॥श्री गणेशाय नम:॥
॥श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
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सम्पूर्ण वाल्मीकि रामायण
[काव्य बीजं सनातनम्]

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

हनुमान जी का तारा को समझाना और तारा का पति के अनुगमन का ही निश्चय करना

एकविंशः सर्गः

सर्ग-21


ततो निपतितां तारां च्युतां तारामिवाम्बरात्।

शनैराश्वासयामास हनुमान् हरियूथपः॥१॥

तारा को आकाश से टूटकर गिरी हुई तारिका के समान पृथ्वी पर पड़ी देख वानरयूथपति हनुमान् ने धीरे-धीरे समझाना आरम्भ किया— ॥ १॥

गुणदोषकृतं जन्तुः स्वकर्म फलहेतुकम्।

अव्यग्रस्तदवाप्नोति सर्वं प्रेत्य शुभाशुभम्॥२॥

‘देवि! जीव के द्वारा गुणबुद्धि से अथवा दोषबुद्धि से किये हुए जो अपने कर्म हैं, वे ही सुख-दुःखरूप फल की प्राप्ति कराने वाले होते हैं। परलोक में जाकर प्रत्येक जीव शान्तभाव से रहकर अपने शुभ और अशुभ–सभी कर्मों का फल भोगता है॥२॥

शोच्या शोचसि कं शोच्यं दीनं दीनानुकम्पसे ।

कश्च कस्यानुशोच्योऽस्ति देहेऽस्मिन् बुबुदोपमे॥३॥

‘तुम स्वयं शोचनीया हो; फिर दूसरे किसको शोचनीय समझकर शोक कर रही हो? स्वयं दीन होकर दूसरे किस दीन पर दया करती हो? पानी के बुलबुले के समान इस शरीर में रहकर कौन जीव किस जीव के लिये शोचनीय है? ॥ ३॥

अङ्गदस्तु कुमारोऽयं द्रष्टव्यो जीवपुत्रया।

आयत्यां च विधेयानि समर्थान्यस्य चिन्तय॥४॥

‘तुम्हारे पुत्र कुमार अङ्गद जीवित हैं। अब तुम्हें इन्हीं की ओर देखना चाहिये और इनके लिये भविष्य में जो उन्नति के साधक श्रेष्ठ कार्य हों, उनका विचार करना चाहिये॥४॥

जानास्यनियतामेवं भूतानामागतिं गतिम्।

तस्माच्छभं हि कर्तव्यं पण्डिते नेह लौकिकम्॥

देवि! तुम विदुषी हो, अतः जानती ही हो कि प्राणियों के जन्म और मृत्यु का कोई निश्चित समय नहीं है। इसलिये शुभ (परलोक के लिये सुखद) कर्म ही करना चाहिये। अधिक रोना-धोना आदि जो

लौकिक कर्म (व्यवहार) है, उसे नहीं करना चाहिये॥५॥

यस्मिन् हरिसहस्राणि शतानि नियुतानि च।

वर्तयन्ति कृताशानि सोऽयं दिष्टान्तमागतः॥६॥

‘सैकड़ों, हजारों और लाखों वानर जिन पर आशा लगाये जीवन-निर्वाह करते थे, वे ही ये वानरराज आज अपनी प्रारब्ध निर्मित आयु की अवधि पूरी कर चुके॥६॥

यदयं न्यायदृष्टार्थः सामदानक्षमापरः।

गतो धर्मजितां भूमिं नैनं शोचितुमर्हसि॥७॥

‘इन्होंने नीतिशास्त्र के अनुसार अर्थ का साधनराज्य-कार्य का संचालन किया है। ये उपयुक्त समयपर साम, दान और क्षमा का व्यवहार करते आये हैं। अतः धर्मानुसार प्राप्त होने वाले लोक में गये हैं। इनके लिये तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये॥७॥

सर्वे च हरिशार्दूलाः पुत्रश्चायं तवाङ्गदः।

हयृक्षपतिराज्यं च त्वत्सनाथमनिन्दिते॥८॥

‘सती साध्वी देवि! ये सभी श्रेष्ठ वानर, ये तुम्हारे पुत्र अङ्गद तथा वानर और भालुओं का यह राज्य– सब तुमसे ही सनाथ हैं—तुम्हीं इन सबकी स्वामिनी हो॥८॥

ताविमौ शोकसंतप्तौ शनैः प्रेरय भामिनि।

त्वया परिगृहीतोऽयमङ्गदः शास्तु मेदिनीम्॥९॥

‘भामिनि! ये अङ्गद और सुग्रीव दोनों ही शोक से संतप्त हो रहे हैं। तुम इन्हें भावी कार्य के लिये प्रेरित करो। तुम्हारे अधीन रहकर अङ्गद इस पृथ्वी का शासन करें॥९॥

संततिश्च यथा दृष्टा कृत्यं यच्चापि साम्प्रतम्।

राज्ञस्तत् क्रियतां सर्वमेष कालस्य निश्चयः॥ १०॥

‘शास्त्र में संतान होने का जो प्रयोजन बतलाया गया है तथा इस समय राजा वाली के पारलौकिक कल्याण के लिये जो कुछ कर्तव्य है, वही करो— यही समय की निश्चित प्रेरणा है॥१०॥

संस्कार्यो हरिराजस्तु अङ्गदश्चाभिषिच्यताम्।

सिंहासनगतं पुत्रं पश्यन्ती शान्तिमेष्यसि॥११॥

‘वानरराज का अन्त्येष्टि-संस्कार और कुमार अङ्गद का राज्याभिषेक किया जाय। बेटे को राजसिंहासन पर बैठा देखकर तुम्हें शान्ति मिलेगी’।११॥

सा तस्य वचनं श्रुत्वा भर्तृव्यसनपीडिता।

अब्रवीदुत्तरं तारा हनूमन्तमवस्थितम्॥१२॥

तारा अपने स्वामी के विरह-शोक से पीड़ित थी। वह उपर्युक्त वचन सुनकर सामने खड़े हुए हनुमान् जी से बोली

अङ्गदप्रतिरूपाणां पुत्राणामेकतः शतम्।

हतस्याप्यस्य वीरस्य गात्रसंश्लेषणं वरम्॥१३॥

‘अङ्गद के समान सौ पुत्र एक ओर और मरे होने पर भी इस वीरवर स्वामी का आलिङ्गन करके सती होना दूसरी ओर-इन दोनों में से अपने वीर पति के शरीर का आलिङ्गन ही मुझे श्रेष्ठ जान पड़ता है॥ १३॥

न चाहं हरिराज्यस्य प्रभवाम्यङ्गदस्य वा।

पितृव्यस्तस्य सुग्रीवः सर्वकार्येष्वनन्तरः॥१४॥

‘मैं न तो वानरों के राज्य की स्वामिनी हूँ और न मुझे अङ्गद के लिये ही कुछ करने का अधिकार है। इसके चाचा सुग्रीव ही समस्त कार्यों के लिये समर्थ हैं और वे ही मेरी अपेक्षा इसके निकटवर्ती भी हैं। १४॥

नह्येषा बुद्धिरास्थेया हनूमन्नङ्गदं प्रति।

पिता हि बन्धुः पुत्रस्य न माता हरिसत्तम॥१५॥

‘कपिश्रेष्ठ हनुमान जी ! अङ्गद के विषय में आपकी यह सलाह मेरे लिये काम में लाने योग्य नहीं है। आपको यह समझना चाहिये कि पुत्र के वास्तविक बन्धु (सहायक) पिता और चाचा ही हैं माता नहीं। १५॥

नहि मम हरिराजसंश्रयात् क्षमतरमस्ति परत्र चेह वा।

अभिमुखहतवीरसेवितं शयनमिदं मम सेवितुं क्षमम्॥१६॥

मेरे लिये वानरराज वाली का अनुगमन करने से बढ़कर इस लोक या परलोक में कोई भी कार्य उचित नहीं है। युद्ध में शत्रु से जूझकर मरे हुए अपने वीर स्वामी के द्वारा सेवित चिता आदि की शय्यापर शयन करना ही मेरे लिये सर्वथा योग्य है’॥ १६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे एकविंशः सर्गः॥२१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में इक्कीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥२१॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

वाली का सुग्रीव और अङ्गद से अपने मन की बात कहकर प्राणों को त्याग देना

द्वाविंशः सर्गः

सर्ग-22


वीक्षमाणस्तु मन्दासुः सर्वतो मन्दमुच्छ्वसन्।

आदावेव तु सुग्रीवं ददर्शानुजमग्रतः॥१॥

वाली के प्राणों की गति शिथिल पड़ गयी थी। वह धीरे-धीरे ऊर्ध्व साँस लेता हुआ सब ओर देखने लगा। सबसे पहले उसने अपने सामने खड़े हुए छोटे भाई सुग्रीव को देखा ॥ १॥

तं प्राप्तविजयं वाली सुग्रीवं प्लवगेश्वरम्।

आभाष्य व्यक्तया वाचा सस्नेहमिदमब्रवीत्॥२॥

युद्ध में जिन्हें विजय प्राप्त हुई थी, उन वानरराज सुग्रीव को सम्बोधित करके वाली ने बड़े स्नेह के साथ स्पष्ट वाणी में कहा- ॥२॥

सुग्रीव दोषेण न मां गन्तुमर्हसि किल्बिषात्।

कृष्यमाणं भविष्येण बुद्धिमोहेन मां बलात्॥३॥

‘सुग्रीव! पूर्वजन्म के किसी पाप से अवश्यम्भावी बुद्धिमोह ने मुझे बलपूर्वक आकृष्ट कर लिया था,इसीलिये मैं तुम्हें शत्रु समझने लगा था और इस कारण मेरे द्वारा जो तुम्हारे प्रति अपराध हुए, उसके लिये तुम्हें मेरे प्रति दोष-दृष्टि नहीं करनी चाहिये॥३॥

युगपद् विहितं तात न मन्ये सुखमावयोः।

सौहार्दै भ्रातृयुक्तं हि तदिदं जातमन्यथा॥४॥

‘तात! मैं समझता हूँ हम दोनों के लिये एक साथ रहकर सुख भोगना नहीं बदा था, इसीलिये दो भाइयों में जो प्रेम होना चाहिये, वह न होकर हमलोगों में उसके विपरीत वैरभाव उत्पन्न हो गया। ४॥

प्रतिपद्य त्वमद्यैव राज्यमेषां वनौकसाम्।

मामप्यद्यैव गच्छन्तं विद्धि वैवस्वतक्षयम्॥५॥

‘भाई! तुम आज ही यह वानरों का राज्य स्वीकार करो तथा मुझे अभी यमराज के घर जाने को तैयार समझो॥

जीवितं च हि राज्यं च श्रियं च विपुलां तथा।

प्रजहाम्येष वै तूर्णमहं चागर्हितं यशः॥६॥

‘मैं अपने जीवन, राज्य, विपुल सम्पत्ति और प्रशंसित यश का भी तुरंत ही त्याग कर रहा हूँ॥६॥

अस्यां त्वहमवस्थायां वीर वक्ष्यामि यद् वचः।

यद्यप्यसुकरं राजन् कर्तुमेव त्वमर्हसि ॥७॥

‘वीर! राजन्! इस अवस्था में मैं जो कुछ कहूँगा,वह यद्यपि करने में कठिन है, तथापि तुम उसे अवश्य करना॥७॥

सुखाहँ सुखसंवृद्धं बालमेनमबालिशम्।

बाष्पपूर्णमुखं पश्य भूमौ पतितमङ्गदम्॥८॥

‘देखो, मेरा बेटा अङ्गद धरती पर पड़ा है। इसका मुँह आँसुओं से भीगा है। यह सुख में पला है और सुख भोगने के ही योग्य है। बालक होने पर भी यह मूढ़ नहीं है॥८॥

मम प्राणैः प्रियतरं पुत्रं पुत्रमिवौरसम्।

मया हीनमहीनार्थं सर्वतः परिपालय॥९॥

‘यह मुझे प्राणों से भी बढ़कर प्रिय है। मेरे न रहने पर तुम इसे सगे पुत्र की भाँति मानना। इसके लिये किसी भी सुख-सुविधा की कमी न होने देना और सदा सब जगह इसकी रक्षा करते रहना ॥ ९॥

त्वमप्यस्य पिता दाता परित्राता च सर्वशः।

भयेष्वभयदश्चैव यथाहं प्लवगेश्वर ॥१०॥

‘वानरराज! मेरे ही समान तुम भी इसके पिता, दाता, सब प्रकार से रक्षक और भय के अवसरों पर अभय देने वाले हो॥१०॥

एष तारात्मजः श्रीमांस्त्वया तुल्यपराक्रमः।

रक्षसां च वधे तेषामग्रतस्ते भविष्यति॥११॥

‘तारा का यह तेजस्वी पुत्र तुम्हारे समान ही पराक्रमी है। उन राक्षसों के वध के समय यह सदा तुम्हारे आगे रहेगा॥

अनुरूपाणि कर्माणि विक्रम्य बलवान् रणे।

करिष्यत्येष तारेयस्तेजस्वी तरुणोऽङ्गदः॥१२॥

‘यह बलवान् तेजस्वी तरुण ताराकुमार अङ्गद रणभूमि में पराक्रम प्रकट करते हुए अपने योग्य कर्म करेगा॥ १२॥

सुषेणदुहिता चेयमर्थसूक्ष्मविनिश्चये।

औत्पातिके च विविधे सर्वतः परिनिष्ठिता॥१३॥

‘सुषेण की पुत्री यह तारा सूक्ष्म विषयों के निर्णय करने तथा नाना प्रकार के उत्पातों के चिह्नों को समझने में सर्वथा निपुण है॥ १३॥

यदेषा साध्विति ब्रूयात् कार्यं तन्मुक्तसंशयम्।

नहि तारामतं किंचिदन्यथा परिवर्तते॥१३॥

‘जिस कार्य को अच्छा बताये, उसे संदेहरहित होकर करना। तारा की किसी भी सम्मति का परिणाम उलटा नहीं होता॥ १४॥

राघवस्य च ते कार्यं कर्तव्यमविशङ्कया।

स्यादधर्मो ह्यकरणे त्वां च हिंस्यादमानितः॥ १५॥

‘श्रीरामचन्द्रजी का काम तुम्हें निःशङ्क होकर करना चाहिये। उसको न करने से तुम्हें पाप लगेगा और अपमानित होने पर श्रीरामचन्द्रजी तुझे मार डालेंगे। १५॥

इमां च मालामाधत्स्व दिव्यां सुग्रीव काञ्चनीम्।

उदारा श्रीः स्थिता ह्यस्यां सम्प्रजह्यान्मृते मयि॥ १६॥

‘सुग्रीव! मेरी यह सोने की दिव्यमाला तुम धारण कर लो। इसमें उदार लक्ष्मी का वास है। मेरे मरजाने पर इसकी श्री नष्ट हो जायगी अतः अभी से पहन लो’ ॥ १६॥

इत्येवमुक्तः सुग्रीवो वालिना भ्रातृसौहृदात्।

हर्षं त्यक्त्वा पुनर्दीनो ग्रहग्रस्त इवोडुराट् ॥१७॥

वाली ने भ्रातृस्नेह के कारण जब ऐसी बातें कहीं, तब उसके वध के कारण जो हर्ष हुआ था, उसे त्यागकर सुग्रीव फिर दुःखी हो गये, मानो चन्द्रमा पर ग्रहण लग गया हो॥ १७॥

तालिवचनाच्छान्तः कुर्वन् युक्तमतन्द्रितः।

जग्राह सोऽभ्यनुज्ञातो मालां तां चैव काञ्चनीम्॥ १८॥

वाली के उस वचन से  सुग्रीव का वैर भाव शान्त हो गया। वे सावधान होकर उचित बर्ताव करने लगे। उन्होंने भाई की आज्ञा से वह सोने की माला ग्रहण कर ली॥ १८॥

तां मालां काञ्चनीं दत्त्वा दृष्ट्वा चैवात्मजं स्थितम्।

संसिद्धः प्रेत्यभावाय स्नेहादङ्गदमब्रवीत्॥१९॥

सुग्रीव को वह सुवर्णमयी माला देने के पश्चात् वाली ने मरने का निश्चय कर लिया। फिर अपने सामने खड़े हुए पुत्र अङ्गद की ओर देखकर स्नेह के साथ कहा— ॥ १९॥

देशकालौ भजस्वाद्य क्षममाणः प्रियाप्रिये।

सुखदुःखसहः काले सुग्रीववशगो भव॥२०॥

‘बेटा! अब देश-काल को समझो—कब और कहाँ कैसा बर्ताव करना चाहिये, इसका निश्चय करके वैसा ही आचरण करो। समयानुसार प्रिय-अप्रिय, सुख-दुःख–जो कुछ आ पड़े उसको सहो। अपने हृदय में क्षमाभाव रखो और सदा सुग्रीव की आज्ञा के अधीन रहो॥२०॥

यथा हि त्वं महाबाहो लालितः सततं मया।

न तथा वर्तमानं त्वां सुग्रीवो बहु मन्यते॥२१॥

‘महाबाहो! सदा मेरा दुलार पाकर जिस प्रकार तुम रहते आये हो, यदि वैसा ही बर्ताव अब भी करोगे तो सुग्रीव तुम्हारा विशेष आदर नहीं करेंगे॥२१॥

नास्यामित्रैर्गतं गच्छेर्मा शत्रुभिररिंदम।

भर्तुरर्थपरो दान्तः सुग्रीववशगो भव॥ २२॥

‘शत्रुदमन अङ्गद! तुम इनके शत्रुओं का साथ मत दो। जो इनके मित्र न हों, उनसे भी न मिलो और अपनी इन्द्रियों को वश में रखकर सदा अपने स्वामी सुग्रीव के कार्य-साधन में संलग्न रहते हुए उन्हीं के अधीन रहो॥ २२॥

न चातिप्रणयः कार्यः कर्तव्योऽप्रणयश्च ते।

उभयं हि महादोषं तस्मादन्तरदृग् भव॥२३॥

‘किसी के साथ अत्यन्त प्रेम न करो और प्रेम का सर्वथा अभाव भी न होने दो; क्योंकि ये दोनों ही महान् दोष हैं। अतः मध्यम स्थिति पर ही दृष्टि रखो’॥ २३॥

इत्युक्त्वाथ विवृत्ताक्षः शरसम्पीडितो भृशम्।

विवृतैर्दशनीमैर्बभूवोत्क्रान्तजीवितः॥२४॥

ऐसा कहकर बाण के आघात से अत्यन्त घायल हुए वाली की आँखें घूमने लगीं। उसके भयंकर दाँत खुल गये और प्राण-पखेरू उड़ गये॥ २४॥

ततो विचुक्रुशुस्तत्र वानरा हतयूथपाः।

परिदेवयमानास्ते सर्वे प्लवगसत्तमाः॥ २५॥

उस समय अपने यूथपति की मृत्यु हो जाने से सभी श्रेष्ठ वानर जोर-जोर से रोने और विलाप करने लगे – ॥ २५॥

किष्किन्धा ह्यद्य शून्या च स्वर्गते वानरेश्वरे।

उद्यानानि च शून्यानि पर्वताः काननानि च॥ २६॥

‘हाय! आज वानरराज वाली के स्वर्गलोक चले जाने से सारी किष्किन्धापुरी सूनी हो गयी। उद्यान, पर्वत और वन भी सूने हो गये॥२६॥

हते प्लवगशार्दूले निष्प्रभा वानराः कृताः।

यस्य वेगेन महता काननानि वनानि च॥२७॥

पुष्पौघेणानुबद्ध्यन्ते करिष्यति तदद्य कः।

‘वानरश्रेष्ठ वाली के मारे जाने से सारे वानर श्रीहीन हो गये। जिनके महान् वेग (प्रताप) से समस्त कानन और वन पुष्पसमूहों से सदा संयुक्त बने रहते थे, आज उनके न रहने से कौन ऐसा चमत्कारपूर्ण कार्य करेगा?॥

येन दत्तं महद् युद्धं गन्धर्वस्य महात्मनः॥ २८॥

गोलभस्य महाबाहोर्दश वर्षाणि पञ्च च।

नैव रात्रौ न दिवसे तद् युद्धमुपशाम्यति॥२९॥

‘उन्होंने महामना महाबाहु गोलभ नामक गन्धर्व को महान् युद्ध का अवसर दिया था। वह युद्ध पंद्रह वर्षों तक लगातार चलता रहा। न दिन में बंद होता था, न रात में॥ २९॥

ततः षोडशमे वर्षे गोलभो विनिपातितः।

तं हत्वा दुर्विनीतं तु वाली दंष्ट्राकरालवान्।

सर्वाभयंकरोऽस्माकं कथमेष निपातितः॥३०॥

‘तदनन्तर सोलहवाँ वर्ष आरम्भ होने पर गोलभ वाली के हाथ से मारा गया। उस दुष्ट गन्धर्व का वध करके जिन विकराल दाढ़ों वाले वाली ने हम सबको अभय दान दिया था, वे ही ये हमारे स्वामी वानरराज स्वयं कैसे मार गिराये गये?’॥३०॥

हते तु वीरे प्लवगाधिपे तदा प्लवङ्गमास्तत्र न शर्म लेभिरे।

वनेचराः सिंहयुते महावने यथा हि गावो निहते गवां पतौ॥३१॥

उस समय वीर वानरराज वाली के मारे जाने पर वनों में विचरने वाले वानर वहाँ चैन न पा सके। जैसे सिंह से युक्त विशाल वन में साँड़ के मारे जाने पर गौएँ दुःखी हो जाती हैं, वही दशा उन वानरों की हुई। ३१॥

ततस्तु तारा व्यसनार्णवप्लुता मृतस्य भर्तुर्वदनं समीक्ष्य सा।

जगाम भूमिं परिरभ्य वालिनं महाद्रुमं छिन्नमिवाश्रिता लता॥३२॥

तदनन्तर शोक के समुद्र में डूबी हुई तारा ने जब अपने मरे हुए स्वामी की ओर दृष्टिपात किया, तब वह वाली का आलिङ्गन करके कटे हुए महान् वृक्ष से लिपटी हुई लता की भाँति पृथ्वी पर गिर पड़ी॥३२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे द्वाविंशः सर्गः ॥२२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में बाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २२॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

तारा का विलाप

त्रयोविंशः सर्गः

सर्ग-23


ततः समुपजिघ्रन्ती कपिराजस्य तन्मुखम्।

पतिं लोकश्रुता तारा मृतं वचनमब्रवीत्॥१॥

उस समय वानरराज का मुख सूंघती हुई लोकविख्यात तारा ने रोकर अपने मृत पति से इस प्रकार कहा— ॥१॥

शेषे त्वं विषमे दुःखमकृत्वा वचनं मम।

उपलोपचिते वीर सुदुःखे वसुधातले॥२॥

‘वीर! दुःख की बात है कि आपने मेरी बात नहीं मानी और अब आप प्रस्तर से पूर्ण अत्यन्त दुःखदायक और ऊँचे-नीचे भूतल पर शयन कर रहे हैं॥२॥

मत्तः प्रियतरा नूनं वानरेन्द्र मही तव।

शेषे हि तां परिष्वज्य मां च न प्रतिभाषसे॥३॥

‘वानरराज! निश्चय ही यह पृथ्वी आपको मुझसे भी बढ़कर प्रिय है, तभी तो आप इसका आलिङ्गन करके सो रहे हैं और मुझसे बात तक नहीं करते॥३॥

सुग्रीवस्य वशं प्राप्तो विधिरेष भवत्यहो।

सुग्रीव एव विक्रान्तो वीर साहसिकप्रिय॥४॥

‘वीर! साहसपूर्ण कार्यों से प्रेम रखने वाले वानरराज! यह श्रीरामरूपी विधाता सुग्रीव के वश में हो गया है (-आपके नहीं) यह बड़े आश्चर्य की बात है, अतः अब इस राज्य पर सुग्रीव ही पराक्रमी राजा के रूप में आसीन होंगे॥ ४॥

ऋक्षवानरमुख्यास्त्वां बलिनं पर्युपासते।

तेषां विलपितं कृच्छ्रमङ्गदस्य च शोचतः॥५॥

मम चेमा गिरः श्रुत्वा किं त्वं न प्रतिबुध्यसे।

‘प्राणनाथ! प्रधान-प्रधान भालू और वानर जो आप महावीर की सेवा में रहा करते थे, इस समय बड़े दुःख से विलाप कर रहे हैं। बेटा अङ्गद भी शोक में पड़ा है। उन वानरों का दुःखमय विलाप, अङ्गद का शोकोद्गार तथा मेरी यह अनुनय-विनयभरी वाणी सुनकर भी आप जागते क्यों नहीं हैं ? ॥ ५ १/२॥

इदं तद् वीरशयनं तत्र शेषे हतो युधि॥६॥

शायिता निहता यत्र त्वयैव रिपवः पुरा।

‘यही वह वीर-शय्या है, जिसपर पूर्वकाल में आपने ही बहुत-से शत्रुओं को मारकर सुलाया था, किंतु आज स्वयं ही युद्ध में मारे जाकर आप इस पर शयन कर रहे हैं।

विशुद्धसत्त्वाभिजन प्रिययुद्ध मम प्रिय॥७॥

मामनाथां विहायैकां गतस्त्वमसि मानद।

‘विशुद्ध बलशाली कुल में उत्पन्न युद्धप्रेमी तथा दूसरों को मान देने वाले मेरे प्रियतम! तुम मुझ अनाथा को अकेली छोड़कर कहाँ चले गये?॥ ७ १/२॥

शूराय न प्रदातव्या कन्या खलु विपश्चिता॥८॥

शूरभार्यां हतां पश्य सद्यो मां विधवां कृताम्।

‘निश्चय ही बुद्धिमान् पुरुष को चाहिये कि वह अपनी कन्या किसी शूरवीर के हाथ में न दे देखो, मैं शूरवीर की पत्नी होने के कारण तत्काल विधवा बना दी गयी और इस प्रकार सर्वथा मारी गयी॥ ८ १/२॥

अवभग्नश्च मे मानो भग्ना मे शाश्वती गतिः॥९॥

अगाधे च निमग्नास्मि विपुले शोकसागरे।

‘राजरानी होने का जो मेरा अभिमान था, वह भङ्ग हो गया। नित्य-निरन्तर सुख पाने की मेरी आशा नष्ट हो गयी तथा मैं अगाध एवं विशाल शोकसमुद्र में डूब गयी हूँ॥९ १/२॥

अश्मसारमयं नूनमिदं मे हृदयं दृढम्॥१०॥

भर्तारं निहतं दृष्ट्वा यन्नाद्य शतधा कृतम्।

‘निश्चय ही यह मेरा कठोर हृदय लोहे का बना हुआ है। तभी तो अपने स्वामी को मारा गया देखकर इसके सैकड़ों टुकड़े नहीं हो जाते॥१० १/२॥

सुहृच्चैव च भर्ता च प्रकृत्या च मम प्रियः॥

प्रहारे च पराक्रान्तः शूरः पञ्चत्वमागतः।।

‘हाय! जो मेरे सुहृद्, स्वामी और स्वभाव से ही प्रिय थे तथा संग्राम में महान् पराक्रम प्रकट करने वाले शूरवीर थे, वे संसार से चल बसे॥ ११ १/२॥

पतिहीना तु या नारी कामं भवतु पुत्रिणी॥१२॥

धनधान्यसमृद्धापि विधवेत्युच्यते जनैः।

‘पतिहीन नारी भले ही पुत्रवती एवं धन-धान्य से समृद्ध भी हो, किन्तु लोग उसे विधवा ही कहते हैं। १२ १/२॥

स्वगात्रप्रभवे वीर शेषे रुधिरमण्डले॥१३॥

कृमिरागपरिस्तोमे स्वकीये शयने यथा।

‘वीर! अपने ही शरीर से प्रकट हुई रक्तराशि में आप उसी तरह शयन करते हैं, जैसे पहले इन्द्रगोप नामक कीड़े के-से रंगवाले बिछौने से युक्त अपने पलंगपर सोया करते थे॥ १३ १/२॥

रेणुशोणितसंवीतं गात्रं तव समन्ततः॥१४॥

परिरब्धुं न शक्नोमि भुजाभ्यां प्लवगर्षभ।

‘वानरश्रेष्ठ! आपका सारा शरीर धूल और रक्त से लथपथ हो रहा है; इसलिये मैं अपनी दोनों भुजाओं से आपका आलिङ्गन नहीं कर पाती॥ १४ १/२॥

कृतकृत्योऽद्य सुग्रीवो वैरेऽस्मिन्नतिदारुणे॥ १५॥

यस्य रामविमुक्तेन हृतमेकेषुणा भयम्।

‘इस अत्यन्त भयंकर वैर में आज सुग्रीव कृतकृत्य हो गये। श्रीराम के छोड़े हुए एक ही बाण ने उनका सारा भय हर लिया॥ १५ १/२॥

शरेण हृदि लग्नेन गात्रसंस्पर्शने तव॥१६॥

वार्यामि त्वां निरीक्षन्ती त्वयि पञ्चत्वमागते ।

‘आपकी छाती में जो बाण धंसा हुआ है; वह मुझे आपके शरीर का आलिङ्गन करने से रोक रहा है, इस कारण आपकी मृत्यु हो जाने पर भी मैं चुपचाप देख रही हूँ (आपको हृदय से लगा नहीं पाती)’ ॥ १६ १/२॥

उद्घबह शरं नीलस्तस्य गात्रगतं तदा॥१७॥

गिरिगह्वरसंलीनं दीप्तमाशीविषं यथा।

उस समय नील ने वाली के शरीर में धंसे हुए उस बाण को निकाला, मानो पर्वत की कन्दरा में छिपे हुए प्रज्वलित मुखवाले विषधर सर्प को वहाँ से निकाला गया हो ॥ १७ १/२॥

तस्य निष्कृष्यमाणस्य बाणस्यापि बभौ द्युतिः॥ १८॥

अस्तमस्तकसंरुद्धरश्मेर्दिनकरादिव।

वाली के शरीर से निकाले जाते हुए उस बाण की कान्ति अस्ताचल के शिखर पर अवरुद्ध किरणों वाले सूर्य की प्रभा के समान जान पड़ती थी॥ १८ १/२॥

पेतुः क्षतजधारास्तु व्रणेभ्यस्तस्य सर्वशः॥१९॥

ताम्रगैरिकसम्पृक्ता धारा इव धराधरात्।

बाण के निकाल लिये जाने पर वाली के शरीर के सभी घावों से खून की धाराएँ गिरने लगीं, मानो किसी पर्वत से लाल गेरूमिश्रित जल की धाराएँ बह रही हों। १९ १/२॥

अवकीर्णं विमार्जन्ती भर्तारं रणरेणुना॥२०॥

अौर्नयनजैः शूरं सिषेचास्त्रसमाहतम्।

वाली का शरीर रणभूमि की धूल से भर गया था। उस समय तारा बाण से आहत हुए अपने शूरवीर स्वामी के उस शरीर को पोंछती हुई उन्हें नेत्रों के अश्रुजल से सींचने लगी॥ २० १/२॥

रुधिरोक्षितसर्वाङ्गं दृष्ट्वा विनिहतं पतिम्॥२१॥

उवाच तारा पिङ्गाक्षं पुत्रमङ्गदमङ्गना।

अपने मारे गये पति के सारे अङ्गों को रक्त से भीगा हुआ देख वालि-पत्नी तारा ने अपने भूरे नेत्रों वाले पुत्र अङ्गद से कहा— ॥ २१ १/२॥

अवस्थां पश्चिमां पश्य पितुः पुत्र सुदारुणाम्॥ २२॥

सम्प्रसक्तस्य वैरस्य गतोऽन्तः पापकर्मणा।

‘बेटा! देखो, तुम्हारे पिता की अन्तिम अवस्था कितनी भयंकर है। ये इस समय पूर्व पाप के कारण प्राप्त हुए वैर से पार हो चुके हैं। २२ १/२ ॥

बालसूर्योज्ज्वलतनुं प्रयातं यमसादनम्॥२३॥

अभिवादय राजानं पितरं पुत्र मानदम्।

‘वत्स! प्रातःकाल के सूर्य की भाँति अरुण गौर शरीर वाले तुम्हारे पिता राजा वाली अब यमलोक को जा पहुँचे। ये तुम्हें बड़ा आदर देते थे। तुम इनके चरणों में प्रणाम करो’॥

एवमुक्तः समुत्थाय जग्राह चरणौ पितुः॥२४॥

भुजाभ्यां पीनवृत्ताभ्यामङ्गदोऽहमिति ब्रुवन्।

माताके ऐसा कहने पर अङ्गद ने उठकर अपनी मोटी और गोलाकार भुजाओं द्वारा पिता के दोनों पैर पकड़ लिये और प्रणाम करते हुए कहा—’पिताजी! मैं अङ्गद हूँ’॥

अभिवादयमानं त्वामङ्गदं त्वं यथा पुरा॥२५॥

दीर्घायुर्भव पुत्रेति किमर्थं नाभिभाषसे।

तब तारा फिर कहने लगी- ‘प्राणनाथ! कुमार अङ्गद पहले की ही भाँति आज भी आपके चरणों में प्रणाम करता है, किंतु आप इसे ‘चिरंजीवी रहो बेटा’ ऐसा कहकर आशीर्वाद क्यों नहीं देते हैं? ॥ २५ १/२॥

अहं पुत्रसहाया त्वामुपासे गतचेतनम्।

सिंहेन पातितं सद्यो गौः सवत्सेव गोवृषम्॥२६॥

‘जैसे कोई बछड़ेसहित गाय सिंह के द्वारा तत्काल मार गिराये हुए साँड़ के पास खड़ी हो, उसी प्रकार पुत्रसहित मैं प्राणहीन हुए आपकी सेवा में बैठी हूँ॥ २६॥

इष्ट्वा संग्रामयज्ञेन रामप्रहरणाम्भसा।

तस्मन्नवभृथे स्नातः कथं पत्न्या मया विना॥ २७॥

‘आपने युद्धरूपी यज्ञ का अनुष्ठान करके श्रीराम के बाणरूपी जल से मुझ पत्नी के बिना अकेले ही अवभृथस्नान कैसे कर लिया? ॥ २७॥

या दत्ता देवराजेन तव तुष्टेन संयुगे।

शातकौम्भी प्रियां मालां तां ते पश्यामि नेह किम्॥२८॥

‘युद्ध में आपसे संतुष्ट हुए देवराज इन्द्र ने आपको जो सोने की प्रिय माला दे रखी थी, उसे मैं इस समय आपके गले में क्यों नहीं देखती हूँ ? ॥ २८॥

राज्यश्रीन जहाति त्वां गतासुमपि मानद।

सूर्यस्यावर्तमानस्य शैलराजमिव प्रभा॥२९॥

‘दूसरों को मान देने वाले वानरराज! प्राणहीन हो जाने पर भी आपको राज्यलक्ष्मी उसी प्रकार नहीं छोड़ रही है, जैसे चारों ओर चक्कर लगाने वाले सूर्यदेव की प्रभा गिरिराज मेरु को कभी नहीं छोड़ती है॥ २९॥

न मे वचः पथ्यमिदं त्वया कृतं न चास्मि शक्ता हि निवारणे तव।

हता सपुत्रास्मि हतेन संयुगे सह त्वया श्रीर्विजहाति मामपि॥३०॥

‘मैंने आपके हित की बात कही थी; परंतु आपने उसे नहीं स्वीकार किया। मैं भी आपको रोक रखने में समर्थ न हो सकी। इसका फल यह हुआ कि आप युद्ध में मारे गये। आपके मारे जाने से मैं भी अपने पुत्रसहित मारी गयी। अब लक्ष्मी आपके साथ ही मुझे और मेरे पुत्र को भी छोड़ रही है’ ॥ ३०॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे त्रयोविंशः सर्गः ॥२३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में तेईसवाँ सर्ग पूराहुआ॥ २३॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

सुग्रीव का शोकमग्न होकर श्रीराम से प्राणत्याग के लिये आज्ञा माँगना, तारा का श्रीराम से अपने वध के लिये प्रार्थना करना और श्रीराम का उसे समझाना

चतुर्विंशः सर्गः

सर्ग-24


तामाशु वेगेन दुरासदेन त्वभिप्लुतां शोकमहार्णवेन।

पश्यंस्तदा वाल्यनुजस्तरस्वी भ्रातुर्वधेनाप्रतिमेन तेपे॥१॥

अत्यन्त वेगशाली और दुःसह शोकसमुद्र में डूबी हुई तारा की ओर दृष्टिपात करके वाली के छोटे भाई वेगवान् सुग्रीव को उस समय अपने भाई के वध से बड़ा संताप हुआ॥

स बाष्पपूर्णेन मुखेन पश्यन् क्षणेन निर्विण्णमना मनस्वी।

जगाम रामस्य शनैः समीपं भृत्यैर्वृतः सम्परिदूयमानः॥२॥

उनके मुख पर आँसुओं की धारा बह चली। उनका मन खिन्न हो गया और वे भीतर-ही-भीतर कष्ट का अनुभव करते हुए अपने भृत्यों के साथ धीरे-धीरे श्रीरामचन्द्रजी के पास गये॥२॥

स तं समासाद्य गृहीतचापमुदात्तमाशीविषतुल्यबाणम्।

यशस्विनं लक्षणलक्षिताङ्ग मवस्थितं राघवमित्युवाच॥३॥

जिन्होंने धनुष ले रखा था, जिनमें धीरोदात्त नायक का स्वभाव विद्यमान था, जिनके बाण विषधर सर्प के समान भयंकर थे, जिनका प्रत्येक अङ्ग सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार उत्तम लक्षणों से लक्षित था तथा जो परम यशस्वी थे, वहाँ खड़े हुए उन श्रीरघुनाथजी के पास जाकर सुग्रीव इस प्रकार बोले – ॥३॥

यथा प्रतिज्ञातमिदं नरेन्द्र कृतं त्वया दृष्टफलं च कर्म।

ममाद्य भोगेषु नरेन्द्रसूनो मनो निवृत्तं हतजीवितेन॥४॥

‘नरेन्द्र! आपने जैसी प्रतिज्ञा की थी, उसके अनुसार यह काम कर दिखाया। इस कर्म का राज्यलाभ रूप फल भी प्रत्यक्ष ही है। किंतु राजकुमार! इससे मेरा जीवन निन्दनीय हो गया है। अतः अब मेरा मन सभी भोगों से निवृत्त हो गया॥४॥

अस्यां महिष्यां तु भृशं रुदत्यां पुरेऽतिविक्रोशति दुःखतप्ते।

हते नृपे संशयितेऽङ्गदे च न राम राज्ये रमते मनो मे॥५॥

‘श्रीराम! राजा वाली के मारे जाने से ये महारानी तारा अत्यन्त विलाप कर रही हैं। सारा नगर दुःख से संतप्त होकर चीख रहा है तथा कुमार अङ्गद का जीवन भी संशयमें पड़ गया है। इन सब कारणों से अब राज्य में मेरा मन नहीं लगता है॥५॥

क्रोधादमर्षादतिविप्रधर्षाद भ्रातुर्वधो मेऽनुमतः पुरस्तात्।

हते त्विदानीं हरियूथपेऽस्मिन् सुतीक्ष्णमिक्ष्वाकुवर प्रतप्स्ये॥६॥

‘इक्ष्वाकुकुल के गौरव श्रीरघुनाथजी! भाईने मेरा बहुत अधिक तिरस्कार किया था, इसलिये क्रोध और अमर्ष के कारण पहले मैंने उसके वध के लिये अनुमति दे दी थी; परंतु अब वानर-यूथपति वाली के मारे जाने पर मुझे बड़ा संताप हो रहा है। सम्भवतः जीवन भर यह संताप बना ही रहेगा॥६॥

श्रेयोऽद्य मन्ये मम शैलमुख्ये तस्मिन् हि वासश्चिरमृष्यमूके।

यथा तथा वर्तयतः स्ववृत्त्या नेमं निहत्य त्रिदिवस्य लाभः॥७॥

‘अपनी जातीय वृत्ति के अनुसार जैसे-तैसे जीवननिर्वाह करते हुए उस श्रेष्ठ पर्वत ऋष्यमूक पर चिरकाल तक रहना ही आज मैं अपने लिये कल्याणकारी समझता हूँ; किंतु अपने इस भाई का वध कराकर अब मुझे स्वर्ग का भी राज्य मिल जाय तो मैं उसे अपने लिये श्रेयस्कर नहीं मानता हूँ॥७॥

न त्वा जिघांसामि चरेति यन्मा मयं महात्मा मतिमानुवाच ।

तस्यैव तद् राम वचोऽनुरूपमिदं वचः कर्म च मेऽनुरूपम्॥८॥

‘बुद्धिमान् महात्मा वाली ने युद्ध के समय मुझसे कहा था कि ‘तुम चले जाओ, मैं तुम्हारे प्राण लेना नहीं चाहता’। श्रीराम! उनकी यह बात उन्हीं के योग्य थी और मैंने जो आपसे कहकर उनका वध कराया, मेरा वह क्रूरतापूर्ण वचन और कर्म मेरे ही अनुरूप है॥८॥

भ्राता कथं नाम महागुणस्य भ्रातुर्वधं राम विरोचयेत।

राज्यस्य दुःखस्य च वीर सारं विचिन्तयन् कामपुरस्कृतोऽपि॥९॥

‘वीर रघुनन्दन! कोई कितना ही स्वार्थी क्यों न हो? यदि राज्य के सुख तथा भ्रातृ-वध से होने वाले दुःख की प्रबलता पर विचार करेगा तो वह भाई होकर अपने महान् गुणवान् भाई का वध कैसे अच्छा समझेगा? ॥९॥

वधो हि मे मतो नासीत् स्वमाहात्म्यव्यतिक्रमात्।

ममासीद् बुद्धिदौरात्म्यात् प्राणहारी व्यतिक्रमः॥ १०॥

‘वाली के मन में मेरे वध का विचार नहीं था, क्योंकि इससे उन्हें अपनी मान-प्रतिष्ठा में बट्टा लगने का डर था। मेरी ही बुद्धि में दुष्टता भरी थी, जिसके कारण मैंने अपने भाई के प्रति ऐसा अपराध कर डाला, जो उनके लिये घातक सिद्ध हुआ॥ १०॥

द्रुमशाखावभग्नोऽहं मुहूर्तं परिनिष्टनन्।

सान्त्वयित्वा त्वनेनोक्तो न पुनः कर्तुमर्हसि॥ ११॥

‘जब वाली ने मुझे एक वृक्ष की शाखा से घायल कर दिया और मैं दो घड़ी तक कराहता रहा, तब उन्होंने मुझे सान्त्वना देकर कहा—’जाओ, फिर मेरे साथ युद्ध करने की इच्छा न करना’ ॥ ११ ॥

भ्रातृत्वमार्यभावश्च धर्मश्चानेन रक्षितः।

मया क्रोधश्च कामश्च कपित्वं च प्रदर्शितम्॥ १२॥

‘उन्होंने भ्रातृभाव, आर्यभाव और धर्म की भी रक्षा की है; परंतु मैंने केवल काम, क्रोध और वानरोचित चपलता का ही परिचय दिया है॥ १२॥

अचिन्तनीयं परिवर्जनीयमनीप्सनीयं स्वनवेक्षणीयम्।

प्राप्तोऽस्मि पाप्मानमिदं वयस्य भ्रातुर्वधात् त्वाष्ट्रवधादिवेन्द्रः॥१३॥

‘मित्र! जैसे वृत्रासुर का वध करने से इन्द्र पाप के भागी हुए थे, उसी प्रकार मैं भाई का वध कराकर ऐसे पाप का भागी हुआ हूँ, जिसको करना तो दूर रहा, सोचना भी अनुचित है। श्रेष्ठ पुरुषों के लिये जो सर्वथा त्याज्य, अवाञ्छनीय तथा देखने के भी अयोग्य है॥ १३॥

पाप्मानमिन्द्रस्य मही जलं च वृक्षाश्च कामं जगृहुः स्त्रियश्च।

को नाम पाप्मानमिमं सहेत शाखामृगस्य प्रतिपत्तुमिच्छेत्॥१४॥

‘इन्द्र के पाप को तो पृथ्वी, जल, वृक्ष और स्त्रियों ने स्वेच्छा से ग्रहण कर लिया था; परंतु मुझ-जैसे वानर के इस पाप को कौन लेना चाहेगा? अथवा कौन ले सकेगा?॥ १४॥

नार्हामि सम्मानमिमं प्रजानां न यौवराज्यं कुत एव राज्यम्।

अधर्मयुक्तं कुलनाशयुक्तमेवंविधं राघव कर्म कृत्वा॥१५॥

‘रघुनाथजी! अपने कुल का नाश करने वाला ऐसा पापपूर्ण कर्म करके मैं प्रजा के सम्मान का पात्र नहीं रहा। राज्य पाना तो दूर की बात है, मुझमें युवराज होने की भी योग्यता नहीं है॥ १५॥

पापस्य कर्तास्मि विगर्हितस्य क्षुद्रस्य लोकापकृतस्य लोके।

शोको महान् मामभिवर्ततेऽयं वृष्टेर्यथा निम्नमिवाम्बुवेगः॥१६॥

‘मैंने वह लोकनिन्दित पापकर्म किया है, जो नीच पुरुषों के योग्य तथा सम्पूर्ण जगत् को हानि पहुँचाने वाला है। जैसे वर्षा के जल का वेग नीची भूमि की ओर जाता है, उसी प्रकार यह भ्रातृवधजनित महान् शोक सब ओर से मुझ पर ही आक्रमण कर रहा है॥ १६॥

सोदर्यघातापरगात्रवालः संतापहस्ताक्षिशिरोविषाणः।

एनोमयो मामभिहन्ति हस्ती दृप्तो नदीकूलमिव प्रवृद्धः॥१७॥

‘भाई का वध ही जिसके शरीर का पिछला भाग और पुच्छ है तथा उससे होने वाला संताप ही जिसकी लँड, नेत्र, मस्तक और दाँत हैं, वह पापरूपी महान् मदमत्त गजराज नदीतट की भाँति मुझ पर ही आघात कर रहा है॥ १७॥

अंहो बतेदं नवराविषह्यं निवर्तते मे हृदि साधुवृत्तम्।

अग्नौ विवर्णं परितप्यमानं किनॊ यथा राघव जातरूपम्॥१८॥

‘नरेश्वर ! रघुनन्दन ! मैंने जो दुःसह पाप किया है, यह मेरे हृदयस्थित सदाचार को भी नष्ट कर रहा है। ठीक उसी तरह, जैसे आग में तपाया जाने वाला मलिन सुवर्ण अपने भीतर के मल को नष्ट कर देता है॥ १८ ॥

महाबलानां हरियूथपानामिदं कुलं राघव मन्निमित्तम्।

अस्याङ्गदस्यापि च शोकतापा दर्धस्थितप्राणमितीव मन्ये॥१९॥

‘रघुनाथजी! मेरे ही कारण वाली का वध हुआ, जिससे इस अङ्गद का भी शोक-संताप बढ़ गया और इसीलिये इन महाबली वानर-यूथपतियों का समुदाय अधमरा-सा जान पड़ता है॥ १९॥

सुतः सुलभ्यः सुजनः सुवश्यः कुतस्तु पुत्रः सदृशोऽङ्गदेन।

न चापि विद्येत स वीर देशो यस्मिन् भवेत् सोदरसंनिकर्षः॥२०॥

‘वीरवर! सुजन और वश में रहने वाला पुत्र तो मिल सकता है, परंतु अङ्गद के समान बेटा कहाँ मिलेगा? तथा ऐसा कोई देश नहीं है, जहाँ मुझे अपने भाई का सामीप्य मिल सके॥२०॥

अद्याङ्गदो वीरवरो न जीवेज्जीवेत माता परिपालनार्थम्।

विना तु पुत्रं परितापदीना सा नैव जीवेदिति निश्चितं मे॥२१॥

‘अब वीरवर अङ्गद भी जीवित नहीं रह सकता। यदि जी सकता तो उसकी रक्षा के लिये उसकी माता भी जीवन धारण करती। वह बेचारी तो यों ही संताप से दीन हो रही है, यदि पुत्र भी न रहा तो उसके जीवन का अन्त हो जायगा-यह बिलकुल निश्चित बात है॥ २१॥

सोऽहं प्रवेक्ष्याम्यतिदीप्तमग्निं भ्रात्रा च पुत्रेण च सख्यमिच्छन्।

इमे विचेष्यन्ति हरिप्रवीराः सीतां निदेशे परिवर्तमानाः॥२२॥

अतः मैं अपने भाई और पुत्र का साथ देने की इच्छा से प्रज्वलित अग्नि में प्रवेश करूँगा। ये वानर वीर आपकी आज्ञा में रहकर सीता की खोज करेंगे। २२॥

कृत्स्नं तु ते सेत्स्यति कार्यमेतन्मय्यप्यतीते मनुजेन्द्रपुत्र।

कुलस्य हन्तारमजीवनाहँ रामानुजानीहि कृतागसं माम्॥२३॥

‘राजकुमार ! मेरी मृत्यु हो जाने पर भी आपका सारा कार्य सिद्ध हो जायगा। मैं कुल की हत्या करने वाला और अपराधी हूँ। अतः संसार में जीवन धारण करने के योग्य नहीं हूँ। इसलिये श्रीराम! मुझे प्राण त्याग करने की आज्ञा दीजिये’ ॥ २३॥

इत्येवमार्तस्य रघुप्रवीरः श्रुत्वा वचो वालिजघन्यजस्य।

संजातबाष्पः परवीरहन्ता रामो मुहूर्तं विमना बभूव॥ २४॥

दुःख से आतुर हुए सुग्रीव के, जो वाली के छोटे भाई थे, ऐसे वचन सुनकर शत्रुवीरों का संहार करने में समर्थ, रघुकुल के वीर भगवान् श्रीराम के नेत्रों से आँसू बहने लगे। वे दो घड़ी तक मन-ही-मन दुःख का अनुभव करते रहे ॥२४॥

तस्मिन् क्षणेऽभीक्ष्णमवेक्षमाणः क्षितिक्षमावान् भुवनस्य गोप्ता।

रामो रुदन्तीं व्यसने निमग्नां समुत्सुकः सोऽथ ददर्श ताराम्॥२५॥

श्रीरघुनाथजी पृथ्वी के समान क्षमाशील और सम्पूर्ण जगत् की रक्षा करने वाले हैं। उन्होंने उस समय अधिक उत्सुक होकर जब इधर-उधर बारंबार दृष्टि दौड़ायी, तब शोकमग्ना तारा उन्हें दिखायी दी, जो अपने स्वामी के लिये रो रही थी॥२५॥

तां चारुनेत्रां कपिसिंहनाथां पतिं समाश्लिष्य तदा शयानाम्।

उत्थापयामासुरदीनसत्त्वां मन्त्रिप्रधानाः कपिराजपत्नीम्॥२६॥

कपियों में सिंह के समान वीर वाली जिसके स्वामी एवं संरक्षक थे, जो वानरराज वाली की रानी थी, जिसका हृदय उदार और नेत्र मनोहर थे, वह तारा उस समय अपने मृत पति का आलिङ्गन करके पड़ी थी। श्रीराम को आते देख प्रधान-प्रधान मन्त्रियों ने तारा को वहाँ से उठाया॥

सा विस्फुरन्ती परिरभ्यमाणा भर्तुः समीपादपनीयमाना।

ददर्श रामं शरचापपाणिं स्वतेजसा सूर्यमिव ज्वलन्तम्॥२७॥

तारा जब पति के समीप से हटायी जाने लगी, तब बारंबार उसका आलिङ्गन करती हुई वह अपने को छुड़ाने और छटपटाने लगी। इतने ही में उसने अपने सामने धनुष-बाण धारण किये श्रीराम को खड़ा देखा, जो अपने तेज से सूर्यदेव के समान प्रकाशित हो रहे थे॥२७॥

सुसंवृतं पार्थिवलक्षणैश्च तं चारुनेत्रं मृगशावनेत्रा।

अदृष्टपूर्वं पुरुषप्रधानमयं स काकुत्स्थ इति प्रजज्ञे॥२८॥

वे राजोचित शुभ लक्षणों से सम्पन्न थे। उनके नेत्र बड़े मनोहर थे। उन पुरुषप्रवर श्रीराम को, जो पहले कभी देखने में नहीं आये थे, देखकर मृगशावकनयनी तारा समझ गयी कि ये ही ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम

तस्येन्द्रकल्पस्य दुरासदस्य महानुभावस्य समीपमार्या।

आर्तातितूर्णं व्यसनं प्रपन्ना जगाम तारा परिविह्वलन्ती॥२९॥

उस समय घोर संकट में पड़ी हुई शोकपीड़ित आर्या तारा अत्यन्त विह्वल हो गिरती-पड़ती तीव्र गति से महेन्द्रतुल्य दुर्जय वीर महानुभाव भगवान् श्रीराम के समीप गयी॥ २९॥

तं सा समासाद्य विशुद्धसत्त्वं शोकेन सम्भ्रान्तशरीरभावा।

मनस्विनी वाक्यमुवाच तारा रामं रणोत्कर्षणलब्धलक्ष्यम्॥३०॥

शोक के कारण वह अपने शरीर की भी सुध-बुध खो बैठी थी। भगवान् श्रीराम विशुद्ध अन्तःकरण वाले तथा युद्धस्थल में सबसे अधिक निपुणता के कारण लक्ष्य बेधने में अचूक थे, उनके पास पहुँचकर वह मनस्विनी तारा इस प्रकार बोली- ॥३०॥

त्वमप्रमेयश्च दुरासदश्च जितेन्द्रियश्चोत्तमधर्मकश्च।

अक्षीणकीर्तिश्च विचक्षणश्च क्षितिक्षमावान् क्षतजोपमाक्षः॥३१॥

‘रघुनन्दन! आप अप्रमेय (देश, काल और वस्तुकी सीमासे रहित) हैं। आपको पाना बहुत कठिन है। आप जितेन्द्रिय तथा उत्तम धर्म का पालन करने वाले हैं। आपकी कीर्ति कभी नष्ट नहीं होती। आप दूरदर्शी एवं पृथ्वी के समान क्षमाशील हैं। आपकी आँखें कुछ-कुछ लाल हैं ॥ ३१॥

त्वमात्तबाणासनबाणपाणिमहाबलः संहननोपपन्नः।

मनुष्यदेहाभ्युदयं विहाय दिव्येन देहाभ्युदयेन युक्तः॥३२॥

‘आपके हाथमें धनुष और बाण शोभा पा रहे हैं। आपका बल महान् है। आप सुदृढ़ शरीर से सम्पन्न हैं और मनुष्य-शरीर से प्राप्त होने वाले लौकिक सुख का परित्याग करके भी दिव्य शरीर के ऐश्वर्य से युक्त हैं। ३२॥

येनैव बाणेन हतः प्रियो मे तेनैव बाणेन हि मां जहीहि।

हता गमिष्यामि समीपमस्य न मां विना वीर रमेत वाली॥३३॥

(‘अतः मैं प्रार्थना करती हूँ कि) आपने जिस बाण से मेरे प्रियतम पति का वध किया है, उसी बाण से आप मुझे भी मार डालिये। मैं मरकर उनके समीप चली जाऊँगी। वीर! मेरे बिना वाली कहीं भी सुखी नहीं रह सकेंगे॥ ३३॥

स्वर्गेऽपि पद्मामलपत्रनेत्र समेत्य सम्प्रेक्ष्य च मामपश्यन्।

न ह्येष उच्चावचताम्रचूडा विचित्रवेषाप्सरसोऽभजिष्यत्॥३३॥

‘अमलकमलदललोचन राम! स्वर्ग में जाकर भी जब वाली सब ओर दृष्टि डालने पर मुझे नहीं देखेंगे, तब उनका मन वहाँ कदापि नहीं लगेगा; नाना प्रकार के लाल फूलों से विभूषित चोटी धारण करने वाली तथा विचित्र वेशभूषा से मनोहर प्रतीत होने वाली स्वर्ग की अप्सराओं को वे कभी स्वीकार नहीं करेंगे॥ ३४॥

स्वर्गेऽपि शोकं च विवर्णतां च मया विना प्राप्स्यति वीर वाली।

रम्ये नगेन्द्रस्य तटावकाशे विदेहकन्यारहितो यथा त्वम्॥ ३५॥

‘वीरवर! स्वर्ग में भी वाली मेरे बिना शोक का अनुभव करेंगे और उनके शरीर की कान्ति फीकी पड़ जायगी। वे उसी तरह दुःखी रहेंगे जैसे गिरिराज ऋष्यमूक के सुरम्य तट-प्रान्त में विदेहनन्दिनी सीता के बिना आप कष्ट का अनुभव करते हैं॥ ३५ ॥

त्वं वेत्थ तावद् वनिताविहीनः प्राप्नोति दुःखं पुरुषः कुमारः।

तत् त्वं प्रजानञ्जहि मां न वाली दुःखं ममादर्शनजं भजेत॥३६॥

‘स्त्री के बिना युवा पुरुष को जो दुःख उठाना पड़ता है, उसे आप अच्छी तरह जानते हैं। इस तत्त्व को समझकर आप मेरा वध करिये, जिससे वाली को मेरे विरह का दुःख न भोगना पड़े॥ ३६॥

यच्चापि मन्येत भवान् महात्मा स्त्रीघातदोषस्तु भवेन्न मह्यम्।

आत्मेयमस्येति हि मां जहि त्वं न स्त्रीवधः स्यान्मनुजेन्द्रपुत्र ॥ ३७॥

‘महाराजकुमार! आप महात्मा हैं, इसलिये यदि ऐसा चाहते हों कि मुझे स्त्री-हत्या का पाप न लगे तो ‘यह वाली की आत्मा है’ ऐसा समझकर मेरा वध कीजिये। इससे आपको स्त्री-हत्या का पाप नहीं लगेगा॥ ३७॥

शास्त्रप्रयोगाद् विविधाश्च वेदादनन्यरूपाः पुरुषस्य दाराः।

दारप्रदानाद्धि न दानमन्यत् प्रदृश्यते ज्ञानवतां हि लोके ॥ ३८॥

‘शास्त्रोक्त यज्ञ-यागादि कर्मों में पति और पत्नी दोनों का संयुक्त अधिकार होता है—पत्नी को साथ लिये बिना पुरुष यज्ञकर्म का अनुष्ठान नहीं कर सकता। इसके सिवा नाना प्रकार की वैदिक श्रुतियाँ भी पत्नी को पति का आधा शरीर बतलाती हैं। दूसरे स्त्रियों का अपने पति से अभिन्न होना सिद्ध होता है। (अतः मुझे मारने से आपको स्त्रीवध का दोष नहीं लग सकता और वाली को स्त्री की प्राप्ति हो जायगी; क्योंकि) संसार में ज्ञानी पुरुषों की दृष्टि में स्त्रीदान से बढ़कर दूसरा कोई दान नहीं है॥ ३८॥

त्वं चापि मां तस्य मम प्रियस्य प्रदास्यसे धर्ममवेक्ष्य वीर।

अनेन दानेन न लप्स्यसे त्वमधर्मयोगं मम वीर घातात्॥३९॥

‘वीरशिरोमणे! यदि धर्म की ओर दृष्टि रखते हुए आप भी मुझे मेरे प्रियतम वाली को समर्पित कर देंगे तो इस दान के प्रभाव से  मेरी हत्या करने पर भी आपको पाप नहीं लगेगा॥ ३९॥

आर्तामनाथामपनीयमानामेवंगतां नार्हसि मामहन्तुम्।

अहं हि मातङ्गविलासगामिना प्लवंगमानामृषभेण धीमता।

विना वराहॊत्तमहेममालिना चिरं न शक्ष्यामि नरेन्द्र जीवितुम्॥४०॥

‘मैं दुःखिनी और अनाथा हूँ। पति से दूर कर दी गयी हूँ। ऐसी दशा में मुझे जीवित छोड़ना आपके लिये उचित नहीं है। नरेन्द्र! मैं सुन्दर एवं बहुमूल्य श्रेष्ठ सुवर्णमाला से अलंकृत तथा गजराज के समान विलासयुक्त गति से चलने वाले बुद्धिमान् वानरश्रेष्ठ वाली के बिना अधिक काल तक जीवित नहीं रह सकूँगी’ ॥ ४०॥

इत्येवमुक्तस्तु विभुर्महात्मा तारां समाश्वास्य हितं बभाषे।

मा वीरभार्ये विमतिं कुरुष्व लोको हि सर्वो विहितो विधात्रा॥४१॥

तारा के ऐसा कहने पर महात्मा भगवान् श्रीराम ने उसे आश्वासन देकर हित की बात कही—’वीरपत्नी! तुम मृत्यु-विषयक विपरीत विचार का त्याग करो; क्योंकि विधाता ने इस सम्पूर्ण जगत् की सृष्टि की है। ४१॥

तं चैव सर्वं सुखदुःखयोगं लोकोऽब्रवीत् तेन कृतं विधात्रा।

त्रयोऽपि लोका विहितं विधानं नातिक्रमन्ते वशगा हि तस्य॥४२॥

‘विधाता ने ही इस सारे जगत् को सुख-दुःख से संयुक्त किया है। यह बात साधारण लोग भी कहते और जानते हैं। तीनों लोकों के प्राणी विधाता के विधान का उल्लङ्घन नहीं कर सकते; क्योंकि सभी उसके अधीन हैं॥४२॥

प्रीतिं परां प्राप्स्यसि तां तथैव पुत्रश्च ते प्राप्स्यति यौवराज्यम्।

धात्रा विधानं विहितं तथैव न शूरपत्न्यः परिदेवयन्ति॥४३॥

‘तुम्हें पहले की ही भाँति अत्यन्त सुख एवं आनन्द की प्राप्ति होगी तथा तुम्हारा पुत्र युवराज पद प्राप्त करेगा। विधाता का ऐसा ही विधान है। शूरवीरों की स्त्रियाँ इस प्रकार विलाप नहीं करती हैं। (अतः तुम भी शोक छोड़कर शान्त हो जाओ)’॥

आश्वासिता तेन महात्मना तु प्रभावयुक्तेन परंतपेन।

सा वीरपत्नी ध्वनता मुखेन सुवेषरूपा विरराम तारा॥४४॥

शत्रुओं को संताप देने वाले परम प्रभावशाली महात्मा श्रीराम के इस प्रकार सान्त्वना देने पर सुन्दर वेश और रूपवाली वीरपत्नी तारा, जिसके मुख से विलाप की ध्वनि निकलती रहती थी, चुप हो गयी— उसने रोना-धोना छोड़ दिया॥ ४४ ॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे चतुर्विंशः सर्गः ॥२४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में चौबीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥२४॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

श्रीराम का सुग्रीव, तारा और अङ्गद को समझाना तथा वाली के दाह-संस्कार के लिये आज्ञा प्रदान करना,अङ्गद के द्वारा उसका दाह-संस्कार कराना और उसे जलाञ्जलि देना

पञ्चविंशः सर्गः

सर्ग-25


स सुग्रीवं च तारां च साङ्गदां सहलक्ष्मणः।

समानशोकः काकुत्स्थः सान्त्वयन्निदमब्रवीत्॥ १॥

लक्ष्मणसहित श्रीरामचन्द्रजी सुग्रीव आदि के शोक से उनके समान ही दुःखी थे। उन्होंने सुग्रीव, अङ्गद और तारा को सान्त्वना देते हुए इस प्रकार कहा-॥ १॥

न शोकपरितापेन श्रेयसा युज्यते मृतः।

यदत्रानन्तरं कार्यं तत् समाधातुमर्हथ॥२॥

‘शोक-संताप करने से मरे हुए जीव की कोई भलाई नहीं होती। अतः अब आगे जो कुछ कर्तव्य है, उसको तुम्हें विधिपूर्वक सम्पन्न करना चाहिये॥२॥

लोकवृत्तमनुष्ठेयं कृतं वो बाष्पमोक्षणम्।।

न कालादुत्तरं किंचित् कर्मशक्यमुपासितुम्॥३॥

‘तुम सब लोग बहुत आँसू बहा चुके। अब उसकी आवश्यकता नहीं है। लोकाचार का भी पालन होना चाहिये। समय बिताकर कोई भी विहित कर्म नहीं किया जा सकता (क्योंकि उचित समय पर न किया जाय तो उस कर्म का कोई फल नहीं होता)॥३॥

नियतिः कारणं लोके नियतिः कर्मसाधनम्।

नियतिः सर्वभूतानां नियोगेष्विह कारणम्॥४॥

‘जगत् में नियति (काल) ही सबका कारण है। वही समस्त कर्मों का साधन है और काल ही समस्त प्राणियों को विभिन्न कर्मों में नियुक्त करने का कारण है । (क्योंकि वही सबका प्रवर्तक है)॥४॥

न कर्ता कस्यचित् कश्चिन्नियोगे नापि चेश्वरः।

स्वभावे वर्तते लोकस्तस्य कालः परायणम्॥

कोई भी पुरुष न तो स्वतन्त्रतापूर्वक किसी काम को कर सकता है और न किसी दूसरे को ही उसमें लगाने की शक्ति रखता है। सारा जगत् स्वभाव के अधीन है और स्वभाव का आधार काल है॥ ५॥

न कालः कालमत्येति न कालः परिहीयते।

स्वभावं च समासाद्य न कश्चिदतिवर्तते॥६॥

‘काल भी काल का (अपनी की हुई व्यवस्था का) उल्लंघन नहीं कर सकता। वह काल कभी क्षीण नहीं होता। स्वभाव (प्रारब्ध कर्म) को पाकर कोई भी उसका उल्लङ्घन नहीं करता॥६॥

न कालस्यास्ति बन्धुत्वं न हेतुर्न पराक्रमः।

न मित्रज्ञातिसम्बन्धः कारणं नात्मनो वशः॥७॥

‘काल का किसी के साथ भाई-चारे का, मित्रता का अथवा जाति-बिरादरी का सम्बन्ध नहीं है। उसको वश में करने का कोई उपाय नहीं है तथा उस पर किसी का पराक्रम नहीं चल सकता। कारणस्वरूप भगवान् काल जीव के भी वश में नहीं है।

किं तु कालपरीणामो द्रष्टव्यः साधु पश्यता।

धर्मश्चार्थश्च कामश्च कालक्रमसमाहिताः॥८॥

अतः साधुदर्शी विवेकी पुरुष को सब कुछ काल का ही परिणाम समझना चाहिये। धर्म, अर्थ और काम भी कालक्रम से ही प्राप्त होते हैं॥८॥

इतः स्वां प्रकृतिं वाली गतः प्राप्तः क्रियाफलम्।

सामदानार्थसंयोगैः पवित्रं प्लवगेश्वरः॥९॥

(मेरे द्वारा मारे जाने के कारण) वानरराज वाली शरीर से मुक्त हो अपने शुद्ध स्वरूप को प्राप्त हुए हैं। नीतिशास्त्र के अनुकूल साम, दान और अर्थ के समुचित प्रयोग से मिलने वाले जो पवित्र कर्म हैं, वे सभी उन्हें प्राप्त हो गये॥९॥

स्वधर्मस्य च संयोगाज्जितस्तेन महात्मना।

स्वर्गः परिगृहीतश्च प्राणानपरिरक्षता॥१०॥

‘महात्मा वाली ने पहले अपने धर्म के संयोग से जिसपर विजय पायी थी, उसी स्वर्ग को इस समय युद्ध में प्राणों की रक्षा न करके उन्होंने अपने हाथ में कर लिया है॥१०॥

एषा वै नियतिः श्रेष्ठा यां गतो हरियूथपः।

तदलं परितापेन प्राप्तकालमुपास्यताम्॥११॥

‘यही सर्वश्रेष्ठ गति है, जिसे वानरों के सरदार वाली ने प्राप्त किया है। अतः अब उनके लिये शोक करना व्यर्थ है। इस समय तुम्हारे सामने जो कर्तव्य उपस्थित है, उसे पूरा करो’ ॥ ११ ॥

वचनान्ते तु रामस्य लक्ष्मणः परवीरहा।

अवदत् प्रश्रितं वाक्यं सुग्रीवं गतचेतसम्॥१२॥

श्रीरामचन्द्रजी की बात समाप्त होने पर शत्रुवीरों का संहार करने वाले लक्ष्मण ने, जिनकी विवेकशक्ति नष्ट हो गयी थी, उन सुग्रीव से नम्रतापूर्वक इस प्रकार कहा-॥

कुरु त्वमस्य सुग्रीव प्रेतकार्यमनन्तरम्।

ताराङ्गदाभ्यां सहितो वालिनो दहनं प्रति॥१३॥

‘सुग्रीव ! अब तुम अङ्गद और तारा के साथ रहकर वाली के दाह-संस्कार-सम्बन्धी प्रेतकार्य करो॥१३॥

समाज्ञापय काष्ठानि शुष्काणि च बहूनि च।

चन्दनानि च दिव्यानि वालिसंस्कारकारणात्॥ १४॥

‘सेवकों को आज्ञा दो-वे वाली के दाह-संस्कार के निमित्त प्रचुर मात्रा में सूखी लकड़ियाँ और दिव्य चन्दन ले आवें॥

समाश्वासय दीनं त्वमङ्गदं दीनचेतसम्।

मा भूर्बालिशबुद्धिस्त्वं त्वदधीनमिदं पुरम्॥ १५॥

अङ्गद का चित्त बहुत दुःखी हो गया है। इन्हें धैर्य बँधाओ। तुम अपने मन में मूढ़ता न लाओ किंकर्तव्यविमूढ़ न बनो; क्योंकि यह सारा नगर तुम्हारे ही अधीन है॥ १५॥

अङ्गदस्त्वानयेन्माल्यं वस्त्राणि विविधानि च।

घृतं तैलमथो गन्धान् यच्चात्र समनन्तरम्॥१६॥

‘अङ्गद पुष्पमाला, नाना प्रकार के वस्त्र, घी, तेल, सुगन्धित पदार्थ तथा अन्य सामान, जिनकी अभी आवश्यकता है, स्वयं ले आवें॥ १६ ॥

त्वं तार शिबिकां शीघ्रमादायागच्छ सम्भ्रमात्।

त्वरा गुणवती युक्ता ह्यस्मिन् काले विशेषतः॥ १७॥

‘तार! तुम शीघ्र जाकर वेगपूर्वक एक पालकी ले आओ; क्योंकि इस समय अधिक फुर्ती दिखानी चाहिये। ऐसे अवसर पर वही लाभदायक होती है। १७॥

सज्जीभवन्तु प्लवगाः शिबिकावाहनोचिताः।

समर्था बलिनश्चैव निहरिष्यन्ति वालिनम्॥ १८॥

‘पालकी को उठाकर ले चलने के योग्य जो बलवान् एवं समर्थ वानर हों, वे तैयार हो जायें। वे ही वाली को यहाँ से श्मशानभूमि में ले चलेंगे’ ॥ १८॥

एवमुक्त्वा तु सुग्रीवं सुमित्रानन्दवर्धनः।

तस्थौ भ्रातृसमीपस्थो लक्ष्मणः परवीरहा॥१९॥

सुग्रीव से ऐसा कहकर शत्रुवीरों का संहार करने वाले सुमित्रानन्दन लक्ष्मण अपने भाई के पास जाकर खड़े हो गये॥

लक्ष्मणस्य वचः श्रुत्वा तारः सम्भ्रान्तमानसः।

प्रविवेश गुहां शीघ्रं शिबिकासक्तमानसः॥२०॥

लक्ष्मणकी बात सुनकर तारके मनमें हड़बड़ी मच गयी। वह शिबिका ले आनेके लिये शीघ्रतापूर्वक किष्किन्धा नामक गुफामें गया॥२०॥

आदाय शिबिकां तारः स तु पर्यापतत् पुनः।

वानरैरुह्यमानां तां शूरैरुदहनोचितैः॥ २१॥

वहाँ से शिबिका ढोने के योग्य शूरवीर वानरों द्वारा कंधों पर उठायी हुई उस शिबिका को साथ लेकर तार फिर तुरंत ही लौट आया॥२१॥

दिव्यां भद्रासनयुतां शिबिकां स्यन्दनोपमाम्।

पक्षिकर्मभिराचित्रां द्रुमकर्मविभूषिताम्॥ २२॥

वह दिव्य पालकी रथ के समान बनी हुई थी। उसके बीच में राजा के बैठने योग्य उत्तम आसन था। उसमें शिल्पियों द्वारा कृत्रिम पक्षी और वृक्ष बनाये गये थे, जो उस पालकी को विचित्र शोभा से सम्पन्न बना रहे थे॥ २२॥

आचितां चित्रपत्तीभिः सुनिविष्टां समन्ततः।

विमानमिव सिद्धानां जालवातायनायुताम्॥२३॥

वह शिबिका चित्र के रूप में बने हुए पैदल सिपाहियों से भरी प्रतीत होती थी। उसकी निर्माणकला सब ओर से बड़ी सुन्दर दिखायी देती थी। देखने में वह सिद्धों के विमान-सी प्रतीत होती थी। उसमें कई  खिड़कियाँ बनी थीं, जिनमें जालियाँ लगी हुई थीं। २३॥

सुनियुक्तां विशालां च सुकृतां शिल्पिभिः कृताम्।

दारुपर्वतकोपेतां चारुकर्मपरिष्कृताम्॥२४॥

कारीगरों ने उस पालकी को बहुत सुन्दर बनाने का प्रयत्न किया था। उसका एक-एक भाग बड़ा सुघड़ बनाया गया था। आकार में वह बहुत बड़ी थी। उसमें लकड़ियों के क्रीडा-पर्वत बने हुए थे। वह मनोहर शिल्प-कर्म से सुशोभित थी॥ २४ ॥

वराभरणहारैश्च चित्रमाल्योपशोभिताम्।

गुहागहनसंछन्नां रक्तचन्दनभूषिताम्॥ २५॥

सुन्दर आभूषण और हारों से उसको सजाया गया था। विचित्र फूलों से उसकी शोभा बढ़ायी गयी थी। शिल्पियों द्वारा निर्मित गुफा और वन से वह संयुक्त थी तथा लाल चन्दन द्वारा उसे विभूषित किया गया था। २५॥

पुष्पौषैः समभिच्छन्नां पद्ममालाभिरेव च।

तरुणादित्यवर्णाभिमा॑जमानाभिरावृताम्॥२६॥

नाना प्रकार के पुष्प समूहों द्वारा वह सब ओर से आच्छादित थी तथा प्रातःकाल के सूर्य की भाँति अरुण कान्तिवाली दीप्तिमती पद्ममालाओं से अलंकृत थी॥ २६॥

ईदृशीं शिबिकां दृष्ट्वा रामो लक्ष्मणमब्रवीत्।

क्षिप्रं विनीयतां वाली प्रेतकार्यं विधीयताम्॥ २७॥

ऐसी पालकी का अवलोकन करके श्रीरामचन्द्रजी ने लक्ष्मण की ओर देखते हुए कहा–’अब वाली को शीघ्र ही यहाँ से श्मशानभूमि में ले जाया जाय और उनका प्रेतकार्य किया जाय’ ॥ २७॥

ततो वालिनमुद्यम्य सुग्रीवः शिबिकां तदा।

आरोपयत विक्रोशन्नङ्गदेन सहैव तु॥२८॥

तब अङ्गद के साथ करुण-क्रन्दन करते हुए सुग्रीव ने वाली के शव को उठाकर उस शिबिका में रखा॥ २८॥

आरोग्य शिबिकां चैव वालिनं गतजीवितम्।

अलंकारैश्च विविधर्माल्यैर्वस्त्रैश्च भूषितम्॥ २९॥

मृत वाली को शिबिका में चढ़ाकर उन्हें नाना प्रकार के अलंकारों, फूलों के गजरों और भाँति-भाँति के वस्त्रों से विभूषित किया॥२९॥

आज्ञापयत् तदा राजा सुग्रीवः प्लवगेश्वरः।

और्ध्वदेहिकमार्यस्य क्रियतामनुकूलतः॥३०॥

तदनन्तर वानरों के स्वामी राजा सुग्रीव ने आज्ञा दी कि ‘मेरे बड़े भाई का और्ध्वदेहिक संस्कार शास्त्रानुकूल विधि से सम्पन्न किया जाय॥३०॥

विश्राणयन्तो रत्नानि विविधानि बहूनि च।

अग्रतः प्लवगा यान्तु शिबिका तदनन्तरम्॥ ३१॥

‘आगे-आगे बहुत-से वानर नाना प्रकार के बहुसंख्यक रत्न लुटाते हुए चलें। उनके पीछे शिबिका चले॥३१॥

राज्ञामृद्धिविशेषा हि दृश्यन्ते भुवि यादृशाः।

तादृशैरिह कुर्वन्तु वानरा भर्तृसक्रियाम्॥३२॥

‘इस भूतल पर राजाओं के और्ध्वदेहिक संस्कार उनकी बढ़ी हुई समृद्धि के अनुसार जैसे धूमधाम से होते देखे जाते हैं, उसी प्रकार अधिक धन लगाकर सब वानर अपने स्वामी महाराज वाली का अन्त्येष्टि संस्कार करें’॥ ३२॥

तादृशं वालिनः क्षिप्रं प्राकुर्वन्नौर्ध्वदेहिकम्।

अङ्गदं परिरभ्याशु तारप्रभृतयस्तदा ॥३३॥

क्रोशन्तः प्रययुः सर्वे वानरा हतबान्धवाः ।

तब तार आदि वानरों ने वाली के और्ध्वदेहिक संस्कार का शीघ्र वैसा ही आयोजन किया। जिनके बान्धव वाली मारे गये थे, वे सब-के-सब वानर अङ्गद को हृदय से लगाकर शीघ्रतापूर्वक वहाँ से रोते हुए शव के साथ चले। ३३ १/२ ॥

ततः प्रणिहिताः सर्वा वानर्योऽस्य वशानुगाः॥ ३४॥

चुक्रुशुर्वीरवीरेति भूयः क्रोशन्ति ताः प्रियम्।

उनके पीछे वाली के अधीन रहने वाली सभी वानरपत्नियाँ समीप आकर ‘हा वीर, हा वीर’ कहती हुई अपने प्रियतम को पुकार-पुकारकर बारंबार रोने चिल्लाने लगीं।

ताराप्रभृतयः सर्वा वानर्यो हतबान्धवाः॥ ३५॥

अनुजग्मुश्च भर्तारं क्रोशन्त्यः करुणस्वनाः।

जिनके जीवनधन का वध किया गया था, वे तारा आदि सब वानरियाँ करुणस्वर से विलाप करती हुई अपने स्वामी के पीछे-पीछे चलने लगीं। ३५ १/२॥

तासां रुदितशब्देन वानरीणां वनान्तरे॥३६॥

वनानि गिरयश्चैव विक्रोशन्तीव सर्वतः।

वन के भीतर रोती हुई उन वानर वधुओं के रोदन शब्द से गूंजते हुए वन और पर्वत भी सब ओर रोते हुए-से प्रतीत होते थे॥३६ १/२॥

पुलिने गिरिनद्यास्तु विविक्ते जलसंवृते॥३७॥

चितां चक्रुः सुबहवो वानरा वनचारिणः।

पहाड़ी* नदी तुङ्गभद्रा के एकान्त तट पर जो जल से घिरा था, पहुँचकर बहुत-से वनचारी वानरों ने एक चिता तैयार की॥ ३७ १/२॥

* यह नदी सह्यपर्वत से निकलकर किष्किन्धा की पर्वतमालाओं के बीच से बहती हुई कृष्णा नदी में जा मिली है।

अवरोप्य ततः स्कन्धाच्छिबिकां वानरोत्तमाः॥ ३८॥

तस्थुरेकान्तमाश्रित्य सर्वे शोकपरायणाः।

तदनन्तर पालकी ढोने वाले श्रेष्ठ वानरों ने उसे अपने कंधे से उतारा और वे सब शोकमग्न हो एकान्त स्थान में जा बैठे।। ३८ १/२॥

ततस्तारा पतिं दृष्ट्वा शिबिकातलशायिनम्॥ ३९॥

आरोप्याङ्के शिरस्तस्य विललाप सुदुःखिता।

तत्पश्चात् तारा ने शिबिका में सुलाये हुए अपने पति के शव को देखकर उनके मस्तक को अपनी गोद में ले लिया और अत्यन्त दुःखी होकर वह विलाप करने लगी॥ ३९ ॥

हा वानरमहाराज हा नाथ मम वत्सल॥४०॥

हा महार्ह महाबाहो हा मम प्रिय पश्य माम्।

जनं न पश्यसीमं त्वं कस्माच्छोकाभिपीडितम्॥ ४१॥

‘हा वानरों के महाराज! हा मेरे दयालु प्राणनाथ! हा परम पूजनीय महाबाहु वीर! हा मेरे प्रियतम! एक बार मेरी ओर देखो तो सही। इस शोक पीड़ित दासी की ओर तुम दृष्टिपात क्यों नहीं करते हो? ॥ ४०-४१॥


‘दूसरों को मान देने वाले प्राणवल्लभ! प्राणों के निकल जाने पर भी तुम्हारा मुख जीवित अवस्था की भाँति अस्ताचलवर्ती सूर्य के समान अरुण प्रभा से युक्त एवं प्रसन्न ही दिखायी देता है॥ ४२ ॥

एष त्वां रामरूपेण कालः कर्षति वानर।

येन स्म विधवाः सर्वाः कृता एकेषुणा रणे॥ ४३॥

‘वानरराज! श्रीराम के रूप में यह काल ही तुम्हें खींचकर लिये जा रहा है, जिसने युद्ध के मैदान में एक ही बाण मारकर हम सबको विधवा बना दिया।४३॥

इमास्तास्तव राजेन्द्र वानर्योऽप्लवगास्तव।

पादैर्विकृष्टमध्वानमागताः किं न बुध्यसे॥४४॥

‘महाराज! ये तुम्हारी प्यारी वानरियाँ, जो वानरों की भाँति उछलकर चलना नहीं जानती हैं, तुम्हारे पीछे पीछे बहुत दूर के मार्ग पर पैदल ही चली आयी हैं। इस बात को क्या तुम नहीं जानते? ॥ ४४ ॥

तवेष्टा ननु चैवेमा भार्याश्चन्द्रनिभाननाः।

इदानीं नेक्षसे कस्मात् सुग्रीवं प्लवगेश्वर ॥४५॥

‘वानरराज! जो तुम्हें परम प्रिय थीं वे तुम्हारी सभी चन्द्रमुखी भार्याएँ यहाँ उपस्थित हैं। तुम इन सबको तथा अपने भाई सुग्रीव को भी इस समय क्यों नहीं देख रहे हो?॥

एते हि सचिवा राजस्तारप्रभृतयस्तव।

पुरवासिजनश्चायं परिवार्य विषीदति॥४६॥

‘राजन्! ये तार आदि तुम्हारे सचिव तथा ये पुरवासीजन तुम्हें चारों ओर से घेरकर दुःखी हो रहे हैं॥

विसर्जयैनान् सचिवान् यथापुरमरिंदम।

ततः क्रीडामहे सर्वा वनेषु मदनोत्कटाः॥४७॥

‘शत्रुदमन! आप पहले की भाँति इन मन्त्रियों को बिदा कर दीजिये। फिर हम सब प्रेमोन्मत्त होकर इन वनों में आपके साथ क्रीडा करेंगी’॥ ४७॥

एवं विलपती तारां पतिशोकपरीवृताम्।

उत्थापयन्ति स्म तदा वानर्यः शोककर्शिताः॥ ४८॥

पति के शोक में डूबी हुई तारा को इस प्रकार विलाप करती देख उस समय शोक से दुर्बल हुई अन्य वानरियों ने उसे उठाया।। ४८॥

सुग्रीवेण ततः सार्धं सोऽङ्गदः पितरं रुदन्।

चितामारोपयामास शोकेनाभिप्लुतेन्द्रियः॥४९॥

इसके बाद संताप पीड़ित इन्द्रियों वाले अङ्गद ने रोते रोते सुग्रीव की सहायता से पिता को चिता पर रखा॥ ४९॥

ततोऽग्निं विधिवद् दत्त्वा सोऽपसव्यं चकार ह।

पितरं दीर्घमध्वानं प्रस्थितं व्याकुलेन्द्रियः॥५०॥

फिर शास्त्रीय विधि के अनुसार उसमें आग लगाकर उन्होंने उसकी प्रदक्षिणा की। इसके बाद यह सोचकर कि ‘मेरे पिता लंबी यात्रा के लिये प्रस्थित हुए हैं’ अङ्गद की सारी इन्द्रियाँ शोक से व्याकुल हो उठीं॥ ५० ॥

संस्कृत्य वालिनं तं तु विधिवत् प्लवगर्षभाः।

आजग्मुरुदकं कर्तुं नदीं शुभजलां शिवाम्॥ ५१॥

इस प्रकार विधिवत् वाली का दाह-संस्कार करके सभी वानर जलाञ्जलि देने के लिये पवित्र जल से भरी हुई कल्याणमयी तुङ्गभद्रा नदी के तटपर आये॥५१॥

ततस्ते सहितास्तत्र ह्यङ्गदं स्थाप्य चाग्रतः।

सुग्रीवतारासहिताः सिषिचुलिने जलम्॥५२॥

वहाँ अङ्गद को आगे रखकर सुग्रीव और तारा सहित सभी वानरों ने वाली के लिये एक साथ जलाञ्जलि दी॥५२॥

सुग्रीवेणैव दीनेन दीनो भूत्वा महाबलः।

समानशोकः काकुत्स्थः प्रेतकार्याण्यकारयत्॥ ५३॥

दुःखी हुए सुग्रीव के साथ ही उन्हीं के समान शोकग्रस्त एवं दुःखी हो महाबली श्रीराम ने वालीके समस्त प्रेतकार्य करवाये॥ ५३॥

ततोऽथ तं वालिनमग्रयपौरुषं प्रकाशमिक्ष्वाकुवरेषुणा हतम्।

प्रदीप्य दीप्ताग्निसमौजसं तदा सलक्ष्मणं राममुपेयिवान् हरिः॥५४॥

इस प्रकार इक्ष्वाकुवंशशिरोमणि श्रीराम के बाणसे मारे गये श्रेष्ठ पराक्रमी और प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी सुविख्यात वाली का दाह-संस्कार करके सुग्रीव उस समय लक्ष्मणसहित श्रीराम के पास आये॥ ५४॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे पञ्चविंशः सर्गः ॥२५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में पचीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २५॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

हनुमान जी का सुग्रीव के अभिषेक के लिये श्रीरामचन्द्रजी से किष्किन्धा में पधारने की प्रार्थना, तत्पश्चात् सुग्रीव और अङ्गद का अभिषेक

षड्विंशः सर्गः

सर्ग-26


ततः शोकाभिसंतप्तं सुग्रीवं क्लिन्नवाससम्।

शाखामृगमहामात्राः परिवार्योपतस्थिरे ॥१॥

अभिगम्य महाबाहुं राममक्लिष्टकारिणम्।

स्थिताः प्राञ्जलयः सर्वे पितामहमिवर्षयः॥२॥

तदनन्तर वानरसेना के प्रधान-प्रधान वीर (हनुमान् आदि) भीगे वस्त्रवाले शोक-संतप्त सुग्रीव को चारों ओर से घेरकर उन्हें साथ लिये अनायास ही महान् कर्म करने वाले महाबाहु श्रीराम की सेवा में उपस्थित हुए। श्रीराम के पास आकर वे सभी वानर उनके सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गये, जैसे ब्रह्माजी के सम्मुख महर्षिगण खड़े रहते हैं।

ततः काञ्चनशैलाभस्तरुणार्कनिभाननः।

अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यं हनूमान् मारुतात्मजः॥३॥

तत्पश्चात् सुवर्णमय मेरु पर्वत के समान सुन्दर एवं विशाल शरीर वाले वायुपुत्र हनुमान् जी , जिनका मुख प्रातःकाल के सूर्य की भाँति अरुण प्रभा से प्रकाशित हो रहा था, दोनों हाथ जोड़कर बोले- ॥३॥

भवत्प्रसादात् काकुत्स्थ पितृपैतामहं महत्।

वानराणां सुदंष्ट्राणां सम्पन्नबलशालिनाम्॥४॥

महात्मनां सुदुष्प्रापं प्राप्तं राज्यमिदं प्रभो।

भवता समनुज्ञातः प्रविश्य नगरं शुभम्॥५॥

संविधास्यति कार्याणि सर्वाणि ससुहृद्गणः।

‘ककुत्स्थकुलनन्दन! आपकी कृपा से सुग्रीव को सुन्दर दाढ़वाले पूर्ण बलशाली और महामनस्वी वानरों का यह विशाल साम्राज्य प्राप्त हुआ, जो इनके बाप-दादों के समय से चला आ रहा है। प्रभो! यद्यपि इसका मिलना बहुत ही कठिन था तो भी आपके प्रसाद से यह इन्हें सुलभ हो गया। अब यदि आप आज्ञा दें तो ये अपने सुन्दर नगर में प्रवेश करके सुहृदों के साथ अपना सब राजकार्य सँभालें।

स्नातोऽयं विविधैर्गन्धैरौषधैश्च यथाविधि॥६॥

अर्चयिष्यति माल्यैश्च रत्नैश्च त्वां विशेषतः।

इमां गिरिगुहां रम्यामभिगन्तुं त्वमर्हसि ॥७॥

कुरुष्व स्वामिसम्बन्धं वानरान् सम्प्रहर्षय।

‘ये शास्त्रविधि के अनुसार नाना प्रकार के सुगन्धित पदार्थों और ओषधियों सहित जल से राज्यपर अभिषिक्त होकर मालाओं तथा रत्नों द्वारा आपकी विशेष पूजा करेंगे। अतः आप इस रमणीय पर्वतगुफा किष्किन्धा में पधारने की कृपा करें और इन्हें इस राज्य का स्वामी बनाकर वानरों का हर्ष बढ़ावें ॥६-७ १/२॥

एवमुक्तो हनुमता राघवः परवीरहा॥८॥

प्रत्युवाच हनूमन्तं बुद्धिमान् वाक्यकोविदः।

हनुमान जी के ऐसा कहने पर शत्रुवीरों का संहार करने वाले तथा बातचीत में कुशल बुद्धिमान् श्रीरघुनाथजी ने उन्हें यों उत्तर दिया- ॥ ८ १/२ ॥

चतुर्दश समाः सौम्य ग्रामं वा यदि वा पुरम्॥

न प्रवेक्ष्यामि हनुमन् पितुर्निर्देशपालकः।

‘हनुमन् ! सौम्य! मैं पिता की आज्ञा का पालन कर रहा हूँ, अतः चौदह वर्षों के पूर्ण होने तक किसी ग्राम या नगर में प्रवेश नहीं करूँगा॥ ९ १/२॥

सुसमृद्धां गुहां दिव्यां सुग्रीवो वानरर्षभः॥१०॥

प्रविष्टो विधिवद् वीरः क्षिप्रं राज्येऽभिषिच्यताम्।

‘वानरश्रेष्ठ वीर सुग्रीव इस समृद्धिशालिनी दिव्य गुफा में प्रवेश करें और वहाँ शीघ्र ही इनका विधिपूर्वक राज्याभिषेक कर दिया जाय’ ॥ १० १/२ ।।

एवमुक्त्वा हनूमन्तं रामः सुग्रीवमब्रवीत्॥११॥

वृत्तज्ञो वृत्तसम्पन्नमुदारबलविक्रमम्।

इममप्यङ्गदं वीरं यौवराज्येऽभिषेचय॥१२॥

हनुमान् से ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजी सुग्रीव से बोले- ‘मित्र! तुम लौकिक और शास्त्रीय सभी व्यवहार जानते हो। कुमार अङ्गद सदाचारसम्पन्न तथा महान् बल-पराक्रम से परिपूर्ण हैं। इनमें वीरता कूट-कूटकर भरी है, अतः तुम इनको भी युवराज के पद पर अभिषिक्त करो॥ ११-१२॥

ज्येष्ठस्य हि सुतो ज्येष्ठः सदृशो विक्रमेण च।

अङ्गदोऽयमदीनात्मा यौवराज्यस्य भाजनम्॥१३॥

ये तुम्हारे बड़े भाई के ज्येष्ठ पुत्र हैं। पराक्रम में भी उन्हीं के समान हैं तथा इनका हृदय उदार है। अतः अङ्गद युवराजपद के सर्वथा अधिकारी हैं॥ १३॥

पूर्वोऽयं वार्षिको मासः श्रावणः सलिलागमः।

प्रवृत्ताः सौम्य चत्वारो मासा वार्षिक संज्ञिताः॥ १४॥

‘सौम्य! वर्षा कहलाने वाले चार मास या चौमासे आ गये। इनमें पहला मास यह श्रावण, जो जल की प्राप्ति कराने वाला है, आरम्भ हो गया॥ १४ ॥

नायमुद्योगसमयः प्रविश त्वं पुरीं शुभाम्।

अस्मिन् वत्स्याम्यहं सौम्य पर्वते सहलक्ष्मणः॥

‘सौम्य! यह किसी पर चढ़ाई करने का समय नहीं है इसलिये तुम अपनी सुन्दर नगरी में जाओ। मैं लक्ष्मण के साथ इस पर्वत पर निवास करूँगा॥ १५ ॥

इयं गिरिगुहा रम्या विशाला युक्तमारुता।

प्रभूतसलिला सौम्य प्रभूतकमलोत्पला॥१६॥

‘सौम्य सुग्रीव! यह पर्वतीय गुफा बड़ी रमणीय और विशाल है। इसमें आवश्यकताके अनुरूप हवा भी मिल जाती है। यहाँ पर्याप्त जल भी सुलभ है और कमल तथा उत्पल भी बहुत हैं ॥ १६ ॥

कार्तिके समनुप्राप्ते त्वं रावणवधे यत।

एष नः समयः सौम्य प्रविश त्वं स्वमालयम्॥ १७॥

अभिषिञ्चस्व राज्ये च सुहृदः सम्प्रहर्षय।

‘सखे! कार्तिक आने पर तुम रावण के वध के लिये प्रयत्न करना। यही हमलोगों का निश्चय रहा। अब तुम अपने महल में प्रवेश करो और राज्यपर अभिषिक्त होकर सुहृदों को आनन्दित करो’ ॥ १७

१/२॥

इति रामाभ्यनुज्ञातः सुग्रीवो वानरर्षभः॥१८॥

प्रविवेश पुरी रम्यां किष्किन्धां वालिपालिताम्।

श्रीरामचन्द्रजी की यह आज्ञा पाकर वानरश्रेष्ठ सुग्रीव उस रमणीय किष्किन्धापुरी में गये, जिसकी रक्षा वाली ने की थी॥ १८ १/२॥

तं वानरसहस्राणि प्रविष्टं वानरेश्वरम्॥१९॥

अभिवार्य प्रविष्टानि सर्वतः प्लवगेश्वरम्।

उस समय गुफा में प्रविष्ट हुए उन वानरराज को चारों ओर से घेरकर हजारों वानर उनके साथ ही गुहा में घुसे॥ १९ १/२॥

ततः प्रकृतयः सर्वा दृष्ट्वा हरिगणेश्वरम्॥२०॥

प्रणम्य मूर्ना पतिता वसुधायं समाहिताः।

वानरराज को देखकर प्रजा आदि समस्त प्रकृतियों ने एकाग्रचित्त हो पृथ्वी पर माथा टेककर उन्हें प्रणाम किया।

सुग्रीवः प्रकृतीः सर्वाः सम्भाष्योत्थाप्य वीर्यवान्॥२१॥

भ्रातुरन्तःपुरं सौम्यं प्रविवेश महाबलः।

महाबली पराक्रमी सुग्रीव ने उन सबको उठने की आज्ञा दी और उन सबसे बातचीत करके वे भाई के सौम्य अन्तःपुर में प्रविष्ट हुए॥ २१ १/२॥

प्रविष्टं भीमविक्रान्तं सुग्रीवं वानरर्षभम्॥२२॥

अभ्यषिञ्चन्त सुहृदः सहस्राक्षमिवामराः।

भयंकर पराक्रम प्रकट करने वाले वानरश्रेष्ठ सुग्रीव को अन्तःपुर में आया देख उनके सुहृदों ने उनका उसी प्रकार अभिषेक किया, जैसे देवताओं ने सहस्र नेत्रधारी इन्द्र का किया था॥ २२ १/२॥

तस्य पाण्डुरमाजह्वश्छत्रं हेमपरिष्कृतम्॥ २३॥

शुक्ले च वालव्यजने हेमदण्डे यशस्करे।

तथा रत्नानि सर्वाणि सर्वबीजौषधानि च ॥२४॥

सक्षीराणां च वृक्षाणां प्ररोहान् कुसुमानि च।

शुक्लानि चैव वस्त्राणि श्वेतं चैवानुलेपनम्॥ २५॥

सुगन्धीनि च माल्यानि स्थलजान्यम्बुजानि च।

चन्दनानि च दिव्यानि गन्धांश्च विविधान् बहून्॥ २६॥

अक्षतं जातरूपं च प्रियङ्गं मधुसर्पिषी।

दधि चर्म च वैयाघ्रं परायौ चाप्युपानहौ ॥२७॥

समालम्भनमादाय गोरोचनमनःशिलाम्।

आजग्मुस्तत्र मुदिता वराः कन्याश्च षोडश॥ २८॥

पहले तो वे सब लोग उनके लिये सुवर्णभूषित श्वेत छत्र, सोनेकी डाँड़ीवाले दो सफेद चँवर, सब प्रकार के रत्न, बीज और ओषधियाँ, दूध वाले वृक्षों की नीचे लटकने वाली जटाएँ, श्वेत पुष्प, श्वेत वस्त्र, श्वेत अनुलेपन, जल और थल में होने वाले सुगन्धित फूलों की मालाएँ, दिव्य चन्दन, नाना प्रकार के बहुतसे सुगन्धित पदार्थ, अक्षत, सोना, प्रियङ्ग (कगनी) मधु, घी, दही, व्याघ्रचर्म, सुन्दर एवं बहुमूल्य जूते, अङ्गराग, गोरोचन और मैनसिल आदि सामग्री लेकर वहाँ उपस्थित हुए, साथ ही हर्ष से भरी हुई सोलह सुन्दरी कन्याएँ भी सुग्रीव के पास आयीं॥ २३–२८॥

ततस्ते वानरश्रेष्ठमभिषेक्तुं यथाविधि।

रत्नैर्वस्त्रैश्च भक्ष्यैश्च तोषयित्वा द्विजर्षभान्॥ २९॥

तदनन्तर उन सबने श्रेष्ठ ब्राह्मणों को नाना प्रकार के रत्न, वस्त्र और भक्ष्य पदार्थों से संतुष्ट करके वानर श्रेष्ठ सुग्रीव का विधिपूर्वक अभिषेक-कार्य आरम्भ किया। २९॥

ततः कुशपरिस्तीर्णं समिद्धं जातवेदसम्।

मन्त्रपूतेन हविषा हुत्वा मन्त्रविदो जनाः॥३०॥

मन्त्रवेत्ता पुरुषों ने वेदी पर अग्नि की स्थापना करके उसे प्रज्वलित किया और अग्निवेदी के चारों ओर कुश बिछाये। फिर अग्नि का संस्कार करके मन्त्रपूत हविष्य के द्वारा प्रज्वलित अग्नि में आहुति दी॥ ३०॥

ततो हेमप्रतिष्ठाने वरास्तरणसंवृते।

प्रासादशिखरे रम्ये चित्रमाल्योपशोभिते॥३१॥

प्रामुखं विधिवन्मन्त्रैः स्थापयित्वा वरासने।

तत्पश्चात् रंग-बिरंगी पुष्पमालाओं से सुशोभित रमणीय अट्टालिका पर एक सोने का सिंहासन रखा गया और उसपर सुन्दर बिछौना बिछाकर उसके ऊपर सुग्रीव को पूर्वाभिमुख करके विधिवत् मन्त्रोच्चारण करते हुए बिठाया गया। ३१ १/२॥

नदीनदेभ्यः संहृत्य तीर्थेभ्यश्च समन्ततः॥ ३२॥

आहृत्य च समुद्रेभ्यः सर्वेभ्यो वानरर्षभाः।

अपः कनककुम्भेषु निधाय विमलं जलम्॥३३॥

शुभैर्ऋषभशृङ्गैश्च कलशैश्चैव काञ्चनैः।

शास्त्रदृष्टेन विधिना महर्षिविहितेन च॥३४॥

गजो गवाक्षो गवयः शरभो गन्धमादनः।

मैन्दश्च द्विविदश्चैव हनूमाजाम्बवांस्तथा॥ ३५॥

अभ्यषिञ्चत सुग्रीवं प्रसन्नेन सुगन्धिना।

सलिलेन सहस्राक्षं वसवो वासवं यथा॥३६॥

इसके बाद श्रेष्ठ वानरों ने नदियों, नदों, सम्पूर्ण दिशाओं के तीर्थों और समस्त समुद्रों से लाये हुए निर्मल जल को एकत्र करके उसे सोने के कलशों में रखा फिर गज, गवाक्ष, गवय, शरभ, गन्धमादन, मैन्द, द्विविद, हनुमान् और जाम्बवान् ने महर्षियों की बतायी हुई शास्त्रोक्त विधि के अनुसार सुवर्णमय कलशों में रखे हुए स्वच्छ और सुगन्धित जल से साँड के सींगों द्वारा सुग्रीव का उसी प्रकार अभिषेक किया, जैसे वसुओं ने इन्द्र का अभिषेक किया था।

अभिषिक्ते तु सुग्रीवे सर्वे वानरपुङ्गवाः।

प्रचुक्रुशुर्महात्मानो हृष्टाः शतसहस्रशः॥ ३७॥

सुग्रीव का अभिषेक हो जाने पर वहाँ लाखों की संख्या में एकत्र हुए समस्त महामनस्वी श्रेष्ठ वानर हर्ष से भरकर जयघोष करने लगे॥ ३७॥

रामस्य तु वचः कुर्वन् सुग्रीवो वानरेश्वरः।

अङ्गदं सम्परिष्वज्य यौवराज्येऽभ्यषेचयत्॥ ३८॥

श्रीरामचन्द्रजी की आज्ञा का पालन करते हुए वानरराज सुग्रीव ने अङ्गद को हृदय से लगाकर उन्हें भी युवराज के पद पर अभिषिक्त कर दिया॥३८॥

अङ्गदे चाभिषिक्ते तु सानुक्रोशाः प्लवंगमाः।

साधु साध्विति सुग्रीवं महात्मानो ह्यपूजयन्॥३९॥

अङ्गद का अभिषेक हो जाने पर महामनस्वी दयालु वानर ‘साधु-साधु’ कहकर सुग्रीव की सराहना करने लगे॥

रामं चैव महात्मानं लक्ष्मणं च पुनः पुनः।

प्रीताश्च तुष्टवुः सर्वे तादृशे तत्र वर्तिनि॥४०॥

इस प्रकार अभिषेक होकर किष्किन्धा में सुग्रीव और अङ्गद के विराजमान होने पर समस्त वानर परम प्रसन्न हो महात्मा श्रीराम और लक्ष्मण की बारंबार स्तुति करने लगे॥ ४०॥

हृष्टपुष्टजनाकीर्णा पताकाध्वजशोभिता।

बभूव नगरी रम्या किष्किन्धा गिरिगह्वरे॥४१॥

उस समय पर्वत की गुफा में बसी हुई किष्किन्धापुरी हृष्ट-पुष्ट पुरवासियों से व्याप्त तथा ध्वजा-पताकाओं से सुशोभित होने के कारण बड़ी रमणीय प्रतीत होती थी॥

निवेद्य रामाय तदा महात्मने महाभिषेकं कपिवाहिनीपतिः।

रुमां च भार्यामुपलभ्य वीर्यवानवाप राज्यं त्रिदशाधिपो यथा॥४२॥

वानरसेना के स्वामी पराक्रमी सुग्रीव ने महात्मा श्रीरामचन्द्रजी के पास जाकर अपने महाभिषेक का समाचार निवेदन किया और अपनी पत्नी रुमा को पाकर उन्होंने उसी प्रकार वानरों का साम्राज्य प्राप्त किया, जैसे देवराज इन्द्र ने त्रिलोकी का॥ ४२॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे षडविंशः सर्गः ॥२६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में छब्बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २६॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

प्रस्रवणगिरि पर श्रीराम और लक्ष्मण की परस्पर बातचीत

सप्तविंशः सर्गः

सर्ग-27


अभिषिक्ते तु सुग्रीवे प्रविष्टे वानरे गुहाम्।

आजगाम सह भ्रात्रा रामः प्रस्रवणं गिरिम्॥१॥

जब वानर सुग्रीव का राज्याभिषेक हो गया और वे किष्किन्धा में जाकर रहने लगे, उस समय अपने भाई लक्ष्मण के साथ श्रीरामजी प्रस्रवणगिरि पर चले गये। १॥

शार्दूलमृगसंघुष्टं सिंहैर्भीमरवैर्वृतम्।

नानागुल्मलतागूढं बहुपादपसंकुलम्॥२॥

वहाँ चीतों और मृगों की आवाज गूंजती रहती थी। भयंकर गर्जना करने वाले सिंहों से वह स्थान भरा था। नाना प्रकार की झाड़ियाँ और लताएँ उस पर्वत को आच्छादित किये हुए थीं और घने वृक्षों के द्वारा वह सब ओर से व्याप्त था॥

ऋक्षवानरगोपुच्छैारैिश्च निषेवितम्।

मेघराशिनिभं शैलं नित्यं शुचिकरं शिवम्॥३॥

रीछ, वानर, लंगूर और बिलाव आदि जन्तु वहाँ निवास करते थे। वह पर्वत मेघों के समूह-सा जान पड़ता था। दर्शन करने वाले लोगों के लिये वह सदा ही मङ्गलमय और पवित्रकारक था॥३॥

तस्य शैलस्य शिखरे महतीमायतां गुहाम्।

प्रत्यगृह्णीत वासार्थं रामः सौमित्रिणा सह॥४॥

उस पर्वत के शिखर पर एक बहुत बड़ी और विस्तृत गुफा थी। लक्ष्मणसहित श्रीराम ने उसी का अपने रहने के लिये आश्रय लिया॥४॥

कृत्वा च समयं रामः सुग्रीवेण सहानघः।

कालयुक्तं महद्वाक्यमुवाच रघुनन्दनः॥५॥

विनीतं भ्रातरं भ्राता लक्ष्मणं लक्ष्मिवर्धनम्।

रघुकुल का आनन्द बढ़ाने वाले निष्पाप श्रीरामचन्द्रजी वर्षा का अन्त होने पर सुग्रीव के साथ रावण पर चढ़ाई करने का निश्चय करके वहाँ आये थे। उन्होंने लक्ष्मी की वृद्धि करने वाले अपने विनययुक्त भ्राता लक्ष्मण से यह समयोचित बात कही – ॥ ५ १/२॥

इयं गिरिगुहा रम्या विशाला युक्तमारुता॥६॥

अस्यां वत्स्याम सौमित्रे वर्षरात्रमरिंदम।

‘शत्रुदमन सुमित्राकुमार! यह पर्वत की गुफा बड़ी ही सुन्दर और विशाल है। यहाँ हवा के आने-जाने का भी मार्ग है। हमलोग वर्षा की रात में इसी गुफा के भीतर निवास करेंगे॥ ६ १/२॥

गिरिशृङ्गमिदं रम्यमुत्तमं पार्थिवात्मज॥७॥

श्वेताभिः कृष्णताम्राभिः शिलाभिरुपशोभितम्।

‘राजकुमार! पर्वत का यह शिखर बहुत ही उत्तम और रमणीय है। सफेद, काले और लाल हर तरह के प्रस्तर-खण्ड इसकी शोभा बढ़ा रहे हैं॥ ७ १/२॥

नानाधातुसमाकीर्णं नदीदर्दुरसंयुतम्॥८॥

विविधैर्वृक्षषण्डैश्च चारुचित्रलतायुतम्।

नानाविहगसंघुष्टं मयूरवरनादितम्॥९॥

‘यहाँ नाना प्रकार के धातुओं की खाने हैं। पास ही नदी बहती है। उसमें रहने वाले मेढक यहाँ भी उछलते-कूदते चले आते हैं। नाना प्रकार के वृक्षसमूह इसकी शोभा बढ़ाते हैं। सुन्दर और विचित्र लताओं से यह शैल-शिखर हरा-भरा दिखायी देता है। भाँति-भाँति के पक्षी यहाँ चहक रहे हैं तथा सुन्दर मोरों की मीठी बोली गूंज रही है॥ ८-९॥

मालतीकुन्दगुल्मैश्च सिन्दुवारैः शिरीषकैः।

कदम्बार्जुनसभँश्च पुष्पितैरुपशोभितम्॥१०॥

‘मालती और कुन्दकी झाड़ियाँ, सिन्दुवार, शिरीष, कदम्ब, अर्जुन और सर्ज के फूले हुए वृक्ष इस स्थान की शोभा बढ़ा रहे हैं॥१०॥

इयं च नलिनी रम्या फुल्लपङ्कजमण्डिता।

नातिदूरे गुहाया नौ भविष्यति नृपात्मज॥११॥

‘राजकुमार! यह पुष्करिणी खिले हुए कमलों से अलंकृत हो बड़ी रमणीय दिखायी देती है। यह हमलोगों की गुफा से अधिक दूर नहीं होगी॥ ११॥

प्रागुदक्प्रवणे देशे गुहा साधु भविष्यति।

पश्चाच्चैवोन्नता सौम्य निवातेयं भविष्यति॥ १२॥

‘सौम्य! यहाँ का स्थान ईशानकोण की ओर से नीचा है, अतः यहाँ यह गुफा हमारे निवास के लिये बहुत अच्छी रहेगी। पश्चिम-दक्षिण के कोण की ओर से ऊँची यह गुफा हवा और वर्षा से बचाने के लिये अच्छी होगी* ॥ १२॥

* ईशानकोण की ओर नीची तथा नैर्ऋत्यकोण की ओर से ऊँची होने से उसका द्वार नैर्ऋत्यकोण की ओर था—यह प्रतीत होता है, इससे उसमें पूर्वी हवा और उधर से आने वाली वर्षा का प्रवेश नहीं

था।

गुहाद्वारे च सौमित्रे शिला समतला शिवा।

कृष्णा चैवायता चैव भिन्नाञ्जनचयोपमा॥ १३॥

‘सुमित्रानन्दन ! इस गुफा के द्वार पर समतल शिला है, जो बाहर बैठने के लिये सुविधाजनक होने के कारण सुखदायिनी है। यह लंबी-चौड़ी होने के साथ ही खान से काटकर निकाले हुए कोयलों की राशि के समान काली है॥ १३॥

गिरिशृङ्गमिदं तात पश्य चोत्तरतः शुभम्।

भिन्नाञ्जनचयाकारमम्भोधरमिवोदितम्॥१४॥

‘तात! देखो, यह सुन्दर पर्वत-शिखर उत्तर की ओर से कटे हुए कोयलों की राशि तथा घुमड़े हुए मेघों की घटा के समान काला दिखायी देता है॥ १४ ॥

दक्षिणस्यामपि दिशि स्थितं श्वेतमिवाम्बरम्।

कैलासशिखरप्रख्यं नानाधातुविराजितम्॥१५॥

‘इसी तरह दक्षिण दिशा में भी इसका जो शिखर है, वह श्वेत वस्त्र और कैलास-शृङ्ग के समान श्वेतदिखायी देता है। नाना प्रकार की धातुएँ उसकी शोभा बढ़ाती हैं॥ १५ ॥

प्राचीनवाहिनीं चैव नदीं भृशमकर्दमाम्।

गुहायाः परतः पश्य त्रिकूटे जाह्नवीमिव॥१६॥

‘वह देखो, इस गुफा के दूसरी ओर त्रिकूट पर्वत के समीप बहने वाली मन्दाकिनी के समान तुङ्गभद्रा नदी बह रही है। उसकी धारा पश्चिम से पूर्व की ओर जा रही है। उसमें कीचड़ का नाम भी नहीं है॥ १६ ॥

चन्दनैस्तिलकैः सालैस्तमालैरतिमुक्तकैः।

पद्मकैः सरलैश्चैव अशोकैश्चैव शोभिताम्॥ १७॥

‘चन्दन, तिलक, साल, तमाल, अतिमुक्तक, पद्मक, सरल और शोक आदि नाना प्रकार के वृक्षों से उस नदी की कैसी शोभा हो रही है ? ॥ १७॥

वानीरैस्तिमिदैश्चैव बकुलैः केतकैरपि।

हिन्तालैस्तिनिशैर्नीपैर्वेतसैः कृतमालकैः॥१८॥

तीरजैः शोभिता भाति नानारूपैस्ततस्ततः।

वसनाभरणोपेता प्रमदेवाभ्यलंकृता॥१९॥

‘जलबेंत, तिमिद, बकुल, केतक, हिन्ताल, तिनिश, नीप, स्थलबेंत, कृतमाल (अमिलतास) आदि भाँति-भाँति के तटवर्ती वृक्षों से जहाँ-तहाँ सुशोभित हुई यह नदी वस्त्राभूषणों से विभूषित शृङ्गारसज्जित युवती स्त्री के समान जान पड़ती है। १८-१९॥

शतशः पक्षिसङ्घश्च नानानादविनादिता।

एकैकमनुरक्तैश्च चक्रवाकैरलंकृता॥२०॥

‘सैकड़ों पक्षिसमूहों से संयुक्त हुई यह नदी उनके नाना प्रकार के कलरवों से गूंजती रहती है। परस्पर अनुरक्त हुए चक्रवाक इस सरिता की शोभा बढ़ाते

पुलिनैरतिरम्यैश्च हंससारससेविता।

प्रहसन्त्येव भात्येषा नानारत्नसमन्विता॥२१॥

‘अत्यन्त रमणीय तटों से अलंकृत, नाना प्रकार के रत्नों से सम्पन्न तथा हंस और सारसों से सेवित यह नदी अपनी हास्यच्छटा बिखेरती हुई-सी जान पड़ती है।॥ २१॥

क्वचिन्नीलोत्पलैश्छन्ना भातिरक्तोत्पलैः क्वचित्।

क्वचिदाभाति शुक्लैश्च दिव्यैः कुमुदकुड्मलैः॥ २२॥

‘कहीं तो यह नील कमलों से ढकी हुई है, कहीं लाल कमलों से सुशोभित होती है और कहीं श्वेत एवं दिव्य कुमुदकलिकाओं से शोभा पाती है॥ २२॥

पारिप्लवशतैर्जुष्टा बर्हिक्रौञ्चविनादिता।

रमणीया नदी सौम्य मुनिसङ्घनिषेविता॥२३॥

‘सैकड़ों जल-पक्षियों से सेवित तथा मोर एवं क्रौञ्च के कलरवों से मुखरित हुई यह सौम्य नदी बड़ी रमणीय प्रतीत होती है। मुनियों के समुदाय इसके जल का सेवन करते हैं॥ २३॥

पश्य चन्दनवृक्षाणां पङ्क्तिः सुरुचिरा इव।

ककुभानां च दृश्यन्ते मनसैवोदिताः समम्॥२४॥

‘वह देखो, अर्जुन और चन्दन वृक्षों की पंक्तियाँ कितनी सुन्दर दिखायी देती हैं। मालूम होता है ये मन के संकल्प के साथ ही प्रकट हो गयी हैं॥२४॥

अहो सुरमणीयोऽयं देशः शत्रुनिषूदन।

दृढं रंस्याव सौमित्रे साध्वत्र निवसावहे ॥२५॥

‘शत्रुसूदन सुमित्राकुमार! यह स्थान अत्यन्त रमणीय और अद्भुत है। यहाँ हमलोगों का मन खूब लगेगा। अतः यहीं रहना ठीक होगा॥ २५ ॥

इतश्च नातिदूरे सा किष्किन्धा चित्रकानना।

सुग्रीवस्य पुरी रम्या भविष्यति नृपात्मज ॥२६॥

‘राजकुमार! विचित्र काननों से सुशोभित सुग्रीव की रमणीय किष्किन्धापुरी भी यहाँ से अधिक दूर नहीं होगी॥

गीतवादित्रनिर्घोषः श्रूयते जयतां वर।

नदतां वानराणां च मृदङ्गाडम्बरैः सह ॥२७॥

‘विजयी वीरों में श्रेष्ठ लक्ष्मण! मृदङ्ग की मधुर ध्वनि के साथ गर्जते हुए वानरों के गीत और वाद्य का गम्भीर घोष यहाँ से सुनायी देता है॥२७॥

लब्ध्वा भार्यां कपिवरः प्राप्य राज्यं सुहृद्वृतः।

ध्रुवं नन्दति सुग्रीवः सम्प्राप्य महतीं श्रियम्॥ २८॥

‘निश्चय ही कपिश्रेष्ठ सुग्रीव अपनी पत्नी को पाकर, राज्य को हस्तगत करके और बड़ी भारी लक्ष्मी पर अधिकार प्राप्त करके सुहृदों के साथ आनन्दोत्सव मना रहे हैं ॥ २८॥

इत्युक्त्वा न्यवसत् तत्र राघवः सहलक्ष्मणः।

बहुदृश्यदरीकुञ्ज तस्मिन् प्रस्रवणे गिरौ॥२९॥

ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण के साथ उस प्रस्रवण पर्वत पर जहाँ बहुत-सी कन्दराओं और कुञ्जों के दर्शन होते थे, निवास करने लगे॥२९॥

सुसुखे हि बहुद्रव्ये तस्मिन् हि धरणीधरे।

वसतस्तस्य रामस्य रतिरल्पापि नाभवत्॥३०॥

हृतां हि भार्यां स्मरतः प्राणेभ्योऽपि गरीयसीम्।

यद्यपि उस पर्वत पर परम सुख प्रदान करने वाले बहुत-से फल-फूल आदि आवश्यक पदार्थ थे, तथापि राक्षस द्वारा हरी गयी प्राणों से भी बढ़कर आदरणीय सीता का स्मरण करते हुए भगवान् श्रीराम को वहाँ तनिक भी सुख नहीं मिलता था॥ ३० १/२॥

उदयाभ्युदितं दृष्ट्वा शशाङ्कं च विशेषतः॥३१॥

आविवेश न तं निद्रा निशासु शयनं गतम्।

विशेषतः उदयाचलपर उदित हुए चन्द्रदेव का दर्शन करके रात में शय्यापर लेट जाने पर भी उन्हें नींद नहीं आती थी॥३१ १/२॥

तत्समुत्थेन शोकेन बाष्पोपहतचेतनम्॥३२॥

तं शोचमानं काकुत्स्थं नित्यं शोकपरायणम्।

तुल्यदुःखोऽब्रवीभ्राता लक्ष्मणोऽनुनयं वचः॥ ३३॥

सीता के वियोगजनित शोक से आँसू बहाते हुए वे अचेत हो जाते थे। श्रीराम को निरन्तर शोकमग्न रहकर चिन्ता करते देख उनके दुःख में समानरूप से भाग लेने वाले भाई लक्ष्मण ने उनसे विनयपूर्वक कहा — ॥३२-३३॥

अलं वीर व्यथां गत्वा न त्वं शोचितुमर्हसि।

शोचतो ह्यवसीदन्ति सर्वार्था विदितं हि ते॥ ३४॥

‘वीर! इस प्रकार व्यथित होने से कोई लाभ नहीं है। अतः आपको शोक नहीं करना चाहिये; क्योंकि शोक करने वाले पुरुष के सभी मनोरथ नष्ट हो जाते हैं, यह बात आपसे छिपी नहीं है॥ ३४॥

भवान् क्रियापरो लोके भवान् देवपरायणः।

आस्तिको धर्मशीलश्च व्यवसायी च राघव॥ ३५॥

‘रघुनन्दन! आप जगत् में कर्मठ-वीर तथा देवताओं का समादर करने वाले हैं। आस्तिक, धर्मात्मा और उद्योगी हैं॥ ३५॥

न ह्यव्यवसितः शत्रु राक्षसं तं विशेषतः।

समर्थस्त्वं रणे हन्तुं विक्रमे जिह्मकारिणम्॥ ३६॥

‘यदि आप शोकवश उद्यम छोड़ बैठते हैं तो पराक्रम के स्थानस्वरूप समराङ्गण में कुटिल कर्म करने वाले उस शत्रु का, जो विशेषतः राक्षस है, वध करने में समर्थ न हो सकेंगे॥ ३६॥

समुन्मूलय शोकं त्वं व्यवसायं स्थिरीकुरु।

ततः सपरिवारं तं राक्षसं हन्तुमर्हसि ॥ ३७॥

‘अतः आप अपने शोक को जड़ से उखाड़ फेंकिये और उद्योग के विचार को सुस्थिर कीजिये। तभी आप परिवारसहित उस राक्षस का विनाश कर सकते हैं। ३७॥

पृथिवीमपि काकुत्स्थ ससागरवनाचलाम्।

परिवर्तयितुं शक्तः किं पुनस्तं हि रावणम्॥३८॥

‘काकुत्स्थ! आप तो समुद्र, वन और पर्वतोंसहित समूची पृथ्वी को भी उलट सकते हैं; फिर उस रावण का संहार करना आपके लिये कौन बड़ी बात है? ॥ ३८॥

शरत्कालं प्रतीक्षस्व प्रावृटकालोऽयमागतः।

ततः सराष्ट्रं सगणं रावणं तं वधिष्यसि ॥३९॥

‘यह वर्षाकाल आ गया है। अब शरद्-ऋतु की प्रतीक्षा कीजिये। फिर राज्य और सेनासहित रावण का वध कीजियेगा॥ ३९॥

अहं तु खलु ते वीर्यं प्रसुप्तं प्रतिबोधये।

दीप्तैराहुतिभिः काले भस्मच्छन्नमिवानलम्॥ ४०॥

‘जैसे राख में छिपी हुई आग को हवनकाल में आहुतियों द्वारा प्रज्वलित किया जाता है, उसी प्रकार मैं आपके सोये हुए पराक्रम को जगा रहा हूँ-भूले हुए बल-विक्रम की याद दिला रहा हूँ’॥ ४० ॥

लक्ष्मणस्य हि तद् वाक्यं प्रतिपूज्य हितं शुभम्।

राघवः सुहृदं स्निग्धमिदं वचनमब्रवीत्॥४१॥

लक्ष्मण के इस शुभ एवं हितकर वचन की सराहना करके श्रीरघुनाथजी ने अपने स्नेही सुहृत् सुमित्राकुमार से इस प्रकार कहा— ॥४१॥

वाच्यं यदनुरक्तेन स्निग्धेन च हितेन च।

सत्यविक्रमयुक्तेन तदुक्तं लक्ष्मण त्वया॥४२॥

‘लक्ष्मण! अनुरागी, स्नेही, हितैषी और सत्यपराक्रमी वीर को जैसी बात कहनी चाहिये वैसी ही तुमने कही है॥४२॥

एष शोकः परित्यक्तः सर्वकार्यावसादकः।

विक्रमेष्वप्रतिहतं तेजः प्रोत्साहयाम्यहम्॥४३॥

‘लो, सब तरह के काम बिगाड़ने वाले शोक को मैंने त्याग दिया। अब मैं पराक्रमविषयक दुर्धर्ष तेज को प्रोत्साहित करता हूँ (बढ़ाता हूँ)॥४३॥

शरत्कालं प्रतीक्षिष्ये स्थितोऽस्मि वचने तव।

सुग्रीवस्य नदीनां च प्रसादमनुपालयन्॥४४॥

‘तुम्हारी बात मान लेता हूँ। सुग्रीव के प्रसन्न होकर सहायता करने और नदियों के जल के स्वच्छ होने की बाट देखता हुआ मैं शरत्-काल की प्रतीक्षा करूँगा॥ ४४॥

उपकारेण वीरस्तु प्रतिकारेण युज्यते।

अकृतज्ञोऽप्रतिकृतो हन्ति सत्त्ववतां मनः॥४५॥

‘जो वीर पुरुष किसी के उपकार से उपकृत होता है, वह प्रत्युपकार करके उसका बदला अवश्य चुकाता है, किंतु यदि कोई उपकार को न मानकर या भुलाकर प्रत्युपकार से मुँह मोड़ लेता है, वह शक्तिशाली श्रेष्ठ पुरुषों के मन को ठेस पहुँचाता है॥ ४५ ॥

तदेव युक्तं प्रणिधाय लक्ष्मणःकृताञ्जलिस्तत् प्रतिपूज्य भाषितम्।

उवाच रामं स्वभिरामदर्शनं प्रदर्शयन् दर्शनमात्मनः शुभम्॥४६॥

‘श्रीरामजी के उस कथन को ही युक्तियुक्त मानकर लक्ष्मण ने उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की और दोनों हाथ जोड़कर अपनी शुभ दृष्टि का परिचय देते हुए वे नयनाभिराम श्रीराम से इस प्रकार बोले- ॥ ४६॥

यथोक्तमेतत् तव सर्वमीप्सितं नरेन्द्र कर्ता नचिरात् तु वानरः।

शरत्प्रतीक्षः क्षमतामिमं भवान् जलप्रपातं रिपुनिग्रहे धृतः॥४७॥

‘नरेश्वर! जैसा कि आपने कहा है, वानरराज सुग्रीव शीघ्र ही आपका यह सारा मनोरथ सिद्ध करेंगे। अतः आप शत्रु के संहार करने का दृढ़ निश्चय लिये शरत्काल की प्रतीक्षा कीजिये और इस वर्षाकाल के विलम्ब को सहन कीजिये॥४७॥

नियम्य कोपं परिपाल्यतां शरत् क्षमस्व मासांश्चतुरो मया सह।

वसाचलेऽस्मिन् मृगराजसेविते संवर्तयन् शत्रुवधे समर्थः॥४८॥

क्रोध को काबू में रखकर शरत्काल की राह देखिये। बरसात के चार महीनों तक जो भी कष्ट हो, उसे सहन कीजिये तथा शत्रुवध में समर्थ होने पर भी इस वर्षाकाल को व्यतीत करते हुए मेरे साथ इस सिंहसेवित पर्वत पर निवास कीजिये’॥ ४८॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे सप्तविंशः सर्गः॥२७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में सत्ताईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥२७॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

श्रीराम के द्वारा वर्षा-ऋतु का वर्णन

अष्टाविंशः सर्गः

सर्ग-28


स तदा वालिनं हत्वा सुग्रीवमभिषिच्य च।

वसन् माल्यवतः पृष्ठे रामो लक्ष्मणमब्रवीत्॥१॥

इस प्रकार वाली का वध और सुग्रीव का राज्याभिषेक करने के अनन्तर माल्यवान् पर्वत के पृष्ठभाग में निवास करते हुए श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण से कहने लगे— ॥१॥

अयं स कालः सम्प्राप्तः समयोऽद्य जलागमः।

सम्पश्य त्वं नभो मेघैः संवृतं गिरिसंनिभैः॥२॥

‘सुमित्रानन्दन! अब यह जल की प्राप्ति कराने वाला वह प्रसिद्ध वर्षाकाल आ गया। देखो, पर्वत के समान प्रतीत होने वाले मेघों से आकाशमण्डल आच्छन्न हो गया है॥२॥

नवमासधृतं गर्भं भास्करस्य गभस्तिभिः।

पीत्वा रसं समुद्राणां द्यौः प्रसूते रसायनम्॥३॥

‘यह आकाशस्वरूपा तरुणी सूर्य की किरणों द्वारा समुद्रों का रस पीकर कार्तिक आदि नौ मासों तक धारण किये हुए गर्भ के रूप में जलरूपी रसायन को जन्म दे रही है॥३॥

शक्यमम्बरमारुह्य मेघसोपानपंक्तिभिः।

कुटजार्जुनमालाभिरलंकर्तुं दिवाकरः॥४॥

‘इस समय मेघरूपी सोपानपंक्तियों (सीढ़ियों) द्वारा आकाश में चढ़कर गिरिमल्लिका और अर्जुनपुष्प की मालाओं से सूर्यदेव को अलंकृत करना सरल-सा हो गया है॥४॥

संध्यारागोत्थितैस्तानैरन्तेष्वपि च पाण्डुभिः।

स्निग्धैरभ्रपटच्छेदैर्बद्धव्रणमिवाम्बरम्॥५॥

‘संध्याकाल की लाली प्रकट होने से बीच में लाल तथा किनारे के भागों में श्वेत एवं स्निग्ध प्रतीत होने वाले मेघखण्डों से आच्छादित हुआ आकाश ऐसा जान पड़ता है, मानो उसने अपने घाव में रक्तरञ्जित सफेद कपड़ों की पट्टी बाँध रखी हो॥५॥

मन्दमारुतिनिःश्वासं संध्याचन्दनरञ्जितम्।

आपाण्डुजलदं भाति कामातुरमिवाम्बरम्॥६॥

‘मन्द-मन्द हवा निःश्वास-सी प्रतीत होती है, संध्याकाल की लाली लाल चन्दन बनकर ललाट आदि अङ्गों को अनुरञ्जित कर रही है तथा मेघरूपी कपोल कुछ-कुछ पाण्डुवर्ण का प्रतीत होता है। इस तरह यह आकाश कामातुर पुरुष के समान जान पड़ता है॥६॥

एषा घर्मपरिक्लिष्टा नववारिपरिप्लुता।

सीतेव शोकसंतप्ता मही बाष्पं विमुञ्चति॥७॥

‘जो ग्रीष्म-ऋतु में घाम से तप गयी थी, वह पृथ्वी वर्षाकाल में नूतन जल से भीगकर (सूर्य-किरणों से तपी और आँसुओं से भीगी हुई) शोकसंतप्त सीता की भाँति बाष्प विमोचन (उष्णता का त्याग अथवा अश्रुपात) कर रही है॥७॥

मेघोदरविनिर्मुक्ताः कर्पूरदलशीतलाः।

शक्यमञ्जलिभिः पातुं वाताः केतकगन्धिनः॥ ८॥

‘मेघ के उदर से निकली, कपूर की डली के समान ठंडी तथा केवड़े की सुगन्ध से भरी हुई इस बरसाती वायु को मानो अञ्जलियों में भरकर पीया जा सकता है।

एष फुल्लार्जुनः शैलः केतकैरभिवासितः।

सुग्रीव इव शान्तारिर्धाराभिरभिषिच्यते॥९॥

यह पर्वत, जिस पर अर्जुन के वृक्ष खिले हुए हैं तथा जो केवड़ों से सुवासित हो रहा है, शान्त हुए शत्रुवाले सुग्रीव की भाँति जल की धाराओं से अभिषिक्त हो रहा है॥९॥

मेघकृष्णाजिनधरा धारायज्ञोपवीतिनः।

मारुतापूरितगुहाः प्राधीता इव पर्वताः॥१०॥

मेघरूपी काले मृगचर्म तथा वर्षा की धारारूप यज्ञोपवीत धारण किये वायु से पूरित गुफा (या हृदय) वाले ये पर्वत ब्रह्मचारियों की भाँति मानो वेदाध्ययन आरम्भ कर रहे हैं॥ १०॥

कशाभिरिव हैमीभिर्विद्युद्भिरभिताडितम्।

अन्तःस्तनितनिर्घोषं सवेदनमिवाम्बरम्॥११॥

‘ये बिजलियाँ सोने के बने हुए कोड़ों के समान जान पड़ती हैं। इनकी मार खाकर मानो व्यथित हुआ आकाश अपने भीतर व्यक्त हुई मेघों की गम्भीर गर्जना के रूप में आर्तनाद-सा कर रहा है॥ ११॥

नीलमेघाश्रिता विद्युत् स्फुरन्ती प्रतिभाति मे।

स्फुरन्ती रावणस्याङ्के वैदेहीव तपस्विनी॥१२॥

‘नील मेघ का आश्रय लेकर प्रकाशित होती हुई यह विद्युत् मुझे रावण के अङ्क में छटपटाती हुई तपस्विनी सीता के समान प्रतीत होती है॥ १२॥

इमास्ता मन्मथवतां हिताः प्रतिहता दिशः।

अनुलिप्ता इव घनैनष्टग्रहनिशाकराः॥१३॥

‘बादलों का लेप लग जाने से जिनमें ग्रह, नक्षत्र और चन्द्रमा अदृश्य हो गये हैं, अतएव जो नष्ट-सी हो गयी है जिनके पूर्व, पश्चिम आदि भेदों का विवेक लुप्त-सा हो गया है, वे दिशाएँ, उन कामियों को, जिन्हें प्रेयसी का संयोगसुख सुलभ है, हितकर प्रतीत होती हैं॥ १३॥

क्वचिद् बाष्पाभिसंरुद्धान् वर्षागमसमुत्सुकान्।

कुटजान् पश्य सौमित्रे पुष्पितान् गिरिसानुषु।

मम शोकाभिभूतस्य कामसंदीपनान् स्थितान्॥ १४॥

‘सुमित्रानन्दन ! देखो, इस पर्वत के शिखरों पर खिले हुए कुटज कैसी शोभा पाते हैं? कहीं तो पहली बार वर्षा होने पर भूमि से निकले हुए भाप से ये व्याप्त हो रहे हैं और कहीं वर्षा के आगमन से अत्यन्त उत्सुक (हर्षोत्फुल्ल) दिखायी देते हैं। मैं तो प्रिया-विरह के शोक से पीड़ित हूँ और ये कुटज पुष्प मेरी प्रेमाग्नि को उद्दीप्त कर रहे हैं॥ १४ ॥

रजः प्रशान्तं सहिमोऽद्य वायुनिदाघदोषप्रसराः प्रशान्ताः।

स्थिता हि यात्रा वसुधाधिपानां प्रवासिनो यान्ति नराः स्वदेशान्॥१५॥

‘धरती की धूल शान्त हो गयी। अब वायु में शीतलता आ गयी। गर्मी के दोषों का प्रसार बंद हो गया। भूपालों की युद्ध यात्रा रुक गयी और परदेशी मनुष्य अपने-अपने देश को लौट रहे हैं॥ १५ ॥

सम्प्रस्थिता मानसवासलुब्धाः प्रियान्विताः सम्प्रति चक्रवाकाः।

अभीक्ष्णवर्षोदकविक्षतेषु यानानि मार्गेषु न सम्पतन्ति॥१६॥

‘मानसरोवर में निवास के लोभी हंस वहाँ के लिये प्रस्थित हो गये। इस समय चकवे अपनी प्रियाओं से मिल रहे हैं। निरन्तर होने वाली वर्षा के जल से मार्ग टूट-फूट गये हैं, इसलिये उन पर रथ आदि नहीं चल रहे हैं॥ १६॥

क्वचित् प्रकाशं क्वचिदप्रकाशं नभः प्रकीर्णाम्बुधरं विभाति।

क्वचित् क्वचित् पर्वतसंनिरुद्धंरूपं यथा शान्तमहार्णवस्य॥१७॥

‘आकाश में सब ओर बादल छिटके हुए हैं। कहीं तो उन बादलों से ढक जाने के कारण आकाश दिखायी नहीं देता है और कहीं उनके फट जाने पर वह स्पष्ट दिखायी देने लगता है। ठीक उसी तरह जैसे जिसकी तरङ्गमालाएँ शान्त हो गयी हों, उस महासागर का रूप कहीं तो पर्वतमालाओं से छिप जाने के कारण नहीं दिखायी देता है और कहीं पर्वतों का आवरण न होने से दिखायी देता है॥ १७॥

व्यामिश्रितं सर्जकदम्बपुष्पैनवं जलं पर्वतधातुताम्रम्।

मयूरकेकाभिरनुप्रयातं शैलापगाः शीघ्रतरं वहन्ति॥१८॥

‘इस समय पहाड़ी नदियाँ वर्षा के नूतन जल को बड़े वेग से बहा रही हैं। वह जल सर्ज और कदम्ब के फूलों से मिश्रित है, पर्वत के गेरू आदि धातुओं से लाल रंग का हो गया है तथा मयूरों की केका ध्वनि उस जल के कलकलनाद का अनुसरण कर रही है॥ १८॥

रसाकुलं षट्पदसंनिकाशं प्रभुज्यते जम्बुफलं प्रकामम्।

अनेकवर्ण पवनावधूतं भूमौ पतत्याम्रफलं विपक्वम्॥१९॥

‘काले-काले भौंरों के समान प्रतीत होने वाले जामुन के सरस फल आजकल लोग जी भरकर खाते हैं और हवा के वेग से हिले हुए आम के पके हुए बहुरंगी फल पृथ्वी पर गिरते रहते है॥ १९॥

विद्युत्पताकाः सबलाकमालाः शैलेन्द्रकूटाकृतिसंनिकाशाः।

गर्जन्ति मेघाः समुदीर्णनादा मत्ता गजेन्द्रा इव संयुगस्थाः ॥२०॥

‘जैसे युद्धस्थल में खड़े हुए मतवाले गजराज उच्चस्वर से चिग्घाड़ते हैं, उसी प्रकार गिरिराज के शिखरों की-सी आकृति वाले मेघ जोर-जोर से गर्जना कर रहे हैं। चमकती हुई बिजलियाँ इन मेघरूपी गजराजों पर पताकाओं के समान फहरा रही हैं और बगुलों की पंक्तियाँ माला के समान शोभा देती हैं। २०॥

वर्षोदकाप्यायितशाबलानि प्रवृत्तनृत्तोत्सवबर्हिणानि।

वनानि निर्वृष्टबलाहकानिपश्यापराणेष्वधिकं विभान्ति॥२१॥

‘देखो, अपराह्नकाल में इन वनों की शोभा अधिक बढ़ जाती है। वर्षा के जल से इनमें हरी-हरी घासें बढ़ गयी हैं। झुंड-के-झुंड मोरों ने अपना नृत्योत्सव आरम्भ कर दिया है और मेघों ने इनमें निरन्तर जल बरसाया है।

समुदहन्तः सलिलातिभारं बलाकिनो वारिधरा नदन्तः।

महत्सु शृङ्गेषु महीधराणां विश्रम्य विश्रम्य पुनः प्रयान्ति॥ २२॥

‘बक-पंक्तियों से सुशोभित ये जलधर मेघ जल का अधिक भार ढोते और गर्जते हुए बड़े-बड़े पर्वत शिखरों पर मानो विश्राम ले-लेकर आगे बढ़ते हैं।॥ २२॥

मेघाभिकामा परिसम्पतन्ती सम्मोदिता भाति बलाकपंक्तिः।

वातावधूता वरपौण्डरीकी लम्बेव माला रुचिराम्बरस्य॥२३॥

‘गर्भ धारण के लिये मेघों की कामना रखकर आकाश में उड़ती हुई आनन्दमग्न बलाकाओं की पंक्ति ऐसी जान पड़ती है, मानो आकाश के गले में हवा से हिलती हुई श्वेत कमलों की सुन्दर माला लटक रही हो॥२३॥

बालेन्द्रगोपान्तरचित्रितेन विभाति भूमिर्नवशाबलेन।

गात्रानुपृक्तेन शुकप्रभेण नारीव लाक्षोक्षितकम्बलेन॥२४॥

‘छोटे-छोटे इन्द्रगोप (वीरबहूटी) नामक कीड़ों से बीच-बीच में चित्रित हुई नूतन घास से आच्छादित भूमि उस नारी के समान शोभा पाती है, जिसने अपने अङ्गों पर तोते के समान रंगवाला एक ऐसा कम्बल ओढ रखा हो, जिसको बीच-बीच में महावर के रंग से रँगकर विचित्र शोभा से सम्पन्न कर दिया गया हो। २४॥

निद्रा शनैः केशवमभ्युपैति द्रुतं नदी सागरमभ्युपैति।

हृष्टा बलाका घनमभ्युपैति कान्ता सकामा प्रियमभ्युपैति॥२५॥

‘चौमासे के इस आरम्भकाल में निद्रा धीरे-धीरे भगवान् केशव के समीप जा रही है। नदी तीव्र वेगसेसमुद्र के निकट पहुँच रही है। हर्षभरी बला का उड़कर मेघ की ओर जा रही है और प्रियतमा कामभाव से अपने प्रियतम की सेवा में उपस्थित हो रही है॥२५॥

जाता वनान्ताः शिखिसुप्रनृत्ता जाताः कदम्बाः सकदम्बशाखाः।

जाता वृषा गोषु समानकामा जाता मही सस्यवनाभिरामा॥२६॥

‘वनप्रान्त मोरों के सुन्दर नृत्य से सुशोभित हो गये हैं। कदम्बवृक्ष फूलों और शाखाओं से सम्पन्न हो गये हैं। साँड़ गौओं के प्रति उन्हीं के समान कामभाव से आसक्त हैं और पृथ्वी हरी-हरी खेती तथा हरे-भरे वनों से अत्यन्त रमणीय प्रतीत होने लगी है॥ २६ ॥

वहन्ति वर्षन्ति नदन्ति भान्ति ध्यायन्ति नृत्यन्ति समाश्वसन्ति।

नद्यो घना मत्तगजा वनान्ताः प्रियाविहीनाः शिखिनः प्लवंगमाः॥२७॥

‘नदियाँ बह रही हैं, बादल पानी बरसा रहे हैं, मतवाले हाथी चिग्घाड़ रहे हैं, वनप्रान्त शोभा पा रहे हैं, प्रियतमा के संयोग से वञ्चित हुए वियोगी प्राणीचिन्तामग्न हो रहे हैं, मोर नाच रहे हैं और वानर निश्चिन्त एवं सुखी हो रहे हैं॥२७॥

प्रहर्षिताः केतकिपुष्पगन्धमाघ्राय मत्ता वननिर्झरेषु।

प्रपातशब्दाकुलिता गजेन्द्राः सार्धं मयूरैः समदा नदन्ति॥२८॥

‘वन के झरनों के समीप क्रीडा से उल्लसित हुए मदवर्षी गजराज केवड़े के फूल की सुगन्ध को सूंघकर मतवाले हो उठे हैं और झरने के जल के गिरने से जो शब्द होता है, उससे आकुल हो ये मोरों के बोलने के साथ-साथ स्वयं भी गर्जना करते हैं॥२८॥

धारानिपातैरभिहन्यमानाः कदम्बशाखासु विलम्बमानाः।

क्षणार्जितं पुष्परसावगाढं शनैर्मदं षट्चरणास्त्यजन्ति॥ २९॥

‘जल की धारा गिरने से आहत होते और कदम्ब की डालियों पर लटकते हुए भ्रमर तत्काल ग्रहण किये पुष्परस से उत्पन्न गाढ़ मद को धीरे-धीरे त्याग रहे हैं।

अङ्गारचूर्णोत्करसंनिकाशैः फलैः सुपर्याप्तरसैः समृद्धैः।

जम्बूद्रुमाणां प्रविभान्ति शाखा निपीयमाना इव षट्पदौघैः॥३०॥

‘कोयलों की चूर्णराशि के समान काले और प्रचुर रस से भरे हुए बड़े-बड़े फलों से लदी हुई जामुनवृक्ष की शाखाएँ ऐसी जान पड़ती हैं, मानो भ्रमरों के समुदाय उनमें सटकर उनके रस पी रहे हैं॥ ३० ॥

तडित्पताकाभिरलंकृतानामुदीर्णगम्भीरमहारवाणाम्।

विभान्ति रूपाणि बलाहकानां रणोत्सुकानामिव वारणानाम्॥३१॥

‘विद्युत्-रूपी पताकाओं से अलंकृत एवं जोर-जोर से गम्भीर गर्जना करने वाले इन बादलों के रूपयुद्ध के लिये उत्सुक हुए गजराजों के समान प्रतीत होते हैं। ३१॥

मार्गानुगः शैलवनानुसारी सम्प्रस्थितो मेघरवं निशम्य।

युद्धाभिकामः प्रतिनादशङ्की मत्तो गजेन्द्रः प्रतिसंनिवृत्तः॥३२॥

‘पर्वतीय वनों में विचरण करने वाला तथा अपने प्रतिद्वन्द्वी के साथ युद्ध की इच्छा रखने वाला मदमत्तगजराज, जो अपने मार्ग का अनुसरण करके आगे बढ़ा जा रहा था, पीछे से मेघ की गर्जना सुनकर प्रतिपक्षी हाथी के गर्जने की आशङ्का करके सहसा पीछे को लौट पड़ा ॥ ३२॥

क्वचित् प्रगीता इव षट्पदौघैः क्वचित् प्रनृत्ता इव नीलकण्ठैः।

क्वचित् प्रमत्ता इव वारणेन्द्रविभान्त्यनेकाश्रयिणो वनान्ताः॥३३॥

‘कहीं भ्रमरों के समूह गीत गा रहे हैं, कहीं मोर नाच रहे हैं और कहीं गजराज मदमत्त होकर विचर रहे हैं। इस प्रकार ये वनप्रान्त अनेक भावों के आश्रय बनकर शोभा पा रहे हैं॥ ३३॥

कदम्बसर्जार्जुनकन्दलाढ्या वनान्तभूमिर्मधुवारिपूर्णा।

मयूरमत्ताभिरुतप्रनृत्तैरापानभूमिप्रतिमा विभाति॥३४॥

‘कदम्ब, सर्ज, अर्जुन और स्थल-कमल से सम्पन्न वन के भीतर की भूमि मधु-जल से परिपूर्ण हो मोरों के मदयुक्त कलरवों और नृत्यों से उपलक्षित होकर आपानभूमि (मधुशाला) के समान प्रतीत होती है। ३४॥

मुक्तासमाभं सलिलं पतद् वै सुनिर्मलं पत्रपुटेषु लग्नम्।

हृष्टा विवर्णच्छदना विहंगाः सुरेन्द्रदत्तं तृषिताः पिबन्ति॥ ३५॥

‘आकाश से गिरता हुआ मोती के समान स्वच्छ एवं निर्मल जल पत्तों के दोनों में संचित हुआ देख प्यासे पक्षी पपीहे हर्ष से भरकर देवराज इन्द्र के दिये हुए उस जल को पीते हैं। वर्षा से भीग जाने के कारण उनकी पाँखें विविध रंग की दिखायी देती हैं॥ ३५॥

षट्पादतन्त्रीमधुराभिधानं प्लवंगमोदीरितकण्ठतालम्।

आविष्कृतं मेघमृदङ्गनादै वनेषु संगीतमिव प्रवृत्तम्॥३६॥

‘भ्रमररूप वीणा की मधुर झंकार हो रही है। मेढकों की आवाज कण्ठताल-सी जान पड़ती है। मेघों की गर्जना के रूप में मृदङ्ग बज रहे हैं। इस प्रकार वनों में संगीतोत्सव का आरम्भ-सा हो रहा है॥ ३६॥

क्वचित् प्रनृत्तैः क्वचिदुन्नदद्भिःक्वचिच्च वृक्षाग्रनिषण्णकायैः।

व्यालम्बबर्हाभरणैर्मयूरै र्वनेषु संगीतमिव प्रवृत्तम्॥ ३७॥

‘विशाल पंखरूपी आभूषणों से विभूषित मोर वनों में कहीं नाच रहे हैं, कहीं जोर-जोर से मीठी बोली बोल रहे हैं और कहीं वृक्षों की शाखाओं पर अपने सारे शरीर का बोझ डालकर बैठे हुए हैं। इस प्रकार उन्होंने संगीत (नाच-गान) का आयोजन-सा कर रखा है। ३७॥

स्वनैर्घनानां प्लवगाः प्रबुद्धा विहाय निद्रां चिरसंनिरुद्धाम्।

अनेकरूपाकृतिवर्णनादा नवाम्बुधाराभिहता नदन्ति॥३८॥

‘मेघों की गर्जना सुनकर चिरकाल से रोकी हुई निद्रा को त्यागकर जागे हुए अनेक प्रकार के रूप, आकार, वर्ण और बोली वाले मेढक नूतन जल की धारा से अभिहत होकर जोर-जोरसे बोल रहे हैं॥ ३८ ॥

नद्यः समुद्राहितचक्रवाकास्तटानि शीर्णान्यपवाहयित्वा।

दृप्ता नवप्रावृतपूर्णभोगादृतं स्वभर्तारमुपोपयान्ति॥३९॥

(कामातुर युवतियों की भाँति) दर्पभरी नदियाँ अपने वक्ष पर (उरोजों के स्थान में) चक्रवाकों को वहन करती हैं और मर्यादा में रखने वाले जीर्ण-शीर्ण कूलकगारों को तोड़-फोड़ एवं दूर बहाकर नूतन पुष्प आदि के उपहार से पूर्ण भोग के लिये सादर स्वीकृत अपने स्वामी समुद्र के समीप वेगपूर्वक चली जा रही हैं॥ ३९॥

नीलेषु नीला नववारिपूर्णा मेघेषु मेघाः प्रतिभान्ति सक्ताः।

दवाग्निदग्धेषु दवाग्निदग्धाः शैलेषु शैला इव बद्धमूलाः॥४०॥

‘नीले मेघों में सटे हुए नूतन जल से परिपूर्ण नील मेघ ऐसे प्रतीत होते हैं, मानो दावानल से जले हुए पर्वतों में दावानल से दग्ध हुए दूसरे पर्वत बद्धमूल होकर सट गये हों॥ ४०॥

प्रमत्तसंनादितबर्हिणानि सशक्रगोपाकुलशादलानि।

चरन्ति नीपार्जुनवासितानि गजाः सुरम्याणि वनान्तराणि॥४१॥

‘जहाँ मतवाले मोर कलनाद कर रहे हैं, जहाँ की हरी-हरी घासें वीरबहूटियों के समुदाय से व्याप्त हो रही हैं तथा जो नीप और अर्जुन-वृक्षों के फूलों की सुगन्ध से सुवासित हैं, उन परम रमणीय वनप्रान्तों में बहुत-से हाथी विचरा करते हैं॥ ४१॥

नवाम्बुधाराहतकेसराणि द्रुतं परित्यज्य सरोरुहाणि।

कदम्बपुष्पाणि सकेसराणि नवानि हृष्टा भ्रमराः पिबन्ति॥४२॥

‘भ्रमरों के समुदाय नूतन जल की धारा से नष्ट हुए केसरवाले कमल-पुष्पों को तुरंत त्यागकर केसरशोभित नवीन कदम्ब-पुष्पों का रस बड़े हर्ष के साथ पी रहे हैं। ४२॥

मत्ता गजेन्द्रा मुदिता गवेन्द्रा वनेषु विक्रान्ततरा मृगेन्द्राः।

रम्या नगेन्द्राः निभृता नरेन्द्राः प्रक्रीडितो वारिधरैः सुरेन्द्रः॥४३॥

‘गजेन्द्र (हाथी) मतवाले हो रहे हैं। गवेन्द्र (वृषभ) आनन्द में मग्न हैं, मृगेन्द्र (सिंह) वन में अत्यन्त पराक्रम प्रकट करते हैं, नगेन्द्र (बड़े-बड़े पर्वत) रमणीय दिखायी देते हैं, नरेन्द्र (राजालोग) मौन हैं युद्ध विषयक उत्साह छोड़ बैठे हैं और सुरेन्द्र (इन्द्रदेव) जलधरों के साथ क्रीडा कर रहे हैं। ४३॥

मेघाः समुद्भूतसमुद्रनादा महाजलौघैर्गगनावलम्बाः।

नदीस्तटाकानि सरांसि वापीमहीं च कृत्स्नामपवाहयन्ति॥४४॥

‘आकाश में लटके हुए ये मेघ अपनी गर्जना से समुद्र के कोलाहल को तिरस्कृत करके अपने जल के महान् प्रवाहसे नदी, तालाब, सरोवर, बावली तथा समूची पृथ्वी को आप्लावित कर रहे हैं। ४४॥

वर्षप्रवेगा विपुलाः पतन्ति प्रवान्ति वाताः समुदीर्णवेगाः।

प्रणष्टकूलाः प्रवहन्ति शीघ्रं नद्यो जलं विप्रतिपन्नमार्गाः॥४५॥

‘बड़े वेग से वर्षा हो रही है, जोरों की हवा चल रही है और नदियाँ अपने कगारों को काटकर अत्यन्त तीव्र गति से जल बहा रही हैं। उन्होंने मार्ग रोक दिये हैं।

नरैर्नरेन्द्रा इव पर्वतेन्द्राःसुरेन्द्रदत्तैः पवनोपनीतैः।

घनाम्बुकुम्भैरभिषिच्यमाना रूपं श्रियं स्वामिव दर्शयन्ति॥४६॥

‘जैसे मनुष्य जल के कलशों से नरेशों का अभिषेक करते हैं, उसी प्रकार इन्द्र के दिये और वायुदेव के द्वारा लाये गये मेघरूपी जल-कलशों से जिनका अभिषेक हो रहा है, वे पर्वतराज अपने निर्मल रूप तथा शोभा सम्पत्ति का दर्शन-सा करा रहे हैं॥ ४६॥

घनोपगूढं गगनं न तारा न भास्करो दर्शनमभ्युपैति।

नवैर्जलौघैर्धरणी वितृप्ता तमोविलिप्ता न दिशः प्रकाशाः॥४७॥

‘मेघों की घटा से समस्त आकाश आच्छादित हो गया है। न रात में तारे दिखायी देते हैं, न दिन में सूर्य नूतन जलराशि पाकर पृथ्वी पूर्ण तृप्त हो गयी है। दिशाएँ अन्धकार से आच्छन्न हो रही हैं, अतएव प्रकाशित नहीं होती हैं उनका स्पष्ट ज्ञान नहीं हो पाता है॥४७॥

महान्ति कूटानि महीधराणां धाराविधौतान्यधिकं विभान्ति।

महाप्रमाणैर्विपुलैः प्रपातैर्मुक्ताकलापैरिव लम्बमानैः॥४८॥

‘जल की धाराओं से घुले हुए पर्वतों के विशाल शिखर मोतियों के लटकते हुए हारों की भाँति एवं बहुसंख्यक झरनों के कारण अधिक शोभा पाते हैं। ४८॥

शैलोपलप्रस्खलमानवेगाः शैलोत्तमानां विपुलाः प्रपाताः।

गुहासु संनादितबर्हिणासु हारा विकीर्यन्त इवावभान्ति॥४९॥

‘पर्वतीय प्रस्तरखण्डों पर गिरने से जिनका वेग टूट गया है, वे श्रेष्ठ पर्वतों के बहुतेरे झरने मयूरों की बोली से गूंजती हुई गुफाओं में टूटकर बिखरते हुए मोतियों के हारों के समान प्रतीत होते हैं॥ ४९॥

शीघ्रप्रवेगा विपुलाः प्रपाता निधीतशृङ्गोपतला गिरीणाम्।

मुक्ताकलापप्रतिमाः पतन्तो महागुहोत्सङ्गतलैर्धियन्ते॥५०॥

‘जिनके वेग शीघ्रगामी हैं, जिनकी संख्या अधिक है, जिन्होंने पर्वतीय शिखरों के निम्न प्रदेशों को धोकर स्वच्छ बना दिया है तथा जो देखने में मुक्तामालाओं के समान प्रतीत होते हैं, पर्वतों के उन झरते हुए झरनों को बड़ी-बड़ी गुफाएँ अपनी गोद में धारण कर लेती हैं।

सुरतामर्दविच्छिन्नाः स्वर्गस्त्रीहारमौक्तिकाः।

पतन्ति चातुला दिक्षु तोयधाराः समन्ततः॥५१॥

‘सुरत-क्रीडा के समय होने वाले अङ्गों के आमर्दन से टूटे हुए देवाङ्गनाओं के मौक्तिक हारों के समान प्रतीत होने वाली जल की अनुपम धाराएँ सम्पूर्ण दिशाओं में सब ओर गिर रही हैं। ५१॥

विलीयमानैर्विहगैर्निमीलद्भिश्च पङ्कजैः।

विकसन्त्या च मालत्या गतोऽस्तं ज्ञायते रविः॥ ५२॥

‘पक्षी अपने घोसलों में छिप रहे हैं, कमल संकुचित हो रहे हैं और मालती खिलने लगी है; इससे जान पड़ता है कि सूर्यदेव अस्त हो गये॥५२॥

वृत्ता यात्रा नरेन्द्राणां सेना पथ्येव वर्तते।

वैराणि चैव मार्गाश्च सलिलेन समीकृताः॥ ५३॥

‘राजाओं की युद्ध-यात्रा रुक गयी। प्रस्थित हुई सेना भी रास्ते में ही पड़ाव डाले पड़ी है। वर्षा के जलने राजाओं के वैर शान्त कर दिये हैं और मार्ग भी रोक दिये हैं। इस प्रकार वैर और मार्ग दोनों की एक-सी अवस्था कर दी है॥ ५३॥

मासि प्रौष्ठपदे ब्रह्म ब्राह्मणानां विवक्षताम्।

अयमध्यायसमयः सामगानामुपस्थितः॥५४॥

‘भादों का महीना आ गया। यह वेदों के स्वाध्याय की इच्छा रखने वाले ब्राह्मणों के लिये उपाकर्म का समय उपस्थित हुआ है। सामगान करने वाले विद्वानों के स्वाध्याय का भी यही समय है। ५४॥

निवृत्तकर्मायतनो नूनं संचितसंचयः।

आषाढीमभ्युपगतो भरतः कोसलाधिपः॥५५॥

‘कोसलदेश के राजा भरत ने चार महीने के लिये आवश्यक वस्तुओं का संग्रह करके गत आषाढ की पूर्णिमा को निश्चय ही किसी उत्तम व्रत की दीक्षा ली होगी॥ ५५॥

नूनमापूर्यमाणायाः सरय्वा वर्धते रयः।

मां समीक्ष्य समायान्तमयोध्याया इव स्वनः॥ ५६॥

‘मुझे वन की ओर आते देख जिस प्रकार अयोध्यापुरी के लोगों का आर्तनाद बढ़ गया था, उसी प्रकार इस समय वर्षा के जल से परिपूर्ण होती हुई सरयू नदी का वेग अवश्य ही बढ़ रहा होगा॥५६॥

इमाः स्फीतगुणा वर्षाः सुग्रीवः सुखमश्नुते।

विजितारिः सदारश्च राज्ये महति च स्थितः॥ ५७॥

‘यह वर्षा अनेक गुणों से सम्पन्न है। इस समय सुग्रीव अपने शत्रु को परास्त करके विशाल वानर राज्य पर प्रतिष्ठित हैं और अपनी स्त्री के साथ रहकर सुख भोग रहे हैं॥ ५७॥

अहं तु हृतदारश्च राज्याच्च महतश्च्युतः।

नदीकूलमिव क्लिन्नमवसीदामि लक्ष्मण ॥५८॥

‘किंतु लक्ष्मण ! मैं अपने महान् राज्य से तो भ्रष्ट हो ही गया हूँ, मेरी स्त्री भी हर ली गयी है; इसलिये पानी से गले हुए नदी के तट की भाँति कष्ट पा रहा हूँ।

शोकश्च मम विस्तीर्णो वर्षाश्च भृशदुर्गमाः।

रावणश्च महाञ्छत्रुरपारः प्रतिभाति मे॥५९॥

‘मेरा शोक बढ़ गया है। मेरे लिये वर्षा के दिनों को बिताना अत्यन्त कठिन हो गया है और मेरा महान् शत्रु रावण भी मुझे अजेय-सा प्रतीत होता है॥ ५९॥

अयात्रां चैव दृष्ट्वेमां मार्गांश्च भृशदुर्गमान्।

प्रणते चैव सुग्रीवे न मया किंचिदीरितम्॥६०॥

‘एक तो यह यात्राका समय नहीं है, दूसरे मार्ग भी अत्यन्त दुर्गम है। इसलिये सुग्रीव के नतमस्तक होने पर भी मैंने उनसे कुछ कहा नहीं है॥ ६० ॥

अपि चापि परिक्लिष्टं चिराद् दारैः समागतम्।

आत्मकार्यगरीयस्त्वाद् वक्तुं नेच्छामि वानरम्॥

‘वानर सुग्रीव बहुत दिनों से कष्ट भोगते थे और दीर्घकाल के पश्चात् अब अपनी पत्नी से मिले हैं। इधर मेरा कार्य बड़ा भारी है (थोड़े दिनों में सिद्ध होने वाला नहीं है); इसलिये मैं इस समय उससे कुछ कहना नहीं चाहता हूँ॥

स्वयमेव हि विश्रम्य ज्ञात्वा कालमुपागतम्।

उपकारं च सुग्रीवो वेत्स्यते नात्र संशयः॥६२॥

‘कुछ दिनों तक विश्राम करके उपयुक्त समय आया हुआ जान वे स्वयं ही मेरे उपकार को समझेंगे; इसमें संशय नहीं है॥ ६२॥

तस्मात् कालप्रतीक्षोऽहं स्थितोऽस्मि शुभलक्षण।

सुग्रीवस्य नदीनां च प्रसादमभिकांक्षयन्॥६३॥

‘अतः शुभलक्षण लक्ष्मण! मैं सुग्रीव की प्रसन्नता और नदियों के जल की स्वच्छता चाहता हुआ शरत्काल की प्रतीक्षा में चुपचाप बैठा हुआ हूँ॥ ६३॥

उपकारेण वीरो हि प्रतीकारेण युज्यते।

अकृतज्ञोऽप्रतिकृतो हन्ति सत्त्ववतां मनः॥६४॥

‘जो वीर पुरुष किसी के उपकार से उपकृत होता है, वह प्रत्युपकार करके उसका बदला अवश्य चुकाता है; किंतु यदि कोई उपकार को न मानकर या भुलाकर प्रत्युपकार से मुँह मोड़ लेता है, वह शक्तिशाली श्रेष्ठ पुरुषों के मन को ठेस पहुँचाता है’॥ ६४॥

अथैवमुक्तः प्रणिधाय लक्ष्मणः कृताञ्जलिस्तत् प्रतिपूज्य भाषितम्।

उवाच रामं स्वभिरामदर्शनं प्रदर्शयन् दर्शनमात्मनः शुभम्॥६५॥

श्रीरामचन्द्रजी के ऐसा कहने पर लक्ष्मण ने सोचविचारकर उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की और दोनों हाथ जोड़कर अपनी शुभ दृष्टि का परिचय देते हुए वे नयनाभिराम श्रीराम से इस प्रकार बोले॥६५॥

यदुक्तमेतत् तव सर्वमीप्सितं नरेन्द्र कर्ता नचिराद्धरीश्वरः।

शरत्प्रतीक्षः क्षमतामिमं भवान् जलप्रपातं रिपुनिग्रहे धृतः॥६६॥

‘नरेश्वर! जैसा कि आपने कहा है, वानरराज सुग्रीव शीघ्र ही आपका यह सारा मनोरथ सिद्ध करेंगे। अतः आप शत्रु के संहार करने का दृढ़ निश्चय लिये शरत्काल की प्रतीक्षा कीजिये और इस वर्षाकाल के विलम्ब को सहन कीजिये॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डेऽष्टाविंशः सर्गः॥२८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में अट्ठाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥२८॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

हनुमान जी के समझाने से सुग्रीव का नील को वानर-सैनिकों को एकत्र करने का आदेश देना

एकोनत्रिंशः सर्गः

सर्ग-29


समीक्ष्य विमलं व्योम गतविद्युबलाहकम्।

सारसाकुलसंघुष्टं रम्यज्योत्स्नानुलेपनम्॥१॥

समृद्धार्थं च सुग्रीवं मन्दधर्मार्थसंग्रहम्।

अत्यर्थं चासतां मार्गमेकान्तगतमानसम्॥२॥

निवृत्तकार्यं सिद्धार्थं प्रमदाभिरतं सदा।

प्राप्तवन्तमभिप्रेतान् सर्वानेव मनोरथान्॥३॥

स्वां च पत्नीमभिप्रेतां तारां चापि समीप्सिताम्।

विहरन्तमहोरात्रं कृतार्थं विगतज्वरम्॥४॥

क्रीडन्तमिव देवेशं गन्धर्वाप्सरसां गणैः।

मन्त्रिषु न्यस्तकार्यं च मन्त्रिणामनवेक्षकम्॥५॥

उच्छिन्नराज्यसंदेहं कामवृत्तमिव स्थितम्।

निश्चितार्थोऽर्थतत्त्वज्ञः कालधर्मविशेषवित्॥६॥

प्रसाद्य वाक्यैर्विविधैर्हेतुमद्भिर्मनोरमैः।

वाक्यविद् वाक्यतत्त्वज्ञं हरीशं मारुतात्मजः॥ ७॥

हितं तथ्यं च पथ्यं च सामधर्मार्थनीतिमत्।

प्रणयप्रीतिसंयुक्तं विश्वासकृतनिश्चयम्॥८॥

हरीश्वरमुपागम्य हनूमान् वाक्यमब्रवीत्।

पवनकुमार हनुमान् शास्त्र के निश्चित सिद्धान्त को जानने वाले थे क्या करना चाहिये और क्या नहीं— इन सभी बातों का उन्हें यथार्थ ज्ञान था। किस समय किस विशेष धर्म का पालन करना चाहिये—इसको भी वे ठीक-ठीक समझते थे। उन्हें बातचीत करने की कला का भी अच्छा ज्ञान था। उन्होंने देखा, आकाश निर्मल हो गया है। अब उसमें न तो बिजली चमकती है और न बादल ही दिखायी देते हैं। अन्तरिक्ष में सब ओर सारस उड़ रहे हैं और उनकी बोली सुनायी देती है। (चन्द्रोदय होने पर) आकाश ऐसा जान पड़ता है, मानो उस पर श्वेत चन्दनसदृश रमणीय चाँदनी का लेप चढ़ा दिया गया हो। सुग्रीव का प्रयोजन सिद्ध हो जाने के कारण अब वे धर्म और अर्थ के संग्रह में शिथिलता दिखाने लगे हैं। असाधु पुरुषों के मार्ग (कामसेवन) का ही अधिक आश्रय ले रहे हैं। एकान्त में ही (जहाँ स्त्रियों के सङ्ग में कोई बाधा न पड़े) उनका मन लगता है। उनका काम पूरा हो गया है। उनके अभीष्ट प्रयोजन की सिद्धि हो चुकी है। अब वे सदा युवती स्त्रियों के साथ क्रीडा-विलास में ही लगे रहते हैं। उन्होंने अपने सारे अभिलषित मनोरथों को प्राप्त कर लिया है। अपनी मनोवाञ्छित पत्नी रुमा तथा अभीष्ट सुन्दरी तारा को भी प्राप्त करके अब वे कृतकृत्य एवं निश्चिन्त होकर दिन-रात भोगविलास में लगे रहते हैं। जैसे देवराज इन्द्र गन्धर्वो और अप्सराओं के समुदाय के साथ क्रीडा में तत्पर रहते हैं, उसी प्रकार सुग्रीव भी अपने मन्त्रियों पर राजकार्य का भार रखकर क्रीडा-विहार में तत्पर हैं। मन्त्रियों के कार्यों की देखभाल वे कभी नहीं करते हैं। मन्त्रियों की सज्जनता के कारण यद्यपि राज्य को किसी प्रकार की हानि पहुँचने का संदेह नहीं है, तथापि स्वयं सुग्रीव ही स्वेच्छाचारी-से हो रहे हैं। यह सब सोचकर हनुमान जी वानरराज सुग्रीवके पास गये और उन्हें युक्तियुक्त विविध एवं मनोरम वचनों के द्वारा प्रसन्न करके बातचीत का मर्म समझने वाले उन सुग्रीव से हितकर, सत्य, लाभदायक, साम, धर्म और अर्थ-नीति से युक्त, शास्त्रविश्वासी पुरुषों के सुदृढ़ निश्चय से सम्पन्न तथा प्रेम और प्रसन्नता से भरे वचन बोले॥१–८ १/२॥

राज्यं प्राप्तं यशश्चैव कौली श्रीरभिवर्धिता॥९॥

मित्राणां संग्रहः शेषस्तद् भवान् कर्तुमर्हति।

‘राजन्! आपने राज्य और यश प्राप्त कर लिया तथा कुलपरम्परा से आयी हुई लक्ष्मी को भी बढ़ाया; किंतु अभी मित्रों को अपनाने का कार्य शेष रह गया है, उसे आपको इस समय पूर्ण करना चाहिये॥९ १/२॥

यो हि मित्रेषु कालज्ञः सततं साधु वर्तते॥१०॥

तस्य राज्यं च कीर्तिश्च प्रतापश्चापि वर्धते।

‘जो राजा ‘कब प्रत्युपकार करना चाहिये’ इस बात को जानकर मित्रों के प्रति सदा साधुतापूर्ण बर्ताव करता है, उसके राज्य, यश और प्रतापकी वृद्धि होती है।

यस्य कोशश्च दण्डश्च मित्राण्यात्मा च भूमिप।

समान्येतानि सर्वाणि स राज्यं महदश्नुते॥११॥

‘पृथ्वीनाथ! जिस राजा का कोश, दण्ड (सेना), मित्र और अपना शरीर—ये सब-के-सब समान रूप से उसके वश में रहते हैं, वह विशाल राज्य का पालन एवं उपभोग करता है॥ ११॥

तद् भवान् वृत्तसम्पन्नः स्थितः पथि निरत्यये।

मित्रार्थमभिनीतार्थं यथावत् कर्तुमर्हति॥१२॥

‘आप सदाचार से सम्पन्न और नित्य सनातन धर्म के मार्ग पर स्थित हैं; अतः मित्र के कार्य को सफल बनाने के लिये जो प्रतिज्ञा की है, उसे यथोचित रूप से पूर्ण कीजिये॥

संत्यज्य सर्वकर्माणि मित्रार्थे यो न वर्तते।

सम्भ्रमाद् विकृतोत्साहः सोऽन, वरुध्यते॥

‘जो अपने सब कार्यों को छोड़कर मित्र का कार्य सिद्ध करने के लिये विशेष उत्साहपूर्वक शीघ्रता के साथ नहीं लग जाता है, उसे अनर्थ का भागी होना पड़ता है।

यो हि कालव्यतीतेषु मित्रकार्येषु वर्तते।

स कृत्वा महतोऽप्यर्थान्न मित्रार्थेन युज्यते॥ १४॥

‘कार्यसाधन का उपयुक्त अवसर बीत जाने के बाद जो मित्र के कार्यों में लगता है, वह बड़े-से-बड़े कार्यों को सिद्ध करके भी मित्र के प्रयोजन को सिद्ध करनेवाला नहीं माना जाता है॥ १४ ॥

तदिदं मित्रकार्यं नः कालातीतमरिंदम।

क्रियतां राघवस्यैतद् वैदेह्याः परिमार्गणम्॥ १५॥

‘शत्रुदमन! भगवान् श्रीराम हमारे परम सुहृद् हैं। उनके इस कार्य का समय बीता जा रहा है; अतः विदेहकुमारी सीता की खोज आरम्भ कर देनी चाहिये॥

न च कालमतीतं ते निवेदयति कालवित्।

त्वरमाणोऽपि स प्राज्ञस्तव राजन् वशानुगः॥ १६॥

‘राजन् ! परम बुद्धिमान् श्रीराम समय का ज्ञान रखते हैं और उन्हें अपने कार्य की सिद्धि के लिये जल्दी लगी हुई है, तो भी वे आपके अधीन बने हुए हैं। संकोचवश आपसे नहीं कहते कि मेरे कार्य का समय बीत रहा है॥१६॥

कुलस्य हेतुः स्फीतस्य दीर्घबन्धुश्च राघवः।

अप्रमेयप्रभावश्च स्वयं चाप्रतिमो गुणैः॥१७॥

तस्य त्वं कुरु वै कार्यं पूर्वं तेन कृतं तव।

हरीश्वर कपिश्रेष्ठानाज्ञापयितुमर्हसि ॥१८॥

‘वानरराज! भगवान् श्रीराम चिरकाल तक मित्रता निभाने वाले हैं। वे आपके समृद्धिशाली कुल के अभ्युदय के हेतु हैं। उनका प्रभाव अतुलनीय है। वे गुणों में अपना शानी नहीं रखते हैं। अब आप उनका कार्य सिद्ध कीजिये; क्योंकि उन्होंने आपका काम पहले ही सिद्ध कर दिया है। आप प्रधान-प्रधान वानरों को इस कार्य के लिये आज्ञा दीजिये॥ १७-१८ ॥

नहि तावद् भवेत् कालो व्यतीतश्चोदनादृते।

चोदितस्य हि कार्यस्य भवेत् कालव्यतिक्रमः॥ १९॥

‘श्रीरामचन्द्रजी के कहने के पहले ही यदि हमलोग कार्य प्रारम्भ कर दें तो समय बीता हुआ नहीं माना जायगा; किंतु यदि उन्हें इसके लिये प्रेरणा करनी पड़ी तो यही समझा जायगा कि हमने समय बिता दिया है— उनके कार्य में बहुत विलम्ब कर दिया है। १९॥

अकर्तुरपि कार्यस्य भवान् कर्ता हरीश्वर।

किं पुनः प्रतिकर्तुस्ते राज्येन च वधेन च॥२०॥

वानरराज! जिसने आपका कोई उपकार नहीं किया हो, उसका कार्य भी आप सिद्ध करने वाले हैं फिर जिन्होंने वाली का वध तथा राज्य प्रदान करके आपका उपकार किया है, उनका कार्य आप शीघ्र सिद्ध करें, इसके लिये तो कहना ही क्या है॥ २० ॥

शक्तिमानतिविक्रान्तो वानरसंगणेश्वर।

कर्तुं दाशरथेः प्रीतिमाज्ञायां किं नु सज्जसे॥ २१॥

‘वानर और भालू-समुदाय के स्वामी सुग्रीव! आप शक्तिमान् और अत्यन्त पराक्रमी हैं; फिर भी दशरथनन्दन श्रीराम का प्रिय कार्य करने के लिये वानरों को आज्ञा देने में क्यों विलम्ब करते हैं? ॥ २१ ॥

कामं खलु शरैः शक्तः सुरासुरमहोरगान्।

वशे दाशरथिः कर्तुं त्वत्प्रतिज्ञामवेक्षते॥२२॥

‘इसमें संदेह नहीं कि दशरथकुमार भगवान् श्रीराम अपने बाणों से समस्त देवताओं, असुरों और बड़े बड़े नागों को भी अपने वश में कर सकते हैं, तथापि आपने जो उनके कार्य को सिद्ध करने की प्रतिज्ञा की है, उसी की वे राह देख रहे हैं॥ २२ ॥

प्राणत्यागाविशंकेन कृतं तेन महत् प्रियम्।

तस्य मार्गाम वैदेहीं पृथिव्यामपि चाम्बरे ॥ २३॥

‘उन्हें आपके लिये वाली के प्राण तक लेने में हिचक नहीं हुई। वे आपका बहुत बड़ा प्रिय कार्य कर चुके हैं; अतः अब हमलोग उनकी पत्नी विदेहकुमारी सीता का इस भूतल पर और आकाश में भी पता लगावें॥

देवदानवगन्धर्वा असुराः समरुद्गणाः।

न च यक्षा भयं तस्य कुर्युः किमिव राक्षसाः॥ २४॥

‘देवता, दानव, गन्धर्व, असुर, मरुद्गण तथा यक्ष भी श्रीराम को भय नहीं पहुँचा सकते; फिर राक्षसों की तो बिसात ही क्या है॥२४॥

तदेवं शक्तियुक्तस्य पूर्वं प्रतिकृतस्तथा।

रामस्यार्हसि पिङ्गेश कर्तुं सर्वात्मना प्रियम्॥ २५॥

‘वानरराज! ऐसे शक्तिशाली तथा पहले ही उपकार करने वाले भगवान् श्रीराम का प्रिय कार्य आपको अपनी सारी शक्ति लगाकर करना चाहिये॥२५॥

नाधस्तादवनौ नाप्सु गतिर्नोपरि चाम्बरे।

कस्यचित् सज्जतेऽस्माकं कपीश्वर तवाज्ञया॥ २६॥

‘कपीश्वर! आपकी आज्ञा हो जाय तो जल में, थल में, नीचे (पातालमें) तथा ऊपर आकाश में— कहीं भी हम लोगों की गति रुक नहीं सकती॥ २६॥

तदाज्ञापय कः किं ते कुतो वापि व्यवस्यतु।

हरयो ह्यप्रधृष्यास्ते सन्ति कोट्यग्रतोऽनघ॥२७॥

‘निष्पाप कपिराज! अतः आप आज्ञा दीजिये कि कौन कहाँ से आपकी किस आज्ञा का पालन करने के लिये उद्योग करे। आपके अधीन करोड़ों से भी अधिक ऐसे वानर मौजूद हैं, जिन्हें कोई परास्त नहीं कर सकता’॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा काले साधु निरूपितम्।

सुग्रीवः सत्त्वसम्पन्नश्चकार मतिमुत्तमाम्॥२८॥

सुग्रीव सत्त्वगुण से सम्पन्न थे। उन्होंने हनुमान जी के द्वारा ठीक समय पर अच्छे ढंग से कही हुई उपर्युक्त बातें सुनकर भगवान् श्रीराम का कार्य सिद्ध करने के लिये अत्यन्त उत्तम निश्चय किया॥२८॥

संदिदेशातिमतिमान् नीलं नित्यकृतोद्यमम्।

दिक्षु सर्वासु सर्वेषां सैन्यानामुपसंग्रहे ॥ २९॥

यथा सेना समग्रा मे यूथपालाश्च सर्वशः।

समागच्छन्त्यसलेन सेनापये ण तथा कुरु॥३०॥

वे परम बुद्धिमान् थे। अतः नित्य उद्यमशील नील नामक वानर को उन्होंने समस्त दिशाओं से सम्पूर्ण वानर-सेनाओं को एकत्र करने के लिये आज्ञा दी और कहा—’तुम ऐसा प्रयत्न करो, जिससे मेरी सारी सेना यहाँ इकट्ठी हो जाय और सभी यूथपति अपनी सेना एवं सेनापतियों के साथ अविलम्ब उपस्थित हो जायँ॥ २९-३०॥

ये त्वन्तपालाः प्लवगाः शीघ्रगा व्यवसायिनः।

समानयन्तु ते शीघ्रं त्वरिताः शासनान्मम।

स्वयं चानन्तरं कार्यं भवानेवानुपश्यतु॥३१॥

‘राज्य-सीमा की रक्षा करने वाले जो-जो उद्योगी और शीघ्रगामी वानर हैं, वे सब मेरी आज्ञा से शीघ्र यहाँ आ जायें। उसके बाद जो कुछ कर्तव्य हो, उसपर तुम स्वयं ही ध्यान दो॥ ३१॥

त्रिपञ्चरात्रादूर्ध्वं यः प्राप्नुयादिह वानरः।

तस्य प्राणान्तिको दण्डो नात्र कार्या विचारणा॥ ३२॥

‘जो वानर पंद्रह दिनों के बाद यहाँ पहुँचेगा, उसे प्राणान्त दण्ड दिया जायगा। इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये॥ ३२॥

हरीश्च वृद्धानुपयातु साङ्गदो भवान् ममाज्ञामधिकृत्य निश्चितम्।

इति व्यवस्थां हरिपुङ्गवेश्वरो विधाय वेश्म प्रविवेश वीर्यवान्॥३३॥

‘यह मेरी निश्चित आज्ञा है। इसके अनुसार इस व्यवस्थाका अधिकार लेकर अङ्गद के साथ तुम स्वयं बड़े-बूढ़े वानरों के पास जाओ।’ ऐसा प्रबन्ध करके महाबली वानरराज सुग्रीव अपने महल में चले गये॥ ३३॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे एकोनत्रिंशः सर्गः ॥२९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में उन्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥२९॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

शरद्-ऋतु का वर्णन तथा श्रीराम का लक्ष्मण को सुग्रीव के पास जाने का आदेश देना

त्रिंशः सर्गः

सर्ग-30


गृहं प्रविष्टे सुग्रीवे विमुक्ते गगने घनैः।

वर्षरात्रे स्थितो रामः कामशोकाभिपीडितः॥१॥

पूर्वोक्त आदेश देकर सुग्रीव तो अपने महल में चले गये और उधर श्रीरामचन्द्रजी, जो वर्षा की रातों में प्रस्रवणगिरि पर निवास करते थे, आकाश के मेघों से मुक्त एवं निर्मल हो जाने पर सीता से मिलने की उत्कण्ठा लिये उनके विरहजन्य शोक से अत्यन्त पीड़ा का अनुभव करने लगे॥१॥

पाण्डुरं गगनं दृष्ट्वा विमलं चन्द्रमण्डलम्।

शारदीं रजनीं चैव दृष्ट्वा ज्योत्स्नानुलेपनाम्॥२॥

उन्होंने देखा, आकाश श्वेत वर्ण का हो रहा है, चन्द्रमण्डल स्वच्छ दिखायी देता है तथा शरद्ऋतु की रजनी के अङ्गों पर चाँदनी का अङ्गराग लगा हुआ है। यह सब देखकर वे सीता से मिलने के लिये व्याकुल हो उठे॥

कामवृत्तं च सुग्रीवं नष्टां च जनकात्मजाम्।

दृष्ट्वा कालमतीतं च मुमोह परमातुरः॥३॥

उन्होंने सोचा ‘सुग्रीव काम में आसक्त हो रहा है, जनककुमारी सीता का अब तक कुछ पता नहीं लगा हैऔर रावण पर चढ़ाई करने का समय भी बीता जा रहा है।’ यह सब देखकर अत्यन्त आतुर हुए श्रीराम का हृदय व्याकुल हो उठा॥३॥

स तु संज्ञामुपागम्य मुहूर्तान्मतिमान् नृपः।

मनःस्थामपि वैदेहीं चिन्तयामास राघवः॥४॥

दो घड़ी के बाद जब उनका मन कुछ स्वस्थ हुआ, तब वे बुद्धिमान् नरेश श्रीरघुनाथजी अपने मन में बसी हुई विदेहनन्दिनी सीता का चिन्तन करने लगे॥ ४॥

दृष्ट्वा च विमलं व्योम गतविद्युबलाहकम्।

सारसारावसंघुष्टं विललापार्तया गिरा॥५॥

उन्होंने देखा, आकाश निर्मल है न कहीं बिजलीकी गड़गड़ाहट है न मेघों की घटा। वहाँ सब ओर सारसों की बोली सुनायी देती है। यह सब देखकर वे आर्तवाणी में विलाप करने लगे॥५॥

आसीनः पर्वतस्याग्रे हेमधातुविभूषिते।

शारदं गगनं दृष्ट्वा जगाम मनसा प्रियाम्॥६॥

सुनहरे रंग की धातुओं से विभूषित पर्वतशिखर पर बैठे हुए श्रीरामचन्द्रजी शरत्काल के स्वच्छ आकाश की ओर दृष्टिपात करके मन-ही-मन अपनी प्यारी पत्नी सीता का ध्यान करने लगे॥६॥

सारसारावसंनादैः सारसारावनादिनी।

याऽऽश्रमे रमते बाला साद्य मे रमते कथम्॥७॥

वे बोले—’जिसकी बोली सारसों की आवाज के समान मीठी थी तथा जो मेरे आश्रम पर सारसों द्वारा परस्पर एक-दूसरे को बुलाने के लिये किये गये मधुर शब्दों से मन बहलाती थी, वह मेरी भोलीभाली स्त्री सीता आज किस तरह मनोरञ्जन करती होगी? ॥ ७॥

पुष्पितांश्चासनान् दृष्ट्वा काञ्चनानिव निर्मलान्।

कथं सा रमते बाला पश्यन्ती मामपश्यती॥८॥

‘सुवर्णमय वृक्षों के समान निर्मल और खिले हुए असन नामक वृक्षों को देखकर बार-बार उन्हें निहारती हुई भोली-भाली सीता जब मुझे अपने पास नहीं देखती होगी, तब कैसे उसका मन लगता होगा?॥ ८॥

या पुरा कलहंसानां कलेन कलभाषिणी।

बुध्यते चारुसर्वाङ्गी साद्य मे रमते कथम्॥९॥

‘जिसके सभी अङ्ग मनोहर हैं तथा जो स्वभाव से ही मधुर भाषण करनेवाली है, वह सीता पहले कलहंसों के मधुर शब्द से जागा करती थी; किंतु आज वह मेरी प्रिया वहाँ कैसे प्रसन्न रहती होगी? ॥ ९॥

निःस्वनं चक्रवाकानां निशम्य सहचारिणाम्।

पुण्डरीकविशालाक्षी कथमेषा भविष्यति॥१०॥

‘जिसके विशाल नेत्र प्रफुल्ल कमलदल के समान शोभा पाते हैं, वह मेरी प्रिया जब साथ विचरने वाले चकवों की बोली सुनती होगी, तब उसकी कैसी दशा हो जाती होगी? ॥ १०॥

सरांसि सरितो वापीः काननानि वनानि च।

तां विना मृगशावाक्षीं चरन्नाद्य सुखं लभे॥

‘हाय! मैं नदी, तालाब, बावली, कानन और वन सब जगह घूमता हूँ; परंतु कहीं भी उस मृगशावकनयनी सीता के बिना अब मुझे सुख नहीं मिलता है॥ ११॥

अपि तां मद्वियोगाच्च सौकुमार्याच्च भामिनीम्।

सुदूरं पीडयेत् कामः शरद्गुणनिरन्तरः॥१२॥

‘कहीं ऐसा तो नहीं होगा कि शरद् ऋतु के गुणों से निरन्तर वृद्धि को प्राप्त होने वाला काम भामिनी सीता को अत्यन्त पीड़ित कर दे; क्योंकि ऐसी सम्भावना के दो कारण हैं—एक तो उसे मेरे वियोग का कष्ट है, दूसरे वह अत्यन्त सुकुमारी होने के कारण इस कष्ट को सहन नहीं कर पाती होगी’ ॥ १२ ॥

एवमादि नरश्रेष्ठो विललाप नृपात्मजः।

विहंग इव सारङ्गः सलिलं त्रिदशेश्वरात्॥१३॥

इन्द्र से पानी की याचना करने वाले प्यासे पपीहे की भाँति नरश्रेष्ठ नरेन्द्रकुमार श्रीराम ने इस तरह की बहुत सी बातें कहकर विलाप किया॥१३॥

ततश्चञ्चूर्य रम्येषु फलार्थी गिरिसानुषु।

ददर्श पर्युपावृत्तो लक्ष्मीवाल्लक्ष्मणोऽग्रजम्॥ १४॥

उस समय शोभाशाली लक्ष्मण फल लेने के लिये गये थे। वे पर्वत के रमणीय शिखरों पर घूम-फिरकर जब लौटे तब उन्होंने अपने बड़े भाई की अवस्था पर दृष्टिपात किया॥१४॥

स चिन्तया दुस्सहया परीतं विसंज्ञमेकं विजने मनस्वी।

भ्रातुर्विषादात् त्वरितोऽतिदीनः समीक्ष्य सौमित्रिरुवाच दीनम्॥१५॥

वे दुस्सह चिन्ता में मग्न होकर अचेत-से हो गये थे और एकान्त में अकेले ही दुःखी होकर बैठे थे। उस समय मनस्वी सुमित्राकुमार लक्ष्मण ने जब उन्हें देखा तब वे तुरंत ही भाई के विषाद से अत्यन्त दुःखी हो गये और उनसे इस प्रकार बोले- ॥ १५ ॥

किमार्य कामस्य वशंगतेन किमात्मपौरुष्यपराभवेन ।

अयं ह्रिया संह्रियते समाधिः किमत्र योगेन निवर्तते न॥१६॥

‘आर्य! इस प्रकार काम के अधीन होकर अपने पौरुष का तिरस्कार करने से—पराक्रम को भूल जाने से क्या लाभ होगा? इस लज्जाजनक शोक के कारण आपके चित्त की एकाग्रता नष्ट हो रही है। क्या इस समय योग का सहारा लेने से—मन को एकाग्र करने से यह सारी चिन्ता दूर नहीं हो सकती? ॥ १६॥

क्रियाभियोगं मनसः प्रसाद समाधियोगानुगतं च कालम्।

सहायसामर्थ्यमदीनसत्त्वः स्वकर्महेतुं च कुरुष्व तात॥१७॥

‘तात! आप आवश्यक कर्मों के अनुष्ठान में पूर्णरूप से लग जाइये, मन को प्रसन्न कीजिये और हर समय चित्त की एकाग्रता बनाये रखिये। साथ ही, अन्तःकरण में दीनता को स्थान न देते हुए अपने पराक्रम की वृद्धि के लिये सहायता और शक्ति को बढ़ाने का प्रयत्न कीजिये॥

न जानकी मानववंशनाथ त्वया सनाथा सुलभा परेण।

न चाग्निचूडां ज्वलितामुपेत्य न दह्यते वीर वराह कश्चित्॥१८॥

‘मानववंश के नाथ तथा श्रेष्ठ पुरुषों के भी पूजनीय वीर रघुनन्दन! जिनके स्वामी आप हैं, वे जनकनन्दिनी सीता किसी भी दूसरे पुरुष के लिये सुलभ नहीं हैं; क्योंकि जलती हुई आग की लपट के पास जाकर कोई भी दग्ध हुए बिना नहीं रह सकता’॥ १८॥

सलक्षणं लक्ष्मणमप्रधृष्यं स्वभावजं वाक्यमुवाच रामः।

हितं च पथ्यं च नयप्रसक्तं ससामधर्मार्थसमाहितं च॥१९॥

निस्संशयं कार्यमवेक्षितव्यं क्रियाविशेषोऽप्यनुवर्तितव्यः।

न तु प्रवृद्धस्य दुरासदस्य कुमार वीर्यस्य फलं च चिन्त्यम्॥२०॥

लक्ष्मण उत्तम लक्षणों से सम्पन्न थे। उन्हें कोई परास्त नहीं कर सकता था। भगवान् श्रीरामने उनसे यह स्वाभाविक बात कही—’कुमार! तुमने जो बात कही है, वह वर्तमान समय में हितकर, भविष्य में भी सुख पहुँचाने वाली, राजनीति के सर्वथा अनुकूल तथा सामके साथ-साथ धर्म और अर्थ से भी संयुक्त है। निश्चय ही सीता के अनुसंधान कार्य पर ध्यान देना चाहिये तथा उसके लिये विशेष कार्य या उपाय का भी अनुसरण करना चाहिये; किंतु प्रयत्न छोड़कर पूर्णरूप से बढ़े हुए दुर्लभ एवं बलवान् कर्म के फलपर ही दृष्टि रखना उचित नहीं है’ ॥ १९-२० ॥

अथ पद्मपलाशाक्षीं मैथिलीमनुचिन्तयन्।

उवाच लक्ष्मणं रामो मुखेन परिशुष्यता॥२१॥

तदनन्तर प्रफुल्ल कमलदल के समान नेत्रवाली मिथिलेशकुमारी सीता का बार-बार चिन्तन करते हुए श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण को सम्बोधित करके सूखे हुए (उदास) मुँह से बोले- ॥२१॥

तर्पयित्वा सहस्राक्षः सलिलेन वसुंधराम्।

निवर्तयित्वा सस्यानि कृतकर्मा व्यवस्थितः॥ २२॥

‘सुमित्रानन्दन! सहस्रनेत्रधारी इन्द्र इस पृथ्वी को जल से तृप्त करके यहाँ के अनाजों को पकाकर अब कृतकृत्य हो गये हैं ॥ २२॥

दीर्घगम्भीरनिर्घोषाः शैलद्रुमपुरोगमाः।

विसृज्य सलिलं मेघाः परिशान्ता नृपात्मज॥ २३॥

‘राजकुमार! देखो, जो अत्यन्त गम्भीर स्वर से गर्जना किया करते और पर्वतों, नगरों तथा वृक्षों के ऊपर से होकर निकलते थे, वे मेघ अपना सारा जल बरसाकर शान्त हो गये हैं ॥ २३॥

नीलोत्पलदलश्यामाः श्यामीकृत्वा दिशो दश।

विमदा इव मातङ्गाः शान्तवेगाः पयोधराः॥ २४॥

‘नील कमलदल के समान श्यामवर्णवाले मेघ दसों दिशाओं को श्याम बनाकर मदरहित गजराजों के समान वेगशून्य हो गये हैं; उनका वेग शान्त हो गया है॥ २४॥

जलगर्भा महावेगाः कुटजार्जुनगन्धिनः।

चरित्वा विरताः सौम्य वृष्टिवाताः समुद्यताः॥ २५॥

‘सौम्य! जिनके भीतर जल विद्यमान था तथा जिनमें कुटज और अर्जुन के फूलों की सुगन्ध भरी हुई थी, वे अत्यन्त वेगशाली झंझावात उमड़-घुमड़कर सम्पूर्ण दिशाओं में विचरण करके अब शान्त हो गये हैं।

घनानां वारणानां च मयूराणां च लक्ष्मण।

नादः प्रस्रवणानां च प्रशान्तः सहसानघ ॥२६॥

‘निष्पाप लक्ष्मण! बादलों, हाथियों, मोरों और झरनों के शब्द इस समय सहसा शान्त हो गये हैं। २६॥

अभिवृष्टा महामेधैर्निर्मलाश्चित्रसानवः।

अनुलिप्ता इवाभान्ति गिरयश्चन्द्ररश्मिभिः॥ २७॥

‘महान् मेघों द्वारा बरसाये हुए जल से घुल जाने के कारण ये विचित्र शिखरों वाले पर्वत अत्यन्त निर्मल हो गये हैं। इन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता है, मानो चन्द्रमा की किरणों द्वारा इनके ऊपर सफेदी कर दी गयी है॥२७॥

शाखासु सप्तच्छदपादपानां प्रभासु तारार्कनिशाकराणाम्।

लीलासु चैवोत्तमवारणानां श्रियं विभज्याद्य शरत्प्रवृत्ता॥२८॥

‘आज शरद्-ऋतु सप्तच्छद (छितवन) की डालियों में, सूर्य, चन्द्रमा और तारोंकी प्रभामें तथा श्रेष्ठ गजराजों की लीलाओं में अपनी शोभा बाँटकर आयी है॥२८॥

सम्प्रत्यनेकाश्रयचित्रशोभा लक्ष्मीः शरत्कालगुणोपपन्ना।

सूर्याग्रहस्तप्रतिबोधितेषु पद्माकरेष्वभ्यधिकं विभाति॥२९॥

‘इस समय शरत्काल के गुणों से सम्पन्न हुई लक्ष्मी यद्यपि अनेक आश्रयों में विभक्त होकर विचित्र शोभा धारण करती हैं, तथापि सूर्य की प्रथम किरणों से विकसित हुए कमल-वनों में वे सबसे अधिक सुशोभित होती हैं।

सप्तच्छदानां कुसुमोपगन्धी षट्पादवृन्दैरनुगीयमानः।

मत्तद्विपानां पवनानुसारी दर्प विनेष्यन्नधिकं विभाति॥३०॥

‘छितवन के फूलों की सुगन्ध धारण करने वाला शरत्काल स्वभावतः वायु का अनुसरण कर रहा है। भ्रमरों के समूह उसके गुणगान कर रहे हैं। वह मार्ग के जल को सोखता और मतवाले हाथियों के दर्प को बढ़ाता हुआ अधिक शोभा पा रहा है॥ ३० ॥

अभ्यागतैश्चारुविशालपक्षैः स्मरप्रियैः पद्मरजोऽवकीर्णैः ।

महानदीनां पुलिनोपयातैः क्रीडन्ति हंसाः सह चक्रवाकैः॥३१॥

‘जिनके पंख सुन्दर और विशाल हैं, जिन्हें कामक्रीडा अधिक प्रिय है, जिनके ऊपर कमलों के पराग बिखरे हुए हैं, जो बड़ी-बड़ी नदियों के तटों पर उतरे हैं और मानसरोवर से साथ ही आये हैं, उन चक्रवाकों के साथ हंस क्रीडा कर रहे हैं॥ ३१॥

मदप्रगल्भेषु च वारणेषु गवां समूहेषु च दर्पितेषु।

प्रसन्नतोयासु च निम्नगासु विभाति लक्ष्मीबहुधा विभक्ता॥३२॥

‘मदमत्त गजराजों में, दर्प-भरे वृषभों के समूहों में तथा स्वच्छ जलवाली सरिताओं में नाना रूपों में विभक्त हुई लक्ष्मी विशेष शोभा पा रही है॥ ३२॥

नभः समीक्ष्याम्बुधरैर्विमुक्तं विमुक्तबर्हाभरणा वनेषु।

प्रियास्वरक्ता विनिवृत्तशोभा गतोत्सवा ध्यानपरा मयूराः॥३३॥

‘आकाश को बादलों से शून्य हुआ देख वनों में पंखरूपी आभूषणों का परित्याग करने वाले मोर अपनी प्रियतमाओं से विरक्त हो गये हैं। उनकी शोभा नष्ट हो गयी है और वे आनन्दशून्य हो ध्यानमग्न होकर बैठे

मनोज्ञगन्धैः प्रियकैरनल्पैः पुष्पातिभारावनतानशाखैः।

सुवर्णगौरैर्नयनाभिरामैरुद्योतितानीव वनान्तराणि॥३४॥

‘वन के भीतर बहुत-से असन नामक वृक्ष खड़े हैं, जिनकी डालियों के अग्रभाग फूलों के अधिक भार से झुक गये हैं। उनपर मनोहर सुगन्ध छा रही है। वे सभी वृक्ष सुवर्ण के समान गौर तथा नेत्रों को आनन्द प्रदान करने वाले हैं। उनके द्वारा वनप्रान्त प्रकाशित-से हो रहे हैं॥ ३४॥

प्रियान्वितानां नलिनीप्रियाणां वने प्रियाणां कुसुमोद्गतानाम्।

मदोत्कटानां मदलालसानां गजोत्तमानां गतयोऽद्य मन्दाः॥ ३५॥

‘जो अपनी प्रियतमाओं के साथ विचरते हैं, जिन्हें कमल के पुष्प तथा वन अधिक प्रिय हैं, जो छितवन के फूलों को सूंघकर उन्मत्त हो उठे हैं, जिनमें अधिक मद है तथा जिन्हें मदजनित कामभोग की लालसा बनी हुई है, उन गजराजों की गति आज मन्द हो गयी है॥ ३५॥

व्यक्तं नभः शस्त्रविधौतवर्णं कृशप्रवाहानि नदीजलानि।

कलारशीताः पवनाः प्रवान्ति तमो विमुक्ताश्च दिशः प्रकाशाः॥३६॥

‘इस समय आकाश का रंग शान पर चढ़े हुए शस्त्र की धार के समान स्वच्छ दिखायी देता है, नदियों के जल मन्दगति से प्रवाहित हो रहे हैं, श्वेत कमल की सुगन्ध लेकर शीतल मन्द वायु चल रही है, दिशाओं का अन्धकार दूर हो गया है और अब उनमें पूर्ण प्रकाश छा रहा है। ३६ ।।

सूर्यातपक्रामणनष्टपङ्का भूमिश्चिरोद्घाटितसान्द्ररेणुः।

अन्योन्यवरेण समायुतानामुद्योगकालोऽद्य नराधिपानाम्॥३७॥

‘घाम लगने से धरती का कीचड़ सूख गया है। अब उस पर बहुत दिनों के बाद घनी धूल प्रकट हुई है। परस्पर वैर रखने वाले राजाओं के लिये युद्ध के निमित्त उद्योग करने का समय अब आ गया है॥३७॥

शरद्गुणाप्यायितरूपशोभाः प्रहर्षिताः पांसुसमुत्थिताङ्गाः।

मदोत्कटाः सम्प्रति युद्धलुब्धा वृषा गवां मध्यगता नदन्ति॥ ३८॥

‘शरद्-ऋतु के गुणों ने जिनके रूप और शोभा को बढ़ा दिया है, जिनके सारे अङ्गों पर धूल छा रही है, जिनके मद की अधिक वृद्धि हुई है तथा जो युद्ध के लिये लुभाये हुए हैं, वे साँड़ इस समय गौओं के बीच में खड़े होकर अत्यन्त हर्षपूर्वक हँकड़ रहे हैं। ३८॥

समन्मथा तीव्रतरानुरागा कुलान्विता मन्दगतिः करेणुः।

मदान्वितं सम्परिवार्य यान्तं वनेषु भर्तारमनुप्रयाति ॥ ३९॥

‘जिसमें कामभाव का उदय हुआ है, इसीलिये जो अत्यन्त तीव्र अनुराग से युक्त है और अच्छे कुल में उत्पन्न हुई है, वह मन्दगति से चलने वाली हथिनी वनों में जाते हुए अपने मदमत्त स्वामी को घेरकर उसका अनुगमन करती है॥ ३९॥

त्यक्त्वा वराण्यात्मविभूषितानि बर्हाणि तीरोपगता नदीनाम्।

निर्भय॑माना इव सारसौघैः प्रयान्ति दीना विमना मयूराः॥४०॥

‘अपने आभूषण रूप श्रेष्ठ पंखों को त्यागकर नदियों के तटों पर आये हुए मोर मानो सारस-समूहों की फटकार सुनकर दुःखी और खिन्नचित्त हो पीछे लौट जाते हैं।

वित्रास्य कारण्डवचक्रवाकान् महारवैर्भिन्नकटा गजेन्द्राः।

सरस्सुबद्धाम्बुजभूषणेषु विक्षोभ्य विक्षोभ्य जलं पिबन्ति॥४१॥

‘जिनके गण्डस्थल से मद की धारा बह रही है, वे गजराज अपनी महती गर्जना से कारण्डवों तथा चक्रवाकों को भयभीत करके विकसित कमलों से विभूषित सरोवरों में जल को हिलोर-हिलोरकर पी रहे हैं॥४१॥

व्यपेतपङ्कासु सवालुकासु प्रसन्नतोयासु सगोकुलासु।

ससारसारावविनादितासु नदीषु हंसा निपतन्ति हृष्टाः॥४२॥

‘जिनके कीचड़ दूर हो गये हैं। जो बालुकाओं से सुशोभित हैं, जिनका जल बहुत ही स्वच्छ है तथा गौओं के समुदाय जिनके जल का सेवन करते हैं, सारसों के कलरवों से गूंजती हुई उन सरिताओं में हंस बड़े हर्ष के साथ उतर रहे हैं॥ ४२ ॥

नदीघनप्रस्रवणोदकानामतिप्रवृद्धानिलबर्हिणानाम्।

प्लवंगमानां च गतोत्सवानां ध्रुवं रवाः सम्प्रति सम्प्रणष्टाः॥४३॥

‘नदी, मेघ, झरनों के जल, प्रचण्ड वायु, मोर और हर्षरहित मेढकों के शब्द निश्चय ही इस समय शान्त हो गये हैं। ४३॥

अनेकवर्णाः सुविनष्टकाया नवोदितेष्वम्बुधरेषु नष्टाः।

क्षुधार्दिता घोरविषा बिलेभ्यश्चिरोषिता विप्रसरन्ति सर्पाः॥४४॥

‘नूतन मेघों के उदित होने पर जो चिरकाल से बिलों में छिपे बैठे थे, जिनकी शरीरयात्रा नष्टप्राय हो गयी थी और इस प्रकार जो मृतवत् हो रहे थे, वे भयंकर विषवाले बहुरंगे सर्प भूख से पीड़ित होकर अब बिलों से बाहर निकल रहे हैं॥४४॥

चञ्चच्चन्द्रकरस्पर्शहर्षोन्मीलिततारका।

अहो रागवती संध्या जहाति स्वयमम्बरम्॥४५॥

‘शोभाशाली चन्द्रमा की किरणों के स्पर्शसे होने वाले हर्ष के कारण जिसके तारे किंचित् प्रकाशित हो रहे हैं (अथवा प्रियतम के कर स्पर्शजनित हर्ष से जिसके नेत्रों की पुतली किंचित् खिल उठी है) वह रागयुक्त संध्या (अथवा अनुरागभरी नायिका) स्वयं ही अम्बर (आकाश अथवा वस्त्र) का त्याग कर रही है, यह कैसे आश्चर्य की बात है ! * ॥ ४५ ॥

* यहाँ संध्या में कामुकी नायिका के व्यवहार का आरोप होने से समासोक्ति अलंकार समझना चाहिये।

रात्रिः शशाङ्कोदितसौम्यवक्त्रा तारागणोन्मीलितचारुनेत्रा।

ज्योत्स्नांशुकप्रावरणा विभाति नारीव शुक्लांशुकसंवृताङ्गी॥४६॥

‘चाँदनी की चादर ओढ़े हुए शरत्काल की यह रात्रि श्वेत साड़ी से ढके हुए अङ्गवाली एक सुन्दरी नारी के समान शोभा पाती है। उदित हुआ चन्द्रमा ही उसका सौम्य मुख है और तारे ही उसकी खुली हुई मनोहर आँखें हैं॥ ४६॥

विपक्वशालिप्रसवानि भुक्त्वा प्रहर्षिता सारसचारुपङ्क्तिः ।

नभः समाक्रामति शीघ्रवेगा वातावधूता ग्रथितेव माला॥४७॥

‘पके हुए धान की बालोंको खाकर हर्ष से भरी हुई और तीव्र वेग से चलने वाली सारसों की वह सुन्दर पंक्ति वायुकम्पित गुंथी हुई पुष्पमाला की भाँति आकाश में उड़ रही है॥४७॥

सुप्तैकहंसं कुमुदैरुपेतं महाह्रदस्थं सलिलं विभाति।

घनैर्विमुक्तं निशि पूर्णचन्द्रं तारागणाकीर्णमिवान्तरिक्षम्॥४८॥

‘कुमुद के फूलों से भरा हुआ उस महान् तालाब का जल जिसमें एक हंस सोया हुआ है, ऐसा जान पड़ता है मानो रात के समय बादलों के आवरण से रहित आकाश सब ओर छिटके हुए तारों से व्याप्त होकर पूर्ण चन्द्रमा के साथ शोभा पा रहा हो॥४८॥

प्रकीर्णहंसाकुलमेखलानां प्रबुद्धपद्मोत्पलमालिनीनाम्।

वाप्युत्तमानामधिकाद्य लक्ष्मीर्वराङ्गनानामिव भूषितानाम्॥४९॥

‘सब ओर बिखरे हुए हंस ही जिनकी फैली हुई मेखला (करधनी) हैं, जो खिले हुए कमलों और उत्पलों की मालाएँ धारण करती हैं। उन उत्तम बावड़ियों की शोभा आज वस्त्राभूषणों से विभूषित हुई सुन्दरी वनिताओं के समान हो रही है॥ ४९॥

वेणुस्वरव्यञ्जिततूर्यमिश्रः प्रत्यूषकालेऽनिलसम्प्रवृत्तः।।

सम्मूर्छितो गर्गरगोवृषाणामन्योन्यमापूरयतीव शब्दः॥५०॥

‘वेणु के स्वर के रूपमें व्यक्त हुए वाद्यघोषसे मिश्रित और प्रातःकाल की वायु से वृद्धि को प्राप्त होकर सब ओर फैला हुआ दही मथने के बड़े-बड़े भाण्डों और साँड़ों का शब्द, मानो एक-दूसरे का पूरक हो रहा है॥५०॥

नवैर्नदीनां कुसुमप्रहासै फ्धूयमानैर्मृदुमारुतेन।

धौतामलक्षौमपटप्रकाशैः कूलानि काशैरुपशोभितानि॥५१॥

‘नदियों के तट मन्द-मन्द वायु से कम्पित, पुष्परूपी हास से सुशोभित और धुले हुए निर्मल रेशमी वस्त्रों के समान प्रकाशित होने वाले नूतन कासों से बड़ी शोभा पा रहे हैं। ५१॥

वनप्रचण्डा मधुपानशौण्डाः प्रियान्विताः षट्चरणाः प्रहृष्टाः।

वनेषु मत्ताः पवनानुयात्रां कुर्वन्ति पद्मासनरेणुगौराः॥५२॥

‘वन में ढिठाई के साथ घूमने वाले तथा कमल और असन के परागों से गौरवर्ण को प्राप्त हुए मतवाले भ्रमर, जो पुष्पों के मकरन्द का पान करने में बड़े चतुर हैं, अपनी प्रियाओं के साथ हर्ष में भरकर वनों में (गन्ध के लोभ से) वायु के पीछे-पीछे जा रहे हैं॥५२॥

जलं प्रसन्नं कुसुमप्रहासं क्रौञ्चस्वनं शालिवनं विपक्वम्।

मृदुश्च वायुर्विमलश्च चन्द्रः शंसन्ति वर्षव्यपनीतकालम्॥५३॥

‘जल स्वच्छ हो गया है, धान की खेती पक गयी है, वायु मन्दगति से चलने लगी है और चन्द्रमा अत्यन्त निर्मल दिखायी देता है ये सब लक्षण उस शरत्काल के आगमन की सूचना देते हैं। जिसमें वर्षा की समाप्ति हो जाती है, क्रौञ्च पक्षी बोलने लगते हैं और फूल उस ऋतु के हास की भाँति खिल उठते हैं ॥ ५३॥

मीनोपसंदर्शितमेखलानां नदीवधूनां गतयोऽद्य मन्दाः।

कान्तोपभुक्तालसगामिनीनां प्रभातकालेष्विव कामिनीनाम्॥५४॥

‘रात को प्रियतम के उपभोग में आकर प्रातःकाल अलसायी गति से चलने वाली कामिनियों की भाँति उन नदीस्वरूपा वधुओं की गति भी आज मन्द हो गयी है, जो मछलियों की मेखला-सी धारण किये हुए हैं। ५४॥

सचक्रवाकानि सशैवलानि काशैर्दुकूलैरिव संवृतानि।

सपत्ररेखाणि सरोचनानि वधूमुखानीव नदीमुखानि॥५५॥

‘नदियों के मुख नव वधुओं के मुँह के समान शोभा पाते हैं। उनमें जो चक्रवाक हैं, वे गोरोचन द्वारा निर्मित तिलक के समान प्रतीत होते हैं, जो सेवार हैं, वे वधू के मुखपर बनी हुई पत्रभङ्गी के समान जान पड़ते हैं तथा जो काश हैं, वे ही मानो श्वेत दुकूल बनकर नदीरूपिणी वधू के मुँह को ढके हुए हैं।॥ ५५ ॥

प्रफुल्लबाणासनचित्रितेषु प्रहृष्टषट्पादनिकूजितेषु।

गृहीतचापोद्यतदण्डचण्डः प्रचण्डचापोऽद्य वनेषु कामः॥५६॥

‘फूले हुए सरकण्डों और असन के वृक्षों से जिनकी विचित्र शोभा हो रही है तथा जिनमें हर्षभरे भ्रमरों की आवाज गूंजती रहती है, उन वनों में आज प्रचण्ड धनुर्धर कामदेव प्रकट हुआ है, जो धनुष हाथ में लेकर विरही जनों को दण्ड देने के लिये उद्यत हो अत्यन्त कोप का परिचय दे रहा है॥५६॥

लोकं सुवृष्टया परितोषयित्वा नदीस्तटाकानि च पूरयित्वा।

निष्पन्नसस्यां वसुधां च कृत्वा त्यक्त्वा नभस्तोयधराः प्रणष्टाः॥५७॥

‘अच्छी वर्षा से लोगों को संतुष्ट करके नदियों और तालाबों को पानी से भरकर तथा भूतल को परिपक्व धान की खेती से सम्पन्न करके बादल आकाश छोड़कर अदृश्य हो गये॥ ५७॥

दर्शयन्ति शरन्नद्यः पुलिनानि शनैः शनैः।

नवसंगमसव्रीडा जघनानीव योषितः॥५८॥

‘शरद् ऋतु की नदियाँ धीरे-धीरे जल के हटने से अपने नग्न तटों को दिखा रही हैं। ठीक उसी तरह जैसे प्रथम समागम के समय लजीली युवतियाँ शनैःशनैः अपने जघन-स्थल को दिखाने के लिये विवश होती हैं।

प्रसन्नसलिलाः सौम्य कुरराभिविनादिताः।

चक्रवाकगणाकीर्णा विभान्ति सलिलाशयाः॥ ५९॥

‘सौम्य! सभी जलाशयों के जल स्वच्छ हो गये हैं। वहाँ कुरर पक्षियों के कलनाद गूंज रहे हैं और चक्रवाकों के समुदाय चारों ओर बिखरे हुए हैं। इस प्रकार उन जलाशयों की बड़ी शोभा हो रही है॥ ५९॥

अन्योन्यबद्धवैराणां जिगीषूणां नृपात्मज।

उद्योगसमयः सौम्य पार्थिवानामुपस्थितः॥६०॥

‘सौम्य! राजकुमार! जिनमें परस्पर वैर बँधा हुआ है और जो एक-दूसरे को जीतने की इच्छा रखते हैं, धान की खेती से सम्पन्न करके बादल आकाश छोड़कर अदृश्य हो गये॥ ५७॥

दर्शयन्ति शरन्नद्यः पुलिनानि शनैः शनैः।

नवसंगमसव्रीडा जघनानीव योषितः॥५८॥

‘शरद् ऋतु की नदियाँ धीरे-धीरे जल के हटने से अपने नग्न तटों को दिखा रही हैं। ठीक उसी तरह जैसे प्रथम समागम के समय लजीली युवतियाँ शनैःशनैः अपने जघन-स्थल को दिखाने के लिये विवश होती हैं।

प्रसन्नसलिलाः सौम्य कुरराभिविनादिताः।

चक्रवाकगणाकीर्णा विभान्ति सलिलाशयाः॥ ५९॥

‘सौम्य! सभी जलाशयों के जल स्वच्छ हो गये हैं। वहाँ कुरर पक्षियों के कलनाद गूंज रहे हैं और चक्रवाकों के समुदाय चारों ओर बिखरे हुए हैं। इस प्रकार उन जलाशयों की बड़ी शोभा हो रही है॥ ५९॥

अन्योन्यबद्धवैराणां जिगीषूणां नृपात्मज।

उद्योगसमयः सौम्य पार्थिवानामुपस्थितः॥६०॥

‘सौम्य! राजकुमार! जिनमें परस्पर वैर बँधा हुआ है और जो एक-दूसरे को जीतने की इच्छा रखते हैं, उन भूमिपालों के लिये यह युद्ध के निमित्त उद्योग करने का समय उपस्थित हुआ है॥ ६०॥

इयं सा प्रथमा यात्रा पार्थिवानां नृपात्मज।

न च पश्यामि सुग्रीवमुद्योगं च तथाविधम्॥ ६१॥

‘नरेशनन्दन! राजाओं की विजय-यात्रा का यह प्रथम अवसर है, किंतु न तो मैं सुग्रीव को यहाँ उपस्थित देखता हूँ और न उनका कोई वैसा उद्योग ही दृष्टिगोचर होता है॥ ६१॥

असनाः सप्तपर्णाश्च कोविदाराश्च पुष्पिताः।

दृश्यन्ते बन्धुजीवाश्च श्यामाश्च गिरिसानुषु॥ ६२॥

‘पर्वत के शिखरों पर असन, छितवन, कोविदार, बन्धु-जीव तथा श्याम तमाल खिले दिखायी देते हैं।६२॥

हंससारसचक्रावैः कुररैश्च समन्ततः।

पुलिनान्यवकीर्णानि नदीनां पश्य लक्ष्मण॥

‘लक्ष्मण! देखो तो सही, नदियों के तटों पर सब ओर हंस, सारस, चक्रवाक और कुरर नामक पक्षी फैले हुए हैं॥ ६३॥

चत्वारो वार्षिका मासा गता वर्षशतोपमाः।

मम शोकाभितप्तस्य तथा सीतामपश्यतः॥६४॥

‘मैं सीता को न देखने के कारण शोक से संतप्त हो रहा हूँ; अतः ये वर्षा के चार महीने मेरे लिये सौ वर्षों के समान बीते हैं॥ ६४॥

चक्रवाकीव भर्तारं पृष्ठतोऽनुगता वनम्।

विषमं दण्डकारण्यमुद्यानमिव चाङ्गना॥६५॥

‘जैसे चकवी अपने स्वामी का अनुसरण करती है, उसी प्रकार कल्याणी सीता इस भयंकर एवं दुर्गम दण्डकारण्य को उद्यान-सा समझकर मेरे पीछे यहाँ तक चली आयी थी॥६५॥

प्रियाविहीने दुःखार्ते हृतराज्ये विवासिते।

कृपां न कुरुते राजा सुग्रीवो मयि लक्ष्मण॥ ६६॥

‘लक्ष्मण! मैं अपनी प्रियतमा से बिछुड़ा हुआ हूँ। मेरा राज्य छीन लिया गया है और मैं देश से निकाल दिया गया हूँ। इस अवस्था में भी राजा सुग्रीव मुझपर कृपा नहीं कर रहा है॥६६॥

अनाथो हृतराज्योऽहं रावणेन च धर्षितः।

दीनो दूरगृहः कामी मां चैव शरणं गतः॥६७॥

इत्येतैः कारणैः सौम्य सुग्रीवस्य दुरात्मनः।

अहं वानरराजस्य परिभूतः परंतपः॥६८॥

‘सौम्यलक्ष्मण! मैं अनाथ हूँ राज्य से भ्रष्ट हो गया हूँ। रावण ने मेरा तिरस्कार किया है। मैं दीन हूँ। मेरा घर यहाँ से बहुत दूर है। मैं कामना लेकर यहाँ आया हूँ तथा सुग्रीव यह भी समझता है कि राम मेरी शरण में आये हैं। इन्हीं सब कारणों से वानरों का राजा दुरात्मा सुग्रीव मेरा तिरस्कार कर रहा है। किंतु उसे पता नहीं है कि मैं सदा शत्रुओं को संताप देने में समर्थ हूँ॥६७-६८॥

स कालं परिसंख्याय सीतायाः परिमार्गणे।

कृतार्थः समयं कृत्वा दुर्मति ववुध्यते॥६९॥

‘उसने सीता की खोज के लिये समय निश्चित कर दिया था; किंतु उसका तो अब काम निकल गया है, इसीलिये वह दुर्बुद्धि वानर प्रतिज्ञा करके भी उसका कुछ खयाल नहीं कर रहा है॥ ६९॥

स किष्किन्धां प्रविश्य त्वं ब्रूहि वानरपुङ्गवम्।

मूर्ख ग्राम्यसुखे सक्तं सुग्रीवं वचनान्मम॥७०॥

‘अतः लक्ष्मण ! तुम मेरी आज्ञा से किष्किन्धापुरी में जाओ और विषयभोग में फँसे हुए मूर्ख वानरराज सुग्रीव से इस प्रकार कहो- ॥ ७० ॥

अर्थिनामुपपन्नानां पूर्वं चाप्युपकारिणाम्।

आशां संश्रुत्य यो हन्ति स लोके पुरुषाधमः॥ ७१॥

‘जो बल-पराक्रम से सम्पन्न तथा पहले ही उपकार करने वाले कार्यार्थी पुरुषों को प्रतिज्ञापूर्वक आशा देकर पीछे उसे तोड़ देता है, वह संसार के सभी पुरुषों में नीच है॥ ७१॥

शुभं वा यदि वा पापं यो हि वाक्यमुदीरितम्।

सत्येन परिगृह्णाति स वीरः पुरुषोत्तमः॥७२॥

‘जो अपने मुख से प्रतिज्ञा के रूप में निकले हुए भले या बुरे सभी तरह के वचनों को अवश्य पालनीय समझकर सत्य की रक्षा के उद्देश्य से उनका पालन करता है, वह वीर समस्त पुरुषों में श्रेष्ठ माना जाता है॥७२॥

कृतार्था ह्यकृतार्थानां मित्राणां न भवन्ति ये।

तान् मृतानपि क्रव्यादाः कृतघ्नान् नोपभुञ्जते॥ ७३॥

‘जो अपना स्वार्थ सिद्ध हो जाने पर, जिनके कार्य नहीं पूरे हुए हैं। उन मित्रों के सहायक नहीं होते उनके कार्य को सिद्ध करने की चेष्टा नहीं करते, उन कृतघ्न पुरुषों के मरने पर मांसाहारी जन्तु भी उनका मांस नहीं खाते हैं।

नूनं काञ्चनपृष्ठस्य विकृष्टस्य मया रणे।

द्रष्टुमिच्छसि चापस्य रूपं विद्युद्गणोपमम्॥ ७४॥

‘सुग्रीव! निश्चय ही तुम युद्ध में मेरे द्वारा खींचे गये सोने की पीठवाले धनुष का कौंधती हुई बिजली के समान रूप देखना चाहते हो॥७४॥

घोरं ज्यातलनिर्घोषं क्रुद्धस्य मम संयुगे।

निर्घोषमिव वज्रस्य पुनः संश्रोतुमिच्छसि॥७५॥

‘संग्राम में कुपित होकर मेरे द्वारा खींची गयी प्रत्यञ्चा की भयंकर टङ्कार को, जो वज्र की गड़गड़ाहट को भी मात करने वाली है, अब फिर तुम्हें सुनने की इच्छा हो रही है। ७५ ॥

काममेवंगतेऽप्यस्य परिज्ञाते पराक्रमे।

त्वत्सहायस्य मे वीर न चिन्ता स्यान्नृपात्मज॥ ७६॥

‘वीर राजकुमार! सुग्रीव को तुम-जैसे सहायक के साथ रहने वाले मेरे पराक्रम का ज्ञान हो चुका है, ऐसी दशा में भी यदि उसे यह चिन्ता न हो कि ये वाली की भाँति मुझे मार सकते हैं तो यह आश्चर्य की ही बात है!॥

यदर्थमयमारम्भः कृतः परपुरंजय।

समयं नाभिजानाति कृतार्थः प्लवगेश्वरः॥७७॥

‘शत्रु-नगरी पर विजय पाने वाले लक्ष्मण! जिसके लिये यह मित्रता आदि का सारा आयोजन किया गया, सीता की खोजविषयक उस प्रतिज्ञा को इस समय वानरराज सुग्रीव भूल गया है-उसे याद नहीं कर रहा है; क्योंकि उसका अपना काम सिद्ध हो चुका॥ ७७॥

वर्षाः समयकालं तु प्रतिज्ञाय हरीश्वरः।

व्यतीतांश्चतुरो मासान् विहरन् नावबुध्यते॥ ७८॥

‘सुग्रीव ने यह प्रतिज्ञा की थी कि वर्षा का अन्त होते ही सीता की खोज आरम्भ कर दी जायगी, किंतु वह क्रीड़ा-विहार में इतना तन्मय हो गया है कि इन बीते हुए चार महीनों का उसे कुछ पता ही नहीं है। ७८ ॥

सामात्यपरिषत्क्रीडन् पानमेवोपसेवते।

शोकदीनेषु नास्मासु सुग्रीवः कुरुते दयाम्॥ ७९॥

‘सुग्रीव मन्त्रियों तथा परिजनों सहित क्रीडाजनित आमोद-प्रमोद में फँसकर विविध पेय पदार्थों का ही सेवन कर रहा है। हमलोग शोक से व्याकुल हो रहे हैं। तो भी वह हम पर दया नहीं करता है॥ ७९ ॥

उच्यतां गच्छ सुग्रीवस्त्वया वीर महाबल।

मम रोषस्य यद्रूपं ब्रूयाश्चैनमिदं वचः॥८०॥

‘महाबली वीर लक्ष्मण! तुम जाओ सुग्रीव से बात करो। मेरे रोष का जो स्वरूप है, वह उसे बताओ और मेरा यह संदेश भी कह सुनाओ॥८०॥

न स संकुचितः पन्था येन वाली हतो गतः।

समये तिष्ठ सुग्रीव मा वालिपथमन्वगाः॥८१॥

सुग्रीव! वाली मारा जाकर जिस रास्ते से गया है, वह आज भी बंद नहीं हुआ है। इसलिये तुम अपनी प्रतिज्ञा पर डटे रहो। वाली के मार्ग का अनुसरण न करो॥ ८१॥

एक एव रणे वाली शरेण निहतो मया।

त्वां तु सत्यादतिक्रान्तं हनिष्यामि सबान्धवम्॥ ८२॥

‘वाली तो रणक्षेत्र में अकेला ही मेरे बाण से मारा गया था, परंतु यदि तुम सत्य से विचलित हुए तो मैं तुम्हें बन्धु-बान्धवों सहित काल के गाल में डाल दूंगा।८२॥

यदेवं विहिते कार्ये यद्धितं पुरुषर्षभ।

तत् तद् ब्रूहि नरश्रेष्ठ त्वर कालव्यतिक्रमः॥८३॥

‘पुरुषप्रवर! नरश्रेष्ठ लक्ष्मण! जब इस तरह कार्य बिगड़ने लगे, ऐसे अवसर पर और भी जो-जो बातें कहनी उचित हों— जिनके कहने से अपना हित होता हो, वे सब बातें कहना। जल्दी करो; क्योंकि कार्य आरम्भ करनेका समय बीता जा रहा है। ८३॥

कुरुष्व सत्यं मम वानरेश्वर प्रतिश्रुतं धर्ममवेक्ष्य शाश्वतम्।

मा वालिनं प्रेतगतो यमक्षये त्वमद्य पश्येर्मम चोदितः शरैः॥ ८४॥

‘सुग्रीव से कहो–’वानरराज! तुम सनातन धर्म पर दृष्टि रखकर अपनी की हुई प्रतिज्ञा को सत्य कर दिखाओ, अन्यथा ऐसा न हो कि तुम्हें आज ही मेरे बाणों से प्रेरित हो प्रेतभाव को प्राप्त होकर यमलोक में वाली का दर्शन करना पड़े’।। ८४॥

स पूर्वजं तीव्रविवृद्धकोपं लालप्यमानं प्रसमीक्ष्य दीनम्।

चकार तीव्रां मतिमुग्रतेजा हरीश्वरे मानववंशवर्धनः॥ ८५॥

मानव-वंश की वृद्धि करने वाले उग्र तेजस्वी लक्ष्मण ने जब अपने बड़े भाई को दुःखी, बढ़े हुए तीव्र रोष से युक्त तथा अधिक बोलते देखा, तब वानरराज सुग्रीव के प्रति कठोर भाव धारण कर लिया॥ ८५॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे त्रिंशः सर्गः॥३०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।३०॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

सुग्रीव पर लक्ष्मण का रोष, लक्ष्मण का किष्किन्धा के द्वार पर जाकर अङ्गद को सुग्रीव के पास भेजना, प्लक्ष और प्रभाव का सुग्रीव को कर्तव्य का उपदेश देना

एकत्रिंशः सर्गः

सर्ग-31


स कामिनं दीनमदीनसत्त्वं शोकाभिपन्नं समुदीर्णकोपम्।

नरेन्द्रसूनुर्नरदेवपुत्रं रामानुजः पूर्वजमित्युवाच॥१॥

श्रीराम के छोटे भाई नरेन्द्रकुमार लक्ष्मण ने उस समय सीता की कामना से युक्त, दुःखी, उदारहृदय, शोकग्रस्त तथा बढ़े हुए रोषवाले ज्येष्ठ भ्राता महाराजपुत्र श्रीराम से इस प्रकार कहा— ॥१॥

न वानरः स्थास्यति साधुवृत्ते न मन्यते कर्मफलानुषङ्गान्।

न भोक्ष्यते वानरराज्यलक्ष्मी तथा हि नातिक्रमतेऽस्य बुद्धिः॥२॥

‘आर्य! सुग्रीव वानर है, वह श्रेष्ठ पुरुषों के लिये उचित सदाचार पर स्थिर नहीं रह सकेगा। सुग्रीव इस बात को भी नहीं मानता है कि अग्नि को साक्षी देकर श्रीरघुनाथजी के साथ मित्रता-स्थापन रूप जो सत्-कर्म किया गया है, उसी के फल से मुझे निष्कण्टक राज्यभोग प्राप्त हुए हैं। अतः वह वानरों की राज्यलक्ष्मी का पालन एवं उपभोग नहीं कर सकेगा; क्योंकि उसकी बुद्धि मित्रधर्म के पालन के लिये अधिक आगे नहीं बढ़ रही है॥२॥

मतिक्षयाद् ग्राम्यसुखेषु सक्तस्तव प्रसादात् प्रतिकारबुद्धिः।

हतोऽग्रजं पश्यतु वीरवालिनं न राज्यमेवं विगुणस्य देयम्॥३॥

‘सुग्रीव की बुद्धि मारी गयी है, इसलिये वह विषयभोगों में आसक्त हो गया है। आपकी कृपा से जो उसे राज्य आदि का लाभ हुआ है, उस उपकार का बदला चुकाने की उसकी नीयत नहीं है। अतः अब वह भी मारा जाकर अपने बड़े भाई वीरवर वाली का दर्शन करे। ऐसे गुणहीन पुरुष को राज्य नहीं देना चाहिये॥३॥

न धारये कोपमुदीर्णवेगं निहन्मि सुग्रीवमसत्यमद्य।

हरिप्रवीरैः सह वालिपुत्रो नरेन्द्रपुत्र्या विचयं करोतु॥४॥

‘मेरे क्रोध का वेग बढ़ा हुआ है। मैं इसे रोक नहीं सकता। असत्यवादी सुग्रीव को आज ही मारे डालता हूँ। अब वालिकुमार अङ्गद ही राजा होकर प्रधान वानर-वीरों के साथ राजकुमारी सीता की खोज करे’॥ ४॥

तमात्तबाणासनमुत्पतन्तं निवेदितार्थं रणचण्डकोपम्।

उवाच रामः परवीरहन्ता स्ववीक्षितं सानुनयं च वाक्यम्॥५॥

यों कहकर लक्ष्मण धनुष-बाण हाथ में ले बड़े वेग से चल पड़े। उन्होंने अपने जाने का प्रयोजन स्पष्ट शब्दों में निवेदन कर दिया था। युद्ध के लिये उनका प्रचण्ड कोप बढ़ा हुआ था तथा वे क्या करने जा रहे हैं, इस पर उन्होंने अच्छी तरह विचार नहीं किया था। उस समय विपक्षी वीरों का संहार करने वाले श्रीरामचन्द्रजी ने उन्हें शान्त करने के लिये यह अनुनययुक्त बात कही— ॥५॥

नहि वै त्वद्विधो लोके पापमेवं समाचरेत्।

कोपमार्येण यो हन्ति स वीरः पुरुषोत्तमः॥६॥

‘सुमित्रानन्दन! तुम-जैसे श्रेष्ठ पुरुष को संसार में ऐसा (मित्रवधरूप) निषिद्ध आचरण नहीं करना चाहिये। जो उत्तम विवेक के द्वारा अपने क्रोध को मार देता है, वह वीर समस्त पुरुषों में श्रेष्ठ है॥६॥

नेदमत्र त्वया ग्राह्यं साधुवृत्तेन लक्ष्मण।

तां प्रीतिमनुवर्तस्व पूर्ववृत्तं च संगतम्॥७॥

‘लक्ष्मण! तुम सदाचारी हो। तुम्हें इस प्रकार सुग्रीव के मारने का निश्चय नहीं करना चाहिये। उसके प्रति जो तुम्हारा प्रेम था, उसी का अनुसरण करो और उसके साथ पहले जो मित्रता की गयी है, उसे निबाहो॥७॥

सामोपहितया वाचा रूक्षाणि परिवर्जयन्।

वक्तुमर्हसि सुग्रीवं व्यतीतं कालपर्यये॥८॥

‘तुम्हें सान्त्वनापूर्ण वाणी द्वारा कटु वचनों का परित्याग करते हुए सुग्रीव से इतना ही कहना चाहिये कि तुमने सीता की खोज के लिये जो समय नियत किया था, वह बीत गया (फिर भी चुप क्यों बैठे हो)’॥ ८॥

सोऽग्रजेनानुशिष्टार्थो यथावत् पुरुषर्षभः।

प्रविवेश पुरी वीरो लक्ष्मणः परवीरहा॥९॥

अपने बड़े भाई के इस प्रकार यथोचित रूप से समझाने पर शत्रुवीरों का संहार करने वाले पुरुषप्रवर वीर लक्ष्मण ने किष्किन्धापुरी में प्रवेश (करनेका विचार) किया॥

ततः शुभमतिः प्राज्ञो भ्रातुः प्रियहिते रतः।

लक्ष्मणः प्रतिसंरब्धो जगाम भवनं कपेः॥१०॥

भाई के प्रिय और हित में तत्पर रहने वाले शुभ बुद्धि से युक्त बुद्धिमान् लक्ष्मण रोष में भरे हुए ही वानरराज सुग्रीव के भवन की ओर चले॥१०॥

शक्रबाणासनप्रख्यं धनुः कालान्तकोपमम्।

प्रगृह्य गिरिशृङ्गाभं मन्दरः सानुमानिव॥११॥

उस समय वे इन्द्रधनुष के समान तेजस्वी, काल और अन्तक के समान भयंकर तथा पर्वत-शिखर के समान विशाल धनुष को हाथ में लेकर शृङ्गसहित मन्दराचल के समान जान पड़ते थे॥११॥

यथोक्तकारी वचनमुत्तरं चैव सोत्तरम्।

बृहस्पतिसमो बुद्धया मत्वा रामानुजस्तदा॥१२॥

श्रीराम के अनुज लक्ष्मण अपने बड़े भाई की आज्ञा का यथोक्त रूप से पालन करने वाले तथा बृहस्पति के समान बुद्धिमान् थे। वे सुग्रीव से जो बात कहते, सुग्रीव उसका जो कुछ उत्तर देते और उस उत्तर का भी ये जो कुछ उत्तर देते, उन सबको अच्छी तरह समझ-बूझकर वहाँ से प्रस्थित हुए थे॥ १२॥

कामक्रोधसमुत्थेन भ्रातुः क्रोधाग्निना वृतः।

प्रभञ्जन इवाप्रीतः प्रययौ लक्ष्मणस्ततः॥१३॥

सीता की खोजविषयक जो श्रीराम की कामना थी और सुग्रीव की असावधानी के कारण उसमें बाधा पड़ने से जो उन्हें क्रोध हुआ था, उन दोनों के कारण लक्ष्मण की भी क्रोधाग्नि भड़क उठी थी। उस क्रोधाग्नि से घिरे हुए लक्ष्मण सुग्रीव के प्रति प्रसन्न नहीं थे। वे उसी अवस्था में वायु के समान वेग से चले॥ १३॥

सालतालाश्वकर्णाश्च तरसा पातयन् बलात्।

पर्यस्यन् गिरिकूटानि द्रुमानन्यांश्च वेगितः॥ १४॥

उनका वेग ऐसा बढ़ा हुआ था कि वे मार्ग में मिलने वाले साल, ताल और अश्वकर्ण नामक वृक्षों को उसी वेग से बलपूर्वक गिराते तथा पर्वतशिखरों एवं अन्य वृक्षों को उठा-उठाकर दूर फेंकते जाते थे॥ १४॥

शिलाश्च शकलीकुर्वन् पद्भ्यां गज इवाशुगः।

दूरमेकपदं त्यक्त्वा ययौ कार्यवशाद् द्रुतम्॥ १५॥

शीघ्रगामी हाथी के समान अपने पैरों की ठोकर से शिलाओं को चूर-चूर करते और लंबी-लंबी डगें भरते हुए वे कार्यवश बड़ी तेजी के साथ चले ॥ १५ ॥

तामपश्यद् बलाकीर्णां हरिराजमहापुरीम्।

दुर्गामिक्ष्वाकुशार्दूलः किष्किन्धां गिरिसंकटे॥ १६॥

इक्ष्वाकुकुल के सिंह लक्ष्मण ने निकट जाकर वानरराज सुग्रीव की विशाल पुरी किष्किन्धा देखी, जो पहाड़ों के बीच में बसी हुई थी। वानरसेना से व्याप्त होने के कारण वह पुरी दूसरों के लिये दुर्गम थी॥ १६॥

रोषात् प्रस्फुरमाणोष्ठः सुग्रीवं प्रति लक्ष्मणः।

ददर्श वानरान् भीमान् किष्किन्धायां बहिश्चरान्॥१७॥

उस समय लक्ष्मण के ओष्ठ सुग्रीव के प्रति रोष से फड़क रहे थे। उन्होंने किष्किन्धा के पास बहुतेरे भयंकर वानरों को देखा जो नगर के बाहर विचर रहे थे॥ १७॥

तं दृष्ट्वा वानराः सर्वे लक्ष्मणं पुरुषर्षभम्।

शैलशृङ्गाणि शतशः प्रवृद्धाश्च महीरुहान्।

जगृहुः कुञ्जरप्रख्या वानराः पर्वतान्तरे॥१८॥

उन वानरों के शरीर हाथियों के समान विशाल थे। उन समस्त वानरों ने पुरुषप्रवर लक्ष्मण को देखते ही पर्वत के अंदर विद्यमान सैकड़ों शैल-शिखर और बड़े-बड़े वृक्ष उठा लिये॥ १८॥

तान् गृहीतप्रहरणान् सर्वान् दृष्ट्वा तु लक्ष्मणः।

बभूव द्विगुणं क्रुद्धो बह्विन्धन इवानलः॥१९॥

उन सबको हथियार उठाते देख लक्ष्मण दूने क्रोध से जल उठे, मानो जलती आग में बहुत-सी सूखी लकड़ियाँ डाल दी गयी हों॥ १९॥

तं ते भयपरीताङ्गा क्षुब्धं दृष्ट्वा प्लवंगमाः।

कालमृत्युयुगान्ताभं शतशो विद्रुता दिशः॥२०॥

क्षुब्ध हुए लक्ष्मण काल, मृत्यु तथा प्रलयकालीन अग्नि के समान भयंकर दिखायी देने लगे। उन्हें देखकर उन वानरों के शरीर भय से काँपने लगे और वे सैकड़ों की संख्या में चारों दिशाओं में भाग गये॥२०॥

ततः सुग्रीवभवनं प्रविश्य हरिपुंगवाः।

क्रोधमागमनं चैव लक्ष्मणस्य न्यवेदयन्॥२१॥

तदनन्तर कई श्रेष्ठ वानरों ने सुग्रीव के महल में जाकर लक्ष्मण के आगमन और क्रोध का समाचार निवेदन किया॥

तारया सहितः कामी सक्तः कपिवृषस्तदा।

न तेषां कपिसिंहानां शुश्राव वचनं तदा ॥ २२॥

उस समय काम के अधीन हुए वानरराज सुग्रीव भोगासक्त हो तारा के साथ थे। इसलिये उन्होंने उन श्रेष्ठ वानरों की बातें नहीं सुनीं॥ २२॥

ततः सचिवसंदिष्टा हरयो रोमहर्षणाः।

गिरिकुञ्जरमेघाभा नगरान्निर्ययुस्तदा ॥२३॥

तब सचिव की आज्ञा से पर्वत, हाथी और मेघ के समान विशालकाय वानर जो रोंगटे खड़े कर देने वाले थे, नगर से बाहर निकले ॥२३॥

नखदंष्ट्रायुधाः सर्वे वीरा विकृतदर्शनाः।

सर्वे शार्दूलदंष्ट्राश्च सर्वे विवृतदर्शनाः॥२४॥

वे सब-के-सब वीर थे। नख और दाँत ही उनके आयुध थे। वे बड़े विकराल दिखायी देते थे। उन सबकी दाढ़ें व्याघ्रों की दाढ़ों के समान थीं और सबके नेत्र खुले हुए थे (अथवा उन सबका वहाँ स्पष्ट दर्शन होता था—कोई छिपे नहीं थे) ॥२४॥

दशनागबलाः केचित् केचिद् दशगुणोत्तराः।

केचिन्नागसहस्रस्य बभूवुस्तुल्यवर्चसः॥ २५॥

किन्हीं में दस हाथियों के बराबर बल था तो कोई सौ हाथियों के समान बलशाली थे तथा किन्हीं किन्हीं का तेज (बल और पराक्रम) एक हजार हाथियों के तुल्य था॥२५॥

ततस्तैः कपिभिर्व्याप्तां द्रुमहस्तैर्महाबलैः।

अपश्यल्लक्ष्मणः क्रुद्धः किष्किन्धां तां दुरासदाम्॥२६॥

हाथ में वृक्ष लिये उन महाबली वानरों से व्याप्त हुई किष्किन्धापुरी अत्यन्त दुर्जय दिखायी देती थी। लक्ष्मण ने कुपित होकर उस पुरी की ओर देखा॥२६॥

ततस्ते हरयः सर्वे प्राकारपरिखान्तरात्।

निष्क्रम्योदग्रसत्त्वास्तु तस्थुराविष्कृतं तदा ॥२७॥

तदनन्तर वे सभी महाबली वानर पुरी की चहारदीवारी और खाईं के भीतर से निकलकर प्रकटरूप से सामने आकर खड़े हो गये॥ २७॥

सुग्रीवस्य प्रमादं च पूर्वजस्यार्थमात्मवान्।

दृष्ट्वा क्रोधवशं वीरः पुनरेव जगाम सः॥२८॥

आत्मसंयमी वीर लक्ष्मण सुग्रीव के प्रमाद तथा अपने बड़े भाई के महत्त्वपूर्ण कार्य पर दृष्टिपात करके पुनः वानरराज के प्रति क्रोध के वशीभूत हो गये।२८॥

स दीर्घोष्णमहोच्छ्वासः कोपसंरक्तलोचनः।

बभूव नरशार्दूलः सधूम इव पावकः॥२९॥

वे अधिक गरम और लंबी साँस खींचने लगे। उनके नेत्र क्रोध से लाल हो गये। उस समय पुरुषसिंह लक्ष्मण धूमयुक्त अग्नि के समान प्रतीत हो रहे थे। २९॥

बाणशल्यस्फुरज्जिह्वः सायकासनभोगवान्।

स्वतेजोविषसम्भूतः पञ्चास्य इव पन्नगः॥३०॥

इतना ही नहीं, वे पाँच मुखवाले सर्प के समान दिखायी देने लगे। बाण का फल ही उस सर्प की लपलपाती हुई जिह्वा जान पड़ता था, धनुष ही उसका विशाल शरीर था तथा वे सर्परूपी लक्ष्मण अपने तेजोमय विष से व्याप्त हो रहे थे॥३०॥

तं दीप्तमिव कालाग्निं नागेन्द्रमिव कोपितम्।

समासाद्याङ्गदस्त्रासाद् विषादमगमत् परम्॥ ३१॥

उस अवसर पर कुमार अङ्गद प्रज्वलित प्रलयाग्नि तथा क्रोध में भरे हुए नागराज शेष की भाँति दृष्टिगोचर होने वाले लक्ष्मण के पास डरते-डरते गये। वे अत्यन्त विषाद में पड़ गये थे॥३१॥

सोऽङ्गदं रोषताम्राक्षः संदिदेश महायशाः।

सुग्रीवः कथ्यतां वत्स ममागमनमित्युत॥३२॥

एष रामानुजः प्राप्तस्त्वत्सकाशमरिंदम।

भ्रातुर्व्यसनसंतप्तो द्वारि तिष्ठति लक्ष्मणः॥३३॥

तस्य वाक्यं यदि रुचिः क्रियतां साधु वानर।

इत्युक्त्वा शीघ्रमागच्छ वत्स वाक्यमरिंदम॥ ३४॥

महायशस्वी लक्ष्मण ने क्रोध से लाल आँखें करके अङ्गद को आदेश दिया—’बेटा! सुग्रीव को मेरे आने की सूचना दो। उनसे कहना—शत्रुदमन वीर! श्रीरामचन्द्रजी के छोटे भाई लक्ष्मण अपने भ्राता के दुःख से दुःखी होकर आपके पास आये हैं और नगर द्वार पर खड़े हैं। वानरराज! यदि आपकी इच्छा हो तो उनकी आज्ञा का अच्छी तरह पालन कीजिये। शत्रुदमन वत्स अङ्गद! बस, इतना ही कहकर तुम शीघ्र मेरे पास लौट आओ’ ॥ ३२–३४॥

लक्ष्मणस्य वचः श्रुत्वा शोकाविष्टोऽङ्गदोऽब्रवीत्।

पितुः समीपमागम्य सौमित्रिरयमागतः॥ ३५॥

लक्ष्मण की बात सुनकर शोकाकुल अङ्गद ने पिता सुग्रीव के समीप आकर कहा—’तात! ये सुमित्रानन्दन लक्ष्मण यहाँ पधारे हैं ॥ ३५ ॥

अथाङ्गदस्तस्य सुतीव्रवाचा सम्भ्रान्तभावः परिदीनवक्त्रः।

निर्गत्य पूर्वं नृपतेस्तरस्वी ततो रुमायाश्चरणौ ववन्दे॥३६॥

(अब इसी बात को कुछ विस्तार के साथ कहते हैं —) लक्ष्मण की कठोर वाणी से अङ्गद के मन में बड़ी घबराहट हुई। उनके मुख पर अत्यन्त दीनता छा गयी। उन वेगशाली कुमार ने वहाँ से निकलकर पहले वानरराज सुग्रीव के, फिर तारा तथा रुमा के चरणों में प्रणाम किया॥३६॥

संगृह्य पादौ पितुरुग्रतेजा जग्राह मातुः पुनरेव पादौ।

पादौ रुमायाश्च निपीडयित्वा निवेदयामास ततस्तदर्थम्॥३७॥

उग्र तेजवाले अङ्गद ने पहले तो पिता के दोनों पैर पकड़े फिर अपनी माता तारा के दोनों चरणों का स्पर्श किया। तदनन्तर रुमा के दोनों पैर दबाये इसके बाद पूर्वोक्त बात कही॥ ३७॥

स निद्राक्लान्तसंवीतो वानरो न विबुद्धवान्।

बभूव मदमत्तश्च मदनेन च मोहितः॥ ३८॥

किंतु सुग्रीव मदमत्त एवं काम से मोहित होकर पड़े थे। निद्रा ने उनके ऊपर पूरा अधिकार जमा लिया था इसलिये वे जाग न सके॥३८॥

ततः किलकिलां चक्रुर्लक्ष्मणं प्रेक्ष्य वानराः।

प्रसादयन्तस्तं क्रुद्धं भयमोहितचेतसः॥ ३९॥

इतने में बाहर क्रोध में भरे हुए लक्ष्मण को देखकर भय से मोहितचित्त हुए वानर उन्हें प्रसन्न करने के लिये दीनतासूचक वाणी में किलकिलाने लगे॥ ३९॥

ते महौघनिभं दृष्ट्वा वज्राशनिसमस्वनम्।

सिंहनादं समं चक्रुर्लक्ष्मणस्य समीपतः॥४०॥

लक्ष्मण पर दृष्टि पड़ते ही उन वानरों ने सुग्रीव के निकटवर्ती स्थान में एक साथ ही महान् जलप्रवाह तथा वज्र की गड़गड़ाहट के समान जोर-जोर से सिंहनाद किया (जिससे सुग्रीव जाग उठे) ॥ ४० ॥

तेन शब्देन महता प्रत्यबुध्यत वानरः।

मदविह्वलताम्राक्षो व्याकुलः स्रग्विभूषणः॥ ४१॥

वानरों की उस भयंकर गर्जना से कपिराज सुग्रीव की नींद खुल गयी। उस समय उनके नेत्र मद से चञ्चल और लाल हो रहे थे। मन भी स्वस्थ नहीं था उनके गले में सुन्दर पुष्पमाला शोभा दे रही थी॥४१॥

अथाङ्गदवचः श्रुत्वा तेनैव च समागतौ।

मन्त्रिणौ वानरेन्द्रस्य सम्मतोदारदर्शनौ॥४२॥

प्लक्षश्चैव प्रभावश्च मन्त्रिणावर्थधर्मयोः।

वक्तुमुच्चावचं प्राप्तं लक्ष्मणं तौ शशंसतुः॥ ४३॥

अङ्गद की पूर्वोक्त बात सुनकर उन्हींके साथ आये हुए दो मन्त्री प्लक्ष और प्रभाव ने भी, जो वानरराज के सम्मानपात्र और उदार दृष्टिवाले थे तथा राजा को अर्थ और धर्म के विषय में ऊँच-नीच समझाने के लिये नियुक्त थे, लक्ष्मण के आगमन की सूचना दी। ४२-४३॥

प्रसादयित्वा सुग्रीवं वचनैः सार्थनिश्चितैः।

आसीनं पर्युपासीनौ यथा शक्रं मरुत्पतिम्॥४४॥

सत्यसंधौ महाभागौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ।

मनुष्यभावं सम्प्राप्तौ राज्याही राज्यदायिनौ॥ ४५॥

राजा के निकट खड़े हुए उन दोनों मन्त्रियों ने देवराज इन्द्र के समान बैठे हुए सुग्रीव को खूब सोचविचार कर निश्चित किये हुए सार्थक वचनों द्वारा प्रसन्न किया और इस प्रकार कहा—’राजन् ! महाभाग श्रीराम और लक्ष्मण-दोनों भाई सत्यप्रतिज्ञ हैं। (वे वास्तव में भगवत्स्वरूप हैं) उन्होंने स्वेच्छा से मनुष्य-शरीर धारण किया है। वे दोनों समस्त त्रिलोकी का राज्य चलाने के योग्य हैं। वे ही आपके राज्यदाता हैं। ४४-४५॥

तयोरेको धनुष्पाणिर्दारि तिष्ठति लक्ष्मणः।

यस्य भीताः प्रवेपन्तो नादान् मुञ्चन्ति वानराः॥ ४६॥

उनमें से एक वीर लक्ष्मण हाथ में धनुष लिये किष्किन्धा के दरवाजे पर खड़े हैं, जिनके भय से काँपते हुए वानर जोर-जोर से चीख रहे हैं॥ ४६॥

स एष राघवभ्राता लक्ष्मणो वाक्यसारथिः।

व्यवसायरथः प्राप्तस्तस्य रामस्य शासनात्॥ ४७॥

‘श्रीराम का आदेशवाक्य ही जिनका सारथि और कर्तव्य का निश्चय ही जिनका रथ है, वे लक्ष्मण श्रीराम की आज्ञा से यहाँ पधारे हैं॥४७॥

अयं च तनयो राजस्ताराया दयितोऽङ्गदः।

लक्ष्मणेन सकाशं ते प्रेषितस्त्वरयानघ॥४८॥

‘राजन्! निष्पाप वानरराज! लक्ष्मण ने तारादेवी के इन प्रिय पुत्र अङ्गद को आपके निकट बड़ी उतावली के साथ भेजा है॥४८॥

सोऽयं रोषपरीताक्षो द्वारि तिष्ठति वीर्यवान्।

वानरान् वानरपते चक्षुषा निर्दहन्निव॥४९॥

‘वानरपते! पराक्रमी लक्ष्मण क्रोध से लाल आँखें किये नगरद्वार पर उपस्थित हैं और वानरों की ओर इस तरह देख रहे हैं, मानो वे अपनी नेत्राग्नि से उन्हें दग्ध कर डालेंगे॥४९॥

तस्य मूर्ना प्रणामं त्वं सपुत्रः सहबान्धवः।

गच्छ शीघ्रं महाराज रोषो ह्यद्योपशाम्यताम्॥ ५०॥

‘महाराज! आप शीघ्र चलें तथा पुत्र और बन्धुबान्धवों के साथ उनके चरणों में मस्तक नवावें और इस प्रकार आज उनका रोष शान्त करें॥ ५० ॥

यथा हि रामो धर्मात्मा तत्कुरुष्व समाहितः।

राजंस्तिष्ठ स्वसमये भव सत्यप्रतिश्रवः॥५१॥

‘राजन्! धर्मात्मा श्रीराम जैसा कहते हैं, सावधानीके साथ उसका पालन कीजिये। आप अपनी दी हुई बातपर अटल रहिये और सत्यप्रतिज्ञ बनिये’ ॥ ५१॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे एकत्रिंशः सर्गः॥३१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में इकतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥३१॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

हनुमान जी का चिन्तित हुए सुग्रीव को समझाना

द्वात्रिंशः सर्गः

सर्ग-32


अङ्गदस्य वचः श्रुत्वा सुग्रीवः सचिवैः सह।

लक्ष्मणं कुपितं श्रुत्वा मुमोचासनमात्मवान्॥१॥

मन्त्रियों सहित अङ्गद का वचन सुनकर और लक्ष्मण के कुपित होने का समाचार पाकर मन को वश में रखने वाले सुग्रीव आसन छोड़कर खड़े हो गये॥१॥

स च तानब्रवीद् वाक्यं निश्चित्य गुरुलाघवम्।

मन्त्रज्ञान् मन्त्रकुशलो मन्त्रेषु परिनिष्ठितः॥२॥

वे मन्त्रणा (कर्तव्यविषयक विचार) के परिनिष्ठित विद्वान् होनेके कारण मन्त्रप्रयोगमें अत्यन्त कुशल थे। उन्होंने श्रीरामचन्द्रजीकी महत्ता और अपनी लघुताका विचार करके मन्त्रज्ञ मन्त्रियोंसे कहा- ॥२॥

न मे दुर्व्याहृतं किंचिन्नापि मे दुरनुष्ठितम्।

लक्ष्मणो राघवभ्राता क्रुद्धः किमिति चिन्तये॥ ३॥

‘मैंने न तो कोई अनुचित बात मुँह से निकाली है और न कोई बुरा काम ही किया है। फिर श्रीरघुनाथजी के भ्राता लक्ष्मण मुझपर कुपित क्यों हुए हैं? इस बात पर मैं बारंबार विचार करता हूँ॥३॥

असुहृद्भिर्ममामित्रैर्नित्यमन्तरदर्शिभिः।

मम दोषानसम्भूतान् श्रावितो राघवानुजः॥४॥

‘जो सदा मेरे छिद्र देखने वाले हैं तथा जिनका हृदय मेरे प्रति शुद्ध नहीं है, उन शत्रुओं ने निश्चय ही श्रीरामचन्द्रजी के छोटे भाई लक्ष्मण से मेरे ऐसे दोष सुनाये हैं जो मेरे भीतर कभी प्रकट नहीं हुए थे॥ ४॥

अत्र तावद् यथाबुद्धिः सर्वैरेव यथाविधि।

भावस्य निश्चयस्तावद् विज्ञेयो निपुणं शनैः॥

‘लक्ष्मण के कोप के विषय में पहले तुम सब लोगों को धीरे-धीरे कुशलतापूर्वक उनके मनोभाव का विधिवत् निश्चय कर लेना चाहिये, जिससे उनके कोप के कारण का यथार्थ रूप से ज्ञान हो जाय॥५॥

न खल्वस्ति मम त्रासो लक्ष्मणान्नापि राघवात्।

मित्रं स्वस्थानकुपितं जनयत्येव सम्भ्रमम्॥६॥

‘अवश्य ही मुझे लक्ष्मण से तथा श्रीरघुनाथजी से कोई भय नहीं है, तथापि बिना अपराध के कुपित हुआ मित्र हृदय में घबराहट उत्पन्न कर ही देता है। ६॥

सर्वथा सुकरं मित्रं दुष्करं प्रतिपालनम्।

अनित्यत्वात् तु चित्तानां प्रीतिरल्पेऽपि भिद्यते॥ ७॥

“किसी को मित्र बना लेना सर्वथा सुकर है, परंतु उस मैत्री को पालना या निभाना बहुत ही कठिन है; क्योंकि मन का भाव सदा एक-सा नहीं रहता। किसी के द्वारा थोड़ी-सी भी चुगली कर दी जाने पर प्रेम में अन्तर आ जाता है।

अतो निमित्तं त्रस्तोऽहं रामेण तु महात्मना।

यन्ममोपकृतं शक्यं प्रतिकर्तुं न तन्मया॥८॥

‘इसी कारण मैं और भी डर गया हूँ; क्योंकि महात्मा श्रीराम ने मेरा जो उपकार किया है, उसका बदला चुकाने की मुझमें शक्ति नहीं है’ ॥ ८॥

सुग्रीवेणैवमुक्ते तु हनूमान् हरिपुंगवः।

उवाच स्वेन तर्केण मध्ये वानरमन्त्रिणाम्॥९॥

सुग्रीव के ऐसा कहने पर वानरों में श्रेष्ठ हनुमान् जी अपनी युक्ति का सहारा लेकर वानरमन्त्रियों के बीच में बोले- ॥९॥

सर्वथा नैतदाश्चर्यं यत् त्वं हरिगणेश्वर।

न विस्मरसि सुस्निग्धमुपकारं कृतं शुभम्॥१०॥

‘कपिराज! मित्रके द्वारा अत्यन्त स्नेहपूर्वक किये गये उत्तम उपकार को जो आप भूल नहीं रहे हैं, इसमें सर्वथा कोई आश्चर्य की बात नहीं है (क्योंकि अच्छे पुरुषों का ऐसा स्वभाव ही होता है) ॥१०॥

राघवेण तु वीरेण भयमुत्सृज्य दूरतः।

त्वत्प्रियार्थं हतो वाली शक्रतुल्यपराक्रमः॥११॥

सर्वथा प्रणयात् क्रुद्धो राघवो नात्र संशयः।

भ्रातरं सम्प्रहितवाँल्लक्ष्मणं लक्ष्मिवर्धनम्॥१२॥

‘वीरवर श्रीरघुनाथजी ने तो लोकापवाद के भय को दूर हटाकर आपका प्रिय करने के लिये इन्द्रतुल्य पराक्रमी वाली का वध किया है; अतः वे निःसंदेह आप पर कुपित नहीं हैं। श्रीरामचन्द्रजी ने शोभासम्पत्ति की वृद्धि करने वाले अपने भाई लक्ष्मण को जो आपके पास भेजा है, इसमें सर्वथा आपके प्रति उनका प्रेम ही कारण है॥ ११-१२ ।।

त्वं प्रमत्तो न जानीषे कालं कालविदां वर।

फुल्लसप्तच्छदश्यामा प्रवृत्ता तु शरच्छुभा॥ १३॥

‘समय का ज्ञान रखने वालों में श्रेष्ठ कपिराज! आपने सीता की खोज करने के लिये जो समय निश्चित किया था, उसे आप इन दिनों प्रमाद में पड़ जाने के कारण भूल गये हैं। देखिये न, यह सुन्दर शरद्-ऋतु आरम्भ हो गयी है, जो खिले हुए छितवन के फूलों से श्यामवर्ण की प्रतीत होती है॥ १३॥

निर्मलग्रहनक्षत्रा द्यौः प्रणष्टबलाहका।

प्रसन्नाश्च दिशः सर्वाः सरितश्च सरांसि च॥ १४॥

‘आकाश में अब बादल नहीं रहे। ग्रह, नक्षत्र निर्मल दिखायी देते हैं। सम्पूर्ण दिशाओं में प्रकाश छा गया है तथा नदियों और सरोवरों के जल पूर्णतः स्वच्छ हो गये हैं।

प्राप्तमुद्योगकालं तु नावैषि हरिपुंगव।

त्वं प्रमत्त इति व्यक्तं लक्ष्मणोऽयमिहागतः॥ १५॥

‘वानरराज! राजाओं के लिये विजय-यात्रा की तैयारी करने का समय आ गया है; किंतु आपको कुछ पता ही नहीं है। इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि आप प्रमाद में पड़ गये हैं। इसीलिये लक्ष्मण यहाँ आये हैं। १५॥

आर्तस्य हृतदारस्य परुषं पुरुषान्तरात्।

वचनं मर्षणीयं ते राघवस्य महात्मनः॥१६॥

‘महात्मा श्रीरामचन्द्रजी की पत्नी का अपहरण हुआ है, इसलिये वे बहुत दुःखी हैं। अतः यदि लक्ष्मण के मुख से उनका कठोर वचन भी सुनना पड़े तो आपको चुपचाप सह लेना चाहिये॥१६॥

कृतापराधस्य हि ते नान्यत् पश्याम्यहं क्षमम्।

अन्तरेणाञ्जलिं बद्ध्वा लक्ष्मणस्य प्रसादनात्॥ १७॥

‘आपकी ओर से अपराध हुआ है। अतः हाथ जोड़कर लक्ष्मण को प्रसन्न करने के सिवा आपके लिये और कोई उचित कर्तव्य मैं नहीं देखता॥१७॥

नियुक्तैर्मन्त्रिभिर्वाच्यो ह्यवश्यं पार्थिवो हितम्।

इत एव भयं त्यक्त्वा ब्रवीम्यवधृतं वचः॥१८॥

‘राज्य की भलाई के काम पर नियुक्त हुए मन्त्रियों का यह कर्तव्य है कि राजा को उसके हित की बात अवश्य बतावें। अतएव मैं भय छोड़कर अपना निश्चित विचार बता रहा हूँ॥ १८॥

अभिक्रुद्धः समर्थो हि चापमुद्यम्य राघवः।

सदेवासुरगन्धर्वं वशे स्थापयितुं जगत्॥१९॥

‘भगवान् श्रीराम यदि क्रोध करके धनुष हाथ में ले लें तो देवता-असुर-गन्धर्वोसहित सम्पूर्ण जगत् को अपने वश में कर सकते हैं ॥ १९ ॥

न स क्षमः कोपयितुं यः प्रसाद्यः पुनर्भवेत्।

पूर्वोपकारं स्मरता कृतज्ञेन विशेषतः॥२०॥

‘जिसे पीछे हाथ जोड़कर मनाना पड़े, ऐसे पुरुषको क्रोध दिलाना कदापि उचित नहीं है। विशेषतः वह पुरुष जो मित्रके किये हुए पहले उपकारको याद रखता हो और कृतज्ञ हो, इस बातका अधिक ध्यान रखे ॥२०॥

तस्य मूर्जा प्रणम्य त्वं सपुत्रः ससुहृज्जनः।

राजंस्तिष्ठ स्वसमये भर्तुर्भार्येव तदशे॥२१॥

‘राजन्! इसलिये आप पुत्र और मित्रों के साथ मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम कीजिये और अपनी प्रतिज्ञा पर अटल रहिये। जैसे पत्नी अपने पति के वश में रहती है, उसी प्रकार आप सदा श्रीरामचन्द्रजी के अधीन रहिये॥२१॥

न रामरामानुजशासनं त्वया कपीन्द्र युक्तं मनसाप्यपोहितुम्।

मनो हि ते ज्ञास्यति मानुषं बलं सराघवस्यास्य सुरेन्द्रवर्चसः॥ २२॥

‘वानरराज! श्रीराम और लक्ष्मण के आदेश की आपको मन से भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये। देवराज इन्द्र के समान तेजस्वी लक्ष्मणसहित श्रीरघुनाथजी के अलौकिक बल का ज्ञान तो आपके मन को है ही’॥ २२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे द्वात्रिंशः सर्गः॥३२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में बत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥३२॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

लक्ष्मण का सुग्रीव के महल में क्रोधपूर्वक धनुष को टंकारना, सुग्रीव का तारा को उन्हें शान्त करने के लिये भेजना तथा तारा का समझा-बुझाकर उन्हें अन्तःपुर में ले आना

त्रयस्त्रिंशः सर्गः

सर्ग-33


अथ प्रतिसमादिष्टो लक्ष्मणः परवीरहा।

प्रविवेश गुहां रम्यां किष्किन्धां रामशासनात्॥

इधर गुफा में प्रवेश करने के लिये अङ्गद के प्रार्थना करने पर शत्रुवीरों का संहार करने वाले लक्ष्मण ने श्रीराम की आज्ञा के अनुसार किष्किन्धा नामक रमणीय गुफा में प्रवेश किया॥१॥

द्वारस्था हरयस्तत्र महाकाया महाबलाः।

बभूवुर्लक्ष्मणं दृष्ट्वा सर्वे प्राञ्जलयः स्थिताः॥२॥

किष्किन्धा के द्वार पर जो विशाल शरीरवाले महाबली वानर थे, वे सब लक्ष्मण को देख हाथ जोड़कर खड़े हो गये॥२॥

निःश्वसन्तं तु तं दृष्ट्वा क्रुद्धं दशरथात्मजम्।

बभूवुर्हरयस्त्रस्ता न चैनं पर्यवारयन्॥३॥

दशरथनन्दन लक्ष्मण को क्रोधपूर्वक लंबी साँस खींचते देख वे सब वानर अत्यन्त भयभीत हो गये थे। इसलिये वे उन्हें चारों ओर से घेरकर उनके साथसाथ नहीं चल सके॥३॥

स तां रत्नमयीं दिव्यां श्रीमान् पुष्पितकाननाम्।

रम्यां रत्नसमाकीर्णां ददर्श महतीं गुहाम्॥४॥

श्रीमान् लक्ष्मण ने द्वार के भीतर प्रवेश करके देखा, किष्किन्धापुरी एक बहुत बड़ी रमणीय गुफा के रूप में बसी हुई है। वह रत्नमयी पुरी नाना प्रकार के रत्नों से भरी-पूरी होने के कारण दिव्य शोभा से सम्पन्न है। वहाँ के वन-उपवन फूलों से सुशोभित दिखायी दिये। ४॥

हर्म्यप्रासादसम्बाधां नानारत्नोपशोभिताम्।

सर्वकामफलैर्वृक्षैः पुष्पितैरुपशोभिताम्॥५॥

हों (धनियों की अट्टालिकाओं) तथा प्रासादों (देवमन्दिरों और राजभवनों) से वह पुरी अत्यन्तघनी दिखायी देती थी। नाना प्रकार के रत्न उसकी शोभा बढ़ाते थे। सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाले फलों से युक्त खिले हुए वृक्षों से वह पुरी सुशोभित थी॥ ५॥

देवगन्धर्वपुत्रैश्च वानरैः कामरूपिभिः।

दिव्यमाल्याम्बरधरैः शोभितां प्रियदर्शनैः॥६॥

वहाँ दिव्य माला और दिव्य वस्त्र धारण करने वाले परम सुन्दर वानर, जो देवताओं और गन्धर्वो के पुत्र तथा इच्छानुसार रूप धारण करने वाले थे, निवास करते हुए उस नगरी की शोभा बढ़ाते थे॥६॥

चन्दनागुरुपद्मानां गन्धैः सुरभिगन्धिताम्।

मैरेयाणां मधूनां च सम्मोदितमहापथाम्॥७॥

वहाँ चन्दन, अगर और कमलों की मनोहर सुगन्ध छा रही थी। उस पुरी की लंबी-चौड़ी सड़कें भी मैरेय तथा मधु के आमोद से महक रही थीं॥७॥

विन्ध्यमेरुगिरिप्रख्यैः प्रासादै कभूमिभिः।

ददर्श गिरिनद्यश्च विमलास्तत्र राघवः॥८॥

उस पुरी में विन्ध्याचल तथा मेरु के समान ऊँचे ऊँचे महल बने थे, जो कई मंजिलके थे। लक्ष्मण ने उस गुफा के निकट ही निर्मल जल से भरी हुई पहाड़ी नदियाँ देखीं॥ ८॥

अङ्गदस्य गृहं रम्यं मैन्दस्य द्विविदस्य च।

गवयस्य गवाक्षस्य गजस्य शरभस्य च॥९॥

विद्युन्मालेश्च सम्पातेः सूर्याक्षस्य हनूमतः ।

वीरबाहोः सुबाहोश्च नलस्य च महात्मनः॥ १०॥

कुमुदस्य सुषेणस्य तारजाम्बवतोस्तथा।

दधिवक्त्रस्य नीलस्य सुपाटलसुनेत्रयोः॥११॥

एतेषां कपिमुख्यानां राजमार्गे महात्मनाम्।

ददर्श गृहमुख्यानि महासाराणि लक्ष्मणः॥१२॥

उन्होंने राजमार्ग पर अङ्गद का रमणीय भवन देखा साथ ही वहाँ मैन्द, द्विविद, गवय, गवाक्ष, गज, शरभ, विद्युन्माली, सम्पाति, सूर्याक्ष, हनुमान्, वीरबाहु, सुबाहु, महात्मा नल, कुमुद, सुषेण, तार, जाम्बवान्, दधिमुख,नील, सुपाटल और सुनेत्र–इन महामनस्वी वानरशिरोमणियों के भी अत्यन्त सुदृढ़ श्रेष्ठ भवन लक्ष्मण को दृष्टिगोचर हुए वे सब-के-सब राजमार्ग पर ही बने हुए थे॥९–१२ ॥

पाण्डुराभ्रप्रकाशानि गन्धमाल्ययुतानि च।

प्रभूतधनधान्यानि स्त्रीरत्नैः शोभितानि च॥ १३॥

वे सभी भवन श्वेत बादलों के समान प्रकाशित हो रहे थे। उन्हें सुगन्धित पुष्पमालाओं से सजाया गया था। वे प्रचुर धन-धान्य से सम्पन्न तथा रत्नस्वरूपा रमणियों से सुशोभित थे। १३ ।।

पाण्डुरेण तु शैलेन परिक्षिप्तं दुरासदम्।

वानरेन्द्रगृहं रम्यं महेन्द्रसदनोपमम्॥१४॥

वानरराज सुग्रीवका सुन्दर भवन इन्द्रसदनके समान रमणीय दिखायी देता था। उसमें प्रवेश करना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन था। वह श्वेत पर्वतकी चहार-दीवारीसे घिरा हुआ था॥१४॥

शुक्लैः प्रासादशिखरैः कैलासशिखरोपमैः।

सर्वकामफलैर्वृक्षैः पुष्पितैरुपशोभितम्॥१५॥

कैलास-शिखर के समान श्वेत प्रासाद-शिखर तथा समस्त मनोरथों को पूर्ण करने वाले फलों से युक्त पुष्पित दिव्य वृक्ष उस राजभवन की शोभा बढ़ाते थे। १५॥

महेन्द्रदत्तैः श्रीमद्भिर्नीलजीमतसंनिभैः।

दिव्यपुष्पफलैर्वृक्षैः शीतच्छायैर्मनोरमैः॥१६॥

वहाँ इन्द्र के दिये हुए दिव्य फल-फूलों से सम्पन्न मनोरम वृक्ष लगाये गये थे, जो परम सुन्दर, नीले मेघ के समान श्याम तथा शीतल छाया से युक्त थे॥ १६॥

हरिभिः संवृतद्वारं बलिभिः शस्त्रपाणिभिः।

दिव्यमाल्यावृतं शुभ्रं तप्तकाञ्चनतोरणम्॥१७॥

अनेक बलवान् वानर हाथों में हथियार लिये उसकी ड्योढ़ी पर पहरा दे रहे थे। वह सुन्दर महल दिव्य मालाओं से अलंकृत था और उसका बाहरी फाटक पक्के सोने का बना हुआ था।॥ १७॥

सुग्रीवस्य गृहं रम्यं प्रविवेश महाबलः।

अवार्यमाणः सौमित्रिर्महाभ्रमिव भास्करः॥१८॥

महाबली सुमित्राकुमार लक्ष्मण ने सुग्रीव के उस रमणीय भवन में प्रवेश किया। मानो सूर्यदेव महान् मेघ के भीतर प्रविष्ट हुए हों। उस समय किसी ने रोक टोक नहीं की॥ १८॥

स सप्त कक्ष्या धर्मात्मा यानासनसमावृताः।

ददर्श सुमहद्गुप्तं ददर्शान्तःपुरं महत्॥१९॥

धर्मात्मा लक्ष्मण ने सवारियों तथा विविध आसनों से सुशोभित उस भवन की सात ड्योढ़ियों को पार करके बहुत ही गुप्त और विशाल अन्तःपुर को देखा ॥ १९ ॥

हैमराजतपर्यज्ञैर्बहुभिश्च वरासनैः।

महार्हास्तरणोपेतैस्तत्र तत्र समावृतम्॥२०॥

उसमें जहाँ-तहाँ चाँदी और सोने के बहुत-से पलंग तथा अनेकानेक श्रेष्ठ आसन रखे हुए थे और उन सब पर बहुमूल्य बिछौने बिछे थे। उन सबसे वह अन्तःपुर सुसज्जित दिखायी देता था॥ २० ॥

प्रविशन्नेव सततं शुश्राव मधुरस्वनम्।

तन्त्रीगीतसमाकीर्णं समतालपदाक्षरम्॥२१॥

उसमें प्रवेश करते ही लक्ष्मण के कानों में संगीत की मीठी तान सुनायी पड़ी, जो वहाँ निरन्तर गूंज रही । थी। वीणा के लय पर कोई कोमल कण्ठ से गा रहा था। प्रत्येक पद और अक्षर का उच्चारण सम* ताल का प्रदर्शन करते हुए हो रहा था॥ २१॥

* संगीत में वह स्थान जहाँ गाने-बजाने वालों का सिर या हाथ आप-से-आप हिल जाता है। यह स्थान ताल के अनुसार निश्चित होता है। जैसे तिताले में दूसरे तालपर और चौताल में पहले ताल पर

सम होता है। इसी प्रकार भिन्न-भिन्न तालों में भिन्न-भिन्न स्थानों पर सम होता है। वाद्यों का आरम्भ और गीतों तथा वाद्यों का अन्त इसी सम पर होता है। परंतु गाने-बजाने के बीच-बीच में भी सम बराबर आता रहता है।

बह्वीश्च विविधाकारा रूपयौवनगर्विताः।

स्त्रियः सुग्रीवभवने ददर्श स महाबलः॥ २२॥

महाबली लक्ष्मण ने सुग्रीव के उस अन्तःपुर में अनेक रूपरंग की बहुत-सी सुन्दरी स्त्रियाँ देखीं, जो रूप और यौवन के गर्व से भरी हुई थीं। २२ ।।

दृष्ट्वाभिजनसम्पन्नास्तत्र माल्यकृतस्रजः।

वरमाल्यकृतव्यग्रा भूषणोत्तमभूषिताः॥२३॥

नातृप्तान् नाति चाव्यग्रान् नानुदात्तपरिच्छदान्।

सुग्रीवानुचरांश्चापि लक्षयामास लक्ष्मणः॥२४॥

वे सब-की-सब उत्तम कुल में उत्पन्न हुई थीं, फूलों के गजरों से अलंकृत थीं, उत्तम पुष्पहारों के निर्माण में लगी हुई थीं और सुन्दर आभूषणों से । विभूषित थीं। उन सबको देखकर लक्ष्मणने सुग्रीवके

सेवकोंपर भी दृष्टिपात किया, जो अतृप्त या असंतुष्ट नहीं थे। स्वामी के कार्य सिद्ध करने के लिये अत्यन्तफुर्ती की भी उनमें कमी नहीं थी तथा उनके वस्त्र और आभूषण भी निम्न श्रेणी के नहीं थे॥ २३-२४ ॥

कूजितं नूपुराणां च काञ्चीनां निःस्वनं तथा।

स निशम्य ततः श्रीमान् सौमित्रिर्लज्जितोऽभवत्॥ २५॥

नूपुरों की झनकार और करधनी की खनखनाहट सुनकर श्रीमान् सुमित्राकुमार लज्जित हो गये (परायी स्त्रियों पर दृष्टि पड़ने के कारण उन्हें स्वभावतः संकोच हुआ) ॥२५॥

रोषवेगप्रकुपितः श्रुत्वा चाभरणस्वनम्।

चकार ज्यास्वनं वीरो दिशः शब्देन पूरयन्॥२६॥

तत्पश्चात् पुनः आभूषणों की झनकार सुनकर वीर लक्ष्मण रोष के आवेग से और भी कुपित हो उठे और उन्होंने अपने धनुष पर टंकार दी, जिसकी ध्वनि से समस्त दिशाएँ गूंज उठीं॥ २६ ॥

चारित्रेण महाबाहुरपकृष्टः स लक्ष्मणः।

तस्थावेकान्तमाश्रित्य रामकोपसमन्वितः॥२७॥

रघुकुलोचित सदाचार का खयाल करके महाबाहु लक्ष्मण कुछ पीछे हट गये और एकान्त में जाकर खड़े हो गये। श्रीरामचन्द्रजी के कार्य की सिद्धि के लिये वहाँ कोई प्रयत्न होता न देख वे मन-ही-मन कुपित हो रहे थे॥२७॥

तेन चापस्वनेनाथ सुग्रीवः प्लवगाधिपः।।

विज्ञायागमनं त्रस्तः स चचाल वरासनात्॥२८॥

धनुष की टंकार सुनकर वानरराज सुग्रीव समझ गये कि लक्ष्मण यहाँ तक आ पहुँचे हैं। फिर तो वे भय से संत्रस्त होकर अपना सिंहासन छोड़कर खड़े हो गये॥२८॥

अङ्गदेन यथा मह्यं पुरस्तात् प्रतिवेदितम्।

सुव्यक्तमेष सम्प्राप्तः सौमित्रिोतृवत्सलः॥२९॥

वे मन-ही-मन सोचने लगे कि अङ्गद ने पहले मुझे जैसा बताया था, उसके अनुसार ये भ्रातृवत्सल सुमित्राकुमार लक्ष्मण अवश्य ही यहाँ आ गये॥ २९॥

अङ्गदेन समाख्यातो ज्यास्वनेन च वानरः।

बुबुधे लक्ष्मणं प्राप्तं मुखं चास्य व्यशुष्यत॥३०॥

अङ्गद के द्वारा उनके आगमन का समाचार तो उन्हें पहले ही मिल गया था। अब धनुष की टंकार से वानर सुग्रीव को इस बात का प्रत्यक्ष अनुभव हो गया कि लक्ष्मण ने अवश्य यहाँ पदार्पण किया है। फिर तो उनका मुख सूख गया॥ ३० ॥

ततस्तारां हरिश्रेष्ठः सुग्रीवः प्रियदर्शनाम्।।

उवाच हितमव्यग्रस्त्राससम्भ्रान्तमानसः॥३१॥

भय के कारण वे मन-ही-मन घबरा उठे (लक्ष्मण के सामने जाने का उन्हें साहस न हुआ।)तथापि किसी तरह धैर्य धारण करके वानरश्रेष्ठ सुग्रीव परम सुन्दरी तारा से हित की बात बोले- ॥३१॥

किं नु रुट्कारणं सुभ्र प्रकृत्या मृदुमानसः।

सरोष इव सम्प्राप्तो येनायं राघवानुजः॥३२॥

‘सुन्दरि! इनके रोष का क्या कारण हो सकता है? जिससे स्वभावतः कोमल चित्त होने पर भी ये श्रीरघुनाथजी के छोटे भाई रुष्ट-से होकर यहाँ पधारे हैं॥३२॥

किं पश्यसि कुमारस्य रोषस्थानमनिन्दिते।

न खल्वकारणे कोपमाहरेन्नरपुङ्गवः॥३३॥

‘अनिन्दिते! तुम्हारे देखने में कुमार लक्ष्मण के रोष का आधार क्या है? ये मनुष्यों में श्रेष्ठ हैं। अतः बिना किसी कारण के निश्चय ही क्रोध नहीं कर सकते॥ ३३॥

यद्यस्य कृतमस्माभिर्बुध्यसे किंचिदप्रियम्।

तबुद्ध्या सम्प्रधार्याशु क्षिप्रमेवाभिधीयताम्॥ ३४॥

‘यदि हमलोगों ने इनका कोई अपराध किया हो और तुम्हें उसका पता हो तो अपनी बुद्धि से विचारकर शीघ्र ही बताओ॥३४॥

अथवा स्वयमेवैनं द्रष्टमर्हसि भामिनि।

वचनैः सान्त्वयुक्तैश्च प्रसादयितुमर्हसि ॥ ३५॥

‘अथवा भामिनि! तुम स्वयं ही जाकर लक्ष्मण को देखो और सान्त्वनायुक्त बातें कहकर उन्हें प्रसन्न करने का प्रयत्न करो॥ ३५॥

त्वदर्शने विशुद्धात्मा न स्म कोपं करिष्यति।

नहि स्त्रीषु महात्मानः क्वचित् कुर्वन्ति दारुणम्॥

‘उनका हृदय शुद्ध है। तुम्हारे सामने वे क्रोध नहीं करेंगे; क्योंकि महात्मा पुरुष स्त्रियों के प्रति कभी कठोर बर्ताव नहीं करते हैं॥ ३६॥

त्वया सान्त्वैरुपक्रान्तं प्रसन्नेन्द्रियमानसम्।

ततः कमलपत्राक्षं द्रक्ष्याम्यहमरिंदमम्॥३७॥

‘जब तुम उनके पास जाकर मीठे वचनों से उन्हें शान्त कर दोगी और जब उनका मन स्वस्थ एवं इन्द्रियाँ प्रसन्न हो जायँगी, उस समय मैं उन शत्रुदमन कमलनयन लक्ष्मण का दर्शन करूँगा’॥ ३७॥

सा प्रस्खलन्ती मदविह्वलाक्षी प्रलम्बकाञ्चीगुणहेमसूत्रा।

सलक्षणा लक्ष्मणसंनिधानं जगाम तारा नमितानयष्टिः॥३८॥

सुग्रीव के ऐसा कहने पर शुभलक्षणा तारा लक्ष्मण के पास गयी। उसका पतला शरीर स्वाभाविक संकोच एवं विनय से झुका हुआ था। उसके नेत्र मद से चञ्चल हो रहे थे, पैर लड़खड़ा रहे थे और उसकी करधनी के सुवर्णमय सूत्र लटक रहे थे॥ ३८॥

स तां समीक्ष्यैव हरीशपत्नी तस्थावुदासीनतया महात्मा।

अवाङ्मखोऽभून्मनुजेन्द्रपुत्रः स्त्रीसंनिकर्षाद् विनिवृत्तकोपः॥ ३९॥

वानरराज की पत्नी तारा पर दृष्टि पड़ते ही राजकुमार महात्मा लक्ष्मण अपना मुँह नीचा करके उदासीन भाव से खड़े हो गये। स्त्री के समीप होने से उनका क्रोध दूर हो गया॥ ३९॥

सा पानयोगाच्च निवृत्तलज्जा दृष्टिप्रसादाच्च नरेन्द्रसूनोः।

उवाच तारा प्रणयप्रगल्भं वाक्यं महार्थं परिसान्त्वरूपम्॥४०॥

मधुपान के कारण तारा की नारीसुलभ लज्जा निवृत्त हो गयी थी। उसे राजकुमार लक्ष्मण की दृष्टि में कुछ प्रसन्नता का आभास मिला। इसलिये उसने स्नेहजनित निर्भीकता के साथ महान् अर्थ से युक्त यह सान्त्वनापूर्ण बात कही— ॥ ४०॥

किं कोपमूलं मनुजेन्द्रपुत्र कस्ते न संतिष्ठति वानिदेशे।

कः शुष्कवृक्षं वनमापतन्तं दावाग्निमासीदति निर्विशङ्कः॥४१॥

‘राजकुमार! आपके क्रोध का क्या कारण है?कौन आपकी आज्ञा के अधीन नहीं है? कौन निडर होकर सूखे वृक्षों से भरे हुए वन के भीतर चारों ओर फैलते हुए दावानल में प्रवेश कर रहा है ?’ ॥ ४१॥

स तस्या वचनं श्रुत्वा सान्त्वपूर्वमशङ्कितः।

भूयः प्रणयदृष्टार्थं लक्ष्मणो वाक्यमब्रवीत्॥ ४२॥

तारा के इस वचन में सान्त्वना भरी थी। उसमें अधिक प्रेमपूर्वक हृदय का भाव प्रकट किया गया था। उसे सुनकर लक्ष्मण के हृदय की आशङ्का जाती रही। वे कहने लगे— ॥ ४२ ॥

किमयं कामवृत्तस्ते लुप्तधर्मार्थसंग्रहः।

भर्ता भर्तृहिते युक्ते न चैनमवबुध्यसे॥४३॥

‘अपने स्वामीके हितमें संलग्न रहनेवाली तारा! तुम्हारा यह पति विषय-भोगमें आसक्त होकर धर्मऔर अर्थके संग्रहका लोप कर रहा है। क्या तुम्हें इसकी इस अवस्थाका पता नहीं है? तुम इसे समझाती क्यों नहीं?॥

न चिन्तयति राज्यार्थं सोऽस्मान् शोकपरायणान्।

सामात्यपरिषत् तारे काममेवोपसेवते॥४४॥

‘तारे! सुग्रीव अपने राज्य की स्थिरता के लिये ही प्रयास करता है। हमलोग शोक में डूबे हुए हैं, परंतु हमारी इसे तनिक भी चिन्ता नहीं होती है। यह अपने मन्त्रियों तथा राज-सभा के सदस्योंसहित केवल विषय-भोगों का ही सेवन कर रहा है॥४४॥

स मासांश्चतुरः कृत्वा प्रमाणं प्लवगेश्वरः।

व्यतीतांस्तान् मदोदग्रो विहरन् नावबुध्यते॥४५॥

‘वानरराज सुग्रीव ने चार महीनों की अवधि निश्चित की थी। वे कभी बीत गये, परंतु वह मधुपान के मद से अत्यन्त उन्मत्त होकर स्त्रियों के साथ क्रीडा-विहार कर रहा है। उसे बीते हुए समय का पता ही नहीं है। ४५॥

नहि धर्मार्थसिद्ध्यर्थं पानमेवं प्रशस्यते।

पानादर्थश्च कामश्च धर्मश्च परिहीयते॥४६॥

‘धर्म और अर्थ की सिद्धि के निमित्त प्रयत्न करने वाले पुरुष के लिये इस तरह मद्यपान अच्छा नहीं माना जाता है; क्योंकि मद्यपान से अर्थ, धर्म और काम तीनों का नाश होता है॥ ४६॥

धर्मलोपो महांस्तावत् कृते ह्यप्रतिकुर्वतः।

अर्थलोपश्च मित्रस्य नाशे गुणवतो महान्॥४७॥

‘मित्र के किये हुए उपकार का यदि अवसर आने पर भी बदला न चुकाया जाय तो धर्म की हानि तो होती ही है। गुणवान् मित्र के साथ मित्रता का नाता टूट जाने पर अपने अर्थ की भी बहुत बड़ी हानि उठानी पड़ती है।

मित्रं ह्यर्थगुणश्रेष्ठं सत्यधर्मपरायणम्।

तद्वयं तु परित्यक्तं न तु धर्मे व्यवस्थितम्॥ ४८॥

‘मित्र दो प्रकार के होते हैं—एक तो अपने मित्र के अर्थसाधन में तत्पर होता है और दूसरा सत्य एवं धर्म के ही आश्रित रहता है। तुम्हारे स्वामी ने मित्र के दोनों ही गुणों का परित्याग कर दिया है। वह न तो मित्र का कार्य सिद्ध करता है और न स्वयं ही धर्म में स्थित है॥४८॥

तदेवं प्रस्तुते कार्ये कार्यमस्माभिरुत्तरम्।

तत् कार्यं कार्यतत्त्वज्ञे त्वमुदाहर्तुमर्हसि॥४९॥

‘ऐसी स्थिति में प्रस्तुत कार्य की सिद्धि के लिये हमलोगों को भविष्य में क्या करना चाहिये? हमारे लिये जो समुचित कर्तव्य हो, उसे तुम्हीं बताओ; क्योंकि तुम कार्य के तत्त्व को जानती हो’। ४९॥

सा तस्य धर्मार्थसमाधियुक्तं निशम्य वाक्यं मधुरस्वभावम्।

तारा गतार्थे मनुजेन्द्रकार्येविश्वासयुक्तं तमुवाच भूयः॥५०॥

लक्ष्मण का वचन धर्म और अर्थ के निश्चय से संयुक्त था। उससे उनके मधुर स्वभाव का परिचय मिल रहा था। उसे सुनकर तारा भगवान् श्रीरामचन्द्रजी के कार्य के विषय में, जिसका प्रयोजन उसे ज्ञात हो चुका था, पुनः लक्ष्मण से विश्वास के योग्य बात बोली- ॥५०॥

न कोपकालः क्षितिपालपुत्र न चापि कोपः स्वजने विधेयः।

त्वदर्थकामस्य जनस्य तस्य प्रमादमप्यर्हसि वीर सोढम्॥५१॥

‘वीर राजकुमार! यह क्रोध करने का समय नहीं है। आत्मीय जनों पर क्रोध करना भी नहीं चाहिये। सुग्रीव के मन में सदा आपका कार्य सिद्ध करने की इच्छा बनी रहती है। अतः यदि उनसे कोई भूल भी हो जाय तो उसे आपको क्षमा करना चाहिये॥५१॥

कोपं कथं नाम गुणप्रकृष्टः कुमार कुर्यादपकृष्टसत्त्वे।

कस्त्वद्विधः कोपवशं हि गच्छेत् सत्त्वावरुद्धस्तपसः प्रसूतिः॥५२॥

‘कुमार! गुणों में श्रेष्ठ पुरुष किसी हीन गुणवाले प्राणी पर क्रोध कैसे कर सकता है? जो सत्त्वगुण से अवरुद्ध होने के कारण शास्त्र-विपरीत व्यापार में लग नहीं सकता, अतएव जो सद्विचार को जन्म देने वाला है, वह आप-जैसा कौन पुरुष क्रोध के वशीभूत हो सकता है ? ।। ५२ ॥

जानामि कोपं हरिवीरबन्धोर्जानामि कार्यस्य च कालसङ्गम्।

जानामि कार्यं त्वयि यत्कृतं नस्तच्चापि जानामि यदत्र कार्यम्॥५३॥

‘वानरवीर सुग्रीव के मित्र भगवान् श्रीराम के क्रोध का कारण मैं जानती हूँ। उनके कार्य में जो विलम्ब हुआ है, उससे भी मैं अपरिचित नहीं हूँ। सुग्रीव का जो कार्य आपके अधीन था और जिसे आपलोगों ने पूरा किया है, उसका भी मुझे पता है तथा इस समय जो आपका कार्य प्रस्तुत है, उसके विषय में हमलोगों का क्या कर्तव्य है, इसका भी मुझे अच्छी तरह ज्ञान है॥ ५३॥

तच्चापि जानामि तथाविषह्यं बलं नरश्रेष्ठ शरीरजस्य।

जानामि यस्मिंश्च जनेऽवबद्धं कामेन सुग्रीवमसक्तमद्य॥५४॥

‘नरश्रेष्ठ! इस शरीर में उत्पन्न हुए काम का जो असह्य बल है, उसको भी मैं जानती हूँ तथा उस काम द्वारा आबद्ध होकर सुग्रीव जहाँ आसक्त हो रहे हैं, वह भी मुझे मालूम है। साथ ही इस बात से भी मैं परिचित हूँ कि कामासक्ति के कारण ही इन दिनों सुग्रीव का मन दूसरे किसी काम में नहीं लगता॥५४॥

न कामतन्त्रे तव बुद्धिरस्ति त्वं वै यथा मन्युवशं प्रपन्नः।

न देशकालौ हि यथार्थधर्मा ववेक्षते कामरतिर्मनुष्यः॥५५॥

‘आप जो क्रोध के वशीभूत हो गये हैं, इससे जान पड़ता है कि काम के अधीन हुए पुरुष की स्थिति का आपको बिलकुल ज्ञान नहीं है, वानर की तो बात ही क्या है ? कामासक्त मनुष्य को भी देश, काल, अर्थ और धर्म का ज्ञान नहीं रह जाता—उनकी ओर उसकी दृष्टि नहीं जाती है।॥ ५५ ॥

तं कामवृत्तं मम संनिकृष्टं कामाभियोगाच्च विमुक्तलज्जम्।

क्षमस्व तावत् परवीरहन्तस्त्व द्भातरं वानरवंशनाथम्॥५६॥

‘विपक्षी वीरों का विनाश करने वाले राजकुमार! वानरराज सुग्रीव विषयभोग में आसक्त होकर इस समय मेरे ही पास थे। काम के आवेश में उन्होंने अपनी लज्जा का परित्याग कर दिया है, तो भी उन्हें अपना भाई समझकर क्षमा कीजिये॥५६॥

महर्षयो धर्मतपोऽभिरामाः कामानुकामाः प्रतिबद्धमोहाः।

अयं प्रकृत्या चपलः कपिस्तु कथं न सज्जेत सुखेषु राजा॥५७॥

‘जो निरन्तर धर्म और तपस्या में ही संलग्न रहते हैं, जिन्होंने मोह को अवरुद्ध कर दिया है-अविवेक को दूर भगा दिया है, वे महर्षि भी कभी-कभी विषयाभिलाषी हो जाते हैं; फिर जो स्वभाव से ही चञ्चल वानर हैं, वह राजा सुग्रीव सुख-भोग में क्यों न आसक्त हों?’ ॥ ५७॥

इत्येवमुक्त्वा वचनं महार्थं सा वानरी लक्ष्मणमप्रमेयम्।

पुनः सखेदं मदविह्वलाक्षीभर्तुर्हितं वाक्यमिदं बभाषे॥५८॥

अप्रमेय शक्तिशाली लक्ष्मण से इस प्रकार महान् अर्थ से युक्त बात कहकर मद से चञ्चल नेत्रवाली वानरपत्नी तारा ने पुनः खेदपूर्वक स्वामी के लिये यह हितकर वचन कहा- ॥ ५८॥

उद्योगस्तु चिराज्ञप्तः सुग्रीवेण नरोत्तम।

कामस्यापि विधेयेन तवार्थप्रतिसाधने॥५९॥

‘नरश्रेष्ठ! यद्यपि सुग्रीव इस समय काम के गुलाम हो रहे हैं, तथापि इन्होंने आपका कार्य सिद्ध करने के लिये बहुत पहले से ही उद्योग आरम्भ करने की आज्ञा दे रखी है॥ ५९॥

आगता हि महावीर्या हरयः कामरूपिणः।

कोटीः शतसहस्राणि नानानगनिवासिनः॥६०॥

‘इसके फलस्वरूप इस समय विभिन्न पर्वतो पर निवास करने वाले लाखों और करोड़ों वानर, जो इच्छानुसार रूप धारण करने में समर्थ एवं महान् पराक्रमी हैं, यहाँ उपस्थित हुए हैं। ६० ॥

तदागच्छ महाबाहो चारित्रं रक्षितं त्वया।

अच्छलं मित्रभावेन सतां दारावलोकनम्॥६१॥

‘महाबाहो! (दूसरे की स्त्रियों को देखना अनुचित समझकर जो आप भीतर नहीं आये, बाहर ही खड़े रह गये—इसके द्वारा) आपने सदाचार की रक्षा की है; अतः अब भीतर आइये। मित्रभाव से स्त्रियों की

ओर देखना (उनके प्रति माता-बहन आदि का भाव रखकर दृष्टि डालना) सत्पुरुषों के लिये अधर्म नहीं है’॥ ६१॥

तारया चाभ्यनुज्ञातस्त्वरया वापि चोदितः।

प्रविवेश महाबाहुरभ्यन्तरमरिंदमः॥६२॥

तारा के आग्रह और कार्य की जल्दी से प्रेरित होकर शत्रुदमन महाबाहु लक्ष्मण सुग्रीव के महल के भीतर गये॥

ततः सुग्रीवमासीनं काञ्चने परमासने।

महार्हास्तरणोपेते ददर्शादित्यसंनिभम्॥६३॥

वहाँ जाकर उन्होंने देखा, एक सोने के सिंहासन पर बहुमूल्य बिछौना बिछा है और वानरराज सुग्रीव सूर्यतुल्य तेजस्वी रूप धारण किये उसके ऊपर विराजमान हैं। ६३॥

दिव्याभरणचित्राङ्गं दिव्यरूपं यशस्विनम्।

दिव्यमाल्याम्बरधरं महेन्द्रमिव दुर्जयम्॥६४॥

उस समय दिव्य आभूषणों के कारण उनके शरीर की विचित्र शोभा हो रही थी। दिव्यरूपधारी यशस्वी सुग्रीव दिव्य मालाएँ और दिव्य वस्त्र धारण करके दुर्जय वीर देवराज इन्द्र के समान दिखायी दे रहे थे॥ ६४॥

दिव्याभरणमाल्याभिः प्रमदाभिः समावृतम्।

संरब्धतररक्ताक्षो बभूवान्तकसंनिभः॥६५॥

दिव्य आभूषणों और मालाओं से अलंकृत युवती स्त्रियाँ उन्हें चारों ओर से घेरकर खड़ी थीं। उन्हें इस अवस्था में देख लक्ष्मण के नेत्र रोषावेश के कारण लाल हो गये। वे उस समय यमराज के समान भयंकर प्रतीत होने लगे॥६५॥

रुमां तु वीरः परिरभ्य गाढं वरासनस्थो वरहेमवर्णः।

ददर्श सौमित्रिमदीनसत्त्वं विशालनेत्रः स विशालनेत्रम्॥६६॥

सुन्दर सुवर्ण के समान कान्ति और विशाल नेत्रवाले वीर सुग्रीव अपनी पत्नी रुमा को गाढआलिङ्गनपाश में बाँधे हुए एक श्रेष्ठ आसन पर विराजमान थे। उसी अवस्था में उन्होंने उदार हृदय और विशाल नेत्रवाले सुमित्राकुमार लक्ष्मण को देखा।। ६६॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे त्रयस्त्रिंशः सर्गः॥३३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में तैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥३३॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

सुग्रीव का लक्ष्मण के पास जाना और लक्ष्मण का उन्हें फटकारना

चतुस्त्रिंशः सर्गः

सर्ग-34


तमप्रतिहतं क्रुद्धं प्रविष्टं पुरुषर्षभम्।

सुग्रीवो लक्ष्मणं दृष्ट्वा बभूव व्यथितेन्द्रियः॥१॥

लक्ष्मण बेरोक-टोक भीतर घुस आये थे। उन पुरुषशिरोमणि को क्रोध से भरा देख सुग्रीव की सारी इन्द्रियाँ व्यथित हो उठीं॥१॥

क्रुद्धं निःश्वसमानं तं प्रदीप्तमिव तेजसा।

भ्रातुर्व्यसनसंतप्तं दृष्ट्वा दशरथात्मजम्॥२॥

उत्पपात हरिश्रेष्ठो हित्वा सौवर्णमासनम्।

महान् महेन्द्रस्य यथा स्वलंकृत इव ध्वजः॥३॥

दशरथ पुत्र लक्ष्मण रोषपूर्वक लंबी साँस खींच रहे थे और तेज से प्रज्वलित-से जान पड़ते थे। अपने । भाई के कष्ट से उनके मन में बड़ा संताप था। उन्हें सामने आया देख वानरश्रेष्ठ सुग्रीव सुवर्ण का सिंहासन छोड़कर कूद पड़े, मानो देवराज इन्द्र का भलीभाँति सजाया हुआ महान् ध्वज आकाश से पृथ्वी पर उतर आया हो॥२-३॥

उत्पतन्तमनूत्पेतू रुमाप्रभृतयः स्त्रियः।

सुग्रीवं गगने पूर्णं चन्द्रं तारागणा इव॥४॥

सुग्रीव के उतरते ही रुमा आदि स्त्रियाँ भी उनके पीछे उस सिंहासन से उतरकर खड़ी हो गयीं। जैसे आकाश में पूर्ण चन्द्रमा का उदय होने पर तारों के समुदाय भी उदित हो गये हों॥४॥

संरक्तनयनः श्रीमान् संचचार कृताञ्जलिः।

बभूवावस्थितस्तत्र कल्पवृक्षो महानिव॥५॥

श्रीमान् सुग्रीव के नेत्र मद से लाल हो रहे थे। वे टहलते हुए लक्ष्मण के पास आये और हाथ जोड़कर खड़े हो गये। लक्ष्मण वहाँ महान् कल्पवृक्ष के समान स्थित थे।

रुमाद्वितीयं सुग्रीवं नारीमध्यगतं स्थितम्।

अब्रवील्लक्ष्मणः क्रुद्धः सतारं शशिनं यथा॥६॥

सुग्रीव के साथ उनकी पत्नी रुमा भी थी। वे स्त्रियों के बीच में खड़े होकर तारिकाओं से घिरे हुए चन्द्रमा की भाँति शोभा पाते थे। उन्हें देखकर लक्ष्मण ने क्रोधपूर्वक कहा- ॥६॥

सत्त्वाभिजनसम्पन्नः सानुक्रोशो जितेन्द्रियः।

कृतज्ञः सत्यवादी च राजा लोके महीयते॥७॥

‘वानरराज! धैर्यवान्, कुलीन, दयालु, जितेन्द्रिय और सत्यवादी राजा का ही संसार में आदर होता है।

यस्तु राजा स्थितोऽधर्मे मित्राणामुपकारिणाम्।

मिथ्या प्रतिज्ञां कुरुते को नृशंसतरस्ततः॥८॥

‘जो राजा अधर् ममें स्थित होकर उपकारी मित्रों के सामने की हुई अपनी प्रतिज्ञा को झूठी कर देता है, उससे बढ़कर अत्यन्त क्रूर कौन होगा? ॥ ८॥

शतमश्वानृते हन्ति सहस्रं तु गवानृते।

आत्मानं स्वजनं हन्ति पुरुषः पुरुषानृते॥९॥

‘अश्वदान की प्रतिज्ञा करके उसकी पूर्ति न करने पर ‘अश्वानृत’ (अश्वविषयक असत्य) नामक पाप होता है। यह पाप बन जाने पर मनुष्य सौ अश्वों की हत्या के पाप का भागी होता है। इसी प्रकार गोदानविषयक प्रतिज्ञा को मिथ्या कर देने पर सहस्र गौओं के वध का पाप लगता है तथा किसी पुरुष के समक्ष उसका कार्य पूर्ण कर देने की प्रतिज्ञा करके जो उसकी पूर्ति नहीं करता है, वह पुरुष आत्मघात और स्वजन-वध के पाप का भागी होता है (फिर जो परम पुरुष श्रीराम के समक्ष की हुई प्रतिज्ञा को मिथ्या करता है, उसके पाप की कोई इयत्ता नहीं हो सकती) ॥९॥

पूर्वं कृतार्थो मित्राणां न तत्प्रतिकरोति यः।

कृतघ्नः सर्वभूतानां स वध्यः प्लवगेश्वर ॥१०॥

‘वानरराज! जो पहले मित्रों के द्वारा अपना कार्य सिद्ध करके बदले में उन मित्रों का कोई उपकार नहीं करता है, वह कृतघ्न एवं सब प्राणियों के लिये वध्य है।॥ १०॥

गीतोऽयं ब्रह्मणा श्लोकः सर्वलोकनमस्कृतः।

दृष्ट्वा कृतघ्नं क्रुद्धेन तन्निबोध प्लवंगम॥११॥

‘कपिराज! किसी कृतघ्न को देखकर कुपित हुए ब्रह्माजी ने सब लोगों के लिये आदरणीय यह एक श्लोक कहा है, इसे सुनो— ॥ ११॥

गोने चैव सुरापे च चौरे भग्नव्रते तथा।

निष्कृतिर्विहिता सद्भिः कृतजे नास्ति निष्कृतिः॥ १२॥

‘गोहत्यारे, शराबी, चोर और व्रत-भंग करने वाले पुरुष के लिये सत्पुरुषों ने प्रायश्चित्त का विधान किया है; किंतु कृतघ्न के उद्धार का कोई उपाय नहीं है। १२॥

अनार्यस्त्वं कृतघ्नश्च मिथ्यावादी च वानर।

पूर्वं कृतार्थो रामस्य न तत्प्रतिकरोषि यत्॥१३॥

‘वानर! तुम अनार्य, कृतघ्न और मिथ्यावादी हो; क्योंकि श्रीरामचन्द्रजी की सहायता से तुमने पहले अपना काम तो बना लिया, किंतु जब उनके लिये सहायता करने का अवसर आया, तब तुम कुछ नहीं करते॥१३॥

ननु नाम कृतार्थेन त्वया रामस्य वानर।

सीताया मार्गणे यत्नः कर्तव्यः कृतमिच्छता॥ १४॥

‘वानर ! तुम्हारा मनोरथ सिद्ध हो चुका है; अतः अब तुम्हें प्रत्युपकार की इच्छा से श्रीराम की पत्नी सीता की खोज के लिये प्रयत्न करना चाहिये॥१४॥

स त्वं ग्राम्येषु भोगेषु सक्तो मिथ्याप्रतिश्रवः।

न त्वां रामो विजानीते सर्प मण्डूकराविणम्॥ १५॥

‘परंतु तुम्हारी दशा यह है कि अपनी प्रतिज्ञा को झूठी करके ग्राम्यभोगों में आसक्त हो रहे हो। श्रीरामचन्द्रजी यह नहीं जानते हैं कि तुम मेढक की सी बोली बोलने वाले सर्प हो (जैसे साँप अपने मुँह में किसी मेढक को जब दबा लेता है, तब केवल मेढक ही बोलता है, दूरके लोग उसे मेढक ही समझते हैं; परंतु वह वास्तव में सर्प होता है। वही दशा तुम्हारी है। तुम्हारी बातें कुछ और हैं और स्वरूप कुछ और) ॥ १५॥

महाभागेन रामेण पापः करुणवेदिना।

हरीणां प्रापितो राज्यं त्वं दुरात्मा महात्मना।१६॥

‘महाभाग श्रीरामचन्द्रजी परम महात्मा तथा दया से द्रवित हो जाने वाले हैं; अतएव उन्होंने तुम-जैसे पापी और दुरात्मा को भी वानरों के राज्य पर बिठा दिया। १६॥

कृतं चेन्नातिजानीषे राघवस्य महात्मनः।

सद्यस्त्वं निशितैर्बाणैर्हतो द्रक्ष्यसि वालिनम्॥ १७॥

‘यदि तुम महात्मा रघुनाथजी के किये हुए उपकार को नहीं समझोगे तो शीघ्र ही उनके तीखे बाणों से मारे जाकर वाली का दर्शन करोगे॥ १७॥

न स संकुचितः पन्था येन वाली हतो गतः।

समये तिष्ठ सुग्रीव मा वालिपथमन्वगाः॥१८॥

‘सुग्रीव! वाली मारा जाकर जिस रास्ते से गया है,वह आज भी बंद नहीं हुआ है। इसलिये तुम अपनी प्रतिज्ञा पर डटे रहो। वाली के मार्ग का अनुसरण न करो॥

न नूनमिक्ष्वाकुवरस्य कार्मुकाच्छरांश्च तान् पश्यसि वज्रसंनिभान्।

ततः सुखं नाम विषेवसे सुखी न रामकार्यं मनसाप्यवेक्षसे॥१९॥

‘इक्ष्वाकुवंशशिरोमणि श्रीरामचन्द्रजी के धनुष से छूटे हुए उन वज्रतुल्य बाणों की ओर निश्चय ही तुम्हारी दृष्टि नहीं जा रही है। इसीलिये तुम ग्राम्य सुख का सेवन कर रहे हो और उसी में सुख मानकर श्रीरामचन्द्रजी के कार्य का मन से भी विचार नहीं करते हो’ ॥ १९॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे चतुस्त्रिंशः सर्गः॥३४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में चौंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥३४॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

तारा का लक्ष्मण को युक्तियुक्त वचनों द्वारा शान्त करना

पञ्चत्रिंशः सर्गः

सर्ग-35


तथा ब्रूवाणं सौमित्रिं प्रदीप्तमिव तेजसा।

अब्रवील्लक्ष्मणं तारा ताराधिपनिभानना॥१॥

सुमित्राकुमार लक्ष्मण अपने तेज के कारण प्रज्वलित-से हो रहे थे। वे जब उपर्युक्त बात कह चुके, तब चन्द्रमुखी तारा उनसे बोली- ॥१॥

नैवं लक्ष्मण वक्तव्यो नायं परुषमर्हति।

हरीणामीश्वरः श्रोतुं तव वक्त्राद् विशेषतः॥२॥

‘कुमार लक्ष्मण! आपको सुग्रीव से ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये। ये वानरों के राजा हैं; अतः इनके प्रति कठोर वचन बोलना उचित नहीं है। विशेषतः आप जैसे सुहृद् के मुख से तो ये कदापि कटु वचन सुनने के अधिकारी नहीं हैं॥२॥

नैवाकृतज्ञः सुग्रीवो न शठो नापि दारुणः।

नैवानृतकथो वीर न जिह्मश्च कपीश्वरः॥३॥

‘वीर! कपिराज सुग्रीव न कृतघ्न हैं, न शठ हैं, न क्रूर हैं, न असत्यवादी हैं और न कुटिल ही हैं॥३॥

उपकारं कृतं वीरो नाप्ययं विस्मृतः कपिः।

रामेण वीर सुग्रीवो यदन्यैर्दुष्करं रणे॥४॥

‘वीर लक्ष्मण! श्रीरामचन्द्रजी ने इनका जो उपकार किया है, वह युद्ध में दूसरों के लिये दुष्कर है। उसे इन वीर कपिराज ने कभी भुलाया नहीं है॥ ४॥

रामप्रसादात् कीर्तिं च कपिराज्यं च शाश्वतम्।

प्राप्तवानिह सुग्रीवो रुमां मां च परंतप॥५॥

‘शत्रुओं को संताप देने वाले सुमित्रानन्दन ! श्रीरामचन्द्रजी के कृपाप्रसाद से ही सुग्रीव ने वानरों के अक्षय राज्य को, यश को, रुमा को तथा मुझको भी प्राप्त किया है।

सुदुःखशयितः पूर्वं प्राप्येदं सुखमुत्तमम्।

प्राप्तकालं न जानीते विश्वामित्रो यथा मुनिः॥

‘पहले इन्होंने बड़ा दुःख उठाया है। अब इस उत्तम सुख को पाकर ये इसमें ऐसे रम गये कि इन्हें प्राप्त हुए समय का ज्ञान ही नहीं रहा। ठीक उसी तरह, जैसे विश्वामित्र मुनि को मेनका में आसक्त हो जाने के कारण समय की सुध-बुध नहीं रह गयी थी* ॥ ६॥

* यह प्रसंग बालकाण्ड के तिरसठवें सर्ग में आया है।

घृताच्यां किल संसक्तो दश वर्षाणि लक्ष्मण।

अहोऽमन्यत धर्मात्मा विश्वामित्रो महामुनिः॥७॥

‘लक्ष्मण! कहते हैं, धर्मात्मा महामुनि विश्वामित्र ने घृताची (मेनका) नामक अप्सरा में आसक्त होने के कारण दस वर्ष के समय को एक दिन ही माना था। ७॥

स हि प्राप्तं न जानीते कालं कालविदां वरः।

विश्वामित्रो महातेजाः किं पुनर्यः पृथग्जनः॥ ८॥

‘काल का ज्ञान रखने वालों में श्रेष्ठ महातेजस्वी विश्वामित्र को भी जब भोगासक्त होने पर काल का ज्ञान नहीं रह गया, तब फिर दूसरे साधारण प्राणी को कैसे रह सकता है ? ॥ ८॥

देहधर्मगतस्यास्य परिश्रान्तस्य लक्ष्मण।

अवितृप्तस्य कामेषु रामः क्षन्तुमिहार्हति॥९॥

‘कुमार लक्ष्मण! आहार, निद्रा और मैथुन आदि जो देह के धर्म हैं, (जो पशुओं में भी समान रूप से पाये जाते हैं) उनमें स्थित हुए ये सुग्रीव पहले तो चिरकालतक दुःख भोगने के कारण थके-माँदे एवं खिन्न थे। अब भगवान् श्रीराम की कृपा से इन्हें जो काम-भोग प्राप्त हुए हैं, उनसे अभी तक इनकी तृप्ति नहीं हुई (इसीलिये इनसे कुछ असावधानी हो गयी); अतः परम कृपालु श्रीरघुनाथजी को यहाँ इनका अपराध क्षमा करना चाहिये॥९॥

न च रोषवशं तात गन्तुमर्हसि लक्ष्मण।

निश्चयार्थमविज्ञाय सहसा प्राकृतो यथा॥१०॥

‘तात लक्ष्मण! आपको यथार्थ बात जाने बिना साधारण मनुष्य की भाँति सहसा क्रोध के अधीन नहीं होना चाहिये॥ १०॥

सत्त्वयुक्ता हि पुरुषास्त्वद्विधाः पुरुषर्षभ।

अविमृश्य न रोषस्य सहसा यान्ति वश्यताम्॥ ११॥

‘पुरुषप्रवर! आप-जैसे सत्त्वगुणसम्पन्न पुरुष विचार किये बिना ही सहसा रोष के वशीभूत नहीं होते हैं।॥ ११॥

प्रसादये त्वां धर्मज्ञ सुग्रीवार्थं समाहिता।

महान् रोषसमुत्पन्नः संरम्भस्त्यज्यतामयम्॥१२॥

‘धर्मज्ञ! मैं एकाग्र हृदय से सुग्रीव के लिये आपसे कृपा की याचना करती हूँ। आप क्रोध से उत्पन्न हुए इस महान् क्षोभ का परित्याग कीजिये॥ १२ ॥

रुमां मां चाङ्गदं राज्यं धनधान्यपशूनि च।

रामप्रियार्थं सुग्रीवस्त्यजेदिति मतिर्मम॥१३॥

‘मेरा तो ऐसा विश्वास है कि सुग्रीव श्रीरामचन्द्रजी का प्रिय करने के लिये रुमा का, मेरा, कुमार अङ्गद का तथा धन-धान्य और पशुओं सहित सम्पूर्ण राज्य का भी परित्याग कर सकते हैं॥ १३॥

समानेष्यति सुग्रीवः सीतया सह राघवम्।

शशाङ्कमिव रोहिण्या हत्वा तं राक्षसाधमम्॥ १४॥

‘सुग्रीव उस अधम राक्षस का वध करके श्रीराम को सीता से उसी तरह मिलायेंगे, जैसे चन्द्रमा का रोहिणी के साथ संयोग हुआ हो॥१४॥

शतकोटिसहस्राणि लङ्कायां किल रक्षसाम्।

अयुतानि च षट्त्रिंशत्सहस्राणि शतानि च॥ १५॥

‘कहते हैं कि लङ्का में सौ हजार करोड़, छत्तीस अयुत, छत्तीस हजार और छत्तीस सौ राक्षस रहते हैं*॥

* आधुनिक गणना के अनुसार यह संख्या दस खरब तीन लाख निन्यानबे हजार छः सौ होती है।

अहत्वा तांश्च दुर्धर्षान् राक्षसान् कामरूपिणः।

न शक्यो रावणो हन्तुं येन सा मैथिली हृता॥ १६॥

‘वे सब-के-सब राक्षस इच्छानुसार रूप धारण करने वाले तथा दुर्जय हैं। उन सबका संहार किये बिना रावण का, जिसने मिथिलेशकुमारी सीता का अपहरण किया है, वध नहीं हो सकता॥ १६ ॥

ते न शक्या रणे हन्तुमसहायेन लक्ष्मण।

रावणः क्रूरकर्मा च सुग्रीवेण विशेषतः॥१७॥

‘लक्ष्मण! किसीकी सहायता लिये बिना अकेले किसी वीर के द्वारा न तो उन राक्षसों का संग्राम में वध किया जा सकता है और न क्रूरकर्मा रावण का ही इसलिये सुग्रीव से सहायता लेने की विशेष आवश्यकता है॥ १७॥

एवमाख्यातवान् वाली स ह्यभिज्ञो हरीश्वरः।

आगमस्तु न मे व्यक्तः श्रवात् तस्य ब्रवीम्यहम्॥ १८॥

‘वानरराज वाली लङ्का के राक्षसों की इस संख्या से परिचित थे, उन्होंने मुझे उनकी इस तरह गणना बतायी थी। रावण ने इतनी सेना का संग्रह कैसे किया? यह तो मुझे नहीं मालूम है। किंतु इस संख्या को मैंने उनके मुँह से सुना था। वह इस समय मैं आपको बता रही हूँ॥१८॥

त्वत्सहायनिमित्तं हि प्रेषिता हरिपुङ्गवाः।

आनेतुं वानरान् युद्धे सुबहून् हरिपुङ्गवान्॥१९॥

‘आपकी सहायता के लिये सुग्रीव ने बहुतेरे श्रेष्ठ वानरों को युद्ध के निमित्त असंख्य वानर वीरों की सेना एकत्र करने के लिये भेज रखा है॥ १९॥

तांश्च प्रतीक्षमाणोऽयं विक्रान्तान् सुमहाबलान्।

राघवस्यार्थसिद्ध्यर्थं न निर्याति हरीश्वरः॥२०॥

‘वानरराज सुग्रीव उन महाबली और पराक्रमी वीरों के आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। अतएव भगवान् श्रीराम का कार्य सिद्ध करने के लिये अभी नगर से बाहर नहीं निकल सके हैं।॥ २०॥

कृता सुसंस्था सौमित्रे सुग्रीवेण पुरा यथा।

अद्य तैर्वानरैः सर्वैरागन्तव्यं महाबलैः॥२१॥

‘सुमित्रानन्दन! सुग्रीव ने उन सबके एकत्र होने के लिये पहले से ही जो अवधि निश्चित कर रखी है, उसके अनुसार उन समस्त महाबली वानरों को आज ही यहाँ उपस्थित हो जाना चाहिये॥ २१॥

ऋक्षकोटिसहस्राणि गोलाङ्गलशतानि च।

अद्य त्वामुपयास्यन्ति जहि कोपमरिंदम।

कोट्योऽनेकास्तु काकुत्स्थ कपीनां दीप्ततेजसाम्॥ २२॥

‘शत्रुदमन लक्ष्मण! आज आपकी सेवा में कोटि सहस्र (दस अरब) रीछ, सौ करोड़ (एक अरब) लंगूर तथा और भी बढ़े हुए तेजवाले कई करोड़ वानर उपस्थित होंगे। इसलिये आप क्रोध को त्याग दीजिये॥ २२॥

तव हि मुखमिदं निरीक्ष्य कोपात् क्षतजसमे नयने निरीक्षमाणाः।

हरिवरवनिता न यान्ति शान्तिं प्रथमभयस्य हि शङ्किताः स्म सर्वाः ॥२३॥

‘आपका मुख क्रोध से तमतमा उठा है और आँखें रोष से लाल हो गयी हैं। यह सब देखकर हम वानरराज की स्त्रियों को शान्ति नहीं मिल रही है। हम सबको प्रथम भय (वालिवध) के समान ही किसी अनिष्ट की आशङ्का हो रही है ॥ २३॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे पञ्चत्रिंशः सर्गः॥ ३५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में पैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३५॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

सुग्रीव का अपनी लघुता तथा श्रीराम की महत्ता बताते हए लक्ष्मण से क्षमा माँगना और लक्ष्मण का उनकी प्रशंसा करके उन्हें अपने साथ चलने के लिये कहना

षट्त्रिंशः सर्गः

सर्ग-36


इत्युक्तस्तारया वाक्यं प्रश्रितं धर्मसंहितम्।

मृदुस्वभावः सौमित्रिः प्रतिजग्राह तद्वचः॥१॥

तारा ने जब इस प्रकार धर्म के अनुकूल विनययुक्त बात कही, तब कोमल स्वभाव वाले सुमित्राकुमार लक्ष्मण ने उसे मान लिया (क्रोध को त्याग दिया)। १॥

तस्मिन् प्रतिगृहीते तु वाक्ये हरिगणेश्वरः।

लक्ष्मणात् सुमहत् त्रासं वस्त्रं क्लिन्नमिवात्यजत्॥२॥

उनके द्वारा तारा की बात मान ली जाने पर वानरयूथपति सुग्रीव ने लक्ष्मण से प्राप्त होने वाले महान् भय को भीगे हुए वस्त्र की भाँति त्याग दिया॥ २॥

ततः कण्ठगतं माल्यं चित्रं बहुगुणं महत्।

चिच्छेद विमदश्चासीत् सुग्रीवो वानरेश्वरः॥३॥

तदनन्तर वानरराज सुग्रीव ने अपने कण्ठ में पड़ी हुई फूलों की विचित्र, विशाल एवं बहुगुणसम्पन्न माला तोड़ डाली और वे मद से रहित हो गये॥३॥

स लक्ष्मणं भीमबलं सर्ववानरसत्तमः।

अब्रवीत् प्रश्रितं वाक्यं सुग्रीवः सम्प्रहर्षयन्॥४॥

फिर समस्त वानरों में शिरोमणि सुग्रीव ने भयंकर बलशाली लक्ष्मण का हर्ष बढ़ाते हुए उनसे यह विनययुक्त बात कही— ॥४॥

प्रणष्टा श्रीश्च कीर्तिश्च कपिराज्यं च शाश्वतम्।

रामप्रसादात् सौमित्रे पुनश्चाप्तमिदं मया ॥५॥

‘सुमित्राकुमार! मेरी श्री, कीर्ति तथा सदा से चला आता हुआ वानरों का राज्य–ये सब नष्ट हो चुके थे। भगवान् श्रीराम की कृपा से ही मुझे पुनः इन सबकी प्राप्ति हुई है॥ ५॥

कः शक्तस्तस्य देवस्य ख्यातस्य स्वेन कर्मणा।

तादृशं प्रतिकुर्वीत अंशेनापि नृपात्मज॥६॥

‘राजकुमार! वे भगवान् श्रीराम अपने कर्मों से ही सर्वत्र विख्यात हैं। उनके उपकार का वैसा ही बदला अंशमात्र से भी कौन चुका सकता है ? ॥ ६॥

सीतां प्राप्स्यति धर्मात्मा वधिष्यति च रावणम्।

सहायमात्रेण मया राघवः स्वेन तेजसा॥७॥

‘धर्मात्मा श्रीराम अपने ही तेज से रावण का वध करेंगे और सीता को प्राप्त कर लेंगे। मैं तो उनका एक तुच्छ सहायकमात्र रहूँगा॥ ७॥

सहायकृत्यं किं तस्य येन सप्त महाद्रुमाः।

गिरिश्च वसुधा चैव बाणेनैकेन दारिताः॥८॥

‘जिन्होंने एक ही बाण से सात बड़े-बड़े ताल वृक्ष, पर्वत, पृथ्वी, पाताल और वहाँ रहने वाले दैत्यों को भी विदीर्ण कर दिया था, उनको दूसरे किसी सहायक की आवश्यकता भी क्या है ? ॥ ८॥

धनुर्विस्फारमाणस्य यस्य शब्देन लक्ष्मण।

सशैला कम्पिता भूमिः सहायैः किं नु तस्य वै॥ ९॥

‘लक्ष्मण! जिनके धनुष खींचते समय उसकी टंकार से पर्वतोंसहित पृथ्वी काँप उठी थी, उन्हें सहायकों से क्या लेना है ? ॥ ९॥

अनयात्रां नरेन्द्रस्य करिष्येऽहं नरर्षभ।

गच्छतो रावणं हन्तुं वैरिणं सपुरस्सरम्॥१०॥

‘नरश्रेष्ठ! मैं तो वैरी रावण का वध करने के लिये अग्रगामी सैनिकों सहित यात्रा करने वाले महाराज श्रीराम के पीछे-पीछे चलूँगा॥ १० ॥

यदि किंचिदतिक्रान्तं विश्वासात् प्रणयेन वा।

प्रेष्यस्य क्षमितव्यं मे न कश्चिन्नापराध्यति॥ ११॥

‘विश्वास अथवा प्रेम के कारण यदि कोई अपराध बन गया हो तो मुझ दास के उस अपराध को क्षमा कर देना चाहिये; क्योंकि ऐसा कोई सेवक नहीं है, जिससे कभी कोई अपराध होता ही न हो’ ॥ ११॥

इति तस्य ब्रुवाणस्य सुग्रीवस्य महात्मनः।

अभवल्लक्ष्मणः प्रीतः प्रेम्णा चेदमुवाच ह॥ १२॥

महात्मा सुग्रीव के ऐसा कहने पर लक्ष्मण प्रसन्न हो गये और बड़े प्रेम से इस प्रकार बोले- ॥ १२ ॥

सर्वथा हि मम भ्राता सनाथो वानरेश्वर।

त्वया नाथेन सुग्रीव प्रश्रितेन विशेषतः॥१३॥

‘वानरराज सुग्रीव! विशेषतः तुम-जैसे विनयशील सहायकको पाकर मेरे भाई श्रीराम सर्वथा सनाथ हैं।

यस्ते प्रभावः सुग्रीव यच्च ते शौचमीदृशम्।

अर्हस्त्वं कपिराज्यस्य श्रियं भोक्तुमनुत्तमाम्॥१४॥

‘सुग्रीव! तुम्हारा जो प्रभाव है और तुम्हारे हृदय में जो इतना शुद्ध भाव है, इससे तुम वानरराज्य की परम उत्तम लक्ष्मी का सदा ही उपभोग करने के अधिकारी हो॥

सहायेन च सुग्रीव त्वया रामः प्रतापवान्।

वधिष्यति रणे शत्रूनचरान्नात्र संशयः॥१५॥

‘सुग्रीव! तुम्हें सहायक के रूप में पाकर प्रतापी श्रीराम रणभूमि में अपने शत्रुओं का शीघ्र ही वध कर डालेंगे, इसमें संशय नहीं है॥ १५ ॥

धर्मज्ञस्य कृतज्ञस्य संग्रामेष्वनिवर्तिनः।

उपपन्नं च युक्तं च सुग्रीव तव भाषितम्॥१६॥

‘सुग्रीव! तुम धर्मज्ञ, कृतज्ञ तथा युद्ध में कभी पीठ न दिखाने वाले हो। तुम्हारा यह भाषण सर्वथा युक्तिसंगत और उचित है॥ १६॥

दोषज्ञः सति सामर्थ्य कोऽन्यो भाषितुमर्हति।

वर्जयित्वा मम ज्येष्ठं त्वां च वानरसत्तम॥१७॥

‘वानरशिरोमणे! तुमको और मेरे बड़े भाई को छोड़कर दूसरा कौन ऐसा विद्वान् है, जो अपने में सामर्थ्य होते हुए भी ऐसा नम्रतापूर्ण वचन कह सके॥ १७॥

सदृशश्चासि रामेण विक्रमेण बलेन च।

सहायो दैवतैर्दत्तश्चिराय हरिपुंगव॥१८॥

‘कपिराज! तुम बल और पराक्रम में भगवान् श्रीराम के बराबर हो। देवताओं ने ही हमें दीर्घकाल के लिये तुम-जैसा सहायक प्रदान किया है।॥ १८ ॥

किं तु शीघ्रमितो वीर निष्क्रम त्वं मया सह।

सान्त्वयस्व वयस्यं च भार्याहरणदुःखितम्॥१९॥

‘किंतु वीर! अब तुम शीघ्र ही मेरे साथ इस पुरी से बाहर निकलो। तुम्हारे मित्र अपनी पत्नी के अपहरण से बहुत दुःखी हैं। उन्हें चलकर सान्त्वना दो॥ १९॥

यच्च शोकाभिभूतस्य श्रुत्वा रामस्य भाषितम्।

मया त्वं परुषाण्युक्तस्तत् क्षमस्व सखे मम॥२०॥

‘सखे! शोकमग्न श्रीराम के वचनों को सुनकर जो मैंने तुम्हारे प्रति कठोर बातें कह दी हैं, उनके लिये मुझे क्षमा करो’ ॥ २०॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे षट्त्रिंशः सर्गः॥ ३६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में छत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥३६॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

सुग्रीव का हनुमान् जी को वानरसेना के संग्रह के लिये दोबारा दूत भेजने की आज्ञा देना, समस्त वानरों का किष्किन्धा के लिये प्रस्थान

सप्तत्रिंशः सर्गः

सर्ग-37


एवमुक्तस्तु सुग्रीवो लक्ष्मणेन महात्मना।

हनूमन्तं स्थितं पार्वे वचनं चेदमब्रवीत्॥१॥

महात्मा लक्ष्मण ने जब ऐसा कहा, तब सुग्रीव अपने पास ही खड़े हुए हनुमान् जी से यों बोले- ॥ १॥

महेन्द्रहिमवद्भिन्ध्यकैलासशिखरेषु च।

मन्दरे पाण्डुशिखरे पञ्चशैलेष ये स्थिताः॥२॥

तरुणादित्यवर्णेषु भ्राजमानेषु नित्यशः।

पर्वतेषु समुद्रान्ते पश्चिमस्यां तु ये दिशि॥३॥

आदित्यभवने चैव गिरौ संध्याभ्रसंनिभे।

पद्माचलवनं भीमाः संश्रिता हरिपुंगवाः॥४॥

अञ्जनाम्बुदसंकाशाः कुञ्जरेन्द्रमहौजसः।

अञ्जने पर्वते चैव ये वसन्ति प्लवंगमाः॥५॥

महाशैलगुहावासा वानराः कनकप्रभाः।

मेरुपार्श्वगताश्चैव ये च धूम्रगिरिं श्रिताः॥६॥

तरुणादित्यवर्णाश्च पर्वते ये महारुणे।

पिबन्तो मधु मैरेयं भीमवेगाः प्लवंगमाः॥७॥

वनेषु च सुरम्येषु सुगन्धिषु महत्सु च।

तापसाश्रमरम्येषु वनान्तेषु समन्ततः॥८॥

तांस्तांस्त्वमानय क्षिप्रं पृथिव्यां सर्ववानरान्।

सामदानादिभिः कल्पैर्वानरैर्वेगवत्तरैः॥९॥

‘महेन्द्र, हिमवान्, विन्ध्य, कैलास तथा श्वेत शिखर वाले मन्दराचल-इन पाँच पर्वतों के शिखरों पर जो श्रेष्ठ वानर रहते हैं, पश्चिम दिशा में समुद्र के परवर्ती तटपर प्रातःकालिक सूर्य के समान कान्तिमान्

और नित्य प्रकाशमान पर्वतों पर जिन वानरों का निवास है, भगवान् सूर्य के निवासस्थान तथा संध्याकालिक मेघसमूह के समान अरुण वर्णवाले उदयाचल एवं अस्ताचल पर जो वानर वास करते हैं,

पद्माचलवर्ती वन का आश्रय लेकर जो भयानक पराक्रमी वानर-शिरोमणि निवास करते हैं, अञ्जनपर्वत पर जो काजल और मेघ के समान काले तथा गजराज के समान महाबली वानर रहते हैं, बड़े

बड़े पर्वतों की गुफाओं में निवास करने वाले तथा मेरुपर्वत के आस-पास रहने वाले जो सुवर्ण की-सीकान्ति वाले वानर हैं, जो धूम्रगिरि का आश्रय लेकर रहते हैं, मैरेय मधु का पान करते हुए जो महारुण पर्वत पर प्रातःकाल के सूर्य की भाँति लाल रंग के भयानक वेगशाली वानर निवास करते हैं तथा सुगन्ध से परिपूर्ण एवं तपस्वियों के आश्रमों से सुशोभित बड़े-बड़े रमणीय वनों और वनान्तों में चारों ओर जो वानर रहते हैं, भूमण्डल के उन सभी वानरों को तुम शीघ्र यहाँ ले आओ। शक्तिशाली तथा अत्यन्त वेगवान् वानरों को भेजकर उनके द्वारा साम, दान आदि उपायों का प्रयोग करके उन सबको यहाँ बुलवाओ॥२-९॥

प्रेषिताः प्रथमं ये च मयाऽऽज्ञाता महाजवाः।

त्वरणार्थं तु भूयस्त्वं सम्प्रेषय हरीश्वरान्॥१०॥

‘मेरी आज्ञा से पहले जो महान् वेगशाली वानर भेजे गये हैं, उनको जल्दी करने के लिये प्रेरणा देने के निमित्त तुम पुनः दूसरे श्रेष्ठ वानरों को भेजो॥ १० ॥

ये प्रसक्ताश्च कामेषु दीर्घसूत्राश्च वानराः।

इहानयस्व तान् शीघ्रं सर्वानेव कपीश्वरान्॥११॥

‘जो वानर कामभोग में फँसे हए हों तथा जो दीर्घसूत्री (प्रत्येक कार्य को विलम्ब से करने वाले) हों, उन सभी कपीश्वरों को शीघ्र यहाँ ले आओ।॥ ११ ॥

अहोभिर्दशभिर्ये च नागच्छन्ति ममाज्ञया।

हन्तव्यास्ते दुरात्मानो राजशासनदूषकाः॥१२॥

‘जो मेरी आज्ञा से दस दिन के भीतर यहाँ न आ जायँ, राजाज्ञा को कलङ्कित करने वाले उन दुरात्मा वानरों को मार डालना चाहिये॥१२॥

शतान्यथ सहस्राणि कोट्यश्च मम शासनात्।

प्रयान्तु कपिसिंहानां निदेशे मम ये स्थिताः॥१३॥

‘जो मेरी आज्ञा के अधीन रहते हों, ऐसे सैकड़ों, हजारों तथा करोड़ों वानरसिंह मेरे आदेश से जाएँ। १३॥

मेघपर्वतसंकाशाश्छादयन्त इवाम्बरम्।

घोररूपाः कपिश्रेष्ठा यान्तु मच्छासनादितः॥ १४॥

‘जो मेघ और पर्वत के समान अपने विशालशरीर से आकाश को आच्छादित-सा कर लेते हैं, वे घोर रूपधारी श्रेष्ठ वानर मेरा आदेश मानकर यहाँ से यात्रा करें॥ १४॥

ते गतिज्ञा गतिं गत्वा पृथिव्यां सर्ववानराः।

आनयन्तु हरीन् सर्वांस्त्वरिताः शासनान्मम॥१५॥

‘वानरों के निवासस्थानों को जानने वाले सभी वानर तीव्र गति से भूमण्डल में चारों ओर जाकर मेरे आदेश से उन-उन स्थानों के सम्पूर्ण वानरगणों को तुरंत यहाँ ले आवे’॥

तस्य वानरराजस्य श्रुत्वा वायुसुतो वचः।

दिक्षु सर्वासु विक्रान्तान् प्रेषयामास वानरान्॥१६॥

वानरराज सुग्रीव की बात सुनकर वायुपुत्र हनुमान् जी ने सम्पूर्ण दिशाओं में बहुत-से पराक्रमी वानरों को भेजा॥१६॥

ते पदं विष्णुविक्रान्तं पतत्त्रिज्योतिरध्वगाः।

प्रयाताः प्रहिता राज्ञा हरयस्तु क्षणेन वै॥१७॥

राजा की आज्ञा पाकर वे सब वानर तत्काल आकाश में पक्षियों और नक्षत्रों के मार्ग से चल दिये॥ १७॥

ते समुद्रेषु गिरिषु वनेषु च सरस्सु च।

वानरा वानरान् सर्वान् रामहेतोरचोदयन्॥१८॥

उन वानरों ने समुद्रों के किनारे, पर्वतो पर, वनों में और सरोवरों के तटों पर रहने वाले समस्त वानरों को श्रीरामचन्द्रजी का कार्य करने के लिये चलने को कहा। १८॥

मृत्युकालोपमस्याज्ञां राजराजस्य वानराः।

सुग्रीवस्याययुः श्रुत्वा सुग्रीवभयशङ्किताः॥१९॥

अपने सम्राट् सुग्रीव का, जो मृत्यु एवं काल के समान भयानक दण्ड देने वाले थे, आदेश सुनकर वे सभी वानर उनके भय से थर्रा उठे और तुरंत ही किष्किन्धा की ओर प्रस्थित हुए॥ १९॥

ततस्तेऽञ्जनसंकाशा गिरेस्तस्मान्महाबलाः।

तिस्रः कोट्यः प्लवंगानां निर्ययुर्यत्र राघवः॥

तदनन्तर कज्जल गिरि से काजल के ही समान काले और महान् बलवान् तीन करोड़ वानर उस स्थान पर जाने के लिये निकले, जहाँ श्रीरघुनाथजी विराजमान थे॥२०॥

अस्तं गच्छति यत्रार्कस्तस्मिन् गिरिवरे रताः।

संतप्तहेमवर्णाभास्तस्मात् कोट्यो दश च्युताः॥ २१॥

जहाँ सूर्यदेव अस्त होते हैं, उस श्रेष्ठ पर्वतपर रहने वाले दस करोड़ वानर, जिनकी कान्ति तपाये हुए सुवर्ण के समान थी, वहाँ से किष्किन्धा के लिये चले॥

कैलासशिखरेभ्यश्च सिंहकेसरवर्चसाम्।

ततः कोटिसहस्राणि वानराणां समागमन्॥२२॥

कैलास के शिखरों से सिंह के अयाल की-सी श्वेत कान्ति वाले दस अरब वानर आये॥२२॥

फलमूलेन जीवन्तो हिमवन्तमुपाश्रिताः।

तेषां कोटिसहस्राणां सहस्रं समवर्तत॥२३॥

जो हिमालय पर रहकर फल-मूल से जीवन निर्वाह करते थे, वे वानर एक नील की संख्या में वहाँ आये।२३॥

अङ्गारकसमानानां भीमानां भीमकर्मणाम्।

विन्ध्याद् वानरकोटीनां सहस्राण्यपतन् द्रुतम्॥ २४॥

विन्ध्याचल पर्वत से मङ्गल के समान लाल रंगवाले भयानक पराक्रमी भयंकर रूपधारी वानरों की दस अरब सेना बड़े वेग से किष्किन्धा में आयी॥ २४ ॥

क्षीरोदवेलानिलयास्तमालवनवासिनः।

नारिकेलाशनाश्चैव तेषां संख्या न विद्यते॥२५॥

क्षीरसमुद्र के किनारे और तमाल वन में नारियल खाकर रहने वाले वानर इतनी अधिक संख्या में आये कि उनकी गणना नहीं हो सकती थी॥२५॥

वनेभ्यो गह्वरेभ्यश्च सरिद्भ्यश्च महाबलाः।

आगच्छद् वानरी सेना पिबन्तीव दिवाकरम्॥ २६॥

वनों से, गुफाओं से और नदियों के किनारों से असंख्य महाबली वानर एकत्र हुए वानरों की वह सारी सेना सूर्यदेव को पीती (आच्छादित करती) हुई सी आयी॥२६॥

ये तु त्वरयितुं याता वानराः सर्ववानरान्।

ते वीरा हिमवच्छैले ददृशुस्तं महाद्रुमम्॥२७॥

जो वानर समस्त वानरों को शीघ्र आने के लिये प्रेरित करने के निमित्त किष्किन्धा से दुबारा भेजे गये थे, उन वीरों ने हिमालय पर्वत पर उस प्रसिद्ध विशाल वृक्ष को देखा (जो भगवान् शंकर की यज्ञशाला में स्थित था) ॥ २७॥

तस्मिन् गिरिवरे पुण्ये यज्ञो माहेश्वरः पुरा।

सर्वदेवमनस्तोषो बभूव सुमनोरमः॥२८॥

उस पवित्र एवं श्रेष्ठ पर्वत पर पूर्वकाल में भगवान् शंकर का यज्ञ हुआ था, जो सम्पूर्ण देवताओं के मन को संतोष देने वाला और अत्यन्त मनोरम था। २८॥

अन्ननिस्यन्दजातानि मूलानि च फलानि च।

अमृतस्वादुकल्पानि ददृशुस्तत्र वानराः॥२९॥

उस पर्वत पर खीर आदि अन्न (होमद्रव्य) से घृत आदि का स्राव हुआ था, उससे वहाँ अमृत के समान स्वादिष्ट फल और मूल उत्पन्न हुए थे। उन फलों को उन वानरों ने देखा॥ २९॥

तदन्नसम्भवं दिव्यं फलमूलं मनोहरम्।

यः कश्चित् सकृदश्नाति मासं भवति तर्पितः॥३०॥

उक्त अन्न से उत्पन्न हुए उस दिव्य एवं मनोहर फल-मूल को जो कोई एक बार खा लेता था, वह एक मासतक उससे तृप्त बना रहता था॥ ३० ॥

तानि मूलानि दिव्यानि फलानि च फलाशनाः।

औषधानि च दिव्यानि जगृहुर्हरिपुंगवाः॥३१॥

फलाहार करने वाले उन वानरशिरोमणियों ने उन दिव्य मूल-फलों और दिव्य औषधों को अपने साथ ले लिया॥

तस्माच्च यज्ञायतनात् पुष्पाणि सुरभीणि च।

आनिन्युनिरा गत्वा सुग्रीवप्रियकारणात्॥३२॥

वहाँ जाकर उस यज्ञ-मण्डप से वे सब वानर सुग्रीव का प्रिय करने के लिये सुगन्धित पुष्प भी लेते आये॥३२॥

ते तु सर्वे हरिवराः पृथिव्यां सर्ववानरान्।

संचोदयित्वा त्वरितं यूथानां जग्मुरग्रतः॥३३॥

वे समस्त श्रेष्ठ वानर भूमण्डल के सम्पूर्ण वानरों को तुरंत चलने का आदेश देकर उनके यूथों के पहुँचने के पहले ही सुग्रीव के पास आ गये॥ ३३॥ ।

ते तु तेन मुहूर्तेन कपयः शीघ्रचारिणः।

किष्किन्धां त्वरया प्राप्ताः सुग्रीवो यत्र वानरः॥ ३४॥

वे शीघ्रगामी वानर उसी मुहूर्त में चलकर बड़ी उतावली के साथ किष्किन्धापुरी में जहाँ वानरराज सुग्रीव थे, जा पहुँचे॥ ३४॥

ते गृहीत्वौषधीः सर्वाः फलमूलं च वानराः।

तं प्रतिग्राहयामासुर्वचनं चेदमब्रुवन्॥ ३५॥

उस सम्पूर्ण ओषधियों और फल-मूलों को लेकर उन वानरों ने सुग्रीव की सेवा में अर्पित कर दिया और इस प्रकार कहा— ॥ ३५ ॥

सर्वे परिसृताः शैलाः सरितश्च वनानि च।

पृथिव्यां वानराः सर्वे शासनादपयान्ति ते॥३६॥

‘महाराज! हमलोग सभी पर्वतों, नदियों और वनों में घूम आये। भूमण्डल के समस्त वानर आपकी आज्ञा से यहाँ आ रहे हैं’॥ ३६॥

एवं श्रुत्वा ततो हृष्टः सुग्रीवः प्लवगाधिपः।

प्रतिजग्राह च प्रीतस्तेषां सर्वमुपायनम्॥ ३७॥

यह सुनकर वानरराज सुग्रीव को बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने उनकी दी हुई सारी भेंट-सामग्री सानन्द ग्रहण की॥ ३७॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे सप्तत्रिंशः सर्गः॥३७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में सैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३७॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

सुग्रीव का भगवान श्रीराम के चरणों में प्रणाम, सुग्रीव का अपने किये हुए सैन्य संग्रह विषयक उद्योग को बताना और उसे सुनकर श्रीराम का प्रसन्न होना

अष्टात्रिंशः सर्गः

सर्ग-38


प्रतिगृह्य च तत् सर्वमुपायनमुपाहृतम्।

वानरान् सान्त्वयित्वा च सर्वानेव व्यसर्जयत्॥ १॥

उनके लाये हुए उन समस्त उपहारों को ग्रहण करके सुग्रीव ने सम्पूर्ण वानरों को मधुर वचनों द्वारा सान्त्वना दी फिर सबको विदा कर दिया॥१॥

विसर्जयित्वा स हरीन् सहस्रान् कृतकर्मणः।

मेने कृतार्थमात्मानं राघवं च महाबलम्॥२॥

कार्य पूरा करके लौटे हुए उन सहस्रों वानरों को विदा करके सुग्रीव ने अपने-आपको कृतार्थ मानाऔर महाबली श्रीरघुनाथजी का भी कार्य सिद्ध हुआ ही समझा ॥२॥

स लक्ष्मणो भीमबलं सर्ववानरसत्तमम्।

अब्रवीत् प्रश्रितं वाक्यं सुग्रीवं सम्प्रहर्षयन्॥३॥

तत्पश्चात् लक्ष्मण समस्त वानरों में श्रेष्ठ भयंकर बलशाली सुग्रीव का हर्ष बढ़ाते हुए उनसे यह विनीत वचन बोले- ॥३॥

किष्किन्धाया विनिष्क्राम यदि ते सौम्य रोचते।

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा लक्ष्मणस्य सुभाषितम्॥४॥

सुग्रीवः परमप्रीतो वाक्यमेतदुवाच ह।

‘सौम्य ! यदि तुम्हारी रुचि हो तो अब किष्किन्धा से बाहर निकलो।’ लक्ष्मण की यह सुन्दर बात सुनकर सुग्रीव अत्यन्त प्रसन्न हुए और इस प्रकार बोले- ॥ ४ १/२॥

एवं भवतु गच्छाम स्थेयं त्वच्छासने मया॥५॥

तमेवमुक्त्वा सुग्रीवो लक्ष्मणं शुभलक्षणम्।

विसर्जयामास तदा ताराद्याश्चैव योषितः॥६॥

‘अच्छा, ऐसा ही हो चलिये, चलें। मुझे तो आपकी आज्ञा का पालन करना है।’ शुभ लक्षणों से युक्त लक्ष्मण से ऐसा कहकर सुग्रीव ने तारा आदि सब स्त्रियों को तत्काल विदा कर दिया॥५-६॥

एहीत्युच्चैर्हरिवरान् सुग्रीवः समुदाहरत्।

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा हरयः शीघ्रमाययुः॥७॥

बद्धाञ्जलिपुटाः सर्वे ये स्युः स्त्रीदर्शनक्षमाः।

इसके बाद सुग्रीव ने शेष वानरों को ‘आओ, आओ’ कहकर उच्च स्वर से पुकारा। उनकी वह पुकार सुनकर सब वानर, जो अन्तःपुर की स्त्रियों को देखने के अधिकारी थे, दोनों हाथ जोड़े शीघ्रतापूर्वक उनके पास आये॥ ७ १/२॥

तानुवाच ततः प्राप्तान् राजार्कसदृशप्रभः॥८॥

उपस्थापयत क्षिप्रं शिबिकां मम वानराः।

पास आये हुए उन वानरों से सूर्यतुल्य तेजस्वी राजा सुग्रीव ने कहा—’वानरो! तुमलोग शीघ्र मेरी शिबिका को यहाँ ले आओ’ ॥ ८ १/२॥

श्रुत्वा तु वचनं तस्य हरयः शीघ्रविक्रमाः॥९॥

समुपस्थापयामासुः शिबिकां प्रियदर्शनाम्।

उनकी बात सुनकर शीघ्रगामी वानरों ने एक सुन्दर शिबिका (पालकी) वहाँ उपस्थित कर दी॥९ १/२ ॥

तामुपस्थापितां दृष्ट्वा शिबिकां वानराधिपः॥१०॥

लक्ष्मणारुह्यतां शीघ्रमिति सौमित्रिमब्रवीत्।

पालकी को वहाँ उपस्थित देख वानरराज सुग्रीव ने सुमित्राकुमार से कहा—’कुमार लक्ष्मण! आप शीघ्र इस पर आरूढ़ हो जायँ’ ॥ १० १/२॥

इत्युक्त्वा काञ्चनं यानं सुग्रीवः सूर्यसंनिभम्॥११॥

बहुभिर्हरिभिर्युक्तमारुरोह सलक्ष्मणः।

ऐसा कहकर लक्ष्मणसहित सुग्रीव उस सूर्य की-सी प्रभावाली सुवर्णमयी पालकी पर, जिसे ढोने के लिये बहुत-से वानर लगे थे, आरूढ़ हुए॥ ११ १/२ ॥

पाण्डुरेणातपत्रेण ध्रियमाणेन मूर्धनि॥१२॥

शुक्लैश्च वालव्यजनै—यमानैः समन्ततः।

शंखभेरीनिनादैश्च बन्दिभिश्चाभिनन्दितः॥१३॥

निर्ययौ प्राप्य सुग्रीवो राज्यश्रियमनुत्तमाम्।

उस समय सुग्रीव के ऊपर श्वेत छत्र लगाया गया और सब ओर से सफेद चँवर डुलाये जाने लगे। शङ्ख और भेरी की ध्वनि के साथ वन्दीजनों का अभिनन्दन सुनते हुए राजा सुग्रीव परम उत्तम राजलक्ष्मी को पाकर किष्किन्धापुरी से बाहर निकले॥ १२-१३ १/२॥

स वानरशतैस्तीक्ष्णैर्बहुभिः शस्त्रपाणिभिः॥१४॥

परिकीर्णो ययौ तत्र यत्र रामो व्यवस्थितः।

हाथ में शस्त्र लिये तीक्ष्ण स्वभाव वाले कई सौ वानरों से घिरे हुए राजा सुग्रीव उस स्थान पर गये, जहाँ भगवान् श्रीराम निवास करते थे॥ १४ १/२॥

स तं देशमनुप्राप्य श्रेष्ठं रामनिषेवितम्॥१५॥

अवातरन्महातेजाः शिबिकायाः सलक्ष्मणः।

आसाद्य च ततो रामं कृताञ्जलिपुटोऽभवत्॥

श्रीरामचन्द्रजी से सेवित उस श्रेष्ठ स्थान में पहुंचकर लक्ष्मणसहित महातेजस्वी सुग्रीव पालकी से उतरे और श्रीराम के पास जा हाथ जोड़कर खड़े हो गये। १५-१६॥

कृताञ्जलौ स्थिते तस्मिन् वानराश्चाभवंस्तथा।

तटाकमिव तं दृष्ट्वा रामः कुड्मलपङ्कजम्॥ १७॥

वानराणां महत् सैन्यं सुग्रीवे प्रीतिमानभूत्।

वानरराज के हाथ जोड़कर खड़े होने पर उनके अनुयायी वानर भी उन्हीं की भाँति अञ्जलि बाँधे खड़े हो गये। मुकुलित कमलों से भरे हुए विशाल सरोवर की भाँति वानरों की उस बड़ी भारी सेना को देखकर श्रीरामचन्द्रजी सुग्रीव पर बहुत प्रसन्न हुए॥ १७ १/२॥

पादयोः पतितं मूर्ना तमुत्थाप्य हरीश्वरम्॥१८॥

प्रेम्णा च बहुमानाच्च राघवः परिषस्वजे।

वानरराज को चरणों में मस्तक रखकर पड़ा हुआ देख श्रीरघुनाथजी ने हाथ से पकड़कर उठाया और बड़े आदर तथा प्रेम के साथ उन्हें हृदय से लगाया॥ १८ १/२ ॥

परिष्वज्य च धर्मात्मा निषीदेति ततोऽब्रवीत्॥१९॥

निषण्णं तं ततो दृष्ट्वा क्षितौ रामोऽब्रवीत् ततः।

हृदय से लगाकर धर्मात्मा श्रीराम ने उनसे कहा — ‘बैठो’ उन्हें पृथ्वी पर बैठा देख श्रीराम बोले— ॥

धर्ममर्थं च कामं च काले यस्तु निषेवते॥२०॥

विभज्य सततं वीर स राजा हरिसत्तम।

हित्वा धर्मं तथार्थं च कामं यस्तु निषेवते॥२१॥

स वृक्षाग्रे यथा सुप्तः पतितः प्रतिबुध्यते।

‘वीर! वानरशिरोमणे! जो धर्म, अर्थ और काम के लिये समय का विभाग करके सदा उचित समय पर उनका (न्याययुक्त) सेवन करता है, वही श्रेष्ठ राजा है। किंतु जो धर्म-अर्थ का त्याग करके केवल काम का ही सेवन करता है, वह वृक्ष की अगली शाखा पर सोये हुए मनुष्य के समान है गिरने पर ही उसकी आँख खुलती है॥ २०-२१ १/२॥

अमित्राणां वधे युक्तो मित्राणां संग्रहे रतः॥२२॥

त्रिवर्गफलभोक्ता च राजा धर्मेण युज्यते।

‘जो राजा शत्रुओं के वध और मित्रों के संग्रह में संलग्न रहकर योग्य समय पर धर्म, अर्थ और काम का (न्याययुक्त) सेवन करता है, वह धर्म के फल का भागी होता है॥ २२ १/२॥

उद्योगसमयस्त्वेष प्राप्तः शत्रुनिषूदन॥२३॥

संचिन्त्यतां हि पिङ्गेश हरिभिः सह मन्त्रिभिः।

‘शत्रुसूदन! यह हमलोगों के लिये उद्योग का समय आया है। वानरराज! तुम इस विषय में इन वानरों और मन्त्रियों के साथ विचार करो’ ॥ २३ १/२ ॥

एवमुक्तस्तु सुग्रीवो रामं वचनमब्रवीत्॥२४॥

प्रणष्टा श्रीश्च कीर्तिश्च कपिराज्यं च शाश्वतम्।

त्वत्प्रसादान्महाबाहो पुनः प्राप्तमिदं मया ॥२५॥

श्रीराम के ऐसा कहने पर सुग्रीव ने उनसे कहा’महाबाहो! मेरी श्री, कीर्ति तथा सदा से चला आने वाला वानरों का राज्य–ये सब नष्ट हो चुके थे। आपकी कृपा से ही मुझे पुनः इन सबकी प्राप्ति हुई है॥ २४-२५॥

तव देव प्रसादाच्च भ्रातुश्च जयतां वर।

कृतं न प्रतिकुर्याद् यः पुरुषाणां हि दूषकः॥२६॥

‘विजयी वीरों में श्रेष्ठ देव! आप और आपके भाई की कृपा से ही मैं वानर-राज्यपर पुनः प्रतिष्ठित हुआ हूँ। जो किये हुए उपकार का बदला नहीं चुकाता है, वह पुरुषों में धर्म को कलङ्कित करने वाला माना गया है॥२६॥

एते वानरमुख्याश्च शतशः शत्रुसूदन।

प्राप्ताश्चादाय बलिनः पृथिव्यां सर्ववानरान्॥२७॥

‘शत्रुसूदन! ये सैकड़ों बलवान् और मुख्य वानर भूमण्डल के सभी बलशाली वानरों को साथ लेकर यहाँ आये हैं॥ २७॥

ऋक्षाश्च वानराः शूरा गोलाङ्गलाश्च राघव।

कान्तारवनदुर्गाणामभिज्ञा घोरदर्शनाः॥२८॥

‘रघुनन्दन! इनमें रीछ हैं, वानर हैं और शौर्यसम्पन्न गोलाङ्गल (लङ्गर) हैं। ये सब-के-सब देखने में बड़े भयंकर हैं और बीहड़ वनों तथा दुर्गम स्थानों के जानकार हैं॥ २८॥

देवगन्धर्वपुत्राश्च वानराः कामरूपिणः।

स्वैः स्वैः परिवृताः सैन्यैर्वर्तन्ते पथि राघव॥२९॥

‘रघुनाथजी! जो देवताओं और गन्धर्वो के पुत्र हैं और इच्छानुसार रूप धारण करने में समर्थ हैं, वे श्रेष्ठ वानर अपनी-अपनी सेनाओं के साथ चल पड़े हैं और इस समय मार्ग में हैं॥ २९॥

शतैः शतसहस्रैश्च वर्तन्ते कोटिभिस्तथा।

अयुतैश्चावृता वीर शङ्कभिश्च परंतप॥३०॥

‘शत्रुओं को संताप देने वाले वीर! इनमें से किसी के साथ सौ, किसी के साथ लाख, किसी के साथ करोड़, किसी के साथ अयुत (दस हजार) और किसी के साथ एक शंकु वानर हैं ॥ ३० ॥

अर्बुदैरर्बुदशतैर्मध्यैश्चान्त्यैश्च वानराः।

समुद्राश्च परार्धाश्च हरयो हरियूथपाः॥३१॥

‘कितने ही वानर अर्बुद (दस करोड़), सौ अर्बुद (दस अरब), मध्य (दस पद्म) तथा अन्त्य (एक पद्म) वानर-सैनिकों के साथ आ रहे हैं। कितने ही वानरों तथा वानर-यूथपतियों की संख्या समुद्र (दस नील) तथा परार्ध (शंख) तक पहुँच गयी है* ॥३१॥

* यहाँ अर्बुद, शंकु, अन्त्य और मध्य आदि संख्या वाचक शब्दों का आधुनिक गणित के अनुसार मान समझने के लिये प्राचीन संज्ञाओं का पूर्ण रूप से उल्लेख किया जाता है और कोष्ठ में उसका आधुनिक मान दिया जा रहा है—एक (इकाई), दश (दहाई), शत (सैकड़ा), सहस्र (हजार), अयुत (दस हजार), लक्ष (लाख), प्रयुत (दस लाख), कोटि (करोड़), अर्बुद (दस करोड़), अब्ज (अरब), खर्व (दस अरब), निखर्व (खर्व), महापद्म (दस खर्व), शंकु (नील), जलधि (दस नील), अन्त्य (पद्म), मध्य (दस पद्म), परार्ध (शंख)–ये संख्या बोधक संज्ञाएँ उत्तरोत्तर दस गुनी मानी गयी हैं (नारदपुराण से)

आगमिष्यन्ति ते राजन् महेन्द्रसमविक्रमाः।

मेघपर्वतसंकाशा मेरुविन्ध्यकृतालयाः॥३२॥

‘राजन्! वे देवराज इन्द्र के समान पराक्रमी तथा मेघों और पर्वतों के समान विशालकाय वानर, जो मेरु और विन्ध्याचल में निवास करते हैं, यहाँ शीघ्र ही उपस्थित होंगे॥३२॥

ते त्वामभिगमिष्यन्ति राक्षसं योद्धमाहवे।

निहत्य रावणं युद्धे ह्यानयिष्यन्ति मैथिलीम्॥३३॥

‘जो युद्ध में रावण का वध करके मिथिलेश-कुमारी सीता को लङ्का से ला देंगे, वे महान् शक्तिशाली वानर संग्राम में उस राक्षस से युद्ध करने के लिये अवश्य आपके पास आयेंगे’ ॥ ३३॥

ततः समुद्योगमवेक्ष्य वीर्यवान् हरिप्रवीरस्य निदेशवर्तिनः।

बभूव हर्षाद् वसुधाधिपात्मजः प्रबुद्धनीलोत्पलतुल्यदर्शनः॥ ३४॥

यह सुनकर परम पराक्रमी राजकुमार श्रीराम अपनी आज्ञा के अनुसार चलने वाले वानरों के प्रमुख वीर सुग्रीव का यह सैन्य-विषयक उद्योग देखकर बड़े प्रसन्न हुए। उनके नेत्र हर्ष से खिल उठे और प्रफुल्ल नील कमल के समान दिखायी देने लगे॥३४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डेऽष्टात्रिंशः सर्गः॥ ३८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में अड़तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥३८॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

श्रीरामचन्द्रजी का सुग्रीव के प्रति कृतज्ञता प्रकट करना तथा विभिन्न वानरयूथपतियों का अपनी सेनाओं के साथ

एकोनचत्वारिंशः सर्गः

सर्ग-39


आगमन इति ब्रुवाणं सुग्रीवं रामो धर्मभृतां वरः।

बाहुभ्यां सम्परिष्वज्य प्रत्युवाच कृताञ्जलिम्॥१॥

सुग्रीव के ऐसा कहने पर धर्मात्माओं में श्रेष्ठ श्रीराम ने अपनी दोनों भुजाओं से उनका आलिङ्गन किया और हाथ जोड़कर खड़े हुए उनसे इस प्रकार कहा— ॥ १॥

यदिन्द्रो वर्षते वर्षं न तच्चित्रं भविष्यति।

आदित्योऽसौ सहस्रांशुः कुर्याद् वितिमिरं नभः॥२॥

चन्द्रमा रजनी कुर्यात् प्रभया सौम्य निर्मलाम्।

त्वद्विधो वापि मित्राणां प्रीतिं कुर्यात् परंतप॥

‘सखे! इन्द्र जो जल की वर्षा करते हैं, सहस्रों किरणों से शोभा पाने वाले सूर्यदेव जो आकाश का अन्धकार दूर कर देते हैं तथा सौम्य! चन्द्रमा अपनी प्रभा से जो अँधेरी रात को भी उज्ज्वल कर देते हैं, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है; क्योंकि यह उनका स्वाभाविक गुण है। शत्रुओं को संताप देनेवाले सुग्रीव! इसी तरह तुम्हारे समान पुरुष भी यदि अपने मित्रों का उपकार करके उन्हें प्रसन्न कर दें तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं मानना चाहिये॥२-३॥

एवं त्वयि न तच्चित्रं भवेद् यत् सौम्य शोभनम्।

जानाम्यहं त्वां सुग्रीव सततं प्रियवादिनम्॥४॥

‘सौम्य सुग्रीव! इसी प्रकार तुममें जो मित्रों का हित साधन रूप कल्याणकारी गुण है, वह आश्चर्य का विषय नहीं है; क्योंकि मैं जानता हूँ कि तुम सदा प्रिय बोलने वाले हो—यह तुम्हारा स्वाभाविक गुण है। ४॥

त्वत्सनाथः सखे संख्ये जेतास्मि सकलानरीन्।

त्वमेव मे सुहृन्मित्रं साहाय्यं कर्तुमर्हसि ॥५॥

‘सखे! तुम्हारी सहायता से सनाथ होकर मैं युद्ध में समस्त शत्रुओं को जीत लूँगा। तुम्हीं मेरे हितैषी मित्र हो और मेरी सहायता कर सकते हो॥५॥

जहारात्मविनाशाय मैथिली राक्षसाधमः।

वञ्चयित्वा तु पौलोमीमनुलादो यथा शचीम्॥६॥

‘राक्षसाधम रावण ने अपना नाश करने के लिये ही मिथिलेशकुमारी को धोखा देकर उसका अपहरण किया है। ठीक उसी तरह, जैसे अनुह्लाद ने अपने विनाश के लिये ही पुलोमपुत्री शची को छलपूर्वक हर लिया था* ॥ ६॥

* पुलोम दानव की कन्या शची इन्द्रदेव के प्रति अनुरक्त थीं, परंतु अनुह्लाद ने उनके पिता को फुसलाकर अपने पक्ष में कर लिया और उसकी अनुमति से शची को हर लिया। जब इन्द्र को इसका पता लगा, तब वे अनुमति देने वाले पुलोम को और अपहरण करने वाले अनुह्लाद को भी मारकर शची को अपने घर ले आये। यह पुराणप्रसिद्ध कथा है(रामायणतिलक से)

नचिरात् तं वधिष्यामि रावणं निशितैः शरैः।

पौलोम्याः पितरं दृप्तं शतक्रतुरिवारिहा॥७॥

‘जैसे शत्रुहन्ता इन्द्रने शचीके घमंडी पिताको मार डाला था, उसी प्रकार मैं भी शीघ्र ही अपने तीखे बाणोंसे रावणका वध कर डालूँगा’॥७॥

एतस्मिन्नन्तरे चैव रजः समभिवर्तत।

उष्णतीव्रां सहस्रांशोश्छादयद् गगने प्रभाम्॥८॥

श्रीराम और सुग्रीव में जब इस प्रकार बातें हो रही थीं, उसी समय बड़े जोर की धूल उठी, जिसने आकाश में फैलकर सूर्य की प्रचण्ड प्रभा को ढक दिया॥८॥

दिशः पर्याकुलाश्चासंस्तमसा तेन दूषिताः।

चचाल च मही सर्वा सशैलवनकानना॥८॥

फिर तो उस धूलजनित अन्धकार से सम्पूर्ण दिशाएँ दूषित एवं व्याप्त हो गयीं तथा पर्वत, वन और काननों के साथ समूची पृथ्वी डगमग होने लगी॥९॥

ततो नगेन्द्रसंकाशैस्तीक्ष्णदंष्टैर्महाबलैः।

कृत्स्ना संछादिता भूमिरसंख्येयैः प्लवंगमैः॥१०॥

तदनन्तर पर्वतराज के समान शरीर और तीखी दाढ़वाले असंख्य महाबली वानरों से वहाँ की सारी भूमि आच्छादित हो गयी॥ १० ॥

निमेषान्तरमात्रेण ततस्तैर्हरियूथपैः ।

कोटीशतपरीवारैर्वानरैर्हरियूथपैः॥११॥

पलक मारते-मारते अरबों वानरों से घिरे हुए अनेकानेक यूथपतियों ने वहाँ आकर सारी भूमि को ढक लिया॥ ११॥

नादेयैः पार्वतेयैश्च सामुद्रैश्च महाबलैः।

हरिभिर्मेघनि दैरन्यैश्च वनवासिभिः॥१२॥

नदी, पर्वत, वन और समुद्र सभी स्थानों के निवासी महाबली वानर जुट गये, जो मेघों की गर्जना के समान उच्च स्वर से सिंहनाद करते थे॥ १२॥

तरुणादित्यवर्णैश्च शशिगौरैश्च वानरैः।

पद्मकेसरवर्णैश्च श्वेतैर्हेमकृतालयैः॥१३॥

कोई बालसूर्य के समान लाल रंग के थे तो कोई चन्द्रमा के समान गौर वर्ण के कितने ही वानर कमल के केसरों के समान पीले रंग के थे और कितने ही हिमाचलवासी वानर सफेद दिखायी देते थे॥ १३॥

कोटीसहस्रर्दशभिः श्रीमान् परिवृतस्तदा।

वीरः शतबलिर्नाम वानरः प्रत्यदृश्यत॥१४॥

उस समय परम कान्तिमान् शतबलि नामक वीर वानर दस अरब वानरों के साथ दृष्टिगोचर हुआ। १४॥

ततः काञ्चनशैलाभस्ताराया वीर्यवान् पिता।

अनेकैर्बहुसाहौः कोटिभिः प्रत्यदृश्यत॥१५॥

तत्पश्चात् सुवर्णशैल के समान सुन्दर एवं विशाल शरीर वाले तारा के महाबली पिता कई सहस्र कोटि वानरों के साथ वहाँ उपस्थित देखे गये॥ १५ ॥

तथापरेण कोटीनां सहस्रेण समन्वितः।

पिता रुमायाः सम्प्राप्तः सुग्रीवश्वशुरो विभुः॥१६॥

इसी प्रकार रुमा के पिता और सुग्रीव के श्वशुर, जो बड़े वैभवशाली थे, वहाँ उपस्थित हुए। उनके साथ भी दस अरब वानर थे॥१६॥

पद्मकेसरसंकाशस्तरुणार्कनिभाननः।

बुद्धिमान् वानरश्रेष्ठः सर्ववानरसत्तमः॥१७॥

अनेकैर्बहुसाहस्त्रैर्वानराणां समन्वितः।

पिता हनुमतः श्रीमान् केसरी प्रत्यदृश्यत॥१८॥

तदनन्तर हनुमान जी के पिता कपिश्रेष्ठ श्रीमान् केसरी दिखायी दिये। उनके शरीर का रंग कमल के केसरों की भाँति पीला और मुख प्रातःकाल के सूर्य के समान लाल था। वे बड़े बुद्धिमान् और समस्त वानरों में श्रेष्ठ थे। वे कई सहस्र वानरों से घिरे हुए थे। १७-१८॥

गोलाङ्गलमहाराजो गवाक्षो भीमविक्रमः।

वृतः कोटिसहस्रेण वानराणामदृश्यत॥१९॥

फिर लंगूर-जातिवाले वानरों के महाराज भयंकर पराक्रमी गवाक्ष का दर्शन हुआ। उनके साथ दस अरब वानरों की सेना थी॥ १९॥

ऋक्षाणां भीमवेगानां धूम्रः शत्रुनिबर्हणः।

वृतः कोटिसहस्राभ्यां द्वाभ्यां समभिवर्तत॥२०॥

शत्रुओं का संहार करने वाले धूम्र भयंकर वेगशाली बीस अरब रीछों की सेना लेकर आये॥२०॥

महाचलनिभैोरैः पनसो नाम यूथपः।

आजगाम महावीर्यस्तिसृभिः कोटिभिर्वृतः॥२१॥

महापराक्रमी यूथपति पनस तीन करोड़ वानरों के साथ उपस्थित हुए। वे सब-के-सब बड़े भयंकर तथा महान् पर्वताकार दिखायी देते थे॥२१॥

नीलाञ्जनचयाकारो नीलो नामैष यूथपः।

अदृश्यत महाकायः कोटिभिर्दशभिर्वृतः॥२२॥

यूथपति नील का शरीर भी बड़ा विशाल था। वे नीले कज्जल गिरि के समान नीलवर्ण के थे और दस करोड़ कपियों से घिरे हुए थे॥२२॥

ततः काञ्चनशैलाभो गवयो नाम यूथपः।

आजगाम महावीर्यः कोटिभिः पञ्चभिर्वृतः॥२३॥

तदनन्तर यूथपति गवय, जो सुवर्णमय पर्वत मेरु के समान कान्तिमान् और महापराक्रमी थे, पाँच करोड़ वानरों के साथ उपस्थित हुए॥ २३ ॥

दरीमुखश्च बलवान् यूथपोऽभ्याययौ तदा।

वृतः कोटिसहस्रेण सुग्रीवं समवस्थितः॥२४॥

उसी समय वानरों के बलवान् सरदार दरीमुख भी आ पहुँचे। वे दस अरब वानरों के साथ सुग्रीव की सेवा में उपस्थित हुए थे॥२४॥

मैन्दश्च द्विविदश्चोभावश्विपुत्रौ महाबलौ।

कोटिकोटिसहस्रेण वानराणामदृश्यताम्॥२५॥

अश्विनीकुमारों के महाबली पुत्र मैन्द और द्विविद, ये दोनों भाई भी दस-दस अरब वानरों की सेना के साथ वहाँ दिखायी दिये॥ २५ ॥

गजश्च बलवान् वीरस्तिसृभिः कोटिभिर्वृतः।

आजगाम महातेजाः सुग्रीवस्य समीपतः॥२६॥

तदनन्तर महातेजस्वी बलवान् वीर गज तीन करोड़ वानरों के साथ सुग्रीव के पास आया॥२६॥

ऋक्षराजो महातेजा जाम्बवान्नाम नामतः।

कोटिभिर्दशभिर्व्याप्तः सुग्रीवस्य वशे स्थितः॥२७॥

रीछों के राजा जाम्बवान् बड़े तेजस्वी थे। वे दस करोड़ रीछों से घिरे हुए आये और सुग्रीव के अधीन होकर खड़े हुए ॥२७॥

रुमणो नाम तेजस्वी विक्रान्तैर्वानरैर्वृतः।

आगतो बलवांस्तूर्णं कोटीशतसमावृतः॥२८॥

रुमण (रुमण्वान्) नामक तेजस्वी और बलवान् वानर एक अरब पराक्रमी वानरों को साथ लिये बड़ी तीव्र गति से वहाँ आया॥२८॥

ततः कोटिसहस्राणां सहस्रेण शतेन च।

पृष्ठतोऽनुगतः प्राप्तो हरिभिर्गन्धमादनः॥२९॥

इसके बाद यूथपति गन्धमादन उपस्थित हुए। उनके पीछे एक पद्म वानरों की सेना आयी थी॥ २९॥

ततः पद्मसहस्रेण वृतः शङ्कशतेन च।

युवराजोऽङ्गदः प्राप्तः पितुस्तुल्यपराक्रमः॥३०॥

तत्पश्चात् युवराज अङ्गद आये। ये अपने पिता के समान ही पराक्रमी थे। इनके साथ एक सहस्र पद्म और सौ शंकु (एक पद्म) वानरों की सेना थी (इनके सैनिकों की कुल संख्या दस शंख एक पद्म थी)। ३०॥

ततस्ताराद्युतिस्तारो हरिभिर्भीमविक्रमैः।

पञ्चभिर्हरिकोटीभिर्दूरतः पर्यदृश्यत॥३१॥

तदनन्तर तारों के समान कान्तिमान् तार नामक वानर पाँच करोड़ भयंकर पराक्रमी वानर वीरों के साथ दूर से आता दिखायी दिया॥३१॥

इन्द्रजानुः कविर्वीरो यूथपः प्रत्यदृश्यत।

एकादशानां कोटीनामीश्वरस्तैश्च संवृतः॥३२॥

इन्द्रजानु (इन्द्रभानु) नामक वीर यूथपति, जो बड़ा ही विद्वान् एवं बुद्धिमान् था, ग्यारह करोड़ वानरों के साथ उपस्थित देखा गया। वह उन सबका स्वामी था॥ ३२॥

ततो रम्भस्त्वनुप्राप्तस्तरुणादित्यसंनिभः।

अयुतेन वृतश्चैव सहस्रेण शतेन च॥३३॥

इसके बाद रम्भ नामक वानर उपस्थित हुआ, जो प्रातःकाल के सूर्य की भाँति लाल रंगका था। उसके साथ ग्यारह हजार एक सौ वानरों की सेना थी॥ ३३॥

ततो यूथपतिर्वीरो दुर्मुखो नाम वानरः।

प्रत्यदृश्यत कोटीभ्यां दाभ्यां परिवृतो बली॥३४॥

तत्पश्चात् वीर यूथपति दुर्मुख नामक बलवान् वानर उपस्थित देखा गया, जो दो करोड़ वानर सैनिकों से घिरा हुआ था॥ ३४॥

कैलासशिखराकारैर्वानरैर्भीमविक्रमैः।

वृतः कोटिसहस्रेण हनुमान् प्रत्यदृश्यत॥ ३५॥

इसके बाद हनुमान जी ने दर्शन दिया। उनके साथ कैलासशिखर के समान श्वेत शरीर वाले भयंकर पराक्रमी वानर दस अरब की संख्या में मौजूद थे। ३५॥

नलश्चापि महावीर्यः संवृतो द्रुमवासिभिः।

कोटीशतेन सम्प्राप्तः सहस्रेण शतेन च॥३६॥

फिर महापराक्रमी नल उपस्थित हुए, जो एक अरब एक हजार एक सौ द्रुमवासी वानरों से घिरे हुए थे॥

ततो दधिमुखः श्रीमान् कोटिभिर्दशभिर्वृतः।

सम्प्राप्तोऽभिनदस्तस्य सुग्रीवस्य महात्मनः॥३७॥

तदनन्तर श्रीमान् दधिमुख दस करोड़ वानरों के साथ गर्जना करते हुए किष्किन्धा में महात्मा सुग्रीव के पास आये॥ ३७॥

शरभः कुमुदो वह्निर्वानरो रंह एव च।

एते चान्ये च बहवो वानराः कामरूपिणः॥३८॥

आवृत्य पृथिवीं सर्वां पर्वतांश्च वनानि च।

यूथपाः समनुप्राप्ता येषां संख्या न विद्यते॥३९॥

इनके सिवा शरभ, कुमुद, वह्नि तथा रंह—ये और दूसरे भी बहुत-से इच्छानुसार रूप धारण करने वाले वानरयूथपति सारी पृथ्वी, पर्वत और वनों को आवृत करके वहाँ उपस्थित हुए, जिनकी कोई गणना नहीं की जा सकती॥ ३८-३९॥

आगताश्च निविष्टाश्च पृथिव्यां सर्ववानराः।

आप्लवन्तः प्लवन्तश्च गर्जन्तश्च प्लवंगमाः।

अभ्यवर्तन्त सुग्रीवं सूर्यमभ्रगणा इव॥४०॥

वहाँ आये हुए सभी वानर पृथ्वी पर बैठे। वे सबके-सब उछलते, कूदते और गर्जते हुए वहाँ सुग्रीव के चारों ओर जमा हो गये। जैसे सूर्य को सब ओर से घेरकर बादलों के समूह छा रहे हों॥ ४० ॥

कुर्वाणा बहुशब्दांश्च प्रकृष्टा बाहुशालिनः।

शिरोभिर्वानरेन्द्राय सुग्रीवाय न्यवेदयन्॥४१॥

अपनी भुजाओं से सुशोभित होने वाले बहुतेरे श्रेष्ठ वानरों ने (जो भीड़ के कारण सुग्रीव के पास तक न पहुँच सके थे) अनेक प्रकार की बोली बोलकर तथा मस्तक झुकाकर वानरराज सुग्रीव को अपने आगमन की सूचना दी॥ ४१॥

अपरे वानरश्रेष्ठाः संगम्य च यथोचितम्।

सुग्रीवेण समागम्य स्थिताः प्राञ्जलयस्तदा॥४२॥

बहुत-से श्रेष्ठ वानर उनके पास गये और यथोचित रूप से मिलकर लौटे तथा कितने ही वानर सुग्रीव से मिलने के बाद उनके पास ही हाथ जोड़कर खड़े हो गये॥४२॥

सुग्रीवस्त्वरितो रामे सर्वांस्तान् वानरर्षभान्।

निवेदयित्वा धर्मज्ञः स्थितः प्राञ्जलिरब्रवीत्॥४३॥

धर्म के ज्ञाता वानरराज सुग्रीव ने वहाँ आये हुए उन सब वानरशिरोमणियों का समाचार निवेदन करके श्रीरामचन्द्रजी को शीघ्रतापूर्वक उनका परिचय दिया, फिर हाथ जोड़कर वे उनके सामने खड़े हो गये। ४३॥

यथासुखं पर्वतनिर्झरेषु वनेषु सर्वेषु च वानरेन्द्राः ।

निवेशयित्वा विधिवद् बलानि बलं बलज्ञः प्रतिपत्तुमीष्टे ॥४४॥

उन वानर-यूथपतियों ने वहाँ के पर्वतीय झरनों के आस-पास तथा समस्त वनों में अपनी सेनाओं को यथोचितरूप से सुखपूर्वक ठहरा दिया। तत्पश्चात् सब सेनाओं के ज्ञाता सुग्रीव उनका पूर्णतः ज्ञान प्राप्त करने में समर्थ हो सके।

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे एकोनचत्वारिंशः सर्गः॥ ३९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में उनतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३९॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

श्रीराम की आज्ञा से सुग्रीव का सीताकी खोज के लिये पूर्व दिशा में वानरों को भेजना और वहाँ के स्थानों का वर्णन करना

चत्वारिंशः सर्गः

सर्ग-40


अथ राजा समृद्धार्थः सुग्रीवः प्लवगेश्वरः।

उवाच नरशार्दूलं रामं परबलार्दनम्॥१॥

तदनन्तर बल-वैभव से सम्पन्न वानरराज राजा सुग्रीव शत्रुसेना का संहार करने वाले पुरुषसिंह श्रीराम से बोले- ॥१॥

आगता विनिविष्टाश्च बलिनः कामरूपिणः।

वानरेन्द्रा महेन्द्राभा ये मद्विषयवासिनः॥२॥

‘भगवन्! जो मेरे राज्य में निवास करते हैं, वे महेन्द्र के समान तेजस्वी, इच्छानुसार रूप धारण करने वाले और बलवान् वानर-यूथपति यहाँ आकर पड़ाव डाले बैठे हैं।

त इमे बहुविक्रान्तैर्बलिभिर्भीमविक्रमैः।

आगता वानरा घोरा दैत्यदानवसंनिभाः॥३॥

‘ये अपने साथ ऐसे बलवान् वानर योद्धाओं को ले आये हैं, जो बहुत-से युद्धस्थलों में अपना पराक्रम प्रकट कर चुके हैं और भयंकर पुरुषार्थ कर दिखाने वाले हैं। यहाँ ऐसे-ऐसे वानर उपस्थित हुए हैं, जो दैत्यों और दानवों के समान भयानक हैं॥३॥

ख्यातकर्मापदानाश्च बलवन्तो जितक्लमाः।

पराक्रमेषु विख्याता व्यवसायेषु चोत्तमाः॥४॥

‘अनेक युद्धों में इन वानर वीरों की शूरवीरता का परिचय मिल चुका है। ये बल के भण्डार हैं, युद्ध से थकते नहीं हैं इन्होंने थकावट को जीत लिया है। ये अपने पराक्रम के लिये प्रसिद्ध और उद्योग करने में श्रेष्ठ हैं॥

पृथिव्यम्बुचरा राम नानानगनिवासिनः।

कोट्योघाश्च इमे प्राप्ता वानरास्तव किंकराः॥

‘श्रीराम! यहाँ आये हुए ये वानरों के करोड़ों यूथ विभिन्न पर्वतों पर निवास करने वाले हैं। जल और थल-दोनों में समान रूप से चलने की शक्ति रखते हैं। ये सब-के-सब आपके किंकर (आज्ञापालक) हैं।

निदेशवर्तिनः सर्वे सर्वे गुरुहिते स्थिताः।

अभिप्रेतमनुष्ठातुं तव शक्ष्यन्त्यरिंदम॥६॥

‘शत्रुदमन! ये सभी आपकी आज्ञा के अनुसार चलने वाले हैं। आप इनके गुरु–स्वामी हैं ये आपके हितसाधन में तत्पर रहकर आपके अभीष्ट मनोरथ को सिद्ध कर सकेंगे॥६॥

त इमे बहुसाहौरनीकैीमविक्रमैः।

आगता वानरा घोरा दैत्यदानवसंनिभाः॥७॥

‘दैत्यों और दानवों के समान घोर रूपधारी ये सभी वानर-यूथपति अपने साथ भयंकर पराक्रम करने वाली कई सहस्र सेनाएँ लेकर आये हैं॥७॥

यन्मन्यसे नरव्याघ्र प्राप्तकालं तदुच्यताम्।

त्वत्सैन्यं त्वद्रशे युक्तमाज्ञापयितुमर्हसि॥८॥

‘पुरुषसिंह! अब इस समय आप जो कर्तव्य उचित समझते हैं, उसे बताइये। आपकी यह सेना आपके वश में है। आप इसे यथोचित कार्य के लिये आज्ञा प्रदान करें॥ ८॥

काममेषामिदं कार्यं विदितं मम तत्त्वतः।

तथापि तु यथायुक्तमाज्ञापयितुमर्हसि॥९॥

‘यद्यपि सीताजी के अन्वेषण का यह कार्य इन सबको तथा मुझे भी अच्छी तरह ज्ञात है, तथापि आप जैसा उचित हो, वैसे कार्य के लिये हमें आज्ञा दें’॥९॥

तथा ब्रुवाणं सुग्रीवं रामो दशरथात्मजः।

बाहुभ्यां सम्परिष्वज्य इदं वचनमब्रवीत्॥१०॥

जब सुग्रीव ने ऐसी बात कही, तब दशरथनन्दन श्रीराम ने दोनों भुजाओं से पकड़कर उन्हें हृदय से लगा लिया और इस प्रकार कहा- ॥ १० ॥

ज्ञायतां सौम्य वैदेही यदि जीवति वा न वा।

स च देशो महाप्राज्ञ यस्मिन् वसति रावणः॥११॥

‘सौम्य! महाप्राज्ञ ! पहले यह तो पता लगाओ कि विदेहकुमारी सीता जीवित है या नहीं तथा वह देश, जिसमें रावण निवास करता है, कहाँ है ? ॥ ११॥

अधिगम्य तु वैदेहीं निलयं रावणस्य च।

प्राप्तकालं विधास्यामि तस्मिन् काले सह त्वया॥१२॥

‘जब सीता के जीवित होने का और रावण के निवासस्थान का निश्चित पता मिल जायगा, तब जो समयोचित कर्तव्य होगा, उसका मैं तुम्हारे साथ मिलकर निश्चय करूँगा॥ १२॥

नाहमस्मिन् प्रभुः कार्ये वानरेन्द्र न लक्ष्मणः।

त्वमस्य हेतुः कार्यस्य प्रभुश्च प्लवगेश्वर ॥१३॥

‘वानरराज! इस कार्य को सिद्ध करने में न तो मैं समर्थ हूँ और न लक्ष्मण ही। कपीश्वर! इस कार्य की सिद्धि तुम्हारे ही हाथ है। तुम्हीं इसे पूर्ण करने में समर्थ हो॥ १३॥

त्वमेवाज्ञापय विभो मम कार्यविनिश्चयम्।

त्वं हि जानासि मे कार्यं मम वीर न संशयः॥१४॥

‘प्रभो! मेरे कार्य का भलीभाँति निश्चय करके तुम्हीं वानरों को उचित आज्ञा दो। वीर! मेरा कार्य क्या है? इसे तुम्हीं ठीक-ठीक जानते हो, इसमें संशय नहीं है। १४॥

सुहृद्वितीयो विक्रान्तः प्राज्ञः कालविशेषवित्।

भवानस्मद्धिते युक्तः सुहृदाप्तोऽर्थवित्तमः॥१५॥

‘लक्ष्मण के बाद तुम्हीं मेरे दूसरे सुहृद् हो। तुम पराक्रमी, बुद्धिमान्, समयोचित कर्तव्य के ज्ञाता, हित में संलग्न रहने वाले, हितैषी बन्धु, विश्वासपात्र तथा मेरे प्रयोजन को अच्छी तरह समझने वाले हो’।

१५॥

एवमुक्तस्तु सुग्रीवो विनतं नाम यूथपम्।

अब्रवीद् रामसांनिध्ये लक्ष्मणस्य च धीमतः॥

शैलाभं मेघनिर्घोषमूर्जितं प्लवगेश्वरम्।

सोमसूर्यनिभैः सार्धं वानरैर्वानरोत्तम॥१७॥

देशकालनयैर्युक्तो विज्ञः कार्यविनिश्चये।

वृतः शतसहस्रेण वानराणां तरस्विनाम्॥१८॥

अधिगच्छ दिशं पूर्वां सशैलवनकाननाम्।

तत्र सीतां च वैदेहीं निलयं रावणस्य च॥१९॥

मार्गध्वं गिरिदुर्गेषु वनेषु च नदीषु च।

श्रीरामचन्द्रजी के ऐसा कहने पर सुग्रीव ने उनके और बुद्धिमान् लक्ष्मण के समीप ही विनत नामक यूथपति से, जो पर्वत के समान विशालकाय, मेघ के समान गम्भीर गर्जना करने वाले, बलवान् तथा वानरों के शासक थे और चन्द्रमा एवं सूर्य के समान कान्तिवाले वानरों के साथ उपस्थित हुए थे, कहा —’वानरशिरोमणे! तुम देश और काल के अनुसार नीति का प्रयोग करने वाले तथा कार्य का निश्चय करने में चतुर हो। तुम एक लाख वेगवान् वानरों के साथ पर्वत, वन और काननों सहित पूर्व दिशा की ओर जाओ और वहाँ पहाड़ों के दुर्गम प्रदेशों, वनों तथा सरिताओं में विदेहकुमारी सीता एवं रावण के निवासस्थान की खोज करो॥ १६–१९ १/२॥

नदीं भागीरथीं रम्यां सरयूं कौशिकी तथा॥२०॥

कालिन्दी यमुनां रम्यां यामुनं च महागिरिम्।

सरस्वती च सिन्धुं च शोणं मणिनिभोदकम्॥२१॥

महीं कालमहीं चापि शैलकाननशोभिताम्।

‘भागीरथी गङ्गा, रमणीय सरयू, कौशिकी, सुरम्य कलिन्दनन्दिनी यमुना, महापर्वत यामुन, सरस्वती नदी, सिंधु, मणि के समान निर्मल जलवाले शोणभद्र, मही तथा पर्वतों और वनों से सुशोभित कालमही आदि नदियों के किनारे ढूँढ़ो ॥ २०-२१ १/२ ।।

ब्रह्ममालान् विदेहांश्च मालवान् काशिकोसलान्॥२२॥

मागधांश्च महाग्रामान् पुण्ड्रांस्त्वकांस्तथैव च।

ब्रह्ममाल, विदेह, मालव, काशी, कोसल, मगध देश के बड़े-बड़े ग्राम, पुण्ड्रदेश तथा अङ्ग आदि जनपदों में छानबीन करो॥ २२ १/२॥

भूमिं च कोशकाराणां भूमिं च रजताकराम्॥२३॥

सर्वं च तद् विचेतव्यं मार्गयद्भिस्ततस्ततः।

रामस्य दयितां भार्यां सीतां दशरथस्नुषाम्॥२४॥

‘रेशम के कीड़ों की उत्पत्ति के स्थानों और चाँदी के खानों में भी खोज करनी चाहिये। इधर-उधर ढूँढ़ते हुए तुम सब लोगों को इन सभी स्थानों में राजा दशरथ की पुत्रवधू तथा श्रीरामचन्द्रजी की प्यारी पत्नी सीता का अन्वेषण करना चाहिये॥ २३-२४॥

समुद्रमवगाढांश्च पर्वतान् पत्तनानि च।

मन्दरस्य च ये कोटिं संश्रिताः केचिदालयाः॥२५॥

‘समुद्र के भीतर प्रविष्ट हुए पर्वतो पर, उसके अन्तर्वर्ती द्वीपों के विभिन्न नगरों में तथा मन्दराचल की चोटी पर जो कोई गाँव बसे हैं, उन सबमें सीता का अनुसंधान करो॥ २५ ॥

कर्णप्रावरणाश्चैव तथा चाप्योष्ठकर्णकाः।

घोरलोहमुखाश्चैव जवनाश्चैकपादकाः॥२६॥

अक्षया बलवन्तश्च तथैव पुरुषादकाः।

किरातास्तीक्ष्णचूडाश्च हेमाभाः प्रियदर्शनाः॥२७॥

आममीनाशनाश्चापि किराता दीपवासिनः।

अन्तर्जलचरा घोरा नरव्याघ्रा इति स्मृताः॥२८॥

एतेषामाश्रयाः सर्वे विचेयाः काननौकसः।

‘जो कर्णप्रावरण (वस्त्र की भाँति पैर तक लटके हुए कान वाले), ओष्ठकर्णक (ओठ तक फैले हुए कान वाले) तथा घोर लोहमुख (लोहे के समान काले एवं भयंकर मुख वाले) हैं, जो एक ही पैर के होते हुए भी वेगपूर्वक चलने वाले हैं, जिनकी संतानपरम्परा कभी क्षीण नहीं होती, वे पुरुष तथा जो बलवान् नरभक्षी राक्षस हैं, जो सूची के अग्रभाग की भाँति तीखी चोटी वाले, सुवर्ण के समान कान्तिमान्, प्रियदर्शन (सुन्दर), कच्ची मछली खाने वाले, द्वीपवासी तथा जल के भीतर विचरने वाले किरात हैं, जिनके नीचे का आकार मनुष्य-जैसा और ऊपर की आकृति व्याघ्र के समान है, ऐसे जो भयंकर प्राणी बताये गये हैं; वानरो! इन सब के निवासस्थानों में जाकर तुम्हें सीता तथा रावण की खोज करनी चाहिये॥ २६–२८ १/२ ॥

गिरिभिर्ये च गम्यन्ते प्लवनेन प्लवेन च॥२९॥

‘जिन द्वीपों में पर्वतों पर होकर जाना पड़ता है, जहाँ समुद्र को तैरकर या नाव आदि के द्वारा पहुँचा जाता है, उन सब स्थानों में सीता को ढूँढ़ना चाहिये॥ २९ ॥

यत्नवन्तो यवदीपं सप्तराजोपशोभितम्।

सुवर्णरूप्यकद्वीपं सुवर्णाकरमण्डितम्॥३०॥

‘इसके सिवा तुमलोग यत्नशील होकर सात राज्यों से सुशोभित यवद्वीप (जावा), सुवर्णद्वीप (सुमात्रा) तथा रूप्यक द्वीप में भी जो सुवर्ण की खानों से सुशोभित हैं, ढूँढ़ने का प्रयत्न करो॥३०॥

यवद्वीपमतिक्रम्य शिशिरो नाम पर्वतः ।

दिवं स्पृशति शृङ्गेण देवदानवसेवितः॥३१॥

‘यवद्वीप को लाँघकर आगे जाने पर एक शिशिर नामक पर्वत मिलता है, जिसके ऊपर देवता और दानव निवास करते हैं। वह पर्वत अपने उच्च शिखर से स्वर्गलोक का स्पर्श करता-सा जान पड़ता है॥३१॥

एतेषां गिरिदुर्गेषु प्रपातेषु वनेषु च।

मार्गध्वं सहिताः सर्वे रामपत्नी यशस्विनीम्॥३२॥

‘इन सब द्वीपों के पर्वतों तथा शिशिर पर्वत के दुर्गम प्रदेशों में, झरनों के आस-पास और जंगलों में तुम सब लोग एक साथ होकर श्रीरामचन्द्रजी की यशस्विनी पत्नी सीता का अन्वेषण करो॥३२॥

ततो रक्तजलं प्राप्य शोणाख्यं शीघ्रवाहिनम्।

गत्वा पारं समुद्रस्य सिद्धचारणसेवितम्॥३३॥

तस्य तीर्थेषु रम्येषु विचित्रेषु वनेषु च।

रावणः सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्ततः॥ ३४॥

‘तदनन्तर समुद्र के उस पार जहाँ सिद्ध और चारण निवास करते हैं, जाकर लाल जल से भरे हुए शीघ्र प्रवाहित होने वाले शोण नामक नद के तटपर पहुँच जाओगे। उसके तटवर्ती रमणीय तीर्थों और विचित्र वनों में जहाँ-तहाँ विदेहकुमारी सीता के साथ रावण की खोज करना॥ ३३-३४॥

पर्वतप्रभवा नद्यः सुभीमबहुनिष्कुटाः।

मार्गितव्या दरीमन्तः पर्वताश्च वनानि च ॥ ३५॥

‘पर्वतों से निकली हुई बहुत-सी ऐसी नदियाँ मिलेंगी, जिनके तटों पर बड़े भयंकर अनेकानेक उपवन प्राप्त होंगे। साथ ही वहाँ बहुत-सी गुफाओं वाले पर्वत उपलब्ध होंगे और अनेक वन भी दृष्टिगोचर होंगे। उन सब में सीता का पता लगाना चाहिये॥ ३५॥

ततः समुद्रदीपांश्च सुभीमान् द्रष्टुमर्हथ।

ऊर्मिमन्तं महारौद्रं क्रोशन्तमनिलोद्धतम्॥३६॥

‘तत्पश्चात् पूर्वोक्त देशों से परे जाकर तुम इक्षुरस से परिपूर्ण समुद्र तथा उसके द्वीपों को देखोगे, जो बड़े ही भयंकर प्रतीत होते हैं। इक्षुरस का वह समुद्र महाभयंकर है। उसमें हवा के वेग से उत्ताल तरंगें उठती रहती हैं तथा वह गर्जना करता हुआ-सा जान पड़ता है॥३६॥

तत्रासुरा महाकायाश्छायां गृह्णन्ति नित्यशः।

ब्रह्मणा समनुज्ञाता दीर्घकालं बुभुक्षिताः॥ ३७॥

‘उस समुद्र में बहुत-से विशालकाय असुर निवास करते हैं। वे बहुत दिनों के भूखे होते हैं और छाया पकड़कर ही प्राणियों को अपने पास खींच लेते हैं। यही उनका नित्य का आहार है। इसके लिये उन्हें ब्रह्माजी से अनुमति मिल चुकी है॥ ३७॥

तं कालमेघप्रतिमं महोरगनिषेवितम्।

अभिगम्य महानादं तीर्थेनैव महोदधिम्॥३८॥

ततो रक्तजलं भीमं लोहितं नाम सागरम्।

गत्वा प्रेक्ष्यथ तां चैव बृहती कूटशाल्मलीम्॥३९॥

‘इक्षुरस का वह समुद्र काले मेघ के समान श्याम दिखायी देता है। बड़े-बड़े नाग उसके भीतर निवास करते हैं। उससे बड़ी भारी गर्जना होती रहती है। विशेष उपायों से उस महासागर के पार जाकर तुम लाल रंग के जल से भरे हुए लोहित नामक भयंकर समुद्र के तट पर पहुँच जाओगे और वहाँ शाल्मलीद्वीप के चिह्नभूत कूटशाल्मली नामक विशाल वृक्ष का दर्शन करोगे॥ ३८-३९॥

गृहं च वैनतेयस्य नानारत्नविभूषितम्।

तत्र कैलाससंकाशं विहितं विश्वकर्मणा॥४०॥

‘उसके पास ही विश्वकर्मा का बनाया हुआ विनतानन्दन गरुड़ का एक सुन्दर भवन है, जो नाना प्रकार के रत्नों से विभूषित तथा कैलास पर्वत के समान उज्ज्वल एवं विशाल है॥ ४०॥

तत्र शैलनिभा भीमा मन्देहा नाम राक्षसाः।

शैलशृङ्गेषु लम्बन्ते नानारूपा भयावहाः॥४१॥

‘उस द्वीप में पर्वत के समान शरीर वाले भयंकर मंदेह नामक राक्षस निवास करते हैं, जो सुरासमुद्र के मध्यवर्ती शैल-शिखरों पर लटकते रहते हैं। वे अनेक प्रकार के रूप धारण करने वाले तथा भयदायक हैं। ४१॥

ते पतन्ति जले नित्यं सूर्यस्योदयनं प्रति।

अभितप्ताः स्म सूर्येण लम्बन्ते स्म पुनः पुनः॥४२॥

निहता ब्रह्मतेजोभिरहन्यहनि राक्षसाः।

‘प्रतिदिन सूर्योदय के समय वे राक्षस ऊर्ध्वमुख होकर सूर्य से जूझने लगते हैं, परंतु सूर्यमण्डल के तापसे संतप्त तथा ब्रह्मतेज से निहत हो सुरा-समुद्र के जल में गिर पड़ते हैं। वहाँ से फिर जीवित हो उन्हीं शैल-शिखरों पर लटक जाते हैं। उनका बारंबार ऐसा ही क्रम चला करता है॥ ४२ १/२॥

ततः पाण्डुरमेघाभं क्षीरोदं नाम सागरम्॥४३॥

‘शाल्मलिद्वीप एवं सुरा-समुद्र से आगे बढ़ने पर (क्रमशः घृत और दधि के समुद्र प्राप्त होंगे। वहाँ सीता की खोज करने के पश्चात् जब आगे बढ़ोगे, तब) सफेद बादलों की-सी आभावाले क्षीरसमुद्र का दर्शन करोगे॥४३॥

गत्वा द्रक्ष्यथ दुर्धर्षा मुक्ताहारमिवोर्मिभिः।

तस्य मध्ये महान् श्वेतो ऋषभो नाम पर्वतः॥४४॥

‘दुर्धर्ष वानरो! वहाँ पहुँचकर उठती हुई लहरों से युक्त क्षीरसागर को इस प्रकार देखोगे, मानो उसने मोतियों के हार पहन रखे हों। उस सागर के बीच में ऋषभ नाम से प्रसिद्ध एक बहुत ऊँचा पर्वत है, जो श्वेत वर्णका है॥

दिव्यगन्धैः कुसुमितैराचितैश्च नगैर्वृतः।

सरश्च राजतैः पद्मवलितैर्हेमकेसरैः॥४५॥

नाम्ना सुदर्शनं नाम राजहंसैः समाकुलम्।

‘उस पर्वत पर सब ओर बहुत-से वृक्ष भरे हुए हैं,जो फूलों से सुशोभित तथा दिव्य गन्ध से सुवासित हैं। उसके ऊपर सुदर्शन नामका एक सरोवर है, जिसमें चाँदी के समान श्वेत रंगवाले कमल खिले हुए हैं। उन कमलों के केसर सुवर्णमय होते हैं और सदा दिव्य दीप्ति से दमकते रहते हैं। वह सरोवर राजहंसों से भरा रहता है॥ ४५ १/२॥

विबुधाश्चारणा यक्षाः किंनराश्चाप्सरोगणाः॥ ४६॥

हृष्टाः समधिगच्छन्ति नलिनीं तां रिरंसवः।

‘देवता, चारण, यक्ष, किन्नर और अप्सराएँ बड़ी प्रसन्नता के साथ जल-विहार करने के लिये वहाँ आया करती हैं। ४६ १/२॥

क्षीरोदं समतिक्रम्य तदा द्रक्ष्यथ वानराः॥४७॥

जलोदं सागरं शीघ्रं सर्वभूतभयावहम्।

तत्र तत्कोपजं तेजः कृतं हयमुखं महत्॥४८॥

‘वानरो! क्षीरसागर लाँघकर जब तुमलोग आगे बढ़ोगे, तब शीघ्र ही सुस्वादु जल से भरे हुए समुद्र को देखोगे। वह महासागर समस्त प्राणियों को भय देने वाला है। उसमें ब्रह्मर्षि और्व के कोप से प्रकट हुआ वडवामुख नामक महान् तेज विद्यमान है॥ ४७-४८॥

अस्याहुस्तन्महावेगमोदनं सचराचरम्।

तत्र विक्रोशतां नादो भूतानां सागरौकसाम्।

श्रूयते चासमर्थानां दृष्ट्वाभूद् वडवामुखम्॥४९॥

‘उस समुद्र में जो चराचर प्राणियों सहित महान् वेगशाली जल है, वही उस वडवामुख नामक अग्नि का आहार बताया जाता है। वहाँ जो वडवानल प्रकट हुआ है, उसे देखकर उसमें पतन के भय से चीखते-चिल्लाते हुए समुद्रनिवासी असमर्थ प्राणियों का आर्तनाद निरन्तर सुनायी देता है॥ ४९॥

स्वादूदस्योत्तरे तीरे योजनानि त्रयोदश।

जातरूपशिलो नाम सुमहान् कनकप्रभः॥५०॥

‘स्वादिष्ट जल से भरे हुए उस समुद्र के उत्तर तेरह योजन की दूरी पर सुवर्णमयी शिलाओं से सुशोभित, कनक की कमनीय कान्ति धारण करने वाला एक बहुत ऊँचा पर्वत है॥५०॥

तत्र चन्द्रप्रतीकाशं पन्नगं धरणीधरम्।

पद्मपत्रविशालाक्षं ततो द्रक्ष्यथ वानराः॥५१॥

आसीनं पर्वतस्याग्रे सर्वदेवनमस्कृतम्।

सहस्रशिरसं देवमनन्तं नीलवाससम्॥५२॥

‘वानरो! उसके शिखर पर इस पृथ्वी को धारण करने वाले भगवान् अनन्त बैठे दिखायी देंगे। उनका श्रीविग्रह चन्द्रमा के समान गौरवर्ण का है। वे सर्प जाति के हैं; परंतु उनका स्वरूप देवताओं के तुल्य है। उनके नेत्र प्रफुल्ल कमलदल के समान हैं और शरीर नील वस्त्र से आच्छादित है। उन अनन्तदेव के सहस्र मस्तक हैं।

त्रिशिराः काञ्चनः केतुस्तालस्तस्य महात्मनः।

स्थापितः पर्वतस्याग्रे विराजति सवेदिकः॥५३॥

‘पर्वत के ऊपर उन महात्मा की ताड़ के चिह्न से युक्त सुवर्णमयी ध्वजा फहराती रहती है। उस ध्वजा की तीन शिखाएँ हैं और उसके नीचे आधारभूमि पर वेदी बनी हुई है। इस तरह उस ध्वज की बड़ी शोभा होती है॥ ५३॥

पूर्वस्यां दिशि निर्माणं कृतं तत् त्रिदशेश्वरैः।

ततः परं हेममयः श्रीमानुदयपर्वतः॥५४॥

‘यही तालध्वज पूर्व दिशा की सीमा के सूचकचिल के रूप में देवताओं द्वारा स्थापित किया गया है। उसके बाद सुवर्णमय उदयपर्वत है, जो दिव्य शोभा से सम्पन्न है॥५४॥

तस्य कोटिर्दिवं स्पृष्ट्वा शतयोजनमायता।

जातरूपमयी दिव्या विराजति सवेदिका॥५५॥

‘उसका गगनचुम्बी शिखर सौ योजन लंबा है। उसका आधारभूत पर्वत भी वैसा ही है। उसके साथ वह दिव्य सुवर्णशिखर अद्भुत शोभा पाता है॥ ५५ ॥

सालैस्तालैस्तमालैश्च कर्णिकारैश्च पुष्पितैः।

जातरूपमयैर्दिव्यैः शोभते सूर्यसंनिभैः॥५६॥

‘वहाँ के साल, ताल, तमाल और फूलों से लदे कनेर आदि वृक्ष भी सुवर्णमय ही हैं। उन सूर्यतुल्य तेजस्वी दिव्य वृक्षों से उदयगिरि की बड़ी शोभा होती है॥५६॥

तत्र योजनविस्तारमुच्छ्रितं दशयोजनम्।

शृङ्गं सौमनसं नाम जातरूपमयं ध्रुवम्॥५७॥

‘उस सौ योजन लंबे उदयगिरि के शिखर पर एक सौमनस नामक सुवर्णमय शिखर है, जिसकी चौड़ाई एक योजन और ऊँचाई दस योजन है॥ ५७॥

तत्र पूर्वं पदं कृत्वा पुरा विष्णुस्त्रिविक्रमे।

द्वितीयं शिखरे मेरोश्चकार पुरुषोत्तमः॥५८॥

‘पूर्वकाल में वामन अवतार के समय पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु ने अपना पहला पैर उस सौमनस नामक शिखर पर रखकर दूसरा पैर मेरु पर्वत के शिखर पर रखा था॥ ५८॥

उत्तरेण परिक्रम्य जम्बूदीपं दिवाकरः।

दृश्यो भवति भूयिष्ठं शिखरं तन्महोच्छ्रयम्॥५९॥

‘सूर्यदेव उत्तर से घूमकर जम्बूद्वीप की परिक्रमा करते हुए जब अत्यन्त ऊँचे ‘सौमनस’ नामक शिखर पर आकर स्थित होते हैं, तब जम्बूद्वीपनिवासियों को उनका अधिक स्पष्टता के साथ दर्शन होता है॥ ५९॥

तत्र वैखानसा नाम वालखिल्या महर्षयः।

प्रकाशमाना दृश्यन्ते सूर्यवर्णास्तपस्विनः॥६०॥

‘उस सौमनस नामक शिखर पर वैखानस महात्मा महर्षि बालखिल्यगण प्रकाशित होते देखे जाते हैं, जो सूर्य के समान कान्तिमान् और तपस्वी हैं॥६०॥

अयं सुदर्शनो द्वीपः पुरो यस्य प्रकाशते।

तस्मिंस्तेजश्च चक्षुश्च सर्वप्राणभृतामपि॥६१॥

‘यह उदयगिरि के सौमनस शिखर के सामने का द्वीप सुदर्शन नाम से प्रसिद्ध है; क्योंकि उक्त शिखर पर जब भगवान् सूर्य उदित होते हैं, तभी इस द्वीप के समस्त प्राणियों का तेज से सम्बन्ध होता है और सबके नेत्रों को प्रकाश प्राप्त होता है (यही इस द्वीप के ‘सुदर्शन’ नाम होने का कारण है) ॥ ६१॥

शैलस्य तस्य पृष्ठेषु कन्दरेषु वनेषु च।

रावणः सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्ततः॥६२॥

‘उदयाचल के पृष्ठभागों में, कन्दराओं में तथा वनों में भी तुम्हें जहाँ-तहाँ विदेहकुमारी सीतासहित रावण का पता लगाना चाहिये॥ ६२॥

काञ्चनस्य च शैलस्य सूर्यस्य च महात्मनः।

आविष्टा तेजसा संध्या पूर्वा रक्ता प्रकाशते॥६३॥

‘उस सुवर्णमय उदयाचल तथा महात्मा सूर्यदेव के तेज से व्याप्त हुई उदयकालिक पूर्व संध्या रक्तवर्ण की प्रभा से प्रकाशित होती है॥ ६३॥

पूर्वमेतत् कृतं द्वारं पृथिव्या भुवनस्य च।

सूर्यस्योदयनं चैव पूर्वा ह्येषा दिगुच्यते॥६४॥

‘सूर्य के उदय का यह स्थान सबसे पहले ब्रह्माजी ने बनाया है; अतः यही पृथ्वी एवं ब्रह्मलोक का द्वार है (ऊपर के लोकों में रहने वाले प्राणी इसी द्वार से भूलोक में प्रवेश करते हैं तथा भूलोक के प्राणी इसी द्वार से ब्रह्मलोक में जाते हैं)। पहले इसी दिशा में इस द्वार का निर्माण हुआ, इसलिये इसे पूर्व दिशा कहते हैं॥ ६४॥

तस्य शैलस्य पृष्ठेषु निर्झरेषु गुहासु च।

रावणः सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्ततः॥६५॥

उदयाचल की घाटियों, झरनों और गुफाओं में यत्रतत्र घूमकर तुम्हें विदेहकुमारी सीतासहित रावण का अन्वेषण करना चाहिये॥६५॥

ततः परमगम्या स्याद् दिक्पूर्वा त्रिदशावृता।

रहिता चन्द्रसूर्याभ्यामदृश्या तमसावृता॥६६॥

‘इससे आगे पूर्व दिशा अगम्य है उधर देवता रहते हैं। उस ओर चन्द्रमा और सूर्य का प्रकाश न होने से वहाँ की भूमि अन्धकार से आच्छन्न एवं अदृश्य है॥६६॥

शैलेषु तेषु सर्वेषु कन्दरेषु नदीषु च।

ये च नोक्ता मयोद्देशा विचेया तेषु जानकी॥६७॥

‘उदयाचल के आस-पास के जो समस्त पर्वत, कन्दराएँ तथा नदियाँ हैं, उनमें तथा जिन स्थानों का मैंने निर्देश नहीं किया है, उनमें भी तुम्हें जानकी की खोज करनी चाहिये॥६७॥

एतावद् वानरैः शक्यं गन्तुं वानरपुङ्गवाः।

अभास्करममर्यादं न जानीमस्ततः परम्॥ ६८॥

‘वानरशिरोमणियो! केवल उदयगिरि तक ही वानरों की पहुँच हो सकती है। इससे आगे न तो सूर्य का प्रकाश है और न देश आदि की कोई सीमा ही है। अतः आगे की भूमि के बारे में मुझे कुछ भी मालूम नहीं है॥ ६८॥

अभिगम्य तु वैदेहीं निलयं रावणस्य च।

मासे पूर्णे निवर्तध्वमुदयं प्राप्य पर्वतम्॥६९॥

‘तुम लोग उदयाचल तक जाकर सीता और रावण के स्थान का पता लगाना और एक मास पूरा होते होते तक लौट आना॥ ६९॥

ऊर्ध्वं मासान्न वस्तव्यं वसन् वध्यो भवेन्मम।

सिद्धार्थाः संनिवर्तध्वमधिगम्य च मैथिलीम्॥७०॥

‘एक महीने से अधिक न ठहरना। जो अधिक कालतक वहाँ रह जायगा, वह मेरे द्वारा मारा जायगा। मिथिलेशकुमारी का पता लगाकर अन्वेषण का प्रयोजन सिद्ध हो जाने पर अवश्य लौट आना॥ ७० ॥

महेन्द्रकान्तां वनषण्डमण्डितां दिशं चरित्वा निपुणेन वानराः।

अवाप्य सीतां रघुवंशजप्रियां ततो निवृत्ताः सुखिनो भविष्यथ॥७१॥

वानरो! वनसमूह से अलंकृत पूर्व दिशा में अच्छी तरह भ्रमण करके श्रीरामचन्द्रजी की प्यारी पत्नी सीता का समाचार जानकर तुम वहाँ से लौट आओ इससे तुम सुखी हो ओगे’॥ ७१॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे चत्वारिंशः सर्गः॥४०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में चालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४०॥