सर्ग-01
ततो रावणनीतायाः सीतायाः शत्रुकर्षणः।
इयेष पदमन्वेष्टुं चारणाचरिते पथि॥१॥
तदनन्तर शत्रुओं का संहार करने वाले हनुमान जी ने रावण द्वारा हरी गयी सीता के निवास स्थान का पता लगाने के लिये उस आकाशमार्ग से जाने का विचार किया, जिसपर चारण (देवजातिविशेष) विचरा करते हैं ॥१॥
दुष्करं निष्प्रतिद्वन्द्वं चिकीर्षन् कर्म वानरः।
समुदग्रशिरोग्रीवो गवां पतिरिवाबभौ॥२॥
कपिवर हनुमान जी ऐसा कर्म करना चाहते थे, जो दूसरों के लिये दुष्कर था तथा उस कार्य में उन्हें किसी और की सहायता भी नहीं प्राप्त थी। उन्होंने मस्तक और ग्रीवा ऊँची की। उस समय वे हृष्ट-पुष्ट साँड़ के समान प्रतीत होने लगे॥२॥
अथ वैदूर्यवर्णेषु शाबलेषु महाबलः।
धीरः सलिलकल्पेषु विचचार यथासुखम्॥३॥
फिर धीर स्वभाव वाले वे महाबली पवनकुमार वैदूर्यमणि (नीलम) और समुद्र के जल की भाँति हरी हरी घास पर सुखपूर्वक विचरने लगे॥३॥
द्विजान् वित्रासयन् धीमानुरसा पादपान् हरन्।
मृगांश्च सुबहून् निघ्नन् प्रवृद्ध इव केसरी॥४॥
उस समय बुद्धिमान् हनुमान् जी पक्षियों को त्रास देते, वृक्षों को वक्षःस्थल के आघात से धराशायी करते तथा बहुत-से मृगों (वन-जन्तुओं) को कुचलते हुए पराक्रम में बढ़े-चढ़े सिंह के समान शोभा पा रहे थे।४॥
नीललोहितमाञ्जिष्ठपद्मवर्णैः सितासितैः।
स्वभावसिद्धैर्विमलैर्धातुभिः समलंकृतम्॥५॥
उस पर्वत का जो तलप्रदेश था, वह पहाड़ों में स्वभाव से ही उत्पन्न होने वाली नीली, लाल, मजीठ और कमल के-से रंगवाली श्वेत तथा श्याम वर्णवाली निर्मल धातुओं से अच्छी तरह अलंकृत था॥५॥
कामरूपिभिराविष्टमभीक्ष्णं सपरिच्छदैः।
यक्षकिंनरगन्धर्वैर्देवकल्पैः सपन्नगैः॥६॥
उसपर देवोपम यक्ष, किन्नर, गन्धर्व और नाग, जो इच्छानुसार रूप धारण करने वाले थे, निरन्तर परिवारसहित निवास करते थे॥६॥
स तस्य गिरिवर्यस्य तले नागवरायुते।
तिष्ठन् कपिवरस्तत्र ह्रदे नाग इवाबभौ॥७॥
बड़े-बड़े गजराजों से भरे हुए उस पर्वत के समतल प्रदेश में खड़े हुए कपिवर हनुमान जी वहाँ जलाशय में स्थित हुए विशालकाय हाथी के समान जान पड़ते थे॥
स सूर्याय महेन्द्राय पवनाय स्वयम्भुवे।
भूतेभ्यश्चाञ्जलिं कृत्वा चकार गमने मतिम्॥८॥
उन्होंने सूर्य, इन्द्र, पवन, ब्रह्मा और भूतों (देवयोनिविशेषों) को भी हाथ जोड़कर उस पारजाने का विचार किया॥८॥
अञ्जलिं प्राङ्खं कुर्वन् पवनायात्मयोनये।
ततो हि ववृधे गन्तुं दक्षिणो दक्षिणां दिशम्॥९॥
फिर पूर्वाभिमुख होकर अपने पिता पवनदेव को प्रणाम किया। तत्पश्चात् कार्यकुशल हनुमान जी दक्षिण दिशा में जाने के लिये बढ़ने लगे (अपने शरीर को बढ़ाने लगे) ॥९॥
प्लवगप्रवरैर्दृष्टः प्लवने कृतनिश्चयः।
ववृधे रामवृद्ध्यर्थं समुद्र इव पर्वसु॥१०॥
बड़े-बड़े वानरों ने देखा, जैसे पूर्णिमा के दिन समुद्र में ज्वार आने लगता है, उसी प्रकार समुद्रलङ्घन के लिये दृढ़ निश्चय करने वाले हनुमान जी श्रीराम की कार्य-सिद्धि के लिये बढ़ने लगे॥१०॥
निष्प्रमाणशरीरः सँल्लिलऋयिषुरर्णवम्।
बाहुभ्यां पीडयामास चरणाभ्यां च पर्वतम्॥११॥
समुद्र को लाँघने की इच्छा से उन्होंने अपने शरीर को बेहद बढ़ा लिया और अपनी दोनों भुजाओं तथा चरणों से उस पर्वत को दबाया॥११॥
स चचालाचलश्चाशु मुहूर्तं कपिपीडितः।
तरूणां पुष्पिताग्राणां सर्वं पुष्पमशातयत्॥१२॥
कपिवर हनुमान जी के द्वारा दबाये जाने पर तुरंत ही वह पर्वत काँप उठा और दो घड़ी तक डगमगाता रहा। उसके ऊपर जो वृक्ष उगे थे, उनकी डालियों के अग्रभाग फूलों से लदे हुए थे; किंतु उस पर्वत के हिलने से उनके वे सारे फूल झड़ गये॥ १२॥
तेन पादपमुक्तेन पुष्पौघेण सुगन्धिना।
सर्वतः संवृतः शैलो बभौ पुष्पमयो यथा॥१३॥
वृक्षों से झड़ी हुई उस सुगन्धित पुष्पराशि के द्वारा सब ओर से आच्छादित हुआ वह पर्वत ऐसा जान पड़ता था, मानो वह फूलों का ही बना हुआ हो। १३॥
तेन चोत्तमवीर्येण पीड्यमानः स पर्वतः।
सलिलं सम्प्रसुस्राव मदमत्त इव द्विपः॥१४॥
महापराक्रमी हनुमान जी के द्वारा दबाया जाता हुआ महेन्द्रपर्वत जल के स्रोत बहाने लगा, मानो कोई मदमत्त गजराज अपने कुम्भस्थल से मद की धारा बहा रहा हो॥१४॥
पीड्यमानस्तु बलिना महेन्द्रस्तेन पर्वतः।
रीतीनिवर्तयामास काञ्चनाञ्जनराजतीः॥१५॥
बलवान् पवनकुमार के भार से दबा हुआ महेन्द्रगिरि सुनहरे, रुपहले और काले रंग के जलस्रोत प्रवाहित करने लगा॥१५॥
मुमोच च शिलाः शैलो विशालाः समनःशिलाः।
मध्यमेनार्चिषा जुष्टो धूमराजीरिवानलः॥१६॥
इतना ही नहीं, जैसे मध्यम ज्वाला से युक्त अग्नि लगातार धुआँ छोड़ रही हो, उसी प्रकार वह पर्वत मैनसिलसहित बड़ी-बड़ी शिलाएँ गिराने लगा॥१६॥
हरिणा पीड्यमानेन पीड्यमानानि सर्वतः।
गुहाविष्टानि सत्त्वानि विनेदुर्विकृतैः स्वरैः॥१७॥
हनुमान जी के उस पर्वत-पीडन से पीड़ित होकर वहाँ के समस्त जीव गुफाओं में घुसे हुए बुरी तरह से चिल्लाने लगे॥१७॥
स महान् सत्त्वसन्नादः शैलपीडानिमित्तजः।
पृथिवीं पूरयामास दिशश्चोपवनानि च॥१८॥
इस प्रकार पर्वत को दबाने के कारण उत्पन्न हुआ वह जीव-जन्तुओं का महान् कोलाहल पृथ्वी, उपवन और सम्पूर्ण दिशाओं में भर गया॥१८॥
शिरोभिः पृथुभिर्नागा व्यक्तस्वस्तिकलक्षणैः।
वमन्तः पावकं घोरं ददंशुर्दशनैः शिलाः॥१९॥
जिनमें स्वस्तिक* चिह्न स्पष्ट दिखायी दे रहे थे, उन स्थूल फणों से विष की भयानक आग उगलते हुए बड़े-बड़े सर्प उस पर्वत की शिलाओं को अपने दाँतों से डंसने लगे॥ १९॥
* साँप के फन में दिखायी देने वाली नील रेखा को ‘स्वस्तिक’ कहते हैं।
तास्तदा सविषैर्दष्टाः कुपितैस्तैर्महाशिलाः।
जज्वलुः पावकोद्दीप्ता बिभिदुश्च सहस्रधा॥२०॥
क्रोध से भरे हुए उन विषैले साँपों के काटने पर वे बड़ी-बड़ी शिलाएँ इस प्रकार जल उठीं, मानो उनमें आग लग गयी हो। उस समय उन सबके सहस्रों टुकड़े हो गये॥ २०॥
यानि त्वौषधजालानि तस्मिजातानि पर्वते।
विषघ्नान्यपि नागानां न शेकुः शमितुं विषम्॥२१॥
उस पर्वत पर जो बहुत-सी ओषधियाँ उगी हुई थीं, वे विष को नष्ट करने वाली होने पर भी उन नागों के विष को शान्त न कर सकीं॥ २१॥
भिद्यतेऽयं गिरिभूतैरिति मत्वा तपस्विनः।
जस्ता विद्याधरास्तस्मादुत्पेतुः स्त्रीगणैः सह॥२२॥
उस समय वहाँ रहने वाले तपस्वी और विद्याधरों ने समझा कि इस पर्वत को भूतलोग तोड़ रहे हैं, इससे भयभीत होकर वे अपनी स्त्रियों के साथ वहाँ से ऊपर उठकर अन्तरिक्ष में चले गये॥ २२॥
पानभूमिगतं हित्वा हैममासवभाजनम्।
पात्राणि च महार्हाणि करकांश्च हिरण्मयान्॥२३॥
लेह्यानुच्चावचान् भक्ष्यान् मांसानि विविधानि च।
आर्षभाणि च चर्माणि खड्गांश्च कनकत्सरून्॥२४॥
कृतकण्ठगुणाः क्षीबा रक्तमाल्यानुलेपनाः।
रक्ताक्षाः पुष्कराक्षाश्च गगनं प्रतिपेदिरे॥२५॥
मधुपान के स्थान में रखे हुए सुवर्णमय आसवपात्र, बहुमूल्य बर्तन, सोने के कलश, भाँति-भाँति के भक्ष्य पदार्थ, चटनी, नाना प्रकार के फलों के गूदे, बैलों की खाल की बनी हुई ढालें और सुवर्णजटित मूठवाली तलवारें छोड़कर कण्ठ में माला धारण किये, लाल रंग के फूल और अनुलेपन (चन्दन) लगाये, प्रफुल्ल कमलके सदृश सुन्दर एवं लाल नेत्रवाले वे मतवाले विद्याधरगण भयभीत-से होकर आकाशमें चले गये। २३–२५॥
हारनपुरकेयूरपारिहार्यधराः स्त्रियः।
विस्मिताः सस्मितास्तस्थुराकाशे रमणौः सह ॥२६॥
उनकी स्त्रियाँ गले में हार, पैरों में नूपुर, भुजाओं में बाजूबंद और कलाइयों में कंगन धारण किये आकाश में अपने पतियों के साथ मन्द-मन्द मुसकराती हुई चकित-सी खड़ी हो गयीं॥२६॥
दर्शयन्तो महाविद्यां विद्याधरमहर्षयः।
सहितास्तस्थुराकाशे वीक्षांचक्रुश्च पर्वतम्॥ २७॥
विद्याधर और महर्षि अपनी महाविद्या (आकाश में निराधार खड़े होने की शक्ति)-का परिचय देते हुए अन्तरिक्ष में एक साथ खड़े हो गये और उस पर्वत की ओर देखने लगे॥२७॥
शुश्रुवुश्च तदा शब्दमृषीणां भावितात्मनाम्।
चारणानां च सिद्धानां स्थितानां विमलेऽम्बरे
उन्होंने उस समय निर्मल आकाश में खड़े हुए भावितात्मा (पवित्र अन्तःकरण वाले) महर्षियों, चारणों और सिद्धों की ये बातें सुनीं— ॥२८॥
एष पर्वतसंकाशो हनुमान् मारुतात्मजः।
तितीर्षति महावेगः समुद्रं वरुणालयम्॥२९॥
‘अहा! ये पर्वत के समान विशालकाय महान् वेगशाली पवनपुत्र हनुमान जी वरुणालय समुद्र को पार करना चाहते हैं॥२९॥
रामार्थं वानरार्थं च चिकीर्षन् कर्म दुष्करम्।
समुद्रस्य परं पारं दुष्प्रापं प्राप्तुमिच्छति॥३०॥
‘श्रीरामचन्द्रजी और वानरों के कार्य की सिद्धि के लिये दुष्कर कर्म करने की इच्छा रखने वाले ये पवनकुमार समुद्र के दूसरे तट पर पहुँचना चाहते हैं, जहाँ जाना अत्यन्त कठिन है ॥ ३०॥
इति विद्याधरा वाचः श्रुत्वा तेषां तपस्विनाम्।
तमप्रमेयं ददृशुः पर्वते वानरर्षभम्॥३१॥
इस प्रकार विद्याधरों ने उन तपस्वी महात्माओं की कही हुई ये बातें सुनकर पर्वत के ऊपर अतुलितबलशाली वानरशिरोमणि हनुमान जी को देखा॥३१॥
दुधुवे च स रोमाणि चकम्पे चानलोपमः।
ननाद च महानादं सुमहानिव तोयदः॥३२॥
उस समय हनुमान जी अग्नि के समान जान पड़ते थे। उन्होंने अपने शरीर को हिलाया और रोएँ झाड़े तथा महान् मेघ के समान बड़े जोर-जोर से गर्जना की॥ ३२॥
आनुपूर्व्या च वृत्तं तल्लाङ्गलं रोमभिश्चितम्।
उत्पतिष्यन् विचिक्षेप पक्षिराज इवोरगम्॥३३॥
हनुमान जी अब ऊपर को उछलना ही चाहते थे। उन्होंने क्रमशः गोलाकार मुड़ी तथा रोमावलियों से भरी हुई अपनी पूँछ को उसी प्रकार आकाश में फेंका, जैसे पक्षिराज गरुड़ सर्प को फेंकते हैं॥ ३३॥
तस्य लाङ्गलमाविद्धमतिवेगस्य पृष्ठतः।
ददृशे गरुडेनेव ह्रियमाणो महोरगः॥३४॥
अत्यन्त वेगशाली हनुमान जी के पीछे आकाश में फैली हुई उनकी कुछ-कुछ मुड़ी हुई पूँछ गरुड़ के द्वारा ले जाये जाते हुए महान् सर्प के समान दिखायी देती थी॥
बाहू संस्तम्भयामास महापरिघसंनिभौ।
आससाद कपिः कट्यां चरणौ संचुकोच च॥३५॥
उन्होंने अपनी विशाल परिघ के समान भुजाओं को पर्वत पर जमाया। फिर ऊपरके सब अंगों को इस तरह सिकोड़ लिया कि वे कटि की सीमा में ही आ गये; साथ ही उन्होंने दोनों पैरों को भी समेट लिया॥ ३५ ॥
संहृत्य च भुजौ श्रीमांस्तथैव च शिरोधराम्।
तेजः सत्त्वं तथा वीर्यमाविवेश स वीर्यवान्॥३६॥
तत्पश्चात् तेजस्वी और पराक्रमी हनुमान जी ने अपनी दोनों भुजाओं और गर्दन को भी सिकोड़ लिया। इस समय उनमें तेज, बल और पराक्रमसभी का आवेश हुआ॥ ३६॥
मार्गमालोकयन् दूरादूर्ध्वप्रणिहितेक्षणः।
रुरोध हृदये प्राणानाकाशमवलोकयन्॥३७॥
उन्होंने अपने लम्बे मार्ग पर दृष्टि दौड़ाने के लिये नेत्रों को ऊपर उठाया और आकाश की ओर देखते हुए प्राणों को हृदय में रोका॥३७॥
पद्भ्यां दृढमवस्थानं कृत्वा स कपिकुञ्जरः।
निकुच्य कर्णौ हनुमानुत्पतिष्यन् महाबलः॥३८॥
वानरान् वानरश्रेष्ठ इदं वचनमब्रवीत्।
इस प्रकार ऊपर को छलाँग मारने की तैयारी करते हुए कपिश्रेष्ठ महाबली हनुमान् ने अपने पैरों को अच्छी तरह जमाया और कानों को सिकोड़कर उन वानरशिरोमणि ने अन्य वानरों से इस प्रकार कहा— ॥ ३८ १/२॥
यथा राघवनिर्मुक्तः शरः श्वसनविक्रमः॥३९॥
गच्छेत् तद्वद् गमिष्यामि लंकां रावणपालिताम्।
‘जैसे श्रीरामचन्द्रजी का छोड़ा हुआ बाण वायुवेग से चलता है, उसी प्रकार मैं रावण द्वारा पालित लंकापुरी में जाऊँगा॥ ३९ १/२॥
नहि द्रक्ष्यामि यदि तां लंकायां जनकात्मजाम्॥४०॥
अनेनैव हि वेगेन गमिष्यामि सुरालयम्।
‘यदि लंका में जनकनन्दिनी सीता को नहीं देखूगा तो इसी वेग से मैं स्वर्गलोक में चला जाऊँगा॥ ४० १/२॥
यदि वा त्रिदिवे सीतां न द्रक्ष्यामि कृतश्रमः॥४१॥
बद्ध्वा राक्षसराजानमानयिष्यामि रावणम्।
‘इस प्रकार परिश्रम करने पर यदि मुझे स्वर्ग में भी सीता का दर्शन नहीं होगा तो राक्षसराज रावण को बाँधकर लाऊँगा॥ ४१ १/२॥
सर्वथा कृतकार्योऽहमेष्यामि सह सीतया॥४२॥
आनयिष्यामि वा लंकां समुत्पाट्य सरावणाम्।
‘सर्वथा कृतकृत्य होकर मैं सीता के साथ लौटूंगा अथवा रावणसहित लंकापुरी को ही उखाड़कर लाऊँगा’॥
एवमुक्त्वा तु हनुमान् वानरो वानरोत्तमः॥४३॥
उत्पपाताथ वेगेन वेगवानविचारयन्।
सुपर्णमिव चात्मानं मेने स कपिकुञ्जरः॥४४॥
ऐसा कहकर वेगशाली वानरप्रवर श्रीहनुमान जी ने विघ्न-बाधाओं का कोई विचार न करके बड़े वेग से ऊपर की ओर छलाँग मारी उस समय उन वानरशिरोमणि ने अपने को साक्षात् गरुड़ के समान ही समझा॥ ४३-४४॥
समुत्पतति वेगात् तु वेगात् ते नगरोहिणः।
संहृत्य विटपान् सर्वान् समुत्पेतुः समन्ततः॥४५॥
जिस समय वे कूदे, उस समय उनके वेग से आकृष्ट हो पर्वत पर उगे हुए सब वृक्ष उखड़ गये और अपनी सारी डालियों को समेटकर उनके साथ ही सब ओर से वेगपूर्वक उड़ चले॥ ४५ ॥
स मत्तकोयष्टिभकान् पादपान् पुष्पशालिनः।
उद्वहन्नुरुवेगेन जगाम विमलेऽम्बरे॥४६॥
वे हनुमान् जी मतवाले कोयष्टि आदि पक्षियों से युक्त, बहुसंख्यक पुष्पशोभित वृक्षों को अपने महान् वेग से ऊपर की ओर खींचते हुए निर्मल आकाश में अग्रसर होने लगे॥ ४६॥
ऊरुवेगोत्थिता वृक्षा मुहूर्तं कपिमन्वयुः।
प्रस्थितं दीर्घमध्वानं स्वबन्धुमिव बान्धवाः॥४७॥
उनकी जाँघों के महान् वेग से ऊपर को उठे हुए वृक्ष एक मुहूर्त तक उनके पीछे-पीछे इस प्रकार गये, जैसे दूर-देश के पथपर जाने वाले अपने भाई-बन्धु को उसके बन्धु-बान्धव पहुँचाने जाते हैं॥४७॥
तमूरुवेगोन्मथिताः सालाश्चान्ये नगोत्तमाः।
अनुजग्मुर्हनूमन्तं सैन्या इव महीपतिम्॥४८॥
हनुमान जी की जाँघों के वेग से उखड़े हुए साल तथा दूसरे-दूसरे श्रेष्ठ वृक्ष उनके पीछे-पीछे उसी प्रकार चले, जैसे राजा के पीछे उसके सैनिक चलते हैं॥ ४८॥
सुपुष्पिताग्रैर्बहुभिः पादपैरन्वितः कपिः।
हनूमान् पर्वताकारो बभूवाद्भुतदर्शनः॥४९॥
जिनकी डालियों के अग्रभाग फूलों से सुशोभित थे, उन बहुतेरे वृक्षों से संयुक्त हुए पर्वताकार हनुमान जी अद्भुत शोभा से सम्पन्न दिखायी दिये॥४९॥
सारवन्तोऽथ ये वृक्षा न्यमज्जल्लवणाम्भसि।
भयादिव महेन्द्रस्य पर्वता वरुणालये॥५०॥
उन वृक्षों में से जो भारी थे, वे थोड़ी ही देर में गिरकर क्षारसमुद्र में डूब गये। ठीक उसी तरह, जैसे कितने ही पंखधारी पर्वत देवराज इन्द्र के भय से वरुणालय में निमग्न हो गये थे॥५०॥
स नानाकुसुमैः कीर्णः कपिः साङ्करकोरकैः।
शुशुभे मेघसंकाशः खद्योतैरिव पर्वतः॥५१॥
मेघ के समान विशालकाय हनुमान जी अपने साथ खींचकर आये हुए वृक्षों के अंकुर और कोरसहित फूलों से आच्छादित हो जुगनुओं की जगमगाहट से युक्त पर्वत के समान शोभा पाते थे॥५१॥
विमुक्तास्तस्य वेगेन मुक्त्वा पुष्पाणि ते द्रुमाः।
व्यवशीर्यन्त सलिले निवृत्ताः सुहृदो यथा॥५२॥
वे वृक्ष जब हनुमान जी के वेग से मुक्त हो जाते (उनके आकर्षण से छूट जाते), तब अपने फूल बरसाते हुए इस प्रकार समुद्र के जल में डूब जाते थे, जैसे सुहृद्वर्ग के लोग परदेश जाने वाले अपने किसी बन्धु को दूर तक पहुँचाकर लौट आते हैं। ५२॥
लघुत्वेनोपपन्नं तद् विचित्रं सागरेऽपतत्।
द्रुमाणां विविधं पुष्पं कपिवायुसमीरितम्।
ताराचितमिवाकाशं प्रबभौ स महार्णवः॥५३॥
हनुमान जी के शरीर से उठी हुई वायु से प्रेरित हो वृक्षों के भाँति-भाँति के पुष्प अत्यन्त हल के होने के कारण जब समुद्र में गिरते थे, तब डूबते नहीं थे इसलिये उनकी विचित्र शोभा होती थी। उन फूलों के कारण वह महासागर तारों से भरे हुए आकाश के समान सुशोभित होता था॥ ५३॥
पुष्पौघेण सुगन्धेन नानावर्णेन वानरः।
बभौ मेघ इवोद्यन् वै विद्युद्गणविभूषितः॥५४॥
अनेक रंग की सुगन्धित पुष्पराशि से उपलक्षित वानर-वीर हनुमान जी बिजली-से सुशोभित होकर उठते हुए मेघ के समान जान पड़ते थे॥५४॥
तस्य वेगसमुद्भूतैः पुष्पैस्तोयमदृश्यत।
ताराभिरिव रामाभिरुदिताभिरिवाम्बरम्॥५५॥
उनके वेग से झड़े हुए फूलों के कारण समुद्र का जल उगे हुए रमणीय तारों से खचित आकाश के समान दिखायी देता था॥ ५५ ॥
तस्याम्बरगतौ बाहू ददृशाते प्रसारितौ।
पर्वताग्राद् विनिष्क्रान्तौ पञ्चास्याविव पन्नगौ॥५६॥
आकाश में फैलायी गयी उनकी दोनों भुजाएँ ऐसी दिखायी देती थीं, मानो किसी पर्वत के शिखर से पाँच फनवाले दो सर्प निकले हुए हों॥५६॥
पिबन्निव बभौ चापि सोर्मिजालं महार्णवम्।
पिपासुरिव चाकाशं ददृशे स महाकपिः॥५७॥
उस समय महाकपि हनुमान् ऐसे प्रतीत होते थे, मानो तरङ्गमालाओं सहित महासागर को पी रहे हों। वे ऐसे दिखायी देते थे, मानो आकाश को भी पी जाना चाहते हों॥ ५७॥
तस्य विद्युत्प्रभाकारे वायुमार्गानुसारिणः।
नयने विप्रकाशेते पर्वतस्थाविवानलौ॥५८॥
वायु के मार्ग का अनुसरण करने वाले हनुमान जी के बिजली की-सी चमक पैदा करने वाले दोनों नेत्र ऐसे प्रकाशित हो रहे थे, मानो पर्वत पर दो स्थानों में लगे हुए दावानल दहक रहे हों॥ ५८॥
पिङ्गे पिङ्गाक्षमुख्यस्य बृहती परिमण्डले।
चक्षुषी सम्प्रकाशेते चन्द्रसूर्याविव स्थितौ॥५९॥
पिंगल नेत्रवाले वानरों में श्रेष्ठ हनुमान जी की दोनों गोल बड़ी-बड़ी और पीले रंग की आँखें चन्द्रमा और सूर्य के समान प्रकाशित हो रही थीं॥ ५९॥
मुखं नासिकया तस्य ताम्रया ताम्रमाबभौ।
संध्यया समभिस्पृष्टं यथा स्यात् सूर्यमण्डलम्॥६०॥
लाल-लाल नासिका के कारण उनका सारा मुँह लाली लिये हुए था, अतः वह संध्याकाल से संयुक्त सूर्यमण्डल के समान सुशोभित होता था॥६०॥
लं च समाविद्धं प्लवमानस्य शोभते।
अम्बरे वायुपुत्रस्य शक्रध्वज इवोच्छ्रितम्॥६१॥
आकाश में तैरते हुए पवनपुत्र हनुमान् की उठी हुई टेढ़ी पूँछ इन्द्र की ऊँची ध्वजा के समान जान पड़ती थी॥ ६१॥
लाङ्गलचक्रो हनुमान् शुक्लदंष्ट्रोऽनिलात्मजः।
व्यरोचत महाप्राज्ञः परिवेषीव भास्करः॥६२॥
महाबुद्धिमान् पवनपुत्र हनुमान् जी की दाढ़ें सफेद थीं और पूँछ गोलाकार मुड़ी हुई थी। इसलिये वे परिधि से घिरे हुए सूर्यमण्डल के समान जान पड़ते थे॥
स्फिग्देशेनातिताम्रेण रराज स महाकपिः।
महता दारितेनेव गिरिगैरिकधातुना॥६३॥
उनकी कमर के नीचे का भाग बहुत लाल था। इससे वे महाकपि हनुमान् फटे हुए गेरू से युक्त विशाल पर्वत के समान शोभा पाते थे॥६३॥
तस्य वानरसिंहस्य प्लवमानस्य सागरम्।
कक्षान्तरगतो वायुर्जीमूत इव गर्जति॥६४॥
ऊपर-ऊपर से समुद्र को पार करते हुए वानरसिंह हनुमान् की काँख से होकर निकली हुई वायु बादल के समान गरजती थी॥६४॥
खे यथा निपतत्युल्का उत्तरान्ताद् विनिःसृता।
दृश्यते सानुबन्धा च तथा स कपिकुञ्जरः॥६५॥
जैसे ऊपर की दिशा से प्रकट हुई पुच्छयुक्त उल्का आकाश में जाती देखी जाती है, उसी प्रकार अपनी पूँछ के कारण कपिश्रेष्ठ हनुमान जी भी दिखायी देते थे॥६५॥
पतत्पतङ्गसंकाशो व्यायतः शुशुभे कपिः।
प्रवृद्ध इव मातङ्गः कक्ष्यया बध्यमानया॥६६॥
चलते हुए सूर्य के समान विशालकाय हनुमान जी अपनी पूँछ के कारण ऐसी शोभा पा रहे थे, मानो कोई बड़ा गजराज अपनी कमर में बँधी हुई रस्सी से सुशोभित हो रहा हो॥६६॥
उपरिष्टाच्छरीरेण च्छायया चावगाढया।
सागरे मारुताविष्टा नौरिवासीत् तदा कपिः॥६७॥
हनुमान जी का शरीर समुद्र से ऊपर-ऊपर चल रहा था और उनकी परछाईं जल में डूबी हुई-सी दिखायी देती थी। इस प्रकार शरीर और परछाईं दोनों से उपलक्षित हुए वे कपिवर हनुमान् समुद्र के जल में पड़ी हुई उस नौका के समान प्रतीत होते थे, जिसका ऊपरी भाग (पाल) वायु से परिपूर्ण हो और निम्नभाग समुद्र के जल से लगा हुआ हो॥६७॥
यं यं देशं समुद्रस्य जगाम स महाकपिः।
स तु तस्याङ्गवेगेन सोन्माद इव लक्ष्यते॥६८॥
वे समुद्र के जिस-जिस भाग में जाते थे, वहाँ-वहाँ उनके अंग के वेग से उत्ताल तरङ्ग उठने लगती थीं। अतः वह भाग उन्मत्त (विक्षुब्ध)-सा दिखायी देता था॥ ६८॥
सागरस्योर्मिजालानामुरसा शैलवर्मणाम्।
अभिध्नंस्तु महावेगः पुप्लुवे स महाकपिः॥६९॥
महान् वेगशाली महाकपि हनुमान् पर्वतों के समान ऊँची महासागर की तरङ्गमालाओं को अपनी छाती से चूर-चूर करते हुए आगे बढ़ रहे थे॥६९ ॥
कपिवातश्च बलवान् मेघवातश्च निर्गतः।
सागरं भीमनिर्हादं कम्पयामासतुर्भृशम्॥७०॥
कपिश्रेठ हनुमान् के शरीर से उठी हुई तथा मेघों की घटा में व्याप्त हुई प्रबल वायु ने भीषण गर्जना करने वाले समुद्र में भारी हलचल मचा दी॥ ७० ॥
विकर्षन्नर्मिजालानि बृहन्ति लवणाम्भसि।
पुप्लुवे कपिशार्दूलो विकिरन्निव रोदसी॥७१॥
वे कपिकेसरी अपने प्रचण्ड वेग से समुद्र में बहुत सी ऊँची-ऊँची तरङ्गों को आकर्षित करते हुए इस प्रकार उड़े जा रहे थे, मानो पृथ्वी और आकाश दोनों को विक्षुब्ध कर रहे हैं॥ ७१॥
मेरुमन्दरसंकाशानुगतान् सुमहार्णवे।
अत्यक्रामन्महावेगस्तरङ्गान् गणयन्निव॥७२॥
वे महान् वेगशाली वानरवीर उस महासमुद्र में उठी हुई सुमेरु और मन्दराचल के समान उत्ताल तरङ्गों की मानो गणना करते हुए आगे बढ़ रहे थे। ७२॥
तस्य वेगसमुघुष्टं जलं सजलदं तदा।
अम्बरस्थं विबभ्राजे शरदभ्रमिवाततम्॥७३॥
उस समय उनके वेग से ऊँचे उठकर मेघमण्डल के साथ आकाश में स्थित हुआ समुद्र का जल शरत्काल के फैले हुए मेघों के समान जान पड़ता था।७३॥
तिमिनक्रझषाः कूर्मा दृश्यन्ते विवृतास्तदा।
वस्त्रापकर्षणेनेव शरीराणि शरीरिणाम्॥७४॥
जल हट जाने के कारण समुद्र के भीतर रहने वाले मगर, नाकें, मछलियाँ और कछुए साफ-साफ दिखायी देते थे। जैसे वस्त्र खींच लेने पर देहधारियों के शरीर नंगे दीखने लगते हैं। ७४॥
क्रममाणं समीक्ष्याथ भुजगाः सागरंगमाः।
व्योम्नि तं कपिशार्दूलं सुपर्णमिव मेनिरे॥७५॥
समुद्र में विचरने वाले सर्प आकाश में जाते हुए कपिश्रेष्ठ हनुमान जी को देखकर उन्हें गरुड़ के ही समान समझने लगे॥ ७५ ॥
दशयोजनविस्तीर्णा त्रिंशद्योजनमायता।
छाया वानरसिंहस्य जवे चारुतराभवत्॥७६॥
कपिकेसरी हनुमान जी की दस योजन चौड़ी और तीस योजन लम्बी छाया वेग के कारण अत्यन्त रमणीय जान पड़ती थी॥ ७६॥
श्वेताभ्रघनराजीव वायुपुत्रानुगामिनी।
तस्य सा शुशुभे छाया पतिता लवणाम्भसि॥७७॥
खारे पानी के समुद्रमें पड़ी हुई पवनपुत्र हनुमान् का अनुसरण करने वाली उनकी वह छाया श्वेत बादलों की पंक्ति के समान शोभा पाती थी॥ ७७॥
शुशुभे स महातेजा महाकायो महाकपिः।
वायुमार्गे निरालम्बे पक्षवानिव पर्वतः॥७८॥
वे परम तेजस्वी महाकाय महाकपि हनुमान् आलम्बनहीन आकाश में पंखधारी पर्वत के समान जान पड़ते थे॥ ७८॥
येनासौ याति बलवान् वेगेन कपिकुञ्जरः।
तेन मार्गेण सहसा द्रोणीकृत इवार्णवः॥७९॥
वे बलवान् कपिश्रेष्ठ जिस मार्ग से वेगपूर्वक निकल जाते थे, उस मार्ग से संयुक्त समुद्र सहसा कठौते या कड़ाह के समान हो जाता था (उनके वेग से उठी हुई वायु के द्वारा वहाँ का जल हट जाने से वह स्थान कठौते आदि के समान गहरा-सा दिखायी पड़ता था) ॥७९॥
आपाते पक्षिसङ्घानां पक्षिराज इव व्रजन्।
हनुमान् मेघजालानि प्रकर्षन् मारुतो यथा॥८०॥
पक्षी-समूहों के उड़ने के मार्ग में पक्षिराज गरुड़ की भाँति जाते हुए हनुमान् वायु के समान मेघमालाओं को अपनी ओर खींच लेते थे। ८० ॥
पाण्डुरारुणवर्णानि नीलमञ्जिष्ठकानि च।
कपिनाऽऽकृष्यमाणानि महाभ्राणि चकाशिरे॥८१॥
हनुमान जी के द्वारा खींचे जाते हुए वे श्वेत, अरुण, नील और मजीठ के-से रंगवाले बड़े-बड़े मेघ वहाँ बड़ी शोभा पाते थे॥ ८१॥
प्रविशन्नभ्रजालानि निष्पतंश्च पुनः पुनः।
प्रच्छन्नश्च प्रकाशश्च चन्द्रमा इव दृश्यते॥८२॥
वे बारम्बार बादलों के समूह में घुस जाते और बाहर निकल आते थे। इस तरह छिपते और प्रकाशित होते हुए चन्द्रमा के समान दृष्टिगोचर होते थे। ८२॥
प्लवमानं तु तं दृष्ट्वा प्लवगं त्वरितं तदा।
ववृषुस्तत्र पुष्पाणि देवगन्धर्वचारणाः॥८३॥
उस समय तीव्रगति से आगे बढ़ते हुए वानरवीर हनुमान जी को देखकर देवता, गन्धर्व और चारण उनके ऊपर फूलों की वर्षा करने लगे। ८३॥
तताप नहि तं सूर्यः प्लवन्तं वानरेश्वरम्।
सिषेवे च तदा वायू रामकार्यार्थसिद्धये॥८४॥
वे श्रीरामचन्द्रजी का कार्य सिद्ध करने के लिये जा रहे थे, अतः उस समय वेग से जाते हुए वानरराज हनुमान् को सूर्यदेव ने ताप नहीं पहुँचाया और वायुदेव ने भी उनकी सेवा की॥ ८४॥
ऋषयस्तुष्टवुश्चैनं प्लवमानं विहायसा।
जगुश्च देवगन्धर्वाः प्रशंसन्तो वनौकसम्॥८५॥
आकाशमार्ग से यात्रा करते हुए वानरवीर हनुमान् की ऋषि-मुनि स्तुति करने लगे तथा देवता और गन्धर्व उनकी प्रशंसा के गीत गाने लगे॥ ८५ ॥
नागाश्च तुष्टवुर्यक्षा रक्षांसि विविधानि च।
प्रेक्ष्य सर्वे कपिवरं सहसा विगतक्लमम्॥८६॥
उन कपिश्रेष्ठ को बिना थकावट के सहसा आगे बढ़ते देख नाग, यक्ष और नाना प्रकार के राक्षस सभी उनकी स्तुति करने लगे॥८६॥
तस्मिन् प्लवगशार्दूले प्लवमाने हनूमति।
इक्ष्वाकुकुलमानार्थी चिन्तयामास सागरः॥८७॥
जिस समय कपिकेसरी हनुमान जी उछलकर समुद्र पार कर रहे थे, उस समय इक्ष्वाकुकुल का सम्मान करने की इच्छा से समुद्र ने विचार किया—॥ ८७॥
साहाय्यं वानरेन्द्रस्य यदि नाहं हनूमतः।
करिष्यामि भविष्यामि सर्ववाच्यो विवक्षताम्॥८८॥
‘यदि मैं वानरराज हनुमान जी की सहायता नहीं करूँगा तो बोलने की इच्छा वाले सभी लोगों की दृष्टि में मैं सर्वथा निन्दनीय हो जाऊँगा॥ ८८ ॥
अहमिक्ष्वाकुनाथेन सगरेण विवर्धितः।
इक्ष्वाकुसचिवश्चायं तन्नार्हत्यवसादितुम्॥८९॥
‘मुझे इक्ष्वाकुकुल के महाराज सगर ने बढ़ाया था इस समय ये हनुमान जी भी इक्ष्वाकुवंशी वीर श्रीरघुनाथजी की सहायता कर रहे हैं, अतः इन्हें इस यात्रा में किसी प्रकार का कष्ट नहीं होना चाहिए ८९॥
तथा मया विधातव्यं विश्रमेत यथा कपिः।
शेषं च मयि विश्रान्तः सुखी सोऽतितरिष्यति॥९०॥
‘मुझे ऐसा कोई उपाय करना चाहिये, जिससे वानरवीर यहाँ कुछ विश्राम कर लें। मेरे आश्रय में विश्राम कर लेने पर मेरे शेष भाग को ये सुगमता से पार कर लेंगे’।
इति कृत्वा मतिं साध्वी समुद्रश्छन्नमम्भसि।
हिरण्यनाभं मैनाकमुवाच गिरिसत्तमम्॥९१॥
यह शुभ विचार करके समुद्र ने अपने जल में छिपे हुए सुवर्णमय गिरिश्रेष्ठ मैनाक से कहा- ॥९१॥
त्वमिहासुरसङ्घानां देवराज्ञा महात्मना।
पातालनिलयानां हि परिघः संनिवेशितः॥९२॥
‘शैलप्रवर! महामना देवराज इन्द्र ने तुम्हें यहाँ पातालवासी असुरसमूहों के निकलने के मार्ग को रोकने के लिये परिघरूप से स्थापित किया है॥ ९२ ॥
त्वमेषां ज्ञातवीर्याणां पुनरेवोत्पतिष्यताम्।
पातालस्याप्रमेयस्य द्वारमावृत्य तिष्ठसि॥९३॥
‘इन असुरों का पराक्रम सर्वत्र प्रसिद्ध है। वे फिर पाताल से ऊपरको आना चाहते हैं, अतः उन्हें रोकने के लिये तुम अप्रमेय पाताललोक के द्वार को बंद करके खड़े हो॥९३॥
तिर्यगूर्ध्वमधश्चैव शक्तिस्ते शैल वर्धितुम्।
तस्मात् संचोदयामि त्वामुत्तिष्ठ गिरिसत्तम ॥ ९४॥
‘शैल! ऊपर-नीचे और अगल-बगल में सब ओर बढ़ने की तुममें शक्ति है। गिरिश्रेष्ठ! इसीलिये मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ कि तुम ऊपर की ओर उठो॥९४ ॥
स एष कपिशार्दूलस्त्वामुपर्येति वीर्यवान्।
हनूमान् रामकार्यार्थी भीमका खमाप्लुतः॥९५॥
‘देखो, ये पराक्रमी कपिकेसरी हनुमान् तुम्हारे ऊपर होकर जा रहे हैं। ये बड़ा भयंकर कर्म करने वाले हैं, इस समय श्रीराम का कार्य सिद्ध करने के लिये इन्होंने आकाश में छलाँग मारी है॥ ९५॥
अस्य साह्यं मया कार्यमिक्ष्वाकुकुलवर्तिनः।
मम इक्ष्वाकवः पूज्याः परं पूज्यतमास्तव॥९६॥
‘ये इक्ष्वाकुवंशी राम के सेवक हैं, अतः मुझे इनकी सहायता करनी चाहिये। इक्ष्वाकुवंश के लोग मेरे पूजनीय हैं और तुम्हारे लिये तो वे परम पूजनीय हैं।
कुरु साचिव्यमस्माकं न नः कार्यमतिक्रमेत्।
कर्तव्यमकृतं कार्यं सतां मन्युमुदीरयेत्॥९७॥
‘अतः तुम हमारी सहायता करो। जिससे हमारे कर्तव्य-कर्म का (हनुमान् जी के सत्काररूपी कार्य का) अवसर बीत न जाय। यदि कर्तव्य का पालन नहीं किया जाय तो वह सत्पुरुषों के क्रोध को जगा देता है॥९७॥
सलिलादूर्ध्वमुत्तिष्ठ तिष्ठत्वेष कपिस्त्वयि।
अस्माकमतिथिश्चैव पूज्यश्च प्लवतां वरः॥९८॥
‘इसलिये तुम पानी से ऊपर उठो, जिससे ये छलाँग मारने वालों में श्रेष्ठ कपिवर हनुमान् तुम्हारे ऊपर कुछ काल तक ठहरें—विश्राम करें वे हमारे पूजनीय अतिथि भी हैं॥९८॥
चामीकरमहानाभ देवगन्धर्वसेवित।
हनूमाँस्त्वयि विश्रान्तस्ततः शेषं गमिष्यति॥९९॥
‘देवताओं और गन्धर्वो द्वारा सेवित तथा सुवर्णमय विशाल शिखर वाले मैनाक! तुम्हारे ऊपर विश्राम करने के पश्चात् हनुमान जी शेष मार्ग को सुखपूर्वक तय कर लेंगे॥ ९९॥
काकुत्स्थस्यानृशंस्यं च मैथिल्याश्च विवासनम्।
श्रमं च प्लवगेन्द्रस्य समीक्ष्योत्थातुमर्हसि॥१००॥
‘ककुत्स्थवंशी श्रीरामचन्द्रजी की दयालुता, मिथिलेशकुमारी सीता का परदेश में रहने के लिये विवश होना तथा वानरराज हनुमान् का परिश्रम देखकर तुम्हें अवश्य ऊपर उठना चाहिये’ ॥ १०० ॥
हिरण्यगर्भो मैनाको निशम्य लवणाम्भसः।
उत्पपात जलात् तूर्णं महाद्रुमलतावृतः॥१०१॥
यह सुनकर बड़े-बड़े वृक्षों और लताओं से आवृत सुवर्णमय मैनाक पर्वत तुरंत ही क्षार समुद्र के जल से ऊपर को उठ गया॥ १०१॥
स सागरजलं भित्त्वा बभूवात्युच्छ्रितस्तदा।
यथा जलधरं भित्त्वा दीप्तरश्मिर्दिवाकरः॥१०२॥
जैसे उद्दीप्त किरणों वाले दिवाकर (सूर्य) मेघों के आवरण को भेदकर उदित होते हैं, उसी प्रकार उस समय महासागर के जल का भेदन करके वह पर्वत बहुत ऊँचा उठ गया॥ १०२॥
स महात्मा मुहूर्तेन पर्वतः सलिलावृतः।
दर्शयामास शृङ्गाणि सागरेण नियोजितः॥१०३॥
समुद्र की आज्ञा पाकर जल में छिपे रहने वाले उस विशालकाय पर्वत ने दो ही घड़ी में हनुमान जी को अपने शिखरों का दर्शन कराया॥ १०३ ॥
शातकुम्भमयैः शृङ्गैः सकिंनरमहोरगैः।
आदित्योदयसंकाशैरुल्लिखद्भिरिवाम्बरम्॥१०४॥
उस पर्वत के वे शिखर सुवर्णमय थे। उन पर किन्नर और बड़े-बड़े नाग निवास करते थे। सूर्योदय के समान तेजःपुञ्ज से विभूषित वे शिखर इतने ऊँचे थे कि आकाश में रेखा-सी खींच रहे थे॥ १०४॥
तस्य जाम्बूनदैः शृङ्गैः पर्वतस्य समुत्थितैः।
आकाशं शस्त्रसंकाशमभवत् काञ्चनप्रभम्॥१०५॥
उस पर्वत के उठे हुए सुवर्णमय शिखरों के कारण शस्त्र के समान नील वर्णवाला आकाश सुनहरी प्रभा से उद्भासित होने लगा॥ १०५ ॥
जातरूपमयैः शृ.ओजमानैर्महाप्रभैः।
आदित्यशतसंकाशः सोऽभवद् गिरिसत्तमः॥१०६॥
उन परम कान्तिमान् और तेजस्वी सुवर्णमय शिखरों से वह गिरिश्रेष्ठ मैनाक सैकड़ों सूर्यों के समान देदीप्यमान हो रहा था॥ १०६॥
समुत्थितमसङ्गेन हनूमानग्रतः स्थितम्।
मध्ये लवणतोयस्य विघ्नोऽयमिति निश्चितः॥१०७॥
क्षार समुद्र के बीच में अविलम्ब उठकर सामने खड़े हुए मैनाक को देखकर हनुमान जी ने मन-ही-मन निश्चित किया कि यह कोई विघ्न उपस्थित हुआ है।
स तमुच्छ्रितमत्यर्थं महावेगो महाकपिः।
उरसा पातयामास जीमूतमिव मारुतः॥१०८॥
अतः वायु जैसे बादल को छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार महान् वेगशाली महाकपि हनुमान् ने बहुत ऊँचे उठे हुए मैनाक पर्वत के उस उच्चतर शिखर को अपनी छाती के धक्के से नीचे गिरा दिया। १०८॥
स तदासादितस्तेन कपिना पर्वतोत्तमः।
बुद्ध्वा तस्य हरेर्वेगं जहर्ष च ननाद च॥१०९॥
इस प्रकार कपिवर हनुमान जी के द्वारा नीचा देखने पर उनके उस महान् वेग का अनुभव करके पर्वतश्रेष्ठ मैनाक बड़ा प्रसन्न हुआ और गर्जना करने लगा॥ १०९॥
तमाकाशगतं वीरमाकाशे समुपस्थितः।
प्रीतो हृष्टमना वाक्यमब्रवीत् पर्वतः कपिम्॥११०॥
मानुषं धारयन् रूपमात्मनः शिखरे स्थितः।
तब आकाश में स्थित हुए उस पर्वत ने आकाशगत वीर वानर हनुमान जी से प्रसन्नचित्त होकर कहा।वह मनुष्यरूप धारण करके अपने ही शिखर पर स्थित हो इस प्रकार बोला— ॥ ११० १/२॥
दुष्करं कृतवान् कर्म त्वमिदं वानरोत्तम॥१११॥
निपत्य मम शृङ्गेषु सुखं विश्रम्य गम्यताम्।
‘वानरशिरोमणे! आपने यह दुष्कर कर्म किया है। अब उतरकर मेरे इन शिखरों पर सुखपूर्वक विश्राम कर लीजिये, फिर आगे की यात्रा कीजियेगा॥ १११ १/२॥
राघवस्य कुले जातैरुदधिः परिवर्धितः॥११२॥
स त्वां रामहिते युक्तं प्रत्यर्चयति सागरः।
‘श्रीरघुनाथजी के पूर्वजों ने समुद्र की वृद्धि की थी, इस समय आप उनका हित करने में लगे हैं; अतः समुद्र आपका सत्कार करना चाहता है ॥ ११२ १/२॥
कृते च प्रतिकर्तव्यमेष धर्मः सनातनः॥११३॥
सोऽयं तत्प्रतिकारार्थी त्वत्तः सम्मानमर्हति।
‘किसी ने उपकार किया हो तो बदले में उसका भी उपकार किया जाय—यह सनातन धर्म है। इस दृष्टि से प्रत्युपकार करने की इच्छा वाला यह सागर आपसे सम्मान पाने के योग्य है (आप इसका सत्कार ग्रहण करें, इतने से ही इसका सम्मान हो जायगा) ॥ ११३ १/२॥
त्वन्निमित्तमनेनाहं बहुमानात् प्रचोदितः॥११४॥
योजनानां शतं चापि कपिरेष खमाप्लुतः।
तव सानुषु विश्रान्तः शेषं प्रक्रमतामिति॥११५॥
‘आपके सत्कार के लिये समुद्र ने बड़े आदर से मुझे नियुक्त किया है और कहा है—’इन कपिवर हनुमान् ने सौ योजन दूर जाने के लिये आकाश में छलाँग मारी है, अतः कुछ देर तक तुम्हारे शिखरों पर ये विश्राम कर लें, फिर शेष भाग का लङ्घन करेंगे’। ११४-११५॥
तिष्ठ त्वं हरिशार्दूल मयि विश्रम्य गम्यताम्।
तदिदं गन्धवत् स्वादु कन्दमूलफलं बहु॥११६॥
तदास्वाद्य हरिश्रेष्ठ विश्रान्तोऽथ गमिष्यसि।
‘अतः कपिश्रेष्ठ! आप कुछ देर तक मेरे ऊपर विश्राम कर लीजिये, फिर जाइयेगा। इस स्थान पर ये बहुत-से सुगन्धित और सुस्वादु कन्द, मूल तथा फल हैं वानरशिरोमणे! इनका आस्वादन करके थोड़ी देर तक सुस्ता लीजिये। उसके बाद आगे की यात्रा कीजियेगा॥ ११६ १/२॥
अस्माकमपि सम्बन्धः कपिमुख्य त्वयास्ति वै।
प्रख्यातस्त्रिषु लोकेषु महागुणपरिग्रहः॥११७॥
‘कपिवर! आपके साथ हमारा भी कुछ सम्बन्ध है। आप महान् गुणों का संग्रह करने वाले और तीनों लोकों में विख्यात हैं॥ ११७॥
वेगवन्तः प्लवन्तो ये प्लवगा मारुतात्मज।
तेषां मुख्यतमं मन्ये त्वामहं कपिकुञ्जर॥११८॥
‘कपिश्रेष्ठ पवननन्दन! जो-जो वेगशाली और छलाँग मारने वाले वानर हैं, उन सबमें मैं आपको ही श्रेष्ठतम मानता हूँ॥ ११८॥
अतिथिः किल पूजार्हः प्राकृतोऽपि विजानता।
धर्मं जिज्ञासमानेन किं पुनर्यादृशो भवान्॥११९॥
‘धर्म की जिज्ञासा रखने वाले विज्ञ पुरुष के लिये एक साधारण अतिथि भी निश्चय ही पूजा के योग्य माना गया है। फिर आप-जैसे असाधारण शौर्यशाली पुरुष कितने सम्मान के योग्य हैं, इस विषय में तो कहना ही क्या है ? ॥ ११९॥
त्वं हि देववरिष्ठस्य मारुतस्य महात्मनः।
पुत्रस्तस्यैव वेगेन सदृशः कपिकुञ्जर॥१२०॥
‘कपिश्रेष्ठ! आप देवशिरोमणि महात्मा वायु के पुत्र हैं और वेग में भी उन्हीं के समान हैं॥ १२० ॥
पूजिते त्वयि धर्मज्ञे पूजां प्राप्नोति मारुतः।
तस्मात् त्वं पूजनीयो मे शृणु चाप्यत्र कारणम्॥१२१॥
‘आप धर्म के ज्ञाता हैं। आपकी पूजा होने पर साक्षात् वायुदेव का पूजन हो जायगा इसलिये आप अवश्य ही मेरे पूजनीय हैं। इसमें एक और भी कारण है, उसे सुनिये॥ १२१॥
पूर्वं कृतयुगे तात पर्वताः पक्षिणोऽभवन्।
तेऽपि जग्मुर्दिशः सर्वा गरुडा इव वेगिनः॥१२२॥
‘तात! पूर्वकाल के सत्ययुग की बात है। उन दिनों पर्वतों के भी पंख होते थे। वे भी गरुड़ के समान वेगशाली होकर सम्पूर्ण दिशाओं में उड़ते फिरते थे॥ १२२॥
ततस्तेषु प्रयातेषु देवसङ्घाः सहर्षिभिः।
भूतानि च भयं जग्मुस्तेषां पतनशङ्कया॥१२३॥
‘उनके इस तरह वेगपूर्वक उड़ने और आने जाने पर देवता, ऋषि और समस्त प्राणियों को उनके गिरने की आशङ्का से बड़ा भय होने लगा॥ १२३ ॥
ततः क्रुद्धः सहस्राक्षः पर्वतानां शतक्रतुः।
पक्षांश्चिच्छेद वज्रेण ततः शतसहस्रशः॥ १२४॥
‘इससे सहस्र नेत्रों वाले देवराज इन्द्र कुपित हो उठे और उन्होंने अपने व्रज से लाखों पर्वतों के पंख काट डाले॥ १२४॥
स मामुपगतः क्रुद्धो वज्रमुद्यम्य देवराट्।
ततोऽहं सहसा क्षिप्तः श्वसनेन महात्मना॥१२५॥
‘उस समय कुपित हुए देवराज इन्द्र वज्र उठाये मेरी ओर भी आये, किन्तु महात्मा वायु ने सहसा मुझे इस समुद्र में गिरा दिया॥ १२५ ॥
अस्मिल्लवणतोये च प्रक्षिप्तः प्लवगोत्तम।
गुप्तपक्षः समग्रश्च तव पित्राभिरक्षितः॥१२६॥
‘वानरश्रेष्ठ! इस क्षार समुद्र में गिराकर आपके पिता ने मेरे पंखों की रक्षा कर ली और मैं अपने सम्पूर्ण अंश से सुरक्षित बच गया॥ १२६॥
ततोऽहं मानयामि त्वां मान्योऽसि मम मारुते।
त्वया ममैष सम्बन्धः कपिमुख्य महागुणः॥१२७॥
‘पवननन्दन! कपिश्रेष्ठ! इसीलिये मैं आपका आदर करता हूँ, आप मेरे माननीय हैं। आपके साथ मेरा यह सम्बन्ध महान् गुणों से युक्त है॥ १२७॥
अस्मिन् नेवंगते कार्ये सागरस्य ममैव च।
प्रीतिं प्रीतमनाः कर्तुं त्वमर्हसि महामते॥१२८॥
‘महामते! इस प्रकार चिरकाल के बाद जो यह प्रत्युपकार रूप कार्य (आपके पिता के उपकार का बदला चुकाने का अवसर) प्राप्त हुआ है, इसमें आप प्रसन्नचित्त होकर मेरी और समुद्र की भी प्रीति का सम्पादन करें (हमारा आतिथ्य ग्रहण करके हमें संतुष्ट करें)॥ १२८॥
श्रमं मोक्षय पूजां च गृहाण हरिसत्तम।
प्रीतिं च मम मान्यस्य प्रीतोऽस्मि तव दर्शनात्॥१२९॥
‘वानरशिरोमणे! आप यहाँ अपनी थकान उतारिये, हमारी पूजा ग्रहण कीजिये और मेरे प्रेम को भी स्वीकार कीजिये। मैं आप-जैसे माननीय पुरुष के दर्शन से बहुत प्रसन्न हुआ हूँ’॥ १२९॥
एवमुक्तः कपिश्रेष्ठस्तं नगोत्तममब्रवीत्।
प्रीतोऽस्मि कृतमातिथ्यं मन्युरेषोऽपनीयताम्॥१३०॥
मैनाक के ऐसा कहने पर कपिश्रेष्ठ हनुमान जी ने उस उत्तम पर्वत से कहा—’मैनाक! मुझे भी आपसे मिलकर बड़ी प्रसन्नता हुई है। मेरा आतिथ्य हो गया अब आप अपने मन से यह दुःख अथवा चिन्ता निकाल दीजिये कि इन्होंने मेरी पूजा ग्रहण नहीं की। १३०॥
त्वरते कार्यकालो मे अहश्चाप्यतिवर्तते।
प्रतिज्ञा च मया दत्ता न स्थातव्यमिहान्तरा॥१३१॥
‘मेरे कार्य का समय मुझे बहुत जल्दी करने के लिये प्रेरित कर रहा है। यह दिन भी बीता जा रहा है। मैंने वानरों के समीप यह प्रतिज्ञा कर ली है कि मैं यहाँ बीच में कहीं नहीं ठहर सकता’ ॥ १३१॥
इत्युक्त्वा पाणिना शैलमालभ्य हरिपुङ्गवः।
जगामाकाशमाविश्य वीर्यवान् प्रहसन्निव॥१३२॥
ऐसा कहकर महाबली वानरशिरोमणि हनुमान् ने हँसते हुएसे वहाँ मैनाक का अपने हाथ से स्पर्श किया और आकाश में ऊपर उठकर चलने लगे॥ १३२॥
स पर्वतसमुद्राभ्यां बहुमानादवेक्षितः।
पूजितश्चोपपन्नाभिराशीभिरभिनन्दितः॥१३३॥
उस समय पर्वत और समुद्र दोनों ने ही बड़े आदर से उनकी ओर देखा, उनका सत्कार किया और यथोचित आशीर्वादों से उनका अभिनन्दन किया॥ १३३॥
अथोर्ध्वं दूरमागत्य हित्वा शैलमहार्णवौ।
पितुः पन्थानमासाद्य जगाम विमलेऽम्बरे॥१३४॥
फिर पर्वत और समुद्र को छोड़कर उनसे दूर ऊपर उठकर अपने पिता के मार्ग का आश्रय ले हनुमान जी निर्मल आकाश में चलने लगे॥ १३४ ॥
भूयश्चोर्ध्वं गतिं प्राप्य गिरिं तमवलोकयन्।
वायुसूनुर्निरालम्बो जगाम कपिकुञ्जरः॥१३५॥
तत्पश्चात् और भी ऊँचे उठकर उस पर्वत को देखते हुए कपिश्रेष्ठ पवनपुत्र हनुमान जी बिना किसी आधार के आगे बढ़ने लगे॥ १३५॥
तद् द्वितीयं हनुमतो दृष्ट्वा कर्म सुदुष्करम्।
प्रशशंसुः सुराः सर्वे सिद्धाश्च परमर्षयः॥१३६॥
हनुमान जी का यह दूसरा अत्यन्त दुष्कर कर्म देखकर सम्पूर्ण देवता, सिद्ध और महर्षिगण उनकी प्रशंसा करने लगे॥ १३६ ॥
देवताश्चाभवन् हृष्टास्तत्रस्थास्तस्य कर्मणा।
काञ्चनस्य सुनाभस्य सहस्राक्षश्च वासवः॥१३७॥
वहाँ आकाश में ठहरे हुए देवता तथा सहस्र नेत्रधारी इन्द्र उस सुन्दर मध्य भागवाले सुवर्णमय मैनाक पर्वत के उस कार्य से बहुत प्रसन्न हुए॥ १३७॥
उवाच वचनं धीमान् परितोषात् सगद्गदम्।
सुनाभं पर्वतश्रेष्ठं स्वयमेव शचीपतिः॥१३८॥
उस समय स्वयं बुद्धिमान् शचीपति इन्द्र ने अत्यन्त संतुष्ट होकर पर्वतश्रेष्ठ सुनाभ नाक से गद्गद वाणी में कहा- ॥ १३८॥
हिरण्यनाभ शैलेन्द्र परितुष्टोऽस्मि ते भृशम्।
अभयं ते प्रयच्छामि गच्छ सौम्य यथासुखम्॥१३९॥
‘सुवर्णमय शैलराज मैनाक! मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूँ। सौम्य! तुम्हें अभय दान देता हूँ। तुम सुखपूर्वक जहाँ चाहो, जाओ॥ १३९॥
साह्यं कृतं ते सुमहद् विश्रान्तस्य हनूमतः।
क्रमतो योजनशतं निर्भयस्य भये सति॥१४०॥
‘सौ योजन समुद्र को लाँघते समय जिनके मन में कोई भय नहीं रहा है, फिर भी जिनके लिये हमारे हृदय में यह भय था कि पता नहीं इनका क्या होगा? उन्हीं हनुमान जी को विश्राम का अवसर देकर तुमने उनकी बहुत बड़ी सहायता की है॥ १४०॥
रामस्यैष हितायैव याति दाशरथेः कपिः।
सक्रियां कुर्वता शक्त्या तोषितोऽस्मि दृढं त्वया॥१४१॥
‘ये वानरश्रेष्ठ हनुमान् दशरथनन्दन श्रीराम की सहायता के लिये ही जा रहे हैं। तुमने यथाशक्ति इनका सत्कार करके मुझे पूर्ण संतोष प्रदान किया है’॥ १४१॥
स तत् प्रहर्षमलभद् विपुलं पर्वतोत्तमः।
देवतानां पतिं दृष्ट्वा परितुष्टं शतक्रतुम्॥१४२॥
देवताओं के स्वामी शतक्रतु इन्द्र को संतुष्ट देखकर पर्वतों में श्रेष्ठ मैनाक को बड़ा हर्ष प्राप्त हुआ॥ १४२॥
स वै दत्तवरः शैलो बभूवावस्थितस्तदा।
हनूमांश्च मुहूर्तेन व्यतिचक्राम सागरम्॥१४३॥
इस प्रकार इन्द्र का दिया हुआ वर पाकर मैनाक उस समय जल में स्थित हो गया और हनुमान जी समुद्र के उस प्रदेश को उसी मुहूर्त में लाँघ गये॥ १४३॥
ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः।
अब्रुवन् सूर्यसंकाशां सुरसां नागमातरम्॥१४४॥
तब देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षियों ने सूर्यतुल्य तेजस्विनी नागमाता सुरसा से कहा- ॥ १४४॥
अयं वातात्मजः श्रीमान् प्लवते सागरोपरि।
हनूमान् नाम तस्य त्वं मुहूर्तं विघ्नमाचर ॥१४५॥
‘ये पवननन्दन श्रीमान् हनुमान जी समुद्र के ऊपर होकर जा रहे हैं। तुम दो घड़ी के लिये इनके मार्ग में विघ्न डाल दो॥ १४५॥
राक्षसं रूपमास्थाय सुघोरं पर्वतोपमम्।
दंष्ट्राकरालं पिङ्गाक्षं वक्त्रं कृत्वा नभःस्पृशम्॥१४६॥
‘तुम पर्वत के समान अत्यन्त भयंकर राक्षसी का रूप धारण करो। उसमें विकराल दाढ़ें, पीले नेत्र और आकाश को स्पर्श करने वाला विकट मुँह बनाओ॥ १४६॥
बलमिच्छामहे ज्ञातुं भूयश्चास्य पराक्रमम्।
त्वां विजेष्यत्युपायेन विषादं वा गमिष्यति॥१४७॥
‘हमलोग पुनः हनुमान जी के बल और पराक्रम की परीक्षा लेना चाहते हैं। या तो किसी उपाय से ये तुम्हें जीत लेंगे अथवा विषाद में पड़ जायँगे (इससे इनके बलाबल का ज्ञान हो जायगा)’ ॥ १४७॥
एवमुक्ता तु सा देवी दैवतैरभिसत्कृता।
समुद्रमध्ये सुरसा बिभ्रती राक्षसं वपुः॥ १४८॥
विकृतं च विरूपं च सर्वस्य च भयावहम्।
प्लवमानं हनूमन्तमावृत्येदमुवाच ह॥१४९॥
देवताओं के सत्कारपूर्वक इस प्रकार कहने पर देवी सुरसा ने समुद्र के बीच में राक्षसी का रूप धारण किया। उसका वह रूप बड़ा ही विकट, बेडौल और सबके लिये भयावना था। वह समुद्र के पार जाते हुए हनुमान् जी को घेरकर उनसे इस प्रकार बोली- ॥ १४८-१४९॥
मम भक्ष्यः प्रदिष्टस्त्वमीश्वरैर्वानरर्षभ।
अहं त्वां भक्षयिष्यामि प्रविशेदं ममाननम्॥१५०॥
‘कपिश्रेष्ठ! देवेश्वरों ने तुम्हें मेरा भक्ष्य बताकर मुझे अर्पित कर दिया है, अतः मैं तुम्हें खाऊँगी तुम मेरे इस मुँह में चले आओ॥ १५०॥
वर एष पुरा दत्तो मम धात्रेति सत्वरा।
व्यादाय वक्त्रं विपुलं स्थिता सा मारुतेः पुरः॥१५१॥
‘पूर्वकाल में ब्रह्माजी ने मुझे यह वर दिया था।’ ऐसा कहकर वह तुरंत ही अपना विशाल मुँह फैलाकर हनुमान् जी के सामने खड़ी हो गयी॥ १५१॥
एवमुक्तः सुरसया प्रहृष्टवदनोऽब्रवीत्।
रामो दाशरथि म प्रविष्टो दण्डकावनम्।
लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा वैदेह्या चापि भार्यया॥१५२॥
सुरसा के ऐसा कहने पर हनुमान जी ने प्रसन्नमुख होकर कहा–’देवि! दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजी अपने भाई लक्ष्मण और धर्मपत्नी सीताजी के साथ दण्डकारण्य में आये थे॥ १५२॥
अन्यकार्यविषक्तस्य बद्धवैरस्य राक्षसैः।
तस्य सीता हृता भार्या रावणेन यशस्विनी॥१५३॥
‘वहाँ परहित-साधन में लगे हुए श्रीराम का राक्षसों के साथ वैर बँध गया। अतः रावण ने उनकी यशस्विनी भार्या सीता को हर लिया॥ १५३॥
तस्याः सकाशं दूतोऽहं गमिष्ये रामशासनात्।
कर्तुमर्हसि रामस्य साह्यं विषयवासिनि॥१५४॥
‘मैं श्रीराम की आज्ञा से उनका दूत बनकर सीताजी के पास जा रहा हूँ। तुम भी श्रीराम के राज्य में निवास करती हो। अतः तुम्हें उनकी सहायता करनी चाहिये॥ १५४॥
अथवा मैथिलीं दृष्ट्वा रामं चाक्लिष्टकारिणम्।
आगमिष्यामि ते वक्त्रं सत्यं प्रतिशृणोमि ते॥१५५॥
‘अथवा (यदि तुम मुझे खाना ही चाहती हो तो) मैं सीताजी का दर्शन करके अनायास ही महान् कर्म करने वाले श्रीरामचन्द्रजी से जब मिल लूँगा, तब तुम्हारे मुख में आ जाऊँगा—यह तुमसे सच्ची प्रतिज्ञा करके कहता हूँ’॥ १५५ ॥
एवमुक्ता हनुमता सुरसा कामरूपिणी।
अब्रवीन्नातिवर्तेन्मां कश्चिदेष वरो मम॥ १५६॥
हनुमान जी के ऐसा कहने पर इच्छानुसार रूप धारण करने वाली सुरसा बोली—’मुझे यह वर मिला है कि कोई भी मुझे लाँघकर आगे नहीं जा सकता’। १५६॥
तं प्रयान्तं समुद्रीक्ष्य सुरसा वाक्यमब्रवीत्।
बलं जिज्ञासमाना सा नागमाता हनूमतः॥१५७॥
फिर भी हनुमान जी को जाते देख उनके बल को जानने की इच्छा रखने वाली नागमाता सुरसा ने उनसे कहा— ॥ १५७॥
निविश्य वदनं मेऽद्य गन्तव्यं वानरोत्तम।
वर एष पुरा दत्तो मम धात्रेति सत्वरा॥१५८॥
व्यादाय विपुलं वक्त्रं स्थिता सा मारुतेःपुरः।
‘वानरश्रेष्ठ! आज मेरे मुख में प्रवेश करके ही तुम्हें आगे जाना चाहिये। पूर्वकाल में विधाता ने मुझे ऐसा ही वर दिया था।’ ऐसा कहकर सुरसा तुरंत अपना विशाल मुँह फैलाकर हनुमान जी के सामने खड़ी हो गयी॥ १५८ १/२॥
एवमुक्तः सुरसया क्रुद्धो वानरपुंगवः॥१५९॥
अब्रवीत् कुरु वै वक्त्रं येन मां विषहिष्यसि।
इत्युक्त्वा सुरसां क्रुद्धो दशयोजनमायताम्॥१६०॥
दशयोजनविस्तारो हनूमानभवत् तदा।
तं दृष्ट्वा मेघसंकाशं दशयोजनमायतम्।
चकार सुरसाप्यास्यं विंशन योजनमायतम्॥१६१॥
सुरसा के ऐसा कहने पर वानरशिरोमणि हनुमान जी कुपित हो उठे और बोले—’तुम अपना मुँह इतना बड़ा बना लो जिससे उसमें मेरा भार सह सको’ यों कहकर जब वे मौन हुए, तब सुरसा ने अपना मुख दस योजन विस्तृत बना लिया। यह देखकर कुपित हुए हनुमान् जी भी तत्काल दस योजन बड़े हो गये। उन्हें मेघ के समान दस योजन विस्तृत शरीर से युक्त हुआ देख सुरसा ने भी अपने मुख को बीस योजन बड़ा बना लिया॥ १५९–१६१॥
हनूमांस्तु ततः क्रुद्धस्त्रिंशद् योजनमायतः।
चकार सुरसा वक्त्रं चत्वारिंशत् तथोच्छ्रितम्॥१६२॥
तब हनुमान जी ने क्रुद्ध होकर अपने शरीर को तीस योजन अधिक बढ़ा दिया। फिर तो सुरसा ने भी अपने मुँह को चालीस योजन ऊँचा कर लिया॥ १६२ ॥
बभूव हनुमान् वीरः पञ्चाशद् योजनोच्छ्रितः।
चकार सुरसा वक्त्रं षष्टिं योजनमुच्छ्रितम्॥१६३॥
यह देख वीर हनुमान् पचास योजन ऊँचे हो गये। तब सुरसा ने अपना मुँह साठ योजन ऊँचा बना लिया॥
तदैव हनुमान् वीरः सप्ततिं योजनोच्छ्रितः।
चकार सुरसा वक्त्रमशीतिं योजनोच्छ्रितम्॥१६४॥
फिर तो वीर हनुमान् उसी क्षण सत्तर योजन ऊँचे हो गये। अब सुरसा ने अस्सी योजन ऊँचा मुँह बना लिया॥ १६४॥
हनूमाननलप्रख्यो नवतिं योजनोच्छ्रितः।
चकार सुरसा वक्त्रं शतयोजनमायतम्॥१६५॥
तदनन्तर अग्नि के समान तेजस्वी हनुमान् नब्बे योजन ऊँचे हो गये। यह देख सुरसा ने भी अपने मुँह का विस्तार सौ योजन का कर लिया * ॥ १६५॥
* १६२ से लेकर १६५ तक के चार श्लोक कुछ टीकाकारों ने प्रक्षिप्त बताये हैं, किंतु रामायणशिरोमणि नामक टीका में इनकी व्याख्या उपलब्ध होती है। अतः यहाँ मूल में इन्हें सम्मिलित कर लिया गया है।
तद्दृष्ट्वा व्यादितं त्वास्यं वायुपुत्रः स बुद्धिमान्।
दीर्घजिवं सुरसया सुभीमं नरकोपमम्॥१६६॥
स संक्षिप्यात्मनः कायं जीमत इव मारुतिः।
तस्मिन् मुहूर्ते हनुमान् बभूवाङ्गुष्ठमात्रकः॥१६७॥
सुरसा के फैलाये हुए उस विशाल जिह्वा से युक्त और नरक के समान अत्यन्त भयंकर मुँह को देखकर बुद्धिमान् वायुपुत्र हनुमान् ने मेघ की भाँति अपने शरीर को संकुचित कर लिया। वे उसी क्षण अँगूठे के बराबर छोटे हो गये॥ १६६-१६७॥
सोऽभिपद्याथ तद्वक्त्रं निष्पत्य च महाबलः।
अन्तरिक्षे स्थितः श्रीमानिदं वचनमब्रवीत्॥१६८॥
फिर वे महाबली श्रीमान् पवनकुमार सुरसा के उस मुँह में प्रवेश करके तुरंत निकल आये और आकाश में खड़े होकर इस प्रकार बोले- ॥ १६८॥
प्रविष्टोऽस्मि हि ते वक्त्रं दाक्षायणि नमोऽस्तुते।
गमिष्ये यत्र वैदेही सत्यश्चासीद् वरस्तव॥१६९॥
‘दक्षकुमारी! तुम्हें नमस्कार है। मैं तुम्हारे मुँह में प्रवेश कर चुका। लो तुम्हारा वर भी सत्य हो गया। अब मैं उस स्थान को जाऊँगा, जहाँ विदेहकुमारी सीता विद्यमान हैं’॥ १६९॥
तं दृष्ट्वा वदनान्मुक्तं चन्द्रं राहुमुखादिव।
अब्रवीत् सुरसा देवी स्वेन रूपेण वानरम्॥१७०॥
राहु के मुख से छूटे हुए चन्द्रमा की भाँति अपने मुख से मुक्त हुए हनुमान जी को देखकर सुरसा देवी ने अपने असली रूप में प्रकट होकर उन वानरवीर से कहा— ॥ १७०॥
अर्थसिद्ध्यै हरिश्रेष्ठ गच्छ सौम्य यथासुखम्।
समानय च वैदेहीं राघवेण महात्मना॥१७१॥
‘कपिश्रेष्ठ! तुम भगवान् श्रीराम के कार्य की सिद्धि के लिये सुखपूर्वक जाओ। सौम्य! विदेहनन्दिनी सीता को महात्मा श्रीराम से शीघ्र मिलाओ’॥ १७१॥
तत् तृतीयं हनुमतो दृष्ट्वा कर्म सुदुष्करम्।
साधुसाध्विति भूतानि प्रशशंसुस्तदा हरिम्॥१७२॥
कपिवर हनुमान जी का यह तीसरा अत्यन्त दुष्कर कर्म देख सब प्राणी वाह-वाह करके उनकी प्रशंसा करने लगे॥ १७२॥
स सागरमनाधृष्यमभ्येत्य वरुणालयम्।
जगामाकाशमाविश्य वेगेन गरुडोपमः॥१७३॥
वे वरुण के निवासभूत अलङ्घय समुद्र के निकट आकर आकाश का ही आश्रय ले गरुड़ के समान वेग से आगे बढ़ने लगे॥ १७३॥
सेविते वारिधाराभिः पतगैश्च निषेविते।
चरिते कैशिकाचारैरावतनिषेविते॥१७४॥
सिंहकुञ्जरशार्दूलपतगोरगवाहनैः।
विमानैः सम्पतद्भिश्च विमलैः समलंकृते॥१७५॥
वज्राशनिसमस्पर्शः पावकैरिव शोभिते।
कृतपुण्यैर्महाभागैः स्वर्गजिद्भिरधिष्ठिते॥१७६॥
वहता हव्यमत्यन्तं सेविते चित्रभानुना।
ग्रहनक्षत्रचन्द्रार्कतारागणविभूषिते॥१७७॥
महर्षिगणगन्धर्वनागयक्षसमाकुले।
विविक्ते विमले विश्वे विश्वावसुनिषेविते॥१७८॥
देवराजगजाक्रान्ते चन्द्रसूर्यपथे शिवे।
विताने जीवलोकस्य वितते ब्रह्मनिर्मिते॥१७९॥
बहुशः सेविते वीरैर्विद्याधरगणैर्वृते।
जगाम वायुमार्गे च गरुत्मानिव मारुतिः॥१८०॥
जो जल की धाराओं से सेवित, पक्षियों से संयुक्त, गानविद्या के आचार्य तुम्बुरु आदि गन्धर्वो के विचरण का स्थान तथा ऐरावत के आने-जाने का मार्ग है, सिंह, हाथी, बाघ, पक्षी और सर्प आदि वाहनों से जुते और उड़ते हुए निर्मल विमान जिसकी शोभा बढ़ाते हैं, जिनका स्पर्श वज्र और अशनि के समान दुःसह तथा तेज अग्नि के समान प्रकाशमान है तथा जो स्वर्गलोक पर विजय पा चुके हैं, ऐसे महाभाग पुण्यात्मा पुरुषों का जो निवासस्थान है, देवता के लिये अधिक मात्रा में हविष्य का भार वहन करने वाले अग्निदेव जिसका सदा सेवन करते हैं, ग्रह, नक्षत्र, चन्द्रमा, सूर्य और तारे आभूषण की भाँति जिसे सजाते हैं, महर्षियों के समुदाय, गन्धर्व, नाग और यक्ष जहाँ भरे रहते हैं, जो जगत् का आश्रयस्थान, एकान्त और निर्मल है, गन्धर्वराज विश्वावसु जिसमें निवास करते हैं, देवराज इन्द्र का हाथी जहाँ चलता-फिरता है, जो चन्द्रमा और सूर्य का भी मङ्गलमय मार्ग है, इस जीवजगत् के लिये विमल वितान (चँदोवा) है, साक्षात् परब्रह्म परमात्मा ने ही जिसकी सृष्टि की है, जो बहुसंख्यक वीरों से सेवित और विद्याधरगणों से आवृत है, उस वायुपथ आकाश में पवननन्दन हनुमान् जी गरुड़ के समान वेग से चले॥ १७४–१८०॥ ।
हनुमान् मेघजालानि प्राकर्षन् मारुतो यथा।
कालागुरुसवर्णानि रक्तपीतसितानि च ॥१८१॥
वायु के समान हनुमान जी अगर के समान काले तथा लाल, पीले और श्वेत बादलों को खींचते हुए आगे बढ़ने लगे॥ १८१॥
कपिना कृष्यमाणानि महाभ्राणि चकाशिरे।
प्रविशन्नभ्रजालानि निष्पतंश्च पुनः पुनः॥१८२॥
प्रावृषीन्दुरिवाभाति निष्पतन् प्रविशंस्तदा।
उनके द्वारा खींचे जाते हुए वे बड़े-बड़े बादल अद्भुत शोभा पा रहे थे। वे बारम्बार मेघ-समूहों में प्रवेश करते और बाहर निकलते थे। उस अवस्था में बादलों में छिपते तथा प्रकट होते हुए वर्षाकाल के चन्द्रमा की भाँति उनकी बड़ी शोभा हो रही थी॥ १८२ १/२॥
प्रदृश्यमानः सर्वत्र हनूमान् मारुतात्मजः॥१८३॥
भेजेऽम्बरं निरालम्बं पक्षयुक्त इवाद्रिराट्।
सर्वत्र दिखायी देते हुए पवनकुमार हनुमान् जी पंखधारी गिरिराज के समान निराधार आकाश का आश्रय लेकर आगे बढ़ रहे थे। १८३ १/२ ॥
प्लवमानं तु तं दृष्ट्वा सिंहिका नाम राक्षसी॥१८४॥
मनसा चिन्तयामास प्रवृद्धा कामरूपिणी।
इस तरह जाते हुए हनुमान जी को इच्छानुसार रूप धारण करने वाली विशालकाया सिंहिका नामवाली राक्षसी ने देखा। देखकर वह मन-ही-मन इस प्रकार विचार करने लगी- ॥ १८४ १/२॥
अद्य दीर्घस्य कालस्य भविष्याम्यहमाशिता॥१८५॥
इदं मम महासत्त्वं चिरस्य वशमागतम्।
‘आज दीर्घकाल के बाद यह विशाल जीव मेरे वश में आया है। इसे खा लेने पर बहुत दिनों के लिये मेरा पेट भर जायगा’॥ १८५ १/२॥
इति संचिन्त्य मनसा च्छायामस्य समाक्षिपत्॥१८६॥
छायायां गृह्यमाणायां चिन्तयामास वानरः।
समाक्षिप्तोऽस्मि सहसा पङ्गकृतपराक्रमः॥१८७॥
प्रतिलोमेन वातेन महानौरिव सागरे।
अपने हृदय में ऐसा सोचकर उस राक्षसी ने हनुमान् जी की छाया पकड़ ली। छाया पकड़ी जाने पर वानरवीर हनुमान् ने सोचा—’अहो! सहसा किसने मुझे पकड़ लिया, इस पकड़ के सामने मेरा पराक्रम पङ्ग हो गया है। जैसे प्रतिकूल हवा चलने पर समुद्र में जहाज की गति अवरुद्ध हो जाती है, वैसी ही दशा आज मेरी भी हो गयी है’ ॥ १८६-१८७ १/२॥
तिर्यगूर्ध्वमधश्चैव वीक्षमाणस्तदा कपिः॥१८८॥
ददर्श स महासत्त्वमुत्थितं लवणाम्भसि।
यही सोचते हुए कपिवर हनुमान् ने उस समय अगल-बगल में, ऊपर और नीचे दृष्टि डाली। इतने ही में उन्हें समुद्र के जल के ऊपर उठा हुआ एक विशालकाय प्राणी दिखायी दिया॥ १८८ १/२॥
तद् दृष्ट्वा चिन्तयामास मारुतिर्विकृताननाम्॥१८९॥
कपिराज्ञा यथाख्यातं सत्त्वमद्भुतदर्शनम्।
छायाग्राहि महावीर्यं तदिदं नात्र संशयः॥१९०॥
उस विकराल मुखवाली राक्षसी को देखकर पवनकुमार हनुमान् सोचने लगे-वानरराज सुग्रीव ने जिस महापराक्रमी छायाग्राही अद्भुत जीव की चर्चा की थी, वह निःसंदेह यही है॥ १८९-१९० ॥
स तां बुद्ध्वार्थतत्त्वेन सिंहिकां मतिमान् कपिः।
व्यवर्धत महाकायः प्रावृषीव बलाहकः॥१९१॥
तब बुद्धिमान् कपिवर हनुमान जी ने यह निश्चय करके कि वास्तव में यही सिंहिका है, वर्षाकाल के मेघ की भाँति अपने शरीर को बढ़ाना आरम्भ किया। इस प्रकार वे विशालकाय हो गये॥ १९१ ॥
तस्य सा कायमुद्रीक्ष्य वर्धमानं महाकपेः।
वक्त्रं प्रसारयामास पातालाम्बरसंनिभम्॥१९२॥
घनराजीव गर्जन्ती वानरं समभिद्रवत्।
उन महाकपि के शरीर को बढ़ते देख सिंहिका ने अपना मुँह पाताल और आकाश के मध्यभाग के समान फैला लिया और मेघों की घटा के समान गर्जना करती हुई उन वानरवीर की ओर दौड़ी॥ १९२ १/२ ॥
स ददर्श ततस्तस्या विकृतं सुमहन्मुखम्॥१९३॥
कायमानं च मेधावी मर्माणि च महाकपिः।
हनुमान जी ने उसका अत्यन्त विकराल और बढ़ा हुआ मुँह देखा। उन्हें अपने शरीर के बराबर ही उसका मुँह दिखायी दिया। उस समय बुद्धिमान् महाकपि हनुमान् ने सिंहिका के मर्मस्थानों को अपना लक्ष्य बनाया॥
स तस्या विकृते वक्त्रे वज्रसंहननः कपिः॥१९४॥
संक्षिप्य मुहुरात्मानं निपपात महाकपिः।
तदनन्तर वज्रोपम शरीर वाले महाकपि पवनकुमार अपने शरीर को संकुचित करके उसके विकराल मुख में आ गिरे। १९४ १/२॥
आस्ये तस्या निमज्जन्तं ददृशुः सिद्धचारणाः॥१९५॥
ग्रस्यमानं यथा चन्द्रं पूर्ण पर्वणि राहुणा।
उस समय सिद्धों और चारणों ने हनुमान जी को सिंहिका के मुख में उसी प्रकार निमग्न होते देखा, जैसे पूर्णिमा की रात में पूर्ण चन्द्रमा राहु के ग्रास बन गये हों॥
ततस्तस्या नखैस्तीक्ष्णैर्मर्माण्युत्कृत्य वानरः॥१९६॥
उत्पपाताथ वेगेन मनःसम्पातविक्रमः।
मुख में प्रवेश करके उन वानरवीर ने अपने तीखे नखों से उस राक्षसी के मर्मस्थानों को विदीर्ण कर डाला। इसके पश्चात् वे मन के समान गति से उछलकर वेगपूर्वक बाहर निकल आये॥ १९६ १/२ ॥
तां तु दिष्ट्या च धृत्या च दाक्षिण्येन निपात्य सः॥१९७॥
कपिप्रवीरो वेगेन ववृधे पुनरात्मवान्।
दैव के अनुग्रह, स्वाभाविक धैर्य तथा कौशल से उस राक्षसी को मारकर वे मनस्वी वानरवीर पुनः वेग से बढ़कर बड़े हो गये॥ १९७ १/२ ॥
हृतहृत्सा हनुमता पपात विधुराम्भसि।
स्वयंभुवैव हनुमान् सृष्टस्तस्या निपातने॥१९८॥
हनुमान् जी ने प्राणों के आश्रयभूत उसके हृदयस्थल को ही नष्ट कर दिया, अतः वह प्राणशून्य होकर समुद्र के जल में गिर पड़ी। विधाता ने ही उसे मार गिराने के लिये हनुमान जी को निमित्त बनाया था॥ १९८॥
तां हतां वानरेणाशु पतितां वीक्ष्य सिंहिकाम्।
भूतान्याकाशचारीणि तमूचुः प्लवगोत्तमम्॥
उन वानरवीर के द्वारा शीघ्र ही मारी जाकर सिंहिका जल में गिर पड़ी। यह देख आकाश में विचरने वाले प्राणी उन कपिश्रेष्ठ से बोले- ॥ १९९॥
भीममद्य कृतं कर्म महत्सत्त्वं त्वया हतम्।
साधयार्थमभिप्रेतमरिष्टं प्लवतां वर॥ २००॥
‘कपिवर! तुमने यह बड़ा ही भयंकर कर्म किया है, जो इस विशालकाय प्राणी को मार गिराया है। अब तुम बिना किसी विघ्न-बाधा के अपना अभीष्ट कार्य सिद्ध करो॥
यस्य त्वेतानि चत्वारि वानरेन्द्र यथा तव।
धृतिर्दृष्टिर्मतिर्दाक्ष्यं स कर्मसु न सीदति ॥ २०१॥
‘वानरेन्द्र ! जिस पुरुष में तुम्हारे समान धैर्य, सूझ, बुद्धि और कुशलता—ये चार गुण होते हैं, उसे अपने कार्य में कभी असफलता नहीं होती’ ॥ २०१॥
स तैः सम्पूजितः पूज्यः प्रतिपन्नप्रयोजनैः।
जगामाकाशमाविश्य पन्नगाशनवत् कपिः॥२०२॥
इस प्रकार अपना प्रयोजन सिद्ध हो जाने से उन आकाशचारी प्राणियों ने हनुमान जी का बड़ा सत्कार किया। इसके बाद वे आकाश में चढ़कर गरुड़ के समान वेग से चलने लगे॥ २०२॥
प्राप्तभूयिष्ठपारस्तु सर्वतः परिलोकयन्।
योजनानां शतस्यान्ते वनराजी ददर्श सः॥२०३॥
सौ योजन के अन्त में प्रायः समुद्र के पार पहुँचकर जब उन्होंने सब ओर दृष्टि डाली, तब उन्हें एक हरीभरी वनश्रेणी दिखायी दी॥ २०३॥
ददर्श च पतन्नेव विविधद्रुमभूषितम्।
दीपं शाखामृगश्रेष्ठो मलयोपवनानि च ॥ २०४॥
आकाश में उड़ते हुए ही शाखामृगों में श्रेष्ठ हनुमान् जी ने भाँति-भाँति के वृक्षों से सुशोभित लंका नामक द्वीप देखा। उत्तर तट की भाँति समुद्र के दक्षिण तट पर भी मलय नामक पर्वत और उसके उपवन दिखायी दिये॥ २०४॥
सागरं सागरानूपान् सागरानूपजान् द्रुमान्।
सागरस्य च पत्नीनां मुखान्यपि विलोकयत्॥२०५॥
समुद्र, सागरतटवर्ती जलप्राय देश तथा वहाँ उगे हुए वृक्ष एवं सागरपत्नी सरिताओं के मुहानों को भी उन्होंने देखा॥ २०५॥
स महामेघसंकाशं समीक्ष्यात्मानमात्मवान्।
निरुन्धन्तमिवाकाशं चकार मतिमान् मतिम्॥२०६॥
मन को वश में रखने वाले बुद्धिमान् हनुमान जी ने अपने शरीर को महान् मेघों की घटा के समान विशाल तथा आकाश को अवरुद्ध करता-सा देख मन-ही-मन इस प्रकार विचार किया— ॥ २०६॥
कायवृद्धिं प्रवेगं च मम दृष्ट्वैव राक्षसाः।
मयि कौतूहलं कुर्युरिति मेने महामतिः॥२०७॥
‘अहो! मेरे शरीर की विशालता तथा मेरा यह तीव्र वेग देखते ही राक्षसों के मन में मेरे प्रति बड़ा कौतूहल होगा—वे मेरा भेद जानने के लिये उत्सुक हो जायेंगे।’ परम बुद्धिमान् हनुमान जी के मन में यह धारणा पक्की हो गयी॥ २०७॥
ततः शरीरं संक्षिप्य तन्महीधरसंनिभम्।
पुनः प्रकृतिमापेदे वीतमोह इवात्मवान्॥२०८॥
मनस्वी हनुमान् अपने पर्वताकार शरीर को संकुचित करके पुनः अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित हो गये। ठीक उसी तरह, जैसे मन को वश में रखने वाला मोहरहित पुरुष अपने मूल स्वरूप में प्रतिष्ठित होता है॥ २०८॥
तद्रूपमतिसंक्षिप्य हनूमान् प्रकृतौ स्थितः।
त्रीन् क्रमानिव विक्रम्य बलिवीर्यहरो हरिः॥२०९॥
जैसे बलि के पराक्रमसम्बन्धी अभिमान को हर लेने वाले श्रीहरि ने विराटूप तीन पग चलकर तीनों लोकों को नाप लेने के पश्चात् अपने उस स्वरूप को समेट लिया था, उसी प्रकार हनुमान जी समुद्र को लाँघ जाने के बाद अपने उस विशाल रूप को संकुचित करके अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित हो गये॥ २०९॥
स चारुनानाविधरूपधारी परं समासाद्य समुद्रतीरम्।
परैरशक्यं प्रतिपन्नरूपः समीक्षितात्मा समवेक्षितार्थः ॥ २१०॥
हनुमान जी बड़े ही सुन्दर और नाना प्रकार के रूप धारण कर लेते थे। उन्होंने समुद्र के दूसरे तट पर, जहाँ दूसरों का पहुँचना असम्भव था, पहुँचकर अपने विशाल शरीर की ओर दृष्टिपात किया। फिर अपने कर्तव्य का विचार करके छोटा-सा रूप धारण कर लिया॥ २१०॥
ततः स लम्बस्य गिरेः समृद्ध विचित्रकूटे निपपात कूटे।
सकेतकोद्दालकनारिकेले महाभ्रकूटप्रतिमो महात्मा॥२११॥
महान् मेघ-समूह के समान शरीर वाले महात्मा हनुमान जी केवड़े, लसोड़े और नारियल के वृक्षों से विभूषित लम्बपर्वत के विचित्र लघु शिखरों वाले महान् समृद्धिशाली शृङ्ग पर कूद पड़े॥ २११॥
ततस्तु सम्प्राप्य समुद्रतीरं समीक्ष्य लंकां गिरिवर्यमूर्ध्नि।
कपिस्तु तस्मिन् निपपात पर्वते विधूय रूपं व्यथयन्मृगद्विजान्॥२१२॥
तदनन्तर समुद्र के तटपर पहुँचकर वहाँ से उन्होंने एक श्रेष्ठ पर्वत के शिखर पर बसी हुई लंका को देखा। देखकर अपने पहले रूप को तिरोहित करके वे वानरवीर वहाँ के पशु-पक्षियों को व्यथित करते हुए उसी पर्वत पर उतर पड़े॥
स सागरं दानवपन्नगायुतं बलेन विक्रम्य महोर्मिमालिनम्।
निपत्य तीरे च महोदधेस्तदा ददर्श लंकाममरावतीमिव॥ २१३॥
इस प्रकार दानवों और साँसे भरे हुए तथा बड़ी बड़ी उत्ताल तरङ्गमालाओं से अलंकृत महासागर को बलपूर्वक लाँघकर वे उसके तट पर उतर गये और अमरावती के समान सुशोभित लंकापुरी की शोभा देखने लगे॥ २१३॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे प्रथमः सर्गः॥१॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में पहला सर्ग पूरा हुआ॥१॥
सर्ग-02
स सागरमनाधृष्यमतिक्रम्य महाबलः।
त्रिकूटस्य तटे लंकां स्थितः स्वस्थो ददर्श ह॥१॥
महाबली हनुमान् जी अलङ्घनीय समुद्र को पार करके त्रिकूट (लम्ब) नामक पर्वत के शिखर पर स्वस्थ भाव से खड़े हो लंकापुरी की शोभा देखने लगे॥१॥
ततः पादपमुक्तेन पुष्पवर्षेण वीर्यवान्।
अभिवृष्टस्ततस्तत्र बभौ पुष्पमयो हरिः॥२॥
उस समय उनके ऊपर वहाँ वृक्षों से झड़े हुए फूलों की वर्षा होने लगी। इससे वहाँ बैठे हुए पराक्रमी हनुमान् फूल के बने हुए वानर के समान प्रतीत होने लगे॥२॥
योजनानां शतं श्रीमांस्ती प्युत्तमविक्रमः।
अनिःश्वसन् कपिस्तत्र न ग्लानिमधिगच्छति॥३॥
उत्तम पराक्रमी श्रीमान् वानरवीर हनुमान् सौ योजन समुद्र लाँघकर भी वहाँ लम्बी साँस नहीं खींच रहे थे और न ग्लानि का ही अनुभव करते थे॥३॥
शतान्यहं योजनानां क्रमेयं सुबहून्यपि।
किं पुनः सागरस्यान्तं संख्यातं शतयोजनम्॥४॥
उलटे वे यह सोचते थे, मैं सौ-सौ योजनों के बहुत से समुद्र लाँघ सकता हूँ; फिर इस गिने-गिनाये सौ योजन समुद्र को पार करना कौन बड़ी बात है? ॥ ४॥
स तु वीर्यवतां श्रेष्ठः प्लवतामपि चोत्तमः।
जगाम वेगवाल्लंकां लङ्कयित्वा महोदधिम्॥५॥
बलवानों में श्रेष्ठ तथा वानरों में उत्तम वे वेगवान् पवन-कुमार महासागर को लाँघकर शीघ्र ही लंका में जा पहुँचे॥५॥
शादलानि च नीलानि गन्धवन्ति वनानि च।
मधुमन्ति च मध्येन जगाम नगवन्ति च॥६॥
रास्ते में हरी-हरी दूब और वृक्षों से भरे हुए मकरन्दपूर्ण सुगन्धित वन देखते हुए वे मध्यमार्ग से जा रहे थे॥६॥
शैलांश्च तरुसंछन्नान् वनराजीश्च पुष्पिताः।
अभिचक्राम तेजस्वी हनूमान् प्लवगर्षभः॥७॥
तेजस्वी वानरशिरोमणि हनुमान् वृक्षों से आच्छादित पर्वतों और फूलों से भरी हुई वन-श्रेणियों में विचरने लगे॥ ७॥
स तस्मिन्नचले तिष्ठन् वनान्युपवनानि च।
स नगाग्रे स्थितां लंकां ददर्श पवनात्मजः॥८॥
उस पर्वत पर स्थित हो पवनपुत्र हनुमान् ने बहुत-से वन और उपवन देखे तथा उस पर्वत के अग्रभाग में बसी हुई लंका का भी अवलोकन किया॥८॥
सरलान् कर्णिकारांश्च खजूरांश्च सुपुष्पितान्।
प्रियालान् मुचुलिन्दांश्च कुटजान् केतकानपि॥९॥
प्रियङ्गन् गन्धपूर्णांश्च नीपान् सप्तच्छदांस्तथा।
असनान् कोविदारांश्च करवीरांश्च पुष्पितान्॥१०॥
पुष्पभारनिबद्धांश्च तथा मुकुलितानपि।
पादपान् विहगाकीर्णान् पवनाधूतमस्तकान्॥११॥
उन कपिश्रेष्ठ ने वहाँ सरल (चीड़), कनेर, खिले हुए खजूर, प्रियाल (चिरौंजी), मुचुलिन्द (जम्बीरीनीबू), कुटज, केतक (केवड़े), सुगन्धपूर्ण प्रियङ्ग (पिप्पली), नीप (कदम्ब या अशोक), छितवन, असन, कोविदार तथा खिले हुए करवीर भी देखे। फूलों के भार से लदे हुए तथा मुकुलित (अधखिले) बहुत-से वृक्ष उन्हें दृष्टिगोचर हुए, जिनमें पक्षी भरे हुए थे और हवा के झोंके से जिनकी डालियाँ झूम रही थीं॥९–११॥
हंसकारण्डवाकीर्णा वापीः पद्मोत्पलावृताः।
आक्रीडान् विविधान् रम्यान् विविधांश्च जलाशयान्॥१२॥
हंसों और कारण्डवों से व्याप्त तथा कमल और उत्पल से आच्छादित हुई बहुत-सी बावड़ियाँ, भाँति-भाँति के रमणीय क्रीड़ास्थान तथा नाना प्रकार के जलाशय उनके दृष्टिपथ में आये॥ १२॥
संततान् विविधैर्वृक्षः सर्वर्तुफलपुष्पितैः।
उद्यानानि च रम्याणि ददर्श कपिकुञ्जरः॥१३॥
उन जलाशयों के चारों ओर सभी ऋतुओं में फलफूल देने वाले अनेक प्रकार के वृक्ष फैले हुए थे। उन वानरशिरोमणि ने वहाँ बहुत-से रमणीय उद्यान भी देखे॥ १३॥
समासाद्य च लक्ष्मीवॉल्लंकां रावणपालिताम्।
परिखाभिः सपद्माभिः सोत्पलाभिरलंकृताम्॥१४॥
सीतापहरणात् तेन रावणेन सुरक्षिताम्।
समन्ताद् विचरद्भिश्च राक्षसैरुग्रधन्वभिः॥१५॥
अद्भुत शोभा से सम्पन्न हनुमान जी धीरे-धीरे रावण-पालित लंकापुरी के पास पहुँचे। उसके चारों ओर खुदी हुई खाइयाँ उस नगरी की शोभा बढ़ा रही थीं। उनमें उत्पल और पद्म आदि कई जातियों के कमल खिले थे। सीता को हर लाने के कारण रावण ने लंकापुरी की रक्षा का विशेष प्रबन्ध कर रखा था। उसके चारों ओर भयंकर धनुष धारण करने वाले राक्षस घूमते रहते थे॥ १४-१५ ॥
काञ्चनेनावृतां रम्यां प्राकारेण महापुरीम्।
गृहैश्च गिरिसंकाशैः शारदाम्बुदसंनिभैः॥१६॥
वह महापुरी सोने की चहारदीवारी से घिरी हुई थी तथा पर्वत के समान ऊँचे और शरद् ऋतु के बादलों के समान श्वेत भवनों से भरी हुई थी॥ १६॥
पाण्डुराभिः प्रतोलीभिरुच्चाभिरभिसंवृताम्।
अट्टालकशताकीर्णां पताकाध्वजशोभिताम्॥१७॥
श्वेत रंग की ऊँची-ऊँची सड़कें उस पुरी को सब ओर से घेरे हुए थीं। सैकड़ों अट्टालिकाएँ वहाँ शोभा पा रही थीं तथा फहराती हुई ध्वजा-पताकाएँ उस नगरी की शोभा बढ़ा रही थीं॥ १७॥
तोरणैः काञ्चनैर्दिव्यैर्लतापङ्क्तिविराजितैः।
ददर्श हनुमाँल्लंकां देवो देवपुरीमिव॥१८॥
उसके बाहरी फाटक सोने के बने हुए थे और उनकी दीवारें लता-बेलों के चित्रसे सुशोभित थीं। हनुमान जी ने उन फाटकों से सुशोभित लंका को उसी प्रकार देखा, जैसे कोई देवता देवपुरी का निरीक्षण कर रहा हो॥ १८॥
गिरिमूर्ध्नि स्थितां लंकां पाण्डुरैर्भवनैः शुभैः।
ददर्श स कपिः श्रीमान् पुरीमाकाशगामिव॥१९॥
तेजस्वी कपि हनुमान् ने सुन्दर शुभ्र सदनों से सुशोभित और पर्वत के शिखर पर स्थित लंका को इस तरह देखा, मानो वह आकाश में विचरने वाली नगरी हो॥ १९॥
पालितां राक्षसेन्द्रेण निर्मितां विश्वकर्मणा।
प्लवमानामिवाकाशे ददर्श हनुमान् कपिः॥२०॥
कपिवर हनुमान् ने विश्वकर्मा द्वारा निर्मित तथा राक्षसराज रावण द्वारा सुरक्षित उस पुरी को आकाश में तैरती-सी देखा॥ २०॥
वप्रप्राकारजघनां विपुलाम्बुवनाम्बराम्।
शतघ्नीशूलकेशान्तामट्टालकावतंसकाम्॥२१॥
मनसेव कृतां लंकां निर्मितां विश्वकर्मणा।
विश्वकर्मा की बनायी हुई लंका मानो उनके मानसिक संकल्प से रची गयी एक सुन्दरी स्त्री थी। चहारदीवारी और उसके भीतर की वेदी उसकी जघनस्थली जान पड़ती थीं, समुद्र का विशाल जलराशि और वन उसके वस्त्र थे, शतघ्नी और शूल नामक अस्त्र ही उसके केश थे और बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएँ उसके लिये कर्णभूषण-सी प्रतीत हो रही थीं॥ २१ १/२॥
द्वारमुत्तरमासाद्य चिन्तयामास वानरः॥२२॥
कैलासनिलयप्रख्यमालिखन्तमिवाम्बरम्।
ध्रियमाणमिवाकाशमुच्छ्रितैर्भवनोत्तमैः॥ २३॥
उस पुरी के उत्तर द्वार पर पहुँचकर वानरवीर हनुमान जी चिन्ता में पड़ गये। वह द्वार कैलास पर्वत पर बसी हुई अलकापुरी के बहिर्द्वार के समान ऊँचा था और आकाश में रेखा-सी खींचता जान पड़ता था। ऐसा जान पड़ता था मानो अपने ऊँचे ऊँचे प्रासादों पर आकाश को उठा रखा है॥ २२-२३॥
सम्पूर्णा राक्षसैोरै गैर्भोगवतीमिव।
अचिन्त्यां सुकृतां स्पष्टां कुबेराध्युषितां पुरा॥२४॥
दंष्ट्राभिर्बहुभिः शूरैः शूलपट्टिशपाणिभिः।
रक्षितां राक्षसैोरैर्गुहामाशीविषैरिव॥२५॥
लंकापुरी भयानक राक्षसों से उसी तरह भरी थी, जैसे पाताल की भोगवतीपुरी नागों से भरी रहती है। उसकी निर्माणकला अचिन्त्य थी। उसकी रचना सुन्दर ढंग से की गयी थी। वह हनुमान जी को स्पष्ट दिखायी देती थी। पूर्वकाल में साक्षात् कुबेर वहाँ निवास करते थे। हाथों में शूल और पट्टिश लिये बड़ी-बड़ी दाढोंवाले बहुत-से शूरवीर घोर राक्षस लंकापुरी की उसी प्रकार रक्षा करते थे, जैसे विषधर सर्प अपनी पुरी की करते हैं ॥ २४-२५ ॥
तस्याश्च महतीं गुप्तिं सागरं च निरीक्ष्य सः।
रावणं च रिपुं घोरं चिन्तयामास वानरः॥२६॥
उस नगर की बड़ी भारी चौकसी, उसके चारों ओर समुद्र की खाईं तथा रावण-जैसे भयंकर शत्रु को देखकर हनुमान जी इस प्रकार विचारने लगे—॥ २६॥
आगत्यापीह हरयो भविष्यन्ति निरर्थकाः।
नहि युद्धेन वै लंका शक्या जेतुं सुरैरपि॥२७॥
‘यदि वानर यहाँ तक आ जायँ तो भी वे व्यर्थ ही सिद्ध होंगे; क्योंकि युद्ध के द्वारा देवता भी लंका पर विजय नहीं पा सकते॥२७॥
इमां त्वविषमां लंकां दुर्गा रावणपालिताम्।
प्राप्यापि सुमहाबाहः किं करिष्यति राघवः॥२८॥
‘जिससे बढ़कर विषम (संकटपूर्ण) स्थान और कोई नहीं है, उस रावणपालित इस दुर्गम लंका में आकर महाबाहु श्रीरघुनाथजी भी क्या करेंगे? ॥ २८॥
अवकाशो न साम्नस्तु राक्षसेष्वभिगम्यते।
न दानस्य न भेदस्य नैव युद्धस्य दृश्यते॥२९॥
‘राक्षसों पर सामनीति के प्रयोग के लिये तो कोई गुंजाइश ही नहीं है। इन पर दान,भेद और युद्ध (दण्ड) नीति का प्रयोग भी सफल होता नहीं दिखायी देता॥ २९॥
चतुर्णामेव हि गतिर्वानराणां तरस्विनाम्।
वालिपुत्रस्य नीलस्य मम राज्ञश्च धीमतः॥३०॥
‘यहाँ चार ही वेगशाली वानरों की पहुँच हो सकती है—बालिपुत्र अंगद की, नील की, मेरी और बुद्धिमान् राजा सुग्रीव की॥३०॥
यावज्जानामि वैदेहीं यदि जीवति वा न वा।
तत्रैव चिन्तयिष्यामि दृष्ट्वा तां जनकात्मजाम्॥३१॥
‘अच्छा, पहले यह तो पता लगाऊँ कि विदेहकुमारी सीता जीवित हैं या नहीं।जनककिशोरी का दर्शन करनेके पश्चात् ही मैं इस विषय में कोई विचार करूँगा’ ॥ ३१॥
ततः स चिन्तयामास मुहूर्तं कपिकुञ्जरः।
गिरेः शृङ्गे स्थितस्तस्मिन् रामस्याभ्युदयं ततः॥३२॥
तदनन्तर उस पर्वत-शिखर पर खड़े हुए कपिश्रेष्ठ हनुमान् जी श्रीरामचन्द्रजी के अभ्युदय के लिये सीताजी का पता लगाने के उपाय पर दो घड़ी तक विचार करते रहे।
अनेन रूपेण मया न शक्या रक्षसां पुरी।
प्रवेष्टुं राक्षसैर्गुप्ता क्रूरैर्बलसमन्वितैः॥३३॥
उन्होंने सोचा—’मैं इस रूप से राक्षसों की इस नगरी में प्रवेश नहीं कर सकता; क्योंकि बहुत-से क्रूर और बलवान् राक्षस इसकी रक्षा कर रहे हैं॥३३॥
महौजसो महावीर्या बलवन्तश्च राक्षसाः।
वञ्चनीया मया सर्वे जानकी परिमार्गता॥३४॥
‘जानकी की खोज करते समय मुझे अपने को छिपाने के लिये यहाँ के सभी महातेजस्वी, महापराक्रमी और बलवान् राक्षसों से आँख बचानी होगी॥ ३४ ॥
लक्ष्यालक्ष्येण रूपेण रात्रौ लंकापुरी मया।
प्राप्तकालं प्रवेष्टुं मे कृत्यं साधयितुं महत्॥३५॥
‘अतः मुझे रात्रि के समय ही नगर में प्रवेश करना चाहिये और सीता का अन्वेषण रूप यह महान् समयोचित कार्य सिद्ध करने के लिये ऐसे रूप का आश्रय लेना चाहिये, जो आँख से देखा न जा सके केवल कार्य से यह अनुमान हो कि कोई आया था’। ३५॥
तां पुरी तादृशीं दृष्ट्वा दुरा हनूमांश्चिन्तयामास विनिःश्वस्य मुहुर्मुहुः॥३६॥
देवताओं और असुरों के लिये भी दुर्जय वैसी लंकापुरी को देखकर हनुमान जी बारम्बार लम्बी साँस खींचते हुए यों विचार करने लगे— ॥३६॥
केनोपायेन पश्येयं मैथिली जनकात्मजाम्।
अदृष्टो राक्षसेन्द्रेण रावणेन दुरात्मना॥ ३७॥
‘किस उपाय से काम लूँ, जिससे दुरात्मा राक्षसराज रावण की दृष्टि से ओझल रहकर मैं मिथिलेशनन्दिनी जनक-किशोरी सीता का दर्शन प्राप्त कर सकूँ॥ ३७॥
न विनश्येत् कथं कार्यं रामस्य विदितात्मनः।
एकामेकस्तु पश्येयं रहिते जनकात्मजाम्॥३८॥
‘किस रीति से कार्य किया जाय, जिससे जगद्विख्यात श्रीरामचन्द्रजी का काम भी न बिगड़े और मैं एकान्त में अकेली जानकीजी से भेंट भी कर लूँ॥ ३८॥
भूताश्चार्था विनश्यन्ति देशकालविरोधिताः।
विक्लवं दूतमासाद्य तमः सूर्योदये यथा॥३९॥
‘कई बार कातर अथवा अविवेकपूर्ण कार्य करने वाले दूत के हाथ में पड़कर देश और काल के विपरीत व्यवहार होने के कारण बने-बनाये काम भी उसी तरह बिगड़ जाते हैं, जैसे सूर्योदय होने पर अन्धकार नष्ट हो जाता है॥ ३९॥
अर्थानान्तरे बुद्धिनिश्चितापि न शोभते।
घातयन्तीह कार्याणि दूताः पण्डितमानिनः॥४०॥
‘राजा और मन्त्रियों के द्वारा निश्चित किया हुआ कर्तव्याकर्तव्यविषयक विचार भी किसी अविवेकी दूत का आश्रय लेने से शोभा (सफलता) नहीं पाता है। अपनेको पण्डित मानने वाले अविवेकी दूत सारा काम ही चौपट कर देते हैं॥ ४०॥
न विनश्येत् कथं कार्यं वैक्लव्यं न कथं भवेत्।
लङ्घनं च समुद्रस्य कथं नु न भवेद् वृथा॥४१॥
‘अच्छा तो किस उपाय का अवलम्बन करने से स्वामी का कार्य नहीं बिगड़ेगा; मुझे घबराहट या अविवेक नहीं होगा और मेरा यह समुद्र का लाँघना भी व्यर्थ नहीं होने पायेगा॥४१॥
मयि दृष्टे तु रक्षोभी रामस्य विदितात्मनः।
भवेद् व्यर्थमिदं कार्यं रावणानर्थमिच्छतः॥४२॥
‘यदि राक्षसों ने मुझे देख लिया तो रावण का अनर्थ चाहने वाले उन विख्यातनामा भगवान् श्रीराम का यह कार्य सफल न हो सकेगा॥४२॥
नहि शक्यं क्वचित् स्थातुमविज्ञातेन राक्षसैः।
अपि राक्षसरूपेण किमुतान्येन केनचित्॥४३॥
‘यहाँ दूसरे किसी रूप की तो बात ही क्या है, राक्षस का रूप धारण करके भी राक्षसों से अज्ञात रहकर कहीं ठहरना असम्भव है॥४३॥
वायुरप्यत्र नाज्ञातश्चरेदिति मतिर्मम।
नह्यत्राविदितं किंचिद् रक्षसां भीमकर्मणाम्॥४४॥
‘मेरा तो ऐसा विश्वास है कि राक्षसों से छिपे रहकर वायुदेव भी इस पुरी में विचरण नहीं कर सकते। यहाँ कोई भी ऐसा स्थान नहीं है, जो इन भयंकर कर्म करने वाले राक्षसों को ज्ञात न हो॥४४॥
इहाहं यदि तिष्ठामि स्वेन रूपेण संवृतः।
विनाशमुपयास्यामि भर्तुरर्थश्च हास्यति॥४५॥
‘यदि यहाँ मैं अपने इस रूप से छिपकर भी रहँगा तो मारा जाऊँगा और मेरे स्वामी के कार्य में भी हानि पहुँचेगी॥४५॥
तदहं स्वेन रूपेण रजन्यां ह्रस्वतां गतः।
लंकामभिपतिष्यामि राघवस्यार्थसिद्धये ॥४६॥
‘अतः मैं श्रीरघुनाथजी का कार्य सिद्ध करने के लिये रात में अपने इसी रूप से छोटा-सा शरीर धारण करके लंका में प्रवेश करूँगा॥ ४६॥
रावणस्य पुरी रात्रौ प्रविश्य सुदुरासदाम्।
प्रविश्य भवनं सर्वं द्रक्ष्यामि जनकात्मजाम्॥४७॥
‘यद्यपि रावण की इस पुरी में जाना बहुत ही कठिन है तथापि रात को इसके भीतर प्रवेश करके सभी घरों में घुसकर मैं जानकीजी की खोज करूँगा’॥ ४७॥
इति निश्चित्य हनुमान् सूर्यस्यास्तमयं कपिः।
आचकाले तदा वीरो वैदेह्या दर्शनोत्सुकः॥४८॥
ऐसा निश्चय करके वीर वानर हनुमान् विदेहनन्दिनी के दर्शन के लिये उत्सुक हो उस समय सूर्यास्त की प्रतीक्षा करने लगे॥४८॥
सूर्ये चास्तं गते रात्रौ देहं संक्षिप्य मारुतिः।
वृषदंशकमात्रोऽथ बभूवाद्भुतदर्शनः॥४९॥
सूर्यास्त हो जाने पर रात के समय उन पवनकुमार ने अपने शरीर को छोटा बना लिया। वे बिल्ली के बराबर होकर अत्यन्त अद्भुत दिखायी देने लगे॥ ४९॥
प्रदोषकाले हनुमांस्तूर्णमुत्पत्य वीर्यवान्।
प्रविवेश पुरी रम्यां प्रविभक्तमहापथाम्॥५०॥
प्रदोषकाल में पराक्रमी हनुमान् तुरंत ही उछलकर उस रमणीय पुरी में घुस गये। वह नगरी पृथक्-पृथक् बने हुए चौड़े और विशाल राजमार्गों से सुशोभित थी॥ ५०॥
प्रासादमालाविततां स्तम्भैः काञ्चनसंनिभैः।
शातकुम्भनिभैर्जालैर्गन्धर्वनगरोपमाम्॥५१॥
उसमें प्रासादों की लंबी पंक्तियाँ दूरतक फैली हुई थीं। सुनहरे रंग के खम्भों और सोने की जालियों से विभूषित वह नगरी गन्धर्वनगर के समान रमणीय प्रतीत होती थी॥५१॥
सप्तभौमाष्टभौमैश्च स ददर्श महापुरीम्।
तलैः स्फटिकसंकीर्णैः कार्तस्वरविभूषितैः॥५२॥
वैदूर्यमणिचित्रैश्च मुक्ताजालविभूषितैः।
तैस्तैः शुशुभिरे तानि भवनान्यत्र रक्षसाम्॥५३॥
हनुमान जी ने उस विशाल पुरी को सतमहले, अठमहले मकानों और सुवर्णजटित स्फटिक मणि की फर्शों से सुशोभित देखा। उनमें वैदूर्य (नीलम) भी जड़े गये थे, जिससे उनकी विचित्र शोभा होती थी। मोतियों की जालियाँ भी उन महलों की शोभा बढ़ाती थीं। उन सबके कारण राक्षसों के वे भवन बड़ी सुन्दर शोभा से सम्पन्न हो रहे थे॥ ५२-५३॥
काञ्चनानि विचित्राणि तोरणानि च रक्षसाम्।
लंकामुद्योतयामासुः सर्वतः समलंकृताम्॥५४॥
सोने के बने हुए विचित्र फाटक सब ओर से सजी हुई राक्षसों की उस लंका को और भी उद्दीप्त कर रहे थे॥५४॥
अचिन्त्यामद्भुताकारां दृष्ट्वा लंकां महाकपिः।
आसीद् विषण्णो हृष्टश्च वैदेह्या दर्शनोत्सुकः॥
ऐसी अचिन्त्य और अद्भुत आकारवाली लंका को देखकर महाकपि हनुमान् विषाद में पड़ गये; परंतु जानकीजी के दर्शन के लिये उनके मन में बड़ी उत्कण्ठा थी, इसलिये उनका हर्ष और उत्साह भी कम नहीं हुआ॥ ५५॥
स पाण्डुराविद्धविमानमालिनी महार्हजाम्बूनदजालतोरणाम्।
यशस्विनीं रावणबाहुपालितां क्षपाचरैर्भीमबलैः सुपालिताम्॥५६॥
परस्पर सटे हुए श्वेतवर्ण के सतमंजिले महलों की पंक्तियाँ लंकापुरी की शोभा बढ़ा रही थीं। बहुमूल्यजाम्बूनद नामक सुवर्ण की जालियों और वन्दनवारों से वहाँ के घरों को सजाया गया था। भयंकर बलशाली निशाचर उस पुरी की अच्छी तरह रक्षा करते थे। रावण के बाहुबल से भी वह सुरक्षित थी। उसके यश की ख्याति सुदूर तक फैली हुई थी। ऐसी लंकापुरी में हनुमान जी ने प्रवेश किया॥
चन्द्रोऽपि साचिव्यमिवास्य कुर्वंस्तारागणैर्मध्यगतो विराजन्।
ज्योत्स्नावितानेन वितत्य लोका नुत्तिष्ठतेऽनेकसहस्ररश्मिः ॥५७॥
उस समय तारागणों के साथ उनके बीच में विराजमान अनेक सहस्र किरणोंवाले चन्द्रदेव भी हनुमान जी की सहायता-सी करते हुए समस्त लोकों पर अपनी चाँदनी का चंदोवा-सा तानकर उदित हो गये॥ ५७॥
शङ्खप्रभं क्षीरमृणालवर्णमुद्गच्छमानं व्यवभासमानम्।
ददर्श चन्द्रं स कपिप्रवीरः पोप्लूयमानं सरसीव हंसम्॥५८॥
वानरों के प्रमुख वीर श्रीहनुमान जी ने शङ्ख की-सी कान्ति तथा दूध और मृणाल के-से वर्णवाले चन्द्रमा को आकाश में इस प्रकार उदित एवं प्रकाशित होते देखा, मानो किसी सरोवर में कोई हंस तैर रहा हो॥ ५८॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे द्वितीयः सर्गः॥२॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में दूसरा सर्ग पूरा हुआ॥२॥
सर्ग-03
स लम्बशिखरे लम्बे लम्बतोयदसंनिभे।
सत्त्वमास्थाय मेधावी हनुमान् मारुतात्मजः॥१॥
निशि लंकां महासत्त्वो विवेश कपिकुञ्जरः।
रम्यकाननतोयाढ्यां पुरीं रावणपालिताम्॥२॥
ऊँचे शिखरवाले लंब (त्रिकूट) पर्वतपर जो महान् मेघों की घटा के समान जान पड़ता था, बुद्धिमान् महाशक्तिशाली कपिश्रेष्ठ पवनकुमार हनुमान् ने सत्त्वगुण का आश्रय ले रात के समय रावणपालित लंकापुरी में प्रवेश किया। वह नगरी सुरम्य वन और जलाशयों से सुशोभित थी॥१-२॥
शारदाम्बुधरप्रख्यैर्भवनैरुपशोभिताम्।
सागरोपमनिर्घोषां सागरानिलसेविताम्॥३॥
शरत्काल के बादलों की भाँति श्वेत कान्तिवाले सुन्दर भवन उसकी शोभा बढ़ाते थे। वहाँ समुद्र की गर्जना के समान गम्भीर शब्द होता रहता था। सागर की लहरों को छूकर बहने वाली वायु इस पुरी की सेवा करती थी॥३॥
सुपुष्टबलसम्पुष्टां यथैव विटपावतीम्।
चारुतोरणनिर्वृहां पाण्डुरद्वारतोरणाम्॥४॥
वह अलकापुरी के समान शक्तिशालिनी सेनाओं से सुरक्षित थी। उस पुरी के सुन्दर फाटकों पर मतवाले हाथी शोभा पाते थे। उस पुरी के अन्तर्द्वार और बहिर्टार दोनों ही श्वेत कान्ति से सुशोभित थे॥४॥
भुजगाचरितां गुप्तां शुभां भोगवतीमिव।
तां सविद्युद्घनाकीर्णां ज्योतिर्गणनिषेविताम्॥
चण्डमारुतनिर्हादां यथा चाप्यमरावतीम्।
उस नगरी की रक्षा के लिये बड़े-बड़े सर्पो का संचरण (आना-जाना) होता रहता है, इसलिये वह नागों से सुरक्षित सुन्दर भोगवतीपुरी के समान जान पड़ती थी। अमरावतीपुरी के समान वहाँ आवश्यकता के अनुसार बिजलियों सहित मेघ छाये रहते थे। ग्रहों और नक्षत्रों के सदृश विद्युत्-दीपों के प्रकाश से वह पुरी प्रकाशित थी तथा प्रचण्ड वायु की ध्वनि वहाँ सदा होती रहती थी॥ ५ १/२॥
शातकुम्भेन महता प्राकारेणाभिसंवृताम्॥६॥
किङ्किणीजालघोषाभिः पताकाभिरलंकृताम्।
सोने के बने हुए विशाल परकोटे से घिरी हुई लंकापुरी क्षुद्र घंटिकाओं की झनकार से युक्त पताकाओं द्वारा अलंकृत थी॥ ६ १/२ ॥
आसाद्य सहसा हृष्टः प्राकारमभिपेदिवान्॥७॥
विस्मयाविष्टहृदयः पुरीमालोक्य सर्वतः।
उस पुरी के समीप पहुँचकर हर्ष और उत्साह से भरे हुए हनुमान् जी सहसा उछलकर उसके परकोटे पर चढ़ गये। वहाँ सब ओर से लंकापुरी का अवलोकन करके हनुमान जी का चित्त आश्चर्यसे चकित हो उठा॥ ७ १/२॥
जाम्बूनदमयैारैर्वैदूर्यकृतवेदिकैः॥८॥
वज्रस्फटिकमुक्ताभिर्मणिकुट्टिमभूषितैः।
तप्तहाटकनि,है राजतामलपाण्डुरैः॥९॥
वैदूर्यकृतसोपानैः स्फाटिकान्तरपांसुभिः।
चारुसंजवनोपेतैः खमिवोत्पतितैः शुभैः॥१०॥
सुवर्ण के बने हुए द्वारों से उस नगरी की अपूर्व शोभा हो रही थी। उन सभी द्वारों पर नीलम के चबूतरे बने हुए थे। वे सब द्वार हीरों, स्फटिकों और मोतियों से जड़े गये थे। मणिमयी फर्श उनकी शोभा बढ़ा रही थीं। उनके दोनों ओर तपाये सुवर्ण के बने हुए हाथी शोभा पाते थे। उन द्वारों का ऊपरी भाग चाँदी से निर्मित होने के कारण स्वच्छ और श्वेत था। उनकी सीढ़ियाँ नीलम की बनी हुई थीं। उन द्वारों के भीतरी भाग स्फटिक मणि के बने हुए और धूल से रहित थे। वे सभी द्वार रमणीय सभा-भवनों से युक्त और सुन्दर थे तथा इतने ऊँचे थे कि आकाशमें उठे हुए-से जान पड़ते थे॥८-१०॥
क्रौञ्चबर्हिणसंघुष्टै राजहंसनिषेवितैः।
तूर्याभरणनिर्घोषैः सर्वतः परिनादिताम्॥११॥
वहाँ क्रौञ्च और मयूरों के कलरव गूंजते रहते थे, उन द्वारों पर राजहंस नामक पक्षी भी निवास करते थे। वहाँ भाँति-भाँति के वाद्यों और आभूषणों की मधुर ध्वनि होती रहती थी, जिससे लंकापुरी सब ओर से प्रतिध्वनित हो रही थी॥११॥
वस्वोकसारप्रतिमां समीक्ष्य नगरी ततः।
खमिवोत्पतितां लंकां जहर्ष हनुमान् कपिः॥१२॥
कुबेर की अलका के समान शोभा पाने वाली लंकानगरी त्रिकूट के शिखर पर प्रतिष्ठित होने के कारण आकाश में उठी हुई-सी प्रतीत होती थी। उसे देखकर कपिवर हनुमान् को बड़ा हर्ष हुआ॥ १२ ॥
तां समीक्ष्य पुरी लंकां राक्षसाधिपतेः शुभाम्।
अनुत्तमामृद्धिमतीं चिन्तयामास वीर्यवान्॥१३॥
राक्षसराज की वह सुन्दर पुरी लंका सबसे उत्तम और समृद्धिशालिनी थी। उसे देखकर पराक्रमी हनुमान् इस प्रकार सोचने लगे- ॥ १३॥
नेयमन्येन नगरी शक्या धर्षयितुं बलात्।
रक्षिता रावणबलैरुद्यतायुधपाणिभिः॥१४॥
‘रावण के सैनिक हाथों में अस्त्र-शस्त्र लिये इस पुरी की रक्षा करते हैं, अतः दूसरा कोई बलपूर्वक इसे अपने काबू में नहीं कर सकता ॥ १४॥
कुमुदाङ्गदयोर्वापि सुषेणस्य महाकपेः।
प्रसिद्धेयं भवेद् भूमिमॆन्दद्विविदयोरपि॥१५॥
विवस्वतस्तनूजस्य हरेश्च कुशपर्वणः।
ऋक्षस्य कपिमुख्यस्य मम चैव गतिर्भवेत्॥१६॥
‘केवल कुमुद, अंगद, महाकपि सुषेण, मैन्द, द्विविद, सूर्यपुत्र सुग्रीव, वानर कुशपर्वा और वानरसेना के प्रमुख वीर ऋक्षराज जाम्बवान् की तथा मेरी भी पहुँच इस पुरी के भीतर हो सकती है। १५-१६॥
समीक्ष्य च महाबाहो राघवस्य पराक्रमम्।
लक्ष्मणस्य च विक्रान्तमभवत् प्रीतिमान् कपिः॥१७॥
फिर महाबाहु श्रीराम और लक्ष्मण के पराक्रमका विचार करके कपिवर हनुमान् को बड़ी प्रसन्नता हुई॥ १७॥
तां रत्नवसनोपेतां गोष्ठागारावतंसिकाम्।
यन्त्रागारस्तनीमृद्धां प्रमदामिव भूषिताम्॥१८॥
तां नष्टतिमिरां दीपैर्भास्वरैश्च महाग्रहैः।
नगरी राक्षसेन्द्रस्य स ददर्श महाकपिः॥१९॥
महाकपि हनुमान् ने देखा, राक्षसराज रावण की नगरी लंका वस्त्राभूषणों से विभूषित सुन्दरी युवती के समान जान पड़ती है। रत्नमय परकोटे ही इसके वस्त्र हैं, गोष्ठ (गोशाला) तथा दूसरे-दूसरे भवन आभूषण हैं। परकोटों पर लगे हुए यन्त्रों के जो गृह हैं, ये ही मानो इस लंकारूपी युवती के स्तन हैं। यह सब प्रकार की समृद्धियों से सम्पन्न है। प्रकाशपूर्ण द्वीपों और महान् ग्रहों ने यहाँ का अन्धकार नष्ट कर दिया है।॥ १८-१९॥
अथ सा हरिशार्दूलं प्रविशन्तं महाकपिम्।
नगरी स्वेन रूपेण ददर्श पवनात्मजम्॥२०॥
तदनन्तर वानरश्रेष्ठ महाकपि पवनकुमार हनुमान् उस पुरी में प्रवेश करने लगे। इतने में ही उस नगरी की अधिष्ठात्री देवी लंका ने अपने स्वाभाविक रूप में प्रकट होकर उन्हें देखा॥२०॥
सा तं हरिवरं दृष्ट्वा लंका रावणपालिता।
स्वयमेवोत्थिता तत्र विकृताननदर्शना॥२१॥
वानरश्रेष्ठ हनुमान् को देखते ही रावणपालित लंका स्वयं ही उठ खड़ी हुई। उसका मुँह देखने में बड़ा विकट था॥ २१॥
पुरस्तात् तस्य वीरस्य वायुसूनोरतिष्ठत।
मुञ्चमाना महानादमब्रवीत् पवनात्मजम्॥२२॥
वह उन वीर पवनकुमार के सामने खड़ी हो गयी और बड़े जोर से गर्जना करती हुई उनसे इस प्रकार बोली- ॥ २२॥
कस्त्वं केन च कार्येण इह प्राप्तो वनालय।
कथयस्वेह यत् तत्त्वं यावत् प्राणा धरन्ति ते॥२३॥
‘वनचारी वानर! तू कौन है और किस कार्य से यहाँ आया है? तुम्हारे प्राण जबतक बने हुए हैं, तबतक ही यहाँ आने का जो यथार्थ रहस्य है, उसे ठीक-ठीक बता दो॥ २३॥
न शक्यं खल्वियं लंका प्रवेष्टुं वानर त्वया।
रक्षिता रावणबलैरभिगुप्ता समन्ततः॥२४॥
‘वानर ! रावण की सेना सब ओर से इस पुरी की रक्षा करती है, अतः निश्चय ही तू इस लंका में प्रवेश नहीं कर सकता’ ॥ २४॥
अथ तामब्रवीद् वीरो हनुमानग्रतः स्थिताम्।
कथयिष्यामि तत् तत्त्वं यन्मां त्वं परिपृच्छसे॥२५॥
का त्वं विरूपनयना पुरद्वारेऽवतिष्ठसे।
किमर्थं चापि मां क्रोधान्निर्भर्त्सयसि दारुणे॥२६॥
तब वीरवर हनुमान् अपने सामने खड़ी हुई लंका से बोले—’क्रूर स्वभाववाली नारी! तू मुझसे जो कुछ पूछ रही है, उसे मैं ठीक-ठीक बता दूंगा; किंतु पहले यह तो बता, तू है कौन? तेरी आँखें बड़ी भयंकर हैं। तू इस नगर के द्वार पर खड़ी है। क्या कारण है कि तू इस प्रकार क्रोध करके मुझे डाँट रही है’ ।। २५-२६॥
हनुमद्रचनं श्रुत्वा लंका सा कामरूपिणी।
उवाच वचनं क्रुद्धा परुषं पवनात्मजम्॥ २७॥
हनुमान जी की यह बात सुनकर इच्छानुसार रूप धारण करने वाली लंका कुपित हो उन पवनकुमार से कठोर वाणी में बोली- ॥२७॥
अहं राक्षसराजस्य रावणस्य महात्मनः।
आज्ञाप्रतीक्षा दुर्धर्षा रक्षामि नगरीमिमाम्॥२८॥
‘मैं महामना राक्षसराज रावण की आज्ञा की प्रतीक्षा करने वाली उनकी सेविका हूँ। मुझपर आक्रमण करना किसी के लिये भी अत्यन्त कठिन है। मैं इस नगरी की रक्षा करती हूँ॥२८॥
न शक्यं मामवज्ञाय प्रवेष्टुं नगरीमिमाम्।
अद्य प्राणैः परित्यक्तः स्वप्स्यसे निहतो मया॥२९॥
मेरी अवहेलना करके इस पुरी में प्रवेश करना किसी के लिये भी सम्भव नहीं है। आज मेरे हाथ से मारा जाकर तू प्राणहीन हो इस पृथ्वी पर शयन करेगा॥ २९॥
अहं हि नगरी लंका स्वयमेव प्लवङ्गम।
सर्वतः परिरक्षामि अतस्ते कथितं मया॥३०॥
‘वानर! मैं स्वयं ही लंका नगरी हूँ, अतः सब ओर से इसकी रक्षा करती हूँ। यही कारण है कि मैंने तेरे प्रति कठोर वाणी का प्रयोग किया है’॥ ३०॥
लंकाया वचनं श्रुत्वा हनुमान् मारुतात्मजः।
यत्नवान् स हरिश्रेष्ठः स्थितः शैल इवापरः॥३१॥
लंका की यह बात सुनकर पवनकुमार कपिश्रेष्ठ हनुमान् उसे जीतने के लिये यत्नशील हो दूसरे पर्वत के समान वहाँ खड़े हो गये॥ ३१॥
स तां स्त्रीरूपविकृतां दृष्ट्वा वानरपुङ्गवः।
आबभाषेऽथ मेधावी सत्त्ववान् प्लवगर्षभः॥
लंका को विकराल राक्षसी के रूप में देखकर बुद्धिमान् वानरशिरोमणि शक्तिशाली कपिश्रेष्ठ हनुमान् ने उससे इस प्रकार कहा— ॥ ३२॥
द्रक्ष्यामि नगरी लंकां साट्टप्राकारतोरणाम्।
इत्यर्थमिह सम्प्राप्तः परं कौतूहलं हि मे ॥३३॥
‘मैं अट्टालिकाओं, परकोटों और नगर द्वारों सहित इस लंका नगरी को देखूगा। इसी प्रयोजन से यहाँ आया हूँ। इसे देखने के लिये मेरे मन में बड़ा कौतूहल
वनान्युपवनानीह लंकायाः काननानि च।
सर्वतो गृहमुख्यानि द्रष्टुमागमनं हि मे ॥ ३४॥
‘इस लंका के जो वन, उपवन, कानन और मुख्यमुख्य भवन हैं, उन्हें देखने के लिये ही यहाँ मेरा आगमन हुआ है’ ॥ ३४॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा लंका सा कामरूपिणी।
भूय एव पुनर्वाक्यं बभाषे परुषाक्षरम्॥३५॥
हनुमान जी का यह कथन सुनकर इच्छानुसार रूप धारण करने वाली लंका पुनः कठोर वाणी में बोली –
मामनिर्जित्य दुर्बुद्धे राक्षसेश्वरपालिताम्।
न शक्यं ह्यद्य ते द्रष्टुं पुरीयं वानराधम॥३६॥
‘खोटी बुद्धिवाले नीच वानर ! राक्षसेश्वर रावण के द्वारा मेरी रक्षा हो रही है। तू मुझे परास्त किये बिना आज इस पुरी को नहीं देख सकता’ ॥ ३६॥
ततः स हरिशार्दूलस्तामुवाच निशाचरीम्।
दृष्ट्वा पुरीमिमां भद्रे पुनर्यास्ये यथागतम्॥३७॥
तब उन वानरशिरोमणिने उस निशाचरी से कहा —’भद्रे! इस पुरी को देखकर मैं फिर जैसे आया हूँ, उसी तरह लौट जाऊँगा’ ॥ ३७॥
ततः कृत्वा महानादं सा वै लंका भयंकरम्।
तलेन वानरश्रेष्ठं ताडयामास वेगिता॥३८॥
यह सुनकर लंका ने बड़ी भयंकर गर्जना करके वानरश्रेष्ठ हनुमान् को बड़े जोर से एक थप्पड़ मारा॥ ३८॥
ततः स हरिशार्दूलो लंकया ताडितो भृशम्।
ननाद सुमहानादं वीर्यवान् मारुतात्मजः॥३९॥
लंका द्वारा इस प्रकार जोर से पीटे जाने पर उन परम पराक्रमी पवनकुमार कपिश्रेष्ठ हनुमान् ने बड़े जोर से सिंहनाद किया॥३९॥
ततः संवर्तयामास वामहस्तस्य सोऽङ्गुलीः।
मुष्टिनाभिजघानैनां हनुमान् क्रोधर्मूच्छितः ॥ ४०॥
फिर उन्होंने अपने बायें हाथ की अंगुलियों को मोड़कर मुट्ठी बाँध ली और अत्यन्त कुपित हो उस लंका को एक मुक्का जमा दिया॥ ४० ॥
स्त्री चेति मन्यमानेन नातिक्रोधः स्वयं कृतः।
सा तु तेन प्रहारेण विह्वलाङ्गी निशाचरी।
पपात सहसा भूमौ विकृताननदर्शना॥४१॥
उसे स्त्री समझकर हनुमान् जी ने स्वयं ही अधिक क्रोध नहीं किया। किंतु उस लघु प्रहार से ही उस निशाचरी के सारे अंग व्याकुल हो गये। वह सहसा पृथ्वी पर गिर पड़ी। उस समय उसका मुख बड़ा विकराल दिखायी देता था॥४१॥
ततस्तु हनुमान् वीरस्तां दृष्ट्वा विनिपातिताम्।
कृपां चकार तेजस्वी मन्यमानः स्त्रियं च ताम्॥४२॥
अपने ही द्वारा गिरायी गयी उस लंका की ओर देखकर और उसे स्त्री समझकर तेजस्वी वीर हनुमान् को उस पर दया आ गयी। उन्होंने उस पर बड़ी कृपा की॥
ततो वै भृशमुद्विग्ना लंका सा गद्गदाक्षरम्।
उवाचागर्वितं वाक्यं हनुमन्तं प्लवङ्गमम्॥४३॥
उधर अत्यन्त उद्विग्न हुई लंका उन वानरवीर हनुमान् से अभिमानशून्य गद्गदवाणी में इस प्रकार बोली- ॥४३॥
प्रसीद सुमहाबाहो त्रायस्व हरिसत्तम।
समये सौम्य तिष्ठन्ति सत्त्ववन्तो महाबलाः॥४४॥
‘महाबाहो! प्रसन्न होइये। कपिश्रेष्ठ! मेरी रक्षा कीजिये। सौम्य! महाबली सत्त्वगुणशाली वीर पुरुष शास्त्र की मर्यादा पर स्थिर रहते हैं (शास्त्र में स्त्री को अवध्य बताया है, इसलिये आप मेरे प्राण न लीजिये)॥
अहं तु नगरी लंका स्वयमेव प्लवङ्गम।
निर्जिताहं त्वया वीर विक्रमेण महाबल॥४५॥
‘महाबली वीर वानर ! मैं स्वयं लंकापुरी ही हूँ, आपने अपने पराक्रम से मुझे परास्त कर दिया है। ४५॥
इदं च तथ्यं शृणु मे ब्रुवन्त्या वै हरीश्वर।
स्वयं स्वयम्भुवा दत्तं वरदानं यथा मम॥४६॥
‘वानरेश्वर! मैं आपसे एक सच्ची बात कहती हूँ आप इसे सुनिये साक्षात् स्वयम्भू ब्रह्माजी ने मुझे जैसा वरदान दिया था, वह बता रही हूँ॥ ४६॥
यदा त्वां वानरः कश्चिद् विक्रमाद् वशमानयेत्।
तदा त्वया हि विज्ञेयं रक्षसां भयमागतम्॥४७॥
‘उन्होंने कहा था—’जब कोई वानर तुझे अपने पराक्रमसे वशमें कर ले, तब तुझे यह समझ लेना चाहिये कि अब राक्षसोंपर बड़ा भारी भय आ पहुँचा है॥४७॥
स हि मे समयः सौम्य प्राप्तोऽद्य तव दर्शनात्।
स्वयम्भूविहितः सत्यो न तस्यास्ति व्यतिक्रमः॥४८॥
‘सौम्य! आपका दर्शन पाकर आज मेरे सामने वही घड़ी आ गयी है। ब्रह्माजी ने जिस सत्य का निश्चय कर दिया है, उसमें कोई उलट-फेर नहीं हो सकता॥४८॥
सीतानिमित्तं राज्ञस्तु रावणस्य दुरात्मनः।
रक्षसां चैव सर्वेषां विनाशः समुपागतः॥४९॥
‘अब सीता के कारण दुरात्मा राजा रावण तथा समस्त राक्षसों के विनाश का समय आ पहुँचा है॥ ४९॥
तत् प्रविश्य हरिश्रेष्ठ पुरीं रावणपालिताम्।
विधत्स्व सर्वकार्याणि यानि यानीह वाञ्छसि॥५०॥
‘कपिश्रेष्ठ! अतः आप इस रावणपालित पुरी में प्रवेश कीजिये और यहाँ जो-जो कार्य करना चाहते हों, उन सबको पूर्ण कर लीजिये॥५०॥
प्रविश्य शापोपहतां हरीश्वर पुरीं शुभां राक्षसमुख्यपालिताम्।
यदृच्छया त्वं जनकात्मजां सतीं विमार्ग सर्वत्र गतो यथासुखम्॥५१॥
‘वानरेश्वर! राक्षसराज रावण के द्वारा पालित यह सुन्दर पुरी अभिशाप से नष्टप्राय हो चुकी है। अतः इसमें प्रवेश करके आप स्वेच्छानुसार सुखपूर्वक सर्वत्र सती-साध्वी जनकनन्दिनी सीता की खोज कीजिये’ ॥ ५१॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे तृतीयः सर्गः॥३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में तीसरा सर्ग पूरा हुआ॥३॥
सर्ग-04
स निर्जित्य पुरीं लंकां श्रेष्ठां तां कामरूपिणीम्।
विक्रमेण महातेजा हनूमान् कपिसत्तमः॥१॥
अद्वारेण महावीर्यः प्राकारमवपुप्लुवे।
निशि लंकां महासत्त्वो विवेश कपिकुञ्जरः॥२॥
इच्छानुसार रूप धारण करने वाली श्रेष्ठ राक्षसी लंकापुरी को अपने पराक्रम से परास्त करके महातेजस्वी महाबली महान् सत्त्वशाली वानरशिरोमणि कपिकुञ्जर हनुमान् बिना दरवाजे के ही रात में चहारदीवारी फाँद गये और लंका के भीतर घुस गये॥ १-२॥
प्रविश्य नगरी लंकां कपिराजहितंकरः।
चक्रेऽथ पादं सव्यं च शत्रूणां स तु मूर्धनि॥३॥
कपिराज सुग्रीव का हित करने वाले हनुमान जी ने इस तरह लंकापुरी में प्रवेश करके मानो शत्रुओं के सिरपर अपना बायाँ पैर रख दिया॥३॥
प्रविष्टः सत्त्वसम्पन्नो निशायां मारुतात्मजः।
स महापथमास्थाय मुक्तपुष्पविराजितम्॥४॥
ततस्तु तां पुरी लंकां रम्यामभिययौ कपिः।
सत्त्वगुण से सम्पन्न पवनपुत्र हनुमान् उस रात में परकोटे के भीतर प्रवेश करके बिखेरे गये फूलों से सुशोभित राजमार्ग का आश्रय ले उस रमणीय लंकापुरी की ओर चले॥ ४ १/२॥
हसितोत्कृष्टनिनदैस्तूर्यघोषपुरस्कृतैः॥५॥
वज्राङ्कशनिकाशैश्च वज्रजालविभूषितैः।
गृहमेघैः पुरी रम्या बभासे द्यौरिवाम्बुदैः॥६॥
जैसे आकाश श्वेत बादलों से सुशोभित होता है, उसी प्रकार वह रमणीय पुरी अपने श्वेत मेघसदृश गृहों से उत्तम शोभा पा रही थी। वे गृह अट्टहासजनित उत्कृष्ट शब्दों तथा वाद्यघोषों से मुखरित थे। उनमें वज्रों तथा अंकुशों के चित्र अङ्कित थे और हीरों के बने हुए झरोखे उनकी शोभा बढ़ाते थे॥५-६॥
प्रजज्वाल तदा लंका रक्षोगणगृहैः शुभैः।
सिताभ्रसदृशैश्चित्रैः पद्मस्वस्तिकसंस्थितैः॥७॥
वर्धमानगृहैश्चापि सर्वतः सुविभूषितैः।
उस समय लंका श्वेत बादलों के समान सुन्दर एवं विचित्र राक्षस-गृहों से प्रकाशित हो रही थी। उन गृहों में से कोई तो कमल के आकार में बने हुए थे। कोई स्वस्तिक के चिह्न या आकार से युक्त थे और किन्हीं का निर्माण वर्धमानसंज्ञक गृहों के रूपमें हुआ था। वे सभी सब ओर से सजाये गये थे॥ ७ १/२॥
१-२ वाराहमिहिर की संहिता में गृहों के विभिन्न संस्थानों (आकृतियों) का वर्णन किया गया है। उन्हीं संस्थानों के अनुसार उनके नाम दिये गये हैं। जहाँ स्वस्तिक संस्थान और वर्धमानसंज्ञक गृह का उल्लेख हुआ है, इनके लक्षणों को स्पष्ट करने वाले वचनों को यहाँ उद्धृत किया जाता है
चतुःशालं चतुर्दारं सर्वतोभद्रसंज्ञितम्।
पश्चिमद्वाररहितं नन्द्यावर्ताह्वयन्तु तत्॥
दक्षिणद्वाररहितं वर्धमानं धनप्रदम्।
प्रारद्वाररहितं स्वस्तिकाख्यं पुत्रधनप्रदम्॥
चार शालाओंसे युक्त गृहको, जिसके प्रत्येक दिशामें एक-एक करके चार द्वार हों, ‘सर्वतोभद्र’ कहते हैं। जिसमें तीन ही द्वार हों, पश्चिम दिशाकी ओर द्वार न हो, उसका नाम ‘नन्द्यावर्त’ है। जिसमें दक्षिणके सिवा अन्य तीन दिशाओंमें द्वार हों, उसे ‘वर्धमान्’ गृह कहते हैं। वह धन देनेवाला होता है तथा जिसमें केवल पूर्व दिशाकी ओर द्वार न हो, उस गृहका नाम ‘स्वस्तिक’ है। वह पुत्र और धन देनेवाला होता है।
तां चित्रमाल्याभरणां कपिराजहितंकरः॥८॥
राघवार्थे चरन् श्रीमान् ददर्श च ननन्द च।
वानरराज सुग्रीव का हित करने वाले श्रीमान् हनुमान् श्रीरघुनाथजी की कार्यसिद्धि के लिये विचित्र पुष्पमय आभरणों से अलंकृत लंका में विचरने लगे। उन्होंने उस पुरी को अच्छी तरह देखा और देखकर प्रसन्नता का अनुभव किया॥ ८ १/२॥
भवनाद् भवनं गच्छन् ददर्श कपिकुञ्जरः॥९॥
विविधाकृतिरूपाणि भवनानि ततस्ततः।
शुश्राव रुचिरं गीतं त्रिस्थानस्वरभूषितम्॥१०॥
उन कपिश्रेष्ठ ने जहाँ-तहाँ एक घर से दूसरे घर पर जाते हुए विविध आकार-प्रकार के भवन देखे तथा हृदय, कण्ठ और मूर्धा इन तीन स्थानों से निकलने वाले मन्द, मध्यम और उच्च स्वर से विभूषित मनोहर गीत सुने॥९-१०॥
स्त्रीणां मदनविद्धानां दिवि चाप्सरसामिव।
शुश्राव काञ्चीनिनदं नूपुराणां च निःस्वनम्॥११॥
उन्होंने स्वर्गीय अप्सराओं के समान सुन्दरी तथा कामवेदना से पीड़ित कामिनियों की करधनी और पायजेबों की झनकार सुनी॥११॥
सोपाननिनदांश्चापि भवनेषु महात्मनाम्।
आस्फोटितनिनादांश्च क्ष्वेडितांश्च ततस्ततः॥१२॥
इसी तरह जहाँ-तहाँ महामनस्वी राक्षसों के घरों में सीढ़ियों पर चढ़ते समय स्त्रियों की काञ्ची और मंजीर की मधुरध्वनि तथा पुरुषों के ताल ठोकने और गर्जने की भी आवाजें उन्हें सुनायी दीं॥ १२॥
शुश्राव जपतां तत्र मन्त्रान् रक्षोगृहेषु वै।
स्वाध्यायनिरतांश्चैव यातुधानान् ददर्श सः॥१३॥
राक्षसों के घरों में बहुतों को तो उन्होंने वहाँ मन्त्र जपते हुए सुना और कितने ही निशाचरों को स्वाध्याय में तत्पर देखा॥१३॥
रावणस्तवसंयुक्तान् गर्जतो राक्षसानपि।
राजमार्ग समावृत्य स्थितं रक्षोगणं महत्॥१४॥
कई राक्षसों को उन्होंने रावण की स्तुति के साथ गर्जना करते और निशाचरों की एक बड़ी भीड़ को राजमार्ग रोककर खड़ी हुई देखा॥ १४॥
ददर्श मध्यमे गुल्मे राक्षसस्य चरान् बहून्।
दीक्षिताञ्जटिलान् मुण्डान् गोजिनाम्बरवाससः॥
दर्भमुष्टिप्रहरणानग्निकुण्डायुधांस्तथा।
कूटमुद्गरपाणींश्च दण्डायुधधरानपि॥१६॥
नगर के मध्यभाग में उन्हें रावण के बहुत-से गुप्तचर दिखायी दिये। उनमें कोई योग की दीक्षा लिये हुए, कोई जटा बढ़ाये, कोई मूड़ मुँडाये, कोई गोचर्म या मृगचर्म धारण किये और कोई नंग-धडंग थे। कोई मुट्ठीभर कुशों को ही अस्त्र-रूप से धारण किये हुए थे। किन्हीं का अग्निकुण्ड ही आयुध था किन्हीं के हाथ में कूट या मुद्गर था। कोई डंडे को ही हथियार रूप में लिये हुए थे।
एकाक्षानेकवर्णाश्च लंबोदरपयोधरान्।
करालान् भुग्नवक्त्रांश्च विकटान् वामनांस्तथा॥१७॥
किन्हीं के एक ही आँख थी तो किन्हीं के रूप बहुरंगे थे। कितनों के पेट और स्तन बहुत बड़े थे। कोई बड़े विकराल थे। किन्हीं के मुँह टेढ़े-मेढ़े थे। कोई विकट थे तो कोई बौने ॥१७॥
धन्विनः खड्गिनश्चैव शतघ्नीमुसलायुधान्।
परिघोत्तमहस्तांश्च विचित्रकवचोज्ज्वलान्॥१८॥
किन्हीं के पास धनुष, खड्ग, शतघ्नी और मूसलरूप आयुध थे। किन्हीं के हाथों में उत्तम परिघ विद्यमान थे और कोई विचित्र कवचों से प्रकाशित हो रहे थे॥१८॥
नातिस्थूलान् नातिकृशान् नातिदीर्घातिह्रस्वकान्।
नातिगौरान् नातिकृष्णान्नातिकुब्जान्न वामनान्॥१९॥
कुछ निशाचर न तो अधिक मोटे थे, न अधिक दुर्बल, न बहुत लंबे थे न अधिक छोटे, न बहुत गोरे थे न अधिक काले तथा न अधिक कुबड़े थे न विशेष बौने ही॥ १९॥
विरूपान् बहुरूपांश्च सुरूपांश्च सुवर्चसः।
ध्वजिनः पताकिनश्चैव ददर्श विविधायुधान्॥२०॥
कोई बड़े कुरूप थे, कोई अनेक प्रकार के रूप धारण कर सकते थे, किन्हीं का रूप सुन्दर था, कोई बड़े तेजस्वी थे तथा किन्हीं के पास ध्वजा, पताका और अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र थे॥२०॥
शक्तिवृक्षायुधांश्चैव पट्टिशाशनिधारिणः।
क्षेपणीपाशहस्तांश्च ददर्श स महाकपिः॥२१॥
कोई शक्ति और वृक्ष रूप आयुध धारण किये देखे जाते थे तथा किन्हीं के पास पट्टिश, वज्र, गुलेल और पाश थे महाकपि हनुमान् ने उन सबको देखा। २१॥
स्रग्विणस्त्वनुलिप्तांश्च वराभरणभूषितान्।
नानावेषसमायुक्तान् यथास्वैरचरान् बहून्॥२२॥
किन्हीं के गले में फूलों के हार थे और ललाट आदि अंग चन्दन से चर्चित थे। कोई श्रेष्ठ आभूषणों से सजे हुए थे। कितने ही नाना प्रकार के वेशभूषा से संयुक्त थे और बहुतेरे स्वेच्छानुसार विचरने वाले जान पड़ते थे॥२२॥
तीक्ष्णशूलधरांश्चैव वज्रिणश्च महाबलान्।
शतसाहस्रमव्यग्रमारक्षं मध्यमं कपिः॥२३॥
रक्षोऽधिपतिनिर्दिष्टं ददर्शान्तःपुराग्रतः।
कितने ही राक्षस तीखे शूल तथा वज्र लिये हुए थे। वे सब-के-सब महान् बल से सम्पन्न थे। इनके सिवा कपिवर हनुमान् ने एक लाख रक्षक सेना को राक्षसराज रावण की आज्ञा से सावधान होकर नगर के मध्यभाग की रक्षा में संलग्न देखा। वे सारे सैनिक रावण के अन्तःपुर के अग्रभाग में स्थित थे॥ २३ १/२॥
स तदा तद् गृहं दृष्ट्वा महाहाटकतोरणम्॥२४॥
राक्षसेन्द्रस्य विख्यातमद्रिमूर्ध्नि प्रतिष्ठितम्।
पुण्डरीकावतंसाभिः परिखाभिः समावृतम्॥२५॥
प्राकारावृतमत्यन्तं ददर्श स महाकपिः।
त्रिविष्टपनिभं दिव्यं दिव्यनादविनादितम्॥२६॥
रक्षक सेना के लिये जो विशाल भवन बना था, उसका फाटक बहुमूल्य सुवर्ण द्वारा निर्मित हुआ था। उस आरक्षा भवनको देखकर महाकपि हनुमान जी ने राक्षसराज रावण के सुप्रसिद्ध राजमहल पर दृष्टिपात किया, जो त्रिकूट पर्वत के एक शिखर पर प्रतिष्ठित था। वह सब ओर से श्वेत कमलों द्वारा अलंकृत खाइयों से घिरा हुआ था। उसके चारों ओर बहुत ऊँचा परकोटा था, जिसने उस राजभवन को घेर रखा था। वह दिव्य भवन स्वर्गलोक के समान मनोहर था और वहाँ संगीत आदि के दिव्य शब्द गूंज रहे थे॥ २४–२६॥
वाजिह्वेषितसंघुष्टं नादितं भूषणैस्तथा।
रथैर्यानैर्विमानैश्च तथा हयगजैः शुभैः॥२७॥
वारणैश्च चतुर्दन्तैः श्वेताभ्रनिचयोपमैः।
भूषितै रुचिरद्वारं मत्तैश्च मृगपक्षिभिः॥२८॥
घोड़ों की हिनहिनाहटकी आवाज भी वहाँ सब ओर फैली हुई थी। आभूषणों की रुनझुन भी कानों में पड़ती रहती थी। नाना प्रकार के रथ, पालकी आदि सवारी, विमान, सुन्दर हाथी, घोड़े, श्वेत बादलों की घटा के समान दिखायी देने वाले चार दाँतों से युक्त सजे-सजाये मतवाले हाथी तथा मदमत्त पशु-पक्षियों के संचरण से उस राजमहल का द्वार बड़ा सुन्दर दिखायी देता था॥ २७-२८॥
रक्षितं सुमहावीर्यातुधानैः सहस्रशः।
राक्षसाधिपतेर्गुप्तमाविवेश गृहं कपिः॥२९॥
सहस्रों महापराक्रमी निशाचर राक्षसराज के उस महल की रक्षा करते थे। उस गुप्त भवन में भी कपिवर हनुमान् जी जा पहुँचे॥ २९॥
स हेमजाम्बूनदचक्रवालं महार्हमुक्तामणि भूषितान्तम्।
परार्घ्यकालागुरुचन्दनार्ह स रावणान्तःपुरमाविवेश॥३०॥
तदनन्तर जिसके चारों ओर सुवर्ण एवं जाम्बूनद का परकोटा था, जिसका ऊपरी भाग बहुमूल्य मोती और मणियों से विभूषित था तथा अत्यन्त उत्तम काले अगुरु एवं चन्दन से जिसकी अर्चना की जाती थी, रावण के उस अन्तःपुर में हनुमान जी ने प्रवेश किया। ३०॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे चतुर्थः सर्गः॥४॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में चौथा सर्ग पूरा हुआ॥४॥
सर्ग-05
ततः स मध्यंगतमंशुमन्तं ज्योत्स्नावितानं मुहुरुद्रमन्तम्।
ददर्श धीमान् भुवि भानुमन्तं गोष्ठे वृषं मत्तमिव भ्रमन्तम्॥१॥
तत्पश्चात् बुद्धिमान् हनुमान जी ने देखा, जिस प्रकार गोशाला के भीतर गौओं के झुंड में मतवाला साँड़ विचरता है, उसी प्रकार पृथ्वी के ऊपर बारम्बार अपनी चाँदनी का चँदोवा तानते हए चन्द्रदेव आकाश के मध्यभाग में तारिकाओं के बीच विचरण कर रहे हैं॥१॥
लोकस्य पापानि विनाशयन्तं महोदधिं चापि समेधयन्तम्।
भूतानि सर्वाणि विराजयन्तं ददर्श शीतांशुमथाभियान्तम्॥२॥
वे शीतरश्मि चन्द्रमा जगत् के पाप-तापका नाश कर रहे हैं, महासागर में ज्वार उठा रहे हैं, समस्त प्राणियों को नयी दीप्ति एवं प्रकाश दे रहे हैं और आकाश में क्रमशः ऊपर की ओर उठ रहे हैं॥२॥
या भाति लक्ष्मी वि मन्दरस्था यथा प्रदोषेषु च सागरस्था।
तथैव तोयेषु च पुष्करस्था रराज सा चारुनिशाकरस्था॥३॥
भूतलपर मन्दराचल में, संध्या के समय महासागर में और जल के भीतर कमलों में जो लक्ष्मी जिस प्रकार सुशोभित होती हैं, वे ही उसी प्रकार मनोहर चन्द्रमा में शोभा पा रही थीं॥३॥
हंसो यथा राजतपञ्जरस्थः सिंहो यथा मन्दरकन्दरस्थः।
वीरो यथा गर्वितकुञ्जरस्थश्चन्द्रोऽपि बभ्राज तथाम्बरस्थः॥४॥
जैसे चाँदी के पिंजरे में हंस, मन्दराचलकी कन्दरा में सिंह तथा मदमत्त हाथी की पीठपर वीर पुरुष शोभा पाते हैं, उसी प्रकार आकाश में चन्द्रदेव सुशोभित हो रहे थे॥
स्थितः ककुद्मानिव तीक्ष्णशृङ्गो महाचलः श्वेत इवोर्ध्वशृङ्गः।
हस्तीव जाम्बूनदबद्धशृङ्गो विभाति चन्द्रः परिपूर्णशृङ्गः॥५॥
जैसे तीखे सींग वाला बैल खड़ा हो, जैसे ऊपर को उठे शिखर वाला महान् पर्वत श्वेत (हिमालय) शोभा पाता हो और जैसे सुवर्णजटित दाँतों से युक्त गजराज सुशोभित होता हो, उसी प्रकार हरिण के शृङ्गरूपी चिह्न से युक्त परिपूर्ण चन्द्रमा छबि पा रहे थे॥५॥
विनष्टशीताम्बुतुषारपङ्को महाग्रहग्राहविनष्टपङ्कः।
प्रकाशलक्ष्याश्रयनिर्मलाङ्को रराज चन्द्रो भगवान् शशाङ्कः॥६॥
जिनका शीतल जल और हिमरूपी पङ्क से संसर्ग का दोष नष्ट हो गया है, अर्थात् जो इनके संसर्ग से बहुत दूर है, सूर्य-किरणों को ग्रहण करने के कारण जिन्होंने अपने अन्धकाररूपी पङ्क को भी नष्ट कर दिया है तथा प्रकाश रूप लक्ष्मी का आश्रयस्थान होने के कारण जिनकी कालिमा भी निर्मल प्रतीत होती है, वे भगवान् शशलाञ्छन चन्द्रदेव आकाश में प्रकाशित हो रहे थे॥६॥
शिलातलं प्राप्य यथा मृगेन्द्रो महारणं प्राप्य यथा गजेन्द्रः।
राज्यं समासाद्य यथा नरेन्द्रस्तथा प्रकाशो विरराज चन्द्रः ॥७॥
जैसे गुफा के बाहर शिलातलपर बैठा हुआ मृगराज (सिंह) शोभा पाता है, जैसे विशाल वन में पहुँचकर गजराज सुशोभित होता है तथा जैसे राज्य पाकर राजा अधिक शोभा से सम्पन्न हो जाता है, उसी प्रकार निर्मल प्रकाश से युक्त होकर चन्द्रदेव सुशोभित हो रहे थे॥७॥
प्रकाशचन्द्रोदयनष्टदोषः प्रवृद्धरक्षःपिशिताशदोषः।
रामाभिरामेरितचित्तदोषः स्वर्गप्रकाशो भगवान् प्रदोषः॥८॥
प्रकाशयुक्त चन्द्रमा के उदय से जिसका अन्धकाररूपी दोष दूर हो गया है, जिसमें राक्षसों के जीव-हिंसा और मांसभक्षणरूपी दोष बढ़ गये हैं तथा रमणियों के रमण-विषयक चित्तदोष (प्रणय-कलह) निवृत्त हो गये हैं, वह पूजनीय प्रदोषकाल स्वर्गसदृश सुख का प्रकाश करने लगा।
तन्त्रीस्वराः कर्णसुखाः प्रवृत्ताः स्वपन्ति नार्यः पतिभिः सुवृत्ताः।
नक्तंचराश्चापि तथा प्रवृत्ता विहर्तुमत्यद्भुतरौद्रवृत्ताः॥९॥
वीणा के श्रवणसुखद शब्द झङ्कत हो रहे थे, सदाचारिणी स्त्रियाँ पतियों के साथ सो रही थीं तथा अत्यन्त अद्भुत और भयंकर शील-स्वभाव वाले निशाचर निशीथ काल में विहार कर रहे थे॥९॥
मत्तप्रमत्तानि समाकुलानि रथाश्वभद्रासनसंकुलानि।
वीरश्रिया चापि समाकुलानि ददर्श धीमान् स कपिः कुलानि॥१०॥
बुद्धिमान् वानर हनुमान् ने वहाँ बहुत-से घर देखे। किन्हीं में ऐश्वर्य-मद से मत्त निशाचर निवास करते थे, किन्हीं में मदिरापान से मतवाले राक्षस भरे हुए थे। । कितने ही घर रथ, घोड़े आदि वाहनों और भद्रासनों से सम्पन्न थे तथा कितने ही वीर-लक्ष्मी से व्याप्त दिखायी देते थे। वे सभी गृह एक-दूसरे से मिले हुए थे॥१०॥
परस्परं चाधिकमाक्षिपन्ति भुजांश्च पीनानधिविक्षिपन्ति।
मत्तप्रलापानधिविक्षिपन्ति मत्तानि चान्योन्यमधिक्षिपन्ति॥११॥
राक्षस लोग आपस में एक-दूसरे पर अधिक आक्षेप करते थे। अपनी मोटी-मोटी भुजाओं को भी हिलाते और चलाते थे। मतवालों की-सी बहकी-बहकी बातें करते थे और मदिरा से उन्मत्त होकर परस्पर कटु वचन बोलते थे॥११॥
रक्षांसि वक्षांसि च विक्षिपन्ति गात्राणि कान्तासु च विक्षिपन्ति।
रूपाणि चित्राणि च विक्षिपन्ति दृढानि चापानि च विक्षिपन्ति॥१२॥
इतना ही नहीं, वे मतवाले राक्षस अपनी छाती भी पीटते थे। अपने हाथ आदि अंगों को अपनी प्यारी पत्नियों पर रख देते थे। सुन्दर रूपवाले चित्रों का निर्माण करते थे और अपने सुदृढ़ धनुषों को कान तक खींचा करते थे॥ १२॥
ददर्श कान्ताश्च समालभन्त्यस्तथापरास्तत्र पुनः स्वपन्त्यः।
सुरूपवत्राश्च तथा हसन्त्यः क्रुद्धाः पराश्चापि विनिःश्वसन्त्यः॥१३॥
हनुमान जी ने यह भी देखा कि नायिकाएँ अपने अंगों में चन्दन आदि का अनुलेपन करती हैं। दूसरी वहीं सोती हैं। तीसरी सुन्दर रूप और मनोहर मुखवाली ललनाएँ हँसती हैं तथा अन्य वनिताएँ प्रणय-कलह से कुपित हो लंबी साँसें खींच रही हैं। १३॥
महागजैश्चापि तथा नदद्भिः सुपूजितैश्चापि तथा सुसद्भिः।
रराज वीरैश्च विनिःश्वसद्भिह्रदा भुजंगैरिव निःश्वसद्भिः॥१४॥
चिग्घाड़ते हुए महान् गजराजों, अत्यन्त सम्मानित श्रेष्ठ सभासदों तथा लंबी साँसें छोड़ने वाले वीरों के कारण वह लंकापुरी फुफकारते हुए सोसे युक्त सरोवरों के समान शोभा पा रही थी॥ १४ ॥
बुद्धिप्रधानान् रुचिराभिधानान् संश्रद्दधानाञ्जगतः प्रधानान्।
नानाविधानान् रुचिराभिधानान् ददर्श तस्यां पुरि यातुधानान्॥१५॥
हनुमान जी ने उस पुरी में बहुत-से उत्कृष्ट बुद्धिवाले, सुन्दर बोलने वाले, सम्यक् श्रद्धा रखने वाले, अनेक प्रकार के रूप-रंगवाले और मनोहर नाम धारण करने वाले विश्वविख्यात राक्षस देखे॥ १५॥
ननन्द दृष्ट्वा स च तान् सुरूपान् नानागुणानात्मगुणानुरूपान्।
विद्योतमानान् स च तान् सुरूपान् ददर्श कांश्चिच्च पुनर्विरूपान्॥१६॥
वे सुन्दर रूपवाले, नाना प्रकार के गुणों से सम्पन्न, अपने गुणों के अनुरूप व्यवहार करने वाले और तेजस्वी थे। उन्हें देखकर हनुमान् जी बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने बहुतेरे राक्षसों को सुन्दर रूपसे सम्पन्न देखा और कोई-कोई उन्हें बड़े कुरूप दिखायी दिये॥ १६॥
ततो वरार्हाः सुविशुद्धभावास्तेषां स्त्रियस्तत्र महानुभावाः।
प्रियेषु पानेषु च सक्तभावा ददर्श तारा इव सुस्वभावाः॥१७॥
तदनन्तर वहाँ उन्होंने सुन्दर वस्त्राभूषण धारण करने के योग्य सुन्दरी राक्षस-रमणियों को देखा, जिनका भाव अत्यन्त विशुद्ध था। वे बड़ी प्रभावशालिनी थीं। उनका मन प्रियतम में तथा मधुपान में आसक्त था। वे तारिकाओं की भाँति कान्तमती और सुन्दर स्वभाववाली थीं॥१७॥
स्त्रियो ज्वलन्तीस्त्रपयोपगूढा निशीथकाले रमणोपगूढाः।
ददर्श काश्चित् प्रमदोपगूढा यथा विहंगा विहगोपगूढाः॥१८॥
हनुमान जी की दृष्टि में कुछ ऐसी स्त्रियाँ भी आयीं, जो अपने रूप-सौन्दर्य से प्रकाशित हो रही थीं। वे बड़ी लजीली थीं और आधी रात के समय अपने प्रियतम के आलिङ्गनपाश में इस प्रकार बँधी हुई थीं जैसे पक्षिणी पक्षी के द्वारा आलिङ्गित होती है। वे सब-के-सब आनन्द में मग्न थीं॥ १८ ॥
अन्याः पुनर्हऱ्यातलोपविष्टास्तत्र प्रियाङ्केषु सुखोपविष्टाः।
भर्तुः परा धर्मपरा निविष्टा ददर्श धीमान् मदनोपविष्टाः ॥ १९॥
दूसरी बहुत-सी स्त्रियाँ महलों की छतों पर बैठी थीं। वे पति की सेवा में तत्पर रहने वाली, धर्मपरायणा, विवाहिता और कामभावना से भावित थीं। हनुमान् जी ने उन सबको अपने प्रियतम के अङ्क में सुखपूर्वक बैठी देखा ॥ १९॥
अप्रावृताः काञ्चनराजिवर्णाः काश्चित्पराास्तपनीयवर्णाः।
पुनश्च काश्चिच्छशलक्ष्मवर्णाः कान्तप्रहीणा रुचिराङ्गवर्णाः॥२०॥
कितनी ही कामिनियाँ सुवर्ण-रेखा के समान कान्तिमती दिखायी देती थीं। उन्होंने अपनी ओढ़नी उतार दी थी। कितनी ही उत्तम वनिताएँ तपाये हुए सुवर्ण के समान रंगवाली थीं तथा कितनी ही
पतिवियोगिनी बालाएँ चन्द्रमा के समान श्वेत वर्ण की दिखायी देती थीं। उनकी अंगकान्ति बड़ी ही सुन्दर थी॥२०॥
ततः प्रियान् प्राप्य मनोऽभिरामान् सुप्रीतियुक्ताः सुमनोऽभिरामाः।
गृहेषु हृष्टाः परमाभिरामा हरिप्रवीरः स ददर्श रामाः॥२१॥
तदनन्तर वानरों के प्रमुख वीर हनुमान जी ने विभिन्न गृहों में ऐसी परम सुन्दरी रमणियों का अवलोकन किया, जो मनोभिराम प्रियतम का संयोग पाकर अत्यन्त प्रसन्न हो रही थीं। फूलों के हार से विभूषित होने के कारण उनकी रमणीयता और भी बढ़ गयी थी और वे सब-की-सब हर्ष से उत्फुल्ल दिखायी देती थीं॥२१॥
चन्द्रप्रकाशाश्च हि वक्त्रमाला वक्राः सुपक्ष्माश्च सुनेत्रमालाः।
विभूषणानां च ददर्श मालाः शतहदानामिव चारुमालाः॥२२॥
उन्होंने चन्द्रमा के समान प्रकाशमान मुखों की पंक्तियाँ, सुन्दर पलकों वाले तिरछे नेत्रों की पंक्तियाँ और चमचमाती हुई विद्युल्लेखाओं के समान आभूषणों की भी मनोहर पंक्तियाँ देखीं॥ २२ ॥
न त्वेव सीतां परमाभिजातां पथि स्थिते राजकुले प्रजाताम्।
लतां प्रफुल्लामिव साधुजातां ददर्श तन्वीं मनसाभिजाताम्॥२३॥
किंतु जो परमात्मा के मानसिक संकल्प से धर्ममार्गपर स्थिर रहने वाले राजकुल में प्रकट हुई थीं, जिनका प्रादुर्भाव परम ऐश्वर्य की प्राप्ति कराने वाला है, जो परम सुन्दररूप में उत्पन्न हुई प्रफुल्ल लता के समान शोभा पाती थीं, उन कृशाङ्गी सीता को उन्होंने वहाँ कहीं नहीं देखा था॥ २३॥ ।
सनातने वर्त्मनि संनिविष्टां रामेक्षणीं तां मदनाभिविष्टाम्।
भर्तर्मनः श्रीमदनप्रविष्टां स्त्रीभ्यः पराभ्यश्च सदा विशिष्टाम्॥२४॥
उष्णार्दितां सानुसृतास्रकण्ठी पुरा वराहॊत्तमनिष्ककण्ठीम्।
सुजातपक्ष्मामभिरक्तकण्ठी वने प्रनृत्तामिव नीलकण्ठीम्॥२५॥
अव्यक्तरेखामिव चन्द्रलेखां पांसुप्रदिग्धामिव हेमरेखाम्।
क्षतप्ररूढामिव वर्णरेखां वायुप्रभुग्नामिव मेघरेखाम्॥२६॥
सीतामपश्यन्मनुजेश्वरस्य रामस्य पत्नी वदतां वरस्य।
बभूव दुःखोपहतश्चिरस्य प्लवंगमो मन्द इवाचिरस्य॥२७॥
जो सदा सनातन मार्गपर स्थित रहने वाली, श्रीराम पर ही दृष्टि रखने वाली, श्रीरामविषयक काम या प्रेम से परिपूर्ण, अपने पति के तेजस्वी मन में बसी हुई तथा दूसरी सभी स्त्रियों से सदा ही श्रेष्ठ थीं; जिन्हें विरहजनित ताप सदा पीड़ा देता रहता था, जिनके नेत्रों से निरन्तर आँसुओं की झड़ी लगी रहती थी और कण्ठ उन आँसुओं से गद्गद रहता था, पहले संयोग काल में जिनका कण्ठ श्रेष्ठ एवं बहुमूल्य निष्क (पदक)-से विभूषित रहा करता था, जिनकी पलकें बहुत ही सुन्दर थीं और कण्ठस्वर अत्यन्त मधुर था । तथा जो वन में नृत्य करने वाली मयूरी के समान मनोहर लगती थीं, जो मेघ आदि से आच्छादित
होने के कारण अव्यक्त रेखावाली चन्द्रलेखा के समान दिखायी देती थीं, धूलि-धूसर सुवर्ण-रेखा-सी प्रतीत होती थीं, बाण के आघात से उत्पन्न हुई रेखा (चिह्न)-सी जान पड़ती थीं तथा वायु के द्वारा उड़ायी जाती हुई बादलों की रेखा-सी दृष्टिगोचर होती थीं। वक्ताओं में श्रेष्ठ नरेश्वर श्रीरामचन्द्रजी की पत्नी उन सीताजी को बहुत देर तक ढूँढ़ने पर भी जब हनुमान् जी न देख सके, तब वे तत्क्षण अत्यन्त दुःखी और शिथिल हो गये॥२४–२७॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे पञ्चमः सर्गः॥५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में पाँचवाँ सर्ग पूरा हुआ॥५॥
सर्ग-06
स निकामं विमानेषु विचरन् कामरूपधृक् ।
विचचार कपिर्लङ्कां लाघवेन समन्वितः॥१॥
फिर इच्छानुसार रूप धारण करने वाले कपिवर हनुमान जी बड़ी शीघ्रता के साथ लंका के सतमहले मकानों में यथेच्छ विचरने लगे॥१॥
आससाद च लक्ष्मीवान् राक्षसेन्द्रनिवेशनम्।
प्राकारेणार्कवर्णेन भास्वरेणाभिसंवृतम्॥२॥
अत्यन्त बल-वैभव से सम्पन्न वे पवनकुमार राक्षसराज रावण के महल में पहुँचे, जो चारों ओर से सूर्य के समान चमचमाते हुए सुवर्णमय परकोटों से घिरा हुआ था॥२॥
रक्षितं राक्षसैीमैः सिंहैरिव महद् वनम्।
समीक्षमाणो भवनं चकाशे कपिकुञ्जरः॥३॥
जैसे सिंह विशाल वन की रक्षा करते हैं, उसी प्रकार बहुतेरे भयानक राक्षस रावण के उस महल की रक्षा कर रहे थे। उस भवन का निरीक्षण करते हुए कपिकुञ्जर हनुमान् जी मन-ही-मन हर्ष का अनुभव करने लगे॥३॥
रूप्यकोपहितैश्चित्रैस्तोरणैर्हेमभूषणैः।
विचित्राभिश्च कक्ष्याभिरैश्च रुचिरैर्वृतम्॥४॥
वह महल चाँदी से मढ़े हुए चित्रों, सोने जड़े हुए दरवाजों और बड़ी अद्भुत ड्योढ़ियों तथा सुन्दर द्वारों से युक्त था॥ ४॥
गजास्थितैर्महामात्रैः शूरैश्च विगतश्रमैः।
उपस्थितमसंहार्हयैः स्यन्दनयायिभिः॥५॥
हाथी पर चढ़े हुए महावत तथा श्रमहीन शूरवीर वहाँ उपस्थित थे। जिनके वेग को कोई रोक नहीं सकता था, ऐसे रथवाहक अश्व भी वहाँ शोभा पा रहे थे॥५॥
सिंहव्याघ्रतनुत्राणैर्दान्तकाञ्चनराजतीः।
घोषवद्भिर्विचित्रैश्च सदा विचरितं रथैः॥६॥
सिंहों और बाघों के चमड़ों के बने हुए कवचों से वे रथ ढके हुए थे, उनमें हाथी-दाँत, सुवर्ण तथा चाँदी की प्रतिमाएँ रखी हुई थीं। उन रथों में लगी हुई छोटी-छोटी घंटिकाओं की मधुर ध्वनि वहाँ होती रहती थी; ऐसे विचित्र रथ उस रावण-भवन में सदा आ-जा रहे थे॥
बहुरत्नसमाकीर्णं पराासनभूषितम्।
महारथसमावापं महारथमहासनम्॥७॥
रावण का वह भवन अनेक प्रकार के रत्नों से व्याप्त था, बहुमूल्य आसन उसकी शोभा बढ़ाते थे। उसमें सब ओर बड़े-बड़े रथों के ठहरने के स्थान बने थे और महारथी वीरों के लिये विशाल वासस्थान बनाये गये थे॥
दृश्यैश्च परमोदारैस्तैस्तैश्च मृगपक्षिभिः।
विविधैर्बहुसाहस्रैः परिपूर्णं समन्ततः॥८॥
दर्शनीय एवं परम सुन्दर नाना प्रकार के सहस्रों पशु और पक्षी वहाँ सब ओर भरे हुए थे॥ ८॥
विनीतैरन्तपालैश्च रक्षोभिश्च सुरक्षितम्।
मुख्याभिश्च वरस्त्रीभिः परिपूर्णं समन्ततः॥९॥
सीमा की रक्षा करने वाले विनयशील राक्षस उस भवन की रक्षा करते थे। वह सब ओर से मुख्य-मुख्य सुन्दरियों से भरा रहता था॥९॥
मुदितप्रमदारलं राक्षसेन्द्रनिवेशनम्।
वराभरणसंहादैः समुद्रस्वननिःस्वनम्॥१०॥
वहाँ की रत्नस्वरूपा युवती रमणियाँ सदा प्रसन्न रहा करती थीं। सुन्दर आभूषणों की झनकारों से झंकृत राक्षसराज का वह महल समुद्र के कल-कलनाद की भाँति मुखरित रहता था॥ १०॥
तद् राजगुणसम्पन्नं मुख्यैश्च वरचन्दनैः।
महाजनसमाकीर्णं सिंहैरिव महद् वनम्॥११॥
वह भवन राजोचित सामग्रीसे पूर्ण था, श्रेष्ठ एवं सुन्दर चन्दनों से चर्चित था तथा सिंहोंसे भरे हुए विशाल वन की भाँति प्रधान-प्रधान पुरुषों से परिपूर्ण था॥ ११॥
भेरीमृदङ्गाभिरुतं शङ्खघोषविनादितम्।
नित्यार्चितं पर्वसुतं पूजितं राक्षसैः सदा॥१२॥
वहाँ भेरी और मृदङ्ग की ध्वनि सब ओर फैली हुई । थी। वहाँ शङ्क की ध्वनि गूंज रही थी। उसकी नित्य पूजा एवं सजावट होती थी। पर्वो के दिन वहाँ होम किया जाता था। राक्षस लोग सदा ही उस राजभवन की पूजा करते थे॥ १२॥
समुद्रमिव गम्भीरं समुद्रसमनिःस्वनम्।
महात्मनो महद् वेश्म महारत्नपरिच्छदम्॥१३॥
वह समुद्र के समान गम्भीर और उसी के समान कोलाहलपूर्ण था। महामना रावण का वह विशाल भवन महान् रत्नमय अलंकारों से अलंकृत था॥१३॥
महारत्नसमाकीर्णं ददर्श स महाकपिः।
विराजमानं वपुषा गजाश्वरथसंकुलम्॥१४॥
उसमें हाथी-घोड़े और रथ भरे हुए थे तथा वह महान् रत्नों से व्याप्त होने के कारण अपने स्वरूप से प्रकाशित हो रहा था। महाकपि हनुमान् ने उसे देखा। १४॥
लंकाभरणमित्येव सोऽमन्यत महाकपिः।
चचार हनुमांस्तत्र रावणस्य समीपतः॥१५॥
देखकर कपिवर हनुमान् ने उस भवन को लंका का आभूषण ही माना। तदनन्तर वे उस रावण-भवन के आस-पास ही विचरने लगे॥ १५ ॥
गृहाद् गृहं राक्षसानामुद्यानानि च सर्वशः।
वीक्षमाणोऽप्यसंत्रस्तः प्रासादांश्च चचार सः॥१६॥
इस प्रकार वे एक घर से दूसरे घर में जाकर राक्षसों के बगीचों के सभी स्थानों को देखते हुए बिना किसी भय से अट्टालिकाओं पर विचरण करने लगे। १६॥
अवप्लुत्य महावेगः प्रहस्तस्य निवेशनम्।
ततोऽन्यत् पुप्लुवे वेश्म महापार्श्वस्य वीर्यवान्॥१७॥
महान् वेगशाली और पराक्रमी वीर हनुमान् वहाँ से कूदकर प्रहस्त के घर में उतर गये। फिर वहाँ से उछले और महापार्श्व के महल में पहुँच गये॥ १७ ॥
अथ मेघप्रतीकाशं कुम्भकर्णनिवेशनम्।
विभीषणस्य च तथा पुप्लुवे स महाकपिः॥१८॥
तदनन्तर वे महाकपि हनुमान् मेघ के समान प्रतीत होने वाले कुम्भकर्ण के भवन में और वहाँ से विभीषण के महल में कूद गये॥ १८॥
महोदरस्य च तथा विरूपाक्षस्य चैव हि।
विद्युज्जिह्वस्य भवनं विद्युन्मालेस्तथैव च॥१९॥
इसी तरह क्रमशः ये महोदर, विरूपाक्ष, विद्युज्जिह्व और विद्युन्मालि के घर में गये॥ १९ ॥
वज्रदंष्ट्रस्य च तथा पुप्लुवे स महाकपिः।
शुकस्य च महावेगः सारणस्य च धीमतः॥२०॥
इसके बाद महान् वेगशाली महाकपि हनुमान् ने फिर छलाँग मारी और वे वज्रदंष्ट्र, शुक तथा बुद्धिमान् सारण के घरों में जा पहुँचे॥ २० ॥
तथा चेन्द्रजितो वेश्म जगाम हरियूथपः।
जम्बुमालेः सुमालेश्च जगाम हरिसत्तमः॥२१॥
इसके बाद वे वानर-यूथपति कपिश्रेष्ठ इन्द्रजित् के घर में गये और वहाँ से जम्बुमालि तथा सुमालि के घर में पहुँच गये॥ २१॥
रश्मिकेतोश्च भवनं सूर्यशत्रोस्तथैव च।
वज्रकायस्य च तथा पुप्लुवे स महाकपिः॥ २२॥
तदनन्तर वे महाकपि उछलते-कूदते हुए रश्मिकेतु, सूर्यशत्रु और वज्रकाय के महलों में जा पहुँचे॥ २२ ॥
धूम्राक्षस्याथ सम्पातेर्भवनं मारुतात्मजः।
विद्युद्रूपस्य भीमस्य घनस्य विघनस्य च॥२३॥
शुकनाभस्य चक्रस्य शठस्य कपटस्य च।
ह्रस्वकर्णस्य दंष्ट्रस्य लोमशस्य च रक्षसः॥२४॥
युद्धोन्मत्तस्य मत्तस्य ध्वजग्रीवस्य सादिनः।
विद्युज्जिह्वद्विजिह्वानां तथा हस्तिमुखस्य च ॥२५॥
करालस्य पिशाचस्य शोणिताक्षस्य चैव हि।
प्लवमानः क्रमेणैव हनुमान् मारुतात्मजः॥ २६॥
तेषु तेषु महार्हेषु भवनेषु महायशाः।
तेषामृद्धिमतामृद्धिं ददर्श स महाकपिः॥ २७॥
फिर क्रमशः वे कपिवर पवनकुमार धूम्राक्ष, सम्पाति, विद्युद्रूप, भीम, घन, विघन, शुकनाभ, चक्र, शठ, कपट, ह्रस्वकर्ण, द्रंष्ट्र, लोमश, युद्धोन्मत्त, मत्त, ध्वजग्रीव, विद्युज्जिह्व, द्विजिह्व, हस्तिमुख, कराल, पिशाच और शोणिताक्ष आदि के महलों में गये। इस प्रकार क्रमशः कूदते-फाँदते हुए महायशस्वी पवनपुत्र हनुमान् उन-उन बहुमूल्य भवनों में पधारे। वहाँ उन महाकपि ने उन समृद्धिशाली राक्षसों की समृद्धि देखी॥ २३–२७॥
सर्वेषां समतिक्रम्य भवनानि समन्ततः।
आससादाथ लक्ष्मीवान् राक्षसेन्द्रनिवेशनम्॥२८॥
तत्पश्चात् बल-वैभव से सम्पन्न हनुमान् उन सब भवनों को लाँघकर पुनः राक्षसराज रावण के महल पर आ गये॥२८॥
रावणस्योपशायिन्यो ददर्श हरिसत्तमः।
विचरन् हरिशार्दूलो राक्षसीर्विकृतेक्षणाः॥२९॥
वहाँ विचरते हुए उन वानरशिरोमणि कपिश्रेष्ठ ने रावण के निकट सोने वाली (उसके पलंग की रक्षा करने वाली) राक्षसियों को देखा, जिनकी आँखें बड़ी विकराल थीं॥ २९॥
शूलमुद्गरहस्तांश्च शक्तितोमरधारिणः।
ददर्श विविधान्गुल्मांस्तस्य रक्षःपतेर्गृहे ॥३०॥
साथ ही, उन्होंने उस राक्षसराज के भवन में राक्षसियों के बहुत-से समुदाय देखे, जिनके हाथों में शूल, मुद्गर, शक्ति और तोमर आदि अस्त्र-शस्त्र विद्यमान थे॥ ३०॥
राक्षसांश्च महाकायान् नानाप्रहरणोधतान्।
रक्तान् श्वेतान् सितांश्चापि हरीश्चापि महाजवान्॥३१॥
उनके सिवा, वहाँ बहुत-से विशालकाय राक्षस भी दिखायी दिये, जो नाना प्रकार के हथियारों से लैस थे। इतना ही नहीं, वहाँ लाल और सफेद रंग के बहुत-से अत्यन्त वेगशाली घोड़े भी बँधे हुए थे॥३१॥
कुलीनान् रूपसम्पन्नान् गजान् परगजारुजान्।
शिक्षितान् गजशिक्षायामैरावतसमान् युधि॥३२॥
निहन्तॄन् परसैन्यानां गृहे तस्मिन् ददर्श सः।
क्षरतश्च यथा मेघान् स्रवतश्च यथा गिरीन्॥३३॥
मेघस्तनितनिर्घोषान् दुर्धर्षान् समरे परैः।
साथ ही अच्छी जाति के रूपवान् हाथी भी थे, जो शत्रु-सेना के हाथियों को मार भगाने वाले थे। वे सबके-सब गजशिक्षा में सुशिक्षित, युद्धमें ऐरावत के समान पराक्रमी तथा शत्रुसेनाओं का संहार करने में समर्थ थे। वे बरसते हुए मेघों और झरने बहाते हुए पर्वतों के समान मद की धारा बहा रहे थे। उनकी गर्जना मेघ-गर्जना के समान जान पड़ती थी। वे समराङ्गण में शत्रुओं के लिये दुर्जय थे। हनुमान जी ने रावण के भवन में उन सबको देखा ॥ ३२-३३ १/२॥
सहस्रं वाहिनीस्तत्र जाम्बूनदपरिष्कृताः॥३४॥
हेमजालैरविच्छिन्नास्तरुणादित्यसंनिभाः।
ददर्श राक्षसेन्द्रस्य रावणस्य निवेशने॥ ३५॥
राक्षसराज रावण के उस महल में उन्होंने सहस्रों ऐसी सेनाएँ देखीं, जो जाम्बूनद के आभूषणों से विभूषित थीं। उनके सारे अंग सोने के गहनों से ढके हुए थे तथा वे प्रातःकाल के सूर्य की भाँति उद्दीप्त हो रही थीं॥
शिबिका विविधाकाराः स कपिर्मारुतात्मजः।
लतागृहाणि चित्राणि चित्रशालागृहाणि च॥३६॥
क्रीडागृहाणि चान्यानि दारुपर्वतकानि च।
कामस्य गृहकं रम्यं दिवागृहकमेव च ॥ ३७॥
ददर्श राक्षसेन्द्रस्य रावणस्य निवेशने।
पवनपुत्र हनुमान् जी ने राक्षसराज रावण के उस भवन में अनेक प्रकार की पालकियाँ, विचित्र लतागृह, चित्रशालाएँ, क्रीडाभवन, काष्ठमय क्रीडापर्वत, रमणीय विलासगृह और दिन में उपयोग में आने वाले विलासभवन भी देखे॥ ३६-३७ १/२॥
स मन्दरसमप्रख्यं मयूरस्थानसंकुलम्॥३८॥
ध्वजयष्टिभिराकीर्णं ददर्श भवनोत्तमम्।
अनन्तरत्ननिचयं निधिजालं समन्ततः।
धीरनिष्ठितकर्माकं गृहं भूतपतेरिव॥ ३९॥
उन्होंने वह महल मन्दराचल के समान ऊँचा, क्रीडा-मयूरों के रहने के स्थानों से युक्त, ध्वजाओं से व्याप्त, अनन्त रत्नों का भण्डार और सब ओर से निधियों से भरा हुआ देखा। उसमें धीर पुरुषों ने निधिरक्षा के उपयुक्त कर्माङ्गों का अनुष्ठान किया था तथा वह साक्षात् भूतनाथ (महेश्वर या कुबेर)-के भवन के समान जान पड़ता था।
अर्चिभिश्चापि रत्नानां तेजसा रावणस्य च।
विरराज च तद् वेश्म रश्मिवानिव रश्मिभिः॥४०॥
रत्नों की किरणों तथा रावण के तेज के कारण वह घर किरणों से युक्त सूर्य के समान जगमगा रहा था। ४०॥
जाम्बूनदमयान्येव शयनान्यासनानि च।
भाजनानि च शुभ्राणि ददर्श हरियूथपः॥४१॥
वानरयूथपति हनुमान् ने वहाँ के पलंग, चौकी और पात्र सभी अत्यन्त उज्ज्वल तथा जाम्बूनद सुवर्ण के बने हुए ही देखे॥ ४१॥
मध्वासवकृतक्लेदं मणिभाजनसंकुलम्।
मनोरममसम्बाधं कुबेरभवनं यथा॥४२॥
नूपुराणां च घोषेण काञ्चीनां निःस्वनेन च।
मृदङ्गतलनिर्घोषैर्घोषवद्भिर्विनादितम्॥४३॥
उसमें मधु और आसव के गिरने से वहाँ की भूमि गीली हो रही थी। मणिमय पात्रों से भरा हुआ वह सुविस्तृत महल कुबेर-भवन के समान मनोरम जान पड़ता था। नूपुरों की झनकार, करधनियों की खनखनाहट, मृदङ्गों और तालियों की मधुर ध्वनि तथा अन्य गम्भीर घोष करने वाले वाद्यों से वह भवन मुखरित हो रहा था।
प्रासादसंघातयुतं स्त्रीरत्नशतसंकुलम्।
सुव्यूढकक्ष्यं हनुमान् प्रविवेश महागृहम्॥४४॥
उसमें सैकड़ों अट्टालिकाएँ थीं, सैकड़ों रमणीरत्नों से वह व्याप्त था। उसकी ड्योढ़ियाँ बहुत बड़ीबड़ी थीं। ऐसे विशाल भवन में हनुमान जी ने प्रवेश किया॥४४॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे षष्ठः सर्गः॥६॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में छठा सर्ग पूरा हुआ॥६॥
सर्ग-07
स वेश्मजालं बलवान् ददर्श व्यासक्तवैदूर्यसुवर्णजालम्।
यथा महत्प्रावृषि मेघजालं विद्युत्पिनद्धं सविहङ्गजालम्॥१॥
बलवान् वीर हनुमान् जी ने नीलम से जड़ी हुई सोने की खिड़कियों से सुशोभित तथा पक्षिसमूहों से युक्त भवनों का समुदाय देखा, जो वर्षाकाल में बिजली से युक्त महती मेघमाला के समान मनोहर जान पड़ता था॥१॥
निवेशनानां विविधाश्च शालाः प्रधानशङ्खायुधचापशालाः।
मनोहराश्चापि पुनर्विशाला ददर्श वेश्माद्रिषु चन्द्रशालाः॥२॥
उसमें नाना प्रकार की बैठकें, शङ्ख, आयुध और धनुषों की मुख्य-मुख्य शालाएँ तथा पर्वतों के समान ऊँचे महलों के ऊपर मनोहर एवं विशाल चन्द्रशालाएँ (अट्टालिकाएँ) देखीं॥२॥
गृहाणि नानावसुराजितानि देवासुरैश्चापि सुपूजितानि।
सर्वैश्च दोषैः परिवर्जितानि कपिर्ददर्श स्वबलार्जितानि॥३॥
कपिवर हनुमान् ने वहाँ नाना प्रकार के रत्नों से सुशोभित ऐसे-ऐसे घर देखे, जिनकी देवता और असुर भी प्रशंसा करते थे। वे गृह सम्पूर्ण दोषों से रहित थे तथा रावण ने उन्हें अपने पुरुषार्थ से प्राप्त किया था॥३॥
तानि प्रयत्नाभिसमाहितानि मयेन साक्षादिव निर्मितानि।
महीतले सर्वगुणोत्तराणि ददर्श लंकाधिपतेर्गृहाणि॥४॥
वे भवन बड़े प्रयत्न से बनाये गये थे और ऐसे अद्भुत लगते थे, मानो साक्षात् मयदानव ने ही उनका निर्माण किया हो। हनुमान जी ने उन्हें देखा, लंकापति रावण के वे घर इस भूतल पर सभी गुणों में सबसे बढ़चढ़कर थे॥ ४॥
ततो ददर्शोच्छ्रितमेघरूपं मनोहरं काञ्चनचारुरूपम्।
रक्षोऽधिपस्यात्मबलानुरूपं गृहोत्तमं ह्यप्रतिरूपरूपम्॥५॥
फिर उन्होंने राक्षसराज रावण का उसकी शक्ति के अनुरूप अत्यन्त उत्तम और अनुपम भवन (पुष्पक विमान) देखा, जो मेघ के समान ऊँचा, सुवर्ण के समान सुन्दर कान्तिवाला तथा मनोहर था॥ ५॥
महीतले स्वर्गमिव प्रकीर्ण श्रिया ज्वलन्तं बहुरत्नकीर्णम्।
नानातरूणां कुसुमावकीर्णं गिरेरिवाग्रं रजसावकीर्णम्॥६॥
वह इस भूतल पर बिखरे हुए स्वर्ण के समान जान पड़ता था। अपनी कान्ति से प्रज्वलित-सा हो रहा था। अनेकानेक रत्नों से व्याप्त, भाँति-भाँति के वृक्षों के फूलों से आच्छादित तथा पुष्पों के पराग से भरे हुए पर्वत-शिखर के समान शोभा पाता था॥ ६॥
नारीप्रवेकैरिव दीप्यमानं तडिद्भिरम्भोधरमय॑मानम्।
हंसप्रवेकैरिव वाह्यमानं श्रिया युतं खे सुकृतं विमानम्॥७॥
वह विमानरूप भवन विद्युन्मालाओं से पूजित मेघ के समान रमणी-रत्नों से देदीप्यमान हो रहा थाऔर श्रेष्ठ हंसों द्वारा आकाश में ढोये जाते हुए विमान की भाँति जान पड़ता था। उस दिव्य विमान को बहुत सुन्दर ढंग से बनाया गया था। वह अद्भुत शोभा से सम्पन्न दिखायी देता था।
यथा नगाग्रं बहुधातुचित्रं यथा नभश्च ग्रहचन्द्रचित्रम्।
ददर्श युक्तीकृतचारुमेघ चित्रं विमानं बहुरत्नचित्रम्॥८॥
जैसे अनेक धातुओं के कारण पर्वतशिखर, ग्रहों और चन्द्रमा के कारण आकाश तथा अनेक वर्णों से युक्त होने के कारण मनोहर मेघ विचित्र शोभा धारण करते हैं, उसी तरह नाना प्रकार के रत्नों से निर्मित होने के कारण वह विमान भी विचित्र शोभा से सम्पन्न दिखायी देता था॥ ८॥
मही कृता पर्वतराजिपूर्णा शैलाः कृता वृक्षवितानपूर्णाः।
वृक्षाः कृताः पुष्पवितानपूर्णाः पुष्पं कृतं केसरपत्रपूर्णम्॥९॥
उस विमान की आधारभूमि (आरोहियों के खड़े होने का स्थान) सोने और मणियों के द्वारा निर्मित कृत्रिम पर्वत-मालाओं से पूर्ण बनायी गयी थी। वे पर्वत वृक्षों की विस्तृत पंक्तियों से हरे-भरे रचे गये थे। वे वृक्ष फूलों के बाहुल्य से व्याप्त बनाये गये थे तथा वे पुष्प भी केसर एवं पंखुड़ियों से पूर्ण निर्मित हुए थे* ॥९॥
* जहाँ पूर्वकथित वस्तुओं के प्रति उत्तरोत्तर कथित वस्तओं का विशेषण-भाव से स्थापन किया जाय, वहाँ ‘एकावली’ अलंकार माना गया है। इस लक्षण के अनुसार इस श्लोक में एकावली अलंकार है। यहाँ ‘मही’ का विशेषण पर्वत, पर्वत का वृक्ष और वृक्ष का विशेषण पुष्प आदि समझना चाहिये। गोविन्दराज ने यहाँ ‘अधिक’ नामक अलंकार माना है, परंतु जहाँ आधार से आधेय की विशेषता बतायी गयी हो वही इसका विषय है; यहाँ ऐसी बात नहीं है।
कृतानि वेश्मानि च पाण्डुराणि तथा सुपुष्पाण्यपि पुष्कराणि।
पुनश्च पद्मानि सकेसराणि वनानि चित्राणि सरोवराणि॥१०॥
उस विमान में श्वेतभवन बने हुए थे। सुन्दर फूलों से सुशोभित पोखरे बनाये गये थे। केसरयुक्त कमल, विचित्र वन और अद्भुत सरोवरों का भी निर्माण किया गया था॥ १० ॥
पुष्पाह्वयं नाम विराजमानं रत्नप्रभाभिश्च विघूर्णमानम्।
वेश्मोत्तमानामपि चोच्चमानं महाकपिस्तत्र महाविमानम्॥११॥
महाकपि हनुमान् ने जिस सुन्दर विमान को वहाँ देखा, उसका नाम पुष्पक था। वह रत्नों की प्रभा से प्रकाशमान था और इधर-उधर भ्रमण करता था। देवताओं के गृहाकार उत्तम विमानों में सबसे अधिक आदर उस महाविमान पुष्पक का ही होता था॥११॥
कृताश्च वैदूर्यमया विहङ्गा रूप्यप्रवालैश्च तथा विहङ्गाः।
चित्राश्च नानावसुभिर्भुजङ्गा जात्यानुरूपास्तुरगाः शुभाङ्गाः॥१२॥
उसमें नीलम, चाँदी और मँगों के आकाशचारी पक्षी बनाये गये थे। नाना प्रकार के रत्नों से विचित्र वर्ण के सो का निर्माण किया गया था और अच्छी जाति के घोड़ों के समान ही सुन्दर अंगवाले अश्व भी बनाये गये थे॥ १२॥
प्रवालजाम्बूनदपुष्पपक्षाः सलीलमावर्जितजिह्मपक्षाः।
कामस्य साक्षादिव भान्ति पक्षाः कृता विहङ्गाः सुमुखाः सुपक्षाः॥१३॥
उस विमान पर सुन्दर मुख और मनोहर पंख वाले बहुत-से ऐसे विहङ्गम निर्मित हुए थे, जो साक्षात् कामदेव के सहायक जान पड़ते थे। उनकी पाँखें मूंगे और सुवर्ण के बने हुए फूलों से युक्त थीं तथा उन्होंने लीलापूर्वक अपने बाँके पंखों को समेट रखा था। १३॥
नियुज्यमानाश्च गजाः सुहस्ताः सकेसराश्चोत्पलपत्रहस्ताः।
बभूव देवी च कृतासुहस्ता लक्ष्मीस्तथा पद्मिनि पद्महस्ता॥१४॥
उस विमान के कमलमण्डित सरोवर में ऐसे हाथी बनाये गये थे, जो लक्ष्मी के अभिषेक-कार्य में नियुक्त थे। उनकी सैंड बड़ी सुन्दर थी। उनके अंगों में कमलों के केसर लगे हुए थे तथा उन्होंने अपनी डों में कमल-पुष्प धारण किये थे। उनके साथ ही वहाँ तेजस्विनी लक्ष्मी देवी की प्रतिमा भी विराजमान थी, जिनका उन हाथियों के द्वारा अभिषेक हो रहा था। उनके हाथ बड़े सुन्दर थे। उन्होंने अपने हाथ में कमल-पुष्प धारण कर रखा था॥ १४॥
इतीव तद्गृहमभिगम्य शोभनं सविस्मयो नगमिव चारुकन्दरम्।
पुनश्च तत्परमसुगन्धि सुन्दरं हिमात्यये नगमिव चारुकन्दरम्॥१५॥
इस प्रकार सुन्दर कन्दराओं वाले पर्वत के समान तथा वसन्त-ऋतु में सुन्दर कोटरों वाले परम सुगन्धयुक्त वृक्ष के समान उस शोभायमान मनोहर भवन (विमान) में पहुँचकर हनुमान जी बड़े विस्मित हुए॥ १५॥
ततः स तां कपिरभिपत्य पूजितां चरन् पुरीं दशमुखबाहुपालिताम्।
अदृश्य तां जनकसुतां सुपूजितां सुदुःखितां पतिगुणवेगनिर्जिताम्॥१६॥
तदनन्तर दशमुख रावण के बाहुबल से पालित उस प्रशंसित पुरी में जाकर चारों ओर घूमने पर भी पति के गुणों के वेग से पराजित (विमुग्ध) अत्यन्त दुःखिनी और परम पूजनीया जनककिशोरी सीता को न देखकर कपिवर हनुमान् बड़ी चिन्ता में पड़ गये॥१६॥
ततस्तदा बहुविधभावितात्मनः कृतात्मनो जनकसुतां सुवर्त्मनः।
अपश्यतोऽभवदतिदुःखितं मनः सचक्षुषः प्रविचरतो महात्मनः ॥ १७॥
महात्मा हनुमान जी अनेक प्रकार से परमार्थचिन्तन में तत्पर रहने वाले कृतात्मा (पवित्र अन्तःकरण वाले) सन्मार्गगामी तथा उत्तम दृष्टि रखने वाले थे। इधर-उधर बहुत घूमने पर भी जब उन महात्मा को जानकीजी का पता न लगा, तब उनका मन बहुत दुःखी हो गया।
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे सप्तमः सर्गः॥७॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में सातवाँ सर्ग पूरा हुआ॥७॥
सर्ग-08
स तस्य मध्ये भवनस्य संस्थितो महद्विमानं मणिरत्नचित्रितम्।
प्रतप्तजाम्बूनदजालकृत्रिमं ददर्श धीमान् पवनात्मजः कपिः॥१॥
रावण के भवन के मध्यभाग में खड़े हुए बुद्धिमान् पवनकुमार कपिवर हनुमान् जी ने मणि तथा रत्नों से जटित एवं तपे हुए सुवर्णमय गवाक्षों की रचना से युक्त उस विशाल विमान को पुनः देखा॥१॥
तदप्रमेयप्रतिकारकृत्रिमं कृतं स्वयं साध्विति विश्वकर्मणा।
दिवं गते वायुपथे प्रतिष्ठितं व्यराजतादित्यपथस्य लक्ष्म तत्॥२॥
उसकी रचना को सौन्दर्य आदि की दृष्टि से मापा नहीं जा सकता था। उसका निर्माण अनुपम रीति से किया गया था। स्वयं विश्वकर्मा ने ही उसे बनाया था और बहुत उत्तम कहकर उसकी प्रशंसा की थी। जब वह आकाश में उठकर वायुमार्ग में स्थित होता था, तब सौर मार्ग के चिह्न-सा सुशोभित होता था॥२॥
न तत्र किंचिन्न कृतं प्रयत्नतो न तत्र किंचिन्न महार्घरत्नवत्।
न ते विशेषा नियताः सुरेष्वपि न तत्र किंचिन्न महाविशेषवत्॥३॥
उसमें कोई ऐसी वस्तु नहीं थी, जो अत्यन्त प्रयत्न से न बनायी गयी हो तथा वहाँ कोई भी ऐसा स्थान या विमान का अंग नहीं था, जो बहुमूल्य रत्नों से जटित न हो। उसमें जो विशेषताएँ थीं, वे देवताओं के विमानों में भी नहीं थीं। उसमें कोई ऐसी चीज नहीं थी, जो बड़ी भारी विशेषता से युक्त न हो॥।३॥
तपः समाधानपराक्रमार्जितं मनःसमाधानविचारचारिणम्।
अनेकसंस्थानविशेषनिर्मितं ततस्ततस्तुल्यविशेषनिर्मितम्॥४॥
रावण ने जो निराहार रहकर तप किया था और भगवान् के चिन्तन में चित्त को एकाग्र किया था, इससे मिले हुए पराक्रम के द्वारा उसने उस विमान पर अधिकार प्राप्त किया था। मनमें जहाँ भी जाने का संकल्प उठता, वहीं वह विमान पहुँच जाता था। अनेक प्रकार की विशिष्ट निर्माण-कलाओं द्वारा उस विमान की रचना हुई थी तथा जहाँ-तहाँ से प्राप्त की गयी दिव्य विमान-निर्माणोचित विशेषताओं से उसका निर्माण हुआ था॥४॥
मनः समाधाय तु शीघ्रगामिनं दुरासदं मारुततुल्यगामिनम्।
महात्मनां पुण्यकृतां महर्द्धिनां यशस्विनामग्यमुदामिवालयम्॥५॥
वह स्वामी के मन का अनुसरण करते हुए बड़ी शीघ्रता से चलने वाला, दूसरों के लिये दुर्लभ और वायु के समान वेगपूर्वक आगे बढ़ने वाला था तथा श्रेष्ठ आनन्द (महान् सुख)के भागी, बढ़े-चढ़े तपवाले, पुण्यकारी महात्माओं का ही वह आश्रय था॥ ५॥
विशेषमालम्ब्य विशेषसंस्थितं विचित्रकूटं बहुकूटमण्डितम्।
मनोऽभिरामं शरदिन्दुनिर्मलं विचित्रकूटं शिखरं गिरेर्यथा॥६॥
वह विमान गतिविशेष का आश्रय ले व्योम रूप देश-विशेष में स्थित था। आश्चर्यजनक विचित्र वस्तुओं का समुदाय उसमें एकत्र किया गया था। बहुत-सी शालाओं के कारण उसकी बड़ी शोभा हो रही थी। वह शरद् ऋतु के चन्द्रमा के समान निर्मल और मन को आनन्द प्रदान करने वाला था। विचित्र छोटे-छोटे शिखरों से युक्त किसी पर्वत के प्रधान शिखर की जैसी शोभा होती है, उसी प्रकार अद्भुत शिखर वाले उस पुष्पक विमान की भी शोभा हो रही थी॥६॥
वहन्ति यत्कुण्डलशोभितानना महाशना व्योमचरानिशाचराः।
विवृत्तविध्वस्तविशाललोचना महाजवा भूतगणाः सहस्रशः॥७॥
वसन्तपुष्पोत्करचारुदर्शनं वसन्तमासादपि चारुदर्शनम्।
स पुष्पकं तत्र विमानमुत्तमं ददर्श तद् वानरवीरसत्तमः॥८॥
जिनके मुखमण्डल कुण्डलों से सुशोभित और नेत्र घूमते या घूरते रहनेवाले, निमेषरहित तथा बड़े-बड़े थे, वे अपरिमित भोजन करने वाले, महान् वेगशाली, आकाश में विचरने वाले तथा रात में भी दिन के समान ही चलने वाले सहस्रों भूतगण जिसका भार वहन करते थे, जो वसन्त-कालिक पुष्प-पुञ्ज के समान रमणीय दिखायी देता था और वसन्त मास से भी अधिक सुहावना दृष्टिगोचर होता था, उस उत्तम पुष्पक विमान को वानरशिरोमणि हनुमान जी ने वहाँ देखा ॥ ७-८॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डेऽष्टमः सर्गः॥८॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में आठवाँ सर्ग पूरा हुआ।८॥
सर्ग-09
तस्यालयवरिष्ठस्य मध्ये विमलमायतम्।
ददर्श भवनश्रेष्ठं हनुमान् मारुतात्मजः॥१॥
अर्धयोजनविस्तीर्णमायतं योजनं महत्।
भवनं राक्षसेन्द्रस्य बहुप्रासादसंकुलम्॥२॥
लंकावर्ती सर्वश्रेष्ठ महान् गृह के मध्यभाग में पवनपुत्र हनुमान जी ने देखा—एक उत्तम भवन शोभा पा रहा है। वह बहुत ही निर्मल एवं विस्तृत था। उसकी लंबाई एक योजन की और चौड़ाई आधे योजन की थी। राक्षसराज रावण का वह विशाल भवन बहुत-सी अट्टालिकाओं से व्याप्त था॥ १-२॥
मार्गमाणस्तु वैदेहीं सीतामायतलोचनाम्।
सर्वतः परिचक्राम हनूमानरिसूदनः॥३॥
विशाललोचना विदेहनन्दिनी सीता की खोज करते हुए शत्रुसूदन हनुमान जी उस भवन में सब ओर चक्कर लगाते फिरे॥३॥
उत्तमं राक्षसावासं हनुमानवलोकयन्।
आससादाथ लक्ष्मीवान् राक्षसेन्द्रनिवेशनम्॥४॥
बल-वैभव से सम्पन्न हनुमान् राक्षसों के उस उत्तम आवास का अवलोकन करते हुए एक ऐसे सुन्दर गृह में जा पहुँचे, जो राक्षसराज रावणका निजी निवासस्थान था॥ ४॥
चतुर्विषाणैर्द्विरदस्त्रिविषाणैस्तथैव च।
परिक्षिप्तमसम्बाधं रक्ष्यमाणमुदायुधैः ॥५॥
चार दाँत तथा तीन दाँतों वाले हाथी इस विस्तृत भवन को चारों ओर से घेरकर खड़े थे और हाथों में हथियार लिये बहुत-से राक्षस उसकी रक्षा करते थे। ५॥
राक्षसीभिश्च पत्नीभी रावणस्य निवेशनम्।
आहृताभिश्च विक्रम्य राजकन्याभिरावृतम्॥६॥
रावण का वह महल उसकी राक्षसजातीय पत्नियों तथा पराक्रमपूर्वक हरकर लायी हुई राजकन्याओं से भरा हुआ था॥ ६॥
तन्नक्रमकराकीर्ण तिमिंगिलझषाकुलम्।
वायुवेगसमाधूतं पन्नगैरिव सागरम्॥७॥
इस प्रकार नर-नारियों से भरा हुआ वह कोलाहलपूर्ण भवन नाक और मगरों से व्याप्त, तिमिंगलों और मत्स्यों से पूर्ण, वायुवेग से विक्षुब्ध तथा साँसे आवृत महासागर के समान प्रतीत होता था। ७॥
या हि वैश्रवणे लक्ष्मीर्या चन्द्रे हरिवाहने।
सा रावणगृहे रम्या नित्यमेवानपायिनी॥८॥
जो लक्ष्मी कुबेर, चन्द्रमा और इन्द्र के यहाँ निवास करती हैं, वे ही और भी सुरम्य रूप से रावण के घर में नित्य ही निश्चल होकर रहती थीं॥ ८॥
या च राज्ञः कुबेरस्य यमस्य वरुणस्य च।
तादृशी तद्विशिष्टा वा ऋद्धी रक्षोगृहेष्विह ॥९॥
जो समृद्धि महाराज कुबेर, यम और वरुणके यहाँ दृष्टिगोचर होती है, वही अथवा उससे भी बढ़कर राक्षसों के घरों मे देखी जाती थी॥९॥
तस्य हर्म्यस्य मध्यस्थवेश्म चान्यत् सुनिर्मितम्।
बहुनिफूहसंयुक्तं ददर्श पवनात्मजः॥१०॥
उस (एक योजन लंबे और आधे योजन चौड़े) महल के मध्यभाग में एक दूसरा भवन (पुष्पक विमान) था, जिसका निर्माण बड़े सुन्दर ढंग से किया गया था। वह भवन बहुसंख्यक मतवाले हाथियों से युक्त था। पवनकुमार हनुमान जी ने फिर उसे देखा। १०॥
ब्रह्मणोऽर्थे कृतं दिव्यं दिवि यद विश्वकर्मणा।
विमानं पुष्पकं नाम सर्वरत्नविभूषितम्॥११॥
वह सब प्रकार के रत्नों से विभूषित पुष्पक नामक दिव्य विमान स्वर्गलोक में विश्वकर्मा ने ब्रह्माजी के लिये बनाया था॥ ११॥
परेण तपसा लेभे यत् कुबेरः पितामहात्।
कुबेरमोजसा जित्वा लेभे तद् राक्षसेश्वरः॥१२॥
कुबेर ने बड़ी भारी तपस्या करके उसे ब्रह्माजी से प्राप्त किया और फिर कुबेर को बलपूर्वक परास्त करके राक्षसराज रावण ने उसे अपने हाथ में कर लिया॥ १२॥
ईहामृगसमायुक्तैः कार्तस्वरहिरण्मयैः।
सुकृतैराचितं स्तम्भैः प्रदीप्तमिव च श्रिया॥१३॥
उसमें भेड़ियों की मूर्तियों से युक्त सोने-चाँदी के सुन्दर खम्भे बनाये गये थे, जिनके कारण वह भवन अद्भुत कान्ति से उद्दीप्त-सा हो रहा था॥१३॥
मेरुमन्दरसंकाशैरुल्लिखद्भिरिवाम्बरम्।
कूटागारैः शुभागारैः सर्वतः समलंकृतम्॥१४॥
उसमें सुमेरु और मन्दराचल के समान ऊँचे अनेकानेक गुप्त गृह और मङ्गल भवन बने थे, जो अपनी ऊँचाई से आकाश में रेखा-सी खींचते हुए जान पड़ते थे। उनके द्वारा वह विमान सब ओर से सुशोभित होता था॥ १४॥
ज्वलनार्कप्रतीकाशैः सुकृतं विश्वकर्मणा।
हेमसोपानयुक्तं च चारुप्रवरवेदिकम्॥१५॥
उनका प्रकाश अग्नि और सूर्य के समान था। विश्वकर्मा ने बड़ी कारीगरी से उसका निर्माण किया था। उसमें सोने की सीढ़ियाँ और अत्यन्त मनोहर उत्तम वेदियाँ बनायी गयी थीं॥ १५ ॥
जालवातायनैर्युक्तं काञ्चनैः स्फाटिकैरपि।
इन्द्रनीलमहानीलमणिप्रवरवेदिकम्॥१६॥
सोने और स्फटिक के झरोखे और खिडकियाँ लगायी गयी थीं। इन्द्रनील और महानील मणियों की श्रेष्ठतम वेदियाँ रची गयी थीं॥ १६॥
विद्रमेण विचित्रेण मणिभिश्च महाधनैः।
निस्तुलाभिश्च मुक्ताभिस्तलेनाभिविराजितम्॥१७॥
उसकी फर्श विचित्र मँगे, बहमूल्य मणियों तथा अनुपम गोल-गोल मोतियों से जड़ी गयी थी, जिससे उस विमान की बड़ी शोभा हो रही थी॥ १७ ॥
चन्दनेन च रक्तेन तपनीयनिभेन च।
सुपुण्यगन्धिना युक्तमादित्यतरुणोपमम्॥१८॥
सुवर्ण के समान लाल रंग के सुगन्धयुक्त चन्दन से संयुक्त होने के कारण वह बालसूर्य के समान जान पड़ता था॥ १८॥
कूटागारैर्वराकारैर्विविधैः समलंकृतम्।
विमानं पुष्पकं दिव्यमारुरोह महाकपिः।
तत्रस्थः सर्वतो गन्धं पानभक्ष्यान्नसम्भवम्॥१९॥
दिव्यं सम्मूर्च्छितं जिघ्रन् रूपवन्तमिवानिलम्।
महाकपि हनुमान जी उस दिव्य पुष्पक विमान पर चढ़ गये, जो नाना प्रकार के सुन्दर कूटागारों (अट्टालिकाओं) से अलंकृत था। वहाँ बैठकर वे सब ओर फैली हुई नाना प्रकार के पेय, भक्ष्य और अन्न की दिव्य गन्ध सूंघने लगे। वह गन्ध मूर्तिमान् पवन-सी प्रतीत होती थी॥ १९ १/२ ॥
स गन्धस्तं महासत्त्वं बन्धुर्बन्धुमिवोत्तमम्॥२०॥
इत एहीत्युवाचेव तत्र यत्र स रावणः।
जैसे कोई बन्धु-बान्धव अपने उत्तम बन्धु को अपने पास बुलाता है, उसी प्रकार वह सुगन्ध उन महाबली हनुमान जी को मानो यह कहकर कि ‘इधर चले आओ’ जहाँ रावण था, वहाँ बुला रही थी॥ २० १/२॥
ततस्तां प्रस्थितः शालां ददर्श महतीं शिवाम्॥२१॥
रावणस्य महाकान्तां कान्तामिव वरस्त्रियम्।
तदनन्तर हनुमान् जी उस ओर प्रस्थित हुए। आगे बढ़ने पर उन्होंने एक बहुत बड़ी हवेली देखी, जो बहुत ही सुन्दर और सुखद थी। वह हवेली रावण को बहुत ही प्रिय थी, ठीक वैसे ही जैसे पति को कान्तिमयी सुन्दरी पत्नी अधिक प्रिय होती है॥ २१ १/२॥
मणिसोपानविकृतां हेमजालविराजिताम्॥ २२॥
स्फाटिकैरावृततलां दन्तान्तरितरूपिकाम्।
मुक्तावज्रप्रवालैश्च रूप्यचामीकरैरपि॥२३॥
उसमें मणियों की सीढ़ियाँ बनी थीं और सोने की खिड़कियाँ उसकी शोभा बढ़ाती थीं। उसकी फर्श स्फटिक मणि से बनायी गयी थी, जहाँ बीच-बीच में हाथी के दाँत के द्वारा विभिन्न प्रकार की आकृतियाँ
बनी हुई थीं। मोती, हीरे, चाँदी और सोने के द्वारा भी उसमें अनेक प्रकार के आकार अङ्कित किये गये थे॥
विभूषितां मणिस्तम्भैः सुबहुस्तम्भभूषिताम्।
समैर्ऋजुभिरत्युच्चैः समन्तात् सुविभूषितैः॥२४॥
मणियों के बने हुए बहुत-से खम्भे, जो समान, सीधे, बहुत ही ऊँचे और सब ओर से विभूषित थे, आभूषण की भाँति उस हवेली की शोभा बढ़ा रहे थे।
स्तम्भैः पक्षैरिवात्युच्चैर्दिवं सम्प्रस्थितामिव।
महत्या कुथयाऽऽस्तीर्णां पृथिवीलक्षणाङ्कया।२५॥
अपने अत्यन्त ऊँचे स्तम्भरूपी पंखों से मानो वह आकाश को उड़ती हुई-सी जान पड़ती थी। उसके भीतर पृथ्वी के वन-पर्वत आदि चिह्नों से अङ्कित एक बहुत बड़ा कालीन बिछा हुआ था॥ २५ ॥
पृथिवीमिव विस्तीर्णा सराष्ट्रगृहशालिनीम्।
नादितां मत्तविहगैर्दिव्यगन्धाधिवासिताम्॥ २६॥
राष्ट्र और गृह आदि के चित्रों से सुशोभित वह शाला पृथ्वी के समान विस्तीर्ण जान पड़ती थी। वहाँ मतवाले विहङ्गमों के कलरव गूंजते रहते थे तथा वह दिव्य सुगन्ध से सुवासित थी॥ २६ ॥
परास्तरणोपेतां रक्षोऽधिपनिषेविताम्।
धूम्रामगुरुधूपेन विमलां हंसपाण्डुराम्॥२७॥
उस हवेली में बहुमूल्य बिछौने बिछे हुए थे तथा स्वयं राक्षसराज रावण उसमें निवास करता था। वह अगुरु नामक धूप के धूएँ से धूमिल दिखायी देती थी, किंतु वास्तव में हंस के समान श्वेत एवं निर्मल थी॥ २७॥
पत्रपुष्पोपहारेण कल्माषीमिव सुप्रभाम्।
मनसो मोदजननीं वर्णस्यापि प्रसाधिनीम्॥२८॥
पत्र-पुष्प के उपहार से वह शाला चितकबरी-सी जान पड़ती थी। अथवा वसिष्ठ मुनि की शबला गौ की भाँति सम्पूर्ण कामनाओं की देने वाली थी। उसकी कान्ति बड़ी ही सुन्दर थी। वह मन को आनन्द देने वाली तथा शोभा को भी सुशोभित करने वाली थी॥ २८॥
तां शोकनाशिनी दिव्यां श्रियः संजननीमिव।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थैस्तु पञ्च पञ्चभिरुत्तमैः॥२९॥
तर्पयामास मातेव तदा रावणपालिता।
वह दिव्य शाला शोक का नाश करने वाली तथा सम्पत्ति की जननी-सी जान पड़ती थी। हनुमान जी ने उसे देखा। उस रावणपालित शाला ने उस समय माता की भाँति शब्द, स्पर्श आदि पाँच विषयों से हनुमान जी की श्रोत्र आदि पाँचों इन्द्रियों को तृप्त कर दिया॥ २९ १/२॥
स्वर्गोऽयं देवलोकोऽयमिन्द्रस्यापि पुरी भवेत्।
सिद्धिर्वेयं परा हि स्यादित्यमन्यत मारुतिः॥३०॥
उसे देखकर हनुमान जी यह तर्क-वितर्क करने लगे कि सम्भव है, यही स्वर्गलोक या देवलोक हो। यह इन्द्र की पुरी भी हो सकती है अथवा यह परमसिद्धि (ब्रह्मलोक की प्राप्ति) है॥ ३० ॥
प्रध्यायत इवापश्यत् प्रदीपस्तित्र काञ्चनान्।
धूर्तानिव महाधूतैर्देवनेन पराजितान्॥ ३१॥
हनुमान जी ने उस शाला में सुवर्णमय दीपकों को एकतार जलते देखा, मानो वे ध्यानमग्न हो रहे हों; ठीक उसी तरह जैसे किसी बड़े जुआरी से जुए में हारे हुए छोटे जुआरी धननाश की चिन्ता के कारण ध्यान में डूबे हुए-से दिखायी देते हैं॥३१॥
दीपानां च प्रकाशेन तेजसा रावणस्य च।
अर्चिभिर्भूषणानां च प्रदीप्तेत्यभ्यमन्यत॥३२॥
दीपकों के प्रकाश, रावण के तेज और आभूषणों की कान्ति से वह सारी हवेली जलती हुई-सी जान पड़ती थी॥
ततोऽपश्यत् कुथासीनं नानावर्णाम्बरस्रजम्।
सहस्रं वरनारीणां नानावेषबिभूषितम्॥३३॥
तदनन्तर हनुमान जी ने कालीन पर बैठी हुई सहस्रों सुन्दरी स्त्रियाँ देखीं, जो रंग-बिरंगे वस्त्र और पुष्पमाला धारण किये अनेक प्रकार की वेशभूषाओं से विभूषित थीं॥ ३३॥
परिवृत्तेऽर्धरात्रे तु पाननिद्रावसंगतम्।
क्रीडित्वोपरतं रात्रौ प्रसुप्तं बलवत् तदा॥३४॥
आधी रात बीत जानेपर वे क्रीड़ा से उपरत हो मधुपान के मद और निद्रा के वशीभूत हो उस समय गाढ़ी नींद में सो गयी थीं॥ ३४॥
तत् प्रसुप्तं विरुरुचे निःशब्दान्तरभूषितम्।
निःशब्दहंसभ्रमरं यथा पद्मवनं महत्॥ ३५॥
उन सोयी हुई सहस्रों नारियों के कटिभाग में अब करधनी की खनखनाहटका शब्द नहीं हो रहा था। हंसों के कलरव तथा भ्रमरों के गुञ्जारव से रहित विशाल कमल-वन के समान उन सुप्त सुन्दरियों का समुदाय बड़ी शोभा पा रहा था॥ ३५॥
तासां संवृतदान्तानि मीलिताक्षीणि मारुतिः।
अपश्यत् पद्मगन्धीनि वदनानि सुयोषिताम्॥
पवनकुमार हनुमान जी ने उन सुन्दरी युवतियों के मुख देखे, जिनसे कमलों की-सी सुगन्ध फैल रही थी। उनके दाँत ढंके हुए थे और आँखें मूंद गयी थीं॥३६॥
प्रबुद्धानीव पद्मानि तासां भूत्वा क्षपाक्षये।
पुनः संवृतपत्राणि रात्राविव बभुस्तदा ॥ ३७॥
रात्रि के अन्त में खिले हुए कमलों के समान उन सुन्दरियों के जो मुखारविन्द हर्ष से उत्फुल्ल दिखायी देते थे, वे ही फिर रात आने पर सो जाने के कारण मुँदे हुए दलवाले कमलों के समान शोभा पा रहे थे।॥ ३७॥
इमानि मुखपद्मानि नियतं मत्तषट्पदाः।
अम्बुजानीव फुल्लानि प्रार्थयन्ति पुनः पुनः॥३८॥
इति वामन्यत श्रीमानुपपत्त्या महाकपिः।
मेने हि गुणतस्तानि समानि सलिलोद्भवैः॥ ३९॥
उन्हें देखकर श्रीमान् महाकपि हनुमान् यह सम्भावना करने लगे कि ‘मतवाले भ्रमर प्रफुल्ल कमलों के समान इन मुखारविन्दों की प्राप्ति के लिये नित्य ही बारंबार प्रार्थना करते होंगे—उनपर सदा स्थान पाने के लिये तरसते होंगे’; क्योंकि वे गुण की दृष्टि से उन मुखारविन्दों को पानी से उत्पन्न होने वाले कमलों के समान ही समझते थे॥ ३८-३९॥
सा तस्य शुशुभे शाला ताभिः स्त्रीभिर्विराजिता।
शरदीव प्रसन्ना द्यौस्ताराभिरभिशोभिता॥४०॥
रावण की वह हवेली उन स्त्रियों से प्रकाशित होकर वैसी ही शोभा पा रही थी, जैसे शरत्काल में निर्मल आकाश ताराओं से प्रकाशित एवं सुशोभित होता है।४०॥
स च ताभिः परिवृतः शुशुभे राक्षसाधिपः।
यथा ह्यडुपतिः श्रीमांस्ताराभिरिव संवृतः॥४१॥
उन स्त्रियों से घिरा हुआ राक्षसराज रावण ताराओं से घिरे हुए कान्तिमान् नक्षत्रपति चन्द्रमा के समान शोभा पा रहा था॥४१॥
याश्च्यवन्तेऽम्बरात् ताराः पुण्यशेषसमावृताः।
इमास्ताः संगताः कृत्स्ना इति मेने हरिस्तदा॥४२॥
उस समय हनुमान जी को ऐसा मालूम हुआ कि आकाश (स्वर्ग)-से भोगावशिष्ट पुण्य के साथ जो ताराएँ नीचे गिरती हैं, वे सब-की-सब मानो यहाँ इन सुन्दरियों के रूपमें एकत्र हो गयी हैं* ॥ ४२ ॥
* इस श्लोक में ‘अत्युक्ति’ अलंकार है।
ताराणामिव सुव्यक्तं महतीनां शुभार्चिषाम्।
प्रभावर्णप्रसादाश्च विरेजुस्तत्र योषिताम्॥४३॥
क्योंकि वहाँ उन युवतियों के तेज, वर्ण और प्रसाद स्पष्टतः सुन्दर प्रभावाले महान् तारों के समान ही सुशोभित होते थे॥४३॥
व्यावृत्तकचपीनस्रक्प्रकीर्णवरभूषणाः।
पानव्यायामकालेषु निद्रोपहतचेतसः॥४४॥
मधुपान के अनन्तर व्यायाम (नृत्य, गान, क्रीड़ा आदि)-के समय जिनके केश खुलकर बिखर गये थे, पुष्पमालाएँ मर्दित होकर छिन्न-भिन्न हो गयी थीं और सुन्दर आभूषण भी शिथिल होकर इधर-उधर खिसक गये थे, वे सभी सुन्दरियाँ वहाँ निद्रा से अचेत-सी होकर सो रही थीं। ४४॥
व्यावृत्ततिलकाः काश्चित् काश्चिदुदभ्रान्तनूपुराः।
पार्वे गलितहाराश्च काश्चित् परमयोषितः॥
किन्हीं के मस्तक की (सिंदूर-कस्तूरी आदि की) वेदियाँ पुछ गयी थीं, किन्हींके नूपुर पैरों से निकलकर दूर जा पड़े थे तथा किन्हीं सुन्दरी युवतियों के हार टूटकर उनके बगल में ही पड़े थे॥ ४५ ॥
मुक्ताहारवृताश्चान्याः काश्चित् प्रसस्तवाससः।
व्याविद्धरशनादामाः किशोर्य इव वाहिताः॥४६॥
कोई मोतियों के हार टूट जाने से उनके बिखरे दानों से आवृत थीं, किन्हींके वस्त्र खिसक गये थे और किन्हीं की करधनी की लड़ें टूट गयी थीं। वे युवतियाँ बोझ ढोकर थकी हुई अश्वजाति की नयी बछेड़ियों के समान जान पड़ती थीं॥ ४६॥
अकुण्डलधराश्चान्या विच्छिन्नमृदितस्रजः।
गजेन्द्रमृदिताः फुल्ला लता इव महावने॥४७॥
किन्हीं के कानों के कुण्डल गिर गये थे, किन्हीं की पुष्पमालाएँ मसली जाकर छिन्न-भिन्न हो गयी थीं। इससे वे महान् वन में गजराज द्वारा दली-मली गयी फूली लताओं के समान प्रतीत होती थीं॥४७॥
चन्द्रांशुकिरणाभाश्च हाराः कासांचिदुद्गताः।
हंसा इव बभुः सुप्ताः स्तनमध्येषु योषिताम्॥४८॥
किन्हीं के चन्द्रमा और सूर्य की किरणों के समान प्रकाशमान हार उनके वक्षःस्थल पर पड़कर उभरे हुए प्रतीत होते थे। वे उन युवतियों के स्तनमण्डल पर ऐसे जान पड़ते थे मानो वहाँ हंस सो रहे हों॥४८॥
अपरासां च वैदूर्याः कादम्बा इव पक्षिणः।
हेमसूत्राणि चान्यासां चक्रवाका इवाभवन्॥४९॥
दूसरी स्त्रियों के स्तनों पर नीलम के हार पड़े थे, जो कादम्ब (जलकाक) नामक पक्षी के समान शोभा पाते थे तथा अन्य स्त्रियों के उरोजों पर जो सोने के हार थे, वे चक्रवाक (पुरखाव) नामक पक्षियों के समान जान पड़ते थे॥४९॥
हंसकारण्डवोपेताश्चक्रवाकोपशोभिताः।
आपगा इव ता रेजुर्जघनैः पुलिनैरिव॥५०॥
इस प्रकार वे हंस, कारण्डव (जलकाक) तथा चक्रवाकों से सुशोभित नदियों के समान शोभा पाती थीं। उनके जघनप्रदेश उन नदियों के तटों के समान जान पड़ते थे॥५०॥
किङ्किणीजालसंकाशास्ता हेमविपुलाम्बुजाः।
भावग्राहा यशस्तीराः सुप्ता नद्य इवाबभुः॥५१॥
वे सोयी हुई सुन्दरियाँ वहाँ सरिताओं के समान सुशोभित होती थीं। किङ्किणियों (घुघुरुओं)-के समूह उनमें मुकुल के समान प्रतीत होते थे। सोने के विभिन्न आभूषण ही वहाँ बहुसंख्यक स्वर्णकमलों की शोभा धारण करते थे। भाव (सुप्तावस्था में भी वासनावश होने वाली शृंगारचेष्टाएँ) ही मानो ग्राह थे तथा यश (कान्ति) ही तट के समान जान पड़ते थे॥५१॥
मृदुष्वंगेषु कासांचित् कुचाग्रेषु च संस्थिताः।
बभूवुर्भूषणानीव शुभा भूषणराजयः॥५२॥
किन्हीं सुन्दरियों के कोमल अंगों में तथा कुचों के अग्रभागपर उभरी हुई आभूषणों की सुन्दर रेखाएँ नये गहनों के समान ही शोभा पाती थीं॥५२॥
अंशुकान्ताश्च कासांचिन्मुखमारुतकम्पिताः।
उपर्युपरि वक्त्राणां व्याधूयन्ते पुनः पुनः॥५३॥
किन्हीं के मुख पर पड़े हुए उनकी झीनी साड़ी के अञ्चल उनकी नासिका से निकली हुई साँस से कम्पित हो बारंबार हिल रहे थे॥५३॥
ताः पताका इवोधूताः पत्नीनां रुचिरप्रभाः।
नानावर्णसुवर्णानां वक्त्रमूलेषु रेजिरे॥५४॥
नाना प्रकार के सुन्दर रूप-रंगवाली उन रावणपत्नियों के मुखों पर हिलते हुए वे अञ्चल सुन्दर कान्तिवाली फहराती हुई पताकाओं के समान शोभा पा रहे थे॥ ५४॥
ववल्गुश्चात्र कासांचित् कुण्डलानि शुभार्चिषाम्।
मखमारुतसंकम्पैर्मन्दं मन्दं च योषिताम्॥५५॥
वहाँ किन्हीं-किन्हीं सुन्दर कान्तिमती कामिनियों के कानों के कुण्डल उनके निःश्वासजनित कम्पन से धीरे-धीरे हिल रहे थे॥ ५५ ॥
शर्करासवगन्धः स प्रकृत्या सुरभिः सुखः।
तासां वदननिःश्वासः सिषेवे रावणं तदा॥५६॥
उन सुन्दरियों के मुख से निकली हुई स्वभाव से ही सुगन्धित श्वासवायु शर्करा निर्मित आसव की मनोहर गन्ध से युक्त हो और भी सुखद बनकर उस समय रावण की सेवा करती थी॥५६॥
रावणाननशंकाश्च काश्चिद् रावणयोषितः।
मुखानि च सपत्नीनामुपाजिघ्रन् पुनः पुनः॥५७॥
रावण की कितनी ही तरुणी पत्नियाँ रावण का ही मुख समझकर बारंबार अपनी सौतों के ही मुखों को सूंघ रही थीं। ५७॥
अत्यर्थं सक्तमनसो रावणे ता वरस्त्रियः।
अस्वतन्त्राः सपत्नीनां प्रियमेवाचरंस्तदा॥५८॥
उन सुन्दरियों का मन रावण में अत्यन्त आसक्त था, इसलिये वे आसक्ति तथा मदिरा के मद से परवश हो उस समय रावण के मुख के भ्रम से अपनी सौतों का मुख सूंघकर उनका प्रिय ही करती थीं (अर्थात् वे भी उस समय अपने मुख-संलग्न हुए उन सौतों के मुखों को रावण का ही मुख समझकर उसे सूंघने का सुख उठाती थीं)॥ ५८॥
बाहूनुपनिधायान्याः पारिहार्यविभूषितान्।
अंशुकानि च रम्याणि प्रमदास्तत्र शिश्यिरे॥५९॥
अन्य मदमत्त युवतियाँ अपनी वलयविभूषित भुजाओं का ही तकिया लगाकर तथा कोई-कोई । सिर के नीचे अपने सुरम्य वस्त्रों को ही रखकर वहाँ सो रही थीं॥ ५९॥
अन्या वक्षसि चान्यस्यास्तस्याः काचित् पुनर्भुजम्।
अपरा त्वङ्कमन्यस्यास्तस्याश्चाप्यपरा कुचौ॥ ६०॥
एक स्त्री दूसरी की छाती पर सिर रखकर सोयी थी तो कोई दूसरी स्त्री उसकी भी एक बाँह को ही तकिया बनाकर सो गयी थी। इसी तरह एक अन्य स्त्री दूसरी की गोद में सिर रखकर सोयी थी तो कोई दूसरी उसके भी कुचों का ही तकिया लगाकर सो गयी थी॥
ऊरुपार्श्वकटीपृष्ठमन्योन्यस्य समाश्रिताः।
परस्परनिविष्टांगयो मदस्नेहवशानुगाः॥६१॥
इस तरह रावण विषयक स्नेह और मदिराजनित मदके वशीभूत हुई वे सुन्दरियाँ एक-दूसरी के ऊरु, पार्श्वभाग, कटिप्रदेश तथा पृष्ठभागका सहारा ले आपस में अंगों-से-अंग मिलाये वहाँ बेसुध पड़ी थीं। ६१॥
अन्योन्यस्यांगसंस्पर्शात् प्रीयमाणाः सुमध्यमाः।
एकीकृतभुजाः सर्वाः सुषुपुस्तत्र योषितः॥६२॥
वे सुन्दर कटिप्रदेशवाली समस्त युवतियाँ एकदूसरी के अंगस्पर्श को प्रियतम का स्पर्श मानकर उससे मन-ही-मन आनन्द का अनुभव करती हुई परस्पर बाँह-से-बाँह मिलाये सो रही थीं॥ ६२॥
अन्योन्यभुजसूत्रेण स्त्रीमाला ग्रथिता हि सा।
मालेव ग्रथिता सूत्रे शुशुभे मत्तषट्पदा॥६३॥
एक-दूसरी के बाहुरूपी सूत्र में गुंथी हुई काले-काले केशोंवाली स्त्रियों की वह माला सूत में पिरोयी हुई मतवाले भ्रमरों से युक्त पुष्पमाला की भाँति शोभा पा रही थी॥ ६३॥
लतानां माधवे मासि फुल्लानां वायुसेवनात्।
अन्योन्यमालाग्रथितं संसक्तकुसुमोच्चयम्॥६४॥
प्रतिवेष्टितसुस्कन्धमन्योन्यभ्रमराकुलम्।
आसीद् वनमिवोधूतं स्त्रीवनं रावणस्य तत्॥६५॥
माधवमास (वसन्त)-में मलयानिल के सेवन से जैसे खिली हुई लताओं का वन कम्पित होता रहता है, उसी प्रकार रावण की स्त्रियों का वह समुदाय निःश्वासवायु के चलने से अञ्चलों के हिलने के कारण कम्पित होता-सा जान पड़ता था। जैसे लताएँ परस्पर मिलकर माला की भाँति आबद्ध हो जाती हैं, उनकी सुन्दर शाखाएँ परस्पर लिपट जाती हैं और इसीलिये उनके पुष्पसमूह भी आपस में मिले हुए-से प्रतीत होते हैं तथा उनपर बैठे हुए भ्रमर भी परस्पर मिल जाते हैं, उसी प्रकार वे सुन्दरियाँ एक-दूसरी से मिलकर माला की भाँति गुँथ गयी थीं। उनकी भुजाएँ और कंधे परस्पर सटे हुए थे। उनकी वेणी में गुंथे हुए फूल भी आपस में मिल गये थे तथा उन सबके केशकलाप भी एक-दूसरे से जुड़ गये थे॥६४-६५ ॥
उचितेष्वपि सुव्यक्तं न तासां योषितां तदा।
विवेकः शक्य आधातुं भूषणांगाम्बरस्रजाम्॥६६॥
यद्यपि उन युवतियों के वस्त्र, अंग, आभूषण और हार उचित स्थानों पर ही प्रतिष्ठित थे, यह बात स्पष्ट दिखायी दे रही थी, तथापि उन सबके परस्पर गुंथ जाने के कारण यह विवेक होना असम्भव हो गया था कि कौन वस्त्र, आभूषण, अंग अथवा हार किसके हैं
* इस श्लोक में ‘भ्रान्तिमान्’ नामक अलंकार है।
रावणे सुखसंविष्टे ताः स्त्रियो विविधप्रभाः।
ज्वलन्तः काञ्चना दीपाः प्रेक्षन्तो निमिषा इव॥६७॥
रावण के सुखपूर्वक सो जाने पर वहाँ जलते हुए सुवर्णमय प्रदीप उन अनेक प्रकार की कान्तिवाली कामिनियों को मानो एकटक दृष्टि से देख रहे थे। ६७॥
राजर्षिविप्रदैत्यानां गन्धर्वाणां च योषितः।
रक्षसां चाभवन् कन्यास्तस्य कामवशंगताः॥६८॥
राजर्षियों, ब्रह्मर्षियों, दैत्यों, गन्धर्वो तथा राक्षसों की कन्याएँ काम के वशीभूत होकर रावण की पत्नियाँ बन गयी थीं॥ ६८॥
युद्धकामेन ताः सर्वा रावणेन हृताः स्त्रियः।
समदा मदनेनैव मोहिताः काश्चिदागताः॥६९॥
उन सब स्त्रियों का रावण ने युद्ध की इच्छा से अपहरण किया था और कुछ मदमत्त रमणियाँ कामदेव से मोहित होकर स्वयं ही उसकी सेवा में उपस्थित हो गयी थीं॥ ६९॥
न तत्र काश्चित् प्रमदाः प्रसह्य वीर्योपपन्नेन गुणेन लब्धाः।
न चान्यकामापि न चान्यपूर्वा विना वराहाँ जनकात्मजां तु॥ ७० ॥
वहाँ ऐसी कोई स्त्रियाँ नहीं थीं, जिन्हें बलपराक्रम से सम्पन्न होने पर भी रावण उनकी इच्छा के विरुद्ध बलात् हर लाया हो। वे सब-की-सब उसे अपने अलौकिक गुण से ही उपलब्ध हुई थीं। जो श्रेष्ठतम पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्रजी के ही योग्य थीं, उन जनककिशोरी सीता को छोड़कर दूसरी कोई ऐसी स्त्री वहाँ नहीं थी, जो रावण के सिवा किसी दूसरे की इच्छा रखने वाली हो अथवा जिसका पहले कोई दूसरा पति रहा हो॥ ७० ॥
न चाकुलीना न च हीनरूपा नादक्षिणा नानुपचारयुक्ता।
भार्याभवत् तस्य न हीनसत्त्वा न चापि कान्तस्य न कामनीया॥७१॥
रावण की कोई भार्या ऐसी नहीं थी, जो उत्तम कुल में उत्पन्न न हुई हो अथवा जो कुरूप, अनुदार या कौशलरहित, उत्तम वस्त्राभूषण एवं माला आदि से वञ्चित, शक्तिहीन तथा प्रियतम को अप्रिय हो॥७१॥
बभूव बुद्धिस्तु हरीश्वरस्य यदीदृशी राघवधर्मपत्नी।
इमा महाराक्षसराजभार्याः सुजातमस्येति हि साधुबुद्धेः ॥७२॥
उस समय श्रेष्ठ बुद्धिवाले वानरराज हनुमान जी के मन में यह विचार उत्पन्न हुआ कि ये महान् राक्षसराज रावण की भार्याएँ जिस तरह अपने पति के साथ रहकर सुखी हैं, उसी प्रकार यदि रघुनाथजी की धर्मपत्नी सीताजी भी इन्हीं की भाँति अपने पति के साथ रहकर सुख का अनुभव करतीं अर्थात् यदि रावण शीघ्र ही उन्हें श्रीरामचन्द्रजी की सेवा में समर्पित कर देता तो यह इसके लिये परम मंगलकारी होता॥ ७२॥
पुनश्च सोऽचिन्तयदात्तरूपो ध्रुवं विशिष्टा गुणतो हि सीता।
अथायमस्यां कृतवान् महात्मा लंकेश्वरः कष्टमनार्यकर्म॥७३॥
फिर उन्होंने सोचा, निश्चय ही सीता गुणों की दृष्टि से इन सबकी अपेक्षा बहुत ही बढ़-चढ़कर हैं। इस महाबली लंकापति ने मायामय रूप धारण करके सीता को धोखा देकर इनके प्रति यह अपहरणरूप महान् कष्टप्रद नीच कर्म किया है॥ ७३ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे नवमः सर्गः॥९॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में नवाँ सर्ग पूरा हुआ॥९॥
सर्ग-10
तत्र दिव्योपमं मुख्यं स्फाटिकं रत्नभूषितम्।
अवेक्षमाणो हनुमान् ददर्श शयनासनम्॥१॥
वहाँ इधर-उधर दृष्टिपात करते हुए हनुमान जी ने एक दिव्य एवं श्रेष्ठ वेदी देखी, जिसपर पलंग बिछाया जाता था। वह वेदी स्फटिक मणि की बनी हुई थी और उसमें अनेक प्रकार के रत्न जड़े गये थे। १॥
दान्तकाञ्चनचित्रांगैवैदूर्यैश्च वरासनैः।
महार्हास्तरणोपेतैरुपपन्नं महाधनैः॥२॥
वहाँ वैदूर्यमणि (नीलम)-के बने हुए श्रेष्ठ आसन(पलंग) बिछे हुए थे, जिनकी पाटी-पाये आदि अंग हाथी-दाँत और सुवर्ण से जटित होने के कारण चितकबरे दिखायी देते थे। उन महामूल्यवान् पलंगों पर बहुमूल्य बिछौने बिछाये गये थे। उन सबके कारण उस वेदी की बड़ी शोभा हो रही थी। २॥
तस्य चैकतमे देशे दिव्यमालोपशोभितम्।
ददर्श पाण्डुरं छत्रं ताराधिपतिसंनिभम्॥३॥
उस पलंग के एक भागमें उन्होंने चन्द्रमा के समान एक श्वेत छत्र देखा, जो दिव्य मालाओं से सुशोभित था।
जातरूपपरिक्षिप्तं चित्रभानोः समप्रभम्।
अशोकमालाविततं ददर्श परमासनम्॥४॥
वह उत्तम पलंग सुवर्ण से जटित होने के कारण अग्नि के समान देदीप्यमान हो रहा था। हनुमान जी ने उसे अशोकपुष्पों की मालाओं से अलंकृत देखा॥४॥
वालव्यजनहस्ताभिर्वीज्यमानं समन्ततः।
गन्धैश्च विविधैर्जुष्टं वरधूपेन धूपितम्॥५॥
उसके चारों ओर खड़ी हुई बहुत-सी स्त्रियाँ हाथों में चँवर लिये उसपर हवा कर रही थीं। वह पलंग अनेक प्रकार की गन्धों से सेवित तथा उत्तम धूप से सुवासित था॥५॥
परमास्तरणास्तीर्णमाविकाजिनसंवृतम्।
दामभिर्वरमाल्यानां समन्तादुपशोभितम्॥६॥
उस पर उत्तमोत्तम बिछौने बिछे हुए थे। उसमें भेड़ की खाल मढ़ी हुई थी तथा वह सब ओर से उत्तम फूलों की मालाओं से सुशोभित था॥६॥
तस्मिञ्जीमूतसंकाशं प्रदीप्तोज्ज्वलकुण्डलम्।
लोहिताक्षं महाबाहुं महारजतवाससम्॥७॥
लोहितेनानुलिप्तांगं चन्दनेन सुगन्धिना।
संध्यारक्तमिवाकाशे तोयदं सतडिद्गुणम्॥८॥
वृतमाभरणैर्दिव्यैः सुरूपं कामरूपिणम्।
सवृक्षवनगुल्माढ्यं प्रसुप्तमिव मन्दरम्॥९॥
क्रीडित्वोपरतं रात्रौ वराभरणभूषितम्।
प्रियं राक्षसकन्यानां राक्षसानां सुखावहम्॥१०॥
पीत्वाप्युपरतं चापि ददर्श स महाकपिः।
भास्वरे शयने वीरं प्रसुप्तं राक्षसाधिपम्॥११॥
उस प्रकाशमान पलंग पर महाकपि हनुमान जी ने वीर राक्षसराज रावण को सोते देखा, जो सुन्दर आभूषणों से विभूषित, इच्छानुसार रूप धारण करने वाला, दिव्य आभरणों से अलंकृत और सुरूपवान् था। वह राक्षस-कन्याओं का प्रियतम तथा राक्षसों को सुख पहुँचाने वाला था। उसके अंगों में सुगन्धित लाल चन्दन का अनुलेप लगा हुआ था, जिससे वह आकाश में संध्याकाल की लाली तथा विद्युल्लेखा से युक्त मेघ के समान शोभा पाता था। उसकी अंगकान्ति मेघ के समान श्याम थी। उसके कानों में उज्ज्वल कुण्डल झिलमिला रहे थे। आँखें लाल थीं और भुजाएँ बड़ी-बड़ी। उसके वस्त्र सुनहरे रंग के थे। वह रात को स्त्रियों के साथ क्रीड़ा करके मदिरा पीकर आराम कर रहा था। उसे देखकर ऐसा जान पड़ता था, मानो वृक्ष, वन और लता-गुल्मों से सम्पन्न मन्दराचल सो रहा हो॥७–११॥
निःश्वसन्तं यथा नागं रावणं वानरोत्तमः।
आसाद्य परमोद्विग्नः सोपासर्पत् सुभीतवत्॥१२॥
अथारोहणमासाद्य वेदिकान्तरमाश्रितः।
क्षीबं राक्षसशार्दूलं प्रेक्षते स्म महाकपिः॥१३॥
उस समय साँस लेता हुआ रावण फुफकारते हुए सर्प के समान जान पड़ता था। उसके पास पहुँचकर वानरशिरोमणि हनुमान् अत्यन्त उद्विग्न हो भलीभाँति डरे हुए की भाँति सहसा दूर हट गये और सीढ़ियों पर चढ़कर एक-दूसरी वेदी पर जाकर खड़े हो गये। वहाँ से उन महाकपि ने उस मतवाले राक्षससिंह को देखना आरम्भ किया॥ १२-१३॥
शुशुभे राक्षसेन्द्रस्य स्वपतः शयनं शुभम्।
गन्धहस्तिनि संविष्टे यथा प्रस्रवणं महत्॥१४॥
राक्षसराज रावण के सोते समय वह सुन्दर पलंग उसी प्रकार शोभा पा रहा था, जैसे गन्धहस्ती के शयन करने पर विशाल प्रस्रवणगिरि सुशोभित हो रहा हो। १४॥
काञ्चनांगदसंनद्धौ ददर्श स महात्मनः।
विक्षिप्तौ राक्षसेन्द्रस्य भुजाविन्द्रध्वजोपमौ॥१५॥
उन्होंने महाकाय राक्षसराज रावण की फैलायी हुई दो भुजाएँ देखीं, जो सोने के बाजूबंद से विभूषित हो इन्द्रध्वज के समान जान पड़ती थीं॥ १५ ॥
ऐरावतविषाणा|रापीडनकृतव्रणौ।
वज्रोल्लिखितपीनांसौ विष्णुचक्रपरिक्षतौ॥१६॥
युद्धकाल में उन भुजाओं पर ऐरावत हाथी के दाँतों के अग्रभाग से जो प्रहार किये गये थे, उनके आघात का चिह्न बन गया था। उन भुजाओं के मूलभाग या कंधेबहुत मोटे थे और उनपर वज्र द्वारा किये गये आघात के भी चिह्न दिखायी देते थे। भगवान् विष्णु के चक्र से भी किसी समय वे भुजाएँ क्षत-विक्षत हो चुकी थीं॥१६॥
पीनौ समसुजातांसौ संगतौ बलसंयुतौ।
सुलक्षणनखांगुष्ठौ स्वंगुलीयकलक्षितौ॥१७॥
वे भुजाएँ सब ओर से समान और सुन्दर कंधोंवाली तथा मोटी थीं। उनकी संधियाँ सुदृढ़ थीं। वे बलिष्ठ और उत्तम लक्षण वाले नखों एवं अंगुष्ठों से सुशोभित थीं। उनकी अंगुलियाँ और हथेलियाँ बड़ी सुन्दर दिखायी देती थीं॥ १७॥
संहतौ परिघाकारौ वृत्तौ करिकरोपमौ।
विक्षिप्तौ शयने शुभ्रे पञ्चशीर्षाविवोरगौ॥१८॥
वे सुगठित एवं पुष्ट थीं। परिघ के समान गोलाकार तथा हाथी के शुण्डदण्ड की भाँति चढ़ाव-उतारवाली एवं लंबी थीं। उस उज्ज्वल पलंग पर फैली वे बाँहें पाँच-पाँच फनवाले दो सर्पो के समान दृष्टिगोचर होती थीं॥
शशक्षतजकल्पेन सुशीतेन सुगन्धिना।
चन्दनेन परायेन स्वनुलिप्तौ स्वलंकृतौ॥१९॥
खरगोश के खून की भाँति लाल रंग के उत्तम, सुशीतल एवं सुगन्धित चन्दन से चर्चित हुई वे भुजाएँ अलंकारों से अलंकृत थीं॥ १९॥
उत्तमस्त्रीविमृदितौ गन्धोत्तमनिषेवितौ।
यक्षपन्नगगन्धर्वदेवदानवराविणौ ॥२०॥
सुन्दरी युवतियाँ धीरे-धीरे उन बाँहों को दबाती थीं। उन पर उत्तम गन्ध-द्रव्य का लेप हुआ था। वे यक्ष, नाग, गन्धर्व, देवता और दानव सभी को युद्ध में रुलाने वाली थीं॥ २०॥
ददर्श स कपिस्तस्य बाहू शयनसंस्थितौ।
मन्दरस्यान्तरे सुप्तौ महाही रुषिताविव॥२१॥
कपिवर हनुमान् ने पलंग पर पड़ी हुई उन दोनों भुजाओं को देखा। वे मन्दराचल की गुफा में सोये हुए दो रोषभरे अजगरों के समान जान पड़ती थीं॥ २१॥
ताभ्यां स परिपूर्णाभ्यामुभाभ्यां राक्षसेश्वरः।
शुशुभेऽचलसंकाशः श्रृंगाभ्यामिव मन्दरः॥२२॥
उन बड़ी-बड़ी और गोलाकार दो भुजाओं से युक्त पर्वताकार राक्षसराज रावण दो शिखरों से संयुक्त मन्दराचल के समान शोभा पा रहा था* ॥ २२॥
* यहाँ शयनागार में सोये हुए रावण के एक ही मुख और दो ही बाँहों का वर्णन आया है। इससे जान पड़ता है कि वह साधारण स्थिति में इसी तरह रहता था। युद्ध आदि के विशेष अवसरों पर ही वह स्वेच्छापूर्वक दस मुख और बीस भुजाओं से संयुक्त होता था।
चूतनागसुरभिर्बकुलोत्तमसंयुतः।
मृष्टान्नरससंयुक्तः पानगन्धपुरःसरः॥२३॥
तस्य राक्षसराजस्य निश्चक्राम महामुखात्।
शयानस्य विनिःश्वासः पूरयन्निव तद् गृहम्॥२४॥
वहाँ सोये हुए राक्षसराज रावण के विशाल मुख से आम और नागकेसर की सुगन्ध से मिश्रित, मौलसिरी के सुवास से सुवासित और उत्तम अन्नरस से संयुक्त तथा मधुपान की गन्ध से मिली हुई जो सौरभयुक्त साँस निकल रही थी, वह उस सारे घर को सुगन्ध से परिपूर्ण-सा कर देती थी॥ २३-२४॥
मुक्तामणिविचित्रेण काञ्चनेन विराजिता।
मुकुटेनापवृत्तेन कुण्डलोज्ज्वलिताननम्॥२५॥
उसका कुण्डल से प्रकाशमान मुखारविन्द अपने स्थान से हटे हुए तथा मुक्तामणि से जटित होने के कारण विचित्र आभावाले सुवर्णमय मुकुट से और भी उद्भासित हो रहा था॥ २५ ॥
रक्तचन्दनदिग्धेन तथा हारेण शोभिना।
पीनायतविशालेन वक्षसाभिविराजिता॥२६॥
उसकी छाती लाल चन्दन से चर्चित, हारसे सुशोभित, उभरी हुई तथा लंबी-चौड़ी थी। उसके द्वारा उस राक्षसराज के सम्पूर्ण शरीर की बड़ी शोभा हो रही थी॥
पाण्डुरेणापविद्धन क्षौमेण क्षतजेक्षणम्।
महार्हेण सुसंवीतं पीतेनोत्तरवाससा॥२७॥
उसकी आँखें लाल थीं। उसकी कटि के नीचे का भाग ढीले-ढाले श्वेत रेशमी वस्त्र से ढका हुआ था तथा वह पीले रंग की बहुमूल्य रेशमी चादर ओढ़े हुए था॥
माषराशिप्रतीकाशं निःश्वसन्तं भुजंगवत्।
गांगे महति तोयान्ते प्रसुप्तमिव कुञ्जरम्॥२८॥
वह स्वच्छ स्थान में रखे हुए उड़द के ढेर के समान जान पड़ता था और सर्प के समान साँसें ले रहा था। उस उज्ज्वल पलंग पर सोया हुआ रावण गंगा की अगाध जलराशि में सोये हुए गजराज के समान दिखायी देता था॥
चतुर्भिः काञ्चनैर्दीपैर्दीप्यमानं चतुर्दिशम्।
प्रकाशीकृतसर्वांगं मेघ विद्युद्गणैरिव॥२९॥
उसकी चारों दिशाओं में चार सुवर्णमय दीपक जल रहे थे; जिनकी प्रभा से वह देदीप्यमान हो रहा थाऔर उसके सारे अंग प्रकाशित होकर स्पष्ट दिखायी दे रहे थे। ठीक उसी तरह, जैसे विद्युद्गणों से मेघ प्रकाशित एवं परिलक्षित होता है॥ २९ ॥
पादमूलगताश्चापि ददर्श सुमहात्मनः।
पत्नीः स प्रियभार्यस्य तस्य रक्षःपतेहे ॥३०॥
पत्नियों के प्रेमी उस महाकाय राक्षसराज के घर में हनुमान जी ने उसकी पत्नियों को भी देखा, जो उसके चरणों के आस-पास ही सो रही थीं॥३०॥
शशिप्रकाशवदना वरकुण्डलभूषणाः।
अम्लानमाल्याभरणा ददर्श हरियूथपः॥३१॥
वानरयूथपति हनुमान् जी ने देखा, उन रावणपत्नियों के मुख चन्द्रमा के समान प्रकाशमान थे। वे सुन्दर कुण्डलों से विभूषित थीं तथा ऐसे फूलों के हार पहने हुए थीं, जो कभी मुरझाते नहीं थे॥ ३१॥
नृत्यवादित्रकुशला राक्षसेन्द्रभुजाङ्कगाः।
वराभरणधारिण्यो निषण्णा ददृशे कपिः॥ ३२॥
वे नाचने और बाजे बजाने में निपुण थीं, राक्षसराज रावण की बाँहों और अंक में स्थान पाने वाली थीं तथा सुन्दर आभूषण धारण किये हुए थीं। कपिवर हनुमान् ने उन सबको वहाँ सोती देखा ॥ ३२॥
वज्रवैदूर्यगर्भाणि श्रवणान्तेषु योषिताम्।
ददर्श तापनीयानि कुण्डलान्यंगदानि च॥३३॥
उन्होंने उन सुन्दरियों के कानों के समीप हीरे तथा नीलम जड़े हुए सोने के कुण्डल और बाजूबंद देखे॥ ३३॥
तासां चन्द्रोपमैर्वक्त्रैः शुभैललितकुण्डलैः।
विरराज विमानं तन्नभस्तारागणैरिव॥३४॥
ललित कुण्डलों से अलंकृत तथा चन्द्रमा के समान मनोहर उनके सुन्दर मुखों से वह विमानाकार पर्यङ्क तारिकाओं से मण्डित आकाश की भाँति सुशोभित हो रहा था॥ ३४॥
मदव्यायामखिन्नास्ता राक्षसेन्द्रस्य योषितः।
तेषु तेष्ववकाशेषु प्रसुप्तास्तनुमध्यमाः॥ ३५॥
क्षीण कटिप्रदेशवाली वे राक्षसराज की स्त्रियाँ मद तथा रतिक्रीड़ा के परिश्रम से थककर जहाँ-तहाँ जो जिस अवस्था में थीं वैसे ही सो गयी थीं॥ ३५ ॥
अंगहारैस्तथैवान्या कोमलैर्नृत्यशालिनी।
विन्यस्तशुभसर्वांगी प्रसुप्ता वरवर्णिनी॥३६॥
विधाता ने जिसके सारे अंगों को सुन्दर एवं विशेष शोभा से सम्पन्न बनाया था, वह कोमलभाव से अंगों के संचालन (चटकाने-मटकाने आदि) द्वारा नाचने वाली कोई अन्य नृत्यनिपुणा सुन्दरी स्त्री गाढ़ निद्रा में सोकर भी वासनावश जाग्रत्-अवस्था की ही भाँति नृत्य के अभिनय से सुशोभित हो रही थी॥ ३६॥
काचिद् वीणां परिष्वज्य प्रसुप्ता सम्प्रकाशते।
महानदीप्रकीर्णेव नलिनी पोतमाश्रिता॥३७॥
कोई वीणा को छाती से लगाकर सोयी हुई सुन्दरी ऐसी जान पड़ती थी, मानो महानदी में पड़ी हुई कोई कमलिनी किसी नौका से सट गयी हो॥ ३७॥
अन्या कक्षगतेनैव मड्डकेनासितेक्षणा।
प्रसुप्ता भामिनी भाति बालपुत्रेव वत्सला॥३८॥
दूसरी कजरारे नेत्रोंवाली भामिनी काँख में दबे हुए मड्डक (लघुवाद्य विशेष)-के साथ ही सो गयी थी।वह ऐसी प्रतीत होती थी, जैसे कोई पुत्रवत्सला जननी अपने छोटे-से शिशु को गोद में लिये सो रही हो॥ ३८॥
पटहं चारुसर्वांगी न्यस्य शेते शुभस्तनी।
चिरस्य रमणं लब्ध्वा परिष्वज्येव कामिनी॥३९॥
कोई सर्वांगसुन्दरी एवं रुचिर कुचोंवाली कामिनी पटह को अपने नीचे रखकर सो रही थी, मानो चिरकाल के पश्चात् प्रियतम को अपने निकट पाकर कोई प्रेयसी उसे हृदय से लगाये सो रही हो ॥३९॥
काचिद् वीणां परिष्वज्य सुप्ता कमललोचना।
वरं प्रियतमं गृह्य सकामेव हि कामिनी॥४०॥
कोई कमललोचना युवती वीणा का आलिंगन करके सोयी हुई ऐसी जान पड़ती थी, मानो कामभाव से युक्त कामिनी अपने श्रेष्ठ प्रियतम को भुजाओं में भरकर सो गयी हो॥ ४० ॥
विपञ्ची परिगृह्यान्या नियता नृत्यशालिनी।
निद्रावशमनुप्राप्ता सहकान्तेव भामिनी॥४१॥
नियमपूर्वक नृत्यकला से सुशोभित होनेवाली एक अन्य युवती विपञ्ची (विशेष प्रकारकी वीणा)-को अंक में भरकर प्रियतम के साथ सोयी हुई प्रेयसी की भाँति निद्रा के अधीन हो गयी थी॥४१॥
अन्या कनकसंकाशैर्मृदुपीनैर्मनोरमैः।
मृदंगं परिविद्ध्यांगैः प्रसुप्ता मत्तलोचना॥४२॥
कोई मतवाले नयनों वाली दूसरी सुन्दरी अपने सुवर्ण-सदृश गौर, कोमल, पुष्ट और मनोरम अंगों से मृदंग को दबाकर गाढ़ निद्रा में सो गयी थी॥ ४२ ॥
भुजपाशान्तरस्थेन कक्षगेन कृशोदरी।
पणवेन सहानिन्द्या सुप्ता मदकृतश्रमा॥४३॥
नशे से थकी हुई कोई कृशोदरी अनिन्द्य सुन्दरी रमणी अपने भुजपाशों के बीच में स्थित और काँख में दबे हुए पणव के साथ ही सो गयी थी॥४३॥
डिण्डिमं परिगृह्यान्या तथैवासक्तडिण्डिमा।
प्रसुप्ता तरुणं वत्समुपगुह्येव भामिनी॥४४॥
दूसरी स्त्री डिण्डिम को लेकर उसी तरह उससे सटी हुई सो गयी थी, मानो कोई भामिनी अपने बालक पुत्र को हृदय से लगाये हुए नींद ले रही हो।
४४॥
काचिदाडम्बरं नारी भुजसम्भोगपीडितम्।
कृत्वा कमलपत्राक्षी प्रसुप्ता मदमोहिता॥४५॥
मदिरा के मद से मोहित हुई कोई कमलनयनी नारी आडम्बर नामक वाद्य को अपनी भुजाओं के आलिंगन से दबाकर प्रगाढ़ निद्रा में निमग्न हो गयी। ४५॥
कलशीमपविद्ध्यान्या प्रसुप्ता भाति भामिनी।
वसन्ते पुष्पशबला मालेव परिमार्जिता॥४६॥
कोई दूसरी युवती निद्रावश जल से भरी हुई सुराही को लुढ़काकर भीगी अवस्था में ही बेसुध सो रही थी। उस अवस्था में वह वसन्त-ऋतु में विभिन्न वर्ण के पुष्पों की बनी और जल के छींटे से सींची हुई माला के समान प्रतीत होती थी॥ ४६॥
पाणिभ्यां च कुचौ काचित् सुवर्णकलशोपमौ।
उपगुह्याबला सुप्ता निद्राबलपराजिता॥४७॥
निद्रा के बल से पराजित हुई कोई अबला सुवर्णमय कलश के समान प्रतीत होने वाले अपने कुचों को दोनों हाथों से दबाकर सो रही थी॥४७॥
अन्या कमलपत्राक्षी पूर्णेन्दुसदृशानना।
अन्यामालिंग्य सुश्रोणी प्रसुप्ता मदविह्वला॥४८॥
पूर्ण चन्द्रमा के समान मनोहर मुखवाली दूसरी कमललोचना कामिनी सुन्दर नितम्बवाली किसी अन्य सुन्दरी का आलिंगन करके मद से विह्वल होकर सो गयी थी॥४८॥
आतोद्यानि विचित्राणि परिष्वज्य वरस्त्रियः।
निपीड्य च कुचैः सुप्ताः कामिन्यः कामुकानिव॥४९॥
जैसे कामिनियाँ अपने चाहने वाले कामुकों को छाती से लगाकर सोती हैं, उसी प्रकार कितनी ही सुन्दरियाँ विचित्र-विचित्र वाद्यों का आलिंगन करके उन्हें कुचों से दबाये सो गयी थीं॥४९॥
तासामेकान्तविन्यस्ते शयानां शयने शुभे।
ददर्श रूपसम्पन्नामथ तां स कपिः स्त्रियम्॥५०॥
उन सबकी शय्याओं से पृथक् एकान्त में बिछी हुई सुन्दर शय्या पर सोयी हुई एक रूपवती युवती को वहाँ हनुमान जी ने देखा ॥ ५० ॥
मुक्तामणिसमायुक्तैर्भूषणैः सुविभूषिताम्।
विभूषयन्तीमिव च स्वश्रिया भवनोत्तमम्॥५१॥
वह मोती और मणियों से जड़े हुए आभूषणों से भलीभाँति विभूषित थी और अपनी शोभा से उस उत्तम भवन को विभूषित-सा कर रही थी॥५१॥
गौरी कनकवर्णाभामिष्टामन्तःपुरेश्वरीम्।
कपिर्मन्दोदरी तत्र शयानां चारुरूपिणीम्॥५२॥
स तां दृष्ट्वा महाबाहुर्भूषितां मारुतात्मजः।
तर्कयामास सीतेति रूपयौवनसम्पदा।
हर्षेण महता युक्तो ननन्द हरियूथपः॥५३॥
वह गोरे रंग की थी। उसकी अंगकान्ति सुवर्ण के समान दमक रही थी। वह रावण की प्रियतमा और उसके अन्तःपुर की स्वामिनी थी। उसका नाम मन्दोदरी था। वह अपने मनोहर रूप से सुशोभित हो रही थी। वही वहाँ सो रही थी। हनुमान जी ने उसी को देखा। रूप और यौवन की सम्पत्ति से युक्त और वस्त्राभूषणों से विभूषित मन्दोदरी को देखकर महाबाहु पवनकुमार ने अनुमान किया कि ये ही सीताजी हैं। फिर तो ये वानरयूथपति हनुमान् महान् हर्ष से युक्त हो आनन्दमग्न हो गये॥ ५२-५३॥
आस्फोटयामास चुचुम्ब पुच्छं ननन्द चिक्रीड जगौ जगाम।
स्तम्भानरोहन्निपपात भूमौ निदर्शयन् स्वां प्रकृति कपीनाम्॥५४॥
वे अपनी पूँछ को पटकने और चूमने लगे। अपनी वानरों-जैसी प्रकृति का प्रदर्शन करते हुए आनन्दित होने, खेलने और गाने लगे, इधर-उधर आने-जाने लगे। वे कभी खंभों पर चढ़ जाते और कभी पृथ्वी पर कूद पड़ते थे॥५४॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे दशमः सर्गः॥१०॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में दसवाँ सर्ग पूरा हुआ।१०॥
सर्ग-11
अवधूय च तां बुद्धिं बभूवावस्थितस्तदा।
जगाम चापरां चिन्तां सीतां प्रति महाकपिः॥१॥
फिर उस समय इस विचार को छोड़कर महाकपि हनुमान जी अपनी स्वाभाविक स्थिति में स्थित हुए और वे सीताजी के विषय में दूसरे प्रकार की चिन्ता करने लगे॥
न रामेण वियुक्ता सा स्वप्तुमर्हति भामिनी।
न भोक्तुं नाप्यलंकर्तुं न पानमुपसेवितुम्॥२॥
(उन्होंने सोचा-) ‘भामिनी सीता श्रीरामचन्द्रजी से बिछुड़ गयी हैं। इस दशा में वे न तो सो सकती हैं, न भोजन कर सकती हैं, न शृंगार एवं अलंकार धारण कर सकती हैं, फिर मदिरापान का सेवन तो किसी प्रकार भी नहीं कर सकतीं॥२॥
नान्यं नरमुपस्थातुं सुराणामपि चेश्वरम्।
न हि रामसमः कश्चिद् विद्यते त्रिदशेष्वपि॥३॥
‘वे किसी दूसरे पुरुष के पास, वह देवताओं का भी ईश्वर क्यों न हो, नहीं जा सकतीं। देवताओं में भी कोई ऐसा नहीं है जो श्रीरामचन्द्रजी की समानता कर सके॥३॥
अन्येयमिति निश्चित्य भूयस्तत्र चचार सः।
पानभूमौ हरिश्रेष्ठः सीतासंदर्शनोत्सुकः॥४॥
‘अतः अवश्य ही यह सीता नहीं, कोई दूसरी स्त्री है।’ ऐसा निश्चय करके वे कपिश्रेष्ठ सीताजी के दर्शन के लिये उत्सुक हो पुनः वहाँ की मधुशाला में विचरने लगे॥
क्रीडितेनापराः क्लान्ता गीतेन च तथापराः।
नृत्येन चापराः क्लान्ताः पानविप्रहतास्तथा॥५॥
वहाँ कोई स्त्रियाँ क्रीड़ा करने से थकी हुई थीं तो कोई गीत गाने से। दूसरी नृत्य करके थक गयी थीं और कितनी ही स्त्रियाँ अधिक मद्यपान करके अचेत हो रही थीं॥५॥
मुरजेषु मृदंगेषु चेलिकासु च संस्थिताः।
तथाऽऽस्तरणमुख्येषु संविष्टाश्चापराः स्त्रियः॥ ६॥
बहुत-सी स्त्रियाँ ढोल, मृदंग और चेलिका नामक वाद्यों पर अपने अंगों को टेककर सो गयी थीं तथा दूसरी महिलाएँ अच्छे-अच्छे बिछौनों पर सोयी हुई थीं॥६॥
अंगनानां सहस्रेण भूषितेन विभूषणैः।
रूपसंलापशीलेन युक्तगीतार्थभाषिणा॥७॥
देशकालाभियुक्तेन युक्तवाक्याभिधायिना।
रताधिकेन संयुक्तां ददर्श हरियूथपः॥८॥
वानरयूथपति हनुमान जी ने उस पानभूमि को ऐसी सहस्रों रमणियों से संयुक्त देखा, जो भाँति-भाँति के आभूषणों से विभूषित, रूप-लावण्य की चर्चा करने वाली, गीत के समुचित अभिप्राय को अपनी वाणी द्वारा प्रकट करने वाली, देश और काल को समझने वाली, उचित बात बोलने वाली और रतिक्रीड़ा में अधिक भाग लेने वाली थीं॥७-८॥
अन्यत्रापि वरस्त्रीणां रूपसंलापशायिनाम्।
सहस्रं युवतीनां तु प्रसुप्तं स ददर्श ह॥९॥
दूसरे स्थान पर भी उन्होंने ऐसी सहस्रों सुन्दरी युवतियों को सोते देखा, जो आपस में रूप-सौन्दर्य की चर्चा करती हुई लेट रही थीं॥९॥
देशकालाभियुक्तं तु युक्तवाक्याभिधायि तत्।
रताविरतसंसुप्तं ददर्श हरियूथपः॥१०॥
वानरयूथपति पवनकुमार ने ऐसी बहुत-सी स्त्रियों को देखा, जो देश-काल को जानने वाली, उचित बात कहने वाली तथा रतिक्रीड़ा के पश्चात् गाढ़ निद्रा में सोयी हुई थीं॥ १० ॥
तासां मध्ये महाबाहुः शुशुभे राक्षसेश्वरः।
गोष्ठे महति मुख्यानां गवां मध्ये यथा वृषः॥११॥
उन सबके बीच में महाबाहु राक्षसराज रावण विशाल गोशाला में श्रेष्ठ गौओं के बीच सोये हुए साँड़ की भाँति शोभा पा रहा था॥ ११॥
स राक्षसेन्द्रः शुशुभे ताभिः परिवृतः स्वयम्।
करेणुभिर्यथारण्ये परिकीर्णो महाद्विपः॥१२॥
जैसे वन में हाथियों से घिरा हुआ कोई महान् गजराज सो रहा हो, उसी प्रकार उस भवन में उन सुन्दरियों से घिरा हुआ स्वयं राक्षसराज रावण सुशोभित हो रहा था॥ १२॥
सर्वकामैरुपेतां च पानभूमिं महात्मनः।
ददर्श कपिशार्दूलस्तस्य रक्षःपतेहे ॥१३॥
मृगाणां महिषाणां च वराहाणां च भागशः।
तत्र न्यस्तानि मांसानि पानभूमौ ददर्श सः॥ १४॥
उस महाकाय राक्षसराज के भवन में कपिश्रेष्ठ हनुमान् ने वह पानभूमि देखी, जो सम्पूर्ण मनोवाञ्छित भोगों से सम्पन्न थी। उस मधुशाला में अलग-अलग मृगों, भैंसों और सूअरों के मांस रखे गये थे, जिन्हें हनुमान जी ने देखा ॥ १३-१४ ॥
रौक्मेषु च विशालेषु भाजनेष्वप्यभक्षितान्।
ददर्श कपिशार्दूलो मयूरान् कुक्कुटांस्तथा ॥१५॥
वराहवाध्रीणसकान् दधिसौवर्चलायुतान्।
शल्यान् मृगमयूरांश्च हनुमानन्ववैक्षत॥१६॥
वानरसिंह हनुमान् ने वहाँ सोने के बड़े-बड़े पात्रों में मोर, मुर्गे, सूअर, गेंडा, साही, हरिण तथा मयूरों के मांस देखे, जो दही और नमक मिलाकर रखे गये थे।वे अभी खाये नहीं गये थे॥१५-१६ ।।
कृकलान् विविधांश्छागान् शशकानर्धभक्षितान्।
महिषानेकशल्यांश्च मेषांश्च कृतनिष्ठितान्॥१७॥
लेह्यानुच्चावचान् पेयान् भोज्यान्युच्चावचानि च।
तथाम्ललवणोत्तंसैर्विविधै रागखाण्डवैः॥१८॥
कृकल नामक पक्षी, भाँति-भाँति के बकरे, खरगोश, आधे खाये हुए भैंसे, एकशल्य नामक मत्स्य और भेड़ें ये सब-के-सब राँध-पकाकर रखे हुए थे। इनके साथ अनेक प्रकार की चटनियाँ भी थीं। भाँति-भाँति के पेय तथा भक्ष्य पदार्थ भी विद्यमान थे। जीभ की शिथिलता दूर करने के लिये खटाई और नमक के साथ भाँति-भाँति के राग* और खाण्डव भी रखे गये थे॥ १७-१८॥
* अंगूर और अनार के रस में मिश्री और मधु आदि मिलाने से जो मधुर रस तैयार होता है, वह पतला हो तो ‘राग’ कहलाता है और गाढ़ा हो जाय तो ‘खाण्डव’ नाम धारण करता है। जैसा कि कहा है
सितामध्वादिमधुरो द्राक्षादाडिमयो रसः।
विरलश्चेत् कृतो रागः सान्द्रश्चेत् खाण्डवः स्मृतः॥
महानपुरकेयूरैरपविद्धैर्महाधनैः।
पानभाजनविक्षिप्तैः फलैश्च विविधैरपि॥१९॥
कृतपुष्पोपहारा भूरधिकां पुष्यति श्रियम्।
बहुमूल्य बड़े-बड़े नूपुर और बाजूबंद जहाँ-तहाँ पड़े हुए थे। मद्यपान के पात्र इधर-उधर लुढ़काये हुए थे। भाँति-भाँति के फल भी बिखरे पड़े थे। इन सबसे उपलक्षित होने वाली वह पानभूमि, जिसे फूलों से सजाया गया था, अधिक शोभा का पोषण एवं संवर्धन कर रही थी॥ १९ १/२॥
तत्र तत्र च विन्यस्तैः सुश्लिष्टशयनासनैः॥२०॥
पानभूमिर्विना वह्नि प्रदीप्तेवोपलक्ष्यते।
यत्र-तत्र रखी हुई सुदृढ़ शय्याओं और सुन्दर स्वर्णमय सिंहासनों से सुशोभित होने वाली वह मधुशाला ऐसी जगमगा रही थी कि बिना आग के ही जलती हुई-सी दिखायी देती थी॥ २० १/२॥
बहुप्रकारैर्विविधैर्वरसंस्कारसंस्कृतैः॥ २१॥
मांसैः कुशलसंयुक्तैः पानभूमिगतैः पृथक् ।
दिव्याः प्रसन्ना विविधाः सुराः कृतसुरा अपि॥२२॥
शर्करासवमाध्वीकाः पुष्पासवफलासवाः।
वासचूर्णैश्च विविधैर्मुष्टास्तैस्तैः पृथक् पृथक्॥२३॥
अच्छी छौंक-बघार से तैयार किये गये नाना प्रकार के विविध मांस चतुर रसोइयों द्वारा बनाये गये थे और उस पानभूमि में पृथक्-पृथक् सजाकर रखे गये थे। उनके साथ ही स्वच्छ दिव्य सुराएँ (जो कदम्ब आदि वृक्षों से स्वतः उत्पन्न हुई थीं) और कृत्रिम सुराएँ (जिन्हें शराब बनाने वाले लोग तैयार करते हैं) भी वहाँ रखी गयी थीं। उनमें शर्करासव, माध्वीक,२ पुष्पासवरे और फलासव भी थे। इन सबको नाना प्रकार के सुगन्धित चूर्णो से पृथक्-पृथक् वासित किया गया था॥ २१–२३॥ १. शर्करा से तैयार की हुई सुरा ‘शर्करासव’ कहलाती है। २. मधु से बनायी हुई ‘मदिरा’
३. महुआ के फूल से तथा अन्यान्य पुष्पों के मकरन्द से बनायी हुई सुरा को ‘पुष्पासव’ कहते हैं। ४. द्राक्षा आदि फलों के रससे तैयार की हुई ‘सुरा’।
संतता शुशुभे भूमिर्माल्यैश्च बहुसंस्थितैः।
हिरण्मयैश्च कलशैर्भाजनैः स्फाटिकैरपि॥२४॥
जाम्बूनदमयैश्चान्यैः करकैरभिसंवृता।
वहाँ अनेक स्थानों पर रखे हुए नाना प्रकार के फूलों, सुवर्णमय कलशों, स्फटिकमणि के पात्रों तथा जाम्बूनद के बने हुए अन्यान्य कमण्डलुओं से व्याप्त हुई वह पानभूमि बड़ी शोभा पा रही थी॥ २४ १/२ ।।
राजतेषु च कुम्भेषु जाम्बूनदमयेषु च ॥२५॥
पानश्रेष्ठां तथा भूमिं कपिस्तत्र ददर्श सः।
चाँदी और सोने के घड़ों में, जहाँ श्रेष्ठ पेय पदार्थ रखे थे, उस पानभूमि को कपिवर हनुमान जी ने वहाँ अच्छी तरह घूम-घूमकर देखा॥ २५ १/२॥
सोऽपश्यच्छातकुम्भानि सीधोर्मणिमयानि च॥२६॥
तानि तानि च पूर्णानि भाजनानि महाकपिः।
महाकपि पवनकुमार ने देखा, वहाँ मदिरा से भरे हुए सोने और मणियों के भिन्न-भिन्न पात्र रखे गये हैं। २६ १/२॥
क्वचिदर्धावशेषाणि क्वचित् पीतान्यशेषतः॥२७॥
क्वचिन्नैव प्रपीतानि पानानि स ददर्श ह।
किसी घड़े में आधी मदिरा शेष थी तो किसी घड़े की सारी-की-सारी पी ली गयी थी तथा किन्हीं किन्हीं घड़ों में रखे हुए मद्य सर्वथा पीये नहीं गये थे। हनुमान जी ने उन सबको देखा॥२७ १/२॥
क्वचिद् भक्ष्यांश्च विविधान् क्वचित् पानानि भागशः॥२८॥
क्वचिदर्धावशेषाणि पश्यन् वै विचचार ह।
कहीं नाना प्रकार के भक्ष्य पदार्थ और कहीं पीने की वस्तुएँ अलग-अलग रखी गयी थीं और कहीं उनमें से आधी-आधी सामग्री ही बची थी। उन सबको देखते हुए वे वहाँ सर्वत्र विचरने लगे॥ २८ १/२॥
शयनान्यत्र नारीणां शून्यानि बहुधा पुनः।
परस्परं समाश्लिष्य काश्चित् सुप्ता वरांगनाः॥२९॥
उस अन्तःपुर में स्त्रियों की बहुत-सी शय्याएँ सूनी पड़ी थीं और कितनी ही सुन्दरियाँ एक ही जगह एक-दूसरी का आलिंगन किये सो रही थीं॥ २९॥
काचिच्च वस्त्रमन्यस्या अपहृत्योपगुह्य च।
उपगम्याबला सुप्ता निद्राबलपराजिता॥३०॥
निद्रा के बल से पराजित हुई कोई अबला दूसरी स्त्री का वस्त्र उतारकर उसे धारण किये उसके पास जा उसी का आलिंगन करके सो गयी थी॥३०॥
तासामुच्छ्वासवातेन वस्त्रं माल्यं च गात्रजम्।
नात्यर्थं स्पन्दते चित्रं प्राप्य मन्दमिवानिलम्॥३१॥
उनकी साँस की हवा से उनके शरीर के विविध प्रकार के वस्त्र और पुष्पमाला आदि वस्तुएँ उसी तरह धीरे-धीरे हिल रही थीं, जैसे धीमी-धीमी वायु के चलने से हिला करती हैं॥३१॥
चन्दनस्य च शीतस्य सीधोर्मधुरसस्य च।
विविधस्य च माल्यस्य पुष्पस्य विविधस्य च॥३२॥
बहुधा मारुतस्तस्य गन्धं विविधमुदहन्।
स्नानानां चन्दनानां च धूपानां चैव मूर्च्छितः॥३३॥
प्रववौ सुरभिर्गन्धो विमाने पुष्पके तदा।
उस समय पुष्पकविमान में शीतल चन्दन, मद्य, मधुरस, विविध प्रकार की माला, भाँति-भाँति के पुष्प, स्नान-सामग्री, चन्दन और धूप की अनेक प्रकार की गन्धका भार वहन करती हुई सुगन्धित वायु सब ओर प्रवाहित हो रही थी॥ ३२-३३ १/२॥
श्यामावदातास्तत्रान्याः काश्चित् कृष्णा वरांगनाः॥३४॥
काश्चित् काञ्चनवर्णांग्यः प्रमदा राक्षसालये।
उस राक्षसराज के भवन में कोई साँवली, कोई गोरी, कोई काली और कोई सुवर्ण के समान कान्तिवाली सुन्दरी युवतियाँ सो रही थीं॥३४ १/२॥
तासां निद्रावशत्वाच्च मदनेन विमूर्च्छितम्॥३५॥
पद्मिनीनां प्रसुप्तानां रूपमासीद् यथैव हि।
निद्रा के वश में होने के कारण उनका काममोहितरूप मुँदे हुए मुखवाले कमलपुष्पों के समान जान पड़ता था॥
एवं सर्वमशेषेण रावणान्तःपुरं कपिः।
ददर्श स महातेजा न ददर्श च जानकीम्॥३६॥
इस प्रकार महातेजस्वी कपिवर हनुमान् ने रावण का सारा अन्तःपुर छान डाला तो भी वहाँ उन्हें जनकनन्दिनी सीता का दर्शन नहीं हुआ॥ ३६॥
निरीक्षमाणश्च ततस्ताः स्त्रियः स महाकपिः।
जगाम महतीं शंकां धर्मसाध्वसशंकितः॥ ३७॥
उन सोती हुई स्त्रियों को देखते-देखते महाकपि हनुमान् धर्म के भय से शंकित हो उठे। उनके हृदय में बड़ा भारी संदेह उपस्थित हो गया॥ ३७॥
परदारावरोधस्य प्रसुप्तस्य निरीक्षणम्।
इदं खलु ममात्यर्थं धर्मलोपं करिष्यति॥ ३८॥
वे सोचने लगे कि ‘इस तरह गाढ़ निद्रा में सोयी हुई परायी स्त्रियों को देखना अच्छा नहीं है। यह तो मेरे धर्म का अत्यन्त विनाश कर डालेगा॥ ३८॥
न हि मे परदाराणां दृष्टिविषयवर्तिनी।
अयं चात्र मया दृष्टः परदारपरिग्रहः॥३९॥
‘मेरी दृष्टि अबतक कभी परायी स्त्रियों पर नहीं पड़ी थी। यहीं आने पर मुझे परायी स्त्रियों का अपहरण करने वाले इस पापी रावण का भी दर्शन हुआ है (ऐसे पापी को देखना भी धर्म का लोप करने वाला होता है) ॥ ३९॥
तस्य प्रादुरभूच्चिन्ता पुनरन्या मनस्विनः।
निश्चितैकान्तचित्तस्य कार्यनिश्चयदर्शिनी॥४०॥
तदनन्तर मनस्वी हनुमान जी के मन में एक दूसरी विचारधारा उत्पन्न हुई। उनका चित्त अपने लक्ष्य में सुस्थिर था; अतः यह नयी विचारधारा उन्हें अपने कर्तव्य का ही निश्चय कराने वाली थी॥ ४०॥
कामं दृष्टा मया सर्वा विश्वस्ता रावणस्त्रियः।
न तु मे मनसा किंचिद् वैकृत्यमुपपद्यते॥४१॥
(वे सोचने लगे—) ‘इसमें संदेह नहीं कि रावण की स्त्रियाँ निःशंक सो रही थीं और उसी अवस्था में मैंने उन सबको अच्छी तरह देखा है, तथापि मेरे मन में कोई विकार नहीं उत्पन्न हुआ है। ४१॥
मनो हि हेतुः सर्वेषामिन्द्रियाणां प्रवर्तने।
शुभाशुभास्ववस्थासु तच्च मे सुव्यवस्थितम्॥४२॥
‘सम्पूर्ण इन्द्रियों को शुभ और अशुभ अवस्थाओं में लगने की प्रेरणा देने में मन ही कारण है; किंतु मेरा वह मन पूर्णतः स्थिर है (उसका कहीं राग या द्वेष नहीं है; इसलिये मेरा यह परस्त्री-दर्शन धर्म का लोप करने वाला नहीं हो सकता) ॥ ४२ ॥
नान्यत्र हि मया शक्या वैदेही परिमार्गितुम्।
स्त्रियो हि स्त्रीषु दृश्यन्ते सदा सम्परिमार्गणे॥४३॥
‘विदेहनन्दिनी सीता को दूसरी जगह मैं ढूँढ़ भी तो नहीं सकता था; क्योंकि स्त्रियों को ढूँढ़ते समय उन्हें स्त्रियों के ही बीच में देखा जाता है॥४३॥
यस्य सत्त्वस्य या योनिस्तस्यां तत् परिमार्गते।
न शक्यं प्रमदा नष्टा मृगीषु परिमार्गितुम्॥४४॥
‘जिस जीव की जो जाति होती है, उसीमें उसे खोजा जाता है। खोयी हुई युवती स्त्री को हरिनियों के बीच में नहीं ढूँढ़ा जा सकता है॥४४॥
तदिदं मार्गितं तावच्छुद्धेन मनसा मया।
रावणान्तःपुरं सर्वं दृश्यते न च जानकी॥४५॥
‘अतः मैंने रावण के इस सारे अन्तःपुर में शुद्ध हृदय से ही अन्वेषण किया है। किंतु यहाँ जानकी जी नहीं दिखायी देती हैं’॥ ४५ ॥
देवगन्धर्वकन्याश्च नागकन्याश्च वीर्यवान्।
अवेक्षमाणो हनुमान् नैवापश्यत जानकीम्॥४६॥
अन्तःपुर का निरीक्षण करते हुए पराक्रमी हनुमान् ने देवताओं, गन्धर्वो और नागों की कन्याओं को वहाँ देखा, किंतु जनकनन्दिनी सीता को नहीं देखा॥ ४६॥
तामपश्यन् कपिस्तत्र पश्यंश्चान्या वरस्त्रियः।
अपक्रम्य तदा वीरः प्रस्थातुमुपचक्रमे॥४७॥
दूसरी सुन्दरियों को देखते हुए वीर वानर हनुमान् ने जब वहाँ सीता को नहीं देखा, तब वे वहाँ से हटकर अन्यत्र जाने को उद्यत हुए॥४७॥
स भूयः सर्वतः श्रीमान् मारुतिर्यत्नमाश्रितः।
आपानभूमिमुत्सृज्य तां विचेतुं प्रचक्रमे॥४८॥
फिर तो श्रीमान् पवनकुमारने उस पानभूमि को छोड़कर अन्य सब स्थानों में उन्हें बड़े यत्न का आश्रय लेकर खोजना आरम्भ किया॥४८॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे एकादशः सर्गः॥११॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में ग्यारहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥११॥
सर्ग-12
स तस्य मध्ये भवनस्य संस्थितो लतागृहांश्चित्रगृहान् निशागृहान्।
जगाम सीतां प्रतिदर्शनोत्सुको न चैव तां पश्यति चारुदर्शनाम्॥१॥
उस राजभवन के भीतर स्थित हुए हनुमान् जी सीताजी के दर्शन के लिये उत्सुक हो क्रमशः लतामण्डपों में, चित्रशालाओं में तथा रात्रिकालिक विश्रामगृहों में गये; परंतु वहाँ भी उन्हें परम सुन्दरी सीता का दर्शन नहीं हुआ॥१॥
स चिन्तयामास ततो महाकपिः प्रियामपश्यन् रघुनन्दनस्य ताम्।
ध्रुवं न सीता ध्रियते यथा न मे विचिन्वतो दर्शनमेति मैथिली॥२॥
रघुनन्दन श्रीराम की प्रियतमा सीता जब वहाँ भी दिखायी न दी, तब वे महाकपि हनुमान् इस प्रकार चिन्ता करने लगे- ‘निश्चय ही अब मिथिलेशकुमारी सीता जीवित नहीं हैं; इसीलिये बहुत खोजने पर भी वे मेरे दृष्टिपथ में नहीं आ रही हैं॥२॥
सा राक्षसानां प्रवरेण जानकी स्वशीलसंरक्षणतत्परा सती।
अनेन नूनं प्रति दुष्टकर्मणा हता भवेदार्यपथे परे स्थिता॥३॥
‘सती-साध्वी सीता उत्तम आर्यमार्ग पर स्थित रहने वाली थीं। वे अपने शील और सदाचार की रक्षा में तत्पर रही हैं; इसलिये निश्चय ही इस दुराचारी राक्षसराज ने उन्हें मार डाला होगा॥३॥
विरूपरूपा विकृता विवर्चसो महानना दीर्घविरूपदर्शनाः।
समीक्ष्य ता राक्षसराजयोषितो भयाद् विनष्टा जनकेश्वरात्मजा॥४॥
‘राक्षसराज रावण के यहाँ जो दास्यकर्म करने वाली राक्षसियाँ हैं, उनके रूप बड़े बेडौल हैं। वे बड़ी विकट और विकराल हैं। उनकी कान्ति भी भयंकर है। उनके मुँह विशाल और आँखें भी बड़ी-बड़ी एवं भयानक हैं। उन सबको देखकर जनकराजनन्दिनी ने भय के मारे प्राण त्याग दिये होंगे॥ ४॥
सीतामदृष्ट्वा ह्यनवाप्य पौरुषं विहृत्य कालं सह वानरैश्चिरम्।
न मेऽस्ति सुग्रीवसमीपगा गतिः सुतीक्ष्णदण्डो बलवांश्च वानरः॥५॥
‘सीता का दर्शन न होने से मुझे अपने पुरुषार्थ का फल नहीं प्राप्त हो सका। इधर वानरों के साथ सुदीर्घ काल तक इधर-उधर भ्रमण करके मैंने लौटने की अवधि भी बिता दी है; अतः अब मेरा सुग्रीव के पास जाने का भी मार्ग बंद हो गया; क्योंकि वह वानर बड़ा बलवान् और अत्यन्त कठोर दण्ड देने वाला है॥ ५॥
दृष्टमन्तःपुरं सर्वं दृष्टा रावणयोषितः।
न सीता दृश्यते साध्वी वृथा जातो मम श्रमः॥
‘मैंने रावण का सारा अन्तःपुर छान डाला, एक एक करके रावण की समस्त स्त्रियों को भी देख लिया; किंतु अभी तक साध्वी सीता का दर्शन नहीं हुआ; अतः मेरा समुद्रलङ्घन का सारा परिश्रम व्यर्थ हो गया॥६॥
किं नु मां वानराः सर्वे गतं वक्ष्यन्ति संगताः।
गत्वा तत्र त्वया वीर किं कृतं तद् वदस्व नः॥७॥
‘जब मैं लौटकर जाऊँगा, तब सारे वानर मिलकर मुझसे क्या कहेंगे; वे पूछेगे, वीर! वहाँ जाकर तुमने क्या किया है—यह मुझे बताओ॥७॥
अदृष्ट्वा किं प्रवक्ष्यामि तामहं जनकात्मजाम्।
ध्रुवं प्रायमुपासिष्ये कालस्य व्यतिवर्तने॥८॥
‘किंतु जनकनन्दिनी सीता को न देखकर मैं उन्हें क्या उत्तर दूंगा। सुग्रीव के निश्चित किये हुए समय का उल्लङ्घन कर देने पर अब मैं निश्चय ही आमरण उपवास करूँगा॥ ८॥
किं वा वक्ष्यति वृद्धश्च जाम्बवानंगदश्च सः।
गतं पारं समुद्रस्य वानराश्च समागताः॥९॥
बड़े-बूढ़े जाम्बवान् और युवराज अंगद मुझसे क्या कहेंगे? समुद्र के पार जाने पर अन्य वानर भी जब मुझसे मिलेंगे, तब वे क्या कहेंगे?’॥९॥
अनिर्वेदः श्रियो मूलमनिर्वेदः परं सुखम्।
भूयस्तत्र विचेष्यामि न यत्र विचयः कृतः॥१०॥
(इस प्रकार थोड़ी देर तक हताश-से होकर वे फिर सोचने लगे-) ‘हताश न होकर उत्साह को बनाये रखना ही सम्पत्ति का मूल कारण है। उत्साह ही परम सुख का हेतु है; अतः मैं पुनः उन स्थानों में सीता की खोज करूँगा, जहाँ अबतक अनुसन्धान नहीं किया गया था॥ १०॥
अनिर्वेदो हि सततं सर्वार्थेषु प्रवर्तकः।
करोति सफलं जन्तोः कर्म यच्च करोति सः॥११॥
‘उत्साह ही प्राणियों को सर्वदा सब प्रकार के कर्मों में प्रवृत्त करता है और वही उन्हें वे जो कुछ करते हैं उस कार्य में सफलता प्रदान करता है॥ ११॥
तस्मादनिर्वेदकरं यत्नं चेष्टेऽहमुत्तमम्।
अदृष्टांश्च विचेष्यामि देशान् रावणपालितान्॥१२॥
‘इसलिये अब मैं और भी उत्तम एवं उत्साहपूर्वक प्रयत्न के लिये चेष्टा करूँगा। रावण के द्वारा सुरक्षित जिन स्थानों को अब तक नहीं देखा था, उनमें भी पता लगाऊँगा॥ १२॥
आपानशाला विचितास्तथा पुष्पगृहाणि च।
चित्रशालाश्च विचिता भूयः क्रीडागृहाणि च॥१३॥
निष्कुटान्तररथ्याश्च विमानानि च सर्वशः।
इति संचिन्त्य भूयोऽपि विचेतुमुपचक्रमे ॥१४॥
‘आपानशाला, पुष्पगृह, चित्रशाला, क्रीड़ागृह, गृहोद्यान की गलियाँ और पुष्पक आदि विमान-इन सबका तो मैंने चप्पा-चप्पा देख डाला (अब अन्यत्र खोज करूँगा)।’ यह सोचकर उन्होंने पुनः खोजना आरम्भ किया॥ १३-१४॥
भूमीगृहांश्चैत्यगृहान् गृहातिगृहकानपि।
उत्पतन् निपतंश्चापि तिष्ठन् गच्छन् पुनः क्वचित्॥१५॥
वे भूमि के भीतर बने हुए घरों (तहखानों)-में, चौराहों पर बने हुए मण्डपों में तथा घरों को लाँघकर उनसे थोड़ी ही दूर पर बने हुए विलास-भवनों में सीता की खोज करने लगे। वे किसी घर के ऊपर चढ़ जाते, किसी से नीचे कूद पड़ते, कहीं ठहर जाते और किसी को चलते-चलते ही देख लेते थे॥ १५ ॥
अपवृण्वंश्च द्वाराणि कपाटान्यवघट्टयन्।
प्रविशन् निष्पतंश्चापि प्रपतन्नुत्पतन्निव॥१६॥
घरों के दरवाजों को खोल देते, कहीं किंवाड़ बंदकर देते, किसी के भीतर घुसकर देखते और फिर निकल आते थे। वे नीचे-कूदते और ऊपर उछलते हुए-से सर्वत्र खोज करने लगे॥ १६ ॥
सर्वमप्यवकाशं स विचचार महाकपिः।
चतुरंगुलमात्रोऽपि नावकाशः स विद्यते।
रावणान्तःपुरे तस्मिन् यं कपिर्न जगाम सः॥१७॥
उन महाकपि ने वहाँ के सभी स्थानों में विचरण किया। रावण के अन्तःपुर में कोई चार अंगुल का भी ऐसा स्थान नहीं रह गया, जहाँ कपिवर हनुमान जी न पहुँचे हों॥
प्राकारान्तरवीथ्यश्च वेदिकाश्चैत्यसंश्रयाः।
श्वभ्राश्च पुष्करिण्यश्च सर्वं तेनावलोकितम्॥१८॥
उन्होंने परकोटे के भीतर की गलियाँ, चौराहे के वृक्षों के नीचे बनी हुई वेदियाँ, गड्डे और पोखरियाँ सबको छान डाला॥ १८ ॥
राक्षस्यो विविधाकारा विरूपा विकृतास्तथा।
दृष्टा हनुमता तत्र न तु सा जनकात्मजा॥१९॥
हनुमान् जी ने जगह-जगह नाना प्रकार के आकार वाली, कुरूप और विकट राक्षसियाँ देखीं; किंतु वहाँ उन्हें जानकीजी का दर्शन नहीं हुआ॥ १९ ॥
रूपेणाप्रतिमा लोके परा विद्याधरस्त्रियः।
दृष्टा हनुमता तत्र न तु राघवनन्दिनी॥२०॥
संसार में जिनके रूप-सौन्दर्य की कहीं तुलना नहीं थी ऐसी बहुत-सी विद्याधरियाँ भी हनुमान जी की दृष्टिमें आयीं; परंतु वहाँ उन्हें श्रीरघुनाथजी को आनन्द प्रदान करने वाली सीता नहीं दिखायी दीं॥ २० ॥
नागकन्या वरारोहाः पूर्णचन्द्रनिभाननाः।
दृष्टा हनुमता तत्र न तु सा जनकात्मजा॥२१॥
हनुमान जी ने सुन्दर नितम्ब और पूर्ण चन्द्रमा के समान मनोहर मुखवाली बहुत-सी नागकन्याएँ भी वहाँ देखीं; किंतु जनककिशोरी का उन्हें दर्शन नहीं हुआ॥ २१॥
प्रमथ्य राक्षसेन्द्रेण नागकन्या बलाद्धृताः।
दृष्टा हनुमता तत्र न सा जनकनन्दिनी॥२२॥
राक्षसराज के द्वारा नागसेना को मथकर बलात् हरकर लायी हुई नागकन्याओं को तो पवनकुमार ने वहाँ देखा; किंतु जानकीजी उन्हें दृष्टिगोचर नहीं हुईं। २२॥
सोऽपश्यंस्तां महाबाहुः पश्यंश्चान्या वरस्त्रियः।
विषसाद महाबाहुर्हनूमान् मारुतात्मजः॥ २३॥
महाबाहु पवनकुमार हनुमान् को दूसरी बहुत-सी सुन्दरियाँ दिखायी दी; परंतु सीताजी उनके देखने में नहीं आयीं। इसलिये वे बहुत दुःखी हो गये॥ २३॥
उद्योगं वानरेन्द्राणां प्लवनं सागरस्य च।
व्यर्थं वीक्ष्यानिलसुतश्चिन्तां पुनरुपागतः॥२४॥
उन वानरशिरोमणि वीरों के उद्योग और अपने द्वारा किये गये समुद्रलंघन को व्यर्थ हुआ देखकर पवनपुत्र हनुमान् वहाँ पुनः बड़ी भारी चिन्ता में पड़ गये।
अवतीर्य विमानाच्च हनूमान् मारुतात्मजः।
चिन्तामुपजगामाथ शोकोपहतचेतनः॥२५॥
उस समय वायुनन्दन हनुमान् विमान से नीचे उतर आये और बड़ी चिन्ता करने लगे। शोक से उनकी चेतनाशक्ति शिथिल हो गयी॥ २५॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे द्वादशः सर्गः॥१२॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें बारहवाँ सर्ग पूरा हुआ। १२॥
सर्ग-13
विमानात् तु स संक्रम्य प्राकारं हरियूथपः।
हनूमान् वेगवानासीद् यथा विद्युद् घनान्तरे॥१॥
वानरयूथपति हनुमान् विमान से उतरकर महल के परकोटे पर चढ़ आये। वहाँ आकर वे मेघमाला के अंक में चमकती हुई बिजली के समान बड़े वेग से इधर-उधर घूमने लगे* ॥ १॥
* घनमाला में विद्युत् की उपमा से यह ध्वनित होता है कि रावण का वह परकोटा इन्द्रनीलमणि का बना हुआ था और उस पर सुवर्ण के समान गौर कान्तिवाले हनुमान जी विद्युत् के समान प्रतीत होते थे।
सम्परिक्रम्य हनुमान् रावणस्य निवेशनान्।
अदृष्ट्वा जानकी सीतामब्रवीद् वचनं कपिः॥२॥
रावण के सभी घरों में एक बार पुनः चक्कर लगाकर जब कपिवर हनुमान जी ने जनकनन्दिनी सीता को नहीं देखा, तब वे मन-ही-मन इस प्रकार कहने लगे – ॥२॥
भूयिष्ठं लोलिता लंका रामस्य चरता प्रियम्।
न हि पश्यामि वैदेहीं सीतां सर्वांगशोभनाम्॥३॥
‘मैंने श्रीरामचन्द्रजी का प्रिय करने के लिये कई बार लंका को छान डाला; किंतु सर्वांगसुन्दरी विदेहनन्दिनी सीता मुझे कहीं नहीं दिखायी देती हैं॥३॥
पल्वलानि तटाकानि सरांसि सरितस्तथा।
नद्योऽनूपवनान्ताश्च दुर्गाश्च धरणीधराः॥४॥
लोलिता वसुधा सर्वा न च पश्यामि जानकीम्।
‘मैंने यहाँ के छोटे तालाब, पोखरे, सरोवर, सरिताएँ, नदियाँ, पानी के आस-पास के जंगल तथा दुर्गम पहाड़- सब देख डाले। इस नगर के आसपास की सारी भूमि खोज डाली; किंतु कहीं भी मुझे जानकीजी का दर्शन नहीं हुआ।
इह सम्पातिना सीता रावणस्य निवेशने।
आख्याता गृध्रराजेन न च सा दृश्यते न किम्॥
‘गृध्रराज सम्पाति ने तो सीताजी को यहाँ रावण के महल में ही बताया था। फिर भी न जाने क्यों वे यहाँ दिखायी नहीं देती हैं॥५॥
किं नु सीताथ वैदेही मैथिली जनकात्मजा।
उपतिष्ठेत विवशा रावणेन हृता बलात्॥६॥
‘क्या रावण के द्वारा बलपूर्वक हरकर लायी हुई विदेह-कुलनन्दिनी मिथिलेशकुमारी जनकदुलारी सीता कभी विवश होकर रावण की सेवा में उपस्थित हो सकती हैं (यह असम्भव है)॥६॥
क्षिप्रमुत्पततो मन्ये सीतामादाय रक्षसः।
बिभ्यतो रामबाणानामन्तरा पतिता भवेत्॥७॥
‘मैं तो समझता हूँ कि श्रीरामचन्द्रजी के बाणों से भयभीत हो वह राक्षस जब सीता को लेकर शीघ्रतापूर्वक आकाश में उछला है, उस समय कहीं बीच में ही वे छूटकर गिर पड़ी हों॥ ७॥
अथवा ह्रियमाणायाः पथि सिद्धनिषेविते।
मन्ये पतितमार्याया हृदयं प्रेक्ष्य सागरम्॥८॥
‘अथवा यह भी सम्भव है कि जब आर्या सीता सिद्धसेवित आकाशमार्ग से ले जायी जाती रही हों, उस समय समुद्र को देखकर भय के मारे उनका हृदय ही फटकर नीचे गिर पड़ा हो॥८॥
रावणस्योरुवेगेन भुजाभ्यां पीडितेन च।
तया मन्ये विशालाक्ष्या त्यक्तं जीवितमार्यया॥९॥
‘अथवा यह भी मालूम होता है कि रावण के प्रबल वेग और उसकी भुजाओं के दृढ़ बन्धन से पीड़ित होकर विशाललोचना आर्या सीता ने अपने प्राणों का परित्याग कर दिया है॥९॥
उपर्युपरि सा नूनं सागरं क्रमतस्तदा।
विचेष्टमाना पतिता समुद्रे जनकात्मजा॥१०॥
‘ऐसा भी हो सकता है कि जिस समय रावण उन्हें समुद्र के ऊपर होकर ला रहा हो, उस समय जनककुमारी सीता छटपटाकर समुद्र में गिर पड़ी हों। अवश्य ऐसा ही हुआ होगा॥ १० ॥
आहो क्षुद्रेण चानेन रक्षन्ती शीलमात्मनः।
अबन्धुभक्षिता सीता रावणेन तपस्विनी॥११॥
अथवा राक्षसेन्द्रस्य पत्नीभिरसितेक्षणा।
अदुष्टा दुष्टभावाभिर्भक्षिता सा भविष्यति॥१२॥
‘अथवा ऐसा तो नहीं हुआ कि अपने शील की रक्षा में तत्पर हुई किसी सहायक बन्धु की सहायता से वञ्चित तपस्विनी सीता को इस नीच रावण ने ही खा लिया हो अथवा मन में दुष्ट भावना रखने वाली राक्षसराज रावण की पत्नियों ने ही कजरारे नेत्रोंवाली साध्वी सीता को अपना आहार बना लिया होगा। ११-१२॥
सम्पूर्णचन्द्रप्रतिमं पद्मपत्रनिभेक्षणम्।
रामस्य ध्यायती वक्त्रं पञ्चत्वं कृपणा गता॥१३॥
‘हाय! श्रीरामचन्द्रजी के पूर्ण चन्द्रमा के समान मनोहर तथा प्रफुल्ल कमलदल के सदृश नेत्रवाले मुख का चिन्तन करती हुई दयनीया सीता इस संसार से चल बसीं॥ १३॥
हा राम लक्ष्मणेत्येवं हायोध्ये चेति मैथिली।
विलप्य बहु वैदेही न्यस्तदेहा भविष्यति॥१४॥
‘हा राम! हा लक्ष्मण! हा अयोध्यापुरी! इस प्रकार पुकार-पुकारकर बहुत विलाप करके मिथिलेशकुमारी विदेहनन्दिनी सीता ने अपने शरीर को त्याग दिया होगा॥१४॥
अथवा निहिता मन्ये रावणस्य निवेशने।
भृशं लालप्यते बाला पञ्जरस्थेव सारिका॥१५॥
‘अथवा मेरी समझ में यह आता है कि वे रावण के ही किसी गुप्त गृह में छिपाकर रखी गयी हैं। हाय! वहाँ वह बाला पीजरे में बन्द हुई मैना की तरह बारम्बार आर्तनाद करती होगी॥ १५ ॥
जनकस्य कुले जाता रामपत्नी सुमध्यमा।
कथमुत्पलपत्राक्षी रावणस्य वशं व्रजेत्॥१६॥
‘जो जनक के कुल में उत्पन्न हुई हैं और श्रीरामचन्द्रजी की धर्मपत्नी हैं, वे नील कमल के-से नेत्रोंवाली सुमध्यमा सीता रावण के अधीन कैसे हो सकती हैं ? ॥ १६॥
विनष्टा वा प्रणष्टा वा मृता वा जनकात्मजा।
रामस्य प्रियभार्यस्य न निवेदयितुं क्षमम्॥१७॥
‘जनककिशोरी सीता चाहे गुप्त गृह में अदृश्य करके रखी गयी हों, चाहे समुद् रमें गिरकर प्राणों से हाथ धो बैठी हों अथवा श्रीरामचन्द्रजी के विरह का कष्ट न सह सकने के कारण उन्होंने मृत्यु की शरण ली हो, किसी भी दशा में श्रीरामचन्द्रजी को इस बात की सूचना देना उचित न होगा; क्योंकि वे अपनी पत्नी को बहुत प्यार करते हैं।
निवेद्यमाने दोषः स्याद् दोषः स्यादनिवेदने।
कथं नु खलु कर्तव्यं विषमं प्रतिभाति मे॥१८॥
‘इस समाचार के बताने में भी दोष है और न बताने में भी दोष की सम्भावना है, ऐसी दशा में किस उपाय से काम लेना चाहिये? मुझे तो बताना और न बताना—दोनों ही दुष्कर प्रतीत होते हैं॥ १८॥
अस्मिन् नेवंगते कार्ये प्राप्तकालं क्षमं च किम्।
भवेदिति मतिं भूयो हनुमान् प्रविचारयन्॥१९॥
‘ऐसी दशा में जब कोई भी कार्य करना दुष्कर प्रतीत होता है, तब मेरे लिये इस समय के अनुसार क्या करना उचित होगा?’ इन्हीं बातों पर हनुमान जी बारम्बार विचार करने लगे॥ १९॥
यदि सीतामदृष्ट्वाहं वानरेन्द्रपुरीमितः।
गमिष्यामि ततः को मे पुरुषार्थो भविष्यति॥२०॥
(उन्होंने फिर सोचा—) ‘यदि मैं सीताजी को देखे बिना ही यहाँ से वानरराज की पुरी किष्किन्धा को लौट जाऊँगा तो मेरा पुरुषार्थ ही क्या रह जायगा? ॥ २० ॥
ममेदं लङ्घनं व्यर्थं सागरस्य भविष्यति।
प्रवेशश्चैव लंकायां राक्षसानां च दर्शनम्॥२१॥
‘फिर तो मेरा यह समुद्रलंघन, लंका में प्रवेश और राक्षसों को देखना सब व्यर्थ हो जायगा॥२१॥
किं वा वक्ष्यति सुग्रीवो हरयो वापि संगताः।
किष्किन्धामनुसम्प्राप्तं तौ वा दशरथात्मजौ॥२२॥
‘किष्किन्धा में पहुँचने पर मुझसे मिलकर सुग्रीव, दूसरे-दूसरे वानर तथा वे दोनों दशरथराजकुमार भी क्या कहेंगे? ॥ २२॥
गत्वा तु यदि काकुत्स्थं वक्ष्यामि परुषं वचः।
न दृष्टेति मया सीता ततस्त्यक्ष्यति जीवितम्॥२३॥
‘यदि वहाँ जाकर मैं श्रीरामचन्द्रजी से यह कठोर बात कह दूँ कि मुझे सीता का दर्शन नहीं हुआ तो वे प्राणों का परित्याग कर देंगे॥ २३॥
परुषं दारुणं तीक्ष्णं क्रूरमिन्द्रियतापनम्।
सीतानिमित्तं दुर्वाक्यं श्रुत्वा स न भविष्यति॥२४॥
‘सीताजी के विषय में ऐसे रूखे, कठोर, तीखे और इन्द्रियों को संताप देने वाले दुर्वचन को सुनकर वे कदापि जीवित नहीं रहेंगे॥२४॥
तं तु कृच्छ्रगतं दृष्ट्वा पञ्चत्वगतमानसम्।
भृशानुरक्तमेधावी न भविष्यति लक्ष्मणः॥ २५॥
‘उन्हें संकट में पड़कर प्राणों के परित्याग का संकल्प करते देख उनके प्रति अत्यन्त अनुराग रखने वाले बुद्धिमान् लक्ष्मण भी जीवित नहीं रहेंगे॥ २५ ॥
विनष्टौ भ्रातरौ श्रुत्वा भरतोऽपि मरिष्यति।
भरतं च मृतं दृष्ट्वा शत्रुघ्नो न भविष्यति॥२६॥
‘अपने इन दो भाइयों के विनाश का समाचार सुनकर भरत भी प्राण त्याग देंगे और भरत की मृत्यु देखकर शत्रुघ्न भी जीवित नहीं रह सकेंगे॥२६॥
पुत्रान् मृतान् समीक्ष्याथ न भविष्यन्ति मातरः।
कौसल्या च सुमित्रा च कैकेयी च न संशयः॥२७॥
‘इस प्रकार चारों पुत्रोंकी मृत्यु हुई देख कौसल्या, सुमित्रा और कैकेयी ये तीनों माताएँ भी निस्संदेह प्राण दे देंगी॥ २७॥
कृतज्ञः सत्यसंधश्च सुग्रीवः प्लवगाधिपः।
रामं तथागतं दृष्ट्वा ततस्त्यक्ष्यति जीवितम्॥२८॥
‘कृतज्ञ और सत्यप्रतिज्ञ वानरराज सुग्रीव भी जब श्रीरामचन्द्रजी को ऐसी अवस्था में देखेंगे तो स्वयं भी प्राणविसर्जन कर देंगे॥ २८॥
दुर्मना व्यथिता दीना निरानन्दा तपस्विनी।
पीडिता भर्तृशोकेन रुमा त्यक्ष्यति जीवितम्॥२९॥
‘तत्पश्चात् पतिशोक से पीड़ित हो दुःखितचित्त, दीन, व्यथित और आनन्दशून्य हुई तपस्विनी रुमा भी जान दे देगी॥ २९॥
वालिजेन तु दुःखेन पीडिता शोककर्शिता।
पञ्चत्वमागता राज्ञी तारापि न भविष्यति॥३०॥
‘फिर तो रानी तारा भी जीवित नहीं रहेंगी। वे वाली के विरहजनित दुःख से तो पीड़ित थी ही, इस नूतन शोक से कातर हो शीघ्र ही मृत्यु को प्राप्त हो जायँगी॥३०॥
मातापित्रोविनाशेन सुग्रीवव्यसनेन च।
कुमारोऽप्यंगदस्तस्माद् विजहिष्यति जीवितम्॥३१॥
‘माता-पिता के विनाश और सुग्रीव के मरणजनित संकट से पीड़ित हो कुमार अंगद भी अपने प्राणों का परित्याग कर देंगे॥ ३१॥
भर्तृजेन तु दुःखेन अभिभूता वनौकसः।
शिरांस्यभिहनिष्यन्ति तलैर्मुष्टिभिरेव च ॥३२॥
सान्त्वेनानुप्रदानेन मानेन च यशस्विना।
लालिताः कपिनाथेन प्राणांस्त्यक्ष्यन्ति वानराः॥
‘तदनन्तर स्वामी के दुःख से पीड़ित हुए सारे वानर अपने हाथों और मुक्कों से सिर पीटने लगेंगे। यशस्वी वानरराज ने सान्त्वनापूर्ण वचनों और दान-मान से जिनका लालन-पालन किया था, वे वानर अपने प्राणों का परित्याग कर देंगे॥ ३२-३३॥
न वनेषु न शैलेषु न निरोधेषु वा पुनः।
क्रीडामनुभविष्यन्ति समेत्य कपिकुञ्जराः॥३४॥
‘ऐसी अवस्था में शेष वानर वनों, पर्वतों और गुफाओं में एकत्र होकर फिर कभी क्रीड़ा-विहार का आनन्द नहीं लेंगे॥३४॥
सपुत्रदाराः सामात्या भर्तृव्यसनपीडिताः।
शैलाग्रेभ्यः पतिष्यन्ति समेषु विषमेषु च॥३५॥
‘अपने राजा के शोक से पीड़ित हो सब वानर अपने पुत्र, स्त्री और मन्त्रियोंसहित पर्वतों के शिखरों से नीचे सम अथवा विषम स्थानों में गिरकर प्राण दे देंगे।
विषमुद्बन्धनं वापि प्रवेशं ज्वलनस्य वा।
उपवासमथो शस्त्रं प्रचरिष्यन्ति वानराः॥३६॥
‘अथवा सारे विष पी लेंगे या फाँसी लगा लेंगे या जलती आग में प्रवेश कर जायेंगे। उपवास करने लगेंगे अथवा अपने ही शरीर में छुरा भोंक लेंगे॥ ३६॥
घोरमारोदनं मन्ये गते मयि भविष्यति।
इक्ष्वाकुकुलनाशश्च नाशश्चैव वनौकसाम्॥३७॥
‘मेरे वहाँ जाने पर मैं समझता हूँ बड़ा भयंकर आर्तनाद होने लगेगा। इक्ष्वाकुकुल का नाश और वानरों का भी विनाश हो जायगा॥ ३७॥
सोऽहं नैव गमिष्यामि किष्किन्धां नगरीमितः।
नहि शक्ष्याम्यहं द्रष्टुं सुग्रीवं मैथिली विना॥३८॥
‘इसलिये मैं यहाँ से किष्किन्धापुरी को तो नहीं जाऊँगा। मिथिलेशकुमारी सीता को देखे बिना मैं सुग्रीव का भी दर्शन नहीं कर सकूँगा॥ ३८॥
मय्यगच्छति चेहस्थे धर्मात्मानौ महारथौ।
आशया तौ धरिष्येते वानराश्च तरस्विनः॥३९॥
‘यदि मैं यहीं रहूँ और वहाँ न जाऊँ तो मेरी आशा लगाये वे दोनों धर्मात्मा महारथी बन्धु प्राण धारण किये रहेंगे और वे वेगशाली वानर भी जीवित रहेंगे। ३९॥
हस्तादानो मुखादानो नियतो वृक्षमूलिकः।
वानप्रस्थो भविष्यामि ह्यदृष्ट्वा जनकात्मजाम्॥४०॥
‘जानकीजी का दर्शन न मिलने पर मैं यहाँ वानप्रस्थी हो जाऊँगा। मेरे हाथ पर अपने-आप जो फल आदि खाद्य वस्तु प्राप्त हो जायगी, उसी को खाकर रहूँगा या परेच्छा से मेरे मुँह में जो फल आदि खाद्य वस्तु पड़ जायगी, उसी से निर्वाह करूँगा तथा शौच, संतोष आदि नियमों के पालनपूर्वक वृक्ष के नीचे निवास करूँगा॥ ४०॥
सागरानूपजे देशे बहुमूलफलोदके।
चितिं कृत्वा प्रवेक्ष्यामि समिद्धमरणीसुतम्॥४१॥
‘अथवा सागरतटवर्ती स्थान में, जहाँ फल-मूल और जल की अधिकता होती है, मैं चिता बनाकर जलती हुई आग में प्रवेश कर जाऊँगा॥ ४१॥
उपविष्टस्य वा सम्यग् लिंगिनं साधयिष्यतः।
शरीरं भक्षयिष्यन्ति वायसाः श्वापदानि च॥४२॥
‘अथवा आमरण उपवास के लिये बैठकर लिंगशरीरधारी जीवात्मा का शरीर से वियोग कराने के प्रयत्न में लगे हुए मेरे शरीर को कौवे तथा हिंसक जन्तु अपना आहार बना लेंगे॥ ४२ ॥
इदमप्यषिभिर्दृष्टं निर्याणमिति मे मतिः।
सम्यगापः प्रवेक्ष्यामि न चेत् पश्यामि जानकीम्॥४३॥
‘यदि मुझे जानकीजी का दर्शन नहीं हुआ तो मैं खुशी-खुशी जल-समाधि ले लूँगा। मेरे विचार से इस तरह जल-प्रवेश करके परलोकगमन करना ऋषियों की दृष्टि में भी उत्तम ही है॥ ४३॥
सुजातमूला सुभगा कीर्तिमाला यशस्विनी।
प्रभग्ना चिररात्राय मम सीतामपश्यतः॥४४॥
‘जिसका प्रारम्भ शुभ है, ऐसी सुभगा, यशस्विनी और मेरी कीर्तिमालारूपा यह दीर्घ रात्रि भी सीताजी को देखे बिना ही बीत चली॥४४॥
तापसो वा भविष्यामि नियतो वृक्षमूलिकः।
नेतः प्रतिगमिष्यामि तामदृष्ट्वासितेक्षणाम्॥४५॥
‘अथवा अब मैं नियमपूर्वक वृक्षके नीचे निवास करनेवाला तपस्वी हो जाऊँगा; किंतु उस असितलोचना सीताको देखे बिना यहाँसे कदापि नहीं लौटूंगा॥ ४५ ॥
यदि तु प्रतिगच्छामि सीतामनधिगम्य ताम्।
अंगदः सहितः सर्वैर्वानरैर्न भविष्यति॥४६॥
‘यदि सीता का पता लगाये बिना ही मैं लौट जाऊँ तो समस्त वानरोंसहित अंगद जीवित नहीं रहेंगे। ४६॥
विनाशे बहवो दोषा जीवन् प्राप्नोति भद्रकम्।
तस्मात् प्राणान् धरिष्यामि ध्रुवो जीवति संगमः॥४७॥
‘इस जीवन का नाश कर देने में बहुत-से दोष हैं। जो पुरुष जीवित रहता है, वह कभी-न-कभी अवश्य कल्याण का भागी होता है; अतः मैं इन प्राणों को धारण किये रहूँगा। जीवित रहने पर अभीष्ट वस्तु अथवा सुख की प्राप्ति अवश्यम्भावी है’॥४७॥
एवं बहुविधं दुःखं मनसा धारयन् बहु।
नाध्यगच्छत् तदा पारं शोकस्य कपिकुञ्जरः॥४८॥
इस तरह मन में अनेक प्रकार के दुःख धारण किये कपिकुञ्जर हनुमान जी शोक का पार न पा सके।४८॥
ततो विक्रममासाद्य धैर्यवान् कपिकुञ्जरः।
रावणं वा वधिष्यामि दशग्रीवं महाबलम्।
काममस्तु हृता सीता प्रत्याचीर्णं भविष्यति॥४९॥
तदनन्तर धैर्यवान् कपिश्रेष्ठ हनुमान् ने पराक्रम का सहारा लेकर सोचा-‘अथवा महाबली दशमुख रावण का ही वध क्यों न कर डालूँ। भले ही सीता का अपहरण हो गया हो, इस रावण को मार डालने से उस वैर का भरपूर बदला सध जायगा॥४९॥
अथवैनं समुत्क्षिप्य उपर्युपरि सागरम्।
रामायोपहरिष्यामि पशुं पशुपतेरिव॥५०॥
अथवा इसे उठाकर समुद्र के ऊपर-ऊपर से ले जाऊँ और जैसे पशुपति (रुद्र या अग्नि)-को पशु अर्पित किया जाय, उसी प्रकार श्रीराम के हाथ में इसको सौंप दूं’। ५०॥
इति चिन्तासमापन्नः सीतामनधिगम्य ताम्।
ध्यानशोकपरीतात्मा चिन्तयामास वानरः॥५१॥
इस प्रकार सीताजी को न पाकर वे चिन्ता में निमग्न हो गये। उनका मन सीता के ध्यान और शोक में डूब गया। फिर वे वानरवीर इस प्रकार विचार करने लगे – ॥५१॥
यावत् सीतां न पश्यामि रामपत्नीं यशस्विनीम्।
तावदेतां पुरी लंकां विचिनोमि पुनः पुनः॥५२॥
‘जब तक मैं यशस्विनी श्रीराम-पत्नी सीता का दर्शन न कर लूँगा, तब तक इस लंकापुरी में बारंबार उनकी खोज करता रहूँगा॥५२॥
सम्पातिवचनाच्चापि रामं यद्यानयाम्यहम्।
अपश्यन् राघवो भार्यां निर्दहेत् सर्ववानरान्॥५३॥
‘यदि सम्पाति के कहने से भी मैं श्रीराम को यहाँ बुला ले आऊँ तो अपनी पत्नी को यहाँ न देखने पर श्रीरघुनाथजी समस्त वानरों को जलाकर भस्म कर देंगे॥ ५३॥
इहैव नियताहारो वत्स्यामि नियतेन्द्रियः।
न मत्कृते विनश्येयुः सर्वे ते नरवानराः॥५४॥
‘अतः यहीं नियमित आहार और इन्द्रियों के संयमपूर्वक निवास करूँगा। मेरे कारण वे समस्त नर और वानर नष्ट न हों॥ ५४॥
अशोकवनिका चापि महतीयं महाद्रुमा।
इमामधिगमिष्यामि नहीयं विचिता मया॥५५॥
‘इधर यह बहुत बड़ी अशोकवाटिका है, इसके भीतर बड़े-बड़े वृक्ष हैं। इसमें मैंने अभीतक अनुसंधान नहीं किया है, अतः अब इसी में चलकर ढूँढंगा॥ ५५॥
वसून् रुद्रांस्तथाऽऽदित्यानश्विनौ मरुतोऽपि च।
नमस्कृत्वा गमिष्यामि रक्षसां शोकवर्धनः॥५६॥
‘राक्षसों के शोक को बढ़ाने वाला मैं यहाँ से वसु, रुद्र, आदित्य, अश्विनीकुमार और मरुद्गणों को नमस्कार करके अशोकवाटिका में चलूँगा॥५६॥
जित्वा तु राक्षसान् देवीमिक्ष्वाकुकुलनन्दिनीम्।
सम्प्रदास्यामि रामाय सिद्धीमिव तपस्विने ॥५७॥
‘वहाँ समस्त राक्षसों को जीतकर जैसे तपस्वी को सिद्धि प्रदान की जाती है, इसी प्रकार श्रीरामचन्द्रजी के हाथ में इक्ष्वाकुकुल को आनन्दित करने वाली देवी सीता को सौंप दूंगा’। ५७॥
स मुहूर्तमिव ध्यात्वा चिन्ताविग्रथितेन्द्रियः।
उदतिष्ठन् महाबाहुर्हनूमान् मारुतात्मजः॥५८॥
नमोऽस्तु रामाय सलक्ष्मणाय देव्यै च तस्यै जनकात्मजायै।
नमोऽस्तु रुद्रेन्द्रयमानिलेभ्यो नमोऽस्तु चन्द्राग्निमरुद्गणेभ्यः॥५९॥
इस प्रकार दो घड़ी तक सोच-विचारकर चिन्ता से शिथिल इन्द्रियवाले महाबाहु पवनकुमार हनुमान् सहसा उठकर खड़े हो गये (और देवताओं को नमस्कार करते हुए बोले-) ‘लक्ष्मणसहित श्रीराम को नमस्कार है। जनकनन्दिनी सीता देवी को भी नमस्कार है। रुद्र, इन्द्र, यम और वायु देवता को नमस्कार है तथा चन्द्रमा, अग्नि एवं मरुद्गणों को भी नमस्कार है’॥ ५८-५९॥
स तेभ्यस्तु नमस्कृत्वा सुग्रीवाय च मारुतिः।
दिशः सर्वाः समालोक्य सोऽशोकवनिकां प्रति॥६०॥
इस प्रकार उन सबको तथा सुग्रीव को भी नमस्कार करके पवनकुमार हनुमान जी सम्पूर्ण दिशाओं की ओर दृष्टिपात करके अशोकवाटिका में जाने को उद्यत हुए। ६०॥
स गत्वा मनसा पूर्वमशोकवनिकां शुभाम्।
उत्तरं चिन्तयामास वानरो मारुतात्मजः॥६१॥
उन वानरवीर पवनकुमार ने पहले मन के द्वारा ही उस सुन्दर अशोक-वाटिका में जाकर भावी कर्तव्य का इस प्रकार चिन्तन किया॥६१॥
ध्रुवं तु रक्षोबहुला भविष्यति वनाकुला।
अशोकवनिका पुण्या सर्वसंस्कारसंस्कृता॥६२॥
‘वह पुण्यमयी अशोकवाटिका सींचने-कोड़ने आदि सब प्रकार के संस्कारों से सँवारी गयी है। वह दूसरे-दूसरे वनों से भी घिरी हुई है; अतः उसकी रक्षा के लिये वहाँ निश्चय ही बहुत-से राक्षस तैनात किये गये होंगे॥ ६२॥
रक्षिणश्चात्र विहिता नूनं रक्षन्ति पादपान्।
भगवानपि विश्वात्मा नातिक्षोभं प्रवायति॥६३॥
‘राक्षसराज के नियुक्त किये हुए रक्षक अवश्य ही वहाँ के वृक्षों की रक्षा करते होंगे; इसलिये जगत् के प्राणस्वरूप भगवान् वायुदेव भी वहाँ अधिक वेग से नहीं बहते होंगे॥६३॥
संक्षिप्तोऽयं मयाऽऽत्मा च रामार्थे रावणस्य च।
सिद्धिं दिशन्तु मे सर्वे देवाः सर्षिगणास्त्विह॥६४॥
‘मैंने श्रीरामचन्द्रजी के कार्य की सिद्धि तथा रावण से अदृश्य रहने के लिये अपने शरीर को संकुचित करके छोटा बना लिया है। मुझे इस कार्य में ऋषियोंसहित समस्त देवता सिद्धि–सफलता प्रदान करें। ६४॥
ब्रह्मा स्वयम्भूर्भगवान् देवाश्चैव तपस्विनः।
सिद्धिमग्निश्च वायुश्च पुरुहूतश्च वज्रभृत्॥६५॥
‘स्वयम्भू भगवान् ब्रह्मा, अन्य देवगण, तपोनिष्ठ महर्षि, अग्निदेव, वायु तथा वज्रधारी इन्द्र भी मुझे सफलता प्रदान करें॥६५॥
वरुणः पाशहस्तश्च सोमादित्यौ तथैव च।
अश्विनौ च महात्मानौ मरुतः सर्व एव च॥६६॥
सिद्धिं सर्वाणि भूतानि भूतानां चैव यः प्रभुः।
दास्यन्ति मम ये चान्येऽप्यदृष्टाः पथि गोचराः॥६७॥
‘पाशधारी वरुण, सोम, आदित्य, महात्मा अश्विनी-कुमार, समस्त मरुद्गण, सम्पूर्ण भूत और भूतों के अधिपति तथा और भी जो मार्ग में दीखने वाले एवं न दीखने वाले देवता हैं, वे सब मुझे सिद्धि प्रदान करेंगे॥६६-६७॥
तदुन्नसं पाण्डुरदन्तमव्रणं शुचिस्मितं पद्मपलाशलोचनम्।
द्रक्ष्ये तदार्यावदनं कदा न्वहं प्रसन्नताराधिपतुल्यवर्चसम्॥६८॥
‘जिसकी नाक ऊँची और दाँत सफेद हैं, जिसमें चेचक आदि के दाग नहीं हैं, जहाँ पवित्र मुसकान की छटा छायी रहती है, जिसके नेत्र प्रफुल्ल कमलदल के समान सुशोभित होते हैं तथा जो निष्कलंक
कलाधर के तुल्य कमनीय कान्ति से युक्त है, वह आर्या सीता का मुख मुझे कब दिखायी देगा?॥ ६८॥
क्षुद्रेण हीनेन नृशंसमूर्तिना सुदारुणालंकृतवेषधारिणा।
बलाभिभूता ह्यबला तपस्विनी कथं नु मे दृष्टिपथेऽद्य सा भवेत्॥६९॥
‘इस क्षुद्र, नीच, नृशंसरूपधारी और अत्यन्त दारुण होने पर भी अलंकारयुक्त विश्वसनीय वेष धारण करने वाले रावण ने उस तपस्विनी अबला को बलात् अपने अधीन कर लिया है। अब किस प्रकार वह मेरे दृष्टिपथ में आ सकती हैं?’ ॥ ६९॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे त्रयोदशः सर्गः॥१३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में तेरहवाँ सर्ग पूरा हुआ।१३॥
सर्ग-14
स मुहूर्तमिव ध्यात्वा मनसा चाधिगम्य ताम्।
अवप्लुतो महातेजाः प्राकारं तस्य वेश्मनः॥१॥
महातेजस्वी हनुमान् जी एक मुहूर्ततक इसी प्रकार विचार करते रहे। तत्पश्चात् मन-ही-मन सीताजी का ध्यान करके वे रावण के महल से कूद पड़े और अशोकवाटिका की चहारदीवारी पर चढ़ गये॥१॥
स तु संहृष्टसर्वांगः प्राकारस्थो महाकपिः।
पुष्पिताग्रान् वसन्तादौ ददर्श विविधान् द्रुमान्॥
उस चहारदीवारी पर बैठे हुए महाकपि हनुमान् जी के सारे अंगों में हर्षजनित रोमाञ्च हो आया। उन्होंने वसन्त के आरम्भ में वहाँ नाना प्रकार के वृक्ष देखे, जिनकी डालियों के अग्रभाग फूलों के भार से लदे थे॥ २॥
सालानशोकान् भव्यांश्च चम्पकांश्च सुपुष्पितान्।
उद्दालकान् नागवृक्षांश्चूतान् कपिमुखानपि॥३॥
तथाऽऽम्रवणसम्पन्नॉल्लताशतसमन्वितान्।
ज्यामुक्त इव नाराचः पुप्लुवे वृक्षवाटिकाम्॥४॥
वहाँ साल, अशोक, निम्ब और चम्पा के वृक्ष खूब खिले हुए थे। बहुवार, नागकेसर और बन्दर के मुँह की भाँति लाल फल देने वाले आम भी पुष्प एवं मञ्जरियों से सुशोभित हो रहे थे। अमराइयों से युक्त वे सभी वृक्ष शत-शत लताओं से आवेष्टित थे। हनुमान् जी प्रत्यञ्चा से छूटे हुए बाण के समान उछले और उन वृक्षों की वाटिका में जा पहुँचे॥३-४॥
स प्रविश्य विचित्रां तां विहगैरभिनादिताम्।
राजतैः काञ्चनैश्चैव पादपैः सर्वतो वृताम्॥५॥
विहगैगसङ्घश्च विचित्रां चित्रकाननाम्।
उदितादित्यसंकाशां ददर्श हनुमान् बली॥६॥
वह विचित्र वाटिका सोने और चाँदी के समान वर्णवाले वृक्षों द्वारा सब ओर से घिरी हुई थी। उसमें नाना प्रकार के पक्षी कलरव कर रहे थे, जिससे वह सारी वाटिका गूंज रही थी। उसके भीतर प्रवेश करके बलवान् हनुमान जी ने उसका निरीक्षण किया। भाँतिभाँति के विहंगमों और मृगसमूहों से उसकी विचित्र शोभा हो रही थी। वह विचित्र काननों से अलंकृत थी और नवोदित सूर्य के समान अरुण रंग की दिखायी देती थी॥
वृतां नानाविधैर्वृक्षैः पुष्पोपगफलोपगैः।
कोकिलै ङ्गराजैश्च मत्तैर्नित्यनिषेविताम्॥७॥
फूलों और फलों से लदे हुए नाना प्रकार के वृक्षों से व्याप्त हुई उस अशोकवाटिका का मतवाले कोकिल और भ्रमर सेवन करते थे॥७॥
प्रहृष्टमनुजां काले मृगपक्षिमदाकुलाम्।
मत्तबर्हिणसंघुष्टां नानाद्विजगणायुताम्॥८॥
वह वाटिका ऐसी थी, जहाँ जाने से हर समय लोगों के मन में प्रसन्नता होती थी। मृग और पक्षी मदमत्त हो उठते थे। मतवाले मोरों का कलनाद वहाँ निरन्तर गूंजता रहता था और नाना प्रकार के पक्षी वहाँ निवास करते थे॥ ८॥
मार्गमाणो वरारोहां राजपुत्रीमनिन्दिताम्।
सुखप्रसुप्तान् विहगान् बोधयामास वानरः॥९॥
उस वाटिका में सती-साध्वी सुन्दरी राजकुमारी सीता की खोज करते हुए वानरवीर हनुमान् ने घोंसलों में सुखपूर्वक सोये हुए पक्षियों को जगा दिया।
उत्पतद्भिर्द्धिजगणैः पक्षैर्वातैः समाहताः।
अनेकवर्णा विविधा मुमुचुः पुष्पवृष्टयः॥१०॥
उड़ते हुए विहंगमों के पंखों की हवा लगने से वहाँ के वृक्ष अनेक प्रकार के रंग-बिरंगे फूलों की वर्षा करने लगे॥
पुष्पावकीर्णः शुशुभे हनूमान् मारुतात्मजः।
अशोकवनिकामध्ये यथा पुष्पमयो गिरिः॥११॥
उस समय पवनकुमार हनुमान जी उन फूलों से आच्छादित होकर ऐसी शोभा पाने लगे, मानो उस अशोक वन में कोई फूलों का बना हुआ पहाड़ शोभा पा रहा हो॥११॥
दिशः सर्वाभिधावन्तं वृक्षखण्डगतं कपिम्।
दृष्ट्वा सर्वाणि भूतानि वसन्त इति मेनिरे॥१२॥
सम्पूर्ण दिशाओं में दौड़ते और वृक्षसमूहों में घूमते हुए कपिवर हनुमान जी को देखकर समस्त प्राणी एवं राक्षस ऐसा मानने लगे कि साक्षात् ऋतुराज वसन्त ही यहाँ वानरवेश में विचर रहा है॥ १२ ॥
वृक्षेभ्यः पतितैः पुष्पैरवकीर्णाः पृथग्विधैः।
रराज वसुधा तत्र प्रमदेव विभूषिता॥१३॥
वृक्षों से झड़कर गिरे हुए भाँति-भाँति के फूलों से आच्छादित हुई वहाँ की भूमि फूलों के शृंगार से विभूषित हुई युवती स्त्री के समान शोभा पाने लगी। १३॥
तरस्विना ते तरवस्तरसा बहु कम्पिताः।
कुसुमानि विचित्राणि ससृजुः कपिना तदा॥१४॥
उस समय उन वेगशाली वानरवीर के द्वारा वेगपूर्वक बारंबार हिलाये हुए वे वृक्ष विचित्र पुष्पों की वर्षा कर रहे थे॥१४॥
निर्धूतपत्रशिखराः शीर्णपुष्पफलद्रुमाः।
निक्षिप्तवस्त्राभरणा धूर्ता इव पराजिताः॥१५॥
इस प्रकार डालियों के पत्ते झड़ जाने तथा फलफूल और पल्लवों के टूटकर बिखर जाने से नंग-धडंग दिखायी देने वाले वे वृक्ष उन हारे हुए जुआरियों के समान जान पड़ते थे, जिन्होंने अपने गहने और कपड़े भी दावॅ पर रख दिये हों॥ १५॥
हनूमता वेगवता कम्पितास्ते नगोत्तमाः।
पुष्पपत्रफलान्याशु मुमुचुः फलशालिनः॥१६॥
वेगशाली हनुमान जी के हिलाये हुए वे फलशाली श्रेष्ठ वृक्ष तुरंत ही अपने फल-फूल और पत्तों का परित्याग कर देते थे॥ १६॥
विहंगसङ्घहीनास्ते स्कन्धमात्राश्रया द्रुमाः।
बभूवुरगमाः सर्वे मारुतेन विनिर्धताः॥१७॥
पवनपुत्र हनुमान् द्वारा कम्पित किये गये वे वृक्ष फल-फूल आदि के न होने से केवल डालियों के आश्रय बने हुए थे; पक्षियों के समुदाय भी उन्हें छोड़कर चल दिये थे। उस अवस्था में वे सब-के-सब प्राणिमात्र के लिये अगम्य (असेवनीय) हो गये थे।१७॥
विधूतकेशी युवतिर्यथा मृदितवर्णका।
निपीतशुभदन्तोष्ठी नखैर्दन्तैश्च विक्षता॥१८॥
तथा लांगूलहस्तैस्तु चरणाभ्यां च मर्दिता।
तथैवाशोकवनिका प्रभग्नवनपादपा॥१९॥
जिसके केश खुल गये हैं, अंगराग मिट गये हैं, सुन्दर दन्तावली से युक्त अधर-सुधा का पान कर लिया गया है तथा जिसके कतिपय अंग नखक्षत एवं दन्तक्षत से उपलक्षित हो रहे हैं, प्रियतम के उपभोग में आयी हुई उस युवती के समान ही उस अशोकवाटिका की भी दशा हो रही थी। हनुमान जी के हाथ-पैर और पूँछ से रौंदी जा चुकी थी तथा उसके अच्छे-अच्छे वृक्ष टूटकर गिर गये थे; इसलिये वह श्रीहीन हो गयी थी॥ १८-१९ ॥
महालतानां दामानि व्यधमत् तरसा कपिः।
यथा प्रावृषि वेगेन मेघजालानि मारुतः॥२०॥
जैसे वायु वर्षा-ऋतु में अपने वेग से मेघसमूहों को छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार कपिवर हनुमान् ने वहाँ फैली हुई विशाल लता-वल्लरियों के वितान वेगपूर्वक तोड़ डाले ॥२०॥
स तत्र मणिभूमीश्च राजतीश्च मनोरमाः।
तथा काञ्चनभूमीश्च विचरन् ददृशे कपिः॥२१॥
वहाँ विचरते हुए उन वानरवीर ने पृथक्-पृथक् ऐसी मनोरम भूमियों का दर्शन किया, जिनमें मणि, चाँदी एवं सोने जड़े गये थे॥२१॥
वापीश्च विविधाकाराः पूर्णाः परमवारिणा।
महामणिसोपानरुपपन्नास्ततस्ततः॥२२॥
मुक्ताप्रवालसिकताः स्फाटिकान्तरकुट्टिमाः।
काञ्चनैस्तरुभिश्चित्रैस्तीरजैरुपशोभिताः॥२३॥
उस वाटिका में उन्होंने जहाँ-तहाँ विभिन्न आकारों की बावड़ियाँ देखीं, जो उत्तम जल से भरी हुईं और मणिमय सोपानों से युक्त थीं। उनके भीतर मोती और मूंगों की बालुकाएँ थीं। जल के नीचे की फर्श स्फटिक मणि की बनी हुई थी और उन बावड़ियों के तटों पर तरह-तरह के विचित्र सुवर्णमय वृक्ष शोभा दे रहे थे॥ २२-२३॥
बुद्धपद्मोत्पलवनाश्चक्रवाकोपशोभिताः।
नत्यूहरुतसंघुष्टा हंससारसनादिताः॥२४॥
उनमें खिले हुए कमलों के वन और चक्रवाकों के जोड़े शोभा बढ़ा रहे थे तथा पपीहा, हंस और सारसों के कलनाद गूंज रहे थे॥ २४॥
दीर्घाभिर्दुमयुक्ताभिः सरिद्भिश्च समन्ततः।
अमृतोपमतोयाभिः शिवाभिरुपसंस्कृताः॥ २५॥
अनेकानेक विशाल, तटवर्ती वृक्षों से सुशोभित, अमृत के समान मधुर जल से पूर्ण तथा सुखदायिनी सरिताएँ चारों ओर से उन बावड़ियों का सदा संस्कार करती थीं (उन्हें स्वच्छ जल से परिपूर्ण बनाये रखती थीं) ॥२५॥
लताशतैरवतताः संतानकुसुमावृताः।
नानागुल्मावृतवनाः करवीरकृतान्तराः॥२६॥
उनके तटों पर सैकड़ों प्रकार की लताएँ फैली हुई थीं। खिले हुए कल्पवृक्षों ने उन्हें चारों ओर से घेर रखा था। उनके जल नाना प्रकार की झाड़ियों से ढके हुए थे तथा बीच-बीच में खिले हुए कनेर के वृक्ष गवाक्ष की-सी शोभा पाते थे॥ २६॥
ततोऽम्बुधरसंकाशं प्रवृद्धशिखरं गिरिम्।
विचित्रकूट कूटैश्च सर्वतः परिवारितम्॥२७॥
शिलागृहैरवततं नानावृक्षसमावृतम्।
ददर्श कपिशार्दूलो रम्यं जगति पर्वतम्॥२८॥
फिर वहाँ कपिश्रेष्ठ हनुमान् ने एक मेघ के समान काला और ऊँचे शिखरों वाला पर्वत देखा, जिसकी चोटियाँ बड़ी विचित्र थीं। उसके चारों ओर दूसरे दूसरे भी बहुत-से पर्वत-शिखर शोभा पाते थे। उसमें बहुत-सी पत्थर की गुफाएँ थीं और उस पर्वत पर अनेकानेक वृक्ष उगे हुए थे। वह पर्वत संसारभर में बड़ा रमणीय था॥
ददर्श च नगात् तस्मान्नदीं निपतितां कपिः।
अंकादिव समुत्पत्य प्रियस्य पतितां प्रियाम्॥२९॥
कपिवर हनुमान् ने उस पर्वत से गिरी हुई एक नदी देखी, जो प्रियतम के अंक से उछलकर गिरी हुई प्रियतमा के समान जान पड़ती थी॥२९॥
जले निपतिताग्रैश्च पादपैरुपशोभिताम्।
वार्यमाणामिव क्रुद्धां प्रमदां प्रियबन्धुभिः॥३०॥
जिनकी डालियाँ नीचे झुककर पानी से लग गयी थीं, ऐसे तटवर्ती वृक्षों से उस नदी की वैसी ही शोभा हो रही थी, मानो प्रियतम से रूठकर अन्यत्र जाती हुई युवती को उसकी प्यारी सखियाँ उसे आगे बढ़ने से रोक रही हों॥ ३०॥
पुनरावृत्ततोयां च ददर्श स महाकपिः।
प्रसन्नामिव कान्तस्य कान्तां पुनरुपस्थिताम्॥३१॥
फिर उन महाकपि ने देखा कि वृक्षों की उन डालियों से टकराकर उस नदी के जल का प्रवाह पीछे की ओर मुड़ गया है। मानो प्रसन्न हुई प्रेयसी पुनः प्रियतम की सेवा में उपस्थित हो रही हो॥ ३१॥
तस्यादूरात् स पद्मिन्यो नानाद्विजगणायुताः।
ददर्श कपिशार्दूलो हनूमान् मारुतात्मजः॥३२॥
उस पर्वत से थोड़ी ही दूरपर कपिश्रेष्ठ पवनपुत्र हनुमान् ने बहुत-से कमलमण्डित सरोवर देखे, जिनमें नाना प्रकार के पक्षी चहचहा रहे थे॥ ३२॥
कृत्रिमा दीर्घिकां चापि पूर्णां शीतेन वारिणा।
मणिप्रवरसोपानां मुक्तासिकतशोभिताम्॥३३॥
उनके सिवा उन्होंने एक कृत्रिम तालाब भी देखा, जो शीतल जल से भरा हुआ था। उसमें श्रेष्ठ मणियों की सीढ़ियाँ बनी थीं और वह मोतियों की बालुकाराशि से सुशोभित था॥ ३३॥
विविधैर्मृगसङ्गैश्च विचित्रां चित्रकाननाम्।
प्रासादैः सुमहद्भिश्च निर्मितैर्विश्वकर्मणा ॥ ३४॥
काननैः कृत्रिमैश्चापि सर्वतः समलंकृताम्।
उस अशोकवाटिका में विश्वकर्मा के बनाये हुए बड़े-बड़े महल और कृत्रिम कानन सब ओर से उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। नाना प्रकार के मृगसमूहों से उसकी विचित्र शोभा हो रही थी। उस वाटिका में विचित्र वन-उपवन शोभा दे रहे थे॥ ३४ १/२॥
ये केचित् पादपास्तत्र पुष्पोपगफलोपगाः॥३५॥
सच्छत्राः सवितर्दीकाः सर्वे सौवर्णवेदिकाः।
वहाँ जो कोई भी वृक्ष थे, वे सब फल-फूल देने वाले थे, छत्र की भाँति घनी छाया किये रहते थे। उन सबके नीचे चाँदी की और उसके ऊपर सोने की वेदियाँ बनी हुई थीं॥ ३५ १/२॥
लताप्रतानैर्बहुभिः पर्णैश्च बहुभिर्वृताम्॥३६॥
काञ्चनीं शिंशपामेकां ददर्श स महाकपिः।
वृतां हेममयीभिस्तु वेदिकाभिः समन्ततः॥३७॥
तदनन्तर महाकपि हनुमान् ने एक सुवर्णमयी शिंशपा (अशोक)-का वृक्ष देखा, जो बहुत-से लतावितानों और अगणित पत्तों से व्याप्त था। वह वृक्ष भी सब ओर से सुवर्णमयी वेदिकाओं से घिरा था॥ ३६-३७॥
सोऽपश्यद् भूमिभागांश्च नगप्रस्रवणानि च।
सुवर्णवृक्षानपरान् ददर्श शिखिसंनिभान्॥ ३८॥
इसके सिवा उन्होंने और भी बहुत-से खुले मैदान, पहाड़ी झरने और अग्नि के समान दीप्तिमान् सुवर्णमय वृक्ष देखे॥ ३८॥
तेषां द्रुमाणां प्रभया मेरोरिव महाकपिः।
अमन्यत तदा वीरः काञ्चनोऽस्मीति सर्वतः॥३९॥
उस समय वीर महाकपि हनुमान जी ने सुमेरु के समान उन वृक्षों की प्रभा के कारण अपने को भी सब ओर से सुवर्णमय ही समझा॥ ३९ ॥
तान् काञ्चनान् वृक्षगणान् मारुतेन प्रकम्पितान्।
किङ्किणीशतनिर्घोषान् दृष्ट्वा विस्मयमागमत्॥४०॥
सुपुष्पिताग्रान् रुचिरांस्तरुणाङ्करपल्लवान्।
वे सुवर्णमय वृक्षसमूह जब वायु के झोंके खाकर हिलने लगते, तब उनसे सैकड़ों घुघुरुओं के बजने की-सी मधुर ध्वनि होती थी। वह सब देखकर हनुमान जी को बड़ा विस्मय हुआ। उन वृक्षों की डालियों में सुन्दर फूल खिले हुए थे और नये-नये अंकुर तथा पल्लव निकले हुए थे, जिससे वे बड़े सुन्दर दिखायी देते थे॥ ४० १/२॥
तामारुह्य महावेगः शिंशपां पर्णसंवृताम्॥४१॥
इतो द्रक्ष्यामि वैदेहीं रामदर्शनलालसाम्।
इतश्चेतश्च दुःखार्ता सम्पतन्तीं यदृच्छया॥४२॥
महान् वेगशाली हनुमान जी पत्तों से हरी-भरी उस शिंशपा पर यह सोचकर चढ़ गये कि ‘मैं यहीं से श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन के लिये उत्सुक हुई उन विदेहनन्दिनी सीता को देलूँगा, जो दुःख से आतुर हो इच्छानुसार इधर-उधर जाती-आती होंगी॥ ४१-४२।।
अशोकवनिका चेयं दृढं रम्या दुरात्मनः।
चन्दनैश्चम्पकैश्चापि बकुलैश्च विभूषिता॥४३॥
इयं च नलिनी रम्या द्विजसङ्घनिषेविता।
इमां सा राजमहिषी नूनमेष्यति जानकी॥४४॥
‘दुरात्मा रावण की यह अशोकवाटिका बड़ी ही रमणीय है। चन्दन, चम्पा और मौलसिरी के वृक्ष इसकी शोभा बढ़ा रहे हैं। इधर यह पक्षियों से सेवित कमलमण्डित सरोवर भी बड़ा सुन्दर है। राजरानी जानकी इसके तट पर निश्चय ही आती होंगी॥ ४३-४४॥
सा रामा राजमहिषी राघवस्य प्रिया सती।
वनसंचारकुशला ध्रुवमेष्यति जानकी॥४५॥
‘रघुनाथजी की प्रियतमा राजरानी रामा सती-साध्वी जानकी वन में घूमने-फिरने में बहुत कुशल हैं। वे अवश्य इधर आयेंगी॥ ४५॥
अथवा मृगशावाक्षी वनस्यास्य विचक्षणा।
वनमेष्यति साद्येह रामचिन्तासुकर्शिता॥४६॥
‘अथवा इस वन की विशेषताओं के ज्ञान में निपुण मृग-शावकनयनी सीता आज यहाँ इस तालाब के तटवर्ती वन में अवश्य पधारेंगी; क्योंकि वे श्रीरामचन्द्रजी के वियोग की चिन्ता से अत्यन्त दुबली हो गयी होंगी (और इस सुन्दर स्थान में आने से उनकी चिन्ता कुछ कम हो सकेगी)॥ ४६॥
रामशोकाभिसंतप्ता सा देवी वामलोचना।
वनवासरता नित्यमेष्यते वनचारिणी॥४७॥
‘सुन्दर नेत्रवाली देवी सीता भगवान् श्रीराम के विरह-शोक से बहुत ही संतप्त होंगी। वनवास में उनका सदा ही प्रेम रहा है, अतः वे वन में विचरती हुई इधर अवश्य आयेंगी॥४७॥
वनेचराणां सततं नूनं स्पृहयते पुरा।
रामस्य दयिता चार्या जनकस्य सुता सती॥४८॥
‘श्रीराम की प्यारी पत्नी सती-साध्वी जनकनन्दिनी सीता पहले निश्चय ही वनवासी जन्तुओं से सदा प्रेम करती रही होंगी। (इसलिये उनके लिये वन में भ्रमण करना स्वाभाविक है, अतः यहाँ उनके दर्शन की सम्भावना है ही)॥४८॥
संध्याकालमनाः श्यामा ध्रुवमेष्यति जानकी।
नदी चेमां शुभजलां संध्यार्थे वरवर्णिनी॥४९॥
‘यह प्रातःकाल की संध्या (उपासना)-का समय है, इसमें मन लगाने वाली और सदा सोलह वर्ष की सी अवस्था में रहने वाली अक्षय यौवना जनककुमारी सुन्दरी सीता संध्याकालिक उपासना के लिये इस पुण्यसलिला नदी के तट पर अवश्य पधारेंगी॥४९॥
तस्याश्चाप्यनुरूपेयमशोकवनिका शुभा।
शुभायाः पार्थिवेन्द्रस्य पत्नी रामस्य सम्मता॥५०॥
‘जो राजाधिराज श्रीरामचन्द्रजी की समादरणीया पत्नी हैं, उन शुभलक्षणा सीता के लिये यह सुन्दर अशोकवाटिका भी सब प्रकार से अनुकूल ही है।५०॥
यदि जीवति सा देवी ताराधिपनिभानना।
आगमिष्यति सावश्यमिमां शीतजलां नदीम्॥५१॥
‘यदि चन्द्रमुखी सीता देवी जीवित हैं तो वे इस शीतल जलवाली सरिता के तट पर अवश्य पदार्पण करेंगी’॥
एवं तु मत्वा हनुमान् महात्मा प्रतीक्षमाणो मनुजेन्द्रपत्नीम्।
अवेक्षमाणश्च ददर्श सर्वं सुपुष्पिते पर्णघने निलीनः॥५२॥
ऐसा सोचते हुए महात्मा हनुमान जी नरेन्द्रपत्नी सीता के शुभागमन की प्रतीक्षा में तत्पर हो सुन्दर फूलों से सुशोभित तथा घने पत्तेवाले उस अशोकवृक्ष पर छिपे रहकर उस सम्पूर्ण वन पर दृष्टिपात करते रहे ॥५२॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे चतुर्दशः सर्गः॥१४॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में चौदहवाँ सर्ग पूरा हुआ।१४॥
सर्ग-15
स वीक्षमाणस्तत्रस्थो मार्गमाणश्च मैथिलीम्।
अवेक्षमाणश्च महीं सर्वां तामन्ववैक्षत॥१॥
उस अशोकवृक्ष पर बैठे-बैठे हनुमान जी सम्पूर्ण वन को देखते और सीता को ढूँढ़ते हुए वहाँ की सारी भूमि पर दृष्टिपात करने लगे॥१॥
संतानकलताभिश्च पादपैरुपशोभिताम्।
दिव्यगन्धरसोपेतां सर्वतः समलंकृताम्॥२॥
वह भूमि कल्पवृक्ष की लताओं तथा वृक्षों से सुशोभित थी, दिव्य गन्ध तथा दिव्य रस से परिपूर्ण थी और सब ओर से सजायी गयी थी॥२॥
तां स नन्दनसंकाशां मृगपक्षिभिरावृताम्।
हर्म्यप्रासादसम्बाधां कोकिलाकुलनिःस्वनाम्॥
मृगों और पक्षियों से व्याप्त होकर वह भूमि नन्दनवन के समान शोभा पा रही थी, अट्टालिकाओं तथा राजभवनों से युक्त थी तथा कोकिल-समूहों की काकली से कोलाहलपूर्ण जान पड़ती थी॥३॥
काञ्चनोत्पलपद्माभिर्वापीभिरुपशोभिताम्।
बह्वासनकुथोपेतां बहुभूमिगृहायुताम्॥४॥
सुवर्णमय उत्पल और कमलों से भरी हुई बावड़ियाँ उसकी शोभा बढ़ा रही थीं। बहुत-से आसन और कालीन वहाँ बिछे हुए थे। अनेकानेक भूमिगृह वहाँ शोभा पा रहे थे॥४॥
सर्वर्तुकुसुमै रम्यैः फलवद्भिश्च पादपैः।
पुष्पितानामशोकानां श्रिया सूर्योदयप्रभाम्॥५॥
सभी ऋतुओं में फूल देने वाले और फलों से भरे हुए रमणीय वृक्ष उस भूमि को विभूषित कर रहे थे। खिले हुए अशोकों की शोभा से सूर्योदयकाल की छटा-सी छिटक रही थी॥५॥
प्रदीप्तामिव तत्रस्थो मारुतिः समुदैक्षत।
निष्पत्रशाखां विहगैः क्रियमाणामिवासकृत्॥६॥
पवनकुमार हनुमान् ने उस अशोक पर बैठे-बैठे ही उस दमकती हुई-सी वाटिका को देखा। वहाँ के पक्षी उस वाटिका को बारंबार पत्रों और शाखाओं से हीन कर रहे थे॥६॥
विनिष्पतद्भिः शतशश्चित्रैः पुष्पावतंसकैः।
समूलपुष्परचितैरशोकैः शोकनाशनैः॥७॥
पुष्पभारातिभारैश्च स्पृशद्भिरिव मेदिनीम्।
कर्णिकारैः कुसुमितैः किंशुकैश्च सुपुष्पितैः॥८॥
स देशः प्रभया तेषां प्रदीप्त इव सर्वतः।
वृक्षों से झड़ते हुए सैकड़ों विचित्र पुष्प-गुच्छों से नीचे से ऊपर तक मानो फूल से बने हुए शोकनाशक अशोकों से, फूलों के भारी भार से झुककर पृथ्वी का स्पर्श-सा करते हुए खिले हुए कनेरों से तथा सुन्दर फूलवाले पलाशों से उपलक्षित वह भूभाग उनकी प्रभा के कारण सब ओर से उद्दीप्त-सा हो रहा था। ७-८ १/२॥
पुंनागाः सप्तपर्णाश्च चम्पकोद्दालकास्तथा॥९॥
विवृद्धमूला बहवः शोभन्ते स्म सुपुष्पिताः।
पुंनाग (श्वेत कमल या नागकेसर), छितवन, चम्पा तथा बहुवार आदि बहुत-से सुन्दर पुष्पवाले वृक्ष, जिनकी जड़ें बहुत मोटी थीं, वहाँ शोभा पा रहे थे॥
शातकुम्भनिभाः केचित् केचिदग्निशिखप्रभाः॥१०॥
नीलाञ्जननिभाः केचित् तत्राशोकाः सहस्रशः।
वहाँ सहस्रों अशोक के वृक्ष थे, जिनमें से कुछ तो सुवर्ण के समान कान्तिमान् थे, कुछ आग की ज्वाला के समान प्रकाशित हो रहे थे और कोई-कोई काले काजल की-सी कान्तिवाले थे॥ १० १/२ ।।
नन्दनं विबुधोद्यानं चित्रं चैत्ररथं यथा॥११॥
अतिवृत्तमिवाचिन्त्यं दिव्यं रम्यश्रियायुतम्।
वह अशोकवन देवोद्यान नन्दन के समान आनन्ददायी, कुबेर के चैत्ररथ वन के समान विचित्र तथा उन दोनों से भी बढ़कर अचिन्त्य, दिव्य एवं रमणीय शोभा से सम्पन्न था॥११ १/२॥
द्वितीयमिव चाकाशं पुष्पज्योतिर्गणायुतम्॥१२॥
पुष्परत्नशतैश्चित्रं पञ्चमं सागरं यथा।
वह पुष्परूपी नक्षत्रों से युक्त दूसरे आकाश के समान सुशोभित होता था तथा पुष्पमय सैकड़ों रत्नों से विचित्र शोभा पाने वाले पाँचवें समुद्र के समान जान पड़ता था॥ १२ १/२॥
सर्वर्तुपुष्पैर्निचितं पादपैर्मधुगन्धिभिः॥१३॥
नानानिनादैरुद्यानं रम्यं मृगगणद्विजैः।
अनेकगन्धप्रवहं पुण्यगन्धं मनोहरम्॥१४॥
शैलेन्द्रमिव गन्धाढ्यं द्वितीयं गन्धमादनम्।
सब ऋतुओं में फूल देने वाले मनोरम गन्धयुक्त वृक्षों से भरा हुआ तथा भाँति-भाँति के कलरव करने वाले मृगों और पक्षियों से सुशोभित वह उद्यान बड़ा रमणीय प्रतीत होता था। वह अनेक प्रकार की सुगन्ध का भार वहन करने के कारण पवित्र गन्ध से युक्त और मनोहर जान पड़ता था। दूसरे गिरिराज गन्धमादन के समान उत्तम सुगन्ध से व्याप्त था। १३-१४ १/२ ॥
अशोकवनिकायां तु तस्यां वानरपुंगवः ॥१५॥
स ददर्शाविदूरस्थं चैत्यप्रासादमूर्जितम्।
मध्ये स्तम्भसहस्रेण स्थितं कैलासपाण्डुरम्॥१६॥
प्रवालकृतसोपानं तप्तकाञ्चनवेदिकम्।
मुष्णन्तमिव चढूंषि द्योतमानमिव श्रिया॥१७॥
निर्मलं प्रांशुभावत्वादुल्लिखन्तमिवाम्बरम्।
उस अशोकवाटिका में वानर-शिरोमणि हनुमान् ने थोड़ी ही दूर पर एक गोलाकार ऊँचा मन्दिर देखा, जिसके भीतर एक हजार खंभे लगे हुए थे। वह मन्दिर कैलास पर्वत के समान श्वेत वर्ण का था। उसमें मूंगे की सीढ़ियाँ बनी थीं तथा तपाये हुए सोने की वेदियाँ बनायी गयी थीं। वह निर्मल प्रासाद अपनी शोभा से देदीप्यमान-सा हो रहा था। दर्शकों की दृष्टि में चकाचौंध-सा पैदा कर देता था और बहुत ऊँचा होने के कारण आकाश में रेखा खींचता-सा जान पड़ता था॥ १५–१७ १/२॥
ततो मलिनसंवीतां राक्षसीभिः समावृताम्॥१८॥
उपवासकृशां दीनां निःश्वसन्तीं पुनः पुनः।
ददर्श शुक्लपक्षादौ चन्द्ररेखामिवामलाम्॥१९॥
वह चैत्यप्रासाद (मन्दिर) देखने के अनन्तर उनकी दृष्टि वहाँ एक सुन्दरी स्त्री पर पड़ी, जो मलिन वस्त्र धारण किये राक्षसियों से घिरी हुई बैठी थी। वह उपवास करने के कारण अत्यन्त दुर्बल और दीन दिखायी देती थी तथा बारंबार सिसक रही थी। शुक्लपक्ष के आरम्भ में चन्द्रमा की कला जैसी निर्मल और कृश दिखायी देती है, वैसी ही वह भी दृष्टिगोचर होती थी॥ १८-१९॥
मन्दप्रख्यायमानेन रूपेण रुचिरप्रभाम्।
पिनद्धां धूमजालेन शिखामिव विभावसोः॥२०॥
धुंधली-सी स्मृति के आधारपर कुछ-कुछ पहचाने जाने वाले अपने रूप से वह सुन्दर प्रभा बिखेर रही थी और धूएँ से ढकी हुई अग्नि की ज्वाला के समान जान पड़ती थी॥२०॥
पीतेनैकेन संवीतां क्लिष्टेनोत्तमवाससा।
सपङ्कामनलंकारां विपद्मामिव पद्मिनीम्॥२१॥
एक ही पीले रंग के पुराने रेशमी वस्त्र से उसका शरीर ढका हुआ था। वह मलिन, अलंकारशून्य होने के कारण कमलों से रहित पुष्करिणी के समान श्रीहीन दिखायी देती थी॥२१॥
पीडितां दुःखसंतप्तां परिक्षीणां तपस्विनीम्।
ग्रहेणांगारकेणेव पीडितामिव रोहिणीम्॥२२॥
वह तपस्विनी मंगलग्रह से आक्रान्त रोहिणी के समान शोक से पीड़ित, दुःख से संतप्त और सर्वथा क्षीणकाय हो रही थी॥ २२॥
अश्रुपूर्णमुखीं दीनां कृशामनशनेन च।
शोकध्यानपरां दीनां नित्यं दुःखपरायणाम्॥२३॥
उपवास से दुर्बल हुई उस दुःखिया नारी के मुँह पर आँसुओं की धारा बह रही थी। वह शोक और चिन्ता में मग्न हो दीन दशा में पड़ी हुई थी एवं निरन्तर दुःख में ही डूबी रहती थी॥२३॥
प्रियं जनमपश्यन्तीं पश्यन्तीं राक्षसीगणम्।
स्वगणेन मृगी हीनां श्वगणेनावृतामिव॥२४॥
वह अपने प्रियजनों को तो देख नहीं पाती थी। उसकी दृष्टि के समक्ष सदा राक्षसियों का समूह ही बैठा रहता था। जैसे कोई मृगी अपने यूथ से बिछुड़कर कुत्तों के झुंड से घिर गयी हो, वही दशा उसकी भी हो रही थी॥२४॥
नीलनागाभया वेण्या जघनं गतयैकया।
नीलया नीरदापाये वनराज्या महीमिव॥ २५॥
काली नागिन के समान कटि से नीचे तक लटकी हुई एकमात्र काली वेणी के द्वारा उपलक्षित होने वाली वह नारी बादलों के हट जाने पर नीली वनश्रेणी से घिरी हुई पृथ्वी के समान प्रतीत होती थी॥ २५॥
सुखाहाँ दुःखसंतप्तां व्यसनानामकोविदाम्।
तां विलोक्य विशालाक्षीमधिकं मलिनां कृशाम्॥२६॥
तर्कयामास सीतेति कारणैरुपपादिभिः।
वह सुख भोगने के योग्य थी, किंतु दुःख से संतप्त हो रही थी। इसके पहले उसे संकटों का कोई अनुभव नहीं था। उस विशाल नेत्रोंवाली, अत्यन्त मलिन और क्षीणकाय अबला का अवलोकन करके युक्तियुक्त कारणों द्वारा हनुमान जी ने यह अनुमान किया कि होन-हो यही सीता है॥ २६ १/२॥
ह्रियमाणा तदा तेन रक्षसा कामरूपिणा॥२७॥
यथारूपा हि दृष्टा सा तथारूपेयमंगना।
इच्छानुसार रूप धारण करने वाला वह राक्षस जब सीताजी को हरकर ले जा रहा था, उस दिन जिस रूप में उनका दर्शन हुआ था, कल्याणी नारी भी वैसे ही रूप से युक्त दिखायी देती है। २७ १/२ ॥
पूर्णचन्द्राननां सुद्धू चारुवृत्तपयोधराम्॥२८॥
कुर्वतीं प्रभया देवी सर्वा वितिमिरा दिशः।
देवी सीता का मुख पूर्ण चन्द्रमा के समान मनोहर था। उनकी भौहें बड़ी सुन्दर थीं। दोनों स्तन मनोहर और गोलाकार थे। वे अपनी अंगकान्ति से सम्पूर्ण दिशाओं का अन्धकार दूर किये देती थीं॥ २८ १/२ ॥
तां नीलकण्ठी बिम्बोष्ठी सुमध्यां सुप्रतिष्ठिताम्॥२९॥
उनके केश काले-काले और ओष्ठ बिम्बफल के समान लाल थे। कटिभाग बहुत ही सुन्दर था। सारे अंग सुडौल और सुगठित थे॥२९॥
सीतां पद्मपलाशाक्षी मन्मथस्य रतिं यथा।
इष्टां सर्वस्य जगतः पूर्णचन्द्रप्रभामिव॥३०॥
भूमौ सुतनुमासीनां नियतामिव तापसीम्।
निःश्वासबहुलां भीरुं भुजगेन्द्रवधूमिव॥३१॥
कमलनयनी सीता कामदेव की प्रेयसी रति के समान सुन्दरी थीं, पूर्ण चन्द्रमा की प्रभा के समान समस्तजगत् के लिये प्रिय थीं। उनका शरीर बहुत ही सुन्दर था। वे नियमपरायणा तापसी के समान भूमि पर बैठी थीं। यद्यपि वे स्वभाव से ही भीरु और चिन्ता के कारण बारंबार लंबी साँस खींचती थीं तो भी दूसरों के लिये नागिन के समान भयंकर थीं॥ ३०-३१॥
शोकजालेन महता विततेन न राजतीम्।
संसक्तां धूमजालेन शिखामिव विभावसोः॥३२॥
वे विस्तृत महान् शोकजाल से आच्छादित होने के कारण विशेष शोभा नहीं पा रही थीं। धूएँ के समूह से मिली हुई अग्निशिखा के समान दिखायी देती थीं। ३२॥
तां स्मृतीमिव संदिग्धामृद्धिं निपतितामिव।
विहतामिव च श्रद्धामाशां प्रतिहतामिव॥३३॥
सोपसर्गां यथा सिद्धिं बुद्धिं सकलुषामिव।
अभूतेनापवादेन कीर्तिं निपतितामिव॥३४॥
वे संदिग्ध अर्थवाली स्मृति, भूतल पर गिरी हुई ऋद्धि, टूटी हुई श्रद्धा, भग्न हुई आशा, विघ्नयुक्त सिद्धि, कलुषित बुद्धि और मिथ्या कलंक से भ्रष्ट हुई कीर्ति के समान जान पड़ती थीं॥ ३३-३४॥
रामोपरोधव्यथितां रक्षोगणनिपीडिताम्।
अबलां मृगशावाक्षीं वीक्षमाणां ततस्ततः॥ ३५॥
अभ्यास न करने से शिथिल (विस्मृत) हुई विद्या के समान क्षीण हुई सीता को देखकर हनुमान जी की बुद्धि संदेह में पड़ गयी॥ ३८॥
दुःखेन बुबुधे सीतां हनुमाननलंकृताम्।
संस्कारेण यथा हीनां वाचमर्थान्तरं गताम्॥३९॥
अलंकार तथा स्नान-अनुलेपन आदि अंगसंस्कार से रहित हुई सीता व्याकरणादिजनित संस्कार से शून्य होने के कारण अर्थान्तर को प्राप्त हुई वाणी के समान पहचानी नहीं जा रही थीं। हनुमान जी ने बड़े कष्ट से उन्हें पहचाना॥ ३९॥
तां समीक्ष्य विशालाक्षीं राजपुत्रीमनिन्दिताम्।
तर्कयामास सीतेति कारणैरुपपादयन्॥४०॥
उन विशाललोचना सती-साध्वी राजकुमारी को देखकर उन्होंने कारणों (युक्तियों)-द्वारा उपपादन करते हुए मन में निश्चय किया कि यही सीता हैं।४०॥
वैदेह्या यानि चांगेषु तदा रामोऽन्वकीर्तयत्।
तान्याभरणजालानि गात्रशोभीन्यलक्षयत्॥४१॥
उन दिनों श्रीरामचन्द्रजी ने विदेहकुमारी के अंगों में जिन-जिन आभूषणों के होने की चर्चा की थी, वे ही आभूषण-समूह इस समय उनके अंगों की शोभा बढ़ा रहे थे। हनुमान जी ने इस बात की ओर लक्ष्य किया। ४१॥
सुकृतौ कर्णवेष्टौ च श्वदंष्ट्रौ च सुसंस्थितौ।
मणिविद्रमचित्राणि हस्तेष्वाभरणानि च॥४२॥
सुन्दर बने हुए कुण्डल और कुत्ते के दाँतों की-सी आकृतिवाले त्रिकर्ण नामधारी कर्णफूल कानों में सुन्दर ढंग से सुप्रतिष्ठित एवं सुशोभित थे। हाथों में कंगन आदि आभूषण थे, जिनमें मणि और मूंगे जड़े हुए थे॥४२॥
श्यामानि चिरयुक्तत्वात् तथा संस्थानवन्ति च।
तान्येवैतानि मन्येऽहं यानि रामोऽन्वकीर्तयत्॥४३॥
तत्र यान्यवहीनानि तान्यहं नोपलक्षये।
यान्यस्या नावहीनानि तानीमानि न संशयः॥४४॥
यद्यपि बहुत दिनों से पहने गये होने के कारण वे कुछ काले पड़ गये थे, तथापि उनके आकार-प्रकार वैसे ही थे। (हनुमान जी ने सोचा-) ‘श्रीरामचन्द्रजी ने जिनकी चर्चा की थी, मेरी समझ में ये वे ही आभूषण हैं। सीताजी ने जो आभूषण वहाँ गिरा दिये थे, उनको मैं इनके अंगों में नहीं देख रहा हूँ। इनके जो आभूषण मार्ग में गिराये नहीं गये थे, वे ही ये दिखायी देते हैं, इसमें संशय नहीं है॥ ४३-४४॥
पीतं कनकपट्टाभं स्रस्तं तदसनं शुभम्।
उत्तरीयं नगासक्तं तदा दृष्टं प्लवंगमैः॥४५॥
भूषणानि च मुख्यानि दृष्टानि धरणीतले।
अनयैवापविद्धानि स्वनवन्ति महान्ति च॥४६॥
‘उस समय वानरों ने पर्वत पर गिराये हुए सुवर्णपत्र के समान जो सुन्दर पीला वस्त्र और पृथ्वी पर पड़े हुए उत्तमोत्तम बहुमूल्य एवं बजने वाले आभूषण देखे थे, वे इन्हीं के गिराये हुए थे। ४५-४६॥
इदं चिरगृहीतत्वाद् वसनं क्लिष्टवत्तरम्।
तथाप्यनूनं तद्वर्णं तथा श्रीमद्यथेतरत्॥४७॥
‘यह वस्त्र बहुत दिनों से पहने जाने के कारण यद्यपि बहुत पुराना हो गया है, तथापि इसका पीला रंग अभी तक उतरा नहीं है। यह भी वैसा ही कान्तिमान् है, जैसा वह दूसरा वस्त्र था॥४७॥
इयं कनकवर्णांगी रामस्य महिषी प्रिया।
प्रणष्टापि सती यस्य मनसो न प्रणश्यति॥४८॥
‘ये सुवर्ण के समान गौर अंगवाली श्रीरामचन्द्रजी की प्यारी महारानी हैं, जो अदृश्य हो जाने पर भी उनके मन से विलग नहीं हुई हैं। ४८॥
इयं सा यत्कृते रामश्चतुर्भिरिह तप्यते।
कारुण्येनानृशंस्येन शोकेन मदनेन च॥४९॥
‘ये वे ही सीता हैं, जिनके लिये श्रीरामचन्द्रजी इस जगत् में करुणा, दया, शोक और प्रेम-इन चार कारणों से संतप्त होते रहते हैं। ४९॥
स्त्री प्रणष्टेति कारुण्यादाश्रितेत्यानृशंस्यतः।
पत्नी नष्टेति शोकेन प्रियेति मदनेन च॥५०॥
‘एक स्त्री खो गयी, यह सोचकर उनके हृदय में करुणा भर आती है। वह हमारे आश्रित थी, यह सोचकर वे दया से द्रवित हो उठते हैं। मेरी पत्नी ही मुझसे बिछुड़ गयी, इसका विचार करके वे शोक से व्याकुल हो उठते हैं तथा मेरी प्रियतमा मेरे पास नहीं रही, ऐसी भावना करके उनके हृदय में प्रेम की वेदना होने लगती है॥५०॥
अस्या देव्या यथारूपमंगप्रत्यंगसौष्ठवम्।
रामस्य च यथारूपं तस्येयमसितेक्षणा॥५१॥
जैसा अलौकिक रूप श्रीरामचन्द्रजी का है तथा जैसा मनोहर रूप एवं अंग-प्रत्यंग की सुघड़ता इन देवी सीता में है; इसे देखते हुए कजरारे नेत्रों वाली सीता उन्हीं के योग्य पत्नी हैं॥५१॥
अस्या देव्या मनस्तस्मिंस्तस्य चास्यां प्रतिष्ठितम्।
तेनेयं स च धर्मात्मा मुहूर्तमपि जीवति॥५२॥
‘इन देवी का मन श्रीरघुनाथजी में और श्रीरघुनाथजी का मन इनमें लगा हुआ है, इसीलिये ये तथा धर्मात्मा श्रीराम जीवित हैं। इनके मुहूर्तमात्र जीवन में भी यही कारण है।
दुष्करं कृतवान् रामो हीनो यदनया प्रभुः।
धारयत्यात्मनो देहं न शोकेनावसीदति॥५३॥
‘इनके बिछुड़ जाने पर भी भगवान् श्रीराम जो अपने शरीर को धारण करते हैं, शोक से शिथिल नहीं हो जाते हैं, यह उन्होंने अत्यन्त दुष्कर कार्य किया है’॥ ५३॥
एवं सीतां तथा दृष्ट्वा हृष्टः पवनसम्भवः।
जगाम मनसा रामं प्रशशंस च तं प्रभुम्॥५४॥
इस प्रकार उस अवस्था में सीता का दर्शन पाकर पवनपुत्र हनुमान जी बहुत प्रसन्न हुए। वे मन-ही-मनभगवान् श्रीराम के पास जा पहुँचे—उनका चिन्तन करने लगे तथा सीता-जैसी साध्वी को पत्नी रूप में पाने से उनके सौभाग्य की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे॥५४॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे पञ्चदशः सर्ग॥१५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में पंद्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥१५॥
सर्ग-16
प्रशस्य तु प्रशस्तव्यां सीतां तां हरिपुंगवः।
गुणाभिरामं रामं च पुनश्चिन्तापरोऽभवत्॥१॥
परम प्रशंसनीया सीता और गुणाभिराम श्रीराम की प्रशंसा करके वानरश्रेष्ठ हनुमान जी फिर विचार करने लगे॥
स मुहूर्तमिव ध्यात्वा बाष्पपर्याकुलेक्षणः।
सीतामाश्रित्य तेजस्वी हनूमान् विललाप ह॥२॥
लगभग दो घड़ी तक कुछ सोच-विचार करने पर उनके नेत्रों में आँसू भर आये और वे तेजस्वी हनुमान् सीता के विषय में इस प्रकार विलाप करने लगे॥२॥
मान्या गुरुविनीतस्य लक्ष्मणस्य गुरुप्रिया।
यदि सीता हि दुःखार्ता कालो हि दुरतिक्रमः॥
‘अहो! जिन्होंने गुरुजनों से शिक्षा पायी है, उन लक्ष्मण के बड़े भाई श्रीराम की प्रियतमा पत्नी सीता भी यदि इस प्रकार दुःख से आतुर हो रही हैं तो यह कहना पड़ता है कि काल का उल्लङ्घन करना सभी के लिये अत्यन्त कठिन है॥३॥
रामस्य व्यवसायज्ञा लक्ष्मणस्य च धीमतः।
नात्यर्थं क्षुभ्यते देवी गंगेव जलदागमे॥४॥
‘जैसे वर्षा-ऋतु आने पर भी देवी गंगा अधिक क्षुब्ध नहीं होती हैं, उसी प्रकार श्रीराम तथा बुद्धिमान् लक्ष्मण के अमोघ पराक्रम का निश्चित ज्ञान रखने वाली देवी सीता भी शोक से अधिक विचलित नहीं हो रही हैं।
तुल्यशीलवयोवृत्तां तुल्याभिजनलक्षणाम्।
राघवोऽर्हति वैदेहीं तं चेयमसितेक्षणा॥५॥
‘सीता के शील, स्वभाव, अवस्था और बर्ताव श्रीराम के ही समान हैं। उनका कुल भी उन्हीं के तुल्य महान् है, अतः श्रीरघुनाथजी विदेहकुमारी सीता के सर्वथा योग्य हैं तथा ये कजरारे नेत्रोंवाली सीता भी उन्हीं के योग्य हैं॥
तां दृष्ट्वा नवहेमाभां लोककान्तामिव श्रियम्।
जगाम मनसा रामं वचनं चेदमब्रवीत्॥६॥
नूतन सुवर्ण के समान दीप्तिमती और लोककमनीया लक्ष्मीजी के समान शोभामयी श्रीसीता को देखकर हनुमान जी ने श्रीरामचन्द्रजी का स्मरण किया और मन-ही-मन इस प्रकार कहा- ॥
अस्या हेतोर्विशालाक्ष्या हतो वाली महाबलः।
रावणप्रतिमो वीर्ये कबन्धश्च निपातितः॥७॥
‘इन्हीं विशाललोचना सीता के लिये भगवान् श्रीराम ने महाबली वाली का वध किया और रावण के समान पराक्रमी कबन्ध को भी मार गिराया॥ ७॥
विराधश्च हतः संख्ये राक्षसो भीमविक्रमः।
वने रामेण विक्रम्य महेन्द्रेणेव शम्बरः॥८॥
‘इन्हीं के लिये श्रीराम ने वन में पराक्रम करके भयानक पराक्रमी राक्षस विराध को भी उसी प्रकार युद्ध में मार डाला, जैसे देवराज इन्द्र ने शम्बरासुर का वध किया था॥ ८॥
चतुर्दश सहस्राणि रक्षसां भीमकर्मणाम्।
निहतानि जनस्थाने शरैरग्निशिखोपमैः॥९॥
खरश्च निहतः संख्ये त्रिशिराश्च निपातितः।
दूषणश्च महातेजा रामेण विदितात्मना॥१०॥
‘इन्हीं के कारण आत्मज्ञानी श्रीरामचन्द्रजी ने जनस्थान में अपने अग्निशिखा के सदृश तेजस्वी बाणों द्वारा भयानक कर्म करने वाले चौदह हजार राक्षसों को काल के गाल में भेज दिया और युद्ध में खर, त्रिशिरा तथा महातेजस्वी दूषण को भी मार गिराया॥ ९-१०॥
ऐश्वर्यं वानराणां च दुर्लभं वालिपालितम्।
अस्या निमित्ते सुग्रीवः प्राप्तवाँल्लोकविश्रुतः॥११॥
‘वानरों का वह दुर्लभ ऐश्वर्य, जो वाली के द्वारा सुरक्षित था, इन्हीं के कारण विश्वविख्यात सुग्रीव को प्राप्त हुआ है॥ ११॥
सागरश्च मयाऽऽक्रान्तः श्रीमान् नदनदीपतिः।
अस्या हेतोर्विशालाक्ष्याः पुरी चेयं निरीक्षिता॥१२॥
‘इन्हीं विशाललोचना सीता के लिये मैंने नदों और नदियों के स्वामी श्रीमान् समुद्र का उल्लङ्घन किया और इस लंकापुरी को छान डाला है॥ १२॥
यदि रामः समुद्रान्तां मेदिनीं परिवर्तयेत्।
अस्याः कृते जगच्चापि युक्तमित्येव मे मतिः॥१३॥
‘इनके लिये तो यदि भगवान् श्रीराम समुद्रपर्यन्त पृथ्वी तथा सारे संसार को भी उलट देते तो भी वह मेरे विचार से उचित ही होता ॥१३॥
राज्यं वा त्रिषु लोकेषु सीता वा जनकात्मजा।
त्रैलोक्यराज्यं सकलं सीताया नाप्नुयात् कलाम्॥१४॥
‘एक ओर तीनों लोकों का राज्य और दूसरी ओर जनककुमारी सीता को रखकर तुलना की जाय तो त्रिलोकी का सारा राज्य सीता की एक कला के बराबर भी नहीं हो सकता॥ १४॥
इयं सा धर्मशीलस्य जनकस्य महात्मनः।
सुता मैथिलराजस्य सीता भर्तृदृढव्रता॥१५॥
‘ये धर्मशील मिथिलानरेश महात्मा राजा जनक की पुत्री सीता पतिव्रत-धर्म में बहुत दृढ़ हैं॥ १५ ॥
उत्थिता मेदिनी भित्त्वा क्षेत्रे हलमुखक्षते।
पद्मरेणुनिभैः कीर्णा शुभैः केदारपांसुभिः॥१६॥
‘जब हल के मुख (फाल)-से खेत जोता जा रहा था, उस समय ये पृथ्वी को फाड़कर कमल के पराग की भाँति क्यारी की सुन्दर धूलों से लिपटी हुई प्रकट हुई थीं॥१६॥
विक्रान्तस्यार्यशीलस्य संयुगेष्वनिवर्तिनः।
स्नुषा दशरथस्यैषा ज्येष्ठा राज्ञो यशस्विनी॥१७॥
‘जो परम पराक्रमी, श्रेष्ठ शील-स्वभाववाले और युद्ध से कभी पीछे न हटने वाले थे, उन्हीं महाराज दशरथ की ये यशस्विनी ज्येष्ठ पुत्रवधू हैं॥ १७॥
धर्मज्ञस्य कृतज्ञस्य रामस्य विदितात्मनः।
इयं सा दयिता भार्या राक्षसीवशमागता॥१८॥
‘धर्मज्ञ, कृतज्ञ एवं आत्मज्ञानी भगवान् श्रीराम की ये प्यारी पत्नी सीता इस समय राक्षसियों के वश में पड़ गयी हैं॥ १८॥
सर्वान् भोगान् परित्यज्य भर्तृस्नेहबलात् कृता।
अचिन्तयित्वा कष्टानि प्रविष्टा निर्जनं वनम्॥१९॥
‘ये केवल पतिप्रेम के कारण सारे भोगों को लात मारकर विपत्तियों का कुछ भी विचार न करके श्रीरघुनाथजी के साथ निर्जन वन में चली आयी थीं। १९॥
संतुष्टा फलमूलेन भर्तृशुश्रूषणापरा।
या परां भजते प्रीतिं वनेऽपि भवने यथा॥२०॥
‘यहाँ आकर फल-मूलों से ही संतुष्ट रहती हुई पतिदेव की सेवा में लगी रहीं और वन में भी उसी प्रकार परम प्रसन्न रहती थीं, जैसे राजमहलों में रहा करती थीं॥२०॥
सेयं कनकवर्णांगी नित्यं सुस्मितभाषिणी।
सहते यातनामेतामनर्थानामभागिनी॥२१॥
‘वे ही ये सुवर्ण के समान सुन्दर अंगवाली और सदा मुसकराकर बात करने वाली सुन्दरी सीता, जो अनर्थ भोगने के योग्य नहीं थीं, इस यातना को सहन करती हैं॥२१॥
इमां तु शीलसम्पन्नां द्रष्टुमिच्छति राघवः।
रावणेन प्रमथितां प्रपामिव पिपासितः॥२२॥
यद्यपि रावण ने इन्हें बहुत कष्ट दिये हैं तो भी ये अपने शील, सदाचार एवं सतीत्व से सम्पन्न हैं। (उसके वशीभूत नहीं हो सकी हैं।) अतएव जैसे प्यासा मनुष्य पौंसले पर जाना चाहता है, उसी प्रकार श्रीरघुनाथजी इन्हें देखना चाहते हैं ॥ २२ ॥
अस्या नूनं पुनर्लाभाद् राघवः प्रीतिमेष्यति।
राजा राज्यपरिभ्रष्टः पुनः प्राप्येव मेदिनीम्॥२३॥
‘जैसे राज्य से भ्रष्ट हुआ राजा पुनः पृथ्वी का राज्य पाकर बहुत प्रसन्न होता है, उसी प्रकार उनकी पुनः प्राप्ति होने से श्रीरघुनाथजी को निश्चय ही बड़ी प्रसन्नता होगी॥ २३॥
कामभोगैः परित्यक्ता हीना बन्धुजनेन च।
धारयत्यात्मनो देहं तत्समागमकाशिणी ॥२४॥
‘ये अपने बन्धुजनों से बिछुड़कर विषयभोगों को तिलाञ्जलि दे केवल भगवान् श्रीरामचन्द्रजी के समागम की आशा से ही अपना शरीर धारण किये हुए हैं॥२४॥
नैषा पश्यति राक्षस्यो नेमान् पुष्पफलद्रुमान्।
एकस्थहृदया नूनं राममेवानुपश्यति॥२५॥
ये न तो राक्षसियों की ओर देखती हैं और न इन फल-फूलवाले वृक्षों पर ही दृष्टि डालती हैं, सर्वथा एकाग्रचित्त हो मन की आँखों से केवल श्रीराम का ही निरन्तर दर्शन (ध्यान) करती हैं इसमें संदेह नहीं है॥ २५॥
भर्ता नाम परं नार्याः शोभनं भूषणादपि।
एषा हि रहिता तेन शोभनार्हा न शोभते॥२६॥
‘निश्चय ही पति नारी के लिये आभूषण की अपेक्षा भी अधिक शोभा का हेतु है। ये सीता उन्हीं पतिदेव से बिछुड़ गयी हैं, इसलिये शोभा के योग्य होने पर भी शोभा नहीं पा रही हैं॥२६॥
दुष्करं कुरुते रामो हीनो यदनया प्रभुः।
धारयत्यात्मनो देहं न दुःखेनावसीदति ॥ २७॥
‘भगवान् श्रीराम इनसे बिछुड़ जाने पर भी जो अपने शरीर को धारण कर रहे हैं, दुःख से अत्यन्त शिथिल नहीं हो जाते हैं, यह उनका अत्यन्त दुष्करकर्म है। २७॥
इमामसितकेशान्तां शतपत्रनिभेक्षणाम्।
सुखाहीँ दुःखितां ज्ञात्वा ममापि व्यथितं मनः॥२८॥
‘काले केश और कमल-जैसे नेत्रवाली ये सीता वास्तव में सुख भोगने के योग्य हैं। इन्हें दुःखी जानकर मेरा मन भी व्यथित हो उठता है॥ २८॥
क्षितिक्षमा पुष्करसंनिभेक्षणा या रक्षिता राघवलक्ष्मणाभ्याम्।
सा राक्षसीभिर्विकृतेक्षणाभिः संरक्ष्यते सम्प्रति वृक्षमूले॥२९॥
‘अहो! जो पृथ्वी के समान क्षमाशील और प्रफुल्ल कमल के समान नेत्रोंवाली हैं तथा श्रीराम और लक्ष्मण ने जिनकी सदा रक्षा की है, वे ही सीता आज इस वृक्ष के नीचे बैठी हैं और ये विकराल नेत्रोंवाली राक्षसियाँ इनकी रखवाली करती हैं॥ २९ ॥
हिमहतनलिनीव नष्टशोभा व्यसनपरम्परया निपीड्यमाना।
सहचररहितेव चक्रवाकी जनकसुता कृपणां दशां प्रपन्ना॥३०॥
‘हिम की मारी हुई कमलिनी के समान इनकी शोभा नष्ट हो गयी है, दुःख-पर-दुःख उठाने के कारण अत्यन्त पीड़ित हो रही हैं तथा अपने सहचर से बिछुड़ी हुई चकवी के समान पति-वियोग का कष्ट सहन करती हुई ये जनककिशोरी सीता बड़ी दयनीय दशा को पहुँच गयी हैं॥ ३०॥
अस्या हि पुष्पावनताग्रशाखाः शोकं दृढं वै जनयन्त्यशोकाः।
हिमव्यपायेन च शीतरश्मि रभ्युत्थितो नैकसहस्ररश्मिः॥३१॥
‘फूलों के भार से जिनकी डालियों के अग्रभाग झुक गये हैं, वे अशोकवृक्ष इस समय सीतादेवी के लिये अत्यन्त शोक उत्पन्न कर रहे हैं तथा शिशिर का अन्त हो जाने से वसन्त की रात में उदित हुए शीतल किरणों वाले चन्द्रदेव भी इनके लिये अनेक सहस्र किरणों से प्रकाशित होने वाले सूर्यदेव की भाँति संताप दे रहे हैं ॥३१॥
इत्येवमर्थं कपिरन्ववेक्ष्य सीतेयमित्येव तु जातबुद्धिः।
संश्रित्य तस्मिन् निषसाद वृक्षे बली हरीणामृषभस्तरस्वी॥३२॥
इस प्रकार विचार करते हुए बलवान् वानरश्रेष्ठ वेगशाली हनुमान जी यह निश्चय करके कि ‘ये ही सीता हैं उसी वृक्ष पर बैठे रहे॥३२॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे षोडशः सर्गः॥१६॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में सोलहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥१६॥
सर्ग-17
ततः कुमुदखण्डाभो निर्मलं निर्मलोदयः।
प्रजगाम नभश्चन्द्रो हंसो नीलमिवोदकम्॥१॥
तदनन्तर वह दिन बीतने के पश्चात् कुमुदसमूह के समान श्वेत वर्णवाले तथा निर्मल रूप से उदित हुए चन्द्रदेव स्वच्छ आकाश में कुछ ऊपर को चढ़ आये। उस समय ऐसा जान पड़ता था, मानो कोई हंस किसी नील जलराशि में तैर रहा हो॥१॥
साचिव्यमिव कुर्वन् स प्रभया निर्मलप्रभः।
चन्द्रमा रश्मिभिः शीतैः सिषेवे पवनात्मजम्॥२॥
निर्मल कान्तिवाले चन्द्रमा अपनी प्रभा से सीताजी के दर्शन आदि में पवनकुमार हनुमान जी की सहायतासी करते हुए अपनी शीतल किरणों द्वारा उनकी सेवा करने लगे॥२॥
स ददर्श ततः सीतां पूर्णचन्द्रनिभाननाम्।
शोकभारैरिव न्यस्तां भारै वमिवाम्भसि॥३॥
उस समय उन्होंने पूर्ण चन्द्रमा के समान मनोहर मुखवाली सीता को देखा, जो जल में अधिक बोझ के कारण दबी हुई नौका की भाँति शोक के भारी भार से मानो झुक गयी थीं॥३॥
दिदृक्षमाणो वैदेहीं हनूमान् मारुतात्मजः।
स ददर्शाविदूरस्था राक्षसी?रदर्शनाः॥४॥
वायुपुत्र हनुमान जी ने जब विदेहकुमारी सीता को देखने के लिये अपनी दृष्टि दौड़ायी, तब उन्हें उनके पास ही बैठी हुई भयानक दृष्टिवाली बहुत-सी राक्षसियाँ दिखायी दीं॥४॥
एकाक्षीमेककर्णां च कर्णप्रावरणां तथा।
अकर्णां शङ्ककर्णां च मस्तकोच्छ्वासनासिकाम्॥५॥
उनमें से किसी के एक आँख थी तो दूसरी के एक कान। किसी-किसी के कान इतने बड़े थे कि वह उन्हें चादर की भाँति ओढ़े हुए थीं। किसी के कान ही नहीं थे और किसी के कान ऐसे दिखायी देते थे मानो खूटे गड़े हुए हों। किसी-किसी की साँस लेने वाली नाक उसके मस्तक पर थी॥५॥
अतिकायोत्तमांगीं च तनुदीर्घशिरोधराम्।
ध्वस्तकेशी तथाकेशी केशकम्बलधारिणीम्॥
किसी का शरीर बहुत बड़ा था और किसी का बहुत उत्तम। किसी की गर्दन पतली और बड़ी थी। किसी के केश उड़ गये थे और किसी-किसी के माथे पर केश उगे ही नहीं थे। कोई-कोई राक्षसी अपने शरीर के केशों का ही कम्बल धारण किये हुए थी॥६॥
लम्बकर्णललाटां च लम्बोदरपयोधराम्।
लम्बोष्ठी चिबुकोष्ठी च लम्बास्यां लम्बजानुकाम्॥७॥
किसी के कान और ललाट बड़े-बड़े थे तो किसी के पेट और स्तन लंबे थे। किसी के ओठ बड़े होने के कारण लटक रहे थे तो किसी के ठोड़ी में ही सटे हुए थे। किसी का मुँह बड़ा था और किसी के घुटने॥७॥
ह्रस्वां दीर्घा च कुब्जां च विकटां वामनां तथा।
कराला भुग्नवक्त्रां च पिंगाक्षी विकृताननाम्॥८॥
कोई नाटी, कोई लंबी, कोई कुबड़ी, कोई टेढ़ीमेढ़ी, कोई बवनी, कोई विकराल, कोई टेढ़े मुँहवाली, कोई पीली आँखवाली और कोई विकट मुँहवाली थीं॥
विकृताः पिंगलाः कालीः क्रोधनाः कलहप्रियाः।
कालायसमहाशूलकूटमुद्गरधारिणीः॥९॥
कितनी ही राक्षसियाँ बिगड़े शरीर वाली, काली, पीली, क्रोध करने वाली और कलह पसंद करने वाली थीं। उन सबने काले लोहे के बने हुए बड़े-बड़े शूल, कूट और मुद्गर धारण कर रखे थे॥९॥
वराहमृगशार्दूलमहिषाजशिवामुखाः।
गजोष्ट्रहयपादाश्च निखातशिरसोऽपराः॥१०॥
कितनी ही राक्षसियों के मुख सूअर, मृग, सिंह, भैंस, बकरी और सियारिनों के समान थे। किन्हीं के पैर हाथियों के समान, किन्हीं के ऊँटोंके समान और किन्हीं के घोड़ों के समान थे। किन्हीं-किन्हीं के सिर कबन्ध की भाँति छाती में स्थित थे; अतः गड्डे के समान दिखायी देते थे। (अथवा किन्हीं-किन्हीं के सिर में गड्ढे थे) ॥ १०॥
एकहस्तैकपादाश्च खरकर्ण्यश्वकर्णिकाः।
गोकर्णीर्हस्तिकर्णीश्च हरिकर्णीस्तथापराः॥११॥
किन्हीं के एक हाथ थे तो किन्हीं के एक पैर। किन्हीं के कान गदहों के समान थे तो किन्हीं के घोड़ों के समान। किन्हीं-किन्हीं के कान गौओं, हाथियों और सिंहों के समान दृष्टिगोचर होते थे॥ ११॥
अतिनासाश्च काश्चिच्च तिर्यङ्नासा अनासिकाः।
गजसंनिभनासाश्च ललाटोच्छ्वासनासिकाः॥ १२॥
किन्हीं की नासिकाएँ बहुत बड़ी थीं और किन्हीं की तिरछी। किन्हीं-किन्हीं के नाक ही नहीं थी। कोई-कोई हाथी की ढूँड़ के समान नाकवाली थीं और किन्हीं किन्हीं की नासिकाएँ ललाट में ही थीं, जिनसे वे साँस लिया करती थीं॥ १२॥
हस्तिपादा महापादा गोपादाः पादचूलिकाः।
अतिमात्रशिरोग्रीवा अतिमात्रकुचोदरीः॥१३॥
किन्हीं के पैर हाथियों के समान थे और किन्हीं के गौओं के समान। कोई बड़े-बड़े पैर धारण करती थीं और कितनी ही ऐसी थीं जिनके पैरों में चोटी के समान केश उगे हुए थे। बहुत-सी राक्षसियाँ बेहद लंबे सिर और गर्दनवाली थीं और कितनों के पेट तथा स्तन बहुत बड़े-बड़े थे॥१३॥
अतिमात्रास्यनेत्राश्च दीर्घजिह्वाननास्तथा।
अजामुखीर्हस्तिमुखीर्गोमुखीः सूकरीमुखीः॥१४॥
हयोष्ट्रखरवकत्राश्च राक्षसी?रदर्शनाः।
किन्हीं के मुँह और नेत्र सीमा से अधिक बड़े थे, किन्हीं-किन्हीं के मुखों में बड़ी-बड़ी जिह्वाएँ थीं और कितनी ही ऐसी राक्षसियाँ थीं, जो बकरी, हाथी, गाय, सूअर, घोड़े, ऊँट और गदहों के समान मुँह धारण करती थीं। इसीलिये वे देखने में बड़ी भयंकर थीं॥ १४ १/२॥
शूलमुद्गरहस्ताश्च क्रोधनाः कलहप्रियाः॥१५॥
कराला धूम्रकेशिन्यो राक्षसीर्विकृताननाः।
पिबन्ति सततं पानं सुरामांससदाप्रियाः॥१६॥
किन्हीं के हाथ में शूल थे तो किन्हीं के मुद्गर। कोई क्रोधी स्वभाव की थीं तो कोई कलह से प्रेम रखती थीं। धुएँ-जैसे केश और विकृत मुखवाली कितनी ही विकराल राक्षसियाँ सदा मद्यपान किया करती थीं। मदिरा और मांस उन्हें सदा प्रिय थे॥ १५-१६॥
मांसशोणितदिग्धांगीमा॑सशोणितभोजनाः।
ता ददर्श कपिश्रेष्ठो रोमहर्षणदर्शनाः॥१७॥
कितनी ही अपने अंगों में रक्त और मांस का लेप लगाये रहती थीं। रक्त और मांस ही उनके भोजन थे। उन्हें देखते ही रोंगटे खड़े हो जाते थे। कपिश्रेष्ठ हनुमान जी ने उन सबको देखा ॥ १७॥
स्कन्धवन्तमुपासीनाः परिवार्य वनस्पतिम्।
तस्याधस्ताच्च तां देवीं राजपुत्रीमनिन्दिताम्॥ १८॥
लक्षयामास लक्ष्मीवान् हनूमाञ्जनकात्मजाम्।
निष्प्रभां शोकसंतप्तां मलसंकुलमूर्धजाम्॥१९॥
वे उत्तम शाखावाले उस अशोकवृक्ष को चारों ओर से घेरकर उससे थोड़ी दूर पर बैठी थीं और सती साध्वी राजकुमारी सीता देवी उसी वृक्ष के नीचे उसकी जड़ से सटी हुई बैठी थीं। उस समय शोभाशाली हनुमान जी ने जनककिशोरी जानकीजी की ओर विशेष रूप से लक्ष्य किया। उनकी कान्ति फीकी पड़ गयी थी। वे शोक से संतप्त थीं और उनके केशों में मैल जम गयी थी॥ १८-१९॥
क्षीणपुण्यां च्युतां भूमौ तारां निपतितामिव।
चारित्रव्यपदेशाढ्यां भर्तृदर्शनदुर्गताम्॥२०॥
जैसे पुण्य क्षीण हो जाने पर कोई तारा स्वर्ग से टूटकर पृथ्वी पर गिर पड़ा हो, उसी तरह वे भी कान्तिहीन दिखायी देती थीं। वे आदर्श चरित्र (पातिव्रत्य)-से सम्पन्न तथा इसके लिये सुविख्यात थीं। उन्हें पति के दर्शनके लिये लाले पड़े थे॥२०॥
भूषणैरुत्तमै नां भर्तृवात्सल्यभूषिताम्।
राक्षसाधिपसंरुद्धां बन्धुभिश्च विनाकृताम्॥२१॥
वे उत्तम भूषणों से रहित थीं तो भी पति के वात्सल्य से विभूषित थीं (पति का स्नेह ही उनके लिये शृंगार था)। राक्षसराज रावण ने उन्हें बंदिनी बना रखा था। वे स्वजनों से बिछुड़ गयी थीं॥ २१॥
वियूथां सिंहसंरुद्धां बद्धां गजवधूमिव।
चन्द्ररेखां पयोदान्ते शारदाभ्रेरिवावृताम्॥२२॥
जैसे कोई हथिनी अपने यूथ से अलग हो गयी हो, यूथपति के स्नेह से बँधी हो और उसे किसी सिंह ने रोक लिया हो। रावण की कैद में पड़ी हुई सीता की भी वैसी ही दशा थी। वे वर्षाकाल बीत जाने पर शरद्ऋतु के श्वेत बादलों से घिरी हुई चन्द्ररेखा के समान प्रतीत होती थीं॥ २२॥
क्लिष्टरूपामसंस्पर्शादयुक्तामिव वल्लकीम्।
स तां भर्तृहिते युक्तामयुक्तां रक्षसां वशे॥२३॥
अशोकवनिकामध्ये शोकसागरमाप्लुताम्।
ताभिः परिवृतां तत्र सग्रहामिव रोहिणीम्॥२४॥
जैसे वीणा अपने स्वामी की अंगुलियों के स्पर्श से वञ्चित हो वादन आदि की क्रिया से रहित अयोग्य अवस्था में मूक पड़ी रहती है, उसी प्रकार सीता पति के सम्पर्क से दूर होने के कारण महान् क्लेश में पड़कर ऐसी अवस्था को पहुँच गयी थीं, जो उनके योग्य नहीं थी। पति के हित में तत्पर रहने वाली सीता राक्षसों के अधीन रहने के योग्य नहीं थीं; फिर भी वैसी दशा में पड़ी थीं। अशोकवाटिका में रहकर भी वे शोक के सागर में डूबी हुई थीं। क्रूर ग्रह से आक्रान्त हुई रोहिणी की भाँति वे वहाँ उन राक्षसियों से घिरी हुई थीं। हनुमान् जी ने उन्हें देखा। वे पुष्पहीन लता की भाँति श्रीहीन हो रही थीं। २३-२४॥
ददर्श हनुमांस्तत्र लतामकुसुमामिव।
सा मलेन च दिग्धांगी वपुषा चाप्यलंकृता।
मृणाली पङ्कदिग्धेव विभाति च न भाति च॥२५॥
उनके सारे अंगों में मैल जम गयी थी। केवल शरीर-सौन्दर्य ही उनका अलंकार था। वे कीचड़ से लिपटी हुई कमलनाल की भाँति शोभा और अशोभा दोनों से युक्त हो रही थीं॥ २५॥
मलिनेन तु वस्त्रेण परिक्लिष्टेन भामिनीम्।
संवृतां मृगशावाक्षीं ददर्श हनुमान् कपिः॥२६॥
मैले और पुराने वस्त्र से ढकी हुई मृगशावकनयनी भामिनी सीता को कपिवर हनुमान् ने उस अवस्था में देखा॥२६॥
तां देवीं दीनवदनामदीनां भर्तृतेजसा।
रक्षितां स्वेन शीलेन सीतामसितलोचनाम्॥२७॥
यद्यपि देवी सीता के मुख पर दीनता छा रही थी तथापि अपने पति के तेज का स्मरण हो आने से उनके हृदय से वह दैन्य दूर हो जाता था। कजरारे नेत्रों वाली सीता अपने शील से ही सुरक्षित थीं॥ २७॥
तां दृष्ट्वा हनुमान् सीतां मृगशावनिभेक्षणाम्।
मृगकन्यामिव त्रस्तां वीक्षमाणां समन्ततः॥२८॥
दहन्तीमिव निःश्वासैर्वृक्षान् पल्लवधारिणः।
संघातमिव शोकानां दुःखस्योर्मिमिवोत्थिताम्॥२९॥
तां क्षमां सुविभक्तांगीं विनाभरणशोभिनीम्।
प्रहर्षमतुलं लेभे मारुतिः प्रेक्ष्य मैथिलीम्॥३०॥
उनके नेत्र मृगछौनों के समान चञ्चल थे। वे डरी हुई मृगकन्या की भाँति सब ओर सशंक दृष्टि से देख रही थीं। अपने उच्छ्वासों से पल्लवधारी वृक्षों को दग्ध-सी करती जान पड़ती थीं। शोकों की मूर्तिमती प्रतिमा-सी दिखायी देती थीं और दुःख की उठी हुई तरंग-सी प्रतीत होती थीं। उनके सभी अंगों का विभाग सुन्दर था। यद्यपि वे विरह-शोक से दुर्बल हो गयी थीं तथापि आभूषणों के बिना ही शोभा पाती थीं। इस अवस्था में मिथिलेशकुमारी सीता को देखकर पवनपुत्र हनुमान् को उनका पता लग जाने के कारण अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ॥ २८–३०॥
हर्षजानि च सोऽश्रूणि तां दृष्ट्वा मदिरेक्षणाम्।
मुमोच हनुमांस्तत्र नमश्चक्रे च राघवम्॥३१॥
मनोहर नेत्रवाली सीता को वहाँ देखकर हनुमान जी हर्ष के आँसू बहाने लगे। उन्होंने मन-ही-मन श्रीरघुनाथजी को नमस्कार किया॥३१॥
नमस्कृत्वाथ रामाय लक्ष्मणाय च वीर्यवान्।
सीतादर्शनसंहृष्टो हनुमान् संवृतोऽभवत्॥३२॥
सीता के दर्शन से उल्लसित हो श्रीराम और लक्ष्मण को नमस्कार करके पराक्रमी हनुमान् वहीं छिपे रहे॥ ३२॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे सप्तदशः सर्गः॥१७॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में सत्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ।१७॥
सर्ग-18
तथा विप्रेक्षमाणस्य वनं पुष्पितपादपम्।
विचिन्वतश्च वैदेहीं किञ्चिच्छेषा निशाभवत्॥१॥
इस प्रकार फूले हुए वृक्षों से सुशोभित उस वन की शोभा देखते और विदेहनन्दिनी का अनुसंधान करते हुए हनुमान जी की वह सारी रात प्रायः बीत चली। केवल एक पहर रात बाकी रही॥१॥
षडंगवेदविदुषां क्रतुप्रवरयाजिनाम्।
शुश्राव ब्रह्मघोषान् स विरात्रे ब्रह्मरक्षसाम्॥२॥
रात के उस पिछले पहर में छहों अंगोंसहित सम्पूर्ण वेदों के विद्वान् तथा श्रेष्ठ यज्ञों द्वारा यजन करने वाले ब्रह्म-राक्षसों के घर में वेदपाठ की ध्वनि होने लगी, जिसे हनुमान जी ने सुना॥२॥
अथ मंगलवादित्रैः शब्दैः श्रोत्रमनोहरैः।
राबोध्यत महाबाहुर्दशग्रीवो महाबलः॥३॥
तदनन्तर मंगल वाद्यों तथा श्रवण-सुखद शब्दों द्वारा महाबली महाबाहु दशमुख रावण को जगाया गया।३॥
विबुध्य तु महाभागो राक्षसेन्द्रः प्रतापवान्।
सस्तमाल्याम्बरधरो वैदेहीमन्वचिन्तयत्॥४॥
जागने पर महान् भाग्यशाली एवं प्रतापी राक्षसराज रावणने सबसे पहले विदेहनन्दिनी सीता का चिन्तन किया। उस समय नींद के कारण उसके पुष्पहार और वस्त्र अपने स्थान से खिसक गये थे॥४॥
भृशं नियुक्तस्तस्यां च मदनेन मदोत्कटः।
न तु तं राक्षसः कामं शशाकात्मनि गुहितुम्॥
वह मदमत्त निशाचर काम से प्रेरित हो सीता के प्रति अत्यन्त आसक्त हो गया था। अतः उस कामभाव को अपने भीतर छिपाये रखने में असमर्थ हो गया॥५॥
स सर्वाभरणैर्युक्तो बिभ्रच्छ्यिमनुत्तमाम्।
तां नगैर्विविधैर्जुष्टां सर्वपुष्पफलोपगैः॥६॥
वृतां पुष्करिणीभिश्च नानापुष्पोपशोभिताम्।
सदा मत्तैश्च विहगैर्विचित्रां परमाद्भुतैः॥७॥
ईहामृगैश्च विविधैर्वृतां दृष्टिमनोहरैः।
वीथीः सम्प्रेक्षमाणश्च मणिकाञ्चनतोरणाम्॥
नानामृगगणाकीर्णां फलैः प्रपतितैर्वृताम्।
अशोकवनिकामेव प्राविशत् संततद्रुमाम्॥९॥
उसने सब प्रकार के आभूषण धारण किये और परम उत्तम शोभा से सम्पन्न हो उस अशोकवाटिका में ही प्रवेश किया, जो सब प्रकार के फूल और फल देने वाले भाँति-भाँति के वृक्षों से सुशोभित थी। नाना प्रकार के पुष्प उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। बहुत-से सरोवरों द्वारा वह वाटिका घिरी हुई थी। सदा मतवाले रहने वाले परम अद्भुत पक्षियों के कारण उसकी विचित्र शोभा होती थी। कितने ही नयनाभिराम क्रीडामृगों से भरी हुई वह वाटिका भाँति-भाँति के मृगसमूहों से व्याप्त थी। बहुत-से गिरे हुए फलों के कारण वहाँ की भूमि ढक गयी थी। पुष्पवाटिका में मणि और सुवर्ण के फाटक लगे थे और उसके भीतर पंक्तिबद्ध वृक्ष बहुत दूर तक फैले हुए थे। वहाँ की गलियों को देखता हुआ रावण उस वाटिका में घुसा॥ ६-९॥
अंगनाः शतमात्रं तु तं व्रजन्तमनुव्रजन्।
महेन्द्रमिव पौलस्त्यं देवगन्धर्वयोषितः॥१०॥
जैसे देवताओं और गन्धर्वो की स्त्रियाँ देवराज इन्द्र के पीछे चलती हैं, उसी प्रकार अशोकवन में जाते हुए पुलस्त्यनन्दन रावण के पीछे-पीछे लगभग एक सौ सुन्दरियाँ गयीं॥ १०॥
दीपिकाः काञ्चनीः काश्चिज्जगृहुस्तत्र योषितः।
वालव्यजनहस्ताश्च तालवृन्तानि चापराः॥११॥
उन युवतियों में से किन्हीं ने सुवर्णमय दीपक ले रखे थे। किन्हीं के हाथों में चँवर थे तो किन्हीं के हाथों में ताड़के पंखे ॥११॥
काञ्चनैश्चैव श्रृंगारैर्जगुः सलिलमग्रतः।
मण्डलाग्रा बृसीश्चैव गृह्यान्याः पृष्ठतो ययुः॥१२॥
कुछ सुन्दरियाँ सोने की झारियों में जल लिये आगे आगे चल रही थीं और कई दूसरी स्त्रियाँ गोलाकार बृसी नामक आसन लिये पीछे-पीछे जा रही थीं। १२॥
काचिद् रत्नमयीं पात्री पूर्णां पानस्य भ्राजतीम्।
दक्षिणा दक्षिणेनैव तदा जग्राह पाणिना॥१३॥
कोई चतुर-चालाक युवती दाहिने हाथ में पेयरस से भरी हुई रत्ननिर्मित चमचमाती कलशी लिये हुए थी॥
राजहंसप्रतीकाशं छत्रं पूर्णशशिप्रभम्।
सौवर्णदण्डमपरा गृहीत्वा पृष्ठतो ययौ॥१४॥
कोई दूसरी स्त्री सोने के डंडे से युक्त और पूर्ण चन्द्रमा तथा राज-हंस के समान श्वेतछत्र लेकर रावण के पीछे-पीछे चल रही थी॥१४॥
निद्रामदपरीताक्ष्यो रावणस्योत्तमस्त्रियः।
अनुजग्मुः पतिं वीरं घनं विद्युल्लता इव ॥१५॥
जैसे बादल के साथ-साथ बिजलियाँ चलती हैं, उसी प्रकार रावण की सुन्दरी स्त्रियाँ अपने वीर पति के पीछे-पीछे जा रही थीं। उस समय नींद के नशे में उनकी आँखें झपी जाती थीं॥ १५ ॥
व्याविद्धहारकेयूराः समामृदितवर्णकाः।
समागलितकेशान्ताः सस्वेदवदनास्तथा॥१६॥
उनके हार और बाजूबंद अपने स्थान से खिसक गये थे। अंगराग मिट गये थे। चोटियाँ खुल गयी थीं और मुखपर पसीने की बूंदें छा रही थीं॥१६॥
घूर्णन्त्यो मदशेषेण निद्रया च शुभाननाः।
स्वेदक्लिष्टांगकुसुमाः समाल्याकुलमूर्धजाः॥१७॥
वे सुमुखी स्त्रियाँ अवशेष मद और निद्रा से झूमती हुई-सी चल रही थीं। विभिन्न अंगों में धारण किये गये पुष्प पसीने से भीग गये थे और पुष्पमालाओं से अलंकृत केश कुछ-कुछ हिल रहे थे॥१७॥
प्रयान्तं नैर्ऋतपतिं नार्यो मदिरलोचनाः।
बहुमानाच्च कामाच्च प्रियभार्यास्तमन्वयुः॥१८॥
जिनकी आँखें मदमत्त बना देने वाली थीं, वे राक्षसराज की प्यारी पत्नियाँ अशोक वन में जाते हुए पति के साथ बड़े आदर से और अनुरागपूर्वक जा रही थीं॥ १८॥
स च कामपराधीनः पतिस्तासां महाबलः।
सीतासक्तमना मन्दो मन्दाञ्चितगतिर्बभौ॥१९॥
उन सबका पति महाबली मन्दबुद्धि रावण काम के अधीन हो रहा था। वह सीता में मन लगाये मन्दगति से आगे बढ़ता हुआ अद्भुत शोभा पा रहा था॥ १९॥
ततः काञ्चीनिनादं च नूपुराणां च निःस्वनम्।
शुश्राव परमस्त्रीणां कपिर्मारुतनन्दनः॥२०॥
उस समय वायुनन्दन कपिवर हनुमान जी ने उन परम सुन्दरी रावणपत्नियों की करधनी का कलनाद और नूपुरों की झनकार सुनी॥२०॥
तं चाप्रतिमकर्माणमचिन्त्यबलपौरुषम्।
द्वारदेशमनुप्राप्तं ददर्श हनुमान् कपिः॥२१॥
साथ ही, अनुपम कर्म करने वाले तथा अचिन्त्य बल-पौरुष से सम्पन्न रावण को भी कपिवर हनुमान् ने देखा, जो अशोकवाटिका के द्वार तक आ पहुँचा था। २१॥
दीपिकाभिरनेकाभिः समन्तादवभासितम्।
गन्धतैलावसिक्ताभिर्धियमाणाभिरग्रतः॥२२॥
उसके आगे-आगे सुगन्धित तेल से भीगी हुई और स्त्रियों द्वारा हाथों में धारण की हुई बहुत-सी मशालें जल रही थीं, जिनके द्वारा वह सब ओर से प्रकाशित हो रहा था॥ २२॥
कामदर्पमदैर्युक्तं जिह्मताम्रायतेक्षणम्।
समक्षमिव कंदर्पमपविद्धशरासनम्॥२३॥
वह काम, दर्प और मद से युक्त था। उसकी आँखें टेढ़ी, लाल और बड़ी-बड़ी थीं। वह धनुषरहित साक्षात् कामदेव के समान जान पड़ता था॥ २३॥
मथितामृतफेनाभमरजोवस्त्रमुत्तमम्।।
सपुष्पमवकर्षन्तं विमुक्तं सक्तमंगदे॥२४॥
उसका वस्त्र मथे हुए दूध के फेन की भाँति श्वेत, निर्मल और उत्तम था। उसमें मोती के दाने और फूल टँके हुए थे। वह वस्त्र उसके बाजूबंद में उलझ गया था और रावण उसे खींचकर सुलझा रहा था॥२४॥
तं पत्रविटपे लीनः पत्रपुष्पशतावृतः।
समीपमुपसंक्रान्तं विज्ञातुमुपचक्रमे॥ २५॥
अशोक-वृक्ष के पत्तों और डालियों में छिपे हुए हनुमान् जी सैकड़ों पत्रों तथा पुष्पों से ढक गये थे। उसी अवस्था में उन्होंने निकट आये हुए रावण को पहचानने का प्रयत्न किया॥ २५ ॥
अवेक्षमाणस्तु तदा ददर्श कपिकुञ्जरः।
रूपयौवनसम्पन्ना रावणस्य वरस्त्रियः॥ २६॥
उसकी ओर देखते समय कपिश्रेष्ठ हनुमान् ने रावण की सुन्दरी स्त्रियों को भी लक्ष्य किया, जो रूप और यौवन से सम्पन्न थीं॥ २६॥
ताभिः परिवृतो राजा सुरूपाभिर्महायशाः।
तन्मृगद्विजसंघुष्टं प्रविष्टः प्रमदावनम्॥ २७॥
उन सुन्दर रूपवाली युवतियों से घिरे हुए महायशस्वी राजा रावण ने उस प्रमदावन में प्रवेश किया, जहाँ अनेक प्रकार के पशु-पक्षी अपनी-अपनी बोली बोल रहे थे॥२७॥
क्षीबो विचित्राभरणः शङ्ककर्णो महाबलः।
तेन विश्रवसः पुत्रः स दृष्टो राक्षसाधिपः॥ २८॥
वह मतवाला दिखायी देता था। उसके आभूषण विचित्र थे। उसके कान ऐसे प्रतीत होते थे, मानो वहाँ खूटे गाड़े गये हैं। इस प्रकार वह विश्रवामुनि का पुत्र महाबली राक्षसराज रावण हनुमान जी के दृष्टिपथ में आया॥२८॥
वृतः परमनारीभिस्ताराभिरिव चन्द्रमाः।
तं ददर्श महातेजास्तेजोवन्तं महाकपिः॥ २९॥
रावणोऽयं महाबाहरिति संचिन्त्य वानरः।
सोऽयमेव पुरा शेते पुरमध्ये गृहोत्तमे।
अवप्लुतो महातेजा हनूमान् मारुतात्मजः॥३०॥
ताराओं से घिरे हुए चन्द्रमा की भाँति वह परम सुन्दरी युवतियों से घिरा हुआ था। महातेजस्वी महाकपि हनुमान् ने उस तेजस्वी राक्षस को देखा और देखकर यह निश्चय किया कि यही महाबाहु रावण है। पहले यही नगर में उत्तम महल के भीतर सोया हुआ था। ऐसा सोचकर वे वानरवीर महातेजस्वीपवनकुमार हनुमान् जी जिस डाली पर बैठे थे, वहाँ से कुछ नीचे उतर आये (क्योंकि वे निकट से रावण की सारी चेष्टाएँ देखना चाहते थे) ॥ २९-३०॥
स तथाप्युग्रतेजाः स निर्धूतस्तस्य तेजसा।
पत्रे गुह्यान्तरे सक्तो मतिमान् संवृतोऽभवत्॥३१॥
यद्यपि मतिमान् हनुमान जी भी बड़े उग्र तेजस्वी थे, तथापि रावण के तेजसे तिरस्कृत-से होकर सघन पत्तों में घुसकर छिप गये॥ ३१॥
स तामसितकेशान्तां सुश्रोणीं संहतस्तनीम्।
दिदृक्षुरसितापांगीमुपावर्तत रावणः॥३२॥
उधर रावण काले केश, कजरारे नेत्र, सुन्दर कटिभाग और परस्पर सटे हुए स्तनवाली सुन्दरी सीता को देखने के लिये उनके पास गया॥ ३२॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डेऽष्टादशः सर्गः॥१८॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में अठारहवाँ सर्ग पूरा हुआ।
सर्ग-19
तस्मिन्नेव ततः काले राजपुत्री त्वनिन्दिता।
रूपयौवनसम्पन्नं भूषणोत्तमभूषितम्॥१॥
ततो दृष्ट्वैव वैदेही रावणं राक्षसाधिपम्।
प्रावेपत वरारोहा प्रवाते कदली यथा॥२॥
उस समय अनिन्दिता सुन्दरी राजकुमारी सीता ने जब उत्तमोत्तम आभूषणों से विभूषित तथा रूप यौवन से सम्पन्न राक्षसराज रावण को आते देखा, तब वे प्रचण्ड हवा में हिलने वाली कदली के समान भय के मारे थर-थर काँपने लगीं॥ १-२॥
ऊरुभ्यामुदरं छाद्य बाहुभ्यां च पयोधरौ।
उपविष्टा विशालाक्षी रुदती वरवर्णिनी॥३॥
सुन्दर कान्तिवाली विशाललोचना जानकी ने अपनी जाँघों से पेट और दोनों भुजाओं से स्तन छिपा लिये तथा वहाँ बैठी-बैठी वे रोने लगीं॥ ३॥
दशग्रीवस्तु वैदेही रक्षितां राक्षसीगणैः।
ददर्श दीनां दुःखार्ती नावं सन्नामिवार्णवे॥४॥
असंवृतायामासीनां धरण्यां संशितव्रताम्।
छिन्नां प्रपतितां भूमौ शाखामिव वनस्पतेः॥५॥
राक्षसियों के पहरे में रहती हुई विदेहराजकुमारी सीता अत्यन्त दीन और दुःखी हो रही थीं। वे समुद्र में जीर्ण-शीर्ण होकर डूबी हुई नौका के समान दुःख के सागर में निमग्न थीं। उस अवस्था में दशमुख रावण ने उनकी ओर देखा। वे बिना बिछौने के खुली जमीन पर बैठी थीं और कटकर पृथ्वी पर गिरी हुई वृक्ष की शाखा के समान जान पड़ती थीं। उनके द्वारा बड़े कठोर व्रत का पालन किया जा रहा था॥ ४-५ ॥
मलमण्डनदिग्धांगी मण्डनार्हाममण्डनाम्।
मृणाली पङ्कदिग्धेव विभाति न विभाति च॥६॥
उनके अंगों में अंगराग की जगह मैल जमी हुई थी। वे आभूषण धारण तथा शृंगार करने योग्य होने पर भी उन सबसे वञ्चित थीं और कीचड़ में सनी हुई कमलनाल की भाँति शोभा पाती थीं तथा नहीं भी पाती थीं (कमलनाल जैसे सुकुमारता के कारण शोभा पाती है और कीचड़ में सनी रहने के कारण शोभा नहीं पाती, वैसे ही वे अपने सहज सौन्दर्य से सुशोभित थीं, किंतु मलिनता के कारण शोभा नहीं देती थीं।) ॥ ६॥
समीपं राजसिंहस्य रामस्य विदितात्मनः।
संकल्पहयसंयुक्तैर्यान्तीमिव मनोरथैः॥७॥
संकल्पों के घोड़ों से जुते हुए मनोमय रथ पर चढ़कर आत्मज्ञानी राजसिंह भगवान् श्रीराम के पास जाती हुई-सी प्रतीत होती थीं॥ ७॥
शुष्यन्तीं रुदतीमेकां ध्यानशोकपरायणाम्।
दुःखस्यान्तमपश्यन्तीं रामां राममनुव्रताम्॥८॥
उनका शरीर सूखता जा रहा था। वे अकेली बैठकर रोती तथा श्रीरामचन्द्रजी के ध्यान एवं उनके वियोग के शोक में डूबी रहती थीं। उन्हें अपने दुःख का अन्त नहीं दिखायी देता था। वे श्रीरामचन्द्रजी में अनुराग रखने वाली तथा उनकी रमणीय भार्या थीं॥ ८॥
चेष्टमानामथाविष्टां पन्नगेन्द्रवधमिव।
धूप्यमानां ग्रहेणेव रोहिणीं धूमकेतुना॥९॥
जैसे नागराज की वधू (नागिन) मणि-मन्त्रादि से अभिभूत हो छटपटाने लगती है, उसी तरह सीता भी पति के वियोग में तड़प रही थीं तथा धूम के समान वर्णवाले केतु ग्रह से ग्रस्त हुई रोहिणी के समान संतप्त हो रही थीं॥९॥
वृत्तशीले कुले जातामाचारवति धार्मिके।
पुनः संस्कारमापन्नां जातामिव च दुष्कुले॥ १०॥
यद्यपि सदाचारी और सुशील कुल में उनका जन्म हुआ था। फिर धार्मिक तथा उत्तम आचार विचारवाले कुल में वे ब्याही गयी थीं—विवाहसंस्कार से सम्पन्न हुई थीं, तथापि दूषित कुल में उत्पन्न हुई नारी के समान मलिन दिखायी देती थीं। १०॥
सन्नामिव महाकीर्तिं श्रद्धामिव विमानिताम्।
प्रज्ञामिव परिक्षीणामाशां प्रतिहतामिव॥११॥
आयतीमिव विध्वस्तामाज्ञां प्रतिहतामिव।
दीप्तामिव दिशं काले पूजामपहतामिव॥१२॥
पौर्णमासीमिव निशां तमोग्रस्तेन्दुमण्डलाम्।
पद्मिनीमिव विध्वस्तां हतशूरां चमूमिव॥१३॥
प्रभामिव तमोध्वस्तामुपक्षीणामिवापगाम्।
वेदीमिव परामृष्टां शान्तामग्निशिखामिव ॥१४॥
वे क्षीण हुई विशाल कीर्ति, तिरस्कृत हुई श्रद्धा, सर्वथा ह्रास को प्राप्त हुई बुद्धि, टूटी हुई आशा, नष्ट हुए भविष्य, उल्लङ्घित हुई राजाज्ञा, उत्पातकाल में दहकती हुई दिशा, नष्ट हुई देवपूजा, चन्द्रग्रहण से मलिन हुई पूर्णमासी की रात, तुषारपात से जीर्ण-शीर्ण हुई कमलिनी, जिसका शूरवीर सेनापति मारा गया हो -ऐसी सेना, अन्धकार से नष्ट हुई प्रभा, सूखी हुई सरिता, अपवित्र प्राणियों के स्पर्श से अशुद्ध हुई वेदी और बुझी हुई अग्निशिखा के समान प्रतीत होती थीं। ११–१४॥
उत्कृष्टपर्णकमलां वित्रासितविहंगमाम्।
हस्तिहस्तपरामृष्टामाकुलामिव पद्मिनीम्॥१५॥
जिसे हाथी ने अपनी सूंड से हुँडेर डाला हो; अतएव जिसके पत्ते और कमल उखड़ गये हों तथा जलपक्षी भय से थर्रा उठे हों, उस मथित एवं मलिन हुई पुष्करिणी के समान सीता श्रीहीन दिखायी देती थीं। १५॥
पतिशोकातुरां शुष्कां नदीं विस्रावितामिव।
परया मृजया हीनां कृष्णपक्षे निशामिव॥१६॥
पति के विरह-शोक से उनका हृदय बड़ा व्याकुल था। जिसका जल नहरों के द्वारा इधर-उधर निकाल दिया गया हो, ऐसी नदी के समान वे सूख गयी थीं तथा उत्तम उबटन आदि के न लगने से कृष्णपक्ष की रात्रि के समान मलिन हो रही थीं॥ १६ ॥
सुकुमारी सुजातांगी रत्नगर्भगृहोचिताम्।
तप्यमानामिवोष्णेन मृणालीमचिरोद्धृताम्॥१७॥
उनके अंग बड़े सुकुमार और सुन्दर थे। वे रत्नजटित राजमहल में रहने के योग्य थीं; परंतु गर्मी से तपी और तुरंत तोड़कर फेंकी हुई कमलिनी के समान दयनीय दशा को पहँच गयी थीं॥ १७॥
गृहीतामालितां स्तम्भे यूथपेन विनाकृताम्।
निःश्वसन्तीं सुदुःखार्ती गजराजवधूमिव॥१८॥
जिसे यूथपति से अलग करके पकड़कर खंभे में बाँध दिया गया हो, उस हथिनी के समान वे अत्यन्त दुःख से आतुर होकर लम्बी साँस खींच रही थीं।१८॥
एकया दीर्घया वेण्या शोभमानामयत्नतः।
नीलया नीरदापाये वनराज्या महीमिव॥१९॥
बिना प्रयत्न के ही बँधी हुई एक ही लम्बी वेणी से सीता की वैसी ही शोभा हो रही थी, जैसे वर्षा-ऋतु बीत जाने पर सुदूर तक फैली हुई हरी-भरी वनश्रेणी से पृथ्वी सुशोभित होती है॥ १९॥
उपवासेन शोकेन ध्यानेन च भयेन च।
परिक्षीणां कृशां दीनामल्पाहारां तपोधनाम्॥२०॥
वे उपवास, शोक, चिन्ता और भय से अत्यन्त क्षीण, कृशकाय और दीन हो गयी थीं। उनका आहार बहुत कम हो गया था तथा एकमात्र तप ही उनका धन था॥ २०॥
आयाचमानां दुःखार्ता प्राञ्जलिं देवतामिव।
भावेन रघुमुख्यस्य दशग्रीवपराभवम्॥२१॥
वे दुःख से आतुर हो अपने कुलदेवता से हाथ जोड़कर मन-ही-मन यह प्रार्थना-सी कर रही थीं कि श्रीरामचन्द्रजी के हाथ से दशमुख रावण की पराजय हो॥
समीक्षमाणां रुदतीमनिन्दितां सुपक्ष्मताम्रायतशुक्ललोचनाम्।
अनुव्रतां राममतीव मैथिली प्रलोभयामास वधाय रावणः॥ २२॥
सुन्दर बरौनियों से युक्त, लाल, श्वेत एवं विशाल नेत्रोंवाली सती-साध्वी मिथिलेशकुमारी सीता श्रीरामचन्द्रजी में अत्यन्त अनुरक्त थीं और इधर-उधर देखती हुई रो रही थीं। इस अवस्था में उन्हें देखकर राक्षसराज रावण अपने ही वध के लिये उनको लुभाने की चेष्टा करने लगा॥२२॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे एकोनविंशः सर्गः॥१९॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में उन्नीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।१९॥
सर्ग-20
स तां परिवृतां दीनां निरानन्दां तपस्विनीम्।
साकारैर्मधरैर्वाक्यैर्व्यदर्शयत रावणः॥१॥
राक्षसियों से घिरी हुई दीन और आनन्दशून्य तपस्विनी सीता को सम्बोधित करके रावण अभिप्राययुक्त मधुर वचनों द्वारा अपने मन का भाव प्रकट करने लगा
मां दृष्ट्वा नागनासोरु गूहमाना स्तनोदरम्।
अदर्शनमिवात्मानं भयान्नेतुं त्वमिच्छसि ॥२॥
‘हाथी की ढूँड़ के समान सुन्दर जाँघों वाली सीते! मुझे देखते ही तुम अपने स्तन और उदर को इस प्रकार छिपाने लगी हो, मानो डर के मारे अपने को अदृश्य कर देना चाहती हो॥२॥
कामये त्वां विशालाक्षि बह मन्यस्व मां प्रिये।
सर्वांगगुणसम्पन्ने सर्वलोकमनोहरे॥३॥
‘किंतु विशाललोचने! मैं तो तुम्हें चाहता हूँ तुम से प्रेम करता हूँ। समस्त संसार का मन मोहने वाली सर्वांगसुन्दरी प्रिये! तुम भी मुझे विशेष आदर दो—मेरी प्रार्थना स्वीकार करो॥३॥
नेह किञ्चिन्मनुष्या वा राक्षसाः कामरूपिणः।
व्यपसर्पतु ते सीते भयं मत्तः समुत्थितम्॥४॥
‘यहाँ तुम्हारे लिये कोई भय नहीं है। इस स्थान में न तो मनुष्य आ सकते हैं, न इच्छानुसार रूप धारण करने वाले दूसरे राक्षस ही, केवल मैं आ सकता हूँ। परन्तु सीते! मुझसे जो तुम्हें भय हो रहा है, वह तो दूर हो ही जाना चाहिये॥ ४॥
स्वधर्मो रक्षसां भीरु सर्वदैव न संशयः।
गमनं वा परस्त्रीणां हरणं सम्प्रमथ्य वा॥५॥
‘भीरु ! (तुम यह न समझो कि मैंने कोई अधर्म किया है) परायी स्त्रियों के पास जाना अथवा बलात् उन्हें हर लाना यह राक्षसों का सदा ही अपना धर्म रहा है—इसमें संदेह नहीं है॥ ५॥
एवं चैवमकामां त्वां न च स्प्रक्ष्यामि मैथिलि।
कामं कामः शरीरे मे यथाकामं प्रवर्तताम्॥६॥
‘मिथिलेशनन्दिनि ! ऐसी अवस्था में भी जब तक तुम मुझे न चाहोगी, तब तक मैं तुम्हारा स्पर्श नहीं करूँगा। भले ही कामदेव मेरे शरीर पर इच्छानुसार अत्याचार करे॥
देवि नेह भयं कार्यं मयि विश्वसिहि प्रिये।
प्रणयस्व च तत्त्वेन मैवं भूः शोकलालसा॥७॥
‘देवि! इस विषय में तुम्हें भय नहीं करना चाहिये। प्रिये! मुझ पर विश्वास करो और यथार्थ रूप से प्रेमदान दो। इस तरह शोक से व्याकुल न हो जाओ॥७॥
एकवेणी अधःशय्या ध्यानं मलिनमम्बरम्।
अस्थानेऽप्युपवासश्च नैतान्यौपयिकानि ते॥८॥
‘एक वेणी धारण करना, नीचे पृथ्वी पर सोना, चिन्तामग्न रहना, मैले वस्त्र पहनना और बिना अवसर के उपवास करना—ये सब बातें तुम्हारे योग्य नहीं हैं॥८॥
विचित्राणि च माल्यानि चन्दनान्यगुरूणि च।
विविधानि च वासांसि दिव्यान्याभरणानि च।
महाणि च पानानि शयनान्यासनानि च।
गीतं नृत्यं च वाद्यं च लभ मां प्राप्य मैथिलि॥१०॥
‘मिथिलेशकुमारी! मुझे पाकर तुम विचित्र पुष्पमाला, चन्दन, अगुरु, नाना प्रकार के वस्त्र, दिव्य आभूषण, बहुमूल्य पेय, शय्या, आसन, नाच, गान और वाद्य का सुख भोगो॥९-१०॥
स्त्रीरत्नमसि मैवं भूः कुरु गात्रेषु भूषणम्।
मां प्राप्य हि कथं वा स्यास्त्वमनीं सुविग्रहे।११॥
‘तुम स्त्रियों में रत्न हो। इस तरह मलिन वेष में न रहो। अपने अंगों में आभूषण धारण करो। सुन्दरि!मुझे पाकर भी तुम भूषण आदि से असम्मानित कैसे रहोगी!॥
इदं ते चारु संजातं यौवनं ह्यतिवर्तते।
यदतीतं पुन:ति स्रोतः स्रोतस्विनामिव॥१२॥
‘यह तुम्हारा नवोदित सुन्दर यौवन बीता जा रहा है। जो बीत जाता है, वह नदियों के प्रवाह की भाँति फिर लौटकर नहीं आता॥ १२॥
त्वां कृत्वोपरतो मन्ये रूपकर्ता स विश्वकृत्।
नहि रूपोपमा ह्यन्या तवास्ति शुभदर्शने ॥१३॥
‘शुभदर्शने! मैं तो ऐसा समझता हूँ कि रूप की रचना करने वाला लोकस्रष्टा विधाता तुम्हें बनाकर फिर उस कार्य से विरत हो गया; क्योंकि तुम्हारे रूप की समता करने वाली दूसरी कोई स्त्री नहीं है। १३॥
त्वां समासाद्य वैदेहि रूपयौवनशालिनीम्।
कः पुनर्नातिवर्तेत साक्षादपि पितामहः॥१४॥
‘विदेहनन्दिनि! रूप और यौवन से सुशोभित होने वाली तुमको पाकर कौन ऐसा पुरुष है, जो धैर्य से विचलित न होगा। भले ही वह साक्षात् ब्रह्मा क्यों न हो॥१४॥
यद् यत् पश्यामि ते गात्रं शीतांशसदृशानने।
तस्मिंस्तस्मिन् पृथुश्रोणि चक्षुर्मम निबध्यते॥१५॥
‘चन्द्रमा के समान मुखवाली सुमध्यमे! मैं तुम्हारे जिस-जिस अंग को देखता हूँ, उसी-उसी में मेरे नेत्र उलझ जाते हैं॥ १५ ॥
भव मैथिलि भार्या मे मोहमेतं विसर्जय।
बह्वीनामुत्तमस्त्रीणां ममाग्रमहिषी भव॥१६॥
‘मिथिलेशकुमारी! तुम मेरी भार्या बन जाओ। पातिव्रत्य के इस मोह को छोड़ो। मेरे यहाँ बहुत-सी सुन्दरी रानियाँ हैं तुम उन सबमें श्रेष्ठ पटरानी बनो॥१६॥
लोकेभ्यो यानि रत्नानि सम्प्रमथ्याहृतानि मे।
तानि ते भीरु सर्वाणि राज्यं चैव ददामि ते॥१७॥
‘भीरु ! मैं अनेक लोकों से उन्हें मथकर जो-जो रत्न लाया हूँ, वे सब तुम्हारे ही होंगे और यह राज्य भी मैं तुम्हीं को समर्पित कर दूंगा॥ १७ ॥
विजित्य पृथिवीं सर्वां नानानगरमालिनीम्।
जनकाय प्रदास्यामि तव हेतोर्विलासिनि॥१८॥
‘विलासिनि ! तुम्हारी प्रसन्नता के लिये मैं विभिन्न नगरों की मालाओं से अलंकृत इस सारी पृथ्वी को जीतकर राजा जनक के हाथ में सौंप दूंगा॥ १८॥
नेह पश्यामि लोकेऽन्यं यो मे प्रतिबलो भवेत्।
पश्य मे सुमहद्वीर्यमप्रतिद्वन्द्वमाहवे॥१९॥
‘इस संसार में मैं किसी दूसरे ऐसे पुरुष को नहीं देखता, जो मेरा सामना कर सके। तुम युद्ध में मेरा वह महान् पराक्रम देखना, जिसके सामने कोई प्रतिद्वन्द्वी टिक नहीं पाता॥ १९॥
असकृत् संयुगे भग्ना मया विमृदितध्वजाः।
अशक्ताः प्रत्यनीकेषु स्थातुं मम सुरासुराः॥२०॥
‘मैंने युद्धस्थल में जिनकी ध्वजाएँ तोड़ डाली थीं,वे देवता और असुर मेरे सामने ठहरने में असमर्थ होने के कारण कई बार पीठ दिखा चुके हैं।॥ २० ॥
इच्छ मां क्रियतामद्य प्रतिकर्म तवोत्तमम्।
सुप्रभाण्यवसज्जन्तां तवांगे भूषणानि हि॥२१॥
‘तुम मुझे स्वीकार करो। आज तुम्हारा उत्तम शृंगार किया जाय और तुम्हारे अंगों में चमकीले आभूषण पहनाये जायँ॥ २१॥
साधु पश्यामि ते रूपं सुयुक्तं प्रतिकर्मणा।
प्रतिकर्माभिसंयुक्ता दाक्षिण्येन वरानने॥२२॥
‘सुमुखि! आज मैं श्रृंगार से सुसज्जित हुए तुम्हारे सुन्दर रूप को देख रहा हूँ। तुम उदारतावश मुझपर कृपा करके शृंगार से सम्पन्न हो जाओ॥ २२॥
* यहाँ भविष्य का वर्तमान की भाँति वर्णन होने से ‘भाविक’ अलंकार समझना चाहिये।
भुक्ष्व भोगान् यथाकामं पिब भीरु रमस्व च।
यथेष्टं च प्रयच्छ त्वं पृथिवीं वा धनानि च॥२३॥
‘भीरु ! फिर इच्छानुसार भाँति-भाँतिके भोग भोगो, दिव्य रस का पान करो, विहरो तथा पृथ्वी या धन का यथेष्ट रूप से दान करो॥ २३॥
ललस्व मयि विस्रब्धा धृष्टमाज्ञापयस्व च।
मत्प्रासादाल्ललन्त्याश्च ललतां बान्धवस्तव॥२४॥
‘तुम मुझ पर विश्वास करके भोग भोगने की इच्छा करो और निर्भय होकर मुझे अपनी सेवा के लिये आज्ञा दो। मुझ पर कृपा करके इच्छानुसार भोग भोगती हुई तुम-जैसी पटरानी के भाई-बन्धु भी मनमाने भोग भोग सकते हैं॥२४॥
ऋद्धिं ममानुपश्य त्वं श्रियं भद्रे यशस्विनि।
किं करिष्यसि रामेण सुभगे चीरवासिना॥२५॥
‘भद्रे! यशस्विनि! तुम मेरी समृद्धि और धनसम्पत्ति की ओर तो देखो। सुभगे! चीर-वस्त्र धारण करने वाले राम को लेकर क्या करोगी? ॥ २५॥
निक्षिप्तविजयो रामो गतश्रीर्वनगोचरः।
व्रती स्थण्डिलशायी च शंके जीवति वा न वा॥२६॥
‘राम ने विजय की आशा त्याग दी है। वे श्रीहीन होकर वन-वन में विचर रहे हैं, व्रत का पालन करते हैंऔर मिट्टी की वेदी पर सोते हैं। अब तो मुझे यह भी संदेह होने लगा है कि वे जीवित भी हैं या नहीं। २६॥
नहि वैदेहि रामस्त्वां द्रष्टुं वाप्युपलभ्यते।
परोबलाकैरसितैर्मेधैर्योत्स्नामिवावृताम्॥२७॥
‘विदेहनन्दिनि! जिनके आगे बगुलों की पंक्तियाँ चलती हैं, उन काले बादलों से छिपी हुई चन्द्रिका के समान तुमको अब राम पाना तो दूर रहा, देख भी नहीं सकते हैं॥२७॥
न चापि मम हस्तात् त्वां प्राप्तुमर्हति राघवः।
हिरण्यकशिपुः कीर्तिमिन्द्रहस्तगतामिव॥२८॥
‘जैसे हिरण्यकशिपु इन्द्र के हाथ में गयी हुई कीर्ति को न पा सका, उसी प्रकार राम भी मेरे हाथ से तुम्हें नहीं पा सकते॥ २८॥
चारुस्मिते चारुदति चारुनेत्रे विलासिनि।
मनो हरसि मे भीरु सुपर्णः पन्नगं यथा॥२९॥
‘मनोहर मुसकान, सुन्दर दन्तावलि तथा रमणीय नेत्रोंवाली विलासिनि! भीरु ! जैसे गरुड़ सर्प को उठाले जाते हैं, उसी प्रकार तुम मेरे मन को हर लेती हो॥ २९॥
क्लिष्टकौशेयवसनां तन्वीमप्यनलंकृताम्।
त्वां दृष्ट्वा स्वेषु दारेषु रतिं नोपलभाम्यहम्॥३०॥
‘तुम्हारा रेशमी पीताम्बर मैला हो गया है। तुम बहुत दुबली-पतली हो गयी हो और तुम्हारे अंगों में आभूषण भी नहीं हैं तो भी तुम्हें देखकर अपनी दूसरी स्त्रियों में मेरा मन नहीं लगता ॥ ३० ॥
अन्तःपुरनिवासिन्यः स्त्रियः सर्वगुणान्विताः।
यावत्यो मम सर्वासामैश्वर्यं कुरु जानकि॥३१॥
‘जनकनन्दिनि! मेरे अन्तःपुर में निवास करने वाली जितनी भी सर्वगुणसम्पन्न रानियाँ हैं, उन सबकी तुम स्वामिनी बन जाओ॥३१॥
मम ह्यसितकेशान्ते त्रैलोक्यप्रवरस्त्रियः।
तास्त्वां परिचरिष्यन्ति श्रियमप्सरसो यथा॥३२॥
‘काले केशोंवाली सुन्दरी ! जैसे अप्सराएँ लक्ष्मी की सेवा करती हैं, उसी प्रकार त्रिभुवन की श्रेष्ठ सुन्दरियाँ यहाँ तुम्हारी परिचर्या करेंगी॥ ३२॥
यानि वैश्रवणे सुभ्र रत्नानि च धनानि च।
तानि लोकांश्च सुश्रोणि मया भुक्ष्व यथासुखम्॥३३॥
‘सुभ्र! सुश्रोणि! कुबेर के यहाँ जितने भी अच्छे रत्न और धन हैं, उन सबका तथा सम्पूर्ण लोकों का तुम मेरे साथ सुखपूर्वक उपभोग करो॥ ३३॥
न रामस्तपसा देवि न बलेन च विक्रमैः।
न धनेन मया तुल्यस्तेजसा यशसापि वा॥३४॥
‘देवि! राम तो न तप से, न बलसे, न पराक्रम से, न धन से और न तेज अथवा यश के द्वारा ही मेरी समानता कर सकते हैं॥३४॥
पिब विहर रमस्व भुक्ष्व भोगान् धननिचयं प्रदिशामि मेदिनीं च।
मयि लल ललने यथासुखं त्वं त्वयि च समेत्य ललन्तु बान्धवास्ते॥ ३५॥
‘तुम दिव्य रस का पान, विहार एवं रमण करो तथा अभीष्ट भोग भोगो। मैं तुम्हें धन की राशि और सारी पृथ्वी भी समर्पित किये देता हूँ। ललने ! तुम मेरे पास रहकर मौज से मनचाही वस्तुएँ ग्रहण करो और तुम्हारे निकट आकर तुम्हारे भाई-बन्धु भी सुखपूर्वक इच्छानुसार भोग आदि प्राप्त करें॥ ३५ ॥
कुसुमिततरुजालसंततानि भ्रमरयुतानि समुद्रतीरजानि।
कनकविमलहारभूषितांगी विहर मया सह भीरु काननानि॥३६॥
‘भीरु ! तुम सोने के निर्मल हारों से अपने अंग को विभूषित करके मेरे साथ समुद्र-तटवर्ती उन काननों में विहार करो, जिनमें खिले हुए वृक्षों के समुदाय सब ओर फैले हुए हैं और उन पर भ्रमर मँडरा रहे हैं। ३६॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे विंशः सर्गः॥२०॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।२०॥