सर्ग-21
स पुनः पतितां दृष्ट्वा क्रोधाच्छूर्पणखां पुनः।
उवाच व्यक्तया वाचा तामनर्थार्थमागताम्॥१॥
शूर्पणखा को पुनः पृथ्वी पर पड़ी हुई देख अनर्थ के लिये आयी हुई उस बहिन से खर ने क्रोधपूर्वक स्पष्ट वाणी में फिर कहा- ॥१॥
मया त्विदानीं शूरास्ते राक्षसाः पिशिताशनाः।
त्वत्प्रियार्थं विनिर्दिष्टाः किमर्थं रुद्यते पुनः॥२॥
‘बहिन ! मैंने तुम्हारा प्रिय करने के लिये उस समय बहुत-से शूरवीर एवं मांसाहारी राक्षसों को जाने की आज्ञा दे दी थी, अब फिर तुम किसलिये रो रही हो? ॥२॥
भक्ताश्चैवानुरक्ताश्च हिताश्च मम नित्यशः।
हन्यमाना न हन्यन्ते न न कुर्युर्वचो मम॥३॥
‘मैंने जिन राक्षसों को भेजा था, वे मेरे भक्त, मुझमें अनुराग रखने वाले और सदा मेरा हित चाहने वाले हैं। वे किसी के मारने पर भी मर नहीं सकते। उनके द्वारा मेरी आज्ञा का पालन न हो, यह भी सम्भव नहीं है।
किमेतच्छोतुमिच्छामि कारणं यत्कृते पुनः।
हा नाथेति विनर्दन्ती सर्पवच्चेष्टसे क्षितौ॥४॥
‘फिर ऐसा कौन-सा कारण उपस्थित हो गया, जिसके लिये तुम ‘हा नाथ’ की पुकार मचाती हुई साँप की तरह धरती पर लोट रही हो। मैं उसे सुनना चाहता हूँ॥४॥
अनाथवद् विलपसि किं नु नाथे मयि स्थिते।
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ मा मैवं वैक्लव्यं त्यज्यतामिति॥५॥
‘मेरे-जैसे संरक्षक के रहते हुए तुम अनाथ की तरह विलाप क्यों करती हो? उठो! उठो!! इस तरह लोटो मत घबराहट छोड़ दो’ ॥ ५॥
इत्येवमुक्ता दुर्धर्षा खरेण परिसान्त्विता।
विमृज्य नयने साने खरं भ्रातरमब्रवीत्॥६॥
खर के इस प्रकार सान्त्वना देने पर वह दुर्धर्षराक्षसी अपने आँसू भरे नेत्रों को पोंछकर भाई खर से बोली-॥
अस्मीदानीमहं प्राप्ता हतश्रवणनासिका।
शोणितौघपरिक्लिन्ना त्वया च परिसान्त्विता॥ ७॥
‘भैया मैं इस समय फिर तुम्हारे पास क्यों आयी हूँ —यह बताती हूँ, सुनो-मेरे नाक-कान कट गये और मैं खून की धारा से नहा उठी, उस अवस्था में जब पहली बार मैं आयी थी, तब तुमने मुझे बड़ी सान्त्वना दी थी॥७॥
प्रेषिताश्च त्वया शूरा राक्षसास्ते चतुर्दश।
निहन्तुं राघवं घोरं मत्प्रियार्थं सलक्ष्मणम्॥८॥
ते तु रामेण सामर्षाः शूलपट्टिशपाणयः।
समरे निहताः सर्वे सायकैमर्मभेदिभिः॥९॥
‘तत्पश्चात् मेरा प्रिय करने के लिये लक्ष्मणसहित राम का वध करने के उद्देश्य से तुमने जो वे चौदह शूरवीर राक्षस भेजे थे, वे सब-के-सब अमर्ष में भरकर हाथों में शूल और पट्टिश लिये वहाँ जा पहुँचे, परंतु राम ने अपने मर्मभेदी बाणों द्वारा उन सबको समराङ्गण में मार गिराया॥ ८-९॥
तान् भूमौ पतितान् दृष्ट्वा क्षणेनैव महाजवान्।
रामस्य च महत्कर्म महांस्त्रासोऽभवन्मम॥१०॥
‘उन महान् वेगशाली निशाचरों को क्षणभर में ही धराशायी हुआ देख राम के उस महान् पराक्रमपर दृष्टिपात करके मेरे मन में बड़ा भय उत्पन्न हो गया।
सास्मि भीता समुद्विग्ना विषण्णा च निशाचर।
शरणं त्वां पुनः प्राप्ता सर्वतो भयदर्शिनी॥११॥
‘निशाचरराज! मैं भयभीत, उद्विग्न और विषादग्रस्त हो गयी हूँ। मुझे सब ओर भय-ही-भय दिखायी देता है, इसीलिये फिर तुम्हारी शरण में आयी हूँ॥११॥
विषादनक्राध्युषिते परित्रासोर्मिमालिनि।
किं मां न त्रायसे मग्नां विपुले शोकसागरे॥ १२॥
‘मैं शोक के उस विशाल समुद्र में डूब गयी हूँ, जहाँ विषादरूपी मगर निवास करते हैं और त्रास की तरङ्गमालाएँ उठती रहती हैं। तुम उस शोक सागर से मेरा उद्धार क्यों नहीं करते हो? ॥ १२ ॥
एते च निहता भूमौ रामेण निशितैः शरैः।
ये च मे पदवी प्राप्ता राक्षसाः पिशिताशनाः॥ १३॥
‘जो मांसभक्षी राक्षस मेरे साथ गये थे, वे सब-के सब राम के पैने बाणों से मारे जाकर पृथ्वी पर पड़े हैं।
मयि ते यद्यनुक्रोशो यदि रक्षःसु तेषु च।
रामेण यदि शक्तिस्ते तेजो वास्ति निशाचर॥ १४॥
दण्डकारण्यनिलयं जहि राक्षसकण्टकम्।
‘राक्षसराज! यदि मुझपर और उन मरे हुए राक्षसों पर तुम्हें दया आती हो तथा यदि राम के साथ लोहा लेने के लिये तुम में शक्ति और तेज हो तो उन्हें मार डालो; क्योंकि दण्डकारण्य में घर बनाकर रहने वाले राम राक्षसों के लिये कण्टक हैं॥ १४ १/२ ॥
यदि रामममित्रघ्नं न त्वमद्य वधिष्यसि॥१५॥
तव चैवाग्रतः प्राणांस्त्यक्ष्यामि निरपत्रपा।
‘यदि तुम आज ही शत्रुघाती राम का वध नहीं कर डालोगे तो मैं तुम्हारे सामने ही अपने प्राण त्याग दूंगी; क्योंकि मेरी लाज लुट चुकी है। १५ १/२॥
बुद्ध्याहमनुपश्यामि न त्वं रामस्य संयुगे॥१६॥
स्थातुं प्रतिमुखे शक्तः सबलोऽपि महारणे।
‘मैं बुद्धि से बारंबार सोचकर देखती हूँ कि तुम महासमर में सबल होकर भी राम के सामने युद्ध में नहीं ठहर सकोगे॥ १६ १/२॥
शूरमानी न शूरस्त्वं मिथ्यारोपितविक्रमः॥१७॥
अपयाहि जनस्थानात् त्वरितः सहबान्धवः।
जहि त्वं समरे मूढान्यथा तु कुलपांसन॥१८॥
‘तुम अपने को शूरवीर मानते हो, किंतु तुम में शौर्य है ही नहीं। तुमने झूठे ही अपने-आप में पराक्रम का आरोप कर लिया है। मूढ़ ! तुम समराङ्गण में उन दोनों को मार डालो अन्यथा अपने कुल में कलङ्क लगाकर भाई-बन्धुओं के साथ तुरंत ही इस जनस्थान से भाग जाओ॥ १७-१८॥
मानुषौ तौ न शक्नोषि हन्तुं वै रामलक्ष्मणौ।
निःसत्त्वस्याल्पवीर्यस्य वासस्ते कीदृशस्त्विह॥ १९॥
‘राम और लक्ष्मण मनुष्य हैं, यदि उन्हें भी मारने की तुममें शक्ति नहीं है तो तुम्हारे-जैसे निर्बल और पराक्रमशून्य राक्षस का यहाँ रहना कैसे सम्भव हो सकता है ? ॥ १९॥
रामतेजोऽभिभूतो हि त्वं क्षिप्रं विनशिष्यसि।
स हि तेजःसमायुक्तो रामो दशरथात्मजः॥२०॥
भ्राता चास्य महावीर्यो येन चास्मि विरूपिता।
‘तुम राम के तेज से पराजित होकर शीघ्र ही नष्ट हो जाओगे; क्योंकि दशरथकुमार राम बड़े तेजस्वी हैं। उनका भाई भी महान् पराक्रमी है, जिसने मुझे नाक कान से हीन करके अत्यन्त कुरूप बना दिया’ ॥ २० १/२॥
एवं विलप्य बहुशो राक्षसी प्रदरोदरी॥२१॥
भ्रातुः समीपे शोकार्ता नष्टसंज्ञा बभूव ह।
कराभ्यामुदरं हत्वा रुरोद भृशदुःखिता॥२२॥
इस प्रकार बहुत विलाप करके गुफा के समान गहरे पेटवाली वह राक्षसी शोक से आतुर हो अपने भाई के पास मूर्च्छित-सी हो गयी और अत्यन्त दुःखी हो दोनों हाथों से पेट पीटती हुई फूट-फूटकर रोने लगी। २१-२२॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे एकविंशः सर्गः॥२१॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में इक्कीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।२१॥
सर्ग-22
एवमाधर्षितः शूरः शूर्पणख्या खरस्ततः।
उवाच रक्षसां मध्ये खरः खरतरं वचः॥१॥
शूर्पणखा द्वारा इस प्रकार तिरस्कृत होकर शूरवीर खर ने राक्षसों के बीच अत्यन्त कठोर वाणी में कहा – ॥१॥
तवापमानप्रभवः क्रोधोऽयमतुलो मम।
न शक्यते धारयितुं लवणाम्भ इवोल्बणम्॥२॥
“बहिन! तुम्हारे अपमान के कारण मुझे बेतरह क्रोध चढ़ आया है। इसे धारण करना या दबा देना उसी प्रकार असम्भव है, जैसे पूर्णिमा को प्रचण्ड वेग से बढ़े हुए खारे पानी के समुद्र के जल को (अथवा यह उसी प्रकार असह्य है, जैसे घाव पर नमकीन पानी का छिड़कना) ॥२॥
न रामं गणये वीर्यान्मानुषं क्षीणजीवितम्।
आत्मदुश्चरितैः प्राणान् हतो योऽद्य विमोक्ष्यते॥ ३॥
‘मैं पराक्रम की दृष्टि से राम को कुछ भी नहीं गिनता हूँ; क्योंकि उस मनुष्य का जीवन अब क्षीण हो चला है। वह अपने दुष्कर्मों से ही मारा जाकर आज प्राणों से हाथ धो बैठेगा॥३॥
बाष्पः संधार्यतामेष सम्भ्रमश्च विमुच्यताम्।
अहं रामं सह भ्रात्रा नयामि यमसादनम्॥४॥
‘तुम अपने आँसुओं को रोको और यह घबराहट छोड़ो। मैं भाईसहित राम को अभी यमलोक पहुँचा देता हूँ॥४॥
परश्वधहतस्याद्य मन्दप्राणस्य भूतले।
रामस्य रुधिरं रक्तमुष्णं पास्यसि राक्षसि॥५॥
‘राक्षसी! आज मेरे फरसे की मार से निष्प्राण होकर धरतीपर पड़े हुए राम का गरम-गरम रक्त तुम्हें पीने को मिलेगा’॥ ५॥
सम्प्रहृष्टा वचः श्रुत्वा खरस्य वदनाच्च्युतम्।
प्रशशंस पुनौाद् भ्रातरं रक्षसां वरम्॥६॥
खर के मुख से निकली हुई इस बात को सुनकर शूर्पणखा को पड़ी प्रसन्नता हुई। उसने मूर्खतावश राक्षसों में श्रेष्ठ भाई खर की पुनः भूरि-भूरि प्रशंसा की।
तया परुषितः पूर्वं पुनरेव प्रशंसितः।।
अब्रवीद् दूषणं नाम खरः सेनापतिं तदा॥७॥
उसने पहले जिसका कठोर वाणी द्वारा तिरस्कार किया और पुनः जिसकी अत्यन्त सराहना की, उस खर ने उस समय अपने सेनापति दूषण से कहा-॥
चतुर्दश सहस्राणि मम चित्तानुवर्तिनाम्।
रक्षसां भीमवेगानां समरेष्वनिवर्तिनाम॥८॥
नीलजीमूतवर्णानां लोकहिंसाविहारिणाम्।
सर्वोद्योगमुदीर्णानां रक्षसां सौम्य कारय॥९॥
‘सौम्य! मेरे मन के अनुकूल चलने वाले, युद्ध के मैदान से पीछे न हटने वाले, भयंकर वेगशाली, मेघों की काली घटा के समान काले रंगवाले, लोगों की हिंसा से ही क्रीड़ा-विहार करने वाले तथा युद्ध में उत्साहपूर्वक आगे बढ़ने वाले चौदह सहस्र राक्षसों को युद्ध के लिये भेजने की पूरी तैयारी कराओ॥ ८-९॥
उपस्थापय मे क्षिप्रं रथं सौम्य धनूंषि च।
शरांश्च चित्रान् खड्गांश्च शक्तीश्च विविधाः शिताः॥१०॥
सौम्य सेनापते! तुम शीघ्र ही मेरा रथ भी यहाँ मँगवा लो। उस पर बहुत-से धनुष, बाण, विचित्रविचित्र खड्ग और नाना प्रकार की तीखी शक्तियों को भी रख दो॥ १० ॥
अग्रे निर्यातुमिच्छामि पौलस्त्यानां महात्मनाम्।
वधार्थं दुर्विनीतस्य रामस्य रणकोविद ॥११॥
‘रणकुशल वीर! मैं इस उद्दण्ड राम का वध करने के लिये महामनस्वी पुलस्त्यवंशी राक्षसों के आगे-आगे जाना चाहता हूँ’॥ ११॥
इति तस्य ब्रुवाणस्य सूर्यवर्ण महारथम्।
सदश्वैः शबलैर्युक्तमाचचक्षेऽथ दूषणः॥१२॥
उसके इस प्रकार आज्ञा देते ही एक सूर्य के समान प्रकाशमान और चितकबरे रंग के अच्छे घोड़ों से जुता हुआ विशाल रथ वहाँ आ गया दूषण ने खर को इसकी सूचना दी॥ १२॥
तं मेरुशिखराकारं तप्तकाञ्चनभूषणम्।
हेमचक्रमसम्बाधं वैदूर्यमयकूबरम्॥१३॥
मत्स्यैः पुष्पैर्दुमैः शैलैश्चन्द्रसूर्यैश्च काञ्चनैः।
माङ्गल्यैः पक्षिसङ्घश्च ताराभिश्च समावृतम्॥ १४॥
ध्वजनिस्त्रिंशसम्पन्नं किंकिणीवरभूषितम्।
सदश्वयुक्तं सोऽमर्षादारुरोह खरस्तदा ॥१५॥
वह रथ मेरुपर्वत के शिखर की भाँति ऊँचा था, उसे तपाये हुए सोने के बने हुए साज-बाज से सजाया गया था, उसके पहियों में सोना जड़ा हुआ था, उसका विस्तार बहुत बड़ा था, उस रथ के कूबर वैदूर्यमणि से जड़े गये थे, उसकी सजावट के लिये सोने के बने हुए मत्स्य, फूल, वृक्ष, पर्वत, चन्द्रमा, सूर्य, माङ्गलिक पक्षियों के समुदाय तथा तारिकाओं से वह रथ सुशोभित हो रहा था, उस पर ध्वजा फहरा रही थी तथा रथ के भीतर खड्ग आदि अस्त्र-शस्त्र रखे हुए थे, छोटी-छोटी घण्टियों अथवा सुन्दर घुघुरुओं से सजे और उत्तम घोड़ों से जुते हुए उस रथ पर राक्षसराज खर उस समय आरूढ़ हुआ। अपनी बहिन के अपमान का स्मरण करके उसके मन में बड़ा अमर्ष हो रहा था॥ १३–१५ ॥
खरस्तु तन्महत्सैन्यं रथचर्मायुधध्वजम्।
निर्यातेत्यब्रवीत् प्रेक्ष्य दूषणः सर्वराक्षसान्॥ १६॥
रथ, ढाल, अस्त्र-शस्त्र तथा ध्वज से सम्पन्न उस विशाल सेना की ओर देखकर खर और दूषण ने समस्त राक्षसों से कहा—’निकलो, आगे बढ़ो’। १६॥
ततस्तद् राक्षसं सैन्यं घोरचर्मायुधध्वजम्।
निर्जगाम जनस्थानान्महानादं महाजवम्॥१७॥
कूच करने की आज्ञा प्राप्त होते ही भयंकर ढाल, अस्त्र-शस्त्र तथा ध्वजा से युक्त वह विशाल राक्षस सेना जोर-जोर से गर्जना करती हुई जनस्थान से बड़े वेग के साथ निकली॥ १७॥
मुद्गरैः पट्टिशैः शूलैः सुतीक्ष्णैश्च परश्वधैः ।
खड्गैश्चक्रैश्च हस्तस्थैर्भ्राजमानैः सतोमरैः॥ १८॥
शक्तिभिः परिघैोरैरतिमात्रैश्च कार्मुकैः।
गदासिमुसलैर्वज्रर्गृहीतैर्भीमदर्शनैः॥ १९॥
राक्षसानां सुघोराणां सहस्राणि चतुर्दश।
निर्यातानि जनस्थानात् खरचित्तानुवर्तिनाम्॥ २०॥
सैनिकों के हाथ में मुद्गर, पट्टिश, शूल, अत्यन्त तीखे फर से, खड़ग, चक्र और तोमर चमक उठे। शक्ति, भयंकर परिघ, विशाल धनुष, गदा, तलवार, मुसल तथा वज्र (आठ कोणवाले आयुधविशेष) उन राक्षसों के हाथों में आकर बड़े भयानक दिखायी दे रहे थे। इन अस्त्र-शस्त्रों से उपलक्षित और खर के मन की इच्छा के अनुसार चलने वाले अत्यन्त भयंकर चौदह हजार राक्षस जनस्थान से युद्ध के लिये चले ॥ १८-२०॥
तांस्तु निर्धावतो दृष्ट्वा राक्षसान् भीमदर्शनान्।
खरस्याथ रथः किंचिज्जगाम तदनन्तरम्॥२१॥
उन भयंकर दिखायी देने वाले राक्षसों को धावा करते देख खर का रथ भी कुछ देर सैनिकों के निकलने की प्रतीक्षा करके उनके साथ ही आगे बढ़ा ॥२१॥
ततस्ताञ्छबलानश्वांस्तप्तकाञ्चनभूषितान्।
खरस्य मतमाज्ञाय सारथिः पर्यचोदयत्॥२२॥
तदनन्तर खर का अभिप्राय जानकर उसके सारथि ने तपाये हुए सोनेके आभूषणों से विभूषित उन चितकबरे घोड़ों को हाँका॥ २२॥
संचोदितो रथः शीघ्रं खरस्य रिपुघातिनः।
शब्देनापूरयामास दिशः सप्रदिशस्तथा॥२३॥
उसके हाँकने पर शत्रुघाती खर का रथ शीघ्र ही अपने घर-घर शब्द से सम्पूर्ण दिशाओं तथा उपदिशाओं को प्रतिध्वनित करने लगा॥ २३॥
प्रवृद्धमन्युस्तु खरः खरस्वरो रिपोर्वधार्थं त्वरितो यथान्तकः।
अचूचुदत् सारथिमुन्नदन् पुनमहाबलो मेघ इवाश्मवर्षवान्॥२४॥
उस समय खर का क्रोध बढ़ा हुआ था। उसका स्वर भी कठोर हो गया था। वह शत्रु के वध के लिये उतावला होकर यमराज के समान भयानक जान पड़ता था। जैसे ओलों की वर्षा करने वाला मेघ बड़े जोर से गर्जना करता है, उसी प्रकार महाबली खर ने उच्चस्वर से सिंहनाद करके पुनः सारथि को रथ हाँकने के लिये प्रेरित किया॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे द्वाविंशः सर्गः ॥२२॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में बाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ।
सर्ग-23
तत्प्रयातं बलं घोरमशिवं शोणितोदकम्।
अभ्यवर्षन्महाघोरस्तुमलो गर्दभारुणः॥१॥
उस सेना के प्रस्थान करते समय आकाश में गधे के समान धूसर रंग वाले बादलों की महाभयंकर घटा घिरआयी। उसकी तुमुल गर्जना होने लगी तथा सैनिकों के ऊपर घोर अमङ्गल सूचक रक्तमय जल की वर्षा आरम्भ हो गयी॥१॥
निपेतुस्तुरगास्तस्य रथयुक्ता महाजवाः।
समे पुष्पचिते देशे राजमार्गे यदृच्छया॥२॥
खर के रथ में जुते हुए महान् वेगशाली घोड़े फूल बिछे हुए समतल स्थान में सड़क पर चलते-चलते अकस्मात् गिर पड़े॥२॥
श्यामं रुधिरपर्यन्तं बभूव परिवेषणम्।
अलातचक्रप्रतिमं प्रतिगृह्य दिवाकरम्॥३॥
सूर्यमण्डल के चारों ओर अलात चक्र के समान गोलाकार घेरा दिखायी देने लगा, जिसका रंग काला और किनारे का रंग लाल था॥३॥
ततो ध्वजमुपागम्य हेमदण्डं समुच्छ्रितम्।
समाक्रम्य महाकायस्तस्थौ गृध्रः सुदारुणः॥४॥
तदनन्तर खर के रथ की सुवर्णमय दण्डवाली ऊँची ध्वजा पर एक विशालकाय गीध आकर बैठ गया, जो देखने में बड़ा ही भयंकर था॥ ४ ॥
जनस्थानसमीपे च समाक्रम्य खरस्वनाः।
विस्वरान् विविधान् नादान् मांसादा मृगपक्षिणः॥५॥
व्याजहरभिदीप्तायां दिशि वै भैरवस्वनम्।
अशिवं यातुधानानां शिवा घोरा महास्वनाः॥
कठोर स्वर वाले मांसभक्षी पशु और पक्षी जनस्थान के पास आकर विकृत स्वर में अनेक प्रकार के विकट शब्द बोलने लगे तथा सूर्य की प्रभा से प्रकाशित हई दिशाओं में जोर-जोर से चीत्कार
करने वाले और मुँह से आग उगलने वाले भयंकर गीदड़ राक्षसों के लिये अमङ्गलजनक भैरवनाद करने लगे॥५-६॥
प्रभिन्नगजसंकाशास्तोयशोणितधारिणः।
आकाशं तदनाकाशं चक्रुर्भीमाम्बुवाहकाः॥७॥
भयंकर मेघ, जो मदकी धारा बहाने वाले गजराज के समान दिखायी देते थे और जल की जगह रक्त धारण किये हए थे, तत्काल घिर आये। उन्होंने समूचे आकाश को ढक दिया। थोड़ा-सा भी अवकाश नहीं रहने दिया॥७॥
बभूव तिमिरं घोरमुद्धतं रोमहर्षणम्।
दिशो वा प्रदिशो वापि सुव्यक्तं न चकाशिरे॥ ८॥
सब ओर अत्यन्त भयंकर तथा रोमाञ्चकारी घना अन्धकार छा गया। दिशाओं अथवा कोणों का स्पष्ट रूप से भान नहीं हो पाता था॥ ८॥
क्षतजार्द्रसवर्णाभा संध्या कालं विना बभौ।
खरं चाभिमुखं नेदुस्तदा घोरा मृगाः खगाः॥९॥
बिना समय के ही खून से भीगे हुए वस्त्र के समान रंगवाली संध्या प्रकट हो गयी। उस समय भयंकर पशु-पक्षी खर के सामने आकर गर्जना करने लगे। ९॥
कङ्कगोमायुगृध्राश्च चुक्रुशुर्भयशंसिनः।
नित्याशिवकरा युद्धे शिवा घोरनिदर्शनाः॥१०॥
नेदुर्बलस्याभिमुखं ज्वालोद्गारिभिराननैः।।
भय की सूचना देने वाले कङ्क (सफेद चील),गीदड़ और गीध खर के सामने चीत्कार करने लगे। युद्ध में सदा अमङ्गल सूचित करने वाली और भय दिखाने वाली गीदड़ियाँ खर की सेना के सामने आकर आग उगलने वाले मुखों से घोर शब्द करने लगीं॥ १० १/२॥
कबन्धः परिघाभासो दृश्यते भास्करान्तिके॥ ११॥
जग्राह सूर्यं स्वर्भानुरपर्वणि महाग्रहः ।
प्रवाति मारुतः शीघ्रं निष्प्रभोऽभूद् दिवाकरः॥ १२॥
सूर्यके निकट परिघ के समान कबन्ध (सिर कटा हुआ धड़) दिखायी देने लगा। महान् ग्रह राहु अमावास्या के बिना ही सूर्य को ग्रसने लगा। हवा तीव्र गति से चलने लगी एवं सूर्यदेव की प्रभा फीकी पड़ गयी॥ ११-१२॥
उत्पेतुश्च विना रात्रिं ताराः खद्योतसप्रभाः।
संलीनमीनविहगा नलिन्यः शुष्कपङ्कजाः॥१३॥
बिना रात के ही जुगनू के समान चमकने वाले तारे आकाश में उदित हो गये। सरोवरों में मछली और जलपक्षी विलीन हो गये। उनके कमल सूख गये॥ १३॥
तस्मिन् क्षणे बभूवुश्च विना पुष्पफलैर्दुमाः।
उद्धृतश्च विना वातं रेणुर्जलधरारुणः॥१४॥
उस क्षण में वृक्षों के फूल और फल झड़ गये। बिना हवा के ही बादलों के समान धूसर रंग की धूल ऊपर उठकर आकाश में छा गयी॥१४॥
चीचीकूचीति वाश्यन्त्यो बभूवुस्तत्र सारिकाः।
उल्काश्चापि सनि?षा निपेत?रदर्शनाः॥१५॥
वहाँ वन की सारिकाएँ चें-चें करने लगीं। भारी आवाज के साथ भयानक उल्काएँ आकाश से पृथ्वी पर गिरने लगीं॥ १५॥
प्रचचाल मही चापि सशैलवनकानना।
खरस्य च रथस्थस्य नर्दमानस्य धीमतः॥१६॥
प्राकम्पत भुजः सव्यः स्वरश्चास्यावसज्जत।
साम्रा सम्पद्यते दृष्टिः पश्यमानस्य सर्वतः॥१७॥
पर्वत, वन और काननों सहित धरती डोलने लगी। बुद्धिमान् खर रथ पर बैठकर गर्जना कर रहा था। उस समय उसकी बायीं भुजा सहसा काँप उठी। स्वर अवरुद्ध हो गया और सब ओर देखते समय उसकी आँखों में आँसू आने लगे॥ १६-१७॥
ललाटे च रुजो जाता न च मोहान्न्यवर्तत।
तान् समीक्ष्य महोत्पातानुत्थितान् रोमहर्षणान्॥ १८॥
अब्रवीद् राक्षसान् सर्वान् प्रहसन् स खरस्तदा।
उसके सिर में दर्द होने लगा, फिर भी मोहवश वह युद्ध से निवृत्त नहीं हुआ। उस समय प्रकट हुए उन बड़े-बड़े रोमाञ्चकारी उत्पातों को देखकर खर जोर-जोरसे हँसने लगा और समस्त राक्षसों से बोला—॥ १८ १/२॥
महोत्पातानिमान् सर्वानुत्थितान् घोरदर्शनान्॥ १९॥
न चिन्तयाम्यहं वीर्याद् बलवान् दुर्बलानिव।
तारा अपि शरैस्तीक्ष्णैः पातयेयं नभस्तलात्॥ २०॥
‘ये जो भयानक दिखायी देने वाले बड़े-बड़े उत्पात प्रकट हो रहे हैं, इन सबकी मैं अपने बल के भरोसे कोई परवा नहीं करता; ठीक उसी तरह, जैसे बलवान् वीर दुर्बल शत्रुओं को कुछ नहीं समझता है। मैं अपने तीखे बाणों द्वारा आकाश से तारों को भी गिरा सकता हूँ॥ १९-२०॥
मृत्यु मरणधर्मेण संक्रुद्धो योजयाम्यहम्।
राघवं तं बलोत्सिक्तं भ्रातरं चापि लक्ष्मणम्॥ २१॥
अहत्वा सायकैस्तीक्ष्णैर्नोपावर्तितुमुत्सहे।
‘यदि कुपित हो जाऊँ तो मृत्यु को भी मौत के मुख में डाल सकता हूँ। आज बल का घमंड रखने वाले राम और उसके भाई लक्ष्मण को तीखे बाणों से मारे बिना मैं पीछे नहीं लौट सकता॥ २१ १/२॥
यन्निमित्तं तु रामस्य लक्ष्मणस्य विपर्ययः॥२२॥
सकामा भगिनीमेऽस्तु पीत्वा त रुधिरं तयोः।
‘जिसे दण्ड देने के लिये राम और लक्ष्मण की बुद्धि में विपरीत विचार (क्रूरतापूर्ण कर्म करने के भाव) का उदय हुआ है, वह मेरी बहिन शूर्पणखा उन दोनोंका खून पीकर सफल मनोरथ हो जाय॥ २२ १/२॥
न क्वचित् प्राप्तपूर्वो मे संयुगेषु पराजयः॥२३॥
युष्माकमेतत् प्रत्यक्षं नानृतं कथयाम्यहम्।
‘आजतक जितने युद्ध हुए हैं, उनमें से किसी में भी पहले मेरी कभी पराजय नहीं हुई है; यह तुम लोगों ने प्रत्यक्ष देखा है मैं झूठ नहीं कहता हूँ॥ २३ १/२ ॥
देवराजमपि क्रुद्धो मत्तैरावतगामिनम्॥२४॥
वज्रहस्तं रणे हन्यां किं पुनस्तौ च मानवौ।
‘मैं मतवाले ऐरावत पर चलने वाले वज्रधारी देवराज इन्द्र को भी रणभूमि में कुपित होकर काल के गाल में डाल सकता हूँ, फिर उन दो मनुष्यों की तो बात ही क्या है ?’ ॥ २४ १/२॥
सा तस्य गर्जितं श्रुत्वा राक्षसानां महाचमूः॥ २५॥
प्रहर्षमतुलं लेभे मृत्युपाशावपाशिता।
खर की यह गर्जना सुनकर राक्षसों की वह विशाल सेना, जो मौत के पाश से बँधी हुई थी, अनुपम हर्ष से भर गयी।। २५ १/२॥
समेयुश्च महात्मानो युद्धदर्शनकांक्षिणः॥ २६ ॥
ऋषयो देवगन्धर्वाः सिद्धाश्च सह चारणैः।
समेत्य चोचुः सहितास्तेऽन्योन्यं पुण्यकर्मणः॥ २७॥
उस समय युद्ध देखने की इच्छा वाले बहुत से पुण्यकर्मा महात्मा, ऋषि, देवता, गन्धर्व, सिद्ध और चारण वहाँ एकत्र हो गये। एकत्र हो वे सभी मिलकर एक-दूसरेसे कहने लगे— ॥ २६-२७॥
स्वस्ति गोब्राह्मणेभ्यस्तु लोकानां ये च सम्मताः।
जयतां राघवो युद्धे पौलस्त्यान् रजनीचरान्॥ २८॥
चक्रहस्तो यथा विष्णुः सर्वानसुरसत्तमान्।
‘गौओं और ब्राह्मणों का कल्याण हो तथा जो अन्य लोकप्रिय महात्मा हैं, वे भी कल्याण के भागी हों। जैसे चक्रधारी भगवान् विष्णु समस्त असुर शिरोमणियों को परास्त कर देते हैं, उसी प्रकार रघुकुलभूषण श्रीराम युद्ध में इन पुलस्त्यवंशी निशाचरों को पराजित करें’। २८ १/२॥
एतच्चान्यच्च बहुशो ब्रुवाणाः परमर्षयः॥२९॥
जातकौतूहलास्तत्र विमानस्थाश्च देवताः।
ददृशुर्वाहिनीं तेषां राक्षसानां गतायुषाम्॥३०॥
ये तथा और भी बहुत-सी मङ्गलकामना सूचक बातें कहते हुए वे महर्षि और देवता कौतूहलवश विमान पर बैठकर जिनकी आयु समाप्त हो चली थी, उन राक्षसों की उस विशाल वाहिनी को देखने लगे। २९-३०॥
रथेन तु खरो वेगात् सैन्यस्याग्राद् विनिःसृतः।
श्येनगामी पृथुग्रीवो यज्ञशत्रुर्विहंगमः ॥ ३१॥
दुर्जयः करवीराक्षः परुषः कालकार्मुकः।
हेममाली महामाली सस्यो रुधिराशनः ॥ ३२॥
द्वादशैते महावीर्याः प्रतस्थुरभितः खरम्।
खर रथ के द्वारा बड़े वेग से चलकर सारी सेना से आगे निकल आया और श्येनगामी, पृथुग्रीव, यज्ञशत्रु, विहंगम, दुर्जय, करवीराक्ष, परुष, कालकार्मक, हेममाली, महामाली, सस्य तथा रुधिराशन—ये बारह महापराक्रमी राक्षस खर को दोनों ओर से घेरकर उसके साथ-साथ चलने लगे। ३१-३२ १/२॥
महाकपालः स्थूलाक्षः प्रमाथस्त्रिशिरास्तथा।
चत्वार एते सेनाग्रे दूषणं पृष्ठतोऽन्वयुः ॥ ३३॥
महाकपाल, स्थूलाक्ष, प्रमाथ और त्रिशिरा ये चार राक्षस-वीर सेना के आगे और सेनापति दूषण के पीछे-पीछे चल रहे थे॥ ३३॥
सा भीमवेगा समराभिकांक्षिणी सुदारुणा राक्षसवीरसेना।
तौ राजपुत्रौ सहसाभ्युपेता माला ग्रहाणामिव चन्द्रसूर्यो॥ ३४॥
राक्षस वीरों की वह भयंकर वेगवाली अत्यन्त दारुण सेना, जो युद्ध की अभिलाषा से आ रही थी, सहसा उन दोनों राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण के पास जा पहुँची, मानो ग्रहों की पंक्ति चन्द्रमा और सूर्य के समीप प्रकाशित हो रही हो॥३४॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे त्रयोविंशः सर्गः ॥२३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में तेईसवाँ सर्ग पूरा हुआ।२३॥
सर्ग-24
आश्रमं प्रतियाते तु खरे खरपराक्रमे।
तानेवौत्पातिकान् रामः सह भ्रात्रा ददर्श ह॥१॥
प्रचण्ड पराक्रमी खर जब श्रीराम के आश्रम की ओर चला, तब भाईसहित श्रीराम ने भी उन्हीं उत्पातसूचक लक्षणों को देखा॥१॥
तानुत्पातान् महाघोरान् रामो दृष्ट्वात्यमर्षणः।
प्रजानामहितान् दृष्ट्वा वाक्यं लक्ष्मणमब्रवीत्॥ २॥
प्रजा के अहित की सूचना देने वाले उन महाभयंकर उत्पातों को देखकर श्रीरामचन्द्रजी राक्षसों के उपद्रव का विचार करके अत्यन्त अमर्ष में भर गये और लक्ष्मण से इस प्रकार बोले- ॥२॥
इमान् पश्य महाबाहो सर्वभूतापहारिणः।
समुत्थितान् महोत्पातान् संहर्तुं सर्वराक्षसान्॥३॥
‘महाबाहो! ये जो बड़े-बड़े उत्पात प्रकट हो रहे हैं, इनकी ओर दृष्टिपात करो। समस्त भूतों के संहार की सूचना देने वाले ये महान् उत्पात इस समय इन सारे राक्षसों का संहार करने के लिये उत्पन्न हुए हैं॥३॥
अमी रुधिरधारास्तु विसृजन्ते खरस्वनाः।
व्योम्नि मेघा निवर्तन्ते परुषा गर्दभारुणाः॥४॥
‘आकाश में जो गधों के समान धूसर वर्णवाले बादल इधर-उधर विचर रहे हैं, ये प्रचण्ड गर्जना करते हुए खून की धाराएँ बरसा रहे हैं।॥ ४॥
सधूमाश्च शराः सर्वे मम युद्धाभिनन्दिताः।
रुक्मपृष्ठानि चापानि विचेष्टन्ते विचक्षण॥५॥
‘युद्धकुशल लक्ष्मण! मेरे सारे बाण उत्पातवश उठने वाले धूम से सम्बद्ध हो युद्ध के लिये मानो आनन्दित हो रहे हैं तथा जिनके पृष्ठभाग में सुवर्ण मढ़ाहुआ है, वे मेरे धनुष भी प्रत्यञ्चा से जुड़ जाने के लिये स्वयं ही चेष्टाशील जान पड़ते हैं॥५॥
यादृशा इह कूजन्ति पक्षिणो वनचारिणः।
अग्रतो नोऽभयं प्राप्तं संशयो जीवितस्य च॥६॥
‘यहाँ जैसे-जैसे वनचारी पक्षी बोल रहे हैं, उनसे हमारे लिये भविष्य में अभय की और राक्षसों के लिये प्राणसंकट की प्राप्ति सूचित हो रही है॥६॥
सम्प्रहारस्तु सुमहान् भविष्यति न संशयः।
अयमाख्याति मे बाहुः स्फुरमाणो मुहुर्मुहुः॥७॥
‘मेरी यह दाहिनी भुजा बारंबार फड़ककर इस बात की सूचना देती है कि कुछ ही देर में बहुत बड़ा युद्ध होगा, इसमें संशय नहीं है॥७॥
संनिकर्षे तु नः शूर जयं शत्रोः पराजयम्।
सुप्रभं च प्रसन्नं च तव वक्त्रं हि लक्ष्यते॥८॥
‘शूरवीर लक्ष्मण! परंतु निकट भविष्य में ही हमारी विजय और शत्रु की पराजय होगी; क्योंकि तुम्हारा मुख कान्तिमान् एवं प्रसन्न दिखायी दे रहा है॥ ८॥
उद्यतानां हि युद्धार्थं येषां भवति लक्ष्मण।
निष्प्रभं वदनं तेषां भवत्यायुः परिक्षयः॥९॥
‘लक्ष्मण! युद्ध के लिये उद्यत होने पर जिनका मुख प्रभाहीन (उदास) हो जाता है, उनकी आयु नष्ट हो जाती है।
रक्षसां नर्दतां घोरः श्रूयतेऽयं महाध्वनिः।
आहतानां च भेरीणां राक्षसैः करकर्मभिः॥१०॥
‘गरजते हुए राक्षसों का यह घोर नाद सुनायी देता है, तथा क्रूरकर्मा राक्षसों द्वारा बजायी गयी भेरियों की यह महाभयंकर ध्वनि कानों में पड़ रही है॥ १० ॥
अनागतविधानं तु कर्तव्यं शुभमिच्छता।
आपदं शङ्कमानेन पुरुषेण विपश्चिता॥११॥
‘अपना कल्याण चाहने वाले विद्वान् पुरुष को उचित है कि आपत्ति की आशङ्का होने पर पहले से ही उससे बचने का उपाय कर ले॥११॥
तस्माद् गृहीत्वा वैदेहीं शरपाणिर्धनुर्धरः।
गुहामाश्रय शैलस्य दुर्गा पादपसंकुलाम्॥१२॥
‘इसलिये तुम धनुष-बाण धारण करके विदेहकुमारी सीता को साथ ले पर्वत की उस गुफा में चले जाओ, जो वृक्षों से आच्छादित है॥ १२॥
प्रतिकूलितुमिच्छामि न हि वाक्यमिदं त्वया।
शापितो मम पादाभ्यां गम्यतां वत्स मा चिरम्॥
‘वत्स! तुम मेरे इस वचन के प्रतिकूल कुछ कहो या करो, यह मैं नहीं चाहता। अपने चरणों की शपथ दिलाकर कहता हूँ, शीघ्र चले जाओ॥१३॥
त्वं हि शूरश्च बलवान् हन्या एतान् न संशयः।
स्वयं निहन्तुमिच्छामि सर्वानेव निशाचरान्॥ १४॥
‘इसमें संदेह नहीं कि तुम बलवान् और शूरवीर हो तथा इन राक्षसों का वध कर सकते हो; तथापि मैं स्वयं ही इन निशाचरों का संहार करना चाहता हूँ (इसलिये तुम मेरी बात मानकर सीता को सुरक्षित रखने के लिये इसे गुफा में ले जाओ) ‘॥ १४ ॥
एवमुक्तस्तु रामेण लक्ष्मणः सह सीतया।
शरानादाय चापं च गुहां दुर्गा समाश्रयत्॥१५॥
श्रीरामचन्द्रजी के ऐसा कहने पर लक्ष्मण धनुष-बाण ले सीता के साथ पर्वत की दुर्गम गुफा में चले गये॥
तस्मिन् प्रविष्टे तु गुहां लक्ष्मणे सह सीतया।
हन्त निर्युक्तमित्युक्त्वा रामः कवचमाविशत्॥ १६॥
सीतासहित लक्ष्मण के गुफा के भीतर चले जाने पर श्रीरामचन्द्रजी ने ‘हर्ष की बात है, लक्ष्मण ने शीघ्र मेरी बात मान ली और सीता की रक्षा का समुचित प्रबन्ध हो गया’ ऐसा कहकर कवच धारण किया॥ १६॥
स तेनाग्निनिकाशेन कवचेन विभूषितः।
बभूव रामस्तिमिरे महानग्निरिवोत्थितः॥१७॥
प्रज्वलित आग के समान प्रकाशित होने वाले उस कवच से विभूषित हो श्रीराम अन्धकार में प्रकट हुए महान् अग्निदेव के समान शोभा पाने लगे॥१७॥
स चापमुद्यम्य महच्छरानादाय वीर्यवान्।
सम्बभूवास्थितस्तत्र ज्यास्वनैः पूरयन् दिशः॥ १८॥
पराक्रमी श्रीराम महान् धनुष एवं बाण हाथ में लेकर युद्ध के लिये डटकर खड़े हो गये और प्रत्यञ्चा की टंकार से सम्पूर्ण दिशाओं को जाने लगे। १८॥
ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च सह चारणैः।
समेयुश्च महात्मानो युद्धदर्शनकांक्षया॥१९॥
तदनन्तर श्रीराम और राक्षसों का युद्ध देखने की इच्छा से देवता, गन्धर्व, सिद्ध और चारण आदिमहात्मा वहाँ एकत्र हो गये॥ १९॥
ऋषयश्च महात्मानो लोके ब्रह्मर्षिसत्तमाः।
समेत्य चोचुः सहितास्तेऽन्योन्यं पुण्यकर्मणः॥ २०॥
स्वस्ति गोब्राह्मणानां च लोकानां चेति संस्थिताः।
जयतां राघवो युद्धे पौलस्त्यान् रजनीचरान्॥ २१॥
चक्रहस्तो यथा युद्धे सर्वानसुरपुंगवान्।
इनके सिवा, जो तीनों लोकों में प्रसिद्ध ब्रह्मर्षिशिरोमणि पुण्यकर्मा महात्मा ऋषि हैं, वे सभी वहाँ जुट गये और एक साथ खड़े हो परस्पर मिलकर यों कहने लगे—’गौओं, ब्राह्मणों और समस्त लोकों का कल्याण हो। जैसे चक्रधारी भगवान् विष्णु युद्ध में समस्त श्रेष्ठ असुरों को परास्त कर देते हैं, उसी प्रकार इस संग्राम में श्रीरामचन्द्रजी पुलस्त्यवंशी निशाचरों पर विजय प्राप्त करें’। २०-२१ १/२ ॥
एवमुक्त्वा पुनः प्रोचुरालोक्य च परस्परम्॥ २२॥
चतुर्दश सहस्राणि रक्षसां भीमकर्मणाम्।
एकश्च रामो धर्मात्मा कथं युद्धं भविष्यति॥ २३॥
ऐसा कहकर वे पुनः एक-दूसरे की ओर देखते हुए बोले—’एक ओर भयंकर कर्म करने वाले चौदह हजार राक्षस हैं और दूसरी ओर अकेले धर्मात्मा श्रीराम हैं, फिर यह युद्ध कैसे होगा?’ ॥ २२-२३॥
इति राजर्षयः सिद्धाः सगणाश्च द्विजर्षभाः।
जातकौतूहलास्तस्थुर्विमानस्थाश्च देवताः॥ २४॥
ऐसी बातें करते हए राजर्षि, सिद्ध, विद्याधर आदि देवयोनिगण सहित श्रेष्ठ ब्रह्मर्षि तथा विमानपर स्थित हुए देवता कौतूहलवश वहाँ खड़े हो गये॥२४॥
आविष्टं तेजसा रामं संग्रामशिरसि स्थितम्।
दृष्ट्वा सर्वाणि भूतानि भयाद् विव्यथिरे तदा॥ २५॥
युद्ध के मुहाने पर वैष्णव तेज से आविष्ट हुए श्रीराम को खड़ा देख उस समय सब प्राणी (उनके प्रभाव को न जानने के कारण) भय से व्यथित हो उठे॥ २५॥
रूपमप्रतिमं तस्य रामस्याक्लिष्टकर्मणः।
बभूव रूपं क्रुद्धस्य रुद्रस्येव महात्मनः ॥२६॥
अनायास ही महान् कर्म करने वाले तथा रोष में भरे हुए महात्मा श्रीराम का वह रूप कुपित हुए रुद्रदेव के समान तुलनारहित प्रतीत होता था॥ २६॥
इति सम्भाष्यमाणे तु देवगन्धर्वचारणैः।
ततो गम्भीरनिर्हादं घोरचर्मायुधध्वजम्॥ २७॥
अनीकं यातुधानानां समन्तात् प्रत्यपद्यत।
जब देवता, गन्धर्व और चारण पूर्वोक्त रूप से श्रीराम की मङ्गलकामना कर रहे थे, उसी समय भयंकर ढाल-तलवार आदि आयुधों और ध्वजाओं से उपलक्षित होने वाली निशाचरों की वह सेना गम्भीर गर्जना करती हुई चारों ओर से श्रीरामजी के पास आ पहुँची॥ २७ १/२॥
वीरालापान् विसृजतामन्योन्यमभिगच्छताम्॥ २८॥
चापानि विस्फारयतां जृम्भतां चाप्यभीक्ष्णशः।
विप्रघुष्टस्वनानां च दुन्दुभींश्चापि निघ्नताम्॥ २९॥
तेषां सुतुमुलः शब्दः पूरयामास तद् वनम्।
वे राक्षस-सैनिक वीरोचित वार्तालाप करते, युद्ध का ढंग बताने के लिये एक-दूसरे के सामने जाते, धनुषों को खींचकर उनकी टंकार फैलाते, बारंबार मदमत्त होकर उछलते, जोर-जोर से गर्जना करते और नगाड़े पीटते थे। उनका वह अत्यन्त तुमुल नाद उस वन में सब ओर गूंजने लगा॥ २८-२९ १/२॥
तेन शब्देन वित्रस्ताः श्वापदा वनचारिणः॥ ३०॥
दुद्रुवुर्यत्र निःशब्दं पृष्ठतो नावलोकयन्।
उस शब्द से डरे हुए वनचारी हिंसक जन्तु उस वन में गये, जहाँ किसी प्रकार का कोलाहल नहीं सुनायी पड़ता था। वे वन्यजन्तु भय के मारे पीछे फिरकर देखते भी नहीं थे। ३० १/२॥
तच्चानीकं महावेगं रामं समनुवर्तत॥३१॥
धृतनानाप्रहरणं गम्भीरं सागरोपमम्।
वह सेना बड़े वेग से श्रीराम की ओर चली। उसमें नाना प्रकार के आयुध धारण करने वाले सैनिक थे। वह समुद्र के समान गम्भीर दिखायी देती थी॥ ३१ १/२॥
रामोऽपि चारयंश्चक्षुः सर्वतो रणपण्डितः॥ ३२॥
ददर्श खरसैन्यं तद् युद्धायाभिमुखो गतः।
युद्धकला के विद्वान् श्रीरामचन्द्रजी ने भी चारों ओर दृष्टिपात करते हुए खर की सेना का निरीक्षण किया और वे युद्ध के लिये उसके सामने बढ़ गये॥ ३२ १/२॥
वितत्य च धनुर्भीमं तूण्याश्चोद्धृत्य सायकान्॥ ३३॥
क्रोधमाहारयत् तीव्र वधार्थं सर्वरक्षसाम्।
दुष्प्रेक्ष्यश्चाभवत् क्रुद्धो युगान्ताग्निरिव ज्वलन्॥ ३४॥
फिर उन्होंने तरकस से अनेक बाण निकाले और अपने भयंकर धनुष को खींचकर सम्पूर्ण राक्षसों का वध करने के लिये तीव्र क्रोध प्रकट किया। कुपित होने पर वे प्रलयकालिक अग्नि के समान प्रज्वलित होने लगे उस समय उनकी ओर देखना भी कठिन हो गया॥३३-३४॥
तं दृष्ट्वा तेजसाऽऽविष्टं प्राव्यथन् वनदेवताः।
तस्य रुष्टस्य रूपं तु रामस्य ददृशे तदा।
दक्षस्येव क्रतुं हन्तुमुद्यतस्य पिनाकिनः॥ ३५॥
तेज से आविष्ट हुए श्रीराम को देखकर वन के देवता व्यथित हो उठे। उस समय रोष में भरे हुए श्रीराम का रूप दक्ष यज्ञ का विनाश करने के लिये उद्यत हुए पिनाकधारी महादेवजी के समान दिखायी देने लगा॥ ३५॥
तत्कार्मुकैराभरणै रथैश्च तद्भर्मभिश्चाग्निसमानवणैः।
बभूव सैन्यं पिशिताशनानां सूर्योदये नीलमिवाभ्रजालम्॥ ३६॥
धनुषों, आभूषणों, रथों और अग्नि के समान कान्तिवाले चमकीले कवचों से युक्त वह पिशाचों की सेना सूर्योदयकाल में नीले मेघों की घटा के समान प्रतीत होती थी॥ ३६॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे चतुर्विंशः सर्गः ॥२४॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में चौबीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।२४॥
सर्ग-25
अवष्टब्धधनु रामं क्रुद्धं तं रिपुघातिनम्।
ददर्शाश्रममागम्य खरः सह पुरःसरैः॥१॥
तं दृष्ट्वा सगुणं चापमुद्यम्य खरनिःस्वनम्।
रामस्याभिमुखं सूतं चोद्यतामित्यचोदयत्॥२॥
खर ने अपने अग्रगामी सैनिकों के साथ आश्रम के पास पहुँचकर क्रोध में भरे हुए शत्रुघाती श्रीराम को देखा, जो हाथ में धनुष लिये खड़े थे। उन्हें देखते ही अपने तीव्र टंकार करने वाले प्रत्यञ्चासहित धनुष को उठाकर सूत को आज्ञा दी—’मेरा रथ राम के सामने ले चलो’॥ १-२॥
स खरस्याज्ञया सूतस्तुरगान् समचोदयत्।
यत्र रामो महाबाहुरेको धुन्वन् धनुः स्थितः॥३॥
खर की आज्ञा से सारथि ने घोड़ों को उधर ही बढ़ाया, जहाँ महाबाहु श्रीराम अकेले खड़े होकर अपने धनुष की टंकार कर रहे थे॥३॥
तं तु निष्पतितं दृष्ट्वा सर्वतो रजनीचराः।
मुञ्चमाना महानादं सचिवाः पर्यवारयन्॥४॥
खर को श्रीराम के समीप पहुँचा देख श्येनगामी आदि उसके निशाचर मन्त्री भी बड़े जोर से सिंहनाद करके उसे चारों ओर से घेरकर खड़े हो गये॥ ४॥
स तेषां यातुधानानां मध्ये रथगतः खरः।
बभूव मध्ये ताराणां लोहिताङ्ग इवोदितः॥५॥
उन राक्षसों के बीच में रथ पर बैठा हुआ खर तारों के मध्यभाग में उगे हुए मङ्गल की भाँति शोभा पा रहा था।॥ ५॥
ततः शरसहस्रेण राममप्रतिमौजसम्।
अर्दयित्वा महानादं ननाद समरे खरः॥६॥
उस समय खर ने समराङ्गण में सहस्रों बाणों द्वारा अप्रतिम बलशाली श्रीराम को पीड़ित-सा करके बड़े जोर से गर्जना की॥६॥
ततस्तं भीमधन्वानं क्रुद्धाः सर्वे निशाचराः।
रामं नानाविधैः शस्त्रैरभ्यवर्षन्त दुर्जयम्॥७॥
तदनन्तर क्रोध में भरे हुए समस्त निशाचर भयंकर धनुष धारण करने वाले दुर्जय वीर श्रीराम पर नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा करने लगे॥ ७ ॥
मुद्गरैरायसैः शूलैः प्रासैः खड्गैः परश्वधैः ।
राक्षसाः समरे शूरं निजजू रोषतत्पराः॥८॥
उस समराङ्गण में रुष्ट हुए राक्षसों ने शूरवीर श्रीराम पर लोहे के मुद्गरों, शूलों, प्रासों, खड्गों और फरसों द्वारा प्रहार किया॥८॥
ते बलाहकसंकाशा महाकाया महाबलाः।
अभ्यधावन्त काकुत्स्थं रथैर्वाजिभिरेव च ॥९॥
गजैः पर्वतकूटाभै रामं युद्धे जिघांसवः।
वे मेघों के समान काले, विशालकाय और महाबली निशाचर रथों, घोड़ों और पर्वतशिखर के समान गजराजों द्वारा ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम पर चारों ओर से टूट पड़े। वे युद्ध में उन्हें मार डालना चाहते थे॥ ९ १/२॥
ते रामे शरवर्षाणि व्यसृजन् रक्षसां गणाः॥१०॥
शैलेन्द्रमिव धाराभिर्वर्षमाणा महाघनाः।
जैसे बड़े-बड़े मेघ गिरिराज पर जल की धाराएँ बरसा रहे हों, उसी प्रकार वे राक्षसगण श्रीराम पर बाणों की वृष्टि कर रहे थे॥ १० १/२ ॥
सर्वैः परिवृतो रामो राक्षसैः क्रूरदर्शनैः॥११॥
तिथिष्विव महादेवो वृतः पारिषदां गणैः।
क्रूरतापूर्ण दृष्टि से देखने वाले उन सभी राक्षसों ने श्रीराम को उसी प्रकार घेर रखा था, जैसे प्रदोषसंज्ञक तिथियों में भगवान् शिव के पार्षदगण उन्हें घेरे रहते हैं।
तानि मुक्तानि शस्त्राणि यातुधानैः स राघवः॥ १२॥
प्रतिजग्राह विशिखैनद्योघानिव सागरः।
श्रीरघुनाथजी ने राक्षसों के छोड़े हुए उन अस्त्रशस्त्रों को अपने बाणों द्वारा उसी तरह ग्रस लिया, जैसे समुद्र नदियों के प्रवाह को आत्मसात् कर लेता है॥ १२ १/२॥
स तैः प्रहरणैोरैर्भिन्नगात्रो न विव्यथे॥१३॥
रामः प्रदीप्तैर्बहुभिर्वओरिव महाचलः।
उन राक्षसों के घोर अस्त्र-शस्त्रों के प्रहार से यद्यपि श्रीराम का शरीर क्षत-विक्षत हो गया था तो भी वे व्यथित या विचलित नहीं हुए, जैसे बहुसंख्यक दीप्तिमान् वज्रों के आघात सहकर भी महान् पर्वत अडिग बना रहता है॥ १३ १/२ ॥
स विद्धः क्षतजादिग्धः सर्वगात्रेषु राघवः॥१४॥
बभूव रामः संध्याभैर्दिवाकर इवावृतः।
श्रीरघुनाथजी के सारे अङ्गों में अस्त्र-शस्त्रों के आघात से घाव हो गया था। वे लहूलुहान हो रहे थे, अतः उस समय संध्याकाल के बादलों से घिरे हुए सूर्यदेव के समान शोभा पा रहे थे॥ १४ १/२ ।।
विषेदुर्देवगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः॥ १५॥
एकं सहस्रैर्बहुभिस्तदा दृष्ट्वा समावृतम्।
श्रीराम अकेले थे। उस समय उन्हें अनेक सहस्र शत्रुओं से घिरा हुआ देख देवता, सिद्ध, गन्धर्व और महर्षि विषाद में डूब गये। १५ १/२॥
ततो रामस्तु संक्रुद्धो मण्डलीकृतकार्मुकः॥१६॥
ससर्ज निशितान् बाणान् शतशोऽथ सहस्रशः।
दुरावारान् दुर्विषहान् कालपाशोपमान् रणे॥ १७॥
तत्पश्चात् श्रीरामचन्द्रजी ने अत्यन्त कुपित हो अपने धनुष को इतना खींचा कि वह गोलाकार दिखायी देने लगा। फिर तो वे उस धनुष से रणभूमि में सैकड़ों, हजारों ऐसे पैने बाण छोड़ने लगे, जिन्हें रोकना सर्वथा कठिन था, जो दुःसह होने के साथ ही कालपाश के समान भयंकर थे॥१६-१७॥
मुमोच लीलया कङ्कपत्रान् काञ्चनभूषणान्।
ते शराः शत्रुसैन्येषु मुक्ता रामेण लीलया॥१८॥
आददू रक्षसां प्राणान् पाशाः कालकृता इव।
उन्होंने खेल-खेल में ही चील के परों से युक्त असंख्य सुवर्णभूषित बाण छोड़े। शत्रु के सैनिकों पर श्रीराम द्वारा लीलापूर्वक छोड़े गये वे बाण कालपाश के समान राक्षसों के प्राण लेने लगे॥ १८ १/२॥
भित्त्वा राक्षसदेहांस्तांस्ते शरा रुधिराप्लुताः॥
अन्तरिक्षगता रेजुर्दीप्ताग्निसमतेजसः।
राक्षसों के शरीरों को छेदकर खून में डूबे हुए वे बाण जब आकाश में पहुँचते, तब प्रज्वलित अग्नि के समान तेज से प्रकाशित होने लगते थे॥ १९ १/२॥
असंख्येयास्तु रामस्य सायकाश्चापमण्डलात्॥ २०॥
विनिष्पेतुरतीवोग्रा रक्षःप्राणापहारिणः।
श्रीराम के मण्डलाकार धनुष से अत्यन्त भयंकर और राक्षसों के प्राण लेने वाले असंख्य बाण छूटने लगे॥ २० १/२॥
तैर्धनंषि ध्वजाग्राणि चर्माणि कवचानि च॥ २१॥
बाहून् सहस्ताभरणानूरून् करिकरोपमान्।
चिच्छेद रामः समरे शतशोऽथ सहस्रशः॥२२॥
उन बाणों द्वारा श्रीराम ने समराङ्गण में शत्रुओं के सैकड़ों हजारों धनुष, ध्वजाओं के अग्रभाग, ढाल, कवच, आभूषणों सहित भुजाएँ तथा हाथी की सँड़ के समान जाँघ काट डालीं॥ २१-२२॥
हयान् काञ्चनसंनाहान् रथयुक्तान् ससारथीन्।
गजांश्च सगजारोहान् सहयान् सादिनस्तदा॥ २३॥
चिच्छिदुर्बिभिदुश्चैव रामबाणा गुणच्युताः।
पदातीन् समरे हत्वा ह्यनयद् यमसादनम्॥२४॥
प्रत्यञ्चा से छूटे हुए श्रीराम के बाणों ने उस समय सोने के साज-बाज एवं कवच से सजे और रथों में जुते हुए घोड़ों, सारथियों, हाथियों, हाथी सवारों, घोड़ों और घुड़सवारों को भी छिन्न-भिन्न कर डाला। इसी प्रकार श्रीराम ने समरभूमि में पैदल सैनिकों को भी मारकर यमलोक पहुँचा दिया॥ २३-२४ ॥
ततो नालीकनाराचैस्तीक्ष्णाग्रैश्च विकर्णिभिः।
भीममार्तस्वरं चक्रुश्छिद्यमाना निशाचराः॥ २५॥
उस समय उनके नालीक, नाराच और तीखे अग्रभागवाले विकर्णी नामक बाणों द्वारा छिन्न-भिन्न होते हुए निशाचर भयंकर आर्तनाद करने लगे॥ २५ ॥
तत्सैन्यं विविधैर्बाणैरर्दितं मर्मभेदिभिः।।
न रामेण सुखं लेभे शुष्कं वनमिवाग्निना॥२६॥
श्रीराम के चलाये हुए नाना प्रकार के मर्मभेदी बाणों द्वारा पीड़ित हुई वह राक्षस सेना आग से जलते हुए सूखे वन की भाँति सुख-शान्ति नहीं पाती थी॥ २६॥
केचिद् भीमबलाः शूराः प्रासान् शूलान्
परश्वधान्। चिक्षिपुः परमक्रुद्धा रामाय रजनीचराः॥२७॥
कुछ भयंकर बलशाली शूरवीर निशाचर अत्यन्त कुपित हो श्रीराम पर प्रासों, शूलों और फरसों का प्रहार करने लगे॥२७॥
तेषां बाणैर्महाबाहुः शस्त्राण्यावार्य वीर्यवान्।
जहार समरे प्राणांश्चिच्छेद च शिरोधरान्॥ २८॥
परंतु पराक्रमी महाबाहु श्रीराम ने रणभूमि में अपने बाणों द्वारा उनके उन अस्त्र-शस्त्रों को रोककर उनके गले काट डाले और प्राण हर लिये॥२८॥
ते छिन्नशिरसः पेतुश्छिन्नचर्मशरासनाः।
सुपर्णवातविक्षिप्ता जगत्यां पादपा यथा॥२९॥
अवशिष्टाश्च ये तत्र विषण्णास्ते निशाचराः।
खरमेवाभ्यधावन्त शरणार्थं शराहताः॥३०॥
सिर, ढाल और धनुष के कट जाने पर वे निशाचर गरुड़ के पंख की हवा से टूटकर गिरने वाले नन्दनवन के वृक्षों की भाँति धराशायी हो गये। जो बचे थे, वे राक्षस भी श्रीराम के बाणों से आहत हो विषाद में डूब गये और अपनी रक्षा के लिये खर के पास ही दौड़े गये। २९-३०॥
तान् सर्वान् धनुरादाय समाश्वास्य च दूषणः।
अभ्यधावत् सुसंक्रुद्धः क्रुद्धं क्रुद्ध इवान्तकः॥ ३१॥
परंतु बीच में दूषण ने धनुष लेकर उन सबको आश्वासन दिया और अत्यन्त कुपित हो रोष में भरे हुए यमराज की भाँति वह क्रुद्ध होकर युद्ध के लिये डटे हुए श्रीरामचन्द्रजी की ओर दौड़ा ॥ ३१॥
निवृत्तास्तु पुनः सर्वे दूषणाश्रयनिर्भयाः।
राममेवाभ्यधावन्त सालतालशिलायुधाः॥३२॥
दूषण का सहारा मिल जाने से निर्भय हो वे सब-के सब फिर लौट आये और साख, ताड़ आदि के वृक्ष तथा पत्थर लेकर पुनः श्रीराम पर ही टूट पड़े॥ ३२॥
शूलमुद्गरहस्ताश्च पाशहस्ता महाबलाः।
सृजन्तः शरवर्षाणि शस्त्रवर्षाणि संयुगे॥३३॥
उस युद्धस्थल में अपने हाथों में शूल, मुद्गर और पाश धारण किये वे महाबली निशाचर बाणों तथा अन्य अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा करने लगे॥ ३३॥
द्रुमवर्षाणि मुञ्चन्तः शिलावर्षाणि राक्षसाः।
तद् बभूवाद्भुतं युद्धं तुमुलं रोमहर्षणम्॥३४॥
रामस्यास्य महाघोरं पुनस्तेषां च रक्षसाम्।
कोई राक्षस वृक्षों की वर्षा करने लगे तो कोई पत्थरों की,उस समय इन श्रीराम और उन निशाचरों में पुनः बड़ा ही अद्भुत, महाभयंकर, घमासान और रोमाञ्चकारी युद्ध होने लगा॥ ३४ १/२॥
ते समन्तादभिक्रुद्धा राघवं पुनरार्दयन्॥३५॥
ततः सर्वा दिशो दृष्ट्वा प्रदिशश्च समावृताः।
राक्षसैः सर्वतः प्राप्तैः शरवर्षाभिरावृतः॥ ३६॥
स कृत्वा भैरवं नादमस्त्रं परमभास्वरम्।
समयोजयद् गान्धर्वं राक्षसेषु महाबलः॥३७॥
वे राक्षस कुपित होकर चारों ओर से पुनः श्रीरामचन्द्रजी को पीड़ित करने लगे। तब सब ओर से आये हुए राक्षसों से सम्पूर्ण दिशाओं और उपदिशाओं को घिरी हुई देख बाण-वर्षा से आच्छादित हुए महाबली श्रीराम ने भैरव-नाद करके उन राक्षसों पर परम तेजस्वी गान्धर्व नामक अस्त्रका प्रयोग किया। ३५-३७॥
ततः शरसहस्राणि निर्ययुश्चापमण्डलात्।
सर्वा दश दिशो बाणैरापूर्यन्त समागतैः॥ ३८॥
फिर तो उनके मण्डलाकार धनुष से सहस्रों बाण छूटने लगे। उन बाणों से दसों दिशाएँ पूर्णतः आच्छादित हो गयीं॥ ३८॥
नाददानं शरान् घोरान् विमुञ्चन्तं शरोत्तमान्।
विकर्षमाणं पश्यन्ति राक्षसास्ते शरार्दिताः॥ ३९॥
बाणों से पीड़ित राक्षस यह नहीं देख पाते थे कि श्रीरामचन्द्रजी कब भयंकर बाण हाथ में लेते हैं और कब उन उत्तम बाणों को छोड़ देते हैं। वे केवल उनको धनुष खींचते देखते थे॥ ३९ ॥
शरान्धकारमाकाशमावृणोत् सदिवाकरम्।
बभूवावस्थितो रामः प्रक्षिपन्निव तान् शरान्॥ ४०॥
श्रीरामचन्द्रजी के बाणसमुदायरूपी अन्धकार ने सूर्यसहित सारे आकाशमण्डल को ढक दिया। उस समय श्रीराम उन बाणों को लगातार छोड़ते हुए एक स्थान पर खड़े थे॥ ४०॥
युगपत्पतमानैश्च युगपच्च हतै शम्।
युगपत्पतितैश्चैव विकीर्णा वसुधाभवत्॥४१॥
एक ही समय बाणों द्वारा अत्यन्त घायल हो एक साथ ही गिरते और गिरे हुए बहुसंख्यक राक्षसों की लाशों से वहाँ की भूमि पट गयी॥४१॥
निहताः पतिताः क्षीणाश्छिन्ना भिन्ना विदारिताः।
तत्र तत्र स्म दृश्यन्ते राक्षसास्ते सहस्रशः॥४२॥
जहाँ-जहाँ दृष्टि जाती थी, वहीं-वहीं वे हजारों राक्षस मरे, गिरे, क्षीण हुए, कटे-पिटे और विदीर्ण हुए दिखायी देते थे॥ ४२ ॥
सोष्णीषैरुत्तमाङ्गैश्च साङ्गदैर्बाहुभिस्तथा।
ऊरुभिर्बाहुभिश्छिन्नैर्नानारूपैर्विभूषणैः॥४३॥
हयैश्च द्विपमुख्यैश्च रथैर्भिन्नैरनेकशः।
चामरव्यजनैश्छत्रैर्ध्वजैर्नानाविधैरपि॥४४॥
रामेण बाणाभिहतैर्विच्छिन्नैः शूलपट्टिशैः।
खड्गैः खण्डीकृतैः प्रासैर्विकीर्णैश्च परश्वधैः॥ ४५॥
चूर्णिताभिः शिलाभिश्च शरैश्चित्रैरनेकशः।
विच्छिन्नैः समरे भूमिर्विस्तीर्णाभूद् भयंकरा॥ ४६॥
वहाँ श्रीराम के बाणों से कटे हुए पगड़ियों सहित मस्तकों, बाजूबंदसहित भुजाओं, जाँघों, बाँहों, भाँतिभाँति के आभूषणों, घोड़ों, श्रेष्ठ हाथियों, टूटे-फूटे अनेकानेक रथों, चँवरों, व्यजनों, छत्रों, नाना प्रकार की ध्वजाओं, छिन्न-भिन्न हुए शूलों, पट्टिशों, खण्डित खड्गों, बिखरे प्रासों, फरसों, चूर-चूर हुई शिलाओं तथा टुकड़े-टुकड़े हुए बहुतेरे विचित्र बाणों से पटी हुई वह समरभूमि अत्यन्त भयंकर दिखायी देती थी॥ ४३–४६॥
तान् दृष्ट्वा निहतान् सर्वे राक्षसाः परमातुराः।
न तत्र चलितुं शक्ता रामं परपुरंजयम्॥४७॥
उन सबको मारा गया देख शेष राक्षस अत्यन्त आतुर हो वहाँ शत्रुनगरी पर विजय पाने वाले श्रीराम के सम्मुख जाने में असमर्थ हो गये॥४७॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे पञ्चविंशः सर्गः॥ २५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में पचीसवाँ सर्ग पूरा हुआ। २५॥
सर्ग-26
दूषणस्तु स्वकं सैन्यं हन्यमानं विलोक्य च।
संदिदेश महाबाहुर्भीमवेगान् दुरासदान्॥१॥
राक्षसान् पञ्चसाहस्रान् समरेष्वनिवर्तिनः।
महाबाहु दूषण ने जब देखा कि मेरी सेना बुरी तरह से मारी जा रही है, तब उसने युद्ध से पीछे पैर न हटाने वाले भयंकर वेगशाली पाँच हजार राक्षसों को, जिन्हें जीतना बड़ा ही कठिन था, आगे बढ़ने की आज्ञा दी॥ १ १/२॥
ते शूलैः पट्टिशैः खड्गैः शिलावधैं मैरपि॥२॥
शरवर्षैरविच्छिन्नं ववर्षुस्तं समन्ततः।
वे श्रीराम पर चारों ओर से शूल, पट्टिश, तलवार, पत्थर, वृक्ष और बाणों की लगातार वर्षा करने लगे। २ १/२॥
तद् द्रुमाणां शिलानां च वर्षं प्राणहरं महत्॥३॥
प्रतिजग्राह धर्मात्मा राघवस्तीक्ष्णसायकैः।
यह देख धर्मात्मा श्रीरघुनाथजी ने वृक्षों और शिलाओं की उस प्राणहारिणी महावृष्टि को अपने तीखे सायकों द्वारा रोका॥ ३ १/२ ॥
प्रतिगृह्य च तद् वर्षं निमीलित इवर्षभः॥४॥
रामः क्रोधं परं लेभे वधार्थं सर्वरक्षसाम्।
उस सारी वर्षा को रोककर आँख मूंदे हुए साँड़ की भाँति अविचल भाव से खड़े हुए श्रीराम ने समस्त राक्षसों के वध के लिये महान् क्रोध धारण किया॥ ४ १/२॥
ततः क्रोधसमाविष्टः प्रदीप्त इव तेजसा॥५॥
शरैरभ्यकिरत् सैन्यं सर्वतः सहदूषणम्।।
क्रोध से युक्त और तेज से उद्दीप्त हुए श्रीराम ने दूषणसहित सारी राक्षस-सेना पर चारों ओर से बाण की वर्षा आरम्भ कर दी॥ ५ १/२ ॥
ततः सेनापतिः क्रुद्धो दूषणः शत्रुदूषणः॥६॥
शरैरशनिकल्पैस्तं राघवं समवारयत्।
इससे शत्रुदूषण सेनापति दूषण को बड़ा क्रोध हुआ और उसने वज्र के समान बाणों से श्रीरामचन्द्रजी को रोका॥ ६ १/२॥
ततो रामः सुसंक्रुद्धः क्षुरेणास्य महद् धनुः॥७॥
चिच्छेद समरे वीरश्चर्तुभिश्चतुरो हयान्।
हत्वा चाश्वान् शरैस्तीक्ष्णैरर्धचन्द्रेण सारथेः॥ ८॥
शिरो जहार तद्रक्षस्त्रिभिर्विव्याध वक्षसि।
तब अत्यन्त कुपित हुए वीर श्रीराम ने समराङ्गण में क्षुर नामक बाण से दूषण के विशाल धनुष को काट डाला और चार तीखे सायकों से उसके चारों घोड़ों को मौत के घाट उतारकर एक अर्धचन्द्राकार बाण से सारथि का भी सिर उड़ा दिया तथा तीन बाणों से उस राक्षस की भी छाती में चोट पहुँचायी॥ ७-८ १/२ ॥
स च्छिन्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः॥९॥
जग्राह गिरिशृङ्गाभं परिघं रोमहर्षणम्।
वेष्टितं काञ्चनैः पट्टैर्देवसैन्याभिमर्दनम्॥१०॥
धनुष कट जाने और घोड़ों तथा सारथि के मारे जाने पर रथहीन हुए दूषण ने पर्वतशिखर के समान एक रोमाञ्चकारी परिघ हाथ में लिया, जिसके ऊपर सोने के पत्र मढ़े गये थे। वह परिघ देवताओं की सेना को भी कुचल डालने वाला था॥ ९-१० ॥
आयसैः शङ्कभिस्तीक्ष्णैः कीर्णं परवसोक्षितम्।
वज्राशनिसमस्पर्श परगोपुरदारणम्॥११॥
उसपर चारों ओर से लोहे की तीखी कीलें लगी हुई थीं। वह शत्रुओं की चर्बी से लिपटा हुआ था। उसका स्पर्श हीरे तथा वज्र के समान कठोर एवं असह्य था। वह शत्रुओं के नगरद्वार को विदीर्ण कर डालने में समर्थ था॥
तं महोरगसंकाशं प्रगृह्य परिघं रणे।
दूषणोऽभ्यपतद् रामं क्रूरकर्मा निशाचरः॥१२॥
रणभूमि में बहुत बड़े सर्प के समान भयंकर उस परिघ को हाथ में लेकर वह क्रूरकर्मा निशाचर दूषण श्रीराम पर टूट पड़ा॥ १२ ॥
तस्याभिपतमानस्य दूषणस्य च राघवः।
द्वाभ्यां शराभ्यां चिच्छेद सहस्ताभरणौ भुजौ॥ १३॥
उसे अपने ऊपर आक्रमण करते देख श्रीरामचन्द्रजी ने दो बाणों से आभूषणोंसहित उसकी दोनों भुजाएँ काट डालीं॥ १३॥
भ्रष्टस्तस्य महाकायः पपात रणमूर्धनि।
परिघश्छिन्नहस्तस्य शक्रध्वज इवाग्रतः॥१४॥
युद्ध के मुहाने पर जिसकी दोनों भुजाएँ कट गयी थीं, उस दूषण के हाथ से खिसककर वह विशालकाय परिघ इन्द्रध्वज के समान सामने गिर पड़ा ॥ १४ ॥
कराभ्यां च विकीर्णाभ्यां पपात भुवि दूषणः।
विषाणाभ्यां विशीर्णाभ्यां मनस्वीव महागजः॥ १५॥
जैसे दोनों दाँतों के उखाड़ लिये जाने पर महान् मनस्वी गजराज उनके साथ ही धराशायी हो जाता है, उसी प्रकार कटकर गिरी हुई अपनी भुजाओं के साथ ही दूषण भी पृथ्वी पर गिर पड़ा ॥ १५ ॥
दृष्ट्वा तं पतितं भूमौ दूषणं निहतं रणे।
साधु साध्विति काकुत्स्थं सर्वभूतान्यपूजयन्॥ १६॥
रणभूमि में मारे गये दूषण को धराशायी हुआ देख समस्त प्राणियों ने ‘साधु-साधु’ कहकर भगवान् श्रीराम की प्रशंसा की॥१६॥
एतस्मिन्नन्तरे क्रुद्धास्त्रयः सेनाग्रयायिनः।
संहत्याभ्यद्रवन् रामं मृत्युपाशावपाशिताः॥१७॥
महाकपालः स्थूलाक्षः प्रमाथी च महाबलः।
इसी समय सेना के आगे चलने वाले महाकपाल,स्थूलाक्ष और महाबली प्रमाथी—ये तीन राक्षस कुपित हो मौत के फंदे में फँसकर संगठित रूप से श्रीरामचन्द्रजी के ऊपर टूट पड़े।
महाकपालो विपुलं शूलमुद्यम्य राक्षसः॥१८॥
स्थूलाक्षः पट्टिशं गृह्य प्रमाथी च परश्वधम्।
राक्षस महाकपाल ने एक विशाल शूल उठाया, स्थूलाक्ष ने पट्टिश हाथ में लिया और प्रमाथी ने फरसा सँभालकर आक्रमण किया। १८ १/२ ॥
दृष्ट्वैवापततस्तांस्तु राघवः सायकैः शितैः॥१९॥
तीक्ष्णाग्रैः प्रतिजग्राह सम्प्राप्तानतिथीनिव।
उन तीनों को अपनी ओर आते देख भगवान् श्रीराम ने तीखे अग्रभाग वाले पैने सायकों द्वारा द्वार पर आये हुए अतिथियों के समान उनका स्वागत किया।
महाकपालस्य शिरश्चिच्छेद रघुनन्दनः॥२०॥
असंख्येयैस्तु बाणौघैः प्रममाथ प्रमाथिनम्।
स्थूलाक्षस्याक्षिणी स्थूले पूरयामास सायकैः॥ २१॥
श्रीरघुनन्दन ने महाकपाल का सिर एवं कपाल उड़ा दिया। प्रमाथी को असंख्य बाणसमूहों से मथ डाला और स्थूलाक्ष की स्थूल आँखों को सायकों से भर दिया॥
स पपात हतो भूमौ विटपीव महाद्रुमः।
दूषणस्यानुगान् पञ्चसाहस्रान् कुपितः क्षणात्॥ २२॥
हत्वा तु पञ्चसाहस्रैरनयद् यमसादनम्।
तीनों अग्रगामी सैनिकों का वह समूह अनेक शाखा वाले विशाल वृक्ष की भाँति पृथ्वी पर गिर पड़ा। तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजी ने कुपित हो दूषण के अनुयायी पाँच हजार राक्षसों को उतने ही बाणों का निशाना बनाकर क्षणभर में यमलोक पहुँचा दिया।। २२ १/२॥
दूषणं निहतं श्रुत्वा तस्य चैव पदानुगान्॥२३॥
व्यादिदेश खरः क्रुद्धः सेनाध्यक्षान् महाबलान्।
अयं विनिहतः संख्ये दूषणः सपदानुगः ॥२४॥
महत्या सेनया सार्धं युद्ध्वा रामं कुमानुषम्।
शस्त्रैर्नानाविधाकारैर्हनध्वं सर्वराक्षसाः॥२५॥
दूषण और उसके अनुयायी मारे गये—यह सुनकर खर को बड़ा क्रोध हुआ। उसने अपने महाबलीसेनापतियों को आज्ञा दी—’वीरो! यह दूषण अपने सेवकोंसहित युद्ध में मार डाला गया। अतः अब तुम सभी राक्षस बहुत बड़ी सेना के साथ धावा करके इस दुष्ट मनुष्य राम के साथ युद्ध करो और नाना प्रकार के शस्त्रों द्वारा इसका वध कर डालो’ ।। २३–२५ ॥
एवमुक्त्वा खरः क्रुद्धो राममेवाभिदुद्रुवे।
श्येनगामी पृथुग्रीवो यज्ञशत्रुर्विहंगमः॥२६॥
दुर्जयः करवीराक्षः परुषः कालकार्मुकः।
हेममाली महामाली सर्पास्यो रुधिराशनः ॥ २७॥
द्वादशैते महावीर्या बलाध्यक्षाः ससैनिकाः।
राममेवाभ्यधावन्त विसृजन्तः शरोत्तमान्॥२८॥
ऐसा कहकर कुपित हुए खर ने श्रीराम पर ही धावा किया। साथ ही श्येनगामी, पृथुग्रीव, यज्ञशत्रु, विहङ्गम, दुर्जय, करवीराक्ष, परुष, कालकार्मुक, हेममाली, महामाली, सर्पास्य तथा रुधिराशन—ये बारह महापराक्रमी सेनापति भी उत्तम बाणों की वर्षा करते हुए अपने सैनिकों के साथ श्रीराम पर ही टूट पड़े॥ २६–२८॥
ततः पावकसंकाशैर्हेमवज्रविभूषितैः।
जघान शेषं तेजस्वी तस्य सैन्यस्य सायकैः॥ २९॥
तब तेजस्वी श्रीरामचन्द्रजी ने सोने और हीरों से विभूषित अग्नितुल्य तेजस्वी सायकों द्वारा उस सेना के बचे-खुचे सिपाहियों का भी संहार कर डाला॥ २९॥
ते रुक्मपुङ्खा विशिखाः सधूमा इव पावकाः।
निजजुस्तानि रक्षांसि वज्रा इव महाद्रुमान्॥ ३०॥
जैसे वज्र बड़े-बड़े वृक्षों को नष्ट कर डालते हैं, उसी प्रकार धूमयुक्त अग्नि के समान प्रतीत होने वाले उन सोने की पाँखवाले बाणों ने उन समस्त राक्षसों का विनाश कर डाला।। ३०॥
रक्षसां तु शतं रामः शतेनैकेन किर्णना।
सहस्रं तु सहस्रेण जघान रणमूर्धनि ॥ ३१॥
उस युद्ध के मुहाने पर श्रीराम ने कर्णिनामक सौ बाणों से सौ राक्षसों का और सहस्र बाणों से सहस्र निशाचरों का एक साथ ही संहार कर डाला॥३१॥
तैर्भिन्नवर्माभरणाश्छिन्नभिन्नशरासनाः।
निपेतुः शोणितादिग्धा धरण्यां रजनीचराः॥ ३२॥
उन बाणों से निशाचरों के कवच, आभूषण और धनुष छिन्न-भिन्न हो गये तथा वे खून से लथपथ हो पृथ्वी पर गिर पड़े॥ ३२॥
तैर्मुक्तकेशैः समरे पतितैः शोणितोक्षितैः।
विस्तीर्णा वसुधा कृत्स्ना महावेदिः कुशैरिव॥ ३३॥
कुशों से ढकी हुई विशाल वेदी के समान युद्ध में लहूलुहान होकर गिरे हुए खुले केशवाले राक्षसों से सारी रणभूमि पट गयी॥ ३३॥
तत्क्षणे तु महाघोरं वनं निहतराक्षसम्।
बभूव निरयप्रख्यं मांसशोणितकर्दमम्॥ ३४॥
राक्षसों के मारे जाने से उस समय वहाँ रक्त और मांस की कीचड़ जम गयी; अतः वह महाभयंकर वन नरक के समान प्रतीत होने लगा॥ ३४ ॥
चतुर्दशसहस्राणि रक्षसां भीमकर्मणाम्।
हतान्येकेन रामेण मानुषेण पदातिना॥ ३५॥
मानवरूपधारी श्रीराम अकेले और पैदल थे, तो भी उन्होंने भयानक कर्म करने वाले चौदह हजार राक्षसों को तत्काल मौत के घाट उतार दिया॥ ३५ ॥
तस्य सैन्यस्य सर्वस्य खरः शेषो महारथः।
राक्षसस्त्रिशिराश्चैव रामश्च रिपुसूदनः॥ ३६॥
उस समूची सेना में केवल महारथी खर और त्रिशिरा—ये दो ही राक्षस बच रहे। उधर शत्रुसंहारक भगवान् श्रीराम ज्यों-के-त्यों युद्ध के लिये डटे रहे। ३६॥
शेषा हता महावीर्या राक्षसा रणमूर्धनि।
घोरा दुर्विषहाः सर्वे लक्ष्मणस्याग्रजेन ते॥ ३७॥
उपर्युक्त दो राक्षसों को छोड़कर शेष सभी निशाचर,जो महान् पराक्रमी, भयंकर और दुर्धर्ष थे, युद्ध के मुहाने पर लक्ष्मण के बड़े भाई श्रीराम के हाथों मारे गये॥३७॥
ततस्तु तद्भीमबलं महाहवे समीक्ष्य रामेण हतं बलीयसा।
रथेन रामं महता खरस्ततः समाससादेन्द्र इवोद्यताशनिः॥ ३८॥
तदनन्तर महासमर में महाबली श्रीराम के द्वारा अपनी भयंकर सेना को मारी गयी देख खर एक विशाल रथ के द्वारा श्रीराम का सामना करने के लिये आया, मानो वज्रधारी इन्द्र ने किसी शत्रु पर आक्रमण किया हो॥ ३८॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे षड्विंशः सर्गः ॥२६॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में छब्बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।२६॥
सर्ग-27
खरं तु रामाभिमुखं प्रयान्तं वाहिनीपतिः।
राक्षसस्त्रिशिरा नाम संनिपत्येदमब्रवीत्॥१॥
खर को भगवान् श्रीराम के सम्मुख जाते देख सेनापति राक्षस त्रिशिरा तुरंत उसके पास आ पहुँचा और इस प्रकार बोला— ॥१॥
मां नियोजय विक्रान्तं त्वं निवर्तस्व साहसात्।
पश्य रामं महाबाहं संयुगे विनिपातितम्॥२॥
‘राक्षसराज! मुझ पराक्रमी वीर को इस युद्ध में लगाइये और स्वयं इस साहसपूर्ण कार्य से अलग रहिये। देखिये, मैं अभी महाबाहु राम को युद्ध में मार गिराता हूँ॥
प्रतिजानामि ते सत्यमायुधं चाहमालभे।
यथा रामं वधिष्यामि वधार्ह सर्वरक्षसाम्॥३॥
‘आपके सामने मैं सच्ची प्रतिज्ञा करता हूँ और अपने हथियार छूकर शपथ खाता हूँ कि जो समस्त राक्षसों के लिये वध के योग्य हैं, उन राम का मैं अवश्य वध करूँगा॥३॥
अहं वास्य रणे मृत्युरेष वा समरे मम।
विनिवर्त्य रणोत्साहं मुहूर्तं प्राश्निको भव॥४॥
‘इस युद्ध में या तो मैं इनकी मृत्यु बनूंगा, या ये ही समराङ्गण में मेरी मृत्यु का कारण होंगे। आप इस समय अपने युद्धविषयक उत्साह को रोककर एक मुहूर्त के लिये जय-पराजय का निर्णय करने वाले साक्षी बन जाइये॥४॥
प्रहृष्टो वा हते रामे जनस्थानं प्रयास्यसि।
मयि वा निहते रामं संयुगाय प्रयास्यसि॥५॥
‘यदि मेरे द्वारा राम मारे गये तो आप प्रसन्नतापूर्वक जनस्थान को लौट जाइये अथवा यदि राम ने ही मुझे मार दिया तो आप युद्ध के लिये इन पर धावा बोल दीजियेगा’।
खरस्त्रिशिरसा तेन मृत्युलोभात् प्रसादितः।
गच्छ युध्येत्यनुज्ञातो राघवाभिमुखो ययौ॥६॥
भगवान् के हाथ से मृत्यु का लोभ होने के कारण जब त्रिशिरा ने इस प्रकार खर को राजी किया, तब उसने आज्ञा दे दी—’अच्छा जाओ, युद्ध करो। आज्ञा पाकर वह श्रीरामचन्द्रजी की ओर चला॥६॥
त्रिशिरास्तु रथेनैव वाजियुक्तेन भास्वता।
अभ्यद्रवद् रणे रामं त्रिशृङ्ग इव पर्वतः॥७॥
घोड़े जुते हुए एक तेजस्वी रथ के द्वारा त्रिशिरा ने रणभूमि में श्रीराम पर आक्रमण किया। उस समय वह तीन शिखरों वाले पर्वत के समान जान पड़ता था॥७॥
शरधारासमूहान् स महामेघ इवोत्सृजन्।।
व्यसृजत् सदृशं नादं जलार्द्रस्येव दुन्दुभेः॥८॥
उसने आते ही बड़े भारी मेघ की भाँति बाणरूपी धाराओं की वर्षा प्रारम्भ कर दी और वह जल से भीगे हुए नगाड़े की तरह विकट गर्जना करने लगा॥८॥
आगच्छन्तं त्रिशिरसं राक्षसं प्रेक्ष्य राघवः।
धनुषा प्रतिजग्राह विधुन्वन् सायकान् शितान्॥
त्रिशिरा नामक राक्षस को आते देख श्रीरघुनाथजी ने धनुष के द्वारा पैने बाण छोड़ते हुए उसे अपने प्रतिद्वन्द्वी के रूप में ग्रहण किया (अथवा उसे आगे बढ़ने से रोक दिया) ॥९॥
स सम्प्रहारस्तुमुलो रामत्रिशिरसोस्तदा।
सम्बभूवातिबलिनोः सिंहकुञ्जरयोरिव॥१०॥
अत्यन्त बलशाली श्रीराम और त्रिशिरा का वह संग्राम महाबली सिंह और गजराज के युद्ध की भाँति बड़ा भयंकर प्रतीत होता था॥ १० ॥
ततस्त्रिशिरसा बाणैर्ललाटे ताडितस्त्रिभिः।
अमर्षी कुपितो रामः संरब्ध इदमब्रवीत्॥११॥
उस समय त्रिशिरा ने तीन बाणों से श्रीरामचन्द्रजी के ललाट को बींध डाला। श्रीराम उसकी यह उद्दण्डता सहन न कर सके। वे कुपित हो रोषावेश में भरकर इस प्रकार बोले- ॥११॥
अहो विक्रमशूरस्य राक्षसस्येदृशं बलम्।
पुष्पैरिव शरैर्योऽहं ललाटेऽस्मि परिक्षतः॥१२॥
ममापि प्रतिगृह्णीष्व शरांश्चापगुणाच्च्युतान्।
‘अहो! पराक्रम प्रकट करने में शूरवीर राक्षस का ऐसा ही बल है, जो तुमने फूलों-जैसे बाणों द्वारा मेरे ललाट पर प्रहार किया है। अच्छा, अब धनुष की डोरी से छूटे हुए मेरे बाणों को भी ग्रहण करो’॥ १२ १/२॥
एवमुक्त्वा सुसंरब्धः शरानाशीविषोपमान्॥ १३॥
त्रिशिरोवक्षसि क्रुद्धो निजघान चतुर्दश।
ऐसा कहकर रोष में भरे हुए श्रीराम ने त्रिशिरा की छाती में क्रोधपूर्वक चौदह बाण मारे, जो विषधर सौ के समान भयंकर थे॥१३ १/२॥
चतुर्भिस्तुरगानस्य शरैः संनतपर्वभिः॥१४॥
न्यपातयत तेजस्वी चतुरस्तस्य वाजिनः।
अष्टभिः सायकैः सूतं रथोपस्थे न्यपातयत्॥ १५॥
तदनन्तर तेजस्वी रघुनाथजी ने झुकी गाँठ वाले चार बाणों से उसके चारों घोड़ों को मार गिराया। फिर आठ सायकों द्वारा उसके सारथि को भी रथ की बैठक में ही सुला दिया॥१४-१५॥
रामश्चिच्छेद बाणेन ध्वजं चास्य समुच्छ्रितम्।
ततो हतरथात् तस्मादुत्पतन्तं निशाचरम्॥१६॥
चिच्छेद रामस्तं बाणैर्हृदये सोऽभवज्जडः।
इसके बाद श्रीराम ने एक बाण से उसकी ध्वजा भी काट डाली। तदनन्तर जब वह उस नष्ट हुए रथ से कूदने लगा, उसी समय श्रीराघवेन्द्र ने अनेक बाणों द्वारा उस निशाचर की छाती छेद डाली फिर तो वह जडवत् हो गया॥ १६ १/२ ॥
सायकैश्चाप्रमेयात्मा सामर्षस्तस्य रक्षसः॥१७॥
शिरांस्यपातयत् त्रीणि वेगवद्भिस्त्रिभिः शरैः।
इसके बाद अप्रमेयस्वरूप श्रीराम ने अमर्ष में भरकर तीन वेगशाली एवं विनाशकारी बाणों द्वारा उस राक्षस के तीनों मस्तक काट गिराये॥ १७ १/२ ॥
स धूमशोणितोद्गारी रामबाणाभिपीडितः॥ १८॥
न्यपतत् पतितैः पूर्वं समरस्थो निशाचरः।
समराङ्गण में खड़ा हुआ वह निशाचर श्रीरामचन्द्रजी के बाणों से पीड़ित हो अपने धड़ से भापसहित रुधिर उगलता हुआ पहले गिरे हुए मस्तकों के साथ ही धराशायी हो गया॥ १८ १/२॥
हतशेषास्ततो भग्ना राक्षसाः खरसंश्रयाः॥१९॥
द्रवन्ति स्म न तिष्ठन्ति व्याघ्रत्रस्ता मृगा इव।।
तत्पश्चात् खर की सेवा में रहने वाले राक्षस, जो मरने से बचे हुए थे, भाग खड़े हुए। वे व्याघ्र से डरे हुए मृगों के समान भागते ही चले जाते थे, खड़े नहीं होते थे॥
तान् खरो द्रवतो दृष्ट्वा निवर्त्य रुषितस्त्वरन्।
राममेवाभिदुद्राव राहुश्चन्द्रमसं यथा॥ २०॥
उन्हें भागते देख रोष में भरे हुए खर ने तुरंत लौटाया और जैसे राहु चन्द्रमा पर आक्रमण करता है, उसी प्रकार उसने श्रीराम पर ही धावा किया॥ २० ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे सप्तविंशः सर्गः ॥२७॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में सत्ताईसवाँ सर्ग पूरा हुआ।२७॥
सर्ग-28
निहतं दूषणं दृष्ट्वा रणे त्रिशिरसा सह।
खरस्याप्यभवत् त्रासो दृष्ट्वा रामस्य विक्रमम्॥ १॥
त्रिशिरासहित दूषण को रणभूमि में मारा गया देख श्रीराम के पराक्रमपर दृष्टिपात करके खर को भी बड़ा भय हुआ॥१॥
स दृष्ट्वा राक्षसं सैन्यमविषह्यं महाबलम्।
हतमेकेन रामेण दूषणस्त्रिशिरा अपि॥२॥
तबलं हतभूयिष्ठं विमनाः प्रेक्ष्य राक्षसः।
आससाद खरो रामं नमुचिर्वासवं यथा॥३॥
एकमात्र श्रीराम ने महान् बलशाली और असह्य राक्षस-सेना का वध कर डाला। दूषण और त्रिशिरा को भी मार गिराया तथा मेरी सेना के अधिकांश (चौदह हजार) प्रमुख वीरों को काल के गाल में भेज दिया यह सब देख और सोचकर राक्षस खर उदास हो गया। उसने श्रीराम पर उसी तरह आक्रमण किया, जैसे नमुचि ने इन्द्र पर किया था॥ २-३॥
विकृष्य बलवच्चापं नाराचान् रक्तभोजनान्।
खरश्चिक्षेप रामाय क्रुद्धानाशीविषानिव॥४॥
खर ने एक प्रबल धनुष को खींचकर श्रीराम के प्रति बहुत-से नाराच चलाये, जो रक्त पीने वाले थे। वे समस्त नाराच रोष में भरे हुए विषधर सर्पो के समान प्रतीत होते थे॥४॥
ज्यां विधुन्वन् सुबहुशः शिक्षयास्त्राणि दर्शयन्।
चचार समरे मार्गान् शरै रथगतः खरः॥५॥
धनुर्विद्या के अभ्यास से प्रत्यञ्चा को हिलाता और नाना प्रकार के अस्त्रों का प्रदर्शन करता हुआ रथारूढ़ खर समराङ्गण में युद्ध के अनेक पैंतरे दिखाता हुआ विचरने लगा॥ ५॥
स सर्वाश्च दिशो बाणैः प्रदिशश्च महारथः।
पूरयामास तं दृष्ट्वा रामोऽपि सुमहद् धनुः॥६॥
उस महारथी वीर ने अपने बाणों से समस्त दिशाओं और विदिशाओं को ढक दिया। उसे ऐसा करते देख श्रीराम ने भी अपना विशाल धनुष उठाया और समस्त दिशाओं को बाणों से आच्छादित कर दिया॥६॥
स सायकैर्दुर्विषहैर्विस्फुलिङ्गैरिवाग्निभिः।
नभश्चकाराविवरं पर्जन्य इव वृष्टिभिः॥७॥
जैसे मेघ जल की वर्षा से आकाश को ढक देता है, उसी प्रकार श्रीरघुनाथजी ने भी आग की चिनगारियों के समान दुःसह सायकों की वर्षा करके आकाश को ठसाठस भर दिया। वहाँ थोड़ी-सी भी जगह खाली नहीं रहने दी॥
तद् बभूव शितैर्बाणैः खररामविसर्जितैः।
पर्याकाशमनाकाशं सर्वतः शरसंकुलम्॥८॥
खर और श्रीराम द्वारा छोड़े गये पैने बाणों से व्याप्त हो सब ओर फैला हुआ आकाश चारों ओर से बाणों द्वारा भर जाने के कारण अवकाश रहित हो गया। ८॥
शरजालावृतः सूर्यो न तदा स्म प्रकाशते।
अन्योन्यवधसंरम्भादुभयोः सम्प्रयुध्यतोः॥९॥
एक-दूसरे के वध के लिये रोषपूर्वक जूझते हुए उन दोनों वीरों के बाणजाल से आच्छादित होकर सूर्यदेव प्रकाशित नहीं होते थे॥९॥
ततो नालीकनाराचैस्तीक्ष्णाग्रैश्च विकर्णिभिः ।
आजघान रणे रामं तोत्रैरिव महाद्विपम्॥१०॥
तदनन्तर खर ने रणभूमि में श्रीराम पर नालीक, नाराच और तीखे अग्रभागवाले विकर्णि नामक बाणों द्वारा प्रहार किया, मानो किसी महान् गजराज को अङ्कशों द्वारा मारा गया हो॥१०॥
तं रथस्थं धनुष्पाणिं राक्षसं पर्यवस्थितम्।
ददृशुः सर्वभूतानि पाशहस्तमिवान्तकम्॥११॥
उस समय हाथ में धनुष लेकर रथ में स्थिरतापूर्वक बैठे हुए राक्षस खर को समस्त प्राणियों ने पाशधारी यमराज के समान देखा ॥ ११॥
हन्तारं सर्वसैन्यस्य पौरुषे पर्यवस्थितम्।
परिश्रान्तं महासत्त्वं मेने रामं खरस्तदा ॥१२॥
उस वेला में समस्त सेनाओं का वध करने वाले तथा पुरुषार्थ पर डटे हुए महान् बलशाली श्रीराम को खर ने थका हुआ समझा ॥ १२ ॥
तं सिंहमिव विक्रान्तं सिंहविक्रान्तगामिनम्।
दृष्ट्वा नोद्विजते रामः सिंहः क्षुद्रमृगं यथा॥१३॥
यद्यपि वह सिंह के समान चलता और सिंह के ही तुल्य पराक्रम प्रकट करता था तो भी उस खर को देखकर श्रीराम उसी तरह उद्विग्न नहीं होते थे, जैसे छोटे-से मृग को देखकर सिंह भयभीत नहीं होता है।
ततः सूर्यनिकाशेन रथेन महता खरः।
आससादाथ तं रामं पतङ्ग इव पावकम्॥१४॥
तत्पश्चात् जैसे पतिङ्गा आग के पास जाता है, उसी प्रकार खर अपने सूर्यतुल्य तेजस्वी विशाल रथ के द्वारा श्रीरामचन्द्रजी के पास गया॥१४॥
ततोऽस्य सशरं चापं मुष्टिदेशे महात्मनः।
खरश्चिच्छेद रामस्य दर्शयन् हस्तलाघवम्॥ १५॥
वहाँ जाकर उस राक्षस खर ने अपने हाथ की फुर्ती दिखाते हुए महात्मा श्रीराम के बाणसहित धनुष को मुट्ठी पकड़ने की जगह से काट डाला॥१५॥
स पुनस्त्वपरान् सप्त शरानादाय मर्मणि।
निजघान रणे क्रुद्धः शक्राशनिसमप्रभान्॥१६॥
फिर इन्द्र के वज्र की भाँति प्रकाशित होने वाले दूसरे सात बाण लेकर रणभूमि में कुपित हुए खर ने उनके द्वारा श्रीराम के मर्मस्थल में चोट पहुँचायी॥ १६॥
ततः शरसहस्रेण राममप्रतिमौजसम्।
अर्दयित्वा महानादं ननाद समरे खरः॥१७॥
तदनन्तर अप्रतिम बलशाली श्रीराम को सहस्रों बाणों से पीड़ित करके निशाचर खर समर भूमि में जोर जोर से गर्जना करने लगा॥ १७॥ ।
ततस्तत्प्रहतं बाणैः खरमुक्तैः सुपर्वभिः।
पपात कवचं भूमौ रामस्यादित्यवर्चसम्॥१८॥
खर के छोड़े हुए उत्तम गाँठ वाले बाणों द्वारा कटकर श्रीराम का सूर्यतुल्य तेजस्वी कवच पृथ्वी पर गिर पड़ा ॥ १८॥
स शरैरर्पितः क्रुद्धः सर्वगात्रेषु राघवः।
रराज समरे रामो विधूमोऽग्निरिव ज्वलन्॥१९॥
उनके सभी अङ्गों में खर के बाण धंस गये थे। उस समय कुपित हो समर भूमि में खड़े हुए श्रीरघुनाथजी धूमरहित प्रज्वलित अग्नि की भाँति शोभा पा रहे थे॥ १९॥
ततो गम्भीरनिर्हादं रामः शत्रुनिबर्हणः।
चकारान्ताय स रिपोः सज्यमन्यन्महद्धनुः ॥२०॥
तब शत्रुओं का नाश करने वाले भगवान् श्रीराम ने अपने विपक्षी का विनाश करने के लिये एक-दूसरे विशाल धनुष पर, जिसकी ध्वनि बहुत ही गम्भीर थी, प्रत्यञ्चा चढ़ायी॥ २० ॥
सुमहद् वैष्णवं यत् तदतिसृष्टं महर्षिणा।
वरं तद् धनुरुद्यम्य खरं समभिधावत ॥२१॥
महर्षि अगस्त्य ने जो महान् और उत्तम वैष्णव धनुष प्रदान किया था, उसी को लेकर उन्होंने खर पर धावा किया॥ २१॥
ततः कनकपुडैस्तु शरैः संनतपर्वभिः।
चिच्छेद रामः संक्रुद्धः खरस्य समरे ध्वजम्॥ २२॥
उस समय अत्यन्त क्रोध में भरकर श्रीराम ने सोने की पाँख और झुकी हुई गाँठ वाले बाणों द्वारा समराङ्गण में खर की ध्वजा काट डाली॥ २२ ॥
स दर्शनीयो बहुधा विच्छिन्नः काञ्चनो ध्वजः।
जगाम धरणीं सूर्यो देवतानामिवाज्ञया॥२३॥
वह दर्शनीय सुवर्णमय ध्वज अनेक टुकड़ों में कटकर धरती पर गिर पड़ा, मानो देवताओं की आज्ञा से सूर्यदेव भूमि पर उतर आये हों॥ २३॥
तं चतुर्भिः खरः क्रुद्धो रामं गात्रेषु मार्गणैः।
विव्याध हृदि मर्मज्ञो मातङ्गमिव तोमरैः॥ २४॥
क्रोध में भरे हुए खर को मर्मस्थानों का ज्ञान था। उसने श्रीराम के अङ्गों में, विशेषतः उनकी छाती में चारबाण मारे, मानो किसी महावत ने गजराज पर तोमरों से प्रहार किया हो॥ २४॥
स रामो बहुभिर्बाणैः खरकार्मुकनिःसृतैः।
विद्धो रुधिरसिक्ताङ्गो बभूव रुषितो भृशम्॥ २५॥
खर के धनुष से छूटे हुए बहुसंख्यक बाणों से घायल होकर श्रीराम का सारा शरीर लहूलुहान हो गया। इससे उनको बड़ा रोष हुआ॥ २५ ॥
स धनुर्धन्विनां श्रेष्ठः संगृह्य परमाहवे।
मुमोच परमेष्वासः षट् शरानभिलक्षितान्॥ २६॥
धनुर्धरों में श्रेष्ठ महाधनुर्धर श्रीराम ने युद्धस्थल में पूर्वोक्त श्रेष्ठ धनुष को हाथ में लेकर लक्ष्य निश्चित करके खर को छः बाण मारे॥ २६॥
शिरस्येकेन बाणेन द्वाभ्यां बाह्वोरथार्पयत् ।
त्रिभिश्चन्द्रार्धवक्त्रैश्च वक्षस्यभिजघान ह॥ २७॥
उन्होंने एक बाण उसके मस्तक में, दो से उसकी भुजाओं में और तीन अर्धचन्द्राकार बाण से उसकी छाती में गहरी चोट पहुँचायी॥२७॥
ततः पश्चान्महातेजा नाराचान् भास्करोपमान्।
जघान राक्षसं क्रुद्धस्त्रयोदश शिलाशितान्॥ २८॥
तत्पश्चात् महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजी ने कुपित होकर उस राक्षस को शान पर तेज किये हुए और सूर्य के समान चमकने वाले तेरह बाण मारे॥ २८॥
रथस्य युगमेकेन चतुर्भिः शबलान् हयान्।
षष्ठेन च शिरः संख्ये चिच्छेद खरसारथेः ॥२९॥
एक बाण से तो उसके रथ का जूआ काट दिया, चार बाणों से चारों चितकबरे घोड़े मार डाले और छठे बाण से युद्धस्थल में खर के सारथि का मस्तक काट गिराया॥२९॥
त्रिभिस्त्रिवेणून् बलवान् द्वाभ्यामक्षं महाबलः।
द्वादशेन तु बाणेन खरस्य सशरं धनुः॥ ३०॥
छित्त्वा वज्रनिकाशेन राघवः प्रहसन्निव।
त्रयोदशेनेन्द्रसमो बिभेद समरे खरम्॥३१॥
तत्पश्चात् तीन बाणों से त्रिवेणु (जूए के आधारदण्ड) और दोसे रथ के धुरे को खण्डित करके महान् शक्तिशाली और बलवान् श्रीराम ने बारहवें बाण से खर के बाणसहित धनुष के दो टुकड़े कर दिये। इसके बाद इन्द्र के समान तेजस्वी श्रीराघवेन्द्र ने हँसते हँसते वज्रतुल्य तेरहवें बाण के द्वारा समराङ्गण में खर को घायल कर दिया॥ ३०-३१॥
प्रभग्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः।
गदापाणिरवप्लुत्य तस्थौ भूमौ खरस्तदा ॥३२॥
धनुष के खण्डित होने, रथ के टूटने, घोड़ों के मारे जाने और सारथि के भी नष्ट हो जाने पर खर उस समय हाथ में गदा ले रथ से कूदकर धरती पर खड़ा हो गया॥ ३२॥
तत् कर्म रामस्य महारथस्य समेत्य देवाश्च महर्षयश्च।
अपूजयन् प्राञ्जलयः प्रहृष्टास्तदा विमानाग्रगताः समेताः॥३३॥
उस अवसर पर विमान पर बैठे हुए देवता और महर्षि हर्ष से उत्फुल्ल हो परस्पर मिलकर हाथ जोड़ महारथी श्रीराम के उस कर्म की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे॥३३॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डेऽष्टाविंशः सर्गः ॥२८॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में अट्ठाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ।२८॥
सर्ग-29
खरं तु विरथं रामो गदापाणिमवस्थितम्।
मृदुपूर्वं महातेजाः परुषं वाक्यमब्रवीत्॥१॥
खर को रथहीन होकर गदा हाथ में लिये सामने उपस्थित देख महातेजस्वी भगवान् श्रीराम पहले कोमल और फिर कठोर वाणी में बोले- ॥१॥
गजाश्वरथसम्बाधे बले महति तिष्ठता।
कृतं ते दारुणं कर्म सर्वलोकजुगुप्सितम्॥२॥
उद्वेजनीयो भूतानां नृशंसः पापकर्मकृत् ।
त्रयाणामपि लोकानामीश्वरोऽपि न तिष्ठति॥३॥
कर्म लोकविरुद्धं तु कुर्वाणं क्षणदाचर।
तीक्ष्णं सर्वजनो हन्ति सष दुष्टमिवागतम्॥४॥
‘निशाचर! हाथी, घोड़े और रथों से भरी हुई विशाल सेना के बीच में खड़े रहकर (असंख्य राक्षसों के स्वामित्व का अभिमान लेकर) तूने सदा जो क्रूरतापूर्ण कर्म किया है, उसकी समस्त लोकों द्वारा निन्दा हुई है। जो समस्त प्राणियों को उद्वेग में डालने वाला, क्रूर और पापाचारी है, वह तीनों लोकों का ईश्वर हो तो भी अधिक काल तक टिक नहीं सकता। जो लोकविरोधी कठोर कर्म करने वाला है, उसे सब लोग सामने आये हुए दुष्ट सर्प की भाँति मारते हैं॥२-४॥
लोभात् पापानि कुर्वाणः कामाद् वा यो न बुध्यते।
हृष्टः पश्यति तस्यान्तं ब्राह्मणी करकादिव॥५॥
‘जो वस्तु प्राप्त नहीं हुई है, उसकी इच्छा को ‘काम’ कहते हैं और प्राप्त हुई वस्तु को अधिक-से अधिक संख्या में पाने की इच्छा का नाम ‘लोभ’ है। जो काम अथवा लोभ से प्रेरित हो पाप करता है और उसके (विनाशकारी) परिणाम को नहीं समझता है, उलटे उस पाप में हर्ष का अनुभव करता है, वह उसी प्रकार अपना विनाशरूप परिणाम देखता है जैसे वर्षा के साथ गिरे हुए ओले को खाकर ब्राह्मणी (रक्तपुच्छिका) नाम वाली कीड़ी अपना विनाश देखती है * ॥ ५॥
* लाल पूँछवाली एक कीड़ी होती है, जो ओला खा लेने पर मर जाती है। वह उसके लिये विष का काम करता है—यह बात लोक में प्रसिद्ध है।
वसतो दण्डकारण्ये तापसान् धर्मचारिणः।
किं नु हत्वा महाभागान् फलं प्राप्स्यसि राक्षस॥
‘राक्षस! दण्डकारण्य में निवास करने वाले तपस्या में संलग्न धर्मपरायण महाभाग मुनियों की हत्या करके न जाने तू कौन-सा फल पायेगा? ॥ ६॥
न चिरं पापकर्माणः क्रूरा लोकजुगुप्सिताः।
ऐश्वर्यं प्राप्य तिष्ठन्ति शीर्णमूला इव द्रुमाः॥७॥
‘जिनकी जड़ खोखली हो गयी हो, वे वृक्ष जैसे अधिक कालतक नहीं खड़े रह सकते, उसी प्रकार पापकर्म करने वाले लोकनिन्दित क्रूर पुरुष (किसी पूर्वपुण्य के प्रभाव से) ऐश्वर्य को पाकर भी चिरकाल तक उसमें प्रतिष्ठित नहीं रह पाते (उससे भ्रष्ट हो ही जाते हैं)॥७॥
अवश्यं लभते कर्ता फलं पापस्य कर्मणः।
घोरं पर्यागते काले द्रुमः पुष्पमिवार्तवम्॥८॥
‘जैसे समय आने पर वृक्ष में ऋतु के अनुसार फूल लगते ही हैं, उसी प्रकार पापकर्म करने वाले पुरुष को समयानुसार अपने उस पापकर्म का भयंकर फल अवश्य ही प्राप्त होता है॥८॥
नचिरात् प्राप्यते लोके पापानां कर्मणां फलम्।
सविषाणामिवान्नानां भुक्तानां क्षणदाचर ॥९॥
‘निशाचर! जैसे खाये हुए विषमिश्रित अन्न का परिणाम तुरंत ही भोगना पड़ता है, उसी प्रकार लोक में किये गये पापकर्मों का फल शीघ्र ही प्राप्त होता है॥९॥
पापमाचरतां घोरं लोकस्याप्रियमिच्छताम्।
अहमासादितो राज्ञा प्राणान् हन्तुं निशाचर ॥ १०॥
‘राक्षस! जो संसार का बुरा चाहते हुए घोर पापकर्म में लगे हुए हैं, उन्हें प्राणदण्ड देने के लिये मेरे पिता महाराज दशरथ ने मुझे यहाँ वन में भेजा है। १०॥
अद्य भित्त्वा मया मुक्ताः शराः काञ्चनभूषणाः।
विदार्यातिपतिष्यन्ति वल्मीकमिव पन्नगाः॥ ११॥
‘आज मेरे छोड़े हुए सुवर्णभूषित बाण जैसे सर्प बाँबी को छेदकर निकलते हैं, उसी प्रकार तेरे शरीर को फाड़कर पृथ्वी को भी विदीर्ण करके पाताल में जाकर गिरेंगे॥११॥
ये त्वया दण्डकारण्ये भक्षिता धर्मचारिणः।
तानद्य निहतः संख्ये ससैन्योऽनुगमिष्यसि ॥१२॥
‘तूने दण्डकारण्य में जिन धर्मपरायण ऋषियों का भक्षण किया है, आज युद्ध में मारा जाकर सेनासहित तू भी उन्हीं का अनुसरण करेगा॥ १२॥
अद्य त्वां निहतं बाणैः पश्यन्तु परमर्षयः।
निरयस्थं विमानस्था ये त्वया निहताः पुरा॥ १३॥
‘पहले तूने जिनका वध किया है, वे महर्षि विमान पर बैठकर आज तुझे मेरे बाणों से मारा गया और नरकतुल्य कष्ट भोगता हुआ देखें॥ १३॥
प्रहरस्व यथाकामं कुरु यत्नं कुलाधम।
अद्य ते पातयिष्यामि शिरस्तालफलं यथा ॥१४॥
कुलाधम! तेरी जितनी इच्छा हो, प्रहार कर। जितना सम्भव हो, मुझे परास्त करने का प्रयत्न कर, किंतु आज मैं तेरे मस्तक को ताड़के फल की भाँति अवश्य काट गिराऊँगा’॥ १४ ॥
एवमुक्तस्तु रामेण क्रुद्धः संरक्तलोचनः।
प्रत्युवाच ततो रामं प्रहसन् क्रोधमूर्च्छितः॥ १५॥
श्रीराम के ऐसा कहने पर खर कुपित हो उठा। उसकी आँखें लाल हो गयीं। वह क्रोध से अचेत-सा होकर हँसता हुआ श्रीराम को इस प्रकार उत्तर देने लगा— ॥१५॥
प्राकृतान् राक्षसान् हत्वा युद्धे दशरथात्मज।
आत्मना कथमात्मानमप्रशस्यं प्रशंससि ॥१६॥
‘दशरथकुमार! तुम साधारण राक्षसों को युद्ध में मारकर स्वयं ही अपनी इतनी प्रशंसा कैसे कर रहे हो? तुम प्रशंसा के योग्य कदापि नहीं हो॥१६॥
विक्रान्ता बलवन्तो वा ये भवन्ति नरर्षभाः।
कथयन्ति न ते किंचित् तेजसा चातिगर्विताः॥ १७॥
‘जो श्रेष्ठ पुरुष पराक्रमी अथवा बलवान् होते हैं, वे अपने प्रताप के कारण अधिक घमंड में भरकर कोई बात नहीं कहते हैं (अपने विषय में मौन ही रहते हैं)॥ १७॥
प्राकृतास्त्वकृतात्मानो लोके क्षत्रियपांसनाः।
निरर्थकं विकत्थन्ते यथा राम विकत्थसे॥१८॥
‘राम! जो क्षुद्र, अजितात्मा और क्षत्रियकुलकलंक होते हैं, वे ही संसार में अपनी बड़ाई के लिये व्यर्थ डींग हाँका करते हैं; जैसे इस समय तुम (अपने विषय में) बढ़-बढ़कर बातें बना रहे हो। १८॥
कुलं व्यपदिशन् वीरः समरे कोऽभिधास्यति।
मृत्युकाले तु सम्प्राप्ते स्वयमप्रस्तवे स्तवम्॥ १९॥
‘जब कि मृत्यु के समान युद्ध का अवसर उपस्थित है, ऐसे समय में बिना किसी प्रस्ताव के ही समराङ्गण में कौन वीर अपनी कुलीनता प्रकट करता हुआ आप ही अपनी स्तुति करेगा? ॥ १९ ॥
सर्वथा तु लघुत्वं ते कत्थनेन विदर्शितम्।
सुवर्णप्रतिरूपेण तप्तेनेव कुशाग्निना॥२०॥
‘जैसे पीतल सुवर्णशोधक आग में तपाये जाने पर अपनी लघुता (कालेपन) को ही व्यक्त करता है,उसी प्रकार अपनी झूठी प्रशंसा के द्वारा तुमने सर्वथा अपने ओछेपन का ही परिचय दिया है॥ २० ॥
न तु मामिह तिष्ठन्तं पश्यसि त्वं गदाधरम्।
धराधरमिवाकम्प्यं पर्वतं धातुभिश्चितम्॥२१॥
‘क्या तुम नहीं देखते कि मैं नाना प्रकार के धातुओं की खानों से युक्त तथा पृथ्वी को धारण करने वाले अविचल कुलपर्वत के समान यहाँ स्थिरभाव से तुम्हारे सामने गदा लेकर खड़ा हूँ॥२१॥
पर्याप्तोऽहं गदापाणिर्हन्तुं प्राणान् रणे तव।
त्रयाणामपि लोकानां पाशहस्त इवान्तकः॥ २२॥
‘मैं अकेला ही पाशधारी यमराज की भाँति गदा हाथ में लेकर रणभूमि में तुम्हारे और तीनों लोकों के भी प्राण लेने की शक्ति रखता हूँ॥ २२॥
कामं बह्वपि वक्तव्यं त्वयि वक्ष्यामि न त्वहम्।
अस्तं प्राप्नोति सविता युद्धविघ्नस्ततो भवेत्॥ २३॥
‘यद्यपि तुम्हारे विषय में मैं इच्छानुसार बहुत कुछ कह सकता हूँ तथापि इस समय कुछ नहीं कहूँगा; क्योंकि सूर्यदेव अस्ताचल को जा रहे हैं, अतः युद्ध में विघ्न पड़ जायगा॥ २३॥
चतुर्दश सहस्राणि राक्षसानां हतानि ते।
त्वद्विनाशात् करोम्यद्य तेषामश्रुप्रमार्जनम्॥ २४॥
‘तुमने चौदह हजार राक्षसों का संहार किया है, अतः आज तुम्हारा भी विनाश करके मैं उन सबके आँसू पोलूंगा—उनकी मौत का बदला चुकाऊँगा’। २४॥
इत्युक्त्वा परमक्रुद्धः स गदां परमाङ्गदाम्।
खरश्चिक्षेप रामाय प्रदीप्तामशनिं यथा॥२५॥
ऐसा कहकर अत्यन्त क्रोध से भरे हुए खर ने उत्तम वलय (कड़े) से विभूषित तथा प्रज्वलित वज्र के समान भयंकर गदा को श्रीरामचन्द्रजी के ऊपर चलाया॥२५॥
खरबाहुप्रमुक्ता सा प्रदीप्ता महती गदा।
भस्म वृक्षांश्च गुल्मांश्च कृत्वागात् तत्समीपतः॥ २६॥
खर के हाथों से छूटी हुई वह दीप्तिमान् विशाल गदा वृक्षों और लताओं को भस्म करके उनके समीप जा पहुँची॥ २६॥
तामापतन्ती महतीं मृत्युपाशोपमां गदाम्।
अन्तरिक्षगतां रामश्चिच्छेद बहुधा शरैः॥२७॥
मृत्यु के पाश की भाँति उस विशाल गदा को अपने ऊपर आती देख श्रीरामचन्द्रजी ने अनेक बाण मारकर आकाश में ही उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले॥२७॥
सा विशीर्णा शरैर्भिन्ना पपात धरणीतले।
गदा मन्त्रौषधिबलैक्लीव विनिपातिता॥२८॥
बाणों से विदीर्ण एवं चूर-चूर होकर वह गदा पृथ्वी पर गिर पड़ी, मानो कोई सर्पिणी मन्त्र और ओषधियों के बल से गिरायी गयी हो ॥२८॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे एकोनत्रिंशः सर्गः॥२९॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में उनतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।२९॥
सर्ग-30
भित्त्वा तु तां गदां बाणै राघवो धर्मवत्सलः।
स्मयमान इदं वाक्यं संरब्धमिदमब्रवीत्॥१॥
धर्म प्रेमी भगवान् श्रीराम ने अपने बाणों द्वारा खर की उस गदा को विदीर्ण करके मुसकराते हुए यह रोषसूचक बात कही— ॥१॥
एतत् ते बलसर्वस्वं दर्शितं राक्षसाधम।
शक्तिहीनतरो मत्तो वृथा त्वमुपगर्जसि॥२॥
‘राक्षसाधम! यही तेरा सारा बल है, जिसे तूने इस गदा के साथ दिखाया है। अब सिद्ध हो गया कि तू मुझसे अत्यन्त शक्तिहीन है व्यर्थ ही अपने बल की डींग हाँक रहा था॥२॥
एषा बाणविनिर्भिन्ना गदा भूमितलं गता।
अभिधानप्रगल्भस्य तव प्रत्ययघातिनी॥३॥
‘मेरे बाणों से छिन्न-भिन्न होकर तेरी यह गदा पृथ्वी पर पड़ी हुई है। तेरे मन में जो यह विश्वास था कि मैं इस गदा से शत्रु का वध कर डालूँगा, इसका खण्डन तेरी इस गदा ने ही कर दिया। अब यह स्पष्ट हो गया कि तू केवल बातें बनाने में ढीठ है (तुझसे कोई पराक्रम नहीं हो सकता) ॥ ३॥
यत् त्वयोक्तं विनष्टानामिदमश्रुप्रमार्जनम्।
राक्षसानां करोमीति मिथ्या तदपि ते वचः॥४॥
‘तूने जो यह कहा था कि मैं तुम्हारा वध करके तुम्हारे हाथ से मारे गये राक्षसों का अभी आँसू पोछूगा, तेरी वह बात भी झूठी हो गयी॥ ४॥
नीचस्य क्षुद्रशीलस्य मिथ्यावृत्तस्य रक्षसः।
प्राणानपहरिष्यामि गरुत्मानमृतं यथा॥५॥
‘तू नीच, क्षुद्रस्वभाव से युक्त और मिथ्याचारी राक्षस है। मैं तेरे प्राणों को उसी प्रकार हर लूँगा, जैसे गरुड़ने देवताओं के यहाँ से अमृत का अपहरण किया था॥५॥
अद्य ते भिन्नकण्ठस्य फेनबुबुदभूषितम्।
विदारितस्य मद्बाणैर्मही पास्यति शोणितम्॥
‘अब मैं अपने बाणों से तेरे शरीर को विदीर्ण करके तेरा गला भी काट डालूँगा। फिर यह पृथ्वी फेन और बुदबुदों से युक्त तेरे गरम-गरम रक्त का पान करेगी।
पांसुरूषितसर्वाङ्गः स्रस्तन्यस्तभुजदयः।
स्वप्स्यसे गां समाश्लिष्य दुर्लभां प्रमदामिव॥ ७॥
‘तेरे सारे अङ्ग धूल से धूसर हो जायेंगे, तेरी दोनों भुजाएँ शरीर से अलग होकर पृथ्वी पर गिर जायँगी और उस दशा में तू दुर्लभ युवती के समान इस पृथ्वी का आलिङ्गन करके सदा के लिये सो जायगा॥ ७॥
प्रवृद्धनिद्रे शयिते त्वयि राक्षसपांसने।
भविष्यन्ति शरण्यानां शरण्या दण्डका इमे॥ ८॥
‘तेरे-जैसे राक्षसकुलकलङ्क के सदा के लिये महानिद्रा में सो जाने पर ये दण्डकवन के प्रदेश शरणार्थियों को शरण देने वाले हो जायेंगे॥ ८॥
जनस्थाने हतस्थाने तव राक्षस मच्छरैः।
निर्भया विचरिष्यन्ति सर्वतो मुनयो वने॥९॥
‘राक्षस! मेरे बाणों से जनस्थान में बने हुए तेरे निवासस्थान के नष्ट हो जाने पर मुनिगण इस वन में सब ओर निर्भय विचर सकेंगे॥९॥
अद्य विप्रसरिष्यन्ति राक्षस्यो हतबान्धवाः।
बाष्पार्द्रवदना दीना भयादन्यभयावहाः॥१०॥
‘जो अबतक दूसरों को भय देती थीं, वे राक्षसियाँ आज अपने बान्धवजनों के मारे जाने से दीन हो आँसुओं से भींगे मुँह लिये जनस्थान से स्वयं ही भय के कारण भाग जायँगी॥१०॥
अद्य शोकरसज्ञास्ता भविष्यन्ति निरर्थिकाः।
अनुरूपकुलाः पत्न्यो यासां त्वं पतिरीदृशः॥ ११॥
‘जिनका तुझ-जैसा दुराचारी पति है, वे तदनुरूप कुलवाली तेरी पत्नियाँ आज तेरे मारे जाने पर काम आदि पुरुषार्थों से वञ्चित हो शोकरूपी स्थायी भाव वाले करुण रस का अनुभव करने वाली होंगी॥ ११॥
नृशंसशील क्षुद्रात्मन् नित्यं ब्राह्मणकण्टक।
त्वत्कृते शङ्कितैरग्नौ मुनिभिः पात्यते हविः॥ १२॥
‘क्रूरस्वभाववाले निशाचर ! तेरा हृदय सदा ही क्षुद्र विचारों से भरा रहता है। तू ब्राह्मणों के लिये कण्टकरूप है। तेरे ही कारण मुनिलोग शङ्कित रहकर ही अग्नि में हविष्य की आहुतियाँ डालते हैं’ ॥ १२॥
तमेवमभिसंरब्धं ब्रुवाणं राघवं वने।
खरो निर्भर्त्सयामास रोषात् खरतरस्वरः॥१३॥
वन में श्रीरामचन्द्रजी जब इस प्रकार रोषपूर्ण बातें कह रहे थे, उस समय क्रोध के कारण खर का भी स्वर अत्यन्त कठोर हो गया और उसने उन्हें फटकारते हुए कहा- ॥ १३॥
दृढं खल्ववलिप्तोऽसि भयेष्वपि च निर्भयः।
वाच्यावाच्यं ततो हि त्वं मृत्योर्वश्यो न बुध्यसे॥ १४॥
‘अहो! निश्चय ही तुम बड़े घमंडी हो, भय के अवसरों पर भी निर्भय बने हुए हो। जान पड़ता है कि तुम मृत्यु के अधीन हो गये हो, इस कारण से ही तुम्हें यह भी पता नहीं है कि कब क्या कहना चाहिये और क्या नहीं कहना चाहिये? ॥ १४ ॥
कालपाशपरिक्षिप्ता भवन्ति पुरुषा हि ये।
कार्याकार्यं न जानन्ति ते निरस्तषडिन्द्रियाः॥
‘जो पुरुष काल के फन्दे में फँस जाते हैं, उनकी छहों इन्द्रियाँ बेकाम हो जाती हैं; इसीलिये उन्हें कर्तव्य और अकर्तव्य का ज्ञान नहीं रह जाता है’। १५॥
एवमुक्त्वा ततो रामं संरुध्य भृकुटिं ततः।
स ददर्श महासालमविदूरे निशाचरः॥१६॥
रणे प्रहरणस्यार्थे सर्वतो ह्यवलोकयन्।
स तमुत्पाटयामास संदष्टदशनच्छदम्॥१७॥
ऐसा कहकर उस निशाचर ने एक बार श्रीराम की ओर भौहें टेढ़ी करके देखा और रणभूमि में उनपर प्रहार करने के लिये वह चारों ओर दृष्टिपात करने लगा। इतने में ही उसे एक विशाल साखू का वृक्ष दिखायी दिया, जो निकट ही था। खर ने अपने होठों को दाँतों से दबाकर उस वृक्ष को उखाड़ लिया। १६-१७॥
तं समुत्क्षिप्य बाहुभ्यां विनर्दित्वा महाबलः।
राममुद्दिश्य चिक्षेप हतस्त्वमिति चाब्रवीत्॥१८॥
फिर उस महाबली निशाचर ने विकट गर्जना करके दोनों हाथों से उस वृक्ष को उठा लिया और श्रीराम पर दे मारा। साथ ही यह भी कहा—’लो, अब तुम मारे गये’ ॥ १८॥
तमापतन्तं बाणौधैश्छित्त्वा रामः प्रतापवान्।
रोषमाहारयत् तीव्र निहन्तुं समरे खरम्॥१९॥
परमप्रतापी भगवान् श्रीराम ने अपने ऊपर आते हुए उस वृक्ष को बाण-समूहों से काट गिराया और उस समरभूमि में खर को मार डालने के लिये अत्यन्त क्रोध प्रकट किया॥ १९॥
जातस्वेदस्ततो रामो रोषरक्तान्तलोचनः।
निर्बिभेद सहस्रेण बाणानां समरे खरम्॥२०॥
उस समय श्रीराम के शरीर में पसीना आ गया। उनके नेत्रप्रान्त रोष से रक्तवर्ण के हो गये। उन्होंने सहस्रों बाणों का प्रहार करके समराङ्गण में खर को क्षत-विक्षत कर दिया॥२०॥
तस्य बाणान्तराद् रक्तं बहु सुस्राव फेनिलम्।
गिरेः प्रस्रवणस्येव धाराणां च परिस्रवः ॥२१॥
उनके बाणों के आघात से उस निशाचर के शरीर में जो घाव हुए थे, उनसे अधिक मात्रा में फेनयुक्त रक्त प्रवाहित होने लगा, मानो पर्वत के झरने से जल की धाराएँ गिर रही हों॥ २१॥
विकलः स कृतो बाणैः खरो रामेण संयुगे।
मत्तो रुधिरगन्धेन तमेवाभ्यद्रवद् द्रुतम्॥२२॥
श्रीराम ने युद्धस्थल में अपने बाणों की मार से खर को व्याकुल कर दिया; तो भी (उसका साहस कम नहीं हुआ।) वह खून की गन्ध से उन्मत्त होकर बड़े वेग से श्रीराम की ओर ही दौड़ा॥२२॥
तमापतन्तं संक्रुद्धं कृतास्त्रो रुधिराप्लुतम्।
अपासर्पद द्वित्रिपदं किंचित्त्वरितविक्रमः॥ २३॥
अस्त्र-विद्या के ज्ञाता भगवान् श्रीराम ने देखा कि यह राक्षस खून से लथपथ होने पर भी अत्यन्त क्रोधपूर्वक मेरी ही ओर बढ़ा आ रहा है तो वे तुरंत चरणों का संचालन करके दो-तीन पग पीछे हट गये (क्योंकि बहुत निकट होने पर बाण चलाना सम्भव नहीं हो सकता था) ॥ २३॥
ततः पावकसंकाशं वधाय समरे शरम्।
खरस्य रामो जग्राह ब्रह्मदण्डमिवापरम्॥२४॥
तदनन्तर श्रीराम ने समराङ्गण में खर का वध करने के लिये एक अग्नि के समान तेजस्वी बाण हाथ में लिया, जो दूसरे ब्रह्मदण्ड के समान भयंकर था॥ २४ ॥
स तद् दत्तं मघवता सुरराजेन धीमता।
संदधे च स धर्मात्मा मुमोच च खरं प्रति॥२५॥
वह बाण बुद्धिमान् देवराज इन्द्र का दिया हुआ था। धर्मात्मा श्रीराम ने उसे धनुष पर रखा और खर को लक्ष्य करके छोड़ दिया॥ २५॥
स विमुक्तो महाबाणो निर्घातसमनिःस्वनः।
रामेण धनुरायम्य खरस्योरसि चापतत्॥ २६॥
उस महाबाण के छूटते ही वज्रपात के समान भयानक शब्द हुआ। श्रीराम ने अपने धनुष को कान तक खींचकर उसे छोड़ा था। वह खर की छाती में जा लगा॥ २६॥
स पपात खरो भूमौ दह्यमानः शराग्निना।
रुद्रेणेव विनिर्दग्धः श्वेतारण्ये यथान्धकः॥२७॥
जैसे श्वेतवन में भगवान् रुद्र ने अन्धकासुर को जलाकर भस्म किया था, उसी प्रकार दण्डकवन में श्रीराम के उस बाण की आग में जलता हुआ निशाचर खर पृथ्वी पर गिर पड़ा॥ २७॥
स वृत्र इव वज्रेण फेनेन नमुचिर्यथा।
बलो वेन्द्राशनिहतो निपपात हतः खरः॥२८॥
जैसे वज्र से वृत्रासुर, फेन से नमुचि और इन्द्र की अशनि से बलासुर मारा गया था, उसी प्रकार श्रीराम के उस बाण से आहत होकर खर धराशायी हो गया॥२८॥
एतस्मिन्नन्तरे देवाश्चारणैः सह संगताः।
दुन्दुभीश्चाभिनिघ्नन्तः पुष्पवर्षं समन्ततः॥२९॥
रामस्योपरि संहृष्टा ववर्षुर्विस्मितास्तदा।
अर्धाधिकमुहूर्तेन रामेण निशितैः शरैः॥३०॥
चतुर्दश सहस्राणि रक्षसां कामरूपिणाम्।
खरदूषणमुख्यानां निहतानि महामृधे॥३१॥
इसी समय देवता चारणों के साथ मिलकर आये और हर्ष में भरकर दुन्दुभि बजाते हुए वहाँ श्रीराम के ऊपर चारों ओर से फूलों की वर्षा करने लगे। उस समय उन्हें यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ था कि श्रीराम ने अपने पैने बाणों से डेढ़ मुहूर्त में ही इच्छानुसार रूप धारण करने वाले खर-दूषण आदि चौदह हजार राक्षसों का इस महासमर में संहार कर डाला॥ २९–३१॥
अहो बत महत्कर्म रामस्य विदितात्मनः।
अहो वीर्यमहो दाढयं विष्णोरिव हि दृश्यते॥ ३२॥
वे बोले—’अहो! अपने स्वरूप को जानने वाले भगवान् श्रीराम का यह कर्म महान् और अद्भुत है, इनका बल-पराक्रम भी अद्भुत है और इनमें भगवान् विष्णु की भाँति आश्चर्यजनक दृढ़ता दिखायी देती है ॥ ३२॥
इत्येवमुक्त्वा ते सर्वे ययुर्देवा यथागतम्।
ततो राजर्षयः सर्वे संगताः परमर्षयः॥३३॥
सभाज्य मुदिता रामं सागस्त्या इदमब्रुवन्।
ऐसा कहकर वे सब देवता जैसे आये थे, वैसे ही चले गये। तदनन्तर बहुत-से राजर्षि और अगस्त्य आदि महर्षि मिलकर वहाँ आये तथा प्रसन्नतापूर्वक श्रीराम का सत्कार करके उनसे इस प्रकार बोले- ॥ ३३ १/२॥
एतदर्थं महातेजा महेन्द्रः पाकशासनः॥ ३४॥
शरभङ्गाश्रमं पुण्यमाजगाम पुरंदरः।
आनीतस्त्वमिमं देशमुपायेन महर्षिभिः॥ ३५॥
‘रघुनन्दन! इसीलिये महातेजस्वी पाकशासन पुरंदर इन्द्र शरभङ्ग मुनि के पवित्र आश्रम पर आये थे और इसी कार्य की सिद्धि के लिये महर्षियों ने विशेष उपाय करके आपको पञ्चवटी के इस प्रदेश में पहुँचाया था। ३४-३५॥
एषां वधार्थं शत्रूणां रक्षसां पापकर्मणाम्।
तदिदं नः कृतं कार्यं त्वया दशरथात्मज ॥३६॥
स्वधर्मं प्रचरिष्यन्ति दण्डकेषु महर्षयः।
‘मुनियों के शत्रुरूप इन पापाचारी राक्षसों के वध के लिये ही आपका यहाँ शुभागमन आवश्यक समझा गया था। दशरथनन्दन! आपने हमलोगोंका यह बहुत बड़ा कार्य सिद्ध कर दिया। अब बड़े-बड़े ऋषि-मुनि दण्डकारण्य के विभिन्न प्रदेशों में निर्भय होकर अपने धर्म का अनुष्ठान करेंगे’॥ ३६ १/२ ॥
एतस्मिन्नन्तरे वीरो लक्ष्मणः सह सीतया।
गिरिदुर्गाद् विनिष्क्रम्य संविवेशाश्रमे सुखी॥ ३७॥
इसी बीच में वीर लक्ष्मण भी सीता के साथ पर्वत की कन्दरा से निकलकर प्रसन्नतापूर्वक आश्रम में आ गये॥
ततो रामस्तु विजयी पूज्यमानो महर्षिभिः॥ ३८॥
प्रविवेशाश्रमं वीरो लक्ष्मणेनाभिपूजितः।
तत्पश्चात् महर्षियों से प्रशंसित और लक्ष्मण से पूजित विजयी वीर श्रीराम ने आश्रम में प्रवेश किया। ३८ १/२॥
तं दृष्ट्वा शत्रुहन्तारं महर्षीणां सुखावहम्॥३९॥
बभूव हृष्टा वैदेही भर्तारं परिषस्वजे।
मुदा परमया युक्ता दृष्ट्वा रक्षोगणान् हतान्।
रामं चैवाव्ययं दृष्ट्वा तुतोष जनकात्मजा॥४०॥
महर्षियों को सुख देने वाले अपने शत्रुहन्ता पति का दर्शन करके विदेहराजनन्दिनी सीता को बड़ा हर्ष हुआ। उन्होंने परमानन्द में निमग्न होकर अपने स्वामी का आलिङ्गन किया। राक्षस-समूह मारे गये
और श्रीराम को कोई क्षति नहीं पहँची—यह देख और जानकर जानकी जीको बहुत संतोष हुआ॥ ३९-४०॥
ततस्तु तं राक्षससङ्घमर्दनं सम्पूज्यमानं मुदितैर्महात्मभिः।
पुनः परिष्वज्य मुदान्वितानना बभूव हृष्टा जनकात्मजा तदा॥४१॥
प्रसन्नता से भरे हुए महात्मा मुनि जिनकी भूरि-भूरि प्रशंसा कर रहे थे तथा जिन्होंने राक्षसों के समुदाय को कुचल डाला था, उन प्राणवल्लभ, श्रीराम का बारम्बार आलिङ्गन करके उस समय जनकनन्दिनी सीता को बड़ा हर्ष हुआ उनका मुख प्रसन्नता से खिल उठा॥ ४१॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे त्रिंशः सर्गः॥३०॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।३०॥
सर्ग-31
त्वरमाणस्ततो गत्वा जनस्थानादकम्पनः।
प्रविश्य लङ्कां वेगेन रावणं वाक्यमब्रवीत्॥१॥
तदनन्तर जनस्थान से अकम्पन नामक राक्षस बड़ी उतावली के साथ लङ्का की ओर गया और शीघ्र ही उस पुरी में प्रवेश करके रावण से इस प्रकार बोला – ॥ १॥
जनस्थानस्थिता राजन् राक्षसा बहवो हताः।
खरश्च निहतः संख्ये कथंचिदहमागतः॥२॥
‘राजन् ! जनस्थान में जो बहुत-से राक्षस रहते थे, वे मार डाले गये। खर युद्ध में मारा गया। मैं किसी तरह जान बचाकर यहाँ आया हूँ’॥२॥
एवमुक्तो दशग्रीवः क्रुद्धः संरक्तलोचनः।
अकम्पनमुवाचेदं निर्दहन्निव तेजसा ॥३॥
अकम्पन के ऐसा कहते ही दशमुख रावण क्रोध से जल उठा और लाल आँखें करके उससे इस तरह बोला, मानो उसे अपने तेज से जलाकर भस्म कर डालेगा॥३॥
केन भीमं जनस्थानं हतं मम परासुना।
को हि सर्वेषु लोकेषु गतिं नाधिगमिष्यति॥४॥
वह बोला—’कौन मौत के मुख में जाना चाहता है, जिसने मेरे भयंकर जनस्थान का विनाश किया है? कौन वह दुःसाहसी है, जिसे समस्त लोकों में कहीं भी ठौर-ठिकाना नहीं मिलने वाला है ? ॥ ४॥
न हि मे विप्रियं कृत्वा शक्यं मघवता सुखम्।
प्राप्तुं वैश्रवणेनापि न यमेन च विष्णुना॥५॥
‘मेरा अपराध करके इन्द्र, यम, कुबेर और विष्णु भी चैन से नहीं रह सकेंगे॥ ५ ॥
कालस्य चाप्यहं कालो दहेयमपि पावकम्।
मृत्यु मरणधर्मेण संयोजयितुमुत्सहे॥६॥
‘मैं काल का भी काल हूँ, आग को भी जला सकता हूँ तथा मौत को भी मृत्यु के मुख में डाल सकता हूँ। ६॥
वातस्य तरसा वेगं निहन्तुमपि चोत्सहे।
दहेयमपि संक्रुद्धस्तेजसाऽऽदित्यपावकौ॥७॥
‘यदि मैं क्रोध में भर जाऊँ तो अपने वेग से वायु की गति को भी रोक सकता हूँ तथा अपने तेज से सूर्य और अग्नि को भी जलाकर भस्म कर सकता हूँ’॥ ७॥
तथा क्रुद्धं दशग्रीवं कृताञ्जलिरकम्पनः ।
भयात् संदिग्धया वाचा रावणं याचतेऽभयम्॥ ८॥
रावण को इस प्रकार क्रोध से भरा देख भय के मारे अकम्पन की बोलती बंद हो गयी। उसने हाथ जोड़कर संशययुक्त वाणी में रावण से अभय की याचना की॥८॥
दशग्रीवोऽभयं तस्मै प्रददौ रक्षसां वरः।
स विस्रब्धोऽब्रवीद् वाक्यमसंदिग्धमकम्पनः॥ ९॥
तब राक्षसों में श्रेष्ठ दशग्रीव ने उसे अभय दान दिया। इससे अकम्पन को अपने प्राण बचने का विश्वास हुआ और वह संशयरहित होकर बोला— ॥९॥
पुत्रो दशरथस्यास्ते सिंहसंहननो युवा।
रामो नाम महास्कन्धो वृत्तायतमहाभुजः॥१०॥
श्यामः पृथुयशाः श्रीमानतुल्यबलविक्रमः।
हतस्तेन जनस्थाने खरश्च सहदूषणः ॥११॥
‘राक्षसराज! राजा दशरथ के नवयुवक पुत्र श्रीराम पञ्चवटी में रहते हैं। उनके शरीर की गठन सिंह के समान है, कंधे मोटे और भुजाएँ गोल तथा लम्बी हैं, शरीर का रंग साँवला है। वे बड़े यशस्वी और तेजस्वी दिखायी देते हैं। उनके बल और पराक्रमकी कहीं तुलना नहीं है। उन्होंने जनस्थान में रहने वाले खर और दूषण आदि का वध किया है’ ॥ १०-११।।
अकम्पनवचः श्रुत्वा रावणो राक्षसाधिपः।
नागेन्द्र इव निःश्वस्य इदं वचनमब्रवीत्॥१२॥
अकम्पन की यह बात सुनकर राक्षसराज रावण ने नागराज (महान् सर्प) की भाँति लम्बी साँस खींचकर इस प्रकार कहा- ॥ १२ ॥
स सुरेन्द्रेण संयुक्तो रामः सर्वामरैः सह।
उपयातो जनस्थानं ब्रूहि कच्चिदकम्पन॥१३॥
अकम्पन! बताओ तो सही क्या राम सम्पूर्ण देवताओं तथा देवराज इन्द्र के साथ जनस्थान में आये हैं?’ ॥१३ ॥
रावणस्य पुनर्वाक्यं निशम्य तदकम्पनः।
आचचक्षे बलं तस्य विक्रमं च महात्मनः॥१४॥
रावण का यह प्रश्न सुनकर अकम्पन ने महात्मा श्रीराम के बल और पराक्रम का पुनः इस प्रकार वर्णन किया
रामो नाम महातेजाः श्रेष्ठः सर्वधनुष्मताम्।
दिव्यास्त्रगुणसम्पन्नः परं धर्मं गतो युधि॥१५॥
‘लङ्गेश्वर! जिनका नाम राम है, वे संसार के समस्त धनुर्धरों में श्रेष्ठ और अत्यन्त तेजस्वी हैं। दिव्यास्त्रों के प्रयोग का जो गुण है, उससे भी वे पूर्णतः सम्पन्न हैं। युद्ध की कला में तो वे पराकाष्ठा को पहुँचे हुए हैं॥ १५॥
तस्यानुरूपो बलवान् रक्ताक्षो दुन्दुभिस्वनः।
कनीयाँल्लक्ष्मणो भ्राता राकाशशिनिभाननः॥१६॥
‘श्रीराम के साथ उनके छोटे भाई लक्ष्मण भी हैं, जो उन्हीं के समान बलवान् हैं। उनका मुख पूर्णिमा के चन्द्रमा की भाँति मनोहर है। उनकी आँखें कुछ-कुछ लाल हैं और स्वर दुन्दुभि के समान गम्भीर है॥ १६ ॥
स तेन सह संयुक्तः पावकेनानिलो यथा।
श्रीमान् राजवरस्तेन जनस्थानं निपातितम्॥१७॥
‘जैसे अग्नि के साथ वायु हों, उसी प्रकार अपने भाई के साथ संयुक्त हुए राजाधिराज श्रीमान् राम बड़े प्रबल हैं। उन्होंने ही जनस्थान को उजाड़ डाला है। १७॥
नैव देवा महात्मानो नात्र कार्या विचारणा।
शरा रामेण तत्सृष्टा रुक्मपुङ्गाः पतत्त्रिणः॥ १८॥
सर्पाः पञ्चानना भूत्वा भक्षयन्ति स्म राक्षसान्।
“उनके साथ न कोई देवता हैं, न महात्मा मुनि। इस विषय में आप कोई विचार न करें। श्रीराम के छोड़े हुए सोने की पाँखवाले बाण पाँच मुखवाले सर्प बनकर राक्षसों को खा जाते थे॥ १८ १/२ ॥
येन येन च गच्छन्ति राक्षसा भयकर्षिताः॥१९॥
तेन तेन स्म पश्यन्ति राममेवाग्रतः स्थितम्।
इत्थं विनाशितं तेन जनस्थानं तवानघ ॥२०॥
‘भय से कातर हुए राक्षस जिस-जिस मार्ग से भागते थे, वहाँ-वहाँ वे श्रीराम को ही अपने सामने खड़ा देखते थे। अनघ! इस प्रकार अकेले श्रीराम ने ही आपके जनस्थान का विनाश किया है’ ॥ १९-२०॥
अकम्पनवचः श्रुत्वा रावणो वाक्यमब्रवीत्।
गमिष्यामि जनस्थानं रामं हन्तुं सलक्ष्मणम्॥ २१॥
अकम्पन की यह बात सुनकर रावण ने कहा—’मैं अभी लक्ष्मणसहित राम का वध करने के लिये जनस्थान को जाऊँगा’ ॥ २१॥
अथैवमुक्ते वचने प्रोवाचेदमकम्पनः ।
शृणु राजन् यथावृत्तं रामस्य बलपौरुषम्॥२२॥
उसके ऐसा कहने पर अकम्पन बोला—’राजन्! श्रीराम का बल और पुरुषार्थ जैसा है, उसका यथावत् वर्णन मुझसे सुनिये॥ २२ ॥
असाध्यः कुपितो रामो विक्रमेण महायशाः।
आपगायास्तु पूर्णाया वेगं परिहरेच्छरैः॥ २३॥
सताराग्रहनक्षत्रं नभश्चाप्यवसादयेत्।
‘महायशस्वी श्रीराम यदि कुपित हो जायँ तो उन्हें अपने पराक्रम के द्वारा कोई भी काबू में नहीं कर सकता। वे अपने बाणों से भरी हुई नदी के वेग को भी पलट सकते हैं तथा तारा, ग्रह और नक्षत्रोंसहित सम्पूर्ण आकाशमण्डल को पीड़ा दे सकते हैं॥ २३ १/२॥
असौ रामस्तु सीदन्तीं श्रीमानभ्युद्धरेन्महीम्॥ २४॥
भित्त्वा वेलां समुद्रस्य लोकानाप्लावयेद् विभुः।
वेगं वापि समुद्रस्य वायुं वा विधमेच्छरैः ॥ २५॥
‘वे श्रीमान् भगवान् राम समुद्र में डूबती हुई पृथ्वी को ऊपर उठा सकते हैं, महासागर की मर्यादा का भेदन करके समस्त लोकों को उसके जल से आप्लावित कर सकते हैं तथा अपने बाणों से समुद्र के वेग अथवा वायु को भी नष्ट कर सकते हैं। २४-२५॥
संहृत्य वा पुनर्लोकान् विक्रमेण महायशाः।
शक्तः श्रेष्ठः स पुरुषः स्रष्टुं पुनरपि प्रजाः॥२६॥
‘वे महायशस्वी पुरुषोत्तम अपने पराक्रम से सम्पूर्ण लोकों का संहार करके पुनः नये सिरे से प्रजा की सृष्टि करने में समर्थ हैं॥ २६॥
नहि रामो दशग्रीव शक्यो जेतुं रणे त्वया।
रक्षसां वापि लोकेन स्वर्गः पापजनैरिव॥२७॥
‘दशग्रीव! जैसे पापी पुरुष स्वर्ग पर अधिकार नहीं प्राप्त कर सकते, उसी प्रकार आप अथवा समस्त राक्षस-जगत् भी युद्ध में श्रीराम को नहीं जीत सकते॥ २७॥
न तं वध्यमहं मन्ये सर्वैर्देवासुरैरपि।
अयं तस्य वधोपायस्तन्ममैकमनाः शृणु॥२८॥
‘मेरी समझ में सम्पूर्ण देवता और असुर मिलकर भी उनका वध नहीं कर सकते। उनके वध का यह एक उपाय मुझे सूझा है, उसे आप मेरे मुख से एकचित्त होकर सुनिये॥ २८॥
भार्या तस्योत्तमा लोके सीता नाम सुमध्यमा।
श्यामा समविभक्ताङ्गी स्त्रीरत्नं रत्नभूषिता॥ २९॥
‘श्रीराम की पत्नी सीता संसार की सर्वोत्तम सुन्दरी है। उसने यौवन के मध्य में पदार्पण किया है। उसके अङ्ग-प्रत्यङ्ग सुन्दर और सुडौल हैं। वह रत्नमय आभूषणों से विभूषित रहती है। सीता सम्पूर्ण स्त्रियों में एक रत्न है॥ २९॥
नैव देवी न गन्धर्वी नाप्सरा न च पन्नगी।
तुल्या सीमन्तिनी तस्या मानुषी तु कुतो भवेत्॥ ३०॥
‘देवकन्या, गन्धर्वकन्या, अप्सरा अथवा नागकन्या कोई भी रूप में उसकी समानता नहीं कर सकती, फिर मनुष्य-जाति की दूसरी कोई नारी उसके समान कैसे हो सकती है॥३०॥
तस्यापहर भार्यां त्वं तं प्रमथ्य महावने।
सीतया रहितो रामो न चैव हि भविष्यति॥३१॥
‘उस विशाल वन में जिस किसी भी उपाय से श्रीराम को धोखे में डालकर आप उनकी पत्नी का अपहरण कर लें। सीता से बिछुड़ जाने पर श्रीराम कदापि जीवित नहीं रहेंगे’ ॥ ३१॥
अरोचयत तद्वाक्यं रावणो राक्षसाधिपः।
चिन्तयित्वा महाबाहुरकम्पनमुवाच ह॥३२॥
राक्षसराज रावण को अकम्पन की वह बात पसंद आ गयी। उस महाबाहु दशग्रीव ने कुछ सोचकर अकम्पन से कहा- ॥३२॥
बाढं कल्यं गमिष्यामि ह्येकः सारथिना सह।
आनेष्यामि च वैदेहीमिमां हृष्टो महापुरीम्॥३३॥
‘ठीक है, कल प्रातःकाल सारथि के साथ मैं अकेला ही जाऊँगा और विदेहकुमारी सीता को प्रसन्नतापूर्वक इस महापुरी में ले आऊँगा’ ॥ ३३॥
तदेवमुक्त्वा प्रययौ खरयुक्तेन रावणः।
रथेनादित्यवर्णेन दिशः सर्वाः प्रकाशयन्॥३४॥
ऐसा कहकर रावण गधों से जुते हुए सूर्यतुल्य तेजस्वी रथ पर आरूढ़ हो सम्पूर्ण दिशाओं को प्रकाशित करता हुआ वहाँ से चला॥ ३४ ॥
स रथो राक्षसेन्द्रस्य नक्षत्रपथगो महान्।
चञ्चूर्यमाणः शुशुभे जलदे चन्द्रमा इव ॥ ३५॥
नक्षत्रों के मार्ग पर विचरता हुआ राक्षसराज का वह विशाल रथ बादलों की आड़ में प्रकाशित होने वाले चन्द्रमा के समान शोभा पा रहा था॥ ३५॥
स दूरे चाश्रमं गत्वा ताटकेयमुपागमत्।
मारीचेनार्चितो राजा भक्ष्यभोज्यैरमानुषैः ॥ ३६॥
कुछ दूर पर स्थित एक आश्रम में जाकर वह ताटकापुत्र मारीच से मिला। मारीच ने अलौकिक भक्ष्य-भोज्य अर्पित करके राजा रावण का स्वागत सत्कार किया॥३६॥
तं स्वयं पूजयित्वा तु आसनेनोदकेन च।
अर्थोपहितया वाचा मारीचो वाक्यमब्रवीत्॥ ३७॥
आसन और जल आदि के द्वारा स्वयं ही उसका पूजन करके मारीच ने अर्थयुक्त वाणी में पूछा- ॥ ३७॥
कच्चित् सकुशलं राजैल्लोकानां राक्षसाधिप।
आशङ्के नाधिजाने त्वं यतस्तूर्णमुपागतः॥ ३८॥
‘राक्षसराज ! तुम्हारे राज्य में लोगों की कुशल तो है न? तुम बड़ी उतावली के साथ आ रहे हो, इसलिये मेरे मन में कुछ खटका हुआ है। मैं समझता हूँ, तुम्हारे यहाँ का अच्छा हाल नहीं है’ ॥ ३८ ॥
एवमुक्तो महातेजा मारीचेन स रावणः।
ततः पश्चादिदं वाक्यमब्रवीद् वाक्यकोविदः॥ ३९॥
मारीच के इस प्रकार पूछने पर बातचीत की कला को जानने वाले महातेजस्वी रावण ने इस प्रकार कहा- ॥ ३९॥
आरक्षो मे हतस्तात रामेणाक्लिष्टकारिणा।
जनस्थानमवध्यं तत् सर्वं युधि निपातितम्॥४०॥
‘तात! अनायास ही महान् पराक्रम दिखाने वाले श्रीराम ने मेरे राज्य की सीमा के रक्षक खर-दूषण आदि को मार डाला है तथा जो जनस्थान अवध्य समझा जाता था, वहाँ के सारे राक्षसों को उन्होंने युद्ध में मार गिराया है॥ ४०॥
तस्य मे कुरु साचिव्यं तस्य भार्यापहारणे।
राक्षसेन्द्रवचः श्रुत्वा मारीचो वाक्यमब्रवीत्॥ ४१॥
‘अतः इसका बदला लेने के लिये मैं उनकी स्त्री का अपहरण करना चाहता हूँ। इस कार्य में तुम मेरी सहायता करो।’ राक्षसराज रावण का यह वचन सुनकर मारीच बोला— ॥४१॥
आख्याता केन वा सीता मित्ररूपेण शत्रुणा।
त्वया राक्षसशार्दूल को न नन्दति नन्दितः॥ ४२॥
‘निशाचरशिरोमणे! मित्र के रूप में तुम्हारा वह कौन-सा ऐसा शत्रु है, जिसने तुम्हें सीता को हर लेने की सलाह दी है? कौन ऐसा पुरुष है, जो तुमसे सुख और आदर पाकर भी प्रसन्न नहीं है, अतः तुम्हारी बुराई करना चाहता है ? ।। ४२ ॥
सीतामिहानयस्वेति को ब्रवीति ब्रवीहि मे।
रक्षोलोकस्य सर्वस्य कः शृङ्ग छेत्तुमिच्छति॥ ४३॥
‘कौन कहता है कि तुम सीता को यहाँ हर ले आओ? मुझे उसका नाम बताओ। वह कौन है, जो समस्त राक्षस-जगत् का सींग काट लेना चाहता है?॥
प्रोत्साहयति यश्च त्वां स च शत्रुरसंशयम्।
आशीविषमुखाद दंष्टामुद्धां चेच्छति त्वया॥ ४४॥
‘जो इस कार्य में तुम्हें प्रोत्साहन दे रहा है, वह तुम्हारा शत्रु है, इसमें संशय नहीं है। वह तुम्हारे हाथों विषधर सर्प के मुख से उसके दाँत उखड़वाना चाहता है॥४४॥
कर्मणानेन केनासि कापथं प्रतिपादितः।
सुखसुप्तस्य ते राजन् प्रहृतं केन मूर्धनि॥४५॥
‘राजन्! किसने तुम्हें ऐसी खोटी सलाह देकर कुमार्ग पर पहुँचाया है ? किसने सुखपूर्वक सोते समय तुम्हारे मस्तक पर लात मारी है॥ ४५ ॥
विशुद्धवंशाभिजनाग्रहस्ततेजोमदः संस्थितदोर्विषाणः।
उदीक्षितुं रावण नेह युक्तः स संयुगे राघवगन्धहस्ती॥ ४६॥
‘रावण! राघवेन्द्र श्रीराम वह गन्धयुक्त गजराज हैं, जिसकी गन्ध सूंघकर ही गजरूपी योद्धा दूर भाग जाते हैं। विशुद्ध कुल में जन्म ग्रहण करना ही उस राघवरूपी गजराज का शुण्डदण्ड है, प्रताप ही मद है और सुडौल बाँहें ही दोनों दाँत हैं। युद्धस्थल में उनकी ओर देखना भी तुम्हारे लिये उचित नहीं है; फिर जूझने की तो बात ही क्या है।॥ ४६॥
असौ रणान्तःस्थितिसंधिवालो विदग्धरक्षोमृगहा नृसिंहः।
सुप्तस्त्वया बोधयितुं न शक्यः शराङ्गपूर्णो निशितासिदंष्ट्रः॥४७॥
“वे श्रीराम मनुष्य के रूप में एक सिंह हैं। रणभूमि के भीतर स्थित होना ही उनके अङ्गों की संधियाँ तथाबाल हैं। वह सिंह चतुर राक्षसरूपी मृगों का वध करनेवाला है, बाणरूपी अङ्गों से परिपूर्ण है तथा तलवारें ही उसकी तीखी दाढ़ें हैं। उस सोते हुए सिंह को तुम नहीं जगा सकते॥४७॥
चापापहारे भुजवेगपङ्के शरोर्मिमाले सुमहाहवौघे।
न रामपातालमुखेऽतिघोरे प्रस्कन्दितुं राक्षसराज युक्तम्॥४८॥
‘राक्षसराज! श्रीराम एक पातालतलव्यापी महासागर हैं, धनुष ही उस समुद्र के भीतर रहने वाला ग्राह है, भुजाओं का वेग ही कीचड़ है, बाण ही तरंगमालाएँ हैं और महान् युद्ध ही उसकी अगाध जलराशि है। उसके अत्यन्त भयंकर मुख अर्थात् बड़वानल में कूद पड़ना तुम्हारे लिये कदापि उचित नहीं है। ४८॥
प्रसीद लङ्केश्वर राक्षसेन्द्र लङ्कां प्रसन्नो भव साधु गच्छ।
त्वं स्वेषु दारेषु रमस्व नित्यं रामः सभार्यो रमतां वनेषु॥४९॥
‘लंकेश्वर ! प्रसन्न होओ। राक्षसराज! सानन्द रहो और सकुशल लंका को लौट जाओ। तुम सदा पुरी में अपनी स्त्रियों के साथ रमण करो और राम अपनी पत्नी के साथ वन में विहार करें’॥ ४९॥
एवमुक्तो दशग्रीवो मारीचेन स रावणः।
न्यवर्तत पुरीं लङ्कां विवेश च गृहोत्तमम्॥५०॥
मारीच के ऐसा कहने पर दशमुख रावण लंका को लौटा और अपने सुन्दर महल में चला गया॥ ५० ॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे एकत्रिंशः सर्गः॥३१॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में इकतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।३१॥
सर्ग-32
ङ्के ततः शार्पणखा दृष्ट्या सहस्राणि चातुर्दशा ।
हतान्येकेन रामेण रक्षसां भीमकर्मणाम्॥१॥
दूषणं च खरं चैव हतं त्रिशिरसं रणे।
दृष्ट्वा पुनर्महानादान् ननाद जलदोपमा॥२॥
उधर शूर्पणखा ने जब देखा कि श्रीराम ने भयंकर कर्म करने वाले चौदह हजार राक्षसों को अकेले ही मार गिराया तथा युद्ध के मैदान में दूषण, खर और त्रिशिरा को भी मौत के घाट उतार दिया, तब वह शोक के कारण मेघ गर्जना के समान पुनः बड़े जोर-जोर से घोर चीत्कार करने लगी॥ १-२॥
सा दृष्ट्वा कर्म रामस्य कृतमन्यैः सुदुष्करम्।
जगाम परमोद्विग्ना लङ्कां रावणपालिताम्॥३॥
श्रीराम ने वह कर्म कर दिखाया, जो दूसरों के लिये अत्यन्त दुष्कर है; यह अपनी आँखों देखकर वहअत्यन्त उद्विग्न हो उठी और रावण द्वारा सुरक्षित लंकापुरी को गयी॥३॥
सा ददर्श विमानाग्रे रावणं दीप्ततेजसम्।
उपोपविष्टं सचिवैर्मरुद्भिरिव वासवम्॥४॥
वहाँ पहुँचकर उसने देखा, रावण पुष्पक विमान (या सतमहले मकान) के ऊपरी भाग में बैठा हुआ है। उसका राजोचित तेज उद्दीप्त हो रहा है तथा मरुद्गणों से घिरे हुए इन्द्र की भाँति वह आस-पास बैठे हुए मन्त्रियों से घिरा है॥ ४॥
आसीनं सूर्यसंकाशे काञ्चने परमासने।
रुक्मवेदिगतं प्राज्यं ज्वलन्तमिव पावकम्॥५॥
रावण जिस उत्तम सुवर्णमय सिंहासन पर विराजमान था, वह सूर्य के समान जगमगा रहा था। जैसे सोने की ईंटों से बनी हुई वेदी पर स्थापित अग्निदेव घी की अधिक आहुति पाकर प्रज्वलित हो उठे हों, उसी प्रकार उस स्वर्णसिंहासन पर रावण शोभा पा रहा था॥ ५॥
देवगन्धर्वभूतानामृषीणां च महात्मनाम्।
अजेयं समरे घोरं व्यात्ताननमिवान्तकम्॥६॥
देवासुरविमर्देषु वज्राशनिकृतव्रणम्।
ऐरावतविषाणाग्रैरुत्कृष्टकिणवक्षसम्॥७॥
देवता, गन्धर्व, भूत और महात्मा ऋषि भी उसे जीतने में असमर्थ थे। समरभूमि में वह मुँह फैलाकर खड़े हुए यमराज की भाँति भयानक जान पड़ता था। देवताओं और असुरों के संग्राम के अवसरों पर उसके शरीर में वज्र और अशनि के जो घाव हुए थे, उनके चिह्न अब तक विद्यमान थे। उसकी छाती में ऐरावत हाथी ने जो अपने दाँत गड़ाये थे, उसके निशान अब भी दिखायी देते थे॥
विंशद्भुजं दशग्रीवं दर्शनीयपरिच्छदम्।
विशालवक्षसं वीरं राजलक्षणलक्षितम्॥८॥
नद्धवैदूर्यसंकाशं तप्तकाञ्चनभूषणम्।
सुभुजं शुक्लदशनं महास्यं पर्वतोपमम्॥९॥
उसके बीस भुजाएँ और दस मस्तक थे। उसके छत्र, चँवर और आभूषण आदि उपकरण देखने ही योग्य थे। वक्षःस्थल विशाल था। वह वीर राजोचित लक्षणों से सम्पन्न दिखायी देता था। वह अपने शरीर में जो वैदूर्यमणि (नीलम) का आभूषण पहने हुए था, उसके समान ही उसके शरीर की कान्ति भी थी। उसने तपाये हुए सोने के आभूषण भी पहन रखे थे। उसकी भुजाएँ सुन्दर, दाँत सफेद, मुँह बहुत बड़ा और शरीर पर्वत के समान विशाल था॥ ८-९॥
विष्णुचक्रनिपातैश्च शतशो देवसंयुगे।
अन्यैः शस्त्रैः प्रहारैश्च महायुद्धेषु ताडितम्॥ १०॥
देवताओं के साथ युद्ध करते समय उसके अङ्गों पर सैकड़ों बार भगवान् विष्णु के चक्र का प्रहार हुआ था। बड़े-बड़े युद्धों में अन्यान्य अस्त्र-शस्त्रों की भी उसपर ङ्केअर पड़ी थी ( उन सबके चिह्न दृष्टिगोचर होते थे)
अहताङ्गैः समस्तैस्तं देवप्रहरणैस्तदा।
अक्षोभ्याणां समुद्राणां क्षोभणं क्षिप्रकारिणम्॥ ११॥
देवताओं के समस्त आयुधों के प्रहारों से भी जो खण्डित न हो सके थे, उन्हीं अङ्गों से वह अक्षोभ्य समुद्रों में भी क्षोभ (हलचल) पैदा कर देता था। वह सभी कार्य बड़ी शीघ्रता से करता था॥११॥
क्षेप्तारं पर्वताग्राणां सुराणां च प्रमर्दनम्।
उच्छेत्तारं च धर्माणां परदाराभिमर्शनम्॥१२॥
पर्वतशिखरों को भी तोड़कर फेंक देता था,देवताओं को भी रौंद डालता था। धर्म की तो वह जड़ ही काट देता था और परायी स्त्रियों के सतीत्व का नाश करने वाला था।
सर्वदिव्यास्त्रयोक्तारं यज्ञविघ्नकरं सदा।
पुरीं भोगवतीं गत्वा पराजित्य च वासुकिम्॥ १३॥
तक्षकस्य प्रियां भार्यां पराजित्य जहार यः।
वह सब प्रकार के दिव्यास्त्रों का प्रयोग करने वाला और सदा यज्ञों में विघ्न डालने वाला था। एक समय पाताल की भोगवती पुरी में जाकर नागराज वासुकि को परास्त करके तक्षक को भी हराकर उसकी प्यारी पत्नी को वह हर ले आया था॥ १३ १/२॥
कैलासं पर्वतं गत्वा विजित्य नरवाहनम्॥१४॥
विमानं पुष्पकं तस्य कामगं वै जहार यः।
इसी तरह कैलास पर्वत पर जाकर कुबेर को युद्ध में पराजित करके उसने उनके इच्छानुसार चलने वाले पुष्पकविमान को अपने अधिकार में कर लिया॥ १४ १/२॥
वनं चैत्ररथं दिव्यं नलिनी नन्दनं वनम्॥१५॥
विनाशयति यः क्रोधाद् देवोद्यानानि वीर्यवान्।
वह पराक्रमी निशाचर क्रोधपूर्वक कुबेर के दिव्य चैत्ररथ वन को, सौगन्धिक कमलों से युक्त नलिनी नामवाली पुष्करिणीको, इन्द्र के नन्दनवन को तथा देवताओं के दूसरे-दूसरे उद्यानों को नष्ट करता रहता था॥ १५ १/२॥
चन्द्रसूर्यौ महाभागावुत्तिष्ठन्तौ परंतपौ॥१६॥
निवारयति बाहभ्यां यः शैलशिखरोपमः।
वह पर्वत-शिखर के समान आकार धारण करके शत्रुओं को संताप देने वाले महाभाग चन्द्रमा और सूर्य को उनके उदयकाल में अपने हाथों से रोक देता था॥ १६ १/२॥
दशवर्षसहस्राणि तपस्तप्त्वा महावने ॥१७॥
पुरा स्वयंभुवे धीरः शिरांस्युपजहार यः।
उस धीर स्वभाव वाले रावण ने पूर्वकाल में एक विशाल वन के भीतर दस हजार वर्षां तक घोर तपस्या करके ब्रह्माजी को अपने मस्तकों की बलि दे दी थी॥ १७ १/२॥
देवदानवगन्धर्वपिशाचपतगोरगैः॥१८॥
अभयं यस्य संग्रामे मृत्युतो मानुषादृते।
उसके प्रभाव से उसे देवता, दानव, गन्धर्व, पिशाच, पक्षी और साँसे भी संग्राम में अभय प्राप्त हो गया था। मनुष्य के सिवा और किसी के हाथ से उसे मृत्यु का भय नहीं था। १८ १/२ ।।
मन्त्रैरभिष्टुतं पुण्यमध्वरेषु द्विजातिभिः॥ १९॥
हविर्धानेषु यः सोममुपहन्ति महाबलः।
वह महाबली राक्षस सोमसवनकर्मविशिष्ट यज्ञों में द्विजातियों द्वारा वेदमन्त्रों के उच्चारणपूर्वक निकाले गये तथा वैदिक मन्त्रों से ही सुसंस्कृत एवं स्तुत हुए पवित्र सोमरस को वहाँ पहुँचकर नष्ट कर देता था। १९ १/२॥
प्राप्तयज्ञहरं दुष्टं ब्रह्मघ्नं क्रूरकारिणम्॥२०॥
कर्कशं निरनुक्रोशं प्रजानामहिते रतम्।
समाप्ति के निकट पहुँचे हुए यज्ञों का विध्वंस करने वाला वह दुष्ट निशाचर ब्राह्मणों की हत्या तथा दूसरे-दूसरे क्रूर कर्म करता था। वह बड़े ही रूखे स्वभाव का और निर्दय था। सदा प्रजाजनों के अहित में ही लगा रहता था। २० १/२॥
रावणं सर्वभूतानां सर्वलोकभयावहम्॥२१॥
राक्षसी भ्रातरं क्रूरं सा ददर्श महाबलम्।
समस्त लोकों को भय देने वाले और सम्पूर्ण प्राणियों को रुलाने वाले अपने इस महाबली क्रूर भाई को राक्षसी शूर्पणखा ने उस समय देखा॥ २१ १/२॥
तं दिव्यवस्त्राभरणं दिव्यमाल्योपशोभितम्॥ २२॥
आसने सूपविष्टं तं काले कालमिवोद्यतम्।
राक्षसेन्द्रं महाभागं पौलस्त्यकुलनन्दनम्॥२३॥
वह दिव्य वस्त्रों और आभूषणों से विभूषित था। दिव्य पुष्पों की मालाएँ उसकी शोभा बढ़ा रही थीं। सिंहासन पर बैठा हुआ राक्षसराज पुलस्त्यकुलनन्दन महाभाग दशग्रीव प्रलयकाल में संहार के लिये उद्यत हुए महाकाल के समान जान पड़ता था॥ २२-२३॥
उपगम्याब्रवीद वाक्यं राक्षसी भयविह्वला।
रावणं शत्रुहन्तारं मन्त्रिभिः परिवारितम्॥२४॥
मन्त्रियों से घिरे हुए शत्रुहन्ता भाई रावण के पास जाकर भय से विह्वल हुई वह राक्षसी कुछ कहने को उद्यत हुई।॥ २४॥
तमब्रवीद् दीप्तविशाललोचनं प्रदर्शयित्वा भयलोभमोहिता।
सुदारुणं वाक्यमभीतचारिणी महात्मना शूर्पणखा विरूपिता॥ २५॥
महात्मा लक्ष्मण ने नाक-कान काटकर जिसे कुरूप कर दिया था तथा जो निर्भय विचरने वाली थी, वह भय और लोभ से मोहित हुई शूर्पणखा बड़े-बड़े चमकीले नेत्रों वाले अत्यन्त क्रूर रावण को अपनी दुर्दशा दिखाकर उससे बोली॥२५॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे द्वात्रिंशः सर्गः॥ ३२॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में बत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ। ३२॥
सर्ग-33
ततः शूर्पणखा दीना रावणं लोकरावणम्।
अमात्यमध्ये संक्रुद्धा परुषं वाक्यमब्रवीत्॥१॥
उस समय शूर्पणखा श्रीराम से तिरस्कृत होने के कारण बहुत दुःखी थी। उसने मन्त्रियों के बीच में बैठे हुए समस्त लोकों को रुलाने वाले रावण से अत्यन्त कुपित होकर कठोर वाणी में कहा- ॥१॥
प्रमत्तः कामभोगेषु स्वैरवृत्तो निरङ्कशः।
समुत्पन्नं भयं घोरं बोद्धव्यं नावबुध्यसे॥२॥
‘राक्षसराज! तुम स्वेच्छाचारी और निरङ्कश होकर विषय-भोगों में मतवाले हो रहे हो। तुम्हारे लिये घोरभय उत्पन्न हो गया है। तुम्हें इसकी जानकारी होनी चाहिये थी, किंतु तुम इसके विषय में कुछ नहीं जानते हो॥२॥
सक्तं ग्राम्येषु भोगेषु कामवृत्तं महीपतिम्।
लुब्धं न बहु मन्यन्ते श्मशानाग्निमिव प्रजाः॥ ३॥
‘जो राजा निम्न श्रेणी के भोगों में आसक्त हो स्वेच्छाचारी और लोभी हो जाता है, उसे मरघट की आग के समान हेय मानकर प्रजा उसका अधिक आदर नहीं करती है॥३॥
स्वयं कार्याणि यः काले नानुतिष्ठति पार्थिवः।
स तु वै सह राज्येन तैश्च कार्यैर्विनश्यति॥४॥
‘जो राजा ठीक समय पर स्वयं ही अपने कार्यों का सम्पादन नहीं करता है, वह राज्य और उन कार्यों के साथ ही नष्ट हो जाता है॥४॥
अयुक्तचारं दुर्दर्शमस्वाधीनं नराधिपम्।
वर्जयन्ति नरा दूरान्नदीपङ्कमिव द्विपाः॥५॥
‘जो राज्य की देखभाल के लिये गुप्तचरों को नियुक्त नहीं करता है, प्रजाजनों को जिसका दर्शन दुर्लभ हो जाता है और कामिनी आदि भोगों में आसक्त होने के कारण अपनी स्वाधीनता खो बैठता है, ऐसे राजा को प्रजा दूर से ही त्याग देती है। ठीक उसी तरह, जैसे हाथी नदी की कीचड़ से दूर ही रहते हैं॥५॥
ये न रक्षन्ति विषयमस्वाधीनं नराधिपाः।
ते न वृद्ध्या प्रकाशन्ते गिरयः सागरे यथा॥६॥
जो नरेश अपने राज्य के उस प्रान्त की, जो अपनी ही असावधानी के कारण दूसरे के अधिकार में चला गया हो, रक्षा नहीं करते—उसे पुनः अपने अधिकार में नहीं लाते, वे समुद्र में डूबे हुए पर्वतों की भाँति अपने अभ्युदय से प्रकाशित नहीं होते हैं।॥ ६॥
आत्मवद्भिर्विगृह्य त्वं देवगन्धर्वदानवैः।
अयुक्तचारश्चपलः कथं राजा भविष्यसि॥७॥
‘जो अपने मन को काबू में रखने वाले एवं प्रयत्नशील हैं, उन देवताओं, गन्धर्वो तथा दानवों के साथ विरोध करके तुमने अपने राज्य की देखभाल के लिये गुप्तचर नहीं नियुक्त किये हैं, ऐसी दशा में तुम जैसा विषयलोलुप चपल पुरुष कैसे राजा बना रह सकेगा? ॥ ७॥
त्वं तु बालस्वभावश्च बुद्धिहीनश्च राक्षस।
ज्ञातव्यं तन्न जानीषे कथं राजा भविष्यसि॥८॥
‘राक्षस! तुम्हारा स्वभाव बालकों-जैसा है। तुम निरे बुद्धिहीन हो। तुम्हें जानने योग्य बातों का भी ज्ञान नहीं है। ऐसी दशा में तुम किस तरह राजा बने रह सकोगे? ॥ ८॥
येषां चाराश्च कोशश्च नयश्च जयतां वर।
अस्वाधीना नरेन्द्राणां प्राकृतैस्ते जनैः समाः॥ ९॥
“विजयी वीरों में श्रेष्ठ निशाचरपते! जिन नरेशों के गुप्तचर, कोष और नीति—ये सब अपने अधीन नहीं हैं, वे साधारण लोगों के ही समान हैं॥९॥
यस्मात् पश्यन्ति दूरस्थान् सर्वानर्थान् नराधिपाः।
चारेण तस्मादुच्यन्ते राजानो दीर्घचक्षुषः ॥ १०॥
‘गुप्तचरों की सहायता से राजालोग दूर-दूर के सारे कार्यों की देखभाल करते रहते हैं, इसीलिये वे दीर्घदर्शी या दूरदर्शी कहलाते हैं॥ १० ॥
अयुक्तचारं मन्ये त्वां प्राकृतैः सचिवैर्युतः।
स्वजनं च जनस्थानं निहतं नावबुध्यसे॥११॥
मैं समझती हूँ, तुम गवाँर मन्त्रियों से घिरे हुए हो, तभी तो तुमने अपने राज्य के भीतर गुप्तचर नहीं तैनात किये हैं। तुम्हारे स्वजन मारे गये और जनस्थान उजाड़ हो गया, फिर भी तुम्हें इसका पता नहीं लगा है।॥ ११॥
चतुर्दश सहस्राणि रक्षसां भीमकर्मणाम्।
हतान्येकेन रामेण खरश्च सहदूषणः॥१२॥
ऋषीणामभयं दत्तं कृतक्षेमाश्च दण्डकाः।
धर्षितं च जनस्थानं रामेणाक्लिष्टकारिणा॥ १३॥
‘अकेले राम ने, जो अनायास ही महान् कर्म करने वाले हैं, भीमकर्मा राक्षसों की चौदह हजार सेना को यमलोक पहुँचा दिया, खर और दूषण के भी प्राण ले लिये, ऋषियों को भी अभय दान कर दिया तथा दण्डकारण्य में राक्षसों की ओर से जो विघ्नबाधाएँ थीं, उन सबको दूर करके वहाँ शान्ति स्थापित कर दी। जनस्थान को तो उन्होंने चौपट ही कर डाला।। १२-१३॥
त्वं तु लुब्धः प्रमत्तश्च पराधीनश्च राक्षस।
विषये स्वे समुत्पन्नं यद् भयं नावबुध्यसे॥१४॥
‘राक्षस! तुम तो लोभ और प्रमाद में फँसकर पराधीन हो रहे हो, अतः अपने ही राज्य में उत्पन्न हुए भय का तुम्हें कुछ पता ही नहीं है॥ १४ ॥
तीक्ष्णमल्पप्रदातारं प्रमत्तं गर्वितं शठम्।
व्यसने सर्वभूतानि नाभिधावन्ति पार्थिवम्॥ १५॥
‘जो राजा कठोरतापूर्ण बर्ताव करता अथवा तीखे स्वभाव का परिचय देता है, सेवकों को बहुत कम वेतन देता है, प्रमाद में पड़ा और गर्व में भरा रहता है तथा स्वभाव से ही शठ होता है, उसके संकट में पड़ने पर सभी प्राणी उसका साथ छोड़ देते हैं उसकी सहायता के लिये आगे नहीं बढ़ते हैं।
अतिमानिनमग्राह्यमात्मसम्भावितं नरम्।
क्रोधनं व्यसने हन्ति स्वजनोऽपि नराधिपम्॥ १६॥
‘जो अत्यन्त अभिमानी, अपनाने के अयोग्य, आप ही अपने को बहुत बड़ा मानने वाला और क्रोधी होता है, ऐसे नर अथवा नरेश को संकटकाल में आत्मीय जन भी मार डालते हैं॥ १६॥
नानुतिष्ठति कार्याणि भयेषु न बिभेति च।
क्षिप्रं राज्याच्च्युतो दीनस्तृणैस्तुल्यो भवेदिह॥ १७॥
‘जो राजा अपने कर्तव्य का पालन अथवा करने योग्य कार्यों का सम्पादन नहीं करता तथा भय के अवसरों पर भयभीत (एवं अपनी रक्षा के लिये सावधान) नहीं होता, वह शीघ्र ही राज्य से भ्रष्ट एवं दीन होकर इस भूतल पर तिनकों के समान उपेक्षणीय हो जाता है।॥ १७॥
शुष्ककाष्ठैर्भवेत् कार्यं लोष्ठैरपि च पांसुभिः।
न तु स्थानात् परिभ्रष्टैः कार्यं स्याद् वसुधाधिपैः॥ १८॥
‘लोगों को सूखे काठों से, मिट्टी के ढेलों तथा धूल से भी कुछ प्रयोजन होता है, किंतु स्थानभ्रष्ट राजाओं से उन्हें कोई प्रयोजन नहीं रहता॥ १८ ॥
उपभुक्तं यथा वासः स्रजो वा मृदिता यथा।
एवं राज्यात् परिभ्रष्टः समर्थोऽपि निरर्थकः॥
‘जैसे पहना हुआ वस्त्र और मसल डाली गयी फूलों की माला दूसरों के उपयोग में आने योग्य नहीं होती, इसी प्रकार राज्य से भ्रष्ट हुआ राजा समर्थ होने पर भी दूसरों के लिये निरर्थक है॥ १९॥
अप्रमत्तश्च यो राजा सर्वज्ञो विजितेन्द्रियः।
कृतज्ञो धर्मशीलश्च स राजा तिष्ठते चिरम्॥ २०॥
‘परंतु जो राजा सदा सावधान रहता, राज्य के समस्त कार्यों की जानकारी रखता, इन्द्रियों को वश में किये रहता, कृतज्ञ (दूसरों के उपकार को मानने वाला) तथा स्वभाव से ही धर्मपरायण होता है, वह राजा बहुत दिनों तक राज्य करता है॥ २० ॥
नयनाभ्यां प्रसुप्तो वा जागर्ति नयचक्षुषा।
व्यक्तक्रोधप्रसादश्च स राजा पूज्यते जनैः॥ २१॥
‘जो स्थूल आँखों से तो सोता है, परंतु नीति की आँखों से सदा जागता रहता है तथा जिसके क्रोध और अनुग्रह का फल प्रत्यक्ष प्रकट होता है, उसी राजा की लोग पूजा करते हैं॥२१॥
त्वं तु रावण दुर्बुद्धिर्गुणैरेतैर्विवर्जितः।
यस्य तेऽविदितश्चारै रक्षसां सुमहान् वधः॥ २२॥
‘रावण! तुम्हारी बुद्धि दूषित है और तुम इन सभी राजोचित गुणों से वञ्चित हो; क्योंकि तुम्हें अबतक गुप्तचरों की सहायता से राक्षसों के इस महान् संहार का समाचार ज्ञात नहीं हो सका था॥ २२॥
परावमन्ता विषयेषु सङ्गवान् न देशकालप्रविभागतत्त्ववित्।
अयुक्तबुद्धिर्गुणदोषनिश्चये विपन्नराज्यो न चिराद् विपत्स्यसे॥२३॥
‘तुम दूसरों का अनादर करने वाले, विषयासक्त और देश-काल के विभाग को यथार्थ रूप से न जानने वाले हो, तुमने गुण और दोष के विचार एवं निश्चय में कभी अपनी बुद्धि को नहीं लगाया है, अतः तुम्हारा राज्य शीघ्र हीनष्ट हो जायगा और तुम स्वयं भी भारी विपत्ति में पड़ जाओगे’।
इति स्वदोषान् परिकीर्तितांस्तथा समीक्ष्य बुद्ध्या क्षणदाचरेश्वरः।
धनेन दर्पण बलेन चान्वितो विचिन्तयामास चिरं स रावणः॥२४॥
शूर्पणखा के द्वारा कहे गये अपने दोषों पर बुद्धिपूर्वक विचार करके धन, अभिमान और बल से सम्पन्न वह निशाचर रावण बहुत देर तक सोच विचार एवं चिन्ता में पड़ा रहा।॥ २४ ॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे त्रयस्त्रिंशः सर्गः ॥३३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में तैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।३३॥
सर्ग-34
ततः शूर्पणखां दृष्ट्वा ब्रुवन्तीं परुषं वचः।
अमात्यमध्ये संक्रुद्धः परिपप्रच्छ रावणः॥१॥
शूर्पणखा को इस प्रकार कठोर बातें कहती देख मन्त्रियों के बीच में बैठे हुए रावण ने अत्यन्त कुपित होकर पूछा- ॥१॥
कश्च रामः कथंवीर्यः किंरूपः किंपराक्रमः।
किमर्थं दण्डकारण्यं प्रविष्टश्च सुदुस्तरम्॥२॥
‘राम कौन है ? उसका बल कैसा है ? रूप और पराक्रम कैसे हैं? अत्यन्त दुस्तर दण्डकारण्य में उसने किस लिये प्रवेश किया है ? ॥ २॥
आयुधं किं च रामस्य येन ते राक्षसा हताः।
खरश्च निहतः संख्ये दूषणस्त्रिशिरास्तथा ॥३॥
‘राम के पास कौन-सा ऐसा अस्त्र है, जिससे वे सब राक्षस मारे गये तथा युद्ध में खर, दूषण और त्रिशिरा का भी संहार हो गया॥३॥
तत्त्वं ब्रूहि मनोज्ञाङ्गि केन त्वं च विरूपिता।
इत्युक्ता राक्षसेन्द्रेण राक्षसी क्रोधमूर्च्छिता॥४॥
‘मनोहर अङ्गों वाली शूर्पणखे! ठीक-ठीक बताओ, किसने तुम्हें कुरूप बनाया है—किसने तुम्हारी नाक और कान काट डाले हैं?’ राक्षसराज रावण के इस प्रकार पूछने पर वह राक्षसी क्रोध से अचेत-सी हो उठी॥ ४॥
ततो रामं यथान्यायमाख्यातुमुपचक्रमे।
दीर्घबाहुर्विशालाक्षश्चीरकृष्णाजिनाम्बरः॥५॥
कन्दर्पसमरूपश्च रामो दशरथात्मजः।।
तदनन्तर उसने श्रीराम का यथावत् परिचय देना आरम्भ किया—’भैया! श्रीरामचन्द्र राजा दशरथ के पुत्र हैं, उनकी भुजाएँ लंबी, आँखें बड़ी-बड़ी और रूप कामदेव के समान है। वे चीर और काला मृगचर्म धारण करते हैं॥ ५ १/२ ॥
शक्रचापनिभं चापं विकृष्य कनकाङ्गदम्॥६॥
दीप्तान् क्षिपति नाराचान् सर्पानिव महाविषान्।
‘श्रीराम इन्द्रधनुष के समान अपने विशाल धनुष को, जिसमें सोने के छल्ले शोभा दे रहे हैं, खींचकर उसके द्वारा महाविषैले सर्पा के समान तेजस्वी नाराचों की वर्षा करते हैं। ६ १/२॥
नाददानं शरान् घोरान् विमुञ्चन्तं महाबलम्॥ ७॥
न कार्मुकं विकर्षन्तं रामं पश्यामि संयुगे।
‘वे महाबली राम युद्धस्थल में कब धनुष खींचते, कब भयंकर बाण हाथ में लेते और कब उन्हें छोड़ते हैं—यह मैं नहीं देख पाती थी॥ ७ १/२॥
हन्यमानं तु तत्सैन्यं पश्यामि शरवृष्टिभिः॥८॥
इन्द्रेणेवोत्तमं सस्यमाहतं त्वश्मवृष्टिभिः।।
‘उनके बाणों की वर्षा से राक्षसों की सेना मर रही है – इतना ही मुझे दिखायी देता था। जैसे इन्द्र (मेघ) द्वारा बरसाये गये ओलों की वृष्टि से अच्छी खेती चौपट हो जाती है, उसी प्रकार राम के बाणों से राक्षसों का विनाश हो गया॥ ८ १/२॥
रक्षसां भीमवीर्याणां सहस्राणि चतुर्दश॥९॥
निहतानि शरैस्तीक्ष्णैस्तेनैकेन पदातिना।
अर्धाधिकमुहूर्तेन खरश्च सहदूषणः॥१०॥
ऋषीणामभयं दत्तं कृतक्षेमाश्च दण्डकाः॥
‘श्रीराम अकेले और पैदल थे, तो भी उन्होंने डेढ़ मुहूर्त (तीन घड़ी) के भीतर ही खर और दूषणसहित चौदह हजार भयंकर बलशाली राक्षसों का तीखे बाणों से संहार कर डाला, ऋषियों को अभय दे दिया और समस्त दण्डक वन को राक्षसों की विघ्न-बाधा से रहित कर दिया॥९–११॥
एका कथंचिन्मुक्ताहं परिभूय महात्मना।
स्त्रीवधं शङ्कमानेन रामेण विदितात्मना॥१२॥
‘आत्मज्ञानी महात्मा श्रीराम ने स्त्री का वध हो जाने के भय से एकमात्र मुझे किसी तरह केवल अपमानित करके ही छोड़ दिया॥ १२ ॥
भ्राता चास्य महातेजा गुणतस्तुल्यविक्रमः।
अनुरक्तश्च भक्तश्च लक्ष्मणो नाम वीर्यवान्॥ १३॥
अमर्षी दुर्जयो जेता विक्रान्तो बुद्धिमान् बली।
रामस्य दक्षिणो बाहुर्नित्यं प्राणो बहिश्चरः॥ १४॥
‘उनका एक बड़ा ही तेजस्वी भाई है, जो गुण और पराक्रम में उन्हीं के समान है। उसका नाम है लक्ष्मण। वह पराक्रमी वीर अपने बड़े भाई का प्रेमी और भक्त है, उसकी बुद्धि बड़ी तीक्ष्ण है, वह अमर्षशील, दुर्जय, विजयी तथा बल-विक्रम से सम्पन्न है। श्रीराम का वह मानो दाहिना हाथ और सदा बाहर विचरने वाला प्राण है॥ १३-१४ ॥
रामस्य तु विशालाक्षी पूर्णेन्दुसदृशानना।
धर्मपत्नी प्रिया नित्यं भर्तुः प्रियहिते रता॥१५॥
‘श्रीराम की धर्मपत्नी भी उनके साथ है। वह पति को बहुत प्यारी है और सदा अपने स्वामी का प्रिय तथा हित करने में ही लगी रहती है। उसकी आँखें विशाल और मुख पूर्ण चन्द्र के समान मनोरम है।॥ १५ ॥
सा सुकेशी सुनासोरूः सुरूपा च यशस्विनी।
देवतेव वनस्यास्य राजते श्रीरिवापरा॥१६॥
‘उसके केश, नासिका, ऊरु तथा रूप बड़े ही सुन्दर तथा मनोहर हैं। वह यशस्विनी राजकुमारी इस दण्डक वन की देवी-सी जान पड़ती है और दूसरी लक्ष्मी के समान शोभा पाती है।॥ १६॥
तप्तकाञ्चनवर्णाभा रक्ततुङ्गनखी शुभा।
सीता नाम वरारोहा वैदेही तनुमध्यमा॥१७॥
‘उसका सुन्दर शरीर तपाये हुए सुवर्ण की कान्ति धारण करता है, नख ऊँचे तथा लाल हैं। वह शुभलक्षणों से सम्पन्न है। उसके सभी अङ्ग सुडौल हैं और कटिभाग सुन्दर तथा पतला है। वह विदेहराज जनक की कन्या है और सीता उसका नाम है॥ १७॥
नैव देवी न गन्धर्वी न यक्षी न च किंनरी।
तथारूपा मया नारी दृष्टपूर्वा महीतले॥१८॥
‘देवताओं, गन्धर्वो, यक्षों और किन्नरों की स्त्रियों में भी कोई उसके समान सुन्दरी नहीं है। इस भूतलपर वैसी रूपवती नारी मैंने पहले कभी नहीं देखी थी॥ १८॥
यस्य सीता भवेद् भार्या यं च हृष्टा परिष्वजेत्।
अभिजीवेत् स सर्वेषु लोकेष्वपि पुरंदरात्॥१९॥
‘सीता जिसकी भार्या हो और वह हर्ष में भरकर जिसका आलिङ्गन करे, समस्त लोकों में उसीका जीवन इन्द्र से भी अधिक भाग्यशाली है॥ १९॥
सा सुशीला वपुःश्लाघ्या रूपेणाप्रतिमा भुवि।
तवानुरूपा भार्या सा त्वं च तस्याः पतिर्वरः॥ २०॥
“उसका शील-स्वभाव बड़ा ही उत्तम है। उसका एक-एक अङ्ग स्तुत्य एवं स्पृहणीय है। उसके रूप की समानता करने वाली भूमण्डल में दूसरी कोई स्त्री नहीं है। वह तुम्हारे योग्य भार्या होगी और तुम भी उसके योग्य श्रेष्ठ पति होओगे॥ २० ॥
तां तु विस्तीर्णजघनां पीनोत्तुङ्गपयोधराम्।
भार्यार्थे तु तवानेतुमुद्यताहं वराननाम्॥२१॥
विरूपितास्मि क्रूरेण लक्ष्मणेन महाभुज।
‘महाबाहो! विस्तृत जघन और उठे हुए पुष्ट कुचों वाली उस सुमुखी स्त्री को जब मैं तुम्हारी भार्या बनाने के लिये ले आने को उद्यत हुई, तब क्रूर लक्ष्मण ने मुझे इस तरह कुरूप कर दिया।। २१ १/२॥
तां तु दृष्ट्वाद्य वैदेहीं पूर्णचन्द्रनिभाननाम्॥२२॥
मन्मथस्य शराणां च त्वं विधेयो भविष्यसि।
‘पूर्ण चन्द्रमा के समान मनोहर मुखवाली विदेहराजकुमारी सीता को देखते ही तुम कामदेव के बाणों के लक्ष्य बन जाओगे॥ २२ १/२॥
यदि तस्यामभिप्रायो भार्यात्वे तव जायते।
शीघ्रमुद्धियतां पादो जयार्थमिह दक्षिणः॥२३॥
‘यदि तम्हें सीता को अपनी भार्या बनाने की इच्छा हो तो शीघ्र ही श्रीराम को जीतने के लिये यहाँ अपना दाहिना पैर आगे बढ़ाओ॥२३॥
रोचते यदि ते वाक्यं ममैतद् राक्षसेश्वर।
क्रियतां निर्विशङ्केन वचनं मम रावण ॥२४॥
‘राक्षसराज रावण! यदि तुम्हें मेरी यह बात पसंद हो तो निःशङ्क होकर मेरे कथनानुसार कार्य करो॥ २४॥
विज्ञायैषामशक्तिं च क्रियतां च महाबल।
सीता तवानवद्याङ्गी भार्यात्वे राक्षसेश्वर ॥२५॥
‘महाबली राक्षसेश्वर! इन राम आदि की असमर्थता और अपनी शक्ति का विचार करके सर्वाङ्गसुन्दरी सीता को अपनी भार्या बनाने का प्रयत्न करो (उसे हर लाओ) ॥ २५ ॥
निशम्य रामेण शरैरजिह्मगैर्हताञ्जनस्थानगतान् निशाचरान्।
खरं च दृष्ट्वा निहतं च दूषणं त्वमद्य कृत्यं प्रतिपत्तुमर्हसि ॥२६॥
‘श्रीराम ने अपने सीधे जाने वाले बाणों द्वारा जनस्थाननिवासी निशाचरों को मार डाला और खर तथा दूषण को भी मौत के घाट उतार दिया, यह सब सुनकर और देखकर अब तुम्हारा क्या कर्तव्य है, इसका निश्चय तुम्हें कर लेना चाहिये’ ।। २६॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे चतुस्त्रिंशः सर्गः॥३४॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में चौंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।३४॥
सर्ग-35
ततः शूर्पणखावाक्यं तच्छ्रुत्वा रोमहर्षणम्।
सचिवानभ्यनुज्ञाय कार्यं बुद्ध्वा जगाम ह॥१॥
शूर्पणखा की ये रोंगटे खड़ी कर देने वाली बातें सुनकर रावण मन्त्रियों से सलाह ले अपने कर्तव्य का निश्चय करके वहाँ से चल दिया॥१॥
तत् कार्यमनुगम्यान्तर्यथावदुपलभ्य च।
दोषाणां च गुणानां च सम्प्रधार्य बलाबलम्॥ २॥
इति कर्तव्यमित्येव कृत्वा निश्चयमात्मनः।
स्थिरबुद्धिस्ततो रम्यां यानशालां जगाम ह॥३॥
उसने पहले सीताहरणरूपी कार्य पर मन-ही-मन विचार किया। फिर उसके दोषों और गुणों का यथावत् ज्ञान प्राप्त करके बलाबल का निश्चय किया। अन्त में यह स्थिर किया कि इस काम को करना ही
चाहिये। जब इस बात पर उसकी बुद्धि जम गयी, तब वह रमणीय रथशाला में गया॥ २-३॥
यानशालां ततो गत्वा प्रच्छन्नं राक्षसाधिपः।
सूतं संचोदयामास रथः संयुज्यतामिति॥४॥
गुप्त रूप से रथशाला में जाकर राक्षसराज रावण ने अपने सारथि को यह आज्ञा दी कि ‘मेरा रथ जोतकर तैयार करो’ ॥ ४॥
एवमुक्तः क्षणेनैव सारथिर्लघुविक्रमः।
रथं संयोजयामास तस्याभिमतमुत्तमम्॥५॥
सारथि शीघ्रतापूर्वक कार्य करने में कुशल था। रावण की उपर्युक्त आज्ञा पाकर उसने एक ही क्षण में उसके मन के अनुकूल उत्तम रथ जोतकर तैयार कर दिया॥ ५॥
कामगं रथमास्थाय काञ्चनं रत्नभूषितम्।
पिशाचवदनैर्युक्तं खरैः कनकभूषणैः॥६॥
वह रथ इच्छानुसार चलने वाला तथा सुवर्णमय था। उसे रत्नों से विभूषित किया गया था। उसमें सोने के साज-बाजों से सजे हुए गधे जुते थे, जिनका मुख पिशाचों के समान था। रावण उस पर आरूढ़ होकर चला॥ ६॥
मेघप्रतिमनादेन स तेन धनदानुजः।
राक्षसाधिपतिः श्रीमान् ययौ नदनदीपतिम्॥७॥
वह रथ मेघ-गर्जना के समान गम्भीर घर-घर ध्वनि फैलाता हुआ चलता था। उसके द्वारा वह कुबेर का छोटा भाई श्रीमान् राक्षसराज रावण समुद्र के तट पर गया॥७॥
स श्वेतवालव्यजनः श्वेतच्छत्रो दशाननः।
स्निग्धवैदूर्यसंकाशस्तप्तकाञ्चनभूषणः॥८॥
दशग्रीवो विंशतिभुजो दर्शनीयपरिच्छदः।
त्रिदशारिर्मुनीन्द्रघ्नो दशशीर्ष इवाद्रिराट् ॥९॥
उस समय उसके लिये सफेद चँवर से हवा की जा रही थी। सिर के ऊपर श्वेत छत्र तना हुआ था। उसकी अङ्गकान्ति स्निग्ध वैदूर्यमणि के समान नीली या काली थी। वह पक्के सोने के आभूषणों से विभूषित था। उसके दस मुख, दस कण्ठ और बीस भुजाएँ थीं। उसके वस्त्राभूषण आदि अन्य उपकरण भी देखने ही योग्य थे। देवताओं का शत्रु और मुनीश्वरों का हत्यारा वह निशाचर दस शिखरों वाले पर्वतराज के समान प्रतीत होता था॥ ८-९॥
कामगं रथमास्थाय शुशुभे राक्षसाधिपः।
विद्युन्मण्डलवान् मेघः सबलाक इवाम्बरे ॥ १०॥
इच्छानुसार चलने वाले उस रथ पर आरूढ़ हो राक्षसराज रावण आकाश में विद्युन्मण्डल से घिरे हुए तथा वकपंक्तियों से सुशोभित मेघ के समान शोभा पा रहा था॥ १० ॥
सशैलसागरानूपं वीर्यवानवलोकयन्।
नानापुष्पफलैर्वृक्षैरनुकीर्णं सहस्रशः॥११॥
शीतमङ्गलतोयाभिः पद्मिनीभिः समन्ततः।
विशालैराश्रमपदैर्वेदिमद्भिरलंकृतम्॥१२॥
पराक्रमी रावण पर्वतयुक्त समुद्र के तट पर पहुँचकर उसकी शोभा देखने लगा। सागर का वह किनारा नाना प्रकार के फल-फूलवाले सहस्रों वृक्षों से व्याप्त था। चारों ओर मङ्गलकारी शीतल जल से भरी हुई पुष्करिणियाँ और वेदिकाओं से मण्डित विशाल आश्रम उस सिन्धुतट की शोभा बढ़ा रहे थे॥ ११-१२ ॥
कदल्यटविसंशोभं नारिकेलोपशोभितम्।
सालैस्तालैस्तमालैश्च तरुभिश्च सुपुष्पितैः॥ १३॥
कहीं कदलीवन और कहीं नारियल के कुञ्ज शोभा दे रहे थे। साल, ताल, तमाल तथा सुन्दर फूलों से भरे हुए दूसरे-दूसरे वृक्ष उस तटप्रान्त को अलंकृत कर रहे थे॥
अत्यन्तनियताहारैः शोभितं परमर्षिभिः।
नागैः सुपर्णैर्गन्धर्वैः किंनरैश्च सहस्रशः॥१४॥
अत्यन्त नियमित आहार करने वाले बड़े-बड़े महर्षियों, नागों, सुपर्णों (गरुड़ों), गन्धर्वो तथा सहस्रों किन्नरों से भी उस स्थान की बड़ी शोभा हो रही थी॥ १४॥
जितकामैश्च सिद्धैश्च चारणैश्चोपशोभितम्।
आजैर्वैखानसैर्माषैर्वालखिल्यैर्मरीचिपैः॥ १५॥
कामविजयी सिद्धों, चारणों, ब्रह्माजी के पुत्रों, वानप्रस्थों, माष गोत्र में उत्पन्न मुनियों, बालखिल्य महात्माओं तथा केवल सूर्य-किरणों का पान करने वाले तपस्वीजनों से भी वह सागर का तटप्रान्त सुशोभित हो रहा था। १५॥
दिव्याभरणमाल्याभिर्दिव्यरूपाभिरावृतम्।
क्रीडारतविधिज्ञाभिरप्सरोभिः सहस्रशः॥१६॥
सेवितं देवपत्नीभिः श्रीमतीभिरुपासितम्।
देवदानवसङ्घश्च चरितं त्वमृताशिभिः॥१७॥
दिव्य आभूषणों और पुष्पमालाओं को धारण करने वाली तथा क्रीड़ा-विहार की विधि को जानने वाली सहस्रों दिव्यरूपिणी अप्सराएँ वहाँ सब ओर विचर रही थीं। कितनी ही शोभाशालिनी देवाङ्गनाएँ उस सिन्धुतट का सेवन करती हुई आस-पास बैठी थीं। देवताओं और दानवों के समूह तथा अमृतभोजी देवगण वहाँ विचर रहे थे॥ १६-१७ ॥
हंसक्रौञ्चप्लवाकीर्णं सारसैः सम्प्रसादितम्।
वैदूर्यप्रस्तरं स्निग्धं सान्द्रं सागरतेजसा॥१८॥
सिन्धु का वह तट समुद्र के तेज से उसकी तरङ्गमालाओं के स्पर्श से स्निग्ध एवं शीतल था। वहाँ हंस, क्रौञ्च तथा मेढक सब ओर फैले हुए थे और सारस उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। उस तट पर वैदर्यमणि के सदृश श्याम रंग के प्रस्तर दिखायी देते थे॥१८॥
पाण्डुराणि विशालानि दिव्यमाल्ययुतानि च।
तूर्यगीताभिजुष्टानि विमानानि समन्ततः॥१९॥
तपसा जितलोकानां कामगान्यभिसम्पतन्।
गन्धर्वाप्सरसश्चैव ददर्श धनदानुजः॥२०॥
आकाशमार्ग से यात्रा करते हुए कुबेर के छोटे भाई रावण ने रास्ते में सब ओर बहुत-से श्वेत वर्ण के विमानों, गन्धर्वो तथा अप्सराओं को भी देखा। वे इच्छानुसार चलने वाले विशाल विमान उन पुण्यात्मा
पुरुषों के थे, जिन्होंने तपस्या से पुण्यलोकों पर विजय पायी थी। उन विमानों को दिव्य पुष्पों से सजाया गयाथा और उनके भीतर से गीत-वाद्य की ध्वनि प्रकट हो रही थी। १९-२०॥
निर्यासरसमूलानां चन्दनानां सहस्रशः।
वनानि पश्यन् सौम्यानि घ्राणतृप्तिकराणि च॥ २१॥
आगे बढ़ने पर उसने, जिनकी जड़ों से गोंद निकले हुए थे, ऐसे चन्दनों के सहस्रों वन देखे, जो बड़े ही सुहावने और अपनी सुगन्ध से नासिका को तृप्त करने वाले थे॥ २१॥
अगुरूणां च मुख्यानां वनान्युपवनानि च।
तक्कोलानां च जात्यानां फलिनां च सुगन्धिनाम्॥ २२॥
पुष्पाणि च तमालस्य गुल्मानि मरिचस्य च।
मुक्तानां च समूहानि शुष्यमाणानि तीरतः॥२३॥
शैलानि प्रवरांश्चैव प्रवालनिचयांस्तथा।
काञ्चनानि च शृङ्गाणि राजतानि तथैव च॥ २४॥
प्रस्रवाणि मनोज्ञानि प्रसन्नान्यद्भुतानि च।
धनधान्योपपन्नानि स्त्रीरत्नैरावृतानि च॥२५॥
हस्त्यश्वरथगाढानि नगराणि विलोकयन्।
कहीं श्रेष्ठ अगुरु के वन थे, कहीं उत्तम जाति के सुगन्धित फल वाले तक्कोलों (वृक्ष विशेषों) के उपवन थे। कहीं तमाल के फूल खिले हुए थे। कहीं गोल मिर्च की झाड़ियाँ शोभा पाती थीं और कहीं समुद्र के तट पर ढेर-के-ढेर मोती सूख रहे थे। कहीं श्रेष्ठ पर्वतमालाएँ, कहीं मूगों की राशियाँ, कहीं सोनेचाँदी के शिखर तथा कहीं सुन्दर, अद्भुत और स्वच्छ पानी के झरने दिखायी देते थे। कहीं धन-धान्य से सम्पन्न, स्त्री-रत्नों से भरे हुए तथा हाथी, घोड़े और रथों से व्याप्त नगर दृष्टिगोचर होते थे। इन सबको देखता हुआ रावण आगे बढ़ा॥ २२–२५ १/२ ॥
तं समं सर्वतः स्निग्धं मृदुसंस्पर्शमारुतम्॥ २६॥
अनूपे सिन्धुराजस्य ददर्श त्रिदिवोपमम्।
फिर उसने सिंधुराज के तट पर एक ऐसा स्थान देखा, जो स्वर्ग के समान मनोहर, सब ओर से समतलऔर स्निग्ध था। वहाँ मन्द-मन्द वायु चलती थी, जिसका स्पर्श बड़ा कोमल जान पड़ता था॥ २६ १/२॥
तत्रापश्यत् स मेघाभं न्यग्रोधं मुनिभिर्वृतम्॥ २७॥
समन्ताद् यस्य ताः शाखाः शतयोजनमायताः।
वहाँ सागर तट पर एक बरगद का वृक्ष दिखायी दिया, जो अपनी घनी छाया के कारण मेघों की घटा के समान प्रतीत होता था। उसके नीचे चारों ओर मुनि निवास करते थे। उस वृक्ष की सुप्रसिद्ध शाखाएँ चारों ओर सौ योजनों तक फैली हुई थीं॥ २७ १/२ ॥
यस्य हस्तिनमादाय महाकायं च कच्छपम्॥ २८॥
भक्षार्थं गरुडः शाखामाजगाम महाबलः।
यह वही वृक्ष था, जिसकी शाखा पर किसी समय महाबली गरुड़ एक विशालकाय हाथी और कछुए को लेकर उन्हें खाने के लिये आ बैठे थे॥ २८ १/२॥
तस्य तां सहसा शाखां भारेण पतगोत्तमः॥२९॥
सुपर्णः पर्णबहुलां बभञ्जाथ महाबलः।
पक्षियों में श्रेष्ठ महाबली गरुड़ ने बहुसंख्यक पत्तों से भरी हुई उस शाखा को सहसा अपने भार से तोड़ डाला था॥ २९ १/२॥
तत्र वैखानसा माषा वालखिल्या मरीचिपाः॥ ३०॥
आजा बभूवुधूम्राश्च संगताः परमर्षयः।
उस शाखा के नीचे बहुत-से वैखानस, माष, बालखिल्य, मरीचिप (सूर्य-किरणों का पान करने वाले), ब्रह्मपुत्र और धूम्रप संज्ञा वाले महर्षि एक साथ रहते थे। ३० १/२॥
तेषां दयार्थं गरुडस्तां शाखां शतयोजनाम्॥ ३१॥
भग्नामादाय वेगेन तौ चोभौ गजकच्छपौ।
एकपादेन धर्मात्मा भक्षयित्वा तदामिषम् ॥ ३२॥
निषादविषयं हत्वा शाखया पतगोत्तमः।
प्रहर्षमतुलं लेभे मोक्षयित्वा महामुनीन्॥३३॥
उन पर दया करके उनके जीवन की रक्षा करने के लिये पक्षियों में श्रेष्ठ धर्मात्मा गरुड़ ने उस टूटी हुई सौयोजन लंबी शाखा को और उन दोनों हाथी तथा कछुए को भी वेगपूर्वक एक ही पंजे से पकड़ लिया तथा आकाश में ही उन दोनों जंतुओं के मांस खाकर फेंकी हुई उस डाली के द्वारा निषाद देश का संहार कर डाला। उस समय पूर्वोक्त महामुनियों को मृत्यु के संकट से बचा लेने से गरुड़ को अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ॥ ३१-३३॥
स तु तेन प्रहर्षेण द्विगुणीकृतविक्रमः।
अमृतानयनार्थं वै चकार मतिमान् मतिम्॥३४॥
उस महान् हर्ष से बुद्धिमान् गरुड़ का पराक्रम दूना हो गया और उन्होंने अमृत ले आने के लिये पक्का निश्चय कर लिया॥ ३४॥
अयोजालानि निर्मथ्य भित्त्वा रत्नगृहं वरम्।
महेन्द्रभवनाद् गुप्तमाजहारामृतं ततः॥ ३५॥
तत्पश्चात् इन्द्रलोक में जाकर उन्होंने इन्द्रभवन की उन जालियों को तोड़ डाला, जो लोहे की सींकचों से बनी हुई थीं। फिर रत्ननिर्मित श्रेष्ठ भवन को नष्ट-भ्रष्ट करके वहाँ छिपाकर रखे हुए अमृत को वे महेन्द्रभवन से हर लाये॥ ३५ ॥
तं महर्षिगणैर्जुष्टं सुपर्णकृतलक्षणम्।
नाम्ना सुभद्रं न्यग्रोधं ददर्श धनदानुजः॥ ३६॥
गरुड़ के द्वारा तोड़ी हुई डाली का वह चिह्न उस बरगद में उस समय भी मौजूद था। उस वृक्ष का नाम था सुभद्रवट। बहुत-से महर्षि उस वृक्ष की छाया में निवास करते थे। कुबेर के छोटे भाई रावण ने उस वटवृक्ष को देखा ॥ ३६॥
तं तु गत्वा परं पारं समुद्रस्य नदीपतेः।
ददर्शाश्रममेकान्ते पुण्ये रम्ये वनान्तरे॥३७॥
नदियों के स्वामी समुद्र के दूसरे तट पर जाकर उसने एक रमणीय वन के भीतर पवित्र एवं एकान्त स्थान में एक आश्रम का दर्शन किया॥ ३७॥
तत्र कृष्णाजिनधरं जटामण्डलधारिणम्।
ददर्श नियताहारं मारीचं नाम राक्षसम्॥३८॥
वहाँ शरीर में काला मृगचर्म और सिर पर जटाओं का समूह धारण किये नियमित आहार करते हुए मारीच नामक राक्षस निवास करता था। रावण वहाँ जाकर उससे मिला॥ ३८॥
स रावणः समागम्य विधिवत् तेन रक्षसा।
मारीचेनार्चितो राजा सर्वकामैरमानुषैः ॥ ३९॥
मिलने पर उस राक्षस मारीच ने सब प्रकार के अलौकिक कमनीय पदार्थ अर्पित करके राजा रावण का विधिपूर्वक आतिथ्य-सत्कार किया॥ ३९ ॥
तं स्वयं पूजयित्वा च भोजनेनोदकेन च।
अर्थोपहितया वाचा मारीचो वाक्यमब्रवीत्॥ ४०॥
अन्न और जल से स्वयं उसका पूर्ण सत्कार करके मारीच ने प्रयोजन की बातें पूछते हुए उससे इस प्रकार कहा- ॥ ४०॥
कच्चित्ते कुशलं राजन् लङ्कायां राक्षसेश्वर।
केनार्थेन पुनस्त्वं वै तूर्णमेव इहागतः॥४१॥
‘राजन् ! तुम्हारी लङ्का में कुशल तो है ? राक्षसराज! तुम किस काम के लिये पुनः इतनी जल्दी यहाँ आये हो?॥
एवमुक्तो महातेजा मारीचेन स रावणः।
ततः पश्चादिदं वाक्यमब्रवीद् वाक्यकोविदः॥ ४२॥
मारीच के इस प्रकार पूछने पर बातचीत करने में कुशल महातेजस्वी रावण ने उससे इस प्रकार कहा
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे पञ्चत्रिंशः सर्गः ॥३५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में पैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।३५॥
सर्ग-36
मारीच श्रूयतां तात वचनं मम भाषतः।
आर्तोऽस्मि मम चार्तस्य भवान् हि परमा गतिः॥
‘तात मारीच! मैं सब बता रहा हूँ। मेरी बात सुनो। इस समय मैं बहुत दुःखी हूँ और इस दुःख की अवस्था में तुम्हीं मुझे सबसे बढ़कर सहारा देने वाले हो॥१॥
जानीषे त्वं जनस्थानं भ्राता यत्र खरो मम।
दूषणश्च महाबाहुः स्वसा शूर्पणखा च मे ॥२॥
त्रिशिराश्च महाबाहू राक्षसः पिशिताशनः।
अन्ये च बहवः शूरा लब्धलक्षा निशाचराः॥३॥
‘तुम जनस्थान को जानते हो, जहाँ मेरा भाई खर, महाबाहु दूषण, मेरी बहिन शूर्पणखा, मांसभोजी राक्षस महाबाहु त्रिशिरा तथा और भी बहुत-से लक्ष्यवेध में कुशल शूरवीर निशाचर रहा करते थे। २-३॥
वसन्ति मन्नियोगेन अधिवासं च राक्षसाः।
बाधमाना महारण्ये मुनीन् ये धर्मचारिणः॥४॥
‘वे सभी राक्षस मेरी आज्ञा से वहाँ घर बनाकर रहते थे और उस विशाल वन में जो धर्माचरण करने वाले मुनि थे, उन्हें सताया करते थे॥४॥
चतुर्दश सहस्राणि रक्षसां भीमकर्मणाम्।
शूराणां लब्धलक्षाणां खरचित्तानुवर्तिनाम्॥५॥
‘वहाँ खर के मन का अनुसरण करने वाले तथा युद्धविषयक उत्साह से सम्पन्न चौदह हजार शूरवीर राक्षस रहते थे, जो भयंकर कर्म करने वाले थे॥५॥
ते त्विदानीं जनस्थाने वसमाना महाबलाः।
सङ्गताः परमायत्ता रामेण सह संयुगे॥६॥
‘जनस्थान में निवास करने वाले जितने महाबली राक्षस थे, वे सब-के-सब उस समय अच्छी तरह सन्नद्ध होकर युद्धक्षेत्र में राम के साथ जा भिड़े थे। ६॥
नानाशस्त्रप्रहरणाः खरप्रमुखराक्षसाः।
तेन संजातरोषेण रामेण रणमूर्धनि॥७॥
अनुक्त्वा परुषं किंचिच्छरैर्व्यापारितं धनुः।
‘वे खर आदि राक्षस नाना प्रकार के अस्त्रशस्त्रों का प्रहार करने में कुशल थे, परंतु युद्ध के मुहाने पर रोष में भरे हुए श्रीराम ने अपने मुँह से कोई कड़वी बात न कहकर बाणों के साथ धनुष का ही व्यापार आरम्भ किया॥ ७ १/२ ।।
चतुर्दश सहस्राणि रक्षसामुग्रतेजसाम्॥८॥
निहतानि शरैर्दीप्तैर्मानुषेण पदातिना।
खरश्च निहतः संख्ये दूषणश्च निपातितः॥९॥
हत्वा त्रिशिरसं चापि निर्भया दण्डकाः कृताः।
‘पैदल और मनुष्य होकर भी राम ने अपने दमकते हुए बाणों से भयंकर तेजवाले चौदह हजार राक्षसों का विनाश कर डाला और उसी युद्ध में खर को भी मौत के घाट उतारकर दूषण को भी मार गिराया। साथ ही त्रिशिरा का वध करके उसने दण्डकारण्य को दूसरों के लिये निर्भय बना दिया॥ ८-९ १/२ ॥
पित्रा निरस्तः क्रुद्धेन सभार्यः क्षीणजीवितः॥ १०॥
स हन्ता तस्य सैन्यस्य रामः क्षत्रियपांसनः।
‘उसके पिता ने कुपित होकर उसे पत्नीसहित घर से निकाल दिया है। उसका जीवन क्षीण हो चला है। यह क्षत्रियकुल-कलङ्क राम ही उस राक्षस-सेना का घातक है॥ १० १/२॥
अशीलः कर्कशस्तीक्ष्णो मूर्यो लुब्धोऽजितेन्द्रियः॥११॥
त्यक्तधर्मा त्वधर्मात्मा भूतानामहिते रतः।
येन वैरं विनारण्ये सत्त्वमास्थाय केवलम्॥१२॥
कर्णनासापहारेण भगिनी मे विरूपिता।
अस्य भार्यां जनस्थानात् सीतां सुरसुतोपमाम्॥ १३॥
ङ्केआनयिष्यामि विक्रम्य सहायस्तत्र में भी ‘वह शीलरहित, क्रूर, तीखे स्वभाव वाला, मूर्ख, लोभी, अजितेन्द्रिय, धर्मत्यागी, अधर्मात्मा और समस्त प्राणियों के अहित में तत्पर रहने वाला है। जिसने बिना किसी वैर-विरोध के केवल बल का आश्रय ले मेरी बहिन के नाक-कान काटकर उसका रूप बिगाड़ दिया, उससे बदला लेने के लिये मैं भी उसकी देवकन्या के समान सुन्दरी पत्नी सीता को जनस्थान से बलपूर्वक हर लाऊँगा। तुम उस कार्य में मेरी सहायता करो॥ ११–१३ १/२ ।।
त्वया ह्यहं सहायेन पावस्थेन महाबल॥१४॥
भ्रातृभिश्च सुरान् सर्वान् नाहमत्राभिचिन्तये।
तत्सहायो भव त्वं मे समर्थो ह्यसि राक्षस॥१५॥
‘महाबली राक्षस! तुम-जैसे पार्श्ववर्ती सहायक के और अपने भाइयों के बलपर ही मैं समस्त देवताओं की यहाँ कोई परवा नहीं करता, अतः तुम मेरे सहायक हो जाओ; क्योंकि तुम मेरी सहायता करने में समर्थ हो॥
वीर्ये युद्धे च दर्प च न ह्यस्ति सदृशस्तव।
उपायतो महान् शूरो महामायाविशारदः॥१६॥
‘पराक्रम में, युद्ध में और वीरोचित अभिमान में तुम्हारे समान कोई नहीं है। नाना प्रकार के उपाय बताने में भी तुम बड़े बहादुर हो। बड़ी-बड़ी मायाओं का प्रयोग करने में भी विशेष कुशल हो॥ १६॥
एतदर्थमहं प्राप्तस्त्वत्समीपं निशाचर।
शृणु तत् कर्म साहाय्ये यत् कार्यं वचनान्मम॥ १७॥
‘निशाचर! इसीलिये मैं तुम्हारे पास आया हूँ। सहायता के लिये मेरे कथनानुसार तुम्हें कौन-सा काम करना है, वह भी सुनो॥ १७॥
सौवर्णस्त्वं मृगो भूत्वा चित्रो रजतबिन्दुभिः।
आश्रमे तस्य रामस्य सीतायाः प्रमुखे चर॥१८॥
‘तुम सोने के बने हुए मृग-जैसा रूप धारण करके रजतमय बिन्दुओं से युक्त चितकबरे हो जाओ और राम के आश्रम में सीता के सामने विचरो॥ १८॥
त्वां तु निःसंशयं सीता दृष्ट्वा तु मृगरूपिणम्।
गृह्यतामिति भर्तारं लक्ष्मणं चाभिधास्यति॥१९॥
‘विचित्र मृग के रूप में तुम्हें देखकर सीता अवश्य ही अपने पति राम से तथा लक्ष्मण से भी कहेगी कि आपलोग इसे पकड़ लावें॥ १९॥
ततस्तयोरपाये तु शून्ये सीतां यथासुखम्।
निराबाधो हरिष्यामि राहुश्चन्द्रप्रभामिव॥२०॥
‘जब वे दोनों तुम्हें पकड़ने के लिये दूर निकल जायँगे, तब मैं बिना किसी विघ्न-बाधा के सूने आश्रम से सीता को उसी तरह सुखपूर्वक हर लाऊँगा, जैसे राहु चन्द्रमा की प्रभा का अपहरण कर लेता है। २०॥
ततः पश्चात् सुखं रामे भार्याहरणकर्शिते।
विश्रब्धं प्रहरिष्यामि कृतार्थेनान्तरात्मना॥२१॥
“उसके बाद स्त्री का अपहरण हो जाने से जब राम अत्यन्त दुःखी और दुर्बल हो जायगा, उस समय मैं निर्भय हो सुखपूर्वक उसके ऊपर कृतार्थचित्त से प्रहार करूँगा’ ॥ २१॥
तस्य रामकथां श्रुत्वा मारीचस्य महात्मनः।
शुष्कं समभवद् वक्त्रं परित्रस्तो बभूव च॥ २२॥
रावण के मुख से श्रीरामचन्द्रजी की चर्चा सुनकर महात्मा मारीच का मुँह सूख गया। वह भय से थर्रा उठा॥
ओष्ठौ परिलिहन् शुष्कौ नेत्रैरनिमिषैरिव।
मृतभूत इवार्तस्तु रावणं समुदैक्षत॥२३॥
वह अपलक नेत्रों से देखता हुआ अपने सूखे ओठों को चाटने लगा। उसे इतना दुःख हुआ कि वह मुर्दा-सा दिखायी देने लगा। उसी अवस्था में उसने रावण की ओर देखा ॥ २३॥
स रावणं त्रस्तविषण्णचेता महावने रामपराक्रमज्ञः।
कृताञ्जलिस्तत्त्वमुवाच वाक्यं हितं च तस्मै हितमात्मनश्च ॥ २४॥
उसे महान् वन में श्रीरामचन्द्रजी के पराक्रम का ज्ञान हो चुका था; इसलिये वह मन-ही-मन अत्यन्त भयभीत और दुःखी हो गया तथा हाथ जोड़कर रावण से यथार्थ वचन बोला। उसकी वह बात रावण के तथा अपने लिये भी हितकर थी॥ २४ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे षट्त्रिंशः सर्गः॥ ३६॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में छत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।३६॥
सर्ग-37
तच्छ्रत्वा राक्षसेन्द्रस्य वाक्यं वाक्यविशारदः।
प्रत्युवाच महातेजा मारीचो राक्षसेश्वरम्॥१॥
राक्षसराज रावण की पूर्वोक्त बात सुनकर बातचीत करने में कुशल महातेजस्वी मारीच ने उसे इस प्रकार उत्तर दिया- ॥१॥
सुलभाः पुरुषा राजन् सततं प्रियवादिनः।
अप्रियस्य च पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः॥ २॥
‘राजन् ! सदा प्रिय वचन बोलने वाले पुरुष तो सर्वत्र सुलभ होते हैं; परंतु जो अप्रिय होने पर भी हितकर हो, ऐसी बात के कहने और सुनने वाले दोनों ही दुर्लभ हैं॥२॥
न नूनं बुध्यसे रामं महावीर्यगुणोन्नतम्।
अयुक्तचारश्चपलो महेन्द्रवरुणोपमम्॥३॥
‘तुम कोई गुप्तचर तो रखते नहीं और तुम्हारा हृदय भी बहुत ही चञ्चल है; अतः निश्चय ही तुम श्रीरामचन्द्रजी को बिलकुल नहीं जानते। वे पराक्रमोचित गुणों में बहुत बढ़े-चढ़े तथा इन्द्र और वरुण के समान हैं॥३॥
अपि स्वस्ति भवेत् तात सर्वेषामपि रक्षसाम्।
अपि रामो न संक्रुद्धः कुर्याल्लोकानराक्षसान्॥ ४॥
‘तात! मैं तो यही चाहता हूँ कि समस्त राक्षसों का कल्याण हो। कहीं ऐसा न हो कि श्रीरामचन्द्रजी अत्यन्त कुपित हो समस्त लोकों को राक्षसों से शून्य कर दें? ॥ ४॥
अपि ते जीवितान्ताय नोत्पन्ना जनकात्मजा।
अपि सीतानिमित्तं च न भवेद् व्यसनं महत्॥५॥
‘जनकनन्दिनी सीता तुम्हारे जीवन का अन्त करने के लिये तो नहीं उत्पन्न हुई है ? कहीं ऐसा न हो कि सीता के कारण तुम्हारे ऊपर कोई बहुत बड़ा सङ्कट आ जाय? ॥ ५ ॥
अपि त्वामीश्वरं प्राप्य कामवृत्तं निरङ्कशम्।
न विनश्येत् पुरी लङ्का त्वया सह सराक्षसा॥६॥
‘तुम-जैसे स्वेच्छाचारी और उच्छृङ्खल राजा को पाकर लङ्कापुरी तुम्हारे और राक्षसों के साथ ही नष्ट न हो जाय? ॥ ६॥
त्वद्विधः कामवृत्तो हि दुःशीलः पापमन्त्रितः।
आत्मानं स्वजनं राष्ट्र स राजा हन्ति दुर्मतिः॥७॥
‘जो राजा तुम्हारे समान दुराचारी, स्वेच्छाचारी, पापपूर्ण विचार रखने वाला और खोटी बुद्धिवाला होता है, वह अपना, अपने स्वजनों का तथा समूचे राष्ट्र का भी विनाश कर डालता है॥७॥
न च पित्रा परित्यक्तो नामर्यादः कथंचन।
न लुब्धो न च दुःशीलो न च क्षत्रियपांसनः॥ ८॥
‘श्रीरामचन्द्रजी न तो पिता द्वारा त्यागे या निकाले गये हैं, न उन्होंने धर्म की मर्यादा का किसी तरह त्याग किया है, न वे लोभी, न दूषित आचार-विचार वाले और न क्षत्रियकुल-कलङ्क ही हैं॥ ८॥
न च धर्मगुणहीनः कौसल्यानन्दवर्धनः।
न च तीक्ष्णो हि भूतानां सर्वभूतहिते रतः॥९॥
‘कौसल्या का आनन्द बढ़ाने वाले श्रीराम धर्मसम्बन्धी गुणों से हीन नहीं हुए हैं। उनका स्वभावभी किसी प्राणी के प्रति तीखा नहीं है। वे सदा समस्त प्राणियों के हित में ही तत्पर रहते हैं॥९॥
वञ्चितं पितरं दृष्ट्वा कैकेय्या सत्यवादिनम्।
करिष्यामीति धर्मात्मा ततः प्रव्रजितो वनम्॥ १०॥
‘रानी कैकेयी ने पिता को धोखे में डालकर मेरे वनवास का वर माँग लिया—यह देखकर धर्मात्मा श्रीराम ने मन-ही-मन यह निश्चय किया कि मैं पिता को सत्यवादी बनाऊँगा (उनके दिये हुए वर या वचन को पूरा करूँगा); इस निश्चय के अनुसार वे स्वयं ही वन को चल दिये॥१०॥
कैकेय्याः प्रियकामार्थं पितुर्दशरथस्य च।
हित्वा राज्यं च भोगांश्च प्रविष्टो दण्डकावनम्॥
‘माता कैकेयी और पिता राजा दशरथ का प्रिय करने की इच्छा से ही वे स्वयं राज्य और भोगों का परित्याग करके दण्डक वन में प्रविष्ट हुए हैं॥ ११॥
न रामः कर्कशस्तात नाविद्वान् नाजितेन्द्रियः।
अनृतं न श्रुतं चैव नैव त्वं वक्तुमर्हसि ॥१२॥
‘तात! श्रीराम कर नहीं हैं। वे मुर्ख और अजितेन्द्रिय भी नहीं हैं। श्रीराम में मिथ्याभाषण का दोष मैंने कभी नहीं सुना है; अतः उनके विषय में तुम्हें ऐसी उलटी बातें कभी नहीं कहनी चाहिये। १२॥
रामो विग्रहवान् धर्मः साधुः सत्यपराक्रमः।
राजा सर्वस्य लोकस्य देवानामिव वासवः॥ १३॥
‘श्रीराम धर्म के मूर्तिमान् स्वरूप हैं। वे साधु और सत्यपराक्रमी हैं। जैसे इन्द्र समस्त देवताओं के अधिपति हैं, उसी प्रकार श्रीराम भी सम्पूर्ण जगत् के राजा हैं॥१३॥
कथं नु तस्य वैदेहीं रक्षितां स्वेन तेजसा।
इच्छसे प्रसभं हर्तुं प्रभामिव विवस्वतः॥१४॥
‘उनकी पत्नी विदेहराजकुमारी सीता अपने ही पातिव्रत्य के तेज से सुरक्षित हैं। जैसे सूर्य की प्रभा उस से अलग नहीं की जा सकती, उसी तरह सीता को श्रीराम से अलग करना असम्भव है। ऐसी दशा में तुम बलपूर्वक उनका अपहरण कैसे करना चाहते हो?॥ १४॥
शरार्चिषमनाधृष्यं चापखड्गेन्धनं रणे।
रामाग्निं सहसा दीप्तं न प्रवेष्टं त्वमर्हसि॥१५॥
‘श्रीराम प्रज्वलित अग्नि के समान हैं। बाण ही उस अग्नि की ज्वाला है। धनुष और खड्ग ही उसके लिये ईंधन का काम करते हैं। तुम्हें युद्ध के लिये सहसा उस अग्नि में प्रवेश नहीं करना चाहिये॥ १५ ॥
धनादितदीप्तास्यं शरार्चिषममर्षणम्।
चापबाणधरं तीक्ष्णं शत्रुसेनापहारिणम्॥१६॥
राज्यं सुखं च संत्यज्य जीवितं चेष्टमात्मनः।
नात्यासादयितुं तात रामान्तकमिहार्हसि ॥१७॥
‘तात! धनुष ही जिसका फैला हुआ दीप्तिमान् मुख है और बाण ही प्रभा है, जो अमर्ष में भरा हुआ है, धनुष और बाण धारण किये खड़ा है, रोषवश तीखे स्वभाव का परिचय देता है और शत्रु सेना के प्राण लेने में समर्थ है, उस रामरूपी यमराज के पास तुम्हें यहाँ अपने राज्यसुख और प्यारे प्राणों का मोह छोड़कर सहसा नहीं जाना चाहिये॥ १६-१७॥
अप्रमेयं हि तत्तेजो यस्य सा जनकात्मजा।
न त्वं समर्थस्तां हर्तुं रामचापाश्रयां वने॥१८॥
‘जनककिशोरी सीता जिनकी धर्मपत्नी हैं, उनका तेज अप्रमेय है। श्रीरामचन्द्रजी का धनुष उनका आश्रय है, अतः तुममें इतनी शक्ति नहीं है कि वन में उनका अपहरण कर सको॥ १८ ॥
तस्य वै नरसिंहस्य सिंहोरस्कस्य भामिनी।
प्राणेभ्योऽपि प्रियतरा भार्या नित्यमनुव्रता॥१९॥
‘श्रीरामचन्द्रजी मनुष्यों में सिंह के समान पराक्रमी हैं। उनका वक्षःस्थल सिंह के समान उन्नत है। भामिनी सीता उनकी प्राणों से भी अधिक प्रियतमा पत्नी हैं। वे सदा अपने पति का ही अनुसरण करती हैं॥ १९॥
न सा धर्षयितुं शक्या मैथिल्योजस्विनः प्रिया।
दीप्तस्येव हुताशस्य शिखा सीता सुमध्यमा॥ २०॥
‘मिथिलेशकुमारी सीता ओजस्वी श्रीराम की प्यारी पत्नी हैं। वे प्रज्वलित अग्नि की ज्वाला के समान असह्य हैं, अतः उन सुन्दरी सीता पर बलात् नहीं किया जा सकता॥ २०॥
किमुद्यम व्यर्थमिमं कृत्वा ते राक्षसाधिप।
दृष्टश्चेत् त्वं रणे तेन तदन्तमुपजीवितम्॥ २१॥
राक्षसराज ! यह व्यर्थ का उद्योग करने से तुम्हें क्या लाभ होगा? जिस दिन युद्ध में तुम्हारे ऊपर श्रीराम की दृष्टि पड़ जाय, उसी दिन तुम अपने जीवन का अन्त समझना ॥ २१॥
जीवितं च सुखं चैव राज्यं चैव सुदुर्लभम्।
यदीच्छसि चिरं भोक्तुं मा कृथा रामविप्रियम्॥ २२॥
‘यदि तुम अपने जीवन का, सुख का और परम दुर्लभ राज्य का चिरकाल तक उपभोग करना चाहते हो तो श्रीराम का अपराध न करो॥ २२ ॥
स सर्वैः सचिवैः सार्धं विभीषणपुरस्कृतैः।
मन्त्रयित्वा स धर्मिष्ठैः कृत्वा निश्चयमात्मनः।
दोषाणां च गुणानां च सम्प्रधार्य बलाबलम्॥ २३॥
आत्मनश्च बलं ज्ञात्वा राघवस्य च तत्त्वतः।
हितं हि तव निश्चित्य क्षमं त्वं कर्तुमर्हसि ॥२४॥
तुम विभीषण आदि सभी धर्मात्मा मन्त्रियों के साथ सलाह करके अपने कर्तव्य का निश्चय करो। अपने और श्रीराम के दोषों तथा गुणों के बलाबल पर भलीभाँति विचार करके अपनी और श्रीरामचन्द्रजी की शक्ति को ठीक-ठीक समझ लो। फिर क्या करने से तुम्हारा हित होगा, इसका निश्चय करके जो उचित जान पड़े, वही कार्य तुम्हें करना चाहिये। २३-२४ ॥
अहं तु मन्ये तव न क्षमं रणे समागमं कोसलराजसूनुना।
इदं हि भूयः शृणु वाक्यमुत्तमं क्षमं च युक्तं च निशाचराधिप॥२५॥
‘निशाचरराज! मैं तो समझता हूँ कि कोसलराजकुमार श्रीरामचन्द्रजी के साथ तुम्हारा युद्ध करना उचित नहीं है। अब पुनः मेरी एक बात और सुनो, यह तुम्हारे लिये बहुत ही उत्तम, उचित और उपयुक्त सिद्ध होगी’ ॥ २५॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे सप्तत्रिंशः सर्गः ॥३७॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में सैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।३७॥
सर्ग-38
कदाचिदप्यहं वीर्यात् पर्यटन् पृथिवीमिमाम्।
बलं नागसहस्रस्य धारयन् पर्वतोपमः॥१॥
‘एक समय की बात है कि मैं अपने पराक्रम के अभिमान में आकर पर्वत के समान शरीर धारण किये इस पृथ्वीपर चक्कर लगा रहा था। उस समय मुझमें एक हजार हाथियोंका बल था॥१॥
नीलजीमूतसंकाशस्तप्तकाञ्चनकुण्डलः।
भयं लोकस्य जनयन् किरीटी परिघायुधः॥२॥
व्यचरन् दण्डकारण्यमृषिमांसानि भक्षयन्।
‘मेरा शरीर नील मेघ के समान काला था। मैंने कानों में पक्के सोने के कुण्डल पहन रखे थे। मेरे मस्तक पर किरीट था और हाथ में परिघ मैं ऋषियों के मांस खाता और समस्त जगत् के मन में भय उत्पन्न करता हुआ दण्डकारण्य में विचर रहा था। २ १/२ ॥
विश्वामित्रोऽथ धर्मात्मा मद्वित्रस्तो महामुनिः॥ ३॥
स्वयं गत्वा दशरथं नरेन्द्रमिदमब्रवीत्।
‘उन दिनों धर्मात्मा महामुनि विश्वामित्र को मुझसे बड़ा भय हो गया था। वे स्वयं राजा दशरथ के पास गये और उनसे इस प्रकार बोले- ॥ ३ १/२ ।।
अयं रक्षतु मां रामः पर्वकाले समाहितः॥४॥
मारीचान्मे भयं घोरं समुत्पन्नं नरेश्वर।
‘नरेश्वर! मुझे मारीच नामक राक्षस से घोर भय प्राप्त हुआ है, अतः ये श्रीराम मेरे साथ चलें और पर्व के दिन एकाग्रचित्त हो मेरी रक्षा करें’॥ ४ १/२॥
इत्येवमुक्तो धर्मात्मा राजा दशरथस्तदा ॥५॥
प्रत्युवाच महाभागं विश्वामित्रं महामुनिम्।
‘मुनिके ऐसा कहने पर उस समय धर्मात्मा राजा दशरथ ने महाभाग महामुनि विश्वामित्र को इस प्रकार उत्तर दिया
ऊनद्वादशवर्षोऽयमकृतास्त्रश्च राघवः॥६॥
कामं तु मम तत् सैन्यं मया सह गमिष्यति।
बलेन चतुरङ्गेण स्वयमेत्य निशाचरम्॥७॥
वधिष्यामि मुनिश्रेष्ठ शत्रु तव यथेप्सितम्।
‘मुनिश्रेष्ठ! रघुकुलनन्दन राम की अवस्था अभी बारह* वर्ष से भी कम है। इन्हें अस्त्र-शस्त्रों के चलाने का पूरा अभ्यास भी नहीं है। आप चाहें तो मेरे साथ मेरी सारी सेना वहाँ चलेगी और मैं चतुरङ्गिणी सेना के साथ स्वयं ही चलकर आपकी इच्छा के अनुसार उस शत्रुरूप निशाचर का वध करूँगा’। ६-७ १/२॥
* यद्यपि बालकाण्ड के २०वें सर्ग के दूसरे श्लोक में राजा दशरथ ने श्रीराम की अवस्था सोलह वर्ष से कम (पंद्रह वर्ष की) बतायी थी, तथापि यहाँ मारीच ने रावण के मन में भय उत्पन्न करने के लिये चार वर्ष कम अवस्था बतायी है। जो छोटी अवस्था में इतने महान् पराक्रमी थे, वे अब बड़े होने पर न जाने कैसे होंगे? यह लक्ष्य कराना ही यहाँ मारीच को अभीष्ट है।
एवमुक्तः स तु मुनी राजानमिदमब्रवीत्॥८॥
रामान्नान्यद बलं लोके पर्याप्तं तस्य रक्षसः।
‘राजा के ऐसा कहने पर मुनि उनसे इस प्रकार बोले —’उस राक्षस के लिये श्रीराम के सिवा दूसरी कोई शक्ति पर्याप्त नहीं है॥ ८ १/२॥
देवतानामपि भवान् समरेष्वभिपालकः॥९॥
आसीत् तव कृतं कर्म त्रिलोकविदितं नृप।
‘राजन्! इसमें संदेह नहीं कि आप समरभूमि में देवताओं की भी रक्षा करने में समर्थ हैं। आपने जो महान् कार्य किया है, वह तीनों लोकों में प्रसिद्ध है। ९ १/२॥
काममस्ति महत् सैन्यं तिष्ठत्विह परंतप॥१०॥
बालोऽप्येष महातेजाः समर्थस्तस्य निग्रहे।
गमिष्ये राममादाय स्वस्ति तेऽस्तु परंतप॥११॥
‘शत्रुओं को संताप देनेवाले नरेश! आपके पास जो विशाल सेना है, वह आपकी इच्छा हो तो यहीं रहे(आप भी यहीं रहें।) महातेजस्वी श्रीराम बालक हैं तो भी उस राक्षस का दमन करने में समर्थ हैं, अतः मैं श्रीराम को ही साथ लेकर जाऊँगा; आपका कल्याण हो’ ॥ १०-११॥
इत्येवमुक्त्वा स मुनिस्तमादाय नृपात्मजम्।
जगाम परमप्रीतो विश्वामित्रः स्वमाश्रमम्॥
‘ऐसा कहकर (लक्ष्मणसहित) राजकुमार श्रीराम को साथ ले महामुनि विश्वामित्र बड़ी प्रसन्नता के साथ अपने आश्रम को गये॥ १२॥
तं तथा दण्डकारण्ये यज्ञमुद्दिश्य दीक्षितम्।
बभूवोपस्थितो रामश्चित्रं विस्फारयन् धनुः॥
‘इस प्रकार दण्डकारण्य में जाकर उन्होंने यज्ञ के लिये दीक्षा ग्रहण की और श्रीराम अपने अद्भुत धनुष की टङ्कार करते हुए उनकी रक्षा के लिये पास ही खड़े हो गये।
अजातव्यञ्जनः श्रीमान् बालः श्यामः शुभेक्षणः।
एकवस्त्रधरो धन्वी शिखी कनकमालया॥१४॥
‘उस समय तक श्रीराम में जवानी के चिह्न प्रकट नहीं हुए थे। (उनकी किशोरावस्था थी।) वे एक शोभाशाली बालक के रूप में दिखायी देते थे। उनके श्रीअङ्ग का रंग साँवला और आँखें बड़ी सुन्दर थीं। वे एक वस्त्र धारण किये, हाथों में धनुष लिये सुन्दर शिखा और सोने के हार से सुशोभित थे॥ १४ ॥
शोभयन् दण्डकारण्यं दीप्तेन स्वेन तेजसा।
अदृश्यत तदा रामो बालचन्द्र इवोदितः॥१५॥
‘उस समय अपने उद्दीप्त तेज से दण्डकारण्य की शोभा बढ़ाते हुए श्रीरामचन्द्र नवोदित बालचन्द्र के समान दृष्टिगोचर होते थे॥ १५ ॥
ततोऽहं मेघसंकाशस्तप्तकाञ्चनकुण्डलः।
बली दत्तवरो दादाजगामाश्रमान्तरम्॥१६॥
‘इधर मैं भी मेघ के समान काले शरीर से बड़े घमंड के साथ उस आश्रम के भीतर घुसा। मेरे कानों में तपाये हुए सुवर्ण के कुण्डल झलमला रहे थे। मैं बलवान् तो था ही, मुझे वरदान भी मिल चुका था कि देवता मुझे मार नहीं सकेंगे॥१६॥
तेन दृष्टः प्रविष्टोऽहं सहसैवोद्यतायुधः।
मां तु दृष्ट्वा धनुः सज्यमसम्भ्रान्तश्चकार ह॥ १७॥
‘भीतर प्रवेश करते ही श्रीरामचन्द्रजी की दृष्टि मुझपर पड़ी। मुझे देखते ही उन्होंने सहसा धनुष उठा लिया और बिना किसी घबराहट के उस पर डोरी चढ़ा दी॥
अवजानन्नहं मोहाद् बालोऽयमिति राघवम्।
विश्वामित्रस्य तां वेदिमभ्यधावं कृतत्वरः॥१८॥
‘मैं मोहवश श्रीरामचन्द्रजी को ‘यह बालक है’ ऐसा समझकर उनकी अवहेलना करता हुआ बड़ी तेजी के साथ विश्वामित्र की उस यज्ञवेदी की ओर दौड़ा॥ १८॥
तेन मुक्तस्ततो बाणः शितः शत्रुनिबर्हणः।
तेनाहं ताडितः क्षिप्तः समुद्रे शतयोजने॥१९॥
‘इतने ही में श्रीराम ने एक ऐसा तीखा बाण छोड़ा,जो शत्रु का संहार करने वाला था; परंतु उस बाण की चोट खाकर (मैं मरा नहीं) सौ योजन दूर समुद्र में आकर गिर पड़ा।
नेच्छता तात मां हन्तुं तदा वीरेण रक्षितः।
रामस्य शरवेगेन निरस्तो भ्रान्तचेतनः॥२०॥
पातितोऽहं तदा तेन गम्भीरे सागराम्भसि।
प्राप्य संज्ञां चिरात् तात लङ्कां प्रति गतः पुरीम्॥ २१॥
‘तात! वीर श्रीरामचन्द्रजी उस समय मुझे मारना नहीं चाहते थे, इसीलिये मेरी जान बच गयी। उनके बाण के वेग से मैं भ्रान्तचित्त होकर दूर फेंक दिया गया और समुद्र के गहरे जल में गिरा दिया गया। तात! फिर दीर्घकाल के पश्चात् जब मुझे चेत हुआ, तब मैं लंकापुरी में गया॥ २०-२१॥
एवमस्मि तदा मुक्तः सहायास्ते निपातिताः।
अकृतास्त्रेण रामेण बालेनाक्लिष्टकर्मणा ॥२२॥
‘इस प्रकार उस समय मैं मरने से बचा। अनायास ही महान् कर्म करने वाले श्रीराम उन दिनों अभी ङ्केबालक थे और उन्हें अस्त्र चलाने का पूरा अभ्यास भी नहीं था तो भी उन्होंने मेरे उन सभी सहायकों को मार गिराया, जो मेरे साथ गये थे॥ २२ ॥
तन्मया वार्यमाणस्तु यदि रामेण विग्रहम्।
करिष्यस्यापदां घोरां क्षिप्रं प्राप्य न शिष्यसि॥ २३॥
‘इसलिये मेरे मना करने पर भी यदि तुम श्रीराम के साथ विरोध करोगे तो शीघ्र ही घोर आपत्ति में पड़ जाओगे और अन्तमें अपने जीवन से भी हाथ धो बैठोगे॥
क्रीडारतिविधिज्ञानां समाजोत्सवदर्शिनाम्।
रक्षसां चैव संतापमनर्थं चाहरिष्यसि ॥२४॥
‘खेल-कूद और भोग-विलास के क्रम को जानने वाले तथा सामाजिक उत्सवों को ही देखदेखकर दिल बहलाने वाले राक्षसों के लिये तुम संताप और अनर्थ (मौत) बुला लाओगे॥ २४ ॥
हर्म्यप्रासादसम्बाधां नानारत्नविभूषिताम्।
द्रक्ष्यसि त्वं पुरीं लङ्कां विनष्टां मैथिलीकृते॥ २५॥
‘मिथिलेशकुमारी सीता के लिये तुम्हें धनियों की अट्टालिकाओं तथा राजभवनों से भरी हुई एवं नाना प्रकार के रत्नों से विभूषित लंकापुरी का विनाश भी अपनी आँखों देखना पड़ेगा॥ २५ ॥
अकुर्वन्तोऽपि पापानि शुचयः पापसंश्रयात्।
परपापैर्विनश्यन्ति मत्स्या नागह्रदे यथा॥२६॥
‘जो लोग आचार-विचार से शुद्ध हैं और पाप या अपराध नहीं करते हैं, वे भी यदि पापियों के सम्पर्क में चले जायँ तो दूसरों के पापों से ही नष्ट हो जाते हैं, जैसे साँपवाले सरोवर में निवास करने वाली मछलियाँ उस सर्प के साथ ही मारी जाती हैं ॥ २६॥
दिव्यचन्दनदिग्धाङ्गान् दिव्याभरणभूषितान्।
द्रक्ष्यस्यभिहतान् भूमौ तव दोषात् तु राक्षसान्॥ २७॥
‘तुम देखोगे कि जिनके अङ्ग दिव्य चन्दन से चर्चित होते थे तथा जो दिव्य आभूषणों से विभूषित रहते थे, वे ही राक्षस तुम्हारे ही अपराध से मारे जाकर पृथ्वी पर पड़े हुए हैं॥२७॥
हृतदारान् सदारांश्च दश विद्रवतो दिशः।
हतशेषानशरणान् द्रक्ष्यसि त्वं निशाचरान्॥ २८॥
‘तुम्हें यह भी दिखायी देगा कि कितने ही निशाचरों की स्त्रियाँ हर ली गयी हैं और कुछ की स्त्रियाँ साथ हैं तथा वे युद्ध में मरने से बचकर असहाय अवस्था में दसों दिशाओं की ओर भाग रहे हैं।। २८॥
शरजालपरिक्षिप्तामग्निज्वालासमावृताम्।
प्रदग्धभवनां लङ्कां द्रक्ष्यसि त्वमसंशयम्॥२९॥
‘निःसंदेह तुम्हारे सामने वह दृश्य भी आयेगा कि लंकापुरी पर बाणों का जाल-सा बिछ गया है। वह आग की ज्वालाओं से घिर गयी है और उसका एक एक घर जलकर भस्म हो गया है।॥ २९॥
परदाराभिमर्शात् तु नान्यत् पापतरं महत्।
प्रमदानां सहस्राणि तव राजन् परिग्रहे ॥३०॥
भव स्वदारनिरतः स्वकुलं रक्ष राक्षसान्।
मानं वृद्धिं च राज्यं च जीवितं चेष्टमात्मनः॥ ३१॥
‘राजन् ! परायी स्त्री के संसर्ग से बढ़कर दूसरा कोई महान् पाप नहीं है। तुम्हारे अन्तःपुर में हजारों युवती स्त्रियाँ हैं, उन अपनी ही स्त्रियों में अनुराग रखो। अपने कुल की रक्षा करो, राक्षसों के प्राण बचाओ तथा अपनी मान, प्रतिष्ठा, उन्नति, राज्य और प्यारे जीवन को नष्ट न होने दो ॥ ३०-३१॥
कलत्राणि च सौम्यानि मित्रवर्गं तथैव च।
यदीच्छसि चिरं भोक्तुं मा कृथा रामविप्रियम्॥ ३२॥
‘यदि तुम अपनी सुन्दरी स्त्रियों तथा मित्रों का सुख अधिक काल तक भोगना चाहते हो तो श्रीराम का अपराध न करो॥३२॥
निवार्यमाणः सुहृदा मया भृशं प्रसह्य सीतां यदि धर्षयिष्यसि।
गमिष्यसि क्षीणबलः सबान्धवो यमक्षयं रामशरास्तजीवितः॥३३॥
‘मैं तुम्हारा हितैषी सुहृद् हूँ। यदि मेरे बारंबार मना करने पर भी तुम हठपूर्वक सीता का अपहरण करोगे तो तुम्हारी सारी सेना नष्ट हो जायगी और तुम श्रीराम के बाणों से अपने प्राण गँवाकर बन्धु-बान्धवों के साथ यमलोक की यात्रा करोगे’॥ ३३॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डेऽष्टात्रिंशः सर्गः॥ ३८॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में अड़तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३८॥
सर्ग-39
एवमस्मि तदा मुक्तः कथंचित् तेन संयुगे।
इदानीमपि यद् वृत्तं तच्छृणुष्व यदुत्तरम्॥१॥
‘इस प्रकार इस समय तो मैं किसी तरह श्रीरामचन्द्रजी के हाथ से जीवित बच गया। उसके बाद इन दिनों जो घटना घटित हुई है, उसे भी सुन लो॥ १॥
राक्षसाभ्यामहं द्वाभ्यामनिर्विण्णस्तथाकृतः।
सहितो मृगरूपाभ्यां प्रविष्टो दण्डकावने॥२॥
‘श्रीराम ने मेरी वैसी दुर्दशा कर दी थी, तो भी मैं उनके विरोध से बाज नहीं आया। एक दिन मृगरूपधारी दो राक्षसों के साथ मैं भी मृग का ही रूप धारण करके दण्डक वन में गया॥२॥
दीप्तजिह्वो महादंष्ट्रस्तीक्ष्णशृङ्गो महाबलः।
व्यचरन् दण्डकारण्यं मांसभक्षो महामृगः ॥३॥
‘मैं महान् बलशाली तो था ही, मेरी जीभ आग के समान उद्दीप्त हो रही थी। दाढ़ें भी बहुत बड़ी थीं,सींग तीखे थे और मैं महान् मृग के रूपमें मांस खाता हुआ दण्डकारण्य में विचरने लगा॥३॥
अग्निहोत्रेषु तीर्थेषु चैत्यवृक्षेषु रावण।
अत्यन्तघोरो व्यचरंस्तापसांस्तान् प्रधर्षयन्॥४॥
‘रावण! मैं अत्यन्त भयंकर रूप धारण किये अग्निशालाओं में, जलाशयों के घाटों पर तथा देववृक्षों के नीचे बैठे हुए तपस्वीजनों को तिरस्कृत करता हुआ सब ओर विचरण करने लगा॥ ४॥
निहत्य दण्डकारण्ये तापसान् धर्मचारिणः।
रुधिराणि पिबंस्तेषां तन्मांसानि च भक्षयन् ॥५॥
‘दण्डकारण्य के भीतर धर्मानुष्ठान में लगे हुए तापसों को मारकर उनका रक्त पीना और मांस खाना यही मेरा काम था॥५॥
ऋषिमांसाशनः क्रूरस्त्रासयन् वनगोचरान्।
तदा रुधिरमत्तोऽहं व्यचरं दण्डकावनम्॥६॥
‘मेरा स्वभाव तो क्रूर था ही, मैं ऋषियों के मांस खाता और वन में विचरने वाले प्राणियों को डराता हुआ रक्तपान करके मतवाला हो दण्डक वन में घूमने लगा॥६॥
तदाहं दण्डकारण्ये विचरन् धर्मदूषकः।
आसादयं तदा रामं तापसं धर्ममाश्रितम्॥७॥
वैदेहीं च महाभागां लक्ष्मणं च महारथम्।
तापसं नियताहारं सर्वभूतहिते रतम्॥८॥
‘इस प्रकार उस समय दण्डकारण्य में विचरता हुआ धर्म को कलङ्कित करने वाला मैं मारीच तापस धर्म का आश्रय लेने वाले श्रीराम, विदेहनन्दिनी महाभागा सीता तथा मिताहारी तपस्वी के रूप में समस्त प्राणियों के हित में तत्पर रहने वाले महारथी लक्ष्मण के पास जा पहुँचा।। ७-८॥
सोऽहं वनगतं रामं परिभूय महाबलम्।
तापसोऽयमिति ज्ञात्वा पूर्ववैरमनुस्मरन्॥९॥
अभ्यधावं सुसंक्रुद्धस्तीक्ष्णशृङ्गो मृगाकृतिः।
जिघांसुरकृतप्रज्ञस्तं प्रहारमनुस्मरन्॥१०॥
‘वन में आये हुए महाबली श्रीराम को ‘यह एक तपस्वी है’ ऐसा जानकर उनकी अवहेलना करके मैं आगे बढ़ा और पहले के वैर का बारंबार स्मरण करके अत्यन्त कुपित हो उनकी ओर दौड़ा। उस समय मेरी आकृति मृग के ही समान थी। मेरे सींग बड़े तीखे थे। उनके पहले के प्रहार को याद करके मैं उन्हें मार डालना चाहता था। मेरी बुद्धि शुद्ध न होने के कारण मैं उनकी शक्ति और प्रभाव को भूल-सा गया था। ९-१०॥
तेन त्यक्तास्त्रयो बाणाः शिताः शत्रुनिबर्हणाः।
विकृष्य सुमहच्चापं सुपर्णानिलतुल्यगाः ॥११॥
‘हम तीनों को आते देख श्रीराम ने अपने विशाल धनुष को खींचकर तीन पैने बाण छोड़े, जो गरुड़ और वायु के समान शीघ्रगामी तथा शत्रु के प्राण लेने वाले थे॥११॥
ते बाणा वज्रसंकाशाः सुघोरा रक्तभोजनाः।
आजग्मुः सहिताः सर्वे त्रयः संनतपर्वणः॥१२॥
‘झुकी हुई गाँठवाले वे सब तीनों बाण, जो वज्र के समान दुःसह, अत्यन्त भयंकर तथा रक्त पीने वाले थे, एक साथ ही हमारी ओर आये॥ १२॥
पराक्रमज्ञो रामस्य शठो दृष्टभयः पुरा।
समुत्क्रान्तस्ततो मुक्तस्तावुभौ राक्षसौ हतौ॥ १३॥
‘मैं तो श्रीराम के पराक्रम को जानता था और पहले एक बार उनके भय का सामना कर चुका था, इसलिये शठतापूर्वक उछलकर भाग निकला। भाग जाने से मैं तो बच गया; किंतु मेरे वे दोनों साथी राक्षस मारे गये॥
शरेण मुक्तो रामस्य कथंचित् प्राप्य जीवितम्।
इह प्रव्राजितो युक्तस्तापसोऽहं समाहितः॥१४॥
‘इस बार श्रीराम के बाण से किसी तरह छुटकारा पाकर मुझे नया जीवन मिला और तभी से संन्यास लेकर समस्त दुष्कर्मों का परित्याग करके स्थिरचित्त हो योगाभ्यास में तत्पर रहकर तपस्या में लग गया। १४॥
वृक्षे वृक्षे हि पश्यामि चीरकृष्णाजिनाम्बरम्।
गृहीतधनुषं रामं पाशहस्तमिवान्तकम्॥१५॥
‘अब मुझे एक-एक वृक्ष में चीर, काला मृगचर्म और धनुष धारण किये श्रीराम ही दिखायी देते हैं, जो मुझे पाशधारी यमराज के समान प्रतीत होते हैं ॥ १५ ॥
अपि रामसहस्राणि भीतः पश्यामि रावण।
रामभूतमिदं सर्वमरण्यं प्रतिभाति मे॥१६॥
‘रावण! मैं भयभीत होकर हजारों रामों को अपने सामने खड़ा देखता हूँ। यह सारा वन ही मुझे राममय प्रतीत हो रहा है॥ १६॥
राममेव हि पश्यामि रहिते राक्षसेश्वर।
दृष्ट्वा स्वप्नगतं राममुद्भमामि विचेतनः॥१७॥
‘राक्षसराज! जब मैं एकान्त में बैठता हूँ, तब मुझे श्रीराम के ही दर्शन होते हैं। सपने में श्रीराम को देखकर मैं उद्भ्रान्त और अचेत-सा हो उठता हूँ॥१७॥
रकारादीनि नामानि रामत्रस्तस्य रावण।
रत्नानि च रथाश्चैव वित्रासं जनयन्ति मे॥१८॥
‘रावण! मैं राम से इतना भयभीत हो गया हूँ कि रत्न और रथ आदि जितने भी रकारादि नाम हैं, वे मेरे कानों में पड़ते ही मन में भारी भय उत्पन्न कर देते हैं।
अहं तस्य प्रभावज्ञो न युद्धं तेन ते क्षमम्।
बलिं वा नमुचिं वापि हन्याद्धि रघुनन्दनः॥१९॥
‘मैं उनके प्रभाव को अच्छी तरह जानता हूँ। इसीलिये कहता हूँ कि श्रीराम के साथ तुम्हारा युद्ध करना कदापि उचित नहीं है। रघुकुलनन्दन श्रीराम राजा बलि अथवा नमुचि का भी वध कर सकते हैं। १९॥
रणे रामेण युद्धस्व क्षमां वा कुरु रावण।
न ते रामकथा कार्या यदि मां द्रष्टमिच्छसि॥ २०॥
‘रावण! तुम्हारी इच्छा हो तो रणभूमि में श्रीराम के साथ युद्ध करो अथवा उन्हें क्षमा कर दो, किंतु यदि मुझे जीवित देखना चाहते हो तो मेरे सामने श्रीराम की चर्चा न करो॥२०॥
बहवः साधवो लोके युक्ता धर्ममनुष्ठिताः।
परेषामपराधेन विनष्टाः सपरिच्छदाः॥२१॥
‘लोक में बहुत-से साधुपुरुष, जो योगयुक्त होकर केवल धर्म के ही अनुष्ठान में लगे रहते थे, दूसरों के अपराध से ही परिकरोंसहित नष्ट हो गये॥२१॥
सोऽहं परापराधेन विनशेयं निशाचर।
कुरु यत् ते क्षमं तत्त्वमहं त्वां नानुयामि वै॥ २२॥
‘निशाचर! मैं भी किसी तरह दूसरों के अपराध से नष्ट हो सकता हूँ, अतः तुम्हें जो उचित जान पड़े, वह करो। मैं इस कार्य में तुम्हारा साथ नहीं दे सकता॥ २२॥
रामश्च हि महातेजा महासत्त्वो महाबलः।
अपि राक्षसलोकस्य भवेदन्तकरोऽपि हि॥२३॥
‘क्योंकि श्रीरामचन्द्रजी बड़े तेजस्वी, महान् आत्मबल से सम्पन्न तथा अधिक बलशाली हैं। वे समस्त राक्षस-जगत् का भी संहार कर सकते हैं। २३॥
यदि शूर्पणखाहेतोर्जनस्थानगतः खरः।
अतिवृत्तो हतः पूर्वं रामेणाक्लिष्टकर्मणा।
अत्र ब्रूहि यथातत्त्वं को रामस्य व्यतिक्रमः॥ २४॥
‘यदि शूर्पणखा का बदला लेने के लिये जनस्थाननिवासी खर पहले श्रीराम पर चढ़ाई करने के लिये गया और अनायास ही महान् कर्म करने वाले श्रीराम के हाथ से मारा गया तो तुम्हीं ठीक-ठीक बताओ, इसमें श्रीराम का क्या अपराध है ? ॥ २४ ॥
इदं वचो बन्धुहितार्थिना मया यथोच्यमानं यदि नाभिपत्स्यसे।
सबान्धवस्त्यक्ष्यसि जीवितं रणे हतोऽद्य रामेण शरैरजिह्मगैः॥ २५॥
‘तुम मेरे बन्धु हो। मैं तुम्हारा हित करने की इच्छा से ही ये बातें कह रहा हूँ। यदि नहीं मानोगे तो युद्ध में आज राम के सीधे जाने वाले बाणों द्वारा घायल होकर तुम्हें बन्धु-बान्धवोंसहित प्राणों का परित्याग करना पड़ेगा’ ॥ २५॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे एकोनचत्वारिंशः सर्गः॥ ३९॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में उनतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥३९॥
सर्ग-40
मारीचस्य तु तद् वाक्यं क्षमं युक्तं च रावणः।
उक्तो न प्रतिजग्राह मर्तुकाम इवौषधम्॥१॥
मारीच का वह कथन उचित और मानने योग्य था तो भी जैसे मरने की इच्छावाला रोगी दवा नहीं लेता, उसी प्रकार उसके बहुत कहने पर भी रावण ने उसकी बात नहीं मानी॥१॥
तं पथ्यहितवक्तारं मारीचं राक्षसाधिपः।
अब्रवीत् परुषं वाक्यमयुक्तं कालचोदितः॥२॥
काल से प्रेरित हुए उस राक्षसराज ने यथार्थ और हित की बात बताने वाले मारीच से अनुचित और कठोर वाणी में कहा- ॥२॥
दुष्कुलैतदयुक्तार्थं मारीच मयि कथ्यते।
वाक्यं निष्फलमत्यर्थं बीजमुप्तमिवोषरे॥३॥
‘दूषित कुल में उत्पन्न मारीच! तुमने मेरे प्रति जो ये अनाप-शनाप बातें कही हैं, ये मेरे लिये अनुचित और असंगत हैं, ऊसर में बोये हुए बीज के समान अत्यन्त निष्फल हैं॥३॥
त्वद्वाक्यैर्न तु मां शक्यं भेत्तुं रामस्य संयुगे।
मूर्खस्य पापशीलस्य मानुषस्य विशेषतः॥४॥
‘तुम्हारे इन वचनों द्वारा मूर्ख, पापाचारी और विशेषतः मनुष्य राम के साथ युद्ध करने अथवा उसकी स्त्री का अपहरण करने के निश्चय से मुझे विचलित नहीं किया जा सकता॥४॥
यस्त्यक्त्वा सुहृदो राज्यं मातरं पितरं तथा।
स्त्रीवाक्यं प्राकृतं श्रुत्वा वनमेकपदे गतः॥५॥
अवश्यं तु मया तस्य संयुगे खरघातिनः।।
प्राणैः प्रियतरा सीता हर्तव्या तव संनिधौ॥६॥
‘एक स्त्री (कैकेयी) के मूर्खतापूर्ण वचन सुनकर जो राज्य, मित्र, माता और पिता को छोड़कर सहसाजंगल में चला आया है तथा जिसने युद्ध में खर का वध किया है, उस रामचन्द्र की प्राणों से भी प्यारी भार्या सीता का मैं तुम्हारे निकट ही अवश्य हरण करूँगा।
एवं मे निश्चिता बुद्धिर्हदि मारीच विद्यते।
न व्यावर्तयितुं शक्या सेन्ट्रैरपि सुरासुरैः॥७॥
‘मारीच! ऐसा मेरे हृदय का निश्चित विचार है, इसे इन्द्र आदि देवता और सारे असुर मिलकर भी बदल नहीं सकते॥७॥
दोषं गुणं वा सम्पृष्टस्त्वमेवं वक्तुमर्हसि।
अपायं वा उपायं वा कार्यस्यास्य विनिश्चये॥ ८॥
‘यदि इस कार्य का निर्णय करने के लिये तुमसे पूछा जाता ‘इसमें क्या दोष है, क्या गुण है, इसकी सिद्धि में कौन-सा विघ्न है अथवा इस कार्य को सिद्ध करने का कौन-सा उपाय है’ तो तुम्हें ऐसी बातें कहनी चाहिये थीं॥ ८॥
सम्पृष्टेन तु वक्तव्यं सचिवेन विपश्चिता।
उद्यताञ्जलिना राज्ञो य इच्छेद् भूतिमात्मनः॥ ९॥
‘जो अपना कल्याण चाहता हो, उस बुद्धिमान् मन्त्री को उचित है कि वह राजा से उसके पूछने पर ही अपना अभिप्राय प्रकट करे और वह भी हाथ जोड़कर नम्रता के साथ॥९॥
वाक्यमप्रतिकूलं तु मृदुपूर्वं शुभं हितम्।
उपचारेण वक्तव्यो युक्तं च वसुधाधिपः॥१०॥
‘राजा के सामने ऐसी बात कहनी चाहिये, जो सर्वथा अनुकूल, मधुर, उत्तम, हितकर, आदर से युक्त और उचित हो॥ १०॥
सावमदं तु यद्वाक्यमथवा हितमुच्यते।
नाभिनन्देत तद् राजा मानार्थी मानवर्जितम्॥ ११॥
‘राजा सम्मान का भूखा होता है। उसकी बात का खण्डन करके आक्षेपपूर्ण भाषा में यदि हितकर वचन भी कहा जाय तो उस अपमानपूर्ण वचन का वह कभी अभिनन्दन नहीं कर सकता॥ ११ ॥
पञ्च रूपाणि राजानो धारयन्त्यमितौजसः।
अग्नेरिन्द्रस्य सोमस्य यमस्य वरुणस्य च ॥१२॥
औष्ण्यं तथा विक्रमं च सौम्यं दण्डं प्रसन्नताम्।
धारयन्ति महात्मानो राजानः क्षणदाचर ॥१३॥
‘निशाचर! अमित तेजस्वी महामनस्वी राजा अग्नि, इन्द्र, सोम, यम और वरुण-इन पाँच देवताओं के स्वरूप धारण किये रहते हैं, इसीलिये वे अपने में इन पाँचों के गुण-प्रताप, पराक्रम, सौम्यभाव, दण्ड और प्रसन्नता भी धारण करते हैं ।। १२-१३॥
तस्मात् सर्वास्ववस्थासु मान्याः पूज्याश्च
नित्यदा। त्वं तु धर्ममविज्ञाय केवलं मोहमाश्रितः॥१४॥
अभ्यागतं तु दौरात्म्यात् परुषं वदसीदृशम्।
गुणदोषौ न पृच्छामि क्षेमं चात्मनि राक्षस॥ १५॥
‘अतः सभी अवस्थाओं में सदा राजाओं का सम्मान और पूजन ही करना चाहिये। तुम तो अपने धर्म को न जानकर केवल मोह के वशीभूत हो रहे हो। मैं तुम्हारा अभ्यागत-अतिथि हूँ तो भी तुम दुष्टतावश मुझसे ऐसी कठोर बातें कह रहे हो। राक्षस! मैं तुमसे अपने कर्तव्य के गुण-दोष नहीं पूछता हूँ और न यही जानना चाहता हूँ कि मेरे लिये क्या उचित है॥१४-१५॥
मयोक्तमपि चैतावत् त्वां प्रत्यमितविक्रम।
अस्मिंस्तु स भवान् कृत्ये साहाय्यं कर्तुमर्हसि॥ १६॥
‘अमितपराक्रमी मारीच! मैंने तो तुमसे इतना ही कहा था कि इस कार्य में तुम्हें मेरी सहायता करनी चाहिये॥१६॥
शृणु तत्कर्म साहाय्ये यत्कार्यं वचनान्मम।
सौवर्णस्त्वं मृगो भूत्वा चित्रो रजतबिन्दुभिः॥ १७॥
आश्रमे तस्य रामस्य सीतायाः प्रमुखे चर।
प्रलोभयित्वा वैदेहीं यथेष्टं गन्तुमर्हसि ॥१८॥
‘अच्छा, अब तुम्हें सहायता के लिये मेरे कथनानुसार जो कार्य करना है, उसे सुनो। तुम सुवर्णमय चर्म से युक्त चितकबरे रंगके मृग हो जाओ। तुम्हारे सारे अङ्ग में चाँदी की-सी सफेद बूंदें रहनी चाहिये। ऐसा रूप धारण करके तुम राम के आश्रम में सीता के सामने विचरो। एक बार विदेहकुमारी को लुभाकर जहाँ तुम्हारी इच्छा हो उधर ही चले जाओ॥ १७-१८॥
त्वां हि मायामयं दृष्ट्वा काञ्चनं जातविस्मया।
आनयनमिति क्षिप्रं रामं वक्ष्यति मैथिली॥१९॥
‘तुम मायामय काञ्चन मृग को देखकर मिथिलेशकुमारी सीता को बड़ा आश्चर्य होगा और वह शीघ्र ही राम से कहेगी कि आप इसे पकड़ लाइये॥ १९॥
अपक्रान्ते च काकुत्स्थे दूरं गत्वाप्युदाहर।
हा सीते लक्ष्मणेत्येवं रामवाक्यानुरूपकम्॥ २०॥
‘जब राम तुम्हें पकड़ने के लिये आश्रम से दूर चले जायँ तो तुम भी दूर तक जाकर श्रीराम की बोली के अनुरूप ही–ठीक उन्हीं के स्वर में ‘हा सीते! हा लक्ष्मण!’ कहकर पुकारना ।। २० ।। ।
तच्छ्रुत्वा रामपदवीं सीतया च प्रचोदितः।
अनुगच्छति सम्भ्रान्तः सौमित्रिरपि सौहृदात्॥ २१॥
‘तुम्हारी उस पुकार को सुनकर सीता की प्रेरणा से सुमित्राकुमार लक्ष्मण भी स्नेहवश घबराये हुए अपने भाई के ही मार्ग का अनुसरण करेंगे॥ २१॥
अपक्रान्ते च काकुत्स्थे लक्ष्मणे च यथासुखम्।
आहरिष्यामि वैदेहीं सहस्राक्षः शचीमिव॥२२॥
‘इस प्रकार राम और लक्ष्मण दोनों के आश्रम से दूर निकल जाने पर मैं सुखपूर्वक सीता को हर लाऊँगा, ठीक उसी तरह जैसे इन्द्र शची को हर लाये थे॥ २२ ॥
एवं कृत्वा त्विदं कार्यं यथेष्टं गच्छ राक्षस।
राज्यस्यार्धं प्रदास्यामि मारीच तव सुव्रत ॥२३॥
‘उत्तम व्रत का पालन करने वाले राक्षस मारीच! इस प्रकार इस कार्य को सम्पन्न करके जहाँ तुम्हारी इच्छा हो, वहाँ चले जाना। मैं इसके लिये तुम्हें अपना आधा राज्य दे दूंगा॥ २३॥
गच्छ सौम्य शिवं मार्ग कार्यस्यास्य विवृद्धये।
अहं त्वानुगमिष्यामि सरथो दण्डकावनम्॥२४॥
‘सौम्य! अब इस कार्य की सिद्धि के लिये प्रस्थान करो। तुम्हारा मार्ग मङ्गलमय हो। मैं रथ पर बैठकर दण्डक वन तक तुम्हारे पीछे-पीछे चलूँगा॥२४॥
प्राप्य सीतामयुद्धेन वञ्चयित्वा तु राघवम्।
लङ्कां प्रति गमिष्यामि कृतकार्यः सह त्वया॥ २५॥
‘राम को धोखा देकर बिना युद्ध किये ही सीता को अपने हाथ में करके कृतार्थ हो तुम्हारे साथ ही लंका को लौट चलूँगा॥ २५॥
नो चेत् करोषि मारीच हन्मि त्वामहमद्य वै।
एतत् कार्यमवश्यं मे बलादपि करिष्यसि।
राज्ञो विप्रतिकूलस्थो न जातु सुखमेधते॥२६॥
‘मारीच! यदि तुम इनकार करोगे तो तुम्हें अभी मार डालूँगा। मेरा यह कार्य तुम्हें अवश्य करना पड़ेगा। मैं बलप्रयोग करके भी तुमसे यह काम कराऊँगा। राजा के प्रतिकूल चलने वाला पुरुष कभी सुखी नहीं होता है॥ २६॥
आसाद्य तं जीवितसंशयस्ते मृत्युर्बुवो ह्यद्य मया विरुध्यतः।
एतद् यथावत् परिगण्य बुद्ध्या यदत्र पथ्यं कुरु तत्तथा त्वम्॥२७॥
‘राम के सामने जाने पर तुम्हारे प्राण जाने का संदेहमात्र है, परंतु मेरे साथ विरोध करने पर तो आज ही तुम्हारी मृत्यु निश्चित है। इन बातों पर बुद्धि लगाकर भलीभाँति विचार कर लो। उसके बाद यहाँ जो हितकर जान पड़े, उसे उसी प्रकार तुम करो’ । २७॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे चत्वारिंशः सर्गः॥ ४०॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में चालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।४०॥