॥श्री गणेशाय नम:॥
॥श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
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सम्पूर्ण वाल्मीकि रामायण
[काव्य बीजं सनातनम्]

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
युद्धकाण्डम्

हनुमान जी की प्रशंसा करके श्रीराम का उन्हें हृदय से लगाना और समुद्र को पार करने के लिये चिन्तित होना

प्रथमः सर्गः

सर्ग-01


श्रुत्वा हनूमतो वाक्यं यथावदभिभाषितम्।

रामः प्रीतिसमायुक्तो वाक्यमुत्तरमब्रवीत्॥१॥

हनुमान जी के द्वारा यथावत् रूप से कहे हुए इन वचनों को सुनकर भगवान् श्रीराम बड़े प्रसन्न हुए और इस प्रकार उत्तम वचन बोले- ॥१॥

कृतं हनूमता कार्यं सुमहद् भुवि दुर्लभम्।

मनसापि यदन्येन न शक्यं धरणीतले॥२॥

‘हनुमान् ने बड़ा भारी कार्य किया है। भूतल पर ऐसा कार्य होना कठिन है। इस भूमण्डल में दूसरा कोई तो ऐसा कार्य करने की बात मनके द्वारा सोच भी नहीं सकता॥२॥

नहि तं परिपश्यामि यस्तरेत महोदधिम्।

अन्यत्र गरुडाद् वायोरन्यत्र च हनूमतः॥३॥

‘गरुड़, वायु और हनुमान् को छोड़कर दूसरे किसी को मैं ऐसा नहीं देखता, जो महासागर को लाँघ सके॥३॥

देवदानवयक्षाणां गन्धर्वोरगरक्षसाम्।

अप्रधृष्यां पुरीं लङ्कां रावणेन सुरक्षिताम्॥४॥

प्रविष्टः सत्त्वमाश्रित्य जीवन को नाम निष्क्रमेत्।

‘देवता, दानव, यक्ष, गन्धर्व, नाग और राक्षस इनमें से किसी के लिये भी जिस पर आक्रमण करना असम्भव है तथा जो रावण के द्वारा भलीभाँति सुरक्षित है, उस लङ्कापुरी में अपने बल के भरोसे प्रवेश करके कौन वहाँ से जीवित निकल सकता है ? ॥ ४ १/२॥

को विशेत् सुदुराधर्षां राक्षसैश्च सुरक्षिताम्॥

यो वीर्यबलसम्पन्नो न समः स्याद्धनूमतः।

‘जो हनुमान् के समान बल-पराक्रम से सम्पन्न न हो, ऐसा कौन पुरुष राक्षसों द्वारा सुरक्षित अत्यन्त दुर्जय लङ्का में प्रवेश कर सकता है॥ ५ १/२ ॥

भृत्यकार्यं हनुमता सुग्रीवस्य कृतं महत्।

एवं विधाय स्वबलं सदृशं विक्रमस्य च॥६॥

‘हनुमान् ने समुद्र-लङ्घन आदि कार्यों के द्वारा अपने पराक्रम के अनुरूप बल प्रकट करके एक सच्चे सेवक के योग्य सुग्रीव का बहुत बड़ा कार्य सम्पन्न किया है॥६॥

यो हि भृत्यो नियुक्तः सन् भर्ना कर्मणि दुष्करे।

कुर्यात् तदनुरागेण तमाहुः पुरुषोत्तमम्॥७॥

‘जो सेवक स्वामी के द्वारा किसी दुष्कर कार्य में नियुक्त होने पर उसे पूरा करके तदनुरूप दूसरे कार्य को भी (यदि वह मुख्य कार्य का विरोधी न हो) सम्पन्न करता है, वह सेवकों में उत्तम कहा गया है।७॥

यो नियुक्तः परं कार्यं न कुर्यान्नृपतेः प्रियम्।

भृत्यो युक्तः समर्थश्च तमाहर्मध्यमं नरम्॥८॥

‘जो एक कार्य में नियुक्त होकर योग्यता और सामर्थ्य होने पर भी स्वामी के दूसरे प्रिय कार्य को नहीं करता (स्वामी ने जितना कहा है, उतना ही करके लौट आता है) वह मध्यम श्रेणी का सेवक बताया गया है।

नियुक्तो नृपतेः कार्यं न कुर्याद् यः समाहितः।

भृत्यो युक्तः समर्थश्च तमाहुः पुरुषाधमम्॥९॥

‘जो सेवक मालिक के किसी कार्य में नियुक्त होकर अपने में योग्यता और सामर्थ्य के होते हुए भी उसे सावधानी से पूरा नहीं करता, वह अधम कोटि का कहा गया है॥९॥

तन्नियोगे नियुक्तेन कृतं कृत्यं हनूमता।

न चात्मा लघुतां नीतः सुग्रीवश्चापि तोषितः॥१०॥

‘हनुमान् ने स्वामी के एक कार्य में नियुक्त होकर उसके साथ ही दूसरे महत्त्वपूर्ण कार्यों को भी पूरा किया, अपने गौरव में भी कमी नहीं आने दी—अपने आपको दूसरों की दृष्टि में छोटा नहीं बनने दिया और सुग्रीव को भी पूर्णतः संतुष्ट कर दिया॥ १० ॥

अहं च रघुवंशश्च लक्ष्मणश्च महाबलः।

वैदेह्या दर्शनेनाद्य धर्मतः परिरक्षिताः॥११॥

‘आज हनुमान ने विदेहनन्दिनी सीता का पता लगाकर उन्हें अपनी आँखों देखकर धर्म के अनुसार मेरी, समस्त रघुवंश की और महाबली लक्ष्मण की भी रक्षा की है॥ ११॥

इदं तु मम दीनस्य मनो भूयः प्रकर्षति।

यदिहास्य प्रियाख्यातुर्न कुर्मि सदृशं प्रियम्॥१२॥

‘आज मेरे पास पुरस्कार देने योग्य वस्तु का अभाव है, यह बात मेरे मन में बड़ी कसक पैदा कर रही है कि यहाँ जिसने मुझे ऐसा प्रिय संवाद सुनाया, उसका मैं कोई वैसा ही प्रिय कार्य नहीं कर पा रहा हूँ॥

१२॥

एष सर्वस्वभूतस्तु परिष्वङ्गो हनूमतः।

मया कालमिमं प्राप्य दत्तस्तस्य महात्मनः॥१३॥

‘इस समय इन महात्मा हनुमान् को मैं केवल अपना प्रगाढ़ आलिङ्गन प्रदान करता हूँ, क्योंकि यही मेरा सर्वस्व है’ ॥ १३॥

इत्युक्त्वा प्रीतिहृष्टाङ्गो रामस्तं परिषस्वजे।

हनूमन्तं कृतात्मानं कृतकार्यमुपागतम्॥१४॥

ऐसा कहते-कहते रघुनाथजी के अङ्ग-प्रत्यङ्ग प्रेम से पुलकित हो गये और उन्होंने अपनी आज्ञा के पालन में सफलता पाकर लौटे हुए पवित्रात्मा हनुमान जी को हृदय से लगा लिया॥ १४॥

ध्यात्वा पुनरुवाचेदं वचनं रघुसत्तमः।

हरीणामीश्वरस्यापि सुग्रीवस्योपशृण्वतः॥१५॥

फिर थोड़ी देर तक विचार करके रघुवंशशिरोमणि श्रीराम ने वानरराज सुग्रीव को सुनाकर यह बात कही — ॥ १५ ॥

सर्वथा सुकृतं तावत् सीतायाः परिमार्गणम्।

सागरं तु समासाद्य पुनर्नष्टं मनो मम॥१६॥

‘बन्धुओ! सीता की खोज का काम तो सुचारु रूप से सम्पन्न हो गया; किंतु समुद्र तक की दुस्तरता का विचार करके मेरे मन का उत्साह फिर नष्ट हो गया। १६॥

कथं नाम समुद्रस्य दुष्पारस्य महाम्भसः।

हरयो दक्षिणं पारं गमिष्यन्ति समागताः॥१७॥

‘महान् जलराशि से परिपूर्ण समुद्र को पार करना तो बड़ा ही कठिन काम है। यहाँ एकत्र हुए ये वानर समुद्र के दक्षिण तट पर कैसे पहुँचेंगे॥ १७ ॥

यद्यप्येष तु वृत्तान्तो वैदेह्या गदितो मम।

समुद्रपारगमने हरीणां किमिवोत्तरम्॥१८॥

‘मेरी सीता ने भी यही संदेह उठाया था, जिसका वृत्तान्त अभी-अभी मुझसे कहा गया है। इन वानरों के समुद्र के पार जाने के विषय में जो प्रश्न खड़ा हुआ है, उसका वास्तविक उत्तर क्या है?’ ॥ १८ ॥

इत्युक्त्वा शोकसम्भ्रान्तो रामः शत्रुनिबर्हणः।

हनूमन्तं महाबाहुस्ततो ध्यानमुपागमत्॥१९॥

हनुमान् जी से ऐसा कहकर शत्रुसूदन महाबाहु श्रीराम शोकाकुल होकर बड़ी चिन्ता में पड़ गये। १९॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे प्रथमः सर्गः॥१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें पहला सर्ग पूरा हुआ॥१॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
युद्धकाण्डम्

सुग्रीव का श्रीराम को उत्साह प्रदान

द्वितीयः सर्गः

सर्ग-02

करना तं तु शोकपरिघुनं रामं दशरथात्मजम्।

उवाच वचनं श्रीमान् सुग्रीवः शोकनाशनम्॥ १॥

इस प्रकार शोक से संतप्त हुए दशरथनन्दन श्रीराम से सुग्रीव ने उनके शोक का निवारण करने वाली बात कही— ॥१॥

किं त्वया तप्यते वीर यथान्यः प्राकृतस्तथा।

मैवं भूस्त्यज संतापं कृतघ्न इव सौहृदम्॥२॥

‘वीरवर! आप दूसरे साधारण मनुष्यों की भाँति क्यों संताप कर रहे हैं? आप इस तरह चिन्तित न हों। जैसे कृतघ्न पुरुष सौहार्द को त्याग देता है, उसी तरह आप भी इस संताप को छोड़ दें॥२॥

संतापस्य च ते स्थानं नहि पश्यामि राघव।

प्रवृत्तावुपलब्धायां ज्ञाते च निलये रिपोः॥३॥

‘रघुनन्दन! जब सीता का समाचार मिल गया और शत्रु के निवास-स्थान का पता लग गया, तब मुझे आपके इस दुःख और चिन्ता का कोई कारण नहीं दिखायी देता॥३॥

मतिमान् शास्त्रवित् प्राज्ञः पण्डितश्चासि राघव।

त्यजेमां प्राकृतां बुद्धिं कृतात्मेवार्थदूषिणीम्॥४॥

‘रघुकुलभूषण! आप बुद्धिमान्, शास्त्रों के ज्ञाता विचारकुशल और पण्डित हैं, अतः कृतात्मा पुरुष की भाँति इस अर्थदूषक प्राकृत बुद्धि का परित्याग कर दीजिये॥४॥

समुद्रं लवयित्वा तु महानक्रसमाकुलम्।

लङ्कामारोहयिष्यामो हनिष्यामश्च ते रिपुम्॥५॥

‘बड़े-बड़े नाकों से भरे हुए समुद्र को लाँघकर हम लोग लङ्का पर चढ़ाई करेंगे और आपके शत्रु को नष्ट कर डालेंगे॥५॥

निरुत्साहस्य दीनस्य शोकपर्याकुलात्मनः।

सर्वार्था व्यवसीदन्ति व्यसनं चाधिगच्छति॥६॥

‘जो पुरुष उत्साहशून्य, दीन और मन-ही-मन शोक से व्याकुल रहता है, उसके सारे काम बिगड़ जाते हैं और वह बड़ी विपत्ति में पड़ जाता है॥६॥

इमे शूराः समर्थाश्च सर्वतो हरियूथपाः।

त्वत्प्रियार्थं कृतोत्साहाः प्रवेष्टमपि पावकम्।

एषां हर्षेण जानामि तर्कश्चापि दृढो मम॥७॥

‘ये वानरयूथपति सब प्रकार से समर्थ एवं शूरवीर हैं। आपका प्रिय करने के लिये इनके मन में बड़ा उत्साह है। ये आपके लिये जलती आग में भी प्रवेश कर सकते हैं। समुद्र को लाँघने और रावण को मारने का प्रसंग चलने पर इनका मुँह प्रसन्नता से खिल जाता है। इनके इस हर्ष और उत्साह से ही मैं इस बात को जानता हूँ तथा इस विषय में मेरा अपना तर्क (निश्चय) भी सुदृढ़ है॥७॥

विक्रमेण समानेष्ये सीतां हत्वा यथा रिपुम्।

रावणं पापकर्माणं तथा त्वं कर्तुमर्हसि॥८॥

‘आप ऐसा कीजिये, जिससे हमलोग पराक्रमपूर्वक अपने शत्रु पापाचारी रावण का वध करके सीता को यहाँ ले आवें॥ ८॥

सेतुरत्र यथा बद्ध्येद् यथा पश्येम तां पुरीम्।

तस्य राक्षसराजस्य तथा त्वं कुरु राघव॥९॥

‘रघुनन्दन! आप ऐसा कोई उपाय कीजिये, जिससे समुद्र पर सेतु बँध सके और हम उस राक्षसराज की लङ्कापुरी को देख सकें॥९॥

दृष्टा तां हि पुरीं लङ्गां त्रिकटशिखरे स्थिताम।

हतं च रावणं युद्धे दर्शनादवधारय॥१०॥

‘त्रिकूटपर्वत के शिखर पर बसी हुई लङ्कापुरी एक बार दीख जाय तो आप यह निश्चित समझिये कि युद्ध में रावण दिखायी दिया और मारा गया॥ १० ॥

अबद्ध्वा सागरे सेतुं घोरे च वरुणालये।

लङ्कां न मर्दितुं शक्या सेन्ट्रैरपि सुरासुरैः॥११॥

‘वरुण के निवासभूत घोर समुद्र पर पुल बाँधे बिना तो इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता और असुर भी लङ्का को पददलित नहीं कर सकते॥११॥

सेतुबन्धः समुद्रे च यावल्लङ्कासमीपतः।

सर्वं तीर्णं च मे सैन्यं जितमित्युपधारय।

इमे हि समरे वीरा हरयः कामरूपिणः॥१२॥

‘अतः जब लङ्काके निकटतक समुद्रपर पुल बँध जायगा, तब हमारी सारी सेना उस पार चली जायगी। फिर तो आप यही समझिये कि अपनी जीत हो गयी; क्योंकि इच्छानुसार रूप धारण करने वाले ये वानर युद्ध में बड़ी वीरता दिखानेवाले हैं॥ १२॥

तदलं विक्लवां बुद्धिं राजन् सर्वार्थनाशिनीम्।

पुरुषस्य हि लोकेऽस्मिन् शोकः शौर्यापकर्षणः॥१३॥

‘अतः राजन्! आप इस व्याकुल बुद्धि का आश्रय न लें-बुद्धि की इस व्याकुलता को त्याग दें; क्योंकि यह समस्त कार्यों को बिगाड़ देने वाली है और शोक इस जगत् में पुरुष के शौर्य को नष्ट कर देता है॥ १३॥

यत् तु कार्यं मनुष्येण शौटीर्यमवलम्ब्यताम्।

तदलंकरणायैव कर्तुर्भवति सत्वरम्॥१४॥

‘मनुष्य को जिसका आश्रय लेना चाहिये, उस शौर्य का ही वह अवलम्बन करे; क्योंकि वह कर्ता को शीघ्र ही अलंकृत कर देता है उसके अभीष्ट फल की सिद्धि करा देता है॥ १४॥

अस्मिन् काले महाप्राज्ञ सत्त्वमातिष्ठ तेजसा।

शूराणां हि मनुष्याणां त्वद्विधानां महात्मनाम्।

विनष्टे वा प्रणष्टे वा शोकः सर्वार्थनाशनः॥१५॥

‘अतः महाप्राज्ञ श्रीराम! आप इस समय तेज के साथ ही धैर्य का आश्रय लें। कोई वस्तु खो गयी हो या नष्ट हो गयी हो, उसके लिये आप-जैसे शूरवीर महात्मा पुरुषों को शोक नहीं करना चाहिये; क्योंकि शोक सब कामों को बिगाड़ देता है॥ १५ ॥

तत्त्वं बुद्धिमतां श्रेष्ठः सर्वशास्त्रार्थकोविदः।

मद्विधैः सचिवैः सार्धमरिं जेतुं समर्हसि॥१६॥

‘आप बुद्धिमानों में श्रेष्ठ और सम्पूर्ण शास्त्रों के मर्मज्ञ हैं। अतः हम-जैसे मन्त्रियों एवं सहायकोंके साथ रहकर अवश्य ही शत्रु पर विजय प्राप्त कर सकते हैं॥ १६॥

नहि पश्याम्यहं कंचित् त्रिषु लोकेषु राघव।

गृहीतधनुषो यस्ते तिष्ठेदभिमुखो रणे॥१७॥

‘रघुनन्दन! मुझे तो तीनों लोकों में ऐसा कोई वीर नहीं दिखायी देता, जो रणभूमि में धनुष लेकर खड़े हुए आपके सामने ठहर सके॥१७॥

वानरेषु समासक्तं न ते कार्यं विपत्स्यते।

अचिराद् द्रक्ष्यसे सीतां तीसागरमक्षयम्॥१८॥

‘वानरों पर जिसका भार रखा गया है, आपका वह कार्य बिगड़ने नहीं पायेगा। आप शीघ्र ही इस अक्षय समुद्र को पार करके सीता का दर्शन करेंगे॥ १८ ॥

तदलं शोकमालम्ब्य क्रोधमालम्ब भूपते।

निश्चेष्टाः क्षत्रिया मन्दाः सर्वे चण्डस्य बिभ्यति॥१९॥

‘पृथ्वीनाथ! अपने हृदय में शोक को स्थान देना व्यर्थ है। इस समय तो आप शत्रुओं के प्रति क्रोध धारण कीजिये। जो क्षत्रिय मन्द (क्रोधशून्य) होते हैं, उनसे कोई चेष्टा नहीं बन पाती; परंतु जो शत्रु के प्रति आवश्यक रोष से भरा होता है, उससे सब डरते हैं। १९॥

लङ्घनार्थं च घोरस्य समुद्रस्य नदीपतेः।

सहास्माभिरिहोपेतः सूक्ष्मबुद्धिर्विचारय॥२०॥

‘नदियों के स्वामी घोर समुद्र को पार करने के लिये क्या उपाय किया जाय, इस विषय में आप हमारे साथ बैठकर विचार कीजिये; क्योंकि आपकी बुद्धि बड़ी सूक्ष्म है॥ २०॥

लक्षिते तत्र तैः सैन्यैर्जितमित्येव निश्चिनु।

सर्वं तीर्णं च मे सैन्यं जितमित्यवधार्यताम्॥२१॥

‘यदि हमारे सैनिक समुद्र को लाँघ गये तो यही निश्चय रखिये कि अपनी जीत अवश्य होगी। सारी सेना का समुद्र के उस पार पहुँच जाना ही अपनी विजय समझिये॥२१॥

इमे हि हरयः शूराः समरे कामरूपिणः।

तानरीन् विधमिष्यन्ति शिलापादपवृष्टिभिः॥२२॥

‘ये वानर संग्राम में बड़े शूरवीर हैं और इच्छानुसार रूप धारण कर सकते हैं। ये पत्थरों और पेड़ों की वर्षा करके ही उन शत्रुओं का संहार कर डालेंगे। २२॥

कथंचित् परिपश्यामि लङ्कितं वरुणालयम्।

हतमित्येव तं मन्ये युद्धे शत्रुनिबर्हण॥२३॥

‘शत्रुसूदन श्रीराम! यदि किसी प्रकार मैं इस वानर-सेना को समुद्र के उस पार पहुँची देख सकूँ तो मैं रावण को युद्ध में मरा हुआ ही समझता हूँ॥२३॥

किमुक्त्वा बहुधा चापि सर्वथा विजयी भवान्।

निमित्तानि च पश्यामि मनो मे सम्प्रहृष्यति॥२४॥

‘बहुत कहने से क्या लाभ! मेरा तो विश्वास है कि आप सर्वथा विजयी होंगे; क्योंकि मुझे ऐसे ही शकुन दिखायी देते हैं और मेरा हृदय भी हर्ष एवं उत्साह से भरा है’॥२४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे द्वितीयः सर्गः॥२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में दूसरा सर्ग पूरा हुआ॥२॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
युद्धकाण्डम्

हनुमान जी का लङ्का का वर्णन करके भगवान् श्रीराम से सेना को कूच करने की आज्ञा देने के लिये प्रार्थना करना

तृतीयः सर्गः

सर्ग-03

सुग्रीवस्य वचः श्रुत्वा हेतुमत् परमार्थवत्।

प्रतिजग्राह काकुत्स्थो हनूमन्तमथाब्रवीत्॥१॥

सुग्रीव के ये युक्तियुक्त और उत्तम अभिप्राय से पूर्ण वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजी ने उन्हें स्वीकार किया और फिर हनुमान जी से कहा- ॥१॥

तपसा सेतुबन्धेन सागरोच्छोषणेन च।

सर्वथापि समर्थोऽस्मि सागरस्यास्य लङ्घने॥२॥

‘मैं तपस्या से पुल बाँधकर और समुद्र को सुखाकर सब प्रकार से महासागर को लाँघ जाने में समर्थ हूँ॥२॥

कति दुर्गाणि दुर्गाया लङ्कायास्तद् ब्रवीष्व मे।

ज्ञातुमिच्छामि तत् सर्वं दर्शनादिव वानर ॥३॥

‘वानरवीर! तुम मुझे यह तो बताओ कि उस दुर्गम लङ्कापुरी के कितने दुर्ग हैं। मैं देखे हुए के समान उसका सारा विवरण स्पष्टरूप से जानना चाहता हूँ। ३॥

बलस्य परिमाणं च द्वारदुर्गक्रियामपि।

गुप्तिकर्म च लङ्काया रक्षसां सदनानि च॥४॥

यथासुखं यथावच्च लङ्कायामसि दृष्टवान्।

सर्वमाचक्ष्व तत्त्वेन सर्वथा कुशलो ह्यसि॥५॥

‘तुमने रावण की सेना का परिमाण, पुरी के दरवाजों को दुर्गम बनाने के साधन, लङ्का की रक्षा के उपाय तथा राक्षसों के भवन–इन सबको सुखपूर्वक यथावत्-रूप से वहाँ देखा है। अतः इन सबका ठीकठीक वर्णन करो; क्योंकि तुम सब प्रकार से कुशल हो’॥ ४-५॥

श्रुत्वा रामस्य वचनं हनूमान् मारुतात्मजः।

वाक्यं वाक्यविदां श्रेष्ठो रामं पुनरथाब्रवीत्॥६॥

श्रीरघुनाथजी का यह वचन सुनकर वाणी के मर्म को समझने वाले विद्वानों में श्रेष्ठ पवनकुमार हनुमान् ने श्रीराम से फिर कहा- ॥६॥

श्रूयतां सर्वमाख्यास्ये दुर्गकर्म विधानतः।

गुप्ता पुरी यथा लङ्का रक्षिता च यथा बलैः॥७॥

राक्षसाश्च यथा स्निग्धा रावणस्य च तेजसा।

परां समृद्धिं लङ्कायाः सागरस्य च भीमताम्॥८॥

विभागं च बलौघस्य निर्देशं वाहनस्य च।

एवमुक्त्वा कपिश्रेष्ठः कथयामास तत्त्वतः॥९॥

‘भगवन्! सुनिये। मैं सब बातें बता रहा हूँ। लङ्का के दुर्ग किस विधि से बने हैं, किस प्रकार लङ्कापुरी की रक्षा की व्यवस्था की गयी है, किस तरह वह सेनाओं से सुरक्षित है, रावण के तेज से प्रभावित हो राक्षस उसके प्रति कैसा स्नेह रखते हैं, लङ्का की समृद्धि कितनी उत्तम है, समुद्र कितना भयंकर है, पैदल सैनिकों का विभाग करके कहाँ कितने सैनिक रखे गये हैं और वहाँ के वाहनों की कितनी संख्या है —इन सब बातों का मैं वर्णन करूँगा। ऐसा कहकर कपिश्रेष्ठ हनुमान् ने वहाँ की बातों को ठीक-ठीक बताना आरम्भ किया॥७–९॥

हृष्टप्रमुदिता लङ्का मत्तद्विपसमाकुला।

महती रथसम्पूर्णा रक्षोगणनिषेविता॥१०॥

‘प्रभो! लङ्कापुरी हर्ष और आमोद-प्रमोद से पूर्ण है। वह विशाल पुरी मतवाले हाथियों से व्याप्त तथा असंख्य रथों से भरी हुई है। राक्षसों के समुदाय सदा उसमें निवास करते हैं ॥ १० ॥

दृढबद्धकपाटानि महापरिघवन्ति च।

चत्वारि विपुलान्यस्या द्वाराणि सुमहान्ति च॥

‘उस पुरी के चार बड़े-बड़े दरवाजे हैं, जो बहुत लंबे-चौड़े हैं। उनमें बहुत मजबूत किवाड़ लगे हैं और मोटी-मोटी अर्गलाएँ हैं॥ ११॥

तत्रेषूपलयन्त्राणि बलवन्ति महान्ति च।

आगतं प्रतिसैन्यं तैस्तत्र प्रतिनिवार्यते॥१२॥

‘उन दरवाजों पर बड़े विशाल और प्रबल यन्त्र लगे हैं। जो तीर और पत्थरों के गोले बरसाते हैं। उनके द्वारा आक्रमण करने वाली शत्रुसेना को आगे बढ़ने से रोका जाता है॥ १२॥

द्वारेषु संस्कृता भीमाः कालायसमयाः शिताः।

शतशो रचिता वीरैः शतघ्न्यो रक्षसां गणैः॥१३॥

‘जिन्हें वीर राक्षसगणों ने बनाया है, जो काले लोहे की बनी हुई, भयंकर और तीखी हैं तथा जिनका अच्छी तरह संस्कार किया गया है, ऐसी सैकड़ों शतघ्नियाँ* (लोहे के काँटों से भरी हुई चार हाथ लंबी गदाएँ) उन दरवाजों पर सजाकर रखी गयी हैं॥१३॥

* शतघ्नी च चतुर्हस्ता लोहकंटकिनी गदा इति वैजयन्ती।

सौवर्णस्तु महांस्तस्याः प्राकारो दुष्प्रधर्षणः।

मणिविद्रुमवैदूर्यमुक्ताविरचितान्तरः॥१४॥

‘उस पुरी के चारों ओर सोने का बना हुआ बहुत ऊँचा परकोटा है, जिसको तोड़ना बहुत ही कठिन है। उसमें मणि, मूंगे, नीलम और मोतियों का काम किया गया है॥ १४॥

सर्वतश्च महाभीमाः शीततोया महाशुभाः।

अगाधा ग्राहवत्यश्च परिखा मीनसेविताः॥१५॥

‘परकोटों के चारों ओर महाभयंकर, शत्रुओं का महान् अमङ्गल करने वाली, ठंडे जल से भरी हुई और अगाध गहराई से युक्त कई खाइयाँ बनी हुई हैं, जिनमें ग्राह और बड़े-बड़े मत्स्य निवास करते हैं।॥ १५ ॥

द्वारेषु तासां चत्वारः संक्रमाः परमायताः।

यन्त्रैरुपेता बहुभिर्महद्भिगृहपङ्कतिभिः॥१६॥

‘उक्त चारों दरवाजों के सामने उन खाइयों पर मचानों के रूप में चार संक्रम* (लकड़ी के पुल) हैं, जो बहुत ही विस्तृत हैं। उनमें बहुत-से बड़े-बड़े यन्त्र लगे हुए हैं और उनके आस-पास परकोटे पर बने हुए मकानों की पंक्तियाँ हैं ॥ १६॥

* मालूम होता है ‘संक्रम’ इस प्रकार के पुल थे, जिन्हें जब आवश्यकता होती, तभी यन्त्रों द्वारा गिरा दिया जाता था। इसी से शत्रु की सेना आने पर उसे खाई में गिरा देने की बात कही गयी है।

त्रायन्ते संक्रमास्तत्र परसैन्यागते सति।

यन्त्रैस्तैरवकीर्यन्ते परिखासु समन्ततः॥१७॥

‘जब शत्रु की सेना आती है, तब यन्त्रों के द्वारा उन संक्रमों की रक्षा की जाती है तथा उन यन्त्रों के द्वारा ही उन्हें सब ओर खाइयों में गिरा दिया जाता है और वहाँ पहुँची हुई शत्रु-सेनाओं को भी सब ओर फेंक दिया जाता है॥ १७॥

एकस्त्वकम्प्यो बलवान् संक्रमः सुमहादृढः ।

काञ्चनैर्बहुभिः स्तम्भैर्वेदिकाभिश्च शोभितः॥१८॥

‘उनमें से एक संक्रम तो बड़ा ही सुदृढ़ और अभेद्य है। वहाँ बहुत बड़ी सेना रहती है और वह सोने के अनेक खंभों तथा चबूतरों से सुशोभित है॥ १८ ॥

स्वयं प्रकृतिमापन्नो युयुत्सू राम रावणः।

उत्थितश्चाप्रमत्तश्च बलानामनुदर्शने॥१९॥

‘रघुनाथजी! रावण युद्ध के लिये उत्सुक होता हुआ स्वयं कभी क्षुब्ध नहीं होता-स्वस्थ एवं धीर बना रहता है। वह सेनाओं के बारंबार निरीक्षण के लिये सदा सावधान एवं उद्यत रहता है॥ १९॥

लङ्का पुनर्निरालम्बा देवदुर्गा भयावहा।

नादेयं पार्वतं वान्यं कृत्रिमं च चतुर्विधम्॥२०॥

‘लङ्का पर चढ़ाई करने के लिये कोई अवलम्ब नहीं है। वह पुरी देवताओं के लिये भी दुर्गम और बड़ी भयावनी है। उसके चारों ओर नदी, पर्वत, वन और कृत्रिम (खाई, परकोटा आदि)—ये चार प्रकार के दुर्ग हैं ॥ २० ॥

स्थिता पारे समुद्रस्य दूरपारस्य राघव।

नौपथश्चापि नास्त्यत्र निरुद्देशश्च सर्वतः॥२१॥

‘रघुनन्दन! वह बहुत दूर तक फैले हुए समुद्र के दक्षिण किनारे पर बसी हुई है। वहाँ जाने के लिये नाव का भी मार्ग नहीं है; क्योंकि उसमें लक्ष्य का भी किसी प्रकार पता रहना सम्भव नहीं है॥ २१॥

शैलाग्रे रचिता दुर्गा सा पूर्देवपुरोपमा।

वाजिवारणसम्पूर्णा लङ्का परमदुर्जया॥२२॥

‘वह दुर्गम पुरी पर्वत के शिखर पर बसायी गयी है और देवपुरी के समान सुन्दर दिखायी देती है, हाथी, घोड़ों से भरी हुई वह लङ्का अत्यन्त दुर्जय है॥ २२॥

परिखाश्च शतघ्न्यश्च यन्त्राणि विविधानि च।

शोभयन्ति पुरीं लङ्कां रावणस्य दुरात्मनः॥ २३॥

‘खाइयाँ, शतघ्नियाँ और तरह-तरह के यन्त्र दुरात्मा रावण की उस लङ्कानगरी की शोभा बढ़ाते हैं॥ २३॥

अयुतं रक्षसामत्र पूर्वद्वारं समाश्रितम्।

शूलहस्ता दुराधर्षाः सर्वे खड्गाग्रयोधिनः॥२४॥

‘लङ्का के पूर्वद्वार पर दस हजार राक्षस रहते हैं, जो सब-के-सब हाथों में शूल धारण करते हैं। वे अत्यन्त दुर्जय और युद्ध के मुहाने पर तलवारों से जूझने वाले हैं।

नियुतं रक्षसामत्र दक्षिणद्वारमाश्रितम्।

चतुरङ्गेण सैन्येन योधास्तत्राप्यनुत्तमाः॥२५॥

‘लङ्का के दक्षिण द्वार पर चतुरंगिणी सेना के साथ एक लाख राक्षस योद्धा डटे रहते हैं। वहाँ के सैनिक भी बड़े बहादुर हैं॥ २५ ॥

प्रयुतं रक्षसामत्र पश्चिमद्वारमाश्रितम्।

चर्मखड्गधराः सर्वे तथा सर्वास्त्रकोविदाः॥२६॥

‘पुरी के पश्चिम द्वार पर दस लाख राक्षस निवास करते हैं। वे सब-के-सब ढाल और तलवार धारण करते हैं तथा सम्पूर्ण अस्त्रों के ज्ञान में निपुण हैं। २६॥

न्यर्बुदं रक्षसामत्र उत्तरद्वारमाश्रितम्।

रथिनश्चाश्ववाहाश्च कुलपुत्राः सुपूजिताः॥२७॥

‘उस पुरी के उत्तर द्वार पर एक अर्बुद (दस करोड़) राक्षस रहते हैं। जिनमें से कुछ तो रथी हैं और कुछ घुड़सवार वे सभी उत्तम कुल में उत्पन्न और अपनी वीरता के लिये प्रशंसित हैं॥ २७॥

शतशोऽथ सहस्राणि मध्यमं स्कन्धमाश्रिताः।

यातुधाना दुराधर्षाः साग्रकोटिश्च रक्षसाम्॥२८॥

‘लङ्का के मध्यभाग की छावनी में सैकड़ों सहस्र दुर्जय राक्षस रहते हैं, जिनकी संख्या एक करोड़ से अधिक है॥२८॥

ते मया संक्रमा भग्नाः परिखाश्चावपूरिताः।

दग्धा च नगरी लङ्का प्राकाराश्चावसादिताः।

बलैकदेशः क्षपितो राक्षसानां महात्मनाम्॥२९॥

‘किंतु मैंने उन सब संक्रमों को तोड़ डाला है, खाइयाँ पाट दी हैं, लङ्कापुरी को जला दिया है और उसके परकोटों को भी धराशायी कर दिया है। इतना ही नहीं, वहाँ के विशालकाय राक्षसों की सेना का एक चौथाई भाग नष्ट कर डाला है॥ २९॥

येन केन तु मार्गेण तराम वरुणालयम्।

हतेति नगरी लङ्का वानरैरुपधार्यताम्॥३०॥

‘हमलोग किसी-न-किसी मार्ग या उपाय से एक बार समुद्र को पार कर लें; फिर तो लङ्का को वानरों के द्वारा नष्ट हुई ही समझिये॥३०॥

अङ्गदो द्विविदो मैन्दो जाम्बवान् पनसो नलः।

नीलः सेनापतिश्चैव बलशेषेण किं तव॥३१॥

‘अङ्गद, द्विविद, मैन्द, जाम्बवान्, पनस, नल और सेनापति नील—इतने ही वानर लङ्काविजय करने के लिये पर्याप्त हैं बाकी सेना लेकर आपको क्या करना है? ॥

प्लवमाना हि गत्वा त्वां रावणस्य महापुरीम्।

सपर्वतवना भित्त्वा सखातां च सतोरणाम्।

सप्राकारां सभवनामानयिष्यन्ति राघव॥३२॥

‘रघुनन्दन! ये अङ्गद आदि वीर आकाश में उछलते-कूदते हुए रावण की महापुरी लङ्का में पहुँचकर उसे पर्वत, वन, खाई, दरवाजे, परकोटे और मकानोंसहित नष्ट करके सीताजी को यहाँ ले आयेंगे॥ ३२॥

एवमाज्ञापय क्षिप्रं बलानां सर्वसंग्रहम्।

मुहूर्तेन तु युक्तेन प्रस्थानमभिरोचय॥३३॥

‘ऐसा समझकर आप शीघ्र ही समस्त सैनिकों को सम्पूर्ण आवश्यक वस्तुओं का संग्रह करके कूच करने की आज्ञा दीजिये और उचित मुहूर्त से प्रस्थान की इच्छा कीजिये’ ॥ ३३॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे तृतीयः सर्गः॥३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में तीसरा सर्ग पूरा हुआ॥३॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
युद्धकाण्डम्

श्रीराम आदि के साथ वानर-सेना का प्रस्थान और समुद्र-तट पर उसका पड़ाव

चतुर्थः सर्गः

सर्ग-04

श्रुत्वा हनूमतो वाक्यं यथावदनुपूर्वशः।

ततोऽब्रवीन्महातेजा रामः सत्यपराक्रमः॥१॥

हनुमान जी के वचनों को क्रमशः यथावत् -रूप से सुनकर सत्यपराक्रमी महातेजस्वी भगवान् श्रीराम ने कहा- ॥१॥

यन्निवेदयसे लङ्कां पुरीं भीमस्य रक्षसः।

क्षिप्रमेनां वधिष्यामि सत्यमेतद् ब्रवीमि ते॥२॥

‘हनुमन्! मैं तुमसे सच कहता हूँ तुमने उस भयानक राक्षस की जिस लङ्कापुरी का वर्णन किया है, उसे मैं शीघ्र ही नष्ट कर डालूँगा॥२॥

अस्मिन् मुहूर्ते सुग्रीव प्रयाणमभिरोचय।

युक्तो मुहूर्ते विजये प्राप्तो मध्यं दिवाकरः॥३॥

‘सुग्रीव! तुम इसी मुहूर्त में प्रस्थान की तैयारी करो। सूर्यदेव दिन के मध्य भाग में जा पहुंचे हैं। इसलिये इस विजय* नामक मुहूर्त में हमारी यात्रा उपयुक्त होगी।

* दिन में दोपहरी के समय अभिजित् मुहूर्त होता है, इसी को विजय-मुहूर्त भी कहते हैं। यह यात्रा के लिये बहुत उत्तम माना गया है। यद्यपि—’भुक्तौ दक्षिणयात्रायां प्रतिष्ठायां द्विजन्मनि। आधाने च ध्वजारोहे मृत्युदः स्यात् सदाभिजित्॥’ इस ज्योतिष-रत्नाकर के वचन के अनुसार उक्त मुहूर्त में दक्षिणयात्रा निषिद्ध है, तथापि किष्किन्धा से लङ्का दक्षिणपूर्व के कोण में होने के कारण वह दोष यहाँ नहीं प्राप्त होता है।

सीतां हृत्वा तु तद् यातु क्वासौ यास्यति जीवितः।

सीता श्रुत्वाभियानं मे आशामेष्यति जीविते।

जीवितान्तेऽमृतं स्पृष्ट्वा पीत्वामृतमिवातुरः॥४॥

‘रावण सीता को हरकर ले जाय; किंतु वह जीवित बचकर कहाँ जायगा? सिद्ध आदि के मुँह से लङ्का पर मेरी चढ़ाई का समाचार सुनकर सीता को अपने जीवन की आशा बँध जायगी; ठीक उसी तरह जैसे जीवन का अन्त उपस्थित होने पर यदि रोगी अमृत का (अमृतत्व के साधनभूत दिव्य ओषधि का) स्पर्श कर ले अथवा अमृतोपम द्रवभूत ओषधि को पी ले तो उसे जीने की आशा हो जाती है॥४॥

उत्तराफाल्गुनी ह्यद्य श्वस्तु हस्तेन योक्ष्यते।

अभिप्रयाम सुग्रीव सर्वानीकसमावृताः॥५॥

‘आज उत्तराफाल्गुनी नामक नक्षत्र है। कल चन्द्रमा का हस्त नक्षत्र से योग होगा। इसलिये सुग्रीव ! हमलोग आज ही सारी सेनाओं के साथ यात्रा कर दें।

निमित्तानि च पश्यामि यानि प्रादुर्भवन्ति वै।

निहत्य रावणं सीतामानयिष्यामि जानकीम्॥६॥

‘इस समय जो शकुन प्रकट हो रहे हैं और जिन्हें मैं देख रहा हूँ, उनसे यह विश्वास होता है कि मैं अवश्य ही रावण का वध करके जनकनन्दिनी सीता को ले आऊँगा॥६॥

उपरिष्टाद्धि नयनं स्फुरमाणमिमं मम।

विजयं समनुप्राप्तं शंसतीव मनोरथम्॥७॥

‘इसके सिवा मेरी दाहिनी आँख का ऊपरी भाग फड़क रहा है। वह भी मानो मेरी विजय-प्राप्ति और मनोरथसिद्धि को सूचित कर रहा है’ ॥७॥

ततो वानरराजेन लक्ष्मणेन सुपूजितः।

उवाच रामो धर्मात्मा पुनरप्यर्थकोविदः॥८॥

यह सुनकर वानरराज सुग्रीव तथा लक्ष्मणने भी उनका बड़ा आदर किया। तत्पश्चात् अर्थवेत्ता (नीतिनिपुण) धर्मात्मा श्रीरामने फिर कहा- ॥८॥

अग्रे यातु बलस्यास्य नीलो मार्गमवेक्षितुम्।

वृतः शतसहस्रेण वानराणां तरस्विनाम्॥९॥

‘इस सेना के आगे-आगे एक लाख वेगवान् वानरों से घिरे हुए सेनापति नील मार्ग देखने के लिये चलें॥९॥

फलमूलवता नील शीतकाननवारिणा।

पथा मधुमता चाशु सेनां सेनापते नय॥१०॥

‘सेनापति नील! तुम सारी सेना को ऐसे मार्ग से शीघ्रतापूर्वक ले चलो, जिसमें फल-मूल की अधिकता हो, शीतल छाया से युक्त सघन वन हो, ठंडा जल मिल सके और मधु भी उपलब्ध हो सके॥ १० ॥

दूषयेयुर्दुरात्मानः पथि मूलफलोदकम्।

राक्षसाः पथि रक्षेथास्तेभ्यस्त्वं नित्यमुद्यतः॥११॥

‘सम्भव है दुरात्मा राक्षस रास्ते के फल-मूल और जल को विष आदि से दूषित कर दें, अतः तुम मार्ग में सतत सावधान रहकर उनसे इन वस्तुओं की रक्षा करना॥

निम्नेषु वनदुर्गेषु वनेषु च वनौकसः।

अभिप्लुत्याभिपश्येयुः परेषां निहितं बलम्॥१२॥

‘वानरों को चाहिये कि जहाँ गड्डे, दुर्गम वन और साधारण जंगल हों, वहाँ सब ओर कूद-फाँदकर यह देखते रहें कि कहीं शत्रुओं की सेना तो नहीं छिपी है (ऐसा न हो कि हम आगे निकल जायँ और शत्रु अकस्मात् पीछे से आक्रमण कर दे) ॥ १२॥

यत्तु फल्गु बलं किंचित् तदत्रैवोपपद्यताम्।

एतद्धि कृत्यं घोरं नो विक्रमेण प्रयुज्यताम्॥१३॥

“जिस सेना में बाल, वृद्ध आदि के कारण दुर्बलता हो, वह यहाँ किष्किन्धा में ही रह जाय; क्योंकि हमारा यह युद्धरूपी कृत्य बड़ा भयंकर है, अतः इसके लिये बल-विक्रमसम्पन्न सेना को ही यात्रा करनी चाहिये॥१३॥

सागरौघनिभं भीममग्रानीकं महाबलाः।

कपिसिंहाः प्रकर्षन्तु शतशोऽथ सहस्रशः॥१४॥

‘सैकड़ों और हजारों महाबली कपिकेसरी वीर महासागर की जलराशि के समान भयंकर एवं अपार वानर-सेना के अग्रभाग को अपने साथ आगे बढ़ाये चलें॥१४॥

गजश्च गिरिसंकाशो गवयश्च महाबलः।

गवाक्षश्चाग्रतो यातु गवां दृप्त इवर्षभः॥१५॥

‘पर्वत के समान विशालकाय गज, महाबली गवय तथा मतवाले साँड़ की भाँति पराक्रमी गवाक्ष सेना के आगे-आगे चलें॥ १५ ॥

यातु वानरवाहिन्या वानरः प्लवतां पतिः।

पालयन् दक्षिणं पार्श्वमृषभो वानरर्षभः॥१६॥

‘उछल-कूदकर चलने वाले कपियों के पालक वानरशिरोमणि ऋषभ इस वानर-सेना के दाहिने भाग की रक्षा करते हुए चलें॥ १६॥

गन्धहस्तीव दुर्धर्षस्तरस्वी गन्धमादनः।

यातु वानरवाहिन्याः सव्यं पार्श्वमधिष्ठितः॥१७॥

‘गन्धहस्ती के समान दुर्जय और वेगशाली वानर गन्धमादन इस वानर-वाहिनी के वामभाग में रहकर इसकी रक्षा करते हुए आगे बढ़ें॥ १७॥

यास्यामि बलमध्येऽहं बलौघमभिहर्षयन्।

अधिरुह्य हनमन्तमैरावतमिवेश्वरः॥१८॥

‘जैसे देवराज इन्द्र ऐरावत हाथीपर आरूढ़ होते हैं, उसी प्रकार मैं हनुमान् के कंधे पर चढ़कर सेना के बीच में रहकर सारी सेना का हर्ष बढ़ाता हुआ चलूँगा॥ १८॥

अङ्गदेनैष संयातु लक्ष्मणश्चान्तकोपमः।

सार्वभौमेन भूतेशो द्रविणाधिपतिर्यथा॥१९॥

‘जैसे धनाध्यक्ष कुबेर सार्वभौम नामक दिग्गज की पीठ पर बैठकर यात्रा करते हैं, उसी प्रकार काल के समान पराक्रमी लक्ष्मण अंगदपर आरूढ़ होकर यात्रा करें॥ १९॥

जाम्बवांश्च सुषेणश्च वेगदर्शी च वानरः।

ऋक्षराजो महाबाहुः कुक्षिं रक्षन्तु ते त्रयः॥२०॥

‘महाबाहु ऋक्षराज जाम्बवान्, सुषेण और वानर वेगदर्शी-ये तीनों वानर सेना के पृष्ठभाग की रक्षा करें॥

राघवस्य वचः श्रुत्वा सुग्रीवो वाहिनीपतिः।

व्यादिदेश महावीर्यो वानरान् वानरर्षभः॥२१॥

रघुनाथजी का यह वचन सुनकर महापराक्रमी वानरशिरोमणि सेनापति सुग्रीव ने उन वानरों को यथोचित आज्ञा दी॥२१॥

ते वानरगणाः सर्वे समुत्पत्य महौजसः।

गुहाभ्यः शिखरेभ्यश्च आशु पुप्लुविरे तदा॥२२॥

तब वे समस्त महाबली वानरगण अपनी गुफाओं और शिखरों से शीघ्र ही निकलकर उछलते-कूदते हुए चलने लगे॥ २२॥

ततो वानरराजेन लक्ष्मणेन च पूजितः।

जगाम रामो धर्मात्मा ससैन्यो दक्षिणां दिशम्॥२३॥

तत्पश्चात् वानरराज सुग्रीव और लक्ष्मण के सादर अनुरोध करने पर सेनासहित धर्मात्मा श्रीरामचन्द्रजी दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थित हुए॥ २३॥

शतैः शतसहस्रैश्च कोटिभिश्चायुतैरपि।

वारणाभैश्च हरिभिर्ययौ परिवृतस्तदा ॥२४॥

उस समय सैकड़ों, हजारों, लाखों और करोड़ों वानरों से, जो हाथी के समान विशालकाय थे, घिरे हुए श्रीरघुनाथजी आगे बढ़ने लगे॥ २४॥

तं यान्तमनुयान्ती सा महती हरिवाहिनी।

हृष्टाः प्रमुदिताः सर्वे सुग्रीवेणापि पालिताः॥२५॥

यात्रा करते हुए श्रीराम के पीछे वह विशाल वानरवाहिनी चलने लगी। उस सेना के सभी वीर सुग्रीव से पालित होने के कारण हृष्ट-पुष्ट एवं प्रसन्न थे॥ २५॥

आप्लवन्तः प्लवन्तश्च गर्जन्तश्च प्लवंगमाः।

क्ष्वेलन्तो निनदन्तश्च जग्मुर्वै दक्षिणां दिशम्॥२६॥

उनमें से कुछ वानर उस सेना की रक्षा के लिये उछलते-कूदते हुए चारों ओर चक्कर लगाते थे, कुछ मार्गशोधन के लिये कूदते-फाँदते आगे बढ़ जाते थे, कुछ वानर मेघों के समान गर्जते, कुछ सिंहों के समान दहाड़ते और कुछ किलकारियाँ भरते हुए दक्षिण दिशा की ओर अग्रसर हो रहे थे॥ २६॥

भक्षयन्तः सुगन्धीनि मधूनि च फलानि च।

उदहन्तो महावृक्षान् मञ्जरीपुञ्जधारिणः॥ २७॥

वे सुगन्धित मधु पीते और मीठे फल खाते हुए मञ्जरी-पुञ्ज धारण करने वाले विशाल वृक्षों को उखाड़कर कंधों पर लिये चल रहे थे॥ २७॥

अन्योन्यं सहसा दृप्ता निर्वहन्ति क्षिपन्ति च।

पतन्तश्चोत्पतन्त्यन्ये पातयन्त्यपरे परान्॥२८॥

कुछ मतवाले वानर विनोद के लिये एक दूसरे को ढो रहे थे। कोई अपने ऊपर चढ़े हुए वानर को झटककर दूर फेंक देते थे। कोई चलते-चलते ऊपर को उछल पड़ते थे और दूसरे वानर दूसरों दूसरों को ऊपर से धक्के देकर नीचे गिरा देते थे॥२८॥

रावणो नो निहन्तव्यः सर्वे च रजनीचराः।

इति गर्जन्ति हरयो राघवस्य समीपतः॥२९॥

श्रीरघुनाथजी के समीप चलते हुए वानर यह कहते हुए गर्जना करते थे कि ‘हमें रावण को मार डालना चाहिये। समस्त निशाचरों का भी संहार कर देना चाहिये’॥

पुरस्तादृषभो नीलो वीरः कुमुद एव च।

पन्थानं शोधयन्ति स्म वानरैर्बहभिः सह ॥३०॥

सबसे आगे ऋषभ, नील और वीर कुमुद ये बहुसंख्यक वानरों के साथ रास्ता ठीक करते जाते थे॥३०॥

मध्ये तु राजा सुग्रीवो रामो लक्ष्मण एव च।

बलिभिर्बहुभिर्भीमैर्वृतः शत्रुनिबर्हणः॥३१॥

सेना के मध्यभाग में राजा सुग्रीव, श्रीराम और लक्ष्मण—ये तीनों शत्रुसूदन वीर अनेक बलशाली एवं भयंकर वानरों से घिरे हुए चल रहे थे॥३१॥

हरिः शतबलिर्वीरः कोटिभिर्दशभिर्वृतः।

सर्वामेको ह्यवष्टभ्य ररक्ष हरिवाहिनीम्॥३२॥

शतबलि नाम का एक वीर वानर दस करोड़ वानरों के साथ अकेला ही सारी सेना को अपने नियन्त्रण में रखकर उसकी रक्षा करता था॥ ३२॥

कोटीशतपरीवारः केसरी पनसो गजः।

अर्कश्च बहुभिः पार्श्वमेकं तस्याभिरक्षति॥

सौ करोड़ वानरों से घिरे हुए केसरी और पनस—ये सेना के एक (दक्षिण) भागकी तथा बहुत-से वानर सैनिकों को साथ लिये गज और अर्क—ये उस वानर-सेना के दूसरे (वाम) भाग की रक्षा करते थे। ३३॥

सुषेणो जाम्बवांश्चैव ऋक्षैर्बहुभिरावृतौ।

सुग्रीवं पुरतः कृत्वा जघनं संररक्षतुः॥ ३४॥

बहुसंख्यक भालुओं से घिरे हुए सुषेण और जाम्बवान्—ये दोनों सुग्रीव को आगे करके सेना के पिछले भाग की रक्षा कर रहे थे॥३४॥

तेषां सेनापतिर्वीरो नीलो वानरपुंगवः।

सम्पतन् प्लवतां श्रेष्ठस्तद् बलं पर्यवारयत्॥३५॥

उन सबके सेनापति कपिश्रेष्ठ वानरशिरोमणि वीरवर नील उस सेना की सब ओर से रक्षा एवं नियन्त्रण कर रहे थे॥ ३५ ॥

दरीमुखः प्रजङ्घश्च जम्भोऽथ रभसः कपिः।

सर्वतश्च ययुर्वीरास्त्वरयन्तः प्लवंगमान्॥३६॥

दरीमुख, प्रजन, जम्भ और रभस—ये वीर सब ओर से वानरों को शीघ्र आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हुए चल रहे थे॥ ३६॥

एवं ते हरिशार्दूला गच्छन्ति बलदर्पिताः।

अपश्यन्त गिरिश्रेष्ठं सां गिरिशतायुतम्॥३७॥

इस प्रकार वे बलोन्मत्त कपि-केसरी वीर बराबर आगे बढ़ते गये। चलते-चलते उन्होंने पर्वतश्रेष्ठ सह्यगिरि को देखा, जिसके आस-पास और भी सैकड़ों पर्वत थे॥ ३७॥

सरांसि च सुफुल्लानि तटाकानि वराणि च।

रामस्य शासनं ज्ञात्वा भीमकोपस्य भीतवत्॥३८॥

वर्जयन् नागराभ्याशांस्तथा जनपदानपि।

सागरौघनिभं भीमं तद् वानरबलं महत्॥३९॥

निःससर्प महाघोरं भीमघोषमिवार्णवम्।

रास्ते में उन्हें बहुत-से सुन्दर सरोवर और तालाब दिखायी दिये, जिनमें मनोहर कमल खिले हुए थे। श्रीरामचन्द्रजी की आज्ञा थी कि रास्ते में कोई किसी प्रकार का उपद्रव न करे। भयंकर कोपवाले श्रीरामचन्द्रजी के इस आदेश को जानकर समुद्र के जलप्रवाह की भाँति अपार एवं भयंकर दिखायी देने वाली वह विशाल वानरसेना भयभीत-सी होकर नगरों के समीपवर्ती स्थानों और जनपदों को दूर से ही छोड़ती चली जा रही थी। विकट गर्जना करने के कारण भयानक शब्दवाले समुद्र की भाँति वह महाघोर जान पड़ती थी॥ ३८-३९ १/२॥

तस्य दाशरथेः पार्वे शूरास्ते कपिकुञ्जराः॥४०॥

तूर्णमापुप्लुवुः सर्वे सदश्वा इव चोदिताः।

वे सभी शूरवीर कपिकुञ्जर हाँके गये अच्छे घोड़ों की भाँति उछलते-कूदते हुए तुरंत ही दशरथनन्दन श्रीराम के पास पहुँच जाते थे॥ ४० १/२॥

कपिभ्यामुह्यमानौ तौ शुशुभाते नरर्षभौ॥४१॥

महद्भयामिव संस्पृष्टौ ग्रहाभ्यां चन्द्रभास्करौ।

हनुमान् और अंगद-इन दो वानर वीरों द्वारा ढोये जाते हुए वे नरश्रेष्ठ श्रीराम और लक्ष्मण शुक्र और बृहस्पति—इन दो महाग्रहों से संयुक्त हुए चन्द्रमा और सूर्य के समान शोभा पा रहे थे॥ ४१ १/२॥

ततो वानरराजेन लक्ष्मणेन सुपूजितः॥४२॥

जगाम रामो धर्मात्मा ससैन्यो दक्षिणां दिशम्।

उस समय वानरराज सुग्रीव और लक्ष्मण से सम्मानित हुए धर्मात्मा श्रीराम सेनासहित दक्षिण दिशा की ओर बढ़े जा रहे थे॥ ४२ १/२॥

तमङ्गदगतो राम लक्ष्मणः शुभया गिरा॥४३॥

उवाच परिपूर्णार्थं पूर्णार्थप्रतिभानवान्।

लक्ष्मणजी अंगद के कंधे पर बैठे हुए थे। वे शकुनों के द्वारा कार्यसिद्धि की बात अच्छी तरह जान लेते थे। उन्होंने पूर्णकाम भगवान् श्रीराम से मङ्गलमयी वाणी में कहा- ॥ ४३ १/२॥

हृतामवाप्य वैदेहीं क्षिप्रं हत्वा च रावणम्॥४४॥

समृद्धार्थः समृद्धार्थामयोध्यां प्रतियास्यसि।

महान्ति च निमित्तानि दिवि भूमौ च राघव॥४५॥

शुभानि तव पश्यामि सर्वाण्येवार्थसिद्धये।

‘रघुनन्दन! मुझे पृथ्वी और आकाश में बहुत अच्छे-अच्छे शकुन दिखायी देते हैं। ये सब आपके मनोरथ की सिद्धि को सूचित करते हैं। इनसे निश्चय होता है कि आप शीघ्र ही रावण को मारकर हरी हुई सीताजी को प्राप्त करेंगे और सफल मनोरथ होकर समृद्धिशालिनी अयोध्या को पधारेंगे॥ ४४-४५ १/२॥

अनुवाति शिवो वायुः सेनां मृदुहितः सुखः॥४६॥

पूर्णवल्गुस्वराश्चेमे प्रवदन्ति मृगद्विजाः।

प्रसन्नाश्च दिशः सर्वा विमलश्च दिवाकरः॥४७॥

उशना च प्रसन्नार्चिरनु त्वां भार्गवो गतः।

ब्रह्मराशिर्विशुद्धश्च शुद्धाश्च परमर्षयः।

अर्चिष्मन्तः प्रकाशन्ते ध्रुवं सर्वे प्रदक्षिणम्॥४८॥

‘देखिये सेना के पीछे शीतल, मन्द, हितकर और सुखमय समीर चल रहा है। ये पशु और पक्षी पूर्ण मधुर स्वर में अपनी-अपनी बोली बोल रहे हैं। सब दिशाएँ प्रसन्न हैं। सूर्यदेव निर्मल दिखायी दे रहे हैं। भृगुनन्दन शुक्र भी अपनी उज्ज्वल प्रभा से प्रकाशित हो आपके पीछे की दिशा में प्रकाशित हो रहे हैं। जहाँ सप्तर्षियों का समुदाय शोभा पाता है, वह ध्रुवतारा भी निर्मल दिखायी देता है। शुद्ध और प्रकाशमान समस्त सप्तर्षिगण ध्रुव को अपने दाहिने रखकर उनकी परिक्रमा करते हैं॥ ४६–४८॥

त्रिशङ्कर्विमलो भाति राजर्षिः सपुरोहितः।

पितामहः पुरोऽस्माकमिक्ष्वाकूणां महात्मनाम्॥४९॥

‘हमारे साथ ही महामना इक्ष्वाकुवंशियों के पितामह राजर्षि त्रिशंकु अपने पुरोहित वसिष्ठजी के साथ हमलोगों के सामने ही निर्मल कान्ति से प्रकाशित हो रहे हैं॥ ४९॥

विमले च प्रकाशेते विशाखे निरुपद्रवे।

नक्षत्रं परमस्माकमिक्ष्वाकूणां महात्मनाम्॥५०॥

‘हम महामनस्वी इक्ष्वाकुवंशियों के लिये जो सबसे उत्तम है, वह विशाखा नामक युगल नक्षत्र निर्मल एवं उपद्रवशून्य (मंगल आदि दुष्ट ग्रहों की आक्रान्ति से रहित) होकर प्रकाशित हो रहा है॥ ५० ॥

नैर्ऋतं नैर्ऋतानां च नक्षत्रमतिपीड्यते।

मूलो मूलवता स्पृष्टो धूप्यते धूमकेतुना॥५१॥

‘राक्षसों का नक्षत्र मूल, जिसके देवता निर्ऋति हैं, अत्यन्त पीड़ित हो रहा है। उस मूल के नियामक धूमकेतु से आक्रान्त होकर वह संताप का भागी हो रहा है॥५१॥

सर्वं चैतद् विनाशाय राक्षसानामुपस्थितम्।

काले कालगृहीतानां नक्षत्रं ग्रहपीडितम्॥५२॥

‘यह सब कुछ राक्षसों के विनाश के लिये ही उपस्थित हुआ है; क्योंकि जो लोग कालपाश में बँधे होते हैं, उन्हीं का नक्षत्र समयानुसार ग्रहों से पीड़ित होता है।

प्रसन्नाः सुरसाश्चापो वनानि फलवन्ति च।

प्रवान्ति नाधिका गन्धा यथर्तुकुसुमा द्रुमाः॥५३॥

‘जल स्वच्छ और उत्तम रस से पूर्ण दिखायी देता है, जंगलों में पर्याप्त फल उपलब्ध होते हैं, सुगन्धित वायु अधिक तीव्रगति से नहीं बह रही है और वृक्षों में ऋतुओं के अनुसार फूल लगे हुए हैं॥ ५३॥

व्यूढानि कपिसैन्यानि प्रकाशन्तेऽधिकं प्रभो।

देवानामिव सैन्यानि संग्रामे तारकामये।

एवमार्य समीक्ष्यैतत् प्रीतो भवितुमर्हसि ॥५४॥

‘प्रभो! व्यूहबद्ध वानरी सेना बड़ी शोभासम्पन्न जान पड़ती है। तारकामय संग्राम के अवसर पर देवताओं की सेनाएँ जिस तरह उत्साह से सम्पन्न थीं, इसी प्रकार आज ये वानर-सेनाएँ भी हैं। आर्य! ऐसे शुभ लक्षण देखकर आपको प्रसन्न होना चाहिये।५४॥

इति भ्रातरमाश्वास्य हृष्टः सौमित्रिरब्रवीत्।

अथावृत्य महीं कृत्स्नां जगाम हरिवाहिनी॥५५॥

अपने भाई श्रीराम को आश्वासन देते हुए हर्ष से भरे सुमित्राकुमार लक्ष्मण जब इस प्रकार कह रहे थे, उस समय वानरों की सेना वहाँ की सारी भूमि को घेरकर आगे बढ़ने लगी॥ ५५ ॥

ऋक्षवानरशार्दूलैर्नखद्रंष्ट्रायुधैरपि।

कराग्रैश्चरणाग्रैश्च वानरैरुद्धतं रजः॥५६॥

उस सेना में कुछ रीछ थे और कुछ सिंह के समान पराक्रमी वानर। नख और दाँत ही उनके शस्त्र थे। वे सभी वानर सैनिक हाथों और पैरों की अंगुलियों से बड़ी धूल उड़ा रहे थे॥५६॥

भीममन्तर्दधे लोकं निवार्य सवितुः प्रभाम्।

सपर्वतवनाकाशं दक्षिणां हरिवाहिनी॥५७॥

छादयन्ती ययौ भीमा द्यामिवाम्बुदसंततिः।

उनकी उड़ायी हुई उस भयंकर धूल ने सूर्य की प्रभा को ढककर सम्पूर्ण जगत् को छिपा-सा दिया। वह भयानक वानर सेना पर्वत, वन और आकाशसहित दक्षिण दिशा को आच्छादित-सी करती हुई उसी तरह आगे बढ़ रही थी, जैसे मेघों की घटा आकाश को ढककर अग्रसर होती है। ५७ १/२॥

उत्तरन्त्याश्च सेनायाः सततं बहुयोजनम्॥५८॥

नदीस्रोतांसि सर्वाणि सस्यन्दुर्विपरीतवत्।

वह वानरी सेना जब किसी नदी को पार करती थी, उस समय लगातार कई योजनों तक उसकी समस्त धाराएँ उलटी बहने लगती थीं॥ ५८ १/२ ॥

सरांसि विमलाम्भांसि द्रुमाकीर्णाश्च पर्वतान्॥५९॥

समान् भूमिप्रदेशांश्च वनानि फलवन्ति च।

मध्येन च समन्ताच्च तिर्यक् चाधश्च साविशत्॥६०॥

समावृत्य महीं कृत्स्नां जगाम महती चमूः।

वह विशाल सेना निर्मल जलवाले सरोवर, वृक्षों से ढके हुए पर्वत, भूमि के समतल प्रदेश और फलों से भरे हुए वन—इन सभी स्थानों के मध्य में, इधर-उधर तथा ऊपर-नीचे सब ओर की सारी भूमि को घेरकर चल रही थी॥ ५९-६० १/२॥

ते हृष्टवदनाः सर्वे जग्मुर्मारुतरंहसः॥६१॥

हरयो राघवस्यार्थे समारोपितविक्रमाः।

उस सेना के सभी वानर प्रसन्नमुख तथा वायु के समान वेगवाले थे। रघुनाथजी की कार्यसिद्धि के लिये उनका पराक्रम उबला पड़ता था॥ ६१ १/२॥

हर्षं वीर्यं बलोद्रेकान् दर्शयन्तः परस्परम्॥६२॥

यौवनोत्सेकजाद् दर्पाद् विविधांश्चक्रुरध्वनि।

वे जवानी के जोश और अभिमानजनित दर्प के कारण रास्ते में एक-दूसरे को उत्साह, पराक्रम तथा नाना प्रकार के बल-सम्बन्धी उत्कर्ष दिखा रहे थे। ६२ १/२॥

तत्र केचिद् द्रुतं जग्मुरुत्पेतुश्च तथापरे॥६३॥

केचित् किलकिलां चक्रुर्वानरा वनगोचराः।

प्रास्फोटयंश्च पुच्छानि संनिजघ्नुः पदान्यपि॥६४॥

उनमें से कोई तो बड़ी तेजी से भूतल पर चलते थे और दूसरे उछलकर आकाश में उड़ जाते थे। कितने ही वनवासी वानर किलकारियाँ भरते, पृथ्वी पर अपनी पूँछ फटकारते और पैर पटकते थे॥ ६३-६४॥

भुजान् विक्षिप्य शैलांश्च द्रुमानन्ये बभञ्जिरे।

आरोहन्तश्च शृङ्गाणि गिरीणां गिरिगोचराः॥६५॥

कितने ही अपनी बाँहें फैलाकर पर्वत-शिखरों और वृक्षों को तोड़ डालते थे तथा पर्वतों पर विचरने वाले बहुतेरे वानर पहाड़ों की चोटियों पर चढ़ जाते थे। ६५॥

महानादान् प्रमुञ्चन्ति क्ष्वेडामन्ये प्रचक्रिरे।

ऊरुवेगैश्च ममृदुर्लताजालान्यनेकशः॥६६॥

कोई बड़े जोर से गर्जते और कोई सिंहनाद करते थे। कितने ही अपनी जाँघों के वेग से अनेकानेक लता-समूहों को मसल डालते थे॥६६॥

जृम्भमाणाश्च विक्रान्ता विचिक्रीडुः शिलाद्रुमैः।

ततः शतसहस्रैश्च कोटिभिश्च सहस्रशः॥६७॥

वानराणां सुघोराणां श्रीमत्परिवृता मही।

वे सभी वानर बड़े पराक्रमी थे। अंगड़ाई लेते हुए पत्थर की चट्टानों और बड़े-बड़े वृक्षों से खेल करते थे। उन सहस्रों, लाखों और करोड़ों वानरों से घिरी हुई सारी पृथ्वी बड़ी शोभा पाती थी॥ ६७ १/२ ॥

सा स्म याति दिवारानं महती हरिवाहिनी॥६८॥

प्रहृष्टमुदिताः सर्वे सुग्रीवेणाभिपालिताः।

वानरास्त्वरिता यान्ति सर्वे युद्धाभिनन्दिनः।

प्रमोक्षयिषवः सीतां मुहूर्तं क्वापि नावसन्॥६९॥

इस प्रकार वह विशाल वानरसेना दिन-रात चलती रही। सुग्रीव से सुरक्षित सभी वानर हृष्ट-पुष्ट और प्रसन्न थे। सभी बड़ी उतावली के साथ चल रहे थे। सभी युद्ध का अभिनन्दन करने वाले थे और सभी सीताजी को रावण की कैद से छुड़ाना चाहते थे। इसलिये उन्होंने रास्ते में कहीं दो घड़ी भी विश्राम नहीं लिया॥

ततः पादपसम्बाधं नानावनसमायुतम्।

सह्यपर्वतमासाद्य वानरास्ते समारुहन्॥७०॥

चलते-चलते घने वृक्षों से व्याप्त और अनेकानेक काननों से संयुक्त सह्य पर्वत के पास पहुँचकर वे सब वानर उसके ऊपर चढ़ गये॥ ७० ॥

काननानि विचित्राणि नदीप्रस्रवणानि च।

पश्यन्नपि ययौ रामः सह्यस्य मलयस्य च॥७१॥

श्रीरामचन्द्रजी सह्य और मलय के विचित्र काननों, नदियों तथा झरनों की शोभा देखते हुए यात्रा कर रहे थे॥

चम्पकांस्तिलकांश्चूतानशोकान् सिन्दुवारकान्।

तिनिशान् करवीरांश्च भञ्जन्ति स्म प्लवंगमाः॥७२॥

वे वानर मार्ग में मिले हुए चम्पा, तिलक, आम, अशोक, सिन्दुवार, तिनिश और करवीर आदि वृक्षों को तोड़ देते थे। ७२॥

अङ्कोलांश्च करजांश्च प्लक्षन्यग्रोधपादपान्।

जम्बूकामलकान् नीपान् भञ्जन्ति स्म प्लवंगमाः॥७३॥

उछल-उछलकर चलने वाले वे वानरसैनिक रास्ते के अंकोल, करंज, पाकड़, बरगद, जामुन, आँवले और नीप आदि वृक्षों को भी तोड़ डालते थे॥७३॥

प्रस्तरेषु च रम्येषु विविधाः काननद्रुमाः।

वायुवेगप्रचलिताः पुष्पैरवकिरन्ति तान्॥७४॥

रमणीय पत्थरों पर उगे हुए नाना प्रकार के जंगली वृक्ष वायु के झोंके से झूम-झूमकर उन वानरों पर फूलों की वर्षा करते थे॥ ७४॥

मारुतः सुखसंस्पर्शो वाति चन्दनशीतलः।

षट्पदैरनुकूजद्भिर्वनेषु मधुगन्धिषु॥७५॥

मधु से सुगन्धित वनों में गुनगुनाते हुए भौंरों के साथ चन्दनके समान शीतल, मन्द, सुगन्ध वायु चल रही थी॥ ७५॥

अधिकं शैलराजस्तु धातुभिस्तु विभूषितः।

धातुभ्यः प्रसृतो रेणुर्वायुवेगेन घट्टितः॥७६॥

सुमहदानरानीकं छादयामास सर्वतः।

वह पर्वतराज गैरिक आदि धातुओं से विभूषित हो बड़ी शोभा पा रहा था। उन धातुओं से फैली हुई धूल वायु के वेग से उड़कर उस विशाल वानरसेना को सब ओरसे आच्छादित कर देती थी॥ ७६ १/२॥

गिरिप्रस्थेषु रम्येषु सर्वतः सम्प्रपुष्पिताः॥७७॥

केतक्यः सिन्दुवाराश्च वासन्त्यश्च मनोरमाः।

माधव्यो गन्धपूर्णाश्च कुन्दगुल्माश्च पुष्पिताः॥७८॥

रमणीय पर्वतशिखरोंपर सब ओर खिली हुई केतकी, सिन्दुवार और वासन्ती लताएँ बड़ी मनोरम जान पड़ती थीं। प्रफुल्ल माधवी लताएँ सुगन्ध से भरी थीं और कुन्दकी झाड़ियाँ भी फूलों से लदी हुई थीं। ७७-७८॥

चिरिबिल्वा मधूकाश्च वञ्जुला बकुलास्तथा।

रञ्जकास्तिलकाश्चैव नागवृक्षाश्च पुष्पिताः॥७९॥

चिरिबिल्व, मधूक (महुआ), वञ्जुल, बकुल, रंजक, तिलक और नागकेसर के वृक्ष भी वहाँ खिले हुए थे।

चूताः पाटलिकाश्चैव कोविदाराश्च पुष्पिताः।

मुचुलिन्दार्जुनाश्चैव शिंशपाः कुटजास्तथा॥८०॥

हिन्तालास्तिनिशाश्चैव चूर्णका नीपकास्तथा।

नीलाशोकाश्च सरला अङ्कोलाः पद्मकास्तथा॥८१॥

आम, पाडर और कोविदार भी फूलों से लदे थे। मुचुलिन्द, अर्जुन, शिंशपा, कुटज, हिंताल, तिनिश, चूर्णक, कदम्ब, नीलाशोक, सरल, अंकोल और पद्मक भी सुन्दर फूलों से सुशोभित थे॥ ८०-८१॥

प्रीयमाणैः प्लवंगैस्तु सर्वे पर्याकुलीकृताः।

वाप्यस्तस्मिन् गिरौ रम्याः पल्वलानि तथैव च॥८२॥

चक्रवाकानुचरिताः कारण्डवनिषेविताः।

प्लवैः क्रौञ्चैश्च संकीर्णा वराहमृगसेविताः॥८३॥

प्रसन्नता से भरे हुए वानरों ने उन सब वृक्षों को घेर लिया था। उस पर्वत पर बहुत-सी रमणीय बावड़ियाँ तथा छोटे-छोटे जलाशय थे, जहाँ चकवे विचरते और जलकुक्कुट निवास करते थे। जलकाक और क्रौञ्च भरे हुए थे तथा सूअर और हिरन उनमें पानी पीते थे॥

ऋक्षस्तरक्षुभिः सिंहैः शार्दूलैश्च भयावहैः।

व्यालैश्च बहुभिर्भीमैः सेव्यमानाः समन्ततः॥८४॥

रीछ, तरक्षु (लकड़बग्घे), सिंह, भयंकर बाघ तथा बहुसंख्यक दुष्ट हाथी, जो बड़े भीषण थे, सब ओर से आ-आकर उन जलाशयों का सेवन करते थे। ८४॥

पद्मः सौगन्धिकैः फुल्लैः कुमुदैश्चोत्पलैस्तथा।

वारिजैर्विविधैः पुष्पै रम्यास्तत्र जलाशयाः॥८५॥

खिले हुए सुगन्धित कमल, कुमुद, उत्पल तथा जल में होने वाले भाँति-भाँति के अन्य पुष्पों से वहाँ के जलाशय बड़े रमणीय दिखायी देते थे॥ ८५ ॥

तस्य सानुषु कूजन्ति नानाद्विजगणास्तथा।

स्नात्वा पीत्वोदकान्यत्र जले क्रीडन्ति वानराः॥८६॥

उस पर्वत के शिखरों पर नाना प्रकार के पक्षी कलरव करते थे। वानर उन जलाशयों में नहाते, पानी पीते और जल में क्रीड़ा करते थे॥८६॥

अन्योन्यं प्लावयन्ति स्म शैलमारुह्य वानराः।

फलान्यमृतगन्धीनि मूलानि कुसुमानि च॥८७॥

बभञ्जुर्वानरास्तत्र पादपानां मदोत्कटाः।

द्रोणमात्रप्रमाणानि लम्बमानानि वानराः॥८८॥

ययुः पिबन्तः स्वस्थास्ते मधूनि मधुपिङ्गलाः।

वे आपस में एक-दूसरे पर पानी भी उछालते थे। कुछ वानर पर्वत पर चढ़कर वहाँ के वृक्षों के अमृततुल्य मीठे फलों, मूलों और फूलों को तोड़ते थे। मधु के समान वर्णवाले कितने ही मदमत्त वानर वृक्षों में लटके और एक-एक द्रोण शहद से भरे हुए मधु के छत्तों को तोड़कर उनका मधु पी लेते और स्वस्थ (संतुष्ट) होकर चलते थे॥ ८७-८८ १/२॥

पादपानवभञ्जन्तो विकर्षन्तस्तथा लताः॥८९॥

विधमन्तो गिरिवरान् प्रययुः प्लवगर्षभाः।

पेड़ों को तोड़ते, लताओं को खींचते और बड़े-बड़े पर्वतों को प्रतिध्वनित करते हुए वे श्रेष्ठ वानर तीव्र गति से आगे बढ़ रहे थे। ८९ १/२॥

वृक्षेभ्योऽन्ये तु कपयो नदन्तो मधु दर्पिताः॥९०॥

अन्ये वृक्षान् प्रपद्यन्ते प्रपिबन्त्यपि चापरे।

दूसरे वानर दर्प में भरकर वृक्षों से मधु के छत्ते उतार लेते और जोर-जोर से गर्जना करते थे। कुछ वानर वृक्षों पर चढ़ जाते और कुछ मधु पीने लगते थे॥९०१/२॥

बभूव वसुधा तैस्तु सम्पूर्णा हरिपुङ्गवैः।

यथा कमलकेदारैः पक्वैरिव वसुंधरा॥९१॥

उन वानरशिरोमणियों से भरी हुई वहाँ की भूमि पके हुए बालवाले कलमी धानों की क्यारियों से ढकी हुई धरती के समान सुशोभित हो रही थी॥९१॥

महेन्द्रमथ सम्प्राप्य रामो राजीवलोचनः।

आरुरोह महाबाहुः शिखरं द्रुमभूषितम्॥९२॥

कमलनयन महाबाहु श्रीरामचन्द्रजी महेन्द्र पर्वत के पास पहुँचकर भाँति-भाँति के वृक्षों से सुशोभित उसके शिखर पर चढ़ गये॥ ९२॥

ततः शिखरमारुह्य रामो दशरथात्मजः।

कूर्ममीनसमाकीर्णमपश्यत् सलिलाशयम्॥९३॥

महेन्द्र पर्वत के शिखर पर आरूढ़ हो दशरथनन्दन भगवान् श्रीराम ने कछुओं और मत्स्यों से भरे हुए समुद्र को देखा॥९३॥

ते सह्यं समतिक्रम्य मलयं च महागिरिम्।

आसेदुरानुपूर्येण समुद्रं भीमनिःस्वनम्॥९४॥

इस प्रकार वे सह्य तथा मलय को लाँघकर क्रमशः महेन्द्र पर्वत के समीपवर्ती समुद्र के तट पर जा पहुँचे, जहाँ बड़ा भयंकर शब्द हो रहा था॥९४ ।।

अवरुह्य जगामाशु वेलावनमनुत्तमम्।

रामो रमयतां श्रेष्ठः ससुग्रीवः सलक्ष्मणः॥ ९५॥

उस पर्वत से उतरकर भक्तों के मन को रमाने वालों में श्रेष्ठ भगवान् श्रीराम सुग्रीव और लक्ष्मण के साथ शीघ्र ही सागर-तटवर्ती परम उत्तम वन में जा पहुँचे।९५ ॥

अथ धौतोपलतलां तोयौघैः सहसोत्थितैः।

वेलामासाद्य विपुलां रामो वचनमब्रवीत्॥९६॥

जहाँ सहसा उठी हुई जल की तरङ्गों से प्रस्तर की शिलाएँ धुल गयी थीं, उस विस्तृत सिन्धुतट पर पहुँचकर श्रीराम ने कहा- ॥९६॥

एते वयमनुप्राप्ताः सुग्रीव वरुणालयम्।

इहेदानीं विचिन्ता सा या नः पूर्वमुपस्थिता॥९७॥

‘सुग्रीव! लो, हम सब लोग समुद्र के किनारे तो आ गये। अब यहाँ मन में फिर वही चिन्ता उत्पन्न हो गयी, जो हमारे सामने पहले उपस्थित थी॥९७॥

अतः परमतीरोऽयं सागरः सरितां पतिः।

न चायमनुपायेन शक्यस्तरितुमर्णवः॥९८॥

‘इससे आगे तो यह सरिताओं का स्वामी महासागर ही विद्यमान है, जिसका कहीं पार नहीं दिखायी देता। अब बिना किसी समुचित उपाय के सागर को पार करना असम्भव है॥९८॥

तदिहैव निवेशोऽस्तु मन्त्रः प्रस्तूयतामिह।

यथेदं वानरबलं परं पारमवाप्नुयात्॥९९॥

‘इसलिये यहीं सेना का पड़ाव पड़ जाय और हमलोग यहाँ बैठकर यह विचार आरम्भ करें कि किस प्रकार यह वानर-सेना समुद्र के उस पार तक पहुँच सकती है’। ९९॥

इतीव स महाबाहुः सीताहरणकर्शितः।

रामः सागरमासाद्य वासमाज्ञापयत् तदा ॥१०॥

इस प्रकार सीताहरण के शोक से दुर्बल हुए महाबाहु श्रीराम ने समुद्र के किनारे पहुँचकर उस समय सारी सेना को वहाँ ठहरने की आज्ञा दी॥ १०० ॥

सर्वाः सेना निवेश्यन्तां वेलायां हरिपुङ्गव।

सम्प्राप्तो मन्त्रकालो नः सागरस्येह लङ्घने॥१०१॥

वे बोले—’कपिश्रेष्ठ! समस्त सेनाओं को समुद्र के तट पर ठहराया जाय। अब यहाँ हमारे लिये समुद्रलङ्घन के उपाय पर विचार करने का अवसर प्राप्त हुआ है। १०१॥

स्वां स्वां सेनां समुत्सृज्य मा च कश्चित् कुतो व्रजेत्।

गच्छन्तु वानराः शूरा ज्ञेयं छन्नं भयं च नः॥ १०२॥

‘इस समय कोई भी सेनापति किसी भी कारण से अपनी-अपनी सेना को छोड़कर कहीं अन्यत्र न जाय। समस्त शूरवीर वानर-सेना की रक्षा के लिये यथास्थान चले जायँ। सबको यह जान लेना चाहिये कि हमलोगों पर राक्षसों की माया से गुप्त भय आ सकता है’॥ १०२॥

रामस्य वचनं श्रुत्वा सुग्रीवः सहलक्ष्मणः।

सेनां निवेशयत् तीरे सागरस्य द्रुमायुते॥१०३॥

श्रीरामचन्द्रजी का यह वचन सुनकर लक्ष्मणसहित सुग्रीव ने वृक्षावलियों से सुशोभित सागर-तट पर सेना को ठहरा दिया॥ १०३॥

विरराज समीपस्थं सागरस्य च तद् बलम्।

मधुपाण्डुजलः श्रीमान् द्वितीय इव सागरः॥१०४॥

समुद्र के पास ठहरी हुई वह विशाल वानर-सेना मधु के समान पिङ्गलवर्ण के जल से भरे हुए दूसरे सागर की-सी शोभा धारण करती थी॥ १०४॥

वेलावनमुपागम्य ततस्ते हरिपुङ्गवाः।

निविष्टाश्च परं पारं काङ्क्षमाणा महोदधेः॥१०५॥

सागर-तटवर्ती वन में पहुँचकर वे सभी श्रेष्ठ वानर समुद्र के उस पार जाने की अभिलाषा मन में लिये वहीं ठहर गये॥ १०५॥

तेषां निविशमानानां सैन्यसंनाहनिःस्वनः।

अन्तर्धाय महानादमर्णवस्य प्रशुश्रुवे॥१०६॥

वहाँ डेरा डालते हुए उन श्रीराम आदि की सेनाओं के संचरण से जो महान् कोलाहल हुआ, वह महासागर की गम्भीर गर्जना को भी दबाकर सुनायी देने लगा॥ १०६॥

सा वानराणां ध्वजिनी सुग्रीवेणाभिपालिता।

त्रिधा निविष्टा महती रामस्यार्थपराभवत्॥१०७॥

सुग्रीव द्वारा सुरक्षित वह वानरों की विशाल सेना श्रीरामचन्द्रजी के कार्य-साधन में तत्पर हो रीछ, लंगूर और वानरों के भेद से तीन भागों में विभक्त होकर ठहर गयी॥

सा महार्णवमासाद्य हृष्टा वानरवाहिनी।

वायुवेगसमाधूतं पश्यमाना महार्णवम्॥१०८॥

महासागर के तटपर पहुँचकर वह वानर-सेना वायुके वेगसे कम्पित हुए समुद्र की शोभा देखती हुई बड़े हर्षका अनुभव करती थी॥ १०८ ॥

दूरपारमसम्बाधं रक्षोगणनिषेवितम्।

पश्यन्तो वरुणावासं निषेदुर्हरियूथपाः॥१०९॥

जिसका दूसरा तट बहुत दूर था और बीच में कोई आश्रय नहीं था तथा जिसमें राक्षसों के समुदाय निवास करते थे, उस वरुणालय समुद्र को देखते हुए वे वानर-यूथपति उसके तट पर बैठे रहे ॥ १०९ ॥

चण्डनक्रग्राहघोरं क्षपादौ दिवसक्षये।

हसन्तमिव फेनौधैर्नृत्यन्तमिव चोर्मिभिः॥११०॥

चन्द्रोदये समुद्भूतं प्रतिचन्द्रसमाकुलम्।

चण्डानिलमहाग्राहैः कीर्णं तिमितिमिंगिलैः॥१११॥

क्रोध में भरे हुए नाकों के कारण समुद्र बड़ा भयंकर दिखायी देता था। दिन के अन्त और रात के आरम्भ में प्रदोष के समय चन्द्रोदय होने पर उसमें ज्वार आ गया था। उस समय वह फेन-समूहों के कारण हँसता और उत्ताल तरङ्गों के कारण नाचता-सा प्रतीत होता था। चन्द्रमा के प्रतिविम्बों से भरा-सा जान पड़ता था। प्रचण्ड वायु के समान वेगशाली बड़े-बड़े ग्राहों से और तिमि नामक महामत्स्यों को भी निगल जाने वाले महाभयंकर जल-जन्तुओं से व्याप्त दिखायी देता था। ११०-१११॥

दीप्तभोगैरिवाकीर्णं भुजङ्गैर्वरुणालयम्।

अवगाढं महासत्त्वै नाशैलसमाकुलम्॥११२॥

वह वरुणालय प्रदीप्त फणोंवाले सों, विशालकाय जलचरों और नाना पर्वतों से व्याप्त जान पड़ता था॥ ११२॥

सुदुर्गं दुर्गमार्गं तमगाधमसुरालयम्।

मकरैर्नागभोगैश्च विगाढा वातलोलिताः।

उत्पेतुश्च निपेतुश्च प्रहृष्टा जलराशयः॥११३॥

राक्षसों का निवासभूत वह अगाध महासागर अत्यन्त दुर्गम था। उसे पार करने का कोई मार्ग या साधन दुर्लभ था। उसमें वायु की प्रेरणा से उठी हुई चञ्चल तरङ्, जो मगरों और विशालकाय साँसे व्याप्त थीं, बड़े उल्लास से ऊपर को उठती और नीचे को उतर आती थीं॥ ११३॥

अग्निचूर्णमिवाविद्धं भास्वराम्बुमहोरगम्।

सुरारिनिलयं घोरं पातालविषयं सदा॥११४॥

सागरं चाम्बरप्रख्यमम्बरं सागरोपमम्।

सागरं चाम्बरं चेति निर्विशेषमदृश्यत॥११५॥

समुद्र के जल-कण बड़े चमकीले दिखायी देते थे। उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था मानो सागर में आग की चिनगारियाँ बिखेर दी गयी हों। (फैले हुए नक्षत्रों के कारण आकाश भी वैसा ही दिखायी देता था।) समुद्र में बड़े-बड़े सर्प थे (आकाश में भी राहु आदि सर्पाकार ही देखे जाते थे)। समुद्र देवद्रोही दैत्यों और राक्षसों का आवास-स्थान था (आकाश भी वैसा ही था; क्योंकि वहाँ भी उनका संचरण देखा जाता था)। दोनों ही देखने में भयंकर और पाताल के समान गम्भीर थे। इस प्रकार समुद्र आकाश के समान और आकाश समुद्र के समान जान पड़ता था। समुद्र और आकाश में कोई अन्तर नहीं दिखायी देता था। ११४-११५ ॥

सम्पृक्तं नभसाप्यम्भः सम्पृक्तं च नभोऽम्भसा।

तादृग्रूपे स्म दृश्यते तारारत्नसमाकुले॥११६॥

जल आकाश से मिला हुआ था और आकाश जल से, आकाश में तारे छिटके हुए थे और समुद्र में मोती। इसलिये दोनों एक-से दिखायी देते थे॥ ११६॥

समुत्पतितमेघस्य वीचिमालाकुलस्य च।

विशेषो न द्वयोरासीत् सागरस्याम्बरस्य च॥११७॥

आकाश में मेघों की घटा घिर आयी थी और समुद्र तरङ्गमालाओं से व्याप्त हो रहा था। अतः समुद्र और आकाश दोनों में कोई अन्तर नहीं रह गया था। ११७॥

अन्योन्यैरहताः सक्ताः सस्वनुर्भीमनिःस्वनाः।

ऊर्मयः सिन्धुराजस्य महाभेर्य इवाम्बरे॥११८॥

परस्पर टकराकर और सटकर सिन्धुराज की लहरें आकाश में बजने वाली देवताओं की बड़ी-बड़ी भेरियों के समान भयानक शब्द करती थीं॥ ११८ ॥

रत्नौघजलसंनादं विषक्तमिव वायुना।

उत्पतन्तमिव क्रुद्धं यादोगणसमाकुलम्॥११९॥

वायु से प्रेरित हो रत्नों को उछालने वाली जल की तरङ्गों के कलकल नाद से युक्त और जल-जन्तुओं से भरा हुआ समुद्र इस प्रकार ऊपर को उछल रहा था, मानो रोष से भरा हुआ हो॥ ११९ ॥

ददृशुस्ते महात्मानो वाताहतजलाशयम्।

अनिलोधूतमाकाशे प्रवलान्तमिवोर्मिभिः॥१२०॥

उन महामनस्वी वानरवीरों ने देखा, समुद्र वायु के थपेड़े खाकर पवन की प्रेरणा से आकाश में ऊँचे उठकर उत्ताल तरङ्गों के द्वारा नृत्य-सा कर रहा था। १२० ॥

ततो विस्मयमापन्ना हरयो ददृशुः स्थिताः।

भ्रान्तोर्मिजालसंनादं प्रलोलमिव सागरम्॥१२१॥

तदनन्तर वहाँ खड़े हुए वानरों ने यह भी देखा कि चक्कर काटते हुए तरङ्ग-समूहों के कल-कल नाद से युक्त महासागर अत्यन्त चञ्चल-सा हो गया है। यह देखकर उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ॥ १२१॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे चतुर्थः सर्गः॥४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में चौथा सर्ग पूरा हुआ॥४॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
युद्धकाण्डम्

श्रीराम का सीता के लिये शोक और विलाप

पञ्चमः सर्गः

सर्ग-05

सा तु नीलेन विधिवत्स्वारक्षा सुसमाहिता।

सागरस्योत्तरे तीरे साधु सा विनिवेशिता॥१॥

नील ने, जिसकी विधिवत् रक्षा की व्यवस्था की गयी थी, उस परम सावधान वानर-सेना को समुद्र के उत्तर तट पर अच्छे ढंग से ठहराया॥१॥

मैन्दश्च द्विविदश्चोभौ तत्र वानरपुङ्गवौ।

विचेरतुश्च तां सेनां रक्षार्थं सर्वतोदिशम्॥२॥

मैन्द और द्विविद—ये दो प्रमुख वानरवीर उस सेना की रक्षा के लिये सब ओर विचरते रहते थे॥२॥

निविष्टायां तु सेनायां तीरे नदनदीपतेः।

पार्श्वस्थं लक्ष्मणं दृष्ट्वा रामो वचनमब्रवीत्॥३॥

समुद्र के किनारे सेना का पड़ाव पड़ जाने पर श्रीरामचन्द्रजी ने अपने पास बैठे हुए लक्ष्मण की ओर देखकर कहा- ॥३॥

शोकश्च किल कालेन गच्छता ह्यपगच्छति।

मम चापश्यतः कान्तामहन्यहनि वर्धते॥४॥

‘सुमित्रानन्दन! कहा जाता है कि शोक बीतते हुए समय के साथ स्वयं भी दूर हो जाता है; परंतु मेरा शोक तो अपनी प्राणवल्लभा को न देखने के कारण दिनों दिन बढ़ रहा है॥४॥

न मे दुःखं प्रिया दूरे न मे दुःखं हृतेति च।

एतदेवानुशोचामि वयोऽस्या ह्यतिवर्तते॥५॥

‘मुझे इस बात का दुःख नहीं है कि मेरी प्रिया मुझसे दूर है। उसका अपहरण हुआ—इसका भी दुःख नहीं है। मैं तो बारंबार इसीलिये शोक में डूबा रहता हूँ कि उसके जीवित रहने के लिये जो अवधि नियत कर दी गयी है, वह शीघ्रतापूर्वक बीती जा रही है॥५॥

वाहि वात यतः कान्ता तां स्पृष्ट्वा मामपि स्पृश।

त्वयि मे गात्रसंस्पर्शश्चन्द्रे दृष्टिसमागमः॥६॥

‘हवा! तुम वहाँ बह, जहाँ मेरी प्राणवल्लभा है। उसका स्पर्श करके मेरा भी स्पर्श कर। उस दशा में तुझसे जो मेरे अङ्गों का स्पर्श होगा, वह चन्द्रमा से होने वाले दृष्टिसंयोग की भाँति मेरे सारे संताप को दूर करने वाला और आह्लादजनक होगा॥६॥

तन्मे दहति गात्राणि विषं पीतमिवाशये।

हा नाथेति प्रिया सा मां ह्रियमाणा यदब्रवीत्॥७॥

‘अपहरण होते समय मेरी प्यारी सीता ने जो मुझे ‘हा नाथ!’ कहकर पुकारा था, वह पीये हुए उदरस्थित विष की भाँति मेरे सारे अङ्गों को दग्ध किये देता है।

तद्वियोगेन्धनवता तच्चिन्ताविमलार्चिषा।

रात्रिंदिवं शरीरं मे दह्यते मदनाग्निना॥८॥

‘प्रियतमा का वियोग ही जिसका ईंधन है, उसकी चिन्ता ही जिसकी दीप्तिमती लपटें हैं, वह प्रेमाग्नि मेरे शरीर को रात-दिन जलाती रहती है॥ ८॥

अवगाह्यार्णवं स्वप्स्ये सौमित्रे भवता विना।

एवं च प्रज्वलन् कामो न मा सुप्तं जले दहेत्॥९॥

‘सुमित्रानन्दन! तुम यहीं रहो। मैं तुम्हारे बिना अकेला ही समुद्र के भीतर घुसकर सोऊँगा। इस तरह जल में शयन करने पर यह प्रज्वलित प्रेमाग्नि मुझे दग्ध नहीं कर सकेगी॥९॥

बह्येतत् कामयानस्य शक्यमेतेन जीवितुम्।

यदहं सा च वामोरुरेकां धरणिमाश्रितौ॥१०॥

‘मैं और वह वामोरु सीता एक ही भूतल पर सोते हैं। प्रियतमा के संयोग की इच्छा रखने वाले मुझ विरही के लिये इतना ही बहुत है। इतने से भी मैं जीवित रह सकता हूँ॥ १०॥

केदारस्येवाकेदारः सोदकस्य निरूदकः।

उपस्नेहेन जीवामि जीवन्तीं यच्छ्रणोमि ताम्॥११॥

‘जैसे जल से भरी हुई क्यारी के सम्पर्क से बिना जल की क्यारी का धान भी जीवित रहता है—सूखता नहीं है, उसी प्रकार मैं जो यह सुनता हूँ कि सीता अभी जीवित है, इसी से जी रहा हूँ॥ ११॥

कदा नु खलु सुश्रोणीं शतपत्रायतेक्षणाम्।

विजित्य शत्रून् द्रक्ष्यामि सीतां स्फीतामिव श्रियम्॥१२॥

‘कब वह समय आयेगा, जब शत्रुओं को परास्त करके मैं समृद्धिशालिनी राजलक्ष्मी के समान कमलनयनी सुमध्यमा सीता को देखूगा॥ १२॥

कदा सुचारुदन्तोष्ठं तस्याः पद्ममिवाननम्।

ईषदुन्नाम्य पास्यामि रसायनमिवातुरः॥१३॥

‘जैसे रोगी रसायन का पान करता है, उसी प्रकार मैं कब सुन्दर दाँतों और बिम्बसदृश मनोहर ओठों से युक्त सीता के प्रफुल्लकमल-जैसे मुख को कुछ ऊपर उठाकर चूसूंगा॥

तौ तस्याः सहितौ पीनौ स्तनौ तालफलोपमौ।

कदा न खलु सोत्कम्पौ श्लिष्यन्त्या मां भजिष्यतः॥१४॥

‘मेरा आलिङ्गन करती हुई प्रिया सीता के वे परस्पर सटे हुए, तालफल के समान गोल और मोटे दोनों स्तन कब किंचित् कम्पन के साथ मेरा स्पर्श करेंगे। १४॥

सा नूनमसितापाङ्गी रक्षोमध्यगता सती।

मन्नाथा नाथहीनेव त्रातारं नाधिगच्छति॥१५॥

‘कजरारे नेत्रप्रान्तवाली वह सती-साध्वी सीता, जिसका मैं ही नाथ हूँ, आज अनाथ की भाँति राक्षसों के बीच में पड़कर निश्चय ही कोई रक्षक नहीं पा रही होगी॥

कथं जनकराजस्य दुहिता मम च प्रिया।

राक्षसीमध्यगा शेते स्नुषा दशरथस्य च॥१६॥

‘राजा जनक की पुत्री, महाराज दशरथ की पुत्रवधू और मेरी प्रियतमा सीता राक्षसियों के बीच में कैसे सोती होगी॥ १६॥

अविक्षोभ्याणि रक्षांसि सा विधूयोत्पतिष्यति।

विधूय जलदान् नीलान् शशिलेखा शरत्स्विव॥१७॥

‘वह समय कब आयेगा, जब कि सीता मेरे द्वारा उन दुर्धर्ष राक्षसों का विनाश करके उसी प्रकार अपना उद्धार करेगी, जैसे शरत्काल में चन्द्रलेखा काले बादलों का निवारण करके उनके आवरण से मुक्त हो जाती है॥ १७॥

स्वभावतनुका नूनं शोकेनानशनेन च।

भूयस्तनुतरा सीता देशकालविपर्ययात्॥१८॥

‘स्वभाव से ही दुबले-पतले शरीर वाली सीता विपरीत देशकाल में पड़ जाने के कारण निश्चय ही शोक और उपवास करके और भी दुर्बल हो गयी होगी॥ १८॥

कदा नु राक्षसेन्द्रस्य निधायोरसि सायकान्।

शोकं प्रत्याहरिष्यामि शोकमुत्सृज्य मानसम्॥१९॥

‘मैं राक्षसराज रावण की छाती में अपने सायकों को धंसाकर अपने मानसिक शोक का निराकरण करके कब सीता का शोक दूर करूँगा॥१९॥

कदा नु खलु मे साध्वी सीतामरसुतोपमा।

सोत्कण्ठा कण्ठमालम्ब्य मोक्ष्यत्यानन्दजं जलम्॥२०॥

‘देवकन्या के समान सुन्दरी मेरी सती-साध्वी सीता कब उत्कण्ठापूर्वक मेरे गले से लगकर अपने नेत्रों से आनन्द के आँसू बहायेगी॥ २० ॥

कदा शोकमिमं घोरं मैथिलीविप्रयोगजम्।

सहसा विप्रमोक्ष्यामि वासः शुक्लेतरं यथा॥२१॥

“ऐसा समय कब आयेगा, जब मैं मिथिलेशकुमारी के वियोग से होने वाले इस भयंकर शोक को मलिन वस्त्र की भाँति सहसा त्याग दूंगा?’॥ २१॥

एवं विलपतस्तस्य तत्र रामस्य धीमतः।

दिनक्षयान्मन्दवपुर्भास्करोऽस्तमुपागमत्॥ २२॥

बुद्धिमान् श्रीरामचन्द्रजी वहाँ इस प्रकार विलाप कर ही रहे थे कि दिन का अन्त होने के कारण मन्दकिरणों वाले सूर्यदेव अस्ताचल को जा पहुँचे॥ २२ ॥

आश्वासितो लक्ष्मणेन रामः संध्यामुपासत।

स्मरन् कमलपत्राक्षीं सीतां शोकाकुलीकृतः॥२३॥

उस समय लक्ष्मण के धैर्य बँधाने पर शोक से व्याकुल हुए श्रीराम ने कमलनयनी सीता का चिन्तन करते हुए संध्योपासना की॥ २३॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे पञ्चमः सर्गः॥५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में पाँचवाँ सर्ग पूरा हुआ॥५॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
युद्धकाण्डम्

रावण का कर्तव्य-निर्णय के लिये अपने मन्त्रियों से समुचित सलाह देने का अनुरोध करना

षष्ठः सर्गः

सर्ग-06

लङ्कायां तु कृतं कर्म घोरं दृष्ट्वा भयावहम्।

राक्षसेन्द्रो हनुमता शक्रेणेव महात्मना।

अब्रवीद् राक्षसान् सर्वान् ह्रिया किंचिदवाङ्मुखः॥१॥

इधर इन्द्रतुल्य पराक्रमी महात्मा हनुमान जी ने लङ्का में जो अत्यन्त भयावह घोर कर्म किया था, उसे देखकर राक्षसराज रावण का मुख लज्जा से कुछ नीचे को झुक गया और उसने समस्त राक्षसों से इस प्रकार कहा- ॥१॥

धर्षिता च प्रविष्टा च लङ्का दुष्प्रसहा पुरी।

तेन वानरमात्रेण दृष्टा सीता च जानकी॥२॥

‘निशाचरो! वह हनुमान्, जो एक वानरमात्र है, अकेला इस दुर्धर्ष पुरी में घुस आया। उसने इसे तहस-नहस कर डाला और जनककुमारी सीता से भेंट भी कर लिया॥२॥

प्रासादो धर्षितश्चैत्यः प्रवरा राक्षसा हताः।

आविला च पुरी लङ्का सर्वा हनुमता कृता॥३॥

‘इतना ही नहीं, हनुमान् ने चैत्यप्रासाद को धराशायी कर दिया, मुख्य-मुख्य राक्षसों को मार गिराया और सारी लङ्कापुरी में खलबली मचा दी॥३॥

किं करिष्यामि भद्रं वः किं वो युक्तमनन्तरम्।

उच्यतां नः समर्थं यत् कृतं च सुकृतं भवेत्॥४॥

‘तुम लोगों का भला हो। अब मैं क्या करूँ? तुम्हें जो कार्य उचित और समर्थ जान पड़े तथा जिसे करने पर कोई अच्छा परिणाम निकले, उसे बताओ॥४॥

मन्त्रमूलं च विजयं प्रवदन्ति मनस्विनः।

तस्माद् वै रोचये मन्त्रं रामं प्रति महाबलाः॥५॥

‘महाबली वीरो! मनस्वी पुरुषों का कहना है कि विजय का मूल कारण मन्त्रियों की दी हुई अच्छी सलाह ही है। इसलिये मैं श्रीराम के विषय में आपलोगों से सलाह लेना अच्छा समझता हूँ॥५॥

त्रिविधाः पुरुषा लोके उत्तमाधममध्यमाः।

तेषां तु समवेतानां गुणदोषौ वदाम्यहम्॥६॥

‘संसार में उत्तम, मध्यम और अधम तीन प्रकार के पुरुष होते हैं। मैं उन सबके गुण-दोषों का वर्णन करता हूँ॥६॥

मन्त्रस्त्रिभिर्हि संयुक्तः समर्थैर्मन्त्रनिर्णये।

मित्रैर्वापि समानार्थैर्बान्धवैरपि वाधिकैः॥७॥

सहितो मन्त्रयित्वा यः कर्मारम्भान् प्रवर्तयेत्।

दैवे च कुरुते यत्नं तमाहुः पुरुषोत्तमम्॥८॥

‘जिसका मन्त्र आगे बताये जाने वाले तीन लक्षणों से युक्त होता है तथा जो पुरुष मन्त्रनिर्णय में समर्थ मित्रों, समान दुःख-सुखवाले बान्धुवों और उनसे भी बढ़कर अपने हितकारियों के साथ सलाह करके कार्य का आरम्भ करता है तथा दैव के सहारे प्रयत्न करता है, उसे उत्तम पुरुष कहते हैं॥ ७-८॥

एकोऽर्थं विमृशेदेको धर्मे प्रकुरुते मनः।

एकः कार्याणि कुरुते तमाहुर्मध्यमं नरम्॥९॥

‘जो अकेला ही अपने कर्तव्य का विचार करता है, अकेला ही धर्म में मन लगाता है और अकेला ही सब काम करता है, उसे मध्यम श्रेणी का पुरुष कहा जाता है।

गुणदोषौ न निश्चित्य त्यक्त्वा दैवव्यपाश्रयम्।

करिष्यामीति यः कार्यमुपेक्षेत् स नराधमः॥१०॥

‘जो गुण-दोषका विचार न करके दैवका भी आश्रय छोड़कर केवल ‘करूँगा’ इसी बुद्धिसे कार्य आरम्भ करता है और फिर उसकी उपेक्षा कर देता है, वह पुरुषोंमें अधम है॥ १० ॥

यथेमे पुरुषा नित्यमुत्तमाधममध्यमाः।

एवं मन्त्रोऽपि विज्ञेय उत्तमाधममध्यमः॥११॥

‘जैसे ये पुरुष सदा उत्तम, मध्यम और अधम तीन प्रकार के होते हैं, वैसे ही मन्त्र (निश्चित किया हुआ विचार) भी उत्तम, मध्यम और अधम-भेद से तीन प्रकार का समझना चाहिये॥ ११॥

ऐकमत्यमुपागम्य शास्त्रदृष्टेन चक्षुषा।

मन्त्रिणो यत्र निरतास्तमाहुर्मन्त्रमुत्तमम्॥१२॥

‘जिसमें शास्त्रोक्त दृष्टि से सब मन्त्री एकमत होकर प्रवृत्त होते हैं, उसे उत्तम मन्त्र कहते हैं॥ १२ ॥

बह्वीरपि मतीर्गत्वा मन्त्रिणामर्थनिर्णयः।

पुनर्यत्रैकतां प्राप्तः स मन्त्रो मध्यमः स्मृतः॥१३॥

‘जहाँ प्रारम्भ में कई प्रकार का मतभेद होने पर भी अन्त में सब मन्त्रियों का कर्तव्यविषयक निर्णय एक हो जाता है, वह मन्त्र मध्यम माना गया है॥ १३॥

अन्योन्यमतिमास्थाय यत्र सम्प्रतिभाष्यते।

न चैकमत्ये श्रेयोऽस्ति मन्त्रः सोऽधम उच्यते॥१४॥

‘जहाँ भिन्न-भिन्न बुद्धिका आश्रय ले सब ओर से स्पर्धापूर्वक भाषण किया जाय और एकमत होने पर भी जिससे कल्याण की सम्भावना न हो, वह मन्त्र या निश्चय अधम कहलाता है॥१४॥

तस्मात् सुमन्त्रितं साधु भवन्तो मतिसत्तमाः।

कार्य सम्प्रतिपद्यन्तमेतत् कृत्यं मतं मम॥१५॥

‘आप सब लोग परम बुद्धिमान् हैं; इसलिये अच्छी तरह सलाह करके कोई एक कार्य निश्चित करें। उसी को मैं अपना कर्तव्य समशृंगा॥ १५॥

वानराणां हि धीराणां सहस्रैः परिवारितः।

रामोऽभ्येति पुरीं लङ्कामस्माकमुपरोधकः॥१६॥

‘(ऐसे निश्चय की आवश्यकता इसलिये पड़ी है कि) राम सहस्रों धीरवीर वानरों के साथ हमारी लङ्कापुरी पर चढ़ाई करने के लिये आ रहे हैं॥१६॥

तरिष्यति च सुव्यक्तं राघवः सागरं सुखम्।

तरसा युक्तरूपेण सानुजः सबलानुगः॥१७॥

‘यह बात भी भलीभाँति स्पष्ट हो चुकी है कि वे रघुवंशी राम अपने समुचित बल के द्वारा भाई, सेना और सेवकोंसहित सुखपूर्वक समुद्र को पार कर लेंगे। १७॥

समुद्रमुच्छोषयति वीर्येणान्यत्करोति वा।

तस्मिन्नेवंविधे कार्ये विरुद्धे वानरैः सह।

हितं पुरे च सैन्ये च सर्वं सम्मन्त्र्यतां मम॥१८॥

‘वे या तो समुद्र को ही सुखा डालेंगे या अपने पराक्रम से कोई दूसरा ही उपाय करेंगे। ऐसी स्थिति में वानरों से विरोध आ पड़ने पर नगर और सेना के लिये जो भी हितकर हो, वैसी सलाह आपलोग दीजिये।१८॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे षष्ठः सर्गः॥६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मत आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में छठा सर्ग पूरा हुआ॥६॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
युद्धकाण्डम्

राक्षसों का रावण और इन्द्रजित् के बल-पराक्रम का वर्णन करते हुए उसे राम पर विजय पाने का विश्वास दिलाना

सप्तमः सर्गः

सर्ग-07

इत्युक्ता राक्षसेन्द्रेण राक्षसास्ते महाबलाः।

ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे रावणं राक्षसेश्वरम्॥१॥

द्विषत्पक्षमविज्ञाय नीतिबाह्यास्त्वबुद्धयः।

राक्षसों को न तो नीति का ज्ञान था और न वे शत्रुपक्ष के बलाबल को ही समझते थे। वे बलवान् तो बहुत थे; किंतु नीति की दृष्टि से महामूर्ख थे। इसलिये जब राक्षसराज रावण ने उनसे पूर्वोक्त बातें कहीं, तब वे सब-के-सब हाथ जोड़कर उससे बोले- ॥ १ १/२॥

राजन् परिघशक्त्यृष्टिशूलपट्टिशकुन्तलम्॥२॥

सुमहन्नो बलं कस्माद् विषादं भजते भवान्।

‘राजन्! हमारे पास परिघ, शक्ति, ऋष्टि, शूल, पट्टिश और भालों से लैस बहुत बड़ी सेना मौजूद है; फिर आप विषाद क्यों करते हैं॥२ १/२॥

त्वया भोगवतीं गत्वा निर्जिताः पन्नगा युधि॥

कैलासशिखरावासी यक्षैर्बहुभिरावृतः।

सुमहत्कदनं कृत्वा वश्यस्ते धनदः कृतः॥४॥

‘आपने तो भोगवतीपुरी में जाकर नागों को भी युद्ध में परास्त कर दिया था। बहुसंख्यक यक्षों से घिरे हुए कैलासशिखर के निवासी कुबेर को भी युद्ध में भारी मार-काट मचाकर वश में कर लिया था। ३-४॥

स महेश्वरसख्येन श्लाघमानस्त्वया विभो।

निर्जितः समरे रोषाल्लोकपालो महाबलः॥५॥

‘प्रभो! महाबली लोकपाल कुबेर महादेवजी के साथ मित्रता होने के कारण आपके साथ बड़ी स्पर्धा रखते थे; परंतु आपने समराङ्गण में रोषपूर्वक उन्हें हरा दिया॥५॥

विनिपात्य च यक्षौघान् विक्षोभ्य विनिगृह्य च।

त्वया कैलासशिखराद् विमानमिदमाहृतम्॥६॥

‘यक्षों की सेना को विचलित करके बंदी बना लिया और कितनों को धराशायी करके कैलासशिखर से आप उनका यह विमान छीन लाये थे॥६॥

मयेन दानवेन्द्रेण त्वद्भयात् सख्यमिच्छता।

दुहिता तव भार्यार्थे दत्ता राक्षसपुङ्गव॥७॥

‘राक्षसशिरोमणे! दानवराज मय ने आपसे भयभीत होकर ही आपको अपना मित्र बना लेने की इच्छा की और इसी उद्देश्य से आपको धर्मपत्नी के रूप में अपनी पुत्री समर्पित कर दी॥७॥

दानवेन्द्रो महाबाहो वीर्योत्सिक्तो दुरासदः।

विगृह्य वशमानीतः कुम्भीनस्याः सुखावहः॥८॥

‘महाबाहो! अपने पराक्रम का घमंड रखने वाले दुर्जय दानवराज मधु को भी, जो आपकी बहिन कुम्भीनसी को सुख देने वाला उसका पति है, आपने युद्ध छेड़कर वश में कर लिया॥८॥

निर्जितास्ते महाबाहो नागा गत्वा रसातलम्।

वासुकिस्तक्षकः शङ्को जटी च वशमाहृताः॥९॥

‘विशालबाहु वीर! आपने रसातल पर चढ़ाई करके वासुकि, तक्षक, शङ्ख और जटी आदि नागों को युद्ध में जीता और अपने अधीन कर लिया॥९॥

अक्षया बलवन्तश्च शूरा लब्धवराः पुनः।

त्वया संवत्सरं युद्ध्वा समरे दानवा विभो॥१०॥

स्वबलं समुपाश्रित्य नीता वशमरिंदम।

मायाश्चाधिगतास्तत्र बढ्यो वै राक्षसाधिप॥११॥

‘प्रभो! शत्रुदमन राक्षसराज! दानवलोग बड़े ही बलवान्, किसी से नष्ट न होने वाले, शूरवीर तथा वर पाकर अद्भुत शक्ति से सम्पन्न हो गये थे; परंतु आपने समराङ्गण में एक वर्षतक युद्ध करके अपने ही बल के भरोसे उन सबको अपने अधीन कर लिया और वहाँ उनसे बहुत-सी मायाएँ भी प्राप्त कीं॥ १०-११॥

शूराश्च बलवन्तश्च वरुणस्य सुता रणे।

निर्जितास्ते महाभाग चतुर्विधबलानुगाः॥१२॥

‘महाभाग! आपने वरुण के शूरवीर और बलवान् पुत्रों को भी उनकी चतुरंगिणी सेनासहित युद्ध में परास्त कर दिया था॥ १२॥

मृत्युदण्डमहाग्राहं शाल्मलीद्रुममण्डितम्।

कालपाशमहावीचिं यमकिंकरपन्नगम्॥१३॥

महाज्वरेण दुर्धर्षं यमलोकमहार्णवम्।

अवगाह्य त्वया राजन् यमस्य बलसागरम्॥१४॥

जयश्च विपुलः प्राप्तो मृत्युश्च प्रतिषेधितः।

सुयुद्धेन च ते सर्वे लोकस्तत्र सुतोषिताः॥१५॥

‘राजन्! मृत्यु का दण्ड ही जिसमें महान् ग्राह के समान है, जो यम-यातना-सम्बन्धी शाल्मलि आदि वृक्षों से मण्डित है, कालपाशरूपी उत्ताल तरङ्गे जिसकी शोभा बढ़ाती हैं, यमदूतरूपी सर्प जिसमें निवास करते हैं तथा जो महान् ज्वर के कारण दुर्जय है, उस यमलोकरूपी महासागर में प्रवेश करके आपनेयमराज की सागर-जैसी सेना को मथ डाला, मृत्यु को रोक दिया और महान् विजय प्राप्त की। यही नहीं, युद्ध की उत्तम कला से आपने वहाँ के सब लोगों को पूर्ण संतुष्ट कर दिया था॥ १३–१५॥

क्षत्रियैर्बहुभिवीरैः शक्रतुल्यपराक्रमैः।

आसीद् वसुमती पूर्णा महद्भिरिव पादपैः॥१६॥

‘पहले यह पृथ्वी विशाल वृक्षों की भाँति इन्द्रतुल्य पराक्रमी बहुसंख्यक क्षत्रिय वीरों से भरी हुई थी।१६॥

तेषां वीर्यगुणोत्साहैर्न समो राघवो रणे।

प्रसह्य ते त्वया राजन् हताः समरदुर्जयाः॥१७॥

‘उन वीरों में जो पराक्रम, गुण और उत्साह थे, उनकी दृष्टि से राम रणभूमि में उनके समान कदापि नहीं है; राजन्! जब आपने उन समरदुर्जय वीरों को भी बलपूर्वक मार डाला, तब रामपर विजय पाना आपके लिये कौन बड़ी बात है ? ॥ १७॥

तिष्ठ वा किं महाराज श्रमेण तव वानरान्।

अयमेको महाबाहुरिन्द्रजित् क्षपयिष्यति॥१८॥

‘अथवा महाराज! आप चुपचाप यहीं बैठे रहें। आपको परिश्रम करने की क्या आवश्यकता है। अकेले ये महाबाहु इन्द्रजित् ही सब वानरों का संहार कर डालेंगे॥ १८॥

अनेन च महाराज माहेश्वरमनुत्तमम्।

इष्ट्वा यज्ञं वरो लब्धो लोके परमदुर्लभः॥१९॥

‘महाराज! इन्होंने परम उत्तम माहेश्वर यज्ञ का अनुष्ठान करके वह वर प्राप्त किया है, जो संसार में दूसरे के लिये अत्यन्त दुर्लभ है॥ १९॥

शक्तितोमरमीनं च विनिकीर्णान्त्रशैवलम्।

गजकच्छपसम्बाधमश्वमण्डूकसंकुलम्॥२०॥

रुद्रादित्यमहाग्राहं मरुद्धसुमहोरगम्।

रथाश्वगजतोयौघं पदातिपुलिनं महत्॥ २१॥

अनेन हि समासाद्य देवानां बलसागरम्।

गृहीतो दैवतपतिर्लङ्कां चापि प्रवेशितः॥२२॥

‘देवताओं की सेना समुद्र के समान थी। शक्ति और तोमर ही उसमें मत्स्य थे। निकालकर फेंकी हुई आँतें सेवार का काम देती थीं। हाथी ही उस सैन्य-सागर में कछुओं के समान भरे थे। घोड़े मेढकों के समान उसमें सब ओर व्याप्त थे। रुद्रगण और आदित्यगण उस सेनारूपी समुद्र के बड़े-बड़े ग्राह थे। मरुद्गण और वसुगण वहाँ के विशाल नाग थे। रथ, हाथी और घोड़े जलराशि के समान थे और पैदल सैनिक उसके विशाल तट थे; परंतु इस इन्द्रजित् ने देवताओं के उस सैन्य-समुद्र में घुसकर देवराज इन्द्र को कैद कर लिया और उन्हें लङ्कापुरी में लाकर बंद कर दिया॥ २०– २२॥

पितामहनियोगाच्च मुक्तः शम्बरवृत्रहा।

गतस्त्रिविष्टपं राजन् सर्वदेवनमस्कृतः॥२३॥

‘राजन्! फिर ब्रह्माजी के कहने से इन्होंने शम्बर और वृत्रासुर को मारने वाले सर्वदेववन्दित इन्द्र को मुक्त किया। तब वे स्वर्गलोक में गये॥ २३॥

तमेव त्वं महाराज विसृजेन्द्रजितं सुतम्।

यावद् वानरसेनां तां सरामां नयति क्षयम्॥२४॥

‘अतः महाराज! इस काम के लिये आप राजकुमार इन्द्रजित् को ही भेजिये, जिससे ये रामसहित वानरसेना का यहाँ आने से पहले ही संहार कर डालें। २४॥

राजन्नापदयुक्तेयमागता प्राकृताज्जनात्।

हृदि नैव त्वया कार्या त्वं वधिष्यसि राघवम्॥२५॥

‘राजन् ! साधारण नर और वानरों से प्राप्त हुई इस आपत्ति के विषय में चिन्ता करना आपके लिये उचित नहीं है। आपको तो अपने हृदय में इसे स्थान ही नहीं देना चाहिये। आप अवश्य ही राम का वध कर डालेंगे’।

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे सप्तमः सर्गः॥७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में सातवाँ सर्ग पूरा हुआ॥७॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
युद्धकाण्डम्

प्रहस्त, दुर्मुख, वज्रदंष्ट, निकुम्भ और वज्रहनु का रावण के सामने शत्रु-सेना को मार गिराने का उत्साह दिखाना

अष्टमः सर्गः

सर्ग-08

ततो नीलाम्बुदप्रख्यः प्रहस्तो नाम राक्षसः।

अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यं शूरः सेनापतिस्तदा॥१॥

इसके बाद नील मेघ के समान श्यामवर्णवाले शूर सेनापति प्रहस्त नामक राक्षस ने हाथ जोड़कर कहा – ॥

देवदानवगन्धर्वाः पिशाचपतगोरगाः।

सर्वे धर्षयितुं शक्याः किं पुनर्मानवौ रणे॥२॥

‘महाराज! हमलोग देवता, दानव, गन्धर्व, पिशाच, पक्षी और सर्प सभी को पराजित कर सकते हैं; फिर उन दो मनुष्यों को रणभूमि में हराना कौन बड़ी बात है॥२॥

सर्वे प्रमत्ता विश्वस्ता वञ्चिताः स्म हनूमता।

नहि मे जीवतो गच्छेज्जीवन् स वनगोचरः॥३॥

‘पहले हमलोग असावधान थे। हमारे मन में शत्रुओं की ओर से कोई खटका नहीं था। इसीलिये हम निश्चिन्त बैठे थे। यही कारण है कि हनुमान् हमें धोखा दे गया। नहीं तो मेरे जीते-जी वह वानर यहाँ से जीता-जागता नहीं जा सकता था॥३॥

सर्वां सागरपर्यन्तां सशैलवनकाननाम्।

करोम्यवानरां भूमिमाज्ञापयतु मां भवान्॥४॥

‘यदि आपकी आज्ञा हो तो पर्वत, वन और काननोंसहित समुद्रतक की सारी भूमि को मैं वानरों से सूनी कर दूँ॥ ४॥

रक्षां चैव विधास्यामि वानराद् रजनीचर।

नागमिष्यति ते दुःखं किंचिदात्मापराधजम्॥५॥

‘राक्षसराज! मैं वानरमात्र से आपकी रक्षा करूँगा, अतः अपने द्वारा किये गये सीताहरणरूपी अपराध के कारण कोई दुःख आप पर नहीं आने पायेगा’॥५॥

अब्रवीत् तु सुसंक्रुद्धो दुर्मुखो नाम राक्षसः।

इदं न क्षमणीयं हि सर्वेषां नः प्रधर्षणम्॥६॥

तत्पश्चात् दुर्मुख नामक राक्षस ने अत्यन्त कुपित होकर कहा—’यह क्षमा करने योग्य अपराध नहीं है, क्योंकि इसके द्वारा हम सब लोगों का तिरस्कार हुआ है॥६॥

अयं परिभवो भूयः पुरस्यान्तःपुरस्य च।

श्रीमतो राक्षसेन्द्रस्य वानरेण प्रधर्षणम्॥७॥

‘वानर के द्वारा हमलोगों पर जो आक्रमण हुआ है, यह समस्त लङ्कापुरी का, महाराज के अन्तःपुर का और श्रीमान् राक्षसराज रावण का भी भारी पराभव है॥७॥

अस्मिन् मुहूर्ते गत्वैको निवर्तिष्यामि वानरान्।

प्रविष्टान् सागरं भीममम्बरं वा रसातलम्॥८॥

‘मैं अभी इसी मुहूर्त में अकेला ही जाकर सारे वानरों को मार भगाऊँगा। भले ही वे भयंकर समुद्र में, आकाश में अथवा रसातल में ही क्यों न घुस गये हों॥

ततोऽब्रवीत् सुसंक्रुद्धो वज्रदंष्ट्रो महाबलः।

प्रगृह्य परिघं घोरं मांसशोणितरूषितम्॥९॥

इतने ही में महाबली वज्रदंष्ट्र अत्यन्त क्रोध से भरकर रक्त, मांस से सने हुए भयानक परिघ को हाथ में लिये हुए बोला- ॥९॥

किं नो हनूमता कार्यं कृपणेन तपस्विना।

रामे तिष्ठति दुर्धर्षे सुग्रीवेऽपि सलक्ष्मणे॥१०॥

‘दुर्जय वीर राम, सुग्रीव और लक्ष्मण के रहते हुए हमें उस बेचारे तपस्वी हनुमान् से क्या काम है? ॥१०॥

अद्य रामं ससुग्रीवं परिघेण सलक्ष्मणम्।

आगमिष्यामि हत्वैको विक्षोभ्य हरिवाहिनीम्॥११॥

‘आज मैं अकेला ही वानर-सेना में तहल का मचा दूंगा और इस परिघ से सुग्रीव तथा लक्ष्मणसहित राम का भी काम तमाम करके लौट आऊँगा॥११॥

इदं ममापरं वाक्यं शृणु राजन् यदिच्छसि।

उपायकुशलो ह्येव जयेच्छनतन्द्रितः॥१२॥

‘राजन् ! यदि आपकी इच्छा हो तो आप यह मेरी दूसरी बात सुनें। उपायकुशल पुरुष ही यदि आलस्य छोड़कर प्रयत्न करे तो वह शत्रुओं पर विजय पा सकता है॥ १२॥

कामरूपधराः शूराः सुभीमा भीमदर्शनाः।

राक्षसा वा सहस्राणि राक्षसाधिप निश्चिताः॥१३॥

काकुत्स्थमुपसंगम्य बिभ्रतो मानुषं वपुः।

सर्वे ह्यसम्भ्रमा भूत्वा ब्रुवन्तु रघुसत्तमम्॥१४॥

प्रेषिता भरतेनैव भ्रात्रा तव यवीयसा।

स हि सेनां समुत्थाप्य क्षिप्रमेवोपयास्यति॥१५॥

‘अतः राक्षसराज! मेरी दूसरी राय यह है कि इच्छानुसार रूप धारण करने वाले, अत्यन्त भयानक तथा भयंकर दृष्टिवाले सहस्रों शूरवीर राक्षस एक निश्चित विचार करके मनुष्य का रूप धारण कर श्रीराम के पास जायँ और सब लोग बिना किसी घबराहट के उन रघुवंशशिरोमणि से कहें कि हम आपके सैनिक हैं। हमें आपके छोटे भाई भरत ने भेजा है। इतना सुनते ही वे वानर-सेना को उठाकर तुरंत लङ्का पर आक्रमण करने के लिये वहाँ से चल देंगे॥ १३-१५॥

ततो वयमितस्तूर्णं शूलशक्तिगदाधराः।

चापबाणासिहस्ताश्च त्वरितास्तत्र यामहे॥१६॥

‘तत्पश्चात् हमलोग यहाँ से शूल, शक्ति, गदा, धनुष, बाण और खड्ग धारण किये शीघ्र ही मार्ग में उनके पास जा पहुँचें॥ १६॥

आकाशे गणशः स्थित्वा हत्वा तां हरिवाहिनीम्।

अश्मशस्त्रमहावृष्ट्या प्रापयाम यमक्षयम्॥१७॥

‘फिर आकाश में अनेक यूथ बनाकर खड़े हो जायँ और पत्थरों तथा शस्त्र-समूहों की बड़ी भारी वर्षा करके उस वानर-सेना को यमलोक पहुँचा दें॥ १७॥

एवं चेदुपसर्पतामनयं रामलक्ष्मणौ।

अवश्यमपनीतेन जहतामेव जीवितम्॥१८॥

‘यदि इस प्रकार हमारी बातें सुनकर वे दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण सेना को कूच करने की आज्ञा दे देंगे और वहाँ से चल देंगे तो उन्हें हमारी अनीति का शिकार होना पड़ेगा; उन्हें हमारे छलपूर्ण प्रहार से पीड़ित होकर अपने प्राणों का परित्याग करना पड़ेगा। १८॥

कौम्भकर्णिस्ततो वीरो निकुम्भो नाम वीर्यवान्।

अब्रवीत् परमक्रुद्धो रावणं लोकरावणम्॥१९॥

तदनन्तर पराक्रमी वीर कुम्भकर्णकुमार निकुम्भ ने अत्यन्त कुपित होकर समस्त लोकों को रुलाने वाले रावण से कहा- ॥ १९॥

सर्वे भवन्तस्तिष्ठन्तु महाराजेन संगताः।

अहमेको हनिष्यामि राघवं सहलक्ष्मणम्॥२०॥

सुग्रीवं सहनूमन्तं सर्वांश्चैवात्र वानरान्।

‘आप सब लोग यहाँ महाराज के साथ चुपचाप बैठे रहें। मैं अकेला ही राम, लक्ष्मण, सुग्रीव, हनुमान् तथा अन्य सब वानरों को भी यहाँ मौत के घाट उतार दूंगा’।। २० १/२॥

ततो वज्रहनुर्नाम राक्षसः पर्वतोपमः॥२१॥

क्रुद्धः परिलिहन् सृक्कां जिह्वया वाक्यमब्रवीत्।

तब पर्वत के समान विशालकाय वज्रहनु नामक राक्षस कुपित हो जीभ से अपने जबड़े को चाटता हुआ बोला— ॥ २१ १/२ ॥

स्वैरं कुर्वन्तु कार्याणि भवन्तो विगतज्वराः॥२२॥

एकोऽहं भक्षयिष्यामि तां सर्वां हरिवाहिनीम्।

‘आप सब लोग निश्चिन्त होकर इच्छानुसार अपना-अपना काम करें। मैं अकेला ही सारी वानरसेना को खा जाऊँगा॥ २२ १/२॥

स्वस्थाः क्रीडन्तु निश्चिन्ताः पिबन्तु मधु वारुणीम्॥२३॥

अहमेको वधिष्यामि सुग्रीवं सहलक्ष्मणम्।

साङ्गदं च हनूमन्तं सर्वांश्चैवात्र वानरान्॥२४॥

‘आपलोग स्वस्थ रहकर क्रीड़ा करें और निश्चिन्त हो वारुणी मदिरा को पियें। मैं अकेला ही सुग्रीव, लक्ष्मण, अंगद, हनुमान् और अन्य सब वानरों का भी यहाँ वध कर डालूँगा’ ॥ २३-२४ ।।

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डेऽष्टमः सर्गः॥८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में आठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥८॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
युद्धकाण्डम्

विभीषण का रावण से श्रीराम की अजेयता बताकर सीताको लौटा देने के लिये अनुरोध करना

नवमः सर्गः

सर्ग-09

ततो निकुम्भो रभसः सूर्यशत्रुर्महाबलः।

सुप्तघ्नो यज्ञकोपश्च महापार्श्वमहोदरौ॥१॥

अग्निकेतुश्च दुर्धर्षो रश्मिकेतुश्च राक्षसः।

इन्द्रजिच्च महातेजा बलवान् रावणात्मजः॥२॥

प्रहस्तोऽथ विरूपाक्षो वज्रदंष्ट्रो महाबलः।

धूम्राक्षश्चातिकायश्च दुर्मुखश्चैव राक्षसः॥३॥

परिघान् पट्टिशान् शूलान् प्रासान् शक्तिपरश्वधान्।

चापानि च सुबाणानि खड्गांश्च विपुलाम्बुभान्॥४॥

प्रगृह्य परमक्रुद्धाः समुत्पत्य च राक्षसाः।

अब्रुवन् रावणं सर्वे प्रदीप्ता इव तेजसा॥५॥

तत्पश्चात् निकुम्भ, रभस, महाबली सूर्यशत्र, सुप्तघ्न, यज्ञकोप, महापार्श्व, महोदर, दुर्जय अग्निकेतु, राक्षस रश्मिकेतु, महातेजस्वी बलवान् रावणकुमार इन्द्रजित् , प्रहस्त, विरूपाक्ष, महाबली वज्रदंष्ट्र, धूम्राक्ष, अतिकाय और निशाचर दुर्मुख—ये सब राक्षस अत्यन्त कुपित हो हाथों में परिघ, पट्टिश, शूल, प्रास, शक्ति, फरसे, धनुष, बाण तथा पैनी धारवाले बड़े-बड़े खड्ग लिये उछलकर रावण के सामने आये और अपने तेज से उद्दीप्त-से होकर वे सब-के-सब उससे बोले- ॥१-५॥

अद्य रामं वधिष्यामः सुग्रीवं च सलक्ष्मणम्।

कृपणं च हनूमन्तं लङ्का येन प्रधर्षिता॥६॥

‘हमलोग आज ही राम, सुग्रीव, लक्ष्मण और उस कायर हनुमान् को भी मार डालेंगे, जिसने लङ्कापुरी जलायी है’॥६॥

तान् गृहीतायुधान् सर्वान् वारयित्वा विभीषणः।

अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यं पुनः प्रत्युपवेश्य तान्॥७॥

हाथों में अस्त्र-शस्त्र लिये खड़े हुए उन सब राक्षसों को जाने के लिये उद्यत देख विभीषण ने रोका और पुनः उन्हें बिठाकर दोनों हाथ जोड़ रावण से कहा- ॥७॥

अप्युपायैस्त्रिभिस्तात योऽर्थः प्राप्तुं न शक्यते।

तस्य विक्रमकालांस्तान् युक्तानाहुर्मनीषिणः॥८॥

‘तात ! जो मनोरथ साम, दान और भेद—इन तीन उपायों से प्राप्त न हो सके, उसी की प्राप्ति के लिये नीतिशास्त्र के ज्ञाता मनीषी विद्वानों ने पराक्रम करने के योग्य अवसर बताये हैं।॥ ८॥

प्रमत्तेष्वभियुक्तेषु दैवेन प्रहतेषु च।

विक्रमास्तात सिद्ध्यन्ति परीक्ष्य विधिना कृताः॥

‘तात ! जो शत्रु असावधान हों, जिन पर दूसरे-दूसरे शत्रुओं ने आक्रमण किया हो तथा जो महारोग आदि से ग्रस्त होने के कारण दैव से मारे गये हों, उन्हीं पर भलीभाँति परीक्षा करके विधिपूर्वक किये गये पराक्रम सफल होते हैं॥९॥

अप्रमत्तं कथं तं तु विजिगीषु बले स्थितम्।

जितरोषं दुराधर्षं तं धर्षयितुमिच्छथ॥१०॥

‘श्रीरामचन्द्रजी बेखबर नहीं हैं। वे विजय की इच्छा से आ रहे हैं और उनके साथ सेना भी है। उन्होंने क्रोध को सर्वथा जीत लिया है। अतः वे सर्वथा दुर्जय हैं। ऐसे अजेय वीर को तुमलोग परास्त करना चाहते हो ॥ १०॥

समुद्रं लवयित्वा तु घोरं नदनदीपतिम्।

गतिं हनूमतो लोके को विद्यात् तर्कयेत वा॥

बलान्यपरिमेयानि वीर्याणि च निशाचराः।

परेषां सहसावज्ञा न कर्तव्या कथंचन॥१२॥

‘निशाचरो! नदों और नदियों के स्वामी भयंकर महासागर को जो एक ही छलाँग में लाँघकर यहाँ तक आ पहुँचे थे, उन हनुमान जी की गति को इस संसार में कौन जान सकता है अथवा कौन उसका अनुमान लगा सकता है? शत्रुओं के पास असंख्य सेनाएँ हैं, उनमें असीम बल और पराक्रम है; इस बात को तुमलोग अच्छी तरह जान लो। दूसरों की शक्ति को भुलाकर किसी तरह भी सहसा उनकी अवहेलना नहीं करनी चाहिये॥ ११-१२॥

किं च राक्षसराजस्य रामेणापकृतं पुरा।

आजहार जनस्थानाद् यस्य भार्यां यशस्विनः॥१३॥

‘श्रीरामचन्द्रजी ने पहले राक्षसराज रावण का कौन सा अपराध किया था, जिससे उन यशस्वी महात्मा की पत्नी को ये जनस्थान से हर लाये? ॥ १३ ॥

खरो यद्यतिवृत्तस्तु स रामेण हतो रणे।

अवश्यं प्राणिनां प्राणा रक्षितव्या यथाबलम्॥१४॥

‘यदि कहें कि उन्होंने खर को मारा था तो यह ठीक नहीं है; क्योंकि खर अत्याचारी था। उसने स्वयं ही उन्हें मार डालने के लिये उन पर आक्रमण किया था। इसलिये श्रीराम ने रणभूमि में उसका वध किया; क्योंकि प्रत्येक प्राणी को यथाशक्ति अपने प्राणों की रक्षा अवश्य करनी चाहिये॥ १४॥

एतन्निमित्तं वैदेही भयं नः सुमहद् भवेत्।

आहृता सा परित्याज्या कलहार्थे कृते नु किम्॥

‘यदि इसी कारण से सीता को हरकर लाया गया हो तो उन्हें जल्दी ही लौटा देना चाहिये; अन्यथा हमलोगों पर महान् भय आ सकता है। जिस कर्म का फल केवल कलह है, उसे करने से क्या लाभ?॥

१५॥

न तु क्षमं वीर्यवता तेन धर्मानुवर्तिना।

वैरं निरर्थकं कर्तुं दीयतामस्य मैथिली॥१६॥

‘श्रीराम बड़े धर्मात्मा और पराक्रमी हैं। उनके साथ व्यर्थ वैर करना उचित नहीं है। मिथिलेशकुमारी सीता को उनके पास लौटा देना चाहिये॥१६॥

यावन्न सगजां साश्वां बहुरत्नसमाकुलाम्।

पुरीं दारयते बाणैर्दीयतामस्य मैथिली॥१७॥

‘जबतक हाथी, घोड़े और अनेकों रत्नों से भरी हुई लङ्कापुरी का श्रीराम अपने बाणों द्वारा विध्वंस नहीं कर डालते, तब तक ही मैथिली को उन्हें लौटा दिया जाय॥ १७॥

यावत् सुघोरा महती दुर्धर्षा हरिवाहिनी।

नावस्कन्दति नो लङ्कां तावत् सीता प्रदीयताम्॥१८॥

‘जबतक अत्यन्त भयंकर, विशाल और दुर्जय वानर-वाहिनी हमारी लङ्का को पददलित नहीं कर देती, तभी तक सीता को वापस कर दिया जाय॥ १८॥

विनश्येद्धि पुरी लङ्का शूराः सर्वे च राक्षसाः।

रामस्य दयिता पत्नी न स्वयं यदि दीयते॥१९॥

‘यदि श्रीराम की प्राणवल्लभा सीता को हमलोग स्वयं ही नहीं लौटा देते हैं तो यह लङ्कापुरी नष्ट हो जायगी और समस्त शूरवीर राक्षस मार डाले जायेंगे। १९॥

प्रसादये त्वां बन्धुत्वात् कुरुष्व वचनं मम।

हितं तथ्यं त्वहं ब्रूमि दीयतामस्य मैथिली॥ २०॥

‘आप मेरे बड़े भाई हैं। अतः मैं आपको विनयपूर्वक प्रसन्न करना चाहता हूँ। आप मेरी बात मान लें। मैं आपके हित के लिये सच्ची बात कहता हूँ -आप श्रीरामचन्द्रजी को उनकी सीता वापस कर दें॥२०॥

पुरा शरत्सूर्यमरीचिसंनिभान् नवाग्रपुङ्खान् सुदृढान् नृपात्मजः।

सृजत्यमोघान् विशिखान् वधाय ते प्रदीयतां दाशरथाय मैथिली॥२१॥

‘राजकुमार श्रीराम जबतक आपके वध के लिये शरत्काल के सूर्य की किरणों के समान तेजस्वी, उज्ज्वल अग्रभाग एवं पंखों से सुशोभित, सुदृढ़ तथा अमोघ बाणों की वर्षा करें, उसके पहले ही आप उन दशरथनन्दन की सेवा में मिथिलेशकुमारी सीता को सौंप दें॥ २१॥

त्यजाशु कोपं सुखधर्मनाशनं भजस्व धर्मं रतिकीर्तिवर्धनम्।

प्रसीद जीवेम सपुत्रबान्धवाः प्रदीयतां दाशरथाय मैथिली॥२२॥

‘भैया! आप क्रोध को त्याग दें; क्योंकि वह सुख और धर्म का नाश करने वाला है। धर्म का सेवन कीजिये; क्योंकि वह सुख और सुयश को बढ़ाने वाला है। हम पर प्रसन्न होइये, जिससे हम पुत्र और बन्धु बान्धवों सहित जीवित रह सकें। इसी दृष्टि से मेरी प्रार्थना है कि आप दशरथनन्दन श्रीराम के हाथ में मिथिलेशकुमारी सीता को लौटा दें’॥ २२ ॥

विभीषणवचः श्रुत्वा रावणो राक्षसेश्वरः।

विसर्जयित्वा तान् सर्वान् प्रविवेश स्वकं गृहम्॥२३॥

विभीषण की यह बात सुनकर राक्षसराज रावण उन सब सभासदों को विदा करके अपने महल में चला गया॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे नवमः सर्गः॥९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में नवाँ सर्ग पूरा हुआ॥९॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
युद्धकाण्डम्

विभीषण का रावण के महल में जाना, उसे अपशकुनों का भय दिखाकर सीता को लौटा देने के लिये प्रार्थना करना

दशमः सर्गः

सर्ग-10

ततः प्रत्युषसि प्राप्ते प्राप्तधर्मार्थनिश्चयः।

राक्षसाधिपतेर्वेश्म भीमकर्मा विभीषणः॥१॥

शैलाग्रचयसंकाशं शैलशृङ्गमिवोन्नतम्।

सुविभक्तमहाकक्षं महाजनपरिग्रहम्॥२॥

मतिमद्भिर्महामात्रैरनुरक्तैरधिष्ठितम्।

राक्षसैराप्तपर्याप्तैः सर्वतः परिरक्षितम्॥३॥

मत्तमातङ्गनिःश्वासैर्व्याकुलीकृतमारुतम्।

शङ्खघोषमहाघोषं तूर्यसम्बाधनादितम्॥४॥

प्रमदाजनसम्बाधं प्रजल्पितमहापथम्।

तप्तकाञ्चननिर्वृहं भूषणोत्तमभूषितम्॥५॥

गन्धर्वाणामिवावासमालयं मरुतामिव।

रत्नसंचयसम्बाधं भवनं भोगिनामिव॥६॥

तं महाभ्रमिवादित्यस्तेजोविस्तृतरश्मिवान्।

अग्रजस्यालयं वीरः प्रविवेश महाद्युतिः॥७॥

दूसरे दिन सबेरा होते ही धर्म और अर्थ के तत्त्व को जानने वाले भीमकर्मा महातेजस्वी वीर विभीषण अपने बड़े भाई राक्षसराज रावण के घर गये। वह घर अनेक प्रासादों के कारण पर्वतशिखरों के समूह की भाँति शोभा पाता था। उसकी ऊँचाई भी पहाड़ की चोटी को लज्जित करती थी। उसमें अलग-अलग बड़ी-बड़ी कक्षाएँ (ड्योढ़ियाँ) सुन्दर ढंग से बनी हुई थीं। बहुतेरे श्रेष्ठ पुरुषों का वहाँ आना-जाना लगा रहता था। अनेकानेक बुद्धिमान् महामन्त्री, जो राजा के प्रति अनुराग रखने वाले थे, उसमें बैठे थे। विश्वसनीय, हितैषी तथा कार्यसाधन में कुशल बहुसंख्यक राक्षस सब ओर से उस भवन की रक्षा करते थे। वहाँ की वायु मतवाले हाथियों के निःश्वास से मिश्रित हो बवंडर-सी जान पड़ती थी। शङ्खध्वनि के समान राक्षसों का गम्भीर घोष वहाँ गूंजता रहता था। नाना प्रकार के वाद्यों के मनोरम शब्द उस भवन को निनादित करते थे। रूप और यौवन के मद से मतवाली युवतियों की वहाँ भीड-सी लगती रहती थी। वहाँ के बड़े-बड़े मार्ग लोगों के वार्तालाप से मुखरित जान पड़ते थे। उसके फाटक तपाये हुए सुवर्ण के बने हुए थे। उत्तम सजावट की वस्तुओं से वह महल अच्छी तरह सजा हुआ था, अतएव वह गन्धर्वो के आवास और देवताओं के निवासस्थान-सा मनोरम प्रतीत होता था। रत्नराशि से परिपूर्ण होने के कारण वह नागभवन के समान उद्भासित होता था। जैसे तेज से विस्तृत किरणों वाले सूर्य महान् मेघों की घटा में प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार तेजस्वी विभीषण ने रावण के उस भवन में पदार्पण किया॥१-७॥

पुण्यान् पुण्याहघोषांश्च वेदविद्भिरुदाहृतान्।

शुश्राव सुमहातेजा भ्रातुर्विजयसंश्रितान्॥८॥

वहाँ पहुँचकर उन महातेजस्वी विभीषण ने अपने भाई की विजय के उद्देश्य से वेदवेत्ता ब्राह्मणों द्वारा किये गये पुण्याहवाचन के पवित्र घोष सुने॥ ८॥

पूजितान् दधिपात्रैश्च सर्पिभिः सुमनोक्षतैः।

मन्त्रवेदविदो विप्रान् ददर्श स महाबलः॥९॥

तत्पश्चात् उन महाबली विभीषण ने वेदमन्त्रों के ज्ञाता ब्राह्मणों का दर्शन किया, जिनके हाथों में दही और घी के पात्र थे। फूलों और अक्षतों से उन सबकी पूजा की गयी थी॥९॥

स पूज्यमानो रक्षोभिर्दीप्यमानं स्वतेजसा।

आसनस्थं महाबाहुर्ववन्दे धनदानुजम्॥१०॥

वहाँ जाने पर राक्षसों ने उनका स्वागत-सत्कार किया। फिर उन महाबाहु विभीषण ने अपने तेज से देदीप्यमान और सिंहासन पर विराजमान कुबेर के छोटे भाई रावण को प्रणाम किया॥ १० ॥

स राजदृष्टिसम्पन्नमासनं हेमभूषितम्।

जगाम समुदाचारं प्रयुज्याचारकोविदः॥११॥

तदनन्तर शिष्टाचार के ज्ञाता विभीषण ‘विजयतां महाराजः’ (महाराज की जय हो) इत्यादि रूप से राजा के प्रति परम्पराप्राप्त शुभाशंसासूचक वचन का प्रयोग करके राजा के द्वारा दृष्टि के संकेत से बताये गये सुवर्णभूषित सिंहासन पर बैठ गये॥ ११॥

स रावणं महात्मानं विजने मन्त्रिसंनिधौ।

उवाच हितमत्यर्थं वचनं हेतुनिश्चितम्॥१२॥

प्रसाद्य भ्रातरं ज्येष्ठं सान्त्वेनोपस्थितक्रमः।

देशकालार्थसंवादि दृष्टलोकपरावरः॥१३॥

विभीषण जगत् की भली-बुरी बातों को अच्छी तरह जानते थे। उन्होंने प्रणाम आदि व्यवहार का यथार्थरूप से निर्वाह करके सान्त्वनापूर्ण वचनों द्वारा अपने बड़े भाई महामना रावण को प्रसन्न किया और उससे एकान्त में मन्त्रियों के निकट देश, काल और प्रयोजन के अनुरूप, युक्तियों द्वारा निश्चित तथा अत्यन्त हितकारक बात कही— ॥१२-१३॥

यदाप्रभृति वैदेही सम्प्राप्तेह परंतप।

तदाप्रभृति दृश्यन्ते निमित्तान्यशुभानि नः॥१४॥

‘शत्रुओं को संताप देने वाले महाराज! जबसे विदेहकुमारी सीता यहाँ आयी हैं, तभी से हमलोगों को अनेक प्रकार के अमङ्गलसूचक अपशकुन दिखायी दे रहे हैं॥१४॥

सस्फुलिङ्गः सधूमार्चिः सधूमकलुषोदयः।

मन्त्रसंधक्षितोऽप्यग्निर्न सम्यगभिवर्धते॥१५॥

‘मन्त्रों द्वारा विधिपूर्वक धधकाने पर भी आग अच्छी तरह प्रज्वलित नहीं हो रही है। उससे चिनगारियाँ निकलने लगती हैं। उसकी लपट के साथ धुआँ उठने लगता है और मन्थनकाल में जब अग्नि प्रकट होती है, उस समय भी वह धूएँसे मलिन ही रहती है। १५॥

अग्निष्टेष्वग्निशालासु तथा ब्रह्मस्थलीषु च।

सरीसृपाणि दृश्यन्ते हव्येषु च पिपीलिकाः॥

‘रसोई-घरों में, अग्निशालाओं में तथा वेदाध्ययन के स्थानों में भी साँप देखे जाते हैं और हवन-सामग्रियों में चीटियाँ पड़ी दिखायी देती हैं॥ १६ ॥

गवां पयांसि स्कन्नानि विमदा वरकुञ्जराः।

दीनमश्वाः प्रहेषन्ते नवग्रासाभिनन्दिनः॥१७॥

‘गायों का दूध सूख गया है, बड़े-बड़े गजराज मदरहित हो गये हैं, घोड़े नये ग्रास से आनन्दित (भोजन से संतुष्ट) होने पर भी दीनतापूर्ण स्वर में हिनहिनाते हैं ॥ १७॥

खरोष्ट्राश्वतरा राजन् भिन्नरोमाः स्रवन्ति च।

न स्वभावेऽवतिष्ठन्ते विधानैरपि चिन्तिताः॥१८॥

‘राजन् ! गधों, ऊँटों और खच्चरों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उनके नेत्रों से आँसू गिरने लगते हैं। विधिपूर्वक चिकित्सा की जाने पर भी वे पूर्णतः स्वस्थ हो नहीं पाते हैं॥ १८॥

वायसाः संघशः क्रूरा व्याहरन्ति समन्ततः।

समवेताश्च दृश्यन्ते विमानाग्रेषु संघशः॥१९॥

‘क्रूर कौए झुंड-के-झुंड एकत्र होकर कर्कश स्वर में काँव-काँव करने लगते हैं तथा वे सतमहले मकानोंपर समूह-के-समूह इकट्ठे हुए देखे जाते हैं। १९॥

गृध्राश्च परिलीयन्ते पुरीमुपरि पिण्डिताः।

उपपन्नाश्च संध्ये द्वे व्याहरन्त्यशिवं शिवाः॥२०॥

लङ्कापुरी के ऊपर झुंड-के-झुंड गीध उसका स्पर्श करते हुए-से मड़राते रहते हैं। दोनों संध्याओं के समय सियारिने नगर के समीप आकर अमङ्गलसूचक शब्द करती हैं॥ २० ॥

क्रव्यादानां मृगाणां च पुरीद्वारेषु संघशः।

श्रूयन्ते विपुला घोषाः सविस्फूर्जितनिःस्वनाः॥२१॥

‘नगर के सभी फाटकों पर समूह-के-समूह एकत्र हुए मांसभक्षी पशुओं के जोर-जोर से किये जानेवाले चीत्कार बिजली की गड़गड़ाहट के समान सुनायी पड़ते हैं ॥ २१॥

तदेवं प्रस्तुते कार्ये प्रायश्चित्तमिदं क्षमम्।

रोचये वीर वैदेही राघवाय प्रदीयताम्॥२२॥

‘वीरवर ! ऐसी परिस्थिति में मुझे तो यही प्रायश्चित्त अच्छा जान पड़ता है कि विदेहकुमारी सीता श्रीरामचन्द्रजी को लौटा दी जायँ।। २२ ॥

इदं च यदि वा मोहाल्लोभाद् वा व्याहृतं मया।

तत्रापि च महाराज न दोषं कर्तुमर्हसि ॥२३॥

‘महाराज! यदि यह बात मैंने मोह या लोभ से कही हो तो भी आपको मुझमें दोषदृष्टि नहीं करनी चाहिये॥

अयं हि दोषः सर्वस्य जनस्यास्योपलक्ष्यते।

रक्षसां राक्षसीनां च पुरस्यान्तःपुरस्य च ॥ २४॥

‘सीता का अपहरण तथा इससे होने वाला अपशकुनरूपी दोष यहाँ की सारी जनता, राक्षसराक्षसी तथा नगर और अन्तःपुर—सभी के लिये उपलक्षित होता है॥ २४॥

प्रापणे चास्य मन्त्रस्य निवृत्ताः सर्वमन्त्रिणः।

अवश्यं च मया वाच्यं यद् दृष्टमथवा श्रुतम्।

सम्प्रधार्य यथान्यायं तद् भवान् कर्तुमर्हति॥२५॥

‘यह बात आपके कानों तक पहुँचाने में प्रायः सभी मन्त्री संकोच करते हैं; परंतु जो बात मैंने देखी या सुनी है वह मुझे तो आपके आगे अवश्य निवेदन कर देनी चाहिये; अतः उसपर यथोचित विचार करके आप जैसा उचित समझें, वैसा करें’॥ २५ ॥

इति स्वमन्त्रिणां मध्ये भ्राता भ्रातरमूचिवान्।

रावणं रक्षसां श्रेष्ठं पथ्यमेतद विभीषणः॥२६॥

इस प्रकार भाई विभीषण ने अपने मन्त्रियों के बीच में बड़े भाई राक्षसराज रावण से ये हितकारी वचन कहे। । २६॥

हितं महार्थं मृदु हेतुसंहितं व्यतीतकालायतिसम्प्रतिक्षमम्।

निशम्य तद्वाक्यमुपस्थितज्वरः प्रसङ्गवानुत्तरमेतदब्रवीत्॥२७॥

भयं न पश्यामि कतश्चिदप्यहं न राघवः प्राप्स्यति जातु मैथिलीम्।

सुरैः सहेन्द्रैरपि संगरे कथं ममाग्रतः स्थास्यति लक्ष्मणाग्रजः॥२८॥

विभीषण की ये हितकर, महान् अर्थ की साधक, कोमल, युक्तिसंगत तथा भूत, भविष्य और वर्तमानकाल में भी कार्यसाधन में समर्थ बातें सुनकर रावण को बुखार चढ़ आया। श्रीराम के साथ वैर बढ़ाने में उसकी आसक्ति हो गयी थी। इसलिये उसने इस प्रकार उत्तर दिया—’विभीषण! मैं तो कहीं से भी कोई भय नहीं देखता। राम मिथिलेशकुमारी सीता को कभी नहीं पा सकते। इन्द्रसहित देवताओं की सहायता प्राप्त कर लेने पर भी लक्ष्मण के बड़े भाई राम मेरे सामने संग्राम में कैसे टिक सकेंगे?’॥

इत्येवमुक्त्वा सुरसैन्यनाशनो महाबलः संयति चण्डविक्रमः।

दशाननो भ्रातरमाप्तवादिनं विसर्जयामास तदा विभीषणम्॥२९॥

ऐसा कहकर देवसेना के नाशक और समराङ्गण में प्रचण्ड पराक्रम प्रकट करने वाले महाबली दशाननने अपने यथार्थवादी भाई विभीषण को तत्काल विदा कर दिया॥ २९॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे दशमः सर्गः॥१०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में दसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥१०॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
युद्धकाण्डम्

रावण और उसके सभासदों का सभाभवन में एकत्र होना

एकादशः सर्गः

सर्ग-11

स बभूव कृशो राजा मैथिलीकाममोहितः।

असन्मानाच्च सुहृदां पापः पापेन कर्मणा॥१॥

राक्षसों का राजा रावण मिथिलेशकुमारी सीता के प्रति काम से मोहित हो रहा था, उसके हितैषी सुहृद् विभीषण आदि उसका अनादर करने लगे थे—उसके कुकृत्यों की निन्दा करते थे तथा वह सीताहरणरूपी जघन्य पाप-कर्म के कारण पापी घोषित किया गया था—इन सब कारणों से वह अत्यन्त कृश (चिन्तायुक्त एवं दुर्बल) हो गया था॥१॥

अतीव कामसम्पन्नो वैदेहीमनुचिन्तयन्।

अतीतसमये काले तस्मिन् वै युधि रावणः।

अमात्यैश्च सुहृद्भिश्च प्राप्तकालममन्यत॥२॥

वह अत्यन्त काम से पीड़ित होकर बारंबार विदेहकुमारी का चिन्तन करता था, इसलिये युद्ध का अवसर बीत जाने पर भी उसने उस समय मन्त्रियों और सुहृदों के साथ सलाह करके युद्ध को ही समयोचित कर्तव्य माना॥२॥

स हेमजालविततं मणिविद्रमभूषितम्।

उपगम्य विनीताश्वमारुरोह महारथम्॥३॥

वह सोने की जाली से आच्छादित तथा मणि एवं मूंगों से विभूषित एक विशाल रथ पर, जिसमें सुशिक्षित घोड़े जुते हुए थे; जा चढ़ा ॥३॥

तमास्थाय रथश्रेष्ठं महामेघसमस्वनम्।

प्रययौ रक्षसां श्रेष्ठो दशग्रीवः सभां प्रति॥४॥

महान् मेघों की गर्जना के समान घर्घराहट पैदा करने वाले उस उत्तम रथ पर आरूढ़ हो राक्षसशिरोमणि दशग्रीव सभाभवन की ओर प्रस्थित हुआ॥४॥

असिचर्मधरा योधाः सर्वायुधधरास्ततः।

राक्षसा राक्षसेन्द्रस्य पुरस्तात् सम्प्रतस्थिरे ॥५॥

उस समय राक्षसराज रावण के आगे-आगे ढाल तलवार एवं सब प्रकार के आयुध धारण करने वाले बहुसंख्यक राक्षस योद्धा जा रहे थे॥५॥

नानाविकृतवेषाश्च नानाभूषणभूषिताः।

पार्श्वतः पृष्ठतश्चैनं परिवार्य ययुस्तदा॥६॥

इसी तरह भाँति-भाँति के आभूषणों से विभूषित और नाना प्रकार के विकराल वेषवाले अगणित निशाचर उसे दायें बायें और पीछे की ओर से घेरकर चल रहे थे॥६॥

रथैश्चातिरथाः शीघ्रं मत्तैश्च वरवारणैः।

अनूत्पेतुर्दशग्रीवमाक्रीडद्भिश्च वाजिभिः॥७॥

रावण के प्रस्थान करते ही बहत-से अतिरथी वीर रथों, मतवाले गजराजों और खेल-खेल में तरहतरह की चालें दिखाने वाले घोड़ों पर सवार हो तुरंत उसके पीछे चल दिये॥ ७॥

गदापरिघहस्ताश्च शक्तितोमरपाणयः।

परश्वधधराश्चान्ये तथान्ये शूलपाणयः।

ततस्तूर्यसहस्राणं संजज्ञे निःस्वनो महान्॥८॥

किन्हीं के हाथों में गदा और परिघ शोभा पा रहे थे। । कोई शक्ति और तोमर लिये हुए थे। कुछ लोगों ने फरसे धारण कर रखे थे तथा अन्य राक्षसों के हाथों में शूल चमक रहे थे, फिर तो वहाँ सहस्रों वाद्यों का महान् घोष होने लगा॥८॥

तुमुलः शङ्खशब्दश्च सभां गच्छति रावणे।

स नेमिघोषेण महान् सहसाभिनिनादयन्॥९॥

राजमार्गं श्रिया जुष्टं प्रतिपेदे महारथः।

रावण के सभाभवन की  ओर यात्रा करते समय तुमुल शङ्खध्वनि होने लगी। उसका वह विशाल रथ अपने पहियों की घर्घराहट से सम्पूर्ण दिशाओं को प्रतिध्वनित करता हुआ सहसा शोभाशाली राजमार् गपर जा पहँचा॥९ १/२॥

विमलं चातपत्रं च प्रगृहीतमशोभत ॥१०॥

पाण्डुरं राक्षसेन्द्रस्य पूर्णस्ताराधिपो यथा।

उस समय राक्षसराज रावण के ऊपर तना हुआ निर्मल श्वेत छत्र पूर्ण चन्द्रमा के समान शोभा पा रहा था॥ १० १/२॥

हेममञ्जरिगर्भे च शुद्धस्फटिकविग्रहे ॥११॥

चामरव्यजने तस्य रेजतुः सव्यदक्षिणे।

उसके दाहिने और बायें भाग में शुद्ध स्फटिक के डंडेवाले चँवर और व्यजन, जिनमें सोने की मञ्जरियाँ बनी हुई थीं, बड़ी शोभा पा रहे थे॥ ११ १/२ ॥

ते कृताञ्जलयः सर्वे रथस्थं पृथिवीस्थिताः॥१२॥

राक्षसा राक्षसश्रेष्ठं शिरोभिस्तं ववन्दिरे।

मार्ग में पृथ्वी पर खड़े हुए सभी राक्षस दोनों हाथ जोड़ रथ पर बैठे हुए राक्षसशिरोमणि रावण की सिर झुकाकर वन्दना करते थे। १२ १/२॥

राक्षसैः स्तूयमानः सञ्जयाशीर्भिररिंदमः॥१३॥

आससाद महातेजाः सभां विरचितां तदा।।

राक्षसों द्वारा की गयी स्तुति, जय-जयकार और आशीर्वाद सुनता हुआ शत्रुदमन महातेजस्वी रावण उस समय विश्वकर्मा द्वारा निर्मित राजसभा में पहुँचा॥

सुवर्णरजतास्तीर्णां विशुद्धस्फटिकान्तराम्॥१४॥

विराजमानो वपुषा रुक्मपट्टोत्तरच्छदाम्।

तां पिशाचशतैः षभिरभिगुप्तां सदाप्रभाम्॥

प्रविवेश महातेजाः सुकृतां विश्वकर्मणा।

उस सभा के फर्श में सोने-चाँदी का काम किया हुआ था तथा बीच-बीच में विशुद्ध स्फटिक भी जड़ा गया था। उसमें सोने के कामवाले रेशमी वस्त्रों की चादरें बिछी हुई थीं। वह सभा सदा अपनी प्रभा से उद्भासित होती रहती थी। छः सौ पिशाच उसकी रक्षा करते थे। विश्वकर्मा ने उसे बहुत ही सुन्दर बनाया था। अपने शरीर से सुशोभित होने वाले महातेजस्वी रावण ने उस सभा में प्रवेश किया॥ १४-१५ १/२॥

तस्यां तु वैदूर्यमयं प्रियकाजिनसंवृतम्॥१६॥

महत्सोपाश्रयं भेजे रावणः परमासनम्।

ततः शशासेश्वरवद्दताल्लघुपराक्रमान्॥१७॥

उस सभाभवन में वैदूर्यमणि (नीलम)-का बना हुआ एक विशाल और उत्तम सिंहासन था, जिसपर अत्यन्त मुलायम चमड़ेवाले ‘प्रियक’ नामक मृग का चर्म बिछा था और उसपर मसनद भी रखा हुआ था। रावण उसी पर बैठ गया। फिर उसने अपने शीघ्रगामी दूतों को आज्ञा दी— ॥ १६-१७॥

समानयत मे क्षिप्रमिहैतान् राक्षसानिति।

कृत्यमस्ति महज्जाने कर्तव्यमिति शत्रुभिः॥१८॥

‘तुमलोग शीघ्र ही यहाँ बैठने वाले सुविख्यात राक्षसों को मेरे पास बुला ले आओ; क्योंकि शत्रुओं के साथ करने योग्य महान् कार्य मुझ पर आ पड़ा है। इस बात को मैं अच्छी तरह समझ रहा हूँ (अतः इस पर विचार करने के लिये सब सभासदों का यहाँ आना अत्यन्त आवश्यक है)’॥ १८॥

राक्षसास्तद्वचः श्रुत्वा लङ्कायां परिचक्रमुः।

अनुगेहमवस्थाय विहारशयनेषु च।

उद्यानेषु च रक्षांसि चोदयन्तो ह्यभीतवत्॥१९॥

रावण का यह आदेश सुनकर वे राक्षस लङ्का में सब ओर चक्कर लगाने लगे। वे एक-एक घर, विहारस्थान, शयनागार और उद्यान में जा-जाकर बड़ी निर्भयता से उन सब राक्षसों को राजसभा में चलने के लिये प्रेरित करने लगे॥ १९॥

ते रथान्तचरा एके दृप्तानेके दृढान् हयान्।

नागानेकेऽधिरुरुहर्जग्मुश्चैके पदातयः॥२०॥

तब उन राक्षसों में से कोई रथ पर चढ़कर चले, कोई मतवाले हाथियों पर और कोई मजबूत घोड़ों पर सवार होकर अपने-अपने स्थान से प्रस्थित हुए। बहुत-से राक्षस पैदल ही चल दिये॥२०॥

सा पुरी परमाकीर्णा रथकुञ्जरवाजिभिः।

सम्पतद्भिर्विरुरुचे गरुत्मद्भिरिवाम्बरम्॥२१॥

उस समय दौड़ते हुए रथों, हाथियों और घोड़ों से व्याप्त हुई वह पुरी बहुसंख्यक गरुड़ों से आच्छादित हुए आकाश की भाँति शोभा पा रही थी॥ २१॥

ते वाहनान्यवस्थाय यानानि विविधानि च।

सभां पद्भिः प्रविविशुः सिंहा गिरिगुहामिव॥२२॥

गन्तव्य स्थान तक पहुँचकर अपने-अपने वाहनों और नाना प्रकार की सवारियों को बाहर ही रखकर वेसब सभासद् पैदल ही उस सभाभवन में प्रविष्ट हुए, मानो बहुत-से सिंह किसी पर्वत की कन्दरा में घुस रहे हों॥ २२॥

राज्ञः पादौ गृहीत्वा तु राज्ञा ते प्रतिपूजिताः।

पीठेष्वन्ये बृसीष्वन्ये भूमौ केचिदुपाविशन्॥२३॥

वहाँ पहुँचकर उन सबने राजा के पाँव पकड़े तथा राजा ने भी उनका सत्कार किया। तत्पश्चात् कुछ लोग सोने के सिंहासनों पर, कुछ लोग कुशकी चटाइयों पर और कुछ लोग साधारण बिछौनों से ढकी हुई भूमि पर ही बैठ गये॥ २३॥

ते समेत्य सभायां वै राक्षसा राजशासनात्।

यथार्हमुपतस्थुस्ते रावणं राक्षसाधिपम्॥२४॥

राजा की आज्ञा से उस सभा में एकत्र होकर वे सब राक्षस राक्षसराज रावण के आसपास यथायोग्य आसनों पर बैठ गये॥२४॥

मन्त्रिणश्च यथामुख्या निश्चितार्थेषु पण्डिताः।

अमात्याश्च गुणोपेताः सर्वज्ञा बुद्धिदर्शनाः॥२५॥

समीयुस्तत्र शतशः शूराश्च बहवस्तथा।

सभायां हेमवर्णायां सर्वार्थस्य सुखाय वै॥२६॥

यथायोग्य भिन्न-भिन्न विषयों के लिये उचित सम्मति देने वाले मुख्य-मुख्य मन्त्री, कर्तव्य-निश्चय में पाण्डित्य का परिचय देने वाले सचिव, बुद्धिदर्शी, सर्वज्ञ, सद्गुण-सम्पन्न उपमन्त्री तथा और भी बहुत से शूरवीर सम्पूर्ण अर्थो के निश्चय के लिये और सुखप्राप्ति के उपायपर विचार करने के लिये उस सुनहरी कान्तिवाली सभा के भीतर सैकड़ों की संख्या में उपस्थित थे॥ २५-२६॥

ततो महात्मा विपुलं सुयुग्यं रथं वरं हेमविचित्रिताङ्गम्।

शुभं समास्थाय ययौ यशस्वी विभीषणः संसदमग्रजस्य॥२७॥

तत्पश्चात् यशस्वी महात्मा विभीषण भी एक सुवर्णजटित, सुन्दर अश्वों से युक्त, विशाल, श्रेष्ठ एवं शुभकारक रथ पर आरूढ़ हो अपने बड़े भाई की सभा में जा पहुँचे॥ २७॥

स पूर्वजायावरजः शशंस नामाथ पश्चाच्चरणौ ववन्दे।

शुकः प्रहस्तश्च तथैव तेभ्यो ददौ यथार्ह पृथगासनानि॥२८॥

छोटे भाई विभीषण ने पहले अपना नाम बताया, फिर बड़े भाई के चरणों में मस्तक झुकाया। इसी तरह शुक और प्रहस्त ने भी किया। तब रावण ने उन सबको यथायोग्य पृथक्-पृथक् आसन दिये॥ २८॥

सुवर्णनानामणिभूषणानां सुवाससां संसदि राक्षसानाम्।

तेषां परार्ध्यागुरुचन्दनानां स्रजां च गन्धाः प्रववुः समन्तात्॥२९॥

सुवर्ण एवं नाना प्रकार की मणियों के आभूषणों से विभूषित उन सुन्दर वस्त्रधारी राक्षसों की उस सभा में सब ओर बहुमूल्य अगुरु, चन्दन तथा पुष्पहारों की सुगन्ध छा रही थी॥ २९॥

न चुक्रुशु नृतमाह कश्चित् सभासदो नापि जजल्पुरुच्चैः।

संसिद्धार्थाः सर्व एवोग्रवीर्या भर्तुः सर्वे ददृशुश्चाननं ते॥३०॥

उस समय उस सभा का कोई भी सदस्य असत्य नहीं बोलता था। वे सभी सभासद् न तो चिल्लाते थे और न जोर-जोर से बातें ही करते थे। वे सब-के-सब सफल मनोरथ एवं भयंकर पराक्रमी थे और सभी अपने स्वामी रावण के मुँह की ओर देख रहे थे॥३०॥

स रावणः शस्त्रभृतां मनस्विनां महाबलानां समितौ मनस्वी।

तस्यां सभायां प्रभया चकाशे मध्ये वसूनामिव वज्रहस्तः॥३१॥

उस सभा में शस्त्रधारी महाबली मनस्वी वीरों का समागम होने पर उनके बीच में बैठा हुआ मनस्वी रावण अपनी प्रभा से उसी प्रकार प्रकाशित हो रहा था, जैसे वसुओं के बीच में वज्रधारी इन्द्र देदीप्यमान होते हैं॥ ३१॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे एकादशः सर्गः॥११॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में ग्यारहवाँ सर्ग पूरा हुआ।११॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
युद्धकाण्डम्

रावण का सीता हरण का प्रसंग बताना , कुम्भकर्ण का पहले तो उसे फटकारना, फिर समस्त शत्रुओं के वध का स्वयं ही भार उठाना

द्वादशः सर्गः

सर्ग-12

स तां परिषदं कृत्स्नां समीक्ष्य समितिंजयः।

प्रचोदयामास तदा प्रहस्तं वाहिनीपतिम्॥१॥

शत्रुविजयी रावण ने उस सम्पूर्ण सभा की ओर दृष्टिपात करके सेनापति प्रहस्त को उस समय इस प्रकार आदेश दिया— ॥१॥

सेनापते यथा ते स्युः कृतविद्याश्चतुर्विधाः।

योधा नगररक्षायां तथा व्यादेष्टमर्हसि ॥२॥

‘सेनापते ! तुम सैनिकों को ऐसी आज्ञा दो, जिससे तुम्हारे अस्त्रविद्या में पारंगत रथी, घुड़सवार, हाथीसवार और पैदल योद्धा नगर की रक्षा में तत्पर रहें ॥२॥

स प्रहस्तः प्रणीतात्मा चिकीर्षन् राजशासनम्।

विनिक्षिपद बलं सर्वं बहिरन्तश्च मन्दिरे॥३॥

अपने मन को वश में रखने वाले प्रहस्त ने राजा के आदेश का पालन करने की इच्छा से सारी सेना को नगर के बाहर और भीतर यथायोग्य स्थानों पर नियुक्त कर दिया।

ततो विनिक्षिप्य बलं सर्वं नगरगुप्तये।

प्रहस्तः प्रमुखे राज्ञो निषसाद जगाद च॥४॥

नगर की रक्षा के लिये सारी सेना को तैनात करके प्रहस्त राजा रावण के सामने आ बैठा और इस प्रकार बोला- ॥४॥

विहितं बहिरन्तश्च बलं बलवतस्तव।

कुरुष्वाविमनाः क्षिप्रं यदभिप्रेतमस्ति ते॥५॥

‘राक्षसराज! आप महाबली महाराज की सेना को मैंने नगर के बाहर और भीतर यथास्थान नियुक्त कर दिया है। अब आप स्वस्थचित्त होकर शीघ्र ही अपने अभीष्ट कार्य का सम्पादन कीजिये’ ॥ ५ ॥

प्रहस्तस्य वचः श्रुत्वा राजा राज्यहितैषिणः।

सुखेप्सुः सुहृदां मध्ये व्याजहार स रावणः॥६॥

राज्य का हित चाहने वाले प्रहस्त की यह बात सुनकर अपने सुख की इच्छा रखने वाले रावण ने सुहृदों के बीच में यह बात कही— ॥६॥

प्रियाप्रिये सुखे दुःखे लाभालाभे हिताहिते।

धर्मकामार्थकृच्छेषु यूयमर्हथ वेदितुम्॥७॥

‘सभासदो! धर्म, अर्थ और कामविषयक संकट उपस्थित होने पर आपलोग प्रिय-अप्रिय, सुख-दुःख, लाभ-हानि और हिताहित का विचार करने में समर्थ हैं।

सर्वकृत्यानि युष्माभिः समारब्धानि सर्वदा।

मन्त्रकर्मनियुक्तानि न जातु विफलानि मे॥८॥

‘आपलोगों ने सदा परस्पर विचार करके जिन-जिन कार्यों का आरम्भ किया है, वे सब-के-सब मेरे लिये कभी निष्फल नहीं हुए हैं॥८॥

ससोमग्रहनक्षत्रैर्मरुद्भिरिव वासवः।

भवद्भिरहमत्यर्थं वृतः श्रियमवाप्नुयाम्॥९॥

‘जैसे चन्द्रमा, ग्रह और नक्षत्रोंसहित मरुद्गणों से घिरे हुए इन्द्र स्वर्ग की सम्पत्ति का उपभोग करते हैं, उसी भाँति आपलोगों से घिरा रहकर मैं भी लङ्का की रचुर राजलक्ष्मी का सुख भोगता रहूँ–यही मेरी अभिलाषा है॥९॥

अहं तु खलु सर्वान् वः समर्थयितुमुद्यतः।

कुम्भकर्णस्य तु स्वप्नान् नेममर्थमचोदयम्॥१०॥

‘मैंने जो काम किया है, उसे मैं पहले ही आप सबके सामने रखकर आपके द्वारा उसका समर्थन चाहता था, परंतु उस समय कुम्भकर्ण सोये हुए थे, इसलिये मैंने इसकी चर्चा नहीं चलायी॥१०॥

अयं हि सुप्तः षण्मासान् कुम्भकर्णो महाबलः।

सर्वशस्त्रभृतां मुख्यः स इदानीं समुत्थितः ॥११॥

‘समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ महाबली कुम्भकर्ण छः महीने से सो रहे थे। अभी इनकी नींद खुली है॥११॥

इयं च दण्डकारण्याद् रामस्य महिषी प्रिया।

रक्षोभिश्चरितोद्देशादानीता जनकात्मजा॥१२॥

मैं दण्डकारण्य से, जो राक्षसों के विचरने का स्थान है, राम की प्यारी रानी जनकदुलारी सीता को हर लाया हूँ॥१२॥

सा मे न शय्यामारोढुमिच्छत्यलसगामिनी।

त्रिषु लोकेषु चान्या मे न सीतासदृशी तथा॥१३॥

“किंतु वह मन्दगामिनी सीता मेरी शय्या पर आरूढ़ होना नहीं चाहती है। मेरी दृष्टि में तीनों लोकों के भीतर सीता के समान सुन्दरी दूसरी कोई स्त्री नहीं है॥ १३॥

तनुमध्या पृथुश्रोणी शरदिन्दुनिभानना।

हेमबिम्बनिभा सौम्या मायेव मयनिर्मिता॥१४॥

‘उसके शरीर का मध्यभाग अत्यन्त सूक्ष्म है, कटि के पीछे का भाग स्थूल है, मुख शरत्काल के चन्द्रमा को लज्जित करता है, वह सौम्य रूप और स्वभाववाली सीता सोने की बनी हुई प्रतिमा-सी जान पड़ती है। ऐसा लगता है, जैसे वह मयासुर की रची हुई कोई माया हो॥१४॥

सुलोहिततलौ श्लक्ष्णौ चरणौ सुप्रतिष्ठितौ।

दृष्ट्वा ताम्रनखौ तस्या दीप्यते मे शरीरजः॥१५॥

‘उसके चरणों के तलवे लाल रंग के हैं। दोनों पैर सुन्दर, चिकने और सुडौल हैं तथा उनके नख ताँबे जैसे लाल हैं। सीता के उन चरणों को देखकर मेरी कामाग्नि प्रज्वलित हो उठती है॥ १५ ॥

हुताग्नेरर्चिसंकाशामेनां सौरीमिव प्रभाम्।

उन्नसं विमलं वल्गु वदनं चारुलोचनम्॥१६॥

पश्यंस्तदवशस्तस्याः कामस्य वशमेयिवान्।

‘जिसमें घी की आहुति डाली गयी हो, उस अग्नि की लपट और सूर्य की प्रभा के समान इस तेजस्विनी सीता को देखकर तथा ऊँची नाक और विशाल नेत्रों से सुशोभित उसके निर्मल एवं मनोहर मुख का अवलोकन करके मैं अपने वश में नहीं रह गया हूँ। काम ने मुझे अपने अधीन कर लिया है॥१६

क्रोधहर्षसमानेन दुर्वर्णकरणेन च ॥१७॥

शोकसंतापनित्येन कामेन कलुषीकृतः।

‘जो क्रोध और हर्ष दोनों अवस्थाओं में समानरूप से बना रहता है, शरीर की कान्ति को फीकी कर देता है और शोक तथा संताप के समय भी कभी मन से दूर नहीं होता, उस काम ने मेरे हृदय को कलुषित (व्याकुल) कर दिया है॥ १७ १/२॥

सा तु संवत्सरं कालं मामयाचत भामिनी॥१८॥

प्रतीक्षमाणा भर्तारं राममायतलोचना।

तन्मया चारुनेत्रायाः प्रतिज्ञातं वचः शुभम्॥१९॥

‘विशाल नेत्रोंवाली माननीय सीता ने मुझसे एक वर्ष का समय माँगा है। इस बीच में वह अपने पति श्रीराम की प्रतीक्षा करेगी। मैंने मनोहर नेत्रोंवाली सीता के उस सुन्दर वचन को सुनकर उसे पूर्ण करने की प्रतिज्ञा कर ली है* ॥ १८-१९॥

* यहाँ रावण ने सभासदों के सामने अपनी झूठी उदारता दिखाने के लिये सर्वथा असत्य कहा है। सीताजी ने कभी अपने मुँह से यह नहीं कहा था कि ‘मुझे एक वर्ष का समय दो यदि उतने दिनों तक श्रीराम नहीं आये तो मैं तुम्हारी हो जाऊँगी।’ सीता ने तो सदा तिरस्कारपूर्वक उसके जघन्य प्रस्ताव को ठकराया ही था। इसने स्वयं ही अपनी ओर से उन्हें एक वर्ष का अवसर दिया था। (देखिये अरण्यकाण्ड सर्ग ५६ श्लोक २४-२५)

श्रान्तोऽहं सततं कामाद् यातो हय इवाध्वनि।

कथं सागरमक्षोभ्यं तरिष्यन्ति वनौकसः॥२०॥

बहुसत्त्वझषाकीर्णं तौ वा दशरथात्मजौ।

‘जैसे बड़े मार्ग में चलते-चलते घोड़ा थक जाता है, उसी प्रकार मैं भी कामपीड़ा से थकावट का अनुभवकर रहा हूँ। वैसे तो मुझे शत्रुओं की ओर से कोई डर नहीं है; क्योंकि वे वनवासी वानर अथवा वे दोनों दशरथकुमार श्रीराम और लक्ष्मण असंख्य जल जन्तुओं तथा मत्स्यों से भरे हुए अलङ्घ्य महासागर को कैसे पार कर सकेंगे? ॥ २० १/२ ॥

अथवा कपिनैकेन कृतं नः कदनं महत्॥२१॥

दुर्जेयाः कार्यगतयो ब्रूत यस्य यथामति।

मानुषान्नो भयं नास्ति तथापि तु विमृश्यताम्॥२२॥

‘अथवा एक ही वानर ने आकर हमारे यहाँ महान् संहार मचा दिया था। इसलिये कार्यसिद्धि के उपायों को समझ लेना अत्यन्त कठिन है। अतः जिसको अपनी बुद्धि के अनुसार जैसा उचित जान पड़े, वह वैसा ही बतावे। तुम सब लोग अपने विचार अवश्य व्यक्त करो। यद्यपि हमें मनुष्य से कोई भय नहीं है, तथापि तुम्हें विजय के उपाय पर विचार तो करना ही चाहिये॥ २१-२२॥

तदा देवासुरे युद्धे युष्माभिः सहितोऽजयम्।

ते मे भवन्तश्च तथा सुग्रीवप्रमुखान् हरीन्॥२३॥

परे पारे समुद्रस्य पुरस्कृत्य नृपात्मजौ।

सीतायाः पदवीं प्राप्य सम्प्राप्तौ वरुणालयम्॥२४॥

‘उन दिनों जब देवताओं और असुरों का युद्ध चल रहा था, उसमें आप सब लोगों की सहायता से ही मैंने विजय प्राप्त की थी। आज भी आप मेरे उसी प्रकार सहायक हैं। वे दोनों राजकुमार सीता का पता पाकर सुग्रीव आदि वानरों को साथ लिये समुद्र के उस तटतक पहुँच चुके हैं॥ २३-२४ ॥

अदेया च यथा सीता वध्यौ दशरथात्मजौ।

भवद्भिर्मन्त्र्यतां मन्त्रः सुनीतं चाभिधीयताम्॥२५॥

‘अब आपलोग आपस में सलाह कीजिये और कोई ऐसी सुन्दर नीति बताइये, जिससे सीता को लौटाना न पड़े तथा वे दोनों दशरथकुमार मारे जायँ।। २५ ॥

नहि शक्तिं प्रपश्यामि जगत्यन्यस्य कस्यचित्।

सागरं वानरैस्तीक़ निश्चयेन जयो मम॥२६॥

‘वानरों के साथ समुद्र को पार करके यहाँ तक आने की शक्ति जगत् में राम के सिवा और किसी में नहीं देखता हूँ (किंतु राम और वानर यहाँ आकर भी मेरा कुछ बिगाड़ नहीं सकते), अतः यह निश्चय है कि जीत मेरी ही होगी’ ॥ २६ ॥

तस्य कामपरीतस्य निशम्य परिदेवितम्।

कुम्भकर्णः प्रचुक्रोध वचनं चेदमब्रवीत्॥ २७॥

कामातुर रावण का यह खेदपूर्ण प्रलाप सुनकर कुम्भकर्ण को क्रोध आ गया और उसने इस प्रकार कहा- ॥२७॥

यदा तु रामस्य सलक्ष्मणस्य प्रसह्य सीता खलु सा इहाहृता।

सकृत् समीक्ष्यैव सुनिश्चितं तदा भजेत चित्तं यमुनेव यामुनम्॥२८॥

‘जब तुम लक्ष्मणसहित श्रीराम के आश्रम से एक बार स्वयं ही मनमाना विचार करके सीता को यहाँ बलपूर्वक हर लाये थे, उसी समय तुम्हारे चित्त को हमलोगों के साथ इस विषय में सुनिश्चित विचार कर लेना चाहिये था। ठीक उसी तरह जैसे यमुना जब पृथ्वी पर उतरने को उद्यत हुईं, तभी उन्होंने यमुनोत्री पर्वत के कुण्डविशेष को अपने जल से पूर्ण किया था (पृथ्वीपर उतर जाने के बाद उनका वेग जब समुद्र में जाकर शान्त हो गया, तब वे पुनः उस कुण्ड को नहीं भर सकतीं, उसी प्रकार तुमने भी जब विचार करने का अवसर था, तब तो हमारे साथ बैठकर विचार किया नहीं। अब अवसर बिताकर सारा काम बिगड़ जाने के बाद तुम विचार करने चले हो)॥ २८॥

सर्वमेतन्महाराज कृतमप्रतिमं तव।

विधीयेत सहास्माभिरादावेवास्य कर्मणः॥२९॥

‘महाराज! तुमने जो यह छलपूर्वक छिपकर परस्त्री-हरण आदि कार्य किया है, यह सब तुम्हारे लिये बहुत अनुचित है। इस पापकर्म को करने से पहले ही आपको हमारे साथ परामर्श कर लेना चाहिये था॥२९॥

न्यायेन राजकार्याणि यः करोति दशानन।

न स संतप्यते पश्चान्निश्चितार्थमतिर्नृपः॥३०॥

‘दशानन! जो राजा सब राजकार्य न्यायपूर्वक करता है, उसकी बुद्धि निश्चयपूर्ण होने के कारण उसे पीछे पछताना नहीं पड़ता है॥३०॥

अनुपायेन कर्माणि विपरीतानि यानि च।

क्रियमाणानि दुष्यन्ति हवींष्यप्रयतेष्विव॥३१॥

‘जो कर्म उचित उपाय का अवलम्बन किये बिना ही किये जाते हैं तथा जो लोक और शास्त्र के विपरीत होते हैं, वे पापकर्म उसी तरह दोष की प्राप्ति कराते हैं जैसे अपवित्र आभिचारिक यज्ञों में होमे गये हविष्य॥३१॥

यः पश्चात् पूर्वकार्याणि कर्माण्यभिचिकीर्षति।

पूर्वं चापरकार्याणि स न वेद नयानयौ॥३२॥

‘जो पहले करने योग्य कार्यों को पीछे करना चाहता है और पीछे करने योग्य काम पहले ही कर डालता है, वह नीति और अनीति को नहीं जानता॥ ३२॥

चपलस्य तु कृत्येषु प्रसमीक्ष्याधिकं बलम्।

छिद्रमन्ये प्रपद्यन्ते क्रौञ्चस्य खमिव द्विजाः॥३३॥

‘शत्रुलोग अपने विपक्षी के बल को अपने से अधिक देखकर भी यदि वह हर काम में चपल (जल्दबाज) है तो उसका दमन करने के लिये उसी तरह उसके छिद्र ढूँढ़ते रहते हैं, जैसे पक्षी दुर्लङ्घय क्रौञ्च

पर्वत को लाँघकर आगे बढ़ने के लिये उसके (उस) । छिद्र का* आश्रय लेते हैं (जिसे कुमार कार्तिकेयने अपनी शक्ति का प्रहार करके बनाया था) ॥ ३३॥

कार्तिकेय ने अपनी शक्ति के द्वारा क्रौञ्चपर्वत को विदीर्ण करके उसमें छेद कर दिया था—यह प्रसंग महाभारत में आया है। (देखिये शल्यप० ४६। ८४)

त्वयेदं महदारब्धं कार्यमप्रतिचिन्तितम्।

दिष्ट्या त्वां नावधीद् रामो विषमिश्रमिवामिषम्॥३४॥

‘महाराज! तुमने भावी परिणाम का विचार किये बिना ही यह बहुत बड़ा दुष्कर्म आरम्भ किया है। जैसे विषमिश्रित भोजन खाने वाले के प्राण हर लेता है, उसी प्रकार श्रीरामचन्द्रजी तुम्हारा वध कर डालेंगे। उन्होंने अभी तक तुम्हें मार नहीं डाला, इसे अपने लिये सौभाग्य की बात समझो॥ ३४ ॥

तस्मात् त्वया समारब्धं कर्म ह्यप्रतिमं परैः।

अहं समीकरिष्यामि हत्वा शत्रूस्तवानघ॥ ३५॥

‘अनघ ! यद्यपि तुमने शत्रुओं के साथ अनुचित कर्म आरम्भ किया है, तथापि मैं तुम्हारे शत्रुओं का संहार करके सबको ठीक कर दूंगा॥ ३५॥

अहमुत्सादयिष्यामि शüस्तव निशाचर।

यदि शक्रविवस्वन्तौ यदि पावकमारुतौ।

तावहं योधयिष्यामि कुबेरवरुणावपि॥ ३६॥

‘निशाचर! तुम्हारे शत्रु यदि इन्द्र, सूर्य, अग्नि, वायु, कुबेर और वरुण भी हों तो मैं उनके साथ युद्ध करूँगा और तुम्हारे सभी शत्रुओं को उखाड़ फेंकूँगा॥ ३६॥

गिरिमात्रशरीरस्य महापरिघयोधिनः।

नर्दतस्तीक्ष्णदंष्टस्य बिभीयाद् वै पुरंदरः॥३७॥

‘मैं पर्वत के समान विशाल एवं तीखी दाढ़ों से युक्त शरीर धारण करके महान् परिघ हाथ में ले समरभूमि में जूझता हुआ जब गर्जना करूँगा, उस समय देवराज इन्द्र भी भयभीत हो जायँगे॥ ३७॥

पुनर्मां स द्वितीयेन शरेण निहनिष्यति।

ततोऽहं तस्य पास्यामि रुधिरं काममाश्वस॥३८॥

‘राम मुझे एक बाण से मारकर दूसरे बाण से मारने लगेंगे, उसी बीच में मैं उनका खून पी लूँगा। इसलिये तुम पूर्णतः निश्चिन्त हो जाओ॥ ३८॥

वधेन वै दाशरथेः सुखावहं जयं तवाहर्तुमहं यतिष्ये।

हत्वा च रामं सह लक्ष्मणेन खादामि सर्वान् हरियूथमुख्यान्॥३९॥

‘मैं दशरथनन्दन श्रीराम का वध करके तुम्हारे लिये सुखदायिनी विजय सुलभ कराने का प्रयत्न करूँगा। लक्ष्मणसहित राम को मारकर समस्त वानरयूथपतियों को खा जाऊँगा॥ ३९ ॥

रमस्व कामं पिब चायवारुणीं कुरुष्व कार्याणि हितानि विज्वरः।

मया तु रामे गमिते यमक्षयं चिराय सीता वशगा भविष्यति॥४०॥

‘तुम मौज से विहार करो। उत्तम वारुणी का पान करो और निश्चिन्त होकर अपने लिये हितकर कार्य करते रहो। मेरे द्वारा राम के यमलोक भेज दिये जाने पर सीता चिरकाल के लिये तुम्हारे अधीन हो जायगी’ ॥ ४०॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे द्वादशः सर्गः॥१२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में बारहवाँ सर्ग पूरा हुआ।१२॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
युद्धकाण्डम्

महापार्श्व का रावण को उकसाना और रावण का शाप के कारण असमर्थ बताना तथा अपने पराक्रम के गीत गाना

त्रयोदशः सर्गः

सर्ग-13

रावणं क्रुद्धमाज्ञाय महापावो महाबलः।

मुहूर्तमनुसंचिन्त्य प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत्॥१॥

तब रावण को कुपित हुआ जान महाबली महापार्श्व ने दो घड़ी-तक कुछ सोच-विचार करने के बाद हाथ जोड़कर कहा- ॥१॥

यः खल्वपि वनं प्राप्य मृगव्यालनिषेवितम्।

न पिबेन्मधु सम्प्राप्य स नरो बालिशो भवेत्॥२॥

‘जो हिंसक पशुओं और साँसे भरे हुए दुर्गम वन में जाकर वहाँ पीने योग्य मधु पाकर भी उसे पीता नहीं है, वह पुरुष मूर्ख ही है॥२॥

ईश्वरस्येश्वरः कोऽस्ति तव शत्रुनिबर्हण।

रमस्व सह वैदेह्या शत्रूनाक्रम्य मूर्धसु॥३॥

‘शत्रुसूदन महाराज! आप तो स्वयं ही ईश्वर हैं। आपका ईश्वर कौन है? आप शत्रुओं के सिर पर पैर रखकर विदेहकुमारी सीता के साथ रमण कीजिये।३॥

बलात् कुक्कुटवृत्तेन प्रवर्तस्व महाबल।

आक्रम्याक्रम्य सीतां वै तां भुक्ष्व च रमस्व च॥४॥

‘महाबली वीर! आप कुक्कुटों के बर्ताव को अपनाकर सीता के साथ बलात्कार कीजिये। बारंबार आक्रमण करके उनके साथ रमण एवं उपभोग कीजिये॥४॥

लब्धकामस्य ते पश्चादागमिष्यति किं भयम्।

प्राप्तमप्राप्तकालं वा सर्वं प्रतिविधास्यसे॥५॥

‘जब आपका मनोरथ सफल हो जायगा, तब फिर आप पर कौन-सा भय आयेगा? यदि वर्तमान एवं भविष्यकाल में कोई भय आया भी तो उस समस्त भय का यथोचित प्रतीकार किया जायगा॥ ५॥

कुम्भकर्णः सहास्माभिरिन्द्रजिच्च महाबलः।

प्रतिषेधयितुं शक्तौ सवज्रमपि वज्रिणम्॥६॥

‘हमलोगोंके साथ यदि महाबली कुम्भकर्ण और इन्द्रजित् खड़े हो जायँ तो ये दोनों वज्रधारी इन्द्रको भी आगे बढ़नेसे रोक सकते हैं॥६॥

उपप्रदानं सान्त्वं वा भेदं वा कुशलैः कृतम्।

समतिक्रम्य दण्डेन सिद्धिमर्थेषु रोचये॥७॥

‘मैं तो नीतिनिपुण पुरुषों के द्वारा प्रयुक्त साम, दान और भेद को छोड़कर केवल दण्ड के द्वारा काम बना लेना ही अच्छा समझता हूँ॥ ७॥

इह प्राप्तान् वयं सर्वाञ्छJस्तव महाबल।

वशे शस्त्रप्रतापेन करिष्यामो न संशयः॥८॥

‘महाबली राक्षसराज! यहाँ आपके जो भी शत्रु आयेंगे, उन्हें हमलोग अपने शस्त्रों के प्रताप से वश में कर लेंगे, इसमें संशय नहीं है’॥८॥

एवमुक्तस्तदा राजा महापाइँन रावणः।

तस्य सम्पूजयन् वाक्यमिदं वचनमब्रवीत्॥९॥

महापार्श्वके ऐसा कहने पर उस समय लङ्का के राजा रावण ने उसके वचनों की प्रशंसा करते हुए इस प्रकार कहा- ॥९॥

महापार्श्व निबोध त्वं रहस्यं किंचिदात्मनः।

चिरवृत्तं तदाख्यास्ये यदवाप्तं पुरा मया॥१०॥

‘महापार्श्व! बहुत दिन हुए पूर्वकाल में एक गुप्त घटना घटित हुई थी—मुझे शाप प्राप्त हुआ था। अपने जीवन के उस गुप्त रहस्यको आज मैं बता रहा हूँ, उसे सुनो॥१०॥

पितामहस्य भवनं गच्छन्तीं पुञ्जिकस्थलाम्।

चञ्चर्यमाणामद्राक्षमाकाशेऽग्निशिखामिव॥

‘एक बार मैंने आकाश में अग्निशिखा के समान प्रकाशित होती हुई पुञ्जिकस्थला नाम की अप्सरा को देखा, जो पितामह ब्रह्माजी के भवन की ओर जा रही थी। वह अप्सरा मेरे भय से लुकती-छिपती आगे बढ़ रही थी॥

सा प्रसह्य मया भुक्ता कृता विवसना ततः।

स्वयम्भूभवनं प्राप्ता लोलिता नलिनी यथा॥१२॥

‘मैंने बलपूर्वक उसके वस्त्र उतार दिये और हठात् उसका उपभोग किया। इसके बाद वह ब्रह्माजी के भवन में गयी। उसकी दशा हाथी द्वारा मसलकर फेंकी हुई कमलिनीके समान हो रही थी॥ १२॥

तच्च तस्य तथा मन्ये ज्ञातमासीन्महात्मनः।

अथ संकुपितो वेधा मामिदं वाक्यमब्रवीत्॥१३॥

‘मैं समझता हूँ कि मेरे द्वारा उसकी जो दुर्दशा की गयी थी, वह पितामह ब्रह्माजी को ज्ञात हो गयी। इससे वे अत्यन्त कुपित हो उठे और मुझसे इस प्रकार बोले- ॥१३॥

अद्यप्रभृति यामन्यां बलान्नारी गमिष्यसि।

तदा ते शतधा मूर्धा फलिष्यति न संशयः॥१४॥

‘आज से यदि तू किसी दूसरी नारी के साथ बलपूर्वक समागम करेगा तो तेरे मस्तक के सौ टुकड़े हो जायेंगे, इसमें संशय नहीं है’ ॥ १४ ॥

इत्यहं तस्य शापस्य भीतः प्रसभमेव ताम्।

नारोहये बलात् सीतां वैदेहीं शयने शुभे॥१५॥

‘इस तरह मैं ब्रह्माजी के शाप से भयभीत हूँ। इसीलिये अपनी शुभ-शय्यापर विदेहकुमारी सीता को हठात् एवं बलपूर्वक नहीं चढ़ाता हूँ॥ १५ ॥

सागरस्येव मे वेगो मारुतस्येव मे गतिः।

नैतद् दाशरथिर्वेद ह्यासादयति तेन माम्॥१६॥

‘मेरा वेग समुद्र के समान है और मेरी गति वायु के तुल्य है। इस बात को दशरथनन्दन राम नहीं जानते हैं, इसी से वे मुझ पर चढ़ाई करते हैं॥१६॥

को हि सिंहमिवासीनं सुप्तं गिरिगुहाशये।

क्रुद्धं मृत्युमिवासीनं प्रबोधयितुमिच्छति ॥१७॥

‘अन्यथा पर्वत की कन्दरा में सुखपूर्वक सोये हुए सिंह के समान तथा कुपित होकर बैठी हुई मृत्यु के तुल्य भयंकर मुझ रावण को कौन जगाना चाहेगा?॥१७॥

न मत्तो निर्गतान् बाणान् द्विजिह्वान् पन्नगानिव।

रामः पश्यति संग्रामे तेन मामभिगच्छति॥१८॥

‘मेरे धनुष से छूटे हुए दो जीभवाले सो के समान भयंकर बाणों को समराङ्गण में श्रीराम ने कभी देखा नहीं है, इसीलिये वे मुझ पर चढ़े आ रहे हैं ॥ १८॥

क्षिप्रं वज्रसमैर्बाणैः शतधा कार्मुकच्युतैः।

राममादीपयिष्यामि उल्काभिरिव कुञ्जरम्॥१९॥

‘मैं अपने धनुष से शीघ्रतापूर्वक छूटे हुए सैकड़ों वज्रसदृश बाणों द्वारा राम को उसी प्रकार जलाडालूँगा, जैसे लोग उल्काओं द्वारा हाथी को उसे भगाने के लिये जलाते हैं॥ १९॥

तच्चास्य बलमादास्ये बलेन महता वृतः।

उदितः सविता काले नक्षत्राणां प्रभामिव॥२०॥

‘जैसे प्रातःकाल उदित हुए सूर्यदेव नक्षत्रों की प्रभा को छीन लेते हैं, उसी प्रकार अपनी विशाल सेना से घिरा हुआ मैं उनकी उस वानर-सेना को आत्मसात् कर लूँगा॥ २०॥

न वासवेनापि सहस्रचक्षुषा युधास्मि शक्यो वरुणेन वा पुनः।

मया त्वियं बाहुबलेन निर्जिता पुरा पुरी वैश्रवणेन पालिता॥२१॥

युद्ध में तो हजार नेत्रोंवाले इन्द्र और वरुण भी मेरा सामना नहीं कर सकते। पूर्वकाल में कुबेर के द्वारा पालित हुई इस लङ्कापुरी को मैंने अपने बाहुबल से ही जीता था’ ॥ २१॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे त्रयोदशः सर्गः॥१३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में तेरहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १३॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
युद्धकाण्डम्

विभीषण का राम को अजेय बताकर उनके पास सीता को लौटा देने की सम्मति देना

चतुर्दशः सर्गः

सर्ग-14

निशाचरेन्द्रस्य निशम्य वाक्यं स कुम्भकर्णस्य च गर्जितानि।

विभीषणो राक्षसराजमुख्यमुवाच वाक्यं हितमर्थयुक्तम्॥१॥

राक्षसराज रावण के इन वचनों और कुम्भकर्ण की गर्जनाओं को सुनकर विभीषण ने रावण से ये सार्थक और हितकारी वचन कहे- ॥१॥

वृतो हि बाह्वन्तरभोगराशिश्चिन्ताविषः सुस्मिततीक्ष्णदंष्ट्रः।

पञ्चाङ्गलीपञ्चशिरोऽतिकायः सीतामहाहिस्तव केन राजन्॥२॥

‘राजन् ! सीता नामधारी विशालकाय महान् सर्प को किसने आपके गले में बाँध दिया है? उसके हृदय का भाग ही उस सर्प का शरीर है, चिन्ता ही विष है, सुन्दर मुसकान ही तीखी दाढ़ हैं और प्रत्येक हाथ की पाँच-पाँच अङ्गलियाँ ही इस सर्प के पाँच सिर हैं॥२॥

यावन्न लङ्कां समभिद्रवन्ति बलीमुखाः पर्वतकूटमात्राः।

दंष्ट्रायुधाश्चैव नखायुधाश्च प्रदीयतां दाशरथाय मैथिली॥३॥

‘जबतक पर्वत-शिखर के समान ऊँचे वानर, जिनके दाँत और नख ही आयुध हैं, लङ्का पर चढ़ाई नहीं करते, तभी तक आप दशरथनन्दन श्रीराम के हाथ में मिथिलेशकुमारी सीता को सौंप दीजिये॥३॥

यावन्न गृह्णन्ति शिरांसि बाणा रामेरिता राक्षसपुंगवानाम्।

वज्रोपमा वायुसमानवेगाः प्रदीयतां दाशरथाय मैथिली॥४॥

‘जबतक श्रीरामचन्द्रजी के चलाये हुए वायु के समान वेगशाली तथा वज्रतुल्य बाण राक्षसशिरोमणियों के सिर नहीं काट रहे हैं, तभी तक आप दशरथनन्दन श्रीराम की सेवा में सीताजी को समर्पित कर दीजिये॥४॥

न कुम्भकर्णेन्द्रजितौ च राजं स्तथा महापार्श्वमहोदरौ वा।

निकुम्भकुम्भौ च तथातिकायः स्थातुं समर्था युधि राघवस्य॥५॥

‘राजन्! ये कुम्भकर्ण, इन्द्रजित् , महापार्श्व, महोदर, निकुम्भ, कुम्भ और अतिकाय—कोई भी समराङ्गण में श्रीरघुनाथजी के सामने नहीं ठहर सकते हैं।॥ ५॥

जीवंस्तु रामस्य न मोक्ष्यसे त्वं गुप्तः सवित्राप्यथवा मरुद्भिः।

न वासवस्याङ्कगतो न मृत्यो नभो न पातालमनुप्रविष्टः॥६॥

‘यदि सूर्य या वायु आपकी रक्षा करें, इन्द्र या यम आपको गोद में छिपा लें अथवा आप आकाश या पाताल में घुस जायँ तो भी श्रीराम के हाथ से जीवित नहीं बच सकेंगे’॥ ६॥

निशम्य वाक्यं तु विभीषणस्य ततः प्रहस्तो वचनं बभाषे।

न नो भयं विद्म न दैवतेभ्यो न दानवेभ्योऽप्यथवा कदाचित्॥७॥

विभीषण की यह बात सुनकर प्रहस्त ने कहा—’हम देवताओं अथवा दानवों से कभी नहीं डरते। भय क्या वस्तु है ? यह हम जानते ही नहीं हैं॥७॥

न यक्षगन्धर्वमहोरगेभ्यो भयं न संख्ये पतगोरगेभ्यः।

कथं नु रामाद् भविता भयं नो नरेन्द्रपुत्रात् समरे कदाचित्॥८॥

‘हमें युद्ध में यक्षों, गन्धों , बड़े-बड़े नागों, पक्षियों और साँसे भी भय नहीं होता है; फिर समराङ्गण में राजकुमार राम से हमें कभी भी कैसे भय होगा?’॥८॥

प्रहस्तवाक्यं त्वहितं निशम्य विभीषणो राजहितानुकाङ्क्षी।

ततो महार्थं वचनं बभाषे धर्मार्थकामेषु निविष्टबुद्धिः॥९॥

विभीषण राजा रावण के सच्चे हितैषी थे। उनकी बुद्धि का धर्म, अर्थ और काम में अच्छा प्रवेश था। उन्होंने प्रहस्त के अहितकर वचन सुनकर यह महान् अर्थ से युक्त बात कही— ॥९॥

प्रहस्त राजा च महोदरश्च त्वं कुम्भकर्णश्च यथार्थजातम्।

ब्रवीत रामं प्रति तन्न शक्यं यथा गतिः स्वर्गमधर्मबुद्धेः॥१०॥

‘प्रहस्त! महाराज रावण, महोदर, तुम और कुम्भकर्ण–श्रीराम के प्रति जो कुछ कह रहे हो, वह सब तुम्हारे किये नहीं हो सकता। ठीक उसी तरह, जैसे पापात्मा पुरुष की स्वर्ग में पहुँच नहीं हो सकती है॥ १०॥

वधस्तु रामस्य मया त्वया च प्रहस्त सर्वैरपि राक्षसैर्वा।

कथं भवेदर्थविशारदस्य महार्णवं तर्तुमिवाप्लवस्य॥११॥

‘प्रहस्त! श्रीराम अर्थविशारद हैं—समस्त कार्यों के साधन में कुशल हैं। जैसे बिना जहाज या नौका के कोई महासागर को पार नहीं कर सकता, उसी प्रकार मुझसे, तुमसे अथवा समस्त राक्षसों से भी श्रीराम का वध होना कैसे सम्भव है ? ॥ ११ ॥

धर्मप्रधानस्य महारथस्य इक्ष्वाकुवंशप्रभवस्य राज्ञः।

पुरोऽस्य देवाश्च तथाविधस्य कृत्येषु शक्तस्य भवन्ति मूढाः॥१२॥

‘श्रीराम धर्म को ही प्रधान वस्तु मानते हैं। उनका प्रादुर्भाव इक्ष्वाकुकुल में हुआ है। वे सभी कार्यों के सम्पादन में समर्थ और महारथी वीर हैं (उन्होंने विराध, कबन्ध और वाली-जैसे वीरों को बात-की बात में यमलोक भेज दिया था)। ऐसे प्रसिद्ध पराक्रमी राजा श्रीराम से सामना पड़ने पर तो देवता भी अपनी हेकड़ी भूल जायँगे (फिर हमारी-तुम्हारी तो बात ही क्या है ?) ॥ १२॥

तीक्ष्णा न तावत् तव कङ्कपत्रा दुरासदा राघवविप्रमुक्ताः।

भित्त्वा शरीरं प्रविशन्ति बाणाः प्रहस्त तेनैव विकत्थसे त्वम्॥१३॥

‘प्रहस्त! अभीतक श्रीराम के चलाये हुए कङ्कपत्रयुक्त, दुर्जय एवं तीखे बाण तुम्हारे शरीर को विदीर्ण करके भीतर नहीं घुसे हैं; इसीलिये तुम बढ़बढ़कर बोल रहे हो॥ १३॥

भित्त्वा न तावत् प्रविशन्ति कायं प्राणान्तिकास्तेऽशनितुल्यवेगाः।

शिताः शरा राघवविप्रमुक्ताः प्रहस्त तेनैव विकत्थसे त्वम्॥१४॥

‘प्रहस्त! श्रीराम के बाण वज्र के समान वेगशाली होते हैं। वे प्राणों का अन्त करके ही छोड़ते हैं। श्रीरघुनाथजी के धनुष से छूटे हुए वे तीखे बाण तुम्हारे शरीरको फोड़कर अंदर नहीं घुसे हैं; इसीलिये तुम इतनी शेखी बघारते हो॥ १४ ॥

न रावणो नातिबलस्त्रिशीर्षो न कुम्भकर्णस्य सुतो निकुम्भः।

न चेन्द्रजिद दाशरथिं प्रवोढुं त्वं वा रणे शक्रसमं समर्थः॥१५॥

‘रावण, महाबली त्रिशिरा, कुम्भकर्णकुमार निकुम्भ और इन्द्रविजयी मेघनाद भी समराङ्गण में इन्द्रतुल्य तेजस्वी दशरथनन्दन श्रीराम का वेग सहन करने में समर्थ नहीं हैं ॥ १५ ॥

देवान्तको वापि नरान्तको वा तथातिकायोऽतिरथो महात्मा।

अकम्पनश्चाद्रिसमानसारः स्थातुं न शक्ता युधि राघवस्य॥१६॥

‘देवान्तक, नरान्तक, अतिकाय, महाकाय, अतिरथ तथा पर्वत के समान शक्तिशाली अकम्पन भी युद्धभूमि में श्रीरघुनाथजी के सामने नहीं ठहर सकते हैं।॥ १६॥

अयं च राजा व्यसनाभिभूतो मित्रैरमित्रप्रतिमैर्भवद्भिः।

अन्वास्यते राक्षसनाशनार्थे तीक्ष्णः प्रकृत्या ह्यसमीक्षकारी॥१७॥

‘ये महाराज रावण तो व्यसनों के* वशीभूत हैं, इसलिये सोच-विचारकर काम नहीं करते हैं। इसके सिवा ये स्वभाव से ही कठोर हैं तथा राक्षसों के सत्यानाश के लिये तुम-जैसे शत्रुतुल्य मित्रकी सेवा में उपस्थित रहते हैं।

* राजाओं में सात व्यसन माने गये हैं

वाग्दण्डयोस्तु पारुष्यमर्थदूषणमेव च।

पानं स्त्री मृगया द्यूतं व्यसनं सप्तधा प्रभो॥

(कामन्दक नीति का वचन गोविन्दराज की टीका रामायणभूषण से) वाणी और दण्ड की कठोरता, धनका अपव्यय, मद्यपान, स्त्री, मृगया और द्यूत-ये राजा के सात प्रकार के व्यसन

अनन्तभोगेन सहस्रमूर्ना नागेन भीमेन महाबलेन।

बलात् परिक्षिप्तमिमं भवन्तो राजानमुत्क्षिप्य विमोचयन्तु॥१८॥

‘अनन्त शारीरिक बल से सम्पन्न, सहस्र फनवाले और महान् बलशाली भयंकर नाग ने इस राजा को बलपूर्वक अपने शरीर से आवेष्टित कर रखा है। तुम सब लोग मिलकर इसे बन्धन से बाहर करके प्राण संकट से बचाओ (अर्थात् श्रीरामचन्द्रजी के साथ वैर बाँधना महान् सर्प के शरीर से आवेष्टित होने के समान है। इस भाव को व्यक्त करने के कारण यहाँ निदर्शना अलङ्कार व्यंग्य है) ॥ १८॥

यावद्धि केशग्रहणात् सुहृद्भिः समेत्य सर्वैः परिपूर्णकामैः।

निगृह्य राजा परिरक्षितव्यो भूतैर्यथा भीमबलैर्गृहीतः॥१९॥

‘इस राजा से अबतक आपलोगों की सभी कामनाएँ पूर्ण हुई हैं। आप सब लोग इसके हितैषी सुहृद् हैं।अतः जैसे भयंकर बलशाली भूतों से गृहीत हुए पुरुष को उसके हितैषी आत्मीयजन उसके प्रति बलपूर्वक व्यवहार करके भी उसकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार आप सब लोग एकमत होकर आवश्यकता हो तो इसके केश पकड़कर भी इसे अनुचित मार्ग पर जाने से रोकें और सब प्रकार से इसकी रक्षा करें॥ १९॥

सुवारिणा राघवसागरेण प्रच्छाद्यमानस्तरसा भवद्भिः।

युक्तस्त्वयं तारयितुं समेत्य काकुत्स्थपातालमुखे पतन् सः॥२०॥

‘उत्तम चरित्ररूपी जल से परिपूर्ण श्रीरघुनाथरूपी समुद्र इसे डुबो रहा है अथवा यों समझो कि यह श्रीरामरूपी पाताल के गहरे गर्त में गिर रहा है। ऐसी दशा में तुम सब लोगों को मिलकर इसका उद्धार करना चाहिये॥२०॥

इदं पुरस्यास्य सराक्षसस्य राज्ञश्च पथ्यं ससुहृज्जनस्य।

सम्यग्घि वाक्यं स्वमतं ब्रवीमि नरेन्द्रपुत्राय ददातु मैथिलीम्॥ २१॥

‘मैं तो राक्षसोंसहित इस सारे नगर के और सुहृदोंसहित स्वयं महाराज के हित के लिये अपनी यही उत्तम सम्मति देता हूँ कि ‘ये राजकुमार श्रीराम के हाथों में मिथिलेशकुमारी सीता को सौंप दें’॥ २१॥

परस्य वीर्यं स्वबलं च बुद्ध्वा स्थानं क्षयं चैव तथैव वृद्धिम्।

तथा स्वपक्षेऽप्यनुमृश्य बुद्ध्या वदेत् क्षमं स्वामिहितं स मन्त्री॥२२॥

‘वास्तव में सच्चा मन्त्री वही है जो अपने और शत्रुपक्ष के बल-पराक्रम को समझकर तथा दोनों पक्षों की स्थिति, हानि और वृद्धि का अपनी बुद्धि के द्वारा विचार करके जो स्वामी के लिये हितकर और उचित हो वही बात कहे’ ॥ २२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे चतुर्दशः सर्गः॥१४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में चौदहवाँ सर्ग पूरा हुआ।१४॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
युद्धकाण्डम्

इन्द्रजित् द्वारा विभीषण का उपहास तथा विभीषण का उसे फटकारकर सभा में अपनी उचित सम्मति देना

पञ्चदशः सर्गः

सर्ग-15

बृहस्पतेस्तुल्यमतेर्वचस्तन्निशम्य यत्नेन विभीषणस्य।

ततो महात्मा वचनं बभाषे तत्रेन्द्रजिन्नैर्ऋतयूथमुख्यः॥१॥

विभीषण बृहस्पति के समान बुद्धिमान् थे। उनके वचनों को जैसे-तैसे बड़े कष्ट से सुनकर राक्षसयूथपतियों में प्रधान महाकाय इन्द्रजित् ने वहाँ यह बात कही— ॥१॥

किं नाम ते तात कनिष्ठ वाक्य मनर्थकं वै बहभीतवच्च।

अस्मिन् कुले योऽपि भवेन्न जातः सोऽपीदृशं नैव वदेन्न कुर्यात्॥२॥

‘मेरे छोटे चाचा! आप बहुत डरे हुए की भाँति यह कैसी निरर्थक बात कह रहे हैं? जिसने इस कुल में जन्म न लिया होगा, वह पुरुष भी न तो ऐसी बात कहेगा और न ऐसा काम ही करेगा॥२॥

सत्त्वेन वीर्येण पराक्रमेण धैर्येण शौर्येण च तेजसा च।

एकः कुलेऽस्मिन् पुरुषो विमुक्तो विभीषणस्तात कनिष्ठ एषः॥३॥

‘पिताजी! हमारे इस राक्षसकुल में एकमात्र ये छोटे चाचा विभीषण ही बल, वीर्य, पराक्रम, धैर्य, शौर्य और तेज से रहित हैं॥३॥

किं नाम तौ मानुषराजपुत्रावस्माकमेकेन हि राक्षसेन।

सुप्राकृतेनापि निहन्तुमेतौ शक्यौ कुतो भीषयसे स्म भीरो॥४॥

‘वे दोनों मानव राजकुमार क्या हैं? उन्हें तो हमारा एक साधारण-सा राक्षस भी मार सकता है; फिर मेरे डरपोक चाचा! आप हमें क्यों डरा रहे हैं? ॥ ४॥

त्रिलोकनाथो ननु देवराजः शक्रो मया भूमितले निविष्टः।

भयार्पिताश्चापि दिशः प्रपन्नाः सर्वे तदा देवगणाः समग्राः॥५॥

‘मैंने तीनों लोकों के स्वामी देवराज इन्द्र को भी स्वर्ग से हटाकर इस भूतल पर ला बिठाया था। उस समय सारे देवताओं ने भयभीत हो भागकर सम्पूर्ण दिशाओं की शरण ली थी॥५॥

ऐरावतो निःस्वनमुन्नदन् स निपातितो भूमितले मया तु।

विकृष्य दन्तौ तु मया प्रसह्य वित्रासिता देवगणाः समग्राः॥६॥

‘मैंने हठपूर्वक ऐरावत हाथी के दोनों दाँत उखाड़कर उसे स्वर्ग से पृथ्वी पर गिरा दिया था। उस समय वह जोर-जोर से चिग्घाड़ रहा था। अपने इस पराक्रम द्वारा मैंने सम्पूर्ण देवताओं को आतङ्क में डाल दिया था॥६॥

सोऽहं सुराणामपि दर्पहन्ता दैत्योत्तमानामपि शोककर्ता।

कथं नरेन्द्रात्मजयोर्न शक्तो मनुष्ययोः प्राकृतयोः सुवीर्यः॥७॥

‘जो देवताओं के भी दर्प का दलन कर सकता है, बड़े-बड़े दैत्यों को भी शोकमग्न कर देने वाला है तथा जो उत्तम बल-पराक्रम से सम्पन्न है, वही मुझ-जैसा वीर मनुष्य-जाति के दो साधारण राजकुमारों का सामना कैसे नहीं कर सकता है ?’ ॥ ७॥

अथेन्द्रकल्पस्य दुरासदस्य महौजसस्तद् वचनं निशम्य।

ततो महार्थं वचनं बभाषे विभीषणः शस्त्रभृतां वरिष्ठः॥८॥

इन्द्रतुल्य तेजस्वी महापराक्रमी दुर्जय वीर इन्द्रजित् की यह बात सुनकर शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ विभीषण ने ये महान् अर्थ से युक्त वचन कहे- ॥८॥

न तात मन्त्रे तव निश्चयोऽस्ति बालस्त्वमद्याप्यविपक्वबुद्धिः।

तस्मात् त्वयाप्यात्मविनाशनाय वचोऽर्थहीनं बहु विप्रलप्तम्॥९॥

‘तात! अभी तुम बालक हो। तुम्हारी बुद्धि कच्ची है। तुम्हारे मन में कर्तव्य और अकर्तव्य का यथार्थ निश्चय नहीं हुआ है। इसीलिये तुम भी अपने ही विनाश के लिये बहुत-सी निरर्थक बातें बक गये हो॥

९॥

पुत्रप्रवादेन तु रावणस्य त्वमिन्द्रजिन्मित्रमुखोऽसि शत्रुः।

यस्येदृशं राघवतो विनाशं निशम्य मोहादनुमन्यसे त्वम्॥१०॥

‘इन्द्रजित् ! तुम रावण के पुत्र कहलाकर भी ऊपर से ही उसके मित्र हो। भीतर से तो तुम पिता के शत्रु ही जान पड़ते हो। यही कारण है कि तुम श्रीरघुनाथजी के द्वारा राक्षसराज के विनाश की बातें सुनकर भी मोहवश उन्हीं की हाँ-में-हाँ मिला रहे हो॥ १०॥

त्वमेव वध्यश्च सुदुर्मतिश्च स चापि वध्यो य इहानयत् त्वाम्।

बालं दृढं साहसिकं च योऽद्य प्रावेशयन्मन्त्रकृतां समीपम्॥११॥

‘तुम्हारी बुद्धि बहुत ही खोटी है। तुम स्वयं तो मार डालने के योग्य हो ही, जो तुम्हें यहाँ बुला लाया है, वह भी वध के ही योग्य है। जिसने आज तुम-जैसे अत्यन्त दुःसाहसी बालक को इन सलाहकारों के समीप आने दिया है, वह प्राणदण्ड का ही अपराधी है॥ ११॥

मूढोऽप्रगल्भोऽविनयोपपन्नस्तीक्ष्णस्वभावोऽल्पमतिर्दुरात्मा।

मूर्खस्त्वमत्यन्तसुदुर्मतिश्च त्वमिन्द्रजिद् बालतया ब्रवीषि॥१२॥

‘इन्द्रजित्! तुम अविवेकी हो तुम्हारी बुद्धि परिपक्व नहीं है। विनय तो तुम्हें छूतक नहीं गयी है। तुम्हारा स्वभाव बड़ा तीखा और बुद्धि बहुत थोड़ी है। तुम अत्यन्त दुर्बुद्धि, दुरात्मा और मूर्ख हो। इसीलिये बालकों की-सी बे-सिर-पैर की बातें करते हो ॥ १२ ॥

को ब्रह्मदण्डप्रतिमप्रकाशानर्चिष्मतः कालनिकाशरूपान्।

सहेत बाणान् यमदण्डकल्पान् समक्षमुक्तान् युधि राघवेण॥१३॥

‘भगवान् श्रीराम के द्वारा युद्ध के मुहानेपर शत्रुओंके समक्ष छोड़े गये तेजस्वी बाण साक्षात् ब्रह्मदण्ड के समान प्रकाशित होते हैं, काल के समान जान पड़ते हैं और यमदण्ड के समान भयंकर होते हैं। भला, उन्हें कौन सह सकता है ? ॥ १३॥

धनानि रत्नानि सुभूषणानि वासांसि दिव्यानि मणींश्च चित्रान्।

सीतां च रामाय निवेद्य देवीं वसेम राजन्निह वीतशोकाः॥१४॥

‘अतः राजन् ! हमलोग धन, रत्न, सुन्दर आभूषण, दिव्यवस्त्र, विचित्र मणि और देवी सीता को श्रीराम की सेवा में समर्पित करके ही शोकरहित होकर इस नगर में निवास कर सकते हैं ॥ १४ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे पञ्चदशः सर्गः॥१५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में पंद्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १५॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
युद्धकाण्डम्

रावण के द्वारा विभीषण का तिरस्कार और विभीषण का भी उसे फटकारकर चल देना

षोडशः सर्गः

सर्ग-16

सुनिविष्टं हितं वाक्यमुक्तवन्तं विभीषणम्।

अब्रवीत् परुषं वाक्यं रावणः कालचोदितः॥

रावण के सिर पर काल मँडरा रहा था, इसलिये उसने सुन्दर अर्थ से युक्त और हितकर बात कहने पर भी विभीषण से कठोर वाणी में कहा— ॥१॥

वसेत् सह सपत्नेन क्रुद्धेनाशीविषेण च।

न तु मित्रप्रवादेन संवसेच्छत्रुसेविना॥२॥

‘भाई! शत्रु और कुपित विषधर सर्प के साथ रहना पड़े तो रह ले; परंतु जो मित्र कहलाकर भी शत्रु की सेवा कर रहा हो, उसके साथ कदापि न रहे ॥२॥

जानामि शीलं ज्ञातीनां सर्वलोकेषु राक्षस।

हृष्यन्ति व्यसनेष्वेते ज्ञातीनां ज्ञातयः सदा॥३॥

‘राक्षस! सम्पूर्ण लोकों में सजातीय बन्धुओं का जो स्वभाव होता है, उसे मैं अच्छी तरह जानता हूँ। जातिवाले सर्वदा अपने अन्य सजातीयों की आपत्तियों में ही हर्ष मानते हैं॥३॥

प्रधानं साधकं वैद्यं धर्मशीलं च राक्षस।

ज्ञातयोऽप्यवमन्यन्ते शूरं परिभवन्ति च॥४॥

‘निशाचर! जो ज्येष्ठ होने के कारण राज्य पाकर सबमें प्रधान हो गया हो, राज्यकार्य को अच्छी तरह चला रहा हो और विद्वान्, धर्मशील तथा शूरवीर हो, उसे भी कुटुम्बीजन अपमानित करते हैं और अवसर पाकर उसे नीचा दिखाने की भी चेष्टा करते हैं॥४॥

नित्यमन्योन्यसंहृष्टा व्यसनेष्वाततायिनः।

प्रच्छन्नहृदया घोरा ज्ञातयस्तु भयावहाः॥५॥

‘जातिवाले सदा एक-दूसरे पर संकट आने पर हर्ष का अनुभव करते हैं। वे बड़े आततायी होते हैं। मौका पड़ने पर आग लगाने, जहर देने, शस्त्र चलाने, धन हड़पने और क्षेत्र तथा स्त्री का अपहरण करने में भी नहीं हिचकते हैं। अपना मनोभाव छिपाये रहते हैं; अतएव क्रूर और भयंकर होते हैं॥५॥

श्रूयन्ते हस्तिभिगीताः श्लोकाः पद्मवने पुरा।

पाशहस्तान् नरान् दृष्ट्वा शृणुष्व गदतो मम॥६॥

‘पूर्वकाल की बात है, पद्मवन में हाथियों ने अपने हृदय के उद्गार प्रकट किये थे, जो अब भी श्लोकों के रूप में गाये और सुने जाते हैं। एक बार कुछ लोगों को हाथ में फंदा लिये आते देख हाथियों ने जो बातें कही थीं, उन्हें बता रहा हूँ, मुझसे सुनो॥६॥

नाग्निर्नान्यानि शस्त्राणि न नः पाशा भयावहाः।

घोराः स्वार्थप्रयुक्तास्तु ज्ञातयो नो भयावहाः॥७॥

‘हमें अग्नि, दूसरे-दूसरे शस्त्र तथा पाश भय नहीं दे सकते। हमारे लिये तो अपने स्वार्थी जाति-भाई ही भयानक और खतरे की वस्तु हैं ॥ ७॥

उपायमेते वक्ष्यन्ति ग्रहणे नात्र संशयः।

कृत्स्नाद् भयाज्ज्ञातिभयं कुकष्टं विहितं च नः॥८॥

‘ये ही हमारे पकड़े जाने का उपाय बता देंगे, इसमें संशय नहीं; अतः सम्पूर्ण भयों की अपेक्षा हमें अपने जाति-भाइयों से प्राप्त होने वाला भय ही अधिक कष्टदायक जान पड़ता है॥ ८॥

विद्यते गोषु सम्पन्नं विद्यते ज्ञातितो भयम्।

विद्यते स्त्रीषु चापल्यं विद्यते ब्राह्मणे तपः॥९॥

‘जैसे गौओं में हव्य-कव्य की सम्पत्ति दूध होता है, स्त्रियों में चपलता होती है और ब्राह्मण में तपस्या रहा करती है, उसी प्रकार जाति-भाइयों से भय अवश्य प्राप्त होता है॥ ९॥

ततो नेष्टमिदं सौम्य यदहं लोकसत्कृतः।

ऐश्वर्यमभिजातश्च रिपूणां मूर्ध्नि च स्थितः॥१०॥

‘अतः सौम्य! आज जो सारा संसार मेरा सम्मान करता है और मैं जो ऐश्वर्यवान्, कुलीन और शत्रुओं के सिर पर स्थित हूँ, यह सब तुम्हें अभीष्ट नहीं है॥१०॥

यथा पुष्करपत्रेषु पतितास्तोयबिन्दवः।

न श्लेषमभिगच्छन्ति तथानार्येषु सौहृदम्॥११॥

‘जैसे कमल के पत्ते पर गिरी हुई पानी की बूंदें उसमें सटती नहीं हैं, उसी प्रकार अनार्यों के हृदय में सौहार्द नहीं टिकता है॥११॥

यथा शरदि मेघानां सिञ्चतामपि गर्जताम्।

न भवत्यम्बुसंक्लेदस्तथानार्येषु सौहृदम्॥१२॥

‘जैसे शरद् ऋतु में गर्जते और बरसते हुए मेघों के जल से धरती गीली नहीं होती है, उसी प्रकार अनार्यों के हृदय में स्नेहजनित आर्द्रता नहीं होती है। १२॥

यथा मधुकरस्तर्षाद् रसं विन्दन्न तिष्ठति।

तथा त्वमपि तत्रैव तथानार्येषु सौहृदम्॥१३॥

‘जैसे भौंरा बड़ी चाहसे फूलों का रस पीता हुआ भी वहाँ ठहरता नहीं है, उसी प्रकार अनार्यों में सुहज्जनोचित स्नेह नहीं टिक पाता है। तुम भी ऐसे ही अनार्य हो॥

यथा मधुकरस्तर्षात् काशपुष्पं पिबन्नपि।

रसमत्र न विन्देत तथानार्येषु सौहृदम्॥१४॥

‘जैसे भ्रमर रस की इच्छा से काश के फूल का पान करे तो उसमें रस नहीं पा सकता, उसी प्रकार अनार्यों में जो स्नेह होता है, वह किसी के लिये लाभदायक नहीं होता॥ १४॥

यथा पूर्वं गजः स्नात्वा गृह्य हस्तेन वै रजः।

दूषयत्यात्मनो देहं तथानार्येषु सौहृदम्॥१५॥

‘जैसे हाथी पहले स्नान करके फिर सँड़ से धूल उछालकर अपने शरीर को गँदला कर लेता है, उसी प्रकार दुर्जनों की मैत्री दूषित होती है॥ १५ ॥

योऽन्यस्त्वेवंविधं ब्रूयाद् वाक्यमेतन्निशाचर।

अस्मिन् मुहूर्ते न भवेत् त्वां तु धिक् कुलपांसन॥१६॥

‘कुलकलङ्क निशाचर! तुझे धिक्कार है। यदि तेरे सिवा दूसरा कोई ऐसी बातें कहता तो उसे इसी मुहूर्त में अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ता’॥ १६ ॥

इत्युक्तः परुषं वाक्यं न्यायवादी विभीषणः।

उत्पपात गदापाणिश्चतुर्भिः सह राक्षसैः ॥१७॥

विभीषण न्यायानुकूल बातें कह रहे थे तो भी रावण ने जब उनसे ऐसे कठोर वचन कहे, तब वे हाथ में गदा लेकर अन्य चार राक्षसों के साथ उसी समय उछलकर आकाश में चले गये॥ १७॥

अब्रवीच्च तदा वाक्यं जातक्रोधो विभीषणः।

अन्तरिक्षगतः श्रीमान् भ्राता वै राक्षसाधिपम्॥१८॥

उस समय अन्तरिक्ष में खड़े हुए तेजस्वी भ्राता विभीषण ने कुपित होकर राक्षसराज रावण से कहा

स त्वं भ्रान्तोऽसि मे राजन् ब्रूहि मां यद्

यदिच्छसि। ज्येष्ठो मान्यः पितृसमो न च धर्मपथे स्थितः।

इदं हि परुषं वाक्यं न क्षमाम्यग्रजस्य ते॥१९॥

‘राजन्! तुम्हारी बुद्धि भ्रम में पड़ी हुई है। तुम धर्म के मार्ग पर नहीं हो। यों तो मेरे बड़े भाई होने के कारण तुम पिता के समान आदरणीय हो। इसलिये मुझे जो-जो चाहो, कह लो; परंतु अग्रज होने पर भी

तुम्हारे इस कठोर वचन को कदापि नहीं सह सकता॥ १९॥

सुनीतं हितकामेन वाक्यमुक्तं दशानन।

न गृह्णन्त्यकृतात्मानः कालस्य वशमागताः॥२०॥

‘दशानन ! जो अजितेन्द्रिय पुरुष काल के वशीभूत हो जाते हैं, वे हितकी कामना से कहे हुए सुन्दर नीतियुक्त वचनों को भी नहीं ग्रहण करते हैं॥ २० ॥

सुलभाः पुरुषा राजन् सततं प्रियवादिनः।

अप्रियस्य च पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः॥२१॥

‘राजन्! सदा प्रिय लगने वाली मीठी-मीठी बातें कहने वाले लोग तो सुगमता से मिल सकते हैं; परंतु जो सुनने में अप्रिय किंतु परिणाम में हितकर हो, ऐसी बात कहने और सुनने वाले दुर्लभ होते हैं।॥ २१॥

बद्धं कालस्य पाशेन सर्वभूतापहारिणः।

न नश्यन्तमुपेक्षे त्वां प्रदीप्तं शरणं यथा॥ २२॥

‘तुम समस्त प्राणियों का संहार करने वाले काल के पाश में बँध चुके हो। जिसमें आग लग गयी हो, उस घर की भाँति नष्ट हो रहे हो। ऐसी दशा में मैं तुम्हारी उपेक्षा नहीं कर सकता था, इसीलिये तुम्हें हित की बात सुझा दी थी॥ २२॥

दीप्तपावकसंकाशैः शितैः काञ्चनभूषणैः ।

न त्वामिच्छाम्यहं द्रष्टुं रामेण निहतं शरैः॥ २३॥

‘श्रीराम के सुवर्णभूषित बाण प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी और तीखे हैं। मैं श्रीराम के द्वारा उन बाणों से तुम्हारी मृत्यु नहीं देखना चाहता था, इसीलिये तुम्हें समझाने की चेष्टा की थी॥ २३॥

शूराश्च बलवन्तश्च कृतास्त्राश्च नरा रणे।

कालाभिपन्नाः सीदन्ति यथा वालुकसेतवः॥२४॥

काल के वशीभूत होने पर बड़े-बड़े शूरवीर, बलवान् और अस्त्रवेत्ता भी बालूकी भीति या बाँध के समान नष्ट हो जाते हैं ॥ २४॥

तन्मर्षयतु यच्चोक्तं गुरुत्वाद्धितमिच्छता।

आत्मानं सर्वथा रक्ष पुरीं चेमां सराक्षसाम्।

स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि सुखी भव मया विना॥२५॥

‘राक्षसराज! मैं तुम्हारा हित चाहता हूँ। इसीलिये जो कुछ भी कहा है, वह यदि तुम्हें अच्छा नहीं लगा तो उसके लिये मुझे क्षमा कर दो; क्योंकि तुम मेरे बड़े भाई हो। अब तुम अपनी तथा राक्षसोंसहित इस समस्त लङ्कापुरी की सब प्रकार से रक्षा करो। तुम्हारा कल्याण हो। अब मैं यहाँ से चला जाऊँगा। तुम मेरे बिना सुखी हो जाओ॥ २५ ॥

निवार्यमाणस्य मया हितैषिणा न रोचते ते वचनं निशाचर।

परान्तकाले हि गतायुषो नरा हितं न गृह्णन्ति सुहृद्भिरीरितम्॥२६॥

‘निशाचरराज! मैं तुम्हारा हितैषी हूँ। इसीलिये मैंने तुम्हें बार-बार अनुचित मार्ग पर चलने से रोका है, किंतु तुम्हें मेरी बात अच्छी नहीं लगती है। वास्तव में जिन लोगों की आयु समाप्त हो जाती है, वे जीवन के अन्तकाल में अपने सुहृदों की कही हुई हितकर बात भी नहीं मानते हैं’॥२६॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे षोडशः सर्गः॥१६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में सोलहवाँ सर्ग पूरा हुआ।१६॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
युद्धकाण्डम्

विभीषण का श्रीराम की शरण में आना और श्रीराम का अपने मन्त्रियों के साथ उन्हें आश्रय देने के विषय में विचार करना

सप्तदशः सर्गः

सर्ग-17

इत्युक्त्वा परुषं वाक्यं रावणं रावणानुजः।

आजगाम मुहूर्तेन यत्र रामः सलक्ष्मणः॥१॥

रावण से ऐसे कठोर वचन कहकर उसके छोटे भाई विभीषण दो ही घड़ी में उस स्थान पर आ गये, जहाँ लक्ष्मण-सहित श्रीराम विराजमान थे॥१॥

तं मेरुशिखराकारं दीप्तामिव शतहदाम्।

गगनस्थं महीस्थास्ते ददृशुर्वानराधिपाः॥२॥

विभीषण का शरीर सुमेरु पर्वत के शिखर के समान ऊँचा था। वे आकाश में चमकती हुई बिजली के समान जान पड़ते थे। पृथ्वी पर खड़े हुए वानरयूथपतियों ने उन्हें आकाश में स्थित देखा॥२॥

ते चाप्यनुचरास्तस्य चत्वारो भीमविक्रमाः।

तेऽपि वर्मायुधोपेता भूषणोत्तमभूषिताः॥३॥

उनके साथ जो चार अनुचर थे। वे भी बड़ा भयंकर पराक्रम प्रकट करने वाले थे। उन्होंने भी कवच धारण करके अस्त्र-शस्त्र ले रखे थे और वे सब-के-सब उत्तम आभूषणों से विभूषित थे॥३॥

स च मेघाचलप्रख्यो वज्रायुधसमप्रभः।

वरायुधधरो वीरो दिव्याभरणभूषितः॥४॥

वीर विभीषण भी मेघ और पर्वत के समान जान पड़ते थे। वज्रधारी इन्द्र के समान तेजस्वी, उत्तम आयुधधारी और दिव्य आभूषणों से अलंकृत थे॥ ४॥

तमात्मपञ्चमं दृष्ट्वा सुग्रीवो वानराधिपः।

वानरैः सह दुर्धर्षश्चिन्तयामास बुद्धिमान्॥५॥

उन चारों राक्षसों के साथ पाँचवें विभीषणको देखकर दुर्धर्ष एवं बुद्धिमान् वीर वानरराज सुग्रीव ने वानरों के साथ विचार किया।॥ ५॥

चिन्तयित्वा मुहूर्तं तु वानरांस्तानुवाच ह।

हनुमत्प्रमुखान् सर्वानिदं वचनमुत्तमम्॥६॥

थोड़ी देर  तक सोचकर उन्होंने हनुमान् आदि सब वानरों से यह उत्तम बात कही— ॥६॥

एष सर्वायुधोपेतश्चतुर्भिः सह राक्षसैः ।

राक्षसोभ्येति पश्यध्वमस्मान् हन्तुं न संशयः॥७॥

‘देखो, सब प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से सम्पन्न यह राक्षस दूसरे चार निशाचरों के साथ आ रहा है। इसमें संदेह नहीं कि यह हमें मारने के लिये ही आता है’।७॥

सुग्रीवस्य वचः श्रुत्वा सर्वे ते वानरोत्तमाः।

सालानुद्यम्य शैलांश्च इदं वचनमब्रुवन्॥८॥

सुग्रीव की यह बात सुनकर वे सभी श्रेष्ठ वानर सालवृक्ष और पर्वत की शिलाएँ उठाकर इस प्रकार बोले- ॥८॥

शीघ्रं व्यादिश नो राजन् वधायैषां दुरात्मनाम्।

निपतन्ति हता यावद् धरण्यामल्पचेतनाः॥९॥

‘राजन् ! आप शीघ्र ही हमें इन दुरात्माओं के वध की आज्ञा दीजिये, जिससे ये मन्दमति निशाचर मरकर ही इस पृथ्वी पर गिरें’॥९॥

तेषां सम्भाषमाणानामन्योन्यं स विभीषणः।

उत्तरं तीरमासाद्य खस्थ एव व्यतिष्ठत ॥१०॥

आपस में वे इस प्रकार बात कर ही रहे थे कि विभीषण समुद्र के उत्तर तट पर आकर आकाश में ही खड़े हो गये॥ १०॥

स उवाच महाप्राज्ञः स्वरेण महता महान्।

सुग्रीवं तांश्च सम्प्रेक्ष्य खस्थ एव विभीषणः॥११॥

महाबुद्धिमान् महापुरुष विभीषण ने आकाश में ही स्थित रहकर सुग्रीव तथा उन वानरों की ओर देखते हुए उच्च स्वर से कहा- ॥११॥

रावणो नाम दुर्वृत्तो राक्षसो राक्षसेश्वरः।

तस्याहमनजो भ्राता विभीषण इति श्रुतः॥१२॥

‘रावण नामका जो दुराचारी राक्षस निशाचरों का राजा है, उसीका मैं छोटा भाई हूँ। मेरा नाम विभीषण है।

तेन सीता जनस्थानाद् हृता हत्वा जटायुषम्।

रुद्धा च विवशा दीना राक्षसीभिः सुरक्षिता॥१३॥

‘रावण ने जटायु को मारकर जनस्थान से सीता का अपहरण किया था। उसीने दीन एवं असहाय सीता को रोक रखा है। इन दिनों सीता राक्षसियों के पहरे में रहती हैं।॥ १३॥

तमहं हेतुभिर्वाक्यैर्विविधैश्च न्यदर्शयम्।

साधु निर्यात्यतां सीता रामायेति पुनः पुनः॥१४॥

‘मैंने भाँति-भाँतिके युक्तिसंगत वचनोंद्वारा उसे बारंबार समझाया कि तुम श्रीरामचन्द्रजीकी सेवामें सीताको सादर लौटा दो—इसीमें भलाई है।॥ १४ ॥

स च न प्रतिजग्राह रावणः कालचोदितः।

उच्यमानं हितं वाक्यं विपरीत इवौषधम्॥१५॥

‘यद्यपि मैंने यह बात उसके हितके लिये ही कही थी तथापि काल से प्रेरित होने के कारण रावण ने मेरी बात नहीं मानी। ठीक उसी प्रकार, जैसे मरणासन्न पुरुष औषध नहीं लेता॥ १५॥

सोऽहं परुषितस्तेन दासवच्चावमानितः।

त्यक्त्वा पुत्रांश्च दारांश्च राघवं शरणं गतः॥१६॥

‘यही नहीं, उसने मुझे बहुत-सी कठोर बातें सुनायीं और दास की भाँति मेरा अपमान किया। इसलिये मैं अपने स्त्री-पुत्रों को वहीं छोड़कर श्रीरघुनाथजी की शरण में आया हूँ॥१६॥

निवेदयत मां क्षिप्रं राघवाय महात्मने।

सर्वलोकशरण्याय विभीषणमुपस्थितम्॥१७॥

‘वानरो! जो समस्त लोकों को शरण देने वाले हैं, उन महात्मा श्रीरामचन्द्रजी के पास जाकर शीघ्र मेरे आगमन की सूचना दो और उनसे कहो—’शरणार्थी विभीषण सेवा में उपस्थित हुआ है’ ॥ १७॥

एतत्तु वचनं श्रुत्वा सुग्रीवो लघुविक्रमः।

लक्ष्मणस्याग्रतो रामं संरब्धमिदमब्रवीत्॥१८॥

विभीषण की यह बात सुनकर शीघ्रगामी सुग्रीव ने तुरंत ही भगवान् श्रीराम के पास जाकर लक्ष्मण के सामने ही कुछ आवेश के साथ इस प्रकार कहा— ॥ १८॥

प्रविष्टः शत्रुसैन्यं हि प्राप्तः शत्रुरतर्कितः।

निहन्यादन्तरं लब्ध्वा उलूको वायसानिव॥१९॥

‘प्रभो! आज कोई वैरी, जो राक्षस होने के कारण पहले हमारे शत्रु रावण की सेना में सम्मिलित हुआ था, अब अकस्मात् हमारी सेना में प्रवेश पाने के लिये आ गया है। वह मौका पाकर हमें उसी तरह मार डालेगा, जैसे उल्लू कौओं का काम तमाम कर देता है॥ १९॥

मन्त्रे व्यूहे नये चारे युक्तो भवितुमर्हसि।

वानराणां च भद्रं ते परेषां च परंतप॥२०॥

‘शत्रुओं को संताप देनेवाले रघुनन्दन! अतः आपको अपने वानरसैनिकों पर अनुग्रह और शत्रुओंका निग्रह करनेके लिये कार्याकार्य के विचार, सेना की मोर्चेबंदी, नीतियुक्त उपायों के प्रयोग तथा गुप्तचरों की नियुक्ति आदि के विषय में सतत सावधान रहना चाहिये। ऐसा करने से ही आपका भला होगा। २०॥

अन्तर्धानगता ह्येते राक्षसाः कामरूपिणः।

शूराश्च निकृतिज्ञाश्च तेषां जातु न विश्वसेत्॥२१॥

‘ये राक्षसलोग मनमाना रूप धारण कर सकते हैं। इनमें अन्तर्धान होने की भी शक्ति होती है। शूरवीरऔर मायावी तो ये होते ही हैं। इसलिये इनका कभी विश्वास नहीं करना चाहिये॥ २१॥

प्रणिधी राक्षसेन्द्रस्य रावणस्य भवेदयम्।

अनुप्रविश्य सोऽस्मासु भेदं कुर्यान्न संशयः॥२२॥

‘सम्भव है यह राक्षसराज रावण का कोई गुप्तचर हो। यदि ऐसा हुआ तो हमलोगों में घुसकर यह फूट पैदा कर देगा, इसमें संदेह नहीं॥ २२ ।।

अथ वा स्वयमेवैष छिद्रमासाद्य बुद्धिमान्।

अनुप्रविश्य विश्वस्ते कदाचित् प्रहरेदपि॥२३॥

‘अथवा यह बुद्धिमान् राक्षस छिद्र पाकर हमारी विश्वस्त सेना के भीतर घुसकर कभी स्वयं ही हमलोगों पर प्रहार कर बैठेगा, इस बात की भी सम्भावना है॥२३॥

मित्राटविबलं चैव मौलभृत्यबलं तथा।

सर्वमेतद् बलं ग्राह्यं वर्जयित्वा द्विषद्रलम्॥२४॥

‘मित्रों की, जंगली जातियों की तथा परम्परागत भृत्यों की जो सेनाएँ हैं, इन सबका संग्रह तो किया जा सकता है। किंतु जो शत्रुपक्ष से मिले हुए हों, ऐसे सैनिकों का संग्रह कदापि नहीं करना चाहिये॥ २४ ॥

प्रकृत्या राक्षसो ह्येष भ्रातामित्रस्य वै प्रभो।

आगतश्च रिपुः साक्षात् कथमस्मिंश्च विश्वसेत्॥ २५॥

‘प्रभो! यह स्वभाव से तो राक्षस है ही, अपने को शत्रु का भाई भी बता रहा है। इस दृष्टिसे यह साक्षात् हमारा शत्रु ही यहाँ आ पहुँचा है; फिर इस पर कैसे विश्वास किया जा सकता है॥ २५ ॥

रावणस्यानुजो भ्राता विभीषण इति श्रुतः।

चतुर्भिः सह रक्षोभिर्भवन्तं शरणं गतः॥२६॥

‘रावण का छोटा भाई, जो विभीषण के नाम से प्रसिद्ध है, चार राक्षसों के साथ आपकी शरण में आया है॥२६॥

रावणेन प्रणीतं हि तमवेहि विभीषणम्।

तस्याहं निग्रहं मन्ये क्षमं क्षमवतां वर॥२७॥

‘आप उस विभीषण को रावण का भेजा हुआ ही समझें। उचित व्यापार करने वालों में श्रेष्ठ रघुनन्दन ! मैं तो उसको कैद कर लेना ही उचित समझता हूँ। २७॥

राक्षसो जिह्मया बुद्ध्या संदिष्टोऽयमिहागतः।

प्रहर्तुं मायया छन्नो विश्वस्ते त्वयि चानघ॥२८॥

‘निष्पाप श्रीराम! मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि यह राक्षस रावण के कहने से ही यहाँ आया है। इसकी बुद्धि में कुटिलता भरी है। यह माया से छिपा रहेगा तथा जब आप इसपर पूरा विश्वास करके इसकी ओर से निश्चिन्त हो जायेंगे, तब यह आपही पर चोट कर बैठेगा। इसी उद्देश्य से इसका यहाँ आना हुआ है॥ २८॥

वध्यतामेष तीव्रण दण्डेन सचिवैः सह।

रावणस्य नृशंसस्य भ्राता ह्येष विभीषणः॥२९॥

‘यह महाक्रूर रावण का भाई है, इसलिये इसे कठोर दण्ड देकर इसके मन्त्रियों सहित मार डालना चाहिये’ ॥ २९॥

एवमुक्त्वा तु तं रामं संरब्धो वाहिनीपतिः।

वाक्यज्ञो वाक्यकुशलं ततो मौनमुपागमत्॥३०॥

बातचीत की कला जानने वाले एवं रोष में भरे हुए सेनापति सुग्रीव प्रवचनकुशल श्रीराम से ऐसी बातें कहकर चुप हो गये॥ ३०॥

सुग्रीवस्य तु तद् वाक्यं श्रुत्वा रामो महाबलः।

समीपस्थानुवाचेदं हनुमत्प्रमुखान् कपीन्॥३१॥

सुग्रीव का वह वचन सुनकर महाबली श्रीराम अपने निकट बैठे हुए हनुमान् आदि वानरों से इस प्रकार बोले- ॥ ३१॥

यदुक्तं कपिराजेन रावणावरजं प्रति।

वाक्यं हेतुमदत्यर्थं भवद्भिरपि च श्रुतम्॥३२॥

‘वानरो! वानरराज सुग्रीव ने रावण के छोटे भाई विभीषण के विषय में जो अत्यन्त युक्तियुक्त बातें कही हैं, वे तुमलोगों ने भी सुनी हैं॥ ३२॥

सुहृदामर्थकृच्छ्रेषु युक्तं बुद्धिमता सदा।

समर्थेनोपसंदेष्टं शाश्वतीं भूतिमिच्छता॥३३॥

‘मित्रों की स्थायी उन्नति चाहने वाले बुद्धिमान् एवं समर्थ पुरुष को कर्तव्याकर्तव्य के विषय में संशय उपस्थित होने पर सदा ही अपनी सम्मति देनी चाहिये’ ॥ ३३॥

इत्येवं परिपृष्टास्ते स्वं स्वं मतमतन्द्रिताः।

सोपचारं तदा राममूचुः प्रियचिकीर्षवः॥३४॥

इस प्रकार सलाह पूछी जाने पर श्रीराम का प्रिय करने की इच्छा रखने वाले वे सब वानर आलस्य छोड़ उत्साहित हो सादर अपना-अपना मत प्रकट करने लगे- ॥ ३४॥

अज्ञातं नास्ति ते किंचित् त्रिषु लोकेषु राघव।

आत्मानं पूजयन् राम पृच्छस्यस्मान् सुहृत्तया॥

‘रघुनन्दन! तीनों लोकों में कोई ऐसी बात नहीं है, जो आपको ज्ञात न हो, तथापि हम आपके अपने ही अङ्ग हैं, अतः आप मित्रभाव से हमारा सम्मान बढ़ाते हुए हमसे सलाह पूछते हैं ॥ ३५ ॥

त्वं हि सत्यव्रतः शूरो धार्मिको दृढविक्रमः।

परीक्ष्यकारी स्मृतिमान् निसृष्टात्मा सुहृत्सु च॥३६॥

‘आप सत्यव्रती, शूरवीर, धर्मात्मा, सुदृढ़ पराक्रमी, जाँच-बूझकर काम करने वाले, स्मरणशक्ति से सम्पन्न और मित्रों पर विश्वास करके उन्हीं के हाथों में अपने आपको सौंप देनेवाले हैं॥ ३६॥

तस्मादेकैकशस्तावद् ब्रुवन्तु सचिवास्तव।

हेतुतो मतिसम्पन्नाः समर्थाश्च पुनः पुनः॥३७॥

‘इसलिये आपके सभी बुद्धिमान् एवं सामर्थ्यशाली सचिव एक-एक करके बारी-बारी से अपने युक्तियुक्त विचार प्रकट करें’॥ ३७॥

इत्युक्ते राघवायाथ मतिमानङ्गदोऽग्रतः।

विभीषणपरीक्षार्थमुवाच वचनं हरिः॥ ३८॥

वानरों के ऐसा कहने पर सबसे पहले बुद्धिमान् वानर अङ्गद विभीषण की परीक्षा के लिये सुझाव देते हुए श्रीरघुनाथजी से बोले- ॥ ३८॥

शत्रोः सकाशात् सम्प्राप्तः सर्वथा तय॑ एव हि।

विश्वासनीयः सहसा न कर्तव्यो विभीषणः॥३९॥

‘भगवन्! विभीषण शत्रु के पास से आया है, इसलिये उस पर अभी शङ्का ही करनी चाहिये उसे सहसा विश्वासपात्र नहीं बना लेना चाहिये॥ ३९॥

छादयित्वाऽऽत्मभावं हि चरन्ति शठबुद्धयः।

प्रहरन्ति च रन्ध्रेषु सोऽनर्थः सुमहान् भवेत्॥४०॥

‘बहुत-से शठतापूर्ण विचार रखने वाले लोग अपने मनोभाव को छिपाकर विचरते रहते हैं और मौका पाते ही प्रहार कर बैठते हैं। इससे बहुत बड़ा अनर्थ हो जाता है॥ ४०॥

अर्थानौँ विनिश्चित्य व्यवसायं भजेत ह।

गुणतः संग्रहं कुर्याद् दोषतस्तु विसर्जयेत्॥४१॥

‘अतः गुण-दोष का विचार करके पहले यह निश्चय कर लेना चाहिये कि इस व्यक्ति से अर्थ की प्राप्ति होगी या अनर्थ की (यह हित का साधन करेगा या अहितका)। यदि उसमें गुण हों तो उसे स्वीकार करे और यदि दोष दिखायी दें तो त्याग दे॥४१॥

यदि दोषो महांस्तस्मिंस्त्यज्यतामविशङ्कितम्।

गुणान् वापि बहून् ज्ञात्वा संग्रहः क्रियतां नृप।४२॥

‘महाराज! यदि उसमें महान दोष हो तो निःसंदेह उसका त्याग कर देना ही उचित है। गुणों की दृष्टि से यदि उसमें बहुत-से सद्गुणों के होने का पता लगे, तभी उस व्यक्ति को अपनाना चाहिये’॥ ४२ ॥

शरभस्त्वथ निश्चित्य सार्थं वचनमब्रवीत्।

क्षिप्रमस्मिन् नरव्याघ्र चारः प्रतिविधीयताम्॥४३॥

तदनन्तर शरभ ने सोच-विचारकर यह सार्थक बात कही-पुरुषसिंह ! इस विभीषण के ऊपर शीघ्र ही कोई गुप्तचर नियुक्त कर दिया जाय॥४३॥

प्रणिधाय हि चारेण यथावत् सूक्ष्मबुद्धिना।

परीक्ष्य च ततः कार्यो यथान्यायं परिग्रहः॥४४॥

‘सूक्ष्म बुद्धिवाले गुप्तचर को भेजकर उसके द्वारा यथावत् रूप से उसकी परीक्षा कर ली जाय। इसके बाद यथोचित रीति से उसका संग्रह करना चाहिये। ४४॥

जाम्बवांस्त्वथ सम्प्रेक्ष्य शास्त्रबुद्ध्या विचक्षणः।

वाक्यं विज्ञापयामास गुणवद् दोषवर्जितम्॥४५॥

इसके बाद परम चतुर जाम्बवान् ने शास्त्रीयबुद्धि से विचार करके ये गुणयुक्त दोषरहित वचन कहे- ॥

बद्धवैराच्च पापाच्च राक्षसेन्द्राद् विभीषणः।

अदेशकाले सम्प्राप्तः सर्वथा शंक्यतामयम्॥४६॥

‘राक्षसराज रावण बड़ा पापी है। उसने हमारे साथ वैर बाँध रखा है और यह विभीषण उसीके पास से आ रहा है। वास्तव में न तो इसके आने का यह समय है और न स्थान ही। इसलिये इसके विषय में सब प्रकार से सशङ्क ही रहना चाहिये’॥ ४६॥

ततो मैन्दस्तु सम्प्रेक्ष्य नयापनयकोविदः।

वाक्यं वचनसम्पन्नो बभाषे हेतुमत्तरम्॥४७॥

तदनन्तर नीति और अनीति के ज्ञाता तथा वाग्वैभव से सम्पन्न मैन्द ने सोच-विचारकर यह युक्तियुक्त उत्तम बात कही— ॥ ४७॥

अनुजो नाम तस्यैष रावणस्य विभीषणः।

पृच्छयतां मधुरेणायं शनैर्नरपतीश्वर ॥४८॥

‘महाराज! यह विभीषण रावण का छोटा भाई ही तो है, इसलिये इससे मधुर व्यवहार के साथ धीरे-धीरे सब बातें पूछनी चाहिये। ४८॥

भावमस्य तु विज्ञाय तत्त्वतस्तं करिष्यसि।

यदि दुष्टो न दुष्टो वा बुद्धिपूर्वं नरर्षभ॥४९॥

‘नरश्रेष्ठ! फिर इसके भाव को समझकर आप बुद्धिपूर्वक यह ठीक-ठीक निश्चय करें कि यह दुष्ट है या नहीं। उसके बाद जैसा उचित हो, वैसा करना चाहिये’॥

अथ संस्कारसम्पन्नो हनूमान् सचिवोत्तमः।

उवाच वचनं श्लक्ष्णमर्थवन्मधुरं लघु॥५०॥

तत्पश्चात् सचिवों में श्रेष्ठ और सम्पूर्ण शास्त्रों के ज्ञानजनित संस्कार से युक्त हनुमान् जी ने ये श्रवणमधुर, सार्थक, सुन्दर और संक्षिप्त वचन कहे – ॥५०॥

न भवन्तं मतिश्रेष्ठं समर्थं वदतां वरम्।

अतिशाययितुं शक्तो बृहस्पतिरपि ब्रुवन्॥५१॥

‘प्रभो! आप बुद्धिमानों में उत्तम, सामर्थ्यशाली और वक्ताओं में श्रेष्ठ हैं। यदि बृहस्पति भी भाषण दें तो वे अपने को आपसे बढ़कर वक्ता नहीं सिद्ध कर सकते॥५१॥

न वादान्नापि संघर्षान्नाधिक्यान्न च कामतः।

वक्ष्यामि वचनं राजन् यथार्थं राम गौरवात्॥५२॥

‘महाराज श्रीराम ! मैं जो कुछ निवेदन करूँगा, वह वाद-विवाद या तर्क, स्पर्धा, अधिक बुद्धिमत्ता के अभिमान अथवा किसी प्रकार की कामना से नहीं करूँगा। मैं तो कार्य की गुरुता पर दृष्टि रखकर जो यथार्थ समझूगा, वही बात कहूँगा॥ ५२॥

अर्थानर्थनिमित्तं हि यदुक्तं सचिवैस्तव।

तत्र दोषं प्रपश्यामि क्रिया नह्युपपद्यते॥५३॥

‘आपके मन्त्रियों ने जो अर्थ और अनर्थ के निर्णय के लिये गुण-दोष की परीक्षा करने का सुझाव दिया है, उसमें मुझे दोष दिखायी देता है; क्योंकि इस समय परीक्षा लेना कदापि सम्भव नहीं है॥५३॥

ऋते नियोगात् सामर्थ्यमवबोद्धुं न शक्यते।

सहसा विनियोगोऽपि दोषवान् प्रतिभाति मे॥५४॥

‘विभीषण आश्रय देने के योग्य हैं या नहीं इसका निर्णय उसे किसी काम में नियुक्त किये बिना नहीं होसकता और सहसा उसे किसी काम में लगा देना भी मुझे सदोष ही प्रतीत होता है॥ ५४॥

चारप्रणिहितं युक्तं यदुक्तं सचिवैस्तव।

अर्थस्यासम्भवात् तत्र कारणं नोपपद्यते॥५५॥

‘आपके मन्त्रियों ने जो गुप्तचर नियुक्त करने की बात कही है, उसका कोई प्रयोजन न होने से वैसा करने का कोई युक्तियुक्त कारण नहीं दिखायी देता। (जो दूर रहता हो और जिसका वृत्तान्त ज्ञात न हो,

उसी के लिये गुप्तचर की नियुक्ति की जाती है। जो सामने खड़ा है और स्पष्टरूप से अपना वृत्तान्त बता रहा है, उसके लिये गुप्तचर भेजने की क्या आवश्यकता है) ॥ ५५ ॥

अदेशकाले सम्प्राप्त इत्ययं यद् विभीषणः।

विवक्षा तत्र मेऽस्तीयं तां निबोध यथामति॥५६॥

‘इसके सिवा जो यह कहा गया है कि विभीषण का इस समय यहाँ आना देश-काल के अनुरूप नहीं है। उसके विषय में भी मैं अपनी बुद्धि के अनुसार कुछ कहना चाहता हूँ। आप सुनें॥ ५६॥

एष देशश्च कालश्च भवतीह यथा तथा।

पुरुषात् पुरुषं प्राप्य तथा दोषगुणावपि॥५७॥

दौरात्म्यं रावणे दृष्ट्वा विक्रमं च तथा त्वयि।

युक्तमागमनं ह्यत्र सदृशं तस्य बुद्धितः॥५८॥

‘उसके यहाँ आने का यही उत्तम देश और काल है, यह बात जिस तरह सिद्ध होती है, वैसा बता रहा हूँ। विभीषण एक नीच पुरुष के पास से चलकर एक श्रेष्ठ पुरुष के पास आया है। उसने दोनों के दोषों और गुणों का भी विवेचन किया है। तत्पश्चात् रावण में दुष्टता और आप में पराक्रम देख वह रावण को छोड़कर आपके पास आ गया है। इसलिये उसका यहाँ आगमन सर्वथा उचित और उसकी उत्तम बुद्धि के अनुरूप है। ५७-५८॥

अज्ञातरूपैः पुरुषैः स राजन् पृच्छ्यतामिति।

यदुक्तमत्र मे प्रेक्षा काचिदस्ति समीक्षिता॥५९॥

‘राजन् ! किसी मन्त्री के द्वारा जो यह कहा गया है कि अपरिचित पुरुषों द्वारा इससे सारी बातें पूछी जायँ। उसके विषय में मेरा जाँच-बूझकर निश्चित किया हुआ विचार है, जिसे आपके सामने रखता हूँ॥ ५९॥

पृच्छ्यमानो विशङ्केत सहसा बुद्धिमान् वचः।

तत्र मित्रं प्रदुष्येत मिथ्या पृष्टं सुखागतम्॥६०॥

‘यदि कोई अपरिचित व्यक्ति यह पूछेगा कि तुम कौन हो, कहाँ से आये हो? किसलिये आये हो? इत्यादि, तब कोई बुद्धिमान् पुरुष सहसा उस पूछने वाले पर संदेह करने लगेगा और यदि उसे यह मालूम हो जायगा कि सब कुछ जानते हुए भी मुझसे झूठे ही पूछा जा रहा है, तब सुख के लिये आये हुए उस नवागत मित्र का हृदय कलुषित हो जायगा (इस प्रकार हमें एक मित्र के लाभ से वञ्चित होना पड़ेगा) ॥ ६०॥

अशक्यं सहसा राजन् भावो बोद्धं परस्य वै।

अन्तरेण स्वरैर्भिन्नै पुण्यं पश्यतां भृशम्॥६१॥

‘इसके सिवा महाराज! किसी दूसरे के म नकी बात को सहसा समझ लेना असम्भव है। बीच-बीच में स्वरभेद से आप अच्छी तरह यह निश्चय कर लें कि यह साधुभाव से आया है या असाधुभाव से॥६१॥

न त्वस्य ब्रुवतो जातु लक्ष्यते दुष्टभावता।

प्रसन्नं वदनं चापि तस्मान्मे नास्ति संशयः॥६२॥

इसकी बातचीत से भी कभी इसका दुर्भाव नहीं लक्षित होता। इसका मुख भी प्रसन्न है। इसलिये मेरे मन में इसके प्रति कोई संदेह नहीं है।। ६२॥

अशङ्कितमतिः स्वस्थो न शठः परिसर्पति।

न चास्य दुष्टवागस्ति तस्मान्मे नास्ति संशयः॥६३॥

‘दुष्ट पुरुष कभी निःशङ्क एवं स्वस्थचित्त होकर सामने नहीं आ सकता। इसके सिवा इसकी वाणी भी दोषयुक्त नहीं है। अतः मुझे इसके विषयमें कोई संदेह नहीं है।

आकारश्छाद्यमानोऽपि न शक्यो विनिगुहितुम्।

बलाद्धि विवृणोत्येव भावमन्तर्गतं नृणाम्॥६३॥

‘कोई अपने आकार को कितना ही क्यों न छिपाये, उसके भीतर का भाव कभी छिप नहीं सकता। बाहरका आकार पुरुषों के आन्तरिक भाव को बलात् प्रकट कर देता है॥ ६४॥

देशकालोपपन्नं च कार्यं कार्यविदां वर।

सफलं कुरुते क्षिप्रं प्रयोगेणाभिसंहितम्॥६५॥

‘कार्यवेत्ताओं में श्रेष्ठ रघुनन्दन! विभीषण का यहाँ आगमनरूप जो कार्य है, वह देश-काल के अनुरूप ही है। ऐसा कार्य यदि योग्य पुरुष के द्वारा सम्पादित हो तो अपने-आपको शीघ्र सफल बनाता है॥६५॥

उद्योगं तव सम्प्रेक्ष्य मिथ्यावृत्तं च रावणम्।

वालिनं च हतं श्रुत्वा सुग्रीवं चाभिषेचितम्॥६६॥

राज्यं प्रार्थयमानस्तु बुद्धिपूर्वमिहागतः।

एतावत् तु पुरस्कृत्य युज्यते तस्य संग्रहः॥६७॥

‘आपके उद्योग, रावण के मिथ्याचार, वाली के वध और सुग्रीव के राज्याभिषेक का समाचार जान-सुनकर राज्य पाने की इच्छा से यह समझ-बूझकर ही यहाँ आपके पास आया है (इसके मन में यह विश्वास है कि शरणागतवत्सल दयालु श्रीराम अवश्य ही मेरी रक्षा करेंगे और राज्य भी दे देंगे)। इन्हीं सब बातों को दृष्टि में रखकर विभीषण का संग्रह करना-उसे अपना लेना मुझे उचित जान पड़ता है॥ ६६-६७॥

यथाशक्ति मयोक्तं तु राक्षसस्यार्जवं प्रति।

प्रमाणं त्वं हि शेषस्य श्रुत्वा बुद्धिमतां वर॥६८॥

‘बुद्धिमानों में श्रेष्ठ रघुनाथ! इस प्रकार इस राक्षस की सरलता और निर्दोषता के विषय में मैंने यथाशक्ति निवेदन किया। इसे सुनकर आगे आप जैसा उचित समझें, वैसा करें’॥ ६८॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे सप्तदशः सर्गः॥१७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में सत्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ।१७॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
युद्धकाण्डम्

भगवान् श्रीराम का शरणागत की रक्षा का महत्त्व एवं अपना व्रत बताकरविभीषण से मिलना

अष्टादशः सर्गः

सर्ग-18

अथ रामः प्रसन्नात्मा श्रुत्वा वायुसुतस्य ह।

प्रत्यभाषत दुर्धर्षः श्रुतवानात्मनि स्थितम्॥१॥

वायुनन्दन हनुमान् जी के मुख से अपने मन में बैठी हुई बात सुनकर दुर्जय वीर भगवान् श्रीराम का चित्त प्रसन्न हो गया। वे इस प्रकार बोले- ॥१॥

ममापि च विवक्षास्ति काचित् प्रति विभीषणम्।

श्रोतुमिच्छामि तत् सर्वं भवद्भिः श्रेयसि स्थितैः॥२॥

‘मित्रो! विभीषण के सम्बन्ध में मैं भी कुछ कहना चाहता हूँ। आप सब लोग मेरे हितसाधन में संलग्न रहने वाले हैं। अतः मेरी इच्छा है कि आप भी उसे सुन लें॥२॥

मित्रभावेन सम्प्राप्तं न त्यजेयं कथंचन।

दोषो यद्यपि तस्य स्यात् सतामेतदगर्हितम्॥३॥

‘जो मित्रभाव से मेरे पास आ गया हो, उसे मैं किसी तरह त्याग नहीं सकता। सम्भव है उसमें कुछ दोष भी हों, परंतु दोषीको आश्रय देना भी सत्पुरुषों के लिये निन्दित नहीं है (अतः विभीषण को मैं अवश्य अपनाऊँगा)’॥३॥

सुग्रीवस्त्वथ तद्वाक्यमाभाष्य च विमृश्य च।

ततः शुभतरं वाक्यमुवाच हरिपुङ्गवः॥४॥

वानरराज सुग्रीव ने भगवान् श्रीराम के इस कथन को सुनकर स्वयं भी उसे दोहराया और उस पर विचार करके यह परम सुन्दर बात कही ॥४॥

स दुष्टो वाप्यदुष्टो वा किमेष रजनीचरः।

ईदृशं व्यसनं प्राप्तं भ्रातरं यः परित्यजेत्॥५॥

को नाम स भवेत् तस्य यमेष न परित्यजेत्।

‘प्रभो! यह दुष्ट हो या अदुष्ट, इससे क्या? है तो यह निशाचर ही। फिर जो पुरुष ऐसे संकट में पड़े हुए अपने भाईको छोड़ सकता है, उसका दूसरा ऐसा कौन सम्बन्धी होगा, जिसे वह त्याग न सके’ ॥ ५ १/२॥

वानराधिपतेर्वाक्यं श्रुत्वा सर्वानुदीक्ष्य तु॥६॥

ईषदुत्स्मयमानस्तु लक्ष्मणं पुण्यलक्षणम्।

इति होवाच काकुत्स्थो वाक्यं सत्यपराक्रमः॥७॥

वानरराज सुग्रीव की यह बात सुनकर सत्यपराक्रमी श्रीरघुनाथजी सबकी ओर देखकर कुछ मुसकराये और पवित्र लक्षणवाले लक्ष्मण से इस प्रकार बोले -||

अनधीत्य च शास्त्राणि वृद्धाननुपसेव्य च।

न शक्यमीदृशं वक्तुं यदुवाच हरीश्वरः॥८॥

‘सुमित्रानन्दन! इस समय वानरराज ने जैसी बात कही है, वैसी कोई भी पुरुष शास्त्रों का अध्ययन और गुरुजनों की सेवा किये बिना नहीं कह सकता॥८॥

अस्ति सूक्ष्मतरं किंचिद् यथात्र प्रतिभाति मा।

प्रत्यक्षं लौकिकं चापि वर्तते सर्वराजसु॥९॥

‘परंतु सुग्रीव! तुमने विभीषण में जो भाई के परित्यागरूप दोष की उद्भावना की है, उस विषयमें मुझे एक ऐसे अत्यन्त सूक्ष्म अर्थ की प्रतीति हो रही है, जो समस्त राजाओं में प्रत्यक्ष देखा गया है और सभी लोगों में प्रसिद्ध है (मैं उसी को तुम सब लोगों से कहना चाहता हूँ)

अमित्रास्तत्कुलीनाश्च प्रातिदेश्याश्च कीर्तिताः।

व्यसनेषु प्रहर्तारस्तस्मादयमिहागतः॥१०॥

‘राजाओं के छिद्र दो प्रकार के बताये गये हैं—एक तो उसी कुल में उत्पन्न हुए जाति-भाई और दूसरे पड़ोसी देशों के निवासी। ये संकट में पड़ने पर अपने विरोधी राजा या राजपुत्र पर प्रहार कर बैठते हैं। इसी भय से यह विभीषण यहाँ आया है (इसे भी अपने जाति-भाइयों से भय है) ॥ १०॥

अपापास्तत्कुलीनाश्च मानयन्ति स्वकान् हितान्।

एष प्रायो नरेन्द्राणां शङ्कनीयस्तु शोभनः॥११॥

‘जिनके मन में पाप नहीं है, ऐसे एक कुल में उत्पन्न हुए भाई-बन्धु अपने कुटुम्बीजनों को हितैषी मानते हैं, परंतु यही सजातीय बन्धु अच्छा होने पर भी प्रायः राजाओं के लिये शङ्कनीय होता है (रावण भी विभीषण को शङ्का की दृष्टि से देखने लगा है; इसलिये इसका अपनी रक्षा के लिये यहाँ आना अनुचित नहीं है। अतः तुम्हें इसके ऊपर भाई के त्याग का दोष नहीं लगाना चाहिये) ॥११॥

यस्तु दोषस्त्वया प्रोक्तो ह्यादानेऽरिबलस्य च।

तत्र ते कीर्तयिष्यामि यथाशास्त्रमिदं शृणु॥१२॥

‘तुमने शत्रुपक्षीय सैनिक को अपनाने में जो यह दोष बताया है कि वह अवसर देखकर प्रहार कर बैठता है, उसके विषय में मैं तुम्हें यह नीतिशास्त्र के अनुकूल उत्तर दे रहा हूँ, सुनो॥ १२॥

न वयं तत्कुलीनाश्च राज्यकाङ्क्षी च राक्षसः।

पण्डिता हि भविष्यन्ति तस्माद् ग्राह्यो विभीषणः॥१३॥

‘हमलोग इसके कुटुम्बी तो हैं नहीं (अतः हमसे स्वार्थ-हानि की आशंका इसे नहीं है) और यह राक्षसराज्य पाने का अभिलाषी है (इसलिये भी यह हमारा त्याग नहीं कर सकता)। इन राक्षसों में बहुत-से लोग बड़े विद्वान् भी होते हैं (अतः वे मित्र होने पर बड़े काम के सिद्ध होंगे) इसलिये विभीषण को अपने पक्ष में मिला लेना चाहिये॥ १३॥

अव्यग्राश्च प्रहृष्टाश्च ते भविष्यन्ति संगताः।

प्रणादश्च महानेषोऽन्योन्यस्य भयमागतम्।

इति भेदं गमिष्यन्ति तस्माद् ग्राह्यो विभीषणः॥१४॥

‘हमसे मिल जाने पर ये विभीषण आदि निश्चिन्त एवं प्रसन्न हो जायँगे। इनकी जो यह शरणागति के लिये प्रबल पुकार है, इससे मालूम होता है, राक्षसों में एक-दूसरेसे भय बना हुआ है। इसी कारण से इनमें परस्पर फूट होगी और ये नष्ट हो जायँगे। इसलिये भी विभीषण को ग्रहण कर लेना चाहिये॥ १४ ॥

न सर्वे भ्रातरस्तात भवन्ति भरतोपमाः।

मद्विधा वा पितुः पुत्राः सुहृदो वा भवद्विधाः॥

‘तात सुग्रीव! संसार में सब भाई भरत के ही समान नहीं होते। बाप के सब बेटे मेरे ही जैसे नहीं होते और सभी मित्र तुम्हारे ही समान नहीं हुआ करते हैं’। १५॥

एवमुक्तस्तु रामेण सुग्रीवः सहलक्ष्मणः।

उत्थायेदं महाप्राज्ञः प्रणतो वाक्यमब्रवीत्॥१६॥

श्रीराम के ऐसा कहने पर लक्ष्मणसहित महाबुद्धिमान् सुग्रीव ने उठकर उन्हें प्रणाम किया और इस प्रकार कहा

रावणेन प्रणिहितं तमवेहि निशाचरम्।

तस्याहं निग्रहं मन्ये क्षमं क्षमवतां वर ॥१७॥

‘उचित कार्य करने वालों में श्रेष्ठ रघुनन्दन! आप उस राक्षस को रावण का भेजा हुआ ही समझें। मैं तो उसे कैद कर लेना ही ठीक समझता हूँ॥ १७ ॥

राक्षसो जिह्मया बुद्ध्या संदिष्टोऽयमिहागतः।

प्रहर्तुं त्वयि विश्वस्ते विश्वस्ते मयि वानघ।१८॥

लक्ष्मणे वा महाबाहो स वध्यः सचिवैः सह।

रावणस्य नृशंसस्य भ्राता ह्येष विभीषणः॥१९॥

‘निष्पाप श्रीराम! यह निशाचर रावण के कहने से मन में कुटिल विचार लेकर ही यहाँ आया है। जब हमलोग इस पर विश्वास करके इसकी ओर से निश्चिन्त हो जायँगे, उस समय यह आप पर, मुझपर अथवा लक्ष्मण पर भी प्रहार कर सकता है। इसलिये महाबाहो! क्रूर रावण के भाई इस विभीषण का मन्त्रियोंसहित वध कर देना ही उचित है’ ॥ १८-१९॥

एवमुक्त्वा रघुश्रेष्ठं सुग्रीवो वाहिनीपतिः।

वाक्यज्ञो वाक्यकुशलं ततो मौनमुपागमत्॥२०॥

प्रवचनकुशल रघुकुलतिलक श्रीराम से ऐसा कहकर बातचीत की कला जानने वाले सेनापति सुग्रीव मौन हो गये॥२०॥

स सुग्रीवस्य तद् वाक्यं रामः श्रुत्वा विमृश्य च।

ततः शुभतरं वाक्यमुवाच हरिपुङ्गवम्॥२१॥

सुग्रीव का वह वचन सुनकर और उसपर भलीभाँति विचार करके श्रीराम ने उन वानरशिरोमणि से यह परम मङ्गलमयी बात कही- ॥२१॥

स दुष्टो वाप्यदुष्टो वा किमेष रजनीचरः।

सूक्ष्ममप्यहितं कर्तुं मम शक्तः कथंचन॥२२॥

‘वानरराज! विभीषण दुष्ट हो या साधु। क्या यह निशाचर किसी तरह भी मेरा सूक्ष्म-से-सूक्ष्मरूप में भी अहित कर सकता है? ॥ २२॥

पिशाचान् दानवान् यक्षान् पृथिव्यां चैव राक्षसान्।

अङ्गल्यग्रेण तान् हन्यामिच्छन् हरिगणेश्वर ॥२३॥

‘वानरयूथपते! यदि मैं चाहूँ तो पृथ्वी पर जितने भी पिशाच, दानव, यक्ष और राक्षस हैं, उन सबको एक अंगुलि के अग्रभाग से मार सकता हूँ॥ २३॥

श्रूयते हि कपोतेन शत्रुः शरणमागतः।

अर्चितश्च यथान्यायं स्वैश्च मांसैर्निमन्त्रितः॥२४॥

‘सुना जाता है कि एक कबूतर ने अपनी शरण में आये हुए अपने ही शत्रु एक व्याध का यथोचित आतिथ्य-सत्कार किया था और उसे निमन्त्रण दे अपने शरीर के मांस का भोजन कराया था॥ २४ ॥

स हि तं प्रतिजग्राह भार्याहर्तारमागतम्।

कपोतो वानरश्रेष्ठ किं पुनर्मद्विधो जनः॥ २५॥

‘उस व्याध ने उस कबूतर की भार्या कबूतरीको पकड़ लिया था तो भी अपने घर आने पर कबूतर ने उसका आदर किया; फिर मेरे-जैसा मनुष्य शरणागत पर अनुग्रह करे, इसके लिये तो कहना ही क्या है ? ॥ २५॥

ऋषेः कण्वस्य पुत्रोण कण्डुना परमर्षिणा।

शृणु गाथा पुरा गीता धर्मिष्ठा सत्यवादिना॥२६॥

‘पूर्वकाल में कण्व मुनि के पुत्र सत्यवादी महर्षि कण्डु ने एक धर्मविषयक गाथा का गान किया था उसे बताता हूँ, सुनो॥ २६॥

बद्धाञ्जलिपुटं दीनं याचन्तं शरणागतम्।

न हन्यादानृशंस्यार्थमपि शत्रु परंतप॥२७॥

‘परंतप! यदि शत्रु भी शरण में आये और दीनभाव से हाथ जोड़कर दया की याचना करे तो उस पर प्रहार नहीं करना चाहिये॥ २७॥

आर्तो वा यदि वा दृप्तः परेषां शरणं गतः।

अरिः प्राणान् परित्यज्य रक्षितव्यः कृतात्मना॥२८॥

‘शत्रु दुःखी हो या अभिमानी, यदि वह अपने विपक्षी की शरण में  जाय तो शुद्ध हृदयवाले श्रेष्ठ पुरुष को अपने प्राणों का मोह छोड़कर उसकी रक्षा करनी चाहिये।

स चेद् भयाद् वा मोहाद् वा कामाद् वापि न रक्षति।

स्वया शक्त्या यथान्यायं तत् पापं लोकगर्हितम्॥२९॥

‘यदि वह भय, मोह अथवा किसी कामना से न्यायानुसार यथाशक्ति उसकी रक्षा नहीं करता तो उसके उस पापकर्म की लोक में बड़ी निन्दा होती है। २९॥

विनष्टः पश्यतस्तस्य रक्षिणः शरणं गतः।

आनाय सुकृतं तस्य सर्वं गच्छेदरक्षितः॥ ३०॥

‘यदि शरण में आया हुआ पुरुष संरक्षण न पाकर उस रक्षक के देखते-देखते नष्ट हो जाय तो वह उसके सारे पुण्य को अपने साथ ले जाता है॥ ३०॥

एवं दोषो महानत्र प्रपन्नानामरक्षणे।

अस्वयँ चायशस्यं च बलवीर्यविनाशनम्॥३१॥

‘इस प्रकार शरणागत की रक्षा न करने में महान् दोष बताया गया है। शरणागत का त्याग स्वर्ग और सुयश की प्राप्ति को मिटा देता है और मनुष्य के बल और वीर्य का नाश करता है॥ ३१॥

करिष्यामि यथार्थं तु कण्डोर्वचनमुत्तमम्।

धर्मिष्ठं च यशस्यं च स्वयँ स्यात् तु फलोदये॥३२॥

‘इसलिये मैं तो महर्षि कण्डु के उस यथार्थ और उत्तम वचन का ही पालन करूँगा; क्योंकि वह परिणाम में धर्म, यश और स्वर्ग की प्राप्ति कराने वाला है।॥ ३२॥

सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते।

अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम॥३३॥

‘जो एक बार भी शरण में आकर ‘मैं तुम्हारा हूँ’ ऐसा कहकर मुझसे रक्षा की प्रार्थना करता है, उसे मैं समस्त प्राणियों से अभय कर देता हूँ। यह मेरा सदा के लिये व्रत है॥ ३३॥

आनयैनं हरिश्रेष्ठ दत्तमस्याभयं मया।

विभीषणो वा सुग्रीव यदि वा रावणः स्वयम्॥३४॥

‘अतः कपिश्रेष्ठ सुग्रीव! वह विभीषण हो या स्वयं रावण आ गया हो। तुम उसे ले आओ मैंने उसे अभयदान दे दिया’ ।। ३४॥

रामस्य तु वचः श्रुत्वा सुग्रीवः प्लवगेश्वरः।

प्रत्यभाषत काकुत्स्थं सौहार्दैनाभिपूरितः॥ ३५॥

भगवान् श्रीराम का यह वचन सुनकर वानरराज सुग्रीवने सौहार्द से भरकर उनसे कहा- ॥ ३५ ॥

किमत्र चित्रं धर्मज्ञ लोकनाथशिखामणे।

यत् त्वमार्यं प्रभाषेथाः सत्त्ववान् सत्पथे स्थितः॥३६॥

धर्मज्ञ! लोकेश्वरशिरोमणे! आपने जो यह श्रेष्ठ धर्म की बात कही है, इसमें क्या आश्चर्य है ? क्योंकि आप महान् शक्तिशाली और सन्मार्ग पर स्थित हैं। ३६॥

मम चाप्यन्तरात्मायं शुद्धं वेत्ति विभीषणम।

अनुमानाच्च भावाच्च सर्वतः सुपरीक्षितः॥ ३७॥

‘यह मेरी अन्तरात्मा भी विभीषण को शुद्ध समझती है। हनुमान जी ने भी अनुमान और भाव से उनकी भीतर-बाहर सब ओर से भलीभाँति परीक्षा कर ली हैं। ३७॥

तस्मात् क्षिप्रं सहास्माभिस्तुल्यो भवतु राघव।

विभीषणो महाप्राज्ञः सखित्वं चाभ्युपैतु नः॥३८॥

‘अतः रघुनन्दन! अब विभीषण शीघ्र ही यहाँ हमारे-जैसे होकर रहें और हमारी मित्रता प्राप्त करें’॥३८॥

ततस्तु सुग्रीववचो निशम्य तधरीश्वरेणाभिहितं नरेश्वरः।

विभीषणेनाशु जगाम संगमं पतत्त्रिराजेन यथा पुरंदरः॥३९॥

तदनन्तर वानरराज सुग्रीवकी कही हुई वह बात सुनकर राजा श्रीराम शीघ्र आगे बढ़कर विभीषण से मिले, मानो देवराज इन्द्र पक्षिराज गरुड़ से मिल रहे हों॥ ३९॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डेऽष्टादशः सर्गः॥१८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में अठारहवाँ सर्ग पूरा हुआ।१८॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
युद्धकाण्डम्

विभीषण का आकाश से उतरकर भगवान् श्रीराम के चरणों की शरण लेना, श्रीराम का रावण-वध की प्रतिज्ञा करना

एकोनविंशः सर्गः

सर्ग-19

राघवेणाभये दत्ते संनतो रावणानुजः।

विभीषणो महाप्राज्ञो भूमिं समवलोकयत्॥१॥

इस प्रकार श्रीरघुनाथजी के अभय देने पर विनयशील महाबुद्धिमान् विभीषण ने नीचे उतरने के लिये पृथ्वी की ओर देखा॥१॥

खात् पपातावनिं हृष्टो भक्तैरनुचरैः सह।

स तु रामस्य धर्मात्मा निपपात विभीषणः॥२॥

पादयोर्निपपाताथ चतुर्भिः सह राक्षसैः।

वे अपने भक्त सेवकों के साथ हर्ष से भरकर आकाश से पृथ्वी पर उतर आये। उतरकर चारों राक्षसों के साथ धर्मात्मा विभीषण श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में गिर पड़े।। २ १/२॥

अब्रवीच्च तदा वाक्यं रामं प्रति विभीषणः॥३॥

धर्मयुक्तं च युक्तं च साम्प्रतं सम्प्रहर्षणम्।

उस समय विभीषण ने श्रीराम से धर्मानुकूल, युक्तियुक्त, समयोचित और हर्षवर्द्धक बात कही— ॥ ३ १/२॥

अनुजो रावणस्याहं तेन चाम्यवमानितः॥४॥

भवन्तं सर्वभूतानां शरण्यं शरणं गतः।

‘भगवन् ! मैं रावण का छोटा भाई हूँ। रावण ने मेरा अपमान किया है। आप समस्त प्राणियों को शरण देने वाले हैं, इसलिये मैंने आपकी शरण ली है॥ ४ १/२॥

परित्यक्ता मया लङ्का मित्राणि च धनानि च॥

भवद्गतं हि मे राज्यं जीवितं च सुखानि च।

‘अपने सभी मित्र, धन और लङ्कापुरी को मैं छोड़ आया हूँ। अब मेरा राज्य, जीवन और सुख सब आपके ही अधीन है’॥ ५ १/२ ॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा रामो वचनमब्रवीत्॥६॥

वचसा सान्त्वयित्वैनं लोचनाभ्यां पिबन्निव।

विभीषण के ये वचन सुनकर श्रीराम ने मधुर वाणी द्वारा उन्हें सान्त्वना दी और नेत्रों से मानो उन्हें पी जायँगे, इस प्रकार प्रेमपूर्वक उनकी ओर देखते हुए कहा— ॥ ६ १/२॥

आख्याहि मम तत्त्वेन राक्षसानां बलाबलम्॥७॥

एवमुक्तं तदा रक्षो रामेणाक्लिष्टकर्मणा।

रावणस्य बलं सर्वमाख्यातुमुपचक्रमे॥८॥

‘विभीषण! तुम मुझे ठीक-ठीक राक्षसों का बलाबल बताओ।’ अनायास ही महान् कर्म करने वाले श्रीराम के ऐसा कहने पर राक्षस विभीषण ने रावण के सम्पूर्ण बल का परिचय देना आरम्भ किया – ॥ ७-८॥

अवध्यः सर्वभूतानां गन्धर्वोरगपक्षिणाम्।

राजपुत्र दशग्रीवो वरदानात् स्वयम्भुवः॥९॥

‘राजकुमार! ब्रह्माजी के वरदान के प्रभाव से दशमुख रावण (केवल मनुष्य को छोड़कर) गन्धर्व, नाग और पक्षी आदि सभी प्राणियों के लिये अवध्य है॥९॥

रावणानन्तरो भ्राता मम ज्येष्ठश्च वीर्यवान्।

कुम्भकर्णो महातेजाः शक्रप्रतिबलो युधि॥१०॥

‘रावण से छोटा और मुझसे बड़ा जो मेरा भाई कुम्भकर्ण है, वह महातेजस्वी और पराक्रमी है। युद्ध में वह इन्द्र के समान बलशाली है॥ १०॥

राम सेनापतिस्तस्य प्रहस्तो यदि ते श्रुतः।

कैलासे येन समरे मणिभद्रः पराजितः॥११॥

‘श्रीराम! रावण के सेनापति का नाम प्रहस्त है। शायद आपने भी उसका नाम सुना होगा। उसने कैलास पर घटित हुए युद्ध में कुबेर के सेनापति मणिभद्र को भी पराजित कर दिया था॥ ११॥

बद्धगोधाङ्गलित्राणस्त्ववध्यकवचो युधि।

धनुरादाय यस्तिष्ठन्नदृश्यो भवतीन्द्रजित्॥१२॥

‘रावण का पुत्र जो इन्द्रजित् है, वह गोह के चमड़े के बने हुए दस्ताने पहनकर अवध्य कवच धारण करके हाथ में धनुष ले जब युद्ध में खड़ा होता है, उस समय अदृश्य हो जाता है॥ १२॥

संग्रामे सुमहद्व्यूहे तर्पयित्वा हुताशनम्।

अन्तर्धानगतः श्रीमानिन्द्रजिद्धन्ति राघव॥१३॥

‘रघुनन्दन! श्रीमान् इन्द्रजित् ने अग्निदेव को तृप्त करके ऐसी शक्ति प्राप्त कर ली है कि वह विशाल व्यूह से युक्त संग्राम में अदृश्य होकर शत्रुओं पर प्रहार करता है॥ १३॥

महोदरमहापाश्वौँ राक्षसश्चाप्यकम्पनः।

अनीकपास्तु तस्यैते लोकपालसमा युधि॥१४॥

‘महोदर, महापार्श्व और अकम्पन—ये तीनों राक्षस रावण के सेनापति हैं और युद्ध में लोकपालों के समान पराक्रम प्रकट करते हैं ॥ १४ ॥

दशकोटिसहस्राणि रक्षसां कामरूपिणाम्।

मांसशोणितभक्ष्याणां लङ्कापुरनिवासिनाम्॥१५॥

स तैस्तु सहितो राजा लोकपालानयोधयत्।

सह देवैस्तु ते भग्ना रावणेन दुरात्मना॥१६॥

‘लङ्का में रक्त और मांस का भोजन करने वाले और इच्छानुसार रूप धारण करने में समर्थ जो दस कोटि सहस्र (एक खरब) राक्षस निवास करते हैं, उन्हें साथ लेकर राजा रावण ने लोकपालों से युद्ध किया था। उस समय देवताओंसहित वे सब लोकपाल दुरात्मा रावण से पराजित हो भाग खड़े हुए। १५-१६॥

विभीषणस्य तु वचस्तच्छ्रुत्वा रघुसत्तमः।

अन्वीक्ष्य मनसा सर्वमिदं वचनमब्रवीत्॥१७॥

विभीषण की यह बात सुनकर रघुकुलतिलक श्रीराम ने मन-ही-मन उस सबपर बारंबार विचार किया और इस प्रकार कहा— ॥१७॥

यानि कर्मापदानानि रावणस्य विभीषण।

आख्यातानि च तत्त्वेन ह्यवगच्छामि तान्यहम्॥१८॥

‘विभीषण! तुमने रावण के युद्धविषयक जिन-जिन पराक्रमों का वर्णन किया है, उन्हें मैं अच्छी तरह जानता हूँ॥ १८॥

अहं हत्वा दशग्रीवं सप्रहस्तं सहात्मजम्।

राजानं त्वां करिष्यामि सत्यमेतच्छृणोतु मे॥१९॥

‘परंतु सुनो! मैं सच कहता हूँ कि प्रहस्त और पुत्रों के सहित रावण का वध करके मैं तुम्हें लङ्का का राजा बनाऊँगा॥ १९॥

रसातलं वा प्रविशेत् पातालं वापि रावणः।

पितामहसकाशं वा न मे जीवन् विमोक्ष्यते॥२०॥

‘रावण रसातल या पाताल में प्रवेश कर जाय अथवा पितामह ब्रह्माजी के पास चला जाय तो भी वह अब मेरे हाथ से जीवित नहीं छूट सकेगा॥२०॥

अहत्वा रावणं संख्ये सपुत्रजनबान्धवम्।

अयोध्यां न प्रवेक्ष्यामि त्रिभिस्तैर्भ्रातृभिः शपे॥२१॥

‘मैं अपने तीनों भाइयों की सौगन्ध खाकर कहता हूँ कि युद्ध में पुत्र, भृत्यजन और बन्धु-बान्धवोंसहित रावण का वध किये बिना अयोध्यापुरी में प्रवेश नहीं करूँगा’ ॥२१॥

श्रुत्वा तु वचनं तस्य रामस्याक्लिष्टकर्मणः।

शिरसाऽऽवन्द्य धर्मात्मा वक्तुमेवं प्रचक्रमे ॥२२॥

अनायास ही महान् कर्म करने वाले श्रीरामचन्द्रजी के ये वचन सुनकर धर्मात्मा विभीषण ने मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और फिर इस प्रकार कहना आरम्भ किया- ॥ २२ ॥

राक्षसानां वधे साह्यं लङ्कायाश्च प्रधर्षणे।

करिष्यामि यथाप्राणं प्रवेक्ष्यामि च वाहिनीम्॥२३॥

‘प्रभो! राक्षसों के संहार में और लङ्कापुरी पर आक्रमण करके उसे जीतने में मैं आपकी यथाशक्ति सहायता करूँगा तथा प्राणों की बाजी लगाकर युद्ध के लिये रावण की सेना में भी प्रवेश करूँगा’॥ २३॥

इति ब्रुवाणं रामस्तु परिष्वज्य विभीषणम्।

अब्रवील्लक्ष्मणं प्रीतः समुद्राज्जलमानय॥२४॥

तेन चेमं महाप्राज्ञमभिषिञ्च विभीषणम्।

राजानं रक्षसां क्षिप्रं प्रसन्ने मयि मानद॥ २५॥

विभीषण के ऐसा कहने पर भगवान् श्रीराम ने उन्हें हृदय से लगा लिया और प्रसन्न होकर लक्ष्मण से कहा —’दूसरों को मान देने वाले सुमित्रानन्दन ! तुम समुद्र से जल ले आओ और उसके द्वारा इन परम बुद्धिमान् राक्षसराज विभीषण का लङ्का के राज्य पर शीघ्र ही अभिषेक कर दो। मेरे प्रसन्न होने पर इन्हें यह लाभ मिलना ही चाहिये’। २४-२५॥

एवमुक्तस्तु सौमित्रिरभ्यषिञ्चद् विभीषणम्।

मध्ये वानरमुख्यानां राजानं राजशासनात्॥२६॥

उनके ऐसा कहने पर सुमित्राकुमार लक्ष्मण ने मुख्यमुख्य वानरों के बीच महाराज श्रीराम के आदेश से विभीषण का राक्षसों के राजा के पद पर अभिषेक कर दिया॥ २६॥

तं प्रसादं तु रामस्य दृष्ट्वा सद्यः प्लवङ्गमाः।

प्रचुक्रुशुर्महात्मानं साधुसाध्विति चाब्रुवन्॥२७॥

भगवान् श्रीराम का यह तात्कालिक प्रसाद (अनुग्रह) देखकर सब वानर हर्षध्वनि करने और महात्मा श्रीराम को साधुवाद देने लगे॥ २७॥

अब्रवीच्च हनूमांश्च सुग्रीवश्च विभीषणम्।

कथं सागरमक्षोभ्यं तराम वरुणालयम्।

सैन्यैः परिवृताः सर्वे वानराणां महौजसाम्॥२८॥

तत्पश्चात् हनुमान् और सुग्रीव ने विभीषण से पूछा ‘राक्षसराज! हम सब लोग इस अक्षोभ्य समुद्र को महाबली वानरों की सेनाओं के साथ किस प्रकार पार कर सकेंगे?

उपायैरभिगच्छाम यथा नदनदीपतिम्।

तराम तरसा सर्वे ससैन्या वरुणालयम्॥२९॥

‘जिस उपाय से हम सब लोग सेनासहित नदों और नदियों के स्वामी वरुणालय समुद्र के पार जा सकें, वह बताओ’ ॥ २९॥

एवमुक्तस्तु धर्मात्मा प्रत्युवाच विभीषणः।

समुद्रं राघवो राजा शरणं गन्तुमर्हति ॥३०॥

उनके इस प्रकार पूछने पर धर्मात्मा विभीषण ने यों उत्तर दिया- ‘रघुवंशी राजा श्रीराम को समुद्र की शरण लेनी चाहिये॥३०॥

खानितः सगरेणायमप्रमेयो महोदधिः।

कर्तुमर्हति रामस्य ज्ञातेः कार्यं महोदधिः॥३१॥

‘इस अपार महासागर को राजा सगर ने खुदवाया था। श्रीरामचन्द्रजी सगर के वंशज हैं। इसलिये समुद्र को इनका काम अवश्य करना चाहिये’॥ ३१॥

एवं विभीषणेनोक्तो राक्षसेन विपश्चिता।

आजगामाथ सुग्रीवो यत्र रामः सलक्ष्मणः॥३२॥

विद्वान् राक्षस विभीषण के ऐसा कहने पर सुग्रीव उस स्थान पर आये, जहाँ लक्ष्मणसहित श्रीराम विद्यमान थे॥ ३२॥

ततश्चाख्यातुमारेभे विभीषणवचः शुभम्।

सुग्रीवो विपुलग्रीवः सागरस्योपवेशनम्॥३३॥

वहाँ विशाल ग्रीवावाले सुग्रीव ने समुद्र पर धरना देने के विषय में जो विभीषण का शुभ वचन था, उसे कहना आरम्भ किया॥३३॥

प्रकृत्या धर्मशीलस्य रामस्यास्याप्यरोचत।

सलक्ष्मणं महातेजाः सुग्रीवं च हरीश्वरम्॥ ३४॥

सत्क्रियार्थं क्रियादक्षं स्मितपूर्वमभाषत।

भगवान् श्रीराम स्वभाव से ही धर्मशील थे, अतः उन्हें भी विभीषण की यह बात अच्छी लगी। वे महातेजस्वी रघुनाथजी लक्ष्मणसहित कार्यदक्ष वानरराज सुग्रीव का सत्कार करते हुए उनसे मुसकराकर बोले- ॥३४ १/२॥

विभीषणस्य मन्त्रोऽयं मम लक्ष्मण रोचते॥३५॥

सुग्रीवः पण्डितो नित्यं भवान् मन्त्रविचक्षणः।

उभाभ्यां सम्प्रधार्यार्थं रोचते यत् तदुच्यताम्॥३६॥

‘लक्ष्मण! विभीषण की यह सम्मति मुझे भी अच्छी लगती है; परंतु सुग्रीव राजनीति के बड़े पण्डित हैं और तुम भी समयोचित सलाह देने में सदा ही कुशल हो। इसलिये तुम दोनों प्रस्तुत कार्य पर अच्छी तरह विचार करके जो ठीक जान पड़े, वह बताओ’। ३५-३६॥

एवमुक्तौ ततो वीरावुभौ सुग्रीवलक्ष्मणौ।

समुदाचारसंयुक्तमिदं वचनमूचतुः॥३७॥

भगवान् श्रीराम के ऐसा कहने पर वे दोनों वीर सुग्रीव और लक्ष्मण उनसे आदरपूर्वक बोले- ॥ ३७॥

किमर्थं नौ नरव्याघ्र न रोचिष्यति राघव।

विभीषणेन यत् तूक्तमस्मिन् काले सुखावहम्॥३८॥

पुरुषसिंह रघुनन्दन! इस समय विभीषण ने जो सुखदायक बात कही है, वह हम दोनों को क्यों नहीं अच्छी लगेगी? ॥ ३८॥

अबद्ध्वा सागरे सेतुं घोरेऽस्मिन् वरुणालये।

लङ्का नासादितुं शक्या सेन्ट्रैरपि सुरासुरैः॥ ३९॥

‘इस भयंकर समुद्र में पुल बाँधे बिना इन्द्रसहित देवता और असुर भी इधर से लङ्कापुरी में नहीं पहुँच सकते॥ ३९॥

विभीषणस्य शूरस्य यथार्थं क्रियतां वचः।

अलं कालात्ययं कृत्वा सागरोऽयं नियुज्यताम्।

यथा सैन्येन गच्छाम पुरी रावणपालिताम्॥४०॥

‘इसलिये आप शूरवीर विभीषण के यथार्थ वचन के अनुसार ही कार्य करें। अब अधिक विलम्ब करना ठीक नहीं है। इस समुद्र से यह अनुरोध किया जाय कि वह हमारी सहायता करे, जिससे हम सेना के साथ रावणपालित लङ्कापुरी में पहुँच सकें’॥ ४० ॥

एवमुक्तः कुशास्तीर्णे तीरे नदनदीपतेः।

संविवेश तदा रामो वेद्यामिव हुताशनः॥४१॥

उन दोनों के ऐसा कहने पर श्रीरामचन्द्रजी उस समय समुद्र के तट पर कुश बिछाकर उसके ऊपर उसी तरह बैठे, जैसे वेदी पर अग्निदेव प्रतिष्ठित होते हैं॥ ४१॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे एकोनविंशः सर्गः॥१९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में उन्नीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।१९॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
युद्धकाण्डम्

शार्दूल के कहने से रावण का शुक को दूत बनाकर सुग्रीव के पास संदेश भेजना, सुग्रीव का रावण के लिये उत्तर देना

विंशः सर्गः

सर्ग-20

ततो निविष्टां ध्वजिनीं सुग्रीवेणाभिपालिताम्।

ददर्श राक्षसोऽभ्येत्य शार्दूलो नाम वीर्यवान्॥

चारो राक्षसराजस्य रावणस्य दुरात्मनः।

तां दृष्ट्वा सर्वतोऽव्यग्रां प्रतिगम्य स राक्षसः॥२॥

आविश्य लङ्कां वेगेन राजानमिदमब्रवीत्।

इसी बीच में दुरात्मा राक्षसराज रावण के गुप्तचर पराक्रमी राक्षस शार्दूल ने वहाँ आकर सागर-तटपर छावनी डाले पड़ी हुई सुग्रीवद्वारा सुरक्षित वानरी सेना को देखा। सब ओर शान्तभाव से स्थित हुई उस विशाल सेना को देखकर वह राक्षस लौट गया और जल्दी से लङ्कापुरी में जाकर राजा रावण से यों बोला — ॥ १-२ १/२॥

एष वै वानरौंघो लङ्कां समभिवर्तते॥३॥

अगाधश्चाप्रमेयश्च द्वितीय इव सागरः।

‘महाराज! लङ्काकी ओर वानरों और भालुओंका एक प्रवाह-सा बढ़ा चला आ रहा है। वह दूसरे समुद्रके समान अगाध और असीम है॥ ३ १/२॥

पुत्रौ दशरथस्येमौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥४॥

उत्तमौ रूपसम्पन्नौ सीतायाः पदमागतौ।

‘राजा दशरथ के ये पुत्र दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण बड़े ही रूपवान् और श्रेष्ठ वीर हैं। वे सीता का उद्धार करने के लिये आ रहे हैं। ४ १/२ ॥

एतौ सागरमासाद्य संनिविष्टौ महाद्युते॥५॥

बलं चाकाशमावृत्य सर्वतो दशयोजनम्।

तत्त्वभूतं महाराज क्षिप्रं वेदितुमर्हसि ॥६॥

‘महातेजस्वी महाराज! ये दोनों रघुवंशी बन्धु भी इस समय समुद्र-तटपर ही आकर ठहरे हुए हैं। वानरों की वह सेना सब ओर से दस योजनतक के खाली स्थान को घेरकर वहाँ ठहरी हुई है। यह बिलकुल ठीक बात है। आप शीघ्र ही इस विषय में विशेष जानकारी प्राप्त करें॥५-६॥

तव दूता महाराज क्षिप्रमर्हन्ति वेदितुम्।

उपप्रदानं सान्त्वं वा भेदो वात्र प्रयुज्यताम्॥७॥

‘राक्षससम्राट! आपके दूत शीघ्र सारी बातों का पता लगा लेने के योग्य हैं, अतः उन्हें भेजें। तत्पश्चात् जैसा उचित समझें, वैसा करें—चाहे उन्हें सीता को लौटा दें, चाहे सुग्रीव से मीठी-मीठी बातें करके उन्हें अपने पक्ष में मिला लें अथवा सुग्रीव और श्रीराम में फूट डलवा दें’॥७॥

शार्दूलस्य वचः श्रुत्वा रावणो राक्षसेश्वरः।

उवाच सहसा व्यग्रः सम्प्रधार्यार्थमात्मनः।

शुकं साधु तदा रक्षो वाक्यमर्थविदां वरम्॥८॥

शार्दूल की बात सुनकर राक्षसराज रावण सहसा व्यग्र हो उठा और अपने कर्तव्य का निश्चय करके अर्थवेत्ताओं में श्रेष्ठ शुक नामक राक्षस से यह उत्तम वचन बोला

सुग्रीवं ब्रूहि गत्वाऽऽशु राजानं वचनान्मम।

यथासंदेशमक्लीबं श्लक्ष्णया परया गिरा॥९॥

‘दूत! तुम मेरे कहने से शीघ्र ही वानरराज सुग्रीव के पास जाओ और मधुर एवं उत्तम वाणी द्वारा निर्भीकतापूर्वक उनसे मेरा यह संदेश कहो— ॥९॥

त्वं वै महाराजकुलप्रसूतो महाबलश्चर्खरजःसुतश्च।

न कश्चनार्थस्तव नास्त्यनर्थस्तथापि मे भ्रातृसमो हरीश॥१०॥

वानरराज! आप वानरों के महाराज के कुल में उत्पन्न हुए हैं। आदरणीय ऋक्षरजा के पुत्र हैं और स्वयं भी बड़े बलवान् हैं। मैं आपको अपने भाई के समान समझता हूँ। यदि मुझसे आपका कोई लाभ नहीं हुआ है तो मेरे द्वारा आपकी कोई हानि भी नहीं हुई है॥ १०॥

अहं यद्यहरं भार्यां राजपुत्रस्य धीमतः।

किं तत्र तव सुग्रीव किष्किन्धां प्रति गम्यताम्॥

सुग्रीव! यदि मैं बुद्धिमान् राजपुत्र राम की स्त्री को हर लाया हूँ तो इसमें आपकी क्या हानि है? अतः आप किष्किन्धा को लौट जाइये॥११॥

नहीयं हरिभिर्लङ्का प्राप्तुं शक्या कथंचन।

देवैरपि सगन्धर्वैः किं पुनर्नरवानरैः॥१२॥

हमारी इस लङ्का में वानरलोग किसी तरह भी नहीं पहुँच सकते। यहाँ देवताओं और गन्धर्वो का भी प्रवेश होना असम्भव है; फिर मनुष्यों और वानरों की तो बात ही क्या है?”॥ १२॥

स तदा राक्षसेन्द्रेण संदिष्टो रजनीचरः।

शुको विहंगमो भूत्वा तूर्णमाप्लुत्य चाम्बरम्॥१३॥

राक्षसराज रावण के इस प्रकार संदेश देने पर उस समय निशाचर शुक तोता नामक पक्षी का रूप धारण करके तुरंत आकाश में उड़ चला॥१३॥

स गत्वा दूरमध्वानमुपर्युपरि सागरम्।

संस्थितो ह्यम्बरे वाक्यं सुग्रीवमिदमब्रवीत्॥१४॥

सर्वमुक्तं यथाऽऽदिष्टं रावणेन दुरात्मना।

समुद्र के ऊपर-ही-ऊपर बहुत दूर का रास्ता तय करके वह सुग्रीव के पास जा पहुँचा और आकाश में ही ठहरकर उसने दुरात्मा रावण की आज्ञा के अनुसार वे सारी बातें सुग्रीव से कहीं॥ १४ १/२ ॥

तत् प्रापयन्तं वचनं तूर्णमाप्लुत्य वानराः॥१५॥

प्रापद्यन्त तदा क्षिप्रं लोप्तुं हन्तुं च मुष्टिभिः।

जिस समय वह संदेश सुना रहा था, उसी समय वानर उछलकर तुरंत उसके पास जा पहुँचे। वे चाहते थे कि हम शीघ्र ही इसकी पाँखें नोच लें और इसे घूसों से ही मार डालें॥ १५ १/२ ॥

सर्वैः प्लवंगैः प्रसभं निगृहीतो निशाचरः॥१६॥

गगनाद् भूतले चाशु प्रतिगृह्यावतारितः।

इस निश्चय के साथ सारे वानरों ने उस निशाचर को बलपूर्वक पकड़ लिया और उसे कैद करके तुरंत आकाश से भूतल पर उतारा ॥ १६ १/२ ॥

वानरैः पीड्यमानस्तु शुको वचनमब्रवीत्॥१७॥

न दूतान् जन्ति काकुत्स्थ वार्यन्तां साधु वानराः।

यस्तु हित्वा मतं भर्तुः स्वमतं सम्प्रधारयेत्।

अनुक्तवादी दूतः सन् स दूतो वधमर्हति॥१८॥

इस प्रकार वानरों के पीड़ा देने पर शुक पुकार उठा —’रघुनन्दन! राजालोग दूतों का वध नहीं करते हैं, अतः आप इन वानरों को भलीभाँति रोकिये। जो स्वामी के अभिप्राय को छोड़कर अपना मत प्रकट करने लगता है, वह दूत बिना कही हुई बात कहने का अपराधी है; अतः वही वध के योग्य होता है’। १७-१८॥

शुकस्य वचनं रामः श्रुत्वा तु परिदेवितम्।

उवाच मावधिष्टेति नतः शाखामृगर्षभान्॥१९॥

शुक के वचन और विलाप को सुनकर भगवान् श्रीराम ने उसे पीटने वाले प्रमुख वानरों को पुकारकर कहा—’इसे मत मारो’ ॥ १९॥

स च पत्रलघुर्भूत्वा हरिभिर्दर्शितेऽभये।

अन्तरिक्षे स्थितो भूत्वा पुनर्वचनमब्रवीत्॥२०॥

उस समय तक शुक के पंखों का भार कुछ हलका हो गया था; (क्योंकि वानरों ने उन्हें नोंच डाला था) फिर उनके अभय देने पर शुक आकाश में खड़ा हो गया और पुनः बोला— ॥२०॥

सुग्रीव सत्त्वसम्पन्न महाबलपराक्रम।

किं मया खलु वक्तव्यो रावणो लोकरावणः॥२१॥

‘महान् बल और पराक्रम से युक्त शक्तिशाली सुग्रीव! समस्त लोकों को रुलाने वाले रावण को मुझे आपकी ओर से क्या उत्तर देना चाहिये’ ॥ २१॥

स एवमुक्तः प्लवगाधिपस्तदा प्लवंगमानामृषभो महाबलः।

उवाच वाक्यं रजनीचरस्य चारं शुकं शुद्धमदीनसत्त्वः ॥ २२॥

शुक के इस प्रकार पूछने पर उस समय कपिशिरोमणि महाबली उदारचेता वानरराज सुग्रीव ने उस निशाचर के दूतसे यह स्पष्ट एवं निश्छल बात कही— ॥ २२॥

न मेऽसि मित्रं न तथानुकम्प्यो न चोपकर्तासि न मे प्रियोऽसि।

अरिश्च रामस्य सहानुबन्धस्ततोऽसि वालीव वधार्ह वध्यः॥२३॥

‘(दूत! तुम रावण से इस प्रकार कहना—)वध के योग्य दशानन ! तुम न तो मेरे मित्र हो, न दया के पात्र हो, न मेरे उपकारी हो और न मेरे प्रिय व्यक्तियों में से ही कोई हो। भगवान् श्रीराम के शत्रु हो, इस कारण अपने सगे-सम्बन्धियोंसहित तुम वाली की भाँति ही मेरे लिये वध्य हो॥ २३॥

निहन्म्यहं त्वां ससुतं सबन्धुं सज्ञातिवर्गं रजनीचरेश।

लङ्कां च सर्वां महता बलेन सर्वैः करिष्यामि समेत्य भस्म॥२४॥

‘निशाचरराज! मैं पुत्र, बन्धु और कुटुम्बीजनोंसहित तुम्हारा संहार करूँगा और बड़ी भारी सेना के साथ आकर समस्त लङ्कापुरी को भस्म कर डालूँगा। २४॥

न मोक्ष्यसे रावण राघवस्य सुरैः सहेन्द्रैरपि मूढ गुप्तः।

अन्तर्हितः सूर्यपथं गतोऽपि तथैव पातालमनुप्रविष्टः।

गिरीशपादाम्बुजसंगतो वा हतोऽसि रामेण सहानुजस्त्वम्॥२५॥

‘मूर्ख रावण! यदि इन्द्र आदि समस्त देवता तुम्हारी रक्षा करें तो भी श्रीरघुनाथजी के हाथ से अब तुम जीवित नहीं छूट सकोगे। तुम अन्तर्धान हो जाओ, आकाश में चले जाओ, पाताल में घुस जाओ अथवा महादेवजी के चरणारविन्दों का आश्रय लो; फिर भी अपने भाइयोंसहित तुम अवश्य श्रीरामचन्द्रजी के हाथों से मारे जाओगे॥२५॥

तस्य ते त्रिषु लोकेषु न पिशाचं न राक्षसम्।

त्रातारं नानुपश्यामि न गन्धर्वं न चासुरम्॥२६॥

‘तीनों लोकों में मुझे कोई भी पिशाच, राक्षस, गन्धर्व या असुर ऐसा नहीं दिखायी देता, जो तुम्हारी रक्षा कर सके॥२६॥

अवधीस्त्वं जरावृद्धं गृध्रराजं जटायुषम्।

किं नु ते रामसांनिध्ये सकाशे लक्ष्मणस्य च।

हृता सीता विशालाक्षी यां त्वं गृह्य न बुध्यसे॥२७॥

‘चिरकाल के बूढ़े गृध्रराज जटायु को तुमने क्यों मारा? यदि तुममें बड़ा बल था तो श्रीराम और लक्ष्मण के पास से तुमने विशाललोचना सीता का अपहरण क्यों नहीं किया? तुम सीताजी को ले जाकर अपने सिर पर आयी हुई विपत्ति को क्यों नहीं समझ रहे हो? ॥ २७॥

महाबलं महात्मानं दुराधर्षं सुरैरपि।

न बुध्यसे रघुश्रेष्ठं यस्ते प्राणान् हरिष्यति॥२८॥

‘रघुकुलतिलक श्रीराम महाबली, महात्मा और देवताओं के लिये भी दुर्जय हैं, किंतु तुम उन्हें अभी तक समझ नहीं सके। (तुमने छिपकर सीता का हरण किया है, परंतु) वे (सामने आकर) तुम्हारे प्राणों का अपहरण करेंगे’ ॥ २८॥

ततोऽब्रवीद् वालिसुतोऽप्यङ्गदो हरिसत्तमः।

नायं दूतो महाराज चारकः प्रतिभाति मे॥२९॥

तुलितं हि बलं सर्वमनेन तव तिष्ठता।

गृह्यतां मागमल्लङ्कामेतद्धि मम रोचते॥३०॥

तत्पश्चात् वानरशिरोमणि वालिकुमार अङ्गद ने कहा—’महाराज! मुझे तो यह दूत नहीं, कोई गुप्तचर प्रतीत होता है। इसने यहाँ खड़े-खड़े आपकी सारी सेना का माप-तौल कर लिया है—पूरा-पूरा अंदाजा लगा लिया है। अतः इसे पकड़ लिया जाय, लङ्का को न जाने पाये मुझे यही ठीक जान पड़ता है। २९-३०॥

ततो राज्ञा समादिष्टाः समुत्पत्य वलीमुखाः।

जगृहुश्च बबन्धुश्च विलपन्तमनाथवत्॥३१॥

फिर तो राजा सुग्रीव के आदेश से वानरों ने उछलकर उसे पकड़ लिया और बाँध दिया। वह बेचारा अनाथ की भाँति विलाप करता रहा ॥ ३१॥

शुकस्तु वानरैश्चण्डैस्तत्र तैः सम्प्रपीडितः।

व्याचुक्रोश महात्मानं रामं दशरथात्मजम्।

लुप्यते मे बलात् पक्षौ भिद्यते मे तथाक्षिणी॥३२॥

यां च रात्रिं मरिष्यामि जाये रात्रिं च यामहम्।

एतस्मिन्नन्तरे काले यन्मया ह्यशुभं कृतम्।

सर्वं तदुपपद्येथा जह्यां चेद् यदि जीवितम्॥३३॥

उन प्रचण्ड वानरों से पीड़ित हो शुक ने दशरथनन्दन महात्मा श्रीराम को बड़े जोर से पुकारा और कहा—’प्रभो! बलपूर्वक मेरी पाँखें नोची और आँखें फोड़ी जा रही हैं। यदि आज मैंने प्राणों का त्याग किया तो जिस रात में मेरा जन्म हुआ था और जिस रात को मैं मरूँगा, जन्म और मरण के इस मध्यवर्ती काल में, मैंने जो भी पाप किया है, वह सब आपको ही लगेगा’॥ ३२-३३॥

नाघातयत् तदा रामः श्रुत्वा तत्परिदेवितम्।

वानरानब्रवीद् रामो मुच्यतां दूत आगतः॥३४॥

उस समय उसका वह विलाप सुनकर श्रीराम ने उसका वध नहीं होने दिया। उन्होंने वानरों से कहा —’छोड़ दो। यह दूत होकर ही आया था’ ॥ ३४ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे विंशः सर्गः॥२०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥२०॥