सर्ग-21
एवं संचिन्त्य विप्रेन्द्रो जगाम लघुविक्रमः।
आख्यातुं तद् यथावृत्तं यमस्य सदनं प्रति॥१॥
(अगस्त्यजी कहते हैं-रघुनन्दन!) ऐसा विचारकर शीघ्र चलने वाले विप्रवर नारदजी रावण के आक्रमण का समाचार बताने के लिये यमलोक में गये॥
अपश्यत् स यमं तत्र देवमग्निपुरस्कृतम्।
विधानमनुतिष्ठन्तं प्राणिनो यस्य यादृशम्॥२॥
वहाँ जाकर उन्होंने देखा, यमदेवता अग्नि को साक्षी के रूप में सामने रखकर बैठे हैं और जिस प्राणी का जैसा कर्म है, उसी के अनुसार फल देने की व्यवस्था कर रहे हैं।
स तु दृष्ट्वा यमः प्राप्तं महर्षिं तत्र नारदम्।
अब्रवीत् सुखमासीनमय॑मावेद्य धर्मतः॥३॥
महर्षि नारद को वहाँ आया देख यमराज ने आतिथ्य-धर्म के अनुसार उनके लिये अर्घ्य आदि निवेदन करके कहा— ॥३॥
कच्चित् क्षेमं नु देवर्षे कच्चिद् धर्मो न नश्यति।
किमागमनकृत्यं ते देवगन्धर्वसेवित॥४॥
‘देवताओं और गन्धर्वो से सेवित देवर्षे ! कुशल तो है न? धर्म का नाश तो नहीं हो रहा है? आज यहाँ आपके शुभागमन का क्या उद्देश्य है ?’ ॥ ४॥
अब्रवीत् तु तदा वाक्यं नारदो भगवानृषिः।
श्रूयतामभिधास्यामि विधानं च विधीयताम्॥५॥
एष नाम्ना दशग्रीवः पितृराज निशाचरः।
उपयाति वशं नेतुं विक्रमैस्त्वां सुदुर्जयम्॥६॥
तब भगवान् नारद मुनि बोले—’पितृराज! सुनिये —मैं एक आवश्यक बात बता रहा हूँ, आप सुनकर उसके प्रतीकार का भी कोई उपाय कर लें। यद्यपि आपको जीतना अत्यन्त कठिन है, तथापि यह दशग्रीव नामक निशाचर अपने पराक्रमों द्वारा आपको वश में करने के लिये यहाँ आ रहा है॥५-६॥
एतेन कारणेनाहं त्वरितो ह्यागतः प्रभो।
दण्डप्रहरणस्याद्य तव किं नु भविष्यति॥७॥
‘प्रभो! इसी कारण से मैं तुरंत यहाँ आया हूँ कि आपको इस सङ्कट की सूचना दे दूँ, परंतु आप तो कालदण्डरूपी आयुध को धारण करने वाले हैं, आपकी उस राक्षस के आक्रमण से क्या हानि होगी?’॥७॥
एतस्मिन्नन्तरे दूरादंशुमन्तमिवोदितम्।
ददृशुर्दीप्तमायान्तं विमानं तस्य रक्षसः॥८॥
इस प्रकार की बातें हो ही रही थीं कि उस राक्षस का उदित हुए सूर्य के समान तेजस्वी विमान दूर से आता दिखायी दिया॥८॥
तं देशं प्रभया तस्य पुष्पकस्य महाबलः।
कृत्वा वितिमिरं सर्वं समीपमभ्यवर्तत॥९॥
महाबली रावण पुष्पक की प्रभा से उस समस्त प्रदेश को अन्धकार शून्य करके अत्यन्त निकट आ गया॥
सोऽपश्यत् स महाबाहुर्दशग्रीवस्ततस्ततः।
प्राणिनः सुकृतं चैव भुञ्जानांश्चैव दुष्कृतम्॥१०॥
महाबाहु दशग्रीव ने यमलोक में आकर देखा कि यहाँ बहुत-से प्राणी अपने-अपने पुण्य तथा पाप का फल भोग रहे हैं॥ १०॥
अपश्यत् सैनिकांश्चास्य यमस्यानुचरैः सह।
यमस्य पुरुषैरुग्रैर्घोररूपैर्भयानकैः॥११॥
ददर्श वध्यमानांश्च क्लिश्यमानांश्च देहिनः।
क्रोशतश्च महानादं तीव्रनिष्टनतत्परान्॥१२॥
उसने यमराज के सेवकों के साथ उनके सैनिकों को भी देखा। उसकी दृष्टि में यमयातना का दृश्य भी आया। घोर रूपधारी उग्र प्रकृति वाले भयानक यमदूत कितने ही प्राणियों को मारते और क्लेश पहुँचाते थे, जिससे वे बड़े जोर-जोरसे चीखते और चिल्लाते थे। ११-१२॥
कृमिभिर्भक्ष्यमाणांश्च सारमेयैश्च दारुणैः।
श्रोत्रायासकरा वाचो वदतश्च भयावहाः॥१३॥
किन्हीं को कीड़े खा रहे थे और कितनों को भयङ्कर कुत्ते नोच रहे थे। वे सब-के-सब दुःखी हो-होकर कानों को पीड़ा देने वाला भयानक चीत्कार करते थे। १३॥
संतार्यमाणान् वैतरणीं बहुशः शोणितोदकाम्।
वालुकासु च तप्तासु तप्यमानान् मुहुर्मुहुः॥१४॥
किन्हीं को बारम्बार रक्त से भरी हुई वैतरणी नदी पार करने के लिये विवश किया जाता था और कितनों को तपायी हुई बालुकाओं पर बार-बार चलाकर संतप्त किया जाता था॥१४॥
असिपत्रवने चैव भिद्यमानानधार्मिकान्।
रौरवे क्षारनद्यां च क्षुरधारासु चैव हि ॥१५॥
पानीयं याचमानांश्च तृषितान् क्षुधितानपि।
शवभूतान् कृशान् दीनान् विवर्णान् मुक्तमूर्धजान्॥१६॥
मलपङ्कधरान् दीनान् रुक्षांश्च परिधावतः।
ददर्श रावणो मार्गे शतशोऽथ सहस्रशः॥१७॥
कुछ पापी असिपत्र-वन में, जिसके पत्ते तलवार की धार के समान तीखे थे, विदीर्ण किये जा रहे थे। किन्हीं को रौरव नरक में डाला जाता था। कितनों को खारे जल से भरी हुई नदियों में डुबाया जाता था और बहुतों को छुरों की धारों पर दौड़ाया जाता था। कई प्राणी भूख और प्यास से तड़प रहे थे और थोड़े-से जल की याचना कर रहे थे। कोई शव के समान कङ्काल, दीन, दुर्बल, उदास और खुले बालों से युक्त दिखायी देते थे। कितने ही प्राणी अपने अङ्गों में मैल और कीचड़ लगाये दयनीय तथा रूखे शरीर से चारों ओर भाग रहे थे। इस तरह के सैकड़ों और हजारों जीवों को रावण ने मार् गमें यातना भोगते देखा ॥ १५– १७॥
कांश्चिच्च गृहमुख्येषु गीतवादित्रनिःस्वनैः।
प्रमोदमानानद्राक्षीद् रावणः सुकृतैः स्वकैः॥१८॥
दूसरी ओर रावण ने देखा कुछ पुण्यात्मा जीव अपने पुण्यकर्मो के प्रभाव से अच्छे-अच्छे घरों में रहकर संगीत और वाद्यों की मनोहर ध्वनि से आनन्दित हो रहे हैं॥ १८॥
गोरसं गोप्रदातारो ह्यन्नं चैवान्नदायिनः।
गृहांश्च गृहदातारः स्वकर्मफलमश्नतः॥१९॥
गोदान करने वाले गोरस को, अन्न देने वाले अन्न को और गृह प्रदान करने वाले लोग गृह को पाकर अपने सत्कर्मों का फल भोग रहे हैं॥ १९॥
सुवर्णमणिमुक्ताभिः प्रमदाभिरलंकृतान्।
धार्मिकानपरांस्तत्र दीप्यमानान् स्वतेजसा॥२०॥
दूसरे धर्मात्मा पुरुष वहाँ सुवर्ण, मणि और मुक्ताओं से अलंकृत हो यौवन के मद से मत्त रहने वाली सुन्दरी स्त्रियों के साथ अपनी अङ्गकान्ति से प्रकाशित हो रहे हैं॥२०॥
ददर्श स महाबाहू रावणो राक्षसाधिपः।
ततस्तान् भिद्यमानांश्च कर्मभिर्दुष्कृतैः स्वकैः॥२१॥
रावणो मोचयामास विक्रमेण बलाद् बली।
प्राणिनो मोक्षितास्तेन दशग्रीवेण रक्षसा॥२२॥
महाबाहु राक्षसराज रावण ने इन सबको देखा। देखकर बलवान् राक्षस दशग्रीव ने अपने पाप-कर्मों के कारण यातना भोगने वाले प्राणियों को पराक्रम द्वारा बलपूर्वक मुक्त कर दिया॥ २१-२२॥
सुखमापुर्मुहूर्तं ते ह्यतर्कितमचिन्तितम्।
प्रेतेषु मुच्यमानेषु राक्षसेन महीयसा॥२३॥
प्रेतगोपाः सुसंक्रुद्धा राक्षसेन्द्रमभिद्रवन्।
इससे थोड़ी देरतक उन पापियों को बड़ा सुख मिला, उसके मिलने की न तो उन्हें सम्भावना थी और न उसके विषय में वे कुछ सोच ही सके थे। उस महान् राक्षस के द्वारा जब सभी प्रेत यातना से मुक्त कर दिये गये, तब उन प्रेतों की रक्षा करने वाले यमदूत अत्यन्त कुपित हो राक्षसराज पर टूट पड़े॥ २३ १/२॥
ततो हलहलाशब्दः सर्वदिग्भ्यः समुत्थितः॥२४॥
धर्मराजस्य योधानां शूराणां सम्प्रधावताम्।
फिर तो सम्पूर्ण दिशाओं की ओर से धावा करने वाले धर्मराज के शूरवीर योद्धाओं का महान् कोलाहल प्रकट हुआ॥ २४ १/२॥
ते प्रासैः परिघैः शूलैर्मुसलैः शक्तितोमरैः॥ २५॥
पुष्पकं समधर्षन्त शूराः शतसहस्रशः।
तस्यासनानि प्रासादान् वेदिकास्तोरणानि च॥२६॥
पुष्पकस्य बभञ्जुस्ते शीघ्रं मधुकरा इव।
जैसे फूल पर झुंड-के-झुंड भौरे जुट जाते हैं, उसी प्रकार पुष्पकविमान पर सैकड़ों-हजारों शूरवीर यमदूत चढ़ आये और प्रासों, परिघों, शूलों, मूसलों, शक्तियों तथा तोमरों द्वारा उसे तहस-नहस करने लगे। उन्होंने पुष्पकविमान के आसन, प्रासाद, वेदी और फाटक शीघ्र ही तोड़ डाले॥ २५-२६ १/२॥
देवनिष्ठानभूतं तद् विमानं पुष्पकं मृधे॥२७॥
भज्यमानं तथैवासीदक्षयं ब्रह्मतेजसा।
देवताओं का अधिष्ठानभूत वह पुष्पकविमान उस युद्ध में तोड़ा जाने पर भी ब्रह्माजी के प्रभाव से ज्यों-कात्यों हो जाता था; क्योंकि वह नष्ट होने वाला नहीं था। २७ १/२॥
असंख्या सुमहत्यासीत् तस्य सेना महात्मनः॥२८॥
शूराणामग्रयातॄणां सहस्राणि शतानि च।
महामना यम की विशाल सेना असंख्य थी। उसमें सैकड़ों-हजारों शूरवीर आगे बढ़कर युद्ध करने वाले थे॥
ततो वृक्षश्च शैलैश्च प्रासादानां शतैस्तथा॥२९॥
ततस्ते सचिवास्तस्य यथाकामं यथाबलम्।
अयुध्यन्त महावीराः स च राजा दशाननः॥३०॥
यमदूतों के आक्रमण करने पर रावण के वे महावीर मन्त्री तथा स्वयं राजा दशग्रीव भी वृक्षों, पर्वतशिखरों तथा यमलोक के सैकड़ों प्रासादों को उखाड़कर उनके द्वारा पूरी शक्ति लगाकर इच्छानुसार युद्ध करने लगे।
ते तु शोणितदिग्धाङ्गाः सर्वशस्त्रसमाहताः।
अमात्या राक्षसेन्द्रस्य चक्रुरायोधनं महत्॥३१॥
राक्षसराज के मन्त्रियों के सारे अङ्ग रक्त से नहा उठे थे। सम्पूर्ण शस्त्रों के आघात से वे घायल हो चुके थे। फिर भी उन्होंने बड़ा भारी युद्ध किया॥३१॥
अन्योन्यं ते महाभागा जघ्नुः प्रहरणैर्भृशम्।
यमस्य च महाबाहो रावणस्य च मन्त्रिणः॥३२॥
महाबाहु श्रीराम ! यमराज तथा रावण के वे महाभाग मन्त्री एक-दूसरे पर नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों द्वारा बड़े जोर से आघात-प्रत्याघात करने लगे॥ ३२॥
अमात्यांस्तांस्तु संत्यज्य यमयोधा महाबलाः।
तमेव चाभ्यधावन्त शूलवर्थैर्दशाननम्॥३३॥
तत्पश्चात् यमराज के महाबली योद्धाओं ने रावण के मन्त्रियों को छोड़कर उस दशग्रीव के ही ऊपर शूलों की वर्षा करते हुए धावा किया॥ ३३॥
ततः शोणितदिग्धाङ्गः प्रहारैर्जर्जरीकृतः।
फुल्लाशोक इवाभाति पुष्पके राक्षसाधिपः॥३४॥
रावणका सारा शरीर शस्त्रों की मार से जर्जर हो गया। वह खून से लथपथ हो गया और पुष्पकविमान के ऊपर फूले हुए अशोक वृक्ष के समान प्रतीत होने लगा॥ ३४॥
स तु शूलगदाप्रासाञ्छक्तितोमरसायकान्।
मुसलानि शिलावृक्षान् मुमोचास्त्रबलाद् बली॥३५॥
तब बलवान् रावण ने अपने अस्त्र-बल से यमराज के सैनिकों पर शूल, गदा, प्रास, शक्ति, तोमर, बाण, मूसल, पत्थर और वृक्षों की वर्षा आरम्भ की॥ ३५ ॥
तरूणां च शिलानां च शस्त्राणां चातिदारुणम्।
यमसैन्येषु तद् वर्षं पपात धरणीतले॥३६॥
वृक्षों, शिलाखण्डों और शस्त्रों की वह अत्यन्त भयंकर वृष्टि भूतल पर खड़े हुए यमराज के सैनिकों पर पड़ने लगी॥ ३६॥
तांस्तु सर्वान् विनिर्भिद्य तदस्त्रमपहत्य च।
जघ्नुस्ते राक्षसं घोरमेकं शतसहस्रशः॥३७॥
वे सैनिक भी सैकड़ों-हजारों की संख्या में एकत्र हो उसके सारे आयुधों को छिन्न-भिन्न करके उसके द्वारा छोड़े हुए दिव्यास्त्र का भी निवारण कर एकमात्र उस भयंकर राक्षस को ही मारने लगे॥३७॥
परिवार्य च तं सर्वे शैलं मेघोत्करा इव।
भिन्दिपालैश्च शूलैश्च निरुछ्वासमपोथयन्॥३८॥
जैसे बादलों के समूह पर्वत पर सब ओर से जल की धाराएँ गिराते हैं, उसी प्रकार यमराज के समस्त सैनिकों ने रावण को चारों ओर से घेरकर उसे भिन्दिपालों और शूलों से छेदना आरम्भ कर दिया। उसको दम लेने की भी फुरसत नहीं दी॥ ३८॥
विमुक्तकवचः क्रुद्धः सिक्तः शोणितविस्रवैः।
ततः स पुष्पकं त्यक्त्वा पृथिव्यामवतिष्ठत॥३९॥
रावण का कवच कटकर गिर पड़ा। उसके शरीर से रक्त की धारा बहने लगी। वह उस रक्त से नहा उठा और कुपित हो पुष्पकविमान छोड़कर पृथ्वी पर खड़ा हो गया॥ ३९॥
ततः स कार्मुकी बाणी समरे चाभिवर्धत।
लब्धसंज्ञो मुहूर्तेन क्रुद्धस्तस्थौ यथान्तकः॥४०॥
वहाँ दो घड़ी के बाद उसने अपने-आपको सँभाला। फिर तो वह धनुष और बाण हाथ में ले बढ़े हुए उत्साह से सम्पन्न हो समराङ्गण में कुपित हुए यमराज के समान खड़ा हुआ॥ ४०॥
ततः पाशुपतं दिव्यमस्त्रं संधाय कार्मुके।
तिष्ठ तिष्ठेति तानुक्त्वा तच्चापं व्यपकर्षत॥४१॥
उसने अपने धनुष पर पाशुपत नामक दिव्य अस्त्र का संधान किया और उन सैनिकों से ‘ठहरो ठहरो’ कहते हुए उस धनुष को खींचा॥४१॥
आकर्णात् स विकृष्याथ चापमिन्द्रारिराहवे।
मुमोच तं शरं क्रुद्धस्त्रिपुरे शंकरो यथा॥४२॥
जैसे भगवान् शङ्कर ने त्रिपुरासुर पर पाशुपतास्त्र का प्रयोग किया था, उसी प्रकार उस इन्द्रद्रोही रावण ने अपने धनुष को कान तक खींचकर वह बाण छोड़ दिया॥
तस्य रूपं शरस्यासीत् सधूमज्वालमण्डलम्।
वनं दहिष्यतो घर्मे दावाग्नेरिव मूर्च्छतः॥४३॥
उस समय उसके बाण का रूप धूम और ज्वालाओं के मण्डल से युक्त हो ग्रीष्म ऋतु में जंगल को जलाने के लिये चारों ओर फैलते हुए दावानल के समान प्रतीत होने लगा॥४३॥
ज्वालामाली स तु शरः क्रव्यादानुगतो रणे।
मुक्तो गुल्मान् द्रुमांश्चापि भस्म कृत्वा प्रधावति॥४४॥
रणभूमि में ज्वालामालाओं से घिरा हुआ वह बाण धनुष से छूटते ही वृक्षों और झाड़ियों को जलाता हुआ तीव्र गति से आगे बढ़ा और उसके पीछे-पीछे मांसाहारी जीव-जन्तु चलने लगे॥४४॥
ते तस्य तेजसा दग्धाः सैन्या वैवस्वतस्य तु।
रणे तस्मिन् निपतिता माहेन्द्रा इव केतवः॥४५॥
उस युद्धस्थल में यमराज के वे सारे सैनिक पाशुपतास्त्र के तेज से दग्ध हो इन्द्रध्वज के समान नीचे गिर पड़े॥ ४५ ॥
ततस्तु सचिवैः सार्धं राक्षसो भीमविक्रमः।
ननाद सुमहानादं कम्पयन्निव मेदिनीम्॥४६॥
तदनन्तर अपने मन्त्रियों के साथ वह भयानक पराक्रमी राक्षस पृथ्वी को कम्पित करता हुआ-सा बड़े जोर-जोर से सिंहनाद करने लगा॥ ४६॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे एकविंशः सर्गः॥२१॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्ड में इक्कीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।२१॥
सर्ग-22
स तस्य तु महानादं श्रुत्वा वैवस्वतः प्रभुः।
शत्रु विजयिनं मेने स्वबलस्य च संक्षयम्॥१॥
(अगस्त्यजी कहते हैं-रघुनन्दन!) रावण के उस महानाद को सुनकर सूर्यपुत्र भगवान् यम ने यह समझ लिया कि ‘शत्रु विजयी हुआ और मेरी सेना मारी गयी’॥१॥
स हि योधान् हतान् मत्वा क्रोधसंरक्तलोचनः।
अब्रवीत् त्वरितः सूतं रथो मे उपनीयताम्॥२॥
‘मेरे योद्धा मारे गये’—यह जानकर यमराजके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये और वे उतावले होकर सारथिसे बोले—’मेरा रथ ले आओ’ ॥२॥
तस्य सूतस्तदा दिव्यमुपस्थाप्य महारथम्।
स्थितः स च महातेजा अध्यारोहत तं रथम्॥३॥
तब उनके सारथि ने तत्काल एक दिव्य एवं विशाल रथ वहाँ उपस्थित कर दिया और वह सामने विनीत भाव से खड़ा हो गया। फिर वे महातेजस्वी यम देवता उस रथ पर आरूढ़ हुए॥३॥
प्रासमुद्गरहस्तश्च मृत्युस्तस्याग्रतः स्थितः।
येन संक्षिप्यते सर्वं त्रैलोक्यमिदमव्ययम्॥४॥
उनके आगे प्रास और मुद्गर हाथ में लिये साक्षात् मृत्यु-देवता खड़े थे, जो प्रवाह रूप से सदा बने रहने वाले इस समस्त त्रिभुवन का संहार करते हैं। ४॥
कालदण्डस्तु पावस्थो मूर्तिमानस्य चाभवत्।
यमप्रहरणं दिव्यं तेजसा ज्वलदग्निवत्॥५॥
उनके पार्श्वभाग में कालदण्ड मूर्तिमान् होकर खड़ा हुआ, जो उनका मुख्य एवं दिव्य आयुध है। वह अपने तेज से अग्नि के समान प्रज्वलित हो रहा था।५॥
तस्य पार्वेषु निश्छिद्राः कालपाशाः प्रतिष्ठिताः।
पावकस्पर्शसंकाशः स्थितो मूर्तश्च मुद्गरः॥६॥
उनके दोनों बगल में छिद्ररहित कालपाश खड़े थे और जिसका स्पर्श अग्नि के समान दुःसह है, वह मुद्गर भी मूर्तिमान् होकर उपस्थित था॥६॥
ततो लोकत्रयं क्षुब्धमकम्पन्त दिवौकसः।
कालं दृष्ट्वा तथा क्रुद्धं सर्वलोकभयावहम्॥७॥
समस्त लोकोंको भय देनेवाले साक्षात् कालको कुपित हुआ देख तीनों लोकोंमें हलचल मच गयी। समस्त देवता काँप उठे॥७॥
ततस्त्वचोदयत् सूतस्तानश्वान् रुचिरप्रभान्।
प्रययौ भीमसंनादो यत्र रक्षःपतिः स्थितः॥८॥
तदनन्तर सारथि ने सुन्दर कान्तिवाले घोड़ों को हाँका और वह रथ भयानक आवाज करता हुआ उस स्थान पर जा पहुंचा, जहाँ राक्षसराज रावण खड़ा था। ८॥
मुहूर्तेन यमं ते तु हया हरिहयोपमाः।
प्रापयन् मनसस्तुल्या यत्र तत् प्रस्तुतं रणम्॥९॥
इन्द्र के घोड़ों के समान तेजस्वी और मन के समान शीघ्रगामी उन घोड़ों ने यमराज को क्षणभर में उस स्थान पर पहुँचा दिया, जहाँ वह युद्ध चल रहा था। ९॥
दृष्ट्वा तथैव विकृतं रथं मृत्युसमन्वितम्।
सचिवा राक्षसेन्द्रस्य सहसा विप्रदुद्रुवुः ॥१०॥
मृत्युदेवता के साथ उस विकराल रथ को आया देख राक्षसराज के सचिव सहसा वहाँ से भाग खड़े हुए। १०॥
लघुसत्त्वतया ते हि नष्टसंज्ञा भयार्दिताः।
नेह योद्धं समर्थाः स्म इत्युक्त्वा प्रययुर्दिशः॥११॥
उनकी शक्ति थोड़ी थी। इसलिये वे भय से पीड़ित हो अपना होश-हवाश खो बैठे और ‘हम यहाँ युद्ध करने में समर्थ नहीं हैं’ ऐसा कहकर विभिन्न दिशाओं में भाग गये॥११॥
स तु तं तादृशं दृष्ट्वा रथं लोकभयावहम्।
नाक्षुभ्यत दशग्रीवो न चापि भयमाविशत्॥१२॥
परंतु समस्त संसार को भयभीत करने वाले वैसे विकराल रथ को देखकर भी दशग्रीव के मन में न तो क्षोभ हुआ और न भय ही॥ १२॥
स तु रावणमासाद्य व्यसृजच्छक्तितोमरान्।
यमो मर्माणि संक्रुद्धो रावणस्य न्यकृन्तत॥१३॥
अत्यन्त क्रोधसे भरे हुए यमराजने रावणके पास पहुँचकर शक्ति और तोमरोंका प्रहार किया तथा रावणके मर्मस्थानोंको छेद डाला॥१३॥
रावणस्तु ततः स्वस्थः शरवर्षं मुमोच ह।
तस्मिन् वैवस्वतरथे तोयवर्षमिवाम्बुदः॥१४॥
तब रावण ने भी सँभलकर यमराज के रथ पर बाणों की झड़ी लगा दी, मानो मेघ जल की वर्षा कर रहा हो॥ १४॥
ततो महाशक्तिशतैः पात्यमानैर्महोरसि।
नाशक्नोत् प्रतिकर्तुं स राक्षसः शल्यपीडितः॥१५॥
तदनन्तर उसकी विशाल छाती पर सैकड़ों महाशक्तियों की मार पड़ने लगी। वह राक्षस शल्यों के प्रहार से इतना पीड़ित हो चुका था कि यमराज से बदला लेने में समर्थ न हो सका॥ १५॥
एवं नानाप्रहरणैर्यमेनामित्रकर्षिणा।
सप्तरात्रं कृतः संख्ये विसंज्ञो विमुखो रिपुः॥१६॥
इस प्रकार शत्रुसूदन यम ने नाना प्रकार के अस्त्रशस्त्रों का प्रहार करते हुए रणभूमि में लगातार सात रातोंतक युद्ध किया। इससे उनका शत्रु रावण अपनी सुध-बुध खोकर युद्ध से विमुख हो गया॥१६॥
तदाऽऽसीत् तुमुलं युद्धं यमराक्षसयोर्द्वयोः।
जयमाकांक्षतोर्वीर समरेष्वनिवर्तिनोः॥१७॥
वीर रघुनन्दन! वे दोनों योद्धा समरभूमि से पीछे हटने वाले नहीं थे और दोनों ही अपनी विजय चाहते थे; इसलिये उन यमराज और राक्षस दोनों में उस समय घोर युद्ध होने लगा॥ १७॥
ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः।
प्रजापतिं पुरस्कृत्य समेतास्तद्रणाजिरे॥१८॥
तब देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षिगण प्रजापति को आगे करके उस समराङ्गण में एकत्र हुए॥ १८॥
संवर्त इव लोकानां युध्यतोरभवत् तदा।
राक्षसानां च मुख्यस्य प्रेतानामीश्वरस्य च॥१९॥
उस समय राक्षसों के राजा रावण तथा प्रेतराज यम के युद्धपरायण होने पर समस्त लोकों के प्रलय का समय उपस्थित हुआ-सा जान पड़ता था॥ १९॥
राक्षसेन्द्रोऽपि विस्फार्य चापमिन्द्राशनिप्रभम्।
निरन्तरमिवाकाशं कुर्वन् बाणांस्ततोऽसृजत्॥२०॥
राक्षसराज रावण भी इन्द्र की अशनि के सदृश अपने धनुष को खींचकर बाणों की वर्षा करने लगा, इससे आकाश ठसाठस भर गया-उसमें तिलभर भी खाली जगह नहीं रह गयी॥२०॥
मृत्युं चतुर्भिर्विशिखैः सूतं सप्तभिरार्दयत्।
यमं शतसहस्रेण शीघ्रं मर्मस्वताडयत्॥२१॥
उसने चार बाण मारकर मृत्यु को और सात बाणों से यम के सारथि को भी पीड़ित कर दिया। फिर जल्दी जल्दी लाख बाण मारकर यमराजके मर्मस्थानों में गहरी चोट पहुँचायी॥२१॥
ततः क्रुद्धस्य वदनाद् यमस्य समजायत।
ज्वालामाली सनिश्वासः सधूमः कोपपावकः॥२२॥
तब यमराज के क्रोध की सीमा न रही। उनके मुख से वह रोष अग्नि बनकर प्रकट हुआ। वह आग ज्वालामालाओं से मण्डित, श्वासवायु से संयुक्त तथा धूम से आच्छन्न दिखायी देती थी॥२२॥
तदाश्चर्यमथो दृष्ट्वा देवदानवसंनिधौ।
प्रहर्षितौ सुसंरब्धौ मृत्युकालौ बभूवतुः ॥ २३॥
देवताओं तथा दानवों के समीप यह आश्चर्यजनक घटना देखकर रोषावेश से भरे हुए मृत्यु एवं काल को बड़ा हर्ष हुआ॥ २३॥
ततो मृत्युः क्रुद्धतरो वैवस्वतमभाषत।
मुञ्च मां समरे यावद्धन्मीमं पापराक्षसम्॥२४॥
तत्पश्चात् मृत्युदेव ने अत्यन्त कुपित होकर वैवस्वत यम से कहा—’आप मुझे छोड़िये—आज्ञा दीजिये, मैं समराङ्गण में इस पापी राक्षस को अभी मारे डालता हूँ॥
नैषा रक्षो भवेदद्य मर्यादा हि निसर्गतः।
हिरण्यकशिपुः श्रीमान् नमुचिः शम्बरस्तथा॥२५॥
निसन्दिधूमकेतुश्च बलिर्वैरोचनोऽपि च।
शम्भुर्दैत्यो महाराजो वृत्रो बाणस्तथैव च॥२६॥
राजर्षयः शास्त्रविदो गन्धर्वाः समहोरगाः।
ऋषयः पन्नगा दैत्या यक्षाश्च ह्यप्सरोगणाः॥२७॥
युगान्तपरिवर्ते च पृथिवी समहार्णवा।
क्षयं नीता महाराज सपर्वतसरिद्रुमा॥२८॥
एते चान्ये च बहवो बलवन्तो दुरासदाः।
विनिपन्ना मया दृष्टाः किमुतायं निशाचरः॥२९॥
‘महाराज! यह मेरी स्वभावसिद्ध मर्यादा है कि मुझसे भिड़कर यह राक्षस जीवित नहीं रह सकता। श्रीमान् हिरण्यकशिपु, नमुचि, शम्बर, निसन्दि, धूमकेतु, विरोचनकुमार बलि, शम्भु नामक दैत्य, महाराज वृत्र तथा बाणासुर, कितने ही शास्त्रवेत्ता राजर्षि, गन्धर्व, बड़े-बड़े नाग, ऋषि, सर्प, दैत्य, यक्ष, अप्सराओं के समुदाय, युगान्तकाल में समुद्रों, पर्वतों, सरिताओं और वृक्षोंसहित पृथ्वी—ये सब मेरे द्वारा क्षय को प्राप्त हुए हैं। ये तथा दूसरे बहुतेरे बलवान् एवं दुर्जय वीर भी मेरे द्वारा विनाश को प्राप्त हो चुके हैं, फिर यह निशाचर किस गिनती में है? ॥ २५–२९॥
मुञ्च मां साधु धर्मज्ञ यावदेनं निहन्म्यहम्।
नहि कश्चिन्मया दृष्टो बलवानपि जीवति॥३०॥
‘धर्मज्ञ! आप मुझे छोड़ दीजिये। मैं इसे अवश्य मार डालूँगा। जिसे मैं देख लूँ, वह कोई बलवान् होने पर भी जीवित नहीं रह सकता॥ ३०॥
बलं मम न खल्वेतन्मर्यादैषा निसर्गतः।
स दृष्टो न मया काल मुहूर्तमपि जीवति॥३१॥
‘काल! मेरी दृष्टि पड़ने पर वह रावण दो घड़ी भी जीवन धारण नहीं कर सकेगा। मेरे इस कथन का तात्पर्य केवल अपने बल को प्रकाशित करना मात्र नहीं है; अपितु यह स्वभावसिद्ध मर्यादा है’॥ ३१॥
तस्यैवं वचनं श्रुत्वा धर्मराजः प्रतापवान्।
अब्रवीत् तत्र तं मृत्युं त्वं तिष्ठेनं निहन्म्यहम्॥३२॥
‘मृत्यु की यह बात सुनकर प्रतापी धर्मराज ने उससे कहा—’तुम ठहरो, मैं ही इसे मारे डालता हूँ’॥ ३२॥
ततः संरक्तनयनः क्रुद्धो वैवस्वतः प्रभुः।
कालदण्डममोघं तु तोलयामास पाणिना॥३३॥
तदनन्तर क्रोध से लाल आँखें करके सामर्थ्यशाली वैवस्वत यम ने अपने अमोघ कालदण्ड को हाथ से उठाया॥
यस्य पार्वेषु निहिताः कालपाशाः प्रतिष्ठिताः।
पावकाशनिसंकाशो मुद्गरो मूर्तिमान स्थितः॥३४॥
उस कालदण्ड के पार्श्वभागों में कालपाश प्रतिष्ठित थे और वज्र एवं अग्नितुल्य तेजस्वी मुद्गर भी मूर्तिमान् होकर स्थित था॥ ३४॥
दर्शनादेव यः प्राणान् प्राणिनामपि कर्षति।
किं पुनः स्पृशमानस्य पात्यमानस्य वा पुनः॥३५॥
वह कालदण्ड दृष्टि में आनेमात्र से प्राणियों के प्राणों का अपहरण कर लेता था। फिर जिससे उसका स्पर्श हो जाय अथवा जिसके ऊपर उसकी मार पड़े, उस पुरुष के प्राणों का संहार करना उसके लिये कौन बड़ी बात है? ॥ ३५॥
स ज्वालापरिवारस्तु निर्दहन्निव राक्षसम्।
तेन स्पृष्टो बलवता महाप्रहरणोऽस्फुरत्॥३६॥
ज्वालाओं से घिरा हुआ वह कालदण्ड उस राक्षस को दग्ध-सा कर देने के लिये उद्यत था। बलवान् यमराज के हाथ में लिया हुआ वह महान् आयुध अपने तेज से प्रकाशित हो उठा॥३६॥
ततो विदुद्रुवुः सर्वे तस्मात् त्रस्ता रणाजिरे।
सुराश्च क्षुभिताः सर्वे दृष्ट्वा दण्डोद्यतं यमम्॥३७॥
उसके उठते ही समराङ्गण में खड़े हुए समस्त सैनिक भयभीत होकर भाग चले। कालदण्ड उठाये यमराज को देखकर समस्त देवता भी क्षुब्ध हो उठे। ३७॥
तस्मिन् प्रहर्तुकामे तु यमे दण्डेन रावणम्।
यमं पितामहः साक्षाद् दर्शयित्वेदमब्रवीत्॥३८॥
यमराज उस दण्ड से रावण पर प्रहार करना ही चाहते थे कि साक्षात् पितामह ब्रह्मा वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने दर्शन देकर इस प्रकार कहा- ॥ ३८ ॥
वैवस्वत महाबाहो न खल्वमितविक्रम।
न हन्तव्यस्त्वयैतेन दण्डेनैष निशाचरः॥३९॥
‘अमित पराक्रमी महाबाहु वैवस्वत! तुम इस कालदण्ड के द्वारा निशाचर रावण का वध न करो॥ ३९॥
वरः खलु मयैतस्मै दत्तस्त्रिदशपुङ्गव।
स त्वया नानृतः कार्यो यन्मया व्याहृतं वचः॥४०॥
‘देवप्रवर! मैंने इसे देवताओं द्वारा न मारे जा सकने का वर दिया है। मेरे मुँह से जो बात निकल चुकी है, उसे तुम्हें असत्य नहीं करना चाहिये॥४०॥
यो हि मामनृतं कुर्याद् देवो वा मानुषोऽपि वा।
त्रैलोक्यमनृतं तेन कृतं स्यान्नात्र संशयः॥४१॥
‘जो देवता अथवा मनुष्य मुझे असत्यवादी बना देगा, उसे समस्त त्रिलोकी को मिथ्याभाषी बनाने का दोष लगेगा, इसमें संशय नहीं है॥४१॥
क्रुद्धेन विप्रमुक्तोऽयं निर्विशेषं प्रियाप्रिये।
प्रजाः संहरते रौद्रो लोकत्रयभयावहः॥४२॥
‘यह कालदण्ड तीनों लोकों के लिये भयंकर तथा रौद्र है। तुम्हारे द्वारा क्रोधपूर्वक छोड़ा जाने पर यह प्रिय और अप्रिय जनों में भेदभाव न रखता हुआ सामने पड़ी हुई समस्त प्रजा का संहार कर डालेगा॥ ४२॥
अमोघो ह्येष सर्वेषां प्राणिनाममितप्रभः।
कालदण्डो मया सृष्टः पूर्वं मृत्युपुरस्कृतः॥४३॥
‘इस अमित तेजस्वी कालदण्ड को भी पूर्वकाल में मैंने ही बनाया था। यह किसी भी प्राणीपर व्यर्थ नहीं होता है। इसके प्रहार से सबकी मृत्यु हो जाती है। ४३॥
तन्न खल्वेष ते सौम्य पात्यो रावणमूर्धनि।
नह्यस्मिन् पतिते कश्चिन्मुहूर्तमपि जीवति॥४४॥
‘अतः सौम्य! तुम इसे रावण के मस्तक पर न गिराओ। इसकी मार पड़ने पर कोई एक मुहूर्त भी जीवित नहीं रह सकता॥४४॥
यदि ह्यस्मिन् निपतिते न म्रियेतैष राक्षसः।
म्रियते वा दशग्रीवस्तदाप्युभयतोऽनृतम्॥४५॥
‘कालदण्ड पड़ने पर यदि यह राक्षस रावण न मरा तो अथवा मर गया तो दोनों ही दशाओं में मेरी बात असत्य होगी॥ ४५॥
तन्निवर्तय लङ्केशाद् दण्डमेतं समुद्यतम्।
सत्यं च मां कुरुष्वाद्य लोकांस्त्वं यद्यवेक्षसे॥४६॥
‘इसलिये हाथ में उठाये हुए इस कालदण्ड को तुम लङ्कापति रावण की ओर से हटा लो। यदि समस्त लोकों पर तुम्हारी दृष्टि है तो आज रावण की रक्षा करके मुझे सत्यवादी बनाओ’॥ ४६॥
एवमुक्तस्तु धर्मात्मा प्रत्युवाच यमस्तदा।
एष व्यावर्तितो दण्डः प्रभविष्णुर्हि नो भवान्॥४७॥
ब्रह्माजी के ऐसा कहने पर धर्मात्मा यमराज ने उत्तर दिया—’यदि ऐसी बात है तो लीजिये मैंने इस दण्ड को हटा लिया। आप हम सब लोगों के प्रभु हैं (अतः आपकी आज्ञा का पालन करना हमारा कर्तव्य है)॥४७॥
किं त्विदानीं मया शक्यं कर्तुं रणगतेन हि।
न मया यद्ययं शक्यो हन्तुं वरपुरस्कृतः॥४८॥
‘परंतु वरदान से युक्त होने के कारण यदि मेरे द्वारा इस निशाचर का वध नहीं हो सकता तो इस समय इसके साथ युद्ध करके ही मैं क्या करूँगा? ॥ ४८॥
एष तस्मात् प्रणश्यामि दर्शनादस्य रक्षसः।
इत्युक्त्वा सरथः साश्वस्तत्रैवान्तरधीयत॥४९॥
‘इसलिये अब मैं इसकी दृष्टि से ओझल होता हूँ, यों कहकर यमराज रथ और घोड़ोंसहित वहीं अन्तर्धान हो गये॥ ४९॥
दशग्रीवस्तु तं जित्वा नाम विश्राव्य चात्मनः।
आरुह्य पुष्पकं भूयो निष्क्रान्तो यमसादनात्॥५०॥
इस प्रकार यमराज को जीतकर अपने नाम की घोषणा करके दशग्रीव रावण पुष्पकविमान पर आरूढ़ हो यमलोक से चला गया॥ ५० ॥
स तु वैवस्वतो देवैः सह ब्रह्मपुरोगमैः।
जगाम त्रिदिवं हृष्टो नारदश्च महामुनिः॥५१॥
तदनन्तर सूर्यपुत्र यमराज तथा महामुनि नारदजी ब्रह्मा आदि देवताओं के साथ प्रसन्नतापूर्वक स्वर्ग में गये॥५१॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे द्वाविंशः सर्गः॥२२॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्ड में बाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ।२२॥
सर्ग-23
ततो जित्वा दशग्रीवो यमं त्रिदशपुङ्गवम्।
रावणस्तु रणश्लाघी स्वसहायान् ददर्श ह॥१॥
(अगस्त्यजी कहते हैं-रघुनन्दन!) देवेश्वर यम को पराजित करके युद्ध का हौसला रखने वाला दशग्रीव रावण अपने सहायकों से मिला॥१॥
ततो रुधिरसिक्ताङ्गं प्रहारैर्जर्जरीकृतम्।
रावणं राक्षसा दृष्ट्वा विस्मयं समुपागमन्॥२॥
उसके सारे अङ्ग रक्त से नहा उठे थे और प्रहारों से जर्जर हो गये थे। इस अवस्था में रावण को देखकर उन राक्षसों को बड़ा विस्मय हुआ॥२॥
जयेन वर्धयित्वा च मारीचप्रमुखास्ततः।
पुष्पकं भेजिरे सर्वे सान्त्विता रावणेन तु॥३॥
‘महाराजकी जय हो’ ऐसा कहकर रावण की अभ्युदय-कामना करके वे मारीच आदि सब राक्षस पुष्पकविमान पर बैठे। उस समय रावण ने उन सबको सान्त्वना दी॥३॥
ततो रसातलं रक्षः प्रविष्टः पयसां निधिम्।
दैत्योरगगणाध्युष्टं वरुणेन सुरक्षितम्॥४॥
तदनन्तर वह राक्षस रसातल में जाने की इच्छा से दैत्यों और नागों से सेवित तथा वरुण के द्वारा सुरक्षित जलनिधि समुद्र में प्रविष्ट हुआ॥४॥
स तु भोगवतीं गत्वा पुरीं वासुकिपालिताम्।
कृत्वा नागान् वशे हृष्टो ययौ मणिमयीं पुरीम्॥
नागराज वासुकि द्वारा पालित भोगवती पुरी में प्रवेश करके उसने नागों को अपने वश में कर लिया और वहाँ से हर्षपूर्वक मणिमयीपुरी को प्रस्थान किया॥५॥
निवातकवचास्तत्र दैत्या लब्धवरा वसन्।
राक्षसस्तान् समागम्य युद्धाय समुपाह्वयत्॥६॥
उस पुरी में निवातकवच नामक दैत्य रहते थे, जिन्हें ब्रह्माजी से उत्तम वर प्राप्त थे। उस राक्षस ने वहाँ जाकर उन सबको युद्ध के लिये ललकारा॥६॥
ते तु सर्वे सुविक्रान्ता दैतेया बलशालिनः।
नानाप्रहरणास्तत्र प्रहृष्टा युद्धदुर्मदाः॥७॥
वे सब दैत्य बड़े पराक्रमी और बलशाली थे। नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्र धारण करते थे तथा युद्ध के लिये सदा उत्साहित एवं उन्मत्त रहते थे॥७॥
शूलैस्त्रिशूलैः कुलिशैः पट्टिशासिपरश्वधैः।
अन्योन्यं बिभिदुः क्रुद्धा राक्षसा दानवास्तथा॥८॥
उनका राक्षसों के साथ युद्ध आरम्भ हो गया। वे राक्षस और दानव कुपित हो एक-दूसरे को शूल, त्रिशूल, वज्र, पट्टिश, खड्ग और फरसों से घायल करने लगे॥८॥
तेषां तु युध्यमानानां साग्रः संवत्सरो गतः।
न चान्यतरतस्तत्र विजयो वा क्षयोऽपि वा॥९॥
उनके युद्ध करते हुए एक वर्ष से अधिक समय व्यतीत हो गया; किंतु उनमें से किसी भी पक्ष की विजय या पराजय नहीं हई॥९॥
ततः पितामहस्तत्र त्रैलोक्यगतिरव्ययः।
आजगाम द्रुतं देवो विमानवरमास्थितः ॥१०॥
तब त्रिभुवन के आश्रयभूत अविनाशी पितामह भगवान् ब्रह्मा एक उत्तम विमान पर बैठकर वहाँ शीघ्र आये॥१०॥
निवातकवचानां तु निवार्य रणकर्म तत्।
वृद्धः पितामहो वाक्यमुवाच विदितार्थवत्॥११॥
बूढ़े पितामह ने निवातकवचों के उस युद्ध-कर्म को रोक दिया और उनसे स्पष्ट शब्दों में यह बात कही –
नह्ययं रावणो युद्धे शक्यो जेतुं सुरासुरैः।
न भवन्तः क्षयं नेतुमपि सामरदानवैः॥१२॥
‘दानवो! समस्त देवता और असुर मिलकर भी युद्ध में इस रावण को परास्त नहीं कर सकते। इसी तरह समस्त देवता और दानव एक साथ आक्रमण करें तो भी वे तुम लोगों का संहार नहीं कर सकते॥ १२॥
राक्षसस्य सखित्वं च भवद्भिः सह रोचते।
अविभक्ताश्च सर्वार्थाः सुहृदां नात्र संशयः॥१३॥
‘(तुम दोनों में वरदानजनित शक्ति एक-सी है) इसलिये मुझे तो यह अच्छा लगता है कि तुमलोगों के साथ इस राक्षस की मैत्री हो जाय; क्योंकि सुहृदों के सभी अर्थ (भोग्य-पदार्थ) एक-दूसरे के लिये समान होते हैं—पृथक्-पृथक् बँटे नहीं रहते हैं। निःसंदेह ऐसी ही बात है’ ॥ १३॥
ततोऽग्निसाक्षिकं सख्यं कृतवांस्तत्र रावणः।
निवातकवचैः सार्धं प्रीतिमानभवत् तदा ॥१४॥
तब वहाँ रावण ने अग्नि को साक्षी बनाकर निवातकवचों के साथ मित्रता कर ली। इससे उसको बड़ी प्रसन्नता हुई॥१४॥
अर्चितस्तैर्यथान्यायं संवत्सरमथोषितः।
स्वपुरान्निर्विशेषं च प्रियं प्राप्तो दशाननः॥१५॥
फिर निवातकवचों से उचित आदर पाकर वह एक वर्ष तक वहीं टिका रहा। उस स्थानपर दशानन को अपने नगर के समान ही प्रिय भोग प्राप्त हुए॥ १५ ॥
तत्रोपधार्य मायानां शतमेकं समाप्तवान्।
सलिलेन्द्रपुरान्वेषी भ्रमति स्म रसातलम्॥१६॥
उसने निवातकवचों से सौ प्रकार की मायाओं का ज्ञान प्राप्त किया। उसके बाद वह वरुण के नगर का पता लगाता हुआ रसातल में सब ओर घूमने लगा॥ १६॥
ततोऽश्मनगरं नाम कालकेयैरधिष्ठितम्।
गत्वा तु कालकेयांश्च हत्वा तत्र बलोत्कटान्॥१७॥
शूर्पणख्याश्च भर्तारमसिना प्राच्छिनत् तदा।
श्यालं च बलवन्तं च विद्युज्जिह्व बलोत्कटम्॥१८॥
जिह्वया संलिहन्तं च राक्षसं समरे तदा।
घूमते-घूमते वह अश्म नामक नगर में जा पहुँचा, जहाँ कालकेय नामक दानव निवास करते थे। कालकेय बड़े बलवान् थे। रावण ने वहाँ उन सबका संहार करके शूर्पणखा के पति उत्कट बलशाली अपने बहनोई महाबली विद्युज्जिह्व को, जो उस राक्षस को समराङ्गण में चाट जाना चाहता था, तलवार से काट डाला॥ १७-१८ १/२॥
तं विजित्य मुहर्तेन जघ्ने दैत्यांश्चतःशतम्॥१९॥
ततः पाण्डुरमेघाभं कैलासमिव भास्वरम्।
वरुणस्यालयं दिव्यमपश्यद् राक्षसाधिपः॥२०॥
उसे परास्त करके रावण ने दो ही घड़ी में चार सौ दैत्यों को मौत के घाट उतार दिया। तत्पश्चात् उस राक्षसराज ने वरुण का दिव्य भवन देखा, जो श्वेत बादलों के समान उज्ज्वल और कैलास पर्वत के समान प्रकाशमान था॥ १९-२० ॥
क्षरन्तीं च पयस्तत्र सुरभिं गामवस्थिताम्।
यस्याः पयोऽभिनिष्पन्दात् क्षीरोदो नाम सागरः॥२१॥
वहीं सुरभि नाम की गौ भी खड़ी थी, जिसके थनों से दूध झर रहा था। कहते हैं, सुरभि के ही दूध की धारा से क्षीरसागर भरा हुआ है।॥ २१॥
ददर्श रावणस्तत्र गोवृषेन्द्रवरारणिम्।
यस्माच्चन्द्रः प्रभवति शीतरश्मिर्निशाकरः॥२२॥
रावण ने महादेवजी के वाहनभूत महावृषभ की जननी सुरभिदेवी का दर्शन किया, जिससे शीतल किरणों वाले निशाकर चन्द्रमा का प्रादुर्भाव हुआ है (सुरभि से क्षीरसमुद्र और क्षीरसमुद्र से चन्द्रमा का आविर्भाव हुआ है) ॥ २२॥
यं समाश्रित्य जीवन्ति फेनपाः परमर्षयः।
अमृतं यत्र चोत्पन्नं स्वधा च स्वधभोजिनाम्॥२३॥
उन्हीं चन्द्रदेव के उत्पत्तिस्थान क्षीरसमुद्र का आश्रय लेकर फेन पीने वाले महर्षि जीवन धारण करते हैं। उस क्षीर-सागर से ही सुधा तथा स्वधाभोजी पितरों की स्वधा प्रकट हुई है॥२३॥
यां ब्रुवन्ति नरा लोके सुरभिं नाम नामतः।
प्रदक्षिणं तु तां कृत्वा रावणः परमाद्भुताम्।
प्रविवेश महाघोरं गुप्तं बहुविधैर्बलैः॥२४॥
लोक में जिनको सुरभि नाम से पुकारा जाता है, उन परम अद्भत गोमाता की परिक्रमा करके रावण ने नाना प्रकार की सेनाओं से सुरक्षित महाभयंकर वरुणालय में प्रवेश किया॥२४॥
ततो धाराशताकीर्णं शारदाभ्रनिभं तदा।
नित्यप्रहृष्टं ददृशे वरुणस्य गृहोत्तमम्॥२५॥
वहाँ प्रवेश करके उसने वरुण के उत्तम भवन को देखा, जो सदा ही आनन्दमय उत्सव से परिपूर्ण, अनेक जलधाराओं (फौवारों)-से व्याप्त तथा शरत्काल के बादलों के समान उज्ज्वल था॥ २५ ॥
ततो हत्वा बलाध्यक्षान् समरे तैश्च ताडितः।
अब्रवीच्च ततो योधान् राजा शीघ्रं निवेद्यताम्॥२६॥
तदनन्तर वरुण के सेनापतियों ने समरभूमि में रावण पर प्रहार किया। फिर रावणने भी उन सबको घायल करके वहाँ के योद्धाओं से कहा—’तुमलोग राजा वरुण से शीघ्र जाकर मेरी यह बात कहो—॥ २६॥
युद्धार्थी रावणः प्राप्तस्तस्य युद्धं प्रदीयताम्।
वद वा न भयं तेऽस्ति निर्जितोऽस्मीति साञ्जलिः॥२७॥
‘राजन् ! राक्षसराज रावण युद्ध के लिये आया है, आप चलकर उससे युद्ध कीजिये अथवा हाथ जोड़कर अपनी पराजय स्वीकार कीजिये। फिर आपको कोई भय नहीं रहेगा’ ॥ २७॥
एतस्मिन्नन्तरे क्रुद्धा वरुणस्य महात्मनः।
पुत्राः पौत्राश्च निष्क्रामन् गौश्च पुष्कर एव च॥२८॥
इसी बीच में सूचना पाकर महात्मा वरुण के पुत्र और पौत्र क्रोध से भरे हुए निकले। उनके साथ ‘गौ’ और ‘पुष्कर’ नामक सेनाध्यक्ष भी थे॥२८॥
ते तु तत्र गुणोपेता बलैः परिवृताः स्वकैः।
युक्त्वा रथान् कामगमानुद्यद्भास्करवर्चसः॥२९॥
वे सब-के-सब सर्वगुणसम्पन्न तथा उगते हुए सूर्य के तुल्य तेजस्वी थे। इच्छानुसार चलने वाले रथों पर आरूढ़ हो अपनी सेनाओं से घिरकर वे वहाँ युद्धस्थल में आये॥ २९॥
ततो युद्धं समभवद् दारुणं रोमहर्षणम्।
सलिलेन्द्रस्य पुत्राणां रावणस्य च धीमतः॥३०॥
फिर तो वरुण के पुत्रों और बुद्धिमान् रावण में बड़ा भयंकर युद्ध छिड़ गया, जो रोंगटे खड़े कर देने वाला था॥ ३०॥
अमात्यैश्च महावीर्यैर्दशग्रीवस्य रक्षसः।
वारुणं तद् बलं सर्वं क्षणेन विनिपातितम्॥३१॥
राक्षस दशग्रीव के महापराक्रमी मन्त्रियों ने एक ही क्षण में वरुण की सारी सेना को मार गिराया॥३१॥
समीक्ष्य स्वबलं संख्ये वरुणस्य सुतास्तदा।
अर्दिताः शरजालेन निवृत्ता रणकर्मणः॥ ३२॥
युद्ध में अपनी सेना की यह अवस्था देख वरुण के पुत्र उस समय बाण-समूहों से पीड़ित होने के कारण कुछ देर के लिये युद्ध-कर्म से हट गये॥ ३२॥
महीतलगतास्ते तु रावणं दृश्य पुष्पके।
आकाशमाशु विविशुः स्यन्दनैः शीघ्रगामिभिः॥
भूतलपर स्थित होकर उन्होंने जब रावण को पुष्पक विमान पर बैठा देखा, तब वे भी शीघ्रगामी रथों द्वारा तुरंत ही आकाश में जा पहुँचे॥३३॥
महदासीत् ततस्तेषां तुल्यं स्थानमवाप्य तत्।
आकाशयुद्धं तुमुलं देवदानवयोरिव ॥ ३४॥
अब बराबर का स्थान मिल जाने से रावण के साथ उनका भारी युद्ध छिड़ गया। उनका वह आकाशयुद्ध देव-दानव-संग्राम के समान भयंकर जान पड़ता था॥ ३४॥
ततस्ते रावणं युद्धे शरैः पावकसंनिभैः।
विमुखीकृत्य संहृष्टा विनेदुर्विविधान् रवान्॥३५॥
उन वरुण-पुत्रों ने अपने अग्नितुल्य तेजस्वी बाणों द्वारा युद्धस्थल में रावण को विमुख करके बड़े हर्ष के साथ नाना प्रकार के स्वरों में महान् सिंहनाद किया॥ ३५॥
ततो महोदरः क्रुद्धो राजानं वीक्ष्य धर्षितम्।
त्यक्त्वा मृत्युभयं वीरो युद्धाकांक्षी व्यलोकयत्॥३६॥
राजा रावण को तिरस्कृत हुआ देख महोदर को बड़ा क्रोध हुआ। उसने मृत्यु का भय छोड़कर युद्धकी इच्छा से वरुण-पुत्रों की ओर देखा॥ ३६ ।।
तेन ते वारुणा युद्धे कामगाः पवनोपमाः।
महोदरेण गदया हयास्ते प्रययुः क्षितिम्॥३७॥
वरुण के घोड़े युद्ध में हवा से बातें करने वाले थे और स्वामी की इच्छा के अनुसार चलते थे। महोदर ने उनपर गदा से आघात किया। गदा की चोट खाकर वे घोड़े धराशायी हो गये॥३७॥
तेषां वरुणसूनूनां हत्वा योधान् हयांश्च तान्।
मुमोचाशु महानादं विरथान् प्रेक्ष्य तान् स्थितान्॥३८॥
वरुण-पुत्रों के योद्धाओं और घोड़ों को मारकर उन्हें रथ हीन हुआ देख महोदर तुरंत ही जोर-जोर से गर्जना करने लगा॥ ३८॥
ते तु तेषां रथाः साश्वाः सह सारथिभिवरैः।
महोदरेण निहताः पतिताः पृथिवीतले॥३९॥
महोदर की गदा के आघात से वरुण-पुत्रों के वे रथ घोड़ों और श्रेष्ठ सारथियोंसहित चूर-चूर हो पृथ्वी पर गिर पड़े॥ ३९॥
ते तु त्यक्त्वा रथान् पुत्रा वरुणस्य महात्मनः।
आकाशे विष्ठिताः शूराः स्वप्रभावान्न विव्यथुः॥४०॥
महात्मा वरुण के वे शूरवीर पुत्र उन रथों को छोड़कर अपने ही प्रभाव से आकाश में खड़े हो गये। उन्हें तनिक भी व्यथा नहीं हुई॥ ४०॥
धनूंषि कृत्वा सज्जानि विनिर्भिद्य महोदरम्।
रावणं समरे क्रुद्धाः सहिताः समवारयन्॥४१॥
उन्होंने धनुषों पर प्रत्यञ्चा चढ़ायी और महोदर को क्षत-विक्षत करके एक साथ कुपित हो रावण को घेर लिया॥४१॥
सायकैश्चापविभ्रष्टैर्वज्रकल्पैः सुदारुणैः।
दारयन्ति स्म संक्रुद्धा मेघा इव महागिरिम्॥४२॥
फिर वे अत्यन्त कुपित हो किसी महान् पर्वत पर जल की धारा गिराने वाले मेघों के समान धनुष से छूटे हुए वज्र-तुल्य भयंकर सायकों द्वारा रावण को विदीर्ण करने लगे॥४२॥
ततः क्रुद्धो दशग्रीवः कालाग्निरिव मूर्च्छितः।
शरवर्षं महाघोरं तेषां मर्मस्वपातयत्॥४३॥
यह देख दशग्रीव प्रलयकाल की अग्नि के समान रोष से प्रज्वलित हो उठा और उन वरुण-पुत्रों के मर्मस्थानों पर महाघोर बाणों की वर्षा करने लगा। ४३॥
मुसलानि विचित्राणि ततो भल्लशतानि च।
पट्टिशांश्चैव शक्तीश्च शतघ्नीमहतीरपि॥४४॥
पातयामास दुर्धर्षस्तेषामुपरि विष्ठितः।
पुष्पकविमान पर बैठे हुए उस दुर्धर्ष वीर ने उन सबके ऊपर विचित्र मूसलों, सैकड़ों भल्लों, पट्टिशों, शक्तियों और बड़ी-बड़ी शतघ्नियों का प्रहार किया। ४४ १/२॥
अपविद्धास्तु ते वीरा विनिष्पेतुः पदातयः ॥ ४५ ॥
ततस्तेनैव सहसा सीदन्ति स्म पदातिनः।
महापङ्कमिवासाद्य कुञ्जराः षष्टिहायनाः॥४६॥
उन अस्त्र-शस्त्रों से घायल हो वे पैदल वीर पुनः युद्ध के लिये आगे बढ़े; परंतु पैदल होने के कारण रावण की उस अस्त्र-वर्षा से ही सहसा संकट में पड़कर बड़ी भारी कीचड़ में फँसे हुए साठ वर्ष के हाथी के समान कष्ट पाने लगे॥ ४५-४६॥
सीदमानान् सुतान् दृष्ट्वा विह्वलान् स महाबलः।
ननाद रावणो हर्षान्महानम्बुधरो यथा॥४७॥
वरुण के पुत्रों को दुःखी एवं व्याकुल देख महाबली रावण महान् मेघ के समान बड़े हर्ष से गर्जना करने लगा॥४७॥
ततो रक्षो महानादान् मुक्त्वा हन्ति स्म वारुणान्।
नानाप्रहरणोपेतैर्धारापातैरिवाम्बुदः॥४८॥
जोर-जोर से सिंहनाद करके वह निशाचर पुनःनाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों द्वारा वरुण-पुत्रों को मारने लगा, मानो बादल अपनी धारावाहिक वृष्टि से वृक्षों को पीड़ित कर रहा हो॥ ४८॥
ततस्ते विमुखाः सर्वे पतिता धरणीतले।
रणात् स्वपुरुषैः शीघ्रं गृहाण्येव प्रवेशिताः॥४९॥
फिर तो वे सभी वरुण-पुत्र युद्ध से विमुख हो पृथ्वी पर गिर पड़े। तत्पश्चात् उनके सेवकों ने उन्हें रणभूमि से हटाकर शीघ्र ही घरों में पहुँचा दिया॥ ४९॥
तानब्रवीत् ततो रक्षो वरुणाय निवेद्यताम्।
रावणं त्वब्रवीन्मन्त्री प्रहासो नाम वारुणः॥५०॥
तदनन्तर उस राक्षस ने वरुण के सेवकों से कहा —’अब वरुण से जाकर कहो कि वे स्वयं युद्ध के लिये आवें’। तब वरुण के मन्त्री प्रभास ने रावण से कहा— ॥५०॥
गतः खलु महाराजो ब्रह्मलोकं जलेश्वरः।
गान्धर्वं वरुणः श्रोतुं यं त्वमाह्वयसे युधि॥५१॥
‘राक्षसराज! जिन्हें तुम युद्ध के लिये बुला रहे हो, वे जल के स्वामी महाराज वरुण संगीत सुनने के लिये ब्रह्मलोक में गये हुए हैं॥५१॥
तत् किं तव यथा वीर परिश्रम्य गते नृपे।
ये तु संनिहिता वीराः कुमारास्ते पराजिताः॥५२॥
‘वीर! राजा वरुण के चले जाने पर यहाँ युद्ध के लिये व्यर्थ परिश्रम करने से तुम्हें क्या लाभ? उनके जो वीर पुत्र यहाँ मौजूद थे, वे तो तुमसे परास्त हो ही गये।
राक्षसेन्द्रस्तु तच्छ्रुत्वा नाम विश्राव्य चात्मनः।
हर्षान्नादं विमुञ्चन् वै निष्क्रान्तो वरुणालयात्॥५३॥
मन्त्री की यह बात सुनकर राक्षसराज रावण वहाँ अपने नाम की घोषणा करके बड़े हर्ष से सिंहनाद करता हुआ वरुणालय से बाहर निकल गया॥ ५३॥
आगतस्तु पथा येन तेनैव विनिवृत्य सः।
लङ्कामभिमुखो रक्षो नभस्तलगतो ययौ॥५४॥
वह जिस मार्ग से आया था, उसी से लौटकर आकाशमार्ग से लङ्का की ओर चल दिया॥५४॥
* * कुछ प्रतियों में तेईसवें सर्ग के बाद पाँच प्रक्षिप्त सर्ग उपलब्ध होते हैं, जिनमें रावण की दिग्विजय-यात्रा का विस्तारपूर्वक वर्णन है। अनावश्यक विस्तार के भय से यहाँ उनको नहीं लिया गया है।
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे त्रयोविंशः सर्गः ॥२३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्ड में तेईसवाँ सर्ग पूरा हुआ।२३॥
सर्ग-24
निवर्तमानः संहृष्टो रावणः स दुरात्मवान्।
जढे पथि नरेन्द्रर्षिदेवदानवकन्यकाः॥१॥
लौटते समय दुरात्मा रावण बड़े हर्ष में भरा था। उसने मार्ग में अनेकानेक नरेशों, ऋषियों, देवताओं और दानवों की कन्याओं का अपहरण किया॥१॥
दर्शनीयां हि यां रक्षः कन्यां स्त्री वाथ पश्यति।
हत्वा बन्धुजनं तस्या विमाने तां रुरोध सः॥२॥
वह राक्षस जिस कन्या अथवा स्त्री को दर्शनीय रूप-सौन्दर्य से युक्त देखता, उसके रक्षक बन्धुजनों का वध करके उसे विमान पर बिठाकर रोक लेता था। २॥
एवं पन्नगकन्याश्च राक्षसासुरमानुषीः।
यक्षदानवकन्याश्च विमाने सोऽध्यरोपयत्॥३॥
इस प्रकार उसने नागों, राक्षसों, असुरों, मनुष्यों, यक्षों और दानवों की भी बहुत-सी कन्याओं को हरकर विमान पर चढ़ा लिया॥३॥
ता हि सर्वाः समं दुःखान्मुमुचुर्बाष्पजं जलम्।
तुल्यमग्नयर्चिषां तत्र शोकाग्निभयसम्भवम्॥४॥
उन सबने एक साथ ही दुःख के कारण नेत्रों से आँसू बहाना आरम्भ किया। शोकाग्नि और भय से प्रकट होने वाले उनके आँसुओं की एक-एक बूंद वहाँ आग की चिनगारी-सी जान पड़ती थी॥ ४॥
ताभिः सर्वानवद्याभिर्नदीभिरिव सागरः।
आपूरितं विमानं तद् भयशोकाशिवाश्रुभिः॥५॥
जैसे नदियाँ सागर को भरती हैं, उसी प्रकार उन समस्त सुन्दरियों ने भय और शोक से उत्पन्न हुए अमङ्गलजनक अश्रुओं से उस विमान को भर दिया।
नागगन्धर्वकन्याश्च महर्षितनयाश्च याः।
दैत्यदानवकन्याश्च विमाने शतशोऽरुदन्॥६॥
नागों, गन्धर्वो, महर्षियों, दैत्यों और दानवों की सैकड़ों कन्याएँ उस विमान पर रो रही थीं॥६॥
दीर्घकेश्यः सुचाङ्ग्यः पूर्णचन्द्रनिभाननाः।
पीनस्तनतटा मध्ये वज्रवेदिसमप्रभाः॥७॥
रथकूबरसंकाशैः श्रोणिदेशैर्मनोहराः।।
स्त्रियः सुराङ्गनाप्रख्या निष्टप्तकनकप्रभाः॥८॥
उनके केश बड़े-बड़े थे। सभी अङ्ग सुन्दर एवं मनोहर थे। उनके मुख की कान्ति पूर्ण चन्द्रमा की छबि को लज्जित करती थी। उरोजों के तटप्रान्त उभरे हुए थे। शरीर का मध्यभाग हीरे के चबूतरे के समान – प्रकाशित होता था। नितम्ब-देश रथ के कूबर-जैसे जान पड़ते थे और उनके कारण उनकी मनोहरता बढ़ रही थी। वे सभी स्त्रियाँ देवाङ्गनाओं के समान कान्तिमती और तपाये हुए सुवर्ण के समान सुनहरी आभा से उद्भासित होती थीं। ७-८॥
शोकदुःखभयत्रस्ता विह्वलाश्च सुमध्यमाः।
तासां निःश्वासवातेन सर्वतः सम्प्रदीपितम्॥९॥
अग्निहोत्रमिवाभाति संनिरुद्धाग्नि पुष्पकम्।
सुन्दर मध्यभाग वाली वे सभी सुन्दरियाँ शोक, दुःख और भय से त्रस्त एवं विह्वल थीं। उनकी गरम-गरम निःश्वासवायु से वह पुष्पकविमान सब ओर से प्रज्वलित-सा हो रहा था और जिसके भीतर अग्नि की स्थापना की गयी हो, उस अग्निहोत्रगृह के समान जान पड़ता था॥ ९ १/२ ॥
दशग्रीववशं प्राप्तास्तास्तु शोकाकुलाः स्त्रियः॥१०॥
दीनवक्त्रेक्षणाः श्यामा मृग्यः सिंहवशा इव।
दशग्रीव के वश में पड़ी हुई वे शोकाकुल अबलाएँ सिंह के पंजे में पड़ी हुई हरिणियों के समान दुःखी हो रही थीं। उनके मुख और नेत्रों में दीनता छा रही थी और उन सबकी अवस्था सोलह वर्ष के लगभग थी॥ १० १/२॥
काचिच्चिन्तयती तत्र किं न मां भक्षयिष्यति॥११॥
काचिद् दध्यौ सुदुःखार्ता अपि मां मारयेदयम्।
कोई सोचती थी, क्या यह राक्षस मुझे खा जायगा? कोई अत्यन्त दुःख से आर्त हो इस चिन्ता में पड़ी थी कि क्या यह निशाचर मुझे मार डालेगा?॥११ १/२॥
इति मातृः पितॄन् स्मृत्वा भर्तृन् भ्रातृस्तथैव च॥१२॥
दुःखशोकसमाविष्टा विलेपुः सहिताः स्त्रियः।
वे स्त्रियाँ माता, पिता, भाई तथा पति की याद करके दुःखशोक में डूब जातीं और एक साथ करुणाजनक विलाप करने लगती थीं। १२ १/२ ॥
कथं नु खलु मे पुत्रो भविष्यति मया विना॥१३॥
कथं माता कथं भ्राता निमग्नाः शोकसागरे।
‘हाय! मेरे बिना मेरा नन्हा-सा बेटा कैसे रहेगा। मेरी माँ की क्या दशा होगी और मेरे भाई कितने चिन्तित होंगे’ ऐसा कहकर वे शोक के सागर में डूब जाती थीं॥
हा कथं नु करिष्यामि भर्तुस्तस्मादहं विना॥१४॥
मृत्यो प्रसादयामि त्वां नय मां दुःखभागिनीम्।
किं नु तद् दुष्कृतं कर्म पुरा देहान्तरे कृतम्॥१५॥
एवं स्म दुःखिताः सर्वाः पतिताः शोकसागरे।
न खल्विदानीं पश्यामो दुःखस्यास्यान्तमात्मनः॥१६॥
‘हाय! अपने उन पतिदेव से बिछुड़कर मैं क्या करूँगी? (कैसे रहूँगी)। हे मृत्युदेव! मेरी प्रार्थना है कि तुम प्रसन्न हो जाओ और मुझ दुखिया को इस लोक से उठा ले चलो। हाय! पूर्व-जन्म में दूसरे शरीर द्वारा हमने कौन-सा ऐसा पाप किया था, जिससे हम सब-की-सब दुःख से पीड़ित हो शोक के समुद्र में गिर पड़ी हैं। निश्चय ही इस समय हमें अपने इस दुःख का अन्त होता नहीं दिखायी देता ॥ १४–१६ ॥
अहो धिमानुषं लोकं नास्ति खल्वधमः परः।
यद् दुर्बला बलवता भर्तारो रावणेन नः ॥१७॥
सूर्येणोदयता काले नक्षत्राणीव नाशिताः।
‘अहो! इस मनुष्यलोक को धिक्कार है! इससे बढ़कर अधम दूसरा कोई लोक नहीं होगा; क्योंकि यहाँ इस बलवान् रावण ने हमारे दुर्बल पतियों को उसी तरह नष्ट कर दिया, जैसे सूर्यदेव उदय लेने के साथ ही नक्षत्रों को अदृश्य कर देते हैं। १७ १/२ ॥
अहो सुबलवद् रक्षो वधोपायेषु रज्यते॥१८॥
अहो दुर्वृत्तमास्थाय नात्मानं वै जुगुप्सते।
‘अहो! यह अत्यन्त बलवान् राक्षस वध के उपायों में ही आसक्त रहता है। अहो! यह पापी दुराचार के पथ पर चलकर भी अपने-आपको धिक्कारता नहीं है ॥ १८ १/२॥
सर्वथा सदृशस्तावद् विक्रमोऽस्य दुरात्मनः॥१९॥
इदं त्वसदृशं कर्म परदाराभिमर्शनम्।
‘इस दुरात्मा का पराक्रम इसकी तपस्या के सर्वथा अनुरूप है, परंतु यह परायी स्त्रियों के साथ जो बलात्कार कर रहा है, यह दुष्कर्म इसके योग्य कदापि नहीं है।
यस्मादेष परक्यासु रमते राक्षसाधमः॥२०॥
तस्माद वै स्त्रीकृतेनैव वधं प्राप्स्यति दर्मतिः।
‘यह नीच निशाचर परायी स्त्रियों के साथ रमण करता है, इसलिये स्त्री के कारण ही इस दुर्बुद्धि राक्षस का वध होगा’ ॥ २० १/२॥
सतीभिर्वरनारीभिरेवं वाक्येऽभ्युदीरिते॥२१॥
नेदुर्दुन्दुभयः खस्थाः पुष्पवृष्टिः पपात च।।
उन श्रेष्ठ सती-साध्वी नारियों ने जब ऐसी बातें कह दी, उस समय आकाश में देवताओं की दुन्दुभियाँ बज उठीं और वहाँ फलों की वर्षा होने लगी। २१ १/२॥
शप्तः स्त्रीभिः स तु समं हतौजा इव निष्प्रभः॥२२॥
पतिव्रताभिः साध्वीभिर्बभूव विमना इव।
पतिव्रता साध्वी स्त्रियों के इस तरह शाप देने पर रावण की शक्ति घट गयी, वह निस्तेज-सा हो गया और उसके मन में उद्वेग-सा होने लगा॥ २२ १/२॥
एवं विलपितं तासां शृण्वन् राक्षसपुङ्गवः॥२३॥
प्रविवेश पुरीं लङ्कां पूज्यमानो निशाचरैः।
इस प्रकार उनका विलाप सुनते हुए राक्षसराज रावण ने निशाचरों द्वारा सत्कृत हो लङ्कापुरी में प्रवेश किया॥ २३ १/२॥
एतस्मिन्नन्तरे घोरा राक्षसी कामरूपिणी ॥ २४॥
सहसा पतिता भूमौ भगिनी रावणस्य सा।
इसी समय इच्छानुसार रूप धारण करने वाली भयंकर राक्षसी शूर्पणखा, जो रावण की बहिन थी, सहसा सामने आकर पृथ्वी पर गिर पड़ी॥ २४ १/२।।
तां स्वसारं समुत्थाप्य रावणः परिसान्त्वयन्॥२५॥
अब्रवीत् किमिदं भद्रे वक्तुकामासि मां द्रुतम्।
रावण ने अपनी उस बहिन को उठाकर सान्त्वना दी और पूछा—’भद्रे! तुम अभी मुझसे शीघ्रतापूर्वक कौन-सी बात कहना चाहती थी?’ ॥ २५ १/२ ॥
सा बाष्पपरिरुद्धाक्षी रक्ताक्षी वाक्यमब्रवीत्॥२६॥
कृतास्मि विधवा राजंस्त्वया बलवता बलात्।
शूर्पणखा के नेत्रों में आँसू भरे थे, उसकी आँखें रोते रोते लाल हो गयी थीं। वह बोली-‘राजन्! तुम बलवान् हो, इसीलिये न तुमने मुझे बलपूर्वक विधवा बना दिया है ? ।। २६ १/२॥
एते राजंस्त्वया वीर्याद दैत्या विनिहता रणे॥२७॥
कालकेया इति ख्याताः सहस्राणि चतुर्दश।
‘राक्षसराज! तुमने रणभूमि में अपने बल-पराक्रम से चौदह हजार कालकेय नामक दैत्यों का वध कर दिया है॥ २७ १/२॥
प्राणेभ्योऽपि गरीयान् मे तत्र भर्ता महाबलः॥२८॥
सोऽपि त्वया हतस्तात रिपुणा भ्रातृगन्धिना।
‘तात! उन्हीं में मेरे लिये प्राणों से भी बढ़कर आदरणीय मेरे महाबली पति भी थे। तुमने उन्हें भी मार डाला। तुम नाममात्र के भाई हो। वास्तव में मेरे शत्रु निकले!॥ २८ १/२॥
त्वयास्मि निहता राजन् स्वयमेव हि बन्धुना॥२९॥
राजन् वैधव्यशब्दं च भोक्ष्यामि त्वत्कृतं ह्यहम्।
‘राजन् ! सगे भाई होकर भी तुमने स्वयं ही अपने हाथों मेरा (मेरे पतिदेव का) वध कर डाला। अब तुम्हारे कारण मैं ‘वैधव्य’ शब्द का उपभोग करूँगी -विधवा कहलाऊँगी॥ २९ १/२॥
ननु नाम त्वया रक्ष्यो जामाता समरेष्वपि॥३०॥
स त्वया निहतो युद्ध स्वयमेव न लज्जसे।
‘भैया! तुम मेरे पिता के तुल्य हो मेरे पति तुम्हारे दामाद थे, क्या तुम्हें युद्ध में अपने दामाद या बहनोई की भी रक्षा नहीं करनी चाहिये थी? तुमने स्वयं ही युद्ध में अपने दामाद का वध किया है; क्या अब भी तुम्हें लज्जा नहीं आती?’ ॥ ३० १/२ ॥
एवमुक्तो दशग्रीवो भगिन्या क्रोशमानया॥३१॥
अब्रवीत् सान्त्वयित्वा तां सामपूर्वमिदं वचः।
रोती और कोसती हुई बहिन के ऐसा कहने पर दशग्रीव ने उसे सान्त्वना देकर समझाते हुए मधुर वाणी में कहा- ॥३१ १/२॥
अलं वत्से रुदित्वा ते न भेतव्यं च सर्वशः॥३२॥
दानमानप्रसादैस्त्वां तोषयिष्यामि यत्नतः।
‘बेटी! अब रोना व्यर्थ है, तुम्हें किसी तरह भयभीत नहीं होना चाहिये। मैं दान, मान और अनुग्रह द्वारा यत्नपूर्वक तुम्हें संतुष्ट करूँगा॥ ३२ १/२॥
युद्धप्रमत्तो व्याक्षिप्तो जयाकांक्षी क्षिपन् शरान्॥
नाहमज्ञासिषं युध्यन् स्वान् परान् वापि संयुगे।
जामातरं न जाने स्म प्रहरन् युद्धदुर्मदः॥ ३४॥
‘मैं युद्ध में उन्मत्त हो गया था, मेरा चित्त ठिकाने नहीं था, मुझे केवल विजय पाने की धुन थी, इसलिये लगातार बाण चलाता रहा। समराङ्गण में जूझते समय मुझे अपने-पराये का ज्ञान नहीं रह जाता था। मैं रणोन्मत्त होकर प्रहार कर रहा था, इसलिये ‘दामाद’ को पहचान न सका॥ ३३-३४॥
तेनासौ निहतः संख्ये मया भर्ता तव स्वसः।
अस्मिन् काले तु यत् प्राप्तं तत् करिष्यामि ते हितम्॥३५॥
‘बहिन! यही कारण है जिससे युद्ध में तुम्हारे पति मेरे हाथ से मारे गये। अब इस समय जो कर्तव्य प्राप्त है, उसके अनुसार मैं सदा तुम्हारे हित का ही साधन करूँगा॥ ३५॥
भ्रातुरैश्वर्ययुक्तस्य खरस्य वस पार्श्वतः।
चतुर्दशानां भ्राता ते सहस्राणां भविष्यति॥३६॥
प्रभुः प्रयाणे दाने च राक्षसानां महाबलः।
‘तुम ऐश्वर्यशाली भाई खर के पास चलकर रहो। तुम्हारा भाई महाबली खर चौदह हजार राक्षसों का अधिपति होगा। वह उन सबको जहाँ चाहेगा भेजेगा और उन सबको अन्न, पान एवं वस्त्र देने में समर्थ होगा॥ ३६ १/२॥
तत्र मातृष्वसेयस्ते भ्रातायं वै खरः प्रभुः॥ ३७॥
भविष्यति तवादेशं सदा कुर्वन् निशाचरः।
‘यह तुम्हारा मौसेरा भाई निशाचर खर सब कुछ करने में समर्थ है और आदेश का सदा पालन करता रहेगा॥ ३७ १/२॥
शीघ्रं गच्छत्वयं वीरो दण्डकान् परिरक्षितुम्॥३८॥
दूषणोऽस्य बलाध्यक्षो भविष्यति महाबलः।
‘यह वीर (मेरी आज्ञा से) शीघ्र ही दण्डकारण्य की रक्षा में जाने वाला है; महाबली दूषण इसका सेनापति होगा॥ ३८ १/२॥
तत्र ते वचनं शूरः करिष्यति सदा खरः॥ ३९॥
रक्षसां कामरूपाणां प्रभुरेष भविष्यति।
“वहाँ शूरवीर खर सदा तुम्हारी आज्ञाका पालन करेगा और इच्छानुसार रूप धारण करने वाले राक्षसों का स्वामी होगा’ ॥ ३९॥
एवमुक्त्वा दशग्रीवः सैन्यमस्यादिदेश ह॥४०॥
चतुर्दश सहस्राणि रक्षसां वीर्यशालिनाम्।
स तैः परिवृतः सः राक्षसै?रदर्शनैः॥४१॥
आगच्छत खरः शीघ्रं दण्डकानकुतोभयः।
स तत्र कारयामास राज्यं निहतकण्टकम्।
सा च शूर्पणखा तत्र न्यवसद् दण्डके वने।४२॥
ऐसा कहकर दशग्रीव ने चौदह हजार पराक्रमशाली राक्षसों की सेना को खर के साथ जाने की आज्ञा दी।उन भयङ्कर राक्षसों से घिरा हुआ खर शीघ्र ही दण्डकारण्य में आया और निर्भय होकर वहाँ का अकण्टक राज्य भोगने लगा। उसके साथ शूर्पणखा भी वहाँ दण्डक वन में रहने लगी॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे चतुर्विंशः सर्गः ॥२४॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्ड में चौबीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥२४॥
सर्ग-25
स तु दत्त्वा दशग्रीवो बलं घोरं खरस्य तत्।
भगिनीं स समाश्वास्य हृष्टः स्वस्थतरोऽभवत्॥
खर को राक्षसों की भयङ्कर सेना देकर और बहिन को धीरज बँधाकर रावण बहुत ही प्रसन्न और स्वस्थचित्त हो गया॥१॥
ततो निकुम्भिला नाम लङ्कोपवनमुत्तमम्।
तद राक्षसेन्द्रो बलवान् प्रविवेश सहानुगः ॥२॥
तदनन्तर बलवान् राक्षसराज रावण लङ्का के निकुम्भिला नामक उत्तम उपवन में गया। उसके साथ बहुत-से सेवक भी थे॥२॥
ततो यूपशताकीर्णं सौम्यचैत्योपशोभितम्।
ददर्श विष्ठितं यज्ञं श्रिया सम्प्रज्वलन्निव॥३॥
रावण अपनी शोभा एवं तेज से अग्नि के समान प्रज्वलित हो रहा था। उसने निकुम्भिला में पहुंचकर देखा, एक यज्ञ हो रहा है, जो सैकड़ों यूपों से व्याप्त और सुन्दर देवालयों से सुशोभित है॥३॥
ततः कृष्णाजिनधरं कमण्डलुशिखाध्वजम्।
ददर्श स्वसुतं तत्र मेघनादं भयावहम्॥४॥
फिर वहाँ उसने अपने पुत्र मेघनाद को देखा, जो काला मृगचर्म पहने हुए तथा कमण्डलु, शिखा और ध्वज धारण किये बड़ा भयङ्कर जान पड़ता था॥ ४ ॥
तं समासाद्य लङ्केशः परिष्वज्याथ बाहुभिः।
अब्रवीत् किमिदं वत्स वर्तसे ब्रूहि तत्त्वतः॥५॥
उसके पास पहुँचकर लङ्केश्वर ने अपनी भुजाओं द्वारा उसका आलिङ्गन किया और पूछा —’बेटा! यह क्या कर रहे हो? ठीक-ठीक बताओ’ ॥ ५॥
उशना त्वब्रवीत् तत्र यज्ञसम्पत्समृद्धये।
रावणं राक्षसश्रेष्ठं द्विजश्रेष्ठो महातपाः॥६॥
(मेघनाद यज्ञ के नियमानुसार मौन रहा) उस समय पुरोहित महातपस्वी द्विजश्रेष्ठ शुक्राचार्य ने, जो यज्ञसम्पत्ति की समृद्धि के लिये वहाँ आये थे, राक्षसशिरोमणि रावण से कहा- ॥६॥
अहमाख्यामि ते राजन् श्रूयतां सर्वमेव तत्।
यज्ञास्ते सप्त पुत्रेण प्राप्तास्ते बहुविस्तराः॥७॥
‘राजन् ! मैं सब बातें बता रहा हूँ, ध्यान देकर सुनिये—आपके पुत्र ने बड़े विस्तार के साथ सात यज्ञों का अनुष्ठान किया है॥ ७॥
अग्निष्टोमोऽश्वमेधश्च यज्ञो बहुसुवर्णकः।
राजसूयस्तथा यज्ञो गोमेधो वैष्णवस्तथा॥८॥
माहेश्वरे प्रवृत्ते तु यज्ञे पुम्भिः सुदुर्लभे।
वरांस्ते लब्धवान् पुत्रः साक्षात् पशुपतेरिह॥९॥
‘अग्निष्टोम, अश्वमेध, बहुसुवर्णक, राजसूय, गोमेध तथा वैष्णव-ये छः यज्ञ पूर्ण करके जब इसने सातवाँ माहेश्वर यज्ञ, जिसका अनुष्ठान दूसरों के लिये अत्यन्त दुर्लभ है, आरम्भ किया, तब आपके इस पुत्र को साक्षात् भगवान् पशुपति से बहुत-से वर प्राप्त हुए। ८-९॥
कामगं स्यन्दनं दिव्यमन्तरिक्षचरं ध्रुवम्।
मायां च तामसी नाम यया सम्पद्यते तमः॥१०॥
‘साथ ही इच्छानुसार चलने वाला एक दिव्य आकाशचारी रथ भी प्राप्त हुआ है, इसके सिवा तामसी नाम की माया उत्पन्न हुई है, जिससे अन्धकार उत्पन्न किया जाता है॥ १०॥
एतया किल संग्रामे मायया राक्षसेश्वर।
प्रयुक्तया गतिः शक्या नहि ज्ञातुं सुरासुरैः॥११॥
‘राक्षसेश्वर! संग्राम में इस माया का प्रयोग करने पर देवता और असुरों को भी प्रयोग करने वाले पुरुष की गतिविधि का पता नहीं लग सकता॥११॥
अक्षयाविषुधी बाणैश्चापं चापि सुदुर्जयम्।
अस्त्रं च बलवद् राजन् शत्रुविध्वंसनं रणे॥१२॥
‘राजन् ! बाणों से भरे हुए दो अक्षय तरकस, अटूट धनुष तथा रणभूमि में शत्रु का विध्वंस करने वाला प्रबल अस्त्र-इन सबकी प्राप्ति हुई है॥ १२॥
एतान् सर्वान् वराँल्लब्ध्वा पुत्रस्तेऽयं दशानन।
अद्य यज्ञसमाप्तौ च त्वां दिदृक्षन् स्थितो ह्यहम्॥
‘दशानन ! तुम्हारा यह पुत्र इन सभी मनोवाञ्छित वरों को पाकर आज यज्ञ की समाप्ति के दिन तुम्हारे दर्शन की इच्छा से यहाँ खड़ा है’॥ १३॥
ततोऽब्रवीद् दशग्रीवो न शोभनमिदं कृतम्।
पूजिताः शत्रवो यस्माद् द्रव्यैरिन्द्रपुरोगमाः॥१४॥
यह सुनकर दशग्रीव ने कहा—’बेटा! तुमने यह अच्छा नहीं किया है; क्योंकि इस यज्ञसम्बन्धी द्रव्यों द्वारा मेरे शत्रुभूत इन्द्र आदि देवताओं का पूजन हुआ है॥ १४॥
एहीदानीं कृतं यद्धि सुकृतं तन्न संशयः।
आगच्छ सौम्य गच्छामः स्वमेव भवनं प्रति॥१५॥
‘अस्तु, जो कर दिया, सो अच्छा ही किया; इसमें संशय नहीं है। सौम्य! अब आओ, चलो हमलोग अपने घर को चलें’॥ १५॥
ततो गत्वा दशग्रीवः सपुत्रः सविभीषणः।
स्त्रियोऽवतारयामास सर्वास्ता बाष्पगद्गदाः॥१६॥
तदनन्तर दशग्रीव ने अपने पुत्र और विभीषण के साथ जाकर पुष्पक विमान से उन सब स्त्रियों को उतारा, जिन्हें हरकर ले आया था। वे अब भी आँसू बहाती हुई गद्गदकण्ठ से विलाप कर रही थीं॥ १६॥
लक्षिण्यो रत्नभूताश्च देवदानवरक्षसाम्।
तस्य तासु मतिं ज्ञात्वा धर्मात्मा वाक्यमब्रवीत्॥
वे उत्तम लक्षणों से सुशोभित होती थीं और देवताओं, दानवों तथा राक्षसों के घर की रत्न थीं। उनमें रावण की आसक्ति जानकर धर्मात्मा विभीषण ने कहा- ॥ १७॥
ईदशैस्त्वं समाचारैर्यशोऽर्थकलनाशनैः।
धर्षणं प्राणिनां ज्ञात्वा स्वमतेन विचेष्टसे॥१८॥
‘राजन् ! ये आचरण यश, धन और कुल का नाश करने वाले हैं। इनके द्वारा जो प्राणियों को पीड़ा दी जाती है, उससे बड़ा पाप होता है। इस बात को जानते हुए भी आप सदाचार का उल्लङ्घन करके स्वेच्छाचार में प्रवृत्त हो रहे हैं।॥ १८॥
ज्ञातींस्तान् धर्षयित्वेमास्त्वयाऽऽनीता वराङ्गनाः।
त्वामतिक्रम्य मधुना राजन् कुम्भीनसी हृता॥१९॥
‘महाराज! इन बेचारी अबलाओं के बन्धुबान्धवों को मारकर आप इन्हें हर लाये हैं और इधर आपका उल्लङ्घन करके-आपके सिर पर लात रखकर मधु ने मौसेरी बहिन कुम्भीनसी का अपहरण कर लिया’ ॥ १९॥
रावणस्त्वब्रवीद वाक्यं नावगच्छामि किं त्विदम।
कोऽयं यस्तु त्वयाऽऽख्यातो मधुरित्येव नामतः॥२०॥
रावण बोला—’मैं नहीं समझता कि तुम क्या कह रहे हो। जिसका नाम तुमने मधु बताया है, वह कौन है?’ ॥२०॥
विभीषणस्तु संक्रुद्धो भ्रातरं वाक्यमब्रवीत्।
श्रूयतामस्य पापस्य कर्मणः फलमागतम्॥२१॥
तब विभीषण ने अत्यन्त कुपित होकर भाई रावण से कहा—’सुनिये, आपके इस पापकर्म का फल हमें बहिन के अपहरण के रूप में प्राप्त हुआ है॥ २१॥
मातामहस्य योऽस्माकं ज्येष्ठो भ्राता सुमालिनः।
माल्यवानिति विख्यातो वृद्धः प्राज्ञो निशाचरः॥२२॥
पिता ज्येष्ठो जनन्या नो ह्यस्माकं चार्यकोऽभवत्।
तस्य कुम्भीनसी नाम दुहितुर्दुहिताभवत्॥ २३॥
मातृष्वसुरथास्माकं सा च कन्यानलोद्भवा।
भवत्यस्माकमेवैषा भ्रातृणां धर्मतः स्वसा॥२४॥
‘हमारे नाना सुमाली के जो बड़े भाई माल्यवान् नाम से विख्यात, बुद्धिमान् और बड़े-बूढ़े निशाचर हैं, वे हमारी माता कैकसी के ताऊ हैं। इसी नाते वे हमलोगों के भी बड़े नाना हैं। उनकी पुत्री अनला हमारी मौसी हैं। उन्हीं की पुत्री कुम्भीन सी है। हमारी मौसी अनला की बेटी होने से ही यह कुम्भीनसी हम सब भाइयों की धर्मतः बहिन होती है॥ २२–२४॥
सा हृता मधुना राजन् राक्षसेन बलीयसा।
यज्ञप्रवृत्ते पुत्रे तु मयि चान्तर्जलोषिते॥२५॥
कुम्भकर्णो महाराज निद्रामनुभवत्यथ।
निहत्य राक्षसश्रेष्ठानमात्यानिह सम्मतान्॥२६॥
‘राजन् ! आपका पुत्र मेघनाद जब यज्ञ में तत्पर हो गया, मैं तपस्या के लिये पानी के भीतर रहने लगा और महाराज! भैया कुम्भकर्ण भी जब नींद का आनन्द लेने लगे, उस समय महाबली राक्षस मधु ने यहाँ आकर हमारे आदरणीय मन्त्रियों को, जो राक्षसों में श्रेष्ठ थे, मार डाला और कुम्भीनसी का अपहरण कर लिया॥ २५-२६॥
धर्षयित्वा हृता सा तु गुप्ताप्यन्तःपुरे तव।
श्रुत्वापि तन्महाराज क्षान्तमेव हतो न सः॥ २७॥
यस्मादवश्यं दातव्या कन्या भā हि भ्रातृभिः।
‘महाराज! यद्यपि कुम्भीनसी अन्तःपुर में भलीभाँति सुरक्षित थी तो भी उसने आक्रमण करके बलपूर्वक उसका अपहरण किया। पीछे इस घटनाको सुनकर भी हमलोगों ने क्षमा ही की। मधु का वध नहीं किया; क्योंकि जब कन्या विवाहके योग्य हो जाय तो उसे किसी योग्य पतिके हाथमें सौंप देना ही उचित है। हम भाइयों को अवश्य यह कार्य पहले कर देना चाहिये था॥ २७ १/२॥
तदेतत् कर्मणो ह्यस्य फलं पापस्य दुर्मतेः॥ २८॥
अस्मिन्नेवाभिसम्प्राप्तं लोके विदितमस्तु ते।
‘हमारे यहाँ से जो बलपूर्वक कन्या का अपहरण हुआ है, यह आपकी इस दूषित बुद्धि एवं पापकर्म का फल है, जो आपको इसी लोक में प्राप्त हो गया। यह बात आपको भलीभाँति विदित हो जानी चाहिये’। २८ १/२॥
विभीषणवचः श्रुत्वा राक्षसेन्द्रः स रावणः॥२९॥
दौरात्म्येनात्मनोधूतस्तप्ताम्भा इव सागरः।
ततोऽब्रवीद दशग्रीवः क्रुद्धः संरक्तलोचनः॥३०॥
विभीषण की यह बात सुनकर राक्षसराज रावण अपनी की हुई दुष्टता से पीड़ित हो तपे हुए जलवाले समुद्र के समान संतप्त हो उठा। वह रोष से जलने लगा और उसके नेत्र लाल हो गये। वह बोला—॥ २९-३०॥
कल्प्यतां मे रथः शीघ्रं शूराः सज्जीभवन्तु नः।
भ्राता मे कुम्भकर्णश्च ये च मुख्या निशाचराः॥३१॥
वाहनान्यधिरोहन्तु नानाप्रहरणायुधाः।
अद्य तं समरे हत्वा मधुं रावणनिर्भयम्॥३२॥
सुरलोकं गमिष्यामि युद्धाकाङ्क्षी सुहृद्वृतः।
‘मेरा रथ शीघ्र ही जोतकर आवश्यक सामग्री से सुसज्जित कर दिया जाय। मेरे शूरवीर सैनिक रणयात्रा के लिये तैयार हो जायें। भाई कुम्भकर्ण तथा अन्य मुख्य-मुख्य निशाचर नाना प्रकार के अस्त्रशस्त्रों से सुसज्जित हो सवारियों पर बैठे। आज रावण का भय न मानने वाले मधु का समराङ्गण में वध करके मित्रों को साथ लिये युद्ध की इच्छा से देवलोक की यात्रा करूँगा’ ।। ३१-३२ १/२ ॥
अक्षौहिणीसहस्राणि चत्वार्यग्रयाणि रक्षसाम्॥
नानाप्रहरणान्याशु निर्ययुर्युद्धकाशिणाम्।
रावण की आज्ञा से युद्ध में उत्साह रखने वाले श्रेष्ठ राक्षसों की चार हजार अक्षौहिणी सेना नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये शीघ्र लङ्का से बाहर निकली॥ ३३ १/२॥
इन्द्रजित् त्वग्रतः सैन्यात् सैनिकान् परिगृह्य च॥३४॥
जगाम रावणो मध्ये कुम्भकर्णश्च पृष्ठतः।
मेघनाद समस्त सैनिकों को साथ लेकर सेना के आगे-आगे चला। रावण बीच में था और कुम्भकर्ण पीछे-पीछे चलने लगा॥ ३४ १/२॥
विभीषणश्च धर्मात्मा लङ्कायां धर्ममाचरन्॥३५॥
शेषाः सर्वे महाभागा ययुर्मधुपुरं प्रति।
विभीषण धर्मात्मा थे। इसलिये वे लङ्का में ही रहकर धर्म का आचरण करने लगे। शेष सभी महाभाग निशाचर मधुपुर की ओर चल दिये॥ ३५ १/२ ।।
खरैरुष्टैर्हयैर्दीप्तैः शिशुमारैर्महोरगैः॥ ३६॥
राक्षसाः प्रययुः सर्वे कृत्वाऽऽकाशं निरन्तरम्।
गदहे, ऊँट, घोड़े, शिशुमार (लॅस) और बड़े-बड़े नाग आदि दीप्तिमान् वाहनों पर आरूढ़ हो सब राक्षस आकाश को अवकाशरहित करते हुए चले॥ ३६ १/२॥
दैत्याश्च शतशस्तत्र कृतवैराश्च दैवतैः॥३७॥
रावणं प्रेक्ष्य गच्छन्तमन्वगच्छन् हि पृष्ठतः।
रावण को देवलोक पर आक्रमण करते देख सैकड़ों दैत्य भी उसके पीछे-पीछे चले, जिनका देवताओं के साथ वैर बँध गया था॥ ३७ १/२ ॥
स तु गत्वा मधुपुरं प्रविश्य च दशाननः॥३८॥
न ददर्श मधुं तत्र भगिनीं तत्र दृष्टवान्।
मधुपुर में पहुँचकर दशमुख रावण ने वहाँ कुम्भीनसी को तो देखा, किंतु मधु का दर्शन उसे नहीं हुआ॥ ३८ १/२॥
सा च प्रह्वाञ्जलिर्भूत्वा शिरसा चरणौ गता॥३९॥
तस्य राक्षसराजस्य त्रस्ता कुम्भीनसी तदा।
उस समय कुम्भीनसी ने भयभीत हो हाथ जोड़कर राक्षसराज के चरणों पर मस्तक रख दिया। ३९ १/२ ॥
तां समुत्थापयामास न भेतव्यमिति ब्रुवन्॥४०॥
रावणो राक्षसश्रेष्ठः किं चापि करवाणि ते।
तब राक्षसप्रवर रावण ने कहा—’डरो मत’; फिर उसने कुम्भीनसी को उठाया और कहा—’मैं तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करूँ?’ ॥ ४० १/२॥
साब्रवीद यदि मे राजन् प्रसन्नस्त्वं महाभुज॥४१॥
भर्तारं न ममेहाद्य हन्तुमर्हसि मानद।
नहीदृशं भयं किंचित् कुलस्त्रीणामिहोच्यते॥४२॥
भयानामपि सर्वेषां वैधव्यं व्यसनं महत्।
वह बोली-‘दूसरों को मान देने वाले राक्षसराज ! महाबाहो ! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो आज यहाँ मेरे पति का वध न कीजिये; क्योंकि कुलवधुओं के लिये वैधव्य के समान दूसरा कोई भय नहीं बताया जाता है। वैधव्य ही नारी के लिये सबसे बड़ा भय और सबसे महान् संकट है॥ ४१-४२ १/२॥
सत्यवाग् भव राजेन्द्र मामवेक्षस्व याचतीम्॥४३॥
त्वयाप्युक्तं महाराज न भेतव्यमिति स्वयम्।
‘राजेन्द्र! आप सत्यवादी हों-अपनी बात सच्ची करें। मैं आपसे पति के जीवन की भीख माँगती हूँ, आप मुझ दुःखिया बहिन की ओर देखिये, मुझ पर कृपा कीजिये। महाराज! आपने स्वयं भी मुझे आश्वासन देते हुए कहा था कि ‘डरो मत’ अतः अपनी उसी बात की लाज रखिये’।
रावणस्त्वब्रवीद्धृष्टः स्वसारं तत्र संस्थिताम्॥४४॥
क्व चासौ तव भर्ता वै मम शीघ्र निवेद्यताम्।
सह तेन गमिष्यामि सुरलोकं जयाय हि॥४५॥
यह सुनकर रावण प्रसन्न हो गया। वह वहाँ खड़ी बहिन से बोला—’तुम्हारे पति कहाँ हैं? उन्हें शीघ्र मुझे सौंप दो। मैं उन्हें साथ लेकर देवलोक पर विजय के लिये जाऊँगा’॥ ४४-४५ ॥
तव कारुण्यसौहार्दान्निवृत्तोऽस्मि मधोर्वधात्।
इत्युक्ता सा समुत्थाप्य प्रसुप्तं तं निशाचरम्॥४६॥
अब्रवीत् सम्प्रहृष्टेव राक्षसी सा पतिं वचः।
‘तुम्हारे प्रति करुणा और सौहार्द के कारण मैंने मधु के वध का विचार छोड़ दिया है।’ रावण के ऐसा कहने पर राक्षसकन्या कुम्भीनसी अत्यन्त प्रसन्न-सी होकर अपने सोये हुए पति के पास गयी और उस निशाचर को उठाकर बोली- ॥ ४६ १/२॥
एष प्राप्तो दशग्रीवो मम भ्राता महाबलः॥४७॥
सुरलोकजयाकाङ्क्षी साहाय्ये त्वां वृणोति च।
तदस्य त्वं सहायार्थं सबन्धुर्गच्छ राक्षस॥४८॥
‘राक्षसप्रवर! ये मेरे भाई महाबली दशग्रीव पधारे हैं और देवलोक पर विजय पाने की इच्छा लेकर वहाँ जा रहे हैं। इस कार्य के लिये ये आपको भी सहायक बनाना चाहते हैं; अतः आप अपने बन्धु-बान्धवों के साथ इनकी सहायता के लिये जाइये॥ ४७-४८॥
स्निग्धस्य भजमानस्य युक्तमर्थाय कल्पितम्।
तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा तथेत्याह मधुर्वचः॥४९॥
‘मेरे नाते आप पर इनका स्नेह है, आपको जामाता मानकर ये आपके प्रति अनुराग रखते हैं; अतः आपको इनके कार्य की सिद्धि के लिये अवश्य सहायता करनी चाहिये।’ पत्नी की यह बात सुनकर मधु ने ‘तथास्तु’ कहकर सहायता देना स्वीकार कर लिया॥४९॥
ददर्श राक्षसश्रेष्ठं यथान्यायमुपेत्य सः।
पूजयामास धर्मेण रावणं राक्षसाधिपम्॥५०॥
फिर वह न्यायोचित रीति से निकट जाकर निशाचरशिरोमणि राक्षसराज रावण से मिला। मिलकर उसने धर्म के अनुसार उसका स्वागत-सत्कार किया॥
प्राप्य पूजां दशग्रीवो मधुवेश्मनि वीर्यवान्।
तत्र चैकां निशामुष्य गमनायोपचक्रमे॥५१॥
मधु के भवन में यथोचित आदर-सत्कार पाकर पराक्रमी दशग्रीव वहाँ एक रात रहा, फिर सबेरे उठकर वहाँ से जाने को उद्यत हुआ॥५१॥
ततः कैलासमासाद्य शैलं वैश्रवणालयम्।
राक्षसेन्द्रो महेन्द्राभः सेनामुपनिवेशयत्॥५२॥
मधुपुर से यात्रा करके महेन्द्र के तुल्य पराक्रमी राक्षसराज रावण सायंकाल तक कुबेर के निवास-स्थान कैलास पर्वत पर जा पहुँचा। वहाँ उसने अपनी सेना का पड़ाव डालने का विचार किया।। ५२॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे पञ्चविंशः सर्गः ॥२५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्ड में पचीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।२५॥
सर्ग-26
स तु तत्र दशग्रीवः सह सैन्येन वीर्यवान्।
अस्तं प्राप्ते दिनकरे निवासं समरोचयत्॥१॥
जब सूर्य अस्ताचल को चले गये, तब पराक्रमी दशग्रीव ने अपनी सेना के साथ कैलास पर ही रात में ठहर जाना ठीक समझा ॥१॥
उदिते विमले चन्द्रे तुल्यपर्वतवर्चसि।
प्रसुप्तं सुमहत् सैन्यं नानाप्रहरणायुधम्॥२॥
(उसने वहीं छावनी डाल दी) फिर, कैलास के ही समान श्वेत कान्तिवाले निर्मल चन्द्रदेव का उदय हुआ और नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित निशाचरों की वह विशाल सेना गाढ़ निद्रा में निमग्न हो गयी॥२॥
रावणस्तु महावीर्यो निषण्णः शैलमूर्धनि।
स ददर्श गुणांस्तत्र चन्द्रपादपशोभितान्॥३॥
परंतु महापराक्रमी रावण उस पर्वत के शिखर पर चुपचाप बैठकर चन्द्रमा की चाँदनी से सुशोभित होने वाले उस पर्वत के विभिन्न स्थानों की (जो सम्पूर्ण कामभोग के उपयुक्त थे) नैसर्गिक छटा निहारने लगा॥३॥
कर्णिकारवनैर्दीप्तैः कदम्बबकुलैस्तथा।
पद्मिनीभिश्च फुल्लाभिर्मन्दाकिन्या जलैरपि।
चम्पकाशोकपूनागमन्दारतरुभिस्तथा।
चूतपाटललोधैश्च प्रियङ्ग्वर्जुनकेतकैः॥५॥
तगरैर्नारिकेलैश्च प्रियालपनसैस्तथा।
एतैरन्यैश्च तरुभिरुद्भासितवनान्तरे॥६॥
कहीं कनेर के दीप्तिमान् कानन शोभा पाते थे, कहीं कदम्ब और बकुल (मौलसिरी) वृक्षों के समूह अपनी रमणीयता बिखेर रहे थे, कहीं मन्दाकिनी के जल से भरी हुई और प्रफुल्ल कमलों से अलंकृत पुष्करिणियाँ शोभा दे रही थीं, कहीं चम्पा, अशोक, पुंनाग (नागकेसर), मन्दार, आम, पाड़र, लोध, प्रियङ्ग, अर्जुन, केतक, तगर, नारिकेल, प्रियाल और पनस आदि वृक्ष अपने पुष्प आदि की शोभा से उस पर्वत-शिखर के वन्यप्रान्त को उद्भासित कर रहे थे॥ ४
किन्नरा मदनेनार्ता रक्ता मधुरकण्ठिनः।
समं सम्प्रजगुर्यत्र मनस्तुष्टिविवर्धनम्॥७॥
मधुर कण्ठवाले कामार्त किन्नर अपनी कामिनियों के साथ वहाँ रागयुक्त गीत गा रहे थे, जो कानों में पड़कर मन का आनन्द-वर्धन करते थे॥७॥
विद्याधरा मदक्षीबा मदरक्तान्तलोचनाः।।
योषिद्भिः सह संक्रान्ताश्चिक्रीडुर्जहृषुश्च वै॥८॥
जिनके नेत्र-प्रान्त मद से कुछ लाल हो गये थे, वे मदमत्त विद्याधर युवतियों के साथ क्रीडा करते और हर्षमग्न होते थे॥८॥
घण्टानामिव संनादः शुश्रुवे मधुरस्वनः।
अप्सरोगणसङ्घानां गायतां धनदालये॥९॥
वहाँ से कुबेर के भवन में गाती हुई अप्सराओं के गीत की मधुर ध्वनि घण्टानाद के समान सुनायी पड़ती थी॥९॥
पुष्पवर्षाणि मुञ्चन्तो नगाः पवनताडिताः।
शैलं तं वासयन्तीव मधुमाधवगन्धिनः ॥१०॥
वसन्त-ऋतु के सभी पुष्पों की गन्ध से युक्त वृक्ष हवा के थपेड़े खाकर फूलों की वर्षा करते हुए उस समूचे पर्वत को सुवासित-सा कर रहे थे॥ १० ॥
मधुपुष्परजःपृक्तं गन्धमादाय पुष्कलम्।
प्रववौ वर्धयन् कामं रावणस्य सुखोऽनिलः॥११॥
विविध कुसुमों के मधुर मकरन्द तथा पराग से मिश्रित प्रचुर सुगन्ध लेकर मन्द-मन्द बहती हुई सुखद वायु रावण की काम-वासना को बढ़ा रही थी॥ ११॥
गेयात् पुष्पसमृद्ध्या च शैत्याद् वायोर्गिरेर्गुणात्।
प्रवृत्तायां रजन्यां च चन्द्रस्योदयनेन च ॥१२॥
रावणः स महावीर्यः कामस्य वशमागतः।
विनिःश्वस्य विनिःश्वस्य शशिनं समवैक्षत॥१३॥
सङ्गीत की मीठी तान, भाँति-भाँति के पुष्पों की समृद्धि, शीतल वायु का स्पर्श, पर्वत के (रमणीयता आदि) आकर्षक गुण, रजनी की मधुवेला और चन्द्रमा का उदय-उद्दीपन के इन सभी उपकरणों के कारण वह महापराक्रमी रावण काम के अधीन हो गया और बारम्बार लंबी साँस खींचकर चन्द्रमा की ओर देखने लगा। १२-१३॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र दिव्याभरणभूषिता।
सर्वाप्सरोवरा रम्भा पूर्णचन्द्रनिभानना॥१४॥
इसी बीच में समस्त अप्सराओं में श्रेष्ठ सुन्दरी, पूर्णचन्द्रमुखी रम्भा दिव्य वस्त्राभूषणों से विभूषित हो उस मार्ग से आ निकली॥ १४॥
दिव्यचन्दनलिप्ताङ्गी मन्दारकृतमूर्धजा।
दिव्योत्सवकृतारम्भा दिव्यपुष्पविभूषिता॥१५॥
उसके अङ्गों में दिव्य चन्दन का अनुलेप लगा था और केशपाश में पारिजात के पुष्प गुंथे हुए थे। दिव्य पुष्पों से अपना शृङ्गार करके वह प्रिय-समागमरूप दिव्य उत्सव के लिये जा रही थी॥१५॥
चक्षुर्मनोहरं पीनं मेखलादामभूषितम्।
समुद्रहन्ती जघनं रतिप्राभृतमुत्तमम्॥१६॥
मनोहर नेत्र तथा काञ्ची की लड़ियों से विभूषित पीन जघन-स्थल को वह रति के उत्तम उपहार के रूप में धारण किये हुए थी॥ १६॥
कृतैर्विशेषकैराः षडतुकुसुमोद्भवैः।
बभावन्यतमेव श्रीः कान्तिश्रीद्युतिकीर्तिभिः॥१७॥
उसके कपोल आदि पर हरिचन्दन से चित्र-रचना की गयी थी। वह छहों ऋतुओं में होने वाले नूतन पुष्पों के आर्द्र हारों से विभूषित थी और अपनी अलौकिक कान्ति, शोभा, द्युति एवं कीर्ति से युक्त हो उस समय दूसरी लक्ष्मी के समान जान पड़ती थी॥१७॥
नीलं सतोयमेघाभं वस्त्रं समवगुण्ठिता।
यस्या वक्त्रं शशिनिभं भ्रवौ चापनिभे शुभे॥१८॥
उसका मुख चन्द्रमा के समान मनोहर था और दोनों सुन्दर भौंहें कमान-सी दिखायी देती थीं। वह सजल जलधर के समान नील रंग की साड़ी से अपने अङ्गों को ढके हुए थी॥१८॥
ऊरू करिकराकारौ करौ पल्लवकोमलौ।
सैन्यमध्येन गच्छन्ती रावणेनोपलक्षिता॥१९॥
उसकी जाँघों का चढ़ाव-उतार हाथी की सूंड के समान था। दोनों हाथ ऐसे कोमल थे, मानो (देहरूपी रसाल की डाल के) नये-नये पल्लव हों। वह सेना के बीच से होकर जा रही थी, अतः रावण ने उसे देख लिया॥१९॥
तां समुत्थाय गच्छन्तीं कामबाणवशं गतः।
करे गृहीत्वा लज्जन्तीं स्मयमानोऽभ्यभाषत।२०॥
देखते ही वह कामदेव के बाणों का शिकार हो गया और खड़ा होकर उसने अन्यत्र जाती हुई रम्भा का हाथ पकड़ लिया। बेचारी अबला लाज से गड़ गयी; परंतु वह निशाचर मुसकराता हुआ उससे बोला-॥ २०॥
क्व गच्छसि वरारोहे कां सिद्धिं भजसे स्वयम्।
कस्याभ्युदयकालोऽयं यस्त्वां समुपभोक्ष्यते॥२१॥
‘वरारोहे ! कहाँ जा रही हो? किसकी इच्छा पूर्ण करने के लिये स्वयं चल पड़ी हो? किसके भाग्योदय का समय आया है, जो तुम्हारा उपभोग करेगा? ॥ २१॥
त्वदाननरसस्याद्य पद्मोत्पलसुगन्धिनः।
सुधामृतरसस्येव कोऽद्य तृप्तिं गमिष्यति ॥२२॥
‘कमल और उत्पल की सुगन्ध धारण करने वाले तुम्हारे इस मनोहर मुखारविन्द का रस अमृत का भी अमृत है। आज इस अमृत-रस का आस्वादन करके कौन तृप्त होगा? ॥ २२॥
स्वर्णकुम्भनिभौ पीनौ शुभौ भीरु निरन्तरौ।
कस्योरःस्थलसंस्पर्श दास्यतस्ते कुचाविमौ॥२३॥
‘भीरु! परस्पर सटे हुए तुम्हारे ये सुवर्णमय कलशों के सदृश सुन्दर पीन उरोज किसके वक्षःस्थलों को अपना स्पर्श प्रदान करेंगे? ॥ २३॥
सुवर्णचक्रप्रतिमं स्वर्णदामचितं पृथु।
अध्यारोक्ष्यति कस्तेऽद्य जघनं स्वर्गरूपिणम्॥२४॥
‘सोने की लड़ियों से विभूषित तथा सुवर्णमय चक्र के समान विपुल विस्तार से युक्त तुम्हारे पीन जघनस्थल पर जो मूर्तिमान् स्वर्ग-सा जान पड़ता है, आज कौन आरोहण करेगा? ॥ २४ ॥
मद्विशिष्टः पुमान् कोऽद्य शक्रो विष्णुरथाश्विनौ।
मामतीत्य हि यच्च त्वं यासि भीरु न शोभनम्॥२५॥
‘इन्द्र, उपेन्द्र अथवा अश्विनीकुमार ही क्यों न हों, इस समय कौन पुरुष मुझसे बढ़कर है? भीरु! तुममुझे छोड़कर अन्यत्र जा रही हो, यह अच्छा नहीं है।२५॥
विश्रम त्वं पृथुश्रोणि शिलातलमिदं शुभम्।
त्रैलोक्ये यः प्रभुश्चैव मदन्यो नैव विद्यते॥२६॥
‘स्थूल नितम्बवाली सुन्दरी! यह सुन्दर शिला है, इसपर बैठकर विश्राम करो। इस त्रिभुवन का जो स्वामी है, वह मुझसे भिन्न नहीं है—मैं ही सम्पूर्ण लोकों का अधिपति हूँ॥२६॥
तदेवं प्राञ्जलिः प्रह्वो याचते त्वां दशाननः।
भर्तुर्भर्ता विधाता च त्रैलोक्यस्य भजस्व माम्॥२७॥
‘तीनों लोकों के स्वामी का भी स्वामी तथा विधाता यह दशमुख रावण आज इस प्रकार विनीतभाव से हाथ जोड़कर तुमसे याचना करता है। सुन्दरी! मुझे स्वीकार करो’॥ २७॥
एवमुक्ताब्रवीद् रम्भा वेपमाना कृताञ्जलिः।
प्रसीद नार्हसे वक्तुमीदृशं त्वं हि मे गुरुः ॥२८॥
रावण के ऐसा कहने पर रम्भा काँप उठी और हाथ जोड़कर बोली—’प्रभो! प्रसन्न होइये—मुझपर कृपा कीजिये। आपको ऐसी बात मुंह से नहीं निकालनी चाहिये; क्योंकि आप मेरे गुरुजन हैं—पिता के तुल्य हैं।॥ २८॥
अन्येभ्योऽपि त्वया रक्ष्या प्राप्नुयां धर्षणं यदि।
तद्धर्मतः स्नुषा तेऽहं तत्त्वमेतद् ब्रवीमि ते॥२९॥
‘यदि दूसरे कोई पुरुष मेरा तिरस्कार करने पर उतारू हों तो उनसे भी आपको मेरी रक्षा करनी चाहिये। मैं धर्मतः आपकी पुत्रवधू हूँ—यह आपसे सच्ची बात बता रही हूँ’॥ २९॥
अथाब्रवीद् दशग्रीवश्चरणाधोमुखीं स्थिताम्।
रोमहर्षमनुप्राप्तां दृष्टमात्रेण तां तदा॥३०॥
रम्भा अपने चरणों की ओर देखती हुई नीचे मुँह किये खड़ी थी। रावण की दृष्टि पड़ने मात्र से भय के कारण उसके रोंगटे खड़े हो गये थे। उस समय उससे रावण ने कहा- ॥ ३० ॥
सुतस्य यदि मे भार्या ततस्त्वं हि स्नुषा भवेः।
बाढमित्येव सा रम्भा प्राह रावणमुत्तरम्॥३१॥
‘रम्भे ! यदि यह सिद्ध हो जाय कि तुम मेरे बेटेकी बहू हो, तभी मेरी पुत्रवधू हो सकती हो, अन्यथा नहीं।’ तब रम्भा ने ‘बहुत अच्छा’ कहकर रावण को इस प्रकार उत्तर दिया- ॥३१॥
धर्मतस्ते सुतस्याहं भार्या राक्षसपुङ्गव।
पुत्रः प्रियतरः प्राणैर्धातुर्वैश्रवणस्य ते॥३२॥
‘राक्षसशिरोमणे! धर्म के अनुसार मैं आपके पुत्र की ही भार्या हूँ। आपके बड़े भाई कुबेर के पुत्र मुझे प्राणों से भी बढ़कर प्रिय हैं॥ ३२॥
विख्यातस्त्रिषु लोकेषु नलकूबर इत्ययम्।
धर्मतो यो भवेद् विप्रः क्षत्रियो वीर्यतो भवेत् ॥
‘वे तीनों लोकों में ‘नलकूबर’ नाम से विख्यात हैं तथा धर्मानुष्ठान की दृष्टि से ब्राह्मण और पराक्रम की दृष्टि से क्षत्रिय हैं॥ ३३॥
क्रोधाद् यश्च भवेदग्निः क्षान्त्या च वसुधासमः।
तस्यास्मि कृतसंकेता लोकपालसुतस्य वै॥३४॥
‘वे क्रोध में अग्नि और क्षमा में पृथ्वी के समान हैं। उन्हीं लोकपालकुमार प्रियतम नलकूबर को आज मैंने मिलने के लिये संकेत दिया है। ३४ ।।
तमुद्दिश्य तु मे सर्वं विभूषणमिदं कृतम्।
यथा तस्य हि नान्यस्य भावो मां प्रति तिष्ठति॥३५॥
‘यह सारा शृङ्गार मैंने उन्हीं के लिये धारण किया है; जैसे उनका मेरे प्रति अनुराग है, उसी प्रकार मेरा भी उन्हीं के प्रति प्रगाढ़ प्रेम है, दूसरे किसी के प्रति नहीं॥ ३५ ॥
तेन सत्येन मां राजन् मोक्तुमर्हस्यरिंदम।
स हि तिष्ठति धर्मात्मा मां प्रतीक्ष्य समुत्सुकः॥३६॥
‘शत्रुओं का दमन करने वाले राक्षसराज! इस सत्य को दृष्टि में रखकर आप इस समय मुझे छोड़ दीजिये; वे मेरे धर्मात्मा प्रियतम उत्सुक होकर मेरी प्रतीक्षा करते होंगे॥३६॥
तत्र विनं तु तस्येह कर्तुं नार्हसि मुञ्च माम्।
सद्भिराचरितं मागं गच्छ राक्षसपुङ्गव॥३७॥
‘उनकी सेवाके इस कार्य में आपको यहाँ विघ्न नहीं डालना चाहिये। मुझे छोड़ दीजिये। राक्षसराज! आप सत्पुरुषों द्वारा आचरित धर्म के मार्ग पर चलिये॥ ३७॥
माननीयो मम त्वं हि पालनीया तथास्मि ते।
एवमुक्तो दशग्रीवः प्रत्युवाच विनीतवत्॥३८॥
‘आप मेरे माननीय गुरुजन हैं, अतः आपको मेरी रक्षा करनी चाहिये।’ यह सुनकर दशग्रीव ने उसे नम्रतापूर्वक उत्तर दिया- ॥ ३८॥
स्नुषास्मि यदवोचस्त्वमेकपत्नीष्वयं क्रमः।
देवलोकस्थितिरियं सुराणां शाश्वती मता॥३९॥
पतिरप्सरसा नास्ति न चैकस्त्रीपरिग्रहः।
‘रम्भे! तुम अपने को जो मेरी पुत्रवधू बता रही हो, वह ठीक नहीं जान पड़ता। यह नाता-रिश्ता उन स्त्रियों के लिये लागू होता है, जो किसी एक पुरुष की पत्नी हों। तुम्हारे देवलोक की तो स्थिति ही दूसरी है। वहाँ सदा से यही नियम चला आ रहा है कि अप्सराओं का कोई पति नहीं होता। वहाँ कोई एक स्त्री के साथ विवाह करके नहीं रहता है’ ।। ३९ १/२॥
एवमुक्त्वा स तां रक्षो निवेश्य च शिलातले॥४०॥
कामभोगाभिसंरक्तो मैथुनायोपचक्रमे।
ऐसा कहकर उस राक्षस ने रम्भा को बलपूर्वक शिलापर बैठा लिया और कामभोग में आसक्त हो उसके साथ समागम किया॥ ४० १/२॥
सा विमुक्ता ततो रम्भा भ्रष्टमाल्यविभूषणा॥४१॥
गजेन्द्राक्रीडमथिता नदीवाकुलतां गता।
उसके पुष्पहार टूटकर गिर गये, सारे आभूषण अस्त-व्यस्त हो गये। उपभोग के बाद रावण ने रम्भा को छोड़ दिया। उसकी दशा उस नदी के समान हो गयी जिसे किसी गजराज ने क्रीडा करके मथ डाला हो; वह अत्यन्त व्याकुल हो उठी॥ ४१ १/२ ॥
लुलिताकुलकेशान्ता करवेपितपल्लवा॥४२॥
पवनेनावधूतेव लता कुसुमशालिनी।
वेणी-बन्ध टूट जाने से उसके खुले हुए केश हवा में उड़ने लगे—उसका शृङ्गार बिगड़ गया। कर-पल्लव काँपने लगे। वह ऐसी लगती थी—मानो फूलों से सुशोभित होने वाली किसी लता को हवाने झकझोर दिया हो॥ ४२ १/२॥
सा वेपमाना लज्जन्ती भीता करकृताञ्जलिः॥४३॥
नलकूबरमासाद्य पादयोर्निपपात ह।
लज्जा और भय से काँपती हुई वह नलकूबर के पास गयी और हाथ जोड़कर उनके पैरों पर गिर पड़ी॥ ४३ १/२॥
तदवस्थां च तां दृष्ट्वा महात्मा नलकूबरः॥४४॥
अब्रवीत् किमिदं भद्रे पादयोः पतितासि मे।
रम्भा को इस अवस्था में देखकर महामना नलकूबर ने पूछा-‘भद्रे ! क्या बात है ? तुम इस तरह मेरे पैरों पर क्यों पड़ गयीं?’ ॥ ४४ १/२ ॥
सा वै निःश्वसमाना तु वेपमाना कृताञ्जलिः॥४५॥
तस्मै सर्वं यथातत्त्वमाख्यातुमुपचक्रमे।
वह थर-थर काँप रही थी। उसने लंबी साँस खींचकर हाथ जोड़ लिये और जो कुछ हुआ था, वह सब ठीक-ठीक बताना आरम्भ किया— ॥ ४५ १/२॥
एष देव दशग्रीवः प्राप्तो गन्तुं त्रिविष्टपम्॥४६॥
तेन सैन्यसहायेन निशेयं परिणामिता।
‘देव! यह दशमुख रावण स्वर्गलोक पर आक्रमण करने के लिये आया है। इसके साथ बहुत बड़ी सेना है। उसने आज की रात में यहीं डेरा डाला है॥ ४६ १/२॥
आयान्ती तेन दृष्टास्मि त्वत्सकाशमरिंदम॥४७॥
गृहीता तेन पृष्टास्मि कस्य त्वमिति रक्षसा।
‘शत्रुदमन वीर! मैं आपके पास आ रही थी, किंतु उस राक्षस ने मुझे देख लिया और मेरा हाथ पकड़ लिया। फिर पूछा—’तुम किसकी स्त्री हो?’॥ ४७ १/२॥
मया तु सर्वं यत् सत्यं तस्मै सर्वं निवेदितम्॥४८॥
काममोहाभिभूतात्मा नाश्रौषीत् तद् वचो मम।
‘मैंने उसे सब कुछ सच-सच बता दिया, किंतु उसका हृदय कामजनित मोह से आक्रान्त था, इसलिये मेरी वह बात नहीं सुनी॥ ४८ १/२॥
याच्यमानो मया देव स्नुषा तेऽहमिति प्रभो॥४९॥
तत् सर्वं पृष्ठतः कृत्वा बलात् तेनास्मि धर्षिता।
‘देव! मैं बारम्बार प्रार्थना करती ही रह गयी कि प्रभो ! मैं आपकी पुत्रवधू हूँ, मुझे छोड़ दीजिये; किंतु उसने मेरी सारी बातें अनसुनी कर दी और बलपूर्वक मेरे साथ अत्याचार किया॥ ४९ १/२॥
एवं त्वमपराधं मे क्षन्तुमर्हसि सुव्रत॥५०॥
नहि तुल्यं बलं सौम्य स्त्रियाश्च पुरुषस्य हि।
‘उत्तम व्रत का पालन करने वाले प्रियतम! इस बेबसी की दशा में मुझसे जो अपराध बन गया है, उसे आप क्षमा करें। सौम्य ! नारी अबला होती है, उसमें पुरुष के बराबर शारीरिक बल नहीं होता है (इसीलिये उस दुष्ट से अपनी रक्षा मैं नहीं कर सकी)’ ॥ ५० १/२॥
एतच्छ्रुत्वा तु संक्रुद्धस्तदा वैश्रवणात्मजः॥५१॥
धर्षणां तां परां श्रुत्वा ध्यानं सम्प्रविवेश ह।
यह सुनकर वैश्रवणकुमार नलकूबर को बड़ा क्रोध हुआ। रम्भा पर किये गये उस महान् अत्याचार को सुनकर उन्होंने ध्यान लगाया॥ ५१ १/२॥
तस्य तत् कर्म विज्ञाय तदा वैश्रवणात्मजः॥५२॥
मुहूर्तात् क्रोधताम्राक्षस्तोयं जग्राह पाणिना।
उस समय दो ही घड़ी में रावण की उस करतूतको जानकर वैश्रवणपुत्र नलकूबर के नेत्र क्रोध से लाल हो गये और उन्होंने अपने हाथ में जल लिया॥ ५२ १/२ ।।
गृहीत्वा सलिलं सर्वमुपस्पृश्य यथाविधि॥५३॥
उत्ससर्ज तदा शापं राक्षसेन्द्राय दारुणम्।
जल लेकर पहले विधिपूर्वक आचमन करके नेत्र आदि सारी इन्द्रियों का स्पर्श करनेके अनन्तर उन्होंने राक्षसराज को बड़ा भयंकर शाप दिया॥ ५३ १/२॥
अकामा तेन यस्मात् त्वं बलात् भद्रे प्रधर्षिता॥५४॥
तस्मात् स युवतीमन्यां नाकामामुपयास्यति।
वे बोले—’भद्रे! तुम्हारी इच्छा न रहने पर भी रावण ने तुम पर बलपूर्वक अत्याचार किया है। अतः वह आज से दूसरी किसी ऐसी युवती से समागम नहीं कर सकेगा जो उसे चाहती न हो॥ ५४ १/२॥
यदा ह्यकामां कामातॊ धर्षयिष्यति योषितम्॥५५॥
मूर्धा तु सप्तधा तस्य शकलीभविता तदा।
‘यदि वह कामपीड़ित होकर उसे न चाहने वाली युवती पर बलात्कार करेगा तो तत्काल उसके मस्तक के सात टुकड़े हो जायँगे’ ।। ५५ १/२॥
तस्मिन्नुदाहृते शापे ज्वलिताग्निसमप्रभे॥५६॥
देवदुन्दुभयो नेदुः पुष्पवृष्टिश्च खाच्च्युता।
नलकूबर के मुख से प्रज्वलित अग्नि के समान दग्धकर देने वाले इस शाप के निकलते ही देवताओं की दुन्दुभियाँ बज उठीं और आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी॥ ५६ १/२॥
पितामहमुखाश्चैव सर्वे देवाः प्रहर्षिताः॥५७॥
ज्ञात्वा लोकगतिं सर्वां तस्य मृत्युं च रक्षसः।
ऋषयः पितरश्चैव प्रीतिमापुरनुत्तमाम्॥५८॥
ब्रह्मा आदि सभी देवताओं को बड़ा हर्ष हुआ। रावण के द्वारा की गयी लोक की सारी दुर्दशा को और उस राक्षस की मृत्यु को भी जानकर ऋषियों तथा पितरों को बड़ी प्रसन्नता प्राप्त हुई। ५७-५८॥
श्रुत्वा तु स दशग्रीवस्तं शापं रोमहर्षणम्।
नारीषु मैथुनीभावं नाकामास्वभ्यरोचयत्॥५९॥
उस रोमाञ्चकारी शाप को सुनकर दशग्रीव ने अपने को न चाहने वाली स्त्रियों के साथ बलात्कार करना छोड़ दिया॥ ५९॥
तेन नीताः स्त्रियः प्रीतिमापः सर्वाः पतिव्रताः।
नलकूबरनिर्मुक्तं शापं श्रुत्वा मनःप्रियम्॥६०॥
वह जिन-जिन पतिव्रता स्त्रियों को हरकर ले गया था, उन सबके मन को नलकूबर का दिया वह शाप बड़ा प्रिय लगा। उसे सुनकर वे सब-की-सब बहुत प्रसन्न हुईं। ६०॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे षड्विंशः सर्गः ॥२६॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्ड में छब्बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।२६॥
सर्ग-27
कैलासं लवयित्वा तु ससैन्यबलवाहनः।
आससाद महातेजा इन्द्रलोकं दशाननः॥१॥
कैलास-पर्वत को पार करके महातेजस्वी दशमुख रावण सेना और सवारियों के साथ इन्द्रलोक में जा पहुँचा॥
तस्य राक्षससैन्यस्य समन्तादुपयास्यतः।
देवलोके बभौ शब्दो भिद्यमानार्णवोपमः॥२॥
सब ओर से आती हुई राक्षस-सेना का कोलाहल देवलोक में ऐसा जान पड़ता था, मानो महासागर के मथे जाने का शब्द प्रकट हो रहा हो॥२॥
श्रुत्वा तु रावणं प्राप्तमिन्द्रश्चलित आसनात्।
देवानथाब्रवीत् तत्र सर्वानेव समागतान्॥३॥
रावण का आगमन सुनकर इन्द्र अपने आसन से उठ गये और अपने पास आये हुए समस्त देवताओं से बोले- ॥३॥
आदित्यांश्च वसून् रुद्रान् साध्यांश्च समरुद्गणान्।
सज्जा भवत युद्धार्थं रावणस्य दुरात्मनः॥४॥
उन्होंने आदित्यों, वसुओं, रुद्रों, साध्यों तथा मरुद्गणों से भी कहा—’तुम सब लोग दुरात्मा रावण के साथ युद्ध करने के लिये तैयार हो जाओ’॥ ४॥
एवमुक्तास्तु शक्रेण देवाः शक्रसमा युधि।
संना सुमहासत्त्वा युद्धश्रद्धासमन्विताः॥५॥
इन्द्र के ऐसा कहने पर युद्ध में उन्हीं के समान पराक्रम प्रकट करने वाले महाबली देवता कवच आदि धारण करके युद्ध के लिये उत्सुक हो गये॥५॥
स तु दीनः परित्रस्तो महेन्द्रो रावणं प्रति।
विष्णोः समीपमागत्य वाक्यमेतदुवाच ह॥६॥
देवराज इन्द्र को रावण से भय हो गया था। अतः वे दुःखी हो भगवान् विष्णु के पास आये और इस प्रकार बोले- ॥६॥
विष्णो कथं करिष्यामि रावणं राक्षसं प्रति।
अहोऽतिबलवद् रक्षो युद्धार्थमभिवर्तते॥७॥
‘विष्णुदेव! मैं राक्षस रावण के लिये क्या करूँ? अहो! वह अत्यन्त बलशाली निशाचर मेरे साथ युद्ध करने के लिये आ रहा है॥७॥
वरप्रदानाद् बलवान् न खल्वन्येन हेतुना।
तत् तु सत्यं वचः कार्यं यदुक्तं पद्मयोनिना॥८॥
‘वह केवल ब्रह्माजी के वरदान के कारण प्रबल हो गया है। दूसरे किसी हेतु से नहीं। कमलयोनि ब्रह्माजी ने जो वर दे दिया है, उसे सत्य करना हम सब लोगों का काम है॥ ८॥
तद् यथा नमुचिर्वृत्रो बलिर्नरकशम्बरौ।
त्वबलं समवष्टभ्य मया दग्धास्तथा कुरु॥९॥
‘अतः जैसे पहले आपके बल का आश्रय लेकर मैंने नमुचि, वृत्रासुर, बलि, नरक और शम्बर आदि । असुरों को दग्ध कर डाला है, उसी प्रकार इस समय भी इस असुरका अन्त हो जाय, ऐसा कोई उपाय आप ही कीजिये॥९॥
नह्यन्यो देवदेवेश त्वदृते मधुसूदन।
गतिः परायणं चापि त्रैलोक्ये सचराचरे॥१०॥
‘मधुसूदन! आप देवताओं के भी देवता एवं ईश्वर हैं। इस चराचर त्रिभुवन में आपके सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जो हम देवताओं को सहारा दे सके। आप ही हमारे परम आश्रय हैं॥ १० ॥
त्वं हि नारायणः श्रीमान् पद्मनाभः सनातनः।
त्वयेमे स्थापिता लोकाः शक्रश्चाहं सुरेश्वरः॥११॥
‘आप पद्मनाभ हैं—आपही के नाभिकमल से जगत् की उत्पत्ति हुई है। आप ही सनातनदेव श्रीमान् नारायण हैं। आपने ही इन तीनों लोकों को स्थापित किया है और आपने ही मुझे देवराज इन्द्र बनाया है। ११॥
त्वया सृष्टमिदं सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम्।
त्वामेव भगवन् सर्वे प्रविशन्तिं युगक्षये॥१२॥
‘भगवन् ! आपने ही स्थावर-जङ्गम प्राणियोंसहित इस समस्त त्रिलोकी की सृष्टि की है और प्रलयकाल में सम्पूर्ण भूत आपमें ही प्रवेश करते हैं।॥ १२॥
तदाचक्ष्व यथातत्त्वं देवदेव मम स्वयम्।
असिचक्रसहायस्त्वं योत्स्यसे रावणं प्रति॥१३॥
‘इसलिये देवदेव! आप ही मुझे कोई ऐसा अमोघ उपाय बताइये, जिससे मेरी विजय हो। क्या आप स्वयं चक्र और तलवार लेकर रावण से युद्ध करेंगे?’ ॥ १३॥
एवमुक्तः स शक्रेण देवो नारायणः प्रभुः।
अब्रवीन्न परित्रासः कर्तव्यः श्रूयतां च मे ॥१४॥
इन्द्र के ऐसा कहने पर भगवान् नारायणदेव बोले —’देवराज! तुम्हें भय नहीं करना चाहिये मेरी बात सुनो— ॥ १४ ॥
न तावदेष दुष्टात्मा शक्यो जेतुं सुरासुरैः।
हन्तुं चापि समासाद्य वरदानेन दुर्जयः॥१५॥
‘पहली बात तो यह है इस दुष्टात्मा रावण को सम्पूर्ण देवता और असुर मिलकर भी न तो मार सकते हैं और न परास्त ही कर सकते हैं; क्योंकि वरदान पाने के कारण यह इस समय दुर्जय हो गया है॥ १५॥
सर्वथा तु महत् कर्म करिष्यति बलोत्कटः।
राक्षसः पुत्रसहितो दृष्टमेतन्निसर्गतः॥१६॥
‘अपने पुत्र के साथ आया हुआ यह उत्कट बलशाली राक्षस सब प्रकार से महान् पराक्रम प्रकट करेगा। यह बात मुझे अपनी स्वाभाविक ज्ञानदृष्टि से दिखायी दे रही है॥१६॥
यत् तु मां त्वमभाषिष्ठा युध्यस्वेति सुरेश्वर।
नाहं तं प्रतियोत्स्यामि रावणं राक्षसं युधि॥१७॥
‘सुरेश्वर! दूसरी बात जो मुझे कहनी है, इस प्रकार है-तुम जो मुझसे कह रहे थे कि ‘आप ही उसके साथ युद्ध कीजिये’ उसके उत्तर में निवेदन है कि मैं इस समय युद्धस्थल में राक्षस रावण का सामना करने के लिये नहीं जाऊँगा॥ १७॥
नाहत्वा समरे शत्रु विष्णुः प्रतिनिवर्तते।
दुर्लभश्चैव कामोऽद्य वरगुप्ताद्धि रावणात्॥१८॥
‘मुझ विष्णुका यह स्वभाव है कि मैं संग्राम में शत्रु का वध किये बिना पीछे नहीं लौटता; परंतु इस समय रावण वरदान से सुरक्षित है, इसलिये उसकी ओर से मेरी इस विजय-सम्बन्धिनी इच्छा की पूर्ति होनी कठिन है॥ १८॥
प्रतिजाने च देवेन्द्र त्वत्समीपे शतक्रतो।
भवितास्मि यथास्याहं रक्षसो मृत्युकारणम्॥१९॥
‘परंतु देवेन्द्र! शतक्रतो! मैं तुम्हारे समीप इस बात की प्रतिज्ञा करता हूँ कि समय आने पर मैं ही इस राक्षस की मृत्यु का कारण बनूँगा ॥ १९॥
अहमेव निहन्तास्मि रावणं सपुरःसरम्।
देवता नन्दयिष्यामि ज्ञात्वा कालमुपागतम्॥२०॥
‘मैं ही रावण को उसके अग्रगामी सैनिकोंसहित मारूँगा और देवताओं को आनन्दित करूँगा; परंतु यह तभी होगा जब मैं जान लूँगा कि इसकी मृत्यु का समय आ पहुँचा है॥२०॥
एतत् ते कथितं तत्त्वं देवराज शचीपते।
युद्ध्यस्व विगतत्रासः सुरैः सार्धं महाबल॥२१॥
‘देवराज! ये सब बातें मैंने तुम्हें ठीक-ठीक बता दीं। महाबलशाली शचीवल्लभ! इस समय तो तुम्हीं देवताओंसहित जाकर उस राक्षस के साथ निर्भय हो युद्ध करो’ ॥ २१॥
ततो रुद्राः सहादित्या वसवो मरुतोऽश्विनौ।
संनद्धा निर्ययुस्तूर्णं राक्षसानभितः पुरात्॥ २२॥
तदनन्तर रुद्र, आदित्य, वसु, मरुद्गण और अश्विनीकुमार आदि देवता युद्ध के लिये तैयार होकर तुरंत अमरावतीपुरी से बाहर निकले और राक्षसों का सामना करने के लिये आगे बढ़े॥ २२ ॥
एतस्मिन्नन्तरे नादः शुश्रुवे रजनीक्षये।
तस्य रावणसैन्यस्य प्रयुद्धस्य समन्ततः॥२३॥
इसी बीच में रात बीतते-बीतते सब ओर से युद्ध के लिये उद्यत हुई रावण की सेनाका महान् कोलाहल सुनायी देने लगा॥ २३॥
ते प्रबुद्धा महावीर्या अन्योन्यमभिवीक्ष्य वै।
संग्राममेवाभिमुखा अभ्यवर्तन्त हृष्टवत्॥२४॥
वे महापराक्रमी राक्षससैनिक सबेरे जागने पर एकदूसरे की ओर देखते हुए बड़े हर्ष और उत्साह के साथ युद्ध के लिये ही आगे बढ़ने लगे॥ २४ ॥
ततो दैवतसैन्यानां संक्षोभः समजायत।
तदक्षयं महासैन्यं दृष्ट्वा समरमूर्धनि॥२५॥
तदनन्तर युद्ध के मुहाने पर राक्षसों की उस अनन्त एवं विशाल सेना को देखकर देवताओं की सेना में बड़ा क्षोभ हुआ॥ २५ ॥
ततो युद्धं समभवद् देवदानवरक्षसाम्।
घोरं तुमुलनिर्हादं नानाप्रहरणोद्यतम्॥२६॥
फिर तो देवताओं का दानवों और राक्षसों के साथ भयंकर युद्ध छिड़ गया। भयंकर कोलाहल होने लगा और दोनों ओरसे नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों की बौछार आरम्भ हो गयी॥२६॥
एतस्मिन्नन्तरे शूरा राक्षसा घोरदर्शनाः।
युद्धार्थं समवर्तन्त सचिवा रावणस्य ते॥२७॥
इसी समय रावण के मन्त्री शूरवीर राक्षस, जो बड़े भयंकर दिखायी देते थे, युद्ध के लिये आगे बढ़ आये॥
मारीचश्च प्रहस्तश्च महापार्श्वमहोदरौ।
अकम्पनो निकुम्भश्च शुकः सारण एव च॥२८॥
संह्रादो धूमकेतुश्च महादंष्ट्रो घटोदरः।
जम्बुमाली महाह्रादो विरूपाक्षश्च राक्षसः॥२९॥
सुप्तनो यज्ञकोपश्च दुर्मुखो दूषणः खरः।
त्रिशिराः करवीराक्षः सूर्यशत्रुश्च राक्षसः॥३०॥
महाकायोऽतिकायश्च देवान्तकनरान्तकौ।
एतैः सर्वैः परिवृतो महावीर्यैर्महाबलः॥ ३१॥
रावणस्यार्यकः सैन्यं सुमाली प्रविवेश ह।
मारीच, प्रहस्त, महापार्श्व, महोदर, अकम्पन, निकुम्भ, शुक, शारण, संहाद, धूमकेतु, महादंष्ट्र, घटोदर, जम्बुमाली, महाह्राद, विरूपाक्ष, सुप्तघ्न, यज्ञकोप, दुर्मुख, दूषण, खर, त्रिशिरा, करवीराक्ष, सूर्यशत्रु, महाकाय, अतिकाय, देवान्तक तथा नरान्तक-इन सभी महापराक्रमी राक्षसों से घिरे हुए महाबली सुमाली ने, जो रावण का नाना था, देवताओं की सेना में प्रवेश किया। २८–३१ १/२॥
स दैवतगणान् सर्वान् नानाप्रहरणैः शितैः॥३२॥
व्यध्वंसयत् समं क्रुद्धो वायुर्जलधरानिव।
उसने कुपित हो नाना प्रकार के पैने अस्त्रशस्त्रों द्वारा समस्त देवताओं को उसी तरह मार भगाया, जैसे वायु बादलों को छिन्न-भिन्न कर देती है॥ ३२ १/२॥
तद् दैवतबलं राम हन्यमानं निशाचरैः ॥ ३३॥
प्रणुन्नं सर्वतो दिग्भ्यः सिंहनुन्ना मृगा इव।
श्रीराम! निशाचरों की मार खाकर देवताओं की वह सेना सिंह द्वारा खदेड़े गये मृगों की भाँति सम्पूर्ण दिशाओं में भाग चली॥ ३३ १/२ ॥
एतस्मिन्नन्तरे शूरो वसूनामष्टमो वसुः॥३४॥
सावित्र इति विख्यातः प्रविवेश रणाजिरम्।
इसी समय वसुओं में से आठवें वसु ने, जिनका नाम सावित्र है, समराङ्गण में प्रवेश किया॥ ३४ १/२॥
सैन्यैः परिवृतो हृष्टै नाप्रहरणोद्यतैः॥ ३५॥
त्रासयन् शत्रुसैन्यानि प्रविवेश रणाजिरम्।
वे नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित एवं उत्साहित सैनिकों से घिरे हुए थे। उन्होंने शत्रुसेनाओं को संत्रस्त करते हुए रणभूमि में पदार्पण किया॥ ३५ १/२॥
तथादित्यौ महावीर्यौ त्वष्टा पूषा च तौ समम्॥३६॥
निर्भयौ सह सैन्येन तदा प्राविशतां रणे।
इनके सिवा अदिति के दो महापराक्रमी पुत्र त्वष्टा और पूषा ने अपनी सेना के साथ एक ही समय युद्धस्थल में प्रवेश किया, वे दोनों वीर निर्भय थे॥३६ १/२॥
ततो युद्धं समभवत् सुराणां सह राक्षसैः॥३७॥
क्रुद्धानां रक्षसां कीर्तिं समरेष्वनिवर्तिनाम्।
फिर तो देवताओं का राक्षसों के साथ घोर युद्ध होने लगा। युद्ध से पीछे न हटने वाले राक्षसों की बढ़ती हुई कीर्ति देख-सुनकर देवता उनके प्रति बहुत कुपित थे। ३७ १/२॥
ततस्ते राक्षसाः सर्वे विबुधान् समरे स्थितान्॥३८॥
नानाप्रहरणैोरैर्जनुः शतसहस्रशः।
तत्पश्चात् समस्त राक्षस समरभूमि में खड़े हुए लाखों देवताओं को नाना प्रकार के घोर अस्त्रशस्त्रों द्वारा मारने लगे॥ ३८ १/२॥
देवाश्च राक्षसान् घोरान् महाबलपराक्रमान्॥३९॥
समरे विमलैः शस्त्रैरुपनिन्युर्यमक्षयम्।
इसी तरह देवता भी महान् बल-पराक्रम से सम्पन्न घोर राक्षसों को समराङ्गण में चमकीले अस्त्र-शस्त्रों से मार-मारकर यमलोक भेजने लगे॥ ३९ १/२ ॥
एतस्मिन्नन्तरे राम सुमाली नाम राक्षसः॥४०॥
नानाप्रहरणैः क्रुद्धस्तत्सैन्यं सोऽभ्यवर्तत।
स दैवतबलं सर्वं नानाप्रहरणैः शितैः॥४१॥
व्यध्वंसयत संक्रुद्धो वायुर्जलधरं यथा।
श्रीराम! इसी बीच में सुमाली नामक राक्षस ने कुपित होकर नाना प्रकार के आयुधों द्वारा देवसेना पर आक्रमण किया। उसने अत्यन्त क्रोध से भरकर बादलों को छिन्न-भिन्न कर देने वाली वायु के समान अपने भाँति-भाँति के तीखे अस्त्र-शस्त्रों द्वारा समस्त देवसेना को तितर-बितर कर दिया॥ ४०-४१ १/२॥
ते महाबाणवषैश्च शूलप्रासैः सुदारुणैः॥४२॥
हन्यमानाः सुराः सर्वे न व्यतिष्ठन्त संहताः।
उसके महान् बाणों और भयङ्कर शूलों एवं प्रासों की वर्षा से मारे जाते हुए सभी देवता युद्धक्षेत्र में संगठित होकर खड़े न रह सके॥ ४२ १/२ ॥
ततो विद्राव्यमाणेषु दैवतेषु सुमालिना॥४३॥
वसूनामष्टमः क्रुद्धः सावित्रो वै व्यवस्थितः।
संवृतः स्वैरथानीकैः प्रहरन्तं निशाचरम्॥४४॥
सुमाली द्वारा देवताओं के भगाये जाने पर आठवें वसु सावित्र को बड़ा क्रोध हुआ। वे अपनी रथसेनाओं के साथ आकर उस प्रहार करने वाले निशाचर के सामने खड़े हो गये॥ ४३-४४॥
स दैवतबलं सर्वं नानाप्रहरणैः शितैः॥४१॥
व्यध्वंसयत संक्रुद्धो वायुर्जलधरं यथा।
श्रीराम! इसी बीच में सुमाली नामक राक्षस ने कुपित होकर नाना प्रकार के आयुधों द्वारा देवसेना पर आक्रमण किया। उसने अत्यन्त क्रोध से भरकर बादलों को छिन्न-भिन्न करदेने वाली वायु के समान अपने भाँति-भाँति के तीखे अस्त्र-शस्त्रों द्वारा समस्त देवसेना को तितर-बितर कर दिया॥ ४०-४१ १/२॥
ते महाबाणवषैश्च शूलप्रासैः सुदारुणैः॥४२॥
हन्यमानाः सुराः सर्वे न व्यतिष्ठन्त संहताः।
उसके महान् बाणों और भयङ्कर शूलों एवं प्रासों की वर्षा से मारे जाते हुए सभी देवता युद्धक्षेत्र में संगठित होकर खड़े न रह सके॥ ४२ १/२ ॥
ततो विद्राव्यमाणेषु दैवतेषु सुमालिना॥४३॥
वसूनामष्टमः क्रुद्धः सावित्रो वै व्यवस्थितः।
संवृतः स्वैरथानीकैः प्रहरन्तं निशाचरम्॥४४॥
सुमाली द्वारा देवताओं के भगाये जाने पर आठवें वसु सावित्र को बड़ा क्रोध हुआ। वे अपनी रथसेनाओं के साथ आकर उस प्रहार करने वाले निशाचर के सामने खड़े हो गये॥ ४३-४४॥
विक्रमेण महातेजा वारयामास संयुगे।
ततस्तयोर्महद् युद्धमभवल्लोमहर्षणम्॥४५॥
सुमालिनो वसोश्चैव समरेष्वनिवर्तिनोः।
महातेजस्वी सावित्र ने युद्धस्थल में अपने पराक्रमद्वारा सुमाली को आगे बढ़ने से रोक दिया। सुमाली और वसु दोनों में से कोई भी युद्ध से पीछे हटने वाला नहीं था; अतः उन दोनों में महान् एवं रोमाञ्चकारी युद्ध छिड़ गया॥ ४५ १/२ ॥
ततस्तस्य महाबाणैर्वसुना सुमहात्मना॥४६॥
निहतः पन्नगरथः क्षणेन विनिपातितः।
तदनन्तर महात्मा वसु ने अपने विशाल बाणों द्वारा सुमाली के सर्प जुते हुए रथ को क्षणभर में तोड़फोड़कर गिरा दिया॥ ४६ १/२ ॥
हत्वा तु संयुगे तस्य रथं बाणशतैश्चितम्॥४७॥
गदां तस्य वधार्थाय वसुर्जग्राह पाणिना।
ततः प्रगृह्य दीप्ताग्रां कालदण्डोपमां गदाम्॥४८॥
तां मूर्ध्नि पातयामास सावित्रो वै सुमालिनः।
युद्धस्थल में सैकड़ों बाणों से छिदे हुए सुमाली के रथ को नष्ट करके वसु ने उस निशाचर के वध के लिये कालदण्ड के समान एक भयङ्कर गदा हाथ में ली, जिसका अग्रभाग अग्नि के समान प्रज्वलित हो रहा था। उसे लेकर सावित्र ने सुमाली के मस्तक पर दे मारा ॥ ४७-४८ १/२॥
सा तस्योपरि चोल्काभा पतन्ती विबभौ गदा॥४९॥
इन्द्रप्रमुक्ता गर्जन्ती गिराविव महाशनिः।
उसके ऊपर गिरती हुई वह गदा उल्का के समान चमक उठी, मानो इन्द्र के द्वारा छोड़ी गयी विशाल अशनि भारी गड़गड़ाहट के साथ किसी पर्वत के शिखर पर गिर रही हो॥ ४९ १/२॥
तस्य नैवास्थि न शिरो न मांसं ददृशे तदा॥५०॥
गदया भस्मतां नीतं निहतस्य रणाजिरे।
उसकी चोट लगते ही समराङ्गण में सुमाली का काम तमाम हो गया। न उसकी हड्डी का पता लगा, न मस्तक का और न कहीं उसका मांस ही दिखायी दिया। वह सब कुछ उस गदा की आग से भस्म हो गया॥ ५० १/२॥
तं दृष्ट्वा निहतं संख्ये राक्षसास्ते समन्ततः॥५१॥
व्यद्रवन् सहिताः सर्वे क्रोशमानाः परस्परम्।
विद्राव्यमाणा वसुना राक्षसा नावतस्थिरे॥५२॥
युद्ध में सुमाली को मारा गया देख वे सब राक्षस एक-दूसरे को पुकारते हुए एक साथ चारों ओर भाग खड़े हुए। वसु के द्वारा खदेड़े जाने वाले वे राक्षस समरभूमि में खड़े न रह सके। ५१-५२॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे सप्तविंशः सर्गः ॥२७॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्ड में सत्ताईसवाँ सर्ग पूरा हुआ।२७॥
सर्ग-28
सुमालिनं हतं दृष्ट्वा वसुना भस्मसात्कृतम्।
स्वसैन्यं विद्रुतं चापि लक्षयित्वार्दितं सुरैः॥१॥
ततः स बलवान् क्रुद्धो रावणस्य सुतस्तदा।
निवर्त्य राक्षसान् सर्वान् मेघनादो व्यवस्थितः॥२॥
सुमाली मारा गया, वसु ने उसके शरीर को भस्म कर दिया और देवताओं से पीड़ित होकर मेरी सेना भागी जा रही है, यह देख रावण का बलवान् पुत्र मेघनाद कुपित हो समस्त राक्षसों को लौटाकर देवताओं से लोहा लेने के लिये स्वयं खड़ा हुआ॥ १-२॥
स रथेनाग्निवर्णेन कामगेन महारथः।
अभिदुद्राव सेनां तां वनान्यग्निरिव ज्वलन्॥३॥
वह महारथी वीर इच्छानुसार चलने वाले अग्नितुल्य तेजस्वी रथ पर आरूढ़ हो वन में फैलाने वाले प्रज्वलित दावानल के समान उस देवसेना की ओर दौड़ा॥३॥
ततः प्रविशतस्तस्य विविधायुधधारिणः।
विदुद्रुवुर्दिशः सर्वा दर्शनादेव देवताः॥४॥
नाना प्रकार के आयुध धारण करके अपनी सेना में प्रवेश करने वाले उस मेघनाद को देखते ही सब देवता सम्पूर्ण दिशाओं की ओर भाग चले॥ ४॥
न बभूव तदा कश्चिद् युयुत्सोरस्य सम्मुखे।
सर्वानाविद्ध्य वित्रस्तांस्ततः शक्रोऽब्रवीत् सुरान्॥
उस समय युद्ध की इच्छा वाले मेघनाद के सामने कोई भी खड़ा न हो सका। तब भयभीत हुए उन समस्त देवताओं को फटकारकर इन्द्र ने उनसे कहा – ॥५॥
न भेतव्यं न गन्तव्यं निवर्तध्वं रणे सुराः।
एष गच्छति पुत्रो मे युद्धार्थमपराजितः॥६॥
‘देवताओ! भय न करो, युद्ध छोड़कर न जाओ और रणक्षेत्र में लौट आओ। यह मेरा पुत्र जयन्त, जो कभी किसी से परास्त नहीं हुआ है, युद्ध के लिये जा रहा है’॥६॥
ततः शक्रसुतो देवो जयन्त इति विश्रुतः।
रथेनाद्भुतकल्पेन संग्रामे सोऽभ्यवर्तत॥७॥
तदनन्तर इन्द्रपुत्र जयन्तदेव अद्भुत सजावट से युक्त रथ पर आरूढ़ हो युद्ध के लिये आया॥७॥
ततस्ते त्रिदशाः सर्वे परिवार्य शचीसुतम्।
रावणस्य सुतं युद्धे समासाद्य प्रजजिरे॥८॥
फिर तो सब देवता शचीपुत्र जयन्त को चारों ओर से घेरकर युद्धस्थल में आये और रावण के पुत्र पर प्रहार करने लगे॥ ८॥
तेषां युद्धं समभवत् सदृशं देवरक्षसाम्।
महेन्द्रस्य च पुत्रस्य राक्षसेन्द्रसुतस्य च॥९॥
उस समय देवताओं का राक्षसों के साथ और महेन्द्रकुमार का रावणपुत्र के साथ उनके बलपराक्रम के अनुरूप युद्ध होने लगा॥९॥
ततो मातलिपुत्रस्य गोमुखस्य स रावणिः।
सारथेः पातयामास शरान् कनकभूषणान्॥१०॥
रावणकुमार मेघनाद जयन्तके सारथि मातलिपुत्र गोमुखपर सुवर्णभूषित बाणों की वर्षा करने लगा। १०॥
शचीसुतश्चापि तथा जयन्तस्तस्य सारथिम्।
तं चापि रावणिः क्रुद्धः समन्तात् प्रत्यविध्यत॥११॥
शचीपुत्र जयन्त ने भी मेघनाद के सारथि को घायल कर दिया। तब कुपित हुए मेघनाद ने जयन्त को भी सब ओर से क्षत-विक्षत कर दिया॥११॥
स हि क्रोधसमाविष्टो बली विस्फारितेक्षणः।
रावणिः शक्रतनयं शरवर्षैरवाकिरत्॥१२॥
उस समय क्रोध से भरा हुआ बलवान् मेघनाद इन्द्रपुत्र जयन्त को आँखें फाड़-फाड़कर देखने और बाणों की वर्षा से पीड़ित करने लगा॥ १२ ॥
ततो नानाप्रहरणाञ्छितधारान् सहस्रशः।
पातयामास संक्रुद्धः सुरसैन्येषु रावणिः॥१३॥
अत्यन्त कुपित हुए रावणकुमार ने देवताओं की सेना पर भी तीखी धार वाले नाना प्रकार के सहस्रों अस्त्र-शस्त्र बरसाये॥१३॥
शतघ्नीमुसलप्रासगदाखड्गपरश्वधान्।
महान्ति गिरिशृङ्गाणि पातयामास रावणिः॥१४॥
उसने शतघ्नी, मूसल, प्रास, गदा, खड्ग और फरसे गिराये तथा बड़े-बड़े पर्वत-शिखर भी चलाये। १४॥
ततः प्रव्यथिताः लोकाः संजज्ञे च तमस्ततः।
तस्य रावणपुत्रस्य शत्रुसैन्यानि निघ्नतः॥१५॥
शत्रुसेनाओं के संहार में लगे हुए रावणकुमारकी माया से उस समय चारों ओर अन्धकार छा गया; अतः समस्त लोक व्यथित हो उठे॥ १५ ॥
ततस्तद् दैवतबलं समन्तात् तं शचीसुतम्।
बहुप्रकारमस्वस्थमभवच्छरपीडितम्॥१६॥
तब शचीकुमार के चारों ओर खड़ी हुई देवताओं की वह सेना बाणों द्वारा पीड़ित हो अनेक प्रकार से अस्वस्थ हो गयी॥ १६॥
नाभ्यजानन्त चान्योन्यं रक्षो वा देवताथवा।
तत्र तत्र विपर्यस्तं समन्तात् परिधावत॥१७॥
राक्षस और देवता आपस में किसी को पहचान न सके। वे जहाँ-तहाँ बिखरे हुए चारों ओर चक्कर काटने लगे॥१७॥
देवा देवान् निज नुस्ते राक्षसान् राक्षसास्तथा।
सम्मूढास्तमसाच्छन्ना व्यद्रवन्नपरे तथा॥१८॥
अन्धकार से आच्छादित होकर वे विवेकशक्ति खो बैठे थे। अतः देवता देवताओं को और राक्षस राक्षसों को ही मारने लगे तथा बहुतेरे योद्धा युद्ध से भाग खड़े हुए।॥ १८॥
एतस्मिन्नन्तरे वीरः पुलोमा नाम वीर्यवान्।
दैत्येन्द्रस्तेन संगृह्य शचीपुत्रोऽपवाहितः॥१९॥
इसी बीच में पराक्रमी वीर दैत्यराज पुलोमा युद्ध में आया और शचीपुत्र जयन्त को पकड़कर वहाँ से दूर हटा ले गया॥ १९॥
संगृह्य तं तु दौहित्रं प्रविष्टः सागरं तदा।
आर्यकः स हि तस्यासीत् पुलोमा येन सा शची॥२०॥
वह शची का पिता और जयन्त का नाना था, अतः अपने दौहित्र को लेकर समुद्र में घुस गया॥२०॥
ज्ञात्वा प्रणाशं तु तदा जयन्तस्याथ देवताः।
अप्रहृष्टास्ततः सर्वा व्यथिताः सम्प्रदुद्रुवुः ॥२१॥
देवताओं को जब जयन्त के गायब होने की बात मालूम हुई, तब उनकी सारी खुशी छिन गयी और वे दुःखी होकर चारों ओर भागने लगे॥ २१॥
रावणिस्त्वथ संक्रुद्धो बलैः परिवृतः स्वकैः।
अभ्यधावत देवांस्तान् मुमोच च महास्वनम्॥२२॥
उधर अपनी सेनाओं से घिरे हुए रावणकुमार मेघनाद ने अत्यन्त कुपित हो देवताओं पर धावा किया और बड़े जोर से गर्जना की॥ २२॥
दृष्ट्वा प्रणाशं पुत्रस्य दैवतेषु च विद्रुतम्।
मातलिं चाह देवेशो रथः समुपनीयताम्॥२३॥
पुत्र लापता हो गया और देवताओं की सेना में भगदड़ मच गयी है—यह देखकर देवराज इन्द्र ने मातलि से कहा—’मेरा रथ ले आओ’ ॥ २३॥
स तु दिव्यो महाभीमः सज्ज एव महारथः।
उपस्थितो मातलिना वाह्यमानो महाजवः॥२४॥
मातलि ने एक सजा-सजाया महाभयङ्कर, दिव्य एवं विशाल रथ लाकर उपस्थित कर दिया। उसके द्वारा हाँका जाने वाला वह रथ बड़ा ही वेगशाली था॥ २४॥
ततो मेघा रथे तस्मिंस्तडित्त्वन्तो महाबलाः।
अग्रतो वायूचपला नेदः परमनिःस्वनाः॥२५॥
तदनन्तर उस रथ पर बिजली से युक्त महाबली मेघ उसके अग्रभाग में वायु से चञ्चल हो बड़े जोर-जोर से गर्जना करने लगे॥ २५ ॥
नानावाद्यानि वाद्यन्त गन्धर्वाश्च समाहिताः।
ननृतुश्चाप्सरःसङ्घा निर्याते त्रिदशेश्वरे ॥२६॥
देवेश्वर इन्द्र के निकलते ही नाना प्रकार के बाजे बज उठे, गन्धर्व एकाग्र हो गये और अप्सराओं के समूह नृत्य करने लगे॥२६॥
रुद्रैर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां समरुद्गणैः।
वृतो नानाप्रहरणैर्निर्ययौ त्रिदशाधिपः॥२७॥
तत्पश्चात् रुद्रों, वसुओं, आदित्यों, अश्विनीकुमारों और मरुद्गणों से घिरे हुए देवराज इन्द्र नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्र साथ लिये पुरी से बाहर निकले॥२७॥
निर्गच्छतस्तु शक्रस्य परुषः पवनो ववौ।
भास्करो निष्प्रभश्चैव महोल्काश्च प्रपेदिरे॥२८॥
इन्द्रके निकलते ही प्रचण्ड वायु चलने लगी। सूर्य की प्रभा फीकी पड़ गयी और आकाश से बड़ीबड़ी उल्काएँ गिरने लगीं॥ २८॥
एतस्मिन्नन्तरे शूरो दशग्रीवः प्रतापवान्।
आरुरोह रथं दिव्यं निर्मितं विश्वकर्मणा ॥२९॥
इसी बीच में प्रतापी वीर दशग्रीव भी विश्वकर्मा के बनाये हुए दिव्य रथ पर सवार हुआ॥ २९॥
पन्नगैः सुमहाकायैर्वेष्टितं लोमहर्षणैः।
येषां निःश्वासवातेन प्रदीप्तमिव संयुगे॥३०॥
उस रथ में रोंगटे खड़े कर देने वाले विशालकाय सर्प लिपटे हुए थे। उनकी निःश्वास-वायु से वह रथ उस युद्धस्थल में ज्वलित-सा जान पड़ता था॥ ३०॥
दैत्यैर्निशाचरैश्चैव स रथः परिवारितः।
समराभिमुखो दिव्यो महेन्द्रं सोऽभ्यवर्तत॥३१॥
दैत्यों और निशाचरों ने उस रथ को सब ओर से घेर रखा था। समराङ्गण की ओर बढ़ता हुआ रावण का वह दिव्य रथ महेन्द्र के सामने जा पहुँचा॥ ३१ ॥
पुत्रं तं वारयित्वा तु स्वयमेव व्यवस्थितः।
सोऽपि युद्धाद् विनिष्क्रम्य रावणिः समुपाविशत्॥ ३२॥
रावण अपने पुत्र को रोककर स्वयं ही युद्ध के लिये खड़ा हुआ। तब रावणपुत्र मेघनाद युद्धस्थल से निकलकर चुपचाप अपने रथ पर जा बैठा॥ ३२॥
ततो युद्धं प्रवृत्तं तु सुराणां राक्षसैः सह।
शस्त्राणि वर्षतां तेषां मेघानामिव संयुगे॥३३॥
फिर तो देवताओं का राक्षसों के साथ घोर युद्ध होने लगा। जल की वर्षा करने वाले मेघों के समान देवता युद्धस्थल में अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा करने लगे॥३३॥
कुम्भकर्णस्तु दुष्टात्मा नानाप्रहरणोद्यतः।
नाज्ञायत तदा राजन् युद्धं केनाभ्यपद्यत ॥ ३४॥
राजन्! दुष्टात्मा कुम्भकर्ण नाना प्रकार के अस्त्रशस्त्र लिये किसके साथ युद्ध करता था, इसका पता नहीं लगता था (अर्थात् मतवाला होने के कारण अपने और पराये सभी सैनिकों के साथ जूझने लगता था) ॥ ३४॥
दन्तैः पादैर्भुजैर्हस्तैः शक्तितोमरमुद्गरैः ।
येन तेनैव संक्रुद्धस्ताडयामास देवताः॥ ३५॥
वह अत्यन्त कुपित हो दाँत, लात, भुजा, हाथ, शक्ति, तोमर और मुद्गर आदि जो ही पाता उसी से देवताओं को पीटता था॥ ३५ ॥
स तु रुदैर्महाघोरैः संगम्याथ निशाचरः।
प्रयुद्धस्तैश्च संग्रामे क्षतः शस्त्रैर्निरन्तरम्॥३६॥
वह निशाचर महाभयङ्कर रुद्रों के साथ भिड़कर घोर युद्ध करने लगा। संग्राम में रुद्रों ने अपने अस्त्रशस्त्रों द्वारा उसे ऐसा क्षत-विक्षत कर दिया था कि उसके शरीर में थोड़ी-सी भी जगह बिना घाव के नहीं रह गयी थी॥३६॥
बभौ शस्त्राचिततनुः कुम्भकर्णः क्षरन्नसृक्।
विद्युत्स्तनितनिर्घोषो धारावानिव तोयदः॥ ३७॥
कुम्भकर्ण का शरीर शस्त्रों से व्याप्त हो खून की धारा बहा रहा था। उस समय वह बिजली तथा गर्जना से युक्त जलकी धारा गिराने वाले मेघ के समान जान पड़ता था॥
ततस्तद् राक्षसं सैन्यं प्रयुद्धं समरुद्गणैः।
रणे विद्रावितं सर्वं नानाप्रहरणैस्तदा ॥ ३८॥
तदनन्तर घोर युद्ध में लगी हुई उस सारी राक्षससेना को रणभूमि में नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाले रुद्रों और मरुद्गणों ने मार भगाया॥ ३८॥
केचिद् विनिहताः कृत्ताश्चेष्टन्ति स्म महीतले।
वाहनेष्ववसक्ताश्च स्थिता एवापरे रणे॥३९॥
कितने ही निशाचर मारे गये। कितने ही कटकर धरती पर लोटने और छटपटाने लगे और बहुत-से राक्षस प्राणहीन हो जाने पर भी उस रणभूमि में अपने वाहनों पर ही चिपटे रहे ॥ ३९॥
रथान् नागान् खरानुष्टान् पन्नगांस्तुरगांस्तथा।
शिशुमारान् वराहांश्च पिशाचवदनानपि॥४०॥
तान् समालिङ्ग्य बाहुभ्यां विष्टब्धाः केचिदुत्थिताः।
देवैस्तु शस्त्रसंभिन्ना मम्रिरे च निशाचराः॥४१॥
कुछ राक्षस रथों, हाथियों, गदहों, ऊँटों, सर्पो, घोड़ों, शिशुमारों, वराहों तथा पिशाचमुख वाहनों को दोनों भुजाओं से पकड़कर उनसे लिपटे हुए निश्चेष्ट हो गये थे। कितने ही जो पहले से मूर्छित होकर पड़े थे, मूर्छा दूर होने पर उठे, किंतु देवताओं के शस्त्रों से छिन्न-भिन्न हो मौत के मुख में चले गये॥ ४०-४१॥
चित्रकर्म इवाभाति सर्वेषां रणसम्प्लवः।
निहतानां प्रसुप्तानां राक्षसानां महीतले॥४२॥
प्राणों से हाथ धोकर धरती पर पड़े हुए उन समस्त राक्षसों का इस तरह युद्ध में मारा जाना जादू-सा आश्चर्यजनक जान पड़ता था॥ ४२॥
शोणितोदकनिष्पन्दा काकगृध्रसमाकुला।
प्रवृत्ता संयुगमुखे शस्त्रग्राहवती नदी॥४३॥
युद्ध के मुहाने पर खून की नदी बह चली, जिसके भीतर अनेक प्रकार के शस्त्र ग्राहों का भ्रम उत्पन्न करते थे। उस नदी के तट पर चारों ओर गीध और कौए छा गये थे॥४३॥
एतस्मिन्नन्तरे क्रुद्धो दशग्रीवः प्रतापवान्।
निरीक्ष्य तु बलं सर्वं दैवतैर्विनिपातितम्॥४४॥
इसी बीच में प्रतापी दशग्रीव ने जब देखा कि देवताओं ने हमारे समस्त सैनिकों को मार गिराया है, तब उसके क्रोध की सीमा न रही॥ ४४॥
स तं प्रतिविगाह्याशु प्रवृद्धं सैन्यसागरम्।
त्रिदशान् समरे निनन् शक्रमेवाभ्यवर्तत ॥ ४५ ॥
वह समुद्र के समान दूर तक फैली हुई देवसेना में घुस गया और समराङ्गण में देवताओं को मारता एवं धराशायी करता हुआ तुरंत ही इन्द्र के सामने जा पहुँचा॥ ४५ ॥
ततः शक्रो महच्चापं विस्फार्य सुमहास्वनम्।
यस्य विस्फारनिर्घोषैः स्तनन्ति स्म दिशो दश॥४६॥
तब इन्द्र ने जोर-जोर से टङ्कार करने वाले अपने विशाल धनुष को खींचा। उसकी टङ्कार-ध्वनि से दसों दिशाएँ प्रतिध्वनित हो उठीं॥ ४६॥
तद् विकृष्य महच्चापमिन्द्रो रावणमूर्धनि।
पातयामास स शरान् पावकादित्यवर्चसः॥४७॥
उस विशाल धनुष को खींचकर इन्द्र ने रावण के मस्तक पर अग्नि और सूर्य के समान तेजस्वी बाण मारे॥४७॥
तथैव च महाबाहुर्दशग्रीवो निशाचरः।
शक्रं कार्मुकविभ्रष्टैः शरवर्षैरवाकिरत्॥४८॥
इसी प्रकार महाबाहु निशाचर दशग्रीव ने भी अपने धनुष से छूटे हुए बाणों की वर्षा से इन्द्र को ढक दिया॥ ४८॥
प्रयुध्यतोरथ तयोर्बाणवषैः समन्ततः।
नाज्ञायत तदा किंचित् सर्वं हि तमसा वृतम्॥४९॥
वे दोनों घोर युद्ध में तत्पर हो जब बाणों की वृष्टि करने लगे, उस समय सब ओर सब कुछ अन्धकार से आच्छादित हो गया। किसी को किसी भी वस्तु की पहचान नहीं हो पाती थी॥ ४९॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डेऽष्टाविंशः सर्गः ॥२८॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्ड में अट्ठाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ।२८॥
सर्ग-29
ततस्तमसि संजाते सर्वे ते देवराक्षसाः।
अयुद्धयन्त बलोन्मत्ताः सूदयन्तः परस्परम्॥१॥
जब सब ओर अन्धकार छा गया, तब बल से उन्मत्त हुए वे समस्त देवता और राक्षस एक-दूसरे को मारते हुए परस्पर युद्ध करने लगे॥१॥
ततस्तु देवसैन्येन राक्षसानां बृहद् बलम्।
दशांशं स्थापितं युद्धे शेषं नीतं यमक्षयम्॥२॥
उस समय देवताओं की सेना ने राक्षसों के विशाल सैन्य-समूह का केवल दसवाँ हिस्सा युद्धभूमि में खड़ा रहने दिया। शेष सब राक्षसों को यमलोक पहुँचा दिया॥
तस्मिंस्तु तामसे युद्धे सर्वे ते देवराक्षसाः।
अन्योन्यं नाभ्यजानन्त युद्ध्यमानाः परस्परम्॥३॥
उस तामस युद्ध में समस्त देवता और राक्षस परस्पर जूझते हुए एक-दूसरे को पहचान नहीं पाते थे॥
इन्द्रश्च रावणश्चैव रावणिश्च महाबलः।
तस्मिंस्तमोजालवृते मोहमीयुर्न ते त्रयः॥४॥
इन्द्र, रावण और रावणपुत्र महाबली मेघनाद ये तीन ही उस अन्धकाराच्छन्न समराङ्गण में मोहित नहीं हुए थे॥ ४॥
स तु दृष्ट्वा बलं सर्वं रावणो निहतं क्षणात्।
क्रोधमभ्यगमत् तीव्र महानादं च मुक्तवान्॥५॥
रावण ने देखा, मेरी सारी सेना क्षणभर में मारी गयी, तब उसके मन में बड़ा क्रोध हुआ और उसने बड़ी भारी गर्जना की॥५॥
क्रोधात् सूतं च दुर्धर्षः स्यन्दनस्थमुवाच ह।
परसैन्यस्य मध्येन यावदन्तो नयस्व माम्॥६॥
उस दुर्जय निशाचर ने रथ पर बैठे हुए अपने सारथि से क्रोधपूर्वक कहा—’सूत! शत्रुओं की इस
तस्मिंस्तु तामसे युद्धे सर्वे ते देवराक्षसाः।
अन्योन्यं नाभ्यजानन्त युद्ध्यमानाः परस्परम्॥३॥
उस तामस युद्ध में समस्त देवता और राक्षस परस्पर जूझते हुए एक-दूसरे को पहचान नहीं पाते थे॥
इन्द्रश्च रावणश्चैव रावणिश्च महाबलः।
तस्मिंस्तमोजालवृते मोहमीयुर्न ते त्रयः॥४॥
इन्द्र, रावण और रावणपुत्र महाबली मेघनाद ये तीन ही उस अन्धकाराच्छन्न समराङ्गण में मोहित नहीं हुए थे॥ ४॥
स तु दृष्ट्वा बलं सर्वं रावणो निहतं क्षणात्।
क्रोधमभ्यगमत् तीव्र महानादं च मुक्तवान्॥५॥
रावणने देखा, मेरी सारी सेना क्षणभरमें मारी गयी, तब उसके मनमें बड़ा क्रोध हुआ और उसने बड़ी भारी गर्जना की॥५॥
क्रोधात् सूतं च दुर्धर्षः स्यन्दनस्थमुवाच ह।
परसैन्यस्य मध्येन यावदन्तो नयस्व माम्॥६॥
उस दुर्जय निशाचर ने रथ पर बैठे हुए अपने सारथि से क्रोधपूर्वक कहा—’सूत! शत्रुओं की इस सेना का जहाँ तक अन्त है, वहाँ तक तुम इस सेना के मध्यभाग से होकर मुझे ले चलो॥६॥
अद्यैतान् त्रिदशान् सर्वान् विक्रमैः समरे स्वयम्।
नानाशस्त्रमहासारैर्नयामि यमसादनम्॥७॥
‘आज मैं स्वयं अपने पराक्रम द्वारा नाना प्रकार के शस्त्रों की मूसलाधार वृष्टि करके इन सब देवताओं को यमलोक पहुँचा दूंगा॥ ७॥
अहमिन्द्रं वधिष्यामि धनदं वरुणं यमम्।
त्रिदशान् विनिहत्याशु स्वयं स्थास्याम्यथोपरि॥८॥
‘मैं इन्द्र, कुबेर, वरुण और यम का भी वध करूँगा। सब देवताओं का शीघ्र ही संहार करके स्वयं सबके ऊपर स्थित होऊँगा॥८॥
विषादो नैव कर्तव्यः शीघ्रं वाहय मे रथम्।
द्विः खलु त्वां ब्रवीम्यद्य यावदन्तं नयस्व माम्॥
‘तुम्हें विषाद नहीं करना चाहिये। शीघ्र मेरे रथ को ले चलो। मैं तुमसे दो बार कहता हूँ, देवताओं की सेना का जहाँतक अन्त है, वहाँ तक मुझे अभी ले चलो॥९॥
अयं स नन्दनोद्देशो यत्र वर्तावहे वयम्।
नय मामद्य तत्र त्वमुदयो यत्र पर्वतः॥१०॥
‘यह नन्दनवन का प्रदेश है, जहाँ इस समय हम दोनों मौजूद हैं। यहीं से देवताओं की सेना का आरम्भ होता है। अब तुम मुझे उस स्थान तक ले चलो, जहाँ उदयाचल है (नन्दनवन से उदयाचल तक देवताओं की सेना फैली हुई है)’॥ १०॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा तुरगान् स मनोजवान्।
आदिदेशाथ शत्रूणां मध्येनैव च सारथिः॥११॥
रावण की यह बात सुनकर सारथि ने मन के समान वेगशाली घोड़ों को शत्रुसेना के बीच से हाँक दिया। ११॥
तस्य तं निश्चयं ज्ञात्वा शक्रो देवेश्वरस्तदा।
रथस्थः समरस्थस्तान् देवान् वाक्यमथाब्रवीत्॥१२॥
रावण के इस निश्चय को जानकर समरभूमि में रथ पर बैठे हुए देवराज इन्द्र ने उन देवताओं से कहा- ॥ १२॥
सुराः शृणुत मद्वाक्यं यत् तावन्मम रोचते।
जीवन्नेव दशग्रीवः साधु रक्षो निगृह्यताम्॥१३॥
‘देवगण! मेरी बात सुनो। मुझे तो यही अच्छा लगता है कि इस निशाचर दशग्रीव को जीवित अवस्था में ही भलीभाँति कैद कर लिया जाय॥ १३॥
एष ह्यतिबलः सैन्ये रथेन पवनौजसा।
गमिष्यति प्रवृद्धोर्मिः समुद्र इव पर्वणि॥१४॥
‘यह अत्यन्त बलशाली राक्षस वायु के समान वेगशाली रथ के द्वारा इस सेना के बीच में होकर उसी तरह तीव्रगति से आगे बढ़ेगा, जैसे पूर्णिमा के दिन उत्ताल तरङ्गों से युक्त समुद्र बढ़ता है॥ १४ ॥
नह्येष हन्तुं शक्योऽद्य वरदानात् सुनिर्भयः।
तद् ग्रहीष्यामहे रक्षो यत्ता भवत संयुगे॥१५॥
‘यह आज मारा नहीं जा सकता; क्योंकि ब्रह्माजी के वरदान के प्रभाव से पूर्णतः निर्भय हो चुका है। इसलिये हमलोग इस राक्षस को पकड़कर कैद कर लेंगे। तुमलोग युद्ध में इस बात के लिये पूरा प्रयत्न करो॥ १५॥
यथा बलौ निरुद्धे च त्रैलोक्यं भुज्यते मया।
एवमेतस्य पापस्य निरोधो मम रोचते॥१६॥
‘जैसे राजा बलि के बाँध लिये जाने पर ही मैं तीनों लोकों के राज्य का उपभोग कर रहा हूँ, उसी प्रकार इस पापी निशाचर को बंदी बना लिया जाय, यही मुझे अच्छा लगता है’ ॥ १६॥
ततोऽन्यं देशमास्थाय शक्रः संत्यज्य रावणम्।
अयुध्यत महाराज राक्षसांस्त्रासयन् रणे॥१७॥
महाराज श्रीराम! ऐसा कहकर इन्द्र ने रावण के साथ युद्ध करना छोड़ दिया और दूसरी ओर जाकर समराङ्गण में राक्षसों को भयभीत करते हुए वे उनके साथ युद्ध करने लगे॥१७॥
उत्तरेण दशग्रीवः प्रविवेशानिवर्तकः।
दक्षिणेन तु पाइँन प्रविवेश शतक्रतुः॥१८॥
युद्ध से पीछे न हटने वाले रावण ने उत्तर की ओर से देवसेना में प्रवेश किया और देवराज इन्द्र ने दक्षिण की ओर राक्षससेना में॥ १८॥
ततः स योजनशतं प्रविष्टो राक्षसाधिपः।
देवतानां बलं सर्वं शरवर्षैरवाकिरत्॥१९॥
देवताओं की सेना चार सौ कोस तक फैली हुई थी। राक्षसराज रावण ने उसके भीतर घुसकर समूची देवसेना को बाणों की वर्षा से ढक दिया॥१९॥
ततः शक्रो निरीक्ष्याथ प्रणष्टं तु स्वकं बलम्।
न्यवर्तयदसम्भ्रान्तः समावृत्य दशाननम्॥२०॥
अपनी विशाल सेना को नष्ट होती देख इन्द्र ने बिना किसी घबराहट के दशमुख रावण का सामना किया और उसे चारों ओर से घेरकर युद्ध से विमुख कर दिया॥२०॥
एतस्मिन्नन्तरे नादो मुक्तो दानवराक्षसैः।
हा हताः स्म इति ग्रस्तं दृष्टा शक्रेण रावणम्॥२१॥
इसी समय रावण को इन्द्र के चंगुल में फँसा हुआ देख दानवों तथा राक्षसों ने ‘हाय! हम मारे गये’ ऐसा कहकर बड़े जोर से आर्तनाद किया॥२१॥
ततो रथं समास्थाय रावणिः क्रोधमूर्च्छितः।
तत् सैन्यमतिसंक्रुद्धः प्रविवेश सुदारुणम्॥२२॥
तब रावण का पुत्र मेघनाद क्रोध से अचेत-सा हो गया और रथ पर बैठकर अत्यन्त कुपित हो उसने शत्रु की भयंकर सेना में प्रवेश किया॥ २२ ॥
तां प्रविश्य महामायां प्राप्तां पशुपतेः पुरा।
प्रविवेश सुसंरब्धस्तत् सैन्यं समभिद्रवत्॥२३॥
पूर्वकाल में पशुपति महादेवजी से उसको जो तमोमयी महामाया प्राप्त हुई थी, उसमें प्रवेश करके उसने अपने को छिपा लिया और अत्यन्त क्रोधपूर्वक शत्रुसेना में घुसकर उसे खदेड़ना आरम्भ किया। २३॥
स सर्वा देवतास्त्यक्त्वा शक्रमेवाभ्यधावत।
महेन्द्रश्च महातेजा नापश्यच्च सुतं रिपोः॥२४॥
वह सब देवताओं को छोड़कर इन्द्र पर ही टूट पड़ा, परंतु महातेजस्वी इन्द्र अपने शत्रु के उस पुत्र को देख न सके॥२४॥
विमुक्तकवचस्तत्र वध्यमानोऽपि रावणिः।
त्रिदशैः सुमहावीर्यैर्न चकार च किंचन॥२५॥
महापराक्रमी देवताओं की मार खाने से यद्यपि वहाँ रावणकुमार का कवच नष्ट हो गया था, तथापि उसने अपने मन में तनिक भी भय नहीं किया॥ २५॥
स मातलिं समायान्तं ताडयित्वा शरोत्तमैः।
महेन्द्र बाणवर्षेण भूय एवाभ्यवाकिरत्॥२६॥
उसने अपने सामने आते हुए मातलि को उत्तम बाणों से घायल करके सायकों की झड़ी लगाकर पुनः देवराज इन्द्र को भी ढक दिया॥ २६॥
ततस्त्यक्त्वा रथं शक्रो विससर्ज च सारथिम्।
ऐरावतं समारुह्य मृगयामास रावणिम्॥२७॥
तब इन्द्रने रथ को छोड़कर सारथि को विदा कर दिया और ऐरावत हाथी पर आरूढ़ हो वे रावणकुमार की खोज करने लगे॥२७॥
स तत्र मायाबलवानदृश्योऽथान्तरिक्षगः।
इन्द्रं मायापरिक्षिप्तं कृत्वा स प्राद्रवच्छरैः॥२८॥
मेघनाद अपनी माया के कारण बहुत प्रबल हो रहा था। वह अदृश्य होकर आकाश में विचरने लगा और इन्द्र को माया से व्याकुल करके बाणों द्वारा उनपर आक्रमण किया॥ २८॥
स तं यदा परिश्रान्तमिन्द्रं जज्ञेऽथ रावणिः।
तदैनं मायया बद्ध्वा स्वसैन्यमभितोऽनयत्॥२९॥
रावणकुमार को जब अच्छी तरह मालूम हो गया कि इन्द्र बहुत थक गये हैं, तब उन्हें माया से बाँधकर अपनी सेना में ले आया॥ २९॥
तं तु दृष्ट्वा बलात् तेन नीयमानं महारणात्।
महेन्द्रममराः सर्वे किं नु स्यादित्यचिन्तयन्॥३०॥
महेन्द्र को उस महासमर से मेघनाद द्वारा बलपूर्वक ले जाये जाते देख सब देवता यह सोचने लगे कि अब क्या होगा? ॥ ३०॥
दृश्यते न स मायावी शक्रजित् समितिंजयः।
विद्यावानपि येनेन्द्रो माययापहृतो बलात्॥३१॥
‘यह युद्धविजयी मायावी राक्षस स्वयं तो दिखायी देता नहीं, इसीलिये इन्द्र पर विजय पाने में सफल हुआ है। यद्यपि देवराज इन्द्र राक्षसी माया का संहार करने की विद्या जानते हैं, तथापि इस राक्षस ने माया द्वारा बलपूर्वक इनका अपहरण किया है’। ३१॥
एतस्मिन्नन्तरे क्रुद्धाः सर्वे सुरगणास्तदा।
रावणं विमुखीकृत्य शरवर्षैरवाकिरन्॥३२॥
ऐसा सोचते हुए वे सब देवता उस समय रोष से भर गये और रावण को युद्ध से विमुख करके उसपर बाणों की झड़ी लगाने लगे॥ ३२॥
रावणस्तु समासाद्य आदित्यांश्च वसूंस्तदा।
न शशाक स संग्रामे योद्धं शत्रुभिरर्दितः॥३३॥
रावण आदित्यों और वसुओं का सामना पड़ जानेपर युद्ध में उनके सम्मुख ठहर न सका; क्योंकि शत्रुओं ने उसे बहुत पीड़ित कर दिया था॥३३॥
स तं दृष्ट्वा परिम्लानं प्रहारैर्जर्जरीकृतम्।
रावणिः पितरं युद्धेऽदर्शनस्थोऽब्रवीदिदम्॥३४॥
मेघनाद ने देखा पिता का शरीर बाणों के प्रहार से जर्जर हो गया है और वे युद्ध में उदास दिखायी देते हैं। तब वह अदृश्य रहकर ही रावण से इस प्रकार बोला-
आगच्छ तात गच्छामो रणकर्म निवर्तताम्।
जितं नो विदितं तेऽस्तु स्वस्थो भव गतज्वरः॥३५॥
‘पिताजी! चले आइये। अब हमलोग घर चलें। युद्ध बंद कर दिया जाय। हमारी जीत हो गयी; अतः आप स्वस्थ, निश्चिन्त एवं प्रसन्न हो जाइये॥ ३५ ॥
अयं हि सुरसैन्यस्य त्रैलोक्यस्य च यः प्रभुः।
स गृहीतो देवबलाद् भग्नदर्पाः सुराः कृताः॥३६॥
‘ये जो देवताओं की सेना तथा तीनों लोकों के स्वामी इन्द्र हैं, इन्हें मैं देवसेना के बीच से कैद कर लाया हूँ। ऐसा करके मैंने देवताओं का घमंड चूर कर दिया है॥ ३६॥
यथेष्टं भुक्ष्व लोकांस्त्रीन् निगृह्यारातिमोजसा।
वृथा किं ते श्रमेणेह युद्धमद्य तु निष्फलम्॥३७॥
‘आप अपने शत्रु को बलपूर्वक कैद करके इच्छानुसार तीनों लोकों का राज्य भोगिये। यहाँ व्यर्थ श्रम करने से आपको क्या लाभ है? अब युद्ध से कोई प्रयोजन नहीं है’ ॥ ३७॥
ततस्ते दैवतगणा निवृत्ता रणकर्मणः।
तच्छ्रुत्वा रावणेर्वाक्यं शक्रहीनाः सुरा गताः॥३८॥
मेघनाद की यह बात सुनकर सब देवता युद्ध से निवृत्त हो गये और इन्द्र को साथ लिये बिना ही लौट गये॥ ३८॥
अथ रणविगतः स उत्तमौजास्त्रिदशरिपुः प्रथितो निशाचरेन्द्रः।
स्वसुतवचनमादृतः प्रियं तत् समनुनिशम्य जगाद चैव सूनुम्॥३९॥
अपने पुत्र के उस प्रिय वचन को आदरपूर्वक सुनकर महान् बलशाली देवद्रोही तथा सुविख्यात राक्षसराज रावण युद्ध से निवृत्त हो गया और अपने बेटे से बोला— ॥ ३९॥
अतिबलसदृशैः पराक्रमैस्त्वं मम कुलवंशविवर्धनः प्रभो।
यदयमतुल्यबलस्त्वयाद्य वै त्रिदशपतिस्त्रिदशाश्च निर्जिताः॥४०॥
‘सामर्थ्यशाली पुत्र! अपने अत्यन्त बल के अनुरूप पराक्रम प्रकट करके आज तुमने जो इन अनुपम बलशाली देवराज इन्द्र को जीता और देवताओं को भी परास्त किया है, इससे यह निश्चय हो गया कि तुम मेरे कुल और वंश के यश और सम्मान की वृद्धि करने वाले हो॥ ४०॥
नय रथमधिरोप्य वासवं नगरमितो व्रज सेनया वृतस्त्वम्।
अहमपि तव पृष्ठतो द्रुतं सह सचिवैरनुयामि हृष्टवत्॥४१॥
‘बेटा! इन्द्र को रथ पर बैठाकर तुम सेना के साथ यहाँ से लङ्कापुरी को चलो! मैं भी अपने मन्त्रियों के साथ शीघ्र ही प्रसन्नतापूर्वक तुम्हारे पीछे-पीछे आ रहा हूँ’॥४१॥
अथ स बलवृतः सवाहनस्त्रिदशपतिं परिगृह्य रावणिः।
स्वभवनमधिगम्य वीर्यवान् कृतसमरान् विससर्ज राक्षसान्॥४२॥
पिताकी यह आज्ञा पाकर पराक्रमी रावणकुमार मेघनाद देवराज को साथ ले सेना और सवारियोंसहित अपने निवास स्थान को लौटा। वहाँ पहुँचकर उसने युद्ध में भाग लेने वाले निशाचरों को विदा कर दिया। ४२॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे एकोनत्रिंशः सर्गः ॥२९॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्ड में उन्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।२९॥
सर्ग-30
जिते महेन्द्रेऽतिबले रावणस्य सुतेन वै।
प्रजापतिं पुरस्कृत्य ययुर्लङ्कां सुरास्तदा ॥१॥
रावणपुत्र मेघनाद जब अत्यन्त बलशाली इन्द्र को जीतकर अपने नगर में ले गया, तब सम्पूर्ण देवता प्रजापति ब्रह्माजी को आगे करके लङ्का में पहुँचे॥१॥
तत्र रावणमासाद्य पुत्रभ्रातृभिरावृतम्।।
अब्रवीद् गगने तिष्ठन् सामपूर्वं प्रजापतिः॥२॥
ब्रह्माजी आकाश में खड़े-खड़े ही पुत्रों और भाइयों के साथ बैठे हुए रावण के निकट जा उसे कोमल वाणी में समझाते हुए बोले- ॥२॥
वत्स रावण तुष्टोऽस्मि पुत्रस्य तव संयुगे।
अहोऽस्य विक्रमौदार्यं तव तुल्योऽधिकोऽपि वा॥३॥
‘वत्स रावण! युद्ध में तुम्हारे पुत्र की वीरता देखकर मैं बहुत संतुष्ट हुआ हूँ। अहो! इसका उदार पराक्रम तुम्हारे समान या तुमसे भी बढ़कर है॥३॥
जितं हि भवता सर्वं त्रैलोक्यं स्वेन तेजसा।
कृता प्रतिज्ञा सफला प्रीतोऽस्मि ससुतस्य ते॥४॥
‘तुमने अपने तेज से समस्त त्रिलोकी पर विजय पायी है और अपनी प्रतिज्ञा सफल कर ली है। इसलिये पुत्रसहित तुम पर मैं बहुत प्रसन्न हूँ॥४॥
अयं च पुत्रोऽतिबलस्तव रावण वीर्यवान्।
जगतीन्द्रजिदित्येव परिख्यातो भविष्यति॥५॥
‘रावण! तुम्हारा यह पुत्र अतिशय बलशाली और पराक्रमी है। आज से यह संसार में इन्द्रजित् के नाम से विख्यात होगा॥ ५॥
बलवान् दुर्जयश्चैव भविष्यत्येव राक्षसः।
यं समाश्रित्य ते राजन् स्थापितास्त्रिदशा वशे॥६॥
‘राजन्! यह राक्षस बड़ा बलवान् और दुर्जय होगा, जिसका आश्रय लेकर तुमने समस्त देवताओं को अपने अधीन कर लिया॥६॥
तन्मुच्यतां महाबाहो महेन्द्रः पाकशासनः।
किं चास्य मोक्षणार्थाय प्रयच्छन्तु दिवौकसः॥
‘महाबाहो! अब तुम पाकशासन इन्द्र को छोड़ दो और बताओ इन्हें छोड़ने के बदले में देवता तुम्हें क्या दें’॥७॥
अथाब्रवीन्महातेजा इन्द्रजित् समितिंजयः।
अमरत्वमहं देव वृणे यद्येष मुच्यते॥८॥
तब युद्धविजयी महातेजस्वी इन्द्रजित् ने स्वयं ही कहा—’देव! यदि इन्द्र को छोड़ना है तो मैं इसके बदले में अमरत्व लेना चाहता हूँ॥८॥
ततोऽब्रवीन्महातेजा मेघनादं प्रजापतिः।
नास्ति सर्वामरत्वं हि कस्यचित् प्राणिनो भुवि॥
चतुष्पदां खेचराणामन्येषां च महौजसाम्।
यह सुनकर महातेजस्वी प्रजापति ब्रह्माजी ने मेघनाद से कहा—’बेटा! इस भूतल पर पक्षियों, चौपायों तथा महातेजस्वी मनुष्य आदि प्राणियों में से कोई भी प्राणी सर्वथा अमर नहीं हो सकता’ ॥ ९ १/२॥
श्रुत्वा पितामहेनोक्तमिन्द्रजित् प्रभुणाव्ययम्॥१०॥
अथाब्रवीत् स तत्रस्थं मेघनादो महाबलः।
भगवान् ब्रह्माजी की कही हुई यह बात सुनकर इन्द्रविजयी महाबली मेघनाद ने वहाँ खड़े हुए अविनाशी ब्रह्माजी से कहा- ॥ १० १/२॥
श्रूयतां या भवेत् सिद्धिः शतक्रतुविमोक्षणे॥११॥
ममेष्टं नित्यशो हव्यैर्मन्त्रैः सम्पूज्य पावकम्।
संग्राममवतर्तुं च शत्रुनिर्जयकाक्षिणः॥१२॥
अश्वयुक्तो रथो मह्यमुत्तिष्ठेत् तु विभावसोः।
तत्स्थस्यामरता स्यान्मे एष मे निश्चितो वरः॥१३॥
‘भगवन्! (यदि सर्वथा अमरत्व प्राप्त होना असम्भव है) तब इन्द्र को छोड़ने के सम्बन्ध में जो मेरी दूसरी शर्त है—जो दूसरी सिद्धि प्राप्त करना मुझे अभीष्ट है, उसे सुनिये। मेरे विषय में यह सदा के लिये नियम हो जाय कि जब मैं शत्रु पर विजय पाने की इच्छा से संग्राम में उतरना चाहूँ और मन्त्रयुक्त हव्य की आहुति से अग्निदेव की पूजा करूँ, उस समय अग्नि से मेरे लिये एक ऐसा रथ प्रकट हो जाया करे, जो घोड़ों से जुता-जुताया तैयार हो और उस पर जब तक मैं बैठा रहँ, तब तक मुझे कोई भी मार न सके, यही मेरा निश्चित वर है॥ ११–१३॥
तस्मिन् यद्यसमाप्ते च जप्यहोमे विभावसौ।
युध्येयं देव संग्रामे तदा मे स्याद् विनाशनम्॥१४॥
‘यदि युद्ध के निमित्त किये जाने वाले जप और होम को पूर्ण किये बिना ही मैं समराङ्गण में युद्ध करने लगें, तभी मेरा विनाश हो॥१४॥
सर्वो हि तपसा देव वृणोत्यमरतां पुमान्।
विक्रमेण मया त्वेतदमरत्वं प्रवर्तितम्॥१५॥
‘देव! सब लोग तपस्या करके अमरत्व प्राप्त करते हैं; परंतु मैंने पराक्रम द्वारा इस अमरत्व का वरण किया है’ ॥ १५ ॥
एवमस्त्विति तं चाह वाक्यं देवः पितामहः।
मुक्तश्चेन्द्रजिता शक्रो गताश्च त्रिदिवं सुराः॥
यह सुनकर भगवान् ब्रह्माजी ने कहा—’एवमस्तु (ऐसा ही हो)’ इसके बाद इन्द्रजित् ने इन्द्र को मुक्त कर दिया और सब देवता उन्हें साथ लेकर स्वर्गलोक को चले गये॥ १६॥
एतस्मिन्नन्तरे राम दीनो भ्रष्टामरद्युतिः।
इन्द्रश्चिन्तापरीतात्मा ध्यानतत्परतां गतः॥१७॥
श्रीराम ! उस समय इन्द्र का देवोचित तेज नष्ट हो गया था। वे दुःखी हो चिन्ता में डूबकर अपनी पराजय का कारण सोचने लगे॥१७॥
तं तु दृष्ट्वा तथा भूतं प्राह देवः पितामहः।
शतक्रतो किमु पुरा करोति स्म सुदुष्कृतम्॥१८॥
भगवान् ब्रह्माजी ने उनकी इस अवस्था को लक्ष्य किया और कहा—’शतक्रतो! यदि आज तुम्हें इस अपमान से शोक और दुःख हो रहा है तो बताओ पूर्वकाल में तुमने बड़ा भारी दुष्कर्म क्यों किया था? ॥ १८॥
अमरेन्द्र मया बुद्ध्या प्रजाः सृष्टास्तथा प्रभो।
एकवर्णाः समाभाषा एकरूपाश्च सर्वशः॥
‘प्रभो! देवराज! पहले मैंने अपनी बुद्धि से जिन प्रजाओं को उत्पन्न किया था, उन सबकी अङ्गकान्ति, भाषा, रूप और अवस्था सभी बातें एक-जैसी थीं॥ १९॥
तासां नास्ति विशेषो हि दर्शने लक्षणेऽपि वा।
ततोऽहमेकाग्रमनास्ताः प्रजाः समचिन्तयम्॥२०॥
‘उनके रूप और रंग आदि में परस्पर कोई विलक्षणता नहीं थी। तब मैं एकाग्रचित्त होकर उन प्रजाओं के विषय में विशेषता लाने के लिये कुछ विचार करने लगा॥ २०॥
सोऽहं तासां विशेषार्थं स्त्रियमेकां विनिर्ममे।
यद् यत् प्रजानां प्रत्यङ्गं विशिष्टं तत् तदुद्धृतम्॥२१॥
‘विचार के पश्चात् उन सब प्रजाओं की अपेक्षा विशिष्ट प्रजा को प्रस्तुत करने के लिये मैंने एक नारी की सृष्टि की प्रजाओं के प्रत्येक अङ्ग में जो-जो अद्भुत विशिष्टता-सारभूत सौन्दर्य था, उसे मैंने उसके अङ्गों में प्रकट किया॥२१॥
ततो मया रूपगुणैरहल्या स्त्री विनिर्मिता।
हलं नामेह वैरूप्यं हल्यं तत्प्रभवं भवेत्॥२२॥
यस्या न विद्यते हल्यं तेनाहल्येति विश्रुता।
अहल्येत्येव च मया तस्या नाम प्रकीर्तितम्॥२३॥
‘उन अद्भुत रूप-गुणों से उपलक्षित जिस नारी का मेरे द्वारा निर्माण हुआ था, उसका नाम हुआ अहल्या। इस जगत् में हल कहते हैं कुरूपता को, उससे जो निन्दनीयता प्रकट होती है उसका नाम हल्य है। जिस नारी में हल्य (निन्दनीय रूप) न हो, वह अहल्या कहलाती है; इसीलिये वह नवनिर्मित नारी अहल्या नाम से विख्यात हुई। मैंने ही उसका नाम अहल्या रख दिया था॥ २२-२३॥
निर्मितायां च देवेन्द्र तस्यां नार्यां सुरर्षभ।
भविष्यतीति कस्यैषा मम चिन्ता ततोऽभवत्॥२४॥
‘देवेन्द्र! सुरश्रेष्ठ! जब उस नारी का निर्माण हो गया, तब मेरे मन में यह चिन्ता हुई कि यह किसकी पत्नी होगी? ॥ २४॥
त्वं तु शक्र तदा नारी जानीषे मनसा प्रभो।
स्थानाधिकतया पत्नी ममैषेति पुरंदर॥२५॥
‘प्रभो! पुरंदर! देवेन्द्र! उन दिनों तुम अपने स्थान और पद की श्रेष्ठता के कारण मेरी अनुमति के बिना ही मन-ही-मन यह समझने लगे थे कि यह मेरी ही पत्नी होगी॥ २५॥
सा मया न्यासभूता तु गौतमस्य महात्मनः।
न्यस्ता बहूनि वर्षाणि तेन निर्यातिता च ह॥२६॥
‘मैंने धरोहर के रूप में महर्षि गौतम के हाथ में उस कन्या को सौंप दिया। वह बहुत वर्षोंतक उनके यहाँ रही। फिर गौतम ने उसे मुझे लौटा दिया॥ २६ ॥
ततस्तस्य परिज्ञाय महास्थैर्यं महामुनेः।
ज्ञात्वा तपसि सिद्धिं च पत्न्यर्थं स्पर्शिता तदा॥२७॥
‘महामुनि गौतम के उस महान् स्थैर्य (इन्द्रियसंयम) तथा तपस्याविषयक सिद्धि को जानकर मैंने वह कन्या पुनः उन्हीं को पत्नी रूप में दे दी॥ २७॥
स तया सह धर्मात्मा रमते स्म महामुनिः।
आसन्निराशा देवास्तु गौतमे दत्तया तया॥२८॥
‘धर्मात्मा महामुनि गौतम उसके साथ सुखपूर्वक रहने लगे। जब अहल्या गौतम को दे दी गयी, तब देवता निराश हो गये॥२८॥
त्वं क्रुद्धस्त्विह कामात्मा गत्वा तस्याश्रमं मुनेः।
दृष्टवांश्च तदा तां स्त्री दीप्तामग्निशिखामिव॥२९॥
‘तुम्हारे तो क्रोध की सीमा न रही। तुम्हारा मन काम के अधीन हो चुका था; इसलिये तुमने मुनि के आश्रम पर जाकर अग्निशिखा के समान प्रज्वलित होने वाली उस दिव्य सुन्दरी को देखा॥ २९॥
सा त्वया धर्षिता शक्र कामार्तेन समन्युना।
दृष्टस्त्वं स तदा तेन आश्रमे परमर्षिणा॥३०॥
‘इन्द्र! तुमने कुपित और काम से पीड़ित होकर उसके साथ बलात्कार किया। उस समय उन महर्षि ने अपने आश्रम में तुम्हें देख लिया॥ ३० ॥
ततः क्रुद्धेन तेनासि शप्तः परमतेजसा।
गतोऽसि येन देवेन्द्र दशाभागविपर्ययम्॥३१॥
‘देवेन्द्र! इससे उन परम तेजस्वी महर्षि को बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने तुम्हें शाप दे दिया। उसी शाप के कारण तुमको इस विपरीत दशा में आना पड़ा है-शत्रु का बंदी बनना पड़ा है।॥ ३१॥
यस्मान्मे धर्षिता पत्नी त्वया वासव निर्भयात्।
तस्मात् त्वं समरे शक्र शत्रुहस्तं गमिष्यसि॥३२॥
‘उन्होंने शाप देते हुए कहा—’वासव! शक्र ! तुमने निर्भय होकर मेरी पत्नी के साथ बलात्कार किया है; इसलिये तुम युद्ध में जाकर शत्रु के हाथ में पड़ जाओगे॥ ३२॥
अयं तु भावो दुर्बुद्धे यस्त्वयेह प्रवर्तितः।
मानुषेष्वपि लोकेषु भविष्यति न संशयः॥ ३३॥
‘दुर्बुद्धे ! तुम-जैसे राजा के दोष से मनुष्यलोक में भी यह जारभाव प्रचलित हो जायगा, जिसका तुमने स्वयं यहाँ सूत्रपात किया है। इसमें संशय नहीं है। ३३॥
तत्रार्धं तस्य यः कर्ता त्वय्यर्धं निपतिष्यति।
न च ते स्थावरं स्थानं भविष्यति न संशयः॥३४॥
‘जो जारभाव से पापाचार करेगा, उस पुरुष पर उस पाप का आधा भाग पड़ेगा और आधा तुम पर पड़ेगा;क्योंकि इसके प्रवर्तक तुम्ही हो। निःसंदेह तुम्हारा यह स्थान स्थिर नहीं होगा॥ ३४ ॥
यश्च यश्च सुरेन्द्रः स्याद् ध्रुवः स न भविष्यति।
एष शापो मया मुक्त इत्यसौ त्वां तदाब्रवीत्॥३५॥
‘जो कोई भी देवराज के पद पर प्रतिष्ठित होगा, वह वहाँ स्थिर नहीं रहेगा। यह शाप मैंने इन्द्रमात्र के लिये दे दिया है।’ यह बात मुनि ने तुमसे कही थी॥ ३५ ॥
तां तु भार्यां सुनिर्भर्त्य सोऽब्रवीत् सुमहातपाः।
दुर्विनीते विनिध्वंस ममाश्रमसमीपतः॥३६॥
रूपयौवनसम्पन्ना यस्मात् त्वमनवस्थिता।
तस्माद् रूपवती लोके न त्वमेका भविष्यति॥३७॥
‘फिर उन महातपस्वी मुनि ने अपनी उस पत्नी को भी भलीभाँति डाँट-फटकारकर कहा—’दुष्टे! तू मेरे आश्रम के पास ही अदृश्य होकर रह और अपने रूप सौन्दर्य से भ्रष्ट हो जा। रूप और यौवन से सम्पन्न होकर मर्यादा में स्थित नहीं रह सकी है, इसलिये अब लोक में तू अकेली ही रूपवती नहीं रहेगी (बहुत-सी रूपवती स्त्रियाँ उत्पन्न हो जायँगी) ॥ ३६-३७॥
रूपं च ते प्रजाः सर्वा गमिष्यन्ति न संशयः।
यत् तदेकं समाश्रित्य विभ्रमोऽयमुपस्थितः॥३८॥
‘जिस एक रूप-सौन्दर्य को लेकर इन्द्र के मन में यह काम-विकार उत्पन्न हुआ था, तेरे उस रूप सौन्दर्य को समस्त प्रजाएँ प्राप्त कर लेंगी; इसमें संशय नहीं है’।
तदाप्रभृति भूयिष्ठं प्रजा रूपसमन्विता।
सा तं प्रसादयामास महर्षि गौतमं तदा ॥ ३९॥
अज्ञानाद् धर्षिता विप्र त्वद्रूपेण दिवौकसा।
न कामकाराद् विप्रर्षे प्रसादं कर्तुमर्हसि॥४०॥
‘तभी से अधिकांश प्रजा रूपवती होने लगी। अहल्या ने उस समय विनीत-वचनों द्वारा महर्षि गौतम को प्रसन्न किया और कहा–’विप्रवर ! ब्रह्मर्षे ! देवराज ने आपका ही रूप धारण करके मुझे कलङ्कित किया है। मैं उसे पहचान न सकी थी। अतः अनजान में मुझसे यह अपराध हुआ है, स्वेच्छाचार वश नहीं। इसलिये आपको मुझ पर कृपा करनी चाहिये’॥ ३९-४०॥
अहल्यया त्वेवमुक्तः प्रत्युवाच स गौतमः।
उत्पत्स्यति महातेजा इक्ष्वाकूणां महारथः॥४१॥
रामो नाम श्रुतो लोके वनं चाप्युपयास्यति।
ब्राह्मणार्थे महाबाहुर्विष्णुर्मानुषविग्रहः॥४२॥
तं द्रक्ष्यसि यदा भद्रे ततः पूता भविष्यसि।
स हि पावयितुं शक्तस्त्वया यद् दुष्कृतं कृतम्॥४३॥
‘अहल्या के ऐसा कहने पर गौतम ने उत्तर दिया —’भद्रे! इक्ष्वाकुवंश में एक महातेजस्वी महारथी वीर का अवतार होगा, जो संसार में श्रीराम के नाम से विख्यात होंगे। महाबाहु श्रीराम के रूप में साक्षात् भगवान् विष्णु ही मनुष्य-शरीर धारण करके प्रकट होंगे। वे ब्राह्मण (विश्वामित्र आदि)-के कार्य से तपोवन में पधारेंगे। जब तुम उनका दर्शन करोगी, तब पवित्र हो जाओगी। तुमने जो पाप किया है, उससे तुम्हें वे ही पवित्र कर सकते हैं। ४१-४३॥
तस्यातिथ्यं च कृत्वा वै मत्समीपं गमिष्यसि।
वत्स्यसि त्वं मया सार्धं तदा हि वरवर्णिनि॥४४॥
‘वरवर्णिनि! उनका आतिथ्य-सत्कार करके तुम मेरे पास आ जाओगी और फिर मेरे ही साथ रहने लगोगी’॥
एवमुक्त्वा तु विप्रर्षिराजगाम स्वमाश्रमम्।
तपश्चचार सुमहत् सा पत्नी ब्रह्मवादिनः॥४५॥
‘ऐसा कहकर ब्रह्मर्षि गौतम अपने आश्रम के भीतर आ गये और उन ब्रह्मवादी मुनि की पत्नी वह अहल्या बड़ी भारी तपस्या करने लगी॥ ४५ ॥
शापोत्सर्गाद्धि तस्येदं मुनेः सर्वमुपस्थितम्।
तत् स्मर त्वं महाबाहो दुष्कृतं यत् त्वया कृतम्॥४६॥
‘महाबाहो! उन ब्रह्मर्षि गौतम के शाप देने से ही तुम पर यह सारा संकट उपस्थित हुआ है। अतः तुमने जो पाप किया था, उसको याद करो॥ ४६॥
तेन त्वं ग्रहणं शत्रोर्यातो नान्येन वासव।
शीघ्रं वै यज यज्ञं त्वं वैष्णवं सुसमाहितः॥४७॥
‘वासव! उस शाप के ही कारण तुम शत्रु की कैद में पड़े हो, दूसरे किसी कारण से नहीं। अतः अब एकाग्रचित्त हो शीघ्र ही वैष्णव-यज्ञ का अनुष्ठान करो॥४७॥
पावितस्तेन यज्ञेन यास्यसे त्रिदिवं ततः।
पुत्रश्च तव देवेन्द्र न विनष्टो महारणे॥४८॥
नीतः संनिहितश्चैव आर्यकेण महोदधौ।
‘देवेन्द्र! उस यज्ञ से पवित्र होकर तुम पुनः स्वर्गलोक प्राप्त कर लोगे। तुम्हारा पुत्र जयन्त उस महासमर में मारा नहीं गया है। उसका नाना पुलोमा उसे महासागर में ले गया है। इस समय वह उसी के पास है’।
एतच्छ्रुत्वा महेन्द्रस्तु यज्ञमिष्ट्वा च वैष्णवम्॥४९॥
पुनस्त्रिदिवमाक्रामदन्वशासच्च देवराट्।
ब्रह्माजी की यह बात सुनकर देवराज इन्द्र ने वैष्णवयज्ञ का अनुष्ठान किया। वह यज्ञ पूरा करके देवराज स्वर्गलोक में गये और वहाँ देवराज्य का शासन करने लगे॥ ४९ १/२॥
एतदिन्द्रजितो नाम बलं यत् कीर्तितं मया॥५०॥
निर्जितस्तेन देवेन्द्रः प्राणिनोऽन्ये तु किं पुनः।
रघुनन्दन! यह है इन्द्रविजयी मेघनाद का बल, जिसका मैंने आपसे वर्णन किया है। उसने देवराज इन्द्र को भी जीत लिया था; फिर दूसरे प्राणियों की तो बिसात ही क्या थी॥ ५० १/२॥
आश्चर्यमिति रामश्च लक्ष्मणश्चाब्रवीत् तदा॥५१॥
अगस्त्यवचनं श्रुत्वा वानरा राक्षसास्तदा।
अगस्त्यजी की यह बात सुनकर श्रीराम और लक्ष्मण तत्काल बोल उठे—’आश्चर्य है।’ साथ ही वानरों और राक्षसों को भी इस बात से बड़ा विस्मय हुआ॥ ५१ १/२॥
विभीषणस्तु रामस्य पार्श्वस्थो वाक्यमब्रवीत्॥
आश्चर्यं स्मारितोऽस्म्यद्य यत् तद् दृष्टं पुरातनम्।
उस समय श्रीराम के बगल में बैठे हुए विभीषण ने कहा—’मैंने पूर्वकालमें जो आश्चर्यकी बातें देखी थीं, उनका आज महर्षि ने स्मरण दिला दिया है’ ॥ ५२ १/२॥
अगस्त्यं त्वब्रवीद् रामः सत्यमेतच्छ्रुतं च मे॥५३॥
एवं राम समुद्भूतो रावणो लोककण्टकः।
सपनो येन संग्रामे जितः शक्रः सुरेश्वरः॥५४॥
तब श्रीरामचन्द्रजी ने अगस्त्यजी से कहा—’आपकी बात सत्य है। मैंने भी विभीषण के मुख से यह बात सुनी थी।’ फिर अगस्त्यजी बोले-‘श्रीराम! इस प्रकार पुत्रसहित रावण सम्पूर्ण जगत् के लिये कण्टकरूप था, जिसने देवराज इन्द्र को भी संग्राम में जीत लिया था’।। ५३-५४॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे त्रिंशः सर्गः॥३०॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्ड में तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।३०॥
सर्ग-31
ततो रामो महातेजा विस्मयात्पुनरेव हि ।
उवाच प्रणतो वाक्यमगस्त्यमृषिसत्तमम् ।। ७.३१.१ ।।
तदनन्तर महातेजस्वी श्रीराम ने मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य को प्रणाम करके पुनः विस्मयपूर्वक पूछा—॥ १ ॥
भगवन्राक्षसः क्रूरो यदाप्रभृति मेदिनीम् ।
पर्यटत्किं तदा लोकाः शून्या आसन्द्विजोत्तम ।। ७.३१.२ ।।
‘भगवन्! द्विजश्रेष्ठ! जब क्रूर निशाचर रावण पृथ्वी पर विजय करता घूम रहा था, उस समय क्या यहाँ के सभी लोग शौर्य सम्बन्धी गुणों से शून्य ही थे ? ॥ २ ॥
राजा वा राजमात्रो वा किं तदा नात्र कश्चन ।
धर्षणं यत्र न प्राप्तो रावणो राक्षसेश्वरः ।। ७.३१.३ ।।
“क्या उन दिनों यहाँ कोई भी क्षत्रिय- नरेश अथवा क्षत्रियेतर राजा अधिक बलवान् नहीं था, जिस से इस भूतल पर पहुँचकर राक्षसराज रावण को पराजित या अपमानित होना नहीं पड़ा ॥ ३ ॥
उताहो हतवीर्यास्ते बभूवुः पृथिवीक्षितः ।
बहिष्कृता वरास्त्रैश्च बहवो निर्जिता नृपाः ।। ७.३१.४ ।।
'अथवा उस समय के सभी राजा पराक्रमशून्य तथा शस्त्रज्ञान से हीन थे, जिस के कारण उन बहुसंख्यक श्रेष्ठ नरपालों को रावण से परास्त होना पड़ा' ॥ ४ ॥
राघवस्य वचः श्रुत्वा ह्यगस्त्यो भगवानृषिः ।
उवाच रामं प्रहसन्पितामह इवेश्वरम् ।। ७.३१.५ ।।
श्रीरामचन्द्रजी की यह बात सुनकर भगवान् अगस्त्य मुनि ठठाकर हँस पड़े और जैसे ब्रह्माजी महादेवजी से कोई बात कहते हों, इसी तरह वे श्रीरामचन्द्रजी से बोले – ॥ ५ ॥
इत्येवं बाधमानस्तु पार्थिवान्पार्थिवर्षभ ।
चचार रावणो राम पृथिवीं पृथिवीपते ।। ७.३१.६ ।।
'पृथ्वीनाथ! भूपालशिरोमणे! श्रीराम ! इसी प्रकार सब राजाओं को सताता और पराजित करता हुआ रावण इस पृथ्वी पर विचर ने लगा ॥ ६ ॥
ततो माहिष्मतीं नाम पुरीं स्वर्गपुरीप्रभाम् ।
सम्प्राप्तो यत्र सान्निध्यं सदासीद्वसुरेतसः ।। ७.३१.७ ।।
'घूमते-घूमते वह स्वर्गपुरी अमरावती के समान सुशोभित होनेवाली माहिष्मती नामक नगरी में जा पहुँचा, जहाँ अग्निदेव सदा विद्यमान रहते थे॥ ७ ॥
तुल्य आसीन्नृपस्तस्य प्रभावाद्वसुरेतसः ।
अर्जुनो नाम यत्राग्निः शरकुण्डेशयः सदा ।। ७.३१.८ ।।
‘उन अग्निदेव के प्रभाव से वहाँ अग्नि के ही समान तेजस्वी अर्जुन नामक राजा राज्य करता था, जिस के राज्यकाल में कुशास्तरण से युक्त अग्निकुण्ड में सदा अग्निदेवता निवास करते थे ॥ ८ ॥
तमेव दिवसं सोऽथ हैहयाधिपतिर्बली ।
अर्जुनो नर्मदां रन्तुं गतः स्त्रीभिः सहेश्वरः ।। ७.३१.९ ।।
'जिस दिन रावण वहाँ पहुँचा, उसी दिन बलवान् हैहयराज राजा अर्जुन अपनी स्त्रियों के साथ नर्मदा नदी में जल-क्रीड़ा करने के लिये चला गया था ॥ ९ ॥
तमेव दिवसं सोऽथ रावणस्तत्र आगतः ।
रावणो राक्षसेन्द्रस्तु तस्यामात्यानपृच्छत ।। ७.३१.१० ।।
'उसी दिन रावण माहिष्मतीपुरी में आया। वहाँ आकर राक्षसराज रावण ने राजा के मन्त्रियों से पूछा- ॥ १० ॥
क्वार्जुनो नृपतिः शीघ्रं सम्यगाख्यातुमर्हथ ।
रावणो ऽहमनुप्राप्तो युद्धेप्सुर्नृवरेण ह ।
ममागमनमप्यग्रे युष्माभिः सन्निवेद्यताम् ।। ७.३१.११ ।।
‘मन्त्रियो! जल्दी और ठीक-ठीक बताओ, राजा अर्जुन कहाँ हैं? मैं रावण हूँ और तुम्हारे महाराज से युद्ध करने के लिये आया हूँ॥ ११ ॥
इत्येवं रावणेनोक्तास्ते ऽमात्याः सुविपश्चितः ।
अब्रुवन्राक्षसपतिमसान्निध्यं महीपतेः ।। ७.३१.१२ ।।
'तुमलोग पहले ही जाकर उन्हें मेरे आगमन की सूचना दे दो।' रावण के ऐसा कह ने पर राजा के विद्वान् मन्त्रियों ने राक्षसराज को बताया कि हमारे महाराज इस समय राजधानी में नहीं हैं ॥ १२ १/२ ॥
श्रुत्वा विश्रवसः पुत्रः पौराणामर्जुनं गतम् ।
अपसृत्यागतो विन्ध्यं हिमवत्सन्निभं गिरिम् ।। ७.३१.१३ ।।
‘पुरवासियों के मुख से राजा अर्जुन के बाहर जाने की बात सुनकर विश्रवाका पुत्र रावण वहाँ से हटकर हिमालय के समान विशाल विन्ध्यगिरि पर आया ॥ १३ १ ॥
स तमभ्रमिवाविष्टमुद्भ्रन्तमिव मेदिनीम् ।
अपश्यद्रावणो विन्ध्यमालिखन्तमिवाम्बरम् ।। ७.३१.१४ ।।
सहस्रशिखरोपेतं सिंहाध्युषितकन्दरम् ।
प्रपातपतितैस्तोयैः साट्टहासमिवाम्बुधिम् ।। ७.३१.१५ ।।
‘वह इतना ऊँचा था कि उसका शिखर बादलों में समाया हुआ-सा जान पड़ता था तथा वह पर्वत पृथ्वी फोड़कर ऊपर को उठा हुआ-सा प्रतीत होता था। विन्ध्य के गगनचुम्बी शिखर आकाश में रेखा खींचते से जान पड़ते थे। रावण ने उस महान शैल को देखा। वह अपने सहस्रों श्रृङ्गों से सुशोभित हो रहा था और उस की कन्दराओं में सिंह निवास करते थे॥ १४-१५ ॥
देवदानवगन्धर्वैः साप्सरोगणकिन्नरैः ।
स्वस्त्रीभिः क्रीडमानैश्च स्वर्गभूतं महोच्छ्रयम् ।। ७.३१.१६ ।।
‘उस के सर्वोच्च शिखर के तट से जो शीतल जल की धाराएँ गिर रही थीं, उनके द्वारा वह पर्वत अट्टहास करता - सा प्रतीत होता था। देवता, दानव, गन्धर्व और किन्नर अपनी-अपनी स्त्रियों और अप्सराओं के साथ वहाँ क्रीड़ा कर रहे थे। वह अत्यन्त ऊँचा पर्वत अपनी सुरम्य सुषमा से स्वर्ग के समान सुशोभित हो रहा था ॥ १६ १/२ ॥
नदीभिः स्यन्दमानाभिः स्फटिकप्रतिमं जलम् ।
फणाभिश्चलजिह्वाभिरनन्तमिव विष्ठितम् ।। ७.३१.१७ ।।
उत्क्रामन्तं दरीवन्तं हिमवत्सन्निभं गिरिम् ।
‘स्फटिक के समान निर्मल जलका स्रोत बहानेवाली नदियों के कारण वह विन्ध्यगिरि चञ्चल जिह्वावाले फनों से उपलक्षित शेषनाग के समान स्थित था। अधिक ऊँचाई के कारण वह ऊर्ध्वलोक को जाता-सा जान पड़ता था ॥ हिमालय के समान विशाल एवं विस्तृत विन्ध्यगिरि बहुत-सी गुफाओं से युक्त दिखायी देता था ॥ १७-१८ ॥
पश्यमानस्ततो विन्ध्यं रावणो नर्मदां ययौ ।। ७.३१.१८ ।।
चलोपलजलां पुण्यां पश्चिमोदधिगामिनीम् ।। ७.३१.१९ ।।
महिषैः सृमरैः सिंहैः शार्दूलर्क्षगजोत्तमैः ।
उष्णाभितप्तैस्तृषितैः सङ्क्षोभितजलाशयाम् ।। ७.३१.२० ।।
‘विन्ध्याचल की शोभा को देखता हुआ रावण पुण्यसलिला नर्मदा नदी के तट पर गया, जिस में शिलाखण्डों से युक्त चञ्चल जल प्रवाहित हो रहा था। वह नदी पश्चिम समुद्र की ओर चली जा रही थी। धूप से तपे हुए प्या से भैं से, हिरन, सिंह, व्याघ्र, रीछ और गजराज उस के जलाशय को विक्षुब्ध कर रहे थे ॥ १९-२० ॥
चक्रवाकैः सकारण्डैः सहंसजलकुक्कुटैः ।
सारसैश्च सदा मत्तैः सुकूजद्भिः समावृताम् ।। ७.३१.२१ ।।
'सदा मतवाले होकर कलरव करनेवाले चक्रवाक, कारण्डव, हंस, जलकुक्कुट और सारस आदि जलपक्षी नर्मदा की जल राशि पर छा रहे थे ॥ २१ ॥
फुल्लद्रुमकृतोत्तंसां चक्रवाकयुगस्तनीम् ।
विस्तीर्णपुलिनश्रोणीं हंसावलिसुमेखलाम् ।। ७.३१.२२ ।।
पुष्परेण्वनुलिप्ताङ्गीं जलफेनामलांशुकाम् ।
जलावगाहसंस्पर्शां फुल्लोत्पलशुभेक्षणाम् ।
पुष्पकादवरुह्याशु नर्मदां सरितां वराम् ।। ७.३१.२३ ।।
इष्टामिव वरां नारीमवगाह्य दशाननः ।
स तस्याः पुलिने रम्ये नानामुनिनिषेविते ।। ७.३१.२४ ।।
उपोपविष्टैः सचिवैः सार्धं राक्षसपुङ्गवः ।
प्रख्याय नर्मदां सोऽथ गङ्गेयमिति रावणः ।। ७.३१.२५ ।।
‘सरिताओं में श्रेष्ठ नर्मदा परम सुन्दरी प्रियतमा नारी के समान प्रतीत होती थी। खिले हुए तटवर्ती वृक्ष मानो उस के आभूषण थे। चक्रवाक के जोड़े उस के दोनों स्तनोंका स्थान ले रहे थे। ऊँचे और विस्तृत पुलिन नितम्ब के समान जान पड़ते थे। हंसों की पंक्ति मोतियों की बनी हुई मेखला ( करधनी ) - के समान शोभा दे रही थी । पुष्पों के पराग ही अङ्गराग बनकर उस के अङ्ग अङ्ग में अनुलिप्त हो रहे थे। जलका उज्ज्वल फेन ही उस की स्वच्छ, श्वेत साड़ीका काम दे रहा था। जल में गोता लगाना ही उसका सुखद संस्पर्श था और खिले हुए कमल ही उस के सुन्दर नेत्र जान पड़ते थे। राक्षसशिरोमणि दशमुख रावण ने शीघ्र ही पुष्पकविमान से उतरकर नर्मदा के जल में डुब की लगायी और बाहर निकलकर वह नाना मुनियों से सेवित उस के रमणीय तट पर अपने मन्त्रियों के साथ बैठा ॥ २२–२५॥
नर्मदादर्शजं हर्षमाप्तवान् राक्षसाधिपः ।
उवाच सचिवांस्तत्र सलीलं शुकसारणौ ।। ७.३१.२६ ।।
‘ये साक्षात् गङ्गा हैं' ऐसा कहकर दशानन रावण ने नर्मदा की प्रशंसा की और उस के दर्शन से हर्षका अनुभव किया ॥ २६ ॥
एष रश्मिसहस्रेण जगत्कृत्वैव काञ्चनम् ।
तीक्ष्णतापकरः सूर्यो नभसो ऽर्धं समाश्रितः ।। ७.३१.२७ ।।
‘फिर वहाँ उस ने शुक, सारण तथा अन्य मन्त्रियों से लीलापूर्वक कहा—'ये सूर्यदेव अपनी सहस्रों किरणों से सम्पूर्ण जगत्को मानो काञ्चनमय बनाकर प्रचण्ड ताप देते हुए इस समय आकाश के मध्यभाग में विराज रहे हैं॥ २७ ॥
मामासीनं विदित्वैव चन्द्रायति दिवाकरः ।। ७.३१.२८ ।।
नर्मदाजलशीतश्च सुगन्धिः श्रमनाशनः ।
मद्भयादनिलो ऽप्यत्र वात्येष सुसमाहितः ।। ७.३१.२९ ।।
'किंतु मुझे यहाँ बैठा जानकर ही चन्द्रमा के समान शीतल हो गये हैं। मेरे ही भय से वायु भी नर्मदा के जल से शीतल, सुगन्धित और श्रमनाशक होकर बड़ी सावधानी के साथ मन्दगति से बह रही है ॥ २८-२९॥
इयं वापि सरिच्छ्रेष्ठा नर्मदा नर्मवर्धिनी ।
नक्रमीनविहङ्गोर्मिः सभयेवाङ्गना स्थिता ।। ७.३१.३० ।।
‘सरिताओं में श्रेष्ठ यह नर्मदा भी क्रीड़ारस एवं प्रीति को बढ़ा रही है। इसकी लहरों में मगर, मत्स्य और जलपक्षी खेल रहे हैं और यह भयभीत नारी के समान स्थित है ॥ ३० ॥
तद्भवन्तः क्षताः शस्त्रैर्नृपैरिन्द्रसमैर्युधि ।
चन्दनस्य रसेनेव रुधिरेण समुक्षिताः ।। ७.३१.३१ ।।
'तुमलोग युद्धस्थल में इन्द्रतुल्य पराक्रमी नरेशों द्वारा अस्त्र-शस्त्रों से घायल कर दिये गये हो और रक्त से इस प्रकार नहा उठे हो कि तुम्हारे अङ्गों में लालचन्दन रसका लेप-सा लगा हुआ जान पड़ता है ॥ ३१ ॥
ते यूयमवगाहध्वं नर्मदां शर्मदां शुभाम् ।
महापद्ममुखा मत्ता गङ्गामिव गहागजाः ।
अस्यां स्नात्वा महानद्यां पाप्मानं विप्रमोक्ष्यथ ।। ७.३१.३२ ।।
'अत: तुम सब- के-सब सुख देनेवाली इस मङ्गलकारिणी नर्मदा नदी में स्नान करो। ठीक उसी तरह, जैसे सार्वभौम आदि महान दिग्गज मतवाले होकर गङ्गा में अवगाहन करते हैं ॥ ३२ ॥
अहमप्यद्य पुलिने शरदिन्दुसमप्रभे ।
पुष्पोपहारं शनकैः करिष्यामि कपर्दिनः ।। ७.३१.३३ ।।
‘इस महानदी में स्नान करके तुम पाप-ताप से मुक्त हो जाओगे। मैं भी आज शरद् ऋतु के चन्द्रमा की भाँति उज्ज्वल नर्मदा-तट पर धीरे-धीरे जटाजूटधारी महादेवजी को फूलोंका उपहार समर्पित करूँगा ॥ ३३ १/२ ॥
रावणेनैवमुक्तास्तु प्रहस्तशुकसारणाः ।
समहोदरधूम्राक्षा नर्मदां विजगाहिरे ।। ७.३१.३४ ।।
‘रावण के ऐसा कह ने पर प्रहस्त, शुक, सारण, महोदर और धूम्राक्ष ने नर्मदा में स्नान किया ॥ ३४ १/२ ॥
राक्षसेन्द्रगजैस्तैस्तु क्षोभिता नर्मदा नदी ।
वामनाञ्जनपद्माद्यैर्गङ्गा इव महागजैः ।। ७.३१.३५ ।।
'राक्षसराज की सेना के हाथियों ने नर्मदा नदी में उतरकर उस के जल को मथ डाला, मानो वामन, अञ्जन, पद्म आदि बड़े-बड़े दिग्गजों ने गङ्गाजी के जल को विक्षुब्ध कर डाला हो ॥ ३५ १/२ ॥
ततस्ते राक्षसाः स्नात्वा नर्मदायां महाबलाः ।
उत्तीर्य पुष्पाण्याजह्रुर्बल्यर्थं रावणस्य तु ।। ७.३१.३६ ।।
‘तदनन्तर वे महाबली राक्षस गङ्गा में स्नान करके बाहर आये और रावण के शिवपूजन के लिये फूल जुटा ने लगे ॥ ३६ १/२॥
नर्मदापुलिने हृद्ये शुभ्राभ्रसदृशप्रभे ।
राक्षसैस्तु मुहूर्तेन कृतः पुष्पमयो गिरिः ।। ७.३१.३७ ।।
‘श्वेत बादलों के समान शुभ्र एवं मनोरम नर्मदा - पुलिन पर उन राक्षसों ने दो ही घड़ी में फूलोंका पहाड़ जैसा ढेर लगा दिया॥ ३७ १/२ ॥
पुष्पेषूपहृतेष्वेवं रावणो राक्षसेश्वरः ।
अवतीर्णो नदीं स्नातुं गङ्गामिव महागजः ।। ७.३१.३८ ।।
'इस प्रकार पुष्पोंका संचय हो जाने पर राक्षसराज रावण स्वयं स्नान करने के लिये नर्मदा नदी में उतरा, मानो कोई महान गजराज गङ्गा में अवगाहन करने के लिये घुसा हो ॥ ३८ १/२ ॥
तत्र स्नात्वा च विधिवज्जप्त्वा जप्यमनुत्तमम् ।
नर्मदासलिलात्तस्मादुत्ततार स रावणः ।। ७.३१.३९ ।।
‘वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके रावण ने परम उत्तम जपनीय मन्त्रका जप किया। इसके बाद वह नर्मदा के जल से बाहर निकला॥ ३९ १/२ ॥
ततः क्लिन्नाम्बरं त्यक्त्वा शुक्लवस्त्रसमावृतम् ।
रावणं प्राञ्जलिं यान्तमन्वयुः सर्वराक्षसाः ।। ७.३१.४० ।।
‘फिर भीगे कपड़े को उतारकर उस ने श्वेत वस्त्र धारण किया। इसके बाद वह हाथ जोड़े महादेवजी की पूजा के लिये चला। उस समय और सब राक्षस भी उस के पीछे हो लिये, मानो मूर्तिमान् पर्वत उस की गति के अधीन हो खिंचे चले जा रहे हों॥ ४०-४१ ॥
तद्गतीवशमापन्ना मूर्तिमन्त इवाचलाः ।
यत्र यत्र च याति स्म रावणो राक्षसेश्वरः ।
जाम्बूनदमयं लिङ्गं तत्र तत्र स्म नीयते ।। ७.३१.४१ ।।
‘राक्षसराज रावण जहाँ-जहाँ भी जाता था, वहाँ-वहाँ एक सुवर्णमय शिवलिङ्ग अपने साथ लिये जाता था ॥ ४२ ॥
वालुकावेदिमध्ये तु तल्लिङ्गं स्थाप्य रावणः ।
अर्चयामास गन्धैश्च पुष्पैश्चामृतगन्धिभिः ।। ७.३१.४२ ।।
‘रावण ने बालू की वेदी पर उस शिवलिङ्ग को स्थापित कर दिया और चन्दन तथा अमृत के समान सुगन्धवाले पुष्पों से उसका पूजन किया ॥ ४३ ॥
ततः सतामार्तिहरं परं वरं वरप्रदं चन्द्रमयूखभूषणम् ।
समर्चयित्वा स निशाचरो जगौ प्रसार्य हस्तान्प्रणनर्त चाग्रतः ।। ७.३१.४३ ।।
'जो अपने ललाट में चन्द्रकिरणों को आभूषणरूप से धारण करते हैं, सत्पुरुषों की पीड़ा हर लेते हैं तथा भक्तों को मनोवाञ्छित वर प्रदान करते हैं, उन श्रेष्ठ एवं उत्कृष्ट देवता भगवान् शङ्करका भलीभाँति पूजन करके वह निशाचर उनके साम ने गा ने और हाथ फैलाकर नाच ने लगा ॥ ४४ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमदुत्तरकाण्डे एकत्रिंशः सर्गः ।। ३१ ।।
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्ड में इकतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३१ ॥
सर्ग-32
नर्मदापुलिने यत्र राक्षसेन्द्रः सुदारुणः ।
पुष्पोपहारं कुरुते तस्माद्देशाददूरतः ।। ७.३२.१ ।।
अर्जुनो जयतां श्रेष्ठो माहिष्मत्याः पतिः प्रभुः ।
क्रीडते सह नारीभिर्नर्मदातोयमाश्रितः ।। ७.३२.२ ।।
‘नर्मदाजी के तट पर जहाँ क्रूर राक्षसराज रावण महादेवजी को फूलोंका उपहार अर्पित कर रहा था, उस स्थान से थोड़ी दूर पर विजयी वीरों में श्रेष्ठ माहिष्मतीपुरीका शक्तिशाली राजा अर्जुन अपनी स्त्रियों के साथ नर्मदा के जल में उतरकर क्रीडा कर रहा था॥ १-२ ॥
तासां मध्यगतो राजा रराज च तदार्जुनः ।
करेणूनां सहस्रस्य मध्यस्थ इव कुञ्जरः ।। ७.३२.३ ।।
‘उन सुन्दरियों के बीच में विराजमान राजा अर्जुन सहस्रों हथिनियों के मध्यभाग में स्थित हुए गजराज के समान शोभा पाता था ॥ ३ ॥
जिज्ञासुः स तु बाहूनां सहस्रस्योत्तमं बलम् ।
रुरोध नर्मदावेगं बाहुभिर्बहुभिर्वृतः ।। ७.३२.४ ।।
‘अर्जुन के हजार भुजाएँ थीं। उनके उत्तम बल को जाँच ने के लिये उस ने उन बहुसंख्यक भुजाओं द्वारा नर्मदा के वेग को रोक दिया ॥ ४ ॥
कार्तवीर्यभुजासक्तं तज्जलं प्राप्य निर्मलम् ।
कूलोपहारं कुर्वाणं प्रतिस्रोतः प्रधावति ।। ७.३२.५ ।।
'कृतवीर्य-पुत्र अर्जुन की भुजाओं द्वारा रोका हुआ नर्मदाका वह निर्मल जल तट पर पूजा करते हुए रावण के पास तक पहुँच गया और उसी ओर उलटी गति से बह ने लगा ॥ ५ ॥
समीननक्रमकरः सपुष्पकुशसंस्तरः ।
स नर्मदाम्भसो वेगः प्रावृट्काल इवाबभौ ।। ७.३२.६ ।।
‘नर्मदा के जलका वह वेग मत्स्य, नक्र, मगर, फूल और कुशास्तरण के साथ बढ़ ने लगा। उस में वर्षाकाल के समान बाढ़ आ गयी ॥ ६ ॥
स वेगः कार्तवीर्येण सम्प्रेषित इवाम्भसः ।
पुष्पोपहारं सकलं रावणस्य जहार ह ।। ७.३२.७ ।।
‘जलका वह वेग, जिसे मानो कार्तवीर्य अर्जुन ने ही भेजा हो, रावण के समस्त पुष्पोपहार को बहा ले गया ॥ ७ ॥
रावणो ऽर्धसमाप्तं तमुत्सृज्य नियमं तदा ।
नर्मदां पश्यते कान्तां प्रतिकूलां यथा प्रियाम् ।। ७.३२.८ ।।
‘रावण का वह पूजन-सम्बन्धी नियम अभी आधा ही समाप्त हुआ था, उसी दशा में उसे छोड़कर वह प्रतिकूल हुई कमनीय कान्तिवाली प्रेयसी की भाँति नर्मदा की ओर देख ने लगा ॥ ८ ॥
पश्चिमेन तु तं दृष्ट्वा सागरोद्गारसन्निभम् ।
वर्धन्तमम्भसो वेगं पूर्वामाशां प्रविश्य तु ।। ७.३२.९ ।।
‘पश्चिम से आते और पूर्व दिशा में प्रवेश करके बढ़ते हुए जल के उस वेग को उस ने देखा। वह ऐसा जान पड़ता था, मानो समुद्र में ज्वार आ गया हो ॥ ९ ॥
ततो ऽनुभ्रान्तशकुनां स्वभावोपरमे स्थिताम् ।
निर्विकाराङ्गनाभासामपश्यद्रावणो नदीम् ।। ७.३२.१० ।।
‘उस के तटवर्ती वृक्षों पर रहनेवाले पक्षियों में कोई घबराहट नहीं थी । वह नदी अपनी परम उत्तम स्वाभाविक स्थिति में स्थित थी— उसका जल पहले ही जैसा स्वच्छ एवं निर्मल दिखायी देता था। उस में वर्षाकालिक बाढ़ के समय जो मलिनता आदि विकार होते थे, उनका उस समय सर्वथा अभाव था। रावण ने उस नदी को विकारशून्य हृदयवाली नारी के समान देखा ॥ १० ॥
सव्येतरकराङ्गुल्या सशब्दं च दशाननः ।
वेगप्रभावमन्वेष्टुं सो ऽदिशच्छुकसारणौ ।। ७.३२.११ ।।
'उस के मुख से एक शब्द भी नहीं निकला। उस ने मौनव्रत की रक्षा के लिये बिना बोले ही दाहि ने हाथ की अङ्गुली से संकेतमात्र करके बाढ़ के कारणका पता लगाने के निमित्त शुक और सारण को आदेश दिया ॥ ११ ॥
तौ तु रावणसन्दिष्टौ भ्रातरौ शुकसारणौ ।
व्योमान्तरगतौ वीरौ प्रस्थितौ पश्चिमामुखौ ।। ७.३२.१२ ।।
‘रावण का आदेश पाकर दोनों वीर भ्राता शुक और सारण आकाशमार्ग से पश्चिम दिशा की ओर प्रस्थित हुए ॥ १२ ॥
अर्धयोजनमात्रं तु गत्वा तौ रजनीचरौ ।
पश्येतां पुरुषं तोये क्रीडन्तं सहयोषितम् ।। ७.३२.१३ ।।
‘केवल आधा योजन जाने पर ही उन दोनों निशाचरों ने एक पुरुष को स्त्रियों के साथ जल में क्रीडा करते देखा ॥ १३ ॥
बृहत्सालप्रतीकाशं तोयव्याकुलमूर्धजम् ।
मदरक्तान्तनयनं मदव्याकुलतेजसम् ।। ७.३२.१४ ।।
‘उसका शरीर विशाल सालवृक्ष के समान ऊँचा था । उस के केश जल से ओतप्रोत हो रहे थे। नेत्रप्रान्त में मद की लाली दिखायी दे रही थी और चित्त भी मद से व्याकुल जान पड़ता था ॥ १४ ॥
नदीं बाहुसहस्रेण रुन्धन्तमरिमर्दनम् ।
गिरिं पादसहस्रेण रुन्धन्तमिव मेदिनीम् ।। ७.३२.१५ ।।
'वह शत्रुमर्दन वीर अपनी सहस्र भुजाओं से नदी के वेग को रोककर सहस्रों चरणों से पृथ्वी को थामे रखनेवाले पर्वत के समान शोभा पाता था ॥ १५ ॥
बालानां वरनारीणां सहस्रेण समावृतम् ।
समदानां करेणूनां सहस्रेणेव कुञ्जरम् ।। ७.३२.१६ ।।
'नयी अवस्था की सहस्रों सुन्दरियाँ उसे घेरे हुए ऐसी जान पड़ती थीं, मानो सहस्रों मदमत्त हथिनियों ने किसी गजराज को घेर रखा हो ॥ १६ ॥
तमद्भुततमं दृष्ट्वा राक्षसौ शुकसारणौ ।
सन्निवृत्तावुपागम्य रावणं तमथोचतुः ।। ७.३२.१७ ।।
‘उस परम अद्भुत दृश्य को देखकर राक्षस शुक और सारण लौट आये और रावण के पास जाकर बोले— ॥ १७ ॥
बृहत्सालप्रतीकाशः को ऽप्यसौ राक्षसेश्वर ।
नर्मदां रोधवद्रुद्ध्वा क्रीडापयति योषितः ।। ७.३२.१८ ।।
'राक्षसराज ! यहाँ से थोड़ी ही दूर पर कोई सालवृक्ष के समान विशालकाय पुरुष है, जो बाँध की तरह नर्मदा के जल को रोककर स्त्रियों के साथ क्रीडा कर रहा है ॥ १८ ॥
तेन बाहुसहस्रेण सन्निरुद्धजला नदी ।
सागरोद्गारसङ्काशानुद्गारान्सृजते मुहुः ।। ७.३२.१९ ।।
'उस की सहस्र भुजाओं से नदीका जल रुक गया है। इसीलिये यह बारम्बार समुद्र के ज्वार की भाँति जल के उद्गार की सृष्टि कर रही है ' ॥ १९ ॥
इत्येवं भाषमाणौ तौ निशाम्य शुकसारणौ ।
रावणो ऽर्जुन इत्युक्त्वा प्रययौ युद्धलालसः ।। ७.३२.२० ।।
' इस प्रकार कहते हुए शुक और सारण की बातें सुनकर रावण बोल उठा - ' वही अर्जुन है' ऐसा कहकर वह युद्ध की लालसा से उसी ओर चल दिया ॥ २० ॥
अर्जुनाभिमुखे तस्मिन्रावणे राक्षसाधिपे ।
चण्डः प्रवाति पवनः सनादः सुरजास्तथा ।। ७.३२.२१ ।।
‘राक्षसराज रावण जब अर्जुन की ओर चला, तब धूल और भारी कोलाहल के साथ वायु प्रचण्ड वेग से चल ने लगी॥ २१ ॥
सकृदेव कृतो रावः सरक्तः प्रेषितो घनैः ।
महोदरमहापार्श्वधूम्राक्षशुकसारणैः ।। ७.३२.२२ ।।
संवृतो राक्षसेन्द्रस्तु तत्रागाद्यत्र चार्जुनः ।
'बादलों ने रक्तबिन्दुओं की वर्षा करके एक बार ही बड़े जोर से गर्जना की। इधर राक्षसराज रावण महोदर, महापार्श्व, धूम्राक्ष, शुक और सारण को साथ ले उस स्थान की ओर चला, जहाँ अर्जुन क्रीडा कर रहा था॥ २२ १/२ ॥
अदीर्घेणैव कालेन स तदा राक्षसो बली ।
तं नर्मदाह्रदं भीममाजगामाञ्जनप्रभः ।। ७.३२.२३ ।।
‘काजल या कोयले के समान काला वह बलवान् राक्षस थोड़ी ही देर में नर्मदा के उस भयंकर जलाशय के पास जा पहुँचा॥ २३ १/२ ॥
स तत्र स्त्रीपरिवृतं वाशिताभिरिव द्विपम् ।
नरेन्द्रं पश्यते राजा राक्षसानां तदार्जुनम् ।। ७.३२.२४ ।।
‘वहाँ पहुँचकर राक्षसों के राजा रावण ने मैथुन की इच्छावाली हथिनियों से घिरे हुए गजराज के समान सुन्दरी स्त्रियों से परिवेष्टित महाराज अर्जुन को देखा ॥ २४ १/२ ॥
स रोषाद्रक्तनयनो राक्षसेन्द्रो बलोद्धतः ।। ७.३२.२५ ।।
इत्येवमर्जुनामात्यनाह गम्भीरया गिरा ।
‘उसे देखते ही रावण के नेत्र रोष से लाल हो गये। अपने बल के घमंड से उद्दण्ड हुए राक्षसराज ने अर्जुन के मन्त्रियों से गम्भीर वाणी में इस प्रकार कहा – ॥ २५ १/२ ॥
अमात्याः क्षिप्रमाख्यात हैहयस्य नृपस्य वै ।। ७.३२.२६ ।।
युद्धार्थी समनुप्राप्तो रावणो नाम राक्षसः ।
‘मन्त्रियो! तुम हैहयराज से जल्दी जाकर कहो कि रावण तुम से युद्ध करने के लिये आया है' ॥ २६ १/२ ॥
रावणस्य वचः श्रुत्वा मन्त्रिणो ऽथार्जुनस्य ते ।
उत्तस्थुः सायुधास्त्राश्च रावणं वाक्यमब्रुवन् ।। ७.३२.२७ ।।
‘रावण की बात सुनकर अर्जुन के वे मन्त्री हथियार लेकर खड़े हो गये और रावण से इस प्रकार बोले—
युद्धस्य कालो विज्ञेयः साधु भोः साधु रावण ।। ७.३२.२८ ।।
चः श्रुत्वा मन्त्रिणो ऽथार्जुनस्य ते ।
यः क्षीबं स्त्रीवृतं चैव योद्धुमुत्सहते नृपम् ।
‘वाह रे रावण! वाह! तुम्हें युद्ध के अवसरका अच्छा ज्ञान है। हमारे महाराज जब मदमत्त होकर स्त्रियों के बीच में क्रीडा कर रहे हैं, ऐसे समय में तुम उनके साथ युद्ध करने के लिये उत्साहित हो रहे हो ॥ २८ १/२॥
स्त्रीसमक्षं कथं यत्तद्योद्धुमुत्सहसे ऽर्जुनम् ।
वाशितामध्यगं मत्तं शार्दूल इव कुञ्जरम् ।। ७.३२.२९ ।।
' जैसे कोई व्याघ्र कामवासना से वासित हथिनियों के बीच में खड़े हुए गजराज से जूझना चाहता हो, उसी प्रकार तुम स्त्रियों के समक्ष क्रीडा - विलास में तत्पर हुए राजा अर्जुन के साथ युद्ध करनेका हौसला दिखा रहे हो॥ २९ १/२ ॥
क्षमस्वाद्य दशग्रीव चोष्यतां रजनी त्वया ।
युद्धे श्रद्धा च यद्यस्ति श्वस्तात समरे ऽर्जुनम् ।। ७.३२.३० ।।
‘तात! दशग्रीव! यदि तुम्हारे हृदय में युद्ध के लिये उत्साह है, तो रातभर क्षमा करो और आज की रात में यहीं ठहरो। फिर कल सबेरे तुम राजा अर्जुन को समराङ्गण में उपस्थित देखोगे ॥ ३० ॥
यद्यद्यास्ति मतिर्योद्धुं युद्धतृष्णासमावृता ।
निहत्यास्मांस्ततो युद्धमर्जुनेनोपयास्यसि ।। ७.३२.३१ ।।
'युद्ध की तृष्णा से घिरे हुए राक्षसराज ! यदि तुम्हें जूझ ने के लिये बड़ी जल्दी लगी हो तो पहले रणभूमि में हम सबको मार गिराओ। उस के बाद महाराज अर्जुन के साथ युद्ध करने पाओगे ॥ ३१ ॥
ततस्ते रावणामात्यैरमात्याः पार्थिवस्य तु ।
सूदिताश्चापि ते युद्धे भक्षिताश्च बुभुक्षितैः ।। ७.३२.३२ ।।
‘यह सुनकर रावण के भूखे मन्त्री युद्धस्थल में अर्जुन के अमात्यों को मार-मारकर खा ने लगे ॥ ३२ ॥
ततो हलहलाशब्दो नर्मदातीर आबभौ ।
अर्जुनस्यानुयातऽणां रावणस्य च मन्त्रिणाम् ।। ७.३२.३३ ।।
‘इस से अर्जुन के अनुयायियों तथा रावण के मन्त्रियोंका नर्मदा के तट पर बड़ा कोलाहल होने लगा ॥ ३३ ॥
इषुभिस्तोमरैः शूलैस्त्रिशूलैर्वज्रकर्षणैः ।
सरावणानर्दयन्तः समन्तात्समभिद्रुताः ।। ७.३२.३४ ।।
'अर्जुन के योद्धा बाणों, तोमरों, भालों, त्रिशूलों और वज्रकर्षण नामक शस्त्रों द्वारा चारों ओर से धावा करके रावणसहित समस्त राक्षसों को घायल करने लगे ॥ ३४ ॥
हैहयाधिपयोधानां वेग आसीत्सुदारुणः ।
सनक्रमीनमकरसमुद्रस्येव निःस्वनः ।। ७.३२.३५ ।।
‘हैहयराज के योद्धाओंका वेग नाकों, मत्स्यों और मगरोंसहित समुद्र की भीषण गर्जना के समान अत्यन्त भयंकर जान पड़ता था ॥ ३५ ॥
रावणस्य तु ते ऽमात्याः प्रहस्तशुकसारणाः ।
कार्तवीर्यबलं क्रुद्धा निर्दहन्ति स्म तेजसा ।। ७.३२.३६ ।।
'रावण के वे मन्त्री प्रहस्त, शुक और सारण आदि कुपित हो अपने बल पराक्रम से कार्तवीर्य अर्जुन की सेनाका संहार करने लगे ॥ ३६॥
अर्जुनाय तु तत्कर्म रावणस्य समन्त्रिणः ।
क्रीडमानाय कथितं पुरुषैर्द्वाररक्षिभिः ।। ७.३२.३७ ।।
‘तब अर्जुन के सेवकों ने भय से विह्वल होकर क्रीडा में लगे हुए अर्जुन से मन्त्रीसहित रावण के उस क्रूर कर्मका समाचार सुनाया ॥ ३७ ॥
श्रुत्वा न भेतव्यमिति स्त्रीजनं तं ततो ऽर्जुनः ।
उत्ततार जलात्तस्माद्गङ्गातोयादिवाञ्जनः ।। ७.३२.३८ ।।
'सुनकर अर्जुन ने अपनी स्त्रियों से कहा- 'तुम सब लोग डरना मत। ' फिर उन सब के साथ वह नर्मदा के जल सेउसी तरह बाहर निकला, जैसे कोई दिग्गज (हथिनियों के साथ) गङ्गाजी के जल से बाहर निकला हो ॥ ३८ ॥
क्रोधदूषितनेत्रस्तु स ततो ऽर्जुनपावकः ।
प्रजज्वाल महाघोरो युगान्त इव पावकः ।। ७.३२.३९ ।।
‘उस के नेत्र रोष से रक्तवर्ण के हो गये। वह अर्जुनरूपी अनल प्रलयकाल के महाभयंकर पावक की भाँति प्रज्वलित हो उठा ॥ ३९ ॥
स तूर्णतरमादाय वरहेमाङ्गदो गदाम् ।
अभिदुद्राव रक्षांसि तमांसीव दिवाकरः ।। ७.३२.४० ।।
'सुन्दर सोनेका बाजूबंद धारण करनेवाले वीर अर्जुन ने तुरंत ही गदा उठा ली और उन राक्षसों पर आक्रमण किया, मानो सूर्यदेव अन्धकार-समूह पर टूट पड़े हों ॥ ४० ॥
बाहुविक्षेपकरणां समुद्यम्य महागदाम् ।
गारुडं वेगमास्थाय चापपातैव सो ऽर्जुनः ।। ७.३२.४१ ।।
'जो भुजाओं द्वारा घुमायी जाती थी उस विशाल गदा को ऊपर उठाकर गरुड़ के समान तीव्र वेगका आश्रय ले राजा अर्जुन तत्काल ही उन निशाचरों पर टूट पड़ा ॥ ४१ ॥
तस्य मार्गं समारुद्ध्य विन्ध्यो ऽर्कस्येव पर्वतः ।
स्थितो विन्ध्य इवाकम्प्यः प्रहस्तो मुसलायुधः ।। ७.३२.४२ ।।
‘उस समय मूसलधारी प्रहस्त, जो विन्ध्यगिरि के समान अविचल था, उसका मार्ग रोककर खड़ा हो गया । ठीक उसी तरह, जैसे पूर्वकाल में विन्ध्याचल ने सूर्यदेवका मार्ग रोक लिया था ॥ ४२ ॥
ततो ऽस्य मुसलं घोरं लोहबद्धं महोद्धतः ।
प्रहस्तः प्रेषयन्क्रुद्धो ररास च यथाम्बुदः ।। ७.३२.४३ ।।
'मद से उद्दण्ड हुए प्रहस्त ने कुपित हो अर्जुन पर लोहे से मढ़ा हुआ एक भयंकर मूसल चलाया और काल के समान भीषण गर्जना की ॥ ४३ ॥
तस्याग्रे मुसलस्याग्निरशोकापीडसन्निभः ।
प्रहस्तकरमुक्तस्य बभूव प्रदहन्निव ।। ७.३२.४४ ।।
' प्रहस्त के हाथ से छूटे हुए उस मूसल के अग्रभाग में अशोक - पुष्प के समान लाल रंग की आग प्रकट हो गयी, जो जलाती हुई - सी जान पड़ती थी ॥ ४४ ॥
अथायान्तं तु मुसलं कार्तवीर्यस्तदार्जुनः ।
निपुणं वञ्चयामास सगदो ऽगदविक्रमः ।। ७.३२.४५ ।।
‘किंतु कार्तवीर्य अर्जुन को इस से तनिक भी भय नहीं हुआ। उस ने अपनी ओर वेगपूर्वक आते हुए उस मूसल को गदा मारकर पूर्णत: विफल कर दिया ॥ ४५ ॥
ततस्तमभिदुद्राव प्रहस्तं हैहयाधिपः ।
भ्रामयानो गदां गुर्वीं पञ्चबाहुशतोच्छ्रयाम् ।। ७.३२.४६ ।।
‘तत्पश्चात् गदाधारी हैहयराज, जिसे पाँच सौ भुजाओं से उठाकर चलाया जाता था, उस भारी गदा को घुमाता हुआ प्रहस्त की ओर दौड़ा ॥ ४६ ॥
तथा हतो ऽतिवेगेन प्रहस्तो गदया तदा ।
निपपात स्थितः शैलो वज्रिवज्रहतो यथा ।। ७.३२.४७ ।।
‘उस गदा से अत्यन्त वेगपूर्वक आहत होकर प्रहस्त तत्काल पृथ्वी पर गिर पड़ा, मानो कोई पर्वत वज्रधारी इन्द्र के वज्रका आघात पाकर ढह गया हो ॥ ४७ ॥
प्रहस्तं पतितं दृष्ट्वा मारीचशुकसारणाः ।
समहोदरधूम्राक्षा ह्यपसृष्टा रणाजिरात् ।। ७.३२.४८ ।।
‘प्रहस्त को धराशायी हुआ देख मारीच, शुक, सारण, महोदर और धूम्राक्ष समराङ्गण से भाग खड़े हुए ॥ ४८ ॥
अपक्रान्तेष्वमात्येषु प्रहस्ते वै निपातिते ।
रावणो ऽभ्यद्रवत्तूर्णमर्जुनं नृपसत्तमम् ।। ७.३२.४९ ।।
‘प्रहस्त के गिर ने और अमात्यों के भाग जाने पर रावण ने नृपश्रेष्ठ अर्जुन पर तत्काल धावा किया ॥ ४९ ॥
सहस्रबाहोस्तद्युद्धं विंशद्बाहोश्च दारुणम् ।
नृपराक्षसयोस्तत्र चारब्धं रोमहर्षणम् ।। ७.३२.५० ।।
‘फिर तो हजार भुजाओंवाले नरनाथ और बीस भुजाओंवाले निशाचरनाथ में वहाँ भयंकर युद्ध आरम्भ हो गया, जो रोंगटे खड़े कर देनेवाला था ॥ ५० ॥
सागराविव संरब्धौ चलन्मूलाविवाचलौ ।
तेजोयुक्ताविवादित्यौ प्रदहन्ताविवानलौ ।। ७.३२.५१ ।।
बलोद्धतौ यथा नागौ वाशितार्थे यथा वृषौ ।
मेघाविव विनर्दन्तौ सिंहाविव बलोत्कटौ ।। ७.३२.५२ ।।
रुद्रकालाविव क्रुद्धौ तदा तौ राक्षसार्जुनौ ।
परस्परं गदाभ्यां तौ ताडयामासतुर्भृशम् ।। ७.३२.५३ ।।
'विक्षुब्ध हुए दो समुद्रों, जिन की जड़ हिल रही हों ऐसे दो पर्वतों, दो तेजस्वी आदित्यों, दो दाहक अग्नियों, बल से उन्मत्त हुए दो गजराजों, कामवासनावाली गाय के लिये लड़नेवाले दो साँड़ों, जोर-जोर से गर्जनेवाले दो मेघों, उत्कट बलशाली दो सिंहों तथा क्रोध से भरे हुए रुद्र और कालदेव के समान वे रावण और अर्जुन गदा लेकर एक-दूसरे पर गहरी चोटें करने लगे ॥ ५१–५३ ॥
वज्रप्रहारानचला यथा घोरान्विषेहिरे ।
गदाप्रहारांस्तौ तत्र सेहाते नरराक्षसौ ।। ७.३२.५४ ।।
‘जैसे पूर्वकाल में पर्वतों ने वज्र के भयंकर आघात सहे थे, उसी प्रकार वे अर्जुन और रावण वहाँ गदाओं के प्रहार सहन करते थे ॥ ५४ ॥
यथा ऽ शनिरवेभ्यस्तु जायते ऽथ प्रतिश्रुतिः ।
तथा तयोर्गदापोथैर्दिशः सर्वाः प्रतिश्रुताः ।। ७.३२.५५ ।।
‘जैसे बिजली की कड़क से सम्पूर्ण दिशाएँ प्रतिध्वनित हो उठती हैं, उसी प्रकार उन दोनों वीरों की गदाओं के आघातों से सभी दिशाएँ गूंज ने लगीं ॥ ५५ ॥
अर्जुनस्य गदा सा तु पात्यमाना ऽहितोरसि ।
काञ्चनाभं नभश्चक्रे विद्युत्सौदामिनी यथा ।। ७.३२.५६ ।।
‘जैसे बिजली चमककर आकाश को सुनहरे रंग से युक्त कर देती है, उसी प्रकार रावण की छाती पर गिरायी जाती हुई अर्जुन की गदा उस के वक्ष:स्थल को सुवर्ण की-सी प्रभा से पूर्ण कर देती थी ॥ ५६ ॥
तथैव रावणेनापि पात्यमाना मुहुर्मुहुः ।
अर्जुनोरसि निर्भाति गदोल्केव महागिरौ ।। ७.३२.५७ ।।
'उसी प्रकार रावण के द्वारा भी अर्जुन की छाती पर बारम्बार गिरायी जाती हुई गदा किसी महान पर्वत पर गिरनेवाली उल्का के समान प्रकाशित हो उठती थी ॥ ५७ ॥
नार्जुनः खेदमायाति न राक्षसगणेश्वरः ।
इदमासीत्तयोर्युद्धं यथा पूर्वं बलीन्द्रयोः ।। ७.३२.५८ ।।
‘उस समय न तो अर्जुन थकता था और न राक्षसगणोंका राजा रावण ही । पूर्वकाल में परस्पर जूझनेवाले इन्द्र और बलि की भाँति उन दोनों का युद्ध एक समान जान पड़ता था ॥ ५८ ॥
शृङ्गैरिव वृषायुध्यन्दन्ताग्रैरिव कुञ्जरौ ।
परस्परं तौ निघ्नन्तौ नरराक्षससत्तमौ ।। ७.३२.५९ ।।
‘जैसे साँड़ अपने सींगों से और हाथी अपने दाँतों के अग्रभाग से परस्पर प्रहार करते हैं, उसी प्रकार वे नरेश और निशाचरराज एक-दूसरे पर गदाओं से चोट करते थे ॥ ५९ ॥
ततो ऽर्जुनेन क्रुद्धेन सर्वप्राणेन सा गदा ।
स्तनयोरन्तरे मुक्ता रावणस्य महोरसि ।। ७.३२.६० ।।
'इसी बीच में अर्जुन ने कुपित होकर रावण के विशाल वक्ष:स्थल पर दोनों स्तनों के बीच में अपनी पूरी शक्ति से गदाका प्रहार किया ॥ ६० ॥
वरदानकृतत्राणे सा गदा रावणोरसि ।
दुर्बलेव यथावेगं द्विधाभूत्वा ऽपतत्क्षितौ ।। ७.३२.६१ ।।
'परंतु रावण तो वर के प्रभाव से सुरक्षित था, अतः रावण की छाती पर वेगपूर्वक चोट करके भी वह गदा किसी दुर्बल गदा की भाँति उस के वक्ष की टक्कर से दो टूक होकर पृथ्वी पर गिर पड़ी ॥ ६१ ॥
स त्वर्जुनप्रमुक्तेन गदापातेन रावणः ।
अपासर्पद्धनुर्मात्रं निषसाद च निष्टनन् ।। ७.३२.६२ ।।
‘तथापि अर्जुन की चलायी हुई गदा के आघात से पीड़ित हो रावण एक धनुष पीछे हट गया और आर्तनाद करता हुआ बैठ गया ॥ ६२ ॥
स विह्वलं तदालक्ष्य दशग्रीवं ततो ऽर्जुनः ।
सहसोत्पत्य जग्राह गरुत्मानिव पन्नगम् ।। ७.३२.६३ ।।
'दशग्रीव को व्याकुल देख अर्जुन ने सहसा उछलकर उसे पकड़ लिया, मानो गरुड़ ने झपट्टा मारकर किसी सर्प को धर दबाया हो ॥ ६३ ॥
स तु बाहुसहस्रेण बलाद्गृह्य दशाननम् ।
बबन्ध बलवान्राजा बलिं नारायणो यथा ।। ७.३२.६४ ।।
‘जैसे पूर्वकाल में भगवान् नारायण ने बलि को बाँधा था, उसी तरह बलवान् राजा अर्जुन ने दशानन को बलपूर्वक पकड़कर अपने हजार हाथों के द्वारा उसे मजबूत रस्सों से बाँध दिया ॥ ६४॥
बध्यमाने दशग्रीवे सिद्धचारणदेवताः ।
साध्वीतिवादिनः पुष्पैः किरन्त्यर्जुनमूर्धनि ।। ७.३२.६५ ।।
‘दशग्रीव के बाँधे जाने पर सिद्ध, चारण और देवता 'शाबाश! शाबाश!' कहते हुए अर्जुन के सिर पर फूलों की वर्षा करने लगे ॥ ६५ ॥
व्याघ्रो मृगमिवादाय मृगराडिव दन्तिनम् ।
ननाद हैहयो राजा हर्षादम्बुदवन्मुहुः ।। ७.३२.६६ ।।
‘जैसे व्याघ्र किसी हिरण को दबोच लेता है अथवा सिंह हाथी को धर दबाता है, उसी प्रकार रावण को अपने वश में करके हैहयराज अर्जुन हर्षातिरेक से मेघ के समान बारम्बार गर्जना करने लगा ॥ ६६ ॥
प्रहस्तस्तु समाश्वस्तो दृष्ट्वा बद्धं दशाननम् ।
सह तै राक्षसैः क्रुद्धश्चाभिदुद्राव पार्थिवम् ।। ७.३२.६७ ।।
‘इसके बाद प्रहस्त ने होश सँभाला। दशमुख रावण को बँधा हुआ देख वह राक्षस सहसा कुपित हो हैहयराज की ओर दौड़ा ॥ ६७ ॥
नक्तञ्चराणां वेगस्तु तेषामापततां बभौ ।
उद्भूत आतपापाये पयोदानामिवाम्बुधौ ।। ७.३२.६८ ।।
‘जैसे वर्षाकाल आ ने पर समुद्र में बादलोंका वेग बढ़ जाता है, उसी प्रकार वहाँ आक्रमण करते हुए उन निशाचरोंका वेग बढ़ा हुआ प्रतीत होता था ॥ ६८ ॥
मुञ्च मुञ्चेति भाषन्तस्तिष्ठतिष्ठेति चासकृत् ।
मुसलानि सशूलानि सोत्ससर्ज तदार्जुने ।। ७.३२.६९ ।।
‘छोड़ो, छोड़ो, ठहरो, ठहरो' ऐसा बारम्बार कहते हुए राक्षस अर्जुन की ओर दौड़े। उस समय प्रहस्त ने रणभूमि में अर्जुन पर मूसल और शूल के प्रहार किये ॥ ६९ ॥
अप्राप्तान्येव तान्याशु असम्भ्रान्तस्तदार्जुनः ।
आयुधान्यमरारीणां जग्राहारिनिषूदनः ।। ७.३२.७० ।।
'परंतु अर्जुन को उस समय घबराहट नहीं हुई। उस शत्रुसूदन वीर ने प्रहस्त आदि देवद्रोही निशाचरों के छोड़े हुए उन अस्त्रों को अपने शरीरतक आ ने से पहले ही पकड़ लिया ॥ ७० ॥
ततस्तैरेव रक्षांसि दुर्धरैः प्रवरायुधैः ।
भित्त्वा विद्रावयामास वायुरम्बुधरानिव ।। ७.३२.७१ ।।
'फिर उन्हीं दुर्धर एवं श्रेष्ठ आयुधों से उन सब राक्षसों को घायल करके उसी तरह भगा दिया, जैसे हवा बादलों को छिन्न-भिन्न करके उड़ा ले जाती है ॥ ७१ ॥
राक्षसांस्त्रासयित्वा तु कार्तवीर्यो ऽर्जुनस्तदा ।
रावणं गृह्य नगरं प्रविवेश सुहृद्वृतः ।। ७.३२.७२ ।।
‘उस समय कार्तवीर्य अर्जुन ने समस्त राक्षसों को भयभीत कर दिया और रावण को लेकर वह अपने सुहृदों के साथ नगर में आया ॥ ७२ ॥
स कीर्यमाणः कुसुमाक्षतोत्करैर्द्विजैः सपौरैः पुरुहूतसन्निभः ।
तदा ऽर्जुनः सम्प्रविवेश तां पुरीं बलिं निगृह्येव सहस्रलोचनः ।। ७.३२.७३ ।।
‘नगर के निकट आ ने पर ब्राह्मणों और पुरवासियों ने अपने इन्द्रतुल्य तेजस्वी नरेश पर फूलों और अक्षतों की वर्षा की और सहस्र नेत्रधारी इन्द्र जैसे बलि को बंदी बनाकर ले गये थे, उसी प्रकार उस राजा अर्जुन ने बँधे हुए रावण को साथ लेकर अपनी पुरी में प्रवेश किया ॥ ७३ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमदुत्तरकाण्डे द्वात्रिंशः सर्गः ।। ३२ ।।
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्ड में बत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३२ ॥
सर्ग-33
रावणग्रहणं तत्तु वायुग्रहणसन्निभम् ।
ततः पुलस्त्यः शुश्राव कथितं दिवि दैवतैः ।। ७.३३.१ ।।
रावण को पकड़ लेना वायु को पकड़ने के समान था। धीरे-धीरे यह बात स्वर्ग में देवताओं के मुख से पुलस्त्यजी ने सुनी ॥ १ ॥
ततः पुत्रकृतस्नेहात्कम्प्यमानो महाधृतिः ।
माहिष्मतीपतिं द्रष्टुमाजगाम महानृषिः ।। ७.३३.२ ।।
यद्यपि वे महर्षि महान धैर्यशाली थे तो भी संतान के प्रति होनेवाले स्नेह के कारण कृपापरवश हो गये और माहिष्मती नरेश से मिल ने के लिये भूतल पर चले आये ॥ २ ॥
स वायुमार्गमास्थाय वायुतुल्यगतिर्द्विजः ।
पुरीं माहिष्मतीं प्राप्तो मनःसम्पातविक्रमः ।। ७.३३.३ ।।
उनका वेग वायु के समान था और गति मन के समान, वे ब्रह्मर्षि वायुपथका आश्रय ले माहिष्मतीपुरी में आ पहुँचे ॥ ३ ॥
सो ऽमरावतिसङ्काशां हृष्टपुष्टजनाकुलाम् ।
प्रविवेश पुरीं ब्रह्मा इन्द्रस्येवामरावतीम् ।। ७.३३.४ ।।
जैसे ब्रह्माजी इन्द्र की अमरावतीपुरी में प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार पुलस्त्यजी ने हृष्ट-पुष्ट मनुष्यों से भरी हुई और अमरावती के समान शोभा से सम्पन्न माहिष्मती नगरी में प्रवेश किया॥ ४ ॥
पादचारमिवादित्यं निष्पतन्तं सुदुर्दशम् ।
ततस्ते प्रत्यभिज्ञाय अर्जुनाय निवेदयन् ।। ७.३३.५ ।।
आकाश से उतरते समय वे पैरों से चलकर आते हुए सूर्य के समान जान पड़ते थे। अत्यन्त तेज के कारण उनकी ओर देखना बहुत ही कठिन जान पड़ता था। अर्जुन के सेवकों ने उन्हें पहचानकर राजा अर्जुन को उनके शुभागमन की सूचना दी॥ ५ ॥
पुलस्त्य इति विज्ञाय वचनाद्धैहयाधिपः ।
शिरस्यञ्जलिमाधाय प्रत्युद्गच्छत्तपस्विनम् ।। ७.३३.६ ।।
सेवकों के कह ने से जब हैहयराज को यह पता चला कि पुलस्त्यजी पधारे हैं, तब वे सिर पर अञ्जलि बाँधे उन तपस्वी मुनि की अगवानी के लिये आगे बढ़ आये॥ ६ ॥
पुरोहितो ऽस्य गृह्यार्घ्यं मधुपर्कं तथैव च ।
पुरस्तात्प्रययौ राज्ञः शक्रस्येव बृहस्पतिः ।। ७.३३.७ ।।
राजा अर्जुन के पुरोहित अर्घ्य और मधुपर्क आदि लेकर उनके आगे-आगे चले, मानो इन्द्र के आगे बृहस्पति चल रहे हों॥ ७ ॥
ततस्तमृषिमायान्तमुद्यन्तमिव भास्करम् ।
अर्जुनो दृश्य सम्भ्रान्तो ववन्देन्द्र इवेश्वरम् ।। ७.३३.८ ।।
वहाँ आते हुए वे महर्षि उदित होते हुए सूर्य के समान तेजस्वी दिखायी देते थे। उन्हें देखकर राजा अर्जुन चकित रह गया। उस ने उन ब्रह्मर्षि के चरणों में उसी तरह आदरपूर्वक प्रणाम किया, जैसे इन्द्र ब्रह्माजी के आगे मस्तक झुकाते हैं॥ ८ ॥
स तस्य मधुपर्कं गां पाद्यमर्घ्यं निवेद्य च ।
पुलस्त्यमाह राजेन्द्रो हर्षगद्गदया गिरा ।। ७.३३.९ ।।
ब्रह्मर्षि को पाद्य, अर्घ्य, मधुपर्क और गौ समर्पित करके राजाधिराज अर्जुन ने हर्षगद्द वाणी में पुलस्त्यजी से कहा–॥९॥
अद्यैवममरावत्या तुल्या माहिष्मती कृता ।
अद्याहं तु द्विजेन्द्र त्वां यस्मात्पश्यामि दुर्दशम् ।। ७.३३.१० ।।
‘द्विजेन्द्र! आपका दर्शन परम दुर्लभ है, तथापि आज मैं आपके दर्शनका सुख उठा रहा हूँ। इस प्रकार यहाँ पधारकर आपने इस माहिष्मतीपुरी को अमरावतीपुरी के समान गौरवशालिनी बना दिया ॥ १० ॥
अद्य मे कुशलं देव अद्य मे कुशलं व्रतम् ।
अद्य मे सफलं जन्म अद्य मे सफलं तपः ।
यस्माद्देवगणैर्वन्द्यौ वन्दे ऽहं चरणौ तव ।। ७.३३.११ ।।
इदं राज्यमिमे पुत्रा इमे दारा इमे वयम् ।
ब्रह्मन्किं कुर्मि किं कार्यमाज्ञापयतु नो भवान् ।। ७.३३.१२ ।।
‘देव! आज मैं आपके देववन्द्य चरणों की वन्दना कर रहा हूँ; अत: आज ही मैं वास्तव में सकुशल हूँ। आज मेरा व्रत निर्विघ्न पूर्ण हो गया। आज ही मेरा जन्म सफल हुआ और तपस्या भी सार्थक हो गयी। ब्रह्मन्! यह राज्य, ये स्त्री- पुत्र और हम सब लोग आपके ही हैं। आप आज्ञा दीजिये । हम आप की क्या सेवा करें? ॥ ११-१२ ॥
तं धर्मे ऽग्निषु पुत्रेषु शिवं पृष्ट्वा च पार्थिवम् ।
पुलस्त्योवाच राजानं हैहयानां तथा ऽर्जुनम् ।। ७.३३.१३ ।।
तब पुलस्त्यजी हैहयराज अर्जुन के धर्म, अग्नि और पुत्रोंका कुशल- समाचार पूछकर उस से इस प्रकार बोले— ॥१३ ॥
नरेन्द्राम्बुजपत्राक्ष पूर्णचन्द्रनिभानन ।
अतुलं ते बलं येन दशग्रीवस्त्वया जितः ।। ७.३३.१४ ।।
'पूर्ण चन्द्रमा के समान मनोहर मुखवाले कमलनयन नरेश ! तुम्हारे बल की कहीं तुलना नहीं है; क्योंकि तुम ने दशग्रीव को जीत लिया ॥ १४ ॥
भयाद्यस्योपतिष्ठेतां निष्पन्दौ सागरानिलौ ।
सो ऽयं मृधे त्वया बद्धः पौत्रो मे रणदुर्जयः ।। ७.३३.१५ ।।
‘जिस के भय से समुद्र और वायु भी चञ्चलता छोड़कर सेवा में उपस्थित होते हैं, उस मेरे रणदुर्जय पौत्र को तुम ने संग्राम में बाँध लिया॥ १५ ॥
पुत्रकस्य यशः पीतं नाम विश्रावितं त्वया ।
मद्वाक्याद्याच्यमानो ऽद्य मुञ्च वत्सं दशाननम् ।। ७.३३.१६ ।।
'ऐसा करके तुम मेरे इस बच्चे का यश पी गये और सर्वत्र अपने नामका ढिंढोरा पीट दिया। वत्स! अब मेरे कह ने से तुम दशानन को छोड़ दो। यह तुम से मेरी याचना है ' ॥ १६ ॥
पुलस्त्याज्ञां प्रगृह्योचे न किञ्चन वचो ऽर्जुनः ।
मुमोच वै पार्थिवेन्द्रो राक्षसेन्द्रं प्रहृष्टवत् ।। ७.३३.१७ ।।
पुलस्त्यजी की इस आज्ञा को शिरोधार्य करके अर्जुन ने इसके विपरीत कोई बात नहीं कही। उस राजाधिराज ने बड़ी प्रसन्नता के साथ राक्षसराज रावण को बन्धन से मुक्त कर दिया ॥ १७ ॥
स तं प्रमुच्य त्रिदशारिमर्जुनः प्रपूज्य दिव्याभरणस्रगम्बरैः ।
अहिंसकं सख्यमुपेत्य साग्निकं प्रणम्य तं ब्रह्मसुतं गृहं ययौ ।। ७.३३.१८ ।।
उस देवद्रोही राक्षस को बन्धनमुक्त करके अर्जुन ने दिव्य आभूषण, माला और वस्त्रों से उसका पूजन किया और अग्नि को साक्षी बनाकर उस के साथ ऐसी मित्रताका सम्बन्ध स्थापित किया, जिस के द्वारा किसी की हिंसा न हो (अर्थात् उन दोनों ने यह प्रतिज्ञा की कि हमलोग अपनी मैत्रीका उपयोग दूसरे प्राणियों की हिंसा में नहीं करेंगे)। इसके बाद ब्रह्मपुत्र पुलस्त्यजी को प्रणाम करके राजा अर्जुन अपने घर को लौट गया ॥ १८॥
पुलस्त्येनापि सन्त्यक्तो राक्षसेन्द्रः प्रतापवान् ।
परिष्वक्तः कृतातिथ्यो लज्जमानो विनिर्जितः ।। ७.३३.१९ ।।
इस प्रकार अर्जुन द्वारा आतिथ्य सत्कार करके छोड़े गये प्रतापी राक्षसराज रावण को पुलस्त्यजी ने हृदय से लगा लिया, परंतु वह पराजय के कारण लज्जित ही रहा ॥ १९ ॥
पितामहसुतश्चापि पुलस्त्यो मुनिपुङ्गवः ।
मोचयित्वा दशग्रीवं ब्रह्मलोकं जगाम ह ।। ७.३३.२० ।।
दशग्रीव को छुड़ाकर ब्रह्माजी के पुत्र मुनिवर पुलस्त्यजी पुनः ब्रह्मलोक को चले गये॥ २० ॥
एवं स रावणः प्राप्तः कार्तवीर्यात्प्रधर्षणम् ।
पुलस्त्यवचनाच्चापि पुनर्मुक्तो महाबलः ।। ७.३३.२१ ।।
इस प्रकार रावण को कार्तवीर्य अर्जुन के हाथ से पराजित होना पड़ा था और फिर पुलस्त्यजी के कह ने से उस महाबली राक्षस को छुटकारा मिला था ॥ २१ ॥
एवं बलिभ्यो बलिनः सन्ति राघवनन्दन ।
नावज्ञा हि परे कार्या य इच्छेत् प्रियमात्मनः ।। ७.३३.२२ ।।
रघुकुलनन्दन! इस प्रकार संसार में बलवान् - से- बलवान् वीर पड़े हुए हैं; अतः जो अपना कल्याण चाहे उसे दूसरे की अवहेलना नहीं करनी चाहिये ॥ २२ ॥
ततः स राजा पिशिताशनानां सहस्रबाहोरुपलभ्य मैत्रीम् ।
पुनर्नृपाणां कदनं चकार चचार सर्वां पृथिवीं च दर्पात् ।। ७.३३.२३ ।।
सहस्रबाहु की मैत्री पाकर राक्षसोंका राजा रावण पुन: घमंड से भरकर सारी पृथ्वी पर विचर ने और नरेशोंका संहार करने लगा ॥ २३॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमदुत्तरकाण्डे त्रयस्त्रिंशः सर्गः ।। ३३ ।।
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्ड में तैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३३॥
सर्ग-34
अर्जुनेन विमुक्तस्तु रावणो राक्षसाधिपः ।
चचार पृथिवीं सर्वामनिर्विण्णस्तथा कृतः ।। ७.३४.१ ।।
अर्जुन से छुटकारा पाकर राक्षसराज रावण निर्वेद रहित हो पुनः सारी पृथ्वी पर विचरण करने लगा ॥ १ ॥
राक्षसं वा मनुष्यं वा शृणुते ऽयं बलाधिकम् ।
रावणस्तं समासाद्य युद्धे ह्वयति दर्पितः ।। ७.३४.२ ।।
राक्षस हो या मनुष्य, जिस को भी वह बल में बढ़ा-चढ़ा सुनता था, उसी के पास पहुँचकर अभिमानी रावण उसे युद्ध के लिये ललकारता था ॥ २ ॥
ततः कदाचित्किष्किन्धां नगरीं वालिपालिताम् ।
गत्वा ह्वयति युद्धाय वालिनं हेममालिनम् ।। ७.३४.३ ।।
तदनन्तर एक दिन वह वाली द्वारा पालित किष्किन्धापुरी में जाकर सुवर्णमालाधारी वाली को युद्ध के लिये ललकार ने लगा ॥ ३ ॥
ततस्तु वानरामात्यस्तारस्तारापिता प्रभुः ।
उवाच वानरो वाक्यं युद्धप्रेप्सुमुपागतम् ।। ७.३४.४ ।।
उस समय युद्ध की इच्छा से आये हुए रावण से वाली के मन्त्री तार, तारा के पिता सुषेण तथा युवराज अङ्गद एवं सुग्रीव ने कहा – ॥ ४ ॥
राक्षसेन्द गतो वाली यस्ते प्रतिबलो भवेत् ।
को ऽन्यः प्रमुखतः स्थातुं तव शक्तः प्लवङ्गमः ।। ७.३४.५ ।।
‘राक्षसराज! इस समय वाली तो बाहर गये हुए हैं। वे ही आप की जोड़ के हो सकते हैं। दूसरा कौन वानर आपके साम ने ठहर सकता है ॥ ५ ॥
चतुर्भ्यो ऽपि समुद्रेभ्यः सन्ध्यामन्वास्य रावण ।
इमं मुहूर्तमायाति वाली तिष्ठ मुहूर्तकम् ।। ७.३४.६ ।।
‘रावण! चारों समुद्रों से सन्ध्योपासन करके वाली अब आते ही होंगे। आप दो घड़ी ठहर जाइये ॥ ६ ॥
एतानस्थिचयान्पश्य य एते शङ्खपाण्डुराः ।
युद्धार्थिनामिमे राजन्वानराधिपतेजसा ।। ७.३४.७ ।।
‘राजन्! देखिये, ये जो शङ्ख के समान उज्ज्वल हड्डियों के ढेर लग रहे हैं, ये वाली के साथ युद्ध की इच्छा से आये हुए आप-जैसे वीरों के ही हैं। वानरराज वाली के तेज से ही इन सबका अन्त हुआ है ॥ ७ ॥
यद्वा ऽमृतरसः पीतस्त्वया रावण राक्षस ।
तदा वालिनमासाद्य तदन्तं तव जीवितम् ।। ७.३४.८ ।।
‘राक्षस रावण! यदि आपने अमृत का रस पी लिया हो तो भी जब आप वाली से टक्कर लेंगे, तब वही आपके जीवनका अन्तिम क्षण होगा ॥ ८ ॥
पश्येदानीं जगच्चित्रमिमं विश्रवसः सुत ।
इदं मुहूर्तं तिष्ठस्व दुर्लभं ते भविष्यति ।। ७.३४.९ ।।
‘विश्रवाकुमार! वाली सम्पूर्ण आश्चर्य के भण्डार हैं। आप इस समय इनका दर्शन करेंगे। केवल इसी मुहूर्ततक उनकी प्रतीक्षा के लिये ठहरिये; फिर तो आपके लिये जीवन दुर्लभ हो जायगा ॥ ९ ॥
अथवा त्वरसे मर्तुं गच्छ दक्षिणसागरम् ।
वालिनं द्रक्ष्यसे तत्र भूमिस्थमिव पावकम् ।। ७.३४.१० ।।
‘अथवा यदि आप को मर ने के लिये बहुत जल्दी लगी हो तो दक्षिण समुद्र के तट पर चले जाइये। वहाँ आप को पृथ्वी पर स्थित हुए अग्निदेव के समान वालीका दर्शन होगा ॥ १० ॥
स तु तारं विनिर्भर्त्स्य रावणो लोकरावणः ।
पुष्पकं तत्समारुह्य प्रययौ दक्षिणार्णवम् ।। ७.३४.११ ।।
तब लोकों को रुलानेवाले रावण ने तार को भला-बुरा कहकर पुष्पकविमान पर आरूढ़ हो दक्षिण समुद्र की ओर प्रस्थान किया ॥ ११ ॥
तत्र हेमगिरिप्रख्यं तरुणार्कनिभाननम् ।
रावणो वालिनं दृष्ट्वा सन्ध्योपासनतत्परम् ।। ७.३४.१२ ।।
वहाँ रावण ने सुवर्णगिरि के समान ऊँचे वाली को संध्योपासन करते हुए देखा। उनका मुख प्रभातकाल के सूर्य की भाँति अरुण प्रभा से उद्भासित हो रहा था ॥ १२ ॥
पुष्पकादवरुह्याथ रावणो ऽञ्जनसन्निभः ।
ग्रहीतुं वालिनं तूर्णं निःशब्दपदमाव्रजत् ।। ७.३४.१३ ।।
उन्हें देखकर काजल के समान काला रावण पुष्पक से उतर पड़ा और वाली को पकड़ने के लिये जल्दी-जल्दी उनकी ओर बढ़ ने लगा। उस समय वह अपने पैरों की आहट नहीं होने देता था ॥ १३ ॥
यदृच्छया तदा दृष्टो वालिनापि स रावणः ।
पापाभिप्रायवान् दृष्ट्वा चकार न तु सम्भ्रमम् ।। ७.३४.१४ ।।
दैवयोग से वाली ने भी रावण को देख लिया; किंतु वे उस के पापपूर्ण अभिप्राय को जानकर भी घबराये नहीं ॥ १४ ॥
शशमालक्ष्य सिंहो वा पन्नगं गरुडो यथा ।
न चिन्तयति तं वाली रावणं पापनिश्चयम् ।। ७.३४.१५ ।।
जैसे सिंह खरगोश को और गरुड़ सर्प को देखकर भी उस की परवा नहीं करता, उसी प्रकार वाली ने पापपूर्ण विचार रखनेवाले रावण को देखकर भी चिन्ता नहीं की ॥ १५ ॥
जिघृक्षमाणमायान्तं रावणं पापचेतसम् ।
कक्षावलम्बिनं कृत्वा गमिष्ये त्रीन्महार्णवान् ।। ७.३४.१६ ।।
उन्होंने यह निश्चय कर लिया था कि जब पापात्मा रावण मुझे पकड़ने की इच्छा से निकट आयेगा, तब मैं इसे काँख में दबाकर लटका लूँगा और इसे लिये दिये शेष तीन महासागरों पर भी हो आऊँगा ॥ १६ ॥
द्रक्ष्यन्त्यरिं ममाङ्कस्थं स्रंसदूरुकराम्बरम् ।
लम्बमानं दशग्रीवं गरुडस्येव पन्नगम् ।। ७.३४.१७ ।।
इसकी जाँघ, हाथ-पैर और वस्त्र खिसकते होंगे। यह मेरी काँख में दबा होगा और उस दशा में लोग मेरे शत्रु को गरुड़ के पंजे में दबे हुए सर्प के समान लटकते देखेंगे॥ १७ ॥
इत्येवं मतिमास्थाय वाली कर्णमुपाश्रितः ।
जपन्वै नैगमान्मन्त्रांस्तस्थौ पर्वतराडिव ।। ७.३४.१८ ।।
ऐसा निश्चय करके वाली मौन ही रहे और वैदिक मन्त्रोंका जप करते हुए गिरिराज सुमेरु की भाँति खड़े रहे ॥ १८ ॥
तावन्योन्यं जिघृक्षन्तौ हरिराक्षसपार्थिवौ ।
प्रयत्नवन्तौ तत्कर्म ईहतुर्बलदर्पितौ ।। ७.३४.१९ ।।
इस प्रकार बल के अभिमान से भरे हुए वे वानरराज और राक्षसराज दोनों एक-दूसरे को पकड़ना चाहते थे। दोनों ही इसके लिये प्रयत्नशील थे और दोनों ही वह काम बना ने की घात में लगे थे ॥ १९ ॥
हस्तग्राहं तु तं मत्वा पादशब्देन रावणम् ।
पराङ्मुखो ऽपि जग्राह वाली सर्पमिवाण्डजः ।। ७.३४.२० ।।
रावण के पैरों की हल की-सी आहट से वाली यह समझ गये कि अब रावण हाथ बढ़ाकर मुझे पकड़ना चाहता है। फिर तो दूसरी ओर मुँह किये होने पर भी वाली ने उसे उसी तरह सहसा पकड़ लिया, जैसे गरुड़ सर्प को दबोच लेता है ॥ २० ॥
ग्रहीतुकामं तं गृह्य रक्षसामीश्वरं हरिः ।
खमुत्पपात वेगेन कृत्वा कक्षावलम्बिनम् ।। ७.३४.२१ ।।
पकड़ने की इच्छावाले उस राक्षसराज को वाली ने स्वयं ही पकड़कर अपनी काँख में लटका लिया और बड़े वेग से वे आकाश में उछले ॥ २१ ॥
तं चापीडयमानं तु वितुदन्तं नखैर्मुहुः ।
जहार रावणं वाली पवनस्तोयदं यथा ।। ७.३४.२२ ।।
रावण अपने नखों से बारम्बार वाली को बकोटता और पीड़ा देता रहा, तो भी जैसे वायु बादलों को उड़ा ले जाती है, उसी प्रकार वाली रावण को बगल में दबाये लिये फिरते थे ॥ २२ ॥
अथ ते राक्षसामात्या ह्रियमाणं दशाननम् ।
मुमोक्षयिषवो वालिं रवमाणा अभिद्रुताः ।। ७.३४.२३ ।।
इस प्रकार रावण के हर लिये जाने पर उस के मन्त्री उसे वाली से छुड़ा ने के लिये कोलाहल करते हुए उनके पीछे- पीछे दौड़ते रहे॥ २३॥
अन्वीयमानस्तैर्वाली भ्राजते ऽम्बरमध्यगः ।
अन्वीयमानो मेघौघैरम्बरस्थ इवांशुमान् ।। ७.३४.२४ ।।
पीछे-पीछे राक्षस चलते थे और आगे-आगे वाली। इस अवस्था में वे आकाश के मध्यभाग में पहुँचकर मेघसमूहों से अनुगत हुए आकाशवर्ती अंशुमाली सूर्य के समान शोभा पाते थे ॥ २४ ॥
ते ऽशक्नुवन्तः सम्प्राप्तुं वालिनं राक्षसोत्तमाः ।
तस्य बाहूरुवेगेन परिश्रान्ता व्यवस्थिताः ।। ७.३४.२५ ।।
वे श्रेष्ठ राक्षस बहुत प्रयत्न करने पर भी वाली के पास तक न पहुँच सके। उनकी भुजाओं और जाँघों के वेग से उत्पन्न हुई वायु के थपेड़ों से थककर वे खड़े हो गये॥ २५ ॥
वालिमार्गादपाक्रामन्पर्वतेन्द्रो हि गच्छतः ।
किं पुनर्जीवितप्रेप्सुर्बिभ्रद्वै मांसशोणितम् ।। ७.३४.२६ ।।
वाली के मार्ग से उड़ते हुए बड़े-बड़े पर्वत भी हट जाते थे; फिर रक्त-मांसमय शरीर धारण करनेवाला और जीवन की रक्षा चाहनेवाला प्राणी उनके मार्ग से हट जाय, इसके लिये तो कहना ही क्या है ॥ २६॥
अपक्षिगणसम्पातान्वानरेन्द्रो महाजवः ।
क्रमशः सागरान्सर्वान्सन्ध्याकालमवन्दत ।। ७.३४.२७ ।।
जितनी देर में वाली समुद्रोंतक पहुँचते थे, उतनी देर में तीव्रगामी पक्षियों के समूह भी नहीं पहुँच पाते थे। उन महावेगशाली वानरराज ने क्रमश: सभी समुद्रों के तट पर पहुँचकर संध्या-वन्दन किया॥ २७॥
सभाज्यमानो भूतैस्तु खैचरैः खैचरोत्तमः ।
पश्चिमं सागरं वाली ह्याजगाम सरावणः ।। ७.३४.२८ ।।
समुद्रों की यात्रा करते हुए आकाशचारियों में श्रेष्ठ वाली की सभी खेचर प्राणी पूजा एवं प्रशंसा करते थे। वे रावण को बगल में दबाये हुए पश्चिम समुद्र के तट पर आये ॥ २८ ॥
तस्मिन्सन्ध्यामुपासित्वा स्नात्वा जप्त्वा च वानरः ।
उत्तरं सागरं प्रायाद्वहमानो दशाननम् ।। ७.३४.२९ ।।
वहाँ स्नान, संध्योपासन और जप करके वे वानरवीर दशानन को लिये दिये उत्तर समुद्र के तट पर जा पहुँचे ॥ २९ ॥
बहुयोजनसाहस्रं वहमानो महाहरिः ।
वायुवच्च मनोवच्च जगाम सह शत्रुणा ।। ७.३४.३० ।।
वायु और मन के समान वेगवाले वे महावानर वाली कई सहस्र योजनतक रावण को ढोते रहे। फिर अपने उस शत्रु के साथ ही वे उत्तर समुद्र के किनारे गये ॥३०॥
उत्तरे सागरे सन्ध्यामुपासित्वा दशाननम् ।
वहमानो ऽगमद्वाली पूर्वं वै स महोदधिम् ।। ७.३४.३१ ।।
उत्तरसागर के तट पर संध्योपासना करके दशाननका भार वहन करते हुए वाली पूर्व दिशावर्ती महासागर के किनारे गये ॥ ३१ ॥
तत्रापि सन्ध्यामन्वास्य वासविः सहरीश्वरः ।
किष्किन्धामभितो गृह्य रावणं पुनरागमत् ।। ७.३४.३२ ।।
वहाँ भी संध्योपासना सम्पन्न करके वे इन्द्रपुत्र वानरराज वाली दशमुख रावण को बगल में दबाये फिर किष्किन्धापुरी के निकट आये ॥ ३२ ॥
चतुर्ष्वपि समुद्रेषु सन्ध्यामन्वास्य वानरः ।
रावणोद्वहनश्रान्तः किष्किन्धोपवने ऽपतत् ।। ७.३४.३३ ।।
इस तरह चारों समुद्रों में संध्योपासनाका कार्य पूरा करके रावण को ढो ने के कारण थ के हुए वानरराज वाली किष्किन्धा के उपवन में आ पहुँचे ॥ ३३ ॥
रावणं तु मुमोचाथ स्वकक्षात्कपिसत्तमः ।
कुतस्त्वमिति चोवाच प्रहसन्रावणं मुहुः ।। ७.३४.३४ ।।
वहाँ आकर उन कपिश्रेष्ठ ने रावण को अपनी काँख से छोड़ दिया और बारम्बार हँसते हुए पूछा - 'कहो जी, तुम कहाँ से आये हो ' ॥ ३४॥
विस्मयं तु महद्गत्वा श्रमलोलनिरीक्षणः ।
राक्षसेन्द्रो हरीन्द्रं तमिदं वचनमब्रवीत् ।। ७.३४.३५ ।।
रावण की आँखें श्रम के कारण चञ्चल हो रही थीं। वाली के इस अद्भुत पराक्रम को देखकर उसे महान आश्चर्य हुआ और उस राक्षसराज ने उन वानरराज से इस प्रकार कहा – ॥ ३५ ॥
वानरेन्द्र महेन्द्राभ राक्षसेन्द्रो ऽस्मि रावणः ।
युद्धेप्सुरिह सम्प्राप्तः स चाद्यासादितस्त्वया ।। ७.३४.३६ ।।
‘महेन्द्र के समान पराक्रमी वानरेन्द्र ! मैं राक्षसेन्द्र रावण हूँ और युद्ध करने की इच्छा से यहाँ आया था, सो वह युद्ध तो आप से मिल ही गया ॥ ३६ ॥
अहो बलमहो वीर्यमहो गाम्भीर्यमेव च ।
येनाहं पशुवद्गृह्य भ्रामितश्चतुरो ऽर्णवान् ।। ७.३४.३७ ।।
'अहो! आप में अद्भुत बल है, अद्भुत पराक्रम है और आश्चर्यजनक गम्भीरता है। आपने मुझे पशु की तरह पकड़कर चारों समुद्रों पर घुमाया है ॥ ३७ ॥
एवमश्रान्तवद्वीर शीघ्रमेव महार्णवान् ।
मां चैवोद्वहमानस्तु को ऽन्यो वीरः क्रमिष्यति ।। ७.३४.३८ ।।
‘वानरवीर! तुम्हारे सिवा दूसरा कौन ऐसा शूरवीर होगा, जो मुझे इस प्रकार बिना थ के-माँदे शीघ्रतापूर्वक ढो स के ॥ ३८ ॥
त्रयाणामेव भूतानां गतिरेषा प्लवङ्गम ।
मनोनिलसुपर्णानां तव चात्र न संशयः ।। ७.३४.३९ ।।
'वानरराज! ऐसी गति तो मन, वायु और गरुड़ – इन तीन भूतों की ही सुनी गयी है। नि:संदेह इस जगत्में चौथे आप भी ऐसे तीव्र वेगवाले हैं॥ ३९ ॥'
सो ऽहं दृष्टबलस्तुभ्यमिच्छामि हरिपुङ्गव ।
त्वया सह चिरं सख्यं सुस्निग्धं पावकाग्रतः ।। ७.३४.४० ।।
कपिश्रेष्ठ ! मैं ने आपका बल देख लिया। अब मैं अग्नि को साक्षी बनाकर आपके साथ सदा के लिये स्नेहपूर्ण मित्रता कर लेना चाहता हूँ ॥ ४० ॥
दाराः पुत्राः पुरं राष्ट्रं भोगाच्छादनभोजनम् ।
सर्वमेवाविभक्तं नौ भविष्यति हरीश्वर ।। ७.३४.४१ ।।
'वानरराज ! स्त्री, पुत्र, नगर, राज्य, भोग, वस्त्र और भोजन – इन सभी वस्तुओं पर हम दोनों का साझेका अधिकार होगा’॥ ४१ ॥
ततः प्रज्वालयित्वाग्निं तावुभौ हरीराक्षसौ ।
भ्रातृत्वमुपसम्पन्नौ परिष्वज्य परस्परम् ।। ७.३४.४२ ।।
तब वानरराज और राक्षसराज दोनों ने अग्नि प्रज्वलित करके एक-दूसरे को हृदय से लगाकर आपस में भाईचारे का सम्बन्ध जोड़ा ॥ ४२ ॥
अन्योन्यं लम्बितकरौ ततस्तौ हरिराक्षसौ ।
किष्किन्धां विशतुर्हृष्टौ सिंहौ गिरिगुहामिव ।। ७.३४.४३ ।।
फिर वे दोनों वानर और राक्षस एक-दूसरेका हाथ पकड़े बड़ी प्रसन्नता के साथ किष्किन्धापुरी के भीतर गये, मानो दो सिंह किसी गुफा में प्रवेश कर रहे हों ॥ ४३ ॥
स तत्र मासमुषितः सुग्रीव इव रावणः ।
अमात्यैरागतैर्नीतस्त्रैलोक्योत्सादनार्थिभिः ।। ७.३४.४४ ।।
रावण वहाँ सुग्रीव की तरह सम्मानित हो महीनेभर रहा। फिर तीनों लोकों को उखाड़ फेंकने की इच्छा रखनेवाले उस के मन्त्री आकर उसे लिवा ले गये॥ ४४ ॥
एवमेतत्पुरावृत्तं वालिना रावणः प्रभो ।
धर्षितश्च कृतश्चापि भ्राता पावकसन्निधौ ।। ७.३४.४५ ।।
प्रभो! इस प्रकार यह घटना पहले घटित हो चुकी है । वाली ने रावण को हराया और फिर अग्नि के समीप उसे अपना भाई बना लिया॥ ४५ ॥
बलमप्रतिमं राम वालिनो ऽभवदुत्तमम् ।
सो ऽपि त्वया विनिर्दग्धः शलभो वह्निना यथा ।। ७.३४.४६ ।।
श्रीराम! वाली में बहुत अधिक और अनुपम बल था, परंतु आपने उस को भी अपनी बाणाग्नि से उसी तरह दग्ध कर डाला, जैसे आग पतिंगे को जला देती है ॥४६।।
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमदुत्तरकाण्डे चतुस्त्रिंशः सर्गः ।। ३४ ।।
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्ड में चौंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३४ ॥
सर्ग-35
अपृच्छत तदा रामो दक्षिणाशाश्रमं मुनिम् ।
प्राञ्जलिर्विनयोपेत इदमाह वचो ऽर्थवत् ।। ७.३५.१ ।।
तब भगवान् श्रीराम ने हाथ जोड़कर दक्षिण दिशा में निवास करनेवाले अगस्त्य मुनि से विनयपूर्वक यह अर्थयुक्त बात कही ॥ १ ॥
अतुलं बलमेतद्वै वालिनो रावणस्य च ।
न त्वेताभ्यां हनुमता समं त्विति मतिर्मम ।। ७.३५.२ ।।
‘महर्षे! इसमें संदेह नहीं कि वाली और रावण के इस बल की कहीं तुलना नहीं थी; परंतु मेरा ऐसा विचार है कि इन दोनों का बल भी हनुमानजी के बल की बराबरी नहीं कर सकता था ॥ २ ॥
शौर्यं दाक्ष्यं बलं धैर्यं प्राज्ञता नयसाधनम् ।
विक्रमश्च प्रभावश्च हनूमति कृतालयाः ।। ७.३५.३ ।।
'शूरता, दक्षता, बल, धैर्य, बुद्धिमत्ता, नीति, पराक्रम और प्रभाव कर रखा है॥ ३ ॥
दृष्ट्वैव सागरं वीक्ष्य सीदन्तीं कपिवाहिनीम् ।
समाश्वास्य महाबाहुर्योजनानां शतं प्लुतः ।। ७.३५.४ ।।
इन सभी सद्गुणों ने हनुमानजी के भीतर घर 'समुद्र को देखते ही वानर सेना घबरा उठी है— यह देख ये महाबाहु वीर उसे धैर्य बँधाकर एक ही छलाँग में सौ योजन समुद्र को लाँघ गये ॥ ४ ॥
धर्षयित्वा पुरीं लङ्कां रावणान्तःपुरं तदा ।
दृष्ट्वा सम्भाषिता चापि सीता ह्याश्वासिता तथा ।। ७.३५.५ ।।
‘फिर लङ्कापुरी के आधिदैविक रूप को परास्त कर रावण के अन्त: पुर में गये, सीताजी से मिले, उनसे बातचीत की और उन्हें धैर्य बँधाया ॥ ५ ॥
सेनाग्रगा मन्त्रिसुताः किङ्करा रावणात्मजः ।
एते हनुमता तत्र ह्येकेन वितिपातिताः ।। ७.३५.६ ।।
‘वहाँ अशोकवन में इन्होंने अकेले ही रावण के सेनापतियों, मन्त्रिकुमारों, किंकरों तथा रावणपुत्र अक्ष को मार गिराया॥ ६ ॥
भूयो बन्धाद्विमुक्तेन भाषयित्वा दशाननम् ।
लङ्का भस्मीकृता येन पावकेनेव मेदिनी ।। ७.३५.७ ।।
‘फिर ये मेघनाद के नागपाश से बँधे और स्वयं ही मुक्त हो गये । तत्पश्चात् इन्होंने रावण से वार्तालाप किया। जैसे प्रलयकाल की आग ने यह सारी पृथ्वी जलायी थी, उसी प्रकार लङ्कापुरी को जलाकर भस्म कर दिया ॥ ७ ॥
न कालस्य न शक्रस्य न विष्णोर्वित्तपस्य च ।
कर्माणि तानि श्रूयन्ते यानि युद्धे हनूमतः ।। ७.३५.८ ।।
'युद्ध में हनुमानजी के जो पराक्रम देखे गये हैं, वै से वीरतापूर्ण कर्म न तो काल के, न इन्द्र के, न भगवान् विष्णु के और न वरुण के ही सुने जाते हैं ॥ ८ ॥
एतस्य बाहुवीर्येण लङ्का सीता च लक्ष्मणः ।
प्राप्ता मया जयश्चैव राज्यं मित्राणि बान्धवाः ।। ७.३५.९ ।।
'मुनीश्वर ! मैं ने तो इन्हीं के बाहुबल से विभीषण के लिये लङ्का, शत्रुओं पर विजय, अयोध्याका राज्य तथा सीता, लक्ष्मण, मित्र और बन्धुजनों को प्राप्त किया है ॥९।।
हनूमान्यदि मे नः स्याद्वानराधिपतेः सखा ।
प्रवृत्तिमपि को वेत्तुं जानक्याः शक्तिमान्भवेत् ।। ७.३५.१० ।।
'यदि मुझे वानरराज सुग्रीव के सखा हनुमान न मिलते तो जानकी का पता लगाने में भी कौन समर्थ हो सकता था? ॥ १० ॥
किमर्थं वाल्यनेनैव सुग्रीवप्रियकाम्यया ।
तदा वैरे समुत्पन्ने न दग्धो वीरुधो यथा ।। ७.३५.११ ।।
‘जिस समय वाली और सुग्रीव में विरोध हुआ, उस समय सुग्रीवका प्रिय करने के लिये इन्होंने जैसे दावानल वृक्ष को जला देता है, उसी प्रकार वाली को क्यों नहीं भस्म कर डाला? यह समझ में नहीं आता ॥ ११ ॥
नहि वेदितवान्मन्ये हनूमानात्मनो बलम् ।
यद्दृष्टवाञ्जीवितेष्टं क्लिश्यन्तं वानराधिपम् ।। ७.३५.१२ ।।
‘मैं तो ऐसा मानता हूँ कि उस समय हनुमानजी को अपने बल का पता ही नहीं था। इसी से ये अपने प्राणों से भी प्रिय वानरराज सुग्रीव को कष्ट उठाते देखते रहे ॥ १२ ॥
एतन्मे भगवन्सर्वं हनूमति महामतौ ।
विस्तरेण यथातत्त्वं कथयामरपूजित ।। ७.३५.१३ ।।
‘देववन्द्य महामुने! भगवन्! आप हनुमानजी के विषय में ये सब बातें यथार्थरूप से विस्तारपूर्वक बताइये'॥ १३॥
राघवस्य वचः श्रुत्वा हेतुयुक्तमृषिस्तदा ।
हनूमतः समक्षं तमिदं वचनमब्रवीत् ।। ७.३५.१४ ।।
श्रीरामचन्द्रजी के ये युक्तियुक्त वचन सुनकर महर्षि अगस्त्यजी हनुमानजी के साम ने ही उनसे इस प्रकार बोले—॥१४॥
सत्यमेतद्रघुश्रेष्ठ यद्ब्रवीषि हनूमतः ।
न बले विद्यते तुल्यो न गतौ न मतौ परः ।। ७.३५.१५ ।।
‘रघुकुलतिलक श्रीराम! हनुमानजी के विषय में आप जो कुछ कहते हैं, यह सब सत्य ही है। बल, बुद्धि और गति में इनकी बराबरी करनेवाला दूसरा कोई नहीं है ॥ १५ ॥
अमोघशापैः शप्तस्तु दत्तो ऽस्य मुनिभिः पुरा ।
न वेत्ता हि बलं येन बली सन्निरिमर्दनः ।। ७.३५.१६ ।।
'शत्रुसूदन रघुनन्दन ! जिनका शाप कभी व्यर्थ नहीं जाता, ऐसे मुनियों ने पूर्वकाल में इन्हें यह शाप दे दिया था कि बल रह ने पर भी इन को अपने पूरे बल का पता नहीं रहेगा ॥ १६ ॥
बाल्ये ऽप्येतेन यत्कर्म कृतं राम महाबल ।
तन्न वर्णयितुं शक्यमिति बालतया ऽ ऽस्यते ।। ७.३५.१७ ।।
‘महाबली श्रीराम! इन्होंने बचपन में भी जो महान कर्म किया था, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। उन दिनों वे बालभाव से—अनजान की तरह रहते थे ॥ १७ ॥
यदि वा ऽस्ति त्वभिप्रायस्तच्छ्रोतुं तव राघव ।
समाधाय मतिं राम निशामय वदाम्यहम् ।। ७.३५.१८ ।।
‘रघुनन्दन! यदि हनुमान्जीका चरित्र सुन ने के लिये आप की हार्दिक इच्छा हो तो चित्त को एकाग्र करके सुनिये। मैंसारी बातें बता रहा हूँ ॥ १८ ॥
सूर्यदत्तवरस्वर्णः सुमेरुर्नाम पर्वतः ।
यत्र राज्यं प्रशास्त्यस्य केसरी नाम वै पिता ।। ७.३५.१९ ।।
‘भगवान् सूर्य के वरदान से जिसका स्वरूप सुवर्णमय हो गया है, ऐसा एक सुमेरु नाम से प्रसिद्ध पर्वत है, जहाँ हनुमानजी के पिता केसरी राज्य करते हैं॥ १९॥
तस्य भार्या बभूवैषा ह्यञ्जनेति परिश्रुता ।
जनयामास तस्यां वै वायुरात्मजमुत्तमम् ।। ७.३५.२० ।।
‘उनकी अञ्जना नाम से विख्यात प्रियतमा पत्नी थीं। उनके गर्भ से वायुदेव ने एक उत्तम पुत्र को जन्म दिया ॥
शालिशूकनिभाभासं प्रासूतामुं तदा ऽञ्जना ।
फलान्याहर्तुकामा वै निष्क्रान्ता गहनेचरा ।। ७.३५.२१ ।।
‘अञ्जना ने जब इन को जन्म दिया, उस समय इनकी अङ्गकान्ति जाड़े में पैदा होनेवाले धान के अग्रभाग की भाँति पिंगल वर्ण की थी । एक दिन माता अञ्जना फल ला ने के लिये आश्रम से निकलीं और गहन वन में चली गयीं ॥ २१ ॥
एष मातुर्वियोगाच्च क्षुधया च भृशार्दितः ।
रुरोद शिशुरत्यर्थं शिशुः शरवणे यथा ।। ७.३५.२२ ।।
‘उस समय माता से बिछुड़ जाने और भूख से अत्यन्त पीड़ित होने के कारण शिशु हनुमान उसी तरह जोर-जोर से रोने लगे, जैसे पूर्वकाल में सरकंडों के बन के भीतर कुमार कार्तिकेय रोये थे॥ २२ ॥
तदोद्यन्तं विवस्वन्तं जपापुष्पोत्करोपमम् ।
ददर्श फललोभाच्च ह्युत्पपात रविं प्रति ।। ७.३५.२३ ।।
'इतने ही में इन्हें जपाकुसुम के समान लाल रंगवाले सूर्यदेव उदित होते दिखायी दिये। हनुमानजी ने उन्हें कोई फल समझा और ये उस फल के लोभ से सूर्य की ओर उछले॥ २३॥
बालार्काभिमुखो बालो बालार्क इव मूर्तिमान् ।
ग्रहीतुकामो बालार्कं प्लवते ऽम्बरमध्यगः ।। ७.३५.२४ ।।
‘बालसूर्य की ओर मुँह किये मूर्तिमान् बालसूर्य के समान बालक हनुमान बालसूर्य को पकड़ने की इच्छा से आकाश में उड़ते चले जा रहे थे ॥ २४ ॥
एतस्मिन्प्लवमाने तु शिशुभावे हनूमति ।
देवदानवयक्षाणां विस्मयः सुमहानभूत् ।। ७.३५.२५ ।।
'शैशवावस्था में हनुमानजी जब इस तरह उड़ रहे थे, उस समय उन्हें देखकर देवताओं, दानवों तथा यक्षों को बड़ा विस्मय हुआ ॥ २५ ॥
नाप्येवं वेगवान्वायुर्गरुडो वा मनस्तथा ।
यथा ऽयं वायुपुत्रस्तु क्रमते ऽम्बरमुत्तमम् ।। ७.३५.२६ ।।
‘वे सोच ने लगे—‘यह वायुका पुत्र जिस प्रकार ऊँचे आकाश में वेगपूर्वक उड़ रहा है, ऐसा वेग न तो वायु में है, न गरुड़ में है और न मन में ही है ॥ २६ ॥
यदि तावच्छिशोरस्य त्वीदृशो गतिविक्रमः ।
यौवनं बलमासाद्य कथं वेगो भविष्यति ।। ७.३५.२७ ।।
‘यदि बाल्यावस्था में ही इस शिशुका ऐसा वेग और पराक्रम है तो यौवनका बल पाकर इसका वेग कैसा होगा ' ॥२७॥
तमनुप्लवते वायुः प्लवन्तं पुत्रमात्मनः ।
सूर्यदाहभयाद्रक्षंस्तुषारचयशीतलः ।। ७.३५.२८ ।।
अपने पुत्र को सूर्य की ओर जाते देख उसे दाह के भय से बचा ने के लिये उस समय वायुदेव भी बर्फ के ढेर की भाँति शीतल होकर उस के पीछे-पीछे चल ने लगे॥२८ ।। '
बहुयोजनसाहस्रं क्रमत्येष गतोम्बरम् ।
पितुर्बलाच्च बाल्याच्च भास्कराभ्याशमागतः ।। ७.३५.२९ ।।
इस प्रकार बालक हनुमान अपने और पिता के बल से कई सहस्र योजन आकाश को लाँघते चले गये और सूर्यदेव के समीप पहुँच गये॥ २९ ॥
शिशुरेष त्वदोषज्ञ इति मत्वा दिवाकरः ।
कार्यं चात्र समायत्तमित्येवं न ददाह सः ।। ७.३५.३० ।।
‘सूर्यदेव ने यह सोचकर कि अभी यह बालक है, इसे गुण-दोषका ज्ञान नहीं है और इसके अधीन देवताओंका भी बहुत-सा भावी कार्य है— इन्हें जलाया नहीं ॥ ३० ॥
यमेव दिवसं ह्येष ग्रहीतुं भास्करं प्लुतः ।
तमेव दिवसं राहुर्जिघृक्षति दिवाकरम् ।। ७.३५.३१ ।।
‘जिस दिन हनुमानजी सूर्यदेव को पकड़ने के लिये उछले थे, उसी दिन राहु सूर्यदेव पर ग्रहण लगाना चाहता था ।।३१ ॥
अनेन स परामृष्टो राम सूर्यरथोपरि ।
अपक्रान्तस्ततस्त्रस्तो राहुश्चन्द्रार्कमर्दनः ।। ७.३५.३२ ।।
'हनुमानजी ने सूर्य के रथ के ऊपरी भाग में जब राहुका स्पर्श किया, तब चन्द्रमा और सूर्यका मर्दन करनेवाला राहु भयभीत हो वहाँ से भाग खड़ा हुआ ॥ ३२ ॥
स इन्द्रभवनं गत्वा सरोषः सिंहिकासुतः ।
अब्रवीद्भ्रुकुटिं कृत्वा देवं देवगणैर्वृतम् ।। ७.३५.३३ ।।
‘सिंहिकाका वह पुत्र रोष से भरकर इन्द्र के भवन में गया और देवताओं से घिरे हुए इन्द्र के साम ने भौंहें टेढ़ी करके बोला—॥ ३३ ॥
बुभुक्षापनयं दत्त्वा चन्द्रार्कौ मम वासव ।
किमिदं तत्त्वया दत्तमन्यस्य बलवृत्रहन् ।। ७.३५.३४ ।।
'बल और वृत्रासुरका वध करनेवाले वासव! आपने चन्द्रमा और सूर्य को मुझे अपनी भूख दूर करने के साधन के रूप में दिया था; किंतु अब आपने उन्हें दूसरे के हवाले कर दिया है। ऐसा क्यों हुआ ? ॥ ३४ ॥
अद्याहं पर्वकाले तु जिघृक्षुः सूर्यमागतः ।
अथान्यो राहुरासाद्य जग्राह सहसा रविम् ।। ७.३५.३५ ।।
‘आज पर्व (अमावास्या)- के समय मैं सूर्यदेव को ग्रस्त करने की इच्छा से गया था। इतने ही में दूसरे राहु ने आकर सहसा सूर्य को पकड़ लिया' ॥ ३५ ॥
स राहोर्वचनं श्रुत्वा वासवः सम्भ्रमान्वितः ।
उत्पपातासनं हित्वा चोद्वहन्काञ्चनीं स्रजम् ।। ७.३५.३६ ।।
'राहु की यह बात सुनकर देवराज इन्द्र घबरा गये और सो ने की माला पह ने अपना सिंहासन छोड़कर उठ खड़े हुए ॥ ३६ ॥
ततः कैलासकूटाभं चतुर्दन्तं मदस्रवम् ।
शृङ्गारधारिणं प्रांशुं स्वर्णघण्टाट्टहासिनम् ।। ७.३५.३७ ।।
इन्द्रः करीन्द्रमारुह्य राहुं कृत्वा पुरःसरम् ।
प्रायाद्यत्राभवत्सूर्यः सहानेन हनूमता ।। ७.३५.३८ ।।
‘फिर कैलास-शिखर के समान उज्ज्वल, चार दाँतों से विभूषित, मद की धारा बहानेवाले, भाँति-भाँति के श्रृङ्गार से युक्त, बहुत ही ऊँचे और सुवर्णमयी घण्टा के नादरूप अट्टहास करनेवाले गजराज ऐरावत पर आरूढ़ होदेवराज इन्द्र राहु को आगे करके उस स्थान पर गये, जहाँ हनुमानजी के साथ सूर्यदेव विराजमान थे॥ ३७-३८ ॥
अथातिरभसेनागाद्राहुरुत्सृज्य वासवम् ।
अनेन च स वै दृष्टः प्रधावञ्छैलकूटवत् ।। ७.३५.३९ ।।
‘इधर राहु इन्द्र को छोड़कर बड़े वेग से आगे बढ़ गया। इसी समय पर्वत-शिखर के समान आकारवाले दौड़ते हुए राहु को हनुमानजी ने देखा ॥ ३९ ॥
ततः सूर्यं समुत्सृज्य राहुं फलमवेक्ष्य च ।
उत्पपात पुनर्व्योम ग्रहीतुं सिंहिकासुतम् ।। ७.३५.४० ।।
'तब राहु को ही फल के रूप में देखकर बालक हनुमान सूर्यदेव को छोड़ उस सिंहिकापुत्र को ही पकड़ने के लिये पुनः आकाश में उछले ॥ ४० ॥
उत्सृज्यार्कमिमं राम प्रधावन्तं प्लवङ्गमम् ।
अवेक्ष्यैवं परावृत्त्य मुखशेषः पराङ्मुखः ।। ७.३५.४१ ।।
‘श्रीराम ! सूर्य को छोड़कर अपनी और धावा करनेवाले इन वानर हनुमान को देखते ही राहु जिसका मुखमात्र ही शेष था, पीछे की ओर मुड़कर भागा ॥ ४१ ॥
इन्द्रमाशंसमानस्तु त्रातारं सिंहिकासुतः ।
इन्द्र इन्द्रेति संत्रासान्मुहुर्महुरभाषत ।। ७.३५.४२ ।।
'उस समय सिंहिकापुत्र राहु अपने रक्षक इन्द्र से ही अपनी रक्षा के लिये कहता हुआ भय के मारे बारम्बार 'इन्द्र ! इन्द्र ! ' की पुकार मचा ने लगा ॥ ४२ ॥
राहोर्विक्रोशमानस्य प्रागेवालक्षितं स्वरम् ।
श्रुत्वेन्द्रोवाच मा भैषीरहमेनं निषूदये ।। ७.३५.४३ ।।
‘चीखते हुए राहु के स्वर को जो पहलेका पहचाना हुआ था, सुनकर इन्द्र बोले – 'डरो मत। मैं इस आक्रमणकारी को मार डालूँगा' ॥ ४३ ॥
ऐरावतं ततो दृष्ट्वा महत्तदिदमित्यपि ।
फलं मत्वा हस्तिराजमभिदुद्राव मारुतिः ।। ७.३५.४४ ।।
‘तत्पश्चात् ऐरावत को देखकर इन्होंने उसे भी एक विशाल फल समझा और उस गजराज को पकड़ने के लिये ये उस की ओर दौड़े ॥ ४४ ॥
तथास्य धावतो रूपमैरावतजिघृक्षया ।
मुहूर्तमभवद्घोरमिन्द्राग्न्योरिव भास्वरम् ।। ७.३५.४५ ।।
‘ऐरावत को पकड़ने की इच्छा से दौड़ते हुए हनुमान्जीका रूप दो घड़ी के लिये इन्द्र और अग्नि के समान प्रकाशमान एवं भयंकर हो गया ॥ ४५ ॥
एवमाधावमानं तु नातिक्रुद्धः शचीपतिः ।
हस्तान्तादतिमुक्तेन कुलिशेनाभ्यताडयत् ।। ७.३५.४६ ।।
‘बालक हनुमान को देखकर शचीपति इन्द्र को अधिक क्रोध नहीं हुआ। फिर भी इस प्रकार धावा करते हुए इन्द्र बालक वानर पर उन्होंने अपने हाथ से छूटे हुए वज्र के द्वारा प्रहार किया ॥ ४६ ॥
ततो गिरौ पपातैष इन्द्रवज्राभिताडितः ।
पतमानस्य चैतस्य वामो हनुरभज्यत ।। ७.३५.४७ ।।
'इन्द्र के वज्र की चोट खाकर ये एक पहाड़ पर गिरे। वहाँ गिरते समय इनकी बायीं ठुड्डी टूट गयी ॥ ४७ ॥
तस्मिंस्तु पतिते बाले वज्रताडनविह्वले ।
चुक्रोधेन्द्राय पवनः प्रजानामहिताय सः ।। ७.३५.४८ ।।
'वज्र के आघात से व्याकुल होकर इनके गिरते ही वायुदेव इन्द्र पर कुपित हो उठे। उनका यह क्रोध प्रजाजनों के लिये अहितकारक हुआ ॥ ४८ ॥
प्रचारं स तु सङ्गृह्य प्रजास्वन्तर्गतः प्रभुः ।
गुहां प्रविष्टः स्वसुतं शिशुमादाय मारुतः ।। ७.३५.४९ ।।
'सामर्थ्यशाली मारुत ने समस्त प्रजा के भीतर रहकर भी वहाँ अपनी गति समेट ली - श्वास आदि के रूप में संचार रोक दिया और अपने शिशुपुत्र हनुमान को लेकर वे पर्वत की गुफा में घुस गये ॥ ४९ ॥
विण्मूत्राशयमावृत्य प्रजानां परमार्तिकृत् ।
रुरोध सर्वभूतानि यथा वर्षाणि वासवः ।। ७.३५.५० ।।
‘जैसे इन्द्र वर्षा रोक देते हैं, उसी प्रकार वे वायुदेव प्रजाजनों के मलाशय और मूत्राशय को रोककर उन्हें बड़ी पीड़ा देने लगे। उन्होंने सम्पूर्ण भूतों के प्राण-संचारका अवरोध कर दिया ॥ ५० ॥
वायुप्रकोपाद्भूतानि निरुच्छ्वासानि सर्वतः ।
सन्धिभिर्भिद्यमानैश्च काष्ठभूतानि जज्ञिरे ।। ७.३५.५१ ।।
'वायु के प्रकोप से समस्त प्राणियों की साँस बंद होने लगी। उनके सभी अङ्गों के जोड़ टूट ने लगे और वे सब- के-सब काठ के समान चेष्टाशून्य हो गये ॥ ५१ ॥
निःस्वाध्यायवषट्कारं निष्क्रियं धर्मवर्जितम् ।
वायुप्रकोपात् त्रैलोक्यं निरयस्थमिवाभवत् ।। ७.३५.५२ ।।
‘तीनों लोकों में न कहीं वेदोंका स्वाध्याय होता था और न यज्ञ। सारे धर्म-कर्म बन्द हो गये। त्रिभुवन के प्राणी ऐसे कष्ट पा ने लगे, मानो नरक में गिर गये हों ॥ ५२ ॥
ततः प्रजाः सगन्धर्वाः सदेवासुरमानुषाः ।
प्रजापतिं समाधावन्दुःखिताश्च सुखेच्छया ।। ७.३५.५३ ।।
‘तब गन्धर्व, देवता, असुर और मनुष्य आदि सभी प्रजा व्यथित हो सुख पा ने की इच्छा से प्रजापति ब्रह्माजी के पास दौड़ी गयी ॥ ५३ ॥
ऊचुः प्राञ्जलयो देवा महोदरनिभोदराः ।
त्वया नु भगवन्सृष्टाः प्रजानाथ चतुर्विधाः ।। ७.३५.५४ ।।
त्वया दत्तो ऽयमस्माकमायुषः पवनः पतिः ।
सो ऽस्मान्प्राणेश्वरो भूत्वा कस्मादेषो ऽद्य सत्तम ।। ७.३५.५५ ।।
रुरोध दुःखं जनयन्नन्तःपुर इव स्त्रियः ।
‘उस समय देवताओं के पेट इस तरह फूल गये थे, मानो उन्हें महोदरका रोग हो गया हो। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा——‘भगवन्! स्वामिन्! आपने चार प्रकार की प्रजाओं की सृष्टि की है। आपने हम सबको हमारी आयु के अधिपति के रूप में वायुदेव को अर्पित किया है। साधुशिरोमणे ! ये पवनदेव हमारे प्राणों के ईश्वर हैं तो भी क्या कारण है कि आज इन्होंने अन्तःपुर में स्त्रियों की भाँति हमारे शरीर के भीतर अपने संचार को रोक दिया है और इस प्रकार ये हमारे लिये दुःखजनक हो गये हैं॥ ५४-५५१⁄२ ॥
तस्मात्त्वां शरणं प्राप्ता वायुनोहता वयम् ।। ७.३५.५६ ।।
एतत्प्रजानां श्रुत्वा तु प्रजानाथः प्रजापतिः ।
‘वायु से पीड़ित होकर आज हमलोग आप की शरण में आये हैं । दु:खहारी प्रजापते! आप हमारे इस वायुरोधजनित दुःख को दूर कीजिये ॥ ५६१⁄२ ॥
कारणादिति चोक्त्वासौ प्रजाः पुनरभाषत ।। ७.३५.५७ ।।
‘प्रजाजनों की यह बात सुनकर उनके पालक और रक्षक ब्रह्माजी ने कहा - ' इसमें कुछ कारण है' ऐसा कहकर वे प्रजाजनों से फिर बोले— ॥ ५७१⁄२ ॥
यस्मिंश्च कारणे वायुश्चुक्रोध च रुरोध च ।
प्रजाः शृणुध्वं तत्सर्वं श्रोतव्यं चात्मनः क्षमम् ।। ७.३५.५८ ।।
‘प्रजाओ! जिस कारण को लेकर वायुदेवता ने क्रोध और अपनी गतिका अवरोध किया है, उसे बताता हूँ, सुनो। वह कारण तुम्हारे सुन ने योग्य और उचित है ॥५८ ।।
पुत्रस्तस्यामरेशेन इन्द्रेणाद्य निपातितः ।
राहोर्वचनमास्थाय ततः स कुपितो ऽनिलः ।। ७.३५.५९ ।।
‘आज देवराज इन्द्र ने राहु की बात सुनकर वायु के पुत्र को मार गिराया है, इसीलिये वे कुपित हो उठे हैं |
अशरीरः शरीरेषु वायुश्चरति पालयन् ।
शरीरं हि विना वायुं समतां याति दारुभिः ।। ७.३५.६० ।।
'वायुदेव स्वयं शरीर धारण न करके समस्त शरीरों में उनकी रक्षा करते हुए विचरते हैं। वायु के बिना यह शरीर सूखे काठ के समान हो जाता है॥ ६०॥
वायुः प्राणः सुखं वायुर्वायुः सर्वमिदं जगत ।
वायुना सम्परित्यक्तं न सुखं विन्दते जगत ।। ७.३५.६१ ।।
अद्यैव च परित्यक्तं वायुना जगदायुषा ।
‘वायु ही सबका प्राण है। वायु ही सुख है और वायु ही यह सम्पूर्ण जगत है। वायु से परित्यक्त होकर जगत कभी सुख नहीं पा सकता ॥ ६११⁄२ ॥
अद्यैव ते निरुच्छ्वासाः काष्ठकुड्योपमाः स्थिताः ।। ७.३५.६२ ।।
'वायु ही जगत की आयु है। इस समय वायु ने संसार के प्राणियों को त्याग दिया है, इसलिये वे सब- के-सब निष्प्राण होकर काठ और दीवार के समान हो गये हैं॥ ६२१⁄२ ॥
तद्यामस्तत्र यत्रास्ते मारुतो रुक्प्रदो हि नः ।
मा विनाशं गमिष्याम अप्रसाद्यादितेः सुताः ।। ७.३५.६३ ।।
‘अदिति-पुत्रो! अतः अब हमें उस स्थान पर चलना चाहिये, जहाँ हम सबको पीड़ा देनेवाले वायुदेव छिपे बैठे हैं। कहीं ऐसा न हो कि उन्हें प्रसन्न किये बिना हम सबका विनाश हो जाय’॥ ६३ ॥
ततः प्रजाभिः सहितः प्रजापतिः सदेवगन्धर्वभुजङ्गगुह्यकैः ।
जगाम तत्रास्यति यत्र मारुतः सुतं सुरेन्द्राभिहतं प्रगृह्य सः ।। ७.३५.६४ ।।
‘तदनन्तर देवता, गन्धर्व, नाग और गुह्यक आदि प्रजाओं को साथ ले प्रजापति ब्रह्माजी उस स्थान पर गये, जहाँ वायुदेव इन्द्र द्वारा मारे गये अपने पुत्र को लेकर बैठे हुए थे ॥ ६४ ॥
ततो ऽर्कवैश्वानरकाञ्चनप्रभं सुतं तदोत्सङ्गगतं सदागतेः ।
चतुर्मुखो वीक्ष्य कृपामथाकरोत्सदेवगन्धर्वर्षियक्षराक्षसैः ।। ७.३५.६५ ।।
‘तत्पश्चात् चतुर्मुख ब्रह्माजी ने देवताओं, गन्धर्वों, ऋषियों तथा यक्षों के साथ वहाँ पहुँचकर वायुदेवता की गोद में सोयेहुए उनके पुत्र को देखा, जिस की अङ्गकान्ति सूर्य, अग्नि और सुवर्ण के समान प्रकाशित हो रही थी । उस की वैसी दशा देखकर ब्रह्माजी को उस पर बड़ी दया आयी' ॥ ६५ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमदुत्तरकाण्डे पंचत्रिंशः सर्गः ।। ३५ ।।
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्ड में पैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३५ ॥
सर्ग-36
ततः पितामहं दृष्ट्वा वायुः पुत्रवधार्दितः ।
शिशुकं तं समादाय उत्तस्थौ धातुरग्रतः ।। ७.३६.१ ।।
'पुत्र के मारे जाने से वायुदेवता बहुत दुःखी थे । ब्रह्माजी को देखकर वे उस शिशु को लिये हुए ही उनके आगे खड़े हो गये॥ १ ॥
चलकुण्डलमौलिस्रक्तपनीयविभूषणः ।
पादयोर्न्यपतद्वायुस्तिस्रोपस्थाय वेधसे ।। ७.३६.२ ।।
'उनके कानों में कुण्डल हिल रहे थे, माथे पर मुकुट और कण्ठ में हार शोभा दे रहे थे और वे सो ने के आभूषणों से विभूषित थे। वायुदेवता तीन बार उपस्थान करके ब्रह्माजी के चरणों में गिर पड़े ॥ २ ॥
तं तु वेदविदा तेन लम्बाभरणशोभिना ।
वायुमुत्थाप्य हस्तेन शिशुं तं परिमृष्टवान् ।। ७.३६.३ ।।
‘वेदवेत्ता ब्रह्माजी ने अपने लम्बे, फैले हुए और आभरणभूषित हाथ से वायुदेवता को उठाकर खड़ा किया तथा उनके उस शिशु पर भी हाथ फेरा ॥ ३ ॥
स्पृष्टमात्रस्ततः सो ऽथ सलीलं पद्मयोनिना ।
जलसिक्तं यथा सस्यं पुनर्जीवितमाप्तवान् ।। ७.३६.४ ।।
'जैसे पानी से सींच देने पर सूखती हुई खेती हरी हो जाती है, उसी प्रकार कमलयोनि ब्रह्माजी के हाथका लीलापूर्वक स्पर्श पाते ही शिशु हनुमान पुनः जीवित हो गये॥ ४ ॥
प्राणवन्तमिमं दृष्ट्वा प्राणो गन्धवहो मुदा ।
चचार सर्वभूतेषु सन्निरुद्धं यथा पुरा ।। ७.३६.५ ।।
‘हनुमान को जीवित हुआ देख जगत प्राण-स्वरूप गन्धवाहन वायुदेव समस्त प्राणियों के भीतर अवरुद्ध हुए प्राण आदिका पूर्ववत् प्रसन्नतापूर्वक संचार करने लगे ॥ ५ ॥
मरुद्रोधाद्विनिर्मुक्तास्ताः प्रजा मुदिता ऽभवन् ।
शीतदाहविनिर्मुक्ताः पद्मिन्य इव साम्बुजाः ।। ७.३६.६ ।।
वायु के अवरोध से छूटकर सारी प्रजा प्रसन्न हो गयी। ठीक उसी तरह, जैसे हिमयुक्त वायु के आघात से मुक्त होकर खिले हुए कमलों से युक्त पुष्करिणियाँ सुशोभित होने लगती हैं॥ ६ ॥
ततस्त्रियुग्मस्त्रिककुत्त्रिधामा त्रिदशार्चितः ।
उवाच देवता ब्रह्मा मारुतप्रियकाम्यया ।। ७.३६.७ ।।
तदनन्तर तीन युग्मों से १ सम्पन्न, प्रधानत: तीन मूर्ति २ धारण करनेवाले, त्रिलोकरूपी गृहमें रहनेवाले तथा तीन दशाओं से ३ युक्त देवताओं द्वारा पूजित ब्रह्माजी वायुदेवताका प्रिय करने की इच्छा से देवगणों से बोले—॥ ७॥
भो महेन्द्रेशवरुणप्रजेश्वरधनेश्वराः ।
जानतामपि वः सर्वं वक्ष्यामि श्रूयतां हितम् ।। ७.३६.८ ।।
'इन्द्र, अग्नि, वरुण, महादेव और कुबेर आदि देवताओ! यद्यपि आप सब लोग जानते हैं तथापि मैं आपलोगों के हित की सारी बातें बताऊँगा, सुनिये ॥ ८ ॥
अनेन शिशुना कार्यं कर्तव्यं वो भविष्यति ।
तद्वदध्वं वरान्सर्वे मारुतस्यास्य तुष्टये ।। ७.३६.९ ।।
‘इस बालक के द्वारा भविष्य में आपलोगों के बहुत से कार्य सिद्ध होंगे, अतः वायुदेवता की प्रसन्नता के लिये आप सब लोग इसे वर दें ॥ ९ ॥
ततः सहस्रनयनः प्रीतियुक्तः शुभाननः ।
कुशेशयमयीं मालामुत्क्षिप्येदं वचो ऽब्रवीत् ।। ७.३६.१० ।।
तब सुन्दर मुखवाले सहस्र नेत्रधारी इन्द्र ने शिशु हनुमान के गले में बड़ी प्रसन्नता के साथ कमलों की माला पहना दी और यह बात कही ॥ १० ॥
मत्करोत्सृष्टवज्रेण हनुरस्य यथा हतः ।
नाम्ना वै कपिशार्दूलो भविता हनुमानिति ।। ७.३६.११ ।।
‘मेरे हाथ से छूटे हुए वज्र के द्वारा इस बालक की हनु (ठुड्डी) टूट गयी थी; इसलिये इस कपिश्रेष्ठका नाम ‘हनुमान ’ होगा ॥ ११ ॥
अहमस्य प्रदास्यामि परमं वरमद्भुतम् ।
इतः प्रभृति वज्रस्य ममावध्यो भविष्यति ।। ७.३६.१२ ।।
‘इसके सिवा मैं इसे दूसरा अद्भुत वर यह देता हूँ कि आज से यह मेरे वज्र के द्वारा भी नहीं मारा जा सकेगा ' ॥१२ ॥
मार्तण्डस्त्वब्रवीत्तत्र भगवांस्तिमिरापहः ।
तेजसो ऽस्य मदीयस्य ददामि शतिकां कलाम् ।। ७.३६.१३ ।।
इसके बाद वहाँ अन्धकारनाशक भगवान् सूर्य ने कहा- 'मैं इसे अपने तेजका सौवाँ भाग देता हूँ ॥ १३ ॥
१. तीन युग्मोंका तात्पर्य यहाँ छ: प्रकार के ऐश्वर्य से है। ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य — ये ही छ: प्रकार के ऐश्वर्य हैं।
२. ब्रह्मा, विष्णु और शिव – ये ही तीन मूर्तियाँ हैं ।
३. बाल्य, पौगण्ड तथा कैशोर—ये हीदेवताओं की तीन अवस्थाएँ हैं।
यदा तु शास्त्राण्यध्येतुं शक्तिरस्य भविष्यति ।
तदास्य शास्त्रं दास्यामि येन वाग्ग्मी भविष्यति ।। ७.३६.१४ ।।
नचास्य भविता कश्चित्सदृशः शास्त्रदर्शने ।
'इसके सिवा जब इसमें शास्त्राध्ययन करने की शक्ति आ जायगी, तब मैं ही इसे शास्त्रोंका ज्ञान प्रदान करूँगा, जिस से यह अच्छा वक्ता होगा। शास्त्रज्ञान में कोई भी इसकी समानता करनेवाला न होगा' ॥ १४ ॥
वरुणश्च वरं प्रादान्नास्य मृत्युर्भविष्यति ।
वर्षायुतशतेनापि मत्पाशादुदकादपि ।। ७.३६.१५ ।।
तत्पश्चात् वरुण ने वर देते हुए कहा - 'दस लाख वर्षों की आयु हो जाने पर भी मेरे पाश और जल से इस बालक की मृत्यु नहीं होगी ' ॥ १५ ॥
यमो दण्डादवध्यत्वमरोगत्वं च नित्यशः ।
वरं ददामि सन्तुष्ट अविषादं च संयुगे ।। ७.३६.१६ ।।
गदेयं मामिका नैनं संयुगेषु वधिष्यति ।
इत्येवं वरदः प्राह तदा ह्येकाक्षिपिङ्गलः ।। ७.३६.१७ ।।
फिर यम ने वर दिया - "यह मेरे दण्ड से अवध्य और नीरोग होगा । ' तदनन्तर पिंगलवर्ण की एक आँखवाले कुबेर ने कहा- 'मैं संतुष्ट होकर यह वर देता हूँ कि युद्ध में कभी इसे विषाद न होगा तथा मेरी यह गदा संग्राम में इसका वध न कर सकेगी' ॥ १६-१७ ॥
मत्तो मदायुधानां च न वध्यो ऽयं भविष्यति ।
इत्येवं शङ्करेणापि दत्तो ऽस्य परमो वरः ।। ७.३६.१८ ।।
इसके बाद भगवान् शङ्कर ने यह उत्तम वर दिया कि 'यह मेरे और मेरे आयुधों के द्वारा भी अवध्य होगा' ॥ १८ ।।
सर्वेषां ब्रह्मदण्डानामवध्यो ऽयं भविष्यति ।
दीर्घायुश्च महात्मा च इति ब्रह्माब्रवीद्वचः ।। ७.३६.१९ ।।
अन्त में ब्रह्माजी ने उस बालक को लक्ष्य करके कहा – “यह दीर्घायु, महात्मा तथा सब प्रकार के ब्रह्मदण्डों से अवध्य होगा' ॥ १९ ॥
विश्वकर्मा च दृष्ट्वैनं बालसूर्योपमं शिशुम् ।
शिल्पिनां प्रवरः प्रादाद्वरमस्य महामतिः ।। ७.३६.२० ।।
शिल्पियों में श्रेष्ठ परम बुद्धिमान् विश्वकर्मा ने बालसूर्य के समान अरुण कान्तिवाले उस शिशु को देखकर उसे इस प्रकार वर दिया — ॥ २० ॥
मत्कृतानि च शस्त्राणि यानि दिव्यानि संयुगे ।
तैरवध्यत्वमापन्नश्चिरजीवी भविष्यति ।। ७.३६.२१ ।।
'मेरे बनाये हुए जित ने दिव्य अस्त्र-शस्त्र हैं, उनसे अवध्य होकर यह बालक चिरञ्जीवी होगा' ॥ २१ ॥
ततः सुराणां तु वरैर्दृष्ट्वा ह्येनमलङ्कृतम् ।
चतुर्मुखस्तुष्टमना वायुमाह जगद्गुरुः ।। ७.३६.२२ ।।
तत्पश्चात् हनुमानजी को इस प्रकार देवताओं के वरों से अलंकृत देख चार मुखोंवाले जगद्गुरु ब्रह्माजी का मन प्रसन्न हो गया और वे वायुदेव से बोले – ॥ २२ ॥
अमित्राणां भयकरो मित्राणामभयङ्करः ।
अजेयो भविता पुत्रस्तव मारुत मारुतिः ।। ७.३६.२३ ।।
‘मारुत! तुम्हारा यह पुत्र मारुति शत्रुओं के लिये भयंकर और मित्रों के लिये अभयदाता होगा। युद्ध में कोई भी इसे जीत न सकेगा ॥ २३॥
कामरूपः कामचारी कामगः प्लवतां वरः ।
भवत्यव्याहतगतिः कीर्तिमांश्च भविष्यति ।। ७.३६.२४ ।।
‘यह इच्छानुसार रूप धारण कर सकेगा, जहाँ चाहेगा जा सकेगा। इसकी गति इसकी इच्छा अनुसार तीव्र या मन्द होगी तथा वह कहीं भी रुक नहीं सकेगी। यह कपिश्रेष्ठ बड़ा यशस्वी होगा ॥ २४ ॥
रावणोत्सादनार्थानि रामप्रियकरणि च ।
रोमहर्षकराण्येष कर्ता कर्माणि संयुगे ।। ७.३६.२५ ।।
‘यह युद्धस्थल में रावण का संहार और भगवान् श्रीरामचन्द्रजी की प्रसन्नताका सम्पादन करनेवाले अनेक अद्भुत एवं रोमाञ्चकारी कर्म करेगा' ॥ २५ ॥
एवमुक्त्वा तमामन्त्र्य मारुतं त्वमरैः सह ।
यथागतं ययुः सर्वे पितामहपुरोगमाः ।। ७.३६.२६ ।।
इस प्रकार हनुमानजी को वर देकर वायुदेवता की अनुमति ले ब्रह्मा आदि सब देवता जैसे आये थे, उसी तरह अपने-अपने स्थान को चले गये॥ २६ ॥
सो ऽपि गन्धवहः पुत्रं प्रगृह्य गृहमानयत् ।
अञ्जनायास्तमाचख्यौ वरदत्तं विनिर्गतः ।। ७.३६.२७ ।।
गन्धवाहन वायु भी पुत्र को लेकर अञ्जना के घर आये और उसे देवताओं के दिये हुए वरदान की बात बताकर चले गये ॥ २७ ॥
प्राप्य राम वरानेष वरदानसमन्वितः ।
बलेनात्मनि संस्थेन सो ऽपूर्यत यथा ऽर्णवः ।। ७.३६.२८ ।।
श्रीराम! इस प्रकार ये हनुमानजी बहुत- से वर पाकर वरदानजनित शक्ति से सम्पन्न हो गये और अपने भीतर विद्यमान अनुपम वेग से पूर्ण हो भरे हुए महासागर के समान शोभा पा ने लगे ॥ २८ ॥
तरसा पूर्यमाणो ऽपि तदा वानरपुङ्गवः ।
आश्रमेषु महर्षीणामपराध्यति निर्भयः ।। ७.३६.२९ ।।
उन दिनों वेग से भरे हुए ये वानरशिरोमणि हनुमान निर्भय हो महर्षियों के आश्रमों में जा-जाकर उपद्रव किया करते थे॥ २९ ॥
स्रुग्भाण्डान्यग्निहोत्रं च वल्कलाजिनसञ्चयान् ।
भग्नविच्छिन्नविध्वस्तान्संशान्तानां करोत्ययम् ।। ७.३६.३० ।।
ये शान्तचित्त महात्माओं के यज्ञोपयोगी पात्र फोड़ डालते, अग्निहोत्र के साधनभूत स्रुक्, स्रुवा आदि को तोड़ डालते और ढेर- के-ढेर रखे गये वल्कलों को चीर-फाड़ देते थे ॥ ३० ॥
एवंविधानि कर्माणि प्रावर्तत महाबलः ।
सर्वेषां ब्रह्मदण्डानामवध्यः शम्भुना कृतः ।। ७.३६.३१ ।।
'महाबली पवनकुमार इस तरह के उपद्रवपूर्ण कार्य करने लगे । कल्याणकारी भगवान् ब्रह्मा ने इन्हें सब प्रकार के ब्रह्मदण्डों से अवध्य कर दिया है—यह बात सभी ऋषि जानते थे; अत: इनकी शक्ति से विवश हो वे इनके सारे अपराध चुपचाप सह लेते थे ॥ ३१ ॥
जानन्त ऋषयस्तं वै सहन्ते तस्य शक्तितः ।। ७.३६.३२ ।।
यद्यपि केसरी तथा वायुदेवता ने भी इन अञ्जनी कुमार को बारम्बार मना किया तो भी ये वानरवीर मर्यादाका उल्लङ्घन कर ही देते थे॥ ३२ ॥
यथा केसरिणा त्वेष वायुना सो ऽञ्जनासुतः ।
प्रतिषिद्धो ऽपि मर्यादां लङ्घयत्येव वानरः ।। ७.३६.३३ ।।
इस से भृगु और अङ्गिरा के वंश में उत्पन्न हुए महर्षि कुपित हो उठे । रघुश्रेष्ठ! उन्होंने अपने हृदय में अधिक खेद पा दुःख को स्थान न देकर इन्हें शाप देते हुए कहा ॥ ३३१⁄२ ॥
बाधसे यत्समाश्रित्य बलमस्मान्प्लवङ्गम ।
तद्दीर्घकालं वेत्तासि नास्माकं शापमोहितः ।
यदा ते स्मार्यते कीर्तिस्तदा ते वर्धते बलम् ।। ७.३६.३५ ।।
'वानरवीर ! तुम जिस बल का आश्रय लेकर हमें सता रहे हो, उसे हमारे शाप से मोहित होकर तुम दीर्घकालतक भूले रहोगे - तुम्हें अपने बल का पता ही नहीं चलेगा। जब कोई तुम्हें तुम्हारी कीर्तिका स्मरण दिला देगा, तभी तुम्हारा बल बढ़ेगा ॥ ३४-३५ ॥
ततस्स हृततेजौजा महर्षिवचनौजसा ।
एषोश्रमाणि तान्येव मृदुभावं गतो ऽचरत् ।। ७.३६.३६ ।।
इस प्रकार महर्षियों के इस वचन के प्रभाव से इनका तेज और ओज घट गया। फिर ये उन्हीं आश्रमों में मृदुल प्रकृति के होकर विचर ने लगे॥ ३६ ॥
अथर्क्षरजसो नाम वालिसुग्रीवयोः पिता ।
सर्ववानरराजा ऽ ऽसीत्तेजसा भास्करप्रभः ।। ७.३६.३७ ।।
वाली और सुग्रीव के पिताका नाम ऋक्षरजा था। वे सूर्य के समान तेजस्वी तथा समस्त वानरों के राजा थे॥ ३७ ॥
स तु राज्यं चिरं कृत्वा वानराणां हरीश्वरः ।
स च ऋक्षरजा नाम कालधर्मेण सङ्गतः ।। ७.३६.३८ ।।
वे वानरराज ऋक्षरजा चिरकालतक वानरों के राज्यका शासन करके अन्त में कालधर्म (मृत्यु) को प्राप्त हुए ॥ ३८ ॥
तस्मिन्नस्तमिते चाथ मन्त्रिभिर्मन्त्रकोविदैः ।
पित्र्ये पदे कृतो वाली सुग्रीवो वालिनः पदे ।। ७.३६.३९ ।।
उनका देहावसान हो जाने पर मन्त्रवेत्ता मन्त्रियों ने पिता के स्थान पर वाली को राजा और वाली के स्थान पर सुग्रीव को युवराज बनाया ॥ ३९ ॥
सुग्रीवेण समं त्वस्य अद्वैधं छिद्रवर्जितम् ।
आबाल्यं सख्यमभवदनिलस्याग्निना यथा ।। ७.३६.४० ।।
जैसे अग्नि के साथ वायु की स्वाभाविक मित्रता है,उसी प्रकार सुग्रीव के साथ वालीका बचपन से ही सख्यभाव था । उन दोनों में परस्पर किसी प्रकारका भेदभाव नहीं था। उन में अटूट प्रेम था ॥ ४० ॥
एष शापवशादेव न वेद बलमात्मनः ।
वालिसुग्रीवयोर्वैरं यदा राम समुत्थितम् ।। ७.३६.४१ ।।
न ह्येष राम सुग्रीवो भ्राम्यमाणो ऽपि वालिना ।। ७.३६.४२ ।।
श्रीराम! फिर जब वाली और सुग्रीव में वैर उठ खड़ा हुआ, उस समय ये हनुमानजी शापवश ही अपने बल को न जान सके। देव! वाली के भय से भटकते रह ने पर भी न तो इन सुग्रीव को इनके बल का स्मरण हुआ और ॥ ४१-४२ ॥
देव जानाति न ह्येष बलमात्मनि मारुतिः ।
ऋषिशापाहृतबलस्तदैष कपिसत्तमः ।। ७.३६.४३ ।।
सिंहः कुञ्जररुद्धो वा आस्थितः सहितो रणे ।। ७.३६.४४ ।।
न स्वयं ये पवनकुमार ही अपने बल का पता पा सके। सुग्रीव के ऊपर जब वह विपत्ति आयी थी, उन दिनों ऋषियों के शाप के कारण इन को अपने बल का ज्ञान भूल गया था, इसीलिये जैसे कोई सिंह हाथी के द्वारा अवरुद्ध होकर चुपचाप खड़ा रहे, उसी प्रकार ये वाली और सुग्रीव के युद्ध में चुपचाप खड़े-खड़े तमाशा देखते रहे, कुछ कर न सके॥ ४३-४४ ।। ॥
पराक्रमोत्साहमतिप्रतापसौशील्यमाधुर्यनयानयैश्च ।
गाम्भीर्यचातुर्यसुवीर्यधैर्यैर्हनूमतः को ऽभ्यधिको ऽस्ति लोके ।। ७.३६.४५ ।।
संसार में ऐसा कौन है जो पराक्रम, उत्साह, बुद्धि, प्रताप, सुशीलता, मधुरता, नीति- अनीति के विवेक, गम्भीरता, चतुरता, उत्तम बल और धैर्य में हनुमानजी से बढ़कर हो ॥ ४५ ॥
असौ पुनर्व्याकरणं ग्रहीष्यन्सूर्योन्मुखः प्रष्टुमना कपीन्द्रः ।
उद्यद्गिरेरस्तगिरिं जगाम ग्रन्थं महद्धारयनप्रमेयः ।। ७.३६.४६ ।।
ये असीम शक्तिशाली कपिश्रेष्ठ हनुमान व्याकरणका अध्ययन करने के लिये शङ्काएँ पूछ ने की इच्छा से सूर्य की ओर मुँह रखकर महान ग्रन्थ धारण किये उनके आगे-आगे उदयाचल से अस्ताचलतक जाते थे॥ ४६ ॥
ससूत्रवृत्त्यर्थपदं महार्थं ससङ्ग्रहं साद्ध्यति वै कपीन्द्रः ।
नह्यस्य कश्चित्सदृशो ऽस्ति शास्त्रे वैशारदे च्छन्दगतौ तथैव ।। ७.३६.४७ ।।
इन्होंने सूत्र, वृत्ति, वार्तिक, महाभाष्य और संग्रह — इन सबका अच्छी तरह अध्ययन किया है। अन्यान्य शास्त्रों के ज्ञान तथा छन्द: शास्त्र के अध्ययन में भी इनकी समानता करनेवाला दूसरा कोई विद्वान् नहीं है॥ ४७ ॥
सर्वासु विद्यासु तपोविधाने प्रस्पर्धते ऽयो हि गुरुं सुराणाम् ।
सो ऽयं नवव्याकरणार्थवेत्ता ब्रह्मा भविष्यत्यपि ते प्रसादात् ।। ७.३६.४८ ।।
सम्पूर्ण विद्याओं के ज्ञान तथा तपस्या के अनुष्ठान में ये देवगुरु बृहस्पति की बराबरी करते हैं। नव व्याकरणों के सिद्धान्तकौ जाननेवाले ये हनुमानजी आप की कृपा से साक्षात् ब्रह्मा के समान आदरणीय होंगे॥ ४८ ॥
प्रवीविवक्षोरिव सागरस्य लोकान्दिधक्षोरिव पावकस्य
युगक्षये ह्येव यथान्तकस्य हनूमतः स्थास्यति कः पुरस्तात् ।। ७.३६.४९ ।।
प्रलयकाल में भूतल को आप्लावित करने के लिये भूमि के भीतर प्रवेश करने की इच्छावाले महासागर, सम्पूर्ण लोकों को दग्ध कर डाल ने के लिये उद्यत हुए संवर्तक अग्नि तथा लोकसंहार के लिये उठे हुए काल के समान प्रभावशाली इन हनुमानजी के साम ने कौन ठहर सकेगा ॥ ४९ ॥
एषेव चान्ये च महाकपीन्द्राः सुग्रीवमैन्दद्विविदाः सनीलाः ।
सतारतारेयनलाः सरम्भास्त्वत्कारणाद्राम सुरैर्हि सृष्टाः ।। ७.३६.५० ।।
श्रीराम! वास्तव में ये तथा इन्हीं के समान दूसरे दूसरे जो सुग्रीव, मैन्द, द्विविद, नील, तार, तारेय (अङ्गद), नल तथा रम्भ आदि महाकपीश्वर हैं; इन सब की सृष्टि देवताओं ने आप की सहायता के लिये ही की है॥ ५० ॥
श्रीराम ! गज, गवाक्ष, गवय, सुदंष्ट्र, मैन्द, प्रभ, ज्योतिमुख और नल – इन सब वानरेश्वरों तथा रीछों की सृष्टि देवताओं ने आपके सहयोग के लिये ही की है ॥ ५० ॥
तदेत्कथितं सर्वं यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।
हनूमतो बालभावे कर्मैतत्कथितं मया ।। ७.३६.५१ ।।
रघुनन्दन! आपने मुझ से जो कुछ पूछा था, वह सब मैं ने कह सुनाया। हनुमानजी की बाल्यावस्था के इस चरित्रका भी वर्णन कर दिया ॥ ५१ ॥
श्रुत्वा ऽगस्त्यस्य कथितं रामः सौमित्रिरेव च ।
विस्मयं परमं जग्मुर्वानरा राक्षसैः सह ।। ७.३६.५२ ।।
अगस्त्यजीका यह कथन सुनकर श्रीराम और लक्ष्मण बड़े विस्मित हुए। वानरों और राक्षसों को भी बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ ५२ ॥
अगस्त्यस्त्वब्रवीद्रामं सर्वमेतछ्रुतं त्वया ।
दृष्टः सम्भाषितश्चासि राम गच्छामहे वयम् ।। ७.३६.५३ ।।
तत्पश्चात् अगस्त्यजी ने श्रीरामचन्द्रजी से कहा – 'योगियों के हृदय में रमण करनेवाले श्रीराम ! आप यह सारा प्रसङ्ग सुन चुके। हमलोगों ने आपका दर्शन और आपके साथ वार्तालाप कर लिया। इसलिये अब हम जा रहे हैं ॥ ५३ ॥
श्रुत्वैतद्राघवो वाक्यमगस्त्यस्योग्रतेजसः ।
प्राञ्जलिः प्रणतश्चापि महर्षिमिदमब्रवीत् ।। ७.३६.५४ ।।
उग्र तेजस्वी अगस्त्यजी की यह बात सुनकर श्रीरघुनाथजी ने हाथ जोड़ विनयपूर्वक उन महर्षि से इस प्रकार कहा—॥ ५४ ॥
अद्य मे देवता हृष्टाः पितरः प्रपितामहाः ।
युष्माकं दर्शनादेव नित्यं तुष्टाः सबान्धवाः ।। ७.३६.५५ ।।
'मुनीश्वर ! आज मुझ पर देवता, पितर और पितामह आदि विशेषरूप से संतुष्ट हैं। बन्धु बान्धवोंसहित हमलोगों को तो आप-जैसे महात्माओं के दर्शन से ही सदा संतोष है ॥ ५५ ॥
विज्ञाप्यं तु ममैतद्धि यद्वदाम्यागतस्पृहः ।
तद्भवद्भिर्मम कृते कर्तव्यमनुकम्पया ।। ७.३६.५६ ।।
'मेरे मन में एक इच्छाका उदय हुआ है, अतः मैं यह सूचित करनेयोग्य बात आप की सेवा में निवेदन कर रहा हूँ। मुझ पर अनुग्रह करके आपलोगों को मेरे उस अभीष्ट कार्य को पूरा करना होगा ॥ ५६ ॥
पौरजानपदान्स्थाप्य स्वकार्येष्वहमागतः ।
क्रतूनेव करिष्यामि प्रभावाद्भवतां सताम् ।। ७.३६.५७ ।।
'मेरी इच्छा है कि पुरवासी और देशवासियों को अपने-अपने कार्यों में लगाकर मैं आप सत्पुरुषों के प्रभाव से यज्ञोंका अनुष्ठान करूँ ॥ ५७ ॥
५९॥
सदस्या मम यज्ञेषु भवन्तो नित्यमेव तत् ।
भविष्यथ महावीर्या ममानुग्रहकाङ्क्षिणः ।। ७.३६.५८ ।।
'मेरे उन यज्ञों में आप महान शक्तिशाली महात्मा मुझ पर अनुग्रह करने के लिये नित्य सदस्य ब ने रहें ॥ ५८ ॥
अहं युष्मान्समाश्रित्य तपोनिर्धूतकल्मषान् ।
अनुग्रहीतः पितृभिर्भविष्यामि सुनिर्वृतः ।। ७.३६.५९ ।।
‘आप तपस्या से निष्पाप हो चुके हैं। मैं आपलोगोंका आश्रय लेकर सदा संतुष्ट एवं पितरों से अनुगृहीत होऊँगा ।
तदागन्तव्यमनिशं भवद्भिरिह सङ्गतैः ।
अगस्त्याद्यास्तु तच्छ्रुत्वा ऋषयः संशितव्रताः ।। ७.३६.६० ।।
एवमस्त्विति तं चोक्त्वा प्रयातुमुपचक्रमुः ।। ७.३६.६१ ।।
‘यज्ञ-आरम्भ के समय सब लोग एकत्र होकर निरन्तर यहाँ आते रहें।' श्रीरामचन्द्रजीका यह वचन सुनकर कठोर व्रतका पालन करनेवाले अगस्त्य आदि महर्षि उनसे 'एवमस्तु ( ऐसा ही होगा)' कहकर वहाँ से जाने को उद्यत हुए ||६०१⁄२-६१ ॥
एवमुक्त्वा गताः सर्वे ऋषयस्ते यथागतम् ।
राघवश्च तमेवार्थं चिन्तयामास विस्मितः ।। ७.३६.६२ ।।
इस प्रकार बातचीत करके सब ऋषि जैसे आये थे, वै से चले गये। इधर श्रीरामचन्द्रजी विस्मित होकर उन्हीं बातों पर विचार करते रहे ॥ ६२ ॥
ततो ऽस्तं भास्करे याते विसृज्य नृपवानरान् ।
सन्ध्यामुपास्य विधिवत्तदा नरवरोत्तमः ।
प्रवृत्तायां रजन्यां तु सो ऽन्तःपुरचरो ऽभवत् ।। ७.३६.६३ ।।
तदनन्तर सूर्यास्त होने पर राजाओं और वानरों को विदा करके नरेशों में श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी ने विधिपूर्वक संध्योपासना की और रात होने पर वे अन्तःपुर में पधारे ॥ ६३॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमदुत्तरकाण्डे षट्त्रिंशः सर्गः ।। ३६ ।।
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्ड में छत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३६ ॥
सर्ग-37
अभिषिक्ते तु काकुत्स्थे धर्मेण विदितात्मनि ।
व्यतीता या निशा पूर्वा पौराणां हर्षवर्धिनी ।। ७.३७.१ ।।
ककुत्स्थकुलभूषण आत्मज्ञानी श्रीरामचन्द्रजीका धर्मपूर्वक राज्याभिषेक हो जाने पर पुरवासियोंका हर्ष बढ़ानेवाली उनकी पहली रात्रि व्यतीत हुई ॥ १ ॥
तस्यां रजन्यां व्युष्टायां प्रातर्नृपतिबोधकाः ।
वन्दिनः समुपातिष्ठन्सौम्या नृपतिवेश्मनि ।। ७.३७.२ ।।
वह रात बीत ने पर जब सबेरा हुआ, तब प्रात:काल महाराज श्रीराम को जगानेवाले सौम्य वन्दीजन राजमहल में उपस्थित हुए ॥ २ ॥
ते रक्तकण्ठिनः सर्वे किन्नरा इव शिक्षिताः ।
तुष्टुवुर्नपतिं वीरं यथावत् सम्प्रहर्षिणः ।। ७.३७.३ ।।
उनके कण्ठ बड़े मधुर थे। वे संगीत की कला में किन्नरों के समान सुशिक्षित थे। उन्होंने बड़े हर्ष में भरकर यथावत्- रूप से वीर नरेश श्रीरघुनाथजीका स्तवन आरम्भ किया ॥ ३ ॥
वीर सौम्य प्रबुध्यस्व कौसल्याप्रीतिवर्धन ।
जगद्धि सर्वं स्वपिति त्वयि सुप्ते नराधिप ।। ७.३७.४ ।।
‘श्रीकौसल्याजीका आनन्द बढ़ानेवाले सौम्य स्वरूप वीर श्रीरघुवीर ! आप जागिये। महाराज! आपके सोये रह ने पर तो सारा जगत ही सोया रहेगा (ब्राह्ममुहूर्त में उठकर धर्मानुष्ठान में नहीं लग सकेगा ॥ ४ ॥
विक्रमस्ते यथा विष्णो रूपं चैवाश्विनोरिव ।
बुद्ध्या बृहस्पतेस्तुल्यः प्रजापतिसमो ह्यसि ।। ७.३७.५ ।।
‘आपका पराक्रम भगवान् विष्णु के समान तथा रूप अश्विनीकुमारों के समान है। बुद्धि में आप बृहस्पति के तुल्य हैं और प्रजापालन में साक्षात् प्रजापति के सदृश हैं ।। ५ ।।
क्षमा ते पृथिवीतुल्या तेजसा भास्करोपमः ।
वेगस्ते वायुना तुल्यो गाम्भीर्यमुदधेरिव ।। ७.३७.६ ।।
‘आप की क्षमा पृथ्वी के समान और तेज भगवान् भास्कर के समान है। वेग वायु के तुल्य और गम्भीरता समुद्र के सदृश है ॥ ६ ॥
अप्रकम्प्यो यता स्थाणुश्चन्द्रे सौम्यत्वमीदृशम् ।
नेदृशाः पार्थिवाः पूर्वं भवितारो नराधिप ।। ७.३७.७ ।।
‘नरेश्वर! आप भगवान् शङ्कर के समान युद्ध में अविचल हैं। आप की-सी सौम्यता चन्द्रमा में ही पायी जाती है। आपके समान राजा न पहले थे और न भविष्य में होंगे॥ ७ ॥
यथा त्वमतिदुर्धर्षो धर्मनित्यः प्रजाहितः ।
न त्वां जहाति कीर्तिश्च लक्ष्मीश्च पुरुषर्षभ ।। ७.३७.८ ।।
‘पुरुषोत्तम! आप को परास्त करना कठिन ही नहीं, असम्भव है। आप सदा धर्म में संलग्न रहते हुए प्रजा के हित- साधन में तत्पर रहते हैं, अत: कीर्ति और लक्ष्मी आप को कभी नहीं छोड़ती हैं ॥ ८ ॥
श्रीश्च धर्मश्च काकुत्स्थ त्वयि नित्यं प्रतिष्ठितौ ।
एताश्चान्याश्च मधुरा वन्दिभिः परिकीर्तिताः ।। ७.३७.९ ।।
‘ककुत्स्थकुलनन्दन! ऐश्वर्य और धर्म आप में नित्य प्रतिष्ठित हैं।' वन्दीजनों ने ये तथा और भी बहुत-सी सुमधुर स्तुतियाँ सुनायीं ॥ ९ ॥
सूताश्च संस्तवैर्दिव्यैर्बोधयन्ति स्म राघवम् ।
स्तुतिभिः स्तूयमानाभिः प्रत्यबुध्यत राघवः ।। ७.३७.१० ।।
सूत भी दिव्य स्तुतियों द्वारा श्रीरघुनाथजी को जगाते रहे। इस प्रकार सुनायी जाती हुई स्तुतियों के द्वारा भगवान् श्रीराम जागे ॥ १० ॥
स तद्विहाय शयनं पाण्डराच्छादनास्तृतम् ।
उत्तस्थौ नागशयनाद्धरिर्नारायणो यथा ।। ७.३७.११ ।।
जैसे पापहारी भगवान् नारायण सर्पशय्या से उठते हैं, उसी प्रकार वे भी श्वेत बिछौनों से ढ की हुई शय्या को छोड़कर उठ बैठे ॥ ११ ॥
तमुत्थितं महात्मानं प्रह्वाः प्राञ्जलयो नराः ।
सलिलं भाजनैः शुभ्रैरुपतस्थुः सहस्रशः ।। ७.३७.१२ ।।
महाराज के शय्या से उठते ही सहस्रों सेवक विनयपूर्वक हाथ जोड़ उज्ज्वल पात्रों में जल लिये उनकी सेवा में उपस्थित हुए॥ १२ ॥
कृतोदकशुचिर्भूत्वा काले हुतहुताशनः ।
देवागारं जगामाशु पुण्यमिक्ष्वाकुसेवितम् ।। ७.३७.१३ ।।
स्नान आदि करके शुद्ध हो उन्होंने समय पर अग्नि में आहुति दी और शीघ्र ही इक्ष्वाकुवंशियों द्वारा सेवित पवित्र देवमन्दिर में वे पधारे ॥ १३ ॥
तत्र देवान्पितऽन्विप्रानर्चयित्वा यथाविधि ।
बाह्यकक्षान्तरं रामो निर्जगाम जनैर्वृतः ।। ७.३७.१४ ।।
वहाँ देवताओं, पितरों और ब्राह्मणोंका विधिवत् पूजन करके वे अनेक कर्मचारियों के साथ बाहर की ड्योढ़ी में आये ॥ १४ ॥
उपतस्थुर्महात्मानो मन्त्रिणः सपुरोहिताः ।
वसिष्ठप्रमुखाः सर्वे दीप्यमाना इवाग्नयः ।। ७.३७.१५ ।।
इसी समय प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी वसिष्ठ आदि सभी महात्मा मन्त्री और पुरोहित वहाँ उपस्थित हुए ॥ १५ ॥
क्षत्रियाश्च महात्मानो नानाजनपदेश्वराः ।
रामस्योपाविशन्पार्श्वे शक्रस्येव यथा ऽमराः ।। ७.३७.१६ ।।
तत्पश्चात् अनेकानेक जनपदों के स्वामी महामनस्वी क्षत्रिय श्रीरामचन्द्रजी के पास उसी तरह आकर बैठे, जैसे इन्द्र के समीप देवतालोग आकर बैठा करते हैं ॥ १६ ॥
भरतो लक्ष्मणश्चात्र शत्रुघ्नश्च महायशाः ।
उपासाञ्चक्रिरे हृष्टा वेदास्त्रय इवाध्वरम् ।। ७.३७.१७ ।।
महायशस्वी भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न – ये तीनों भाई बड़े हर्ष के साथ उसी तरह भगवान् श्रीराम की सेवा में उपस्थित रहते थे, जैसे तीनों वेद यज्ञ की ॥ १७ ॥
याताः प्राञ्जलयो भूत्वा किङ्करा मुदिताननाः ।
मुदिता नाम पार्श्वस्था बहवः समुपाविशन् ।। ७.३७.१८ ।।
इसी समय मुदित नाम से प्रसिद्ध बहुत- से सेवक भी, जिन के मुख पर प्रसन्नता खेलती रहती थी, हाथ जोड़ेसभाभवन में आये और श्रीरघुनाथजी के पास बैठ गये॥ १८ ॥
वानराश्च महावीर्या विंशतिः कामरूपिणः ।
सुग्रीवप्रमुखा राममुपासन्ते महौजसः ।। ७.३७.१९ ।।
फिर महापराक्रमी महातेजस्वी तथा इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले सुग्रीव आदि बीस- वानर भगवान् श्रीराम के समीप आकर बैठे ॥ १९ ॥
विभीषणश्च रक्षोभिश्चतुर्भिः परिवारितः ।
उपासते महात्मानं धनेशमिव गुह्यकाः ।। ७.३७.२० ।।
अपने चार राक्षस मन्त्रियों से घिरे हुए विभीषण भी उसी प्रकार महात्मा श्रीराम की सेवा में उपस्थित हुए, जैसे गुह्यकगण धनपति कुबेर की सेवा में उपस्थित होते हैं॥ २० ॥
तथा निगमवृद्धाश्च कुलीना ये च मानवाः ।
शिरसा ऽ ऽवन्द्य राजानमुपासन्ते विचक्षणाः ।। ७.३७.२१ ।।
जो लोग शास्त्रज्ञान में बढ़े - चढ़े और कुलीन थे, वे चतुर मनुष्य भी महाराज को मस्तक झुकाकर प्रणाम करके वहाँ बैठ गये॥ २१ ॥
तथा परिवृतो राजा श्रीमद्भिर्ऋषिभिर्वृतः ।
राजभिश्च महावीर्यैर्वानरैश्च सराक्षसैः ।। ७.३७.२२ ।।
इस प्रकार बहुत- से श्रेष्ठ एवं तेजस्वी महर्षि, महापराक्रमी राजा, वानर और राक्षसों से घिरे राजसभा में बैठे हुए श्रीरघुनाथजी बड़ी शोभा पा रहे थे॥ २२ ॥
यथा देवेश्वरो नित्यमृषिभिः समुपास्यते ।
अधिकस्तेन रूपेण सहस्राक्षाद्विरोचते ।। ७.३७.२३ ।।
जैसे देवराज इन्द्र सदा ऋषियों से सेवित होते हैं, उसी तरह महर्षि - मण्डली से घिरे हुए श्रीरामचन्द्रजी उस समय सहस्रलोचन इन्द्र से भी अधिक शोभा पा रहे थे ॥ २३ ॥
तेषां समुपविष्टानां तास्ताः सुमधुराः कथाः ।
कथ्यन्ते धर्मसंयुक्ताः पुराणज्ञैर्महात्मभिः ।। ७.३७.२४ ।।
जब सब लोग यथास्थान बैठ गये, तब पुराणवेत्ता महात्मा लोग भिन्न-भिन्न धर्म-कथाएँ कह ने लगे ॥ २४ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमदुत्तरकाण्डे सप्तत्रिंशः सर्गः ।। ३७ ।।
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्ड में सैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३७॥
*सुग्रीव, अङ्गद, हनुमान , जाम्बवान्, सुषेण, तार, नील, नल, मैन्द, द्विविद, कुमुद, शरभ, शतबलि, गन्धमादन, गज, गवाक्ष, गवय, धूम्र, रम्भ तथा ज्योतिमुख – ये प्रधान प्रधान वानर-वीर बीस की संख्या में उपस्थित थे।
**इस सर्ग के बाद कुछ प्रतियों में प्रक्षिप्त रूप से पाँच सर्ग और उपलब्ध होते हैं, जिनमें वाली और सुग्रीव की उत्पत्तिका तथा रावण के श्वेतद्वीप में गमनका इतिहास वर्णित है। इस इतिहास के वक्ता भी अगस्त्यजी ही हैं। परंतु इसके पहले सर्ग में ही अगस्त्यजी के विदा होनेका वर्णन आ गया है; अतः यहाँ इन सर्गोंका उल्लेख असङ्गत प्रतीत होता है। इसीलिये ये सर्ग यहाँ नहीं लिये गये हैं।
सर्ग-38
एवमास्ते महाबाहुरहन्यहनि राघवः ।
प्रशासत्सर्वकार्याणि पौरजानपदेषु च ।। ७.३८.१ ।।
महाबाहु श्रीरघुनाथजी इसी प्रकार प्रतिदिन राजसभा में बैठकर पुरवासियों और जनपदवासियों के सारे कार्यों की देखभाल करते हुए शासनका कार्य चलाते थे ॥ १ ॥
ततः कतिपयाहःसु वैदेहं मिथिलाधिपम् ।
राघवः प्राञ्जलिर्भूत्वा वाक्यमेतदुवाच ह ।। ७.३८.२ ।।
तदनन्तर कुछ दिन बीत ने पर श्रीरामचन्द्रजी ने मिथिलानरेश विदेहराज जनकजी से हाथ जोड़कर यह बात कही॥ २ ॥
भवान्हि गतिरव्यग्रा भवता पालिता वयम् ।
भवतस्तेजसोग्रेण रावणो निहतो मया ।। ७.३८.३ ।।
'महाराज! आप ही हमारे सुस्थिर आश्रय हैं। आपने सदा हमलोगोंका लालन-पालन किया है। आपके ही बढ़े हुए तेज से मैं ने रावण का वध किया है ॥ ३ ॥
इक्ष्वाकूणां च सर्वेषां मैथिलानां च सर्वशः ।
अतुलाः प्रीतयो राजन्सम्बन्धकपुरोगमाः ।। ७.३८.४ ।।
‘राजन्! समस्त इक्ष्वाकुवंशी और मैथिल नरेशों में आपस के सम्बन्ध के कारण सब प्रकार से जो प्रेम बढ़ा है, उस की कहीं तुलना नहीं है ॥ ४ ॥
तद्भवान्स्वपुरं यातु रत्नान्यादाय पार्थिव ।
भरतश्च सहायार्थं पृष्ठतस्ते ऽनुयास्यति ।। ७.३८.५ ।।
'पृथ्वीनाथ ! अब आप हमारे द्वारा भेंट किये गये ये रत्न लेकर अपनी राजधानी को पधारें। भरत (तथा उनके साथ-साथ शत्रुघ्न भी) आप की सहायता के लिये आपके पीछे-पीछे जायँगे ' ॥ ५ ॥
स तथेति नृपः कृत्वा राघवं वाक्यमब्रवीत् ।
प्रीतो ऽस्मि भवतो राजन्दर्शनेन नयेन च ।। ७.३८.६ ।।
तब जनकजी ‘बहुत अच्छा' कहकर श्रीरामचन्द्रजी से बोले – ‘राजन् ! मैं आपके दर्शन तथा न्यायानुसार व्यवहार से बहुत प्रसन्न हूँ॥ ६ ॥
यान्येतानि तु रत्नानि मदर्थं सञ्चितानि वै ।
दुहित्रे तानि वै राजन्सर्वाण्येव ददामि च ।। ७.३८.७ ।।
'आपने मेरे लिये जो रत्न एकत्र किये हैं, वह सब मैं अपनी सीता आदि पुत्रियों को देता हूँ ' ॥ ७ ॥
एवमुक्त्वा तु काकुत्स्थं जनको हृष्टमानसः ।
प्रययौ मिथिलां श्रीमांस्तमनुज्ञाय राघवम् ।। ७.३८.८ ।।
श्रीरामचन्द्रजी से ऐसा कहकर श्रीमान् राजा जनक प्रसन्न-चित्त हो श्रीराम की अनुमति ले मिथिलापुरी को चल दिये॥ ८ ॥
ततः प्रयाते जनके केकयं मातुलं प्रभुः ।
राघवः प्राञ्जलिर्भूत्वा वाक्यमेतदुवाच ह ।। ७.३८.९ ।।
जनकजी के चले जाने के पश्चात् श्रीरघुनाथजी ने हाथ जोड़कर अपने मामा केकय- नरेश युधाजित्से, जो बड़े सामर्थ्यशाली थे, विनयपूर्वक कहा ॥ ९ ॥
इदं राज्यमहं चैव भरतश्च सलक्ष्मणः ।
आयत्तास्त्वं हि नो राजन्गतिश्च पुरुषर्षभ ।। ७.३८.१० ।।
‘राजन्! पुरुषप्रवर! यह राज्य, मैं, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न सब आपके अधीन हैं। आप ही हमारे आश्रय हैं ॥ १० ॥
राजा हि वृद्धः सन्तापं त्वदर्थमुपयास्यति ।
तस्माद्गमनमद्यैव रोचते तव पार्थिव ।। ७.३८.११ ।।
‘महाराज केकयराज वृद्ध हैं। वे आपके लिये बहुत चिन्तित होंगे। इसलिये पृथ्वीनाथ! आपका आज ही जाना मुझे अच्छा जान पड़ता है ॥ ११ ॥
लक्ष्मणेनानुयात्रेण पृष्ठतो ऽनुगमिष्यते ।
धनमादाय विपुलं रत्नानि विविधानि च ।। ७.३८.१२ ।।
‘आप बहुत-सा धन तथा नाना प्रकार के रत्न लेकर पधारें। मार्ग में सहायता के लिये लक्ष्मण आपके साथ जायँगे ' ॥ १२ ॥
युधाजित्तु तथेत्याह गमनं प्रति राघवम् ।
रत्नानि च धनं चैव त्वय्येवाक्षय्यमस्त्विति ।। ७.३८.१३ ।।
तब युधाजित ने ‘तथास्तु' कहकर श्रीरामचन्द्रजी की बात मान ली और कहा - ' रघुनन्दन ! ये रत्न और धन सब तुम्हारे ही पास अक्षयरूप से रहें’॥ १३ ॥
प्रदक्षिणं स राजानं कृत्वा केकयवर्धनः ।
रामेण हि कृतः पूर्वमभिवाद्य प्रदक्षिणम् ।। ७.३८.१४ ।।
फिर पहले श्रीरघुनाथजी ने प्रणामपूर्वक अपने मामा की परिक्रमा की, इसके बाद केकयकुल की वृद्धि करनेवाले राजकुमार युधाजित ने भी राजा श्रीराम की प्रदक्षिणा की ॥ १४ ॥
लक्ष्मणेन सहायेन प्रयातः केकयेश्वरः ।
हते ऽसुरे यथा वृत्रे विष्णुना सह वासवः ।। ७.३८.१५ ।।
इसके बाद केकयराज ने लक्ष्मणजी के साथ उसी तरह अपने देश को प्रस्थान किया, जैसे वृत्रासुर के मारे जाने पर इन्द्र ने भगवान् विष्णु के साथ अमरावती की यात्रा की थी ॥ १५ ॥
तं विसृज्य ततो रामो वयस्यमकुतोभयम् ।
प्रतर्दनं काशिपतिं परिष्वज्येदमब्रवीत् ।। ७.३८.१६ ।।
मामा को विदा करके रघुनाथजी ने किसी से भी भय न माननेवाले अपने मित्र काशिराज प्रतर्दन को हृदय से लगाकर कहा—॥ १६॥
दर्शिता भवता प्रीतिर्दर्शितं सौहृदं परम् ।
उद्योगश्च कृतो राजन्भरतेन त्वया सह ।। ७.३८.१७ ।।
‘राजन्! आपने राज्याभिषेक कार्य में भरत के साथ पूरा उद्योग किया है और ऐसा करके अपने महान प्रेम तथा परम सौहार्दका परिचय दिया है ॥ १७ ॥
तद्भवानद्य काशेय पुरीं वाराणसीं व्रज ।
रमणीयां त्वया गुप्तां सुप्रकाशां सुतोरणाम् ।। ७.३८.१८ ।।
‘काशिराज! अब आप सुन्दर परकोटों तथा मनोहर फाटकों से सुशोभित और अपने ही द्वारा सुरक्षित रमणीय पुरी वाराणसी को पधारिये ' ॥ १८ ॥
एतावदुक्त्वा चोत्थाय काकुत्स्थः परमासनात् ।
पर्यष्वजत धर्मात्मा निरन्तरमुरोगतम् ।। ७.३८.१९ ।।
ऐसा कहकर धर्मात्मा श्रीराम ने पुन: अपने उत्तम आसन से उठकर प्रतर्दन को छाती से लगा उनका गाढ़ आलिङ्गन किया ॥ १९॥
विसर्जयामास तदा कौसल्यानन्दवर्धनः ।
राघवेणाभ्यनुज्ञातः काशीशो ऽप्यकुतोभयः ।
वाराणसीं ययौ तूर्णं राघवेण विसर्जितः ।। ७.३८.२० ।।
इस प्रकार कौसल्याका आनन्द बढ़ानेवाले श्रीराम ने उस समय काशिराज को विदा किया। श्रीरघुनाथजी की अनुमति पाकर उनसे विदा ले निर्भय काशिराज तत्काल वाराणसीपुरी की ओर चल दिये ॥ २०%१⁄२ ॥
विसृज्य तं काशिपतिं त्रिशतं पृथिवीपतीन् ।
प्रहसन्राघवो वाक्यमुवाच मधुराक्षरम् ।। ७.३८.२१ ।।
काशिराज को विदा करके श्रीरघुनाथजी हँसते हुए अन्य तीन सौ भूपालों से मधुर वाणी में बोले - ॥ २१ ॥
भवतां प्रीतिरव्यग्रा तेजसा परिरक्षिता ।
धर्मश्च नियतो नित्यं सत्यं च भवतां सदा ।। ७.३८.२२ ।।
'मेरे ऊपर आपलोगों का अविचल प्रेम है, जिस की रक्षा आपने अपने ही तेज से की है। आपलोगों में सत्य और धर्म नियतरूप से नित्य-निरन्तर निवास करते हैं ॥ २२१⁄२ ॥
युष्माकं चानुभावेन तेजसा च महात्मनाम् ।
हतो दुरात्मा दुर्बुद्धी रावणो राक्षसाधमः ।। ७.३८.२३ ।।
‘आप महापुरुषों के प्रभाव और तेज से ही मेरे द्वारा दुर्बुद्धि दुरात्मा राक्षसाधम रावण मारा गया है॥ २३१⁄२॥
हेतुमात्रमहं तत्र भवतां तेजसा हतः ।
रावणः सगणो युद्धे सपुत्रामात्यबान्धवः ।। ७.३८.२४ ।।
‘मैं तो उस के वध में निमित्तमात्र बना हूँ। वास्तव में तो आपलोगों के तेज से ही पुत्र, मन्त्री, बन्धु बान्धव तथा सेवकगणों के सहित रावण युद्ध में मारा गया है॥ २४१⁄२ ॥
भवन्तश्च समानीता भरतेन महात्मना ।
श्रुत्वा जनकराजस्य काननात्तनयां हृताम् ।। ७.३८.२५ ।।
‘वन से जनकराजनन्दिनी सीता के अपहरण का समाचार सुनकर महात्मा भरत ने आपलोगों को यहाँ बुलाया था ।।२५१⁄२ ॥
उद्युक्तानां च सर्वेषां पार्थिवानां महात्मनाम् ।
कालो व्यतीतः सुमहान्गमनं रोचयाम्यतः ।। ७.३८.२६ ।।
'आप सभी महामना भूपाल राक्षसों पर आक्रमण करने के लिये उद्योगशील थे। तबसे आजतक यहाँ आपलोगोंका बहुत समय व्यतीत हो गया है। अतः अब मुझे आपलोगोंका अपने नगर को लौट जाना ही उचित जान पड़ता है ' ॥२६१⁄२॥
प्रत्यूचुस्तं च राजानो हर्षेण महता वृताः ।
दिष्ट्यां त्वं विजयी राम स्वराज्ये ऽपि प्रतिष्ठितः ।। ७.३८.२७ ।।
इस पर राजाओं ने अत्यन्त हर्ष से भरकर कहा— 'श्रीराम ! आप विजयी हुए और अपने राज्य पर भी प्रतिष्ठित हो गये, यह बड़े सौभाग्य की बात है ॥ २७१⁄२॥
दिष्ट्या प्रत्याहृता सीता दिष्ट्या शत्रुः पराजितः ।
एष नः परमः काम एषा नः पीतिरुत्तमा ।। ७.३८.२८ ।।
यत्त्वां विजयिनं राम पश्यामो हतशात्रवम् ।। ७.३८.२९ ।।
‘हमारे सौभाग्य से ही आप सीता को लौटा लाये और उस प्रबल शत्रु को परास्त कर दिया। श्रीराम ! यही हमारा सबसे बड़ा मनोरथ है और यही हमारे लिये सबसे बढ़कर प्रसन्नता की बात है कि आज हमलोग आप को विजयी देख रहे हैं तथा आप की शत्रु-मण्डली मारी जा चुकी है॥ २८-२९ ॥
एतत्त्वय्युपपन्नं च यदस्मांस्त्वं प्रशंससे ।
प्रशंसार्ह न जानीमः प्रशंसां वक्तुमीदृशीम् ।। ७.३८.३० ।।
‘प्रशंसनीय श्रीराम! आप जो हमलोगों की प्रशंसा कर रहे हैं, यह आपही के योग्य है। हम ऐसी प्रशंसा करने की कला नहीं जानते हैं॥ ३० ॥
आपृच्छामो गमिष्यामो हृदिस्थो नः सदा भवान् ।
वर्तामहे महाबाहो प्रीत्यात्र महता वृताः ।
भवेच्च ते महाराज प्रीतिरस्मासु नित्यदा ।। ७.३८.३१ ।।
बाढमित्येव राजानो हर्षेण परमान्विताः ।
उचुः प्राञ्जलयः सर्वे राघवं गमनोत्सुकाः ।। ७.३८.३२ ।।
‘अब हम आज्ञा चाहते हैं। अपनी पुरी को जायँगे। जिस प्रकार आप सदा हमारे हृदय में विराजमान रहते हैं, उसी प्रकार हे महाबाहो! जिस में हमलोग आपके प्रति प्रेम से युक्त रहकर आपके हृदय में बसे रहें, ऐसी प्रीति आप की हम पर सदा बनी रहनी चाहिये।' तब श्रीरघुनाथजी ने हर्ष से भरे हुए उन राजाओं से कहा 'अवश्य ऐसा ही होगा ' ॥ ३१-३२ ॥
पूजिताश्चैव रामेण जग्मुर्देशान्स्वकान्स्वकान् ।। ७.३८.३३ ।।
तत्पश्चात् जाने के लिये उत्सुक हो सबने हाथ जोड़कर श्रीरघुनाथजी से कहा— 'भगवन्! अब हम जा रहे हैं।' इस तरह श्रीराम से सम्मानित हो वे सब राजा अपने-अपने देश को चले गये॥ ३३ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमदुत्तरकाण्डे ऽष्टात्रिंशः सर्गः ।। ३८ ।।
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्ड में अड़तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३८ ॥
सर्ग-39
ते प्रयाता महात्मानः पार्थिवास्ते प्रहृष्टवत् ।
गजवाजिसहस्रौघैः कम्पयन्तो वसुन्धराम् ।। ७.३९.१ ।।
अयोध्या से प्रस्थित हो वे महामना भूपाल सहस्रों हाथी, घोड़े तथा पैदल-समूहों से पृथ्वी को कम्पित करते हुए- से हर्षपूर्वक आगे बढ़ ने लगे ॥ १ ॥
अक्षौहिण्यो हि तत्रासन्राघवार्थे समुद्यताः ।
भरतस्याज्ञया ऽनेकाः प्रहृष्टा बलवाहनाः ।। ७.३९.२ ।।
भरत की आज्ञा से श्रीरामचन्द्रजी की सहायता के लिये वहाँ कई अक्षौहिणी सेनाएँ युद्ध के लिये उद्यत होकर आयी थीं। उन सब के सैनिक और वाह्न हर्ष एवं उत्साह से भरे हुए थे ॥ २ ॥
ऊचुस्ते च महीपाला बलदर्पसमन्विताः ।
न रामरावणं युद्धे पश्यामः पुरतः स्थितम् ।। ७.३९.३ ।।
वे सभी भूपाल बल के घमंड में भरकर आपस में इस तरह की बातें करने लगे – 'हमलोगों ने युद्ध में श्रीराम और रावण को आम ने-साम ने खड़ा नहीं देखा ॥ ३॥
भरतेन वयं पश्चात्समानीता निरर्थकम् ।
हता हि राक्षसाः क्षिप्रं पार्थिवैः स्युर्न संशयः ।। ७.३९.४ ।।
‘भरत ने (पहले तो सूचना नहीं दी) पीछे युद्ध समाप्त हो जाने पर हमें व्यर्थ ही बुला लिया। यदि सब राजा गये होते तो उनके द्वारा समस्त राक्षसोंका संहार बहुत जल्दी हो गया होता, इसमें संशय नहीं है ॥ ४ ॥
रामस्य बाहुवीर्येण रक्षिता लक्ष्मणस्य च ।
सुखं पारेसमुद्रस्य युध्येम विगतज्वराः ।। ७.३९.५ ।।
‘श्रीराम और लक्ष्मण के बाहुबल से सुरक्षित एवं निश्चिन्त हो हमलोग समुद्र के उस पार सुखपूर्वक युद्ध कर सकते थे'॥ ५॥
एताश्चान्याश्च राजानः कथास्तत्र सहस्रशः ।
कथयन्तः स्वराज्यानि जग्मुर्हर्षसमन्विताः ।। ७.३९.६ ।।
ये तथा और भी बहुत-सी बातें कहते हुए वे सहस्रों नरेश बड़े हर्ष के साथ अपने-अपने राज्य को गये।
स्वानि राज्यानि मुख्यानि ऋद्धानि मुदितानि च ।
समृद्धधनधान्यानि पूर्णानि वसुमन्ति च ।। ७.३९.७ ।।
यथापुराणि ते गत्वा रत्नानि विविधान्यथ ।
रामस्य प्रियकामार्थमुपहारान् नृपा ददुः ।। ७.३९.८ ।।
अश्वान्यानानि रत्नानि हस्तिनश्च मदोत्कटान् ।
चन्दनानि च मुख्यानि दिव्यान्याभरणानि च ।। ७.३९.९ ।।
मणिमुक्ताप्रवालांस्तु दास्यो रूपसमन्विताः ।
अजाविकांश्च विविधान् रथांस्तु विविधान्ददुः ।। ७.३९.१० ।।
उनके अपने-अपने प्रसिद्ध राज्य समृद्धिशाली, सुख और आनन्द से परिपूर्ण, धन-धान्य से सम्पन्न तथा रत्न आदि से भरे-पूरे थे। उन राज्यों तथा नगरों में जाकर उन नरेशों ने श्रीरामचन्द्रजीका प्रिय करने की इच्छा से नाना प्रकार के रत्न और उपहार भेजे। घोड़े, सवारियाँ, रत्न, मतवाले हाथी, उत्तम चन्दन, दिव्य आभूषण, मणि, मोती, मूँगे, रूपवती दासियाँ, नाना प्रकार की बकरियाँ और भेड़ें तथा तरह-तरह के बहुत- से रथ भेंट किये ॥ ७-१० ॥
भरतो लक्ष्मणश्चैव शत्रुघ्नश्च महाबलाः ।
आदाय तानि रत्नानि स्वां पुरीं पुनरागताः ।। ७.३९.११ ।।
आगम्य च पुरीं रम्यामयोध्यां पुरुषर्षभाः ।
तानि रत्नानि चित्राणि रामाय समुपाहरन् ।। ७.३९.१२ ।।
महाबली भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न उन रत्नों को लेकर पुन: अपनी पुरी में लौट आये। रमणीय पुरी अयोध्या में आकर उन तीनों पुरुषप्रवर बन्धुओं ने ये विचित्र रत्न श्रीराम को समर्पित कर दिये ॥ ११-१२ ॥
प्रतिगृह्य च तत्सर्वं रामः प्रीतिसमन्वितः ।
सुग्रीवाय ददौ राज्ञे महात्मा कृतकर्मणे ।। ७.३९.१३ ।।
बिभीषणाय च ददौ तथान्येभ्यो ऽपि राघवः ।
राक्षसेभ्यः कपिभ्यश्च यैर्वृतो जयमाप्तवान् ।। ७.३९.१४ ।।
उन सबको ग्रहण करके महात्मा श्रीराम ने बड़ी प्रसन्नता के साथ उपकारी वानरराज सुग्रीव और विभीषण को तथा अन्य राक्षसों और वानरों को भी बाँट दिया; क्योंकि उन्हीं से घिरे रहकर भगवान् श्रीराम ने युद्ध में विजय प्राप्त की थी॥ १३-१४ ॥
ते सर्वे रामदत्तानि रत्नानि कपिराक्षसाः ।
शिरोभिर्धारयामासुर्बाहुभिश्च महाबलाः ।। ७.३९.१५ ।।
उन सभी महाबली वानरों और राक्षसों ने श्रीरामचन्द्रजी के दिये हुए वे रत्न अपने मस्तक और भुजाओं में धारण कर लिये॥ १५ ॥
हनूमन्तं च नृपतिरिक्ष्वाकूणां महारथः ।
अङ्गदं च महाबाहुमङ्कमारोप्य वीर्यवान् ।। ७.३९.१६ ।।
रामः कमलपत्राक्षः सुग्रीवमिदमब्रवीत् ।
अङ्गदस्ते सुपुत्रो ऽयं मन्त्री चाप्यनिलात्मजः ।। ७.३९.१७ ।।
सुग्रीवमन्त्रिते युक्तौ मम चापि हिते रतौ ।
अर्हतो विविधां पूजां त्वत्कृते वै हरीश्वर ।। ७.३९.१८ ।।
तत्पश्चात् इक्ष्वाकुनरेश महापराक्रमी महारथी कमलनयन श्रीराम ने महाबाहु हनुमान और अङ्गद को गोद में बैठाकर सुग्रीव से इस प्रकार कहा 'सुग्रीव! अङ्गद तुम्हारे सुपुत्र हैं और पवनकुमार हनुमान मन्त्री। वानरराज! ये दोनों मेरे लिये मन्त्रीका भी काम देते थे और सदा मेरे हित-साधन में लगे रहते थे। इसलिये और विशेषत: तुम्हारे नाते ये मेरी ओर से विविध आदर-सत्कार एवं भेंट पा ने के योग्य हैं ॥ १६ – १८ ॥
इत्युक्त्वा व्यवमुच्याङ्गाद्भूषणानि महायशाः ।
स बबन्ध महार्हाणि तदाङ्गदहनूमतोः ।। ७.३९.१९ ।।
ऐसा कहकर महायशस्वी श्रीराम ने अपने शरीर से बहुमूल्य आभूषण उतारकर उन्हें अङ्गद तथा हनुमान के अङ्गों में बाँध दिया॥ १९ ॥
आभाष्य च महावीर्यान्राघवो यूथपर्षभान् ।
नीलं नलं केसरिणं कुमुदं गन्धमादनम् ।। ७.३९.२० ।।
सुषेणं पनसं वीरं मैन्दं द्विविदमेव च ।
जाम्बवन्तं गवाक्षं च विनतं धूम्रमेव च ।। ७.३९.२१ ।।
वलीमुखं प्रजङ्घं च सन्नादं च महाबलम् ।
दरीमुखं दधिमुखमिन्द्रजानुं च यूथपम् ।। ७.३९.२२ ।।
मधुरं श्लक्ष्णया वाचा नेत्राभ्यामापिबन्निव ।
सुहृदो मे भवन्तश्च शरीरं भ्रातरस्तथा ।। ७.३९.२३ ।।
युष्माभिरुद्धृतश्चाहं व्यसनात्काननौकसः ।
धन्यो राजा च सुग्रीवो भवद्भिः सुहृदां वरैः ।। ७.३९.२४ ।।
इसके बाद श्रीरघुनाथजी ने महापराक्रमी वानरयूथ पतियों नील, नल, केसरी, कुमुद, गन्धमादन, सुषेण, पनस, वीर मैन्द, द्विविद, जाम्बवान्, गवाक्ष, विनत, धूम्र, बलीमुख, प्रजङ्घ, महाबली संनाद, दरीमुख, दधिमुख और यूथप इन्द्रजानु को बुलाकर उनकी और दोनों नेत्रों से इस प्रकार देखा, मानो वे उन्हें नेत्रपुटों द्वारा पी रहे हों। उन्होंने स्नेहयुक्त मधुर वाणी में उनसे कहा – 'वानरवीरो! आपलोग मेरे सुहृद्, शरीर और भाई हैं। आपने ही मुझे संकट से उबारा है। आप जैसे श्रेष्ठ सुहृदों को पाकर राजा सुग्रीव धन्य हैं ॥ २० – २४॥
एवमुक्त्वा ददौ तेभ्यो भूषणानि यथार्हतः ।
वज्राणि च महार्हाणि सस्वजे च नरर्षभः ।। ७.३९.२५ ।।
ऐसा कहकर नरश्रेष्ठ श्रीरघुनाथजी ने उन्हें यथायोग्य आभूषण और बहुमूल्य हीरे दिये तथा उनका आलिङ्गन किया॥ २५ ॥
ते पिबन्तः सुगन्धीनि मधूनि मधुपिङ्गलाः ।
मांसानि च सुमृष्टानि मूलानि च फलानि च ।। ७.३९.२६ ।।
मधु के समान पिङ्गल वर्णवाले वे वानर वहाँ सुगन्धित मधु पीते, राजभोग वस्तुओंका उपभोग करते और स्वादिष्ट फल-मूल खाते थे ॥ २६ ॥
एवं तेषां निवसतां मासः साग्रो ययौ तदा ।
मुहूर्तमिव ते सर्वे रामभक्त्या च मेनिरे ।। ७.३९.२७ ।।
इस प्रकार निवास करते हुए उन वानरोंका वहाँ एक मही ने से अधिक समय बीत गया; परंतु श्रीरघुनाथजी के प्रति भक्ति के कारण उन्हें वह समय एक मुहूर्त के समान ही जान पड़ा ॥ २७ ॥
रामो ऽपि रेमे तैः सार्धं वानरैः कामरूपिभिः ।
राक्षसैश्च महावीर्यैर्ऋक्षैश्चैव महाबलैः ।। ७.३९.२८ ।।
श्रीराम भी इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले उन वानरों, महापराक्रमी राक्षसों तथा महाबली रीछों के साथ बड़े आनन्द से समय बिताते थे॥ २८ ॥
एवं तेषां ययौ मासो द्वितीयः शिशिरः सुखम् ।
वानराणां प्रहृष्टानां राक्षसानां च सर्वशः ।। ७.३९.२९ ।।
इक्ष्वाकुनगरे रम्ये परां प्रीतिमुपासताम् ।
रामस्य प्रीतिकरणैः कालस्तेषां सुखं ययौ ।। ७.३९.३० ।।
इस तरह उनका शिशिर ऋतुका दूसरा महीना भी सुखपूर्वक बीत गया। इक्ष्वाकुवंशी नरेशों की उस सुरम्य राजधानी में वे वानर और राक्षस बड़े हर्ष और प्रेम से रहते थे। श्रीराम के प्रेमपूर्वक सत्कार से उनका वह समय सुखपूर्वक बीत रहा था॥ २९-३० ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमदुत्तरकाण्डे एकोनचत्वारिंशः सर्गः ।। ३९ ।।
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्ड में उनतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३९ ॥
सर्ग-40
तथा स्म तेषां वसतां ऋक्षवानर रक्षसाम् ।
राघवस्तु महातेजाः सुग्रीवमिदमब्रवीत् ॥ १ ॥
वहाँ आनन्दपूर्वक निवास करने वाले रीछों , वानरों तथा दैत्यों में सुग्रीव को सम्बोधित करते हुए महा राघव ने इस प्रकार कहा-॥१॥
गम्यतां सौम्य किष्किन्धां दुराधर्षां सुरासुरैः ।
पालयस्व सहामात्यो राज्यं निहतकण्टकम् ॥ २ ॥
सज्जन! अब तुम देवताओं और असुरों के उद्धारकर्ता किष्किन्धापुरी को जाओ और वहाँ अपने मन्त्रियों के साथ रहकर अपने नित्य नियम का पालन करो। २
अङ्गदं च महाबाहो प्रीत्या परमया युतः ।
पश्य त्वं हनुमन्तं च नलं च सुमहाबलम् ॥ ३ ॥
सुषेणं श्वशुरं वीरं तारं च बलिनां वरम् ।
कुमुदं चैव दुर्धर्षं नीलं चैव महाबलम् ॥ ४ ॥
वीरं शतवलिं चैव मैन्दं द्विविदमेव च ।
गजं गवाक्षं गवयं शरभं च महाबलम् ॥ ५ ॥
ऋक्षराजं च दुर्धर्षं जाम्बवन्तं महाबलम् ।
पश्य प्रीतिसमायुक्तो गन्धमादनमेव च ॥ ६ ॥
महाबाहो! अंगद और हनुमान के साथ भी आप बड़े प्यारे लगते हैं। आप महाबली नल , अपने ससुर वीर सुषेण , परम बलशाली तारा , दुर्धर्ष वीर कुमुद , महाबली नील , वीर शतबली मैन , द्विविद , गज , गवक्ष , महाबली शरभ , पराक्रमी योद्धा ऋक्षराज जाम्बवान और गंधमादन को प्रेमपूर्वक देखें। ३-६
ऋषभं च सुविक्रान्तं प्लवगं च सुपाटलम् ।
केसरिं शरभं सुम्भं शङ्खचूडं महाबलम् ॥ ७ ॥
आपको पराक्रमी ऋषभ , वानर , सुपाताल , केसरी , शरभ , शुंभ और साथ ही महाबली शंखचूड़ को प्रेमपूर्वक देखना चाहिए। ७
ये ये मे सुमहात्मानो मदर्थे त्यक्तजीविताः ।
पश्य त्वं प्रीतिसंयुक्तो मा चैषां विप्रियं कृथाः ॥ ८ ॥
उन सब महान हृदय वानरों के प्रति भी तुम्हारा प्रेम होना चाहिए जिन्होंने मेरे लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी। उन्हें कभी अप्रिय न बनाएं। ८
एवमुक्त्वा तु सुग्रीवं आश्लिष्य च पुनः पुनः ।
विभीषणमुवाचाथ रामो मधुरया गिरा ॥ ९ ॥
सो राम ने बार-बार सुग्रीव को हृदय से लगा लिया और फिर विभीषण से मधुर वाणी में कहा-॥९॥
लङ्कां प्रशाधि धर्मेण धर्मज्ञस्त्वं मतो मम ।
पुरस्य राक्षसानां च भ्रातुर्वैश्रवणस्य च ॥ १० ॥
राक्षसराज! लंका पर धर्म से शासन करो। मैं आपको धार्मिक मानता हूं। आपके नगर के लोग , सभी राक्षस और आपका भाई कुबेर आपको धर्मात्मा मानते हैं। १०
मा च बुद्धिमधर्मे त्वं कुर्या राजम् कथञ्चन ।
बुद्धिमन्तो हि राजानो ध्रुवमश्नन्ति मेदिनीम् ॥ ११ ॥
राजन! किसी भी तरह से अधर्म में लिप्त न हों। जिन राजाओं की बुद्धि उत्तम है, वे निश्चय ही दीर्घकाल तक पृथ्वी के राज्य का भोग करेंगे ॥ । ११
अहं च नित्यशो राजन् सुग्रीवसहितस्त्वया ।
स्मर्तव्यः परया प्रीत्या गच्छ त्वं विगतज्वरः ॥ १२ ॥
राजन! सुग्रीव सहित सदा मेरा स्मरण करना। अब आप निश्चिंत होकर यहां से जा सकते हैं। ॥ १२
रामस्य भाषितं श्रुत्वा ऋक्षवानर राक्षसाः ।
साधुसाध्विति काकुत्स्थं प्रशशंसुः पुनः पुनः ॥ १३ ॥
श्री राम की यह वाणी सुनकर रीछ , वानर और दैत्य सभी ने उन्हें धन्य मानकर उनकी बार-बार स्तुति की। १३
तव बुद्धिर्महाबाहो वीर्यं अद्भुतमेव च ।
माधुर्यं परमं राम स्वयम्भोरिव नित्यदा ॥ १४ ॥
उन्होंने कहा- महाबाहु श्री राम! स्वयंभू ब्रह्मा की तरह हमारे स्वभाव में भी हमेशा मधुरता रहती है। आपकी बुद्धिमत्ता और पराक्रम अद्भुत है। १४
तेषामेवं ब्रुवाणानां वानराणां च रक्षसाम् ।
हनूमान् प्रणतो भूत्वा राघवं वाक्यमब्रवीत् ॥ १५ ॥
जिस समय वानर और दैत्य ऐसा कह रहे थे , उसी समय हनुमान जी ने अपने को दीन किया और श्री राघव से कहा-॥१५॥
स्नेहो मे परमो राजन् त्वयि तिष्ठतु नित्यदा ।
भक्तिश्च नियता वीर भावो नान्यत्र गच्छतु ॥ १६ ॥
महाराज ! आपको मेरा बहुत प्यार हमेशा रहें। बहादुर! मेरी अटल भक्ति आप ही में बनी रहे। मुझे आपके अलावा और कहीं भी कोई आंतरिक स्नेह नहीं होना चाहिए। १६
यावद् रामकथा वीर चरिष्यति महीतले ।
तावच्छरीरे वत्स्यन्तु प्राणा मम न संशयः ॥ १७ ॥
वीर श्री राम! जब तक इस धरा पर रामकथा का आविर्भाव हो, तब तक नि:संदेह मेरा प्राण इस शरीर में रहना चाहिए। १७
यच्चैतच्चरितं दिव्यं कथा ते रघुनन्दन ।
तन्मयाप्सरसो नाम श्रावयेयुर्नरर्षभ ॥ १८ ॥
रघुनंदन! भगवान राम! आपका जे एक दिव्य जीवनी और कहानी है। वे अप्सराएँ मुझे गाती और सुनती रहें। १८
तच्छ्रुत्वाहं ततो वीर तव चर्यामृतं प्रभो ।
उत्कण्ठां तां हरिष्यामि मेघलेखामिवानिलः ॥ १९ ॥
वीर प्रभो! आपके इस चरित्रामृत को सुनकर मैं अपनी तृष्णाओं को वैसे ही भगाता रहूंगा जैसे वायु बादलों की पंक्ति को उड़ा ले जाती है । १९
एवं ब्रुवाणं रामस्तु हनूमन्तं वरासनात् ।
उत्थाय सस्वजे स्नेहाद् वाक्यमेतदुवाच ह ॥ २० ॥
हनुमान के ऐसा कहने पर श्री रघुनाथ ने सिंहासन पर से उठकर उन्हें हृदय से लगा लिया और स्नेहपूर्वक इस प्रकार कहा-॥२०॥
एवमेतत् कपिश्रेष्ठ भविता नात्र संशयः ।
चरिष्यति कथा यावद् एषा लोके च मामिका ॥ २१ ॥
तावत् ते भविता कीर्तिः शरीरेऽप्यसवस्तथा ।
लोका हि यावत्स्थास्यन्ति तावत्स्थास्यति मे कथा ॥ २२ ॥
सर्वश्रेष्ठ! नि:संदेह ऐसा होगा। संसार में जब तक मेरी कथा रहेगी तब तक तेरा यश बना रहेगा और तेरे शरीर में प्राण रहेंगे॥ जब तक ये लोग रहेंगे , तब तक मेरी कहानियां भी रहेंगी। २१-२२
एकैकस्योपकारस्य प्राणान् दास्यामि ते कपे ।
शेषस्येहोपकाराणां भवाम ऋणिनो वयम् ॥ २३ ॥
कप! आपके द्वारा किए गए प्रत्येक एहसान के लिए मैं अपनी जान दे सकता था। मैं आपके बाकी एहसानों के लिए आभारी रहूंगा। २३
मद्ङ्गे जीर्णतां यातु यत् त्वयोपकृतं कपे ।
नरः प्रत्युपकाराणां आपस्त्वायाति पात्रताम् ॥ २४ ॥
सर्वश्रेष्ठ! मेरी इच्छा है कि आपके द्वारा किए गए सभी एहसान मेरे शरीर में पच जाएं । मुझे उन्हें चुकाने का अवसर कभी नहीं मिलना चाहिए ; क्योंकि मनुष्य में उपकार का फल पाने की क्षमता विपत्ति के समय ही आती है। (मैं नहीं चाहता कि तुम इस संकट में पड़ो और मैं तुम्हारा उपकार चुकाऊं।)॥२४॥
ततोऽस्य हारं चन्द्राभं मुच्य कण्ठात्स राघवः ।
वैदुउर्यतरलं कण्ठे बबन्ध च हनूमतः ॥ २५ ॥
तो राघव ने अपने गले से चंद्रमा के समान एक चमकीला हार निकाल दिया , जिसके केंद्र में वैदुर्यमणि थी। उन्होंने इसे हनुमंता के गले में डाल दिया। २५
तेनोरसि निबद्धेन हारेण महता कपिः ।
रराज हेमशैलेन्द्रः चन्द्रेणाक्रान्तमस्तकः ॥ २६ ॥
हनुमान की छाती पर उस विशाल माला के कारण स्वर्ण गिरिराज सुमेरु के शिखर पर चंद्रमा के उदय के समान शोभा थी। २६
श्रुत्वा तु राघवस्यैतद् उत्थायोत्थाय वानराः ।
प्रणम्य शिरसा पादौ निर्जग्मुस्ते महाबलाः ॥ २७ ॥
श्री राघव के उन विदाई वचनों को सुनकर महाबली वानर एक-एक करके उठे और उनके चरणों में सिर नवाकर जाने लगे। २७
सुग्रीवः स च रामेण निरन्तरमुरोगतः ।
विभीषणश्च धर्मात्मा सर्वे ते बाष्पविक्लवाः ॥ २८ ॥
सुग्रीव और धर्मात्मा विभीषण श्री राम के हृदय से टकराए और उन्हें गहरा आलिंगन देकर चले गए। उस समय वे श्री राम की भावी हानि से व्यथित थे और उनकी आंखों में आंसू थे। २८
सर्वे च ते बाष्पकलाः साश्रुनेत्रा विचेतसः ।
सम्मूढा इव दुःखेन त्यजन्तो राघवं तदा ॥ २९ ॥
राघव को छोड़कर, वे सभी या तो बेहोश थे या शोक से बेहोश थे। किसी के गले से आवाज नहीं निकल रही थी और सभी की आंखों में आंसू थे। २९
कृतप्रसादास्तेनैवं राघवेण महात्मना ।
जग्मुः स्वं स्वं गृहं सर्वे देही देहमिव त्यजन् ॥ ३० ॥
, सभी बंदरों को अपने-अपने घर जाने के लिए मजबूर किया गया , जैसे आत्मा को शरीर छोड़कर परलोक जाने के लिए मजबूर किया जाता है। ३०
ततस्तु ते राक्षसऋक्षवानराः
प्रणम्य रामं रघुवंशवर्धनम् ।
वियोगजाश्रुप्रतिपूर्णलोचनाः
प्रतिप्रयातास्तु यथा निवासिनः ॥ २९ ॥
उन दैत्यों , रीछों और वानरों ने रघुवंशवर्धन श्री राम को प्रणाम किया और आँखों में विरह के आँसू लिए वे अपने धाम को लौट गए। ३१
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमद्उत्तरकाण्डे चत्वारिंशः सर्गः ॥ ४० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि द्वारा रचित अर्शरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्ड का चालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ। ॥ ४० ॥