवेयकोचिता।

कोमला विलपन्त्यास्तु कान्ताया भक्षिता शुभा॥ ३२॥

‘रोती-विलखती हुई प्रियतमा सीता की वह चम्पा के समान वर्णवाली कोमल एवं सुन्दर ग्रीवा, जो हार और हँसली आदि आभूषण पहनने के योग्य थी, निशाचरों का आहार बन गयी॥ ३२॥

नूनं विक्षिप्यमाणौ तौ बाहू पल्लवकोमलौ।

भक्षितौ वेपमानाग्रौ सहस्ताभरणाङ्गदौ॥३३॥

‘वे नूतन पल्लवों के समान कोमल भुजाएँ, जो इधर-उधर पटकी जा रही होंगी और जिनके अग्रभाग काँप रहे होंगे, हाथों के आभूषण तथा बाजूबंदसहित निश्चय ही राक्षसों के पेट में चली गयीं॥ ३३ ॥

मया विरहिता बाला रक्षसां भक्षणाय वै।

सार्थेनेव परित्यक्ता भक्षिता बहुबान्धवा॥३४॥

‘मैंने राक्षसों का भक्ष्य बनने के लिये ही उस बाला को अकेली छोड़ दिया। यद्यपि उसके बन्धुबान्धव बहुत हैं, तथापि वह यात्रियों के समुदाय से विलग हुई किसी अकेली स्त्री की भाँति निशाचरों का ग्रास बन गयी॥ ३४॥

हा लक्ष्मण महाबाहो पश्यसे त्वं प्रियां क्वचित्।

हा प्रिये क्व गता भद्रे हा सीतेति पुनः पुनः॥ ३५॥

इत्येवं विलपन् रामः परिधावन् वनाद् वनम्।

क्वचिदुद्भ्रमते वेगात् क्वचिद् विभ्रमते बलात्॥ ३६॥

‘हा महाबाहु लक्ष्मण! क्या तुम कहीं मेरी प्रियतमा को देखते हो! हा प्रिये! हा भद्रे! हा सीते! तुम कहाँ चली गयी?’ इस तरह बारंबार विलाप करते हुए श्रीरामचन्द्रजी एक वन से दूसरे वन में दौड़ने लगे। वे कहीं सीता की समानता पाकर उद्भ्रान्त हो उठते (उछल पड़ते थे) और कहीं शोक की प्रबलता के कारण विभ्रान्त हो जाते (बवंडर की भाँति चक्कर काटने लगते) थे॥ ३५-३६॥

क्वचिन्मत्त इवाभाति कान्तान्वेषणतत्परः।

स वनानि नदीः शैलान् गिरिप्रस्रवणानि च।

काननानि च वेगेन भ्रमत्यपरिसंस्थितः॥३७॥

अपनी प्रियतमा की खोज करते हए वे कभी-कभी पागलों की-सी चेष्टा करने लगते थे। उन्होंने बड़ी दौड़-धूप करके कहीं भी विश्राम न करते हुए वनों, नदियों, पर्वतों, पहाड़ी झरनों और विभिन्न काननों में घूम-घूमकर अन्वेषण किया॥ ३७॥

तदा स गत्वा विपुलं महद् वनं परीत्य सर्वं त्वथ मैथिली प्रति।

अनिष्ठिताशः स चकार मार्गणे पुनः प्रियायाः परमं परिश्रमम्॥ ३८॥

उस समय मिथिलेशकुमारी को ढूँढ़ने के लिये वे उस विशाल एवं विस्तृत वन में गये और सब में चक्कर लगाकर थक गये तो भी निराश नहीं हुए। उन्होंने पुनः अपनी प्रियतमा के अनुसंधान के लिये बड़ा भारी परिश्रम किया॥३८॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे षष्टितमः सर्गः॥६०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में साठवाँ सर्ग पूरा हुआ।६०॥