सर्ग-21
तथा त विलपन्तीं तां कौसल्यां राममातरम्।
उवाच लक्ष्मणो दीनस्तत्कालसदृशं वचः॥१॥
इस प्रकार विलाप करती हुई श्रीराम माता कौसल्या से अत्यन्त दुःखी हुए लक्ष्मण ने उस समय के योग्य बात कही— ॥१॥
न रोचते ममाप्येतदार्ये यद् राघवो वनम्।
त्यक्त्वा राज्यश्रियं गच्छेत् स्त्रिया वाक्यवशंगतः॥२॥
विपरीतश्च वृद्धश्च विषयैश्च प्रधर्षितः।
नृपः किमिव न ब्रूयाच्चोद्यमानः समन्मथः॥३॥
‘बड़ी माँ! मुझे भी यह अच्छा नहीं लगता कि श्रीराम राज्यलक्ष्मी का परित्याग करके वन में जायँ। महाराज तो इस समय स्त्री की बात में आ गये हैं, इसलिये उनकी प्रकृति विपरीत हो गयी है। एक तो वे बूढ़े हैं, दूसरे विषयों ने उन्हें वश में कर लिया है; अतः कामदेव के वशीभूत हुए वे नरेश कैकेयी-जैसी स्त्री की प्रेरणा से क्या नहीं कह सकते हैं? ।। २-३॥
नास्यापराधं पश्यामि नापि दोषं तथाविधम्।
येन निर्वास्यते राष्ट्राद् वनवासाय राघवः॥४॥
‘मैं श्रीरघुनाथजी का ऐसा कोई अपराध या दोष नहीं देखता, जिससे इन्हें राज्य से निकाला जाय और वन में रहने के लिये विवश किया जाय॥४॥
न तं पश्याम्यहं लोके परोक्षमपि यो नरः।
स्वमित्रोऽपि निरस्तोऽपि योऽस्य दोषमुदाहरेत्॥
‘मैं संसार में एक मनुष्य को भी ऐसा नहीं देखता, जो अत्यन्त शत्रु एवं तिरस्कृत होने पर भी परोक्ष में भी इनका कोई दोष बता सके॥५॥
देवकल्पमृगँ दान्तं रिपूणामपि वत्सलम्।
अवेक्षमाणः को धर्मं त्यजेत् पुत्रमकारणात्॥
‘धर्मपर दृष्टि रखने वाला कौन ऐसा राजा होगा, जो देवता के समान शुद्ध, सरल, जितेन्द्रिय और शत्रुओं पर भी स्नेह रखने वाले (श्रीराम-जैसे) पुत्र का अकारण परित्याग करेगा? ॥ ६॥
तदिदं वचनं राज्ञः पुनर्बाल्यमुपेयुषः।
पुत्रः को हृदये कुर्याद् राजवृत्तमनुस्मरन्॥७॥
‘जो पुनः बालभाव (विवेक शून्यता) को प्राप्त हो गये हैं, ऐसे राजा के इस वचन को राजनीति का ध्यान रखने वाला कौन पुत्र अपने हृदय में स्थान दे सकता है?॥
यावदेव न जानाति कश्चिदर्थमिमं नरः।
तावदेव मया सार्धमात्मस्थं कुरु शासनम्॥८॥
‘रघुनन्दन! जबतक कोई भी मनुष्य आपके वनवास की बात को नहीं जानता है, तब तक ही, आप मेरी सहायता से इस राज्य के शासन की बागडोर अपने हाथ में ले लीजिये॥८॥
मया पार्श्वे सधनुषा तव गुप्तस्य राघव।
कः समर्थोऽधिकं कर्तुं कृतान्तस्येव तिष्ठतः॥९॥
रघुवीर ! जब मैं धनुष लिये आपके पास रहकर आपकी रक्षा करता रहूँ और आप काल के समान युद्ध के लिये डट जायँ, उस समय आपसे अधिक पौरुष प्रकट करने में कौन समर्थ हो सकता है? ॥
निर्मनुष्यामिमां सर्वामयोध्यां मनुजर्षभ।
करिष्यामि शरैस्तीक्ष्णैर्यदि स्थास्यति विप्रिये॥ १०॥
‘नरश्रेष्ठ! यदि नगर के लोग विरोध में खड़े होंगे तो मैं अपने तीखे बाणों से सारी अयोध्या को मनुष्यों से सूनी कर दूंगा॥१०॥
भरतस्याथ पक्ष्यो वा यो वास्य हितमिच्छति।
सर्वांस्तांश्च वधिष्यामि मृदुर्हि परिभूयते॥११॥
‘जो-जो भरतका पक्ष लेगा अथवा केवल जो उन्हींका हित चाहेगा, उन सबका मैं वध कर डालूँगा; क्योंकि जो कोमल या नम्र होता है, उसका सभी तिरस्कार करते हैं।॥ ११॥
प्रोत्साहितोऽयं कैकेय्या संतुष्टो यदि नः पिता।
अमित्रभूतो निःसङ्गं वध्यतां वध्यतामपि॥१२॥
‘यदि कैकेयी के प्रोत्साहन देने पर उसके ऊपर – संतुष्ट हो पिताजी हमारे शत्रु बन रहे हैं तो हमें भी मोह-ममता छोड़कर इन्हें कैद कर लेना या मार डालना चाहिये॥ १२॥
गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः।
उत्पथं प्रतिपन्नस्य कार्यं भवति शासनम्॥१३॥
‘क्योंकि यदि गुरु भी घमंड में आकर कर्तव्याकर्तव्य का ज्ञान खो बैठे और कुमार्ग पर चलने लगे तो उसे भी दण्ड देना आवश्यक हो जाता है। १३॥
बलमेष किमाश्रित्य हेतुं वा पुरुषोत्तम।
दातुमिच्छति कैकेय्यै उपस्थितमिदं तव॥१४॥
‘पुरुषोत्तम! राजा किस बल का सहारा लेकर अथवा किस कारण को सामने रखकर आपको न्यायतः प्राप्त हुआ यह राज्य अब कैकेयी को देना चाहते हैं?॥
त्वया चैव मया चैव कृत्वा वैरमनुत्तमम्।
कास्य शक्तिः श्रियं दातुं भरतायारिशासन॥ १५॥
‘शत्रुदमन श्रीराम! आपके और मेरे साथ भारी वैर बाँधकर इनकी क्या शक्ति है कि यह राज्यलक्ष्मी ये भरत को दे दें? ॥ १५॥
अनुरक्तोऽस्मि भावेन भ्रातरं देवि तत्त्वतः।
सत्येन धनुषा चैव दत्तेनेष्टेन ते शपे॥१६॥
‘देवि! (बड़ी माँ!) मैं सत्य, धनुष, दान तथा यज्ञ आदि की शपथ खाकर तुमसे सच्ची बात कहता हूँ कि मेरा अपने पूज्य भ्राता श्रीराम में हार्दिक अनुराग है॥१६॥
दीप्तमग्निमरण्यं वा यदि रामः प्रवेक्ष्यति।
प्रविष्टं तत्र मां देवि त्वं पूर्वमवधारय॥१७॥
‘देवि! आप विश्वास रखें, यदि श्रीराम जलती हुई आग में या घोर वन में प्रवेश करने वाले होंगे तो मैं इनसे भी पहले उसमें प्रविष्ट हो जाऊँगा॥ १७॥
हरामि वीर्याद् दुःखं ते तमः सूर्य इवोदितः।
देवी पश्यतु मे वीर्यं राघवश्चैव पश्यतु॥१८॥
‘इस समय आप, रघुनाथ जी तथा अन्य सब लोग भी मेरे पराक्रम को देखें। जैसे सूर्य उदित होकर अन्धकार का नाश कर देता है, उसी प्रकार मैं भी अपनी शक्ति से आपके सब दुःख दूर कर दूंगा। १८॥
हनिष्ये पितरं वृद्धं कैकेय्यासक्तमानसम्।
कृपणं च स्थितं बाल्ये वृद्धभावेन गर्हितम्॥ १९॥
‘जो कैकेयी में आसक्तचित्त होकर दीन बन गये हैं, बालभाव (अविवेक) में स्थित हैं और अधिक बुढ़ापे के कारण निन्दित हो रहे हैं, उन वृद्ध पिता को मैं अवश्य मार डालूँगा’ ॥ १९ ॥
एतत् तु वचनं श्रुत्वा लक्ष्मणस्य महात्मनः।
उवाच रामं कौसल्या रुदती शोकलालसा॥ २०॥
महामनस्वी लक्ष्मण के ये ओजस्वी वचन सुनकर शोकमग्न कौसल्या श्रीराम से रोती हुई बोलीं-॥ २०॥
भ्रातुस्ते वदतः पुत्र लक्ष्मणस्य श्रुतं त्वया।
यदत्रानन्तरं तत्त्वं कुरुष्व यदि रोचते॥२१॥
‘बेटा ! तुमने अपने भाई लक्ष्मण की कही हुई सारी बातें सुन लीं, यदि झुंचे तो अब इसके बाद तुम जो कुछ करना उचित समझो, उसे करो॥ २१ ॥
न चाधर्म्यं वचः श्रुत्वा सपत्न्या मम भाषितम्।
विहाय शोकसंतप्तां गन्तुमर्हसि मामितः॥२२॥
‘मेरी सौत की कही हुई अधर्मयुक्त बात सुनकर मुझ शोक से संतप्त हुई माता को छोड़कर तुम्हें यहाँ से नहीं जाना चाहिये॥ २२॥
धर्मज्ञ इति धर्मिष्ठ धर्मं चरितुमिच्छसि।
शुश्रूष मामिहस्थस्त्वं चर धर्ममनुत्तमम्॥ २३॥
“धर्मिष्ठ! तुम धर्म को जानने वाले हो, इसलिये यदि धर्म का पालन करना चाहो तो यहीं रहकर मेरी सेवा करो और इस प्रकार परम उत्तम धर्म का आचरण करो॥
शुश्रूषुर्जननीं पुत्र स्वगृहे नियतो वसन्।
परेण तपसा युक्तः काश्यपस्त्रिदिवं गतः॥२४॥
‘वत्स! अपने घर में नियम पूर्वक रहकर माता की सेवा करने वाले काश्यप उत्तम तपस्या से युक्त हो स्वर्गलोक में चले गये थे॥ २४॥
यथैव राजा पूज्यस्ते गौरवेण तथा ह्यहम्।
त्वां साहं नानुजानामि न गन्तव्यमितो वनम्॥ २५॥
‘जैसे गौरव के कारण राजा तुम्हारे पूज्य हैं, उसी प्रकार मैं भी हूँ। मैं तुम्हें वन जाने की आज्ञा नहीं देती, अतः तुम्हें यहाँ से वन को नहीं जाना चाहिये॥ २५ ॥
त्वद्वियोगान्न मे कार्यं जीवितेन सुखेन च।
त्वया सह मम श्रेयस्तृणानामपि भक्षणम्॥२६॥
‘तुम्हारे साथ तिनके चबाकर रहना भी मेरे लिये श्रेयस्कर है, परंतु तुमसे विलग हो जाने पर न मुझे इस जीवन से कोई प्रयोजन है और न सुख से॥२६॥
यदि त्वं यास्यसि वनं त्यक्त्वा मां शोकलालसाम्।
अहं प्रायमिहासिष्ये न च शक्ष्यामि जीवितुम्॥ २७॥
‘यदि तुम मुझे शोक में डूबी हुई छोड़कर वन को चले जाओगे तो मैं उपवास करके प्राण त्याग दूंगी, जीवित नहीं रह सकूँगी॥ २७॥
ततस्त्वं प्राप्स्यसे पुत्र निरयं लोकविश्रुतम्।
ब्रह्महत्यामिवाधर्मात् समुद्रः सरितां पतिः॥२८॥
‘बेटा! ऐसा होने पर तुम संसार प्रसिद्ध वह नरकतुल्य कष्ट पाओगे, जो ब्रह्महत्या के समान है और जिसे सरिताओं के स्वामी समुद्र ने अपने अधर्म के फलरूप से प्राप्त किया था’* ॥ २८॥
* किसी कल्प में समुद्र ने अपनी माता को दुःख दिया था, उससे पिप्पलाद नामक ब्रह्मर्षि ने उस अधर्म का दण्ड देने के लिये उसके ऊपर एक कृत्या का प्रयोग किया। इससे समुद्र को नरकवासतुल्य महान् दुःख भोगना पड़ा था।
विलपन्तीं तथा दीनां कौसल्यां जननीं ततः।
उवाच रामो धर्मात्मा वचनं धर्मसंहितम्॥२९॥
माता कौसल्या को इस प्रकार दीन होकर विलाप करती देख धर्मात्मा श्रीरामचन्द्र ने यह धर्मयुक्त वचन कहा- ॥२९॥
नास्ति शक्तिः पितुर्वाक्यं समतिक्रमितुं मम।
प्रसादये त्वां शिरसा गन्तुमिच्छाम्यहं वनम्॥ ३०॥
‘माता! मैं तुम्हारे चरणों में सिर झुकाकर तुम्हें प्रसन्न करना चाहता हूँ। मुझमें पिताजी की आज्ञा का उल्लङ्घन करने की शक्ति नहीं है, अतः मैं वन को ही जाना चाहता हूँ॥ ३०॥
ऋषिणा च पितुर्वाक्यं कुर्वता वनचारिणा।
गौर्हता जानताधर्मं कण्डुना च विपश्चिता॥ ३१॥
‘वनवासी विद्वान् कण्डु मुनि ने पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये अधर्म समझते हुए भी गौ का वध कर डाला था॥ ३१॥
अस्माकं तु कुले पूर्वं सगरस्याज्ञया पितुः।
खनद्भिः सागरैर्भूमिमवाप्तः सुमहान् वधः॥३२॥
‘हमारे कुल में भी पहले राजा सगर के पुत्र ऐसे हो गये हैं, जो पिता की आज्ञा से पृथ्वी खोदते हुए बुरी तरह से मारे गये॥ ३२॥
जामदग्न्येन रामेण रेणुका जननी स्वयम्।
कृत्ता परशुनारण्ये पितुर्वचनकारणात्॥ ३३॥
‘जमदग्नि के पुत्र परशुराम ने पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये ही वन में फरसे से अपनी माता रेणुका का गला काट डाला था॥ ३३॥
एतैरन्यैश्च बहुभिर्देवि देवसमैः कृतम्।
पितर्वचनमक्लीबं करिष्यामि पितुर्हितम्॥३४॥
‘देवि! इन्होंने तथा और भी बहुत-से देवतुल्य मनुष्यों ने उत्साह के साथ पिता के आदेश का पालन किया है। अतः मैं भी कायरता छोड़कर पिता का हित-साधन करूँगा॥ ३४॥
न खल्वेतन्मयैकेन क्रियते पितृशासनम्।
एतैरपि कृतं देवि ये मया परिकीर्तिताः॥ ३५॥
‘देवि! केवल मैं ही इस प्रकार पिता के आदेश का पालन नहीं कर रहा हूँ। जिनकी मैंने अभी चर्चा की है, उन सबने भी पिता के आदेश का पालन किया है।
नाहं धर्ममपूर्वं ते प्रतिकूलं प्रवर्तये।
पूर्वैरयमभिप्रेतो गतो मार्गोऽनुगम्यते॥३६॥
‘मा! मैं तुम्हारे प्रतिकूल किसी नवीन धर्म का प्रचार नहीं कर रहा हूँ। पूर्वकाल के धर्मात्मा पुरुषों को भी यह अभीष्ट था। मैं तो उनके चले हुए मार्ग का ही अनुसरण करता हूँ॥ ३६॥
तदेतत् तु मया कार्यं क्रियते भुवि नान्यथा।
पितुर्हि वचनं कुर्वन् न कश्चिन्नाम हीयते॥ ३७॥
‘इस भूमण्डल पर जो सबके लिये करने योग्य है, वही मैं भी करने जा रहा हूँ। इसके विपरीत कोई न करने योग्य काम नहीं कर रहा हूँ। पिता की आज्ञा का पालन करने वाला कोई भी पुरुष धर्म से भ्रष्ट नहीं होता’॥
तामेवमुक्त्वा जननी लक्ष्मणं पुनरब्रवीत्।
वाक्यं वाक्यविदां श्रेष्ठः श्रेष्ठः सर्वधनुष्मताम्॥ ३८॥
अपनी माता से ऐसा कहकर वाक्यवेत्ताओं में श्रेष्ठ समस्त धनुर्धरशिरोमणि श्रीराम ने पुनः लक्ष्मण से कहा – ॥ ३८॥
तव लक्ष्मण जानामि मयि स्नेहमनुत्तमम्।
विक्रमं चैव सत्त्वं च तेजश्च सुदुरासदम्॥३९॥
‘लक्ष्मण ! मेरे प्रति तुम्हारा जो परम उत्तम स्नेह है, उसे मैं जानता हूँ। तुम्हारे पराक्रम, धैर्य और दुर्धर्ष तेज का भी मुझे ज्ञान है॥ ३९॥
मम मातुर्महद् दुःखमतुलं शुभलक्षण।
अभिप्रायं न विज्ञाय सत्यस्य च शमस्य च॥ ४०॥
‘शुभलक्षण लक्ष्मण ! मेरी माता को जो अनुपम एवं महान् दुःख हो रहा है, वह सत्य और शम के विषय में मेरे अभिप्राय को न समझने के कारण है।॥ ४० ॥
धर्मो हि परमो लोके धर्मे सत्यं प्रतिष्ठितम्।
धर्मसंश्रितमप्येतत् पितुर्वचनमुत्तमम्॥४१॥
‘संसार में धर्म ही सबसे श्रेष्ठ है। धर्म में ही सत्य की प्रतिष्ठा है। पिताजी का यह वचन भी धर्म के आश्रित होने के कारण परम उत्तम है॥ ४१॥
संश्रुत्य च पितुर्वाक्यं मातुर्वा ब्राह्मणस्य वा।
न कर्तव्यं वृथा वीर धर्ममाश्रित्य तिष्ठता॥४२॥
‘वीर! धर्म का आश्रय लेकर रहने वाले पुरुष को पिता, माता अथवा ब्राह्मण के वचनों का पालन करने की प्रतिज्ञा करके उसे मिथ्या नहीं करना चाहिये॥ ४२ ॥
सोऽहं न शक्ष्यामि पुनर्नियोगमतिवर्तितुम्।
पितुर्हि वचनाद् वीर कैकेय्याह प्रचोदितः॥४३॥
‘वीर! अतः मैं पिताजी की आज्ञा का उल्लङ्घन नहीं कर सकता; क्योंकि पिताजी के कहने से ही कैकेयी ने मुझे वन में जाने की आज्ञा दी है॥ ४३॥
तदेतां विसृजानार्यां क्षत्रधर्माश्रितां मतिम्।
धर्ममाश्रय मा तैक्ष्ण्यं मबुद्धिरनुगम्यताम्॥ ४४॥
‘इसलिये केवल क्षात्रधर्म का अवलम्बन करने वाली इस ओछी बुद्धि का त्याग करो, धर्म का आश्रय लो, कठोरता छोड़ो और मेरे विचार के अनुसार चलो’ ॥ ४४॥
तमेवमुक्त्वा सौहार्दाद् भ्रातरं लक्ष्मणाग्रजः।
उवाच भूयः कौसल्यां प्राञ्जलिः शिरसा नतः॥ ४५॥
अपने भाई लक्ष्मण से सौहार्दवश ऐसी बात कहकर उनके बड़े भ्राता श्रीराम ने पुनः कौसल्या के चरणों में मस्तक झुकाया और हाथ जोड़कर कहा- ॥ ४५ ॥
अनुमन्यस्व मां देवि गमिष्यन्तमितो वनम्।
शापितासि मम प्राणैः कुरु स्वस्त्ययनानि मे॥ ४६॥
‘देवि! मैं यहाँ से वन को जाऊँगा। तुम मुझे आज्ञा दो और स्वस्तिवाचन कराओ। यह बात मैं अपने प्राणों की शपथ दिलाकर कहता हूँ॥ ४६॥
तीर्णप्रतिज्ञश्च वनात् पुनरेष्याम्यहं पुरीम्।
ययातिरिव राजर्षिः पुरा हित्वा पुनर्दिवम्॥४७॥
‘जैसे पूर्वकाल में राजर्षि ययाति स्वर्गलोक का त्याग करके पुनः भूतल पर उतर आये थे, उसी प्रकार मैं भी प्रतिज्ञा पूर्ण करके पुनः वन से अयोध्यापुरी को लौट आऊँगा॥ ४७॥
शोकः संधार्यतां मातर्हृदये साधु मा शुचः।
वनवासादिहैष्यामि पुनः कृत्वा पितुर्वचः॥४८॥
‘मा! शोक को अपने हृदय में ही अच्छी तरह दबाये रखो। शोक न करो। पिता की आज्ञा का पालन करके मैं फिर वनवास से यहाँ लौट आऊँगा॥४८॥
त्वया मया च वैदेह्या लक्ष्मणेन सुमित्रया।
पितर्नियोगे स्थातव्यमेष धर्मः सनातनः॥४९॥
‘तुमको, मुझको, सीता को, लक्ष्मण को और माता सुमित्रा को भी पिताजी की आज्ञा में ही रहना चाहिये। यही सनातन धर्म है॥ ४९॥
अम्ब सम्भृत्य सम्भारान् दुःखं हृदि निगृह्य च।
वनवासकृता बुद्धिर्मम धानुवर्त्यताम्॥५०॥
‘मा! यह अभिषेक की सामग्री ले जाकर रख दो। अपने मन का दुःख मन में ही दबा लो और वनवास के सम्बन्ध में जो मेरा धर्मानुकूल विचार है, उसका अनुसरण करो—मुझे जाने की आज्ञा दो’ ॥ ५० ॥
एतद् वचस्तस्य निशम्य माता सुधर्म्यमव्यग्रमविक्लवं च।
मृतेव संज्ञां प्रतिलभ्य देवी समीक्ष्य रामं पुनरित्युवाच॥५१॥
श्रीरामचन्द्रजी की यह धर्मानुकूल तथा व्यग्रता और आकुलता से रहित बात सुनकर जैसे मरे हुए मनुष्य में प्राण आ जाय, उसी प्रकार देवी कौसल्या मर्छा त्यागकर होश में आ गयीं तथा अपने पुत्र श्रीराम की ओर देखकर इस प्रकार कहने लगीं- ॥५१॥
यथैव ते पुत्र पिता तथाहं गुरुः स्वधर्मेण सुहृत्तया च।
न त्वानुजानामि न मां विहाय सुदुःखितामर्हसि पुत्र गन्तुम्॥५२॥
‘बेटा! धर्म और सौहार्द के नाते जैसे पिता तुम्हारे लिये आदरणीय गुरुजन हैं, वैसी ही मैं भी हूँ। मैं तुम्हें वन में जाने की आज्ञा नहीं देती। वत्स! मुझ दुःखिया को छोड़कर तुम्हें कहीं नहीं जाना चाहिये। ५२॥
किं जीवितेनेह विना त्वया मे लोकेन वा किं स्वधयामृतेन।
श्रेयो मुहर्तं तव संनिधानं ममैव कृत्स्नादपि जीवलोकात्॥५३॥
‘तुम्हारे बिना मुझे यहाँ इस जीवन से क्या लाभ है ? इन स्वजनों से, देवता तथा पितरों की पूजा से और अमृत से भी क्या लेना है? तुम दो घड़ी भी मेरे पास रहो तो वही मेरे लिये सम्पूर्ण संसार के राज्य से भी बढ़कर सुख देनेवाला है’ ।। ५३ ।।
नरैरिवोल्काभिरपोह्यमानो महागजो ध्वान्तमभिप्रविष्टः।
भूयः प्रजज्वाल विलापमेवं निशम्य रामः करुणं जनन्याः॥५४॥
जैसे कोई विशाल गजराज किसी अन्धकूप में पड़ जाय और लोग उसे जलते लुआठों से मार-मारकर पीडित करने लगें, उस दशा में वह क्रोध से जल उठे; उसी प्रकार श्रीराम भी माता का बारंबार करुण विलाप सुनकर (इसे स्वधर्मपालन में बाधा मानकर) आवेश में भर गये। (वन में जाने का ही दृढ़ निश्चय कर लिया) ॥५४॥
स मातरं चैव विसंज्ञकल्पामार्तं च सौमित्रिमभिप्रतप्तम्।
धर्मे स्थितो धर्म्यमुवाच वाक्यं यथा स एवार्हति तत्र वक्तुम्॥५५॥
उन्होंने धर्म में ही दृढ़तापूर्वक स्थित रहकर अचेत सी हो रही माता से और आर्त एवं संतप्त हुए सुमित्रा कुमार लक्ष्मण से भी ऐसी धर्मानुकूल बात कही, जैसी उस अवसर पर वे ही कह सकते थे। ५५॥
अहं हि ते लक्ष्मण नित्यमेव जानामि भक्तिं च पराक्रमं च।
मम त्वभिप्रायमसंनिरीक्ष्य मात्रा सहाभ्यर्दसि मा सुदुःखम्॥५६॥
‘लक्ष्मण ! मैं जानता हूँ, तुम सदा ही मुझमें भक्ति रखते हो और तुम्हारा पराक्रम कितना महान् है, यह भी मुझसे छिपा नहीं है; तथापि तुम मेरे अभिप्राय की ओर ध्यान न देकर माताजी के साथ स्वयं भी मुझे पीड़ा दे रहे हो। इस तरह मुझे अत्यन्त दुःख में न डालो॥५६॥
धर्मार्थकामाः खलु जीवलोके समीक्षिता धर्मफलोदयेषु।
ये तत्र सर्वे स्युरसंशयं मे भार्येव वश्याभिमता सपुत्रा॥५७॥
‘इस जीवजगत् में पूर्वकृत धर्म के फल की प्राप्ति के अवसरों पर जो धर्म, अर्थ और काम तीनों देखे गये हैं, वे सब-के-सब जहाँ धर्म है, वहाँ अवश्य प्राप्त होते हैं—इसमें संशय नहीं है; ठीक उसी तरह जैसे भार्या धर्म, अर्थ और काम तीनों की साधन होती है। वह पति के वशीभूत या अनुकूल रहकर अतिथिसत्कार आदि धर् के पालन में सहायक होती है। प्रेयसीरूप से काम का साधन बनती है और पुत्रवती होकर उत्तम लोक की प्राप्तिरूप अर्थ की साधिका होती है।। ५७॥
यस्मिंस्तु सर्वे स्युरसंनिविष्टा धर्मो यतः स्यात् तदुपक्रमेत।
द्वेष्यो भवत्यर्थपरो हि लोके कामात्मता खल्वपि न प्रशस्ता॥५८॥
‘जिस कर्ममें धर्म आदि सब पुरुषार्थोंका समावेश । न हो, उसको नहीं करना चाहिये। जिससे धर्मकी सिद्धि होती हो, उसीका आरम्भ करना चाहिये। जो केवल अर्थपरायण होता है, वह लोकमें सबके द्वेषका पात्र बन जाता है तथा धर्मविरुद्ध काममें अत्यन्त आसक्त होना प्रशंसा नहीं, निन्दाकी बात है। ५८॥
गुरुश्च राजा च पिता च वृद्धः क्रोधात् प्रहर्षादथवापि कामात्।
यद् व्यादिशेत् कार्यमवेक्ष्य धर्म कस्तं न कुर्यादनृशंसवृत्तिः॥५९॥
‘महाराज हमलोगों के गुरु, राजा और पिता होने के साथ ही बड़े-बूढ़े माननीय पुरुष हैं। वे क्रोध से, हर्ष से अथवा काम से प्रेरित होकर भी यदि किसी कार्य के लिये आज्ञा दें तो हमें धर्म समझकर उसका पालन करना चाहिये। जिसके आचरणों में क्रूरता नहीं है, ऐसा कौन पुरुष पिता की आज्ञा के पालन रूप धर्म का आचरण नहीं करेगा॥ ५९॥
न तेन शक्नोमि पितुः प्रतिज्ञामिमां न कर्तुं सकलां यथावत्।
स ह्यावयोस्तात गुरुर्नियोगे देव्याश्च भर्ता स गतिश्च धर्मः॥६०॥
‘इसलिये मैं पिता की इस सम्पूर्ण प्रतिज्ञा का यथावत् पालन करने से मुँह नहीं मोड़ सकता। तात लक्ष्मण! वे हम दोनों को आज्ञा देने में समर्थ गुरु हैं और माताजी के तो वे ही पति, गति तथा धर्म हैं। ६०॥
तस्मिन् पुनर्जीवति धर्मराजे विशेषतः स्वे पथि वर्तमाने।
देवी मया सार्धमितोऽभिगच्छेत् कथंस्विदन्या विधवेव नारी॥६१॥
‘वे धर्म के प्रवर्तक महाराज अभी जीवित हैं और विशेषतः अपने धर्ममय मार्गपर स्थित हैं, ऐसी दशा में माताजी, जैसे दूसरी कोई विधवा स्त्री बेटे के साथ रहती है, उस प्रकार मेरे साथ यहाँ से वन में कैसे चल सकती हैं? ॥ ६१॥
सा मानुमन्यस्व वनं व्रजन्तं कुरुष्व नः स्वस्त्ययनानि देवि।
यथा समाप्ते पुनराव्रजेयं यथा हि सत्येन पुनर्ययातिः॥६२॥
‘अतः देवि! तुम मुझे वन में जाने की आज्ञा दो और हमारे मङ्गल के लिये स्वस्तिवाचन कराओ, जिससे वनवास की अवधि समाप्त होने पर मैं फिर तुम्हारी सेवा में आ जाऊँ। जैसे राजा ययाति सत्य के प्रभाव से फिर स्वर्गमें लौट आये थे॥६२॥
यशो ह्यहं केवलराज्यकारणान्न पृष्ठतः कर्तुमलं महोदयम्।
अदीर्घकालेन तु देवि जीविते वृणेऽवरामद्य महीमधर्मतः॥६३॥
केवल धर्महीन राज्य के लिये मैं महान् फलदायक धर्मपालनरूप सुयश को पीछे नहीं ढकेल सकता। मा! जीवन अधिक कालतक रहने वाला नहीं है; इसके लिये मैं आज अधर्मपूर्वक इस तुच्छ पृथ्वी का राज्य लेना नहीं चाहता’ ॥ ६३॥
प्रसादयन्नरवृषभः स मातरं पराक्रमाज्जिगमिषुरेव दण्डकान्।
अथानुजं भृशमनुशास्य दर्शनं चकार तां हृदि जननीं प्रदक्षिणम्॥६४॥
इस प्रकार नरश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी ने धैर्यपूर्वक दण्डकारण्य में जाने की इच्छा से माता को प्रसन्न करने का प्रयत्न किया तथा अपने छोटे भाई लक्ष्मण को भी अपने विचार के अनुसार भलीभाँति धर्म का रहस्य समझाकर मन-ही-मन माता की परिक्रमा करने का संकल्प किया।
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकविंशः सर्गः ॥२१॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में इक्कीसवाँ सर्ग पूरा हुआ। २१॥
सर्ग-22
अथ तं व्यथया दीनं सविशेषममर्षितम्।
सरोषमिव नागेन्द्रं रोषविस्फारितेक्षणम्॥१॥
आसाद्य रामः सौमित्रिं सुहृदं भ्रातरं प्रियम्।
उवाचेदं स धैर्येण धारयन् सत्त्वमात्मवान्॥२॥
(श्रीराम के राज्याभिषेक में विघ्न पड़ने के कारण) सुमित्राकुमार लक्ष्मण मानसिक व्यथा से बहुत दुःखी थे। उनके मन में विशेष अमर्ष भरा हुआ था। वे रोष से भरे हए गजराज की भाँति क्रोध से आँखें फाड़फाड़कर देख रहे थे। अपने मन को वश में रखने वाले श्रीराम धैर्यपूर्वक चित्त को निर्विकाररूप से काबू में रखते हुए अपने हितैषी सुहृद् प्रिय भाई लक्ष्मण के पास जाकर इस प्रकार बोले- ॥ १-२॥
निगृह्य रोषं शोकं च धैर्यमाश्रित्य केवलम्।
अवमानं निरस्यैनं गृहीत्वा हर्षमुत्तमम्॥३॥
उपक्लुप्तं यदैतन्मे अभिषेकार्थमुत्तमम्।
सर्वं निवर्तय क्षिप्रं कुरु कार्यं निरव्ययम्॥४॥
‘लक्ष्मण! केवल धैर्य का आश्रय लेकर अपने मन के क्रोध और शोक को दूर करो, चित्त से अपमान की भावना निकाल दो और हृदय में भलीभाँति हर्ष भरकर मेरे अभिषेक के लिये यह जो उत्तम सामग्री एकत्र की गयी है, इसे शीघ्र हटा दो और ऐसा कार्य करो, जिससे मेरे वनगमन में बाधा उपस्थित न हो॥३-४॥
सौमित्रे योऽभिषेकार्थे मम सम्भारसम्भ्रमः।
अभिषेकनिवृत्त्यर्थे सोऽस्तु सम्भारसम्भ्रमः॥५॥
‘सुमित्रानन्दन! अबतक अभिषेक के लिये सामग्री जुटाने में जो तुम्हारा उत्साह था, वह इसे रोकने और मेरे वन जाने की तैयारी करने में होना चाहिये॥५॥
यस्या मदभिषेकार्थे मानसं परितप्यते।
माता नः सा यथा न स्यात् सविशङ्का तथा कुरु॥ ६ ॥
मेरे अभिषेक के कारण जिसके चित्त में संताप हो रहा है, उस हमारी माता कैकेयी को जिससे किसी तरह की शङ्का न रह जाय, वही काम करो॥६॥
तस्याः शङ्कामयं दुःखं मुहूर्तमपि नोत्सहे।
मनसि प्रतिसंजातं सौमित्रेऽहमुपेक्षितुम्॥७॥
‘लक्ष्मण! उसके मन में संदेह के कारण दुःख उत्पन्न हो, इस बात को मैं दो घड़ी के लिये भी नहीं सह सकता और न इसकी उपेक्षा ही कर सकता हूँ।
न बुद्धिपूर्वं नाबुद्धं स्मरामीह कदाचन।
मातृणां वा पितुहिं कृतमल्पं च विप्रियम्॥८॥
‘मैंने यहाँ कभी जान-बूझकर या अनजान में माताओं का अथवा पिताजी का कोई छोटा-सा भी अपराध किया हो, ऐसा याद नहीं आता॥ ८॥
सत्यः सत्याभिसंधश्च नित्यं सत्यपराक्रमः।
परलोकभयाद् भीतो निर्भयोऽस्तु पिता मम॥९॥
‘पिताजी सदा सत्यवादी और सत्यपराक्रमी रहे हैं।वे परलोक के भय से सदा डरते रहते हैं; इसलिये मुझे वही काम करना चाहिये, जिससे मेरे पिताजी का पारलौकिक भय दूर हो जाय॥९॥
तस्यापि हि भवेदस्मिन् कर्मण्यप्रतिसंहृते।
सत्यं नेति मनस्तापस्तस्य तापस्तपेच्च माम्॥ १०॥
‘यदि इस अभिषेकसम्बन्धी कार्य को रोक नहीं दिया गया तो पिताजी को भी मन-ही-मन यह सोचकर संताप होगा कि मेरी बात सच्ची नहीं हुई और उनका वह मनस्ताप मुझे सदा संतप्त करता रहेगा॥ १० ॥
अभिषेकविधानं तु तस्मात् संहृत्य लक्ष्मण।
अन्वगेवाहमिच्छामि वनं गन्तुमितः पुरः॥११॥
“लक्ष्मण! इन्हीं सब कारणों से मैं अपने अभिषेक का कार्य रोककर शीघ्र ही इस नगर से वन को चला जाना चाहता हूँ॥ ११॥
मम प्रव्राजनादद्य कृतकृत्या नृपात्मजा।
सुतं भरतमव्यग्रमभिषेचयतां ततः॥१२॥
‘आज मेरे चले जाने से कृतकृत्य हुई राजकुमारी कैकेयी अपने पुत्र भरत का निर्भय एवं निश्चिन्त होकर अभिषेक करावे॥ १२॥
मयि चीराजिनधरे जटामण्डलधारिणि।
गतेऽरण्यं च कैकेय्या भविष्यति मनः सुखम्॥ १३॥
‘मैं वल्कल और मृगचर्म धारण करके सिर पर जटाजूट बाँधे जब वन को चला जाऊँगा, तभी कैकेयी के मन को सुख प्राप्त होगा॥ १३॥ ।
बुद्धिः प्रणीता येनेयं मनश्च सुसमाहितम्।
तं नु नार्हामि संक्लेष्टुं प्रव्रजिष्यामि मा चिरम्॥ १४॥
‘जिस विधाता ने कैकेयी को ऐसी बुद्धि प्रदान की है तथा जिसकी प्रेरणा से उसका मन मुझे वन भेजने में अत्यन्त दृढ़ हो गया है, उसे विफल मनोरथ करके कष्ट देना मेरे लिये उचित नहीं है।॥ १४ ॥
कृतान्त एव सौमित्रे द्रष्टव्यो मत्प्रवासने।
राज्यस्य च वितीर्णस्य पुनरेव निवर्तने॥ १५॥
‘सुमित्राकुमार! मेरे इस प्रवास में तथा पिताद्वारा दिये हुए राज्य के फिर हाथ से निकल जाने में दैव को ही कारण समझना चाहिये॥ १५ ॥
कैकेय्याः प्रतिपत्तिर्हि कथं स्यान्मम वेदने।
यदि तस्या न भावोऽयं कृतान्तविहितो भवेत्॥ १६॥
‘मेरी समझसे कैकेयी का यह विपरीत मनोभाव दैव का ही विधान है। यदि ऐसा न होता तो वह मुझे वन में भेजकर पीड़ा देने का विचार क्यों करती॥ १६ ॥
जानासि हि यथा सौम्य न मातृषु ममान्तरम्।
भूतपूर्वं विशेषो वा तस्या मयि सुतेऽपि वा॥ १७॥
‘सौम्य! तुम तो जानते ही हो कि मेरे मन में पहले भी कभी माताओं के प्रति भेदभाव नहीं हुआ और कैकेयी भी पहले मुझमें या अपने पुत्र में कोई अन्तर नहीं समझती थी॥ १७॥
सोऽभिषेकनिवृत्त्यर्थैः प्रवासाथैश्च दुर्वचैः।
उग्रैर्वाक्यैरहं तस्या नान्यद् दैवात् समर्थये ॥१८॥
‘मेरे अभिषेक को रोकने और मुझे वन में भेजने के लिये उसने राजा को प्रेरित करने के निमित्त जिन भयंकर और कटुवचनों का प्रयोग किया है, उन्हें साधारण मनुष्यों के लिये भी मुँह से निकालना कठिन है। उसकी ऐसी चेष्टा में मैं दैव के सिवा दूसरे किसी कारण का समर्थन नहीं करता॥ १८॥
कथं प्रकृतिसम्पन्ना राजपुत्री तथागुणा।
ब्रूयात् सा प्राकृतेव स्त्री मत्पीड्यं भर्तृसंनिधौ॥ १९॥
‘यदि ऐसी बात न होती तो वैसे उत्तम स्वभाव और श्रेष्ठ गुणों से युक्त राजकुमारी कैकेयी एक साधारण स्त्री की भाँति अपने पति के समीप मुझे पीड़ा देनेवाली बात कैसे कहती—मुझे कष्ट देने के लिये राम को वन में भेजने का प्रस्ताव कैसे उपस्थित करती। १९॥
यदचिन्त्यं तु तद् दैवं भूतेष्वपि न हन्यते।
व्यक्तं मयि च तस्यां च पतितो हि विपर्ययः॥ २०॥
‘जिसके विषय में कभी कुछ सोचा न गया हो, वही दैव का विधान है। प्राणियों में अथवा उनके अधिष्ठाता देवताओं में भी कोई ऐसा नहीं है, जो उस दैव के विधान को मेट सके अतः निश्चय ही उसी की प्रेरणा से मुझमें और कैकेयी में यह भारी उलट-फेर हुआ है (मेरे हाथ में आया हुआ राज्य चला गया और कैकेयी की बुद्धि बदल गयी) ॥ २० ॥
कश्च दैवेन सौमित्रे योद्धमुत्सहते पुमान्।
यस्य नु ग्रहणं किंचित् कर्मणोऽन्यन्न दृश्यते॥ २१॥
सुमित्रानन्दन! कर्मों के सुख-दुःखादि रूप फल प्राप्त होने पर ही जिसका ज्ञान होता है, कर्मफल से अन्यत्र कहीं भी जिसका पता नहीं चलता, उस दैव के साथ कौन पुरुष युद्ध कर सकता है ? ॥ २१॥
सुखदुःखे भयक्रोधौ लाभालाभौ भवाभवौ।
यस्य किंचित् तथाभूतं ननु दैवस्य कर्म तत्॥ २२॥
‘सुख-दुःख, भय-क्रोध (क्षोभ), लाभ-हानि, उत्पत्ति और विनाश तथा इस प्रकार के और भी जितने परिणाम प्राप्त होते हैं, जिनका कोई कारण समझ में नहीं आता, वे सब दैव के ही कर्म हैं ॥ २२ ॥
ऋषयोऽप्युग्रतपसो दैवेनाभिप्रचोदिताः।
उत्सृज्य नियमांस्तीव्रान् भ्रश्यन्ते काममन्युभिः॥ २३॥
‘उग्र तपस्वी ऋषि भी दैव से प्रेरित होकर अपने तीव्र नियमों को छोड़ बैठते और काम-क्रोध के द्वारा विवश हो मर्यादा से भ्रष्ट हो जाते हैं।। २३॥
असंकल्पितमेवेह यदकस्मात् प्रवर्तते।
निवारब्धमारम्भैर्ननु दैवस्य कर्म तत्॥२४॥
‘जो बात बिना सोचे-विचारे अकस्मात् सिर पर आ पड़ती है और प्रयत्नों द्वारा आरम्भ किये हुए कार्य को रोककर एक नया ही काण्ड उपस्थित कर देती है, अवश्य वह दैव का ही विधान है॥२४॥
एतया तत्त्वया बुद्ध्या संस्तभ्यात्मानमात्मना।
व्याहतेऽप्यभिषेके मे परितापो न विद्यते॥ २५॥
‘इस तात्त्विक बुद्धि के द्वारा स्वयं ही मन को स्थिर कर लेने के कारण मुझे अपने अभिषेक में विघ्न पड़ जाने पर भी दुःख या संताप नहीं हो रहा है॥ २५ ॥
तस्मादपरितापः संस्त्वमप्यनविधाय माम्।
प्रतिसंहारय क्षिप्रमाभिषेचनिकी क्रियाम्॥२६॥
‘इसी प्रकार तुम भी मेरे विचार का अनुसरण करके संताप शून्य हो राज्याभिषेक के इस आयोजन को शीघ्र बंद करा दो॥ २६॥
एभिरेव घटैः सर्वैरभिषेचनसम्भृतैः।
मम लक्ष्मण तापस्ये व्रतस्नानं भविष्यति॥२७॥
‘लक्ष्मण! राज्याभिषेक के लिये सँजोकर रखे गये इन्हीं सब कलशों द्वारा मेरा तापस-व्रत के संकल्प के लिये आवश्यक स्नान होगा॥ २७॥
अथवा किं मयैतेन राज्यद्रव्यमयेन तु।
उद्धृतं मे स्वयं तोयं व्रतादेशं करिष्यति ॥२८॥
‘अथवा राज्याभिषेक सम्बन्धी मङ्गल द्रव्यमय इस कलश जल की मुझे क्या आवश्यकता है? स्वयं मेरे द्वारा अपने हाथ से निकाला हुआ जल ही मेरे व्रतादेश का साधक होगा।॥ २८॥
मा च लक्ष्मण संतापं कार्षीर्लक्ष्या विपर्यये।
राज्यं वा वनवासो वा वनवासो महोदयः॥२९॥
‘लक्ष्मण! लक्ष्मी के इस उलट-फेर के विषय में तुम कोई चिन्ता न करो। मेरे लिये राज्य अथवा वनवास दोनों समान हैं, बल्कि विशेष विचार करने पर वनवास ही महान् अभ्युदयकारी प्रतीत होता है॥२९॥
न लक्ष्मणास्मिन् मम राज्यविघ्ने माता यवीयस्यभिशङ्कितव्या।
दैवाभिपन्ना न पिता कथंचिज्जानासि दैवं हि तथाप्रभावम्॥३०॥
‘लक्ष्मण! मेरे राज्याभिषेक में जो विघ्न आया है, इसमें मेरी सबसे छोटी माता कारण है, ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिये; क्योंकि वह दैव के अधीन थी। इसी प्रकार पिताजी भी किसी तरह इसमें कारण नहीं हैं। तुम तो दैव और उसके अद्भुत प्रभाव को जानते ही हो, वही कारण है ॥३०॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे द्वाविंशः सर्गः॥ २२॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्डमें बाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ।२२॥
सर्ग-23
इति ब्रुवति रामे तु लक्ष्मणोऽवाक् शिरा इव।
ध्यात्वा मध्यं जगामाशु सहसा दैन्यहर्षयोः॥१॥
श्रीरामचन्द्रजी जब इस प्रकार कह रहे थे, उस समय लक्ष्मण सिर झुकाये कुछ सोचते रहे; फिर सहसा शीघ्रतापूर्वक वे दुःख और हर्ष के बीच की स्थिति में आ गये (श्रीराम के राज्याभिषेक में विघ्न पड़ने के कारण उन्हें दुःख हुआ और उनकी धर्म में दृढ़ता देखकर प्रसन्नता हुई)॥
तदा तु बद्ध्वा भ्रुकुटी ध्रुवोर्मध्ये नरर्षभः।
निशश्वास महासर्पो बिलस्थ इव रोषितः॥२॥
नरश्रेष्ठ लक्ष्मण ने उस समय ललाट में भौंहों को चढ़ाकर लंबी साँस खींचना आरम्भ किया, मानो बिल में बैठा हुआ महान् सर्प रोष में भरकर फुकार मार रहा हो॥
तस्य दुष्प्रतिवीक्ष्यं तद् भृकुटीसहितं तदा।
बभौ क्रुद्धस्य सिंहस्य मुखस्य सदृशं मुखम्॥३॥
तनी हुई भौंहों के साथ उस समय उनका मुख कुपित हुए सिंह के मुख के समान जान पड़ता था, उसकी ओर देखना कठिन हो रहा था॥३॥
अग्रहस्तं विधुन्वंस्तु हस्ती हस्तमिवात्मनः।
तिर्यगूर्ध्वं शरीरे च पातयित्वा शिरोधराम्॥४॥
अग्राक्ष्णा वीक्षमाणस्तु तिर्यग्भ्रातरमब्रवीत्।
जैसे हाथी अपनी सूंड हिलाया करता है, उसी प्रकार वे अपने दाहिने हाथ को हिलाते और गर्दन को शरीर में ऊपर-नीचे और अगल-बगल सब ओर घुमाते हुए नेत्रों के अग्रभाग से टेढ़ी नजरों द्वारा अपने भाई श्रीराम को देखकर उनसे बोले- ॥ ४ १/२॥
अस्थाने सम्भ्रमो यस्य जातो वै सुमहानयम्॥५॥
धर्मदोषप्रसङ्गेन लोकस्यानतिशङ्कया।
कथं ह्येतदसम्भ्रान्तस्त्वद्विधो वक्तुमर्हति॥६॥
यथा ह्येवमशौण्डीरं शौण्डीरः क्षत्रियर्षभः।
किं नाम कृपणं दैवमशक्तमभिशंससि॥७॥
‘भैया! आप समझते हैं कि यदि पिता की इस आज्ञा का पालन करने के लिये मैं वन को न जाऊँ तो धर्म के विरोध का प्रसङ्ग उपस्थित होता है, इसके सिवा लोगों के मन में यह बड़ी भारी शङ्का उठ खड़ी होगी कि जो पिता की आज्ञा का उल्लङ्घन करता है, वह यदि राजा ही हो जाय तो हमारा धर्मपूर्वक पालन कैसे करेगा? साथ ही आप यह भी सोचते हैं कि यदि मैं पिता की इस आज्ञा का पालन नहीं करूँ तो दूसरे लोग भी नहीं करेंगे। इस प्रकार धर्म की अवहेलना होने से जगत् के विनाश का भय उपस्थित होगा। इन सब दोषों और शङ्काओं का निराकरण करने के लिये आपके मन में वनगमन के प्रति जो यह बड़ा भारी सम्भ्रम (उतावलापन) आ गया है, यह सर्वथा अनुचित एवं भ्रममूलक ही है; क्योंकि आप असमर्थ ‘दैव’ नामक तुच्छ वस्तु को प्रबल बता रहे हैं। दैव का निराकरण करने में समर्थ आप-जैसा क्षत्रियशिरोमणि वीर यदि भ्रम में नहीं पड़ गया होता तो ऐसी बात कैसे कह सकता था? अतः असमर्थ पुरुषों द्वारा ही अपनाये जाने योग्य और पौरुष के निकट कुछ भी करनेमें असमर्थ ‘दैव’ की आप साधारण मनुष्य के समान इतनी स्तुति या प्रशंसा क्यों कर रहे हैं? ॥ ५-७॥
पापयोस्ते कथं नाम तयोः शङ्का न विद्यते।
सन्ति धर्मोपधासक्ता धर्मात्मन् किं न बुध्यसे॥ ८॥
‘धर्मात्मन् ! आपको उन दोनों पापियों पर संदेह क्यों नहीं होता? संसार में कितने ही ऐसे पापासक्त मनुष्य हैं, जो दूसरों को ठगने के लिये धर्म का ढोंग बनाये रहते हैं, क्या आप उन्हें नहीं जानते हैं? ॥ ८॥
तयोः सुचरितं स्वार्थं शाठ्यात् परिजिहीर्षतोः।
यदि नैवं व्यवसितं स्याद्धि प्रागेव राघव।
तयोः प्रागेव दत्तश्च स्याद् वरः प्रकृतश्च सः॥ ९॥
‘रघुनन्दन! वे दोनों अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिये शठतावश धर्म के बहाने आप-जैसे सच्चरित्र पुरुष का परित्याग करना चाहते हैं। यदि उनका ऐसा विचार न होता तो जो कार्य आज हुआ है, वह पहले ही हो गया होता। यदि वरदान वाली बात सच्ची होती तो आपके अभिषेक का कार्य प्रारम्भ होने से पहले ही इस तरह का वर दे दिया गया होता॥९॥
लोकविदिष्टमारब्धं त्वदन्यस्याभिषेचनम्।
नोत्सहे सहितुं वीर तत्र मे क्षन्तुमर्हसि॥१०॥
(गुणवान् ज्येष्ठ पुत्र के रहते हुए छोटे का अभिषेक करना) यह लोकविरुद्ध कार्य है, जिसका आज आरम्भ किया गया है। आपके सिवा दूसरे किसी का राज्याभिषेक हो, यह मुझसे सहन नहीं होग। इसके लिये आप मुझे क्षमा करेंगे॥ १० ॥
येनैवमागता द्वैधं तव बुद्धिर्महामते।
सोऽपि धर्मो मम द्वेष्यो यत्प्रसङ्गाद् विमुह्यसि॥ ११॥
‘महामते! पिता के जिस वचन को मानकर आप मोह में पड़े हुए हैं और जिसके कारण आपकी बुद्धि में दुविधा उत्पन्न हो गयी है, मैं उसे धर्म मानने का पक्षपाती नहीं हूँ; ऐसे धर्म का तो मैं घोर विरोध करता हूँ॥ ११॥
कथं त्वं कर्मणा शक्तः कैकेयीवशवर्तिनः।
करिष्यसि पितर्वाक्यमधर्मिष्ठं विगर्हितम्॥१२॥
‘आप अपने पराक्रमसे सब कुछ करनेमें समर्थ होकर भी कैकेयीके वशमें रहनेवाले पिताके अधर्मपूर्ण एवं निन्दित वचनका पालन कैसे करेंगे? ॥ १२॥
यदयं किल्बिषाद् भेदः कृतोऽप्येवं न गृह्यते।
जायते तत्र मे दुःखं धर्मसङ्गश्च गर्हितः॥१३॥
‘वरदान की झूठी कल्पना का पाप करके आपके अभिषेक में रोड़ा अटकाया गया है, फिर भी आप इस रूप में नहीं ग्रहण करते हैं। इसके लिये मेरे मन में बड़ा दुःख होता है। ऐसे कपटपूर्ण धर्म के प्रति होने वाली आसक्ति निन्दित है॥ १३॥
तवायं धर्मसंयोगो लोकस्यास्य विगर्हितः।
मनसापि कथं कामं कुर्यात् त्वां कामवृत्तयोः।
तयोस्त्वहितयोर्नित्यं शञ्चोः पित्रभिधानयोः॥ १४॥
‘ऐसे पाखण्डपूर्ण धर्म के पालन में जो आपकी प्रवृत्ति हो रही है, वह यहाँ के जनसमुदाय की दृष्टि में निन्दित है। आपके सिवा दूसरा कोई पुरुष सदा पुत्र का अहित करने वाले, पिता-माता नामधारी उन कामाचारी शत्रुओं के मनोरथ को मन से भी कैसे पूर्ण कर सकता है (उसकी पूर्ति का विचार भी मन में कैसे ला सकता है?) ॥ १४॥
यद्यपि प्रतिपत्तिस्ते दैवी चापि तयोर्मतम।
तथाप्युपेक्षणीयं ते न मे तदपि रोचते॥१५॥
‘माता-पिता के इस विचार को कि–’आपका राज्याभिषेक न हो’ जो आप दैव की प्रेरणा का फल मानते हैं, यह भी मुझे अच्छा नहीं लगता। यद्यपि वह आपका मत है, तथापि आपको उसकी उपेक्षा कर देनी चाहिये॥ १५ ॥
विक्लवो वीर्यहीनो यः स दैवमनुवर्तते।
वीराः सम्भावितात्मानो न दैवं पर्युपासते॥१६॥
‘जो कायर है, जिसमें पराक्रम का नाम नहीं है, वही दैव का भरोसा करता है। सारा संसार जिन्हें आदर की दृष्टि से देखता है, वे शक्तिशाली वीर पुरुष दैव की उपासना नहीं करते हैं॥ १६
दैवं पुरुषकारेण यः समर्थः प्रबाधितुम्।
न दैवेन विपन्नार्थः पुरुषः सोऽवसीदति ॥१७॥
‘जो अपने पुरुषार्थ से दैव को दबाने में समर्थ है, वह पुरुष दैव के द्वारा अपने कार्य में बाधा पड़ने पर खेद नहीं करता—शिथिल होकर नहीं बैठता॥ १७ ॥
द्रक्ष्यन्ति त्वद्य दैवस्य पौरुषं पुरुषस्य च।
दैवमानुषयोरद्य व्यक्ता व्यक्तिर्भविष्यति॥१८॥
आज संसार के लोग देखेंगे कि दैव की शक्ति बड़ी है या पुरुष का पुरुषार्थ। आज दैव और मनुष्य में कौन बलवान् है और कौन दुर्बल—इसका स्पष्ट निर्णय हो जायगा॥१८॥
अद्य मे पौरुषहतं दैवं द्रक्ष्यन्ति वै जनाः।
यैर्दैवादाहतं तेऽद्य दृष्टं राज्याभिषेचनम्॥१९॥
‘जिन लोगों ने दैव के बलसे आज आपके राज्याभिषेक को नष्ट हुआ देखा है, वे ही आज मेरे पुरुषार्थ से अवश्य ही दैव का भी विनाश देख लेंगे। १९॥
अत्यङ्कशमिवोद्दामं गजं मदजलोद्धतम्।
प्रधावितमहं दैवं पौरुषेण निवर्तये॥२०॥
‘जो अङ्कश की परवा नहीं करता और रस्से या साँकल को भी तोड़ देता है, मद की धारा बहाने वाले उस मत्त गजराज की भाँति वेग पूर्वक दौड़ने वाले दैव को भी आज मैं अपने पुरुषार्थ से पीछे लौटा दूंगा। २०॥
लोकपालाः समस्तास्ते नाद्य रामाभिषेचनम्।
न च कृत्स्नास्त्रयो लोका विहन्युः किं पुनःपिता॥२१॥
समस्त लोकपाल और तीनों लोकों के सम्पर्ण प्राणी आज श्रीराम के राज्याभिषेक को नहीं रोक सकते, फिर केवल पिताजी की तो बात ही क्या है ? ॥ २१॥
यैर्विवासस्तवारण्ये मिथो राजन् समर्थितः।
अरण्ये ते विवत्स्यन्ति चतुर्दश समास्तथा ॥ २२॥
‘राजन् ! जिन लोगों ने आपस में आपके वनवास का समर्थन किया है, वे स्वयं चौदह वर्षों तक वन में जाकर छिपे रहेंगे॥ २२॥
अहं तदाशां धक्ष्यामि पितुस्तस्याश्च या तव।
अभिषेकविघातेन पुत्रराज्याय वर्तते॥२३॥
‘मैं पिता की और जो आपके अभिषेक में विघ्न डालकर अपने पुत्र को राज्य देने के प्रयत्न में लगी हुई है, उस कैकेयी की भी उस आशा को जलाकर भस्म कर डालूँगा ।। २३॥
मबलेन विरुद्धाय न स्याद् दैवबलं तथा।
प्रभविष्यति दुःखाय यथोग्रं पौरुषं मम॥२४॥
‘जो मेरे बल के विरोध में खड़ा होगा, उसे मेरा भयंकर पुरुषार्थ जैसा दुःख देने में समर्थ होगा, वैसा दैव बल उसे सुख नहीं पहुँचा सकेगा॥ २४ ॥
ऊर्ध्वं वर्षसहस्रान्ते प्रजापाल्यमनन्तरम्।
आर्यपुत्राः करिष्यन्ति वनवासं गते त्वयि ॥२५॥
‘सहस्रों वर्ष बीतने के पश्चात् जब आप अवस्था क्रम से वन में निवास करने के लिये जायेंगे, उस समय आपके बाद आपके पुत्र प्रजापालनरूप कार्य करेंगे (अर्थात् उस समय भी दूसरों को इस राज्य में दखल देने का अवसर नहीं प्राप्त होगा) ॥ २५॥
पूर्वराजर्षिवृत्त्या हि वनवासोऽभिधीयते।
प्रजा निक्षिप्य पुत्रेषु पुत्रवत् परिपालने॥२६॥
‘पुरातन राजर्षियों की आचारपरम्परा के अनुसार प्रजा का पुत्रवत् पालन करने के निमित्त प्रजावर्ग को पुत्रों के हाथ में सौंपकर वृद्ध राजा का वन में निवास करना उचित बताया जाता है॥२६॥
स चेद् राजन्यनेकाग्रे राज्यविभ्रमशङ्कया।
नैवमिच्छसि धर्मात्मन् राज्यं राम त्वमात्मनि॥२७॥
‘धर्मात्मा श्रीराम! हमारे महाराज वानप्रस्थधर्म के पालन में चित्त को एकाग्र नहीं कर रहे हैं, इसीलिये यदि आप यह समझते हों कि उनकी आज्ञा के विरुद्ध राज्य ग्रहण कर लेने पर समस्त जनता विद्रोही हो
जायगी, अतः राज्य अपने हाथ में नहीं रह सकेगा और इसी शङ्का से यदि आप अपने ऊपर राज्यकाभार नहीं लेना चाहते हैं अथवा वन में चले जाना चाहते हैं तो इस शङ्का को छोड़ दीजिये॥२७॥
प्रतिजाने च ते वीर मा भूवं वीरलोकभाक्।
राज्यं च तव रक्षेयमहं वेलेव सागरम्॥२८॥
‘वीर! मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि जैसे तटभूमि समुद्र को रोके रहती है, उसी प्रकार मैं आपकी और आपके राज्य की रक्षा करूँगा। यदि ऐसा न करूँ तो वीरलोक का भागी न होऊँ॥ २८॥
मङ्गलैरभिषिञ्चस्व तत्र त्वं व्याप्तो भव।
अहमेको महीपालानलं वारयितुं बलात्॥२९॥
‘इसलिये आप मङ्गलमयी अभिषेक-सामग्री से अपना अभिषेक होने दीजिये। इस अभिषेक के कार्य में आप तत्पर हो जाइये। मैं अकेला ही बलपूर्वक समस्त विरोधी भूपालों को रोक रखनेमें समर्थ हूँ॥ २९॥
न शोभार्थाविमौ बाहू न धनुर्भूषणाय मे।
नासिराबन्धनार्थाय न शराः स्तम्भहेतवः॥३०॥
‘ये मेरी दोनों भुजाएँ केवल शोभा के लिये नहीं हैं। मेरे इस धनुष का आभूषण नहीं बनेगा। यह तलवार केवल कमर में बाँधे रखने के लिये नहीं है तथा इन बाणों के खम्भे नहीं बनेंगे॥ ३० ॥
अमित्रमथनार्थाय सर्वमेतच्चतुष्टयम्।
न चाहं कामयेऽत्यर्थं यः स्याच्छत्रुर्मतो मम॥
‘ये सब चारों वस्तुएँ शत्रुओं का दमन करने के लिये ही हैं। जिसे मैं अपना शत्रु समझता हूँ, उसे कदापि जीवित रहने देना नहीं चाहता।। ३१॥
असिना तीक्ष्णधारेण विद्युच्चलितवर्चसा।
प्रगृहीतेन वै शत्रु वज्रिणं वा न कल्पये॥३२॥
‘जिस समय मैं इस तीखी धारवाली तलवार को हाथ में लेता हूँ, यह बिजली की तरह चञ्चल प्रभा से चमक उठती है। इसके द्वारा अपने किसी भी शत्रु को, वह वज्रधारी इन्द्र ही क्यों न हो, मैं कुछ नहीं समझता ॥ ३२॥
खड्गनिष्पेषनिष्पिष्टैर्गहना दुश्चरा च मे।
हस्त्यश्वरथिहस्तोरुशिरोभिर्भविता मही॥ ३३॥
आज मेरे खड्ग के प्रहार से पीस डाले गये हाथी,घोड़े और रथियों के हाथ, जाँघ और मस्तकों द्वारा पटी हुई यह पृथ्वी ऐसी गहन हो जायगी कि इस पर चलना-फिरना कठिन हो जायगा॥ ३३॥
खड्गधाराहता मेऽद्य दीप्यमाना इवाग्नयः।
पतिष्यन्ति द्विषो भूमौ मेघा इव सविद्युतः॥ ३४॥
‘मेरी तलवार की धार से कटकर रक्त से लथपथ हुए शत्रु जलती हुई आग के समान जान पड़ेंगे और बिजली सहित मेघों के समान आज पृथ्वी पर गिरेंगे। ३४॥
बद्धगोधाङ्गलित्राणे प्रगृहीतशरासने।
कथं पुरुषमानी स्यात् पुरुषाणां मयि स्थिते॥ ३५॥
अपने हाथों में गोह के चर्म से बने हुए दस्ताने को बाँधकर जब हाथ में धनुष ले मैं युद्ध के लिये खड़ा हो जाऊँगा, उस समय पुरुषों से कोई भी मेरे सामने कैसे अपने पौरुष पर अभिमान कर सकेगा? ॥ ३५ ॥
बहुभिश्चैकमत्यस्यन्नेकेन च बहूञ्जनान्।
विनियोक्ष्याम्यहं बाणान्नृवाजिगजमर्मसु॥३६॥
मैं बहुत-से बाणों द्वारा एक को और एक ही बाण से बहुत-से योद्धाओं को धराशायी करता हुआ मनुष्यों, घोड़ों और हाथियों के मर्मस्थानों पर बाण मारूँगा॥३६॥
अद्य मेऽस्त्रप्रभावस्य प्रभावः प्रभविष्यति।
राज्ञश्चाप्रभुतां कर्तुं प्रभुत्वं च तव प्रभो॥३७॥
‘प्रभो! आज राजा दशरथ की प्रभुता को मिटाने और आपके प्रभुत्व की स्थापना करने के लिये अस्त्रबल से सम्पन्न मुझ लक्ष्मण का प्रभाव प्रकट होगा॥ ३७॥
अद्य चन्दनसारस्य केयूरामोक्षणस्य च।
वसूनां च विमोक्षस्य सुहृदां पालनस्य च॥ ३८॥
अनुरूपाविमौ बाहू राम कर्म करिष्यतः।
अभिषेचनविघ्नस्य कर्तृणां ते निवारणे॥३९॥
‘श्रीराम! आज मेरी ये दोनों भुजाएँ, जो चन्दन का लेप लगाने, बाजूबंद पहनने, धन का दान करने और सुहृदों के पालन में संलग्न रहने के योग्य हैं, आपके राज्याभिषेक में विघ्न डालने वालों को रोकने के लिये अपने अनुरूप पराक्रम प्रकट करेंगी॥ ३८-३९ ॥
ब्रवीहि कोऽद्यैव मया वियुज्यतां तवासुहृत् प्राणयशःसुहृज्जनैः।
यथा तवेयं वसुधा वशा भवेत् तथैव मां शाधि तवास्मि किंकरः॥४०॥
‘प्रभो! बतलाइये, मैं आपके किस शत्रुको अभी प्राण, यश और सुहृज्जनों से सदा के लिये बिलग कर दूं। जिस उपाय से भी यह पृथ्वी आपके अधिकार में आ जाय, उसके लिये मुझे आज्ञा दीजिये, मैं आपका दास हूँ’॥
विमृज्य बाष्पं परिसान्त्व्य चासकृत् स लक्ष्मणं राघववंशवर्धनः।
उवाच पित्रोर्वचने व्यवस्थितं निबोध मामेष हि सौम्य सत्पथः॥४१॥
रघुवंश की वृद्धि करने वाले श्रीराम ने लक्ष्मण की ये बातें सुनकर उनके आँसू पोंछे और उन्हें बारंबार सान्त्वना देते हुए कहा—’सौम्य! मुझे तो तुम माता पिता की आज्ञा के पालन में ही दृढ़तापूर्वक स्थित समझो यही सत्पुरुषों का मार्ग है’ ॥ ४१॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्रयोविंशः सर्गः ॥२३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में तेईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥२३॥
सर्ग-24
तं समीक्ष्य व्यवसितं पितुर्निर्देशपालने।
कौसल्या बाष्पसंरुद्धा वचो धर्मिष्ठमब्रवीत्॥१॥
कौसल्या ने जब देखा कि श्रीराम ने पिता की आज्ञा के पालन का ही दृढ़ निश्चय कर लिया है, तब वे आँसुओं से सैंधी हुई गद्गद वाणी में धर्मात्मा श्रीराम से इस प्रकार बोलीं- ॥१॥
अदृष्टदुःखो धर्मात्मा सर्वभूतप्रियंवदः।
मयि जातो दशरथात् कथमुञ्छेन वर्तयेत्॥२॥
‘हाय! जिसने जीवन में कभी दुःख नहीं देखा है, जो समस्त प्राणियों से सदा प्रिय वचन बोलता है, जिसका जन्म महाराज दशरथ से मेरे द्वारा हुआ है,वह मेरा धर्मात्मा पुत्र उञ्छवृत्ति से-खेत में गिरे हुए अनाज के एक-एक दाने को बीनकर कैसे जीवन निर्वाह कर सकेगा? ॥ २॥
यस्य भृत्याश्च दासाश्च मृष्टान्यन्नानि भुञ्जते।
कथं स भोक्ष्यते रामो वने मूलफलान्ययम्॥३॥
‘जिनके भृत्य और दास भी शुद्ध, स्वादिष्ट अन्न खाते हैं, वे ही श्रीराम वन में फल-मूल का आहार कैसे करेंगे? ॥ ३॥
क एतच्छ्रद्दधेच्छ्रत्वा कस्य वा न भवेद् भयम्।
गुणवान् दयितो राज्ञः काकुत्स्थो यद् विवास्यते॥४॥
‘जो सद्गुणसम्पन्न और महाराज दशरथ के प्रिय हैं, उन्हीं ककुत्स्थ-कुल-भूषण श्रीराम को जो वनवास दिया जा रहा है, इसे सुनकर कौन इस पर विश्वास करेगा? अथवा ऐसी बात सुनकर किसको भय नहीं होगा? ॥ ४॥
नूनं तु बलवाँल्लोके कृतान्तः सर्वमादिशन्।
लोके रामाभिरामस्त्वं वनं यत्र गमिष्यसि॥५॥
श्रीराम! निश्चय ही इस जगत् में दैव सबसे बड़ा बलवान् है। उसकी आज्ञा सबके ऊपर चलती है वही सबको सुख-दुःख से संयुक्त करता है; क्योंकि उसी के प्रभाव में आकर तुम्हारे-जैसा लोकप्रिय मनुष्य भी वन में जाने को उद्यत है॥५॥
अयं तु मामात्मभवस्तवादर्शनमारुतः।
विलापदुःखसमिधो रुदिताश्रुहुताहुतिः॥६॥
चिन्ताबाष्पमहाधूमस्तवागमनचिन्तजः।।
कर्शयित्वाधिकं पुत्र निःश्वासायाससम्भवः॥७॥
त्वया विहीनामिह मां शोकाग्निरतुलो महान्।
प्रधक्ष्यति यथा कक्ष्यं चित्रभानुर्हिमात्यये॥८॥
‘परंतु बेटा! तुमसे बिछुड़ जाने पर यहाँ मुझे शोक की अनुपम एवं बहुत बढ़ी हुई आग उसी तरह जलाकर भस्म कर डालेगी, जैसे ग्रीष्मऋतु में दावानल सूखी लकड़ियों और घास-फूस को जला डालता है। शोक की यह आग मेरे अपने ही मन में प्रकट हुई है। तुम्हें न देख पाने की सम्भावना ही वायु बनकर इस अग्नि को उद्दीप्त कर रही है। । विलाप जनित दुःख ही इसमें ईंधन का काम कर रहे । हैं। रोने से जो अश्रुपात होते हैं, वे ही मानो इसमें दी हुई घी की आहुति हैं। चिन्ता के कारण जो गरम-गरम उच्छ्वास उठ रहा है, वही इसका महान् धूम है। तुम दूर देश में जाकर फिर किस तरह आओगे इस प्रकार की चिंता ही इस शोकाग्नि को जन्म दे रही है। साँस लेने का जो प्रयत्न है, उसी से इस आग की प्रतिक्षण वृद्धि हो रही है। तुम्हीं इसे बुझाने के लिये जल हो तुम्हारे बिना यह आग मुझे अधिक सुखाकर जला डालेगी॥६-८॥
कथं हि धेनुः स्वं वत्सं गच्छन्तमनुगच्छति।
अहं त्वानुगमिष्यामि यत्र वत्स गमिष्यसि ॥९॥
‘वत्स! धेनु आगे जाते हुए अपने बछड़े के पीछे पीछे कैसे चली जाती है, उसी प्रकार मैं भी तुम जहाँ भी जाओगे, तुम्हारे पीछे-पीछे चली चलूँगी’ ॥९॥
यथा निगदितं मात्रा तद् वाक्यं पुरुषर्षभः।
श्रुत्वा रामोऽब्रवीद् वाक्यं मातरं भृशदुःखिताम्॥ १०॥
माता कौसल्या ने जैसे जो कुछ कहा, उस वचन को सुनकर पुरुषोत्तम श्रीराम ने अत्यन्त दुःख में डूबी हुई अपनी माँ से पुनः इस प्रकार कहा- ॥ १० ॥
कैकेय्या वञ्चितो राजा मयि चारण्यमाश्रिते।
भवत्या च परित्यक्तो न ननं वर्तयिष्यति॥११॥
‘माँ! कैकेयी ने राजा के साथ धोखा किया है। इधर मैं वन को चला जा रहा हूँ। इस दशा में यदि तुम भी उनका परित्याग कर दोगी तो निश्चय ही वे जीवित नहीं रह सकेंगे॥११॥
भर्तः किल परित्यागो नृशंसः केवलं स्त्रियाः।
स भवत्या न कर्तव्यो मनसापि विगर्हितः॥१२॥
‘पति का परित्याग नारी के लिये बड़ा ही क्रूरतापूर्ण कर्म है। सत्पुरुषों ने इसकी बड़ी निन्दा की है; अतः तुम्हें तो ऐसी बात कभी मन में भी नहीं लानी चाहिये। १२॥
यावज्जीवति काकुत्स्थः पिता मे जगतीपतिः।
शुश्रूषा क्रियतां तावत् स हि धर्मः सनातनः॥ १३॥
‘मेरे पिता ककुत्स्थकुल-भूषण महाराज दशरथ जबतक जीवित हैं, तबतक तुम उन्हीं की सेवा करो। पति की सेवा ही स्त्री के लिये सनातन धर्म है’ ॥ १३ ॥
एवमुक्ता तु रामेण कौसल्या शुभदर्शना।
तथेत्युवाच सुप्रीता राममक्लिष्टकारिणम्॥१४॥
श्रीराम के ऐसा कहने पर शुभ कर्मो पर दृष्टि रखने वाली देवी कौसल्या ने अत्यन्त प्रसन्न होकर अनायास ही महान् कर्म करने वाले श्रीराम से कहा —’अच्छा बेटा ! ऐसा ही करूँगी’ ॥ १४ ॥
एवमुक्तस्तु वचनं रामो धर्मभृतां वरः।
भूयस्तामब्रवीद् वाक्यं मातरं भृशदुःखिताम्॥ १५॥
माँ के इस प्रकार स्वीकृतिसूचक बात कहने पर धर्मात्माओं में श्रेष्ठ श्रीराम ने अत्यन्त दुःख में पड़ी हुई अपनी माता से पुनः इस प्रकार कहा- ॥ १५ ॥
मया चैव भवत्या च कर्तव्यं वचनं पितुः।
राजा भर्ता गुरुः श्रेष्ठः सर्वेषामीश्वरः प्रभुः॥ १६॥
‘माँ! पिताजी की आज्ञा का पालन करना मेरा और तुम्हारा—दोनों का कर्तव्य है; क्योंकि राजा हम सब लोगों के स्वामी, श्रेष्ठ गुरु, ईश्वर एवं प्रभु हैं॥ १६॥
इमानि तु महारण्ये विहृत्य नव पञ्च च।
वर्षाणि परमप्रीत्या स्थास्यामि वचने तव॥१७॥
‘इन चौदह वर्षों तक मैं विशाल वन में घूम-फिरकर लौट आऊँगा और बड़े प्रेम से तुम्हारी आज्ञा का पालन करता रहूँगा’॥ १७॥
एवमुक्ता प्रियं पुत्रं बाष्पपूर्णानना तदा।
उवाच परमार्ता तु कौसल्या सुतवत्सला॥१८॥
उनके ऐसा कहने पर पुत्रवत्सला कौसल्या के मुखपर पुनः आँसुओं की धारा बह चली। वे उस समय अत्यन्त आर्त होकर अपने प्रिय पुत्र से बोलीं – ॥१८॥
आसां राम सपत्नीनां वस्तुं मध्ये न मे क्षमम्।
नय मामपि काकुत्स्थ वनं वन्यां मृगीमिव॥ १९॥
यदि ते गमने बुद्धिः कृता पितरपेक्षया।
‘बेटा राम! अब मुझसे इन सौतों के बीच में नहीं रहा जायगा। काकुत्स्थ! यदि पिता की आज्ञा का पालन करने की इच्छा से तुमने वन में जाने का ही निश्चय किया है तो मुझे भी वनवासिनी हरिणी की भाँति वन में ही ले चलो’ ॥ १९ १/२॥
तां तथा रुदतीं रामो रुदन् वचनमब्रवीत्॥२०॥
जीवन्त्या हि स्त्रिया भर्ता दैवतं प्रभुरेव च।
भवत्या मम चैवाद्य राजा प्रभवति प्रभुः ॥२१॥
यह कहकर माता कौसल्या रोने लगीं। उन्हें उस तरह रोती देख श्रीराम भी रो पड़े और उन्हें सान्त्वना देते हुए बोले—’माँ! स्त्री के जीते-जी उसका पति ही उसके लिये देवता और ईश्वर के समान है। महाराज तुम्हारे और मेरे दोनों के प्रभु हैं। २०-२१॥
न ह्यनाथा वयं राज्ञा लोकनाथेन धीमता।
भरतश्चापि धर्मात्मा सर्वभूतप्रियंवदः॥ २२॥
भवतीमनुवर्तेत स हि धर्मरतः सदा।
‘जबतक बुद्धिमान् जगदीश्वर महाराज दशरथ जीवित हैं, तब तक हमें अपने को अनाथ नहीं समझना चाहिये। भरत भी बड़े धर्मात्मा हैं। वे समस्त प्राणियों के प्रति प्रिय वचन बोलने वाले और सदा ही धर्म में तत्पर रहने वाले हैं; अतः वे तुम्हारा अनुसरण -तुम्हारी सेवा करेंगे॥ २२ १/२ ॥
यथा मयि तु निष्क्रान्ते पुत्रशोकेन पार्थिवः ॥२३॥
श्रमं नावाप्नुयात् किंचिदप्रमत्ता तथा कुरु।
‘मेरे चले जाने पर जिस तरह भी महाराज को पुत्रशोक के कारण कोई विशेष कष्ट न हो, तुम सावधानी के साथ वैसा ही प्रयत्न करना॥ २३ १/२ ॥
दारुणश्चाप्ययं शोको यथैनं न विनाशयेत॥२४॥
राज्ञो वृद्धस्य सततं हितं चर समाहिता।
‘कहीं ऐसा न हो कि यह दारुण शोक इनकी जीवनलीला ही समाप्त कर डाले। जैसे भी सम्भव हो, तुम सदा सावधान रहकर बूढ़े महाराज के हितसाधन में लगी रहना ॥ २४ १/२ ।।
व्रतोपवासनिरता या नारी परमोत्तमा॥२५॥
भर्तारं नानुवर्तेत सा च पापगतिर्भवेत्।
‘उत्कृष्ट गुण और जाति आदि की दृष्टि से परम उत्तम तथा व्रत-उपवास में तत्पर होकर भी जो नारी पति की सेवा नहीं करती है, उसे पापियों को मिलने वाली गति (नरक आदि)- की प्राप्ति होती है। २५ १/२॥
भर्तुः शुश्रूषया नारी लभते स्वर्गमुत्तमम्॥२६॥
अपि या निर्नमस्कारा निवृत्ता देवपूजनात्।
‘जो अन्यान्य देवताओं की वन्दना और पूजा से दूर रहती है, वह नारी भी केवल पति की सेवामात्र से उत्तम स्वर्गलोक को प्राप्त कर लेती है।। २६ १/२॥
शुश्रूषामेव कुर्वीत भर्तुः प्रियहिते रता॥ २७॥
एष धर्मः स्त्रिया नित्यो वेदे लोके श्रुतः स्मृतः।
‘अतः नारी को चाहिये कि वह पति के प्रिय एवं हितसाधन में तत्पर रहकर सदा उसकी सेवा ही करे, यही स्त्री का वेद और लोक में प्रसिद्ध नित्य (सनातन) धर्म है। इसी का श्रुतियों और स्मृतियों में भी वर्णन है॥ २७ १/२ ॥
अग्निकार्येषु च सदा सुमनोभिश्च देवताः॥ २८॥
पूज्यास्ते मत्कृते देवि ब्राह्मणाश्चैव सत्कृताः।
‘देवि! तुम्हें मेरी मङ्गल-कामना से सदा अग्निहोत्र के अवसरों पर पुष्पों से देवताओं का तथा सत्कारपूर्वक ब्राह्मणों का भी पूजन करते रहना चाहिये॥ २८ १/२॥
एवं कालं प्रतीक्षस्व ममागमनकांक्षिणी॥२९॥
नियता नियताहारा भर्तृशुश्रूषणे रता।
‘इस प्रकार तुम नियमित आहार करके नियमों का पालन करती हुई स्वामी की सेवा में लगी रहो और मेरे आगमन की इच्छा रखकर समय की प्रतीक्षा करो॥२९ १/२॥
प्राप्स्यसे परमं कामं मयि पर्यागते सति ॥ ३०॥
यदि धर्मभृतां श्रेष्ठो धारयिष्यति जीवितम्।
‘यदि धर्मात्माओं में श्रेष्ठ महाराज जीवित रहेंगे तो मेरे लौट आने पर तुम्हारी भी शुभ कामना पूर्ण होगी’।
एवमुक्ता तु रामेण बाष्पपर्याकुलेक्षणा॥३१॥
कौसल्या पुत्रशोकार्ता रामं वचनमब्रवीत्।
श्रीराम के ऐसा कहने पर कौसल्या के नेत्रों में आँसू छलक आये। वे पुत्रशोक से पीड़ित होकर श्रीरामचन्द्रजी से बोलीं- ॥३१ १/२॥
गमने सुकृतां बुद्धिं न ते शक्नोमि पुत्रक॥३२॥
विनिवर्तयितुं वीर नूनं कालो दुरत्ययः।
‘बेटा! मैं तुम्हारे वन में जाने के निश्चित विचार को नहीं पलट सकती। वीर! निश्चय ही काल की आज्ञा का उल्लङ्घन करना अत्यन्त कठिन है॥ ३२ १/२॥
गच्छ पुत्र त्वमेकाग्रो भद्रं तेऽस्तु सदा विभो॥ ३३॥
पुनस्त्वयि निवृत्ते तु भविष्यामि गतक्लमा।
‘सामर्थ्यशाली पुत्र! अब तुम निश्चिन्त होकर वन को जाओ, तुम्हारा सदा ही कल्याण हो। जब फिर तुम वन से लौट आओगे, उस समय मेरे सारे क्लेश-सब संताप दूर हो जायेंगे॥ ३३ १/२ ॥
प्रत्यागते महाभागे कृतार्थे चरितव्रते।
पितुरानृण्यतां प्राप्ते स्वपिष्ये परमं सुखम्॥३४॥
‘बेटा! जब तुम वनवास का महान् व्रत पूर्ण करके कृतार्थ एवं महान् सौभाग्यशाली होकर लौट आओगे और ऐसा करके पिता के ऋण से उऋण हो जाओगे, तभी मैं उत्तम सुख की नींद सो सकूँगी॥ ३४ ॥
कृतान्तस्य गतिः पुत्र दुर्विभाव्या सदा भुवि।
यस्त्वां संचोदयति मे वच आविध्य राघव॥
‘बेटा रघुनन्दन! इस भूतल पर दैव की गति को समझना बहुत ही कठिन है, जो मेरी बात काटकर तुम्हें वन जाने के लिये प्रेरित कर रहा है।॥ ३५ ॥
गच्छेदानीं महाबाहो क्षेमेण पुनरागतः।
नन्दयिष्यसि मां पुत्र साम्ना श्लक्ष्णेन चारुणा॥ ३६॥
‘बेटा! महाबाहो! इस समय जाओ, फिर कुशलपूर्वक लौटकर सान्त्वना भरे मधुर एवं मनोहर वचनोंसे मुझे आनन्दित करना।। ३६ ॥
अपीदानीं स कालः स्याद् वनात् प्रत्यागतं पुनः।
यत् त्वां पुत्रक पश्येयं जटावल्कलधारिणम्॥ ३७॥
‘वत्स! क्या वह समय अभी आ सकता है, जब कि जटा-वल्कल धारण किये वन से लौटकर आये हुए तुमको फिर देख सकूँगी’ ॥ ३७॥
तथा हि रामं वनवासनिश्चितं ददर्श देवी परमेण चेतसा।
उवाच रामं शुभलक्षणं वचो बभूव च स्वस्त्ययनाभिकांक्षिणी॥३८॥
देवी कौसल्या ने जब देखा कि इस प्रकार श्रीराम वनवास का दृढ़ निश्चय कर चुके हैं, तब वे परम आदरयुक्त हृदय से उनको शुभसूचक आशीर्वाद देने और उनके लिये स्वस्तिवाचन कराने की इच्छा करने लगीं ॥ ३८॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतुर्विंशः सर्गः॥२४॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में चौबीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥२४॥
सर्ग-25
सा विनीय तमायासमुपस्पृश्य जलं शुचि।
चकार माता रामस्य मङ्गलानि मनस्विनी॥१॥
तदनन्तर उस क्लेशजनक शोक को मन से निकालकर श्रीराम की मनस्विनी माता कौसल्या ने पवित्र जल से आचमन किया, फिर वे यात्राकालिक मङ्गलकृत्यों का अनुष्ठान करने लगीं॥ १॥
न शक्यसे वारयितुं गच्छेदानीं रघूत्तम।
शीघ्रं च विनिवर्तस्व वर्तस्व च सतां क्रमे॥२॥
(इसके बाद वे आशीर्वाद देती हुई बोलीं-) ‘रघुकुलभूषण! अब मैं तुम्हें रोक नहीं सकती, इस समय जाओ, सत्पुरुषों के मार्ग पर स्थिर रहो और शीघ्र ही वन से लौट आओ॥२॥
यं पालयसि धर्मं त्वं प्रीत्या च नियमेन च।
स वै राघवशार्दूल धर्मस्त्वामभिरक्षतु॥३॥
‘रघुकुलसिंह! तुम नियमपूर्वक प्रसन्नता के साथ जिस धर्म का पालन करते हो, वही सब ओर से तुम्हारी रक्षा करे॥३॥
येभ्यः प्रणमसे पुत्र देवेष्वायतनेषु च।
ते च त्वामभिरक्षन्तु वने सह महर्षिभिः॥४॥
‘बेटा! देवस्थानों और मन्दिरों में जाकर तुम जिनको प्रणाम करते हो, वे सब देवता महर्षियों के साथ वन में तुम्हारी रक्षा करें॥४॥
यानि दत्तानि तेऽस्त्राणि विश्वामित्रेण धीमता।
तानि त्वामभिरक्षन्तु गुणैः समुदितं सदा॥५॥
“तुम सद्गुणों से प्रकाशित हो, बुद्धिमान् विश्वामित्रजी ने तुम्हें जो-जो अस्त्र दिये हैं, वे सबके-सब सदा सब ओर से तुम्हारी रक्षा करें॥ ५॥
पितृशुश्रूषया पुत्र मातृशुश्रूषया तथा।
सत्येन च महाबाहो चिरं जीवाभिरक्षितः॥६॥
‘महाबाहु पुत्र! तुम पिता की शुश्रूषा, माता की सेवा तथा सत्य के पालन से सुरक्षित होकर चिरंजीवी बने रहो॥
समित्कुशपवित्राणि वेद्यश्चायतनानि च।
स्थण्डिलानि च विप्राणां शैला वृक्षाः क्षुपा ह्रदाः।
पतङ्गाः पन्नगाः सिंहास्त्वां रक्षन्तु नरोत्तम॥७॥
‘नरश्रेष्ठ! समिधा, कुशा, पवित्री, वेदियाँ, मन्दिर, ब्राह्मणोंके देवपूजन सम्बन्धी स्थान, पर्वत, वृक्ष, क्षुप (छोटी शाखा वाले वृक्ष), जलाशय, पक्षी, सर्प और सिंह वन में तुम्हारी रक्षा करें॥ ७॥
स्वस्ति साध्याश्च विश्वे च मरुतश्च महर्षिभिः।
स्वस्ति धाता विधाता च स्वस्ति पूषा भगोय॑मा॥८॥
‘साध्य, विश्वेदेव तथा महर्षियों सहित मरुद्गण तुम्हारा कल्याण करें; धाता और विधाता तुम्हारे लिये मङ्गलकारी हों; पूषा, भग और अर्यमा तुम्हारा कल्याण करें॥८॥
लोकपालाश्च ते सर्वे वासवप्रमुखास्तथा।
ऋतवः षट् च ते सर्वे मासाः संवत्सराः क्षपाः॥
दिनानि च मुहूर्ताश्च स्वस्ति कुर्वन्तु ते सदा।
श्रुतिः स्मृतिश्च धर्मश्च पातु त्वां पुत्र सर्वतः॥ १०॥
‘वे इन्द्र आदि समस्त लोकपाल, छहों ऋतुएँ, सभी मास, संवत्सर, रात्रि, दिन और मुहूर्त सदा तुम्हारा मङ्गल करें। बेटा ! श्रुति, स्मृति और धर्म भी सब ओर से तुम्हारी रक्षा करें। ९-१०॥
स्कन्दश्च भगवान् देवः सोमश्च सबृहस्पतिः।
सप्तर्षयो नारदश्च ते त्वां रक्षन्तु सर्वतः॥११॥
‘भगवान् स्कन्ददेव, सोम, बृहस्पति, सप्तर्षिगण और नारद-ये सभी सब ओर से तुम्हारी रक्षा करें। ११॥
ते चापि सर्वतः सिद्धा दिशश्च सदिगीश्वराः।
स्तुता मया वने तस्मिन् पान्तु त्वां पुत्र नित्यशः॥ १२॥
‘बेटा! वे प्रसिद्ध सिद्धगण, दिशाएँ और दिक्पाल मेरी की हुई स्तुति से संतुष्ट हो उस वन में सदा सब ओर से तुम्हारी रक्षा करें॥ १२ ॥
शैलाः सर्वे समुद्राश्च राजा वरुण एव च।
द्यौरन्तरिक्षं पृथिवी वायुश्च सचराचरः॥१३॥
नक्षत्राणि च सर्वाणि ग्रहाश्च सह दैवतैः।
अहोरात्रे तथा संध्ये पान्तु त्वां वनमाश्रितम्॥ १४॥
‘समस्त पर्वत, समुद्र, राजा वरुण, धुलोक, अन्तरिक्ष, पृथिवी, वायु, चराचर प्राणी, समस्त नक्षत्र, देवताओं सहित ग्रह, दिन और रात तथा दोनों संध्याएँ—ये सब-के-सब वन में जाने पर सदा तुम्हारी रक्षा करें॥ १३-१४॥
ऋतवश्चापि षट् चान्ये मासाः संवत्सरास्तथा।
कलाश्च काष्ठाश्च तथा तव शर्म दिशन्तु ते॥ १५॥
‘छः ऋतुएँ, अन्यान्य मास, संवत्सर, कला और काष्ठा—ये सब तुम्हें कल्याण प्रदान करें॥ १५ ॥
महावनेऽपि चरतो मुनिवेषस्य धीमतः।
तथा देवाश्च दैत्याश्च भवन्तु सुखदाः सदा॥ १६॥
‘मुनि का वेष धारण करके उस विशाल वन में विचरते हुए तुझ बुद्धिमान् पुत्र के लिये समस्त देवता और दैत्य सदा सुखदायक हों॥ १६॥
राक्षसानां पिशाचानां रौद्राणां क्रूरकर्मणाम्।
क्रव्यादानां च सर्वेषां मा भूत् पुत्रक ते भयम्॥ १७॥
‘बेटा! तुम्हें भयंकर राक्षसों, क्रूरकर्मा पिशाचों तथा समस्त मांसभक्षी जन्तुओं से कभी भय न हो। १७॥
प्लवगा वृश्चिका दंशा मशकाश्चैव कानने।
सरीसृपाश्च कीटाश्च मा भूवन् गहने तव॥ १८॥
‘वन में जो मेढक या वानर, बिच्छू, डाँस, मच्छर, पर्वतीय सर्प और कीड़े होते हैं, वे उस गहन वन में तुम्हारे लिये हिंसक न हों॥ १८॥
महाद्विपाश्च सिंहाश्च व्याघ्रा ऋक्षाश्च दंष्ट्रिणः।
महिषाः शृङ्गिणो रौद्रा न ते द्रुह्यन्तु पुत्रक॥१९॥
‘पुत्र! बड़े-बड़े हाथी, सिंह, व्याघ्र, रीछ, दाढ़ वाले अन्य जीव तथा विशाल सींगवाले भयंकर भैंसे वन में तुमसे द्रोह न करें॥ १९॥
नृमांसभोजना रौद्रा ये चान्ये सर्वजातयः।
मा च त्वां हिंसिषुः पुत्र मया सम्पूजितास्त्विह॥ २०॥
वत्स! इनके सिवा जो सभी जातियों में नरमांसभक्षी भयंकर प्राणी हैं, वे मेरे द्वारा यहाँ पूजित होकर वन में तुम्हारी हिंसा न करें॥ २०॥
आगमास्ते शिवाः सन्तु सिध्यन्तु च पराक्रमाः।
सर्वसम्पत्तयो राम स्वस्तिमान् गच्छ पुत्रक॥ २१॥
‘बेटा राम! सभी मार्ग तुम्हारे लिये मङ्गलकारी हों। तुम्हारे पराक्रम सफल हों तथा तुम्हें सब सम्पत्तियाँ प्राप्त होती रहें। तुम सकुशल यात्रा करो ॥ २१॥
स्वस्ति तेऽस्त्वान्तरिक्षेभ्यः पार्थिवेभ्यः पुनः पुनः
सर्वेभ्यश्चैव देवेभ्यो ये च ते परिपन्थिनः॥ २२॥
‘तुम्हें आकाशचारी प्राणियों से, भूतल के जीवजन्तुओं से, समस्त देवताओं से तथा जो तुम्हारे शत्रु हैं, उनसे भी सदा कल्याण प्राप्त होता रहे ॥ २२॥
शुक्रः सोमश्च सूर्यश्च धनदोऽथ यमस्तथा।
पान्तु त्वामर्चिता राम दण्डकारण्यवासिनम॥ २३॥
‘श्रीराम! शुक्र, सोम, सूर्य, कुबेर तथा यम—ये मुझसे पूजित हो दण्डकारण्य में निवास करते समय सदा तुम्हारी रक्षा करें॥ २३॥
अग्निर्वायुस्तथा धूमो मन्त्राश्चर्षिमुखच्युताः।
उपस्पर्शनकाले तु पान्तु त्वां रघुनन्दन॥२४॥
‘रघुनन्दन! स्नान और आचमन के समय अग्नि, वायु, धूम तथा ऋषियों के मुख से निकले हुए मन्त्र तुम्हारी रक्षा करें॥२४॥
सर्वलोकप्रभुर्ब्रह्मा भूतकर्तृ तथर्षयः।
ये च शेषाः सुरास्ते तु रक्षन्तु वनवासिनम्॥ २५॥
‘समस्त लोकों के स्वामी ब्रह्मा, जगत् के कारणभूत परब्रह्म, ऋषिगण तथा उनके अतिरिक्त जो देवता हैं, वे सब-के-सब वनवास के समय तुम्हारी रक्षा करें’। २५॥
इति माल्यैः सुरगणान् गन्धैश्चापि यशस्विनी।
स्तुतिभिश्चानुरूपाभिरान यतलोचना॥२६॥
ऐसा कहकर विशाललोचना यशस्विनी रानी कौसल्या ने पुष्पमाला और गन्ध आदि उपचारों से तथा अनुरूप स्तुतियों द्वारा देवताओं का पूजन किया।२६॥
ज्वलनं समुपादाय ब्राह्मणेन महात्मना।
हावयामास विधिना राममङ्गलकारणात्॥२७॥
उन्होंने श्रीरामकी मङ्गलकामना से अग्नि को लाकर एक महात्मा ब्राह्मण के द्वारा उसमें विधिपूर्वक होम करवाया।
घृतं श्वेतानि माल्यानि समिधश्चैव सर्षपान्।
उपसम्पादयामास कौसल्या परमाङ्गना॥२८॥
श्रेष्ठ नारी महारानी कौसल्या ने घी, श्वेत पुष्प और माला, समिधा तथा सरसों आदि वस्तुएँ ब्राह्मण के समीप रखवा दीं॥ २८॥
उपाध्यायः स विधिना हुत्वा शान्तिमनामयम्।
हतहव्यावशेषेण बाह्यं बलिमकल्पयत्॥२९॥
पुरोहितजी ने समस्त उपद्रवों की शान्ति और आरोग्य के उद्देश्यसे विधिपूर्वक अग्नि में होम करके हवन से बचे हुए हविष्य के द्वारा होम की वेदी से बाहर दसों दिशाओं में इन्द्र आदि लोकपालों के लिये बलि अर्पित की॥ २९॥
मधुदध्यक्षतघृतैः स्वस्तिवाच्यं द्विजांस्ततः।
वाचयामास रामस्य वने स्वस्त्ययनक्रियाम्॥ ३०॥
तदनन्तर स्वस्तिवाचन के उद्देश्य से ब्राह्मणों को मधु, दही, अक्षत और घृत अर्पित करके ‘वन में श्रीराम का सदा मङ्गल हो’ इस कामना से कौसल्याजी ने उन सबसे स्वस्त्ययनसम्बन्धी मन्त्रों का पाठ करवाया। ३०॥
ततस्तस्मै द्विजेन्द्राय राममाता यशस्विनी।
दक्षिणां प्रददौ काम्यां राघवं चेदमब्रवीत्॥३१॥
इसके बाद यशश्विनी श्रीराममाता ने उन विप्रवर पुरोहितजी को उनकी इच्छा के अनुसार दक्षिणा दी और श्रीरघुनाथजी से इस प्रकार कहा— ॥३१॥
यन्मङ्गलं सहस्राक्षे सर्वदेवनमस्कृते।
वृत्रनाशे समभवत् तत् ते भवतु मङ्गलम्॥३२॥
‘वृत्रासुर का नाश करने के निमित्त सर्वदेववन्दित सहस्रनेत्रधारी इन्द्र को जो मङ्गलमय आशीर्वाद प्राप्त हुआ था, वही मङ्गल तुम्हारे लिये भी हो॥३२॥
यन्मङ्गलं सुपर्णस्य विनताकल्पयत् पुरा।
अमृतं प्रार्थयानस्य तत् ते भवतु मङ्गलम्॥३३॥
‘पूर्वकाल में विनतादेवी ने अमृत लाने की इच्छा वाले अपने पुत्र गरुड़ के लिये जो मङ्गलकृत्य किया था, वही मङ्गल तुम्हें भी प्राप्त हो॥ ३३॥
अमृतोत्पादने दैत्यान् नतो वज्रधरस्य यत्।
अदितिर्मङ्गलं प्रादात् तत् ते भवतु मङ्गलम्॥ ३४॥
‘अमृतकी उत्पत्ति के समय दैत्यों का संहार करने वाले वज्रधारी इन्द्र के लिये माता अदिति ने जो मङ्गलमय आशीर्वाद दिया था, वही मङ्गल तुम्हारे लिये भी सुलभ हो॥ ३४॥
त्रिविक्रमान प्रक्रमतो विष्णोरतलतेजसः।
यदासीन्मङ्गलं राम तत् ते भवतु मङ्गलम्॥३५॥
‘श्रीराम! तीन पगों को बढ़ाते हुए अनुपम तेजस्वी भगवान् विष्णु के लिये जो मङ्गलाशंसा की गयी थी, वही मङ्गल तुम्हारे लिये भी प्राप्त हो॥ ३५ ॥
ऋषयः सागरा दीपा वेदा लोका दिशश्च ते।
मङ्गलानि महाबाहो दिशन्तु शुभमङ्गलम्॥३६॥
‘महाबाहो! ऋषि, समुद्र, द्वीप, वेद, समस्त लोक और दिशाएँ तुम्हें मङ्गल प्रदान करें। तुम्हारा सदा शुभ मङ्गल हो’ ॥ ३६॥
इति पुत्रस्य शेषाश्च कृत्वा शिरसि भामिनी।
गन्धैश्चापि समालभ्य राममायतलोचना॥ ३७॥
औषधीं च सुसिद्धार्थां विशल्यकरणीं शुभाम्।
चकार रक्षां कौसल्या मन्त्रैरभिजजाप च॥३८॥
इस प्रकार आशीर्वाद देकर विशाललोचना भामिनी कौसल्या ने पुत्र के मस्तक पर अक्षत रखकर चन्दन और रोली लगायी तथा सब मनोरथों को सिद्ध करने वाली विशल्यकरणी नामक शुभ ओषधि लेकर रक्षा के उद्देश्य से मन्त्र पढ़ते हुए उसको श्रीराम के हाथ में बाँध दिया; फिर उसमें उत्कर्ष लाने के लिये मन्त्र का जप भी किया।
उवाचापि प्रहृष्टेव सा दुःखवशवर्तिनी।
वामात्रेण न भावेन वाचा संसज्जमानया॥३९॥
तदनन्तर दुःख के अधीन हुई कौसल्या ने ऊपर से प्रसन्न-सी होकर मन्त्रों का स्पष्ट उच्चारण भी किया। उस समय वे वाणीमात्र से ही मन्त्रोच्चारण कर सकीं, हृदय से नहीं (क्योंकि हृदय श्रीराम के वियोग की सम्भावनासे व्यथित था, इसीलिये) वे खेद से गद्गद, लड़खड़ाती हुई वाणी से मन्त्र बोल रही थीं॥ ३९॥
आनम्य मूर्ध्नि चाघ्राय परिष्वज्य यशस्विनी।
अवदत् पुत्रमिष्टार्थो गच्छ राम यथासुखम्॥ ४०॥
अरोगं सर्वसिद्धार्थमयोध्यां पुनरागतम्।
पश्यामि त्वां सुखं वत्स संधितं राजवर्त्मसु॥ ४१॥
इसके बाद उनके मस्तक को कुछ झुकाकर यशस्विनी माता ने सूंघा और बेटे को हृदय से लगाकर कहा—’वत्स राम! तुम सफलमनोरथ होकर सुखपूर्वक वन को जाओ। जब पूर्णकाम होकर रोगरहित सकुशल अयोध्या लौटोगे, उस समय तुम्हें राजमार्ग पर स्थित देखकर सुखी होऊँगी। ४०-४१॥
प्रणष्टदुःखसंकल्पा हर्षविद्योतितानना।
द्रक्ष्यामि त्वां वनात् प्राप्तं पूर्णचन्द्रमिवोदितम्॥ ४२॥
‘उस समय मेरे दुःखपूर्ण संकल्प मिट जायँगे, मुखपर हर्षजनित उल्लास छा जायगा और मैं वन से आये हुए तुमको पूर्णिमा की रातमें उदित हुए पूर्ण चन्द्रमा की भाँति देलूँगी॥ ४३॥
भद्रासनगतं राम वनवासादिहागतम्।
द्रक्ष्यामि च पुनस्त्वां तु तीर्णवन्तं पितुर्वचः॥ ४३॥
‘श्रीराम ! वनवास से यहाँ आकर पिता की प्रतिज्ञा को पूर्ण करके जब तुम राजसिंहासन पर बैठोगे, उस समय मैं पुनः प्रसन्नतापूर्वक तुम्हारा दर्शन करूँगी॥ ४३॥
मङ्गलैरुपसम्पन्नो वनवासादिहागतः।
वध्वाश्च मम नित्यं त्वं कामान् संवर्ध याहि भोः॥४४॥
‘अब जाओ और वनवास से यहाँ लौटकर राजोचित मङ्गलमय वस्त्राभूषणों से विभूषित हो तुम सदा मेरी बहू सीता की समस्त कामनाएँ पूर्ण करते रहो॥४४॥
मयार्चिता देवगणाः शिवादयो महर्षयो भूतगणाः सुरोरगाः।
अभिप्रयातस्य वनं चिराय ते हितानि कांक्षन्तु दिशश्च राघव॥४५॥
‘रघुनन्दन ! मैंने सदा जिनका पूजन और सम्मान किया है, वे शिव आदि देवता, महर्षि, भूतगण, देवोपम नाग और सम्पूर्ण दिशाएँ—ये सब-के-सब वन में जानेपर चिरकालतक तुम्हारे हितसाधन की कामना करते रहें’॥ ४५ ॥
अतीव चाश्रुप्रतिपूर्णलोचना समाप्य च स्वस्त्ययनं यथाविधि।
प्रदक्षिणं चापि चकार राघवं पुनः पुनश्चापि निरीक्ष्य सस्वजे॥४६॥
इस प्रकार माता ने नेत्रों में अत्यन्त आँसू भरकर विधिपूर्वक वह स्वस्तिवाचन कर्म पूर्ण किया। फिर श्रीराम की परिक्रमा की और बारंबार उनकी ओर देखकर उन्हें छाती से लगाया॥ ४६॥
तया हि देव्या च कृतप्रदक्षिणो निपीड्य मातुश्चरणौ पुनः पुनः।
जगाम सीतानिलयं महायशाः स राघवः प्रज्वलितस्तया श्रिया॥४७॥
देवी कौसल्या ने जब श्रीराम की प्रदक्षिणा कर ली, तब महायशस्वी रघुनाथजी बारंबार माता के चरणोंको दबाकर प्रणाम करके माता की मङ्गलकामना-जनित उत्कृष्ट शोभा से सम्पन्न हो सीताजी के महल की ओर चल दिये॥ ४७॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चविंशः सर्गः ॥२५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में पचीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।२५॥
सर्ग-26
अभिवाद्य तु कौसल्यां रामः सम्प्रस्थितो वनम्।
कृतस्वस्त्ययनो मात्रा धर्मिष्ठे वर्त्मनि स्थितः॥१॥
धर्मिष्ठ मार्ग पर स्थित हुए श्रीराम माता द्वारा स्वस्तिवाचन-कर्म सम्पन्न हो जाने पर कौसल्या को प्रणाम करके वहाँ से वन के लिये प्रस्थित हुए॥१॥
विराजयन् राजसुतो राजमार्ग नरैर्वृतम्।
हृदयान्याममन्थेव जनस्य गुणवत्तया॥२॥
उस समय मनुष्यों की भीड़ से भरे हुए राजमार्ग को प्रकाशित करते हुए राजकुमार श्रीराम अपने सद्गुणों के कारण लोगों के मन को मथने-से लगे (ऐसे गुणवान् श्रीराम को वनवास दिया जा रहा है, यह सोचकर वहाँ के लोगों का जी कचोटने लगा) ॥२॥
वैदेही चापि तत् सर्वं न शुश्राव तपस्विनी।
तदेव हृदि तस्याश्च यौवराज्याभिषेचनम्॥३॥
तपस्विनी विदेहनन्दिनी सीता ने अभी तक वह सारा हाल नहीं सुना था। उनके हृदय में यही बात समायी हुई थी कि मेरे पति का युवराज पद पर अभिषेक हो रहा होगा।
देवकार्यं स्म सा कृत्वा कृतज्ञा हृष्टचेतना।
अभिज्ञा राजधर्माणां राजपुत्री प्रतीक्षति॥४॥
विदेहराजकुमारी सीता सामयिक कर्तव्यों तथा राजधर्मो को जानती थीं, अतः देवताओं की पूजा करके प्रसन्नचित्त से श्रीराम के आगमन की प्रतीक्षा कर रही थीं।
प्रविवेशाथ रामस्तु स्ववेश्म सुविभूषितम्।
प्रहृष्टजनसम्पूर्ण ह्रिया किंचिदवाङ्मखः॥५॥
इतने में ही श्रीराम ने अपने भलीभाँति सजे-सजाये अन्तःपुर में, जो प्रसन्न मनुष्यों से भरा हुआ था, प्रवेश किया। उस समय लज्जा से उनका मुख कुछ नीचा हो रहा था।
अथ सीता समुत्पत्य वेपमाना च तं पतिम्।
अपश्यच्छोकसंतप्तं चिन्ताव्याकुलितेन्द्रियम्॥
सीता उन्हें देखते ही आसन से उठकर खड़ी हो गयीं। उनकी अवस्था देखकर काँपने लगीं और चिन्ता से व्याकुल इन्द्रियों वाले अपने उन शोकसंतप्त पति को निहारने लगीं॥६॥
तां दृष्ट्वा स हि धर्मात्मा न शशाक मनोगतम्।
तं शोकं राघवः सोढुं ततो विवृततां गतः॥७॥
धर्मात्मा श्रीराम सीता को देखकर अपने मानसिक शोक का वेग सहन न कर सके, अतः उनका वह शोक प्रकट हो गया॥७॥
विवर्णवदनं दृष्ट्वा तं प्रस्विन्नममर्षणम्।
आह दुःखाभिसंतप्ता किमिदानीमिदं प्रभो॥८॥
उनका मुख उदास हो गया था। उनके अङ्गों से पसीना निकल रहा था। वे अपने शोक को दबाये रखने में असमर्थ हो गये थे। उन्हें इस अवस्था में देखकर सीता दुःख से संतप्त हो उठी और बोलीं —’प्रभो! इस समय यह आपकी कैसी दशा है? ॥ ८॥
अद्य बार्हस्पतः श्रीमान् युक्तः पुष्येण राघव।
प्रोच्यते ब्राह्मणैः प्राज्ञैः केन त्वमसि दुर्मनाः॥९॥
‘रघुनन्दन! आज बृहस्पति देवता-सम्बन्धी मङ्गलमय पुष्यनक्षत्र है, जो अभिषेक के योग्य है। उस पुष्यनक्षत्र के योग में विद्वान् ब्राह्मणों ने आपका अभिषेक बताया है। ऐसे समय में जब कि आपको प्रसन्न होना चाहिये था, आपका मन इतना उदास क्यों है? ॥९॥
न ते शतशलाकेन जलफेननिभेन च।
आवृतं वदनं वल्गु च्छत्रेणाभिविराजते॥१०॥
‘मैं देखती हूँ, इस समय आपका मनोहर मुख जल के फेन के समान उज्ज्वल तथा सौ तीलियों वाले श्वेत छत्र से आच्छादित नहीं है, अतएव अधिक शोभा नहीं पा रहा है॥ १० ॥
व्यजनाभ्यां च मुख्याभ्यां शतपत्रनिभेक्षणम्।
चन्द्रहंसप्रकाशाभ्यां वीज्यते न तवाननम्॥११॥
‘कमल-जैसे सुन्दर नेत्र धारण करनेवाले आपके इस मुखपर चन्द्रमा और हंसके समान श्वेत वर्णवाले दो श्रेष्ठ चँवरोंद्वारा हवा नहीं की जा रही है॥ ११॥
वाग्मिनो वन्दिनश्चापि प्रहृष्टास्त्वां नरर्षभ।
स्तुवन्तो नाद्य दृश्यन्ते मङ्गलैः सूतमागधाः॥ १२॥
‘नरश्रेष्ठ! प्रवचनकुशल वन्दी, सूत और मागधजन आज अत्यन्त प्रसन्न हो अपने माङ्गलिक वचनोंद्वारा आपकी स्तुति करते नहीं दिखायी देते हैं।१२ ॥
न ते क्षौद्रं च दधि च ब्राह्मणा वेदपारगाः।
मूर्ध्नि मूर्धाभिषिक्तस्य ददति स्म विधानतः॥
‘वेदों के पारङ्गत विद्वान् ब्राह्मणों ने आज मूर्धाभिषिक्त हुए आपके मस्तक पर तीर्थोदकमिश्रित मधु और दधि का विधिपूर्वक अभिषेक नहीं किया। १३॥
न त्वां प्रकृतयः सर्वाः श्रेणीमुख्याश्च भूषिताः।
अनुव्रजितुमिच्छन्ति पौरजानपदास्तथा ॥१४॥
‘मन्त्री-सेनापति आदि सारी प्रकृतियाँ, वस्त्राभूषणों से विभूषित मुख्य-मुख्य सेठ-साहूकार तथा नगर और जनपद के लोग आज आपके पीछे पीछे चलने की इच्छा नहीं कर रहे हैं! (इसका क्या कारण है?) ॥१४॥
चतुर्भिर्वेगसम्पन्नैर्हयैः काञ्चनभूषणैः ।
मुख्यः पुष्परथो युक्तः किं न गच्छति तेऽग्रतः॥ १५॥
‘सुनहरे साज-बाज से सजे हुए चार वेगशाली घोड़ों से जुता हुआ श्रेष्ठ पुष्परथ (पुष्पभूषित केवल भ्रमणोपयोगी रथ) आज आपके आगे-आगे क्यों नहीं चल रहा है? ॥ १५ ॥
न हस्ती चाग्रतः श्रीमान् सर्वलक्षणपूजितः।
प्रयाणे लक्ष्यते वीर कृष्णमेघगिरिप्रभः॥१६॥
‘वीर! आपकी यात्रा के समय समस्त शुभ लक्षणों से प्रशंसित तथा काले मेघवाले पर्वत के समान विशालकाय तेजस्वी गजराज आज आपके आगे क्यों नहीं दिखायी देता है ? ॥ १६॥
न च काञ्चनचित्रं ते पश्यामि प्रियदर्शन।
भद्रासनं पुरस्कृत्य यान्तं वीर पुरःसरम्॥१७॥
‘प्रियदर्शन वीर! आज आपके सुवर्णजटित भद्रासन को सादर हाथ में लेकर अग्रगामी सेवक आगे जाता क्यों नहीं दिखायी देता है ? ।। १७॥
अभिषेको यदा सज्जः किमिदानीमिदं तव।
अपूर्वो मुखवर्णश्च न प्रहर्षश्च लक्ष्यते॥१८॥
‘जब अभिषेककी सारी तैयारी हो चुकी है, ऐसे समयमें आपकी यह क्या दशा हो रही है? आपके मुखकी कान्ति उड़ गयी है। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। आपके चेहरेपर प्रसन्नताका कोई चिह्न नहीं दिखायी देता है। इसका क्या कारण है?’। १८॥
इतीव विलपन्तीं तां प्रोवाच रघुनन्दनः।
सीते तत्रभवांस्तातः प्रव्राजयति मां वनम्॥१९॥
इस प्रकार विलाप करती हुई सीतासे रघुनन्दन श्रीरामने कहा—’सीते! आज पूज्य पिताजी मुझे वनमें भेज रहे हैं॥१९॥
कुले महति सम्भूते धर्मज्ञे धर्मचारिणि।
शृणु जानकि येनेदं क्रमेणाद्यागतं मम॥२०॥
‘महान् कुलमें उत्पन्न, धर्मको जाननेवाली तथा धर्मपरायणे जनकनन्दिनि! जिस कारण यह वनवास आज मुझे प्राप्त हुआ है, वह क्रमशः बताता हूँ, सुनो॥
राज्ञा सत्यप्रतिज्ञेन पित्रा दशरथेन वै।
कैकेय्यै मम मात्रे तु पुरा दत्तौ महावरौ॥२१॥
मेरे सत्यप्रतिज्ञ पिता महाराज दशरथ ने माता कैकेयी को पहले कभी दो महान् वर दिये थे॥ २१॥
तयाद्य मम सज्जेऽस्मिन्नभिषेके नृपोद्यते।
प्रचोदितः स समयो धर्मेण प्रतिनिर्जितः॥२२॥
‘इधर जब महाराज के उद्योग से मेरे राज्याभिषेक की तैयारी होने लगी, तब कैकेयी ने उस वरदान की प्रतिज्ञा को याद दिलाया और महाराज को धर्मतः अपने काबू में कर लिया॥ २२॥
चतुर्दश हि वर्षाणि वस्तव्यं दण्डके मया।
पित्रा मे भरतश्चापि यौवराज्ये नियोजितः॥ २३॥
‘इससे विवश होकर पिताजी ने भरत को तो युवराज के पदपर नियुक्त किया और मेरे लिये दूसरा वर स्वीकार किया, जिसके अनुसार मुझे चौदह वर्षों तक दण्डकारण्य में निवास करना होगा॥२३॥
सोऽहं त्वामागतो द्रष्टुं प्रस्थितो विजनं वनम्।
भरतस्य समीपे ते नाहं कथ्यः कदाचन ॥२४॥
ऋद्धियुक्ता हि पुरुषा न सहन्ते परस्तवम्।
तस्मान्न ते गुणाः कथ्या भरतस्याग्रतो मम॥ २५॥
‘इस समय मैं निर्जन वन में जाने के लिये प्रस्थान कर चुका हूँ और तुमसे मिलने के लिये यहाँ आया हूँ। तुम भरत के समीप कभी मेरी प्रशंसा न करना; क्योंकि समृद्धिशाली पुरुष दूसरे की स्तुति नहीं सहन कर पाते हैं। इसीलिये कहता हूँ कि तुम भरत के सामने मेरे गुणों की प्रशंसा न करना॥ २४-२५ ॥
अहं ते नानुवक्तव्यो विशेषेण कदाचन।
अनुकूलतया शक्यं समीपे तस्य वर्तितुम्॥२६॥
‘विशेषतः तुम्हें भरत के समक्ष अपनी सखियों के साथ भी बारंबार मेरी चर्चा नहीं करनी चाहिये; क्योंकि उनके मन के अनुकूल बर्ताव करके ही तुम उनके निकट रह सकती हो॥२६॥
तस्मै दत्तं नृपतिना यौवराज्यं सनातनम्।
स प्रसाद्यस्त्वया सीते नृपतिश्च विशेषतः॥२७॥
‘सीते! राजा ने उन्हें सदा के लिये युवराज पद दे दिया है, इसलिये तुम्हें विशेष प्रयत्नपूर्वक उन्हें प्रसन्न रखना चाहिये; क्योंकि अब वे ही राजा होंगे। २७॥
अहं चापि प्रतिज्ञां तां गुरोः समनुपालयन्।
वनमद्यैव यास्यामि स्थिरीभव मनस्विनि॥२८॥
मैं भी पिताजी की उस प्रतिज्ञा का पालन करने के लिये आज ही वन को चला जाऊँगा। मनस्विनि ! तुम धैर्य धारण करके रहना॥२८॥
याते च मयि कल्याणि वनं मुनिनिषेवितम्।
व्रतोपवासपरया भवितव्यं त्वयानघे॥२९॥
‘कल्याणि! निष्पाप सीते! मेरे मुनिजन सेवित वन को चले जाने पर तुम्हें प्रायः व्रत और उपवास में संलग्न रहना चाहिये॥ २९॥
कल्यमुत्थाय देवानां कृत्वा पूजां यथाविधि।
वन्दितव्यो दशरथः पिता मम जनेश्वरः॥३०॥
‘प्रतिदिन सबेरे उठकर देवताओंकी विधिपूर्वक पूजा करके तुम्हें मेरे पिता महाराज दशरथकी वन्दना करनी चाहिये॥३०॥
माता च मम कौसल्या वृद्धा संतापकर्शिता।
धर्ममेवाग्रतः कृत्वा त्वत्तः सम्मानमर्हति॥३१॥
‘मेरी माता कौसल्या को भी प्रणाम करना चाहिये। एक तो वे बूढ़ी हुईं, दूसरे दुःख और संताप ने उन्हें दुर्बल कर दिया है; अतः धर्म को ही सामने रखकर तुमसे वे विशेष सम्मान पाने के योग्य हैं॥ ३१॥
वन्दितव्याश्च ते नित्यं याः शेषा मम मातरः।
स्नेहप्रणयसम्भोगैः समा हि मम मातरः॥३२॥
‘जो मेरी शेष माताएँ हैं, उनके चरणों में भी तुम्हें प्रतिदिन प्रणाम करना चाहिये; क्योंकि स्नेह, उत्कृष्ट प्रेम और पालन-पोषण की दृष्टि से सभी माताएँ मेरे लिये समान हैं॥ ३२॥
भ्रातृपुत्रसमौ चापि द्रष्टव्यौ च विशेषतः।
त्वया भरतशत्रुघ्नौ प्राणैः प्रियतरौ मम॥३३॥
‘भरत और शत्रुघ्न मुझे प्राणों से भी बढ़कर प्रिय हैं, अतः तुम्हें उन दोनोंको विशेषतः अपने भाई और पुत्र के समान देखना और मानना चाहिये।। ३३॥
विप्रियं च न कर्तव्यं भरतस्य कदाचन।
स हि राजा च वैदेहि देशस्य च कुलस्य च॥ ३४॥
‘विदेहनन्दिनि! तुम्हें भरत की इच्छाके विरुद्ध कोई काम नहीं करना चाहिये; क्योंकि इस समय वे मेरे देश और कुल के राजा हैं॥ ३४॥
आराधिता हि शीलेन प्रयत्नैश्चोपसेविताः।
राजानः सम्प्रसीदन्ति प्रकुप्यन्ति विपर्यये॥ ३५॥
‘अनुकूल आचरण के द्वारा आराधना और प्रयत्नपूर्वक सेवा करने पर राजा लोग प्रसन्न होते हैं तथा विपरीत बर्ताव करने पर वे कुपित हो जाते हैं। ३५॥
औरस्यानपि पुत्रान् हि त्यजन्त्यहितकारिणः।
समर्थान् सम्प्रगृह्णन्ति जनानपि नराधिपाः॥ ३६॥
‘जो अहित करने वाले हैं, वे अपने औरस पुत्र ही क्यों न हों, राजा उन्हें त्याग देते हैं और आत्मीय न होने पर भी जो सामर्थ्यवान् होते हैं, उन्हें वे अपना बना लेते हैं॥ ३६॥
सा त्वं वसेह कल्याणि राज्ञः समनुवर्तिनी।
भरतस्य रता धर्मे सत्यव्रतपरायणा॥३७॥
‘अतः कल्याणि! तुम राजा भरत के अनुकूल बर्ताव करती हुई धर्म एवं सत्यव्रत में तत्पर रहकर यहाँ निवास करो॥ ३७॥
अहं गमिष्यामि महावनं प्रिये त्वया हि वस्तव्यमिहैव भामिनि।
यथा व्यलीकं कुरुषे न कस्यचित् तथा त्वया कार्यमिदं वचो मम॥३८॥
‘प्रिये! अब मैं उस विशाल वन में चला जाऊँगा,भामिनि! तुम्हें यहीं निवास करना होगा। तुम्हारे बर्ताव से किसी को कष्ट न हो, इसका ध्यान रखते हुए तुम्हें यहाँ मेरी इस आज्ञा का पालन करते रहना चाहिये’॥ ३८॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे षड्विंशः सर्गः ॥२६॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में छब्बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥२६॥
सर्ग-27
एवमुक्ता तु वैदेही प्रियाय प्रियवादिनी।
प्रणयादेव संक्रुद्धा भर्तारमिदमब्रवीत्॥१॥
श्रीराम के ऐसा कहने पर प्रियवादिनी विदेहकुमारी सीताजी, जो सब प्रकार से अपने स्वामी का प्यार पाने योग्य थीं, प्रेम से ही कुछ कुपित होकर पति से इस प्रकार बोलीं- ॥ १॥
किमिदं भाषसे राम वाक्यं लघुतया ध्रुवम्।
त्वया यदपहास्यं मे श्रुत्वा नरवरोत्तम ॥२॥
‘नरश्रेष्ठ श्रीराम! आप मुझे ओछी समझकर यह क्या कह रहे हैं? आपकी ये बातें सुनकर मुझे बहुत हँसी आती है॥२॥
वीराणां राजपुत्राणां शस्त्रास्त्रविदुषां नृप।
अनर्हमयशस्यं च न श्रोतव्यं त्वयेरितम्॥३॥
‘नरेश्वर! आपने जो कुछ कहा है, वह अस्त्रशस्त्रों के ज्ञाता वीर राजकुमारों के योग्य नहीं है। वह अपयश का टीका लगानेवाला होने के कारण सुनने योग्य भी नहीं है॥३॥
आर्यपुत्र पिता माता भ्राता पुत्रस्तथा स्नुषा।
स्वानि पुण्यानि भुञ्जानाः स्वं स्वं भाग्यमुपासते॥४॥
‘आर्यपुत्र ! पिता, माता, भाई, पुत्र और पुत्रवधू-ये सब पुण्यादि कर्मों का फल भोगते हुए अपने-अपने भाग्य (शुभाशुभ कर्म) के अनुसार जीवन-निर्वाह करते हैं॥४॥
भर्तुर्भाग्यं तु नार्येका प्राप्नोति पुरुषर्षभ।
अतश्चैवाहमादिष्टा वने वस्तव्यमित्यपि॥५॥
‘पुरुषप्रवर! केवल पत्नी ही अपने पति के भाग्य का अनुसरण करती है, अतः आपके साथ ही मुझे भी वन में रहने की आज्ञा मिल गयी है॥५॥
न पिता नात्मजो वात्मा न माता न सखीजनः।
इह प्रेत्य च नारीणां पतिरेको गतिः सदा॥६॥
‘नारियों के लिये इस लोक और परलोक में एकमात्र पति ही सदा आश्रय देनेवाला है। पिता, पुत्र, माता, सखियाँ तथा अपना यह शरीर भी उसका सच्चा सहायक नहीं है।
यदि त्वं प्रस्थितो दुर्गं वनमद्यैव राघव।
अग्रतस्ते गमिष्यामि मृदुनन्ती कुशकण्टकान्॥ ७॥
‘रघुनन्दन! यदि आप आज ही दुर्गम वन की ओर प्रस्थान कर रहे हैं तो मैं रास्ते के कुश और काँटों को कुचलती हुई आपके आगे-आगे चलूँगी॥७॥
ईर्ष्या रोषं बहिष्कृत्य भुक्तशेषमिवोदकम्।
नय मां वीर विस्रब्धः पापं मयि न विद्यते॥८॥
‘अतः वीर! आप ईर्ष्या और रोष को दूर करके पीने से बचे हुए जल की भाँति मुझे निःशङ्क होकर साथ ले चलिये। मुझमें ऐसा कोई पाप-अपराध नहीं है, जिसके कारण आप मुझे यहाँ त्याग दें॥८॥
१. स्त्री होकर यह वनमें जानेका साहस कैसे करती है ? इस विचारसे ईर्ष्या होती है।
२. यह मेरी बात नहीं मान रही है, यह सोचकर रोष प्रकट होता है। इन दोनों का त्याग अपेक्षित है।
३. जैसे किसी जलहीन बीहड़ पथ में लोग अपने पीने से बचे हुए पानी को साथ ले चलते हैं, उसी प्रकार मुझे भी आप साथ ले चलें—यह सीता का अनुरोध है।
प्रासादाग्रे विमानैर्वा वैहायसगतेन वा।
सर्वावस्थागता भर्तुः पादच्छाया विशिष्यते॥९॥
‘ऊँचे-ऊँचे महलों में रहना, विमानों पर चढ़कर घूमना अथवा अणिमा आदि सिद्धियों के द्वारा आकाश में विचरना—इन सबकी अपेक्षा स्त्री के लिये सभी अवस्थाओं में पति के चरणों की छाया में रहना विशेष महत्त्व रखता है॥९॥
अनुशिष्टास्मि मात्रा च पित्रा च विविधाश्रयम्।
नास्मि सम्प्रति वक्तव्या वर्तितव्यं यथा मया॥ १०॥
‘मुझे किसके साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये, इस विषय में मेरी माता और पिता ने मुझे अनेक प्रकार से शिक्षा दी है। इस समय इसके विषय में मुझे कोई उपदेश देने की आवश्यकता नहीं है॥ १०॥
अहं दुर्गं गमिष्यामि वनं पुरुषवर्जितम्।
नानामृगगणाकीर्णं शार्दूलगणसेवितम्॥११॥
‘अतः नाना प्रकारके वन्य पशुओंसे व्याप्त तथा सिंहों और व्याघ्रोंसे सेवित उस निर्जन एवं दुर्गम | वनमें मैं अवश्य चलूँगी॥११॥
सुखं वने निवत्स्यामि यथैव भवने पितुः।
अचिन्तयन्ती त्रील्लोकांश्चिन्तयन्ती पतिव्रतम्॥
‘मैं तो जैसे अपने पिता के घर में रहती थी, उसी प्रकार उस वन में भी सुखपूर्वक निवास करूँगी। वहाँ तीनों लोकों के ऐश्वर्य को भी कुछ न समझती हुई मैं सदा पतिव्रत-धर्म का चिन्तन करती हुई आपकी सेवा में लगी रहूँगी॥ १२ ॥
शुश्रूषमाणा ते नित्यं नियता ब्रह्मचारिणी।
सह रंस्ये त्वया वीर वनेषु मधुगन्धिषु॥१३॥
‘वीर! नियमपूर्वक रहकर ब्रह्मचर्यव्रत का पालन करूँगी और सदा आपकी सेवा में तत्पर रहकर आपही के साथ मीठी-मीठी सुगन्ध से भरे हुए वनों में विचरूँगी॥ १३॥
त्वं हि कर्तुं वने शक्तो राम सम्परिपालनम्।
अन्यस्यापि जनस्येह किं पुनर्मम मानद ॥१४॥
‘दूसरों को मान देने वाले श्रीराम! आप तो वन में रहकर दूसरे लोगों की भी रक्षा कर सकते हैं, फिर मेरी रक्षा करना आपके लिये कौन बड़ी बात है?॥ १४॥
साहं त्वया गमिष्यामि वनमद्य न संशयः।
नाहं शक्या महाभाग निवर्तयितुमुद्यता॥१५॥
‘महाभाग! अतः मैं आपके साथ आज अवश्य वनमें चलूँगी। इसमें संशय नहीं है। मैं हर तरह चलनेको तैयार हूँ। मुझे किसी तरह भी रोका नहीं जा सकता ॥ १५॥
फलमूलाशना नित्यं भविष्यामि न संशयः।
न ते दुःखं करिष्यामि निवसन्ती त्वया सदा॥ १६॥
‘वहाँ चलकर मैं आपको कोई कष्ट नहीं दूंगी, सदा आपके साथ रहूँगी और प्रतिदिन फल-मूल खाकर ही निर्वाह करूँगी। मेरे इस कथनमें किसी प्रकारके संदेहके लिये स्थान नहीं है॥१६॥
अग्रतस्ते गमिष्यामि भोक्ष्ये भुक्तवति त्वयि।
इच्छामि परतः शैलान् पल्वलानि सरांसि च॥ १७॥
द्रष्टुं सर्वत्र निर्मीता त्वया नाथेन धीमता।
‘आपके आगे-आगे चलूँगी और आपके भोजन कर लेने पर जो कुछ बचेगा, उसे ही खाकर रहूँगी।प्रभो! मेरी बड़ी इच्छा है कि मैं आप बुद्धिमान् प्राणनाथ के साथ निर्भय हो वन में सर्वत्र घूमकर पर्वतों, छोटे-छोटे तालाबों और सरोवरों को देखू॥ १७ १/२॥
हंसकारण्डवाकीर्णाः पद्मिनीः साधुपुष्पिताः॥ १८॥
इच्छेयं सुखिनी द्रष्टुं त्वया वीरेण संगता।
‘आप मेरे वीर स्वामी हैं। मैं आपके साथ रहकर सुखपूर्वक उन सुन्दर सरोवरों की शोभा देखना चाहती हूँ, जो श्रेष्ठ कमलपुष्पों से सुशोभित हैं तथा जिनमें हंस और कारण्डव आदि पक्षी भरे रहते हैं॥ १८ १/२॥
अभिषेकं करिष्यामि तासु नित्यमनुव्रता॥१९॥
सह त्वया विशालाक्ष रंस्ये परमनन्दिनी।
‘विशाल नेत्रोंवाले आर्यपुत्र! आपके चरणों में अनुरक्त रहकर मैं प्रतिदिन उन सरोवरों में स्नान करूँगी और आपके साथ वहाँ सब ओर विचरूँगी, इससे मुझे परम आनन्द का अनुभव होगा॥ १९ १/२ ॥
एवं वर्षसहस्राणि शतं वापि त्वया सह ॥२०॥
व्यतिक्रमं न वेत्स्यामि स्वर्गोऽपि हि न मे मतः।
‘इस तरह सैकड़ों या हजारों वर्षों तक भी यदि आपके साथ रहने का सौभाग्य मिले तो मुझे कभी कष्ट का अनुभव नहीं होगा। यदि आप साथ न हों तो मुझे स्वर्गलोक की प्राप्ति भी अभीष्ट नहीं है॥ २० १/२॥
स्वर्गेऽपि च विना वासो भविता यदि राघव।
त्वया विना नरव्याघ्र नाहं तदपि रोचये॥२१॥
‘पुरुषसिंह रघुनन्दन! आपके बिना यदि मुझे स्वर्गलोक का निवास भी मिल रहा हो तो वह मेरे लिये रुचिकर नहीं हो सकता—मैं उसे लेना नहीं चाहूँगी॥ २१॥
अहं गमिष्यामि वनं सदर्गमं मृगायुतं वानरवारणैश्च।
वने निवत्स्यामि यथा पितुर्गृहे तवैव पादावुपगृह्य सम्मता॥२२॥
‘प्राणनाथ! अतः उस अत्यन्त दुर्गम वन में, जहाँ सहस्रों मृग, वानर और हाथी निवास करते हैं, मैं अवश्य चलूँगी और आपके ही चरणों की सेवा में रहकर आपके अनुकूल चलती हुई उस वन में उसी तरह सुख से रहूँगी, जैसे पिता के घर में रहा करती थी॥ २२॥
अनन्यभावामनुरक्तचेतसं त्वया वियुक्तां मरणाय निश्चिताम्।
नयस्व मां साधु कुरुष्व याचना नातो मया ते गुरुता भविष्यति ॥२३॥
‘मेरे हृदय का सम्पूर्ण प्रेम एकमात्र आपको ही अर्पित है, आपके सिवा और कहीं मेरा मन नहीं जाता, यदि आपसे वियोग हुआ तो निश्चय ही मेरी मृत्यु हो जायगी। इसलिये आप मेरी याचना सफल करें, मुझे साथ ले चलें, यही अच्छा होगा; मेरे रहने से आपपर कोई भार नहीं पड़ेगा’ ॥ २३॥
तथा ब्रुवाणामपि धर्मवत्सलां न च स्म सीतां नृवरो निनीषति।
उवाच चैनां बहु संनिवर्तने वने निवासस्य च दुःखितां प्रति॥२४॥
धर्म में अनुरक्त रहने वाली सीता के इस प्रकार प्रार्थना करने पर भी नरश्रेष्ठ श्रीराम को उन्हें साथ ले जाने की इच्छा नहीं हुई। वे उन्हें वनवास के विचार से निवृत्त करने के लिये वहाँ के कष्टों का अनेक प्रकार से विस्तारपूर्वक वर्णन करने लगे॥ २४॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्तविंशः सर्गः ॥२७॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में सत्ताईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २७॥
सर्ग-28
स एवं ब्रुवतीं सीतां धर्मज्ञां धर्मवत्सलः।
न नेतुं कुरुते बुद्धिं वने दुःखानि चिन्तयन्॥१॥
धर्म को जानने वाली सीता के इस प्रकार कहने पर भी धर्मवत्सल श्रीराम ने वन में होने वाले दुःखों को सोचकर उन्हें साथ ले जाने का विचार नहीं किया॥१॥
सान्त्वयित्वा ततस्तां तु बाष्पदूषितलोचनाम्।
निवर्तनार्थे धर्मात्मा वाक्यमेतदुवाच ह॥२॥
सीता के नेत्रों में आँसू भरे हुए थे। धर्मात्मा श्रीराम उन्हें वनवास के विचार से निवृत्त करने के लिये सान्त्वना देते हुए इस प्रकार बोले- ॥२॥
सीते महाकुलीनासि धर्मे च निरता सदा।
इहाचरस्व धर्मं त्वं यथा मे मनसः सुखम्॥॥
‘सीते! तुम अत्यन्त उत्तम कुल में उत्पन्न हुई हो और सदा धर्म के आचरण में ही लगी रहती हो; अतःयहीं रहकर धर्म का पालन करो, जिससे मेरे मन को संतोष हो॥
सीते यथा त्वां वक्ष्यामि तथा कार्यं त्वयाबले।
वने दोषा हि बहवो वसतस्तान् निबोध मे॥४॥
‘सीते! मैं तुमसे जैसा कहूँ, वैसा ही करना तुम्हारा कर्तव्य है। तुम अबला हो, वन में निवास करने वाले मनुष्य को बहुत-से दोष प्राप्त होते हैं; उन्हें बता रहा हूँ, मुझसे सुनो॥४॥
सीते विमुच्यतामेषा वनवासकृता मतिः।
बहुदोषं हि कान्तारं वनमित्यभिधीयते॥५॥
‘सीते! वनवास के लिये चलने का यह विचार छोड़ दो, वन को अनेक प्रकार के दोषों से व्याप्त और दुर्गम बताया जाता है॥५॥
हितबुद्ध्या खलु वचो मयैतदभिधीयते।
सदा सुखं न जानामि दुःखमेव सदा वनम्॥६॥
‘तुम्हारे हित की भावना से ही मैं ये सब बातें कह रहा हूँ। जहाँ तक मेरी जानकारी है, वन में सदा सुख नहीं मिलता। वहाँ तो सदा दुःख ही मिला करता है। ६॥
गिरिनिर्झरसम्भूता गिरिनिर्दरिवासिनाम्।
सिंहानां निनदा दुःखाः श्रोतुं दुःखमतो वनम्॥ ७॥
‘पर्वतों से गिरने वाले झरनों के शब्द को सुनकर उन पर्वतों की कन्दराओं में रहने वाले सिंह दहाड़ने लगते हैं। उनकी वह गर्जना सुनने में बड़ी दुःखदायिनी प्रतीत होती है, इसलिये वन दुःखमय ही है॥ ७॥
क्रीडमानाश्च विस्रब्धा मत्ताः शून्ये तथा मृगाः।
दृष्ट्वा समभिवर्तन्ते सीते दुःखमतो वनम्॥८॥
‘सीते! सूने वन में निर्भय होकर क्रीड़ा करने वाले मतवाले जंगली पशु मनुष्य को देखते ही उस पर चारों ओर से टूट पड़ते हैं; अतः वन दुःख से भरा हुआ है।
सग्राहाः सरितश्चैव पङ्कवत्यस्तु दुस्तराः।
मत्तैरपि गजैर्नित्यमतो दुःखतरं वनम्॥९॥
‘वन में जो नदियाँ होती हैं, उनके भीतर ग्राह निवास करते हैं, उनमें कीचड़ अधिक होने के कारण उन्हें पार करना अत्यन्त कठिन होता है। इसके सिवा वन में मतवाले हाथी सदा घूमते रहते हैं। इस सब कारणों से वन बहुत ही दुःखदायक होता है॥९॥
लताकण्टकसंकीर्णाः कृकवाकूपनादिताः।
निरपाश्च सुदुःखाश्च मार्गा दुःखमतो वनम्॥ १०॥
‘वन के मार्ग लताओं और काँटों से भरे रहते हैं। वहाँ जंगली मुर्गे बोला करते हैं, उन मार्गों पर चलने में बड़ा कष्ट होता है तथा वहाँ आस-पास जल नहीं मिलता, इससे वन में दुःख-ही-दुःख है॥ १० ॥
सुप्यते पर्णशय्यासु स्वयंभग्नासु भूतले।
रात्रिषु श्रमखिन्नेन तस्माद् दुःखमतो वनम्॥ ११॥
‘दिनभर के परिश्रम से थके-माँदे मनुष्य को रात में जमीन के ऊपर अपने-आप गिरे हुए सूखे पत्तों के बिछौने पर सोना पड़ता है, अतः वन दुःख से भरा हुआ है॥ ११॥
अहोरात्रं च संतोषः कर्तव्यो नियतात्मना।
फलैर्वृक्षावपतितैः सीते दुःखमतो वनम्॥१२॥
‘सीते! वहाँ मन को वश में रखकर वृक्षों से स्वतः गिरे हुए फलों के आहार पर ही दिन-रात संतोष करना पड़ता है, अतः वन दुःख देने वाला ही है॥ १२ ॥
उपवासश्च कर्तव्यो यथा प्राणेन मैथिलि।
जटाभारश्च कर्तव्यो वल्कलाम्बरधारणम्॥ १३॥
‘मिथिलेशकुमारी! अपनी शक्तिके अनुसार उपवास करना, सिरपर जटाका भार ढोना और वल्कल वस्त्र धारण करना—यही वहाँकी जीवनशैली है॥ १३ ॥
देवतानां पितॄणां च कर्तव्यं विधिपूर्वकम्।
प्राप्तानामतिथीनां च नित्यशः प्रतिपूजनम्॥ १४॥
‘देवताओं का, पितरों का तथा आये हुए अतिथियों का प्रतिदिन शास्त्रोक्तविधि के अनुसार पूजन करना—यह वनवासी का प्रधान कर्तव्य है॥ १४ ॥
कार्यस्त्रिरभिषेकश्च काले काले च नित्यशः।
चरतां नियमेनैव तस्माद् दुःखतरं वनम्॥१५॥
‘वनवासी को प्रतिदिन नियमपूर्वक तीनों समय स्नान करना होता है। इसलिये वन बहुत ही कष्ट देनेवाला है।
उपहारश्च कर्तव्यः कुसुमैः स्वयमाहृतैः।
आर्षेण विधिना वेद्यां सीते दुःखमतो वनम्॥ १६॥
‘सीते! वहाँ स्वयं चुनकर लाये हुए फूलों द्वारा वेदोक्त विधि से वेदी पर देवताओं की पूजा करनी पड़ती है। इसलिये वन को कष्टप्रद कहा गया है।॥ १६॥
यथालब्धेन कर्तव्यः संतोषस्तेन मैथिलि।
यताहारैर्वनचरैः सीते दुःखमतो वनम्॥१७॥
‘मिथिलेशकुमारी जानकी! वनवासियों को जबजैसा आहार मिल जाय उसी पर संतोष करना पड़ता है; अतः वन दुःखरूप ही है॥ १७॥
अतीव वातस्तिमिरं बुभुक्षा चाति नित्यशः।
भयानि च महान्त्यत्र ततो दुःखतरं वनम्॥१८॥
‘वन में प्रचण्ड आँधी, घोर अन्धकार, प्रतिदिन भूख का कष्ट तथा और भी बड़े-बड़े भय प्राप्त होते हैं, अतः वन अत्यन्त कष्टप्रद है॥ १८॥
सरीसृपाश्च बहवो बहुरूपाश्च भामिनि।
चरन्ति पथि ते दर्पात् ततो दुःखतरं वनम्॥१९॥
‘भामिनि! वहाँ बहुत-से पहाड़ी सर्प, जो अनेक प्रकार के रूपवाले होते हैं, दर्पवश बीच रास्ते में विचरते रहते हैं; अतः वन अत्यन्त कष्टदायक है। १९॥
नदीनिलयनाः सर्पा नदीकुटिलगामिनः।
तिष्ठन्त्यावृत्य पन्थानमतो दुःखतरं वनम्॥२०॥
‘जो नदियों में निवास करते और नदियों के समान ही कुटिल गति से चलते हैं, ऐसे बहुसंख्यक सर्प वन में रास्ते को घेरकर पड़े रहते हैं; इसलिये वन बहुत ही कष्टदायक है॥ २०॥
पतङ्गा वृश्चिकाः कीटा दंशाश्च मशकैः सह।
बाधन्ते नित्यमबले सर्वं दुःखमतो वनम्॥ २१॥
‘अबले! पतंगे, बिच्छू, कीड़े, डाँस और मच्छर वहाँ सदा कष्ट पहुँचाते रहते हैं; अतः सारा वन दुःखरूप ही है॥ २१॥
द्रुमाः कण्टकिनश्चैव कुशाः काशाश्च भामिनि।
वने व्याकुलशाखाग्रास्तेन दुःखमतो वनम्॥ २२॥
‘भामिनि! वन में काँटेदार वृक्ष, कुश और कास होते हैं, जिनकी शाखाओं के अग्रभाग सब ओर फैले हुए होते हैं; इसलिये वन विशेष कष्टदायक होता है। २२॥
कायक्लेशाश्च बहवो भयानि विविधानि च।
अरण्यवासे वसतो दुःखमेव सदा वनम्॥२३॥
‘वनमें निवास करने वाले मनुष्य को बहुत-से शारीरिक क्लेशों और नाना प्रकार के भयों का सामना करना पड़ता है, अतः वन सदा दुःखरूप ही होता है।॥ २३॥
क्रोधलोभौ विमोक्तव्यौ कर्तव्या तपसे मतिः।
न भेतव्यं च भेतव्ये दुःखं नित्यमतो वनम्॥ २४॥
‘वहाँ क्रोध और लोभ को त्याग देना होता है, तपस्या में मन लगाना पड़ता है और जहाँ भय का स्थान है, वहाँ भी भयभीत न होने की आवश्यकता होती है; अतः वन में सदा दुःख-ही-दुःख है॥ २४॥
तदलं ते वनं गत्वा क्षेमं नहि वनं तव।।
विमृशन्निव पश्यामि बहुदोषकरं वनम्॥२५॥
‘इसलिये तुम्हारा वन में जाना ठीक नहीं है। वहाँ जाकर तुम सकुशल नहीं रह सकती। मैं बहुत सोच विचारकर देखता और समझता हूँ कि वन में रहना अनेक दोषों का उत्पादक बहुत ही कष्टदायक है। २५॥
वनं तु नेतुं न कृता मतिर्यदा बभूव रामेण तदा महात्मना।
न तस्य सीता वचनं चकार तं ततोऽब्रवीद् राममिदं सुदुःखिता॥२६॥
जब महात्मा श्रीराम ने उस समय सीता को वन में ले जाने का विचार नहीं किया, तब सीता ने भी उनकी उस बात को नहीं माना। वे अत्यन्त दुःखी होकर श्रीराम से इस प्रकार बोलीं॥२६॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टाविंशः सर्गः ॥२८॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में अट्ठाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥२८॥
सर्ग-29
एतत् तु वचनं श्रुत्वा सीता रामस्य दुःखिता।
प्रसक्ताश्रुमुखी मन्दमिदं वचनमब्रवीत्॥१॥
श्रीरामचन्द्रजी की यह बात सुनकर सीता को बड़ा दुःख हुआ, उनके मुख पर आँसुओं की धारा बह चली और वे धीरे-धीरे इस प्रकार कहने लगीं- ॥१॥
ये त्वया कीर्तिता दोषा वने वस्तव्यतां प्रति।
गुणानित्येव तान् विद्धि तव स्नेहपुरस्कृता॥२॥
‘प्राणनाथ! आपने वन में रहने के जो-जो दोष बताये हैं, वे सब आपका स्नेह पाकर मेरे लिये गुणरूप हो जायँगे। इस बात को आप अच्छी तरह समझ लें॥
मृगाः सिंहा गजाश्चैव शार्दूलाः शरभास्तथा।
चमराः सृमराश्चैव ये चान्ये वनचारिणः॥३॥
अदृष्टपूर्वरूपत्वात् सर्वे ते तव राघव।
रूपं दृष्ट्वापसपैयुस्तव सर्वे हि बिभ्यति॥४॥
‘रघुनन्दन! मृग, सिंह, हाथी, शेर, शरभ. चमरी गाय, नीलगाय तथा जो अन्य जंगली जीव हैं, वे सब-के-सब आपका रूप देखकर भाग जायँगे; क्योंकि ऐसा प्रभावशाली स्वरूप उन्होंने पहले कभी नहीं देखा होगा। आपसे तो सभी डरते हैं; फिर वे पशु क्यों नहीं डरेंगे? ॥ ३-४॥
त्वया च सह गन्तव्यं मया गुरुजनाज्ञया।
त्वद्वियोगेन मे राम त्यक्तव्यमिह जीवितम्॥५॥
‘श्रीराम! मुझे गुरुजनों की आज्ञा से निश्चय ही आपके साथ चलना है; क्योंकि आपका वियोग हो जाने पर मैं यहाँ अपने जीवन का परित्याग कर दूँगी॥
नहि मां त्वत्समीपस्थामपि शक्रोऽपि राघव।
सुराणामीश्वरः शक्तः प्रधर्षयितुमोजसा॥६॥
‘रघुनाथजी! आपके समीप रहने पर देवताओं के राजा इन्द्र भी बलपूर्वक मेरा तिरस्कार नहीं कर सकते॥६॥
पतिहीना तु या नारी न सा शक्ष्यति जीवितुम्।
काममेवंविधं राम त्वया मम निदर्शितम्॥७॥
श्रीराम ! पतिव्रता स्त्री अपने पति से वियोग होने पर जीवित नहीं रह सकेगी; ऐसी बात आपने भी मुझे भलीभाँति दर्शायी है॥७॥
अथापि च महाप्राज्ञ ब्राह्मणानां मया श्रुतम्।
पुरा पितृगृहे सत्यं वस्तव्यं किल मे वने॥८॥
‘महाप्राज्ञ! यद्यपि वन में दोष और दुःख ही भरे हैं, तथापि अपने पिता के घर पर रहते समय मैं ब्राह्मणों के मुख से पहले यह बात सुन चुकी हूँ कि ‘मुझे अवश्य ही वन में रहना पड़ेगा’ यह बात मेरे जीवन में सत्य होकर रहेगी॥८॥
लक्षणिभ्यो द्विजातिभ्यः श्रुत्वाहं वचनं गृहे।
वनवासकृतोत्साहा नित्यमेव महाबल॥९॥
‘महाबली वीर! हस्तरेखा देखकर भविष्य की बातें जान लेने वाले ब्राह्मणों के मुख से अपने घर पर ऐसी बात सुनकर मैं सदा ही वनवास के लिये उत्साहित रहती हूँ॥
आदेशो वनवासस्य प्राप्तव्यः स मया किल।
सा त्वया सह भाहं यास्यामि प्रिय नान्यथा॥ १०॥
‘प्रियतम! ब्राह्मण से ज्ञात हुआ वन में रहने का आदेश एक-न-एक दिन मुझे पूरा करना ही पड़ेगा, यह किसी तरह पलट नहीं सकता। अतः मैं अपने स्वामी आपके साथ वन में अवश्य चलूँगी॥ १० ॥
कृतादेशा भविष्यामि गमिष्यामि त्वया सह।
कालश्चायं समुत्पन्नः सत्यवान् भवतु द्विजः॥ ११॥
‘ऐसा होने से मैं उस भाग्य के विधान को भोग लूंगी। उसके लिये यह समय आ गया है, अतः आपके साथ मुझे चलना ही है; इससे उस ब्राह्मण की बात भी सच्ची हो जायगी॥ ११॥
वनवासे हि जानामि दुःखानि बहुधा किल।
प्राप्यन्ते नियतं वीर पुरुषैरकृतात्मभिः॥१२॥
‘वीर! मैं जानती हूँ कि वनवास में अवश्य ही बहुत-से दुःख प्राप्त होते हैं; परंतु वे उन्हीं को दुःख जान पड़ते हैं, जिनकी इन्द्रियाँ और मन अपने वश में नहीं हैं ॥ १२॥
कन्यया च पितुर्गेहे वनवासः श्रुतो मया।
भिक्षिण्याः शमवृत्ताया मम मातुरिहाग्रतः॥१३॥
‘पिता के घर पर कुमारी अवस्था में एक शान्तिपरायणा भिक्षुकी के मुख से भी मैंने अपने वनवास की बात सुनी थी। उसने मेरी माता के सामने ही ऐसी बात कही थी॥
प्रसादितश्च वै पूर्वं त्वं मे बहुतिथं प्रभो।
गमनं वनवासस्य कांक्षितं हि सह त्वया॥१४॥
‘प्रभो! यहाँ आने पर भी मैंने पहले ही कई बार आपसे कुछ कालतक वन में रहने के लिये प्रार्थना की थी और आपको राजी भी कर लिया था। इससे आप निश्चितरूप से जान लें कि आपके साथ वन को चलना मुझे पहले से ही अभीष्ट है॥ १४ ॥
कृतक्षणाहं भद्रं ते गमनं प्रति राघव।
वनवासस्य शूरस्य मम चर्या हि रोचते॥१५॥
‘रघुनन्दन! आपका भला हो। मैं वहाँ चलने के लिये पहले से ही आपकी अनुमति प्राप्त कर चुकी हूँ। अपने शूरवीर वनवासी पति की सेवा करना मेरे लिये अधिक रुचिकर है॥ १५ ॥
शुद्धात्मन् प्रेमभावाद्धि भविष्यामि विकल्मषा।
भर्तारमनुगच्छन्ती भर्ता हि परदैवतम्॥१६॥
‘शुद्धात्मन्! आप मेरे स्वामी हैं, आपके पीछे प्रेमभाव से वन में जाने पर मेरे पाप दूर हो जायेंगे; क्योंकि स्वामी ही स्त्री के लिये सबसे बड़ा देवता है॥ १६॥
प्रेत्यभावे हि कल्याणः संगमो मे सदा त्वया।
श्रुतिर्हि श्रूयते पुण्या ब्राह्मणानां यशस्विनाम्॥ १७॥
‘आपके अनुगमन से परलोक में भी मेरा कल्याण होगा और सदा आपके साथ मेरा संयोग बना रहेगा। इस विषय में यशस्वी ब्राह्मणों के मुख से एक पवित्र – श्रुति सुनी जाती है (जो इस प्रकार है-)॥१७॥
इहलोके च पितृभिर्या स्त्री यस्य महाबल।
अद्भिर्दत्ता स्वधर्मेण प्रेत्यभावेऽपि तस्य सा॥ १८॥
‘महाबली वीर! इस लोक में पिता आदि के द्वारा जो कन्या जिस पुरुष को अपने धर्म के अनुसार जल से संकल्प करके दे दी जाती है, वह मरने के बाद परलोक में भी उसी की स्त्री होती है॥ १८॥
एवमस्मात् स्वकां नारी सुवृत्तां हि पतिव्रताम्।
नाभिरोचयसे नेतुं त्वं मां केनेह हेतुना ॥१९॥
‘मैं आपकी धर्मपत्नी हूँ, उत्तम व्रत का पालन करने वाली और पतिव्रता हूँ, फिर क्या कारण है कि आप मुझे यहाँ से अपने साथ ले चलना नहीं चाहतेहैं।॥ १९॥
भक्तां पतिव्रतां दीनां मां समां सुखदुःखयोः।
नेतुमर्हसि काकुत्स्थ समानसुखदुःखिनीम्॥२०॥
‘ककुत्स्थकुलभूषण! मैं आपकी भक्त हूँ, पातिव्रत्य का पालन करती हूँ, आपके बिछोह के भय से दीन हो रही हूँ तथा आपके सुख-दुःख में समान रूप से हाथ बँटाने वाली हूँ। मुझे सुख मिले या दुःख, मैं दोनों अवस्थाओं में सम रहूँगी हर्ष या शोक के वशीभूत नहीं होऊँगी। अतः आप अवश्य ही मुझे साथ ले चलने की कृपा करें॥ २०॥
यदि मां दुःखितामेवं वनं नेतुं न चेच्छसि।
विषमग्निं जलं वाहमास्थास्ये मृत्युकारणात्॥ २१॥
‘यदि आप इस प्रकार दुःख में पड़ी हुई मुझ सेविका को अपने साथ वन में ले जाना नहीं चाहते हैं तो मैं मृत्यु के लिये विष खा लूँगी, आगमें कूद पडूंगी अथवा जल में डूब जाऊँगी’ ॥ २१॥
एवं बहुविधं तं सा याचते गमनं प्रति।
नानुमेने महाबाहुस्तां नेतुं विजनं वनम्॥ २२॥
इस तरह अनेक प्रकार से सीताजी वन में जाने के लिये याचना कर रही थीं तथापि महाबाहु श्रीराम ने उन्हें अपने साथ निर्जन वन में ले जाने की अनुमति नहीं दी।
एवमुक्ता तु सा चिन्तां मैथिली समुपागता।
स्नापयन्तीव गामुष्णैरश्रुभिर्नयनच्युतैः॥२३॥
इस प्रकार उनके अस्वीकार कर देने पर मिथिलेशकुमारी सीता को बड़ी चिन्ता हुई और वे अपने नेत्रों से गरम-गरम आँसू बहाकर धरती को भिगोने-सी लगीं॥ २३॥
चिन्तयन्तीं तदा तां तु निवर्तयितुमात्मवान्।
क्रोधाविष्टां तु वैदेहीं काकुत्स्थो बह्वसान्त्वयत्॥ २४॥
उस समय विदेहनन्दिनी जानकी को चिन्तित और कुपित देख मन को वश में रखने वाले श्रीरामचन्द्रजी ने उन्हें वनवास के विचार से निवृत्त करने के लिये भाँति
भाँति की बातें कहकर समझाया॥ २४ ॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकोनत्रिंशः सर्गः ॥२९॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में उनतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥२९॥
सर्ग-30
सान्त्व्यमाना तु रामेण मैथिली जनकात्मजा।
वनवासनिमित्तार्थं भर्तारमिदमब्रवीत्॥१॥
श्रीराम के समझाने पर मिथिलेशकुमारी जानकी वनवास की आज्ञा प्राप्त करने के लिये अपने पति से फिर इस प्रकार बोलीं॥१॥
सा तमुत्तमसंविग्ना सीता विपुलवक्षसम्।
प्रणयाच्चाभिमानाच्च परिचिक्षेप राघवम्॥२॥
सीता अत्यन्त डरी हुई थीं। वे प्रेम और स्वाभिमान के कारण विशाल वक्षःस्थलवाले श्रीरामचन्द्रजी पर आक्षेप-सा करती हुई कहने लगीं – ॥२॥
किं त्वामन्यत वैदेहः पिता मे मिथिलाधिपः।
राम जामातरं प्राप्य स्त्रियं पुरुषविग्रहम्॥३॥
‘श्रीराम! क्या मेरे पिता मिथिलानरेश विदेहराज जनक ने आपको जामाता के रूप में पाकर कभी यह भी समझा था कि आप केवल शरीर से ही पुरुष हैं; कार्यकलाप से तो स्त्री ही हैं॥३॥
अनृतं बत लोकोऽयमज्ञानाद् यदि वक्ष्यति।
तेजो नास्ति परं रामे तपतीव दिवाकरे॥४॥
‘नाथ! आपके मुझे छोड़कर चले जानेपर संसारके लोग अज्ञानवश यदि यह कहने लगें कि सूर्यके समान तपनेवाले श्रीरामचन्द्रमें तेज और पराक्रमका अभाव है तो उनकी यह असत्य धारणा मेरे लिये कितने दुःखकी बात होगी॥ ४॥
किं हि कृत्वा विषण्णस्त्वं कुतो वा भयमस्ति ते।
यत् परित्यक्तुकामस्त्वं मामनन्यपरायणाम्॥५॥
‘आप क्या सोचकर विषादमें पड़े हुए हैं अथवा किससे आपको भय हो रहा है, जिसके कारण आप अपनी पत्नी मुझ सीताका, जो एकमात्र आपके ही आश्रित है, परित्याग करना चाहते हैं॥ ५॥
धुमत्सेनसुतं वीरं सत्यवन्तमनुव्रताम्।
सावित्रीमिव मां विद्धि त्वमात्मवशवर्तिनीम्॥ ६॥
‘जैसे सावित्री धुमत्सेनकुमार वीरवर सत्यवान् की ही अनुगामिनी थी, उसी प्रकार आप मुझे भी अपनी ही आज्ञा के अधीन समझिये॥६॥
न त्वहं मनसा त्वन्यं द्रष्टास्मि त्वदृतेऽनघ।
त्वया राघव गच्छेयं यथान्या कुलपांसनी॥७॥
‘निष्पाप रघुनन्दन! जैसी दूसरी कोई कुलकलङ्किनी स्त्री परपुरुष पर दृष्टि रखती है, वैसी मैं नहीं हूँ। मैं तो आपके सिवा किसी दूसरे पुरुष को मन से भी नहीं देख सकती। इसलिये आपके साथ ही चलूँगी (आपके बिना अकेली यहाँ नहीं रहूँगी)॥ ७॥
स्वयं तु भार्यां कौमारी चिरमध्युषितां सतीम्।
शैलूष इव मां राम परेभ्यो दातुमिच्छसि॥८॥
‘श्रीराम! जिसका कुमारावस्था में ही आपके साथ विवाह हुआ है और जो चिरकाल तक आपके साथ रह चुकी है, उसी मुझ अपनी सती-साध्वी पत्नी को आप औरत की कमाई खाने वाले नट की भाँति दूसरों के हाथ में सौंपना चाहते हैं? ॥ ८॥
यस्य पथ्यंचरामात्थ यस्य चार्थेऽवरुध्यसे।
त्वं तस्य भव वश्यश्च विधेयश्च सदानघ॥९॥
‘निष्पाप रघुनन्दन! आप मुझे जिसके अनुकूल चलने की शिक्षा दे रहे हैं और जिसके लिये आपका राज्याभिषेक रोक दिया गया है, उस भरत के सदा ही वशवर्ती और आज्ञापालक बनकर आप ही रहिये, मैं नहीं रहूँगी॥९॥
स मामनादाय वनं न त्वं प्रस्थितमर्हसि।
तपो वा यदि वारण्यं स्वर्गो वा स्यात् त्वया सह॥ १०॥
‘इसलिये आपका मुझे अपने साथ लिये बिना वन की ओर प्रस्थान करना उचित नहीं है। यदि तपस्या करनी हो, वन में रहना हो अथवा स्वर्ग में जाना हो तो सभी जगह मैं आपके साथ रहना चाहती हूँ॥ १०॥
न च मे भविता तत्र कश्चित् पथि परिश्रमः।
पृष्ठतस्तव गच्छन्त्या विहारशयनेष्विव॥११॥
‘जैसे बगीचे में घूमने और पलंग पर सोने में कोई कष्ट नहीं होता, उसी प्रकार आपके पीछे-पीछे वन के मार्ग पर चलने में भी मुझे कोई परिश्रम नहीं जान पड़ेगा।
कुशकाशशरेषीका ये च कण्टकिनो द्रुमाः।
तूलाजिनसमस्पर्शा मार्गे मम सह त्वया॥१२॥
‘रास्ते में जो कुश-कास, सरकंडे, सींक और काँटेदार वृक्ष मिलेंगे, उनका स्पर्श मुझे आपके साथ रहने से रूई और मृगचर्म के समान सुखद प्रतीत होगा॥
महावातसमुद्भूतं यन्मामवकरिष्यति।
रजो रमण तन्मन्ये परार्घ्यमिव चन्दनम्॥१३॥
‘प्राणवल्लभ! प्रचण्ड आँधी से उड़कर मेरे शरीर पर जो धूल पड़ेगी, उसे मैं उत्तम चन्दन के समान समशृंगी॥
शाद्रलेषु यदा शिश्ये वनान्तर्वनगोचरा।
कुथास्तरणयुक्तेषु किं स्यात् सुखतरं ततः॥१४॥
‘जब वन के भीतर रहँगी, तब आपके साथ घासों पर भी सो लूँगी। रंग-बिरंगे कालीनों और मुलायम बिछौनों से युक्त पलंगों पर क्या उससे अधिक सुख हो सकता है ? ॥ १४॥
पत्रं मूलं फलं यत्तु अल्पं वा यदि वा बहु।
दास्यसे स्वयमाहृत्य तन्मेऽमृतरसोपमम्॥१५॥
‘आप अपने हाथ से लाकर थोड़ा या बहुत फल, मूल या पत्ता, जो कुछ दे देंगे, वही मेरे लिये अमृत रस के समान होगा॥ १५ ॥
न मातुर्न पितुस्तत्र स्मरिष्यामि न वेश्मनः।
आर्तवान्युपभुजाना पुष्पाणि च फलानि च। १६॥
‘ऋतु के अनुकूल जो भी फल-फूल प्राप्त होंगे, उन्हें खाकर रहँगी और माता-पिता अथवा महल को कभी याद नहीं करूँगी॥१६॥
न च तत्र ततः किंचिद् द्रष्टमर्हसि विप्रियम्।
मत्कृते न च ते शोको न भविष्यामि दुर्भरा॥ १७॥
‘वहाँ रहते समय मेरा कोई भी प्रतिकूल व्यवहार आप नहीं देख सकेंगे। मेरे लिये आपको कोई कष्ट नहीं उठाना पड़ेगा। मेरा निर्वाह आपके लिये दूभर नहीं होगा॥ १७ ॥
यस्त्वया सह स स्वर्गो निरयो यस्त्वया विना।
इति जानन् परां प्रीतिं गच्छ राम मया सह ॥ १८॥
‘आपके साथ जहाँ भी रहना पड़े, वही मेरे लिये स्वर्ग है और आपके बिना जो कोई भी स्थान हो, वह मेरे लिये नरक के समान है। श्रीराम! मेरे इस निश्चय को जानकर आप मेरे साथ अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक वनको चलें॥ १८॥
अथ मामेवमव्यग्रां वनं नैव नयिष्यसे।
विषमद्यैव पास्यामि मा वशं द्विषतां गमम्॥ १९॥
‘मुझे वनवास के कष्ट से कोई घबराहट नहीं है। यदि इस दशा में भी आप अपने साथ मुझे वन में नहीं ले चलेंगे तो मैं आज ही विष पी लूँगी, परंतु शत्रुओं के अधीन होकर नहीं रहूँगी॥ १९॥
पश्चादपि हि दुःखेन मम नैवास्ति जीवितम्।
उज्झितायास्त्वया नाथ तदैव मरणं वरम्॥२०॥
नाथ! यदि आप मुझे त्यागकर वन को चले जायँगे तो पीछे भी इस भारी दुःख के कारण मेरा जीवित रहना सम्भव नहीं है; ऐसी दशा में मैं इसी समय आपके जाते ही अपना प्राण त्याग देना अच्छा समझती हूँ॥ २०॥
इमं हि सहितुं शोकं मुहूर्तमपि नोत्सहे।
किं पुनर्दश वर्षाणि त्रीणि चैकं च दुःखिता॥ २१॥
‘आपके विरह का यह शोक मैं दो घड़ी भी नहीं सह सकूँगी। फिर मुझ दुःखिया से यह चौदह वर्षों तक कैसे सहा जायगा?’ ॥ २१॥
इति सा शोकसंतप्ता विलप्य करुणं बह।
चुक्रोश पतिमायस्ता भृशमालिङ्ग्य सस्वरम्॥ २२॥
इस प्रकार बहुत देरतक करुणाजनक विलाप करके शोक से संतप्त हुई सीता शिथिल हो अपने पति को जोर से पकड़कर उनका गाढ़ आलिङ्गन करके फूट-फूटकर रोने लगीं ॥ २२ ॥
सा विद्धा बहुभिर्वाक्यैर्दिग्धैरिव गजाङ्गना।
चिरसंनियतं बाष्पं मुमोचाग्निमिवारणिः॥२३॥
जैसे कोई हथिनी विष में बुझे हुए बहुसंख्यक बाणों द्वारा घायल कर दी गयी हो, उसी प्रकार सीता श्रीरामचन्द्रजी के पूर्वोक्त अनेकानेक वचनों द्वारा मर्माहत हो उठी थीं; अतः जैसे अरणी आग प्रकट करती है, उसी प्रकार वे बहुत देर से रोके हुए आँसुओं को बरसाने लगीं॥ २३॥
तस्याः स्फटिकसंकाशं वारि संतापसम्भवम्।
नेत्राभ्यां परिसुस्राव पङ्कजाभ्यामिवोदकम्॥ २४॥
उनके दोनों नेत्रों से स्फटिक के समान निर्मल संतापजनित अश्रुजल झर रहा था, मानो दो कमलों से जलकी धारा गिर रही हो॥२४॥
तत्सितामलचन्द्राभं मुखमायतलोचनम्।
पर्यशुष्यत बाष्पेण जलोद्धृतमिवाम्बुजम्॥२५॥
बड़े-बड़े नेत्रों से सुशोभित और पूर्णिमा के निर्मल चन्द्रमा के समान कान्तिमान् उनका वह मनोहर मुख संतापजनित ताप के कारण पानी से बाहर निकाले हुए कमल के समान सूख-सा गया था॥ २५ ॥
तां परिष्वज्य बाहुभ्यां विसंज्ञामिव दुःखिताम्।
उवाच वचनं रामः परिविश्वासयंस्तदा ॥२६॥
सीताजी दुःख के मारे अचेत-सी हो रही थीं। श्रीरामचन्द्रजी ने उन्हें दोनों हाथों से सँभालकर हृदय से लगा लिया और उस समय उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा- ॥२६॥
न देवि बत दुःखेन स्वर्गमप्यभिरोचये।
नहि मेऽस्ति भयं किंचित् स्वयम्भोरिव सर्वतः॥ २७॥
‘देवि! तुम्हें दुःख देकर मुझे स्वर्ग का सुख मिलताहो तो मैं उसे भी लेना नहीं चाहूँगा। स्वयम्भू ब्रह्माजी की भाँति मुझे किसी से किञ्चित् भी भय नहीं है॥ २७॥
तव सर्वमभिप्रायमविज्ञाय शुभानने।
वासं न रोचयेऽरण्ये शक्तिमानपि रक्षणे॥२८॥
‘शुभानने! यद्यपि वन में तुम्हारी रक्षा करने के लिये मैं सर्वथा समर्थ हूँ तो भी तुम्हारे हार्दिक अभिप्राय को पूर्णरूप से जाने बिना तुमको वनवासिनी बनाना मैं उचित नहीं समझता था॥२८॥
यत् सृष्टासि मया सार्धं वनवासाय मैथिलि।
न विहातुं मया शक्या प्रीतिरात्मवता यथा॥ २९॥
‘मिथिलेशकुमारी! जब तुम मेरे साथ वन में रहने के लिये ही उत्पन्न हुई हो तो मैं तुम्हें छोड़ नहीं सकता, ठीक उसी तरह जैसे आत्मज्ञानी पुरुष अपनी स्वाभाविक प्रसन्नता का त्याग नहीं करते ॥ २९ ॥
धर्मस्तु गजनासोरु सद्भिराचरितः पुरा।
तं चाहमनुवर्तिष्ये यथा सूर्यं सुवर्चला ॥ ३०॥
‘हाथी की ढूँड़ के समान जाँघ वाली जनककिशोरी! पूर्वकाल के सत्पुरुषों ने अपनी पत्नी के साथ रहकर जिस धर्म का आचरण किया था, उसीका मैं भी तुम्हारे साथ रहकर अनुसरण करूँगा तथा जैसे सुवर्चला (संज्ञा) अपने पति सूर्य का अनुगमन करती है, उसी प्रकार तुम भी मेरा अनुसरण करो॥३०॥
न खल्वहं न गच्छेयं वनं जनकनन्दिनि।
वचनं तन्नयति मां पितुः सत्योपबृंहितम्॥३१॥
‘जनकनन्दिनि! यह तो किसी प्रकार सम्भव ही नहीं है कि मैं वन को न जाऊँ; क्योंकि पिताजी का वह सत्ययुक्त वचन ही मुझे वन की ओर ले जा रहा है।
एष धर्मश्च सुश्रोणि पितुर्मातुश्च वश्यता।
आज्ञां चाहं व्यतिक्रम्य नाहं जीवितुमुत्सहे॥ ३२॥
‘सुश्रोणि! पिता और माता की आज्ञा के अधीन रहना पुत् रका धर्म है, इसलिये मैं उनकी आज्ञाका उल्लङ्घन करके जीवित नहीं रह सकता॥ ३२ ॥
अस्वाधीनं कथं दैवं प्रकारैरभिराध्यते।
स्वाधीनं समतिक्रम्य मातरं पितरं गुरुम्॥३३॥
‘जो अपनी सेवा के अधीन हैं, उन प्रत्यक्ष देवता माता, पिता एवं गुरु का उल्लङ्घन करके जो सेवा के अधीन नहीं है, उस अप्रत्यक्ष देवता दैव की विभिन्न प्रकार से किस तरह आराधना की जा सकती है। ३३॥
यत्र त्रयं त्रयो लोकाः पवित्रं तत्समं भुवि।
नान्यदस्ति शुभापाले तेनेदमभिराध्यते॥३४॥
‘सुन्दर नेत्रप्रान्तवाली सीते! जिनकी आराधना करने पर धर्म, अर्थ और काम तीनों प्राप्त होते हैं तथा तीनों लोकों की आराधना सम्पन्न हो जाती है, उन माता, पिता और गुरु के समान दूसरा कोई पवित्र देवता इस भूतल पर नहीं है। इसीलिये भूतल के निवासी इन तीनों देवताओं की आराधना करते हैं। ३४॥
न सत्यं दानमानौ वा यज्ञो वाप्याप्तदक्षिणाः।
तथा बलकराः सीते यथा सेवा पितुर्मता॥ ३५॥
‘सीते! पिताकी सेवा करना कल्याण की प्राप्ति का जैसा प्रबल साधन माना गया है, वैसा न सत्य है, न दान है, न मान है और न पर्याप्त दक्षिणा वाले यज्ञ ही हैं॥ ३५॥
स्वर्गो धनं वा धान्यं वा विद्या पुत्राः सुखानि च।
गुरुवृत्त्यनुरोधेन न किंचिदपि दुर्लभम्॥३६॥
‘गुरुजनों की सेवा का अनुसरण करने से स्वर्ग, धनधान्य, विद्या, पुत्र और सुख-कुछ भी दुर्लभ नहीं है॥ ३६॥
देवगन्धर्वगोलोकान् ब्रह्मलोकांस्तथापरान्।
प्राप्नुवन्ति महात्मानो मातापितृपरायणाः॥३७॥
‘माता-पिता की सेवा में लगे रहने वाले महात्मा पुरुष देवलोक, गन्धर्वलोक, ब्रह्मलोक, गोलोक तथा अन्य लोकों को भी प्राप्त कर लेते हैं॥ ३७॥
स मा पिता यथा शास्ति सत्यधर्मपथे स्थितः।
तथा वर्तितुमिच्छामि स हि धर्मः सनातनः॥ ३८॥
‘इसीलिये सत्य और धर्म के मार्ग पर स्थित रहने वाले पूज्य पिताजी मुझे जैसी आज्ञा दे रहे हैं, मैं वैसा ही बर्ताव करना चाहता हूँ; क्योंकि वह सनातन धर्म है॥
मम सन्ना मतिः सीते नेतुं त्वां दण्डकावनम्।
वसिष्यामीति सा त्वं मामनुयातुं सुनिश्चिता॥ ३९॥
‘सीते! ‘मैं आपके साथ वन में निवास करूँगी’ऐसा कहकर तुमने मेरे साथ चलने का दृढ़ निश्चय कर लिया है, इसलिये तुम्हें दण्डकारण्य ले चलने के सम्बन्ध में जो मेरा पहला विचार था, वह अब बदल गया है॥ ३९॥
सा हि दिष्टानवद्याङ्गि वनाय मदिरेक्षणे।
अनुगच्छस्व मां भीरु सहधर्मचरी भव॥४०॥
‘मदभरे नेत्रोंवाली सुन्दरी! अब मैं तुम्हें वन में चलने के लिये आज्ञा देता हूँ। भीरु! तुम मेरी अनुगामिनी बनो और मेरे साथ रहकर धर्म का आचरण करो॥ ४०॥
सर्वथा सदृशं सीते मम स्वस्य कुलस्य च।
व्यवसायमनुक्रान्ता कान्ते त्वमतिशोभनम्॥ ४१॥
‘प्राणवल्लभे सीते! तुमने मेरे साथ चलने का जो यह परम सुन्दर निश्चय किया है, यह तुम्हारे और मेरे कुल के सर्वथा योग्य ही है॥ ४१॥
आरभस्व शुभश्रोणि वनवासक्षमाः क्रियाः।
नेदानीं त्वदते सीते स्वर्गोऽपि मम रोचते॥४२॥
‘सुश्रोणि! अब तुम वनवास के योग्य दान आदि कर्म प्रारम्भ करो। सीते! इस समय तुम्हारे इस प्रकार दृढ़ निश्चय कर लेने पर तुम्हारे बिना स्वर्ग भी मुझे अच्छा नहीं लगता है॥ ४२ ॥
ब्राह्मणेभ्यश्च रत्नानि भिक्षुकेभ्यश्च भोजनम्।
देहि चाशंसमानेभ्यः संत्वरस्व च मा चिरम्॥ ४३॥
‘ब्राह्मणों को रत्नस्वरूप उत्तम वस्तुएँ दान करो और भोजन माँगने वाले भिक्षकों को भोजन दो। शीघ्रता करो, विलम्ब नहीं होना चाहिये॥४३॥
भूषणानि महार्हाणि वरवस्त्राणि यानि च।
रमणीयाश्च ये केचित् क्रीडार्थाश्चाप्युपस्कराः॥ ४४॥
शयनीयानि यानानि मम चान्यानि यानि च।
देहि स्वभृत्यवर्गस्य ब्राह्मणानामनन्तरम्॥४५॥
तुम्हारे पास जितने बहुमूल्य आभूषण हों, जो-जो अच्छे-अच्छे वस्त्र हों, जो कोई भी रमणीय पदार्थ हों तथा मनोरञ्जनकी जो-जो सुन्दर सामग्रियाँ हों, मेरे और तुम्हारे उपयोग में आने वाली जो उत्तमोत्तम शय्याएँ, सवारियाँ तथा अन्य वस्तुएँ हों, उनमें से ब्राह्मणों को दान करनेके पश्चात् जो बचें उन सबको अपने सेवकों को बाँट दो’ ॥ ४४-४५ ॥
अनुकूलं तु सा भर्तुर्ज्ञात्वा गमनमात्मनः।
क्षिप्रं प्रमुदिता देवी दातुमेव प्रचक्रमे॥४६॥
‘स्वामी ने वन में मेरा जाना स्वीकार कर लिया मेरा वनगमन उनके मन के अनुकूल हो गया’ यह जानकर देवी सीता बहुत प्रसन्न हुईं और शीघ्रतापूर्वक सब वस्तुओं का दान करने में जुट गयीं। ४६॥
ततः प्रहृष्टा प्रतिपूर्णमानसा यशस्विनी भर्तुरवेक्ष्य भाषितम्।
धनानि रत्नानि च दातुमङ्गना प्रचक्रमे धर्मभृतां मनस्विनी॥४७॥
तदनन्तर अपना मनोरथ पूर्ण हो जाने से अत्यन्त हर्ष में भरी हुई यशस्विनी एवं मनस्विनी सीता देवी स्वामी के आदेश पर विचार करके धर्मात्मा ब्राह्मणों को धन और रत्नों का दान करने के लिये उद्यत हो गयीं।
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्रिंशः सर्गः॥३०॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ। ३०॥
सर्ग-31
एवं श्रुत्वा स संवादं लक्ष्मणः पूर्वमागतः।
बाष्पपर्याकुलमुखः शोकं सोढुमशक्नुवन्॥१॥
जिस समय श्रीराम और सीता में बातचीत हो रही थी, लक्ष्मण वहाँ पहले से ही आ गये थे। उन दोनों का ऐसा संवाद सुनकर उनका मुखमण्डल आँसुओं से भींग गया। भाई के विरह का शोक अब उनके लिये भी असह्य हो उठा॥१॥
स भ्रातुश्चरणौ गाढं निपीड्य रघुनन्दनः।
सीतामुवाचातियशां राघवं च महाव्रतम्॥२॥
रघुकुल को आनन्दित करने वाले लक्ष्मण ने ज्येष्ठ भ्राता श्रीरामचन्द्रजी के दोनों पैर जोर से पकड़ लिये और अत्यन्त यशस्विनी सीता तथा महान् व्रतधारी श्रीरघुनाथजी से कहा- ॥२॥
यदि गन्तुं कृता बुद्धिर्वनं मृगगजायुतम्।
अहं त्वानुगमिष्यामि वनमग्रे धनुर्धरः॥३॥
‘आर्य! यदि आपने सहस्रों वन्य पशुओं तथा हाथियों से भरे हुए वन में जाने का निश्चय कर ही लिया है तो मैं भी आपका अनुसरण करूँगा। धनुष हाथ में लेकर आगे-आगे चलूँगा॥३॥
मया समेतोऽरण्यानि रम्याणि विचरिष्यसि।
पक्षिभिर्मंगयूथैश्च संघुष्टानि समन्ततः॥४॥
‘आप मेरे साथ पक्षियों के कलरव और भ्रमरसमूहों के गुञ्जारव से गूंजते हुए रमणीय वनों में सब ओर विचरण कीजियेगा॥ ४॥
न देवलोकाक्रमणं नामरत्वमहं वृणे।
ऐश्वर्यं चापि लोकानां कामये न त्वया विना॥
‘मैं आपके बिना स्वर्ग में जाने, अमर होने तथा सम्पूर्ण लोकों का ऐश्वर्य प्राप्त करने की भी इच्छा नहीं रखता’ ॥५॥
एवं ब्रुवाणः सौमित्रिर्वनवासाय निश्चितः।
रामेण बहुभिः सान्त्वैर्निषिद्धः पुनरब्रवीत्॥६॥
वनवास के लिये निश्चित विचार करके ऐसी बात कहने वाले सुमित्राकुमार लक्ष्मण को श्रीरामचन्द्रजी ने बहुत-से सान्त्वनापूर्ण वचनों द्वारा समझाकर जब वन में चलने से मना किया, तब वे फिर बोले- ॥६॥
अनुज्ञातस्तु भवता पूर्वमेव यदस्म्यहम्।
किमिदानीं पुनरपि क्रियते मे निवारणम्॥७॥
‘भैया! आपने तो पहले से ही मुझे अपने साथ रहने की आज्ञा दे रखी है, फिर इस समय आप मुझे क्यों रोकते हैं? ॥७॥
यदर्थं प्रतिषेधो मे क्रियते गन्तुमिच्छतः।
एतदिच्छामि विज्ञातुं संशयो हि ममानघ॥८॥
‘निष्पाप रघुनन्दन! जिस कारण से आपके साथ चलने की इच्छा वाले मुझको आप मना करते हैं, उस कारण को मैं जानना चाहता हूँ। मेरे हृदय में इसके लिये बड़ा संशय हो रहा है’ ॥ ८॥
ततोऽब्रवीन्महातेजा रामो लक्ष्मणमग्रतः।
स्थितं प्राग्गामिनं धीरं याचमानं कृताञ्जलिम्॥ ९॥
ऐसा कहकर धीर-वीर लक्ष्मण आगे जानेके लिये तैयार हो भगवान् श्रीरामके सामने खड़े हो गये और हाथ जोड़कर याचना करने लगे। तब महातेजस्वी श्रीरामने उनसे कहा- ॥९॥
स्निग्धो धर्मरतो धीरः सततं सत्पथे स्थितः।
प्रियः प्राणसमो वश्यो विजेयश्च सखा च मे॥ १०॥
‘लक्ष्मण! तुम मेरे स्नेही, धर्मपरायण, धीर-वीर तथा सदा सन्मार्ग में स्थित रहने वाले हो। मुझे प्राणों के समान प्रिय हो तथा मेरे वश में रहने वाले आज्ञापालक और सखा हो॥१०॥
मयाद्य सह सौमित्रे त्वयि गच्छति तदनम्।
को भजिष्यति कौसल्यां सुमित्रां वा यशस्विनीम्॥११॥
‘सुमित्रानन्दन ! यदि आज मेरे साथ तुम भी वन को चल दोगे तो परमयशस्विनी माता कौसल्या और सुमित्रा की सेवा कौन करेगा? ॥ ११॥
अभिवर्षति कामैर्यः पर्जन्यः पृथिवीमिव।
स कामपाशपर्यस्तो महातेजा महीपतिः॥१२॥
‘जैसे मेघ पृथ्वी पर जल की वर्षा करता है, उसी प्रकार जो सबकी कामनाएँ पूर्ण करते थे, वे महातेजस्वी महाराज दशरथ अब कैकेयी के प्रेमपाश में बँध गये हैं।॥ १२ ॥
सा हि राज्यमिदं प्राप्य नृपस्याश्वपतेः सुता।
दुःखितानां सपत्नीनां न करिष्यति शोभनम्॥ १३॥
‘केकयराज अश्वपतिकी पुत्री कैकेयी महाराजके इस राज्यको पाकर मेरे वियोगके दुःखमें डूबी हुई अपनी सौतोंके साथ अच्छा बर्ताव नहीं करेगी॥१३॥
न भरिष्यति कौसल्यां सुमित्रां च सुदुःखिताम्।
भरतो राज्यमासाद्य कैकेय्यां पर्यवस्थितः॥१४॥
‘भरत भी राज्य पाकर कैकेयी के अधीन रहने के कारण दुःखिया कौसल्या और सुमित्रा का भरणपोषण नहीं करेंगे॥ १४॥
तामार्यां स्वयमेवेह राजानुग्रहणेन वा।
सौमित्रे भर कौसल्यामुक्तमर्थममुं चर॥१५॥
‘अतः सुमित्राकुमार! तुम यहीं रहकर अपने प्रयत्न से अथवा राजा की कृपा प्राप्त करके माता कौसल्या का पालन करो। मेरे बताये हुए इस प्रयोजन को ही सिद्ध करो॥
एवं मयि च ते भक्तिर्भविष्यति सुदर्शिता।
धर्मज्ञगुरुपूजायां धर्मश्चाप्यतुलो महान्॥१६॥
‘ऐसा करने से मेरे प्रति जो तुम्हारी भक्ति है, वह भी भलीभाँति प्रकट हो जायगी तथा धर्मज्ञ गुरुजनों की पूजा करने से जो अनुपम एवं महान् धर्म होता है, वह भी तुम्हें प्राप्त हो जायगा॥ १६ ॥
एवं कुरुष्व सौमित्रे मत्कृते रघुनन्दन।
अस्माभिर्विप्रहीणाया मातु! न भवेत् सुखम्॥ १७॥
‘रघुकुल को आनन्दित करने वाले सुमित्राकुमार! तुम मेरे लिये ऐसा ही करो; क्योंकि हमलोगों से बिछुड़ी हुई हमारी माँ को कभी सुख नहीं होगा (वह सदा हमारी ही चिन्ता में डूबी रहेगी)’ ॥ १७ ॥
एवमुक्तस्तु रामेण लक्ष्मणः श्लक्ष्णया गिरा।
प्रत्युवाच तदा रामं वाक्यज्ञो वाक्यकोविदम्॥ १८॥
श्रीराम के ऐसा कहने पर बातचीत के मर्म को समझने वाले लक्ष्मण ने उस समय बात का तात्पर्य समझने वाले श्रीराम को मधुर वाणी में उत्तर दिया- ॥ १८॥
तवैव तेजसा वीर भरतः पूजयिष्यति।
कौसल्यां च सुमित्रां च प्रयतो नास्ति संशयः॥ १९॥
‘वीर! आपके ही तेज (प्रभाव) से भरत माता कौसल्या और सुमित्रा दोनों का पवित्र भाव से पूजन करेंगे, इसमें संशय नहीं है ॥ १९॥
यदि दुःस्थो न रक्षेत भरतो राज्यमुत्तमम्।
प्राप्य दुर्मनसा वीर गर्वेण च विशेषतः ॥२०॥
तमहं दुर्मतिं क्रूरं वधिष्यामि न संशयः।
तत्पक्षानपि तान् सर्वांस्त्रैलोक्यमपि किं तु सा॥ २१॥
कौसल्या बिभृयादार्या सहस्रं मद्विधानपि।
यस्याः सहस्रं ग्रामाणां सम्प्राप्तमुपजीविनाम्॥ २२॥
‘वीरवर! इस उत्तम राज्य को पाकर यदि भरत बुरे रास्ते पर चलेंगे और दृषित हृदय एवं विशेषतः घमण्ड के कारण माताओं की रक्षा नहीं करेंगे तो मैं उन दुर्बुद्धि और क्रूर भरत का तथा उनके पक्ष का समर्थन करने वाले उन सब लोगों का वध कर डालूँगा; इसमें संशय नहीं है। यदि सारी त्रिलोकी उनका पक्ष करने लगे तो उसे भी अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ेगा, परंतु बड़ी माता कौसल्या तो स्वयं ही मेरे-जैसे सहस्रों मनुष्यों का भी भरण कर सकती हैं;क्योंकि उन्हें अपने आश्रितों का पालन करने के लिये एक सहस्र गाँव मिले हुए हैं।
तदात्मभरणे चैव मम मातुस्तथैव च।
पर्याप्ता मद्विधानां च भरणाय मनस्विनी॥२३॥
‘इसलिये वे मनस्विनी कौसल्या स्वयं ही अपना, मेरी माताका तथा मेरे-जैसे और भी बहुत-से मनुष्योंका भरण-पोषण करनेमें समर्थ हैं॥ २३॥
कुरुष्व मामनुचरं वैधवें नेह विद्यते।
कृतार्थोऽहं भविष्यामि तव चार्थः प्रकल्प्यते॥ २४॥
‘अतः आप मुझको अपना अनुगामी बना लीजिये। इसमें कोई धर्म की हानि नहीं होगी। मैं कृतार्थ हो जाऊँगा तथा आपका भी प्रयोजन मेरे द्वारा सिद्ध हुआ करेगा॥२४॥
धनुरादाय सगुणं खनित्रपिटकाधरः।
अग्रतस्ते गमिष्यामि पन्थानं तव दर्शयन्॥ २५॥
‘प्रत्यञ्चासहित धनुष लेकर खंती और पिटारी लिये आपको रास्ता दिखाता हुआ मैं आपके आगेआगे चलूँगा॥ २५ ॥
आहरिष्यामि ते नित्यं मूलानि च फलानि च।
वन्यानि च तथान्यानि स्वाहाहा॑णि तपस्विनाम्॥ २६॥
‘प्रतिदिन आपके लिये फल-मूल लाऊँगा तथा तपस्वीजनों के लिये वन में मिलने वाली तथा अन्यान्य हवन-सामग्री जुटाता रहूँगा॥ २६॥
भवांस्तु सह वैदेह्या गिरिसानुषु रंस्यसे।
अहं सर्वं करिष्यामि जाग्रतः स्वपतश्च ते॥२७॥
‘आप विदेहकुमारीके साथ पर्वतशिखरों पर भ्रमण करेंगे। वहाँ आप जागते हों या सोते, मैं हर समय आपके सभी आवश्यक कार्य पूर्ण करूँगा’ ॥ २७॥
रामस्त्वनेन वाक्येन सुप्रीतः प्रत्युवाच तम्।
व्रजापृच्छस्व सौमित्रे सर्वमेव सुहृज्जनम्॥ २८॥
लक्ष्मण की इस बात से श्रीरामचन्द्रजी को बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने उनसे कहा —’सुमित्रानन्दन! जाओ, माता आदि सभी सुहृदों से मिलकर अपनी वनयात्रा के विषय में पूछ लो-उनकी आज्ञा एवं अनुमति ले लो॥ २८॥
ये च राज्ञो ददौ दिव्ये महात्मा वरुणः स्वयम्।
जनकस्य महायज्ञे धनुषी रौद्रदर्शने॥२९॥
अभेद्ये कवचे दिव्ये तूणी चाक्षय्यसायकौ।
आदित्यविमलाभौ द्वौ खड्गौ हेमपरिष्कृतौ॥ ३०॥
सत्कृत्य निहितं सर्वमेतदाचार्यसद्मनि।
सर्वमायुधमादाय क्षिप्रमाव्रज लक्ष्मण॥३१॥
‘लक्ष्मण! राजा जनक के महान् यज्ञ में स्वयं महात्मा वरुण ने उन्हें जो देखने में भयंकर दो दिव्य धनुष दिये थे, साथ ही, जो दो दिव्य अभेद्य कवच, अक्षय बाणों से भरे हुए दो तरकस तथा सूर्य की भाँति निर्मल दीप्ति से दमकते हुए जो दो सुवर्णभूषित खड्गप्रदान किये थे (वे सभी दिव्यास्त्र मिथिला नरेश ने मुझे दहेज में दे दिये थे), उन सबको आचार्यदेव के घर में सत्कारपूर्वक रखा गया है। तुम उन सारे आयुधों को लेकर शीघ्र लौट आओ’ ॥ २९–३१॥
स सुहृज्जनमामन्त्र्य वनवासाय निश्चितः।
इक्ष्वाकुगुरुमागम्य जग्राहायुधमुत्तमम्॥३२॥
आज्ञा पाकर लक्ष्मणजी गये और सुहृज्जनोंकी अनुमति लेकर वनवास के लिये निश्चित रूप से तैयार हो इक्ष्वाकुकुल के गुरु वसिष्ठजी के यहाँ गये। वहाँ से उन्होंने उन उत्तम आयुधों को ले लिया॥३२॥
तद् दिव्यं राजशार्दूलः सत्कृतं माल्यभूषितम्।
रामाय दर्शयामास सौमित्रिः सर्वमायुधम्॥३३॥
क्षत्रियशिरोमणि सुमित्राकुमार लक्ष्मण ने सत्कारपूर्वक रखे हुए उन माल्यविभूषित समस्त दिव्य आयुधों को लाकर उन्हें श्रीराम को दिखाया। ३३॥
तमुवाचात्मवान् रामः प्रीत्या लक्ष्मणमागतम्।
काले त्वमागतः सौम्य कांक्षिते मम लक्ष्मण॥३४॥
तब मनस्वी श्रीराम ने वहाँ आये हुए लक्ष्मण से प्रसन्न होकर कहा—’सौम्य! लक्ष्मण! तुम ठीक समय पर आ गये। इसी समय तुम्हारा आना मुझे अभीष्ट था॥ ३५॥
अहं प्रदातुमिच्छामि यदिदं मामकं धनम्।
ब्राह्मणेभ्यस्तपस्विभ्यस्त्वया सह परंतप॥३५॥
‘शत्रुओं को संताप देने वाले वीर! मेरा जो यह धन है, इसे मैं तुम्हारे साथ रहकर तपस्वी ब्राह्मणों को बाँटना चाहता हूँ॥ ३५॥
वसन्तीह दृढं भक्त्या गुरुषु द्विजसत्तमाः।
तेषामपि च मे भूयः सर्वेषां चोपजीविनाम्॥ ३६॥
‘गुरुजनों के प्रति सुदृढ़ भक्तिभाव से युक्त जो श्रेष्ठ ब्राह्मण यहाँ मेरे पास रहते हैं, उनको तथा समस्तआश्रितजनों को भी मुझे अपना यह धन बाँटना है। ३६॥
वसिष्ठपुत्रं तु सुयज्ञमार्य त्वमानयाशु प्रवरं द्विजानाम्।
अपि प्रयास्यामि वनं समस्तानभ्यर्च्य शिष्टानपरान् द्विजातीन्॥३७॥
‘वसिष्ठजी के पुत्र जो ब्राह्मणों में श्रेष्ठ आर्य सुयज्ञ हैं, उन्हें तुम शीघ्र यहाँ बुला लाओ। मैं इन सबका तथा और जो ब्राह्मण शेष रह गये हों, उनका भी सत्कार करके वन को जाऊँगा’ ॥ ३७॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकत्रिंशः सर्गः ॥ ३१॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में इकतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३१॥
सर्ग-32
ततः शासनमाज्ञाय भ्रातुः प्रियकरं हितम्।
गत्वा स प्रविवेशाशु सुयज्ञस्य निवेशनम्॥१॥
तदनन्तर अपने भाई श्रीराम की प्रियकारक एवं हितकर आज्ञा पाकर लक्ष्मण वहाँ से चल दिये। उन्होंने शीघ्र ही गुरुपुत्र सुयज्ञ के घर में प्रवेश किया। १॥
तं विप्रमग्न्यगारस्थं वन्दित्वा लक्ष्मणोऽब्रवीत्।
सखेऽभ्यागच्छ पश्य त्वं वेश्म दुष्करकारिणः॥ २॥
” उस समय विप्रवर सुयज्ञ अग्निशाला में बैठे हए थे। लक्ष्मण ने उन्हें प्रणाम करके कहा—’सखे! दुष्कर कर्म करने वाले श्रीरामचन्द्रजी के घर पर आओ और उनका कार्य देखो’॥२॥
ततः संध्यामुपास्थाय गत्वा सौमित्रिणा सह।
ऋष्टुं स प्राविशल्लक्ष्या रम्यं रामनिवेशनम्॥
सुयज्ञ ने मध्याह्नकाल की संध्योपासना पूरी करके लक्ष्मण के साथ जाकर श्रीराम के रमणीय भवन में प्रवेश किया, जो लक्ष्मी से सम्पन्न था॥ ३॥
तमागतं वेदविदं प्राञ्जलिः सीतया सह।
सुयज्ञमभिचक्राम राघवोऽग्निमिवार्चितम्॥४॥
होमकाल में पूजित अग्नि के समान तेजस्वी वेदवेत्ता सुयज्ञ को आया जान सीतासहित श्रीराम ने हाथ जोड़कर उनकी अगवानी की॥४॥
जातरूपमयैर्मुख्यैरङ्गदैः कुण्डलैः शुभैः ।
सहेमसूत्रैर्मणिभिः केयरैर्वलयैरपि॥५॥
अन्यैश्च रत्नैर्बहुभिः काकुत्स्थः प्रत्यपूजयत्।
तत्पश्चात् ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम ने सोने के बने हुए श्रेष्ठ अङ्गदों, सुन्दर कुण्डलों, सुवर्णमय सूत्र में पिरोयी हुई मणियों, केयूरों, वलयों तथा अन्य बहुत से रत्नों द्वारा उनका पूजन किया॥ ५ १/२ ।।
सुयज्ञं स तदोवाच रामः सीताप्रचोदितः॥६॥
हारं च हेमसूत्रं च भार्यायै सौम्य हारय।
रशनां चाथ सा सीता दातुमिच्छति ते सखी॥ ७॥
इसके बाद सीता की प्रेरणा से श्रीराम ने सुयज्ञ से कहा —’सौम्य! तुम्हारी पत्नी की सखी सीता तुम्हें अपना हार, सुवर्णसूत्र और करधनी देना चाहती है। इन वस्तुओं को अपनी पत्नी के लिये ले जाओ॥६-७॥
अङ्गदानि च चित्राणि केयूराणि शुभानि च।
प्रयच्छति सखी तुभ्यं भार्यायै गच्छती वनम्॥ ८॥
‘वनको प्रस्थान करने वाली तुम्हारी स्त्रीकी सखी सीता तुम्हें तुम्हारी पत्नी के लिये विचित्र अङ्गद और सुन्दर केयूर भी देना चाहती है॥ ८॥
पर्यमग्र्यास्तरणं नानारत्नविभूषितम्।
तमपीच्छति वैदेही प्रतिष्ठापयितुं त्वयि॥९॥
‘उत्तम बिछौनोंसे युक्त तथा नाना प्रकार के रत्नों से विभूषित जो पलंग है, उसे भी विदेहनन्दिनी सीता तुम्हारे ही घरमें भेज देना चाहती है॥९॥
नागः शत्रुजयो नाम मातुलोऽयं ददौ मम।
तं ते निष्कसहस्रेण ददामि द्विजपुङ्गव॥१०॥
‘विप्रवर! शत्रुञ्जय नामक जो हाथी है, जिसे मेरे मामा ने मुझे भेंट किया था, उसे एक हजार अशर्फियों के साथ मैं तुम्हें अर्पित करता हूँ’॥ १०॥
इत्युक्तः स तु रामेण सुयज्ञः प्रतिगृह्य तत्।
रामलक्ष्मणसीतानां प्रयुयोजाशिषः शिवाः॥ ११॥
श्रीराम के ऐसा कहने पर सुयज्ञने वे सब वस्तुएँ ग्रहण करके श्रीराम, लक्ष्मण और सीता के लिये मङ्गलमय आशीर्वाद प्रदान किये॥ ११॥
अथ भ्रातरमव्यग्रं प्रियं रामः प्रियंवदम्।
सौमित्रिं तमुवाचेदं ब्रह्मेव त्रिदशेश्वरम्॥१२॥
तदनन्तर श्रीराम ने शान्तभाव से खड़े हुए और प्रिय वचन बोलने वाले अपने प्रिय भ्राता सुमित्राकुमार लक्ष्मण से उसी तरह निम्नाङ्कित बात कही, जैसे ब्रह्मा देवराज इन्द्र से कुछ कहते हैं॥ १२॥
अगस्त्यं कौशिकं चैव तावुभौ ब्राह्मणोत्तमौ।
अर्चयाहूय सौमित्रे रत्नैः सस्यमिवाम्बुभिः॥
तर्पयस्व महाबाहो गोसहस्रेण राघव।
सुवर्णरजतैश्चैव मणिभिश्च महाधनैः॥१४॥
‘सुमित्रानन्दन! अगस्त्य और विश्वामित्र दोनों उत्तम ब्राह्मणों को बुलाकर रत्नों द्वारा उनकी पूजा करो। महाबाहु रघुनन्दन ! जैसे मेघ जल की वर्षाद्वारा खेती को तृप्त करता है, उसी प्रकार तुम उन्हें सहस्रों गौओं, सुवर्णमुद्राओं, रजतद्रव्यों और बहुमूल्य मणियों द्वारा संतुष्ट करो। १३-१४॥
कौसल्यां च य आशीर्भिर्भक्तः पर्युपतिष्ठति।
आचार्यस्तैत्तिरीयाणामभिरूपश्च वेदवित्॥ १५॥
तस्य यानं च दासीश्च सौमित्रे सम्प्रदापय।
कौशेयानि च वस्त्राणि यावत् तुष्यति स द्विजः॥ १६॥
‘लक्ष्मण! यजुर्वेदीय तैत्तिरीय शाखा का अध्ययन करने वाले ब्राह्मणों के जो आचार्य और सम्पूर्ण वेदों के विद्वान् हैं, साथ ही जिनमें दानप्राप्ति की योग्यता है तथा जो माता कौसल्या के प्रति भक्तिभाव रखकर प्रतिदिन उनके पास आकर उन्हें आशीर्वाद प्रदान करते हैं, उनको सवारी, दास-दासी, रेशमी वस्त्र और जितने धन से वे ब्राह्मणदेवता संतुष्ट हों, उतना धन खजाने से दिलवाओ॥१५-१६ ॥
सूतश्चित्ररथश्चार्यः सचिवः सुचिरोषितः।
तोषयैनं महाहश्च रत्नैर्वस्त्रैर्धनैस्तथा॥१७॥
पशकाभिश्च सर्वाभिर्गवां दशशतेन च।
‘चित्ररथ नामक सूत श्रेष्ठ सचिव भी हैं। वे सुदीर्घकाल से यहीं राजकुल की सेवा में रहते हैं। इनको भी तुम बहुमूल्य रत्न, वस्त्र और धन देकर संतुष्ट करो। साथ ही, इन्हें उत्तम श्रेणी के अज आदि सभी पशु और एक सहस्र गौएँ अर्पित करके पूर्ण संतोष प्रदान करो॥ १७ १/२॥
ये चेमे कठकालापा बहवो दण्डमाणवाः॥१८॥
नित्यस्वाध्यायशीलत्वान्नान्यत् कुर्वन्ति किंचन।
अलसाः स्वादुकामाश्च महतां चापि सम्मताः॥ १९॥
तेषामशीतियानानि रत्नपूर्णानि दापय।
शालिवाहसहस्रं च द्वे शते भद्रकांस्तथा ॥२०॥
मुझसे सम्बन्ध रखने वाले जो कठशाखा और कलाप-शाखा के अध्येता बहुत-से दण्डधारी ब्रह्मचारी हैं, वे सदा स्वाध्याय में ही संलग्न रहने के कारण दूसरा कोई कार्य नहीं कर पाते। भिक्षा माँगने में आलसी हैं, परंतु स्वादिष्ट अन्न खाने की इच्छा रखते हैं। महान् पुरुष भी उनका सम्मान करते हैं। उनके लिये रत्नों के बोझसे लदे हुए अस्सी ऊँट, अगहनी चावल का भार ढोने वाले एक सहस्र बैल तथा भद्रक नामक धान्यविशेष (चने, मूंग आदि) का भार लिये हुए दो सौ बैल और दिलवाओ॥
व्यञ्जनार्थं च सौमित्रे गोसहस्रमुपाकुरु।
मेखलीनां महासङ्गः कौसल्यां समुपस्थितः।
तेषां सहस्रं सौमित्रे प्रत्येकं सम्प्रदापय॥२१॥
‘सुमित्राकुमार! उपर्युक्त वस्तुओं के सिवा उनके लिये दही, घी आदि व्यञ्जन के निमित्त एक सहस्र गौएँ भी हँकवा दो। माता कौसल्या के पास मेखलाधारी ब्रह्मचारियों का बहुत बड़ा समुदाय आया है। उनमें से प्रत्येक को एक-एक हजार स्वर्णमुद्राएँ दिलवा दो॥ २१॥
अम्बा यथा नो नन्देच्च कौसल्या मम दक्षिणाम्।
तथा द्विजातीस्तान् सर्वाल्लँक्ष्मणार्चय सर्वशः॥ २२॥
‘लक्ष्मण! उन समस्त ब्रह्मचारी ब्राह्मणों को मेरे द्वारा दिलायी हुई दक्षिणा देखकर जिस प्रकार मेरी माता कौसल्या आनन्दित हो उठे, उसी प्रकार तुम उन सबकी सब प्रकार से पूजा करो’ ।। २२ ।। ततः
पुरुषशार्दूलस्तद् धनं लक्ष्मणः स्वयम्।
यथोक्तं ब्राह्मणेन्द्राणामददाद् धनदो यथा॥ २३॥
इस प्रकार आज्ञा प्राप्त होने पर पुरुषसिंह लक्ष्मण ने स्वयं ही कुबेर की भाँति श्रीराम के कथनानुसार उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को उस धन का दान किया॥२३॥
अथाब्रवीद् बाष्पगलांस्तिष्ठतश्चोपजीविनः।
स प्रदाय बहुद्रव्यमेकैकस्योपजीवनम्॥२४॥
लक्ष्मणस्य च यद् वेश्म गृहं च यदिदं मम।
अशून्यं कार्यमेकैकं यावदागमनं मम॥ २५॥
इसके बाद वहाँ खड़े हुए अपने आश्रित सेवकों को जिनका गला आँसुओं से रुंधा हुआ था, बुलाकर श्रीराम ने उनमें से एक-एक को चौदह वर्षों तक जीविका चलाने योग्य बहुत-सा द्रव्य प्रदान किया और उन सबसे कहा—’जब तक मैं वन से लौटकर न आऊँ, तब तक तुम लोग लक्ष्मण के और मेरे इस घर को कभी सूना न करना—छोड़कर अन्यत्र न जाना’ ।। २४-२५॥
इत्युक्त्वा दुःखितं सर्वं जनं तमुपजीविनम्।
उवाचेदं धनाध्यक्षं धनमानीयतां मम॥२६॥
वे सब सेवक श्रीराम के वनगमन से बहुत दुःखी थे। उनसे उपर्युक्त बात कहकर श्रीराम अपने धनाध्यक्ष (खजांची) से बोले—’खजाने में मेरा जितना धन है, वह सब ले आओ’ ॥ २६॥
ततोऽस्य धनमाजहः सर्व एवोपजीविनः।
स राशिः सुमहांस्तत्र दर्शनीयो ह्यदृश्यत॥ २७॥
यह सुनकर सभी सेवक उनका धन ढो-ढोकर ले आने लगे। वहाँ उस धन की बहुत बड़ी राशि एकत्र हुई दिखायी देने लगी, जो देखने ही योग्य थी॥२७॥
ततः स पुरुषव्याघ्रस्तद् धनं सहलक्ष्मणः।
द्विजेभ्यो बालवृद्धेभ्यः कृपणेभ्यो ह्यदापयत्॥ २८॥
तब लक्ष्मण सहित पुरुषसिंह श्रीराम ने बालक और बूढ़े ब्राह्मणों तथा दीन-दुःखियों को वह सारा धन बँटवा दिया॥ २८॥
तत्रासीत् पिङ्गलो गार्ग्यस्त्रिजटो नाम वै द्विजः।
क्षतवृत्तिर्वने नित्यं फालकुद्दाललाङ्गली॥२९॥
उन दिनों वहाँ अयोध्या के आस-पास वन में त्रिजट नाम वाले एक गर्गगोत्रीय ब्राह्मण रहते थे। उनके पास जीविका का कोई साधन नहीं था, इसलिये उपवास आदि के कारण उनके शरीर का रंग पीला पड़ गया था। वे सदा फाल, कुदाल और हल लिये वन में फल-मूल की तलाश में घूमा करते थे॥२९॥
तं वृद्धं तरुणी भार्या बालानादाय दारकान्।
अब्रवीद् ब्राह्मणं वाक्यं स्त्रीणां भर्ता हि देवता॥ ३०॥
अपास्य फालं कुद्दालं कुरुष्व वचनं मम।
रामं दर्शय धर्मज्ञं यदि किंचिदवाप्स्यसि॥३१॥
वे स्वयं तो बूढ़े हो चले थे, परंतु उनकी पत्नी अभी तरुणी थी। उसने छोटे बच्चों को लेकर ब्राह्मण देवता से यह बात कही—’प्राणनाथ! (यद्यपि) स्त्रियों के लिये पति ही देवता है, (अतः मुझे आपको आदेश देने का कोई अधिकार नहीं है, तथापि मैं आपकी भक्त हूँ; इसलिये विनयपूर्वक यह अनुरोध करती हूँ कि-) आप यह फाल और कुदाल फेंककर मेरा कहना कीजिये। धर्मज्ञ श्रीरामचन्द्रजी से मिलिये। यदि आप ऐसा करें तो वहाँ अवश्य कुछ पा जायँगे’ ॥ ३०-३१॥
स भार्याया वचः श्रुत्वा शाटीमाच्छाद्य दुश्छदाम्।
स प्रातिष्ठत पन्थानं यत्र रामनिवेशनम्॥३२॥
पत्नी की बात सुनकर ब्राह्मण एक फटी धोती, जिससे मुश्किल से शरीर ढक पाता था, पहनकर उस मार्गपर चल दिये, जहाँ श्रीरामचन्द्रजी का महल था॥ ३२॥
भृग्वङ्गिरःसमं दीप्त्या त्रिजटं जनसंसदि।
आपञ्चमायाः कक्ष्याया नैतं कश्चिदवारयत्॥ ३३॥
भृगु और अङ्गिरा के समान तेजस्वी त्रिजट, जनसमुदाय के बीच से होकर श्रीराम-भवन की पाँचवीं ड्यौढ़ीतक चले गये, परंतु उनके लिये किसी ने रोक टोक नहीं की॥ ३३॥
स राममासाद्य तदा त्रिजटो वाक्यमब्रवीत्।
निर्धनो बहुपुत्रोऽस्मि राजपुत्र महाबल॥३४॥
क्षतवृत्तिर्वने नित्यं प्रत्यवेक्षस्व मामिति।
उस समय श्रीराम के पास पहुँचकर त्रिजट ने कहा-‘महाबली राजकुमार! मैं निर्धन हूँ, मेरे बहुत-से पुत्र हैं, जीविका नष्ट हो जाने से सदा वन में ही रहता हूँ, आप मुझपर कृपादृष्टि कीजिये’ ॥ ३४ १/२ ॥
तमुवाच ततो रामः परिहाससमन्वितम्॥३५॥
गवां सहस्रमप्येकं न च विश्राणितं मया।
परिक्षिपसि दण्डेन यावत्तावदवाप्स्यसे॥३६॥
तब श्रीराम ने विनोदपूर्वक कहा—’ब्रह्मन् ! मेरे पास असंख्य गौएँ हैं, इनमें से एक सहस्र का भी मैंने अभी तक किसी को दान नहीं किया है। आप अपना डंडा जितनी दूर फेंक सकेंगे, वहाँत क की सारी गौएँ आपको मिल जायँगी’ ॥ ३६॥
स शाटी परितः कट्यां सम्भ्रान्तः परिवेष्टय ताम्।
आविध्य दण्डं चिक्षेप सर्वप्राणेन वेगतः॥३७॥
यह सुनकर उन्होंने बड़ी तेजी के साथ धोती के पल्ले को सब ओर से कमर में लपेट लिया और अपनी सारी शक्ति लगाकर डंडे को बड़े वेग से घुमाकर फेंका॥
स तीर्वा सरयूपारं दण्डस्तस्य कराच्च्युतः।
गोव्रजे बहुसाहस्रे पपातोक्षणसंनिधौ॥ ३८॥
ब्राह्मण के हाथसे छूटा हुआ वह डंडा सरयू के उस पार जाकर हजारों गौओं से भरे हुए गोष्ठ में एक साँड़ के पास गिरा॥ ३८॥
तं परिष्वज्य धर्मात्मा आ तस्मात् सरयूतटात्।
आनयामास ता गावस्त्रिजटस्याश्रमं प्रति॥ ३९॥
धर्मात्मा श्रीराम ने त्रिजट को छाती से लगा लिया और उस सरयूतट से लेकर उस पार गिरे हुए डंडे के स्थान तक जितनी गौएँ थीं, उन सबको मँगवाकर त्रिजट के आश्रम पर भेज दिया।॥ ३९ ॥
उवाच च तदा रामस्तं गाय॑मभिसान्त्वयन्।
मन्युर्न खलु कर्तव्यः परिहासो ह्ययं मम॥४०॥
उस समय श्रीराम ने गर्गवंशी त्रिजट को सान्त्वना देते हुए कहा—’ब्रह्मन् ! मैंने विनोद में यह बात कही थी, आप इसके लिये बुरा न मानियेगा॥ ४०॥
इदं हि तेजस्तव यद् दुरत्ययं तदेव जिज्ञासितुमिच्छता मया।
इमं भवानर्थमभिप्रचोदितो वृणीष्व किंचेदपरं व्यवस्यसि ॥४१॥
‘आपका यह जो दुर्लङ्घय तेज है, इसीको जानने की इच्छासे मैंने आपको यह डंडा फेंकने के लिये प्रेरित किया था, यदि आप और कुछ चाहते हों तो माँगिये॥४१॥
ब्रवीमि सत्येन न ते स्म यन्त्रणां धनं हि यद्यन्मम विप्रकारणात्।
भवत्सु सम्यकप्रतिपादनेन मयार्जितं चैव यशस्करं भवेत्॥४२॥
मैं सच कहता हूँ कि इसमें आपके लिये कोई संकोच की बात नहीं है। मेरे पास जो-जो धन हैं, वह सब ब्राह्मणों के लिये ही है। आप-जैसे ब्राह्मणों को शास्त्रीय विधि के अनुसार दान देने से मेरे द्वारा उपार्जित किया हुआ धन मेरे यश की वृद्धि करने वाला होगा’॥
ततः सभार्यस्त्रिजटो महामुनिर्गवामनीकं प्रतिगृह्य मोदितः।
यशोबलप्रीतिसुखोपबंहिणीस्तदाशिषः प्रत्यवदन्महात्मनः॥४३॥
गौओं के उस महान् समूह को पाकर पत्नी सहित महामुनि त्रिजट को बड़ी प्रसन्नता हुई, वे महात्मा श्रीराम को यश, बल, प्रीति तथा सुख बढ़ानेवाले आशीर्वाद देने लगे॥ ४३॥
स चापि रामः प्रतिपूर्णपौरुषो महाधनं धर्मबलैरुपार्जितम्।
नियोजयामास सुहृज्जने चिराद् यथार्हसम्मानवचः प्रचोदितः॥४४॥
तदनन्तर पूर्ण पराक्रमी भगवान् श्रीराम धर्मबल से उपार्जित किये हुए उस महान् धन को लोगों के यथायोग्य सम्मानपूर्ण वचनों से प्रेरित हो बहुत देर तक अपने सुहृदों में बाँटते रहे ॥४४॥
द्विजः सुहृद् भृत्यजनोऽथवा तदा दरिद्रभिक्षाचरणश्च यो भवेत्।
न तत्र कश्चिन्न बभूव तर्पितो यथार्हसम्माननदानसम्भ्रमैः॥४५॥
उस समय वहाँ कोई भी ब्राह्मण, सुहृद्, सेवक, दरिद्र अथवा भिक्षुक ऐसा नहीं था, जो श्रीराम के यथायोग्य सम्मान, दान तथा आदर-सत्कार से तृप्त न किया गया हो॥ ४५॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे द्वात्रिंशः सर्गः ॥ ३२॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में बत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३२॥
सर्ग-33
दत्त्वा तु सह वैदेह्या ब्राह्मणेभ्यो धनं बहु।
जग्मतुः पितरं द्रष्टं सीतया सह राघवौ॥१॥
विदेहकुमारी सीता के साथ श्रीराम और लक्ष्मण ब्राह्मणों को बहुत-सा धन दान करके वन जाने के लिये उद्यत हो पिता का दर्शन करने के लिये गये॥१॥
ततो गृहीते प्रेष्याभ्यामशोभेतां तदायुधे।
मालादामभिरासक्ते सीतया समलंकृते॥२॥
उनके साथ दो सेवक श्रीराम और लक्ष्मण के वे धनुष आदि आयुध लेकर चले, जिन्हें फूल की मालाओं से सजाया गया था और सीताजी ने पूजा के लिये चढ़ाये हुए चन्दन आदि से अलंकृत किया था। उन दोनों के आयुधों की उस समय बड़ी शोभा हो रही थी।॥ २॥
ततः प्रासादहाणि विमानशिखराणि च।।
अभिरुह्य जनः श्रीमानुदासीनो व्यलोकयत्॥३॥
उस अवसरपर धनी लोग प्रासादों (तिमंजिले महलों), हर्म्यगृहों (राजभवनों) तथा विमानों (सात मंजिले महलों) की ऊपरी छतों पर चढ़कर उदासीन भाव से उन तीनों की ओर देखने लगे॥३॥
न हि रथ्याः सुशक्यन्ते गन्तुं बहुजनाकुलाः।
आरुह्य तस्मात् प्रासादाद् दीनाः पश्यन्ति राघवम्॥४॥
उस समय सड़कें मनुष्यों की भीड़ से भरी थीं इसलिये उनपर सुगमतापूर्वक चलना कठिन हो गया था। अतः अधिकांश मनुष्य प्रासादों (तिमंजिले मकानों) पर चढ़कर वहीं से दुःखी होकर श्रीरामचन्द्रजी की ओर देख रहे थे॥ ४॥
पदातिं सानुजं दृष्ट्वा ससीतं च जनास्तदा।
ऊचुर्बहुजना वाचः शोकोपहतचेतसः॥५॥
श्रीराम को अपने छोटे भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता के साथ पैदल जाते देख बहुत-से मनुष्यों का हृदय शोक से व्याकुल हो उठा। वे खेदपूर्वक कहने लगे— ॥५॥
यं यान्तमनुयाति स्म चतुरङ्गबलं महत्।
तमेकं सीतया सार्धमनुयाति स्म लक्ष्मणः॥६॥
‘हाय! यात्रा के समय जिनके पीछे विशाल चतुरङ्गिणी सेना चलती थी, वे ही श्रीराम आज अकेले जा रहे हैं और उनके पीछे सीता के साथ लक्ष्मण चल रहे हैं॥ ६॥
ऐश्वर्यस्य रसज्ञः सन् कामानां चाकरो महान्।
नेच्छत्येवानृतं कर्तुं वचनं धर्मगौरवात्॥७॥
‘जो ऐश्वर्य के सुख का अनुभव करने वाले तथा भोग्य वस्तुओं के महान् भण्डार थे—जहाँ सबकी कामनाएँ पूर्ण होती थीं, वे ही श्रीराम आज धर्म का गौरव रखने के लिये पिता की बात झूठी करना नहीं चाहते हैं॥ ७॥
या न शक्या पुरा द्रष्टं भूतैराकाशगैरपि।
तामद्य सीतां पश्यन्ति राजमार्गगता जनाः॥८॥
‘ओह! पहले जिसे आकाश में विचरने वाले प्राणी भी नहीं देख पाते थे, उसी सीता को इस समय सड़कों पर खड़े हुए लोग देख रहे हैं॥ ८॥
अङ्गरागोचितां सीतां रक्तचन्दनसेविनीम्।
वर्षमुष्णं च शीतं च नेष्यत्याशु विवर्णताम्॥९॥
‘सीता अङ्गराग-सेवनके योग्य हैं, लाल चन्दनका सेवन करनेवाली हैं। अब वर्षा, गर्मी और सर्दी शीघ्र ही इनके अङ्गोंकी कान्ति फीकी कर देगी॥९॥
अद्य नूनं दशरथः सत्त्वमाविश्य भाषते।
नहि राजा प्रियं पुत्रं विवासयितुमर्हति ॥१०॥
‘निश्चय ही आज राजा दशरथ किसी पिशाच के आवेश में पड़कर अनुचित बात कह रहे हैं; क्योंकि अपनी स्वाभाविक स्थिति में रहने वाला कोई भी राजा अपने प्यारे पुत्र को घर से निकाल नहीं सकता॥१० ॥
निर्गुणस्यापि पुत्रस्य कथं स्याद् विनिवासनम्।
किं पुनर्यस्य लोकोऽयं जितो वृत्तेन केवलम्॥
‘पुत्र यदि गुणहीन हो तो भी उसे घर से निकाल देने का साहस कैसे हो सकता है? फिर जिसके केवल चरित्र से ही यह सारा संसार वशीभूत हो जाता है, उसको वनवास देने की तो बात ही कैसे की जा सकती है? ॥
आनृशंस्यमनुक्रोशः श्रुतं शीलं दमः शमः।
राघवं शोभयन्त्येते षड्गुणाः पुरुषर्षभम्॥१२॥
‘क्रूरता का अभाव, दया, विद्या, शील, दम (इन्द्रियसंयम) और शम (मनोनिग्रह)-ये छः गुण नरश्रेष्ठ श्रीराम को सदा ही सुशोभित करते हैं ।। १२ ।।
तस्मात् तस्योपघातेन प्रजाः परमपीडिताः।
औदकानीव सत्त्वानि ग्रीष्मे सलिलसंक्षयात्॥
‘अतः इनके ऊपर आघात करने—इनके राज्याभिषेक में विघ्न डालने से प्रजा को उसी तरह महान् क्लेश पहुँचा है, जैसे गर्मी में जलाशय का पानी सूख जाने से उसके भीतर रहने वाले जीव तड़पने लगते हैं।
पीडया पीडितं सर्वं जगदस्य जगत्पतेः।
मूलस्येवोपघातेन वृक्षः पुष्पफलोपगः॥१४॥
‘इन जगदीश्वर श्रीराम की व्यथा से सम्पूर्ण जगत् व्यथित हो उठा है, जैसे जड़ काट देने से पुष्प और फलसहित सारा वृक्ष सूख जाता है॥ १४ ॥
मूलं ह्येष मनुष्याणां धर्मसारो महाद्युतिः।
पुष्पं फलं च पत्रं च शाखाश्चास्येतरे जनाः॥ १५॥
‘ये महान् तेजस्वी श्रीराम सम्पूर्ण मनुष्यों के मूल हैं, धर्म ही इनका बल है। जगत् के दूसरे प्राणी पत्र, पुष्प, फल और शाखाएँ हैं॥ १५ ॥
ते लक्ष्मण इव क्षिप्रं सपत्न्यः सहबान्धवाः।
गच्छन्तमनुगच्छामो येन गच्छति राघवः॥१६॥
‘अतः हमलोग भी लक्ष्मण की भाँति पत्नी और बन्धु-बान्धवों के साथ शीघ्र ही इन जाने वाले श्रीराम के ही पीछे-पीछे चल दें। जिस मार्ग से श्रीरघुनाथ जी जा रहे हैं, उसी का हम भी अनुसरण करें॥ १६॥
उद्यानानि परित्यज्य क्षेत्राणि च गृहाणि च।
एकदुःखसुखा राममनुगच्छाम धार्मिकम्॥१७॥
‘बाग-बगीचे, घर-द्वार और खेती-बारी—सब छोड़कर धर्मात्मा श्रीराम का अनुगमन करें। इनके दुःख-सुख के साथी बनें॥ १७॥
समुद्धृतनिधानानि परिध्वस्ताजिराणि च।
उपात्तधनधान्यानि हृतसाराणि सर्वशः॥१८॥
रजसाभ्यवकीर्णानि परित्यक्तानि दैवतैः।
मूषकैः परिधावद्भिरुबिलैरावृतानि च॥१९॥
अपेतोदकधूमानि हीनसम्मार्जनानि च।
प्रणष्टबलिकर्मेज्यामन्त्रहोमजपानि च ॥२०॥
दुष्कालेनेव भग्नानि भिन्नभाजनवन्ति च।
अस्मत्त्यक्तानि कैकेयी वेश्मानि प्रतिपद्यताम्॥ २१॥
‘हम अपने घरों की गड़ी हुई निधि निकालें। आँगन की फर्श खोद डालें। सारा धन-धान्य साथ ले लें। सारी आवश्यक वस्तुएँ हटा लें। इनमें चारों ओर धूल भर जाय। देवता इन घरों को छोड़कर भाग जाएँ। चूहे बिल से बाहर निकलकर इनमें चारों ओर दौड़ लगाने लगें और उनसे ये घर भर जायें। इनमें न कभी आग जले, न पानी रहे और न झाड़ ही लगे। यहाँ बलिवैश्वदेव, यज्ञ, मन्त्रपाठ, होम और जप बंद हो जाय। मानो बड़ा भारी अकाल पड़ गया हो, इस प्रकार ये सारे घर ढह जायें। इनमें टूटे बर्तन बिखरे पड़े हों और हम सदा के लिये इन्हें छोड़ दें ऐसी दशा में इन घरों पर कैकेयी आकर अधिकार कर ले॥ १८-२१॥
वनं नगरमेवास्तु येन गच्छति राघवः।
अस्माभिश्च परित्यक्तं पुरं सम्पद्यतां वनम्॥ २२॥
‘जहाँ पहुँचने के लिये ये श्रीरामचन्द्रजी जा रहे हैं,वह वन ही नगर हो जाय और हमारे छोड़ देने पर यह नगर भी वन के रूप में परिणत हो जाय॥ २२ ॥
बिलानि दंष्टिणः सर्वे सानूनि मृगपक्षिणः।
त्यजन्त्वस्मद्भयागीता गजाः सिंहा वनान्यपि॥ २३॥
‘वन में हमलोगों के भयसे साँप अपने बिल छोड़कर भाग जायँ। पर्वत पर रहने वाले मृग और पक्षी उसके शिखरों को छोड़ दें तथा हाथी और सिंह भी उन वनों को त्यागकर दूर चले जायँ।। २३॥
अस्मत्त्यक्तं प्रपद्यन्तु सेव्यमानं त्यजन्तु च।
तृणमांसफलादानां देशं व्यालमृगद्विजम्॥२४॥
प्रपद्यतां हि कैकेयी सपुत्रा सह बान्धवैः।
राघवेण वयं सर्वे वने वत्स्याम निर्वृताः॥२५॥
‘वे सर्प आदि उन स्थानों में चले जायँ, जिन्हें हमलोगों ने छोड़ रखा है और उन स्थानों को त्याग दें, जिनका हम सेवन करते हैं। यह देश घास चरने वाले पशुओं, मांसभक्षी हिंसक जन्तुओं और फल खाने वाले पक्षियों का निवासस्थान बन जाय। यहाँ सर्प, पशु और पक्षी रहने लगें। उस दशा में पुत्र और बन्धु-बान्धवोंसहित कैकेयी इसे अपने अधिकार में कर ले। हम सब लोग वन में श्रीरघुनाथजी के साथ बड़े आनन्द से रहेंगे’॥ २४-२५ ॥
इत्येवं विविधा वाचो नानाजनसमीरिताः।
शुश्राव राघवः श्रुत्वा न विचक्रेऽस्य मानसम्॥ २६॥
स तु वेश्म पुनर्मातुः कैलासशिखरप्रभम्।
अभिचक्राम धर्मात्मा मत्तमातङ्गविक्रमः॥२७॥
इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी ने बहुत-से मनुष्यों के मुँह से निकली हुई तरह-तरह की बातें सुनीं; किंतु सुनकर भी उनके मन में कोई विकार नहीं हुआ। मतवाले गजराज के समान पराक्रमी धर्मात्मा श्रीराम पुनः माता कैकेयी के कैलासशिखर के सदृश शुभ्र भवन में गये॥ २६-२७॥
विनीतवीरपुरुषं प्रविश्य तु नृपालयम्।
ददर्शावस्थितं दीनं सुमन्त्रमविदूरतः॥२८॥
विनयशील वीर पुरुषों से युक्त उस राजभवन में प्रवेश करके उन्होंने देखा-सुमन्त्र पास ही दुःखी होकर खड़े हैं।॥ २८॥
प्रतीक्षमाणोऽभिजनं तदात मनार्तरूपः प्रहसन्निवाथ।
जगाम रामः पितरं दिदृक्षुः पितुर्निदेशं विधिवच्चिकीर्षुः ॥ २९॥
पूर्वजों की निवासभूमि अवध के मनुष्य वहाँ शोक से आतुर होकर खड़े थे। उन्हें देखकर भी श्रीराम स्वयं शोक से पीड़ित नहीं हुए उनके शरीर पर व्यथा का कोई चिह्न प्रकट नहीं हुआ। वे पिता की आज्ञा का विधिपूर्वक पालन करने की इच्छा से उनका दर्शन करने के लिये हँसते हुए-आगे बढ़े॥ २९॥
तत्पूर्वमैक्ष्वाकसुतो महात्मा रामो गमिष्यन् नृपमार्तरूपम्।
व्यतिष्ठत प्रेक्ष्य तदा सुमन्त्रं पितुर्महात्मा प्रतिहारणार्थम्॥३०॥
शोकाकुल रूप से पड़े हुए राजा के पास जाने वाले महात्मा महामना इक्ष्वाकुकुलनन्दन श्रीराम वहाँ पहुँचने से पहले सुमन्त्र को देखकर पिता के पास अपने आगमन की सूचना भेज नेके लिये उस समय वहीं ठहर गये॥ ३०॥
पितुर्निदेशेन तु धर्मवत्सलो वनप्रवेशे कृतबुद्धिनिश्चयः।
स राघवः प्रेक्ष्य सुमन्त्रमब्रवीनिवेदयस्वागमनं नृपाय मे॥३१॥
पिता के आदेश से वन में प्रवेश करने का बुद्धिपूर्वक निश्चय करके आये हुए धर्मवत्सल श्रीरामचन्द्रजी सुमन्त्र की ओर देखकर बोले—’आप महाराज को मेरे आगमन की सूचना दे दें’॥ ३१॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्रयस्त्रिंशः सर्गः॥३३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में तैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।३३॥
सर्ग-34
ततः कमलपत्राक्षः श्यामो निरुपमो महान्।
उवाच रामस्तं सूतं पितुराख्याहि मामिति॥१॥
स रामप्रेषितः क्षिप्रं संतापकलुषेन्द्रियम्।
प्रविश्य नृपतिं सूतो निःश्वसन्तं ददर्श ह॥२॥
जब कमलनयन श्यामसुन्दर उपमारहित महापुरुष श्रीराम ने सूत सुमन्त्र से कहा—’आप पिताजी को मेरे आगमन की सूचना दे दीजिये’ तब श्रीराम की प्रेरणा से शीघ्र ही भीतर जाकर सारथि सुमन्त्र ने राजा का दर्शन किया। उनकी सारी इन्द्रियाँ संताप से कलुषित हो रही थीं। वे लम्बी साँस खींच रहे थे॥ १-२॥
उपरक्तमिवादित्यं भस्मच्छन्नमिवानलम्।
तटाकमिव निस्तोयमपश्यज्जगतीपतिम्॥३॥
आबोध्य च महाप्राज्ञः परमाकुलचेतनम्।
राममेवानुशोचन्तं सूतः प्राञ्जलिरब्रवीत्॥४॥
सुमन्त्र ने देखा, पृथ्वीपति महाराज दशरथ राहुग्रस्त सूर्य, राख से ढकी हुई आग तथा जलशून्य तालाब के समान श्रीहीन हो रहे हैं। उनका चित्त अत्यन्त व्याकुल है और वे श्रीराम का ही चिन्तन कर रहे हैं। तब महाप्राज्ञ सूत ने महाराज को सम्बोधित करके हाथ जोड़कर कहा॥
तं वर्धयित्वा राजानं पूर्वं सूतो जयाशिषा।
भयविक्लवया वाचा मन्दया श्लक्ष्णयाब्रवीत्॥
पहले तो सूत सुमन्त्र ने विजयसूचक आशीर्वाद देते हुए महाराज की अभ्युदय-कामना की; फिर भय से व्याकुल मन्द-मधुर वाणी द्वारा यह बात कही—॥ ५॥
अयं स पुरुषव्याघ्रो द्वारि तिष्ठति ते सुतः।
ब्राह्मणेभ्यो धनं दत्त्वा सर्वं चैवोपजीविनाम्॥ ६॥
स त्वां पश्यतु भद्रं ते रामः सत्यपराक्रमः।
सर्वान् सुहृद आपृच्छ्य त्वां हीदानी दिदृक्षते॥ ७॥
गमिष्यति महारण्यं तं पश्य जगतीपते।
वृतं राजगुणैः सर्वैरादित्यमिव रश्मिभिः॥८॥
‘पृथ्वीनाथ! आपके पुत्र ये सत्यपराक्रमी पुरुषसिंह श्रीराम ब्राह्मणों तथा आश्रित सेवकों को अपना साराधन देकर द्वार पर खड़े हैं। आपका कल्याण हो, ये अपने सब सुहृदों से मिलकर उनसे विदा लेकर इस
समय आपका दर्शन करना चाहते हैं। आज्ञा हो तो यहाँ आकर आपका दर्शन करें। राजन्! अब ये विशाल वन में चले जायेंगे, अतः किरणों से युक्त सूर्य की भाँति समस्त राजोचित गुण से सम्पन्न इन
श्रीराम को आप भी जी भरकर देख लीजिये’॥ ६– ८॥
स सत्यवाक्यो धर्मात्मा गाम्भीर्यात् सागरोपमः।
आकाश इव निष्पङ्को नरेन्द्रः प्रत्युवाच तम्॥९॥
यह सुनकर समुद्र के समान गम्भीर तथा आकाश की भाँति निर्मल, सत्यवादी धर्मात्मा महाराज दशरथ ने उन्हें उत्तर दिया- ॥९॥
सुमन्त्रानय मे दारान् ये केचिदिह मामकाः।
दारैः परिवृतः सर्वैर्द्रष्टमिच्छामि राघवम्॥१०॥
‘सुमन्त्र! यहाँ जो कोई भी मेरी स्त्रियाँ हैं, उन सबको बुलाओ। उन सबके साथ मैं श्रीराम को देखना चाहता हूँ’॥१०॥
सोऽन्तःपुरमतीत्यैव स्त्रियस्ता वाक्यमब्रवीत्।
आर्यो ह्वयति वो राजा गम्यतां तत्र मा चिरम्॥ ११॥
तब सुमन्त्र ने बड़े वेग से अन्तःपुर में जाकर सब स्त्रियों से कहा—’देवियो! आपलोगों को महाराज बुला रहे हैं, अतः वहाँ शीघ्र चलें ॥११॥
एवमुक्ताः स्त्रियः सर्वाः सुमन्त्रेण नृपाज्ञया।
प्रचक्रमुस्तद् भवनं भर्तुराज्ञाय शासनम्॥१२॥
राजा की आज्ञा से सुमन्त्र के ऐसा कहने पर वे सब रानियाँ स्वामी का आदेश समझकर उस भवन की ओर चलीं॥ १२॥
अर्धसप्तशतास्तत्र प्रमदास्ताम्रलोचनाः।
कौसल्यां परिवार्याथ शनैर्जग्मुधृतव्रताः॥१३॥
कुछ-कुछ लाल नेत्रोंवाली साढ़े तीन सौ पतिव्रता युवती स्त्रियाँ महारानी कौसल्या को सब ओर से घेरकर धीरे-धीरे उस भवन में गयीं॥ १३॥
आगतेषु च दारेषु समवेक्ष्य महीपतिः।
उवाच राजा तं सूतं सुमन्त्रानय मे सुतम्॥१४॥
उन सबके आ जाने पर उन्हें देखकर पृथ्वीपति राजा दशरथ ने सूत से कहा—’सुमन्त्र! अब मेरे पुत्र को ले आओ’ ॥
स सूतो राममादाय लक्ष्मणं मैथिली तथा।
जगामाभिमुखस्तूर्णं सकाशं जगतीपतेः ॥१५॥
आज्ञा पाकर सुमन्त्र गये और श्रीराम, लक्ष्मण तथा सीता को साथ लेकर शीघ्र ही महाराज के पास लौट आये॥ १५॥
स राजा पुत्रमायान्तं दृष्ट्वा चारात् कृताञ्जलिम्।
उत्पपातासनात् तूर्णमार्तः स्त्रीजनसंवृतः॥१६॥
महाराज दूर से ही अपने पुत्र को हाथ जोड़कर आते देख सहसा अपने आसन से उठ खड़े हुए। उस समय स्त्रियों से घिरे हुए वे नरेश शोक से आर्त हो रहे थे॥
सोऽभिदुद्राव वेगेन रामं दृष्ट्वा विशाम्पतिः।
तमसम्प्राप्य दुःखार्तः पपात भुवि मूर्च्छितः॥ १७॥
श्रीराम को देखते ही वे प्रजापालक महाराज बड़े वेग से उनकी ओर दौड़े, किंतु उनके पास पहँचने के पहले ही दुःख से व्याकुल हो पृथ्वी पर गिर पड़े और मूर्छित हो गये॥१७॥
तं रामोऽभ्यपतत् क्षिप्रं लक्ष्मणश्च महारथः।
विसंज्ञमिव दुःखेन सशोकं नृपतिं तथा॥१८॥
उस समय श्रीराम और महारथी लक्ष्मण बड़ी तेजी से चलकर दुःख के कारण अचेत-से हुए शोकमग्न महाराज के पास जा पहुँचे॥१८॥
स्त्रीसहस्रनिनादश्च संजज्ञे राजवेश्मनि।
हा हा रामेति सहसा भूषणध्वनिमिश्रितः॥१९॥
इतने ही में उस राजभवन के भीतर सहसा आभूषणों की ध्वनि के साथ सहस्रों स्त्रियों का ‘हा राम! हा राम!’ यह आर्तनाद गूंज उठा॥१९॥
तं परिष्वज्य बाहुभ्यां तावुभौ रामलक्ष्मणौ।
पर्यङ्के सीतया सार्धं रुदन्तः समवेशयन्॥२०॥
श्रीराम और लक्ष्मण दोनों भाई भी सीता के साथ रो पड़े और उन तीनों ने महाराज को दोनों भुजाओं से उठाकर पलंग पर बिठा दिया॥ २०॥
अथ रामो मुहूर्तस्य लब्धसंज्ञं महीपतिम्।
उवाच प्राञ्जलिर्बाष्पशोकार्णवपरिप्लुतम्॥२१॥
शोकाश्रु के सागर में डूबे हुए महाराज दशरथ को दो घड़ी में जब फिर चेत हुआ, तब श्रीराम ने हाथ जोड़कर उनसे कहा- ॥ २१॥
आपृच्छे त्वां महाराज सर्वेषामीश्वरोऽसि नः।
प्रस्थितं दण्डकारण्यं पश्य त्वं कुशलेन माम्॥ २२॥
‘महाराज! आप हमलोगों के स्वामी हैं। मैं दण्डकारण्य को जा रहा हूँ और आपसे आज्ञा लेने आया हूँ। आप अपनी कल्याणमयी दृष्टि से मेरी ओर देखिये॥
लक्ष्मणं चानुजानीहि सीता चान्वेतु मां वनम्।
कारणैर्बहुभिस्तथ्यैर्वार्यमाणौ न चेच्छतः॥ २३॥
अनुजानीहि सर्वान् नः शोकमुत्सृज्य मानद।
लक्ष्मणं मां च सीतां च प्रजापतिरिवात्मजान्॥ २४॥
‘मेरे साथ लक्ष्मण को भी वन में जाने की आज्ञा दीजिये। साथ ही यह भी स्वीकार कीजिये कि सीता भी मेरे साथ वन को जाय। मैंने बहुत-से सच्चे कारण बताकर इन दोनों को रोकने की चेष्टा की है. परंतु ये यहाँ रहना नहीं चाहते हैं; अतः दूसरों को मान देने वाले नरेश! आप शोक छोड़कर हम सबको मुझको, लक्ष्मण को और सीता को भी उसी तरह वन में जाने की आज्ञा दीजिये, जैसे ब्रह्माजी ने अपने पुत्र सनकादिकों को तप के लिये वन में जाने की अनुमति दी थी’ ॥ २३-२४॥
प्रतीक्षमाणमव्यग्रमनुज्ञां जगतीपतेः।
उवाच राजा सम्प्रेक्ष्य वनवासाय राघवम्॥२५॥
इस प्रकार शान्तभाव से वनवास के लिये राजा की आज्ञा की प्रतीक्षा करते हुए श्रीरामचन्द्रजी की ओर देखकर महाराज ने उनसे कहा— ॥२५॥
अहं राघव कैकेय्या वरदानेन मोहितः।
अयोध्यायां त्वमेवाद्य भव राजा निगृह्य माम्॥ २६॥
‘रघुनन्दन ! मैं कैकेयी को दिये हुए वर के कारण मोह में पड़ गया हूँ। तुम मुझे कैद करके स्वयं ही अब अयोध्या के राजा बन जाओ’ ॥ २६॥
एवमुक्तो नृपतिना रामो धर्मभृतां वरः।
रत्युवाचाञ्जलिं कृत्वा पितरं वाक्यकोविदः॥ २७॥
महाराज के ऐसा कहने पर बातचीत करने में कुशल धर्मात्माओं में श्रेष्ठ श्रीराम ने दोनों हाथ जोड़कर पिता को इस प्रकार उत्तर दिया- ॥२७॥
भवान् वर्षसहस्राय पृथिव्या नृपते पतिः।
अहं त्वरण्ये वत्स्यामि न मे राज्यस्य कांक्षिता॥ २८॥
‘महाराज! आप सहस्रों वर्षों तक इस पृथ्वी केअधिपति बने रहें। मैं तो अब वन में ही निवास करूँगा। मुझे राज्य लेने की इच्छा नहीं है॥ २८॥
नव पञ्च च वर्षाणि वनवासे विहृत्य ते।
पुनः पादौ ग्रहीष्यामि प्रतिज्ञान्ते नराधिप॥२९॥
‘नरेश्वर! चौदह वर्षों तक वन में घूम-फिरकर आपकी प्रतिज्ञा पूरी कर लेने के पश्चात् मैं पुनः आपके युगल चरणों में मस्तक झुकाऊँगा’ ॥ २९॥
रुदन्नार्तः प्रियं पुत्रं सत्यपाशेन संयुतः।
कैकेय्या चोद्यमानस्तु मिथो राजा तमब्रवीत्॥ ३०॥
राजा दशरथ एक तो सत्य के बन्धन में बँधे हुए थे, दूसरे एकान्त में कैकेयी उन्हें श्रीराम को वन में तुरंत भेजने के लिये बाध्य कर रही थी—इस अवस्था में वे आर्तभाव से रोते हुए वहाँ अपने प्रिय पुत्र श्रीराम से बोले- ॥३०॥
श्रेयसे वृद्धये तात पुनरागमनाय च।
गच्छस्वारिष्टमव्यग्रः पन्थानमकुतोभयम्॥३१॥
‘तात! तुम कल्याण के लिये, वृद्धि के लिये और फिर लौट आने के लिये शान्तभाव से जाओ। तुम्हारा मार्ग विघ्न-बाधाओं से रहित और निर्भय हो॥३१॥
न हि सत्यात्मनस्तात धर्माभिमनसस्तव।
संनिवर्तयितुं बुद्धिः शक्यते रघुनन्दन॥३२॥
अद्य त्विदानी रजनी पुत्र मा गच्छ सर्वथा।
एकाहं दर्शनेनापि साधु तावच्चराम्यहम्॥३३॥
‘बेटा रघुनन्दन ! तुम सत्यस्वरूप और धर्मात्मा हो। तुम्हारे विचार को पलटना तो असम्भव है; परंतु रात भर और रह जाओ। सिर्फ एक रात के लिये सर्वथा अपनी यात्रा रोक दो। केवल एक दिन भी तो तुम्हें देखने का सुख उठा लूँ॥ ३२-३३॥
मातरं मां च सम्पश्यन् वसेमामद्य शर्वरीम्।
तर्पितः सर्वकामैस्त्वं श्वः काल्ये साधयिष्यसि॥ ३४॥
‘अपनी माता को और मुझको इस अवस्था में देखकर आज की इस रात में यहीं रह जाओ। मेरे द्वारा सम्पूर्ण अभिलषित वस्तुओं से तृप्त होकर कल प्रातःकाल यहाँ से जाना॥
दुष्करं क्रियते पुत्र सर्वथा राघव प्रिय।
त्वया हि मत्प्रियार्थं तु वनमेवमुपाश्रितम्॥ ३५॥
‘मेरे प्रिय पुत्र श्रीराम ! तुम सर्वथा दुष्कर कार्य कर रहे हो। मेरा प्रिय करने के लिये ही तुमने इस प्रकार वन का आश्रय लिया है॥ ३५॥
न चैतन्मे प्रियं पुत्र शपे सत्येन राघव।
छन्नया चलितस्त्वस्मि स्त्रिया भस्माग्निकल्पया॥ ३६॥
वञ्चना या तु लब्धा मे तां त्वं निस्तर्तुमिच्छसि।
अनया वृत्तसादिन्या कैकेय्याभिप्रचोदितः॥ ३७॥
‘परंतु बेटा रघुनन्दन! मैं सत्य की शपथ खाकर कहता हूँ कि यह मुझे प्रिय नहीं है। मुझे तुम्हारा वन में जाना अच्छा नहीं लगता। यह मेरी स्त्री कैकेयी राख में छिपी हुई आग के समान भयंकर है। इसने अपने क्रूर अभिप्राय को छिपा रखा था। इसी ने आज मुझे मेरे अभीष्ट संकल्प से विचलित कर दिया है। कुलोचित सदाचार का विनाश करने वाली इस कैकेयी ने मुझे वरदान के लिये प्रेरित करके मेरे साथ बहुत बड़ा धोखा किया है। इसके द्वारा जो वञ्चना मुझे प्राप्त हुई है, उसी को तुम पार करना चाहते हो॥ ३६-३७॥
न चैतदाश्चर्यतमं यत् त्वं ज्येष्ठः सुतो मम।
अपानृतकथं पुत्र पितरं कर्तुमिच्छसि ॥ ३८॥
‘पुत्र! तुम अपने पिता को सत्यवादी बनाना चाहते हो। तुम्हारे लिये यह कोई अधिक आश्चर्य की बात नहीं है; क्योंकि तुम गुण और अवस्था दोनों ही दृष्टियों से मेरे ज्येष्ठ पुत्र हो’ ॥ ३८॥
अथ रामस्तदा श्रुत्वा पितुरार्तस्य भाषितम्।
लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा दीनो वचनमब्रवीत्॥३९॥
अपने शोकाकुल पिता का यह कथन सुनकर उस समय छोटे भाई लक्ष्मणसहित श्रीराम ने दुःखी होकर कहा- ॥३९॥
राप्स्यामि यानद्य गुणान् को मे श्वस्तान् प्रदास्यति।
अपक्रमणमेवातः सर्वकामैरहं वृणे॥४०॥
‘महाराज! आज यात्रा करके मैं जिन गुणों (लाभों) को पाऊँगा, उन्हें कल कौन मुझे देगा?* अतः मैं सम्पूर्ण कामनाओं के बदले आज यहाँ से निकल जाना ही अच्छा समझता हूँ और इसी का वरण करता हूँ॥
* ‘प्राप्स्यामि……इस आधे श्लोक का अर्थ यह भी हो सकता है कि आज यहाँ रहकर जिन उत्तमोत्तम अभीष्ट पदार्थों को मैं पाऊँगा, उन्हें कल से कौन देगा?
इयं सराष्ट्रा सजना धनधान्यसमाकुला।
मया विसृष्टा वसुधा भरताय प्रदीयताम्॥४१॥
‘राष्ट्र और यहाँ के निवासी मनुष्यों सहित धनधान्य से सम्पन्न यह सारी पृथ्वी मैंने छोड़ दी। आप इसे भरत को दे दें॥४१॥
वनवासकृता बुद्धिर्न च मेऽद्य चलिष्यति।
यस्तु युद्धे वरो दत्तः कैकेय्यै वरद त्वया॥४२॥
दीयतां निखिलेनैव सत्यस्त्वं भव पार्थिव।
मेरा वनवास विषयक निश्चय अब बदल नहीं सकेगा। वरदायक नरेश! आपने देवासुर-संग्राम में कैकेयी को जो वर देने की प्रतिज्ञा की थी, उसे पूर्णरूप से दीजिये और सत्यवादी बनिये॥ ४२ १/२ ।।
अहं निदेशं भवतो यथोक्तमनुपालयन्॥४३॥
चतुर्दश समा वत्स्ये वने वनचरैः सह।
मा विमर्शो वसुमती भरताय प्रदीयताम्॥४४॥
‘मैं आपकी उक्त आज्ञा का पालन करता हुआ चौदह वर्षों तक वन में वनचारी प्राणियों के साथ निवास करूँगा। आपके मन में कोई अन्यथा विचार नहीं होना चाहिये। आप यह सारी पृथ्वी भरत को दे दीजिये॥
नहि मे कांक्षितं राज्यं सुखमात्मनि वा प्रियम्।
यथानिदेशं कर्तुं वै तवैव रघुनन्दन॥४५॥
‘रघुनन्दन! मैंने अपने मन को सुख देने अथवा । स्वजनों का प्रिय करने के उद्देश्य से राज्य लेने की इच्छा नहीं की थी। आपकी आज्ञा का यथावत् रूप से पालन करने के लिये ही मैंने उसे ग्रहण करने की अभिलाषा की थी॥४५॥
अपगच्छतु ते दुःखं मा भूर्बाष्पपरिप्लुतः।
नहि क्षुभ्यति दुर्धर्षः समुद्रः सरितां पतिः॥४६॥
‘आपका दुःख दूर हो जाय, आप इस प्रकार आँसू न बहावें। सरिताओं का स्वामी दुर्धर्ष समुद्र क्षुब्ध नहीं होता है—अपनी मर्यादा का त्याग नहीं करता है (इसी तरह आपको भी क्षुब्ध नहीं होना चाहिये) ॥ ४६॥
नैवाहं राज्यमिच्छामि न सुखं न च मेदिनीम्।
नैव सर्वानिमान् कामान् न स्वर्गं न च जीवितुम्॥ ४७॥
‘मुझे न तो इस राज्य की, न सुख की, न पृथ्वी की, न इन सम्पूर्ण भोगों की, न स्वर्ग की और न जीवन की ही इच्छा है॥४७॥
त्वामहं सत्यमिच्छामि नानृतं पुरुषर्षभ।
प्रत्यक्षं तव सत्येन सुकृतेन च ते शपे॥४८॥
‘पुरुषशिरोमणे! मेरे मन में यदि कोई इच्छा है तो यही कि आप सत्यवादी बनें। आपका वचन मिथ्या न होने पावे। यह बात मैं आपके सामने सत्य और शुभ कर्मों की शपथ खाकर कहता हूँ॥४८॥
न च शक्यं मया तात स्थातुं क्षणमपि प्रभो।
स शोकं धारयस्वेमं नहि मेऽस्ति विपर्ययः॥ ४९॥
तात! प्रभो! अब मैं यहाँ एक क्षण भी नहीं ठहर सकता। अतः आप इस शोक को अपने भीतर ही दबा लें। मैं अपने निश्चय के विपरीत कुछ नहीं कर सकता॥
अर्थितो ह्यस्मि कैकेय्या वनं गच्छेति राघव।
मया चोक्तं व्रजामीति तत्सत्यमनुपालये॥५०॥
‘रघुनन्दन! कैकेयी ने मुझसे यह याचना की कि ‘राम! तुम वन को चले जाओ’ मैंने वचन दिया था कि ‘अवश्य जाऊँगा’ उस सत्य का मुझे पालन करना
मा चोत्कण्ठां कृथा देव वने रंस्यामहे वयम्।
प्रशान्तहरिणाकीर्णे नानाशकुनिनादिते॥५१॥
‘देव! बीच में हमें देखने या हमसे मिलने के लिये आप उत्कण्ठित न होंगे। शान्तस्वभाव वाले मृगों से भरे हुए और भाँति-भाँति के पक्षियों के कलरवों से गूंजते हुए उस वन में हमलोग बड़े आनन्द से रहेंगे॥५१॥
पिता हि दैवतं तात देवतानामपि स्मृतम्।
तस्माद दैवतमित्येव करिष्यामि पितुर्वचः॥५२॥
‘तात! पिता देवताओं के भी देवता माने गये हैं। अतः मैं देवता समझकर ही पिता (आप) की आज्ञा का पालन करूँगा॥५२॥
चतुर्दशसु वर्षेषु गतेषु नृपसत्तम।
पुनर्द्रक्ष्यसि मां प्राप्तं संतापोऽयं विमुच्यताम्॥ ५३॥
‘नृपश्रेष्ठ! अब यह संताप छोड़िये। चौदह वर्ष बीत जाने पर आप फिर मुझे आया हुआ देखेंगे॥ ५३॥
येन संस्तम्भनीयोऽयं सर्वो बाष्पकलो जनः।
स त्वं पुरुषशार्दूल किमर्थं विक्रियां गतः॥५४॥
‘पुरुषसिंह ! यहाँ जितने लोग आँसू बहा रहे हैं, इन सबको धैर्य बँधाना आपका कर्तव्य है; फिर आप स्वयं ही इतने विकल कैसे हो रहे हैं? ॥ ५४॥
पुरं च राष्ट्रं च मही च केवला मया विसृष्टा भरताय दीयताम्।
अहं निदेशं भवतोऽनुपालयन् वनं गमिष्यामि चिराय सेवितुम्॥५५॥
‘यह नगर, यह राज्य और यह सारी पृथ्वी मैंने छोड़ दी। आप यह सब कुछ भरत को दे दीजिये।अब मैं आपके आदेश का पालन करता हुआ । दीर्घकालतक वन में निवास करने के लिये यहाँ से यात्रा कर रहा हूँ॥
मया विसृष्टां भरतो महीमिमां सशैलखण्डां सपुरोपकाननाम्।
शिवासु सीमास्वनुशास्तु केवलं त्वया यदुक्तं नृपते तथास्तु तत्॥५६॥
‘मेरी छोड़ी हुई पर्वतखण्डों, नगरों और उपवनोंसहित इस सारी पृथ्वी का भरत कल्याणकारिणी मर्यादाओं में स्थित रहकर पालन करें। नरेश्वर! आपने जो वचन दिया है, वह पूर्ण हो॥५६॥
न मे तथा पार्थिव धीयते मनो महत्सु कामेषु न चात्मनः प्रिये।
यथा निदेशे तव शिष्टसम्मते व्यपैतु दुःखं तव मत्कृतेऽनघ॥५७॥
‘पृथ्वीनाथ! निष्पाप महाराज! सत्पुरुषोंद्वारा अनुमोदित आपकी आज्ञा का पालन करने में मेरा मन जैसा लगता है, वैसा बड़े-बड़े भोगों में तथा अपने किसी प्रिय पदार्थ में भी नहीं लगता; अतः मेरे लिये आपके मन में जो दुःख है, वह दूर हो जाना चाहिये। ५७॥
तदद्य नैवानघ राज्यमव्ययं न सर्वकामान् वसुधां न मैथिलीम्।
न चिन्तितं त्वामनृतेन योजयन् वृणीय सत्यं व्रतमस्तु ते तथा॥५८॥
‘निष्पाप नरेश! आज आपको मिथ्यावादी बनाकर मैं अक्षय राज्य, सब प्रकार के भोग, वसुधा का आधिपत्य, मिथिलेशकुमारी सीता तथा अन्य किसी अभिलषित पदार्थ को भी स्वीकार नहीं कर सकता। मेरी एक मात्र इच्छा यही है कि ‘आपकी प्रतिज्ञा सत्य हो’ ॥ ५८॥
फलानि मूलानि च भक्षयन् वने गिरीश्च पश्यन् सरितः सरांसि च।
वनं प्रविश्यैव विचित्रपादपं सुखी भविष्यामि तवास्तु निर्वृतिः॥५९॥
‘मैं विचित्र वृक्षों से युक्त वन में प्रवेश करके फलमूल का भोजन करता हुआ वहाँ के पर्वतों, नदियों और सरोवरों को देख-देखकर सुखी होऊँगा; इसलिये आप अपने मन को शान्त कीजिये’ ॥ ५९॥
एवं स राजा व्यसनाभिपन्नस्तापेन दुःखेन च पीड्यमानः।
आलिङ्ग्य पुत्रं सुविनष्टसंज्ञो भूमिं गतो नैव चिचेष्ट किंचित्॥६०॥
श्रीराम के ऐसा कहने पर पुत्र-बिछोह के संकट में पड़े हुए राजा दशरथ ने दुःख और संताप से पीड़ित हो उन्हें छाती से लगाया और फिर अचेत होकर वे पृथ्वी पर गिर पड़े। उस समय उनका शरीर जड की भाँति कुछ भी चेष्टा न कर सका। ६०॥
देव्यः समस्ता रुरुदुः समेतास्तां वर्जयित्वा नरदेवपत्नीम्।
रुदन् सुमन्त्रोऽपि जगाम मूच्र्छा हाहाकृतं तत्र बभूव सर्वम्॥६१॥
यह देख राजरानी कैकेयी को छोड़कर वहाँ एकत्र हुई अन्य सभी रानियाँ रो पड़ीं। सुमन्त्र भी रोते-रोते मूर्च्छित हो गये तथा वहाँ सब ओर हाहाकार मच गया॥ ६॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतुस्त्रिंशः सर्गः ॥३४॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में चौंतीसवाँ सर्ग पूराहुआ॥३४॥
सर्ग-35
ततो निधूय सहसा शिरो निःश्वस्य चासकृत्।
पाणिं पाणौ विनिष्पिष्य दन्तान् कटकटाय्य च॥
लोचने कोपसंरक्ते वर्णं पूर्वोचितं जहत्।
कोपाभिभूतः सहसा संतापमशुभं गतः॥२॥
मनः समीक्षमाणश्च सूतो दशरथस्य च।
कम्पयन्निव कैकेय्या हृदयं वाक्शरैः शितैः॥३॥
तदनन्तर होश में आने पर सारथि सुमन्त्र सहसा उठकर खड़े हो गये। उनके मन में बड़ा संताप हुआ, जो अमङ्गलकारी था। वे क्रोध के मारे काँपने लगे। उनके शरीर और मुख की पहली स्वाभाविक कान्ति बदल गयी। वे क्रोध से आँखें लाल करके दोनों हाथों से सिर पीटने लगे और बारम्बार लम्बी साँस खींचकर, हाथ-से-हाथ मलकर, दाँत कटकटाकर राजा दशरथ के मन की वास्तविक अवस्था देखते हुए
अपने वचनरूपी तीखे बाणों से कैकेयी के हृदय को कम्पित-सा करने लगे॥१-३॥
वाक्यवज्ररनुपमैर्निर्भिन्दन्निव चाशुभैः।
कैकेय्याः सर्वमर्माणि सुमन्त्रः प्रत्यभाषत॥४॥
अपने अशुभ एवं अनुपम वचनरूपी वज्र से कैकेयी के सारे मर्मस्थानों को विदीर्ण-से करते हुए सुमन्त्र ने उससे इस प्रकार कहना आरम्भ किया— ॥ ४॥
यस्यास्तव पतिस्त्यक्तो राजा दशरथः स्वयम्।
भर्ता सर्वस्य जगतः स्थावरस्य चरस्य च॥५॥
नह्यकार्यतमं किंचित्तव देवीह विद्यते।
पतिघ्नीं त्वामहं मन्ये कुलनीमपि चान्ततः॥६॥
‘देवि! जब तुमने सम्पूर्ण चराचर जगत् के स्वामी स्वयं अपने पति महाराज दशरथ का ही त्याग कर दिया, तब इस जगत् में कोई ऐसा कुकर्म नहीं है, जिसे तुम न कर सको; मैं तो समझता हूँ कि तुम पति की हत्या करने वाली तो हो ही; अन्ततः कुलघातिनी भी हो॥५-६॥
यन्महेन्द्रमिवाजय्यं दुष्प्रकम्प्यमिवाचलम्।
महोदधिमिवाक्षोभ्यं संतापयसि कर्मभिः॥७॥
‘ओह! जो देवराज इन्द्र के समान अजेय, पर्वत के समान अकम्पनीय और महासागर के समान क्षोभरहित हैं, उन महाराज दशरथ को भी तुम अपने कर्मों से संतप्त कर रही हो॥७॥
मावमंस्था दशरथं भर्तारं वरदं पतिम्।
भर्तुरिच्छा हि नारीणां पुत्रकोट्या विशिष्यते॥ ८॥
राजा दशरथ तुम्हारे पति, पालक और वरदाता हैं। तुम इनका अपमान न करो। नारियों के लिये पति की इच्छा का महत्त्व करोड़ों पुत्रों से भी अधिक है।॥ ८॥
यथावयो हि राज्यानि प्राप्नुवन्ति नृपक्षये।
इक्ष्वाकुकुलनाथेऽस्मिंस्तं लोपयितुमिच्छसि॥९॥
‘इस कुल में राजा का परलोकवास हो जाने पर उसके पुत्रों की अवस्था का विचार करके जो ज्येष्ठ पुत्र होते हैं, वे ही राज्य पाते हैं। राजकुल के इस परम्परागत आचार को तुम इन इक्ष्वाकुवंश के स्वामी महाराज दशरथ के जीते-जी ही मिटा देना चाहती हो। ९॥
राजा भवतु ते पुत्रो भरतः शास्तु मेदिनीम्।
वयं तत्र गमिष्यामो यत्र रामो गमिष्यति॥१०॥
‘तुम्हारे पुत्र भरत राजा हो जायँ और इस पृथ्वी का शासन करें; किंतु हमलोग तो वहीं चले जायँगे जहाँ श्रीराम जायँगे॥ १० ॥
न च ते विषये कश्चिद् ब्राह्मणो वस्तुमर्हति।
तादृशं त्वममर्यादमद्य कर्म करिष्यसि॥११॥
नूनं सर्वे गमिष्यामो मार्गं रामनिषेवितम्।
‘तुम्हारे राज्य में कोई भी ब्राह्मण निवास नहीं करेगा; यदि तुम आज वैसा मर्यादाहीन कर्म करोगी तो निश्चय ही हम सब लोग उसी मार्ग पर चले जायेंगे, जिसका श्रीराम ने सेवन किया है॥ ११ १/२ ।।
त्यक्ता या बान्धवैः सर्वैाह्मणैः साधुभिः सदा॥ १२॥
का प्रीती राज्यलाभेन तव देवि भविष्यति।
तादृशं त्वममर्यादं कर्म कर्तुं चिकीर्षसि॥१३॥
‘सम्पूर्ण बन्धु-बान्धव और सदाचारी ब्राह्मण भी तुम्हारा त्याग कर देंगे। देवि! फिर इस राज्य को पाकर तुम्हें क्या आनन्द मिलेगा। ओह! तुम ऐसा मर्यादाहीन कर्म करना चाहती हो॥ १२-१३ ॥
आश्चर्यमिव पश्यामि यस्यास्ते वृत्तमीदृशम्।
आचरन्त्या न विवृता सद्यो भवति मेदिनी॥ १४॥
‘मुझे तो यह देखकर आश्चर्य-सा हो रहा है कि तुम्हारे इतने बड़े अत्याचार करने पर भी पृथ्वी तुरंत फट क्यों नहीं जाती? ॥ १४ ॥
महाब्रह्मर्षिसृष्टा वा ज्वलन्तो भीमदर्शनाः।
धिग्वाग्दण्डा न हिंसन्ति रामप्रव्राजने स्थिताम्॥ १५॥
‘अथवा बड़े-बड़े ब्रह्मर्षियों के धिक्कारपूर्ण वाग्दण्ड (शाप) जो देखने में भयंकर और जलाकर भस्म कर देने वाले होते हैं, श्रीराम को घर से निकालने के लिये तैयार खड़ी हुई तुम-जैसी पाषाणहृदया का सर्वनाश क्यों नहीं कर डालते हैं ? ॥ १५ ॥
आनं छित्त्वा कुठारेण निम्बं परिचरेत् तु कः।
यश्चैनं पयसा सिञ्चेन्नैवास्य मधुरो भवेत्॥
‘भला आम को कुल्हाड़ी से काटकर उसकी जगह नीम का सेवन कौन करेगा? जो आम की जगह नीम को ही दूध से सींचता है, उसके लिये भी यह नीम मीठा फल देने वाला नहीं हो सकता (अतः वरदान के बहाने श्रीराम को वनवास देकर कैकेयी के चित्त को संतुष्ट करना राजा के लिये कभी सुखद परिणाम का जनक नहीं हो सकता) ॥१६॥
आभिजात्यं हि ते मन्ये यथा मातुस्तथैव च।
न हि निम्बात् स्रवेत् क्षौद्रं लोके निगदितं वचः॥ १७॥
‘कैकेयि! मैं समझता हूँ कि तुम्हारी माता का अपने कुल के अनुरूप जैसा स्वभाव था, वैसा ही तुम्हारा भी है। लोक में कही जाने वाली यह कहावत सत्य ही है कि नीम से मधु नहीं टपकता॥ १७ ॥
तव मातुरसद्ग्राहं विद्म पूर्वं यथा श्रुतम्।
पितुस्ते वरदः कश्चिद् ददौ वरमनुत्तमम्॥१८॥
‘तुम्हारी माता के दुराग्रह की बात भी हम जानते हैं। इसके विषय में पहले जैसा सुना गया है, वह बताया जाता है। एक समय किसी वर देने वाले साधुने तुम्हारे पिता को अत्यन्त उत्तम वर दिया था॥ १८ ॥
सर्वभूतरुतं तस्मात् संजज्ञे वसुधाधिपः।
तेन तिर्यग्गतानां च भूतानां विदितं वचः॥१९॥
‘उस वर के प्रभाव से केकयनरेश समस्त प्राणियों की बोली समझने लगे तिर्यक् योनि में पड़े हुएप्राणियों की बातें भी उनकी समझमें आ जाती थीं। १९॥
ततो जृम्भस्य शयने विरुताद् भूरिवर्चसः।
पित्स्ते विदितो भावः स तत्र बहुधाहसत्॥२०॥
‘एक दिन तुम्हारे महातेजस्वी पिता शय्यापर लेटे हुए थे। उसी समय जृम्भ नामक पक्षी की आवाज उनके कानों में पड़ी। उसकी बोली का अभिप्राय उनकी समझमें आ गया। अतः वे वहाँ कई बार हँसे॥२०॥
तत्र ते जननी क्रुद्धा मृत्युपाशमभीप्सती।
हासं ते नृपते सौम्य जिज्ञासामीति चाब्रवीत्॥ २१॥
‘उसी शय्या पर तुम्हारी माँ भी सोयी थी। वह यह समझकर कि राजा मेरी ही हँसी उड़ा रहे हैं, कुपित हो उठी और गले में मौत की फाँसी लगाने की इच्छा रखती हुई बोली—’सौम्य! नरेश्वर! तुम्हारे हँसने का क्या कारण है, यह मैं जानना चाहती हूँ’॥ २१॥
नृपश्चोवाच तां देवीं हासं शंसामि ते यदि।
ततो मे मरणं सद्यो भविष्यति न संशयः॥ २२॥
‘तब राजा ने उस देवी से कहा—’रानी! यदि मैं अपने हँसने का कारण बता दूं तो उसी क्षण मेरी मृत्यु हो जायगी, इसमें संशय नहीं है’ ॥ २२॥
माता ते पितरं देवि पुनः केकयमब्रवीत्।
शंस मे जीव वा मा वा न मां त्वं प्रहसिष्यसि॥ २३॥
‘देवि! यह सुनकर तुम्हारी रानी माता ने तुम्हारे पिता केकयराज से फिर कहा–’तुम जीओ या मरो, मुझे कारण बता दो। भविष्य में तुम फिर मेरी हँसी नहीं उड़ा सकोगे’ ॥ २३॥
प्रियया च तथोक्तः स केकयः पृथिवीपतिः।
तस्मै तं वरदायार्थं कथयामास तत्त्वतः॥२४॥
‘अपनी प्यारी रानी के ऐसा कहने पर केकयनरेश ने उस वर देने वाले साधु के पास जाकर सारा समाचार ठीक-ठीक कह सुनाया॥ २४ ॥
ततः स वरदः साधू राजानं प्रत्यभाषत।
म्रियतां ध्वंसतां वेयं मा शंसीस्त्वं महीपते॥२५॥
‘तब उस वर देने वाले साधु ने राजा को उत्तर दिया – ‘महाराज! रानी मरे या घर से निकल जाय; तुम कदापि यह बात उसे न बताना’ ॥ २५ ॥
स तच्छ्रुत्वा वचस्तस्य प्रसन्नमनसो नृपः।
मातरं ते निरस्याशु विजहार कुबेरवत्॥२६॥
‘प्रसन्न चित्तवाले उस साधु का यह वचन सुनकर केकय नरेश ने तुम्हारी माता को तुरंत घर से निकाल दिया और स्वयं कुबेर के समान विहार करने लगे। २६॥
तथा त्वमपि राजानं दुर्जनाचरिते पथि।
असद्ग्राहमिमं मोहात् कुरुषे पापदर्शिनी॥२७॥
‘तुम भी इसी प्रकार दुर्जनों के मार्ग पर स्थित हो पापपर ही दृष्टि रखकर मोहवश राजा से यह अनुचित आग्रह कर रही हो ॥२७॥
सत्यश्चात्र प्रवादोऽयं लौकिकः प्रतिभाति मा।
पितृन् समनुजायन्ते नरा मातरमङ्गनाः॥२८॥
‘आज मुझे यह लोकोक्ति सोलह आने सच मालूम होती है कि पुत्र पिता के समान होते हैं और कन्याएँ माता के समान॥ २८॥
नैवं भव गृहाणेदं यदाह वसुधाधिपः।
भर्तुरिच्छामुपास्वेह जनस्यास्य गतिर्भव॥२९॥
‘तुम ऐसी न बनो—इस लोकोक्ति को अपने जीवन में चरितार्थ न करो। राजा ने जो कुछ कहा है, उसे स्वीकार करो (श्रीराम का राज्याभिषेक होने दो)। अपने पति की इच्छा का अनुसरण करके इस जन-समुदाय को यहाँ शरण देने वाली बनो॥ २९॥
मा त्वं प्रोत्साहिता पापैर्देवराजसमप्रभम्।
भर्तारं लोकभर्तारमसद्धर्ममुपादध॥३०॥
‘पापपूर्ण विचार रखनेवाले लोगोंके बहकावेमें आकर तुम देवराज इन्द्रके तुल्य तेजस्वी अपने लोक-प्रतिपालक स्वामीको अनुचित कर्ममें न लगाओ॥ ३०॥
नहि मिथ्या प्रतिज्ञातं करिष्यति तवानघः।
श्रीमान् दशरथो राजा देवि राजीवलोचनः॥ ३१॥
‘देवि! कमलनयन श्रीमान् राजा दशरथ पाप से दूर रहते हैं। वे अपनी प्रतिज्ञा झूठी नहीं करेंगे॥ ३१॥
ज्येष्ठो वदान्यः कर्मण्यः स्वधर्मस्यापि रक्षिता।
रक्षिता जीवलोकस्य बली रामोऽभिषिच्यताम्॥ ३२॥
‘श्रीरामचन्द्रजी अपने भाइयों में ज्येष्ठ, उदार, कर्मठ, स्वधर्म के पालक, जीवजगत् के रक्षक और बलवान् हैं। इनका इस राज्य पर अभिषेक होने दो॥ ३२॥
परिवादो हि ते देवि महाँल्लोके चरिष्यति।
यदि रामो वनं याति विहाय पितरं नृपम्॥३३॥
‘देवि! यदि श्रीराम अपने पिता राजा दशरथ को छोड़कर वन को चले जायँगे तो संसार में तुम्हारी बड़ी निन्दा होगी॥३३॥
स्वराज्यं राघवः पातु भव त्वं विगतज्वरा।
नहि ते राघवादन्यः क्षमः पुरवरे वसन्॥३४॥
‘अतः श्रीरामचन्द्रजी ही अपने राज्य का पालन करें और तुम निश्चिन्त होकर बैठो। श्रीराम के सिवा दूसरा कोई राजा इस श्रेष्ठ नगर में रहकर तुम्हारे अनुकूल आचरण नहीं कर सकता॥३४॥
रामे हि यौवराज्यस्थे राजा दशरथो वनम्।
प्रवेक्ष्यति महेष्वासः पूर्ववृत्तमनुस्मरन्॥३५॥
‘श्रीराम के युवराज पद पर प्रतिष्ठित हो जाने के बाद महाधनुर्धर राजा दशरथ पूर्वजों के वृत्तान्त का स्मरण करके स्वयं वन में प्रवेश करेंगे’ ॥ ३५ ॥
इति सान्त्वैश्च तीक्ष्णैश्च कैकेयीं राजसंसदि।
भूयः संक्षोभयामास सुमन्त्रस्तु कृताञ्जलिः॥ ३६॥
नैव सा क्षुभ्यते देवी न च स्म परिदूयते।
न चास्या मुखवर्णस्य लक्ष्यते विक्रिया तदा॥ ३७॥
इस प्रकार सुमन्त्र ने हाथ जोड़कर कैकेयी को उस राजभवन में सान्त्वनापूर्ण तथा तीखे वचनों से भी बारम्बार विचलित करने की चेष्टा की; किंतु वह टस से-मस न हुई। देवी कैकेयी के मन में न तो क्षोभ हुआ और न दुःख ही। उस समय उसके चेहरे के रंग में भी कोई फर्क पड़ता नहीं दिखायी दिया॥ ३६-३७॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीयेआदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चत्रिंशः सर्गः॥३५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में पैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ। ३५॥
सर्ग-36
ततः समन्त्रमैक्ष्वाकः पीडितोऽत्र प्रतिज्ञया।
सबाष्पमतिनिःश्वस्य जगादेदं पुनर्वचः॥१॥
तब इक्ष्वाकु कुलनन्दन राजा दशरथ वहाँ अपनी प्रतिज्ञा से पीड़ित हो आँसू बहाते हुए लम्बी साँस खींचकर सुमन्त्र से फिर इस प्रकार बोले- ॥१॥
सूत रत्नसुसम्पूर्णा चतुर्विधबला चमूः।
राघवस्यानुयात्रार्थं क्षिप्रं प्रतिविधीयताम्॥२॥
‘सूत! तुम शीघ्र ही रत्नों से भरी-पूरी चतुरङ्गिणी सेनाको श्रीराम के पीछे-पीछे जाने की आज्ञा दो॥२॥
रूपाजीवाश्च वादिन्यो वणिजश्च महाधनाः।
शोभयन्तु कुमारस्य वाहिनीः सुप्रसारिताः॥३॥
‘रूपसे आजीविका चलाने और सरस वचन बोलने वाली स्त्रियाँ तथा महाधनी एवं विक्रययोग्य द्रव्यों का प्रसारण करने में कुशल वैश्य राजकुमार श्रीराम की सेनाओं को सुशोभित करें॥३॥
ये चैनमुपजीवन्ति रमते यैश्च वीर्यतः।
तेषां बहविधं दत्त्वा तानप्यत्र नियोजय॥४॥
‘जो श्रीराम के पास रहकर जीवन-निर्वाह करते हैं तथा जिन मल्लों से ये उनका पराक्रम देखकर प्रसन्न रहते हैं, उन सबको अनेक प्रकार का धन देकर उन्हें भी इनके साथ जाने की आज्ञा दे दो॥४॥
आयुधानि च मुख्यानि नागराः शकटानि च।
अनुगच्छन्तु काकुत्स्थं व्याधाश्चारण्यकोविदाः॥
‘मुख्य-मुख्य आयुध, नगर के निवासी, छकड़े तथा वन के भीतरी रहस्य को जानने वाले व्याध ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम के पीछे-पीछे जायें॥ ५॥
निघ्नन् मृगान् कुञ्जरांश्च पिबंश्चारण्यकं मधु।
नदीश्च विविधाः पश्यन् न राज्यं संस्मरिष्यति॥ ६॥
‘वे रास्ते में आये हुए मृगों एवं हाथियों को पीछे लौटाते, जंगली मधु का पान करते और नाना प्रकार की नदियों को देखते हुए अपने राज्य का स्मरण नहीं करेंगे।
धान्यकोशश्च यः कश्चिद् धनकोशश्च मामकः।
तौ राममनुगच्छेतां वसन्तं निर्जने वने॥७॥
‘श्रीराम निर्जन वन में निवास करने के लिये जा रहे हैं, अतः मेरा खजाना और अन्नभण्डार—ये दोनोंवस्तुएँ इनके साथ जायें ।। ७॥
यजन् पुण्येषु देशेषु विसृजंश्चाप्तदक्षिणाः।
ऋषिभिश्चापि संगम्य प्रवत्स्यति सुखं वने॥८॥
‘ये वन के पावन प्रदेशों में यज्ञ करेंगे, उनमें आचार्य आदि को पर्याप्त दक्षिणा देंगे तथा ऋषियों से मिलकर वन में सुखपूर्वक रहेंगे॥८॥
भरतश्च महाबाहुरयोध्यां पालयिष्यति।
सर्वकामैः पुनः श्रीमान् रामः संसाध्यतामिति॥
‘महाबाहु भरत अयोध्या का पालन करेंगे। श्रीमान् राम को सम्पूर्ण मनोवाञ्छित भोगों से सम्पन्न करके यहाँ से भेजा जाय’ ॥९॥
एवं ब्रुवति काकुत्स्थे कैकेय्या भयमागतम्।
मुखं चाप्यगमच्छोषं स्वरश्चापि व्यरुध्यत॥
जब महाराज दशरथ ऐसी बातें कहने लगे, तब कैकेयी को बड़ा भय हुआ। उसका मुँह सूख गया और उसका स्वर भी रुंध गया॥१०॥
सा विषण्णा च संत्रस्ता मुखेन परिशुष्यता।
राजानमेवाभिमुखी कैकेयी वाक्यमब्रवीत्॥ ११॥
वह केकयराजकुमारी विषादग्रस्त एवं त्रस्त होकर सूखे मुँह से राजा की ओर ही मुँह करके बोली- ॥ ११॥
राज्यं गतधनं साधो पीतमण्डां सुरामिव।
निरास्वाद्यतमं शन्यं भरतो नाभिपत्स्यते॥१२॥
‘श्रेष्ठ महाराज! जिसका सारभाग पहले से ही पी लिया गया हो, उस आस्वादरहित सुरा को जैसे उसका सेवन करने वाले लोग नहीं ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार इस धनहीन और सूने राज्य को, जो कदापि सेवन करने योग्य नहीं रह जायगा, भरत कदापि नहीं ग्रहण करेंगे’ ॥ १२॥
कैकेय्यां मुक्तलज्जायां वदन्त्यामतिदारुणम्।
राजा दशरथो वाक्यमुवाचायतलोचनाम्॥१३॥
कैकेयी लाज छोड़कर जब वह अत्यन्त दारुण वचन बोलने लगी, तब राजा दशरथने उस विशाललोचना कैकेयीसे इस प्रकार कहा- ॥१३॥
वहन्तं किं तुदसि मां नियुज्य धुरि माहिते।
अनार्ये कृत्यमारब्धं किं न पूर्वमुपारुधः॥१४॥
‘अनार्ये! अहितकारिणि! तु राम को वनवास देने के दुर्वह भार में लगाकर जब मैं उस भार को ढो रहा हूँ, उस अवस्था में क्यों अपने वचनों का चाबुक मारकर मुझे पीड़ा दे रही है ? इस समय जो कार्य तूने आरम्भ किया है अर्थात् श्रीराम के साथ सेना और सामग्री भेजने में जो प्रतिबन्ध लगाया है, इसके लिये तूने पहले ही क्यों नहीं प्रार्थना की थी? (अर्थात् पहले ही यह क्यों नहीं कह दिया था कि श्रीराम को अकेले वन में जाना पड़ेगा, उनके साथ सेना आदि सामग्री नहीं जा सकती)’ ॥१४॥
तस्यैतत् क्रोधसंयुक्तमुक्तं श्रुत्वा वराङ्गना।
कैकेयी द्विगुणं क्रुद्धा राजानमिदमब्रवीत्॥ १५॥
राजा का यह क्रोधयुक्त वचन सुनकर सुन्दरी कैकेयी उनकी अपेक्षा दूना क्रोध करके उनसे इस प्रकार बोली- ॥ १५ ॥
तवैव वंशे सगरो ज्येष्ठपुत्रमुपारुधत्।
असमञ्ज इति ख्यातं तथायं गन्तुमर्हति ॥१६॥
‘महाराज! आपके ही वंशमें पहले राजा सगर हो गये हैं, जिन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र असमञ्ज को निकालकर उसके लिये राज्य का दरवाजा सदा के लिये बंद कर दिया था। इसी तरह इनको भी यहाँ से निकल जाना चाहिये’ ॥ १६॥
एवमुक्तो धिगित्येव राजा दशरथोऽब्रवीत्।
वीडितश्च जनः सर्वः सा च तन्नावबुध्यत॥ १७॥
उसके ऐसा कहने पर राजा दशरथ ने कहा —‘धिक्कार है।’ वहाँ जितने लोग बैठे थे सभी लाज से गड़ गये; किंतु कैकेयी अपने कथन के अनौचित्य को अथवा राजा द्वारा दिये गये धिक्कार के औचित्य को नहीं समझ सकी॥ १७॥
तत्र वृद्धो महामात्रः सिद्धार्थो नाम नामतः।
शुचिर्बहुमतो राज्ञः कैकेयीमिदमब्रवीत्॥१८॥
उस समय वहाँ राजा के प्रधान और वयोवृद्ध मन्त्री सिद्धार्थ बैठे थे। वे बड़े ही शुद्ध स्वभाव वाले और राजा के विशेष आदरणीय थे। उन्होंने कैकेयी से इस प्रकार कहा— ॥ १८॥
असमञ्जो गृहीत्वा तु क्रीडतः पथि दारकान्।
सरय्वां प्रक्षिपन्नप्सु रमते तेन दुर्मतिः॥१९॥
‘देवि! असमञ्ज बड़ी दुष्ट बुद्धि का राजकुमार था। वह मार्गपर खेलते हुए बालकों को पकड़कर सरयू के जल में फेंक देता था और ऐसे ही कार्यों से अपना मनोरञ्जन करता था॥ १९॥
तं दृष्ट्वा नागराः सर्वे क्रुद्धा राजानमब्रुवन्।
असमजं वृणीष्वैकमस्मान् वा राष्टवर्धन॥२०॥
‘उसकी यह करतूत देखकर सभी नगरनिवासी कुपित हो राजा के पास जाकर बोले—’राष्ट्र की वृद्धि करने वाले महाराज! या तो आप अकेले असमञ्ज को लेकर रहिये या इन्हें निकालकर हमें इस नगर में रहने दीजिये’ ॥२०॥
तानुवाच ततो राजा किंनिमित्तमिदं भयम्।
ताश्चापि राज्ञा सम्पृष्टा वाक्यं प्रकृतयोऽब्रुवन्॥ २१॥
‘तब राजा ने उनसे पूछा—’तुम्हें असमञ्ज से किस कारण भय हुआ है?’ राजा के पूछने पर उन प्रजाजनों ने यह बात कही-॥२१॥
क्रीडतस्त्वेष नः पुत्रान् बालानुभ्रान्तचेतसः।
सरय्वां प्रक्षिपन्मौादतुलां प्रीतिमश्नुते॥२२॥
‘महाराज! यह हमारे खेलते हुए छोटे-छोटे बच्चोंको पकड़ लेते हैं और जब वे बहुत घबरा जाते हैं, तब उन्हें सरयूमें फेंक देते हैं। मूर्खतावश ऐसा करके इन्हें अनुपम आनन्द प्राप्त होता है’ ॥ २२॥
स तासां वचनं श्रुत्वा प्रकृतीनां नराधिपः।
तं तत्याजाहितं पुत्रं तासां प्रियचिकीर्षया॥२३॥
‘उन प्रजाजनों की वह बात सुनकर राजा सगर ने उनका प्रिय करने की इच्छा से अपने उस अहितकारक दुष्ट पुत्र को त्याग दिया॥ २३॥
तं यानं शीघ्रमारोप्य सभार्यं सपरिच्छदम्।
यावज्जीवं विवास्योऽयमिति तानन्वशात् पिता॥ २४॥
‘पिता ने अपने उस पुत्र को पत्नी और आवश्यक सामग्री सहित शीघ्र रथ पर बिठाकर अपने सेवकों को आज्ञा दी—’इसे जीवन भर के लिये राज्य से बाहर निकाल दो’ ॥ २४॥
स फालपिटकं गृह्य गिरिदुर्गाण्यलोकयत्।
दिशः सर्वास्त्वनुचरन् स यथा पापकर्मकृत्॥ २५॥
इत्येनमत्यजद् राजा सगरो वै सुधार्मिकः।
रामः किमकरोत् पापं येनैवमुपरुध्यते॥२६॥
‘असमञ्ज ने फाल और पिटारी लेकर पर्वतों की दुर्गम गुफाओं को ही अपने निवास के योग्य देखा और कन्द आदि के लिये वह सम्पूर्ण दिशाओं में विचरने लगा। वह जैसा कि बताया गया है, पापाचारी था, इसलिये परम धार्मिक राजा सगर ने उसको त्याग दिया था। श्रीराम ने ऐसा कौन-सा अपराध किया है, जिसके कारण इन्हें इस तरह राज्य पाने से रोका जा रहा है? ॥
नहि कंचन पश्यामो राघवस्यागुणं वयम्।
दुर्लभो ह्यस्य निरयः शशाङ्कस्येव कल्मषम्॥ २७॥
‘हमलोग तो श्रीरामचन्द्रजी में कोई अवगुण नहीं देखते हैं; जैसे (शुक्लपक्ष की द्वितीया के) चन्द्रमा में मलिनता का दर्शन दुर्लभ है, उसी प्रकार इनमें कोई पाप या अपराध ढूँढ़ने से भी नहीं मिल सकता॥२७॥
अथवा देवि त्वं कंचिद् दोषं पश्यसि राघवे।
तमद्य ब्रूहि तत्त्वेन तदा रामो विवास्यते॥२८॥
‘अथवा देवि! यदि तुम्हें श्रीरामचन्द्रजी में कोई दोष दिखायी देता हो तो आज उसे ठीक-ठीक बताओ। उस दशा में श्रीराम को निकाल दिया जा सकता है। २८॥
अदुष्टस्य हि संत्यागः सत्पथे निरतस्य च।
निर्दहेदपि शक्रस्य द्युतिं धर्मविरोधवान्॥२९॥
‘जिसमें कोई दुष्टता नहीं है, जो सदा सन्मार्ग में ही स्थित है, ऐसे पुरुष का त्याग धर्म से विरुद्ध माना जाता है। ऐसा धर्म विरोधी कर्म तो इन्द्र के भी तेज को दग्ध कर देगा॥ २९॥
तदलं देवि रामस्य श्रिया विहतया त्वया।
लोकतोऽपि हि ते रक्ष्यः परिवादः शुभानने॥ ३०॥
अतः देवि! श्रीरामचन्द्रजी के राज्याभिषेक में विघ्न डालने से तुम्हें कोई लाभ नहीं होगा। शुभानने! तुम्हें लोकनिन्दा से भी बचने की चेष्टा करनी चाहिये। ३०॥
श्रुत्वा तु सिद्धार्थवचो राजा श्रान्ततरस्वरः।
शोकोपहतया वाचा कैकेयीमिदमब्रवीत्॥३१॥
सिद्धार्थ की बातें सुनकर राजा दशरथ अत्यन्त थके हुए स्वर से शोकाकुल वाणी में कैकेयी से इस प्रकार बोले- ॥३१॥
एतद्रचो नेच्छसि पापरूपे हितं न जानासि ममात्मनोऽथवा।
आस्थाय मार्ग कृपणं कुचेष्टा चेष्टा हि ते साधुपथादपेता॥३२॥
‘पापिनि! क्या तुझे यह बात नहीं रुची? तुझे मेरे या अपने हित का भी बिलकुल ज्ञान नहीं है? तू दुःखद मार्ग का आश्रय लेकर ऐसी कुचेष्टा कर रही है। तेरी यह सारी चेष्टा साधु पुरुषों के मार्ग के विपरीत है॥३२॥
अनुव्रजिष्याम्यहमद्य रामं राज्यं परित्यज्य सुखं धनं च।
सर्वे च राज्ञा भरतेन च त्वं यथासुखं भुक्ष्व चिराय राज्यम्॥३३॥
‘अब मैं भी यह राज्य, धन और सुख छोड़कर श्रीराम के पीछे चला जाऊँगा। ये सब लोग भी उन्हीं के साथ जायँगे। तू अकेली राजा भरत के साथ चिरकाल तक सुखपूर्वक राज्य भोगती रह’ ॥ ३३॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे षट्त्रिंशः सर्गः॥ ३६॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में छत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३६॥
सर्ग-37
महामात्रवचः श्रुत्वा रामो दशरथं तदा।
अभ्यभाषत वाक्यं तु विनयज्ञो विनीतवत्॥१॥
प्रधान मन्त्री की पूर्वोक्त बात सुनकर विनय के ज्ञाता श्रीराम ने उस समय राजा दशरथ से विनीत होकर कहा- ॥१॥
त्यक्तभोगस्य मे राजन् वने वन्येन जीवतः।
किं कार्यमनुयात्रेण त्यक्तसङ्गस्य सर्वतः॥२॥
‘राजन्! मैं भोगों का परित्याग कर चुका हूँ। मुझे जंगल के फल-मूलों से जीवन-निर्वाह करना है। जब मैं सब ओर से आसक्ति छोड़ चुका हूँ, तब मुझे सेना से क्या प्रयोजन है? ॥२॥
यो हि दत्त्वा द्विपश्रेष्ठं कक्ष्यायां कुरुते मनः।
रज्जुस्नेहेन किं तस्य त्यजतः कुञ्जरोत्तमम्॥३॥
‘जो श्रेष्ठ गजराज का दान करके उसके रस्से में मन लगाता है—लोभवश रस्से को रख लेना चाहता है, वह अच्छा नहीं करता; क्योंकि उत्तम हाथी का त्याग करने वाले पुरुष को उसके रस्से में आसक्ति रखने की क्या आवश्यकता है?॥३॥
तथा मम सतां श्रेष्ठ किं ध्वजिन्या जगत्पते।
सर्वाण्येवानुजानामि चीराण्येवानयन्तु मे॥४॥
‘सत्पुरुषों में श्रेष्ठ महाराज! इसी तरह मुझे सेना लेकर क्या करना है? मैं ये सारी वस्तुएँ भरत को अर्पित करने की अनुमति देता हूँ। मेरे लिये तो (माता कैकेयी की दासियाँ) चीर (चिथड़े या वल्कलवस्त्र) ला दें॥४॥
खनित्रपिटके चोभे समानयत गच्छत।
चतुर्दश वने वासं वर्षाणि वसतो मम॥५॥
‘दासियो! जाओ, खन्ती और पेटारी अथवा कुदारी और खाँची ये दोनों वस्तुएँ लाओ। चौदह वर्षों तक वन में रहने के लिये ये चीजें उपयोगी हो सकती हैं।
अथ चीराणि कैकेयी स्वयमाहृत्य राघवम्।
उवाच परिधत्स्वेति जनौघे निरपत्रपा॥६॥
कैकेयी लाज-संकोच छोड़ चुकी थी। वह स्वयं ही जाकर बहुत-सी चीर ले आयी और जनसमुदाय में श्रीरामचन्द्रजी से बोली, ‘लो, पहन लो’ ॥ ६॥
स चीरे पुरुषव्याघ्रः कैकेय्याः प्रतिगृह्य ते।
सूक्ष्मवस्त्रमवक्षिप्य मुनिवस्त्राण्यवस्त ह॥७॥
पुरुषसिंह श्रीराम ने कैकेयी के हाथ से दो चीर ले लिये और अपने महीन वस्त्र उतारकर मुनियों के-से वस्त्र धारण कर लिये॥७॥
लक्ष्मणश्चापि तत्रैव विहाय वसने शुभे।
तापसाच्छादने चैव जग्राह पितुरग्रतः॥८॥
इसी प्रकार लक्ष्मण ने भी अपने पिता के सामने ही दोनों सुन्दर वस्त्र उतारकर तपस्वियों के-से वल्कलवस्त्र पहन लिये॥ ८॥
अथात्मपरिधानार्थं सीता कौशेयवासिनी।
सम्प्रेक्ष्य चीरं संत्रस्ता पृषती वागुरामिव॥९॥
सा व्यपत्रपमाणेव प्रगृह्य च सुदुर्मनाः।
कैकेय्याः कुशचीरे ते जानकी शुभलक्षणा॥ १०॥
अश्रुसम्पूर्णनेत्रा च धर्मज्ञा धर्मदर्शिनी।
गन्धर्वराजप्रतिमं भर्तारमिदमब्रवीत्॥११॥
कथं नु चीरं बघ्नन्ति मुनयो वनवासिनः।
इति ह्यकुशला सीता सा मुमोह मुहुर्मुहुः॥१२॥
तदनन्तर रेशमी-वस्त्र पहनने और धर्म पर ही दृष्टि रखने वाली धर्मज्ञा शुभलक्षणा जनकनन्दिनी सीता अपने पहनने के लिये भी चीरवस्त्र को प्रस्तुत देख उसी प्रकार डर गयीं, जैसे मृगी बिछे हुए जाल को देखकर भयभीत हो जाती है। वे कैकेयी के हाथ से दो वल्कल-वस्त्र लेकर लज्जित-सी हो गयीं। उनके मन में बड़ा दुःख हुआ और नेत्रों में आँसू भर आये। उस समय उन्होंने गन्धर्वराज के समान तेजस्वी पति से इस प्रकार पूछा—’नाथ! वनवासी मुनि लोग चीर कैसे बाँधते हैं?’ यह कहकर उसे धारण करने में कुशल न होने के कारण सीता बारम्बार मोह में पड़ जाती थीं—भूल कर बैठती थीं।
कृत्वा कण्ठे स्म सा चीरमेकमादाय पाणिना।
तस्थौ ह्यकुशला तत्र व्रीडिता जनकात्मजा॥ १३॥
चीर-धारण में कुशल न होने से जनकनन्दिनी सीता लज्जित हो एक वल्कल गले में डाल दूसरा हाथ में लेकर चुपचाप खड़ी रहीं॥ १३॥
तस्यास्तत् क्षिप्रमागत्य रामो धर्मभृतां वरः।
चीरं बबन्ध सीतायाः कौशेयस्योपरि स्वयम्॥ १४॥
तब धर्मात्माओं में श्रेष्ठ श्रीराम जल्दी से उनके पास आकर स्वयं अपने हाथों से उनके रेशमी वस्त्र के ऊपर वल्कल-वस्त्र बाँधने लगे॥१४॥
रामं प्रेक्ष्य तु सीताया बध्नन्तं चीरमुत्तमम्।
अन्तःपुरचरा नार्यो मुमुचुर्वारि नेत्रजम्॥१५॥
सीता को उत्तम चीरवस्त्र पहनाते हुए श्रीराम की ओर देखकर रनवास की स्त्रियाँ अपने नेत्रों से आँसू बहाने लगीं॥ १५ ॥
ऊचुश्च परमायत्ता रामं ज्वलिततेजसम्।
वत्स नैवं नियुक्तेयं वनवासे मनस्विनी॥१६॥
वे सब अत्यन्त खिन्न होकर उदीप्त तेजवाले श्रीराम से बोलीं-‘बेटा! मनस्विनी सीता को इस प्रकार वनवास की आज्ञा नहीं दी गयी है।१६ ॥
पितुर्वाक्यानुरोधेन गतस्य विजनं वनम्।
तावद् दर्शनमस्या नः सफलं भवतु प्रभो॥१७॥
‘प्रभो! तुम पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये जबतक निर्जन वन में जाकर रहोगे, तबतक इसी को देखकर हमारा जीवन सफल होने दो॥ १७॥
लक्ष्मणेन सहायेन वनं गच्छस्व पुत्रक।
नेयमर्हति कल्याणि वस्तुं तापसवद् वने॥१८॥
‘बेटा! तुम लक्ष्मण को अपना साथी बनाकर उनके साथ वन को जाओ, परंतु यह कल्याणी सीता तपस्वी मुनि की भाँति वन में निवास करने के योग्य नहीं है। १८॥
कुरु नो याचनां पुत्र सीता तिष्ठतु भामिनी।
धर्मनित्यः स्वयं स्थातुं न हीदानीं त्वमिच्छसि॥ १९॥
‘पुत्र! तुम हमारी यह याचना सफल करो। भामिनी सीता यहीं रहे। तुम तो नित्य धर्मपरायण हो अतः स्वयं इस समय यहाँ नहीं रहना चाहते हो (परंतु सीता को तो रहने दो)’ ॥ १९॥
तासामेवंविधा वाचः शृण्वन् दशरथात्मजः।
बबन्धैव तथा चीरं सीतया तुल्यशीलया॥२०॥
चीरे गृहीते तु तया सबाष्पो नृपतेर्गुरुः।
निवार्य सीतां कैकेयीं वसिष्ठो वाक्यमब्रवीत्॥ २१॥
माताओं की ऐसी बातें सुनते हुए भी दशरथ-नन्दन श्रीराम ने सीता को वल्कल-वस्त्र पहना ही दिया। पति के समान शील स्वभाव वाली सीता के वल्कल धारण कर लेने पर राजा के गुरु वसिष्ठजी के नेत्रों में आँसू भर आया। उन्होंने सीता को रोककर कैकेयी से कहा- ॥२०-२१॥
अतिप्रवृत्ते दुर्मेधे कैकेयि कुलपांसनि।
वञ्चयित्वा तु राजानं न प्रमाणेऽवतिष्ठसि ॥२२॥
‘मर्यादा का उल्लङ्घन करके अधर्म की ओर पैर बढ़ाने वाली दुर्बुद्धि कैकेयी! तू केकयराज के कुल की जीती-जागती कलङ्क है। अरी! राजा को धोखा देकर अब तू सीमा के भीतर नहीं रहना चाहती है ? ॥ २२ ॥
न गन्तव्यं वनं देव्या सीतया शीलवर्जिते।
अनुष्ठास्यति रामस्य सीता प्रकृतमासनम्॥२३॥
‘शील का परित्याग करने वाली दुष्टे! देवी सीता वन में नहीं जायँगी। राम के लिये प्रस्तुत हुए राजसिंहासन पर ये ही बैठेंगी॥ २३॥
आत्मा हि दाराः सर्वेषां दारसंग्रहवर्तिनाम्।
आत्मेयमिति रामस्य पालयिष्यति मेदिनीम्॥ २४॥
‘सम्पूर्ण गृहस्थों की पत्नियाँ उनका आधा अङ्ग हैं। इस तरह सीता देवी भी श्रीराम की आत्मा हैं; अतः उनकी जगह ये ही इस राज्य का पालन करेंगी॥ २४॥
अथ यास्यति वैदेही वनं रामेण संगता।
वयमत्रानुयास्यामः पुरं चेदं गमिष्यति॥ २५॥
अन्तपालाश्च यास्यन्ति सदारो यत्र राघवः।
सहोपजीव्यं राष्ट्रं च पुरं च सपरिच्छदम्॥२६॥
‘यदि विदेहनन्दिनी सीता श्रीराम के साथ वन में जायँगी तो हमलोग भी इनके साथ चले जायँगे। यह सारा नगर भी चला जायगा और अन्तःपुर के रक्षकभी चले जायँगे। अपनी पत्नी के साथ श्रीरामचन्द्रजी जहाँ निवास करेंगे, वहीं इस राज्य और नगर के लोग भी धन-दौलत और आवश्यक सामान लेकर चले जायँगे॥
भरतश्च सशत्रुघ्नश्चीरवासा वनेचरः।
वने वसन्तं काकुत्स्थमनुवत्स्यति पूर्वजम्॥२७॥
‘भरत और शत्रुघ्न भी चीरवस्त्र धारण करके वन में रहेंगे और वहाँ निवास करने वाले अपने बड़े भाई श्रीराम की सेवा करेंगे॥२७॥
ततः शून्यां गतजनां वसुधां पादपैः सह।
त्वमेका शाधि दुर्वृत्ता प्रजानामहिते स्थिता॥ २८॥
‘फिर तू वृक्षों के साथ अकेली रहकर इस निर्जन एवं सूनी पृथ्वी का राज्य करना। तू बड़ी दुराचारिणी है और प्रजा का अहित करने में लगी हुई है॥ २८॥
न हि तद् भविता राष्ट्रं यत्र रामो न भूपतिः।
तद् वनं भविता राष्ट्रं यत्र रामो निवत्स्यति॥ २९॥
‘याद रख, श्रीराम जहाँ के राजा न होंगे, वह राज्य राज्य नहीं रह जायगा–जंगल हो जायगा तथा श्रीराम जहाँ निवास करेंगे, वह वन एक स्वतन्त्र राष्ट्र बन जायगा॥ २९॥
न ह्यदत्तां महीं पित्रा भरतः शास्तुमिच्छति।
त्वयि वा पत्रवद वस्तं यदि जातो महीपतेः॥ ३०॥
‘यदि भरत राजा दशरथ से पैदा हुए हैं तो पिता के प्रसन्नतापूर्वक दिये बिना इस राज्य को कदापि लेना नहीं चाहेंगे तथा तेरे साथ पुत्रवत् बर्ताव करने के लिये भी यहाँ बैठे रहने की इच्छा नहीं करेंगे॥ ३० ॥
यद्यपि त्वं क्षितितलाद् गगनं चोत्पतिष्यसि।
पितृवंशचरित्रज्ञः सोऽन्यथा न करिष्यति॥३१॥
‘तू पृथ्वी छोड़कर आसमान में उड़ जाय तो भी अपने पितृकुल के आचार-व्यवहार को जानने वाले भरत उसके विरुद्ध कुछ नहीं करेंगे॥ ३१॥
तत् त्वया पुत्रगर्धिन्या पुत्रस्य कृतमप्रियम्।
लोके नहि स विद्येत यो न राममनुव्रतः॥ ३२॥
‘तूने पुत्र का प्रिय करने की इच्छा से वास्तव में उसका अप्रिय ही किया है; क्योंकि संसार में कोई ऐसा पुरुष नहीं है जो श्रीराम का भक्त न हो॥३२॥
द्रक्ष्यस्यद्यैव कैकेयि पशुव्यालमृगद्विजान्।
गच्छतः सह रामेण पादपांश्च तदुन्मुखान्॥ ३३॥
‘कैकेयि! तू आज ही देखेगी कि वन को जाते हुए श्रीराम के साथ पशु, सर्प, मृग और पक्षी भी चले जा रहे हैं औरों की तो बात ही क्या, वृक्ष भी उनके साथ जाने को उत्सुक हैं॥ ३३॥
अथोत्तमान्याभरणानि देवि देहि स्नुषायै व्यपनीय चीरम्।
न चीरमस्याः प्रविधीयतेति न्यवारयत् तद् वसनं वसिष्ठः॥ ३४॥
‘देवि! सीता तेरी पुत्रवधू हैं। इनके शरीर से वल्कल-वस्त्र हटाकर तू इन्हें पहनने के लिये उत्तमोत्तम वस्त्र और आभूषण दे। इनके लिये वल्कल-वस्त्र देना कदापि उचित नहीं है।’ ऐसा कहकर वसिष्ठ ने उसे जानकी को वल्कल-वस्त्र पहनाने से मना किया॥३४॥
एकस्य रामस्य वने निवासस्त्वया वृतः केकयराजपुत्रि।
विभूषितेयं प्रतिकर्मनित्या वसत्वरण्ये सह राघवेण॥३५॥
वे फिर बोले—’केकयराजकुमारी! तूने अकेले श्रीराम के लिये ही वनवास का वर माँगा है (सीता के लिये नहीं); अतः ये राजकुमारी वस्त्राभूषणों से विभूषित होकर सदा शृङ्गार धारण करके वन में श्रीरामचन्द्रजी के साथ निवास करें। ३५ ॥
यानैश्च मुख्यैः परिचारकैश्च सुसंवृता गच्छतु राजपुत्री।
वस्त्रैश्च सर्वैः सहितैर्विधान र्नेयं वृता ते वरसम्प्रदाने॥ ३६॥
‘राजकुमारी सीता मुख्य-मुख्य सेवकों तथा सवारियों के साथ सब प्रकार के वस्त्रों और आवश्यक उपकरणों से सम्पन्न होकर वन की यात्रा करें। तूने वर माँगते समय पहले सीता के वनवास की कोई चर्चा नहीं की थी (अतः इन्हें वल्कल-वस्त्र नहीं पहनाया जा सकता)’॥
तस्मिंस्तथा जल्पति विप्रमुख्ये गुरौ नृपस्याप्रतिमप्रभावे।
नैव स्म सीता विनिवृत्तभावा प्रियस्य भर्तुः प्रतिकारकामा॥३७॥
ब्राह्मणशिरोमणि अप्रतिम प्रभावशाली राजगुरु महर्षि वसिष्ठ के ऐसा कहने पर भी सीता अपने प्रियतम पति के समान ही वेशभूषा धारण करने की इच्छा रखकर उस चीर-धारण से विरत नहीं हुईं॥ ३७॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्तत्रिंशः सर्गः॥ ३७॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में सैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।३७॥
सर्ग-38
तस्यां चीरं वसानायां नाथवत्यामनाथवत्।
प्रचुक्रोश जनः सर्वो धिक् त्वां दशरथं त्विति॥
सीताजी सनाथ होकर भी जब अनाथ की भाँति चीर-वस्त्र धारण करने लगी, तब सब लोग चिल्लाचिल्लाकर कहने लगे—’राजा दशरथ! तुम्हें धिक्कार है!’ ॥१॥
तेन तत्र प्रणादेन दुःखितः स महीपतिः।
चिच्छेद जीविते श्रद्धां धर्मे यशसि चात्मनः॥
स निःश्वस्योष्णमैक्ष्वाकस्तां भार्यामिदमब्रवीत्।
कैकेयि कुशचीरेण न सीता गन्तुमर्हति॥३॥
वहाँ होने वाले उस कोलाहल से दुःखी हो इक्ष्वाकुवंशी महाराज दशरथ ने अपने जीवन, धर्म और यश की उत्कट इच्छा त्याग दी। फिर वे गरम साँस खींचकर अपनी भार्या कैकेयी से इस प्रकार बोले—’कैकेयि! सीता कुश-चीर (वल्कल-वस्त्र) पहनकर वन में जाने के योग्य नहीं है॥ २-३॥
सुकुमारी च बाला च सततं च सुखोचिता।
नेयं वनस्य योग्येति सत्यमाह गुरुर्मम॥४॥
‘यह सुकुमारी है, बालिका है और सदा सुखों में ही पली है। मेरे गुरुजी ठीक कहते हैं कि यह सीता वन में जाने योग्य नहीं है॥४॥
इयं हि कस्यापि करोति किंचित् तपस्विनी राजवरस्य पुत्री।
या चीरमासाद्य जनस्य मध्ये स्थिता विसंज्ञा श्रमणीव काचित् ॥५॥
‘राजाओं में श्रेष्ठ जनक की यह तपस्विनी पुत्री क्या किसी का भी कुछ बिगाड़ती है? जो इस प्रकार जनसमुदाय के बीच किसी किंकर्तव्यविमूढ़ भिक्षुकी के समान चीर धारण करके खड़ी है ? ॥ ५ ॥
चीराण्यपास्याज्जनकस्य कन्या नेयं प्रतिज्ञा मम दत्तपूर्वा ।
यथासुखं गच्छतु राजपुत्री वनं समग्रा सह सर्वरत्नैः॥६॥
‘जनकनन्दिनी अपने चीर-वस्त्र उतार डाले। यह इस रूप में वन जाय’ ऐसी कोई प्रतिज्ञा मैंने पहले नहीं की है और न किसी को इस तरह का वचन ही दिया है। अतः राजकुमारी सीता सम्पूर्ण वस्त्रालंकारों से सम्पन्न हो सब प्रकार के रत्नों के साथ जिस तरह भी वह सुखी रह सके, उसी तरह वन को जा सकती है॥६॥
अजीवनाण मया नृशंसा कृता प्रतिज्ञा नियमेन तावत्।
त्वया हि बाल्यात् प्रतिपन्नमेतत् तन्मा दहेद् वेणुमिवात्मपुष्पम्॥७॥
‘मैं जीवित रहने योग्य नहीं हूँ। मैंने तेरे वचनों में बँधकर एक तो यों ही नियम (शपथ) पूर्वक बड़ी क्रूर प्रतिज्ञा कर डाली है, दूसरे तूने अपनी नादानी के कारण सीता को इस तरह चीर पहनाना प्रारम्भ कर दिया। जिस प्रकार बाँस का फूल उसी को सुखा डालता है, उसी प्रकार मेरी की हुई प्रतिज्ञा मुझी को भस्म किये डालती है॥ ७॥
रामेण यदि ते पापे किंचित्कृतमशोभनम्।
अपकारः क इह ते वैदेह्या दर्शितोऽधमे॥८॥
‘नीच पापिनि! यदि श्रीराम ने तेरा कोई अपराध किया है तो (उन्हें तो तू वनवास दे ही चुकी) विदेहनन्दिनी सीता ने ऐसा दण्ड पाने योग्य तेरा कौन सा अपकार कर डाला है ? ॥ ८॥
मृगीवोत्फुल्लनयना मृदुशीला मनस्विनी।
अपकारं कमिव ते करोति जनकात्मजा॥९॥
‘जिसके नेत्र हरिणी के नेत्रों के समान खिले हुए हैं, जिसका स्वभाव अत्यन्त कोमल एवं मधुर है, वह मनस्विनी जनकनन्दिनी तेरा कौन-सा अपराध कर रही है? ॥९॥
ननु पर्याप्तमेवं ते पापे रामविवासनम्।
किमेभिः कृपणैर्भूयः पातकैरपि ते कृतैः॥१०॥
‘पापिनि! तूने श्रीराम को वनवास देकर ही पूरा पाप कमा लिया है। अब सीता को भी वन में भेजने और वल्कल पहनाने आदि का अत्यन्त दुःखद कार्य करके फिर तू इतने पातक किसलिये बटोर रही है ? ॥ १० ॥
प्रतिज्ञातं मया तावत् त्वयोक्तं देवि शृण्वता।
रामं यदभिषेकाय त्वमिहागतमब्रवीः॥११॥
‘देवि! श्रीराम जब अभिषेक के लिये यहाँ आये थे, उस समय तूने उनसे जो कुछ कहा था, उसे सुनकर मैंने उतने के लिये ही प्रतिज्ञा की थी॥११॥
तत्त्वेतत् समतिक्रम्य निरयं गन्तुमिच्छसि।
मैथिलीमपि या हि त्वमीक्षसे चीरवासिनीम्॥ १२॥
‘उसका उल्लङ्घन करके जो तू मिथिलेशकुमारी जानकी को भी वल्कल-वस्त्र पहने देखना चाहती है, इससे जान पड़ता है, तुझे नरक में ही जाने की इच्छा हो रही है ॥ १२॥
एवं ब्रुवन्तं पितरं रामः सम्प्रस्थितो वनम्।
अवाक्शिरसमासीनमिदं वचनमब्रवीत्॥१३॥
राजा दशरथ सिर नीचा किये बैठे हुए जब इस प्रकार कह रहे थे, उस समय वन की ओर जाते हुए श्रीराम ने पिता से इस प्रकार कहा- ॥ १३॥
इयं धार्मिक कौसल्या मम माता यशस्विनी।
वृद्धा चाक्षुद्रशीला च न च त्वां देव गर्हते॥ १४॥
मया विहीनां वरद प्रपन्नां शोकसागरम्।
अदृष्टपूर्वव्यसनां भूयः सम्मन्तुमर्हसि ॥१५॥
‘धर्मात्मन्! ये मेरी यशस्विनी माता कौसल्या अब वृद्ध हो चली हैं। इनका स्वभाव बहुत ही उच्च और उदार है। देव! यह कभी आपकी निन्दा नहीं करती हैं। इन्होंने पहले कभी ऐसा भारी संकट नहीं देखा होगा। वरदायक नरेश! ये मेरे न रहने से शोक के समुद्र में डूब जायँगी। अतः आप सदा इनका अधिक सम्मान करते रहें। १४-१५ ॥
पुत्रशोकं यथा नछेत् त्वया पूज्येन पूजिता।
मां हि संचिन्तयन्ती सा त्वयि जीवेत् तपस्विनी॥ १६॥
‘आप पूज्यतम पतिसे सम्मानित हो जिस प्रकार यह पुत्रशोकका अनुभव न कर सकें और मेरा चिन्तन करती हुई भी आपके आश्रयमें ही ये मेरी तपस्विनी माता जीवन धारण करें, ऐसा प्रयत्न आपको करना चाहिये॥१६॥
इमां महेन्द्रोपम जातगर्धिनी तथा विधातुं जननीं ममार्हसि।
यथा वनस्थे मयि शोककर्शिता न जीवितं न्यस्य यमक्षयं व्रजेत्॥१७॥
‘इन्द्र के समान तेजस्वी महाराज! ये निरन्तर अपने बिछुड़े हुए बेटे को देखने के लिये उत्सुक रहेंगी। कहीं ऐसा न हो मेरे वन में रहते समय ये शोक से कातर हो अपने प्राणों को त्याग करके यमलोक को चली जायँ। अतः आप मेरी माता को सदा ऐसी ही परिस्थिति में रखें, जिससे उक्त आशङ्का के लिये अवकाश न रह जाय’ ॥ १७॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टात्रिंशः सर्गः॥ ३८॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें अड़तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३८॥
सर्ग-39
रामस्य तु वचः श्रुत्वा मुनिवेषधरं च तम्।
समीक्ष्य सह भार्याभी राजा विगतचेतनः॥१॥
श्रीराम की बात सुनकर और उन्हें मुनिवेष धारण किये देख स्त्रियोंसहित राजा दशरथ शोक से अचेत हो गये॥१॥
नैनं दुःखेन संतप्तः प्रत्यवैक्षत राघवम्।
न चैनमभिसम्प्रेक्ष्य प्रत्यभाषत दुर्मनाः॥२॥
दुःख से संतप्त होने के कारण वे श्रीराम की ओर भर आँख देख भी न सके और देखकर भी मन में दुःख होने के कारण उन्हें कुछ उत्तर न दे सके॥२॥
स मुहूर्तमिवासंज्ञो दुःखितश्च महीपतिः।
विललाप महाबाहू राममेवानुचिन्तयन्॥३॥
दो घड़ी तक अचेत-सा रहने के बाद जब उन्हें होश हुआ, तब वे महाबाहु नरेश श्रीराम का ही चिन्तन करते हुए दुःखी होकर विलाप करने लगे— ॥३॥
मन्ये खल मया पूर्वं विवत्सा बहवः कृताः।
प्राणिनो हिंसिता वापि तन्मामिदमुपस्थितम्॥ ४॥
‘मालूम होता है, मैंने पूर्वजन्म में अवश्य ही बहुत सी गौओं का उनके बछड़ों से विछोह कराया है अथवा अनेक प्राणियों की हिंसा की है, इसी से आज मेरे ऊपर यह संकट आ पड़ा है॥ ४॥
न त्वेवानागते काले देहाच्च्यवति जीवितम्।
कैकेय्या क्लिश्यमानस्य मृत्युर्मम न विद्यते॥५॥
‘समय पूरा हुए बिना किसी के शरीर से प्राण नहीं निकलते; तभी तो कैकेयी के द्वारा इतना क्लेश पाने पर भी मेरी मृत्यु नहीं हो रही है॥ ५ ॥
योऽहं पावकसंकाशं पश्यामि पुरतः स्थितम्।
विहाय वसने सूक्ष्मे तापसाच्छादमात्मजम्॥६॥
‘ओह! अपने अग्नि के समान तेजस्वी पुत्र को महीन वस्त्र त्यागकर तपस्वियों के-से वल्कल-वस्त्र धारण किये सामने खड़ा देख रहा हूँ (फिर भी मेरे प्राण नहीं निकलते हैं) ॥ ६॥
एकस्याः खलु कैकेय्याः कृतेऽयं खिद्यते जनः।
स्वार्थे प्रयतमानायाः संश्रित्य निकृतिं त्विमाम्॥ ७॥
‘इस वरदानरूप शठता का आश्रय लेकर अपने स्वार्थसाधन के प्रयत्न में लगी हुई एकमात्र कैकेयी के कारण ये सब लोग महान् कष्ट में पड़ गये हैं ॥७॥
एवमुक्त्वा तु वचनं बाष्पेण विहतेन्द्रियः।
रामेति सकृदेवोक्त्वा व्याहर्तुं न शशाक सः॥ ८॥
‘ऐसी बात कहते-कहते राजा के नेत्रों में आँसू भर आये। उनकी इन्द्रियाँ शिथिल हो गयीं और वे एक ही बार ‘हे राम!’ कहकर मूर्च्छित हो गये। आगे कुछ न बोल सके’ ॥ ८॥
संज्ञां तु प्रतिलभ्यैव मुहूर्तात् स महीपतिः।
नेत्राभ्यामश्रुपूर्णाभ्यां सुमन्त्रमिदमब्रवीत्॥९॥
दो घड़ी बाद होश में आते ही वे महाराज आँसू-भरे नेत्रों से देखते हुए सुमन्त्र से इस प्रकार बोले- ॥९॥
औपवाह्यं रथं युक्त्वा त्वमायाहि हयोत्तमैः।
प्रापयैनं महाभागमितो जनपदात् परम्॥१०॥
‘तुम सवारी के योग्य एक रथ को उसमें उत्तम घोड़े जोतकर यहाँ ले आओ और इन महाभाग श्रीराम को उसपर बिठाकर इस जनपद से बाहर तक पहुँचा आओ॥१०॥
एवं मन्ये गुणवतां गुणानां फलमुच्यते।
पित्रा मात्रा च यत्साधुर्वीरो निर्वास्यते वनम्॥
‘अपने श्रेष्ठ वीर पुत्र को स्वयं माता-पिता ही जब घर से निकालकर वन में भेज रहे हैं, तब ऐसा मालूम होता है कि शास्त्र में गुणवान् पुरुषों के गुणों का यही फल बताया जाता है’ ॥ ११॥
राज्ञो वचनमाज्ञाय सुमन्त्रः शीघ्रविक्रमः।
योजयित्वा ययौ तत्र रथमश्वैरलंकृतम्॥१२॥
राजा की आज्ञा शिरोधार्य करके शीघ्रगामी सुमन्त्र गये और उत्तम घोड़ों से सुशोभित रथ जोतकर ले आये॥ १२॥
तं रथं राजपुत्राय सूतः कनकभूषितम्।
आचचक्षेऽञ्जलिं कृत्वा युक्तं परमवाजिभिः॥ १३॥
फिर सूत सुमन्त्र ने हाथ जोड़कर कहा—’महाराज! राजकुमार श्रीराम के लिये उत्तम घोड़ों से जुता हुआ सुवर्णभूषित रथ तैयार है’।॥ १३॥
राजा सत्वरमाहूय व्यापृतं वित्तसंचये।
उवाच देशकालज्ञो निश्चितं सर्वतः शुचिः॥ १४॥
तब देश और काल को समझने वाले, सब ओर से शुद्ध (इहलोक और परलोक से उऋण) राजा दशरथ ने तुरंत ही धन-संग्रह के व्यापार में नियुक्त कोषाध्यक्ष को बुलाकर यह निश्चित बात कही-॥ १४॥
वासांसि च वराहा॑णि भूषणानि महान्ति च।
वर्षाण्येतानि संख्याय वैदेह्याः क्षिप्रमानय॥१५॥
‘तुम विदेहकुमारी सीता के पहनने योग्य बहुमूल्य वस्त्र और महान् आभूषण जो चौदह वर्षों के लिये पर्याप्त हों, गिनकर शीघ्र ले आओ’ ॥ १५ ॥
नरेन्द्रेणैवमुक्तस्तु गत्वा कोशगृहं ततः।
प्रायच्छत् सर्वमाहृत्य सीतायै क्षिप्रमेव तत्॥ १६॥
महाराज के ऐसा कहने पर कोषाध्यक्ष ने खजाने में जा वहाँ से सब चीजें लाकर शीघ्र ही सीता को समर्पित कर दीं॥ १६॥
सा सुजाता सुजातानि वैदेही प्रस्थिता वनम्।
भूषयामास गात्राणि तैर्विचित्रैर्विभूषणैः ॥१७॥
उत्तम कुल में उत्पन्न अथवा अयोनिजा और वनवास के लिये प्रस्थित विदेहकुमारी सीता ने सुन्दर लक्षणों से युक्त अपने सभी अङ्गों को उन विचित्र आभूषणों से विभूषित किया॥१७॥
व्यराजयत वैदेही वेश्म तत् सुविभूषिता।
उद्यतोऽशुमतः काले खं प्रभेव विवस्वतः॥१८॥
उन आभूषणों से विभूषित हुई विदेहनन्दिनी सीता उस घर को उसी प्रकार सुशोभित करने लगीं, जैसे प्रातःकाल उगते हुए अंशुमाली सूर्य की प्रभा आकाश को प्रकाशित करती है॥ १८॥
तां भुजाभ्यां परिष्वज्य श्वश्रूर्वचनमब्रवीत्।
अनाचरन्तीं कृपणं मूर्युपाघ्राय मैथिलीम्॥ १९॥
उस समय सास कौसल्या ने कभी दुःखद बर्ताव न करने वाली मिथिलेशकुमारी सीता को अपनी दोनों भुजाओं से कसकर छाती से लगा लिया और उनके मस्तक को सूंघकर कहा- ॥ १९॥
असत्यः सर्वलोकेऽस्मिन सततं सत्कृताः प्रियैः ।
भर्तारं नानुमन्यन्ते विनिपातगतं स्त्रियः॥२०॥
‘बेटी! जो स्त्रियाँ अपने प्रियतम पति के द्वारा सदा सम्मानित होकर भी संकट में पड़ने पर उसका आदर नहीं करती हैं, वे इस सम्पूर्ण जगत् में ‘असती’ (दुष्टा) के नाम से पुकारी जाती हैं॥ २० ॥
एष स्वभावो नारीणामनुभूय पुरा सुखम्।
अल्पामप्यापदं प्राप्य दुष्यन्ति प्रजहत्यपि॥२१॥
‘दुष्टा स्त्रियों का यह स्वभाव होता है कि पहले तो वे पति के द्वारा यथेष्ट सुख भोगती हैं, परंतु जब वह थोड़ी-सी भी विपत्ति में पड़ता है, तब उस पर दोषारोपण करती और उसका साथ छोड़ देती हैं। २१॥
असत्यशीला विकृता दुर्गा अहृदयाः सदा।
असत्यः पापसंकल्पाः क्षणमात्रविरागिणः॥ २२॥
‘जो झूठ बोलने वाली, विकृत चेष्टा करनेवाली, दुष्ट पुरुषों से संसर्ग रखने वाली, पति के प्रति सदा हृदयहीनता का परिचय देने वाली, कुलटा, पाप के ही मनसूबे बाँधने वाली और छोटी-सी बात के लिये भी क्षणमात्र में पति की ओर से विरक्त हो जाने वाली हैं, वे सब-की-सब असती या दुष्टा कही गयी हैं।२२ ॥
न कुलं न कृतं विद्या न दत्तं नापि संग्रहः।
स्त्रीणां गृह्णाति हृदयमनित्यहृदया हि ताः॥ २३॥
‘उत्तम कुल, किया हुआ उपकार, विद्या, भूषण आदि का दान और संग्रह (पति के द्वारा स्नेहपूर्वक अपनाया जाना), यह सब कुछ दुष्टा स्त्रियों के हृदय को नहीं वश में कर पाता है; क्योंकि उनका चित्त अव्यवस्थित होता है॥
साध्वीनां तु स्थितानां तु शीले सत्ये श्रुते स्थिते।
स्त्रीणां पवित्रं परमं पतिरेको विशिष्यते॥२४॥
‘इसके विपरीत जो सत्य, सदाचार, शास्त्रों की आज्ञा और कुलोचित मर्यादाओं में स्थित रहती हैं, उन साध्वी स्त्रियों के लिये एकमात्र पति ही परम पवित्र एवं सर्वश्रेष्ठ देवता है॥ २४॥
स त्वया नावमन्तव्यः पुत्रः प्रव्राजितो वनम्।
तव देवसमस्त्वेष निर्धनः सधनोऽपि वा ॥२५॥
‘इसलिये तुम मेरे पुत्र श्रीराम का, जिन्हें वनवास की आज्ञा मिली है, कभी अनादर न करना। ये निर्धन हों या धनी, तुम्हारे लिये देवता के तुल्य हैं’ ॥ २५ ॥
विज्ञाय वचनं सीता तस्या धर्मार्थसंहितम्।
कृत्वाञ्जलिमुवाचेदं श्वश्रूमभिमुखे स्थिता॥ २६॥
सास के धर्म और अर्थयुक्त वचनों का तात्पर्य भलीभाँति समझकर उनके सामने खड़ी हुई सीता ने हाथ जोड़कर उनसे इस प्रकार कहा— ॥२६॥
करिष्ये सर्वमेवाहमार्या यदनुशास्ति माम्।
अभिज्ञास्मि यथा भर्तुर्वर्तितव्यं श्रुतं च मे ॥२७॥
‘आर्ये! आप मेरे लिये जो कुछ उपदेश दे रही हैं, मैं उसका पूर्णरूप से पालन करूँगी। स्वामी के साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये, यह मुझे भलीभाँति विदित है; क्योंकि इस विषय को मैंने पहले से ही सुन रखा है।
न मामसज्जनेनार्या समानयितुमर्हति।
धर्माद् विचलितुं नाहमलं चन्द्रादिव प्रभा॥ २८॥
‘पूजनीया माताजी! आपको मुझे असती स्त्रियों के समान नहीं मानना चाहिये; क्योंकि जैसे प्रभा चन्द्रमा से दूर नहीं हो सकती, उसी प्रकार मैं पतिव्रत धर्म से विचलित नहीं हो सकती॥ २८॥
नातन्त्री वाद्यते वीणा नाचक्रो विद्यते रथः।
नापतिः सुखमेधेत या स्यादपि शतात्मजा॥ २९॥
‘जैसे बिना तार की वीणा नहीं बज सकती और बिना पहिये का रथ नहीं चल सकता है, उसी प्रकार नारी सौ बेटों की माता होने पर भी बिना पति के सुखी नहीं हो सकती॥ २९॥
मितं ददाति हि पिता मितं भ्राता मितं सुतः।
अमितस्य तु दातारं भर्तारं का न पूजयेत्॥३०॥
‘पिता, भ्राता और पुत्र—ये परिमित सुख प्रदान करते हैं, परंतु पति अपरिमित सुख का दाता है उसकी सेवा से इहलोक और परलोक दोनों में कल्याण होता है; अतः ऐसी कौन स्त्री है, जो अपने पति का सत्कार नहीं करेगी॥३०॥
साहमेवंगता श्रेष्ठा श्रुतधर्मपरावरा।
आर्ये किमवमन्येयं स्त्रिया भर्ता हि दैवतम्॥ ३१॥
‘आर्ये! मैंने श्रेष्ठ स्त्रियों—माता आदि के मुख से नारी के सामान्य और विशेष धर्मों का श्रवण किया है। इस प्रकार पातिव्रत्य का महत्त्व जानकर भी मैं पति का क्यों अपमान करूँगी? मैं जानती हूँ कि पति ही स्त्री का देवता है’ ॥ ३१॥
सीताया वचनं श्रुत्वा कौसल्या हृदयङ्गमम्।
शुद्धसत्त्वा मुमोचाश्रु सहसा दुःखहर्षजम्॥३२॥
सीता का यह मनोहर वचन सुनकर शुद्ध अन्तःकरण वाली देवी कौसल्या के नेत्रों से सहसा दुःख और हर्ष के आँसू बहने लगे॥ ३२ ॥
तां प्राञ्जलिरभिप्रेक्ष्य मातृमध्येऽतिसत्कृताम्।
रामः परमधर्मात्मा मातरं वाक्यमब्रवीत्॥३३॥
तब परम धर्मात्मा श्रीराम ने माताओं के बीच में अत्यन्त सम्मानित होकर खड़ी हुई माता कौसल्या की ओर देख हाथ जोड़कर कहा- ॥३३॥
अम्ब मा दुःखिता भूत्वा पश्येस्त्वं पितरं मम।
क्षयोऽपि वनवासस्य क्षिप्रमेव भविष्यति॥३४॥
‘माँ! (इन्हीं के कारण मेरे पुत्र का वनवास हुआ है; ऐसा समझकर) तुम मेरे पिताजी की ओर दुःखित होकर न देखना। वनवास की अवधि भी शीघ्र ही समाप्त हो जायगी॥ ३४॥
सुप्तायास्ते गमिष्यन्ति नव वर्षाणि पञ्च च।
समग्रमिह सम्प्राप्तं मां द्रक्ष्यसि सुहृद्वृतम्॥ ३५॥
‘ये चौदह वर्ष तो तुम्हारे सोते-सोते निकल जायेंगे, फिर एक दिन देखोगी कि मैं अपने सुहृदों से घिरा हुआ सीता और लक्ष्मण के साथ सम्पूर्ण रूप से यहाँ आ पहुँचा हूँ’॥ ३५॥
एतावदभिनीतार्थमुक्त्वा स जननीं वचः।
त्रयः शतशतार्धा हि ददर्शावेक्ष्य मातरः॥३६॥
ताश्चापि स तथैवार्ता मातृर्दशरथात्मजः।
धर्मयुक्तमिदं वाक्यं निजगाद कृताञ्जलिः॥ ३७॥
माता से इस प्रकार अपना निश्चित अभिप्राय बताकर दशरथनन्दन श्रीराम ने अपनी अन्य साढ़े तीन सौ माताओं की ओर दृष्टिपात किया और उनको भी कौसल्या की ही भाँति शोकाकुल पाया। तब उन्होंने हाथ जोड़कर उन सबसे यह धर्मयुक्त बात कही—॥ ३६-३७॥
संवासात् परुषं किंचिदज्ञानादपि यत् कृतम्।
तन्मे समुपजानीत सर्वाश्चामन्त्रयामि वः॥ ३८॥
‘माताओ! सदा एक साथ रहने के कारण मैंने जो कुछ कठोर वचन कह दिये हों अथवा अनजान में भी मुझसे जो अपराध बन गये हों, उनके लिये आप मुझे क्षमा कर दें। मैं आप सब माताओं से विदा माँगता हूँ’॥ ३८॥
वचनं राघवस्यैतद् धर्मयुक्तं समाहितम्।
शुश्रुवुस्ताः स्त्रियः सर्वाः शोकोपहतचेतसः॥ ३९॥
राजा दशरथ की उन सभी स्त्रियों ने श्रीरघुनाथजी का यह समाधानकारी धर्मयुक्त वचन सुना, सुनकर उन सबका चित्त शोक से व्याकुल हो गया॥ ३९ ॥
जज्ञोऽथ तासां संनादः क्रौञ्चीनामिव निःस्वनः।
मानवेन्द्रस्य भार्याणामेवं वदति राघवे॥४०॥
श्रीरामके ऐसी बात कहते समय महाराज दशरथकी रानियाँ कुररियोंके समान विलाप करनेलगीं उनका वह आर्तनाद उस राजभवनमें सब ओर गूंज उठा॥ ४०॥
मुरजपणवमेघघोषवद् दशरथवेश्म बभूव यत् पुरा।
विलपितपरिदेवनाकुलं व्यसनगतं तदभूत् सुदुःखितम्॥४१॥
राजा दशरथ का जो भवन पहले मुरज, पणव और मेघ आदि वाद्यों के गम्भीर घोष से गूंजता रहता था, वही विलाप और रोदन से व्याप्त हो संकट में पड़कर अत्यन्त दुःखमय प्रतीत होने लगा॥४१॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकोनचत्वारिंशः सर्गः॥३९॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में उनतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३९॥
सर्ग-40
अथ रामश्च सीता च लक्ष्मणश्च कृताञ्जलिः।
उपसंगृह्य राजानं चक्रुर्दीनाः प्रदक्षिणम्॥१॥
तदनन्तर राम, लक्ष्मण और सीता ने हाथ जोड़कर दीनभाव से राजा दशरथ के चरणों का स्पर्श करके उनकी दक्षिणावर्त परिक्रमा की॥१॥
तं चापि समनुज्ञाप्य धर्मज्ञः सह सीतया।
राघवः शोकसम्मूढो जननीमभ्यवादयत्॥२॥
उनसे विदा लेकर सीतासहित धर्मज्ञ रघुनाथजी ने माता का कष्ट देखकर शोक से व्याकुल हो उनके चरणों में प्रणाम किया॥२॥
अन्वक्षं लक्ष्मणो भ्रातुः कौसल्यामभ्यवादयत्।
अपि मातुः सुमित्राया जग्राह चरणौ पुनः॥३॥
श्रीराम के बाद लक्ष्मण ने भी पहले माता कौसल्या को प्रणाम किया, फिर अपनी माता सुमित्रा के भी दोनों पैर पकड़े॥३॥
तं वन्दमानं रुदती माता सौमित्रिमब्रवीत्।।
हितकामा महाबाहं मूर्युपाघ्राय लक्ष्मणम्॥४॥
अपने पुत्र महाबाहु लक्ष्मण को प्रणाम करते देख उनका हित चाहने वाली माता सुमित्रा ने बेटे का मस्तक सूंघकर कहा- ॥४॥
सृष्टस्त्वं वनवासाय स्वनुरक्तः सुहृज्जने।
रामे प्रमादं मा कार्षीः पुत्र भ्रातरि गच्छति॥५॥
‘वत्स! तुम अपने सुहृद् श्रीराम के परम अनुरागी हो, इसलिये मैं तुम्हें वनवास के लिये विदा करती हूँ। अपने बड़े भाई के वन में इधर-उधर जाते समय तुम उनकी सेवा में कभी प्रमाद न करना॥ ५॥
व्यसनी वा समृद्धो वा गतिरेष तवानघ।
एष लोके सतां धर्मो यज्ज्येष्ठवशगो भवेत्॥६॥
ये संकट में हों या समृद्धि में, ये ही तुम्हारी परम गति हैं। निष्पाप लक्ष्मण! संसार में सत्पुरुषों का यही धर्म है कि सर्वदा अपने बड़े भाई की आज्ञा के अधीन रहें॥
इदं हि वृत्तमुचितं कुलस्यास्य सनातनम्।
दानं दीक्षा च यज्ञेषु तनुत्यागो मृधेषु हि॥७॥
‘दान देना, यज्ञ में दीक्षा ग्रहण करना और युद्ध में शरीर त्यागना—यही इस कुल का उचित एवं सनातन आचार है’ ॥ ७॥
लक्ष्मणं त्वेवमुक्त्वासौ संसिद्धं प्रियराघवम्।
सुमित्रा गच्छ गच्छेति पुनः पुनरुवाच तम्॥८॥
अपने पुत्र लक्ष्मण से ऐसा कहकर सुमित्रा ने वनवास के लिये निश्चित विचार रखने वाले सर्वप्रिय श्रीरामचन्द्रजी से कहा—’बेटा! जाओ, जाओ (तुम्हारा मार्ग मङ्गलमय हो)।’ इसके बाद वे लक्ष्मण से फिर बोलीं- ॥ ८॥
रामं दशरथं विद्धि मां विद्धि जनकात्मजाम्।
अयोध्यामटवीं विद्धि गच्छ तात यथासुखम्॥ ९॥
बेटा! तुम श्रीराम को ही अपने पिता महाराज दशरथ समझो, जनकनन्दिनी सीता को ही अपनी माता सुमित्रा मानो और वन को ही अयोध्या जानो। अब सुखपूर्वक यहाँ से प्रस्थान करो’ ॥९॥
ततः सुमन्त्रः काकुत्स्थं प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत्।
विनीतो विनयज्ञश्च मातलिसवं यथा ॥१०॥
इसके बाद जैसे मातलि इन्द्र से कोई बात कहते हैं, उसी प्रकार विनय के ज्ञाता सुमन्त्र ने ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम से विनयपूर्वक हाथ जोड़कर कहा— ॥१०॥
रथमारोह भद्रं ते राजपुत्र महायशः।
क्षिप्रं त्वां प्रापयिष्यामि यत्र मां राम वक्ष्यसे॥ ११॥
‘महायशस्वी राजकुमार श्रीराम! आपका कल्याण हो। आप इस रथ पर बैठिये। आप मुझसे जहाँ कहेंगे, वहीं मैं शीघ्र आपको पहुँचा दूंगा॥ ११॥
चतुर्दश हि वर्षाणि वस्तव्यानि वने त्वया।
तान्युपक्रमितव्यानि यानि देव्या प्रचोदितः॥ १२॥
आपको जिन चौदह वर्षों तक वन में रहना है, उनकी गणना आज से ही आरम्भ हो जानी चाहिये; क्योंकि देवी कैकेयी ने आज ही आपको वन में जाने के लिये प्रेरित किया है’ ॥ १२ ॥
तं रथं सूर्यसंकाशं सीता हृष्टेन चेतसा।
आरुरोह वरारोहा कृत्वालंकारमात्मनः॥१३॥
तब सुन्दरी सीता अपने अङ्गों में उत्तम अलंकार धारण करके प्रसन्न चित्त से उस सूर्य के समान तेजस्वी रथ पर आरूढ़ हुईं। १३ ।।
वनवासं हि संख्याय वासांस्याभरणानि च।
भर्तारमनुगच्छन्त्यै सीतायै श्वशुरो ददौ ॥१४॥
पति के साथ जाने वाली सीता के लिये उनके श्वशुर ने वनवास की वर्षसंख्या गिनकर उसके अनुसार ही वस्त्र और आभूषण दिये थे॥१४॥
तथैवायुधजातानि भ्रातृभ्यां कवचानि च।
रथोपस्थे प्रविन्यस्य सचर्म कठिनं च यत्॥१५॥
इसी प्रकार महाराज ने दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण के लिये जो बहुत-से अस्त्र-शस्त्र और कवच प्रदान किये थे, उन्हें रथ के पिछले भाग में रखकर उन्होंने चमड़े से मढ़ी हुई पिटारी और खन्ती या कुदारी भी उसी पर रख दी॥ १५॥
अथो ज्वलनसंकाशं चामीकरविभूषितम्।
तमारुरुहतुस्तूर्णं भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥१६॥
इसके बाद दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण उस अग्नि के समान दीप्तिमान् सुवर्णभूषित रथ पर शीघ्र ही आरूढ़ हो गये॥ १६॥
सीतातृतीयानारूढान् दृष्ट्वा रथमचोदयत्।
सुमन्त्रः सम्मतानश्वान् वायुवेगसमाजवे॥१७॥
जिनमें सीता की संख्या तीसरी थी, उन श्रीराम आदि को रथ पर आरूढ़ हुआ देख सारथि सुमन्त्र ने रथ को आगे बढ़ाया। उसमें जुते हुए वायु के समान वेगशाली उत्तम घोड़ों को हाँका॥१७॥
प्रयाते तु महारण्यं चिररात्राय राघवे।
बभूव नगरे मूर्छा बलमूर्छा जनस्य च ॥१८॥
जब श्रीरामचन्द्र जी सुदीर्घकाल के लिये महान् वन की ओर जाने लगे, उस समय समस्त पुरवासियों, सैनिकों तथा दर्शक रूप में आये हुए बाहरी लोगों को भी मूर्छा आ गयी॥ १८ ॥
तत् समाकुलसम्भ्रान्तं मत्तसंकुपितद्विपम्।
हयसिञ्जितनिर्घोषं पुरमासीन्महास्वनम्॥१९॥
उस समय सारी अयोध्या में महान् कोलाहल मच गया। सब लोग व्याकुल होकर घबरा उठे। मतवाले हाथी श्रीराम के वियोग से कुपित हो उठे और इधर उधर भागते हुए घोड़ों के हिनहिनाने एवं उनके आभूषणों के खनखनाने की आवाज सब ओर गूंजने लगी॥ १९॥
ततः सबालवृद्धा सा पुरी परमपीडिता।
राममेवाभिदुद्राव घर्तिः सलिलं यथा॥२०॥
अयोध्यापुरी के आबाल वृद्ध सब लोग अत्यन्त पीड़ित होकर श्रीराम के ही पीछे दौड़े, मानो धूप से पीडित हुए प्राणी पानी की ओर भागे जाते हों।॥ २० ॥
पार्श्वतः पृष्ठतश्चापि लम्बमानास्तदुन्मुखाः।
बाष्पपूर्णमुखाः सर्वे तमच शनिःस्वनाः॥२१॥
उनमें से कुछ लोग रथ के पीछे और अगल-बगल में लटक गये। सभी श्रीराम के लिये उत्कण्ठित थे और सबके मुख पर आँसुओं की धारा बह रही थी। वे सबके-सब उच्चस्वर से कहने लगे- ॥२१॥
संयच्छ वाजिनां रश्मीन् सूत याहि शनैः शनैः।
मुखं द्रक्ष्याम रामस्य दुर्दर्शं नो भविष्यति॥२२॥
सूत! घोड़ों की लगाम खींचो। रथ को धीरे-धीरे ले चलो। हम श्रीराम का मुख देखेंगे; क्योंकि अब इस मुख का दर्शन हमलोगों के लिये दुर्लभ हो जायगा॥ २२॥
आयसं हृदयं नूनं राममातुरसंशयम्।
यद् देवगर्भप्रतिमे वनं याति न भिद्यते॥२३॥
निश्चय ही श्रीरामचन्द्रजी की माता का हृदय लोहे का बना हुआ है, इसमें तनिक भी संशय नहीं है। तभी तो देवकुमार के समान तेजस्वी पुत्र के वन की ओर जाते समय फट नहीं जाता है।॥ २३॥
कृतकृत्या हि वैदेही छायेवानुगता पतिम्।
न जहाति रता धर्मे मेरुमर्कप्रभा यथा॥२४॥
‘विदेहनन्दिनी सीता कृतार्थ हो गयीं; क्योंकि वे पतिव्रत-धर्म में तत्पर रहकर छाया की भाँति पति के पीछे-पीछे चली जा रही हैं। वे श्रीराम का साथ उसी प्रकार नहीं छोड़ती हैं, जैसे सूर्य की प्रभा मेरुपर्वत का त्याग नहीं करती है॥ २४॥
अहो लक्ष्मण सिद्धार्थः सततं प्रियवादिनम्।
भ्रातरं देवसंकाशं यस्त्वं परिचरिष्यसि ॥ २५॥
अहो लक्ष्मण! तुम भी कृतार्थ हो गये; क्योंकि तुम सदा प्रिय वचन बोलने वाले अपने देवतुल्य भाई की वन में सेवा करोगे॥ २५॥
महत्येषा हि ते बुद्धिरेष चाभ्युदयो महान्।
एष स्वर्गस्य मार्गश्च यदेनमनुगच्छसि ॥२६॥
‘तुम्हारी यह बुद्धि विशाल है। तुम्हारा यह महान् अभ्युदय है और तुम्हारे लिये यह स्वर्ग का मार्ग मिल गया है; क्योंकि तुम श्रीराम का अनुसरण कर रहे हो’ ॥ २६॥
एवं वदन्तस्ते सोढुं न शेकुर्बाष्पमागतम्।
नरास्तमनुगच्छन्ति प्रियमिक्ष्वाकुनन्दनम्॥२७॥
ऐसी बातें कहते हुए वे पुरवासी मनुष्य उमड़े हुए आँसुओं का वेग न सह सके। वे लोग सबके प्रेमपात्र इक्ष्वाकुकुलनन्दन श्रीरामचन्द्रजी के पीछे-पीछे चले जा रहे थे॥२७॥
अथ राजा वृतः स्त्रीभिर्दीनाभिर्दीनचेतनः।
निर्जगाम प्रियं पुत्रं द्रक्ष्यामीति ब्रुवन् गृहात्॥ २८॥
उसी समय दयनीय दशा को प्राप्त हुई अपनी स्त्रियों से घिरे हुए राजा दशरथ अत्यन्त दीन होकर मैं अपने प्यारे पुत्र श्रीराम को देखूगा’ ऐसा कहते हुए महल से बाहर निकल आये॥ २८॥
शुश्रुवे चाग्रतः स्त्रीणां रुदतीनां महास्वनः।
यथा नादः करेणूनां बद्धे महति कुञ्जरे॥२९॥
उन्होंने अपने आगे रोती हुई स्त्रियों का महान् आर्तनाद सुना। वह वैसा ही जान पड़ता था, जैसे बड़े हाथी यूथपति के बाँध लिये जाने पर हथिनियों का चीत्कार सुनायी देता है॥ २९॥
पिता हि राजा काकुत्स्थः श्रीमान् सन्नस्तदा बभौ।
परिपूर्णः शशी काले ग्रहेणोपप्लुतो यथा॥३०॥
उस समय श्रीराम के पिता ककुत्स्थवंशी श्रीमान् राजा दशरथ उसी तरह खिन्न जान पड़ते थे, जैसे पर्व के समय राहु से ग्रस्त होने पर पूर्ण चन्द्रमा श्रीहीन प्रतीत होते हैं॥३०॥
स च श्रीमानचिन्त्यात्मा रामो दशरथात्मजः।
सूतं संचोदयामास त्वरितं वाह्यतामिति॥३१॥
यह देख अचिन्त्यस्वरूप दशरथनन्दन श्रीमान् भगवान् राम ने सुमन्त्र को प्रेरित करते हुए कहा —’आप रथ को तेजीसे चलाइये’ ॥ ३१॥
रामो याहीति तं सूतं तिष्ठेति च जनस्तथा।
उभयं नाशकत् सूतः कर्तुमध्वनि चोदितः॥ ३२॥
एक ओर श्रीरामचन्द्रजी सारथि से रथ हाँकने के लिये कहते थे और दूसरी ओर सारा जनसमुदाय उन्हें ठहर जाने के लिये कहता था। इस प्रकार दुविधा में पड़कर सारथि सुमन्त्र उस मार्गपर दोनों में से कुछ न कर सके न तो रथ को आगे बढ़ा सके और न सर्वथा रोक ही सके॥३२॥
निर्गच्छति महाबाहौ रामे पौरजनाश्रुभिः।
पतितैरभ्यवहितं प्रणनाश महीरजः॥ ३३॥
महाबाहु श्रीराम के नगर से निकलते समय पुरवासियों के नेत्रों से गिरे हुए आँसुओं द्वारा भीगकर धरती की उड़ती हुई धूल शान्त हो गयी॥ ३३॥
रुदिताश्रुपरिघुनं हाहाकृतमचेतनम्।
प्रयाणे राघवस्यासीत् पुरं परमपीडितम्॥३४॥
श्रीरामचन्द्रजी के प्रस्थान करते समय सारा नगर अत्यन्त पीड़ित हो गया। सब रोने और आँसू बहाने लगे तथा सभी हाहाकार करते-करते अचेत-से हो गये॥ ३४॥
सुस्राव नयनैः स्त्रीणामस्रमायाससम्भवम्।
मीनसंक्षोभचलितैः सलिलं पङ्कजैरिव॥ ३५॥
नारियों के नेत्रों से उसी तरह खेदजनित अश्रु झर रहे थे, जैसे मछलियों के उछलने से हिले हुए कमलों द्वारा जलकणों की वर्षा होने लगती है॥ ३५ ॥
दृष्ट्वा तु नृपतिः श्रीमानेकचित्तगतं पुरम्।
निपपातैव दुःखेन कृत्तमूल इव द्रुमः॥३६॥
श्रीमान् राजा दशरथ सारी अयोध्यापुरी के लोगों को एक-सा व्याकुलचित्त देखकर अत्यन्त दुःख के कारण जड़ से कटे हुए वृक्ष की भाँति भूमिपर गिर पड़े॥३६॥
ततो हलहलाशब्दो जज्ञे रामस्य पृष्ठतः।
नराणां प्रेक्ष्य राजानं सीदन्तं भृशदुःखितम्॥ ३७॥
उस समय राजा को अत्यन्त दुःख में मग्न हो कष्ट पाते देख श्रीराम के पीछे जाते हुए मनुष्यों का पुनः महान् कोलाहल प्रकट हुआ॥ ३७॥
हा रामेति जनाः केचिद् राममातेति चापरे।
अन्तःपुरसमृद्धं च क्रोशन्तं पर्यदेवयन्॥३८॥
अन्तःपुरकी रानियों के सहित राजा दशरथ को उच्चस्वर से विलाप करते देख कोई ‘हा राम!’ कहकर और कोई ‘हा राममाता!’ की पुकार मचाकर करुणक्रन्दन करने लगे॥ ३८ ॥
अन्वीक्षमाणो रामस्तु विषण्णं भ्रान्तचेतसम्।
राजानं मातरं चैव ददर्शानुगतौ पथि॥३९॥
उस समय श्रीरामचन्द्रजी ने पीछे घूमकर देखा तो उन्हें विषादग्रस्त तथा भ्रान्तचित्त पिता राजा दशरथ और दुःख में डूबी हुई माता कौसल्या दोनों ही मार्ग पर अपने पीछे आते हुए दिखायी दिये॥ ३९॥ ।
स बद्ध इव पाशेन किशोरो मातरं यथा।
धर्मपाशेन संयुक्तः प्रकाशं नाभ्युदैक्षत॥४०॥
जैसे रस्सी में बँधा हुआ घोड़े का बच्चा अपनी मा को नहीं देख पाता, उसी प्रकार धर्म के बन्धन में बँधे हुए श्रीरामचन्द्रजी अपनी माता की ओर स्पष्ट रूप से न देख सके॥ ४०॥
पदातिनौ च यानाविदुःखाही सुखोचितौ।
दृष्ट्वा संचोदयामास शीघ्रं याहीति सारथिम्॥ ४१॥
जो सवारीपर चलने योग्य, दुःख भोगनेके अयोग्य और सुख भोगने के ही योग्य थे, उन माता-पिता को पैदल ही अपने पीछे-पीछे आते देख श्रीरामचन्द्रजी ने सारथि को शीघ्र रथ हाँकने के लिये प्रेरित किया। ४१॥
नहि तत् पुरुषव्याघ्रो दुःख दर्शनं पितुः।
मातुश्च सहितुं शक्तस्तोत्नैर्नुन्न इव द्विपः॥४२॥
जैसे अंकुश से पीड़ित किया हुआ गजराज उस कष्ट को नहीं सहन कर पाता है, उसी प्रकार पुरुषसिंह श्रीराम के लिये माता-पिता को इस दुःखद अवस्था में देखना असह्य हो गया॥४२॥
प्रत्यगारमिवायान्ती सवत्सा वत्सकारणात्।
बद्धवत्सा यथा धेनू राममाताभ्यधावत॥४३॥
जैसे बँधे हुए बछड़े वाली सवत्सा गौ शाम को घर की ओर लौटते समय बछड़े के स्नेह से दौड़ी चली आती है, उसी प्रकार श्रीराम की माता कौसल्या उनकी ओर दौड़ी आ रही थीं॥ ४३॥
तथा रुदन्तीं कौसल्यां रथं तमनुधावतीम्।
क्रोशन्तीं राम रामेति हा सीते लक्ष्मणेति च॥ ४४॥
रामलक्ष्मणसीतार्थं सवन्तीं वारि नेत्रजम्।
असकृत् प्रैक्षत स तां नृत्यन्तीमिव मातरम्॥ ४५॥
हा राम! हा राम! हा सीते! हा लक्ष्मण !’ की रट लगाती और रोती हुई कौसल्या उस रथ के पीछे दौड़ रही थीं। वे श्रीराम, लक्ष्मण और सीता के लिये नेत्रों से आँसू बहा रही थीं एवं इधर-उधर नाचती–चक्कर लगाती-सी डोल रही थीं। इस अवस्था में माता कौसल्या को श्रीरामचन्द्रजी ने बारंबार देखा। ४४-४५॥
तिष्ठेति राजा चुक्रोश याहि याहीति राघवः।
सुमन्त्रस्य बभूवात्मा चक्रयोरिव चान्तरा॥४६॥
राजा दशरथ चिल्लाकर कहते थे—’सुमन्त्र ! ठहरो।’ किंतु श्रीरामचन्द्रजी कहते थे—’आगे बढ़िये, शीघ्र आगे बढ़िये।’ उन दो प्रकार के आदेशों में पड़े हुए बेचारे सुमन्त्र का मन उस समय दो पहियों के बीच में फंसे हुए मनुष्यका-सा हो रहा था॥ ४६॥
नाश्रौषमिति राजानमपालब्धोऽपि वक्ष्यसि।
चिरं दुःखस्य पापिष्ठमिति रामस्तमब्रवीत्॥४७॥
उस समय श्रीराम ने सुमन्त्र से कहा—’यहाँ अधिक विलम्ब करना मेरे और पिताजी के लिये दुःख ही नहीं, महान् दुःख का कारण होगा; इसलिये रथ आगे बढ़ाइये। लौटने पर महाराज उलाहना दें तो कह दीजियेगा, मैंने आपकी बात नहीं सुनी’ ॥ ४७॥
स रामस्य वचः कुर्वन्ननुज्ञाप्य च तं जनम्।
व्रजतोऽपि हयान् शीघ्रं चोदयामास सारथिः॥ ४८॥
अन्त में श्रीराम के ही आदेश का पालन करते हुए सारथि ने पीछे से आने वाले लोगों से जाने की आज्ञा ली और स्वतः चलते हुए घोड़ों को भी तीव्रगति से चलने के लिये हाँका॥४८॥
न्यवर्तत जनो राज्ञो रामं कृत्वा प्रदक्षिणम्।
मनसाप्याशुवेगेन न न्यवर्तत मानुषम्॥४९॥
राजा दशरथ के साथ आने वाले लोग मन-ही-मन श्रीराम की परिक्रमा करके शरीर मात्र से लौटे (मन से नहीं लौटे); क्योंकि वह उनके रथ की अपेक्षा भी तीव्रगामी था। दूसरे मनुष्यों का समुदाय शीघ्रगामी मन और शरीर दोनों से ही नहीं लौटा (वे सब लोग श्रीराम के पीछे-पीछे दौड़े चले गये) ॥ ४९॥
यमिच्छेत् पुनरायातं नैनं दूरमनुव्रजेत्।
इत्यमात्या महाराजमूचुर्दशरथं वचः॥५०॥
इधर मन्त्रियों ने महाराज दशरथ से कहा—’राजन् ! जिसके लिये यह इच्छा की जाय कि वह पुनः शीघ्र लौट आये, उसके पीछे दूर तक नहीं जाना चाहिये’। ५०॥
तेषां वचः सर्वगुणोपपन्नः प्रस्विन्नगात्रः प्रविषण्णरूपः।
निशम्य राजा कृपणः सभार्यो व्यवस्थितस्तं सुतमीक्षमाणः॥५१॥
सर्वगुणसम्पन्न राजा दशरथ का शरीर पसीने से भीग रहा था। वे विषाद के मूर्तिमान् स्वरूप जान पड़ते थे। अपने मन्त्रियों की उपर्युक्त बात सुनकर वे वहीं खड़े हो गये और रानियों सहित अत्यन्त दीनभाव से पुत्र की ओर देखने लगे॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चत्वारिंशः सर्गः॥४०॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में चालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४०॥