॥श्री गणेशाय नम:॥
॥श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
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सम्पूर्ण वाल्मीकि रामायण
[काव्य बीजं सनातनम्]

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
युद्धकाण्डम्

श्रीराम का समुद्र के तट पर तीन दिनों तक धरना देने पर भी समुद्र के दर्शन न देने से बाण मारकर विक्षुब्ध कर देना

एकविंशः सर्गः

सर्ग-21

ततः सागरवेलायां दर्भानास्तीर्य राघवः।

अञ्जलिं प्राङ्मखः कृत्वा प्रतिशिश्ये महोदधेः॥१॥

तदनन्तर श्रीरघुनाथजी समुद्र के तट पर कुशा बिछा महासागर के समक्ष हाथ जोड़ पूर्वाभिमुख हो वहाँ लेट गये॥१॥

बाहुं भुजङ्गभोगाभमुपधायारिसूदनः।

जातरूपमयैश्चैव भूषणैर्भूषितं पुरा॥२॥

उस समय शत्रुसूदन श्रीराम ने सर्प के शरीर की भाँति कोमल और वनवास के पहले सोने के बने हुए सुन्दर आभूषणों से सदा विभूषित रहने वाली अपनी एक (दाहिनी) बाँह को तकिया बना रखा था॥२॥

मणिकाञ्चनकेयूरमुक्ताप्रवरभूषणैः।

भुजैः परमनारीणामभिष्टमनेकधा॥३॥

अयोध्या में रहते समय मातृकोटि की अनेक उत्तम नारियाँ (धायें) मणि और सुवर्ण के बने हुए केयूरों तथा मोती के श्रेष्ठ आभूषणों से विभूषित अपने करकमलों द्वारा नहलाने-धुलाने आदि के समय अनेक बार श्रीराम के उस बाँह को सहलाती और दबाती थीं। ३॥

चन्दनागुरुभिश्चैव पुरस्तादभिसेवितम्।

बालसूर्यप्रकाशैश्च चन्दनैरुपशोभितम्॥४॥

पहले चन्दन और अगुरु से उस बाँह की सेवा होती थी। प्रातःकाल के सूर्य की-सी कान्तिवाले लाल चन्दन उसकी शोभा बढ़ाते थे॥ ४॥

शयने चोत्तमाङ्गेन सीतायाः शोभितं पुरा।

तक्षकस्येव सम्भोगं गङ्गाजलनिषेवितम्॥५॥

सीताहरण से पहले शयनकाल में सीता का सिर उस बाँह की शोभा बढ़ाता था और श्वेत शय्या पर स्थित एवं लाल चन्दन से चर्चित हुई वह बाँह गङ्गाजल में निवास करने वाले तक्षक के* शरीर की भाँति सुशोभित होती थी॥५॥

* तक्षकनाग का रंग लाल माना गया है। (देखिये महाभारत, आदिपर्व ४४ । २-३)

संयुगे युगसंकाशं शत्रूणां शोकवर्धनम्।

सुहृदां नन्दनं दीर्घ सागरान्तव्यपाश्रयम्॥६॥

युद्धस्थल में जूए के समान वह विशाल भुजा शत्रुओं का शोक बढ़ाने वाली और सुहृदों को दीर्घ काल तक आनन्दित करने वाली थी। समुद्रपर्यन्त अखण्ड भूमण्डल की रक्षा का भार उनकी उसी भुजा पर प्रतिष्ठित था॥६॥

अस्यता च पुनः सव्यं ज्याघातविहतत्वचम्।

दक्षिणो दक्षिणं बाहुं महापरिघसंनिभम्॥७॥

गोसहस्रप्रदातारं ह्युपधाय भुजं महत्।

अद्य मे तरणं वाथ मरणं सागरस्य वा॥८॥

इति रामो धृतिं कृत्वा महाबाहुर्महोदधिम्।

अधिशिष्ये च विधिवत् प्रयतो नियतो मुनिः॥९॥

बायीं ओर को बारंबार बाण चलाने के कारण प्रत्यञ्चा के आघात से जिसकी त्वचा पर रगड़ पड़ गयी थी, जो विशाल परिघ के समान सुदृढ़ एवं बलिष्ठ थी तथा जिसके द्वारा उन्होंने सहस्रों गौओं का दान किया था, उस विशाल दाहिनी भुजा का तकिया लगाकर उदारता आदि गुणों से युक्त महाबाहु श्रीराम ‘आज या तो मैं समुद्र के पार जाऊँगा या मेरे द्वारा समुद्र का संहार होगा’ ऐसा निश्चय करके मौन हो मन, वाणी और शरीर को संयम में रखकर महासागर को अनुकूल करने के उद्देश्य से विधिपूर्वक धरना देते हुए उस कुशासन पर सो गये॥७–९॥

तस्य रामस्य सुप्तस्य कुशास्तीर्णे महीतले।

नियमादप्रमत्तस्य निशास्तिस्रोऽभिजग्मतुः॥१०॥

कुश बिछी हुई भूमि पर सोकर नियम से असावधान न होते हुए श्रीराम की वहाँ तीन रातें व्यतीत हो गयीं।

स त्रिरात्रोषितस्तत्र नयज्ञो धर्मवत्सलः।

उपासत तदा रामः सागरं सरितां पतिम्॥११॥

न च दर्शयते रूपं मन्दो रामस्य सागरः।

प्रयतेनापि रामेण यथार्हमभिपूजितः॥१२॥

इस प्रकार उस समय वहाँ तीन रात लेटे रहकर नीति के ज्ञाता, धर्मवत्सल श्रीरामचन्द्रजी सरिताओं के स्वामी समुद्र की उपासना करते रहे; परंतु नियमपूर्वक रहते हुए श्रीराम के द्वारा यथोचित पूजा और सत्कार पाकर भी उस मन्दमति महासागर ने उन्हें अपने आधिदैविक रूप का दर्शन नहीं कराया—वह उनके समक्ष प्रकट नहीं हुआ॥ ११-१२॥

समुद्रस्य ततः क्रुद्धो रामो रक्तान्तलोचनः।

समीपस्थमुवाचेदं लक्ष्मणं शुभलक्षणम्॥१३॥

तब अरुणनेत्र प्रान्तवाले भगवान् श्रीराम समुद्रपर कुपित हो उठे और पास ही खड़े हुए शुभलक्षणयुक्त लक्ष्मण से इस प्रकार बोले- ॥ १३॥

अवलेपः समुद्रस्य न दर्शयति यः स्वयम्।

प्रशमश्च क्षमा चैव आर्जवं प्रियवादिता॥१४॥

असामर्थ्यफला ह्येते निर्गुणेषु सतां गुणाः।

‘समुद्र को अपने ऊपर बड़ा अहङ्कार है, जिससे वह स्वयं मेरे सामने प्रकट नहीं हो रहा है। शान्ति, क्षमा, सरलता और मधुर भाषण—ये जो सत्पुरुषों के गुण हैं, इनका गुणहीनों के प्रति प्रयोग करने पर यही परिणाम होता है कि वे उस गुणवान् पुरुष को भी असमर्थ समझ लेते हैं। १४ १/२ ॥

आत्मप्रशंसिनं दुष्टं धृष्टं विपरिधावकम्॥१५॥

सर्वत्रोत्सृष्टदण्डं च लोकः सत्कुरुते नरम्।

‘जो अपनी प्रशंसा करने वाला, दुष्ट, धृष्ट, सर्वत्र धावा करने वाला और अच्छे-बुरे सभी लोगों पर कठोर दण्ड का प्रयोग करने वाला होता है, उस मनुष्य का सब लोग सत्कार करते हैं। १५ १/२॥

न साम्ना शक्यते कीर्तिर्न साम्ना शक्यते यशः॥१६॥

प्राप्तुं लक्ष्मण लोकेऽस्मिञ्जयो वा रणमूर्धनि।

‘लक्ष्मण ! सामनीति (शान्ति)-के द्वारा इस लोक में न तो कीर्ति प्राप्त की जा सकती है, न यश का प्रसार हो सकता है और न संग्राम में विजय ही पायी जा सकती है।

अद्य मबाणनिर्भग्नैर्मकरैर्मकरालयम्॥१७॥

निरुद्धतोयं सौमित्रे प्लवद्भिः पश्य सर्वतः।

‘सुमित्रानन्दन! आज मेरे बाणों से खण्ड-खण्ड हो मगर और मत्स्य सब ओर उतराकर बहने लगेंगे और उनकी लाशों से इस मकरालय (समुद्र)-का जल आच्छादित हो जायगा। तुम यह दृश्य आज अपनी आँखों देख लो॥ १७ १/२ ॥

भोगिनां पश्य भोगानि मया भिन्नानि लक्ष्मण॥१८॥

महाभोगानि मत्स्यानां करिणां च करानिह।

‘लक्ष्मण! तुम देखो कि मैं यहाँ जल में रहने वाले सोके शरीर, मत्स्यों के विशाल कलेवर और जलहस्तियों के शुण्ड-दण्ड के किस तरह टुकड़े-टुकड़े कर डालता हूँ॥ १८ १/२॥

सशङ्खशुक्तिकाजालं समीनमकरं तथा॥१९॥

अद्य युद्धेन महता समुद्रं परिशोषये।

‘आज महान् युद्ध ठानकर शङ्खों और सीपियों के समुदाय तथा मत्स्यों और मगरोंसहित समुद्र को मैं अभी सुखाये देता हूँ॥ १९ १/२॥

क्षमया हि समायुक्तं मामयं मकरालयः॥२०॥

असमर्थं विजानाति धिक् क्षमामीदृशे जने।

‘मगरों का निवासभूत यह समुद्र मुझे क्षमा से युक्त देख असमर्थ समझने लगा है। ऐसे मूों के प्रति की गयी क्षमा को धिक्कार है॥२० १/२॥

न दर्शयति साम्ना मे सागरो रूपमात्मनः॥२१॥

चापमानय सौमित्रे शरांश्चाशीविषोपमान्।

समुद्रं शोषयिष्यामि पद्भयां यान्तु प्लवंगमाः॥२२॥

‘सुमित्रानन्दन! सामनीति का आश्रय लेने से यह समुद्र मेरे सामने अपना रूप नहीं प्रकट कर रहा है, इसलिये धनुष तथा विषधर सो के समान भयंकर बाण ले आओ। मैं समुद्र को सुखा डालूँगा; फिर वानर लोग पैदल ही लङ्कापुरी को चलें॥ २१-२२॥

अद्याक्षोभ्यमपि क्रुद्धः क्षोभयिष्यामि सागरम्।

वेलासु कृतमर्यादं सहस्रोर्मिसमाकुलम्॥२३॥

निर्मर्यादं करिष्यामि सायकैर्वरुणालयम्।

महार्णवं क्षोभयिष्ये महादानवसंकुलम्॥२४॥

‘यद्यपि समुद्र को अक्षोभ्य कहा गया है; फिर भी आज कुपित होकर मैं इसे विक्षुब्ध कर दूंगा। इसमें सहस्रों तरङ् उठती रहती हैं। फिर भी यह सदा अपने तट की मर्यादा (सीमा) में ही रहता है। किंतु अपने बाणों से मारकर मैं इसकी मर्यादा नष्ट कर दूंगा। बड़े बड़े दानवों से भरे हुए इस महासागर में हलचल मचा दूंगा-तूफान ला दूंगा’ ॥ २३-२४॥

एवमुक्त्वा धनुष्पाणिः क्रोधविस्फारितेक्षणः।

बभूव रामो दुर्धर्षो युगान्ताग्निरिव ज्वलन्॥२५॥

यों कहकर दुर्धर्ष वीर भगवान् श्रीराम ने हाथ में धनुष ले लिया। वे क्रोध से आँखें फाड़-फाड़कर देखने लगे और प्रलयाग्नि के समान प्रज्वलित हो उठे॥२५॥

सम्पीड्य च धनुर्घोरं कम्पयित्वा शरैर्जगत्।

मुमोच विशिखानुग्रान् वज्रानिव शतक्रतुः॥२६॥

उन्होंने अपने भयंकर धनुष को धीरे से दबाकर उसपर प्रत्यञ्चा चढ़ा दी और उसकी टङ्कार से सारे जगत् को कम्पित करते हुए बड़े भयंकर बाण छोड़े, मानो इन्द्रने बहुत-से वज्रों का प्रहार किया हो॥२६॥

ते ज्वलन्तो महावेगास्तेजसा सायकोत्तमाः।

प्रविशन्ति समुद्रस्य जलं वित्रस्तपन्नगम्॥२७॥

तेज से प्रज्वलित होते हुए वे महान् वेगशाली श्रेष्ठ बाण समुद्र के जल में घुस गये। वहाँ रहने वाले सर्प भय से थर्रा उठे॥२७॥

तोयवेगः समुद्रस्य समीनमकरो महान्।

स बभूव महाघोरः समारुतरवस्तथा ॥२८॥

‘मत्स्यों और मगरोंसहित महासागर के जल का महान् वेग सहसा अत्यन्त भयंकर हो गया। वहाँ तूफान का कोलाहल छा गया॥ २८॥

महोर्मिमालाविततः शङ्कशुक्तिसमावृतः।

सधूमः परिवृत्तोर्मिः सहसासीन्महोदधिः॥२९॥

बड़ी-बड़ी तरङ्ग-मालाओं से सारा समुद्र व्याप्त हो उठा। शङ्ख और सीपियाँ पानी के ऊपर छा गयीं। वहाँ धुआँ उठने लगा और सारे महासागर में सहसा बड़ी बड़ी लहरें चक्कर काटने लगीं॥ २९॥

व्यथिताः पन्नगाश्चासन् दीप्तास्या दीप्तलोचनाः।

दानवाश्च महावीर्याः पातालतलवासिनः॥३०॥

चमकीले फन और दीप्तिशाली नेत्रोंवाले सर्प व्यथित हो उठे तथा पाताल में रहने वाले महापराक्रमी दानव भी व्याकुल हो गये॥३०॥

ऊर्मयः सिन्धुराजस्य सनक्रमकरास्तथा।

विन्ध्यमन्दरसंकाशाः समुत्पेतुः सहस्रशः॥३१॥

सिन्धुराज की सहस्रों लहरें जो विन्ध्याचल और मन्दराचल के समान विशाल एवं विस्तृत थीं, नाकों और मकरों को साथ लिये ऊपर को उठने लगीं॥ ३१॥

आघूर्णिततरङ्गौघः सम्भ्रान्तोरगराक्षसः।

उदर्तितमहाग्राहः सघोषो वरुणालयः॥३२॥

सागर की उत्ताल तरङ्ग-मालाएँ झूमने और चक्कर काटने लगीं। वहाँ निवास करने वाले नाग और राक्षस घबरा गये। बड़े-बड़े ग्राह ऊपर को उछलने लगे तथा वरुण के निवासभूत उस समुद्र में सब ओर भारी कोलाहल मच गया॥ ३२॥

ततस्तु तं राघवमुग्रवेगं प्रकर्षमाणं धनुरप्रमेयम्।

सौमित्रिरुत्पत्य विनिःश्वसन्तं मामेति चोक्त्वा धनुराललम्बे॥३३॥

तदनन्तर श्रीरघुनाथजी रोष से लंबी साँस लेते हुए अपने भयंकर वेगशाली अनुपम धनुष को पुनः खींचने लगे। यह देख सुमित्राकुमार लक्ष्मण उछलकर उनके पास जा पहुँचे और ‘बस, बस, अब नहीं, अब नहीं’ ऐसा कहते हुए उन्होंने उनका धनुष पकड़ लिया। ३३॥

एतद्विनापि ह्युदधेस्तवाद्य सम्पत्स्यते वीरतमस्य कार्यम्।

भवद्विधाः क्रोधवशं न यान्ति दीर्घ भवान् पश्यतु साधुवृत्तम्॥३४॥

(फिर वे बोले-) भैया! आप वीर-शिरोमणि हैं। इस समुद्र को नष्ट किये बिना भी आपका कार्य सम्पन्न हो जायगा। आप-जैसे महापुरुष क्रोध के अधीन नहीं होते हैं। अब आप सुदीर्घकाल तक उपयोग में लाये जाने वाले किसी अच्छे उपायपर दृष्टि डालें—कोई दूसरी उत्तम युक्ति सोचें’॥ ३४॥

अन्तर्हितैश्चापि तथान्तरिक्षे ब्रह्मर्षिभिश्चैव सुरर्षिभिश्च।

शब्दः कृतः कष्टमिति ब्रुवद्भिर्मामेति चोक्त्वा महता स्वरेण॥३५॥

इसी समय अन्तरिक्ष में अव्यक्तरूप से स्थित महर्षियों और देवर्षियों ने भी ‘हाय! यह तो बड़े कष्टकी बात है’ ऐसा कहते हुए ‘अब नहीं, अब नहीं’ कहकर बड़े जोर से कोलाहल किया॥ ३५ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे एकविंशः सर्गः ॥२१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में इक्कीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।२१॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
युद्धकाण्डम्

नल के द्वारा सागर पर सौ योजन लंबे पुल का निर्माण तथा उसके द्वारा श्रीराम सहित वानरसेना का उस पार पड़ाव डालना

द्वाविंशति सर्गः

सर्ग-22

अथोवाच रघुश्रेष्ठः सागरं दारुणं वचः।

अद्य त्वां शोषयिष्यामि सपातालं महार्णव॥१॥

तब रघुकुलतिलक श्रीराम ने समुद्र से कठोर शब्दों में  कहा—’महासागर! आज मैं पातालसहित तुझे सुखा डालूँगा’॥१॥

शरनिर्दग्धतोयस्य परिशुष्कस्य सागर।

मया निहतसत्त्वस्य पांसुरुत्पद्यते महान्॥२॥

‘सागर! मेरे बाणों से तुम्हारी सारी जलराशि दग्ध हो जायगी, तू सूख जायगा और तेरे भीतर रहने वाले सब जीव नष्ट हो जायँगे। उस दशा में तेरे यहाँ जल के स्थान में विशाल बालुकाराशि पैदा हो जायगी॥२॥

मत्कार्मुकविसृष्टेन शरवर्षेण सागर।

परं तीरं गमिष्यन्ति पद्भिरेव प्लवंगमाः॥३॥

‘समुद्र! मेरे धनुष द्वारा की गयी बाण-वर्षा से जब तेरी ऐसी दशा हो जायगी, तब वानर लोग पैदल ही चलकर तेरे उस पार पहुँच जायेंगे॥३॥

विचिन्वन्नाभिजानासि पौरुषं नापि विक्रमम्।

दानवालय संतापं मत्तो नाम गमिष्यसि ॥४॥

‘दानवों के निवासस्थान! तू केवल चारों ओर से बहकर आयी हुई जलराशि का संग्रह करता है। तुझे मेरे बल और पराक्रम का पता नहीं हैं। किंतु याद रख, (इस उपेक्षा के कारण) तुझे मुझसे भारी संताप प्राप्त होगा’ ॥ ४॥

ब्राह्मणास्त्रेण संयोज्य ब्रह्मदण्डनिभं शरम्।

संयोज्य धनुषि श्रेष्ठ विचकर्ष महाबलः॥५॥

यों कहकर महाबली श्रीराम ने एक ब्रह्मदण्ड के समान भयंकर बाण को ब्रह्मास्त्र से अभिमन्त्रित करके अपने श्रेष्ठ धनुष पर चढ़ाकर खींचा॥ ५ ॥

तस्मिन् विकृष्टे सहसा राघवेण शरासने।

रोदसी सम्पफालेव पर्वताश्च चकम्पिरे॥६॥

श्रीरघुनाथजी के द्वारा सहसा उस धनुष के खींचे जाते ही पृथ्वी और आकाश मानो फटने लगे और पर्वत डगमगा उठे॥६॥

तमश्च लोकमावतें दिशश्च न चकाशिरे।

प्रतिचुक्षुभिरे चाशु सरांसि सरितस्तथा॥७॥

सारे संसार में अन्धकार छा गया। किसी को दिशाओं का ज्ञान न रहा। सरिताओं और सरोवरों में तत्काल हलचल पैदा हो गयी॥ ७॥

तिर्यक् च सह नक्षत्रैः संगतौ चन्द्रभास्करौ।

भास्करांशुभिरादीप्तं तमसा च समावृतम्॥८॥

चन्द्रमा और सूर्य नक्षत्रों के साथ तिर्यक्-गति से चलने लगे। सूर्य की किरणों से प्रकाशित होने पर भी आकाश में अन्धकार छा गया॥८॥

प्रचकाशे तदाऽऽकाशमुल्काशतविदीपितम्।

अन्तरिक्षाच्च निर्घाता निर्जग्मुरतुलस्वनाः॥९॥

उस समय आकाश में सैकड़ों उल्काएँ प्रज्वलित होकर उसे प्रकाशित करने लगीं तथा अन्तरिक्ष से अनुपम एवं भारी गड़गड़ाहट के साथ वज्रपात होने लगे॥९॥

वपुःप्रकर्षेण ववुर्दिव्यमारुतपङ्क्तयः।

बभञ्ज च तदा वृक्षाञ्जलदानुदहन्मुहुः॥१०॥

आरुजंश्चैव शैलाग्रान् शिखराणि बभञ्ज च।

परिवह आदि वायुभेदों का समूह बड़े वेग से बहने लगा। वह मेघों की घटा को उड़ाता हुआ बारंबार वृक्षों को तोड़ने, बड़े-बड़े पर्वतों से टकराने और उनके शिखरों को खण्डित करके गिराने लगा॥१० १/२॥

दिवि च स्म महामेघाः संहताः समहास्वनाः॥११॥

मुमुचुर्वैद्युतानग्नींस्ते महाशनयस्तदा।

यानि भूतानि दृश्यानि चुक्रुशुश्चाशनेः समम्॥१२॥

अदृश्यानि च भूतानि मुमुचुभैरवस्वनम्।

आकाश में महान् वेगशाली विशाल वज्र भारी गड़गड़ाहट के साथ टकराकर उस समय वैद्युत अग्नि की वर्षा करने लगे। जो प्राणी दिखायी दे रहे थे और जो नहीं दिखायी देते थे, वे सब बिजली की कड़क के समान भयंकर शब्द करने लगे॥ ११-१२ १/२॥

शिश्यिरे चाभिभूतानि संत्रस्तान्युद्भिजन्ति च॥

सम्प्रविव्यथिरे चापि न च पस्पन्दिरे भयात्।

उनमें से कितने ही अभिभूत होकर धराशायी हो गये। कितने ही भयभीत और उद्विग्न हो उठे। कोई व्यथा से व्याकुल हो गये और कितने ही भय के मारे जडवत् हो गये॥

सह भूतैः सतोयोर्मिः सनागः सहराक्षसः॥१४॥

सहसाभूत् ततो वेगाद् भीमवेगो महोदधिः।

योजनं व्यतिचक्राम वेलामन्यत्र सम्प्लवात्॥१५॥

समुद्र अपने भीतर रहने वाले प्राणियों, तरङ्गों,सो और राक्षसोंसहित सहसा भयानक वेग से युक्त हो गया और प्रलयकाल के बिना ही तीव्रगति से अपनी मर्यादा लाँघकर एक-एक योजन आगे बढ़ गया॥ १४-१५॥

तं तथा समतिक्रान्तं नातिचक्राम राघवः।

समुद्धतममित्रघ्नो रामो नदनदीपतिम्॥१६॥

इस प्रकार नदों और नदियों के स्वामी उस उद्धत समुद्र के मर्यादा लाँघकर बढ़ जाने पर भी शत्रुसूदन श्रीरामचन्द्रजी अपने स्थान से पीछे नहीं हटे॥१६॥

ततो मध्यात् समुद्रस्य सागरः स्वयमुत्थितः।

उदयाद्रिमहाशैलान्मेरोरिव दिवाकरः॥१७॥

तब समुद्र के बीच से सागर स्वयं मूर्तिमान् होकर प्रकट हुआ, मानो महाशैल मेरुपर्वत के अङ्गभूत उदयाचल से सूर्यदेव उदित हुए हों॥ १७ ॥

पन्नगैः सह दीप्तास्यैः समुद्रः प्रत्यदृश्यत।

स्निग्धवैदूर्यसंकाशो जाम्बूनदविभूषणः॥१८॥

चमकीले मुखवाले सो के साथ समुद्र का दर्शन हुआ। उसका वर्ण स्निग्ध वैदूर्यमणि के समान श्याम था। उसने जाम्बूनद नामक सुवर्ण के बने हुए आभूषण पहन रखे थे॥१८॥

रक्तमाल्याम्बरधरः पद्मपत्रनिभेक्षणः।

सर्वपुष्पमयीं दिव्यां शिरसा धारयन् स्रजम्॥१९॥

लाल रंग के फूलों की माला तथा लाल ही वस्त्र धारण किये थे। उसके नेत्र प्रफुल्ल कमलदल के समान सुन्दर थे। उसने सिर पर एक दिव्य पुष्पमाला धारण कर रखी थी, जो सब प्रकार के फूलों से बनायी गयी थी॥

जातरूपमयैश्चैव तपनीयविभूषणैः।

आत्मजानां च रत्नानां भूषितो भूषणोत्तमैः॥२०॥

सुवर्ण और तपे हुए काञ्चन के आभूषण उसकी शोभा बढ़ाते थे। वह अपने ही भीतर उत्पन्न हुए रत्नों के उत्तम आभूषणों से विभूषित था॥ २० ॥

धातुभिर्मण्डितः शैलो विविधैर्हिमवानिव।

एकावलीमध्यगतं तरलं पाण्डरप्रभम्॥२१॥

विपुलेनोरसा बिभ्रत्कौस्तुभस्य सहोदरम्।

इसीलिये नाना प्रकार के धातुओं से  अलंकृत हिमवान् पर्वत के समान शोभा पाता था। वह अपने विशाल वक्षःस्थल पर कौस्तुभ मणि के सहोदर (सदृश) एक श्वेत प्रभा से युक्त मुख्य रत्न धारण किये हुए था, जो मोतियों की इकहरी माला के मध्यभाग में प्रकाशित हो रहा था॥ २१ १/२॥

आघूर्णिततरङ्गौघः कालिकानिलसंकुलः॥२२॥

गङ्गासिन्धुप्रधानाभिरापगाभिः समावृतः।

चञ्चल तरङ्गे उसे घेरे हुए थीं। मेघमाला और वायु से वह व्याप्त था तथा गङ्गा और सिन्धु आदि नदियाँ उसे सब ओर से घेरकर खड़ी थीं॥ २२ १/२ ॥

उद्धर्तितमहाग्राहः सम्भ्रान्तोरगराक्षसः॥२३॥

देवतानां सुरूपाभिर्नानारूपाभिरीश्वरः।

सागरः समुपक्रम्य पूर्वमामन्त्र्य वीर्यवान्॥२४॥

अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यं राघवं शरपाणिनम्॥२५॥

उसके भीतर बड़े-बड़े ग्राह उद्भान्त हो रहे थे, नाग और राक्षस घबराये हुए थे। देवताओं के समान सुन्दर रूप धारण करके आयी हुई विभिन्न रूपवाली नदियों के साथ शक्तिशाली नदीपति समुद्र ने निकट आकर पहले धनुर्धर श्रीरघुनाथजी को सम्बोधित किया और फिर हाथ जोड़कर कहा- ॥ २३–२५ ॥

पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च राघव।

स्वभावे सौम्य तिष्ठन्ति शाश्वतं मार्गमाश्रिताः॥२६॥

‘सौम्य रघुनन्दन! पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और तेज—ये सर्वदा अपने स्वभाव में स्थित रहते हैं। अपने सनातन मार्ग को कभी नहीं छोड़ते—सदा उसी के आश्रित रहते हैं॥ २६॥

तत्स्वभावो ममाप्येष यदगाधोऽहमप्लवः।

विकारस्तु भवेद् गाध एतत् ते प्रवदाम्यहम्॥२७॥

‘मेरा भी यह स्वभाव ही है जो मैं अगाध और अथाह हूँ-कोई मेरे पार नहीं जा सकता। यदि मेरी थाह मिल जाय तो यह विकार—मेरे स्वभाव का व्यतिक्रम ही होगा। इसलिये मैं आपसे पार होने का यह उपाय बताता हूँ॥ २७॥

न कामान्न च लोभाद् वा न भयात् पार्थिवात्मज।

ग्राहनक्राकुलजलं स्तम्भयेयं कथंचन॥२८॥

‘राजकुमार! मैं मगर और नाक आदि से भरे हुए अपने जल को किसी कामना से, लोभ से अथवा भय से किसी तरह स्तम्भित नहीं होने दूंगा॥२८॥

विधास्ये येन गन्तासि विषहिष्येऽप्यहं तथा।

न ग्राहा विधमिष्यन्ति यावत्सेना तरिष्यति।

हरीणां तरणे राम करिष्यामि यथा स्थलम्॥२९॥

‘श्रीराम! मैं ऐसा उपाय बताऊँगा, जिससे आप मेरे पार चले जायँगे, ग्राह वानरों को कष्ट नहीं देंगे, सारी सेना पार उतर जायगी और मुझे भी खेद नहीं होगा। मैं आसानी से सब कुछ सह लूँगा। वानरों के पार जाने के लिये जिस प्रकार पुल बन जाय, वैसा प्रयत्न मैं करूँगा’॥ २९॥

तमब्रवीत् तदा रामः शृणु मे वरुणालय।

अमोघोऽयं महाबाणः कस्मिन् देशे निपात्यताम्॥३०॥

तब श्रीरामचन्द्रजी ने उससे कहा—’वरुणालय! मेरी बात सुनो। मेरा यह विशाल बाण अमोघ है। बताओ, इसे किस स्थान पर छोड़ा जाय’ ॥ ३० ॥

रामस्य वचनं श्रुत्वा तं च दृष्ट्वा महाशरम्।

महोदधिर्महातेजा राघवं वाक्यमब्रवीत्॥३१॥

श्रीरामचन्द्रजी का यह वचन सुनकर और उस महान् बाण को देखकर महातेजस्वी महासागर ने रघुनाथजी से कहा- ॥३१॥

उत्तरेणावकाशोऽस्ति कश्चित् पुण्यतरो मम।

द्रुमकुल्य इति ख्यातो लोके ख्यातो यथा भवान्॥३२॥

‘प्रभो! जैसे जगत् में आप सर्वत्र विख्यात एवं पुण्यात्मा हैं, उसी प्रकार मेरे उत्तर की ओर द्रुमकुल्य नाम से विख्यात एक बड़ा ही पवित्र देश है॥ ३२॥

उग्रदर्शनकर्माणो बहवस्तत्र दस्यवः।

आभीरप्रमुखाः पापाः पिबन्ति सलिलं मम॥३३॥

‘वहाँ आभीर आदि जातियों के बहुत-से मनुष्य निवास करते हैं, जिनके रूप और कर्म बड़े ही भयानक हैं। वे सब-के-सब पापी और लुटेरे हैं। वे लोग मेरा जल पीते हैं॥ ३३॥

तैर्न तत्स्पर्शनं पापं सहेयं पापकर्मभिः।

अमोघः क्रियतां राम अयं तत्र शरोत्तमः॥३४॥

‘उन पापाचारियों का स्पर्श मुझे प्राप्त होता रहता है, इस पाप को मैं नहीं सह सकता। श्रीराम! आप अपने इस उत्तम बाण को वहीं सफल कीजिये’॥ ३४॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा सागरस्य महात्मनः।

मुमोच तं शरं दीप्तं परं सागरदर्शनात्॥ ३५॥

महामना समुद्र का यह वचन सुनकर सागर के दिखाये अनुसार उसी देश में श्रीरामचन्द्रजी ने वह अत्यन्त प्रज्वलित बाण छोड़ दिया॥ ३५ ॥

तेन तन्मरुकान्तारं पृथिव्यां किल विश्रुतम्।

निपातितः शरो यत्र वज्राशनिसमप्रभः॥३६॥

वह वज्र और अशनि के समान तेजस्वी बाण जिस स्थान पर गिरा था, वह स्थान उस बाण के कारण ही पृथ्वी में दुर्गम मरुभूमि के नाम से प्रसिद्ध हुआ॥३६॥

ननाद च तदा तत्र वसुधा शल्यपीडिता।

तस्माद् व्रणमुखात् तोयमुत्पपात रसातलात्॥३७॥

उस बाण से पीड़ित होकर उस समय वसुधा आर्तनाद कर उठी। उसकी चोट से जो छेद हुआ, उसमें होकर रसातल का जल ऊपर को उछलने लगा। ३७॥

स बभूव तदा कूपो व्रण इत्येव विश्रुतः।

सततं चोत्थितं तोयं समुद्रस्येव दृश्यते॥३८॥

वह छिद्र कुएँ के समान हो गया और व्रण के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उस कुएँ से सदा निकलता हुआ जल समुद्र के जल की भाँति ही दिखायी देता है॥ ३८॥

अवदारणशब्दश्च दारुणः समपद्यत।

तस्मात् तद् बाणपातेन अपः कुक्षिष्वशोषयत्॥३९॥

उस समय वहाँ भूमि के विदीर्ण होने का भयंकर शब्द सुनायी पड़ा। उस बाण को गिराकर वहाँ के भूतल की कुक्षि में (तालाब-पोखरे आदि में) वर्तमान जल को श्रीराम ने सुखा दिया॥ ३९॥

विख्यातं त्रिषु लोकेषु मरुकान्तारमेव च।

शोषयित्वा तु तं कुक्षिं रामो दशरथात्मजः॥४०॥

वरं तस्मै ददौ विद्वान् मरवेऽमरविक्रमः॥४१॥

तबसे वह स्थान तीनों लोकों में मरुकान्तार के नाम से  ही विख्यात हो गया। जो पहले समुद्र का कुक्षिप्रदेश था, उसे सुखाकर देवोपम पराक्रमी विद्वान् दशरथनन्दन श्रीराम ने उस मरुभूमि को वरदान दिया॥ ४०-४१॥

पशव्यश्चाल्परोगश्च फलमूलरसायुतः।

बहुस्नेहो बहुक्षीरः सुगन्धिर्विविधौषधिः॥४२॥

‘यह मरुभूमि पशुओं के लिये हितकारी होगी। यहाँ रोग कम होंगे। यह भूमि फल, मूल और रसों से सम्पन्न होगी। यहाँ घी आदि चिकने पदार्थ अधिक सुलभ होंगे, दूध की भी बहुतायत होगी। यहाँ सुगन्ध छायी रहेगी और अनेक प्रकार की ओषधियाँ उत्पन्न होंगी’॥ ४२॥

एवमेतैश्च संयुक्तो बहुभिः संयुतो मरुः।

रामस्य वरदानाच्च शिवः पन्था बभूव ह॥४३॥

इस प्रकार भगवान् श्रीराम के वरदान से वह मरुप्रदेश इस तरह के बहुसंख्यक गुणों से सम्पन्न हो सबके लिये मङ्गलकारी मार्ग बन गया॥४३॥

तस्मिन् दग्धे तदा कुक्षौ समुद्रः सरितां पतिः।

राघवं सर्वशास्त्रज्ञमिदं वचनमब्रवीत्॥४४॥

उस कुक्षिस्थान के दग्ध हो जाने पर सरिताओं के स्वामी समुद्र ने सम्पूर्ण शास्त्रों के ज्ञाता श्रीरघुनाथजी से कहा— ॥४४॥

अयं सौम्य नलो नाम तनयो विश्वकर्मणः।

पित्रा दत्तवरः श्रीमान् प्रीतिमान् विश्वकर्मणः॥४५॥

‘सौम्य! आपकी सेना में जो यह नल नामक कान्तिमान् वानर है, साक्षात् विश्वकर्मा का पुत्र है। इसे इसके पिता ने यह वर दिया है कि ‘तुम मेरे ही समान समस्त शिल्पकला में निपुण हो ओगे।’ प्रभो! आप भी तो इस विश्व के स्रष्टा विश्वकर्मा हैं। इस नल के हृदय में आपके प्रति बड़ा प्रेम है॥ ४५ ॥

एष सेतुं महोत्साहः करोतु मयि वानरः।

तमहं धारयिष्यामि यथा ह्येष पिता तथा॥४६॥

‘यह महान् उत्साही वानर अपने पिता के समान ही शिल्पकर्म में समर्थ है, अतः यह मेरे ऊपर पुल का निर्माण करे। मैं उस पुल को धारण करूँगा’॥ ४६॥

एवमुक्त्वोदधिनष्टः समुत्थाय नलस्ततः।

अब्रवीद् वानरश्रेष्ठो वाक्यं रामं महाबलम्॥४७॥

यों कहकर समुद्र अदृश्य हो गया। तब वानरश्रेष्ठ नल उठकर महाबली भगवान् श्रीराम से बोला—॥ ४७॥

अहं सेतुं करिष्यामि विस्तीर्णे मकरालये।

पितुः सामर्थ्यमासाद्य तत्त्वमाह महोदधिः॥४८॥

‘प्रभो! मैं पिता की दी हुई शक्ति को पाकर इस विस्तृत समुद्रपर सेतु का निर्माण करूँगा। महासागर ने ठीक कहा है॥४८॥

दण्ड एव वरो लोके पुरुषस्येति मे मतिः।

धिक् क्षमामकृतज्ञेषु सान्त्वं दानमथापि वा॥ ४९॥

‘संसार में पुरुष के लिये अकृतज्ञों के प्रति दण्डनीति का प्रयोग ही सबसे बड़ा अर्थसाधक है, ऐसा मेरा विश्वास है। वैसे लोगों के प्रति क्षमा, सान्त्वना और दाननीति के प्रयोग को धिक्कार है॥४९॥

अयं हि सागरो भीमः सेतुकर्मदिदृक्षया।

ददौ दण्डभयाद् गाधं राघवाय महोदधिः॥५०॥

‘इस भयानक समुद्र को राजा सगर के पुत्रों ने ही बढ़ाया है। फिर भी इसने कृतज्ञता से नहीं, दण्ड के भय से ही सेतुकर्म देखने की इच्छा मन में लाकर श्रीरघुनाथजी को अपनी थाह दी है।॥ ५० ॥

मम मातुर्वरो दत्तो मन्दरे विश्वकर्मणा।

मया तु सदृशः पुत्रस्तव देवि भविष्यति॥५१॥

‘मन्दराचलपर विश्वकर्माजी ने मेरी माता को यह वर दिया था कि ‘देवि! तुम्हारे गर्भ से मेरे ही समान पुत्र होगा’। ५१॥

औरसस्तस्य पुत्रोऽहं सदृशो विश्वकर्मणा।

स्मारितोऽस्म्यहमेतेन तत्त्वमाह महोदधिः।

न चाप्यहमनुक्तो वः प्रब्रूयामात्मनो गुणान्॥५२॥

‘इस प्रकार मैं विश्वकर्मा का औरस पुत्र हूँ और शिल्पकर्म में उन्हीं के समान हूँ। इस समुद्र ने आज मुझे इन सब बातों का स्मरण दिला दिया है। महासागर ने जो कुछ कहा है, ठीक है। मैं बिना पूछे आपलोगों से अपने गुणों को नहीं बता सकता था, इसीलिये अबतक चुप था॥५२॥

समर्थश्चाप्यहं सेतुं कर्तुं वै वरुणालये।

तस्मादद्यैव बध्नन्तु सेतुं वानरपुङ्गवाः॥५३॥

‘मैं महासागर पर पुल बाँधने में समर्थ हूँ, अतः सब वानर आज ही पुल बाँधने का कार्य आरम्भ कर दें।

ततो विसृष्टा रामेण सर्वतो हरिपुङ्गवाः।

उत्पेततुर्महारण्यं हृष्टाः शतसहस्रशः॥५४॥

तब भगवान् श्रीराम के भेजने से लाखों बड़े-बड़े वानर हर्ष और उत्साह में भरकर सब ओर उछलते हुए गये और बड़े-बड़े जंगलों में घुस गये॥ ५४॥

ते नगान् नगसंकाशाः शाखामृगगणर्षभाः।

बभञ्जः पादपांस्तत्र प्रचकर्षुश्च सागरम्॥५५॥

वे पर्वत के समान विशालकाय वानरशिरोमणि पर्वतशिखरों और वृक्षों को तोड़ देते और उन्हें समुद्र तक खींच लाते थे॥ ५५॥

ते सालैश्चाश्वकर्णैश्च धवैर्वंशैश्च वानराः।

कुटजैरर्जुनैस्तालैस्तिलकैस्तिनिशैरपि॥५६॥

बिल्वकैः सप्तपर्णैश्च कर्णिकारैश्च पुष्पितैः।

चूतैश्चाशोकवृक्षैश्च सागरं समपूरयन्॥५७॥

वे साल, अश्वकर्ण, धव, बाँस, कुटज, अर्जुन, ताल, तिलक, तिनिश, बेल, छितवन, खिले हुए कनेर, आम और अशोक आदि वृक्षों से समुद्र को पाटने लगे॥ ५६-५७॥

समूलांश्च विमूलांश्च पादपान् हरिसत्तमाः।

इन्द्रकेतूनिवोद्यम्य प्रजह्वानरास्तरून्॥५८॥

वे श्रेष्ठ वानर वहाँ के वृक्षों को जड़ से उखाड़ लाते या जड़ के ऊपर से भी तोड़ लाते थे। इन्द्रध्वज के समान ऊँचे-ऊँचे वृक्षों को उठाये लिये चले आते थे। ५८॥

तालान् दाडिमगुल्मांश्च नारिकेलविभीतकान्।

करीरान् बकुलान् निम्बान् समाजलुरितस्ततः॥

ताड़ों, अनार की झाड़ियों, नारियल और बहेड़े के वृक्षों, करीर, बकुल तथा नीम को भी इधर-उधर से तोड़-तोड़कर लाने लगे॥ ५९॥

हस्तिमात्रान् महाकायाः पाषाणांश्च महाबलाः।

पर्वतांश्च समुत्पाट्य यन्त्रैः परिवहन्ति च॥६०॥

महाकाय महाबली वानर हाथी के समान बड़ी-बड़ी शिलाओं और पर्वतों को उखाड़कर यन्त्रों (विभिन्न साधनों) द्वारा समुद्रतट पर ले आते थे॥६०॥

प्रक्षिप्यमाणैरचलैः सहसा जलमुद्धृतम्।

समुत्ससर्प चाकाशमवासर्पत् ततः पुनः॥६१॥

शिलाखण्डों को फेंकने से समुद्र का जल सहसा आकाश में उठ जाता और फिर वहाँ से नीचे को गिर जाता था॥ ६१॥

समुद्रं क्षोभयामासुर्निपतन्तः समन्ततः।

सूत्राण्यन्ये प्रगृह्णन्ति ह्यायतं शतयोजनम्॥६२॥

उन वानरों ने सब ओर पत्थर गिराकर समुद्र में हलचल मचा दी। कुछ दूसरे वानर सौ योजन लंबा सूत पकड़े हुए थे॥ ६२॥

नलश्चक्रे महासेतुं मध्ये नदनदीपतेः।

स तदा क्रियते सेतुर्वानोरकर्मभिः॥६३॥

नल नदों और नदियों के स्वामी समुद्र के बीचमें महान् सेतु का निर्माण कर रहे थे। भयंकर कर्म करने वाले वानरों ने  मिल-जुलकर उस समय सेतुनिर्माण का कार्य आरम्भ किया था॥ ६३॥

दण्डानन्ये प्रगृह्णन्ति विचिन्वन्ति तथापरे।

वानरैः शतशस्तत्र रामस्याज्ञापुरःसरैः॥६४॥

मेघाभैः पर्वताभैश्च तृणैः काष्ठैर्बबन्धिरे।

पुष्पिताग्रैश्च तरुभिः सेतुं बघ्नन्ति वानराः॥६५॥

कोई नापने के लिये दण्ड पकड़ते थे तो कोई सामग्री जुटाते थे। श्रीरामचन्द्रजी की आज्ञा शिरोधार्य करके सैकड़ों वानर जो पर्वतों और मेघों के समान प्रतीत होते थे, वहाँ तिनकों और काष्ठों द्वारा भिन्नभिन्न स्थानों में पुल बाँध रहे थे। जिनके अग्रभाग फूलों से लदे थे, ऐसे वृक्षों द्वारा भी वे वानर सेतु बाँधते थे॥६४-६५॥

पाषाणांश्च गिरिप्रख्यान् गिरीणां शिखराणि च।

दृश्यन्ते परिधावन्तो गृह्य दानवसंनिभाः॥६६॥

पर्वतों-जैसी बड़ी-बड़ी चट्टानें और पर्वत-शिखर लेकर सब ओर दौड़ते वानर दानवों के समान दिखायी देते थे॥

शिलानां क्षिप्यमाणानां शैलानां तत्र पात्यताम्।

बभूव तुमुलः शब्दस्तदा तस्मिन् महोदधौ॥६७॥

उस समय उस महासागरमें फेंकी जाती हुई शिलाओं और गिराये जाते हुए पहाड़ों के गिरने से बड़ा भीषण शब्द हो रहा था॥ ६७॥

कृतानि प्रथमेनाना योजनानि चतुर्दश।

प्रहृष्टैर्गजसंकाशैस्त्वरमाणैः प्लवङ्गमैः॥ ६८॥

हाथी के समान विशालकाय वानर बड़े उत्साह और तेजी के साथ काम में लगे हुए थे। पहले दिन उन्होंने चौदह योजन लंबा पुल बाँधा॥ ६८॥

द्वितीयेन तथैवाह्ना योजनानि तु विंशतिः।

कृतानि प्लवगैस्तूर्णं भीमकायैर्महाबलैः॥६९॥

फिर दूसरे दिन भयंकर शरीरवाले महाबली वानरों ने तेजी से काम करके बीस योजन लंबा पुल बाँध दिया॥ ६९॥

अह्ना तृतीयेन तथा योजनानि तु सागरे।

त्वरमाणैर्महाकायैरेकविंशतिरेव च॥७०॥

तीसरे दिन शीघ्रतापूर्वक काम में जुटे हुए महाकाय कपियों ने समुद्र में इक्कीस योजन लंबा पुल बाँध दिया॥

चतुर्थेन तथा चाह्ना द्वाविंशतिरथापि वा।

योजनानि महावेगैः कृतानि त्वरितैस्ततः॥७१॥

चौथे दिन महान् वेगशाली और शीघ्रकारी वानरों ने बाईस योजन लंबा पुल और बाँध दिया॥७१॥

पञ्चमेन तथा चाला प्लवगैः क्षिप्रकारिभिः।

योजनानि त्रयोविंशत् सुवेलमधिकृत्य वै॥७२॥

तथा पाँचवें दिन शीघ्रता करने वाले उन वानरवीरों ने सुवेल पर्वत के निकट तक तेईस योजन लंबा पुल बाँधा॥

स वानरवरः श्रीमान् विश्वकर्मात्मजो बली।

बबन्ध सागरे सेतुं यथा चास्य पिता तथा॥७३॥

इस प्रकार विश्वकर्मा के बलवान् पुत्र कान्तिमान् कपिश्रेष्ठ नल ने समुद्र में सौ योजन लंबा पुल तैयार कर दिया। इस कार्य में वे अपने पिता के समान ही प्रतिभाशाली थे॥७३॥

स नलेन कृतः सेतुः सागरे मकरालये।

शुशुभे सुभगः श्रीमान् स्वातीपथ इवाम्बरे॥७४॥

मकरालय समुद्र में नल के द्वारा निर्मित हुआ वह सुन्दर और शोभाशाली सेतु आकाश में स्वातीपथ (छायापथ)-के समान सुशोभित होता था॥ ७४॥

ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः।

आगम्य गगने तस्थुर्द्रष्टुकामास्तदद्भुतम्॥७५॥

उस समय देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षि उस अद्भुत कार्य को देखने के लिये आकाश में आकर खड़े थे॥

दशयोजनविस्तीर्णं शतयोजनमायतम्।

ददृशुर्देवगन्धर्वा नलसेतुं सुदुष्करम्॥७६ ॥

नलके बनाये हुए सौ योजन लंबे और दस योजन चौड़े उस पुलको देवताओं और गन्धर्वोने देखा, जिसे बनाना बहुत ही कठिन काम था॥ ७६॥

आप्लवन्तः प्लवन्तश्च गर्जन्तश्च प्लवंगमाः।

तमचिन्त्यमसह्यं च ह्यद्भुतं लोमहर्षणम्॥७७॥

ददृशुः सर्वभूतानि सागरे सेतुबन्धनम्।

वानरलोग भी इधर-उधर उछल-कूदकर गर्जना करते हुए उस अचिन्त्य, असह्य, अद्भुत और रोमाञ्चकारी पुल को देख रहे थे। समस्त प्राणियों ने ही समुद्र में सेतु बाँधने का वह कार्य देखा॥ ७७ १/२ ।।

तानि कोटिसहस्राणि वानराणां महौजसाम्॥७८॥

बध्नन्तः सागरे सेतुं जग्मुः पारं महोदधेः।

इस प्रकार उन सहस्र कोटि (एक खरब) महाबली एवं उत्साही वानरों का दल पुल बाँधते बाँधते ही समुद्र के उस पार पहुँच गया॥ ७८ १/२॥

विशालः सुकृतः श्रीमान् सुभूमिः सुसमाहितः॥७९॥

अशोभत महान् सेतुः सीमन्त इव सागरे।

वह पुल बड़ा ही विशाल, सुन्दरता से बनाया हुआ, शोभासम्पन्न, समतल और सुसम्बद्ध था। वह महान् सेतु सागर में सीमन्त के समान शोभा पाता था॥ ७९ १/२॥

ततः पारे समुद्रस्य गदापाणिर्विभीषणः॥८०॥

परेषामभिघातार्थमतिष्ठत् सचिवैः सह।

पुल तैयार हो जाने पर अपने सचिवों के साथ विभीषण गदा हाथ में लेकर समुद्र के दूसरे तट पर खड़े हो गये, जिससे शत्रुपक्षीय राक्षस यदि पुल तोड़ने के लिये आवे तो उन्हें दण्ड दिया जा सके। ८० १/२॥

सुग्रीवस्तु ततः प्राह रामं सत्यपराक्रमम्॥८१॥

हनूमन्तं त्वमारोह अङ्गदं त्वथ लक्ष्मणः।

अयं हि विपुलो वीर सागरो मकरालयः॥८२॥

वैहायसौ युवामेतौ वानरौ धारयिष्यतः।

तदनन्तर सुग्रीव ने सत्यपराक्रमी श्रीराम से कहा – वीरवर! आप हनुमान् के कंधे पर चढ़ जाइये और लक्ष्मण अङ्गद की पीठ पर सवार हो लें; क्योंकि यह मकरालय समुद्र बहुत लंबा-चौड़ा है। ये दोनों वानर आकाश-मार्ग से चलने वाले हैं। अतः ये ही दोनों आप दोनों भाइयों को धारण कर सकेंगे’।। ८१-८२ १/२ ॥

अग्रतस्तस्य सैन्यस्य श्रीमान् रामः सलक्ष्मणः॥८३॥

जगाम धन्वी धर्मात्मा सुग्रीवेण समन्वितः।

इस प्रकार धनुर्धर एवं धर्मात्मा भगवान् श्रीराम लक्ष्मण और सुग्रीव के साथ उस सेना के आगे-आगे चले॥

अन्ये मध्येन गच्छन्ति पार्श्वतोऽन्ये प्लवंगमाः॥८४॥

सलिलं प्रपतन्त्यन्ये मार्गमन्ये प्रपेदिरे।

केचिद् वैहायसगताः सुपर्णा इव पुप्लुवुः ॥ ८५॥

दूसरे वानर सेना के बीच में और अगल-बगल में होकर चलने लगे। कितने ही वानर जल में कूद पड़ते और तैरते हुए चलते थे। दूसरे पुल का मार्ग पकड़कर जाते थे और कितने ही आकाश में उछलकर गरुड़ के समान उड़ते थे॥ ८४-८५॥

घोषेण महता घोषं सागरस्य समुच्छ्रितम्।

भीममन्तर्दधे भीमा तरन्ती हरिवाहिनी॥८६॥

इस प्रकार पार जाती हुई उस भयंकर वानर-सेना ने अपने महान् घोष से समुद्रकी बढ़ी हुई भीषण गर्जना को भी दबा दिया॥ ८६ ॥

वानराणां हि सा तीर्णा वाहिनी नलसेतुना।

तीरे निविविशे राज्ञो बहुमूलफलोदके॥ ८७॥

धीरे-धीरे वानरों की सारी सेना नल के बनाये हुए पुल से समुद्र के उस पार पहुँच गयी। राजा सुग्रीव ने फल, मूल और जल की अधिकता देख सागर के तट पर ही सेना का पड़ाव डाला॥ ८७॥

तदद्भुतं राघवकर्म दुष्करं समीक्ष्य देवाः सह सिद्धचारणैः।

उपेत्य रामं सहसा महर्षिभिस्तमभ्यषिञ्चन् सुशुभै लैः पृथक्॥८८॥

भगवान् श्रीराम का वह अद्भुत और दुष्कर कर्म देखकर सिद्ध, चारण और महर्षियों के साथ देवतालोग उनके पास आये तथा उन्होंने अलग अलग पवित्र एवं शुभ जल से उनका अभिषेक किया॥ ८८॥

जयस्व शत्रून् नरदेव मेदिनी ससागरां पालय शाश्वतीः समाः।

इतीव रामं नरदेवसत्कृतं शुभैर्वचोभिर्विविधैरपूजयन्॥८९॥

फिर बोले-‘नरदेव! तुम शत्रुओं पर विजय प्राप्त करो और समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वी का सदा पालन करते रहो।’ इस प्रकार भाँति-भाँति के मङ्गलसूचक वचनों द्वारा राजसम्मानित श्रीराम का उन्होंने अभिवादन किया॥ ८९॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे द्वाविंशः सर्गः ॥२२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में बाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥२२॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
युद्धकाण्डम्

श्रीराम का लक्ष्मण से उत्पातसूचक लक्षणों का वर्णन और लङ्का पर आक्रमण

त्रयोविंशः सर्गः

सर्ग-23

निमित्तानि निमित्तज्ञो दृष्ट्वा लक्ष्मणपूर्वजः।

सौमित्रिं सम्परिष्वज्य इदं वचनमब्रवीत्॥१॥

उत्पातसूचक लक्षणों के ज्ञाता तथा लक्ष्मण के बड़े भाई श्रीराम ने बहुत-से अपशकुन देखकर सुमित्राकुमार लक्ष्मण को हृदय से लगाया और इस प्रकार कहा

परिगृह्योदकं शीतं वनानि फलवन्ति च।

बलौघं संविभज्येमं व्यूह्य तिष्ठेम लक्ष्मण॥२॥

‘लक्ष्मण! जहाँ शीतल जल की सुविधा हो और फलों से भरे हुए जंगल हों, उन स्थानों का आश्रय लेकर हम अपने सैन्यसमूह को कई भागों में बाँट दें और इसे व्यूहबद्ध करके इसकी रक्षा के लिये सदा सावधान रहें।

लोकक्षयकरं भीमं भयं पश्याम्युपस्थितम्।

प्रबर्हणं प्रवीराणामृक्षवानररक्षसाम्॥३॥

‘मैं देखता हूँ समस्त लोकों का संहार करने वाला भीषण भय उपस्थित हुआ है, जो रीछों, वानरों और राक्षसों के प्रमुख वीरों के विनाश का सूचक है॥३॥

वाताश्च कलुषा वान्ति कम्पते च वसुंधरा।

पर्वताग्राणि वेपन्ते पतन्ति च महीरुहाः॥४॥

‘धूल से भरी हुई प्रचण्ड वायु चल रही है। धरती काँपती है पर्वतों के शिखर हिल रहे हैं और पेड़ गिर रहे हैं॥४॥

मेघाः क्रव्यादसंकाशाः परुषाः परुषस्वनाः।

क्रूराः क्रूरं प्रवर्षन्ति मिश्रं शोणितबिन्दभिः॥५॥

‘मेघों की घटा घिर आयी है, जो मांसभक्षी राक्षसों के समान दिखायी देती है। वे मेघ देखने में तोक्रूर हैं ही, इनकी गर्जना भी बड़ी कठोर है। ये क्रूरतापूर्वक रक्त की बूंदों से मिले हुए जल की वर्षा करते हैं ॥५॥

रक्तचन्दनसंकाशा संध्या परमदारुणा।

ज्वलतः प्रपतत्येतदादित्यादग्निमण्डलम्॥६॥

‘यह संध्या लाल चन्दन के समान कान्ति धारण करके बड़ी भयंकर दिखायी देती है। प्रज्वलित सूर्य से ये आग की ज्वालाएँ टूट-टूटकर गिर रही हैं॥ ६॥

दीना दीनस्वराः क्रूराः सर्वतो मृगपक्षिणः।

प्रत्यादित्यं विनर्दन्ति जनयन्तो महद्भयम्॥७॥

‘क्रूर पशु और पक्षी दीन आकार धारण कर सूर्य की ओर मुँह करके दीनतापूर्ण स्वर में चीत्कार करते हुए महान् भय उत्पन्न कर रहे हैं।॥ ७॥

रजन्यामप्रकाशस्तु संतापयति चन्द्रमाः।

कृष्णरक्तांशुपर्यन्तो लोकक्षय इवोदितः॥८॥

रात में भी चन्द्रमा पूर्णतः प्रकाशित नहीं होते और अपने स्वभाव के विपरीत ताप दे रहे हैं। ये काली और लाल किरणों से व्याप्त हो इस तरह उदित हुए हैं, मानो जगत् के प्रलय का काल आ पहुँचा हो॥ ८॥

ह्रस्वो रूक्षोऽप्रशस्तश्च परिवेषस्तु लोहितः।

आदित्ये विमले नीलं लक्ष्म लक्ष्मण दृश्यते॥९॥

‘लक्ष्मण! निर्मल सूर्यमण्डल में नीला चिह्न दिखायी देता है। सूर्य के चारों ओर ऐसा घेरा पड़ा है, जो छोटा, रूखा, अशुभ तथा लाल है॥९॥

रजसा महता चापि नक्षत्राणि हतानि च।

युगान्तमिव लोकानां पश्य शंसन्ति लक्ष्मण॥१०॥

‘सुमित्रानन्दन ! देखो ये तारे बड़ी भारी धूलिराशि से आच्छादित हो हतप्रभ हो गये हैं, अतएव जगत् के भावी संहार की सूचना दे रहे हैं॥ १० ॥

काकाः श्येनास्तथा नीचा गृध्राः परिपतन्ति च।

शिवाश्चाप्यशुभान् नादान् नदन्ति सुमहाभयान्॥११॥

‘कौए, बाज तथा अधम गीध चारों ओर उड़ रहे हैं और सियारिनें अशुभसूचक महाभयंकर बोली बोल रही हैं॥ ११॥

शैलैः शूलैश्च खड्गैश्च विमुक्तैः कपिराक्षसैः।

भविष्यत्यावृता भूमिमा॑सशोणितकर्दमा॥१२॥

‘जान पड़ता है वानरों और राक्षसों के चलाये हुए शिलाखण्डों, शूलों और तलवारों से यह सारी भूमि पट जायगी तथा यहाँ मांस और रक्त की कीच जम जायगी॥

क्षिप्रमद्यैव दुर्धर्षां पुरीं रावणपालिताम्।

अभियाम जवेनैव सर्वैर्हरिभिरावृताः॥१३॥

‘हमलोग आज ही जितनी जल्दी हो सके, इस रावणपालित दुर्जय नगरी लङ्का पर समस्त वानरों के साथ वेगपूर्वक धावा बोल दें’॥ १३॥

इत्येवमुक्त्वा धन्वी स रामः संग्रामधर्षणः।

प्रतस्थे पुरतो रामो लङ्कामभिमुखो विभुः॥१४॥

ऐसा कहकर संग्रामविजयी भगवान् श्रीराम हाथ में धनुष लिये सबसे आगे लङ्कापुरी की ओर प्रस्थित हुए॥१४॥

सविभीषणसुग्रीवाः सर्वे ते वानरर्षभाः।

प्रतस्थिरे विनर्दन्तो धृतानां द्विषतां वधे॥१५॥

फिर विभीषण और सुग्रीव के साथ वे सभी श्रेष्ठ वानर गर्जना करते हुए युद्ध का ही निश्चय रखने वाले शत्रुओं का वध करने के लिये आगे बढ़े॥ १५ ॥

राघवस्य प्रियार्थं तु सुतरां वीर्यशालिनाम्।

हरीणां कर्मचेष्टाभिस्तुतोष रघुनन्दनः॥१६॥

वे सब-के-सब रघुनाथजी का प्रिय करना चाहते थे। उन बलशाली वानरों के कर्मों और चेष्टाओं से रघुकुलनन्दन श्रीराम को बड़ा संतोष हुआ॥ १६॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे त्रयोविंशः सर्गः ॥२३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में तेईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥२३॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
युद्धकाण्डम्

श्रीराम का लक्ष्मण से लङ्का की शोभा का वर्णन कर सेना को व्यूहबद्ध करना, रावण का अपने बल की डींग हाँकना

चतुर्विंशः सर्गः

सर्ग-24

सा वीरसमिती राज्ञा विरराज व्यवस्थिता।

शशिना शुभनक्षत्रा पौर्णमासीव शारदी॥१॥

सुग्रीव ने उस वीर वानरसेना की यथोचित व्यवस्था की थी। उनके कारण वह वैसी ही शोभा पाती थी, जैसे चन्द्रमा और शुभ नक्षत्रों से युक्त शरत्काल की पूर्णिमा सुशोभित हो रही हो॥१॥

प्रचचाल च वेगेन त्रस्ता चैव वसुंधरा।

पीड्यमाना बलौघेन तेन सागरवर्चसा॥२॥

हाकना वह विशाल सैन्य-समूह समुद्र के समान जान पड़ता था। उसके भार से दबी हुई वसुधा भयभीत हो उठी और उसके वेग से डोलने लगी॥२॥

ततः शुश्रुवुराक्रुष्टं लङ्कायां काननौकसः।

भेरीमृदङ्गसंघुष्टं तुमुलं लोमहर्षणम्॥३॥

तदनन्तर वानरों ने लङ्का में महान् कोलाहल सुना, जो भेरी और मृदङ्ग के गम्भीर घोष से मिलकर बड़ा ही भयंकर और रोमाञ्चकारी जान पड़ता था॥३॥

बभूवुस्तेन घोषेण संहृष्टा हरियूथपाः।

अमृष्यमाणास्तद् घोषं विनेदुर्घोषवत्तरम्॥४॥

उस तुमुलनाद को सुनकर वानरयूथपति हर्ष और उत्साह में भर गये और उसे न सह सकने के कारण उससे भी बढ़कर जोर-जोर से गर्जना करने लगे॥४॥

राक्षसास्तत् प्लवंगानां शुश्रुवुस्तेऽपि गर्जितम्।

नर्दतामिव दृप्तानां मेघानामम्बरे स्वनम्॥५॥

राक्षसों ने वानरों की वह गर्जना सुनी, जो दर्प में भरकर सिंहनाद कर रहे थे। उनकी आवाज आकाश में मेघों की गर्जना के समान जान पड़ती थी॥

दृष्ट्वा दाशरथिर्लङ्कां चित्रध्वजपताकिनीम्।

जगाम मनसा सीतां दूयमानेन चेतसा॥६॥

दशरथनन्दन श्रीराम ने विचित्र ध्वजा-पताकाओं से सुशोभित लङ्कापुरी को देखकर व्यथितचित्त से मन-हीमन सीता का स्मरण किया॥६॥

अत्र सा मृगशावाक्षी रावणेनोपरुध्यते।

अभिभूता ग्रहेणेव लोहिताङ्गेन रोहिणी॥७॥

वे भीतर-ही-भीतर कहने लगे—’हाय! यहीं वह मृगलोचना सीता रावण की कैद में पड़ी है। उसकी दशा मंगलग्रह से आक्रान्त हुई रोहिणी के समान हो रही है’॥ ७॥

दीर्घमुष्णं च निःश्वस्य समुद्रीक्ष्य च लक्ष्मणम्।

उवाच वचनं वीरस्तत्कालहितमात्मनः॥८॥

मन-ही-मन ऐसा कहकर वीर श्रीराम गरम-गरम लंबी साँस खींचकर लक्ष्मण की ओर देखते हुए अपने लिये समयानुकूल हितकर वचन बोले- ॥ ८॥

आलिखन्तीमिवाकाशमुत्थितां पश्य लक्ष्मण।

मनसेव कृतां लङ्कां नगाग्रे विश्वकर्मणा॥९॥

‘लक्ष्मण! इस लङ्का की ओर तो देखो। यह अपनी ऊँचाई से आकाश में रेखा खींचती हुई-सी जान पड़ती है। जान पड़ता है पूर्वकाल में विश्वकर्मा ने अपने मन से ही इस पर्वत-शिखर पर लङ्कापुरी का निर्माण किया है॥९॥

विमानैर्बहुभिर्लङ्का संकीर्णा रचिता पुरा।

विष्णोः पदमिवाकाशं छादितं पाण्डुभिर्घनैः॥१०॥

‘पूर्वकाल में यह पुरी अनेक सतमंज ले मकानों से भरी-पूरी बनायी गयी थी। इसके श्वेत एवं सघन विमानाकार भवनों से भगवान् विष्णु के चरणस्थापन का स्थानभूत आकाश आच्छादित-सा हो गया॥१०॥

पुष्पितैः शोभिता लङ्का वनैश्चित्ररथोपमैः।

नानापतगसंघुष्टफलपुष्पोपगैः शुभैः॥११॥

‘फूलों से भरे हुए चैत्ररथ वन के सदृश सुन्दर काननों से लङ्कापुरी सुशोभित हो रही है। उन काननों में नाना प्रकार के पक्षी कलरव कर रहे हैं तथा फलों और फूलों की प्राप्ति कराने के कारण वे बड़े सुन्दर जान पड़ते हैं॥ ११॥

पश्य मत्तविहंगानि प्रलीनभ्रमराणि च।

कोकिलाकुलखण्डानि दोधवीति शिवोऽनिलः॥१२॥

‘देखो, यह शीतल सुखद वायु इन वनों को, जिनमें मतवाले पक्षी चहचहा रहे हैं, भौरे पत्तों और फूलों में लीन हो रहे हैं तथा जिनके प्रत्येक खण्ड कोकिलों के समूह एवं संगीतसे व्याप्त हैं, बारंबार कम्पित कर रहा है’।

इति दाशरथी रामो लक्ष्मणं समभाषत।

बलं च तत्र विभजच्छास्त्रदृष्टेन कर्मणा॥१३॥

दशरथनन्दन भगवान् श्रीराम ने लक्ष्मण से ऐसा कहा और युद्ध के शास्त्रीय नियमानुसार सेना का विभाग किया॥१३॥

शशास कपिसेनां तां बलादादाय वीर्यवान्।

अङ्गदः सह नीलेन तिष्ठेदुरसि दुर्जयः॥१४॥

उस समय श्रीराम ने वानरसैनिकों को यह आदेश दिया—’इस विशाल सेना में से अपनी सेना को साथ लेकर दुर्जय एवं पराक्रमी वीर अङ्गद नील के साथ वानरसेना के पुरुषव्यूह में हृदय के स्थान में स्थित हो॥ १४॥

तिष्ठेद् वानरवाहिन्या वानरौघसमावृतः।

आश्रितो दक्षिणं पार्श्वमृषभो नाम वानरः॥१५॥

‘इसी तरह ऋषभ नामक वानर कपियों के समुदाय से घिरे रहकर इस वानरवाहिनी के दाहिने पार्श्व में खड़े रहें॥ १५॥

गन्धहस्तीव दुर्धर्षस्तरस्वी गन्धमादनः।

तिष्ठेद् वानरवाहिन्याः सव्यं पार्श्वमधिष्ठितः॥१६॥

‘जो गन्धहस्ती के समान दुर्जय एवं वेगशाली हैं, वे कपिश्रेष्ठ गन्धमादन वानरवाहिनी के वाम पार्श्व में खड़े हों॥१६॥

मूर्ध्नि स्थास्याम्यहं यत्तो लक्ष्मणेन समन्वितः।

जाम्बवांश्च सुषेणश्च वेगदर्शी च वानरः ॥१७॥

ऋक्षमुख्या महात्मानः कुक्षिं रक्षन्तु ते त्रयः।

‘मैं लक्ष्मण के साथ सावधान रहकर इस व्यूह के मस्तक के स्थान में खड़ा होऊँगा। जाम्बवान्, सुषेण और वानर वेगदर्शी—ये तीन महामनस्वी वीर जो रीछों की सेना के प्रधान हैं, वे सैन्यव्यूह के कुक्षिभाग की रक्षा करें।

जघनं कपिसेनायाः कपिराजोऽभिरक्षतु।

पश्चार्धमिव लोकस्य प्रचेतास्तेजसा वृतः॥१८॥

‘वानरराज सुग्रीव वानरवाहिनी के पिछले भाग की रक्षा में उसी प्रकार लगे रहें, जैसे तेजस्वी वरुण इस जगत् की पश्चिम दिशा का संरक्षण करते हैं’ ॥ १८ ॥

सुविभक्तमहाव्यूहा महावानररक्षिता।

अनीकिनी सा विबभौ यथा द्यौः साभ्रसम्लवा॥१९॥

इस प्रकार सुन्दरता से विभक्त हो विशाल व्यूह में बद्ध हुई वह सेना, जिसकी बड़े-बड़े वानर रक्षा करते थे, मेघों से घिरे हुए आकाश के समान जान पड़ती थी॥

प्रगृह्य गिरिशृङ्गाणि महतश्च महीरुहान्।

आसेदुर्वानरा लङ्कां मिमर्दयिषवो रणे॥२०॥

वानरलोग पर्वतों के शिखर और बड़े-बड़े वृक्ष लेकर युद्ध के लिये लङ्का पर चढ़ आये। वे उस पुरी को पददलित करके धूल में मिला देना चाहते थे।२०॥

शिखरैर्विकिरामैनां लङ्कां मुष्टिभिरेव वा।

इति स्म दधिरे सर्वे मनांसि हरिपुङ्गवाः॥२१॥

सभी वानरयूथपति ये ही मनसूबे बाँधते थे कि हम लङ्कापर पर्वत-शिखरों की वर्षा करें और लङ्कावासियों को मुक्कों से मार-मारकर यमलोक पहुँचा दें॥२१॥

ततो रामो महातेजाः सुग्रीवमिदमब्रवीत्।।

सुविभक्तानि सैन्यानि शुक एष विमुच्यताम्॥२२॥

तदनन्तर महातेजस्वी रामने सुग्रीव से कहा ‘हमलोगों ने अपनी सेनाओं को सुन्दर ढंग से विभक्त करके उन्हें व्यूहबद्ध कर लिया है, अतः अब इस शुक को छोड़ दिया जाय’ ॥ २२ ॥

रामस्य तु वचः श्रुत्वा वानरेन्द्रो महाबलः।

मोचयामास तं दूतं शुकं रामस्य शासनात्॥२३॥

श्रीरामचन्द्रजी का यह वचन सुनकर महाबली वानरराज ने उनके आदेश से रावणदूत शुक को बन्धनमुक्त करा दिया॥ २३॥

मोचितो रामवाक्येन वानरैश्च निपीडितः।

शुकः परमसंत्रस्तो रक्षोधिपमुपागमत्॥२४॥

श्रीरामचन्द्रजी की आज्ञा से छुटकारा पाकर वानरों से पीड़ित होने के कारण अत्यन्त भयभीत हुआ शुक राक्षसराज के पास गया॥ २४ ॥

रावणः प्रहसन्नेव शुकं वाक्यमुवाच ह।

किमिमौ ते सितौ पक्षौ लूनपक्षश्च दृश्यसे॥२५॥

कच्चिन्नानेकचित्तानां तेषां त्वं वशमागतः।

उस समय रावण ने हँसते हुए-से ही शुक से कहा —’ये तुम्हारी दोनों पाँखें बाँध क्यों दी गयी हैं। इससे तुम इस तरह दिखायी देते हो मानो तुम्हारे पंख नोच लिये गये हों। कहीं तुम उन चञ्चलचित्तवाले वानरों के चंगुल में तो नहीं फँस गये थे?’ ।। २५ १/२॥

ततः स भयसंविग्नस्तेन राज्ञाभिचोदितः।

वचनं प्रत्युवाचेदं राक्षसाधिपमुत्तमम्॥२६॥

राजा रावण के इस प्रकार पूछने पर भय से घबराये हुए शुक ने उस समय उस श्रेष्ठ राक्षसराज को इस प्रकार उत्तर दिया- ॥ २६॥

सागरस्योत्तरे तीरेऽब्रुवं ते वचनं तथा।

यथा संदेशमक्लिष्टं सान्त्वयन् श्लक्ष्णया गिरा॥२७॥

‘महाराज! मैंने समुद्र के उत्तर तट पर पहुंचकर आपका संदेश बहुत स्पष्ट शब्दों में मधुर वाणी द्वारा सान्त्वना देते हुए सुनाया॥ २७॥

क्रुद्वैस्तैरहमुत्प्लुत्य दृष्टमात्रः प्लवंगमैः।

गृहीतोऽस्म्यपि चारब्धो हन्तुं लोप्तुं च मुष्टिभिः॥२८॥

‘किंतु मुझपर दृष्टि पड़ते ही कुपित हुए वानरों ने उछलकर मुझे पकड़ लिया और घूसों से मारना एवं पाँखें नोचना आरम्भ किया॥ २८॥

न ते संभाषितुं शक्याः सम्प्रश्नोऽत्र न विद्यते।

प्रकृत्या कोपनास्तीक्ष्णा वानरा राक्षसाधिप॥२९॥

‘राक्षसराज! वे वानर स्वभाव से ही क्रोधी और तीखे हैं। उनसे बात भी नहीं की जा सकती थी। फिर यह पूछने का अवसर कहाँ था कि तुम मुझे क्यों मार रहे हो?॥

स च हन्ता विराधस्य कबन्धस्य खरस्य च।

सुग्रीवसहितो रामः सीतायाः पदमागतः॥ ३०॥

‘जो विराध, कबन्ध और खर का वध कर चुके हैं, वे श्रीराम सुग्रीव के साथ सीता के स्थान का पता पाकर उनका उद्धार करने के लिये आये हैं ॥ ३० ॥

स कृत्वा सागरे सेतुं तीर्वा च लवणोदधिम्।

एष रक्षांसि निधूय धन्वी तिष्ठति राघवः॥ ३१॥

‘वे रघुनाथजी समुद्र पर पुल बाँध लवणसागर को पार करके राक्षसों को तिनकों के समान समझकर धनुष हाथ में लिये यहाँ पास ही खड़े हैं ॥ ३१॥

ऋक्षवानरसङ्घानामनीकानि सहस्रशः।

गिरिमेघनिकाशानां छादयन्ति वसुंधराम्॥३२॥

‘पर्वत और मेघों के समान विशालकाय रीछों और वानर-समूहों की सहस्रों सेनाएँ इस पृथ्वी पर छा गयी हैं।॥ ३२॥

राक्षसानां बलौघस्य वानरेन्द्रबलस्य च।

नैतयोर्विद्यते संधिर्देवदानवयोरिव॥३३॥

‘देवता और दानवों में जैसे मेल होना असम्भव है, उसी प्रकार राक्षसों और वानरराज सुग्रीव के सैनिकों में संधि नहीं हो सकती॥ ३३॥

पुरा प्राकारमायान्ति क्षिप्रमेकतरं कुरु।

सीतां चास्मै प्रयच्छाशु युद्धं वापि प्रदीयताम्॥३४॥

‘अतः जब तक वे लङ्गापुरी की चहारदिवारी पर नहीं चढ़ आते, उसके पहले ही आप शीघ्रतापूर्वक दो में से एक काम कर डालिये—या तो तुरंत ही उन्हें सीता को लौटा दीजिये या फिर सामने खड़े होकर युद्ध कीजिये।

शुकस्य वचनं श्रुत्वा रावणो वाक्यमब्रवीत्।

रोषसंरक्तनयनो निर्दहन्निव चक्षुषा॥ ३५॥

शुक की यह बात सुनकर रावण की आँखें रोष से लाल हो गयीं। वह इस तरह घूर-घूरकर देखने लगा, मानो अपनी दृष्टि से उसको दग्ध कर देगा। वह बोला –

यदि मां प्रति युद्धेरन देवगन्धर्वदानवाः।

नैव सीतां प्रदास्यामि सर्वलोकभयादपि॥ ३६॥

‘यदि देवता, गन्धर्व और दानव भी मुझसे युद्ध करने को तैयार हो जायँ तथा सारे संसार के लोग मुझे भय दिखाने लगें तो भी मैं सीता को नहीं लौटाऊँगा॥ ३६॥

कदा समभिधावन्त मामका राघवं शराः।

वसन्ते पुष्पितं मत्ता भ्रमरा इव पादपम्॥३७॥

‘जैसे मतवाले भ्रमर वसन्त-ऋतु में फूलों से भरे हुए वृक्षपर टूट पड़ते हैं, उसी प्रकार मेरे बाण कब उस रघुवंशी पर धावा करेंगे? ॥ ३७॥

कदा शोणितदिग्धाङ्गं दीप्तैः कार्मुकविच्युतैः।

शरैरादीपयिष्यामि उल्काभिरिव कुञ्जरम्॥३८॥

‘वह अवसर कब आयेगा जब मेरे धनुष से छूटे हुए तेजस्वी बाणों द्वारा घायल होकर राम का शरीर लहूलुहान हो जायगा और जैसे जलती हुई लुकारी से लोग हाथी को जलाते हैं, उसी तरह मैं उन बाणों से राम को दग्ध कर डालूँगा॥ ३८॥

तच्चास्य बलमादास्ये बलेन महता वृतः।

ज्योतिषामिव सर्वेषां प्रभामुद्यन् दिवाकरः॥३९॥

‘जैसे सूर्य अपने उदय के साथ ही समस्त नक्षत्रों की प्रभा हर लेते हैं, उसी प्रकार मैं विशाल सेना के साथ रणभूमि में खड़ा हो राम की समस्त वानर-सेना को आत्मसात् कर लूँगा॥ ३९॥

सागरस्येव मे वेगो मारुतस्येव मे बलम्।

न च दाशरथिर्वेद तेन मां योद्धमिच्छति॥४०॥

दशरथकुमार राम ने अभी समरभूमि में समुद्र के समान मेरे वेग और वायु के समान मेरे बल का अनुभव नहीं किया है, इसलिये वह मेरे साथ युद्ध करना चाहता है।

न मे तूणीशयान् बाणान् सविषानिव पन्नगान्।

रामः पश्यति संग्रामे तेन मां योद्धुमिच्छति॥४१॥

‘मेरे तरकस में सोये हुए बाण विषधर साँ के समान भयंकर हैं। राम ने संग्राम में उन बाणों को देखा ही नहीं है; इसलिये वह मुझसे जूझना चाहता है। ४१॥

न जानाति पुरा वीर्यं मम युद्धे स राघवः।

मम चापमयीं वीणां शरकोणैः प्रवादिताम्॥४२॥

ज्याशब्दतुमुलां घोरामार्तगीतमहास्वनाम्।

नाराचतलसंनादां नदीमहितवाहिनीम्।

अवगाह्य महारङ्गं वादयिष्याम्यहं रणे॥४३॥

‘पहले कभी युद्ध में राम का मेरे बल-पराक्रम से पाला नहीं पड़ा है, इसीलिये वह मेरे साथ लड़ने का हौसला रखता है। मेरा धनुष एक सुन्दर वीणा है, जो बाणों के कोनों से बजायी जाती है। उसकी प्रत्यञ्चा से जो टङ्कार-ध्वनि उठती है, वही उसकी भयंकर स्वरलहरी है। आतॊ की चीत्कार और पुकार ही उस पर उच्च स्वर से  गाया जाने वाला गीत है। नाराचों को छोड़ते समय जो चट-चट शब्द होता है, वही मानो हथेली पर दिया जाने वाला ताल है। बहती हुई नदी के समान जो शत्रुओं की वाहिनी है, वही मानो उस संगीतोत्सव के लिये विशाल रंगभूमि है। मैं समराङ्गण में उस रंगभूमि के भीतर प्रवेश करके अपनी वह भयंकर वीणा बजाऊँगा।। ४२-४३॥

न वासवेनापि सहस्रचक्षुषा युद्धेऽस्मि शक्यो वरुणेन वा स्वयम्।

यमेन वा धर्षयितुं शराग्निना महाहवे वैश्रवणेन वा पुनः॥४४॥

‘यदि महासमर में सहस्रनेत्रधारी इन्द्र अथवा साक्षात् वरुण या स्वयं यमराज अथवा मेरे बड़े भाई कुबेर ही आ जायँ तो वे भी अपनी बाणाग्नि से मुझे पराजित नहीं कर सकते’ ॥ ४४॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे चतुर्विंशः सर्गः॥२४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में चौबीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।२४॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
युद्धकाण्डम्

रावण का शुक और सारण को गुप्त रूप से वानरसेना में भेजना, श्रीराम का संदेश लेकर लङ्का में लौट रावण को समझाना

पञ्चविंशः सर्गः

सर्ग-25

सबले सागरं तीर्णे रामे दशरथात्मजे।

अमात्यौ रावणः श्रीमानब्रवीच्छुकसारणौ ॥१॥

दशरथनन्दन भगवान् श्रीराम जब सेनासहित समुद्र पार कर चुके, तब श्रीमान् रावण ने अपने दोनों मन्त्री शुक और सारण से फिर कहा- ॥१॥

समग्रं सागरं तीर्णं दुस्तरं वानरं बलम्।

अभूतपूर्वं रामेण सागरे सेतुबन्धनम्॥२॥

‘यद्यपि समुद्र को पार करना अत्यन्त कठिन था तो भी सारी वानरसेना उसे लाँघकर इस पार चली आयी। राम के द्वारा सागर पर सेतु का बाँधा जाना अभूतपूर्व कार्य है।

सागरे सेतुबन्धं तं न श्रद्दध्यां कथंचन।

अवश्यं चापि संख्येयं तन्मया वानरं बलम्॥३॥

‘लोगों के मुँह से सुनने पर भी मुझे किसी तरह यह विश्वास नहीं होता कि समुद्र पर पुल बाँधा गया होगा। वानर सेना कितनी है? इसका ज्ञान मुझे अवश्य प्राप्त करना चाहिये॥३॥

भवन्तौ वानरं सैन्यं प्रविश्यानुपलक्षितौ।

परिमाणं च वीर्यं च ये च मुख्याः प्लवंगमाः॥४॥

मन्त्रिणो ये च रामस्य सुग्रीवस्य च सम्मताः।

ये पूर्वमभिवर्तन्ते ये च शूराः प्लवंगमाः॥५॥

स च सेतुर्यथा बद्धः सागरे सलिलार्णवे।

निवेशं च यथा तेषां वानराणां महात्मनाम्॥६॥

रामस्य व्यवसायं च वीर्यं प्रहरणानि च।

लक्ष्मणस्य च वीरस्य तत्त्वतो ज्ञातुमर्हथः॥७॥

कश्च सेनापतिस्तेषां वानराणां महात्मनाम्।

तच्च ज्ञात्वा यथातत्त्वं शीघ्रमागन्तुमर्हथः॥८॥

‘तुम दोनों इस तरह वानर-सेना में प्रवेश करो कि तुम्हें कोई पहचान न सके। वहाँ जाकर यह पता लगाओ कि वानरों की संख्या कितनी है? उनकी शक्ति कैसी है? उनमें मुख्य-मुख्य वानर कौन

कौन से हैं। श्रीराम और सुग्रीव के मनोऽनुकूल मन्त्री कौन-कौन हैं? कौन-कौन शूरवीर वानर-सेना के आगे रहते हैं? अगाध जलराशि से भरे हुए समुद्र में वह पुल किस तरह बाँधा गया? महामनस्वी वानरों की छावनी कैसे पड़ी है? श्रीराम और वीर लक्ष्मण का निश्चय क्या है?—वे क्या करना चाहते हैं? उनके बल-पराक्रम कैसे हैं? उन दोनों के पास कौन-कौन से अस्त्र-शस्त्र हैं? और उन महामना वानरों का प्रधान सेनापति कौन है? इन सब बातों की तुम लोग ठीक-ठीक जानकारी प्राप्त करो और सबका यथार्थ ज्ञान हो जाने पर शीघ्र लौट आओ’ ।

इति प्रतिसमादिष्टौ राक्षसौ शुकसारणौ।

हरिरूपधरौ वीरौ प्रविष्टौ वानरं बलम्॥९॥

ऐसा आदेश पाकर दोनों वीर राक्षस शुक और सारण वानररूप धारण करके उस वानरी सेना में घुस गये॥

ततस्तद् वानरं सैन्यमचिन्त्यं लोमहर्षणम्।

संख्यातुं नाध्यगच्छेतां तदा तौ शुकसारणौ ॥१०॥

वानरों की वह सेना कितनी है? यह गिनना तो दूर रहा; मनसे उसका अंदाजा लगाना भी असम्भव था। उस अपार सेना को देखकर रोंगटे खड़े हो जाते थे। उस समय शुक और सारण किसी तरह भी उसकी गणना नहीं कर सके।

तत् स्थितं पर्वताग्रेषु निर्झरेषु गुहासु च।

समुद्रस्य च तीरेषु वनेषूपवनेषु च।

तरमाणं च तीर्णं च ततुकामं च सर्वशः॥११॥

वह सेना पर्वत के शिखरों पर, झरनों के आसपास, गुफाओं में, समुद्र के किनारे तथा वनों और उपवनों में भी फैली हुई थी। उसका कुछ भाग समुद्र पार कर रहा था, कुछ पार कर चुका था और कुछ सब प्रकार से समुद्र को पार करने की तैयारी में लगा था॥ ११॥

निविष्टं निविशच्चैव भीमनादं महाबलम्।

तबलार्णवमक्षोभ्यं ददृशाते निशाचरौ॥१२॥

भयंकर कोलाहल करनेवाली वह विशाल सेना कुछ स्थानोंपर छावनी डाल चुकी थी और कुछ जगहोंपर डालती जा रही थी। दोनों निशाचरोंने देखा, वह वानरवाहिनी समुद्रके समान अक्षोभ्य थी॥ १२ ॥

तौ ददर्श महातेजाः प्रतिच्छन्नौ विभीषणः।

आचचक्षे स रामाय गृहीत्वा शकसारणौ ॥१३॥

वानरवेश में छिपकर सेना का निरीक्षण करते हुए दोनों राक्षस शुक और सारण को महातेजस्वी विभीषण ने देखा, देखते ही पहचाना और उन दोनों को पकड़कर श्रीरामचन्द्रजी से कहा- ॥ १३॥

तस्यैतौ राक्षसेन्द्रस्य मन्त्रिणौ शुकसारणौ।

लङ्कायाः समनुप्राप्तौ चारौ परपुरंजय॥१४॥

‘शत्रुनगरी पर विजय पाने वाले नरेश्वर! ये दोनों लङ्का से आये हुए गुप्तचर एवं राक्षसराज रावण के मन्त्री शुक तथा सारण हैं’ ॥१४॥

तौ दृष्ट्वा व्यथितौ रामं निराशौ जीविते तथा।

कृताञ्जलिपुटौ भीतौ वचनं चेदमूचतुः॥१५॥

वे दोनों राक्षस श्रीरामचन्द्रजी को देखकर अत्यन्त व्यथित हुए और जीवन से निराश हो गये। उन दोनों के मन में भय समा गया। वे हाथ जोड़कर इस प्रकार बोले- ॥१५॥

आवामिहागतौ सौम्य रावणप्रहितावुभौ।

परिज्ञातुं बलं सर्वं तदिदं रघुनन्दन॥१६॥

‘सौम्य! रघुनन्दन! हम दोनों को रावण ने भेजा है और हम इस सारी सेना के विषय में आवश्यक जानकारी प्राप्त करने के लिये आये हैं’ ॥ १६ ॥

तयोस्तद् वचनं श्रुत्वा रामो दशरथात्मजः।

अब्रवीत् प्रहसन् वाक्यं सर्वभूतहिते रतः॥१७॥

उन दोनों की वह बात सुनकर सम्पूर्ण प्राणियों के हित में लगे रहने वाले दशरथनन्दन भगवान् श्रीराम हँसते हुए बोले- ॥१७॥

यदि दृष्टं बलं सर्वं वयं वा सुसमाहिताः।

यथोक्तं वा कृतं कार्यं छन्दतः प्रतिगम्यताम्॥१८॥

‘यदि तुमने सारी सेना देख ली हो, हमारी सैनिकशक्ति का ज्ञान प्राप्त कर लिया हो तथा रावण के कथनानुसार सब काम पूरा कर लिया हो तो अब तुम दोनों अपनी इच्छा के अनुसार प्रसन्नतापूर्वक लौट जाओ॥

अथ किंचिददृष्टं वा भूयस्तद् द्रष्टुमर्हथः।

विभीषणो वा कात्स्न्र्येन पुनः संदर्शयिष्यति॥१९॥

‘अथवा यदि अभी कुछ देखना बाकी रह गया हो तो फिर देख लो। विभीषण तुम्हें सब कुछ पुनः पूर्णरूप से दिखा देंगे॥ १९॥

न चेदं ग्रहणं प्राप्य भेतव्यं जीवितं प्रति।

न्यस्तशस्त्रौ गृहीतौ च न दूतौ वधमर्हथः ॥२०॥

‘इस समय जो तुम पकड़ लिये गये हो, इससे तुम्हें अपने जीवनके विषय में कोई भय नहीं होना चाहिये; क्योंकि शस्त्रहीन अवस्था में पकड़े गये तुम दोनों दूत वध के योग्य नहीं हो॥२०॥

प्रच्छन्नौ च विमुञ्चेमौ चारौ रात्रिंचरावुभौ।

शत्रुपक्षस्य सततं विभीषण विकर्षिणौ ॥२१॥

‘विभीषण! ये दोनों राक्षस रावण के गुप्तचर हैं और छिपकर यहाँ का भेद लेने के लिये आये हैं। ये अपने शत्रुपक्ष (वानरसेना)-में फूट डालने का प्रयास कर रहे हैं। अब तो इनका भण्डा फूट ही गया; अतः इन्हें छोड़ दो॥

प्रविश्य महतीं लङ्कां भवद्भ्यां धनदानुजः।

वक्तव्यो रक्षसां राजा यथोक्तं वचनं मम॥ २२॥

‘शुक और सारण! जब तुम दोनों लङ्का में पहुँचो, तब कुबेर के छोटे भाई राक्षसराज रावण को मेरी ओर से यह संदेश सुना देना- ॥ २२ ॥

यद् बलं त्वं समाश्रित्य सीतां मे हृतवानसि।

तद् दर्शय यथाकामं ससैन्यश्च सबान्धवः॥२३॥

‘रावण! जिस बल के भरोसे तुमने मेरी सीता का अपहरण किया है, उसे अब सेना और बन्धुजनोंसहित आकर इच्छानुसार दिखाओ।। २३॥

श्वः काल्ये नगरी लङ्कां सप्राकारां सतोरणाम्।

रक्षसां च बलं पश्य शरैर्विध्वंसितं मया॥२४॥

‘कल प्रातःकाल ही तुम परकोटे और दरवाजों के सहित लङ्कापुरी तथा राक्षसी सेना का मेरे बाणों से विध्वंस होता देखोगे॥२४॥

क्रोधं भीममहं मोक्ष्ये ससैन्ये त्वयि रावण।

श्वः काल्ये वज्रवान् वज्रं दानवेष्विव वासवः॥२५॥

‘रावण! जैसे वज्रधारी इन्द्र दानवों पर अपना वज्र छोड़ते हैं, उसी प्रकार मैं कल सबेरे ही सेनासहित तुम पर अपना भयंकर क्रोध छोडूंगा’ ॥ २५ ॥

इति प्रतिसमादिष्टौ राक्षसौ शुकसारणौ।

जयेति प्रतिनन्यैनं राघवं धर्मवत्सलम्॥२६॥

आगम्य नगरीं लङ्कामब्रूतां राक्षसाधिपम्।

भगवान् श्रीराम का यह संदेश पाकर दोनों राक्षस शुक और सारण धर्मवत्सल श्रीरघुनाथजी का ‘आपकी जय हो’, ‘आप चिरंजीवी हों’ इत्यादि वचनों द्वारा अभिनन्दन करके लङ्कापुरी में आकर राक्षसराज रावण से बोले- ॥

विभीषणगृहीतौ तु वधार्थं राक्षसेश्वर ॥२७॥

दृष्ट्वा धर्मात्मना मुक्तौ रामेणामिततेजसा।

‘राक्षसेश्वर! हमें तो विभीषण ने वध करने के लिये पकड़ लिया था; किंतु जब अमित तेजस्वी धर्मात्मा श्रीराम ने देखा, तब हमें छुड़वा दिया॥ २७ १/२।।

एकस्थानगता यत्र चत्वारः पुरुषर्षभाः॥२८॥

लोकपालसमाः शूराः कृतास्त्रा दृढविक्रमाः।

रामो दाशरथिः श्रीमाल्लँक्ष्मणश्च विभीषणः॥२९॥

सुग्रीवश्च महातेजा महेन्द्रसमविक्रमः।

एते शक्ताः पुरीं लङ्कां सप्राकारां सतोरणाम्॥३०॥

उत्पाट्य संक्रामयितुं सर्वे तिष्ठन्तु वानराः।

‘दशरथनन्दन श्रीराम, श्रीमान् लक्ष्मण, विभीषण तथा महेन्द्रतुल्य पराक्रमी महातेजस्वी सुग्रीव ये चारों वीर लोकपालों के समान शौर्यशाली, दृढ़ पराक्रमी और अस्त्र-शस्त्रों के ज्ञाता हैं। जहाँ ये चारों पुरुषप्रवर एक जगह एकत्र हो गये हैं, वहाँ विजय निश्चित है। और सब वानर अलग रहें तो भी ये चार ही परकोटे और दरवाजों के सहित सारी लङ्कापुरी को उखाड़कर फेंक सकते हैं॥ २८–३० १/२॥

यादृशं तद्धि रामस्य रूपं प्रहरणानि च ॥३१॥

वधिष्यति पुरीं लङ्कामेकस्तिष्ठन्तु ते त्रयः।

‘श्रीरामचन्द्रजी का जैसा रूप है और जैसे उनके अस्त्र-शस्त्र हैं, उनसे तो यही मालूम होता है कि वे अकेले ही सारी लङ्कापुरी का वध कर डालेंगे। भले ही वे बाकी तीन वीर भी बैठे ही रहें॥ ३१ १/२॥

रामलक्ष्मणगुप्ता सा सुग्रीवेण च वाहिनी।

बभूव दुर्धर्षतरा सर्वैरपि सुरासुरैः॥ ३२॥

‘महाराज! श्रीराम, लक्ष्मण और सुग्रीव से सुरक्षित वह वानरों की सेना तो समस्त देवताओं और असुरों के लिये भी अत्यन्त दुर्जय है॥ ३२॥

प्रहृष्टयोधा ध्वजिनी महात्मनां वनौकसां सम्प्रति योद्भुमिच्छताम्।

अलं विरोधेन शमो विधीयतां प्रदीयतां दाशरथाय मैथिली॥३३॥

‘महामनस्वी वानर इस समय युद्ध करने के लिये उत्सुक हैं। उनकी सेना के सभी वीर योद्धा बड़े प्रसन्न हैं। अतः उनके साथ विरोध करने से आपको कोई लाभ नहीं होगा। इसलिये संधि कर लीजिये और

श्रीरामचन्द्रजी की सेवा में सीता को लौटा दीजिये। ३३॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे पञ्चविंशः सर्गः ॥२५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में पचीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।२५॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
युद्धकाण्डम्

सारण का रावण को पृथक-पृथक वानर यूथपतियों का परिचय देना

षड्विंशः सर्गः

सर्ग-26


तद्वचः सत्यमक्लीबं सारणेनाभिभाषितम्।

निशम्य रावणो राजा प्रत्यभाषत सारणम्॥१॥

(शुक और) सारण के ये सच्चे और जोशीले शब्द सुनकर रावण ने सारण से कहा— ॥१॥

यदि मामभियुञ्जीरन् देवगन्धर्वदानवाः।

नैव सीतामहं दद्यां सर्वलोकभयादपि॥२॥

‘यदि देवता, गन्धर्व और दानव भी मुझसे युद्ध करने आ जायँ और समस्त लोक भय दिखाने लगे तो भी मैं सीता को नहीं दूंगा॥२॥

त्वं तु सौम्य परित्रस्तो हरिभिः पीडितो भृशम्।

प्रतिप्रदानमद्यैव सीतायाः साधु मन्यसे॥३॥

को हि नाम सपत्नो मां समरे जेतुमर्हति।

‘सौम्य! जान पड़ता है कि तुम्हें बंदरों ने बहुत तंग किया है। इसी से भयभीत होकर तुम आज ही सीता को लौटा देना ठीक समझने लगे हो। भला, कौन ऐसा शत्रु है, जो समराङ्गण में मुझे जीत सके’॥ ३ १/२॥

इत्युक्त्वा परुषं वाक्यं रावणो राक्षसाधिपः॥४॥

आरुरोह ततः श्रीमान् प्रासादं हिमपाण्डुरम्।

बहुतालसमुत्सेधं रावणोऽथ दिदृक्षया॥५॥

ऐसा कठोर वचन कहकर श्रीमान् राक्षसराज रावण वानरों की सेना का निरीक्षण करने के लिये अपनी कई ताल ऊँची और बर्फ के समान श्वेत रंग की अट्टालिका पर चढ़ गया॥ ४-५ ॥

ताभ्यां चराभ्यां सहितो रावणः क्रोधमूर्च्छितः।

पश्यमानः समुद्रं तं पर्वतांश्च वनानि च॥६॥

ददर्श पृथिवीदेशं सुसम्पूर्णं प्लवंगमैः।

उस समय रावण क्रोध से तमतमा उठा था। उसने उन दोनों गुप्तचरों के साथ जब समुद्र, पर्वत और वनों पर दृष्टिपात किया, तब पृथिवी का सारा प्रदेश वानरों से भरा दिखायी दिया॥ ६ १/२॥

तदपारमसह्यं च वानराणां महाबलम्॥७॥

आलोक्य रावणो राजा परिपप्रच्छ सारणम्।

वानरों की वह विशाल सेना अपार और असह्य थी। उसे देखकर राजा रावण ने सारण से पूछा- ॥ ७१/२॥

एषां के वानरा मुख्याः के शूराः के महाबलाः॥८॥

‘सारण! इन वानरों में कौन-कौन से मुख्य हैं? कौन शूरवीर हैं और कौन बल में बहुत बढ़े-चढ़े हैं? ॥ ८॥

के पूर्वमभिवर्तन्ते महोत्साहाः समन्ततः।

केषां शृणोति सुग्रीवः के वा यूथपयूथपाः॥९॥

सारणाचक्ष्व मे सर्वं किंप्रभावाः प्लवंगमाः।

‘कौन-कौनसे वानर महान् उत्साहसे सम्पन्न होकर युद्धमें आगे-आगे रहते हैं? सुग्रीव किनकी बातें सुनते हैं और कौन यूथपतियोंके भी यूथपति हैं? सारण! ये सारी बातें मुझे बताओ। साथ ही यह भी कहो कि उन वानरोंका प्रभाव कैसा है?’ ॥ ९ १/२॥

सारणो राक्षसेन्द्रस्य वचनं परिपृच्छतः॥१०॥

आबभाषेऽथ मुख्यज्ञो मुख्यास्तत्र वनौकसः।

इस प्रकार पूछते हुए राक्षसराज रावण का वचन सुनकर मुख्य-मुख्य वानरों को जानने वाले सारण ने उन मुख्य वानरों का परिचय देते हुए कहा- ॥ १० १/२ ॥

एष योऽभिमुखो लङ्कां नर्दस्तिष्ठति वानरः॥११॥

यूथपानां सहस्राणां शतेन परिवारितः।

यस्य घोषेण महता सप्राकारा सतोरणा॥१२॥

लङ्का प्रतिहता सर्वा सशैलवनकानना।

सर्वशाखामृगेन्द्रस्य सुग्रीवस्य महात्मनः॥१३॥

बलाग्रे तिष्ठते वीरो नीलो नामैष यूथपः।

‘महाराज! यह जो लङ्का की ओर मुख करके खड़ा है और गरज रहा है, एक लाख यूथपों से घिरा हुआ है तथा जिसकी गर्जना के अत्यन्त गम्भीर घोष से परकोटे, दरवाजे, पर्वत और वनों के सहित सारी लङ्का प्रतिहत हो गूंज उठी है, इसका नाम नील है। यह वीर यूथपतियों में से है। समस्त वानरों के राजा महामना सुग्रीव की सेना के आगे यही खड़ा होता है। ११–१३ १/२॥

बाहू प्रगृह्य यः पद्भ्यां महीं गच्छति वीर्यवान्॥१४॥

लङ्कामभिमुखः कोपादभीक्ष्णं च विजृम्भते।

गिरिशृङ्गप्रतीकाशः पद्मकिंजल्कसंनिभः॥१५॥

स्फोटयत्यतिसंरब्धो लाङ्गलं च पुनः पुनः।

यस्य लाङ्गलशब्देन स्वनन्ति प्रदिशो दश॥१६॥

एष वानरराजेन सुग्रीवेणाभिषेचितः।

युवराजोऽङ्गदो नाम त्वामाह्वयति संयुगे॥१७॥

‘जो पराक्रमी वानर दोनों उठी हुई बाँहों को एक दूसरी से पकड़कर दोनों पैरों से पृथ्वी पर टहल रहा है, लङ्का की ओर मुख करके क्रोधपूर्वक देखता है और बारंबार अंगड़ाई लेता है, जिसका शरीर पर्वत शिखर के समान ऊँचा है, जिसकी कान्ति कमलकेसर के समान सुनहले रंग की है, जो रोष से भरकर बारंबार अपनी पूँछ पटक रहा है तथा जिसकी पूँछके पटकने की आवाज से दसों दिशाएँ गूंज उठती हैं, यह युवराज अङ्गद है। वानरराज सुग्रीव ने इसका युवराज के पद पर अभिषेक किया है। यह अपने साथ युद्ध के लिये आपको ललकारता है॥ १४ -१७॥

वालिनः सदृशः पुत्रः सुग्रीवस्य सदा प्रियः।

राघवार्थे पराक्रान्तः शक्रार्थे वरुणो यथा॥१८॥

‘वाली का यह पुत्र अपने पिता के समान ही बलशाली है। सुग्रीव को यह सदा ही प्रिय है। जैसे वरुण इन्द्र के लिये पराक्रम प्रकट करते हैं, उसी प्रकार यह श्रीरामचन्द्रजी के लिये अपना पुरुषार्थ प्रकट करने के लिये उद्यत है॥ १८ ॥

एतस्य सा मतिः सर्वा यद् दृष्टा जनकात्मजा।

हनूमता वेगवता राघवस्य हितैषिणा॥१९॥

‘श्रीरघुनाथजी का हित चाहने वाले वेगशाली हनुमान् जी ने जो यहाँ आकर जनकनन्दिनी सीता का दर्शन किया, उसके भीतर इस अङ्गद की ही सारी बुद्धि काम कर रही थी॥ १९॥

बहूनि वानरेन्द्राणामेष यूथानि वीर्यवान्।

परिगृह्याभियाति त्वां स्वेनानीकेन मर्दितुम्॥२०॥

‘पराक्रमी अङ्गद वानरशिरोमणियों के बहुत-से यूथ लिये अपनी सेना के साथ आपको कुचल डालने के लिये आ रहा है॥२०॥

अनुवालिसुतस्यापि बलेन महता वृतः।

वीरस्तिष्ठति संग्रामे सेतुहेतुरयं नलः॥२१॥

‘अङ्गद के पीछे संग्रामभूमि में जो वीर विशाल सेना से घिरा हुआ खड़ा है, इसका नाम नल है। यही सेतु-निर्माण का प्रधान हेतु है॥ २१ ॥

ये तु विष्टभ्य गात्राणि क्ष्वेडयन्ति नदन्ति च।

उत्थाय च विजृम्भन्ते क्रोधेन हरिपुङ्गवाः॥२२॥

एते दुष्प्रसहा घोराश्चण्डाश्चण्डपराक्रमाः।

अष्टौ शतसहस्राणि दशकोटिशतानि च।

य एनमनुगच्छन्ति वीराश्चन्दनवासिनः॥२३॥

एषैवाशंसते लङ्कां स्वेनानीकेन मर्दितुम्।

‘जो अपने अङ्गों को सुस्थिर करके सिंहनाद करते और गर्जते हैं तथा जो कपिश्रेष्ठ वीर अपने आसनों से उठकर क्रोधपूर्वक अंगड़ाई लेते हैं, इनके वेग को सह लेना अत्यन्त कठिन है। ये बड़े भयंकर, अत्यन्त क्रोधी और प्रचण्ड पराक्रमी हैं। इनकी संख्या दस अरब और आठ लाख है। ये सब वानर तथा चन्दनवन में  निवास करने वाले वीर वानर इस यूथपति नल का ही अनुसरण करते हैं। यह नल भी अपनी सेना द्वारा लङ्कापुरी को कुचल देनेका हौसला रखता है।॥ २२-२३ १/२॥

श्वेतो रजतसंकाशश्चपलो भीमविक्रमः॥२४॥

बुद्धिमान् वानरः शूरस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः।

तूर्णं सुग्रीवमागम्य पुनर्गच्छति वानरः॥ २५॥

विभजन वानरी सेनामनीकानि प्रहर्षयन्।

‘यह जो चाँदी के समान सफेद रंग का चञ्चल वानर दिखायी देता है, इसका नाम श्वेत है। यह भयंकर पराक्रम करने वाला, बुद्धिमान्, शूरवीर औरतीनों लोकों में विख्यात है। श्वेत बड़ी तेजी से सुग्रीव के

पास आकर फिर लौट जाता है। यह वानरीसेना का विभाग करता और सैनिकों में हर्ष तथा उत्साह भरता है॥ २४-२५ १/२॥

यः पुरा गोमतीतीरे रम्यं पर्येति पर्वतम्॥२६॥

नाम्ना संरोचनो नाम नानानगयुतो गिरिः।

तत्र राज्य प्रशास्त्येष कुमुदो नाम यूथपः॥२७॥

‘गोमती के तट पर जो नाना प्रकार के वृक्षों से युक्त संरोचन नामक पर्वत है, उसी रमणीय पर्वत के चारों ओर जो पहले विचरा करता था और वहीं अपने वानरराज्य का शासन करता था, वही यह कुमुद नामक यूथपति है॥

योऽसौ शतसहस्राणि सहर्षं परिकर्षति।

यस्य वाला बहुव्यामा दीर्घलाङ्गलमाश्रिताः॥२८॥

ताम्राः पीताः सिताः श्वेताः प्रकीर्णा घोरदर्शनाः।

अदीनो वानरश्चण्डः संग्राममभिकाङ्क्षति।

एषोऽप्याशंसते लङ्कां स्वेनानीकेन मर्दितुम्॥२९॥

‘वह जो लाखों वानर-सैनिकों को सहर्ष अपने साथ खींचे लाता है, जिसकी लंबी दुम में बहुत बड़े-बड़े लाल, पीले, भूरे और सफेद रंग के बाल फैले हुए हैं और देखने में बड़े भयंकर हैं तथा जो कभी दीनता न दिखाकर सदा युद्ध की ही इच्छा रखता है, उस वानर का नाम चण्ड है। यह चण्ड भी अपनी सेना द्वारा लङ्का को कुचल देने की इच्छा रखता है। २८-२९॥

यस्त्वेष सिंहसंकाशः कपिलो दीर्घकेसरः।

निभृतः प्रेक्षते लङ्कां दिधक्षन्निव चक्षुषा॥३०॥

विन्ध्यं कृष्णगिरिं सह्यं पर्वतं च सुदर्शनम्।

राजन् सततमध्यास्ते स रम्भो नाम यूथपः।

शतं शतसहस्राणां त्रिंशच्च हरिपुङ्गवाः॥३१॥

यं यान्तं वानरा घोराश्चण्डाश्चण्डपराक्रमाः।

परिवार्यानुगच्छन्ति लङ्कां मर्दितुमोजसा॥३२॥

‘राजन् ! जो सिंह के समान पराक्रमी और कपिल वर्ण का है, जिसकी गर्दन में लंबे-लंबे बाल हैं और जो ध्यान लगाकर लङ्का की ओर इस प्रकार देख रहा है, मानो इसे भस्म कर देगा, वह रम्भ नामक यूथपति है। वह निरन्तर विन्ध्य, कृष्णगिरि, सह्य और सुदर्शन आदि पर्वतों पर रहा करता है। जब वह युद्ध के लिये चलता है, उस समय उसके पीछे एक करोड़ तीस श्रेष्ठ भयंकर, अत्यन्त क्रोधी और प्रचण्ड पराक्रमी वानर चलते हैं। वे सब-के-सब अपने बल से लङ्का को मसल डालने के लिये रम्भ को सब ओर से घेरे हुए आ रहे हैं॥ ३०–३२॥

यस्तु कौँ विवृणुते जृम्भते च पुनः पुनः।

न तु संविजते मृत्योर्न च सेनां प्रधावति॥३३॥

प्रकम्पते च रोषेण तिर्यक् च पुनरीक्षते।

पश्य लाङ्गलविक्षेपं क्ष्वेडत्येष महाबलः॥३४॥

‘जो कानों को फैलाता है, बारंबार जंभाई लेता है, मृत्यु से भी नहीं डरता है और सेना के पीछे न जाकर अर्थात् सेना का भरोसा न करके अकेले ही युद्ध करना चाहता है, रोष से काँप रहा है, तिरछी नजर से देखता है और पूंछ फटकारकर सिंहनाद करता है, इसका नाम शरभ है। देखिये, यह महाबली वानर कैसी गर्जना करता है॥ ३३-३४॥

महाजवो वीतभयो रम्यं साल्वेयपर्वतम्।

राजन् सततमध्यास्ते शरभो नाम यूथपः॥ ३५॥

‘इसका वेग महान् है। भय तो इसे छूतक नहीं गया है। राजन्! यह यूथपति शरभ सदा रमणीय साल्वेय पर्वत पर निवास करता है॥ ३५ ॥

एतस्य बलिनः सर्वे विहारा नाम यूथपाः।

राजन् शतसहस्राणि चत्वारिंशत्तथैव च ॥३६॥

‘इसके पास जो यूथपति हैं, उन सबकी ‘विहार’ संज्ञा है। वे बड़े बलवान् हैं। राजन्! उनकी संख्या एक लाख चालीस हजार है॥ ३६॥

यस्तु मेघ इवाकाशं महानावृत्य तिष्ठति।

मध्ये वानरवीराणां सुराणामिव वासवः॥ ३७॥

भेरीणामिव संनादो यस्यैष श्रूयते महान्।

घोषः शाखामृगेन्द्राणां संग्राममभिकाङ्क्षताम्॥३८॥

एष पर्वतमध्यास्ते पारियात्रमनुत्तमम्।

युद्धे दुष्प्रसहो नित्यं पनसो नाम यूथपः॥३९॥

एनं शतसहस्राणां शतार्धं पर्युपासते।

यूथपा यूथपश्रेष्ठं येषां यूथानि भागशः॥४०॥

‘जो विशाल वानर मेघ के समान आकाश को घेरे हुए खड़ा है तथा वानरवीरों के बीच में ऐसा जान पड़ता है, जैसे देवताओं में इन्द्र हों, युद्ध की इच्छावाले वानरों के बीच में जिसकी गम्भीर गर्जना ऐसी सुनायी देती है, मानो बहुत-सी भेरियों का तुमुल नाद हो रहा हो तथा जो युद्ध में दुःसह है, वह ‘पनस’ नाम से प्रसिद्ध यूथपति है। यह पनस परम उत्तम पारियात्र पर्वतपर निवास करता है। यूथपतियों में श्रेष्ठ पनस की सेवा में पचास लाख यूथपति रहते हैं, जिनके अपने अपने यूथ अलग-अलग हैं॥ ३७–४०॥

यस्तु भीमां प्रवल्गन्ती चमू तिष्ठति शोभयन्।

स्थितां तीरे समुद्रस्य द्वितीय इव सागरः॥४१॥

एष दर्दुरसंकाशो विनतो नाम यूथपः।

पिबंश्चरति यो वेणां नदीनामुत्तमां नदीम्॥४२॥

षष्टिः शतसहस्राणि बलमस्य प्लवंगमाः।

‘जो समुद्र के तट पर स्थित हुई इस उछलती-कूदती भीषण सेना को दूसरे मूर्तिमान् समुद्र की भाँति सुशोभित करता हुआ खड़ा है, वह दर्दुर पर्वत के समान विशालकाय वानर विनत नाम से प्रसिद्ध यूथपति है। वह नदियों में श्रेष्ठ वेणा नदी का पानी पीता हुआ विचरता है। साठ लाख वानर उसके सैनिक हैं॥ ४१-४२ १/२॥

त्वामाह्वयति युद्धाय क्रोधनो नाम वानरः॥४३॥

विक्रान्ता बलवन्तश्च यथा यूथानि भागशः।

‘जो युद्ध के लिये सदा आपको ललकारता रहता है तथा जिसके पास बल-विक्रमशाली अनेक यूथपति रहते हैं और उन यूथपतियों के पास पृथक्-पृथक् बहुत-से यूथ हैं, वह ‘क्रोधन’ नाम से प्रसिद्ध वानर है॥ ४३ १/२॥

यस्तु गैरिकवर्णाभं वपुः पुष्यति वानरः॥४४॥

अवमत्य सदा सर्वान् वानरान् बलदर्पितः।

गवयो नाम तेजस्वी त्वां क्रोधादभिवर्तते॥४५॥

एनं शतसहस्राणि सप्ततिः पर्युपासते।

एषैवाशंसते लङ्कां स्वेनानीकेन मर्दितुम्॥४६॥

‘वह जो गेरु के समान लाल रंग के शरीर का पोषण करता है, उस तेजस्वी वानर का नाम ‘गवय’ है। उसे अपने बलपर बड़ा घमंड है। वह सदा सब वानरों का तिरस्कार किया करता है। देखिये, कितने रोष से वह आपकी ओर बढ़ा आ रहा है। इसकी सेवा में सत्तर लाख वानर रहते हैं। यह भी अपनी सेना के द्वारा लङ्का को धूल में मिला देने की इच्छा रखता है॥ ४४– ४६॥

एते दुष्प्रसहा वीरा येषां संख्या न विद्यते।

यूथपा यूथपश्रेष्ठास्तेषां यूथानि भागशः॥४७॥

‘ये सारे-के-सारे वानर दुःसह वीर हैं। इनकी गणना करना भी असम्भव है। यूथपतियों में श्रेष्ठ जो यूथप हैं, उन सबके अलग-अलग यूथ हैं’॥४७॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे षड्विंशः सर्गः॥२६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में छब्बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।२६॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
युद्धकाण्डम्

वानरसेना के प्रधान यूथपतियों का परिचय

सप्तविंशः सर्गः

सर्ग-27


तांस्तु ते सम्प्रवक्ष्यामि प्रेक्षमाणस्य यूथपान्।

राघवार्थे पराक्रान्ता ये न रक्षन्ति जीवितम्॥१॥

(सारण ने कहा-) ‘राक्षसराज! आप वानरसेना का निरीक्षण कर रहे हैं, इसलिये मैं आपको उन यूथपतियों का परिचय दे रहा हूँ, जो रघुनाथजी के लिये पराक्रम करने को उद्यत हैं और अपने प्राणों का मोह नहीं रखते हैं॥१॥

स्निग्धा यस्य बहुव्यामा दीर्घलाङ्गलमाश्रिताः।

ताम्राः पीताः सिताः श्वेताः प्रकीर्णा घोरकर्मणः॥२॥

प्रगृहीताः प्रकाशन्ते सूर्यस्येव मरीचयः।

पृथिव्यां चानुकृष्यन्ते हरो नामैष वानरः॥३॥

यं पृष्ठतोऽनुगच्छन्ति शतशोऽथ सहस्रशः।

वृक्षानुद्यम्य सहसा लङ्कारोहणतत्पराः॥४॥

यूथपा हरिराजस्य किंकराः समुपस्थिताः।

‘इधर यह हर नाम का वानर है। भयंकर कर्म करने वाले इस वानर की लंबी पूँछ पर लाल, पीले, भूरे और सफेद रंग के साढ़े तीन-तीन हाथ बड़े-बड़े चिकने रोएँ हैं। ये इधर-उधर फैले हुए रोम उठे होने के कारण सूर्य की किरणों के समान चमक रहे हैं तथा चलते समय भूमि पर लोटते रहते हैं। इसके पीछे वानरराज के किंकररूप सैकड़ों और हजारों यूथपति उपस्थित हो वृक्ष उठाये सहसा लङ्का पर आक्रमण करने के लिये चले आ रहे हैं॥२–४ १/२॥

नीलानिव महामेघांस्तिष्ठतो यांस्तु पश्यसि॥५॥

असिताञ्जनसंकाशान् युद्धे सत्यपराक्रमान्।

असंख्येयाननिर्देशान् परं पारमिवोदधेः॥६॥

पर्वतेषु च ये केचिद् विषयेषु नदीषु च।

एते त्वामभिवर्तन्ते राजन्नृक्षाः सुदारुणाः॥७॥

एषां मध्ये स्थितो राजन् भीमाक्षो भीमदर्शनः।

पर्जन्य इव जीमूतैः समन्तात् परिवारितः॥८॥

ऋक्षवन्तं गिरिश्रेष्ठमध्यास्ते नर्मदां पिबन्।

सर्वाणामधिपतिधूम्रो नामैष यूथपः॥९॥

‘उधर नील महामेघ और अञ्जन के समान काले रंग के जिन रीछों को आप खड़े देख रहे हैं, वे युद्ध में सच्चा पराक्रम प्रकट करनेवाले हैं। समुद्र के दूसरे तट पर स्थित हुए बालुका-कणों के समान इनकी गणना नहीं की जा सकती, इसीलिये पृथक्-पृथक् नाम लेकर इनके विषय में कुछ बताना सम्भव नहीं है। ये सब पर्वतों, विभिन्न देशों और नदियों के तटों पर रहते हैं। राजन्! ये अत्यन्त भयंकर स्वभाव वाले रीछ आप पर चढ़े आ रहे हैं। इनके बीच में इनका राजा खड़ा है, जिसकी आँखें बड़ी भयानक और जो दूसरों के देखने में भी बड़ा भयंकर जान पड़ता है। वह काले मेघों से घिरे हुए इन्द्र की भाँति चारों ओर से इन रीछों द्वारा घिरा हुआ है। इसका नाम धूम्र है। यह समस्त रीछों का राजा और यूथपति है। यह रीछराज धूम्र पर्वतश्रेष्ठ ऋक्षवान् पर रहता और नर्मदा का जल पीता है॥५-९॥

यवीयानस्य तु भ्राता पश्यैनं पर्वतोपमम्।

भ्रात्रा समानो रूपेण विशिष्टस्तु पराक्रमे॥१०॥

स एष जाम्बवान् नाम महायूथपयूथपः।

प्रशान्तो गुरुवर्ती च सम्प्रहारेष्वमर्षणः॥११॥

‘इस धूम्र के छोटे भाई जाम्बवान् हैं, जो महान् यूथपतियों के भी यूथपति हैं। देखिये ये कैसे पर्वताकार दिखायी देते हैं। ये रूप में तो अपने भाई के समान ही हैं; किंतु पराक्रम में उससे भी बढ़कर हैं। इनका स्वभाव शान्त है। ये बड़े भाई तथा गुरुजनों की आज्ञा के अधीन रहते हैं और उनकी सेवा करते हैं। युद्ध के अवसरों पर इनका रोष और अमर्ष बहुत बढ़ जाता है॥ १०-११॥

एतेन साह्यं तु महत् कृतं शक्रस्य धीमता।

दैवासुरे जाम्बवता लब्धाश्च बहवो वराः॥१२॥

‘इन बुद्धिमान् जाम्बवान् ने देवासुर-संग्राम में इन्द्र की बहुत बड़ी सहायता की थी और उनसे इन्हें बहुत-से वर भी प्राप्त हुए थे॥ १२ ॥

आरुह्य पर्वताग्रेभ्यो महाभ्रविपुलाः शिलाः।

मुञ्चन्ति विपुलाकारा न मृत्योरुद्विजन्ति च॥१३॥

राक्षसानां च सदृशाः पिशाचानां च रोमशाः।

एतस्य सैन्या बहवो विचरन्त्यमितौजसः॥१४॥

‘इनके बहुत-से सैनिक विचरते हैं, जिनके बलपराक्रम की कोई सीमा नहीं है। इन सबके शरीर बड़ी-बड़ी रोमावलियों से भरे हुए हैं। ये राक्षसों और पिशाचों के समान क्रूर हैं और बड़े-बड़े पर्वत शिखरों पर चढ़कर वहाँ से महान् मेघों के समान विशाल एवं विस्तृत शिलाखण्ड शत्रुओं पर छोड़ते हैं। इन्हें मृत्यु से कभी भय नहीं होता॥ १३-१४ ॥

य एनमभिसंरब्धं प्लवमानमवस्थितम्।

प्रेक्षन्ते वानराः सर्वे स्थिता यूथपयूथपम्॥१५॥

एष राजन् सहस्राक्षं पर्युपास्ते हरीश्वरः।

बलेन बलसंयुक्तो दम्भो नामैष यूथपः॥१६॥

‘जो खेल-खेल में ही कभी उछलता और कभी खड़ा होता है, वहाँ खड़े हुए सब वानर जिसकी ओर आश्चर्यपूर्वक देखते हैं, जो यूथपतियों का भी सरदार है और रोष से भरा दिखायी देता है, यह दम्भ नाम से प्रसिद्ध यूथपति है। इसके पास बहुत बड़ी सेना है। राजन्! यह वानरराज दम्भ अपनी सेना द्वारा ही सहस्राक्ष इन्द्र की उपासना करता है उनकी सहायता के लिये सेनाएँ भेजता रहता है॥१५-१६॥

यः स्थितं योजने शैलं गच्छन् पाइँन सेवते।

ऊर्ध्वं तथैव कायेन गतः प्राप्नोति योजनम्॥१७॥

यस्मात् तु परमं रूपं चतुष्पात्सु न विद्यते।

श्रुतः संनादनो नाम वानराणां पितामहः॥१८॥

येन युद्धं तदा दत्तं रणे शक्रस्य धीमता।

पराजयश्च न प्राप्तः सोऽयं यूथपयूथपः॥१९॥

‘जो चलते समय एक योजन दूर खड़े हुए पर्वत को भी अपने पार्श्वभाग से छू लेता है और एक योजन ऊँचे की वस्तुतक अपने शरीर से ही पहुँचकर उसे ग्रहण कर लेता है, चौपायों में जिससे बड़ा रूप कहीं नहीं है, वह वानर संनादन नाम से विख्यात है। उसे वानरों का पितामह कहा जाता है। उस बुद्धिमान् वानर ने किसी समय इन्द्र को अपने साथ युद्ध का अवसर दिया था, किंतु वह उनसे परास्त नहीं हुआ था, वही यह यूथपतियों का भी सरदार है॥ १७– १९॥

यस्य विक्रममाणस्य शक्रस्येव पराक्रमः।

एष गन्धर्वकन्यायामुत्पन्नः कृष्णवर्त्मना॥२०॥

तदा देवासुरे युद्धे साह्यार्थं त्रिदिवौकसाम्।

यत्र वैश्रवणो राजा जम्बूमुपनिषेवते॥२१॥

यो राजा पर्वतेन्द्राणां बहुकिंनरसेविनाम्।

विहारसुखदो नित्यं भ्रातुस्ते राक्षसाधिप॥२२॥

तत्रैष रमते श्रीमान् बलवान् वानरोत्तमः।

युद्धेष्वकत्थनो नित्यं क्रथनो नाम यूथपः॥२३॥

वृतः कोटिसहस्रेण हरीणां समवस्थितः।।

एषैवाशंसते लङ्कां स्वेनानीकेन मर्दितुम्॥२४॥

‘युद्ध के लिये जाते समय जिसका पराक्रम इन्द्र के समान दृष्टिगोचर होता है तथा देवताओं और असुरों के युद्ध में देवताओं की सहायता के लिये जिसे अग्निदेव ने एक गन्धर्व-कन्या के गर्भ से उत्पन्न किया था, वही यह क्रथन नामक यूथपति है। राक्षसराज! बहुत-से किन्नर जिनका सेवन करते हैं, उन बड़े-बड़े पर्वतों का जो राजा है और आपके भाई कुबेर को सदा विहार का सुख प्रदान करता है तथा जिसपर उगे हुए जामुन के वृक्ष के नीचे राजाधिराज कुबेर बैठा करते हैं, उसी पर्वत पर यह तेजस्वी बलवान् वानरशिरोमणि श्रीमान् क्रथन भी रमण करता है। यह युद्ध में कभी अपनी प्रशंसा नहीं करता और दस अरब वानरों से घिरा रहता है। यह भी अपनी सेना के द्वारा लङ्का को रौंद डालने का हौसला रखता है। २०–२४॥

यो गङ्गामनुपर्येति त्रासयन् गजयूथपान्।

हस्तिनां वानराणां च पूर्ववैरमनुस्मरन्॥२५॥

एष यूथपतिर्नेता गर्जन गिरिगुहाशयः।

गजान् रोधयते वन्यानारुजंश्च महीरुहान्॥२६॥

हरीणां वाहिनीमुख्यो नदीं हैमवतीमनु।

उशीरबीजमाश्रित्य मन्दरं पर्वतोत्तमम्॥२७॥

रमते वानरश्रेष्ठो दिवि शक्र इव स्वयम्।

एनं शतसहस्राणां सहस्रमभिवर्तते॥२८॥

वीर्यविक्रमदृप्तानां नर्दतां बाहुशालिनाम्।

स एष नेता चैतेषां वानराणां महात्मनाम्॥२९॥

स एष दुर्धरो राजन् प्रमाथी नाम यूथपः।

वातेनेवोद्धतं मेघं यमेनमनुपश्यसि ॥३०॥

अनीकमपि संरब्धं वानराणां तरस्विनाम्।

उद्धृतमरुणाभासं पवनेन समन्ततः॥३१॥

विवर्तमानं बहशो यत्रैतबहुलं रजः।

‘जो हाथियों और वानरों के पुराने* वैर का स्मरण करके गज-यूथपतियों को भयभीत करता हुआ गङ्गा के किनारे विचरा करता है, जंगली पेड़ों को तोड़ उखाड़कर उनके द्वारा हाथियों को आगे बढ़ने से रोक देता है, पर्वतों की कन्दरा में सोता और जोर-जोर से  गर्जना करता है, वानरयूथों का स्वामी तथा संचालक है, वानरों की सेना में जिसे प्रमुख वीर माना जाता है, जो गङ्गातट पर विद्यमान उशीरबीज नामक पर्वत तथा गिरिश्रेष्ठ मन्दराचल का आश्रय लेकर रहता एवं रमण करता है और जो वानरों में उसी प्रकार श्रेष्ठ स्थान रखता है जैसे स्वर्ग के देवताओं में साक्षात् इन्द्र, वही यह दुर्जय वीर प्रमाथी नामक यूथपति है। इसके साथ बल और पराक्रम पर गर्व रखकर गर्जना करने वाले दस करोड़ वानर रहते हैं, जो अपने बाहुबल से सुशोभित होते हैं। यह प्रमाथी इन सभी महात्मा वानरों का नेता है। वायु के वेग से उठे हुए मेघ की भाँति जिस वानर की ओर आप बारंबार देख रहे हैं, जिससे सम्बन्ध रखने वाले वेगशाली वानरों की सेना भी रोष से भरी दिखायी देती है तथा जिसकी सेना द्वारा उड़ायी गयी धूमिल रंग की बहुत बड़ी धूलिराशि वायु से सब ओर फैलकर जिसके निकट गिर रही है, वही यह प्रमाथी नामक वीर है॥ २५–३१ १/२॥

* हनुमान जी के पिता वानरराज केसरी ने शम्बसादन नामक राक्षस को, जो हाथी का रूप धारण करके आया था, मार डाला था। इसीसे पूर्वकाल में हाथियों से वानरों का वैर बँध गया था।

एतेऽसितमुखा घोरा गोलाङ्गला महाबलाः॥३२॥

शतं शतसहस्राणि दृष्ट्वा वै सेतुबन्धनम्।

गोलाङ्गुलं महाराज गवाक्षं नाम यूथपम्॥३३॥

परिवार्याभिनर्दन्ते लङ्कां मर्दितुमोजसा।

‘ये काले मुँहवाले लंगूरजाति के वानर हैं। इनमें महान् बल है। इन भयंकर वानरों की संख्या एक करोड़ है। महाराज! जिसने सेतु बाँधने में सहायता की है, उस लंगूरजाति के गवाक्ष नामक यूथपति को चारों

ओर से घेरकर ये वानर चल रहे हैं और लङ्का को बलपूर्वक कुचल डालने के लिये जोर-जोर से गर्जना करते हैं॥ ३२-३३ १/२॥

भ्रमराचरिता यत्र सर्वकालफलद्रुमाः॥३४॥

यं सूर्यस्तुल्यवर्णाभमनुपर्येति पर्वतम्।

यस्य भासा सदा भान्ति तद्वर्णा मृगपक्षिणः॥३५॥

यस्य प्रस्थं महात्मानो न त्यजन्ति महर्षयः।

सर्वकामफला वृक्षाः सदा फलसमन्विताः॥

मधूनि च महार्हाणि यस्मिन् पर्वतसत्तमे।

तत्रैष रमते राजन् रम्ये काञ्चनपर्वते॥३७॥

मुख्यो वानरमुख्यानां केसरी नाम यूथपः।

‘जिस पर्वत पर सभी ऋतुओं में फल देने वाले वृक्ष भ्रमरों से सेवित दिखायी देते हैं, सूर्यदेव अपने ही समान वर्णवाले जिस पर्वत की प्रतिदिन परिक्रमा करते हैं, जिसकी कान्ति से वहाँ के मृग और पक्षी सदा सुनहरे रंग के प्रतीत होते हैं, महात्मा महर्षिगण जिसके शिखर का कभी त्याग नहीं करते हैं, जहाँके सभी वृक्ष सम्पूर्ण मनोवाञ्छित वस्तुओंको फलके रूपमें प्रदान करते हैं और उनमें सदा फल लगे रहते हैं, जिस श्रेष्ठ शैलपर बहुमूल्य मधु उपलब्ध होता है, उसी रमणीय सुवर्णमय पर्वत महामेरुपर ये प्रमुख वानरों में प्रधान यूथपति केसरी रमण करते हैं॥ ३४– ३७ १/२॥

षष्टिर्गिरिसहस्राणि रम्याः काञ्चनपर्वताः॥३८॥

तेषां मध्ये गिरिवरस्त्वमिवानघ रक्षसाम्।

‘साठ हजार जो रमणीय सुवर्णमय पर्वत हैं, उनके बीच में एक श्रेष्ठ पर्वत है, जिसका नाम है सावर्णिमेरु। निष्पाप निशाचरपते! जैसे राक्षसोंमें आप श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार पर्वतोंमें वह सावर्णिमेरु उत्तम है॥ ३८ १/२॥

तत्रैके कपिलाः श्वेतास्ताम्रास्या मधुपिङ्गलाः॥३९॥

निवसन्त्यन्तिमगिरौ तीक्ष्णदंष्ट्रा नखायुधाः।

सिंहा इव चतुर्दष्ट्रा व्याघ्रा इव दुरासदाः॥४०॥

सर्वे वैश्वानरसमा ज्वलदाशीविषोपमाः।

सुदीर्घाञ्चितलाङ्गला मत्तमातङ्गसंनिभाः॥४१॥

महापर्वतसंकाशा महाजीमूतनिःस्वनाः।

वृत्तपिङ्गलनेत्रा हि महाभीमगतिस्वनाः॥४२॥

मर्दयन्तीव ते सर्वे तस्थुर्लङ्कां समीक्ष्य ते।

‘वहाँ जो पर्वतका अन्तिम शिखर है, उसपर कपिल (भूरे), श्वेत, लाल मुँहवाले और मधु के समान पिङ्गल वर्णवाले वानर निवास करते हैं, जिनके दाँत बड़े तीखे हैं और नख ही उनके आयुध हैं। वे सब सिंह के समान चार दाँतों वाले, व्याघ्र के समान दुर्जय, अग्नि के समान तेजस्वी और प्रज्वलित मुखवाले विषधर सर्प के समान क्रोधी होते हैं। उनकी पूँछ बहुत बड़ी ऊपर को ऊठी हुई और सुन्दर होती है। वे मतवाले हाथी के समान पराक्रमी, महान् पर्वत के समान ऊँचे और सुदृढ़ शरीर वाले तथा महान् मेघ के समान गम्भीर गर्जना करने वाले हैं। उनके नेत्र गोल-गोल एवं पिङ्गल वर्ण के होते हैं। उनके चलने पर बड़ा भयानक शब्द होता है। वे सभी वानर यहाँ आकर इस तरह खड़े हैं, मानो आपकी लङ्का को देखते ही मसल डालेंगे॥ ३९–४२ १/२ ॥

एष चैषामधिपतिर्मध्ये तिष्ठति वीर्यवान्॥४३॥

जयार्थी नित्यमादित्यमुपतिष्ठति वीर्यवान्।

नाम्ना पृथिव्यां विख्यातो राजन् शतबलीति यः॥४४॥

‘देखिये उनके बीच में यह उनका पराक्रमी सेनापति खड़ा है। यह बड़ा बलवान् है और विजय की प्राप्ति के लिये सदा सूर्यदेव की उपासना करता है। राजन् ! यह वीर इस भूमण्डल में शतबलि के नाम से विख्यात है॥ ४३-४४ ॥

एषैवाशंसते लङ्कां स्वेनानीकेन मर्दितुम्।

विक्रान्तो बलवान् शूरः पौरुषे स्वे व्यवस्थितः॥४५॥

रामप्रियार्थं प्राणानां दयां न कुरुते हरिः।

‘बलवान्, पराक्रमी तथा शूरवीर यह शतबलि भी अपने ही पुरुषार्थ के भरोसे युद्ध के लिये खड़ा है और अपनी सेना द्वारा लङ्कापुरी को मसल डालना चाहता है। यह वानरवीर श्रीरामचन्द्रजी का प्रिय करने के लिये अपने प्राणों पर भी दया नहीं करता है॥ ४५ १/२ ॥

गजो गवाक्षो गवयो नलो नीलश्च वानरः॥४६॥

एकैकमेव योधानां कोटिभिर्दशभिर्वृतः।

‘गज, गवाक्ष, गवय, नल और नील—इनमें से एक-एक सेनापति दस-दस करोड़ योद्धाओं से घिरा हुआ है॥ ४६ १/२॥

तथान्ये वानरश्रेष्ठा विन्ध्यपर्वतवासिनः।

न शक्यन्ते बहुत्वात् तु संख्यातुं लघुविक्रमाः॥४७॥

‘इसी तरह विन्ध्यपर्वतपर निवास करनेवाले और भी बहुत-से शीघ्र पराक्रमी श्रेष्ठ वानर हैं, जो अधिक होनेके कारण गिने नहीं जा सकते॥४७॥

सर्वे महाराज महाप्रभावाः सर्वे महाशैलनिकाशकायाः।

सर्वे समर्थाः पृथिवीं क्षणेन कर्तुं प्रविध्वस्तविकीर्णशैलाम्॥४८॥

‘महाराज! ये सभी वानर बड़े प्रभावशाली हैं। सभी के शरीर बड़े-बड़े पर्वतों के समान विशाल हैं और सभी क्षणभर में भूमण्डल के समस्त पर्वतों को चूर-चूर करके सब ओर बिखेर देने की शक्ति रखते हैं’॥४८॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे सप्तविंशः सर्गः॥२७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में सत्ताईसवाँ सर्ग पूरा हुआ।२७॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
युद्धकाण्डम्

शुक के द्वारा सुग्रीव के मन्त्रियों का, मैन्द और द्विविद का, हनुमान् का, श्रीराम, लक्ष्मण, विभीषण और सग्रीव का परि चय देना

अष्टाविंशः सर्गः

सर्ग-28


सारणस्य वचः श्रुत्वा रावणं राक्षसाधिपम्।

बलमादिश्य तत् सर्वं शुको वाक्यमथाब्रवीत्॥१॥

‘उस सारी वानरीसेना का परिचय देकर जब सारण चुप हो गया, तब उसका कथन सुनकर शुक ने राक्षसराज रावण से कहा— ॥१॥

स्थितान् पश्यसि यानेतान् मत्तानिव महाद्विपान्।

न्यग्रोधानिव गाङ्गेयान् सालान् हैमवतानिव॥२॥

एते दुष्प्रसहा राजन् बलिनः कामरूपिणः।

दैत्यदानवसंकाशा युद्धे देवपराक्रमाः॥३॥

‘राजन् ! जिन्हें आप मतवाले महागजराजों के समान वहाँ खड़ा देख रहे हैं, जो गङ्गातट के वटवृक्षों और हिमालय के सालवृक्षों के समान जान पड़ते हैं, इनका वेग दुस्सह है। ये इच्छानुसार रूप धारण करने वाले और बलवान् हैं। दैत्यों और दानवों के समान शक्तिशाली तथा युद्ध में देवताओं के समान पराक्रम प्रकट करने वाले हैं। २-३॥

एषां कोटिसहस्राणि नव पञ्च च सप्त च।

तथा शङ्कसहस्राणि तथा वृन्दशतानि च॥४॥

एते सुग्रीवसचिवाः किष्किन्धानिलयाः सदा।

हरयो देवगन्धर्वैरुत्पन्नाः कामरूपिणः॥५॥

‘इनकी संख्या इक्कीस कोटि सहस्र, सहस्र शङ्क और सौ वृन्द है*। ये सब-के-सब वानर सदा किष्किन्धा में रहने वाले सुग्रीव के मन्त्री हैं। इनकी उत्पत्ति देवताओं और गन्धर्वो से हुई है। ये सभी इच्छानुसार रूप धारण करने में समर्थ हैं। ४-५॥

* इन संख्याओं का स्पष्टीकरण इसी सर्ग के अन्त में दी हुई परिभाषा के अनुसार समझना चाहिये।

यौ तौ पश्यसि तिष्ठन्तौ कुमारौ देवरूपिणौ।

मैन्दश्च द्विविदश्चैव ताभ्यां नास्ति समो युधि॥

ब्रह्मणा समनुज्ञातावमृतप्राशिनावुभौ।

आशंसेते यथा लङ्कामेतौ मर्दितुमोजसा॥७॥

‘राजन्! आप इन वानरों में देवताओं के समान रूपवाले जिन दो वानरों को खड़ा देख रहे हैं उनके नाम हैं मैन्द और द्विविद। युद्ध में उनकी बराबरी करने वाला कोई नहीं है। ब्रह्माजी की आज्ञा से उन दोनों ने अमृतपान किया है। ये दोनों वीर अपने बलपराक्रम से लङ्का को कुचल डालने की इच्छा रखते हैं। ६-७॥

यं तु पश्यसि तिष्ठन्तं प्रभिन्नमिव कुञ्जरम्।

यो बलात् क्षोभयेत् क्रुद्धः समुद्रमपि वानरः॥८॥

एषोऽभिगन्ता लङ्कायां वैदेह्यास्तव च प्रभो।

एनं पश्य पुरा दृष्टं वानरं पुनरागतम्॥९॥

ज्येष्ठः केसरिणः पुत्रो वातात्मज इति श्रुतः।

हनूमानिति विख्यातो लङ्घितो येन सागरः॥१०॥

‘इधर जिसे आप मद की धारा बहाने वाले मतवाले हाथी की भाँति खड़ा देख रहे हैं, जो वानर कुपित होने पर समुद्र को भी विक्षुब्ध कर सकता है, जो लङ्का में आपके पास आया था और विदेहनन्दिनी सीता से मिलकर गया था, उसे देखिये। पहले का देखा हुआ यह वानर फिर आया है। यह केसरी का बड़ा पुत्र है। पवनपुत्र के भी नाम से विख्यात है। उसे लोग हनुमान् कहते हैं। इसी ने पहले समुद्र लाँघा था॥ ८ —१०॥

कामरूपो हरिश्रेष्ठो बलरूपसमन्वितः।

अनिवार्यगतिश्चैव यथा सततगः प्रभुः॥११॥

‘बल और रूप से सम्पन्न यह श्रेष्ठ वानर अपनी इच्छा के अनुसार रूप धारण कर सकता है। इसकी गति कहीं नहीं रुकती। यह वायु के समान सर्वत्र जा सकता है॥

उद्यन्तं भास्करं दृष्ट्वा बालः किल बुभुक्षितः।

त्रियोजनसहस्रं तु अध्वानमवतीर्य हि॥१२॥

आदित्यमाहरिष्यामि न मे क्षुत् प्रतियास्यति।

इति निश्चित्य मनसा पुप्लुवे बलदर्पितः॥१३॥

‘जब यह बालक था उस समय की बात है, एक दिन इसको बहुत भूख लगी थी। उस समय उगते हुए सूर्य को देखकर यह तीन हजार योजन ऊँचा उछल गया था। उस समय मन-ही-मन यह निश्चय करके कि ‘यहाँ के फल आदि से मेरी भूख नहीं जायगी, इसलिये सूर्य को (जो आकाश का दिव्य फल है) ले आऊँगा’ यह बलाभिमानी वानर ऊपर को उछला था॥ १२-१३॥

अनाधृष्यतमं देवमपि देवर्षिराक्षसैः।

अनासाद्यैव पतितो भास्करोदयने गिरौ॥१४॥

‘देवर्षि और राक्षस भी जिन्हें परास्त नहीं कर सकते, उन सूर्यदेवतक न पहुँचकर यह वानर उदयगिरिपर ही गिर पड़ा॥१४॥

पतितस्य कपेरस्य हनुरेका शिलातले।

किंचिद् भिन्ना दृढहनुर्हनूमानेष तेन वै॥१५॥

‘वहाँ के शिलाखण् डपर गिरने के कारण इस वानर की एक हनु (ठोढ़ी) कुछ कट गयी; साथ ही अत्यन्त दृढ़ हो गयी, इसलिये यह ‘हनुमान्’ नाम से प्रसिद्ध हुआ॥ १५॥

सत्यमागमयोगेन ममैष विदितो हरिः।

नास्य शक्यं बलं रूपं प्रभावो वानुभाषितुम्॥१६॥

एष आशंसते लङ्कामेको मथितुमोजसा।

येन जाज्वल्यतेऽसौ वै धूमकेतुस्तवाद्य वै।

लङ्कायां निहितश्चापि कथं विस्मरसे कपिम्॥१७॥

‘विश्वसनीय व्यक्तियों के सम्पर्क से मैंने इस वानर का वृत्तान्त ठीक-ठीक जाना है। इसके बल, रूप और प्रभाव का पूर्णरूप से वर्णन करना किसी के लिये भी असम्भव है। यह अकेला ही सारी लङ्का को मसल देना चाहता है। जिसे आपने लङ्का में रोक रखा था, उस अग्नि को भी जिसने अपनी पूँछ द्वारा प्रज्वलित करके सारी लङ्का जला डाली, उस वानर को आप भूलते कैसे हैं? ॥ १६-१७॥

यश्चैषोऽनन्तरः शूरः श्यामः पद्मनिभेक्षणः।

इक्ष्वाकूणामतिरथो लोके विश्रुतपौरुषः॥१८॥

‘हनुमान जी के पास ही जो कमल के समान नेत्रवाले साँवले शूरवीर विराज रहे हैं, वे इक्ष्वाकुवंश के अतिरथी हैं। इनका पौरुष सम्पूर्ण लोकों में प्रसिद्ध है॥ १८॥

यस्मिन् न चलते धर्मो यो धर्मं नातिवर्तते।

यो ब्राह्ममस्त्रं वेदांश्च वेद वेदविदां वरः॥१९॥

‘धर्म उनसे कभी अलग नहीं होता। ये धर्मका कभी उल्लङ्घन नहीं करते तथा ब्रह्मास्त्र और वेद दोनोंके ज्ञाता हैं। वेदवेत्ताओंमें इनका बहुत ऊँचा स्थान है॥ १९॥

यो भिन्द्याद् गगनं बाणैर्मेदिनीं वापि दारयेत्।

यस्य मृत्योरिव क्रोधः शक्रस्येव पराक्रमः॥२०॥

‘ये अपने बाणों से आकाश का भी भेदन कर सकते हैं, पृथ्वी को भी विदीर्ण करने की क्षमता रखते हैं। इनका क्रोध मृत्यु के समान और पराक्रम इन्द्र के तुल्य है॥२०॥

यस्य भार्या जनस्थानात् सीता चापि हृता त्वया।

स एष रामस्त्वां राजन् योद्धं समभिवर्तते॥२१॥

‘राजन्! जिनकी भार्या सीता को आप जनस्थान से हर लाये हैं, वे ही ये श्रीराम आपसे युद्ध करने के लिये सामने आकर खड़े हैं॥ २१॥

यस्यैष दक्षिणे पार्वे शुद्धजाम्बूनदप्रभः।

विशालवक्षास्ताम्राक्षो नीलकुञ्चितमूर्धजः॥२२॥

एषो हि लक्ष्मणो नाम भ्रातुः प्रियहिते रतः।

नये युद्धे च कुशलः सर्वशस्त्रभृतां वरः॥२३॥

‘उनके दाहिने भाग में जो ये शुद्ध सुवर्ण के समान कान्तिमान्, विशाल वक्षःस्थल से सुशोभित, कुछ कुछ लाल नेत्रवाले तथा मस्तक पर काले-काले धुंघराले केश धारण करने वाले हैं, इनका नाम लक्ष्मण है। ये अपने भाई के प्रिय और हित में लगे रहने वाले हैं, राजनीति और युद्ध में कुशल हैं तथा सम्पूर्ण शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ हैं।। २२-२३॥ ।

अमर्षी दुर्जयो जेता विक्रान्तश्च जयी बली।

रामस्य दक्षिणो बाहुर्नित्यं प्राणो बहिश्चरः॥२४॥

‘ये अमर्षशील, दुर्जय, विजयी, पराक्रमी, शत्रु को पराजित करने वाले तथा बलवान् हैं। लक्ष्मण सदा ही श्रीराम के दाहिने हाथ और बाहर विचरने वाले प्राण हैं॥

नह्येष राघवस्यार्थे जीवितं परिरक्षति।

एषैवाशंसते युद्धे निहन्तुं सर्वराक्षसान्॥२५॥

‘इन्हें श्रीरघुनाथजी के लिये अपने प्राणों की रक्षा का भी ध्यान नहीं रहता। ये अकेले ही युद्ध में सम्पूर्ण राक्षसों का संहार कर देने की इच्छा रखते हैं॥ २५ ॥

यस्तु सव्यमसौ पक्षं रामस्याश्रित्य तिष्ठति।

रक्षोगणपरिक्षिप्तो राजा ह्येष विभीषणः॥२६॥

श्रीमता राजराजेन लङ्कायामभिषेचितः।

त्वामसौ प्रतिसंरब्धो युद्धायैषोऽभिवर्तते॥२७॥

‘श्रीरामचन्द्रजी की बायीं ओर जो राक्षसों से घिरे हुए खड़े हैं, ये राजा विभीषण हैं। राजाधिराज श्रीराम ने इन्हें लङ्का के राज्य पर अभिषिक्त कर दिया है। अब ये आप पर कुपित होकर युद्ध के लिये सामने आ गये हैं॥

यं तु पश्यसि तिष्ठन्तं मध्ये गिरिमिवाचलम्।

सर्वशाखामृगेन्द्राणां भर्तारममितौजसम्॥२८॥

‘जिन्हें आप सब वानरों के बीच में पर्वत के समान अविचल भाव से खड़ा देखते हैं, वे समस्त वानरों के स्वामी अमित तेजस्वी सुग्रीव हैं॥ २८॥

तेजसा यशसा बुद्ध्या बलेनाभिजनेन च।

यः कपीनतिबभ्राज हिमवानिव पर्वतः॥२९॥

‘जैसे हिमालय सब पर्वतों में श्रेष्ठ है, उसी प्रकार वे तेज, यश, बुद्धि, बल और कुल की दृष्टि से समस्त वानरों में सर्वोपरि विराजमान हैं॥ २९॥

किष्किन्धां यः समध्यास्ते गुहां सगहनद्रुमाम्।

दुर्गा पर्वतदुर्गम्यां प्रधानैः सह यूथपैः॥३०॥

‘ये गहन वृक्षों से युक्त किष्किन्धा नामक दुर्गम गुफा में निवास करते हैं। पर्वतों के कारण उसमें प्रवेश करना अत्यन्त कठिन है। इनके साथ वहाँ प्रधानप्रधान यूथपति भी रहते हैं॥३०॥

यस्यैषा काञ्चनी माला शोभते शतपुष्करा।

कान्ता देवमनुष्याणां यस्यां लक्ष्मीः प्रतिष्ठिता॥

‘इनके गले में जो सौ कमलों की सुवर्णमयी माला सुशोभित है, उसमें सर्वदा लक्ष्मीदेवी का निवास है। उसे देवता और मनुष्य सभी पाना चाहते हैं॥ ३१॥

एतां मालां च तारां च कपिराज्यं च शाश्वतम्।

सुग्रीवो वालिनं हत्वा रामेण प्रतिपादितः॥३२॥

‘भगवान् श्रीराम ने वाली को मारकर यह माला, तारा और वानरों का राज्य—ये सब वस्तुएँ सुग्रीव को समर्पित कर दीं॥ ३२॥

शतं शतसहस्राणां कोटिमाहुर्मनीषिणः।

शतं कोटिसहस्राणां शङ्करित्यभिधीयते॥३३॥

‘मनीषी पुरुष सौ लाख की संख्या को एक कोटि कहते हैं और सौ सहस्र कोटि (एक नील)-को एक शङ्क कहा जाता है॥ ३३॥

शतं शङ्कसहस्राणां महाशङ्करिति स्मृतः।

महाशङ्कसहस्राणां शतं वृन्दमिहोच्यते॥ ३४॥

‘एक लाख शङ्क को महाशङ्क नाम दिया गया है। एक लाख महाशङ्कु को वृन्द कहते हैं ॥ ३४॥

शतं वृन्दसहस्राणां महावृन्दमिति स्मृतम्।

महावृन्दसहस्राणां शतं पद्ममिहोच्यते॥ ३५॥

‘एक लाख वृन्द का नाम महावृन्द है। एक लाख महावृन्द को पद्म कहते हैं॥ ३५ ॥

शतं पद्मसहस्राणां महापद्ममिति स्मृतम्।

महापद्मसहस्राणां शतं खर्वमिहोच्यते॥३६॥

‘एक लाख पद्म को महापद्म माना गया है। एक लाख महापद्म को खर्व कहते हैं॥ ३६॥

शतं खर्वसहस्राणां महाखर्वमिति स्मृतम्।

महाखर्वसहस्राणां समुद्रमभिधीयते।

शतं समुद्रसाहस्रमोघ इत्यभिधीयते॥३७॥

शतमोघसहस्राणां महौघा इति विश्रुतः।

‘एक लाख खर्व का महाखर्व होता है। एक सहस्र महाखर्व को समुद्र कहते हैं। एक लाख समुद्र को  ओघ कहते हैं और एक लाख ओघ की महौघ संज्ञा है॥ ३७ १/२॥

एवं कोटिसहस्रेण शङ्कनां च शतेन च।

महाशङ्कसहस्रेण तथा वृन्दशतेन च॥ ३८॥

महावृन्दसहस्रेण तथा पद्मशतेन च।

महापद्मसहस्रेण तथा खर्वशतेन च॥३९॥

समुद्रेण च तेनैव महौघेन तथैव च

एष कोटिमहौघेन समुद्रसदृशेन च॥४०॥

विभीषणेन वीरेण सचिवैः परिवारितः।

सुग्रीवो वानरेन्द्रस्त्वां युद्धार्थमनुवर्तते।

महाबलवृतो नित्यं महाबलपराक्रमः॥४१॥

‘इस प्रकार सहस्र कोटि, सौ शङ्क, सहस्रमहाशङ्क, सौ वृन्द, सहस्र महावृन्द, सौ पद्म, सहस्र महापद्म,सौ खर्व, सौ समुद्र, सौ महौघ तथा समुद्र-सदृश (सौ) कोटि महौघ सैनिकों से, वीर विभीषण से तथा अपने सचिवों से घिरे हुए वानरराज सुग्रीव आपको युद्ध के लिये ललकारते हुए सामने आ रहे हैं। विशाल सेना से घिरे हुए सुग्रीव महान् बल और पराक्रम से सम्पन्न हैं॥

इमां महाराज समीक्ष्य वाहिनी मुपस्थितां प्रज्वलितग्रहोपमाम्।

ततः प्रयत्नः परमो विधीयतां यथा जयः स्यान्न परैः पराभवः॥४२॥

‘महाराज! यह सेना एक प्रकाशमान ग्रह के समान है। इसे उपस्थित देख आप कोई ऐसा उपाय करें, जिससे आपकी विजय हो और शत्रुओं के सामने आपको नीचा न देखना पड़े’ ॥ ४२ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डेऽष्टाविंशः सर्गः ॥२८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में अट्ठाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ।२८॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
युद्धकाण्डम्

रावण का शुक और सारण को फटकारना,उसके भेजे गुप्तचरों का श्रीराम की दया से वानरों के चंगुल से छूटकर लङ्का में आना

एकोनत्रिंशः सर्गः

सर्ग-29


शुकेन तु समादिष्टान् दृष्ट्वा स हरियूथपान्।

लक्ष्मणं च महावीर्यं भुजं रामस्य दक्षिणम्॥१॥

समीपस्थं च रामस्य भ्रातरं च विभीषणम्।

सर्ववानरराजं च सुग्रीवं भीमविक्रमम्॥२॥

अङ्गदं चापि बलिनं वज्रहस्तात्मजात्मजम्।

हनूमन्तं च विक्रान्तं जाम्बवन्तं च दुर्जयम्॥३॥

सुषेणं कुमुदं नीलं नलं च प्लवगर्षभम्।

गजं गवाक्षं शरभं मैन्दं च द्विविदं तथा॥४॥

शुक के बताये अनुसार रावण ने समस्त यूथपतियों को देखकर श्रीराम की दाहिनी बाँह महापराक्रमी लक्ष्मण को, श्रीराम के निकट बैठे हुए अपने भाई विभीषण को, समस्त वानरों के राजा भयंकर पराक्रमी सुग्रीव को, इन्द्रपुत्र वाली के बेटे बलवान् अङ्गद को, बल-विक्रमशाली हनुमान् को, दुर्जय वीर जाम्बवान् को तथा सुषेण, कुमुद, नील, वानरश्रेष्ठ नल, गज, गवाक्ष, शरभ, मैन्द एवं द्विविद को भी देखा॥१-४॥

किंचिदाविग्नहृदयो जातक्रोधश्च रावणः।

भर्त्सयामास तौ वीरौ कथान्ते शुकसारणौ ॥५॥

उन सबको देखकर रावण का हृदय कुछ उद्विग्न हो उठा। उसे क्रोध आ गया और उसने बात समाप्त होने पर वीर शुक और सारण को फटकारा॥५॥

अधोमुखौ तौ प्रणतावब्रवीच्छुकसारणौ।

रोषगद्गदया वाचा संरब्धं परुषं तथा॥६॥

‘बेचारे शुक और सारण विनीत भाव से नीचे मुँह किये खड़े रहे और रावण ने रोषगद्गद वाणी में क्रोधपूर्वक यह कठोर बात कही-॥६॥

न तावत् सदृशं नाम सचिवैरुपजीविभिः।

विप्रियं नृपतेर्वक्तुं निग्रहे प्रग्रहे प्रभोः॥७॥

‘राजा निग्रह और अनुग्रह करने में भी समर्थ होता है। उसके सहारे जीविका चलाने वाले मन्त्रियों को ऐसी कोई बात नहीं कहनी चाहिये, जो उसे अप्रिय लगे॥७॥

रिपूणां प्रतिकूलानां युद्धार्थमभिवर्तताम्।

उभाभ्यां सदृशं नाम वक्तुमप्रस्तवे स्तवम्॥८॥

‘जो शत्रु अपने विरोधी हैं और युद्ध के लिये सामने आये हैं; उनकी बिना किसी प्रसङ्ग के ही स्तुति करना क्या तुम दोनों के लिये उचित था? ॥ ८॥

आचार्या गुरवो वृद्धा वृथा वां पर्युपासिताः।

सारं यद् राजशास्त्राणामनुजीव्यं न गृह्यते॥९॥

‘तुमलोगों ने आचार्य, गुरु और वृद्धों की व्यर्थ ही सेवा की है; क्योंकि राजनीति का जो संग्रहणीय सार है, उसे तुम नहीं ग्रहण कर सके॥९॥

गृहीतो वा न विज्ञातो भारोऽज्ञानस्य वाह्यते।

ईदृशैः सचिवैर्युक्तो मूखैर्दिष्ट्या धराम्यहम्॥१०॥

‘यदि तुमने उसे ग्रहण भी किया हो तो भी इस समय तुम्हें उसका ज्ञान नहीं रह गया है तुमने उसे भुला दिया है। तुमलोग केवल अज्ञान का बोझ ढो रहे हो। ऐसे मूर्ख मन्त्रियों के सम्पर्क में रहते हुए भी जो मैं अपने राज्य को सुरक्षित रख सका हूँ, यह सौभाग्य की ही बात है॥ १०॥

किं नु मृत्योर्भयं नास्ति मां वक्तुं परुषं वचः।

यस्य मे शासतो जिह्वा प्रयच्छति शुभाशुभम्॥

मैं इस राज्य का शासक हूँ। मेरी जिह्वा ही तुम्हें शुभ या अशुभ की प्राप्ति करा सकती है—मैं वाणीमात्र से तुम पर निग्रह और अनुग्रह कर सकता हूँ; फिर भी तुम दोनों ने मेरे सामने कठोर बात कहने का साहस किया। क्या तुम्हें मृत्यु का भय नहीं है? ॥ ११॥

अप्येव दहनं स्पृष्ट्वा वने तिष्ठन्ति पादपाः।

राजदण्डपरामृष्टास्तिष्ठन्ते नापराधिनः॥१२॥

‘वन में दावानल का स्पर्श करके भी वहाँ के वृक्ष खड़े रह जायँ, यह सम्भव है; परंतु राजदण्ड के अधिकारी अपराधी नहीं टिक सकते। वे सर्वथा नष्ट हो जाते हैं॥ १२॥

हन्यामहं त्विमौ पापौ शत्रुपक्षप्रशंसिनौ।

यदि पूर्वोपकारैर्मे क्रोधो न मृदुतां व्रजेत्॥१३॥

‘यदि इनके पहले के उपकारों को याद करके मेरा क्रोध नरम न पड़ जाता तो शत्रुपक्ष की प्रशंसा करने वाले इन दोनों पापियों को मैं अभी मार डालता॥ १३॥

अपध्वंसत नश्यध्वं संनिकर्षादितो मम।

नहि वां हन्तुमिच्छामि स्मराम्युपकृतानि वाम्।

हतावेव कृतघ्नौ द्वौ मयि स्नेहपराङ्मखौ॥१४॥

‘अब तुम दोनों मेरी सभा में प्रवेश के अधिकार से वञ्चित हो। मेरे पास से चले जाओ; फिर कभी मुझे अपना मुँह न दिखाना। मैं तुम दोनों का वध करना नहीं चाहता; क्योंकि तुम दोनों के किये हुए उपकारों को सदा स्मरण रखता हूँ। तुम दोनों मेरे स्नेह से विमुख और कृतघ्न हो, अतः मरे हुए के ही समान हो’ ॥ १४॥

एवमुक्तौ तु सव्रीडौ तौ दृष्ट्वा शुकसारणौ।

रावणं जयशब्देन प्रतिनन्द्याभिनिःसृतौ ॥१५॥

उसके ऐसा कहने पर शुक और सारण बहुत लज्जित हुए और जय-जयकार के द्वारा रावण का अभिनन्दन करके वहाँ से निकल गये॥ १५ ॥

अब्रवीच्च दशग्रीवः समीपस्थं महोदरम्।

उपस्थापय मे शीघ्रं चारानिति निशाचरः।

महोदरस्तथोक्तस्तु शीघ्रमाज्ञापयच्चरान्॥१६॥

इसके पश्चात् दशमुख रावण ने अपने पास बैठे हुए महोदर से कहा—’मेरे सामने शीघ्र ही गुप्तचरों को उपस्थित होने की आज्ञा दो।’ यह आदेश पाकर निशाचर महोदरने शीघ्र ही गुप्तचरों को हाजिर होने की आज्ञा दी॥ १६॥

ततश्चाराः संत्वरिताः प्राप्ताः पार्थिवशासनात्।

उपस्थिताः प्राञ्जलयो वर्धयित्वा जयाशिषः॥१७॥

राजा की आज्ञा पाकर गुप्तचर उसी समय विजयसूचक आशीर्वाद दे हाथ जोड़े सेवा में उपस्थित हुए॥१७॥

तानब्रवीत् ततो वाक्यं रावणो राक्षसाधिपः।

चारान् प्रत्यायिकान् शूरान् धीरान् विगतसाध्वसान्॥१८॥

वे सभी गुप्तचर विश्वासपात्र, शूरवीर, धीर एवं निर्भय थे। राक्षसराज रावण ने उनसे यह बात कही।

इतो गच्छत रामस्य व्यवसायं परीक्षितुम्।

मन्त्रेष्वभ्यन्तरा येऽस्य प्रीत्या तेन समागताः॥१९॥

‘तुमलोग अभी वानरसेना में राम का क्या निश्चय है, यह जानने के लिये तथा गुप्तमन्त्रणा में भाग लेने वाले जो उनके अन्तरङ्ग मन्त्री हैं और जो लोग प्रेमपूर्वक उनसे मिले हैं उनके मित्र हो गये हैं; उन सबके भी निश्चित विचार क्या हैं, इसकी जाँच करने के लिये यहाँ से जाओ॥ १९॥

कथं स्वपिति जागर्ति किमद्य च करिष्यति।

विज्ञाय निपुणं सर्वमागन्तव्यमशेषतः॥२०॥

‘वे कैसे सोते हैं? किस तरह जागते हैं और आज क्या करेंगे?—इन सब बातों का पूर्णरूप से अच्छी तरह पता लगाकर लौट आओ॥२०॥

चारेण विदितः शत्रुः पण्डितैर्वसुधाधिपैः।

युद्धे स्वल्पेन यत्नेन समासाद्य निरस्यते॥२१॥

‘गुप्तचर के द्वारा यदि शत्रु की गति-विधि का पता चल जाय तो बुद्धिमान् राजा थोड़े-से ही प्रयत्न के द्वारा युद्ध में उसे धर दबाते और मार भगाते हैं’।२१॥

चारास्तु ते तथेत्युक्त्वा प्रहृष्टा राक्षसेश्वरम्।

शार्दूलमग्रतः कृत्वा ततश्चक्रुः प्रदक्षिणम्॥२२॥

तब ‘बहुत अच्छा ‘ कहकर हर्ष में भरे हुए गुप्तचरों ने शार्दूल को आगे करके राक्षसराज रावण की परिक्रमा की॥ २२॥

ततस्तं तु महात्मानं चारा राक्षससत्तमम्।

कृत्वा प्रदक्षिणं जग्मुर्यत्र रामः सलक्ष्मणः॥२३॥

इस प्रकार वे गुप्तचर राक्षसशिरोमणि महाकाय रावण की परिक्रमा करके उस स्थान पर गये, जहाँ लक्ष्मणसहित श्रीराम विराजमान थे॥ २३॥

ते सुवेलस्य शैलस्य समीपे रामलक्ष्मणौ।

प्रच्छन्ना ददृशुर्गत्वा ससुग्रीवविभीषणौ ॥२४॥

सुवेल पर्वत के निकट जाकर उन गुप्तचरों ने छिपे रहकर श्रीराम, लक्ष्मण, सुग्रीव और विभीषण को देखा॥

प्रेक्षमाणाश्चमूं तां च बभूवुर्भयविह्वलाः।

ते तु धर्मात्मना दृष्टा राक्षसेन्द्रेण राक्षसाः॥२५॥

वानरों की उस सेना को देखकर वे भयसे व्याकुल हो उठे। इतने ही में धर्मात्मा राक्षसराज विभीषण ने उन सब राक्षसों को देख लिया॥ २५॥ ।

विभीषणेन तत्रस्था निगृहीता यदृच्छया।

शार्दूलो ग्राहितस्त्वेकः पापोऽयमिति राक्षसः॥२६॥

तब उन्होंने अकस्मात् वहाँ आये हुए राक्षसों को फटकारा और अकेले शार्दूल को यह सोचकर पकड़वा लिया कि यह राक्षस बड़ा पापी है ॥ २६॥

मोचितः सोऽपि रामेण वध्यमानः प्लवंगमैः।

आनृशंस्येन रामेण मोचिता राक्षसाः परे॥२७॥

फिर तो वानर उसे पीटने लगे। तब भगवान् श्रीराम ने दयावश उसे तथा अन्य राक्षसों को भी छुड़ा दिया॥२७॥

वानरैरर्दितास्ते तु विक्रान्तैर्लघुविक्रमैः।

पुनर्लङ्कामनुप्राप्ताः श्वसन्तो नष्टचेतसः॥२८॥

बल-विक्रमसम्पन्न शीघ्र पराक्रमी वानरों से पीड़ित हो उन राक्षसों के होश उड़ गये और वे हाँफते-हाँफते फिर लङ्का में जा पहुँचे॥२८॥

ततो दशग्रीवमुपस्थितास्ते चारा बहिर्नित्यचरा निशाचराः।

गिरेः सुवेलस्य समीपवासिनं न्यवेदयन् रामबलं महाबलाः॥२९॥

तदनन्तर रावण की सेवा में उपस्थित हो चर के वेश में सदा बाहर विचरने वाले उन महाबली निशाचरों ने यह सूचना दी कि श्रीरामचन्द्रजी की सेना सुवेल पर्वत के निकट डेरा डाले पड़ी है।॥ २९ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे एकोनत्रिंशः सर्गः॥ २९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में उन्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।२९॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
युद्धकाण्डम्

रावण के भेजे हुए गुप्तचरों एवं शार्दूल का उससे वानर-सेना का समाचार बताना और मुख्य-मुख्य वीरों का परिचय देना

त्रिंशः सर्गः

सर्ग-30


ततस्तमक्षोभ्यबलं लङ्काधिपतये चराः।

सुवेले राघवं शैले निविष्टं प्रत्यवेदयन्॥१॥

गुप्तचरों ने लङ्कापति रावण को यह बताया कि श्रीरामचन्द्रजी की सेना सुवेल पर्वत के पास आकर ठहरी है और वह सर्वथा अजेय है॥१॥

चाराणां रावणः श्रुत्वा प्राप्तं रामं महाबलम्।

जातोद्वेगोऽभवत् किंचिच्छार्दूलं वाक्यमब्रवीत् ॥२॥

गुप्तचरों के मुँह से यह सुनकर कि महाबली श्रीराम आ पहुँचे हैं; रावण को कुछ भय हो गया। वह शार्दूल से बोला— ॥२॥

अयथावच्च ते वर्णो दीनश्चासि निशाचर।

नासि कच्चिदमित्राणां क्रुद्धानां वशमागतः॥३॥

‘निशाचर! तुम्हारे शरीर की कान्ति पहले-जैसी नहीं रह गयी है। तुम दीन (दुःखी) दिखायी दे रहे हो। कहीं कुपित हुए शत्रुओं के वश में तो नहीं पड़ गये थे?’॥३॥

इति तेनानुशिष्टस्तु वाचं मन्दमुदीरयन्।

तदा राक्षसशार्दूलं शार्दूलो भयविक्लवः॥४॥

उसके इस प्रकार पूछने पर भय से  घबराये हुए शार्दूल ने राक्षसप्रवर रावण से मन्द स्वर में कहा— ॥४॥

न ते चारयितुं शक्या राजन् वानरपुङ्गवाः।

विक्रान्ता बलवन्तश्च राघवेण च रक्षिताः॥५॥

‘राजन्! उन श्रेष्ठ वानरों की गतिविधि का पता गुप्तचरों द्वारा नहीं लगाया जा सकता। वे बड़े पराक्रमी, बलवान् तथा श्रीरामचन्द्रजी के द्वारा सुरक्षित हैं॥ ५॥

नापि सम्भाषितुं शक्याः सम्प्रश्नोऽत्र न लभ्यते।

सर्वतो रक्ष्यते पन्था वानरैः पर्वतोपमैः॥६॥

‘उनसे वार्तालाप करना भी असम्भव है; अतः ‘आप कौन हैं, आपका क्या विचार है’ इत्यादि प्रश्नों के लिये वहाँ अवकाश ही नहीं मिलता। पर्वतों के समान विशालकाय वानर सब ओर से मार्ग की रक्षा करते हैं; अतः वहाँ प्रवेश होना भी कठिन ही है॥६॥

प्रविष्टमात्रे ज्ञातोऽहं बले तस्मिन् विचारिते।

बलाद् गृहीतो रक्षोभिर्बहुधास्मि विचारितः॥७॥

‘उस सेना में प्रवेश करके ज्यों ही उसकी गतिविधि का विचार करना आरम्भ किया, त्यों ही विभीषण के साथी राक्षसों ने मुझे पहचानकर बलपूर्वक पकड़ लिया और बारंबार इधर-उधर घुमाया॥७॥

जानुभिर्मुष्टिभिर्दन्तैस्तलैश्चाभिहतो भृशम्।

परिणीतोऽस्मि हरिभिर्बलमध्ये अमर्षणैः॥८॥

‘उस सेना के बीच अमर्ष से भरे हुए वानरों ने घुटनों, मुक्कों, दाँतों और थप्पड़ों से मुझे बहुत मारा और सारी सेना में मेरे अपराध की घोषणा करते हुए सब ओर मुझे घुमाया।

परिणीय च सर्वत्र नीतोऽहं रामसंसदि।

रुधिरस्राविदीनाङ्गो विह्वलश्चलितेन्द्रियः॥९॥

‘सर्वत्र घुमाकर मुझे श्रीराम के दरबार में ले जाया गया। उस समय मेरे शरीर से खून निकल रहा था और अङ्ग-अङ्ग में दीनता छा रही थी। मैं व्याकुल हो गया था। मेरी इन्द्रियाँ विचलित हो रही थीं॥९॥

हरिभिर्वध्यमानश्च याचमानः कृताञ्जलिः।

राघवेण परित्रातो मा मेति च यदृच्छया॥१०॥

‘वानर पीट रहे थे और मैं हाथ जोड़कर रक्षा के लिये याचना कर रहा था। उस दशा में श्रीराम ने अकस्मात् ‘मत मारो, मत मारो’ कहकर मेरी रक्षा की॥ १० ॥

एष शैलशिलाभिस्तु पूरयित्वा महार्णवम्।

द्वारमाश्रित्य लङ्काया रामस्तिष्ठति सायुधः ॥११॥

‘श्रीराम पर्वतीय शिलाखण्डों द्वारा समुद्र को पाटकर लङ्का के दरवाजे पर आ धमके हैं और हाथ में धनुष लिये खड़े हैं॥ ११॥

गरुडव्यूहमास्थाय सर्वतो हरिभिर्वृतः।

मां विसृज्य महातेजा लङ्कामेवातिवर्तते॥१२॥

‘वे महातेजस्वी रघुनाथजी गरुड़व्यूह का आश्रय ले वानरों के बीच में विराजमान हैं और मुझे विदा करके वे लङ्का पर चढ़े चले आ रहे हैं॥ १२॥

पुरा प्राकारमायाति क्षिप्रमेकतरं कुरु।

सीतां वापि प्रयच्छाशु युद्धं वापि प्रदीयताम्॥१३॥

‘जबतक वे लङ्का के परकोटे तक पहुँचें, उसके पहले ही आप शीघ्रतापूर्वक दो में से एक काम अवश्य कर डालिये—या तो उन्हें सीताजी को लौटा दीजिये या युद्धस्थल में खड़े होकर उनका सामना कीजिये।१३॥

मनसा तत् तदा प्रेक्ष्य तच्छ्रुत्वा राक्षसाधिपः।

शार्दूलं सुमहद्वाक्यमथोवाच स रावणः॥१४॥

उसकी बात सुनकर मन-ही-मन उस पर विचार करने के पश्चात् राक्षसराज रावण ने शार्दूल से यह महत्त्वपूर्ण बात कही- ॥१४॥

यदि मां प्रतियुध्यन्ते देवगन्धर्वदानवाः।

नैव सीतां प्रदास्यामि सर्वलोकभयादपि॥१५॥

‘यदि देवता, गन्धर्व और दानव मुझसे युद्ध करें और सम्पूर्ण लोक मुझे भय देने लगे तो भी मैं सीता को नहीं लौटाऊँगा’॥ १५॥

एवमुक्त्वा महातेजा रावणः पुनरब्रवीत्।

चरिता भवता सेना केऽत्र शूराः प्लवंगमाः॥१६॥

ऐसा कहकर महातेजस्वी रावण फिर बोला—’तुम तो वानरों की सेना में विचरण कर चुके हो; उसमें कौन-कौन-से वानर अधिक शूरवीर हैं? ॥ १६॥

किंप्रभाः कीदृशाः सौम्य वानरा ये दुरासदाः।

कस्य पुत्राश्च पौत्राश्च तत्त्वमाख्याहि राक्षस॥१७॥

‘सौम्य! जो दुर्जय वानर हैं, वे कैसे हैं? उनका प्रभाव कैसा है? तथा वे किसके पुत्र और पौत्र हैं? राक्षस! ये सब बातें ठीक-ठीक बताओ॥१७॥

तथात्र प्रतिपत्स्यामि ज्ञात्वा तेषां बलाबलम्।

अवश्यं खलु संख्यानं कर्तव्यं युद्धमिच्छता॥१८॥

‘उन वानरों का बलाबल जानकर तदनुसार कर्तव्य का निश्चय करूँगा। युद्ध की इच्छा रखने वाले पुरुष को अपने तथा शत्रुपक्ष की सेना की गणना उसके विषय की आवश्यक जानकारी अवश्य करनी चाहिये’॥ १८॥

अथैवमुक्तः शार्दूलो रावणेनोत्तमश्चरः।

इदं वचनमारेभे वक्तुं रावणसंनिधौ॥१९॥

रावण के इस प्रकार पूछने पर श्रेष्ठ गुप्तचर शार्दूल ने उसके समीप यों कहना आरम्भ किया— ॥ १९॥

अथर्भरजसः पुत्रो युधि राजन् सुदुर्जयः।

गद्गदस्याथ पुत्रोऽत्र जाम्बवानिति विश्रुतः॥२०॥

‘राजन् ! उस वानरसेना में जाम्बवान् नाम से प्रसिद्ध एक वीर है, जिसको युद्ध में परास्त करना बहुत ही कठिन है। वह ऋक्षरजा तथा गद्गद का पुत्र है॥ २०॥

गद्गदस्याथ पुत्रोऽन्यो गुरुपुत्रः शतक्रतोः।

कदनं यस्य पुत्रेण कृतमेकेन रक्षसाम्॥२१॥

‘गद्गद का एक दूसरा पुत्र भी है (जिसका नाम धूम्र है)। इन्द्र के गुरु बृहस्पति का पुत्र केसरी है, जिसके पुत्र हनुमान् ने अकेले ही यहाँ आकर पहले बहुत-से राक्षसों का संहार कर डाला था॥ २१॥

सुषेणश्चात्र धर्मात्मा पुत्रो धर्मस्य वीर्यवान्।

सौम्यः सोमात्मजश्चात्र राजन् दधिमुखः कपिः॥२२॥

‘धर्मात्मा और पराक्रमी सुषेण धर्म का पुत्र है। राजन्! दधिमुख नामक सौम्य वानर चन्द्रमा का बेटा है।॥ २२॥

सुमुखो दुर्मुखश्चात्र वेगदर्शी च वानरः।

मृत्युर्वानररूपेण नूनं सृष्टः स्वयंभुवा॥२३॥

‘सुमुख, दुर्मुख और वेगदर्शी नामक वानर-ये मृत्यु के पुत्र हैं। निश्चय ही स्वयम्भू ब्रह्मा ने मृत्यु की ही इन वानरों के रूप में सृष्टि की है॥ २३॥

पुत्रो हुतवहस्यात्र नीलः सेनापतिः स्वयम्।

अनिलस्य तु पुत्रोऽत्र हनूमानिति विश्रुतः॥ २४॥

‘स्वयं सेनापति नील अग्नि का पुत्र है। सुविख्यात वीर हनुमान् वायु का बेटा है॥ २४ ॥

नप्ता शक्रस्य दुर्धर्षों बलवानङ्गदो युवा।

मैन्दश्च द्विविदश्चोभौ बलिनावश्विसम्भवौ॥२५॥

‘बलवान् एवं दुर्जय वीर अङ्गद इन्द्र का नाती है। वह अभी नौजवान है। बलवान् वानर मैन्द और द्विविद—ये दोनों अश्विनीकुमारों के पुत्र हैं॥२५॥

पुत्रा वैवस्वतस्याथ पञ्च कालान्तकोपमाः।

गजो गवाक्षो गवयः शरभो गन्धमादनः॥२६॥

‘गज, गवाक्ष, गवय, शरभ और गन्धमादन-ये पाँच यमराज के पुत्र हैं और काल एवं अन्तक के समान पराक्रमी हैं॥ २६॥

दश वानरकोट्यश्च शूराणां युद्धकाङ्क्षिणाम्।

श्रीमतां देवपुत्राणां शेषं नाख्यातुमुत्सहे॥२७॥

‘इस प्रकार देवताओं से उत्पन्न हुए तेजस्वी शूरवीर वानरों की संख्या दस करोड़ है। वे सब-के-सब युद्ध की इच्छा रखने वाले हैं। इनके अतिरिक्त जो शेष वानर हैं, उनके विषय में मैं कुछ नहीं कह सकता; क्योंकि उनकी गणना असम्भव है॥२७॥

पुत्रो दशरथस्यैष सिंहसंहननो युवा।

दूषणो निहतो येन खरश्च त्रिशिरास्तथा॥२८॥

‘दशरथनन्दन श्रीराम का श्रीविग्रह सिंह के समान सुगठित है। इनकी युवावस्था है। इन्होंने अकेले ही खर-दूषण और त्रिशिरा का संहार किया था॥२८॥

नास्ति रामस्य सदृशे विक्रमे भुवि कश्चन।

विराधो निहतो येन कबन्धश्चान्तकोपमः॥२९॥

‘इस भूमण्डल में श्रीरामचन्द्रजी के समान पराक्रमी वीर दूसरा कोई नहीं है। इन्होंने ही विराध का और काल के समान विकराल कबन्ध का भी वध किया था॥

वक्तुं न शक्तो रामस्य गुणान् कश्चिन्नरः क्षितौ।

जनस्थानगता येन तावन्तो राक्षसा हताः॥३०॥

‘इस भूतल पर कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं है, जो श्रीराम के गुणों का पूर्णरूप से वर्णन कर सके। श्रीराम ने ही जनस्थान में उतने राक्षसों का संहार किया था। ३०॥

लक्ष्मणश्चात्र धर्मात्मा मातंगानामिवर्षभः।

यस्य बाणपथं प्राप्य न जीवेदपि वासवः॥३१॥

‘धर्मात्मा लक्ष्मण भी श्रेष्ठ गजराज के समान पराक्रमी हैं, उनके बाणों का निशाना बन जाने पर देवराज इन्द्र भी जीवित नहीं रह सकते॥३१॥

श्वेतो ज्योतिर्मुखश्चात्र भास्करस्यात्मसम्भवौ।

वरुणस्याथ पुत्रोऽथ हेमकूटः प्लवंगमः॥३१॥

‘इनके सिवा उस सेना में श्वेत और ज्योतिर्मुख—ये दो वानर भगवान् सूर्य के औरस पुत्र हैं। हेमकूट नाम का वानर वरुण का पुत्र बताया जाता है॥ ३२॥

विश्वकर्मसुतो वीरो नलः प्लवगसत्तमः।

विक्रान्तो वेगवानत्र वसुपुत्रः स दुर्धरः॥३३॥

‘वानरशिरोमणि वीरवर नल विश्वकर्मा के पुत्र हैं। वेगशाली और पराक्रमी दुर्धर वसु देवता का पुत्र है।

राक्षसानां वरिष्ठश्च तव भ्राता विभीषणः।

प्रतिगृह्य पुरीं लङ्कां राघवस्य हिते रतः॥३४॥

आपके भाई राक्षसशिरोमणि विभीषण भी लङ्कापुरी का राज्य लेकर श्रीरघुनाथजी के ही हितसाधन में तत्पर रहते हैं।

इति सर्वं समाख्यातं तथा वै वानरं बलम्।

सुवेलेऽधिष्ठितं शैले शेषकार्ये भवान् गतिः॥३५॥

‘इस प्रकार मैंने सुवेल पर्वत पर ठहरी हुई वानरसेना का पूरा-पूरा वर्णन कर दिया। अब जो शेष कार्य है, वह आपके ही हाथ है’* ॥ ३५ ॥

* इस सर्ग में जो वानरों के जन्म का वर्णन किया गया है, वह प्रायः बालकाण्ड के सत्रहवें सर्ग में किये गये वर्णन से विरुद्ध है। वहाँ वरुण से सुषेण, पर्जन्य से शरभ और कुबेर से गन्धमादन की उत्पत्ति कही गयी है। परंतु इस सर्ग में सुषेण को धर्म का तथा शरभ और गन्धमादन को वैवस्वत यम का पुत्र कहा गया है। इस विरोध का परिहार यही है कि यहाँ कहे गये सुषेण आदि बालकाण्डवर्णित सुषेण आदि से भिन्न हैं।

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे त्रिंशः सर्गः॥३०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥३०॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
युद्धकाण्डम्

मायारचित श्रीराम का कटा मस्तक दिखाकर रावण द्वारा सीता को मोह में डालने का प्रयत्न

एकत्रिंशः सर्गः

सर्ग-31


ततस्तमक्षोभ्यबलं लङ्कायां नृपतेश्चराः।

सुवेले राघवं शैले निविष्टं प्रत्यवेदयन्॥१॥

चाराणां रावणः श्रुत्वा प्राप्तं रामं महाबलम्।

जातोरेगोऽभवत् किंचित् सचिवानिदमब्रवीत्॥२॥

राक्षसराज रावण के गुप्तचरों ने जब लङ्का में लौटकर यह बताया कि श्रीरामचन्द्रजी की सेना सुवेल पर्वत पर आकर ठहरी है और उस पर विजय पाना असम्भव है, तब उन गुप्तचरों की बात सुनकर और महाबली श्रीराम आ गये, यह जानकर रावण को कुछ उद्वेग हुआ। उसने अपने मन्त्रियों से इस प्रकार कहा- ॥ १-२॥

मन्त्रिणः शीघ्रमायान्तु सर्वे वै सुसमाहिताः।

अयं नो मन्त्रकालो हि सम्प्राप्त इति राक्षसाः॥

‘मेरे सभी मन्त्री एकाग्रचित्त होकर शीघ्र यहाँ आ जायँ। राक्षसो! यह हमारे लिये गुप्त मन्त्रणा करने का अवसर आ गया है’ ॥३॥

तस्य तच्छासनं श्रुत्वा मन्त्रिणोऽभ्यागमन् द्रुतम्।

ततः स मन्त्रयामास राक्षसैः सचिवैः सह ॥४॥

रावण का आदेश सुनकर समस्त मन्त्री शीघ्रतापूर्वक वहाँ आ गये। तब रावण ने उन राक्षसजातीय सचिवों के साथ बैठकर आवश्यक कर्तव्य पर विचार किया॥४॥

मन्त्रयित्वा तु दुर्धर्षः क्षमं यत् तदनन्तरम्।

विसर्जयित्वा सचिवान् प्रविवेश स्वमालयम्॥

दुर्धर्ष वीर रावण ने जो उचित कर्तव्य था, उसके विषय में शीघ्र ही विचार-विमर्श करके उन सचिवों को विदा कर दिया और अपने भवन में प्रवेश किया।

ततो राक्षसमादाय विद्युज्जिवं महाबलम्।

मायाविनं महामायं प्राविशद् यत्र मैथिली॥६॥

फिर उसने महाबली, महामायावी, मायाविशारद राक्षस विद्युज्जिह्व को साथ लेकर उस प्रमदावन में प्रवेश किया, जहाँ मिथिलेशकुमारी सीता विद्यमान थीं॥६॥

विद्युज्जिवं च मायाज्ञमब्रवीद् राक्षसाधिपः।

मोहयिष्यावहे सीतां मायया जनकात्मजाम्॥७॥

उस समय राक्षसराज रावण ने माया जानने वाले विद्युज्जिह्व से कहा—’हम दोनों माया द्वारा जनकनन्दिनी सीता को मोहित करेंगे॥७॥

शिरो मायामयं गृह्य राघवस्य निशाचर।

मां त्वं समुपतिष्ठस्व महच्च सशरं धनुः॥८॥

‘निशाचर! तुम श्रीरामचन्द्रजी का मायानिर्मित मस्तक लेकर एक महान् धनुष-बाण के साथ मेरे पास आओ’॥

एवमुक्तस्तथेत्याह विद्युज्जिह्वो निशाचरः।

दर्शयामास तां मायां सुप्रयुक्तां स रावणे॥९॥

रावण की यह आज्ञा पाकर निशाचर विद्युज्जिह्व ने कहा—’बहुत अच्छा’। फिर उसने रावण को बड़ी कुशलता से प्रकट की हुई अपनी माया दिखायी॥९॥

तस्य तुष्टोऽभवद् राजा प्रददौ च विभूषणम्।

अशोकवनिकायां च सीतादर्शनलालसः॥१०॥

नैर्ऋतानामधिपतिः संविवेश महाबलः।

इससे राजा रावण उस पर बहुत प्रसन्न हुआ और उसे अपना आभूषण उतारकर दे दिया। फिर वह महाबली राक्षसराज सीताजी को देखने के लिये अशोकवाटिका में गया॥ १० १/२॥

ततो दीनामदैन्याहाँ ददर्श धनदानुजः॥११॥

अधोमुखीं शोकपरामुपविष्टां महीतले।

भर्तारं समनुध्यान्तीमशोकवनिकां गताम्॥१२॥

कुबेर के छोटे भाई रावण ने वहाँ सीता को दीनदशा में पड़ी देखा, जो उस दीनता के योग्य नहीं थीं। वे अशोक-वाटिका में रहकर भी शोकमग्न थीं और सिर नीचा किये पृथ्वी पर बैठकर अपने पतिदेव का चिन्तन कर रही थीं।

उपास्यमानां घोराभी राक्षसीभिरदूरतः।

उपसृत्य ततः सीतां प्रहर्षं नाम कीर्तयन्॥१३॥

इदं च वचनं धृष्टमुवाच जनकात्मजाम्।

उनके आसपास बहुत-सी भयंकर राक्षसियाँ बैठी थीं। रावण ने बड़े हर्ष के साथ अपना नाम बताते हुए जनककिशोरी सीता के पास जाकर धृष्टतापूर्ण वचनों में कहा- ॥ १३ १/२॥

सान्त्व्यमाना मया भद्रे यमाश्रित्य विमन्यसे॥१४॥

खरहन्ता स ते भर्ता राघवः समरे हतः।

‘भद्रे! मेरे बार-बार सान्त्वना देने और प्रार्थना करने पर भी तुम जिनका आश्रय लेकर मेरी बात नहीं मानती थीं, खर का वध करने वाले वे तुम्हारे पतिदेव श्रीराम समरभूमि में मारे गये॥ १४ १/२ ॥

छिन्नं ते सर्वथा मूलं दर्पश्च निहतो मया॥१५॥

व्यसनेनात्मनः सीते मम भार्या भविष्यसि।

विसृजैतां मतिं मूढे किं मृतेन करिष्यसि॥१६॥

‘तुम्हारी जो जड़ थी, सर्वथा कट गयी। तुम्हारे दर्प को मैंने चूर्ण कर दिया। अब अपने ऊपर आये हुए इस संकट से ही विवश होकर तुम स्वयं मेरी भार्या बन जाओगी। मूढ़ सीते! अब यह रामविषयक चिन्तन छोड़ दो। उस मरे हुए राम को लेकर क्या करोगी॥ १५-१६॥

भवस्व भद्रे भार्याणां सर्वासामीश्वरी मम।

अल्पपुण्ये निवृत्तार्थे मूढे पण्डितमानिनि।

शृणु भर्तृवधं सीते घोरं वृत्रवधं यथा॥१७॥

‘भद्रे! मेरी सब रानियों की स्वामिनी बन जाओ। मूढे! तुम अपने को बड़ी बुद्धिमती समझती थी न। तुम्हारा पुण्य बहुत कम हो गया था। इसीलिये ऐसा हुआ है। अब राम के मारे जाने से तुम्हारा जो उनकी प्राप्तिरूप प्रयोजन था, वह समाप्त हो गया। सीते! यदि सुनना चाहो तो वृत्रासुर के वध की भयंकर घटना के समान अपने पति के मारे जाने का घोर समाचार सुन लो॥ १७॥

समायातः समुद्रान्तं हन्तुं मां किल राघवः।

वानरेन्द्रप्रणीतेन बलेन महता वृतः॥१८॥

‘कहा जाता है राम मुझे मारने के लिये समुद्र के किनारे तक आये थे। उनके साथ वानरराज सुग्रीव की लायी हुई विशाल सेना भी थी॥ १८ ॥

संनिविष्टः समुद्रस्य पीड्य तीरमथोत्तरम्।

बलेन महता रामो व्रजत्यस्तं दिवाकरे॥१९॥

‘उस विशाल सेना के द्वारा राम समुद्र के उत्तर तट को दबाकर ठहरे। उस समय सूर्यदेव अस्ताचल को चले गये थे॥ १९॥

अथाध्वनि परिश्रान्तमर्धरात्रे स्थितं बलम्।

सुखसुप्तं समासाद्य चरितं प्रथमं चरैः॥२०॥

‘जब आधी रात हुई, उस समय रास्ते की थकी माँदी सारी सेना सुखपूर्वक सो गयी थी। उस अवस्था में वहाँ पहुँचकर मेरे गुप्तचरों ने पहले तो उसका भलीभाँति निरीक्षण किया॥ २० ॥

तत्प्रहस्तप्रणीतेन बलेन महता मम।

बलमस्य हतं रात्रौ यत्र रामः सलक्ष्मणः॥२१॥

‘फिर प्रहस्त के सेनापतित्व में वहाँ गयी हुई मेरी बहुत बड़ी सेना ने रात में , जहाँ राम और लक्ष्मण थे, उस वानर-सेना को नष्ट कर दिया॥२१॥

पट्टिशान् परिघांश्चक्रानृष्टीन् दण्डान् महायुधान्।

बाणजालानि शूलानि भास्वरान् कूटमुद्गरान्॥२२॥

यष्टीश्च तोमरान् प्रासांश्चक्राणि मुसलानि च।

उद्यम्योद्यम्य रक्षोभिर्वानरेषु निपातिताः॥२३॥

‘उस समय राक्षसों ने पट्टिश, परिघ, चक्र, ऋष्टि, दण्ड, बड़े-बड़े आयुध, बाणों के समूह, त्रिशूल, चमकीले कूट और मुद्गर, डंडे, तोमर, प्रास तथा मूसल उठा-उठाकर वानरों पर प्रहार किया था। २२-२३॥

अथ सुप्तस्य रामस्य प्रहस्तेन प्रमाथिना।

असक्तं कृतहस्तेन शिरश्छिन्नं महासिना॥२४॥

‘तदनन्तर शत्रुओं को मथ डालने वाले प्रहस्त ने, जिसके हाथ खूब सधे हुए हैं, बहुत बड़ी तलवार हाथ में लेकर उससे बिना किसी रुकावट के राम का मस्तक काट डाला॥ २४॥

विभीषणः समुत्पत्य निगृहीतो यदृच्छया।

दिशः प्रव्राजितः सैन्यैर्लक्ष्मणः प्लवगैः सह ॥२५॥

‘फिर अकस्मात् उछलकर उसने विभीषण को पकड़ लिया और वानर सैनिकोंसहित लक्ष्मण को विभिन्न दिशाओं में भाग जाने को विवश किया॥ २५ ॥

सुग्रीवो ग्रीवया सीते भग्नया प्लवगाधिपः।

निरस्तहनुकः सीते हनूमान् राक्षसैर्हतः॥२६॥

‘सीते! वानरराज सुग्रीव की ग्रीवा काट दी गयी, हनुमान् की हनु (ठोढ़ी) नष्ट करके उसे राक्षसों ने मार डाला॥ २६॥

जाम्बवानथ जानुभ्यामुत्पतन् निहतो युधि।

पट्टिशैर्बहुभिश्छिन्नो निकृत्तः पादपो यथा॥ २७॥

‘जाम्बवान् ऊपर को उछल रहे थे, उसी समय युद्धस्थल में राक्षसों ने बहुत-से पट्टिशों द्वारा उनके दोनों घुटनों पर प्रहार किया। वे छिन्न-भिन्न होकर कटे हुए पेड़ की भाँति धराशायी हो गये॥ २७॥

मैन्दश्च द्विविदश्चोभौ तौ वानरवरर्षभौ।

निःश्वसन्तौ रुदन्तौ च रुधिरेण परिप्लुतौ ॥२८॥

असिना व्यायतौ छिन्नौ मध्ये ह्यरिनिषूदनौ।

‘मैन्द और द्विविद दोनों श्रेष्ठ वानर खून से लथपथ होकर पड़े हैं। वे लंबी साँसें खींचते और रोते थे। उसी अवस्था में उन दोनों विशालकाय शत्रुसूदन वानरों को तलवार द्वारा बीच से ही काट डाला गया है।

अनुश्वसिति मेदिन्यां पनसः पनसो यथा॥२९॥

नाराचैर्बहुभिश्छिन्नः शेते दर्यां दरीमुखः।

कुमुदस्तु महातेजा निष्कूजन् सायकैर्हतः॥३०॥

‘पनस नामका वानर पककर फटे हुए पनस (कटहल) के समान पृथ्वी पर पड़ा-पड़ा अन्तिम साँसें ले रहा है। दरीमुख अनेक नाराचों से छिन्न-भिन्न हो किसी दरी (कन्दरा) में पड़ा सो रहा है। महातेजस्वी कुमुद सायकों से घायल हो चीखता चिल्लाता हुआ मर गया॥ २९-३० ॥

अङ्गदो बहुभिश्छिन्नः शरैरासाद्य राक्षसैः।

परितो रुधिरोद्गारी क्षितौ निपतितोऽङ्गदः॥३१॥

‘अङ्गदधारी अङ्गद पर आक्रमण करके बहुत-से राक्षसों ने उन्हें बाणों द्वारा छिन्न-भिन्न कर दिया है। वे सब अङ्गों से रक्त बहाते हुए पृथ्वी पर पड़े हैं॥३१॥

हरयो मथिता नागै रथजालैस्तथापरे।

शयाना मृदितास्तत्र वायुवेगैरिवाम्बुदाः॥ ३२॥

‘जैसे बादल वायु के वेग से फट जाते हैं, उसी प्रकार बड़े-बड़े हाथियों तथा रथसमूहों ने वहाँ सोये हुए वानरों को रौंदकर मथ डाला॥ ३२ ॥

प्रसृताश्च परे त्रस्ता हन्यमाना जघन्यतः।

अनुद्रुतास्तु रक्षोभिः सिंहैरिव महाद्विपाः॥३३॥

‘जैसे सिंह के खदेड़ने से बड़े-बड़े हाथी भागते हैं, उसी प्रकार राक्षसों के पीछा करने पर बहुत-से वानर पीठपर बाणों की मार खाते हुए भाग गये हैं॥ ३३॥

सागरे पतिताः केचित् केचिद् गगनमाश्रिताः।

ऋक्षा वृक्षानुपारूढा वानरी वृत्तिमाश्रिताः॥३४॥

‘कोई समुद्र में कूद पड़े और कोई आकाश में उड़ गये हैं। बहुत-से रीछ वानरी वृत्ति का आश्रय ले पेड़ों पर चढ़ गये हैं॥ ३४॥

सागरस्य च तीरेषु शैलेषु च वनेषु च।

पिङ्गलास्ते विरूपाक्ष राक्षसैर्बहवो हताः॥ ३५॥

‘विकराल नेत्रोंवाले राक्षसों ने इन बहुसंख्यक भूरे बंदरों को समुद्रतट, पर्वत और वनों में खदेड़ खदेड़कर मार डाला है।॥ ३५॥

एवं तव हतो भर्ता ससैन्यो मम सेनया।

क्षतजार्दै रजोध्वस्तमिदं चास्याहृतं शिरः॥३६॥

‘इस प्रकार मेरी सेनाने सैनिकोंसहित तुम्हारे पति को मौत के घाट उतार दिया। खून से भीगा और धूल में सना हुआ उनका यह मस्तक यहाँ लाया गया है’॥ ३६॥

ततः परमदुर्धर्षो रावणो राक्षसेश्वरः।

सीतायामुपशृण्वन्त्यां राक्षसीमिदमब्रवीत्॥३७॥

‘ऐसा कहकर अत्यन्त दुर्जय राक्षसराज रावण ने सीता के सुनते-सुनते एक राक्षसी से कहा- ॥ ३७॥

राक्षसं क्रूरकर्माणं विद्युज्जिवं समानय।

येन तद्राघवशिरः संग्रामात् स्वयमाहृतम्॥३८॥

‘तुम क्रूरकर्मा राक्षस विद्युज्जिह्व को बुला ले आओ, जो स्वयं संग्रामभूमि से राम का सिर यहाँ ले आया है।

विद्युज्जिह्वस्तदा गृह्य शिरस्तत्सशरासनम्।

प्रणामं शिरसा कृत्वा रावणस्याग्रतः स्थितः॥

तमब्रवीत् ततो राजा रावणो राक्षसं स्थितम्।

विद्युज्जिवं महाजिवं समीपपरिवर्तिनम्॥४०॥

तब विद्युज्जिह्व धनुषसहित उस मस्तक को लेकर आया और सिर झुका रावण को प्रणाम करके उसके सामने खड़ा हो गया। उस समय अपने पास खड़े हुए विशाल जिह्वावाले राक्षस विद्युज्जिह्व से राजा रावण यों बोला

अग्रतः कुरु सीतायाः शीघ्रं दाशरथेः शिरः।

अवस्थां पश्चिमां भर्तुः कृपणा साधु पश्यतु॥४१॥

‘तुम दशरथकुमार राम का मस्तक शीघ्र ही सीता के आगे रख दो, जिससे यह बेचारी अपने पति की अन्तिम अवस्था का अच्छी तरह दर्शन कर ले’। ४१॥

एवमुक्तं तु तद् रक्षः शिरस्तत् प्रियदर्शनम्।

उपनिक्षिप्य सीतायाः क्षिप्रमन्तरधीयत॥४२॥

रावण के ऐसा कहने पर वह राक्षस उस सुन्दर मस्तक को सीता के निकट रखकर तत्काल अदृश्य हो गया॥४२॥

रावणश्चापि चिक्षेप भास्वरं कार्मुकं महत्।

त्रिषु लोकेषु विख्यातं रामस्यैतदिति ब्रुवन्॥४३॥

रावण ने भी उस विशाल चमकीले धनुष को यह कहकर सीता के सामने डाल दिया कि यही राम का त्रिभुवनविख्यात धनुष है॥४३॥

इदं तत् तव रामस्य कार्मुकं ज्यासमावृतम्।

इह प्रहस्तेनानीतं तं हत्वा निशि मानुषम्॥४४॥

फिर बोला—’सीते! यही तुम्हारे राम का प्रत्यञ्चासहित धनुष है। रात के समय उस मनुष्य को मारकर प्रहस्त इस धनुष को यहाँ ले आया है’। ४४॥

स विद्युज्जिह्वेन सहैव तच्छिरो धनुश्च भूमौ विनिकीर्यमाणः।

विदेहराजस्य सुतां यशस्विनी ततोऽब्रवीत् तां भव मे वशानुगा॥४५॥

जब विद्युज्जिह्व ने मस्तक वहाँ रखा, उसके साथ ही रावण ने वह धनुष पृथ्वी पर डाल दिया। तत्पश्चात् वह विदेहराजकुमारी यशस्विनी सीता से बोला—’अब तुम मेरे वश में हो जाओ’ ॥ ४५ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे एकत्रिंशः सर्गः॥३१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में इकतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।३१॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
युद्धकाण्डम्

श्रीराम के मारे जाने का विश्वास करके सीता का विलाप तथा रावण का सभा में जाकर मन्त्रियों के सलाह से युद्ध-विषयक उद्योग करना

द्वात्रिंशः सर्गः

सर्ग-32


सा सीता तच्छिरो दृष्ट्वा तच्च कार्मुकमुत्तमम्।

सुग्रीवप्रतिसंसर्गमाख्यातं च हनूमता॥१॥

नयने मुखवर्णं च भर्तुस्तत्सदृशं मुखम्।

केशान् केशान्तदेशं च तं च चूडामणिं शुभम्॥२॥

एतैः सर्वैरभिज्ञानैरभिज्ञाय सुदुःखिता।

विजगहेऽत्र कैकेयीं क्रोशन्ती कुररी यथा॥३॥

सीताजी ने उस मस्तक और उस उत्तम धनुष को देखकर तथा हनुमान जी की कही हुई सुग्रीव के साथ मैत्री-सम्बन्ध होने की बात याद करके अपने पति के जैसे ही नेत्र, मुख का वर्ण, मुखाकृति, केश, ललाट और उस सुन्दर चूडामणि को लक्ष्य किया। इन सब चिह्नों से पति को पहचानकर वे बहुत दुखी हुईं और कुररी की भाँति रो-रोकर कैकेयी की निन्दा करने लगीं — ॥१-३॥

सकामा भव कैकेयि हतोऽयं कुलनन्दनः।

कुलमुत्सादितं सर्वं त्वया कलहशीलया॥४॥

‘कैकेयि! अब तुम सफलमनोरथ हो जाओ, रघुकुल को आनन्दित करने वाले ये मेरे पतिदेव मारे गये। तुम स्वभाव से ही कलहकारिणी हो। तुमने समस्त रघुकुल का संहार कर डाला॥४॥

आर्येण किं नु कैकेय्याः कृतं रामेण विप्रियम्।

यन्मया चीरवसनं दत्त्वा प्रव्राजितो वनम्॥५॥

‘आर्य श्रीराम ने कैकेयी का कौन-सा अपराध किया था, जिससे उसने इन्हें चीरवस्त्र देकर मेरे साथ वन में भेज दिया था’॥५॥

एवमुक्त्वा तु वैदेही वेपमाना तपस्विनी।

जगाम जगतीं बाला छिन्ना तु कदली यथा॥६॥

ऐसा कहकर दुःख की मारी तपस्विनी वैदेही बाला थर-थर काँपती हुई कटी कदली के समान पृथ्वी पर गिर पड़ीं॥६॥

सा मुहूर्तात् समाश्वस्य परिलभ्याथ चेतनाम्।

तच्छिरः समुपास्थाय विललापायतेक्षणा॥७॥

फिर दो घड़ी में उनकी चेतना लौटी और वे विशाललोचना सीता कुछ धीरज धारणकर उस मस्तक को अपने निकट रखकर विलाप करने लगीं – ॥ ७॥

हा हतास्मि महाबाहो वीरव्रतमनुव्रत।

इमां ते पश्चिमावस्थां गतास्मि विधवा कृता॥८॥

‘हाय! महाबाहो! मैं मारी गयी। आप वीरव्रत का पालन करने वाले थे। आपकी इस अन्तिम अवस्था को मुझे अपनी आँखों से देखना पड़ा। आपने मुझे विधवा बना दिया॥८॥

प्रथमं मरणं नार्या भर्तुर्वैगुण्यमुच्यते।

सुवृत्तः साधुवृत्तायाः संवृत्तस्त्वं ममाग्रतः॥९॥

‘स्त्री से पहले पति का मरना उसके लिये महान् अनर्थकारी दोष बताया जाता है। मुझ सती-साध्वी के रहते हुए मेरे सामने आप-जैसे सदाचारी पति का निधन हुआ, यह मेरे लिये महान् दुःख की बात है।

महद् दुःखं प्रपन्नाया मग्नायाः शोकसागरे।

यो हि मामुद्यतस्त्रातुं सोऽपि त्वं विनिपातितः॥१०॥

‘मैं महान् संकट में पड़ी हूँ, शोक के समुद्र में डूबी हूँ, जो मेरा उद्धार करने के लिये उद्यत थे, उन आप जैसे वीर को भी शत्रुओं ने मार गिराया॥१०॥

सा श्वश्रूर्मम कौसल्या त्वया पुत्रेण राघव।

वत्सेनेव यथा धेनुर्विवत्सा वत्सला कृता॥११॥

‘रघुनन्दन! जैसे कोई बछड़े के प्रति स्नेह से भरी हुई गाय को उस बछड़े से विलग कर दे, यही दशा मेरी सास कौसल्या की हुई है। वे दयामयी जननी आप जैसे पुत्र से बिछुड़ गयीं॥ ११॥

उद्दिष्टं दीर्घमायुस्ते दैवज्ञैरपि राघव।

अनृतं वचनं तेषामल्पायुरसि राघव॥१२॥

‘रघुवीर! ज्योतिषियों ने तो आपकी आयु बहुत बड़ी बतायी थी, किंतु उनकी बात झूठी सिद्ध हुई। रघुनन्दन! आप बड़े अल्पायु निकले॥ १२ ॥

अथवा नश्यति प्रज्ञा प्राज्ञस्यापि सतस्तव।

पचत्येनं तथा कालो भूतानां प्रभवो ह्ययम्॥१३॥

‘अथवा बुद्धिमान् होकर भी आपकी बुद्धि मारी गयी। तभी तो आप सोते हुए ही शत्रु के वश में पड़ गये अथवा यह काल ही समस्त प्राणियों के उद्भव में हेतु है। अतः वही प्राणिमात्र को पकाता है उन्हें शुभाशुभ कर्मों के फल से संयुक्त करता है॥ १३॥

अदृष्टं मृत्युमापन्नः कस्मात् त्वं नयशास्त्रवित्।

व्यसनानामुपायज्ञः कुशलो ह्यसि वर्जने॥१४॥

‘आप तो नीतिशास्त्र के विद्वान् थे। संकट से बचने के उपायों को जानते थे और व्यसनों के निवारण में कुशल थे तो भी कैसे आपको ऐसी मृत्यु प्राप्त हुई, जो दूसरे किसी वीर पुरुष को प्राप्त होती नहीं देखी गयी थी?॥

तथा त्वं सम्परिष्वज्य रौद्रयातिनृशंसया।

कालरात्र्या ममाच्छिद्य हृतः कमललोचन॥१५॥

‘कमलनयन! भीषण और अत्यन्त क्रूर कालरात्रि आपको हृदय से लगाकर मुझसे हठात् छीन ले गयी।

इह शेषे महाबाहो मां विहाय तपस्विनीम्।

प्रियामिव यथा नारी पृथिवीं पुरुषर्षभ॥१६॥

‘पुरुषोत्तम! महाबाहो! आप मुझ तपस्विनी को त्यागकर अपनी प्रियतमा नारी की भाँति इस पृथ्वी का आलिङ्गन करके यहाँ सो रहे हैं॥ १६॥

अर्चितं सततं यत्नाद् गन्धमाल्यैर्मया तव।

इदं ते मत्प्रियं वीर धनुः काञ्चनभूषितम्॥१७॥

‘वीर! जिसका मैं प्रयत्नपूर्वक गन्ध और पुष्पमाला आदि के द्वारा नित्यप्रति पूजन करती थी तथा जो मुझे बहुत प्रिय था, यह आपका वही स्वर्णभूषित धनुष

पित्रा दशरथेन त्वं श्वशुरेण ममानघ।

सर्वैश्च पितृभिः सार्धं नूनं स्वर्गे समागतः॥१८॥

‘निष्पाप रघुनन्दन ! निश्चय ही आप स्वर्ग में जाकर मेरे श्वशुर और अपने पिता महाराज दशरथ से तथा अन्य सब पितरों से भी मिले होंगे॥ १८॥

दिवि नक्षत्रभूतं च महत्कर्मकृतं तथा।

पुण्यं राजर्षिवंशं त्वमात्मनः समुपेक्षसे॥१९॥

‘आप पिताकी आज्ञा का पालनरूपी महान् कर्म करके अद्भुत पुण्य का उपार्जन कर यहाँ से अपने उस राजर्षिकुल की उपेक्षा करके (उसे छोड़कर) जा रहे हैं, जो आकाश में नक्षत्र* बनकर प्रकाशित होता है (आपको ऐसा नहीं करना चाहिये) ॥ १९॥

* इक्ष्वाकुवंश के राजा त्रिशंकु आकाश में नक्षत्र होकर प्रकाशित होते हैं, उन्हीं के कारण क्षत्रिन्याय से समस्त कुल को ही नक्षत्रकुल बताया है।

किं मां न प्रेक्षसे राजन् किं वा न प्रतिभाषसे।

बालां बालेन सम्प्राप्तां भार्यां मां सहचारिणीम्॥२०॥

‘राजन् ! आपने अपनी छोटी अवस्था में ही जब कि मेरी भी छोटी ही अवस्था थी, मुझे पत्नी रूप में प्राप्त किया। मैं सदा आपके साथ विचरने वाली सहधर्मिणी हूँ। आप मेरी ओर क्यों नहीं देखते हैं अथवा मेरी बात का उत्तर क्यों नहीं देते हैं? ॥ २० ॥

संश्रुतं गृह्णता पाणिं चरिष्यामीति यत् त्वया।

स्मर तन्नाम काकुत्स्थ नय मामपि दुःखिताम्॥२१॥

‘काकुत्स्थ! मेरा पाणिग्रहण करते समय जो आपने प्रतिज्ञा की थी कि मैं तुम्हारे साथ धर्माचरण करूँगा, उसका स्मरण कीजिये और मुझ दुःखिनीको भी साथ ही ले चलिये॥ २१॥

कस्मान्मामपहाय त्वं गतो गतिमतां वर।

अस्माल्लोकादमुं लोकं त्यक्त्वा मामपि दुःखिताम्॥२२॥

‘गतिमानों में श्रेष्ठ रघुनन्दन! आप मुझे अपने साथ वन में लाकर और यहाँ मुझ दुःखिनी को छोड़कर इस लोक से परलोक को क्यों चले गये? ॥ २२॥

कल्याणै रुचिरं गात्रं परिष्वक्तं मयैव तु।

क्रव्यादैस्तच्छरीरं ते नूनं विपरिकृष्यते॥२३॥

‘मैंने ही अनेक मङ्गलमय उपचारों से सुन्दर आपके जिस श्रीविग्रह का आलिङ्गन किया था, आज उसी को मांस-भक्षी हिंसक जन्तु अवश्य इधर-उधर घसीट रहे होंगे॥

अग्निष्टोमादिभिर्यज्ञैरिष्टवानाप्तदक्षिणैः।

अग्निहोत्रेण संस्कार केन त्वं न तु लप्स्यसे॥२४॥

‘आपने तो पर्याप्त दक्षिणाओं से युक्त अग्निष्टोम आदि यज्ञों द्वारा भगवान् यज्ञपुरुष की आराधना की है; फिर क्या कारण है कि अग्निहोत्र की अग्नि से दाहसंस्कार का सुयोग आपको नहीं मिल रहा है॥ २४॥

प्रव्रज्यामुपपन्नानां त्रयाणामेकमागतम्।

परिप्रेक्ष्यति कौसल्या लक्ष्मणं शोकलालसा॥२५॥

‘हम तीन व्यक्ति एक साथ वन में आये थे; परंतु अब शोकाकुल हुई माता कौसल्या केवल एक व्यक्ति लक्ष्मण को ही घर लौटा हुआ देख सकेंगी। २५॥

स तस्याः परिपृच्छन्त्या वधं मित्रबलस्य ते।

तव चाख्यास्यते नूनं निशायां राक्षसैर्वधम्॥२६॥

‘उनके पूछने पर लक्ष्मण उन्हें रात्रि के समय राक्षसों के हाथ से आपके मित्र की सेना के तथा सोते हुए आपके भी वध का समाचार अवश्य सुनायेंगे। २६॥

सा त्वां सुप्तं हतं ज्ञात्वा मां च रक्षोगृहं गताम्।

हृदयेनावदीर्णेन न भविष्यति राघव॥२७॥

‘रघुनन्दन! जब उन्हें यह ज्ञात होगा कि आप सोते समय मारे गये और मैं राक्षस के घर में हर लायी गयी हूँ तो उनका हृदय विदीर्ण हो जायगा और वे अपने प्राण त्याग देंगी॥ २७॥

मम हेतोरनार्याया अनघः पार्थिवात्मजः।

रामः सागरमुत्तीर्य वीर्यवान् गोष्पदे हतः॥२८॥

‘हाय! मुझ अनार्या के लिये निष्पाप राजकुमार श्रीराम, जो महान् पराक्रमी थे, समुद्रलङ्घन-जैसा महान् कर्म करके भी गाय की खुरी के बराबर जल में डूब गये—बिना युद्ध किये सोते समय मारे गये॥ २८॥

अहं दाशरथेनोढा मोहात् स्वकुलपांसनी।

आर्यपुत्रस्य रामस्य भार्या मृत्युरजायत॥२९॥

‘हाय! दशरथनन्दन श्रीराम मुझ-जैसी कुलकलङ्किनी नारी को मोहवश ब्याह लाये। पत्नी ही आर्यपुत्र श्रीराम के लिये मृत्युरूप बन गयी॥२९॥

नूनमन्यां मया जातिं वारितं दानमुत्तमम्।

याहमद्यैव शोचामि भार्या सर्वातिथेरिह॥३०॥

‘जिनके यहाँ सब लोग याचक बनकर आते थे एवं सभी अतिथि जिन्हें प्रिय थे, उन्हीं श्रीराम की पत्नी होकर जो मैं आज शोक कर रही हूँ, इससे जान पड़ता है कि मैंने दूसरे जन्म में निश्चय ही उत्तम दानधर्म में बाधा डाली थी॥३०॥

साधु घातय मां क्षिप्रं रामस्योपरि रावण।

समानय पति पत्न्या कुरु कल्याणमुत्तमम्॥३१॥

‘रावण! मुझे भी श्रीराम के शव के ऊपर रखकर मेरा वध करा डालो; इस प्रकार पति को पत्नी से मिला दो; यह उत्तम कल्याणकारी कार्य है, इसे अवश्य करो॥

शिरसा मे शिरश्चास्य कायं कायेन योजय।

रावणानुगमिष्यामि गतिं भर्तुर्महात्मनः॥३२॥

‘रावण! मेरे सिर से पति के सिर का और मेरे शरीर से उनके शरीर का संयोग करा दो। इस प्रकार मैं अपने महात्मा पति की गति का ही अनुसरण करूँगी’।

इतीव दुःखसंतप्ता विललापायतेक्षणा।

भर्तुः शिरो धनुश्चैव ददर्श जनकात्मजा॥३३॥

इस प्रकार दुःख से संतप्त हुई विशाललोचना जनकनन्दिनी सीता पति के मस्तक तथा धनुष को देखने और विलाप करने लगीं॥ ३३॥

एवं लालप्यमानायां सीतायां तत्र राक्षसः।

अभिचक्राम भर्तारमनीकस्थः कृताञ्जलिः॥३४॥

जब सीता इस तरह विलाप कर रही थीं, उसी समय वहाँ रावण की सेना का एक राक्षस हाथ जोड़े हुए अपने स्वामी के पास आया॥ ३४॥

विजयस्वार्यपुत्रेति सोऽभिवाद्य प्रसाद्य च।

न्यवेदयदनुप्राप्तं प्रहस्तं वाहिनीपतिम्॥३५॥

उसने ‘आर्यपुत्र महाराज की जय हो’ कहकर रावण का अभिवादन किया और उसे प्रसन्न करके यह सूचना दी कि ‘सेनापति प्रहस्त पधारे हैं ॥ ३५॥

अमात्यैः सहितः सर्वैः प्रहस्तस्त्वामुपस्थितः।

तेन दर्शनकामेन अहं प्रस्थापितः प्रभो॥३६॥

‘प्रभो! सब मन्त्रियों के साथ प्रहस्त महाराज की सेवा में उपस्थित हुए हैं। वे आपका दर्शन करना चाहते हैं, इसीलिये उन्होंने मुझे यहाँ भेजा है॥ ३६॥

नूनमस्ति महाराज राजभावात् क्षमान्वित।

किंचिदात्ययिकं कार्यं तेषां त्वं दर्शनं कुरु॥३७॥

‘क्षमाशील महाराज! निश्चय ही कोई अत्यन्त आवश्यक राजकीय कार्य आ पड़ा है, अतः आप उन्हें दर्शन देने का कष्ट करें? ॥ ३७॥

एतच्छ्रुत्वा दशग्रीवो राक्षसप्रतिवेदितम्।

अशोकवनिकां त्यक्त्वा मन्त्रिणां दर्शनं ययौ॥३८॥

राक्षस की कही हुई यह बात सुनकर दशग्रीव रावण अशोकवाटिका छोड़कर मन्त्रियों से मिलने के लिये चला गया॥ ३८॥

स तु सर्वं समथ्र्यैव मन्त्रिभिः कृत्यमात्मनः।

सभां प्रविश्य विदधे विदित्वा रामविक्रमम्॥३९॥

उसने मन्त्रियों से अपने सारे कृत्य का समर्थन कराया और श्रीरामचन्द्रजी के पराक्रम का पता लगाकर सभाभवन में प्रवेश करके वह प्रस्तुत कार्य की व्यवस्था करने लगा॥ ३९॥

अन्तर्धानं तु तच्छीर्षं तच्च कार्मुकमुत्तमम्।

जगाम रावणस्यैव निर्याणसमनन्तरम्॥४०॥

रावण के वहाँ से निकलते ही वह सिर और उत्तम धनुष दोनों अदृश्य हो गये॥ ४० ॥

राक्षसेन्द्रस्तु तैः सार्धं मन्त्रिभिर्भीमविक्रमैः।

समर्थयामास तदा रामकार्यविनिश्चयम्॥४१॥

राक्षसराज रावण ने अपने उन भयानक मन्त्रियों के साथ बैठकर राम के प्रति किये जाने वाले तत्कालोचितकर्तव्य का निश्चय किया॥४१॥

अविदूरस्थितान् सर्वान् बलाध्यक्षान् हितैषिणः।

अब्रवीत् कालसदृशं रावणो राक्षसाधिपः॥४२॥

फिर राक्षसराज रावण ने पास ही खड़े हुए अपने हितैषी सेनापतियों से इस प्रकार समयानुकूल बात कही-॥

शीघ्रं भेरीनिनादेन स्फुटं कोणाहतेन मे।

समानयध्वं सैन्यानि वक्तव्यं च न कारणम्॥४३॥

‘तुम सब लोग शीघ्र ही डंडे से पीट-पीटकर धौंसा बजाते हुए समस्त सैनिकों को एकत्र करो; परंतु उन्हें इसका कारण नहीं बताना चाहिये’ ॥४३॥

ततस्तथेति प्रतिगृह्य तद्रचस्तदैव दूताः सहसा महद् बलम्।

समानयंश्चैव समागतं च न्यवेदयन् भर्तरि युद्धकाङ्क्षिणि॥४४॥

तब दूतों ने ‘तथास्तु’ कहकर रावण की आज्ञा स्वीकार की और उसी समय सहसा विशाल सेना को एकत्र कर दिया; फिर युद्ध की अभिलाषा रखने वाले अपने स्वामी को यह सूचना दी कि ‘सारी सेना आ गयी’ ॥४४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे द्वात्रिंशः सर्गः॥३२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में बत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।३२॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
युद्धकाण्डम्

सरमा का सीता को सान्त्वना देना, रावण की माया का भेद खोलना, श्रीराम के आगमन और उनके विजयी होने का विश्वास दिलाना

त्रयस्त्रिंशः सर्गः

सर्ग-33


सीतां तु मोहितां दृष्ट्वा सरमा नाम राक्षसी।

आससादाथ वैदेहीं प्रियां प्रणयिनी सखीम्॥१॥

विदेहनन्दिनी सीता को मोह में पड़ी हुई देख सरमा नाम की राक्षसी उनके पास उसी तरह आयी, जैसे प्रेम रखने वाली सखी अपनी प्यारी सखी के पास जाती है।

मोहितां राक्षसेन्द्रेण सीतां परमदुःखिताम्।

आश्वासयामास तदा सरमा मृदुभाषिणी॥२॥

सीता राक्षसराज की माया से मोहित हो बड़े दुःख में पड़ गयी थीं। उस समय मृदुभाषिणी सरमा ने उन्हें अपने वचनों द्वारा सान्त्वना दी॥२॥

सा हि तत्र कृता मित्रं सीतया रक्ष्यमाणया।

रक्षन्ती रावणादिष्टा सानुक्रोशा दृढव्रता॥३॥

सरमा रावण की आज्ञा से सीताजी की रक्षा करती थी। उसने अपनी रक्षणीया सीता के साथ मैत्री कर ली थी। वह बड़ी दयालु और दृढ-संकल्प थी॥३॥

सा ददर्श सखी सीतां सरमा नष्टचेतनाम्।

उपावृत्योत्थितां ध्वस्तां वडवामिव पांसुषु॥४॥

सरमा ने सखी सीता को देखा। उनकी चेतना नष्ट-सी हो रही थी। जैसे परिश्रम से थकी हुई घोड़ी धरती की धूल में लोटकर खड़ी हुई हो, उसी प्रकार सीता भी पृथ्वी पर लोटकर रोने और विलाप करने के कारण धूलिधूसरित हो रही थीं॥ ४॥

तां समाश्वासयामास सखीस्नेहेन सुव्रताम्।

समाश्वसिहि वैदेहि मा भूत् ते मनसो व्यथा।

उक्ता यद् रावणेन त्वं प्रयुक्तश्च स्वयं त्वया॥

सखीस्नेहेन तद् भीरु मया सर्वं प्रतिश्रुतम्।

लीनया गहने शून्ये भयमुत्सृज्य रावणात्।

तव हेतोर्विशालाक्षि नहि मे रावणाद् भयम्॥

उसने एक सखी के स्नेह से उत्तम व्रत का पालन करने वाली सीता को आश्वासन दिया —’विदेहनन्दिनी! धैर्य धारण करो। तुम्हारे मन में व्यथा नहीं होनी चाहिये। भीरु! रावण ने तुमसे जो कुछ कहा है और स्वयं तुमने उसे जो उत्तर दिया है, वह सब मैंने सखी के प्रति स्नेह होने के कारण सुन लिया है। विशाललोचने! तुम्हारे लिये मैं रावण का भय छोड़कर अशोकवाटिका में सूने गहन स्थान में छिपकर सारी बातें सुन रही थी। मुझे रावण से कोई डर नहीं है॥५-६॥

स सम्भ्रान्तश्च निष्क्रान्तो यत्कृते राक्षसेश्वरः।

तत्र मे विदितं सर्वमभिनिष्क्रम्य मैथिलि॥७॥

‘मिथिलेशकुमारी! राक्षसराज रावण जिस कारण यहाँ से घबराकर निकल गया है, उसका भी मैं वहाँ जाकर पूर्णरूप से पता लगा आयी हूँ॥७॥

न शक्यं सौप्तिकं कर्तुं रामस्य विदितात्मनः।

वधश्च पुरुषव्याघ्र तस्मिन् नैवोपपद्यते॥८॥

‘भगवान् श्रीराम अपने स्वरूप को जानने वाले सर्वज्ञ परमात्मा हैं। उनका सोते समय वध करना किसी के लिये भी सर्वथा असम्भव है। पुरुषसिंह श्रीराम के विषय में इस तरह उनके वध होने की बात युक्तिसंगत नहीं जान पड़ती॥

न त्वेवं वानरा हन्तुं शक्याः पादपयोधिनः।

सुरा देवर्षभेणेव रामेण हि सुरक्षिताः॥९॥

‘वानरलोग वृक्षों के द्वारा युद्ध करने वाले हैं। उनका भी इस तरह मारा जाना कदापि सम्भव नहीं है; क्योंकि जैसे देवतालोग देवराज इन्द्रसे पालित होते हैं, उसी प्रकार ये वानर श्रीरामचन्द्रजी से भलीभाँति सुरक्षित हैं॥

दीर्घवृत्तभुजः श्रीमान् महोरस्कः प्रतापवान्।

धन्वी संनहनोपेतो धर्मात्मा भुवि विश्रुतः॥१०॥

विक्रान्तो रक्षिता नित्यमात्मनश्च परस्य च।

लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा कुलीनो नयशास्त्रवित् ॥११॥

हन्ता परबलौघानामचिन्त्यबलपौरुषः।

न हतो राघवः श्रीमान् सीते शत्रुनिबर्हणः॥१२॥

‘सीते! श्रीमान् राम गोलाकार बड़ी-बड़ी भुजाओं से सुशोभित, चौड़ी छातीवाले, प्रतापी, धनुर्धर, सुगठित शरीर से युक्त और भूमण्डल में सुविख्यात धर्मात्मा हैं। उनमें महान् पराक्रम है। वे भाई लक्ष्मण की सहायता से अपनी तथा दूसरे की भी रक्षा करने में समर्थ हैं। नीतिशास्त्र के ज्ञाता और कुलीन हैं। उनके बल और पौरुष अचिन्त्य हैं। वे शत्रुपक्ष के सैन्यसमूहों का संहार करने की शक्ति रखते हैं। शत्रुसूदन श्रीराम कदापि मारे नहीं गये हैं॥ १०– १२॥

अयुक्तबुद्धिकृत्येन सर्वभूतविरोधिना।

एवं प्रयुक्ता रौद्रेण माया मायाविना त्वयि॥१३॥

‘रावण की बुद्धि और कर्म दोनों ही बुरे हैं। वहसमस्त प्राणियों का विरोधी, क्रूर और मायावी है। उसने तुम पर यह माया का प्रयोग किया था (वह मस्तक और धनुष माया द्वारा रचे गये थे)॥ १३॥

शोकस्ते विगतः सर्वकल्याणं त्वामुपस्थितम्।

ध्रुवं त्वां भजते लक्ष्मीः प्रियं ते भवति शृणु॥१४॥

‘अब तुम्हारे शोक के दिन बीत गये। सब प्रकार से कल्याण का अवसर उपस्थित हुआ है। निश्चय ही लक्ष्मी तुम्हारा सेवन करती हैं। तुम्हारा प्रिय कार्य होने जा रहा है उसे बताती हूँ, सुनो॥ १४ ॥

उत्तीर्य सागरं रामः सह वानरसेनया।

संनिविष्टः समुद्रस्य तीरमासाद्य दक्षिणम्॥१५॥

‘श्रीरामचन्द्रजी वानरसेना के साथ समुद्र को लाँघकर इस पार आ रहे हैं। उन्होंने सागर के दक्षिणतट पर पड़ाव डाला है॥ १५ ॥

दृष्टो मे परिपूर्णार्थः काकुत्स्थः सहलक्ष्मणः।

सहितैः सागरान्तस्थैर्बलैस्तिष्ठति रक्षितः॥१६॥

‘मैंने स्वयं लक्ष्मणसहित पूर्णकाम श्रीराम का दर्शन किया है। वे समुद्रतट पर ठहरी हुई अपनी संगठित सेनाओं द्वारा सर्वथा सुरक्षित हैं॥१६॥

अनेन प्रेषिता ये च राक्षसा लघुविक्रमाः।

राघवस्तीर्ण इत्येवं प्रवृत्तिस्तैरिहाहृता॥१७॥

‘रावणने जो-जो शीघ्रगामी राक्षस भेजे थे, वे सब यहाँ यही समाचार लाये हैं कि ‘श्रीरघुनाथजी समुद्र को पार करके आ गये’ ॥ १७॥

स तां श्रुत्वा विशालाक्षि प्रवृत्तिं राक्षसाधिपः।

एष मन्त्रयते सर्वैः सचिवैः सह रावणः॥१८॥

‘विशाललोचने! इस समाचार को सुनकर यह राक्षसराज रावण अपने सभी मन्त्रियों के साथ गुप्त परामर्श कर रहा है’ ॥ १८॥

इति ब्रुवाणा सरमा राक्षसी सीतया सह।

सर्वोद्योगेन सैन्यानां शब्दं शुश्राव भैरवम्॥१९॥

जब राक्षसी सरमा सीता से ये बातें कह रही थी, उसी समय उसने युद्ध के लिये पूर्णतः उद्योगशील सैनिकों का भैरव नाद सुना॥ १९॥

दण्डनिर्घातवादिन्याः श्रुत्वा भेर्या महास्वनम्।

उवाच सरमा सीतामिदं मधुरभाषिणी॥२०॥

डंडे की चोट से बजने वाले धौंसे का गम्भीर नाद सुनकर मधुरभाषिणी सरमा ने सीता से कहा— ॥२०॥

संनाहजननी ह्येषा भैरवा भीरु भेरिका।

भेरीनादं च गम्भीरं शृणु तोयदनिःस्वनम्॥२१॥

‘भीरु ! यह भयानक भेरीनाद युद्ध के लिये तैयारी की सूचना दे रहा है। मेघ की गर्जना के समान रणभेरी का गम्भीर घोष तुम भी सुन लो॥२१॥

कल्प्यन्ते मत्तमातङ्गा युज्यन्ते रथवाजिनः।

दृश्यन्ते तुरगारूढाः प्रासहस्ताः सहस्रशः॥२२॥

‘मतवाले हाथी सजाये जा रहे हैं। रथ में घोड़े जोते जा रहे हैं और हजारों घुड़सवार हाथ में भाला लिये दृष्टिगोचर हो रहे हैं ॥ २२॥

तत्र तत्र च संनद्धाः सम्पतन्ति सहस्रशः।

आपूर्यन्ते राजमार्गाः सैन्यैरद्भुतदर्शनैः॥२३॥

वेगवद्भिर्नदद्भिश्च तोयौपैरिव सागरः।

‘जहाँ-तहाँ से युद्ध के लिये संनद्ध हुए सहस्रों सैनिक दौड़े चले आ रहे हैं। सारी सड़कें अद्भुत वेष में सजे और बड़े वेगसे गर्जना करते हुए सैनिकों से उसी तरह भरती जा रही हैं जैसे जल के असंख्य प्रवाह सागर में मिल रहे हों॥ २३ १/२॥

शस्त्राणां च प्रसन्नानां चर्मणां वर्मणां तथा॥२४॥

रथवाजिगजानां च राक्षसेन्द्रानुयायिनाम्।

सम्भ्रमो रक्षसामेष हृषितानां तरस्विनाम्॥२५॥

प्रभां विसृजतां पश्य नानावर्णसमुत्थिताम्।

वनं निर्दहतो घर्मे यथा रूपं विभावसोः॥२६॥

‘नाना प्रकार की प्रभा बिखेरने वाले चमचमाते हुए अस्त्र-शस्त्रों, ढालों और कवचों की वह चमक देखो। राक्षसराज रावण का अनुगमन करने वाले रथों, घोड़ों, हाथियों तथा रोमाञ्चित हुए वेगशाली राक्षसों में इस समय यह बड़ी हड़बड़ी दिखायी देती है। ग्रीष्म ऋतु में वन को जलाते हुए दावानल का जैसा जाज्वल्यमान रूप होता है, वैसी ही प्रभा इन अस्त्रशस्त्र आदि की दिखायी देती है॥ २४–२६॥

घण्टानां शृणु निर्घोषं रथानां शृणु निःस्वनम्।

हयानां हेषमाणानां शृणु तूर्यध्वनिं तथा॥ २७॥

‘हाथियों पर बजते हुए घण्टों का गम्भीर घोष सुनो, रथों की घर्घराहट सुनो और हिनहिनाते हुए घोड़ों तथा भाँति-भाँति के बाजों की आवाज भी सुन लो॥२७॥

उद्यतायुधहस्तानां राक्षसेन्द्रानुयायिनाम्।

सम्भ्रमो रक्षसामेष तुमुलो लोमहर्षणम्॥२८॥

श्रीस्त्वां भजति शोकनी रक्षसां भयमागतम्।

‘हाथों मे हथियार लिये रावण के अनुगामी राक्षसों में इस समय बड़ी घबराहट है। इससे यह जान लो कि उनपर कोई बड़ा भारी रोमाञ्चकारी भय उपस्थित हुआ है और शोक का निवारण करने वाली लक्ष्मी तुम्हारी सेवा में उपस्थित हो रही है॥ २८ १/२॥

रामः कमलपत्राक्षो दैत्यानामिव वासवः॥२९॥

अवजित्य जितक्रोधस्तमचिन्त्यपराक्रमः।

रावणं समरे हत्वा भर्ता त्वाधिगमिष्यति॥३०॥

‘तुम्हारे पति कमलनयन श्रीराम क्रोध को जीत चुके हैं। उनका पराक्रम अचिन्त्य है। वे दैत्यों को परास्त करने वाले इन्द्र की भाँति राक्षसों को हराकर समराङ्गण में रावण का वध करके तुम्हें प्राप्त कर लेंगे॥ २९-३०॥

विक्रमिष्यति रक्षःसु भर्ता ते सहलक्ष्मणः।

यथा शत्रुषु शत्रुघ्नो विष्णुना सह वासवः॥३१॥

‘जैसे शत्रुसूदन इन्द्र ने उपेन्द्र की सहायता से शत्रुओं पर पराक्रम प्रकट किया था, उसी प्रकार तुम्हारे पतिदेव श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण के सहयोग से राक्षसों पर अपने बलविक्रम का प्रदर्शन करेंगे॥३१॥

आगतस्य हि रामस्य क्षिप्रमङ्कागतां सतीम्।

अहं द्रक्ष्यामि सिद्धार्थां त्वां शत्रौ विनिपातिते॥३२॥

‘शत्रु रावण का संहार हो जाने पर मैं शीघ्र ही तुम जैसी सतीसाध्वी को यहाँ पधारे हुए श्रीरघुनाथजी की गोद में समोद बैठी देखूगी। अब शीघ्र ही तुम्हारा मनोरथ पूरा होगा॥ ३२॥

अस्राण्यानन्दजानि त्वं वर्तयिष्यसि जानकि।

समागम्य परिष्वक्ता तस्योरसि महोरसः॥३३॥

‘जनकनन्दिनि! विशाल वक्षःस्थल से विभूषित श्रीराम के मिलने पर उनकी छाती से लगकर तुम शीघ्र ही नेत्रों से आनन्द के आँसू बहाओगी॥ ३३॥

अचिरान्मोक्ष्यते सीते देवि ते जघनं गताम्।

धृतामेकां बहून् मासान् वेणी रामो महाबलः॥३४॥

‘देवि सीते! कई महीनों से तुम्हारे केशों की एक ही वेणी जटा के रूप में परिणत हो जो कटिप्रदेशतक लटक रही है, उसे महाबली श्रीराम शीघ्र ही अपने हाथों से खोलेंगे॥३४॥

तस्य दृष्ट्वा मुखं देवि पूर्णचन्द्रमिवोदितम्।

मोक्ष्यसे शोकजं वारि निर्मोकमिव पन्नगी॥३५॥

‘देवि! जैसे नागिन केंचुल छोड़ती है, उसी प्रकार तुम उदित हुए पूर्णचन्द्र के समान अपने पति का मुदित मुख देखकर शोक के आँसू बहाना छोड़ दोगी॥ ३५ ॥

रावणं समरे हत्वा नचिरादेव मैथिलि।

त्वया समग्रः प्रियया सुखार्हो लप्स्यते सुखम्॥३६॥

‘मिथिलेशकुमारी! समराङ्गण में शीघ्र ही रावण का वध करके सुख भोगने के योग्य श्रीराम सफलमनोरथ हो तुझ प्रियतमा के साथ मनोवाञ्छित सुख प्राप्त करेंगे।

सभाजिता त्वं रामेण मोदिष्यसि महात्मना।

सुवर्षेण समायुक्ता यथा सस्येन मेदिनी॥ ३७॥

‘जैसे पृथ्वी उत्तम वर्षासे अभिषिक्त होनेपर हरीभरी खेतीसे लहलहा उठती है, उसी प्रकार तुम महात्मा श्रीरामसे सम्मानित हो आनन्दमग्न हो जाओगी॥३७॥

गिरिवरमभितो विवर्तमानो हय इव मण्डलमाशु यः करोति।

तमिह शरणमभ्युपैहि देवि दिवसकरं प्रभवो ह्ययं प्रजानाम्॥३८॥

‘देवि! जो गिरिवर मेरु के चारों ओर घूमते हुए अश्व की भाँति शीघ्रतापूर्वक मण्डलाकार-गति से चलते हैं, उन्हीं भगवान् सूर्य की (जो तुम्हारे कुल के देवता हैं) तुम यहाँ शरण लो; क्योंकि ये प्रजाजनों को सुख देने तथा उनका दुःख दूर करने में समर्थ हैं’।३८॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे त्रयस्त्रिंशः सर्गः॥ ३३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में तैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥३३॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
युद्धकाण्डम्

सीता के अनुरोध से सरमा का उन्हें मन्त्रियोंसहित रावण का निश्चित विचार बताना

चतुस्त्रिंशः सर्गः

सर्ग-34


अथ तां जातसंतापां तेन वाक्येन मोहिताम्।

सरमा लादयामास महीं दग्धामिवाम्भसा॥१॥

रावण के पूर्वोक्त वचन से मोहित एवं संतप्त हुई सीता को सरमा ने अपनी वाणी द्वारा उसी प्रकार आह्लाद प्रदान किया, जैसे ग्रीष्म ऋतु के ताप से दग्ध हुई पृथ्वी को वर्षा-काल की मेघमाला अपने जल से आह्लादित कर देती है।

ततस्तस्या हितं सख्याश्चिकीर्षन्ती सखी वचः।

उवाच काले कालज्ञा स्मितपूर्वाभिभाषिणी॥२॥

तदनन्तर समय को पहचानने और मुसकराकर बात करने वाली सखी सरमा अपनी प्रिय सखी सीता का हित करने की इच्छा रखकर यह समयोचित वचन बोली

उत्सहेयमहं गत्वा त्वद्वाक्यमसितेक्षणे।

निवेद्य कुशलं रामे प्रतिच्छन्ना निवर्तितुम्॥३॥

‘कजरारे नेत्रोंवाली सखी! मुझमें यह साहस और उत्साह है कि मैं श्रीराम के पास जाकर तुम्हारा संदेश और कुशल-समाचार निवेदन कर दूँ और फिर छिपी हुई वहाँ से लौट आऊँ॥३॥

नहि मे क्रममाणाया निरालम्बे विहायसि।

समर्थो गतिमन्वेतुं पवनो गरुडोऽपि वा॥४॥

‘निराधार आकाश में तीव्र वेग से जाती हुई मेरी गति का अनुसरण करने में वायु अथवा गरुड़ भी समर्थ नहीं हैं।

एवं ब्रुवाणां तां सीता सरमामिदमब्रवीत्।

मधुरं श्लक्ष्णया वाचा पूर्वशोकाभिपन्नया॥५॥

ऐसी बात कहती हुई सरमा से सीता ने उस स्नेहभरी मधुर वाणी द्वारा जो पहले शोक से व्याप्त थी, इस प्रकार कहा— ॥ ५॥

समर्था गगनं गन्तुमपि च त्वं रसातलम्।

अवगच्छाद्य कर्तव्यं कर्तव्यं ते मदन्तरे॥६॥

‘सरमे! तुम आकाश और पाताल सभी जगह जाने में समर्थ हो। मेरे लिये जो कर्तव्य तुम्हें करना है, उसे अब बता रही हूँ, सुनो और समझो॥६॥

मत्प्रियं यदि कर्तव्यं यदि बुद्धिः स्थिरा तव।

ज्ञातुमिच्छामि तं गत्वा किं करोतीति रावणः॥७॥

‘यदि तुम्हें मेरा प्रिय कार्य करना है और यदि इस विषय में तुम्हारी बुद्धि स्थिर है तो मैं यह जानना चाहती हूँ कि रावण यहाँ से जाकर क्या कर रहा है? ॥ ७॥

स हि मायाबलः क्रूरो रावणः शत्रुरावणः।

मां मोहयति दुष्टात्मा पीतमात्रेव वारुणी॥८॥

‘शत्रुओं को रुलाने वाला रावण मायाबल से सम्पन्न है। वह दुष्टात्मा मुझे उसी प्रकार मोहित कर रहा है, जैसे वारुणी अधिक मात्रा में पी लेने पर वह पीने वाले को मोहित (अचेत) कर देती है॥८॥

तर्जापयति मां नित्यं भर्सापयति चासकृत्।

राक्षसीभिः सुघोराभिर्यो मां रक्षति नित्यशः॥९॥

‘वह राक्षस अत्यन्त भयानक राक्षसियों द्वारा प्रतिदिन मुझे डाँट बताता है, धमकाता है और सदा मेरी रखवाली करता है॥९॥

उद्विग्ना शङ्किता चास्मि न स्वस्थं च मनो मम।

तद्भयाच्चाहमुद्रिग्ना अशोकवनिकां गता॥१०॥

‘मैं सदा उससे उद्विग्न और शङ्कित रहती हूँ। मेरा चित्त स्वस्थ नहीं हो पाता। मैं उसी के भय से व्याकुल होकर अशोकवाटिका में चली आयी थी॥१०॥

यदि नाम कथा तस्य निश्चितं वापि यद्भवेत्।

निवेदयेथाः सर्वं तद् वरो मे स्यादनुग्रहः॥११॥

‘यदि मन्त्रियों के साथ उसकी बातचीत चल रही है तो वहाँ जो कुछ निश्चय हो अथवा रावण का जो निश्चित विचार हो, वह सब मुझे बताती रहो। यह मुझ पर तुम्हारी बहुत बड़ी कृपा होगी’ ॥ ११॥

साप्येवं ब्रुवतीं सीतां सरमा मृदुभाषिणी।

उवाच वदनं तस्याः स्पृशन्ती बाष्पविक्लवम्॥१२॥

ऐसी बातें कहती हुई सीता से मधुरभाषिणी सरमा ने उनके आँसुओं से भीगे हुए मुखमण्डल को हाथ से पोंछते हुए इस प्रकार कहा- ॥ १२॥ ।

एष ते यद्यभिप्रायस्तस्माद् गच्छामि जानकि।

गृह्य शत्रोरभिप्रायमुपावर्तामि मैथिलि॥१३॥

‘मिथिलेशकुमारी जनकनन्दिनि! यदि तुम्हारी यही इच्छा है तो मैं जाती हूँ और शत्रु के अभिप्राय को जानकर अभी लौटती हूँ’॥ १३॥

एवमुक्त्वा ततो गत्वा समीपं तस्य रक्षसः।

शुश्राव कथितं तस्य रावणस्य समन्त्रिणः॥१४॥

ऐसा कहकर सरमा ने उस राक्षस के समीप जाकर मन्त्रियोंसहित रावण की कही हुई सारी बातें सुनीं। १४॥

सा श्रुत्वा निश्चयं तस्य निश्चयज्ञा दुरात्मनः।

पुनरेवागमत् क्षिप्रमशोकवनिकां शुभाम्॥१५॥

उस दुरात्मा के निश्चय को सुनकर उसने अच्छी तरह समझ लिया और फिर वह शीघ्र ही सुन्दर अशोकवाटिका में लौट आयी॥ १५ ॥

सा प्रविष्टा ततस्तत्र ददर्श जनकात्मजाम्।

प्रतीक्षमाणां स्वामेव भ्रष्टपद्मामिव श्रियम्॥१६॥

वहाँ प्रवेश करके उसने अपनी ही प्रतीक्षा में बैठी हुई जनककिशोरी को देखा, जो उस लक्ष्मी के समान जान पड़ती थीं, जिसके हाथ का कमल कहीं गिर गया हो॥

तां तु सीता पुनः प्राप्तां सरमां प्रियभाषिणीम्।

परिष्वज्य च सुस्निग्धं ददौ च स्वयमासनम्॥१७॥

फिर लौटकर आयी हुई प्रियभाषिणी सरमा को बड़े स्नेह से गले लगाकर सीता ने स्वयं उसे बैठने के लिये आसन दिया और कहा- ॥ १७॥

इहासीना सुखं सर्वमाख्याहि मम तत्त्वतः।

क्रूरस्य निश्चयं तस्य रावणस्य दुरात्मनः॥१८॥

‘सखी! यहाँ सुख से बैठकर सारी बातें ठीक-ठीक बताओ। उस क्रूर एवं दुरात्मा रावण ने क्या निश्चय किया’॥

एवमुक्ता तु सरमा सीतया वेपमानया।

कथितं सर्वमाचष्ट रावणस्य समन्त्रिणः॥१९॥

काँपती हुई सीता के इस प्रकार पूछने पर सरमा ने मन्त्रियोंसहित रावण की कही हुई सारी बातें बतायीं

जनन्या राक्षसेन्द्रो वै त्वन्मोक्षार्थं बृहद्वचः।

अतिस्निग्धेन वैदेहि मन्त्रिवृद्धेन चोदितः॥२०॥

‘विदेहनन्दिनि! राक्षसराज रावण की माता ने तथा रावण के प्रति अत्यन्त स्नेह रखने वाले एक बूढ़े मन्त्री ने भी बड़ी-बड़ी बातें कहकर तुम्हें छोड़ देने के लिये रावण को प्रेरित किया॥२०॥

दीयतामभिसत्कृत्य मनुजेन्द्राय मैथिली।

निदर्शनं ते पर्याप्तं जनस्थाने यदद्भुतम्॥२१॥

‘राक्षसराज! तुम महाराज श्रीराम को सत्कारपूर्वक उनकी पत्नी सीता लौटा दो। जनस्थान में जो अद्भुत घटना घटित हुई थी, वही श्रीराम के पराक्रम को समझने के लिये पर्याप्त प्रमाण एवं उदाहरण है॥

२१॥

लङ्घनं च समुद्रस्य दर्शनं च हनूमतः।

वधं च रक्षसां युद्धे कः कुर्यान्मानुषो युधि॥२२॥

‘(उनके सेवकों में भी अद्भुत शक्ति है) हनुमान् ने जो समुद्र को लाँघा, सीता से भेंट की और युद्ध में बहुत-से राक्षसों का वध किया—यह सब कार्य दूसरा कौन मनुष्य कर सकता है ?’ ॥ २२ ॥

एवं स मन्त्रवृद्धैश्च मात्रा च बहुबोधितः।

न त्वामुत्सहते मोक्तुमर्थमर्थपरो यथा॥२३॥

‘इस प्रकार बूढ़े मन्त्रियों तथा माता के बहुत समझाने पर भी वह तुम्हें उसी तरह छोड़ने की इच्छा नहीं करता है, जैसे धन का लोभी धन को त्यागना नहीं चाहता है॥ २३॥

नोत्सहत्यमृतो मोक्तुं युद्धे त्वामिति मैथिलि।

सामात्यस्य नृशंसस्य निश्चयो ह्येष वर्तते॥२४॥

‘मिथिलेशकुमारी! वह युद्ध में मरे बिना तुम्हें छोड़ने का साहस नहीं कर सकता। मन्त्रियोंसहित उस नृशंस निशाचर का यही निश्चय है॥२४॥

तदेषा सुस्थिरा बुद्धिर्मृत्युलोभादुपस्थिता।

भयान्न शक्तस्त्वां मोक्तुमनिरस्तः स संयुगे॥२५॥

राक्षसानां च सर्वेषामात्मनश्च वधेन हि।

‘रावण के सिर पर काल नाच रहा है। इसलिये उसके मन में मृत्यु के प्रति लोभ पैदा हो गया है। यही कारण है कि तुम्हें न लौटाने के निश्चय पर उसकी बुद्धि सुस्थिर हो गयी है। वह जबतक युद्ध में राक्षसों के संहार और अपने वध के द्वारा (नष्ट) नहीं हो जायगा; केवल भय दिखाने से तुम्हें नहीं छोड़ सकता॥ २५ १/२॥

निहत्य रावणं संख्ये सर्वथा निशितैः शरैः।

प्रतिनेष्यति रामस्त्वामयोध्यामसितेक्षणे॥२६॥

‘कजरारे नेत्रोंवाली सीते! इसका परिणाम यही होगा कि भगवान् श्रीराम अपने सर्वथा तीखे बाणों से युद्धस्थल में रावण का वध करके तुम्हें अयोध्या को ले जायँगे’ ॥ २६॥

एतस्मिन्नन्तरे शब्दो भेरीशङ्खसमाकुलः।

श्रुतो वै सर्वसैन्यानां कम्पयन् धरणीतलम्॥२७॥

इसी समय भेरीनाद और शङ्खध्वनि से मिला हुआ समस्त सैनिकों का महान् कोलाहल सुनायी दिया, जो भूकम्प पैदा कर रहा था॥२७॥

श्रुत्वा तु तं वानरसैन्यनादं लङ्कागता राक्षसराजभृत्याः।

हतौजसो दैन्यपरीतचेष्टाः श्रेयो न पश्यन्ति नृपस्य दोषात्॥२८॥

वानरसैनिकों के उस भीषण सिंहनाद को सुनकर लङ्का में रहने वाले राक्षसराज रावण के सेवक हतोत्साह हो गये। उनकी सारी चेष्टा दीनता से व्याप्त हो गयी। रावण के दोष से उन्हें भी कोई कल्याण का उपाय नहीं दिखायी देता था।

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे चतुस्त्रिंशः सर्गः॥ ३४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में चौंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।३४॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
युद्धकाण्डम्

माल्यवान् का रावण को श्रीराम से संधि करने के लिये समझाना

पञ्चत्रिंशः सर्गः

सर्ग-35


तेन शङ्कविमिश्रेण भेरीशब्देन नादिना।

उपयाति महाबाहू रामः परपुरंजयः॥१॥

शत्रुनगरी पर विजय पाने वाले महाबाहु श्रीराम ने शङ्खध्वनि से मिश्रित हो तुमुल नाद करने वाली भेरी की आवाज के साथ लङ्का पर आक्रमण किया॥१॥

तं निनादं निशम्याथ रावणो राक्षसेश्वरः।

मुहूर्तं ध्यानमास्थाय सचिवानभ्युदैक्षत॥२॥

उस भेरीनाद को सुनकर राक्षसराज रावण ने दो घड़ी तक कुछ सोच-विचार करने के पश्चात् अपने मन्त्रियों की ओर देखा॥२॥

अथ तान् सचिवांस्तत्र सर्वानाभाष्य रावणः।

सभां संनादयन् सर्वामित्युवाच महाबलः॥३॥

जगत्संतापनः क्रूरोऽगर्हयन् राक्षसेश्वरः।

उन सब मन्त्रियों को सम्बोधित करके जगत् को संताप देने वाले, महाबली, क्रूर राक्षसराज रावण ने सारी सभा को प्रतिध्वनित करके किसी पर आक्षेप न करते हुए कहा- ॥ ३ १/२॥

तरणं सागरस्यास्य विक्रमं बलपौरुषम्॥४॥

यदुक्तवन्तो रामस्य भवन्तस्तन्मया श्रुतम्।

भवतश्चाप्यहं वेद्मि युद्धे सत्यपराक्रमान्।

तूष्णीकानीक्षतोऽन्योन्यं विदित्वा रामविक्रमम्॥

‘आपलोगों ने राम के पराक्रम, बल-पौरुष तथा समुद्र-लङ्घन की जो बात बतायी है, वह सब मैंने सुन ली; परंतु मैं तो आपलोगों को भी, जो इस समय राम के पराक्रम की बातें जानकर चुपचाप एकदूसरे का मुँह देख रहे हैं, संग्रामभूमि में सत्यपराक्रमी वीर समझता हूँ’॥ ४-५॥

ततस्तु सुमहाप्राज्ञो माल्यवान् नाम राक्षसः।

रावणस्य वचः श्रुत्वा इति मातामहोऽब्रवीत् ॥६॥

रावण के इस आक्षेपपूर्ण वचन को सुनने के पश्चात् महाबुद्धिमान् माल्यवान् नामक राक्षस ने, जो रावण का नाना था, इस प्रकार कहा— ॥६॥

विद्यास्वभिविनीतो यो राजा राजन् नयानुगः।

स शास्ति चिरमैश्वर्यमरीश्च कुरुते वशे॥७॥

‘राजन् ! जो राजा चौदहों विद्याओं में सुशिक्षित और नीति का अनुसरण करने वाला होता है, वह दीर्घकालतक राज्य का शासन करता है। वह शत्रुओं को भी वश में कर लेता है॥७॥

संदधानो हि कालेन विगृह्णश्चारिभिः सह।

स्वपक्षे वर्धनं कुर्वन्महदैश्वर्यमश्नुते॥८॥

‘जो समय के अनुसार आवश्यक होने पर शत्रुओं के साथ संधि और विग्रह करता है तथा अपने पक्ष की वृद्धि में लगा रहता है, वह महान् ऐश्वर्य का भागी होता है॥८॥

हीयमानेन कर्तव्यो राज्ञा संधिः समेन च।

न शत्रुमवमन्येत ज्यायान् कुर्वीत विग्रहम्॥९॥

‘जिस राजा की शक्ति क्षीण हो रही हो अथवा जो शत्रु के समान ही शक्ति रखता हो, उससे संधि कर लेनी चाहिये। अपने से अधिक या समान शक्तिवाले शत्रु का कभी अपमान न करे। यदि स्वयं ही शक्ति में बढ़ा-चढ़ा हो, तभी शत्रु के साथ वह युद्ध ठाने॥९॥

तन्मह्यं रोचते संधिः सह रामेण रावण।

यदर्थमभियुक्तोऽसि सीता तस्मै प्रदीयताम्॥१०॥

‘इसलिये रावण! मुझे तो श्रीराम के साथ संधि करना ही अच्छा लगता है। जिसके लिये तुम्हारे ऊपर आक्रमण हो रहा है, वह सीता तुम श्रीराम को लौटा दो॥

तस्य देवर्षयः सर्वे गन्धर्वाश्च जयैषिणः।

विरोधं मा गमस्तेन संधिस्ते तेन रोचताम्॥११॥

‘देखो देवता, ऋषि और गन्धर्व सभी श्रीराम की विजय चाहते हैं, अतः तुम उनसे विरोध न करो। उनके साथ संधि कर लेने की ही इच्छा करो॥ ११॥

असृजद् भगवान् पक्षौ दावेव हि पितामहः।

सुराणामसुराणां च धर्माधर्मों तदाश्रयौ॥१२॥

‘भगवान् ब्रह्मा ने सुर और असुर दो ही पक्षों की सृष्टि की है। धर्म और अधर्म ही इनके आश्रय हैं।१२॥

धर्मो हि श्रूयते पक्ष अमराणां महात्मनाम्।

अधर्मो रक्षसां पक्षो ह्यसुराणां च राक्षस॥१३॥

‘सुना जाता है महात्मा देवताओं का पक्ष धर्म है। राक्षसराज! राक्षसों और असुरों का पक्ष अधर्म है॥१३॥

धर्मो वै ग्रसतेऽधर्मं यदा कृतमभूद् युगम्।

अधर्मो ग्रसते धर्मं यदा तिष्यः प्रवर्तते॥१४॥

‘जब सत्ययुग होता है, तब धर्म बलवान् होकर अधर्म को ग्रस लेता है और जब कलियुग आता है, तब अधर्म ही धर्म को दबा देता है॥ १४॥

तत् त्वया चरता लोकान् धर्मोऽपि निहतो महान्।

अधर्मः प्रगृहीतश्च तेनास्मद् बलिनः परे॥१५॥

‘तुमने दिग्विजय के लिये सब लोकों में भ्रमण करते हुए महान् धर्म का नाश किया है और अधर्म को गले लगाया है, इसलिये हमारे शत्रु हमसे प्रबल हैं।

स प्रमादात् प्रवृद्धस्तेऽधर्मोऽहिर॑सते हि नः।

विवर्धयति पक्षं च सुराणां सुरभावनः॥१६॥

‘तुम्हारे प्रमाद से बढ़ा हुआ अधर्मरूपी अजगर अब हमें निगल जाना चाहता है और देवताओं द्वारा पालित धर्म उनके पक्ष की वृद्धि कर रहा है॥ १६॥

विषयेषु प्रसक्तेन यत्किंचित्कारिणा त्वया।

ऋषीणामग्निकल्पानामुढेगो जनितो महान्॥१७॥

‘विषयों में आसक्त होकर जो कुछ भी कर डालने वाले तुमने जो मनमाना आचरण किया है, इससे अग्नि के समान तेजस्वी ऋषियों को बड़ा ही उद्वेग प्राप्त हुआ है।॥ १७॥

तेषां प्रभावो दुर्धर्षः प्रदीप्त इव पावकः।

तपसा भावितात्मानो धर्मस्यानुग्रहे रताः॥१८॥

‘उनका प्रभाव प्रज्वलित अग्नि के समान दुर्धर्ष है। वे ऋषि-मुनि तपस्या के द्वारा अपने अन्तःकरण को शुद्ध करके धर्म के ही संग्रह में तत्पर रहते हैं॥ १८॥

मुख्यैर्यज्ञैर्यजन्त्येते तैस्तैर्यत्ते द्विजातयः।

जुह्वत्यग्नींश्च विधिवद् वेदांश्चोच्चैरधीयते॥१९॥

‘ये द्विजगण मुख्य-मुख्य यज्ञों द्वारा यजन करते, विधिवत् अग्नि में आहुति देते और उच्च स्वर से वेदों का पाठ करते हैं ॥ १९॥

अभिभूय च रक्षांसि ब्रह्मघोषानुदीरयन्।

दिशो विप्रद्रुताः सर्वाः स्तनयित्नुरिवोष्णगे॥२०॥

‘उन्होंने राक्षसों को अभिभूत करके वेदमन्त्रों की ध्वनि का विस्तार किया है, इसलिये ग्रीष्म ऋतु में मेघ की भाँति राक्षस सम्पूर्ण दिशाओं में भाग खड़े हुए हैं॥२०॥

ऋषीणामग्निकल्पानामग्निहोत्रसमुत्थितः।

आदत्ते रक्षसां तेजो धूमो व्याप्य दिशो दश॥२१॥

‘अग्नितुल्य तेजस्वी ऋषियों के अग्निहोत्र से प्रकट हुआ धूम दसों दिशाओं में व्याप्त होकर राक्षसों के तेज को हर लेता है॥ २१॥

तेषु तेषु च देशेषु पुण्येष्वेव दृढव्रतैः।

चर्यमाणं तपस्तीव्र संतापयति राक्षसान्॥२२॥

‘भिन्न-भिन्न देशों में पुण्य कर्मों में ही लगे रहकर दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रत का पालन करने वाले ऋषिलोग जो तीव्र तपस्या करते हैं, वही राक्षसों को संताप दे रही है॥ २२॥

देवदानवयक्षेभ्यो गृहीतश्च वरस्त्वया।

मनुष्या वानरा ऋक्षा गोलाङ्गला महाबलाः।

बलवन्त इहागम्य गर्जन्ति दृढविक्रमाः॥२३॥

‘तुमने देवताओं, दानवों और यक्षों से ही अवध्य होने का वर प्राप्त किया है, मनुष्य आदि से नहीं। परंतु यहाँ तो मनुष्य, वानर, रीछ और लंगूर आकर गरज रहे हैं। वे सब-के-सब हैं भी बड़े बलवान्, सैनिकशक्ति से सम्पन्न तथा सुदृढ़ पराक्रमी॥ २३॥

उत्पातान् विविधान् दृष्ट्वा घोरान् बहुविधान् बहून्।

विनाशमनुपश्यामि सर्वेषां रक्षसामहम्॥२४॥

‘नाना प्रकार के बहुत-से भयंकर उत्पातों को लक्ष्य करके मैं तो इन समस्त राक्षसों के विनाश का ही अवसर उपस्थित देख रहा हूँ॥२४॥

खराभिस्तनिता घोरा मेघाः प्रतिभयंकराः।

शोणितेनाभिवर्षन्ति लङ्कामुष्णेन सर्वतः॥२५॥

‘घोर एवं भयंकर मेघ प्रचण्ड गर्जन-तर्जन के साथ लङ्का पर सब ओर से गर्म खून की वर्षा कर रहे हैं। २५॥

रुदतां वाहनानां च प्रपतन्त्यश्रुबिन्दवः।

रजोध्वस्ता विवर्णाश्च न प्रभान्ति यथापुरम्॥२६॥

‘घोड़े-हाथी आदि वाहन रो रहे हैं और उनके नेत्रों से अश्रुविन्दु झर रहे हैं। दिशाएँ धूल भर जाने से मलिन हो अब पहले की भाँति प्रकाशित नहीं हो रही हैं ॥ २६॥

व्याला गोमायवो गृध्रा वाश्यन्ति च सुभैरवम्।

प्रविश्य लङ्कामारामे समवायांश्च कुर्वते॥२७॥

मांसभक्षी हिंसक पशु, गीदड़ और गीध भयंकर बोली बोलते हैं तथा लङ्का के उपवन में घुसकर झुंड बनाकर बैठते हैं ॥ २७॥

कालिकाः पाण्डुरैर्दन्तैः प्रहसन्त्यग्रतः स्थिताः।

स्त्रियः स्वप्नेषु मुष्णन्त्यो गृहाणि प्रतिभाष्य च॥२८॥

‘सपने में काले रंग की स्त्रियाँ अपने पीले दाँत दिखाती हुई सामने आकर खड़ी हो जाती और प्रतिकूल बातें कहकर घर के सामान चुराती हुई जोरजोर से हँसती हैं॥२८॥

गृहाणां बलिकर्माणि श्वानः पर्युपभुञ्जते।

खरा गोषु प्रजायन्ते मूषका नकुलेषु च॥२९॥

‘घरों में जो बलिकर्म किये जाते हैं, उस बलिसामग्री को कुत्ते खा जाते हैं। गौओं से गधे और नेवलों से चूहे पैदा होते हैं॥ २९॥

मार्जारा दीपिभिः सार्धं सूकराः शुनकैः सह।

किंनरा राक्षसैश्चापि समेयुर्मानुषैः सह॥३०॥

‘बाघों के साथ बिलाव, कुत्तों के साथ सूअर तथा राक्षसों और मनुष्यों के साथ किन्नर समागम करते

पाण्डुरा रक्तपादाश्च विहगाः कालचोदिताः।

राक्षसानां विनाशाय कपोता विचरन्ति च॥३१॥

‘जिनकी पाँखें सफेद और पंजे लाल हैं, वे कबूतर पक्षी दैवसे प्रेरित हो राक्षसों का भावी विनाश सूचित करने के लिये यहाँ सब ओर विचरते हैं॥३१॥

चीचीकूचीति वाशन्त्यः शारिका वेश्मसु स्थिताः।

पतन्ति ग्रथिताश्चापि निर्जिताः कलहैषिभिः॥३२॥

‘घरों में रहने वाली सारिकाएँ कलहकी इच्छावाले दूसरे पक्षियों से चें-चें करती हुई गुँथ जाती हैं और उनसे पराजित हो पृथ्वी पर गिर पड़ती हैं ॥ ३२॥

पक्षिणश्च मृगाः सर्वे प्रत्यादित्यं रुदन्ति ते।

करालो विकटो मुण्डः पुरुषः कृष्णपिङ्गलः॥३३॥

कालो गृहाणि सर्वेषां काले कालेऽन्ववेक्षते।

‘पक्षी और मृग सभी सूर्य की ओर मुंह करके रोते हैं। विकराल, विकट, काले और भूरे रंग के मूंड़ मुड़ाये हुए पुरुष का रूप धारण करके काल समयसमय पर हम सबके घरों की ओर देखता है॥ ३३ १/२॥

एतान्यन्यानि दुष्टानि निमित्तान्युत्पतन्ति च॥३४॥

विष्णुं मन्यामहे रामं मानुषं रूपमास्थितम्।

नहि मानुषमात्रोऽसौ राघवो दृढविक्रमः॥ ३५॥

येन बद्धः समुद्रे च सेतुः स परमाद्भुतः।

कुरुष्व नरराजेन संधिं रामेण रावण।

ज्ञात्वावधार्य कर्माणि क्रियतामायतिक्षमम्॥

‘ये तथा और भी बहुत-से अपशकुन हो रहे हैं। मैं ऐसा समझता हूँ कि साक्षात् भगवान् विष्णु ही मानवरूप धारण करके राम होकर आये हैं। जिन्होंने समुद्र में अत्यन्त अद्भुत सेतु बाँधा है, वे दृढपराक्रमी रघुवीर साधारण मनुष्यमात्र नहीं हैं। रावण! तुम नरराज श्रीराम के साथ संधि कर लो। श्रीराम के अलौकिक कर्मों और लङ्का में होने वाले उत्पातों को जानकर जो कार्य भविष्य में सुख देनेवाला हो, उसका निश्चय करके वही करो’॥

इदं वचस्तस्य निगद्य माल्यवान् परीक्ष्य रक्षोधिपतेर्मनः पुनः।

अनुत्तमेषूत्तमपौरुषो बली बभूव तूष्णीं समवेक्ष्य रावणम्॥३७॥

यह बात कहकर तथा राक्षसराज रावण के मनोभाव की परीक्षा करके उत्तम मन्त्रियों में श्रेष्ठ पौरुषशाली महाबली माल्यवान् रावण की ओर देखता हुआ चुप हो गया॥ ३७॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे पञ्चत्रिंशः सर्गः॥ ३५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में पैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।३५॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
युद्धकाण्डम्

माल्यवान् पर आक्षेप और नगर की रक्षा का प्रबन्ध करके रावण का अपने अन्तःपुर में जाना

षट्त्रिंशः सर्गः

सर्ग-36


तत् तु माल्यवतो वाक्यं हितमुक्तं दशाननः।

न मर्षयति दुष्टात्मा कालस्य वशमागतः॥१॥

दुष्टात्मा दशमुख रावण काल के अधीन हो रहा था, इसलिये माल्यवान् की कही हुई हितकर बात को भी वह सहन नहीं कर सका॥१॥

स बद्ध्वा भ्रुकुटिं वक्त्रे क्रोधस्य वशमागतः।

अमर्षात् परिवृत्ताक्षो माल्यवन्तमथाब्रवीत्॥२॥

वह क्रोध के वशीभूत हो गया। अमर्ष से उसके नेत्र घूमने लगे। उसने भौंहें टेढ़ी करके माल्यवान् से कहा – ॥२॥

हितबुद्ध्या यदहितं वचः परुषमुच्यते।

परपक्षं प्रविश्यैव नैतच्छ्रोत्रगतं मम॥३॥

‘तुमने शत्रु का पक्ष लेकर हित-बुद्धि से जो मेरे अहित की कठोर बात कही है, वह पूरी तौर से मेरे कानों तक नहीं पहुँची॥ ३॥

मानुषं कृपणं राममेकं शाखामृगाश्रयम्।

समर्थं मन्यसे केन त्यक्तं पित्रा वनाश्रयम्॥४॥

‘बेचारा राम एक मनुष्य ही तो है, जिसने सहारा लिया है कुछ बंदरों का। पिता के त्याग देने से उसने वन की शरण ली है। उसमें कौन-सी ऐसी विशेषता है, जिससे तुम उसे बड़ा सामर्थ्यशाली मान रहे हो॥ ४॥

रक्षसामीश्वरं मां च देवानां च भयंकरम्।

हीनं मां मन्यसे केन अहीनं सर्वविक्रमैः॥५॥

‘मैं राक्षसों का स्वामी तथा सभी प्रकार के पराक्रमों से सम्पन्न हूँ, देवताओं के मन में भी भय उत्पन्न करता हूँ; फिर किस कारण से तुम मुझे राम की अपेक्षा हीन समझते हो? ॥ ५ ॥

वीरद्वेषेण वा शङ्के पक्षपातेन वा रिपोः।

त्वयाहं परुषाण्युक्तो परप्रोत्साहनेन वा॥६॥

‘तुमने जो मुझे कठोर बातें सुनायी हैं, उनके विषयमें मुझे शङ्का है कि तुम या तो मुझ-जैसे वीरसे द्वेष रखते हो या शत्रुसे मिले हुए हो अथवा शत्रुओंनेऐसा कहने या करनेके लिये तुम्हें प्रोत्साहन दिया है। ६॥

प्रभवन्तं पदस्थं हि परुषं कोऽभिभाषते।

पण्डितः शास्त्रतत्त्वज्ञो विना प्रोत्साहनेन वा॥७॥

‘जो प्रभावशाली होने के साथ ही अपने राज्य पर प्रतिष्ठित है, ऐसे पुरुष को कौन शास्त्रतत्त्वज्ञ विद्वान् शत्रु का प्रोत्साहन पाये बिना कटु वचन सुना सकता है?॥

आनीय च वनात् सीतां पद्महीनामिव श्रियम्।

किमर्थं प्रतिदास्यामि राघवस्य भयादहम्॥८॥

‘कमलहीन कमला की भाँति सुन्दरी सीता को वन से ले आकर अब केवल राम के भय से मैं कैसे लौटा दूँ ?॥८॥

वृतं वानरकोटीभिः ससुग्रीवं सलक्ष्मणम्।

पश्य कैश्चिदहोभिश्च राघवं निहतं मया॥९॥

‘करोड़ों वानरों से घिरे हुए सुग्रीव और लक्ष्मणसहित राम को मैं कुछ ही दिनों में मार डालूँगा, यह तुम अपनी आँखों देख लेना॥९॥

द्वन्द्धे यस्य न तिष्ठन्ति दैवतान्यपि संयुगे।

स कस्माद् रावणो युद्धे भयमाहारयिष्यति॥१०॥

‘जिसके सामने द्वन्द्वयुद्ध में देवता भी नहीं ठहर पाते हैं, वही रावण युद्ध में किससे भयभीत होगा। १०॥

द्विधा भज्येयमप्येवं न नमेयं तु कस्यचित्।

एष मे सहजो दोषः स्वभावो दुरतिक्रमः॥११॥

‘मैं बीच से दो टूक हो जाऊँगा, पर किसी के सामने झुक नहीं सकूँगा, यह मेरा सहज दोष है और स्वभाव किसी के लिये भी दुर्लङ्घय होता है॥११॥

यदि तावत् समुद्रे तु सेतुर्बद्धो यदृच्छया।

रामेण विस्मयः कोऽत्र येन ते भयमागतम्॥१२॥

‘यदि राम ने दैववश समुद्र पर सेतु बाँध लिया तो इसमें विस्मय की कौन बात है, जिससे तुम्हें इतना भय हो गया है ? ॥ १२॥

स तु तीर्णिवं रामः सह वानरसेनया।

प्रतिजानामि ते सत्यं न जीवन् प्रतियास्यति॥१३॥

‘मैं तुम्हारे आगे सच्ची प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि समुद्र पार करके वानरसेनासहित आये हुए राम यहाँ से जीवित नहीं लौट सकेंगे’ ॥ १३॥

एवं ब्रुवाणं संरब्धं रुष्टं विज्ञाय रावणम्।

वीडितो माल्यवान् वाक्यं नोत्तरं प्रत्यपद्यत॥१४॥

ऐसी बातें कहते हुए रावण को क्रोध से भरा हुआ एवं रुष्ट जानकर माल्यवान् बहुत लज्जित हुआ और उसने कोई उत्तर नहीं दिया॥ १४ ॥

जयाशिषा तु राजानं वर्धयित्वा यथोचितम्।

माल्यवानभ्यनुज्ञातो जगाम स्वं निवेशनम्॥१५॥

माल्यवान् ने ‘महाराज की जय हो’ इस विजय सूचक आशीर्वाद से राजा को यथोचित बढ़ावा दिया और उससे आज्ञा लेकर वह अपने घर चला गया॥ १५॥

रावणस्तु सहामात्यो मन्त्रयित्वा विमृश्य च।

लङ्कायास्तु तदा गुप्तिं कारयामास राक्षसः॥१६॥

तदनन्तर मन्त्रियोंसहित राक्षस रावण ने परस्परविचार-विमर्श करके तत्काल लङ्का की रक्षा का प्रबन्ध किया॥१६॥

व्यादिदेश च पूर्वस्यां प्रहस्तं द्वारि राक्षसम्।

दक्षिणस्यां महावीरों महापार्श्वमहोदरौ॥१७॥

पश्चिमायामथ द्वारि पुत्रमिन्द्रजितं तदा।

व्यादिदेश महामायं राक्षसैर्बहुभिर्वृतम्॥१८॥

उसने पूर्व द्वार पर उसकी रक्षा के लिये राक्षस प्रहस्त को तैनात किया, दक्षिण द्वार पर महापराक्रमी महापार्श्व और महोदर को नियुक्त किया तथा पश्चिम द्वार पर अपने पुत्र इन्द्रजित् को रखा, जो महान् मायावी था। वह बहुत-से राक्षसों द्वारा घिरा हुआ था। १७-१८॥

उत्तरस्यां पुरद्वारि व्यादिश्य शुकसारणौ।

स्वयं चात्र गमिष्यामि मन्त्रिणस्तानुवाच ह॥१९॥

तदनन्तर नगर के उत्तर द्वार पर शुक और सारण को रक्षा के लिये जाने की आज्ञा दे मन्त्रियों से रावण ने कहा ‘मैं स्वयं भी उत्तर द्वार पर जाऊँगा’ ॥ १९॥

राक्षसं तु विरूपाक्षं महावीर्यपराक्रमम्।

मध्यमेऽस्थापयद् गुल्मे बहुभिः सह राक्षसैः॥२०॥

नगर के बीच की छावनी पर उसने बहुसंख्यक राक्षसों के साथ महान् बल-पराक्रम से सम्पन्न राक्षस विरूपाक्ष को स्थापित किया॥२०॥

एवं विधानं लङ्कायां कृत्वा राक्षसपुंगवः।

कृतकृत्यमिवात्मानं मन्यते कालचोदितः॥२१॥

इस प्रकार लङ्का में पुरी की रक्षा का प्रबन्ध करके कालप्रेरित राक्षसशिरोमणि रावण अपने-आपको कृतकृत्य मानने लगा॥ २१॥

विसर्जयामास ततः स मन्त्रिणो विधानमाज्ञाप्य पुरस्य पुष्कलम्।

जयाशिषा मन्त्रिगणेन पूजितो विवेश सोऽन्तःपुरमृद्धिमन्महत्॥ २२॥

इस तरह नगर के संरक्षण की प्रचुर व्यवस्था के लिये आज्ञा देकर रावण ने सब मन्त्रियों को विदा कर दिया और स्वयं भी उनके विजयसूचक आशीर्वाद से सम्मानित हो अपने समृद्धिशाली एवं विशाल अन्तःपुर में चला गया॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे षट्त्रिंशः सर्गः॥ ३६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में छत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।३६॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
युद्धकाण्डम्

विभीषण का श्रीराम से लङ्का की रक्षा के प्रबन्ध का वर्णन तथा श्रीराम द्वारा लङ्का के विभिन्न द्वारों पर आक्रमण करने के लिये अपने सेनापतियों की नियुक्ति

सप्तत्रिंशः सर्गः

सर्ग-37


नरवानरराजानौ स तु वायुसुतः कपिः।

जाम्बवानृक्षराजश्च राक्षसश्च विभीषणः॥१॥

अङ्गदो वालिपुत्रश्च सौमित्रिः शरभः कपिः।

सुषेणः सहदायादो मैन्दो द्विविद एव च ॥२॥

गजो गवाक्षः कुमुदो नलोऽथ पनसस्तथा।

अमित्रविषयं प्राप्ताः समवेताः समर्थयन्॥३॥

शत्रु के देश में पहुँचे हुए नरराज श्रीराम, सुमित्राकुमार लक्ष्मण, वानरराज सुग्रीव, वायुपुत्र हनुमान्, ऋक्षराज जाम्बवान्, राक्षस विभीषण, वालिपुत्र अङ्गद, शरभ,बन्धु-बान्धवोंसहित सुषेण, मैन्द, द्विविद, गज, गवाक्ष, कुमुद, नल और पनस ये सब आपस में मिलकर विचार करने लगे— ॥१–३॥

इयं सा लक्ष्यते लङ्का पुरी रावणपालिता।

सासुरोरगगन्धर्वैरमरैरपि दुर्जया॥४॥

‘यही वह लङ्कापुरी दिखायी देती है, जिसका पालन रावण करता है। असुर, नाग और गन्धर्वोसहित सम्पूर्ण देवताओं के लिये भी इसपर विजय पाना अत्यन्त कठिन है॥४॥

कार्यसिद्धिं पुरस्कृत्य मन्त्रयध्वं विनिर्णये।

नित्यं संनिहितो यत्र रावणो राक्षसाधिपः॥५॥

‘राक्षसराज रावण इस पुरी में सदा निवास करता है। अब आपलोग इस पर विजय पाने के उपायों का निर्णय करने के लिये परस्पर विचार करें’॥५॥

अथ तेषु ब्रुवाणेषु रावणावरजोऽब्रवीत्।।

वाक्यमग्राम्यपदवत् पुष्कलार्थं विभीषणः॥६॥

उन सबके इस प्रकार कहने पर रावण के छोटे भाई विभीषण ने संस्कारयुक्त पद और प्रचुर अर्थ से भरी हुई वाणी में कहा- ॥६॥

अनलः पनसश्चैव सम्पातिः प्रमतिस्तथा।

गत्वा लङ्कां ममामात्याः पुरी पुनरिहागताः॥७॥

‘मेरे मन्त्री अनल, पनस, सम्पाति और प्रमति—ये चारों लङ्कापुरी में जाकर फिर यहाँ लौट आये हैं॥७॥

भूत्वा शकुनयः सर्वे प्रविष्टाश्च रिपोर्बलम्।

विधानं विहितं यच्च तद् दृष्ट्वा समुपस्थिताः॥८॥

‘ये सब लोग पक्षी का रूप धारण करके शत्रु की सेना में गये थे और वहाँ जो व्यवस्था की गयी है, उसे अपनी आँखों देखकर फिर यहाँ उपस्थित हुए हैं॥ ८॥

संविधानं यथाहुस्ते रावणस्य दुरात्मनः।

राम तद् ब्रुवतः सर्वं याथातथ्येन मे शृणु॥९॥

‘श्रीराम! इन्होंने दुरात्मा रावण के द्वारा किये गये नगर-रक्षा के प्रबन्ध का जैसा वर्णन किया है, उसे मैं ठीक-ठीक बताता हूँ। आप वह सब मुझसे सुनिये॥ ९॥

पूर्वं प्रहस्तः सबलो द्वारमासाद्य तिष्ठति।

दक्षिणं च महावीयौँ महापार्श्वमहोदरौ॥१०॥

‘सेनासहित प्रहस्त नगर के पूर्व द्वार का आश्रय लेकर खड़ा है। महापराक्रमी महापार्श्व और महोदर दक्षिण द्वार पर खड़े हैं॥ १० ॥

इन्द्रजित् पश्चिमं द्वारं राक्षसैर्बहुभिर्वृतः।

पट्टिशासिधनुष्मद्भिः शूलमुद्गरपाणिभिः॥११॥

नानाप्रहरणैः शूरैरावृतो रावणात्मजः।

‘बहुसंख्यक राक्षसों से घिरा हुआ इन्द्रजित् नगर के पश्चिम द्वार पर खड़ा है। उसके साथी राक्षस पट्टिश, खड्ग, धनुष, शूल और मुद्गर आदि अस्त्र-शस्त्र हाथों में लिये हुए हैं। नाना प्रकार के आयुध धारण करने वाले शूरवीरों से घिरा हुआ वह रावणकुमार पश्चिमद्वार की रक्षा के लिये डटा है॥

राक्षसानां सहस्रेस्तु बहुभिः शस्त्रपाणिभिः॥१२॥

युक्तः परमसंविग्नो राक्षसैः सह मन्त्रवित्।

उत्तरं नगरद्वारं रावणः स्वयमास्थितः॥१३॥

‘स्वयं मन्त्रवेत्ता रावण शुक, सारण आदि कई सहस्र शस्त्रधारी राक्षसों के साथ नगर के उत्तर द्वार पर सावधानी के साथ खड़ा है। वह मन-ही-मन अत्यन्त उद्विग्न जान पड़ता है। १२-१३॥

विरूपाक्षस्तु महता शूलखड्गधनुष्मता।

बलेन राक्षसैः सार्धं मध्यमं गुल्ममाश्रितः॥१४॥

‘विरूपाक्ष शूल, खड्ग और धनुष धारण करने वाली विशाल राक्षससेना के साथ नगर के बीच की छावनी पर खड़ा है॥१४॥

एतानेवं विधान् गुल्मॉल्लङ्कायां समुदीक्ष्य ते।

मामका मन्त्रिणः सर्वे शीघ्रं पुनरिहागताः॥१५॥

‘इस प्रकार मेरे सारे मन्त्री लङ्का में विभिन्न स्थानों पर नियुक्त हुई इन सेनाओं का निरीक्षण करके फिर शीघ्र यहाँ लौटे हैं॥ १५॥

गजानां दशसाहस्रं रथानामयुतं तथा।

हयानामयुते द्वे च साग्रकोटिश्च रक्षसाम्॥१६॥

‘रावण की सेना में दस हजार हाथी, दस हजार रथ, बीस हजार घोड़े और एक करोड़ से भी ऊपर पैदल राक्षस हैं॥ १६॥

विक्रान्ता बलवन्तश्च संयुगेष्वाततायिनः।

इष्टा राक्षसराजस्य नित्यमेते निशाचराः॥१७॥

वे सभी बड़े वीर, बल-पराक्रम से सम्पन्न और युद्ध में आततायी हैं। ये सभी निशाचर राक्षसराज रावण को सदा ही प्रिय हैं॥१७॥

एकैकस्यात्र युद्धार्थे राक्षसस्य विशाम्पते।

परीवारः सहस्राणां सहस्रमुपतिष्ठते॥१८॥

‘प्रजानाथ! इनमें से एक-एक राक्षस के पास युद्ध के लिये दस-दस लाख का परिवार उपस्थित है’॥ १८॥

एतां प्रवृत्तिं लङ्कायां मन्त्रिप्रोक्तां विभीषणः।

एवमुक्त्वा महाबाहू राक्षसांस्तानदर्शयत्॥१९॥

लङ्कायां सचिवैः सर्वं रामाय प्रत्यवेदयत्।

महाबाहु विभीषण ने मन्त्रियों द्वारा बताये गये लङ्काविषयक समाचार को इस प्रकार बताकर उन मन्त्रीस्वरूप राक्षसों को भी श्रीराम से मिलाया और उनके द्वारा लङ्का का सारा वृत्तान्त पुनः उनसे कहलाया॥१९ १/२॥

रामं कमलपत्राक्षमिदमुत्तरमब्रवीत्॥२०॥

रावणावरजः श्रीमान् रामप्रियचिकीर्षया।

तदनन्तर रावण के छोटे भाई श्रीमान् विभीषण ने कमलनयन श्रीराम से उनका प्रिय करने के लिये स्वयं भी यह उत्तम बात कही— ॥२० १/२॥

कुबेरं तु यदा राम रावणः प्रतियुद्ध्यति ॥२१॥

षष्टिः शतसहस्राणि तदा निर्यान्ति राक्षसाः।

पराक्रमेण वीर्येण तेजसा सत्त्वगौरवात्।

सदृशा ह्यत्र दर्पण रावणस्य दुरात्मनः ॥ २२॥

‘श्रीराम! जब रावण ने कुबेर के साथ युद्ध किया था, उस समय साठ लाख राक्षस उसके साथ गये थे। वे सब-के-सब बल, पराक्रम, तेज, धैर्य की अधिकता और दर्प की दृष्टि से दुरात्मा रावण के ही समान थे॥ २१-२२॥

अत्र मन्युर्न कर्तव्यः कोपये त्वां न भीषये।

समर्थो ह्यसि वीर्येण सुराणामपि निग्रहे॥२३॥

‘मैंने जो रावण की शक्ति का वर्णन किया है, इसको लेकर न तो आपको अपने मन में दीनता लानी चाहिये और न मुझ पर रोष ही करना चाहिये। मैं आपको डराता नहीं, शत्रु के प्रति आपके क्रोध को उभाड़ रहा हूँ; क्योंकि आप अपने बलपराक्रम द्वारा देवताओं का भी दमन करने में समर्थ हैं ॥ २३॥

तद्भवांश्चतुरङ्गेण बलेन महता वृतम्।

व्यूह्येदं वानरानीकं निर्मथिष्यसि रावणम्॥२४॥

‘इसलिये आप इस वानरसेना का व्यूह बनाकर ही विशाल चतुरङ्गिणी सेना से घिरे हुए रावण का विनाश कर सकेंगे’॥२४॥

रावणावरजे वाक्यमेवं ब्रुवति राघवः।

शत्रूणां प्रतिघातार्थमिदं वचनमब्रवीत्॥२५॥

विभीषण के ऐसी बात कहने पर भगवान् श्रीराम ने शत्रुओं को परास्त करने के लिये इस प्रकार कहा-॥

पूर्वद्वारं तु लङ्काया नीलो वानरपुङ्गवः।

प्रहस्तं प्रतियोद्धा स्याद् वानरैर्बहुभिर्वृतः॥ २६॥

‘बहुसंख्यक वानरों से घिरे हुए कपिश्रेष्ठ नील पूर्व द्वार पर जाकर प्रहस्त का सामना करें॥ २६॥

अङ्गदो वालिपुत्रस्तु बलेन महता वृतः।

दक्षिणे बाधतां द्वारे महापार्श्वमहोदरौ॥२७॥

‘विशाल वाहिनी से युक्त वालिकुमार अङ्गद दक्षिण द्वार पर स्थित हो महापार्श्व और महोदर के कार्य में बाधा दें॥२७॥

हनूमान् पश्चिमद्वारं निष्पीड्य पवनात्मजः।

प्रविशत्वप्रमेयात्मा बहुभिः कपिभिर्वृतः॥२८॥

‘पवनकुमार हनुमान् अप्रमेय आत्मबल से सम्पन्न हैं। ये बहुत-से वानरों के साथ लङ्का के पश्चिम फाटक में प्रवेश करें॥ २८ ॥

दैत्यदानवसङ्घानामृषीणां च महात्मनाम्।

विप्रकारप्रियः क्षुद्रो वरदानबलान्वितः॥२९॥

परिक्रमति यः सर्वान् लोकान् संतापयन् प्रजाः।

तस्याहं राक्षसेन्द्रस्य स्वयमेव वधे धृतः॥३०॥

उत्तरं नगरद्वारमहं सौमित्रिणा सह।

निपीड्याभिप्रवेक्ष्यामि सबलो यत्र रावणः॥

‘दैत्यों, दानवसमूहों तथा महात्मा ऋषियों का अपकार करना ही जिसे प्रिय लगता है, जिसका स्वभाव क्षुद्र है, जो वरदान की शक्ति से सम्पन्न है और प्रजाजनों को संताप देता हुआ सम्पूर्ण लोकों में घूमता रहता है, उस राक्षसराज रावण के वध का दृढ़ निश्चय लेकर मैं स्वयं ही सुमित्राकुमार लक्ष्मण के साथ नगर के उत्तर फाटक पर आक्रमण करके उसके भीतर प्रवेश करूँगा, जहाँ सेनासहित रावण विद्यमान है॥ २९-३१॥

वानरेन्द्रश्च बलवानृक्षराजश्च वीर्यवान्।

राक्षसेन्द्रानुजश्चैव गुल्मे भवतु मध्यमे ॥३२॥

‘बलवान् वानरराज सुग्रीव, रीछों के पराक्रमी राजा जाम्बवान् तथा राक्षसराज रावण के छोटे भाई विभीषण—ये लोग नगर के बीच के मोर्चे पर आक्रमण करें॥ ३२॥

न चैव मानुषं रूपं कार्यं हरिभिराहवे।

एषा भवतु नः संज्ञा युद्धेऽस्मिन् वानरे बले॥३३॥

‘वानरों को युद्ध में मनुष्य का रूप नहीं धारण करना चाहिये। इस युद्ध में वानरों की सेना का हमारे लिये यही संकेत या चिह्न होगा॥ ३३॥

वानरा एव नश्चिह्न स्वजनेऽस्मिन् भविष्यति।

वयं तु मानुषेणैव सप्त योत्स्यामहे परान्॥३४॥

‘इस स्वजनवर्ग में वानर ही हमारे चिह्न होंगे। केवल हम सात व्यक्ति ही मनुष्यरूप में रहकर शत्रुओं के साथ युद्ध करेंगे॥ ३४॥

अहमेव सह भ्रात्रा लक्ष्मणेन महौजसा।

आत्मना पञ्चमश्चायं सखा मम विभीषणः॥३५॥

‘मैं अपने महातेजस्वी भाई लक्ष्मण के साथ रहूँगा और ये मेरे मित्र विभीषण अपने चार मन्त्रियों के साथ पाँचवें होंगे (इस प्रकार हम सात व्यक्ति मनुष्यरूप में रहकर युद्ध करेंगे)’॥ ३५॥

स रामः कृत्यसिद्ध्यर्थमेवमुक्त्वा विभीषणम्।

सुवेलारोहणे बुद्धिं चकार मतिमान् प्रभुः।

रमणीयतरं दृष्ट्वा सुवेलस्य गिरेस्तटम्॥३६॥

अपने विजयरूपी प्रयोजन की सिद्धि के लिये विभीषण से ऐसा कहकर बुद्धिमान् भगवान् श्रीराम ने सुवेल पर्वत पर चढ़ने का विचार किया। सुवेल पर्वत का तटप्रान्त बड़ा ही रमणीय था, उसे देखकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई॥

ततस्तु रामो महता बलेन प्रच्छाद्य सर्वां पृथिवीं महात्मा।

प्रहृष्टरूपोऽभिजगाम लङ्कां कृत्वा मतिं सोऽरिवधे महात्मा॥३७॥

तदनन्तर महामना महात्मा श्रीराम अपनी विशाल सेना के द्वारा वहाँ की सारी पृथ्वी को आच्छादित करके शत्रुवध का निश्चय किये बड़े हर्ष और उत्साह से लङ्का की ओर चले॥ ३७॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे सप्तत्रिंशः सर्गः॥ ३७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में सैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।३७॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
युद्धकाण्डम्

श्रीराम का प्रमुख वानरों के साथ सुवेल पर्वत पर चढ़कर वहाँ रात में निवास करना

अष्टात्रिंशः सर्गः

सर्ग-38


स तु कृत्वा सुवेलस्य मतिमारोहणं प्रति।

लक्ष्मणानुगतो रामः सुग्रीवमिदमब्रवीत्॥१॥

विभीषणं च धर्मज्ञमनुरक्तं निशाचरम्।

मन्त्रज्ञं च विधिज्ञं च श्लक्ष्णया परया गिरा॥२॥

सुवेल पर्वत पर चढ़ने का विचार करके जिनके पीछे लक्ष्मणजी चल रहे थे, वे भगवान् श्रीराम सुग्रीव से और धर्म के ज्ञाता, मन्त्रवेत्ता, विधिज्ञ एवं अनुरागी निशाचर विभीषण से भी उत्तम एवं मधुर वाणी में बोले – ॥१-२॥

सुवेलं साधु शैलेन्द्रमिमं धातुशतैश्चितम्।

अध्यारोहामहे सर्वे वत्स्यामोऽत्र निशामिमाम्॥३॥

‘मित्रो! यह पर्वतराज सुवेल सैकड़ों धातुओं से भलीभाँति भरा हुआ है। हम सब लोग इसपर चढ़ें और आज की इस रात में यहीं निवास करें॥३॥

लङ्कां चालोकयिष्यामो निलयं तस्य रक्षसः।

येन मे मरणान्ताय हृता भार्या दुरात्मना॥४॥

‘यहाँ से हमलोग उस राक्षस की निवासभूत लङ्कापुरी का भी अवलोकन करेंगे, जिस दुरात्मा ने अपनी मृत्यु के लिये ही मेरी भार्या का अपहरण किया है॥ ४॥

येन धर्मो न विज्ञातो न वृत्तं न कुलं तथा।

राक्षस्या नीचया बुद्ध्या येन तद् गर्हितं कृतम्॥

‘जिसने न तो धर्म को जाना है, न सदाचार को ही कुछ समझा है और न कुल का ही विचार किया है; केवल राक्षसोचित नीच बुद्धि के कारण ही वह निन्दित कर्म किया है॥५॥

तस्मिन् मे वर्तते रोषः कीर्तिते राक्षसाधमे।

यस्यापराधान्नीचस्य वधं द्रक्ष्यामि रक्षसाम्॥६॥

‘उस नीच राक्षस का नाम लेते ही उस पर मेरा रोष जाग उठता है। केवल उसी अधम निशाचर के अपराध से मैं समस्त राक्षसों का वध देलूँगा॥६॥

एको हि कुरुते पापं कालपाशवशं गतः।

नीचेनात्मापचारेण कुलं तेन विनश्यति॥७॥

‘काल के पाश में बँधा हुआ एक ही पुरुष पाप करता है, किंतु उस नीच के अपने ही दोष से सारा कुल नष्ट हो जाता है’॥७॥

एवं सम्मन्त्रयन् नेव सक्रोधो रावणं प्रति।

रामः सुवेलं वासाय चित्रसानुमुपारुहत्॥८॥

इस प्रकार चिन्तन करते हुए ही श्रीराम रावण के प्रति कुपित हो विचित्र शिखरवाले सुवेल पर्वत पर निवास करने के लिये चढ़ गये॥८॥

पृष्ठतो लक्ष्मणश्चैनमन्वगच्छत् समाहितः।

सशरं चापमुद्यम्य सुमहद्रिक्रमे रतः॥९॥

उनके पीछे लक्ष्मण भी महान् पराक्रम में तत्पर एवं एकाग्रचित्त हो धनुष-बाण लिये हुए उस पर्वत पर आरूढ़ हो गये॥९॥

तमन्वारोहत् सुग्रीवः सामात्यः सविभीषणः।

हनुमानङ्गदो नीलो मैन्दो द्विविद एव च॥१०॥

गजो गवाक्षो गवयः शरभो गन्धमादनः।

पनसः कुमुदश्चैव हरो रम्भश्च यूथपः॥११॥

जाम्बवांश्च सुषेणश्च ऋषभश्च महामतिः।

दुर्मुखश्च महातेजास्तथा शतवलिः कपिः॥१२॥

एते चान्ये च बहवो वानराः शीघ्रगामिनः।

ते वायुवेगप्रवणास्तं गिरिं गिरिचारिणः॥१३॥

तत्पश्चात् सुग्रीव, मन्त्रियोंसहित विभीषण, हनुमान्, अङ्गद, नील, मैन्द, द्विविद, गज, गवाक्ष, गवय, शरभ, गन्धमादन, पनस, कुमुद, हर, यूथपति रम्भ, जाम्बवान्, सुषेण, महामति ऋषभ, महातेजस्वी दुर्मुख तथा कपिवर शतवलि—ये और दूसरे भी बहुत-से शीघ्रगामी वानर जो वायु के समान वेग से चलने वाले तथा पर्वतों पर ही विचरने वाले थे, उस सुवेलगिरि पर चढ़ गये॥ १०–१३॥

अध्यारोहन्त शतशः सुवेलं यत्र राघवः।

ते त्वदीर्पण कालेन गिरिमारुह्य सर्वतः॥१४॥

सुवेल पर्वत पर जहाँ श्रीरघुनाथजी विराजमान थे, वे सैकड़ों वानर थोड़ी ही देर में चढ़ गये और चढ़कर सब ओर विचरने लगे॥१४॥

ददृशुः शिखरे तस्य विषक्तामिव खे पुरीम्।

तां शुभां प्रवरद्वारां प्राकारवरशोभिताम्॥१५॥

लङ्कां राक्षससम्पूर्णां ददृशुर्हरियूथपाः।

उन वानर-यूथपतियों ने सुवेलपर्वत के शिखर पर खड़े हो उस सुन्दर लङ्कापुरी का निरीक्षण किया, जो आकाश में ही बनी हुई-सी जान पड़ती थी। उसके फाटक बड़े मनोहर थे। उत्तम परकोटे उस नगरी की शोभा बढ़ाते थे तथा वह पुरी राक्षसों से भरी-पूरी थी॥

प्राकारवरसंस्थैश्च तथा नीलैश्च राक्षसैः॥१६॥

ददृशुस्ते हरिश्रेष्ठाः प्राकारमपरं कृतम्॥१७॥

उत्तम परकोटों पर खड़े हुए नीलवर्ण के राक्षस ऐसे जान पड़ते थे, मानो उन परकोटों पर दूसरा परकोटा बना दिया गया हो। उन श्रेष्ठ वानरों ने वह सब कुछ देखा॥ १६-१७॥

ते दृष्ट्वा वानराः सर्वे राक्षसान् युद्धकारिणः।

मुमुचुर्विविधान् नादांस्तस्य रामस्य पश्यतः॥१८॥

युद्ध की इच्छा रखने वाले राक्षसों को देखकर वे सब वानर श्रीराम के देखते-देखते नाना प्रकार से सिंहनाद करने लगे॥१८॥

ततोऽस्तमगमत् सूर्यः संध्यया प्रतिरञ्जितः।

पूर्णचन्द्रप्रदीप्ता च क्षपा समतिवर्तत॥१९॥

तदनन्तर संध्या की लाली से रंगे हुए सूर्यदेव अस्ताचल को चले गये और पूर्णचन्द्रमा से प्रकाशित उजेली रात वहाँ सब ओर छा गयी॥ १९॥

ततः स रामो हरिवाहिनीपतिविभीषणेन प्रतिनन्द्य सत्कृतः।

सलक्ष्मणो यूथपयूथसंयुतः सुवेलपृष्ठे न्यवसद् यथासुखम्॥२०॥

तत्पश्चात् विभीषण द्वारा सादर सम्मानित हो वानरसेना के स्वामी श्रीराम ने अपने भाई लक्ष्मण और यूथपतियों के समुदाय के साथ सुवेल पर्वत के पृष्ठभाग पर सुखपूर्वक निवास किया॥२०॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डेऽष्टात्रिंशः सर्गः॥ ३८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में अड़तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।३८॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
युद्धकाण्डम्

वानरों सहित श्रीराम का सुवेल शिखर से लङ्कापुरी का निरीक्षण करना

एकोनचत्वारिंशः सर्गः

सर्ग-39


तां रात्रिमुषितास्तत्र सुवेले हरियूथपाः।

लङ्कायां ददृशुर्वीरा वनान्युपवनानि च॥१॥

वानर-यूथपतियों ने वह रात उस सुवेल पर्वत पर ही बितायी और वहाँ से उन वीरों ने लङ्का के वन और उपवन भी देखे॥१॥

समसौम्यानि रम्याणि विशालान्यायतानि च।

दृष्टिरम्याणि ते दृष्वा बभूवुर्जातविस्मयाः॥२॥

वे बड़े ही चौरस, शान्त, सुन्दर, विशाल और विस्तृत थे तथा देखने में अत्यन्त रमणीय जान पड़ते थे। उन्हें देखकर उन सब वानरों को बड़ा विस्मय हुआ॥२॥

चम्पकाशोकबकुलशालतालसमाकुला।

तमालवनसंछन्ना नागमालासमावृता॥३॥

हिन्तालैरर्जुनैर्नीपैः सप्तपर्णैः सुपुष्पितैः।

तिलकैः कर्णिकारैश्च पाटलैश्च समन्ततः॥४॥

शुशुभे पुष्पिताग्रैश्च लतापरिगतैर्दुमैः।

लङ्का बहुविधैर्दिव्यैर्यथेन्द्रस्यामरावती॥५॥

चम्पा, अशोक, बकुल, शाल और ताल-वृक्षों से व्याप्त, तमाल-वन से आच्छादित और नागकेसरों से आवृत लङ्कापुरी हिंताल, अर्जुन, नीप (कदम्ब), खिले हुए छितवन, तिलक,कनेर तथा पाटल आदि नाना प्रकार के दिव्य वृक्षों से जिनके अग्रभाग फूलों के भार से लदे थे तथा जिनपर लताबल्लरियाँ फैली हुई थीं, इन्द्र की अमरावती के समान शोभा पाती थी॥ ३ –५॥

विचित्रकुसुमोपेतै रक्तकोमलपल्लवैः।

शादलैश्च तथा नीलैश्चित्राभिर्वनराजिभिः॥६॥

विचित्र फूलों से युक्त लाल कोमल पल्लवों, हरी हरी घासों तथा विचित्र वनश्रेणियों से भी उस पुरी की बड़ी शोभा हो रही थी॥६॥

गन्धाढ्यान्यतिरम्याणि पुष्पाणि च फलानि च।

धारयन्त्यगमास्तत्र भूषणानीव मानवाः॥७॥

जैसे मनुष्य आभूषण धारण करते हैं, उसी प्रकार वहाँ के वृक्ष सुगन्धित फूल और अत्यन्त रमणीय फल धारण करते थे॥७॥

तच्चैत्ररथसंकाशं मनोज्ञं नन्दनोपमम्।

वनं सर्वर्तुकं रम्यं शुशुभे षट्पदायुतम्॥८॥

चैत्ररथ और नन्दनवन के समान वहाँ का मनोहर वन सभी ऋतुओं में भ्रमरों से व्याप्त हो रमणीय शोभा धारण करता था॥ ८॥

दात्यूहकोयष्टिबकैर्नृत्यमानैश्च बर्हिणैः।

रुतं परभृतानां च शुश्रुवे वननिर्झरे॥९॥

दात्यूह, कोयष्टि, बक और नाचते हुए मोर उस वन को सुशोभित करते थे। वन में झरनों के आसपास कोकिल की कूक सुनायी पड़ती थी॥९॥

नित्यमत्तविहंगानि भ्रमराचरितानि च।

कोकिलाकुलखण्डानि विहंगाभिरुतानि च॥१०॥

भृङ्गराजाधिगीतानि कुररस्वनितानि च।

कोणालकविघुष्टानि सारसाभिरुतानि च।

विविशुस्ते ततस्तानि वनान्युपवनानि च॥११॥

लङ्का के वन और उपवन नित्य मतवाले विहङ्गमों से विभूषित थे। वहाँ वृक्षों की डालियों पर भौरे मँडराते रहते थे। उनके प्रत्येक खण्ड में कोकिलाएँ कुहू कुहू बोला करती थीं। पक्षी चहचहाते रहते थे। भृङ्गराज के गीत मुखरित होते थे। कुरर के शब्द गूंजा करते थे। कोणालक के कलरव होते रहते थे तथा सारसों की स्वरलहरी सब ओर छायी रहती थी। कुछ वानरवीर उन वनों और उपवनों में घुस गये॥ १०-११॥

हृष्टाः प्रमुदिता वीरा हरयः कामरूपिणः।

तेषां प्रविशतां तत्र वानराणां महौजसाम्॥१२॥

पुष्पसंसर्गसुरभिर्ववौ घ्राणसुखोऽनिलः।

अन्ये तु हरिवीराणां यूथान्निष्क्रम्य यूथपाः।

सुग्रीवेणाभ्यनुज्ञाता लङ्कां जग्मुः पताकिनीम्॥१३॥

वे सभी वीर वानर इच्छानुसार रूप धारण करने वाले, उत्साही और आनन्दमग्न थे। उन महातेजस्वी वानरों के वहाँ प्रवेश करते ही फूलों के संसर्ग से सुगन्धित तथा घ्राणेन्द्रिय को सुख देने वाली मन्द वायु चलने लगी। दूसरे बहुत-से यूथपति उन वानरवीरों के समूह से निकलकर सुग्रीव की आज्ञा ले ध्वजा-पताकाओं से अलंकृत लङ्कापुरी में गये॥ १२-१३॥

वित्रासयन्तो विहगान् ग्लापयन्तो मृगद्विपान्।

कम्पयन्तश्च तां लङ्कां नादैः स्वैर्नदतां वराः॥१४॥

गर्जने वाले लोगों में से श्रेष्ठ वे वानरवीर अपने सिंहनाद से पक्षियों को डराते, मृगों और हाथियों के हर्ष छीनते तथा लङ्का को कम्पित करते हुए आगे बढ़ रहे थे॥

कुर्वन्तस्ते महावेगा महीं चरणपीडिताम्।

रजश्च सहसैवोर्ध्वं जगाम चरणोत्थितम्॥१५॥

वे महान् वेगशाली वानर पृथ्वी को जब चरणों से दबाते थे, उस समय उनके पैरों से उठी हुई धूल सहसा ऊपर को उड़ जाती थी॥ १५ ॥

ऋक्षाः सिंहाश्च महिषा वारणाश्च मृगाः खगाः।

तेन शब्देन वित्रस्ता जग्मुर्रता दिशो दश॥१६॥

वानरों के उस सिंहनाद से त्रस्त एवं भयभीत हुए रीछ, सिंह, भैंसे, हाथी, मृग और पक्षी दसों दिशाओं की ओर भाग गये॥१६॥

शिखरं तु त्रिकूटस्य प्रांशु चैकं दिविस्पृशम्।

समन्तात् पुष्पसंछन्नं महारजतसंनिभम्॥१७॥

त्रिकूट पर्वत का एक शिखर बहुत ऊँचा था। वह ऐसा जान पड़ता था, मानो स्वर्गलोक को छू रहा हो। उसपर सब ओर पीले रंग के फूल खिले हुए थे, जिनसे वह सोने का-सा जान पड़ता था॥ १७॥

शतयोजनविस्तीर्णं विमलं चारुदर्शनम्।

श्लक्ष्णं श्रीमन्महच्चैव दुष्प्रापं शकुनैरपि॥१८॥

उस शिखर का विस्तार सौ योजन था। वह देखने में बड़ा ही सुन्दर, स्वच्छ, स्निग्ध, कान्तिमान् और विशाल था। पक्षियों के लिये भी उसकी चोटी तक पहुँचना कठिन होता था॥ १८॥

मनसापि दुरारोहं किं पुनः कर्मणा जनैः।

निविष्टा तस्य शिखरे लङ्का रावणपालिता॥१९॥

लोग त्रिकूट के उस शिखर पर मन के द्वारा चढ़ने की कल्पना भी नहीं कर सकते थे। फिर क्रियाद्वारा उस पर आरूढ़ होने की तो बात ही क्या है? रावण द्वारा पालित लङ्का त्रिकूट के उसी शिखर पर बसी हुई थी॥ १९॥

दशयोजनविस्तीर्णा विंशद्योजनमायता।

सा पुरी गोपुरैरुच्चैः पाण्डुराम्बुदसंनिभैः।

काञ्चनेन च शालेन राजतेन च शोभते॥२०॥

वह पुरी दस योजन चौड़ी और बीस योजन लंबी थी। सफेद बादलों के समान ऊँचे-ऊँचे गोपुर तथा सोने और चाँदी के परकोटे उसकी शोभा बढ़ाते थे॥२०॥

प्रासादैश्च विमानैश्च लङ्का परमभूषिता।

घनैरिवातपापाये मध्यमं वैष्णवं पदम्॥२१॥

जैसे ग्रीष्म के अन्तकाल वर्षा ऋतु में घनीभूत बादल आकाश की शोभा बढ़ाते हैं, उसी प्रकार प्रासादों और विमानों से लङ्कापुरी अत्यन्त सुशोभित हो रही थी॥

१. अमरकोश के अनुसार देवताओं के मन्दिरों तथा राजाओं के महलों को प्रासाद कहते हैं। प्राचीन वास्तुविद्या के अनुसार बहुत लंबा, चौड़ा, ऊँचा और कई भूमियों का पक्का या पत्थर का बना हुआ भव्य भवन जिसमें अनेक शृङ्ग, शृङ्खला और अण्डक आदि हों ‘प्रासाद’ कहा गया है। उसमें बहुत-से गवाक्षों से युक्त त्रिकोण, चतुष्कोण, आयत और वृत्तशालाएँ बनी होती हैं। आकृति के भेद से पुराणों में प्रासाद के पाँच भेद किये गये हैं-चतुरस्र, चतुरायत, वृत्त, वृत्तायत और अष्टास्र। इनका नाम क्रमशः वैराज, पुष्पक, कैलास, मालक और त्रिविष्टप है। भूमि, अण्डक और शिखर आदि की न्यूनता-अधिकता के कारण इन पाँचों के नौ-नौ भेद माने गये हैं। जैसे वैराज के मेरु, मन्दर, विमान, भद्रक, शतेन सर्वतोभद्र, रुचक, नन्दन, नन्दिवर्धन और श्रीवत्स; पुष्पक के वलभी, गृहराज, शालागृह, मन्दिर, विमान, ब्रह्ममन्दिर, भवन, उत्तम्भ और शिविकावेश्म; कैलास के वलय, दुन्दुभि, पद्म, महापद्म, भद्रक, सर्वतोभद्र, रुचक, नन्दन, गवाक्ष और गवावृत्त; मालक के गज, वृषभ, हंस, गरुड, सिंह, भूमुख, भूधर, श्रीजय और पृथ्वीधर तथा त्रिविष्टप के वज्र, चक्र, मुष्टिक या वभ्र, वक्र, स्वस्तिक, खड्ग, गदा, श्रीवृक्ष और विजय।

२. आकाशमार्ग से गमन करने वाला रथ जो देवता आदि के पास होता है ‘विमान’ कहलाता है। सात मंजिल के मकान को भी विमान कहते हैं। प्राचीन वास्तुविद्या के अनुसार उस देवमन्दिर को विमान की संज्ञा दी गयी है जो ऊपर की ओर पतला होता चला गया हो। मानसार नामक प्राचीन ग्रन्थ के अनुसार विमान गोल, चौपहला और अठपहला होता है। गोल को बेसर, चौपहले को नागर और अठपहले को द्रावि कहते हैं (हिंदी-शब्दसागर से)।

यस्यां स्तम्भसहस्रेण प्रासादः समलंकृतः।

कैलासशिखराकारो दृश्यते खमिवोल्लिखन्॥२२॥

उस पुरी में सहस्र खम्भों से अलंकृत एक चैत्यप्रासाद था, जो कैलास-शिखर के समान दिखायी देता था। वह आकाश को मापता हुआ-सा जान पड़ता था॥ २२॥

चैत्यः स राक्षसेन्द्रस्य बभूव पुरभूषणम्।

रक्षसां नित्यं यः समग्रेण रक्ष्यते॥२३॥

राक्षसराज रावण का वह चैत्यप्रासाद लङ्कापुरी का आभूषण था। कई सौ राक्षस रक्षा के सभी साधनों से सम्पन्न होकर प्रतिदिन उसकी रक्षा करते थे॥२३॥

मनोज्ञां काञ्चनवतीं पर्वतैरुपशोभिताम्।

नानाधातुविचित्रैश्च उद्यानैरुपशोभिताम्॥२४॥

इस प्रकार वह पुरी बड़ी ही मनोहर, सुवर्णमयी, अनेकानेक पर्वतों से अलंकृत, नाना प्रकार की विचित्र धातुओं से चित्रित और अनेक उद्यानों से सुशोभित थी॥

नानाविहगसंघुष्टां नानामृगनिषेविताम्।

नानाकुसुमसम्पन्नां नानाराक्षससेविताम्॥२५॥

भाँति-भाँति के विहङ्गम वहाँ अपनी मधुर बोली बोल रहे थे। नाना प्रकार के मृग आदि पशु उसका सेवन करते थे। अनेक प्रकार के फूलों की सम्पत्ति से वह सम्पन्न थी और विविध प्रकार के आकार वाले राक्षस वहाँ निवास करते थे॥ २५ ॥

तां समृद्धां समृद्धार्थां लक्ष्मीवाल्लक्ष्मणाग्रजः।

रावणस्य पुरीं रामो ददर्श सह वानरैः॥ २६॥

धन-धान्य से सम्पन्न तथा सम्पूर्ण मनोवाञ्छित वस्तुओं से भरी-पूरी उस रावण-पुरी को लक्ष्मण के बड़े भाई लक्ष्मीवान् श्रीराम ने वानरों के साथ देखा॥ २६॥

तां महागृहसम्बाधां दृष्ट्वा लक्ष्मणपूर्वजः।

नगरीं त्रिदिवप्रख्यां विस्मयं प्राप वीर्यवान्॥२७॥

बड़े-बड़े महलों से सघन बसी हुई उस स्वर्गतुल्य नगरी को देखकर पराक्रमी श्रीराम बड़े विस्मित हुए।

तां रत्नपूर्णा बहुसंविधानां प्रासादमालाभिरलंकृतां च।

पुरीं महायन्त्रकवाटमुख्यां ददर्श रामो महता बलेन॥२८॥

इस प्रकार अपनी विशाल सेना के साथ श्रीरघुनाथजी ने अनेक प्रकार के रत्नों से पूर्ण, तरहतरह की रचनाओं से सुसज्जित, ऊँचे-ऊँचे महलों की पंक्ति से अलंकृत और बड़े-बड़े यन्त्रों से युक्त मजबूत किवाड़ोंवाली वह अद्भुत पुरी देखी॥ २८॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे एकोनचत्वारिंशः सर्गः॥३९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में उन्तालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।३९॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
युद्धकाण्डम्

सुग्रीव और रावण का मल्लयुद्ध

चत्वारिंशः सर्गः

सर्ग-40


ततो रामः सुवेलाग्रं योजनद्वयमण्डलम्।

उपारोहत् ससुग्रीवो हरियथैः समन्वितः॥१॥

तदनन्तर वानरयूथों से युक्त सुग्रीवसहित श्रीराम सुवेल पर्वत के सबसे ऊँचे शिखर पर चढ़े, जिसका विस्तार दो योजन का था॥१॥

स्थित्वा मुहूर्तं तत्रैव दिशो दश विलोकयन्।

त्रिकूटशिखरे रम्ये निर्मितां विश्वकर्मणा॥२॥

ददर्श लङ्कां सुन्यस्तां रम्यकाननशोभिताम्।

वहाँ दो घड़ी ठहरकर दसों दिशाओं की ओर दृष्टिपात करते हुए श्रीराम ने त्रिकूट पर्वत के रमणीय शिखर पर सुन्दर ढंग से बसी हुई विश्वकर्मा द्वारा निर्मित लङ्कापुरी को देखा, जो मनोहर काननों से सुशोभित थी॥

तस्य गोपुरशृङ्गस्थं राक्षसेन्द्रं दुरासदम्॥३॥

श्वेतचामरपर्यन्तं विजयच्छत्रशोभितम्।

रक्तचन्दनसंलिप्तं रत्नाभरणभूषितम्॥४॥

उस नगर के गोपुर की छत पर उन्हें दुर्जय राक्षसराज रावण बैठा दिखायी दिया, जिसके दोनों ओर श्वेत चँवर डुलाये जा रहे थे, सिर पर विजय-छत्र शोभा दे रहा था। रावण का सारा शरीर रक्तचन्दन से चर्चित था। उसके अङ्ग लाल रंग के आभूषणों से विभूषित थे॥३-४॥

नीलजीमूतसंकाशं हेमसंछादिताम्बरम्।

ऐरावतविषाणाग्रैरुत्कृष्टकिणवक्षसम्॥५॥

वह काले मेघ के समान जान पड़ता था। उसके वस्त्रों पर सोने के काम किये गये थे। ऐरावत हाथी के दाँतों के अग्रभाग से आहत होने के कारण उसके वक्षःस्थल में आघातचिह्न बन गया था॥५॥

शशलोहितरागेण संवीतं रक्तवाससा।

संध्यातपेन संछन्नं मेघराशिमिवाम्बरे॥६॥

खरगोश के रक्त के समान लाल रंग से रँगे हुए वस्त्र से आच्छादित होकर वह आकाश में संध्याकाल की धूप से ढकी हुई मेघमाला के समान दिखायी देता था॥६॥

पश्यतां वानरेन्द्राणां राघवस्यापि पश्यतः।

दर्शनाद् राक्षसेन्द्रस्य सुग्रीवः सहसोत्थितः॥७॥

मुख्य-मुख्य वानरों तथा श्रीरघुनाथजी के सामने ही राक्षसराज रावण पर दृष्टि पड़ते ही सुग्रीव सहसा खड़े हो गये॥७॥

क्रोधवेगेन संयुक्तः सत्त्वेन च बलेन च।

अचलाग्रादथोत्थाय पुप्लुवे गोपुरस्थले॥८॥

वे क्रोध के वेग से युक्त और शारीरिक एवं मानसिक बल से प्रेरित हो सुवेल के शिखर से उठकर उस गोपुर की छत पर कूद पड़े॥८॥

स्थित्वा मुहूर्तं सम्प्रेक्ष्य निर्भयेनान्तरात्मना।

तृणीकृत्य च तद् रक्षः सोऽब्रवीत् परुषं वचः॥

वहाँ खड़े होकर वे कुछ देर तो रावण को देखते रहे। फिर निर्भय चित्त से उस राक्षस को तिनके के समान समझकर वे कठोर वाणी में बोले- ॥९॥

लोकनाथस्य रामस्य सखा दासोऽस्मि राक्षस।

न मया मोक्ष्यसेऽद्य त्वं पार्थिवेन्द्रस्य तेजसा॥१०॥

‘राक्षस! मैं लोकनाथ भगवान् श्रीराम का सखा और दास हूँ। महाराज श्रीराम के तेज से आज तू मेरे हाथ से छूट नहीं सकेगा’ ॥ १० ॥

इत्युक्त्वा सहसोत्पत्य पुप्लुवे तस्य चोपरि।

आकृष्य मुकुटं चित्रं पातयामास तद् भुवि॥११॥

ऐसा कहकर वे अकस्मात् उछलकर रावण के ऊपर जा कूदे और उसके विचित्र मुकुटों को खींचकर उन्होंने पृथ्वी पर गिरा दिया॥११॥

समीक्ष्य तूर्णमायान्तं बभाषे तं निशाचरः।

सुग्रीवस्त्वं परोक्षं मे हीनग्रीवो भविष्यसि॥१२॥

उन्हें इस प्रकार तीव्र गति से अपने ऊपर आक्रमण करते देख रावण ने कहा—’अरे! जबतक तू मेरे सामने नहीं आया था, तभी तक सुग्रीव (सुन्दर कण्ठ से युक्त) था। अब तो तू अपनी इस ग्रीवा से रहित हो जायगा’॥

इत्युक्त्वोत्थाय तं क्षिप्रं बाहुभ्यामाक्षिपत् तले।

कन्दुवत् स समुत्थाय बाहुभ्यामाक्षिपद्धरिः॥१३॥

ऐसा कहकर रावण ने अपनी दो भुजाओं द्वारा उन्हें शीघ्र ही उठाकर उस छत की फर्श पर दे मारा। फिर वानरराज सुग्रीव ने भी गेंद की तरह उछलकर रावण को दोनों भुजाओं से उठा लिया और उसी फर्शपर जोर से पटक दिया॥१३॥

परस्परं स्वेदविदिग्धगात्रौ परस्परं शोणितरक्तदेहौ।

परस्परं श्लिष्टनिरुद्धचेष्टौ परस्परं शाल्मलिकिंशुकाविव॥१४॥

फिर तो वे दोनों आपस में गुंथ गये। दोनों के ही शरीर पसीने से तर और खून से लथपथ हो गये तथा दोनों ही एक-दूसरे की पकड़ में आने के कारण निश्चेष्ट होकर खिले हुए सेमल और पलाश नामक वृक्षों के समान दिखायी देने लगे॥१४॥

मुष्टिप्रहारैश्च तलप्रहारैररनिघातैश्च कराग्रघातैः।

तौ चक्रतुयुद्धमसह्यरूपं महाबलौ राक्षसवानरेन्द्रौ॥१५॥

राक्षसराज रावण और वानरराज सुग्रीव दोनों ही बड़े बलवान् थे, अतः दोनों चूंसे, थप्पड़, कोहनी और पंजों की मार के साथ बड़ा असह्य युद्ध करने लगे॥ १५॥

कृत्वा नियुद्धं भृशमुग्रवेगौ कालं चिरं गोपुरवेदिमध्ये।

उत्क्षिप्य चोरिक्षप्य विनम्य देहौ पादक्रमाद् गोपुरवेदिलग्नौ ॥१६॥

गोपुर के चबूतरे पर बहुत देर तक भारी मल्लयुद्ध करके वे भयानक वेगवाले दोनों वीर बार-बार एक-दूसरे को उछालते और झुकाते हुए पैरों को विशेष दाँव-पेंच के साथ चलाते-चलाते उस चबूतरे से जा लगे॥१६॥

अन्योन्यमापीड्य विलग्नदेहौ तौ पेततुः सालनिखातमध्ये।

उत्पेततुर्भूमितलं स्पृशन्तौ स्थित्वा मुहूर्तं त्वभिनिःश्वसन्तौ॥१७॥

एक-दूसरे को दबाकर परस्पर सटे हुए शरीरवाले वे दोनों योद्धा किले के परकोटे और खाईं के बीच में गिर गये। वहाँ हाँफते हुए दो घड़ी तक पृथ्वी का आलिङ्गन किये पड़े रहे। तत्पश्चात् उछलकर खड़े हो गये॥ १७॥

आलिङ्ग्य चालिङ्ग्य च बाहुयोक्त्रैः संयोजयामासतुराहवे तौ।

संरम्भशिक्षाबलसम्प्रयुक्तौ सुचेरतुः सम्प्रति युद्धमार्गः ॥१८॥

फिर वे एक-दूसरे का बार-बार आलिङ्गन करके उसे बाहुपाश में जकड़ने लगे। दोनों ही क्रोध, शिक्षा (मल्लयुद्ध-विषयक अभ्यास) तथा शारीरिक बल से सम्पन्न थे; अतः उस युद्धस्थल में कुश्ती के अनेक दाँव-पेंच दिखाते हुए भ्रमण करने लगे॥ १८ ॥

शार्दूलसिंहाविव जातदंष्ट्रौ गजेन्द्रपोताविव सम्प्रयुक्तौ।

संहत्य संवेद्य च तौ कराभ्यां तौ पेततुर्वै युगपद् धरायाम्॥१९॥

जिनके नये-नये दाँत निकले हों, ऐसे बाघ और सिंह के बच्चों तथा परस्पर लड़ते हुए गजराज के छोटे छौनों के समान वे दोनों वीर अपने वक्षःस्थल से एकदूसरे को दबाते और हाथों से परस्पर बल आजमाते हुए एक साथ ही पृथ्वी पर गिर पड़े॥ १९॥

उद्यम्य चान्योन्यमधिक्षिपन्तौ संचक्रमाते बहु युद्धमार्गे।

व्यायामशिक्षाबलसम्प्रयुक्तौ क्लमं न तौ जग्मतुराशु वीरौ॥२०॥

दोनों ही कसरती जवान थे और युद्ध की शिक्षा तथा बल से सम्पन्न थे। अतः युद्ध जीतने के लिये उद्यमशील हो एक-दूसरे पर आक्षेप करते हुए युद्धमार्ग पर अनेक प्रकार से विचरण करते थे तथापि उन वीरों को जल्दी थकावट नहीं होती थी॥ २० ॥

बाहूत्तमैारणवारणाभैनिवारयन्तौ परवारणाभौ।

चिरेण कालेन भृशं प्रयुद्धौ संचेरतुर्मण्डलमार्गमाशु॥२१॥

मतवाले हाथियों के समान सुग्रीव और रावण गजराज के शुण्ड-दण्ड की भाँति मोटे एवं बलिष्ठ बाहुदण्डों द्वारा एक-दूसरे के दाँव को रोकते हुए बहुत देर तक बड़े आवेश के साथ युद्ध करते और शीघ्रतापूर्वक पैंतरे बदलते रहे ॥ २१॥

तौ परस्परमासाद्य यत्तावन्योन्यसूदने।

मार्जाराविव भक्षार्थेऽवतस्थाते मुहुर्मुहुः॥२२॥

वे परस्पर भिड़कर एक-दूसरे को मार डालने का प्रयत्न कर रहे थे। जैसे दो बिलाव किसी भक्ष्य वस्तु के लिये क्रोधपूर्वक स्थित हो परस्पर दृष्टिपात कर बारंबार गुर्राते रहते हैं, उसी तरह रावण और सुग्रीव भी लड़ रहे थे।

मण्डलानि विचित्राणि स्थानानि विविधानि च।

गोमूत्रकाणि चित्राणि गतप्रत्यागतानि च॥२३॥

विचित्र मण्डल’ और भाँति-भाँति के स्थान का प्रदर्शन करते हुए गोमूत्र की रेखा के समान कुटिल गति से चलते और विचित्र रीति से कभी आगे बढ़ते और कभी पीछे हटते थे॥ २३॥

१. भरत ने मल्लयुद्ध में चार प्रकार के मण्डल बताये हैं। इनके नाम हैं-चारिमण्डल, करणमण्डल, खण्डमण्डल और महामण्डल। इनके लक्षण इस प्रकार हैं-एक पैर से आगे बढ़कर चक्कर काटते हुए शत्रु पर आक्रमण करना चारिमण्डल कहलाता है। दो पैर से मण्डलाकार घूमते हुए आक्रमण करना करणमण्डल कहा गया है। अनेक करणमण्डलों का संयोग होने से खण्डमण्डल होता है और तीन या चार खण्डमण्डलों के संयोग से महामण्डल कहा गया है।

२. भरत मुनि ने मल्लयुद्ध में छः स्थानों का उल्लेख किया हैवैष्णव, समपाद, वैशाख, मण्डल, प्रत्यालीढ़ और अनालीढ़। पैरों को आगे-पीछे अगल-बगल में चलाते हुए विशेष प्रकार से उन्हें यथास्थान स्थापित करना ही स्थान कहलाता है। कोई-कोई बाघ, सिंह आदि जन्तुओं के समान खड़े होने की रीति को ही स्थान कहते

तिरश्चीनगतान्येव तथा वक्रगतानि च।

परिमोक्षं प्रहाराणां वर्जनं परिधावनम्॥२४॥

अभिद्रवणमाप्लावमवस्थानं सविग्रहम्।

परावृत्तमपावृत्तमपद्रुतमवप्लुतम्॥ २५॥

उपन्यस्तमपन्यस्तं युद्धमार्गविशारदौ।

तौ विचेरतुरन्योन्यं वानरेन्द्रश्च रावणः॥ २६॥

वे कभी तिरछी चाल से चलते, कभी टेढ़ी चाल से दायें-बायें घूम जाते, कभी अपने स्थान से हटकर शत्रु के प्रहार को व्यर्थ कर देते, कभी बदले में स्वयं भी दाँव-पेंच का प्रयोग करके शत्रु के आक्रमण से अपने को बचा लेते, कभी एक खड़ा रहता तो दूसरा उसके चारों ओर दौड़ लगाता, कभी दोनों एक दूसरे के सम्मुख शीघ्रतापूर्वक दौड़कर आक्रमण करते, कभी झुककर या मेढक की भाँति धीरे से उछलकर चलते, कभी लड़ते हुए एक ही जगह पर स्थिर रहते, कभी पीछे की ओर लौट पड़ते, कभी सामने खड़े-खड़े ही पीछे हटते, कभी विपक्षी को पकड़ने की इच्छा से अपने शरीर को सिकोड़कर या झुकाकर उसकी ओर दौड़ते, कभी प्रतिद्वन्द्वी पर पैर से प्रहार करने के लिये नीचे मुँह किये उस पर टूट पड़ते, कभी प्रतिपक्षी योद्धा की बाँह पकड़ने के लिये अपनी बाँह फैला देते और कभी विरोधी की पकड़ से बचने के लिये अपनी बाहों को पीछे खींच लेते। इस प्रकार मल्लयुद्ध की कला में परम प्रवीण वानरराज सुग्रीव तथा रावण एक दूसरे पर आघात करने के लिये मण्डलाकार विचर रहे थे॥ २४–२६॥

एतस्मिन्नन्तरे रक्षो मायाबलमथात्मनः।

आरब्धुमुपसम्पेदे ज्ञात्वा तं वानराधिपः॥ २७॥

उत्पपात तदाऽऽकाशं जितकाशी जितक्लमः।

रावणः स्थित एवात्र हरिराजेन वञ्चितः॥२८॥

इसी बीच में राक्षस रावण ने अपनी मायाशक्ति से काम लेने का विचार किया। वानरराज सुग्रीव इस बात को ताड़ गये; इसलिये सहसा आकाश में उछल पड़े। वे विजयोल्लास से सुशोभित होते थे और थकावट को जीत चुके थे। वानरराज रावण को चकमा देकर निकल गये और वह खड़ा-खड़ा देखता ही रह गय॥ २७-२८॥

अथ हरिवरनाथः प्राप्तसंग्रामकीर्तिनिशिचरपतिमाजौ योजयित्वा श्रमेण।

गगनमतिविशालं लयित्वार्कसूनु हरिगणबलमध्ये रामपार्वं जगाम॥२९॥

जिन्हें संग्राम में कीर्ति प्राप्त हुई थी, वे वानरराज सूर्यपुत्र सुग्रीव निशाचरपति रावण को युद्ध में थकाकर अत्यन्त विशाल आकाशमार्ग का लङ्घन करके वानरों की सेना के बीच श्रीरामचन्द्रजी के पास आ पहुँचे॥ २९॥

इति स सवितृसूनुस्तत्र तत् कर्म कृत्वा पवनगतिरनीकं प्राविशत् सम्प्रहृष्टः।

रघुवरनृपसूनोर्वर्धयन् युद्धहर्षं तरुमृगगणमुख्यैः पूज्यमानो हरीन्द्रः॥३०॥

इस प्रकार वहाँ अद्भुत कर्म करके वायु के समान शीघ्रगामी सूर्यपुत्र सुग्रीव ने दशरथराजकुमार श्रीराम के युद्धविषयक उत्साह को बढ़ाते हुए बड़े हर्ष के साथ वानरसेना में प्रवेश किया। उस समय प्रधान-प्रधान वानरों ने वानरराज का अभिनन्दन किया॥३०॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे चत्वारिंशः सर्गः॥४०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में चालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।४०॥