॥श्री गणेशाय नम:॥
॥श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
**************
सम्पूर्ण वाल्मीकि रामायण
[काव्य बीजं सनातनम्]

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(विश्वामित्र के रोषपूर्ण वचन तथा वसिष्ठ का राजा दशरथ को समझाना)

एकविंशः सर्गः 

सर्ग-21

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य स्नेहपर्याकुलाक्षरम्।

समन्युः कौशिको वाक्यं प्रत्युवाच महीपतिम्॥

राजा दशरथ की बात के एक-एक अक्षर में पुत्र के प्रति स्नेह भरा हुआ था, उसे सुनकर महर्षि विश्वामित्र कुपित हो उनसे इस प्रकार बोले- ॥१॥

पूर्वमर्थं प्रतिश्रुत्य प्रतिज्ञा हातुमिच्छसि।।

राघवाणामयुक्तोऽयं कुलस्यास्य विपर्ययः॥२॥

‘राजन् ! पहले मेरी माँगी हुई वस्तु के देने की प्रतिज्ञा करके अब तुम उसे तोड़ना चाहते हो। प्रतिज्ञा का यह त्याग रघुवंशियों के योग्य तो नहीं है,यह बर्ताव तो इस कुल के विनाश का सूचक है॥२॥

यदीदं ते क्षमं राजन् गमिष्यामि यथागतम्।

मिथ्याप्रतिज्ञः काकुत्स्थ सुखी भव सुहृवृतः॥

‘नरेश्वर ! यदि तुम्हें ऐसा ही उचित प्रतीत होता है तो मैं जैसे आया था, वैसे ही लौट जाऊँगा। ककुत्स्थकुल के रत्न! अब तुम अपनी प्रतिज्ञा झूठी करके हितैषी सुहृदों से घिरे रहकर सुखी रहो’ ॥ ३॥

तस्य रोषपरीतस्य विश्वामित्रस्य धीमतः।

चचाल वसुधा कृत्स्ना देवानां च भयं महत्॥४॥

बुद्धिमान् विश्वामित्र के कुपित होते ही सारी पृथ्वी काँप उठी और देवताओं के मन में महान् भय समा गया॥४॥

त्रस्तरूपं तु विज्ञाय जगत् सर्वं महानृषिः।

नृपतिं सुव्रतो धीरो वसिष्ठो वाक्यमब्रवीत्॥५॥

उनके रोष से सारे संसार को त्रस्त हुआ जान उत्तम व्रत का पालन करने वाले धीरचित्त महर्षि वसिष्ठ ने राजासे इस प्रकार कहा- ॥५॥

इक्ष्वाकूणां कुले जातः साक्षाद् धर्म इवापरः।

धृतिमान् सुव्रतः श्रीमान् न धर्मं हातुमर्हसि॥६॥

‘महाराज! आप इक्ष्वाकुवंशी राजाओं के कुल में साक्षात् दूसरे धर्म के समान उत्पन्न हुए हैं। धैर्यवान्, ” उत्तम व्रत के पालक तथा श्रीसम्पन्न हैं। आपको अपने धर्म का परित्याग नहीं करना चाहिये॥६॥

त्रिषु लोकेषु विख्यातो धर्मात्मा इति राघवः।

स्वधर्मं प्रतिपद्यस्व नाधर्मं वोढुमर्हसि ॥७॥

“रघुकुलभूषण दशरथ बड़े धर्मात्मा हैं’ यह बात तीनों लोकों में प्रसिद्ध है। अतः आप अपने धर्म का ही पालन कीजिये; अधर्म का भार सिरपर न उठाइये॥ ७॥

प्रतिश्रुत्य करिष्येति उक्तं वाक्यमकुर्वतः।

इष्टापूर्तवधो भूयात् तस्माद् रामं विसर्जय॥८॥

‘मैं अमुक कार्य करूँगा’—ऐसी प्रतिज्ञा करके भी जो उस वचनका पालन नहीं करता, उसके यज्ञयागादि इष्ट तथा बावली-तालाब बनवाने आदि पूर्त कर्मो के पुण्यका नाश हो जाता है, अतः आप श्रीराम को विश्वामित्रजी के साथ भेज दीजिये॥ ८॥

कृतास्त्रमकृतास्त्रं वा नैनं शक्ष्यन्ति राक्षसाः।

गुप्तं कुशिकपुत्रेण ज्वलनेनामृतं यथा॥९॥

‘ये अस्त्रविद्या जानते हों या न जानते हों, राक्षस इनका सामना नहीं कर सकते। जैसे प्रज्वलित अग्निद्वारा सुरक्षित अमृत पर कोई हाथ नहीं लगा सकता, उसी प्रकार कुशिकनन्दन विश्वामित्र से सुरक्षित हुए श्रीराम का वे राक्षस कुछ भी बिगाड़ नहीं सकते॥९॥

एष विग्रहवान् धर्म एष वीर्यवतां वरः।

एष विद्याधिको लोके तपसश्च परायणम्॥

‘ये श्रीराम तथा महर्षि विश्वामित्र साक्षात् धर्म की मूर्ति हैं। ये बलवानों में श्रेष्ठ हैं। विद्या के द्वारा ही ये संसार में सबसे बढ़े-चढ़े हैं। तपस्या के तो ये विशाल भण्डार ही हैं॥ १०॥

एषोऽस्त्रान् विविधान् वेत्ति त्रैलोक्ये सचराचरे।

नैनमन्यः पुमान् वेत्ति न च वेत्स्यन्ति केचन॥ ११॥

‘चराचर प्राणियों सहित तीनों लोकों में जो नाना प्रकार के अस्त्र हैं, उन सबको ये जानते हैं। इन्हें मेरे सिवा दूसरा कोई पुरुष न तो अच्छी तरह जानता है और न कोई जानेंगे ही॥ ११॥

न देवा नर्षयः केचिन्नामरा न च राक्षसाः।

गन्धर्वयक्षप्रवराः सकिन्नरमहोरगाः॥१२॥

‘देवता, ऋषि, राक्षस, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर तथा बड़े-बड़े नाग भी इनके प्रभाव को नहीं जानते हैं। १२॥

सर्वास्त्राणि कृशाश्वस्य पुत्राः परमधार्मिकाः।

कौशिकाय पुरा दत्ता यदा राज्यं प्रशासति॥ १३॥

‘प्रायः सभी अस्त्र प्रजापति कृशाश्व के परम धर्मात्मा पुत्र हैं। उन्हें प्रजापति ने पूर्वकाल में कुशिकनन्दन विश्वामित्र को जब कि वे राज्यशासन करते थे, समर्पित कर दिया था॥१३॥

तेऽपि पुत्राः कृशाश्वस्य प्रजापतिसुतासुताः।

नैकरूपा महावीर्या दीप्तिमन्तो जयावहाः॥१४॥

‘कृशाश्व के वे पुत्र प्रजापति दक्ष की दो पुत्रियों की संतानें हैं,उनके अनेक रूप हैं। वे सब-के-सब महान् शक्तिशाली, प्रकाशमान और विजय दिलानेवाले हैं॥१४॥

जया च सुप्रभा चैव दक्षकन्ये सुमध्यमे।

ते सतेऽस्त्राणि शस्त्राणि शतं परमभास्वरम्॥ १५॥

‘प्रजापति दक्ष की दो सुन्दरी कन्याएँ हैं, उनके नाम हैं जया और सुप्रभा। उन दोनों ने एक सौ परम प्रकाशमान अस्त्र-शस्त्रों को उत्पन्न किया है॥ १५॥

पञ्चाशतं सुताँल्लेभे जया लब्धवरा वरान्।

वधायासुरसैन्यानामप्रमेयानरूपिणः॥१६॥

‘उनमेंसे जया ने वर पाकर पचास श्रेष्ठ पुत्रों को प्राप्त किया है, जो अपरिमित शक्तिशाली और रूपरहित हैं। वे सब-के-सब असुरों की सेनाओं का वध करने के लिये प्रकट हुए हैं।॥ १६॥

सुप्रभाजनयच्चापि पुत्रान् पञ्चाशतं पुनः ।

संहारान् नाम दुर्धर्षान् दुराकामान् बलीयसः॥ १७॥

‘फिर सुप्रभा ने भी संहार नामक पचास पुत्रों को जन्म दिया, जो अत्यन्त दुर्जय हैं। उन पर आक्रमण करना किसी के लिये भी सर्वथा कठिन है तथा वे सब-के-सब अत्यन्त बलिष्ठ हैं॥ १७॥

तानि चास्त्राणि वेत्त्येष यथावत् कुशिकात्मजः।

अपूर्वाणां च जनने शक्तो भूयश्च धर्मवित्॥ १८॥

‘ये धर्मज्ञ कुशिकनन्दन उन सब अस्त्र-शस्त्रों को अच्छी तरह जानते हैं। जो अस्त्र अब तक उपलब्ध नहीं हुए हैं, उनको भी उत्पन्न करने की इनमें पूर्ण शक्ति है॥ १८॥

तेनास्य मुनिमुख्यस्य धर्मज्ञस्य महात्मनः।

न किञ्चिदस्त्यविदितं भूतं भव्यं च राघव॥ १९॥

‘रघुनन्दन! इसलिये इन मुनिश्रेष्ठ धर्मज्ञ महात्मा विश्वामित्रजीसे भूत या भविष्यकी कोई बात छिपी नहीं है ॥ १९॥

एवंवीर्यो महातेजा विश्वामित्रो महायशाः।

न रामगमने राजन् संशयं गन्तुमर्हसि ॥२०॥

‘राजन्! ये महातेजस्वी, महायशस्वी विश्वामित्र ऐसे प्रभावशाली हैं। अतः इनके साथ राम को भेजने में आप किसी प्रकार का संदेह न करें॥२०॥

तेषां निग्रहणे शक्तः स्वयं च कुशिकात्मजः।

तव पुत्रहितार्थाय त्वामुपेत्याभियाचते॥२१॥

‘महर्षि कौशिक स्वयं भी उन राक्षसोंका संहार करने में समर्थ हैं; किंतु ये आपके पुत्र का कल्याण करना चाहते हैं, इसीलिये यहाँ आकर आपसे याचना कर रहे हैं ॥ २१॥

इति मुनिवचनात् प्रसन्नचित्तो रघुवृषभश्च मुमोद पार्थिवाग्र्यः।

गमनमभिरुरोच राघवस्य प्रथितयशाः कुशिकात्मजाय बुद्ध्या॥२२॥

महर्षि वसिष् ठके इस वचन से विख्यात यश वाले रघुकुल शिरोमणि नृपश्रेष्ठ दशरथ का मन प्रसन्न हो गया। वे आनन्दमग्न हो गये और बुद्धि से विचार करनेपर विश्वामित्रजी की प्रसन्नता के लिये उनके साथ श्रीराम का जाना उन्हें रुचि के अनुकूल प्रतीत होने लगा॥ २२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकविंशः सर्गः ॥२१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में इक्कीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।२१॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(राजा दशरथ का स्वस्तिवाचन पूर्वक राम-लक्ष्मण को मुनि के साथ भेजना,विश्वामित्र से बला और अतिबला नामक विद्या की प्राप्ति)

द्वाविंशः सर्गः 

सर्ग-22

तथा वसिष्ठे ब्रुवति राजा दशरथः स्वयम्।

प्रहृष्टवदनो राममाजुहाव सलक्ष्मणम्॥१॥

कृतस्वस्त्ययनं मात्रा पित्रा दशरथेन च।

पुरोधसा वसिष्ठेन मंगलैरभिमन्त्रितम्॥२॥

वसिष्ठ के ऐसा कहने पर राजा दशरथ का मुख प्रसन्नता से खिल उठा। उन्होंने स्वयं ही लक्ष्मण सहित श्रीराम को अपने पास बुलाया,फिर माता कौसल्या, पिता दशरथ और पुरोहित वसिष्ठ ने स्वस्तिवाचन करने के पश्चात् उनका यात्रा सम्बन्धी मंगलकार्य सम्पन्न किया—श्रीराम को मंगलसूचक मन्त्रों से अभिमन्त्रित किया गया॥ १-२॥

स पुत्रं मूर्युपाघ्राय राजा दशरथस्तदा।

ददौ कुशिकपुत्राय सुप्रीतेनान्तरात्मना॥ ३॥

तदनन्तर राजा दशरथ ने पुत्र का मस्तक सूंघकर अत्यन्त प्रसन्नचित्त से उसको विश्वामित्र को सौंप दिया॥३॥

ततो वायुः सुखस्पर्शी नीरजस्को ववौ तदा।

विश्वामित्रगतं रामं दृष्ट्वा राजीवलोचनम्॥४॥

पुष्पवृष्टिर्महत्यासीद् देवदुन्दुभिनिःस्वनैः।

शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषः प्रयाते तु महात्मनि॥५॥

उस समय धूलरहित सुखदायिनी वायु चलने लगी। कमलनयन श्रीराम को विश्वामित्रजी के साथ जाते देख देवताओं ने आकाश से वहाँ फूलों की बड़ी भारी वर्षा की। देवदुन्दुभियाँ बजने लगीं,महात्मा श्रीराम की यात्रा के समय शङ्खों और नगाड़ोंकी ध्वनि होने लगी॥

विश्वामित्रो ययावग्रे ततो रामो महायशाः।

काकपक्षधरो धन्वी तं च सौमित्रिरन्वगात्॥६॥

आगे-आगे विश्वामित्र, उनके पीछे काकपक्षधारी महायशस्वी श्रीराम तथा उनके पीछे सुमित्राकुमार लक्ष्मण जा रहे थे॥६॥

कलापिनौ धनुष्पाणी शोभयानौ दिशो दश।

विश्वामित्रं महात्मानं त्रिशीर्षाविव पन्नगौ॥७॥

उन दोनों भाइयों ने पीठ पर तरकस बाँध रखे थे। उनके हाथों में धनुष शोभा पा रहे थे तथा वे दोनों दसों दिशाओं को सुशोभित करते हुए महात्मा विश्वामित्र के पीछे तीन-तीन फनवाले दो सर्पो के समान चल रहे थे। एक ओर कंधेपर धनुष, दूसरी ओर पीठपर तूणीर और बीच में मस्तक-इन्हीं तीनों की तीन फन से उपमा दी गयी है॥७॥

अनुजग्मतुरक्षुद्रौ पितामहमिवाश्विनौ।

अनुयातौ श्रिया दीप्तौ शोभयन्तावनिन्दितौ॥८॥

उनका स्वभाव उच्च एवं उदार था। अपनी अनुपम कान्ति से प्रकाशित होने वाले वे दोनों अनिन्द्य सुन्दर राजकुमार सब ओर शोभा का प्रसार करते हुए विश्वामित्रजी के पीछे उसी तरह जा रहे थे, जैसे ब्रह्माजी के पीछे दोनों अश्विनी कुमार चलते हैं॥८॥

तदा कुशिकपुत्रं तु धनुष्पाणी स्वलंकृतौ।

बद्धगोधांगुलित्राणौ खड्गवन्तौ महाद्युती॥९॥

कुमारौ चारुवपुषौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ।

अनुयातौ श्रिया दीप्तौ शोभयेतामनिन्दितौ॥ १०॥

स्थाणुं देवमिवाचिन्त्यं कुमाराविव पावकी।

वे दोनों भाई कुमार श्रीराम और लक्ष्मण वस्त्र और आभूषणों से अच्छी तरह अलंकृत थे। उनके हाथों में धनुष थे। उन्होंने अपने हाथों की अंगुलियों में गोहटी के चमड़े के बने हुए दस्ताने पहन रखे थे। उनके कटिप्रदेश में तलवारें लटक रही थीं। उनके श्रीअंग बड़े मनोहर थे। वे महातेजस्वी श्रेष्ठ वीर अद्भुत कान्ति से उद्भासित हो सब ओर अपनी शोभा फैलाते हुए कुशिक पुत्र विश्वामित्र का अनुसरण कर रहे थे। उस समय वे दोनों वीर अचिन्त्य शक्तिशाली स्थाणुदेव (महादेव) के पीछे चलने वाले दो अग्निकुमार स्कन्द और विशाख की भाँति शोभा पाते थे॥

अध्यर्धयोजनं गत्वा सरय्वा दक्षिणे तटे॥११॥

रामेति मधुरां वाणीं विश्वामित्रोऽभ्यभाषत।

गृहाण वत्स सलिलं मा भूत् कालस्य पर्ययः॥ १२॥

अयोध्या से डेढ़ योजन दूर जाकर सरयू के दक्षिण तट पर विश्वामित्र ने मधुर वाणी में राम को सम्बोधित किया और कहा—’वत्स राम! अब सरयू के जलसे आचमन करो। इस आवश्यक कार्य में विलम्ब न हो॥

मन्त्रग्रामं गृहाण त्वं बलामतिबलां तथा।

न श्रमो न ज्वरो वा ते न रूपस्य विपर्ययः॥ १३॥

‘बला और अतिबला नाम से प्रसिद्ध इस मन्त्रसमुदाय को ग्रहण करो। इसके प्रभाव से तुम्हें कभी श्रम (थकावट) का अनुभव नहीं होगा। ज्वर (रोग या चिन्ताजनित कष्ट) नहीं होगा। तुम्हारे रूप में किसी प्रकार का विकार या उलट-फेर नहीं होने पायेगा। १३॥

न च सुप्तं प्रमत्तं वा धर्षयिष्यन्ति नैर्ऋताः।

न बाह्वोः सदृशो वीर्ये पृथिव्यामस्ति कश्चन॥ १४॥

‘सोते समय अथवा असावधानी की अवस्था में भी राक्षस तुम्हारे ऊपर आक्रमण नहीं कर सकेंगे। इस भूतल पर बाहुबल में तुम्हारी समानता करने वाला कोई न होगा॥१४॥

त्रिषु लोकेषु वा राम न भवेत् सदृशस्तव।

बलामतिबलां चैव पठतस्तात राघव॥१५॥

‘तात! रघुकुलनन्दन राम! बला और अतिबला का अभ्यास करने से तीनों लोकों में तुम्हारे समान कोई नहीं रह जायगा॥ १५॥

न सौभाग्ये न दाक्षिण्ये न ज्ञाने बुद्धिनिश्चये।

नोत्तरे प्रतिवक्तव्ये समो लोके तवानघ॥१६॥

‘अनघ! सौभाग्य, चातुर्य, ज्ञान और बुद्धिसम्बन्धी निश्चय में तथा किसी के प्रश्न का उत्तर देने में भी कोई तुम्हारी तुलना नहीं कर सकेगा॥ १६ ॥

एतद्विद्याद्वये लब्धे न भवेत् सशस्तव।

बला चातिबला चैव सर्वज्ञानस्य मातरौ॥१७॥

‘इन दोनों विद्याओं के प्राप्त हो जाने पर कोई तुम्हारी समानता नहीं कर सकेगा; क्योंकि ये बला और अतिबला नामक विद्याएँ सब प्रकार के ज्ञान की जननी हैं॥ १७

क्षुत्पिपासे न ते राम भविष्यते नरोत्तम।

बलामतिबलां चैव पठतस्तात राघव॥१८॥

गृहाण सर्वलोकस्य गुप्तये रघुनन्दन।

‘नरश्रेष्ठ श्रीराम! तात रघुनन्दन! बला और अतिबला का अभ्यास कर लेने पर तुम्हें भूख-प्यास का भी कष्ट नहीं होगा; अतः रघुकुल को आनन्दित

करने वाले राम! तुम सम्पूर्ण जगत् की रक्षा के लिये इन दोनों विद्याओं को ग्रहण करो॥ १८ १/२ ॥

विद्याद्वयमधीयाने यशश्चाथ भवेद् भुवि।

पितामहसुते ह्येते विद्ये तेजःसमन्विते॥१९॥

‘इन दोनों विद्याओं का अध्ययन कर लेनेप र इस भूतल पर तुम्हारे यश का विस्तार होगा। ये दोनों विद्याएँ ब्रह्माजी की तेजस्विनी पुत्रियाँ हैं ॥ १९॥

प्रदातुं तव काकुत्स्थ सदृशस्त्वं हि पार्थिव।

कामं बहुगुणाः सर्वे त्वय्येते नात्र संशयः॥२०॥

तपसा सम्भृते चैते बहुरूपे भविष्यतः।

‘ककुत्स्थनन्दन! मैंने इन दोनों को तुम्हें देने का विचार किया है। राजकुमार! तुम्हीं इनके योग्य पात्र हो। यद्यपि तुममें इस विद्या को प्राप्त करने योग्य बहुत-से गुण हैं अथवा सभी उत्तम गुण विद्यमान हैं, इसमें संशय नहीं है तथापि मैंने तपोबल से इनका अर्जन किया है। अतः मेरी तपस्या से परिपूर्ण होकर ये तुम्हारे लिये बहुरूपिणी होंगी—अनेक प्रकारके फल प्रदान करेंगी’ ॥ २० १/२॥

ततो रामो जलं स्पृष्ट्वा प्रहृष्टवदनः शुचिः॥२१॥

प्रतिजग्राह ते विद्ये महर्षेवितात्मनः।

तब श्रीराम आचमन करके पवित्र हो गये। उनका मुख प्रसन्नता से खिल उठा। उन्होंने उन शुद्ध अन्तःकरणवाले महर्षि से वे दोनों विद्याएँ ग्रहण की। २१ १/२॥

विद्यासमुदितो रामः शुशुभे भीमविक्रमः ॥२२॥

सहस्ररश्मिभगवान्शरदीव दिवाकरः।

विद्या से सम्पन्न होकर भयङ्कर पराक्रमी श्रीराम सहस्रों किरणों से युक्त शरत्कालीन भगवान् सूर्य के समान शोभा पाने लगे॥ २२ १/२॥

गुरुकार्याणि सर्वाणि नियुज्य कुशिकात्मजे।

ऊषुस्तां रजनीं तत्र सरय्वां ससुखं त्रयः॥२३॥

तत्पश्चात् श्रीराम ने विश्वामित्रजी की सारी गुरुजनोचित सेवाएँ करके हर्ष का अनुभव किया,फिर वे तीनों वहाँ सरयू के तट पर रात में सुखपूर्वक रहे॥ २३॥

दशरथनृपसूनुसत्तमाभ्यां तृणशयनेऽनुचिते तदोषिताभ्याम्।

कुशिकसुतवचोऽनुलालिताभ्यां सुखमिव सा विबभौ विभावरी च॥२४॥

राजा दशरथ के वे दोनों श्रेष्ठ राजकुमार उस समय वहाँ तृण की शय्यापर, जो उनके योग्य नहीं थी, सोये थे। महर्षि विश्वामित्र अपनी वाणीद्वारा उन दोनों के प्रति लाड़-प्यार प्रकट कर रहे थे, इससे उन्हें वह रात बड़ी सुखमयी-सी प्रतीत हुई।॥ २४॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे द्वाविंशः सर्गः ॥२२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में बाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ।२२॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

( विश्वामित्र सहित श्रीराम और लक्ष्मण का सरयू-गंगा संगम के समीप पुण्य आश्रम में रात को ठहरना)

त्रयोविंशः सर्गः 

सर्ग-23

प्रभातायां तु शर्वर्यां विश्वामित्रो महामुनिः।

अभ्यभाषत काकुत्स्थौ शयानौ पर्णसंस्तरे॥१॥

जब रात बीती और प्रभात हुआ, तब महामुनि विश्वामित्र ने तिनकों और पत्तों के बिछौने पर सोये हुए उन दोनों ककुत्स्थवंशी राजकुमारों से कहा- ॥१॥

कौसल्या सुप्रजा राम पूर्वा संध्या प्रवर्तते।

उत्तिष्ठ नरशार्दूल कर्तव्यं दैवमाह्निकम्॥२॥

‘नरश्रेष्ठ राम! तुम्हारे-जैसे पुत्र को पाकर महारानी कौसल्या सुपुत्रजननी कही जाती हैं। यह देखो, प्रातःकाल की संध्या का समय हो रहा है; उठो और प्रतिदिन किये जाने वाले देव सम्बन्धी कार्यों को पूर्ण करो’ ॥२॥

तस्यर्षेः परमोदारं वचः श्रुत्वा नरोत्तमौ।

स्नात्वा कृतोदकौ वीरौ जेपतुः परमं जपम्॥३॥

महर्षि का यह परम उदार वचन सुनकर उन दोनों नरश्रेष्ठ वीरों ने स्नान करके देवताओं का तर्पण किया और फिर वे परम उत्तम जपनीय मन्त्र गायत्री का जप करने लगे॥३॥

कृताह्निकौ महावीर्यो विश्वामित्रं तपोधनम्।

अभिवाद्यातिसंहृष्टौ गमनायाभितस्थतुः॥४॥

नित्य कर्म समाप्त करके महापराक्रमी श्रीराम और लक्ष्मण अत्यन्त प्रसन्न हो तपोधन विश्वामित् रको प्रणाम करके वहाँ से आगे जाने को उद्यत हो गये। ४॥

तौ प्रयान्तौ महावी? दिव्यां त्रिपथगां नदीम्।

ददृशाते ततस्तत्र सरय्वाः संगमे शुभे॥५॥

जाते-जाते उन महाबली राजकुमारों ने गंगा और सरयू के शुभ संगम पर पहुँचकर वहाँ दिव्य त्रिपथगा नदी गंगाजी का दर्शन किया॥५॥

तत्राश्रमपदं पुण्यमृषीणां भावितात्मनाम्।

बहुवर्षसहस्राणि तप्यतां परमं तपः॥६॥

संगम के पास ही शुद्ध अन्तःकरण वाले महर्षियों का एक पवित्र आश्रम था, जहाँ वे कई हजार वर्षों से तीव्र तपस्या करते थे॥६॥

तं दृष्ट्वा परमप्रीतौ राघवौ पुण्यमाश्रमम्।

ऊचतुस्तं महात्मानं विश्वामित्रमिदं वचः॥७॥

उस पवित्र आश्रम को देखकर रघुकुलरत्न श्रीराम और लक्ष्मण बड़े प्रसन्न हुए उन्होंने महात्मा विश्वामित्र से यह बात कही— ॥७॥

कस्यायमाश्रमः पुण्यः को न्वस्मिन् वसते पुमान्।

भगवञ्छ्रोतुमिच्छावः परं कौतूहलं हि नौ॥८॥

‘भगवन्! यह किसका पवित्र आश्रम है? और इसमें कौन पुरुष निवास करता है? यह हम दोनों सुनना चाहते हैं इसके लिये हमारे मन में बड़ी उत्कण्ठा है’॥ ८॥

तयोस्तद् वचनं श्रुत्वा प्रहस्य मुनिपुंगवः।

अब्रवीच्छ्रयतां राम यस्यायं पूर्व आश्रमः॥९॥

उन दोनों का यह वचन सुनकर मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र हँसते हुए बोले—’राम! यह आश्रम पहले जिसके अधिकार में रहा है, उसका परिचय देता हूँ, सुनो। ९॥

कन्दर्पो मूर्तिमानासीत् काम इत्युच्यते बुधैः ।

तपस्यन्तमिह स्थाणुं नियमेन समाहितम्॥१०॥

‘विद्वान् पुरुष जिसे काम कहते हैं, वह कन्दर्प पूर्वकाल में मूर्तिमान् था—शरीर धारण करके विचरता था। उन दिनों भगवान् स्थाणु (शिव) इसी आश्रम में चित्तको एकाग्र करके नियमपूर्वक तपस्या करते थे। १०॥

कृतोद्धाहं तु देवेशं गच्छन्तं समरुद्गणम्।

धर्षयामास दुर्मेधा हुंकृतश्च महात्मना ॥११॥

‘एक दिन समाधि से उठकर देवेश्वर शिव मरुद्गणों के साथ कहीं जा रहे थे। उसी समय दुर्बुद्धि काम ने उन पर आक्रमण किया। यह देख महात्मा शिव ने हुङ्कार करके उसे रोका॥ ११॥

अवध्यातश्च रुद्रेण चक्षुषा रघुनन्दन।

व्यशीर्यन्त शरीरात् स्वात् सर्वगात्राणि दुर्मते॥ १२॥

‘रघुनन्दन! भगवान् रुद्र ने रोष भरी दृष् टिसे अवहेलना-पूर्वक उसकी ओर देखा; फिर तो उस दुर्बुद्धि के सारे अंग उसके शरीर से जीर्ण-शीर्ण होकर गिर गये॥ १२॥

तत्र गात्रं हतं तस्य निर्दग्धस्य महात्मनः।

अशरीरः कृतः कामः क्रोधाद् देवेश्वरेण ह॥ १३॥

‘वहाँ दग्ध हुए महामना कन्दर्पका शरीर नष्ट हो गया,देवेश्वर रुद्र ने अपने क्रोध से कामको अंगहीन कर दिया॥ १३॥

अनंग इति विख्यातस्तदाप्रभृति राघव।

स चांगविषयः श्रीमान् यत्रांगं स मुमोच ह॥ १४॥

‘राम! तभीसे वह ‘अनंग’ नाम से विख्यात हुआ शोभाशाली कन्दर्प ने जहाँ अपना अंग छोड़ा था, वह प्रदेश अंगदेश के नाम से विख्यात हुआ॥ १४ ॥

तस्यायमाश्रमः पुण्यस्तस्येमे मुनयः पुरा।

शिष्या धर्मपरा वीर तेषां पापं न विद्यते॥१५॥

‘यह उन्हीं महादेवजी का पुण्य आश्रम है। वीर! ये मुनि लोग पूर्वकाल में उन्हीं स्थाणु के धर्मपरायण शिष्य थे,इनका सारा पाप नष्ट हो गया है॥ १५ ॥

इहाद्य रजनीं राम वसेम शुभदर्शन।

पुण्ययोः सरितोर्मध्ये श्वस्तरिष्यामहे वयम्॥ १६॥

‘शुभदर्शन राम! आज की रात में हम लोग यहीं इन पुण्यसलिला सरिताओं के बीच में निवास करें। कल सबेरे इन्हें पार करेंगे॥१६॥

अभिगच्छामहे सर्वे शुचयः पुण्यमाश्रमम्।

 इह वासः परोऽस्माकं सुखं वत्स्यामहे निशाम्॥ १७॥

स्नाताश्च कृतजप्याश्च हुतहव्या नरोत्तम।

‘हम सब लोग पवित्र होकर इस पुण्य आश्रम में चलें। यहाँ रहना हमारे लिये बहुत उत्तम होगा। नरश्रेष्ठ! यहाँ स्नान करके जप और हवन करने के बाद हम रात में बड़े सुख से रहेंगे’ ॥ १७ १/२ ॥

 तेषां संवदतां तत्र तपोदीर्घेण चक्षुषा॥१८॥

विज्ञाय परमप्रीता मुनयो हर्षमागमन्।

वे लोग वहाँ इस प्रकार आपस में बातचीत कर ही रहे थे कि उस आश्रम में निवास करने वाले मुनि तपस्या द्वारा प्राप्त हुई दूर दृष्टि से उनका आगमन जानकर मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए, उनके हृदयमें हर्षजनित उल्लास छा गया॥ १८ १/२ ॥

अर्घ्यं पाद्यं तथाऽऽतिथ्यं निवेद्य कुशिकात्मजे॥ १९॥

 रामलक्ष्मणयोः पश्चादकुर्वन्नतिथिक्रियाम्।

उन्होंने विश्वामित्रजी को अर्घ्य, पाद्य और अतिथि सत्कार की सामग्री अर्पित करने के बाद श्रीराम और लक्ष्मण का भी आतिथ्य किया॥ १९ १/२॥

सत्कारं समनुप्राप्य कथाभिरभिरञ्जयन्॥२०॥

यथार्हमजपन् संध्यामृषयस्ते समाहिताः।

यथोचित सत्कार करके उन मुनियों ने इन अतिथियों का भाँति-भाँति की कथा-वार्ताओं द्वारा मनोरञ्जन किया, फिर उन महर्षियों ने एकाग्रचित्त होकर यथावत् संध्यावन्दन एवं जप किया॥ २० १/२॥

 तत्र वासिभिरानीता मुनिभिः सुव्रतैः सह ॥२१॥

न्यवसन् सुसुखं तत्र कामाश्रमपदे तथा।।

तदनन्तर वहाँ रहने वाले मुनियों ने अन्य उत्तम व्रतधारी मुनियों के साथ विश्वामित्र आदि को शयन के लिये उपयुक्त स्थान में पहुँचा दिया। सम्पूर्ण कामनाओं की पूर्ति करने वाले उस पुण्य आश्रम में विश्वामित्र आदि ने बड़े सुख से निवास किया॥ २१ १/२॥

कथाभिरभिरामाभिरभिरामौ नृपात्मजौ।

रमयामास धर्मात्मा कौशिको मुनिपुंगवः॥२२॥

 धर्मात्मा मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र ने उन मनोहर राजकुमारों का सुन्दर कथाओं द्वारा मनोरञ्जन किया॥ २२।।

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे त्रयोविंशः सर्गः॥२३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें तेईसवाँ सर्ग पूरा हुआ।२३॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

 (श्रीराम और लक्ष्मण का गंगापार होते समय तुमुलध्वनि के विषय में प्रश्न, मलद, करूष एवं ताटका वन का परिचय,ताटका वध की आज्ञा)

चतुर्विंशः सर्गः 

सर्ग-24

ततः प्रभाते विमले कृताह्निकमरिन्दमौ।

विश्वामित्रं पुरस्कृत्य नद्यास्तीरमुपागतौ॥१॥

तदनन्तर निर्मल प्रभात काल में नित्यकर्म से निवृत्त हुए विश्वामित्रजी को आगे करके शत्रुदमन वीर श्रीराम और लक्ष्मण गंगा नदी के तट पर आये॥१॥

ते च सर्वे महात्मानो मुनयः संशितव्रताः।

 उपस्थाप्य शुभां नावं विश्वामित्रमथाब्रवन्॥२॥

उस समय उत्तम व्रत का पालन करने वाले उन पुण्याश्रम निवासी महात्मा मुनियों ने एक सुन्दर नाव मँगवाकर विश्वामित्रजी से कहा- ॥२॥

आरोहतु भवान् नावं राजपुत्रपुरस्कृतः।

अरिंष्ट गच्छ पन्थानं मा भूत् कालस्य पर्ययः॥ ३॥

‘महर्षे! आप इन राजकुमारों को आगे करके इस नाव पर बैठ जाइये और मार्ग को निर्विघ्नतापूर्वक तय कीजिये, जिससे विलम्ब न हो’ ॥३॥

विश्वामित्रस्तथेत्युक्त्वा तानृषीन् प्रतिपूज्य च।

ततार सहितस्ताभ्यां सरितं सागरंगमाम्॥४॥

विश्वामित्रजी ने ‘बहुत अच्छा’ कहकर उन महर्षियों की सराहना की और वे श्रीराम तथा लक्ष्मण के साथ समुद्रगामिनी गंगा नदी को पार करने लगे॥ ४॥

तत्र शुश्राव वै शब्दं तोयसंरम्भवर्धितम्।

मध्यमागम्य तोयस्य तस्य शब्दस्य निश्चयम्॥

ज्ञातुकामो महातेजाः सह रामः कनीयसा।

गंगा की बीच धारा में आने पर छोटे भाई सहित महातेजस्वी श्रीराम को दो जलों के टकराने की बड़ी भारी आवाज सुनायी देने लगी। ‘यह कैसी आवाज है? क्यों तथा कहाँ से आ रही है?’ इस बात को निश्चित रूप से जानने की इच्छा उनके भीतर जाग उठी॥ ५ १/२॥

अथ रामः सरिन्मध्ये पप्रच्छ मुनिपुंगवम्॥६॥

वारिणो भिद्यमानस्य किमयं तमलो ध्वनिः।

तब श्रीराम ने नदी के मध्य भाग में मुनिवर विश्वामित्र से पूछा—’जल के परस्पर मिलने से यहाँ ऐसी तुमुलध्वनि क्यों हो रही है ?’॥ ६ १/२॥

राघवस्य वचः श्रुत्वा कौतूहलसमन्वितम्॥७॥

कथयामास धर्मात्मा तस्य शब्दस्य निश्चयम्।

श्रीरामचन्द्रजी के वचन में इस रहस्य को जानने की उत्कण्ठा भरी हुई थी। उसे सुनकर धर्मात्मा विश्वामित्र ने उस महान् शब्द (तुमुलध्वनि) का सुनिश्चित कारण बताते हुए कहा- ॥ ७ १/२॥

 कैलासपर्वते राम मनसा निर्मितं परम्॥८॥

ब्रह्मणा नरशार्दूल तेनेदं मानसं सरः।

‘नरश्रेष्ठ राम! कैलास पर्वत पर एक सुन्दर सरोवर है। उसे ब्रह्माजी ने अपने मानसिक संकल्प से प्रकट किया था। मन के द्वारा प्रकट होने से ही वह उत्तम सरोवर ‘मानस’ कहलाता है॥ ८ १/२॥

तस्मात् सुस्राव सरसः सायोध्यामुपगूहते॥९॥

 सरःप्रवृत्ता सरयूः पुण्या ब्रह्मसरश्च्युता।

‘उस सरोवर से एक नदी निकली है, जो अयोध्यापुरी से सटकर बहती है। ब्रह्मसर से निकलने के कारण वह पवित्र नदी सरयू के नाम से विख्यात है॥ ९ १/२॥

तस्यायमतुलः शब्दो जाह्नवीमभिवर्तते॥१०॥

वारिसंक्षोभजो राम प्रणामं नियतः कुरु।

“उसी का जल गंगा जी में मिल रहा है। दो नदियों के जलों के संघर्ष से ही यह भारी आवाज हो रही है; जिसकी कहीं तुलना नहीं है। राम! तुम अपने मन को संयम में रखकर इस संगम के जलको प्रणाम करो’ ॥ १० १/२॥

ताभ्यां तु तावुभौ कृत्वा प्रणाममतिधार्मिकौ॥

तीरं दक्षिणमासाद्य जग्मतुर्लघुविक्रमौ।

यह सुनकर उन दोनों अत्यन्त धर्मात्मा भाइयों ने उन दोनों नदियों को प्रणाम किया और गंगा के दक्षिण किनारे पर उतरकर वे दोनों बन्धु जल्दी-जल्दी पैर बढ़ाते हुए चलने लगे॥ ११ १/२॥

 स वनं घोरसंकाशं दृष्ट्वा नरवरात्मजः॥१२॥

अविप्रहतमैक्ष्वाकः पप्रच्छ मुनिपुंगवम्।

उस समय इक्ष्वाकुनन्दन राजकुमार श्रीराम ने अपने सामने एक भयङ्कर वन देखा, जिसमें मनुष्यों के आने-जाने का कोई चिह्न नहीं था। उसे देखकर उन्होंने मुनिवर विश्वामित्र से पूछा- ॥ १२ १/२॥

अहो वनमिदं दुर्गं झिल्लिकागणसंयुतम्॥१३॥

भैरवैः श्वापदैः कीर्णं शकन्तैर्दारुणारवैः।

नानाप्रकारैः शकुनैर्वाश्यद्भिभैरवस्वनैः॥१४॥

‘गुरुदेव! यह वन तो बड़ा ही अद्भुत एवं दुर्गम है। यहाँ चारों ओर झिल्लियों की झनकार सुनायी देती है। भयानक हिंसक जन्तु भरे हुए हैं। भयङ्कर बोली बोलनेवाले पक्षी सब ओर फैले हुए हैं। नाना प्रकारके विहंगम भीषण स्व रमें चहचहा रहे हैं। १३-१४॥

सिंहव्याघ्रवराहैश्च वारणैश्चापि शोभितम्।

धवाश्वकर्णककुभैर्बिल्वतिन्दुकपाटलैः॥१५॥

संकीर्णं बदरीभिश्च किं न्विदं दारुणं वनम्।

‘सिंह, व्याघ्र, सूअर और हाथी भी इस जंगलकी शोभा बढ़ा रहे हैं। धव (धौरा), अश्वकर्ण (एक प्रकारके शालवृक्ष), ककुभ (अर्जुन), बेल, तिन्दुक (तेन्दू), पाटल (पाड़र) तथा बेरके वृक्षों से भरा हुआ यह भयङ्कर वन क्या है?—इसका क्या नाम है?’ ॥ १५ १/२॥

तमुवाच महातेजा विश्वामित्रो महामुनिः॥१६॥

श्रूयतां वत्स काकुत्स्थ यस्यैतद् दारुणं वनम्।

तब महातेजस्वी महामुनि विश्वामित्र ने उनसे कहा —’वत्स! ककुत्स्थनन्दन! यह भयङ्कर वन जिसके अधिकार में रहा है, उसका परिचय सुनो। १६ १/२ ॥

एतौ जनपदौ स्फीतौ पूर्वमास्तां नरोत्तम॥१७॥

मलदाश्च करूषाश्च देवनिर्माणनिर्मितौ।

‘नरश्रेष्ठ ! पूर्वकाल में यहाँ दो समृद्धिशाली जनपद थे—मलद और करूष। ये दोनों देश देवताओं के प्रयत्न से निर्मित हुए थे॥ १७ १/२॥

पुरा वृत्रवधे राम मलेन समभिप्लुतम्॥१८॥

क्षुधा चैव सहस्राक्षं ब्रह्महत्या समाविशत्।

‘राम! पहले की बात है, वृत्रासुर का वध करने के पश्चात् देवराज इन्द्र मल से लिप्त हो गये,क्षुधाने भी उन्हें धर दबाया और उनके भीतर ब्रह्म हत्या प्रविष्ट हो गयी॥

तमिन्द्रं मलिनं देवा ऋषयश्च तपोधनाः॥१९॥

कलशैः स्नापयामासुर्मलं चास्य प्रमोचयन्।

‘तब देवताओं तथा तपोधन ऋषियों ने मलिन इन्द्र को यहाँ गंगाजल से भरे हुए कलशों द्वारा नहलाया तथा उनके मल (और कारूष—क्षुधा) को छुड़ा दिया॥

इह भूम्यां मलं दत्त्वा देवाः कारूषमेव च॥२०॥

शरीर महेन्द्रस्य ततो हर्षं प्रपेदिरे।

इस भूभाग में देवराज इन्द्र के शरीर से उत्पन्न हुए मल और कारूष को देकर देवता लोग बड़े प्रसन्न हुए॥

निर्मलो निष्करूषश्च शुद्ध इन्द्रो यथाभवत्॥ २१॥

ततो देशस्य सुप्रीतो वरं प्रादादनुत्तमम्।

इमौ जनपदौ स्फीतौ ख्यातिं लोके गमिष्यतः॥ २२॥

मलदाश्च करूषाश्च ममांगमलधारिणौ।

‘इन्द्र पूर्ववत् निर्मल, निष्करूष (क्षुधाहीन) एवं शुद्ध हो गये। तब उन्होंने प्रसन्न होकर इस देशको यह उत्तम वर प्रदान किया—’ये दो जनपद लोक में मलद और करूष नाम से विख्यात होंगे। मेरे अंगजनित मल को धारण करने वाले ये दोनों देश बड़े समृद्धिशाली होंगे’।

साधु साध्विति तं देवाः पाकशासनमब्रुवन्॥ २३॥

देशस्य पूजां तां दृष्ट्वा कृतां शक्रेण धीमता।

‘बुद्धिमान् इन्द्र के द्वारा की गयी उस देश की वह पूजा देखकर देवताओं ने पाकशासन को बारम्बार साधुवाद दिया॥ २३ १/२॥

एतौ जनपदौ स्फीतौ दीर्घकालमरिंदम ॥२४॥

मलदाश्च करूषाश्च मुदिता धनधान्यतः।

‘शत्रुदमन! मलद और करूष—ये दोनों जनपद दीर्घकाल तक समृद्धिशाली, धन-धान्यसे सम्पन्न तथा सुखी रहे हैं॥ २४ १/२॥

कस्यचित्त्वथ कालस्य यक्षिणी कामरूपिणी॥ २५॥

 बलं नागसहस्रस्य धारयन्ती तदा ह्यभूत्।

‘कुछ काल के अनन्तर यहाँ इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली एक यक्षिणी आयी, जो अपने शरीर में एक हजार हाथियों का बल धारण करती है॥ २५ १/२॥

ताटका नाम भद्रं ते भार्या सुन्दस्य धीमतः॥ २६॥

मारीचो राक्षसः पुत्रो यस्याः शक्रपराक्रमः।

वृत्तबाहुर्महाशीर्षो विपुलास्यतनुर्महान्॥ २७॥

“उसका नाम ताटका है। वह बुद्धिमान् सुन्द नामक दैत्य की पत्नी है,तुम्हारा कल्याण हो। मारीच नामक राक्षस, जो इन्द्र के समान पराक्रमी है, उस ताटका का ही पुत्र है। उसकी भुजाएँ गोल, मस्तक बहुत बड़ा, मुँह फैला हुआ और शरीर विशाल है॥ २६-२७॥

राक्षसो भैरवाकारो नित्यं त्रासयते प्रजाः।

 इमौ जनपदौ नित्यं विनाशयति राघव॥२८॥

मलदांश्च करूषांश्च ताटका दुष्टचारिणी।

‘वह भयानक आकार वाला राक्षस यहाँ की प्रजा को सदा ही त्रास पहुँचाता रहता है। रघुनन्दन! वह दुराचारिणी ताटका भी सदा मलद और करूष—इन दोनों जनपदों का विनाश करती रहती है॥ २८१/२॥

सेयं पन्थानमावृत्य वसत्यत्यर्धयोजने॥२९॥

अत एव च गन्तव्यं ताटकाया वनं यतः।

 स्वबाहुबलमाश्रित्य जहीमां दुष्टचारिणीम्॥३०॥

‘वह यक्षिणी डेढ़ योजन (छः कोस) तक के मार्ग को घेरकर इस वन में रहती है; अतः हमलोगों को जिस ओर ताटका-वन है, उधर ही चलना चाहिये। तुम अपने बाहुबल का सहारा लेकर इस दुराचारिणी को मार डालो॥ २९-३०॥

मन्नियोगादिमं देशं कुरु निष्कण्टकं पुनः।

नहि कश्चिदिमं देशं शक्तो ह्यागन्तुमीदृशम्॥ ३१॥

‘मेरी आज्ञा से इस देश को पुनः निष्कण्टक बना दो। यह देश ऐसा रमणीय है तो भी इस समय कोई यहाँ आ नहीं सकता है॥ ३१॥

यक्षिण्या घोरया राम उत्सादितमसह्यया।

एतत्ते सर्वमाख्यातं यथैतद् दारुणं वनम्।

 यक्ष्या चोत्सादितं सर्वमद्यापि न निवर्तते॥ ३२॥

‘राम! उस असह्य एवं भयानक यक्षिणी ने इस देशको उजाड़ कर डाला है। यह वन ऐसा भयङ्कर क्यों है, यह सारा रहस्य मैंने तुम्हें बता दिया। उस यक्षिणी ने ही इस सारे देश को उजाड़ दिया है और वह आज भी अपने उस क्रूर कर्म से निवृत्त नहीं हुई है’॥ ३२॥

 इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे चतुर्विंशः सर्गः॥२४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें चौबीसवाँ सर्ग पूरा हुआ। २४॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(श्रीराम के पूछने पर विश्वामित्रजी का ताटका की उत्पत्ति, विवाह एवं शाप आदि का प्रसंग सुनाकर उन्हें ताटका-वध के लिये प्रेरित करना)

पञ्चविंशः सर्गः 

सर्ग-25

अथ तस्याप्रमेयस्य मुनेर्वचनमुत्तमम्।

श्रुत्वा पुरुषशार्दूलः प्रत्युवाच शुभां गिरम्॥१॥

अपरिमित प्रभावशाली विश्वामित्र मुनि का यह उत्तम वचन सुनकर पुरुषसिंह श्रीराम ने यह शुभ बात कही-॥१॥

अल्पवीर्या यदा यक्षी श्रूयते मुनिपुंगव।

कथं नागसहस्रस्य धारयत्यबला बलम्॥२॥

‘मुनिश्रेष्ठ! जब वह यक्षिणी एक अबला सुनी जाती है, तब तो उसकी शक्ति थोड़ी ही होनी चाहिये; फिर वह एक हजार हाथियों का बल कैसे धारण करती है ?’ ॥२॥

इत्युक्तं वचनं श्रुत्वा राघवस्यामितौजसः।

हर्षयन् श्लक्ष्णया वाचा सलक्ष्मणमरिंदमम्॥३॥

विश्वामित्रोऽब्रवीद् वाक्यं शृणु येन बलोत्कटा।

वरदानकृतं वीर्यं धारयत्यबला बलम्॥४॥

अमित तेजस्वी श्रीरघुनाथ के कहे हुए इस वचन को सुनकर विश्वामित्र जी अपनी मधुर वाणीद् वारा लक्ष्मण सहित शत्रुदमन श्रीराम को हर्ष प्रदान करते हुए बोले—’रघुनन्दन! जिस कारण से ताटका अधिक बलशालिनी हो गयी है, वह बताता हूँ, सुनो। उसमें वरदानजनित बल का उदय हुआ है; अतः वह अबला होकर भी बल धारण करती है (सबला हो गयी है)। ३-४॥

पूर्वमासीन्महायक्षः सुकेतुर्नाम वीर्यवान्।

 अनपत्यः शुभाचारः स च तेपे महत्तपः॥५॥

‘पूर्व काल की बात है, सुकेतु नाम से प्रसिद्ध एक महान् यक्ष थे। वे बड़े पराक्रमी और सदाचारी थे परंतु उन्हें कोई संतान नहीं थी; इसलिये उन्होंने बड़ी भारी तपस्या की॥ ५॥

पितामहस्तु सुप्रीतस्तस्य यक्षपतेस्तदा।

कन्यारत्नं ददौ राम ताटकां नाम नामतः॥६॥

‘श्रीराम! यक्षराज सुकेतु की उस तपस्या से ब्रह्माजी को बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने सुकेतु को एक कन्यारत्न प्रदान किया, जिसका नाम ताटका था।

ददौ नागसहस्रस्य बलं चास्याः पितामहः।

 न त्वेव पुत्रं यक्षाय ददौ चासौ महायशाः॥७॥

ब्रह्माजी ने ही उस कन्या को एक हजार हाथियों के समान बल दे दिया; परंतु उन महायशस्वी पितामह ने उस यक्ष को पुत्र नहीं ही दिया (उसके संकल्प के अनुसार पुत्र प्राप्त हो जाने पर उसके द्वारा जनता का अत्यधिक उत्पीड़न होता, यही सोचकर ब्रह्माजी ने पुत्र नहीं दिया) ॥ ७॥

तां तु बालां विवर्धन्तीं रूपयौवनशालिनीम्।

जम्भपुत्राय सुन्दाय ददौ भार्यां यशस्विनीम्॥ ८॥

‘धीरे-धीरे वह यक्ष-बालिका बढ़ने लगी और बढ़कर रूप-यौवन से सुशोभित होने लगी। उस अवस्था में सुकेतु ने अपनी उस यशस्विनी कन्या को जम्भपुत्र सुन्द के हाथ में उसकी पत्नी के रूप में दे दिया॥ ८॥

कस्यचित्त्वथ कालस्य यक्षी पुत्रं व्यजायत।

मारीचं नाम दुर्धर्षं यः शापाद् राक्षसोऽभवत्॥ ९॥

‘कुछ काल के बाद उस यक्षी ताटका ने मारीच नाम से प्रसिद्ध एक दुर्जय पुत्र को जन्म दिया, जो अगस्त्य मुनि के शाप से राक्षस हो गया॥९॥

सुन्दे तु निहते राम अगस्त्यमृषिसत्तमम्।

 ताटका सहपुत्रेण प्रधर्षयितुमिच्छति॥१०॥

‘श्रीराम! अगस्त्य ने ही शाप देकर ताटका पति सुन्द को भी मार डाला। उसके मारे जाने पर ताटका पुत्र सहित जाकर मुनिवर अगस्त्य को भी मौत के घाट उतार देने की इच्छा करने लगी॥१०॥

भक्षार्थं जातसंरम्भा गर्जन्ती साभ्यधावत।

आपतन्तीं तु तां दृष्ट्वा अगस्त्यो भगवानृषिः॥ ११॥

 राक्षसत्वं भजस्वेति मारीचं व्याजहार सः।

‘वह कुपित हो मुनि को खा जानेके लिये गर्जना करती हुई दौड़ी। उसे आती देख भगवान् अगस्त्य मुनि ने मारीच से कहा—’तू देवयोनि-रूप का परित्याग करके राक्षस भाव को प्राप्त हो जा’॥ ११ १/२॥

अगस्त्यः परमामर्षस्ताटकामपि शप्तवान्॥१२॥

 पुरुषादी महायक्षी विकृता विकृतानना।

इदं रूपं विहायाशु दारुणं रूपमस्तु ते॥१३॥

‘फिर अत्यन्त अमर्ष में भरे हुए ऋषि ने ताटका को भी शाप दे दिया—’तू विकराल मुखवाली नरभक्षिणी राक्षसी हो जा। तू है तो महायक्षी; परंतु अब शीघ्र ही इस रूप को त्याग कर तेरा भयङ्कर रूप हो जाय’। १२-१३॥

सैषा शापकृतामर्षा ताटका क्रोधमर्च्छिता।

देशमुत्सादयत्येनमगस्त्याचरितं शुभम्॥१४॥

‘इस प्रकार शाप मिलने के कारण ताटका का अमर्ष और भी बढ़ गया। वह क्रोध से मूर्च्छित हो उठी और उन दिनों अगस्त्य जी जहाँ रहते थे, उस सुन्दर देश को उजाड़ने लगी॥१४॥

एनां राघव दुर्वृत्तां यक्षीं परमदारुणाम्।

गोब्राह्मणहितार्थाय जहि दुष्टपराक्रमाम्॥१५॥

‘रघुनन्दन! तुम गौओं और ब्राह्मणों का हित करनेके लिये दुष्ट पराक्रम वाली इस परम भयङ्कर दुराचारिणी यक्षी का वध कर डालो॥ १५ ॥

नह्येनां शापसंसृष्टां कश्चिदुत्सहते पुमान्।

 निहन्तुं त्रिषु लोकेषु त्वामृते रघुनन्दन॥१६॥

‘रघुकुल को आनन्दित करनेवाले वीर! इस शापग्रस्त ताटका को मारने के लिये तीनों लोकों में तुम्हारे सिवा दूसरा कोई पुरुष समर्थ नहीं है॥ १६॥

नहि ते स्त्रीवधकृते घृणा कार्या नरोत्तम।

 चातुर्वर्ण्यहितार्थं हि कर्तव्यं राजसूनुना॥ १७॥

‘नरश्रेष्ठ! तुम स्त्री-हत्या का विचार करके इसके प्रति दया न दिखाना। एक राजपुत्र को चारों वर्गों के हितके लिये स्त्रीहत्या भी करनी पड़े तो उससे मुँह नहीं मोड़ना चाहिये॥ १७॥

नृशंसमनृशंसं वा प्रजारक्षणकारणात्।

पातकं वा सदोषं वा कर्तव्यं रक्षता सदा॥१८॥

‘प्रजापालक नरेश को प्रजाजनों की रक्षाके लिये क्रूरतापूर्ण या क्रूरतारहित, पातकयुक्त अथवा सदोष कर्म भी करना पड़े तो कर लेना चाहिये। यह बात उसे सदा ही ध्यान में रखनी चाहिये॥१८॥

राज्यभारनियुक्तानामेष धर्मः सनातनः।

अध` जहि काकुत्स्थ धर्मो ह्यस्यां न विद्यते॥ १९॥

‘जिनके ऊपर राज्य के पालनका भार है, उनका तो यह सनातन धर्म है। ककुत्स्थकुलनन्दन! ताटका महापापिनी है। उसमें धर्म का लेशमात्र भी नहीं है; अतः उसे मार डालो॥ १९॥

श्रूयते हि पुरा शक्रो विरोचनसुतां नृप।

 पृथिवीं हन्तुमिच्छन्ती मन्थरामभ्यसूदयत्॥ २०॥

‘नरेश्वर! सुना जाता है कि पूर्वकाल में विरोचन की पुत्री मन्थरा सारी पृथ्वी का नाश कर डालना चाहती थी। उसके इस विचार को जानकर इन्द्र ने उसका वध कर डाला ॥ २०॥

विष्णुना च पुरा राम भृगुपत्नी पतिव्रता।

 अनिन्द्रं लोकमिच्छन्ती काव्यमाता निषूदिता॥ २१॥

‘श्रीराम! प्राचीन काल में शुक्राचार्य की माता तथा भृगुकी पतिव्रता पत्नी त्रिभुवन को इन्द्र से शून्य कर देना चाहती थीं। यह जानकर भगवान् विष्णु ने उनको मार डाला॥

एतैश्चान्यैश्च बहुभी राजपुत्रैर्महात्मभिः।

अधर्मसहिता नार्यो हताः पुरुषसत्तमैः।

तस्मादेनां घृणां त्यक्त्वा जहि मच्छासनान्नृप। २२॥

‘इन्होंने तथा अन्य बहुत-से महामनस्वी पुरुषप्रवर राजकुमारों ने पापचारिणी स्त्रियों का वध किया है। नरेश्वर! अतः तुम भी मेरी आज्ञा से दया अथवा घृणा को त्यागकर इस राक्षसी को मार डालो’ ॥ २२ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे पञ्चविंशः सर्गः ॥२५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में पचीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥२५॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(श्रीराम द्वारा ताटका का वध)

षड्विंशः सर्गः

सर्ग-26

मुनेर्वचनमक्लीबं श्रुत्वा नरवरात्मजः।

राघवः प्राञ्जलिभूत्वा प्रत्युवाच दृढव्रतः॥१॥

मुनि के ये उत्साह भरे वचन सुनकर दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रत का पालन करने वाले राजकुमार श्रीराम ने हाथ जोड़कर उत्तर दिया- ॥१॥

पितुर्वचननिर्देशात् पितुर्वचनगौरवात्।

वचनं कौशिकस्येति कर्तव्यमविशङ्कया॥२॥

अनुशिष्टोऽस्म्ययोध्यायां गुरुमध्ये महात्मना।

पित्रा दशरथेनाहं नावज्ञेयं हि तद्वचः॥३॥

‘भगवन्! अयोध्या में मेरे पिता महामना महाराजदशरथ ने अन्य गुरुजनों के बीच मुझे यह उपदेश दिया था कि ‘बेटा! तुम पिता के कहने से पिता के वचनों का गौरव रखने के लिये कुशिकनन्दन विश्वामित्र की आज्ञा का निःशङ्क होकर पालन करना कभी भी उनकी बात की अवहेलना न करना’।

सोऽहं पितुर्वचः श्रुत्वा शासनाद् ब्रह्मवादिनः।

करिष्यामि न संदेहस्ताटकावधमुत्तमम्॥४॥

‘अतः मैं पिताजी के उस उपदेश को सुनकर आप ब्रह्मवादी महात्मा की आज्ञा से ताटका वध सम्बन्धी कार्य को उत्तम मानकर करूँगा—इसमें संदेह नहीं है॥ ४॥

गोब्राह्मणहितार्थाय देशस्य च हिताय च।

तव चैवाप्रमेयस्य वचनं कर्तुमुद्यतः॥५॥

‘गौ, ब्राह्मण तथा समूचे देश का हित करने के लिये मैं आप-जैसे अनुपम प्रभावशाली महात्मा के आदेश का पालन करने को सब प्रकार से तैयार हूँ’।

एवमुक्त्वा धनुर्मध्ये बद्ध्वा मुष्टिमरिंदमः।

ज्याघोषमकरोत् तीव्र दिशः शब्देन नादयन्॥ ६॥

ऐसा कहकर शत्रुदमन श्रीराम ने धनुष के मध्यभाग में मुट्ठी बाँधकर उसे जोर से पकड़ा और उसकी प्रत्यञ्चा पर तीव्र टङ्कार दी। उसकी आवाज से सम्पूर्ण दिशाएँ गूंज उठीं॥६॥

तेन शब्देन वित्रस्तास्ताटकावनवासिनः।

ताटका च सुसंक्रुद्धा तेन शब्देन मोहिता॥७॥

उस शब्द से ताटका वन में रहने वाले समस्त प्राणी थर्रा उठे। ताटका भी उस टङ्कार-घोष से पहले तो किंकर्तव्यविमूढ़ हो उठी; परंतु फिर कुछ सोचकर अत्यन्त क्रोध में भर गयी॥७॥

तं शब्दमभिनिध्याय राक्षसी क्रोधमूर्च्छिता।

श्रुत्वा चाभ्यद्रवत् क्रुद्धा यत्र शब्दो विनिःसृतः॥ ८॥

उस शब्दको सुनकर वह राक्षसी क्रोध से अचेत-सी हो गयी थी। उसे सुनते ही वह जहाँ से आवाज आयी थी, उसी दिशाकी ओर रोषपूर्वक दौड़ी॥८॥

तां दृष्ट्वा राघवः क्रुद्धां विकृतां विकृताननाम्।

प्रमाणेनातिवृद्धां च लक्ष्मणं सोऽभ्यभाषत॥९॥

उसके शरीर की ऊँचाई बहुत अधिक थी। उसकी मुखाकृति विकृत दिखायी देती थी। क्रोध में भरी हुई उस विकराल राक्षसी की ओर दृष्टिपात करके श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा— ॥९॥

पश्य लक्ष्मण यक्षिण्या भैरवं दारुणं वपुः।

भिद्येरन् दर्शनादस्या भीरूणां हृदयानि च॥ १०॥

‘लक्ष्मण! देखो तो सही, इस यक्षिणी का शरीर कैसा दारुण एवं भयङ्कर है! इसके दर्शन मात्र से भीरु पुरुषों के हृदय विदीर्ण हो सकते हैं ॥ १० ॥

एतां पश्य दुराधर्षां मायाबलसमन्विताम्।

विनिवृत्तां करोम्यद्य हृतकर्णाग्रनासिकाम्॥११॥

‘मायाबलसे सम्पन्न होने के कारण यह अत्यन्त दुर्जय हो रही है। देखो, मैं अभी इसके कान और नाक काटकर इसे पीछे लौटने को विवश किये देता हूँ॥ ११॥

न ह्येनामुत्सहे हन्तुं स्त्रीस्वभावेन रक्षिताम्।

वीर्यं चास्या गतिं चैव हन्यामिति हि मे मतिः॥ १२॥

‘यह अपने स्त्री स्वभाव के कारण रक्षित है; अतः मुझे इसे मारने में उत्साह नहीं है। मेरा विचार यह है कि मैं इसके बल-पराक्रम तथा गमन शक्ति को नष्ट कर दूँ (अर्थात् इसके हाथ-पैर काट डालूँ) ‘ ॥ १२॥

एवं ब्रुवाणे रामे तु ताटका क्रोधमूर्च्छिता।

उद्यम्य बाहं गर्जन्ती राममेवाभ्यधावत॥१३॥

श्रीराम इस प्रकार कह ही रहे थे कि क्रोध से अचेत हुई ताटका वहाँ आ पहुँची और एक बाँह उठाकर गर्जना करती हुई उन्हीं की ओर झपटी॥ १३॥

विश्वामित्रस्तु ब्रह्मर्षिहुँकारेणाभिभत्र्य ताम्।

स्वस्ति राघवयोरस्तु जयं चैवाभ्यभाषत ॥१४॥

यह देख ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने अपने हुंकार के द्वारा उसे डाँटकर कहा–’रघुकुल के इन दोनों राजकुमारों का कल्याण हो इनकी विजय हो’ ॥ १४ ॥

उद्धन्वाना रजो घोरं ताटका राघवावुभौ।

रजोमेघेन महता मुहूर्तं सा व्यमोहयत्॥१५॥

तब ताटका ने उन दोनों रघुवंशी वीरों पर भयङ्कर धूल उड़ाना आरम्भ किया। वहाँ धूल का विशाल बादल-सा छा गया। उसके द्वारा उसने श्रीराम और लक्ष्मण को दो घड़ी तक मोह में डाल दिया॥ १५ ॥

ततो मायां समास्थाय शिलावर्षेण राघवौ।

अवाकिरत् सुमहता ततश्चुक्रोध राघवः॥१६॥

तत्पश्चात् माया का आश्रय लेकर वह उन दोनों भाइयों पर पत्थरों की बड़ी भारी वर्षा करने लगी। यह देख रघुनाथ जी उसपर कुपित हो उठे॥ १६॥

शिलावर्षं महत् तस्याः शरवर्षेण राघवः।

प्रतिवार्योपधावन्त्याः करौ चिच्छेद पत्रिभिः॥ १७॥

रघुवीर ने अपनी बाण वर्षा के द्वारा उसकी बड़ी भारी शिलावृष्टि को रोककर अपनी ओर आती हुई उस निशाचरी के दोनों हाथ तीखे सायकों से काट डाले॥ १७॥

ततश्छिन्नभुजां श्रान्तामभ्याशे परिगर्जतीम्।

सौमित्रिरकरोत् क्रोधाद्धृतकर्णाग्रनासिकाम्॥ १८॥

दोनों भुजाएँ कट जानेसे थकी हुई ताटका उनके निकट खड़ी होकर जोर-जोरसे गर्जना करने लगी। यह देख सुमित्राकुमार लक्ष्मणने क्रोधमें भरकर उसके नाक-कान काट लिये॥ १८ ॥

कामरूपधरा सा तु कृत्वा रूपाण्यनेकशः।

अन्तर्धानं गता यक्षी मोहयन्ती स्वमायया॥१९॥

परंतु वह तो इच्छानुसार रूप धारण करने वाली यक्षिणी थी; अतः अनेक प्रकार के रूप बनाकर अपनी माया से श्रीराम और लक्ष्मण को मोह में डालती हुई अदृश्य हो गयी॥ १९॥

अश्मवर्षं विमुञ्चन्ती भैरवं विचचार सा।

ततस्तावश्मवर्षेण कीर्यमाणौ समन्ततः॥२०॥

दृष्ट्वा गाधिसुतः श्रीमानिदं वचनमब्रवीत्।

अलं ते घृणया राम पापैषा दुष्टचारिणी॥२१॥

यज्ञविघ्नकरी यक्षी पुरा वर्धेत मायया।

वध्यतां तावदेवैषा पुरा संध्या प्रवर्तते॥२२॥

रक्षांसि संध्याकाले तु दुर्धर्षाणि भवन्ति हि।

अब वह पत्थरों की भयङ्कर वर्षा करती हुई आकाश में विचरने लगी। श्रीराम और लक्ष्मण पर चारों ओर से प्रस्तरों की वृष्टि होती देख तेजस्वी गाधिनन्दन विश्वामित्र ने इस प्रकार कहा—’श्रीराम! इसके ऊपर तुम्हारा दया करना व्यर्थ है। यह बड़ी पापिनी और दुराचारिणी है। सदा यज्ञों में विघ्न डाला करती है। यह अपनी मायासे पुनः प्रबल हो उठे, इसके पहले ही इसे मार डालो। अभी संध्याकाल आना चाहता है, इसके पहले ही यह कार्य हो जाना चाहिये; क्योंकि संध्याके समय राक्षस दुर्जय हो जाते हैं’। २०–२२ १/२॥

इत्युक्तः स तु तां यक्षीमश्मवृष्टयाभिवर्षिणीम्॥ २३॥

दर्शयन् शब्दवेधित्वं तां रुरोध स सायकैः।

विश्वामित्रजी के ऐसा कहने पर श्रीराम ने शब्दवेधी बाण चलाने की शक्ति का परिचय देते हुए बाण मारकर प्रस्तरों की वर्षा करने वाली उस यक्षिणी  को सब ओर से अवरुद्ध कर दिया। २३ १/२॥

सा रुद्वा बाणजालेन मायाबलसमन्विता ॥ २४॥

अभिदुद्राव काकुत्स्थं लक्ष्मणं च विनेदुषी।

तामापतन्तीं वेगेन विक्रान्तामशनीमिव॥ २५॥

शरेणोरसि विव्याध सा पपात ममार च।

उनके बाण-समूह से घिर जानेपर मायाबल से युक्त वह यक्षिणी जोर-जोरसे गर्जना करती हुई श्रीराम और लक्ष्मण के ऊपर टूट पड़ी। उसे चलाये हुए इन्द्रके वज्र की भाँति वेग से आती देख श्रीराम ने एक बाण मारकर उसकी छाती चीर डाली तब ताटका पृथ्वी पर गिरी और मर गयी॥ २४-२५ १/२ ।।

तां हतां भीमसंकाशां दृष्ट्वा सुरपतिस्तदा ॥२६॥

साधु साध्विति काकुत्स्थं सुराश्चाप्यभिपूजयन्।

उस भयङ्कर राक्षसी को मारी गयी देख देवराज इन्द्र तथा देवताओं ने श्रीराम को साधुवाद देते हुए उनकी सराहना की॥ २६ १/२॥

उवाच परमप्रीतः सहस्राक्षः पुरन्दरः॥ २७॥

सुराश्च सर्वे संहृष्टा विश्वामित्रमथाब्रुवन्।

उस समय सहस्रलोचन इन्द्र तथा समस्त देवताओं ने अत्यन्त प्रसन्न एवं हर्षोत्फुल्ल होकर विश्वामित्रजीसे कहा- ॥ २७ १/२॥

मुने कौशिक भद्रं ते सेन्द्राः सर्वे मरुद्गणाः॥ २८॥

तोषिताः कर्मणानेन स्नेहं दर्शय राघवे।

‘मुने! कुशिकनन्दन! आपका कल्याण हो,आपने इस कार्य से इन्द्र सहित सम्पूर्ण देवताओं को संतुष्ट किया है। अब रघुकुलतिलक श्रीरामपर आप अपना स्नेह प्रकट कीजिये॥ २८ १/२॥

प्रजापतेः कृशाश्वस्य पुत्रान् सत्यपराक्रमान्॥ २९॥

तपोबलभृतो ब्रह्मन् राघवाय निवेदय।

” ‘ब्रह्मन्! प्रजापति कृशाश्व के अस्त्र-रूपधारी पत्रोंको, जो सत्यपराक्रमी तथा तपोबल से सम्पन्न हैं, श्रीरामको समर्पित कीजिये॥ २९ १/२ ॥

पात्रभूतश्च ते ब्रह्मस्तवानुगमने रतः॥३०॥

कर्तव्यं सुमहत् कर्म सुराणां राजसूनुना।

‘विप्रवर! ये आपके अस्त्रदान के सुयोग्य पात्र हैं तथा आपके अनुसरण (सेवा-शुश्रूषा) में तत्पर रहते हैं। राजकुमार श्रीराम के द्वारा देवताओं का महान् कार्य सम्पन्न होनेवाला है’ ॥ ३० १/२ ॥

एवमुक्त्वा सुराः सर्वे जग्मुर्हृष्टा विहायसम्॥ ३१॥

विश्वामित्रं पूजयन्तस्ततः संध्या प्रवर्तते।

ऐसा कहकर सभी देवता विश्वामित्रजीकी प्रशंसा करते हुए प्रसन्नतापूर्वक आकाश मार्ग से चले गये तत्पश्चात् संध्या हो गयी॥ ३१ १/२ ॥

ततो मुनिवरः प्रीतस्ताटकावधतोषितः॥३२॥

मूर्ध्नि राममुपाघ्राय इदं वचनमब्रवीत्।

तदनन्तर ताटकावधसे संतुष्ट हुए मुनिवर विश्वामित्रने श्रीरामचन्द्रजीका मस्तक सूंघकर उनसे यह बात कही— ॥ ३२ १/२॥

इहाद्य रजनीं राम वसाम शुभदर्शन॥३३॥

श्वः प्रभाते गमिष्यामस्तदाश्रमपदं मम।

‘शुभदर्शन राम! आजकी रात में हम लोग यहीं निवास करें कल सबेरे अपने आश्रम पर चलेंगे’। ३३ १/२॥

विश्वामित्रवचः श्रुत्वा हृष्टो दशरथात्मजः॥ ३४॥

उवास रजनीं तत्र ताटकाया वने सुखम्।

विश्वामित्रजी की यह बात सुनकर दशरथकुमार श्रीराम बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने ताटका वन में रहकर वह रात्रि बड़े सुख से व्यतीत की॥ ३४ १/२॥

मुक्तशापं वनं तच्च तस्मिन्नेव तदाहनि।

रमणीयं विबभ्राज यथा चैत्ररथं वनम्॥३५॥

उसी दिन वह वन शापमुक्त होकर रमणीय शोभा से सम्पन्न हो गया और चैत्ररथ वनकी भाँति अपनी मनोहर छटा दिखाने लगा॥ ३५ ॥

निहत्य तां यक्षसुतां स रामः प्रशस्यमानः सुरसिद्धसंघैः।

उवास तस्मिन् मुनिना सहैव प्रभातवेलां प्रतिबोध्यमानः॥३६॥

यक्षकन्या ताटका का वध करके श्रीरामचन्द्र जी देवताओं तथा सिद्ध समूहों की प्रशंसाके पात्र बन गये। उन्होंने प्रातःकाल की प्रतीक्षा करते हुए विश्वामित्रजी के साथ ताटका वन में निवास किया। ३६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे षड्विंशः सर्गः ॥२६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में छब्बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ। २६॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(विश्वामित्र द्वारा श्रीराम को दिव्यास्त्र)

सप्तविंशः सर्गः 

सर्ग-27

दान अथ तां रजनीमुष्य विश्वामित्रो महायशाः।

 प्रहस्य राघवं वाक्यमुवाच मधुरस्वरम्॥१॥

ताटका वन में वह रात बिताकर महायशस्वी विश्वामित्र हँसते हुए मीठे स्वर में श्रीरामचन्द्रजी से बोले- ॥१॥

परितुष्टोऽस्मि भद्रं ते राजपुत्र महायशः।

प्रीत्या परमया युक्तो ददाम्यस्त्राणि सर्वशः॥२॥

‘महायशस्वी राजकुमार! तुम्हारा कल्याण हो। ताटका वध के कारण मैं तुम पर बहुत संतुष्ट हूँ; अतःबड़ी प्रसन्नता के साथ तुम्हें सब प्रकार के अस्त्र दे रहा हूँ॥

देवासुरगणान् वापि सगन्धर्वोरगान् भुवि।

यैरमित्रान् प्रसह्याजौ वशीकृत्य जयिष्यसि॥३॥

‘इनके प्रभाव से तुम अपने शत्रुओं को–चाहे वे देवता, असुर, गन्धर्व अथवा नाग ही क्यों न हों, “रणभूमि में बलपूर्वक अपने अधीन करके उनपर विजय पा जाओगे॥३॥

तानि दिव्यानि भद्रं ते ददाम्यस्त्राणि सर्वशः।

दण्डचक्रं महद दिव्यं तव दास्यामि राघव॥४॥

धमर्चक्रं ततो वीर कालचक्रं तथैव च।

विष्णुचक्रं तथात्युग्रमैन्द्रं चक्रं तथैव च॥५॥

‘रघुनन्दन! तुम्हारा कल्याण हो,आज मैं तुम्हें वे सभी दिव्यास्त्र दे रहा हूँ। वीर ! मैं तुमको दिव्य एवं महान् दण्डचक्र, धर्मचक्र, कालचक्र, विष्णुचक्र तथा अत्यन्त भयंकर ऐन्द्रचक्र दूंगा॥ ४-५॥

वज्रमस्त्रं नरश्रेष्ठ शैवं शूलवरं तथा।

अस्त्रं ब्रह्मशिरश्चैव ऐषीकमपि राघव॥६॥

ददामि ते महाबाहो ब्राह्ममस्त्रमनुत्तमम्।

‘नरश्रेष्ठ राघव! इन्द्रका वज्रास्त्र, शिवका श्रेष्ठ त्रिशूल तथा ब्रह्माजी का ब्रह्मशिर नामक अस्त्र भी दूंगा। महाबाहो! साथ ही तुम्हें ऐषीकास्त्र तथा परम उत्तम ब्रह्मास्त्र भी प्रदान करता हूँ॥६॥

गदे द्वे चैव काकुत्स्थ मोदकीशिखरी शुभे॥७॥

प्रदीप्ते नरशार्दूल प्रयच्छामि नृपात्मज।

 धर्मपाशमहं राम कालपाशं तथैव च॥८॥

वारुणं पाशमस्त्रं च ददाम्यहमनुत्तमम्।

‘ककुत्स्थकुलभूषण! इनके सिवा दो अत्यन्त उज्ज्वल और सुन्दर गदाएँ, जिनके नाम मोद की और शिखरी हैं, मैं तुम्हें अर्पण करता हूँ। पुरुषसिंह राजकुमार राम! धर्मपाश, कालपाश और वरुणपाश भी बड़े उत्तम अस्त्र हैं,इन्हें भी आज तुम्हें अर्पित करता हूँ॥ ७-८॥

अशनी द्वे प्रयच्छामि शुष्कार्टे रघुनन्दन॥९॥

ददामि चास्त्रं पैनाकमस्त्रं नारायणं तथा।

‘रघुनन्दन ! सूखी और गीली दो प्रकार की अशनि तथा पिनाक एवं नारायणास्त्र भी तुम्हें दे रहा हूँ॥९॥

आग्नेयमस्त्रं दयितं शिखरं नाम नामतः॥१०॥

वायव्यं प्रथमं नाम ददामि तव चानघ।

‘अग्निका प्रिय आग्नेय-अस्त्र, जो शिखरास्त्रके नामसे भी प्रसिद्ध है, तुम्हें अर्पण करता हूँ। अनघ! अस्त्रों में प्रधान जो वायव्यास्त्र है, वह भी तुम्हें दे रहा हूँ॥१० १/२॥

अस्त्रं हयशिरो नाम क्रौञ्चमस्त्रं तथैव च॥११॥

शक्तिद्वयं च काकुत्स्थ ददामि तव राघव।

‘ककुत्स्थ कुलभूषण राघव! हयशिरा नामक अस्त्र, क्रौञ्च-अस्त्र तथा दो शक्तियों को भी तुम्हें देता हूँ॥

कङ्कालं मुसलं घोरं कापालमथ किङ्किणीम्॥ १२॥

वधार्थं रक्षसां यानि ददाम्येतानि सर्वशः।

‘कङ्काल, घोर मूसल, कपाल तथा किङ्किणी आदि सब अस्त्र, जो राक्षसों के वध में उपयोगी होते हैं, तुम्हें दे रहा हूँ॥ १२ १/२॥

वैद्याधरं महास्त्रं च नन्दनं नाम नामतः॥१३॥

असिरत्नं महाबाहो ददामि नृवरात्मज।

‘महाबाहु राजकुमार! नन्दन नाम से प्रसिद्ध विद्याधरों का महान् अस्त्र तथा उत्तम खड्ग भी तुम्हें अर्पित करता हूँ॥ १३ १/२॥

 गान्धर्वमस्त्रं दयितं मोहनं नाम नामतः॥१४॥

प्रस्वापनं प्रशमनं दद्मि सौम्यं च राघव।

‘रघुनन्दन ! गन्धर्वो का प्रिय सम्मोहन नामक अस्त्र, प्रस्वापन, प्रशमन तथा सौम्य-अस्त्र भी देता हूँ॥ १४१/२॥

 वर्षणं शोषणं चैव संतापनविलापने॥१५॥

मादनं चैव दुर्धर्षं कन्दर्पदयितं तथा।

गान्धर्वमस्त्रं दयितं मानवं नाम नामतः॥१६॥

पैशाचमस्त्रं दयितं मोहनं नाम नामतः।

प्रतीच्छ नरशार्दूल राजपुत्र महायशः॥१७॥

‘महायशस्वी पुरुषसिंह राजकुमार! वर्षण, शोषण, संतापन, विलापन तथा कामदेव का प्रिय दुर्जय अस्त्र मादन, गन्धर्वो का प्रिय मानवास्त्र तथा पिशाचों का प्रिय मोहनास्त्र भी मुझसे ग्रहण करो। १५–१७॥

तामसं नरशार्दूल सौमनं च महाबलम्।

 संवर्तं चैव दुर्धर्षं मौसलं च नृपात्मज॥१८॥

सत्यमस्त्रं महाबाहो तथा मायामयं परम्।

 सौरं तेजःप्रभं नाम परतेजोऽपकर्षणम्॥१९॥

‘नरश्रेष्ठ राजपुत्र महाबाहु राम! तामस, महाबली सौमन, संवर्त, दुर्जय, मौसल, सत्य और मायामय उत्तम अस्त्र भी तुम्हें अर्पण करता हूँ। सूर्यदेवता का तेजःप्रभ नामक अस्त्र, जो शत्रु के तेज का नाश करने वाला है, तुम्हें अर्पित करता हूँ॥ १८-१९ ॥

सोमास्त्रं शिशिरं नाम त्वाष्ट्रमस्त्रं सुदारुणम्।

 दारुणं च भगस्यापि शीतेषुमथ मानवम्॥२०॥

‘सोम देवता का शिशिर नामक अस्त्र, त्वष्टा (विश्वकर्मा) का अत्यन्त दारुण अस्त्र, भगदेवता का भी भयंकर अस्त्र तथा मनु का शीतेषु नामक अस्त्र भी तुम्हें देता हूँ॥ २० ॥

 एतान् राम महाबाहो कामरूपान् महाबलान्।

गृहाण परमोदारान् क्षिप्रमेव नृपात्मज॥२१॥

‘महाबाहु राजकुमार श्रीराम! ये सभी अस्त्र इच्छानुसार रूप धारण करने वाले, महान् बल से सम्पन्न तथा परम उदार हैं,तुम शीघ्र ही इन्हें ग्रहण करो’ ॥ २१॥

 स्थितस्तु प्राङ्मुखो भूत्वा शुचिर्मुनिवरस्तदा।

ददौ रामाय सुप्रीतो मन्त्रग्राममनुत्तमम्॥२२॥

ऐसा कहकर मुनिवर विश्वामित्रजी उस समय स्नान आदिसे शुद्ध हो पूर्वाभिमुख होकर बैठ गये और अत्यन्त प्रसन्नताके साथ उन्होंने श्रीरामचन्द्रजीको उन सभी उत्तम अस्त्रोंका उपदेश दिया॥ २२॥

सर्वसंग्रहणं येषां दैवतैरपि दुर्लभम्।

 तान्यस्त्राणि तदा विप्रो राघवाय न्यवेदयत्॥ २३॥

जिन अस्त्रों का पूर्ण रूप से संग्रह करना देवताओं के लिये भी दुर्लभ है, उन सब को विप्रवर विश्वामित्रजी नेश्रीरामचन्द्रजी को समर्पित कर दिया॥ २३ ॥

जपतस्तु मुनेस्तस्य विश्वामित्रस्य धीमतः।

 उपतस्थुर्महार्हाणि सर्वाण्यस्त्राणि राघवम्॥ २४॥

ऊचुश्च मुदिता रामं सर्वे प्राञ्जलयस्तदा।

इमे च परमोदार किंकरास्तव राघव॥ २५॥

यद्यदिच्छसि भद्रं ते तत्सर्वं करवाम वै।

बुद्धिमान् विश्वामित्रजी ने ज्यों ही जप आरम्भ किया त्यों ही वे सभी परम पूज्य दिव्यास्त्र स्वतः आकर श्रीरघुनाथजी के पास उपस्थित हो गये और अत्यन्त हर्ष में भरकर उस समय श्रीरामचन्द्रजी से हाथ जोड़कर कहने लगे—’परम उदार रघुनन्दन ! आपका कल्याण हो। हम सब आपके किङ्कर हैं। आप हमसे जो-जो सेवा लेना चाहेंगे, वह सब हम करनेको तैयार रहेंगे’। २४-२५ १/२ ॥

ततो रामः प्रसन्नात्मा तैरित्युक्तो महाबलैः॥२६॥

 प्रतिगृह्य च काकुत्स्थः समालभ्य च पाणिना।

मानसा मे भविष्यध्वमिति तान्यभ्यचोदयत्॥ २७॥

उन महान् प्रभावशाली अस्त्रों के इस प्रकार कहने पर श्रीरामचन्द्र जी मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुए और उन्हें ग्रहण करने के पश्चात् हाथ से उनका स्पर्श करके बोले—’आप सब मेरे मन में निवास करें’। २६-२७॥

 ततः प्रीतमना रामो विश्वामित्रं महामुनिम्।

 अभिवाद्य महातेजा गमनायोपचक्रमे ॥२८॥

तदनन्तर महातेजस्वी श्रीराम ने प्रसन्नचित्त होकर महामुनि विश्वामित्र को प्रणाम किया और आगे की यात्रा आरम्भ की॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे सप्तविंशः सर्गः ॥२७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में सत्ताईसवाँ सर्ग पूरा हुआ। २७॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

 (विश्वामित्र का श्रीराम को अस्त्रों की संहारविधि बताना,अस्त्रोंका उपदेश करना, श्रीराम का आश्रम एवं यज्ञस्थानके विषय में मुनि से प्रश्न)

अष्टाविंशः सर्गः 

सर्ग-28

प्रतिगृह्य ततोऽस्त्राणि प्रहृष्टवदनः शुचिः।

गच्छन्नेव च काकुत्स्थो विश्वामित्रमथाब्रवीत्॥१॥

उन अस्त्रों को ग्रहण करके परम पवित्र श्रीराम का मुख प्रसन्नता से खिल उठा था। वे चलते-चलते ही विश्वामित् रसे बोले- ॥१॥

गृहीतास्त्रोऽस्मि भगवन् दुराधर्षः सुरैरपि।

अस्त्राणां त्वहमिच्छामि संहारान् मुनिपुंगव॥२॥

‘भगवन्! आपकी कृपा से इन अस्त्रों को ग्रहण करके मैं देवताओं के लिये भी दुर्जय हो गया हूँ। । मुनिश्रेष्ठ! अब मैं अस्त्रों की संहार विधि जानना चाहता हूँ’॥२॥

एवं ब्रुवति काकुत्स्थे विश्वामित्रो महातपाः।

 संहारान् व्याजहाराथ धृतिमान् सुव्रतः शुचिः॥ ३॥

ककुत्स्थकुलतिलक श्रीराम के ऐसा कहने पर महातपस्वी, धैर्यवान्, उत्तम व्रतधारी और पवित्र विश्वामित्र मुनि ने उन्हें अस्त्रों की संहार विधि का उपदेश दिया॥३॥

सत्यवन्तं सत्यकीर्तिं धृष्टं रभसमेव च।

 प्रतिहारतरं नाम पराङ्मुखमवाङ्मुखम्॥४॥

 लक्ष्यालक्ष्याविमौ चैव दृढनाभसुनाभको।

 दशाक्षशतवक्त्रौ च दशशीर्षशतोदरौ॥५॥

पद्मनाभमहानाभौ दुन्दुनाभस्वनाभको।

ज्योतिषं शकुनं चैव नैरास्यविमलावुभौ॥६॥

यौगंधरविनिद्रौ च दैत्यप्रमथनौ तथा।

शुचिबाहुर्महाबाहुनिष्कलिर्विरुचस्तथा।

सार्चिमाली धृतिर्माली वृत्तिमान् रुचिरस्तथा॥ ७॥

पित्र्यः सौमनसश्चैव विधूतमकरावुभौ।

परवीरं रतिं चैव धनधान्यौ च राघव॥८॥

कामरूपं कामरुचिं मोहमावरणं तथा।

 जृम्भकं सर्पनाथं च पन्थानवरुणौ तथा॥९॥

कृशाश्वतनयान् राम भास्वरान् कामरूपिणः।

 प्रतीच्छ मम भद्रं ते पात्रभूतोऽसि राघव॥१०॥

तदनन्तर वे बोले—’रघुकुलनन्दन राम! तुम्हारा कल्याण हो! तुम अस्त्र विद्या के सुयोग्य पात्र हो; अतः निम्नाङ्कित अस्त्रों को भी ग्रहण करो—सत्यवान्, सत्यकीर्ति, धृष्ट, रभस, प्रतिहारतर, प्रामख, अवाङ्मख, लक्ष्य, अलक्ष्य, दृढ़नाभ, सुनाभ, दशाक्ष, शतवक्त्र, दशशीर्ष, शतोदर, पद्मनाभ, महानाभ, दुन्दुनाभ, स्वनाभ, ज्योतिष, शकुन, नैरास्य, विमल, दैत्यनाशक यौगंधर और विनिद्र, शुचिबाहु, महाबाहु, निष्कलि, विरुच, सार्चिमाली, धृतिर्माली, वृत्तिमान्, रुचिर, पित्र्य, सौमनस, विधूत, मकर, परवीर, रति, धन, धान्य, कामरूप, कामरुचि, मोह, आवरण, जृम्भक, सर्पनाथ, पन्थान और वरुण—ये सभी प्रजापति कृशाश्व के पुत्र हैं। ये इच्छानुसार रूप धारण करने वाले तथा परम तेजस्वी हैं तुम इन्हें ग्रहण करो’ ॥ ४–१०॥

बाढमित्येव काकुत्स्थः प्रहृष्टेनान्तरात्मना।

 दिव्यभास्वरदेहाश्च मूर्तिमन्तः सुखप्रदाः॥११॥

तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर श्रीरामचन्द्रजी ने प्रसन्न मन से उन अस्त्रों को ग्रहण किया। उन मूर्तिमान् अस्त्रों के शरीर दिव्य तेज से उद्भासित हो रहे थे। वे अस्त्र जगत् को सुख देनेवाले थे॥ ११ ॥

केचिदंगारसदृशाः केचिद् धूमोपमास्तथा।

चन्द्रार्कसदृशाः केचित् प्रह्वाञ्जलिपुटास्तथा॥ १२॥

उनमें से कितने ही अंगारों के समान तेजस्वी थे। कितने ही धूम के समान काले प्रतीत होते थे तथा कुछ अस्त्र सूर्य और चन्द्रमा के समान प्रकाशमान थे। वे सब-के-सब हाथ जोड़कर श्रीरामके समक्ष खड़े हुए॥ १२॥

रामं प्राञ्जलयो भूत्वाब्रुवन् मधुरभाषिणः।

इमे स्म नरशार्दूल शाधि किं करवाम ते॥१३॥

उन्होंने अञ्जलि बाँधे मधुर वाणी में श्रीराम से इस प्रकार कहा–’पुरुषसिंह! हम लोग आपके दास हैं। आज्ञा कीजिये, हम आपकी क्या सेवा करें?’ ।। १३॥

गम्यतामिति तानाह यथेष्टं रघुनन्दनः।

 मानसाः कार्यकालेषु साहाय्यं मे करिष्यथ॥ १४॥

तब रघुकुलनन्दन राम ने उनसे कहा—’इस समय तो आप लोग अपने अभीष्ट स्थान को जायँ; परंतु आवश्यकता के समय मेरे मन में स्थित होकर सदा मेरी सहायता करते रहें’ ।। १४॥

अथ ते राममामन्त्र्य कृत्वा चापि प्रदक्षिणम्।

 एवमस्त्विति काकुत्स्थमुक्त्वा जग्मुर्यथागतम्॥ १५॥

तत्पश्चात् वे श्रीराम की परिक्रमा करके उनसे विदा ले उनकी आज्ञा के अनुसार कार्य करने की प्रतिज्ञा करके जैसे आये थे, वैसे चले गये॥ १५ ॥

स च तान् राघवो ज्ञात्वा विश्वामित्रं महामुनिम्।

गच्छन्नेवाथ मधुरं श्लक्ष्णं वचनमब्रवीत्॥१६॥

किमेतन्मेघसंकाशं पर्वतस्याविदूरतः।

वृक्षखण्डमितो भाति परं कौतूहलं हि मे॥१७॥

इस प्रकार उन अस्त्रों का ज्ञान प्राप्त करके श्रीरघुनाथजी ने चलते-चलते ही महामुनि विश्वामित्र से मधुर वाणी में पूछा—’भगवन्! सामने वाले पर्वत के पास ही जो यह मेघों की घटा के समान सघन वृक्षों से भरा स्थान दिखायी देता है, क्या है ? उसके विषय में जानने के लिये मेरे मन में बड़ी उत्कण्ठा हो रही है। १६-१७॥

दर्शनीयं मृगाकीर्णं मनोहरमतीव च।

नानाप्रकारैः शकुनैवल्गुभाषैरलंकृतम्॥१८॥

‘यह दर्शनीय स्थान मृगों के झुंड से भरा हुआ होने के कारण अत्यन्त मनोहर प्रतीत होता है। नाना प्रकार के पक्षी अपनी मधुर शब्दावली से इस स्थान की शोभा बढ़ाते हैं॥ १८॥

निःसृताःस्मो मुनिश्रेष्ठ कान्ताराद् रोमहर्षणात्।

अनया त्ववगच्छामि देशस्य सुखवत्तया॥१९॥

‘मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रदेशकी इस सुखमयी स्थिति से यह जान पड़ता है कि अब हम लोग उस रोमाञ्चकारी दुर्गम ताटका वन से बाहर निकल आये हैं॥ १९॥

सर्वं मे शंस भगवन् कस्याश्रमपदं त्विदम्।

सम्प्राप्ता यत्र ते पापा ब्रह्मघ्ना दुष्टचारिणः॥ २०॥

तव यज्ञस्य विघ्नाय दुरात्मानो महामुने।

भगवंस्तस्य को देशः सा यत्र तव याज्ञिकी॥ २१॥

रक्षितव्या क्रिया ब्रह्मन् मया वध्याश्च राक्षसाः।

एतत् सर्वं मुनिश्रेष्ठ श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो॥२२॥

‘भगवन्! मुझे सब कुछ बताइये यह किसका आश्रम है? भगवन्! महामुने! जहाँ आपकी यज्ञक्रिया हो रही है, जहाँ वे पापी, दुराचारी, ब्रह्महत्यारे, दुरात्मा राक्षस आपके यज्ञ में विघ्न डालने के लिये आया करते हैं और जहाँ मुझे यज्ञ की रक्षा तथा राक्षसों के वध का कार्य करना है, उस आपके आश्रमका कौन-सा देश है ? ब्रह्मन् ! मुनिश्रेष्ठ प्रभो! यह सब मैं सुनना चाहता हूँ’। २०–२२॥

 इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डेऽष्टाविंशः सर्गः ॥२८॥

 इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें अट्ठाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ।२८॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(विश्वामित्रजी का श्रीराम से सिद्धाश्रम का पूर्ववृत्तान्त बताना और उन दोनों भाइयों के साथ अपने आश्रम पहुँचकर पूजित होना)

एकोनत्रिंशः सर्गः 

सर्ग-29

अथ तस्याप्रमेयस्य वचनं परिपृच्छतः।

विश्वामित्रो महातेजा व्याख्यातुमुपचक्रमे॥१॥

अपरिमित प्रभावशाली भगवान् श्रीराम का वचन सुनकर महातेजस्वी विश्वामित्र ने उनके प्रश्नका उत्तर देना आरम्भ किया— ॥१॥

इह राम महाबाहो विष्णुर्देवनमस्कृतः।

वर्षाणि सुबहूनीह तथा युगशतानि च॥२॥

तपश्चरणयोगार्थमुवास सुमहातपाः।

 एष पूर्वाश्रमो राम वामनस्य महात्मनः॥३॥

‘महाबाहु श्रीराम! पूर्वकाल में यहाँ देववन्दित भगवान् विष्णु ने बहुत वर्षों एवं सौ युगों तक तपस्या के लिये निवास किया था। उन्होंने यहाँ बहुत बड़ी तपस्या की थी। यह स्थान महात्मा वामन का वामन अवतार धारण करने को उद्यत हुए श्री विष्णुका अवतार ग्रहण से पूर्व आश्रम था॥२-३॥

सिद्धाश्रम इति ख्यातः सिद्धो ह्यत्र महातपाः।

 एतस्मिन्नेव काले तु राजा वैरोचनिर्बलिः॥४॥

 निर्जित्य दैवतगणान् सेन्द्रान् सहमरुद्गणान्।

 कारयामास तद्राज्यं त्रिषु लोकेषु विश्रुतः॥५॥

‘इसकी सिद्धाश्रम के नाम से प्रसिद्धि थी; क्योंकि यहाँ महातपस्वी विष्णु को सिद्धि प्राप्त हुई थी। जब वे तपस्या करते थे, उसी समय विरोचन कुमार राजा बलि ने इन्द्र और मरुद्गणों सहित समस्त देवताओं को पराजित करके उनका राज्य अपने अधिकार में कर लिया था। वे तीनों लोकों में विख्यात हो गये थे। ४-५॥

यज्ञं चकार सुमहानसुरेन्द्रो महाबलः।

बलेस्तु यजमानस्य देवाः साग्निपुरोगमाः।

समागम्य स्वयं चैव विष्णुमूचुरिहाश्रमे॥६॥

‘उन महाबली महान् असुरराज ने एक यज् ञका आयोजन किया। उधर बलि यज्ञ में लगे हुए थे, इधर अग्नि आदि देवता स्वयं इस आश्रम में पधार कर भगवान् विष्णु से बोले—॥

बलिर्वैरोचनिर्विष्णो यजते यज्ञमुत्तमम्।

असमाप्तव्रते तस्मिन् स्वकार्यमभिपद्यताम्॥७॥

“सर्वव्यापी परमेश्वर! विरोचन कुमार बलि एक उत्तम यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे हैं। उनका वह यज्ञ सम्बन्धी नियम पूर्ण होने से पहले ही हमें अपना कार्य सिद्ध कर लेना चाहिये॥७॥

ये चैनमभिवर्तन्ते याचितार इतस्ततः।

यच्च यत्र यथावच्च सर्वं तेभ्यः प्रयच्छति॥८॥

“इस समय जो भी याचक इधर-उधर से आकर उनके यहाँ याचना के लिये उपस्थित होते हैं, वे गो, भूमि और सुवर्ण आदि सम्पत्तियों में से जिस वस्तु को भी लेना चाहते हैं, उनको वे सारी वस्तुएँ राजा बलि यथावत्-रूप से अर्पित करते हैं॥८॥

स त्वं सुरहितार्थाय मायायोगमुपाश्रितः।

 वामनत्वं गतो विष्णो कुरु कल्याणमुत्तमम्॥९॥

“अतः विष्णो! आप देवताओं के हित के लिये अपनी योगमाया का आश्रय ले वामनरूप धारण करके उस यज्ञ में जाइये और हमारा उत्तम कल्याण साधन कीजिये’ ॥ ९॥

एतस्मिन्नन्तरे राम कश्यपोऽग्निसमप्रभः।

 अदित्या सहितो राम दीप्यमान इवौजसा॥१०॥

देवीसहायो भगवान् दिव्यं वर्षसहस्रकम्।

व्रतं समाप्य वरदं तुष्टाव मधुसूदनम्॥११॥

‘श्रीराम! इसी समय अग्नि के समान तेजस्वी महर्षि कश्यप धर्मपत्नी अदिति के साथ अपने तेज से प्रकाशित होते हुए वहाँ आये। वे एक सहस्र दिव्य वर्षों तक चालू रहनेवाले महान् व्रत को अदिति देवी के साथ ही समाप्त करके आये थे। उन्होंने वरदायक भगवान् मधुसूदन की इस प्रकार स्तुति की— ॥ १० ११॥

तपोमयं तपोराशिं तपोमूर्तिं तपात्मकम्।

 तपसा त्वां सुतप्तेन पश्यामि पुरुषोत्तमम्॥१२॥

“भगवन्! आप तपोमय हैं,तपस्या की राशि हैं, तप आपका स्वरूप है, आप ज्ञानस्वरूप हैं मैं भलीभाँति तपस्या करके उसके प्रभाव से आप पुरुषोत्तम का दर्शन कर रहा हूँ॥१२॥

शरीरे तव पश्यामि जगत् सर्वमिदं प्रभो।

त्वमनादिरनिर्देश्यस्त्वामहं शरणं गतः॥१३॥

“प्रभो! मैं इस सारे जगत् को आपके शरीर में स्थित देखता हूँ। आप अनादि हैं। देश, काल और वस्तु की सीमा से परे होने के कारण आपका – इदमित्थंरूप से निर्देश नहीं किया जा सकता, मैं आपकी शरण में आया हूँ’॥ १३॥

तमुवाच हरिः प्रीतः कश्यपं गतकल्मषम्।

वरं वरय भद्रं ते वरार्होऽसि मतो मम॥१४॥

‘कश्यप जी के सारे पाप धुल गये थे। भगवान् श्रीहरि ने अत्यन्त प्रसन्न होकर उनसे कहा—’महर्षे! तुम्हारा कल्याण हो। तुम अपनी इच्छा के अनुसार कोई वर माँगो; क्योंकि तुम मेरे विचार से वर पाने के योग्य हो’॥ १४॥

 तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य मारीचः कश्यपोऽब्रवीत्।

 अदित्या देवतानां च मम चैवानुयाचितम्॥ १५॥

वरं वरद सुप्रीतो दातुमर्हसि सुव्रत।

पुत्रत्वं गच्छ भगवन्नदित्या मम चानघ॥१६॥

‘भगवान् का यह वचन सुनकर मरीचिनन्दन कश्यप ने कहा-‘उत्तम व्रत का पालन करने वाले वरदायक परमेश्वर! सम्पूर्ण देवताओं की, अदिति की तथा मेरी भी आपसे एक ही बातके लिये बारम्बार याचना है। आप अत्यन्त प्रसन्न होकर मुझे वह एक ही वर प्रदान करें। भगवन् ! निष्पाप नारायणदेव! आप मेरे और अदिति के पुत्र हो जायँ॥ १५-१६ ।।

भ्राता भव यवीयांस्त्वं शक्रस्यासुरसूदन।

 शोकार्तानां तु देवानां साहाय्यं कर्तुमर्हसि ॥१७॥

“असुरसूदन! आप इन्द्र के छोटे भाई हों और शोक से पीड़ित हुए इन देवताओं की सहायता करें। १७॥

अयं सिद्धाश्रमो नाम प्रसादात् ते भविष्यति।

 सिद्धे कर्मणि देवेश उत्तिष्ठ भगवन्नितः॥१८॥

“देवेश्वर! भगवन्! आपकी कृपा से यह स्थान सिद्धाश्रम के नाम से विख्यात होगा। अब आपका तपरूप कार्य सिद्ध हो गया है,अतः यहाँ से उठिये’। १८॥

अथ विष्णुर्महातेजा अदित्यां समजायत।

 वामनं रूपमास्थाय वैरोचनिमुपागमत्॥१९॥

‘तदनन्तर महातेजस्वी भगवान् विष्णु अदिति देवी के गर्भ से प्रकट हुए और वामनरूप धारण करके विरोचन कुमार बलि के पास गये॥ १९॥

त्रीन् पदानथ भिक्षित्वा प्रतिगृह्य च मेदिनीम्।

आक्रम्य लोकाँल्लोकार्थी सर्वलोकहिते रतः॥ २०॥

महेन्द्राय पुनः प्रादान्नियम्य बलिमोजसा।

 त्रैलोक्यं स महातेजाश्चक्रे शक्रवशं पुनः॥ २१॥

‘सम्पूर्ण लोकों के हित में तत्पर रहने वाले भगवान् विष्णु बलि के अधिकार से त्रिलोकी का राज्य ले लेना चाहते थे; अतः उन्होंने तीन पग भूमि के लिये याचना करके उनसे भूमिदान ग्रहण किया और तीनों लोकों को आक्रान्त करके उन्हें पुनः देवराज इन्द्र को लौटा दिया। महातेजस्वी श्रीहरि ने अपनी शक्ति से बलि का निग्रह करके त्रिलोकी को पुनः इन्द्र के अधीन कर दिया॥ २०-२१॥

तेनैव पूर्वमाक्रान्त आश्रमः श्रमनाशनः।

 मयापि भक्त्या तस्यैव वामनस्योपभुज्यते॥२२॥

‘उन्हीं भगवान् ने पूर्वकाल में यहाँ निवास किया था; इसलिये यह आश्रम सब प्रकार के श्रम (दुःखशोक) का नाश करनेवाला है। उन्हीं भगवान् वामन में भक्ति होने के कारण मैं भी इस स्थान को अपने उपयोग में लाता हूँ॥ २२॥

एनमाश्रममायान्ति राक्षसा विघ्नकारिणः।

अत्र ते पुरुषव्याघ्र हन्तव्या दुष्टचारिणः ॥२३॥

‘इसी आश्रमपर मेरे यज्ञ में विघ्न डालने वाले राक्षस आते हैं। पुरुषसिंह! यहीं तुम्हें उन दुराचारियों का वध करना है॥२३॥

अद्य गच्छामहे राम सिद्धाश्रममनुत्तमम्।

तदाश्रमपदं तात तवाप्येतद् यथा मम॥२४॥

‘श्रीराम ! अब हम लोग उस परम उत्तम सिद्धाश्रम में पहुँच रहे हैं। तात! वह आश्रम जैसे मेरा है, वैसे ही तुम्हारा भी है’ ॥ २४ ॥

इत्युक्त्वा परमप्रीतो गृह्य रामं सलक्ष्मणम्।

 प्रविशन्नाश्रमपदं व्यरोचत महामुनिः।

 शशीव गतनीहारः पुनर्वसुसमन्वितः॥ २५॥

ऐसा कहकर महामुनि ने बड़े प्रेम से श्रीराम और लक्ष्मण के हाथ पकड़ लिये और उन दोनों के साथ आश्रम में प्रवेश किया। उस समय पुनर्वसु नामक दो नक्षत्रों के बीचमें स्थित तुषाररहित चन्द्रमाकी भाँति उनकी शोभा हुई॥ २५ ॥

तं दृष्ट्वा मुनयः सर्वे सिद्धाश्रमनिवासिनः।

 उत्पत्योत्पत्य सहसा विश्वामित्रमपूजयन्॥२६॥

यथार्ह चक्रिरे पूजां विश्वामित्राय धीमते।

 तथैव राजपुत्राभ्यामकुर्वन्नतिथिक्रियाम्॥ २७॥

विश्वामित्रजी को आया देख सिद्धाश्रम में रहने वाले सभी तपस्वी उछलते-कूदते हुए सहसा उनके पास आये और सबने मिलकर उन बुद्धिमान् विश्वामित्रजी की यथोचित पूजा की। इसी प्रकार उन्होंने उन दोनों राजकुमारों का भी अतिथि- सत्कार किया॥ २६-२७॥

मुहूर्तमथ विश्रान्तौ राजपुत्रावरिंदमौ।

 प्राञ्जली मुनिशार्दूलमूचतू रघुनन्दनौ ॥२८॥

दो घड़ी तक विश्राम करने के बाद रघुकुल को आनन्द देने वाले शत्रुदमन राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण हाथ जोड़कर मुनिवर विश्वामित्र से बोले-॥ २८॥

अद्यैव दीक्षां प्रविश भद्रं ते मुनिपुंगव।

 सिद्धाश्रमोऽयं सिद्धः स्यात् सत्यमस्तु वचस्तव॥ २९॥

‘मुनिश्रेष्ठ ! आप आज ही यज्ञ की दीक्षा ग्रहण करें,आपका कल्याण हो। यह सिद्धाश्रम वास्तव में यथानाम तथागुण सिद्ध हो और राक्षसों के वध के विषयमें आपकी कही हुई बात सच्ची हो’ ॥ २९॥

एवमुक्तो महातेजा विश्वामित्रो महानृषिः।

 प्रविवेश तदा दीक्षा नियतो नियतेन्द्रियः॥३०॥

कुमारावपि तां रात्रिमुषित्वा सुसमाहितौ।

 प्रभातकाले चोत्थाय पूर्वां संध्यामुपास्य च॥ ३१॥

प्रशुची परमं जाप्यं समाप्य नियमेन च।

हताग्निहोत्रमासीनं विश्वामित्रमवन्दताम्॥३२॥

उनके ऐसा कहने पर महातेजस्वी महर्षि विश्वामित्र जितेन्द्रिय भाव से नियमपूर्वक यज्ञ की दीक्षा में प्रविष्ट हुए। वे दोनों राजकुमार भी सावधानी के साथ रात व्यतीत करके सबेरे उठे और स्नान आदि से शुद्ध हो प्रातःकाल की संध्योपासना तथा नियमपूर्वक सर्वश्रेष्ठ गायत्री मन्त्र का जप करने लगे। जप पूरा होने पर उन्होंने अग्निहोत्र करके बैठे हुए विश्वामित्रजी के चरणों में वन्दना की॥ ३०–३२॥

 इत्या श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकोनत्रिंशः सर्गः॥२९॥

 इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें उन्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ। २९॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(श्रीराम द्वारा विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा तथा राक्षसों का संहार)

त्रिंशः सर्गः 

सर्ग-30

अथ तौ देशकालज्ञौ राजपुत्रावरिंदमौ।

देशे काले च वाक्यज्ञावब्रूतां कौशिकं वचः॥

तदनन्तर देश और काल को जानने वाले शत्रुदमन राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण जो देश और काल के अनुसार बोलने योग्य वचन के मर्मज्ञ थे, कौशिक मुनि से इस प्रकार बोले ॥१॥

भगवञ्छ्रोतुमिच्छावो यस्मिन् काले निशाचरौ।

 संरक्षणीयौ तौ ब्रूहि नातिवर्तेत तत्क्षणम्॥२॥

‘भगवन् ! अब हम दोनों यह सुनना चाहते हैं कि किस समय उन दोनों निशाचरों का आक्रमण होता है? जब कि हमें उन दोनों को यज्ञ भूमि में आने से रोकना है,कहीं ऐसा न हो, असावधानी में ही वह समय हाथ से निकल जाय; अतः उसे बता दीजिये’॥२॥।

 एवं ब्रुवाणौ काकुत्स्थौ त्वरमाणौ युयुत्सया।

 सर्वे ते मुनयः प्रीताः प्रशशंसुर्नृपात्मजौ॥३॥

ऐसी बात कहकर युद्ध की इच्छा से उतावले हुए उन दोनों ककुत्स्थवंशी राजकुमारों की ओर देखकर वे सब मुनि बड़े प्रसन्न हुए और उन दोनों बन्धुओं की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे॥३॥

अद्यप्रभृति षड्रानं रक्षतां राघवौ युवाम्।

दीक्षां गतो ह्येष मुनिौनित्वं च गमिष्यति॥४॥

वे बोले—’ये मुनिवर विश्वामित्रजी यज्ञ की दीक्षा ले चुके हैं; अतः अब मौन रहेंगे आप दोनों रघुवंशी वीर सावधान होकर आज से छः रातों तक इनके यज्ञ की रक्षा करते रहें’॥४॥

तौ तु तद्वचनं श्रुत्वा राजपुत्रौ यशस्विनौ।

अनिद्रं षडहोरात्रं तपोवनमरक्षताम्॥५॥

मुनियोंका यह वचन सुनकर वे दोनों यशस्वी राजकुमार लगातार छः दिन और छः रात तक उस तपोवन की रक्षा करते रहे; इस बीच में उन्होंने नींद भी नहीं ली।॥ ५॥

उपासांचक्रतुर्वीरौ यत्तौ परमधन्विनौ।

ररक्षतुर्मुनिवरं विश्वामित्रमरिंदमौ॥६॥

शत्रुओं का दमन करने वाले वे परम धनुर्धर वीर सतत सावधान रहकर मुनिवर विश्वामित्र के पास खड़े हो उनकी (और उनके यज्ञ की) रक्षा में लगे रहे॥६॥

अथ काले गते तस्मिन् षष्ठेऽहनि तदागते।

सौमित्रिमब्रवीद् रामो यत्तो भव समाहितः॥७॥

इस प्रकार कुछ काल बीत जाने पर जब छठा दिन आया, तब श्रीराम ने सुमित्राकुमार लक्ष्मण से कहा —’सुमित्रानन्दन! तुम अपने चित्त को एकाग्र करके सावधान हो जाओ’ ॥७॥

रामस्यैवं ब्रुवाणस्य त्वरितस्य युयुत्सया।

 प्रजज्वाल ततो वेदिः सोपाध्यायपुरोहिता॥८॥

युद्ध की इच्छा से शीघ्रता करते हुए श्रीराम इस प्रकार कह ही रहे थे कि उपाध्याय (ब्रह्मा), पुरोहित (उपद्रष्टा) तथा अन्यान्य ऋत्विजों से घिरी हुई यज्ञ की वेदी सहसा प्रज्वलित हो उठी (वेदी का यह जलना राक्षसों के आगमन का सूचक उत्पात था) ॥ ८॥

सदर्भचमसमुक्का ससमित्कुसुमोच्चया।

विश्वामित्रेण सहिता वेदिर्जज्वाल सर्विजा॥९॥

इसके बाद कुश, चमस, मुक्, समिधा और फूलों के ढेरसे सुशोभित होनेवाली विश्वामित्र तथा ऋत्विजों सहित जो यज्ञ की वेदी थी, उसपर आहवनीय अग्नि प्रज्वलित हुई (अग्नि का यह प्रज्वलन यज्ञ के उद्देश्य से हुआ था)॥९॥

 मन्त्रवच्च यथान्यायं यज्ञोऽसौ सम्प्रवर्तते।

आकाशे च महान् शब्दः प्रादुरासीद् भयानकः॥ १०॥

फिर तो शास्त्रीय विधि के अनुसार वेद-मन्त्रों के उच्चारणपूर्वक उस यज्ञ का कार्य आरम्भ हुआ। इसी समय आकाश में बड़े जोर का शब्द हुआ, जो बड़ा ही भयानक था॥ १०॥

आवार्य गगनं मेघो यथा प्रावृषि दृश्यते।

 तथा मायां विकुर्वाणौ राक्षसावभ्यधावताम्॥ ११॥

मारीचश्च सुबाहुश्च तयोरनुचरास्तथा।

आगम्य भीमसंकाशा रुधिरौघानवासृजन्॥१२॥

जैसे वर्षाकाल में मेघों की घटा सारे आकाश को घेरकर छायी हुई दिखायी देती है, उसी प्रकार मारीच और सुबाहु नामक राक्षस सब ओर अपनी माया फैलाते हुए यज्ञमण्डप की ओर दौड़े आ रहे थे। उनके अनुचर भी साथ थे। उन भयंकर राक्षसों ने वहाँ आकर रक्त की धाराएँ बरसाना आरम्भ कर दिया। ११-१२॥

तां तेन रुधिरौघेण वेदी वीक्ष्य समुक्षिताम्।

सहसाभिद्रुतो रामस्तानपश्यत् ततो दिवि॥१३॥

तावापतन्तौ सहसा दृष्ट्वा राजीवलोचनः।

लक्ष्मणं त्वभिसम्प्रेक्ष्य रामो वचनमब्रवीत्॥१४॥

रक्त के उस प्रवाह से यज्ञ-वेदी के आस-पास की भूमि को भीगी हुई देख श्रीरामचन्द्र जी सहसा दौड़े और इधर-उधर दृष्टि डालने पर उन्होंने उन राक्षसों को आकाश में स्थित देखा। मारीच और सुबाहुको सहसा आते देख कमलनयन श्रीराम ने लक्ष्मण की ओर देखकर कहा- ॥ १३-१४॥

पश्य लक्ष्मण दुर्वृत्तान् राक्षसान् पिशिताशनान्।

मानवास्त्रसमाधूताननिलेन यथा घनान्॥१५॥

करिष्यामि न संदेहो नोत्सहे हन्तुमीदृशान्।

‘लक्ष्मण! वह देखो, मांस भक्षण करने वाले दुराचारी राक्षस आ पहुँचे, मैं मानवास्त्रसे इन सबको उसी प्रकार मार भगाऊँगा, जैसे वायु के वेग से बादल छिन्न-भिन्न हो जाते हैं। मेरे इस कथनमें तनिक भी संदेह नहीं है,ऐसे कायरों को मैं मारना नहीं चाहता’। १५ १/२॥

 इत्युक्त्वा वचनं रामश्चापे संधाय वेगवान्॥ १६॥

मानवं परमोदारमस्त्रं परमभास्वरम्।

 चिक्षेप परमक्रुद्धो मारीचोरसि राघवः॥१७॥

ऐसा कहकर वेगशाली श्रीराम ने अपने धनुष पर परम उदार मानवास्त्रका संधान किया। वह अस्त्र अत्यन्त तेजस्वी था। श्रीरामने बड़े रोष में भरकर मारीच की छाती में उस बाण का प्रहार किया। १६-१७॥

स तेन परमास्त्रेण मानवेन समाहतः।

सम्पूर्ण योजनशतं क्षिप्तः सागरसम्प्लवे॥१८॥

उस उत्तम मानवास्त्र का गहरा आघात लगने से मारीच पूरे सौ योजन की दूरी पर समुद्र के जल में जा गिरा॥ १८॥

विचेतनं विघूर्णन्तं शीतेषुबलपीडितम्।

निरस्तं दृश्य मारीचं रामो लक्ष्मणमब्रवीत्॥ १९॥

शीतेषु नामक मानवास्त्र से पीड़ित हो मारीच अचेत-सा होकर चक्कर काटता हुआ दूर चला जा रहा है यह देख श्रीरामने लक्ष्मणसे कहा- ॥१९॥

पश्य लक्ष्मण शीतेषु मानवं मनुसंहितम्।

मोहयित्वा नयत्येनं न च प्राणैर्वियुज्यते॥२०॥

‘लक्ष्मण! देखो, मनु के द्वारा प्रयुक्त शीतेषु नामक मानवास्त्र इस राक्षस को मूर्छित करके दूर लिये जा रहा है, किंतु उसके प्राण नहीं ले रहा है।॥ २० ॥

इमानपि वधिष्यामि निघृणान् दुष्टचारिणः।

राक्षसान् पापकर्मस्थान् यज्ञघ्नान् रुधिराशनान्॥ २१॥

‘अब यज्ञ में विघ्न डालने वाले इन दूसरे निर्दय, दुराचारी, पापकर्मी एवं रक्तभोजी राक्षसों को भी मार गिराता हूँ’॥ २१॥

इत्युक्त्वा लक्ष्मणं चाशु लाघवं दर्शयन्निव।

विगृह्य सुमहच्चास्त्रमाग्नेयं रघुनन्दनः॥२२॥

सुबाहूरसि चिक्षेप स विद्धः प्रापतद् भुवि।

 शेषान् वायव्यमादाय निजघान महायशाः।

राघवः परमोदारो मुनीनां मुदमावहन्॥ २३॥

लक्ष्मण से ऐसा कहकर रघुनन्दन श्रीराम ने अपने हाथ की फुर्ती दिखाते हुए-से शीघ्र ही महान् आग्नेयास्त्र का संधान करके उसे सुबाहु की छाती पर चलाया । उसकी चोट लगते ही वह मरकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। फिर महायशस्वी परम उदार रघुवीर ने वायव्यास्त्र लेकर शेष निशाचरों का भी संहार कर डाला और मुनियों को परम आनन्द प्रदान किया। २३॥

स हत्वा राक्षसान् सर्वान् यज्ञघ्नान् रघुनन्दनः।

ऋषिभिः पूजितस्तत्र यथेन्द्रो विजये पुरा॥२४॥

इस प्रकार रघुकुलनन्दन श्रीराम यज्ञ में विघ्न डालने वाले समस्त राक्षसों का वध करके वहाँ ऋषियों द्वारा उसी प्रकार सम्मानित हुए जैसे पूर्वकाल में देवराज इन्द्र असुरों पर विजय पाकर महर्षियों द्वारा पूजित हुए थे॥ २४॥

अथ यज्ञे समाप्ते तु विश्वामित्रो महामुनिः।

निरीतिका दिशो दृष्ट्वा काकुत्स्थमिदमब्रवीत्॥ २५॥

यज्ञ समाप्त होने पर महामुनि विश्वामित्र ने सम्पूर्ण दिशाओं को विघ्न-बाधाओं से रहित देख श्रीरामचन्द्रजीसे कहा- ॥ २५ ॥

कृतार्थोऽस्मि महाबाहो कृतं गुरुवचस्त्वया।

सिद्धाश्रममिदं सत्यं कृतं वीर महायशः।

 स हि रामं प्रशस्यैवं ताभ्यां संध्यामुपागमत्॥ २६॥

‘महाबाहो! मैं तुम्हें पाकर कृतार्थ हो गया। तुमने गुरु की आज्ञा का पूर्णरूप से पालन किया। महायशस्वी वीर! तुमने इस सिद्धाश्रम का नाम सार्थक कर दिया।’ इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी की प्रशंसा करके मुनि ने उन दोनों भाइयों के साथ संध्योपासना की॥२६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे त्रिंशः सर्गः॥३०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥३०॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

 (श्रीराम, लक्ष्मण तथा ऋषियों सहित विश्वामित्र का मिथिला को प्रस्थान तथा मार्ग में संध्या के समय शोणभद्र तट पर विश्राम)

एकत्रिंशः सर्गः 

सर्ग-31

अथ तां रजनीं तत्र कृतार्थौ रामलक्ष्मणौ।

ऊषतुर्मुदितौ वीरौ प्रहृष्टेनान्तरात्मना॥१॥

तदनन्तर (विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा करके) कृतकृत्य हुए श्रीराम और लक्ष्मण ने उस यज्ञशाला में ही वह रात बितायी। उस समय वे दोनों वीर बड़े प्रसन्न थे। उनका हृदय

हर्षोल्लाससे परिपूर्ण था॥ १॥

प्रभातायां तु शर्वर्यां कृतपौर्वाणिकक्रियौ।

 विश्वामित्रमृषींश्चान्यान् सहितावभिजग्मतुः॥ २ ॥

रात बीतने पर जब प्रातःकाल आया, तब वे दोनों भाई पूर्वाण काल के नित्य-नियम से निवृत्त हो विश्वामित्र मुनि तथा अन्य ऋषियों के पास साथ-साथ गये॥२॥

अभिवाद्य मुनिश्रेष्ठं ज्वलन्तमिव पावकम्।

ऊचतुः परमोदारं वाक्यं मधुरभाषिणौ ॥३॥

वहाँ जाकर उन्होंने प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी मुनिश्रेष्ठ! विश्वामित्र को प्रणाम किया और मधुर भाषा में यह परम उदार वचन कहा- ॥३॥

इमौ स्म मुनिशार्दूल किंकरौ समुपागतौ।

आज्ञापय मुनिश्रेष्ठ शासनं करवाव किम्॥४॥

‘मुनिप्रवर! हम दोनों किङ्कर आपकी सेवा में उपस्थित हैं। मुनिश्रेष्ठ! आज्ञा दीजिये, हम क्या सेवा करें?’ ॥ ४॥

एवमुक्ते तयोर्वाक्ये सर्व एव महर्षयः।

विश्वामित्रं पुरस्कृत्य रामं वचनमब्रुवन्॥५॥

उन दोनों के ऐसा कहने पर वे सभी महर्षि विश्वामित्र को आगे करके श्रीरामचन्द्रजी से बोले-॥ ५॥

मैथिलस्य नरश्रेष्ठ जनकस्य भविष्यति।

यज्ञः परमधर्मिष्ठस्तत्र यास्यामहे वयम्॥६॥

‘नरश्रेष्ठ! मिथिला के राजा जनक का परम धर्ममय यज्ञ प्रारम्भ होने वाला है उसमें हम सब लोग जायँगे॥६॥

त्वं चैव नरशार्दूल सहास्माभिर्गमिष्यसि।

 अद्भुतं च धनूरत्नं तत्र त्वं द्रष्टुमर्हसि ॥७॥

‘पुरुषसिंह! तुम्हें भी हमारे साथ वहाँ चलना है। वहाँ एक बड़ा ही अद्भुत धनुषरत्न है, तुम्हें उसे देखना चाहिये॥७॥

तद्धि पूर्वं नरश्रेष्ठ दत्तं सदसि दैवतैः।

अप्रमेयबलं घोरं मखे परमभास्वरम्॥८॥

‘पुरुषप्रवर! पहले कभी यज्ञ में पधारे हुए देवताओं ने जनक के किसी पूर्वपुरुष को वह धनुष दिया था। वह कितना प्रबल और भारी है, इसका कोई माप-तोल नहीं है। वह बहुत ही प्रकाशमान एवं भयंकर है॥ ८॥

नास्य देवा न गन्धर्वा नासुरा न च राक्षसाः।

 कर्तुमारोपणं शक्ता न कथंचन मानुषाः॥९॥

‘मनुष्यों की तो बात ही क्या है देवता, गन्धर्व, असुर तथा राक्षस भी किसी तरह उसकी प्रत्यञ्चा नहीं चढ़ा पाते॥९॥

धनुषस्तस्य वीर्यं हि जिज्ञासन्तो महीक्षितः।

न शेकुरारोपयितुं राजपुत्रा महाबलाः॥१०॥

‘उस धनुष की शक्ति का पता लगाने के लिये कितने ही महाबली राजा और राजकुमार आये; किंतु कोई भी उसे चढ़ा न सके॥१०॥

तद्धनुर्नरशार्दूल मैथिलस्य महात्मनः।

 तत्र द्रक्ष्यसि काकुत्स्थ यज्ञं च परमाद्भुतम्॥ ११॥

‘ककुत्स्थकुलनन्दन पुरुषसिंह राम! वहाँ चलने से तुम महामना मिथिलानरेश के उस धनुष को तथा उनके परम अद्भुत यज्ञ को भी देख सकोगे॥११॥

तद्धि यज्ञफलं तेन मैथिलेनोत्तमं धनुः ।

याचितं नरशार्दूल सुनाभं सर्वदैवतैः॥१२॥

‘नरश्रेष्ठ! मिथिलानरेश ने अपने यज्ञ के फलरूप में उस उत्तम धनुषको माँगा था; अतः सम्पूर्ण देवताओं तथा भगवान् शङ्कर ने उन्हें वह धनुष प्रदान किया था। उस धनुषका मध्यभाग जिसे मुट्ठीसे पकड़ा जाता है, बहुत ही सुन्दर है॥ १२॥

आयागभूतं नृपतेस्तस्य वेश्मनि राघव।

 अर्चितं विविधैर्गन्धैधूपैश्चागुरुगन्धिभिः॥१३॥

‘रघुनन्दन! राजा जनक के महल में वह धनुष पूजनीय देवता की भाँति प्रतिष्ठित है और नाना प्रकार के गन्ध, धूप तथा अगुरु आदि सुगन्धित पदार्थों से उसकी पूजा होती है’॥ १३॥

एवमुक्त्वा मुनिवरः प्रस्थानमकरोत् तदा।

 सर्षिसङ्घः सकाकुत्स्थ आमन्त्र्य वनदेवताः॥ १४॥

ऐसा कहकर मुनिवर विश्वामित्रजी ने वनदेवताओं से आज्ञा ली और ऋषिमण्डली तथा राम लक्ष्मणके साथ वहाँ से प्रस्थान किया।। १४॥

स्वस्ति वोऽस्तु गमिष्यामि सिद्धः सिद्धाश्रमादहम्। ।

उत्तरे जाह्नवीतीरे हिमवन्तं शिलोच्चयम्॥१५॥

चलते समय उन्होंने वनदेवताओं से कहा—’मैं अपना यज्ञकार्य सिद्ध करके इस सिद्धाश्रम से जा रहा हूँ। गंगा के उत्तर तट पर होता हुआ हिमालय पर्वतकी उपत्यका में जाऊँगा आप लोगोंका कल्याण हो’॥ १५॥

इत्युक्त्वा मुनिशार्दूलः कौशिकः स तपोधनः।

 उत्तरां दिशमुद्दिश्य प्रस्थातुमुपचक्रमे॥१६॥

ऐसा कहकर तपस्या के धनी मुनिश्रेष्ठ कौशिक ने उत्तर दिशा की ओर प्रस्थान आरम्भ किया॥१६॥

तं व्रजन्तं मुनिवरमन्वगादनुसारिणाम्।

शकटीशतमात्रं तु प्रयाणे ब्रह्मवादिनाम्॥१७॥

उस समय—प्रस्थान के समय यात्रा करते हुए मुनिवर विश्वामित्र के पीछे उनके साथ जाने वाले ब्रह्मवादी महर्षियों की सौ गाड़ियाँ चलीं॥ १७॥

मृगपक्षिगणाश्चैव सिद्धाश्रमनिवासिनः।

अनुजग्मुर्महात्मानं विश्वामित्रं तपोधनम्॥१८॥

सिद्धाश्रममें निवास करने वाले मृग और पक्षी भी तपोधन विश्वामित्र के पीछे-पीछे जाने लगे॥ १८ ॥

निवर्तयामास ततः सर्षिसङ्घः स पक्षिणः।

 ते गत्वा दूरमध्वानं लम्बमाने दिवाकरे॥१९॥

वासं चक्रुर्मुनिगणाः शोणाकूले समाहिताः।

तेऽस्तं गते दिनकरे स्नात्वा हुतहुताशनाः॥२०॥

कुछ दूर जानेपर ऋषिमण्डली सहित विश्वामित्र ने उन पशु-पक्षियों को लौटा दिया फिर दूर तक का मार्ग तय कर लेने के बाद जब सूर्य अस्ताचल को जाने लगे, तब उन ऋषियों ने पूर्ण सावधान रहकर शोणभद्र के तट पर पड़ाव डाला। जब सूर्यदेव अस्त हो गये, तब स्नान करके उन सबने अग्निहोत्र का कार्य पूर्ण किया॥

विश्वामित्रं पुरस्कृत्य निषेदुरमितौजसः।

 रामोऽपि सहसौमित्रिर्मुनीस्तानभिपूज्य च॥२१॥

अग्रतो निषसादाथ विश्वामित्रस्य धीमतः।

इसके बाद वे सभी अमिततेजस्वी ऋषि मुनिवर विश्वामित्र को आगे करके बैठे; फिर लक्ष्मणसहित श्रीराम भी उन ऋषियोंका आदर करते हुए बुद्धिमान् विश्वामित्रजीके सामने बैठ गये॥ २१ १/२ ।।

अथ रामो महातेजा विश्वामित्रं तपोधनम्॥२२॥

पप्रच्छ मुनिशार्दूलं कौतूहलसमन्वितम्।

तत्पश्चात् महातेजस्वी श्रीराम ने तपस्या के धनी मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र से कौतूहलपूर्वक पूछा- ॥ २२ १/२॥

भगवन् को न्वयं देशः समृद्धवनशोभितः॥२३॥

श्रोतुमिच्छामि भद्रं ते वक्तुमर्हसि तत्त्वतः।

भगवन् ! यह हरे-भरे समृद्धिशाली वन से सुशोभित देश कौन-सा है? मैं इसका परिचय सुनना चाहता हूँ। आपका कल्याण हो आप मुझे ठीक-ठीक इसका रहस्य बताइये’ ।।२३ १/२ ।।

 नोदितो रामवाक्येन कथयामास सुव्रतः।

तस्य देशस्य निखिलमृषिमध्ये महातपाः॥२४॥

श्रीरामचन्द्रजी के इस प्रश्न से प्रेरित होकर उत्तम व्रत का पालन करने वाले महातपस्वी विश्वामित्र ने ऋषिमण्डली के बीच उस देशका पूर्णरूप से परिचय देना प्रारम्भ किया॥ २४ ॥

 इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकत्रिंशः सर्गः॥ ३१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें इकतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ। ३१॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

 (ब्रह्मपुत्र कुश के चार पुत्रों का वर्णन, शोणभद्र-तटवर्ती प्रदेश को वसु की भूमि बताना, कुशनाभ की सौ कन्याओं का वायु के कोप से ‘कुब्जा’ होना)

द्वात्रिंशः सर्गः 

सर्ग-32

ब्रह्मयोनिमहानासीत् कुशो नाम महातपाः।

अक्लिष्टव्रतधर्मज्ञः सज्जनप्रतिपूजकः॥१॥

(विश्वामित्रजी कहते हैं-) श्रीराम! पूर्वकाल में कुश नाम से प्रसिद्ध एक महातपस्वी राजा हो गये हैं। वे साक्षात् ब्रह्माजी के पुत्र थे। उनका प्रत्येक व्रत एवं संकल्प बिना किसी क्लेश या कठिनाई के ही पूर्ण होता था। वे धर्मके ज्ञाता, सत्पुरुषों का आदर करने वाले और महान् थे॥१॥

स महात्मा कुलीनायां युक्तायां सुमहाबलान्।

 वैदर्थ्यां जनयामास चतुरः सदृशान् सुतान्॥२॥

उत्तम कुल में उत्पन्न विदर्भदेश की राजकुमारी उनकी पत्नी थी। उसके गर्भ से उन महात्मा नरेश ने चार पुत्र उत्पन्न किये, जो उन्हीं के समान थे॥२॥

कुशाम्बं कुशनाभं च असूर्तरजसं वसुम्।

दीप्तियुक्तान् महोत्साहान् क्षत्रधर्मचिकीर्षया॥ ३॥

तानुवाच कुशः पुत्रान् धर्मिष्ठान् सत्यवादिनः।

 क्रियतां पालनं पुत्रा धर्मं प्राप्स्यथ पुष्कलम्॥४॥

उनके नाम इस प्रकार हैं-कुशाम्ब, कुशनाभ, असूर्तरजस’ तथा वसु, ये सब-के-सब तेजस्वी तथा महान् उत्साही थे। राजा कुशने ‘प्रजारक्षणरूप’ क्षत्रिय-धर्मके पालन की इच्छा से अपने उन धर्मिष्ठ तथा सत्यवादी पुत्रों से कहा—’पुत्रो! प्रजाका पालन करो, इससे तुम्हें धर्म का पूरा-पूरा फल प्राप्त होगा’। ३-४॥

१. रामायणशिरोमणि नामक व्याख्या के निर्माता ने ‘अमूर्तिरजसम्’ पाठ माना है। महाभारत के अनुसार इनका नाम ‘अमूर्तरयस्’ या ‘अमूर्तरया’ था (वन ९५।१७)। यहाँ इनके द्वारा धर्मारण्य नामक नगर बसानेका उल्लेख है। यह नगर धर्मारण्य नामक तीर्थभूत वन में था। यह वन गया के आस-पास का ही प्रदेश है। अमूर्तरया के पुत्र गयने ही गया नामक नगर बसाया था। अतः धर्मारण्य और गया की एकता सिद्ध होती है। महाभारत वनपर्व (८४१८५) में गया के ब्रह्मसरोवर को धर्मारण्य से सुशोभित बताया गया है। (वन० ८२६४७)

धर्मारण्यमें पितृ-पूजनकी महत्ता बतायी गयी है।

कुशस्य वचनं श्रुत्वा चत्वारो लोकसत्तमाः।

 निवेशं चक्रिरे सर्वे पुराणां नृवरास्तदा॥५॥

अपने पिता महाराज कुश की यह बात सुनकर उन चारों लोकशिरोमणि नरश्रेष्ठ राजकुमारों ने उस समय अपने-अपने लिये पृथक्-पृथक् नगर निर्माण कराया। ५॥

 कुशाम्बस्तु महातेजाः कौशाम्बीमकरोत् पुरीम्।

 कुशनाभस्तु धर्मात्मा पुरं चक्रे महोदयम्॥६॥

महातेजस्वी कुशाम्ब ने ‘कौशाम्बी’ पुरी बसायी (जिसे आजकल ‘कोसम’ कहते हैं)। धर्मात्मा कुशनाभने ‘महोदय’ नामक नगरका निर्माण कराया। ६॥

असूर्तरजसो नाम धर्मारण्यं महामतिः।

 चक्रे पुरवरं राजा वसुनाम गिरिव्रजम्॥७॥

परम बुद्धिमान् असूर्तरजस ने ‘धर्मारण्य’ नामक एक श्रेष्ठ नगर बसाया तथा राजा वसुने ‘गिरिव्रज’ नगर की स्थापना की॥७॥

एषा वसुमती नाम वसोस्तस्य महात्मनः । ।

 एते शैलवराः पञ्च प्रकाशन्ते समन्ततः॥८॥

महात्मा वसु की यह ‘गिरिव्रज’ नामक राजधानी वसुमती के नामसे प्रसिद्ध हुई। इसके चारों ओर ये पाँच श्रेष्ठ पर्वत सुशोभित होते हैं* ॥ ८॥ * महाभारत सभापर्व (२१।१-१०) में इन पाँचों पर्वतोंके नाम इस प्रकार वर्णित हैं—(१) विपुल, (२) वराह, (३) वृषभ (ऋषभ), (४) ऋषिगिरि (मातङ्ग) तथा (५) चैत्यक।

सुमागधी नदी रम्या मागधान् विश्रुताऽऽययौ।

पञ्चानां शैलमुख्यानां मध्ये मालेव शोभते॥९॥

यह रमणीय (सोन) नदी दक्षिण-पश्चिम की ओर से बहती हुई मगध देश में आयी है, इसलिये यहाँ ‘सुमागधी’ नाम से विख्यात हुई है। यह इन पाँच श्रेष्ठ पर्वतों के बीच में मालाकी भाँति सुशोभित हो रही है। ९॥

सैषा हि मागधी राम वसोस्तस्य महात्मनः।

 पूर्वाभिचरिता राम सुक्षेत्रा सस्यमालिनी॥१०॥

श्रीराम ! इस प्रकार ‘मागधी’ नाम से प्रसिद्ध हुई यह सोन नदी पूर्वोक्त महात्मा वसु से सम्बन्ध रखती है। रघुनन्दन! यह दक्षिण-पश्चिम से आकर पूर्वोत्तर दिशा की ओर प्रवाहित हुई है। इसके दोनों तटों पर सुन्दर क्षेत्र (उपजाऊ खेत) हैं, अतः यह सदासस्य-मालाओं से अलंकृत (हरी-भरी खेती से सुशोभित) रहती है॥ १०॥

कुशनाभस्तु राजर्षिः कन्याशतमनुत्तमम्।

जनयामास धर्मात्मा घृताच्यां रघुनन्दन॥११॥

रघुकुल को आनन्दित करने वाले श्रीराम! धर्मात्मा राजर्षि कुशनाभ ने घृताची अप्सरा के गर्भ से परम उत्तम सौ कन्याओं को जन्म दिया॥११॥

तास्तु यौवनशालिन्यो रूपवत्यः स्वलंकृताः।

उद्यानभूमिमागम्य प्रावृषीव शतहदाः॥१२॥

गायन्त्यो नृत्यमानाश्च वादयन्त्यस्तु राघव।

आमोदं परमं जग्मुर्वराभरणभूषिताः॥१३॥

वे सब-की-सब सुन्दर रूप-लावण्य से सुशोभित थीं। धीरे-धीरे युवावस्था ने आकर उनके सौन्दर्य को और भी बढ़ा दिया। रघुवीर! एक दिन वस्त्र और आभूषणों से विभूषित हो वे सभी राजकन्याएँ उद्यानभूमि में आकर वर्षाऋतु में प्रकाशित होने वाली विद्युन्मालाओं की भाँति शोभा पाने लगीं। सुन्दर अलंकारों से अलंकृत हुई वे अंगनाएँ गाती, बजाती और नृत्य करती हुई वहाँ परम आमोद-प्रमोद में मग्न हो गयीं॥ १२-१३॥

अथ ताश्चारुसर्वाङ्यो रूपेणाप्रतिमा भुवि।

उद्यानभूमिमागम्य तारा इव घनान्तरे॥१४॥

उनके सभी अंग बड़े मनोहर थे। इस भूतल पर उनके रूप-सौन्दर्य की कहीं भी तुलना नहीं थी। उस उद्यान में आकर वे बादलों के ओट में कुछ-कुछ छिपी हुई तारिकाओं के समान शोभा पा रही थीं॥१४ ॥

ताः सर्वा गुणसम्पन्ना रूपयौवनसंयुताः।

 दृष्ट्वा सर्वात्मको वायुरिदं वचनमब्रवीत्॥१५॥

उस समय उत्तम गुणों से सम्पन्न तथा रूप और यौवन से सुशोभित उन सब राजकन्याओं को देखकर सर्वस्वरूप वायु देवता ने उनसे इस प्रकार कहा-॥

अहं वः कामये सर्वा भार्या मम भविष्यथ।

मानुषस्त्यज्यतां भावो दीर्घमायुरवाप्स्यथ॥१६॥

‘सुन्दरियो! मैं तुम सबको अपनी प्रेयसी के रूप में प्राप्त करना चाहता हूँ, तुम सब मेरी भार्याएँ बनोगी। अब मनुष्य भाव का त्याग करो और मुझे अंगीकार करके देवांगनाओं की भाँति दीर्घ आयु प्राप्त कर लो।

चलं हि यौवनं नित्यं मानुषेषु विशेषतः।

अक्षयं यौवनं प्राप्ता अमर्यश्च भविष्यथ ॥१७॥

‘विशेषतः मानव-शरीर में जवानी कभी स्थिर नहीं रहती–प्रतिक्षण क्षीण होती जाती है। मेरे साथ सम्बन्ध हो जाने पर तुम लोग अक्षय यौवन प्राप्त करके अमर हो जाओगी’ ॥१७॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा वायोरक्लिष्टकर्मणः।

अपहास्य ततो वाक्यं कन्याशतमथाब्रवीत्॥ १८॥

अनायास ही महान् कर्म करने वाले वायुदेव का यह कथन सुनकर वे सौ कन्याएँ अवहेलनापूर्वक हँसकर बोलीं- ॥१८॥

अन्तश्चरसि भूतानां सर्वेषां सुरसत्तम।

 प्रभावज्ञाश्च ते सर्वाः किमर्थमवमन्यसे॥१९॥

‘सुरश्रेष्ठ! आप प्राणवायु के रूप में समस्त प्राणियों के भीतर विचरते हैं (अतः सबके मनकी बातें जानते हैं; आपको यह मालूम होगा कि हमारे । मन में आपके प्रति कोई आकर्षण नहीं है)। हम सब बहिनें आपके अनुपम प्रभाव को भी जानती हैं (तो भी हमारा आपके प्रति अनुराग नहीं है); ऐसी दशामें यह अनुचित प्रस्ताव करके आप हमारा अपमान किसलिये कर रहे हैं? ॥ १९॥

कुशनाभसुता देव समस्ताः सुरसत्तम।

स्थानाच्च्यावयितुं देवं रक्षामस्तु तपो वयम्॥ २०॥

‘देव! देवशिरोमणे! हम सब-की-सब राजर्षि कुशनाभ की कन्याएँ हैं। देवता होने पर भी आपको शाप देकर वायुपद से भ्रष्ट कर सकती हैं, किंतु ऐसा करना नहीं चाहतीं; क्योंकि हम अपने तप को सुरक्षित रखती हैं॥२०॥

मा भूत् स कालो दुर्मेधः पितरं सत्यवादिनम्।

अवमन्य स्वधर्मेण स्वयंवरमुपास्महे ॥२१॥

‘दुर्मते! वह समय कभी न आवे, जब कि हम अपने सत्यवादी पिता की अवहेलना करके कामवश या अत्यन्त अधर्मपूर्वक स्वयं ही वर ढूँढ़ने लगें। २१॥

पिता हि प्रभुरस्माकं दैवतं परमं च सः।

 यस्य नो दास्यति पिता स नो भर्ता भविष्यति॥ २२॥

‘हम लोगों पर हमारे पिताजी का प्रभुत्व है, वे हमारे लिये सर्वश्रेष्ठ देवता हैं। पिताजी हमें जिसके हाथ में दे देंगे, वही हमारा पति होगा’ ॥ २२ ॥

तासां तु वचनं श्रुत्वा हरिः परमकोपनः।

 प्रविश्य सर्वगात्राणि बभञ्ज भगवान् प्रभुः॥ २३॥

अरनिमात्राकृतयो भग्नगात्रा भयार्दिताः।

उनकी यह बात सुनकर वायुदेव अत्यन्त कुपित हो उठे। उन ऐश्वर्यशाली प्रभु ने उनके भीतर प्रविष्ट हो सब अंगों को मोड़कर टेढ़ा कर दिया। शरीर मुड़ जानेके कारण वे कुबड़ी हो गयीं। उनकी आकृति मुट्ठी बँधे हुए एक हाथ के बराबर हो गयी वे भयसे व्याकुल हो उठीं। २३ १/२॥

 ताः कन्या वायुना भग्ना विविशुनृपतेर्गृहम्।

प्रविश्य च सुसम्भ्रान्ताः सलज्जाः सास्रलोचनाः॥ २४॥

वायुदेव के द्वारा कुबड़ी की हुई उन कन्याओं ने राजभवन में प्रवेश किया। प्रवेश करके वे लज्जित और उद्विग्न हो गयीं। उनके नेत्रों से आँसुओं की धाराएँ बहने लगीं॥ २४॥

 स च ता दयिता भग्नाः कन्याः परमशोभनाः।

दृष्ट्वा दीनास्तदा राजा सम्भ्रान्त इदमब्रवीत्॥ २५॥

अपनी परम सुन्दरी प्यारी पुत्रियों को कुब्जता के कारण अत्यन्त दयनीय दशा में पड़ी देख राजा कुशनाभ घबरा गये और इस प्रकार बोले- ॥२५॥

 किमिदं कथ्यतां पुत्र्यः को धर्ममवमन्यते।

कुब्जाः केन कृताः सर्वाश्चेष्टन्त्यो नाभिभाषथ।

 एवं राजा विनिःश्वस्य समाधिं संदधे ततः॥ २६॥

‘पुत्रियो! यह क्या हुआ? बताओ कौन प्राणी धर्म की अवहेलना करता है? किसने तुम्हें कुबड़ी बना दिया, जिससे तुम तड़प रही हो, किंतु कुछ बताती नहीं हो।’ यों कहकर राजा ने लंबी साँस खींची और उनका उत्तर सुनने के लिये वे सावधान होकर बैठ गये॥२६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे द्वात्रिंशः सर्गः॥३२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें बत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ। ३२॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

 (राजा कुशनाभद्वारा कन्याओं के धैर्य एवं क्षमाशीलता की प्रशंसा, ब्रह्मदत्त की उत्पत्ति तथा उनके साथ कुशनाभ की कन्याओं का विवाह)

त्रयस्त्रिंशः सर्गः 

सर्ग-33

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा कुशनाभस्य धीमतः।

 शिरोभिश्चरणौ स्पृष्ट्वा कन्याशतमभाषत॥१॥

बुद्धिमान् महाराज कुशनाभ का वह वचन सुनकर उन सौ कन्याओंने पिता के चरणों में सिर रखकर प्रणाम किया और इस प्रकार कहा- ॥१॥

वायुः सर्वात्मको राजन् प्रधर्षयितुमिच्छति।

अशुभं मार्गमास्थाय न धर्मं प्रत्यवेक्षते॥२॥

राजन्! सर्वत्र संचार करने वाले वायुदेव अशुभ मार्गका अवलम्बन करके हमपर बलात्कार करना चाहते थे धर्मपर उनकी दृष्टि नहीं थी॥२॥

पितृमत्यः स्म भद्रं ते स्वच्छन्दे न वयं स्थिताः।

 पितरं नो वृणीष्व त्वं यदि नो दास्यते तव॥३॥

हमने उनसे कहा—’देव! आपका कल्याण हो, हमारे पिता विद्यमान हैं; हम स्वच्छन्द नहीं हैं। आप पिताजी के पास जाकर हमारा वरण कीजिये यदि वे हमें आपको सौंप देंगे तो हम आपकी हो जायँगी’।३॥

तेन पापानुबन्धेन वचनं न प्रतीच्छता।

 एवं ब्रुवन्त्यः सर्वाः स्म वायुनाभिहता भृशम्॥ ४॥

परंतु उनका मन तो पापसे बँधा हुआ था उन्होंने हमारी बात नहीं मानी। हम सब बहिनें ये ही धर्मसंगत बातें कह रही थीं, तो भी उन्होंने हमें गहरी चोट पहुँचायी—बिना अपराध के ही हमें पीडा दी॥ ४॥

तासां तु वचनं श्रुत्वा राजा परमधार्मिकः।

प्रत्युवाच महातेजाः कन्याशतमनुत्तमम्॥५॥

उनकी बात सुनकर परम धर्मात्मा महातेजस्वी राजाने उन अपनी परम उत्तम सौ कन्याओंको इस प्रकार उत्तर दिया- ॥ ५॥

क्षान्तं क्षमावतां पुत्र्यः कर्तव्यं सुमहत् कृतम्।

 ऐकमत्यमुपागम्य कुलं चावेक्षितं मम॥६॥

‘पुत्रियो! क्षमाशील महापुरुष ही जिसे कर सकते हैं, वही क्षमा तुमने भी की है। यह तुमलोगोंके द्वारा महान् कार्य सम्पन्न हुआ है। तुम सबने एकमत होकर जो मेरे कुलकी मर्यादा पर ही दृष्टि रखी है कामभाव को अपने मन में स्थान नहीं दिया है—यह भी तुमने बहुत बड़ा काम किया है॥६॥

अलंकारो हि नारीणां क्षमा तु पुरुषस्य वा।

दुष्करं तच्च वै क्षान्तं त्रिदशेषु विशेषतः॥७॥

यादृशी वः क्षमा पुत्र्यः सर्वासामविशेषतः।

‘स्त्री हो या पुरुष, उसके लिये क्षमा ही आभूषण है। पुत्रियो! तुम सब लोगों में समानरूप से जैसी क्षमा या सहिष्णुता है, वह विशेषतः देवताओंके लिये भी दुष्कर ही है॥ ७ १/२॥

 क्षमा दानं क्षमा सत्यं क्षमा यज्ञाश्च पुत्रिकाः॥ ८॥

क्षमा यशः क्षमा धर्मः क्षमायां विष्ठितं जगत्।

‘पुत्रियो! क्षमा दान है, क्षमा सत्य है, क्षमा यज्ञ है, क्षमा यश है और क्षमा धर्म है, क्षमा पर भी यह सम्पूर्ण जगत् टिका हुआ है’ ।। ८ १/२॥

विसृज्य कन्याः काकुत्स्थ राजा त्रिदशविक्रमः॥ ९॥

मन्त्रज्ञो मन्त्रयामास प्रदानं सह मन्त्रिभिः।

देशे काले च कर्तव्यं सदृशे प्रतिपादनम्॥१०॥

ककुत्स्थकुलनन्दन श्रीराम! देवतुल्य पराक्रमी राजा कुशनाभ ने कन्याओं से ऐसा कहकर उन्हें अन्तःपुर में जाने की आज्ञा दे दी और मन्त्रणा के तत्त्व को जानने वाले उन नरेश ने स्वयं मन्त्रियों के साथ बैठकर कन्याओं के विवाह के विषय में विचार आरम्भ किया। विचारणीय विषय यह था कि ‘किस देशमें किस समय और किस सुयोग्य वरके साथ उनका विवाह किया जाय?’ ॥९-१०॥

 एतस्मिन्नेव काले तु चूली नाम महाद्युतिः।

ऊर्ध्वरेताः शुभाचारो ब्राह्म तप उपागमत्॥११॥

उन्हीं दिनों चूली नाम से प्रसिद्ध एक महातेजस्वी, सदाचारी एवं ऊर्ध्वरेता (नैष्ठिक ब्रह्मचारी) मुनि वेदोक्त तपका अनुष्ठान कर रहे थे (अथवा ब्रह्मचिन्तनरूप तपस्यामें संलग्न थे) ॥ ११॥

तपस्यन्तमृषिं तत्र गन्धर्वी पर्युपासते।

 सोमदा नाम भद्रं ते ऊर्मिलातनया तदा॥१२॥

श्रीराम! तुम्हारा भला हो, उस समय एक गन्धर्वकुमारी वहाँ रहकर उन तपस्वी मुनि की उपासना (अनुग्रहकी इच्छा से सेवा) करती थी। उसका नाम था सोमदा, वह ऊर्मिला की पुत्री थी॥ १२॥

सा च तं प्रणता भूत्वा शुश्रूषणपरायणा।

उवास काले धर्मिष्ठा तस्यास्तुष्टोऽभवद् गुरुः॥ १३॥

वह प्रतिदिन मुनि को प्रणाम करके उनकी सेवा में लगी रहती थी तथा धर्म में स्थित रहकर समय-समय पर सेवा के लिये उपस्थित होती थी; इससे उसके ऊपर वे गौरवशाली मुनि बहुत संतुष्ट हुए। १३॥

स च तां कालयोगेन प्रोवाच रघुनन्दन।

 परितुष्टोऽस्मि भद्रं ते किं करोमि तव प्रियम्॥ १४॥

रघुनन्दन! शुभ समय आने पर चूली ने उस गन्धर्व कन्या से कहा—’शुभे! तुम्हारा कल्याण हो, मैं तुम पर बहुत संतुष्ट हूँ बोलो, तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य सिद्ध करूँ’॥ १४ ॥

परितुष्टं मुनिं ज्ञात्वा गन्धर्वी मधुरस्वरम्।

उवाच परमप्रीता वाक्यज्ञा वाक्यकोविदम्॥ १५॥

मुनि को संतुष्ट जानकर गन्धर्व-कन्या बहुत प्रसन्न हुई वह बोलने की कला जानती थी; उसने वाणी के मर्मज्ञ मुनि से मधुर स्वर में इस प्रकार कहा- ॥ १५ ॥

लक्ष्म्या समुदितो ब्राह्मया ब्रह्मभूतो महातपाः।

 ब्राह्मण तपसा युक्तं पुत्रमिच्छामि धार्मिकम्॥ १६॥

‘महर्षे! आप ब्राह्मी सम्पत्ति (ब्रह्मतेज) से सम्पन्न होकर ब्रह्मस्वरूप हो गये हैं, अतएव आप महान् तपस्वी हैं मैं आपसे ब्राह्म तप (ब्रह्म-ज्ञान एवं वेदोक्त तप) से युक्त धर्मात्मा पुत्र प्राप्त करना चाहती हूँ॥१६॥

अपतिश्चास्मि भद्रं ते भार्या चास्मि न कस्यचित्

ब्राह्मणोपगतायाश्च दातुमर्हसि मे सुतम्॥१७॥

‘मुने! आपका भला हो मेरे कोई पति नहीं है मैं न तो किसी की पत्नी हुई हूँ और न आगे होऊँगी, आपकी सेवामें आयी हूँ; आप अपने ब्राह्म बल (तपःशक्ति) से मुझे पुत्र प्रदान करें’॥ १७॥ ।

तस्याः प्रसन्नो ब्रह्मर्षिर्ददौ ब्राह्ममनुत्तमम्।

ब्रह्मदत्त इति ख्यातं मानसं चूलिनः सुतम्॥१८॥

उस गन्धर्व कन्या की सेवा से संतुष्ट हुए ब्रह्मर्षि चूली ने उसे परम उत्तम ब्राह्म तप से सम्पन्न पुत्र प्रदान किया। वह उनके मानसिक संकल्पसे प्रकट हुआ मानस पुत्र था। उसका नाम ‘ब्रह्मदत्त’ हुआ॥१८॥

स राजा ब्रह्मदत्तस्तु पुरीमध्यवसत् तदा।

काम्पिल्यां परया लक्षया देवराजो यथा दिवम्॥ १९॥

(कुशनाभके यहाँ जब कन्याओंके विवाहका विचार चल रहा था) उस समय राजा ब्रह्मदत्त उत्तम लक्ष्मीसे सम्पन्न हो ‘काम्पिल्या’ नामक नगरी में उसी तरह निवास करते थे, जैसे स्वर्ग की अमरावतीपुरी में देवराज इन्द्र॥ १९॥

स बुद्धिं कृतवान् राजा कुशनाभः सुधार्मिकः।

ब्रह्मदत्ताय काकुत्स्थ दातुं कन्याशतं तदा ॥२०॥

ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम! तब परम धर्मात्मा राजा कुशनाभ ने ब्रह्मदत्त के साथ अपनी सौ कन्याओं को ब्याह देनेका निश्चय किया॥ २० ॥

तमाहय महातेजा ब्रह्मदत्तं महीपतिः।

ददौ कन्याशतं राजा सुप्रीतेनान्तरात्मना॥२१॥

महातेजस्वी भूपाल राजा कुशनाभ ने ब्रह्मदत्त को बुलाकर अत्यन्त प्रसन्न चित्त से उन्हें अपनी सौ कन्याएँ सौंप दीं ॥ २१॥

यथाक्रमं तदा पाणिं जग्राह रघुनन्दन।

 ब्रह्मदत्तो महीपालस्तासां देवपतिर्यथा॥२२॥

रघुनन्दन! उस समय देवराज इन्द्र के समान तेजस्वी पृथ्वीपति ब्रह्मदत्त ने क्रमशः उन सभी कन्याओं का पाणिग्रहण किया॥ २२॥

स्पृष्टमात्रे तदा पाणौ विकुब्जा विगतज्वराः।

युक्तं परमया लक्ष्म्या बभौ कन्याशतं तदा॥ २३॥

विवाहकाल में उन कन्याओं के हाथों का ब्रह्मदत्त के हाथ से स्पर्श होते ही वे सब-की-सब कन्याएँ कुब्जत्वदोषसे रहित, नीरोग तथा उत्तम शोभा से सम्पन्न प्रतीत होने लगीं॥ २३॥

स दृष्ट्वा वायुना मुक्ताः कुशनाभो महीपतिः।

बभूव परमप्रीतो हर्षं लेभे पुनः पुनः॥२४॥

वातरोग के रूपमें आये हुए वायुदेव ने उन कन्याओं को छोड़ दिया—यह देख पृथ्वीपति राजा कुशनाभ बड़े प्रसन्न हुए और बारम्बार हर्ष का अनुभव करने लगे॥२४॥

कृतोद्वाहं तु राजानं ब्रह्मदत्तं महीपतिम्।

 सदारं प्रेषयामास सोपाध्यायगणं तदा ॥२५॥

भूपाल राजा ब्रह्मदत्त का विवाह-कार्य सम्पन्न हो जाने पर महाराज कुशनाभ ने उन्हें पत्नियों तथा पुरोहितों सहित आदरपूर्वक विदा किया।। २५ ॥

 सोमदापि सुतं दृष्ट्वा पुत्रस्य सदृशीं क्रियाम्।

यथान्यायं च गन्धर्वी स्नुषास्ताः प्रत्यनन्दत।

स्पृष्ट्वा स्पृष्ट्वा च ताः कन्याः कुशनाभं प्रशस्य च॥२६॥

गन्धर्वी सोमदाने अपने पुत्र को तथा उसके योग्य विवाह-सम्बन्ध को देखकर अपनी उन पुत्रवधुओं का यथोचितरूप से अभिनन्दन किया। उसने एक-एक करके उन सभी राजकन्याओं को हृदयसे लगाया और महाराज कुशनाभ की सराहना करके वहाँ से प्रस्थान किया॥२६॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे त्रयस्त्रिंशः सर्गः॥३३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में तैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३३॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(गाधि की उत्पत्ति, कौशिकी की प्रशंसा, विश्वामित्रजी का कथा बंद करके आधी रात का वर्णन करना)

चतुस्त्रिंशः सर्गः 

सर्ग-34

कृतोद्धाहे गते तस्मिन् ब्रह्मदत्ते च राघव।

 अपुत्रः पुत्रलाभाय पौत्रीमिष्टिमकल्पयत्॥१॥

रघुनन्दन ! विवाह करके जब राजा ब्रह्मदत्त चले गये, तब पुत्रहीन महाराज कुशनाभ ने श्रेष्ठ पुत्र की प्राप्तिके लिये पुत्रेष्टि यज्ञका अनुष्ठान किया॥१॥

इष्टयां तु वर्तमानायां कुशनाभं महीपतिम्।

 उवाच परमोदारः कुशो ब्रह्मसुतस्तदा ॥२॥

उस यज्ञ के होते समय परम उदार ब्रह्मकुमार महाराज कुशने भूपाल कुशनाभ से कहा- ॥२॥

पुत्रस्ते सदृशः पुत्र भविष्यति सुधार्मिकः।

गाधि प्राप्स्यसि तेन त्वं कीर्तिं लोके च शाश्वतीम्॥३॥

‘बेटा! तुम्हें अपने समान ही परम धर्मात्मा पुत्र प्राप्त होगा। तुम ‘गाधि’ नामक पुत्र प्राप्त करोगे और उसके द्वारा तुम्हें संसार में अक्षय कीर्ति उपलब्ध होगी’ ॥३॥

एवमुक्त्वा कुशो राम कुशनाभं महीपतिम्।

 जगामाकाशमाविश्य ब्रह्मलोकं सनातनम्॥४॥

श्रीराम! पृथ्वीपति कुशनाभ से ऐसा कहकर राजर्षि कुश आकाश में प्रविष्ट हो सनातन ब्रह्मलोक को चले गये॥ ४॥

कस्यचित् त्वथ कालस्य कुशनाभस्य धीमतः।

जज्ञे परमधर्मिष्ठो गाधिरित्येव नामतः॥५॥

कुछ काल के पश्चात् बुद्धिमान् राजा कुशनाभके यहाँ परम धर्मात्मा ‘गाधि’ नामक पुत्र का जन्म हुआ॥ ५॥

स पिता मम काकुत्स्थ गाधिः परमधार्मिकः।

कुशवंशप्रसूतोऽस्मि कौशिको रघुनन्दन॥६॥

ककुत्स्थकुलभूषण रघुनन्दन! वे परम धर्मात्मा राजा गाधि मेरे पिता थे मैं कुशके कुल में उत्पन्न होनेके कारण ‘कौशिक’ कहलाता हूँ॥६॥

पूर्वजा भगिनी चापि मम राघव सुव्रता।

 नाम्ना सत्यवती नाम ऋचीके प्रतिपादिता॥७॥

राघव! मेरे एक ज्येष्ठ बहिन भी थी, जो उत्तम व्रत का पालन करने वाली थी उसका नाम सत्यवती था वह ऋचीक मुनि को ब्याही गयी थी॥ ७॥

सशरीरा गता स्वर्गं भर्तारमनुवर्तिनी।

 कौशिकी परमोदारा प्रवृत्ता च महानदी॥८॥

अपने पति का अनुसरण करने वाली सत्यवती शरीर सहित स्वर्गलोक को चली गयी थी। वही परम उदार महानदी कौशिकी के रूप में भी प्रकट होकर इस भूतल पर प्रवाहित होती है॥ ८॥

दिव्या पुण्योदका रम्या हिमवन्तमुपाश्रिता।

लोकस्य हितकार्यार्थं प्रवृत्ता भगिनी मम॥९॥

मेरी वह बहिन जगत् के हित के लिये हिमालय का आश्रय लेकर नदी रूप में प्रवाहित हुई। वह पुण्यसलिला दिव्य नदी बड़ी रमणीय है ॥ ९॥

 ततोऽहं हिमवत्पार्वे वसामि नियतः सुखम्।

भगिन्यां स्नेहसंयुक्तः कौशिक्यां रघुनन्दन॥ १०॥

रघुनन्दन! मेरा अपनी बहिन कौशिकी के प्रति बहुत स्नेह है; अतः मैं हिमालय के निकट उसी के ” तटपर नियमपूर्वक बड़े सुख से निवास करता हूँ। १०॥

सा तु सत्यवती पुण्या सत्ये धर्मे प्रतिष्ठिता।

 पतिव्रता महाभागा कौशिकी सरितां वरा॥११॥

पुण्यमयी सत्यवती सत्य धर्म में प्रतिष्ठित है। वह परम सौभाग्यशालिनी पतिव्रता देवी यहाँ सरिताओं में श्रेष्ठ कौशिकी के रूप में विद्यमान है॥ ११ ॥

अहं हि नियमाद् राम हित्वा तां समुपागतः।

सिद्धाश्रममनुप्राप्तः सिद्धोऽस्मि तव तेजसा॥ १२॥

श्रीराम ! मैं यज्ञ सम्बन्धी नियमकी सिद्धि के लिये ही अपनी बहिनका सांनिध्य छोड़कर सिद्धाश्रम (बक्सर) में आया था। अब तुम्हारे तेज से मुझे वह सिद्धि प्राप्त हो गयी है॥ १२॥

एषा राम ममोत्पत्तिः स्वस्य वंशस्य कीर्तिता।

देशस्य हि महाबाहो यन्मां त्वं परिपृच्छसि॥ १३॥

महाबाहु श्रीराम! तुमने मुझसे जो पूछा था, उसके उत्तरमें मैंने तुम्हें शोणभद्रतटवर्ती देशका परिचय देते हुए यह अपनी तथा अपने कुलकी उत्पत्ति बतायी है।

गतोऽर्धरात्रः काकुत्स्थ कथाः कथयतो मम।

 निद्रामभ्येहि भद्रं ते मा भूद् विघ्नोऽध्वनीह नः॥ १४॥

काकुत्स्थ! मेरे कथा कहते-कहते आधी रात बीत गयी। अब थोड़ी देर नींद ले लो तुम्हारा कल्याण हो। मैं चाहता हूँ कि अधिक जागरणके कारण हमारी यात्रा में विघ्न न पड़े॥१४॥

निष्पन्दास्तरवः सर्वे निलीना मृगपक्षिणः।

 नैशेन तमसा व्याप्ता दिशश्च रघुनन्दन॥१५॥

सारे वृक्ष निष्कम्प जान पड़ते हैं—इनका एक पत्ता भी नहीं हिलता है। पशु-पक्षी अपने-अपने वासस्थान में छिपकर बसेरे लेते हैं। रघुनन्दन ! रात्रि के अन्धकार से सम्पूर्ण दिशाएँ व्याप्त हो रही हैं॥ १५ ॥

शनैर्विसृज्यते संध्या नभो नेत्ररिवावृतम्।

नक्षत्रतारागहनं ज्योतिर्भिरवभासते॥१६॥

धीरे-धीरे संध्या दूर चली गयी नक्षत्रों तथा ताराओं से भरा हुआ आकाश (सहस्राक्ष इन्द्रकी भाँति) सहस्रों ज्योतिर्मय नेत्रों से व्याप्त-सा होकर प्रकाशित हो रहा है।॥ १६ ॥

उत्तिष्ठते च शीतांशुः शशी लोकतमोनुदः।

ह्लादयन् प्राणिनां लोके मनांसि प्रभया स्वया॥ १७॥

सम्पूर्ण लोकका अन्धकार दूर करनेवाले शीतरश्मि चन्द्रमा अपनी प्रभासे जगत् के प्राणियों के मन को आह्लाद प्रदान करते हुए उदित हो रहे हैं * ॥ १७॥

* इस वर्णनसे जान पड़ता है कि उस रात्रिको कृष्णपक्षकी नवमी तिथि थी।

नैशानि सर्वभूतानि प्रचरन्ति ततस्ततः।

यक्षराक्षससङ्घाश्च रौद्राश्च पिशिताशनाः॥ १८॥

रातमें विचरने वाले समस्त प्राणी-यक्ष-राक्षसों के समुदाय तथा भयंकर पिशाच इधर-उधर विचर रहे हैं॥

एवमुक्त्वा महातेजा विरराम महामुनिः।

साधुसाध्विति ते सर्वे मुनयो ह्यभ्यपूजयन्॥१९॥

ऐसा कहकर महातेजस्वी महामुनि विश्वामित्र चुप हो गये। उस समय सभी मुनियों ने साधुवाद देकर विश्वामित्रजी की भूरि-भूरि प्रशंसा की— ॥१९॥

 कुशिकानामयं वंशो महान् धर्मपरः सदा।

ब्रह्मोपमा महात्मानः कुशवंश्या नरोत्तमाः॥ २०॥

‘कुशपुत्रोंका यह वंश सदा ही महान् धर्मपरायण रहा है। कुशवंशी महात्मा श्रेष्ठ मानव ब्रह्माजी के समान तेजस्वी हुए हैं।॥ २० ॥

विशेषेण भवानेव विश्वामित्र महायशः।

कौशिकी सरितां श्रेष्ठा कुलोद्योतकरी तव॥ २१॥

‘महायशस्वी विश्वामित्रजी! अपने वंश में सबसे बड़े महात्मा आप ही हैं तथा सरिताओं में श्रेष्ठ कौशिकी भी आपके कुल की कीर्ति को प्रकाशित करने वाली है॥

 मुदितैर्मुनिशार्दूलैः प्रशस्तः कुशिकात्मजः।

निद्रामुपागमच्छ्रीमानस्तंगत इवांशुमान्॥ २२॥

इस प्रकार आनन्दमग्न हुए उन मुनिवरोंद्वारा प्रशंसित श्रीमान् कौशिक मुनि अस्त हुए सूर्य की भाँति नींद लेने लगे॥ २२॥

रामोऽपि सहसौमित्रिः किंचिदागतविस्मयः।

प्रशस्य मुनिशार्दूलं निद्रां समुपसेवते॥२३॥

वह कथा सुनकर लक्ष्मण सहित श्रीरामको भी कुछ विस्मय हो आया वे भी मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्रकी सराहना करके नींद लेने लगे॥ २३॥

 इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे चतुस्त्रिंशः सर्गः॥३४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में चौंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।३४॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(शोणभद्र पार करके विश्वामित्र आदि का गंगाजी के तटपर पहुँचकर वहाँ रात्रिवास करना, श्रीराम विश्वामित्रजी का उन्हें गंगाजी की उत्पत्ति की कथा सुनाना)

पञ्चत्रिंशः सर्गः 

सर्ग-35

उपास्य रात्रिशेषं तु शोणाकूले महर्षिभिः।

 निशायां सुप्रभातायां विश्वामित्रोऽभ्यभाषत।

महर्षियों सहित विश्वामित्र ने रात्रि के शेषभाग में शोणभद्रके तटपर शयन किया। जब रात बीती और प्रभात हुआ, तब वे श्रीरामचन्द्र जी से इस प्रकार बोले – ॥१॥

सुप्रभाता निशा राम पूर्वा संध्या प्रवर्तते।

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रं ते गमनायाभिरोचय॥२॥

‘श्रीराम! रात बीत गयी। सबेरा हो गया। तुम्हारा कल्याण हो, उठो, उठो और चलनेकी तैयारी करो’। २॥

 तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य कृतपूर्वाणिकक्रियः।

गमनं रोचयामास वाक्यं चेदमुवाच ह॥३॥

मुनिकी बात सुनकर पूर्वाह्णकालका नित्यनियम पूर्ण करके श्रीराम चलनेको तैयार हो गये और इस प्रकार बोले-॥३॥

अयं शोणः शुभजलोऽगाधः पुलिनमण्डितः।

कतरेण पथा ब्रह्मन् संतरिष्यामहे वयम्॥४॥

‘ब्रह्मन्! शुभ जल से परिपूर्ण तथा अपने तटों से  सुशोभित होने वाला यह शोणभद्र तो अथाह जान पड़ता है हमलोग किस मार्ग से चलकर इसे पार करेंगें?’ ॥४॥ ।

एवमुक्तस्तु रामेण विश्वामित्रोऽब्रवीदिदम्।

एष पन्था मयोद्दिष्टो येन यान्ति महर्षयः॥५॥

श्रीराम के ऐसा कहने पर विश्वामित्र बोले—’जिस मार्ग से महर्षिगण शोणभद्रको पार करते हैं, उसका मैंने पहले से ही निश्चय कर रखा है, वह मार्ग यह है’॥५॥

एवमुक्ता महर्षयो विश्वामित्रेण धीमता।

पश्यन्तस्ते प्रयाता वै वनानि विविधानि च॥६॥

बुद्धिमान् विश्वामित्र के ऐसा कहनेपर वे महर्षि नाना प्रकार के वनों की शोभा देखते हुए वहाँ से प्रस्थित हुए॥६॥

ते गत्वा दूरमध्वानं गतेऽर्धदिवसे तदा।

जाह्नवीं सरितां श्रेष्ठां ददृशुर्मुनिसेविताम्॥७॥

बहुत दूर का मार्ग तै कर लेनेपर दोपहर होते-होते उन सब लोगोंने मुनिजनसेवित, सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगाजी के तटपर पहुँचकर उनका दर्शन किया। ७॥

तां दृष्ट्वा पुण्यसलिलां हंससारससेविताम्।

बभूवुर्मुनयः सर्वे मुदिताः सहराघवाः॥८॥

हंसों तथा सारसों से सेवित पुण्यसलिला भागीरथी का दर्शन करके श्रीरामचन्द्र जी के साथ समस्त मुनि बहुत प्रसन्न हुए॥८॥

तस्यास्तीरे तदा सर्वे चक्रुर्वासपरिग्रहम्।

ततः स्नात्वा यथान्यायं संतर्ण्य पितृदेवताः॥९॥

हुत्वा चैवाग्निहोत्राणि प्राश्य चामृतवद्धविः।

विविशुर्जाह्नवीतीरे शुभा मुदितमानसाः॥१०॥

विश्वामित्रं महात्मानं परिवार्य समन्ततः।

उस समय सबने गंगाजीके तट पर डेरा डाला फिर विधिवत् स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण किया। उसके बाद अग्निहोत्र करके अमृत के समान मीठे हविष्य का भोजन किया तदनन्तर वे सभी कल्याणकारी महर्षि प्रसन्नचित्त हो महात्मा विश्वामित्र को चारों ओरसे घेरकर गंगाजीके तटपर बैठ गये॥९-१० १/२॥

विष्ठिताश्च यथान्यायं राघवौ च यथार्हतः।

सम्प्रहृष्टमना रामो विश्वामित्रमथाब्रवीत्॥११॥

जब वे सब मुनि स्थिरभावसे विराजमान हो गये और श्रीराम तथा लक्ष्मण भी यथायोग्य स्थानपर बैठ गये, तब श्रीरामने प्रसन्नचित्त होकर विश्वामित्रजीसे पूछा- ॥११॥

भगवन् श्रोतुमिच्छामि गंगां त्रिपथगां नदीम्।

त्रैलोक्यं कथमाक्रम्य गता नदनदीपतिम्॥१२॥

‘भगवन् ! मैं यह सुनना चाहता हूँ कि तीन मार्गों से प्रवाहित होने वाली नदी ये गंगा जी किस प्रकार तीनों लोकों में घूमकर नदों और नदियों के स्वामी समुद्र में जा मिली हैं?’ ॥ १२॥

चोदितो रामवाक्येन विश्वामित्रो महामुनिः।

वृद्धिं जन्म  गंगाया वक्तुमेवोपचक्रमे॥१३॥

श्रीराम के इस प्रश्न द्वारा प्रेरित हो महामुनि विश्वामित्र ने गंगाजी की उत्पत्ति और वृद्धि की कथा कहना आरम्भ किया— ॥१३॥

शैलेन्द्रो हिमवान् राम धातूनामाकरो महान्।

 तस्य कन्याद्वयं राम रूपेणाप्रतिमं भुवि॥१४॥

‘श्रीराम! हिमवान् नामक एक पर्वत है, जो समस्त पर्वतों का राजा तथा सब प्रकार के धातुओंका बहुत बड़ा खजाना है। हिमवान् की दो कन्याएँ हैं, जिनके सुन्दर रूप की इस

भूतलपर कहीं तुलना नहीं है। १४॥

या मेरुदुहिता राम तयोर्माता सुमध्यमा।

 नाम्ना मेना मनोज्ञा वै पत्नी हिमवतः प्रिया॥ १५॥

‘मेरु पर्वतकी मनोहारिणी पुत्री मेना हिमवान की प्यारी पत्नी है । सुन्दर कटिप्रदेशवाली मेना ही उन दोनों कन्याओंकी जननी हैं॥ १५ ॥

तस्यां गंगेयमभवज्ज्येष्ठा हिमवतः सुता।

उमा नाम द्वितीयाभूत् कन्या तस्यैव राघव॥ १६॥

” ‘रघुनन्दन ! मेनाके गर्भसे जो पहली कन्या उत्पन्न हुई, वही ये गंगाजी हैं । ये हिमवान्की ज्येष्ठ पुत्री हैं । हिमवानकी ही दूसरी कन्या, जो मेना के गर्भसे उत्पन्न हुईं, उमा नामसे प्रसिद्ध हैं ॥ १६॥

 अथ ज्येष्ठां सुराः सर्वे देवकार्यचिकीर्षया।

 शैलेन्द्रं वरयामासुरींगां त्रिपथगां नदीम्॥१७॥

कुछ काल के पश्चात् सब देवताओं ने देवकार्य की सिद्धिके लिये ज्येष्ठ कन्या गंगाजी को, जो आगे चलकर स्वर्ग से त्रिपथगा नदीके रूप में अवतीर्ण हुईं, गिरिराज हिमालय से माँगा ॥ १७॥

ददौ धर्मेण हिमवांस्तनयां लोकपावनीम्।

स्वच्छन्दपथगां गंगां त्रैलोक्यहितकाम्यया॥ १८॥

‘हिमवान्ने त्रिभुवन का हित करनेकी इच्छासे स्वच्छन्द पथ पर विचरने वाली अपनी लोक पावनी पुत्री गंगा को धर्म पूर्वक उन्हें दे दिया॥१८॥

प्रतिगृह्य त्रिलोकार्थं त्रिलोकहितकांक्षिणः।

गंगामादाय तेऽगच्छन् कृतार्थेनान्तरात्मना ॥१९॥

‘तीनों लोकों के हितकी इच्छा वाले देवता त्रिभुवनकी भलाई के लिये ही गंगाजी को लेकर मन ही-मन कृतार्थता का अनुभव करते हुए चले गये। १९॥

या चान्या शैलदुहिता कन्याऽऽसीद्रघुनन्दन।

 उग्रं सुव्रतमास्थाय तपस्तेपे तपोधना॥२०॥

‘रघुनन्दन! गिरिराजकी जो दूसरी कन्या उमा थीं, वे उत्तम एवं कठोर व्रत का पालन करती हुई घोर तपस्यामें लग गयीं उन्होंने तपोमय धनका संचय किया॥ २०॥

उग्रेण तपसा युक्तां ददौ शैलवरः सुताम्।

 रुद्रायाप्रतिरूपाय उमां लोकनमस्कृताम्॥२१॥

‘गिरिराजने उग्र तपस्यामें संलग्न हुई अपनी वह विश्ववन्दिता पुत्री उमा अनुपम प्रभावशाली भगवान् रुद्र को ब्याह दी॥ २१॥

एते ते शैलराजस्य सुते लोकनमस्कृते।

 गंगा च सरितां श्रेष्ठा उमादेवी च राघव॥२२॥

‘रघुनन्दन! इस प्रकार सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगा तथा भगवती उमा—ये दोनों गिरिराज हिमालयकी कन्याएँ हैं। सारा संसार इनके चरणों में मस्तक झुकाता है। २२॥

एतत् ते सर्वमाख्यातं यथा त्रिपथगामिनी।

 खं गता प्रथमं तात गतिं गतिमतां वर ॥२३॥

सैषा सुरनदी रम्या शैलेन्द्रतनया तदा।

 सुरलोकं समारूढा विपापा जलवाहिनी॥२४॥

‘गतिशीलों में श्रेष्ठ तात श्रीराम! गंगाजी की उत्पत्ति के विषय में ये सारी बातें मैंने तुम्हें बता दीं, ये त्रिपथगामिनी कैसे हुईं ? यह भी सुन लो, पहले तो ये आकाश मार्ग में गयी थीं तत्पश्चात् ये गिरिराजकुमारी गंगा रमणीया देवनदी के रूपमें देवलोक में आरूढ़ हुई थीं। फिर जलरूपमें प्रवाहित हो लोगों के पाप दूर करती हुई रसातल में पहुंची थीं’ ॥ २३-२४॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे पञ्चत्रिंशः सर्गः॥ ३५॥

 इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें पैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ। ३५॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(देवताओं का शिव-पार्वती को सुरतक्रीडा से निवृत्त करना तथा उमादेवी का देवताओं और पृथ्वी को शाप देना)

षट्त्रिंशः सर्गः 

सर्ग-36

उक्तवाक्ये मुनौ तस्मिन्नुभौ राघवलक्ष्मणौ।

प्रतिनन्द्य कथां वीरावूचतुर्मुनिपुंगवम्॥१॥

विश्वामित्र जी की बात समाप्त होने पर श्रीराम और लक्ष्मण दोनों वीरों ने उनकी कही हुई कथा का अभिनन्दन करके मुनिवर विश्वामित्र से इस प्रकार कहा- ॥१॥

धर्मयुक्तमिदं ब्रह्मन् कथितं परमं त्वया।

दुहितुः शैलराजस्य ज्येष्ठाया वक्तुमर्हसि।

 विस्तरं विस्तरज्ञोऽसि दिव्यमानुषसम्भवम्॥२॥

‘ब्रह्मन्! आपने यह बड़ी उत्तम धर्मयुक्त कथा सुनायी। अब आप गिरिराज हिमवान् की ज्येष्ठ पुत्री गंगा के दिव्यलोक तथा मनुष्यलोक से सम्बन्ध होने का वृत्तान्त विस्तार के साथ सुनाइये; क्योंकि आप विस्तृत वृत्तान्त के ज्ञाता हैं ॥२॥

 त्रीन् पथो हेतुना केन प्लावयेल्लोकपावनी।

 कथं गंगा त्रिपथगा विश्रुता सरिदुत्तमा॥३॥

‘लोक को पवित्र करने वाली गंगा किस कारण से तीन मार्गों में प्रवाहित होती हैं? सरिताओं में श्रेष्ठ गंगाकी ‘त्रिपथगा’ नाम से प्रसिद्धि क्यों हुई? ॥ ३॥

 त्रिषु लोकेषु धर्मज्ञ कर्मभिः कैः समन्विता।

तथा ब्रुवति काकुत्स्थे विश्वामित्रस्तपोधनः॥४॥

निखिलेन कथां सर्वामृषिमध्ये न्यवेदयत्।

‘धर्मज्ञ महर्षे! तीनों लोकों में वे अपनी तीन धाराओं के द्वारा कौन-कौन-से कार्य करती हैं?’ श्रीरामचन्द्रजी के इस प्रकार पूछने पर तपोधन विश्वामित्र ने मुनिमण्डली के बीच गंगाजी से सम्बन्ध रखनेवाली सारी बातें पूर्णरूप से कह सुनायीं- ॥ ४ १/२॥

पुरा राम कृतोद्वाहः शितिकण्ठो महातपाः॥५॥

दृष्ट्वा च भगवान् देवीं मैथुनायोपचक्रमे।

‘श्रीराम! पूर्वकाल में महातपस्वी भगवान् नीलकण्ठ ने उमादेवी के साथ विवाह करके उनको नववधूके रूपमें अपने निकट आयी देख उनके साथ रति-क्रीडा आरम्भ की॥ ५ १/२॥

तस्य संक्रीडमानस्य महादेवस्य धीमतः।

 शितिकण्ठस्य देवस्य दिव्यं वर्षशतं गतम्॥६॥

‘परम बुद्धिमान् महान् देवता भगवान् नीलकण्ठ के उमादेवी के साथ क्रीडा-विहार करते सौ दिव्य वर्ष बीत गये॥६॥

न चापि तनयो राम तस्यामासीत् परंतप।

 सर्वे देवाः समुद्युक्ताः पितामहपुरोगमाः॥७॥

‘शत्रुओं को संताप देने वाले श्रीराम! इतने वर्षोंतक विहार के बाद भी महादेवजी के उमा देवी के गर्भ से कोई पुत्र नहीं हुआ। यह देख ब्रह्मा आदि सभी देवता उन्हें रोकने का उद्योग करने लगे॥७॥

यदिहोत्पद्यते भूतं कस्तत् प्रतिसहिष्यति।

अभिगम्य सुराः सर्वे प्रणिपत्येदमब्रुवन्॥८॥

“उन्होंने सोचा-इतने दीर्घकाल के पश्चात् यदि रुद्र के तेजसे उमादेवी के गर् भसे कोई महान् प्राणी प्रकट हो भी जाय तो कौन उसके तेज को सहन करेगा? यह विचारकर सब देवता भगवान् शिवके पास जा उन्हें प्रणाम करके यों बोले- ॥८॥

देवदेव महादेव लोकस्यास्य हिते रत।

सुराणां प्रणिपातेन प्रसादं कर्तुमर्हसि॥९॥

‘इस लोक के हितमें तत्पर रहनेवाले देव देव महादेव! देवता आपके चरणोंमें मस्तक झुकाते हैं। इससे प्रसन्न होकर आप इन देवताओंपर कृपा करें॥९॥

न लोका धारयिष्यन्ति तव तेजः सुरोत्तम।

ब्राह्मण तपसा युक्तो देव्या सह तपश्चर॥१०॥

‘सुरश्रेष्ठ! ये लोक आपके तेज को नहीं धारण कर सकेंगे; अतः आप क्रीडा से निवृत्त हो वेद बोधित तपस्या से युक्त होकर उमादेवी के साथ तप कीजिये॥ १०॥

त्रैलोक्यहितकामार्थं तेजस्तेजसि धारय।

रक्ष सर्वानिमाल्लोकान् नालोकं कर्तुमर्हसि ॥ ११॥

‘तीनों लोकोंके हितकी कामनासे अपने तेज (वीर्य) को तेजःस्वरूप अपने-आप में ही धारण कीजिये। इन सब लोकों की रक्षा कीजिये लोकोंका विनाश न कर डालिये’ ॥ ११॥

देवतानां वचः श्रुत्वा सर्वलोकमहेश्वरः।

बाढमित्यब्रवीत् सर्वान् पुनश्चेदमुवाच ह॥१२॥

‘देवताओंकी यह बात सुनकर सर्वलोकमहेश्वर शिवने ‘बहुत अच्छा’ कहकर उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया; फिर उनसे इस प्रकार कहा-॥ १२॥

धारयिष्याम्यहं तेजस्तेजसैव सहोमया।

त्रिदशाः पृथिवी चैव निर्वाणमधिगच्छतु॥१३॥

“देवताओ! उमा सहित मैं अर्थात् हम दोनों अपने तेज से ही तेज को धारण कर लेंगे। पृथ्वी आदि सभी लोकों के निवासी शान्ति लाभ करें॥ १३ ॥

यदिदं क्षुभितं स्थानान्मम तेजो ह्यनुत्तमम्।

 धारयिष्यति कस्तन्मे ब्रुवन्तु सुरसत्तमाः॥१४॥

‘किंतु सुरश्रेष्ठगण! यदि मेरा यह सर्वोत्तम तेज (वीर्य) क्षुब्ध होकर अपने स्थान से स्खलित हो जाय तो उसे कौन धारण करेगा?—यह मुझे बताओ’। १४॥

एवमुक्तास्ततो देवाः प्रत्यूचुर्वृषभध्वजम्।

यत्तेजः क्षुभितं ह्यद्य तद्धरा धारयिष्यति॥१५॥

उनके ऐसा कहने पर देवताओं ने वृषभध्वज भगवान् शिव से कहा—’भगवन् ! आज आपका जो तेज क्षुब्ध होकर गिरेगा, उसे यह पृथ्वी देवी धारण करेगी’। १५॥

 एवमुक्तः सुरपतिः प्रमुमोच महाबलः।

 तेजसा पृथिवी येन व्याप्ता सगिरिकानना॥१६॥

‘देवताओंका यह कथन सुनकर महाबली देवेश्वर शिव ने अपना तेज छोड़ा, जिससे पर्वत और वनों सहित यह सारी पृथ्वी व्याप्त हो गयी॥ १६ ॥

ततो देवाः पुनरिदमूचुश्चापि हुताशनम्।

आविश त्वं महातेजो रौद्रं वायुसमन्वितः॥१७॥

‘तब देवताओंने अग्नि देव से कहा—’अग्ने! तुम वायु के सहयोग से भगवान् शिवके इस महान् तेज को अपने भीतर रख लो’ ॥ १७॥

तदग्निना पुनर्व्याप्तं संजातं श्वेतपर्वतम्।

दिव्यं शरवणं चैव पावकादित्यसंनिभम्॥१८॥

‘अग्नि से व्याप्त होने पर वह तेज श्वेत पर्वत के रूप में परिणत हो गया। साथ ही वहाँ दिव्य सरकंडों का वन भी प्रकट हुआ, जो अग्नि और सूर् यके समान तेजस्वी प्रतीत होता था॥ १८॥

यत्र जातो महातेजाः कार्तिकेयोऽग्निसम्भवः ।

 अथोमां च शिवं चैव देवाः सर्षिगणास्तथा॥ १९॥

 पूजयामासुरत्यर्थं सुप्रीतमनसस्तदा।

‘उसी वनमें अग्निजनित महातेजस्वी कार्तिकेयका प्रादुर्भाव हुआ। तदनन्तर ऋषियों सहित देवताओं ने अत्यन्त प्रसन्नचित्त होकर देवी उमा और भगवान् शिवका बड़े भक्तिभावसे पूजन किया। १९ १/२॥

 अथ शैलसुता राम त्रिदशानिदमब्रवीत्॥२०॥

समन्युरशपत् सर्वान् क्रोधसंरक्तलोचना।

‘श्रीराम! इसके बाद गिरिराजनन्दिनी उमा के नेत्र क्रोध से लाल हो गये। उन्होंने समस्त देवताओं को रोषपूर्वक शाप दे दिया। वे बोलीं- ॥२० १/२॥

यस्मान्निवारिता चाहं संगता पुत्रकाम्यया॥२१॥

अपत्यं स्वेषु दारेषु नोत्पादयितुमर्हथ।

 अद्यप्रभृति युष्माकमप्रजाः सन्तु पत्नयः॥ २२॥

‘देवताओ ! मैंने पुत्र-प्राप्तिकी इच्छा से पति के साथ समागम किया था, परंतु तुमने मुझे रोक दिया अतः अब तुम लोग भी अपनी पत्नियों से संतान उत्पन्न करने योग्य नहीं रह जाओगे। आज से तुम्हारी पत्नियाँ संतानोत्पादन नहीं कर सकेंगी संतानहीन हो जायँगी’ ॥ २१-२२॥

 एवमुक्त्वा सुरान् सर्वान् शशाप पृथिवीमपि।

अवने नैकरूपा त्वं बहभार्या भविष्यसि ॥२३॥

‘सब देवताओं से ऐसा कहकर उमादेवी ने पृथिवी को भी शाप दिया—’भूमे! तेरा एक रूप नहीं रह जायगा तू बहुतों की भार्या होगी॥ २३॥

न च पुत्रकृतां प्रीतिं मत्क्रोधकलुषीकृता।

 प्राप्स्यसि त्वं सुदुर्मेधो मम पुत्रमनिच्छती॥ २४॥

‘खोटी बुद्धिवाली पृथ्वी! तू चाहती थी कि मेरे पुत्र न हो अतः मेरे क्रोध से कलुषित होकर तू भी पुत्रजनित सुख या प्रसन्नता का अनुभव न कर सकेगी’ ॥ २४॥

 तान् सर्वान् पीडितान् दृष्ट्वा सुरान् सुरपतिस्तदा।

 गमनायोपचक्राम दिशं वरुणपालिताम्॥ २५॥

‘उन सब देवताओंको उमादेवी के शाप से पीडित देख देवेश्वर भगवान् शिव ने उस समय पश्चिम दिशा की ओर प्रस्थान कर दिया॥ २५ ॥

स गत्वा तप आतिष्ठत् पार्श्वे तस्योत्तरे गिरेः।

हिमवत्प्रभवे श्रृंगे सह देव्या महेश्वरः॥२६॥

‘वहाँ से जाकर हिमालय पर्वत के उत्तर भाग में उसी के एक शिखरपर उमादेवी के साथ भगवान् महेश्वर तप करने लगे॥ २६॥

एष ते विस्तरो राम शैलपुत्र्या निवेदितः।

गंगायाः प्रभवं चैव शृणु मे सहलक्ष्मण ॥२७॥

‘लक्ष्मण सहित श्रीराम! यह मैंने तुम्हें गिरिराज हिमवान् की छोटी पुत्री उमादेवी का विस्तृत वृत्तान्त बताया है अब मुझसे गंगा के प्रादुर्भाव की कथा  सुनो’ ।। २७॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे षत्रिंशः सर्गः ॥३६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में छत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(गंगा से कार्तिकेय की उत्पत्ति का प्रसंग)

सप्तत्रिंशः सर्गः  

सर्ग-37

तप्यमाने तदा देवे सेन्द्राः साग्निपुरोगमाः।

सेनापतिमभीप्सन्तः पितामहमुपागमन्॥१॥

जब महादेवजी तपस्या कर रहे थे, उस समय इन्द्र और अग्नि आदि सम्पूर्ण देवता अपने लिये सेनापति की इच्छा लेकर ब्रह्माजी के पास आये॥१॥

ततोऽब्रुवन् सुराः सर्वे भगवन्तं पितामहम्।

प्रणिपत्य सुराराम सेन्द्राः साग्निपुरोगमाः॥२॥

देवताओं को आराम देनेवाले श्रीराम! इन्द्र और अग्निसहित समस्त देवताओं ने भगवान् ब्रह्मा को प्रणाम करके इस प्रकार कहा— ॥२॥

येन सेनापतिर्देव दत्तो भगवता पुरा।

स तपः परमास्थाय तप्यते स्म सहोमया॥३॥

‘प्रभो! पूर्वकाल में जिन भगवान् महेश्वरने हमें (बीजरूपसे) सेनापति प्रदान किया था, वे उमादेवी के साथ उत्तम तप का आश्रय लेकर तपस्या करते हैं ॥ ३॥

यदत्रानन्तरं कार्यं लोकानां हितकाम्यया।

संविधत्स्व विधानज्ञ त्वं हि नः परमा गतिः॥४॥

‘विधि-विधान के ज्ञाता पितामह ! अब लोकहित के लिये जो कर्तव्य प्राप्त हो, उसको पूर्ण कीजिये; क्योंकि आप ही हमारे परम आश्रय हैं’॥ ४॥

देवतानां वचः श्रुत्वा सर्वलोकपितामहः।

सान्त्वयन् मधुरैर्वाक्यैस्त्रिदशानिदमब्रवीत्॥५॥

देवताओं की यह बात सुनकर सम्पूर्ण लोकों के पितामह ब्रह्माजी ने मधुर वचनों द्वारा उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा— ॥५॥

शैलपुत्र्या यदुक्तं तन्न प्रजाः स्वासु पत्निषु।

तस्या वचनमक्लिष्टं सत्यमेव न संशयः॥६॥

‘देवताओ! गिरिराजकुमारी पार्वती ने जो शाप दिया है, उसके अनुसार तुम्हें अपनी पत्नियों के गर्भ से अब कोई संतान नहीं होगी। उमादेवी की वाणी अमोघ है; अतः वह सत्य होकर ही रहेगी,इसमें संशय नहीं है।

इयमाकाशगंगा च यस्यां पुत्रं हुताशनः।

जनयिष्यति देवानां सेनापतिमरिंदमम्॥७॥

‘ये हैं उमा की बड़ी बहिन आकाशगंगा, जिनके गर्भ में शङ्करजी के उस तेज को स्थापित करके अग्निदेव एक ऐसे पुत्र को जन्म देंगे जो देवताओं के शत्रुओं का दमन करने में समर्थ सेनापति होगा॥७॥

ज्येष्ठा शैलेन्द्रदुहिता मानयिष्यति तं सुतम्।

उमायास्तबहुमतं भविष्यति न संशयः॥८॥

‘ये गंगा गिरिराज की ज्येष्ठ पुत्री हैं, अतः अपनी छोटी बहिन के उस पुत्र को अपने ही पुत्र के समान मानेंगी। उमा को भी यह बहुत प्रिय लगेगा इसमें संशय नहीं है’।

तच्छ्रत्वा वचनं तस्य कृतार्था रघुनन्दन।

प्रणिपत्य सुराः सर्वे पितामहमपूजयन्॥९॥

रघुनन्दन! ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर सब देवता कृतकृत्य हो गये। उन्होंने ब्रह्माजी को प्रणाम करके उनका पूजन किया॥९॥

ते गत्वा परमं राम कैलासं धातुमण्डितम्।

अग्निं नियोजयामासुः पुत्रार्थं सर्वदेवताः॥१०॥

श्रीराम! विविध धातुओं से अलंकृत उत्तम कैलास पर्वत पर जाकर उन सम्पूर्ण देवताओं ने अग्निदेव को पुत्र उत्पन्न करने के कार्य में नियुक्त किया॥ १० ॥

देवकार्यमिदं देव समाधत्स्व हुताशन।

शैलपुत्र्यां महातेजो गंगायां तेज उत्सृज॥११॥

वे बोले—’देव! हुताशन! यह देवताओं का कार्य है, इसे सिद्ध कीजिये। भगवान् रुद्र के उस महान् तेज को अब आप गंगाजी में स्थापित कर दीजिये’। ११॥

देवतानां प्रतिज्ञाय गंगामभ्येत्य पावकः।

गर्भ धारय वै देवि देवतानामिदं प्रियम्॥१२॥

तब देवताओं से ‘बहुत अच्छा’ कहकर अग्निदेव गंगाजी के निकट आये और बोले—’देवि! आप इस गर्भ को धारण करें यह देवताओं का प्रिय कार्य है’। १२॥

इत्येतद् वचनं श्रुत्वा दिव्यं रूपमधारयत्।

स तस्या महिमां दृष्ट्वा समन्तादवशीर्यत॥१३॥

अग्निदेव की यह बात सुनकर गंगादेवी ने दिव्यरूप धारण कर लिया। उनकी यह महिमा—यह रूप वैभव देखकर अग्निदेव ने उस रुद्र-तेज को उनके सब ओर बिखेर दिया॥१३॥

समन्ततस्तदा देवीमभ्यषिञ्चत पावकः।

सर्वस्रोतांसि पूर्णानि गंगाया रघुनन्दन॥१४॥

रघुनन्दन ! अग्निदेव ने जब गंगादेवी को सब ओर से उस रुद्र-तेजद्वारा अभिषिक्त कर दिया, तब गंगाजी के सारे स्रोत उससे परिपूर्ण हो गये॥ १४ ॥

तमुवाच ततो गंगा सर्वदेवपुरोगमम्।

अशक्ता धारणे देव तेजस्तव समुद्धतम्॥१५॥

दह्यमानाग्निना तेन सम्प्रव्यथितचेतना।

तब गंगा ने समस्त देवताओं के अग्रगामी अग्निदेव से इस प्रकार कहा—’देव! आपके द्वारा स्थापित किये गये इस बढ़े हुए तेजको धारण करने में मैं असमर्थ हूँ। इसकी आँच से जल रही हूँ और मेरी चेतना व्यथित हो गयी है’ ॥ १५ १/२॥

अथाब्रवीदिदं गंगां सर्वदेवहुताशनः ॥१६॥

इह हैमवते पार्वे गर्भोऽयं संनिवेश्यताम्।

तब सम्पूर्ण देवताओं के हविष्य को भोग लगाने वाले अग्निदेव ने गंगादेवी से कहा—’देवि! हिमालय पर्वत के पार्श्वभाग में इस गर्भ को स्थापित कर दीजिये’ ॥ १६ १/२ ॥

श्रुत्वा त्वग्निवचो गंगा तं गर्भमतिभास्वरम्॥ १७॥

उत्ससर्ज महातेजाः स्रोतोभ्यो हि तदानघ।

निष्पाप रघुनन्दन! अग्नि की यह बात सुनकर महातेजस्विनी गंगा ने उस अत्यन्त प्रकाशमान गर्भ को अपने स्रोतों से निकालकर यथोचित स्थान में रख दिया॥

यदस्या निर्गतं तस्मात् तप्तजाम्बूनदप्रभम्॥१८॥

काञ्चनं धरणी प्राप्तं हिरण्यमतुलप्रभम्।

तानं काष्र्णायसं चैव तैक्ष्ण्यादेवाभिजायत॥ १९॥

गंगा के गर्भसे जो तेज निकला, वह तपाये हुए जाम्बूनद नामक सुवर्ण के समान कान्तिमान् दिखायी देने लगा (गंगा सुवर्णमय मेरुगिरि से प्रकट हुई हैं;अतः उनका बालक भी वैसे ही रूप-रंग का हुआ)। पृथ्वीपर जहाँ वह तेजस्वी गर्भ स्थापित हुआ,वहाँ की भूमि तथा प्रत्येक वस्तु सुवर्णमयी हो गयी। उसके आस-पास का स्थान अनुपम प्रभा से प्रकाशित होने वाला रजत हो गया। उस तेज की तीक्ष्णता से ही दूरवर्ती भूभाग की वस्तुएँ ताँबे और लोहे के रूप में परिणत हो गयीं॥ १८-१९॥

मलं तस्याभवत् तत्र त्रपु सीसकमेव च।

तदेतद्धरणीं प्राप्य नानाधातुरवर्धत ॥२०॥

उस तेजस्वी गर्भ का जो मल था, वही वहाँ राँगा और सीसा हुआ। इस प्रकार पृथ्वी पर पड़कर वहतेज नाना प्रकार के धातुओं के रूप में वृद्धि को प्राप्त हुआ॥ २०॥

निक्षिप्तमात्रे गर्भे तु तेजोभिरभिरञ्जितम्।

सर्वं पर्वतसंनद्धं सौवर्णमभवद् वनम्॥२१॥

पृथ्वी पर उस गर् भके रखे जाते ही उसके तेज से व्याप्त होकर पूर्वोक्त श्वेतपर्वत और उससे सम्बन्ध रखने वाला सारा वन सुवर्णमय होकर जगमगाने लगा॥ २१॥

जातरूपमिति ख्यातं तदाप्रभृति राघव।

सुवर्णं पुरुषव्याघ्र हुताशनसमप्रभम्।

तृणवृक्षलतागुल्मं सर्वं भवति काञ्चनम् ॥ २२॥

पुरुषसिंह रघुनन्दन! तभी से अग्नि के समान प्रकाशित होने वाले सुवर्ण का नाम जातरूप हो गया; क्योंकि उसी समय सुवर्ण का तेजस्वी रूप प्रकट हुआ था। उस गर्भ के सम्पर्क से वहाँ का तृण, वृक्ष, लता और गुल्म-सब कुछ सोने का हो गया॥ २२॥

तं कुमारं ततो जातं सेन्द्राः सह मरुद्गणाः।

क्षीरसम्भावनार्थाय कृत्तिकाः समयोजयन्॥ २३॥

तदनन्तर इन्द्र और मरुद्गणों सहित सम्पूर्ण देवताओं ने वहाँ उत्पन्न हए कमार को दूध पिलाने के लिये छहों कृत्तिकाओं को नियुक्त किया॥ २३॥ ।

ताः क्षीरं जातमात्रस्य कृत्वा समयमुत्तमम्।

ददुः पुत्रोऽयमस्माकं सर्वासामिति निश्चिताः॥ २४॥

तब उन कृत्तिकाओं ने ‘यह हम सबका पुत्र हो’ ऐसी उत्तम शर्त रखकर और इस बात का निश्चित विश्वास लेकर उस नवजात बालक को अपना दूध प्रदान किया।॥ २४॥

ततस्तु देवताः सर्वाः कार्तिकेय इति ब्रुवन्।

पुत्रस्त्रैलोक्यविख्यातो भविष्यति न संशयः॥ २५॥

उस समय सब देवता बोले—’यह बालक कार्तिकेय कहलायेगा और तुमलोगोंका त्रिभुवनविख्यात पुत्र होगा—इसमें संशय नहीं है’। २५॥

तेषां तद् वचनं श्रुत्वा स्कन्नं गर्भपरिस्रवे।

स्नापयन् परया लक्ष्या दीप्यमानं यथानलम्॥२६॥

देवताओं का यह अनुकूल वचन सुनकर शिव और पार्वती से स्कन्दित (स्खलित) तथा गंगा द्वारा गर्भस्राव होने पर प्रकट हुए अग्नि के समान उत्तम प्रभा से प्रकाशित होने वाले उस बालक को कृत्तिकाओं ने नहलाया।

स्कन्द इत्यब्रुवन् देवाः स्कन्नं गर्भपरिस्रवे।

कार्तिकेयं महाबाहुं काकुत्स्थ ज्वलनोपमम्॥२७॥

ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम! अग्नितुल्य तेजस्वी महाबाहु कार्तिकेय गर्भस्रावकाल में स्कन्दित हुए थे; इसलिये देवताओं ने उन्हें स्कन्द कहकर पुकारा॥ २७॥

प्रादुर्भूतं ततः क्षीरं कृत्तिकानामनुत्तमम्।

षण्णां षडाननो भूत्वा जग्राह स्तनजं पयः॥२८॥

तदनन्तर कृत्तिकाओं के स्तनों में परम उत्तम दूध प्रकट हुआ। उस समय स्कन्दने अपने छः मुख प्रकट करके उन छहों का एक साथ ही स्तनपान किया॥२८॥

गृहीत्वा क्षीरमेकाना सुकुमारवपुस्तदा।

अजयत् स्वेन वीर्येण दैत्यसैन्यगणान् विभुः॥ २९॥

एक ही दिन दूध पीकर उस सुकुमार शरीर वाले शक्तिशाली कुमार ने अपने पराक्रम से दैत्यों की सारी सेनाओं पर विजय प्राप्त की॥ २९॥

सुरसेनागणपतिमभ्यषिञ्चन्महाद्युतिम्।

ततस्तममराः सर्वे समेत्याग्निपुरोगमाः॥३०॥

तत्पश्चात् अग्नि आदि सब देवताओं ने मिलकर उन महातेजस्वी स्कन्दका देवसेनापति के पदपर अभिषेक किया॥ ३०॥

एष ते राम गंगाया विस्तरोऽभिहितो मया।

कुमारसम्भवश्चैव धन्यः पुण्यस्तथैव च॥३१॥

श्रीराम! यह मैंने तुम्हें गंगाजी के चरित्र को विस्तारपूर्वक बताया है। साथ ही कुमार कार्तिकेय के जन्म का भी प्रसंग सुनाया है, जो श्रोता को धन्य एवं पुण्यात्मा बनाने वाला है॥ ३१॥

भक्तश्च यः कार्तिकेये काकुत्स्थ भुवि मानवः।

आयुष्मान् पुत्रपौत्रैश्च स्कन्दसालोक्यतां व्रजेत्॥ ३२॥

काकुत्स्थ! इस पृथ्वी पर जो मनुष्य कार्तिकेय में भक्तिभाव रखता है, वह इस लोक में दीर्घायु तथा पुत्र-पौत्रों से सम्पन्न हो मृत्यु के पश्चात् स्कन्द के लोक में जाता है।

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे सप्तत्रिंशः सर्गः॥ ३७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में सैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥३७॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(राजा सगर के पुत्रों की उत्पत्ति तथा यज्ञ की तैयारी)

अष्टात्रिंशः सर्गः 

सर्ग-38

तां कथां कौशिको रामे निवेद्य मधुराक्षराम्।

पुनरेवापरं वाक्यं काकुत्स्थमिदमब्रवीत्॥१॥

विश्वामित्रजी ने मधुर अक्षरों से युक्त वह कथा श्रीराम को सुनाकर फिर उनसे दूसरा प्रसंग इस प्रकार कहा— ॥१॥

अयोध्याधिपतिर्वीर पूर्वमासीन्नराधिपः।

सगरो नाम धर्मात्मा प्रजाकामः स चाप्रजः॥२॥

‘वीर! पहले की बात है, अयोध्या सगर नाम से प्रसिद्ध एक धर्मात्मा राजा राज्य करते थे। उन्हें कोई पुत्र नहीं था; अतः वे पुत्र-प्राप्ति के लिये सदा उत्सुक रहा करते थे॥२॥

वैदर्भदुहिता राम केशिनी नाम नामतः।

ज्येष्ठा सगरपत्नी सा धर्मिष्ठा सत्यवादिनी॥३॥

‘श्रीराम! विदर्भराजकुमारी केशिनी राजा सगर की ज्येष्ठ पत्नी थी। वह बड़ी धर्मात्मा और सत्यवादिनी थी॥३॥

अरिष्टनेमेर्दुहिता सुपर्णभगिनी तु सा।

द्वितीया सगरस्यासीत् पत्नी सुमतिसंज्ञिता॥४॥

‘सगर की दूसरी पत्नी का नाम सुमति था। वह अरिष्टनेमि कश्यप की पुत्री तथा गरुड की बहिन थी॥ ४॥

ताभ्यां सह महाराजः पत्नीभ्यां तप्तवांस्तपः।

हिमवन्तं समासाद्य भृगुप्रस्रवणे गिरौ॥५॥

‘महाराज सगर अपनी उन दोनों पत्नियों के साथ हिमालय पर्वतपर जाकर भृगुप्रस्रवण नामक शिखर पर तपस्या करने लगे।॥ ५॥

अथ वर्षशते पूर्णे तपसाऽऽराधितो मुनिः।

सगराय वरं प्रादाद् भृगुः सत्यवतां वरः॥६॥

‘सौ वर्ष पूर्ण होने पर उनकी तपस्या द्वारा प्रसन्न हुए सत्यवादियों में श्रेष्ठ महर्षि भृगुने राजा सगर को वर दिया॥६॥

अपत्यलाभः सुमहान् भविष्यति तवानघ।

कीर्तिं चाप्रतिमां लोके प्राप्स्यसे पुरुषर्षभ॥७॥

‘निष्पाप नरेश! तुम्हें बहुत-से पुत्रों की प्राप्ति होगी। । पुरुषप्रवर! तुम इस संसार में अनुपम कीर्ति प्राप्त करोगे॥७॥

एका जनयिता तात पुत्रं वंशकरं तव।

षष्टिं पुत्रसहस्राणि अपरा जनयिष्यति॥८॥

‘तात! तुम्हारी एक पत्नी तो एक ही पुत्रको जन्म देगी, जो अपनी वंशपरम्पराका विस्तार करनेवाला होगा तथा दूसरी पत्नी साठ हजार पुत्रोंकी जननी होगी॥८॥

भाषमाणं महात्मानं राजपुत्र्यौ प्रसाद्य तम्।

ऊचतुः परमप्रीते कृताञ्जलिपुटे तदा॥९॥

‘महात्मा भृगु जब इस प्रकार कह रहे थे, उस समय उन दोनों राजकुमारियों (रानियों)-ने उन्हें प्रसन्न करके स्वयं भी अत्यन्त आनन्दित हो दोनों हाथ जोड़कर पूछा- ॥९॥

एकः कस्याः सुतो ब्रह्मन् का बहूञ्जनयिष्यति।

श्रोतुमिच्छावहे ब्रह्मन् सत्यमस्तु वचस्तव॥१०॥

‘ब्रह्मन् ! किस रानी के एक पुत्र होगा और कौन बहुत-से पुत्रों की जननी होगी? हम दोनों यह सुनना चाहती हैं आपकी वाणी सत्य हो’ ।। १० ।।

तयोस्तद् वचनं श्रुत्वा भृगुः परमधार्मिकः।

उवाच परमां वाणी स्वच्छन्दोऽत्र विधीयताम्॥ ११॥

एको वंशकरो वास्तु बहवो वा महाबलाः।

कीर्तिमन्तो महोत्साहाः का वा कं वरमिच्छति॥ १२॥

“उन दोनों की यह बात सुनकर परम धर्मात्मा भृगुने उत्तम वाणी में कहा—’देवियो! तुम लोग यहाँ अपनी इच्छा प्रकट करो। तुम्हें वंश चलाने वाला एक ही पुत्र प्राप्त हो अथवा महान् बलवान्, यशस्वी एवं अत्यन्त उत्साही बहुत-से पुत्र? इन दो वरों में से किस वर को कौन-सी रानी ग्रहण करना चाहती है ?’ ।। ११-१२ ॥

मुनेस्तु वचनं श्रुत्वा केशिनी रघुनन्दन।

पुत्रं वंशकरं राम जग्राह नृपसंनिधौ॥१३॥

‘रघुकुलनन्दन श्रीराम! मुनि का यह वचन सुनकर केशिनी ने राजा सगर के समीप वंश चलाने वाले एक ही पुत्र का वर ग्रहण किया॥१३॥

षष्टिं पुत्रसहस्राणि सुपर्णभगिनी तदा।

महोत्साहान् कीर्तिमतो जग्राह सुमतिः सुतान्॥ १४॥

‘तब गरुड़ की बहिन सुमति ने महान् उत्साही और यशस्वी साठ हजार पुत्रों को जन्म देने का वर प्राप्त किया॥ १४॥

प्रदक्षिणमृषिं कृत्वा शिरसाभिप्रणम्य तम्।

जगाम स्वपुरं राजा सभार्यो रघुनन्दन॥१५॥

‘रघुनन्दन! तदनन्तर रानियों सहित राजा सगर ने महर्षि की परिक्रमा करके उनके चरणों में मस्तक झुकाया और अपने नगर को प्रस्थान किया।॥ १५ ॥

अथ काले गते तस्य ज्येष्ठा पुत्रं व्यजायत।

असमञ्ज इति ख्यातं केशिनी सगरात्मजम्॥ १६॥

‘कुछ काल व्यतीत होने पर बड़ी रानी केशिनी ने सगर के औरस पुत्र ‘असमञ्ज’ को जन्म दिया। १६॥

सुमतिस्तु नरव्याघ्र गर्भतुम्बं व्यजायत।

षष्टिः पुत्रसहस्राणि तुम्बभेदाद् विनिःसृताः॥ १७॥

‘पुरुषसिंह! (छोटी रानी) सुमति ने तूंबी के आकार का एक गर्भपिण्ड उत्पन्न किया। उसको फोड़ने से साठ हजार बालक निकले॥ १७॥

घृतपूर्णेषु कुम्भेषु धात्र्यस्तान् समवर्धयन्।

कालेन महता सर्वे यौवनं प्रतिपेदिरे॥१८॥

“उन्हें घी से भरे हुए घड़ों में रखकर धाइयाँ उनका पालन-पोषण करने लगीं। धीरे-धीरे जब बहुत दिन बीत गये, तब वे सभी बालक युवावस्था को प्राप्त हुए॥

अथ दीर्पण कालेन रूपयौवनशालिनः।

षष्टिः पुत्रसहस्राणि सगरस्याभवंस्तदा॥१९॥

‘इस तरह दीर्घकाल के पश्चात् राजा सगर के रूप और युवावस्था से सुशोभित होने वाले साठ हजार पुत्र तैयार हो गये॥ १९॥

स च ज्येष्ठो नरश्रेष्ठ सगरस्यात्मसम्भवः।

बालान् गृहीत्वा तु जले सरय्वा रघुनन्दन ॥२०॥

प्रक्षिप्य प्राहसन्नित्यं मज्जतस्तान् निरीक्ष्य वै।

‘नरश्रेष्ठ रघुनन्दन! सगर का ज्येष्ठ पुत्र असमञ्ज नगर के बालकों को पकड़कर सरयू के जल में फेंक देता और जब वे डूबने लगते, तब उनकी ओर देखकर हँसा करता॥ २० १/२॥

एवं पापसमाचारः सज्जनप्रतिबाधकः॥२१॥

पौराणामहिते युक्तः पित्रा निर्वासितः पुरात्।

‘इस प्रकार पापाचार में प्रवृत्त होकर जब वह सत्पुरुषों को पीडा देने और नगर-निवासियों का अहित करने लगा, तब पिता ने उसे नग रसे बाहर निकाल दिया॥ २१ १/२॥

तस्य पुत्रोंऽशुमान् नाम असमञ्जस्य वीर्यवान्॥२२॥

 सम्मतः सर्वलोकस्य सर्वस्यापि प्रियंवदः।

‘असमञ्ज के पुत्र का नाम था अंशुमान्,वह बड़ा ही पराक्रमी, सबसे मधुर वचन बोलनेवाला तथा सब लोगों को प्रिय था॥ २२ १/२॥

ततः कालेन महता मतिः समभिजायत॥२३॥

सगरस्य नरश्रेष्ठ यजेयमिति निश्चिता।

‘नरश्रेष्ठ! कुछ काल के अनन्तर महाराज सगर के मन में यह निश्चित विचार हुआ कि ‘मैं यज्ञ करूँ’॥ २३ १/२॥

स कृत्वा निश्चयं राजा सोपाध्यायगणास्तदा।

यज्ञकर्मणि वेदज्ञो यष्टुं समुपचक्रमे ॥२४॥

‘यह दृढ़ निश्चय करके वे वेदवेत्ता नरेश अपने उपाध्यायों के साथ यज्ञ करने की तैयारी में लग गये’। २४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डेऽष्टात्रिंशः सर्गः॥३८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में अड़तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।३८॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(इन्द्र के द्वारा राजा सगर के यज्ञ सम्बन्धी अश्व का अपहरण, सगरपुत्रों द्वारा सारी पृथ्वी का भेदन )

एकोनचत्वारिंशः सर्गः 

सर्ग-39

विश्वामित्रवचः श्रुत्वा कथान्ते रघुनन्दनः।

उवाच परमप्रीतो मुनिं दीप्तमिवानलम्॥१॥

विश्वामित्रजी की कही हुई कथा सुनकर श्रीरामचन्द्र जी बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने कथा के अन्त में अग्नितुल्य तेजस्वी विश्वामित्र मुनि से कहा – ॥१॥

श्रोतुमिच्छामि भद्रं ते विस्तरेण कथामिमाम्।

पूर्वजो मे कथं ब्रह्मन् यज्ञं वै समुपाहरत्॥२॥

‘ब्रह्मन्! आपका कल्याण हो मैं इस कथा को विस्तार के साथ सुनना चाहता हूँ। मेरे पूर्वज महाराज सगर ने किस प्रकार यज्ञ किया था?’ ॥२॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा कौतूहलसमन्वितः।

विश्वामित्रस्तु काकुत्स्थमुवाच प्रहसन्निव॥३॥

उनकी वह बात सुनकर विश्वामित्रजी को बड़ा कौतूहल हुआ। वे यह सोचकर कि मैं जो कुछ कहना चाहता हूँ, उसी के लिये ये प्रश्न कर रहे हैं, जोर-जोर से हँस पड़े। हँसते हुए-से ही उन्होंने श्रीराम से कहा- ॥

श्रूयतां विस्तरो राम सगरस्य महात्मनः ।

शंकरश्वशुरो नाम्ना हिमवानिति विश्रुतः॥४॥

विन्ध्यपर्वतमासाद्य निरीक्षेते परस्परम्।

तयोर्मध्ये समभवद् यज्ञः स पुरुषोत्तम॥५॥

‘राम! तुम महात्मा सगर के यज्ञ का विस्तारपूर्वक वर्णन सुनो। पुरुषोत्तम! शङ्करजी के श्वशुर हिमवान् नाम से विख्यात पर्वत विन्ध्याचल तक पहुँचकर तथा विन्ध्यपर्वत हिमवान् तक पहुँचकर दोनों एक दूसरेको देखते हैं (इन दोनों के बीच में दूसरा कोई ऐसा ऊँचा पर्वत नहीं है, जो दोनों के पारस्परिक दर्शन में बाधा उपस्थित कर सके)। इन्हीं दोनों पर्वतों के बीच आर्यावर्त की पुण्यभूमि में उस यज्ञ का अनुष्ठान हुआ था॥ ४-५॥

स हि देशो नरव्याघ्र प्रशस्तो यज्ञकर्मणि।

तस्याश्वचयाँ काकुत्स्थ दृढधन्वा महारथः॥६॥

अंशुमानकरोत् तात सगरस्य मते स्थितः।

‘पुरुषसिंह! वही देश यज्ञ करनेके लिये उत्तम माना गया है। तात ककुत्स्थनन्दन! राजा सगरकी आज्ञासे यज्ञिय अश्वकी रक्षाका भार सुदृढ़ धनुर्धर महारथी अंशुमान ने स्वीकार किया था। ६ १/२॥

तस्य पर्वणि तं यज्ञं यजमानस्य वासवः॥७॥

राक्षसी तनुमास्थाय यज्ञियाश्वमपाहरत्।

‘परंतु पर्व के दिन यज्ञ में लगे हुए राजा सगर के यज्ञ सम्बन्धी घोड़े को इन्द्र ने राक्षस का रूप धारण करके चुरा लिया॥ ७ १/२ ॥

ह्रियमाणे तु काकुत्स्थ तस्मिन्नश्वे महात्मनः॥ ८॥

उपाध्यायगणाः सर्वे यजमानमथाब्रुवन्।

अयं पर्वणि वेगेन यज्ञियाश्वोऽपनीयते॥९॥

हर्तारं जहि काकुत्स्थ हयश्चैवोपनीयताम्।

यज्ञच्छिद्रं भवत्येतत् सर्वेषामशिवाय नः॥१०॥

तत् तथा क्रियतां राजन् यज्ञोऽच्छिद्रः कृतो भवेत्

‘काकुत्स्थ! महामना सग रके उस अश्व का अपहरण होते समय समस्त ऋत्विजों ने यजमान सगर से कहा—’ककुत्स्थनन्दन! आज पर् वके दिन कोई इस यज्ञ सम्बन्धी अश्व को चुराकर बड़े वेग से लिये जा रहा है। आप चोर को मारिये और घोड़ा वापस लाइये, नहीं तो यज्ञ में विघ्न पड़ जायगा और वह हम सब लोगों के लिये अमंगल का कारण होगा। राजन्! आप ऐसा प्रयत्न कीजिये, जिससे यह यज्ञ बिना किसी विघ्न-बाधा के परिपूर्ण हो’।

सोपाध्यायवचः श्रुत्वा तस्मिन् सदसि पार्थिवः॥ ११॥

षष्टिं पुत्रसहस्राणि वाक्यमेतदुवाच ह।

गतिं पुत्रा न पश्यामि रक्षसां पुरुषर्षभाः॥१२॥

मन्त्रपूतैर्महाभागैरास्थितो हि महाक्रतुः।

‘उस यज्ञ-सभा में बैठे हुए राजा सगर ने उपाध्यायों की बात सुनकर अपने साठ हजार पुत्रों से कहा—’पुरुषप्रवर पुत्रो! यह महान् यज्ञ वेदमन्त्रों से पवित्र अन्तःकरण वाले महाभाग महात्माओं द्वारा सम्पादित हो रहा है; अतः यहाँ राक्षसों की पहुँच हो,ऐसा मुझे नहीं दिखायी देता (अतः यह अश्व चुरानेवाला कोई देवकोटि का पुरुष होगा)।

तद् गच्छथ विचिन्वध्वं पुत्रका भद्रमस्तु वः॥ १३॥

समुद्रमालिनी सर्वां पृथिवीमनुगच्छथ।

एकैकं योजनं पुत्रा विस्तारमभिगच्छत॥१४॥

यावत् तुरगसंदर्शस्तावत् खनत मेदिनीम्।

तमेव हयहर्तारं मार्गमाणा ममाज्ञया॥१५॥

‘अतः पुत्रो! तुम लोग जाओ, घोड़े की खोज करो तुम्हारा कल्याण हो  समुद्रसे घिरी हुई इस सारी पृथ्वी को छान डालो। एक-एक योजन विस्तृत भूमि को बाँटकर उसका चप्पा-चप्पा देख डालो। जब तक घोड़े का पता न लग जाय, तब तक मेरी आज्ञा से इस पृथ्वी को खोदते रहो। इस खोदने का एक ही लक्ष्य है—उस अश्व के चोर को ढूँढ़ निकालना॥ १३–१५ ॥

दीक्षितः पौत्रसहितः सोपाध्यायगणस्त्वहम्।

इह स्थास्यामि भद्रं वो यावत् तुरगदर्शनम्॥ १६॥

‘मैं यज्ञ की दीक्षा ले चुका हूँ, अतः स्वयं उसे ढूँढ़ने के लिये नहीं जा सकता; इसलिये जब तक उस” अश्व का दर्शन न हो, तब तक मैं उपाध्यायों और पौत्र अंशुमान के साथ यहीं रहूँगा’ ॥ १६ ॥

ते सर्वे हृष्टमनसो राजपुत्रा महाबलाः।

जग्मुर्महीतलं राम पितुर्वचनयन्त्रिताः॥१७॥

‘श्रीराम! पिता के आदेशरूपी बन्धन से बँधकर वे सभी महाबली राजकुमार मन-ही-मन हर्ष का अनुभव करते हुए भूतलपर विचरने लगे॥ १७॥

गत्वा तु पृथिवीं सर्वामदृष्ट्वा तं महाबलाः।

योजनायामविस्तारमेकैको धरणीतलम्।

बिभिदुः पुरुषव्याघ्रा वज्रस्पर्शसमैर्भुजैः॥१८॥

‘सारी पृथ्वी का चक्कर लगाने के बाद भी उस अश्व को न देखकर उन महाबली पुरुषसिंह राजपुत्रों ने प्रत्येक के हिस्से में एक-एक योजन भूमि का बँटवारा करके अपनी भुजाओं द्वारा उसे खोदना आरम्भ किया। उनकी उन भुजाओं का स्पर्श वज्र के स्पर्श की भाँति दुस्सह था॥ १८॥

शूलैरशनिकल्पैश्च हलैश्चापि सुदारुणैः।

भिद्यमाना वसुमती ननाद रघुनन्दन॥१९॥

‘रघुनन्दन! उस समय वज्रतुल्य शूलों और अत्यन्त दारुण हलों द्वारा सब ओर से विदीर्ण की जाती हुई वसुधा आर्तनाद करने लगी॥ १९॥

नागानां वध्यमानानामसुराणां च राघव।

राक्षसानां दुराधर्षं सत्त्वानां निनदोऽभवत्॥२०॥

‘रघुवीर ! उन राजकुमारोंद्वारा मारे जाते हुए नागों, असुरों, राक्षसों तथा दूसरे-दूसरे प्राणियोंका भयंकर आर्तनाद गूंजने लगा॥ २०॥

योजनानां सहस्राणि षष्टिं तु रघुनन्दन।

बिभिदुर्धरणी राम रसातलमनुत्तमम्॥२१॥

‘रघुकुल को आनन्दित करने वाले श्रीराम ! उन्होंने साठ हजार योजन की भूमि खोद डाली मानो वे सर्वोत्तम रसातल का अनुसंधान कर रहे हों॥ २१॥

एवं पर्वतसम्बाधं जम्बूद्वीपं नृपात्मजाः।

खनन्तो नृपशार्दूल सर्वतः परिचक्रमुः॥२२॥

‘नृपश्रेष्ठ राम! इस प्रकार पर्वतों से युक्त जम्बूद्वीप की भूमि खोदते हुए वे राजकुमार सब ओर चक्कर लगाने लगे॥

ततो देवाः सगन्धर्वाः सासुराः सहपन्नगाः।

सम्भ्रान्तमनसः सर्वे पितामहमुपागमन्॥२३॥

‘इसी समय गन्धों , असुरों और नागोंसहित सम्पूर्ण देवता मन-ही-मन घबरा उठे और ब्रह्माजीके पास गये॥ २३॥

ते प्रसाद्य महात्मानं विषण्णवदनास्तदा।

ऊचुः परमसंत्रस्ताः पितामहमिदं वचः॥२४॥

‘उनके मुख पर विषाद छा रहा था। वे भय से अत्यन्त संत्रस्त हो गये थे। उन्होंने महात्मा ब्रह्माजी को प्रसन्न करके इस प्रकार कहा- ॥२४॥

भगवन् पृथिवी सर्वा खन्यते सगरात्मजैः।

बहवश्च महात्मानो वध्यन्ते जलचारिणः॥ २५॥

‘भगवन् ! सगर के पुत्र इस सारी पृथ्वी को खोदे डालते हैं और बहुत-से महात्माओं तथा जलचारी जीवों का वध कर रहे हैं ॥ २५॥

अयं यज्ञहरोऽस्माकमनेनाश्वोऽपनीयते।

इति ते सर्वभूतानि हिंसन्ति सगरात्मजाः॥२६॥

‘यह हमारे यज्ञ में विघ्न डालने वाला है। यह हमारा अश्व चुराकर ले जाता है’ ऐसा कहकर वे सगर के पुत्र समस्त प्राणियों की हिंसा कर रहे हैं’ ॥२६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकोनचत्वारिंशः सर्गः॥ ३९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में उनतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥३९॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

( सगर के पुत्रों का पृथ्वी को खोदते हुए कपिलजी के पास पहुँचना और उनके रोष से जलकर भस्म होना)

चत्वारिंशः सर्गः 

सर्ग-40

देवतानां वचः श्रुत्वा भगवान् वै पितामहः।

प्रत्युवाच सुसंत्रस्तान् कृतान्तबलमोहितान्॥१॥

देवताओं की बात सुनकर भगवान् ब्रह्माजी ने कितने ही प्राणियों का अन्त करने वाले सगरपुत्रों के बल से मोहित एवं भयभीत हुए उन देवताओं से इस प्रकार कहा- ॥१॥

यस्येयं वसुधा कृत्स्ना वासुदेवस्य धीमतः।

महिषी माधवस्यैषा स एव भगवान् प्रभुः॥२॥

कापिलं रूपमास्थाय धारयत्यनिशं धराम्।

तस्य कोपाग्निना दग्धा भविष्यन्ति नृपात्मजाः॥ ३॥

‘देवगण ! यह सारी पृथ्वी जिन भगवान् वासुदेव की वस्तु है तथा जिन भगवान् लक्ष्मीपति की यह रानी है, वे ही सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीहरि कपिल मुनि का रूप धारण करके निरन्तर इस पृथ्वी को धारण करते हैं। उनकी कोपाग्नि से ये सारे राजकुमार जलकर भस्म हो जायँगे॥ २-३॥

पृथिव्याश्चापि निर्भेदो दृष्ट एव सनातनः।

सगरस्य च पुत्राणां विनाशो दीर्घदर्शिनाम्॥४॥

‘पृथ्वीका यह भेदन सनातन है—प्रत्येक कल्प में अवश्यम्भावी है। (श्रुतियों और स्मृतियों में आये हुए सागर आदि शब्दों से यह बात सुस्पष्ट ज्ञात होती है।) इसी प्रकार दूरदर्शी पुरुषों ने सगर के पुत्रों का भावी विनाश भी देखा ही है; अतः इस विषय में शोक करना अनुचित है।

पितामहवचः श्रुत्वा त्रयस्त्रिंशदरिंदमाः।

देवाः परमसंहृष्टाः पुनर्जग्मुर्यथागतम्॥५॥

ब्रह्माजी का यह कथन सुनकर शत्रुओं का दमन करने वाले तैंतीस देवता बड़े हर्ष में भरकर जैसे आये थे, उसी तरह पुनः लौट गये॥५॥

सगरस्य च पुत्राणां प्रादुरासीन्महास्वनः ।

पृथिव्यां भिद्यमानायां निर्घातसमनिःस्वनः॥६॥

सगरपुत्रों के हाथ से जब पृथ्वी खोदी जा रही थी,उस समय उससे वज्रपात के समान बड़ा भयंकर शब्द होता था।

ततो भित्त्वा महीं सर्वां कृत्वा चापि प्रदक्षिणम्।

सहिताः सागराः सर्वे पितरं वाक्यमब्रुवन्॥७॥

इस तरह सारी पृथ्वी खोदकर तथा उसकी परिक्रमा करके वे सभी सगरपुत्र पिता के पास खाली हाथ लौट आये और बोले- ॥७॥

परिक्रान्ता मही सर्वा सत्त्ववन्तश्च सूदिताः।

देवदानवरक्षांसि पिशाचोरगपन्नगाः॥८॥

न च पश्यामहेऽश्वं ते अश्वहर्तारमेव च।

किं करिष्याम भद्रं ते बुद्धिरत्र विचार्यताम्॥९॥

‘पिताजी! हमने सारी पृथ्वी छान डाली। देवता, दानव, राक्षस, पिशाच और नाग आदि बड़े-बड़े बलवान् प्राणियों को मार डाला। फिर भी हमें न तो कहीं घोड़ा दिखायी दिया और न घोड़े का चुराने वाला ही। आपका भला हो अब हम क्या करें? इस विषय में आप ही कोई उपाय सोचिये ॥ ८-९॥

तेषां तद् वचनं श्रुत्वा पुत्राणां राजसत्तमः ।

समन्युरब्रवीद् वाक्यं सगरो रघुनन्दन॥१०॥

‘रघुनन्दन! पुत्रों का यह वचन सुनकर राजाओं में श्रेष्ठ सगर ने उनसे कुपित होकर कहा- ॥ १० ॥

भूयः खनत भद्रं वो विभेद्य वसुधातलम्।

अश्वहर्तारमासाद्य कृतार्थाश्च निवर्तत॥११॥

‘जाओ, फिर से सारी पृथ्वी खोदो और इसे विदीर्ण करके घोड़े के चोर का पता लगाओ। चोर तक पहुँचकर काम पूरा होने पर ही लौटना’ ॥ ११॥

पितुर्वचनमासाद्य सगरस्य महात्मनः।

षष्टिः पुत्रसहस्राणि रसातलमभिद्रवन्॥१२॥

अपने महात्मा पिता सगर की यह आज्ञा शिरोधार्य करके वे साठ हजार राजकुमार रसातल की ओर बढ़े (और रोष में भरकर पृथ्वी खोदने लगे) ॥ १२॥

खन्यमाने ततस्तस्मिन् ददृशुः पर्वतोपमम्।

दिशागजं विरूपाक्षं धारयन्तं महीतलम्॥१३॥

उस खुदाई के समय ही उन्हें एक पर्वताकार दिग्गज दिखायी दिया, जिसका नाम विरूपाक्ष है वह इस भूतलको धारण किये हुए था॥ १३॥

सपर्वतवनां कृत्स्नां पृथिवीं रघुनन्दन।

धारयामास शिरसा विरूपाक्षो महागजः॥१४॥

रघुनन्दन! महान् गजराज विरूपाक्ष ने पर्वत और वनोंसहित इस सम्पूर्ण पृथ्वी को अपने मस्तक पर धारण कर रखा था॥ १४ ॥

यदा पर्वणि काकुत्स्थ विश्रमार्थं महागजः। १५॥

काकुत्स्थ! वह महान् दिग्गज जिस समय थककर विश्राम के लिये अपने मस्तक को इधर-उधर हटाता था, उस समय भूकम्प होने लगता था॥ १५ ॥

ते तं प्रदक्षिणं कृत्वा दिशापालं महागजम्।

मानयन्तो हि ते राम जग्मुर्भित्त्वा रसातलम्॥ १६॥

श्रीराम! पूर्व दिशा की रक्षा करने वाले विशाल गजराज विरूपाक्ष की परिक्रमा करके उसका सम्मान करते हुए वे सगरपुत्र रसातल का भेदन करके आगे बढ़ गये॥ १६॥

ततः पूर्वां दिशं भित्त्वा दक्षिणां बिभिदुः पुनः।

दक्षिणस्यामपि दिशि ददृशुस्ते महागजम्॥१७॥

पूर्व दिशा का भेदन करने के पश्चात् वे पुनः दक्षिण दिशा की भूमिको खोदने लगे। दक्षिण दिशा में भी उन्हें एक महान् दिग्गज दिखायी दिया॥१७॥

महापद्मं महात्मानं सुमहत्पर्वतोपमम्।

शिरसा धारयन्तं गां विस्मयं जग्मुरुत्तमम्॥१८॥

उसका नाम था महापद्म महान् पर्वत के समान ऊँचा वह विशालकाय गजराज अपने मस्तक पर पृथ्वी को धारण करता था उसे देखकर उन राजकुमारों को बड़ा विस्मय हुआ॥ १८॥

ते तं प्रदक्षिणं कृत्वा सगरस्य महात्मनः।

षष्टिः पुत्रसहस्राणि पश्चिमां बिभिदुर्दिशम्॥ १९॥

महात्मा सगर के वे साठ हजार पुत्र उस दिग्गज की परिक्रमा करके पश्चिम दिशाकी भूमिका भेदन करने लगे॥ १९॥

पश्चिमायामपि दिशि महान्तमचलोपमम्।

दिशागजं सौमनसं ददृशुस्ते महाबलाः॥२०॥

पश्चिम दिशा में भी उन महाबली सगरपुत्रों ने महान् पर्वताकार दिग्गज सौमनस का दर्शन किया॥ २० ॥

ते तं प्रदक्षिणं कृत्वा पृष्ट्वा चापि निरामयम्।

खनन्तः समुपाक्रान्ता दिशं सोमवतीं तदा ॥२१॥

उसकी भी परिक्रमा करके उसका कुशल-समाचार पूछकर वे सभी राजकुमार भूमि खोदते हुए उत्तर दिशा में जा पहुँचे॥ २१॥

उत्तरस्यां रघुश्रेष्ठ ददृशुर्हिमपाण्डुरम्।

भद्रं भद्रेण वपुषा धारयन्तं महीमिमाम्॥ २२॥

रघुश्रेष्ठ! उत्तर दिशा में उन्हें हिमके समान श्वेतभद्र नामक दिग्गज दिखायी दिया, जो अपने कल्याणमय शरीर से इस पृथ्वी को धारण किये हुए था॥ २२ ॥

समालभ्य ततः सर्वे कृत्वा चैनं प्रदक्षिणम्।

षष्टिः पुत्रसहस्राणि बिभिदुर्वसुधातलम्॥२३॥

उसका कुशल-समाचार पूछकर राजा सगर के वे सभी साठ हजार पुत्र उसकी परिक्रमा करने के पश्चात् भूमि खोदने के काम में जुट गये॥२३॥

ततः प्रागुत्तरां गत्वा सागराः प्रथितां दिशम्।

रोषादभ्यखनन् सर्वे पृथिवीं सगरात्मजाः॥२४॥

तदनन्तर सुविख्यात पूर्वोत्तर दिशा में जाकर उन सगरकुमारों ने एक साथ होकर रोषपूर्वक पृथ्वी को खोदना आरम्भ किया॥२४॥

ते तु सर्वे महात्मानो भीमवेगा महाबलाः।

ददृशुः कपिलं तत्र वासुदेवं सनातनम्॥ २५॥

” इस बार उन सभी महामना, महाबली एवं भयानक वेगशाली राजकुमारों ने वहाँ सनातन वासुदेवस्वरूप भगवान् कपिल को देखा॥ २५ ॥

हयं च तस्य देवस्य चरन्तमविदूरतः।

प्रहर्षमतुलं प्राप्ताः सर्वे ते रघुनन्दन ॥२६॥

राजा सगर के यज्ञ का वह घोड़ा भी भगवान् कपिल के पास ही चर रहा था। रघुनन्दन! उसे देखकर उन सबको अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ॥ २६॥

ते तं यज्ञहनं ज्ञात्वा क्रोधपर्याकुलेक्षणाः।

खनित्रलांगलधरा नानावृक्षशिलाधराः॥२७॥

भगवान् कपिल को अपने यज्ञ में विघ्न डालने वाला जानकर उनकी आँखें क्रोध से लाल हो गयीं। उन्होंने अपने हाथों में खंती, हल और नाना प्रकार के वृक्ष एवं पत्थरों के टुकड़े ले रखे थे॥२७॥

अभ्यधावन्त संक्रुद्धास्तिष्ठ तिष्ठति चाब्रुवन्।।

अस्माकं त्वं हि तुरगं यज्ञियं हृतवानसि॥२८॥

दुर्मेधस्त्वं हि सम्प्राप्तान् विद्धि नः सगरात्मजान्।

वे अत्यन्त रोष में भरकर उनकी ओर दौड़े और बोले- ‘अरे! खड़ा रह, खड़ा रह। तू ही हमारे यज्ञ के घोड़े को यहाँ चुरा लाया है। दुर्बुद्धे ! अब हम आ गये। तू समझ ले, हम महाराज सगर के पुत्र हैं’। २८ १/२॥

श्रुत्वा तद् वचनं तेषां कपिलो रघुनन्दन॥२९॥

रोषेण महताविष्टो हुङ्कारमकरोत् तदा।

रघुनन्दन! उनकी बात सुनकर भगवान् कपिल को बड़ा रोष हुआ और उस रोष के आवेश में ही उनके मुँह से एक हुंकार निकल पड़ा॥२९ १/२॥

ततस्तेनाप्रमेयेण कपिलेन महात्मना।

भस्मराशीकृताः सर्वे काकुत्स्थ सगरात्मजाः॥ ३०॥

श्रीराम! उस हुंकार के साथ ही उन अनन्त प्रभावशाली महात्मा कपिल ने उन सभी सगरपुत्रों को जलाकर राखका ढेर कर दिया॥३०॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे चत्वारिंशः सर्गः॥४०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में चालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ। ४०॥