॥श्री गणेशाय नम:॥
॥श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
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सम्पूर्ण वाल्मीकि रामायण
[काव्य बीजं सनातनम्]

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
उत्तरकाण्डम्

श्रीराम के दरबार में महर्षियों का आगमन, उनके साथ उनकी बातचीत तथा श्रीराम के प्रश्न

प्रथमः सर्गः

सर्ग-01


प्राप्तराज्यस्य रामस्य राक्षसानां वधे कृते।

आजग्मुर्मुनयः सर्वे राघवं प्रतिनन्दितुम्॥१॥

राक्षसों का संहार करने के अनन्तर जब भगवान् श्रीराम ने अपना राज्य प्राप्त कर लिया, तब सम्पूर्ण ऋषि-महर्षि श्रीरघुनाथजी का अभिनन्दन करने के लिये अयोध्यापुरी में आये॥१॥

कौशिकोऽथ यवक्रीतो गाग्र्यो गालव एव च।

कण्वो मेधातिथेः पुत्रः पूर्वस्यां दिशि ये श्रिताः॥२॥

जो मुख्यतः पूर्व दिशा में निवास करते हैं, वे कौशिक, यवक्रीत, गार्ग्य, गालव और मेधातिथि के पुत्र कण्व वहाँ पधारे॥२॥

स्वस्त्यात्रेयश्च भगवान् नमुचिः प्रमुचिस्तथा।

अगस्त्योऽत्रिश्च भगवान् सुमुखो विमुखस्तथा॥

आजग्मुस्ते सहागस्त्या ये श्रिता दक्षिणां दिशम्।

स्वस्त्यात्रेय, भगवान् नमुचि, प्रमुचि, अगस्त्य, भगवान् अत्रि, सुमुख और विमुख—ये दक्षिण दिशा में रहने वाले महर्षि अगस्त्यजी के साथ वहाँ आये॥ ३ १/२॥

नृषङ्गः कवषो धौम्यः कौशेयश्च महानृषिः॥४॥

तेऽप्याजग्मुः सशिष्या वै ये श्रिताः पश्चिमां दिशम्।

जो प्रायः पश्चिम दिशा का आश्रय लेकर रहते हैं, वे नृषङ्ग, कवष, धौम्य और महर्षि कौशेय भी अपने शिष्यों के साथ वहाँ आये॥ ४ १/२ ॥

वसिष्ठः कश्यपोऽथात्रिर्विश्वामित्रः सगौतमः॥

जमदग्निर्भरद्वाजस्तेऽपि सप्तर्षयस्तथा।

उदीच्यां दिशि सप्तैते नित्यमेव निवासिनः॥६॥

इसी तरह उत्तर दिशा के नित्य-निवासी वसिष्ठ,* कश्यप, अत्रि, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि औरभरद्वाज—ये सात ऋषि जो सप्तर्षि कहलाते हैं, अयोध्यापुरी में पधारे॥

* वसिष्ठमुनि एक शरीर से अयोध्या में रहते हुए भी दूसरे शरीर से सप्तर्षिमण्डल में रहते थे, उसी दूसरे शरीर से उनके आने की बात यहाँ कही गयी है—ऐसा समझना चाहिये।

सम्प्राप्यैते महात्मानो राघवस्य निवेशनम्।

विष्ठिताः प्रतिहारार्थं हुताशनसमप्रभाः॥७॥

वेदवेदाङ्गविदुषो नानाशास्त्रविशारदाः।

ये सभी अग्नि के समान तेजस्वी, वेद-वेदाङ्गों के विद्वान् तथा नाना प्रकार के शास्त्रों का विचार करने में प्रवीण थे। वे महात्मा मुनि श्रीरघुनाथजी के राजभवन के पास पहुँचकर अपने आगमन की सूचना देने के लिये ड्योढ़ी पर खड़े हो गये॥ ७ १/२॥

द्वाःस्थं प्रोवाच धर्मात्मा अगस्त्यो मुनिसत्तमः॥८॥

निवेद्यतां दाशरथेर्ऋषयो वयमागताः।

उस समय धर्मपरायण मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य ने द्वारपाल से कहा—’तुम दशरथनन्दन भगवान् श्रीराम को जाकर सूचना दो कि हम अनेक ऋषि-मुनि आपसे मिलने के लिये आये हैं’॥ ८ १/२॥

प्रतीहारस्ततस्तूर्णमगस्त्यवचनाद् द्रुतम्॥९॥

समीपं राघवस्याशु प्रविवेश महात्मनः।

नयेङ्गितज्ञः सद्वृत्तो दक्षो धैर्यसमन्वितः॥१०॥

महर्षि अगस्त्य की आज्ञा पाकर द्वारपाल तुरंत महात्मा श्रीरघुनाथजी के समीप गया। वह नीतिज्ञ, इशारे से बात को समझने वाला, सदाचारी, चतुर और धैर्यवान् था॥

स रामं दृश्य सहसा पूर्णचन्द्रसमद्युतिम्।

अगस्त्यं कथयामास सम्प्राप्तमृषिसत्तमम्॥११॥

पूर्ण चन्द्रमा के समान कान्तिमान् श्रीराम का दर्शन करके उसने सहसा बताया—’प्रभो! मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य अनेक ऋषियों के साथ पधारे हुए हैं’॥११॥

श्रुत्वा प्राप्तान् मुनींस्तांस्तु बालसूर्यसमप्रभान्।

प्रत्युवाच ततो दाःस्थं प्रवेशय यथासुखम्॥१२॥

प्रातःकाल के सूर्य की भाँति दिव्य तेज से प्रकाशित होने वाले उन मुनीश्वरों के पदार्पण का समाचार सुनकर श्रीरामचन्द्रजी ने द्वारपाल से कहा—’तुम जाकर उन सब लोगों को यहाँ सुखपूर्वक ले आओ’ ॥१२॥

दृष्ट्वा प्राप्तान् मुनींस्तांस्तु प्रत्युत्थाय कृताञ्जलिः।

पाद्याादिभिरानर्च गां निवेद्य च सादरम्॥१३॥

(आज्ञा पाकर द्वारपाल गया और सबको साथ ले आया।) उन मुनीश्वरों को उपस्थित देख श्रीरामचन्द्रजी हाथ जोड़कर खड़े हो गये। फिर पाद्यअर्घ्य आदि के द्वारा उनका आदरपूर्वक पूजन किया। पूजन से पहले उन सबके लिये एक-एक गाय भेंट की॥१३॥

रामोऽभिवाद्य प्रयत आसनान्यादिदेश ह।

तेषु काञ्चनचित्रेषु महत्सु च वरेषु च॥१४॥

कुशान्तर्धानदत्तेषु मृगचर्मयुतेषु च।

यथार्हमुपविष्टास्ते आसनेष्वृषिपुङ्गवाः॥१५॥

श्रीराम ने शुद्धभाव से उन सबको प्रणाम करके उन्हें बैठने के लिये आसन दिये। वे आसन सोने के बने हुए और विचित्र आकार-प्रकार वाले थे। सुन्दर होने के साथ ही वे विशाल और विस्तृत भी थे। उनपर कुश के आसन रखकर ऊपर से मृगचर्म बिछाये गये थे। उन आसनों पर वे श्रेष्ठ मुनि यथायोग्य बैठ गये॥ १४-१५॥

रामेण कुशलं पृष्टाः सशिष्याः सपुरोगमाः।

महर्षयो वेदविदो रामं वचनमब्रुवन्।

तब श्रीराम ने शिष्यों और गुरुजनोंसहित उन सबका कुशल-समाचार पूछा। उनके पूछने पर वे वेदवेत्ता महर्षि इस प्रकार बोले- ॥ १५ १/२॥

कुशलं नो महाबाहो सर्वत्र रघुनन्दन॥१६॥

त्वां तु दिष्ट्या कुशलिनं पश्यामो हतशात्रवम्।

दिष्ट्या त्वया हतो राजन् रावणो लोकरावणः॥१७॥

‘महाबाहु रघुनन्दन! हमारे लिये तो सर्वत्र कुशलही-कुशल है। सौभाग्य की बात है कि हम आपको सकुशल देख रहे हैं और आपके सारे शत्रु मारे जा चुके हैं। राजन्! आपने सम्पूर्ण लोकों को रुलाने वाले रावण का वध किया, यह सबके लिये बड़े सौभाग्य की बात है।

नहि भारः स ते राम रावणः पुत्रपौत्रवान्।

सधनुस्त्वं हि लोकांस्त्रीन् विजयेथा न संशयः॥१८॥

‘श्रीराम! पुत्र-पौत्रोंसहित रावण आपके लिये कोई भार नहीं था। आप धनुष लेकर खड़े हो जायँ तो तीनों लोकों पर विजय पा सकते हैं; इसमें संशय नहीं

दिष्ट्या त्वया हतो राम रावणो राक्षसेश्वरः।

दिष्ट्या विजयिनं त्वाद्य पश्यामः सह सीतया॥१९॥

‘रघुनन्दन राम! आपने राक्षसराज रावण का वध कर दिया और सीता के साथ आप विजयी वीरों को आज हम सकुशल देख रहे हैं, यह कितने आनन्द की बात है॥ १९॥

लक्ष्मणेन च धर्मात्मन् भ्रात्रा त्वद्धितकारिणा।

मातृभिर्धातृसहितं पश्यामोऽद्य वयं नृप॥२०॥

‘धर्मात्मा नरेश! आपके भाई लक्ष्मण सदा आपके हित में लगे रहने वाले हैं। आप इनके, भरत-शत्रुघ्न के तथा माताओं के साथ अब यहाँ सानन्द विराज रहे हैं और इस रूप में हमें आपका दर्शन हो रहा है, यह हमारा अहोभाग्य है॥ २० ॥

दिष्ट्या प्रहस्तो विकटो विरूपाक्षो महोदरः।

अकम्पनश्च दुर्धर्षो निहतास्ते निशाचराः॥२१॥

‘प्रहस्त, विकट, विरूपाक्ष, महोदर तथा दुर्धर्ष अकम्पन-जैसे निशाचर आपलोगों के हाथ से मारे गये, यह बड़े आनन्द की बात है॥ २१॥

यस्य प्रमाणाद् विपुलं प्रमाणं नेह विद्यते।

दिष्ट्या ते समरे राम कुम्भकर्णो निपातितः॥२२॥

‘श्रीराम! शरीर की ऊँचाई और स्थूलता में जिससे बढ़कर दूसरा कोई है ही नहीं, उस कुम्भकर्ण को भी आपने समराङ्गण में मार गिराया, यह हमारे लिये परम सौभाग्य की बात है॥ २२॥

त्रिशिराश्चातिकायश्च देवान्तकनरान्तकौ।

दिष्ट्या ते निहता राम महावीर्या निशाचराः॥२३॥

‘श्रीराम! त्रिशिरा, अतिकाय, देवान्तक तथा नरान्तक-ये महापराक्रमी निशाचर भी हमारे सौभाग्य से ही आपके हाथों मारे गये॥ २३॥

कुम्भश्चैव निकुम्भश्च राक्षसौ भीमदर्शनौ।

दिष्ट्या तौ निहतौ राम कुम्भकर्णसुतौ मृधे॥२४॥

‘रघुवीर! जो देखने में भी बड़े भयंकर थे, वे कुम्भकर्ण के दोनों पुत्र कुम्भ और निकुम्भ नामक राक्षस भी भाग्यवश युद्ध में मारे गये॥२४॥

युद्धोन्मत्तश्च मत्तश्च कालान्तकयमोपमौ।

यज्ञकोपश्च बलवान् धूम्राक्षो नाम राक्षसः॥२५॥

‘प्रलयकाल के संहारकारी यमराज की भाँति भयानक युद्धोन्मत्त और मत्त भी काल के गाल में चले गये। बलवान् यज्ञकोप और धूम्राक्ष नामक राक्षस भी यमलोक के अतिथि हो गये॥ २५॥

कुर्वन्तः कदनं घोरमेते शस्त्रास्त्रपारगाः।

अन्तकप्रतिमैर्बाणैर्दिष्ट्या विनिहतास्त्वया॥२६॥

‘ये समस्त निशाचर अस्त्र-शस्त्रों के पारंगत विद्वान् थे। इन्होंने जगत् में भयंकर संहार मचा रखा था; परंतु आपने अन्तकतुल्य बाणों द्वारा इन सबको मौत के घाट उतार दिया; यह कितने हर्ष की बात है। २६॥

दिष्ट्या त्वं राक्षसेन्द्रेण द्वन्द्वयुद्धमुपागतः।

देवतानामवध्येन विजयं प्राप्तवानसि॥२७॥

‘राक्षसराज रावण देवताओं के लिये भी अवध्य था, उसके साथ आप द्वन्द्वयुद्ध में उतर आये और विजय भी आपको ही मिली; यह बड़े सौभाग्य की बात है।

संख्ये तस्य न किंचित् तु रावणस्य पराभवः।

द्वन्द्वयुद्धमनुप्राप्तो दिष्ट्या ते रावणिर्हतः॥२८॥

‘युद्ध में आपके द्वारा जो रावण का पराभव (संहार) हुआ, वह कोई बड़ी बात नहीं है; परंतु द्वन्द्वयुद्ध में लक्ष्मण के द्वारा जो रावणपुत्र इन्द्रजित् का वध हुआ है, वही सबसे बढ़कर आश्चर्य की बात है॥ २८॥

दिष्टया तस्य महाबाहो कालस्येवाभिधावतः।

मुक्तः सुररिपोर्वीर प्राप्तश्च विजयस्त्वया॥२९॥

‘महाबाहु वीर! काल के समान आक्रमण करने वाले उस देवद्रोही राक्षस के नागपाश से मुक्त होकर आपने विजय प्राप्त की, यह महान् सौभाग्य की बात है॥ २९॥

अभिनन्दाम ते सर्वे संश्रुत्येन्द्रजितो वधम्।

अवध्यः सर्वभूतानां महामायाधरो युधि॥३०॥

विस्मयस्त्वेष चास्माकं तं श्रुत्वेन्द्रजितं हतम्।

‘इन्द्रजित् के वध का समाचार सुनकर हम सब लोग बहुत प्रसन्न हुए हैं और इसके लिये आपका अभिनन्दन करते हैं। वह महामायावी राक्षस युद्ध में सभी प्राणियों के लिये अवध्य था। वह इन्द्रजित् भी मारा गया, यह सुनकर हमें अधिक आश्चर्य हुआ है॥ ३० १/२॥

एते चान्ये च बहवो राक्षसाः कामरूपिणः॥३१॥

दिष्ट्या त्वया हता वीरा रघूणां कुलवर्धन।

‘रघुकुल की वृद्धि करने वाले श्रीराम ! ये तथा और भी बहुत-से इच्छानुसार रूप धारण करने वाले वीर राक्षस आपके द्वारा मारे गये, यह बड़े आनन्द की बात है॥ ३१ १/२॥

दत्त्वा पुण्यामिमां वीर सौम्यामभयदक्षिणाम्॥३२॥

दिष्ट्या वर्धसि काकुत्स्थ जयेनामित्रकर्शन।

‘वीर! ककुत्स्थकुलभूषण! शत्रुसूदन श्रीराम! आप संसार को यह परम पुण्यमय सौम्य अभयदान देकर अपनी विजय के कारण वधाई के पात्र हो गये हैं निरन्तर बढ़ रहे हैं, यह कितने हर्ष की बात है!’॥ ३२ १/२॥

श्रुत्वा तु वचनं तेषां मुनीनां भावितात्मनाम्॥३३॥

विस्मयं परमं गत्वा रामः प्राञ्जलिरब्रवीत्।

उन पवित्रात्मा मुनियों की वह बात सुनकर श्रीरामचन्द्रजी को बड़ा आश्चर्य हुआ। वे हाथ जोड़कर पूछने लगे- ॥ ३३ १/२॥

भगवन्तः कुम्भकर्णं रावणं च निशाचरम्॥३४॥

अतिक्रम्य महावी किं प्रशंसथ रावणिम्।

‘पूज्यपाद महर्षियो! निशाचर रावण तथा कुम्भकर्ण दोनों ही महान् बल-पराक्रम से सम्पन्न थे। उन दोनों को लाँघकर आप रावणपुत्र इन्द्रजित् की ही प्रशंसा क्यों करते हैं? ॥ ३४ १/२॥

महोदरं प्रहस्तं च विरूपाक्षं च राक्षसम्॥३५॥

मत्तोन्मत्तौ च दुर्धर्षों देवान्तकनरान्तकौ।

अतिक्रम्य महावीरान् किं प्रशंसथ रावणिम्॥

‘महोदर, प्रहस्त, विरूपाक्ष, मत्त, उन्मत्त तथा दुर्धर्ष वीर देवान्तक और नरान्तक-इन महान् वीरों का उल्लङ्घन करके आपलोग रावणकुमार इन्द्रजित् की ही प्रशंसा क्यों कर रहे हैं? ॥ ३५-३६ ॥

अतिकायं त्रिशिरसं धूम्राक्षं च निशाचरम्।

अतिक्रम्य महावीर्यान् किं प्रशंसथ रावणिम्॥३७॥

‘अतिकाय, त्रिशिरा तथा निशाचर धूम्राक्ष—इन महापराक्रमी वीरों का अतिक्रमण करके आप रावणपुत्र इन्द्रजित् की ही प्रशंसा क्यों करते हैं? ॥ ३७॥

कीदृशो वै प्रभावोऽस्य किं बलं कः पराक्रमः।

केन वा कारणेनैष रावणादतिरिच्यते॥३८॥

‘उसका प्रभाव कैसा था? उसमें कौन-सा बल और पराक्रम था? अथवा किस कारण से यह रावण से भी बढ़कर सिद्ध होता है॥ ३८॥

शक्यं यदि मया श्रोतुं न खल्वाज्ञापयामि वः।

यदि गुह्यं न चेद् वक्तुं श्रोतुमिच्छामि कथ्यताम्॥३९॥

‘यदि यह मेरे सुनने योग्य हो, गोपनीय न हो तो मैं इसे सुनना चाहता हूँ। आपलोग बताने की कृपा करें। यह मेरा विनम्र अनुरोध है। मैं आपलोगों को आज्ञा नहीं दे रहा हूँ॥ ३९॥

शक्रोऽपि विजितस्तेन कथं लब्धवरश्च सः।

कथं च बलवान् पुत्रो न पिता तस्य रावणः॥४०॥

‘उस रावणपुत्र ने इन्द्र को भी किस तरह जीत लिया? कैसे वरदान प्राप्त किया? पुत्र किस प्रकार महाबलवान् हो गया और उसका पिता रावण क्यों वैसा बलवान् नहीं हुआ? ॥ ४०॥

कथं पितुश्चाप्यधिको महाहवे शक्रस्य जेता हि कथं स राक्षसः।

वरांश्च लब्धाः कथयस्व मेऽद्य तत् पृच्छतश्चास्य मुनीन्द्र सर्वम्॥४१॥

‘मुनीश्वर! वह राक्षस इन्द्रजित् महासमर में किस तरह पिता से भी अधिक शक्तिशाली एवं इन्द्रपर भी विजय पाने वाला हो गया? तथा किस तरह उसने बहुत-से वर प्राप्त कर लिये? इन सब बातों को मैं जानना चाहता हूँ; इसलिये बारम्बार पूछता हूँ। आज आप ये सारी बातें मुझे बताइये ॥ ४१॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे प्रथमः सर्गः॥१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्ड में पहला सर्ग पूरा हुआ॥१॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
उत्तरकाण्डम्

महर्षि अगस्त्य के द्वारा पुलस्त्य के गुण और तपस्या का वर्णन तथा उनसे विश्रवामुनि की उत्पत्ति का कथन

द्वितीयः सर्गः

सर्ग-02


तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राघवस्य महात्मनः।

कुम्भयोनिमहातेजा वाक्यमेतदवाच ह॥१॥

महात्मा रघुनाथजी का वह प्रश्न सुनकर महातेजस्वी कुम्भयोनि अगस्त्य ने उनसे इस प्रकार कहा- ॥१॥

शृणु राम तथा वृत्तं तस्य तेजोबलं महत्।

जघान शत्रून् येनासौ न च वध्यः स शत्रुभिः॥२॥

‘श्रीराम! इन्द्रजित् के महान् बल और तेज के उद्देश्य से जो वृत्तान्त घटित हुआ है, उसे बताता हूँ, सुनो। जिस बल के कारण वह तो शत्रुओं को मार गिराता था, परंतु स्वयं किसी शत्रु के हाथ से मारा नहीं जाता था; उसका परिचय दे रहा हूँ॥२॥

तावत् ते रावणस्येदं कुलं जन्म च राघव।

वरप्रदानं च तथा तस्मै दत्तं ब्रवीमि ते॥३॥

‘रघुनन्दन! इस प्रस्तुत विषय का वर्णन करने के लिये मैं पहले आपको रावण के कुल, जन्म तथा वरदान-प्राप्ति आदि का प्रसङ्ग सुनाता हूँ॥ ३॥

पुरा कृतयुगे राम प्रजापतिसुतः प्रभुः।

पुलस्त्यो नाम ब्रह्मर्षिः साक्षादिव पितामहः॥४॥

‘श्रीराम! प्राचीनकाल–सत्ययुग की बात है, प्रजापति ब्रह्माजी के एक प्रभावशाली पुत्र हुए, जो ब्रह्मर्षि पुलस्त्य के नाम से प्रसिद्ध हैं। वे साक्षात् ब्रह्माजी के समान ही तेजस्वी हैं॥ ४॥

नानुकीर्त्या गुणास्तस्य धर्मतः शीलतस्तथा।

प्रजापतेः पुत्र इति वक्तुं शक्यं हि नामतः॥५॥

‘उनके गुण, धर्म और शील का पूरा-पूरा वर्णन नहीं किया जा सकता। उनका इतना ही परिचय देना पर्याप्त होगा कि वे प्रजापति के पुत्र हैं॥५॥

प्रजापतिसुतत्वेन देवानां वल्लभो हि सः।

इष्टः सर्वस्य लोकस्य गुणैः शुभैर्महामतिः॥६॥

‘प्रजापति ब्रह्मा के पुत्र होने के कारण ही देवता लोग उनसे बहुत प्रेम करते हैं। वे बड़े बुद्धिमान् हैं और अपने उज्ज्वल गुणों के कारण ही सब लोगों के प्रिय हैं॥६॥

स तु धर्मप्रसङ्गेन मेरोः पार्वे महागिरेः।

तृणबिन्द्राश्रमं गत्वाप्यवसन्मुनिपुङ्गवः॥७॥

‘एक बार मुनिवर पुलस्त्य धर्माचरण के प्रसङ्ग से महागिरि मेरु के निकटवर्ती राजर्षि तृणबिन्दु के आश्रम में गये और वहीं रहने लगे॥७॥

तपस्तेपे स धर्मात्मा स्वाध्यायनियतेन्द्रियः।

गत्वाऽऽश्रमपदं तस्य विघ्नं कुर्वन्ति कन्यकाः॥८॥

ऋषिपन्नगकन्याश्च राजर्षितनयाश्च याः।

क्रीडन्त्योऽप्सरसश्चैव तं देशमुपपेदिरे॥९॥

‘उनका मन सदा धर्म में ही लगा रहता था। वे इन्द्रियों को संयम में रखते हुए प्रतिदिन वेदों का स्वाध्याय करते और तपस्या में लगे रहते थे। परंतु कुछ कन्याएँ उनके आश्रम में जाकर उनकी तपस्या में विघ्न डालने लगीं। ऋषियों, नागों तथा राजर्षियों की कन्याएँ और जो अप्सराएँ हैं, वे भी प्रायः क्रीडा करती हुई उनके आश्रम की ओर आ जाती थीं। ८-९॥

सर्वर्तुषूपभोग्यत्वाद् रम्यत्वात् काननस्य च।

नित्यशस्तास्तु तं देशं गत्वा क्रीडन्ति कन्यकाः॥१०॥

‘वहाँ का वन सभी ऋतुओं में उपभोग में लाने के योग्य और रमणीय था, इसलिये वे कन्याएँ प्रतिदिन उस प्रदेश में जाकर भाँति-भाँति की क्रीडाएँ करती थीं॥ १०॥

देशस्य रमणीयत्वात् पुलस्त्यो यत्र स द्विजः।

गायन्त्यो वादयन्त्यश्च लासयन्त्यस्तथैव च॥११॥

मुनेस्तपस्विनस्तस्य विघ्नं चक्रुरनिन्दिताः।

‘जहाँ ब्रह्मर्षि पुलस्त्य रहते थे, वह स्थान तो और भी रमणीय था; इसलिये वे सती-साध्वी कन्याएँ प्रतिदिन वहाँ आकर गाती, बजाती तथा नाचती थीं। इस प्रकार उन तपस्वी मुनि के तप में विघ्न डाला करती थीं। ११ १/२॥

अथ रुष्टो महातेजा व्याजहार महामुनिः॥१२॥

या मे दर्शनमागच्छेत् सा गर्भ धारयिष्यति।

‘इससे वे महातेजस्वी महामुनि पुलस्त्य कुछ रुष्ट हो गये और बोले—’कल से जो लड़की यहाँ मेरे दृष्टिपथ में आयेगी, वह निश्चय ही गर्भ धारण कर लेगी’ ॥ १२ १/२॥

तास्तु सर्वाः प्रतिश्रुत्य तस्य वाक्यं महात्मनः॥१३॥

ब्रह्मशापभयाद् भीतास्तं देशं नोपचक्रमुः।

‘उन महात्मा की यह बात सुनकर वे सब कन्याएँ ब्रह्मशाप के भय से डर गयीं और उन्होंने उस स्थान पर आना छोड़ दिया॥ १३ १/२॥

तृणबिन्दोस्तु राजर्षेस्तनया न शृणोति तत्॥१४॥

गत्वाऽऽश्रमपदं तत्र विचचार सुनिर्भया।

‘परंतु राजर्षि तृणबिन्दु की कन्या ने इस शाप को नहीं सुना था; इसलिये वह दूसरे दिन भी बेखट के आकर उस आश्रम में विचरने लगी॥ १४ १/२॥

न चापश्यच्च सा तत्र कांचिदभ्यागतां सखीम्॥१५॥

तस्मन् काले महातेजाः प्राजापत्यो महानृषिः।

स्वाध्यायमकरोत् तत्र तपसा भावितः स्वयम्॥१६॥

‘वहाँ उसने अपनी किसी सखी को आयी हुई नहीं देखा। उस समय प्रजापति के पुत्र महातेजस्वी महर्षि पुलस्त्य अपनी तपस्या से प्रकाशित हो वहाँ वेदों का स्वाध्याय कर रहे थे॥ १५-१६॥

सा तु वेदश्रुतिं श्रुत्वा दृष्ट्वा वै तपसो निधिम्।

अभवत् पाण्डुदेहा सा सुव्यञ्जितशरीरजा॥१७॥

‘उस वेदध्वनि को सुनकर वह कन्या उसी ओर गयी और उसने तपोनिधि पुलस्त्यजी का दर्शन किया। महर्षि की दृष्टि पड़ते ही उसके शरीर पर पीलापन छा गया और गर्भ के लक्षण प्रकट हो गये॥ १७॥

बभूव च समुद्रिग्ना दृष्ट्वा तद्दोषमात्मनः।

इदं मे किंत्विति ज्ञात्वा पितुर्गत्वाऽऽश्रमे स्थिता॥१८॥

‘अपने शरीर में यह दोष देखकर वह घबरा उठी और ‘मुझे यह क्या हो गया?’ इस प्रकार चिन्ता करती हुई पिता के आश्रम पर जाकर खड़ी हुई॥ १८ ॥

तां तु दृष्ट्वा तथाभूतां तृणबिन्दुरथाब्रवीत्।

किं त्वमेतत्त्वसदृशं धारयस्यात्मनो वपुः॥१९॥

‘अपनी कन्या को उस अवस्था में देखकर तृणबिन्दु ने पूछा—’तुम्हारे शरीर की ऐसी अवस्था कैसे हुई? तुम अपने शरीर को जिस रूप में धारण कर रही हो, यह तुम्हारे लिये सर्वथा अयोग्य एवं अनुचित है’ ॥ १९॥

सा तु कृत्वाञ्जलिं दीना कन्योवाच तपोधनम्।

न जाने कारणं तात येन मे रूपमीदृशम्॥२०॥

वह बेचारी कन्या हाथ जोड़कर उन तपोधन मुनि से बोली—’पिताजी ! मैं उस कारण को नहीं समझ पाती, जिससे मेरा रूप ऐसा हो गया है॥ २०॥

किं तु पूर्वं गतास्म्येका महर्षेर्भावितात्मनः।

पुलस्त्यस्याश्रमं दिव्यमन्वेष्टुं स्वसखीजनम्॥२१॥

‘अभी थोड़ी देर पहले मैं पवित्र अन्तःकरण वाले महर्षि पुलस्त्य के दिव्य आश्रम पर अपनी सखियों को खोजने के लिये अकेली गयी थी॥२१॥

न च पश्याम्यहं तत्र कांचिदभ्यागतां सखीम्।

रूपस्य तु विपर्यासं दृष्ट्वा त्रासादिहागता॥२२॥

‘वहाँ देखती हूँ तो कोई भी सखी उपस्थित नहीं है। साथ ही मेरा रूप पहले से विपरीत अवस्था में पहुँच गया है; यह सब देखकर मैं भयभीत हो यहाँ आ गयी हूँ’॥ २२॥

तृणबिन्दुस्तु राजर्षिस्तपसा द्योतितप्रभः ।

ध्यानं विवेश तच्चापि अपश्यदृषिकर्मजम्॥२३॥

‘राजर्षि तृणबिन्दु अपनी तपस्या से प्रकाशमान थे। उन्होंने ध्यान लगाकर देखा तो ज्ञात हुआ कि यह सब कुछ महर्षि पुलस्त्य के ही करने से हुआ है। २३॥

स तु विज्ञाय तं शापं महर्षेर्भावितात्मनः।

गृहीत्वा तनयां गत्वा पुलस्त्यमिदमब्रवीत्॥२४॥

‘उन पवित्रात्मा महर्षि के उस शाप को जानकर वे अपनी पुत्री को साथ लिये पुलस्त्यजी के पास गये और इस प्रकार बोले- ॥२४॥

भगवंस्तनयां मे त्वं गुणैः स्वैरेव भूषिताम्।

भिक्षां प्रतिगृहाणेमां महर्षे स्वयमुद्यताम्॥२५॥

‘भगवन् ! मेरी यह कन्या अपने गुणों से ही विभूषित है। महर्षे! आप इसे स्वयं प्राप्त हुई भिक्षा के रूप में ग्रहण कर लें॥२५॥

तपश्चरणयुक्तस्य श्रम्यमाणेन्द्रियस्य ते।

शुश्रूषणपरा नित्यं भविष्यति न संशयः॥२६॥

‘आप तपस्या में लगे रहने के कारण थक जाते होंगे; अतः यह सदा साथ रहकर आपकी सेवाशुश्रूषा किया करेगी, इसमें संशय नहीं है ॥२६॥

तं ब्रुवाणं तु तद् वाक्यं राजर्षि धार्मिकं तदा।

जिघृक्षरब्रवीत् कन्यां बाढमित्येव स द्विजः॥२७॥

ऐसी बात कहते हुए उन धर्मात्मा राजर्षि को देखकर उनकी कन्या को ग्रहण करने की इच्छा से उन ब्रह्मर्षि ने कहा—’बहुत अच्छा’ ॥२७॥

दत्त्वा तु तनयां राजा स्वमाश्रमपदं गतः।

सापि तत्रावसत् कन्या तोषयन्ती पतिं गुणैः॥२८॥

‘तब उन महर्षि को अपनी कन्या देकर राजर्षि तृणबिन्दु अपने आश्रम पर लौट आये और वह कन्या अपने गुणों से पति को संतुष्ट करती हुई वहीं रहने लगी॥ २८॥

तस्यास्तु शीलवृत्ताभ्यां तुतोष मुनिपुङ्गवः।

प्रीतः स तु महातेजा वाक्यमेतदुवाच ह॥२९॥

‘उसके शील और सदाचार से वे महातेजस्वी मुनिवर पुलस्त्य बहुत संतुष्ट हुए और प्रसन्नतापूर्वक यों बोले- ॥२९॥

परितुष्टोऽस्मि सुश्रोणि गुणानां सम्पदा भृशम्।

तस्माद् देवि ददाम्यद्य पुत्रमात्मसमं तव॥३०॥

उभयोर्वंशकर्तारं पौलस्त्य इति विश्रुतम्।

‘सुन्दरि! मैं तुम्हारे गुणों के वैभव से अत्यन्त प्रसन्न हूँ। देवि! इसीलिये आज मैं तुम्हें अपने समान पुत्र प्रदान करता हूँ, जो माता और पिता दोनों के कुल की प्रतिष्ठा बढ़ायेगा और पौलस्त्य नाम से विख्यात होगा।

यस्मात् तु विश्रुतो वेदस्त्वयेहाध्ययतो मम॥३१॥

तस्मात् स विश्रवा नाम भविष्यति न संशयः।

‘देवि! मैं यहाँ वेद का स्वाध्याय कर रहा था, उस समय तुमने आकर उसका विशेषरूप से श्रवण किया, इसलिये तुम्हारा वह पुत्र विश्रवा या विश्रवण कहलायेगा; इसमें संशय नहीं है’ ॥ ३१ १/२॥

एवमुक्ता तु सा देवी प्रहृष्टेनान्तरात्मना॥३२॥

अचिरेणैव कालेनासूत विश्रवसं सुतम्।

त्रिषु लोकेषु विख्यातं यशोधर्मसमन्वितम्॥३३॥

‘पति के प्रसन्नचित्त होकर ऐसी बात कहने पर उस देवी ने बड़े हर्ष के साथ थोड़े ही समय में विश्रवा नामक पुत्र को जन्म दिया, जो यश और धर्म से सम्पन्न होकर तीनों लोकों में विख्यात हुआ। ३२-३३॥

श्रुतिमान् समदर्शी च व्रताचाररतस्तथा।

पितेव तपसा युक्तो ह्यभवद् विश्रवा मुनिः॥३४॥

‘विश्रवा मुनि वेद के विद्वान्, समदर्शी, व्रत और आचारका पालन करने वाले तथा पिता के समान ही तपस्वी हुए’ ॥ ३४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे द्वितीयः सर्गः॥२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्ड में दूसरा सर्ग पूरा हुआ॥२॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
उत्तरकाण्डम्

विश्रवा से वैश्रवण (कुबेर ) की उत्पत्ति, उनकी तपस्या, वरप्राप्ति तथा लङ्का में निवास

तृतीयः सर्गः

सर्ग-03


अथ पुत्रः पुलस्त्यस्य विश्रवा मुनिपुङ्गवः।

अचिरेणैव कालेन पितेव तपसि स्थितः॥१॥

पुलस्त्य के पुत्र मुनिवर विश्रवा थोड़े ही समय में पिता की भाँति तपस्या में संलग्न हो गये॥१॥

सत्यवान् शीलवान् दान्तः स्वाध्यायनिरतः शुचिः ।

सर्वभोगेष्वसंसक्तो नित्यं धर्मपरायणः॥२॥

वे सत्यवादी, शीलवान्, जितेन्द्रिय, स्वाध्यायपरायण, बाहर-भीतर से पवित्र, सम्पूर्ण भोगों में अनासक्त तथा सदा ही धर्म में तत्पर रहने वाले थे॥२॥

ज्ञात्वा तस्य तु तद् वृत्तं भरद्वाजो महामुनिः।

ददौ विश्रवसे भार्यां स्वसुतां देववर्णिनीम्॥३॥

विश्रवा के इस उत्तम आचरण को जानकर महामुनि भरद्वाज ने अपनी कन्या का, जो देवाङ्गना के समान सुन्दरी थी, उनके साथ विवाह कर दिया॥३॥

प्रतिगृह्य तु धर्मेण भरद्वाजसुतां तदा।

प्रजान्वेषिकया बुद्ध्या श्रेयो ह्यस्य विचिन्तयन्॥४॥

मुदा परमया युक्तो विश्रवा मुनिपुङ्गवः।

स तस्यां वीर्यसम्पन्नमपत्यं परमाद्भुतम्॥५॥

जनयामास धर्मज्ञः सर्वैर्ब्रह्मगुणैर्वृतम्।

तस्मिजाते तु संहृष्टः स बभूव पितामहः॥६॥

धर्म के ज्ञाता मुनिवर विश्रवा ने बड़ी प्रसन्नता के साथ धर्मानुसार भरद्वाज की कन्या का पाणिग्रहण किया और प्रजा का हित चिन्तन करने वाली बुद्धि के द्वारा लोककल्याण का विचार करते हुए उन्होंने उसके गर्भ से एक अद्भुत और पराक्रमी पुत्र उत्पन्न किया। उसमें सभी ब्राह्मणोचित गुण विद्यमान थे। उसके जन्म से पितामह पुलस्त्य मुनि को बड़ी प्रसन्नता हुई॥४-६॥

दृष्ट्वा श्रेयस्करी बुद्धिं धनाध्यक्षो भविष्यति।

नाम चास्याकरोत् प्रीतः सार्धं देवर्षिभिस्तदा॥७॥

उन्होंने दिव्य दृष्टिसे देखा—’इस बालक में संसार का कल्याण करने की बुद्धि है तथा यह आगे चलकर धनाध्यक्ष होगा’ तब उन्होंने बड़े हर्ष से भरकर देवर्षियों के साथ उसका नामकरण-संस्कार किया॥७॥

यस्माद् विश्रवसोऽपत्यं सादृश्याद् विश्रवा इव।

तस्माद् वैश्रवणो नाम भविष्यत्येष विश्रुतः॥८॥

वे बोले—’विश्रवा का यह पुत्र विश्रवा के ही समान उत्पन्न हुआ है; इसलिये यह वैश्रवण नाम से विख्यात होगा’ ॥ ८॥

स तु वैश्रवणस्तत्र तपोवनगतस्तदा।

अवर्धताहुतिहुतो महातेजा यथानलः॥९॥

कुमार वैश्रवण वहाँ तपोवन में रहकर उस समय आहुति डालने से प्रज्वलित हुई अग्नि के समान बढ़ने लगे और महान् तेज से सम्पन्न हो गये॥९॥

तस्याश्रमपदस्थस्य बुद्धिर्जज्ञे महात्मनः।

चरिष्ये परमं धर्मं धर्मो हि परमा गतिः॥१०॥

आश्रम में रहने के कारण उन महात्मा वैश्रवण के मन में भी यह विचार उत्पन्न हुआ कि मैं उत्तम धर्म का आचरण करूँ; क्योंकि धर्म ही परमगति है॥१०॥

स तु वर्षसहस्राणि तपस्तप्त्वा महावने।

यन्त्रितो नियमैरुग्रैश्चकार सुमहत्तपः॥११॥

यह सोचकर उन्होंने तपस्या का निश्चय करने के पश्चात् महान् वन के भीतर सहस्रों वर्षों तक कठोर नियमों से बँधकर बड़ी भारी तपस्या की॥ ११॥

पूर्णे वर्षसहस्रान्ते तं तं विधिमकल्पयत्।

जलाशी मारुताहारो निराहारस्तथैव च॥१२॥

एवं वर्षसहस्राणि जग्मुस्तान्येकवर्षवत्।

वे एक-एक सहस्र वर्ष पूर्ण होने पर तपस्या की नयी-नयी विधि ग्रहण करते थे। पहले तो उन्होंने केवल जल का आहार किया। तत्पश्चात् वे हवा पीकर रहने लगे; फिर आगे चलकर उन्होंने उसका भी त्याग कर दिया और वे एकदम निराहार रहने लगे। इस तरह उन्होंने कई सहस्र वर्षों को एक वर्ष के समान बिता दिया॥ १२ १/२॥

अथ प्रीतो महातेजाः सेन्द्रैः सुरगणैः सह ॥१३॥

गत्वा तस्याश्रमपदं ब्रह्मेदं वाक्यमब्रवीत्।।

तब उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर महातेजस्वी ब्रह्माजी इन्द्र आदि देवताओं के साथ उनके आश्रमपर पधारे और इस प्रकार बोले- ॥ १३ १/२॥

परितुष्टोऽस्मि ते वत्स कर्मणानेन सुव्रत॥१४॥

वरं वृणीष्व भद्रं ते वराहस्त्वं महामते।

‘उत्तम व्रत का पालन करने वाले वत्स! मैं तुम्हारे इस कर्म से—तपस्या से बहुत संतुष्ट हूँ। महामते ! तुम्हारा भला हो। तुम कोई वर माँगो; क्योंकि वर पाने के योग्य हो’॥ १४ १/२॥

अथाब्रवीद वैश्रवणः पितामहमुपस्थितम्॥१५॥

भगवॅल्लोकपालत्वमिच्छेयं लोकरक्षणम्।

यह सुनकर वैश्रवण ने अपने निकट खड़े हुए पितामह से कहा—’भगवन् ! मेरा विचार लोक की रक्षा करने का  है, अतः मैं लोकपाल होना चाहता हूँ’॥ १५ १/२॥

अथाब्रवीद् वैश्रवणं परितुष्टेन चेतसा॥१६॥

ब्रह्मा सुरगणैः सार्धं बाढमित्येव हृष्टवत्।

वैश्रवणकी इस बात से ब्रह्माजी के चित्त को और भी संतोष हुआ। उन्होंने सम्पूर्ण देवताओं के साथ प्रसन्नतापूर्वक कहा—’बहुत अच्छा’ ॥ १६ १/२॥

अहं वै लोकपालानां चतुर्थं स्रष्टुमुद्यतः॥१७॥

यमेन्द्रवरुणानां च पदं यत् तव चेप्सितम्।

इसके बाद वे फिर बोले—’बेटा! मैं चौथे लोकपाल की सृष्टि करने के लिये उद्यत था। यम, इन्द्र और वरुण को जो पद प्राप्त है, वैसा ही लोकपाल पद तुम्हें भी प्राप्त होगा, जो तुमको अभीष्ट है॥ १७ १/२॥

तद् गच्छ बत धर्मज्ञ निधीशत्वमवाप्नुहि ॥१८॥

शक्राम्बुपयमानां च चतुर्थस्त्वं भविष्यसि।

‘धर्मज्ञ ! तुम प्रसन्नतापूर्वक उस पद को ग्रहण करो और अक्षय निधियों के स्वामी बनो। इन्द्र, वरुण और यम के साथ तुम चौथे लोकपाल कहलाओगे॥ १८ १/२॥

एतच्च पुष्पकं नाम विमानं सूर्यसंनिभम्॥१९॥

प्रतिगृह्णीष्व यानार्थं त्रिदशैः समतां व्रज।

‘यह सूर्यतुल्य तेजस्वी पुष्पकविमान है। इसे अपनी सवारी के लिये ग्रहण करो और देवताओं के समान हो जाओ॥ १९ १/२॥

स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामः सर्व एव यथागतम्॥२०॥

कृतकृत्या वयं तात दत्वा तव वरद्रयम्।

‘तात! तुम्हारा कल्याण हो। अब हम सब लोग जैसे आये हैं, वैसे लौट जायेंगे। तुम्हें ये दो वर देकर हम अपने को कृतकृत्य समझते हैं ॥ २० १/२॥

इत्युक्त्वा स गतो ब्रह्मा स्वस्थानं त्रिदशैः सह।२१॥

गतेषु ब्रह्मपूर्वेषु देवेष्वथ नभस्तलम्।

धनेशः पितरं प्राह प्राञ्जलिः प्रयतात्मवान्॥२२॥

भगवॅल्लब्धवानस्मि वरमिष्टं पितामहात्।

ऐसा कहकर ब्रह्माजी देवताओं के साथ अपने स्थान को चले गये। ब्रह्मा आदि देवताओं के आकाश में चले जाने पर अपने मन को संयम में रखने वाले धनाध्यक्ष ने पिता से हाथ जोड़कर कहा ‘भगवन्! मैंने पितामह ब्रह्माजी से मनोवाञ्छित फल प्राप्त किया है॥ २१-२२ १/२॥

निवासनं न मे देवो विदधे स प्रजापतिः॥२३॥

तं पश्य भगवन् कंचिन्निवासं साधु मे प्रभो।

न च पीडा भवेद् यत्र प्राणिनो यस्य कस्यचित्॥२४॥

‘परंतु उन प्रजापतिदेव ने मेरे लिये कोई निवासस्थान नहीं बताया। अतः भगवन् ! अब आप ही मेरे रहने के योग्य किसी ऐसे स्थान की खोज कीजिये, जो सभी दृष्टियों से अच्छा हो। प्रभो! वह स्थान ऐसा होना चाहिये, जहाँ रहने से किसी भी प्राणी को कष्ट न हो’॥ २३-२४॥

एवमुक्तस्तु पुत्रेण विश्रवा मुनिपुंगवः।

वचनं प्राह धर्मज्ञ श्रूयतामिति सत्तम ॥२५॥

दक्षिणस्योदधेस्तीरे त्रिकूटो नाम पर्वतः।

तस्याग्रे तु विशाला सा महेन्द्रस्य पुरी यथा॥२६॥

अपने पुत्र के ऐसा कहने पर मुनिवर विश्रवा बोले —’धर्मज्ञ! साधुशिरोमणे! सुनो—दक्षिण समुद्र के तट पर एक त्रिकूट नामक पर्वत है। उसके शिखर पर एक विशाल पुरी है, जो देवराज इन्द्र की अमरावती पुरी के समान शोभा पाती है॥ २५-२६ ॥

लङ्का नाम पुरी रम्या निर्मिता विश्वकर्मणा।

राक्षसानां निवासार्थं यथेन्द्रस्यामरावती॥२७॥

‘उसका नाम लङ्का है। इन्द्र की अमरावती के समान उस रमणीय पुरी का निर्माण विश्वकर्मा ने राक्षसों के रहने के लिये किया है॥२७॥

तत्र त्वं वस भद्रं ते लङ्कायां नात्र संशयः।

हेमप्राकारपरिखा यन्त्रशस्त्रसमावृता॥२८॥

‘बेटा! तुम्हारा कल्याण हो। तुम निःसंदेह उस लङ्कापुरी में ही जाकर रहो। उसकी चहारदीवारी सोने की बनी हुई है। उसके चारों ओर चौड़ी खाइयाँ खुदी हुई हैं और वह अनेकानेक यन्त्रों तथा शस्त्रों से सुरक्षित है॥

रमणीया पुरी सा हि रुक्मवैदूर्यतोरणा।

राक्षसैः सा परित्यक्ता पुरा विष्णुभयार्दितैः॥२९॥

‘वह पुरी बड़ी ही रमणीय है। उसके फाटक सोने और नीलम के बने हुए हैं। पूर्वकाल में भगवान् विष्णु के भय से पीड़ित हुए राक्षसों ने उस पुरी को त्याग दिया था॥२९॥

शून्या रक्षोगणैः सर्वै रसातलतलं गतैः।

शून्या सम्प्रति लङ्का सा प्रभुस्तस्या न विद्यते॥३०॥

‘वे समस्त राक्षस रसातल को चले गये थे, इसलिये लङ्कापुरी सूनी हो गयी। इस समय भी लङ्कापुरी सूनी ही है, उसका कोई स्वामी नहीं है॥३०॥

स त्वं तत्र निवासाय गच्छ पुत्र यथासुखम्।

निर्दोषस्तत्र ते वासो न बाधस्तत्र कस्यचित्॥३१॥

‘अतः बेटा! तुम वहाँ निवास करने के लिये सुखपूर्वक जाओ। वहाँ रहने में किसी प्रकार का दोष या खटका नहीं है। वहाँ किसी की ओर से कोई विघ्नबाधा नहीं आ सकती’ ॥ ३१॥

एतच्छ्रुत्वा स धर्मात्मा धर्मिष्ठं वचनं पितुः।

निवासयामास तदा लङ्कां पर्वतमूर्धनि॥३२॥

अपने पिता के इस धर्मयुक्त वचन को सुनकर धर्मात्मा वैश्रवण ने त्रिकूट पर्वत के शिखर पर बनी हुई लङ्कापुरी में निवास किया॥३२॥

नैर्ऋतानां सहस्रेस्तु हृष्टैः प्रमुदितैः सदा।

अचिरेणैव कालेन सम्पूर्णा तस्य शासनात्॥३३॥

उनके निवास करने पर थोड़े ही दिनों में वह पुरी सहस्रों हृष्टपुष्ट राक्षसों से भर गयी। उनकी आज्ञा से वेराक्षस वहाँ आकर आनन्दपूर्वक रहने लगे॥३३॥

स तु तत्रावसत् प्रीतो धर्मात्मा नैर्ऋतर्षभः।

समुद्रपरिखायां स लङ्कायां विश्रवात्मजः॥३४॥

समुद्र जिसके लिये खाई का काम देता था, उस लङ्कानगरी में विश्रवा के धर्मात्मा पुत्र वैश्रवण राक्षसों के राजा हो बड़ी प्रसन्नता के साथ निवास करने लगे। ३४॥

काले काले तु धर्मात्मा पुष्पकेण धनेश्वरः।

अभ्यागच्छद् विनीतात्मा पितरं मातरं च हि॥३५॥

धर्मात्मा धनेश्वर समय-समयपर पुष्पकविमान के द्वारा आकर अपने माता-पिता से मिल जाया करते थे। उनका हृदय बड़ा ही विनीत था॥ ३५ ॥

स देवगन्धर्वगणैरभिष्टतस्तथाप्सरोनृत्यविभूषितालयः।

गभस्तिभिः सूर्य इवावभासयन् पितुः समीपं प्रययौ स वित्तपः॥३६॥

देवता और गन्धर्व उनकी स्तुति करते थे। उनका भव्य भवन अप्सराओं के नृत्य से सुशोभित होता था। वे धनपति कुबेर अपनी किरणों से प्रकाशित होने वाले सूर्य की भाँति सब ओर प्रकाश बिखेरते हुए अपने पिता के समीप गये॥३६॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे तृतीयः सर्गः॥३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्ड में तीसरा सर्ग पूरा हुआ॥३॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
उत्तरकाण्डम्

राक्षसवंश का वर्णन हेति, विद्युत्केश और सुकेश की उत्पत्ति

चतुर्थः सर्गः

सर्ग-04


श्रुत्वागस्त्येरितं वाक्यं रामो विस्मयमागतः।

कथमासीत् तु लङ्कायां सम्भवो रक्षसां पुरा॥१॥

अगस्त्यजी की कही हुई इस बात को सुनकर श्रीरामचन्द्रजी को बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने मन-ही मन सोचा, राक्षसकुल की उत्पत्ति तो मुनिवर विश्रवा से ही मानी जाती है। यदि उनसे भी पहले प्रकार हुई थी॥


ततः शिरः कम्पयित्वा त्रेताग्निसमविग्रहम्।

तमगस्त्यं मुहर्दृष्ट्वा स्मयमानोऽभ्यभाषत॥२॥

इस प्रकार आश्चर्य होने के अनन्तर सिर हिलाकर श्रीरामचन्द्रजी ने त्रिविध अग्नियों के समान तेजस्वी शरीर वाले अगस्त्यजी की ओर बारम्बार देखा और मुस्कराकर पूछा— ॥२॥

भगवन् पूर्वमप्येषा लङ्काऽऽसीत् पिशिताशिनाम्।

श्रुत्वेदं भगवद्वाक्यं जातो मे विस्मयः परः॥३॥

‘भगवन्! कुबेर और रावण से पहले भी यह लङ्कापुरी मांसभक्षी राक्षसों के अधिकार में थी, यह आपके मुँह से सुनकर मुझे बड़ा विस्मय हुआ है। ३॥

पुलस्त्यवंशादुद्भूता राक्षसा इति नः श्रुतम्।

इदानीमन्यतश्चापि सम्भवः कीर्तितस्त्वया॥४॥

‘हमने तो यही सुन रखा है कि राक्षसों की उत्पत्ति पुलस्त्यजी के कुल से हुई है। किंतु इस समय आपने किसी दूसरे के कुल से भी राक्षसों के प्रादुर्भाव की बात कही है॥४॥

रावणात् कुम्भकर्णाश्च प्रहस्ताद् विकटादपि।

रावणस्य च पुत्रेभ्यः किं नु ते बलवत्तराः॥५॥

‘क्या वे पहले के राक्षस रावण, कुम्भकर्ण, प्रहस्त, विकट तथा रावणपुत्रों से भी बढ़कर बलवान् थे? ॥

क एषां पूर्वको ब्रह्मन् किंनामा च बलोत्कटः।

अपराधं च कं प्राप्य विष्णुना द्राविताः कथम्॥

‘ब्रह्मन् ! उनका पूर्वज कौन था और उस उत्कट बलशाली पुरुष का नाम क्या था? भगवान् विष्णु ने उन राक्षसों का कौन-सा अपराध पाकर किस तरह उन्हें लङ्का से मार भगाया? ॥ ६॥

एतद् विस्तरतः सर्वं कथयस्व ममानघ।

कुतूहलमिदं मह्यं नुद भानुर्यथा तमः॥७॥

‘निष्पाप महर्षे ! ये सब बातें आप मुझे विस्तार से बताइये। इनके लिये मेरे मन में बड़ा कौतूहल है जैसे सूर्यदेव अन्धकार को दूर करते हैं, उसी तरह आप मेरे इस कौतूहल का निवारण कीजिये’ ॥७॥

राघवस्य वचः श्रुत्वा संस्कारालंकृतं शुभम्।

अथ विस्मयमानस्तमगस्त्यः प्राह राघवम्॥८॥

श्रीरघुनाथजी की वह सुन्दर वाणी पदसंस्कार, वाक्यसंस्कार और अर्थसंस्कार से अलंकृत थी। उसे सुनकर अगस्त्यजी को यह सोचकर विस्मय हुआ कि ये सर्वज्ञ होकर भी मुझसे अनजान की भाँति पूछ रहे हैं। तत्पश्चात् उन्होंने श्रीराम से कहा- ॥८॥

प्रजापतिः पुरा सृष्ट्वा अपः सलिलसम्भवः।

तासां गोपायने सत्त्वानसृजत् पद्मसम्भवः॥९॥

‘रघुनन्दन! जल से प्रकट हुए कमल से उत्पन्न प्रजापति ब्रह्माजी ने पूर्वकाल में समुद्रगत जल की सृष्टि करके उसकी रक्षा के लिये अनेक प्रकार के जलजन्तुओं को उत्पन्न किया॥९॥

ते सत्त्वाः सत्त्वकर्तारं विनीतवदुपस्थिताः।

किं कुर्म इति भाषन्तः क्षुत्पिपासाभयार्दिताः॥१०॥

‘वे जन्तु भूख-प्यास के भय से पीड़ित हो ‘अब हम क्या करें’, ऐसी बातें करते हुए अपने जन्मदाता ब्रह्माजी के पास विनीतभाव से गये॥ १०॥

प्रजापतिस्तु तान् सर्वान् प्रत्याह प्रहसन्निव।

आभाष्य वाचा यत्नेन रक्षध्वमिति मानद॥११॥

‘दूसरों को मान देने वाले रघुवीर! उन सबको आया देख प्रजापति ने उन्हें वाणी द्वारा सम्बोधित करके हँसते हुए-से कहा—’जल-जन्तुओ! तुम यत्नपूर्वक इस जल की रक्षा करो’ ॥११॥

रक्षाम इति तत्रान्यैर्यक्षाम इति चापरैः।

भुक्षिताभुक्षितैरुक्तस्ततस्तानाह भूतकृत्॥१२॥

‘वे सब जन्तु भूखे-प्यासे थे। उनमें से कुछ ने कहा —’हम इस जल की रक्षा करेंगे’ और दूसरे ने कहा’हम इसका यक्षण (पूजन) करेंगे’, तब उन भूतों की सृष्टि करने वाले प्रजापति ने उनसे कहा- ॥१२॥

रक्षाम इति यैरुक्तं राक्षसास्ते भवन्तु वः।

यक्षाम इति यैरुक्तं यक्षा एव भवन्तु वः॥१३॥

‘तुममें से जिन लोगों ने रक्षा करने की बात कही है, वे राक्षस नाम से प्रसिद्ध हों और जिन्होंने यक्षण (पूजन) करना स्वीकार किया है, वे लोग यक्ष नाम से ही विख्यात हों’ (इस प्रकार वे जीव राक्षस और यक्ष—इन दो जातियों में विभक्त हो गये) ॥ १३॥

तत्र हेतिः प्रहेतिश्च भ्रातरौ राक्षसाधिपौ।

मधुकैटभसंकाशौ बभूवतुररिंदमौ॥१४॥

‘उन राक्षसों में हेति और प्रहेति नामवाले दो भाई थे, जो समस्त राक्षसों के अधिपति थे। शत्रुओंका दमन करने में समर्थ वे दोनों वीर मधु और कैटभ के समान शक्तिशाली थे॥ १४॥

प्रहेतिर्धार्मिकस्तत्र तपोवनगतस्तदा।

हेतिरक्रियार्थे तु परं यत्नमथाकरोत्॥१५॥

‘उनमें प्रहेति धर्मात्मा था; अतः वह तत्काल तपोवन में जाकर तपस्या करने लगा। परंतु हेति ने विवाह के लिये बड़ा प्रयत्न किया॥ १५ ॥

स कालभगिनीं कन्यां भयां नाम महाभयाम्।

उदावहदमेयात्मा स्वयमेव महामतिः॥१६॥

‘वह अमेय आत्मबल से सम्पन्न और बड़ा बुद्धिमान् था। उसने स्वयं ही याचना करके काल की कुमारी भगिनी भया के साथ विवाह किया भया बड़ी भयानक थी॥१६॥

स तस्यां जनयामास हेती राक्षसपुंगवः।

पुत्रं पुत्रवतां श्रेष्ठो विद्युत्केशमिति श्रुतम्॥१७॥

‘राक्षसराज हेति ने भया के गर्भ से एक पुत्र को उत्पन्न किया, जो विद्युत्केश के नाम से प्रसिद्ध था। उसे जन्म देकर हेति पुत्रवानों में श्रेष्ठ समझा जाने लगा॥

विद्युत्केशो हेतिपुत्रः स दीप्तार्कसमप्रभः।

व्यवर्धत महातेजास्तोयमध्य इवाम्बुजम्॥१८॥

‘हेतिपुत्र विद्युत्केश दीप्तिमान् सूर्य के समान प्रकाशित होता था। वह महातेजस्वी बालक जल में कमल की भाँति दिनोदिन बढ़ने लगा॥ १८ ॥

स यदा यौवनं भद्रमनुप्राप्तो निशाचरः।

ततो दारक्रियां तस्य कर्तुं व्यवसितः पिता॥१९॥

‘निशाचर विद्युत्केश जब बढ़कर उत्तम युवावस्था को प्राप्त हुआ, तब उसके पिता राक्षसराज हेति ने अपने पुत्र का ब्याह कर देने का निश्चय किया। १९॥

संध्यादुहितरं सोऽथ संध्यातुल्यां प्रभावतः।

वरयामास पुत्रार्थं हेती राक्षसपुंगवः॥२०॥

‘राक्षसराजशिरोमणि हेति ने अपने पुत्र को ब्याहने के लिये संध्या की पुत्री का, जो प्रभाव में अपनी माता संध्या के ही समान थी, वरण किया॥२०॥

अवश्यमेव दातव्या परस्मै सेति संध्यया।

चिन्तयित्वा सुता दत्ता विद्युत्केशाय राघव॥२१॥

‘रघुनन्दन! संध्या ने सोचा—’कन्याका किसी दूसरे के साथ ब्याह तो अवश्य ही करना पड़ेगा, अतः इसीके साथ क्यों न कर दूँ?’ यह विचारकर उसने अपनी पुत्री विद्युत्केश को ब्याह दी॥ २१॥

संध्यायास्तनयां लब्ध्वा विद्युत्केशो निशाचरः।

रमते स तया सार्धं पौलोम्या मघवानिव॥२२॥

‘संध्या की उस पुत्री को पाकर निशाचर विद्युत्केश उसके साथ उसी तरह रमण करने लगा, जैसे देवराज इन्द्र पुलोमपुत्री शची के साथ विहार करते हैं ॥ २२॥

केनचित्त्वथ कालेन राम सालकटङ्कटा।

विद्युत्केशाद् गर्भमाप घनराजिरिवार्णवात्॥२३॥

‘श्रीराम! संध्या की उस पुत्री का नाम सालकटङ्कटा था। कुछ काल के पश्चात् उसने विद्युत्केश से उसी तरह गर्भधारण किया, जैसे मेघों की पंक्ति समुद्र से जल ग्रहण करती है।

ततः सा राक्षसी गर्भं घनगर्भसमप्रभम्।

प्रसूता मन्दरं गत्वा गङ्गा गर्भमिवाग्निजम्।

समुत्सृज्य तु सा गर्भ विद्युत्केशरतार्थिनी॥२४॥

तदनन्तर उस राक्षसी ने मन्दराचल पर जाकर विद्युत् के समान कान्तिमान् बालक को जन्म दिया, मानो गङ्गा ने अग्नि के छोड़े हुए भगवान् शिव के तेजःस्वरूप गर्भ (कुमार कार्तिकेय)-को उत्पन्न किया हो। उस नवजात शिशु को वहीं छोड़कर वह विद्युत्केश के साथ रति-क्रीडा के लिये चली गयी। २४॥

रेमे तु सार्धं पतिना विस्मृत्य सुतमात्मजम्।

उत्सृष्टस्तु तदा गर्भो घनशब्दसमस्वनः॥२५॥

‘अपने बेटे को भुलाकर सालकटङ्कटा पति के साथ रमण करने लगी। उधर उसका छोड़ा हुआ वह नवजात शिशु मेघ की गम्भीर गर्जना के समान शब्द करने लगा।

तयोत्सृष्टः स तु शिशुः शरदर्कसमद्युतिः।

निधायास्ये स्वयं मुष्टिं रुरोद शनकैस्तदा ॥२६॥

उसके शरीर की कान्ति शरत्काल के सूर्य की भाँति उद्भासित होती थी। माता का छोड़ा हुआ वह शिशु स्वयं ही अपनी मुट्ठी मुँह में डालकर धीरे-धीरे रोने लगा॥२६॥

ततो वृषभमास्थाय पार्वत्या सहितः शिवः।

वायुमार्गेण गच्छन् वै शुश्राव रुदितस्वनम्॥२७॥

‘उस समय भगवान् शंकर पार्वतीजी के साथ बैलपर चढ़कर वायुमार्ग (आकाश) से जा रहे थे। उन्होंने उस बालक के रोने की आवाज सुनी॥ २७॥

अपश्यदुमया सार्धं रुदन्तं राक्षसात्मजम्।

कारुण्यभावात् पार्वत्या भवस्त्रिपुरसूदनः॥२८॥

तं राक्षसात्मजं चक्रे मातुरेव वयःसमम्।

‘सुनकर पार्वतीसहित शिव ने उस रोते हुए राक्षसकुमार की ओर देखा। उसकी दयनीय अवस्था पर दृष्टिपात करके माता पार्वती के हृदय में करुणा का स्रोत उमड़ उठा और उनकी प्रेरणा से त्रिपुरसूदन भगवान् शिव ने उस राक्षस-बालक को उसकी माता की अवस्था के समान ही नौजवान बना दिया॥ २८ १/२॥

अमरं चैव तं कृत्वा महादेवोऽक्षरोऽव्ययः॥२९॥

पुरमाकाशगं प्रादात् पार्वत्याः प्रियकाम्यया।

‘इतना ही नहीं, पार्वतीजी का प्रिय करने की इच्छा से अविनाशी एवं निर्विकार भगवान् महादेव ने उस बालक को अमर बनाकर उसके रहने के लिये एक आकाशचारी नगराकार विमान दे दिया। २९ १/२ ॥

उमयापि वरो दत्तो राक्षसीनां नृपात्मज॥३०॥

सद्योपलब्धिर्गर्भस्य प्रसूतिः सद्य एव च।

सद्य एव वयःप्राप्तिं मातुरेव वयःसमम्॥३१॥

‘राजकुमार! तत्पश्चात् पार्वतीजी ने भी यह वरदान दिया कि आज से राक्षसियाँ जल्दी ही गर्भ धारण करेंगी; फिर शीघ्र ही उसका प्रसव करेंगी और उनका पैदा किया हुआ बालक तत्काल बढ़कर माता के ही समान अवस्थाका हो जायगा॥३०-३१॥

ततः सुकेशो वरदानगर्वितः श्रियं प्रभोः प्राप्य हरस्य पार्श्वतः।

चचार सर्वत्र महान् महामतिः खगं पुरं प्राप्य पुरंदरो यथा॥३२॥

‘विद्युत्केश का वह पुत्र सुकेश के नाम से प्रसिद्ध हुआ। वह बड़ा बुद्धिमान् था। भगवान् शंकर का वरदान पाने से उसे बड़ा गर्व हुआ और वह उन परमेश्वर के पास से अद्भुत सम्पत्ति एवं आकाशचारी विमान पाकर देवराज इन्द्र की भाँति सर्वत्र अबाधगति से विचरने लगा॥३२॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे चतुर्थः सर्गः॥४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्ड में चौथा सर्ग पूरा हुआ॥४॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
उत्तरकाण्डम्

सुकेश के पुत्र माल्यवान्, सुमाली और माली की संतानों का वर्णन

पञ्चमः सर्गः

सर्ग-05


सुकेशं धार्मिकं दृष्ट्वा वरलब्धं च राक्षसम्।

ग्रामणीर्नाम गन्धर्वो विश्वावसुसमप्रभः॥१॥

तस्य देववती नाम द्वितीया श्रीरिवात्मजा।

त्रिषु लोकेषु विख्याता रूपयौवनशालिनी॥२॥

तां सुकेशाय धर्मात्मा ददौ रक्षःश्रियं यथा।

(अगस्त्यजी कहते हैं—रघुनन्दन!) तदनन्तर एक दिन विश्वावसु के समान तेजस्वी ग्रामणी नामक गन्धर्व ने राक्षस सुकेश को धर्मात्मा तथा वरप्राप्त वैभव से सम्पन्न देख अपनी देववती नामक कन्या का उसके साथ ब्याह कर दिया। वह कन्या दूसरी लक्ष्मी के समान दिव्य रूप और यौवन से सुशोभित एवं तीनों लोकों में विख्यात थी। धर्मात्मा ग्रामणी ने राक्षसों की मूर्तिमती राजलक्ष्मी के समान देववती का हाथ सुकेश के हाथ में दे दिया॥ १-२ १/२॥

वरदानकृतैश्वर्यं सा तं प्राप्य पतिं प्रियम्॥३॥

आसीद् देववती तुष्टा धनं प्राप्येव निर्धनः।

वरदान में मिले हुए ऐश्वर्य से सम्पन्न प्रियतम पति को पाकर देववती बहुत संतुष्ट हुई, मानो किसी निर्धन को धन की राशि मिल गयी हो ॥ ३ १/२ ।।

स तया सह संयुक्तो रराज रजनीचरः॥४॥

अञ्जनादभिनिष्क्रान्तः करेण्वेव महागजः।

जैसे अञ्जन नामक दिग्गज से उत्पन्न कोई महान् गज किसी हथिनी के साथ शोभा पा रहा हो, उसी तरह वह राक्षस गन्धर्व-कन्या देववती के साथ रहकर अधिक शोभा पाने लगा॥ ४ १/२॥

ततः काले सुकेशस्तु जनयामास राघव॥५॥

त्रीन् पुत्राञ्जनयामास त्रेताग्निसमविग्रहान्।

रघुनन्दन! तदनन्तर समय आने पर सुकेश ने देववती के गर्भ से तीन पुत्र उत्पन्न किये, जो तीन* अग्नियों के समान तेजस्वी थे॥ ५ १/२॥

* गार्हपत्य, आहवनीय और दक्षिणाग्नि।

माल्यवन्तं सुमालिं च मालिं च बलिनां वरम्॥

त्रींस्त्रिनेत्रसमान् पुत्रान् राक्षसान् राक्षसाधिपः।

उनके नाम थे—माल्यवान्, सुमाली और माली। माली बलवानों में श्रेष्ठ था। वे तीनों त्रिनेत्रधारी महादेवजी के समान शक्तिशाली थे। उन तीनों राक्षसपुत्रों को देखकर राक्षसराज सुकेश बड़ा प्रसन्न हुआ॥ ६ १/२॥

त्रयो लोका इवाव्यग्राः स्थितास्त्रय इवाग्नयः॥७॥

 त्रयो मन्त्रा इवात्युग्रास्त्रयो घोरा इवामयाः।

वे तीनों लोकों के समान सुस्थिर, तीन अग्नियों के समान तेजस्वी, तीन मन्त्रों (शक्तियों अथवा वेदों’)के समान उग्र तथा तीन रोगों के समान अत्यन्त भयंकर थे॥ ७ १/२ ॥

१. प्रभु-शक्ति, उत्साह-शक्ति तथा मन्त्र-शक्ति-ये तीन शक्तियाँ हैं। २. ऋग्, यजु और साम—ये तीन वेद हैं। ३. वात, पित्त और कफ-इनके प्रकोप से उत्पन्न होने वाले तीन प्रकार के रोग हैं।

त्रयः सुकेशस्य सुतास्त्रेताग्निसमतेजसः॥८॥

विवृद्धिमगमंस्तत्र व्याधयोपेक्षिता इव।

सुकेश के वे तीनों पुत्र त्रिविध अग्नियों के समान तेजस्वी थे। वे वहाँ उसी तरह बढ़ने लगे, जैसे उपेक्षावश दवा न करने से रोग बढ़ते हैं॥ ८ १/२॥

वरप्राप्तिं पितुस्ते तु ज्ञात्वैश्वर्यं तपोबलात्॥९॥

तपस्तप्तुं गता मेरुं भ्रातरः कृतनिश्चयाः।

उन्हें जब यह मालूम हुआ कि हमारे पिता को तपोबल के द्वारा वरदान एवं ऐश्वर्य की प्राप्ति हुई है, तब वे तीनों भाई तपस्या करने का निश्चय करके मेरुपर्वत पर चले गये॥९ १/२॥

प्रगृह्य नियमान् घोरान् राक्षसा नृपसत्तम॥१०॥

विचेरुस्ते तपो घोरं सर्वभूतभयावहम्।

नृपश्रेष्ठ! वे राक्षस वहाँ भयंकर नियमों को ग्रहण करके घोर तपस्या करने लगे। उनकी वह तपस्या समस्त प्राणियों को भय देने वाली थी॥ १० १/२ ॥

सत्यार्जवशमोपेतैस्तपोभिर्भुवि दुर्लभैः॥११॥

संतापयन्तस्त्रील्लोकान् सदेवासुरमानुषान्।

सत्य, सरलता एवं शम-दम आदि से युक्त तप के द्वारा, जो भूतल पर दुर्लभ है, वे देवताओं, असुरों और मनुष्योंसहित तीनों लोकों को संतप्त करने लगे। ११ १/२॥

ततो विभुश्चतुर्वक्त्रो विमानवरमाश्रितः॥१२॥

सुकेशपुत्रानामन्त्र्य वरदोऽस्मीत्यभाषत।

तब चार मुखवाले भगवान् ब्रह्मा एक श्रेष्ठ विमान पर बैठकर वहाँ गये और सुकेश के पुत्रों को सम्बोधित करके बोले—’मैं तुम्हें वर देने के लिये आया हूँ’॥ १२ १/२॥

ब्रह्माणं वरदं ज्ञात्वा सेन्ट्रैर्देवगणैर्वृतम्॥१३॥

ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे वेपमाना इव द्रुमाः।

इन्द्र आदि देवताओं से घिरे हुए वरदायक ब्रह्माजी को आया जान वे सब-के-सब वृक्षों के समान काँपते हुए हाथ जोड़कर बोले- ॥ १३ १/२॥

तपसाऽऽराधितो देव यदि नो दिशसे वरम्॥१४॥

अजेयाः शत्रुहन्तारस्तथैव चिरजीविनः।

प्रभविष्ण्वो भवामेति परस्परमनुव्रताः॥१५॥

‘देव! यदि आप हमारी तपस्या से आराधित एवं संतुष्ट होकर हमें वर देना चाहते हैं तो ऐसी कृपा कीजिये, जिससे हमें कोई परास्त न कर सके। हम शत्रुओं का वध करने में समर्थ, चिरजीवी तथा प्रभावशाली हों। साथ ही हमलोगों में परस्पर प्रेम बना रहे’ ॥ १४-१५॥

एवं भविष्यथेत्युक्त्वा सुकेशतनयान् विभुः।

स ययौ ब्रह्मलोकाय ब्रह्मा ब्राह्मणवत्सलः॥१६॥

यह सुनकर ब्रह्माजी ने कहा—’तुम ऐसे ही होओगे’। सुकेश के पुत्रों से ऐसा कहकर ब्राह्मणवत्सल ब्रह्माजी ब्रह्मलोक को चले गये॥१६॥

वरं लब्ध्वा तु ते सर्वे राम रात्रिंचरास्तदा।

सुरासुरान् प्रबाधन्ते वरदानसुनिर्भयाः॥१७॥

श्रीराम! वर पाकर वे सब निशाचर उस वरदान से अत्यन्त निर्भय हो देवताओं तथा असुरों को भी बहुत कष्ट देने लगे॥ १७॥

तैर्बाध्यमानास्त्रिदशाः सर्षिसङ्घाः सचारणाः।

त्रातारं नाधिगच्छन्ति निरयस्था यथा नराः॥१८॥

उनके द्वारा सताये जाते हुए देवता, ऋषि-समुदाय और चारण नरक में पड़े हुए मनुष्यों के समान किसी को अपना रक्षक या सहायक नहीं पाते थे। १८॥

अथ ते विश्वकर्माणं शिल्पिनां वरमव्ययम्।

ऊचुः समेत्य संहृष्टा राक्षसा रघुसत्तम॥१९॥

‘रघुवंशशिरोमणे! एक दिन शिल्प-कर्म के ज्ञाताओं में श्रेष्ठ अविनाशी विश्वकर्मा के पास जाकर वे राक्षस हर्ष और उत्साह से भरकर बोले- ॥ १९॥

ओजस्तेजोबलवतां महतामात्मतेजसा।

गृहकर्ता भवानेव देवानां हृदयेप्सितम्॥२०॥

अस्माकमपि तावत् त्वं गृहं कुरु महामते।

हिमवन्तमुपाश्रित्य मेरुं मन्दरमेव वा॥२१॥

महेश्वरगृहप्रख्यं गृहं नः क्रियतां महत्।

‘महामते! जो ओज, बल और तेज से सम्पन्न होने के कारण महान् हैं, उन देवताओं के लिये आप ही अपनी शक्ति से मनोवाञ्छित भवन का निर्माण करते हैं, अतः हमारे लिये भी आप हिमालय,मेरु अथवा मन्दराचल पर चलकर भगवान् शंकर के दिव्य भवन की भाँति एक विशाल निवासस्थान का निर्माण कीजिये’। २०-२१ १/२॥

विश्वकर्मा ततस्तेषां राक्षसानां महाभुजः॥२२॥

निवासं कथयामास शक्रस्येवामरावतीम्।

यह सुनकर महाबाहु विश्वकर्मा ने उन राक्षसों को एक ऐसे निवासस्थान का पता बताया, जो इन्द्रकी अमरावती को भी लज्जित करने वाला था॥ २२ १/२॥

दक्षिणस्योदधेस्तीरे त्रिकूटो नाम पर्वतः॥२३॥

सुवेल इति चाप्यन्यो द्वितीयो राक्षसेश्वरः।

(वे बोले-) ‘राक्षसपतियो! दक्षिण समुद्र के तट पर एक त्रिकूट नामक पर्वत है और दूसरा सुवेल नाम से विख्यात शैल है।। २३ १/२ ॥

शिखरे तस्य शैलस्य मध्यमेऽम्बुदसंनिभे॥२४॥

शकुनैरपि दुष्प्रापे टङ्कच्छिन्नचतुर्दिशि।

त्रिंशद्योजनविस्तीर्णा शतयोजनमायता॥ २५॥

स्वर्णप्राकारसंवीता हेमतोरणसंवृता।

मया लङ्केति नगरी शक्राज्ञप्तेन निर्मिता॥२६॥

‘उस त्रिकूटपर्वत के मझले शिखर पर जो हरा-भरा होने के कारण मेघ के समान नीला दिखायी देता है तथा जिसके चारों ओर के आश्रय टाँकी से काट दिये गये हैं, अतएव जहाँ पक्षियों के लिये भी पहुँचना कठिन है, मैंने इन्द्र की आज्ञा से लङ्का नामक नगरी का निर्माण किया है। वह तीस योजन चौड़ी और सौ योजन लम्बी है। उसके चारों ओर सोने की चहारदीवारी है और उसमें सोने के ही फाटक लगे हैं ॥ २४–२६॥

तस्यां वसत दुर्धर्षा यूयं राक्षसपुंगवाः।

अमरावतीं समासाद्य सेन्द्रा इव दिवौकसः॥२७॥

‘दुर्धर्ष राक्षसशिरोमणियो! जैसे इन्द्र आदि देवता अमरावतीपुरी का आश्रय लेकर रहते हैं, उसी प्रकार तुम लोग भी उस लङ्कापुरी में जाकर निवास करो॥ २७॥

लङ्कादुर्गं समासाद्य राक्षसैर्बहुभिर्वृताः।

भविष्यथ दुराधर्षाः शत्रूणां शत्रुसूदनाः॥२८॥

‘शत्रुसूदन वीरो! लङ्का के दुर्ग का आश्रय लेकर बहुत-से राक्षसों के साथ जब तुम निवास करोगे, उस समय शत्रुओं के लिये तुम पर विजय पाना अत्यन्त कठिन होगा’ ॥ २८॥

विश्वकर्मवचः श्रुत्वा ततस्ते राक्षसोत्तमाः।

सहस्रानुचरा भूत्वा गत्वा तामवसन् पुरीम्॥२९॥

विश्वकर्मा की यह बात सुनकर वे श्रेष्ठ राक्षस सहस्रों अनुचरों के साथ उस पुरी में जाकर बस गये॥ २९॥

दृढप्राकारपरिखां हैमैहशतैर्वृताम्।

लङ्कामवाप्य ते हृष्टा न्यवसन् रजनीचराः॥३०॥

उसकी खाई और चहारदीवारी बड़ी मजबूत बनी थी। सोने के सैकड़ों महल उस नगरी की शोभा बढ़ा रहे थे। उस लङ्कापुरी में पहुँचकर वे निशाचर बड़े हर्ष के साथ वहाँ रहने लगे॥३०॥

एतस्मिन्नेव काले तु यथाकामं च राघव।

नर्मदा नाम गन्धर्वी बभूव रघुनन्दन॥३१॥

तस्याः कन्यात्रयं ह्यासीद् ह्रीश्रीकीर्तिसमद्युति।

ज्येष्ठक्रमेण सा तेषां राक्षसानामराक्षसी॥३२॥

कन्यास्ताः प्रददौ हृष्टाः पूर्णचन्द्रनिभाननाः।

रघुकुलनन्दन श्रीराम! इन्हीं दिनों नर्मदा नाम की एक गन्धर्वी थी। उसके तीन कन्याएँ हुईं, जो ह्री, श्री, और कीर्ति* के समान शोभासम्पन्न थीं। इनकी माता यद्यपि राक्षसी नहीं थी तो भी उसने अपनी रुचि के अनुसार सुकेश के उन तीनों राक्षसजातीय पुत्रों के साथ अपनी कन्याओं का ज्येष्ठ आदि अवस्था के अनुसार विवाह कर दिया। वे कन्याएँ बहुत प्रसन्न थीं। उनके मुख पूर्ण चन्द्रमा के समान मनोहर थे॥ ३१-३२ १/२॥

* ये तीन देवियाँ हैं, जो क्रमशः लज्जा, शोभा-सम्पत्ति और कीर्ति की अधिष्ठात्री मानी गयी हैं।

त्रयाणां राक्षसेन्द्राणां तिस्रो गन्धर्वकन्यकाः॥३३॥

दत्ता मात्रा महाभागा नक्षत्रे भगदैवते।

माता नर्मदा ने उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में उन तीनों महाभाग्यवती गन्धर्व-कन्याओं को उन तीनों राक्षसराजों के हाथ में दे दिया॥३३ १/२॥

कृतदारास्तु ते राम सुकेशतनयास्तदा ॥ ३४॥

चिक्रीडुः सह भार्याभिरप्सरोभिरिवामराः।

श्रीराम! जैसे देवता अप्सराओं के साथ क्रीड़ा करते हैं, उसी प्रकार सुकेश के पुत्र विवाह के पश्चात् अपनी उन पत्नियों के साथ रहकर लौकिक सुख का उपभोग करने लगे॥ ३४ १/२॥

ततो माल्यवतो भार्या सुन्दरी नाम सुन्दरी॥३५॥

स तस्यां जनयामास यदपत्यं निबोध तत्।

उनमें माल्यवान् की स्त्री का नाम सुन्दरी था। वह अपने नाम के अनुरूप ही परम सुन्दरी थी। माल्यवान् ने उसके गर्भ से जिन संतानों को जन्म दिया, उन्हें बता रहा हूँ, सुनिये॥ ३५ १/२॥

वज्रमुष्टिर्विरूपाक्षो दुर्मुखश्चैव राक्षसः॥३६॥

सुप्तघ्नो यज्ञकोपश्च मत्तोन्मत्तौ तथैव च।

अनला चाभवत् कन्या सुन्दरीं राम सुन्दरी॥३७॥

वज्रमुष्टि, विरूपाक्ष, राक्षस दुर्मुख, सुप्तघ्न, यज्ञकोप, मत्त और उन्मत्त—ये सात पुत्र थे। श्रीराम ! इनके अतिरिक्त सुन्दरी के गर्भ से अनला नामवाली एक सुन्दरी कन्या भी उत्पन्न हुई थी॥ ३६-३७॥

सुमालिनोऽपि भार्याऽऽसीत् पूर्णचन्द्रनिभानना।

नाम्ना केतुमती राम प्राणेभ्योऽपि गरीयसी॥३८॥

सुमाली की पत्नी भी बड़ी सुन्दरी थी। उसका मुख पूर्णचन्द्रमा के समान मनोहर और नाम केतुमती था। सुमाली को वह प्राणों से भी अधिक प्रिय थी॥३८॥

सुमाली जनयामास यदपत्यं निशाचरः।

केतुमत्यां महाराज तन्निबोधानुपूर्वशः॥ ३९॥

महाराज! निशाचर सुमाली ने केतुमती के गर्भ से जो संतानें उत्पन्न की थीं, उनका भी क्रमशः परिचय दिया जा रहा है, सुनिये॥ ३९॥

प्रहस्तोऽकम्पनश्चैव विकटः कालिकामुखः।

धूम्राक्षश्चैव दण्डश्च सुपार्श्वश्च महाबलः॥४०॥

संहादिः प्रघसश्चैव भासकर्णश्च राक्षसः।

राका पुष्पोत्कटा चैव कैकसी च शुचिस्मिताः॥४१॥

कुम्भीनसी च इत्येते सुमालेः प्रसवाः स्मृताः॥४२॥

प्रहस्त, अकम्पन, विकट, कालिकामुख, धूम्राक्ष, दण्ड, महाबली सुपार्श्व, संहादि, प्रघस तथा राक्षस भासकर्ण—ये सुमाली के पुत्र थे और राका, पुष्पोत्कटा, कैकसी और कुम्भीनसी—ये चार पवित्र मुस्कान वाली उसकी कन्याएँ थीं। ये सब सुमाली की संतानें बतायी गयी हैं।

मालेस्तु वसुदा नाम गन्धर्वी रूपशालिनी।

भार्यासीत् पद्मपत्राक्षी स्वक्षी यक्षीवरोपमा॥४३॥

माली की पत्नी गन्धर्वकन्या वसुदा थी, जो अपने रूप-सौन्दर्य से सुशोभित होती थी। उसके नेत्र प्रफुल्ल कमल के समान विशाल एवं सुन्दर थे। वह श्रेष्ठ यक्षपत्नियों के समान सुन्दरी थी॥४३॥

सुमालेरनुजस्तस्यां जनयामास यत् प्रभो।

अपत्यं कथ्यमानं तु मया त्वं शृणु राघव॥४४॥

प्रभो! रघुनन्दन! सुमाली के छोटे भाई माली ने वसुदा के गर्भ से जो संतति उत्पन्न की थी, उसका मैं वर्णन कर रहा हूँ; आप सुनिये॥४४॥

अनलश्चानिलश्चैव हरः सम्पातिरेव च।

एते विभीषणामात्या मालेयास्ते निशाचराः॥४५॥

अनल, अनिल, हर और सम्पाति—ये चार निशाचर माली के ही पुत्र थे, जो इस समय विभीषण के मन्त्री हैं॥ ४५ ॥

ततस्तु ते राक्षसपुङ्गवास्त्रयो निशाचरैः पुत्रशतैश्च संवृताः।

सुरान् सहेन्द्रानृषिनागयक्षान् बबाधिरे तान् बहुवीर्यदर्पिताः॥४६॥

माल्यवान् आदि तीनों श्रेष्ठ राक्षस अपने सैकड़ों पुत्रों तथा अन्यान्य निशाचरों के साथ रहकर अपने बाहुबल के अभिमान से युक्त हो इन्द्र आदि देवताओं, ऋषियों, नागों तथा यक्षों को पीड़ा देने लगे॥ ४६॥

जगभ्रमन्तोऽनिलवद् दुरासदा रणेषु मृत्युप्रतिमानतेजसः।

वरप्रदानादपि गर्विता भृशं क्रतुक्रियाणां प्रशमंकराः सदा॥४७॥

वे वायु की भाँति सारे संसार में विचरने वाले थे। युद्ध में उन्हें जीतना बहुत ही कठिन था। वे मृत्यु के तुल्य तेजस्वी थे। वरदान मिल जाने से भी उनका घमंड बहुत बढ़ गया था; अतः वे यज्ञादि क्रियाओं का सदा अत्यन्त विनाश किया करते थे। ४७॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे पञ्चमः सर्गः॥५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्ड में पाँचवाँ सर्ग पूरा हुआ॥५॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
उत्तरकाण्डम्

देवताओं का भगवान् शङ्कर की सलाह से राक्षसों के वध के लिये भगवान् विष्णु की शरण में जाना, राक्षसों का देवताओं पर आक्रमण और भगवान् विष्णु का उनकी सहायता के लिये आना

षष्ठः सर्गः

सर्ग-06


तैर्वध्यमाना देवाश्च ऋषयश्च तपोधनाः।

भयार्ताः शरणं जग्मुर्देवदेवं महेश्वरम्॥१॥

(महर्षि अगस्त्य कहते हैं-रघुनन्दन!) इन राक्षसों से पीड़ित होते हुए देवता तथा तपोधन ऋषि भय से व्याकुल हो देवाधिदेव महादेवजी की शरण में गये॥१॥

जगत्सृष्टयन्तकर्तारमजमव्यक्तरूपिणम्।

आधारं सर्वलोकानामाराध्यं परमं गुरुम्॥२॥

ते समेत्य तु कामारिं त्रिपुरारिं त्रिलोचनम्।

ऊचुः प्राञ्जलयो देवा भयगद्गदभाषिणः॥३॥

जो जगत् की सृष्टि और संहार करने वाले, अजन्मा, अव्यक्त रूपधारी, सम्पूर्ण जगत् के आधार, आराध्य देव और परम गुरु हैं, उन कामनाशक, त्रिपुरविनाशक, त्रिनेत्रधारी भगवान् शिव के पास जाकर वे सब देवता हाथ जोड़ भय से गद्गदवाणी में बोले- ॥ २-३॥

सुकेशपुत्रैर्भगवन् पितामहवरोद्धतैः।

प्रजाध्यक्ष प्रजाः सर्वा बाध्यन्ते रिपुबाधनैः॥४॥

‘भगवन्! प्रजानाथ! ब्रह्माजी के वरदान से उन्मत्त हुए सुकेश के पुत्र शत्रुओं को पीड़ा देने वाले साधनों द्वारा सम्पूर्ण प्रजा को बड़ा कष्ट पहुँचा रहे हैं।४॥

शरण्यान्यशरण्यानि ह्याश्रमाणि कृतानि नः।

स्वर्गाच्च देवान् प्रच्याव्य स्वर्गे क्रीडन्ति देववत्॥५॥

‘सबको शरण देने योग्य जो हमारे आश्रम थे, उन्हें उन राक्षसों ने निवास के योग्य नहीं रहने दिया है उजाड़ डाला है। देवताओं को स्वर्ग से हटाकर वे स्वयं ही वहाँ अधिकार जमाये बैठे हैं और देवताओं की भाँति स्वर्ग में विहार करते हैं॥ ५ ॥

अहं विष्णुरहं रुद्रो ब्रह्माहं देवराडहम्।

अहं यमश्च वरुणश्चन्द्रोऽहं रविरप्यहम्॥६॥

इति माली सुमाली च माल्यवांश्चैव राक्षसाः।

बाधन्ते समरोद्धर्षा ये च तेषां पुरःसराः॥७॥

‘माली, सुमाली और माल्यवान्—ये तीनों राक्षस कहते हैं—’मैं ही विष्णु हूँ, मैं ही रुद्र हूँ, मैं ही ब्रह्मा हूँ तथा मैं ही देवराज इन्द्र, यमराज, वरुण, चन्द्रमा और सूर्य हूँ’ इस प्रकार अहंकार प्रकट करते हुए वे रणदुर्जय निशाचर तथा उनके अग्रगामी सैनिक हमें बड़ा कष्ट दे रहे हैं॥६-७॥

तन्नो देव भयार्तानामभयं दातुमर्हसि।

अशिवं वपुरास्थाय जहि वै देवकण्टकान्॥८॥

‘देव! उनके भय से हम बहुत घबराये हुए हैं, इसलिये आप हमें अभयदान दीजिये तथा रौद्र रूप धारण करके देवताओं के लिये कण्टक बने हुए उन राक्षसों का संहार कीजिये’ ॥ ८॥

इत्युक्तस्तु सुरैः सर्वैः कपर्दी नीललोहितः।

सुकेशं प्रति सापेक्षः प्राह देवगणान् प्रभुः॥९॥

समस्त देवताओं के ऐसा कहने पर नील एवं लोहित वर्णवाले जटाजूटधारी भगवान् शंकर सुकेश के प्रति घनिष्ठता रखने के कारण उनसे इस प्रकार बोले-॥

अहं तान् न हनिष्यामि ममावध्या हि तेऽसुराः।

किं तु मन्त्रं प्रदास्यामि यो वै तान् निहनिष्यति॥१०॥

‘देवगण! मैंने सुकेश के जीवन की रक्षा की है। वे असुर सुकेश के ही पुत्र हैं; इसलिये मेरे द्वारा मारे जाने योग्य नहीं हैं। अतः मैं तो उनका वध नहीं करूँगा; परंतु तुम्हें एक ऐसे पुरुष के पास जाने की सलाह दूंगा, जो निश्चय ही उन निशाचरों का वध करेंगे॥ १०॥

एतमेव समुद्योगं पुरस्कृत्य महर्षयः।

गच्छध्वं शरणं विष्णुं हनिष्यति स तान् प्रभुः॥११॥

‘देवताओ और महर्षियो! तुम इसी उद्योग को सामने रखकर तत्काल भगवान् विष्णु की शरण में जाओ। वे प्रभु अवश्य उनका नाश करेंगे’ ॥ ११॥

ततस्तु जयशब्देन प्रतिनन्द्य महेश्वरम्।

विष्णोः समीपमाजग्मुर्निशाचरभयार्दिताः॥१२॥

यह सुनकर सब देवता जय-जयकार के द्वारा महेश्वर का अभिनन्दन करके उन निशाचरों के भय से पीड़ित हो भगवान् विष्णु के समीप आये॥ १२ ॥

शङ्खचक्रधरं देवं प्रणम्य बहुमान्य च।

ऊचुः सम्भ्रान्तवद् वाक्यं सुकेशतनयान् प्रति॥१३॥

शङ्ख, चक्र धारण करने वाले उन नारायणदेव को नमस्कार करके देवताओं ने उनके प्रति बहुत अधिक सम्मानका भाव प्रकट किया और सुकेश के पुत्रों के विषय में बड़ी घबराहट के साथ इस प्रकार कहा-॥ १३॥

सुकेशतनयैर्देव त्रिभिस्त्रेताग्निसंनिभैः।

आक्रम्य वरदानेन स्थानान्यपहृतानि नः॥१४॥

‘देव! सुकेश के तीन पुत्र त्रिविध अग्नियों के तुल्य तेजस्वी हैं। उन्होंने वरदान के बल से आक्रमण करके हमारे स्थान छीन लिये हैं॥ १४ ॥

लङ्का नाम पुरी दुर्गा त्रिकूटशिखरे स्थिता।

तत्र स्थिताः प्रबाधन्ते सर्वान् नः क्षणदाचराः॥१५॥

त्रिकूटपर्वत के शिखर पर जो लङ्का नामवाली दुर्गम नगरी है, वहीं रहकर वे निशाचर हम सभी देवताओं को क्लेश पहुँचाते रहते हैं।॥ १५॥

स त्वमस्मद्धितार्थाय जहि तान् मधुसूदन।

शरणं त्वां वयं प्राप्ता गतिर्भव सुरेश्वर ॥१६॥

‘मधुसूदन! आप हमारा हित करने के लिये उन असुरों का वध करें। देवेश्वर! हम आपकी शरण में आये हैं। आप हमारे आश्रयदाता हों॥ १६॥

चक्रकृत्तास्यकमलान् निवेदय यमाय वै।

भयेष्वभयदोऽस्माकं नान्योऽस्ति भवता विना॥१७॥

‘अपने चक्र से उनका कमलोपम मस्तक काटकर आप यमराज को भेंट कर दीजिये। आपके सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जो इस भय के अवसर पर हमें अभय दान दे सके॥१७॥

राक्षसान् समरे हृष्टान् सानुबन्धान् मदोद्धतान्।

नुद त्वं नो भयं देव नीहारमिव भास्करः॥१८॥

‘देव! वे राक्षस मद से मतवाले हो रहे हैं। हमें कष्ट देकर हर्ष से फूले नहीं समाते हैं; अतः आप समराङ्गण में सगे-सम्बन्धियोंसहित उनका वध करके हमारे भय को उसी तरह दूर कर दीजिये, जैसे सूर्यदेव कुहरे को नष्ट कर देते हैं’॥ १८॥

इत्येवं दैवतैरुक्तो देवदेवो जनार्दनः।

अभयं भयदोऽरीणां दत्त्वा देवानुवाच ह॥१९॥

देवताओं के ऐसा कहने पर शत्रुओं को भय देने वाले देवाधिदेव भगवान् जनार्दन उन्हें अभय दान देकर बोले- ॥ १९॥

सुकेशं राक्षसं जाने ईशानवरदर्पितम्।

तांश्चास्य तनयाञ्जाने येषां ज्येष्ठः स माल्यवान्।२०॥

तानहं समतिक्रान्तमर्यादान् राक्षसाधमान्।

निहनिष्यामि संक्रुद्धः सुरा भवत विज्वराः॥२१॥

‘देवताओ! मैं सुकेश नामक राक्षस को जानता हूँ। वह भगवान् शंकर का वर पाकर अभिमान से उन्मत्त हो उठा है। इसके उन पुत्रों को भी जानता हूँ, जिनमें माल्यवान् सबसे बड़ा है। वे नीच राक्षस धर्म की मर्यादा का उल्लङ्घन कर रहे हैं, अतः मैं क्रोधपूर्वक उनका विनाश करूँगा। तुमलोग निश्चिन्त हो जाओ’ ।। २०-२१॥

इत्युक्तास्ते सुराः सर्वे विष्णुना प्रभविष्णुना।

यथावासं ययुर्हृष्टाः प्रशंसन्तो जनार्दनम्॥२२॥

सब कुछ करने में समर्थ भगवान् विष्णु के इस प्रकार आश्वासन देने पर देवताओं को बड़ा हर्ष हुआ। वे उन जनार्दन की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए अपने अपने स्थान को चले गये॥ २२ ॥

विबुधानां समुद्योगं माल्यवांस्तु निशाचरः।

श्रुत्वा तौ भ्रातरौ वीराविदं वचनमब्रवीत् ॥२३॥

देवताओं के इस उद्योग का समाचार सुनकर निशाचर माल्यवान् ने अपने दोनों वीर भाइयों से इस प्रकार कहा- ॥२३॥

अमरा ऋषयश्चैव संगम्य किल शङ्करम्।

अस्मद्वधं परीप्सन्त इदं वचनमब्रुवन्॥२४॥

‘सुनने में आया है कि देवता और ऋषि मिलकर हमलोगों का वध करना चाहते हैं। इसके लिये उन्होंने भगवान् शंकर के पास जाकर यह बात कही॥ २४ ॥

सुकेशतनया देव वरदानबलोद्धताः।

बाधन्तेऽस्मान् समुहप्ता घोररूपाः पदे पदे॥२५॥

‘देव! सुकेश के पुत्र आपके वरदान के बल से उद्दण्ड और अभिमान से उन्मत्त हो उठे हैं। वे भयंकर राक्षस पग-पगपर हमलोगों को सता रहे हैं ॥ २५ ॥

राक्षसैरभिभूताः स्मो न शक्ताः स्म प्रजापते।

स्वेषु सद्मसु संस्थातुं भयात् तेषां दुरात्मनाम्॥२६॥

‘प्रजानाथ! राक्षसों से पराजित होकर हम उन दुष्टों के भय से अपने घरों में नहीं रहने पाते हैं ॥२६॥

तदस्माकं हितार्थाय जहि तांश्च त्रिलोचन।

राक्षसान् हुंकृतेनैव दह प्रदहतां वर ॥२७॥

‘त्रिलोचन ! आप हमारे हित के लिये उन असुरों का वध कीजिये। दाहकों में श्रेष्ठ रुद्रदेव! आप अपने हुंकार से ही राक्षसों को जलाकर भस्म कर दीजिये’।२७॥

इत्येवं त्रिदशैरुक्तो निशम्यान्धकसूदनः।

शिरः करं च धुन्वान इदं वचनमब्रवीत्॥२८॥

‘देवताओं के ऐसा कहने पर अन्धकशत्रु भगवान् शिव ने अस्वीकृति सूचित करने के लिये अपने सिर और हाथ को हिलाते हुए इस प्रकार कहा- ॥२८॥

अवध्या मम ते देवाः सुकेशतनया रणे।

मन्त्रं तु वः प्रदास्यामि यस्तान् वै निहनिष्यति॥२९॥

‘देवताओ! सुकेश के पुत्र रणभूमि में मेरे हाथ से मारे जाने योग्य नहीं हैं, परंतु मैं तुम्हें ऐसे पुरुष के पास जाने की सलाह दूंगा, जो निश्चय ही उन सबका वध कर डालेंगे॥ २९॥

योऽसौ चक्रगदापाणिः पीतवासा जनार्दनः।

हरिर्नारायणः श्रीमान् शरणं तं प्रपद्यथ॥३०॥

‘जिनके हाथ में चक्र और गदा सुशोभित हैं, जो पीताम्बर धारण करते हैं, जिन्हें जनार्दन और हरि कहते हैं तथा जो श्रीमान् नारायण के नाम से विख्यात हैं, उन्हीं भगवान् की शरण में तुम सब लोग जाओ’। ३०॥

हरादवाप्य ते मन्त्रं कामारिमभिवाद्य च।

नारायणालयं प्राप्य तस्मै सर्वं न्यवेदयन्॥३१॥

भगवान् शङ्कर से यह सलाह पाकर उन कामदाहक महादेवजी को प्रणाम करके देवता नारायण के धाम में जा पहुँचे और वहाँ उन्होंने उनसे सब बातें बतायीं॥ ३१॥

ततो नारायणेनोक्ता देवा इन्द्रपुरोगमाः।

सुरारींस्तान् हनिष्यामि सुरा भवत निर्भयाः॥३२॥

तब उन नारायणदेव ने इन्द्र आदि देवताओं से कहा —’देवगण ! मैं उन देवद्रोहियों का नाश कर डालूँगा, अतः तुमलोग निर्भय हो जाओ’ ॥ ३२ ॥

देवानां भयभीतानां हरिणा राक्षसर्षभौ।

प्रतिज्ञातो वधोऽस्माकं चिन्त्यतां यदिह क्षमम्॥३३॥

‘राक्षसशिरोमणियो! इस प्रकार भयभीत देवताओं के समक्ष श्रीहरि ने हमें मारने की प्रतिज्ञा की है; अतः अब इस विषय में हमलोगों के लिये जो उचित कर्तव्य हो, उसका विचार करना चाहिये। ३३॥

हिरण्यकशिपोर्मृत्युरन्येषां च सुरद्विषाम्।

नमुचिः कालनेमिश्च संह्रादो वीरसत्तमः॥ ३४॥

राधेयो बहुमायी च लोकपालोऽथ धार्मिकः।

यमलार्जुनौ च हार्दिक्यः शुम्भश्चैव निशुम्भकः॥३५॥

असुरा दानवाश्चैव सत्त्ववन्तो महाबलाः।

सर्वे समरमासाद्य न श्रूयन्तेऽपराजिताः॥ ३६॥

‘हिरण्यकशिपु तथा अन्य देवद्रोही दैत्यों की मृत्यु इन्हीं विष्णु के हाथ से हुई है। नमुचि, कालनेमि, वीरशिरोमणि संह्राद, नाना प्रकार की माया जानने वाला राधेय, धर्मनिष्ठ लोकपाल, यमलार्जुन, हार्दिक्य, शुम्भ और निशुम्भ आदि महाबली शक्तिशाली समस्त असुर और दानव समरभूमि में भगवान् विष्णु का सामना करके पराजित न हुए हों, ऐसा नहीं सुना जाता॥ ३४-३६॥

सर्वैः क्रतुशतैरिष्टं सर्वे मायाविदस्तथा।

सर्वे सर्वास्त्रकुशलाः सर्वे शत्रुभयंकराः॥ ३७॥

‘उन सभी असुरों ने सैकड़ों यज्ञ किये थे। वे सबके-सब माया जानते थे। सभी सम्पूर्ण अस्त्रों में कुशल तथा शत्रुओं के लिये भयंकर थे॥ ३७॥

नारायणेन निहताः शतशोऽथ सहस्रशः।

एतज्ज्ञात्वा तु सर्वेषां क्षमं कर्तुमिहार्हथ।

दुःखं नारायणं जेतुं यो नो हन्तुमिहेच्छति॥३८॥

‘ऐसे सैकड़ों और हजारों असुरों को नारायणदेव ने मौत के घाट उतार दिया है। इस बात को जानकर हमसब के लिये जो उचित कर्तव्य हो, वही करना चाहिये। जो नारायणदेव हमारा वध करना चाहते हैं, उन्हें जीतना अत्यन्त दुष्कर कार्य है’ ॥ ३८ ॥

ततः सुमाली माली च श्रुत्वा माल्यवतो वचः।

ऊचतुतिरं ज्येष्ठमश्विनाविव वासवम्॥३९॥

माल्यवान् की यह बात सुनकर सुमाली और माली अपने उस बड़े भाई से उसी प्रकार बोले, जैसे दोनों अश्विनीकुमार देवराज इन्द्र से वार्तालाप कर रहे हों।

स्वधीतं दत्तमिष्टं च ऐश्वर्यं परिपालितम्।

आयुर्निरामयं प्राप्तं सुधर्मः स्थापितः पथि॥४०॥

वे बोले-राक्षसराज! हमलोगों ने स्वाध्याय, दान और यज्ञ किये हैं। ऐश्वर्य की रक्षा तथा उसका उपभोग भी किया है। हमें रोग-व्याधि से रहित आयु प्राप्त हुई है और हमने कर्तव्य-मार्ग में उत्तम धर्म की स्थापना की है॥ ४०॥

देवसागरमक्षोभ्यं शस्त्रैः समवगाह्य च।

जिता द्विषो ह्यप्रतिमास्तन्नो मृत्युकृतं भयम्॥४१॥

‘यही नहीं, हमने अपने शस्त्रों के बल से देवसेनारूपी अगाध समुद्र में प्रवेश करके ऐसे-ऐसे शत्रुओं पर विजय पायी है, जो वीरता में अपना सानी नहीं रखते थे; अतः हमें मृत्यु से कोई भय नहीं है। ४१॥

नारायणश्च रुद्रश्च शक्रश्चापि यमस्तथा।

अस्माकं प्रमुखे स्थातुं सर्वे बिभ्यति सर्वदा॥४२॥

‘नारायण, रुद्र, इन्द्र तथा यमराज ही क्यों न हों, सभी सदा हमारे सामने खड़े होनेमें डरते हैं। ४२॥

विष्णोषस्य नास्त्येव कारणं राक्षसेश्वर।

देवानामेव दोषेण विष्णोः प्रचलितं मनः॥४३॥

‘राक्षसेश्वर! विष्णु के मन में भी हमारे प्रति द्वेष का कोई कारण तो नहीं है। (क्योंकि हमने उनका कोई अपराध नहीं किया है) केवल देवताओं के चुगली खाने से उनका मन हमारी ओर से फिर गया है॥४३॥

तस्मादद्यैव सहिताः सर्वेऽन्योन्यसमावृताः।

देवानेव जिघांसामो येभ्यो दोषः समुत्थितः॥४४॥

‘इसलिये हम सब लोग एकत्र हो एक-दूसरे की रक्षा करते हुए साथ-साथ चलें और आज ही देवताओं का वध कर डालने की चेष्टा करें, जिनके कारण यह उपद्रव खड़ा हुआ है’ ।। ४४॥

एवं सम्मन्त्र्य बलिनः सर्वसैन्यसमावृताः।

उद्योगं घोषयित्वा तु सर्वे नैर्ऋतपुंगवाः॥४५॥

युद्धाय निर्ययुः क्रुद्धा जम्भवृत्रादयो यथा।

ऐसा निश्चय करके उन सभी महाबली राक्षसपतियों ने युद्ध के लिये अपने उद्योग की घोषणा कर दी और समूची सेना साथ ले जम्भ एवं वृत्र आदि की भाँति कुपित हो वे युद्ध के लिये निकले॥ ४५ १/२॥

इति ते राम सम्मन्त्र्य सर्वोद्योगेन राक्षसाः॥४६॥

युद्धाय निर्ययुः सर्वे महाकाया महाबलाः।

श्रीराम! पूर्वोक्त मन्त्रणा करके उन सभी महाबली विशालकाय राक्षसों ने पूरी तैयारी की और युद्ध के लिये कूच कर दिया॥ ४६ १/२॥

स्यन्दनैर्वारणैश्चैव हयैश्च करिसंनिभैः॥४७॥

खरैर्गोभिरथोष्ट्रैश्च शिशुमारैर्भुजंगमैः।

मकरैः कच्छपैर्मीनैर्विहंगैर्गरुडोपमैः॥४८॥

सिंहैा र्वराहैश्च सृमरैश्चमरैरपि।

त्यक्त्वा लङ्कां गताः सर्वे राक्षसा बलगर्विताः॥४९॥

प्रयाता देवलोकाय योद्धं दैवतशत्रवः।

अपने बल का घमण्ड रखने वाले वे समस्त देवद्रोही राक्षस रथ, हाथी, हाथी-जैसे घोड़े, गदहे,बैल, ऊँट, शिशुमार, सर्प, मगर, कछुआ, मत्स्य, गरुड़-तुल्य पक्षी, सिंह, बाघ, सूअर, मृग और नीलगाय आदि वाहनों पर सवार हो लङ्का छोड़कर युद्ध के लिये देवलोक की ओर चल दिये॥ ४७–४९ १/२॥

लङ्काविपर्ययं दृष्ट्वा यानि लङ्कालयान्यथ॥५०॥

भूतानि भयदीनि विमनस्कानि सर्वशः।

लङ्का में रहने वाले जो प्राणी अथवा ग्रामदेवता आदि थे, वे सब अपशकुन आदि के द्वारा लङ्का के भावी विध्वंस को देखकर भय का अनुभव करते हुए मनही-मन खिन्न हो उठे। ५० १/२॥

रथोत्तमैरुह्यमानाः शतशोऽथ सहस्रशः॥५१॥

प्रयाता राक्षसास्तूर्णं देवलोकं प्रयत्नतः।

रक्षसामेव मार्गेण दैवतान्यपचक्रमुः॥५२॥

उत्तम रथों पर बैठे हुए सैकड़ों और हजारों राक्षस तुरंत ही प्रयत्नपूर्वक देवलोक की ओर बढ़ने लगे। उस नगरके देवता राक्षसों के मार्ग से ही पुरी छोड़कर निकल गये॥ ५१-५२॥

भौमाश्चैवान्तरिक्षाश्च कालाज्ञप्ता भयावहाः।

उत्पाता राक्षसेन्द्राणामभावाय समुत्थिताः॥५३॥

उस समय काल की प्रेरणा से पृथ्वी और आकाश में अनेक भयंकर उत्पात प्रकट होने लगे, जो राक्षसों के विनाश की सूचना दे रहे थे॥५३॥

अस्थीनि मेघा ववृषुरुष्णं शोणितमेव च।

वेलां समुद्राश्चोत्क्रान्ताश्चेलुश्चाप्यथ भूधराः॥५४॥

बादल गरम-गरम रक्त और हड्डियों की वर्षा करने लगे, समुद्र अपनी सीमा का उल्लङ्घन करके आगे बढ़ गये और पर्वत हिलने लगे॥५४॥

अट्टहासान् विमुञ्चन्तो घननादसमस्वनाः।

वाश्यन्त्यश्च शिवास्तत्र दारुणं घोरदर्शनाः॥५५॥

मेघ के समान गम्भीर ध्वनि करने वाले प्राणी विकट अट्टहास करने लगे और भयंकर दिखायी देने वाली गीदड़ियाँ कठोर आवाज में चीत्कार करने लगीं। ५५॥

सम्पतन्त्यथ भूतानि दृश्यन्ते च यथाक्रमम्।

गृध्रचक्रं महच्चात्र प्रज्वालोद्गारिभिर्मुखैः॥५६॥

रक्षोगणस्योपरिष्टात् परिभ्रमति कालवत्।

पृथ्वी आदि भूत क्रमशः गिरते-विलीन होते-से दिखायी देने लगे, गीधों का विशाल समूह मुख से आग की ज्वाला उगलता हुआ राक्षसों के ऊपर काल के समान मँडराने लगा॥ ५६ १/२॥

कपोता रक्तपादाश्च सारिका विद्रुता ययुः॥५७॥

काका वाश्यन्ति तत्रैव विडाला वै द्विपादयः।

कबूतर, तोता और मैना लङ्का छोड़कर भाग चले। कौए वहीं काँव-काँव करने लगे। बिल्लियाँ भी वहीं गुर्राने लगीं तथा हाथी आदि पशु आर्तनाद करने लगे॥ ५७ १/२ ॥

उत्पातांस्ताननादृत्य राक्षसा बलदर्पिताः॥५८॥

यान्त्येव न निवर्तन्ते मृत्युपाशावपाशिताः।

राक्षस बल के घमण्ड में मतवाले हो रहे थे। वे काल के पाश में बँध चुके थे। इसलिये उन उत्पातों की अवहेलना करके युद्ध के लिये चलते ही गये, लौटे नहीं।। ५८ १/२॥

माल्यवांश्च सुमाली च माली च सुमहाबलः॥

पुरस्सरा राक्षसानां ज्वलिता इव पावकाः।

माल्यवान्, सुमाली और महाबली माली—ये तीनों प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी शरीर से समस्त राक्षसों के आगे-आगे चल रहे थे॥ ५९ १/२ ।।

माल्यवन्तं तु ते सर्वे माल्यवन्तमिवाचलम्॥६०॥

निशाचरा आश्रयन्ति धातारमिव देवताः।

जैसे देवता ब्रह्माजी का आश्रय लेते हैं, उसी प्रकार उन सब निशाचरों ने माल्यवान् पर्वत के समान अविचल माल्यवान् का ही आश्रय ले रखा था॥६० १/२॥

तद् बलं राक्षसेन्द्राणां महाभ्रघननादितम्॥६१॥

जयेप्सया देवलोकं ययौ मालिवशे स्थितम्।

राक्षसों की वह सेना महान् मेघों की गर्जना के समान कोलाहल करती हुई विजय पाने की इच्छा से देवलोक की ओर बढ़ती जा रही थी। उस समय वह सेनापति माली के नियन्त्रण में थी॥६१ १/२ ॥

राक्षसानां समुद्योगं तं तु नारायणः प्रभुः॥६२॥

देवदूतादुपश्रुत्य चक्रे युद्धे तदा मनः।

देवताओं के दूत से राक्षसों के उस युद्धविषयक उद्योग की बात सुनकर भगवान् नारायण ने भी युद्ध करने का विचार किया॥ ६२ १/२ ॥

स सज्जायुधतूणीरो वैनतेयोपरि स्थितः॥६३॥

आसाद्य कवचं दिव्यं सहस्रार्कसमद्युति।

वे सहस्रों सूर्यों के समान दीप्तिमान् दिव्य कवचधारण करके बाणों से भरा तरकस लिये गरुड़ पर सवार हुए।

आबद्ध्य शरसम्पूर्णे इषुधी विमले तदा॥ ६४॥

श्रोणिसूत्रं च खड्गं च विमलं कमलेक्षणः।

इसके अतिरिक्त भी उन्होंने सायकों से पूर्ण दो चमचमाते हुए तूणीर बाँध रखे थे। उन कमलनयन श्रीहरि ने अपनी कमर में पट्टी बाँधकर उसमें चमकती हुई तलवार भी लटका ली थी॥ ६४ १/२ ।।

शङ्खचक्रगदाशाखड्गांश्चैव वरायुधान्॥६५॥

सुपर्णं गिरिसंकाशं वैनतेयमथास्थितः।

राक्षसानामभावाय ययौ तूर्णतरं प्रभुः॥६६॥

इस प्रकार शङ्ख, चक्र, गदा, शार्ङ्गधनुष और खड्ग आदि उत्तम आयुधों को धारण किये सुन्दरपंख वाले पर्वताकार गरुड़ पर आरूढ़ हो वे प्रभु उन राक्षसों का संहार करने के लिये तुरंत चल दिये॥ ६५-६६॥

सुपर्णपृष्ठे स बभौ श्यामः पीताम्बरो हरिः।

काञ्चनस्य गिरेः शृङ्गे सतडित्तोयदो यथा॥६७॥

गरुड़ की पीठ पर बैठे हुए वे पीताम्बरधारी श्यामसुन्दर श्रीहरि सुवर्णमय मेरुपर्वत के शिखर पर स्थित हुए विद्युत्सहित मेघ के समान शोभा पा रहे थे। ६७॥

स सिद्धदेवर्षिमहोरगैश्च गन्धर्वयक्षरुपगीयमानः।

समाससादासुरसैन्यशत्रुश्चक्रासिशार्णायुधशङ्खपाणिः॥६८॥

उस समय सिद्ध, देवर्षि, बड़े-बड़े नाग, गन्धर्व और यक्ष उनके गुण गा रहे थे। असुरों की सेना के शत्रु वे श्रीहरि हाथों में शङ्ख, चक्र, खड्ग और शार्ङ्गधनुष लिये सहसा वहाँ आ पहुँचे॥ ६८॥

सुपर्णपक्षानिलनुन्नपक्षं भ्रमत्पताकं प्रविकीर्णशस्त्रम्।

चचाल तद्राक्षसराजसैन्यं चलोपलं नीलमिवाचलाग्रम्॥६९॥

गरुड़ के पंखों की तीव्र वायु के झोंके खाकर वह सेना क्षुब्ध हो उठी। सैनिकों के रथों की पताकाएँ चक्कर खाने लगी और सबके हाथों से अस्त्र-शस्त्र गिर गये। इस प्रकार राक्षसराज माल्यवान् की समूची सेना काँपने लगी। उसे देखकर ऐसा जान पड़ता था, मानो पर्वतका नील शिखर अपनी शिलाओं को बिखेरता हुआ हिल रहा हो॥ ६९॥

ततः शितैः शोणितमांसरूषितै युगान्तवैश्वानरतुल्यविग्रहैः।

निशाचराः सम्परिवार्य माधवं वरायुधैर्निर्बिभिदुः सहस्रशः॥ ७० ॥

राक्षसों के उत्तम अस्त्र-शस्त्र तीखे, रक्त और मांस में सने हुए तथा प्रलयकालीन अग्नि के समान दीप्तिमान् थे। उनके द्वारा वे सहस्रों निशाचर भगवान् लक्ष्मीपति को चारों ओर से घेरकर उन पर चोट करने लगे॥ ७० ॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे षष्ठः सर्गः॥६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें छठा सर्ग पूरा हुआ॥६॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
उत्तरकाण्डम्

भगवान् विष्णु द्वारा राक्षसों का संहार और पलायन

सप्तमः सर्गः

सर्ग-07


नारायणगिरिं ते तु गर्जन्तो राक्षसाम्बुदाः।

अर्दयन्तोऽस्त्रवर्षेण वर्षेणेवाद्रिमम्बुदाः॥१॥

(अगस्त्यजी कहते हैं-रघुनन्दन!) जैसे बादल जल की वर्षा से किसी पर्वत को आप्लावित करते हैं, उसी प्रकार गर्जना करते हुए वे राक्षसरूपी मेघ अस्त्ररूपी जल की वर्षा से नारायणरूपी पर्वत को पीड़ित करने लगे॥१॥

श्यामावदातस्तैर्विष्णुर्नीलैर्नक्तंचरोत्तमैः।

वृतोऽञ्जनगिरीवायं वर्षमाणैः पयोधरैः॥२॥

भगवान् विष्णु का श्रीविग्रह उज्ज्वल श्यामवर्ण से सुशोभित था और अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा करते हुए वे श्रेष्ठ निशाचर नीले रंग के दिखायी देते थे; इसलिये ऐसा जान पड़ता था, मानो अञ्जनगिरि को चारों

ओर से घेरकर मेघ उस पर जल की धारा बरसा रहे हों॥२॥

शलभा इव केदारं मशका इव पावकम्।

यथामृतघटं दंशा मकरा इव चार्णवम्॥३॥

तथा रक्षोधनुर्मुक्ता वज्रानिलमनोजवाः।

हरिं विशन्ति स्म शरा लोका इव विपर्यये॥४॥

जैसे टिड्डीदल धान आदि के खेतों में, पतिंगे आग में, डंक मारने वाली मक्खियाँ मधु से भरे हुए घड़े और मगर समुद्र में घुस जाते हैं, उसी प्रकार राक्षसों के धनुष से छूटे हुए वज्र, वायु तथा मन के समान वेगवाले बाण भगवान् विष्णु के शरीर में प्रवेश करके इस प्रकार लीन हो जाते थे, जैसे प्रलयकाल में समस्त लोक उन्हीं में प्रवेश कर जाते हैं। ३-४ ॥

स्यन्दनैः स्यन्दनगता गजैश्च गजमूर्धगाः।

अश्वारोहास्तथाश्वैश्च पादाताश्चाम्बरे स्थिताः॥

रथपर बैठे हुए योद्धा रथोंसहित, हाथीसवार हाथियों के साथ, घुड़सवार घोड़ोंसहित तथा पैदल पाँव-पयादे ही आकाश में खड़े थे॥५॥

राक्षसेन्द्रा गिरिनिभाः शरैः शक्त्यष्टितोमरैः।

निरुच्छ्वासं हरिं चक्रुः प्राणायामा इव द्विजम्॥

उन राक्षसराजों के शरीर पर्वत के समान विशाल थे। उन्होंने सब ओर से शक्ति, ऋष्टि, तोमर और बाणों की वर्षा करके भगवान् विष्णु का साँस लेना बंद कर दिया। ठीक उसी तरह, जैसे प्राणायाम द्विज के श्वास को रोक देते हैं॥६॥

निशाचरैस्ताड्यमानो मीनैरिव महोदधिः।

शामायम्य दुर्धर्षो राक्षसेभ्योऽसृजच्छरान्॥७॥

जैसे मछली महासागर पर प्रहार करे, उसी तरह वे निशाचर अपने अस्त्र-शस्त्रों द्वारा श्रीहरि पर चोट करते थे। उस समय दुर्जय देवता भगवान् विष्णु ने अपने शाङ्ग-धनुष को खींचकर राक्षसों पर बाण बरसाना आरम्भ किया॥७॥

शरैः पूर्णायतोत्सृष्टैर्वज्रकल्पैर्मनोजवैः।

चिच्छेद विष्णुर्निशितैः शतशोऽथ सहस्रशः॥८॥

वे बाण धनुष को पूर्णरूप से खींचकर छोड़े गये थे; अतः वज्र के समान असह्य और मन के समान वेगवान् थे। उन पैने बाणों द्वारा भगवान् विष्णु ने सैकड़ों और हजारों निशाचरों के टुकड़े-टुकड़े कर डाले॥८॥

विद्राव्य शरवर्षेण वर्षं वायुरिवोत्थितम्।

पाञ्चजन्यं महाशङ्ख प्रदध्मौ पुरुषोत्तमः॥९॥

जैसे हवा उमड़ी हुई बदली एवं वर्षा को उड़ा देती है, उसी प्रकार अपनी बाणवर्षा से राक्षसों को भगाकर पुरुषोत्तम श्रीहरि ने अपने पाञ्चजन्य नामक महान् शङ्ख को बजाया॥९॥

सोऽम्बुजो हरिण ध्मातः सर्वप्राणेन शङ्खराट्।

ररास भीमनि दस्त्रैलोक्यं व्यथयन्निव॥१०॥

सम्पूर्ण प्राणशक्ति से श्रीहरि के द्वारा बजाया गया वह जलजनित शङ्खराज भयंकर आवाज से तीनों लोकों को व्यथित करता हुआ-सा गूंजने लगा॥ १० ॥

शङ्खराजरवः सोऽथ त्रासयामास राक्षसान्।

मृगराज इवारण्ये समदानिव कुञ्जरान्॥११॥

जैसे वन में दहाड़ता हुआ सिंह मतवाले हाथियों को भयभीत कर देता है, उसी प्रकार उस शङ्खराज की ध्वनि ने समस्त राक्षसों को भय और घबराहट में डाल दिया॥११॥

न शेकुरश्वाः संस्थातुं विमदाः कुञ्जराऽभवन्।

स्यन्दनेभ्यश्च्युता वीराः शङ्खरावितदुर्बलाः॥१२॥

वह शङ्खध्वनि सुनकर शक्ति और साहस से हीन हुए घोड़े युद्धभूमि में खड़े न रह सके, हाथियों के मद उतर गये और वीर सैनिक रथों से नीचे गिर पड़े। १२॥

शाईचापविनिर्मुक्ता वज्रतुल्याननाः शराः।

विदार्य तानि रक्षांसि सुपुङ्खा विविशुः क्षितिम्॥१३॥

सुन्दर पंखवाले उन बाणों के मुखभाग वज्र के समान कठोर थे। वे शार्ङ्गधनुष से छूटकर राक्षसों को विदीर्ण करते हुए पृथ्वी में घुस जाते थे॥ १३॥

भिद्यमानाः शरैः संख्ये नारायणकरच्युतैः।

निपेतू राक्षसा भूमौ शैला वज्रहता इव॥१४॥

संग्रामभूमि में भगवान् विष्णु के हाथ से छूटे हुए उन बाणों द्वारा छिन्न-भिन्न हुए निशाचर वज्र के मारे हुए पर्वतों की भाँति धराशायी होने लगे॥ १४ ॥

व्रणानि परगात्रेभ्यो विष्णुचक्रकृतानि हि।

असृक् क्षरन्ति धाराभिः स्वर्णधारा इवाचलाः॥१५॥

श्रीहरि के चक्र के आघात से शत्रुओं के शरीरों में जो घाव हो गये थे, उनसे उसी तरह रक्त की धारा बह रही थी, मानो पर्वतों से गेरुमिश्रित जल का झरना गिर रहा हो॥ १५॥

शङ्खराजरवश्चापि शार्ङ्गचापरवस्तथा।

राक्षसानां रवांश्चापि ग्रसते वैष्णवो रवः॥१६॥

शङ्खराज की ध्वनि, शार्ङ्गधनुष की टंकार तथा भगवान् विष्णु की गर्जना—इन सबके तुमुल नाद ने राक्षसों के कोलाहल को दबा दिया॥१६॥

तेषां शिरोधरान् धूताञ्छरध्वजधनूंषि च।

रथान् पताकास्तूणीरांश्चिच्छेद स हरिः शरैः॥१७॥

भगवान् ने राक्षसों के काँपते हुए मस्तकों, बाणों, ध्वजाओं, धनुषों, रथों, पताकाओं और तरकसों को अपने बाणों से काट डाला॥१७॥

सूर्यादिव करा घोरा वार्योघा इव सागरात्।

पर्वतादिव नागेन्द्रा धारौघा इव चाम्बुदात्॥१८॥

तथा शार्ङ्गविनिर्मुक्ताः शरा नारायणेरिताः।

निर्धावन्तीषवस्तूर्णं शतशोऽथ सहस्रशः॥१९॥

जैसे सूर्य से भयंकर किरणें, समुद्र से जल के प्रवाह, पर्वत से बड़े-बड़े सर्प और मेघ से जल की धाराएँ प्रकट होती हैं, उसी प्रकार भगवान् नारायण के चलाये और शार्ङ्गधनुष से छूटे हुए सैकड़ों और हजारों बाण तत्काल इधर-उधर दौड़ने लगे। १८-१९॥

शरभेण यथा सिंहाः सिंहेन द्विरदा यथा।

द्विरदेन यथा व्याघ्रा व्याघ्रण दीपिनो यथा॥२०॥

दीपिनेव यथा श्वानः शुना मार्जारको यथा।

मार्जारेण यथा सर्पाः सर्पेण च यथाखवः॥२१॥

तथा ते राक्षसाः सर्वे विष्णुना प्रभविष्णुना।

द्रवन्ति द्राविताश्चान्ये शायिताश्च महीतले॥२२॥

जैसे शरभ से सिंह, सिंह से हाथी, हाथी से बाघ, बाघ से चीते, चीतेसे  कुत्ते, कुत्ते से बिलाव, बिलाव से साँप और साँप से चूहे डरकर भागते हैं, उसी प्रकार वे सब राक्षस प्रभावशाली भगवान् विष्णु की मार खाकर भागने लगे। उनके भगाये हुए बहुत-से राक्षस धराशायी हो गये। २०-२२॥

राक्षसानां सहस्राणि निहत्य मधुसूदनः।

वारिजं पूरयामास तोयदं सुरराडिव॥२३॥

सहस्रों राक्षसों का वध करके भगवान् मधुसूदन ने अपने शङ्ख पाञ्चजन्य को उसी तरह गम्भीर ध्वनि से पूर्ण किया, जैसे देवराज इन्द्र मेघ को जल से भर देते

नारायणशरत्रस्तं शङ्खनादसुविह्वलम्।

ययौ लङ्कामभिमुखं प्रभग्नं राक्षसं बलम्॥२४॥

भगवान् नारायण के बाणों से भयभीत और शङ्खनाद से व्याकुल हुई राक्षस-सेना लङ्का की ओर भाग चली॥ २४॥

प्रभग्ने राक्षसबले नारायणशराहते।

सुमाली शरवर्षेण निववार रणे हरिम्॥ २५॥

नारायण के सायकों से आहत हुई राक्षससेना जब भागने लगी, तब सुमाली ने रणभूमि में बाणों की वर्षा करके उन श्रीहरि को आगे बढ़ने से रोका॥२५॥

स तु तं छादयामास नीहार इव भास्करम्।

राक्षसाः सत्त्वसम्पन्नाः पुनर्धेर्यं समादधुः ॥२६॥

जैसे कुहरा सूर्यदेव को ढक लेता है, उसी तरह सुमाली ने बाणों से भगवान् विष्णु को आच्छादित कर दिया। यह देख शक्तिशाली राक्षसों ने पुनः धैर्य धारण किया॥२६॥

अथ सोऽभ्यपतद् रोषाद् राक्षसो बलदर्पितः।

महानादं प्रकुर्वाणो राक्षसाञ्जीवयन्निव॥२७॥

उस बलाभिमानी निशाचर ने बड़े जोर से गर्जना करके राक्षसों में नूतन जीवन का संचार करते हुए-से रोषपूर्वक आक्रमण किया॥२७॥

उत्क्षिप्य लम्बाभरणं धुन्वन् करमिव द्विपः।

ररास राक्षसो हर्षात् सतडित्तोयदो यथा॥२८॥

जैसे हाथी सूंड़ को उठाकर हिलाता हो, उसी तरह लटकते हुए आभूषण से युक्त हाथ को ऊपर उठाकर हिलाता हुआ वह राक्षस विद्युत् सहित सजल जलधर के समान बड़े हर्ष से गर्जना करने लगा॥२८॥

सुमालेर्नर्दतस्तस्य शिरो ज्वलितकुण्डलम्।

चिच्छेद यन्तुरश्वाश्च भ्रान्तास्तस्य तु रक्षसः॥२९॥

तब भगवान् ने अपने बाणों द्वारा गर्जते हुए सुमाली के सारथि का जगमगाते हुए कुण्डलों से मण्डित मस्तक काट डाला। इससे उस राक्षस के घोड़े बेलगाम होकर चारों ओर चक्कर काटने लगे। २९॥

तैरश्वैर्धाम्यते भ्रान्तैः सुमाली राक्षसेश्वरः।

इन्द्रियाश्वैः परिभ्रान्तैधृतिहीनो यथा नरः॥३०॥

उन घोड़ों के चक्कर काटने से उनके साथ ही राक्षसराज सुमाली भी चक्कर काटने लगा। ठीक उसी तरह, जैसे अजितेन्द्रिय मनुष्य विषयों में भटकने वाली इन्द्रियों के साथ-साथ स्वयं भी भटकता फिरता है। ३०॥

ततो विष्णुं महाबाहुं प्रपतन्तं रणाजिरे।

हृते सुमालेरश्वैश्च रथे विष्णुरथं प्रति॥३१॥

माली चाभ्यद्रवद् युक्तः प्रगृह्य सशरं धनुः।

जब घोड़े रणभूमि में सुमाली के रथ को इधर-उधर लेकर भागने लगे, तब माली नामक राक्षस ने युद्ध के लिये उद्यत हो धनुष लेकर गरुड़ की ओर धावा किया। राक्षसों पर टूटते हुए महाबाहु विष्णु पर आक्रमण किया॥ ३१ १/२ ।।

मालेर्धनुश्च्युता बाणाः कार्तस्वरविभूषिताः॥३२॥

विविशुहरिमासाद्य क्रौञ्चं पत्ररथा इव।

वज्र और बिजली के समान प्रकाशित होने वाले वे बाण माली के शरीर में घुसकर उसका रक्त पीने लगे, मानो सर्प अमृतरस का पान कर रहे हों॥ ३५ १/२॥

मालिनं विमुखं कृत्वा शङ्खचक्रगदाधरः॥ ३६॥

मालिमौलिं ध्वजं चापं वाजिनश्चाप्यपातयत्।

अन्त में माली को पीठ दिखाने के लिये विवश करके शङ्ख, चक्र और गदा धारण करने वाले भगवान् श्रीहरि ने उस राक्षस के मुकुट, ध्वज और धनुष को काटकर घोड़ों को भी मार गिराया। ३६ १/२ ।।

विरथस्तु गदां गृह्य माली नक्तंचरोत्तमः॥ ३७॥

आपुप्लुवे गदापाणिनिर्यग्रादिव केसरी।

रथहीन हो जाने पर राक्षसप्रवर माली गदा हाथ में लेकर कूद पड़ा, मानो कोई सिंह पर्वत के शिखर से छलॉग मारकर नीचे आ गया हो। ३७ १/२॥

गदया गरुडेशानमीशानमिव चान्तकः॥ ३८॥

ललाटदेशेऽभ्यहनन् वज्रणेन्द्रो यथाचलम्।

जैसे यमराज ने भगवान् शिव पर गदा का और इन्द्र ने पर्वत पर वज्र का प्रहार किया हो, उसी तरह माली ने पक्षिराज गरुड़ के ललाट में अपनी गदा द्वारा गहरी चोट पहुँचायी॥

गदयाभिहतस्तेन मालिना गरुडो भृशम्॥३९॥

रणात् पराङ्मखं देवं कृतवान् वेदनातुरः।

माली की गदा से अत्यन्त आहत हुए गरुड़ वेदना से व्याकुल हो उठे। उन्होंने स्वयं युद्ध से विमुख होकर भगवान् विष्णु को भी विमुख-सा कर दिया॥ ३९ १/२॥

परामखो कृते देवे मालिना गरुडेन वै॥४०॥

उदतिष्ठन्महान् शब्दो रक्षसामभिनर्दताम्।

माली ने गरुड़ के साथ ही जब भगवान् विष्णु को भी युद्ध से विमुख-सा कर दिया, तब वहाँ जोर-जोर से गर्जते हुए राक्षसों का महान् शब्द गूंज उठा॥ ४० १/२॥

रक्षसां रुवतां रावं श्रुत्वा हरिहयानुजः॥४१॥

तिर्यगास्थाय संक्रुद्धः पक्षीशे भगवान् हरिः।

परामखोऽप्युत्ससर्ज मालेश्चक्रं जिघांसया॥४२॥

गर्जते हुए राक्षसों का वह सिंहनाद सुनकर इन्द्र के छोटे भाई भगवान् विष्णु अत्यन्त कुपित हो पक्षिराज की पीठ पर तिरछे होकर बैठ गये। (इससे वह राक्षस उन्हें दीखने लगा) उस समय पराङ्मुख माली को मारा गया देख सुमाली और माल्यवान् दोनों राक्षस शोक से व्याकुल हो सेनासहित लङ्का की ओर ही भागे॥

गरुडस्तु समाश्वस्तः संनिवृत्य यथा पुरा।

राक्षसान् द्रावयामास पक्षवातेन कोपितः॥४७॥

इतने ही में गरुड़ की पीड़ा कम हो गयी, वे पुनः सँभलकर लौटे और कुपित हो पूर्ववत् अपने पंखों की हवा से राक्षसों को खदेड़ने लगे॥४७॥ ।

चक्रकृत्तास्यकमला गदासंचूर्णितोरसः।

लाङ्गलग्लपितग्रीवा मुसलैर्भिन्नमस्तकाः॥४८॥

कितने ही राक्षसों के मुखकमल चक्र के प्रहार से कट गये। गदाओं के आघात से बहुतों के वक्षःस्थलचूर-चूर हो गये। हल के फाल से कितनों के गर्दनें उतर गयीं। मूसलों की मार से बहुतों के मस्तकों की धज्जियाँ उड़ गयीं।

केचिच्चैवासिना छिन्नास्तथान्ये शरताडिताः।

निपेतुरम्बरात् तूर्णं राक्षसाः सागराम्भसि॥४९॥

तलवार का हाथ पड़ने से  कितने ही राक्षस टुकड़े टुकड़े हो गये। बहुतेरे बाणों से पीड़ित हो तुरंत ही आकाश से समुद्र के जल में गिर पड़े॥ ४९॥

नारायणोऽपीषुवराशनीभिविदारयामास धनुर्विमुक्तैः।

नक्तंचरान् धूतविमुक्तकेशान् यथाशनीभिः सतडिन्महाभ्रः॥५०॥

भगवान् विष्णु भी अपने धनुष से छूटे हुए श्रेष्ठ बाणों और अशनियों द्वारा राक्षसों को विदीर्ण करने लगे। उस समय उन निशाचरों के खुले हुए केश हवा से उड़ रहे थे और पीताम्बरधारी श्यामसुन्दर श्रीहरि विद्युन्माला-मण्डित महान् मेघ के समान सुशोभित हो रहे थे॥ ५० ॥

भिन्नातपत्रं पतमानशस्त्रं शरैरपध्वस्तविनीतवेषम्।

विनिःसृतान्त्रं भयलोलनेत्रं बलं तदुन्मत्ततरं बभूव॥५१॥

राक्षसों की वह सारी सेना अत्यन्त उन्मत्त-सी प्रतीत । होती थी बाणों से उसके छत्र कट गये थे, अस्त्रशस्त्र गिर गये थे, सौम्य वेष दूर हो गया था, आँतें बाहर निकल आयी थीं और सबके नेत्र भय से चञ्चल हो रहे थे।

सिंहार्दितानामिव कुञ्जराणां निशाचराणां सह कुञ्जराणाम्।

रवाश्च वेगाश्च समं बभूवुः पुराणसिंहेन विमर्दितानाम्॥५२॥

जैसे सिंहों द्वारा पीडित हुए हाथियों के चीत्कार और वेग एक साथ ही प्रकट होते हैं, उसी प्रकार उन पुराणप्रसिद्ध नृसिंहरूपधारी श्रीहरि के द्वारा रौंदे गये उन निशाचररूपी गजराजों के हाहाकार और वेग साथ-साथ प्रकट हो रहे थे।

ते वार्यमाणा हरिबाणजालैः स्वबाणजालानि समुत्सृजन्तः।

धावन्ति नक्तंचरकालमेघा वायुप्रणुन्ना इव कालमेघाः॥५३॥

भगवान् विष्णु के बाणसमूहों से आवृत हो अपने सायकों का परित्याग करके वे निशाचररूपी काले मेघ उसी प्रकार भागे जा रहे थे, जैसे हवा के उड़ाये हुए वर्षाकालीन मेघ आकाश में भागते देखे जाते हैं। ५३॥

चक्रप्रहारैर्विनिकृत्तशीर्षाः संचूर्णिताङ्गाश्च गदाप्रहारैः।

असिप्रहारैर्द्धिविधाविभिन्नाः पतन्ति शैला इव राक्षसेन्द्राः॥५४॥

चक्र के प्रहारों से राक्षसों के मस्तक कट गये थे, गदाओं की मार से उनके शरीर चूर-चूर हो रहे थे तथा तलवारों के आघात से उनके दो-दो टुकड़े हो गये थे। इस तरह वे राक्षसराज पर्वतों के समान धराशायी हो रहे थे।

विलम्बमानैर्मणिहारकुण्डलैनिशाचरैर्नीलबलाहकोपमैः।

निपात्यमानैर्ददृशे निरन्तरं निपात्यमानैरिव नीलपर्वतैः ॥५५॥

लटकते हुए मणिमय हारों और कुण्डलों के साथ गिराये जाते हुए नील मेघ-सदृश उन निशाचरों की लाशों से वह रणभूमि पट गयी थी। वहाँ धराशायी हुए वे राक्षस नीलपर्वतों के समान जान पड़ते थे। उनसे वहाँ का भूभाग इस तरह आच्छादित हो गया था कि कहीं तिल रखने की भी जगह नहीं दिखायी देती थी॥ ५५॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे सप्तमः सर्गः॥७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आपरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्ड में सातवाँ सर्ग पूरा हुआ॥७॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
उत्तरकाण्डम्

माल्यवान् का युद्ध और पराजय तथा सुमाली आदि सब राक्षसों का रसातल में प्रवेश

अष्टमः सर्गः

सर्ग-08


हन्यमाने बले तस्मिन् पद्मनाभेन पृष्ठतः।

माल्यवान् संनिवृत्तोऽथ वेलामेत्य इवार्णवः॥१॥

(अगस्त्यजी कहते हैं-रघुनन्दन!) पद्मनाभ भगवान् विष्णु ने जब भागती हुई राक्षसों की सेना को पीछे की ओर से मारना आरम्भ किया, तब माल्यवान् लौट पड़ा, मानो महासागर अपनी तट भूमितक जाकर निवृत्त हो गया हो।

संरक्तनयनः क्रोधाच्चलन्मौलिर्निशाचरः।

पद्मनाभमिदं प्राह वचनं पुरुषोत्तमम्॥२॥

उसके नेत्र क्रोध से लाल हो रहे थे और मुकुट हिल रहा था। उस निशाचर ने पुरुषोत्तम भगवान् पद्मनाभ से इस प्रकार कहा- ॥२॥

नारायण न जानीषे क्षात्रधर्मं पुरातनम्।

अयुद्धमनसो भीतानस्मान् हंसि यथेतरः॥३॥

‘नारायणदेव! जान पड़ता है पुरातन क्षात्रधर्म को बिलकुल नहीं जानते हो, तभी तो साधारण मनुष्य की भाँति तुम जिनका मन युद्ध से विरत हो गया है तथा जो डरकर भागे जा रहे हैं, ऐसे हम राक्षसों को भी मार रहे हो॥३॥

पराङ्मुखवधं पापं यः करोति सुरेश्वर।

स हन्ता न गतः स्वर्गं लभते पुण्यकर्मणाम्॥४॥

‘सुरेश्वर! जो युद्ध से विमुख हुए सैनिकों के वध का पाप करता है, वह घातक इस शरीर का त्याग करके परलोक में जाने पर पुण्यकर्मा पुरुषों को मिलने वाले स्वर्ग को नहीं पाता है॥४॥

युद्धश्रद्धाथवा तेऽस्ति शङ्खचक्रगदाधर।

अहं स्थितोऽस्मि पश्यामि बलं दर्शय यत् तव॥

‘शङ्ख, चक्र और गदा धारण करने वाले देवता! यदि तुम्हारे हृदय में युद्ध का हौसला है तो मैं खड़ा हूँ। देखता हूँ, तुममें कितना बल है? दिखाओ अपना पराक्रम’ ॥ ५॥

माल्यवन्तं स्थितं दृष्ट्वा माल्यवन्तमिवाचलम्।

उवाच राक्षसेन्द्रं तं देवराजानुजो बली॥६॥

माल्यवान् पर्वत के समान अविचलभाव से खड़े हुए राक्षसराज माल्यवान् को देखकर देवराज इन्द्र के छोटे भाई महाबली भगवान् विष्णु ने उससे कहा- ॥६॥

युष्मत्तो भयभीतानां देवानां वै मयाभयम्।

राक्षसोत्सादनं दत्तं तदेतदनुपाल्यते॥७॥

‘देवताओं को तुमलोगों से बड़ा भय उपस्थित हुआ है, मैंने राक्षसों के संहार की प्रतिज्ञा करके उन्हें अभय दान दिया है। अतः इस रूप में मेरे द्वारा उस प्रतिज्ञा का ही पालन किया जा रहा है॥७॥

प्राणैरपि प्रियं कार्यं देवानां हि सदा मया।

सोऽहं वो निहनिष्यामि रसातलगतानपि॥८॥

‘मुझे अपने प्राण देकर भी सदा ही देवताओं का प्रिय कार्य करना है। इसलिये तुमलोग भागकर रसातल में चले जाओ तो भी मैं तुम्हारा वध किये बिना नहीं रहूँगा’ ॥ ८॥

देवदेवं ब्रुवाणं तं रक्ताम्बुरुहलोचनम्।

शक्त्या बिभेद संक्रुद्धो राक्षसेन्द्रो भुजान्तरे॥९॥

लाल कमल के  समान नेत्रवाले देवाधिदेव भगवान् विष्णु जब इस प्रकार कह रहे थे, उस समय अत्यन्त कुपित हुए राक्षसराज माल्यवान् ने अपनी शक्ति के द्वारा प्रहार करके भगवान् विष्णु का वक्षःस्थल विदीर्ण कर दिया॥९॥

माल्यवद्भुजनिर्मुक्ता शक्तिघण्टाकृतस्वना।

हरेरुरसि बभ्राज मेघस्थेव शतहदा॥१०॥

माल्यवान् के हाथ से छूटकर घंटानाद करती हुई वह शक्ति श्रीहरि की छाती से जा लगी और मेघ के अङ्क में प्रकाशित होने वाली बिजली के समान शोभा पाने लगी॥

ततस्तामेव चोत्कृष्य शक्तिं शक्तिधरप्रियः।

माल्यवन्तं समुद्दिश्य चिक्षेपाम्बुरुहेक्षणः॥११॥

शक्तिधारी कार्तिकेय जिन्हें प्रिय हैं अथवा जो शक्तिधर स्कन्द के प्रियतम हैं, उन भगवान् कमलनयन विष्णु ने उसी शक्ति को अपनी छाती से खींचकर माल्यवान् पर दे मारा॥११॥

स्कन्दोत्सृष्टेव सा शक्तिर्गोविन्दकरनिःसृता।

कांक्षन्ती राक्षसं प्रायान्महोल्केवाञ्जनाचलम्॥१२॥

स्कन्द की छोड़ी हुई शक्ति के समान गोविन्द के हाथ से निकली हुई वह शक्ति उस राक्षस को लक्ष्यकरके चली, मानो अञ्जनगिरि पर कोई बड़ी भारी उल्का गिर रही हो॥ १२॥

सा तस्योरसि विस्तीर्णे हारभारावभासिते।

आपतद् राक्षसेन्द्रस्य गिरिकूट इवाशनिः॥१३॥

हारों के समूह से प्रकाशित होने वाले उस राक्षसराज के विशाल वक्षःस्थल पर वह शक्ति गिरी, मानो किसी पर्वत के शिखर पर वज्रपात हुआ हो। १३॥

तया भिन्नतनुत्राणः प्राविशद् विपुलं तमः।

माल्यवान् पुनराश्वस्तस्तस्थौ गिरिरिवाचलः॥१४॥

उससे माल्यवान् का कवच कट गया तथा वह गहरी मू में डूब गया; किंतु थोड़ी ही देर में पुनः सँभलकर माल्यवान् पर्वत की भाँति अविचलभाव से खड़ा हो गया॥

ततः कालायसं शूलं कण्टकैर्बहुभिश्चितम्।

प्रगृह्याभ्यहनन देवं स्तनयोरन्तरे दृढम्॥१५॥

तत्पश्चात् उसने काले लोहे के बने हुए और बहुसंख्यक काँटों से जड़े हुए शूल को हाथ में लेकर भगवान् की छाती में गहरा आघात किया॥ १५ ॥

तथैव रणरक्तस्तु मुष्टिना वासवानुजम्।

ताडयित्वा धनुर्मात्रमपक्रान्तो निशाचरः॥१६॥

इसी प्रकार वह युद्धप्रेमी राक्षस भगवान् विष्णुको मुक्के से मारकर एक धनुष पीछे हट गया॥१६॥

ततोऽम्बरे महान् शब्दः साधुसाध्विति चोत्थितः।

आहत्य राक्षसो विष्णुं गरुडं चाप्यताडयत्॥१७॥

उस समय आकाश में राक्षसों का महान् हर्षनाद गूंज उठा-वे एक साथ बोल उठे—’बहुत अच्छा, बहुत अच्छा’। भगवान् विष्णु को घुसा मारकर उस राक्षस ने गरुड़ पर भी प्रहार किया॥ १७॥

वैनतेयस्ततः क्रुद्धः पक्षवातेन राक्षसम्।

व्यपोहद् बलवान् वायुः शुष्कपर्णचयं यथा॥१८॥

यह देख विनतानन्दन गरुड़ कुपित हो उठे और उन्होंने अपने पंखों की हवा से उस राक्षस को उसी तरह उड़ा दिया, जैसे प्रबल आँधी सूखे पत्तों के ढेर को उड़ा देती है॥ १८॥

द्विजेन्द्रपक्षवातेन द्रावितं दृश्य पूर्वजम्।

सुमाली स्वबलैः सार्धं लङ्कामभिमुखो ययौ॥१९॥

अपने बड़े भाई को पक्षिराज के पंखों की हवा से उडा हुआ देख सुमाली अपने सैनिकों के साथ लङ्का की ओर चल दिया॥ १९॥

पक्षवातबलोद्धृतो माल्यवानपि राक्षसः।

स्वबलेन समागम्य ययौ लङ्कां ह्रिया वृतः॥२०॥

गरुड़ के पंखों की हवा के बल से उड़ा हुआ राक्षस माल्यवान् भी लज्जित होकर अपनी सेना से जा मिला और लङ्का की ओर चला गया॥ २० ॥

एवं ते राक्षसा राम हरिणा कमलेक्षण।

बहुशः संयुगे भग्ना हतप्रवरनायकाः॥२१॥

कमलनयन श्रीराम! इस प्रकार उन राक्षसों का भगवान् विष्णु के साथ अनेक बार युद्ध हुआ और प्रत्येक संग्राम में प्रधान-प्रधान नायकों के मारे जाने पर उन सबको भागना पड़ा॥ २१॥

अशक्नुवन्तस्ते विष्णुं प्रतियोद्धं बलार्दिताः।

त्यक्त्वा लङ्कां गता वस्तुं पातालं सहपत्नयः॥२२॥

वे किसी प्रकार भगवान् विष्णु का सामना नहीं कर सके। सदा ही उनके बल से पीड़ित होते रहे। अतः समस्त निशाचर लङ्का छोड़कर अपनी स्त्रियों के साथ पाताल में रहने के लिये चले गये॥ २२ ॥

सुमालिनं समासाद्य राक्षसं रघुसत्तम।

स्थिताः प्रख्यातवीर्यास्ते वंशे सालकटङ्कटे॥२३॥

रघश्रेष्ठ! वे विख्यात पराक्रमी निशाचर सालकटङ्कटवंश में विद्यमान राक्षस सुमाली का आश्रय लेकर रहने लगे॥

ये त्वया निहतास्ते तु पौलस्त्या नाम राक्षसाः।

समाली माल्यवान् माली ये च तेषां पुरःसराः।

सर्व एते महाभागा रावणाद् बलवत्तराः॥२४॥

श्रीराम! आपने पुलस्त्यवंश के जिन-जिन राक्षसों का विनाश किया है, उनकी अपेक्षा प्राचीन राक्षसों का पराक्रम अधिक था। सुमाली, माल्यवान् और माली तथा उनके आगे चलने वाले योद्धा—ये सभी महाभाग निशाचर रावण से बढ़कर बलवान् थे॥ २४ ॥

न चान्यो राक्षसान् हन्ता सुरारीन् देवकण्टकान्।

ऋते नारायणं देवं शङ्खचक्रगदाधरम्॥ २५॥

देवताओं के लिये कण्टकरूप उन देवद्रोही राक्षसों का वध शङ्ख, चक्र, गदाधारी भगवान् नारायणदेव के सिवा दूसरा कोई नहीं कर सकता। २५॥

भवान् नारायणो देवश्चतुर्बाहुः सनातनः।

राक्षसान् हन्तुमुत्पन्नो ह्यजय्यः प्रभुरव्ययः॥२६॥

आप चार भुजाधारी सनातन देव भगवान् नारायण ही हैं। आपको कोई परास्त नहीं कर सकता। आप अविनाशी प्रभु हैं और राक्षसों का वध करनेके लिये इस लोक में अवतीर्ण हुए हैं।॥ २६॥

नष्टधर्मव्यवस्थानां काले काले प्रजाकरः।

उत्पद्यते दस्युवधे शरणागतवत्सलः॥ २७॥

आप ही इन प्रजाओं के स्रष्टा हैं और शरणागतो पर दया रखते हैं। जब-जब धर्म की व्यवस्था को नष्ट करने वाले दस्यु पैदा हो जाते हैं, तब-तब उन दस्युओं का वध करने के लिये आप समय-समय पर अवतार लेते रहते हैं॥२७॥

एषा मया तव नराधिप राक्षसानामुत्पत्तिरद्य कथिता सकला यथावत्।

भूयो निबोध रघुसत्तम रावणस्य जन्मप्रभावमतुलं ससुतस्य सर्वम्॥ २८॥

नरेश्वर! इस प्रकार मैंने आपको राक्षसों की उत्पत्ति का यह पूरा प्रसंग ठीक-ठीक सुना दिया। रघुवंशशिरोमणे! अब आप रावण तथा उसके पुत्रों के जन्म और अनुपम प्रभाव का सारा वर्णन सुनिये॥ २८॥

चिरात् सुमाली व्यचरद् रसातलं स राक्षसो विष्णुभयार्दितस्तदा।

पुत्रैश्च पौत्रैश्च समन्वितो बली ततस्तु लङ्कामवसद् धनेश्वरः॥२९॥

भगवान् विष्णु के भय से पीड़ित होकर राक्षस सुमाली सुदीर्घ कालतक अपने पुत्र-पौत्रों के साथ रसातल में विचरता रहा। इसी बीच में धनाध्यक्ष कुबेर ने लङ्का को अपना निवास स्थान बनाया॥ २९॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डेऽष्टमः सर्गः॥८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें आठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥८॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
उत्तरकाण्डम्

रावण आदि का जन्म और उनका तप के लिये गोकर्ण-आश्रम में जाना

नवमः सर्गः

सर्ग-09


कस्यचित् त्वथ कालस्य सुमाली नाम राक्षसः।

रसातलान्मर्त्यलोकं सर्वं वै विचचार ह॥१॥

नीलजीमूतसंकाशस्तप्तकाञ्चनकुण्डलः।

कन्यां दुहितरं गृह्य विना पद्ममिव श्रियम्॥२॥

कुछ काल के पश्चात् नीले मेघ के समान श्याम वर्णवाला राक्षस सुमाली तपाये हुए सोने के कुण्डलों से अलंकृत हो अपनी सुन्दरी कन्या को, जो बिना कमल की लक्ष्मी के समान जान पड़ती थी, साथ ले रसातल से निकला और सारे मर्त्यलोक में विचरने लगा॥ १-२॥

राक्षसेन्द्रः स तु तदा विचरन् वै महीतले।

तदापश्यत् स गच्छन्तं पुष्पकेण धनेश्वरम्॥३॥

गच्छन्तं पितरं द्रष्टुं पुलस्त्यतनयं विभुम्।

तं दृष्ट्वामरसंकाशं गच्छन्तं पावकोपमम्॥४॥

रसातलं प्रविष्टः सन्मर्त्यलोकात् सविस्मयः।

उस समय भूतल पर विचरते हुए उस राक्षसराज ने अग्नि के समान तेजस्वी तथा देवतुल्य शोभा धारण करने वाले धनेश्वर कुबेर को देखा, जो पुष्पकविमान द्वारा अपने पिता पुलस्त्यनन्दन विश्रवा का दर्शन करने के लिये जा रहे थे। उन्हें देखकर वह अत्यन्त विस्मित हो मर्त्यलोक से रसातल में प्रविष्ट हुआ॥३-४ १/२॥

इत्येवं चिन्तयामास राक्षसानां महामतिः॥५॥

किं कृत्वा श्रेय इत्येवं वर्धेमहि कथं वयम्।

सुमाली बड़ा बुद्धिमान् था। वह सोचने लगा, क्या करने से हम राक्षसों का भला होगा? कैसे हमलोग उन्नति कर सकेंगे? ॥ ५ १/२॥

अथाब्रवीत् सुतां रक्षः कैकसीं नाम नामतः॥६॥

पुत्र प्रदानकालोऽयं यौवनं व्यतिवर्तते।

प्रत्याख्यानाच्च भीतैस्त्वं न वरैः प्रतिगृह्यसे॥७॥

ऐसा विचार करके उस राक्षस ने अपनी पुत्री से, जिसका नाम कैकसी था, कहा—’बेटी! अब तुम्हारे विवाह के योग्य समय आ गया है; क्योंकि इस समय तुम्हारी युवावस्था बीत रही है। तुम कहीं इनकार नकर दो, इसी भय से श्रेष्ठ वर तुम्हारा वरण नहीं कर रहे हैं॥ ६-७॥

त्वत्कृते च वयं सर्वे यन्त्रिता धर्मबुद्धयः।

त्वं हि सर्वगुणोपेता श्रीः साक्षादिव पुत्रिके॥८॥

‘पुत्री! तुम्हें विशिष्ट वर की प्राप्ति हो, इसके लिये हमलोगों ने बहुत प्रयास किया है; क्योंकि कन्यादान के विषय में हम धर्मबुद्धि रखने वाले हैं। तुम तो साक्षात् लक्ष्मी के समान सर्वगुणसम्पन्न हो (अतः तुम्हारा वर भी सर्वथा तुम्हारे योग्य ही होना चाहिये) ॥ ८॥

कन्यापितृत्वं दुःखं हि सर्वेषां मानकांक्षिणाम्।

न ज्ञायते च कः कन्यां वरयेदिति कन्यके॥९॥

‘बेटी! सम्मान की इच्छा रखने वाले सभी लोगों के लिये कन्या का पिता होना दुःखका ही कारण होता है; क्योंकि यह पता नहीं चलता कि कौन और कैसा पुरुष कन्या का वरण करेगा? ॥९॥

मातुः कुलं पितृकुलं यत्र चैव च दीयते।

कुलत्रयं सदा कन्या संशये स्थाप्य तिष्ठति॥१०॥

‘माता के, पिता के और जहाँ कन्या दी जाती है,उस पति के कुल को भी कन्या सदा संशय में डाले रहती है।

सा त्वं मुनिवरं श्रेष्ठं प्रजापतिकुलोद्भवम्।

भज विश्रवसं पुत्रि पौलस्त्यं वरय स्वयम्॥११॥

‘अतः बेटी ! तुम प्रजापति के कुल में उत्पन्न, श्रेष्ठ गुणसम्पन्न, पुलस्त्यनन्दन मुनिवर विश्रवा का स्वयं चलकर पति के रूप में वरण करो और उनकी सेवा में रहो॥११॥

ईदृशास्ते भविष्यन्ति पुत्राः पुत्रि न संशयः।

तेजसा भास्करसमो तादृशोऽयं धनेश्वरः॥१२॥

‘पुत्री! ऐसा करने से निःसंदेह तुम्हारे पुत्र भी ऐसे ही होंगे, जैसे ये धनेश्वर कुबेर हैं। तुमने तो देखा ही था; वे कैसे अपने तेज से सूर्य के समान उद्दीप्त हो रहे थे?’ ॥ १२॥

सा तु तद् वचनं श्रुत्वा कन्यका पितृगौरवात्।

तत्र गत्वा च सा तस्थौ विश्रवा यत्र तप्यते॥१३॥

पिता की यह बात सुनकर उनके गौरव का खयाल करके कैकसी उस स्थान पर गयी, जहाँ मुनिवर विश्रवा तप करते थे। वहाँ जाकर वह एक जगह खड़ी हो गयी॥१३॥

एतस्मिन्नन्तरे राम पुलस्त्यतनयो द्विजः।

अग्निहोत्रमुपातिष्ठच्चतुर्थ इव पावकः॥१४॥

श्रीराम! इसी बीच में पुलस्त्यनन्दन ब्राह्मण विश्रवा सायंकाल का अग्निहोत्र करने लगे। वे तेजस्वी मुनि उस समय तीन अग्नियों के साथ स्वयं भी चतुर्थ अग्नि के समान देदीप्यमान हो रहे थे॥१४॥

अविचिन्त्य तु तां वेलां दारुणां पितृगौरवात्।

उपसृत्याग्रतस्तस्य चरणाधोमुखी स्थिता॥१५॥

पिता के प्रति गौरवबुद्धि होने के कारण कैकसी ने उस भयंकर वेला का विचार नहीं किया और निकट जा उनके चरणों पर दृष्टि लगाये नीचा मुँह किये वह सामने खड़ी हो गयी॥ १५ ॥

विलिखन्ती मुहुर्भूमिमङ्गष्ठाग्रेण भामिनी।

स तु तां वीक्ष्य सुश्रोणी पूर्णचन्द्रनिभाननाम्॥१६॥

अब्रवीत् परमोदारो दीप्यमानां स्वतेजसा।

वह भामिनी अपने पैर के अँगूठे से बारम्बार धरती पर रेखा खींचने लगी। पूर्ण चन्द्रमा के समान मुख तथा सुन्दर कटिप्रदेशवाली उस सुन्दरी को जो अपने तेज से उद्दीप्त हो रही थी, देखकर उन परम उदार महर्षि ने पूछा— ॥ १६ १/२॥

भद्रे कस्यासि दुहिता कुतो वा त्वमिहागता॥१७॥

किं कार्यं कस्य वा हेतोस्तत्त्वतो ब्रूहि शोभने॥१८॥

‘भद्रे! तुम किसकी कन्या हो, कहाँ से यहाँ आयी हो, मुझसे तुम्हारा क्या काम है अथवा किस उद्देश्य से यहाँ तुम्हारा आना हुआ है? शोभने! ये सब बातें मुझे ठीक-ठीक बताओ’ ॥ १७-१८॥

एवमुक्ता तु सा कन्या कृताञ्जलिरथाब्रवीत्।

आत्मप्रभावेण मुने ज्ञातुमर्हसि मे मतम्॥१९॥

किं तु मां विद्धि ब्रह्मर्षे शासनात् पितुरागताम्।

कैकसी नाम नाम्नाहं शेषं त्वं ज्ञातुमर्हसि ॥२०॥

विश्रवा के इस प्रकार पूछने पर उस कन्या ने हाथ जोड़कर कहा—’मुने! आप अपने ही प्रभाव से मेरे मनोभाव को समझ सकते हैं; किंतु ब्रह्मर्षे! मेरे मुख से इतना अवश्य जान लें कि मैं अपने पिता की आज्ञा से आपकी सेवा में आयी हूँ और मेरा नाम कैकसी है।बाकी सब बातें आपको स्वतः जान लेनी चाहिये (मुझसे न कहलावें)’॥ १९-२०॥

स तु गत्वा मुनिर्व्यानं वाक्यमेतदुवाच ह।

विज्ञातं ते मया भद्रे कारणं यन्मनोगतम्॥२१॥

सुताभिलाषो मत्तस्ते मत्तमातङ्गगामिनि।

दारुणायां तु वेलायां यस्मात् त्वं मामुपस्थिता॥२२॥

शृणु तस्मात् सुतान् भद्रे यादृशाञ्जनयिष्यसि।

दारुणान् दारुणाकारान् दारुणाभिजनप्रियान्॥२३॥

प्रसविष्यसि सुश्रोणि राक्षसान् क्रूरकर्मणः।

यह सुनकर मुनि ने थोड़ी देर तक ध्यान लगाया और उसके बाद कहा—’भद्रे! तुम्हारे मन का भाव मालूम हुआ। मतवाले गजराज की भाँति मन्दगति से चलने वाली सुन्दरी! तुम मुझसे पुत्र प्राप्त करना चाहती हो; परंतु इस दारुण वेला में मेरे पास आयी हो, इसलिये यह भी सुन लो कि तुम कैसे पुत्रों को जन्म दोगी। सुश्रोणि! तुम्हारे पुत्र क्रूर स्वभाव वाले और शरीर से भी भयंकर होंगे तथा उनका क्रूरकर्मा राक्षसों के साथ ही प्रेम होगा। तुम क्रूरतापूर्ण कर्म करने वाले राक्षसों को ही पैदा करोगी’॥ २१–२३ १/२॥

सा तु तद्वचनं श्रुत्वा प्रणिपत्याब्रवीद् वचः॥२४॥

भगवन्नीदृशान् पुत्रांस्त्वत्तोऽहं ब्रह्मवादिनः।

नेच्छामि सुदुराचारान् प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥२५॥

मुनि का यह वचन सुनकर कैकसी उनके चरणों पर गिर पड़ी और इस प्रकार बोली-भगवन्! आप ब्रह्मवादी महात्मा हैं। मैं आपसे ऐसे दुराचारी पुत्रों को पाने की अभिलाषा नहीं रखती; अतः आप मुझ पर कृपा कीजिये’ ॥ २४-२५॥

कन्यया त्वेवमुक्तस्तु विश्रवा मुनिपुङ्गवः।

उवाच कैकसीं भूयः पूर्णेन्दुरिव रोहिणीम्॥२६॥

उस राक्षसकन्या के इस प्रकार कहने पर पूर्णचन्द्रमा के समान मुनिवर विश्रवा रोहिणी-जैसे सुन्दरी कैकसी से फिर बोले- ॥२६॥

पश्चिमो यस्तव सुतो भविष्यति शुभानने।

मम वंशानुरूपः स धर्मात्मा च न संशयः॥२७॥

‘शुभानने ! तुम्हारा जो सबसे छोटा एवं अन्तिम पुत्र होगा, वह मेरे वंश के अनुरूप धर्मात्मा होगा। इसमें संशय नहीं है’ ॥२७॥

एवमुक्ता तु सा कन्या राम कालेन केनचित्।

जनयामास बीभत्सं रक्षोरूपं सुदारुणम्॥२८॥

दशग्रीवं महादंष्ट्र नीलाञ्जनचयोपमम्।

ताम्रोष्ठं विंशतिभुजं महास्यं दीप्तमूर्धजम्॥२९॥

श्रीराम! मुनि के ऐसा कहने पर कैकसी ने कुछ काल के अनन्तर अत्यन्त भयानक और क्रूर स्वभाव वाले एक राक्षस को जन्म दिया, जिसके दस मस्तक, बड़ी-बड़ी दाढ़ें, ताँबे-जैसे ओठ, बीस भुजाएँ, विशाल मुख और चमकीले केश थे। उसके शरीर का रंग कोयले के पहाड़-जैसा काला था। २८—९॥

तस्मिञ्जाते ततस्तस्मिन् सज्वालकवलाः शिवाः।

क्रव्यादाश्चापसव्यानि मण्डलानि प्रचक्रमुः॥३०॥

उसके पैदा होते ही मुँह में अङ्गारों के कौर लिये गीदड़ियाँ और मांसभक्षी गृध्र आदि पक्षी दायीं ओर मण्डलाकार घूमने लगे॥ ३० ॥

ववर्ष रुधिरं देवो मेघाश्च खरनिःस्वनाः।

प्रबभौ न च सूर्यो वै महोल्काश्चापतन् भुवि॥३१॥

चकम्पे जगती चैव ववुर्वाताः सुदारुणाः।

अक्षोभ्यः क्षुभितश्चैव समुद्रः सरितां पतिः॥३२॥

इन्द्रदेव रुधिर की वर्षा करने लगे, मेघ भयंकर स्वर में गर्जने लगे, सूर्य की प्रभा फीकी पड़ गयी, पृथ्वी पर उल्कापात होने लगा, धरती काँप उठी, भयानक आँधी चलने लगी तथा जो किसी के द्वारा क्षुब्ध नहीं किया जा सकता, वह सरिताओं का स्वामी समुद्र विक्षुब्ध हो उठा॥ ३१-३२॥

अथ नामाकरोत् तस्य पितामहसमः पिता।

दशग्रीवः प्रसूतोऽयं दशग्रीवो भविष्यति॥३३॥

उस समय ब्रह्माजी के समान तेजस्वी पिता विश्रवा मुनि ने पुत्र का नामकरण किया—’यह दस ग्रीवाएँ लेकर उत्पन्न हुआ है, इसलिये ‘दशग्रीव’ नाम से प्रसिद्ध होगा’॥

तस्य त्वनन्तरं जातः कुम्भकर्णो महाबलः।

प्रमाणाद् यस्य विपुलं प्रमाणं नेह विद्यते॥३४॥

उसके बाद महाबली कुम्भकर्ण का जन्म हुआ, जिसके शरीर से बड़ा शरीर इस जगत् में दूसरे किसी का नहीं है॥३४॥

ततः शूर्पणखा नाम संजज्ञे विकृतानना।

विभीषणश्च धर्मात्मा कैकस्याः पश्चिमः सुतः॥३५॥

इसके बाद विकराल मुखवाली शूर्पणखा उत्पन्न हुई। तदनन्तर धर्मात्मा विभीषण का जन्म हुआ, जो कैकसी के अन्तिम पुत्र थे॥ ३५ ॥

तस्मिन् जाते महासत्त्वे पुष्पवर्षं पपात ह।

नभःस्थाने दुन्दुभयो देवानां प्राणदंस्तथा।

वाक्यं चैवान्तरिक्षे च साधु साध्विति तत् तदा॥३६॥

उस महान् सत्त्वशाली पुत्र का जन्म होने पर आकाश से फूलों की वर्षा हुई और आकाश में देवों की दुन्दुभियाँ बज उठीं। उस समय अन्तरिक्ष में ‘साधुसाधु’ की ध्वनि सुनायी देने लगी॥३६॥

तौ तु तत्र महारण्ये ववृधाते महौजसौ।

कुम्भकर्णदशग्रीवौ लोकोद्वेगकरौ तदा॥३७॥

कुम्भकर्ण और दशग्रीव वे दोनों महाबली राक्षस लोक में उद्वेग पैदा करनेवाले थे। वे दोनों ही उस विशाल वन में पालित होने और बढ़ने लगे॥ ३७॥

कुम्भकर्णः प्रमत्तस्तु महर्षीन् धर्मवत्सलान्।

त्रैलोक्ये नित्यासंतुष्टो भक्षयन् विचचार ह॥३८॥

कुम्भकर्ण बड़ा ही उन्मत्त निकला। वह भोजन से कभी तृप्त ही नहीं होता था; अतः तीनों लोकों में घूमघूमकर धर्मात्मा महर्षियों को खाता फिरता था॥ ३८ ॥

विभीषणस्तु धर्मात्मा नित्यं धर्मव्यवस्थितः।

स्वाध्यायनियताहार उवास विजितेन्द्रियः॥३९॥

विभीषण बचपन से ही धर्मात्मा थे। वे सदा धर्म में स्थित रहते, स्वाध्याय करते और नियमित आहार करते हुए इन्द्रियों को अपने काबू में रखते थे॥ ३९॥

अथ वैश्रवणो देवस्तत्र कालेन केनचित्।

आगतः पितरं द्रष्टुं पुष्पकेण धनेश्वरः॥४०॥

कुछ काल बीतने पर धन के स्वामी वैश्रवण पुष्पकविमान पर आरूढ़ हो अपने पिता का दर्शन करने के लिये वहाँ आये॥ ४०॥

तं दृष्ट्वा कैकसी तत्र ज्वलन्तमिव तेजसा।

आगम्य राक्षसी तत्र दशग्रीवमुवाच ह॥४१॥

वे अपने तेज से प्रकाशित हो रहे थे। उन्हें देखकर राक्षसकन्या कैकसी अपने पुत्र दशग्रीव के पास आयी और इस प्रकार बोली- ॥४१॥

पुत्र वैश्रवणं पश्य भ्रातरं तेजसा वृतम्।

भ्रातृभावे समे चापि पश्यात्मानं त्वमीदृशम्॥४२॥

‘बेटा! अपने भाई वैश्रवण की ओर तो देखो। वे कैसे तेजस्वी जान पड़ते हैं? भाई होने के नाते तुम भी इन्हीं के समान हो। परंतु अपनी अवस्था देखो, कैसी है? ॥ ४२॥

दशग्रीव यथा यत्नं कुरुष्वामितविक्रम।

यथा त्वमपि मे पुत्र भवेर्वैश्रवणोपमः॥४३॥

‘अमित पराक्रमी दशग्रीव! मेरे बेटे! तुम भी ऐसा कोई यत्न करो, जिससे वैश्रवण की ही भाँति तेज और वैभव से सम्पन्न हो जाओ’ ॥४३॥

मातुस्तद् वचनं श्रुत्वा दशग्रीवः प्रतापवान्।

अमर्षमतुलं लेभे प्रतिज्ञां चाकरोत् तदा॥४४॥

माता की यह बात सुनकर प्रतापी दशग्रीव को अनुपम अमर्ष हुआ। उसने तत्काल प्रतिज्ञा की—॥ ४४॥

सत्यं ते प्रतिजानामि भ्रातृतुल्योऽधिकोऽपि वा।

भविष्याम्योजसा चैव संतापं त्यज हृद्गतम्॥४५॥

‘माँ! तुम अपने हृदय की चिन्ता छोड़ो। मैं तुमसे सच्ची प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ कि अपने पराक्रम से भाई वैश्रवण के समान या उनसे भी बढ़कर हो जाऊँगा’ ॥ ४५ ॥

ततः क्रोधेन तेनैव दशग्रीवः सहानुजः।

चिकीर्षुर्दुष्करं कर्म तपसे धृतमानसः॥४६॥

प्राप्स्यामि तपसा काममिति कृत्वाध्यवस्य च।

आगच्छदात्मसिद्ध्यर्थं गोकर्णस्याश्रमं शुभम्॥४७॥

तदनन्तर उसी क्रोध के आवेश में भाइयोंसहित दशग्रीव ने दुष्कर कर्म की इच्छा मन में लेकर सोचा —’मैं तपस्या से ही अपना मनोरथ पूर्ण कर सकूँगा, ऐसा विचारकर उसने मन में तपस्या का ही निश्चय किया और अपनी अभीष्ट-सिद्धि के लिये वह गोकर्ण के पवित्र आश्रम पर गया॥ ४६-४७॥

स राक्षसस्तत्र सहानुजस्तदा तपश्चचारातुलमुग्रविक्रमः।

अतोषयच्चापि पितामहं विभुं ददौ स तुष्टश्च वराञ्जयावहान्॥४८॥

भाइयोंसहित उस भयंकर पराक्रमी राक्षस ने अनुपम तपस्या आरम्भ की। उस तपस्या द्वारा उसने भगवान् ब्रह्माजी को संतुष्ट किया और उन्होंने प्रसन्न होकर उसे विजय दिलाने वाले वरदान दिये॥४८॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे नवमः सर्गः॥९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्ड में नवाँ सर्ग पूरा हुआ॥९॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
उत्तरकाण्डम्

 रावण आदि की तपस्या और वर प्राप्ति

दशमः सर्गः

सर्ग-10


अथाब्रवीन्मुनिं रामः कथं ते भ्रातरो वने।

कीदृशं तु तदा ब्रह्मस्तपस्तेपुर्महाबलाः॥१॥

इतनी कथा सुनकर श्रीरामचन्द्रजी ने अगस्त्य मुनि से पूछा-‘ब्रह्मन्! उन तीनों महाबली भाइयों ने वन में किस प्रकार और कैसी तपस्या की?’॥१॥

अगस्त्यस्त्वब्रवीत् तत्र रामं सुप्रीतमानसम्।

तांस्तान् धर्मविधींस्तत्र भ्रातरस्ते समाविशन्॥२॥

तब अगस्त्यजी ने अत्यन्त प्रसन्नचित्तवाले श्रीराम से कहा—’रघुनन्दन! उन तीनों भाइयों ने वहाँ पृथक्पृथक् धर्मविधियों का अनुष्ठान किया॥२॥

कुम्भकर्णस्ततो यत्तो नित्यं धर्मपथे स्थितः।

तताप ग्रीष्मकाले तु पञ्चाग्नीन् परितः स्थितः॥३॥

‘कुम्भकर्ण अपनी इन्द्रियों को संयम में रखकर प्रतिदिन धर्म के मार्ग में स्थित हो गर्मी के दिनों में अपने चारों ओर आग जला धूप में बैठकर पञ्चाग्नि का सेवन करने लगा॥३॥

मेघाम्बुसिक्तो वर्षासु वीरासनमसेवत।

नित्यं च शिशिरे काले जलमध्यप्रतिश्रयः॥४॥

‘फिर वर्षा-ऋतु में खुले मैदान में वीरासन से बैठकर मेघों के बरसाये हुए जल से भीगता रहा और जाड़े के दिनों में प्रतिदिन जल के भीतर रहने लगा॥४॥

एवं वर्षसहस्राणि दश तस्यापचक्रमुः।

धर्मे प्रयतमानस्य सत्पथे निष्ठितस्य च॥५॥

‘इस प्रकार सन्मार्ग में स्थित हो धर्म के लिये प्रयत्नशील हुए उस कुम्भकर्ण के दस हजार वर्ष बीत गये॥५॥

विभीषणस्तु धर्मात्मा नित्यं धर्मपरः शुचिः।

पञ्चवर्षसहस्राणि पादेनैकेन तस्थिवान्॥६॥

‘विभीषण तो सदा से ही धर्मात्मा थे। वे नित्य धर्मपरायण रहकर शुद्ध आचार-विचार का पालन करते हुए पाँच हजार वर्षांतक एक पैर से खड़े रहे। ६॥

समाप्ते नियमे तस्य ननृतुश्चाप्सरोगणाः।

पपात पुष्पवर्षं च तुष्टवुश्चापि देवताः॥७॥

‘उनका नियम समाप्त होने पर अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। उनके ऊपर आकाश से फूलों की वर्षा हुई और देवताओं ने उनकी स्तुति की॥७॥

पञ्चवर्षसहस्राणि सूर्यं चैवान्ववर्तत।

तस्थौ चोर्ध्वशिरोबाहुः स्वाध्याये धृतमानसः॥८॥

‘तदनन्तर विभीषण ने अपनी दोनों बाँहें और मस्तक ऊपर उठाकर स्वाध्यायपरायण हो पाँच हजार वर्षांतक सूर्यदेव की आराधना की॥८॥

एवं विभीषणस्यापि स्वर्गस्थस्येव नन्दने।

दशवर्षसहस्राणि गतानि नियतात्मनः॥९॥

‘इस प्रकार मन को वश में रखने वाले विभीषण के भी दस हजार वर्ष बड़े सुख से बीते, मानो वे स्वर्ग के नन्दनवन में निवास करते हों॥९॥

दशवर्षसहस्रं तु निराहारो दशाननः।

पूर्णे वर्षसहस्रे तु शिरश्चाग्नौ जुहाव सः॥१०॥

‘दशमुख रावण ने दस हजार वर्षांतक लगातार उपवास किया। प्रत्येक सहस्र वर्ष के पूर्ण होने पर वह अपना एक मस्तक काटकर आग में होम देता था। १०॥

एवं वर्षसहस्राणि नव तस्यातिचक्रमुः।

शिरांसि नव चाप्यस्य प्रविष्टानि हुताशनम्॥११॥

‘इस तरह एक-एक करके उसके नौ हजार वर्ष बीत गये और नौ मस्तक भी अग्निदेव को भेंट हो गये॥

अथ वर्षसहस्रे तु दशमे दशमं शिरः।

छेत्तुकामे दशग्रीवे प्राप्तस्तत्र पितामहः॥१२॥

‘जब दसवाँ सहस्र पूरा हुआ और दशग्रीव अपना दसवाँ मस्तक काटने को उद्यत हुआ, इसी समय पितामह ब्रह्माजी वहाँ आ पहुँचे॥ १२॥

पितामहस्तु सुप्रीतः सार्धं देवैरुपस्थितः।

तव तावद् दशग्रीव प्रीतोऽस्मीत्यभ्यभाषत।१३॥

‘पितामह ब्रह्मा अत्यन्त प्रसन्न होकर देवताओं के साथ वहाँ पहुँचे थे। उन्होंने आते ही कहा–दशग्रीव! मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूँ॥१३॥

शीघ्रं वरय धर्मज्ञ वरो यस्तेऽभिकांक्षितः।

कं ते कामं करोम्यद्य न वृथा ते परिश्रमः॥१४॥

‘धर्मज्ञ! तुम्हारे मन में जिस वर को पाने की इच्छा हो, उसे शीघ्र माँगो। बोलो, आज मैं तुम्हारी किस अभिलाषा को पूर्ण करूँ? तुम्हारा परिश्रम व्यर्थ नहीं होना चाहिये’॥ १४॥

अथाब्रवीद् दशग्रीवः प्रहृष्टेनान्तरात्मना।

प्रणम्य शिरसा देवं हर्षगद्गदया गिरा॥१५॥

यह सुनकर दशग्रीव की अन्तरात्मा प्रसन्न हो गयी। उसने मस्तक झुकाकर भगवान् ब्रह्मा को प्रणाम किया और हर्ष-गद्गदवाणी में कहा— ॥ १५ ॥

भगवन् प्राणिनां नित्यं नान्यत्र मरणाद् भयम्।

नास्ति मृत्युसमः शत्रुरमरत्वमहं वृणे॥१६॥

‘भगवन्! प्राणियों के लिये मृत्यु के सिवा और किसी का सदा भय नहीं रहता है; अतएव मैं अमर होना चाहता हूँ; क्योंकि मृत्यु के समान दूसरा कोई शत्रु नहीं है’।

एवमुक्तस्तदा ब्रह्मा दशग्रीवमुवाच ह।

नास्ति सर्वामरत्वं ते वरमन्यं वृणीष्व मे॥१७॥

‘उसके ऐसा कहने पर ब्रह्माजी ने दशग्रीव से कहा —’तुम्हें सर्वथा अमरत्व नहीं मिल सकता; इसलिये दूसरा कोई वर माँगो’ ॥ १७॥

एवमुक्ते तदा राम ब्रह्मणा लोककर्तृणा।

दशग्रीव उवाचेदं कृताञ्जलिरथाग्रतः॥१८॥

‘श्रीराम! लोकस्रष्टा ब्रह्माजी के ऐसा कहने पर दशग्रीव ने उनके सामने हाथ जोड़कर कहा- ॥ १८॥

सुपर्णनागयक्षाणां दैत्यदानवरक्षसाम्।

अवध्योऽहं प्रजाध्यक्ष देवतानां च शाश्वत॥१९॥

‘सनातन प्रजापते! मैं गरुड़, नाग, यक्ष, दैत्य, दानव, राक्षस तथा देवताओं के लिये अवध्य हो जाऊँ॥ १९॥

नहि चिन्ता ममान्येषु प्राणिष्वमरपूजित।

तृणभूता हि ते मन्ये प्राणिनो मानुषादयः॥२०॥

‘देववन्द्य पितामह ! अन्य प्राणियों से मुझे तनिक भी चिन्ता नहीं है। मनुष्य आदि अन्य जीवों को तो मैं तिनके के समान समझता हूँ’॥२०॥

एवमुक्तस्तु धर्मात्मा दशग्रीवेण रक्षसा।

उवाच वचनं देवः सह देवैः पितामहः॥२१॥

राक्षस दशग्रीव के ऐसा कहने पर देवताओंसहित भगवान् ब्रह्माजी ने कहा- ॥२१॥

भविष्यत्येवमेतत् ते वचो राक्षसपुङ्गव।

एवमुक्त्वा तु तं राम दशग्रीवं पितामहः॥ २२॥

राक्षसप्रवर! तुम्हारा यह वचन सत्य होगा’ श्रीराम! दशग्रीव से ऐसा कहकर पितामह फिर बोले – ॥२२॥

शृणु चापि वरो भूयः प्रीतस्येह शुभो मम।

हुतानि यानि शीर्षाणि पूर्वमग्नौ त्वयानघ॥ २३॥

पुनस्तानि भविष्यन्ति तथैव तव राक्षस।

वितरामीह ते सौम्य वरं चान्यं दुरासदम्॥२४॥

छन्दतस्तव रूपं च मनसा यद् यथेप्सितम्।

‘निष्पाप राक्षस! सुनो—मैं प्रसन्न होकर पुनः तुम्हें यह शुभ वर प्रदान करता हूँ तुमने पहले अग्नि में अपने जिन-जिन मस्तकों का हवन किया है, वे सब तुम्हारे लिये फिर पूर्ववत् प्रकट हो जायँगे। सौम्य! इसके सिवा एक और भी दुर्लभ वर मैं तुम्हें यहाँ दे रहा हूँ-तुम अपने मन से जब जैसा रूप धारण करना चाहोगे, तुम्हारी इच्छा के अनुसार उस समय तुम्हारा वैसा ही रूप हो जायगा’॥ २३-२४ १/२॥

एवं पितामहोक्तस्य दशग्रीवस्य रक्षसः॥२५॥

अग्नौ हुतानि शीर्षाणि पुनस्तान्युत्थितानि वै।

‘पितामह ब्रह्मा के इतना कहते ही राक्षस दशग्रीव के वे मस्तक, जो पहले आग में होम दिये गये थे, फिर नये रूप में प्रकट हो गये॥ २५ १/२॥

एवमुक्त्वा तु तं राम दशग्रीवं पितामहः॥२६॥

विभीषणमथोवाच वाक्यं लोकपितामहः।

‘श्रीराम! दशग्रीव से पूर्वोक्त बात कहकर लोकपितामह ब्रह्माजी विभीषण से बोले- ॥ २६ १/२॥

विभीषण त्वया वत्स धर्मसंहितबुद्धिना॥२७॥

परितुष्टोऽस्मि धर्मात्मन् वरं वरय सुव्रत।

‘बेटा विभीषण! तुम्हारी बुद्धि सदा धर्म में लगी रहने वाली है, अतः मैं तुमसे बहुत संतुष्ट हूँ। उत्तम व्रत का पालन करने वाले धर्मात्मन्! तुम भी अपनी रुचि के अनुसार कोई वर माँगो’ ॥ २७ १/२ ॥

विभीषणस्तु धर्मात्मा वचनं प्राह साञ्जलिः॥२८॥

वृतः सर्वगुणैर्नित्यं चन्द्रमा रश्मिभिर्यथा।

भगवन् कृतकृत्योऽहं यन्मे लोकगुरुः स्वयम्॥२९॥

प्रीतेन यदि दातव्यो वरो मे शृणु सुव्रत।

‘तब किरणमालामण्डित चन्द्रमा की भाँति सदा समस्त गुणों से सम्पन्न धर्मात्मा विभीषण ने हाथ जोड़कर कहा—’भगवन्! यदि साक्षात् लोकगुरु आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मैं कृतार्थ हूँ। मुझे कुछ भी पाना शेष नहीं रहा। उत्तम व्रत को धारण करने वाले पितामह! यदि आप प्रसन्न होकर मुझे वर देना ही चाहते हैं तो सुनिये॥

परमापद्गगतस्यापि धर्मे मम मतिर्भवेत्॥३०॥

अशिक्षितं च ब्रह्मास्त्रं भगवन् प्रतिभातु मे।

‘भगवन् ! बड़ी-से-बड़ी आपत्ति में पड़ने पर भी मेरी बुद्धि धर्म में ही लगी रहे—उससे विचलित न हो और बिना सीखे ही मुझे ब्रह्मास्त्र का ज्ञान हो जाय॥

या या मे जायते बुद्धिर्येषु येष्वाश्रमेषु च॥३१॥

सा सा भवतु धर्मिष्ठा तं तं धर्मं च पालये।

एष मे परमोदारो वरः परमको मतः॥३२॥

‘जिस-जिस आश्रम के विषय में मेरा जो-जो विचार हो, वह धर्म के अनुकूल ही हो और उस-उस धर्म का मैं पालन करूँ; यही मेरे लिये सबसे उत्तम और अभीष्ट वरदान है॥ ३१-३२॥

नहि धर्माभिरक्तानां लोके किंचन दुर्लभम्।

पुनः प्रजापतिः प्रीतो विभीषणमुवाच ह॥३३॥

‘क्योंकि जो धर्म में अनुरक्त हैं, उनके लिये कुछ भी दुर्लभ नहीं है’ यह सुनकर प्रजापति ब्रह्मा पुनः प्रसन्न हो विभीषण से बोले— ॥३३॥

धर्मिष्ठस्त्वं यथा वत्स तथा चैतद् भविष्यति।

यस्माद् राक्षसयोनौ ते जातस्यामित्रनाशन॥३४॥

नाधर्मे जायते बुद्धिरमरत्वं ददामि ते।

‘वत्स! तुम धर्म में स्थित रहने वाले हो; अतः जो कुछ चाहते हो, वह सब पूर्ण होगा। शत्रुनाशन ! राक्षसयोनि में उत्पन्न होकर भी तुम्हारी बुद्धि अधर्म में नहीं लगती है; इसलिये मैं तुम्हें अमरत्व प्रदान करता हूँ॥३४ १/२॥

इत्युक्त्वा कुम्भकर्णाय वरं दातुमवस्थितम्॥३५॥

प्रजापतिं सुराः सर्वे वाक्यं प्राञ्जलयोऽब्रुवन्।

‘विभीषण से ऐसा कहकर जब ब्रह्माजी कुम्भकर्ण को वर देने के लिये उद्यत हुए, तब सब देवता उनसे हाथ जोड़कर बोले— ॥३५ १/२ ॥

न तावत् कुम्भकर्णाय प्रदातव्यो वरस्त्वया॥३६॥

जानीषे हि यथा लोकांस्त्रासयत्येष दुर्मतिः।

‘प्रभो! आप कुम्भकर्ण को वरदान न दीजिये; क्योंकि आप जानते हैं कि यह दुर्बुद्धि निशाचर किस तरह समस्त लोकों को त्रास देता है। ३६ १/२॥

नन्दनेऽप्सरसः सप्त महेन्द्रानुचरा दश॥ ३७॥

अनेन भक्षिता ब्रह्मन्नृषयो मानुषास्तथा।

‘ब्रह्मन्! इसने नन्दनवन की सात अप्सराओं, देवराज इन्द्र के दस अनुचरों तथा बहुत-से ऋषियों और मनुष्यों को भी खा लिया है॥ ३७ १/२॥

अलब्धवरपूर्वेण यत् कृतं राक्षसेन तु॥ ३८॥

यद्येष वरलब्धः स्याद् भक्षयेद् भुवनत्रयम्।

‘पहले वर न पाने पर भी इस राक्षस ने जब इस प्रकार प्राणियों के भक्षण का क्रूरतापूर्ण कर्म कर डाला है, तब यदि इसे वर प्राप्त हो जाय, उस दशा में तो यह तीनों लोकों को खा जायगा॥ ३८ १/२॥

वरव्याजेन मोहोऽस्मै दीयताममितप्रभ॥३९॥

लोकानां स्वस्ति चैवं स्याद् भवेदस्य च सम्मतिः।

‘अमिततेजस्वी देव! आप वर के बहाने इसको मोह प्रदान कीजिये। इससे समस्त लोकों का कल्याण होगा और इसका भी सम्मान हो जायगा’॥ ३९ १/२॥

एवमुक्तः सुरैर्ब्रह्माचिन्तयत् पद्मसम्भवः॥४०॥

चिन्तिता चोपतस्थेऽस्य पाश्र्वं देवी सरस्वती।

‘देवताओं के ऐसा कहने पर कमलयोनि ब्रह्माजी ने सरस्वती का स्मरण किया। उनके चिन्तन करते ही देवी सरस्वती पास आ गयीं॥ ४० १/२॥

प्राञ्जलिः सा तु पार्श्वस्था प्राह वाक्यं सरस्वती॥४१॥

इयमस्म्यागता देव किं कार्यं करवाण्यहम्।

उनके पार्श्वभाग में खड़ी हो सरस्वती ने हाथ जोड़कर कहा—’देव! यह मैं आ गयी। मेरे लिये क्या आज्ञा है? मैं कौन-सा कार्य करूँ?’॥ ४१ १/२॥

प्रजापतिस्तु तां प्राप्तां प्राह वाक्यं सरस्वतीम्॥४२॥

वाणि त्वं राक्षसेन्द्रस्य भव वाग्देवतेप्सिता।

‘तब प्रजापति ने वहाँ आयी हुई सरस्वतीदेवी से कहा—’वाणि! तुम राक्षसराज कुम्भकर्ण की जिह्वा पर विराजमान हो देवताओं के अनुकूल वाणी के रूप में प्रकट होओ’॥

तथेत्युक्त्वा प्रविष्टा सा प्रजापतिरथाब्रवीत्॥४३॥

कुम्भकर्ण महाबाहो वरं वरय यो मतः।

‘तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर सरस्वती कुम्भकर्ण के मुख में समा गयीं। इसके बाद प्रजापति ने उस राक्षस से कहा—’महाबाहु कुम्भकर्ण! तुम भी अपने मन के अनुकूल कोई वर माँगो’॥ ४३ १/२॥

कुम्भकर्णस्तु तदाक्यं श्रुत्वा वचनमब्रवीत्॥४४॥

स्वप्तुं वर्षाण्यनेकानि देवदेव ममेप्सितम्।

एवमस्त्विति तं चोक्त्वा प्रायाद् ब्रह्मा सुरैःसमम्॥४५॥

‘उनकी बात सुनकर कुम्भकर्ण बोला—’देवदेव! मैं अनेकानेक वर्षां तक सोता रहूँ। यही मेरी इच्छा है।’ तब ‘एवमस्तु (ऐसा ही हो)’ कहकर ब्रह्माजी देवताओं के साथ चले गये॥ ४४-४५॥

देवी सरस्वती चैव राक्षसं तं जहौ पुनः।

ब्रह्मणा सह देवेषु गतेषु च नभःस्थलम्॥४६॥

विमुक्तोऽसौ सरस्वत्या स्वां संज्ञां च ततो गतः।

कुम्भकर्णस्तु दुष्टात्मा चिन्तयामास दुःखितः॥४७॥

‘फिर सरस्वतीदेवी ने भी उस राक्षस को छोड़ दिया। ब्रह्माजी के साथ देवताओं के आकाश में चले जाने पर जब सरस्वतीजी उसके ऊपर से उतर गयीं, तब दुष्टात्मा कुम्भकर्ण को चेत हुआ और वह दुःखी होकर इस प्रकार चिन्ता करने लगा॥ ४६-४७॥

ईदृशं किमिदं वाक्यं ममाद्य वदनाच्च्युतम्।

अहं व्यामोहितो देवैरिति मन्ये तदागतैः॥४८॥

‘अहो! आज मेरे मुँह से ऐसी बात क्यों निकल गयी। मैं समझता हूँ, ब्रह्माजी के साथ आये हुए देवताओं ने ही उस समय मुझे मोह में डाल दिया था’॥ ४८॥

एवं लब्धवराः सर्वे भ्रातरो दीप्ततेजसः।

श्लेष्मातकवनं गत्वा तत्र ते न्यवसन् सुखम्॥४९॥

‘इस प्रकार वे तीनों तेजस्वी भ्राता वर पाकर श्लेष्मातकवन (लसोड़े के जंगल)-में गये और वहाँ सुखपूर्वक रहने लगे। ४९ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे दशमः सर्गः॥१०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्ड में दसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥१०॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
उत्तरकाण्डम्

रावण का संदेश सुनकर पिताकी आज्ञा से कुबेर का लङ्का को छोड़कर कैलास पर जाना, लङ्का में रावण का राज्याभिषेक तथा राक्षसों का निवास

एकादशः सर्गः

सर्ग-11


सुमाली वरलब्धांस्तु ज्ञात्वा चैतान् निशाचरान्।

उदतिष्ठद् भयं त्यक्त्वा सानुगः स रसातलात्॥

रावण आदि निशाचरों को वर प्राप्त हुआ है, यह जानकर सुमाली नामक राक्षस अपने अनुचरोंसहित भय छोड़कर रसातल से निकला॥१॥

मारीचश्च प्रहस्तश्च विरूपाक्षो महोदरः।

उदतिष्ठन् सुसंरब्धाः सचिवास्तस्य रक्षसः॥२॥

साथ ही मारीच, प्रहस्त, विरूपाक्ष और महोदर ये उस राक्षस के चार मन्त्री भी रसातल से ऊपर को उठे। वे सब-के-सब रोषावेष से भरे हुए थे॥२॥

सुमाली सचिवैः सार्धं वृतो राक्षसपुङ्गवैः।

अभिगम्य दशग्रीवं परिष्वज्येदमब्रवीत्॥३॥

श्रेष्ठ राक्षसों से घिरा हुआ सुमाली अपने सचिवों के साथ दशग्रीव के पास गया और उसे छाती से लगाकर इस प्रकार बोला— ॥३॥

दिष्ट्या ते वत्स सम्प्राप्तश्चिन्तितोऽयं मनोरथः।

यस्त्वं त्रिभुवनश्रेष्ठाल्लब्धवान् वरमुत्तमम्॥४॥

‘वत्स! बड़े सौभाग्य की बात है कि तुमने त्रिभुवनश्रेष्ठ ब्रह्माजी से उत्तम वर प्राप्त किया, जिससे तुम्हें यह चिरकाल से चिन्तित मनोरथ उपलब्ध हो गया॥

यत्कृते च वयं लङ्कां त्यक्त्वा याता रसातलम्।

तद्गतं नो महाबाहो महद्विष्णुकृतं भयम्॥५॥

‘महाबाहो! जिसके कारण हम सब राक्षस लङ्का छोड़कर रसातल में चले गये थे, भगवान् विष्णु से प्राप्त होने वाला हमारा यह महान् भय दूर हो गया।

असकृत् तद्भयाद् भग्नाः परित्यज्य स्वमालयम्।

विद्रुताः सहिताः सर्वे प्रविष्टाः स्म रसातलम्॥

‘हम सब लोग बारम्बार भगवान् विष्णु के भय से पीड़ित होने के कारण अपना घर छोड़ भाग निकले और सब-के-सब एक साथ ही रसातल में प्रविष्ट हो गये॥

अस्मदीया च लङ्केयं नगरी राक्षसोषिता।

निवेशिता तव भ्रात्रा धनाध्यक्षेण धीमता॥७॥

‘यह लङ्कानगरी जिसमें तुम्हारे बुद्धिमान् भाई धनाध्यक्ष कुबेर निवास करते हैं, हमलोगों की है। पहले इसमें राक्षस ही रहा करते थे॥७॥

यदि नामात्र शक्यं स्यात् साम्ना दानेन वानघ।

तरसा वा महाबाहो प्रत्यानेतुं कृतं भवेत्॥८॥

‘निष्पाप महाबाहो! यदि साम, दान अथवा बलप्रयोग के द्वारा भी पुनः लङ्का को वापस लिया जा सके तो हमलोगों का काम बन जाय॥८॥

त्वं च लङ्केश्वरस्तात भविष्यसि न संशयः।

त्वया राक्षसवंशोऽयं निमग्नोऽपि समुद्धृतः॥९॥

‘तात! तुम्हीं लङ्का के स्वामी हो ओगे, इसमें संशय नहीं है; क्योंकि तुमने इस राक्षसवंश का जो रसातल में डूब गया था, उद्धार किया है॥९॥

सर्वेषां नः प्रभुश्चैव भविष्यसि महाबल।

अथाब्रवीद् दशग्रीवो मातामहमुपस्थितम्॥१०॥

वित्तेशो गुरुरस्माकं नार्हसे वक्तुमीदृशम्।

‘महाबली वीर! तुम्हीं हम सबके राजा होओगे।’ यह सुनकर दशग्रीव ने पास खड़े हुए अपने मातामह से कहा—’नानाजी! धनाध्यक्ष कुबेर हमारे बड़े भाई हैं, अतः उनके सम्बन्ध में आपको मुझसे ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये’ ॥ १० १/२॥

साम्ना हि राक्षसेन्द्रेण प्रत्याख्यातो गरीयसा॥

किंचिन्नाह तदा रक्षो ज्ञात्वा तस्य चिकीर्षितम्।

उस श्रेष्ठ राक्षसराज के द्वारा शान्तभाव से ही ऐसा कोरा उत्तर पाकर सुमाली समझ गया कि रावण क्या करना चाहता है, इसलिये वह राक्षस चुप हो गया। फिर कुछ कहने का साहस न कर सका॥ ११ १/२॥

कस्यचित् त्वथ कालस्य वसन्तं रावणं ततः॥१२॥

उक्तवन्तं तथा वाक्यं दशग्रीवं निशाचरः।

प्रहस्तः प्रश्रितं वाक्यमिदमाह सकारणम्॥१३॥

तदनन्तर कुछ काल व्यतीत होने पर अपने स्थान पर निवास करते हुए दशग्रीव रावण से जो सुमाली को पहले पूर्वोक्त उत्तर दे चुका था, निशाचर प्रहस्त ने विनयपूर्वक यह युक्तियुक्त बात कही— ॥ १२-१३॥

दशग्रीव महाबाहो नार्हसे वक्तुमीदृशम्।

सौभ्रानं नास्ति शूराणां शृणु चेदं वचो मम॥१४॥

‘महाबाहु दशग्रीव! आपने अपने नाना से जो कुछ कहा है, वैसा नहीं कहना चाहिये; क्योंकि वीरों में इस तरह भ्रातृभाव का निर्वाह होता नहीं देखा जाता। आप मेरी यह बात सुनिये॥ १४ ॥

अदितिश्च दितिश्चैव भगिन्यौ सहिते हि ते।

भार्ये परमरूपिण्यौ कश्यपस्य प्रजापतेः॥१५॥

‘अदिति और दिति दोनों सगी बहनें हैं। वे दोनों ही प्रजापति कश्यप की परम सुन्दरी पत्नियाँ हैं॥ १५॥

अदितिर्जनयामास देवांस्त्रिभुवनेश्वरान्।

दितिस्त्वजनयद् दैत्यान् कश्यपस्यात्मसम्भवान्॥१६॥

‘अदिति ने देवताओं को जन्म दिया है, जो इस समय त्रिभुवन के स्वामी हैं और दितिने दैत्यों को उत्पन्न किया है। देवता और दैत्य दोनों ही महर्षि कश्यप के औरस पुत्र हैं॥१६॥

दैत्यानां किल धर्मज्ञ पुरेयं सवनार्णवा।

सपर्वता मही वीर तेऽभवन् प्रभविष्णवः॥१७॥

‘धर्मज्ञ वीर! पहले पर्वत, वन और समुद्रोंसहित यह सारी पृथ्वी दैत्यों के ही अधिकार में थी; क्योंकि वे बड़े प्रभावशाली थे॥ १७॥

निहत्य तांस्तु समरे विष्णुना प्रभविष्णुना।

देवानां वशमानीतं त्रैलोक्यमिदमव्ययम्॥१८॥

‘किंतु सर्वशक्तिमान् भगवान् विष्णु ने युद्ध में दैत्यों को मारकर त्रिलोकी का यह अक्षय राज्य देवताओं के अधिकार में दे दिया॥ १८ ॥

नैतदेको भवानेव करिष्यति विपर्ययम्।

सुरासुरैराचरितं तत् कुरुष्व वचो मम॥१९॥

‘इस तरहका विपरीत आचरण केवल आप ही नहीं करेंगे। देवताओं और असुरों ने भी पहले इस नीति से काम लिया है; अतः आप मेरी बात मान लें’॥ १९॥

एवमुक्तो दशग्रीवः प्रहृष्टेनान्तरात्मना।

चिन्तयित्वा मुहूर्तं वै बाढमित्येव सोऽब्रवीत्॥२०॥

प्रहस्त के ऐसा कहने पर दशग्रीव का चित्त प्रसन्न हो गया। उसने दो घड़ी तक सोच-विचारकर कहा —’बहुत अच्छा (तुम जैसा कहते हो, वैसा ही करूँगा)’ ॥२०॥

स तु तेनैव हर्षेण तस्मिन्नहनि वीर्यवान्।

वनं गतो दशग्रीवः सह तैः क्षणदाचरैः॥ २१॥

तदनन्तर उसी दिन उसी हर्ष के साथ पराक्रमी दशग्रीव उन निशाचरों को साथ ले लङ्का के निकटवर्ती वन में गया॥२१॥

त्रिकूटस्थः स तु तदा दशग्रीवो निशाचरः।

प्रेषयामास दौत्येन प्रहस्तं वाक्यकोविदम्॥ २२॥

उस समय त्रिकूटपर्वत पर जाकर निशाचर दशग्रीव ठहर गया और बातचीत करने में कुशल प्रहस्त को उसने दूत बनाकर भेजा॥ २२॥

प्रहस्त शीघ्रं गच्छ त्वं ब्रूहि नैर्ऋतपुङ्गवम्।

वचसा मम वित्तेशं सामपूर्वमिदं वचः॥२३॥

वह बोला—’प्रहस्त! तुम शीघ्र जाओ और मेरे कथनानुसार धन के स्वामी राक्षसराज कुबेर से शान्तिपूर्वक यह बात कहो॥२३॥

इयं लङ्का पुरी राजन् राक्षसानां महात्मनाम्।

त्वया निवेशिता सौम्य नैतद् युक्तं तवानघ॥२४॥

‘राजन्! यह लङ्कापुरी महामना राक्षसों की है, जिसमें आप निवास कर रहे हैं। सौम्य! निष्पाप यक्षराज! यह आपके लिये उचित नहीं है॥२४॥

तद् भवान् यदि नो ह्यद्य दद्यादतुलविक्रम।

कृता भवेन्मम प्रीतिधर्मश्चैवानुपालितः॥ २५॥

‘अतुल पराक्रमी धनेश्वर! यदि आप हमें यह लङ्कापुरी लौटा दें तो इससे हमें बड़ी प्रसन्नता होगी

और आपके द्वारा धर्म का पालन हुआ समझा जायगा’॥

स तु गत्वा पुरीं लङ्कां धनदेन सुरक्षिताम्।

अब्रवीत् परमोदारं वित्तपालमिदं वचः॥२६॥

तब प्रहस्त कुबेर के द्वारा सुरक्षित लङ्कापुरी में गया और उन वित्तपाल से बड़ी उदारतापूर्ण वाणी में बोला

प्रेषितोऽहं तव भ्रात्रा दशग्रीवेण सुव्रत।

त्वत्समीपं महाबाहो सर्वशस्त्रभृतां वर ॥२७॥

तच्छ्रयतां महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद।

वचनं मम वित्तेश यद् ब्रवीति दशाननः॥२८॥

‘उत्तम व्रत का पालन करने वाले, सम्पूर्ण शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ, सर्वशास्त्रविशारद, महाबाहु, महाप्राज्ञ धनेश्वर! आपके भाई दशग्रीव ने मुझे आपके पास भेजा है। दशमुख रावण आपसे जो कुछ कहना चाहते हैं, वह बता रहा हूँ। आप मेरी बात सुनिये॥ २७-२८॥

इयं किल पुरी रम्या सुमालिप्रमुखैः पुरा।

भुक्तपूर्वा विशालाक्ष राक्षसैर्भीमविक्रमैः॥२९॥

तेन विज्ञाप्यते सोऽयं साम्प्रतं विश्रवात्मज।

तदेषा दीयतां तात याचतस्तस्य सामतः॥३०॥

‘विशाललोचन वैश्रवण! यह रमणीय लङ्कापुरी पहले भयानक पराक्रमी सुमाली आदि राक्षसों के अधिकार में रही है। उन्होंने बहुत समय तक इसका उपभोग किया है। अतः वे दशग्रीव इस समय यह सूचित कर रहे हैं कि ‘यह लङ्का जिनकी वस्तु है, उन्हें लौटा दी जाय।’ तात! शान्तिपूर्वक याचना करने वाले दशग्रीव को आप यह पुरी लौटा दें॥ २९-३०॥

प्रहस्तादपि संश्रुत्य देवो वैश्रवणो वचः।

प्रत्युवाच प्रहस्तं तं वाक्यं वाक्यविदां वरः॥३१॥

प्रहस्त के मुख से यह बात सुनकर वाणी का मर्म समझने वालों में श्रेष्ठ भगवान् वैश्रवण ने प्रहस्त को इस प्रकार उत्तर दिया- ॥३१॥

दत्ता ममेयं पित्रा तु लङ्का शून्या निशाचरैः।

निवेशिता च मे रक्षो दानमानादिभिर्गुणैः॥३२॥

‘राक्षस! यह लङ्का पहले निशाचरों से सूनी थी। उस समय पिताजीने मुझे इसमें रहने की आज्ञा दी और मैंने इसमें दान, मान आदि गुणों द्वारा प्रजाजनों को बसाया॥

ब्रूहि गच्छ दशग्रीवं पुरी राज्यं च यन्मम।

तत्राप्येतन्महाबाहो भुक्ष्व राज्यमकण्टकम्॥३३॥

‘दूत ! तुम जाकर दशग्रीव से कहो—महाबाहो! यह पुरी तथा यह निष्कण्टक राज्य जो कुछ भी मेरे पास है, वह सब तुम्हारा भी है। तुम इसका उपभोग करो॥ ३३॥

अविभक्तं त्वया सार्धं राज्यं यच्चापि मे वसु।

एवमुक्त्वा धनाध्यक्षो जगाम पितुरन्तिकम्॥३४॥

‘मेरा राज्य तथा सारा धन तुमसे बँटा हुआ नहीं है’ ऐसा कहकर धनाध्यक्ष कुबेर अपने पिता विश्रवा मुनि के पास चले गये॥३४॥

अभिवाद्य गुरुं प्राह रावणस्य यदीप्सितम्।

एष तात दशग्रीवो दूतं प्रेषितवान् मम॥ ३५॥

दीयतां नगरी लङ्का पूर्वं रक्षोगणोषिता।

मयात्र यदनुष्ठेयं तन्ममाचक्ष्व सुव्रत॥३६॥

वहाँ पिता को प्रणाम करके उन्होंने रावण की जो इच्छा थी, उसे इस प्रकार बताया—’तात! आज दशग्रीव ने मेरे पास दूत भेजा और कहलाया है कि इस लङ्का नगरी में पहले राक्षस रहा करते थे, अतः इसे राक्षसों को लौटा दीजिये। सुव्रत! अब मुझे इस विषय में क्या करना चाहिये, बताने की कृपा करें॥ ३५-३६॥

ब्रह्मर्षिस्त्वेवमुक्तोऽसौ विश्रवा मुनिपुङ्गवः।

प्राञ्जलिं धनदं प्राह शृणु पुत्र वचो मम॥३७॥

उनके ऐसा कहने पर ब्रह्मर्षि मुनिवर विश्रवा हाथ जोड़कर खड़े हुए धनद कुबेर से बोले—’बेटा! मेरी बात सुनो॥ ३७॥

दशग्रीवो महाबाहुरुक्तवान् मम संनिधौ।

मया निर्भर्त्सतश्चासीद् बहुशोक्तः सुदुर्मतिः॥३८॥

स क्रोधेन मया चोक्तो ध्वंससे च पुनः पुनः।

महाबाहु दशग्रीव ने मेरे निकट भी यह बात कही थी। इसके लिये मैंने उस दुर्बुद्धि को बहुत फटकारा, डाँट बतायी और बारम्बार क्रोधपूर्वक कहा—’अरे! ऐसा करने से तेरा पतन हो जायगा’ किंतु इसका कुछ फल नहीं हुआ॥ ३८ १/२॥

श्रेयोऽभियुक्तं धन॑ च शृणु पुत्र वचो मम॥३९॥

वरप्रदानसम्मूढो मान्यामान्यं सुदुर्मतिः।

न वेत्ति मम शापाच्च प्रकृतिं दारुणां गतः॥४०॥

‘बेटा! अब तुम्हीं मेरे धर्मानुकूल एवं कल्याणकारी वचन को ध्यान देकर सुनो। रावण की बुद्धि बहुत ही खोटी है। वह वर पाकर मदमत्त हो उठा है—विवेक खो बैठा है। मेरे शाप के कारण भी उसकी प्रकृति क्रूर हो गयी है॥ ३९-४०॥

तस्माद् गच्छ महाबाहो कैलासं धरणीधरम्।

निवेशय निवासार्थं त्यक्त्वा लङ्कां सहानुगः॥४१॥

‘इसलिये महाबाहो! अब तुम अनुचरोंसहित लङ्का छोड़कर कैलास पर्वत पर चले जाओ और अपने रहने के लिये वहीं दूसरा नगर बसाओ॥४१॥

तत्र मन्दाकिनी रम्या नदीनामुत्तमा नदी।

काञ्चनैः सूर्यसंकाशैः पङ्कजैः संवृतोदका॥४२॥

कुमुदैरुत्पलैश्चैव अन्यैश्चैव सुगन्धिभिः।

‘वहाँ नदियों में श्रेष्ठ रमणीय मन्दाकिनी नदी बहती है, जिसका जल सूर्य के समान प्रकाशित होने वाले सुवर्णमय कमलों, कुमुदों, उत्पलों और दूसरे-दूसरे सुगन्धित कुसुमों से आच्छादित है॥ ४२ १/२॥

तत्र देवाः सगन्धर्वाः साप्सरोरगकिंनराः॥४३॥

विहारशीलाः सततं रमन्ते सर्वदाश्रिताः।

नहि क्षमं तवानेन वैरं धनद रक्षसा॥४४॥

जानीषे हि यथानेन लब्धः परमको वरः॥४५॥

‘उस पर्वत पर देवता, गन्धर्व, अप्सरा, नाग और किन्नर आदि दिव्य प्राणी, जिन्हें स्वभाव से ही घूमना फिरना अधिक प्रिय है, सदा रहते हुए निरन्तर आनन्द का अनुभव करते हैं। धनद! इस राक्षस के साथ तुम्हारा वैर करना उचित नहीं है। तुम तो जानते ही हो कि इसने ब्रह्माजी से कैसा उत्कृष्ट वर प्राप्त किया है’। ४३–४५॥

एवमुक्तो गृहीत्वा तु तद्वचः पितृगौरवात्।

सदारपुत्रः सामात्यः सवाहनधनो गतः॥४६॥

मुनि के ऐसा कहने पर कुबेर ने पिता का मान रखते हुए उनकी बात मान ली और स्त्री, पुत्र, मन्त्री, वाहन तथा धन साथ लेकर वे लङ्का से कैलास को चले गये॥

प्रहस्तोऽथ दशग्रीवं गत्वा वचनमब्रवीत्।

प्रहृष्टात्मा महात्मानं सहामात्यं सहानुजम्॥४७॥

तदनन्तर प्रहस्त प्रसन्न होकर मन्त्री और भाइयों के साथ बैठे हुए महामना दशग्रीव के पास जाकर बोला

शून्या सा नगरी लङ्का त्यक्त्वैनां धनदो गतः।

प्रविश्य तां सहास्माभिः स्वधर्मं तत्र पालय॥४८॥

‘लङ्का नगरी खाली हो गयी। कुबेर उसे छोड़कर चले गये। अब आप हमलोगों के साथ उसमें प्रवेश करके अपने धर्म का पालन कीजिये’ ॥ ४८॥

एवमुक्तो दशग्रीवः प्रहस्तेन महाबलः।

विवेश नगरी लङ्कां भ्रातृभिः सबलानुगैः॥४९॥

धनदेन परित्यक्तां सुविभक्तमहापथाम्।

आरुरोह स देवारिः स्वर्गं देवाधिपो यथा॥५०॥

प्रहस्त के ऐसा कहने पर महाबली दशग्रीव ने अपनी सेना, अनुचर तथा भाइयोंसहित कुबेर द्वारा त्यागी हुई लङ्कापुरी में प्रवेश किया। उस नगरी में सुन्दर विभागपूर्वक बड़ी-बड़ी सड़कें बनी थीं। जैसे देवराज इन्द्र स्वर्ग के सिंहासन पर आरूढ़ हुए थे, उसी प्रकार देवद्रोही रावण ने लङ्का में पदार्पण किया॥ ४९-५०॥

स चाभिषिक्तः क्षणदाचरैस्तदा निवेशयामास पुरीं दशाननः।

निकामपूर्णा च बभूव सा पुरी निशाचरैर्नीलबलाहकोपमैः॥५१॥

उस समय निशाचरों ने दशमुख रावण का राज्याभिषेक किया। फिर रावण ने उस पुरी को बसाया। देखते-देखते समूची लङ्कापुरी नील मेघ के समान वर्णवाले राक्षसों से पूर्णतः भर गयी॥५१॥

धनेश्वरस्त्वथ पितृवाक्यगौरवान्यवेशयच्छशिविमले गिरौ पुरीम्।

स्वलंकृतैर्भवनवरैर्विभूषितां पुरंदरस्येव तदाऽमरावतीम्॥५२॥

धन के स्वामी कुबेर ने पिताकी आज्ञा को आदर देकर चन्द्रमा के समान निर्मल कान्तिवाले कैलास पर्वत पर शोभाशाली श्रेष्ठ भवनों से विभूषित अलकापुरी बसायी, ठीक वैसे ही जैसे देवराज इन्द्र ने स्वर्गलोक में अमरावती पुरी बसायी थी॥५२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे एकादशः सर्गः॥११॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्ड में ग्यारहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥११॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
उत्तरकाण्डम्

शूर्पणखा तथा रावण आदि तीनों भाइयों का विवाह और मेघनाद का जन्म

द्वादशः सर्गः

सर्ग-12


राक्षसेन्द्रोऽभिषिक्तस्तु भ्रातृभिः सहितस्तदा।

ततः प्रदानं राक्षस्या भगिन्याः समचिन्तयत्॥

(अगस्त्यजी कहते हैं— श्रीराम!) अपना अभिषेक हो जाने पर जब राक्षसराज रावण भाइयोंसहित लङ्कापुरी में रहने लगा, तब उसे अपनी बहिन राक्षसी शूर्पणखा के ब्याह की चिन्ता हुई॥१॥

स्वसारं कालकेयाय दानवेन्द्राय राक्षसीम्।

ददौ शूर्पणखां नाम विद्युज्जिह्वाय राक्षसः॥२॥

उस राक्षस ने दानवराज विद्युज्जिह्व को, जो कालका का पुत्र था, अपनी बहिन शूर्पणखा ब्याह दी॥२॥

अथ दत्त्वा स्वयं रक्षो मृगयामटते स्म तत्।

तत्रापश्यत् ततो राम मयं नाम दितेः सुतम्॥३॥

कन्यासहायं तं दृष्ट्वा दशग्रीवो निशाचरः।

अपृच्छत् को भवानेको निर्मनुष्यमृगे वने॥४॥

अनया मृगशावाक्ष्या कमर्थं सह तिष्ठसि।

श्रीराम! बहिन का ब्याह करके राक्षस रावण एक दिन स्वयं शिकार खेलने के लिये वन में घूम रहा था। वहाँ उसने दिति के पुत्र मय को देखा। उसके साथ एक सुन्दरी कन्या भी थी। उसे देखकर निशाचर दशग्रीव ने पूछा-‘आप कौन हैं, जो मनुष्यों और पशुओं से रहित इस सूने वन में अकेले घूम रहे हैं? इस मृगनयनी कन्या के साथ आप यहाँ किस उद्देश्य से निवास करते हैं?’ ॥ ३-४ १/२॥

मयस्तदाब्रवीद् राम पृच्छन्तं तं निशाचरम्॥५॥

श्रूयतां सर्वमाख्यास्ये यथावृत्तमिदं तव।

श्रीराम ! इस प्रकार पूछने वाले उस निशाचर से मय बोला—’सुनो, मैं अपना सारा वृत्तान्त तुम्हें यथार्थरूप से बता रहा हूँ॥ ५ १/२॥

हेमा नामाप्सरास्तात श्रुतपूर्वा यदि त्वया॥६॥

दैवतैर्मम सा दत्ता पौलोमीव शतक्रतोः।

तस्यां सक्तमना ह्यासं दशवर्षशतान्यहम्॥७॥

सा च दैवतकार्येण गता वर्षाश्चतुर्दश।

तस्याः कृते च हेमायाः सर्वं हेममयं पुरम्॥८॥

वज्रवैदूर्यचित्रं च मायया निर्मितं मया।

तत्राहमवसं दीनस्तया हीनः सुदुःखितः॥९॥

‘तात! तुमने पहले कभी सुना होगा, स्वर्ग में हेमा नाम से प्रसिद्ध एक अप्सरा रहती है। उसे देवताओं ने उसी प्रकार मुझे अर्पित कर दिया था, जैसे पुलोम दानव की कन्या शची देवराज इन्द्र को दी गयी थीं। मैं उसी में आसक्त होकर एक सहस्र वर्षों तक उसके साथ रहा हूँ। एक दिन वह देवताओं के कार्य से स्वर्गलोक को चली गयी, तब से चौदह वर्ष बीत गये। मैंने उस हेमा के लिये माया से एक नगर का निर्माण किया था, जो सम्पूर्णतः सोने का बना है। हीरे और नीलम के संयोग से वह विचित्र शोभा धारण करता है। उसीमें मैं अबतक उसके वियोग से अत्यन्त दुःखी एवं दीन होकर रहता था॥६-९॥

तस्माद् पुराद् दुहितरं गृहीत्वा वनमागतः।

इयं ममात्मजा राजंस्तस्याः कुक्षौ विवर्धिता॥१०॥

‘उसी नगर से इस कन्या को साथ लेकर मैं वन में आया हूँ। राजन् ! यह मेरी पुत्री है, जो हेमा के गर्भ में ही पली है और उससे उत्पन्न होकर मेरे द्वारा पालित हो बड़ी हुई है॥ १०॥

भर्तारमनया सार्धमस्याः प्राप्तोऽस्मि मार्गितुम्।

कन्यापितृत्वं दुःखं हि सर्वेषां मानकांक्षिणाम्॥११॥

कन्या हि द्वे कुले नित्यं संशये स्थाप्य तिष्ठति।

‘इसके साथ मैं इसके योग्य पति की खोज करने के लिये आया हूँ। मान की अभिलाषा रखने वाले प्रायः सभी लोगों के लिये कन्या का पिता होना कष्टकारक होता है। (क्योंकि इसके लिये कन्या के पिताको दूसरों के सामने झुकना पड़ता है।) कन्या सदा दो कुलों को संशय में डाले रहती है॥ ११ १/२ ॥

पुत्रद्रयं ममाप्यस्यां भार्यायां सम्बभूव ह॥१२॥

मायावी प्रथमस्तात दुन्दुभिस्तदनन्तरः।

‘तात! मेरी इस भार्या हेमा के गर्भ से दो पुत्र भी हुए हैं, जिनमें प्रथम पुत्र का नाम मायावी और दूसरे का दुन्दुभि है॥ १२ १/२॥

एवं ते सर्वमाख्यातं याथातथ्येन पृच्छतः॥१३॥

त्वामिदानीं कथं तात जानीयां को भवानिति।

तात! तुमने पूछा था, इसलिये मैंने इस तरह अपनी सारी बातें तुम्हें यथार्थरूप से बता दी। अब मैं यह जानना चाहता हूँ कि तुम कौन हो? यह मुझे किस तरह ज्ञात हो सकेगा?’॥ १३ १/२॥

एवमुक्तं तु तद् रक्षो विनीतमिदमब्रवीत्॥१४॥

अहं पौलस्त्यतनयो दशग्रीवश्च नामतः।

मुनेर्विश्रवसो यस्तु तृतीयो ब्रह्मणोऽभवत्॥१५॥

मयासुर के इस प्रकार कहने पर राक्षस रावण विनीतभावसे यों बोला—’मैं पुलस्त्य के पुत्र विश्रवा का बेटा हूँ। मेरा नाम दशग्रीव है। मैं जिन विश्रवा मुनि से उत्पन्न हुआ हूँ, वे ब्रह्माजी से तीसरी पीढ़ी में पैदा हुए हैं’। १४-१५ ॥

एवमुक्तस्तदा राम राक्षसेन्द्रेण दानवः।

महर्षेस्तनयं ज्ञात्वा मयो हर्षमुपागतः॥१६॥

दातुं दुहितरं तस्मै रोचयामास तत्र वै।

श्रीराम! राक्षसराज के ऐसा कहने पर दानव मय महर्षि विश्रवा के उस पुत्र का परिचय पाकर बहुत प्रसन्न हुआ और उसके साथ वहाँ उसने अपनी पुत्री का विवाह कर देने की इच्छा की॥ १६ १/२॥

करेण तु करं तस्या ग्राहयित्वा मयस्तदा॥१७॥

प्रहसन् प्राह दैत्येन्द्रो राक्षसेन्द्रमिदं वचः।

इसके बाद दैत्यराज मय अपनी बेटी का हाथ रावण के हाथ में देकर हँसता हुआ उस राक्षसराज से इस प्रकार बोला— ॥ १७ १/२॥

इयं ममात्मजा राजन् हेमयाप्सरसा धृता॥१८॥

कन्या मन्दोदरी नाम पत्न्यर्थं प्रतिगृह्यताम्।

‘राजन्! यह मेरी बेटी है, जिसे हेमा अप्सरा ने अपने गर्भ में धारण किया था। इसका नाम मन्दोदरी है। इसे तुम अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करो’॥ १८१/२॥

बाढमित्येव तं राम दशग्रीवोऽभ्यभाषत ॥१९॥

प्रज्वाल्य तत्र चैवाग्निमकरोत् पाणिसंग्रहम्।

श्रीराम! तब दशग्रीव ने ‘बहुत अच्छा’ कहकर मयासुर की बात मान ली। फिर वहाँ उसने अग्नि को प्रज्वलित करके मन्दोदरी का पाणिग्रहण किया॥ १९ १/२॥

स हि तस्य मयो राम शापाभिज्ञस्तपोधनात्॥२०॥

विदित्वा तेन सा दत्ता तस्य पैतामहं कुलम्।

रघुनन्दन! यद्यपि तपोधन विश्रवा से रावण को जो क्रूर-प्रकृति होने का शाप मिला था, उसे मयासुर जानता था; तथापि रावण को ब्रह्माजी के कुल का बालक समझकर उसने उसको अपनी कन्या दे दी। २० १/२॥

अमोघां तस्य शक्तिं च प्रददौ परमाद्भुताम्॥२१॥

परेण तपसा लब्धां जनिवाँल्लक्ष्मणं यया।

साथ ही उत्कृष्ट तपस्या से प्राप्त हुई एक परम अद्भुत अमोघ शक्ति भी प्रदान की, जिसके द्वारा रावण ने लक्ष्मण को घायल किया था॥ २१ १/२॥

एवं स कृत्वा दारान् वै लङ्काया ईश्वरः प्रभुः॥२२॥

गत्वा तु नगरी भार्ये भ्रातृभ्यां समुपाहरत्।

इस प्रकार दारपरिग्रह (विवाह) करके प्रभावशाली लङ्केश्वर रावण लङ्कापुरी में गया और अपने दोनों भाइयों के लिये भी दो भार्याएँ उनका विवाह कराकर ले आया॥

वैरोचनस्य दौहित्रीं वज्रज्वालेति नामतः॥२३॥

तां भार्यां कुम्भकर्णस्य रावणः समकल्पयत्।

विरोचनकुमार बलि की दौहित्री को, जिसका नाम वज्रज्वाला था, रावण ने कुम्भकर्ण की पत्नी बनाया॥ २३ १/२॥

गन्धर्वराजस्य सुतां शैलूषस्य महात्मनः॥२४॥

सरमां नाम धर्मज्ञां लेभे भार्यां विभीषणः।

गन्धर्वराज महात्मा शैलूष की कन्या सरमा को, जो धर्म के तत्त्व को जानने वाली थी, विभीषण ने अपनी पत्नी के रूप में प्राप्त किया॥ २४ १/२॥

तीरे तु सरसो वै तु संजज्ञे मानसस्य हि॥२५॥

सरस्तदा मानसं तु ववृधे जलदागमे।

मात्रा तु तस्याः कन्यायाः स्नेहेनाक्रन्दितं वचः॥२६॥

सरो मा वर्धयस्वेति ततः सा सरमाभवत्।

वह मानसरोवर के तट पर उत्पन्न हुई थी। जब उसका जन्म हुआ, उस समय वर्षा-ऋतु का आगमन होने से मान-सरोवर बढ़ने लगा। तब उस कन्या की माता ने पुत्री के स्नेह से करुणक्रन्दन करते हुए उस सरोवर से कहा—’सरो मा वर्धयस्व’ (हे सरोवर! तुम अपने जल को बढ़ने न दो)। उसने घबराहट में ‘सरः मा’ ऐसा कहा था; इसलिये उस कन्या का नाम सरमा हो गया॥ २५-२६ १/२॥

एवं ते कृतदारा वै रेमिरे तत्र राक्षसाः॥२७॥

स्वां स्वां भार्यामुपादाय गन्धर्वा इव नन्दने।

इस प्रकार वे तीनों राक्षस विवाहित होकर अपनी-अपनी स्त्री को साथ ले नन्दनवन में विहार करने वाले गन्धर्वो के समान लङ्का में सुखपूर्वक रमण करने लगे।

ततो मन्दोदरी पुत्रं मेघनादमजीजनत्॥२८॥

स एष इन्द्रजिन्नाम युष्माभिरभिधीयते।

तदनन्तर कुछ काल के बाद मन्दोदरी ने अपने पुत्र मेघनाद को जन्म दिया, जिसे आपलोग इन्द्रजित् के नाम से पुकारते थे॥ २८ १/२॥

जातमात्रेण हि पुरा तेन रावणसूनुना॥ २९॥

रुदता सुमहान् मुक्तो नादो जलधरोपमः।

पूर्वकाल में उस रावणपुत्र ने पैदा होते ही रोते-रोते मेघ के समान गम्भीर नाद किया था॥ २९ १/२ ॥

जडीकृता च सा लङ्का तस्य नादेन राघव॥३०॥

पिता तस्याकरोन्नाम मेघनाद इति स्वयम्।

रघुनन्दन! उस मेघतुल्य नाद से सारी लङ्का जडवत् स्तब्ध रह गयी थी; इसलिये पिता रावण ने स्वयं ही उसका नाम मेघनाद रखा ॥ ३० १/२॥

सोऽवर्धत तदा राम रावणान्तःपुरे शुभे॥३१॥

रक्ष्यमाणो वरस्त्रीभिश्छन्नः काष्ठरिवानलः।

मातापित्रोर्महाहर्षं जनयन् रावणात्मजः॥३२॥

श्रीराम! उस समय वह रावणकुमार रावण के सुन्दर अन्तःपुर में माता-पिता को महान् हर्ष प्रदान करता हुआ श्रेष्ठ नारियों से सुरक्षित हो काष्ठ से आच्छादित हुई अग्नि के समान बढ़ने लगा। ३१-३२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे द्वादशः सर्गः॥१२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्ड में बारहवाँ सर्ग पूरा हुआ।१२॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
उत्तरकाण्डम्

रावण द्वारा बनवाये गये शयनागार में कुम्भकर्ण का सोना, रावण का अत्याचार, कुबेर का दूत भेजना तथा रावण का उस दूत को मार डालना

त्रयोदशः सर्गः

सर्ग-13


अथ लोकेश्वरोत्सृष्टा तत्र कालेन केनचित्।

निद्रा समभवत् तीव्रा कुम्भकर्णस्य रूपिणी॥

(अगस्त्यजी कहते हैं-रघुनन्दन!) तदनन्तर कुछ काल बीतने पर लोकेश्वर ब्रह्माजी की भेजी हुई निद्रा जंभाई आदि के रूप में मूर्तिमती हो कुम्भकर्ण के भीतर तीव्र वेग से प्रकट हुई॥१॥

ततो भ्रातरमासीनं कुम्भकर्णोऽब्रवीद् वचः।

निद्रा मां बाधते राजन् कारयस्व ममालयम्॥२॥

तब कुम्भकर्ण ने पास ही बैठे हुए अपने भाई रावण से कहा—’राजन् ! मुझे नींद सता रही है; अतः मेरे लिये शयन करने के योग्य घर बनवा दें’॥ २॥

विनियक्तास्ततो राज्ञा शिल्पिनो विश्वकर्मवत्।

विस्तीर्णं योजनं स्निग्धं ततो द्विगुणमायतम्॥

दर्शनीयं निराबाधं कुम्भकर्णस्य चक्रिरे।

स्फाटिकैः काञ्चनैश्चित्रैः स्तम्भैः सर्वत्र शोभितम्॥४॥

यह सुनकर राक्षसराज ने विश्वकर्मा के समान सुयोग्य शिल्पियों को घर बनाने के लिये आज्ञा दे दी। उन शिल्पियों ने दो योजन लम्बा और एक योजन चौड़ा चिकना घर बनाया, जो देखने ही योग्य था। उसमें किसी प्रकार की बाधा का अनुभव नहीं होता था। उसमें सर्वत्र स्फटिकमणि एवं सुवर्ण के बने हुए खम्भे लगे थे, जो उस भवन की शोभा बढ़ा रहे थे। ३-४॥

वैदूर्यकृतसोपानं किङ्किणीजालकं तथा।

दान्ततोरणविन्यस्तं वज्रस्फटिकवेदिकम्॥५॥

उसमें नीलम की सीढ़ियाँ बनी थीं। सब ओर घुघुरूदार झालरें लगायी गयी थीं। उसका सदरफाटक हाथी-दाँतका बना हुआ था और हीरे तथा स्फटिक-मणि की वेदी एवं चबूतरे शोभा दे रहे थे। ५॥

मनोहरं सर्वसुखं कारयामास राक्षसः।।

सर्वत्र सुखदं नित्यं मेरोः पुण्यां गुहामिव॥६॥

वह भवन सब प्रकार से सुखद एवं मनोहर था। मेरु की पुण्यमयी गुफा के समान सदा सर्वत्र सुख प्रदान करने वाला था। राक्षसराज रावण ने कुम्भकर्ण के लिये ऐसा सुन्दर एवं सुविधाजनक शयनागार बनवाया॥६॥

तत्र निद्रां समाविष्टः कुम्भकर्णो महाबलः।

बहून्यब्दसहस्राणि शयानो न च बुध्यते॥७॥

महाबली कुम्भकर्ण उस घर में जाकर निद्रा के वशीभूत हो कई हजार वर्षां तक सोता रहा जाग नहीं पाता था॥ ७॥

निद्राभिभूते तु तदा कुम्भकर्णे दशाननः।

देवर्षियक्षगन्धर्वान् संजने हि निरङ्कशः॥८॥

जब कुम्भकर्ण निद्रा से अभिभूत होकर सो गया, तब दशमुख रावण उच्छृङ्खल हो देवताओं, ऋषियों, यक्षों और गन्धर्वो के समूहों को मारने तथा पीड़ा देने लगा॥ ८॥

उद्यानानि विचित्राणि नन्दनादीनि यानि च।

तानि गत्वा सुसंक्रुद्धो भिनत्ति स्म दशाननः॥९॥

देवताओं के नन्दनवन आदि जो विचित्र उद्यान थे, उनमें जाकर दशानन अत्यन्त कुपित हो उन सबको उजाड़ देता था॥९॥

नदीं गज इव क्रीडन् वृक्षान् वायुरिव क्षिपन्।

नगान् वज्र इवोत्सृष्टो विध्वंसयति राक्षसः॥१०॥

वह राक्षस नदी में हाथी की भाँति क्रीडा करता हुआ उसकी धाराओं को छिन्न-भिन्न कर देता था। वृक्षों को वायु की भाँति झकझोरता हुआ उखाड़ फेंकता था और पर्वतों को इन्द्र के हाथ से छूटे हुए वज्र की भाँति तोड़-फोड़ डालता था॥ १०॥

तथावृत्तं तु विज्ञाय दशग्रीवं धनेश्वरः।

कुलानुरूपं धर्मज्ञो वृत्तं संस्मृत्य चात्मनः॥११॥

सौभ्रात्रदर्शनार्थं तु दूतं वैश्रवणस्तदा।

लङ्कां सम्प्रेषयामास दशग्रीवस्य वै हितम्॥१२॥

दशग्रीव के इस निरंकुश बर्ताव का समाचार पाकर धन के स्वामी धर्मज्ञ कुबेर ने अपने कुल के अनुरूप आचार-व्यवहार का विचार करके उत्तम भ्रातृप्रेम का परिचय देने के लिये लङ्का में एक दूत भेजा। उनका उद्देश्य यह था कि मैं रावण को उसके हित की बात बताकर राहपर लाऊँ॥ ११-१२ ॥

स गत्वा नगरीं लङ्कामाससाद विभीषणम्।

मानितस्तेन धर्मेण पृष्टश्चागमनं प्रति॥१३॥

वह दूत लङ्कापुरी में जाकर पहले विभीषण से मिला। विभीषण ने धर्म के अनुसार उसका सत्कार किया और लङ्का में आने का कारण पूछा ॥ १३॥

पृष्ट्वा च कुशलं राज्ञो ज्ञातीनां च विभीषणः।

सभायां दर्शयामास तमासीनं दशाननम्॥१४॥

फिर बन्धु-बान्धवों का कुशल-समाचार पूछकर विभीषण ने उस दूत को ले जाकर राजसभा में बैठे हुए रावण से मिलाया॥१४॥

स दृष्ट्वा तत्र राजानं दीप्यमानं स्वतेजसा।

जयेति वाचा सम्पूज्य तूष्णीं समभिवर्तत ॥१५॥

राजा रावण सभा में अपने तेज से उद्दीप्त हो रहा था, उसे देखकर दूतने ‘महाराज की जय हो’ ऐसा कहकर वाणी द्वारा उसका सत्कार किया और फिर वह कुछ देर तक चुपचाप खड़ा रहा ॥ १५ ॥

स तत्रोत्तमपर्यङ्के वरास्तरणशोभिते।

उपविष्टं दशग्रीवं दूतो वाक्यमथाब्रवीत्॥१६॥

तत्पश्चात् उत्तम बिछौने से सुशोभित एक श्रेष्ठ पलङ्ग पर बैठे हुए दशग्रीव से उस दूत ने इस प्रकार कहा- ॥१६॥

राजन् वदामि ते सर्वं भ्राता तव यदब्रवीत्।

उभयोः सदृशं वीर वृत्तस्य च कुलस्य च॥१७॥

‘वीर महाराज! आपके भाई धनाध्यक्ष कुबेरने आपके पास जो संदेश भेजा है, वह माता-पिता दोनों के कुल तथा सदाचार के अनुरूप है, मैं उसे पूर्णरूप से आपको बता रहा हूँ; सुनिये- ॥ १७॥

साधु पर्याप्तमेतावत् कृत्यश्चारित्रसंग्रहः।

साधु धर्मे व्यवस्थानं क्रियतां यदि शक्यते॥१८॥

‘दशग्रीव! तुमने अब तक जो कुछ कुकृत्य किया है, इतना ही बहुत है। अब तो तुम्हें भलीभाँति सदाचार का संग्रह करना चाहिये। यदि हो सके तो धर्म के मार्ग पर स्थित रहो; यही तुम्हारे लिये अच्छा होगा॥१८॥

दृष्टं मे नन्दनं भग्नमृषयो निहताः श्रुताः।

देवतानां समुद्योगस्त्वत्तो राजन् मया श्रुतः॥१९॥

‘तुमने नन्दनवन को उजाड़ दिया—यह मैंने अपनी आँखों देखा है। तुम्हारे द्वारा बहुत-से ऋषियों का वध हुआ है, यह भी मेरे सुनने में आया है। राजन्! (इससे तंग आकर देवता तुमसे बदला लेना चाहते हैं) मैंने सुना है कि तुम्हारे विरुद्ध देवताओं का उद्योग आरम्भ हो गया है।

निराकृतश्च बहुशस्त्वयाहं राक्षसाधिप।

सापराधोऽपि बालो हि रक्षितव्यः स्वबान्धवैः॥२०॥

‘राक्षसराज! तुमने कई बार मेरा भी तिरस्कार किया है; तथापि यदि बालक अपराध कर दे तो भी अपने बन्धु-बान्धवों को तो उसकी रक्षा ही करनी चाहिये (इसीलिये तुम्हें हितकारक सलाह दे रहा हूँ॥२०॥

अहं तु हिमवत्पृष्ठं गतो धर्ममुपासितुम्।

रौद्रं व्रतं समास्थाय नियतो नियतेन्द्रियः ॥२१॥

‘मैं शौच-संतोषादि नियमों के पालन और इन्द्रियसंयमपूर्वक ‘रौद्र-व्रत’ का आश्रय ले धर्म का अनुष्ठान करने के लिये हिमालय के एक शिखर पर गया था। २१॥

तत्र देवो मया दृष्ट उमया सहितः प्रभुः।

सव्यं चक्षुर्मया दैवात् तत्र देव्यां निपातितम्॥२२॥

का न्वेषेति महाराज न खल्वन्येन हेतुना।

रूपं चानुपमं कृत्वा रुद्राणी तत्र तिष्ठति ॥२३॥

‘वहाँ मुझे उमासहित भगवान् महादेवजी का दर्शन हुआ। महाराज! उस समय मैंने केवल यह जानने के लिये कि देखू ये कौन हैं? दैववश देवी पार्वती पर अपनी बायीं दृष्टि डाली थी। निश्चय ही मैंने दूसरे किसी हेतु से (विकारयुक्त भावना से) उनकी ओर नहीं देखा था। उस वेला में देवी रुद्राणी अनुपम रूप धारण करके वहाँ खड़ी थीं॥ २२-२३॥

देव्या दिव्यप्रभावेण दग्धं सव्यं ममेक्षणम्।

रेणुध्वस्तामिव ज्योतिः पिङ्गलत्वमुपागतम्॥२४॥

‘देवी के दिव्य प्रभाव से उस समय मेरी बायीं आँख जल गयी और दूसरी (दायीं आँख) भी धूल से भरी हुई-सी पिङ्गल वर्ण की हो गयी॥ २४ ॥

ततोऽहमन्यद् विस्तीर्णं गत्वा तस्य गिरेस्तटम्।

तूष्णीं वर्षशतान्यष्टौ समधारं महाव्रतम्॥ २५॥

‘तदनन्तर मैंने पर्वत के दूसरे विस्तृत तट पर जाकर आठ सौ वर्षों तक मौनभाव से उस महान् व्रत को धारण किया॥ २५ ॥

समाप्ते नियमे तस्मिंस्तत्र देवो महेश्वरः।

ततः प्रीतेन मनसा प्राह वाक्यमिदं प्रभुः॥२६॥

‘उस नियम के समाप्त होने पर भगवान् महेश्वरदेव ने मुझे दर्शन दिया और प्रसन्न मन से कहा- ॥ २६ ॥

प्रीतोऽस्मि तव धर्मज्ञ तपसानेन सुव्रत।

मया चैतद व्रतं चीर्णं त्वया चैव धनाधिप॥२७॥

‘उत्तम व्रत का पालन करने वाले धर्मज्ञ धनेश्वर ! मैं तुम्हारी इस तपस्या से बहुत संतुष्ट हूँ। एक तो मैंने इस व्रत का आचरण किया है और दूसरे तुमने॥२७॥

तृतीयः पुरुषो नास्ति यश्चरेद् व्रतमीदृशम्।

व्रतं सुदुष्करं ह्येतन्मयैवोत्पादितं पुरा॥२८॥

‘तीसरा कोई ऐसा पुरुष नहीं है, जो ऐसे कठोर व्रत का पालन कर सके। इस अत्यन्त दुष्कर व्रत को पूर्वकाल में मैंने ही प्रकट किया था॥ २८ ॥

तत्सखित्वं मया सौम्य रोचयस्व धनेश्वर।

तपसा निर्जितश्चैव सखा भव ममानघ॥२९॥

“अतः सौम्य धनेश्वर! अब तुम मेरे साथ मित्रता का सम्बन्ध स्थापित करो, यह सम्बन्ध तुम्हें पसंद आना चाहिये। अनघ! तुमने अपने तप से मुझे जीत लिया है; अतः मेरा मित्र बनकर रहो॥ २९ ॥

देव्या दग्धं प्रभावेण यच्च सव्यं तवेक्षणम्।

पैङ्गल्यं यदवाप्तं हि देव्या रूपनिरीक्षणात्॥३०॥

एकाक्षपिङ्गलीत्येव नाम स्थास्यति शाश्वतम्।

एवं तेन सखित्वं च प्राप्यानुज्ञां च शङ्करात्॥३१॥ 

 आगतेन मया चैवं श्रुतस्ते पापनिश्चयः।

‘देवी पार्वती के रूप पर दृष्टिपात करने से देवी के प्रभाव से जो तुम्हारा बायाँ नेत्र जल गया और दूसरा नेत्र भी पिङ्गलवर्ण का हो गया, इससे सदा स्थिर रहने वाला तुम्हारा ‘एकाक्षपिङ्गली’ यह नाम चिरस्थायी होगा।’ इस प्रकार भगवान् शङ्कर के साथ मैत्री स्थापित करके उनकी आज्ञा लेकर जब मैं घर लौटा हूँ, तब मैंने तुम्हारे पापपूर्ण निश्चय की बात सुनी है।। ३०-३१ १/२॥

तदधर्मिष्ठसंयोगान्निवर्त कुलदूषणात्॥३२॥

चिन्त्यते हि वधोपायः सर्षिसङ्घः सुरैस्तव।

‘अतः अब तुम अपने कुल में कलंक लगाने वाले पापकर्म के संसर्ग से दूर हट जाओ; क्योंकि ऋषिसमुदायसहित देवता तुम्हारे वध का उपाय सोच रहे

एवमुक्तो दशग्रीवः कोपसंरक्तलोचनः॥३३॥

हस्तान् दन्तांश्च सम्पिष्य वाक्यमेतदुवाच ह।

दूत के मुँह से ऐसी बात सुनकर दशग्रीव रावण के नेत्र क्रोध से लाल हो गये। वह हाथ मलता हुआ दाँत पीसकर बोला— ॥ ३३ १/२ ॥

विज्ञातं ते मया दूत वाक्यं यत् त्वं प्रभाषसे॥३४॥

नैव त्वमसि नैवासौ भ्रात्रा येनासि चोदितः।

‘दूत! तू जो कुछ कह रहा है, उसका अभिप्राय मैंने समझ लिया। अब तो न तू जीवित रह सकता हैऔर न वह भाई ही, जिसने तुझे यहाँ भेजा है॥ ३४ १/२॥

हितं नैष ममैतद्धि ब्रवीति धनरक्षकः॥ ३५॥

महेश्वरसखित्वं तु मूढः श्रावयते किल।

‘धनरक्षक कुबेर ने जो संदेश दिया है, वह मेरे लिये हितकर नहीं है। वह मूढ़ मुझे (डराने के लिये) महादेवजी के साथ अपनी मित्रता की कथा सुना रहा है? ॥ ३५ १/२॥

नैवेदं क्षमणीयं मे यदेतद् भाषितं त्वया॥३६॥

यदेतावन्मया कालं दूत तस्य तु मर्षितम्।

न हन्तव्यो गुरुयेष्ठो मयायमिति मन्यते॥३७॥

‘दूत! तूने जो बात यहाँ कही है, यह मेरे लिये सहन करने योग्य नहीं है। कुबेर मेरे बड़े भाई हैं, अतः उनका वध करना उचित नहीं है—ऐसा समझकर ही मैंने आजतक उन्हें क्षमा किया है। ३६-३७॥

तस्य त्विदानीं श्रुत्वा मे वाक्यमेषा कृता मतिः।

त्रील्लोकानपि जेष्यामि बाहवीर्यमुपाश्रितः॥३८॥

‘किंतु इस समय उनकी बात सुनकर मैंने यह निश्चय किया है कि मैं अपने बाहुबल का भरोसा करके तीनों लोकों को जीतूंगा॥ ३८॥

एतन्मुहूर्तमेवाहं तस्यैकस्य तु वै कृते।

चतुरो लोकपालांस्तान् नयिष्यामि यमक्षयम्॥३९॥

‘इसी मुहूर्त में मैं एक के ही अपराध से उन चारों लोकपालों को यमलोक पहँचाऊँगा’ ॥ ३९॥

एवमुक्त्वा तु लङ्केशो दूतं खड्गेन जनिवान्।

ददौ भक्षयितुं ह्येनं राक्षसानां दुरात्मनाम्॥४०॥

ऐसा कहकर लङ्केश रावण ने तलवार से उस दूत के दो टुकड़े कर डाले और उसकी लाश उसने दुरात्मा राक्षसों को खाने के लिये दे दी॥ ४० ॥

ततः कृतस्वस्त्ययनो रथमारुह्य रावणः।

त्रैलोक्यविजयाकांक्षी ययौ यत्र धनेश्वरः॥४१॥

तत्पश्चात् रावण स्वस्तिवाचन करके रथ पर चढ़ा और तीनों लोकों पर विजय पाने की इच्छा से उस स्थान पर गया, जहाँ धनपति कुबेर रहते थे॥४१॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे त्रयोदशः सर्गः॥१३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्ड में तेरहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥१३॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
उत्तरकाण्डम्

मन्त्रियोंसहित रावण का यक्षों पर आक्रमण और उनकी पराजय

चतुर्दशः सर्गः

सर्ग-14


ततः स सचिवैः सार्धं षड्भिनित्यबलोद्धतः।

महोदरप्रहस्ताभ्यां मारीचशुकसारणैः॥१॥

धूम्राक्षेण च वीरेण नित्यं समरगर्द्धिना।

वृतः सम्प्रययौ श्रीमान् क्रोधाल्लोकान् दहन्निव॥२॥

(अगस्त्यजी कहते हैं-रघुनन्दन!) तदनन्तर बल के अभिमान से सदा उन्मत्त रहने वाला रावण महोदर, प्रहस्त, मारीच, शुक, सारण तथा सदा ही युद्ध की अभिलाषा रखने वाले वीर धूम्राक्ष-इन छः मन्त्रियों के साथ लङ्का से प्रस्थित हुआ। उस समय ऐसा जान पड़ता था, मानो अपने क्रोध से सम्पूर्ण लोकों को भस्म कर डालेगा॥

पुराणि स नदीः शैलान् वनान्युपवनानि च।

अतिक्रम्य मुहूर्तेन कैलासं गिरिमागमत्॥३॥

बहत-से नगरों, नदियों, पर्वतों. वनों और उपवनों को लाँघकर वह दो ही घड़ी में कैलास पर्वत पर जा पहुँचा॥

संनिविष्टं गिरौ तस्मिन् राक्षसेन्द्रं निशम्य तु।

युद्धेप्सुं तं कृतोत्साहं दुरात्मानं समन्त्रिणम्॥४॥

यक्षा न शेकुः संस्थातुं प्रमुखे तस्य रक्षसः।

राज्ञो भ्रातेति विज्ञाय गता यत्र धनेश्वरः॥५॥

यक्षों ने जब सुना कि दुरात्मा राक्षसराज रावण ने युद्ध के लिये उत्साहित होकर अपने मन्त्रियों के साथ कैलास पर्वत पर डेरा डाला है, तब वे उस राक्षस के सामने खड़े न हो सके। यह राजा का भाई है, ऐसा जानकर यक्षलोग उस स्थान पर गये, जहाँ धन के स्वामी कुबेर विद्यमान थे॥

ते गत्वा सर्वमाचख्यु तुस्तस्य चिकीर्षितम्।

अनुज्ञाता ययुर्हृष्टा युद्धाय धनदेन ते॥६॥

वहाँ जाकर उन्होंने उनके भाई का सारा अभिप्राय कह सुनाया। तब कुबेर ने युद्ध के लिये यक्षों को आज्ञा दे दी; फिर तो यक्ष बड़े हर्ष से भरकर चल दिये॥ ६॥

ततो बलानां संक्षोभो व्यवर्धत इवोदधेः।

तस्य नैर्ऋतराजस्य शैलं संचालयन्निव॥७॥

उस समय यक्षराज की सेनाएँ समुद्र के समान क्षुब्ध हो उठीं। उनके वेग से वह पर्वत हिलता-सा जान पड़ा।

ततो युद्धं समभवद् यक्षराक्षससंकुलम्।

व्यथिताश्चाभवंस्तत्र सचिवा राक्षसस्य ते॥८॥

तदनन्तर यक्षों और राक्षसों में घमासान युद्ध छिड़ गया। वहाँ रावण के वे सचिव व्यथित हो उठे॥ ८॥

स दृष्ट्वा तादृशं सैन्यं दशग्रीवो निशाचरः।

हर्षनादान् बहून् कृत्वा स क्रोधादभ्यधावत॥९॥

अपनी सेना की वैसी दुर्दशा देख निशाचर दशग्रीव बार-बार हर्षवर्धक सिंहनाद करके रोषपूर्वक यक्षों की ओर दौड़ा॥९॥

ये तु ते राक्षसेन्द्रस्य सचिवा घोरविक्रमाः।

तेषां सहस्रमेकैको यक्षाणां समयोधयत्॥१०॥

राक्षसराज के जो सचिव थे, वे बड़े भयंकर पराक्रमी थे। उनमें से एक-एक सचिव हजार-हजार यक्षों से युद्ध करने लगा।॥ १०॥

ततो गदाभिर्मुसलैरसिभिः शक्तितोमरैः।

हन्यमानो दशग्रीवस्तत्सैन्यं समगाहत॥११॥

स निरुच्छ्वासवत् तत्र वध्यमानो दशाननः।

वर्षद्भिरिव जीमूतैर्धाराभिरवरुध्यत॥१२॥

उस समय यक्ष जल की धारा गिराने वाले मेघों के समान गदाओं, मूसलों, तलवारों, शक्तियों और तोमरों की वर्षा करने लगे। उनकी चोट सहता हुआ दशग्रीव शत्रुसेना में घुसा। वहाँ उस पर इतनी मार

पड़ने लगी कि उसे दम मारने की भी फुरसत नहीं मिली। यक्षों ने उसका वेग रोक दिया। ११-१२॥

न चकार व्यथां चैव यक्षशस्त्रैः समाहतः।

महीधर इवाम्भोदैर्धाराशतसमुक्षितः॥१३॥

यक्षों के शस्त्रों से आहत होने पर भी उसने अपने मन में दुःख नहीं माना; ठीक उसी तरह, जैसे मेघों द्वारा बरसायी हुई सैकड़ों जलधाराओं से अभिषिक्त होने पर भी पर्वत विचलित नहीं होता है। १३॥

स महात्मा समुद्यम्य कालदण्डोपमां गदाम्।

प्रविवेश ततः सैन्यं नयन् यक्षान् यमक्षयम्॥१४॥

उस महाकाय निशाचर ने कालदण्ड के समान भयंकर गदा उठाकर यक्षों की सेना में प्रवेश किया और उन्हें यमलोक पहुँचाना आरम्भ कर दिया। १४॥

स कक्षमिव विस्तीर्णं शुष्कन्धनमिवाकुलम्।

वातेनाग्निरिवादीप्तो यक्षसैन्यं ददाह तत्॥१५॥

वायु से प्रज्वलित हुई अग्नि के समान रावण ने तिनकों के समान फैली और सूखे ईंधन की भाँति आकुल हुई यक्षों की सेना को जलाना आरम्भ किया।१५॥

तैस्तु तत्र महामात्यैर्महोदरशुकादिभिः।

अल्पावशेषास्ते यक्षाः कृता वातैरिवाम्बुदाः॥१६॥

जैसे हवा बादलों को उड़ा देती है, उसी तरह उन महोदर और शुक आदि महामन्त्रियों ने वहाँ यक्षों का संहार कर डाला। अब वे थोड़ी ही संख्या में बच रहे।

केचित् समाहता भग्नाः पतिताः समरे क्षितौ।

ओष्ठांश्च दशनैस्तीक्ष्णैरदशन् कुपिता रणे॥१७॥

कितने ही यक्ष शस्त्रों के आघात से अङ्ग-भङ्ग हो जाने के कारण समराङ्गण में धराशायी हो गये। कितने ही रणभूमि में कुपित हो अपने तीखे दाँतों से ओठ दबाये हुए थे॥ १७॥

श्रान्ताश्चान्योन्यमालिङ्ग्य भ्रष्टशस्त्रा रणाजिरे।

सीदन्ति च तदा यक्षाः कूला इव जलेन ह॥१८॥

कोई थककर एक-दूसरे से लिपट गये। उनके अस्त्र-शस्त्र गिर गये और वे समराङ्गण में उसी तरह शिथिल होकर गिरे जैसे जल के वेग से नदी के किनारे टूट पड़ते हैं।। १८॥

हतानां गच्छतां स्वर्गं युध्यतामथ धावताम्।

प्रेक्षतामृषिसङ्घानां न बभूवान्तरं दिवि॥१९॥

मर-मरकर स्वर्ग में जाते, जूझते और दौड़ते हुए यक्षों की तथा आकाश में खड़े होकर युद्ध देखने वाले ऋषिसमूहों की संख्या इतनी बढ़ गयी थी कि आकाश में उन सबके लिये जगह नहीं अँटती थी॥ १९॥

भग्नांस्तु तान् समालक्ष्य यक्षेन्द्रांस्तु महाबलान्।

धनाध्यक्षो महाबाहुः प्रेषयामास यक्षकान्॥२०॥

महाबाहु धनाध्यक्ष ने उन यक्षों को भागते देख दूसरे महाबली यक्षराजों को युद्ध के लिये भेजा ॥ २० ॥

एतस्मिन्नन्तरे राम विस्तीर्णबलवाहनः।

प्रेषितो न्यपतद् यक्षो नाम्ना संयोधकण्टकः॥२१॥

श्रीराम! इसी बीच में कुबेर का भेजा हुआ संयोधकण्टक नामक यक्ष वहाँ आ पहुँचा। उसके साथ बहुत-सी सेना और सवारियाँ थीं॥ २१ ॥

तेन चक्रेण मारीचो विष्णुनेव रणे हतः।

पतितो भूतले शैलात् क्षीणपुण्य इव ग्रहः॥२२॥

उसने आते ही भगवान् विष्णु की भाँति चक्र से रणभूमि में मारीच पर प्रहार किया। उससे घायल होकर वह राक्षस कैलास से नीचे पृथ्वी पर उसी तरह गिर पड़ा, जैसे पुण्य क्षीण होने पर स्वर्गवासी ग्रह वहाँ से भूतल पर गिर पड़ा हो॥ २२॥

ससंज्ञस्तु मुहूर्तेन स विश्रम्य निशाचरः।

तं यक्षं योधयामास स च भग्नः प्रदुद्रुवे॥२३॥

दो घड़ी के बाद होश में आने पर निशाचर मारीच विश्राम करके लौटा और उस यक्ष के साथ युद्ध करने लगा। तब वह यक्ष भाग खड़ा हुआ॥ २३ ॥

ततः काञ्चनचित्राङ्गं वैदूर्यरजतोक्षितम्।

मर्यादां प्रतिहाराणां तोरणान्तरमाविशत्॥ २४॥

तदनन्तर रावण ने कुबेरपुरी के फाटक में, जिसके प्रत्येक अङ्ग में सुवर्ण जड़ा हुआ था तथा जो नीलम और चाँदी से भी विभूषित था, प्रवेश किया। वहाँ द्वारपालों का पहरा लगता था। वह फाटक ही सीमा थी। उससे आगे दूसरे लोग नहीं जा सकते थे॥ २४ ॥

तं तु राजन् दशग्रीवं प्रविशन्तं निशाचरम्।

सूर्यभानुरिति ख्यातो द्वारपालो न्यवारयत्॥२५॥

महाराज श्रीराम! जब निशाचर दशग्रीव फाटक के भीतर प्रवेश करने लगा, तब सूर्यभानु नामक द्वारपाल ने उसे रोका॥ २५॥

स वार्यमाणो यक्षेण प्रविवेश निशाचरः।

यदा तु वारितो राम न व्यतिष्ठत् स राक्षसः॥२६॥

ततस्तोरणमुत्पाट्य तेन यक्षेण ताडितः।

रुधिरं प्रस्रवन् भाति शैलो धातुस्रवैरिव॥२७॥

जब यक्ष के रोकने पर भी वह निशाचर न रुका और भीतर प्रविष्ट हो गया, तब द्वारपाल ने फाटक में लगे हुए एक खंभे को उखाड़कर उसे दशग्रीव के ऊपर दे मारा। उसके शरीर से रक्त की धारा बहने लगी, मानो किसी पर्वत से गेरू मिश्रित जल का झरना गिर रहा हो।

स शैलशिखराभेण तोरणेन समाहतः।

जगाम न क्षतिं वीरो वरदानात् स्वयम्भुवः॥२८॥

पर्वतशिखर के समान प्रतीत होने वाले उस खंभे की चोट खाकर भी वीर दशग्रीव की कोई क्षति नहीं हुई। वह ब्रह्माजी के वरदान के प्रभाव से उस यक्ष के द्वारा मारा न जा सका॥ २८॥

तेनैव तोरणेनाथ यक्षस्तेनाभिताडितः।

नादृश्यत तदा यक्षो भस्मीकृततनुस्तदा ॥ २९॥

तब उसने भी वही खंभ उठाकर उसके द्वारा यक्ष पर प्रहार किया, इससे यक्षका शरीर चूर-चूर हो गया। फिर उसकी शकल नहीं दिखायी दी॥ २९॥

ततः प्रदुद्रुवुः सर्वे दृष्ट्वा रक्षःपराक्रमम्।

ततो नदीगुहाश्चैव विविशुर्भयपीडिताः।

त्यक्तप्रहरणाः श्रान्ता विवर्णवदनास्तदा॥३०॥

उस राक्षस का यह पराक्रम देखकर सभी यक्ष भाग गये। कोई नदियों में कूद पड़े और कोई भय से पीड़ित हो गुफाओं में घुस गये। सबने अपने हथियार त्याग दिये थे। सभी थक गये थे और सबके मुखों की कान्ति फीकी पड़ गयी थी॥३०॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे चतुर्दशः सर्गः॥१४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्ड में चौदहवाँ सर्ग पूरा हुआ।१४॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
उत्तरकाण्डम्

माणिभद्र तथा कुबेर की पराजय और रावण द्वारा पुष्पकविमान का अपहरण

पञ्चदशः सर्गः

सर्ग-15


ततस्ताँल्लक्ष्य वित्रस्तान् यक्षेन्द्रांश्च सहस्रशः।

धनाध्यक्षो महायक्षं माणिभद्रमथाब्रवीत्॥१॥

(अगस्त्यजी कहते हैं-रघुनन्दन!) धनाध्यक्षों ने देखा, हजारों यक्षप्रवर भयभीत होकर भाग रहे हैं; तब उन्होंने माणिभद्र नामक एक महायक्ष से कहा – ॥१॥

रावणं जहि यक्षेन्द्र दुर्वृत्तं पापचेतसम्।

शरणं भव वीराणां यक्षाणां युद्धशालिनाम्॥२॥

‘यक्षप्रवर! रावण पापात्मा एवं दुराचारी है, तुम उसे मार डालो और युद्ध में शोभा पाने वाले वीर यक्षों को शरण दो—उनकी रक्षा करो’ ॥२॥

एवमुक्तो महाबाहुर्माणिभद्रः सुदुर्जयः।

वृतो यक्षसहस्रैस्तु चतुर्भिः समयोधयत्॥३॥

महाबाहु माणिभद्र अत्यन्त दुर्जय वीर थे। कुबेर की उक्त आज्ञा पाकर वे चार हजार यक्षों की सेना साथ ले फाटक पर गये और राक्षसों के साथ युद्ध करने लगे॥३॥

ते गदामुसलप्रासैः शक्तितोमरमुद्गरैः।

अभिनन्तस्तदा यक्षा राक्षसान् समुपाद्रवन्॥४॥

उस समय यक्षयोद्धा गदा, मूसल, प्रास, शक्ति, तोमर तथा मुद्गरों का प्रहार करते हुए राक्षसों पर टूट पड़े॥४॥

कुर्वन्तस्तुमुलं युद्धं चरन्तः श्येनवल्लघु।

बाढं प्रयच्छ नेच्छामि दीयतामिति भाषिणः॥५॥

वे घोर युद्ध करते हुए बाज पक्षी की तरह तीव्रगति से सब ओर विचरने लगे। कोई कहता ‘मुझे युद्ध का अवसर दो।’ दूसरा बोलता—’मैं यहाँ से पीछे हटना नहीं चाहता।’ फिर तीसरा बोल उठता—’मुझे अपना हथियार दो’॥

ततो देवाः सगन्धर्वा ऋषयो ब्रह्मवादिनः।

दृष्ट्वा तत् तुमुलं युद्धं परं विस्मयमागमन्॥६॥

उस तुमुल युद्ध को देखकर देवता, गन्धर्व तथा ब्रह्मवादी ऋषि भी बड़े आश्चर्य में पड़ गये थे॥६॥

यक्षाणां तु प्रहस्तेन सहस्रं निहतं रणे।

महोदरेण चानिन्द्यं सहस्रमपरं हतम्॥७॥

उस रणभूमि में प्रहस्त ने एक हजार यक्षों का संहार कर डाला। फिर महोदर ने दूसरे एक सहस्र प्रशंसनीय यक्षों का विनाश किया॥७॥

क्रुद्धेन च तदा राजन् मारीचेन युयुत्सुना।

निमेषान्तरमात्रेण हे सहस्रे निपातिते॥८॥

राजन् ! उस समय कुपित हुए रणोत्सुक मारीच ने पलक मारते-मारते शेष दो हजार यक्षों को धराशायी कर दिया॥८॥

क्व च यक्षार्जवं युद्धं क्व च मायाबलाश्रयम्।

रक्षसां पुरुषव्याघ्र तेन तेऽभ्यधिका युधि॥९॥

पुरुषसिंह! कहाँ यक्षों का सरलतापूर्वक युद्ध ?और कहाँ राक्षसों का मायामय संग्राम? वे अपने मायाबल के भरोसे ही यक्षों की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली सिद्ध हुए॥९॥

धूम्राक्षेण समागम्य माणिभद्रो महारणे।

मुसलेनोरसि क्रोधात् ताडितो न च कम्पितः॥१०॥

उस महासमर में धूम्राक्ष ने आकर क्रोधपूर्वक माणिभद्र की छाती में मूसल का प्रहार किया; किंतु इससे वे विचलित नहीं हुए॥ १० ॥

ततो गदां समाविध्य माणिभद्रेण राक्षसः।

धूम्राक्षस्ताडितो मूर्ध्नि विह्वलः स पपात ह॥११॥

फिर माणिभद्र ने भी गदा घुमाकर उसे राक्षस धूम्राक्ष के मस्तक पर दे मारा। उसकी चोट से व्याकुल हो धूम्राक्ष धरती पर गिर पड़ा॥ ११॥

धूम्राक्षं ताडितं दृष्ट्वा पतितं शोणितोक्षितम्।

अभ्यधावत संग्रामे माणिभद्रं दशाननः॥१२॥

धूम्राक्ष को गदा की चोट से घायल एवं खून से लथपथ होकर पृथ्वी पर पड़ा देख दशमुख रावण ने रणभूमि में माणिभद्र पर धावा किया॥ १२ ॥

संक्रुद्धमभिधावन्तं माणिभद्रो दशाननम्।

शक्तिभिस्ताडयामास तिसृभिर्यक्षपुङ्गवः॥१३॥

‘दशानन को क्रोध में भरकर धावा करते देख यक्षप्रवर माणिभद्र ने उसके ऊपर तीन शक्तियों द्वारा प्रहार किया॥१३॥

ताडितो माणिभद्रस्य मुकुटे प्राहरद् रणे।

तस्य तेन प्रहारेण मुकुटं पार्श्वमागतम्॥१४॥

चोट खाकर रावण ने रणभूमि में माणिभद्र के मुकुट पर वार किया। उसके उस प्रहार से उनका मुकुट खिसककर बगल में आ गया॥ १४ ॥

ततः प्रभृति यक्षोऽसौ पार्श्वमौलिरभूत् किल।

तस्मिंस्तु विमुखीभूते माणिभद्रे महात्मनि।

संनादः सुमहान् राजेस्तस्मिन् शैले व्यवर्धत॥१५॥

तबसे माणिभद्र यक्ष पार्श्वमौलि के नाम से प्रसिद्ध हुए महामना माणिभद्र यक्ष युद्ध से भाग चले। राजन् ! उनके युद्ध से विमुख होते ही उस पर्वत पर राक्षसों का महान् सिंहनाद सब ओर फैल गया॥ १५ ॥

ततो दूरात् प्रददृशे धनाध्यक्षो गदाधरः।।

शुक्रप्रौष्ठपदाभ्यां च पद्मशङ्कसमावृतः॥१६॥

इसी समय धन के स्वामी गदाधारी कुबेर दूर से आते दिखायी दिये। उनके साथ शुक्र और प्रौष्ठपद नामक मन्त्री तथा शङ्क और पद्म नामक धन के अधिष्ठाता देवता भी थे॥ १६॥

स दृष्ट्वा भ्रातरं संख्ये शापाद् विभ्रष्टगौरवम्।

उवाच वचनं धीमान् युक्तं पैतामहे कुले॥१७॥

विश्रवा मुनि के शाप से क्रूर प्रकृति हो जाने के कारण जो गुरुजनों के प्रति प्रणाम आदि व्यवहार भी नहीं कर पाता था—गुरुजनोचित शिष्टाचार से भी वञ्चित था, उस अपने भाई रावण को युद्ध में उपस्थित देख बुद्धिमान् कुबेर ने ब्रह्माजी के कुल में उत्पन्न हुए पुरुष के योग्य बात कही— ॥ १७ ॥

यन्मया वार्यमाणस्त्वं नावगच्छसि दुर्मतेः।

पश्चादस्य फलं प्राप्य ज्ञास्यसे निरयं गतः॥१८॥

‘दुर्बुद्धि दशग्रीव! मेरे मना करने पर भी इस समय तुम समझ नहीं रहे हो, किंतु आगे चलकर जब इस कुकर्म का फल पाओगे और नरक में पड़ोगे, उस समय मेरी बात तुम्हारी समझ में आयेगी॥ १८ ॥

यो हि मोहाद् विषं पीत्वा नावगच्छति दुर्मतिः।

स तस्य परिणामान्ते जानीते कर्मणः फलम्॥१९॥

‘जो खोटी बुद्धिवाला पुरुष मोहवश विष को पीकर भी उसे विष नहीं समझता है, उसे उसका परिणाम प्राप्त हो जाने पर अपने किये हुए उस कर्म के फल का ज्ञान होता है॥ १९॥

दैवतानि न नन्दन्ति धर्मयुक्तेन केनचित्।

येन त्वमीदृशं भावं नीतस्तच्च न बुद्ध्यसे ॥२०॥

‘तुम्हारे किसी व्यापार से, वह तुम्हारी मान्यता के अनुसार धर्मयुक्त ही क्यों न हो, देवता प्रसन्न नहीं होते हैं; इसीलिये तुम ऐसे क्रूरभाव को प्राप्त हो गये हो, परंतु यह बात तुम्हारी समझ में नहीं आती है। २०॥

मातरं पितरं विप्रमाचार्यं चावमन्यते।

स पश्यति फलं तस्य प्रेतराजवशं गतः॥२१॥

‘जो माता, पिता, ब्राह्मण और आचार्य का अपमान करता है, वह यमराज के वश में पड़कर उस पाप का फल भोगता है॥२१॥

अध्रुवे हि शरीरे यो न करोति तपोऽर्जनम्।

स पश्चात् तप्यते मूढो मृतो गत्वाऽऽत्मनो गतिम्॥२२॥

‘यह शरीर क्षणभङ्गुर है। इसे पाकर जो तप का उपार्जन नहीं करता, वह मूर्ख मरने के बाद जब उसे अपने दुष्कर्मों का फल मिलता है, पश्चात्ताप करता

धर्माद् राज्यं धनं सौख्यमधर्माद् दुःखमेव च।

तस्माद् धर्मं सुखार्थाय कुर्यात् पापं विसर्जयेत्॥२३॥

‘धर्म से राज, धन और सुख की प्राप्ति होती है। अधर्म से केवल दुःख ही भोगना पड़ता है, अतः सुख के लिये धर्म का आचरण करे, पाप को सर्वथा त्याग दे॥

पापस्य हि फलं दुःखं तद् भोक्तव्यमिहात्मना।

तस्मादात्मापघातार्थं मूढः पापं करिष्यति॥२४॥

‘पाप का फल केवल दुःख है और उसे स्वयं ही यहाँ भोगना पड़ता है; इसलिये जो मूढ़ पाप करेगा, वह मानो स्वयं ही अपना वध कर लेगा॥२४॥

कस्यचिन्न हि दुर्बुद्धेश्छन्दतो जायते मतिः।

यादृशं कुरुते कर्म तादृशं फलमश्नुते॥२५॥

“किसी भी दुर्बुद्धि पुरुष को (शुभकर्म का अनुष्ठान और गुरुजनों की सेवा किये बिना) स्वेच्छामात्र से उत्तम बुद्धि की प्राप्ति नहीं होती। वह जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल भोगता है॥ २५ ॥

ऋद्धिं रूपं बलं पुत्रान् वित्तं शूरत्वमेव च।

प्राप्नुवन्ति नरा लोके निर्जितं पुण्यकर्मभिः॥२६॥

‘संसार के पुरुषों को समृद्धि, सुन्दर रूप, बल, वैभव, वीरता तथा पुत्र आदि की प्राप्ति पुण्यकर्मो के अनुष्ठान से ही होती है॥ २६॥

एवं निरयगामी त्वं यस्य ते मतिरीदृशी।

न त्वां समभिभाषिष्येऽसद्वृत्तेष्वेव निर्णयः॥२७॥

‘इसी प्रकार अपने दुष्कर्मो के कारण तुम्हें भी नरक में जाना पड़ेगा; क्योंकि तुम्हारी बुद्धि ऐसी पापासक्त हो रही है। दुराचारियों से बात नहीं करना चाहिये, यही शास्त्रों का निर्णय है; अतः मैं भी अब तुमसे कोई बात नहीं करूँगा’ ॥ २७॥

एवमुक्तास्ततस्तेन तस्यामात्याः समाहताः।

मारीचप्रमुखाः सर्वे विमुखा विप्रदुद्रुवुः ॥२८॥

इसी तरह की बात उन्होंने रावण के मन्त्रियों से भी कही। फिर उनपर शस्त्रों द्वारा प्रहार किया। इससे आहत होकर वे मारीच आदि सब राक्षस युद्ध से मुँह मोड़कर भाग गये॥२८॥

ततस्तेन दशग्रीवो यक्षेन्द्रेण महात्मना।

गदयाभिहतो मूर्ध्नि न च स्थानात् प्रकम्पितः॥२९॥

तदनन्तर महामना यक्षराज कुबेर ने अपनी गदा से रावण के मस्तक पर प्रहार किया। उससे आहत होकर भी वह अपने स्थान से विचलित नहीं हुआ॥ २९॥

ततस्तौ राम निघ्नन्तौ तदान्योन्यं महामृधे।

न विह्वलौ न च श्रान्तौ तावुभौ यक्षराक्षसौ॥३०॥

श्रीराम! तत्पश्चात् वे दोनों यक्ष और राक्षसकुबेर तथा रावण दोनों उस महासमर में एक-दूसरे पर प्रहार करने लगे; परंतु दोनों में से कोई भी न तो घबराता था, न थकता ही था। ३० ।।

आग्नेयमस्त्रं तस्मै स मुमोच धनदस्तदा।

राक्षसेन्द्रो वारुणेन तदस्त्रं प्रत्यवारयत्॥ ३१॥

उस समय कुबेर ने रावण पर आग्नेयास्त्र का प्रयोग किया, परंतु राक्षसराज रावण ने वारुणास्त्र के द्वारा उनके उस अस्त्र को शान्त कर दिया॥३१॥

ततो मायां प्रविष्टोऽसौ राक्षसी राक्षसेश्वरः।

रूपाणां शतसाहस्रं विनाशाय चकार च॥३२॥

तत्पश्चात् उस राक्षसराज ने राक्षसी माया का आश्रय लिया और कुबेर का विनाश करने के लिये लाखों रूप धारण कर लिया॥३२॥

व्याघ्रो वराहो जीमूतः पर्वतः सागरो द्रुमः।

यक्षो दैत्यस्वरूपी च सोऽदृश्यत दशाननः॥३३॥

उस समय दशमुख रावण बाघ, सूअर, मेघ, पर्वत, समुद्र, वृक्ष, यक्ष और दैत्य सभी रूपों में दिखायी देने लगा॥ ३३॥

बहूनि च करोति स्म दृश्यन्ते न त्वसौ ततः।

प्रतिगृह्य ततो राम महदस्त्रं दशाननः॥३४॥

जघान मूर्ध्नि धनदं व्याविद्ध्य महतीं गदाम्।

इस प्रकार वह बहुत-से रूप प्रकट करता था। वे रूप ही दिखायी देते थे, वह स्वयं दृष्टिगोचर नहीं होता था। श्रीराम! तदनन्तर दशमुख ने एक बहुत बड़ी गदा हाथ में ली और उसे घुमाकर कुबेर के मस्तक पर दे मारा ॥ ३४ १/२॥

एवं स तेनाभिहतो विह्वलः शोणितोक्षितः॥३५॥

कृत्तमूल इवाशोको निपपात धनाधिपः।

इस प्रकार रावण द्वारा आहत हो धन के स्वामी कुबेर रक्त से नहा उठे और व्याकुल हो जड़ से कटे हुए अशोक की भाँति पृथ्वी पर गिर पड़े॥ ३५ २ ॥

ततः पद्मादिभिस्तत्र निधिभिः स तदा वृतः॥

धनदोच्छ्वासितस्तैस्तु वनमानीय नन्दनम्।

तत्पश्चात् पद्म आदि निधियों के अधिष्ठाता देवताओं ने उन्हें घेरकर उठा लिया और नन्दनवन में ले जाकर चेत कराया॥ ३६ १/२ ॥

निर्जित्य राक्षसेन्द्रस्तं धनदं हृष्टमानसः॥ ३७॥

पुष्पकं तस्य जग्राह विमानं जयलक्षणम्।

इस तरह कुबेर को जीतकर राक्षसराज रावण अपने मन में बहुत प्रसन्न हुआ और अपनी विजय के चिह्न के रूप में उसने उनका पुष्पकविमान अपने अधिकार में कर लिया।

काञ्चनस्तम्भसंवीतं वैदूर्यमणितोरणम्॥ ३८॥

मुक्ताजालप्रतिच्छन्नं सर्वकालफलद्रुमम्।

उस विमान में सोने के खम्भे और वैदूर्यमणि के फाटक लगे थे। वह सब ओर से मोतियों की जाली से ढका हुआ था। उसके भीतर ऐसे-ऐसे वृक्ष लगे थे, जो सभी ऋतुओं में फल देने वाले थे॥ ३८ १/२ ॥

मनोजवं कामगमं कामरूपं विहंगमम्॥ ३९॥

मणिकाञ्चनसोपानं तप्तकाञ्चनवेदिकम्।

उसका वेग मन के समान तीव्र था। वह अपने ऊपर बैठे हुए लोगों की इच्छा के अनुसार सब जगह जा सकता था तथा चालक जैसा चाहे, वैसा छोटा या बड़ा रूप धारण कर लेता था। उस आकाशचारी विमान में मणि और सुवर्ण की सीढ़ियाँ तथा तपाये हुए सोने की वेदियाँ बनी थीं॥ ३९ १/२ ॥

देवोपवाह्यमक्षय्यं सदा दृष्टिमनःसुखम्॥४०॥

बह्वाश्चर्यं भक्तिचित्रं ब्रह्मणा परिनिर्मितम्।

वह देवताओं का ही वाहन था और टूटने फूटने वाला नहीं था। सदा देखने में सुन्दर और चित्त को प्रसन्न करने वाला था। उसके भीतर अनेक प्रकार के आश्चर्यजनक चित्र थे। उसकी दीवारों पर तरह-तरह के बेल-बूटे बने थे, जिनसे उनकी विचित्र शोभा हो रही थी। ब्रह्मा (विश्वकर्मा) ने उसका निर्माण किया था।

निर्मितं सर्वकामैस्तु मनोहरमनुत्तमम्॥४१॥

न तु शीतं न चोष्णं च सर्वर्तुसुखदं शुभम्।

स तं राजा समारुह्य कामगं वीर्यनिर्जितम्॥४२॥

जितं त्रिभुवनं मेने दर्पोत्सेकात् सुदुर्मतिः।

जित्वा वैश्रवणं देवं कैलासात् समवातरत्॥४३॥

वह सब प्रकार की मनोवाञ्छित वस्तुओं से सम्पन्न, मनोहर और परम उत्तम था न अधिक ठंडा था औरन अधिक गरम। सभी ऋतुओं में आराम पहुँचाने वाला तथा मङ्गलकारी था। अपने पराक्रम से जीते हुए उस इच्छानुसार चलने वाले विमान पर आरूढ़ हो अत्यन्त खोटी बुद्धिवाला राजा रावण अहंकारकी अधिकता से ऐसा मानने लगा कि मैंने तीनों लोकों को जीत लिया। इस प्रकार वैश्रवणदेव को पराजित करके वह कैलास से नीचे उतरा॥

स तेजसा विपुलमवाप्य तं जयं प्रतापवान् विमलकिरीटहारवान्।

रराज वै परमविमानमास्थितो निशाचरः सदसि गतो यथानलः॥४४॥

निर्मल किरीट और हार से विभूषित वह प्रतापी निशाचर अपने तेज से उस महान् विजय को पाकर उस उत्तम विमान पर आरूढ़ हो यज्ञमण्डप में प्रज्वलित होने वाले अग्निदेव की भाँति शोभा पाने लगा॥ ४४॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे पञ्चदशः सर्गः॥१५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्ड में पंद्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ।१५॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
उत्तरकाण्डम्

नन्दीश्वर का रावण को शाप, भगवान् शङ्कर द्वारा रावण का मान-भङ्ग तथा उनसे चन्द्रहास नामक खड्ग की प्राप्ति

षोडशः सर्गः

सर्ग-16


स जित्वा धनदं राम भ्रातरं राक्षसाधिपः।

महासेनप्रसूतिं तद् ययौ शरवणं महत्॥१॥

(अगस्त्यजी कहते हैं-) रघुकुलनन्दन राम ! अपने भाई कुबेर को जीतकर राक्षसराज दशग्रीव ‘शरवण’ नाम से प्रसिद्ध सरकंडों के विशाल वन में गया, जहाँ महासेन कार्तिकेयजी की उत्पत्ति हुई थी।१॥

अथापश्यद् दशग्रीवो रौक्मं शरवणं महत्।

गभस्तिजालसंवीतं द्वितीयमिव भास्करम्॥२॥

वहाँ पहुँचकर दशग्रीव ने सुवर्णमयी कान्ति से युक्त उस विशाल शरवण (सरकंडों के जंगल)-को देखा, जो किरण-समूहों से व्याप्त होने के कारण दूसरे सूर्यदेव के समान प्रकाशित हो रहा था॥२॥

स पर्वतं समारुह्य कंचिद् रम्यवनान्तरम्।

प्रेक्षते पुष्पकं तत्र राम विष्टम्भितं तदा॥३॥

उसके पास ही कोई पर्वत था, जहाँ की वनस्थली बड़ी रमणीय थी। श्रीराम! जब वह उसपर चढ़ने लगा, तब देखता है कि पुष्पकविमान की गति रुक गयी॥३॥

विष्टब्धं किमिदं कस्मान्नागमत् कामगं कृतम्।

अचिन्तयद राक्षसेन्द्रः सचिवैस्तैः समावृतः॥४॥

किंनिमित्तमिच्छया मे नेदं गच्छति पुष्पकम्।

पर्वतस्योपरिष्ठस्य कर्मेदं कस्यचिद् भवेत्॥५॥

तब वह राक्षसराज अपने उन मन्त्रियों के साथ मिलकर विचार करने लगा—’क्या कारण है कि यह पुष्पकविमान रुक गया? यह तो स्वामी की इच्छा के अनुसार चलने वाला बनाया गया है। फिर आगे क्यों नहीं बढ़ता? कौन-सा ऐसा कारण बन गया, जिससे यह पुष्पकविमान मेरी इच्छा के अनुसार नहीं चल । रहा है ? सम्भव है, इस पर्वत के ऊपर कोई रहता हो, उसीका यह कर्म हो सकता है?’॥ ४-५॥

ततोऽब्रवीत् तदा राम मारीचो बुद्धिकोविदः।

नेदं निष्कारणं राजन् पुष्पकं यन्न गच्छति॥६॥

श्रीराम! तब बुद्धिकुशल मारीच ने कहा—’राजन् ! यह पुष्पकविमान जो आगे नहीं बढ़ रहा है, इसमें कुछ-न-कुछ कारण अवश्य है। अकारण ही ऐसी घटना घटित हो गयी हो, यह बात नहीं है॥६॥

अथवा पुष्पकमिदं धनदान्नान्यवाहनम्।

अतो निस्पन्दमभवद् धनाध्यक्षविनाकृतम्॥७॥

‘अथवा यह पुष्पकविमान कुबेर के सिवा दूसरे का वाहन नहीं हो सकता, इसीलिये उनके बिना यह निश्चेष्ट हो गया है’ ।। ७॥

इति वाक्यान्तरे तस्य करालः कृष्णपिङ्गलः।

वामनो विकटो मुण्डी नन्दी ह्रस्वभुजो बली॥८॥

ततः पार्श्वमुपागम्य भवस्यानुचरोऽब्रवीत् ।

नन्दीश्वरो वचश्चेदं राक्षसेन्द्रमशङ्कितः॥९॥

उसकी इस बात के बीच में ही भगवान् शङ्कर के पार्षद नन्दीश्वर रावण के पास आ पहुँचे, जो देखने में बड़े विकराल थे। उनकी अङ्गकान्ति काले एवं पिङ्गल वर्ण की थी। वे नाटे कद के विकट रूपवाले थे। उनका मस्तक मुण्डित और भुजाएँ छोटी-छोटी थीं। वे बड़े बलवान् थे। नन्दी ने निःशङ्क होकर राक्षसराज दशग्रीव से इस प्रकार कहा- ॥ ८-९॥

निवर्तस्व दशग्रीव शैले क्रीडति शंकरः।

सुपर्णनागयक्षाणां देवगन्धर्वरक्षसाम्॥१०॥

सर्वेषामेव भूतानामगम्यः पर्वतः कृतः।

‘दशग्रीव! लौट जाओ। इस पर्वत पर भगवान् शङ्कर क्रीडा करते हैं। यहाँ सुपर्ण, नाग, यक्ष, देवता, गन्धर्व और राक्षस सभी प्राणियों का आना-जाना बंद कर दिया गया है’ ।। १० १/२॥

इति नन्दिवचः श्रुत्वा क्रोधात् कम्पितकुण्डलः॥११॥

रोषात् तु ताम्रनयनः पुष्पकादवरुह्य सः।

कोऽयं शङ्कर इत्युक्त्वा शैलमूलमुपागतः॥१२॥

नन्दी की यह बात सुनकर दशग्रीव कुपित हो उठा। उसके कानों के कुण्डल हिलने लगे। आँखें रोष से लाल हो गयीं और वह पुष्पक से उतरकर बोला —’कौन है यह शङ्कर?’ ऐसा कहकर वह पर्वत के मूलभाग में आ गया॥ ११-१२॥

सोऽपश्यन्नन्दिनं तत्र देवस्यादूरतः स्थितम्।

दीप्तं शूलमवष्टभ्य द्वितीयमिव शङ्करम्॥१३॥

वहाँ पहुँचकर उसने देखा, भगवान् शङ्कर से थोड़ी ही दूर पर चमचमाता हुआ शूल हाथ में लिये नन्दी दूसरे शिव की भाँति खड़े हैं॥ १३॥

तं दृष्ट्वा वानरमुखमवज्ञाय स राक्षसः।

प्रहासं मुमुचे तत्र सतोय इव तोयदः॥१४॥

उनका मुँह वानर के समान था। उन्हें देखकर वह निशाचर उनका तिरस्कार करता हुआ सजल जलधर के समान गम्भीर स्वर में ठहाका मारकर हँसने लगा॥ १४ ॥

तं क्रुद्धो भगवान् नन्दी शङ्करस्यापरा तनुः।

अब्रवीत् तत्र तद् रक्षो दशाननमुपस्थितम्॥१५॥

यह देख शिव के दूसरे स्वरूप भगवान् नन्दी कुपित हो वहाँ पास ही खड़े हुए निशाचर दशमुख से इस प्रकार बोले- ॥ १५॥

यस्माद् वानररूपं मामवज्ञाय दशानन।

अशनीपातसंकाशमपहासं प्रमुक्तवान्॥१६॥

तस्मान्मबीर्यसंयुक्ता मद्रूपसमतेजसः।

उत्पत्स्यन्ति वधार्थं हि कुलस्य तव वानराः॥१७॥

‘दशानन! तुमने वानररूप में मुझे देखकर मेरी अवहेलना की है और वज्रपात के समान भयानक अट्टहास किया है; अतः तुम्हारे कुल का विनाश करने के लिये मेरे ही समान पराक्रम, रूप और तेज से सम्पन्न वानर उत्पन्न होंगे॥ १६-१७॥

नखदंष्ट्रायुधाः क्रूर मनःसम्पातरंहसः।

युद्धोन्मत्ता बलोद्रिक्ताः शैला इव विसर्पिणः॥१८॥

‘क्रूर निशाचर! नख और दाँत ही उन वानरों के अस्त्र होंगे तथा मन के समान उनका तीव्र वेग होगा। वे युद्ध के लिये उन्मत्त रहने वाले और अतिशय बलशाली होंगे तथा चलते-फिरते पर्वतों के समान जान पड़ेंगे॥

ते तव प्रबलं दर्पमुत्सेधं च पृथग्विधम्।

व्यपनेष्यन्ति सम्भूय सहामात्यसुतस्य च॥१९॥

‘वे एकत्र होकर मन्त्री और पुत्रोंसहित तुम्हारे प्रबल अभिमान को और विशालकाय होने के गर्व को चूर-चूर कर देंगे॥ १९॥

किं त्विदानीं मया शक्यं हन्तुं त्वां हे निशाचर।

न हन्तव्यो हतस्त्वं हि पूर्वमेव स्वकर्मभिः ॥ २०॥

‘ओ निशाचर ! मैं तुम्हें अभी मार डालने की शक्ति रखता हूँ, तथापि तुम्हें मारना नहीं है; क्योंकि अपने कुत्सित कर्मो द्वारा तुम पहले से ही मारे जा चुके हो (अतः मरे हुए को मारने से क्या लाभ?)’ ॥ २० ॥

इत्युदीरितवाक्ये तु देवे तस्मिन् महात्मनि।

देवदुन्दुभयो नेदुः पुष्पवृष्टिश्च खाच्युता॥ २१॥

महामना भगवान् नन्दी के इतना कहते ही देवताओं की दुन्दुभियाँ बज उठीं और आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी॥ २१ ॥

अचिन्तयित्वा स तदा नन्दिवाक्यं महाबलः।

पर्वतं तु समासाद्य वाक्यमाह दशाननः॥ २२॥

परंतु महाबली दशानन ने उस समय नन्दी के उन वचनों की कोई परवा नहीं की और उस पर्वत के निकट जाकर कहा- ॥ २२॥

पुष्पकस्य गतिश्छिन्ना यत्कृते मम गच्छतः।

तमिमं शैलमुन्मूलं करोमि तव गोपते॥२३॥

‘पशुपते! जिसके कारण यात्रा करते समय मेरे पुष्पकविमान की गति रुक गयी, तुम्हारे उस पर्वतको, जो यह मेरे सामने खड़ा है, मैं जड़से उखाड़ फेंकता

केन प्रभावेण भवो नित्यं क्रीडति राजवत्।

विज्ञातव्यं न जानीते भयस्थानमुपस्थितम्॥ २४॥

‘किस प्रभाव से शङ्कर प्रतिदिन यहाँ राजा की भाँति क्रीडा करते हैं? इन्हें इस जानने योग्य बात का भी पता नहीं है कि इनके समक्ष भय का स्थान उपस्थित है’ ॥ २४॥

एवमुक्त्वा ततो राम भुजान् विक्षिप्य पर्वते।

तोलयामास तं शीघ्रं स शैलः समकम्पत ॥२५॥

श्रीराम! ऐसा कहकर दशग्रीव ने पर्वत के निचले भाग में अपनी भुजाएँ लगायीं और उसे शीघ्र उठा लेने का प्रयत्न किया। वह पर्वत हिलने लगा॥ २५ ॥

चालनात् पर्वतस्यैव गणा देवस्य कम्पिताः।

चचाल पार्वती चापि तदाश्लिष्टा महेश्वरम्॥२६॥

पर्वत के हिलने से भगवान् शङ्कर के सारे गण काँप उठे। पार्वती देवी भी विचलित हो उठीं और भगवान् शङ्कर से लिपट गयीं॥ २६॥

ततो राम महादेवो देवानां प्रवरो हरः।

पादाङ्गष्ठेन तं शैलं पीडयामास लीलया॥२७॥

श्रीराम! तब देवताओं में श्रेष्ठ पापहारी महादेव ने उस पर्वत को अपने पैर के अँगूठे से खिलवाड़ में ही दबा दिया॥ २७॥

पीडितास्तु ततस्तस्य शैलस्तम्भोपमा भुजाः।

विस्मिताश्चाभवंस्तत्र सचिवास्तस्य रक्षसः॥२८॥

फिर तो दशग्रीव की वे भुजाएँ, जो पर्वत के खंभों के समान जान पड़ती थीं, उस पहाड़ के नीचे दब गयीं। यह देख वहाँ खड़े हुए उस राक्षस के मन्त्री बड़े आश्चर्य में पड़ गये॥२८॥

रक्षसा तेन रोषाच्च भुजानां पीडनात् तथा।

मुक्तो विरावः सहसा त्रैलोक्यं येन कम्पतम्॥२९॥

उस राक्षस ने रोष तथा अपनी बाँहों की पीडा के कारण सहसा बड़े जोर से विराव-रोदन अथवा आर्तनाद किया, जिससे तीनों लोकों के प्राणी काँप उठे॥२९॥

मेनिरे वज्रनिष्पेषं तस्यामात्या युगक्षये।

तदा वर्त्मसु चलिता देवा इन्द्रपुरोगमाः॥३०॥

उसके मन्त्रियों ने समझा, अब प्रलयकाल आ गया और विनाशकारी वज्रपात होने लगा है। उस समय इन्द्र आदि देवता मार्ग में विचलित हो उठे॥ ३० ॥

समुद्राश्चापि संक्षुब्धाश्चलिताश्चापि पर्वताः।

यक्षा विद्याधराः सिद्धाः किमेतदिति चाब्रुवन्॥३१॥

समुद्रों में ज्वार आ गया। पर्वत हिलने लगे और यक्ष, विद्याधर तथा सिद्ध एक-दूसरे से पूछने लगे —’यह क्या हो गया?’ ॥ ३१॥

तोषयस्व महादेवं नीलकण्ठमुमापतिम्।

तमृते शरणं नान्यं पश्यामोऽत्र दशानन॥३२॥

तदनन्तर दशग्रीवके मन्त्रियों ने उससे कहा —’महाराज दशानन! अब आप नीलकण्ठ उमावल्लभ महादेवजी को संतुष्ट कीजिये। उनके सिवा दूसरे किसी को हम ऐसा नहीं देखते, जो यहाँ आपको शरण दे सके॥३२॥

स्तुतिभिः प्रणतो भूत्वा तमेव शरणं व्रज।

कृपालुः शङ्करस्तुष्टः प्रसादं ते विधास्यति॥३३॥

‘आप स्तुतियों द्वारा उन्हें प्रणाम करके उन्हीं की शरण में जाइये। भगवान् शङ्कर बड़े दयालु हैं। वे संतुष्ट होकर आप पर कृपा करेंगे’ ॥ ३३॥

एवमुक्तस्तदामात्यैस्तुष्टाव वृषभध्वजम्।

सामभिर्विविधैः स्तोत्रैः प्रणम्य स दशाननः।

संवत्सरसहस्रं तु रुदतो रक्षसो गतम्॥३४॥

मन्त्रियों के ऐसा कहने पर दशमुख रावण ने भगवान् वृषभध्वज को प्रणाम करके नाना प्रकार के स्तोत्रों तथा सामवेदोक्त मन्त्रों द्वारा उनका स्तवन किया। इस प्रकार हाथों की पीड़ा से रोते और स्तुति करते हुए उस राक्षस के एक हजार वर्ष बीत गये॥ ३४ ॥

ततः प्रीतो महादेवः शैलाग्रे विष्ठितः प्रभुः।

मुक्त्वा चास्य भुजान् राम प्राह वाक्यं दशाननम्॥३५॥

श्रीराम! तत्पश्चात् उस पर्वत के शिखर पर स्थित हुए भगवान् महादेव प्रसन्न हो गये। उन्होंने दशग्रीव की भुजाओं को उस संकट से मुक्त करके उससे कहा-

प्रीतोऽस्मि तव वीरस्य शौटीर्याच्च दशानन।

शैलाक्रान्तेन यो मुक्तस्त्वया रावः सुदारुणः॥३६॥

यस्माल्लोकत्रयं चैतद् रावितं भयमागतम्।

तस्मात् त्वं रावणो नाम नाम्ना राजन् भविष्यसि॥३७॥

‘दशानन ! तुम वीर हो। तुम्हारे पराक्रम से मैं प्रसन्न हूँ। तुमने पर्वत से दब जाने के कारण जो अत्यन्तभयानक राव (आर्तनाद) किया था, उससे भयभीत होकर तीनों लोकों के प्राणी रो उठे थे, इसलिये राक्षसराज! अब तुम रावण के नाम से प्रसिद्ध हो ओगे॥३६-३७॥

देवता मानुषा यक्षा ये चान्ये जगतीतले।

एवं त्वामभिधास्यन्ति रावणं लोकरावणम्॥३८॥

‘देवता, मनुष्य, यक्ष तथा दूसरे जो लोग भूतल पर निवास करते हैं, वे सब इस प्रकार समस्त लोकों को रुलाने वाले तुझ दशग्रीव को रावण कहेंगे॥ ३८॥

गच्छ पौलस्त्य विस्रब्धं पथा येन त्वमिच्छसि।

मया चैवाभ्यनुज्ञातो राक्षसाधिप गम्यताम्॥३९॥

‘पुलस्त्यनन्दन ! अब तुम जिस मार्ग से जाना चाहो, बेखट के जा सकते हो। राक्षसपते ! मैं भी तुम्हें अपनी ओर से जाने की आज्ञा देता हूँ, जाओ’ ॥ ३९॥

एवमुक्तस्तु लङ्केशः शम्भुना स्वयमब्रवीत्।

प्रीतो यदि महादेव वरं मे देहि याचतः॥४०॥

भगवान् शङ्कर के ऐसा कहने पर लङ्केश्वर बोला —’महादेव! यदि आप प्रसन्न हैं तो वर दीजिये। मैं आपसे वर की याचना करता हूँ॥ ४०॥

अवध्यत्वं मया प्राप्तं देवगन्धर्वदानवैः।

राक्षसैर्गुह्यकै गैर्ये चान्ये बलवत्तराः॥४१॥

‘मैंने देवता, गन्धर्व, दानव, राक्षस, गुह्यक, नाग तथा अन्य महाबलशाली प्राणियों से अवध्य होने का वर प्राप्त किया है॥४१॥

मानुषान् न गणे देव स्वल्पास्ते मम सम्मताः।

दीर्घमायुश्च मे प्राप्तं ब्रह्मणस्त्रिपुरान्तक॥४२॥

वाञ्छितं चायुषः शेषं शस्त्रं त्वं च प्रयच्छ मे।

‘देव! मनुष्यों को तो मैं कुछ गिनता ही नहीं। मेरी मान्यता के अनुसार उनकी शक्ति बहुत थोड़ी है। । त्रिपुरान्तक! मुझे ब्रह्माजी के द्वारा दीर्घ आयु भी प्राप्त हुई है। ब्रह्माजी की दी हुई आयु का जितना अंश बच गया है, वह भी पूरा-का-पूरा प्राप्त हो जाय (उसमें किसी कारण से कमी न हो)। ऐसी मेरी इच्छा है। इसे आप पूर्ण कीजिये। साथ ही अपनी ओर से मुझे एक शस्त्र भी दीजिये’॥ ४२ १/२॥

एवमुक्तस्ततस्तेन रावणेन स शङ्करः॥४३॥

ददौ खड्गं महादीप्तं चन्द्रहासमिति श्रुतम्।

आयुषश्चावशेषं च ददौ भूतपतिस्तदा॥४४॥

रावण के ऐसा कहने पर भूतनाथ भगवान् शङ्कर ने उसे एक अत्यन्त दीप्तिमान् चन्द्रहास नामक खड्ग दिया और उसकी आयु का जो अंश बीत गया था, उसको भी पूर्ण कर दिया॥ ४३-४४॥

दत्त्वोवाच ततः शम्भु वज्ञेयमिदं त्वया।

अवज्ञातं यदि हि ते मामेवैष्यत्यसंशयः॥४५॥

उस खड्ग को देकर भगवान् शिव ने कहा—’तुम्हें कभी इसका तिरस्कार नहीं करना चाहिये। यदि तुम्हारे द्वारा कभी इसका तिरस्कार हुआ तो यह फिर मेरे ही पास लौट आयेगा; इसमें संशय नहीं है’। ४५॥

एवं महेश्वरेणैव कृतनामा स रावणः।

अभिवाद्य महादेवमारुरोहाथ पुष्पकम्॥ ४६॥

इस प्रकार भगवान् शङ्कर से नूतन नाम पाकर रावण ने उन्हें प्रणाम किया। तत्पश्चात् वह पुष्पकविमान पर आरूढ़ हुआ॥ ४६॥

ततो महीतलं राम पर्यक्रामत रावणः।

क्षत्रियान् सुमहावीर्यान् बाधमानस्ततस्ततः॥४७॥

श्रीराम! इसके बाद रावण समूची पृथ्वी पर दिग्विजयके लिये भ्रमण करने लगा। उसने इधर उधर जाकर बहुत-से महापराक्रमी क्षत्रियों को पीड़ा पहुँचायी॥४७॥

केचित् तेजस्विनः शूराः क्षत्रिया युद्धदुर्मदाः।

तच्छासनमकुर्वन्तो विनेशुः सपरिच्छदाः॥४८॥

कितने ही तेजस्वी क्षत्रिय जो बड़े ही शूरवीर और रणोन्मत्त थे, रावण की आज्ञा न मानने के कारण सेना और परिवारसहित नष्ट हो गये॥४८॥

अपरे दुर्जयं रक्षो जानन्तः प्राज्ञसम्मताः।

जिताः स्म इत्यभाषन्त राक्षसं बलदर्पितम्॥४९॥

दूसरे क्षत्रियों ने, जो बुद्धिमान् माने जाते थे और उस राक्षस को अजेय समझते थे, उस बलाभिमानी निशाचर के सामने अपनी पराजय स्वीकार कर ली।४९॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे षोडशः सर्गः॥१६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्ड में सोलहवाँ सर्ग पूरा हुआ।१६॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
उत्तरकाण्डम्

रावण से तिरस्कृत ब्रह्मर्षि कन्या वेदवती का उसे शाप देकर अग्नि में प्रवेश करना और दूसरे जन्म में सीता के रूप में प्रादुर्भूत होना

सप्तदशः सर्गः

सर्ग-17


अथ राजन् महाबाहुर्विचरन् पृथिवीतले।

हिमवदनमासाद्य परिचक्राम रावणः॥१॥

(अगस्त्यजी कहते हैं-) राजन्! तत्पश्चात् महाबाहु रावण भूतल पर विचरता हुआ हिमालय के वन में आकर वहाँ सब ओर चक्कर लगाने लगा॥१॥

तत्रापश्यत् स वै कन्यां कृष्णाजिनजटाधराम्।

आर्षेण विधिना चैनां दीप्यन्ती देवतामिव॥२॥

वहाँ उसने एक तपस्विनी कन्या को देखा, जो अपने अङ्गों में काले रंग का मृगचर्म तथा सिर पर जटा धारण किये हुए थी। वह ऋषिप्रोक्त विधि से तपस्या में संलग्न हो देवाङ्गना के समान उद्दीप्त हो रही थी॥२॥

स दृष्ट्वा रूपसम्पन्नां कन्यां तां सुमहाव्रताम्।

काममोहपरीतात्मा पप्रच्छ प्रहसन्निव॥३॥

उत्तम एवं महान् व्रत का पालन करने वाली तथा रूप-सौन्दर्य से सुशोभित उस कन्याको देखकर रावण का चित्त कामजनित मोह के वशीभूत हो गया। उसने अट्टहास करते हुए-से पूछा- ॥३॥

किमिदं वर्तसे भद्रे विरुद्धं यौवनस्य ते।

नहि युक्ता तवैतस्य रूपस्यैवं प्रतिक्रिया॥४॥

‘भद्रे! तुम अपनी इस युवावस्था के विपरीत यह कैसा बर्ताव कर रही हो? तुम्हारे इस दिव्य रूप के लिये ऐसा आचरण कदापि उचित नहीं है॥४॥

रूपं तेऽनुपमं भीरु कामोन्मादकरं नृणाम्।

न युक्तं तपसि स्थातुं निर्गतो ह्येष निर्णयः॥५॥

‘भीरु ! तुम्हारे इस रूप की कहीं तुलना नहीं है। यह पुरुषों के हृदय में कामजनित उन्माद पैदा करने वाला है। अतः तुम्हारा तप में संलग्न होना उचित नहीं है। तुम्हारे लिये हमारे हृदय से यही निर्णय प्रकट हुआ है॥५॥

कस्यासि किमिदं भद्रे कश्च भर्ता वरानने।

येन सम्भुज्यसे भीरु स नरः पुण्यभाग् भुवि॥

पृच्छतः शंस मे सर्वं कस्य हेतोः परिश्रमः।

‘भद्रे! तुम किसकी पुत्री हो? यह कौन-सा व्रत कर रही हो? सुमुखि! तुम्हारा पति कौन है? भीरु ! जिसके साथ तुम्हारा सम्बन्ध है, वह मनुष्य इस भूलोक में महान् पुण्यात्मा है। मैं जो कुछ पूछता हूँ, वह सब मुझे बताओ। किस फल के लिये यह परिश्रम किया जा रहा है ?’ ॥ ६ १/२॥

एवमुक्ता तु सा कन्या रावणेन यशस्विनी॥७॥

अब्रवीद् विधिवत् कृत्वा तस्यातिथ्यं तपोधना।

रावण के इस प्रकार पूछने पर वह यशस्विनी तपोधनाकन्या उसका विधिवत् आतिथ्य-सत्कार करके बोली- ॥ ७ १/२॥

कुशध्वजो नाम पिता ब्रह्मर्षिरमितप्रभः॥८॥

बृहस्पतिसुतः श्रीमान् बुद्ध्या तुल्यो बृहस्पतेः।

‘अमिततेजस्वी ब्रह्मर्षि श्रीमान् कुशध्वज मेरे पिता थे, जो बृहस्पति के पुत्र थे और बुद्धि में भी उन्हीं के समान माने जाते थे। ८ १/२॥

तस्याहं कुर्वतो नित्यं वेदाभ्यासं महात्मनः॥९॥

सम्भूता वाङ्मयी कन्या नाम्ना वेदवती स्मृता।

‘प्रतिदिन वेदाभ्यास करने वाले उन महात्मा पिता से वाङ्मयी कन्या के रूप में मेरा प्रादुर्भाव हुआ था। मेरा नाम वेदवती है॥९ १/२॥

ततो देवाः सगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः॥१०॥

ते चापि गत्वा पितरं वरणं रोचयन्ति मे।

‘जब मैं बड़ी हुई, तब देवता, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और नाग भी पिताजी के पास जा-जाकर उनसे मुझे माँगने लगे॥ १० १/२ ॥

न च मां स पिता तेभ्यो दत्तवान् राक्षसेश्वर ॥११॥

कारणं तद् वदिष्यामि निशामय महाभुज।

‘महाबाहु राक्षसेश्वर! पिताजी ने उनके हाथ में मुझे नहीं सौंपा। इसका क्या कारण था, मैं बता रही हूँ, सुनिये॥ ११ १/२॥

पितुस्तु मम जामाता विष्णुः किल सुरेश्वरः॥१२॥

अभिप्रेतस्त्रिलोकेशस्तस्मान्नान्यस्य मे पिता।

दातुमिच्छति तस्मै तु तच्छ्रुत्वा बलदर्पितः॥१३॥

शम्भुर्नाम ततो राजा दैत्यानां कुपितोऽभवत्।

तेन रात्रौ शयानो मे पिता पापेन हिंसितः॥१४॥

‘पिताजी की इच्छा थी कि तीनों लोकों के स्वामी देवेश्वर भगवान् विष्णु मेरे दामाद हों। इसीलिये वे दूसरे किसी के हाथ में मुझे नहीं देना चाहते थे। उनके इस अभिप्राय को सुनकर बलाभिमानी दैत्यराज शम्भु उन पर कुपित हो उठा और उस पापी ने रात में सोते समय मेरे पिताजी की हत्या कर डाली॥ १२–१४ ॥

ततो मे जननी दीना तच्छरीरं पितुर्मम।

परिष्वज्य महाभागा प्रविष्टा हव्यवाहनम्॥१५॥

‘इससे मेरी महाभागा माता को बड़ा दुःख हुआ और वे पिताजी के शव को हृदय से लगाकर चिता की आग में प्रविष्ट हो गयीं॥ १५ ॥

ततो मनोरथं सत्यं पितुर्नारायणं प्रति।

करोमीति तमेवाहं हृदयेन समुद्रहे ॥१६॥

‘तब से मैंने प्रतिज्ञा कर ली है कि भगवान् नारायण के प्रति पिताजी का जो मनोरथ था, उसे मैं सफल करूँगी। इसलिये मैं उन्हीं को अपने हृदयमन्दिर में धारण करती हूँ॥ १६॥

इति प्रतिज्ञामारुह्य चरामि विपुलं तपः।

एतत् ते सर्वमाख्यातं मया राक्षसपुङ्गव॥१७॥

‘यही प्रतिज्ञा करके मैं यह महान् तप कर रही हूँ। राक्षसराज! आपके प्रश्न के अनुसार यह सब बात मैंने आपको बता दी॥ १७॥

नारायणो मम पतिर्न त्वन्यः पुरुषोत्तमात्।

आश्रये नियमं घोरं नारायणपरीप्सया॥१८॥

‘नारायण ही मेरे पति हैं। उन पुरुषोत्तम के सिवा दूसरा कोई मेरा पति नहीं हो सकता। उन नारायणदेव को प्राप्त करने के लिये ही मैंने इस कठोर व्रत का आश्रय लिया है।॥ १८ ॥

विज्ञातस्त्वं हि मे राजन् गच्छ पौलस्त्यनन्दन।

जानामि तपसा सर्वं त्रैलोक्ये यद्धि वर्तते॥१९॥

‘राजन्! पौलस्त्यनन्दन! मैंने आपको पहचान लिया है। आप जाइये त्रिलोकी में जो कोई भी वस्तु विद्यमान है, वह सब मैं तपस्या द्वारा जानती हूँ’॥ १९॥

सोऽब्रवीद् रावणो भूयस्तां कन्यां सुमहाव्रताम्।

अवरुह्य विमानाग्रात् कन्दर्पशरपीडितः॥२०॥

यह सुनकर रावण कामबाण से पीड़ित हो विमान से उतर गया और उस उत्तम एवं महान् व्रत का पालन करने वाली कन्या से फिर बोला— ॥२०॥

अवलिप्तासि सुश्रोणि यस्यास्ते मतिरीदृशी।

वृद्धानां मृगशावाक्षि भ्राजते पुण्यसंचयः॥२१॥

‘सुश्रोणि! तुम गर्वीली जान पड़ती हो, तभी तो तुम्हारी बुद्धि ऐसी हो गयी है। मृगशावकलोचने! इस तरह पुण्य का संग्रह बूढ़ी स्त्रियों को ही शोभा देता है, तुम-जैसे युवती को नहीं ॥ २१॥

त्वं सर्वगुणसम्पन्ना नार्हसे वक्तुमीदृशम्।

त्रैलोक्यसुन्दरी भीरु यौवनं तेऽतिवर्तते ॥ २२॥

‘तुम तो सर्वगुणसम्पन्न एवं त्रिलोकी की अद्वितीय सुन्दरी हो। तुम्हें ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये। भीरु ! तुम्हारी जवानी बीती जा रही है॥२२॥

अहं लङ्कापतिर्भद्रे दशग्रीव इति श्रुतः।

तस्य मे भव भार्या त्वं भुक्ष्व भोगान् यथासुखम्॥२३॥

‘भद्रे! मैं लङ्का का राजा हूँ। मेरा नाम दशग्रीव है। तुम मेरी भार्या हो जाओ और सुखपूर्वक उत्तम भोग भोगो॥ २३॥

कश्च तावदसौ यं त्वं विष्णुरित्यभिभाषसे।

वीर्येण तपसा चैव भोगेन च बलेन च॥२४॥

स मया नो समो भद्रे यं त्वं कामयसेऽङ्गने।

‘पहले यह तो बताओ, तुम जिसे विष्णु कहती है, वह कौन है ? अङ्गने! भद्रे! तुम जिसे चाहती हो, वह बल, पराक्रम, तप और भोग-वैभव के द्वारा मेरी समानता नहीं कर सकता’ ॥ २४ १/२ ॥

इत्युक्तवति तस्मिंस्तु वेदवत्यथ साब्रवीत्॥२५॥

मा मैवमिति सा कन्या तमुवाच निशाचरम्।

उसके ऐसा कहने पर कुमारी वेदवती उस निशाचर से बोली—’नहीं, नहीं, ऐसा न कहो॥ २५ १/२॥

त्रैलोक्याधिपतिं विष्णुं सर्वलोकनमस्कृतम्॥२६॥

त्वदृते राक्षसेन्द्रान्यः कोऽवमन्येत बुद्धिमान्।

‘राक्षसराज! भगवान् विष्णु तीनों लोकों के अधिपति हैं। सारा संसार उनके चरणों में मस्तक झुकाता है। तुम्हारे सिवा दूसरा कौन पुरुष है, जो बुद्धिमान् होकर भी उनकी अवहेलना करेगा’ ॥ २६ १/२॥

एवमुक्तस्तया तत्र वेदवत्या निशाचरः॥२७॥

मूर्धजेषु तदा कन्यां कराग्रेण परामृशत्।

वेदवती के ऐसा कहने पर उस राक्षस ने अपने हाथ से उस कन्या के केश पकड़ लिये॥ २७ १/२॥

ततो वेदवती क्रुद्धा केशान् हस्तेन साच्छिनत्॥२८॥

असिर्भूत्वा करस्तस्याः केशांश्छिन्नांस्तदाकरोत्।

इससे वेदवती को बड़ा क्रोध हुआ। उसने अपने हाथ से उन केशों को काट दिया। उसके हाथ ने तलवार बनकर तत्काल उसके केशों को मस्तक से अलग कर दिया। २८ १/२॥

सा ज्वलन्तीव रोषेण दहन्तीव निशाचरम्॥२९॥

उवाचाग्निं समाधाय मरणाय कृतत्वरा।

वेदवती रोष से प्रज्वलित-सी हो उठी। वह जल मरने के लिये उतावली हो अग्नि की स्थापना करके उस निशाचर को दग्ध करती हुई-सी बोली— ॥ २९ १/२॥

धर्षितायास्त्वयानार्य न मे जीवितमिष्यते॥३०॥

रक्षस्तस्मात् प्रवेक्ष्यामि पश्यतस्ते हुताशनम्।

‘नीच राक्षस! तूने मेरा तिरस्कार किया है; अतः अब इस जीवन को सुरक्षित रखना मुझे अभीष्ट नहीं है। इसलिये तेरे देखते-देखते मैं अग्नि में प्रवेश कर जाऊँगी॥

यस्मात् तु धर्षिता चाहं त्वया पापात्मना वने॥३१॥

तस्मात् तव वधार्थं हि समुत्पत्स्ये ह्यहं पुनः।

“तुझ पापात्मा ने इस वन में मेरा अपमान किया है। इसलिये मैं तेरे वध के लिये फिर उत्पन्न होऊँगी॥ ३११/२॥

नहि शक्यः स्त्रिया हन्तुं पुरुषः पापनिश्चयः॥३२॥

शापे त्वयि मयोत्सृष्टे तपसश्च व्ययो भवेत्।

‘स्त्री अपनी शारीरिक शक्ति से किसी पापाचारी पुरुष का वध नहीं कर सकती। यदि मैं तुझे शाप दूँ तो मेरी तपस्या क्षीण हो जायगी॥ ३२ १/२॥

यदि त्वस्ति मया किंचित् कृतं दत्तं हुतं तथा॥३३॥

तस्मात् त्वयोनिजा साध्वी भवेयं धर्मिणः सुता।

‘यदि मैंने कुछ भी सत्कर्म, दान और होम किये हों तो अगले जन्म में मैं सती-साध्वी अयोनिजा कन्या के रूप में प्रकट होऊँ तथा किसी धर्मात्मा पिता की पुत्री बनूँ॥

एवमुक्त्वा प्रविष्टा सा ज्वलितं जातवेदसम्॥३४॥

पपात च दिवो दिव्या पुष्पवृष्टिः समन्ततः।

ऐसा कहकर वह प्रज्वलित अग्नि में समा गयी। उस समय उसके चारों ओर आकाश से दिव्य पुष्पों की वर्षा होने लगी॥ ३४ १/२ ॥

पुनरेव समुद्भूता पद्मे पद्मसमप्रभा॥३५॥

तस्मादपि पुनः प्राप्ता पूर्ववत् तेन रक्षसा।

तदनन्तर दूसरे जन्म में वह कन्या पुनः एक कमल से प्रकट हुई। उस समय उसकी कान्ति कमल के समान ही सुन्दर थी। उस राक्षस ने पहले की ही भाँति फिर वहाँ से भी उस कन्या को प्राप्त कर लिया॥ ३५ १/२॥

कन्यां कमलगर्भाभां प्रगृह्य स्वगृहं ययौ॥३६॥

प्रगृह्य रावणस्त्वेतां दर्शयामास मन्त्रिणे।।

कमल के भीतरी भाग के समान सुन्दर कान्तिवाली उस कन्या को लेकर रावण अपने घर गया। वहाँ उसने मन्त्री को वह कन्या दिखायी॥ ३६ १/२॥

लक्षणज्ञो निरीक्ष्यैव रावणं चैवमब्रवीत्॥३७॥

गृहस्थैषा हि सुश्रोणी त्वदधायैव दृश्यते।

मन्त्री बालक-बालिकाओं के लक्षणों को जानने वाला था। उसने उसे अच्छी तरह देखकर रावण से कहा—’राजन्! यह सुन्दरी कन्या यदि घर में रही तो आपके वध का ही कारण होगी, ऐसा लक्षण देखा जाता है’।

एतच्छ्रत्वार्णवे राम तां प्रचिक्षेप रावणः॥३८॥

सा चैव क्षितिमासाद्य यज्ञायतनमध्यगा।

राज्ञो हलमुखोत्कृष्टा पुनरप्युत्थिता सती॥ ३९॥

श्रीराम! यह सुनकर रावण ने उसे समुद्र में फेंक दिया। तत्पश्चात् वह भूमि को प्राप्त होकर राजा जनक के यज्ञमण्डप के मध्यवर्ती भूभाग में जा पहुंची। वहाँ राजा के हलके मुखभाग से उस भूभाग के जोते जाने पर वह सती साध्वी कन्या फिर प्रकट हो गयी। ३८-३९॥

सैषा जनकराजस्य प्रसूता तनया प्रभो।

तव भार्या महाबाहो विष्णुस्त्वं हि सनातनः॥४०॥

प्रभो! वही यह वेदवती महाराज जनक की पुत्री के रूप में प्रादुर्भूत हो आपकी पत्नी हुई है। महाबाहो! आप ही सनातन विष्णु हैं॥ ४० ॥

पूर्वं क्रोधहतः शत्रुर्ययासौ निहतस्तया।

उपाश्रयित्वा शैलाभस्तव वीर्यममानुषम्॥४१॥

उस वेदवती ने पहले ही अपने रोषजनित शाप के द्वारा आपके उस पर्वताकार शत्रु को मार डाला था, जिसे अब आपने आक्रमण करके मौत के घाट उतारा है। प्रभो! आपका पराक्रम अलौकिक है॥४१॥

एवमेषा महाभागा मर्येषूत्पत्स्यते पुनः।

क्षेत्रे हलमुखोत्कृष्टे वेद्यामग्निशिखोपमा॥४२॥

इस प्रकार यह महाभागा देवी विभिन्न कल्पों में पुनः रावणवध के उद्देश्य से मर्त्यलोक में अवतीर्ण होती रहेगी। यज्ञवेदी पर अग्निशिखा के समान हल से जोते गये क्षेत्र में इसका आविर्भाव हुआ है॥४२॥

एषा वेदवती नाम पूर्वमासीत् कृते युगे।

त्रेतायुगमनुप्राप्य वधार्थं तस्य रक्षसः॥४३॥

उत्पन्ना मैथिलकुले जनकस्य महात्मनः।

सीतोत्पन्ना तु सीतेति मानुषैः पुनरुच्यते॥४४॥

यह वेदवती पहले सत्ययुग में प्रकट हुई थी। फिर त्रेतायुग आने पर उस राक्षस रावण के वध के लिये मिथिलावर्ती राजा जनक के कुल में सीतारूप से अवतीर्ण हुई। सीता (हल जोतने से भूमि पर बनी हुई रेखा)-से उत्पन्न होने के कारण मनुष्य इस देवी को सीता कहते हैं।

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे सप्तदशः सर्गः॥१७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्ड में सत्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ।१७॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
उत्तरकाण्डम्

रावण द्वारा मरुत्त की पराजय तथा इन्द्र आदि देवताओं का मयूर आदि पक्षियों को वरदान देना

अष्टादशः सर्गः

सर्ग-18


प्रविष्टायां हुताशं तु वेदवत्यां स रावणः।

पुष्पकं तु समारुह्य परिचक्राम मेदिनीम्॥१॥

अगस्त्यजी कहते हैं रघुनन्दन! वेदवती के अग्नि में प्रवेश कर जाने पर रावण पुष्पकविमान पर आरूढ़ हो पृथ्वी पर सब ओर भ्रमण करने लगा।१॥

ततो मरुत्तं नृपतिं यजन्तं सह दैवतैः।

उशीरबीजमासाद्य ददर्श स तु रावणः॥२॥

उसी यात्रा में उशीर बीज नामक देश में पहुंचकर रावण ने देखा, राजा मरुत्त देवताओं के साथ बैठकर यज्ञ कर रहे हैं॥२॥

संवर्तो नाम ब्रह्मर्षिः साक्षाद् भ्राता बृहस्पतेः।

याजयामास धर्मज्ञः सर्वैर्देवगणैर्वृतः॥३॥

उस समय साक्षात् बृहस्पति के भाई तथा धर्मके मर्म को जानने वाले ब्रह्मर्षि संवर्त सम्पूर्ण देवताओं से घिरे रहकर वह यज्ञ करा रहे थे॥३॥

दृष्ट्वा देवास्तु तद् रक्षो वरदानेन दुर्जयम्।

तिर्यग्योनिं समाविष्टास्तस्य धर्षणभीरवः॥४॥

ब्रह्माजी के वरदान से जिसको जीतना कठिन हो गया था, उस राक्षस रावण को वहाँ देखकर उसके आक्रमण से भयभीत हो देवता लोग तिर्यग्-योनि में प्रवेश कर गये॥४॥

इन्द्रो मयूरः संवृत्तो धर्मराजस्तु वायसः।

कृकलासो धनाध्यक्षो हंसश्च वरुणोऽभवत्॥

इन्द्र मोर, धर्मराज कौआ, कुबेर गिरगिट और वरुण हंस हो गये॥५॥

अन्वेष्वपि गतेष्वेवं देवेष्वरिनिषूदन।

रावणः प्राविशद् यज्ञं सारमेय इवाशुचिः॥६॥

शत्रुसूदन श्रीराम! इसी तरह दूसरे-दूसरे देवता भी जब विभिन्न रूपों में स्थित हो गये, तब रावण ने उस यज्ञमण्डप में प्रवेश किया, मानो कोई अपवित्र कुत्ता वहाँ आ गया हो॥६॥

तं च राजानमासाद्य रावणो राक्षसाधिपः।

प्राह युद्धं प्रयच्छेति निर्जितोऽस्मीति वा वद॥७॥

राजा मरुत्त के पास पहुँचकर राक्षसराज रावण ने कहा—’मुझसे युद्ध करो या अपने मुँह से यह कह दो कि मैं पराजित हो गया’॥७॥

ततो मरुत्तो नृपतिः को भवानित्युवाच तम्।

अवहासं ततो मुक्त्वा रावणो वाक्यमब्रवीत्॥८॥

तब राजा मरुत्त ने पूछा—’आप कौन हैं?’ उनका प्रश्न सुनकर रावण हँस पड़ा और बोला- ॥८॥

अकुतूहलभावेन प्रीतोऽस्मि तव पार्थिव।

धनदस्यानुजं यो मां नावगच्छसि रावणम्॥९॥

‘भूपाल ! मैं कुबेर का छोटा भाई रावण हूँ। फिर भी तुम मुझे नहीं जानते और मुझे देखकर भी तुम्हारे मन में न तो कौतूहल हुआ, न भय ही; इससे मैं तुम्हारे ऊपर बहुत प्रसन्न हूँ॥९॥

त्रिषु लोकेषु कोऽन्योऽस्ति यो न जानाति मे बलम्।

भ्रातरं येन निर्जित्य विमानमिदमाहृतम्॥१०॥

‘तीनों लोकों में तुम्हारे सिवा दूसरा कौन ऐसा राजा होगा, जो मेरे बलको न जानता हो। मैं वह रावण हूँ, जिसने अपने भाई कुबेर को जीतकर यह विमान छीन लिया है’ ॥ १०॥

ततो मरुत्तः स नृपस्तं रावणमथाब्रवीत्।

धन्यः खलु भवान् येन ज्येष्ठो भ्राता रणे जितः॥११॥

तब राजा मरुत्त ने रावण से कहा—’तुम धन्य हो, जिसने अपने बड़े भाई को रणभूमि में पराजित कर दिया॥११॥

न त्वया सदृशः श्लाघ्यस्त्रिषु लोकेषु विद्यते।

कं त्वं प्राक् केवलं धर्मं चरित्वा लब्धवान् वरम्॥१२॥

‘तुम्हारे-जैसा स्पृहणीय पुरुष तीनों लोकों में दूसरा कोई नहीं है। तुमने पूर्वकाल में किस शुद्ध धर्म का आचरण करके वर प्राप्त किया है॥ १२॥

श्रुतपूर्वं हि न मया भाषसे यादृशं स्वयम्।

तिष्ठेदानीं न मे जीवन् प्रतियास्यसि दुर्मते॥१३॥

अद्य त्वां निशितैर्बाणैः प्रेषयामि यमक्षयम्।

‘तुम स्वयं जो कुछ कह रहे हो, ऐसी बात मैंने पहले कभी नहीं सुनी है। दुर्बुद्धे ! इस समय खड़े तो रहो। मेरे हाथ से जीवित बचकर नहीं जा सकोगे। आज अपने पैने बाणों से मारकर तुम्हें यमलोक पहुँचाये देता हूँ’॥ १३ १/२॥

ततः शरासनं गृह्य सायकांश्च नराधिपः॥१४॥

रणाय निर्ययौ क्रुद्धः संवर्तो मार्गमावृणोत्।

तदनन्तर राजा मरुत्त धनुष-बाण लेकर बड़े रोष के साथ युद्ध के लिये निकले, परंतु महर्षि संवर्त ने उनका रास्ता रोक लिया॥१४ १/२॥

सोऽब्रवीत् स्नेहसंयुक्तं मरुत्तं तं महानृषिः॥१५॥

श्रोतव्यं यदि मद्वाक्यं सम्प्रहारो न ते क्षमः।

उन महर्षि ने महाराज मरुत्त से स्नेहपूर्वक कहा —’राजन् ! यदि मेरी बात सुनना और उसपर ध्यान देना उचित समझो तो सुनो। तुम्हारे लिये युद्ध करना उचित नहीं है। १५ १/२॥

माहेश्वरमिदं सत्रमसमाप्तं कुलं दहेत्॥१६॥

दीक्षितस्य कुतो युद्धं क्रोधित्वं दीक्षिते कुतः।

‘यह माहेश्वर यज्ञ आरम्भ किया गया है। यदि पूरा न हुआ तो तुम्हारे समस्त कुल को दग्ध कर डालेगा। जो यज्ञ की दीक्षा ले चुका है, उसके लिये युद्ध का अवसर ही कहाँ है? यज्ञदीक्षित पुरुष में क्रोध के लिये स्थान ही कहाँ है? ॥ १६ १/२॥

संशयश्च जये नित्यं राक्षसश्च सुदुर्जयः॥१७॥

स निवृत्तो गुरोर्वाक्यान्मरुत्तः पृथिवीपतिः।

विसृज्य सशरं चापं स्वस्थो मखमुखोऽभवत्॥१८॥

‘युद्ध में किसकी विजय होगी, इस प्रश्न को लेकर सदा संशय ही बना रहता है। उधर वह राक्षस अत्यन्त दुर्जय है।’ अपने आचार्य के इस कथन से पृथ्वीपति मरुत्त युद्ध से निवृत्त हो गये। उन्होंने धनुषबाण त्याग दिया और स्वस्थभाव से वे यज्ञ के लिये उन्मुख हो गये॥

ततस्तं निर्जितं मत्वा घोषयामास वै शुकः।

रावणो जयतीत्युच्चैर्हर्षान्नादं विमुक्तवान्॥१९॥

तब उन्हें पराजित हुआ मानकर शुक ने यह घोषणा कर दी कि महाराज रावण की विजय हुई और वह बड़े हर्ष के साथ उच्चस्वर से सिंहनाद करने लगा। १९॥

तान् भक्षयित्वा तत्रस्थान् महर्षीन् यज्ञमागतान्।

वितृप्तो रुधिरैस्तेषां पुनः सम्प्रययौ महीम्॥२०॥

उस यज्ञमें आकर बैठे हुए महर्षियोंको खाकर उनके रक्तसे पूर्णतः तृप्त हो रावण फिर पृथ्वीपर विचरने लगा॥ २०॥

रावणे तु गते देवाः सेन्द्राश्चैव दिवौकसः।

ततः स्वां योनिमासाद्य तानि सत्त्वानि चाब्रुवन्॥२१॥

रावणके चले जानेपर इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता पुनः अपने स्वरूपमें प्रकट हो उन-उन प्राणियोंको (जिनके रूपमें वे स्वयं प्रकट हुए थे) वरदान देते हुए बोले ॥२१॥

हर्षात् तदाब्रवीदिन्द्रो मयूरं नीलबर्हिणम्।

प्रीतोऽस्मि तव धर्मज्ञ भुजङ्गाद्धि न ते भयम्॥२२॥

सबसे पहले इन्द्रने हर्षपूर्वक नीले पंखवाले मोर से कहा—’धर्मज्ञ ! मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हें सर्प से भय नहीं होगा॥ २२॥

इदं नेत्रसहस्रं तु यत् तद् बर्हे भविष्यति।

वर्षमाणे मयि मुदं प्राप्स्यसे प्रीतिलक्षणाम्॥२३॥

एवमिन्द्रो वरं प्रादान्मयूरस्य सुरेश्वरः॥२४॥

‘मेरे जो ये सहस्र नेत्र हैं, इनके समान चिह्न तुम्हारी पाँख में प्रकट होंगे। जब मैं मेघरूप होकर वर्षा करूँगा, उस समय तुम्हें बड़ी प्रसन्नता प्राप्त होगी। वह प्रसन्नता मेरी प्राप्ति को लक्षित कराने वाली होगी।’ इस प्रकार देवराज इन्द्र ने मोर को वरदान दिया॥ २३-२४॥

नीलाः किल पुरा बर्हा मयूराणां नराधिप।

सुराधिपाद वरं प्राप्य गताः सर्वेऽपि बर्हिणः॥२५॥

नरेश्वर श्रीराम! इस वरदान के पहले मोरों के पंख केवल नीले रंग के ही होते थे। देवराजसे उक्त वर पाकर सब मयूर वहाँ से चले गये॥२५॥

धर्मराजोऽब्रवीद् राम प्राग्वंशे वायसं प्रति।

पक्षिस्तवास्मि सुप्रीतः प्रीतस्य वचनं शृणु॥२६॥

श्रीराम! तदनन्तर धर्मराज ने प्राग्वंश की* छतपर बैठे हुए कौए से कहा—’पक्षी! मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूँ। प्रसन्न होकर जो कुछ कहता हूँ, मेरे इस वचन को सुनो॥२६॥

* यज्ञशाला के पूर्वभाग में यजमान और उसकी पत्नी आदि के ठहरने के लिये वने हुए गृह को प्राग्वंश कहते हैं। यह घर हविर्गृह के पूर्व ओर होता है।

यथान्ये विविधै रोगैः पीड्यन्ते प्राणिनो मया।

ते न ते प्रभविष्यन्ति मयि प्रीते न संशयः॥ २७॥

‘जैसे दूसरे प्राणियों को मैं नाना प्रकार के रोगों द्वारा पीड़ित करता हूँ, वे रोग मेरी प्रसन्नता के कारण तुमपर अपना प्रभाव नहीं डाल सकेंगे इसमें संशय नहीं है।॥ २७॥

मृत्युतस्ते भयं नास्ति वरान् मम विहङ्गम।

यावत् त्वां न वधिष्यन्ति नरास्तावद् भविष्यसि॥२८॥

‘विहङ्गम! मेरे वरदान से तुम्हें मृत्यु का भय नहीं होगा। जबतक मनुष्य आदि प्राणी तुम्हारा वध नहीं करेंगे, तबतक तुम जीवित रहोगे॥ २८॥

ये च मद्विषयस्था वै मानवाः क्षुधयार्दिताः।

त्वयि भुक्ते सुतृप्तास्ते भविष्यन्ति सबान्धवाः॥२९॥

‘मेरे राज्य–यमलोक में स्थित रहकर जो मानव भूख से पीड़ित हैं, उनके पुत्र आदि इस भूतल पर जबतुम्हें भोजन करावेंगे, तब वे बन्धु-बान्धवोंसहित परम तृप्त होंगे’ ॥ २९॥

वरुणस्त्वब्रवीद्धंसं गङ्गातोयविचारिणम्।

श्रूयतां प्रीतिसंयुक्तं वचः पत्ररथेश्वर ॥३०॥

तत्पश्चात् वरुण ने गङ्गाजी के जल में विचरने वाले हंस को सम्बोधित करके कहा—’पक्षिराज! मेरा प्रेमपूर्ण वचन सुनो— ॥ ३० ॥

वर्णो मनोरमः सौम्यश्चन्द्रमण्डलसंनिभः।

भविष्यति तवोदग्रः शुद्धफेनसमप्रभः॥३१॥

‘तुम्हारे शरीर का रंग चन्द्रमण्डल तथा शुद्ध फेन के समान परम उज्ज्वल, सौम्य एवं मनोरम होगा॥३१॥

मच्छरीरं समासाद्य कान्तो नित्यं भविष्यसि।

प्राप्स्यसे चातुलां प्रीतिमेतन्मे प्रीतिलक्षणम्॥३२॥

‘मेरे अङ्गभूत जल का आश्रय लेकर तुम सदा कान्तिमान् बने रहोगे और तुम्हें अनुपम प्रसन्नता प्राप्त होगी। यही मेरे प्रेम का परिचायक चिह्न होगा’ ॥ ३२॥

हंसानां हि पुरा राम न वर्णः सर्वपाण्डुरः।

पक्षा नीलाग्रसंवीताः क्रोडाः शष्पाग्रनिर्मलाः॥३३॥

श्रीराम! पूर्वकाल में हंसों का रंग पूर्णतः श्वेत नहीं था। उनकी पाँखों का अग्रभाग नीला और दोनों भुजाओं के बीच का भाग नूतन दूर्वादल के अग्रभाग-सा कोमल एवं श्याम वर्ण से युक्त होता था॥ ३३॥

अथाब्रवीद् वैश्रवणः कृकलासं गिरौ स्थितम्।

हैरण्यं सम्प्रयच्छामि वर्णं प्रीतस्तवाप्यहम्॥३४॥

तदनन्तर विश्रवा के पुत्र कुबेर ने पर्वतशिखर पर बैठे हुए कृकलास (गिरगिट)-से कहा—’मैं प्रसन्न होकर तुम्हें सुवर्ण के समान सुन्दर रंग प्रदान करता हूँ॥ ३४॥

सद्रव्यं च शिरो नित्यं भविष्यति तवाक्षयम्।

एष काञ्चनको वर्णो मत्प्रीत्या ते भविष्यति॥३५॥

‘तुम्हारा सिर सदा ही सुवर्ण के समान रंग का एवं अक्षय होगा। मेरी प्रसन्नता से तुम्हारा यह (काला) रंग सुनहरे रंग में परिवर्तित हो जायगा’ ॥ ३५ ॥

एवं दत्त्वा वरांस्तेभ्यस्तस्मिन् यज्ञोत्सवे सुराः।

निवृत्ते सह राज्ञा ते पुनः स्वभवनं गताः॥३६॥

इस प्रकार उन्हें उत्तम वर देकर वे सब देवता वह यज्ञोत्सव समाप्त होने पर राजा मरुत्त के साथ पुनः अपने भवन–स्वर्गलोक को चले गये॥ ३६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डेऽष्टादशः सर्गः॥१८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्ड में अठारहवाँ सर्ग पूरा हुआ।१८॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
उत्तरकाण्डम्

रावण के द्वारा अनरण्य का वध तथा उनके द्वारा उसे शाप की प्राप्ति

एकोनविंशः सर्गः

सर्ग-19


अथ जित्वा मरुत्तं स प्रययौ राक्षसाधिपः।

नगराणि नरेन्द्राणां युद्धकाङ्क्षी दशाननः॥१॥

(अगस्त्यजी कहते हैं रघुनन्दन!) पूर्वोक्त रूप से राजा मरुत्त को जीतने के पश्चात् राक्षसराज दशग्रीव क्रमशः अन्य नरेशों के नगरों में भी युद्ध की इच्छा से गया॥१॥

समासाद्य तु राजेन्द्रान् महेन्द्रवरुणोपमान्।

अब्रवीद् राक्षसेन्द्रस्तु युद्धं मे दीयतामिति॥२॥

निर्जिताः स्मेति वा ब्रूत एष मे हि सुनिश्चयः।

अन्यथा कुर्वतामेवं मोक्षो नैवोपपद्यते॥३॥

महेन्द्र और वरुण के समान पराक्रमी उन महाराजों के पास जाकर वह राक्षसराज उनसे कहता —’राजाओ! तुम मेरे साथ युद्ध करो अथवा यह कह दो कि ‘हम हार गये।’ यही मेरा अच्छी तरह किया हुआ निश्चय है। इसके विपरीत करने से तुम्हें छुटकारा नहीं मिलेगा’॥२-३॥

ततस्त्वभीरवः प्राज्ञाः पार्थिवा धर्मनिश्चयाः।

मन्त्रयित्वा ततोऽन्योन्यं राजानः सुमहाबलाः॥४॥

निर्जिताः स्मेत्यभाषन्त ज्ञात्वा वरबलं रिपोः।

तब निर्भय, बुद्धिमान् तथा धर्मपूर्ण विचार रखने वाले बहुत-से महाबली राजा परस्पर सलाह करके शत्रु की प्रबलता को समझकर बोले —’राक्षसराज! हम तुमसे हार मान लेते हैं’॥ ४ १/२॥

दुष्यन्तः सुरथो गाधिर्गयो राजा पुरूरवाः॥५॥

एते सर्वेऽब्रुवंस्तात निर्जिताः स्मेति पार्थिवाः।

दुष्यन्त, सुरथ, गाधि, गय, राजा पुरूरवा—इन सभी भूपालों ने अपने-अपने राजत्वकाल में रावण के सामने अपनी पराजय स्वीकार कर ली॥ ५ १/२॥

अथायोध्यां समासाद्य रावणो राक्षसाधिपः॥६॥

सुगुप्तामनरण्येन शक्रेणेवामरावतीम्।

स तं पुरुषशार्दूलं पुरंदरसमं बले॥७॥

प्राह राजानमासाद्य युद्धं देहीति रावणः।

निर्जितोऽस्मीति वा ब्रूहि त्वमेवं मम शासनम्॥८॥

इसके बाद राक्षसों का राजा रावण इन्द्र द्वारा सुरक्षित अमरावती की भाँति महाराज अनरण्य द्वारा पालित अयोध्यापुरी में आया। वहाँ पुरन्दर (इन्द्र)-के समान पराक्रमी पुरुषसिंह राजा अनरण्य से मिलकर बोला’राजन् ! तुम मुझसे युद्ध करने का वचन दो अथवा कह दो कि ‘मैं हार गया।’ यही मेरा आदेश है’॥६ -८॥

अयोध्याधिपतिस्तस्य श्रुत्वा पापात्मनो वचः।

अनरण्यस्तु संक्रुद्धो राक्षसेन्द्रमथाब्रवीत्॥९॥

उस पापात्मा की वह बात सुनकर अयोध्यानरेश अनरण्य को बड़ा क्रोध हुआ और वे उस राक्षसराज से बोले- ॥९॥

दीयते इन्द्रयुद्धं ते राक्षसाधिपते मया।

संतिष्ठ क्षिप्रमायत्तो भव चैवं भवाम्यहम्॥१०॥

‘निशाचरपते ! मैं तुम्हें द्वन्द्वयुद्ध का अवसर देता हूँ। ठहरो, शीघ्र युद्ध के लिये तैयार हो जाओ। मैं भी तैयार हो रहा हूँ’॥ १०॥

अथ पूर्वं श्रुतार्थेन निर्जितं सुमहद् बलम्।

निष्क्रामत् तन्नरेन्द्रस्य बलं रक्षोवधोद्यतम्॥

राजा ने रावण की दिग्विजय की बात पहले से ही सुन रखी थी, इसलिये उन्होंने बहुत बड़ी सेना इकट्ठी कर ली थी। नरेश की वह सारी सेना उस समय राक्षस के वध के लिये उत्साहित हो नगर से बाहर निकली। ११॥

नागानां दशसाहस्रं वाजिनां नियुतं तथा।

रथानां बहुसाहस्रं पत्तीनां च नरोत्तम॥१२॥

महीं संछाद्य निष्क्रान्तं सपदातिरथं रणे।

नरश्रेष्ठ श्रीराम! दस हजार हाथीसवार, एक लाख घुड़सवार, कई हजार रथी और पैदल सैनिक पृथ्वी को आच्छादित करके युद्ध के लिये आगे बढ़े। रथों और पैदलोंसहित सारी सेना रणक्षेत्र में जा पहुँची॥ १२ १/२॥

ततः प्रवृत्तं सुमहद् युद्धं युद्धविशारद ॥१३॥

अनरण्यस्य नृपते राक्षसेन्द्रस्य चाद्भुतम्।

युद्धविशारद रघुवीर! फिर तो राजा अनरण्य और निशाचर रावण में बड़ा अद्भुत संग्राम होने लगा॥ १३ १/२॥

तद् रावणबलं प्राप्य बलं तस्य महीपतेः॥१४॥

प्राणश्यत तदा सर्वं हव्यं हुतमिवानले।

उस समय राजा की सारी सेना रावण की सेना के साथ टक्कर लेकर उसी तरह नष्ट होने लगी, जैसे अग्नि में दी हुई आहुति पूर्णतः भस्म हो जाती है॥ १४ १/२॥

युद्ध्वा च सुचिरं कालं कृत्वा विक्रममुत्तमम्॥१५॥

प्रज्वलन्तं तमासाद्य क्षिप्रमेवावशेषितम्।

प्राविशत् संकुलं तत्र शलभा इव पावकम्॥१६॥

उस सेना ने बहुत देरतक युद्ध किया, बड़ा पराक्रम दिखाया; परंतु तेजस्वी रावण का सामना करके वह बहुत थोड़ी संख्या में शेष रह गयी और अन्ततोगत्वा जैसे पतिङ् गे आग में जलकर भस्म हो जाते हैं, उसी प्रकार काल के गाल में चली गयी॥ १५-१६॥

सोऽपश्यत् तन्नरेन्द्रस्तु नश्यमानं महाबलम्।

महार्णवं समासाद्य वनापगशतं यथा॥१७॥

राजा ने देखा, मेरी विशाल सेना उसी प्रकार नष्ट होती चली जा रही है, जैसे जल से भरी हुई सैकड़ों नदियाँ महासागर के पास पहुँचकर उसी में विलीन हो जाती हैं।॥ १७॥

ततः शक्रधनुःप्रख्यं धनुर्विस्फारयन् स्वयम्।

आससाद नरेन्द्रस्तं रावणं क्रोधमूर्च्छितः॥१८॥

तब महाराज अनरण्य क्रोध से मूर्छित हो अपने इन्द्रधनुष के समान महान् शरासन को टंकारते हुए रावण का सामना करने के लिये आये॥ १८॥

अनरण्येन तेऽमात्या मारीचशुकसारणाः।

प्रहस्तसहिता भग्ना व्यद्रवन्त मृगा इव॥१९॥

फिर तो जैसे सिंह को देखकर मृग भाग जाते हैं, उसी प्रकार मारीच, शुक, सारण तथा प्रहस्त—ये चारों राक्षस मन्त्री राजा अनरण्य से परास्त होकर भाग खड़े हुए॥१९॥

ततो बाणशतान्यष्टौ पातयामास मूर्धनि।

तस्य राक्षसराजस्य इक्ष्वाकुकुलनन्दनः॥२०॥

तत्पश्चात् इक्ष्वाकुवंश को आनन्दित करने वाले राजा अनरण्य ने राक्षसराज रावण के मस्तक पर आठ सौ बाण मारे॥ २०॥

तस्य बाणाः पतन्तस्ते चक्रिरे न क्षतं क्वचित्।

वारिधारा इवाभ्रेभ्यः पतन्त्यो गिरिमूर्धनि॥२१॥

परंतु जैसे बादलों से पर्वतशिखर पर गिरती हुई जलधाराएँ उसे क्षति नहीं पहुँचातीं, उसी प्रकार वे बरसते हुए बाण उस निशाचर के शरीर पर कहीं घाव न कर सके॥२१॥

ततो राक्षसराजेन क्रुद्धेन नृपतिस्तदा।

तलेनाभिहतो मूर्ध्नि स रथान्निपपात ह॥२२॥

इसके बाद राक्षसराज ने कुपित होकर राजा के मस्तक पर एक तमाचा मारा। इससे आहत होकर राजा रथ से नीचे गिर पड़े ॥ २२॥

स राजा पतितो भूमौ विह्वलः प्रविवेपितः।

वज्रदग्ध इवारण्ये सालो निपतितो यथा॥२३॥

जैसे वनमें वज्रपात से दग्ध हुआ साखू का वृक्ष धराशायी हो जाता है, उसी प्रकार राजा अनरण्य व्याकुल हो भूमि पर गिरे और थर-थर काँपने लगे। २३॥

तं प्रहस्याब्रवीद् रक्ष इक्ष्वाकुं पृथिवीपतिम्।

किमिदानीं फलं प्राप्तं त्वया मां प्रति युध्यता॥२४॥

यह देख रावण जोर-जोर से हँस पड़ा और उन इक्ष्वाकुवंशी नरेश से बोला—’इस समय मेरे साथ परंतु जैसे बादलों से पर्वतशिखर पर गिरती हुई जलधाराएँ उसे क्षति नहीं पहुँचातीं, उसी प्रकार वे बरसते हुए बाण उस निशाचर के शरीर पर कहीं घाव न कर सके॥२१॥

ततो राक्षसराजेन क्रुद्धेन नृपतिस्तदा।

तलेनाभिहतो मूर्ध्नि स रथान्निपपात ह॥२२॥

इसके बाद राक्षसराज ने कुपित होकर राजा के मस्तक पर एक तमाचा मारा। इससे आहत होकर राजा रथ से नीचे गिर पड़े ॥ २२॥

स राजा पतितो भूमौ विह्वलः प्रविवेपितः।

वज्रदग्ध इवारण्ये सालो निपतितो यथा॥२३॥

जैसे वन में वज्रपात से दग्ध हुआ साखू का वृक्ष धराशायी हो जाता है, उसी प्रकार राजा अनरण्य व्याकुल हो भूमि पर गिरे और थर-थर काँपने लगे। २३॥

तं प्रहस्याब्रवीद् रक्ष इक्ष्वाकुं पृथिवीपतिम्।

किमिदानीं फलं प्राप्तं त्वया मां प्रति युध्यता॥२४॥

यह देख रावण जोर-जोर से हँस पड़ा और उन इक्ष्वाकुवंशी नरेश से बोला—’इस समय मेरे साथ युद्ध करके तुमने क्या फल प्राप्त किया है ? ॥ २४ ॥

त्रैलोक्ये नास्ति यो द्वन्द्वं मम दद्यान्नराधिप।

शङ्के प्रसक्तो भोगेषु न शृणोषि बलं मम॥२५॥

‘नरेश्वर! तीनों लोकों में कोई ऐसा वीर नहीं है, जो मुझे द्वन्द्वयुद्ध दे सके। जान पड़ता है तुमने भोगों में अधिक आसक्त रहने के कारण मेरे बल-पराक्रम को नहीं सुना था’ ॥ २५ ॥

तस्यैवं ब्रुवतो राजा मन्दासुर्वाक्यमब्रवीत्।

किं शक्यमिह कर्तुं वै कालो हि दुरतिक्रमः॥२६॥

राजा की प्राणशक्ति क्षीण हो रही थी। उन्होंने इस प्रकार बातें करने वाले रावण का वचन सुनकर कहा’राक्षसराज! अब यहाँ क्या किया जा सकता है ? क्योंकि काल का उल्लङ्घन करना अत्यन्त दुष्कर है।२६॥

नह्यहं निर्जितो रक्षस्त्वया चात्मप्रशंसिना।

कालेनैव विपन्नोऽहं हेतुभूतस्तु मे भवान्॥२७॥

‘राक्षस! तू अपने मुँह से अपनी प्रशंसा कर रहा है किंतु तूने जो आज मुझे पराजित किया है, इसमें काल ही कारण है। वास्तव में काल ने ही मुझे मारा है तू तो मेरी मृत्यु में निमित्तमात्र बन गया है॥ २७॥

किं त्विदानी मया शक्यं कर्तुं प्राणपरिक्षये।

नह्यहं विमुखी रक्षो युद्ध्यमानस्त्वया हतः॥२८॥

‘मेरे प्राण जा रहे हैं, अतः इस समय मैं क्या कर सकता हूँ? निशाचर! मुझे संतोष है कि मैंने युद्ध से मुँह नहीं मोड़ा। युद्ध करता हुआ ही मैं तेरे हाथ से मारा गया हूँ॥ २८॥

इक्ष्वाकुपरिभावित्वाद् वचो वक्ष्यामि राक्षस।

यदि दत्तं यदि हुतं यदि मे सुकृतं तपः।

यदि गुप्ताः प्रजाः सम्यक् तदा सत्यं वचोऽस्तु मे॥२९॥

‘परंतु राक्षस! तूने अपने व्यङ्ग्यपूर्ण वचन से इक्ष्वाकुकुल का अपमान किया है, इसलिये मैं तुझेशाप दूंगा तेरे लिये अमङ्गलजनक बात कहूँगा। । यदि मैंने दान, पुण्य, होम और तप किये हों, यदि

मेरे द्वारा धर्म के अनुसार प्रजाजनों का ठीक-ठीक पालन हुआ हो तो मेरी बात सत्य होकर रहे ॥२९॥

उत्पत्स्यते कुले ह्यस्मिन्निक्ष्वाकूणां महात्मनाम्।

रामो दाशरथि म स ते प्राणान् हरिष्यति॥३०॥

‘महात्मा इक्ष्वाकुवंशी नरेशों के इस वंश में ही दशरथनन्दन श्रीराम प्रकट होंगे, जो तेरे प्राणों का अपहरण करेंगे’ ॥ ३०॥

ततो जलधरोदग्रस्ताडितो देवदुन्दुभिः।

तस्मिन्नुदाहृते शापे पुष्पवृष्टिश्च खाच्च्युता॥३१॥

राजा के इस प्रकार शाप देते ही मेघ के समान गम्भीर स्वर में देवताओं की दुन्दुभि बज उठी और आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी॥ ३१॥

ततः स राजा राजेन्द्र गतः स्थानं त्रिविष्टपम्।

स्वर्गते च नृपे तस्मिन् राक्षसः सोऽपसर्पत॥३२॥

राजाधिराज श्रीराम! तदनन्तर राजा अनरण्य स्वर्गलोक को सिधारे। उनके स्वर्गगामी हो जाने पर राक्षस रावण वहाँ से अन्यत्र चला गया॥ ३२ ॥

इत्या श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे एकोनविंशः सर्गः॥१९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्ड में उन्नीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।१९॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
उत्तरकाण्डम्

नारदजी का रावण को समझाना, रावण का युद्ध के लिये यमलोक को जाना तथा नारदजी का इस युद्ध के विषय में विचार करना

विंशः सर्गः

सर्ग-20


ततो वित्रासयन् मान् पृथिव्यां राक्षसाधिपः।

आससाद घने तस्मिन् नारदं मुनिपुङ्गवम्॥१॥

(अगस्त्यजी कहते हैं-रघुनन्दन!) इसके बाद राक्षसराज रावण मनुष्यों को भयभीत करता हुआ पृथ्वी पर विचरने लगा। एक दिन पुष्पकविमान से यात्रा करते समय उसे बादलों के बीच में मुनिश्रेष्ठ देवर्षि नारदजी मिले॥१॥

तस्याभिवादनं कृत्वा दशग्रीवो निशाचरः।

अब्रवीत् कुशलं पृष्ट्वा हेतुमागमनस्य च ॥२॥

निशाचर दशग्रीव ने उनका अभिवादन करके कुशल-समाचार की जिज्ञासा की और उनके आगमन का कारण पूछा- ॥२॥

नारदस्तु महातेजा देवर्षिरमितप्रभः।

अब्रवीन्मेघपृष्ठस्थो रावणं पुष्पके स्थितम्॥३॥

तब बादलों की पीठ पर खड़े हुए अमित कान्तिमान् महातेजस्वी देवर्षि नारद ने पुष्पकविमान पर बैठे हुए रावण से कहा- ॥६॥

राक्षसाधिपते सौम्य तिष्ठ विश्रवसः सुत।

प्रीतोऽस्म्यभिजनोपेत विक्रमैरूर्जितैस्तव॥४॥

‘उत्तम कुल में उत्पन्न विश्रवणकुमार राक्षसराज रावण! सौम्य! ठहरो, मैं तुम्हारे बढ़े हुए बलविक्रम से बहुत प्रसन्न हूँ॥ ४॥

विष्णुना दैत्यघातैश्च गन्धर्वोरगधर्षणैः।

त्वया समं विमर्दैश्च भृशं हि परितोषितः॥५॥

‘दैत्यों का विनाश करने वाले अनेक संग्राम करके भगवान् विष्णु ने तथा गन्धर्वो और नागों को पददलित करने वाले युद्धों द्वारा तुमने मुझे समानरूप से संतुष्ट किया है॥५॥

किंचिद् वक्ष्यामि तावत् तु श्रोतव्यं श्रोष्यसे यदि।

तन्मे निगदतस्तात समाधिं श्रवणे कुरु॥६॥

‘इस समय यदि तुम सुनोगे तो मैं तुमसे कुछ सुनने योग्य बात कहूँगा। तात! मेरे मुँह से निकली हुई उस बात को सुनने के लिये तुम अपने चित्त को एकाग्र करो॥६॥

किमयं वध्यते तात त्वयावध्येन दैवतैः।

हत एव ह्ययं लोको यदा मृत्युवशं गतः॥७॥

‘तात! तुम देवताओं के लिये भी अवध्य होकर इस भूलोक के निवासियों का वध क्यों कर रहे हो? यहाँ के प्राणी तो मृत्यु के अधीन होने के कारण स्वयं ही मरे हुए हैं; फिर तुम भी इन मरे हुओं को क्यों मार रहे हो? ॥ ७॥

देवदानवदैत्यानां यक्षगन्धर्वरक्षसाम्।

अवध्येन त्वया लोकः क्लेष्टुं योग्यो न मानुषः॥८॥

‘देवता, दानव, दैत्य, यक्ष, गन्धर्व और राक्षस भी जिसे नहीं मार सकते, ऐसे विख्यात वीर होकर भी तुम इस मनुष्यलोक को क्लेश पहुँचाओ, यह कदापि तुम्हारे योग्य नहीं है॥ ८॥

नित्यं श्रेयसि सम्मूढ़ महद्भिर्व्यसनैर्वृतम्।

हन्यात् कस्तादृशं लोकं जराव्याधिशतैर्युतम्॥

‘जो सदा अपने कल्याण-साधन में मूढ़ हैं, बड़ी-बड़ी विपत्तियों से घिरे हुए हैं और बुढ़ापा तथा सैकड़ों रोगों से युक्त हैं, ऐसे लोगों को कोई भी वीर पुरुष कैसे मार सकता है? ॥९॥

तैस्तैरनिष्टोपगमैरजस्रं यत्र कुत्र कः।

मतिमान् मानुषे लोके युद्धेन प्रणयी भवेत्॥१०॥

‘जो नाना प्रकार के अनिष्टों की प्राप्ति से जहाँ कहीं भी पीड़ित है, उस मनुष्यलोक में आकर कौन बुद्धिमान् वीर पुरुष युद्ध के द्वारा मनुष्यों के वध में अनुरक्त होगा?॥

क्षीयमाणं दैवहतं क्षुत्पिपासाजरादिभिः।

विषादशोकसम्मूढं लोकं त्वं क्षपयस्व मा॥११॥

‘यह लोक तो यों ही भूख, प्यास और जरा आदि से क्षीण हो रहा है तथा विषाद और शोक में डूबकर अपनी विवेक-शक्ति खो बैठा है। दैव के मारे हुए इस मर्त्यलोक का तुम विनाश न करो॥११॥

पश्य तावन्महाबाहो राक्षसेश्वर मानुषम्।

मूढमेवं विचित्रार्थं यस्य न ज्ञायते गतिः॥१२॥

‘महाबाहु राक्षसराज! देखो तो सही, यह मनुष्यलोक ज्ञानशून्य होने के कारण मूढ़ होने पर भी किस तरह नाना प्रकार के क्षुद्र पुरुषार्थों में आसक्त है? इसे इस बात का भी पता नहीं है कि कब दुःख और सुख आदि भोगने का अवसर आयेगा? ॥ १२॥

क्वचिद् वादित्रनृत्यादि सेव्यते मुदितैर्जनैः।

रुद्यते चापरैराÉर्धाराश्रुनयनाननैः॥१३॥

‘यहाँ कहीं कुछ मनुष्य तो आनन्दमग्न होकर गाजे-बाजे और नाच आदि का सेवन करते हैं उनके द्वारा मन बहलाते हैं तथा कहीं कितने ही लोग दुःख से पीड़ित हो नेत्रों से आँसू बहाते हुए रोते रहते हैं।। १३॥

मातापितृसुतस्नेहभाबन्धुमनोरमैः।

मोहितोऽयं जनो ध्वस्तः क्लेशं स्वं नावबुध्यते॥१४॥

‘माता, पिता तथा पुत्र के स्नेह से और पत्नी तथा भाई के सम्बन्ध में नाना प्रकार के मनसूबे बाँधने के कारण यह मनुष्यलोक मोहग्रस्त हो परमार्थ से भ्रष्ट हो रहा है। इसे अपने बन्धनजनित क्लेश का अनुभव ही नहीं होता है॥ १४ ॥

तत्किमेवं परिक्लिश्य लोकं मोहनिराकृतम्।

जित एव त्वया सौम्य मर्त्यलोको न संशयः॥

‘इस प्रकार जो मोह (अज्ञान)-के कारण परम पुरुषार्थ से वञ्चित हो गया है, ऐसे मनुष्य-लोक को क्लेश पहुँचाकर तुम्हें क्या मिलेगा? सौम्य! तुमने मनुष्य-लोक को तो जीत ही लिया है, इसमें कोई भी संशय नहीं है॥ १५ ॥

अवश्यमेभिः सर्वैश्च गन्तव्यं यमसादनम्।

तन्निगृह्णीष्व पौलस्त्य यमं परपुरंजय॥१६॥

तस्मिञ्जिते जितं सर्वं भवत्येव न संशयः।

‘शत्रुनगरी पर विजय पाने वाले पुलस्त्यनन्दन! इन । सब मनुष्यों को यमलोक में अवश्य जाना पड़ता है।अतः यदि शक्ति हो तो तुम यमराज को अपने काबू में करो। उन्हें जीत लेने पर तुम सबको जीत सकते हो; इसमें संशय नहीं है’ ॥ १६ १/२ ॥

एवमुक्तस्तु लङ्केशो दीप्यमानं स्वतेजसा॥१७॥

अब्रवीन्नारदं तत्र सम्प्रहस्याभिवाद्य च।

नारदजी के ऐसा कहने पर लङ्कापति रावण अपने तेज से उद्दीप्त होने वाले उन देवर्षि को प्रणाम करके हँसता हुआ बोला- ॥ १७ १/२ ॥

महर्षे देवगन्धर्वविहार समरप्रिय॥१८॥

अहं समुद्यतो गन्तुं विजयार्थं रसातलम्।

‘महर्षे! आप देवताओं और गन्धर्वो के लोक में विहार करने वाले हैं। युद्ध के दृश्य देखना आपको बहुत ही प्रिय है। मैं इस समय दिग्विजय के लिये रसातल में जाने को उद्यत हूँ॥ १८ १/२॥

ततो लोकत्रयं जित्वा स्थाप्य नागान् सुरान् वशे॥१९॥

समुद्रममृतार्थं च मथिष्यामि रसालयम्।

‘फिर तीनों लोकों को जीतकर नागों और देवताओं को अपने वश में करके अमृत की प्राप्ति के लिये रसनिधि समुद्र का मन्थन करूँगा’ ॥ १९ १/२ ॥

अथाब्रवीद् दशग्रीवं नारदो भगवानृषिः॥२०॥

क्व खल्विदानी मार्गेण त्वयेहान्येन गम्यते।

अयं खलु सुदुर्गम्यः प्रेतराजपुरं प्रति॥२१॥

मार्गो गच्छति दुर्धर्ष यमस्यामित्रकर्शन।

यह सुनकर देवर्षि भगवान् नारद ने कहा ‘शत्रुसूदन! यदि तुम रसातल को जाना चाहते हो तो इस समय उसका मार्ग छोड़कर दूसरे रास्ते से हँसता हुआ बोला- ॥ १७ १/२ ॥

महर्षे देवगन्धर्वविहार समरप्रिय॥१८॥

अहं समुद्यतो गन्तुं विजयार्थं रसातलम्।

‘महर्षे! आप देवताओं और गन्धर्वो के लोक में विहार करने वाले हैं। युद्ध के दृश्य देखना आपको बहुत ही प्रिय है। मैं इस समय दिग्विजय के लिये रसातल में जाने को उद्यत हूँ॥ १८ १/२॥

ततो लोकत्रयं जित्वा स्थाप्य नागान् सुरान् वशे॥१९॥

समुद्रममृतार्थं च मथिष्यामि रसालयम्।

‘फिर तीनों लोकों को जीतकर नागों और देवताओं को अपने वश में करके अमृत की प्राप्ति के लिये रसनिधि समुद्र का मन्थन करूँगा’ ॥ १९ १/२ ॥

अथाब्रवीद् दशग्रीवं नारदो भगवानृषिः॥२०॥

क्व खल्विदानी मार्गेण त्वयेहान्येन गम्यते।

अयं खलु सुदुर्गम्यः प्रेतराजपुरं प्रति॥२१॥

मार्गो गच्छति दुर्धर्ष यमस्यामित्रकर्शन।

यह सुनकर देवर्षि भगवान् नारद ने कहा ‘शत्रुसूदन! यदि तुम रसातल को जाना चाहते हो तो इस समय उसका मार्ग छोड़कर दूसरे रास्ते से

तदिह प्रस्थितोऽहं वै पितृराजपुरं प्रति॥ २५॥

प्राणिसंक्लेशकर्तारं योजयिष्यामि मृत्युना।

‘अतः मैं यहाँ से यमपुरी को प्रस्थान कर रहा हूँ। संसार के प्राणियों को मौत का कष्ट देने वाले सूर्यपुत्र यम को स्वयं ही मृत्यु से संयुक्त कर दूंगा’ ॥ २५ १/२ ॥

एवमुक्त्वा दशग्रीवो मुनिं तमभिवाद्य च॥२६॥

प्रययौ दक्षिणामाशां प्रविष्टः सह मन्त्रिभिः।

ऐसा कहकर दशग्रीव ने मुनि को प्रणाम किया और मन्त्रियों के साथ वह दक्षिण दिशा की ओर चल दिया॥

नारदस्तु महातेजा मुहूर्तं ध्यानमास्थितः॥२७॥

चिन्तयामास विप्रेन्द्रो विधूम इव पावकः।

उसके चले जाने पर धूमरहित अग्नि के समान महातेजस्वी विप्रवर नारदजी दो घड़ी तक ध्यानमग्न हो इस प्रकार विचार करने लगे- ॥२७ १/२ ।।

येन लोकास्त्रयः सेन्द्राः क्लिश्यन्ते सचराचराः॥२८॥

क्षीणे चायुषि धर्मेण स कालो जेष्यते कथम्।

‘आयु क्षीण होने पर जिनके द्वारा धर्मपूर्वक इन्द्रसहित तीनों लोकों के चराचर प्राणी क्लेश में डाले जाते-दण्डित होते हैं, वे कालस्वरूप यमराज इस रावण के द्वारा कैसे जीते जायँगे? ॥ २८२ ॥

स्वदत्तकृतसाक्षी यो द्वितीय इव पावकः॥२९॥

लब्धसंज्ञा विचेष्टन्ते लोका यस्य महात्मनः।

यस्य नित्यं त्रयो लोका विद्रवन्ति भयार्दिताः॥३०॥

तं कथं राक्षसेन्द्रोऽसौ स्वयमेव गमिष्यति।

‘जो जीवों के दान और कर्म के साक्षी हैं, जिनका तेज द्वितीय अग्नि के समान है, जिन महात्मा से चेतना पाकर सम्पूर्ण जीव नाना प्रकार की चेष्टाएँ करते हैं. जिनके भय से पीड़ित हो तीनों लोकों के प्राणी उनसे दूर भागते हैं, उन्हीं के पास यह राक्षसराज स्वयं ही कैसे जायगा? ॥ २९-३० १/२॥

यो विधाता च धाता च सुकृतं दुष्कृतं तथा॥३१॥

त्रैलोक्यं विजितं येन तं कथं विजयिष्यते।

अपरं किं तु कृत्वैवं विधानं संविधास्यति॥३२॥

‘जो त्रिलोकी को धारण-पोषण करने वाले तथा पुण्य और पाप के फल देने वाले हैं और जिन्होंने तीनों लोकों पर विजय पायी है, उन्हीं कालदेव को यह राक्षस कैसे जीतेगा? काल ही सबका साधन है। यह राक्षस काल के अतिरिक्त दूसरे किस साधन का सम्पादन करके उस काल पर विजय प्राप्त करेगा? ॥ ३१-३२॥

कौतूहलं समुत्पन्नो यास्यामि यमसादनम्।

विमर्द द्रष्टमनयोर्यमराक्षसयोः स्वयम्॥३३॥

‘अब तो मेरे मन में बड़ा कौतूहल उत्पन्न हो गया है, अतः इन यमराज और राक्षसराज का युद्ध देखने के लिये मैं स्वयं भी यमलोक को जाऊँगा’॥ ३३॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे विंशः सर्गः ॥२०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्ड में बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।२०॥