॥श्री गणेशाय नम:॥
॥श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
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सम्पूर्ण वाल्मीकि रामायण
[काव्य बीजं सनातनम्]

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
सुन्दरकाण्डम्

सीताजी का रावण को समझाना और उसे श्रीराम के सामने नगण्य बताना

एकविंशः सर्गः

सर्ग-21

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा सीता रौद्रस्य रक्षसः।

आर्ता दीनस्वरा दीनं प्रत्युवाच ततः शनैः॥१॥

उस भयंकर राक्षस की वह बात सुनकर सीता को बड़ी पीड़ा हुई। उन्होंने दीन वाणी में बड़े दुःख के साथ धीरे-धीरे उत्तर देना आरम्भ किया॥१॥

दुःखार्ता रुदती सीता वेपमाना तपस्विनी।

चिन्तयन्ती वरारोहा पतिमेव पतिव्रता॥२॥

उस समय सुन्दर अंगोंवाली पतिव्रता देवी तपस्विनी सीता दुःख से आतुर होकर रोती हुई काँप रही थीं और अपने पतिदेव का ही चिन्तन कर रही थीं॥२॥

तृणमन्तरतः कृत्वा प्रत्युवाच शुचिस्मिता।

निवर्तय मनो मत्तः स्वजने प्रीयतां मनः॥३॥

पवित्र मुसकान वाली विदेहनन्दिनी ने तिनके की ओट करके रावण को इस प्रकार उत्तर दिया-‘तुम मेरी ओर से अपना मन हटा लो और आत्मीय जनों (अपनी ही पत्नियों)-पर प्रेम करो॥३॥

न मां प्रार्थयितुं युक्तस्त्वं सिद्धिमिव पापकृत्।

अकार्यं न मया कार्यमेकपत्न्या विगर्हितम्॥४॥

‘जैसे पापाचारी पुरुष सिद्धि की इच्छा नहीं कर सकता, उसी प्रकार तुम मेरी इच्छा करने के योग्य नहीं हो। जो पतिव्रता के लिये निन्दित है, वह न करने योग्य कार्य मैं कदापि नहीं कर सकती॥ ४॥

कुलं सम्प्राप्तया पुण्यं कुले महति जातया।

एवमुक्त्वा तु वैदेही रावणं तं यशस्विनी॥५॥

रावणं पृष्ठतः कृत्वा भूयो वचनमब्रवीत्।

नाहमौपयिकी भार्या परभार्या सती तव॥६॥

‘क्योंकि मैं एक महान् कुल में उत्पन्न हुई हूँ और ब्याह करके एक पवित्र कुल में आयी हूँ।’ रावण से ऐसा कहकर यशस्विनी विदेहराजकुमारीने उसकी ओर अपनी पीठ फेर ली और इस प्रकार कहा —’रावण! मैं सती और परायी स्त्री हूँ। तुम्हारी भार्या बनने योग्य नहीं हूँ॥

साधु धर्ममवेक्षस्व साधु साधुव्रतं चर।

यथा तव तथान्येषां रक्ष्या दारा निशाचर॥७॥

‘निशाचर! तुम श्रेष्ठ धर्म की ओर दृष्टिपात करो और सत्पुरुषों के व्रत का अच्छी तरह पालन करो। जैसे तुम्हारी स्त्रियाँ तुमसे संरक्षण पाती हैं, उसी प्रकार दूसरों की स्त्रियों की भी तुम्हें रक्षा करनी चाहिये॥७॥

आत्मानमुपमां कृत्वा स्वेषु दारेषु रम्यताम्।

अतुष्टं स्वेषु दारेषु चपलं चपलेन्द्रियम्।

नयन्ति निकृतिप्रज्ञं परदाराः पराभवम्॥८॥

‘तुम अपने को आदर्श बनाकर अपनी ही स्त्रियों में अनुरक्त रहो। जो अपनी स्त्रियों से संतुष्ट नहीं रहता तथा जिसकी बुद्धि धिक्कार देने योग्य है, उस चपल इन्द्रियों वाले चञ्चल पुरुष को परायी स्त्रियाँ पराभव को पहुँचा देती हैं उसे फजीहत में डाल देती हैं।॥ ८॥

इह सन्तो न वा सन्ति सतो वा नानुवर्तसे।

यथा हि विपरीता ते बुद्धिराचारवर्जिता॥९॥

‘क्या यहाँ सत्पुरुष नहीं रहते हैं अथवा रहने पर भी तुम उनका अनुसरण नहीं करते हो? जिससे तुम्हारी बुद्धि ऐसी विपरीत एवं सदाचारशून्य हो गयी है ?॥९॥

वचो मिथ्याप्रणीतात्मा पथ्यमुक्तं विचक्षणैः।

राक्षसानामभावाय त्वं वा न प्रतिपद्यसे॥१०॥

‘अथवा बुद्धिमान् पुरुष जो तुम्हारे हित की बात कहते हैं, उसे निःसार मानकर राक्षसों के विनाशपर तुले रहने के कारण तुम ग्रहण ही नहीं करते हो? ॥१०॥

अकृतात्मानमासाद्य राजानमनये रतम्।

समृद्धानि विनश्यन्ति राष्ट्राणि नगराणि च॥

‘जिसका मन अपवित्र तथा सदुपदेश को नहीं ग्रहण करनेवाला है, ऐसे अन्यायी राजा के हाथ में पड़कर बड़े-बड़े समृद्धिशाली राज्य और नगर नष्ट हो जाते हैं ॥११॥

तथैव त्वां समासाद्य लंका रत्नौघसंकुला।

अपराधात् तवैकस्य नचिराद् विनशिष्यति॥१२॥

‘इसी प्रकार यह रत्नराशि से पूर्ण लंकापुरी तुम्हारे हाथ में आ जाने से अब अकेले तुम्हारे ही अपराध से बहुत जल्द नष्ट हो जायगी॥ १२॥

स्वकृतैर्हन्यमानस्य रावणादीर्घदर्शिनः।

अभिनन्दन्ति भूतानि विनाशे पापकर्मणः॥१३॥

‘रावण! जब कोई अदूरदर्शी पापाचारी अपने कुकर्मों से मारा जाता है, उस समय उसका विनाश होने पर समस्त प्राणियों को प्रसन्नता होती है॥ १३॥

एवं त्वां पापकर्माणं वक्ष्यन्ति निकृता जनाः।

दिष्टयैतद् व्यसनं प्राप्तो रौद्र इत्येव हर्षिताः॥१४॥

‘इसी प्रकार तुमने जिन लोगों को कष्ट पहुँचाया है, वे तुम्हें पापी कहेंगे और बड़ा अच्छा हुआ, जो इस आततायी को यह कष्ट प्राप्त हुआ’ ऐसा कहकर हर्ष मनायेंगे॥१४॥

शक्या लोभयितुं नाहमैश्वर्येण धनेन वा।

अनन्या राघवेणाहं भास्करेण यथा प्रभा॥१५॥

‘जैसे प्रभा सूर्य से अलग नहीं होती, उसी प्रकार मैं श्रीरघुनाथजी से अभिन्न हूँ। ऐश्वर्य या धन के द्वारा तुम मुझे लुभा नहीं सकते॥ १५ ॥

उपधाय भुजं तस्य लोकनाथस्य सत्कृतम्।

कथं नामोपधास्यामि भुजमन्यस्य कस्यचित्॥१६॥

‘जगदीश्वर श्रीरामचन्द्रजी की सम्मानित भुजा पर सिर रखकर अब मैं किसी दूसरे की बाँह का तकिया कैसे लगा सकती हूँ ? ॥ १६॥

अहमौपयिकी भार्या तस्यैव च धरापतेः।

व्रतस्नातस्य विद्येव विप्रस्य विदितात्मनः॥१७॥

‘जिस प्रकार वेदविद्या आत्मज्ञानी स्नातक ब्राह्मण की ही सम्पत्ति होती है, उसी प्रकार मैं केवल उन पृथ्वीपति रघुनाथजी की ही भार्या होनेयोग्य हूँ। १७॥

साधु रावण रामेण मां समानय दुःखिताम्।

वने वासितया सार्धं करेण्वेव गजाधिपम्॥१८॥

‘रावण! तुम्हारे लिये यही अच्छा होगा कि जिस प्रकार वन में समागम की वासना से युक्त हथिनी को कोई गजराज से मिला दे, उसी प्रकार तुम मुझ दुःखिया को श्रीरघुनाथजी से मिला दो॥ १८॥

मित्रमौपयिकं कर्तुं रामः स्थान परीप्सता।

बन्धं चानिच्छता घोरं त्वयासौ पुरुषर्षभः॥१९॥

‘यदि तुम्हें अपने नगर की रक्षा और दारुण बन्धन से बचने की इच्छा हो तो पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम को अपना मित्र बना लेना चाहिये; क्योंकि वे ही इसके योग्य हैं।॥ १९॥

विदितः सर्वधर्मज्ञः शरणागतवत्सलः।

तेन मैत्री भवतु ते यदि जीवितुमिच्छसि॥२०॥

‘भगवान् श्रीराम समस्त धर्मो के ज्ञाता और सुप्रसिद्ध शरणागतवत्सल हैं। यदि तुम जीवित रहना चाहते हो तो उनके साथ तुम्हारी मित्रता हो जानी चाहिये॥ २०॥

प्रसादयस्व त्वं चैनं शरणागतवत्सलम्।

मां चास्मै प्रयतो भूत्वा निर्यातयितुमर्हसि ॥२१॥

‘तुम शरणागतवत्सल श्रीराम की शरण लेकर उन्हें प्रसन्न करो और शुद्धहृदय होकर मुझे उनके पास लौटा दो॥ २१॥

एवं हि ते भवेत् स्वस्ति सम्प्रदाय रघूत्तमे।

अन्यथा त्वं हि कुर्वाणः परां प्राप्स्यसि चापदम्॥२२॥

‘इस प्रकार मुझे श्रीरघुनाथजी को सौंप देने पर तुम्हारा भला होगा। इसके विपरीत आचरण करने पर तुम बड़ी भारी विपत्ति में पड़ जाओगे॥ २२॥

वर्जयेद् वज्रमुत्सृष्टं वर्जयेदन्तकश्चिरम्।

त्वद्विधं न तु संक्रुद्धो लोकनाथः स राघवः॥२३॥

‘तुम्हारे-जैसे निशाचर को कदाचित् हाथ से छूटा हुआ वज्र बिना मारे छोड़ सकता है और काल भी बहुत दिनों तक तुम्हारी उपेक्षा कर सकता है; किंतु क्रोध में भरे हुए लोकनाथ रघुनाथ जी कदापि नहीं छोड़ेंगे॥ २३॥

रामस्य धनुषः शब्दं श्रोष्यसि त्वं महास्वनम्।

शतक्रतुविसृष्टस्य निर्घोषमशनेरिव॥२४॥

‘इन्द्र के छोड़े हुए वज्र की गड़गड़ाहट के समान तुम श्रीरामचन्द्रजी के धनुष की घोर टंकार सुनोगे॥२४॥

इह शीघ्रं सुपर्वाणो ज्वलितास्या इवोरगाः।

इषवो निपतिष्यन्ति रामलक्ष्मणलक्षिताः॥२५॥

‘यहाँ श्रीराम और लक्ष्मण के नामों से अङ्कित और सुन्दर गाँठवाले बाण प्रज्वलित मुखवाले सो के समान शीघ्र ही गिरेंगे॥ २५ ॥

रक्षांसि निहनिष्यन्तः पुर्यामस्यां न संशयः।

असम्पातं करिष्यन्ति पतन्तः कङ्कवाससः॥२६॥

‘वे कङ्कपत्रवाले बाण इस पुरी में राक्षसों का संहार करेंगे, इसमें संशय नहीं है। वे इस तरह बरसेंगे कि यहाँ तिल रखने की भी जगह नहीं रह जायगी॥ २६॥

राक्षसेन्द्रमहासर्पान् स रामगरुडो महान्।

उद्धरिष्यति वेगेन वैनतेय इवोरगान्॥२७॥

‘जैसे विनतानन्दन गरुड़ सो का संहार करते हैं, उसी प्रकार श्रीरामरूपी महान् गरुड़ राक्षसराजरूपी बड़े-बड़े सो को वेगपूर्वक उच्छिन्न कर डालेंगे। २७॥

अपनेष्यति मां भर्ता त्वत्तः शीघ्रमरिंदमः।

असुरेभ्यः श्रियं दीप्तां विष्णुस्त्रिभिरिव क्रमैः॥२८॥

‘जैसे भगवान् विष्णु ने अपने तीन ही पगों द्वारा असुरों से उनकी उद्दीप्त राजलक्ष्मी छीन ली थी, उसी प्रकार मेरे स्वामी शत्रुसूदन श्रीराम मुझे शीघ्र ही तेरे यहाँ से निकाल ले जायेंगे॥ २८॥

जनस्थाने हतस्थाने निहते रक्षसां बले।

अशक्तेन त्वया रक्षः कृतमेतदसाधु वै॥२९॥

‘राक्षस! जब राक्षसों की सेना का संहार हो जाने से जनस्थान का तुम्हारा आश्रय नष्ट हो गया और तुम युद्ध करने में असमर्थ हो गये, तब तुमने छल और चोरी से यह नीच कर्म किया है॥ २९॥

आश्रमं तत्तयोः शून्यं प्रविश्य नरसिंहयोः।

गोचरं गतयोर्धात्रोरपनीता त्वयाधम॥३०॥

‘नीच निशाचर! तुमने पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मण के सूने आश्रम में घुसकर मेरा हरण किया था। वे दोनों उस समय मायामृग को मारने के लिये वन में गये हुए थे (नहीं तो तभी तुम्हें इसका फल मिल जाता) ॥ ३०॥

नहि गन्धमुपाघ्राय रामलक्ष्मणयोस्त्वया।

शक्यं संदर्शने स्थातुं शुना शार्दूलयोरिव॥३१॥

‘श्रीराम और लक्ष्मण की तो गन्ध पाकर भी तुम उनके सामने नहीं ठहर सकते। क्या कुत्ता कभी दो दो बाघों के सामने टिक सकता है ? ॥ ३१॥

तस्य ते विग्रहे ताभ्यां युगग्रहणमस्थिरम्।

वृत्रस्येवेन्द्रबाहुभ्यां बाहोरेकस्य विग्रहे ॥३२॥

‘जैसे इन्द्रकी दो बाँहों के साथ युद्ध छिड़ने पर वृत्रासुर की एक बाँह के लिये संग्राम के बोझ को सँभालना असम्भव हो गया, उसी प्रकार समरांगण में उन दोनों भाइयों के साथ युद्ध का जुआ उठाये रखना या टिकना तुम्हारे लिये सर्वथा असम्भव है॥ ३२॥

क्षिप्रं तव स नाथो मे रामः सौमित्रिणा सह।

तोयमल्पमिवादित्यः प्राणानादास्यते शरैः॥३३॥

‘वे मेरे प्राणनाथ श्रीराम सुमित्राकुमार लक्ष्मण के साथ आकर अपने बाणों द्वारा शीघ्र तुम्हारे प्राण हर लेंगे। ठीक उसी तरह, जैसे सूर्य थोड़े-से जल को अपनी किरणों द्वारा शीघ्र सुखा देते हैं॥३३॥

गिरिं कुबेरस्य गतोऽथवाऽऽलयं सभां गतो वा वरुणस्य राज्ञः।

असंशयं दाशरथेविमोक्ष्यसे महाद्रुमः कालहतोऽशनेरिव॥३४॥

‘तुम कुबेर के कैलासपर्वत पर चले जाओ अथवा वरुण की सभा में जाकर छिप रहो, किंतु काल का मारा हुआ विशाल वृक्ष जैसे वज्र का आघात लगते ही नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार तुम दशरथनन्दन श्रीराम के बाण से मारे जाकर तत्काल प्राणों से हाथ धो बैठोगे, इसमें संशय नहीं है; क्योंकि काल तुम्हें पहले से ही मार चुका है’ ॥ ३४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे एकविंशः सर्गः ॥२१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में इक्कीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।२१॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
सुन्दरकाण्डम्

रावण का सीता को दो मास की अवधि देना, सीता का उसे फटकारना, फिर रावण का उन्हें धमकाना

द्वाविंशति सर्गः

सर्ग-22

सीताया वचनं श्रुत्वा परुषं राक्षसेश्वरः।

प्रत्युवाच ततः सीतां विप्रियं प्रियदर्शनाम्॥१॥

सीता के ये कठोर वचन सुनकर राक्षसराज रावण ने उन प्रियदर्शना सीता को यह अप्रिय उत्तर दिया— ॥

यथा यथा सान्त्वयिता वश्यः स्त्रीणां तथा तथा।

यथा यथा प्रियं वक्ता परिभूतस्तथा तथा॥२॥

‘लोक में पुरुष जैसे-जैसे स्त्रियों से अनुनय-विनय करता है, वैसे-वैसे वह उनका प्रिय होता जाता है; परंतु मैं तुमसे ज्यों-ज्यों मीठे वचन बोलता हूँ, त्योंही-त्यों तुम मेरा तिरस्कार करती जा रही हो॥२॥

संनियच्छति मे क्रोधं त्वयि कामः समुत्थितः।

द्रवतो मार्गमासाद्य हयानिव सुसारथिः॥३॥

‘किंतु जैसे अच्छा सारथि कुमार्ग में दौड़ते हुए घोड़ों को रोकता है, वैसे ही तुम्हारे प्रति जो मेरा प्रेम उत्पन्न हो गया है, वही मेरे क्रोध को रोक रहा है। ३॥

वामः कामो मनुष्याणां यस्मिन् किल निबध्यते।

जने तस्मिंस्त्वनुक्रोशः स्नेहश्च किल जायते॥४॥

‘मनुष्यों में यह काम (प्रेम) बड़ा टेढ़ा है। वह जिसके प्रति बँध जाता है, उसी के प्रति करुणा और स्नेह उत्पन्न हो जाता है॥ ४॥

एतस्मात् कारणान्न त्वां घातयामि वरानने।

वधार्हामवमानाहाँ मिथ्या प्रव्रजने रताम्॥५॥

‘सुमुखि! यही कारण है कि झूठे वैराग्य में तत्पर तथा वध और तिरस्कार के योग्य होने पर भी तुम्हारा मैं वध नहीं कर रहा हूँ॥५॥

परुषाणि हि वाक्यानि यानि यानि ब्रवीषि माम्।

तेषु तेषु वधो युक्तस्तव मैथिलि दारुणः॥६॥

‘मिथिलेशकुमारी! तुम मुझसे जैसी-जैसी कठोर बातें कह रही हो, उनके बदले तो तुम्हें कठोर प्राणदण्ड देना ही उचित है’॥६॥

एवमुक्त्वा तु वैदेहीं रावणो राक्षसाधिपः।

क्रोधसंरम्भसंयुक्तः सीतामुत्तरमब्रवीत्॥७॥

विदेहराजकुमारी सीता से ऐसा कहकर क्रोध के आवेश में भरे हुए राक्षसराज रावण ने उन्हें फिर इस प्रकार उत्तर दिया- ॥७॥

द्वौ मासौ रक्षितव्यौ मे योऽवधिस्ते मया कृतः।

ततः शयनमारोह मम त्वं वरवर्णिनि॥८॥

‘सुन्दरि! मैंने तुम्हारे लिये जो अवधि नियुक्त की है, उसके अनुसार मुझे दो महीने और प्रतीक्षा करनी है। तत्पश्चात् तुम्हें मेरी शय्या पर आना होगा॥ ८॥

दाभ्यामूर्ध्वं तु मासाभ्यां भर्तारं मामनिच्छतीम्।

मम त्वां प्रातराशार्थे सूदाश्छेत्स्यन्ति खण्डशः॥९॥

‘अतः याद रखो यदि दो महीने के बाद तुम मुझे अपना पति बनाना स्वीकार नहीं करोगी तो रसोइये मेरे कलेवे के लिये तुम्हारे टुकड़े-टुकड़े कर डालेंगे’।

तां भय॑मानां सम्प्रेक्ष्य राक्षसेन्द्रेण जानकीम्।

देवगन्धर्वकन्यास्ता विषेदुर्विकृतेक्षणाः॥१०॥

राक्षसराज रावण के द्वारा जनकनन्दिनी सीता को इस प्रकार धमकायी जाती देख देवताओं और गन्धर्वो की कन्याओं को बड़ा विषाद हुआ। उनकी आँखें विकृत हो गयीं॥ १०॥

ओष्ठप्रकारैरपरा नेत्रैर्वक्त्रैस्तथापराः।

सीतामाश्वासयामासुस्तर्जितां तेन रक्षसा॥११॥

तब उनमें से किसी ने ओठों से, किसी ने नेत्रों से तथा किसी ने मुँह के संकेत से उस राक्षस द्वारा डाँटी जाती हुई सीता को धैर्य बँधाया॥११॥

ताभिराश्वासिता सीता रावणं राक्षसाधिपम्।

उवाचात्महितं वाक्यं वृत्तशौटीर्यगर्वितम्॥१२॥

उनके धैर्य बँधाने पर सीता ने राक्षसराज रावण से अपने सदाचार (पातिव्रत्य) और पति के शौर्य के अभिमान से पूर्ण हितकर वचन कहा— ॥ १२ ॥

नूनं न ते जनः कश्चिदस्मिन्निःश्रेयसि स्थितः।

निवारयति यो न त्वां कर्मणोऽस्माद् विगर्हितात्॥१३॥

‘निश्चय ही इस नगर में कोई भी पुरुष तेरा भला चाहने वाला नहीं है, जो तुझे इस निन्दित कर्म से रोके॥

मां हि धर्मात्मनः पत्नीं शचीमिव शचीपतेः।

त्वदन्यस्त्रिषु लोकेषु प्रार्थयेन्मनसापि कः॥१४॥

‘जैसे शची इन्द्र की धर्मपत्नी हैं, उसी प्रकार मैं धर्मात्मा भगवान् श्रीराम की पत्नी हूँ। त्रिलोकी में तेरे सिवा दूसरा कौन है, जो मन से भी मुझे प्राप्त करने की इच्छा करे॥

राक्षसाधम रामस्य भार्याममिततेजसः।

उक्तवानसि यत् पापं क्व गतस्तस्य मोक्ष्यसे॥१५॥

‘नीच राक्षस! तूने अमित तेजस्वी श्रीराम की भार्या से जो पाप की बात कही है, उसके फलस्वरूप दण्ड से तू कहाँ जाकर छुटकारा पायेगा? ॥ १५ ॥

यथा दृप्तश्च मातंगः शशश्च सहितौ वने।

तथा द्विरदवद् रामस्त्वं नीच शशवत् स्मृतः॥१६॥

‘जिस प्रकार वन में कोई मतवाला हाथी और कोई खरगोश दैववश एक-दूसरे के साथ युद्ध के लिये तुल जायँ, वैसे ही भगवान् श्रीराम और तू है। नीच निशाचर! भगवान् राम तो गजराज के समान हैं और तू खरगोश के तुल्य है॥ १६ ॥

स त्वमिक्ष्वाकुनाथं वै क्षिपन्निह न लज्जसे।

चक्षुषो विषये तस्य न यावदुपगच्छसि॥१७॥

‘अरे! इक्ष्वाकुनाथ श्रीराम का तिरस्कार करते तुझे लज्जा नहीं आती। तू जबतक उनकी आँखों के सामने नहीं जाता, तब तक जो चाहे कह ले॥१७॥

इमे ते नयने क्रूरे विकृते कृष्णपिंगले।

क्षितौ न पतिते कस्मान्मामनार्य निरीक्षतः॥१८॥

‘अनार्य! मेरी ओर दृष्टि डालते समय तेरी ये क्रूर और विकारयुक्त काली-पीली आँखें पृथ्वी पर क्यों नहीं गिर पड़ीं? ॥ १८॥

तस्य धर्मात्मनः पत्नी स्नुषा दशरथस्य च।

कथं व्याहरतो मां ते न जिह्वा पाप शीर्यति॥१९॥

‘मैं धर्मात्मा श्रीराम की धर्मपत्नी और महाराज दशरथ की पुत्रवधू हूँ। पापी ! मुझसे पाप की बातें करते समय तेरी जीभ क्यों नहीं गल जाती है ? ॥ १९॥

असंदेशात्तु रामस्य तपसश्चानुपालनात्।

न त्वां कुर्मि दशग्रीव भस्म भस्माइतेजसा॥२०॥

‘दशमुख रावण! मेरा तेज ही तुझे भस्म कर डालने के लिये पर्याप्त है। केवल श्रीराम की आज्ञा न होने से और अपनी तपस्या को सुरक्षित रखने के विचार से मैं तुझे भस्म नहीं कर रही हूँ॥२०॥

नापहर्तुमहं शक्या तस्य रामस्य धीमतः।

विधिस्तव वधार्थाय विहितो नात्र संशयः॥२१॥

‘मैं मतिमान् श्रीराम की भार्या हूँ, मुझे हर ले आने की शक्ति तेरे अंदर नहीं थी। निःसंदेह तेरे वध के लिये ही विधाता ने यह विधान रच दिया है॥२१॥

शूरेण धनदभ्रात्रा बलैः समुदितेन च।

अपोह्य रामं कस्माच्चिद् दारचौर्यं त्वया कृतम्॥२२॥

‘तू तो बड़ा शूरवीर बनता है, कुबेर का भाई है और तेरे पास सेनाएँ भी बहुत हैं, फिर श्रीराम को छल से दूर हटाकर क्यों तूने उनकी स्त्री की चोरी की है ?’॥ २२॥

सीताया वचनं श्रुत्वा रावणो राक्षसाधिपः।

विवृत्य नयने क्रूर जानकीमन्ववैक्षत॥२३॥

सीता की ये बातें सुनकर राक्षसराज रावण ने उन जनकदुलारी की ओर आँखें तरेरकर देखा। उसकी दृष्टि से क्रूरता टपक रही थी॥२३॥

नीलजीमूतसंकाशो महाभुजशिरोधरः।

सिंहसत्त्वगतिः श्रीमान् दीप्तजिह्वोग्रलोचनः॥२४॥

वह नीलमेघ के समान काला और विशालकाय था। उसकी भुजाएँ और ग्रीवा बड़ी थीं। वह गति और पराक्रम में सिंह के समान था और तेजस्वी दिखायी देता था। उसकी जीभ आग की लपट के समान लपलपा रही थी तथा नेत्र बड़े भयंकर प्रतीत होते थे॥२४॥

चलानमुकुटप्रांशुश्चित्रमाल्यानुलेपनः।

रक्तमाल्याम्बरधरस्तप्तांगदविभूषणः॥२५॥

श्रोणीसूत्रेण महता मेचकेन सुसंवृतः।

अमृतोत्पादने नद्धो भुजंगेनेव मन्दरः॥२६॥

क्रोध के कारण उसके मुकुट का अग्रभाग हिल रहा था, जिससे वह बहुत ऊँचा जान पड़ता था। उसने तरह-तरह के हार और अनुलेपन धारण कर रखे थे तथा पक्के सोने के बने हुए बाजूबंद उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। वह लाल रंग के फूलों की माला और लाल वस्त्र पहने हुए था। उसकी कमर के चारों ओर काले रंग का लम्बा कटिसूत्र बँधा हुआ था, जिससे वह अमृत-मन्थन के समय वासुकि से लिपटे हुए मन्दराचल के समान जान पड़ता था॥ २५-२६॥

ताभ्यां स परिपूर्णाभ्यां भुजाभ्यां राक्षसेश्वरः।

शुशुभेऽचलसंकाशः शृंगाभ्यामिव मन्दरः॥२७॥

पर्वत के समान विशालकाय राक्षसराज रावण अपनी दोनों परिपुष्ट भुजाओं से उसी प्रकार शोभा पा रहा था, मानो दो शिखरों से मन्दराचल सुशोभित हो रहा हो॥२७॥

तरुणादित्यवर्णाभ्यां कुण्डलाभ्यां विभूषितः।

रक्तपल्लवपुष्पाभ्यामशोकाभ्यामिवाचलः॥२८॥

प्रातःकाल के सूर्य की भाँति अरुण-पीत कान्तिवाले दो कुण्डल उसके कानों की शोभा बढ़ा रहे थे, मानो लाल पल्लवों और फूलों से युक्त दो अशोक वृक्ष किसी पर्वत को सुशोभित कर रहे हों॥ २८॥

स कल्पवृक्षप्रतिमो वसन्त इव मूर्तिमान्।

श्मशानचैत्यप्रतिमो भूषितोऽपि भयंकरः॥२९॥

वह अभिनव शोभा से सम्पन्न होकर कल्पवृक्ष एवं मूर्तिमान् वसन्त के समान जान पड़ता था। आभूषणों से विभूषित होने पर भी श्मशानचैत्य* (मरघट में बने हुए देवालय)-की भाँति भयंकर प्रतीत होता था॥ २९॥

* प्राचीनकाल में नगर की श्मशानभूमि के पास एक गोलाकार देवालय-सा बना रहता था, जहाँ राजा की आज्ञा से प्राणदण्ड के अपराधियों का जल्लादों के द्वारा वध कराया जाता था। जब वहाँ किसी को प्राणदण्ड देने का अवसर आता, तब उस देवालय को लीप-पोतकर फूलों की बन्दनवारों से सजाया जाता था। उस विभूषित श्मशानचैत्य को देखते ही लोग यह सोचकर भयभीत हो उठते थे कि आज यहाँ किसी के जीवन का अन्त होने वाला है। इस तरह जैसे वह श्मशानचैत्य विभूषित होने पर भी भयंकर लगता था, उसी प्रकार रावण सुन्दर शृङ्गार करके भी सीता को भयानक प्रतीत होता था; क्योंकि वह उनके सतीत्व को नष्ट करना चाहता था।

अवेक्षमाणो वैदेही कोपसंरक्तलोचनः।

उवाच रावणः सीतां भुजंग इव निःश्वसन्॥३०॥

रावण ने क्रोध से लाल आँखें करके विदेहकुमारी सीता की ओर देखा और फुफकारते हुए सर्प के समान लम्बी साँसें खींचकर कहा- ॥३०॥

अनयेनाभिसम्पन्नमर्थहीनमनुव्रते।

नाशयाम्यहमद्य त्वां सूर्यः संध्यामिवौजसा॥

‘अन्यायी और निर्धन मनुष्य का अनुसरण करने वाली नारी! जैसे सूर्यदेव अपने तेज से प्रातःकालिक संध्या के अन्धकार को नष्ट कर देते हैं, उसी प्रकार आज मैं तेरा विनाश किये देता हूँ। ३१॥

इत्युक्त्वा मैथिली राजा रावणः शत्रुरावणः।

संददर्श ततः सर्वा राक्षसी?रदर्शनाः॥३२॥

मिथिलेशकुमारी से ऐसा कहकर शत्रुओं को रुलाने वाले राजा रावण ने भयंकर दिखायी देने वाली समस्त राक्षसियों की ओर देखा॥ ३२॥

एकाक्षीमेककर्णां च कर्णप्रावरणां तथा।

गोकर्णी हस्तिकर्णी च लम्बकर्णीमकर्णिकाम्॥३३॥

हस्तिपद्यश्वपद्यौ च गोपदीं पादचूलिकाम्।

एकाक्षीमेकपादीं च पृथुपादीमपादिकाम्॥३४॥

अतिमात्रशिरोग्रीवामतिमात्रकुचोदरीम्।

अतिमात्रास्यनेत्रां च दीर्घजिह्वानखामपि॥ ३५॥

अनासिकां सिंहमुखीं गोमुखीं सूकरीमुखीम्।

यथा मदशगा सीता क्षिप्रं भवति जानकी॥३६॥

तथा कुरुत राक्षस्यः सर्वाः क्षिप्रं समेत्य वा।

प्रतिलोमानुलोमैश्च सामदानादिभेदनैः॥ ३७॥

आवर्जयत वैदेहीं दण्डस्योद्यमनेन च।

उसने एकाक्षी (एक आँखवाली), एककर्णा (एक कान वाली), कर्णप्रावरणा (लंबे कानों से अपने शरीर को ढक लेने वाली), गोकर्णी (गौके-से कानों वाली), हस्तिकर्णी (हाथी के समान कानों वाली), लम्बकर्णी (लम्बे कान वाली), अकर्णिका (बिना कान की), हस्तिपदी (हाथी के-से पैरों वाली), अश्वपदी (घोड़े के समान पैरवाली), गोपदी (गाय के समान पैरवाली), पादचूलिका (केशयुक्त पैरों वाली), एकाक्षी, एकपादी (एक पैर वाली), पृथुपादी (मोटे पैर वाली), अपादि का (बिना पैरों की), अतिमात्रशिरोग्रीवा (विशाल सिर और गर्दन वाली), अतिमात्रकुचोदरी (बहुत बड़े-बड़े स्तन और पेट वाली), अतिमात्रास्यनेत्रा (विशाल मुख और नेत्रवाली), दीर्घजिह्वानखा (लंबी जीभ और नखों वाली), अनासिका (बिना नाक की), सिंहमुखी (सिंह के समान मुखवाली), गोमुखी (गौ के समान मुखवाली) तथा सूकरीमुखी (सूकरी के समान मुखवाली)—इन सब राक्षसियों से कहा- ‘निशाचरियो ! तुम सब लोग मिलकर अथवा अलग-अलग शीघ्र ही ऐसा प्रयत्न करो, जिससे जनककिशोरी सीता बहुत जल्द मेरे वश में आ जाय। अनुकूल-प्रतिकूल उपायों से, साम, दान और भेदनीति से तथा दण्ड का भी भय दिखाकर विदेहकुमारी सीता को वश में लाने की चेष्टा करो’ ॥ ३३ —३७ १/२॥

इति प्रतिसमादिश्य राक्षसेन्द्रः पुनः पुनः॥३८॥

काममन्युपरीतात्मा जानकी प्रति गर्जत।

राक्षसियों को इस प्रकार बारम्बार आज्ञा देकर काम और क्रोध से व्याकुल हुआ राक्षसराज रावण जानकीजी की ओर देखकर गर्जना करने लगा॥ ३८ १/२॥

उपगम्य ततः क्षिप्रं राक्षसी धान्यमालिनी॥३९॥

परिष्वज्य दशग्रीवमिदं वचनमब्रवीत्।

तदनन्तर राक्षसियों की स्वामिनी मन्दोदरी तथा धान्यमालिनी नाम वाली राक्षस-कन्या शीघ्र रावण के पास आयीं और उसका आलिंगन करके बोलीं- ॥ ३९ १/२॥

मया क्रीड महाराज सीतया किं तवानया॥४०॥

विवर्णया कृपणया मानुष्या राक्षसेश्वर।

‘महाराज राक्षसराज! आप मेरे साथ क्रीडा कीजिये। इस कान्तिहीन और दीन-मानव-कन्या सीता से आपको क्या प्रयोजन है? ॥ ४० १/२ ॥

नूनमस्यां महाराज न देवा भोगसत्तमान्॥४१॥

विदधत्यमर श्रेष्ठास्तव बाहुबलार्जितान्।

‘महाराज! निश्चय ही देवश्रेष्ठ ब्रह्माजी ने इसके भाग्य में आपके बाहुबल से उपार्जित दिव्य एवं उत्तम भोग नहीं लिखे हैं॥ ४१ १/२ ॥

अकामां कामयानस्य शरीरमुपतप्यते॥४२॥

इच्छतीं कामयानस्य प्रीतिर्भवति शोभना।

‘प्राणनाथ! जो स्त्री अपने से प्रेम नहीं करती, उसकी कामना करने वाले पुरुष के शरीर में केवल ताप ही होता है और अपने प्रति अनुराग रखने वाली स्त्री की कामना करने वाले को उत्तम प्रसन्नता प्राप्त होती है’॥

एवमुक्तस्तु राक्षस्या समुत्क्षिप्तस्ततो बली।

प्रहसन् मेघसंकाशो राक्षसः स न्यवर्तत॥४३॥

जब राक्षसी ने ऐसा कहा और उसे दूसरी ओर वह हटा ले गयी, तब मेघ के समान काला और बलवान् राक्षस रावण जोर-जोर से हँसता हुआ महल की ओर लौट पड़ा॥४३॥

प्रस्थितः स दशग्रीवः कम्पयन्निव मेदिनीम्।

ज्वलद्भास्करसंकाशं प्रविवेश निवेशनम्॥४४॥

अशोकवाटिका से प्रस्थित होकर पृथ्वी को कम्पितसी करते हुए दशग्रीव ने उद्दीप्त सूर्य के सदृश प्रकाशित होने वाले अपने भवन में प्रवेश किया। ४४॥

देवगन्धर्वकन्याश्च नागकन्याश्च तास्ततः।

परिवार्य दशग्रीवं प्रविशुस्ता गृहोत्तमम्॥४५॥

तदनन्तर देवता, गन्धर्व और नागों की कन्याएँ भी रावण को सब ओर से घेरकर उसके साथ ही उस उत्तम राजभवन में चली गयीं॥ ४५ ॥

स मैथिली धर्मपरामवस्थितां प्रवेपमानां परिभत्र्य रावणः।

विहाय सीतां मदनेन मोहितः स्वमेव वेश्म प्रविवेश रावणः॥४६॥

इस प्रकार अपने धर्म में तत्पर, स्थिरचित्त और भय से काँपती हुई मिथिलेशकुमारी सीता को धमकाकर काममोहित रावण अपने ही महल में चला गया॥ ४६॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे द्वाविंशः सर्गः ॥२२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में बाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ।२२॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
सुन्दरकाण्डम्

राक्षसियों का सीताजी को समझाना

त्रयोविंशः सर्गः

सर्ग-23

इत्युक्त्वा मैथिली राजा रावणः शत्रुरावणः।

संदिश्य च ततः सर्वा राक्षसीर्निर्जगाम ह॥१॥

शत्रुओं को रुलाने वाला राजा रावण सीताजी से पूर्वोक्त बातें कहकर तथा सब राक्षसियों को उन्हें वश में लाने के लिये आदेश दे वहाँ से निकल गया। १॥

निष्क्रान्ते राक्षसेन्द्रे तु पुनरन्तःपुरं गते।

राक्षस्यो भीमरूपास्ताः सीतां समभिदुद्रुवुः॥२॥

अशोकवाटिका से निकलकर जब राक्षसराज रावण अन्तःपुर को चला गया, तब वहाँ जो भयानक रूप वाली राक्षसियाँ थीं, वे सब चारों ओर से दौड़ी हुई सीता के पास आयीं॥२॥

ततः सीतामुपागम्य राक्षस्यः क्रोधमूर्च्छिताः।

परं परुषया वाचा वैदेहीमिदमब्रुवन्॥३॥

विदेहकुमारी सीता के समीप आकर क्रोध से व्याकुल हुई उन राक्षसियों ने अत्यन्त कठोर वाणी द्वारा उनसे इस प्रकार कहना आरम्भ किया- ॥३॥

पौलस्त्यस्य वरिष्ठस्य रावणस्य महात्मनः।

दशग्रीवस्य भार्यात्वं सीते न बहु मन्यसे॥४॥

‘सीते! तुम पुलस्त्यजी के कुल में उत्पन्न हुए सर्वश्रेष्ठ दशग्रीव महामना रावण की भार्या बनना भी कोई बहुत बड़ी बात नहीं समझती?’ ॥ ४॥

ततस्त्वेकजटा नाम राक्षसी वाक्यमब्रवीत्।

आमन्त्र्य क्रोधताम्राक्षी सीतां करतलोदरीम्॥५॥

तत्पश्चात् एकजटा नाम वाली राक्षसी ने क्रोध से लाल आँखें करके कृशोदरी सीता को पुकारकर कहा – ॥५॥

प्रजापतीनां षण्णां तु चतुर्थोऽयं प्रजापतिः।

मानसो ब्रह्मणः पुत्रः पुलस्त्य इति विश्रुतः॥६॥

‘विदेहकुमारी! पुलस्त्यजी छ: * प्रजापतियों में चौथे हैं और ब्रह्माजी के मानस पुत्र हैं। इस रूप में उनकी सर्वत्र ख्याति है॥६॥

* मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु–ये छः प्रजापति हैं।

पुलस्त्यस्य तु तेजस्वी महर्षिर्मानसः सुतः।

नाम्ना स विश्रवा नाम प्रजापतिसमप्रभः॥७॥

‘पुलस्त्यजी के मानस पुत्र तेजस्वी महर्षि विश्रवा हैं। वे भी प्रजापति के समान ही प्रकाशित होते हैं। ७॥

तस्य पुत्रो विशालाक्षि रावणः शत्रुरावणः।

तस्य त्वं राक्षसेन्द्रस्य भार्या भवितुमर्हसि॥८॥

मयोक्तं चारुसर्वाङ्गि वाक्यं किं नानुमन्यसे।

‘विशाललोचने! ये शत्रुओं के रुलाने वाले महाराज रावण उन्हीं के पुत्र हैं और समस्त राक्षसों के राजा हैं। तुम्हें इनकी भार्या हो जाना चाहिये। सर्वांगसुन्दरी! मेरी इस कही हुई बातका तुम अनुमोदन क्यों नहीं करती?’॥

ततो हरिजटा नाम राक्षसी वाक्यमब्रवीत्॥९॥

विवृत्य नयने कोपान्मार्जारसदृशेक्षणा।

येन देवास्त्रयस्त्रिंशद् देवराजश्च निर्जितः॥१०॥

तस्य त्वं राक्षसेन्द्रस्य भार्या भवितुमर्हसि।

इसके बाद बिल्ली के समान भूरे आँखों वाली हरिजटा नाम की राक्षसी ने क्रोध से आँखें फाड़कर कहना आरम्भ किया—’अरी! जिन्होंने तैंतीसों* देवताओं तथा देवराज इन्द्र को भी परास्त कर दिया है, उन राक्षसराज रावण की रानी तो तुम्हें अवश्य बन जाना चाहिये।

* बारह आदित्य, ग्यारह रुद्र, आठ वसु और दो अश्विनीकुमार—ये तैंतीस देवता हैं।

वीर्योत्सिक्तस्य शूरस्य संग्रामेष्वनिवर्तिनः।

बलिनो वीर्ययुक्तस्य भार्यात्वं किं न लिप्ससे॥११॥

‘उन्हें अपने पराक्रम पर गर्व है। वे युद्ध से पीछे न हटने वाले शूरवीर हैं। ऐसे बल-पराक्रमसम्पन्न पुरुष की भार्या बनना तुम क्यों नहीं चाहती हो?॥

प्रियां बहुमतां भार्यां त्यक्त्वा राजा महाबलः।

सर्वासां च महाभागां त्वामुपैष्यति रावणः॥१२॥

समृद्धं स्त्रीसहस्रेण नानारत्नोपशोभितम्।

अन्तःपुरं तदुत्सृज्य त्वामुपैष्यति रावणः॥१३॥

‘महाबली राजा रावण अपनी अधिक प्रिय और सम्मानित भार्या मन्दोदरी को भी, जो सबकी स्वामिनी हैं, छोड़कर तुम्हारे पास पधारेंगे। तुम्हारा कितना महान् सौभाग्य है। वे सहस्रों रमणियों से भरे हुए और अनेक प्रकार के रत्नों से सुशोभित उस अन्तःपुर को छोड़कर तुम्हारे पास पधारेंगे (अतः तुम्हें उनकी प्रार्थना मान लेनी चाहिये) ॥ १२-१३॥

अन्या तु विकटा नाम राक्षसी वाक्यमब्रवीत्।

असकृद् भीमवीर्येण नागा गन्धर्वदानवाः।

निर्जिताः समरे येन स ते पार्श्वमुपागतः॥१४॥

तस्य सर्वसमृद्धस्य रावणस्य महात्मनः।

किमर्थं राक्षसेन्द्रस्य भार्यात्वं नेच्छसेऽधमे ॥१५॥

तदनन्तर विकटा नामवाली दूसरी राक्षसी ने कहा —’जिन भयानक पराक्रमी राक्षसराज ने नागों, गन्धर्वो और दानवों को भी समरांगण में बारम्बार परास्त किया है, वे ही तुम्हारे पास पधारे थे। नीच नारी! उन्हीं सम्पूर्ण ऐश्वर्यों से सम्पन्न महामना राक्षसराज रावण की भार्या बनने के लिये तुम्हें क्यों इच्छा नहीं होती है ?’ ॥ १४-१५॥

ततस्तां दुर्मुखी नाम राक्षसी वाक्यमब्रवीत्।

यस्य सूर्यो न तपति भीतो यस्य स मारुतः।

न वाति स्मायतापाङ्गि किं त्वं तस्य न तिष्ठसे॥१६॥

फिर उनसे दुर्मुखी नामवाली राक्षसी ने कहा —’विशाललोचने! जिनसे भय मानकर सूर्य तपना छोड़ देता है और वायु की गति रुक जाती है, उनके पास तुम क्यों नहीं रहती? ॥ १६॥

पुष्पवृष्टिं च तरवो मुमुचुर्यस्य वै भयात्।

शैलाः सुस्रुवुः पानीयं जलदाश्च यदेच्छति॥१७॥

तस्य नैर्ऋतराजस्य राजराजस्य भामिनि।

किं त्वं न कुरुषे बुद्धिं भार्यार्थे रावणस्य हि॥१८॥

‘भामिनि ! जिनके भय से वृक्ष फूल बरसाने लगते हैं और जो जब इच्छा करते हैं, तभी पर्वत तथा मेघ जल का स्रोत बहाने लगते हैं। उन्हीं राजाधिराज राक्षसराज रावण की भार्या बनने के लिये तुम्हारे मन में क्यों नहीं विचार होता है ? ॥ १७-१८॥

साधु ते तत्त्वतो देवि कथितं साधु भामिनि।

गृहाण सुस्मिते वाक्यमन्यथा न भविष्यसि ॥१९॥

‘देवि! मैंने तुमसे उत्तम, यथार्थ और हित की बात कही है। सुन्दर मुसकानवाली सीते! तुम मेरी बात मान लो, नहीं तो तुम्हें प्राणों से हाथ धोना पड़ेगा’। १९॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे त्रयोविंशः सर्गः॥ २३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में तेईसवाँ सर्ग पूरा हुआ।२३॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
सुन्दरकाण्डम्

सीताजी का राक्षसियों की बात मानने से इनकार कर देना तथा राक्षसियों का उन्हें मारने-काटने की धमकी देना

चतुर्विंशः सर्गः

सर्ग-24

ततः सीतां समस्तास्ता राक्षस्यो विकृताननाः।

परुषं परुषानर्हामूचुस्तद्वाक्यमप्रियम्॥१॥

तदनन्तर विकराल मुखवाली उन समस्त राक्षसियों ने जो कटुवचन सुनने के योग्य नहीं थीं, उन सीता से अप्रिय तथा कठोर वचन कहना आरम्भ किया— ॥१॥

किं त्वमन्तःपुरे सीते सर्वभूतमनोरमे।

महार्हशयनोपेते न वासमनुमन्यसे ॥२॥

‘सीते! रावण का अन्तःपुर समस्त प्राणियों के लिये मनोरम है। वहाँ बहुमूल्य शय्याएँ बिछी रहती हैं। उस अन्तःपुर में तुम्हारा निवास हो, इसके लिये तुम क्यों नहीं अनुमति देतीं? ॥२॥

मानुषी मानुषस्यैव भार्यात्वं बहु मन्यसे।

प्रत्याहर मनो रामान्नैवं जातु भविष्यति॥३॥

‘तुम मानुषी हो, इसलिये मनुष्य की भार्या का जो पद है, उसी को तुम अधिक महत्त्व देती हो; किंतु अब तुम राम की ओर से अपना मन हटा लो, अन्यथा कदापि जीवित नहीं रहोगी॥३॥

त्रैलोक्यवसुभोक्तारं रावणं राक्षसेश्वरम्।

भर्तारमुपसंगम्य विहरस्व यथासुखम्॥४॥

‘तुम त्रिलोकी के ऐश्वर्य को भोगने वाले राक्षसराज रावण को पतिरूप में पाकर आनन्दपूर्वक विहार करो।४॥

मानुषी मानुषं तं तु राममिच्छसि शोभने।

राज्याद् भ्रष्टमसिद्धार्थं विक्लवन्तमनिन्दिते॥५॥

‘अनिन्द्य सुन्दरि! तुम मानवी हो, इसीलिये मनुष्य जातीय राम को ही चाहती हो; परंतु राम इस समय राज्य से भ्रष्ट हैं। उनका कोई मनोरथ सफल नहीं होता है तथा वे सदा व्याकुल रहते हैं’॥५॥

राक्षसीनां वचः श्रुत्वा सीता पद्मनिभेक्षणा।

नेत्राभ्यामश्रुपूर्णाभ्यामिदं वचनमब्रवीत्॥६॥

राक्षसियों की ये बातें सुनकर कमलनयनी सीता ने आँसूभरे नेत्रों से उनकी ओर देखकर इस प्रकार कहा – ॥६॥

यदिदं लोकविद्विष्टमुदाहरत संगताः।

नैतन्मनसि वाक्यं मे किल्बिषं प्रतितिष्ठति॥७॥

‘तुम सब मिलकर मुझसे जो यह लोकविरुद्ध प्रस्ताव कर रही हो, तुम्हारा यह पापपूर्ण वचन मेरे हृदय में एक क्षण के लिये भी नहीं ठहर पाता है॥७॥

न मानुषी राक्षसस्य भार्या भवितुमर्हति।

कामं खादत मां सर्वा न करिष्यामि वो वचः॥८॥

‘एक मानवकन्या किसी राक्षस की भार्या नहीं हो सकती। तुम सब लोग भले ही मुझे खा जाओ; किंतु मैं तुम्हारी बात नहीं मान सकती॥ ८॥

दीनो वा राज्यहीनो वा यो मे भर्ता स मे गुरुः।

तं नित्यमनुरक्तास्मि यथा सूर्यं सुवर्चला॥९॥

‘मेरे पति दीन हों अथवा राज्यहीन–वे ही मेरे स्वामी हैं, वे ही मेरे गुरु हैं, मैं सदा उन्हीं में अनुरक्त हूँ और रहूँगी। जैसे सुवर्चला सूर्य में अनुरक्त रहती हैं॥९॥

यथा शची महाभागा शक्रं समुपतिष्ठति।

अरुन्धती वसिष्ठं च रोहिणी शशिनं यथा॥१०॥

लोपामुद्रा यथागस्त्यं सुकन्या च्यवनं यथा।

सावित्री सत्यवन्तं च कपिलं श्रीमती यथा॥११॥

सौदासं मदयन्तीव केशिनी सगरं यथा।

नैषधं दमयन्तीव भैमी पतिमनुव्रता॥१२॥

तथाहमिक्ष्वाकुवरं रामं पतिमनुव्रता।

‘जैसे महाभागा शची इन्द्र की सेवा में उपस्थित होती हैं, जैसे देवी अरुन्धती महर्षि वसिष्ठ में, रोहिणी चन्द्रमा में, लोपामुद्रा अगस्त्य में, सुकन्या च्यवन में, सावित्री सत्यवान् में, श्रीमती कपिल में, मदयन्ती सौदास में, केशिनी सगर में तथा भीमकुमारी दमयन्ती अपने पति निषधनरेश नल में अनुराग रखती हैं, उसी प्रकार मैं भी अपने पतिदेव इक्ष्वाकुवंश-शिरोमणि भगवान् श्रीराम में अनुरक्त हूँ’॥ १०–१२ १/२ ॥

सीताया वचनं श्रुत्वा राक्षस्यः क्रोधमूर्च्छिताः।

भर्त्सयन्ति स्म परुषैर्वाक्यै रावणचोदिताः॥१३॥

सीता की बात सुनकर राक्षसियों के क्रोध की सीमा न रही। वे रावण की आज्ञा के अनुसार कठोर वचनों द्वारा उन्हें धमकाने लगीं॥ १३॥

अवलीनः स निर्वाक्यो हनुमान् शिंशपाद्रुमे।

सीतां संतर्जयन्तीस्ता राक्षसीरशृणोत् कपिः॥१४॥

अशोकवृक्ष में चुपचाप छिपे बैठे हुए वानर हनुमान् जी सीता को फटकारती हुई राक्षसियों की बातें सुनते रहे ॥१४॥

तामभिक्रम्य संरब्धा वेपमानां समन्ततः।

भृशं संलिलिहुर्दीप्तान् प्रलम्बान् दशनच्छदान्॥१५॥

वे सब राक्षसियाँ कुपित हो वहाँ काँपती हुई सीता पर चारों ओर से टूट पड़ीं और अपने लम्बे एवं चमकीले ओठों को बारम्बार चाटने लगीं॥ १५ ॥

ऊचुश्च परमक्रुद्धाः प्रगृह्याशु परश्वधान्।

नेयमर्हति भर्तारं रावणं राक्षसाधिपम्॥१६॥

उनका क्रोध बहुत बढ़ा हुआ था। वे सब-की-सब तुरंत हाथों में फर से लेकर बोल उठीं—’यह राक्षसराज रावण को पतिरूप में पाने योग्य है ही नहीं। १६॥

सा भय॑माना भीमाभी राक्षसीभिर्वरांगना।

सा बाष्पमपमार्जन्ती शिंशपां तामुपागमत्॥१७॥

उस भयानक राक्षसियों के बारम्बार डाँटने और धमकाने पर सर्वांगसुन्दरी कल्याणी सीता अपने आँसू पोंछती हुई उसी अशोकवृक्ष के नीचे चली आयीं (जिसके ऊपर हनुमान जी छिपे बैठे थे) ॥ १७॥

ततस्तां शिंशपां सीता राक्षसीभिः समावृता।

अभिगम्य विशालाक्षी तस्थौ शोकपरिप्लुता॥१८॥

विशाललोचना वैदेही शोक-सागर में डूबी हुई थीं। इसलिये वहाँ चुपचाप बैठ गयीं। किंतु उन राक्षसियों ने वहाँ भी आकर उन्हें चारों ओर से घेर लिया॥१८॥

तां कृशां दीनवदनां मलिनाम्बरवासिनीम्।

भर्त्सयाञ्चक्रिरे भीमा राक्षस्यस्ताः समन्ततः॥१९॥

वे बहुत ही दुर्बल हो गयी थीं। उनके मुख पर दीनता छा रही थी और उन्होंने मलिन वस्त्र पहन रखा था। उस अवस्था में उन जनकनन्दिनी को चारों ओर खड़ी हुई भयानक राक्षसियों ने फिर धमकाना आरम्भ किया॥

ततस्तु विनता नाम राक्षसी भीमदर्शना।

अब्रवीत् कुपिताकारा कराला निर्णतोदरी॥२०॥

तदनन्तर विनता नामकी राक्षसी आगे बढ़ी। वह देखने में बड़ी भयंकर थी। उसकी देह क्रोध की सजीव प्रतिमा जान पड़ती थी। उस विकराल राक्षसी के पेट भीतर की ओर धंसे हुए थे। वह बोली- ॥२०॥

सीते पर्याप्तमेतावद् भर्तुः स्नेहः प्रदर्शितः।

सर्वत्रातिकृतं भद्रे व्यसनायोपकल्पते॥२१॥

‘सीते! तूने अपने पति के प्रति जितना स्नेह दिखाया है, इतना ही बहुत है। भद्रे ! अति करना तो सब जगह दुःख का ही कारण होता है॥ २१॥

परितुष्टास्मि भद्रं ते मानुषस्ते कृतो विधिः।

ममापि तु वचः पथ्यं ब्रुवन्त्याः कुरु मैथिलि॥२२॥

‘मिथिलेशकुमारी! तुम्हारा भला हो। मैं तुमसे बहुत संतुष्ट हूँ; क्योंकि तुमने मानवोचित शिष्टाचार का अच्छी तरह पालन किया है। अब मैं भी तुम्हारे हित के लिये जो बात कहती हूँ, उसपर ध्यान दो उसका शीघ्र पालन करो॥ २२॥

रावणं भज भर्तारं भर्तारं सर्वरक्षसाम्।

विक्रान्तमापतन्तं च सुरेशमिव वासवम्॥२३॥

‘समस्त राक्षसोंका भरण-पोषण करनेवाले महाराज रावणको तुम अपना पति स्वीकार कर लो। वे देवराज इन्द्रके समान बड़े पराक्रमी तथा रूपवान् हैं।२३॥

दक्षिणं त्यागशीलं च सर्वस्य प्रियवादिनम्।

मानुषं कृपणं रामं त्यक्त्वा रावणमाश्रय॥२४॥

‘दीन-हीन मनुष्य राम का परित्याग करके सबसे प्रिय वचन बोलने वाले, उदार और त्यागी रावण का आश्रय लो॥२४॥

दिव्यांगरागा वैदेहि दिव्याभरणभूषिता।

अद्यप्रभृति लोकानां सर्वेषामीश्वरी भव॥२५॥

‘विदेहराजकुमारी! तुम आज से  समस्त लोकों की स्वामिनी बन जाओ और दिव्य अंगराग तथा दिव्य आभूषण धारण करो॥ २५॥

अग्नेः स्वाहा यथा देवी शची वेन्द्रस्य शोभने।

किं ते रामेण वैदेहि कृपणेन गतायुषा॥२६॥

‘शोभने! जैसे अग्नि की प्रिय पत्नी स्वाहा और इन्द्र की प्राणवल्लभा शची हैं, उसी प्रकार तुम रावण की प्रेयसी बन जाओ। विदेहकुमारी! श्रीराम तो दीन हैं। उनकी आयु भी अब समाप्त हो चली है। उनसे तुम्हें क्या मिलेगा!॥ २६॥

एतदुक्तं च मे वाक्यं यदि त्वं न करिष्यसि।

अस्मिन् मुहूर्ते सर्वास्त्वां भक्षयिष्यामहे वयम्॥२७॥

‘यदि तुम मेरी कही हुई इस बात को नहीं मानोगी तो हम सब मिलकर तुम्हें इसी मुहूर्त में अपना आहार बना लेंगी’ ॥ २७॥

अन्या तु विकटा नाम लम्बमानपयोधरा।

अब्रवीत् कुपिता सीतां मुष्टिमुद्यम्य तर्जती॥२८॥

तदनन्तर दूसरी राक्षसी सामने आयी। उसके लम्बे लम्बे स्तन लटक रहे थे। उसका नाम विकटा था। वह कुपित हो मुक्का तानकर डाँटती हुई सीता से बोली – ॥२८॥

बहून्यप्रतिरूपाणि वचनानि सुदुर्मते।

अनुक्रोशान्मृदुत्वाच्च सोढानि तव मैथिलि॥२९॥

‘अत्यन्त खोटी बुद्धिवाली मिथिलेशकुमारी! अबतक हमलोगों ने अपने कोमल स्वभाववश तुम पर दया आ जाने के कारण तुम्हारी बहुत-सी अनुचित बातें सह ली हैं॥ २९॥

न च नः कुरुषे वाक्यं हितं कालपुरस्कृतम्।

आनीतासि समुद्रस्य पारमन्यैर्दुरासदम्॥३०॥

रावणान्तःपुरे घोरे प्रविष्टा चासि मैथिलि।

रावणस्य गृहे रुद्धा अस्माभिस्त्वभिरक्षिता॥३१॥

‘इतने पर भी तुम हमारी बात नहीं मानती हो। हमने तुम्हारे हित के लिये ही समयोचित सलाह दी थी। देखो, तुम्हें समुद्र के इस पार ले आया गया है, जहाँ पहुँचना दूसरों के लिये अत्यन्त कठिन है। यहाँ भी रावण के भयानक अन्तःपुर में तुम लाकर रखी गयी हो। मिथिलेशकुमारी! याद रखो, रावण के घर में कैद हो और हम-जैसी राक्षसियाँ तुम्हारी चौकसी कर रही हैं॥३०-३१॥

न त्वां शक्तः परित्रातुमपि साक्षात् पुरंदरः।

कुरुष्व हितवादिन्या वचनं मम मैथिलि॥३२॥

‘मैथिलि! साक्षात् इन्द्र भी यहाँ तुम्हारी रक्षा करने में समर्थ नहीं हो सकते। अतः मेरा कहना मानो, मैं तुम्हारे हितकी बात बता रही हूँ॥३२॥

अलमश्रुनिपातेन त्यज शोकमनर्थकम्।

भज प्रीतिं प्रहर्षं च त्यजन्ती नित्यदैन्यताम्॥३३॥

‘आँसू बहाने से कुछ होने-जाने वाला नहीं है। यह व्यर्थ का शोक त्याग दो। सदा छायी रहने वाली दीनता को दूर करके अपने हृदय में प्रसन्नता और उल्लास को स्थान दो॥ ३३॥

सीते राक्षसराजेन परिक्रीड यथासुखम्।

जानीमहे यथा भीरु स्त्रीणां यौवनमध्रुवम्॥३४॥

‘सीते! राक्षसराज रावण के साथ सुखपूर्वक क्रीडाविहार करो। भीरु! हम सभी स्त्रियाँ जानती हैं कि नारियों का यौवन टिकने वाला नहीं होता॥ ३४॥

यावन्न ते व्यतिक्रामेत् तावत् सुखमवाप्नुहि।

उद्यानानि च रम्याणि पर्वतोपवनानि च ॥३५॥

सह राक्षसराजेन चर त्वं मदिरेक्षणे।

स्त्रीसहस्राणि ते देवि वशे स्थास्यन्ति सुन्दरि॥३६॥

‘जबतक तुम्हारा यौवन नहीं ढल जाता, तबतक सुख भोग लो। मदमत्त बना देने वाले नेत्रों से शोभा पाने वाली सुन्दरी! तुम राक्षसराज रावण के साथ लङ्का के रमणीय उद्यानों और पर्वतीय उपवनों में विहार करो। देवि! ऐसा करने से सहस्रों स्त्रियाँ सदा तुम्हारी आज्ञा के अधीन रहेंगी॥ ३५-३६ ॥

रावणं भज भर्तारं भर्तारं सर्वरक्षसाम्।

उत्पाट्य वा ते हृदयं भक्षयिष्यामि मैथिलि॥३७॥

यदि मे व्याहृतं वाक्यं न यथावत् करिष्यसि।

‘महाराज रावण समस्त राक्षसों का भरण-पोषण करने वाले स्वामी हैं। तुम उन्हें अपना पति बना लो। मैथिलि! याद रखो, मैंने जो बात कही है, यदि उसका ठीक-ठीक पालन नहीं करोगी तो मैं अभी तुम्हारा कलेजा निकालकर खा जाऊँगी’ ॥ ३७ १/२॥

ततश्चण्डोदरी नाम राक्षसी क्रूरदर्शना॥३८॥

भ्रामयन्ती महच्छलमिदं वचनमब्रवीत्।

अब चण्डोदरी नामवाली राक्षसी की बारी आयी। उसकी दृष्टिसे  ही क्रूरता टपकती थी। उसने विशाल त्रिशूल घुमाते हुए यह बात कही— ॥ ३८ १/२ ॥

इमां हरिणशावाक्षीं त्रासोत्कम्पपयोधराम्॥३९॥

रावणेन हृतां दृष्ट्वा दौर्हदो मे महानयम्।

यकृत्प्लीहं महत् क्रोडं हृदयं च सबन्धनम्॥४०॥

गात्राण्यपि तथा शीर्षं खादेयमिति मे मतिः।

‘महाराज रावण जब इसे हरकर ले आये थे, उस समय भय के मारे यह थर-थर काँप रही थी, जिससे इसके दोनों स्तन हिल रहे थे। उस दिन इस मृगशावकनयनी मानव-कन्या को देखकर मेरे हृदय में यह बड़ी भारी इच्छा जाग्रत् हुई—इसके जिगर, तिल्ली, विशाल वक्षःस्थल, हृदय, उसके आधार स्थान, अन्यान्य अंग तथा सिर को मैं खा जाऊँ। इस समय भी मेरा ऐसा ही विचार है’। ३९-४० १/२॥

ततस्तु प्रघसा नाम राक्षसी वाक्यमब्रवीत्॥४१॥

कण्ठमस्या नृशंसायाः पीडयामः किमास्यते।

निवेद्यतां ततो राज्ञे मानुषी सा मृतेति ह॥४२॥

नात्र कश्चन संदेहः खादतेति स वक्ष्यति।

तदनन्तर प्रघसा नामक राक्षसी बोल उठी—’फिर तो हमलोग इस क्रूर-हृदया सीता का गला घोंट दें;अब चुपचाप बैठे रहने की क्या आवश्यकता है? इसे मारकर महाराज को सूचना दे दी जाय कि वह मानव कन्या मर गयी। इसमें कोई संदेह नहीं कि इस समाचार को सुनकर महाराज यह आज्ञा दे देंगे कि तुम सब लोग उसे खा जाओ’ ॥ ४१-४२ १/२॥

ततस्त्वजामुखी नाम राक्षसी वाक्यमब्रवीत्॥४३॥

विशस्येमां ततः सर्वान् समान् कुरुत पिण्डकान्।

विभजाम ततः सर्वा विवादो मे न रोचते॥४४॥

पेयमानीयतां क्षिप्रं माल्यं च विविधं बहु।

तत्पश्चात् राक्षसी अजामुखी ने कहा—’मुझे तो व्यर्थ का वाद-विवाद अच्छा नहीं लगता। आओ, पहले इसे काटकर इसके बहुत-से टुकड़े कर डालें। वे सभी टुकड़े बराबर माप-तौल के होने चाहिये। फिर उन टुकड़ों को हमलोग आपस में बाँट लेंगी। साथ ही नाना प्रकार की पेय-सामग्री तथा फूल-माला आदि भी शीघ्र ही प्रचुर मात्रा में मँगा ली जाय’॥ ४३-४४ १/२॥

ततः शूर्पणखा नाम राक्षसी वाक्यमब्रवीत्॥४५॥

अजामुख्या यदुक्तं वै तदेव मम रोचते।

सुरा चानीयतां क्षिप्रं सर्वशोकविनाशिनी॥४६॥

मानुषं मांसमास्वाद्य नृत्यामोऽथ निकुम्भिलाम्।

तदनन्तर राक्षसी शूर्पणखा ने कहा—’अजामुखी ने जो बात कही है, वही मुझे भी अच्छी लगती है। समस्त शोकों को नष्ट कर देने वाली सुरा को भी शीघ्र मँगवा लो। उसके साथ मनुष्य के मांस का आस्वादन करके हम निकुम्भिला देवी के सामने नृत्य करेंगी’। ४५-४६ १/२॥

एवं निर्भय॑माना सा सीता सुरसुतोपमा।

राक्षसीभिर्विरूपाभिधैर्यमुत्सृज्य रोदिति॥४७॥

उन विकराल रूपवाली राक्षसियों के द्वारा इस प्रकार धमकायी जाने पर देवकन्या के समान सुन्दरी सीता धैर्य छोड़कर फूट-फूटकर रोने लगीं॥ ४७॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे चतुर्विंशः सर्गः ॥२४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में चौबीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।२४॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
सुन्दरकाण्डम्

राक्षसियों की बात मानने से इनकार करके शोक-संतप्त सीता का विलाप करना

पञ्चविंशः सर्गः

सर्ग-25

अथ तासां वदन्तीनां परुषं दारुणं बहु।

राक्षसीनामसौम्यानां रुरोद जनकात्मजा॥१॥

जब वे क्रूर राक्षसियाँ इस प्रकार की बहुत-सी कठोर एवं क्रूरतापूर्ण बातें कह रही थीं, उस समय जनकनन्दिनी सीता अधीर हो-होकर रो रही थीं॥१॥

एवमुक्ता तु वैदेही राक्षसीभिर्मनस्विनी।

उवाच परमत्रस्ता बाष्पगद्गदया गिरा॥२॥

उन राक्षसियों के इस प्रकार कहने पर अत्यन्त भयभीत हुई मनस्विनी विदेहराजकुमारी सीता नेत्रों से आँसू बहाती गद्गद वाणी में बोलीं- ॥२॥

न मानुषी राक्षसस्य भार्या भवितुमर्हति।

कामं खादत मां सर्वा न करिष्यामि वो वचः॥

‘राक्षसियो! मनुष्य की कन्या कभी राक्षस की भार्या नहीं हो सकती। तुम्हारा जी चाहे तो तुम सब लोग मिलकर मुझे खा जाओ, परंतु मैं तुम्हारी बात नहीं मानूँगी’ ॥३॥

सा राक्षसीमध्यगता सीता सुरसुतोपमा।

न शर्म लेभे शोकार्ता रावणेनेव भर्त्सिता॥४॥

राक्षसियों के बीच में बैठी हुई देवकन्या के समान सुन्दरी सीता रावण के द्वारा धमकायी जाने के कारण शोक से आर्त-सी होकर चैन नहीं पा रही थीं॥४॥

वेपते स्माधिकं सीता विशन्तीवांगमात्मनः।

वने यूथपरिभ्रष्टा मृगी कोकैरिवादिता॥५॥

जैसे वन में अपने यूथ से बिछुड़ी हुई मृगी भेड़ियों से पीड़ित होकर भय के मारे काँप रही हो, उसी प्रकार सीता जोर-जोर से काँप रही थीं और इस तरह सिकुड़ी जा रही थीं, मानो अपने अंगों में ही समा जायँगी॥५॥

सा त्वशोकस्य विपुलां शाखामालम्ब्य पुष्पिताम्।

चिन्तयामास शोकेन भर्तारं भग्नमानसा॥६॥

उनका मनोरथ भंग हो गया था। वे हताश-सी होकर अशोकवृक्ष की खिली हुई एक विशाल शाखा का सहारा ले शोक से पीड़ित हो अपने पतिदेव का चिन्तन करने लगीं॥६॥

सा स्नापयन्ती विपुलौ स्तनौ नेत्रजलस्रवैः।

चिन्तयन्ती न शोकस्य तदान्तमधिगच्छति॥७॥

आँसुओं के प्रवाह से अपने स्थूल उरोजों का अभिषेक करती हुई वे चिन्ता में डूबी थीं और उस समय शोक का पार नहीं पा रही थीं॥ ७॥

सा वेपमाना पतिता प्रवाते कदली यथा।

राक्षसीनां भयत्रस्ता विवर्णवदनाभवत्॥८॥

प्रचण्ड वायु के चलने पर कम्पित होकर गिरे हुए केले के वृक्ष की भाँति वे राक्षसियों के भय से  त्रस्त हो पृथ्वी पर गिर पड़ीं। उस समय उनके मुख की कान्ति फीकी पड़ गयी थी॥८॥

तस्याः सा दीर्घबहुला वेपन्त्याः सीतया तदा।

ददृशे कम्पिता वेणी व्यालीव परिसर्पती॥९॥

उस बेला में काँपती हुई सीता की विशाल एवं घनीभूत वेणी भी कम्पित हो रही थी, इसलिये वह रेंगती हुई सर्पिणी के समान दिखायी देती थी॥९॥

सा निःश्वसन्ती शोकार्ता कोपोपहतचेतना।

आर्ता व्यसृजदOणि मैथिली विललाप च॥१०॥

वे शोक से पीड़ित होकर लम्बी साँसें खींच रही थीं और क्रोध से अचेत-सी होकर आर्तभाव से आँसू बहा रही थीं। उस समय मिथिलेशकुमारी इस प्रकार विलाप करने लगीं— ॥१०॥

हा रामेति च दुःखार्ता हा पुनर्लक्ष्मणेति च।

हा श्वश्रूर्मम कौसल्ये हा सुमित्रेति भामिनी॥११॥

‘हा राम! हा लक्ष्मण! हा मेरी सासु कौसल्ये! हा आर्ये सुमित्रे! बारम्बार ऐसा कहकर दुःख से पीड़ित हुई भामिनी सीता रोने-बिलखने लगीं॥ ११॥

लोकप्रवादः सत्योऽयं पण्डितैः समुदाहृतः।

अकाले दुर्लभो मृत्युः स्त्रिया वा पुरुषस्य वा॥

‘हाय! पण्डितों ने यह लोकोक्ति ठीक ही कही है कि ‘किसी भी स्त्री या पुरुष की मृत्यु बिना समय आये नहीं होती’ ॥ १२॥

यत्राहमाभिः क्रूराभी राक्षसीभिरिहार्दिता।

जीवामि हीना रामेण मुहूर्तमपि दुःखिता॥१३॥

‘तभी तो मैं श्रीराम के दर्शन से वञ्चित तथा इन क्रूर राक्षसियों द्वारा पीड़ित होने पर भी यहाँ मुहूर्तभर भी जी रही हूँ॥ १३॥

एषाल्पपुण्या कृपणा विनशिष्याम्यनाथवत्।

समुद्रमध्ये नौः पूर्णा वायुवेगैरिवाहता॥१४॥

‘मैंने पूर्वजन्म में बहुत थोड़े पुण्य किये थे, इसीलिये इस दीन दशा में पड़कर मैं अनाथ की भाँति मारी जाऊँगी। जैसे समुद्र के भीतर सामान से भरी हुई नौका वायु के वेग से आहत हो डूब जाती है, उसी प्रकार मैं भी नष्ट हो जाऊँगी॥ १४ ॥

भर्तारं तमपश्यन्ती राक्षसीवशमागता।

सीदामि खलु शोकेन कूलं तोयहतं यथा॥१५॥

‘मुझे पतिदेव के दर्शन नहीं हो रहे हैं। मैं इन राक्षसियों के चंगुल में फँस गयी हूँ और पानी के थपेड़ों से आहत हो कटते हुए कगारों के समान शोक से क्षीण होती जा रही हूँ॥ १५ ॥

तं पद्मदलपत्राक्षं सिंहविक्रान्तगामिनम्।

धन्याः पश्यन्ति मे नाथं कृतज्ञं प्रियवादिनम्॥१६॥

‘आज जिन लोगों को सिंह के समान पराक्रमी और सिंह की-सी चाल वाले मेरे कमलदललोचन, कृतज्ञ और प्रियवादी प्राणनाथ के दर्शन हो रहे हैं, वे धन्य हैं॥ १६॥

सर्वथा तेन हीनाया रामेण विदितात्मना।

तीक्ष्णं विषमिवास्वाद्य दुर्लभं मम जीवनम्॥१७॥

‘उन आत्मज्ञानी भगवान् श्रीराम से बिछुड़कर मेरा जीवित रहना उसी तरह सर्वथा दुर्लभ है, जैसे तेज विष का पान करके किसी का भी जीना अत्यन्त कठिन हो जाता है॥१७॥

कीदृशं तु महापापं मया देहान्तरे कृतम्।

तेनेदं प्राप्यते घोरं महादुःखं सुदारुणम्॥१८॥

‘पता नहीं, मैंने पूर्वजन्म में दूसरे शरीर से कैसा महान् पाप किया था, जिससे यह अत्यन्त कठोर, घोर और महान् दुःख मुझे प्राप्त हुआ है ? ॥ १८॥

जीवितं त्यक्तुमिच्छामि शोकेन महता वृता।

राक्षसीभिश्च रक्षन्त्या रामो नासाद्यते मया॥१९॥

‘इन राक्षसियों के संरक्षण में रहकर तो मैं अपने प्राणाराम श्रीराम को कदापि नहीं पा सकती, इसलिये महान् शोक से घिर गयी हूँ और इससे तंग आकर अपने जीवन का अन्त कर देना चाहती हूँ॥ १९॥

धिगस्तु खलु मानुष्यं धिगस्तु परवश्यताम्।

न शक्यं यत् परित्यक्तुमात्मच्छन्देन जीवितम्॥२०॥

‘इस मानव-जीवन और परतन्त्रता को धिक्कार है, जहाँ अपनी इच्छा के अनुसार प्राणों का परित्याग भी नहीं किया जा सकता’ ॥ २०॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे पञ्चविंशः सर्गः ॥२५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में पचीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।२५॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
सुन्दरकाण्डम्

सीता का करुण-विलाप तथा अपने प्राणों को त्याग देने का निश्चय करना

षड्विंशः सर्गः

सर्ग-26

प्रसक्ताश्रुमुखी त्वेवं ब्रुवती जनकात्मजा।

अधोगतमुखी बाला विलप्तुमुपचक्रमे ॥१॥

उन्मत्तेव प्रमत्तेव भ्रान्तचित्तेव शोचती।

उपावृत्ता किशोरीव विचेष्टन्ती महीतले॥२॥

जनकनन्दिनी सीता के मुख पर आँसुओं की धारा बह रही थी। उन्होंने अपना मुख नीचे की ओर झुका लिया था। वे उपर्युक्त बातें कहती हुई ऐसी जान पड़ती थीं मानो उन्मत्त हो गयी हों उन पर भूत सवार हो गया हो अथवा पित्त बढ़ जाने से पागलों का-सा प्रलाप कर रही हों अथवा दिग्भ्रम आदि के कारण, उनका चित्त भ्रान्त हो गया हो। वे शोकमग्न हो धरती पर लोटती हुई बछेड़ी के समान पड़ी-पड़ी छटपटा रही थीं। उसी अवस्था में सरलहृदया सीता ने इस प्रकार विलाप करना आरम्भ किया— ॥ १-२॥

राघवस्य प्रमत्तस्य रक्षसा कामरूपिणा।

रावणेन प्रमथ्याहमानीता क्रोशती बलात्॥३॥

‘हाय! इच्छानुसार रूप धारण करने वाले राक्षस मारीच के द्वारा जब रघुनाथजी दूर हटा दिये गये और मेरी ओर से असावधान हो गये, उस अवस्था में रावण मुझ रोती, चिल्लाती हुई अबला को बलपूर्वक उठाकर यहाँ ले आया॥३॥

राक्षसीवशमापन्ना भय॑माना च दारुणम्।

चिन्तयन्ती सुदुःखार्ता नाहं जीवितुमुत्सहे॥४॥

‘अब मैं राक्षसियों के वश में पड़ी हूँ और इनकी कठोर धमकियाँ सुनती एवं सहती हूँ। ऐसी दशा में अत्यन्त दुःख से आर्त एवं चिन्तित होकर मैं जीवित नहीं रह सकती॥ ४॥

नहि मे जीवितेनार्थो नैवार्थैर्न च भूषणैः।

वसन्त्या राक्षसीमध्ये विना रामं महारथम्॥५॥

‘महारथी श्रीराम के बिना राक्षसियों के बीच में रहकर मुझे न तो जीवन से कोई प्रयोजन है, न धनकी आवश्यकता है और न आभूषणों से ही कोई काम है॥

अश्मसारमिदं नूनमथवाप्यजरामरम्।

हृदयं मम येनेदं न दुःखेन विशीर्यते॥६॥

अवश्य ही मेरा यह हृदय लोहे का बना हुआ है अथवा अजर-अमर है, जिससे इस महान् दुःख में पड़कर भी यह फटता नहीं है॥६॥

धिनामनार्यामसती याहं तेन विना कृता।

मुहूर्तमपि जीवामि जीवितं पापजीविका॥७॥

‘मैं बड़ी ही अनार्य और असती हूँ, मुझे धिक्कार है, जो उनसे अलग होकर मैं एक मुहूर्त भी इस पापी जीवन को धारण किये हूँ। अब तो यह जीवन केवल दुःख देने के लिये ही है॥७॥

चरणेनापि सव्येन न स्पृशेयं निशाचरम्।

रावणं किं पुनरहं कामयेयं विगर्हितम्॥८॥

‘उस लोकनिन्दित निशाचर रावण को तो मैं बायें पैर से भी नहीं छू सकती, फिर उसे चाहने की तो बात ही क्या है ? ॥ ८॥

प्रत्याख्यानं न जानाति नात्मानं नात्मनः कुलम्।

यो नृशंसस्वभावेन मां प्रार्थयितुमिच्छति॥९॥

‘यह राक्षस अपने क्रूर स्वभाव के कारण न तो मेरे इनकार पर ध्यान देता है, न अपने महत्त्व को समझता है और न अपने कुल की प्रतिष्ठा का ही विचार करता है। बारम्बार मुझे प्राप्त करने की ही इच्छा करता है। ९॥

छिन्ना भिन्ना प्रभिन्ना वा दीप्ता वाग्नौ प्रदीपिता।

रावणं नोपतिष्ठेयं किं प्रलापेन वश्चिरम्॥१०॥

‘राक्षसियो! तुम्हारे देर तक बकवाद करने से क्या लाभ? तुम मुझे छेदो, चीरो, टुकड़े-टुकड़े कर डालो, आग में सेंक दो अथवा सर्वथा जलाकर भस्म कर डालो तो भी मैं रावण के पास नहीं फटक सकती॥ १०॥

ख्यातः प्राज्ञः कृतज्ञश्च सानुक्रोशश्च राघवः।

सवृत्तो निरनुक्रोशः शङ्के मद्भाग्यसंक्षयात्॥११॥

‘श्रीरघुनाथजी विश्वविख्यात ज्ञानी, कृतज्ञ, सदाचारी और परम दयालु हैं तथापि मुझे संदेह हो रहा है कि कहीं वे मेरे भाग्य के नष्ट हो जानेसे मेरे प्रति निर्दय तो नहीं हो गये? ॥ ११ ॥

राक्षसानां जनस्थाने सहस्राणि चतुर्दश।

एकेनैव निरस्तानि स मां किं नाभिपद्यते॥१२॥

‘अन्यथा जिन्होंने जनस्थान में अकेले ही चौदह हजार राक्षसों को काल के गाल में डाल दिया, वे मेरे पास क्यों नहीं आ रहे हैं? ॥ १२॥

निरुद्धा रावणेनाहमल्पवीर्येण रक्षसा।

समर्थः खलु मे भर्ता रावणं हन्तुमाहवे॥१३॥

‘इस अल्प बलवाले राक्षस रावण ने मुझे कैद कर रखा है। निश्चय ही मेरे पतिदेव समरांगण में इस रावण का वध करने में समर्थ हैं॥ १३॥

विराधो दण्डकारण्ये येन राक्षसपुंगवः।

रणे रामेण निहतः स मां किं नाभिपद्यते॥१४॥

‘जिन श्रीराम ने दण्डकारण्य के भीतर राक्षसशिरोमणि विराध को युद्ध में मार डाला था, वे मेरी रक्षा करने के लिये यहाँ क्यों नहीं आ रहे हैं? ॥ १४॥

कामं मध्ये समुद्रस्य लङ्केयं दुष्प्रधर्षणा।

न तु राघवबाणानां गतिरोधो भविष्यति॥१५॥

‘यह लङ्का समुद्र के बीच में बसी है, अतः किसी दूसरे के लिये यहाँ आक्रमण करना भले ही कठिन हो; किंतु श्रीरघुनाथजी के बाणों की गति यहाँ भी कुण्ठित नहीं हो सकती॥ १५ ॥

किं नु तत् कारणं येन रामो दृढपराक्रमः।

रक्षसापहृतां भार्यामिष्टां यो नाभिपद्यते॥१६॥

‘वह कौन-सा कारण है, जिससे बाधित होकर सुदृढ़ पराक्रमी श्रीराम राक्षस द्वारा अपहृत हुई अपनी प्राणपत्नी सीता को छुड़ाने के लिये नहीं आ रहे हैं। १६॥

इहस्थां मां न जानीते शङ्के लक्ष्मणपूर्वजः।।

जानन्नपि स तेजस्वी धर्षणां मर्षयिष्यति॥१७॥

‘मुझे तो संदेह होता है कि लक्ष्मणजी के ज्येष्ठ भ्राता श्रीरामचन्द्रजी को मेरे इस लङ्का में होने का पता ही नहीं है। मेरे यहाँ होने की बात यदि वे जानते होते तो उनके-जैसा तेजस्वी पुरुष अपनी पत्नी का यह तिरस्कार कैसे सह सकता था? ॥ १७॥

हृतेति मां योऽधिगत्य राघवाय निवेदयेत्।

गृध्रराजोऽपि स रणे रावणेन निपातितः॥१८॥

‘जो श्रीरघुनाथजी को मेरे हरे जाने की सूचना दे सकते थे, उन गृध्रराज जटायु को भी रावण ने युद्ध में मार गिराया था॥ १८॥

कृतं कर्म महत् तेन मां तथाभ्यवपद्यता।

तिष्ठता रावणवधे वृद्धेनापि जटायुषा॥१९॥

‘जटायु यद्यपि बूढ़े थे तो भी मुझपर अनुग्रह करके रावण का वध करने के लिये उद्यत हो उन्होंने बहुत बड़ा पुरुषार्थ किया था॥ १९॥

यदि मामिह जानीयाद् वर्तमानां हि राघवः।

अद्य बाणैरभिक्रुद्धः कुर्याल्लोकमराक्षसम्॥२०॥

‘यदि श्रीरघुनाथजी को मेरे यहाँ रहने का पता लग जाता तो वे आज ही कुपित होकर सारे संसार को राक्षसों से शून्य कर डालते॥२०॥

निर्दहेच्च पुरीं लङ्कां निर्दहेच्च महोदधिम्।

रावणस्य च नीचस्य कीर्तिं नाम च नाशयेत्॥२१॥

‘लङ्कापुरी को भी जला देते, महासागर को भी भस्म कर डालते तथा इस नीच निशाचर रावण के नाम और यश का भी नाश कर देते॥२१॥

ततो निहतनाथानां राक्षसीनां गृहे गृहे।

यथाहमेवं रुदती तथा भूयो न संशयः॥२२॥

‘फिर तो निःसंदेह अपने पतियों का संहार हो जाने से घर-घर में राक्षसियों का इसी प्रकार क्रन्दन होता, जैसे आज मैं रो रही हूँ॥२२॥

अन्विष्य रक्षसां लङ्कां कुर्याद् रामः सलक्ष्मणः।

नहि ताभ्यां रिपुर्दृष्टो मुहूर्तमपि जीवति ॥२३॥

‘श्रीराम और लक्ष्मण लङ्का का पता लगाकर निश्चय ही राक्षसों का संहार करेंगे। जिस शत्रु को उन दोनों भाइयों ने एक बार देख लिया, वह दो घड़ी भी जीवित नहीं रह सकता॥ २३॥

चिताधूमाकुलपथा गृध्रमण्डलमण्डिता।

अचिरेणैव कालेन श्मशानसदृशी भवेत्॥२४॥

‘अब थोड़े ही समय में यह लङ्कापुरी श्मशानभूमि के समान हो जायगी। यहाँ की सड़कों पर चिता का धुआँ फैल रहा होगा और गीधों की जमातें इस भूमि की शोभा बढ़ाती होंगी॥२४॥

अचिरेणैव कालेन प्राप्स्याम्येनं मनोरथम्।

दुष्प्रस्थानोऽयमाभाति सर्वेषां वो विपर्ययः॥२५॥

‘वह समय शीघ्र आने वाला है जब कि मेरा यह मनोरथ पूर्ण होगा। तुम सब लोगों का यह दुराचार तुम्हारे लिये शीघ्र ही विपरीत परिणाम उपस्थित करेगा, ऐसा स्पष्ट जान पड़ता है।॥ २५ ॥

यादृशानि तु दृश्यन्ते लङ्कायामशुभानि तु।

अचिरेणैव कालेन भविष्यति हतप्रभा॥२६॥

‘लङ्का में जैसे-जैसे अशुभ लक्षण दिखायी दे रहे हैं, उनसे जान पड़ता है कि अब शीघ्र ही इसकी चमकदमक नष्ट हो जायगी॥२६॥

नूनं लङ्का हते पापे रावणे राक्षसाधिपे।

शोषमेष्यति दुर्धर्षा प्रमदा विधवा यथा॥२७॥

‘पापाचारी राक्षसराज रावण के मारे जाने पर यह दुर्धर्ष लङ्कापुरी भी निश्चय ही विधवा युवती की भाँति सूख जायगी, नष्ट हो जायगी॥२७॥

पुण्योत्सवसमृद्धा च नष्टभी सराक्षसा।

भविष्यति पुरी लङ्का नष्टभी यथांगना॥२८॥

‘आज जिस लङ्का में पुण्यमय उत्सव होते हैं, वह राक्षसों के सहित अपने स्वामी के नष्ट हो जाने पर विधवा स्त्री के समान श्रीहीन हो जायगी॥ २८॥

नूनं राक्षसकन्यानां रुदतीनां गृहे गृहे।

श्रोष्यामि नचिरादेव दुःखार्तानामिह ध्वनिम्॥२९॥

‘निश्चय ही मैं बहुत शीघ्र लङ्का के घर-घर में दुःख से आतुर होकर रोती हुई राक्षस कन्याओं की क्रन्दन-ध्वनि सुनूँगी॥ २९॥

सान्धकारा हतद्योता हतराक्षसपुंगवा।

भविष्यति पुरी लङ्का निर्दग्धा रामसायकैः॥३०॥

‘श्रीरामचन्द्रजी के सायकों से दग्ध हो जाने के कारण लङ्कापुरी की प्रभा नष्ट हो जायगी। इसमें अन्धकार छा जायगा और यहाँ के सभी प्रमुख राक्षस काल के गाल में चले जायेंगे॥ ३०॥

यदि नाम स शूरो मां रामो रक्तान्तलोचनः।

जानीयाद् वर्तमानां यां राक्षसस्य निवेशने ॥३१॥

‘यह सब तभी सम्भव होगा, जब कि लाल नेत्रप्रान्तवाले शूरवीर भगवान् श्रीराम को यह पता लग जाय कि मैं राक्षस के अन्तःपुर में बंदी बनाकर रखी गयी हूँ॥३१॥

अनेन तु नृशंसेन रावणेनाधमेन मे।

समयो यस्तु निर्दिष्टस्तस्य कालोऽयमागतः॥३२॥

‘इस नीच और नृशंस रावणने मेरे लिये जो समय नियत किया है, उसकी पूर्ति भी निकट भविष्यमें ही हो जायगी॥ ३२॥

स च मे विहितो मृत्युरस्मिन् दुष्टेन वर्तते।

अकार्यं ये न जानन्ति नैर्ऋताः पापकारिणः॥३३॥

‘उसी समय दुष्ट रावण ने मेरे वध का निश्चय किया है। ये पापाचारी राक्षस इतना भी नहीं जानते हैं कि क्या करना चाहिये और क्या नहीं॥ ३३॥

अधर्मात् तु महोत्पातो भविष्यति हि साम्प्रतम्।

नैते धर्मं विजानन्ति राक्षसाः पिशिताशनाः॥३४॥

‘इस समय अधर्म से ही महान् उत्पात होने वाला है। ये मांसभक्षी राक्षस धर्म को बिलकुल नहीं जानते हैं।

ध्रुवं मां प्रातराशार्थं राक्षसः कल्पयिष्यति।

साहं कथं करिष्यामि तं विना प्रियदर्शनम्॥३५॥

‘वह राक्षस अवश्य ही अपने कलेवे के लिये मेरे शरीर के टुकड़े-टुकड़े करा डालेगा। उस समय अपने प्रियदर्शन पति के बिना मैं असहाय अबला क्या करूँगी? ॥ ३५॥

रामं रक्तान्तनयनमपश्यन्ती सुदुःखिता।

क्षिप्रं वैवस्वतं देवं पश्येयं पतिना विना॥३६॥

‘जिनके नेत्रप्रान्त अरुण वर्ण के हैं, उन श्रीरामचन्द्रजी का दर्शन न पाकर अत्यन्त दुःख में पड़ी हुई मुझ असहाय अबला को पति का चरणस्पर्श किये बिना ही शीघ्र यमदेवता का दर्शन करना पड़ेगा। ३६॥

नाजानाज्जीवतीं रामः स मां भरतपूर्वजः।

जानन्तौ तु न कुर्यातां नोर्त्यां हि परिमार्गणम्॥३७॥

‘भरत के बड़े भाई भगवान् श्रीराम यह नहीं जानते हैं कि मैं जीवित हूँ यदि उन्हें इस बात का पता होता तो ऐसा सम्भव नहीं था कि वे पृथ्वी पर मेरी खोज नहीं करते॥ ३७॥

नूनं ममैव शोकेन स वीरो लक्ष्मणाग्रजः।

देवलोकमितो यातस्त्यक्त्वा देहं महीतले॥३८॥

‘मुझे तो यह निश्चित जान पड़ता है कि मेरे ही शोक से लक्ष्मणके बड़े भाई वीरवर श्रीराम भूतल पर अपने शरीर का त्याग करके यहाँ से देवलोक को चले गये हैं॥ ३८॥

धन्या देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः।

मम पश्यन्ति ये वीरं रामं राजीवलोचनम्॥३९॥

‘वे देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षिगण धन्य हैं, जो मेरे पतिदेव वीर-शिरोमणि कमलनयन श्रीराम का दर्शन पा रहे हैं॥ ३९॥

अथवा नहि तस्यार्थो धर्मकामस्य धीमतः।

मया रामस्य राजर्षेर्भार्यया परमात्मनः॥४०॥

‘अथवा केवल धर्म की कामना रखने वाले परमात्मस्वरूप बुद्धिमान् राजर्षि श्रीराम को भार्या से कोई प्रयोजन नहीं है (इसलिये वे मेरी सुध नहीं ले रहे हैं)॥ ४०॥

दृश्यमाने भवेत् प्रीतिः सौहृदं नास्त्यदृश्यतः।

नाशयन्ति कृतजास्तु न रामो नाशयिष्यति॥४१॥

‘जो स्वजन अपनी दृष्टि के सामने होते हैं, उन्हीं पर प्रीति बनी रहती है। जो आँख से ओझल होते हैं, उनपर लोगों का स्नेह नहीं रहता है (शायद इसीलिये श्रीरघुनाथजी मुझे भूल गये हैं, परंतु यह भी सम्भव नहीं है; क्योंकि) कृतघ्न मनुष्य ही पीठ-पीछे प्रेम को ठुकरा देते हैं। भगवान् श्रीराम ऐसा नहीं करेंगे॥ ४१॥

किं वा मय्यगुणाः केचित् किं वा भाग्यक्षयो हि या हि सीता वराहेण हीना रामेण भामिनी॥४२॥

‘अथवा मुझमें कोई दुर्गुण हैं या मेरा भाग्य ही फूट गया है, जिससे इस समय मैं मानिनी सीता अपने परम पूजनीय पति श्रीराम से बिछुड़ गयी हूँ॥ ४२ ॥

श्रेयो मे जीवितान्मर्तुं विहीनाया महात्मना।

रामादक्लिष्टचारित्राच्छूराच्छत्रुनिबर्हणात्॥४३॥

‘मेरे पति भगवान् श्रीराम का  सदाचार अक्षुण्ण है।वे शूरवीर होने के साथ ही शत्रुओं का संहार करने में समर्थ हैं। मैं उनसे संरक्षण पाने के योग्य हूँ, परंतु उन महात्मा से बिछुड़ गयी। ऐसी दशा में जीवित रहने की अपेक्षा मर जाना ही मेरे लिये श्रेयस्कर है॥४३॥

अथवा न्यस्तशस्त्रौ तौ वने मूलफलाशनौ।

भ्रातरौ हि नरश्रेष्ठौ चरन्तौ वनगोचरौ॥४४॥

‘अथवा वन में फल-मूल खाकर विचरने वाले वे दोनों वनवासी बन्धु नरश्रेष्ठ श्रीराम और लक्ष्मण अब अहिंसा का व्रत लेकर अपने अस्त्र-शस्त्रों का परित्याग कर चुके हैं। ४४॥

अथवा राक्षसेन्द्रेण रावणेन दुरात्मना।

छद्मना घातितौ शूरौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥४५॥

अथवा दुरात्मा राक्षसराज रावण ने उन दोनों शूरवीर बन्धु श्रीराम और लक्ष्मण को छल से मरवा डाला है॥४५॥

साहमेवंविधे काले मर्तुमिच्छामि सर्वतः।

न च मे विहितो मृत्युरस्मिन् दुःखेऽतिवर्तति॥४६॥

‘अतः ऐसे समय में मैं सब प्रकार से अपने जीवन का अन्त कर देने की इच्छा रखती हूँ; परंतु मालूम होता है इस महान् दुःख में होते हुए भी अभी मेरी मृत्यु नहीं लिखी है॥ ४६॥

धन्याः खलु महात्मानो मुनयः सत्यसम्मताः।

जितात्मानो महाभागा येषां न स्तः प्रियाप्रिये॥४७॥

‘सत्यस्वरूप परमात्मा को ही अपना आत्मा मानने वाले और अपने अन्तःकरण को वशमें रखने वाले वे महाभाग महात्मा महर्षिगण धन्य हैं, जिनके कोई प्रिय और अप्रिय नहीं हैं॥४७॥

प्रियान्न सम्भवेद् दुःखमप्रियादधिकं भवेत्।

ताभ्यां हि ते वियुज्यन्ते नमस्तेषां महात्मनाम्॥४८॥

जिन्हें प्रिय के वियोग से दुःख नहीं होता और अप्रिय का संयोग प्राप्त होने पर उससे भी अधिक कष्ट का अनुभव नहीं होता—इस प्रकार जो प्रिय और अप्रिय दोनों से परे हैं, उन महात्माओं को मेरा नमस्कार है॥४८॥

साहं त्यक्ता प्रियेणैव रामेण विदितात्मना।

प्राणांस्त्यक्ष्यामि पापस्य रावणस्य गता वशम्॥४९॥

‘मैं अपने प्रियतम आत्मज्ञानी भगवान् श्रीराम से बिछुड़ गयी हूँ और पापी रावण के चंगुल में आ फँसी हूँ; अतः अब इन प्राणों का परित्याग कर दूंगी’। ४९॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे षड्विंशः सर्गः ॥२६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में छब्बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।२६॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
सुन्दरकाण्डम्

त्रिजटा का स्वप्न, राक्षसों के विनाश और श्रीरघुनाथजी की विजय की शुभ सूचना

सप्तविंशः सर्गः

सर्ग-27

इत्युक्ताः सीतया घोरं राक्षस्यः क्रोधमूर्च्छिताः।

काश्चिज्जग्मुस्तदाख्यातुं रावणस्य दुरात्मनः॥१॥

सीता ने जब ऐसी भयंकर बात कही, तब वे राक्षसियाँ क्रोध से अचेत-सी हो गयीं और उनमें से कुछ उस दुरात्मा रावण से वह संवाद कहने के लिये चल दीं॥ १॥

ततः सीतामुपागम्य राक्षस्यो भीमदर्शनाः।

पुनः परुषमेकार्थमनर्थार्थमथाब्रुवन्॥२॥

तत्पश्चात् भयंकर दिखायी देने वाली वे राक्षसियाँ सीता के पास आकर पुनः एक ही प्रयोजन से सम्बन्ध रखने वाली कठोर बातें, जो उनके लिये ही अनर्थकारिणी थीं, कहने लगीं- ॥२॥

अद्येदानीं तवानार्ये सीते पापविनिश्चये।

राक्षस्यो भक्षयिष्यन्ति मांसमेतद् यथासुखम्॥

‘पापपूर्ण विचार रखने वाली अनार्ये सीते! आज इसी समय ये सब राक्षसियाँ मौज के साथ तेरा यह मांस खायेंगी’ ॥३॥

सीतां ताभिरनार्याभिर्दृष्ट्वा संतर्जितां तदा।

राक्षसी त्रिजटा वृद्धा प्रबुद्धा वाक्यमब्रवीत्॥४॥

उन दुष्ट निशाचरियों के द्वारा सीता को इस प्रकार डरायी जाती देख बूढ़ी राक्षसी त्रिजटा, जो तत्काल सोकर उठी थी, उन सबसे कहने लगी— ॥४॥

आत्मानं खादतानार्या न सीतां भक्षयिष्यथ।

जनकस्य सुतामिष्टां स्नुषां दशरथस्य च॥५॥

‘नीच निशाचरियो! तुमलोग अपने-आपको ही खा जाओ। राजा जनक की प्यारी बेटी तथा महाराज दशरथ की प्रिय पुत्रवधू सीताजी को नहीं खा सकोगी॥ ५॥

स्वप्नो ह्यद्य मया दृष्टो दारुणो रोमहर्षणः।

राक्षसानामभावाय भर्तुरस्या भवाय च॥६॥

‘आज मैंने बड़ा भयंकर और रोमाञ्चकारी स्वप्न देखा है, जो राक्षसोंके विनाश और सीतापति के अभ्युदय की सूचना देनेवाला है’ ॥६॥

एवमुक्तास्त्रिजटया राक्षस्यः क्रोधमूर्च्छिताः।

सर्वा एवाब्रुवन् भीतास्त्रिजटां तामिदं वचः॥७॥

त्रिजटा के ऐसा कहने पर वे सब राक्षसियाँ, जो पहले क्रोध से मूर्च्छित हो रही थीं, भयभीत हो उठीं और त्रिजटा से इस प्रकार बोलीं- ॥७॥

कथयस्व त्वया दृष्टः स्वप्नोऽयं कीदृशो निशि।

तासां श्रुत्वा तु वचनं राक्षसीनां मुखोद्गतम्॥८॥

उवाच वचनं काले त्रिजटा स्वप्नसंश्रितम्।

‘अरी! बताओ तो सही, तुमने आज रात में यह कैसा स्वप्न देखा है?’ उन राक्षसियों के मुख से निकली हुई यह बात सुनकर त्रिजटा ने उस समय वह स्वप्न-सम्बन्धी बात इस प्रकार कही- ॥ ८ १/२॥

गजदन्तमयीं दिव्यां शिबिकामन्तरिक्षगाम्॥९॥

युक्तां वाजिसहस्रेण स्वयमास्थाय राघवः।

शुक्लमाल्याम्बरधरो लक्ष्मणेन समागतः॥१०॥

‘आज स्वप्न में मैंने देखा है कि आकाश में चलने वाली एक दिव्य शिबिका है। वह हाथी दाँत की बनी हुई है। उसमें एक हजार घोड़े जुते हुए हैं और श्वेत पुष्पों की माला तथा श्वेत वस्त्र धारण किये स्वयं श्रीरघुनाथजी लक्ष्मण के साथ उस शिबिका पर चढ़कर यहाँ पधारे हैं।

स्वप्ने चाद्य मया दृष्टा सीता शुक्लाम्बरावृता।

सागरेण परिक्षिप्तं श्वेतपर्वतमास्थिता॥११॥

रामेण संगता सीता भास्करण प्रभा यथा।

‘आज स्वप्न में मैंने यह भी देखा है कि सीता श्वेत वस्त्र धारण किये श्वेत पर्वत के शिखर पर बैठी हैं और वह पर्वत समुद्र से घिरा हुआ है, वहाँ जैसे सूर्यदेव से उनकी प्रभा मिलती है, उसी प्रकार सीता श्रीरामचन्द्रजी से मिली हैं॥ ११ १/२॥

राघवश्च पुनर्दृष्टश्चतुर्दन्तं महागजम्॥१२॥

आरूढः शैलसंकाशं चकास सहलक्ष्मणः।

‘मैंने श्रीरघुनाथजी को फिर देखा, वे चार दाँतवाले विशाल गजराजपर, जो पर्वत के समान ऊँचा था,लक्ष्मण के साथ बैठे हुए बड़ी शोभा पा रहे थे। १२ १/२॥

ततस्तु सूर्यसंकाशौ दीप्यमानौ स्वतेजसा॥१३॥

शुक्लमाल्याम्बरधरौ जानकी पर्युपस्थितौ।

तदनन्तर अपने तेज से सूर्य के समान प्रकाशित होते तथा श्वेत माला और श्वेत वस्त्र धारण किये वे दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण जानकीजी के पास आये॥ १३ १/२॥

ततस्तस्य नगस्याग्रे ह्याकाशस्थस्य दन्तिनः॥१४॥

भर्चा परिगृहीतस्य जानकी स्कन्धमाश्रिता।

‘फिर उस पर्वत-शिखर पर आकाश में ही खड़े हुए और पति द्वारा पकड़े गये उस हाथी के कंधे पर जानकीजी भी आ पहुँचीं॥ १४ १/२॥

भर्तुरङ्कात् समुत्पत्य ततः कमललोचना॥१५॥

चन्द्रसूर्यो मया दृष्टा पाणिभ्यां परिमार्जती।

‘इसके बाद कमलनयनी सीता अपने पति के अङ्क से ऊपर को उछलकर चन्द्रमा और सूर्य के पास पहुँच गयीं। वहाँ मैंने देखा, वे अपने दोनों हाथों से चन्द्रमा और सूर्य को पोंछ रही हैं उन पर हाथ फेर रही हैं* ॥ १५ १/२॥

*जो स्त्री या पुरुष स्वप्नमें अपने दोनों हाथोंसे सूर्यमण्डल अथवा चन्द्रमण्डलको छू लेता है, उसे विशाल राज्यकी प्राप्ति होती है। जैसा कि स्वप्नाध्यायका वचन है

आदित्यमण्डलं वापि चन्द्रमण्डलमेव वा।

स्वप्ने गृह्णाति हस्ताभ्यां राज्यं सम्प्राप्नुयान्महत्॥

ततस्ताभ्यां कुमाराभ्यामास्थितः स गजोत्तमः।

सीतया च विशालाक्ष्या लङ्काया उपरि स्थितः॥१६॥

तत्पश्चात् जिस पर वे दोनों राजकुमार और विशाललोचना सीताजी विराजमान थीं, वह महान् गजराज लङ्का के ऊपर आकर खड़ा हो गया॥१६॥

पाण्डुरर्षभयुक्तेन रथेनाष्टयुजा स्वयम्।

इहोपयातः काकुत्स्थः सीतया सह भार्यया॥१७॥

शुक्लमाल्याम्बरधरो लक्ष्मणेन सहागतः।

‘फिर मैंने देखा कि आठ सफेद बैलों से जुते हुए एक रथ पर आरूढ़ हो ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामचन्द्रजी श्वेत पुष्पों की माला और वस्त्र धारण किये अपनी धर्मपत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ यहाँ पधारे हैं।। १७ १/२ ॥

ततोऽन्यत्र मया दृष्टो रामः सत्यपराक्रमः॥१८॥

लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा सीतया सह वीर्यवान्।

आरुह्य पुष्पकं दिव्यं विमानं सूर्यसंनिभम्॥१९॥

उत्तरां दिशमालोच्य प्रस्थितः पुरुषोत्तमः।

‘इसके बाद दूसरी जगह मैंने देखा, सत्यपराक्रमी और बल-विक्रमशाली पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ सूर्यतुल्य तेजस्वी दिव्य पुष्पक विमान पर आरूढ़ हो उत्तर दिशा को लक्ष्य करके यहाँ से प्रस्थित हुए हैं॥ १८-१९ १/२॥

एवं स्वप्ने मया दृष्टो रामो विष्णुपराक्रमः॥२०॥

लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा सीतया सह भार्यया।

‘इस प्रकार मैंने स्वप्न में भगवान् विष्णु के समान पराक्रमी श्रीराम का उनकी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ दर्शन किया॥ २० १/२॥

न हि रामो महातेजाः शक्यो जेतुं सुरासुरैः॥२१॥

राक्षसैर्वापि चान्यैर्वा स्वर्गः पापजनैरिव।

‘श्रीरामचन्द्रजी महातेजस्वी हैं। उन्हें देवता, असुर, राक्षस तथा दूसरे लोग भी कदापि जीत नहीं सकते। ठीक उसी तरह, जैसे पापी मनुष्य स्वर्गलोक पर विजय नहीं पा सकते॥२१ १/२॥

रावणश्च मया दृष्टो मुण्डस्तैलसमुक्षितः॥२२॥

रक्तवासाः पिबन्मत्तः करवीरकृतस्रजः।

विमानात् पुष्पकादद्य रावणः पतितः क्षितौ॥ २३॥

‘मैंने रावण को भी सपने में देखा था। वह मूड़ मुड़ाये तेल से नहाकर लाल कपड़े पहने हुए था। मदिरा पीकर मतवाला हो रहा था तथा करवीर के फूलों की माला पहने हुए था। इसी वेशभूषा में आज रावण पुष्पक विमान से पृथ्वी पर गिर पड़ा था। २२-२३॥

कृष्यमाणः स्त्रिया मुण्डो दृष्टः कृष्णाम्बरः पुनः।

रथेन खरयुक्तेन रक्तमाल्यानुलेपनः॥२४॥

पिबंस्तैलं हसन्नृत्यन् भ्रान्तचित्ताकुलेन्द्रियः।

गर्दभेन ययौ शीघ्रं दक्षिणां दिशमास्थितः॥२५॥

‘एक स्त्री उस मुण्डित-मस्तक रावण को कहीं खींचे लिये जा रही थी। उस समय मैंने फिर देखा, रावण ने काले कपड़े पहन रखे हैं। वह गधे जुते हुए रथ से यात्रा कर रहा था। लाल फूलों की माला और लाल चन्दन से विभूषित था। तेल पीता, हँसता और नाचता था। पागलों की तरह उसका चित्त भ्रान्त और इन्द्रियाँ व्याकुल थीं। वह गधे पर सवार हो शीघ्रतापूर्वक दक्षिण-दिशा की ओर जा रहा था। २४-२५॥

पुनरेव मया दृष्टो रावणो राक्षसेश्वरः।

पतितोऽवाक्शिरा भूमौ गर्दभाद् भयमोहितः॥२६॥

‘तदनन्तर मैंने फिर देखा राक्षसराज रावण गधे से नीचे भूमि पर गिर पड़ा है। उसका सिर नीचे की ओर है (और पैर ऊपर की ओर) तथा वह भय से मोहित हो रहा है॥२६॥

सहसोत्थाय सम्भ्रान्तो भया मदविह्वलः।

उन्मत्तरूपो दिग्वासा दुर्वाक्यं प्रलपन् बहु॥२७॥

दुर्गन्धं दुःसहं घोरं तिमिरं नरकोपमम्।

मलपकं प्रविश्याशु मग्नस्तत्र स रावणः॥२८॥

‘फिर वह भयातुर हो घबराकर सहसा उठा और मद से विह्वल हो पागल के समान नंग-धडंग वेष में बहुत-से दुर्वचन (गाली आदि) बकता हुआ आगे बढ़ गया। सामने ही दुर्गन्धयुक्त दुःसह घोर अन्धकारपूर्ण और नरकतुल्य मल का पङ्क था, रावण उसी में घुसा और वहीं डूब गया॥ २७-२८॥

प्रस्थितो दक्षिणामाशां प्रविष्टोऽकर्दमं ह्रदम्।

कण्ठे बद्ध्वा दशग्रीवं प्रमदा रक्तवासिनी॥२९॥

काली कर्दमलिप्तांगी दिशं याम्यां प्रकर्षति।

एवं तत्र मया दृष्टः कुम्भकर्णो महाबलः॥३०॥

‘तदनन्तर फिर देखा, रावण दक्षिण की ओर जा रहा है। उसने एक ऐसे तालाब में प्रवेश किया है, जिसमें कीचड़ का नाम नहीं है। वहाँ एक काले रंग की स्त्री है, जिसके अंगों में कीचड़ लिपटी हुई है। वह युवती लाल वस्त्र पहने हुए है और रावण का गला बाँधकर उसे दक्षिण-दिशा की ओर खींच रही है। वहाँ महाबली कुम्भकर्ण को भी मैंने इसी अवस्था में देखा है।

रावणस्य सुताः सर्वे मुण्डास्तैलसमुक्षिताः।

वराहेण दशग्रीवः शिशुमारेण चेन्द्रजित्॥३१॥

उष्टेण कुम्भकर्णश्च प्रयातो दक्षिणां दिशम्।

‘रावण के सभी पुत्र भी मूड़ मुड़ाये और तेल में नहाये दिखायी दिये हैं। यह भी देखने में आया कि रावण सूअर पर, इन्द्रजित् सँस पर और कुम्भकर्ण ऊँट पर सवार हो दक्षिण-दिशा को गये हैं। ३१ १/२॥

एकस्तत्र मया दृष्टः श्वेतच्छत्रो विभीषणः॥३२॥

शुक्लमाल्याम्बरधरः शुक्लगन्धानुलेपनः।

‘राक्षसों में एकमात्र विभीषण ही ऐसे हैं, जिन्हें मैंने वहाँ श्वेत छत्र लगाये, सफेद माला पहने, श्वेत वस्त्र धारण किये तथा श्वेत चन्दन और अंगराग लगाये देखा है॥ ३२ १/२॥

शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषैर्नृत्तगीतैरलंकृतः॥३३॥

आरुह्य शैलसंकाशं मेघस्तनितनिःस्वनम्।

चतुर्दन्तं गजं दिव्यमास्ते तत्र विभीषणः॥३४॥

चतुर्भिः सचिवैः सार्धं वैहायसमुपस्थितः॥३५॥

‘उनके पास शकध्वनि हो रही थी, नगाड़े बजाये जा रहे थे। इनके गम्भीर घोष के साथ ही नृत्य और गीत भी हो रहे थे, जो विभीषण की शोभा बढ़ा रहे थे। विभीषण वहाँ अपने चार मन्त्रियों के साथ पर्वत के समान विशालकाय मेघ के समान गम्भीर शब्द करने वाले तथा चार दाँतों वाले दिव्य गजराजपर आरूढ़ हो आकाश में खड़े थे॥ ३३–३५॥

समाजश्च महान् वृत्तो गीतवादित्रनिःस्वनः।

पिबतां रक्तमाल्यानां रक्षसां रक्तवाससाम्॥३६॥

‘यह भी देखने में आया कि तेल पीने वाले तथा लाल माला और लाल वस्त्र धारण करने वाले राक्षसों का वहाँ बहुत बड़ा समाज जुटा हुआ है एवं गीतों और वाद्यों की मधुर ध्वनि हो रही है॥ ३६॥

लङ्का चेयं पुरी रम्या सवाजिरथकुञ्जरा।

सागरे पतिता दृष्टा भग्नगोपुरतोरणा॥३७॥

‘यह रमणीय लङ्कापुरी घोड़े, रथ और हाथियोंसहित समुद्र में गिरी हुई देखी गयी है। इसके बाहरी और भीतरी दरवाजे टूट गये हैं॥ ३७॥

लङ्का दृष्टा मया स्वप्ने रावणेनाभिरक्षिता।

दग्धा रामस्य दूतेन वानरेण तरस्विना॥३८॥

‘मैंने स्वप्न में देखा है कि रावण द्वारा सुरक्षित लङ्कापुरी को श्रीरामचन्द्रजी का दूत बनकर आये हुए एक वेगशाली वानर ने जलाकर भस्म कर दिया है। ३८॥

पीत्वा तैलं प्रमत्ताश्च प्रहसन्त्यो महास्वनाः।

लङ्कायां भस्मरूक्षायां सर्वा राक्षसयोषितः॥३९॥

‘राख से रूखी हुई लङ्का में सारी राक्षसरमणियाँ तेल पीकर मतवाली हो बड़े जोर-जोर से ठहाका मारकर हँसती हैं॥ ३९॥

कुम्भकर्णादयश्चेमे सर्वे राक्षसपंगवाः।

रक्तं निवसनं गृह्य प्रविष्टा गोमयह्रदम्॥४०॥

‘कुम्भकर्ण आदि ये समस्त राक्षसशिरोमणि वीर लाल कपड़े पहनकर गोबर के कुण्ड में घुस गये हैं। ४०॥

अपगच्छत पश्यध्वं सीतामाप्नोति राघवः।

घातयेत् परमामर्षी युष्मान् सार्धं हि राक्षसैः॥४१॥

‘अतः अब तुमलोग हट जाओ और देखो कि किस तरह श्रीरघुनाथजी सीता को प्राप्त कर रहे हैं। वे बड़े अमर्षशील हैं, राक्षसों के साथ तुम सबको भी मरवा डालेंगे॥४१॥

प्रियां बहुमतां भार्यां वनवासमनुव्रताम्।

भसितां तर्जितां वापि नानुमंस्यति राघवः॥४२॥

‘जिन्होंने वनवास में भी उनका साथ दिया है, उन अपनी पतिव्रता भार्या और परमादरणीया प्रियतमा सीता का इस तरह धमकाया और डराया जाना श्रीरघुनाथजी कदापि सहन नहीं करेंगे॥४२॥

तदलं क्रूरवाक्यैश्च सान्त्वमेवाभिधीयताम्।

अभियाचाम वैदेहीमेतद्धि मम रोचते॥४३॥

‘अतः अब इस तरह कठोर बातें सुनाना छोड़ो; क्योंकि इनसे कोई लाभ नहीं होगा। अब तो मधुर वचन का ही प्रयोग करो। मुझे तो यही अच्छा लगता है कि हमलोग विदेहनन्दिनी सीता से कृपा और क्षमा की याचना करें॥४३॥

यस्या ह्येवंविधः स्वप्नो दुःखितायाः प्रदृश्यते।

सा दुःखैर्बहुभिर्मुक्ता प्रियं प्राप्नोत्यनुत्तमम्॥४४॥

‘जिस दुःखिनी नारीके विषयमें ऐसा स्वप्न देखा जाता है, वह बहुसंख्यक दुःखोंसे छुटकारा पाकर परम उत्तम प्रिय वस्तु प्राप्त कर लेती है॥४४॥

भर्त्तितामपि याचध्वं राक्षस्यः किं विवक्षया।

राघवाद्धि भयं घोरं राक्षसानामुपस्थितम्॥४५॥

‘राक्षसियो! मैं जानती हूँ, तुम्हें कुछ और कहने या बोलने की इच्छा है; किंतु इससे क्या होगा? यद्यपि तुमने सीता को बहुत धमकाया है तो भी इनकी शरण में आकर इनसे अभय की याचना करो; क्योंकि श्रीरघुनाथजी की ओर से राक्षसों के लिये घोर भय उपस्थित हुआ है॥ ४५॥

प्रणिपातप्रसन्ना हि मैथिली जनकात्मजा।

अलमेषा परित्रातुं राक्षस्यो महतो भयात्॥४६॥

‘राक्षसियो! जनकनन्दिनी मिथिलेशकुमारी सीता केवल प्रणाम करने से ही प्रसन्न हो जायँगी। ये ही उस महान् भय से तुम्हारी रक्षा करने में समर्थ हैं। ४६॥

अपि चास्या विशालाक्ष्या न किंचिदुपलक्षये।

विरूपमपि चांगेषु सुसूक्ष्ममपि लक्षणम्॥४७॥

‘इन विशाललोचना सीता के अंगों में मुझे कोई सूक्ष्म-से-सूक्ष्म भी विपरीत लक्षण नहीं दिखायी देता (जिससे समझा जाय कि ये सदा कष्ट में ही रहेंगी)॥ ४७॥

छायावैगुण्यमात्रं तु शङ्के दुःखमुपस्थितम्।

अदुःखार्हामिमां देवीं वैहायसमुपस्थिताम्॥४८॥

‘मैं तो समझती हूँ कि इन्हें जो वर्तमान दुःख प्राप्त हुआ है, वह ग्रहण के समय चन्द्रमा पर पड़ी हुई छाया के समान थोड़ी ही देर का है; क्योंकि ये देवी सीता मुझे स्वप्न में विमान पर बैठी दिखायी दी हैं, अतः ये दुःख भोगने के योग्य कदापि नहीं हैं॥४८॥

अर्थसिद्धिं तु वैदेह्याः पश्याम्यहमुपस्थिताम्।

राक्षसेन्द्रविनाशं च विजयं राघवस्य च॥४९॥

‘मुझे तो अब जानकीजी के अभीष्ट मनोरथ की सिद्धि उपस्थित दिखायी देती है। राक्षसराज रावण के विनाश और रघुनाथजी की विजय में अब अधिक विलम्ब नहीं है॥४९॥

निमित्तभूतमेतत् तु श्रोतुमस्या महत् प्रियम्।

दृश्यते च स्फुरच्चक्षुः पद्मपत्रमिवायतम्॥५०॥

‘कमलदल के समान इनका विशाल बायाँ नेत्र फड़कता दिखायी देता है। यह इस बात का सूचक है कि इन्हें शीघ्र ही अत्यन्त प्रिय संवाद सुनने को मिलेगा॥

ईषद्धि हृषितो वास्या दक्षिणाया ह्यदक्षिणः।

अकस्मादेव वैदेह्या बाहुरेकः प्रकम्पते॥५१॥

‘इन उदारहृदया विदेहराजकुमारी की एक बायीं बाँह कुछ रोमाञ्चित होकर सहसा काँपने लगी है (यह भी शुभ का ही सूचक है) ॥५१॥

करेणुहस्तप्रतिमः सव्यश्चोरुरनुत्तमः।

वेपन् कथयतीवास्या राघवं पुरतः स्थितम्॥५२॥

‘हाथी की सैंड़ के समान जो इनकी परम उत्तम बायीं जाँघ है, वह भी कम्पित होकर मानो यह सूचित कर रही है कि अब श्रीरघुनाथजी शीघ्र ही तुम्हारे सामने उपस्थित होंगे॥५२॥

पक्षी च शाखानिलयं प्रविष्टः पुनः पुनश्चोत्तमसान्त्ववादी।

सुस्वागतां वाचमुदीरयाणः पुनः पुनश्चोदयतीव हृष्टः॥५३॥

‘देखो, सामने यह पक्षी शाखा के ऊपर अपने घोंसले में बैठकर बारम्बार उत्तम सान्त्वनापूर्ण मीठी बोली बोल रहा है। इसकी वाणी से ‘सुस्वागतम्’ की ध्वनि निकल रही है और इसके द्वारा यह हर्ष में भरकर मानो पुनः-पुनः मंगलप्राप्ति की सूचना दे रहा है अथवा आने वाले प्रियतम की अगवानी के लिये प्रेरित कर रहा है’ ॥ ५३॥

ततः सा ह्रीमती बाला भर्तुर्विजयहर्षिता।

अवोचद् यदि तत् तथ्यं भवेयं शरणं हि वः॥५४॥

इस प्रकार पतिदेव की विजयके संवाद से हर्ष में भरी हुई लजीली सीता उन सबसे बोलीं-‘यदि तुम्हारी बात ठीक हुई तो मैं अवश्य ही तुम सबकी रक्षा करूँगी’ ॥ ५४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे सप्तविंशः सर्गः ॥२७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में सत्ताईसवाँ सर्ग पूरा हुआ।२७॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
सुन्दरकाण्डम्

विलाप करती हुई सीताका प्राण त्यागके लिये उद्यत होना

अष्टाविंशः सर्गः

सर्ग-28

सा राक्षसेन्द्रस्य वचो निशम्य तद् रावणस्याप्रियमप्रियार्ता।

सीता वितत्रास यथा वनान्ते सिंहाभिपन्ना गजराजकन्या॥१॥

पति के विरह के दुःख से व्याकुल हुई सीता राक्षसराज रावण के उन अप्रिय वचनों को याद करके उसी तरह भयभीत हो गयीं, जैसे वन में सिंह के पंजे में पड़ी हुई कोई गजराज की बच्ची॥१॥

सा राक्षसीमध्यगता च भीरुर्वाग्भिर्भृशं रावणतर्जिता च।

कान्तारमध्ये विजने विसृष्टा बालेव कन्या विललाप सीता॥२॥

राक्षसियों के बीच में बैठकर उनके कठोर वचनों से बारम्बार धमकायी और रावण द्वारा फटकारी गयी भीरु स्वभाववाली सीता निर्जन एवं बीहड़ वन में अकेली छूटी हुई अल्पवयस्का बालिका के समान विलाप करने लगीं॥२॥

सत्यं बतेदं प्रवदन्ति लोके नाकालमृत्युर्भवतीति सन्तः।

यत्राहमेवं परिभय॑माना जीवामि यस्मात् क्षणमप्यपुण्या॥३॥

वे बोलीं—’संतजन लोक में यह बात ठीक ही कहते हैं कि बिना समय आये किसी की मृत्यु नहीं होती, तभी तो इस प्रकार धमकायी जाने पर भी मैं पुण्यहीना नारी क्षणभर भी जीवित रह पाती हूँ॥३॥

सुखाद् विहीनं बहुदुःखपूर्णमिदं तु नूनं हृदयं स्थिरं मे।

विदीर्यते यन्न सहस्रधाद्य वज्राहतं श्रृंगमिवाचलस्य॥४॥

‘मेरा यह हृदय सुख से रहित और अनेक प्रकार के दुःखों से भरा होने पर भी निश्चय ही अत्यन्त दृढ़ है। इसीलिये वज्र के मारे हुए पर्वतशिखर की भाँति आज इसके सहस्रों टुकड़े नहीं हो जाते॥४॥

नैवास्ति नूनं मम दोषमत्र वध्याहमस्याप्रियदर्शनस्य।

भावं न चास्याहमनुप्रदातुमलं द्विजो मन्त्रमिवाद्विजाय॥५॥

‘मैं इस दुष्ट रावण के हाथ से मारी जाने वाली हूँ, इसलिये यहाँ आत्मघात करने से भी मुझे कोई दोष नहीं लग सकता। कुछ भी हो, जैसे द्विज किसी शूद्र को वेदमन्त्र का उपदेश नहीं देता, उसी प्रकार मैं भी इस निशाचर को अपने हृदय का अनुराग नहीं दे सकती॥ ५॥

तस्मिन्ननागच्छति लोकनाथे गर्भस्थजन्तोरिव शल्यकृन्तः।

नूनं ममांगान्यचिरादनार्यः शस्त्रैः शितैश्छेत्स्यति राक्षसेन्द्रः॥६॥

‘हाय! लोकनाथ भगवान् श्रीराम के आने से पहले ही यह दुष्ट राक्षसराज निश्चय ही अपने तीखे शस्त्रों से मेरे अंगों के शीघ्र ही टुकड़े-टुकड़े कर डालेगा। ठीक वैसे ही, जैसे शल्यचिकित्सक किसी विशेष अवस्था में गर्भस्थ शिशु के टूक-टूक कर देता है (अथवा जैसे इन्द्र ने दिति के गर्भ में स्थित शिशु के उनचास टुकड़े कर डाले थे)॥६॥

दुःखं बतेदं ननु दुःखिताया मासौ चिरायाभिगमिष्यतो द्रौ।

बद्धस्य वध्यस्य यथा निशान्ते राजोपरोधादिव तस्करस्य॥७॥

‘मैं बड़ी दुःखिया हूँ दुःख की बात है कि मेरी अवधि के ये दो महीने भी जल्दी ही समाप्त हो जायँगे। राजा के कारागार में कैद हुए और रात्रि के अन्त में फाँसी की सजा पाने वाले अपराधी चोर की जो दशा होती है, वही मेरी भी है॥७॥

हा राम हा लक्ष्मण हा सुमित्रे हा राममातः सह मे जनन्यः।

एषा विपद्याम्यहमल्पभाग्या महार्णवे नौरिव मूढवाता॥८॥

‘हा राम! हा लक्ष्मण! हा सुमित्रे! हा श्रीरामजननी कौसल्ये! और हा मेरी माताओ! जिस प्रकार बवंडर में पड़ी हुई नौका महासागर में डूब जाती है, उसी प्रकार आज मैं मन्दभागिनी सीता प्राणसङ्कट की दशा में पड़ी हुई हूँ॥८॥

तरस्विनौ धारयता मृगस्य सत्त्वेन रूपं मनुजेन्द्रपुत्रौ।

नूनं विशस्तौ मम कारणात् तौ सिंहर्षभौ द्वाविव वैद्युतेन॥९॥

‘निश्चय ही उस मृगरूपधारी जीवने मेरे कारण उन दोनों वेगशाली राजकुमारों को मार डाला होगा। जैसे दो श्रेष्ठ सिंह बिजली से मार दिये जायँ, वही दशा उन दोनों भाइयों की हुई होगी॥९॥

नूनं स कालो मृगरूपधारी मामल्पभाग्यां लुलुभे तदानीम्।

यत्रार्यपुत्रौ विससर्ज मूढा रामानुजं लक्ष्मणपूर्वजं च॥१०॥

‘अवश्य ही उस समय काल ने ही मृग का रूप धारण करके मुझ मन्दभागिनी को लुभाया था, जिससे प्रभावित हो मुझ मूढ़ नारी ने उन दोनों आर्यपुत्रों श्रीराम और लक्ष्मण को उसके पीछे भेज दिया था। १०॥

हा राम सत्यव्रत दीर्घबाहो हा पूर्णचन्द्रप्रतिमानवकत्र।

हा जीवलोकस्य हितः प्रियश्च वध्यां न मां वेत्सि हि राक्षसानाम्॥११॥

‘हा सत्यव्रतधारी महाबाहु श्रीराम! हा पूर्ण चन्द्रमा के समान मनोहर मुखवाले रघुनन्दन! हा जीवजगत् के हितैषी और प्रियतम! आपको पता नहीं है कि मैं राक्षसों के हाथ से मारी जाने वाली हूँ॥ ११॥

अनन्यदेवत्वमियं क्षमा च भूमौ च शय्या नियमश्च धर्मे।

पतिव्रतात्वं विफलं ममेदं कृतं कृतघ्नेष्विव मानुषाणाम्॥१२॥

‘मेरी यह अनन्योपासना, क्षमा, भूमिशयन, धर्मसम्बन्धी नियमों का पालन और पतिव्रतपरायणता —ये सब-के-सब कृतघ्नों के प्रति किये गये मनुष्यों के उपकार की भाँति निष्फल हो गये॥ १२ ॥

मोघो हि धर्मश्चरितो ममायं तथैकपत्नीत्वमिदं निरर्थकम्।

या त्वां न पश्यामि कृशा विवर्णा हीना त्वया संगमने निराशा॥१३॥

‘प्रभो! यदि मैं अत्यन्त कृश और कान्तिहीन होकर आपसे बिछुड़ी ही रह गयी तथा आपसे मिलने की आशा खो बैठी, तब तो मैंने जिसका जीवनभर आचरण किया है, वह धर्म मेरे लिये व्यर्थ हो गया और यह एकपत्नीव्रत भी किसी काम नहीं आया। १३॥

पितुर्निदेशं नियमेन कृत्वा वनान्निवृत्तश्चरितव्रतश्च।

स्त्रीभिस्तु मन्ये विपुलेक्षणाभिः संरस्यसे वीतभयः कृतार्थः॥१४॥

‘मैं तो समझती हूँ आप नियमानुसार पिता की आज्ञा का पालन करके अपने व्रत को पूर्ण करने के पश्चात् जब वन से लौटेंगे, तब निर्भय एवं सफल मनोरथ हो विशाल नेत्रोंवाली बहुत-सी सुन्दरियों के साथ विवाह करके उनके साथ रमण करेंगे॥१४॥

अहं तु राम त्वयि जातकामा चिरं विनाशाय निबद्धभावा।

मोघं चरित्वाथ तपो व्रतं च त्यक्ष्यामि धिग्जीवितमल्पभाग्याम्॥१५॥

‘किंतु श्रीराम! मैं तो केवल आपमें ही अनुराग रखती हूँ। मेरा हृदय चिरकालतक आपसे ही बँधा रहेगा। मैं अपने विनाश के लिये ही आपसे प्रेम करती हूँ। अबतक मैंने तप और व्रत आदि जो कुछ भी किया है, वह मेरे लिये व्यर्थ सिद्ध हुआ है। उस अभीष्ट फल को न देने वाले धर्म का आचरण करके अब मुझे अपने प्राणों का परित्याग करना पड़ेगा। अतः मुझ मन्दभागिनी को धिक्कार है॥ १५ ॥

संजीवितं क्षिप्रमहं त्यजेयं विषेण शस्त्रेण शितेन वापि।

विषस्य दाता न तु मेऽस्ति कश्चिच्छस्त्रस्य वा वेश्मनि राक्षसस्य॥१६॥

‘मैं शीघ्र ही किसी तीखे शस्त्र अथवा विष से अपने प्राण त्याग दूंगी; परंतु इस राक्षस के यहाँ मुझे कोई विष या शस्त्र देने वाला भी नहीं है’ ॥ १६॥

शोकाभितप्ता बहुधा विचिन्त्य सीताथ वेणीग्रथनं गृहीत्वा।

उद्बद्ध्य वेण्युद्ग्रथनेन शीघ्रमहं गमिष्यामि यमस्य मूलम्॥१७॥

शोक से संतप्त हुई सीता ने इसी प्रकार बहुत कुछ विचार करके अपनी चोटी को पकड़कर निश्चय किया कि मैं शीघ्र ही इस चोटी से फाँसी लगाकर यमलोक में पहुँच जाऊँगी॥ १७॥

उपस्थिता सा मृदुसर्वगात्री शाखां गृहीत्वा च नगस्य तस्य।

तस्यास्तु रामं परिचिन्तयन्त्या रामानुजं स्वं च कुलं शुभांगयाः॥१८॥

तस्या विशोकानि तदा बहूनि धैर्यार्जितानि प्रवराणि लोके।

प्रादुर्निमित्तानि तदा बभूवुः पुरापि सिद्धान्युपलक्षितानि॥१९॥

सीताजी के सभी अंग बड़े कोमल थे। वे उस अशोक-वृक्ष के निकट उसकी शाखा पकड़कर खड़ी हो गयीं। इस प्रकार प्राण-त्याग के लिये उद्यत हो जब वे श्रीराम, लक्ष्मण और अपने कुल के विषय में विचार करने लगीं, उस समय शुभांगी सीता के समक्ष ऐसे बहुत-से लोकप्रसिद्ध श्रेष्ठ शकुन प्रकट हुए, जो शोक की निवृत्ति करने वाले और उन्हें ढाढ़स बँधाने वाले थे। उन शकुनों का दर्शन और उनके शुभ फलों का अनुभव उन्हें पहले भी हो चुका था। १८-१९॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डेऽष्टाविंशः सर्गः॥२८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में अट्ठाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥२८॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
सुन्दरकाण्डम्

सीताजी के शुभ शकुन

एकोनत्रिंशः सर्गः

सर्ग-29

तथागतां तां व्यथितामनिन्दितां व्यतीतहर्षां परिदीनमानसाम्।

शुभां निमित्तानि शुभानि भेजिरे नरं श्रिया जुष्टमिवोपसेविनः॥१॥

इस प्रकार अशोकवृक्ष के नीचे आने पर बहुत-से शुभ शकुन प्रकट हो उन व्यथितहृदया, सती-साध्वी, हर्षशून्य, दीनचित्त तथा शुभलक्षणा सीता का उसी तरह सेवन करने लगे, जैसे श्रीसम्पन्न पुरुष के पास सेवा करने वाले लोग स्वयं पहुँच जाते हैं॥१॥

तस्याः शुभं वाममरालपक्ष्मराज्यावृतं कृष्णविशालशुक्लम्।

प्रास्पन्दतैकं नयनं सुकेश्या मीनाहतं पद्ममिवाभिताम्रम्॥२॥

उस समय सुन्दर केशोंवाली सीता का बाँकी बरौनियों से घिरा हुआ परम मनोहर काला, श्वेत और विशाल बायाँ नेत्र फड़कने लगा। जैसे मछली के आघात से लाल कमल हिलने लगा हो॥२॥

भुजश्च चार्वञ्चितवृत्तपीनः परार्घ्यकालागुरुचन्दनार्हः।

अनुत्तमेनाघ्युषितः प्रियेण चिरेण वामः समवेपताशु॥३॥

साथ ही उनकी सुन्दर प्रशंसित गोलाकार मोटी, बहुमूल्य काले अगुरु और चन्दन से चर्चित होनेयोग्य तथा परम उत्तम प्रियतम द्वारा चिरकाल से सेवित बायीं भुजा भी तत्काल फड़क उठी॥३॥

गजेन्द्रहस्तप्रतिमश्च पीनस्तयोर्द्वयोः संहतयोस्तु जातः।

प्रस्पन्दमानः पुनरूरुरस्या रामं पुरस्तात् स्थितमाचचक्षे॥४॥

फिर उनकी परस्पर जुड़ी हुई दोनों जाँघों में से एक बायीं जाँघ, जो गजराज की ढूँड़ के समान पीन (मोटी) थी, बारम्बार फड़ककर मानो यह सूचना देने लगी कि भगवान् श्रीराम तुम्हारे सामने खड़े हैं। ४॥

शुभं पुनर्हेमसमानवर्ण मीषद्रजोध्वस्तमिवातुलाक्ष्याः।

वासः स्थितायाः शिखराग्रदन्त्याः किंचित् परिसंसत चारुगात्र्याः॥५॥

तत्पश्चात् अनार के बीज की भाँति सुन्दर दाँत, मनोहर गात्र और अनुपम नेत्रवाली सीता का, जो वहाँ वृक्ष के नीचे खड़ी थीं, सोने के समान रंगवाला किंचित् मलिन रेशमी पीताम्बर तनिक-सा खिसक गया और भावी शुभ की सूचना देने लगा॥५॥

एतैर्निमित्तैरपरैश्च सुभ्रूः संचोदिता प्रागपि साधुसिद्धैः।

वातातपक्लान्तमिव प्रणष्टं वर्षेण बीजं प्रतिसंजहर्ष ॥६॥

इनसे तथा और भी अनेक शकुनों से, जिनके द्वारा पहले भी मनोरथसिद्धि का परिचय मिल चुका था, प्रेरित हुई सुन्दर भौंहोंवाली सीता उसी प्रकार हर्ष से खिल उठीं, जैसे हवा और धूप से सूखकर नष्ट हुआ बीज वर्षा के जल से सिंचकर हरा हो गया हो॥६॥

तस्याः पुनर्बिम्बफलोपमोष्ठं स्वक्षिकेशान्तमरालपक्ष्म।

वक्त्रं बभासे सितशुक्लदंष्ट्र राहोर्मुखाच्चन्द्र इव प्रमुक्तः॥७॥

उनका बिम्बफल के समान लाल ओठों, सुन्दर नेत्रों, मनोहर भौंहों, रुचिर केशों, बाँकी बरौनियों तथा श्वेत, उज्ज्वल दाँतों से सुशोभित मुख राहु के ग्रास से मुक्त हुए चन्द्रमा की भाँति प्रकाशित होने लगा॥ ७॥

सा वीतशोका व्यपनीततन्द्रा शान्तज्वरा हर्षविबुद्धसत्त्वा।

अशोभतार्या वदनेन शुक्ले शीतांशुना रात्रिरिवोदितेन॥८॥

उनका शोक जाता रहा, सारी थकावट दूर हो गयी, मन का ताप शान्त हो गया और हृदय हर्ष से खिल उठा। उस समय आर्या सीता शुक्लपक्ष में उदित हुए शीतरश्मि चन्द्रमा से सुशोभित रात्रि की भाँति अपने मनोहर मुख से अद्भुत शोभा पाने लगीं॥ ८॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे एकोनत्रिंशः सर्गः॥ २९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में उनतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥२९॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
सुन्दरकाण्डम्

सीताजी से वार्तालाप करने के विषय में हनुमान जी का विचार करना

त्रिंशः सर्गः

सर्ग-30

हनुमानपि विक्रान्तः सर्वं शुश्राव तत्त्वतः।

सीतायास्त्रिजटायाश्च राक्षसीनां च तर्जितम्॥१॥

पराक्रमी हनुमान जी ने भी सीताजी का विलाप, त्रिजटाकी स्वप्नचर्चा तथा राक्षसियों की डाँट-डपट— ये सब प्रसंग ठीक-ठीक सुन लिये॥१॥

अवेक्षमाणस्तां देवी देवतामिव नन्दने।

ततो बहुविधां चिन्तां चिन्तयामास वानरः॥२॥

सीताजी ऐसी जान पड़ती थीं मानो नन्दनवन में कोई देवी हों। उन्हें देखते हुए वानरवीर हनुमान जी तरह-तरह की चिन्ता करने लगे- ॥२॥

यां कपीनां सहस्राणि सुबहून्ययुतानि च।

दिक्षु सर्वासु मार्गन्ते सेयमासादिता मया॥३॥

“जिन सीताजी को हजारों-लाखों वानर समस्त दिशाओं में ढूँढ़ रहे हैं, आज उन्हें मैंने पा लिया॥३॥

चारेण तु सुयुक्तेन शत्रोः शक्तिमवेक्षता।

गूढेन चरता तावदवेक्षितमिदं मया॥४॥

राक्षसानां विशेषश्च पुरी चेयं निरीक्षिता।

राक्षसाधिपतेरस्य प्रभावो रावणस्य च॥५॥

‘मैं स्वामी द्वारा नियुक्त दूत बनकर गुप्तरूप से शत्रु की शक्ति का पता लगा रहा था। इसी सिलसिले में मैंने राक्षसों के तारतम्य का, इस पुरी का तथा इस राक्षसराज रावण के प्रभाव का भी निरीक्षण कर लिया॥ ४-५॥

यथा तस्याप्रमेयस्य सर्वसत्त्वदयावतः।

समाश्वासयितुं भार्यां पतिदर्शनकांक्षिणीम्॥६॥

‘श्रीसीताजी असीम प्रभावशाली तथा सब जीवों पर दया करने वाले भगवान् श्रीराम की भार्या हैं। ये अपने पतिदेव का दर्शन पाने की अभिलाषा रखती हैं, अतः इन्हें सान्त्वना देना उचित है॥६॥

अहमाश्वासयाम्येनां पूर्णचन्द्रनिभाननाम्।

अदृष्टदुःखां दुःखस्य न ह्यन्तमधिगच्छतीम्॥७॥

‘इनका मुख पूर्णचन्द्रमा के समान मनोहर है। इन्होंने पहले कभी ऐसा दुःख नहीं देखा था, परंतु इस समय दुःखका पार नहीं पा रही हैं। अतः मैं इन्हें आश्वासन दूंगा॥७॥

यदि ह्यहं सतीमेनां शोकोपहतचेतनाम्।

अनाश्वास्य गमिष्यामि दोषवद् गमनं भवेत्॥८॥

‘ये शोक के कारण अचेत-सी हो रही हैं, यदि मैं इन सती-साध्वी सीता को सान्त्वना दिये बिना ही चला जाऊँगा तो मेरा वह जाना दोषयुक्त होगा॥ ८॥

गते हि मयि तत्रेयं राजपुत्री यशस्विनी।

परित्राणमपश्यन्ती जानकी जीवितं त्यजेत्॥९॥

‘मेरे चले जाने पर अपनी रक्षा का कोई उपाय न देखकर ये यशस्विनी राजकुमारी जानकी अपने जीवन का अन्त कर देंगी॥९॥

यथा च स महाबाहुः पूर्णचन्द्रनिभाननः।

समाश्वासयितुं न्याय्यः सीतादर्शनलालसः॥१०॥

‘पूर्णचन्द्रमा के समान मनोहर मुखवाले महाबाहु श्रीरामचन्द्रजी भी सीताजी के दर्शन के लिये उत्सुक हैं। जिस प्रकार उन्हें सीता का संदेश सुनाकर सान्त्वना देना उचित है, उसी प्रकार सीता को भी उनका संदेश सुनाकर आश्वासन देना उचित होगा॥१०॥

निशाचरीणां प्रत्यक्षमक्षमं चाभिभाषितम्।

कथं नु खलु कर्तव्यमिदं कृच्छ्रगतो ह्यहम्॥११॥

‘परंतु राक्षसियों के सामने इनसे बात करना मेरे लिये ठीक नहीं होगा। ऐसी अवस्था में यह कार्य कैसे सम्पन्न करना चाहिये, यही निश्चय करना मेरे लिये सबसे बड़ी कठिनाई है॥ ११॥

अनेन रात्रिशेषेण यदि नाश्वास्यते मया।

सर्वथा नास्ति संदेहः परित्यक्ष्यति जीवितम्॥१२॥

‘यदि इस रात्रि के बीतते-बीतते मैं सीता को सान्त्वना नहीं दे देता हूँ तो ये सर्वथा अपने जीवन का परित्याग कर देंगी, इसमें संदेह नहीं है॥ १२ ॥

रामस्तु यदि पृच्छेन्मां किं मां सीताब्रवीद्वचः।

किमहं तं प्रतिब्रूयामसम्भाष्य सुमध्यमाम्॥१३॥

‘यदि श्रीरामचन्द्रजी मुझसे पूछे कि सीता ने मेरे लिये क्या संदेश भेजा है तो इन सुमध्यमा सीता से बात किये बिना मैं उन्हें क्या उत्तर दूंगा॥ १३॥

सीतासंदेशरहितं मामितस्त्वरया गतम्।

निर्दहेदपि काकुत्स्थः क्रोधतीवेण चक्षुषा॥१४॥

‘यदि मैं सीता का संदेश लिये बिना ही यहाँ से तुरंत लौट गया तो ककुत्स्थकुलभूषण भगवान् श्रीराम अपनी क्रोधभरी दुःसह दृष्टि से मुझे जलाकर भस्म कर डालेंगे॥ १४॥

यदि वोद्योजयिष्यामि भर्तारं रामकारणात्।

व्यर्थमागमनं तस्य ससैन्यस्य भविष्यति॥१५॥

‘यदि मैं इन्हें सान्त्वना दिये बिना ही लौट जाऊँ और श्रीरामचन्द्रजी के कार्य की सिद्धि के लिये अपने स्वामी वानरराज सुग्रीव को उत्तेजित करूँ तो वानरसेना के साथ उनका यहाँ तक आना व्यर्थ हो जायगा (क्योंकि सीता इसके पहले ही अपने प्राण त्याग देंगी) ॥ १५॥

अन्तरं त्वहमासाद्य राक्षसीनामवस्थितः।

शनैराश्वासयाम्यद्य संतापबहुलामिमाम्॥१६॥

‘अच्छा तो राक्षसियों के रहते हुए ही अवसर पाकर आज मैं यहीं बैठे-बैठे इन्हें धीरे-धीरे सान्त्वना दूंगा; क्योंकि इनके मन में बड़ा संताप है॥ १६॥

अहं ह्यतितनुश्चैव वानरश्च विशेषतः।

वाचं चोदाहरिष्यामि मानुषीमिह संस्कृताम्॥१७॥

‘एक तो मेरा शरीर अत्यन्त सूक्ष्म है, दूसरे मैं वानर हूँ। विशेषतः वानर होकर भी मैं यहाँ मानवोचित संस्कृत-भाषा में बोलूंगा॥ १७ ॥

यदि वाचं प्रदास्यामि द्विजातिरिव संस्कृताम्।

रावणं मन्यमाना मां सीता भीता भविष्यति॥१८॥

‘परंतु ऐसा करने में एक बाधा है, यदि मैं द्विज की भाँति संस्कृत-वाणी का प्रयोग करूँगा तो सीता मुझे रावण समझकर भयभीत हो जायँगी॥ १८ ॥

अवश्यमेव वक्तव्यं मानुषं वाक्यमर्थवत्।

मया सान्त्वयितुं शक्या नान्यथेयमनिन्दिता॥१९॥

‘ऐसी दशा में अवश्य ही मुझे उस सार्थक भाषा का प्रयोग करना चाहिये, जिसे अयोध्या के आस-पास की साधारण जनता बोलती है, अन्यथा इन सती-साध्वी सीता को मैं उचित आश्वासन नहीं दे सकता॥ १९॥

सेयमालोक्य मे रूपं जानकी भाषितं तथा।

रक्षोभिस्त्रासिता पूर्वं भूयस्त्रासमुपैष्यति॥२०॥

‘यदि मैं सामने जाऊँ तो मेरे इस वानररूप को देखकर और मेरे मुख से मानवोचित भाषा सुनकर ये जनकनन्दिनी सीता, जिन्हें पहले से ही राक्षसों ने भयभीत कर रखा है और भी डर जायँगी॥ २०॥

ततो जातपरित्रासा शब्दं कुर्यान्मनस्विनी।

जानाना मां विशालाक्षी रावणं कामरूपिणम्॥२१॥

‘मन में भय उत्पन्न हो जाने पर ये विशाललोचना मनस्विनी सीता मुझे इच्छानुसार रूप धारण करने वाला रावण समझकर जोर-जोर से चीखने चिल्लाने लगेंगी॥

सीतया च कृते शब्दे सहसा राक्षसीगणः।

नानाप्रहरणो घोरः समेयादन्तकोपमः॥२२॥

‘सीता के चिल्लाने पर ये यमराज के समान भयानक राक्षसियाँ तरह-तरह के हथियार लेकर सहसा आ धमकेंगी॥

ततो मां सम्परिक्षिप्य सर्वतो विकृताननाः।

वधे च ग्रहणे चैव कुर्युर्यत्नं महाबलाः॥२३॥

‘तदनन्तर ये विकट मुखवाली महाबलवती राक्षसियाँ मुझे सब ओर से घेरकर मारने या पकड़ लेने का प्रयत्न करेंगी॥ २३॥

तं मां शाखाः प्रशाखाश्च स्कन्धांश्चोत्तमशाखिनाम्।

दृष्ट्वा च परिधावन्तं भवेयुः परिशङ्किताः॥२४॥

‘फिर मुझे बड़े-बड़े वृक्षों की शाखा-प्रशाखा और मोटी-मोटी डालियों पर दौड़ता देख ये सब-की-सब सशङ्क हो उठेगी॥२४॥

मम रूपं च सम्प्रेक्ष्य वने विचरतो महत्।

राक्षस्यो भयवित्रस्ता भवेयुर्विकृतस्वराः॥२५॥

‘वन में विचरते हुए मेरे इस विशाल रूप को देखकर राक्षसियाँ भी भयभीत हो बुरी तरहसे चिल्लाने लगेंगी॥

ततः कुर्युः समाह्वानं राक्षस्यो रक्षसामपि।

राक्षसेन्द्रनियुक्तानां राक्षसेन्द्रनिवेशने ॥२६॥

‘इसके बाद वे निशाचरियाँ राक्षसराज रावण के महल में उसके द्वारा नियुक्त किये गये राक्षसों को बुला लेंगी॥ २६॥

ते शूलशरनिस्त्रिंशविविधायुधपाणयः।

आपतेयुर्विमर्देऽस्मिन् वेगेनो गकारणात्॥ २७॥

‘इस हलचल में वे राक्षस भी उद्विग्न होकर शूल, बाण, तलवार और तरह-तरह के शस्त्रास्त्र लेकर बड़े वेग से आ धमकेंगे॥२७॥

संरुद्धस्तैस्तु परितो विधमे राक्षसं बलम्।

शक्नुयां न तु सम्प्राप्तुं परं पारं महोदधेः॥२८॥

‘उनके द्वारा सब ओर से घिर जाने पर मैं राक्षसों की सेना का संहार तो कर सकता हूँ; परंतु समुद्र के उस पार नहीं पहुँच सकता॥ २८॥

मां वा गृह्णीयुरावृत्य बहवः शीघ्रकारिणः।

स्यादियं चागृहीतार्था मम च ग्रहणं भवेत्॥२९॥

‘यदि बहुत-से फुर्तीले राक्षस मुझे घेरकर पकड़ लें तो सीताजी का मनोरथ भी पूरा नहीं होगा और मैं भी बंदी बना लिया जाऊँगा॥ २९॥

हिंसाभिरुचयो हिंस्युरिमां वा जनकात्मजाम्।

विपन्नं स्यात् ततः कार्यं रामसुग्रीवयोरिदम्॥३०॥

‘इसके सिवा हिंसा में रुचि रखने वाले राक्षस यदि इन जनकदुलारी को मार डालें तो श्रीरघुनाथजी और सुग्रीव का यह सीता की प्राप्तिरूप अभीष्ट कार्य ही नष्ट हो जायगा॥३०॥

उद्देशे नष्टमार्गेऽस्मिन् राक्षसैः परिवारिते।

सागरेण परिक्षिप्ते गुप्ते वसति जानकी॥३१॥

‘यह स्थान राक्षसों से घिरा हुआ है। यहाँ आने का मार्ग दूसरों का देखा या जाना हुआ नहीं है तथा इस प्रदेश को समुद्र ने चारों ओर से घेर रखा है। ऐसे गुप्त स्थान में जानकी जी निवास करती हैं॥३१॥

विशस्ते वा गृहीते वा रक्षोभिर्मयि संयुगे।

नान्यं पश्यामि रामस्य सहायं कार्यसाधने॥३२॥

‘यदि राक्षसों ने मुझे संग्राम में मार दिया या पकड़ लिया तो फिर श्रीरघुनाथजी के कार्य को पूर्ण करने के लिये कोई दूसरा सहायक भी मैं नहीं देख रहा हूँ।

विमृशंश्च न पश्यामि यो हते मयि वानरः।

शतयोजनविस्तीर्णं लक्षयेत महोदधिम्॥३३॥

‘बहुत विचार करनेपर भी मुझे ऐसा कोई वानर नहीं दिखायी देता है, जो मेरे मारे जानेपर सौ योजन विस्तृत महासागरको लाँघ सके॥३३॥

कामं हन्तुं समर्थोऽस्मि सहस्राण्यपि रक्षसाम्।

न तु शक्ष्याम्यहं प्राप्तुं परं पारं महोदधेः॥३४॥

‘मैं इच्छानुसार सहस्रों राक्षसों को मार डालने में समर्थ हूँ; परंतु युद्ध में फँस जाने पर महासागर के उस पार नहीं जा सकूँगा॥३४॥

असत्यानि च युद्धानि संशयो मे न रोचते।

कश्च निःसंशयं कार्यं कुर्यात् प्राज्ञः ससंशयम्॥३५॥

‘युद्ध अनिश्चयात्मक होता है (उसमें किस पक्ष की विजय होगी, यह निश्चित नहीं रहता) और मुझे संशययुक्त कार्य प्रिय नहीं है। कौन ऐसा बुद्धिमान् होगा, जो संशयरहित कार्य को संशययुक्त बनाना चाहेगा॥ ३५॥

एष दोषो महान् हि स्यान्मम सीताभिभाषणे।

प्राणत्यागश्च वैदेह्या भवेदनभिभाषणे॥३६॥

‘सीताजी से बातचीत करने में मुझे यही महान् दोष प्रतीत होता है और यदि बातचीत नहीं करता हूँ तो विदेहनन्दिनी सीता का प्राणत्याग भी निश्चित ही है। ३६॥

भूताश्चार्था विरुध्यन्त देशकालविरोधिताः।

विक्लवं दूतमासाद्य तमः सूर्योदये यथा॥ ३७॥

अविवेकी या असावधान दूत के हाथ में पड़ने पर बने-बनाये काम भी देश-काल के विरोधी होकर उसी प्रकार असफल हो जाते हैं, जैसे सूर्य के उदय होने पर सब ओर फैले हुए अन्धकार का कोई वश नहीं चलता, वह निष्फल हो जाता है॥ ३७॥

अर्थानान्तरे बुद्धिनिश्चितापि न शोभते।

घातयन्ति हि कार्याणि दूताः पण्डितमानिनः॥३८॥

‘कर्तव्य और अकर्तव्य के विषय में स्वामी की निश्चित बुद्धि भी अविवेकी दूत के कारण शोभा नहीं पाती है; क्योंकि अपने को बड़ा बुद्धिमान् या पण्डित समझनेवाले दूत अपनी ही नासमझी से कार्य को नष्ट कर डालते हैं॥ ३८॥

न विनश्येत् कथं कार्यं वैक्लव्यं न कथं मम।

लङ्घनं च समुद्रस्य कथं नु न वृथा भवेत्॥३९॥

कथं नु खलु वाक्यं मे शृणुयान्नोद्रिजेत च।

इति संचिन्त्य हनुमांश्चकार मतिमान् मतिम्॥४०॥

‘फिर किस प्रकार यह काम न बिगड़े, किस तरह मुझसे कोई असावधानी न हो, किस प्रकार मेरा समुद्र लाँघना व्यर्थ न हो जाय और किस तरह सीताजी मेरी सारी बातें सुन लें, किंतु घबराहट में न पढ़ें-इन सब बातों पर विचार करके बुद्धिमान् हनुमान् जी ने यह निश्चय किया॥ ३९-४०॥

राममक्लिष्टकर्माणं सुबन्धुमनुकीर्तयन्।

नैनामुढेजयिष्यामि तद्बन्धुगतचेतनाम्॥४१॥

‘जिनका चित्त अपने जीवन-बन्धु श्रीराम में ही लगा है, उन सीताजी को मैं उनके प्रियतम श्रीराम का जो अनायास ही महान् कर्म करनेवाले हैं, गुण गा-गाकर सुनाऊँगा और उन्हें उद्विग्न नहीं होने दूंगा॥ ४१ ॥

इक्ष्वाकूणां वरिष्ठस्य रामस्य विदितात्मनः।

शुभानि धर्मयुक्तानि वचनानि समर्पयन्॥४२॥

‘मैं इक्ष्वाकुकुलभूषण विदितात्मा भगवान् श्रीराम के सुन्दर, धर्मानुकूल वचनों को सुनाता हुआ यहीं बैठा रहूँगा॥

श्रावयिष्यामि सर्वाणि मधुरां प्रब्रुवन् गिरम्।

श्रद्धास्यति यथा सीता तथा सर्वं समादधे॥४३॥

‘मीठी वाणी बोलकर श्रीराम के सारे संदेशों को इस प्रकार सुनाऊँगा, जिससे सीता का उन वचनों पर विश्वास हो। जिस तरह उनके मन का संदेह दूर हो, उसी तरह मैं सब बातों का समाधान करूँगा’॥४३॥

इति स बहुविधं महाप्रभावो जगतिपतेः प्रमदामवेक्षमाणः।

मधुरमवितथं जगाद वाक्यं द्रुमविटपान्तरमास्थितो हनूमान्॥४४॥

इस प्रकार भाँति-भाँति से विचार करके अशोकवृक्ष की शाखाओं में छिपकर बैठे हुए महाप्रभावशाली हनुमान जी पृथ्वीपति श्रीरामचन्द्रजी की भार्या की ओर देखते हुए मधुर एवं यथार्थ बात कहने लगे॥ ४४ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे त्रिंशः सर्गः॥३०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्डमें तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।३०॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
सुन्दरकाण्डम्

हनुमान जी का सीता को सुनाने के लिये श्रीराम-कथा का वर्णन करना

एकत्रिंशः सर्गः

सर्ग-31

एवं बहुविधां चिन्तां चिन्तयित्वा महामतिः।

संश्रवे मधुरं वाक्यं वैदेह्या व्याजहार ह॥१॥

इस प्रकार बहुत-सी बातें सोच-विचारकर महामति हनुमान जी ने सीता को सुनाते हुए मधुर वाणी में इस तरह कहना आरम्भ किया— ॥१॥

राजा दशरथो नाम रथकुञ्जरवाजिमान्।

पुण्यशीलो महाकीर्तिरिक्ष्वाकूणां महायशाः॥२॥

‘इक्ष्वाकुवंश में राजा दशरथ नाम से प्रसिद्ध एक पुण्यात्मा राजा हो गये हैं। वे अत्यन्त कीर्तिमान् और महान् यशस्वी थे। उनके यहाँ रथ, हाथी और घोड़े बहुत अधिक थे॥२॥

राजर्षीणां गुणश्रेष्ठस्तपसा चर्षिभिः समः।

चक्रवर्तिकुले जातः पुरंदरसमो बले॥३॥

‘उन श्रेष्ठ नरेश में राजर्षियों के समान गुण थे। तपस्या में भी वे ऋषियों की समानता करते थे। उनका जन्म चक्रवर्ती नरेशों के कुल में हुआ था। वे देवराज इन्द्र के समान बलवान् थे॥३॥

अहिंसारतिरक्षुद्रो घृणी सत्यपराक्रमः।

मुख्यस्येक्ष्वाकुवंशस्य लक्ष्मीवॉल्लक्ष्मिवर्धनः॥४॥

पार्थिवव्यञ्जनैर्युक्तः पृथुश्रीः पार्थिवर्षभः।

पृथिव्यां चतुरन्तायां विश्रुतः सुखदः सुखी॥५॥

‘उनके मन में अहिंसा-धर्म के प्रति बड़ा अनुराग था। उनमें क्षुद्रता का नाम नहीं था। वे दयालु, सत्यपराक्रमी और श्रेष्ठ इक्ष्वाकुवंश की शोभा बढ़ाने वाले थे। वे लक्ष्मीवान् नरेश राजोचित लक्षणों से युक्त, परिपुष्ट शोभा से सम्पन्न और भूपालों में श्रेष्ठ थे। चारों समुद्र जिसकी सीमा हैं, उस सम्पूर्ण भूमण्डल में सब ओर उनकी बड़ी ख्याति थी। वे स्वयं तो सुखी थे ही दूसरों को भी सुख देने वाले थे॥ ४-५ ॥

तस्य पुत्रः प्रियो ज्येष्ठस्ताराधिपनिभाननः।

रामो नाम विशेषज्ञः श्रेष्ठः सर्वधनुष्मताम्॥६॥

‘उनके ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम-नाम से प्रसिद्ध हैं। वे पिता के लाडले, चन्द्रमा के समान मनोहर मुखवाले, सम्पूर्ण धनुर्धारियों में श्रेष्ठ और शस्त्र-विद्या के विशेषज्ञ हैं॥६॥

रक्षिता स्वस्य वृत्तस्य स्वजनस्यापि रक्षिता।

रक्षिता जीवलोकस्य धर्मस्य च परंतपः॥७॥

‘शत्रुओं को संताप देने वाले श्रीराम अपने सदाचार के, स्वजनों के, इस जीव-जगत् के तथा धर्म के भी रक्षक हैं ॥ ७॥

तस्य सत्याभिसंधस्य वृद्धस्य वचनात् पितुः।

सभार्यः सह च भ्रात्रा वीरः प्रव्रजितो वनम्॥८॥

‘उनके बूढ़े पिता महाराज दशरथ बड़े सत्यप्रतिज्ञ थे। उनकी आज्ञा से वीर श्रीरघुनाथजी अपनी पत्नी और भाई लक्ष्मण के साथ वन में चले आये॥८॥

तेन तत्र महारण्ये मृगयां परिधावता।

राक्षसा निहताः शूरा बहवः कामरूपिणः॥९॥

‘वहाँ विशाल वन में शिकार खेलते हुए श्रीराम ने इच्छानुसार रूप धारण करने वाले बहुत-से शूरवीर राक्षसों का वध कर डाला॥९॥

जनस्थानवधं श्रुत्वा निहतौ खरदूषणौ।

ततस्त्वमर्षापहृता जानकी रावणेन तु॥१०॥

‘उनके द्वारा जनस्थान के विध्वंस और खरदूषण के वध का समाचार सुनकर रावण ने अमर्षवश जनकनन्दिनी सीता का अपहरण कर लिया॥ १०॥

वञ्चयित्वा वने रामं मृगरूपेण मायया।

स मार्गमाणस्तां देवीं रामः सीतामनिन्दिताम्॥

आससाद वने मित्रं सुग्रीवं नाम वानरम्।

‘पहले तो उस राक्षस ने माया से मृग बने हुए मारीच के द्वारा वन में श्रीरामचन्द्रजी को धोखा दियाऔर स्वयं जानकीजी को हर ले गया। भगवान् श्रीराम परम साध्वी सीतादेवी की खोज करते हुए मतंग-वन में आकर सुग्रीव नामक वानर से मिले और उनके साथ उन्होंने मैत्री स्थापित कर ली॥ ११ १/२॥

ततः स वालिनं हत्वा रामः परपुरंजयः॥१२॥

आयच्छत् कपिराज्यं तु सुग्रीवाय महात्मने।

‘तदनन्तर शत्रु-नगरी पर विजय पाने वाले श्रीराम ने वाली का वध करके वानरों का राज्य महात्मा सुग्रीव को दे दिया॥ १२ १/२॥

सुग्रीवेणाभिसंदिष्टा हरयः कामरूपिणः॥१३॥

दिक्षु सर्वासु तां देवीं विचिन्वन्तः सहस्रशः।

‘तत्पश्चात् वानरराज सुग्रीव की आज्ञा से इच्छानुसार रूप धारण करने वाले हजारों वानर सीतादेवी का पता लगाने के लिये सम्पूर्ण दिशाओं में निकले हैं॥ १३ १/२॥

अहं सम्पातिवचनाच्छतयोजनमायतम्॥१४॥

तस्या हेतोर्विशालाक्ष्याः समुद्रं वेगवान् प्लुतः।

‘उन्हीं में से एक मैं भी हूँ। मैं सम्पाति के कहने से विशाललोचना विदेहनन्दिनी की खोज के लिये सौ योजन विस्तृत समुद्र को वेगपूर्वक लाँघकर यहाँ आया हूँ॥ १४ १/२॥

यथारूपां यथावर्णां यथालक्ष्मवती च ताम्॥१५॥

अश्रौषं राघवस्याहं सेयमासादिता मया।

विररामैवमुक्त्वा स वाचं वानरपुंगवः ॥ १६॥

‘मैंने श्रीरघुनाथजी के मुख से जानकीजी का जैसा रूप, जैसा रंग तथा जैसे लक्षण सुने थे, उनके अनुरूप ही इन्हें पाया है।’ इतना ही कहकर वानरशिरोमणि हनुमान जी चुप हो गये॥ १५-१६ ॥

जानकी चापि तच्छ्रुत्वा विस्मयं परमं गता।

ततः सा वक्रकेशान्ता सुकेशी केशसंवृतम्।

उन्नम्य वदनं भीरुः शिंशपामन्ववैक्षत॥१७॥

उनकी बातें सुनकर जनकनन्दिनी सीता को बड़ा विस्मय हुआ। उनके केश धुंघराले और बड़े ही सुन्दर थे। भीरु सीता ने केशों से ढके हुए अपने मुँह को ऊपर उठाकर उस अशोक-वृक्ष की ओर देखा ॥ १७॥

निशम्य सीता वचनं कपेश्च दिशश्च सर्वाः प्रदिशश्च वीक्ष्य।

स्वयं प्रहर्षं परमं जगाम सर्वात्मना राममनुस्मरन्ती॥१८॥

कपि के वचन सुनकर सीता को बड़ी प्रसन्नता हुई। । वे सम्पूर्ण वृत्तियों से भगवान् श्रीराम का स्मरण करती हुई समस्त दिशाओं में दृष्टि दौड़ाने लगीं॥ १८॥

सा तिर्यगूर्ध्वं च तथा ह्यधस्तानिरीक्षमाणा तमचिन्त्यबुद्धिम्।

ददर्श पिंगाधिपतेरमात्यं वातात्मजं सूर्यमिवोदयस्थम्॥१९॥

उन्होंने ऊपर-नीचे तथा इधर-उधर दृष्टिपात करके उन अचिन्त्य बुद्धिवाले पवनपुत्र हनुमान् को, जो वानरराज सुग्रीव के मन्त्री थे, उदयाचल पर विराजमान सूर्य के समान देखा॥ १९॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे एकत्रिंशः सर्गः॥३१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में इकतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।३१॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
सुन्दरकाण्डम्

सीताजी का तर्क-वितर्क

द्वात्रिंशः सर्गः

सर्ग-32

ततः शाखान्तरे लीनं दृष्ट्वा चलितमानसा।

वेष्टितार्जुनवस्त्रं तं विद्युत्संघातपिंगलम्॥१॥

सा ददर्श कपिं तत्र प्रश्रितं प्रियवादिनम्।

फुल्लाशोकोत्कराभासं तप्तचामीकरेक्षणम्॥२॥

तब शाखाके भीतर छिपे हुए, विद्युत्पुञ्ज के समान अत्यन्त पिंगल वर्णवाले और श्वेत वस्त्रधारी हनुमान जी पर उनकी दृष्टि पड़ी फिर तो उनका चित्त चञ्चल हो उठा। उन्होंने देखा, फूले हुए अशोक के समान अरुण कान्ति से प्रकाशित एक विनीत और प्रियवादी वानर डालियों के बीच में बैठा है। उसके नेत्र तपाये हुए सुवर्ण के समान चमक रहे हैं। १-२॥

साथ दृष्ट्वा हरिश्रेष्ठं विनीतवदवस्थितम्।

मैथिली चिन्तयामास विस्मयं परमं गता॥३॥

विनीतभाव से बैठे हुए वानरश्रेष्ठ हनुमान जी को देखकर मिथिलेशकुमारी को बड़ा आश्चर्य हुआ। वे मन-ही-मन सोचने लगीं- ॥३॥

अहो भीममिदं सत्त्वं वानरस्य दुरासदम्।

दुर्निरीक्ष्यमिदं मत्वा पुनरेव मुमोह सा॥४॥

‘अहो! वानरयोनि का यह जीव तो बड़ा ही भयंकर है। इसे पकड़ना बहुत ही कठिन है। इसकी ओर तो आँख उठाकर देखने का भी साहस नहीं होता।’ ऐसा विचारकर वे पुनः भयसे मूर्च्छित-सी हो गयीं॥ ४॥

विललाप भृशं सीता करुणं भयमोहिता।

राम रामेति दुःखार्ता लक्ष्मणेति च भामिनी॥५॥

भय से मोहित हुई भामिनी सीता अत्यन्त करुणाजनक स्वर में ‘हा राम! हा राम! हा लक्ष्मण!’ ऐसा कहकर दुःख से आतुर हो अत्यन्त विलाप करने लगीं॥ ५॥

रुरोद सहसा सीता मन्दमन्दस्वरा सती।

साथ दृष्ट्वा हरिवरं विनीतवदुपागतम्।

मैथिली चिन्तयामास स्वप्नोऽयमिति भामिनी॥

उस समय सीता मन्द स्वर में सहसा रो पड़ीं। । इतने ही में उन्होंने देखा, वह श्रेष्ठ वानर बड़ी विनय के साथ निकट आ बैठा है तब भामिनी मिथिलेशकुमारीने सोचा-‘यह कोई स्वप्न तो नहीं है॥६॥

सा वीक्षमाणा पृथुभुग्नवक्त्रं शाखामृगेन्द्रस्य यथोक्तकारम्।

ददर्श पिंगप्रवरं महार्ह वातात्मजं बुद्धिमतां वरिष्ठम्॥७॥

उधर दृष्टिपात करते हुए उन्होंने वानरराज सुग्रीवके आज्ञापालक विशाल और टेढ़े मुखवाले परम आदरणीय, बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ, वानरप्रवर पवनपुत्र हनुमान जी को देखा॥७॥

सा तं समीक्ष्यैव भृशं विपन्ना गतासुकल्पेव बभूव सीता।

चिरेण संज्ञां प्रतिलभ्य चैवं विचिन्तयामास विशालनेत्रा॥८॥

उन्हें देखते ही सीताजी अत्यन्त व्यथित होकर ऐसी दशा को पहुँच गयीं, मानो उनके प्राण निकल गये हों। फिर बड़ी देर में चेत होने पर विशाललोचना विदेहराजकुमारी ने इस प्रकार विचार किया— ॥ ८॥

स्वप्नो मयायं विकृतोऽद्य दृष्टः शाखामृगः शास्त्रगणैर्निषिद्धः।

स्वस्त्यस्तु रामाय सलक्ष्मणाय तथा पितुर्मे जनकस्य राज्ञः॥९॥

‘आज मैंने यह बड़ा बुरा स्वप्न देखा है। सपने में वानर को देखना शास्त्रों ने निषिद्ध बताया है। मेरी भगवान् से प्रार्थना है कि श्रीराम, लक्ष्मण और मेरे पिता जनक का मंगल हो (उनपर इस दुःस्वप्न का प्रभाव न पड़े) ॥९॥

स्वप्नो हि नायं नहि मेऽस्ति निद्रा शोकेन दुःखेन च पीडितायाः।

सुखं हि मे नास्ति यतो विहीना तेनेन्दुपूर्णप्रतिमाननेन॥१०॥

‘परंतु यह स्वप्न तो हो नहीं सकता; क्योंकि शोक और दुःख से पीड़ित रहने के कारण मुझे कभी नींद आती ही नहीं है (नींद उसे आती है, जिसे सुख हो) मुझे तो उन पूर्णचन्द्र के समान मुखवाले श्रीरघुनाथजी से बिछुड़ जाने के कारण अब सुख सुलभ ही नहीं है॥ १० ॥

रामेति रामेति सदैव बुद्ध्या विचिन्त्य वाचा ब्रुवती तमेव।।

तस्यानुरूपं च कथां तदर्था मेवं प्रपश्यामि तथा शृणोमि॥११॥

‘मैं बुद्धि से सर्वदा ‘राम! राम!’ ऐसा चिन्तन करके वाणी द्वारा भी राम-नाम का ही उच्चारण करती रहती हूँ; अतः उस विचार के अनुरूप वैसे ही अर्थवाली यह कथा देख और सुन रही हूँ॥११॥

अहं हि तस्याद्य मनोभवेन सम्पीडिता तदगतसर्वभावा।

विचिन्तयन्ती सततं तमेव तथैव पश्यामि तथा शृणोमि॥१२॥

‘मेरा हृदय सर्वदा श्रीरघुनाथ में ही लगा हुआ है; अतः श्रीराम-दर्शन की लालसा से अत्यन्त पीड़ित हो सदा उन्हीं का चिन्तन करती हुई उन्हीं को देखती और उन्हीं की कथा सुनती हूँ॥ १२॥

मनोरथः स्यादिति चिन्तयामि तथापि बुद्ध्यापि वितर्कयामि।

किं कारणं तस्य हि नास्ति रूपं सुव्यक्तरूपश्च वदत्ययं माम्॥१३॥

‘सोचती हूँ कि सम्भव है यह मेरे मन की ही कोई भावना हो तथापि बुद्धि से भी तर्क-वितर्क करती हूँ कि यह जो कुछ दिखायी देता है, इसका क्या कारण है? मनोरथ या मन की भावना का कोई स्थूल रूप नहीं होता; परंतु इस वानर का रूप तो स्पष्ट दिखायी दे रहा है और यह मुझसे बातचीत भी करता है। १३॥

नमोऽस्तु वाचस्पतये सवज्रिणे स्वयम्भुवे चैव हुताशनाय।

अनेन चोक्तं यदिदं ममाग्रतो वनौकसा तच्च तथास्तु नान्यथा॥१४॥

‘मैं वाणी के स्वामी बृहस्पति को, वज्रधारी इन्द्रको, स्वयम्भू ब्रह्माजी को तथा वाणी के अधिष्ठातृ-देवता अग्नि को भी नमस्कार करती हूँ। इस वनवासी वानर ने मेरे सामने यह जो कुछ कहा है, वह सब सत्य हो, उसमें कुछ भी अन्यथा न हो’ ॥ १४॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे द्वात्रिंशः सर्गः॥३२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में बत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।३२॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
सुन्दरकाण्डम्

सीताजी का हनुमान जी को अपना परिचय देते हुए अपने वनगमन और अपहरण का वृत्तान्त बताना

त्रयस्त्रिंशः सर्गः

सर्ग-33

सोऽवतीर्य द्रुमात् तस्माद् विद्रुमप्रतिमाननः।

विनीतवेषः कृपणः प्रणिपत्योपसृत्य च॥१॥

तामब्रवीन्महातेजा हनूमान् मारुतात्मजः।

शिरस्यञ्जलिमाधाय सीतां मधुरया गिरा॥२॥

उधर मूंगे के समान लाल मुखवाले महातेजस्वी पवनकुमार हनुमान जी ने उस अशोक-वृक्ष से नीचे उतरकर माथे पर अञ्जलि बाँध ली और विनीतभाव से दीनतापूर्वक निकट आकर प्रणाम करने के अनन्तर सीताजी से मधुर वाणी में कहा— ॥१-२॥

का नु पद्मपलाशाक्षि क्लिष्टकौशेयवासिनि।

द्रुमस्य शाखामालम्ब्य तिष्ठसि त्वमनिन्दिते॥३॥

किमर्थं तव नेत्राभ्यां वारि स्रवति शोकजम्।

पुण्डरीकपलाशाभ्यां विप्रकीर्णमिवोदकम्॥४॥

‘प्रफुल्लकमलदल के समान विशाल नेत्रोंवाली देवि! यह मलिन रेशमी पीताम्बर धारण किये आप कौन हैं? अनिन्दिते! इस वृक्ष की शाखा का सहारा लिये आप यहाँ क्यों खड़ी हैं? कमल के पत्तों से झरते हुए जल-बिन्दुओं के समान आप की आँखों से ये शोक के आँसू क्यों गिर रहे हैं। ३-४॥

सुराणामसुराणां च नागगन्धर्वरक्षसाम्।

यक्षाणां किंनराणां च का त्वं भवसि शोभने॥

का त्वं भवसि रुद्राणां मरुतां वा वरानने।

वसूनां वा वरारोहे देवता प्रतिभासि मे॥६॥

‘शोभने! आप देवता, असुर, नाग, गन्धर्व, राक्षस, यक्ष, किन्नर, रुद्र, मरुद्गण अथवा वसुओं में से कौन हैं? इनमें से किसकी कन्या अथवा पत्नी हैं? सुमुखि! वरारोहे ! मुझे तो आप कोई देवता-सी जान पड़ती हैं। ५-६॥

किं नु चन्द्रमसा हीना पतिता विबुधालयात्।

रोहिणी ज्योतिषां श्रेष्ठा श्रेष्ठा सर्वगुणाधिका॥७॥

‘क्या आप चन्द्रमा से बिछुड़कर देवलोक से गिरी हुई नक्षत्रों में श्रेष्ठ और गुणों में सबसे बढ़ी-चढ़ी रोहिणी देवी हैं? ॥ ७॥

कोपाद् वा यदि वा मोहाद् भर्तारमसितेक्षणे।

वसिष्ठं कोपयित्वा त्वं वासि कल्याण्यरुन्धती॥८॥

‘अथवा कजरारे नेत्रोंवाली देवि! आप कोप या मोह से अपने पति वसिष्ठजी को कुपित करके यहाँ आयी हुई कल्याणस्वरूपा सतीशिरोमणि अरुन्धती तो नहीं हैं॥८॥

को नु पुत्रः पिता भ्राता भर्ता वा ते सुमध्यमे।

अस्माल्लोकादमुं लोकं गतं त्वमनुशोचसि॥९॥

‘सुमध्यमे! आपका पुत्र, पिता, भाई अथवा पति कौन इस लोक से चलकर परलोकवासी हो गया है, जिसके लिये आप शोक करती हैं॥९॥

रोदनादतिनिःश्वासाद् भूमिसंस्पर्शनादपि।

न त्वां देवीमहं मन्ये राज्ञः संज्ञावधारणात्॥१०॥

व्यञ्जनानि हि ते यानि लक्षणानि च लक्षये।

महिषी भूमिपालस्य राजकन्या च मे मता ॥११॥

‘रोने, लम्बी साँस खींचने तथा पृथ्वी का स्पर्श करने के कारण मैं आपको देवी नहीं मानता। आप बारम्बार किसी राजा का नाम ले रही हैं तथा आपके चिह्न और लक्षण जैसे दिखायी देते हैं, उन सब पर दृष्टिपात करने से यही अनुमान होता है कि आप किसी राजा की महारानी तथा किसी नरेश की कन्या हैं॥ १०-११॥

रावणेन जनस्थानाद् बलात् प्रमथिता यदि।

सीता त्वमसि भद्रं ते तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः॥१२॥

‘रावण जनस्थान से जिन्हें बलपूर्वक हर लाया था, वे सीताजी ही यदि आप हों तो आपका कल्याण हो। आप ठीक-ठीक मुझे बताइये। मैं आपके विषय में जानना चाहता हूँ॥ १२ ॥

यथा हि तव वै दैन्यं रूपं चाप्यतिमानुषम्।

तपसा चान्वितो वेषस्त्वं राममहिषी ध्रुवम्॥१३॥

‘दुःख के कारण आप में जैसी दीनता आ गयी है, जैसा आपका अलौकिक रूप है तथा जैसा तपस्विनी का-सा वेष है, इन सबके द्वारा निश्चय ही आप श्रीरामचन्द्रजी की महारानी जान पड़ती हैं’। १३॥

सा तस्य वचनं श्रुत्वा रामकीर्तनहर्षिता।

उवाच वाक्यं वैदेही हनूमन्तं द्रुमाश्रितम्॥१४॥

हनुमान जी की बात सुनकर विदेहनन्दिनी सीता श्रीरामचन्द्रजी की चर्चा से बहुत प्रसन्न थीं; अतः वृक्ष का सहारा लिये खड़े हुए उन पवनकुमार से इस प्रकार बोलीं॥

पृथिव्यां राजसिंहानां मुख्यस्य विदितात्मनः।

स्नुषा दशरथस्याहं शत्रुसैन्यप्रणाशिनः ॥ १५॥

दुहिता जनकस्याहं वैदेहस्य महात्मनः।

सीतेति नाम्ना चोक्ताहं भार्या रामस्य धीमतः॥

‘कपिवर! जो भूमण्डल के श्रेष्ठ राजाओं में प्रधान थे, जिनकी सर्वत्र प्रसिद्धि थी तथा जो शत्रुओं की सेना का संहार करने में समर्थ थे, उन महाराज दशरथ की मैं पुत्रवधू हूँ, विदेहराज महात्मा जनक की पुत्री हूँ और परमबुद्धिमान् भगवान् श्रीराम की धर्मपत्नी हूँ मेरा नाम सीता है।

समा द्वादश तत्राहं राघवस्य निवेशने।

भुञ्जाना मानुषान् भोगान् सर्वकामसमृद्धिनी॥१७॥

‘अयोध्या में श्रीरघुनाथजी के अन्तःपुर में बारह वर्षों तक मैं सब प्रकार के मानवीय भोग भोगती रही और मेरी सारी अभिलाषाएँ सदैव पूर्ण होती रहीं। १७॥

ततस्त्रयोदशे वर्षे राज्ये चेक्ष्वाकुनन्दनम्।

अभिषेचयितुं राजा सोपाध्यायः प्रचक्रमे॥१८॥

‘तदनन्तर तेरहवें वर्ष में महाराज दशरथ ने राजगुरु वसिष्ठजी के साथ इक्ष्वाकुकुलभूषण भगवान् श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारी आरम्भ की॥ १८॥

तस्मिन् सम्भ्रियमाणे तु राघवस्याभिषेचने।

कैकेयी नाम भर्तारमिदं वचनमब्रवीत्॥१९॥

‘जब वे श्रीरघुनाथजी के अभिषेक के लिये आवश्यक सामग्री का संग्रह कर रहे थे, उस समय उनकी कैकेयी नामवाली भार्या ने पति से इस प्रकार कहा- ॥ १९॥

न पिबेयं न खादेयं प्रत्यहं मम भोजनम्।

एष मे जीवितस्यान्तो रामो यद्यभिषिच्यते॥२०॥

‘अब न तो मैं जलपान करूँगी और न प्रतिदिन का भोजन ही ग्रहण करूँगी। यदि श्रीराम का राज्याभिषेक हुआ तो यही मेरे जीवन का अन्त होगा॥ २० ॥

यत् तदुक्तं त्वया वाक्यं प्रीत्या नृपतिसत्तम।

तच्चेन्न वितथं कार्यं वनं गच्छतु राघवः॥ २१॥

‘नृपश्रेष्ठ! आपने प्रसन्नतापूर्वक मुझे जो वचन दिया है, उसे यदि असत्य नहीं करना है तो श्रीराम वन को चले जायँ’ ॥ २१॥

स राजा सत्यवाग् देव्या वरदानमनुस्मरन्।

मुमोह वचनं श्रुत्वा कैकेय्याः क्रूरमप्रियम्॥२२॥

‘महाराज दशरथ बड़े सत्यवादी थे। उन्होंने कैकेयी देवी को दो वर देने के लिये कहा था। उस वरदान का स्मरण करके कैकेयी के क्रूर एवं अप्रिय वचन को सुनकर वे मूर्च्छित हो गये॥ २२ ॥

ततस्तं स्थविरो राजा सत्यधर्मे व्यवस्थितः।

ज्येष्ठं यशस्विनं पुत्रं रुदन् राज्यमयाचत॥२३॥

‘तदनन्तर सत्यधर्म में स्थित हुए बूढ़े महाराज ने अपने यशस्वी ज्येष्ठ पुत्र श्रीरघुनाथजी से भरत के लिये राज्य माँगा॥ २३॥

स पितुर्वचनं श्रीमानभिषेकात् परं प्रियम्।

मनसा पूर्वमासाद्य वाचा प्रतिगृहीतवान्॥२४॥

‘श्रीमान् राम को पिताके वचन राज्याभिषेक से भी बढ़कर प्रिय थे। इसलिये उन्होंने पहले उन वचनों को मन से ग्रहण किया, फिर वाणी से भी स्वीकार कर लिया॥

दद्यान्न प्रतिगृह्णीयात् सत्यं ब्रूयान्न चानृतम्।

अपि जीवितहेतोर्हि रामः सत्यपराक्रमः॥२५॥

‘सत्य-पराक्रमी भगवान् श्रीराम केवल देते हैं, लेते नहीं। वे सदा सत्य बोलते हैं, अपने प्राणोंकी रक्षाके लिये भी कभी झूठ नहीं बोल सकते॥ २५ ॥

स विहायोत्तरीयाणि महार्हाणि महायशाः।

विसृज्य मनसा राज्यं जनन्यै मां समादिशत्॥२६॥

‘उन महायशस्वी श्रीरघुनाथजी ने बहुमूल्य उत्तरीय वस्त्र उतार दिये और मन से राज्य का त्याग करके मुझे अपनी माता के हवाले कर दिया॥ २६॥

साहं तस्याग्रतस्तूर्णं प्रस्थिता वनचारिणी।

नहि मे तेन हीनाया वासः स्वर्गेऽपि रोचते॥२७॥

‘किंतु मैं तुरंत ही उनके आगे-आगे वन की ओर चल दी; क्योंकि उनके बिना मुझे स्वर्ग में रहना अच्छा नहीं लगता॥२७॥

प्रागेव तु महाभागः सौमित्रिर्मित्रनन्दनः।

पूर्वजस्यानुयात्रार्थे कुशचीरैरलंकृतः॥ २८॥

‘अपने सुहृदों को आनन्द देने वाले सुमित्राकुमार महाभाग लक्ष्मण भी अपने बड़े भाई का अनुसरण करने के लिये उनसे भी पहले कुश तथा चीर-वस्त्र धारण करके तैयार हो गये॥ २८॥

ते वयं भर्तुरादेशं बहुमान्य दृढव्रताः।

प्रविष्टाः स्म पुरादृष्टं वनं गम्भीरदर्शनम्॥२९॥

‘इस प्रकार हम तीनों ने अपने स्वामी महाराज दशरथ की आज्ञा को अधिक आदर देकर दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रत का पालन करते हुए उस सघन वन में प्रवेश किया, जिसे पहले कभी नहीं देखा था॥२९॥

वसतो दण्डकारण्ये तस्याहममितौजसः।

रक्षसापहृता भार्या रावणेन दुरात्मना॥३०॥

‘वहाँ दण्डकारण्य में रहते समय उन अमिततेजस्वी भगवान् श्रीराम की भार्या मुझ सीता को दुरात्मा राक्षस रावण यहाँ हर लाया है ॥ ३० ॥

द्वौ मासौ तेन मे कालो जीवितानुग्रहः कृतः।

ऊर्ध्वं द्वाभ्यां तु मासाभ्यां ततस्त्यक्ष्यामि जीवितम्॥३१॥

‘उसने अनुग्रहपूर्वक मेरे जीवन-धारण के लिये दो मास की अवधि निश्चित कर दी है। उन दो महीनों के बाद मुझे अपने प्राणों का परित्याग करना पड़ेगा’। ३१॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे त्रयस्त्रिंशः सर्गः॥३३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में तैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।३३॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
सुन्दरकाण्डम्

सीताजी का हनुमान् जी के प्रति संदेह और उसका समाधान तथा हनुमान् जी के द्वारा श्रीरामचन्द्रजी के गुणों का गान

चतुस्त्रिंशः सर्गः

सर्ग-34

तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा हनूमान् हरिपुंगवः।

दुःखाद् दुःखाभिभूतायाः सान्त्वमुत्तरमब्रवीत्॥

दुःख-पर-दुःख उठाने के कारण पीड़ित हुई सीता का उपर्युक्त वचन सुनकर वानरशिरोमणि हनुमान जी ने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा- ॥१॥

अहं रामस्य संदेशाद् देवि दूतस्तवागतः।

वैदेहि कुशली रामः स त्वां कौशलमब्रवीत्॥२॥

‘देवि! मैं श्रीरामचन्द्रजी का दूत हूँ और आपके लिये उनका संदेश लेकर आया हूँ। विदेहनन्दिनी ! श्रीरामचन्द्रजी सकुशल हैं और उन्होंने आपका कुशल-समाचार पूछा है॥२॥

यो ब्राह्ममस्त्रं वेदांश्च वेद वेदविदां वरः।

स त्वां दाशरथी रामो देवि कौशलमब्रवीत्॥३॥

‘देवि! जिन्हें ब्रह्मास्त्र और वेदों का भी पूर्ण ज्ञान है, वे वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ दशरथनन्दन श्रीराम स्वयं सकुशल रहकर आपकी भी कुशल पूछ रहे हैं॥३॥

लक्ष्मणश्च महातेजा भर्तुस्तेऽनुचरः प्रियः।

कृतवाञ्छोकसंतप्तः शिरसा तेऽभिवादनम्॥४॥

‘आपके पति के अनुचर तथा प्रिय महातेजस्वी लक्ष्मण ने भी शोक से संतप्त हो आपके चरणों में मस्तक झुकाकर प्रणाम कहलाया है’ ॥ ४॥

सा तयोः कुशलं देवी निशम्य नरसिंहयोः।

प्रतिसंहृष्टसर्वांगी हनूमन्तमथाब्रवीत्॥५॥

पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मण का समाचार सुनकर देवी सीता के सम्पूर्ण अंगों में हर्षजनित रोमांच हो आया और वे हनुमान् जी से बोलीं- ॥५॥

कल्याणी बत गाथेयं लौकिकी प्रतिभाति मा।

एति जीवन्तमानन्दो नरं वर्षशतादपि॥६॥

‘यदि मनुष्य जीवित रहे तो उसे सौ वर्ष बाद भी आनन्द प्राप्त होता ही है, यह लौकिक कहावत आज मुझे बिलकुल सत्य एवं कल्याणमयी जान पड़ती है’॥६॥

तयोः समागमे तस्मिन् प्रीतिरुत्पादिताद्भुता।

परस्परेण चालापं विश्वस्तौ तौ प्रचक्रतुः॥७॥

सीता और हनुमान् के इस मिलाप (परस्पर दर्शन)-से दोनों को ही अद्भुत प्रसन्नता प्राप्त हुई। वे दोनों विश्वस्त होकर एक-दूसरे से वार्तालाप करने लगे॥७॥

तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा हनूमान् मारुतात्मजः।

सीतायाः शोकतप्तायाः समीपमुपचक्रमे॥८॥

शोकसंतप्त सीता की वे बातें सुनकर पवनकुमार हनुमान् जी उनके कुछ निकट चले गये॥ ८॥

यथा यथा समीपं स हनूमानुपसर्पति।

तथा तथा रावणं सा तं सीता परिशङ्कते॥९॥

हनुमान जी ज्यों-ज्यों निकट आते, त्यों-ही-त्यों सीता को यह शङ्का होती कि यह कहीं रावण न हो॥ ९॥

अहो धिग् धिक्कृतमिदं कथितं हि यदस्य मे।

रूपान्तरमुपागम्य स एवायं हि रावणः॥१०॥

ऐसा विचार आते ही वे मन-ही-मन कहने लगीं’अहो! धिक्कार है, जो इसके सामने मैंने अपने मन की बात कह दी। यह दूसरा रूप धारण करके आया हुआ वह रावण ही है’ ॥ १० ॥

तामशोकस्य शाखां तु विमुक्त्वा शोककर्शिता।

तस्यामेवानवद्याङ्गी धरण्यां समुपाविशत्॥११॥

फिर तो निर्दोष अङ्गोंवाली सीता उस अशोक वृक्ष की शाखा को छोड़ शोक से कातर हो वहीं जमीन पर बैठ गयीं॥११॥

अवन्दत महाबाहुस्ततस्तां जनकात्मजाम्।

सा चैनं भयसंत्रस्ता भूयो नैनमुदैक्षत॥१२॥

तत्पश्चात् महाबाहु हनुमान् ने जनकनन्दिनी सीता के चरणों में प्रणाम किया, किंतु वे भयभीत होने के कारण फिर उनकी ओर देख न सकीं॥ १२ ॥

तं दृष्ट्वा वन्दमानं च सीता शशिनिभानना।

अब्रवीद दीर्घमुच्छ्वस्य वानरं मधुरस्वरा॥१३॥

वानर हनुमान् को बारम्बार वन्दना करते देख चन्द्रमुखी सीता लम्बी साँस खींचकर उनसे मधुर वाणी में बोलीं- ॥ १३॥

मायां प्रविष्टो मायावी यदि त्वं रावणः स्वयम्।

उत्पादयसि मे भूयः संतापं तन्न शोभनम्॥१४॥

‘यदि तुम स्वयं मायावी रावण हो और मायामय शरीर में प्रवेश करके फिर मुझे कष्ट दे रहे हो तो यह तुम्हारे लिये अच्छी बात नहीं है॥ १४ ॥

स्वं परित्यज्य रूपं यः परिव्राजकरूपवान्।

जनस्थाने मया दृष्टस्त्वं स एव हि रावणः॥१५॥

‘जिसे मैंने जनस्थान में देखा था तथा जो अपने यथार्थ रूप को छोड़कर संन्यासी का रूप धारण करके आया था, तुम वही रावण हो॥ १५ ॥

उपवासकृशां दीनां कामरूप निशाचर।

संतापयसि मां भूयः संतापं तन्न शोभनम्॥१६॥

‘इच्छानुसार रूप धारण करने वाले निशाचर! मैं उपवास करते-करते दुबली हो गयी हूँ और मन-ही मन दुःखी रहती हूँ। इतने पर भी जो तुम फिर मुझे संताप दे रहे हो, यह तुम्हारे लिये अच्छी बात नहीं

है॥१६॥

अथवा नैतदेवं हि यन्मया परिशङ्कितम्।

मनसो हि मम प्रीतिरुत्पन्ना तव दर्शनात्॥१७॥

‘अथवा जिस बात की मेरे मन में शङ्का हो रही है, वह न भी हो; क्योंकि तुम्हें देखने से मेरे मन में प्रसन्नता हुई है॥ १७॥

यदि रामस्य दूतस्त्वमागतो भद्रमस्तु ते।

पृच्छामि त्वां हरिश्रेष्ठ प्रिया रामकथा हि मे॥१८॥

‘वानरश्रेष्ठ! सचमुच ही यदि तुम भगवान् श्रीराम के दूत हो तो तुम्हारा कल्याण हो। मैं तुमसे उनकी बातें पूछती हूँ; क्योंकि श्रीराम की चर्चा मुझे बहुत ही प्रिय है।

गुणान् रामस्य कथय प्रियस्य मम वानर।

चित्तं हरसि मे सौम्य नदीकुलं यथा रयः॥१९॥

‘वानर ! मेरे प्रियतम श्रीराम के गुणों का वर्णन करो। सौम्य ! जैसे जल का वेग नदी के तट को हर लेता है,उसी प्रकार तुम श्रीराम की चर्चा से मेरे चित्त को चुराये लेते हो॥ १९॥

अहो स्वप्नस्य सुखता याहमेव चिराहृता।

प्रेषितं नाम पश्यामि राघवेण वनौकसम्॥२०॥

‘अहो! यह स्वप्न कैसा सुखद हुआ? जिससे यहाँ चिरकाल से हरकर लायी गयी मैं आज भगवान् श्रीराम के भेजे हुए दूत वानर को देख रही हूँ॥२०॥

स्वप्नेऽपि यद्यहं वीरं राघवं सहलक्ष्मणम्।

पश्येयं नावसीदेयं स्वप्नोऽपि मम मत्सरी ॥२१॥

यदि मैं लक्ष्मणसहित वीरवर श्रीरघुनाथजी को स्वप्न में भी देख लिया करूँ तो मुझे इतना कष्ट न हो; परंतु स्वप्न भी मुझसे डाह करता है॥ २१॥

नाहं स्वप्नमिमं मन्ये स्वप्ने दृष्ट्वा हि वानरम्।

न शक्योऽभ्युदयः प्राप्तुं प्राप्तश्चाभ्युदयो मम॥२२॥

‘मैं इसे स्वप्न नहीं समझती; क्योंकि स्वप्न में वानर को देख लेने पर किसी का अभ्युदय नहीं हो सकता और मैंने यहाँ अभ्युदय प्राप्त किया है (अभ्युदयकाल में जैसी प्रसन्नता होती है, वैसी ही प्रसन्नता मेरे मन में छा रही है) ॥ २२॥

किं नु स्याच्चित्तमोहोऽयं भवेद् वातगतिस्त्वियम्।

उन्मादजो विकारो वा स्यादयं मृगतृष्णिका॥२३॥

‘अथवा यह मेरे चित्त का मोह तो नहीं है। वातविकार से होने वाला भ्रम तो नहीं है। उन्माद का विकार तो नहीं उमड़ आया अथवा यह मृगतृष्णा तो नहीं है।

अथवा नायमुन्मादो मोहोऽप्युन्मादलक्षणः।

सम्बुध्ये चाहमात्मानमिमं चापि वनौकसम्॥२४॥

‘अथवा यह उन्मादजनित विकार नहीं है। उन्माद के समान लक्षण वाला मोह भी नहीं है; क्योंकि मैं अपने आपको देख और समझ रही हूँ तथा इस वानर को भी ठीक-ठीक देखती और समझती हूँ (उन्माद आदि की अवस्थाओं में इस तरह ठीक-ठीक ज्ञान होना सम्भव नहीं है।)’ ॥ २४॥

इत्येवं बहुधा सीता सम्प्रधार्य बलाबलम्।

रक्षसां कामरूपत्वान्मेने तं राक्षसाधिपम्॥२५॥

एतां बुद्धिं तदा कृत्वा सीता सा तनुमध्यमा।

न प्रतिव्याजहाराथ वानरं जनकात्मजा॥२६॥

इस तरह सीता अनेक प्रकार से राक्षसों की प्रबलता और वानर की निर्बलता का निश्चय करके उन्हें राक्षसराज रावण ही माना; क्योंकि राक्षसों में इच्छानुसार रूप धारण करने की शक्ति होती है। ऐसा विचारकर सूक्ष्म कटिप्रदेशवाली जनककुमारी सीता ने कपिवर हनुमान् जी से फिर कुछ नहीं कहा। २५-२६॥

सीताया निश्चितं बुद्ध्वा हनूमान् मारुतात्मजः।

श्रोत्रानुकूलैर्वचनैस्तदा तां सम्प्रहर्षयन्॥२७॥

सीता के इस निश्चय को समझकर पवनकुमार हनुमान् जी उस समय कानों को सुख पहुँचाने वाले अनुकूल वचनों द्वारा उनका हर्ष बढ़ाते हुए बोले-॥ २७॥

आदित्य इव तेजस्वी लोककान्तः शशी यथा।

राजा सर्वस्य लोकस्य देवो वैश्रवणो यथा॥२८॥

‘भगवान् श्रीराम सूर्य के समान तेजस्वी, चन्द्रमा के समान लोककमनीय तथा देव कुबेर की भाँति सम्पूर्ण जगत् के राजा हैं॥ २८॥

विक्रमेणोपपन्नश्च यथा विष्णुर्महायशाः।

सत्यवादी मधुरवाग् देवो वाचस्पतिर्यथा॥२९॥

‘महायशस्वी भगवान् विष्णु के समान पराक्रमी तथा बृहस्पतिजी की भाँति सत्यवादी एवं मधुरभाषी हैं

रूपवान् सुभगः श्रीमान् कंदर्प इव मूर्तिमान्।

स्थानक्रोधे प्रहर्ता च श्रेष्ठो लोके महारथः ॥ ३०॥

‘रूपवान्, सौभाग्यशाली और कान्तिमान् तो वे इतने हैं, मानो मूर्तिमान् कामदेव हों वे क्रोध के पात्र पर ही प्रहार करने में समर्थ और संसार के श्रेष्ठ महारथी हैं॥ ३०॥

बाहच्छायामवष्टब्धो यस्य लोको महात्मनः।

अपक्रम्याश्रमपदान्मृगरूपेण राघवम्॥३१॥

शून्ये येनापनीतासि तस्य द्रक्ष्यसि तत्फलम्।

‘सम्पूर्ण विश्व उन महात्मा की भुजाओं के आश्रय में – उन्हीं की छत्रछाया में विश्राम करता है। मृगरूपधारी निशाचर द्वारा श्रीरघुनाथजी को आश्रम से  दूर हटाकर जिसने सूने आश्रम में पहुँचकर आपका अपहरण किया है, उसे उस पाप का जो फल मिलनेवाला है, उसको आप अपनी आँखों देखेंगी॥ ३१ १/२॥

अचिराद् रावणं संख्ये यो वधिष्यति वीर्यवान्॥३२॥

क्रोधप्रमुक्तैरिषुभिर्व्वलद्भिरिव पावकैः।

‘पराक्रमी श्रीरामचन्द्रजी क्रोधपूर्वक छोड़े गये प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी बाणों द्वारा समराङ्गण में शीघ्र ही रावण का वध करेंगे॥ ३२ १/२॥

तेनाहं प्रेषितो दूतस्त्वत्सकाशमिहागतः॥३३॥

त्वद्वियोगेन दुःखार्तः स त्वां कौशलमब्रवीत्।

‘मैं उन्हीं का भेजा हुआ दूत होकर यहाँ आपके पास आया हूँ। भगवान् श्रीराम आपके वियोगजनितदुःख से पीड़ित हैं। उन्होंने आपके पास अपनी कुशल कहलायी है और आपकी भी कुशल पूछी है।। ३३ १/२॥

लक्ष्मणश्च महातेजाः सुमित्रानन्दवर्धनः॥ ३४॥

अभिवाद्य महाबाहुः स त्वां कौशलमब्रवीत्।

‘सुमित्रा का आनन्द बढ़ाने वाले महातेजस्वी महाबाहु लक्ष्मण ने भी आपको प्रणाम करके आपकी कुशल पूछी है॥ ३४ १/२॥

रामस्य च सखा देवि सुग्रीवो नाम वानरः॥३५॥

राजा वानरमुख्यानां स त्वां कौशलमब्रवीत्।

नित्यं स्मरति ते रामः ससुग्रीवः सलक्ष्मणः॥३६॥

‘देवि! श्रीरघुनाथजी के सखा एक सुग्रीव नामक वानर हैं, जो मुख्य-मुख्य वानरों के राजा हैं, उन्होंने भी आपसे कुशल पूछी है सुग्रीव और लक्ष्मणसहित श्रीरामचन्द्रजी प्रतिदिन आपका स्मरण करते हैं। ३५-३६॥

दिष्ट्या जीवसि वैदेहि राक्षसीवशमागता।

नचिराद् द्रक्ष्यसे राम लक्ष्मणं च महारथम्॥३७॥

‘विदेहनन्दिनि! राक्षसियों के चंगुल में फँसकर भी आप अभीतक जीवित हैं, यह बड़े सौभाग्य की बात है। अब आप शीघ्र ही महारथी श्रीराम और लक्ष्मण का दर्शन करेंगी॥ ३७॥

मध्ये वानरकोटीनां सुग्रीवं चामितौजसम्।

अहं सुग्रीवसचिवो हनूमान् नाम वानरः॥ ३८॥

‘साथ ही करोड़ों वानरों से घिरे हुए अमिततेजस्वी सुग्रीव को भी आप देखेंगी। मैं सुग्रीव का मन्त्री हनुमान् नामक वानर हूँ॥ ३८॥

प्रविष्टो नगरी लङ्कां लङ्घयित्वा महोदधिम्।

कृत्वा मूर्ध्नि पदन्यासं रावणस्य दुरात्मनः॥ ३९॥

‘मैंने महासागर को लाँघकर और दुरात्मा रावण के सिरपर पैर रखकर लङ्कापुरी में प्रवेश किया है॥ ३९॥

त्वां द्रष्टमुपयातोऽहं समाश्रित्य पराक्रमम्।

नाहमस्मि तथा देवि यथा मामवगच्छसि।

विशङ्का त्यज्यतामेषा श्रद्धत्स्व वदतो मम॥४०॥

‘मैं अपने पराक्रम का भरोसा करके आपका दर्शन करने के लिये यहाँ उपस्थित हुआ हूँ। देवि! आप मुझे जैसा समझ रही हैं, मैं वैसा नहीं हूँ। आप यह विपरीत आशङ्का छोड़ दीजिये और मेरी बात पर विश्वास कीजिये’ ॥ ४०॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे चतुस्त्रिंशः सर्गः॥ ३४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में चौंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।३४॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
सुन्दरकाण्डम्

सीताजी के पूछने पर हनुमान जी का श्रीराम के शारीरिक चिह्नों और गुणों का वर्णन करना तथा नर-वानर की मित्रता का प्रसङ्ग सुनाकर सीताजी के मन में विश्वास उत्पन्न करना

पञ्चत्रिंशः सर्गः

सर्ग-35

तां तु रामकथां श्रुत्वा वैदेही वानरर्षभात्।

उवाच वचनं सान्त्वमिदं मधुरया गिरा॥१॥

वानरश्रेष्ठ हनुमान जी के मुख से श्रीरामचन्द्रजी की चर्चा सुनकर विदेहराजकुमारी सीता शान्तिपूर्वक मधुर वाणी में बोलीं- ॥१॥

क्व ते रामेण संसर्गः कथं जानासि लक्ष्मणम्।

वानराणां नराणां च कथमासीत् समागमः ॥२॥

‘कपिवर! तुम्हारा श्रीरामचन्द्रजी के साथ सम्बन्ध कहाँ हुआ? तुम लक्ष्मण को कैसे जानते हो? मनुष्यों और वानरों का यह मेल किस प्रकार सम्भव हुआ? ॥ २॥

यानि रामस्य चिह्नानि लक्ष्मणस्य च वानर।

तानि भूयः समाचक्ष्व न मां शोकः समाविशेत्॥३॥

‘वानर! श्रीराम और लक्ष्मण के जो चिह्न हैं, उनका फिर से वर्णन करो, जिससे मेरे मन में किसी प्रकार के शोक का समावेश न हो॥३॥

कीदृशं तस्य संस्थानं रूपं तस्य च कीदृशम्।

कथारू कथं बाहू लक्ष्मणस्य च शंस मे॥४॥

‘मुझे बताओ भगवान् श्रीराम और लक्ष्मण की आकृति कैसी है? उनका रूप किस तरह का है? उनकी जाँघे और भुजाएँ कैसी हैं?’ ॥ ४॥

एवमुक्तस्तु वैदेह्या हनूमान् मारुतात्मजः।

ततो रामं यथातत्त्वमाख्यातुमुपचक्रमे॥५॥

विदेहराजकुमारी सीता के इस प्रकार पूछने पर पवनकुमार हनुमान जी ने श्रीरामचन्द्रजी के स्वरूप का यथावत् वर्णन आरम्भ किया— ॥ ५॥

जानन्ती बत दिष्ट्या मां वैदेहि परिपृच्छसि।

भर्तुः कमलपत्राक्षि संस्थानं लक्ष्मणस्य च॥६॥

‘कमल के समान सुन्दर नेत्रोंवाली विदेहराजकुमारी! आप अपने पतिदेव श्रीराम के तथा देवर लक्ष्मणजी के शरीर के विषय में जानती हई भी जो मुझसे पूछ रही हैं, यह मेरे लिये बड़े सौभाग्य की बात है॥६॥

यानि रामस्य चिह्नानि लक्ष्मणस्य च यानि वै।

लक्षितानि विशालाक्षि वदतः शृणु तानि मे॥७॥

‘विशाललोचने! श्रीराम और लक्ष्मण के जिन-जिन चिह्नों को मैंने लक्ष्य किया है, उन्हें बताता हूँ मुझसे सुनिये॥७॥

रामः कमलपत्राक्षः पूर्णचन्द्रनिभाननः।

रूपदाक्षिण्यसम्पन्नः प्रसूतो जनकात्मजे॥८॥

‘जनकनन्दिनि! श्रीरामचन्द्रजी के नेत्र प्रफुल्लकमलदल के समान विशाल एवं सुन्दर हैं। मुख पूर्णिमा के चन्द्रमाके समान मनोहर है। वे जन्मकाल से ही रूप और उदारता आदि गुणों से सम्पन्न हैं॥८॥

तेजसाऽऽदित्यसंकाशः क्षमया पृथिवीसमः।

बृहस्पतिसमो बुद्ध्या यशसा वासवोपमः॥९॥

रक्षिता जीवलोकस्य स्वजनस्य च रक्षिता।

रक्षिता स्वस्य वृत्तस्य धर्मस्य च परंतपः॥१०॥

‘वे तेज में सूर्य के समान, क्षमा में पृथ्वी के तुल्य, बुद्धि में बृहस्पति के सदृश और यश में इन्द्र के समान हैं। वे सम्पूर्ण जीव-जगत् के तथा स्वजनों के भी रक्षक हैं। शत्रुओं को संताप देने वाले श्रीराम अपने सदाचार और धर्म की रक्षा करते हैं। ९-१० ॥

रामो भामिनि लोकस्य चातुर्वर्ण्यस्य रक्षिता।

मर्यादानां च लोकस्य कर्ता कारयिता च सः॥

‘भामिनि! श्रीरामचन्द्रजी जगत् के चारों वर्गों की रक्षा करते हैं। लोक में धर्म की मर्यादाओं को बाँधकर उनका पालन करने और कराने वाले भी वे ही हैं। ११॥

अर्चिष्मानर्चितोऽत्यर्थं ब्रह्मचर्यव्रते स्थितः।

साधूनामुपकारज्ञः प्रचारज्ञश्च कर्मणाम्॥१२॥

‘सर्वत्र अत्यन्त भक्तिभाव से उनकी पूजा होती है। ये कान्तिमान् एवं परम प्रकाशस्वरूप हैं, ब्रह्मचर्यव्रत के पालन में लगे रहते हैं, साधु पुरुषों का उपकार मानते और आचरणों द्वारा सत्कर्मो के प्रचार का ढंग जानते हैं॥ १२॥

राजनीत्यां विनीतश्च ब्राह्मणानामुपासकः।

ज्ञानवान शीलसम्पन्नो विनीतश्च परंतपः॥१३॥

‘वे राजनीति में पूर्ण शिक्षित, ब्राह्मणों के उपासक, ज्ञानवान्, शीलवान्, विनम्र तथा शत्रुओं को संताप देने में समर्थ हैं॥ १३॥

यजुर्वेदविनीतश्च वेदविद्भिः सुपूजितः।

धनुर्वेदे च वेदे च वेदाङ्गेषु च निष्ठितः॥१४॥

‘उन्हें यजुर्वेद की भी अच्छी शिक्षा मिली है। वेदवेत्ता विद्वानों ने उनका बड़ा सम्मान किया है। वे चारों वेद, धनुर्वेद और छहों वेदाङ्गों के भी परिनिष्ठित विद्वान् हैं ॥ १४॥

विपुलांसो महाबाहुः कम्बुग्रीवः शुभाननः।

गूढजत्रुः सुताम्राक्षो रामो नाम जनैः श्रुतः॥१५॥

‘उनके कंधे मोटे, भुजाएँ बड़ी-बड़ी, गला शङ्ख के समान और मुख सुन्दर है। गले की हँसली मांस से ढकी हुई है तथा नेत्रों में कुछ-कुछ लालिमा है। वे लोगों में ‘श्रीराम’ के नाम से प्रसिद्ध हैं॥ १५ ॥

दुन्दुभिस्वननिर्घोषः स्निग्धवर्णः प्रतापवान्।

समश्च सुविभक्ताङ्गो वर्णं श्यामं समाश्रितः॥१६॥

‘उनका स्वर दुन्दुभि के समान गम्भीर और शरीर का रंग सुन्दर एवं चिकना है। उनका प्रताप बहुत बढ़ा-चढ़ा है। उनके सभी अङ्ग सुडौल और बराबर हैं। उनकी कान्ति स्याम है॥ १६ ॥

त्रिस्थिरस्त्रिप्रलम्बश्च त्रिसमस्त्रिषु चोन्नतः।

त्रिताम्रस्त्रिषु च स्निग्धो गम्भीरस्त्रिषु नित्यशः॥१७॥

‘उनके तीन अङ्ग (वक्षःस्थल, कलाई और मुट्ठी) स्थिर (सुदृढ़) हैं। भौहें, भुजाएँ और मेढ—ये तीन अङ्ग लंबे हैं। केशों का अग्रभाग, अण्डकोष और घुटने—ये तीन समान–बराबर हैं। वक्षःस्थल, नाभि के किनारे का भाग और उदर—ये तीन उभरे हुए हैं। नेत्रों के कोने, नख और हाथ-पैर के तलवे—ये तीन लाल हैं शिश्न के अग्रभाग, दोनों पैरों की रेखाएँ और सिर के बाल—ये तीन चिकने हैं तथा स्वर, चाल और नाभि-ये तीन गम्भीर हैं॥ १७ ॥

त्रिवलीमांस्त्र्यवनतश्चतुर्व्यङ्गस्त्रिशीर्षवान्।

चतुष्कलश्चतुर्लेखश्चतुष्किष्कुश्चतुःसमः॥१८॥

‘उनके उदर तथा गले में तीन रेखाएँ हैं। तलवों के मध्यभाग, पैरों की रेखाएँ और स्तनों के अग्रभाग—ये तीन धंसे हुए हैं। गला, पीठ तथा दोनों पिण्डलियाँये चार अङ्ग छोटे हैं। मस्तक में तीन भँवरें हैं। पैरों के अँगूठे के नीचे तथा ललाट में चार-चार रेखाएँ हैं। वे चार हाथ ऊँचें हैं। उनके कपोल, भुजाएँ, जाँचे और घुटने—ये चार अङ्ग बराबर हैं॥ १८॥

चतुर्दशसमद्वन्द्वश्चतुर्दष्टश्चतुर्गतिः।

महोष्ठहनुनासश्च पञ्चस्निग्धोऽष्टवंशवान्॥१९॥

‘शरीर में जो दो-दो की संख्या में चौदह* अङ्ग होते हैं, वे भी उनके परस्पर सम हैं। उनकी चारों कोनों की चारों दाढ़ें शास्त्रीय लक्षणों से युक्त हैं। वे सिंह, बाघ, हाथी और साँड़-इन चार के समान चार प्रकार की गति से चलते हैं। उनके ओठ, ठोढ़ी और नासिका सभी प्रशस्त हैं। केश, नेत्र, दाँत, त्वचा और पैर के तलवे—इन पाँचों अङ्गों में स्निग्धता भरी है। दोनों भुजाएँ, दोनों जाँघे, दोनों पिण्डलियाँ, हाथ और पैरों की अँगुलियाँ—ये आठ अङ्ग उत्तम लक्षणों से सम्पन्न (लंबे) हैं॥ १९ ॥

* भौंह, नथुने, नेत्र, कान, ओठ, स्तन, कोहनी, कलाई, जाँघ, घुटने, अण्डकोष, कमर के दोनों भाग, हाथ और पैर

दशपद्मो दशबृहत् त्रिभिर्व्याप्तो द्विशुक्लवान्।

षडुन्नतो नवतनुस्त्रिभिर्व्याप्नोति राघवः॥२०॥

‘उनके नेत्र, मुख-विवर, मुख-मण्डल, जिह्वा,ओठ,तालु, स्तन, नख, हाथ और पैर—ये दस अङ्ग कमल के समान हैं। छाती, मस्तक, ललाट, गला, भुजाएँ, कंधे, नाभि, चरण, पीठ और कान—ये दस अङ्ग विशाल हैं। वे श्री, यश और प्रताप–इन तीनों से व्याप्त हैं। उनके मातृकुल और पितृकुल दोनों अत्यन्त शुद्ध हैं। पार्श्वभाग, उदर, वक्षःस्थल, नासिका, कंधे और ललाट—ये छः अङ्ग ऊँचे हैं। केश, नख, लोम, त्वचा, अंगुलियों के पोर, शिश्न, बुद्धि और दृष्टि आदि नौ सूक्ष्म (पतले) हैं तथा वे श्रीरघुनाथजी पूर्वाण, मध्याह्न और अपराण-इन तीन कालों द्वारा क्रमशः धर्म, अर्थ और काम का अनुष्ठान करते हैं।॥ २०॥

सत्यधर्मरतः श्रीमान् संग्रहानुग्रहे रतः।

देशकालविभागज्ञः सर्वलोकप्रियंवदः॥ २१॥

‘श्रीरामचन्द्रजी सत्यधर्म के अनुष्ठान में संलग्न, श्रीसम्पन्न, न्यायसङ्गत धन का संग्रह और प्रजापर अनुग्रह करने में तत्पर, देश और काल के विभाग को समझने वाले तथा सब लोगों से प्रिय वचन बोलने वाले हैं।॥ २१॥

भ्राता चास्य च वैमात्रः सौमित्रिरमितप्रभः।

अनुरागेण रूपेण गुणैश्चापि तथाविधः ॥२२॥

“उनके सौतेले भाई सुमित्राकुमार लक्ष्मण भी बड़े तेजस्वी हैं। अनुराग, रूप और सद्गुणों की दृष्टि से भी वे श्रीरामचन्द्रजी के ही समान हैं॥ २२॥

स सुवर्णच्छविः श्रीमान् रामः श्यामो महायशाः।

तावुभौ नरशार्दूलौ त्वदर्शनकृतोत्सवौ॥२३॥

विचिन्वन्तौ महीं कृत्स्नामस्माभिः सह संगतौ।

“उन दोनों भाइयों में अन्तर इतना ही है कि लक्ष्मण के शरीर की कान्ति सुवर्ण के समान गौर है और महायशस्वी श्रीरामचन्द्रजी का विग्रह श्यामसुन्दर है। वे दोनों नरश्रेष्ठ आपके दर्शन के लिये उत्कण्ठित हो सारी पृथ्वी पर आपकी ही खोज करते हुए हमलोगों से मिले थे॥ २३ १/२॥

त्वामेव मार्गमाणौ तौ विचरन्तौ वसुन्धराम्॥२४॥

ददर्शतुर्मूगपतिं पूर्वजनावरोपितम्।

‘आपको ही ढूँढ़ने के लिये पृथ्वी पर विचरते हुए उन दोनों भाइयों ने वानरराज सुग्रीव का साक्षात्कार किया, जो अपने बड़े भाई के द्वारा राज्य से उतार दिये गये थे॥ २४ १/२॥

ऋष्यमूकस्य मूले तु बहुपादपसंकुले॥२५॥

भ्रातुर्भयार्तमासीनं सुग्रीवं प्रियदर्शनम्।

‘ऋष्यमूक पर्वत के मूलभाग में जो बहुत-से वृक्षों द्वारा घिरा हुआ है, भाई के भय से पीड़ित हो बैठे हुए प्रियदर्शन सुग्रीव से वे दोनों भाई मिले॥ २५ १/२॥

वयं च हरिराजं तं सुग्रीवं सत्यसङ्गरम्॥२६॥

परिचर्यामहे राज्यात् पूर्वजेनावरोपितम्।

‘उन दिनों जिन्हें बड़े भाई ने राज्य से उतार दिया था, उन सत्यप्रतिज्ञ वानरराज सुग्रीव की सेवा में हम सब लोग रहा करते थे॥ २६ १/२ ॥

ततस्तौ चीरवसनौ धनुःप्रवरपाणिनौ ॥२७॥

ऋष्यमूकस्य शैलस्य रम्यं देशमुपागतौ।

स तौ दृष्ट्वा नरव्याघ्रौ धन्विनौ वानरर्षभः॥२८॥

अभिप्लुतो गिरेस्तस्य शिखरं भयमोहितः।

‘शरीर पर वल्कलवस्त्र तथा हाथ में धनुष धारण किये वे दोनों भाई जब ऋष्यमूक पर्वत के रमणीय प्रदेश में आये, तब धनुष धारण करने वाले उन दोनों नरश्रेष्ठ वीरों को वहाँ उपस्थित देख वानरशिरोमणि सुग्रीव भय से घबरा उठे और उछलकर उस पर्वत के उच्चतम शिखर पर जा चढ़े॥ २७-२८ १/२॥

ततः स शिखरे तस्मिन् वानरेन्द्रो व्यवस्थितः॥२९॥

तयोः समीपं मामेव प्रेषयामास सत्वरम्।

‘उस शिखर पर बैठने के पश्चात् वानरराज सुग्रीव ने मुझे ही शीघ्रतापूर्वक उन दोनों बन्धुओं के पास भेजा। २९ १/२॥

तावहं पुरुषव्याघ्रौ सुग्रीववचनात् प्रभू॥३०॥

रूपलक्षणसम्पन्नौ कृताञ्जलिरुपस्थितः।

‘सुग्रीव की आज्ञा से उन प्रभावशाली रूपवान् तथा शुभलक्षणसम्पन्न दोनों पुरुषसिंह वीरों की सेवा में मैं हाथ जोड़कर उपस्थित हुआ॥३० १/२॥

तौ परिज्ञाततत्त्वार्थी मया प्रीतिसमन्वितौ ॥ ३१॥

पृष्ठमारोप्य तं देशं प्रापितौ पुरुषर्षभौ।

‘मुझसे यथार्थ बातें जानकर उन दोनों को बड़ी प्रसन्नता हुई। फिर मैं अपनी पीठ पर चढ़ाकर उन दोनों पुरुषोत्तम बन्धुओं को उस स्थान पर ले गया (जहाँ वानरराज सुग्रीव थे) ॥ ३१ १/२॥

निवेदितौ च तत्त्वेन सुग्रीवाय महात्मने ॥ ३२॥

तयोरन्योन्यसम्भाषाद् भृशं प्रीतिरजायत।

‘वहाँ महात्मा सुग्रीव को मैंने इन दोनों बन्धुओं का यथार्थ परिचय दिया। तत्पश्चात् श्रीराम और सुग्रीव ने परस्पर बातें कीं, इससे उन दोनों में बड़ा प्रेम हो गया॥

तत्र तौ कीर्तिसम्पन्नौ हरीश्वरनरेश्वरौ॥ ३३॥

परस्परकृताश्वासौ कथया पूर्ववृत्तया।

‘वहाँ उन दोनों यशस्वी वानरेश्वर और नरेश्वरों ने अपने ऊपर बीती हुई पहले की घटनाएँ सुनायीं तथा दोनों ने दोनों को आश्वासन दिया॥३३ १/२॥

तं ततः सान्त्वयामास सुग्रीवं लक्ष्मणाग्रजः॥३४॥

स्त्रीहेतोलिना भ्रात्रा निरस्तं पुरुतेजसा।

‘उस समय लक्ष्मण के बड़े भाई श्रीरघुनाथजी ने स्त्री के लिये अपने महातेजस्वी भाई वाली द्वारा घर से निकाले हुए सुग्रीव को सान्त्वना दी॥ ३४ १/२॥

ततस्त्वन्नाशजं शोकं रामस्याक्लिष्टकर्मणः॥३५॥

लक्ष्मणो वानरेन्द्राय सुग्रीवाय न्यवेदयत्।

‘तत्पश्चात् अनायास ही महान् कर्म करने वाले भगवान् श्रीराम को आपके वियोग से जो शोक हो रहा था, उसे लक्ष्मण ने वानरराज सुग्रीव को सुनाया।। ३५ १/२॥

स श्रुत्वा वानरेन्द्रस्तु लक्ष्मणेनेरितं वचः॥ ३६॥

तदासीन्निष्प्रभोऽत्यर्थं ग्रहग्रस्त इवांशुमान्।

‘लक्ष्मणजी की कही हुई वह बात सुनकर वानरराज सुग्रीव उस समय ग्रहग्रस्त सूर्य के समान अत्यन्त कान्तिहीन हो गये॥ ३६ १/२ ॥

ततस्त्वद्गात्रशोभीनि रक्षसा ह्रियमाणया॥३७॥

यान्याभरणजालानि पातितानि महीतले।

तानि सर्वाणि रामाय आनीय हरियूथपाः॥३८॥

संहृष्टा दर्शयामासुर्गतिं तु न विदुस्तव।

प्रादीपयद् दाशरथेस्तदा शोकहुताशनम्॥४२॥

शायितं च चिरं तेन दुःखार्तेन महात्मना।

मयापि विविधैर्वाक्यैः कृच्छ्रादुत्थापितः पुनः॥४३॥

‘उन आभूषणों को बारंबार देखते, रोते और तिलमिला उठते थे। उस समय दशरथनन्दन श्रीराम की शोकाग्नि प्रज्वलित हो उठी। उस दुःख से आतुर हो वे महात्मा रघुवीर बहुत देर तक मूर्च्छित अवस्था में पड़े रहे। तब मैंने नाना प्रकार के सान्त्वनापूर्ण वचन कहकर बड़ी कठिनाई से उन्हें उठाया॥ ४१-४३॥

तानि दृष्ट्वा महार्हाणि दर्शयित्वा मुहुर्मुहुः।

राघवः सहसौमित्रिः सुग्रीवे संन्यवेशयत्॥४४॥

‘लक्ष्मणसहित श्रीरघुनाथजी ने उन बहुमूल्य आभूषणों को बारंबार देखा और दिखाया। फिर वे सब सुग्रीव को दे दिये॥४४॥

स तवादर्शनादार्ये राघवः परितप्यते।

महता ज्वलता नित्यमग्निनेवाग्निपर्वतः॥४५॥

‘आर्ये! आपको न देख पाने के कारण श्रीरघुनाथजी को बड़ा दुःख और संताप हो रहा है जैसे ज्वालामुखी पर्वत जलती हुई बड़ी भारी आग से सदा तपता रहता है, उसी प्रकार वे आपकी विरहाग्नि से जल रहे हैं॥ ४५ ॥

त्वत्कृते तमनिद्रा च शोकश्चिन्ता च राघवम्।

तापयन्ति महात्मानमग्न्यगारमिवाग्नयः॥४६॥

‘आपके लिये महात्मा श्रीरघुनाथजी को अनिद्रा (निरन्तर जागरण), शोक और चिन्ता—ये तीनों उसी प्रकार संताप देते हैं, जैसे आहवनीय आदि त्रिविध अग्नियाँ अग्निशाला को तपाती रहती हैं। ४६॥

तवादर्शनशोकेन राघवः परिचाल्यते।

महता भूमिकम्पेन महानिव शिलोच्चयः॥४७॥

‘देवि! आपको न देख पाने का शोक श्रीरघुनाथजी को उसी प्रकार विचलित कर देता है, जैसे भारी भूकम्प से महान् पर्वत भी हिल जाता है। ४७॥

काननानि सुरम्याणि नदीप्रस्रवणानि च।

चरन् न रतिमाप्नोति त्वामपश्यन् नृपात्मजे॥४८॥

‘राजकुमारि! आपको न देखने के कारण रमणीय काननों, नदियों और झरनों के पास विचरने पर भी श्रीराम को सुख नहीं मिलता है॥ ४८॥

स त्वां मनुजशार्दूलः क्षिप्रं प्राप्स्यति राघवः।

समित्रबान्धवं हत्वा रावणं जनकात्मजे॥४९॥

‘जनकनन्दिनि! पुरुषसिंह भगवान् श्रीराम रावण को उसके मित्र और बन्धु-बान्धवोंसहित मारकर शीघ्र ही आपसे मिलेंगे॥ ४९॥

सहितौ रामसुग्रीवावुभावकुरुतां तदा।

समयं वालिनं हन्तुं तव चान्वेषणं प्रति॥५०॥

‘उन दिनों श्रीराम और सुग्रीव जब मित्रभाव से मिले, तब दोनों ने एक-दूसरे की सहायता के लिये प्रतिज्ञा की। श्रीरामने वाली को मारने का और सुग्रीव ने आपकी खोज कराने का वचन दिया॥५०॥

ततस्ताभ्यां कुमाराभ्यां वीराभ्यां स हरीश्वरः।

किष्किन्धां समुपागम्य वाली युद्धे निपातितः॥५१॥

‘इसके बाद उन दोनों वीर राजकुमारों ने किष्किन्धा में जाकर वानरराज वाली को युद्ध में मार गिराया। ५१॥

ततो निहत्य तरसा रामो वालिनमाहवे।

सर्वद॑हरिसङ्घानां सुग्रीवमकरोत् पतिम्॥५२॥

‘युद्ध में वेगपूर्वक वाली को मारकर श्रीराम ने सुग्रीव को समस्त भालुओं और वानरों का राजा बना दिया॥५२॥

रामसुग्रीवयोरैक्यं देव्येवं समजायत।

हनूमन्तं च मां विद्धि तयोर्दूतमुपागतम्॥५३॥

‘देवि! श्रीराम और सुग्रीव में इस प्रकार मित्रता हुई है। मैं उन दोनों का दूत बनकर यहाँ आया हूँ। आप मुझे हनुमान् समझें ॥ ५३॥

स्वं राज्यं प्राप्य सुग्रीवः स्वानानीय महाकपीन्।

त्वदर्थं प्रेषयामास दिशो दश महाबलान्॥५४॥

‘अपना राज्य पाने के अनन्तर सुग्रीव ने अपने आश्रय में रहने वाले बड़े-बड़े बलवान् वानरों को बुलाया और उन्हें आपकी खोज के लिये दसों दिशाओं में भेजा॥ ५४॥

आदिष्टा वानरेन्द्रेण सुग्रीवेण महौजसः।

अद्रिराजप्रतीकाशाः सर्वतः प्रस्थिता महीम्॥५५॥

‘वानरराज सुग्रीव की आज्ञा पाकर गिरिराज के समान विशालकाय महाबली वानर पृथ्वी पर सब ओर चल दिये॥ ५५॥

ततस्ते मार्गमाणा वै सुग्रीववचनातुराः।

चरन्ति वसुधां कृत्स्नां वयमन्ये च वानराः॥५६॥

‘सुग्रीव की आज्ञा से  भयभीत हो हम तथा अन्य वानर आपकी खोज करते हुए समस्त भूमण्डल में विचर रहे हैं॥५६॥

अङ्गदो नाम लक्ष्मीवान् वालिसूनुर्महाबलः।

प्रस्थितः कपिशार्दूलस्त्रिभागबलसंवृतः॥५७॥

‘वाली के शोभाशाली पुत्र महाबली कपिश्रेष्ठ अंगद वानरों की एक तिहाई सेना साथ लेकर आपकी खोज में निकले थे (उन्हीं के दल में मैं भी था) ॥ ५७॥

तेषां नो विप्रणष्टानां विन्ध्ये पर्वतसत्तमे।

भृशं शोकपरीतानामहोरात्रगणा गताः॥५८॥

‘पर्वतश्रेष्ठ विन्ध्य में आकर खो जाने के कारण हमने वहाँ बड़ा कष्ट उठाया और वहीं हमारे बहुत दिन बीत गये॥ ५८॥

ते वयं कार्यनैराश्यात् कालस्यातिक्रमेण च।

भयाच्च कपिराजस्य प्राणांस्त्यक्तुमुपस्थिताः॥

‘अब हमें कार्य-सिद्धि की कोई आशा नहीं रह गयी और निश्चित अवधि से भी अधिक समय बिता देने के कारण वानरराज सुग्रीव का भी भय था, इसलिये हम सब लोग अपने प्राण त्याग देने के लिये उद्यत हो गये॥ ५९॥

विचित्य गिरिदुर्गाणि नदीप्रस्रवणानि च।

अनासाद्य पदं देव्याः प्राणांस्त्यक्तुं व्यवस्थिताः॥६०॥

‘पर्वत के दर्गम स्थानों में, नदियों के तटों पर और झरनों के आस-पास की सारी भूमि छान डाली तो भी जब हमें देवी सीता-(आप-) के स्थान का पता न चला, तब हम प्राण त्याग देने को तैयार हो गये। ६०॥

ततस्तस्य गिरेर्मूर्ध्नि वयं प्रायमुपास्महे।

दृष्ट्वा प्रायोपविष्टांश्च सर्वान् वानरपुङ्गवान्॥६१॥

भृशं शोकार्णवे मग्नः पर्यदेवयदङ्गदः।

‘मरणान्त उपवास का निश्चय करके हम सब-के सब उस पर्वत के शिखर पर बैठ गये। उस समय समस्त वानर-शिरोमणियों को प्राण त्याग देने के लिये बैठे देख कुमार अङ्गद अत्यन्त शोक के समुद्र में डूब गये और विलाप करने लगे॥६१ १/२ ॥

तव नाशं च वैदेहि वालिनश्च तथा वधम्॥६२॥

प्रायोपवेशमस्माकं मरणं च जटायुषः।

‘विदेहनन्दिनि! आपका पता न लगने, वाली के मारे जाने, हमलोगों के मरणान्त उपवास करने तथा जटायु के मरने की बात पर विचार करके कुमार अङ्गद को बड़ा दुःख हुआ था॥ ६२ १/२ ॥

तेषां नः स्वामिसंदेशान्निराशानां मुमूर्षताम्॥

कार्यहेतोरिहायातः शकुनिर्वीर्यवान् महान्।

गृध्रराजस्य सोदर्यः सम्पातिर्नाम गृध्रराट् ॥ ६४॥

‘स्वामी के आज्ञापालन से निराश होकर हम मरना ही चाहते थे कि दैववश हमारा कार्य सिद्ध करने के लिये गृध्रराज जटायु के बड़े भाई सम्पाति, जो स्वयं भी गीधों के राजा और महान् बलवान् पक्षी हैं, वहाँ आ पहुँचे॥ ६३-६४॥

श्रुत्वा भ्रातृवधं कोपादिदं वचनमब्रवीत्।

यवीयान् केन मे भ्राता हतः क्व च निपातितः॥६५॥

एतदाख्यातुमिच्छामि भवद्भिर्वानरोत्तमाः।

‘हमारे मुँह से अपने भाई के वध की चर्चा सुनकर वे कुपित हो उठे और बोले—’वानरशिरोमणियो! बताओ, मेरे छोटे भाई जटायु का वध किसने किया है? वह कहाँ मारा गया है? यह सब वृत्तान्त मैं तुमलोगों से सुनना चाहता हूँ’॥ ६५ १/२ ॥

अङ्गदोऽकथयत् तस्य जनस्थाने महदधम्॥६६॥

रक्षसा भीमरूपेण त्वामुद्दिश्य यथार्थतः।

‘तब अंगद ने जनस्थान में आपकी रक्षा के उद्देश्य से जूझते समय जटायु का उस भयानक रूपधारी राक्षस के द्वारा जो महान् वध किया गया था, वह सब प्रसंग ज्यों-का-त्यों कह सुनाया॥ ६६ १/२ ॥

जटायोस्तु वधं श्रुत्वा दुःखितः सोऽरुणात्मजः॥६७॥

त्वामाह स वरारोहे वसन्तीं रावणालये।

‘जटायु के वध का वृत्तान्त सुनकर अरुणपुत्र सम्पाति को बड़ा दुःख हुआ। वरारोहे ! उन्होंने ही हमें बताया कि आप रावण के घर में निवास कर रही हैं।

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा सम्पातेः प्रीतिवर्धनम्॥६८॥

अङ्गदप्रमुखाः सर्वे ततः प्रस्थापिता वयम्।

विन्ध्यादुत्थाय सम्प्राप्ताः सागरस्यान्तमुत्तमम्॥६९॥

त्वदर्शने कृतोत्साहा हृष्टाः पुष्टाः प्लवङ्गमाः।

अङ्गदप्रमुखाः सर्वे वेलोपान्तमुपागताः॥७०॥

‘सम्पाति का वह वचन वानरों के लिये बड़ा हर्षवर्धक था। उसे सुनकर उन्हीं के भेजने से अङ्गद आदि हम सभी वानर आपके दर्शन की आशा से उत्साहित हो विन्ध्यपर्वत से उठकर समुद्र के उत्तम तट पर आये। इस प्रकार अङ्गद आदि सभी हृष्ट-पुष्ट वानर समुद्र के किनारे आ पहुँचे॥

चिन्तां जग्मुः पुनर्भीमां त्वदर्शनसमुत्सुकाः।

अथाहं हरिसैन्यस्य सागरं दृश्य सीदतः॥ ७१॥

व्यवधूय भयं तीन योजनानां शतं प्लुतः।

‘आपके दर्शन के लिये उत्सुक होने पर भी सामने अपार समुद्र को देखकर सब वानर फिर भयानक चिन्ता में पड़ गये। समुद्र को देखकर वानर-सेना कष्ट में पड़ गयी है, यह जानकर मैं उन सबके तीव्र भय को दूर करता हुआ सौ योजन समुद्र को लाँघकर यहाँ आ गया। ७१ १/२ ॥

लङ्का चापि मया रात्रौ प्रविष्टा राक्षसाकुला॥७२॥

 रावणश्च मया दृष्टस्त्वं च शोकनिपीडिता।

‘राक्षसों से भरी हुई लङ्का में मैंने रात में ही प्रवेश किया है। यहाँ आकर रावण को देखा है और शोक से पीड़ित हुई आपका भी दर्शन किया है॥ ७२ १/२ ॥

एतत् ते सर्वमाख्यातं यथावृत्तमनिन्दिते॥७३॥

अभिभाषस्व मां देवि दूतो दाशरथेरहम्।

‘सतीशिरोमणे! यह सारा वृत्तान्त मैंने ठीक-ठीक आपके सामने रखा है। देवि! मैं दशरथनन्दन श्रीराम का दूत हूँ, अतः आप मुझसे बात कीजिये। ७३ १/२॥

तन्मां रामकृतोद्योगं त्वन्निमित्तमिहागतम्॥७४॥

सुग्रीवसचिवं देवि बुद्ध्यस्व पवनात्मजम्।

‘मैंने श्रीरामचन्द्रजी के कार्य की सिद्धि के लिये ही यह सारा उद्योग किया है और आपके दर्शन के निमित्त मैं यहाँ आया हूँ। देवि! आप मुझे सुग्रीव का मन्त्री तथा वायुदेवता का पुत्र हनुमान् समझें।। ७४ १/२॥

कुशली तव काकुत्स्थः सर्वशस्त्रभृतां वरः॥७५॥

गुरोराराधने युक्तो लक्ष्मणः शुभलक्षणः।

तस्य वीर्यवतो देवि भर्तस्तव हिते रतः॥७६॥

‘देवि! आपके पतिदेव समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामचन्द्रजी सकुशल हैं तथा बड़े भाई की सेवा में संलग्न रहने वाले शुभलक्षण लक्ष्मण भी प्रसन्न हैं। वे आपके उन पराक्रमी पतिदेव के हित-साधन में ही तत्पर रहते हैं।। ७५-७६॥

अहमेकस्तु सम्प्राप्तः सुग्रीववचनादिह।

मयेयमसहायेन चरता कामरूपिणा॥७७॥

दक्षिणा दिगनुक्रान्ता त्वन्मार्गविचयैषिणा।

‘मैं सुग्रीव की आज्ञा से अकेला ही यहाँ आया हूँ। इच्छानुसार रूप धारण करने की शक्ति रखता हूँ। आपका पता लगाने की इच्छा से मैंने बिना किसी सहायक के अकेले ही घूम-फिरकर इस दक्षिणदिशा का अनुसंधान किया है॥ ७७ १/२ ॥

दिष्टयाहं हरिसैन्यानां त्वन्नाशमनुशोचताम्॥७८॥

अपनेष्यामि संतापं तवाधिगमशासनात्।

‘आपके विनाश की सम्भावना से जो निरन्तर शोक में डूबे रहते हैं, उन वानर सैनिकों को यह बताकर कि आप मिल गयीं, मैं उनका संताप दूर करूँगा। यह मेरे लिये बड़े हर्ष की बात होगी॥ ७८ १/२ ॥

दिष्टया हि न मम व्यर्थं सागरस्येह लङ्घनम्॥७९॥

प्राप्स्याम्यहमिदं देवि त्वद्दर्शनकृतं यशः।

‘देवि! मेरा समुद्र को लाँघकर यहाँ तक आना व्यर्थ नहीं हुआ। सबसे पहले आपके दर्शन का यह यश मुझे ही मिलेगा। यह मेरे लिये सौभाग्य की बात है। । ७९ १/२॥

राघवश्च महावीर्यः क्षिप्रं त्वामभिपत्स्यते॥८०॥

सपुत्रबान्धवं हत्वा रावणं राक्षसाधिपम्।

‘महापराक्रमी श्रीरामचन्द्रजी राक्षसराज रावण को उसके पुत्र और बन्धु-बान्धवोंसहित मारकर शीघ्र ही आपसे आ मिलेंगे। ८० १/२॥

माल्यवान् नाम वैदेहि गिरीणामुत्तमो गिरिः॥८१॥

ततो गच्छति गोकर्णं पर्वतं केसरी हरिः।

स च देवर्षिभिर्दिष्टः पिता मम महाकपिः।

तीर्थे नदीपतेः पुण्ये शम्बसादनमुद्धरन्॥८२॥

यस्याहं हरिणः क्षेत्रे जातो वातेन मैथिलि।

हनूमानिति विख्यातो लोके स्वेनैव कर्मणा॥८३॥

‘विदेहनन्दिनि! पर्वतों में माल्यवान् नाम से प्रसिद्ध एक उत्तम पर्वत है। वहाँ केसरी नामक वानर निवास करते थे। एक दिन वे वहाँ से गोकर्ण पर्वत पर गये। महाकपि केसरी मेरे पिता हैं। उन्होंने समुद्र के तट पर विद्यमान उस पवित्र गोकर्ण-तीर्थ में देवर्षियों की आज्ञा से शम्बसादन नामक दैत्य का संहार किया था। मिथिलेशकुमारी! उन्हीं कपिराज केसरी की स्त्री के गर्भ से वायुदेवता के द्वारा मेरा जन्म हुआ है। मैं लोक में अपने ही कर्मद्वारा ‘हनुमान्’ नाम से विख्यात हूँ॥८१-८३॥

विश्वासार्थं तु वैदेहि भर्तुरुक्ता मया गुणाः।

अचिरात् त्वामितो देवि राघवो नयिता ध्रुवम्॥८४॥

‘विदेहनन्दनि! आपको विश्वास दिलाने के लिये मैंने आपके स्वामी के गुणों का वर्णन किया है। देवि! श्रीरघुनाथजी शीघ्र ही आपको यहाँ से ले चलेंगे—यह निश्चित बात है’।। ८४॥

एवं विश्वासिता सीता हेतुभिः शोककर्शिता।

उपपन्नैरभिज्ञानैर्दूतं तमधिगच्छति॥८५॥

इस प्रकार युक्तियुक्त एवं विश्वसनीय कारणों तथा पहचान के रूप में बताये गये श्रीराम और लक्ष्मण के शारीरिक चिह्नों द्वारा हनुमान् जी ने शोक से दुर्बल हुई सीता को अपना विश्वास दिलाया। तब उन्होंने हनुमान् जी को श्रीराम का दूत समझा॥ ८५ ॥

अतुलं च गता हर्षं प्रहर्षेण तु जानकी।

नेत्राभ्यां वक्रपक्ष्माभ्यां मुमोचानन्दजं जलम्॥८६॥

उस समय जनकनन्दिनी सीता को अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ। उस महान् हर्ष के कारण वे कुटिल बरौनियों वाले दोनों नेत्रों से आनन्द के आँसू बहाने लगीं॥८६॥

चारु तद् वदनं तस्यास्ताम्रशुक्लायतेक्षणम्।

अशोभत विशालाक्ष्या राहुमुक्त इवोडुराट्॥८७॥

उस अवसर पर विशाललोचना सीता का मनोहर मुख, जो लाल, सफेद और बड़े-बड़े नेत्रों से युक्त था, राहु के ग्रहण से मुक्त हुए चन्द्रमा के समान शोभा पा रहा था।

हनूमन्तं कपिं व्यक्तं मन्यते नान्यथेति सा।

अथोवाच हनूमांस्तामुत्तरं प्रियदर्शनाम्॥८८॥

अब वे हनुमान् को वास्तविक वानर मानने लगीं। इसके विपरीत मायामय रूपधारी राक्षस नहीं। तदनन्तर हनुमान जी ने प्रियदर्शना सीता से फिर कहा – ॥ ८८॥

एतत् ते सर्वमाख्यातं समाश्वसिहि मैथिलि।

किं करोमि कथं वा ते रोचते प्रतियाम्यहम्॥८९॥

‘मिथिलेशकुमारी! इस प्रकार आपने जो कुछ पूछा था, वह सब मैंने बता दिया। अब आप धैर्य धारण करें बताइये, मैं आपकी कैसी और क्या सेवा करूँ। इस समय आपकी रुचि क्या है, आज्ञा हो तो अब मैं लौट जाऊँ॥ ८९॥

हतेऽसुरे संयति शम्बसादने कपिप्रवीरेण महर्षिचोदनात्।

ततोऽस्मि वायुप्रभवो हि मैथिलि प्रभावतस्तत्प्रतिमश्च वानरः॥९०॥

‘महर्षियों की प्रेरणा से कपिवर केसरी द्वारा युद्ध में शम्बसादन नामक असुर के मारे जाने पर मैंने पवनदेवता के द्वारा जन्म ग्रहण किया। अतः मैथिलि! मैं उन वायुदेवता के समान ही प्रभावशाली वानर हूँ’। ९०॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे पञ्चत्रिंशः सर्गः॥ ३५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में पैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।३५॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
सुन्दरकाण्डम्

हनुमान जी का सीता को मुद्रिका देना, सीता का ‘श्रीराम कब मेरा उद्धार करेंगे’ यह उत्सुक होकर पूछना तथा हनुमान् का श्रीराम के सीताविषयक प्रेम का वर्णन करके उन्हें सान्त्वना देना

षट्त्रिंशः सर्गः

सर्ग-36

भूय एव महातेजा हनूमान् पवनात्मजः।

अब्रवीत् प्रश्रितं वाक्यं सीताप्रत्ययकारणात्॥१॥

तदनन्तर महातेजस्वी पवनकुमार हनुमान् जी सीताजी को विश्वास दिलाने के लिये पुनः विनययुक्त वचन बोले- ॥१॥

वानरोऽहं महाभागे दूतो रामस्य धीमतः।

रामनामाङ्कितं चेदं पश्य देव्यङ्गलीयकम्॥२॥

‘महाभागे ! मैं परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीराम का दूत वानर हूँ। देवि! यह श्रीराम नाम से अङ्कित मुद्रिका है, इसे लेकर देखिये॥२॥

प्रत्ययार्थं तवानीतं तेन दत्तं महात्मना।

समाश्वसिहि भद्रं ते क्षीणदुःखफला ह्यसि॥३॥

‘आपको विश्वास दिलाने के लिये ही मैं इसे लेता आया हूँ। महात्मा श्रीरामचन्द्रजी ने स्वयं यह अंगूठी मेरे हाथ में दी थी। आपका कल्याण हो। अब आप धैर्य धारण करें। आपको जो दुःखरूपी फल मिल रहा था, वह अब समाप्त हो चला है’॥३॥

गृहीत्वा प्रेक्षमाणा सा भर्तुः करविभूषितम्।

भर्तारमिव सम्प्राप्त जानकी मुदिताभवत्॥४॥

पति के हाथ को सुशोभित करने वाली उस मुद्रिका को लेकर सीताजी उसे ध्यान से देखने लगीं। उस समय जानकीजी को इतनी प्रसन्नता हुई, मानो स्वयं उनके पतिदेव ही उन्हें मिल गये हों॥४॥

चारु तद् वदनं तस्यास्ताम्रशुक्लायतेक्षणम्।

बभूव हर्षोदग्रं च राहुमुक्त इवोडुराट्॥५॥

उनका लाल, सफेद और विशाल नेत्रों से युक्त मनोहर मुख हर्ष से खिल उठा, मानो चन्द्रमा राहु के ग्रहण से मुक्त हो गया हो॥५॥

ततः सा ह्रीमती बाला भर्तुः संदेशहर्षिता।

परितुष्टा प्रियं कृत्वा प्रशशंस महाकपिम्॥६॥

वे लजीली विदेहबाला प्रियतम का संदेश पाकर बहुत प्रसन्न हुईं। उनके मन को बड़ा संतोष हुआ। वे महाकपि हनुमान जी का आदर करके उनकी प्रशंसा करने लगीं- ॥६॥

विक्रान्तस्त्वं समर्थस्त्वं प्राज्ञस्त्वं वानरोत्तम।

येनेदं राक्षसपदं त्वयैकेन प्रधर्षितम्॥७॥

‘वानरश्रेष्ठ! तुम बड़े पराक्रमी, शक्तिशाली और बुद्धिमान् हो; क्योंकि तुमने अकेले ही इस राक्षसपुरी को पददलित कर दिया है॥७॥

शतयोजनविस्तीर्णः सागरो मकरालयः।

विक्रमश्लाघनीयेन क्रमता गोष्पदीकृतः॥८॥

‘तुम अपने पराक्रम के कारण प्रशंसा के योग्य हो; क्योंकि तुमने मगर आदि जन्तुओं से भरे हुए सौ योजन विस्तारवाले महासागर को लाँघते समय उसे गाय की खुरी के बराबर समझा है, इसलिये प्रशंसा के पात्र हो॥

नहि त्वां प्राकृतं मन्ये वानरं वानरर्षभ।

यस्य ते नास्ति संत्रासो रावणादपि सम्भ्रमः॥९॥

‘वानरशिरोमणे! मैं तुम्हें कोई साधारण वानर नहीं मानती हूँ; क्योंकि तुम्हारे मन में रावण-जैसे राक्षससेभी न तो भय होता है और न घबराहट ही॥९॥

अर्हसे च कपिश्रेष्ठ मया समभिभाषितुम्।

यद्यसि प्रेषितस्तेन रामेण विदितात्मना॥१०॥

‘कपिश्रेष्ठ! यदि तुम्हें आत्मज्ञानी भगवान् श्रीराम ने भेजा है तो तुम अवश्य इस योग्य हो कि मैं तुमसे बातचीत करूँ॥ १० ॥

प्रेषयिष्यति दुर्धर्षो रामो नापरीक्षितम्।

पराक्रममविज्ञाय मत्सकाशं विशेषतः॥११॥

‘दुर्धर्ष वीर श्रीरामचन्द्रजी विशेषतः मेरे निकट ऐसे किसी पुरुष को नहीं भेजेंगे, जिसके पराक्रमका उन्हें ज्ञान न हो तथा जिसके शीलस्वभाव की उन्होंने परीक्षा न कर ली हो ॥ ११॥

दिष्ट्या च कुशली रामो धर्मात्मा सत्यसंगरः।

लक्ष्मणश्च महातेजाः सुमित्रानन्दवर्धनः॥१२॥

‘सत्यप्रतिज्ञ एवं धर्मात्मा भगवान् श्रीराम सकुशल हैं तथा सुमित्रा का आनन्द बढ़ाने वाले महातेजस्वी लक्ष्मण भी स्वस्थ एवं सुखी हैं, यह जानकर मुझे बड़ा हर्ष हुआ है और यह शुभ संवाद मेरे लिये सौभाग्य का सूचक है॥ १२॥

कुशली यदि काकुत्स्थः किं न सागरमेखलाम्।

महीं दहति कोपेन युगान्ताग्निरिवोत्थितः॥१३॥

‘यदि ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम सकुशल हैं तो वे प्रलयकाल में उठे हुए प्रलयंकर अग्नि के समान कुपित हो समुद्रों से घिरी हुई सारी पृथ्वी को दग्ध क्यों नहीं कर देते हैं ? ॥ १३॥

अथवा शक्तिमन्तौ तौ सुराणामपि निग्रहे।

ममैव तु न दुःखानामस्ति मन्ये विपर्ययः॥१४॥

‘अथवा वे दोनों भाई देवताओं को भी दण्ड देने की शक्ति रखते हैं (तो भी अबतक जो चुप बैठे हैं, इसमें उनका नहीं मेरे ही भाग्य का दोष है)। मैं समझती हूँ कि अभी मेरे ही दुःखों का अन्त नहीं आया है॥ १४॥

कच्चिन्न व्यथते रामः कच्चिन्न परितप्यते।

उत्तराणि च कार्याणि कुरुते पुरुषोत्तमः॥१५॥

‘अच्छा, यह तो बताओ, पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्रजी के मन में कोई व्यथा तो नहीं है? वे संतप्त तो नहीं होते? उन्हें आगे जो कुछ करना है, उसे वे करते हैं या नहीं? ॥ १५ ॥

कच्चिन्न दीनः सम्भ्रान्तः कार्येषु च न मुह्यति।

कच्चित् पुरुषकार्याणि कुरुते नृपतेः सुतः॥१६॥

उन्हें किसी प्रकार की दीनता या घबराहट तो नहीं है? वे काम करते-करते मोह के वशीभूत तो नहीं हो जाते? क्या राजकुमार श्रीराम पुरुषोचित कार्य (पुरुषार्थ) करते हैं? ॥ १६॥

द्विविधं त्रिविधोपायमुपायमपि सेवते।

विजिगीषुः सुहृत् कच्चिन्मित्रेषु च परंतपः॥१७॥

‘क्या शत्रुओं को संताप देने वाले श्रीराम मित्रों के प्रति मित्रभाव रखकर साम और दानरूप दो उपायों का ही अवलम्बन करते हैं? तथा शत्रुओं के प्रति उन्हें जीतने की इच्छा रखकर दान, भेद और दण्ड–इन तीन प्रकार के उपायों का ही आश्रय लेते हैं ? ॥ १७॥

कच्चिन्मित्राणि लभतेऽमित्रैश्चाप्यभिगम्यते।

कच्चित् कल्याणमित्रश्च मित्रैश्चापि पुरस्कृतः॥१८॥

‘क्या श्रीराम स्वयं प्रयत्नपूर्वक मित्रों का संग्रह करते हैं? क्या उनके शत्रु भी शरणागत होकर अपनी रक्षा के लिये उनके पास आते हैं? क्या उन्होंने मित्रों का उपकार करके उन्हें अपने लिये कल्याणकारी बना लिया है? क्या वे कभी अपने मित्रों से भी उपकृत या पुरस्कृत होते हैं? ॥ १८ ॥

कच्चिदाशास्ति देवानां प्रसादं पार्थिवात्मजः।

कच्चित् पुरुषकारं च दैवं च प्रतिपद्यते॥१९॥

‘क्या राजकुमार श्रीराम कभी देवताओं का भी कृपा प्रसाद चाहते हैं उनकी कृपा के लिये प्रार्थना करते हैं? क्या वे पुरुषार्थ और दैव दोनों का आश्रय लेते हैं? ॥

कच्चिन्न विगतस्नेहो विवासान्मयि राघवः।

कच्चिन्मां व्यसनादस्मान्मोक्षयिष्यति राघवः॥२०॥

‘दुर्भाग्यवश मैं उनसे दूर हो गयी हूँ। इस कारण श्रीरघुनाथजी मुझ पर स्नेहहीन तो नहीं हो गये हैं? क्या वे मुझे कभी इस संकट से छुड़ायेंगे? ॥ २० ॥

सुखानामुचितो नित्यमसुखानामनूचितः।

दुःखमुत्तरमासाद्य कच्चिद् रामो न सीदति॥२१॥

‘वे सदा सुख भोगने के ही योग्य हैं, दुःख भोगने के योग्य कदापि नहीं हैं; परंतु इन दिनों दुःख-पर-दुःख उठाने के कारण श्रीराम अधिक खिन्न और शिथिल तो नहीं हो गये हैं? ॥२१॥

कौसल्यायास्तथा कच्चित् सुमित्रायास्तथैव च।

अभीक्ष्णं श्रूयते कच्चित् कुशलं भरतस्य च॥२२॥

‘क्या उन्हें माता कौसल्या, सुमित्रा तथा भरत का कुशल-समाचार बराबर मिलता रहता है ? ॥ २२ ॥

मन्निमित्तेन मानार्हः कच्चिच्छोकेन राघवः।

कच्चिन्नान्यमना रामः कच्चिन्मां तारयिष्यति॥२३॥

‘क्या सम्माननीय श्रीरघुनाथजी मेरे लिये होने वाले शोक से अधिक संतप्त हैं? वे मेरी ओर से अन्यमनस्क तो नहीं हो गये हैं? क्या श्रीराम मुझे इस संकट से उबारेंगे?॥

कच्चिदक्षौहिणी भीमां भरतो भ्रातृवत्सलः।

ध्वजिनी मन्त्रिभिर्गप्तां प्रेषयिष्यति मत्कृते॥२४॥

‘क्या भाईपर अनुराग रखने वाले भरतजी मेरे उद्धार के लिये मन्त्रियों द्वारा सुरक्षित भयंकर अक्षौहिणी सेना भेजेंगे? ॥ २४ ॥

वानराधिपतिः श्रीमान् सुग्रीवः कच्चिदेष्यति।

मत्कृते हरिभिर्वीरैर्वृतो दन्तनखायुधैः॥ २५॥

‘क्या श्रीमान् वानरराज सुग्रीव दाँत और नखों से प्रहार करने वाले वीर वानरों को साथ ले मुझे छुड़ाने के लिये यहाँ तक आने का कष्ट करेंगे? ॥ २५॥

कच्चिच्च लक्ष्मणः शूरः सुमित्रानन्दवर्धनः।

अस्त्रविच्छरजालेन राक्षसान् विधमिष्यति॥२६॥

‘क्या सुमित्रा का आनन्द बढ़ाने वाले शूरवीर लक्ष्मण, जो अनेक अस्त्रों के ज्ञाता हैं, अपने बाणों की वर्षा से राक्षसों का संहार करेंगे? ॥ २६ ॥

रौद्रेण कच्चिदस्त्रेण रामेण निहतं रणे।

द्रक्ष्याम्यल्पेन कालेन रावणं ससुहृज्जनम्॥२७॥

‘क्या मैं रावण को उसके बन्धु-बान्धवोंसहित थोड़े ही दिनों में श्रीरघुनाथजी के द्वारा युद्ध में भयंकर अस्त्रशस्त्रों से मारा गया देखूगी? ॥ २७॥

कच्चिन्न तद्धेमसमानवर्णं तस्याननं पद्मसमानगन्धि।

मया विना शुष्यति शोकदीनं जलक्षये पद्ममिवातपेन॥२८॥

‘जैसे पानी सूख जाने पर धूप से कमल सूख जाता है, उसी प्रकार मेरे बिना शोक से दुःखी हुआ श्रीराम का वह सुवर्ण के समान कान्तिमान् और कमल के सदृश सुगन्धित मुख सूख तो नहीं गया है? ॥ २८॥

धर्मापदेशात् त्यजतः स्वराज्यं मां चाप्यरण्यं नयतः पदातेः।

नासीद् यथा यस्य न भीन शोकःकच्चित् स धैर्यं हृदये करोति॥२९॥

‘धर्मपालन के उद्देश्य से अपने राज्य का त्याग करते और मुझे पैदल ही वन में लाते समय जिन्हें तनिक भी भय और शोक नहीं हुआ, वे श्रीरघुनाथजी इस संकट के समय हृदय में धैर्य तो धारण करते हैं न?॥ २९॥

न चास्य माता न पिता न चान्यः स्नेहाद् विशिष्टोऽस्ति मया समो वा।

तावद्ध्यहं दूत जिजीविषेयं यावत् प्रवृत्तिं शृणुयां प्रियस्य॥३०॥

‘दूत! उनके माता-पिता तथा अन्य कोई सम्बन्धी भी ऐसे नहीं हैं, जिन्हें उनका स्नेह मुझसे अधिक अथवा मेरे बराबर भी मिला हो। मैं तो तभीतक जीवित रहना चाहती हूँ, जबतक यहाँ आने के सम्बन्ध में अपने प्रियतम की प्रवृत्ति सुन रही हूँ’। ३०॥

इतीव देवी वचनं महार्थं तं वानरेन्द्रं मधुरार्थमुक्त्वा ।

श्रोतुं पुनस्तस्य वचोऽभिरामं रामार्थयुक्तं विरराम रामा॥३१॥

देवी सीता वानरश्रेष्ठ हनुमान् के प्रति इस प्रकार महान् अर्थ से युक्त मधुर वचन कहकर श्रीरामचन्द्रजी से सम्बन्ध रखने वाली उनकी मनोहर वाणी पुनः सुनने के लिये चुप हो गयीं॥ ३१ ॥

सीताया वचनं श्रुत्वा मारुतिर्भीमविक्रमः।

शिरस्यञ्जलिमाधाय वाक्यमुत्तरमब्रवीत्॥३२॥

सीताजी का वचन सुनकर भयंकर पराक्रमी पवनकुमार हनुमान् मस्तक पर अञ्जलि बाँधे उन्हें इस प्रकार उत्तर देने लगे— ॥ ३२॥

न त्वामिहस्थां जानीते रामः कमललोचनः।

तेन त्वां नानयत्याशु शचीमिव पुरंदरः॥३३॥

‘देवि! कमलनयन भगवान् श्रीराम को यह पता ही नहीं है कि आप लङ्का में रह रही हैं। इसीलिये जैसे इन्द्र दानवों के यहाँ से शची को उठा ले गये, उस प्रकार वे शीघ्र यहाँ से आपको नहीं ले जा रहे हैं।

३३॥

श्रुत्वैव च वचो मह्यं क्षिप्रमेष्यति राघवः।

चमू प्रकर्षन् महतीं हयृक्षगणसंयुताम्॥३४॥

‘जब मैं यहाँ से लौटकर जाऊँगा, तब मेरी बात सुनते ही श्रीरघुनाथजी वानर और भालुओं की विशाल सेना लेकर तुरंत वहाँ से चल देंगे॥ ३४ ॥

विष्टम्भयित्वा बाणौटुरक्षोभ्यं वरुणालयम्।

करिष्यति पुरीं लङ्कां काकुत्स्थः शान्तराक्षसाम्॥३५॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम अपने बाण-समूहों द्वारा अक्षोभ्य महासागर को भी स्तब्ध करके उसपर सेतु बाँधकर लङ्कापुरी में पहुँच जायेंगे और उसे राक्षसों से सूनी कर देंगे॥ ३५॥

तत्र यद्यन्तरा मृत्युर्यदि देवा महासुराः।

स्थास्यन्ति पथि रामस्य स तानपि वधिष्यति॥३६॥

उस समय श्रीराम के मार्ग में यदि मृत्यु, देवता अथवा बड़े-बड़े असुर भी विघ्न बनकर खड़े होंगे तो वे उन सबका भी संहार कर डालेंगे॥३६॥

तवादर्शनजेनार्ये शोकेन परिपूरितः।

न शर्म लभते रामः सिंहार्दित इव द्विपः॥ ३७॥

‘आर्ये! आपको न देखने के कारण उत्पन्न हुए शोक से उनका हृदय भरा रहता है; अतः श्रीराम सिंह से पीड़ित हुए हाथी की भाँति क्षणभर को भी चैन नहीं पाते हैं॥३७॥

मन्दरेण च ते देवि शपे मूलफलेन च।

मलयेन च विन्ध्येन मेरुणा दर्दुरेण च॥३८॥

यथा सुनयनं वल्गु बिम्बोष्ठं चारुकुण्डलम्।

मुखं द्रक्ष्यसि रामस्य पूर्णचन्द्रमिवोदितम्॥३९॥

‘देवि! मन्दर आदि पर्वत हमारे वासस्थान हैं और फल-मूल भोजन। अतः मैं मन्दराचल, मलय, विन्ध्य, मेरु तथा दर्दुर पर्वत की और अपनी जीविका के साधन फल-मूल की सौगंध खाकर कहता हूँ कि आप शीघ्र ही श्रीराम का नवोदित पूर्ण चन्द्रमा के समान वह मनोहर मुख देखेंगी, जो सुन्दर नेत्र, बिम्बफल के समान लाल-लाल ओठ और सुन्दर कुण्डलों से अलंकृत एवं चित्ताकर्षक है॥ ३८-३९॥

क्षिप्रं द्रक्ष्यसि वैदेहि रामं प्रस्रवणे गिरौ।

शतक्रतुमिवासीनं नागपृष्ठस्य मूर्धनि॥४०॥

‘विदेहनन्दिनि! ऐरावत की पीठ पर बैठे हुए देवराज इन्द्र के समान प्रस्रवण गिरि के शिखरपर विराजमान श्रीराम का आप शीघ्र दर्शन करेंगी॥ ४०॥

न मांसं राघवो भुङ्क्ते न चैव मधु सेवते।

वन्यं सुविहितं नित्यं भक्तमश्नाति पञ्चमम्॥ ४१॥

‘कोई भी रघुवंशी न तो मांस खाता है और न मधु का ही सेवन करता है; फिर भगवान् श्रीराम इन वस्तुओं का सेवन क्यों करते? वे सदा चार समय उपवास करके पाँचवें समय शास्त्रविहित जंगली फल-मूल और नीवार आदि भोजन करते हैं॥ ४१॥

नैव दंशान् न मशकान् न कीटान् न सरीसृपान्।

राघवोऽपनयेद् गात्रात् त्वद्गतेनान्तरात्मना॥४२॥

‘श्रीरघुनाथजी का चित्त सदा आप में लगा रहता है, अतः उन्हें अपने शरीर पर चढ़े हुए डाँस, मच्छर,कीड़ों और सर्पो को हटाने की भी सुधि नहीं रहती॥ ४२॥

नित्यं ध्यानपरो रामो नित्यं शोकपरायणः।

नान्यच्चिन्तयते किंचित् स तु कामवशं गतः॥४३॥

‘श्रीराम आपके प्रेम के वशीभूत हो सदा आपका ही ध्यान करते और निरन्तर आपके ही विरह-शोक में डूबे रहते हैं। आपको छोड़कर दूसरी कोई बात वे सोचते ही नहीं हैं॥४३॥

अनिद्रः सततं रामः सुप्तोऽपि च नरोत्तमः।

सीतेति मधुरां वाणीं व्याहरन् प्रतिबुध्यते॥४४॥

‘नरश्रेष्ठ! श्रीराम को सदा आपकी चिन्ता के कारण कभी नींद नहीं आती है। यदि कभी आँख लगी भी तो ‘सीता-सीता’ इस मधुर वाणी का उच्चारण करते हुए वे जल्दी ही जाग उठते हैं॥४४॥

दृष्ट्वा फलं वा पुष्पं वा यच्चान्यत् स्त्रीमनोहरम्।

बहुशो हा प्रियेत्येवं श्वसंस्त्वामभिभाषते॥४५॥

‘किसी फल, फूल अथवा स्त्रियों के मन को लुभाने वाली दूसरी वस्तु को भी जब वे देखते हैं, तब लंबी साँस लेकर बारंबार ‘हा प्रिये! हा प्रिये!’ कहते हुए आपको पुकारने लगते हैं॥ ४५ ॥

स देवि नित्यं परितप्यमानस्त्वामेव सीतेत्यभिभाषमाणः।

धृतव्रतो राजसुतो महात्मा तवैव लाभाय कृतप्रयत्नः॥४६॥

‘देवि! राजकुमार महात्मा श्रीराम आपके लिये सदा दुःखी रहते हैं, सीता-सीता कहकर आपकी ही रट लगाते हैं तथा उत्तम व्रत का पालन करते हुए आपकी ही प्राप्ति के प्रयत्न में लगे हुए हैं’॥ ४६॥

सा रामसंकीर्तनवीतशोका रामस्य शोकेन समानशोका।

शरन्मुखेनाम्बुदशेषचन्द्रा निशेव वैदेहसुता बभूव॥४७॥

श्रीरामचन्द्रजी की चर्चा से सीता का अपना शोक तो दूर हो गया; किंतु श्रीराम के शोक की बात सुनकर वे पुनः उन्हीं के समान शोक में निमग्न हो गयीं। उस समय विदेहनन्दिनी सीता शरद्-ऋतु आने पर मेघों की घटा और चन्द्रमा–दोनों से युक्त (अन्धकार और प्रकाशपूर्ण) रात्रि के समान हर्ष और शोक से युक्त प्रतीत होती थीं॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे षट्त्रिंशः सर्गः॥ ३६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में छत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।३६॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
सुन्दरकाण्डम्

सीता का हनुमान जी से श्रीराम को शीघ्र बुलाने का आग्रह, हनुमान जी का सीता से अपने साथ चलने का अनुरोध तथा सीता का अस्वीकार करना

सप्तत्रिंशः सर्गः

सर्ग-37

सा सीता वचनं श्रुत्वा पूर्णचन्द्रनिभानना।

हनूमन्तमुवाचेदं धर्मार्थसहितं वचः॥१॥

हनुमान जी का पूर्वोक्त वचन सुनकर पूर्णचन्द्रमा के समान मनोहर मुखवाली सीता ने उनसे धर्म और अर्थ से युक्त बात कही— ॥१॥

अमृतं विषसम्पृक्तं त्वया वानर भाषितम्।

यच्च नान्यमना रामो यच्च शोकपरायणः॥२॥

‘वानर! तुमने जो कहा कि श्रीरघुनाथजी का चित्त दूसरी ओर नहीं जाता और वे शोक में डूबे रहते हैं, तुम्हारा यह कथन मुझे विषमिश्रित अमृत के समान लगा है॥

ऐश्वर्ये वा सुविस्तीर्णे व्यसने वा सुदारुणे।

रज्ज्वेव पुरुषं बद्ध्वा कृतान्तः परिकर्षति॥३॥

‘कोई बड़े भारी ऐश्वर्य में स्थित हो अथवा अत्यन्त भयंकर विपत्ति में पड़ा हो, काल मनुष्य को इस तरह खींच लेता है, मानो उसे रस्सी में बाँध रखा हो।

विधिनमसंहार्यः प्राणिनां प्लवगोत्तम।

सौमित्रं मां च रामं च व्यसनैः पश्य मोहितान्॥४॥

‘वानरशिरोमणे! दैव के विधान को रोकना प्राणियों के वश की बात नहीं है। उदाहरण के लिये सुमित्राकुमार लक्ष्मण को, मुझको और श्रीराम को भी देख लो। हमलोग किस तरह वियोग-दुःख से मोहित हो रहे हैं। ४॥

शोकस्यास्य कथं पारं राघवोऽधिगमिष्यति।

प्लवमानः परिक्रान्तो हतनौः सागरे यथा॥५॥

‘समुद्रमें नौका के नष्ट हो जाने पर अपने हाथों से तैरने वाले पराक्रमी पुरुष की भाँति श्रीरघुनाथजी कैसे इस शोक-सागर से पार होंगे? ॥ ५॥

राक्षसानां वधं कृत्वा सूदयित्वा च रावणम्।

लङ्कामुन्मथितां कृत्वा कदा द्रक्ष्यति मां पतिः॥६॥

‘राक्षसों का वध, रावण का संहार और लङ्कापुरी का विध्वंस करके मेरे पतिदेव मुझे कब देखेंगे? ॥६॥

स वाच्यः संत्वरस्वेति यावदेव न पूर्यते।

अयं संवत्सरः कालस्तावद्धि मम जीवितम्॥७॥

‘तुम उनसे जाकर कहना, वे शीघ्रता करें। यह वर्ष जब तक पूरा नहीं हो जाता, तभी तक मेरा जीवन शेष है॥

वर्तते दशमो मासो द्वौ तु शेषौ प्लवङ्गम।

रावणेन नृशंसेन समयो यः कृतो मम॥८॥

‘वानर! यह दसवाँ महीना चल रहा है। अब वर्ष पूरा होने में दो ही मास शेष हैं। निर्दयी रावण ने मेरे जीवन के लिये जो अवधि निश्चित की है, उसमें इतना ही समय बाकी रह गया है॥ ८॥

विभीषणेन च भ्रात्रा मम निर्यातनं प्रति।

अनुनीतः प्रयत्नेन न च तत् कुरुते मतिम्॥९॥

‘रावण के भाई विभीषण ने मुझे लौटा देने के लिये उससे यत्नपूर्वक बड़ी अनुनय-विनय की थी, किंतु वह उनकी बात नहीं मानता है॥९॥

मम प्रतिप्रदानं हि रावणस्य न रोचते।

रावणं मार्गते संख्ये मृत्युः कालवशंगतम्॥१०॥

‘मेरा लौटाया जाना रावण को अच्छा नहीं लगता; क्योंकि वह काल के अधीन हो रहा है और युद्ध में मौत उसे ढूँढ़ रही है॥१०॥

ज्येष्ठा कन्या कला नाम विभीषणसुता कपे।

तया ममैतदाख्यातं मात्रा प्रहितया स्वयम्॥११॥

‘कपे! विभीषण की ज्येष्ठ पुत्री का नाम कला है। उसकी माता ने स्वयं उसे मेरे पास भेजा था। उसी ने ये सारी बातें मुझसे कही हैं॥ ११॥

अविन्ध्यो नाम मेधावी विद्वान् राक्षसपुङ्गवः।

धृतिमाञ्छीलवान् वृद्धो रावणस्य सुसम्मतः॥१२॥

‘अविन्ध्य नाम का एक श्रेष्ठ राक्षस है, जो बड़ा ही बुद्धिमान्, विद्वान्, धीर, सुशील, वृद्ध तथा रावण का सम्मानपात्र है॥ १२॥

रामात् क्षयमनुप्राप्तं रक्षसां प्रत्यचोदयत्।

न च तस्य स दुष्टात्मा शृणोति वचनं हितम्॥१३॥

“उसने रावण को यह बताकर कि श्रीराम के हाथ से राक्षसों के विनाश का अवसर आ पहुँचा है, मुझे लौटा देने के लिये प्रेरित किया था, किंतु वह दुष्टात्मा उसके हितकारी वचनों को भी नहीं सुनता है॥ १३॥

आशंसेयं हरिश्रेष्ठ क्षिप्रं मां प्राप्स्यते पतिः।

अन्तरात्मा हि मे शुद्धस्तस्मिंश्च बहवो गुणाः॥१४॥

‘कपिश्रेष्ठ! मुझे तो यह आशा हो रही है कि मेरे पतिदेव मुझसे शीघ्र ही आ मिलेंगे; क्योंकि मेरी अन्तरात्मा शुद्ध है और श्रीरघुनाथजी में बहुत-से गुण हैं।॥ १४॥

उत्साहः पौरुषं सत्त्वमानृशंस्यं कृतज्ञता।

विक्रमश्च प्रभावश्च सन्ति वानर राघवे॥१५॥

‘वानर! श्रीरामचन्द्रजी में उत्साह, पुरुषार्थ, बल, दयालुता, कृतज्ञता, पराक्रम और प्रभाव आदि सभी गुण विद्यमान हैं॥ १५॥

चतुर्दश सहस्राणि राक्षसानां जघान यः।

जनस्थाने विना भ्रात्रा शत्रुः कस्तस्य नोद्विजेत्॥१६॥

‘जिन्होंने जनस्थान में अपने भाई की सहायता लिये बिना ही चौदह हजार राक्षसों का संहार कर डाला, उनसे कौन शत्रु भयभीत न होगा? ॥ १६ ॥

न स शक्यस्तुलयितुं व्यसनैः पुरुषर्षभः।

अहं तस्यानुभावज्ञा शक्रस्येव पुलोमजा॥१७॥

‘श्रीरामचन्द्रजी पुरुषों में श्रेष्ठ हैं। वे संकटों से तोले या विचलित किये जायँ, यह सर्वथा असम्भव है।जैसे पुलोम-कन्या शची इन्द्र के प्रभावको  जानती हैं, उसी तरह मैं श्रीरघुनाथजी की शक्ति-सामर्थ्य को अच्छी तरह जानती हूँ॥ १७॥

शरजालांशुमान् शूरः कपे रामदिवाकरः।

शत्रुरक्षोमयं तोयमुपशोषं नयिष्यति॥१८॥

‘कपिवर ! शूरवीर भगवान् श्रीराम सूर्य के समान हैं। उनके बाणसमूह ही उनकी किरणें हैं। वे उनके द्वारा शत्रुभूत राक्षसरूपी जल को शीघ्र ही सोख लेंगे’। १८॥

इति संजल्पमानां तां रामार्थे शोककर्शिताम्।

अश्रुसम्पूर्णवदनामुवाच हनुमान् कपिः॥१९॥

इतना कहते-कहते सीताके मुख पर आँसुओं की धारा बह चली। वे श्रीरामचन्द्रजी के लिये शोक से पीड़ित हो रही थीं। उस समय कपिवर हनुमान जी ने उनसे कहा— ॥ १९॥

श्रुत्वैव च वचो मह्यं क्षिप्रमेष्यति राघवः।

चमूं प्रकर्षन् महतीं हयृक्षगणसंकुलाम्॥२०॥

‘देवि! आप धैर्य धारण करें। मेरा वचन सुनते ही श्रीरघुनाथजी वानर और भालुओं की विशाल सेना लेकर शीघ्र यहाँ के लिये प्रस्थान कर देंगे॥२०॥

अथवा मोचयिष्यामि त्वामद्यैव सराक्षसात्।

अस्माद् दुःखादुपारोह मम पृष्ठमनिन्दिते॥२१॥

‘अथवा मैं अभी आपको इस राक्षसजनित दुःख से छुटकारा दिला दूंगा। सती-साध्वी देवि! आप मेरी पीठ पर बैठ जाइये॥ २१॥

त्वां तु पृष्ठगतां कृत्वा संतरिष्यामि सागरम्।

शक्तिरस्ति हि मे वोढुं लङ्कामपि सरावणाम्॥२२॥

‘आपको पीठ पर बैठाकर मैं समुद्र को लाँघ जाऊँगा। मुझमें रावणसहित सारी लङ्का को भी ढो ले जाने की शक्ति है॥२२॥

अहं प्रस्रवणस्थाय राघवायाद्य मैथिलि।

प्रापयिष्यामि शक्राय हव्यं हुतमिवानलः॥२३॥

‘मिथिलेशकुमारी! रघुनाथजी प्रस्रवणगिरि पर रहते हैं। मैं आज ही आपको उनके पास पहुँचा दूंगा ठीक उसी तरह, जैसे अग्निदेव हवन किये गये हविष्य को इन्द्र की सेवा में ले जाते हैं ॥ २३॥

द्रक्ष्यस्यद्यैव वैदेहि राघवं सहलक्ष्मणम्।

व्यवसायसमायुक्तं विष्णुं दैत्यवधे यथा॥२४॥

‘विदेहनन्दिनि! दैत्यों के वध के लिये उत्साह रखने वाले भगवान् विष्णु की भाँति राक्षसों के संहार के लिये सचेष्ट हुए श्रीराम और लक्ष्मण का आप आज ही दर्शन करेंगी॥ २४॥

त्वदर्शनकृतोत्साहमाश्रमस्थं महाबलम्।

पुरंदरमिवासीनं नगराजस्य मूर्धनि॥२५॥

‘आपके दर्शन का उत्साह मन में लिये महाबली श्रीराम पर्वत-शिखर पर अपने आश्रम में उसी प्रकार बैठे हैं, जैसे देवराज इन्द्र गजराज ऐरावत की पीठ पर विराजमान होते हैं॥२५॥

पृष्ठमारोह मे देवि मा विकाङ्क्षस्व शोभने।

योगमन्विच्छ रामेण शशाङ्केनेव रोहिणी॥२६॥

‘देवि! आप मेरी पीठ पर बैठिये। शोभने! मेरे कथन की उपेक्षा न कीजिये। चन्द्रमा से मिलने वाली रोहिणी की भाँति आप श्रीरामचन्द्रजी के साथ मिलने का निश्चय कीजिये॥२६॥

कथयन्तीव शशिना संगमिष्यसि रोहिणी।।

मत्पृष्ठमधिरोह त्वं तराकाशं महार्णवम्॥२७॥

‘मुझे भगवान् श्रीराम से मिलना है, इतना कहते ही आप चन्द्रमा से रोहिणी की भाँति श्रीरघुनाथजी से मिल जायँगी। आप मेरी पीठ पर आरूढ़ होइये और आकाशमार्ग से ही महासागर को पार कीजिये॥२७॥

नहि मे सम्प्रयातस्य त्वामितो नयतोऽङ्गने।

अनुगन्तुं गतिं शक्ताः सर्वे लङ्कानिवासिनः॥२८॥

‘कल्याणि! मैं आपको लेकर जब यहाँ से चलूँगा, उस समय समूचे लङ्का-निवासी मिलकर भी मेरा पीछा नहीं कर सकते॥२८॥

यथैवाहमिह प्राप्तस्तथैवाहमसंशयम्।

यास्यामि पश्य वैदेहि त्वामुद्यम्य विहायसम्॥२९॥

‘विदेहनन्दिनि ! जिस प्रकार मैं यहाँ आया हूँ, उसी तरह आपको लेकर आकाशमार्ग से चला जाऊँगा, इसमें संदेह नहीं है आप मेरा पराक्रम देखिये’। २९॥

मैथिली तु हरिश्रेष्ठाच्छ्रुत्वा वचनमद्भुतम्।

हर्षविस्मितसर्वाङ्गी हनूमन्तमथाब्रवीत्॥३०॥

वानरश्रेष्ठ हनुमान् के मुख से यह अद्भुत वचन सुनकर मिथिलेशकुमारी सीता के सारे शरीर में हर्ष और विस्मय के कारण रोमाञ्च हो आया। उन्होंने हनुमान जी से कहा— ॥ ३०॥

हनूमन् दूरमध्वानं कथं मां नेतुमिच्छसि।

तदेव खलु ते मन्ये कपित्वं हरियूथप॥३१॥

‘वानरयूथपति हनुमान् ! तुम इतने दूर के मार्ग पर मुझे कैसे ले चलना चाहते हो? तुम्हारे इसदुःसाहस को मैं वानरोचित चपलता ही समझती हूँ।३१॥

कथं चाल्पशरीरस्त्वं मामितो नेतुमिच्छसि।

सकाशं मानवेन्द्रस्य भर्तुर्मे प्लवगर्षभ॥३२॥

‘वानरशिरोमणे! तुम्हारा शरीर तो बहुत छोटा है। फिर तुम मुझे मेरे स्वामी महाराज श्रीराम के पास ले जाने की इच्छा कैसे करते हो?’ ॥ ३२ ॥

सीतायास्तु वचः श्रुत्वा हनूमान् मारुतात्मजः।

चिन्तयामास लक्ष्मीवान् नवं परिभवं कृतम्॥३३॥

सीताजी की यह बात सुनकर शोभाशाली पवनकुमार हनुमान् ने इसे अपने लिये नया तिरस्कार ही माना॥ ३३॥

न मे जानाति सत्त्वं वा प्रभाव वासितेक्षणा।

तस्मात् पश्यतु वैदेही यद् रूपं मम कामतः॥३४॥

वे सोचने लगे—’कजरारे नेत्रोंवाली विदेहनन्दिनी सीता मेरे बल और प्रभाव को नहीं जानतीं। इसलिये आज मेरे उस रूप को, जिसे मैं इच्छानुसार धारण कर लेता हूँ, ये देख लें’॥ ३४॥

इति संचिन्त्य हनुमांस्तदा प्लवगसत्तमः।

दर्शयामास सीतायाः स्वरूपमरिमर्दनः॥३५॥

ऐसा विचार करके शत्रुमर्दन वानरशिरोमणि हनुमान् ने उस समय सीता को अपना स्वरूप दिखाया॥ ३५॥

स तस्मात् पादपाद् धीमानाप्लुत्य प्लवगर्षभः।

ततो वर्धितुमारेभे सीताप्रत्ययकारणात्॥३६॥

वे बुद्धिमान् कपिवर उस वृक्ष से नीचे कूद पड़े और सीताजी को विश्वास दिलाने के लिये बढ़ने लगे।३६॥

मेरुमन्दरसंकाशो बभौ दीप्तानलप्रभः।

अग्रतो व्यवतस्थे च सीताया वानरर्षभः॥३७॥

बात-की-बात में उनका शरीर मेरुपर्वत के समान ऊँचा हो गया। वे प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी प्रतीत होने लगे। इस तरह विशाल रूप धारण करके वे वानरश्रेष्ठ हनुमान् सीताजी के सामने खड़े हो गये।

हरिः पर्वतसंकाशस्ताम्रवक्त्रो महाबलः।

वज्रदंष्ट्रनखो भीमो वैदेहीमिदमब्रवीत्॥ ३८॥

तत्पश्चात् पर्वत के समान विशालकाय, तामे के समान लाल मुख तथा वज्र के समान दाढ़ और नखवाले भयानक महाबली वानरवीर हनुमान् विदेहनन्दिनी से इस प्रकार बोले- ॥ ३८॥

सपर्वतवनोद्देशां साट्टप्राकारतोरणाम्।

लङ्कामिमां सनाथां वा नयितुं शक्तिरस्ति मे॥३९॥

‘देवि! मुझमें पर्वत, वन, अट्टालिका, चहारदिवारी और नगरद्वार सहित इस लङ्कापुरी को रावण के साथ ही उठा ले जाने की शक्ति है॥ ३९॥

तदवस्थाप्यतां बुद्धिरलं देवि विकाङ्ख्या।

विशोकं कुरु वैदेहि राघवं सहलक्ष्मणम्॥४०॥

‘अतः आप मेरे साथ चलने का निश्चय कर लीजिये। आपकी आशङ्का व्यर्थ है। देवि! विदेहनन्दिनि! आप मेरे साथ चलकर लक्ष्मणसहित श्रीरघुनाथजी का शोक दूर कीजिये’॥ ४०॥

तं दृष्ट्वाचलसंकाशमुवाच जनकात्मजा।

पद्मपत्रविशालाक्षी मारुतस्यौरसं सुतम्॥४१॥

वायु के औरस पुत्र हनुमान जी को पर्वत के समान विशाल शरीर धारण किये देख प्रफुल्ल कमलदल के समान बड़े-बड़े नेत्रोंवाली जनककिशोरी ने उनसे कहा – ॥४१॥

तव सत्त्वं बलं चैव विजानामि महाकपे।

वायोरिव गतिश्चापि तेजश्चाग्नेरिवाद्भुतम्॥४२॥

‘महाकपे! मैं तुम्हारी शक्ति और पराक्रम को जानती हूँ। वायु के समान तुम्हारी गति और अग्नि के समान तुम्हारा अद्भुत तेज है॥ ४२ ॥

प्राकृतोऽन्यः कथं चेमां भूमिमागन्तुमर्हति।

उदधेरप्रमेयस्य पारं वानरयूथप॥४३॥

‘वानरयूथपते! दूसरा कोई साधारण वानर अपार महासागर के पार की इस भूमि में कैसे आ सकता है?॥

जानामि गमने शक्तिं नयने चापि ते मम।

अवश्यं सम्प्रधाशु कार्यसिद्धिरिवात्मनः॥४४॥

‘मैं जानती हूँ’ तुम समुद्र पार करने और मुझे ले जाने में भी समर्थ हो, तथापि तुम्हारी तरह मुझे भी अपनी कार्यसिद्धि के विषय में अवश्य भलीभाँति विचार कर लेना चाहिये॥४४॥

अयुक्तं तु कपिश्रेष्ठ मया गन्तुं त्वया सह।

वायुवेगसवेगस्य वेगो मां मोहयेत् तव॥४५॥

‘कपिश्रेष्ठ ! तुम्हारे साथ मेरा जाना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है; क्योंकि तुम्हारा वेग वायु के वेग के समान तीव्र है। जाते समय यह वेग मुझे मूर्च्छित कर सकता है॥ ४५ ॥

अहमाकाशमासक्ता उपर्युपरि सागरम्।

प्रपतेयं हि ते पृष्ठाद् भूयो वेगेन गच्छतः॥४६॥

‘मैं समुद्र के ऊपर-ऊपर आकाश में पहुँच जाने पर अधिक वेग से चलते हुए तुम्हारे पृष्ठभाग से नीचे गिर सकती हूँ॥ ४६॥

पतिता सागरे चाहं तिमिनक्रझषाकुले।

भवेयमाशु विवशा यादसामन्नमुत्तमम्॥४७॥

‘इस तरह समुद्र में, जो तिमि नामक बड़े-बड़े मत्स्यों, नाकों और मछलियों से भरा हुआ है, गिरकर विवश हो मैं शीघ्र ही जल-जन्तुओं का उत्तम आहार बन जाऊँगी॥

न च शक्ष्ये त्वया सार्धं गन्तुं शत्रुविनाशन।

कलत्रवति संदेहस्त्वयि स्यादप्यसंशयम्॥४८॥

‘इसलिये शत्रुनाशन वीर! मैं तुम्हारे साथ नहीं चल सकूँगी। एक स्त्री को साथ लेकर जब तुम जाने लगोगे, उस समय राक्षसों को तुम पर संदेह होगा, इसमें संशय नहीं है॥४८॥

ह्रियमाणां तु मां दृष्ट्वा राक्षसा भीमविक्रमाः।

अनुगच्छेयुरादिष्टा रावणेन दुरात्मना॥४९॥

‘मुझे हरकर ले जायी जाती देख दुरात्मा रावण की आज्ञा से भयंकर पराक्रमी राक्षस तुम्हारा पीछा करेंगे। ४९॥

तैस्त्वं परिवृतः शूरैः शूलमुद्गरपाणिभिः।

भवेस्त्वं संशयं प्राप्तो मया वीर कलत्रवान्॥५०॥

‘वीर! उस समय मुझ-जैसी रक्षणीया अबला के साथ होने के कारण तुम हाथों में शूल और मुद्गर धारण करने वाले उन शौर्यशाली राक्षसों से घिरकर प्राणसंशय की अवस्था में पहुँच जाओगे॥ ५० ॥

सायुधा बहवो व्योम्नि राक्षसास्त्वं निरायुधः।

कथं शक्ष्यसि संयातुं मां चैव परिरक्षितुम्॥५१॥

‘आकाश में अस्त्र-शस्त्रधारी बहुत-से राक्षस तुमपर आक्रमण करेंगे और तुम्हारे हाथ में कोई भी अस्त्र न होगा। उस दशा में तुम उन सबके साथ युद्ध और मेरी रक्षा दोनों कार्य कैसे कर सकोगे? ॥ ५१॥

युध्यमानस्य रक्षोभिस्ततस्तैः क्रूरकर्मभिः।

प्रपतेयं हि ते पृष्ठाद् भयार्ता कपिसत्तम॥५२॥

‘कपिश्रेष्ठ! उन क्रूरकर्मा राक्षसों के साथ जब तुम युद्ध करने लगोगे, उस समय मैं भय से पीड़ित होकर तुम्हारी पीठ से अवश्य ही गिर जाऊँगी॥५२॥

अथ रक्षांसि भीमानि महान्ति बलवन्ति च।

कथंचित् साम्पराये त्वां जयेयुः कपिसत्तम।५३॥

अथवा युध्यमानस्य पतेयं विमुखस्य ते।

पतितां च गृहीत्वा मां नयेयुः पापराक्षसाः॥५४॥

‘कपिश्रेष्ठ! यदि कहीं वे महान् बलवान् भयानक राक्षस किसी तरह तुम्हें युद्ध में जीत लें अथवा युद्ध करते समय मेरी रक्षा की ओर तुम्हारा ध्यान न रहने से यदि मैं गिर गयी तो वे पापी राक्षस मुझ गिरी हुई अबला को फिर पकड़ ले जायँगे॥ ५३-५४॥

मां वा हरेयुस्त्वद्धस्ताद् विशसेयुरथापि वा।

अनवस्थौ हि दृश्येते युद्धे जयपराजयौ॥५५॥

‘अथवा यह भी सम्भव है कि वे निशाचर मुझे तुम्हारे हाथ से छीन ले जायँ या मेरा वध ही कर डालें; क्योंकि युद्ध में विजय और पराजय को अनिश्चित ही देखा जाता है॥ ५५ ॥

अहं वापि विपद्येयं रक्षोभिरभितर्जिता।

त्वत्प्रयत्नो हरिश्रेष्ठ भवेन्निष्फल एव तु॥५६॥

‘अथवा वानरशिरोमणे! यदि राक्षसों की अधिक डाँट पड़ने पर मेरे प्राण निकल गये तो फिर तुम्हारा यह सारा प्रयत्न निष्फल ही हो जायगा॥५६॥

कामं त्वमपि पर्याप्तो निहन्तुं सर्वराक्षसान्।

राघवस्य यशो हीयेत् त्वया शस्तैस्तु राक्षसैः॥५७॥

‘यद्यपि तुम भी सम्पूर्ण राक्षसों का संहार करने में समर्थ हो तथापि तुम्हारे द्वारा राक्षसों का वध हो जानेपर श्रीरघुनाथजी के सुयश में बाधा आयेगी (लोग यही कहेंगे कि श्रीराम स्वयं कुछ भी न कर सके)। ५७॥

अथवाऽऽदाय रक्षांसि न्यसेयुः संवृते हि माम्।

यत्र ते नाभिजानीयुहरयो नापि राघवः॥५८॥

‘अथवा यह भी सम्भव है कि राक्षसलोग मुझे ले जाकर किसी ऐसे गुप्त स्थान में रख दें, जहाँ न तो वानरों को मेरा पता लगे और न श्रीरघुनाथजी को ही॥

आरम्भस्तु मदर्थोऽयं ततस्तव निरर्थकः।

त्वया हि सह रामस्य महानागमने गुणः॥५९॥

‘यदि ऐसा हुआ तो मेरे लिये किया गया तुम्हारा यह सारा उद्योग व्यर्थ हो जायगा। यदि तुम्हारे साथ श्रीरामचन्द्रजी यहाँ पधारें तो उनके आने से बहुत बड़ा लाभ होगा॥ ५९॥

मयि जीवितमायत्तं राघवस्यामितौजसः।

भ्रातृणां च महाबाहो तव राजकुलस्य च॥६०॥

‘महाबाहो! अमित पराक्रमी श्रीरघुनाथजी का, उनके भाइयों का, तुम्हारा तथा वानरराज सुग्रीव के कुल का जीवन मुझ पर ही निर्भर है॥६०॥

तौ निराशौ मदर्थं च शोकसंतापकर्शितौ।

सह सर्वक्षहरिभिस्त्यक्ष्यतः प्राणसंग्रहम्॥६१॥

‘शोक और संताप से पीड़ित हुए वे दोनों भाई जब मेरी प्राप्ति की ओर से निराश हो जायँगे, तब सम्पूर्ण रीछों और वानरों के साथ अपने प्राणों का परित्याग कर देंगे॥

भर्तुर्भक्तिं पुरस्कृत्य रामादन्यस्य वानर।

नाहं स्प्रष्टुं स्वतो गात्रमिच्छेयं वानरोत्तम॥६२॥

‘वानरश्रेष्ठ! (तुम्हारे साथ न चल सकने का एक प्रधान कारण और भी है—) वानरवीर! पतिभक्ति की ओर दृष्टि रखकर मैं भगवान् श्रीराम के सिवा दूसरे किसी पुरुष के शरीर का स्वेच्छा से स्पर्श करना नहीं चाहती॥ ६२॥

यदहं गात्रसंस्पर्श रावणस्य गता बलात्।

अनीशा किं करिष्यामि विनाथा विवशा सती॥६३॥

‘रावण के शरीर से  जो मेरा स्पर्श हो गया है, वह तो उसके बलात् हुआ है उस समय मैं असमर्थ, अनाथ और बेबस थी, क्या करती॥ ६३॥

यदि रामो दशग्रीवमिह हत्वा सराक्षसम्।

मामितो गृह्य गच्छेत तत् तस्य सदृशं भवेत्॥६४॥

‘यदि श्रीरघुनाथजी यहाँ राक्षसोंसहित दशमुख रावणका वध करके मुझे यहाँ से ले चलें तो वह उनके योग्य कार्य होगा॥६४॥

श्रुताश्च दृष्टा हि मया पराक्रमा महात्मनस्तस्य रणावमर्दिनः।

न देवगन्धर्वभुजङ्गराक्षसा भवन्ति रामेण समा हि संयुगे॥६५॥

‘मैंने युद्ध में शत्रुओं का मर्दन करने वाले महात्मा श्रीराम के पराक्रम अनेक बार देखे और सुने हैं। देवता, गन्धर्व, नाग और राक्षस सब मिलकर भी संग्राम में उनकी समानता नहीं कर सकते॥६५॥

समीक्ष्य तं संयति चित्रकार्मुकं महाबलं वासवतुल्यविक्रमम्।

सलक्ष्मणं को विषहेत राघवं हुताशनं दीप्तमिवानिलेरितम्॥६६॥

‘युद्धस्थल में विचित्र धनुष धारण करने वाले इन्द्रतुल्य पराक्रमी महाबली श्रीरघुनाथजी लक्ष्मण के साथ रह वायु का सहारा पाकर प्रज्वलित हुए अग्नि की भाँति उद्दीप्त हो उठते हैं। उस समय उन्हें देखकर उनका वेग कौन सह सकता है? ॥६६॥

सलक्ष्मणं राघवमाजिमर्दनं दिशागजं मत्तमिव व्यवस्थितम्।

सहेत को वानरमुख्य संयुगे युगान्तसूर्यप्रतिमं शरार्चिषम्॥६७॥

‘वानरशिरोमणे! समराङ्गण में अपने बाणरूपी तेज से प्रलयकालीन सूर्य के समान प्रकाशित होने वालेऔर मतवाले दिग्गज की भाँति खड़े हुए रणमर्दन श्रीराम और लक्ष्मण का सामना कौन कर सकता है? ॥ ६७॥

स मे कपिश्रेष्ठ सलक्ष्मणं प्रियं सयूथपं क्षिप्रमिहोपपादय।

चिराय रामं प्रति शोककर्शितां कुरुष्व मां वानरवीर हर्षिताम्॥६८॥

‘इसलिये कपिश्रेष्ठ! वानरवीर! तुम प्रयत्न करके यूथपति सुग्रीव और लक्ष्मणसहित मेरे प्रियतम श्रीरामचन्द्रजी को शीघ्र यहाँ बुला ले आओ। मैं श्रीराम के लिये चिरकाल से शोकाकुल हो रही हूँ। तुम उनके शुभागमन से मुझे हर्ष प्रदान करो’ ॥ ६८॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे सप्तत्रिंशः सर्गः॥३७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में सैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।३७॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
सुन्दरकाण्डम्

सीताजी का हनुमान जी को पहचान के रूप में चित्रकट पर्वत पर घटित हए एक कौए के प्रसंग को सुनाना, श्रीराम को शीघ्र बुलाने के लिये अनुरोध करना और चूड़ामणि देना

अष्टात्रिंशः सर्गः

सर्ग-38

ततः स कपिशार्दूलस्तेन वाक्येन तोषितः।

सीतामुवाच तच्छ्रुत्वा वाक्यं वाक्यविशारदः॥१॥

सीता के इस वचन से कपिश्रेष्ठ हनुमान जी को बड़ी प्रसन्नता हुई। वे बातचीत में कुशल थे। उन्होंने पूर्वोक्त बातें सुनकर सीता से कहा— ॥१॥

युक्तरूपं त्वया देवि भाषितं शुभदर्शने।

सदृशं स्त्रीस्वभावस्य साध्वीनां विनयस्य च॥२॥

‘देवि! आपका कहना बिलकुल ठीक और युक्तिसंगत है। शुभदर्शने! आपकी यह बात नारी स्वभाव के तथा पतिव्रताओं की विनयशीलता के अनुरूप है॥२॥

स्त्रीत्वान्न त्वं समर्थासि सागरं व्यतिवर्तितुम्।

मामधिष्ठाय विस्तीर्णं शतयोजनमायतम्॥३॥

‘इसमें संदेह नहीं कि आप अबला होने के कारण मेरी पीठ पर बैठकर सौ योजन विस्तृत समुद्र के पार जाने में समर्थ नहीं हैं॥३॥

द्वितीयं कारणं यच्च ब्रवीषि विनयान्विते।

रामादन्यस्य नार्हामि संसर्गमिति जानकि॥४॥

एतत् ते देवि सदृशं पत्न्यास्तस्य महात्मनः।

का ह्यन्या त्वामृते देवि ब्रूयाद् वचनमीदृशम्॥

‘जनकनन्दिनि! आपने जो दूसरा कारण बताते हुए कहा है कि मेरे लिये श्रीरामचन्द्रजी के सिवा दूसरे किसी पुरुष का स्वेच्छापूर्वक स्पर्श करना उचित नहीं है, यह आपके ही योग्य है। देवि! महात्मा श्रीराम की धर्मपत्नी के मुख से ऐसी बात निकल सकती है। आपको छोड़कर दूसरी कौन स्त्री ऐसा वचन कह सकती है॥ ४-५॥

श्रोष्यते चैव काकुत्स्थः सर्वं निरवशेषतः।

चेष्टितं यत् त्वया देवि भाषितं च ममाग्रतः॥६॥

‘देवि! मेरे सामने आपने जो-जो पवित्र चेष्टाएँ की और जैसी-जैसी उत्तम बातें कही हैं, वे सब पूर्णरूप से श्रीरामचन्द्रजी मुझसे सुनेंगे॥६॥

कारणैर्बहुभिर्देवि रामप्रियचिकीर्षया।

स्नेहप्रस्कन्नमनसा मयैतत् समुदीरितम्॥७॥

‘देवि! मैंने जो आपको अपने साथ ले जाने का आग्रह किया, उसके बहुत-से कारण हैं। एक तो मैं श्रीरामचन्द्रजी का शीघ्र ही प्रिय करना चाहता था। अतः स्नेहपूर्ण हृदय से ही मैंने ऐसी बात कही है।

७॥

लङ्काया दुष्प्रवेशत्वाद् दुस्तरत्वान्महोदधेः।

सामर्थ्यादात्मनश्चैव मयैतत् समुदीरितम्॥८॥

‘दूसरा कारण यह है कि लङ्का में प्रवेश करना सबके लिये अत्यन्त कठिन है। तीसरा कारण है, महासागर को पार करने की कठिनाई इन सब कारणों से तथा अपने में आपको ले जाने की शक्ति होने से मैंने ऐसा प्रस्ताव किया था॥८॥

इच्छामि त्वां समानेतुमद्यैव रघुनन्दिना।

गुरुस्नेहेन भक्त्या च नान्यथा तदुदाहृतम्॥९॥

‘मैं आज ही आपको श्रीरघुनाथजी से मिला देना चाहता था। अतः अपने परमाराध्य गुरु श्रीराम के प्रति स्नेह और आपके प्रति भक्ति के कारण ही मैंने ऐसी बात कही थी, किसी और उद्देश्य से नहीं॥९॥

यदि नोत्सहसे यातुं मया सार्धमनिन्दिते।

अभिज्ञानं प्रयच्छ त्वं जानीयाद् राघवो हि यत्॥१०॥

‘किंतु सती-साध्वी देवि! यदि आपके मन में मेरे साथ चलने का उत्साह नहीं है तो आप अपनी कोई पहचान ही दे दीजिये, जिससे श्रीरामचन्द्रजी यह जान लें कि मैंने आपका दर्शन किया है’ ॥१०॥

एवमुक्ता हनुमता सीता सुरसुतोपमा।

उवाच वचनं मन्दं बाष्पप्रग्रथिताक्षरम्॥११॥

हनुमान जी के ऐसा कहने पर देवकन्या के समान तेजस्विनी सीता अश्रुगद्गदवाणी में धीरे-धीरे इस प्रकार बोलीं- ॥ ११॥

इदं श्रेष्ठमभिज्ञानं ब्रूयास्त्वं तु मम प्रियम्।

शैलस्य चित्रकूटस्य पादे पूर्वोत्तरे पदे॥१२॥

तापसाश्रमवासिन्याः प्राज्यमूलफलोदके।

तस्मिन् सिद्धाश्रिते देशे मन्दाकिन्यविदूरतः॥

तस्योपवनखण्डेषु नानापुष्पसुगन्धिषु।

विहृत्य सलिले क्लिन्नो ममाङ्के समुपाविशः॥१४॥

‘वानरश्रेष्ठ! तुम मेरे प्रियतम से यह उत्तम पहचान बताना—’नाथ! चित्रकूट पर्वत के उत्तर-पूर्ववाले भाग पर, जो मन्दाकिनी नदी के समीप है तथा जहाँ फल-मूल और जल की अधिकता है, उस सिद्धसेवित प्रदेश में तापसाश्रम के भीतर जब मैं निवास करती थी, उन्हीं दिनों नाना प्रकार के फूलों की सुगन्ध से वासित उस आश्रम के उपवनों में जलविहार करके आप भीगे हुए आये और मेरी गोद में बैठ गये॥ १२–१४॥

ततो मांससमायुक्तो वायसः पर्यतुण्डयत्।

तमहं लोष्टमुद्यम्य वारयामि स्म वायसम्॥१५॥

दारयन् स च मां काकस्तत्रैव परिलीयते।

न चाप्युपारमन्मांसाद् भक्षार्थी बलिभोजनः॥१६॥

‘तदनन्तर (किसी दूसरे समय) एक मांसलोलुप कौआ आकर मुझपर चोंच मारने लगा। मैंने ढेला उठाकर उसे हटाने की चेष्टा की, परंतु मुझे बार-बार चोंच मारकर वह कौआ वहीं कहीं छिप जाता था। उस बलिभोजी कौए को खाने की इच्छा थी, इसलिये वह मेरा मांस नोचने से निवृत्त नहीं होता था। १५-१६॥

उत्कर्षन्त्यां च रशनां क्रुद्धायां मयि पक्षिणे।

स्रंसमाने च वसने ततो दृष्टा त्वया ह्यहम्॥१७॥

‘मैं उस पक्षी पर बहुत कुपित थी। अतः अपने लहँगे को दृढ़तापूर्वक कसने के लिये कटिसूत्र (नारे)को खींचने लगी। उस समय मेरा वस्त्र कुछ नीचे खिसक गया और उसी अवस्था में आपने मुझे देख लिया॥१७॥

त्वया विहसिता चाहं क्रुद्धा संलज्जिता तदा।

भक्ष्यगृद्धेन काकेन दारिता त्वामुपागता॥१८॥

‘देखकर आपने मेरी हँसी उड़ायी। इससे मैं पहले तो कुपित हुई और फिर लज्जित हो गयी। इतने में ही उस भक्ष्य-लोलुप कौएने फिर चोंच मारकर मुझे क्षत-विक्षत कर दिया और उसी अवस्था में मैं आपके पास आयी॥१८॥

ततः श्रान्ताहमुत्सङ्गमासीनस्य तवाविशम्।

क्रुध्यन्तीव प्रहृष्टेन त्वयाहं परिसान्त्विता॥१९॥

‘आप वहाँ बैठे हुए थे। मैं उस कौए की हरकत से तंग आ गयी थी। अतः थककर आपकी गोद में आ बैठी। उस समय मैं कुपित-सी हो रही थी और आपने प्रसन्न होकर मुझे सान्त्वना दी॥ १९॥

बाष्पपूर्णमुखी मन्दं चक्षुषी परिमार्जती।

लक्षिताहं त्वया नाथ वायसेन प्रकोपिता॥२०॥

‘नाथ! कौए ने मुझे कुपित कर दिया था। मेरे मुखपर आँसुओं की धारा बह रही थी और मैं धीरे-धीरे आँखें पोंछ रही थी। आपने मेरी उस अवस्था को लक्ष्य किया’॥

परिश्रमाच्च सुप्ता हे राघवाङ्केऽस्म्यहं चिरम्।

पर्यायेण प्रसुप्तश्च ममाङ्के भरताग्रजः॥२१॥

‘हनुमान् ! मैं थक जाने के कारण उस दिन बहुत देर तक श्रीरघुनाथजी की गोद में सोयी रही। फिर उनकी बारी आयी और वे भरत के बड़े भाई मेरी गोद में सिर रखकर सो रहे ॥२१॥

स तत्र पुनरेवाथ वायसः समुपागमत्।

ततः सुप्तप्रबुद्धां मां राघवाङ्कात् समुत्थिताम्।

वायसः सहसागम्य विददार स्तनान्तरे ॥२२॥

‘इसी समय वह कौआ फिर वहाँ आया। मैं सोकर जगने के बाद श्रीरघुनाथजी की गोद से उठकर बैठी ही थी कि उस कौए ने सहसा झपटकर मेरी छाती में चोंच मार दी॥ २२॥

पुनः पुनरथोत्पत्य विददार स मां भृशम्।

ततः समुत्थितो रामो मुक्तैः शोणितबिन्दुभिः॥२३॥

‘उसने बारंबार उड़कर मुझे अत्यन्त घायल कर दिया। मेरे शरीर से रक्त की बूंदें झरने लगीं, इससे श्रीरामचन्द्रजी की नींद खुल गयी और वे जागकर उठ बैठे॥२३॥

स मां दृष्ट्वा महाबाहुर्वितुन्नां स्तनयोस्तदा।

आशीविष इव क्रुद्धः श्वसन् वाक्यमभाषत॥२४॥

‘मेरी छाती में घाव हुआ देख महाबाहु श्रीराम उस समय कुपित हो उठे और फुफकारते हुए विषधर सर्प के समान जोर-जोर से साँस लेते हुए बोले- ॥ २४॥

केन ते नागनासोरु विक्षतं वै स्तनान्तरम्।

कः क्रीडति सरोषेण पञ्चवक्त्रेण भोगिना॥२५॥

‘हाथी की ढूँड़ के समान जाँघों वाली सुन्दरी! किसने तुम्हारी छाती को क्षत-विक्षत किया है ? कौन रोष से भरे हुए पाँच मुखवाले सर्प के साथ खेल रहा है?’ ॥ २५॥

वीक्षमाणस्ततस्तं वै वायसं समवैक्षत।

नखैः सरुधिरैस्तीक्ष्णैर्मामेवाभिमुखं स्थितम्॥२६॥

‘इतना कहकर जब उन्होंने इधर-उधर दृष्टि डाली, तब उस कौए को देखा, जो मेरी ओर ही मुँह किये बैठा था। उसके तीखे पंजे खून से रँग गये थे॥ २६॥

पुत्रः किल स शक्रस्य वायसः पततां वरः।

धरान्तरं गतः शीघ्रं पवनस्य गतौ समः॥२७॥

‘वह पक्षियों में श्रेष्ठ कौआ इन्द्र का पुत्र था। उसकी गति वायु के समान तीव्र थी। वह शीघ्र ही स्वर्ग से उड़कर पृथ्वी पर आ पहुँचा था॥ २७॥

ततस्तस्मिन् महाबाहुः कोपसंवर्तितेक्षणः।

वायसे कृतवान् क्रूरां मतिं मतिमतां वरः॥२८॥

‘उस समय बुद्धिमानों में श्रेष्ठ महाबाहु श्रीराम के नेत्र क्रोध से घूमने लगे। उन्होंने उस कौए को कठोर दण्ड देने का विचार किया॥२८॥

स दर्भसंस्तराद् गृह्य ब्रह्मणोऽस्त्रेण योजयत्।

स दीप्त इव कालाग्निर्जज्वालाभिमुखो द्विजम्॥२९॥

‘श्रीराम ने कुश की चटाई से एक कुश निकाला और उसे ब्रह्मास्त्र के मन्त्र से अभिमन्त्रित किया। अभिमन्त्रित करते ही वह कालाग्नि के समान प्रज्वलित हो उठा। उसका लक्ष्य वह पक्षी ही था। २९॥

स तं प्रदीप्तं चिक्षेप दर्भ तं वायसं प्रति।

ततस्तु वायसं दर्भः सोऽम्बरेऽनुजगाम ह॥३०॥

‘श्रीरघुनाथजी ने वह प्रज्वलित कुश उस कौए की ओर छोड़ा। फिर तो वह आकाश में उसका पीछा करने लगा॥३०॥

अनुसृष्टस्तदा काको जगाम विविधां गतिम्।

त्राणकाम इमं लोकं सर्वं वै विचचार ह॥३१॥

‘वह कौआ कई प्रकार की उड़ानें लगाता अपने प्राण बचाने के लिये इस सम्पूर्ण जगत् में भागता फिरा, किंतु उस बाण ने कहीं भी उसका पीछा न छोड़ा॥३१॥

स पित्रा च परित्यक्तः सर्वैश्च परमर्षिभिः।

त्रील्लोकान् सम्परिक्रम्य तमेव शरणं गतः॥३२॥

‘उसके पिता इन्द्र तथा समस्त श्रेष्ठ महर्षियों ने भी उसका परित्याग कर दिया। तीनों लोकों में घूमकर अन्त में वह पुनः भगवान् श्रीराम की ही शरण में आया॥

स तं निपतितं भूमौ शरण्यः शरणागतम्।

वधार्हमपि काकुत्स्थः कृपया पर्यपालयत्॥३३॥

‘रघुनाथजी शरणागतवत्सल हैं। उनकी शरण में आकर जब वह पृथ्वी पर गिर पड़ा, तब उन्हें उस पर दया आ गयी; अतः वध के योग्य होने पर भी उस कौए को उन्होंने मारा नहीं, उबारा॥३३॥

परिघुनं विवर्णं च पतमानं तमब्रवीत्।

मोघमस्त्रं न शक्यं तु ब्राह्मं कर्तुं तदुच्यताम्॥३४॥

‘उसकी शक्ति क्षीण हो चुकी थी और वह उदास होकर सामने गिरा था। इस अवस्था में उसको लक्ष्यकर के भगवान् बोले—’ब्रह्मास्त्र को तो व्यर्थ किया नहीं जा सकता। अतः बताओ, इसके द्वारा तुम्हारा कौन-सा अङ्ग-भङ्ग किया जाय’॥ ३४ ॥

ततस्तस्याक्षि काकस्य हिनस्ति स्म स दक्षिणम्।

दत्त्वा तु दक्षिणं नेत्रं प्राणेभ्यः परिरक्षितः॥३५॥

‘फिर उसकी सम्मति के अनुसार श्रीराम ने उस अस्त्र से उस कौए की दाहिनी आँख नष्ट कर दी। इस प्रकार दायाँ नेत्र देकर वह अपने प्राण बचा सका। ३५॥

स रामाय नमस्कृत्वा राज्ञे दशरथाय च।

विसृष्टस्तेन वीरेण प्रतिपेदे स्वमालयम्॥ ३६॥

‘तदनन्तर दशरथनन्दन राजा राम को नमस्कार करके उन वीरशिरोमणि से विदा लेकर वह अपने निवासस्थान को चला गया॥३६॥

मत्कृते काकमात्रेऽपि ब्रह्मास्त्रं समुदीरितम्।

कस्माद् यो माहरत् त्वत्तः क्षमसे तं महीपते॥३७॥

‘कपिश्रेष्ठ! तुम मेरे स्वामी से जाकर कहना —’प्राणनाथ! पृथ्वीपते! आपने मेरे लिये एक साधारण अपराध करने वाले कौए पर भी ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया था; फिर जो आपके पास से मुझे हर ले आया, उसको आप कैसे क्षमा कर रहे हैं? ॥ ३७॥

स कुरुष्व महोत्साहां कृपां मयि नरर्षभ।

त्वया नाथवती नाथ ह्यनाथा इव दृश्यते॥३८॥

‘नरश्रेष्ठ! मेरे ऊपर महान् उत्साहसे पूर्ण कृपा कीजिये। प्राणनाथ! जो सदा आपसे सनाथ है, वह सीता आज अनाथ-सी दिखायी देती है॥ ३८॥

आनृशंस्यं परो धर्मस्त्वत्त एव मया श्रुतम्।

जानामि त्वां महावीर्यं महोत्साहं महाबलम्॥३९॥

‘दया करना सबसे बड़ा धर्म है, यह मैंने आपसे ही सुना है। मैं आपको अच्छी तरह जानती हूँ। आपका बल, पराक्रम और उत्साह महान् है॥ ३९॥

अपारवारमक्षोभ्यं गाम्भीर्यात् सागरोपमम्।

भर्तारं ससमुद्राया धरण्या वासवोपमम्॥४०॥

‘आपका कहीं आर-पार नहीं है—आप असीम हैं। आपको कोई क्षुब्ध या पराजित नहीं कर सकता। आप गम्भीरता में समुद्र के समान हैं। समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वी के स्वामी हैं तथा इन्द्र के समान तेजस्वी हैं। मैं आपके प्रभाव को जानती हूँ॥ ४०॥

एवमस्त्रविदां श्रेष्ठो बलवान् सत्त्ववानपि।

किमर्थमस्त्रं रक्षःसु न योजयसि राघव॥४१॥

‘रघुनन्दन! इस प्रकार अस्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ, बलवान् और शक्तिशाली होते हुए भी आप राक्षसों पर अपने अस्त्रों का प्रयोग क्यों नहीं करते हैं? ॥ ४१॥

न नागा नापि गन्धर्वा न सुरा न मरुद्गणाः।

रामस्य समरे वेगं शक्ताः प्रतिसमीहितुम्॥४२॥

‘पवनकुमार! नाग, गन्धर्व, देवता और मरुद्गण —कोई भी समराङ्गण में श्रीरामचन्द्रजी का वेग नहीं सह सकते॥४२॥

तस्य वीर्यवतः कच्चिद् यद्यस्ति मयि सम्भ्रमः।

किमर्थं न शरैस्तीक्ष्णैः क्षयं नयति राक्षसान्॥४३॥

‘उन परम पराक्रमी श्रीराम के हृदय में यदि मेरे लिये कुछ व्याकुलता है तो वे अपने तीखे सायकों से इन राक्षसों का संहार क्यों नहीं कर डालते? ॥ ४३॥

भ्रातुरादेशमादाय लक्ष्मणो वा परंतपः।

कस्य हेतोर्न मां वीरः परित्राति महाबलः॥४४॥

‘अथवा शत्रुओं को संताप देने वाले महाबली वीर लक्ष्मण ही अपने बड़े भाई की आज्ञा लेकर मेरा उद्धार क्यों नहीं करते हैं? ॥ ४४॥

यदि तौ पुरुषव्याघ्रौ वाय्विन्द्रसमतेजसौ।

सुराणामपि दुर्धर्षी किमर्थं मामुपेक्षतः॥४५॥

‘वे दोनों पुरुषसिंह वायु तथा इन्द्र के समान तेजस्वी हैं। यदि वे देवताओं के लिये भी दुर्जय हैं तो किसलिये मेरी उपेक्षा करते हैं? ॥ ४५ ॥

ममैव दुष्कृतं किंचिन्महदस्ति न संशयः।

समर्थावपि तौ यन्मां नावेक्षेते परंतपौ॥४६॥

‘निःसंदेह मेरा ही कोई महान् पाप उदित हुआ है, जिससे वे दोनों शत्रुसंतापी वीर मेरा उद्धार करने में समर्थ होते हुए भी मुझ पर कृपादृष्टि नहीं कर रहे हैं’।

वैदेह्या वचनं श्रुत्वा करुणं साश्रु भाषितम्।

अथाब्रवीन्महातेजा हनूमान् हरियूथपः॥४७॥

विदेहकुमारी सीता ने आँसू बहाते हुए जब यह करुणायुक्त बात कही, तब इसे सुनकर वानरयूथपति महातेजस्वी हनुमान् इस प्रकार बोले- ॥४७॥

त्वच्छोकविमुखो रामो देवि सत्येन ते शपे।

रामे दुःखाभिपन्ने तु लक्ष्मणः परितप्यते॥४८॥

‘देवि! मैं सत्य की शपथ खाकर आपसे कहता हूँ कि श्रीरामचन्द्रजी आपके विरह-शोक से पीड़ित हो अन्य सब कार्यों से विमुख हो गये हैं केवल आपका ही चिन्तन करते रहते हैं। श्रीराम के दुःखी होने से लक्ष्मण भी सदा संतप्त रहते हैं॥४८॥

कथंचिद् भवती दृष्टा न कालः परिशोचितुम्।

इमं मुहूर्तं दुःखानामन्तं द्रक्ष्यसि शोभने॥४९॥

‘किसी तरह आपका दर्शन हो गया। अब शोक करने का अवसर नहीं है। शोभने! इसी घड़ी से आप अपने दुःखों का अन्त होता देखेंगी॥४९॥

तावुभौ पुरुषव्याघ्रौ राजपुत्रौ महाबलौ।

त्वदर्शनकृतोत्साही लोकान् भस्मीकरिष्यतः॥५०॥

‘वे दोनों पुरुषसिंह राजकुमार बड़े बलवान् हैं तथा आपको देखने के लिये उनके मन में विशेष उत्साह है। अतः वे समस्त राक्षस-जगत् को भस्म कर डालेंगे। ५०॥

हत्वा च समरक्रूरं रावणं सहबान्धवम्।

राघवस्त्वां विशालाक्षि स्वां पुरीं प्रति नेष्यति॥५१॥

‘विशाललोचने! रघुनाथजी समराङ्गण में क्रूरता प्रकट करनेवाले रावण को उसके बन्धु-बान्धवोंसहित मारकर आपको अपनी पुरी में ले जायँगे॥५१॥

ब्रूहि यद् राघवो वाच्यो लक्ष्मणश्च महाबलः।

सुग्रीवो वापि तेजस्वी हरयो वा समागताः॥५२॥

‘अब भगवान् श्रीराम, महाबली लक्ष्मण, तेजस्वी सुग्रीव तथा वहाँ एकत्र हुए वानरों के प्रति आपको जो कुछ कहना हो, वह कहिये’ ॥ ५२॥

इत्युक्तवति तस्मिंश्च सीता पुनरथाब्रवीत्।

कौसल्या लोकभर्तारं सुषुवे यं मनस्विनी॥५३॥

तं ममार्थे सुखं पृच्छ शिरसा चाभिवादय।

हनुमान जी के ऐसा कहने पर देवी सीता ने फिर कहा—’कपिश्रेष्ठ! मनस्विनी कौसल्या देवी ने जिन्हें जन्म दिया है तथा जो सम्पूर्ण जगत् के स्वामी हैं, उन श्रीरघुनाथजी को मेरी ओर से मस्तक झुकाकर प्रणाम करना और उनका कुशल-समाचार पूछना। ५३ १/२॥

स्रजश्च सर्वरत्नानि प्रियायाश्च वराङ्गनाः॥५४॥

ऐश्वर्यं च विशालायां पृथिव्यामपि दुर्लभम्।

पितरं मातरं चैव सम्मान्याभिप्रसाद्य च॥५५॥

अनुप्रव्रजितो रामं सुमित्रा येन सुप्रजाः।

आनुकूल्येन धर्मात्मा त्यक्त्वा सुखमनुत्तमम्॥

अनुगच्छति काकुत्स्थं भ्रातरं पालयन् वने।

सिंहस्कन्धो महाबाहुर्मनस्वी प्रियदर्शनः॥५७॥

पितृवद् वर्तते रामे मातृवन्मां समाचरत्।

ह्रियमाणां तदा वीरो न तु मां वेद लक्ष्मणः॥५८॥

वृद्धोपसेवी लक्ष्मीवान् शक्तो न बहुभाषिता।

राजपुत्रप्रियश्रेष्ठः सदृशः श्वशुरस्य मे॥५९॥

मत्तः प्रियतरो नित्यं भ्राता रामस्य लक्ष्मणः।

नियुक्तो धुरि यस्यां तु तामुदहति वीर्यवान्॥६०॥

यं दृष्ट्वा राघवो नैव वृत्तमार्यमनुस्मरत्।

स ममार्थाय कुशलं वक्तव्यो वचनान्मम॥६१॥

मृदुर्नित्यं शुचिर्दक्षः प्रियो रामस्य लक्ष्मणः।

यथा हि वानरश्रेष्ठ दुःखक्षयकरो भवेत्॥६२॥

तत्पश्चात् विशाल भूमण्डल में भी जिसका मिलना कठिन है ऐसे उत्तम ऐश्वर्य का, भाँति-भाँति के हारों, सब प्रकार के रत्नों तथा मनोहर सुन्दरी स्त्रियों का भी परित्याग कर पिता-माता को सम्मानित एवं राजी करके जो श्रीरामचन्द्रजी के साथ वन में चले आये, जिनके कारण सुमित्रा देवी उत्तम संतानवाली कही जाती हैं, जिनका चित्त सदा धर्म में लगा रहता है, जो सर्वोत्तम सुख को त्यागकर वन में बड़े भाई श्रीराम की रक्षा करते हुए सदा उनके अनुकूल चलते हैं, जिनके कंधे सिंह के समान और भुजाएँ बड़ी-बड़ी हैं, जो देखने में प्रिय लगते और मन को वश में रखते हैं, जिनका श्रीराम के प्रति पिता के समान और मेरे प्रति माता के समान भाव तथा बर्ताव रहता है, जिन वीर लक्ष्मण को उस समय मेरे हरे जाने की बात नहीं मालूम हो सकी थी, जो बड़े-बूढों की सेवा में संलग्न रहने वाले, शोभाशाली, शक्तिमान् तथा कम बोलने वाले हैं, राजकुमार श्रीराम के प्रिय व्यक्तियों में जिनका सबसे ऊँचा स्थान है, जो मेरे श्वशुर के सदृश पराक्रमी हैं तथा श्रीरघुनाथजी का जिन छोटे भाई लक्ष्मण के प्रति सदा मुझसे भी अधिक प्रेम रहता है, जो पराक्रमी वीर अपने ऊपर डाले हुए कार्यभार को बड़ी योग्यता के साथ वहन करते हैं तथा जिन्हें देखकर श्रीरघुनाथजी अपने मरे हुए पिता को भी भूल गये हैं (अर्थात् जो पिता के समान श्रीराम के पालन में दत्तचित्त रहते हैं)। उन लक्ष्मण से भी तुम मेरी ओर से कुशल पूछना और वानरश्रेष्ठ! मेरे कथनानुसार उनसे ऐसी बातें कहना, जिन्हें सुनकर नित्य कोमल, पवित्र, दक्ष तथा श्रीराम के प्रिय बन्धु लक्ष्मण मेरा दुःख दूर करने को तैयार हो जायँ॥ ५४–६२॥

त्वमस्मिन् कार्यनिर्वाहे प्रमाणं हरियूथप।

राघवस्त्वत्समारम्भान्मयि यत्नपरो भवेत्॥६३॥

‘वानरयूथपते! अधिक क्या कहूँ? जिस तरह यह कार्य सिद्ध हो सके, वही उपाय तुम्हें करना चाहिये। इस विषय में तुम्ही प्रमाण हो—इसका सारा भार तुम्हारे ही ऊपर है। तुम्हारे प्रोत्साहन देने से ही श्रीरघुनाथजी मेरे उद्धार के लिये प्रयत्नशील हो सकते हैं॥६३॥

इदं ब्रूयाश्च मे नाथं शूरं रामं पुनः पुनः।

जीवितं धारयिष्यामि मासं दशरथात्मज॥६४॥

ऊर्ध्वं मासान्न जीवेयं सत्येनाहं ब्रवीमि ते।

‘तुम मेरे स्वामी शूरवीर भगवान् श्रीराम से बारंबार कहना—’दशरथनन्दन! मेरे जीवन की अवधि के लिये जो मास नियत हैं, उनमें से जितना शेष है, उतने ही समय तक मैं जीवन धारण करूँगी। उन अवशिष्ट दो महीनों के बाद मैं जीवित नहीं रह सकती। यह मैं आपसे सत्य की शपथ खाकर कह रही हूँ॥ ६४१/२॥

रावणेनोपरुद्धां मां निकृत्या पापकर्मणा।

त्रातुमर्हसि वीर त्वं पातालादिव कौशिकीम्॥६५॥

‘वीर! पापाचारी रावण ने मुझे कैद कर रखा है। अतः राक्षसियों द्वारा शठतापूर्वक मुझे बड़ी पीड़ा दी जाती है। जैसे भगवान् विष्णु ने इन्द्र की लक्ष्मी का पाताल से उद्धार किया था, उसी प्रकार आप यहाँ से मेरा उद्धार करें॥६५॥

ततो वस्त्रगतं मुक्त्वा दिव्यं चूडामणिं शुभम्।

प्रदेयो राघवायेति सीता हनुमते ददौ॥६६॥

ऐसा कहकर सीता ने कपड़े में बँधी हुई सुन्दर दिव्य चूड़ामणि को खोलकर निकाला और इसे श्रीरामचन्द्रजी को दे देना’ ऐसा कहकर हनुमान जी के हाथ पर रख दिया॥६६॥

प्रतिगृह्य ततो वीरो मणिरत्नमनुत्तमम्।

अङ्गल्या योजयामास नह्यस्य प्राभवद् भुजः॥६७॥

उस परम उत्तम मणिरत्न को लेकर वीर हनुमान जी ने उसे अपनी अङ्गली में डाल लिया। उनकी बाँह अत्यन्त सूक्ष्म होने पर भी उसके छेद में न आ सकी (इससे जान पड़ता है कि हनुमान जी ने अपना विशाल रूप दिखाने के बाद फिर सूक्ष्म रूप धारण कर लिया था) ॥ ६७॥

मणिरत्नं कपिवरः प्रतिगृह्याभिवाद्य च।

सीतां प्रदक्षिणं कृत्वा प्रणतः पार्श्वतः स्थितः॥६८॥

वह मणिरत्न लेकर कपिवर हनुमान् ने सीता को प्रणाम किया और उनकी प्रदक्षिणा करके वे विनीतभाव से उनके पास खड़े हो गये॥ ६८॥

हर्षेण महता युक्तः सीतादर्शनजेन सः।

हृदयेन गतो राम लक्ष्मणं च सलक्षणम्॥६९॥

सीताजी का दर्शन होने से उन्हें महान् हर्ष प्राप्त हुआ था। वे मन-ही-मन भगवान् श्रीराम और शुभलक्षणसम्पन्न लक्ष्मण के पास पहुँच गये थे। उन दोनों का चिन्तन करने लगे थे॥६९॥

मणिवरमुपगृह्य तं महार्ह जनकनृपात्मजया धृतं प्रभावात्।

गिरिवरपवनावधूतमुक्तः सुखितमनाः प्रतिसंक्रमं प्रपेदे॥७०॥

राजा जनक की पुत्री सीता ने अपने विशेष प्रभाव से जिसे छिपाकर धारण कर रखा था, उस बहुमूल्य मणि-रत्न को लेकर हनुमान जी मन-ही-मन उस पुरुष के समान सुखी एवं प्रसन्न हुए, जो किसी श्रेष्ठ पर्वत के ऊपरी भाग से उठी हुई प्रबल वायु के वेग से कम्पित होकर पुनः उसके प्रभाव से  मुक्त हो गया हो। तदनन्तर उन्होंने वहाँ से लौट जाने की तैयारी की। ७०॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डेऽष्टात्रिंशः सर्गः॥ ३८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में अड़तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥३८॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
सुन्दरकाण्डम्

समुद्र-तरण के विषय में शङ्कित हुई सीता को वानरों का पराक्रम बताकर हनुमान जी का आश्वासन देना

एकोनचत्वारिंशः सर्गः

सर्ग-39

मणिं दत्त्वा ततः सीता हनूमन्तमथाब्रवीत्।

अभिज्ञानमभिज्ञातमेतद् रामस्य तत्त्वतः॥१॥

मणि देने के पश्चात् सीता हनुमान् जी से बोलीं —’मेरे इस चिह्म को भगवान् श्रीरामचन्द्रजी भलीभाँति पहचानते हैं॥१॥

मणिं दृष्ट्वा तु रामो वै त्रयाणां संस्मरिष्यति।

वीरो जनन्या मम च राज्ञो दशरथस्य च॥२॥

‘इस मणि को देखकर वीर श्रीराम निश्चय ही तीन व्यक्तियों का—मेरी माता का, मेरा तथा महाराज दशरथका एक साथ ही स्मरण करेंगे॥२॥

स भूयस्त्वं समुत्साहचोदितो हरिसत्तम।

अस्मिन् कार्यसमुत्साहे प्रचिन्तय यदुत्तरम्॥३॥

‘कपिश्रेष्ठ ! तुम पुनः विशेष उत्साह से प्रेरित हो इस कार्य की सिद्धि के लिये जो भावी कर्तव्य हो, उसे सोचो॥३॥

त्वमस्मिन् कार्यनिर्योगे प्रमाणं हरिसत्तम।

तस्य चिन्तय यो यत्नो दुःखक्षयकरो भवेत्॥४॥

‘वानरशिरोमणे! इस कार्य को निभाने में तुम्ही प्रमाण हो—तुम पर ही सारा भार है। तुम इसके लिये कोई ऐसा उपाय सोचो, जो मेरे दुःख का निवारण करने वाला हो॥४॥

हनूमन् यत्नमास्थाय दुःखक्षयकरो भव।

स तथेति प्रतिज्ञाय मारुतिर्भीमविक्रमः॥५॥

शिरसाऽऽवन्द्य वैदेहीं गमनायोपचक्रमे।

‘हनूमन् ! तुम विशेष प्रयत्न करके मेरा दुःख दूर करने में सहायक बनो।’ तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर सीताजी की आज्ञा के अनुसार कार्य करने की प्रतिज्ञा करके वे भयंकर पराक्रमी पवनकुमार विदेहनन्दिनी के चरणों में मस्तक झुकाकर वहाँ से जाने को तैयार हुए॥ ५ १/२॥

ज्ञात्वा सम्प्रस्थितं देवी वानरं पवनात्मजम्॥६॥

बाष्पगद्गदया वाचा मैथिली वाक्यमब्रवीत्।

पवनपुत्र वानरवीर हनुमान् को वहाँ से लौटने के लिये उद्यत जान मिथिलेशकुमारी का गला भर आया और वे अश्रुगद्गद वाणी में बोलीं- ॥ ६ १/२ ॥

हनूमन् कुशलं ब्रूयाः सहितौ रामलक्ष्मणौ॥७॥

सुग्रीवं च सहामात्यं सर्वान् वृद्धांश्च वानरान्।

ब्रूयास्त्वं वानरश्रेष्ठ कुशलं धर्मसंहितम्॥८॥

‘हनूमन् ! तुम श्रीराम और लक्ष्मण दोनों को एक साथ ही मेरा कुशल-समाचार बताना और उनका कुशल-मङ्गल पूछना। वानरश्रेष्ठ! फिर मन्त्रियोंसहित सुग्रीव तथा अन्य सब बड़े-बूढ़े वानरों से धर्मयुक्त कुशल-समाचार कहना और पूछना॥७-८॥

यथा च स महाबाहुर्मां तारयति राघवः।

अस्माद् दुःखाम्बुसंरोधात् त्वं समाधातुमर्हसि॥९॥

‘महाबाहु श्रीरघुनाथजी जिस प्रकार इस दुःख के समुद्र से मेरा उद्धार करें, वैसा ही यत्न तुम्हें करना चाहिये॥

जीवन्तीं मां यथा रामः सम्भावयति कीर्तिमान।

तत् त्वया हनुमन् वाच्यं वाचा धर्ममवाप्नुहि॥१०॥

‘हनुमन् ! यशस्वी रघुनाथजी जिस प्रकार मेरे जीते जी यहाँ आकर मुझसे मिलें—मुझे सँभालें वैसी ही बातें तुम उनसे कहो और ऐसा करके वाणी के द्वारा धर्माचरण का फल प्राप्त करो॥ १० ॥

नित्यमुत्साहयुक्तस्य वाचः श्रुत्वा मयेरिताः।

वर्धिष्यते दाशरथेः पौरुषं मदवाप्तये॥११॥

‘यों तो दशरथनन्दन भगवान् श्रीराम सदा ही उत्साह से भरे रहते हैं, तथापि मेरी कही हुई बातें सुनकर मेरी प्राप्ति के लिये उनका पुरुषार्थ और भी बढ़ेगा॥ ११॥

मत्संदेशयुता वाचस्त्वत्तः श्रुत्वैव राघवः।

पराक्रमे मतिं वीरो विधिवत् संविधास्यति॥१२॥

‘तुम्हारे मुख से मेरे संदेश से युक्त बातें सुनकर ही वीर रघुनाथजी पराक्रम करने में विधिवत् अपना मन लगायेंगे’॥ १२॥

सीतायास्तद् वचः श्रुत्वा हनूमान् मारुतात्मजः।

शिरस्यञ्जलिमाधाय वाक्यमुत्तरमब्रवीत्॥१३॥

सीता की यह बात सुनकर पवनकुमार हनुमान् ने माथे पर अञ्जलि बाँधकर विनयपूर्वक उनकी बात का उत्तर दिया- ॥१३॥

क्षिप्रमेष्यति काकुत्स्थो हपृक्षप्रवरैर्वृतः।

यस्ते युधि विजित्यारीन् शोकं व्यपनयिष्यति॥१४॥

‘देवि! जो युद्ध में सारे शत्रुओं को जीतकर आपके शोक का निवारण करेंगे, वे ककुत्स्थकुलभूषण भगवान् श्रीराम श्रेष्ठ वानरों और भालुओं के साथ शीघ्र ही यहाँ पधारेंगे॥१४॥

नहि पश्यामि मत्र्येषु नासुरेषु सुरेषु वा।

यस्तस्य वमतो बाणान् स्थातुमुत्सहतेऽग्रतः॥१५॥

‘मैं मनुष्यों, असुरों अथवा देवताओं में भी किसी को ऐसा नहीं देखता, जो बाणों की वर्षा करते हुए भगवान् श्रीराम के सामने ठहर सके॥ १५ ॥

अप्यर्कमपि पर्जन्यमपि वैवस्वतं यमम्।

स हि सोढुं रणे शक्तस्तव हेतोर्विशेषतः॥१६॥

‘भगवान् श्रीराम विशेषतः आपके लिये तो युद्ध में सूर्य, इन्द्र और सूर्यपुत्र यम का भी सामना कर सकते हैं।। १६॥

स हि सागरपर्यन्तां महीं साधितुमर्हति।

त्वन्निमित्तो हि रामस्य जयो जनकनन्दिनि॥१७॥

‘वे समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वी को भी जीत लेनेयोग्य हैं। जनकनन्दिनि! आपके लिये युद्ध करते समय श्रीरामचन्द्रजी को निश्चय ही विजय प्राप्त होगी’। १७॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा सम्यक् सत्यं सुभाषितम्।

जानकी बहु मेने तं वचनं चेदमब्रवीत्॥१८॥

हनुमान जी का कथन युक्तियुक्त, सत्य और सुन्दर था। उसे सुनकर जनकनन्दिनी ने उनका बड़ा आदर किया और वे उनसे फिर कुछ कहने को उद्यत हुईं।

ततस्तं प्रस्थितं सीता वीक्षमाणा पुनः पुनः।

भर्तृस्नेहान्वितं वाक्यं सौहार्दादनुमानयत्॥१९॥

तदनन्तर वहाँ से प्रस्थित हुए हनुमान जी की ओर बार-बार देखती हई सीता ने सौहार्दवश स्वामी के प्रति स्नेह से युक्त सम्मानपूर्ण बात कही— ॥१९॥

यदि वा मन्यसे वीर वसैकाहमरिंदम।

कस्मिंश्चित् संवृते देशे विश्रान्तः श्वो गमिष्यसि॥२०॥

‘शत्रुओं का दमन करने वाले वीर! यदि तुम ठीक समझो तो यहाँ एक दिन किसी गुप्त स्थान में निवास करो। इस तरह एक दिन विश्राम करके कल चले जाना॥ २०॥

मम चैवाल्पभाग्यायाः सांनिध्यात् तव वानर।

अस्य शोकस्य महतो मुहर्तं मोक्षणं भवेत्॥ २१॥

‘वानरवीर! तुम्हारे निकट रहने से मुझ मन्दभागिनी के महान् शोक का थोड़ी देर के लिये निवारण हो जायगा॥२१॥

ततो हि हरिशार्दूल पुनरागमनाय तु।

प्राणानामपि संदेहो मम स्यान्नात्र संशयः॥ २२॥

‘कपिश्रेष्ठ ! विश्राम के पश्चात् यहाँ से यात्रा करने के अनन्तर यदि फिर तुमलोगों के आने में संदेह या विलम्ब हुआ तो मेरे प्राणों पर भी संकट आ जायगा, इसमें संशय नहीं है।॥ २२॥

तवादर्शनजः शोको भूयो मां परितापयेत्।

दुःखादुःखपरामृष्टां दीपयन्निव वानर ॥२३॥

‘वानरवीर ! मैं दुःख-पर-दुःख उठा रही हूँ। तुम्हारे चले जाने पर तुम्हें न देख पाने का शोक मुझे पुनः दग्ध करता हुआ-सा संताप देता रहेगा॥ २३॥

अयं च वीर संदेहस्तिष्ठतीव ममाग्रतः।

सुमहांस्त्वत्सहायेषु हर्युक्षेषु हरीश्वर ॥२४॥

कथं नु खलु दुष्पारं तरिष्यन्ति महोदधिम्।

तानि हयृक्षसैन्यानि तौ वा नरवरात्मजौ॥ २५॥

‘वीर वानरेश्वर! तुम्हारे साथी रीछों और वानरों के विषय में मेरे सामने अब भी यह महान् संदेह तो विद्यमान ही है कि वे रीछ और वानरों की सेनाएँ तथा वे दोनों राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण इस दुष्पार महासागर को कैसे पार करेंगे॥ २४-२५॥

त्रयाणामेव भूतानां सागरस्येह लङ्घने।

शक्तिः स्याद् वैनतेयस्य तव वा मारुतस्य वा॥२६॥

‘इस संसार में समुद्र को लाँघने की शक्ति तो केवल तीन प्राणियों में ही देखी गयी है। तुम में, गरुड़ में अथवा वायु देवता में॥२६॥

तदस्मिन् कार्यनिर्योगे वीरैवं दुरतिक्रमे।

किं पश्यसे समाधानं त्वं हि कार्यविदां वरः॥२७॥

‘वीर! इस प्रकार इस समुद्रलङ्घनरूपी कार्य को निभाना अत्यन्त कठिन हो गया है। ऐसी दशा में तुम्हें कार्यसिद्धि का कौन-सा उपाय दिखायी देता है? यह बताओ; क्योंकि कार्यसिद्धि का उपाय जानने वाले लोगों में तुम सबसे श्रेष्ठ हो॥२७॥

काममस्य त्वमेवैकः कार्यस्य परिसाधने।

पर्याप्तः परवीरघ्न यशस्यस्ते फलोदयः॥२८॥

‘शत्रुवीरों का संहार करने वाले पवनकुमार! इसमें संदेह नहीं कि तुम अकेले ही मेरे उद्धाररूपी कार्य को सिद्ध करने में पूर्णतः समर्थ हो; परंतु ऐसा करने से जो विजयरूप फल प्राप्त होगा, उसका यश केवल तुम्हीं को मिलेगा, भगवान् श्रीराम को नहीं॥ २८॥

बलैः समग्रैर्युधि मां रावणं जित्य संयुगे।

विजयी स्वपुरं यायात् तत्तस्य सदृशं भवेत्॥२९॥

‘यदि रघुनाथजी सारी सेना के साथ रावण को युद्ध में पराजित करके विजयी हो मुझे साथ ले अपनी पुरी को पधारें तो वह उनके अनुरूप कार्य होगा॥ २९ ॥

बलैस्तु संकुलां कृत्वा लङ्कां परबलार्दनः।

मां नयेद् यदि काकुत्स्थस्तत् तस्य सदृशं भवेत्॥३०॥

‘शत्रुसेना का संहार करने वाले श्रीराम यदि अपनी सेनाओं द्वारा लङ्का को पददलित करके मुझे अपने साथ ले चलें तो वही उनके योग्य होगा॥ ३०॥

तद्यथा तस्य विक्रान्तमनुरूपं महात्मनः।

भवेदाहवशूरस्य तथा त्वमुपपादय॥३१॥

‘अतः तुम ऐसा उपाय करो जिससे समरशूर महात्मा श्रीराम का उनके अनुरूप पराक्रम प्रकट हो’॥३१॥

तदर्थोपहितं वाक्यं प्रश्रितं हेतुसंहितम्।

निशम्य हनुमान् शेषं वाक्यमुत्तरमब्रवीत्॥३२॥

देवी सीता की उपर्युक्त बात अर्थयुक्त, स्नेहयुक्त तथा युक्तियुक्त थी। उनकी उस अवशिष्ट बात को सुनकर हनुमान जी ने इस प्रकार उत्तर दिया-॥ ३२॥

देवि हय॒क्षसैन्यानामीश्वरः प्लवतां वरः।

सुग्रीवः सत्यसम्पन्नस्तवार्थे कृतनिश्चयः॥३३॥

‘देवि! वानर और भालुओं की सेना के स्वामी कपिश्रेष्ठ सुग्रीव सत्यवादी हैं। वे आपके उद्धार के लिये दृढ़ निश्चय कर चुके हैं॥ ३३॥

स वानरसहस्राणां कोटीभिरभिसंवृतः।

क्षिप्रमेष्यति वैदेहि राक्षसानां निबर्हणः॥३४॥

‘विदेहनन्दिनि! उनमें राक्षसों का संहार करने की शक्ति है। वे सहस्रों कोटि वानरों की सेना साथ लेकर शीघ्र ही लङ्का पर चढ़ाई करेंगे॥ ३४॥ ।

तस्य विक्रमसम्पन्नाः सत्त्ववन्तो महाबलाः।

मनःसंकल्पसम्पाता निदेशे हरयः स्थिताः॥३५॥

‘उनके पास पराक्रमी, धैर्यशाली, महाबली और मानसिक संकल्प के समान बहुत दूर तक उछलकर जाने वाले बहुत-से वानर हैं, जो उनकी आज्ञा का पालन करने के लिये सदा तैयार रहते हैं ॥ ३५ ॥

येषां नोपरि नाधस्तान्न तिर्यक् सज्जते गतिः।

न च कर्मसु सीदन्ति महत्स्वमिततेजसः॥३६॥

‘जिनकी ऊपर-नीचे तथा इधर-उधर कहीं भी गति नहीं रुकती। वे बड़े-से-बड़े कार्यों के आ पड़ने पर भी कभी हिम्मत नहीं हारते उनमें महान् तेज है॥३६॥

असकृत् तैर्महोत्साहैः ससागरधराधरा।

प्रदक्षिणीकृता भूमिर्वायुमार्गानुसारिभिः॥ ३७॥

“उन्होंने अत्यन्त उत्साह से पूर्ण होकर वायुपथ (आकाश) का अनुसरण करते हुए समुद्र और पर्वतोंसहित इस पृथ्वी की अनेक बार परिक्रमा की है॥३७॥

मदिशिष्टाश्च तुल्याश्च सन्ति तत्र वनौकसः।

मत्तः प्रत्यवरः कश्चिन्नास्ति सुग्रीवसंनिधौ॥३८॥

‘सुग्रीव की सेना में मेरे समान तथा मुझसे भी बढ़कर पराक्रमी वानर हैं। उनके पास कोई भी ऐसा वानर नहीं है जो बल-पराक्रम में मुझसे कम हो। ३८॥

अहं तावदिह प्राप्तः किं पुनस्ते महाबलाः।

नहि प्रकृष्टाः प्रेष्यन्ते प्रेष्यन्ते हीतरे जनाः॥३९॥

‘जब मैं ही यहाँ आ गया, तब अन्य महाबली वीरों के आने में क्या संदेह है? जो श्रेष्ठ पुरुष होते हैं, उन्हें संदेश-वाहक दूत बनाकर नहीं भेजा जाता। साधारण कोटि के लोग ही भेजे जाते हैं॥ ३९॥

तदलं परितापेन देवि शोको व्यपैतु ते।

एकोत्पातेन ते लङ्कामेष्यन्ति हरियूथपाः॥४०॥

‘अतः देवि! आपको संताप करने की आवश्यकता नहीं है। आपका शोक दूर हो जाना चाहिये। वानरयूथपति एक ही छलाँग में लङ्का पहुँच जायँगे॥ ४०॥

मम पृष्ठगतौ तौ च चन्द्रसूर्याविवोदितौ।

त्वत्सकाशं महासङ्घौ नृसिंहावागमिष्यतः॥४१॥

‘उदयकाल के सूर्य और चन्द्रमा की भाँति शोभा पाने वाले और महान् वानर-समुदाय के साथ रहने वाले वे दोनों पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मण मेरी पीठ पर बैठकर आपके पास आ पहुँचेंगे॥४१॥

तौ हि वीरौ नरवरौ सहितौ रामलक्ष्मणौ।

आगम्य नगरी लङ्कां सायकैर्विधमिष्यतः॥४२॥

‘वे दोनों नरश्रेष्ठ वीर श्रीराम और लक्ष्मण एक साथ आकर अपने सायकों से लङ्कापुरी का विध्वंस कर डालेंगे॥४२॥

सगणं रावणं हत्वा राघवो रघुनन्दनः।

त्वामादाय वरारोहे स्वपुरीं प्रति यास्यति॥४३॥

‘वरारोहे! रघुकुल को आनन्दित करने वाले श्रीरघुनाथजी रावण को उसके सैनिकोंसहित मारकर आपको साथ ले अपनी पुरी को लौटेंगे॥४३॥

तदाश्वसिहि भद्रं ते भव त्वं कालकाङ्किणी।

नचिराद् द्रक्ष्यसे रामं प्रज्वलन्तमिवानलम्॥४४॥

‘इसलिये आप धैर्य धारण करें। आपका कल्याण हो। आप समयकी प्रतीक्षा करें। प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी श्रीरघुनाथजी आपको शीघ्र ही दर्शन देंगे॥४४॥

निहते राक्षसेन्द्रे च सपुत्रामात्यबान्धवे।

त्वं समेष्यसि रामेण शशाङ्केनेव रोहिणी॥४५॥

‘पुत्र, मन्त्री और बन्धु-बान्धवोंसहित राक्षसराज रावण के मारे जाने पर आप श्रीरामचन्द्रजी से उसी प्रकार मिलेंगी, जैसे रोहिणी चन्द्रमा से मिलती है।४५॥

क्षिप्रं त्वं देवि शोकस्य पारं द्रक्ष्यसि मैथिलि।

रावणं चैव रामेण द्रक्ष्यसे निहतं बलात्॥४६॥

‘देवि! मिथिलेशकुमारी! आप शीघ्र ही अपने शोक का अन्त हुआ देखेंगी। आपको यह भी दृष्टिगोचर होगा कि श्रीरामचन्द्रजी ने रावण को बलपूर्वक मार डाला है’ ॥ ४६॥

एवमाश्वास्य वैदेहीं हनूमान् मारुतात्मजः।

गमनाय मतिं कृत्वा वैदेहीं पुनरब्रवीत्॥४७॥

विदेहनन्दिनी सीता को इस प्रकार आश्वासन दे पवनकुमार हनुमान जी ने वहाँ से लौटने का निश्चय करके उनसे फिर कहा- ॥४७॥

तमरिघ्नं कृतात्मानं क्षिप्रं द्रक्ष्यसि राघवम्।

लक्ष्मणं च धनुष्पाणिं लङ्काद्वारमुपागतम्॥४८॥

‘देवि! आप शीघ्र ही देखेंगी कि शुद्ध हृदयवाले शत्रुनाशक श्रीरघुनाथजी तथा लक्ष्मण हाथ में धनुष लिये लङ्का के द्वार पर आ पहुँचे हैं॥४८॥

नखदंष्ट्रायुधान् वीरान् सिंहशार्दूलविक्रमान्।

वानरान् वारणेन्द्राभान् क्षिप्रं द्रक्ष्यसि संगतान्॥४९॥

‘नख और दाढ़ ही जिनके अस्त्र-शस्त्र हैं तथा जो सिंह और व्याघ्रके समान पराक्रमी एवं गजराजों के समान विशालकाय हैं, ऐसे वानरों को भी आप शीघ्र ही एकत्र हुआ देखेंगी॥४९॥

शैलाम्बुदनिकाशानां लङ्कामलयसानुषु।

नर्दतां कपिमुख्यानामार्ये यूथान्यनेकशः॥५०॥

‘आर्ये! पर्वत और मेघ के समान विशालकाय मुख्य-मुख्य वानरों के बहुत-से झुंड लङ्कावर्ती मलयपर्वत के शिखरों पर गर्जते दिखायी देंगे॥५०॥

स तु मर्मणि घोरेण ताडितो मन्मथेषुणा।

न शर्म लभते रामः सिंहार्दित इव द्विपः॥५१॥

‘श्रीरामचन्द्रजी के मर्मस्थल में कामदेव के भयंकर बाणों से चोट पहुँची है। इसलिये वे सिंह से पीड़ित हुए गजराज की भाँति चैन नहीं पाते हैं। ५१॥

रुद मा देवि शोकेन मा भूत् ते मनसो भयम्।

शचीव भा शक्रेण सङ्गमेष्यसि शोभने॥५२॥

‘देवि! आप शोक के कारण रोदन न करें। आपके मन का भय दूर हो जाय। शोभने! जैसे शची देवराज इन्द्र से मिलती हैं, उसी प्रकार आप अपने पतिदेव से मिलेंगी॥५२॥

रामाद् विशिष्टः कोऽन्योऽस्ति कश्चित् सौमित्रिणा समः।

अग्निमारुतकल्पौ तौ भ्रातरौ तव संश्रयौ॥५३॥

‘भला, श्रीरामचन्द्रजी से बढ़कर दूसरा कौन है? तथा लक्ष्मणजी के समान भी कौन हो सकता है? अग्नि और वायु के तुल्य तेजस्वी वे दोनों भाई आपके आश्रय हैं (आपको कोई चिन्ता नहीं करनी चाहिये) ॥ ५३॥

नास्मिंश्चिरं वत्स्यसि देवि देशे रक्षोगणैरध्युषितेऽतिरौद्रे।

न ते चिरादागमनं प्रियस्य क्षमस्व मत्संगमकालमात्रम्॥५४॥

‘देवि! राक्षसोंद्वारा सेवित इस अत्यन्त भयंकर देश में आपको अधिक दिनों तक नहीं रहना पड़ेगा। आपके प्रियतम के आने में विलम्ब नहीं होगा। जबतक मेरी उनसे भेंट न हो, उतने समयतक के विलम्ब को आप क्षमा करें।

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे एकोनचत्वारिंशः सर्गः॥ ३९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में उनतालीसवाँ सर्ग पूराहुआ॥३९॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
सुन्दरकाण्डम्

सीता का श्रीराम से कहने के लिये पुनः संदेश देना तथा हनुमान जी का उन्हें आश्वासन दे उत्तर-दिशा की ओर जाना

चत्वारिंशः सर्गः

सर्ग-40

श्रुत्वा तु वचनं तस्य वायुसूनोर्महात्मनः।

उवाचात्महितं वाक्यं सीता सुरसुतोपमा॥१॥

वायुपुत्र महात्मा हनुमान् जी का वचन सुनकर देवकन्या के समान तेजस्विनी सीता ने अपने हित के विचार से इस प्रकार कहा— ॥१॥

त्वां दृष्ट्वा प्रियवक्तारं सम्प्रहृष्यामि वानर।

अर्धसंजातसस्येव वृष्टिं प्राप्य वसुंधरा ॥२॥

‘वानरवीर! तुमने मुझे बड़ा ही प्रिय संवाद सुनाया है। तुम्हें देखकर हर्ष के मारे मेरे शरीर में रोमाञ्च हो आया है। ठीक उसी तरह, जैसे वर्षा का पानी पड़ने से आधी जमी हुई खेतीवाली भूमि हरी-भरी हो जाती है।

यथा तं पुरुषव्याघ्रं गात्रैः शोकाभिकर्शितैः।

संस्पृशेयं सकामाहं तथा कुरु दयां मयि॥३॥

‘मुझपर ऐसी दया करो, जिससे मैं शोक के कारण दुर्बल हुए अपने अङ्गों द्वारा नरश्रेष्ठ श्रीराम का प्रेमपूर्वक स्पर्श कर सकूँ॥३॥

अभिज्ञानं च रामस्य दद्या हरिगणोत्तम।

क्षिप्तामिषीकां काकस्य कोपादेकाक्षिशातनीम्॥४॥

‘वानरश्रेष्ठ! श्रीराम ने क्रोधवश जो कौए की एक आँख को फोड़ने वाली सींक का बाण चलाया था, उस प्रसङ्ग की तुम पहचान के रूप में उन्हें याद दिलाना॥ ४॥

मनःशिलायास्तिलको गण्डपार्वे निवेशितः।

त्वया प्रणष्टे तिलके तं किल स्मर्तुमर्हसि ॥५॥

‘मेरी ओर से यह भी कहना कि प्राणनाथ! पहले की उस बात को भी याद कीजिये, जब कि मेरे कपोल में लगे हुए तिलक के मिट जाने पर आपने अपने हाथ से मैन्सिल का तिलक लगाया था॥ ५॥

स वीर्यवान् कथं सीतां हृतां समनुमन्यसे।

वसन्तीं रक्षसां मध्ये महेन्द्रवरुणोपम॥६॥

‘महेन्द्र और वरुण  के समान पराक्रमी प्रियतम! आप बलवान् होकर भी अपहृत होकर राक्षसों के घर में निवास करने वाली मुझ सीता का तिरस्कार कैसे सहन करते हैं? ॥६॥

एष चूडामणिर्दिव्यो मया सुपरिरक्षितः।

एतं दृष्ट्वा प्रहृष्यामि व्यसने त्वामिवानघ॥७॥

‘निष्पाप प्राणेश्वर! इस दिव्य चूड़ामणि को मैंने बड़े यत्न से सुरक्षित रखा था और संकट के समय इसे देखकर मानो मुझे आपका ही दर्शन हो गया हो, इस तरह मैं हर्ष का अनुभव करती थी॥७॥

एष निर्यातितः श्रीमान् मया ते वारिसम्भवः।

अतः परं न शक्ष्यामि जीवितुं शोकलालसा॥८॥

‘समुद्र के जल से उत्पन्न हुआ यह कान्तिमान् मणिरत्न आज आपको लौटा रही हूँ। अब शोक से आतुर होने के कारण मैं अधिक समयतक जीवित नहीं रह सकूँगी॥८॥

असह्यानि च दुःखानि वाचश्च हृदयच्छिदः।

राक्षसैः सह संवासं त्वत्कृते मर्षयाम्यहम्॥९॥

‘दुःसह दुःख, हृदय को छेदने वाली बातें और राक्षसियों के साथ निवास—यह सब कुछ मैं आपके लिये ही सह रही हूँ॥९॥

धारयिष्यामि मासं तु जीवितं शत्रुसूदन।

मासादूर्ध्वं न जीविष्ये त्वया हीना नृपात्मज॥१०॥

‘राजकुमार! शत्रुसूदन ! मैं आपकी प्रतीक्षा में किसी तरह एक मास तक जीवन धारण करूँगी। इसके बाद आपके बिना मैं जीवित नहीं रह सकूँगी॥ १० ॥

घोरो राक्षसराजोऽयं दृष्टिश्च न सुखा मयि।

त्वां च श्रुत्वा विषज्जन्तं न जीवेयमपि क्षणम्॥११॥

‘यह राक्षसराज रावण बड़ा क्रूर है। मेरे प्रति इसकी दृष्टि भी अच्छी नहीं है। अब यदि आपको भी विलम्ब करते सुन लूँगी तो मैं क्षणभर भी जीवित नहीं रह सकती’ ॥ ११॥

वैदेह्या वचनं श्रुत्वा करुणं साश्रुभाषितम्।

अथाब्रवीन्महातेजा हनूमान् मारुतात्मजः॥१२॥

सीताजी के यह आँसू बहाते कहे हुए करुणाजनक वचन सुनकर महातेजस्वी पवनकुमार हनुमान जी बोले- ॥ १२॥

त्वच्छोकविमुखो रामो देवि सत्येन ते शपे।।

रामे शोकाभिभूते तु लक्ष्मणः परितप्यते॥१३॥

‘देवि! मैं सत्य की शपथ खाकर कहता हूँ कि श्रीरघुनाथजी आपके शोक से ही सब कामों से विमुख हो रहे हैं। श्रीराम के शोकातुर होने से लक्ष्मण भी बहुत दुःखी रहते हैं॥ १३॥

दृष्टा कथंचिद् भवती न कालः परिदेवितुम्।

इम मुहूर्तं दुःखानामन्तं द्रक्ष्यसि भामिनि॥१४॥

‘अब किसी तरह आपका दर्शन हो गया, इसलिये रोने-धोने या शोक करने का अवसर नहीं रहा। भामिनि! आप इसी मुहूर्त में अपने सारे दुःखों का अन्त हुआ देखेंगी॥ १४॥

तावुभौ पुरुषव्याघ्रौ राजपुत्रावनिन्दितौ।

त्वदर्शनकृतोत्साहौ लङ्कां भस्मीकरिष्यतः॥१५॥

‘वे दोनों भाई पुरुषसिंह राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण सर्वत्र प्रशंसित वीर हैं। आपके दर्शन के लिये उत्साहित होकर वे लङ्कापुरी को भस्म कर डालेंगे। १५॥

हत्वा तु समरे रक्षो रावणं सहबान्धवैः।

राघवौ त्वां विशालाक्षि स्वां पुरी प्रति नेष्यतः॥१६॥

‘विशाललोचने! राक्षस रावण को समराङ्गण में उसके बन्धु-बान्धवोंसहित मारकर वे दोनों रघुवंशी बन्धु आपको अपनी पुरी में ले जायँगे॥१६॥

यत्तु रामो विजानीयादभिज्ञानमनिन्दिते।

प्रीतिसंजननं भूयस्तस्य त्वं दातुमर्हसि ॥१७॥

‘सती-साध्वी देवि! जिसे श्रीरामचन्द्रजी जान सकें और जो उनके हृदय में प्रेम एवं प्रसन्नताका संचार करने वाली हो, ऐसी कोई और भी पहचान आपके पास हो तो वह उनके लिये आप मुझे दें’॥ १७॥

साब्रवीद् दत्तमेवाहो मयाभिज्ञानमुत्तमम्।

एतदेव हि रामस्य दृष्ट्वा यत्नेन भूषणम्॥१८॥

श्रद्धेयं हनुमन् वाक्यं तव वीर भविष्यति।

तब सीताजी ने कहा—’कपिश्रेष्ठ! मैंने तुम्हें उत्तम से-उत्तम पहचान तो दे ही दी। वीर हनुमन् ! इसी आभूषण को यत्नपूर्वक देख लेनेपर श्रीराम के लिये तुम्हारी सारी बातें विश्वसनीय हो जायँगी’ ॥ १८ १/२॥

स तं मणिवरं गृह्य श्रीमान् प्लवगसत्तमः॥१९॥

प्रणम्य शिरसा देवीं गमनायोपचक्रमे।

उस श्रेष्ठ मणि को लेकर वानरशिरोमणि श्रीमान् हनुमान् देवी सीता को सिर झुका प्रणाम करने के पश्चात् वहाँ से जाने को उद्यत हुए॥ १९ १/२॥

तमुत्पातकृतोत्साहमवेक्ष्य हरियूथपम्॥२०॥

वर्धमानं महावेगमुवाच जनकात्मजा।

अश्रुपूर्णमुखी दीना बाष्पगद्गदया गिरा॥२१॥

वानरयूथपति महावेगशाली हनुमान् को वहाँ से छलाँग मारने के लिये उत्साहित हो बढ़ते देख जनकनन्दिनी सीता के मुख पर आँसुओं की धारा बहने लगी। वे दुःखी हो अश्रु-गद्गद वाणी में बोलीं- ॥ २०-२१॥

हनूमन् सिंहसंकाशौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ।

सुग्रीवं च सहामात्यं सर्वान् ब्रूया अनामयम्॥२२॥

‘हनूमन् ! सिंह के समान पराक्रमी दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण से तथा मन्त्रियोंसहित सुग्रीव एवं अन्य सब वानरों से मेरा कुशल-मङ्गल कहना॥ २२ ॥

यथा च स महाबाहुर्मां तारयति राघवः।

अस्माद् दुःखाम्बुसंरोधात् त्वं समाधातुमर्हसि॥२३॥

‘महाबाहु श्रीरघुनाथजी को तुम्हें इस प्रकार समझाना चाहिये, जिससे वे दुःख के इस महासागर से मेरा उद्धार करें॥ २३॥

इदं च तीव्र मम शोकवेगं रक्षोभिरेभिः परिभर्त्सनं च।

ब्रूयास्तु रामस्य गतः समीपं शिवश्च तेऽध्वास्तु हरिप्रवीर ॥२४॥

‘वानरों के प्रमुख वीर! मेरा यह दुःसह शोकवेग और इन राक्षसों की यह डाँट-डपट भी तुम श्रीराम के समीप जाकर कहना जाओ, तुम्हारा मार्ग मङ्गलमय हो’॥२४॥

स राजपुत्र्या प्रतिवेदितार्थः कपिः कृतार्थः परिहृष्टचेताः।

तदल्पशेषं प्रसमीक्ष्य कार्य दिशं ह्यदीची मनसा जगाम॥२५॥

राजकुमारी सीता के उक्त अभिप्राय को जानकर कपिवर हनुमान् ने अपने को कृतार्थ समझा और प्रसन्नचित्त होकर थोड़े-से शेष रहे कार्य का विचार करते हुए वहाँ से उत्तर-दिशा की ओर प्रस्थान किया। २५॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे चत्वारिंशः सर्गः॥४०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में चालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।४०॥