॥श्री गणेशाय नम:॥
॥श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
**************
सम्पूर्ण वाल्मीकि रामायण
[काव्य बीजं सनातनम्]

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

पम्पासरोवर के दर्शन से श्रीराम की व्याकुलता, दोनों भाइयों को ऋष्यमूक की ओर आते देख सुग्रीव तथा अन्य वानरों का भयभीत होना

प्रथमः सर्गः

सर्ग-01


स तां पुष्करिणीं गत्वा पद्मोत्पलझषाकुलाम्।

रामः सौमित्रिसहितो विललापाकुलेन्द्रियः॥१॥

कमल, उत्पल तथा मत्स्यों से भरी हुई उस पम्पा नामक पुष्करिणी के पास पहुँचकर सीता की सुधि आ जाने के कारण श्रीराम की इन्द्रियाँ शोक से व्याकुल हो उठीं। वे विलाप करने लगे उस समय सुमित्राकुमार लक्ष्मण उनके साथ थे॥१॥

तत्र दृष्ट्वैव तां हर्षादिन्द्रियाणि चकम्पिरे।

स कामवशमापन्नः सौमित्रिमिदमब्रवीत्॥२॥

वहाँ पम्पापर दृष्टि पड़ते ही (कमल-पुष्पों में सीता के नेत्रमुख आदि का किञ्चित् सादृश्य पाकर) हर्षोल्लास से श्रीराम की सारी इन्द्रियाँ चञ्चल हो उठीं। उनके मन में सीता के दर्शन की प्रबल इच्छा जाग उठी। उस इच्छा के अधीन-से होकर वे सुमित्राकुमार लक्ष्मण से इस प्रकार बोले- ॥२॥

सौमित्रे शोभते पम्पा वैदूर्यविमलोदका।

फुल्लपद्मोत्पलवती शोभिता विविधैर्दुमैः॥३॥

‘सुमित्रानन्दन! यह पम्पा कैसी शोभा पा रही है? इसका जल वैदूर्यमणि के समान स्वच्छ एवं श्याम है। इसमें बहुत-से पद्म और उत्पल खिले हुए हैं। तट  पर उत्पन्न हुए नाना प्रकार के वृक्षों से इसकी शोभा और भी बढ़ गयी है॥३॥

सौमित्रे पश्य पम्पायाः काननं शुभदर्शनम्।

यत्र राजन्ति शैला वा द्रुमाः सशिखरा इव॥४॥

‘सुमित्राकुमार! देखो तो सही, पम्पा के किनारे का वन कितना सुन्दर दिखायी दे रहा है। यहाँ के ऊँचे ऊँचे वृक्ष अपनी फैली हुई शाखाओं के कारण अनेक शिखरों से युक्त पर्वतों के समान सुशोभित होते हैं॥४॥

मां तु शोकाभिसंतप्तमाधयः पीडयन्ति वै।

भरतस्य च दुःखेन वैदेह्या हरणेन च ॥५॥

‘परंतु मैं इस समय भरत के दुःख और सीताहरण की चिन्ता के शोक से संतप्त हो रहा हूँ। मानसिक वेदनाएँ मुझे बहुत कष्ट पहुँचा रही हैं॥५॥

शोकार्तस्यापि मे पम्पा शोभते चित्रकानना।

व्यवकीर्णा बहुविधैः पुष्पैः शीतोदका शिवा॥

‘यद्यपि मैं शोक से पीड़ित हूँ तो भी मुझे यह पम्पा बड़ी सुहावनी लग रही है। इसके निकटवर्ती वन बड़े विचित्र दिखायी देते हैं। यह नाना प्रकार के फूलों से व्याप्त है। इसका जल बहुत शीतल है और यह बहुत सुखदायिनी प्रतीत होती है॥६॥

नलिनैरपि संछन्ना ह्यत्यर्थशुभदर्शना।

सर्पयालानुचरितामृगजिसमाकुला॥॥

‘कमलों से यह सारी पुष्करिणी ढकी हुई है। इसलिये बड़ी सुन्दर दिखायी देती है। इसके आसपास सर्प तथा हिंसक जन्तु विचर रहे हैं। मृग आदि पशु और पक्षी भी सब ओर छा रहे हैं॥७॥

अधिकं प्रविभात्येतन्नीलपीतं तु शाबलम्।

द्रमाणां विविधैः पुष्पैः परिस्तोमैरिवार्पितम्॥८॥

‘नयी-नयी घासों से ढका हुआ यह स्थान अपनी नीली-पीली आभा के कारण अधिक शोभा पा रहा है। यहाँ वृक्षों के नाना प्रकार के पुष्प सब ओर बिखरे हुए हैं। इससे ऐसा जान पड़ता है मानो यहाँ बहुत-से गलीचे बिछा दिये गये हों॥८॥

पुष्पभारसमृद्धानि शिखराणि समन्ततः।

लताभिः पुष्पिताग्राभिरुपगूढानि सर्वतः॥९॥

‘चारों ओर वृक्षों के अग्रभाग फूलों के भार से लदे होने के कारण समृद्धिशाली प्रतीत होते हैं। ऊपर से खिली हुई लताएँ उनमें सब ओर से लिपटी हुई हैं। ९॥

सुखानिलोऽयं सौमित्रे कालः प्रचुरमन्मथः।

गन्धवान् सुरभिर्मासो जातपुष्पफलद्रुमः॥१०॥

‘सुमित्रानन्दन! इस समय मन्द-मन्द सुखदायिनी हवा चल रही है, जिससे कामना का उद्दीपन हो रहा है (सीता को देखने की इच्छा प्रबल हो उठी है)। यह चैत्र का महीना है। वृक्षों में फूल और फल लग गये हैं और सब ओर मनोहर सुगन्ध छा रही है॥ १०॥

पश्य रूपाणि सौमित्रे वनानां पुष्पशालिनाम्।

सृजतां पुष्पवर्षाणि वर्षं तोयमुचामिव॥११॥

‘लक्ष्मण! फूलों से सुशोभित होने वाले इन वनों के रूप तो देखो। ये उसी तरह फूलों की वर्षा कर रहे हैं जैसे मेघ जल की वृष्टि करते हैं॥ ११॥

प्रस्तरेषु च रम्येषु विविधाः काननद्रुमाः।

वायुवेगप्रचलिताः पुष्पैरवकिरन्ति गाम्॥१२॥

‘वन के ये विविध वृक्ष वायु के वेग से झूम-झूमकर रमणीय शिलाओं पर फूल बरसा रहे हैं और यहाँ की भूमि को ढक देते हैं ॥ १२ ॥

पतितैः पतमानैश्च पादपस्थैश्च मारुतः।

कुसुमैः पश्य सौमित्रे क्रीडतीव समन्ततः॥१३॥

‘सुमित्राकुमार! उधर तो देखो, जो वृक्षों से झड़ गये हैं, झड़ रहे हैं तथा जो अभी डालियों में ही लगे हुए हैं, उन सभी फूलों के साथ सब ओर वायु खेल-सा कर रही है॥ १३॥

विक्षिपन् विविधाः शाखां नगानां कुसुमोत्कटाः।

मारुतश्चलितस्थानैः षट्पदैरनुगीयते॥१४॥

‘फूलों से भरी हुई वृक्षों की विभिन्न शाखाओं को झकझोरती हुई वायु जब आगे को बढ़ती है, तब अपने-अपने स्थान से विचलित हुए भ्रमर मानो उसका यशोगान करते हुए उसके पीछे-पीछे चलने लगते हैं॥ १४॥

मत्तकोकिलसंनादैर्तयन्निव पादपान्।

शैलकंदर निष्क्रान्तः प्रगीत इव चानिलः॥१५॥

‘पर्वत की कन्दरा से विशेष ध्वनि के साथ निकली हुई वायु मानो उच्च स्वर से गीत गा रही है। मतवाले कोकिलों के कलनाद वाद्य का काम देते हैं और उन वाद्यों की ध्वनि के साथ वह वायु इन झूमते हुए वृक्षों को मानो नृत्य की शिक्षा-सी दे रही है।॥ १५ ॥

तेन विक्षिपतात्यर्थं पवनेन समन्ततः।

अमी संसक्तशाखाग्रा ग्रथिता इव पादपाः॥ १६॥

‘वायु के वेगपूर्वक हिलाने से जिनकी शाखाओं के अग्रभाग सब ओर से परस्पर सट गये हैं, वे वृक्ष एक-दूसरे से गुंथे हुए की भाँति जान पड़ते हैं॥ १६॥

स एव सुखसंस्पर्शो वाति चन्दनशीतलः।

गन्धमभ्यवहन् पुण्यं श्रमापनयनोऽनिलः॥१७॥

‘मलयचन्दन का स्पर्श करके बहने वाली यह शीतलवायु शरीर से छू जाने पर कितनी सुखद जान पड़ती है। यह थकावट दूर करती हुई बह रही है और सर्वत्र पवित्र सुगन्ध फैला रही है॥ १७ ॥

अमी पवनविक्षिप्ता विनदन्तीव पादपाः।

षट्पदैरनुकूजद्भिर्वनेषु मधुगन्धिषु॥१८॥

‘मधुर मकरन्द और सुगन्ध से भरे हुए इन वनों में गुनगुनाते हुए भ्रमरों के व्याज से ये वायु द्वारा हिलाये गये वृक्ष मानो नृत्य के साथ गान कर रहे हैं॥ १८ ॥

गिरिप्रस्थेषु रम्येषु पुष्पवद्भिर्मनोरमैः।

संसक्तशिखराः शैला विराजन्ति महाद्रुमैः॥१९॥

‘अपने रमणीय पृष्ठभागों पर उत्पन्न फूलों से सम्पन्न तथा मन को लुभाने वाले विशाल वृक्षों से सटे हुए शिखर वाले पर्वत अद्भुत शोभा पा रहे हैं॥ १९॥

पुष्पसंछन्नशिखरा मारुतोत्क्षेपचञ्चलाः।

अमी मधुकरोत्तंसाः प्रगीता इव पादपाः॥२०॥

‘जिनकी शाखाओं के अग्रभाग फूलों से ढके हैं, जो वायु के झोंके से हिल रहे हैं तथा भ्रमरों को पगड़ी के रूप में सिर पर धारण किये हुए हैं, वे वृक्ष ऐसे जान पड़ते हैं मानो इन्होंने नाचना-गाना आरम्भ कर दिया है॥२०॥

सुपुष्पितांस्तु पश्यैतान् कर्णिकारान् समन्ततः।

हाटकप्रतिसंछन्नान् नरान् पीताम्बरानिव॥२१॥

‘देखो, सब ओर सुन्दर फूलों से भरे हुए ये कनेर सोने के आभूषणों से विभूषित पीताम्बरधारी मनुष्यों के समान शोभा पा रहे हैं॥ २१॥

अयं वसन्तः सौमित्रे नानाविहगनादितः।।

सीतया विप्रहीणस्य शोकसंदीपनो मम॥२२॥

‘सुमित्रानन्दन! नाना प्रकार के विहङ्गमों के कलरवों से गूंजता हुआ यह वसन्त का समय सीता से बिछुड़े हुए मेरे लिये शोक को बढ़ाने वाला हो गया है॥२२॥

मां हि शोकसमाक्रान्तं संतापयति मन्मथः।

हृष्टं प्रवदमानश्च समाह्वयति कोकिलः॥२३॥

‘वियोग के शोक से तो मैं पीड़ित हूँ ही, यह कामदेव (सीता-विषयक अनुराग) मुझे और भी संताप दे रहा है। कोकिल बड़े हर्ष के साथ कलनाद करता हुआ मानो मुझे ललकार रहा है॥२३॥

एष दात्यूहको हृष्टो रम्ये मां वननिर्झरे।

प्रणदन्मन्मथाविष्टं शोचयिष्यति लक्ष्मण॥२४॥

‘लक्ष्मण! वन के रमणीय झरने के निकट बड़े हर्ष के साथ बोलता हुआ यह जलकुक्कुट सीता से मिलने की इच्छावाले मुझ राम को शोकमग्न किये देता है। २४॥

श्रुत्वैतस्य पुरा शब्दमाश्रमस्था मम प्रिया।

मामाहूय प्रमुदिताः परमं प्रत्यनन्दत॥२५॥

‘पहले मेरी प्रिया जब आश्रम में रहती थी, उन दिनों इसका शब्द सुनकर आनन्दमग्न हो जाती थी और मुझे भी निकट बुलाकर अत्यन्त आनन्दित कर देती थी॥ २५॥

एवं विचित्राः पतगा नानारावविराविणः।

वृक्षगुल्मलताः पश्य सम्पतन्ति समन्ततः॥२६॥

‘देखो, इस प्रकार भाँति-भाँति की बोली बोलने वाले विचित्र पक्षी चारों ओर वृक्षों, झाड़ियों और लताओं की ओर उड़ रहे हैं॥२६॥

विमिश्रा विहगाः पुंभिरात्मव्यूहाभिनन्दिताः।

भृङ्गराजप्रमुदिताः सौमित्रे मधुरस्वराः॥२७॥

‘सुमित्रानन्दन! देखो, ये पक्षिणियाँ नर पक्षियों से संयुक्त हो अपने झुंड में आनन्द का अनुभव कर रहीहैं, भौंरों का गुञ्जारव सुनकर प्रसन्न हो रही हैं और स्वयं भी मीठी बोली बोल रही हैं॥२७॥

अस्याः कूले प्रमुदिताः सङ्घशः शकुनास्त्विह।

दात्यूहरतिविक्रन्दैः पुंस्कोकिलरुतैरपि॥२८॥

स्वनन्ति पादपाश्चेमे ममानङ्गप्रदीपकाः।

‘इस पम्पा के तट पर यहाँ झुंड-के-झुंड पक्षी आनन्दमग्न होकर चहक रहे हैं। जलकुक्कुटों के रतिसम्बन्धी कूजन तथा नर कोकिलों के कलनाद के व्याज से मानो ये वृक्ष ही मधुर बोली बोलते हैं और मेरी अनङ्ग वेदना को उद्दीप्त कर रहे हैं॥ २८ १/२॥

अशोकस्तबकाङ्गारः षट्पदस्वननिःस्वनः॥ २९॥

मां हि पल्लवताम्रार्चिर्वसन्ताग्निः प्रधक्ष्यति।

‘जान पड़ता है, यह वसन्तरूपी आग मुझे जलाकर भस्म कर देगी। अशोक पुष्प के लाल-लाल गुच्छे ही इस अग्नि के अङ्गार हैं, नूतन पल्लव ही इसकी लाल-लाल लपटें हैं तथा भ्रमरों का गुञ्जारव ही इस जलती आगका ‘चट-चट’ शब्द है॥ २९ १/२॥

नहि तां सूक्ष्मपक्ष्माक्षीं सुकेशी मृदुभाषिणीम्॥ ३०॥

अपश्यतो मे सौमित्रे जीवितेऽस्ति प्रयोजनम्।

‘सुमित्रानन्दन ! यदि मैं सूक्ष्म बरौनियों और सुन्दर केशोंवाली मधुरभाषिणी सीता को न देख सका तो मुझे इस जीवन से कोई प्रयोजन नहीं है॥ ३० १/२॥

अयं हि रुचिरस्तस्याः कालो रुचिरकाननः॥ ३१॥

कोकिलाकुलसीमान्तो दयिताया ममानघ।

‘निष्पाप लक्ष्मण! वसन्त ऋतु में वन की शोभा बड़ी मनोहर हो जाती है, इसकी सीमा में सब ओर कोयल की मधुर कूक सुनायी पड़ती है। मेरी प्रिया सीता को यह समय बड़ा ही प्रिय लगता था॥ ३१ १/२॥

मन्मथायाससम्भूतो वसन्तगुणवर्धितः॥३२॥

अयं मां धक्ष्यति क्षिप्रं शोकाग्निर्नचिरादिव।

‘अनङ्गवेदना से उत्पन्न हुई शोकाग्नि वसन्तऋतु के गुणों का* ईंधन पाकर बढ़ गयी है; जान पड़ता है, यह मुझे शीघ्र ही अविलम्ब जला देगी॥ ३२ १/२॥

* मन्द-मन्द मलयानिल का चलना, वन के वृक्षों का नूतन पल्लवों और फूलों से सज जाना, कोकिलों का कूकना, कमलों का खिल जाना तथा सब ओर मधुर सुगन्ध का छा जाना आदि वसन्त के गुण हैं, जो विरही की शोकाग्नि को उद्दीप्त करते हैं।

अपश्यतस्तां वनितां पश्यतो रुचिरान् द्रुमान्॥

ममायमात्मप्रभवो भूयस्त्वमुपयास्यति।

‘अपनी उस प्रियतमा पत्नी को मैं नहीं देख पाता हूँ और इन मनोहर वृक्षों को देख रहा हूँ, इसलिये मेरा यह अनङ्गज्वर अब और बढ़ जायगा॥ ३३ १/२ ॥

अदृश्यमाना वैदेही शोकं वर्धयतीह मे॥३४॥

दृश्यमानो वसन्तश्च स्वेदसंसर्गदूषकः।

‘विदेहनन्दिनी सीता यहाँ मुझे नहीं दिखायी दे रही है, इसलिये मेरा शोक बढ़ाती है तथा मन्द मलयानिल के द्वारा स्वेदसंसर्ग का निवारण करने वाला यह वसन्त भी मेरे शोक की वृद्धि कर रहा है॥ ३४ १/२॥

मां हि सा मृगशावाक्षी चिन्ताशोकबलात्कृतम्॥ ३५॥

संतापयति सौमित्रे क्रूरश्चैत्रवनानिलः।

‘सुमित्राकुमार! मृगनयनी सीता चिन्ता और शोक से बलपूर्वक पीडित किये गये मुझ राम को और भी संताप दे रही है। साथ ही यह वन में बहने वाली चैत्रमास की वायु भी मुझे पीड़ा दे रही है॥ ३५ १/२ ॥

अमी मयूराः शोभन्ते प्रनृत्यन्तस्ततस्ततः॥३६॥

स्वैः पक्षैः पवनोद्धृतैर्गवाक्षैः स्फाटिकैरिव।

‘ये मोर स्फटिकमणि के बने हुए गवाक्षों (झरोखों) के समान प्रतीत होने वाले अपने फैले हुए पंखों से, जो वायु से कम्पित हो रहे हैं, इधर-उधर नाचते हुए कैसी शोभा पा रहे हैं? ॥ ३६ १/२॥

शिखिनीभिः परिवृतास्त एते मदमूर्च्छिताः॥ ३७॥

मन्मथाभिपरीतस्य मम मन्मथवर्धनाः।

‘मयूरियों से घिरे हुए ये मदमत्त मयूर अनङ्गवेदना से संतप्त हुए मेरी इस काम पीडा को और भी बढ़ा रहे हैं।

पश्य लक्ष्मण नृत्यन्तं मयूरमुपनृत्यति॥३८॥

शिखिनी मन्मथातॆषा भर्तारं गिरिसानुनि।

‘लक्ष्मण! वह देखो, पर्वतशिखर पर नाचते हुए अपने स्वामी मयूर के साथ-साथ वह मोरनी भी कामपीड़ित होकर नाच रही है॥ ३८ १/२ ॥

तामेव मनसा रामां मयूरोऽप्यनुधावति॥३९॥

वितत्य रुचिरौ पक्षौ रुतैरुपहसन्निव।

‘मयूर भी अपने दोनों सुन्दर पंखों को फैलाकर मन-ही-मन अपनी उसी रामा (प्रिया) का अनुसरण कर रहा है तथा अपने मधुर स्वरों से मेरा उपहास करता-सा जान पड़ता है॥ ३९ १/२॥

मयूरस्य वने नूनं रक्षसा न हृता प्रिया॥४०॥

तस्मान्नृत्यति रम्येषु वनेषु सह कान्तया।

‘निश्चय ही वन में किसी राक्षस ने मोर की प्रिया का अपहरण नहीं किया है, इसीलिये यह रमणीय वनों में अपनी वल्लभा के साथ नृत्य कर रहा है* ॥ ४० १/२॥

* रामायणशिरोमणिकार इस श्लोक के पूर्वार्ध का अर्थ यों लिखते हैं—निश्चय ही इस मोर के निवासभूत वन में उस राक्षस ने मेरी प्रिया सीता का अपहरण नहीं किया; नहीं तो यह भी उसी के शोक में डूबा रहता।

मम त्वयं विना वासः पुष्पमासे सुदुःसहः॥४१॥

पश्य लक्ष्मण संरागस्तिर्यग्योनिगतेष्वपि।

यदेषा शिखिनी कामाद भर्तारमभिवर्तते॥४२॥

‘फूलों से भरे हुए इस चैत्रमास में सीता के बिना यहाँ निवास करना मेरे लिये अत्यन्त दुःसह है। लक्ष्मण ! देखो तो सही, तिर्यग्योनि में पड़े हुए प्राणियों में भी परस्पर कितना अधिक अनुराग है। इस समय यह मोरनी कामभाव से अपने स्वामी के सामने उपस्थित हुई है॥ ४१-४२॥

ममाप्येवं विशालाक्षी जानकी जातसम्भ्रमा।

मदनेनाभिवर्तेत यदि नापहृता भवेत्॥४३॥

‘यदि विशाल नेत्रोंवाली सीता का अपहरण न हुआ होता तो वह भी इसी प्रकार बड़े प्रेम से वेगपूर्वक मेरे पास आती॥ ४३॥

पश्य लक्ष्मण पुष्पाणि निष्फलानि भवन्ति मे।

पुष्पभारसमृद्धानां वनानां शिशिरात्यये॥४४॥

‘लक्ष्मण! इस वसन्त ऋतु में फूलों के भार से सम्पन्न हुए इन वनों के ये सारे फूल मेरे लिये निष्फल हो रहे हैं। प्रिया सीता के यहाँ न होने से इनका मेरे लिये कोई प्रयोजन नहीं रह गया है। ४४ ॥

रुचिराण्यपि पुष्पाणि पादपानामतिश्रिया।

निष्फलानि महीं यान्ति समं मधुकरोत्करैः॥ ४५॥

‘अत्यन्त शोभा से मनोहर प्रतीत होने वाले ये वृक्षों के फूल भी निष्फल होकर भ्रमरसमूहों के साथ ही पृथ्वी पर गिर जाते हैं॥ ४५ ॥

नदन्ति कामं शकुना मुदिताः सङ्घशः कलम्।

आह्वयन्त इवान्योन्यं कामोन्मादकरा मम॥ ४६॥

‘हर्ष में भरे हुए ये झुंड-के-झुंड पक्षी एक-दूसरे को बुलाते हुए-से इच्छानुसार कलरव कर रहे हैं और मेरे मन में प्रेमोन्माद उत्पन्न किये देते हैं॥ ४६॥

वसन्तो यदि तत्रापि यत्र मे वसति प्रिया।

नूनं परवशा सीता सापि शोचत्यहं यथा॥४७॥

‘जहाँ मेरी प्रिया सीता निवास करती है, वहाँ भी यदि इसी तरह वसन्त छा रहा हो तो उसकी क्या दशा होगी? निश्चय ही वहाँ पराधीन हुई सीता मेरी ही तरह शोक कर रही होगी॥४७॥

नूनं न तु वसन्तस्तं देशं स्पृशति यत्र सा।

कथं ह्यसितपद्माक्षी वर्तयेत् सा मया विना॥ ४८॥

‘अवश्य ही जहाँ सीता है, उस एकान्त स्थान में वसन्त का प्रवेश नहीं है तो भी मेरे बिना वह कजरारे नेत्रोंवाली कमलनयनी सीता कैसे जीवित रह सकेगी॥४८॥

अथवा वर्तते तत्र वसन्तो यत्र मे प्रिया।

किं करिष्यति सुश्रोणी सा तु निर्भसिता परैः॥ ४९॥

‘अथवा सम्भव है जहाँ मेरी प्रिया है वहाँ भी इसी तरह वसन्त छा रहा हो, परंतु उसे तो शत्रुओं की डाँटफटकार सुननी पड़ती होगी; अतः वह बेचारी सुन्दरी सीता क्या कर सकेगी॥४९॥

श्यामा पद्मपलाशाक्षी मृदुभाषा च मे प्रिया।

नूनं वसन्तमासाद्य परित्यक्ष्यति जीवितम्॥५०॥

‘जिसकी अभी नयी-नयी अवस्था है और प्रफुल्ल कमलदल के समान मनोहर नेत्र हैं, वह मीठी बोली बोलने वाली मेरी प्राणवल्लभा जानकी निश्चय ही इस वसन्त ऋतु को पाकर अपने प्राण त्याग देगी॥ ५० ॥

दृढं हि हृदये बुद्धिर्मम सम्परिवर्तते।

नालं वर्तयितुं सीता साध्वी मदिरहं गता॥५१॥

‘मेरे हृदय में यह विचार दृढ़ होता जा रहा है कि साध्वी सीता मुझसे अलग होकर अधिक कालतक जीवित नहीं रह सकती॥५१॥

मयि भावो हि वैदेह्यास्तत्त्वतो विनिवेशितः।

ममापि भावः सीतायां सर्वथा विनिवेशितः॥ ५२॥

‘वास्तव में विदेहकुमारीका हार्दिक अनुराग मुझमें और मेरा सम्पूर्ण प्रेम सर्वथा विदेहनन्दिनी सीता में ही प्रतिष्ठित है॥५२॥

एष पुष्पवहो वायुः सुखस्पर्शो हिमावहः।

तां विचिन्तयतः कान्तां पावकप्रतिमो मम॥ ५३॥

‘फूलों की सुगन्ध लेकर बहने वाली यह शीतलवायु, जिसका स्पर्श बहुत ही सुखद है, प्राणवल्लभा सीता की याद आने पर मुझे आग की भाँति तपाने लगती है॥ ५३॥

सदा सुखमहं मन्ये यं पुरा सह सीतया।

मारुतः स विना सीतां शोकसंजननो मम॥५४॥

‘पहले जानकी के साथ रहने पर जो मुझे सदा सुखद जान पड़ती थी, वही वायु आज सीता के विरह में मेरे लिये शोकजनक हो गयी है॥ ५४॥

तां विनाथ विहङ्गोऽसौ पक्षी प्रणदितस्तदा।

वायसः पादपगतः प्रहृष्टमभिकूजति॥५५॥

‘जब सीता मेरे साथ थी उन दिनों जो पक्षी कौआ आकाश में जाकर काँव-काँव करता था, वह उसके भावी वियोग को सूचित करने वाला था। अब सीता के वियोगकाल में वह कौआ वृक्ष पर बैठकर बड़े हर्ष के साथ अपनी बोली बोल रहा है (इससे सूचित हो रहा है कि सीता का संयोग शीघ्र ही सुलभ होगा) ॥ ५५ ॥

एष वै तत्र वैदेह्या विहगः प्रतिहारकः।

पक्षी मां तु विशालाक्ष्याः समीपमुपनेष्यति॥ ५६॥

‘यही वह पक्षी है, जो आकाश में स्थित होकर बोलने पर वैदेही के अपहरण का सूचक हुआ; किंतु आज यह जैसी बोली बोल रहा है, उससे जान पड़ता है कि यह मुझे विशाललोचना सीता के समीप ले जायगा॥५६॥

पश्य लक्ष्मण संनादं वने मदविवर्धनम्।

पुष्पिताग्रेषु वृक्षेषु द्विजानामवकूजताम्॥५७॥

‘लक्ष्मण! देखो, जिनकी ऊपरी डालियाँ फूलों से लदी हैं, वन में उन वृक्षों पर कलरव करने वाले पक्षियों का यह मधुर शब्द विरहीजनों के मदनोन्माद को बढ़ानेवाला है।

विक्षिप्तां पवनेनैतामसौ तिलकमञ्जरीम्।

षट्पदः सहसाभ्येति मदोद्धृतामिव प्रियाम्॥ ५८॥

‘वायु के द्वारा हिलायी जाती हुई उस तिलक वृक्ष की मंजरी पर भ्रमर सहसा जा बैठा है। मानो कोई प्रेमी काममद से कम्पित हई प्रेयसी से मिल रहा हो। ५८॥

कामिनामयमत्यन्तमशोकः शोकवर्धनः।

स्तबकैः पवनोत्क्षिप्तैस्तर्जयन्निव मां स्थितः॥ ५९॥

‘यह अशोक प्रियाविरही कामी पुरुषों के लिये अत्यन्त शोक बढ़ाने वाला है। यह वायु के झोंके से कम्पित हुए पुष्पगुच्छों द्वारा मुझे डाँट बताता हुआ-सा खड़ा है॥ ५९॥

अमी लक्ष्मण दृश्यन्ते चूताः कुसुमशालिनः।

 विभ्रमोत्सिक्तमनसः साङ्गरागा नरा इव॥६०॥

‘लक्ष्मण! ये मञ्जरियों से सुशोभित होने वाले आम के वृक्ष शृङ्गार-विलास से मदमत्तहृदय होकर चन्दन आदि अङ्गराग धारण करने वाले मनुष्यों के समान दिखायी देते हैं। ६० ॥

सौमित्रे पश्य पम्पायाश्चित्रासु वनराजिषु।

किंनरा नरशार्दूल विचरन्ति यतस्ततः॥६१॥

‘नरश्रेष्ठ सुमित्राकुमार! देखो, पम्पा की विचित्र वनश्रेणियों में इधर-उधर किन्नर विचर रहे हैं॥ ६१॥

इमानि शुभगन्धीनि पश्य लक्ष्मण सर्वशः।

नलिनानि प्रकाशन्ते जले तरुणसूर्यवत्॥६२॥

‘लक्ष्मण! देखो, पम्पा के जल में सब ओर खिले हुए ये सुगन्धित कमल प्रातःकाल के सूर्य की भाँति प्रकाशित हो रहे हैं। ६२॥

एषा प्रसन्नसलिला पद्मनीलोत्पलायुता।

हंसकारण्डवाकीर्णा पम्पा सौगन्धिकायुता॥ ६३॥

‘पम्पाका जल बड़ा ही स्वच्छ है। इसमें लालकमल और नील कमल खिले हुए हैं। हंस और कारण्डव आदि पक्षी सब ओर फैले हुए हैं तथा सौगन्धिक कमल इसकी शोभा बढ़ा रहे हैं। ६३॥

जले तरुणसूर्याभैः षट्पदाहतकेसरैः।

पङ्कजैः शोभते पम्पा समन्तादभिसंवृता॥६४॥

‘जल में प्रातःकाल के सूर्य की भाँति प्रकाशित होने वाले कमलों के द्वारा सब ओर से घिरी हुई पम्पाबड़ी शोभा पा रही है। उन कमलों के केसरों को भ्रमरों ने चूस लिया है॥ ६४॥

चक्रवाकयुता नित्यं चित्रप्रस्थवनान्तरा।

मातङ्गमृगयूथैश्च शोभते सलिलार्थिभिः॥६५॥

‘इसमें चक्रवाक सदा निवास करते हैं। यहाँ के वनों में विचित्र-विचित्र स्थान हैं तथा पानी पीने के लिये आये हुए हाथियों और मृगों के समूहों से इस पम्पा की शोभा और भी बढ़ जाती है॥६५॥

पवनाहतवेगाभिरूर्मिभिर्विमलेऽम्भसि।

पङ्कजानि विराजन्ते ताड्यमानानि लक्ष्मण॥ ६६॥

‘लक्ष्मण ! वायु के थपेड़े से जिनमें वेग पैदा होता है, उन लहरों से ताड़ित होने वाले कमल पम्पा के निर्मल जल में बड़ी शोभा पाते हैं॥६६॥

पद्मपत्रविशालाक्षीं सततं प्रियपङ्कजाम्।

अपश्यतो मे वैदेहीं जीवितं नाभिरोचते॥६७॥

‘प्रफुल्ल कमलदल के समान विशाल नेत्रोंवाली विदेहराजकुमारी सीता को कमल सदा ही प्रिय रहे हैं। उसे न देखने के कारण मुझे जीवित रहना अच्छा नहीं लगता है॥६७॥

अहो कामस्य वामत्वं यो गतामपि दुर्लभाम्।

स्मारयिष्यति कल्याणी कल्याणतरवादिनीम्॥ ६८॥

‘अहो! काम कितना कुटिल है, जो अन्यत्र गयी हुई एवं परम दुर्लभ होने पर भी कल्याणमय वचन बोलने वाली उस कल्याणस्वरूपा सीता का बारंबार स्मरण दिला रहा है॥ ६८॥

शक्यो धारयितुं कामो भवेदभ्यागतो मया।

यदि भूयो वसन्तो मां न हन्यात् पुष्पितद्रुमः॥ ६९॥

‘यदि खिले हुए वृक्षों वाला यह वसन्त मुझ पर पुनः प्रहार न करे तो प्राप्त हुई कामवेदना को मैं किसी तरह मन में ही रोके रह सकता हूँ॥ ६९॥

यानि स्म रमणीयानि तया सह भवन्ति मे।

तान्येवारमणीयानि जायन्ते मे तया विना॥७०॥

‘सीता के साथ रहने पर जो-जो वस्तुएँ मुझे रमणीय प्रतीत होती थीं, वे ही आज उसके बिना असुन्दर जान पड़ती हैं। ७०॥

पद्मकोशपलाशानि द्रष्टं दृष्टिर्हि मन्यते।

सीताया नेत्रकोशाभ्यां सदृशानीति लक्ष्मण॥ ७१॥

‘लक्ष्मण! ये कमलकोशों के दल सीता के नेत्रकोशों के समान हैं। इसलिये मेरी आँखें इन्हें ही देखना चाहती हैं।

पद्मकेसरसंसृष्टो वृक्षान्तरविनिःसृतः।

निःश्वास इव सीताया वाति वायुर्मनोहरः॥७२॥

‘कमलकेसरों का स्पर्श करके दूसरे वृक्षों के बीच से निकली हुई यह सौरभयुक्त मनोहर वायु सीता के निःश्वास की भाँति चल रही है॥७२॥

सौमित्रे पश्य पम्पाया दक्षिणे गिरिसानुषु।

पुष्पितां कर्णिकारस्य यष्टिं परमशोभिताम्॥ ७३॥

‘सुमित्रानन्दन! वह देखो, पम्पाके दक्षिण भाग में पर्वत-शिखरों पर खिली हुई कनेर की डाल कितनी अधिक शोभा पा रही है। ७३ ॥

अधिकं शैलराजोऽयं धातुभिस्तु विभूषितः।

विचित्रं सृजते रेणुं वायुवेगविघट्टितम्॥७४॥

‘विभिन्न धातुओं से विभूषित हुआ यह पर्वतराज ऋष्यमूक वायु के वेग से लायी हुई विचित्र धूलि की सृष्टि कर रहा है।। ७४॥

गिरिप्रस्थास्तु सौमित्रे सर्वतः सम्प्रपुष्पितैः।

निष्पत्रैः सर्वतो रम्यैः प्रदीप्ता इव किंशुकैः॥ ७५॥

‘सुमित्राकुमार! चारों ओर खिले हुए और सब ओर से रमणीय प्रतीत होने वाले पत्रहीन पलाश वृक्षों से उपलक्षित इस पर्वत के पृष्ठभाग आग में जलते हुए-से जान पड़ते हैं। ७५॥

पम्पातीररुहाश्चेमे संसिक्ता मधुगन्धिनः।

मालतीमल्लिकापद्मकरवीराश्च पुष्पिताः॥७६॥

‘पम्पा के तट पर उत्पन्न हुए ये वृक्ष इसी के जल से अभिषिक्त हो बढ़े हैं और मधुर मकरन्द एवं गन्ध से सम्पन्न हुए हैं। इनके नाम इस प्रकार हैं—मालती, मल्लिका, पद्म और करवीर। ये सब-के-सब फूलों से सुशोभित हैं॥ ७६॥

केतक्यः सिन्दुवाराश्च वासन्त्यश्च सुपुष्पिताः।

माधव्यो गन्धपूर्णाश्च कुन्दगुल्माश्च सर्वशः॥ ७७॥

‘केतकी (केवड़े), सिन्दुवार तथा वासन्ती लताएँ भी सुन्दर फूलों से भरी हुई हैं! गन्धभरी माधवी लता तथा कुन्द-कुसुमों की झाड़ियाँ सब ओर शोभा पा रही हैं॥ ७७॥

चिरिबिल्वा मधूकाश्च वञ्जुला बकुलास्तथा।

चम्पकास्तिलकाश्चैव नागवृक्षाश्च पुष्पिताः॥ ७८॥

‘चिरिबिल्व (चिलबिल), महुआ, बेंत, मौलसिरी, चम्पा, तिलक और नागकेसर भी खिले दिखायी देते

पद्मकाश्चैव शोभन्ते नीलाशोकाश्च पुष्पिताः।

लोध्राश्च गिरिपृष्ठेषु सिंहकेसरपिञ्जराः॥७९॥

‘पर्वत के पृष्ठभागों पर पद्मक और खिले हुए नील अशोक भी शोभा पाते हैं। वहीं सिंह के अयाल की भाँति पिङ्गल वर्णवाले लोध्र भी सुशोभित हो रहे हैं। ७९॥

अङ्कोलाश्च कुरण्टाश्च चूर्णकाः पारिभद्रकाः।

चूताः पाटलयश्चापि कोविदाराश्च पुष्पिताः॥ ८०॥

मुचुकुन्दार्जुनाश्चैव दृश्यन्ते गिरिसानुषु।

‘अङ्कोल, कुरंट, चूर्णक (सेमल), पारिभद्रक(नीम या मदार), आम, पाटलि, कोविदार, मुचुकुन्द (नारङ्ग) और अर्जुन नामक वृक्ष भी पर्वत-शिखरों पर फूलों से लदे दिखायी देते हैं। ८० १/२॥

केतकोद्दालकाश्चैव शिरीषाः शिंशपा धवाः॥ ८१॥

शाल्मल्यः किंशुकाश्चैव रक्ताः कुरबकास्तथा।

तिनिशा नक्तमालाश्च चन्दनाः स्यन्दनास्तथा॥ ८२॥

हिन्तालास्तिलकाश्चैव नागवृक्षाश्च पुष्पिताः।

‘केतक, उद्दालक (लसोड़ा), शिरीष, शीशम, धव, सेमल, पलाश, लाल कुरबक, तिनिश, नक्तमाल, चन्दन, स्यन्दन, हिन्ताल, तिलक तथा नागकेसर के पेड़ भी फूलों से  भरे दिखायी देते हैं। ८१-८२ १/२॥

पुष्पितान् पुष्पिताग्राभिलताभिः परिवेष्टितान्॥ ८३॥

द्रमान् पश्येह सौमित्रे पम्पाया रुचिरान् बहून्।

सुमित्रानन्दन! जिनके अग्रभाग फूलों से भरे हुए हैं, उन लता-वल्लरियों से लिपटे हुए पम्पा के इन मनोहर और बहुसंख्यक वृक्षों को तो देखो। वे सब-के-सब यहाँ फूलों के भार से लदे हुए हैं। ८३ १/२ ॥

वातविक्षिप्तविटपान् यथासन्नान् द्रुमानिमान्॥ ८४॥

लताः समनुवर्तन्ते मत्ता इव वरस्त्रियः।

‘हवा के झोंके खाकर जिनकी डालें हिल रही हैं, वे ये वृक्ष झुककर इतने निकट आ जाते हैं कि हाथ से इनकी डालियों का स्पर्श किया जा सके। सलोनी लताएँ मदमत्त सुन्दरियों की भाँति इनका अनुसरण करती हैं। ८४ १/२॥

पादपात् पादपं गच्छन् शैलाच्छैलं वनाद् वनम्॥ ८५॥

वाति नैकरसास्वादसम्मोदित इवानिलः।

‘एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष पर, एक पर्वत से दूसरे पर्वत पर तथा एक वन से दूसरे वन में जाती हुई वायु अनेक रसों के आस्वादन से आनन्दित-सी होकर बह रही है॥ ८५ १/२॥

केचित् पर्याप्तकुसुमाः पादपा मधुगन्धिनः॥ ८६॥

केचिन्मुकुलसंवीताः श्यामवर्णा इवाबभुः।

‘कुछ वृक्ष प्रचुर पुष्पों से भरे हुए हैं और मधु एवं सुगन्ध से सम्पन्न हैं। कुछ मुकुलों से आवेष्टित होश्यामवर्ण-से प्रतीत हो रहे हैं। ८६ १/२॥

इदं मृष्टमिदं स्वादु प्रफुल्लमिदमित्यपि॥ ८७॥

रागरक्तो मधुकरः कुसुमेष्वेव लीयते।

‘वह भ्रमर राग से रँगा हुआ है और यह मधुर है, यह स्वादिष्ट है तथा यह अधिक खिला हुआ है’ इत्यादि बातें सोचता हुआ फूलों में ही लीन हो रहा है॥ ८७ १/२॥

निलीय पुनरुत्पत्य सहसान्यत्र गच्छति।

मधुलुब्धो मधुकरः पम्पातीरद्रुमेष्वसौ॥८८॥

‘पुष्पों में छिपकर फिर ऊपर को उड़ जाता है और सहसा अन्यत्र चल देता है। इस प्रकार मधु का लोभी भ्रमर पम्पातीरवर्ती वृक्षों पर विचर रहा है। ८८ ॥

इयं कुसुमसंघातैरुपस्तीर्णा सुखाकृता।

स्वयं निपतितैर्भूमिः शयनप्रस्तरैरिव॥८९॥

‘स्वयं झड़कर गिरे हुए पुष्पसमूहों से आच्छादित हुई यह भूमि ऐसी सुखदायिनी हो गयी है, मानो इसपर शयन करने के लिये मुलायम बिछौने बिछा दिये गये हों॥ ८९॥

विविधा विविधैः पुष्पैस्तैरेव नगसानुषु।

विस्तीर्णाः पीतरक्ताभाः सौमित्रे प्रस्तराः कृताः॥ ९०॥

‘सुमित्रानन्दन! पर्वत के शिखरों पर जो नानाप्रकार की विशाल शिलाएँ हैं, उनपर झड़े हुए भाँति-भाँति के फूलों ने उन्हें लाल-पीले रंग की शय्याओं के समान बना दिया है॥९०॥

हिमान्ते पश्य सौमित्रे वृक्षाणां पुष्पसम्भवम्।

पुष्पमासे हि तरवः संघर्षादिव पुष्पिताः॥९१॥

‘सुमित्राकुमार! वसन्त ऋतु में वृक्षों के फूलों का यह वैभव तो देखो। इस चैत्र मास में ये वृक्ष मानो परस्पर होड़ लगाकर फूले हुए हैं॥९१॥

आह्वयन्त इवान्योन्यं नगाः षट्पदनादिताः।

कुसुमोत्तंसविटपाः शोभन्ते बहु लक्ष्मण॥ ९२॥

‘लक्ष्मण! वृक्ष अपनी ऊपरी डालियों पर फूलों का मुकुट धारण करके बड़ी शोभा पा रहे हैं तथा वे भ्रमरों के गुञ्जारव से इस तरह कोलाहलपूर्ण हो रहे हैं, मानो एक-दूसरे का आह्वान कर रहे हों। ९२॥

एष कारण्डवः पक्षी विगाह्य सलिलं शुभम्।

रमते कान्तया सार्धं काममुद्दीपयन्निव॥९३॥

‘यह कारण्डव पक्षी पम्पा के स्वच्छ जल में प्रवेश करके अपनी प्रियतमा के साथ रमण करता हुआ काम का उद्दीपन-सा कर रहा है। ९३॥

मन्दाकिन्यास्तु यदिदं रूपमेतन्मनोरमम्।

स्थाने जगति विख्याता गुणास्तस्या मनोरमाः॥ ९४॥

‘मन्दाकिनी के समान प्रतीत होने वाली इस पम्पा का जब ऐसा मनोरम रूप है, तब संसार में उसके जो मनोरम गुण विख्यात हैं, वे उचित ही हैं॥ ९४॥

यदि दृश्येत सा साध्वी यदि चेह वसेमहि।

स्पृहयेयं न शक्राय नायोध्यायै रघूत्तम ॥ ९५॥

‘रघुश्रेष्ठ लक्ष्मण! यदि साध्वी सीता दीख जाय और यदि उसके साथ हम यहाँ निवास करने लगें तो हमें न इन्द्रलोक में जाने की इच्छा होगी और न अयोध्या लौटने की ही॥९५ ॥

न ह्येवं रमणीयेषु शाहलेषु तया सह।

रमतो मे भवेच्चिन्ता न स्पृहान्येषु वा भवेत्॥ ९६॥

‘हरी-हरी घासों से सुशोभित ऐसे रमणीय प्रदेशों में सीता के साथ सानन्द विचरने का अवसर मिले तो मुझे(अयोध्या का राज्य न मिलने के कारण) कोई चिन्ता नहीं होगी और न दूसरे ही दिव्य भोगों की अभिलाषा हो सकेगी॥ ९६॥

अमी हि विविधैः पुष्पैस्तरवो विविधच्छदाः।

काननेऽस्मिन् विना कान्तां चिन्तामुत्पादयन्ति मे॥९७॥

‘इस वन में भाँति-भाँति के पल्लवों से सुशोभित और नाना प्रकार के फूलों से उपलक्षित ये वृक्ष प्राणवल्लभा सीता के बिना मेरे मन में चिन्ता उत्पन्न कर देते हैं।

पश्य शीतजलां चेमां सौमित्रे पुष्करायुताम्।

चक्रवाकानुचरितां कारण्डवनिषेविताम्॥९८॥

प्लवैः क्रौञ्चैश्च सम्पूर्णां महामृगनिषेविताम्।

‘सुमित्राकुमार! देखो, इस पम्पा का जल कितना शीतल है। इसमें असंख्य कमल खिले हुए हैं। चकवे विचरते हैं और कारण्डव निवास करते हैं। इतना ही नहीं, जलकुक्कुट तथा क्रौञ्च भरे हुए हैं एवं बड़े-बड़े मृग इसका सेवन करते हैं। ९८ १/२॥

अधिकं शोभते पम्पा विकूजद्भिर्विहंगमैः॥९९॥

दीपयन्तीव मे कामं विविधा मुदिता द्विजाः।

श्यामां चन्द्रमुखीं स्मृत्वा प्रियां पद्मनिभेक्षणाम्॥ १००॥

‘चहकते हुए पक्षियों से इस पम्पा की बड़ी शोभा हो रही है। आनन्द में निमग्न हुए ये नाना प्रकार के पक्षी मेरे सीताविषयक अनुराग को उद्दीप्त कर देते हैं; क्योंकि इनकी बोली सुनकर मुझे नूतन अवस्थावाली कमलनयनी चन्द्रमुखी प्रियतमा सीता का स्मरण हो आता है॥ ९९-१०० ॥

पश्य सानुषु चित्रेषु मृगीभिः सहितान् मृगान्।

मां पुनर्मूगशावाक्ष्या वैदेह्या विरहीकृतम्।

व्यथयन्तीव मे चित्तं संचरन्तस्ततस्ततः॥१०१॥

‘लक्ष्मण! देखो, पर्वत के विचित्र शिखरों पर ये हरिण अपनी हरिणियों के साथ विचर रहे हैं और मैं मृगनयनी सीता से बिछुड़ गया हूँ। इधर-उधर विचरते हुए ये मृग मेरे चित्त को व्यथित किये देते हैं॥१०१॥

अस्मिन् सानुनि रम्ये हि मत्तद्विजगणाकुले।

पश्येयं यदि तां कान्तां ततः स्वस्ति भवेन्मम॥ १०२॥

‘मतवाले पक्षियों से भरे हुए इस पर्वत के रमणीय शिखर पर यदि प्राणवल्लभा सीता का दर्शन पा सकूँ तभी मेरा कल्याण होगा॥ १०२॥

जीवेयं खलु सौमित्रे मया सह सुमध्यमा।

सेवेत यदि वैदेही पम्पायाः पवनं शुभम्॥१०३॥

‘सुमित्रानन्दन! यदि सुमध्यमा सीता मेरे साथ रहकर इस पम्पासरोवर के तट पर सुखद समीर का सेवन कर सके तो मैं निश्चय ही जीवित रह सकता हूँ॥ १०३॥

पद्मसौगन्धिकवहं शिवं शोकविनाशनम्।

धन्या लक्ष्मण सेवन्ते पम्पाया वनमारुतम्॥ १०४॥

‘लक्ष्मण! जो लोग अपनी प्रियतमा के साथ रहकर पद्म और सौगन्धिक कमलों की सुगन्ध लेकर बहने वाली शीतल, मन्द एवं शोकनाशन पम्पा-वन की वायु का सेवन करते हैं, वे धन्य हैं॥ १०४॥

श्यामा पद्मपलाशाक्षी प्रिया विरहिता मया।

कथं धारयति प्राणान् विवशा जनकात्मजा॥ १०५॥

‘हाय! वह नयी अवस्थावाली कमललोचना जनकनन्दिनी प्रिया सीता मुझसे बिछुड़कर बेबसी की दशा में अपने प्राणों को कैसे धारण करती होगी। १०५॥

किं नु वक्ष्यामि धर्मज्ञं राजानं सत्यवादिनम्।

जनकं पृष्टसीतं तं कुशलं जनसंसदि॥१०६॥

‘लक्ष्मण! धर्म के जानने वाले सत्यवादी राजा जनक जब जन-समुदाय में बैठकर मुझसे सीता का कुशल समाचार पूछेगे, उस समय मैं उन्हें क्या उत्तर दूंगा। १०६॥

या मामनुगता मन्दं पित्रा प्रस्थापितं वनम्।

सीता धर्मं समास्थाय क्व नु सा वर्तते प्रिया॥ १०७॥

‘हाय! पिता के द्वारा वन में भेजे जाने पर जो धर्म का आश्रय ले मेरे पीछे-पीछे यहाँ चली आयी, वह मेरी प्रिया इस समय कहाँ है ? ॥ १०७॥

तया विहीनः कृपणः कथं लक्ष्मण धारये।

या मामनुगता राज्याद् भ्रष्टं विहतचेतसम्॥ १०८॥

‘लक्ष्मण! जिसने राज्य से वञ्चित और हताश हो जाने पर भी मेरा साथ नहीं छोड़ा-मेरा ही अनुसरण किया, उसके बिना अत्यन्त दीन होकर मैं कैसे जीवन धारण करूँगा॥ १०८॥

तच्चाञ्चितपद्माक्षं सुगन्धि शुभमव्रणम्।

अपश्यतो मुखं तस्याः सीदतीव मतिर्मम॥ १०९॥

‘जो कमलदल के समान सुन्दर, मनोहर एवं प्रशंसनीय नेत्रों से सुशोभित है, जिससे मीठी-मीठी सुगन्ध निकलती रहती है, जो निर्मल तथा चेचक आदि के चिह्नसे रहित है, जनककिशोरी के उस दर्शनीय मुख को देखे बिना मेरी सुध-बुध खोयी जा रही है॥ १०९॥

स्मितहास्यान्तरयुतं गुणवन्मधुरं हितम्।

वैदेह्या वाक्यमतुलं कदा श्रोष्यामि लक्ष्मण॥ ११०॥

‘लक्ष्मण! वैदेही के द्वारा कभी हँसकर और कभी मुसकराकर कही हुई वे मधुर, हितकर एवं लाभदायक बातें जिनकी कहीं तुलना नहीं है, मुझे अब कब सुनने को मिलेंगी? ॥ ११०॥

प्राप्य दुःखं वने श्यामा मां मन्मथविकर्शितम्।

नष्टदुःखेव हृष्टेव साध्वी साध्वभ्यभाषत॥१११॥

‘सोलह वर्ष की-सी अवस्था वाली साध्वी सीता यद्यपि वन में आकर कष्ट उठा रही थी, तथापि जब मुझे अनङ्गवेदना या मानसिक कष्ट से पीड़ित देखती, तब मानो उसका अपना सारा दुःख नष्ट हो गया हो, इस प्रकार प्रसन्न-सी होकर मेरी पीड़ा दूर करने के लिये अच्छी-अच्छी बातें करने लगती थी॥ १११॥

किं नु वक्ष्याम्ययोध्यायां कौसल्यां हि नृपात्मज।

क्व सा स्नुषेति पृच्छन्तीं कथं चापि मनस्विनीम्॥ ११२॥

‘राजकुमार! अयोध्या में चलने पर जब मनस्विनी माता कौसल्या पूछेगी कि ‘मेरी बहूरानी कहाँ है?’ तो मैं उन्हें क्या उत्तर दूंगा? ॥ ११२॥

गच्छ लक्ष्मण पश्य त्वं भरतं भ्रातृवत्सलम्।

नह्यहं जीवितुं शक्तस्तामृते जनकात्मजाम्॥ ११३॥

इति रामं महात्मानं विलपन्तमनाथवत्।

उवाच लक्ष्मणो भ्राता वचनं युक्तमव्ययम्॥ ११४॥

‘लक्ष्मण! तुम जाओ, भ्रातृवत्सल भरत से मिलो। मैं तो जनकनन्दिनी सीता के बिना जीवित नहीं रह सकता।’ इस प्रकार महात्मा श्रीराम को अनाथ की भाँति विलाप करते देख भाई लक्ष्मण ने युक्तियुक्त एवं निर्दोष वाणी में कहा- ॥ ११२-११४॥

संस्तम्भ राम भद्रं ते मा शुचः पुरुषोत्तम।

नेदृशानां मतिर्मन्दा भवत्यकलुषात्मनाम्॥११५॥

‘पुरुषोत्तम श्रीराम! आपका भला हो। आप अपने को सँभालिये। शोक न कीजिये। आप-जैसे पुण्यात्मा पुरुषों की बुद्धि उत्साहशून्य नहीं होती। ११५॥

स्मृत्वा वियोगजं दुःखं त्यज स्नेहं प्रिये जने।

अतिस्नेहपरिष्वङ्गाद् वर्तिरार्द्रापि दह्यते॥११६॥

‘स्वजनों के अवश्यम्भावी वियोग का दुःख सभी को सहना पड़ता है, इस बात को स्मरण करके अपने प्रिय जनों के प्रति अधिक स्नेह (आसक्ति) को त्याग दीजिये; क्योंकि जल आदि से भीगी हुई बत्ती भी अधिक स्नेह (तेल) में डुबो दी जाने पर जलने लगती है॥ ११६॥

यदि गच्छति पातालं ततोऽभ्यधिकमेव वा।

सर्वथा रावणस्तात न भविष्यति राघव॥११७॥

‘तात रघुनन्दन ! यदि रावण पाताल में या उससे भी अधिक दूर चला जाय तो भी वह अब किसी तरह जीवित नहीं रह सकता॥ ११७ ॥

प्रवृत्तिर्लभ्यतां तावत् तस्य पापस्य रक्षसः।

ततो हास्यति वा सीतां निधनं वा गमिष्यति॥ ११८॥

‘पहले उस पापी राक्षस का पता लगाइये। फिर या तो वह सीता को वापस करेगा या अपने प्राणों से हाथ धो बैठेगा॥ ११८॥

यदि याति दितेर्गर्भं रावणं सह सीतया।

तत्राप्येनं हनिष्यामि न चेद् दास्यति मैथिलीम्॥ ११९॥

‘रावण यदि सीता को साथ लेकर दिति के गर्भ में जाकर छिप जाय तो भी यदि मिथिलेशकुमारी को लौटा न देगा तो मैं वहाँ भी उसे मार डालूँगा॥ ११९ ॥

स्वास्थ्यं भद्रं भजस्वार्य त्यज्यतां कृपणा मतिः।

अर्थो हि नष्टकार्याथै रयत्नेनाधिगम्यते॥१२०॥

‘अतः आर्य! आप कल्याणकारी धैर्य को अपनाइये। वह दीनतापूर्ण विचार त्याग दीजिये। जिनका प्रयत्न और धन नष्ट हो गया है, वे पुरुष यदिउत्साहपूर्वक उद्योग न करें तो उन्हें उस अभीष्ट अर्थ की प्राप्ति नहीं हो सकती॥ १२० ॥

उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात् परं बलम्।

सोत्साहस्य हि लोकेषु न किंचिदपि दुर्लभम्॥ १२१॥

‘भैया! उत्साह ही बलवान् होता है। उत्साह से बढ़कर दूसरा कोई बल नहीं है। उत्साही पुरुष के लिये संसार में कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं है। १२१ ॥

उत्साहवन्तः पुरुषा नावसीदन्ति कर्मसु।

उत्साहमात्रमाश्रित्य प्रतिलप्स्याम जानकीम्॥ १२२॥

‘जिनके हृदय में उत्साह होता है वे पुरुष कठिन-से कठिन कार्य आ पड़ने पर हिम्मत नहीं हारते। हमलोग केवल उत्साह का आश्रय लेकर ही जनकनन्दिनी को प्राप्त कर सकते हैं॥ १२२॥

त्यजतां कामवृत्तत्वं शोकं संन्यस्य पृष्ठतः।

महात्मानं कृतात्मानमात्मानं नावबुध्यसे॥१२३॥

‘शोक को पीछे छोड़कर कामी के-से व्यवहार का त्याग कीजिये। आप महात्मा एवं कृतात्मा (पवित्र अन्तःकरण वाले) हैं, किंतु इस समय अपने-आपको भूल गये हैं अपने स्वरूप का स्मरण नहीं कर रहे हैं’॥ १२३॥

एवं सम्बोधितस्तेन शोकोपहतचेतनः।

त्यज्य शोकं च मोहं च रामो धैर्यमुपागमत्॥ १२४॥

लक्ष्मण के इस प्रकार समझाने पर शोक से संतप्तचित्त हुए श्रीराम ने शोक और मोह का परित्याग करके धैर्य धारण किया॥ १२४॥

सोऽभ्यतिक्रामदव्यग्रस्तामचिन्त्यपराक्रमः।

रामः पम्पां सुरुचिरां रम्यां पारिप्लवद्रुमाम्॥ १२५॥

तदनन्तर व्यग्रतारहित (शान्तस्वरूप) अचिन्त्यपराक्रमी श्रीरामचन्द्रजी जिसके तटवर्ती वृक्ष वायु के झोंके खाकर झूम रहे थे, उस परम सुन्दर रमणीय पम्पासरोवर को लाँघकर आगे बढ़े॥ १२५ ॥

निरीक्षमाणः सहसा महात्मा सर्वं वनं निर्झरकन्दरं च।

उद्विग्नचेताः सह लक्ष्मणेन विचार्य दुःखोपहतः प्रतस्थे॥१२६॥

सीता के स्मरण से जिनका चित्त उद्विग्न हो गया था, अत एव जो दुःख में डूबे हुए थे, वे महात्मा श्रीरामलक्ष्मण की कही हुई बातों पर विचार करके सहसा सावधान हो गये और झरनों तथा कन्दराओंसहित उस सम्पूर्ण वन का निरीक्षण करते हुए वहाँ से आगे को प्रस्थित हुए॥ १२६॥

तं मत्तमातङ्गविलासगामी गच्छन्तमव्यग्रमना महात्मा।

स लक्ष्मणो राघवमिष्टचेष्टो ररक्ष धर्मेण बलेन चैव॥१२७॥

मतवाले हाथी के समान विलासपूर्ण गति से चलने वाले शान्तचित्त महात्मा लक्ष्मण आगे-आगे चलते हुए श्रीरघुनाथजी की उनके अनुकूल चेष्टा करते धर्म और बल के द्वारा रक्षा करने लगे॥ १२७॥

तावृष्यमूकस्य समीपचारी चरन् ददर्शाद्भुतदर्शनीयौ।

शाखामृगाणामधिपस्तरस्वी वितत्रसे नैव विचेष्ट चेष्टाम्॥१२८॥

ऋष्यमूक पर्वत के समीप विचरने वाले बलवान् वानरराज सुग्रीव पम्पा के निकट घूम रहे थे। उसी समय उन्होंने उन अद्भुत दर्शनीय वीर श्रीराम और लक्ष्मण को देखा। देखते ही उनके मन में यह भय हो गया कि हो न हो इन्हें मेरे शत्रु वाली ने ही भेजा होगा, फिर तो वे इतने डर गये कि खाने-पीने आदि की भी चेष्टा न कर सके॥ १२८॥

स तौ महात्मा गजमन्दगामी शाखामृगस्तत्र चरंश्चरन्तौ।

दृष्ट्वा विषादं परमं जगाम चिन्तापरीतो भयभारभग्नः॥१२९॥

हाथी के समान मन्दगति से  चलने वाले महामना वानरराज सुग्रीव जो वहाँ विचर रहे थे, उस समय एक साथ आगे बढ़ते हुए उन दोनों भाइयों को देखकर चिन्तित हो उठे। भय के भारी भार से उनका उत्साह नष्ट हो गया। वे महान् दुःख में पड़ गये। १२९॥

तमाश्रमं पुण्यसुखं शरण्यं सदैव शाखामृगसेवितान्तम्।

त्रस्ताश्च दृष्ट्वा हरयोऽभिजग्मुमहौजसौ राघवलक्ष्मणौ तौ॥ १३०॥

मतङ्ग मुनि का वह आश्रम परम पवित्र एवं सुखदायक था। मुनि के शाप से उसमें वाली का प्रवेश होना कठिन था, इसलिये वह दूसरे वानरों का आश्रय बना हुआ था। उस आश्रम या वन के भीतर सदा ही अनेकानेक शाखामृग निवास करते थे। उस दिन उन महातेजस्वी श्रीराम और लक्ष्मण को देखकर दूसरे दूसरे वानर भी भयभीत हो आश्रम के भीतर चले गये॥ १३०॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे प्रथमः सर्गः॥१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में पहला सर्ग पूरा हुआ।१॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

सुग्रीव तथा वानरों की आशङ्का, हनुमान्जी द्वारा उसका निवारण तथा सुग्रीव का हनुमान जी को श्रीराम-लक्ष्मण के पास उनका भेद लेने के लिये भेजना

द्वितीयः सर्गः

सर्ग-02


तौ तु दृष्ट्वा महात्मानौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ।

वरायुधधरौ वीरौ सुग्रीवः शङ्कितोऽभवत्॥१॥

महात्मा श्रीराम और लक्ष्मण दोनों भाइयों को श्रेष्ठ आयुध धारण किये वीर वेश में आते देख (ऋष्यमूक पर्वत पर बैठे हुए) सुग्रीव के मन में बड़ी शङ्का हुई।१॥

उद्विग्नहृदयः सर्वा दिशः समवलोकयन्।

न व्यतिष्ठत कस्मिंश्चिद् देशे वानरपुंगवः॥२॥

वे उद्विग्नचित्त होकर चारों दिशाओं की ओर देखने लगे। उस समय वानरशिरोमणि सुग्रीव किसी एक स्थान पर स्थिर न रह सके॥२॥

नैव चक्रे मनः स्थातुं वीक्षमाणौ महाबलौ।

कपेः परमभीतस्य चित्तं व्यवससाद ह॥३॥

महाबली श्रीराम और लक्ष्मण को देखते हुए सुग्रीव अपने मन को स्थिर न रख सके। उस समय अत्यन्त भयभीत हुए उन वानरराज का चित्त बहुत दुःखी हो गया॥३॥

चिन्तयित्वा स धर्मात्मा विमृश्य गुरुलाघवम्।

सुग्रीवः परमोद्विग्नः सर्वैस्तैर्वानरैः सह॥४॥

सुग्रीव धर्मात्मा थे—उन्हें राजधर्म का ज्ञान था। उन्होंने मन्त्रियों के साथ विचारकर अपनी दुर्बलता और शत्रुपक्ष की प्रबलता का निश्चय किया। तत्पश्चात् वे समस्त वानरों के साथ अत्यन्त उद्विग्न हो उठे॥४॥

ततः स सचिवेभ्यस्तु सुग्रीवः प्लवगाधिपः।

शशंस परमोद्विग्नः पश्यंस्तौ रामलक्ष्मणौ॥५॥

वानरराज सुग्रीव के हृदय में बड़ा उद्वेग हो गया था। वे श्रीराम और लक्ष्मण की ओर देखते हुए अपने मन्त्रियों से इस प्रकार बोले- ॥५॥

एतौ वनमिदं दुर्गं वालिप्रणिहितौ ध्रुवम्।

छद्मना चीरवसनौ प्रचरन्ताविहागतौ॥६॥

‘निश्चय ही ये दोनों वीर वाली के भेजे हुए ही इस दुर्गम वन में विचरते हुए यहाँ आये हैं। इन्होंने छल से चीर वस्त्र धारण कर लिये हैं, जिससे हम इन्हें पहचान न सकें’॥६॥

ततः सुग्रीवसचिवा दृष्ट्वा परमधन्विनौ।

जग्मुर्गिरितटात् तस्मादन्यच्छिखरमुत्तमम्॥७॥

उधर सुग्रीव के सहायक दूसरे-दूसरे वानरों ने जब उन महाधनुर्धर श्रीराम और लक्ष्मण को देखा, तब वे उस पर्वततट से भागकर दूसरे उत्तम शिखर पर जा पहुँचे॥७॥

ते क्षिप्रमभिगम्याथ यूथपा यूथपर्षभम्।

हरयो वानरश्रेष्ठं परिवार्योपतस्थिरे॥८॥

वे यूथपति वानर शीघ्रतापूर्वक जाकर यूथपतियों के सरदार वानरशिरोमणि सुग्रीव को चारों ओर से घेरकर उनके पास खड़े हो गये॥ ८॥

एवमेकायनगताः प्लवमाना गिरेगिरिम्।

प्रकम्पयन्तो वेगेन गिरीणां शिखराणि च॥९॥

ततः शाखामृगाः सर्वे प्लवमाना महाबलाः।

बभञ्जुश्च नगांस्तत्र पुष्पितान् दुर्गमाश्रितान्॥ १०॥

इस तरह एक पर्वत से दूसरे पर्वत पर उछलते-कूदते और अपने वेग से उन पर्वत-शिखरों को प्रकम्पित करते हुए वे समस्त महाबली वानर एक मार्ग पर आ गये। उन सबने उछल-कूदकर उस समय वहाँ दुर्गम स्थानों में स्थित हुए पुष्पशोभित बहुसंख्यक वृक्षों को तोड़ डाला था॥९-१०॥

आप्लवन्तो हरिवराः सर्वतस्तं महागिरिम्।

मृगमार्जारशार्दूलांस्त्रासयन्तो ययुस्तदा॥११॥

उस बेला में चारों ओर से उस महान् पर्वत पर उछलकर आते हुए वे श्रेष्ठ वानर वहाँ रहने वाले मृगों, बिलावों तथा व्याघ्रों को भयभीत करते हुए जा रहे थे॥

ततः सुग्रीवसचिवाः पर्वतेन्द्रे समाहिताः।

संगम्य कपिमुख्येन सर्वे प्राञ्जलयः स्थिताः॥ १२॥

इस प्रकार सुग्रीव के सभी सचिव पर्वतराज ऋष्यमूक पर आ पहुँचे और एकाग्रचित्त हो उन वानरराज से मिलकर उनके सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गये॥ १२॥

ततस्तु भयसंत्रस्तं वालिकिल्बिषशङ्कितम्।

उवाच हनुमान् वाक्यं सुग्रीवं वाक्यकोविदः॥

तदनन्तर वाली से बुराई की आशङ्का करके सुग्रीव को भयभीत देख बातचीत करने में कुशल हनुमान जी बोले

सम्भ्रमस्त्यज्यतामेष सर्वैालिकृते महान्।

मलयोऽयं गिरिवरो भयं नेहास्ति वालिनः॥१४॥

‘आप सब लोग वाली के कारण होने वाली इस भारी घबराहट को छोड़ दीजिये। यह मलय नामक श्रेष्ठ पर्वत है। यहाँ वाली से कोई भय नहीं है॥ १४॥

यस्मादुद्विग्नचेतास्त्वं विद्रुतो हरिपुङ्गव।

तं क्रूरदर्शनं क्रूरं नेह पश्यामि वालिनम्॥१५॥

‘वानरशिरोमणे! जिससे उद्विग्नचित्त होकर आप भागे हैं, उस क्रूर दिखायी देने वाले निर्दय वाली को मैं यहाँ नहीं देखता हूँ॥ १५ ॥

यस्मात् तव भयं सौम्य पूर्वजात् पापकर्मणः।

स नेह वाली दुष्टात्मा न ते पश्याम्यहं भयम्॥

‘सौम्य! आपको अपने जिस पापाचारी बड़े भाई से भय प्राप्त हुआ है, वह दुष्टात्मा वाली यहाँ नहीं आ सकता; अतः मुझे आपके भय का कोई कारण नहीं दिखायी देता॥

अहो शाखामृगत्वं ते व्यक्तमेव प्लवङ्गम।

लघुचित्ततयाऽऽत्मानं न स्थापयसि यो मतौ॥ १७॥

‘आश्चर्य है कि इस समय आपने अपनी वानरोचित चपलता को ही प्रकट किया है। वानरप्रवर! आपका चित्त चञ्चल है। इसलिये आप अपने को विचार-मार्ग पर स्थिर नहीं रख पाते हैं। १७॥

बुद्धिविज्ञानसम्पन्न इङ्गितैः सर्वमाचर।

नह्यबुद्धिं गतो राजा सर्वभूतानि शास्ति हि॥ १८॥

‘बुद्धि और विज्ञान से सम्पन्न होकर आप दूसरों की चेष्टाओं के द्वारा उनका मनोभाव समझें और उसी के अनुसार सभी आवश्यक कार्य करें; क्योंकि जो राजा बुद्धि-बल का आश्रय नहीं लेता, वह सम्पूर्ण प्रजापर शासन नहीं कर सकता’ ॥ १८॥

सुग्रीवस्तु शुभं वाक्यं श्रुत्वा सर्वं हनूमतः।

ततः शुभतरं वाक्यं हनूमन्तमुवाच ह॥१९॥

हनुमान जी के मुख से निकले हुए इन सभी श्रेष्ठ वचनों को सुनकर सुग्रीव ने उनसे बहुत ही उत्तम बात कही

दीर्घबाहू विशालाक्षौ शरचापासिधारिणौ।

कस्य न स्याद् भयं दृष्ट्वा ह्येतौ सुरसुतोपमौ॥ २०॥

‘इन दोनों वीरों की भुजाएँ लंबी और नेत्र बड़े-बड़े हैं। ये धनुष, बाण और तलवार धारण किये देवकुमारों के समान शोभा पा रहे हैं। इन दोनों को देखकर किसके मन में भय का संचार न होगा॥२०॥

वालिप्रणिहितावेव शङ्केऽहं पुरुषोत्तमौ।

राजानो बहुमित्राश्च विश्वासो नात्र हि क्षमः॥ २१॥

‘मेरे मन में संदेह है कि ये दोनों श्रेष्ठ पुरुष वाली के ही भेजे हुए हैं; क्योंकि राजाओं के बहुत-से मित्र होते हैं। अतः उनपर विश्वास करना उचित नहीं है।॥ २१॥

अरयश्च मनुष्येण विज्ञेयाश्छद्मचारिणः।

विश्वस्तानामविश्वस्ताश्छिद्रेषु प्रहरन्त्यपि॥२२॥

‘प्राणिमात्र को छद्मवेष में विचरने वाले शत्रुओं को विशेषरूप से पहचानने की चेष्टा करनी चाहिये; क्योंकि वे दूसरों पर अपना विश्वास जमा लेते हैं, परंतु स्वयं किसी का विश्वास नहीं करते और अवसर पाते ही उन विश्वासी पुरुषों पर ही प्रहार कर बैठते हैं ॥ २२॥

कृत्येषु वाली मेधावी राजानो बहुदर्शिनः।

भवन्त परहन्तारस्ते ज्ञेयाः प्राकृतैनरैः॥ २३॥

‘वाली इन सब कार्यों में बड़ा कुशल है। राजालोग बहुदर्शी होते हैं—वञ्चना के अनेक उपाय जानते हैं, इसीलिये शत्रुओं का विध्वंस कर डालते हैं। ऐसे शत्रुभूत राजाओं को प्राकृत वेशभूषावाले मनुष्यों (गुप्तचरों) द्वारा जानने का प्रयत्न करना चाहिये। २३॥

तौ त्वया प्राकृतेनेव गत्वा ज्ञेयौ प्लवंगम।

इङ्गितानां प्रकारैश्च रूपव्याभाषणेन च ॥२४॥

‘अतः कपिश्रेष्ठ! तुम भी एक साधारण पुरुष की भाँति यहाँ से जाओ और उनकी चेष्टाओं से, रूप से तथा बातचीत के तौर-तरीकों से उन दोनों का यथार्थ परिचय प्राप्त करो॥ २४॥

लक्षयस्व तयोर्भावं प्रहृष्टमनसौ यदि।

विश्वासयन् प्रशंसाभिरिङ्गितैश्च पुनः पुनः॥ २५॥

‘उनके मनोभावों को समझो। यदि वे प्रसन्नचित्त जान पड़ें तो बारंबार मेरी प्रशंसा करके तथा मेरे अभिप्राय को सूचित करने वाली चेष्टाओं द्वारा मेरे प्रति उनका विश्वास उत्पन्न करो॥ २५॥

ममैवाभिमुखं स्थित्वा पृच्छ त्वं हरिपुङ्गव।

प्रयोजनं प्रवेशस्य वनस्यास्य धनुर्धरौ॥२६॥

‘वानरशिरोमणे! तुम मेरी ही ओर मुँह करके खड़ा होना और उन धनुर्धर वीरों से इस वन में प्रवेश करने का कारण पूछना॥ २६॥

शुद्धात्मानौ यदि त्वेतौ जानीहि त्वं प्लवङ्गम।

व्याभाषितैर्वा रूपैर्वा विज्ञेया दुष्टतानयोः॥२७॥

‘यदि उनका हृदय शुद्ध जान पड़े तो भी तरहतरह की बातों और आकृति के द्वारा यह जानने की विशेष चेष्टा करनी चाहिये कि वे दोनों कोई दुर्भावना लेकर तो नहीं आये हैं’ ॥ २७॥

इत्येवं कपिराजेन संदिष्टो मारुतात्मजः।

चकार गमने बुद्धिं यत्र तौ रामलक्ष्मणौ ॥२८॥

वानरराज सुग्रीव के इस प्रकार आदेश देने पर पवनकुमार हनुमान जी ने उस स्थान पर जाने का विचार किया, जहाँ श्रीराम और लक्ष्मण विद्यमान थे॥ २८॥

तथेति सम्पूज्य वचस्तु तस्य कपेः सुभीतस्य दुरासदस्य।

महानुभावो हनुमान् ययौ तदा स यत्र रामोऽतिबली सलक्ष्मणः॥२९॥

अत्यन्त डरे हुए दुर्जय वानर सुग्रीव के उस वचन का आदर करके ‘बहुत अच्छा कहकर’ महानुभाव हनुमान जी जहाँ अत्यन्त बलशाली श्रीराम और लक्ष्मण थे, उस स्थान के लिये तत्काल चल दिये॥२९॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे द्वितीयः सर्गः॥२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में दूसरा सर्ग पूरा हुआ।२॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

हनुमान जी का श्रीराम और लक्ष्मण से वन में आने का कारण पूछना और अपना तथा सुग्रीव का परिचय देना

तृतीयः सर्गः

सर्ग-03


वचो विज्ञाय हनुमान् सुग्रीवस्य महात्मनः।

पर्वतादृष्यमूकात् तु पुप्लुवे यत्र राघवौ॥१॥

महात्मा सुग्रीव के कथन का तात्पर्य समझकर हनुमान जी ऋष्यमूक पर्वत से उस स्थान की ओर उछलते हुए चले, जहाँ वे दोनों रघुवंशी बन्धु विराजमान थे॥

कपिरूपं परित्यज्य हनुमान् मारुतात्मजः।

भिक्षुरूपं ततो भेजे शठबुद्धितया कपिः॥२॥

पवनकुमार वानरवीर हनुमान् ने यह सोचकर कि मेरे इस कपिरूप पर किसी का विश्वास नहीं जम सकता, अपने उस रूप का परित्याग करके भिक्षु (सामान्य तपस्वी) का रूप धारण कर लिया॥२॥

ततश्च हनुमान् वाचा श्लक्ष्णया सुमनोज्ञया।

विनीतवदुपागम्य राघवौ प्रणिपत्य च॥३॥

आबभाषे च तौ वीरौ यथावत् प्रशशंस च।

सम्पूज्य विधिवद् वीरौ हनुमान् वानरोत्तमः॥४॥

उवाच कामतो वाक्यं मृदु सत्यपराक्रमौ।

राजर्षिदेवप्रतिमौ तापसौ संशितव्रतौ॥५॥

तदनन्तर हनुमान् ने विनीत भाव से उन दोनों रघुवंशी वीरों के पास जाकर उन्हें प्रणाम करके मन को अत्यन्त प्रिय लगने वाली मधुर वाणी में उनके साथ वार्तालाप आरम्भ किया। वानरशिरोमणि हनुमान् ने पहले तो उन दोनों वीरों की यथोचित प्रशंसा की। फिर विधिवत् उनका पूजन (आदर) करके स्वच्छन्द-रूप से मधुर वाणी में कहा—’वीरो! आप दोनों सत्य-पराक्रमी, राजर्षियों और देवताओं के समान प्रभावशाली, तपस्वी तथा कठोर व्रत का पालन करने वाले जान पड़ते हैं ।। ३—॥

देशं कथमिमं प्राप्तौ भवन्तौ वरवर्णिनौ।

त्रासयन्तौ मृगगणानन्यांश्च वनचारिणः॥६॥

पम्पातीररुहान् वृक्षान् वीक्षमाणौ समन्ततः।

इमां नदी शुभजलां शोभयन्तौ तरस्विनौ॥७॥

धैर्यवन्तौ सुवर्णाभौ कौ युवां चीरवाससौ।

निःश्वसन्तौ वरभुजौ पीडयन्ताविमाः प्रजाः॥

‘आपके शरीर की कान्ति बड़ी सुन्दर है। आप दोनों इस वन्य प्रदेश में किसलिये आये हैं। वन में विचरने वाले मृगसमूहों तथा अन्य जीवों को भी त्रास देते पम्पासरोवर के तटवर्ती वृक्षों को सब ओर से देखते और इस सुन्दर जलवाली नदी-सरीखी पम्पा को सुशोभित करते हुए आप दोनों वेगशाली वीर कौन । हैं? आपके अङ्गों की कान्ति सुवर्ण के समान प्रकाशित होती है। आप दोनों बड़े धैर्यशाली दिखायी देते हैं। आप दोनों के अङ्गों पर चीर वस्त्र शोभा पाता है। आप दोनों लंबी साँस खींच रहे हैं। आपकी भुजाएँ विशाल हैं। आप अपने प्रभाव से इस वन के प्राणियों को पीड़ा दे रहे हैं। बताइये, आपका क्या परिचय है ? ॥ ६–८॥

सिंहविप्रेक्षितौ वीरौ महाबलपराक्रमौ।

शक्रचापनिभे चापे गृहीत्वा शत्रुनाशनौ॥९॥

‘आप दोनों वीरों की दृष्टि सिंह के समान है। आपके बल और पराक्रम महान् हैं। इन्द्र-धनुष के समान महान् शरासन धारण करके आप शत्रुओं को नष्ट करने की शक्ति रखते हैं॥९॥

श्रीमन्तौ रूपसम्पन्नौ वृषभश्रेष्ठविक्रमौ।

हस्तिहस्तोपमभुजौ द्युतिमन्तौ नरर्षभौ॥१०॥

‘आप कान्तिमान् तथा रूपवान् हैं। आप विशालकाय साँड़ के समान मन्दगति से चलते हैं।आप दोनों की भुजाएँ हाथी की ड़ के समान जान पड़ती हैं। आप मनुष्यों में श्रेष्ठ और परम तेजस्वी हैं। १०॥

प्रभया पर्वतेन्द्रोऽसौ युवयोरवभासितः।

राज्याविमरप्रख्यौ कथं देशमिहागतौ ॥११॥

‘आप दोनों की प्रभा से गिरिराज ऋष्यमूक जगमगा रहा है। आप लोग देवताओं के समान पराक्रमी और राज्य भोगने के योग्य हैं। भला, इस दुर्गम वनप्रदेश में आपका आगमन कैसे सम्भव हुआ॥११॥

पद्मपत्रेक्षणौ वीरौ जटामण्डलधारिणौ।

अन्योन्यसदृशौ वीरौ देवलोकादिहागतौ॥१२॥

‘आपके नेत्र प्रफुल्ल कमल-दल के समान शोभा पाते हैं। आपमें वीरता भरी है। आप दोनों अपने मस्तक पर जटामण्डल धारण करते हैं और दोनों ही एक-दूसरे के समान हैं। वीरो! क्या आप देवलोक से यहाँ पधारे हैं?॥

यदृच्छयेव सम्प्राप्तौ चन्द्रसूर्यौ वसुंधराम्।

विशालवक्षसौ वीरौ मानुषौ देवरूपिणौ ॥१३॥

‘आप दोनों को देखकर ऐसा जान पड़ता है, मानो चन्द्रमा और सूर्य स्वेच्छा से ही इस भूतल पर उतर आये हैं। आपके वक्षःस्थल विशाल हैं। मनुष्य होकर भी आपके रूप देवताओं के तुल्य हैं॥ १३॥

सिंहस्कन्धौ महोत्साहौ समदाविव गोवृषौ।

आयताश्च सुवृत्ताश्च बाहवः परिघोपमाः॥ १४॥

सर्वभूषणभूषार्हाः किमर्थं न विभूषिताः।

उभौ योग्यावहं मन्ये रक्षितुं पृथिवीमिमाम्॥ १५॥

ससागरवनां कृत्स्नां विन्ध्यमेरुविभूषिताम्।

‘आपके कंधे सिंह के समान हैं। आपमें महान् उत्साह भरा हुआ है। आप दोनों मदमत्त साँड़ों के समान प्रतीत होते हैं। आपकी भुजाएँ विशाल, सुन्दर, गोल-गोल और परिघ के समान सुदृढ़ हैं। ये समस्त आभूषणों को धारण करने के योग्य हैं तो भी आपने इन्हें विभूषित क्यों नहीं किया है ? मैं तो समझता हूँ कि आप दोनों समुद्रों और वनों से युक्त तथा विन्ध्य और मेरु आदि पर्वतों से विभूषित इस सारी पृथ्वी की रक्षा करने के योग्य हैं। १४-१५ ।।

इमे च धनुषी चित्रे श्लक्ष्णे चित्रानुलेपने॥१६॥

प्रकाशेते यथेन्द्रस्य वज्रे हेमविभूषिते।

‘आपके ये दोनों धनुष विचित्र, चिकने तथा अद्भुत अनुलेपन से चित्रित हैं। इन्हें सुवर्ण से विभूषित किया गया है; अतः ये इन्द्र के वज्र के समान प्रकाशित हो रहे हैं॥ १६ १/२॥

सम्पूर्णाश्च शितैर्बाणैस्तूणाश्च शुभदर्शनाः॥ १७॥

जीवितान्तकरैोरैवलद्भिरिव पन्नगैः।

‘प्राणों का अन्त कर देने वाले सर्पो के समान भयंकर तथा प्रकाशमान तीखे बाणों से भरे हुए आप दोनों के तूणीर बड़े सुन्दर दिखायी देते हैं’ ॥ १७ १/२ ॥

महाप्रमाणौ विपुलौ तप्तहाटकभूषणौ ॥१८॥

खड्गावेतौ विराजेते निर्मुक्तभुजगाविव।

‘आपके ये दोनों खड्ग बहुत बड़े और विस्तृत हैं। इन्हें पक्के सोने से विभूषित किया गया है। ये दोनों केंचुल छोड़कर निकले हुए सो के समान शोभा पाते

एवं मां परिभाषन्तं कस्माद् वै नाभिभाषतः॥ १९॥

सुग्रीवो नाम धर्मात्मा कश्चिद् वानरपुङ्गवः।

वीरो विनिकृतो भ्रात्रा जगभ्रमति दुःखितः॥ २०॥

‘वीरो! इस तरह मैं बारम्बार आपका परिचय पूछ रहा हूँ, आपलोग मुझे उत्तर क्यों नहीं दे रहे हैं? यहाँ सुग्रीव नामक एक श्रेष्ठ वानर रहते हैं, जो बड़े धर्मात्मा और वीर हैं। उनके भाई वाली ने उन्हें घर से निकाल दिया है। इसलिये वे अत्यन्त दुःखी होकर सारे जगत् में मारे-मारे फिरते हैं ॥ २० ॥

प्राप्तोऽहं प्रेषितस्तेन सुग्रीवेण महात्मना। 

राज्ञा वानरमुख्यानां हनुमान् नाम वानरः॥२१॥

‘उन्हीं वानरशिरोमणियों के राजा महात्मा सुग्रीव के भेजने से मैं यहाँ आया हूँ। मेरा नाम हनुमान् है। मैं भी वानरजाति का ही हूँ॥२१॥

युवाभ्यां स हि धर्मात्मा सुग्रीवः सख्यमिच्छति।

तस्य मां सचिवं वित्तं वानरं पवनात्मजम्॥ २२॥

भिक्षुरूपप्रतिच्छन्नं सुग्रीवप्रियकारणात्।

ऋष्यमूकादिह प्राप्तं कामगं कामचारिणम्॥ २३॥

‘धर्मात्मा सुग्रीव आप दोनों से मित्रता करना चाहते हैं। मुझे आपलोग उन्हीं का मन्त्री समझें। मैं वायुदेवता का वानरजातीय पुत्र हूँ। मेरी जहाँ इच्छा हो, जा सकता हूँ और जैसा चाहूँ, रूप धारण कर सकता हूँ। इस समय सुग्रीव का प्रिय करने के लिये भिक्षु के रूप में अपने को छिपाकर मैं ऋष्यमूक पर्वत से यहाँपर आया हूँ’॥

एवमुक्त्वा तु हनुमांस्तौ वीरौ रामलक्ष्मणौ।

वाक्यज्ञो वाक्यकुशलः पुनर्नोवाच किंचन॥ २४॥

उन दोनों भाई वीरवर श्रीराम और लक्ष्मण से ऐसा कहकर बातचीत करने में कुशल तथा बात का मर्म समझने में निपुण हनुमान् चुप हो गये; फिर कुछ न बोले॥ २४॥

एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य रामो लक्ष्मणमब्रवीत्।

प्रहृष्टवदनः श्रीमान् भ्रातरं पार्श्वतः स्थितम्॥ २५॥

उनकी यह बात सुनकर श्रीरामचन्द्रजी का मुख प्रसन्नता से खिल उठा। वे अपने बगल में खड़े हुए छोटे भाई लक्ष्मण से इस प्रकार कहने लगे- ॥२५॥

सचिवोऽयं कपीन्द्रस्य सुग्रीवस्य महात्मनः।

तमेव कांक्षमाणस्य ममान्तिकमिहागतः॥२६॥

‘सुमित्रानन्दन! ये महामनस्वी वानरराज सुग्रीव के सचिव हैं और उन्हीं के हित की इच्छा से यहाँ मेरे पास आये हैं॥२६॥

तमभ्यभाष सौमित्रे सुग्रीवसचिवं कपिम्।

वाक्यज्ञं मधुरैर्वाक्यैः स्नेहयुक्तमरिंदमम्॥२७॥

‘लक्ष्मण! इन शत्रुदमन सुग्रीवसचिव कपिवर हनुमान् से, जो बात के मर्म को समझने वाले हैं, तुम स्नेहपूर्वक मीठी वाणी में बातचीत करो॥ २७॥

नानृग्वेदविनीतस्य नायजुर्वेदधारिणः।

नासामवेदविदुषः शक्यमेवं विभाषितुम्॥ २८॥

जिसे ऋग्वेद की शिक्षा नहीं मिली, जिसनेयजुर्वेद का अभ्यास नहीं किया तथा जो सामवेद का विद्वान् नहीं है, वह इस प्रकार सुन्दर भाषा में वार्तालाप नहीं कर सकता।

नूनं व्याकरणं कृत्स्नमनेन बहुधा श्रुतम्।

बह व्याहरतानेन न किंचिदपशब्दितम्॥२९॥

‘निश्चय ही इन्होंने समूचे व्याकरण का कई बार स्वाध्याय किया है; क्योंकि बहुत-सी बातें बोल जाने पर भी इनके मुँह से कोई अशुद्धि नहीं निकली। २९॥

न मुखे नेत्रयोश्चापि ललाटे च भ्रुवोस्तथा।

अन्येष्वपि च सर्वेषु दोषः संविदितः क्वचित्॥ ३०॥

‘सम्भाषण के समय इनके मुख, नेत्र, ललाट, भौंह तथा अन्य सब अङ्गों से भी कोई दोष प्रकट हुआ हो, ऐसा कहीं ज्ञात नहीं हुआ॥ ३०॥

अविस्तरमसंदिग्धमविलम्बितमव्यथम्।

उरःस्थं कण्ठगं वाक्यं वर्तते मध्यमस्वरम्॥३१॥

‘इन्होंने थोड़े में ही बड़ी स्पष्टता के साथ अपना अभिप्राय निवेदन किया है। उसे समझने में कहीं कोई संदेह नहीं हुआ है। रुक-रुककर अथवा शब्दों या अक्षरों को तोड़-मरोड़कर किसी ऐसे वाक्य का उच्चारण नहीं किया है, जो सुनने में कर्णकटु हो। इनकी वाणी हृदय में मध्यमारूप से स्थित है और कण्ठ से बैखरीरूप में प्रकट होती है, अतः बोलते समय इनकी आवाज न बहुत धीमी रही है न बहुत ऊँची मध्यम स्वर में ही इन्होंने सब बातें कहीं हैं। ३१॥

संस्कारक्रमसम्पन्नामद्भुतामविलम्बिताम्।

उच्चारयति कल्याणी वाचं हृदयहर्षिणीम्॥ ३२॥

‘ये संस्कार’ और क्रम से सम्पन्न, अद्भुत, अविलम्बित तथा हृदय को आनन्द प्रदान करने वाली कल्याणमयी वाणी का उच्चारण करते हैं।॥ ३२ ॥

१. व्याकरण के नियमानुकूल शुद्ध वाणी को संस्कार सम्पन्न (संस्कृत) कहते हैं। २. शब्दोच्चारण की शास्त्रीय परिपाटी का नाम क्रम है। ३. बिना रुके धाराप्रवाहरूप से बोलना अविलम्बित कहलाता है।

अनया चित्रया वाचा त्रिस्थानव्यञ्जनस्थया।

कस्य नाराध्यते चित्तमुद्यतासेररेरपि॥३३॥

‘हृदय, कण्ठ और मूर्धा—इन तीनों स्थानों द्वारा स्पष्टरूप से अभिव्यक्त होने वाली इनकी इस विचित्र वाणी को सुनकर किसका चित्त प्रसन्न न होगा। वध करने के लिये तलवार उठाये हुए शत्रु का हृदय भी इस अद्भुत वाणी से बदल सकता है।॥ ३३॥

एवंविधो यस्य दूतो न भवेत् पार्थिवस्य तु।

सिद्ध्यन्ति हि कथं तस्य कार्याणां गतयोऽनघ॥ ३४॥

‘निष्पाप लक्ष्मण ! जिस राजा के पास इनके समान दूत न हो, उसके कार्यों की सिद्धि कैसे हो सकती है।

एवंगुणगणैर्युक्ता यस्य स्युः कार्यसाधकाः।

तस्य सिद्धयन्ति सर्वेऽर्था दूतवाक्यप्रचोदिताः॥ ३५॥

‘जिसके कार्यसाधक दूत ऐसे उत्तम गुणों से युक्त हों, उस राजा के सभी मनोरथ दूतों की बातचीत से ही सिद्ध हो जाते हैं ॥ ३५॥

एवमुक्तस्तु सौमित्रिः सुग्रीवसचिवं कपिम्।

अभ्यभाषत वाक्यज्ञो वाक्यज्ञं पवनात्मजम्॥ ३६॥

श्रीरामचन्द्रजी के ऐसा कहने पर बातचीत की कला जानने वाले सुमित्रानन्दन लक्ष्मण बात का मर्म समझने वाले पवनकुमार सुग्रीवसचिव कपिवर हनुमान् से इस प्रकार बोले- ॥ ३६॥

विदिता नौ गुणा विदन् सुग्रीवस्य महात्मनः।

तमेव चावां मार्गावः सुग्रीवं प्लवगेश्वरम्॥ ३७॥

‘विद्वन्! महामना सुग्रीव के गुण हमें ज्ञात हो चुके हैं। हम दोनों भाई वानरराज सुग्रीव की ही खोज में यहाँ आये हैं॥ ३७॥

यथा ब्रवीषि हनुमन् सुग्रीववचनादिह।

तत् तथा हि करिष्यावो वचनात् तव सत्तम॥ ३८॥

‘साधुशिरोमणि हनुमान् जी! आप सुग्रीव के कथनानुसार यहाँ आकर जो मैत्री की बात चला रहे हैं, वह हमें स्वीकार है। हम आपके कहने से ऐसा कर सकते हैं’॥ ३८॥

तत् तस्य वाक्यं निपुणं निशम्य प्रहृष्टरूपः पवनात्मजः कपिः।

मनः समाधाय जयोपपत्तौ सख्यं तदा कर्तुमियेष ताभ्याम्॥ ३९॥

लक्ष्मण के यह स्वीकृतिसूचक निपुणतायुक्त वचन सुनकर पवनकुमार कपिवर हनुमान् बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने सुग्रीव की विजयसिद्धि में मन लगाकर उस समय उन दोनों भाइयों के साथ उनकी मित्रता करने की इच्छा की॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे तृतीयः सर्गः॥३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में तीसरा सर्ग पूरा हुआ।३॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

लक्ष्मण का हनुमान जी से श्रीराम के वन में आने और सीताजी के हरे जाने का वृत्तान्त बताना, हनुमान् जी का उन्हें आश्वासन देकर उन दोनों भाइयों को अपने साथ ले जाना

चतुर्थः सर्गः

सर्ग-04


ततः प्रहृष्टो हनुमान् कृत्यवानिति तद्वचः।

श्रुत्वा मधुरभावं च सुग्रीवं मनसा गतः॥१॥

श्रीरामजी की बात सुनकर तथा सुग्रीव के विषय में उनका सौम्यभाव जानकर और साथ ही यह समझकर कि इन्हें भी सुग्रीव से कोई आवश्यक काम है, हनुमान जी को बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने मनही-मन सुग्रीव का स्मरण किया॥१॥

भाव्यो राज्यागमस्तस्य सुग्रीवस्य महात्मनः।

यदयं कृत्यवान् प्राप्तः कृत्यं चैतदुपागतम्॥२॥

‘अब अवश्य ही महामना सुग्रीव को राज्य की प्राप्ति होने वाली है; क्योंकि ये महानुभाव किसी कार्य या प्रयोजन से यहाँ आये हैं और यह कार्य सुग्रीव के ही द्वारा सिद्ध होने वाला है॥२॥

ततः परमसंहृष्टो हनूमान् प्लवगोत्तमः।

प्रत्युवाच ततो वाक्यं रामं वाक्यविशारदः॥३॥

तत्पश्चात् बातचीत में कुशल वानरश्रेष्ठ हनुमान जी अत्यन्त हर्ष में भरकर श्रीरामचन्द्रजी से बोले- ॥३॥

किमर्थं त्वं वनं घोरं पम्पाकाननमण्डितम्।

आगतः सानुजो दुर्गं नानाव्यालमृगायुतम्॥४॥

‘पम्पा-तटवर्ती कानन से सुशोभित यह वन भयंकर और दुर्गम है। इसमें नाना प्रकार के हिंसक जन्तु निवास करते हैं। आप अपने छोटे भाई के साथ यहाँ किसलिये आये हैं ?’ ॥ ४॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा लक्ष्मणो रामचोदितः।

आचचक्षे महात्मानं रामं दशरथात्मजम्॥५॥

हनुमान जी का यह वचन सुनकर श्रीराम की आज्ञा से लक्ष्मण ने दशरथनन्दन महात्मा श्रीराम का इस प्रकार परिचय देना आरम्भ किया— ॥५॥

राजा दशरथो नाम द्युतिमान् धर्मवत्सलः।

चातुर्वण्र्यं स्वधर्मेण नित्यमेवाभिपालयन्॥६॥

‘विद्वन्! इस पृथ्वी पर दशरथ नाम से प्रसिद्ध जो धर्मानुरागी तेजस्वी राजा थे, वे सदा ही अपने धर्म के अनुसार चारों वर्गों की प्रजाका पालन करते थे॥६॥

न द्वेष्टा विद्यते तस्य स तु द्वेष्टि न कंचन।

स तु सर्वेषु भूतेषु पितामह इवापरः॥७॥

‘इस भूतल पर उनसे द्वेष रखने वाला कोई नहीं था और वे भी किसी से द्वेष नहीं रखते थे। वे समस्त प्राणियों पर दूसरे ब्रह्माजी के समान स्नेह रखते थे। ७॥

अग्निष्टोमादिभिर्यज्ञैरिष्टवानाप्तदक्षिणैः।

तस्यायं पूर्वजः पुत्रो रामो नाम जनैः श्रुतः॥८॥

‘उन्होंने पर्याप्त दक्षिणावाले अग्निष्टोम आदि यज्ञों का अनुष्ठान किया था। ये उन्हीं महाराज के ज्येष्ठ पुत्र हैं। लोग इन्हें श्रीराम कहते हैं॥ ८॥

शरण्यः सर्वभूतानां पितुर्निर्देशपारगः।

ज्येष्ठो दशरथस्यायं पुत्राणां गुणवत्तरः॥९॥

‘ये सब प्राणियों को शरण देने वाले और पिता की आज्ञा का पालन करने वाले हैं। महाराज दशरथ के चारों पुत्रों में ये सबसे अधिक गुणवान् हैं॥९॥

राजलक्षणसंयुक्तः संयुक्तो राज्यसम्पदा।

राज्याद् भ्रष्टो मया वस्तुं वने सार्धमिहागतः॥ १०॥

‘ये राजा के उत्तम लक्षणों से सम्पन्न हैं। जब इन्हें राज्य-सम्पत्ति से संयुक्त किया जा रहा था, उस समय कुछ ऐसा कारण आ पड़ा, जिससे ये राज्य से वञ्चित हो गये और वन में निवास करने के लिये मेरे साथ यहाँ आ गये॥१०॥

भार्यया च महाभाग सीतयानुगतो वशी।

दिनक्षये महातेजाः प्रभयेव दिवाकरः॥११॥

‘महाभाग! जैसे दिन का क्षय होने पर सायंकाल महातेजस्वी सूर्य अपने प्रभा के साथ अस्ताचल को जाते हैं, उसी प्रकार ये जितेन्द्रिय श्रीरघुनाथजी अपनी पत्नी सीता के साथ वन में आये थे।॥ ११॥

अहमस्यावरो भ्राता गुणैर्दास्यमुपागतः।

कृतज्ञस्य बहुज्ञस्य लक्ष्मणो नाम नामतः॥१२॥

‘मैं इनका छोटा भाई हूँ। मेरा नाम लक्ष्मण है। मैं अपने कृतज्ञ और बहुज्ञ भाई के गुणों से आकृष्ट होकर इनका दास हो गया हूँ॥ १२ ॥

सुखार्हस्य महार्हस्य सर्वभूतहितात्मनः।

ऐश्वर्येण विहीनस्य वनवासे रतस्य च॥१३॥

रक्षसापहृता भार्या रहिते कामरूपिणा।

तच्च न ज्ञायते रक्षः पत्नी येनास्य वा हृता॥ १४॥

‘सम्पूर्ण भूतों के हित में मन लगाने वाले, सुख भोगने के योग्य, महापुरुषों द्वारा पूजनीय, ऐश्वर्य से हीन तथा वनवास में तत्पर मेरे भाई की पत्नी को इच्छानुसार रूप धारण करने वाले एक राक्षस ने सूने आश्रम से हर लिया। जिसने इनकी पत्नी का हरण किया है, वह राक्षस कौन है और कहाँ रहता है ? इत्यादि बातों का ठीक-ठीक पता नहीं लग रहा है॥ १३-१४ ॥

दनु म दितेः पुत्रः शापाद् राक्षसतां गतः।

आख्यातस्तेन सुग्रीवः समर्थो वानराधिपः॥१५॥

स ज्ञास्यति महावीर्यस्तव भार्यापहारिणम्।

एवमुक्त्वा दनुः स्वर्ग भ्राजमानो दिवं गतः॥ १६॥

‘दनु नामक एक दैत्य था, जो शापसे राक्षसभाव को प्राप्त हुआ था। उसने सुग्रीव का नाम बताया और कहा- ‘वानरराज सुग्रीव सामर्थ्यशाली और महान् पराक्रमी हैं। वे आपकी पत्नी का अपहरण करने वाले राक्षस का पता लगा देंगे।’ ऐसा कहकर तेज से प्रकाशित होता हुआ दनु स्वर्गलोक में पहुँचने के लिये आकाश में उड़ गया॥

एतत् ते सर्वमाख्यातं याथातथ्येन पृच्छतः।

अहं चैव च रामश्च सुग्रीवं शरणं गतौ॥१७॥

‘आपके प्रश्न के अनुसार मैंने सब बातें ठीक-ठीक बता दीं। मैं और श्रीराम दोनों ही सुग्रीव की शरण में आये हैं।

एष दत्त्वा च वित्तानि प्राप्य चानुत्तमं यशः।

लोकनाथः पुरा भूत्वा सुग्रीवं नाथमिच्छति॥ १८॥

‘ये पहले बहुत-से धन-वैभव का दान करके परम उत्तम यश प्राप्त कर चुके हैं। जो पूर्वकाल में सम्पूर्ण जगत् के नाथ (संरक्षक) थे, वे आज सुग्रीव को अपना रक्षक बनाना चाहते हैं ॥ १८॥

सीता यस्य स्नुषा चासीच्छरण्यो धर्मवत्सलः।

तस्य पुत्रः शरण्यश्च सुग्रीवं शरणं गतः॥१९॥

‘सीता जिनकी पुत्रवधू है, जो शरणागतपालक और धर्मवत्सल रहे हैं, उन्हीं महाराज दशरथ के पुत्र शरणदाता श्रीराम आज सुग्रीव की शरण में आये हैं। १९॥

सर्वलोकस्य धर्मात्मा शरण्यः शरणं पुरा।

गुरुर्मे राघवः सोऽयं सुग्रीवं शरणं गतः॥२०॥

‘जो मेरे धर्मात्मा बड़े भाई श्रीरघुनाथजी पहले सम्पूर्ण जगत् को शरण देने वाले तथा शरणागतवत्सल रहे हैं, वे इस समय सुग्रीव की शरण में आये हैं॥ २०॥

यस्य प्रसादे सततं प्रसीदेयुरिमाः प्रजाः।

स रामो वानरेन्द्रस्य प्रसादमभिकांक्षते॥२१॥

‘जिनके प्रसन्न होने पर सदा यह सारी प्रजा प्रसन्नता से खिल उठती थी, वे ही श्रीराम आज वानरराज सुग्रीव की प्रसन्नता चाहते हैं ॥२१॥

येन सर्वगुणोपेताः पृथिव्यां सर्वपार्थिवाः।

मानिताः सततं राज्ञा सदा दशरथेन वै॥२२॥

तस्यायं पूर्वजः पुत्रस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः।

सुग्रीवं वानरेन्द्रं तु रामः शरणमागतः॥२३॥

‘जिन राजा दशरथ ने सदा अपने यहाँ आये हुए भूमण्डल के सर्वसद्गुणसम्पन्न समस्त राजाओं का निरन्तर सम्मान किया, उन्हीं के ये त्रिभुवनविख्यात ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम आज वानरराज सुग्रीव की शरण में आये हैं।

शोकाभिभूते रामे तु शोकार्ते शरणं गते।

कर्तुमर्हति सुग्रीवः प्रसादं सह यूथपैः॥२४॥

‘श्रीराम शोक से अभिभूत और आर्त होकर शरण में आये हैं। यूथपतियोंसहित सुग्रीव को इन पर कृपा करनी चाहिये॥॥ २४॥

एवं ब्रुवाणं सौमित्रिं करुणं साश्रुपातनम्।

हनूमान् प्रत्युवाचेदं वाक्यं वाक्यविशारदः॥ २५॥

नेत्रों से आँसू बहाकर करुणाजनक स्वर में ऐसी बातें कहते हुए सुमित्राकुमार लक्ष्मण से कुशल वक्ता हनुमान जी ने इस प्रकार कहा- ॥ २५ ॥

ईदृशा बुद्धिसम्पन्ना जितक्रोधा जितेन्द्रियाः।

द्रष्टव्या वानरेन्द्रेण दिष्ट्या दर्शनमागताः॥ २६॥

‘राजकुमारो! वानरराज सुग्रीव को आप-जैसे बुद्धिमान्, क्रोधविजयी और जितेन्द्रिय पुरुषों से मिलने की आवश्यकता थी। सौभाग्य की बात है कि आपने स्वयं ही दर्शन दे दिया॥२६॥

स हि राज्याश्च विभ्रष्टः कृतवैरश्च वालिना।

हृतदारो वने त्रस्तो भ्रात्रा विनिकृतो भृशम्॥ २७॥

‘वे भी राज्य से भ्रष्ट हैं। वाली के साथ उनकी शत्रुता हो गयी है। उनकी स्त्री का भी वाली ने ही अपहरण कर लिया है तथा उस दुष्ट भाई ने उन्हें घर से निकाल दिया है, इसलिये वे अत्यन्त भयभीत होकर वन में निवास करते हैं ॥ २७॥

करिष्यति स साहाय्यं युवयोर्भास्करात्मजः।

सुग्रीवः सह चास्माभिः सीतायाः परिमार्गणे॥ २८॥

‘सूर्यनन्दन सुग्रीव सीता का पता लगाने में हमारे साथ स्वयं रहकर आप दोनों की पूर्ण सहायता करेंगे’ ॥ २८॥

इत्येवमुक्त्वा हनुमान् श्लक्ष्णं मधुरया गिरा।

बभाषे साधु गच्छामः सुग्रीवमिति राघवम्॥ २९॥

ऐसा कहकर हनुमान जी ने श्रीरघुनाथजी से स्निग्ध मधुर वाणी में कहा—’अच्छा, अब हमलोग सुग्रीव के पास चलें’॥ २९॥

एवं ब्रुवन्तं धर्मात्मा हनूमन्तं स लक्ष्मणः।

प्रतिपूज्य यथान्यायमिदं प्रोवाच राघवम्॥३०॥

उस समय धर्मात्मा लक्ष्मण ने उपर्युक्त बात कहने वाले हनुमान जी का यथोचित सम्मान किया और श्रीरामचन्द्रजी से कहा- ॥ ३० ॥

कपिः कथयते हृष्टो यथायं मारुतात्मजः।

कृत्यवान् सोऽपि सम्प्राप्तः कृतकृत्योऽसि राघव॥

‘भैया रघुनन्दन! ये वानरश्रेष्ठ पवनकुमार हनुमान् अत्यन्त हर्ष से भरकर जैसी बात कह रहे हैं, उससे जान पड़ता है कि सुग्रीव को भी आपसे कुछ काम है। ऐसी दशा में आप अपना कार्य सिद्ध हुआ ही समझें ॥ ३१॥

प्रसन्नमुखवर्णश्च व्यक्तं हृष्टश्च भाषते।

नानृतं वक्ष्यते वीरो हनूमान् मारुतात्मजः॥३२॥

‘इनके मुख की कान्ति स्पष्टतः प्रसन्न दिखायी देती । है और ये हर्ष से उत्फुल्ल होकर बातचीत करते हैं।अतः मेरा विश्वास है कि पवनपुत्र वीर हनुमान् जी झूठ नहीं बोलेंगे’ ॥ ३२ ॥

ततः स सुमहाप्राज्ञो हनूमान् मारुतात्मजः।

जगामादाय तौ वीरौ हरिराजाय राघवौ ॥३३॥

तदनन्तर परम बुद्धिमान् पवनपुत्र हनुमान जी उन दोनों रघुवंशी वीरों को साथ ले सुग्रीव से मिलने के लिये चले॥३३॥

भिक्षुरूपं परित्यज्य वानरं रूपमास्थितः।

पृष्ठमारोप्य तौ वीरौ जगाम कपिकुञ्जरः॥३४॥

कपिवर हनुमान् ने भिक्षुरूप को त्यागकर वानररूप धारण कर लिया। वे उन दोनों वीरों को पीठपर बिठाकर वहाँ से चल दिये।। ३४ ॥

स तु विपुलयशाः कपिप्रवीरः पवनसुतः कृतकृत्यवत् प्रहृष्टः।

गिरिवरमुरुविक्रमः प्रयातः स शुभमतिः सह रामलक्ष्मणाभ्याम्॥ ३५॥

महान् यशस्वी तथा शुभ विचारवाले महापराक्रमी वे कपिवीर पवनकुमार कृतकृत्य-से होकर अत्यन्त हर्ष में भर गये और श्रीराम-लक्ष्मण के साथ गिरिवर ऋष्यमूकपर जा पहुँचे॥ ३५॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे चतुर्थः सर्गः॥४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में चौथा सर्ग पूरा हुआ।

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

श्रीराम और सुग्रीव की मैत्री तथा श्रीराम द्वारा वालि वध की प्रतिज्ञा

पञ्चमः सर्गः

सर्ग-05


ऋष्यमूकात् तु हनुमान् गत्वा तं मलयं गिरिम्।

आचचक्षे तदा वीरौ कपिराजाय राघवौ॥१॥

श्रीराम और लक्ष्मण को ऋष्यमूक पर्वत पर सुग्रीव के वास-स्थान में बिठाकर हनुमान जी वहाँ से मलयपर्वत पर गये (जो ऋष्यमूक का ही एक शिखर है) और वहाँ वानरराज सुग्रीव को उन दोनों रघुवंशी वीरों का परिचय देते हुए इस प्रकार बोले- ॥१॥

अयं रामो महाप्राज्ञ सम्प्राप्तो दृढविक्रमः।

लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा रामोऽयं सत्यविक्रमः॥२॥

‘महाप्राज्ञ! जिनका पराक्रम अत्यन्त दृढ़ और अमोघ है, वे श्रीरामचन्द्रजी अपने भाई लक्ष्मण के साथ पधारे हैं॥२॥

इक्ष्वाकूणां कुले जातो रामो दशरथात्मजः।

धर्मे निगदितश्चैव पितुर्निर्देशकारकः॥३॥

‘इन श्रीराम का आविर्भाव इक्ष्वाकुकुल में हुआ है। ये महाराज दशरथ के पुत्र हैं और स्वधर्मपालन के लिये संसार में विख्यात हैं। अपने पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये इस वन में इनका आगमन हुआ है॥३॥

राजसूयाश्वमेधैश्च वह्निर्येनाभितर्पितः।

दक्षिणाश्च तथोत्सृष्टा गावः शतसहस्रशः॥४॥

तपसा सत्यवाक्येन वसुधा येन पालिता।

स्त्रीहेतोस्तस्य पुत्रोऽयं रामोऽरण्यं समागतः॥५॥

‘जिन्होंने राजसूय और अश्वमेध-यज्ञों का अनुष्ठान करके अग्निदेव को तृप्त किया था, ब्राह्मणों को बहुत सी दक्षिणाएँ बाँटी थीं और लाखों गौएँ दानमें दी थीं। जिन्होंने सत्य-भाषणपूर्वक तप के द्वारा वसुधा का पालन किया था, उन्हीं महाराज दशरथ के पुत्र ये श्रीराम पिता द्वारा अपनी पत्नी कैकेयी के लिये दिये हुए वर का पालन करने के निमित्त इस वन में आये हैं। ४-५॥

तस्यास्य वसतोऽरण्ये नियतस्य महात्मनः।

रावणेन हृता भार्या स त्वां शरणमागतः॥६॥

‘महात्मा श्रीराम मुनियों की भाँति नियम का पालन करते हुए दण्डकारण्य में निवास करते थे। एक दिन रावण ने आकर सूने आश्रम से इनकी पत्नी सीता का अपहरण कर लिया। उन्हीं की खोज में आपसे सहायता लेने के लिये ये आपकी शरण में आये हैं।६॥

भवता सख्यकामौ तौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ।

प्रगृह्य चार्चयस्वैतौ पूजनीयतमावुभौ॥७॥

‘ये दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण आपसे मित्रता करना चाहते हैं। आप चलकर इन्हें अपनावें और इनका यथोचित सत्कार करें; क्योंकि ये दोनों ही वीर हमलोगों के लिये परम पूजनीय हैं ॥७॥

श्रुत्वा हनूमतो वाक्यं सुग्रीवो वानराधिपः।

दर्शनीयतमो भूत्वा प्रीत्योवाच च राघवम्॥८॥

हनुमान् जी का यह वचन सुनकर वानरराज सुग्रीव स्वेच्छा से अत्यन्त दर्शनीय रूप धारण करके श्रीरघुनाथजी के पास आये और बड़े प्रेम से बोले- ॥ ८॥

भवान् धर्मविनीतश्च सुतपाः सर्ववत्सलः।

आख्याता वायुपुत्रेण तत्त्वतो मे भवद्गुणाः॥ ९॥

‘प्रभो! आप धर्म के विषय में भलीभाँति सुशिक्षित, परम तपस्वी और सबपर दया करने वाले हैं। पवनकुमार हनुमान जी ने मुझसे आपके यथार्थ गुणों का वर्णन किया है।

तन्ममैवैष सत्कारो लाभश्चैवोत्तमः प्रभो।

यत्त्वमिच्छसि सौहार्द वानरेण मया सह ॥१०॥

‘भगवन् ! मैं वानर हूँ और आप नर मेरे साथ जो आप मैत्री करना चाहते हैं, इसमें मेरा ही सत्कार है और मुझे ही उत्तम लाभ प्राप्त हो रहा है॥१०॥

रोचते यदि मे सख्यं बाहुरेष प्रसारितः।

गृह्यतां पाणिना पाणिर्मर्यादा बध्यतां ध्रुवा॥

‘यदि मेरी मैत्री आपको पसंद हो तो मेरा यह हाथ फैला हुआ है। आप इसे अपने हाथ में ले लें और परस्पर मैत्री का अटूट सम्बन्ध बना रहे इसके लिये स्थिर मर्यादा बाँध दें’॥ ११॥

एतत् तु वचनं श्रुत्वा सुग्रीवस्य सुभाषितम्।

सम्प्रहृष्टमना हस्तं पीडयामास पाणिना॥१२॥

आख्याता वायुपुत्रेण तत्त्वतो मे भवद्गुणाः॥ ९॥

‘प्रभो! आप धर्म के विषय में भलीभाँति सुशिक्षित, परम तपस्वी और सब पर दया करने वाले हैं। पवनकुमार हनुमान जी ने मुझसे आपके यथार्थ गुणों का वर्णन किया है।

तन्ममैवैष सत्कारो लाभश्चैवोत्तमः प्रभो।

यत्त्वमिच्छसि सौहार्द वानरेण मया सह ॥१०॥

‘भगवन् ! मैं वानर हूँ और आप नर। मेरे साथ जो आप मैत्री करना चाहते हैं, इसमें मेरा ही सत्कार है और मुझे ही उत्तम लाभ प्राप्त हो रहा है॥१०॥

रोचते यदि मे सख्यं बाहुरेष प्रसारितः।

गृह्यतां पाणिना पाणिर्मर्यादा बध्यतां ध्रुवा॥

‘यदि मेरी मैत्री आपको पसंद हो तो मेरा यह हाथ फैला हुआ है। आप इसे अपने हाथ में ले लें और परस्पर मैत्री का अटूट सम्बन्ध बना रहे इसके लिये स्थिर मर्यादा बाँध दें’॥ ११॥

एतत् तु वचनं श्रुत्वा सुग्रीवस्य सुभाषितम्।

सम्प्रहृष्टमना हस्तं पीडयामास पाणिना॥१२॥

हृष्टः सौहृदमालम्ब्य पर्यष्वजत पीडितम्।

सुग्रीव का यह सुन्दर वचन सुनकर भगवान् श्रीराम का चित्त प्रसन्न हो गया। उन्होंने अपने हाथ से उनका हाथ पकड़कर दबाया और सौहार्दका आश्रय ले बड़े हर्ष के साथ शोकपीड़ित सुग्रीव को छाती से लगा लिया। १२ १/२॥

ततो हनूमान् संत्यज्य भिक्षुरूपमरिंदमः॥१३॥

काष्ठयोः स्वेन रूपेण जनयामास पावकम्।

(सुग्रीव के पास जाने से पूर्व हनुमान जी ने पुनः भिक्षुरूप धारण कर लिया था।) श्रीराम सुग्रीव की मैत्री के समय शत्रुदमन हनुमान जी ने भिक्षुरूप को त्यागकर अपना स्वाभाविक रूप धारण कर लिया

और दो लकड़ियों को रगड़कर आग पैदा की॥ १३ १/२॥

दीप्यमानं ततो वह्नि पुष्पैरभ्यर्च्य सत्कृतम्॥ १४॥

तयोर्मध्ये तु सुप्रीतो निदधौ सुसमाहितः।

तत्पश्चात् उस अग्नि को प्रज्वलित करके उन्होंने फूलों द्वारा अग्निदेव का सादर पूजन किया; फिर एकाग्रचित्त हो श्रीराम और सुग्रीव के बीच में साक्षी के रूप में उस अग्नि को प्रसन्नतापूर्वक स्थापित कर दिया॥ १४ १/२॥

ततोऽग्निं दीप्यमानं तौ चक्रतुश्च प्रदक्षिणम्॥ १५॥

सुग्रीवो राघवश्चैव वयस्यत्वमुपागतौ।

इसके बाद सुग्रीव और श्रीरामचन्द्रजी ने उस प्रज्वलित अग्नि की प्रदक्षिणा की और दोनों एकदूसरे के मित्र बन गये॥ १५ १/२ ॥

ततः सप्रीतमनसौ तावुभौ हरिराघवौ॥१६॥

अन्योन्यमभिवीक्षन्तौ न तृप्तिमभिजग्मतुः।

इससे उन वानरराज तथा श्रीरघुनाथजी दोनों के हृदय में बड़ी प्रसन्नता हुई। वे एक-दूसरे की ओर देखते हुए तृप्त नहीं होते थे॥ १६ १/२ ॥

त्वं वयस्योऽसि हृद्यो मे ह्येकं दुःखं सुखं च नौ॥ १७॥

सुग्रीवो राघवं वाक्यमित्युवाच प्रहृष्टवत्।

उस समय सुग्रीव ने श्रीरामचन्द्रजी से प्रसन्नतापूर्वक कहा—’आप मेरे प्रिय मित्र हैं। आज से हम दोनों का दुःख और सुख एक है’ ॥ १७ १/२॥

ततः सुपर्णबहुलां भक्त्वा शाखां सुपुष्पिताम्॥ १८॥

सालस्यास्तीर्य सुग्रीवो निषसाद सराघवः।

यह कहकर सुग्रीव ने अधिक पत्ते और फूलों वाली शाल वृक्ष की एक शाखा तोड़ी और उसे बिछाकर वे श्रीरामचन्द्रजी के साथ उस पर बैठे। १८ १/२ ॥

लक्ष्मणायाथ संहृष्टो हनुमान् मारुतात्मजः॥१९॥

शाखां चन्दनवृक्षस्य ददौ परमपुष्पिताम्।।

तदनन्तर पवनपुत्र हनुमान् ने अत्यन्त प्रसन्न हो चन्दन-वृक्ष की एक डाली, जिसमें बहुत-से फूल लगे हुए थे, तोड़कर लक्ष्मण को बैठने के लिये दी॥ १९ १/२॥

ततः प्रहृष्टः सुग्रीवः श्लक्ष्णं मधुरया गिरा॥२०॥

प्रत्युवाच तदा रामं हर्षव्याकुललोचनः।

इसके बाद हर्ष से भरे हुए सुग्रीव ने जिनके नेत्र हर्ष से खिल उठे थे, उस समय भगवान् श्रीराम से स्निग्ध मधुर वाणी में कहा— ॥ २० १/२ ॥

अहं विनिकृतो राम चरामीह भयार्दितः॥२१॥

हृतभार्यो वने त्रस्तो दुर्गमेतदुपाश्रितः।

‘श्रीराम ! मैं घर से निकाल दिया गया हूँ और भय से पीड़ित होकर यहाँ विचरता हूँ। मेरी पत्नी भी मुझसे छीन ली गयी। मैंने आतङ्कित होकर वन में इस दुर्गम पर्वत का आश्रय लिया है॥ २१ १/२ ॥

सोऽहं त्रस्तो वने भीतो वसाम्युभ्रान्तचेतनः॥ २२॥

वालिना निकृतो भ्रात्रा कृतवैरश्च राघव।

‘रघुनन्दन! मेरे बड़े भाई वाली ने मुझे घर से निकालकर मेरे साथ वैर बाँध लिया है। उसी के त्रास और भय से उद्भ्रान्तचित्त होकर मैं इस वन में निवास करता हूँ॥ २२॥

वालिनो मे महाभाग भयार्तस्याभयं कुरु॥२३॥

कर्तुमर्हसि काकुत्स्थ भयं मे न भवेद् यथा।

‘महाभाग! वाली के भय से पीड़ित हुए मुझ सेवक को आप अभय-दान दीजिये। काकुत्स्थ! आपको ऐसा करना चाहिये, जिससे मेरे लिये किसी प्रकार का भय न रह जाय’ ॥ २३ १/२ ॥

एवमुक्तस्तु तेजस्वी धर्मज्ञो धर्मवत्सलः॥२४॥

प्रत्यभाषत काकुत्स्थः सुग्रीवं प्रहसन्निव।

सुग्रीव के ऐसा कहने पर धर्म के ज्ञाता, धर्मवत्सल, ककुत्स्थकुलभूषण तेजस्वी श्रीराम ने हँसते हुए-से वहाँ सुग्रीव को इस प्रकार उत्तर दिया- ॥२४॥

उपकारफलं मित्रं विदितं मे महाकपे॥२५॥

वालिनं तं वधिष्यामि तव भार्यापहारिणम्।

‘महाकपे! मुझे मालूम है कि मित्र उपकाररूपी फल देने वाला होता है। मैं तुम्हारी पत्नी का अपहरण करने वाले वाली का वध कर दूंगा॥ २५ १/२॥

अमोघाः सूर्यसंकाशा ममेमे निशिताः शराः॥ २६॥

तस्मिन् वालिनि दुर्वृत्ते निपतिष्यन्ति वेगिताः।

कङ्कपत्रप्रतिच्छन्ना महेन्द्राशनिसंनिभाः॥२७॥

तीक्ष्णाग्रा ऋजुपर्वाणः सरोषा भुजगा इव।

‘मेरे तूणीर में संगृहीत हुए ये सूर्यतुल्य तेजस्वी बाण अमोघ हैं—इनका वार खाली नहीं जाता। ये बड़ेवेगशाली हैं। इनमें कंक पक्षी के परों के पंख लगे हुए हैं, जिनसे ये आच्छादित हैं। इनके अग्रभाग बड़े तीखे हैं और गाँठे भी सीधी हैं। ये रोष में भरे हुए सर्पो के समान छूटते हैं और इन्द्र के वज्र की भाँति भयंकर चोट करते हैं। उस दुराचारी वाली पर मेरे ये बाण अवश्य गिरेंगे॥ २६-२७ १/२ ।।

तमद्य वालिनं पश्य तीक्ष्णैराशीविषोपमैः॥२८॥

शरैर्विनिहतं भूमौ प्रकीर्णमिव पर्वतम्।

‘आज देखना, मैं अपने विषधर सो के समान तीखे बाणों से मारकर वाली को पृथ्वी पर गिरा दूंगा। वह इन्द्र के वज्र से टूट-फूटकर गिरे हुए पर्वत के समान दिखायी देगा’॥

स तु तद् वचनं श्रुत्वा राघवस्यात्मनो हितम्।

सुग्रीवः परमप्रीतः परमं वाक्यमब्रवीत्॥२९॥

अपने लिये परम हितकर वह श्रीरघुनाथजी का वचन सुनकर सुग्रीव को बड़ी प्रसन्नता हुई। वे उत्तम वाणी में  बोले- ॥ २९॥

तव प्रसादेन नृसिंह वीर प्रियां च राज्यं च समाप्नुयामहम्।

तथा कुरु त्वं नरदेव वैरिणं यथा न हिंस्यात् स पुनर्ममाग्रजम्॥३०॥

‘वीर! पुरुषसिंह ! मैं आपकी कृपा से अपनी प्यारी पत्नी तथा राज्य को प्राप्त कर सकूँ, ऐसा यत्न कीजिये। नरदेव! मेरा बड़ा भाई वैरी हो गया है। आप उसकी ऐसी अवस्था कर दें जिससे वह फिर मुझे मार न सके’ ॥ ३०॥

सीताकपीन्द्रक्षणदाचराणां राजीवहेमज्वलनोपमानि।

सुग्रीवरामप्रणयप्रसङ्गे वामानि नेत्राणि समं स्फुरन्ति॥३१॥

सुग्रीव और श्रीराम की इस प्रेमपूर्ण मैत्री के प्रसङ्ग में सीता के प्रफुल्ल कमल-जैसे, कपिराज वाली के सुवर्ण-जैसे तथा निशाचरों के प्रज्वलित अग्नि-जैसे बायें नेत्र एक साथ ही फड़कने लगे॥३१॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे पञ्चमः सर्गः॥५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में पाँचवाँ सर्ग पूरा हुआ॥५॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

सुग्रीव का श्रीराम को सीताजी के आभूषण दिखाना तथा श्रीराम का शोक एवं रोषपूर्ण वचन

षष्ठः सर्गः

सर्ग-06


पुनरेवाब्रवीत् प्रीतो राघवं रघुनन्दनम्।

अयमाख्याति ते राम सचिवो मन्त्रिसत्तमः॥१॥

हनुमान् यन्निमित्तं त्वं निर्जनं वनमागतः।

सुग्रीव ने पुनः प्रसन्नतापूर्वक रघुकुलनन्दन श्रीरामचन्द्रजी से कहा—’श्रीराम! मेरे मन्त्रियों में श्रेष्ठ सचिव ये हनुमान जी आपके विषय में वह सारा वृत्तान्त बता चुके हैं, जिसके कारण आपको इस निर्जन वन में आना पड़ा है॥ १ १/२॥

लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा वसतश्च वने तव॥२॥

रक्षसापहृता भार्या मैथिली जनकात्मजा।

त्वया वियुक्ता रुदती लक्ष्मणेन च धीमता॥३॥

अन्तरं प्रेप्सुना तेन हत्वा गृधं जटायुषम्।

भार्यावियोगजं दुःखं प्रापितस्तेन रक्षसा॥४॥

‘अपने भाई लक्ष्मण के साथ जब आप वन में निवास करते थे, उस समय राक्षस रावण ने आपकी पत्नी मिथिलेशकुमारी जनकनन्दिनी सीता को हर लिया। उस वेला में आप उनसे अलग थे और बुद्धिमान् लक्ष्मण भी उन्हें अकेली छोड़कर चले गये थे। राक्षस इसी अवसर की प्रतीक्षा में था। उसने गीध जटायु का वध करके रोती हुई सीता का अपहरण किया है। इस प्रकार उस राक्षस ने आपको पत्नी वियोग के कष्ट में डाल दिया है॥२-४॥

भार्यावियोगजं दुःखं नचिरात् त्वं विमोक्ष्यसे।

अहं तामानयिष्यामि नष्टां वेदश्रुतीमिव॥५॥

‘परंतु इस पत्नी-वियोग के दुःख से आप शीघ्र ही मुक्त हो जायेंगे। मैं राक्षस द्वारा हरी गयी वेदवाणी के समान आपकी पत्नी को वापस ला दूंगा॥ ५ ॥

रसातले वा वर्तन्तीं वर्तन्तीं वा नभस्तले।

अहमानीय दास्यामि तव भार्यामरिंदम॥६॥

‘शत्रुदमन श्रीराम! आपकी भार्या सीता पाताल में हों या आकाश में, मैं उन्हें ढूँढ़ लाकर आपकी सेवा में समर्पित कर दूंगा॥६॥

इदं तथ्यं मम वचस्त्वमवेहि च राघव।

न शक्या सा जरयितुमपि सेन्द्रैः सुरासुरैः॥७॥

तव भार्या महाबाहो भक्ष्यं विषकृतं यथा।

त्यज शोकं महाबाहो तां कान्तामानयामि ते॥ ८॥

‘रघुनन्दन! आप मेरी इस बात को सत्य मानें। महाबाहो! आपकी पत्नी जहर मिलाये हुए भोजन की भाँति दूसरों के लिये अग्राह्य है। इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता और असुर भी उन्हें पचा नहीं सकते। आप शोक त्याग दीजिये। मैं आपकी प्राणवल्लभा को अवश्य ला दूंगा॥

अनुमानात् तु जानामि मैथिली सा न संशयः।

ह्रियमाणा मया दृष्टा रक्षसा रौद्रकर्मणा॥९॥

क्रोशन्ती रामरामेति लक्ष्मणेति च विस्वरम्।

स्फुरन्ती रावणस्याङ्के पन्नगेन्द्रवधूर्यथा॥१०॥

‘एक दिन मैंने देखा, भयंकर कर्म करने वाला कोई राक्षस किसी स्त्री को लिये जा रहा है। मैं अनुमान से समझता हूँ, वे मिथिलेशकुमारी सीता ही रही होंगी, इसमें संशय नहीं है; क्योंकि वे टूटे हुए स्वर में ‘हा राम! हा राम! हा लक्ष्मण!’ पुकारती हुई रो रही थीं तथा रावण की गोद में नागराज की वधू (नागिन) की भाँति छटपटाती हुई प्रकाशित हो रही थीं।

आत्मना पञ्चमं मां हि दृष्ट्वा शैलतले स्थितम्।

उत्तरीयं तया त्यक्तं शुभान्याभरणानि च॥११॥

‘चार मन्त्रियों सहित पाँचवाँ मैं इस शैल-शिखर पर बैठा हुआ था। मुझे देखकर देवी सीता ने अपनी चादर और कई सुन्दर आभूषण ऊपर से गिराये॥ ११ ॥

तान्यस्माभिर्गृहीतानि निहितानि च राघव।

आनयिष्याम्यहं तानि प्रत्यभिज्ञातुमर्हसि ॥१२॥

‘रघुनन्दन! वे सब वस्तुएँ हमलोगों ने लेकर रख ली हैं। मैं अभी उन्हें लाता हूँ, आप उन्हें पहचान सकते हैं।

तमब्रवीत् ततो रामः सुग्रीवं प्रियवादिनम्।

आनयस्व सखे शीघ्रं किमर्थं प्रविलम्बसे ॥१३॥

तब श्रीराम ने यह प्रिय संवाद सुनाने वाले सुग्रीव से कहा—’सखे! शीघ्र ले आओ, क्यों विलम्ब करते हो?’॥

एवमुक्तस्तु सुग्रीवः शैलस्य गहनां गुहाम्।

प्रविवेश ततः शीघ्रं राघवप्रियकाम्यया॥१४॥

उत्तरीयं गृहीत्वा तु स तान्याभरणानि च।

इदं पश्येति रामाय दर्शयामास वानरः॥१५॥

उनके ऐसा कहने पर सुग्रीव शीघ्र ही श्रीरामचन्द्रजी का प्रिय करने की इच्छा से पर्वत की एक गहन गुफा में गये और चादर तथा वे आभूषण लेकर निकल आये। बाहर आकर वानरराज ने ‘लीजिये, यह देखिये’ ऐसा कहकर श्रीराम को वे सारे आभूषण दिखाये॥ १४-१५॥

ततो गृहीत्वा वासस्तु शुभान्याभरणानि च।

अभवद् बाष्पसंरुद्धो नीहारेणेव चन्द्रमाः॥१६॥

उन वस्त्र और सुन्दर आभूषणों को लेकर श्रीरामचन्द्रजी कुहासे से ढके हुए चन्द्रमा की भाँति आँसुओं से अवरुद्ध हो गये॥१६॥

सीतास्नेहप्रवृत्तेन स तु बाष्पेण दूषितः।

हा प्रियेति रुदन् धैर्यमुत्सृज्य न्यपतत् क्षितौ॥ १७॥

सीता के स्नेहवश बहते हुए आँसुओं से उनका मुख और वक्षःस्थल भीगने लगे। वे ‘हा प्रिये!’ ऐसा कहकर रोने लगे और धैर्य छोड़कर पृथ्वी पर गिर पड़े॥१७॥

हृदि कृत्वा स बहुशस्तमलंकारमुत्तमम्।

निशश्वास भृशं सर्पो बिलस्थ इव रोषितः॥ १८॥

उन उत्तम आभूषणों को बारम्बार हृदय से लगाकर वे बिल में बैठे हुए रोष में भरे सर्प की भाँति जोर-जोर से साँस लेने लगे॥ १८॥

अविच्छिन्नाश्रुवेगस्तु सौमित्रिं प्रेक्ष्य पार्श्वतः।

परिदेवयितुं दीनं रामः समुपचक्रमे ॥१९॥

उनके आँसुओं का वेग रुकता ही नहीं था। अपने पास खड़े हुए सुमित्राकुमार लक्ष्मण की ओर देखकर श्रीराम दीनभाव से विलाप करते हुए बोले- ॥ १९॥

पश्य लक्ष्मण वैदेह्या संत्यक्तं ह्रियमाणया।

उत्तरीयमिदं भूमौ शरीराद् भूषणानि च॥२०॥

‘लक्ष्मण! देखो, राक्षस के द्वारा हरी जाती हुई विदेहनन्दिनी सीता ने यह चादर और ये गहने अपने शरीर से उतारकर पृथ्वी पर डाल दिये थे॥२०॥

शादलिन्यां ध्रुवं भूम्यां सीतया ह्रियमाणया।

उत्सृष्टं भूषणमिदं तथा रूपं हि दृश्यते॥२१॥

‘निशाचर के द्वारा अपहृत होती हुई सीता के द्वारा त्यागे गये ये आभूषण निश्चय ही घासवाली भूमि पर गिरे होंगे; क्योंकि इनका रूप ज्यों-का-त्यों दिखायी देता है—ये टूटे-फूटे नहीं हैं ॥२१॥

एवमुक्तस्तु रामेण लक्ष्मणो वाक्यमब्रवीत्।

नाहं जानामि केयूरे नाहं जानामि कुण्डले॥ २२॥

नूपुरे त्वभिजानामि नित्यं पादाभिवन्दनात्।

श्रीराम के ऐसा कहने पर लक्ष्मण बोले—’भैया! मैं इन बाजूबंदों को तो नहीं जानता और न इन कुण्डलों को ही समझ पाता हूँ कि किसके हैं; परंतु प्रतिदिन भाभी के चरणों में प्रणाम करने के कारण मैं इन दोनों नूपुरों को अवश्य पहचानता हूँ’॥ २२ १/२॥

ततस्तु राघवो वाक्यं सुग्रीवमिदमब्रवीत्॥२३॥

ब्रूहि सुग्रीव कं देशं ह्रियन्ती लक्षिता त्वया।

रक्षसा रौद्ररूपेण मम प्राणप्रिया हृता॥ २४॥

तब श्रीरघुनाथजी सुग्रीव से इस प्रकार बोले —’सुग्रीव! तुमने तो देखा है, वह भयंकर रूपधारी राक्षस मेरी प्राणप्यारी सीता को किस दिशा की ओर ले गया है, यह बताओ॥ २३-२४ ॥

क्व वा वसति तद् रक्षो महद् व्यसनदं मम।

यन्निमित्तमहं सर्वान् नाशयिष्यामि राक्षसान्॥ २५॥

‘मुझे महान् संकट देने वाला वह राक्षस कहाँ रहता है? मैं केवल उसी के अपराध के कारण समस्त राक्षसों का विनाश कर डालूँगा॥ २५ ॥

हरता मैथिली येन मां च रोषयता ध्रुवम्।

आत्मनो जीवितान्ताय मृत्युद्धारमपावृतम्॥२६॥

‘उस राक्षस ने मैथिली का अपहरण करके मेरा रोष बढ़ाकर निश्चय ही अपने जीवन का अन्त करने के लिये मौत का दरवाजा खोल दिया है॥२६॥

मम दयिततमा हृता वनाद् रजनिचरेण विमथ्य येन सा।

कथय मम रिपुं तमद्य वै प्लवगपते यमसंनिधिं नयामि॥२७॥

‘वानरराज! जिस निशाचर ने मुझे धोखे में डालकर मेरा अपमान करके मेरी प्रियतमा का वन से अपहरण किया है, वह मेरा घोर शत्रु है। तुम उसका पता बताओ। मैं अभी उसे यमराज के पास पहुँचाता हूँ॥२७॥


इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे षष्ठः सर्गः॥६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में छठा सर्ग पूरा हुआ।

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

सुग्रीव का श्रीराम को समझाना तथा श्रीराम का सुग्रीव को उनकी कार्य सिद्धि का विश्वास दिलाना

सप्तमः सर्गः

सर्ग-07


एवमुक्तस्तु सुग्रीवो रामेणार्तेन वानरः।

अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यं सबाष्पं बाष्पगद्गदः॥ १॥

श्रीराम ने शोक से पीड़ित होकर जब ऐसी बातें कहीं, तब वानरराज सुग्रीव की आँखों में आँसू भर आये और वे हाथ जोड़कर अश्रुगद्गद कण्ठ से इस प्रकार बोले- ॥१॥

न जाने निलयं तस्य सर्वथा पापरक्षसः।

सामर्थ्य विक्रमं वापि दौष्कुलेयस्य वा कुलम्॥ २॥

‘प्रभो! नीच कुल में उत्पन्न हुए उस पापात्मा राक्षस का गुप्त निवासस्थान कहाँ है, उसमें कितनी शक्ति है, उसका पराक्रम कैसा है अथवा वह किस वंश का है—इन सब बातों को मैं सर्वथा नहीं जानता॥

सत्यं तु प्रतिजानामि त्यज शोकमरिंदम।

करिष्यामि तथा यत्नं यथा प्राप्स्यसि मैथिलीम्॥

‘परंतु आपके सामने सच्ची प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि मैं ऐसा यत्न करूँगा कि जिससे मिथिलेशकुमारी सीता आपको मिल जायँ, इसलिये शत्रुदमन वीर! आप शोक का त्याग करें॥३॥

रावणं सगणं हत्वा परितोष्यात्मपौरुषम्।

तथास्मि कर्ता नचिराद् यथा प्रीतो भविष्यसि॥ ४॥

‘मैं आपके संतोष के लिये सैनिकों सहित रावण का वध करके अपना ऐसा पुरुषार्थ प्रकट करूँगा, जिससे आप शीघ्र ही प्रसन्न हो जायँगे॥ ४॥

अलं वैक्लव्यमालम्ब्य धैर्यमात्मगतं स्मर।

त्वद्विधानां न सदृशमीदृशं बुद्धिलाघवम्॥५॥

‘इस तरह मन में व्याकुलता लाना व्यर्थ है। आपके हृदय में स्वाभाविक रूप से जो धैर्य है, उसका स्मरण कीजिये। इस तरह बुद्धि और विचार को हलका बना देना—उसकी सहज गम्भीरता को खो देना आप-जैसे महापुरुषों के लिये उचित नहीं है॥५॥

मयापि व्यसनं प्राप्तं भार्याविरहजं महत्।

नाहमेवं हि शोचामि धैर्यं न च परित्यजे॥६॥

‘मुझे भी पत्नी के विरह का महान् कष्ट प्राप्त हुआ है, परंतु मैं इस तरह शोक नहीं करता और न धैर्य को ही छोड़ता हूँ॥६॥

नाहं तामनुशोचामि प्राकृतो वानरोऽपि सन्।

महात्मा च विनीतश्च किं पुनधृतिमान् महान्॥ ७॥

‘यद्यपि मैं एक साधारण वानर हूँ तथापि अपनी पत्नीके लिये निरन्तर शोक नहीं करता हूँ। फिर आप-जैसे महात्मा, सुशिक्षित और धैर्यवान् महापुरुष शोक न करें—इसके लिये तो कहना ही क्या है। ७॥

बाष्पमापतितं धैर्यान्निग्रहीतुं त्वमर्हसि।

मर्यादां सत्त्वयुक्तानां धृतिं नोत्स्रष्टुमर्हसि॥८॥

‘आपको चाहिये कि धैर्य धारण करके इन गिरते हुए आँसुओं को रोकें। सात्त्विक पुरुषों की मर्यादा और धैर्य का परित्याग न करें॥८॥

व्यसने वार्थकृच्छ्रे वा भये वा जीवितान्तगे।

विमृशंश्च स्वयाबुद्ध्या धृतिमान् नावसीदति॥ ९॥

‘(आत्मीयजनों के वियोग आदि से होने वाले) शोक में, आर्थिक संकट में अथवा प्राणान्तकारी भय उपस्थित होने पर जो अपनी बुद्धि से दुःख-निवारण के उपाय का विचार करते हुए धैर्य धारण करता है, वह कष्ट नहीं भोगता है॥९॥

बालिशस्तु नरो नित्यं वैक्लव्यं योऽनुवर्तते।

स मज्जत्यवशः शोके भाराक्रान्तेव नौर्जले॥ १०॥

‘जो मूढ़ मानव सदा घबराहट में ही पड़ा रहता है, वह पानी में भार से दबी हुई नौका के समान शोक में विवश होकर डूब जाता है॥ १०॥

एषोऽञ्जलिर्मया बद्धः प्रणयात् त्वां प्रसादये।

पौरुषं श्रय शोकस्य नान्तरं दातुमर्हसि ॥११॥

‘मैं हाथ जोड़ता हूँ। प्रेमपूर्वक अनुरोध करता हूँ कि आप प्रसन्न हों और पुरुषार्थ का आश्रय लें। शोक को अपने ऊपर प्रभाव डालने का अवसर न दें। ११॥

ये शोकमनुवर्तन्ते न तेषां विद्यते सुखम्।

तेजश्च क्षीयते तेषां न त्वं शोचितुमर्हसि॥१२॥

‘जो शोक का अनुसरण करते हैं, उन्हें सुख नहीं मिलता है और उनका तेज भी क्षीण हो जाता है; अतः आप शोक न करें॥ १२॥

शोकेनाभिप्रपन्नस्य जीविते चापि संशयः।

स शोकं त्यज राजेन्द्र धैर्यमाश्रय केवलम्॥ १३॥

‘राजेन्द्र! शोक से आक्रान्त हुए मनुष्य के जीवन में (उसके प्राणों की रक्षा में) भी संशय उपस्थित हो जाता है। इसलिये आप शोक को त्याग दें और केवल धैर्य का आश्रय लें॥१३॥

हितं वयस्यभावेन ब्रूहि नोपदिशामि ते।

वयस्यतां पूजयन्मे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥१४॥

‘मैं मित्रता के नाते हित की सलाह देता हूँ। आपको उपदेश नहीं दे रहा हूँ। आप मेरी मैत्री का आदर करते हुए कदापि शोक न करें ॥ १४ ॥

मधुरं सान्त्वितस्तेन सुग्रीवेण स राघवः।

मुखमश्रुपरिक्लिन्नं वस्त्रान्तेन प्रमार्जयत्॥१५॥

सुग्रीव ने जब मधुर वाणी में इस प्रकार सान्त्वना दी, तब श्रीरघुनाथजी ने आँसुओं से भीगे हुए अपने मुख को वस्त्र के छोर से पोंछ लिया॥१५॥

प्रकृतिस्थस्तु काकुत्स्थः सुग्रीवचनात् प्रभुः।

सम्परिष्वज्य सुग्रीवमिदं वचनमब्रवीत्॥१६॥

सुग्रीव के वचन से शोक का परित्याग करके स्वस्थचित्त हो ककुत्स्थकुलभूषण भगवान् श्रीराम ने मित्रवर सुग्रीव को हृदय से लगा लिया और इस प्रकार कहा— ॥१६॥

कर्तव्यं यद् वयस्येन स्निग्धेन च हितेन च।

अनुरूपं च युक्तं च कृतं सुग्रीव तत् त्वया॥ १७॥

‘सुग्रीव! एक स्नेही और हितैषी मित्र को जो कुछ करना चाहिये, वही तुमने किया है। तुम्हारा कार्य सर्वथा उचित और तुम्हारे योग्य है॥ १७॥

एष च प्रकृतिस्थोऽहमनुनीतस्त्वया सखे।

दुर्लभो हीदृशो बन्धुरस्मिन् काले विशेषतः॥ १८॥

‘सखे! तुम्हारे आश्वासन से मेरी सारी चिन्ता जाती रही। अब मैं पूर्ण स्वस्थ हूँ। तुम्हारे-जैसे बन्धु का विशेषतः ऐसे संकट के समय मिलना कठिन होता है॥

किं तु यत्नस्त्वया कार्यो मैथिल्याः परिमार्गणे।

राक्षसस्य च रौद्रस्य रावणस्य दुरात्मनः॥१९॥

‘परंतु तुम्हें मिथिलेशकुमारी सीता तथा रौद्ररूपधारी दुरात्मा राक्षस रावण का पता लगाने के लिये प्रयत्न करना चाहिये॥ १९॥

मया च यदनुष्ठेयं विस्रब्धेन तदुच्यताम्।

वर्षास्विव च सुक्षेत्रे सर्वं सम्पद्यते तव॥२०॥

‘साथ ही मुझे भी इस समय तुम्हारे लिये जो कुछ करना आवश्यक हो, उसे बिना किसी सङ्कोच के बताओ। जैसे वर्षाकाल में अच्छे खेत में बोया हुआ बीज अवश्य फल देता है, उसी प्रकार तुम्हारा सारा मनोरथ सफल होगा॥२०॥

मया च यदिदं वाक्यमभिमानात् समीरितम्।

तत्त्वया हरिशार्दूल तत्त्वमित्युपधार्यताम्॥२१॥

‘वानरश्रेष्ठ! मैंने जो अभिमानपूर्वक यह वाली के वध आदि करने की बात कही है, इसे तुम ठीक ही समझो॥२१॥

अनृतं नोक्तपूर्वं मे न च वक्ष्ये कदाचन।

एतत्ते प्रतिजानामि सत्येनैव शपाम्यहम्॥२२॥

‘मैंने पहले भी कभी झूठी बात नहीं कही है और भविष्य में भी कभी असत्य नहीं बोलूँगा। इस समय जो कुछ कहा है, उसे पूर्ण करने के लिये प्रतिज्ञा करता हूँ और तुम्हें विश्वास दिलाने के लिये सत्य की ही शपथ खाता हूँ’॥ २२॥

ततः प्रहृष्टः सुग्रीवो वानरैः सचिवैः सह।

राघवस्य वचः श्रुत्वा प्रतिज्ञातं विशेषतः॥२३॥

श्रीरघुनाथजी की बात, विशेषतः उनकी प्रतिज्ञा सुनकर अपने वानर-मन्त्रियों सहित सुग्रीव को बड़ी प्रसन्नता हुई॥ २३॥

एवमेकान्तसम्पृक्तौ ततस्तौ नरवानरौ।

उभावन्योन्यसदृशं सुखं दुःखमभाषताम्॥२४॥

इस प्रकार एकान्त में एक-दूसरे के निकट बैठे हुए वे दोनों नर और वानर (श्रीराम और सुग्रीव) ने परस्पर सुख और दुःख की बातें कहीं, जो एक दूसरे के  लिये अनुरूप थीं॥ २४ ॥

महानुभावस्य वचो निशम्य हरिनुपाणामधिपस्य तस्य।

कृतं स मेने हरिवीरमुख्य स्तदा च कार्यं हृदयेन विद्वान्॥२५॥

राजाधिराज महाराज श्रीरघुनाथजी की बात सुनकर वानर वीरों के प्रधान विद्वान् सुग्रीव ने उस समय मन ही-मन अपने कार्य को सिद्ध हुआ ही माना॥ २५ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे सप्तमः सर्गः॥७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में सातवाँ सर्ग पूरा हुआ।७ ॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

सुग्रीव का श्रीराम से अपना दुःख निवेदन करना और श्रीराम का उन्हें आश्वासन देते हुए दोनों भाइयोंमें वैर होने का कारण पूछना

अष्टमः सर्गः

सर्ग-08


परितुष्टस्तु सुग्रीवस्तेन वाक्येन हर्षितः।

लक्ष्मणस्याग्रजं शूरमिदं वचनमब्रवीत्॥१॥

श्रीरामचन्द्रजी की उस बात से सुग्रीव को बड़ा संतोष हुआ। वे हर्ष से भरकर लक्ष्मण के बड़े भाई शूरवीर श्रीरामचन्द्रजी से इस प्रकार बोले- ॥१॥

सर्वथाहमनुग्राह्यो देवतानां न संशयः।

उपपन्नो गुणोपेतः सखा यस्य भवान् मम॥२॥

‘भगवन् ! इसमें संदेह नहीं कि देवताओं की मेरे ऊपर बड़ी कृपा है—मैं सर्वथा उनके अनुग्रह का पात्र हूँ; क्योंकि आप-जैसे गुणवान् महापुरुष मेरे सखा हो गये॥

शक्यं खलु भवेद् राम सहायेन त्वयानघ।

सुरराज्यमपि प्राप्तुं स्वराज्यं किमुत प्रभो॥३॥

‘प्रभो! निष्पाप श्रीराम! आप-जैसे सहायक के सहयोग से तो देवताओं का राज्य भी अवश्य ही प्राप्त किया जा सकता है; फिर अपने खोये हुए राज्य को पाना कौन बड़ी बात है।

सोऽहं सभाज्यो बन्धूनां सुहृदां चैव राघव।

यस्याग्निसाक्षिकं मित्रं लब्धं राघववंशजम्॥४॥

‘रघुनन्दन! अब मैं अपने बन्धुओं और सुहृदों के विशेष सम्मान का पात्र हो गया; क्योंकि आज रघुवंश के राजकुमार आप अग्नि को साक्षी बनाकर मुझे मित्र के रूप में प्राप्त हुए हैं।

अहमप्यनुरूपस्ते वयस्यो ज्ञास्यसे शनैः।

न तु वक्तुं समर्थोऽहं त्वयि आत्मगतान् गुणान्॥

‘मैं भी आपके योग्य मित्र हूँ। इसका ज्ञान आपको धीरे-धीरे हो जायगा। इस समय आपके सामने मैं अपने गुणों का वर्णन करने में असमर्थ हूँ॥५॥

महात्मनां तु भूयिष्ठं त्वद्विधानां कृतात्मनाम्।

निश्चला भवति प्रीतिधैर्यमात्मवतां वर॥६॥

‘आत्मज्ञानियों में श्रेष्ठ श्रीराम! आप-जैसे पुण्यात्मा महात्माओं का प्रेम और धैर्य अधिकाधिक बढ़ता और अविचल होता है॥६॥

रजतं वा सुवर्णं वा शुभान्याभरणानि च।

अविभक्तानि साधूनामवगच्छन्ति साधवः॥७॥

‘अच्छे स्वभाव वाले मित्र अपने घर के सोने-चाँदी अथवा उत्तम आभूषणों को अपने अच्छे मित्रों के लिये अविभक्त ही मानते हैं उन मित्रों का अपने धन पर अपने ही समान अधिकार समझते हैं॥७॥

आढ्योवापि दरिद्रो वा दुःखितः सुखितोऽपि वा।

निर्दोषश्च सदोषश्च वयस्यः परमा गतिः॥८॥

‘अतएव मित्र धनी हो या दरिद्र, सुखी हो या दुःखी अथवा निर्दोष हो या सदोष, वह मित्र के लिये सबसे बड़ा सहायक होता है॥८॥

धनत्यागः सुखत्यागो देशत्यागोऽपि वानघ।

वयस्यार्थे प्रवर्तन्ते स्नेहं दृष्ट्वा तथाविधम्॥९॥

‘अनघ! साधुपुरुष अपने मित्र का अत्यन्त उत्कृष्ट प्रेम देख आवश्यकता पड़ने पर उसके लिये धन, सुख और देश का भी परित्याग कर देते हैं ॥९॥

तत् तथेत्यब्रवीद् रामः सुग्रीवं प्रियवादिनम्।

लक्ष्मणस्याग्रतो लक्ष्म्या वासवस्येव धीमतः॥ १०॥

यह सुनकर लक्ष्मी (दिव्य कान्ति) से उपलक्षित श्रीरामचन्द्रजी ने इन्द्रतुल्य तेजस्वी बुद्धिमान् लक्ष्मण के सामने ही प्रिय वचन बोलने वाले सुग्रीव से कहा —’सखे! तुम्हारी बात बिलकुल ठीक है’ ॥ १० ॥

ततो रामं स्थितं दृष्ट्वा लक्ष्मणं च महाबलम्।

सुग्रीवः सर्वतश्चक्षुर्वने लोलमपातयत्॥११॥

तदनन्तर (दूसरे दिन) महाबली श्रीराम और लक्ष्मण को खड़ा देख सुग्रीव ने वन में चारों ओर अपनी चञ्चल दृष्टि दौड़ायी॥ ११॥

स ददर्श ततः सालमविदूरे हरीश्वरः।

सुपुष्पमीषत्पत्राढ्यं भ्रमरैरुपशोभितम्॥१२॥

उस समय वानरराज ने पास ही एक साल का वृक्ष देखा, जिसमें थोड़े से ही सुन्दर पुष्प लगे हुए थे; परंतु उसमें पत्रों की बहुलता थी। उस वृक्ष पर मँडराते हुए भौरे उसकी शोभा बढ़ा रहे थे॥ १२॥

तस्यैकां पर्णबहुलां शाखां भक्त्वा सुशोभिताम्।

रामस्यास्तीर्य सुग्रीवो निषसाद सराघवः॥१३॥

उसकी एक डाली को जिसमें अधिक पत्ते थे और जो पुष्पों से सुशोभित थी, सुग्रीव ने तोड़ डाला और उसे श्रीराम के लिये बिछाकर वे स्वयं भी उनके साथ ही उस पर बैठ गये॥ १३॥ ।

तावासीनौ ततो दृष्ट्वा हनूमानपि लक्ष्मणम्।

शालशाखां समुत्पाट्य विनीतमुपवेशयत्॥१४॥

उन दोनों को आसन पर विराजमान देख हनुमान जी ने भी साल की एक डाल तोड़ डाली और उस पर विनयशील लक्ष्मण को बैठाया॥ १४॥

सुखोपविष्टं रामं तु प्रसन्नमुदधिं यथा।

सालपुष्पावसंकीर्णे तस्मिन् गिरिवरोत्तमे॥१५॥

ततः प्रहृष्टः सुग्रीवः श्लक्ष्णया शुभया गिरा।

उवाच प्रणयाद् रामं हर्षव्याकुलिताक्षरम्॥१६॥

उस श्रेष्ठ पर्वत पर, जहाँ सब ओर साल के पुष्प बिखरे हुए थे, सुखपूर्वक बैठे हुए श्रीराम शान्त समुद्र के समान प्रसन्न दिखायी देते थे। उन्हें देखकर अत्यन्त हर्ष से भरे हुए सुग्रीव ने श्रीराम से स्निग्ध एवं सुन्दर वाणी में वार्तालाप आरम्भ किया। उस समय आनन्दातिरेक से उनकी वाणी लड़खड़ा जाती थी अक्षरों का स्पष्ट उच्चारण नहीं हो पाता था॥ १५-१६ ॥

अहं विनिकृतो भ्रात्रा चराम्येष भयादितः।

ऋष्यमूकं गिरिवरं हृतभार्यः सुदुःखितः॥१७॥

‘प्रभो! मेरे भाई ने मुझे घर से निकालकर मेरी स्त्री को भी छीन लिया है। मैं उसी के भय से अत्यन्त पीड़ित एवं दुःखी होकर इस पर्वतश्रेष्ठ ऋष्यमूक पर विचरता रहता हूँ॥ १७॥

सोऽहं त्रस्तो भये मग्नो वने सम्भ्रान्तचेतनः।

वालिना निकृतो भ्रात्रा कृतवैरश्च राघव॥१८॥

‘मुझे बराबर उसका त्रास बना रहता है। मैं भय में डूबा रहकर भ्रान्तचित्त हो इस वन में भटकता फिरता हूँ। रघुनन्दन ! मेरे भाई वाली ने मुझे घर से निकालने के बाद भी मेरे साथ वैर बाँध रखा है॥ १८ ॥

वालिनो मे भयार्तस्य सर्वलोकाभयंकर।

ममापि त्वमनाथस्य प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥१९॥

‘प्रभो! आप समस्त लोकों को अभय देने वाले हैं। मैं वाली के भय से दुःखी और अनाथ हूँ, अतः आपको मुझपर भी कृपा करनी चाहिये’ ॥ १९ ॥

एवमुक्तस्तु तेजस्वी धर्मज्ञो धर्मवत्सलः।

प्रत्युवाच स काकुत्स्थः सुग्रीवं प्रहसन्निव॥२०॥

सुग्रीव के ऐसा कहने पर तेजस्वी, धर्मज्ञ एवं धर्मवत्सल भगवान् श्रीराम ने उन्हें हँसते हुए-से इस प्रकार उत्तर दिया- ॥२०॥

उपकारफलं मित्रमपकारोऽरिलक्षणम्।

अद्यैव तं वधिष्यामि तव भार्यापहारिणम्॥२१॥

‘सखे! उपकार ही मित्रता का फल है और अपकार शत्रुता का लक्षण है; अतः मैं आज ही तुम्हारी स्त्री का अपहरण करने वाले उस वाली का वध करूँगा॥२१॥

इमे हि मे महाभाग पत्रिणस्तिग्मतेजसः।

कार्तिकेयवनोद्भूताः शरा हेमविभूषिताः॥२२॥

‘महाभाग! मेरे इन बाणों का तेज प्रचण्ड है। सुवर्ण-भूषित ये शर कार्तिकेय की उत्पत्ति के स्थानभूत शरों के वन में उत्पन्न हुए हैं। (इसलिये अभेद्य हैं)॥ २२॥

कङ्कपत्रपरिच्छन्ना महेन्द्राशनिसंनिभाः।

सुपर्वाणः सुतीक्ष्णाग्राः सरोषा भुजगा इव॥ २३॥

‘ये कंकपक्षी के परों से युक्त हैं और इन्द्र के वज्र की भाँति अमोघ हैं। इनकी गाँठे सुन्दर और अग्रभाग तीखे हैं। ये रोष में भरे भुजङ्गों की भाँति भयंकर हैं। २३॥

वालिसंज्ञममित्रं ते भ्रातरं कृतकिल्बिषम्।

शरैर्विनिहतं पश्य विकीर्णमिव पर्वतम्॥२४॥

‘इन बाणों से तुम अपने वाली नामक शत्रु को, जो भाई होकर भी तुम्हारी बुराई कर रहा है, विदीर्ण हुए पर्वत की भाँति मरकर पृथ्वी पर पड़ा देखोगे’॥२४॥

राघवस्य वचः श्रुत्वा सुग्रीवो वाहिनीपतिः।

प्रहर्षमतुलं लेभे साधु साध्विति चाब्रवीत्॥२५॥

श्रीरघुनाथजी की यह बात सुनकर वानरसेनापति सुग्रीव को अनुपम प्रसन्नता प्राप्त हुई और वे उन्हें बारंबार साधुवाद देते हुए बोले- ॥ २५ ॥

राम शोकाभिभूतोऽहं शोकार्तानां भवान् गतिः।

वयस्य इति कृत्वा हि त्वय्यहं परिदेवये॥२६॥

‘श्रीराम! मैं शोक से पीड़ित हूँ और आप शोकाकुल प्राणियों की परमगति हैं। मित्र समझकर मैं आपसे अपना दुःख निवेदन करता हूँ॥२६॥

त्वं हि पाणिप्रदानेन वयस्यो मेऽग्निसाक्षिकम्।

कृतः प्राणैर्बहुमतः सत्येन च शपाम्यहम्॥२७॥

‘मैंने आपके हाथ में हाथ देकर अग्निदेव के सामने आपको अपना मित्र बनाया है। इसलिये आप मुझे अपने प्राणों से भी बढ़कर प्रिय हैं। यह बात मैं सत्य की शपथ खाकर कहता हूँ॥

वयस्य इति कृत्वा च विस्रब्धः प्रवदाम्यहम्।

दुःखमन्तर्गतं तन्मे मनो हरति नित्यशः॥२८॥

‘आप मेरे मित्र हैं, इसलिये आप पर पूर्ण विश्वास करके मैं अपने भीतर का दुःख, जो सदा मेरे मन को व्याकुल किये रहता है, आपको बता रहा हूँ’॥ २८॥

एतावदुक्त्वा वचनं बाष्पदूषितलोचनः।

बाष्पदूषितया वाचा नोच्चैः शक्नोति भाषितुम्॥ २९॥

इतनी बात कहते-कहते सुग्रीव के नेत्रों में आँसू भर आये। उनकी वाणी अश्रुगद्गद हो गयी। इसलिये वे उच्च स्वर से बोलने में समर्थ न हो सके॥२९॥

बाष्पवेगं तु सहसा नदीवेगमिवागतम्।

धारयामास धैर्येण सुग्रीवो रामसंनिधौ॥३०॥

तत्पश्चात् सुग्रीव ने सहसा बढ़े हुए नदी के वेग के समान उमड़े हुए आँसुओं के वेग को श्रीराम के समीप धैर्यपूवर्क रोका॥ ३०॥

स निगृह्य तु तं बाष्पं प्रमृज्य नयने शुभे।

विनिःश्वस्य च तेजस्वी राघवं पुनरूचिवान्॥३१॥

आँसुओंको रोककर अपने दोनों सुन्दर नेत्रों को पोंछने के पश्चात् तेजस्वी सुग्रीव पुनः लंबी साँस खींचकर श्रीरघुनाथजी से बोले- ॥३१॥

पुराहं वालिना राम राज्यात् स्वादवरोपितः।

परुषाणि च संश्राव्य निर्धूतोऽस्मि बलीयसा॥ ३२॥

‘श्रीराम! पहले की बात है, बलिष्ठ वाली ने कटुवचन सुनाकर बलपूर्वक मेरा तिरस्कार किया और अपने राज्य (युवराजपद) से नीचे उतार दिया। ३२॥

हृता भार्या च मे तेन प्राणेभ्योऽपि गरीयसी।

सुहृदश्च मदीया ये संयता बन्धनेषु ते॥३३॥

‘इतना ही नहीं, मेरी स्त्री को भी, जो मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय है; उसने छीन लिया और जितने मेरे सुहृद् थे, उन सबको कैद में डाल दिया॥३३॥

यत्नवांश्च स दुष्टात्मा मद्विनाशाय राघव।

बहुशस्तप्रयुक्ताश्च वानरा निहता मया॥३४॥

‘रघुनन्दन! इसके बाद भी वह दुरात्मा वाली मेरे विनाश के लिये यत्न करता रहता है। उसके भेजे हुए बहुत-से वानरों का मैं वध कर चुका हूँ॥ ३४॥

शङ्कया त्वेतयाहं च दृष्ट्वा त्वामपि राघव।

नोपसाम्यहं भीतो भये सर्वे हि बिभ्यति॥ ३५॥

‘रघुनाथजी! आपको भी देखकर मेरे मन में ऐसा ही संदेह हुआ था, इसीलिये डर जाने के कारण मैं पहले आपके पास न आ सका; क्योंकि भय का अवसर आने पर प्रायः सभी डर जाते हैं॥ ३५ ॥

केवलं हि सहाया मे हनुमत्प्रमुखास्त्विमे।

अतोऽहं धारयाम्यद्य प्राणान् कृच्छ्रगतोऽपि सन्॥ ३६॥

‘केवल ये हनुमान् आदि वानर ही मेरे सहायक हैं; अतएव महान् संकट में पड़कर भी मैं अबतक प्राण धारण करता हूँ॥ ३६॥

एते हि कपयः स्निग्धा मां रक्षन्ति समन्ततः।

सह गच्छन्ति गन्तव्ये नित्यं तिष्ठन्ति चास्थिते॥ ३७॥

‘इन लोगों का मुझ पर स्नेह है, अतः ये सभी वानर सब ओर से सदा मेरी रक्षा करते रहते हैं। जहाँ जाना होता है वहाँ साथ-साथ जाते हैं और जब कहीं मैं ठहर जाता हूँ वहाँ ये नित्य मेरे साथ रहते हैं॥३७॥

संक्षेपस्त्वेष मे राम किमुक्त्वा विस्तरं हि ते।

स मे ज्येष्ठो रिपुद्घता वाली विश्रुतपौरुषः॥ ३८॥

‘रघुनन्दन! यह मैंने संक्षेप से अपनी हालत बतलायी है। आपके सामने विस्तारपूर्वक कहने से क्या लाभ? वाली मेरा ज्येष्ठ भाई है, फिर भी इस समय मेरा शत्रु हो गया है। उसका पराक्रम सर्वत्र विख्यात है॥ ३८॥

तद्विनाशेऽपि मे दुःखं प्रमृष्टं स्यादनन्तरम्।

सुखं मे जीवितं चैव तद्विनाशनिबन्धनम्॥३९॥

(यद्यपि भाई का नाश भी दुःख का ही कारण है, तथापि) इस समय जो मेरा दुःख है, वह उसका नाश होने पर ही मिट सकता है। मेरा सुख और जीवन उसके विनाश पर ही निर्भर है॥ ३९ ॥

एष मे राम शोकान्तः शोकार्तेन निवेदितः।

दुःखितः सुखितो वापि सख्युर्नित्यं सखा गतिः॥ ४०॥

‘श्रीराम! यही मेरे शोक के नाश का उपाय है। मैंने शोक से पीड़ित होने के कारण आपसे यह बात निवेदन की है; क्योंकि मित्र दुःख में हो या सुख में, वह अपने मित्र की सदा ही सहायता करता है’। ४०॥

श्रुत्वैतच्च वचो रामः सुग्रीवमिदमब्रवीत्।

किं निमित्तमभूद् वैरं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः॥ ४१॥

यह सुनकर श्रीराम ने सुग्रीव से कहा—’तुम दोनों भाइयों में वैर पड़ने का क्या कारण है, यह मैं ठीक ठीक सुनना चाहता हूँ॥४१॥

सुखं हि कारणं श्रुत्वा वैरस्य तव वानर।

आनन्तर्याद् विधास्यामि सम्प्रधार्य बलाबलम्॥ ४२॥

‘वानरराज! तुमलोगों की शत्रुता का कारण सुनकर तुम दोनों की प्रबलता और निर्बलता का निश्चय करके फिर तत्काल ही तुम्हें सुखी बनाने वाला उपाय करूँगा॥४२॥

बलवान् हि ममामर्षः श्रुत्वा त्वामवमानितम्।

वर्धते हृदयोत्कम्पी प्रावृड्वेग इवाम्भसः॥४३॥

‘जैसे वर्षाकाल में नदी आदि का वेग बहुत बढ़ जाता है, उसी प्रकार तुम्हारे अपमानित होने की बात सुनकर मेरा प्रबल रोष बढ़ता जा रहा है और मेरे हृदय को कम्पित किये देता है॥४३॥

हृष्टः कथय विस्रब्धो यावदारोप्यते धनुः।

सृष्टश्च हि मया बाणो निरस्तश्च रिपुस्तव॥ ४४॥

‘मेरे धनुष चढ़ाने के पहले ही तुम अपनी सब बातें प्रसन्नतापूर्वक कह डालो; क्योंकि ज्यों ही मैंने बाण छोड़ा, तुम्हारा शत्रु तत्काल काल के गाल में चला जायगा’॥४४॥

एवमुक्तस्तु सुग्रीवः काकुत्स्थेन महात्मना।

प्रहर्षमतुलं लेभे चतुर्भिः सह वानरैः॥४५॥

महात्मा श्रीरामचन्द्रजी के ऐसा कहने पर सुग्रीव को अपने चारों वानरों के साथ अपार हर्ष हुआ॥ ४५ ॥

ततः प्रहृष्टवदनः सुग्रीवो लक्ष्मणाग्रजे।

वैरस्य कारणं तत्त्वमाख्यातुमुपचक्रमे॥४६॥

तदनन्तर सुग्रीव के मुख पर प्रसन्नता छा गयी और उन्होंने श्रीराम को वाली के साथ वैर होने का यथार्थ कारण बताना आरम्भ किया॥४६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डेऽष्टमः सर्गः॥८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में आठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥८॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

सुग्रीव का श्रीरामचन्द्रजी को वाली के साथ अपने वैर होने का कारण बताना

नवमः सर्गः

सर्ग-09


वाली नाम मम भ्राता ज्येष्ठः शत्रुनिषूदनः।

पितुर्बहमतो नित्यं मम चापि तथा पुरा॥१॥

‘रघुनन्दन! वाली मेरे बड़े भाई हैं। उनमें शत्रुओं का संहार करने की शक्ति है। मेरे पिता ऋक्षरजा उनको बहुत मानते थे। वैरसे पहले मेरे मन में भी उनके प्रति आदर का भाव था॥१॥

पितर्युपरते तस्मिन् ज्येष्ठोऽयमिति मन्त्रिभिः।

कपीनामीश्वरो राज्ये कृतः परमसम्मतः॥२॥

‘पिताकी मृत्यु के पश्चात् मन्त्रियों ने उन्हें ज्येष्ठ समझकर वानरों का राजा बनाया। वे सबको बड़े प्रिय थे, इसीलिये किष्किन्धा के राज्यपर प्रतिष्ठित किये गये थे॥

राज्यं प्रशासतस्तस्य पितृपैतामहं महत्।

अहं सर्वेषु कालेषु प्रणतः प्रेष्यवत् स्थितः॥३॥

‘वे पिता-पितामहों के विशाल राज्य का शासन करने लगे और मैं हर समय विनीतभाव से दास की भाँति उनकी सेवा में रहने लगा॥३॥

मायावी नाम तेजस्वी पूर्वजो दुन्दुभेः सुतः।

तेन तस्य महबेरं वालिनः स्त्रीकृतं पुरा॥४॥

‘उन दिनों मायावी नामक एक तेजस्वी दानव रहता था, जो मय दानव का पुत्र और दुन्दुभि का बड़ा भाई था। उसके साथ वाली का स्त्री के कारण बहुत बड़ा वैर हो गया था॥४॥

स तु सुप्ते जने रात्रौ किष्किन्धाद्वारमागतः।

नर्दति स्म सुसंरब्धो वालिनं चाह्वयद् रणे॥५॥

‘एक दिन आधी रात के समय जब सब लोग सो गये, मायावी किष्किन्धापुरी के दरवाजे पर आया और क्रोध से भरकर गर्जने तथा वाली को युद्ध के लिये ललकारने लगा॥५॥

प्रसुप्तस्तु मम भ्राता नर्दतो भैरवस्वनम्।

श्रुत्वा न ममृषे वाली निष्पपात जवात् तदा॥६॥

‘उस समय मेरे भाई सो रहे थे। उसका भैरवनाद सुनकर उनकी नींद खुल गयी। उनसे उस राक्षस की ललकार सही नहीं गयी; अतः वे तत्काल वेगपूर्वक घर से निकले॥

स तु वै निःसृतः क्रोधात् तं हन्तुमसुरोत्तमम्।

वार्यमाणस्ततः स्त्रीभिर्मया च प्रणतात्मना॥७॥

‘जब वे क्रोध करके उस श्रेष्ठ असुर को मारने के लिये निकले, उस समय मैंने तथा अन्तःपुर की स्त्रियों ने पैरों पड़कर उन्हें जाने से रोका॥७॥

स तु निर्धूय सर्वान् नो निर्जगाम महाबलः।

ततोऽहमपि सौहार्दान्निःसृतो वालिना सह॥८॥

‘परंतु महाबली वाली हम सबको हटाकर निकल पड़े, तब मैं भी स्नेहवश वाली के साथ ही बाहर निकला॥

स तु मे भ्रातरं दृष्ट्वा मां च दूरादवस्थितम्।

असुरो जातसंत्रासः प्रदुद्राव तदा भृशम्॥९॥

‘उस असुर ने मेरे भाई को देखा तथा कुछ दूर पर खड़े हुए मेरे ऊपर भी उसकी दृष्टि पड़ी; फिर तो वह भय से थर्रा उठा और बड़े जोर से भागा॥९॥

तस्मिन् द्रवति संत्रस्ते ह्यावां द्रुततरं गतौ।

प्रकाशोऽपि कृतो मार्गश्चन्द्रेणोद्गच्छता तदा॥ १०॥

‘उसके भयभीत होकर भागने पर हम दोनों भाइयों ने बड़ी तेजी के साथ उसका पीछा किया। उस समय उदित हुए चन्द्रमा ने हमारे मार्ग को भी प्रकाशित कर दिया था॥१०॥

स तृणैरावृतं दुर्गं धरण्या विवरं महत्।

प्रविवेशासुरो वेगादावामासाद्य विष्ठितौ॥११॥

‘आगे जाने पर धरती में एक बहुत बड़ा बिल था, जो घास-फूस से ढका हुआ था। उसमें प्रवेश करना अत्यन्त कठिन था। वह असुर बड़े वेग से उस बिल में जा घुसा। वहाँ पहुँचकर हम दोनों ठहर गये॥ ११॥

तं प्रविष्टं रिपुं दृष्ट्वा बिलं रोषवशं गतः।

मामुवाच ततो वाली वचनं क्षुभितेन्द्रियः॥१२॥

‘शत्रु को बिल के अंदर घुसा देख वाली के क्रोध की सीमा न रही। उनकी सारी इन्द्रियाँ क्षुब्ध हो उठीं और वे मुझसे इस प्रकार बोले- ॥ १२॥

इह तिष्ठाद्य सुग्रीव बिलदारि समाहितः।

यावदत्र प्रविश्याहं निहन्मि समरे रिपुम्॥१३॥

‘सुग्रीव! जब तक मैं इस बिल के भीतर प्रवेश करके युद्ध में शत्रु को मारता हूँ, तब तक तुम आज इसके दरवाजे पर सावधानी से खड़े रहो’ ॥ १३॥

मया त्वेतद् वचः श्रुत्वा याचितः स परंतपः।

शापयित्वा च मां पद्भ्यां प्रविवेश बिलं ततः॥ १४॥

‘यह बात सुनकर मैंने शत्रुओं को संताप देने वाले वाली से स्वयं भी साथ चलने के लिये प्रार्थना की, किंतु वे अपने चरणों की सौगन्ध दिलाकर अकेले ही बिल में घुसे॥१४॥

तस्य प्रविष्टस्य बिलं साग्रः संवत्सरो गतः।

स्थितस्य च बिलद्वारि स कालो व्यत्यवर्तत॥ १५॥

‘बिल के भीतर गये हुए उन्हें एक साल से अधिक समय बीत गया और बिल के दरवाजे पर खड़े-खड़े मेरा भी उतना ही समय निकल गया॥ १५ ॥

अहं तु नष्टं तं ज्ञात्वा स्नेहादागतसम्भ्रमः।

भ्रातरं न प्रपश्यामि पापशति च मे मनः॥१६॥

‘जब इतने दिनों तक मुझे भाई का दर्शन नहीं हुआ, तब मैंने समझा कि मेरे भाई इस गुफा में ही कहीं खो गये। उस समय भ्रातृस्नेह के कारण मेरा हृदय व्याकुल हो उठा। मेरे मन में उनके मारे जाने की शङ्का होने लगी॥

अथ दीर्घस्य कालस्य बिलात् तस्माद्

विनिःसृतम्। सफेनं रुधिरं दृष्ट्वा ततोऽहं भृशदुःखितः॥१७॥

‘तदनन्तर दीर्घकाल के पश्चात् उस बिल से सहसा फेनसहित खून की धारा निकली। उसे देखकर मैं बहुत दुःखी हो गया॥१७॥

नतामसुराणां च ध्वनिर्मे श्रोत्रमागतः।

न रतस्य च संग्रामे क्रोशतोऽपि स्वनो गुरोः॥ १८॥

‘इतने ही में गरजते हुए असुरों की आवाज भी मेरे कानों में पड़ी। युद्ध में लगे हुए मेरे बड़े भाई भी गरजना कर रहे थे, किंतु उनकी आवाज मैं नहीं सुन सका॥

अहं त्ववगतो बुद्ध्या चिह्नस्तै तरं हतम्।

पिधाय च बिलदारं शिलया गिरिमात्रया॥१९॥

शोकार्तश्चोदकं कृत्वा किष्किन्धामागतः सखे।

गृहमानस्य मे तत् त्वं यत्नतो मन्त्रिभिः श्रुतम्॥ २०॥

‘इन सब चिह्नों को देखकर बुद्धि द्वारा विचार करने पर मैं इस निश्चय पर पहुँचा कि मेरे बड़े भाई मारे गये। फिर तो उस गुफा के दरवाजे पर मैंने पर्वत के समान एक पत्थर की चट्टान रख दी और उसे बंद करके भाई को जलाञ्जलि दे शोक से व्याकुल हुआ मैं किष्किन्धापुरी में लौट आया। सखे! यद्यपि मैं इस यथार्थ बात को छिपा रहा था, तथापि मन्त्रियों ने यत्न करके सुन लिया॥ १९-२० ॥

ततोऽहं तैः समागम्य समेतैरभिषेचितः।

राज्यं प्रशासतस्तस्य न्यायतो मम राघव॥२१॥

आजगाम रिपुं हत्वा दानवं स तु वानरः।

अभिषिक्तं तु मां दृष्ट्वा क्रोधात् संरक्तलोचनः॥ २२॥

‘तब उन सबने मिलकर मुझे राज्य पर अभिषिक्त कर दिया। रघुनन्दन! मैं न्यायपूर्वक राज्य का संचालन करने लगा। इसी समय अपने शत्रुभूत उस दानव को मारकर वानरराज वाली घर लौटे। लौटने पर मुझे राज्य पर अभिषिक्त हुआ देख उनकी आँखें क्रोध से लाल हो गयीं॥ २१-२२॥

मदीयान् मन्त्रिणो बद्ध्वा परुषं वाक्यमब्रवीत्।

निग्रहे च समर्थस्य तं पापं प्रति राघव॥२३॥

न प्रावर्तत मे बुद्धिर्भ्रातृगौरवयन्त्रिता।

‘मेरे मन्त्रियों को उन्होंने कैद कर लिया और उन्हें कठोर बातें सुनायीं। रघुवीर! यद्यपि मैं स्वयं भी उस पापी को कैद करने में समर्थ था तो भी भाई के प्रति गुरुभाव होने के कारण मेरी बुद्धि में ऐसा विचार नहीं हुआ॥ २३ १/२॥

हत्वा शत्रु स मे भ्राता प्रविवेश पुरं तदा॥२४॥

मानयंस्तं महात्मानं यथावच्चाभिवादयम्।

उक्ताश्च नाशिषस्तेन प्रहृष्टेनान्तरात्मना॥२५॥

‘इस प्रकार शत्रु का वध करके मेरे भाई ने उस समय नगर में प्रवेश किया। उन महात्मा का सम्मान करते हुए मैंने यथोचितरूप से उनके चरणों में मस्तक झुकाया तो भी उन्होंने प्रसन्नचित्त से मुझे आशीर्वाद नहीं दिया॥ २४-२५॥

नत्वा पादावहं तस्य मुकुटेनास्पृशं प्रभो।

अपि वाली मम क्रोधान्न प्रसादं चकार सः॥ २६॥

‘प्रभो! मैंने भाई के सामने झुककर अपने मस्तक के मुकुट से उनके दोनों चरणों का स्पर्श किया तो भी क्रोध के कारण वाली मुझ पर प्रसन्न नहीं हुए’ ॥२६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे नवमः सर्गः॥९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में नवाँ सर्ग पूरा हुआ।९॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

भाई के साथ वैर का कारण बताने के प्रसङ्ग में सुग्रीव का वाली को मनाने और वाली द्वारा अपने निष्कासित होने का वृत्तान्त सुनाना

दशमः सर्गः

सर्ग-10


ततः क्रोधसमाविष्टं संरब्धं तमुपागतम्।

अहं प्रसादयांचक्रे भ्रातरं हितकाम्यया॥१॥

(सुग्रीव कहते हैं-) ‘तदनन्तर क्रोध से आविष्ट तथा विक्षुब्ध होकर आये हुए अपने बड़े भाई को उनके हित की कामना से मैं पुनः प्रसन्न करने की चेष्टा करने लगा॥१॥

दिष्ट्यासि कुशली प्राप्तो निहतश्च त्वया रिपुः ।

अनाथस्य हि मे नाथस्त्वमेकोऽनाथनन्दन॥२॥

‘मैंने कहा—’अनाथनन्दन ! सौभाग्य की बात है कि आप सकुशल लौट आये और वह शत्रु आपके हाथ से मारा गया। मैं आपके बिना अनाथ हो रहा था। अब एकमात्र आप ही मेरे नाथ हैं॥२॥

इदं बहुशलाकं ते पूर्णचन्द्रमिवोदितम्।

छत्रं सवालव्यजनं प्रतीच्छस्व मया धृतम्॥३॥

“यह बहुत-सी तीलियों से युक्त तथा उदित हुए पूर्ण चन्द्रमा के समान श्वेत छत्र मैं आपके मस्तक पर लगाता और चँवर डुलाता हूँ। आप इन्हें स्वीकार करें।

आर्तस्तत्र बिलद्वारि स्थितः संवत्सरं नृप।

दृष्ट्वा च शोणितं द्वारि बिलाच्चापि समुत्थितम्॥ ४॥

शोकसंविग्नहृदयो भृशं व्याकुलितेन्द्रियः।

“वानरराज! मैं बहुत दुःखी होकर एक वर्ष तक उस बिल के दरवाजे पर खड़ा रहा। उसके बाद बिल के भीतर से खून की धारा निकली। द्वार पर वह रक्त देखकर मेरा हृदय शोक से उद्विग्न हो उठा और मेरी सारी इन्द्रियाँ अत्यन्त व्याकुल हो गयीं॥ ४ १/२॥

अपिधाय बिलद्वारं शैलशृङ्गेण तत् तदा॥५॥

तस्माद् देशादपाक्रम्य किष्किन्धां प्राविशं पुनः।

“तब उस बिल के द्वार को एक पर्वत-शिखर से ढककर मैं उस स्थान से हट गया और पुनः किष्किन्धापुरी में चला आया॥ ५ १/२ ॥

विषादात्त्विह मां दृष्ट्वा पौरैर्मन्त्रिभिरेव च॥६॥

अभिषिक्तो न कामेन तन्मे क्षन्तुं त्वमर्हसि।

“यहाँ विषादपूर्वक मुझे अकेला लौटा देख पुरवासियों और मन्त्रियों ने ही इस राज्य पर मेरा अभिषेक कर दिया। मैंने स्वेच्छा से इस राज्य को नहीं ग्रहण किया है। अतः अज्ञानवश होने वाले मेरे इस अपराध को आप क्षमा करें। ६ १/२॥

त्वमेव राजा मानार्हः सदा चाहं यथा पुरा॥७॥

राजभावे नियोगोऽयं मम त्वद्विरहात् कृतः।

“आप ही यहाँ के सम्माननीय राजा हैं और मैं सदा आपका पूर्ववत् सेवक हूँ। आपके वियोग से ही राजा के पद पर मेरी यह नियुक्ति की गयी॥ ७ १/२॥

सामात्यपौरनगरं स्थितं निहतकण्टकम्॥८॥

न्यासभूतमिदं राज्यं तव निर्यातयाम्यहम्।

“मन्त्रियों, पुरवासियों तथा नगरसहित आपका यह सारा अकंटक राज्य मेरे पास धरोहर के रूप में रखा था। अब इसे मैं आपकी सेवा में लौटा रहा हूँ॥ ८ १/२॥

मा च रोषं कृथाः सौम्य मम शत्रुनिषूदन॥९॥

याचे त्वां शिरसा राजन् मया बद्धोऽयमञ्जलिः।

“सौम्य! शत्रुसूदन! आप मुझ पर क्रोध न करें। ‘राजन्! मैं इसके लिये मस्तक झुकाकर प्रार्थना करता हूँ और हाथ जोड़ता हूँ॥ ९ १/२॥

बलादस्मिन् समागम्य मन्त्रिभिः पुरवासिभिः॥ १०॥

राजभावे नियुक्तोऽहं शून्यदेशजिगीषया।

“मन्त्रियों तथा पुरवासियों ने मिलकर जबर्दस्ती मुझे इस राज्य पर बिठाया है। वह भी इसलिये कि राजा से रहित राज्य देखकर कोई शत्रु इसे जीतने की इच्छा से आक्रमण न कर बैठे”॥ १० १/२॥

स्निग्धमेवं ब्रुवाणं मां स विनिर्भय॑ वानरः॥

धिक्त्वामिति च मामुक्त्वा बहु तत्तदुवाच ह।

‘मैंने ये सारी बातें बड़े प्रेम से कही थीं, किंतु उस वानर ने मुझे डाँटकर कहा—’तुझे धिक्कार है’। यों कहकर उसने मुझे और भी बहुत-सी कठोर बातें सुनायीं ॥ ११ १/२॥

प्रकृतीश्च समानीय मन्त्रिणश्चैव सम्मतान्॥ १२॥

मामाह सुहृदां मध्ये वाक्यं परमगर्हितम्।

‘तत्पश्चात् उसने प्रजाजनों और सम्मान्य मन्त्रियों को बुलाया तथा सुहृदों के बीच में मेरे प्रति अत्यन्त निन्दित वचन कहा ॥ १२ १/२ ॥

विदितं वो मया रात्रौ मायावी स महासुरः॥ १३॥

मां समाह्वयत क्रुद्धो युद्धाकांक्षी तदा पुरा।

‘वह बोला—’आपलोगों को मालूम होगा कि एक दिन रात में मेरे साथ युद्ध करने की इच्छा से मायावी नामक महान् असुर यहाँ आया था। उसने क्रोध में भरकर पहले मुझे युद्ध के लिये ललकारा॥ १३ १/२॥

तस्य तद् भाषितं श्रुत्वा निःसृतोऽहं नृपालयात्॥ १४॥

अनुयातश्च मां तूर्णमयं भ्राता सुदारुणः।

“उसकी वह ललकार सुनकर मैं राजभवन से निकल पड़ा। उस समय यह क्रूर स्वभाववाला मेरा भाई भी तुरंत ही मेरे पीछे-पीछे आया॥ १४ १/२॥

स तु दृष्ट्वैव मां रात्रौ सद्वितीयं महाबलः॥१५॥

प्राद्रवद् भयसंत्रस्तो वीक्ष्यावां समुपागतौ।

अभिद्रुतस्तु वेगेन विवेश स महाबिलम्॥१६॥

“यद्यपि वह असुर बड़ा बलवान् था तथापि मुझे एक दूसरे सहायक के साथ देखते ही भयभीत हो उस रात में भाग चला। हम दोनों भाइयों को आते देख वह बड़े वेग से दौड़ा और एक विशाल गुफा में घुस गया॥

तं प्रविष्टं विदित्वा तु सुघोरं सुमहबिलम्।

अयमुक्तोऽथ मे भ्राता मया तु क्रूरदर्शनः॥१७॥

“उस अत्यन्त भयंकर विशाल गुफा में उस असुर को घुसा हुआ जानकर मैंने अपने इस क्रूरदर्शी भाई से कहा- ॥१७॥

अहत्वा नास्ति मे शक्तिः प्रतिगन्तुमितः पुरीम्।

बिलद्वारि प्रतीक्ष त्वं यावदेनं निहन्म्यहम्॥१८॥

“सुग्रीव! इस शत्रु को मारे बिना मैं यहाँ से किष्किन्धापुरी को लौट चलने में असमर्थ हूँ; अतः जबतक मैं इस असुर को मारकर लौटता हूँ, तबतक तुम इस गुफा के दरवाजे पर रहकर मेरी प्रतीक्षा करो’ ॥ १८॥

स्थितोऽयमिति मत्वाहं प्रविष्टस्तु दुरासदम्।

तं मे मार्गयतस्तत्र गतः संवत्सरस्तदा॥१९॥

“ऐसा कहकर और ‘यह तो यहाँ खड़ा है ही’ ऐसा विश्वास करके मैं उस अत्यन्त दुर्गम गुफा के भीतर प्रविष्ट हुआ। भीतर जाकर मैं उस दानव की खोज करने लगा और इसी में मेरा वहाँ एक वर्ष का समय व्यतीत हो गया॥ १९॥

स तु दृष्टो मया शत्रुरनिर्वेदाद् भयावहः।

निहतश्च मया सद्यः स सर्वैः सह बन्धुभिः॥ २०॥

“इसके बाद मैंने उस भयंकर शत्रु को देखा। इतने दिनों तक उसके न मिलने से मेरे मन में कोई क्लेश या उदासीनता नहीं हुई थी। मैंने उसे उसके समस्त बन्धु-बान्धवोंसहित तत्काल काल के गाल में डाल दिया॥२०॥

तस्यास्यात्तु प्रवृत्तेन रुधिरौघेण तद्बिलम्।

पूर्णमासीद् दुराक्रामं स्तनतस्तस्य भूतले॥२१॥

“उसके मुख से और छाती से भी भूतल पर रक्त का ऐसा प्रवाह जारी हुआ, जिससे वह सारी दुर्गम गुफा भर गयी॥ २१॥

सूदयित्वा तु तं शत्रु विक्रान्तं तमहं सुखम्।

निष्क्रामं नैव पश्यामि बिलस्य पिहितं मुखम्॥ २२॥

“इस तरह उस पराक्रमी शत्रु का सुखपूर्वक वध करके जब मैं लौटा, तब मुझे निकलने का कोई मार्ग ही नहीं दिखायी देता था; क्योंकि बिल का दरवाजा बंद कर दिया गया था॥ २२ ॥

विक्रोशमानस्य तु मे सुग्रीवेति पुनः पुनः।

यतः प्रतिवचो नास्ति ततोऽहं भृशदुःखितः॥२३॥

“मैंने ‘सुग्रीव! सुग्रीव! कहकर बारंबार पुकारा, किंतु कोई उत्तर नहीं मिला। इससे मुझे बड़ा दुःख हुआ॥२३॥

पादप्रहारैस्तु मया बहुभिः परिपातितम्।

ततोऽहं तेन निष्क्रम्य पथा पुरमुपागतः॥२४॥

“मैंने बारंबार लात मारकर किसी तरह उस पत्थर को पीछे की ओर ढकेला। इसके बाद गुफा द्वार से निकलकर यहाँ की राह पकड़े मैं इस नगर में लौटा हूँ॥ २४॥

तत्रानेनास्मि संरुद्धो राज्यं मृगयताऽऽत्मनः।

सुग्रीवेण नृशंसेन विस्मृत्य भ्रातृसौहृदम्॥२५॥

“यह सुग्रीव ऐसा क्रूर और निर्दयी है कि इसने भ्रातृ-प्रेम को भुला दिया और सारा राज्य अपने हाथ में कर लेने के लिये मुझे उस गुफा के अंदर बंद कर दिया था’।

एवमुक्त्वा तु मां तत्र वस्त्रेणैकेन वानरः।

तदा निर्वासयामास वाली विगतसाध्वसः॥२६॥

‘ऐसा कहकर वानरराज वाली ने निर्भयतापूर्वक मुझे घर से निकाल दिया। उस समय मेरे शरीर पर एक ही वस्त्र रह गया था॥२६॥

तेनाहमपविद्धश्च हृतदारश्च राघव।

तद्भयाच्च महीं सर्वां क्रान्तवान् सवनार्णवाम्॥ २७॥

ऋष्यमूकं गिरिवरं भार्याहरणदुःखितः।

प्रविष्टोऽस्मि दुराधर्षं वालिनः कारणान्तरे॥२८॥

‘रघुनन्दन! उसने मुझे घर से तो निकाल ही दिया, मेरी स्त्री को भी छीन लिया। उसके भय से मैं वनों और समुद्रोंसहित सारी पृथ्वी पर मारा-मारा फिरता रहा। अन्ततोगत्वा मैं भार्याहरण के दुःख से दुःखी हो इस श्रेष्ठ पर्वत ऋष्यमूक पर चला आया; क्योंकि एक विशेष कारणवश वाली के लिये इस स्थान पर आक्रमण करना बहुत कठिन है॥ २७-२८॥

एतत्ते सर्वमाख्यातं वैरानुकथनं महत्।

अनागसा मया प्राप्तं व्यसनं पश्य राघव॥२९॥

‘रघुनाथजी! यही वाली के साथ मेरे वैर पड़ने की विस्तृत कथा है। यह सब मैंने आपको सुना दी। देखिये, बिना अपराध के ही मुझे यह सब संकट भोगना पड़ता है॥ २९॥

वालिनश्च भयात् तस्य सर्वलोकभयापह।

कर्तुमर्हसि मे वीर प्रसादं तस्य निग्रहात्॥३०॥

‘वीरवर! आप सम्पूर्ण जगत् का भय दूर करने वाले हैं। मुझपर कृपा कीजिये और वाली का दमन करके मुझे उसके भय से बचाइये’ ॥ ३० ॥

एवमुक्तः स तेजस्वी धर्मज्ञो धर्मसंहितम्।

वचनं वक्तुमारेभे सुग्रीवं प्रहसन्निव॥३१॥

सुग्रीव के ऐसा कहने पर धर्म के ज्ञाता परम तेजस्वी श्रीरामचन्द्रजी ने उनसे हँसते हुए-से यह धर्मयुक्त वचन कहना आरम्भ किया- ॥३१॥

अमोघाः सूर्यसंकाशा निशिता मे शरा इमे।

तस्मिन् वालिनि दुर्वृत्ते पतिष्यन्ति रुषान्विताः॥ ३२॥

‘मित्र! ये मेरे सूर्य के समान तेजस्वी तीखे बाण अमोघ हैं, जो दुराचारी वाली पर रोषपूर्वक पड़ेंगे। ३२॥

यावत् तं नहि पश्येयं तव भार्यापहारिणम्।

तावत् स जीवेत् पापात्मा वाली चारित्रदूषकः॥ ३३॥

‘जबतक तुम्हारी भार्या का अपहरण करने वाले उस वानर को मैं अपने सामने नहीं देखता हूँ तब तक सदाचार को कलंकित करने वाला वह पापात्मा वाली जीवन धारण कर ले॥ ३३॥

आत्मानुमानात् पश्यामि मग्नस्त्वं शोकसागरे।

त्वामहं तारयिष्यामि बाढं प्राप्स्यसि पुष्कलम्॥ ३४॥

‘मैं अपने ही अनुमान से  समझता हूँ कि तुम शोक के समुद्र में डूबे हुए हो। मैं तुम्हारा उद्धार करूँगा। तुम अपनी पत्नी तथा विशाल राज्य को भी अवश्य प्राप्त कर लोगे’ ॥ ३४॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा हर्षपौरुषवर्धनम्।

सुग्रीवः परमप्रीतः सुमहद्वाक्यमब्रवीत्॥३५॥

श्रीराम का यह वचन हर्ष और पुरुषार्थ को बढ़ाने वाला था। उसे सुनकर सुग्रीव को बड़ी प्रसन्नता हुई। फिर वे बहुत ही महत्त्वपूर्ण बात कहने लगे। ३५॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे दशमः सर्गः॥१०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में दसवाँ सर्ग पूरा हुआ।१०॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

वाली का दुन्दुभि दैत्य को मारकर उसकी लाश को मतङ्ग वन में फेंकना, मतङ्गमुनि का वाली को शाप देना, सुग्रीव का राम से साल-भेदन के लिये आग्रह करना

एकादशः सर्गः

सर्ग-11


रामस्य वचनं श्रुत्वा हर्षपौरुषवर्धनम्।

सुग्रीवः पूजयांचक्रे राघवं प्रशशंस च॥१॥

श्रीरामचन्द्रजी का वचन हर्ष और पुरुषार्थ को बढ़ाने वाला था, उसे सुनकर सुग्रीव ने उसके प्रति अपना आदर प्रकट किया और श्रीरघुनाथजी की इस प्रकार प्रशंसा की— ॥१॥

असंशयं प्रज्वलितैस्तीक्ष्णैर्मर्मातिगैः शरैः।

त्वं दहेः कुपितो लोकान् युगान्त इव भास्करः॥ २॥

‘प्रभो! आपके बाण प्रज्वलित, तीक्ष्ण एवं मर्मभेदी हैं। यदि आप कुपित हो जायँ तो इनके द्वारा प्रलयकाल के सूर्य की भाँति समस्त लोकों को भस्म कर सकते हैं। इसमें संशय की बात नहीं है॥२॥

वालिनः पौरुषं यत्तद् यच्च वीर्यं धृतिश्च या।

तन्ममैकमनाः श्रुत्वा विधत्स्व यदनन्तरम्॥३॥

‘परंतु वाली का जैसा पुरुषार्थ है, जो बल है और जैसा धैर्य है, वह सब एकचित्त होकर सुन लीजिये। उसके बाद जैसा उचित हो, कीजियेगा॥३॥

समुद्रात् पश्चिमात् पूर्वं दक्षिणादपि चोत्तरम्।

क्रामत्यनुदिते सूर्ये वाली व्यपगतक्लमः॥४॥

‘वाली सूर्योदय के पहले ही पश्चिम समुद्र से  पूर्व समुद्रतक और दक्षिण सागर से उत्तर तक घूम आता है; फिर भी वह थकता नहीं है॥४॥

अग्राण्यारुह्य शैलानां शिखराणि महान्त्यपि।

ऊर्ध्वमुत्पात्य तरसा प्रतिगृह्णाति वीर्यवान्॥५॥

‘पराक्रमी वाली पर्वतों की चोटियों पर चढ़कर बड़े बड़े शिखरों को बलपूर्वक उठा लेता और ऊपर को उछालकर फिर उन्हें हाथों से थाम लेता है॥५॥

बहवः सारवन्तश्च वनेषु विविधा द्रुमाः।

वालिना तरसा भग्ना बलं प्रथयताऽऽत्मनः॥६॥

‘वनों में नाना प्रकार के जो बहुत-से सुदृढ़ वृक्ष थे, उन्हें अपने बल को प्रकट करते हुए वाली ने वेगपूर्वक तोड़ डाला है॥६॥

महिषो दुन्दुभिर्नाम कैलासशिखरप्रभः।

बलं नागसहस्रस्य धारयामास वीर्यवान्॥७॥

‘पहले की बात है यहाँ एक दुन्दुभि नाम का असुर रहता था, जो भैंसे के रूप में दिखायी देता था। वह ऊँचाई में कैलास पर्वत के समान जान पड़ता था। पराक्रमी दुन्दुभि अपने शरीर में एक हजार हाथियों का बल रखता था॥

स वीर्योत्सेकदुष्टात्मा वरदानेन मोहितः।

जगाम स महाकायः समुद्रं सरितां पतिम्॥८॥

‘बल के घमंड में भरा हुआ वह विशालकाय दुष्टात्मा दानव अपने को मिले हुए वरदान से मोहित हो सरिताओं के स्वामी समुद्र के पास गया॥८॥

ऊर्मिमन्तमतिक्रम्य सागरं रत्नसंचयम्।

मम युद्धं प्रयच्छेति तमुवाच महार्णवम्॥९॥

‘जिसमें उत्ताल तरङ्गे उठ रही थीं तथा जो रत्नों की निधि हैं, उस महान् जलराशि से परिपूर्ण समुद्र को लाँघकर—उसे कुछ भी न समझकर दुन्दुभि ने उसके अधिष्ठाता देवता से कहा—’मुझे अपने साथ युद्ध का अवसर दो’ ॥ ९॥

ततः समुद्रो धर्मात्मा समुत्थाय महाबलः।

अब्रवीद् वचनं राजन्नसुरं कालचोदितम्॥१०॥

‘राजन् ! उस समय महान् बलशाली धर्मात्मा समुद्र उस कालप्रेरित असुर से इस प्रकार बोला- ॥ १० ॥

समर्थो नास्मि ते दातुं युद्धं युद्धविशारद।

श्रूयतां त्वभिधास्यामि यस्ते युद्धं प्रदास्यति॥ ११॥

“युद्धविशारद वीर! मैं तुम्हें युद्ध का अवसर देने– तुम्हारे साथ युद्ध करने में असमर्थ हूँ। जो तुम्हें युद्ध प्रदान करेगा, उसका नाम बतलाता हूँ, सुनो॥ ११॥

शैलराजो महारण्ये तपस्विशरणं परम्।

शंकरश्वशुरो नाम्ना हिमवानिति विश्रुतः॥१२॥

महाप्रस्रवणोपेतो बहुकन्दरनिर्झरः।

स समर्थस्तव प्रीतिमतुलां कर्तुमर्हति॥१३॥

‘विशाल वन में जो पर्वतों का राजा और भगवान् शंकर का श्वशुर है, तपस्वी जनों का सबसे बड़ा आश्रय और संसार में हिमवान् नाम से विख्यात है, जहाँ से जल के बड़े-बड़े स्रोत प्रकट हुए हैं। तथा जहाँ बहुत-सी कन्दराएँ और झरने हैं, वह गिरिराज हिमालय ही तुम्हारे साथ युद्ध करने में समर्थ है। वह तुम्हें अनुपम प्रीति प्रदान कर सकता है॥ १२-१३॥

तं भीतमिति विज्ञाय समुद्रमसुरोत्तमः।

हिमवदनमागम्य शरश्चापादिव च्युतः॥१४॥

ततस्तस्य गिरेः श्वेता गजेन्द्रप्रतिमाः शिलाः।

चिक्षेप बहुधा भूमौ दुन्दुभिर्विननाद च॥१५॥

‘यह सुनकर असुरशिरोमणि दुन्दुभि समुद्र को डरा हुआ जान धनुष से छूटे हुए बाण की भाँति तुरंत हिमालय के वन में जा पहुँचा और उस पर्वत की गजराजों के समान विशाल श्वेत शिलाओं को बारंबार भूमि पर फेंकने और गर्जना करने लगा॥ १४-१५ ॥

ततः श्वेताम्बुदाकारः सौम्यः प्रीतिकराकृतिः।

हिमवानब्रवीद् वाक्यं स्व एव शिखरे स्थितः॥ १६॥

‘तब श्वेत बादल के समान आकार धारण किये सौम्य स्वभाव वाले हिमवान् वहाँ प्रकट हुए। उनकी आकृति प्रसन्नता को बढ़ाने वाली थी। वे अपने ही शिखर पर खड़े होकर बोले- ॥ १६॥

क्लेष्टुमर्हसि मां न त्वं दुन्दुभे धर्मवत्सल।

रणकर्मस्वकुशलस्तपस्विशरणो ह्यहम्॥१७॥

“धर्मवत्सल दुन्दुभे! तुम मुझे क्लेश न दो। मैं युद्धकर्म में कुशल नहीं हूँ। मैं तो केवल तपस्वी जनों का निवासस्थान हूँ॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा गिरिराजस्य धीमतः।

उवाच दुन्दुभिर्वाक्यं क्रोधात् संरक्तलोचनः॥ १८॥

‘बुद्धिमान् गिरिराज हिमालय की यह बात सुनकर दुन्दुभि के नेत्र क्रोध से लाल हो गये और वह इस प्रकार बोला— ॥ १८॥

यदि युद्धेऽसमर्थस्त्वं मद्भयाद् वा निरुद्यमः।

तमाचक्ष्व प्रदद्यान्मे यो हि युद्धं युयुत्सतः॥१९॥

‘यदि तुम युद्ध करने में असमर्थ हो अथवा मेरे भय से ही युद्ध की चेष्टा से विरत हो गये हो तो मुझे उस वीर का नाम बताओ, जो युद्ध की इच्छा रखने वाले मुझको अपने साथ युद्ध करने का अवसर दे’ ॥ १९॥

हिमवानब्रवीद् वाक्यं श्रुत्वा वाक्यविशारदः।

अनुक्तपूर्वं धर्मात्मा क्रोधात् तमसुरोत्तमम्॥२०॥

“उसकी यह बात सुनकर बातचीत में कुशल धर्मात्मा हिमवान् ने श्रेष्ठ असुर से, जिसके लिये पहले किसी ने किसी प्रतिद्वन्द्वी योद्धा का नाम नहीं बताया था, क्रोधपूर्वक कहा- ॥ २०॥

वाली नाम महाप्राज्ञ शक्रपुत्रः प्रतापवान्।

अध्यास्ते वानरः श्रीमान् किष्किन्धामतुलप्रभाम्॥ २१॥

“महाप्राज्ञ दानवराज! वाली नाम से प्रसिद्ध एक परम तेजस्वी और प्रतापी वानर हैं, जो देवराज इन्द्र के पुत्र हैं और अनुपम शोभा से  पूर्ण किष्किन्धा नामक पुरी में निवास करते हैं॥२१॥

स समर्थो महाप्राज्ञस्तव युद्धविशारदः।

द्वन्द्वयुद्धं स दातुं ते नमुचेरिव वासवः॥२२॥

“वे बड़े बुद्धिमान् और युद्ध की कला में निपुण हैं। वे ही तुमसे जूझने में समर्थ हैं। जैसे इन्द्र ने नमुचि को युद्ध का अवसर दिया था, उसी प्रकार वाली तुम्हें द्वन्द्वयुद्ध प्रदान कर सकते हैं॥ २२॥

तं शीघ्रमभिगच्छ त्वं यदि युद्धमिहेच्छसि।

स हि दुर्मर्षणो नित्यं शूरः समरकर्मणि॥२३॥

“यदि तुम यहाँ युद्ध चाहते हो तो शीघ्र चले जाओ; क्योंकि वाली के लिये किसी शत्रु की ललकार को सह सकना बहुत कठिन है। वे युद्ध कर्म में सदा शूरता प्रकट करने वाले हैं’ ॥ २३॥

श्रुत्वा हिमवतो वाक्यं कोपाविष्टः स दुन्दुभिः।

जगाम तां पुरीं तस्य किष्किन्धां वालिनस्तदा॥ २४॥

‘हिमवान् की बात सुनकर क्रोध से भरा हुआ दुन्दुभि तत्काल वाली की किष्किन्धापुरी में जा पहुँचा॥ २४ ॥

धारयन् माहिषं रूपं तीक्ष्णशृङ्गो भयावहः।

प्रावृषीव महामेघस्तोयपूर्णो नभस्तले ॥२५॥

‘उसने भैंसे का-सा रूप धारण कर रखा था। उसके सींग बड़े तीखे थे। वह बड़ा भयंकर था और वर्षाकाल के आकाश में छाये हुए जल से भरे महान् मेघ के समान जान पड़ता था॥ २५ ॥

ततस्तु द्वारमागम्य किष्किन्धाया महाबलः।

ननर्द कम्पयन् भूमिं दुन्दुभिर्दुन्दुभिर्यथा॥२६॥

‘वह महाबली दुन्दुभि किष्किन्धापुरी के द्वार पर आकर भूमि को कँपाता हुआ जोर-जोर से गर्जना करने लगा, मानो दुन्दुभि का गम्भीर नाद हो रहा हो ॥ २६ ॥

समीपजान् द्रुमान् भञ्जन् वसुधां दारयन् खुरैः।

विषाणेनोल्लिखन् दर्पात् तद्वारं द्विरदो यथा॥ २७॥

‘वह आसपास के वृक्षों को तोड़ता, धरती को खुरों से खोदता और घमंड में आकर पुरी के दरवाजे को सींगों से खरोंचता हुआ युद्ध के लिये डट गया॥ २७॥

अन्तःपुरगतो वाली श्रुत्वा शब्दममर्षणः।

निष्पपात सह स्त्रीभिस्ताराभिरिव चन्द्रमा॥ २८॥

‘वाली उस समय अन्तःपुर में था। उस दानव की गर्जना सुनकर वह अमर्ष से भर गया और तारों से घिरे हुए चन्द्रमा की भाँति स्त्रियों से घिरा हुआ नगर के बाहर निकल आया॥२८॥

मितं व्यक्ताक्षरपदं तमुवाच स दुन्दुभिम्।

हरीणामीश्वरो वाली सर्वेषां वनचारिणाम्॥ २९॥

‘समस्त वनचारी वानरों के राजा वाली ने वहाँ सुस्पष्ट अक्षरों तथा पदों से युक्त परिमित वाणी में उस दुन्दुभि से कहा- ॥२९॥

किमर्थं नगरद्वारमिदं रुद्ध्वा विनर्दसे।

दुन्दुभे विदितो मेऽसि रक्ष प्राणान् महाबल॥ ३०॥

“महाबली दुन्दुभे! मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूँ। तुम इस नगरद्वार को रोककर क्यों गरज रहे हो? अपने प्राणों की रक्षा करो’ ॥ ३० ॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा वानरेन्द्रस्य धीमतः।

उवाच दुन्दुभिर्वाक्यं क्रोधात् संरक्तलोचनः॥ ३१॥

‘बुद्धिमान् वानराज वाली का यह वचन सुनकर दुन्दुभि की आँखें क्रोध से लाल हो गयीं। वह उससे इस प्रकार बोला— ॥३१॥

न त्वं स्त्रीसंनिधौ वीर वचनं वक्तुमर्हसि।

मम युद्धं प्रयच्छाद्य ततो ज्ञास्यामि ते बलम्॥ ३२॥

“वीर तुम्हें स्त्रियों के समीप ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये। मुझे युद्ध का अवसर दो, तब मैं तुम्हारा बल समशृंगा॥ ३२॥

अथवा धारयिष्यामि क्रोधमद्य निशामिमाम्।

गृह्यतामुदयः स्वैरं कामभोगेषु वानर ॥ ३३॥

“अथवा वानर ! मैं आज की रात में अपने क्रोध को रोके रहूँगा। तुम स्वेच्छानुसार कामभोग के लिये सूर्योदय तक समय मुझसे ले लो॥ ३३॥

दीयतां सम्प्रदानं च परिष्वज्य च वानरान्।

सर्वशाखामृगेन्द्रस्त्वं संसादय सुहृज्जनम्॥३४॥

“वानरों को हृदय से लगाकर जिसे जो कुछ देना हो दे दो; तुम समस्त कपियों के राजा हो न! अपने सुहृदों से मिल लो, सलाह कर लो॥३४॥

सुदृष्टां कुरु किष्किन्धां कुरुष्वात्मसमं पुरे।

क्रीडस्व च समं स्त्रीभिरहं ते दर्पशासनः॥ ३५॥

“किष्किन्धापुरी को अच्छी तरह देख लो। अपने समान पुत्र आदि को इस नगरी के राज्य पर अभिषिक्त कर दो और स्त्रियों के साथ आज जी भरकर क्रीडा कर लो। इसके बाद मैं तुम्हारा घमंड चूर कर दूंगा। ३५॥

यो हि मत्तं प्रमत्तं वा भग्नं वा रहितं कृशम्।

हन्यात् स भ्रूणहा लोके त्वद्विधं मदमोहितम्॥ ३६॥

“जो मधुपान से मत्त, प्रमत्त (असावधान), युद्ध से भगे हुए, अस्त्ररहित, दुर्बल, तुम्हारे-जैसे स्त्रियों से घिरे हुए तथा मदमोहित पुरुष का वध करता है, वह जगत् में गर्भ-हत्यारा कहा जाता है’॥ ३६॥

स प्रहस्याब्रवीन्मन्दं क्रोधात् तमसुरेश्वरम्।

विसृज्य ताः स्त्रियः सर्वास्ताराप्रभृतिकास्तदा॥ ३७॥

‘यह सुनकर वाली मन्द-मन्द मुसकराकर उन तारा आदि सब स्त्रियों को दूर हटा उस असुरराज से क्रोधपूर्वक बोला— ॥ ३७॥

मत्तोऽयमिति मा मंस्था यद्यभीतोऽसि संयुगे।

मदोऽयं सम्प्रहारेऽस्मिन् वीरपानं समर्थ्यताम्॥ ३८॥

“यदि तुम युद्ध के लिये निर्भय होकर खड़े हो तो यह न समझो कि यह वाली मधु पीकर मतवाला हो गया है। मेरे इस मद को तुम युद्धस्थल में उत्साहवृद्धि के लिये वीरों द्वारा किया जाने वाला औषधविशेष का पान समझो’॥

तमेवमुक्त्वा संक्रुद्धो मालामुत्क्षिप्य काञ्चनीम्।

पित्रा दत्तां महेन्द्रेण युद्धाय व्यवतिष्ठत॥३९॥

‘उससे ऐसा कहकर पिता इन्द्र की दी हुई विजयदायिनी सुवर्णमाला को गले में डालकर वालीकुपित हो युद्ध के लिये खड़ा हो गया॥ ३९ ॥

विषाणयोर्गृहीत्वा तं दुन्दुभिं गिरिसंनिभम्।

आविध्यत तथा वाली विनदन् कपिकुञ्जरः॥ ४०॥

‘कपिश्रेष्ठ वालीने पर्वताकार दुन्दुभि के दोनों सींग पकड़कर उस समय गर्जना करते हुए उसे बारंबार घुमाया॥

बलाद् व्यापादयांचक्रे ननदं च महास्वनम्।

श्रोत्राभ्यामथ रक्तं तु तस्य सुस्राव पात्यतः॥ ४१॥

‘फिर बलपूर्वक उसे धरती पर दे मारा और बड़े जोर से सिंहनाद किया। पृथ्वी पर गिराये जाते समय उसके दोनों कानों से खून की धाराएँ बहने लगीं।४१॥

तयोस्तु क्रोधसंरम्भात् परस्परजयैषिणोः।

युद्धं समभवद् घोरं दुन्दुभेलिनस्तथा॥४२॥

‘क्रोध के आवेश से युक्त हो एक-दूसरे को जीतने की इच्छावाले उन दोनों दुन्दुभि और वाली में घोर युद्ध होने लगा॥ ४२॥

अयुध्यत तदा वाली शक्रतुल्यपराक्रमः।

मुष्टिभिर्जानुभिः पद्भिः शिलाभिः पादपैस्तथा॥ ४३॥

‘उस समय इन्द्र के तुल्य पराक्रमी वाली दुन्दुभिपर मुक्कों, लातों, घुटनों, शिलाओं तथा वृक्षों से प्रहार करने लगा।

परस्परं जतोस्तत्र वानरासुरयोस्तदा।

आसीद्धीनोऽसुरो युद्धे शक्रसूनुर्व्यवर्धत॥४४॥

‘उस युद्धस्थल में परस्पर प्रहार करते हुए वानर और असुर दोनों योद्धाओं में से असुरकी शक्ति तो घटने लगी और इन्द्रकुमार वाली का बल बढ़ने लगा॥४४॥

तं तु दुन्दुभिमुद्यम्य धरण्यामभ्यपातयत्।

युद्धे प्राणहरे तस्मिन्निष्पिष्टो दुन्दुभिस्तदा॥४५॥

‘उन दोनों में वहाँ प्राणान्तकारी युद्ध छिड़ गया। उस समय वाली ने दुन्दुभि को उठाकर पृथ्वी पर दे मारा, साथ ही अपने शरीर से उसको दबा दिया, जिससे दुन्दुभि पिस गया॥

स्रोतोभ्यो बहु रक्तं तु तस्य सुस्राव पात्यतः।

पपात च महाबाहुः क्षितौ पञ्चत्वमागतः॥४६॥

‘गिरते समय उसके शरीर के समस्त छिद्रों से बहुत सा रक्त बहने लगा। वह महाबाहु असुर पृथ्वी पर गिरा और मर गया॥ ४६॥

तं तोलयित्वा बाहुभ्यां गतसत्त्वमचेतनम्।

चिक्षेप वेगवान् वाली वेगेनैकेन योजनम्॥४७॥

‘जब उसके प्राण निकल गये और चेतना लुप्त हो गयी, तब वेगवान् वाली ने उसे दोनों हाथों से उठाकर एक साधारण वेग से एक योजन दूर फेंक दिया। ४७॥

तस्य वेगप्रविद्धस्य वक्त्रात् क्षतजबिन्दवः।

प्रपेतुर्मारुतोत्क्षिप्ता मतङ्गस्याश्रमं प्रति॥४८॥

‘वेगपूर्वक फेंके गये उस असुर के मुख से निकली हुई रक्त की बहुत-सी बूंदें हवा के साथ उड़कर मतंगमुनि के आश्रम में पड़ गयीं॥४८॥

तान् दृष्ट्वा पतितांस्तत्र मुनिः शोणितविपुषः।

क्रुद्धस्तस्य महाभाग चिन्तयामास को न्वयम्॥ ४९॥

‘महाभाग! वहाँ पड़े हुए उन रक्त-बिन्दुओं को देखकर मतंगमुनि कुपित हो उठे और इस विचार में पड़ गये कि ‘यह कौन है, जो यहाँ रक्त के छींटे डाल गया है?॥४९॥

येनाहं सहसा स्पृष्टः शोणितेन दुरात्मना।

कोऽयं दुरात्मा दुर्बुद्धिरकृतात्मा च बालिशः॥ ५०॥

“जिस दुष्टने सहसा मेरे शरीर से रक्त का स्पर्श करा दिया, यह दुरात्मा दुर्बुद्धि, अजितात्मा और मूर्ख कौन है?’॥

इत्युक्त्वा स विनिष्क्रम्य ददृशे मुनिसत्तमः।

महिषं पर्वताकारं गतासुं पतितं भुवि॥५१॥

‘ऐसा कहकर मुनिवर मतंग ने बाहर निकलकर देखा तो उन्हें एक पर्वताकार भैंसा पृथ्वी पर प्राणहीन होकर पड़ा दिखायी दिया॥५१॥

स तु विज्ञाय तपसा वानरेण कृतं हि तत्।

उत्ससर्ज महाशापं क्षेप्तारं वानरं प्रति॥५२॥

‘उन्होंने अपने तपोबल से यह जान लिया कि यह एक वानर की करतूत है। अतः उस लाश को फेंकने वाले वानर के प्रति उन्होंने बड़ा भारी शाप दिया – ॥५२॥

इह तेनाप्रवेष्टव्यं प्रविष्टस्य वधो भवेत्।

वनं मत्संश्रयं येन दूषितं रुधिरस्रवैः॥५३॥

“जिसने खून के छींटे डालकर मेरे निवासस्थान इस वन को अपवित्र कर दिया है, वह आज से इस वन में प्रवेश न करे। यदि इसमें प्रवेश करेगा तो उसका वध हो जायगा॥ ५३॥

क्षिपता पादपाश्चेमे सम्भग्नाश्चासुरीं तनुम्।

समन्तादाश्रमं पूर्णं योजनं मामकं यदि॥५४॥

आगमिष्यति दुर्बुद्धिर्व्यक्तं स न भविष्यति।

“इस असुर के शरीर को इधर फेंककर जिसने इन वृक्षों को तोड़ डाला है, वह दुर्बुद्धि यदि मेरे आश्रम के चारों ओर पूरे एक योजनतक की भूमि में पैर रखेगा तो अवश्य ही अपने प्राणों से हाथ धो बैठेगा॥५४ १/२॥

ये चास्य सचिवाः केचित् संश्रिता मामकं वनम्॥ ५५॥

न च तैरिह वस्तव्यं श्रुत्वा यान्तु यथासुखम्।

तेऽपि वा यदि तिष्ठन्ति शपिष्ये तानपि ध्रुवम्॥ ५६॥

“उस वाली के जो कोई सचिव भी मेरे इस वन में रहते हों, उन्हें अब यहाँ का निवास त्याग देना चाहिये। वे मेरी आज्ञा सुनकर सुखपूर्वक यहाँ से चले जायें। यदि वे रहेंगे तो उन्हें भी निश्चय ही शाप दे दूंगा॥ ५५-५६॥

वनेऽस्मिन् मामके नित्यं पुत्रवत् परिरक्षिते।

पत्राङ्करविनाशाय फलमूलाभवाय च॥५७॥

“मैंने अपने इस वन की सदा पुत्र की भाँति रक्षा की है। जो इसके पत्र और अङ्कर का विनाश तथा फलमूल का अभाव करने के लिये यहाँ रहेंगे, वे अवश्य शाप के भागी होंगे॥ ५७॥

दिवसश्चाद्य मर्यादा यं द्रष्टा श्वोऽस्मि वानरम्।

बहुवर्षसहस्राणि स वै शैलो भविष्यति॥५८॥

“आज का दिन उन सबके आने-जाने या रहने की अन्तिम अवधि है—आजभर के लिये मैं उन सबको छुट्टी देता हूँ। कल से जो कोई वानर यहाँ मेरी दृष्टि में पड़ जायगा, वह कई हजार वर्षों के लिये पत्थर हो जायगा’॥

ततस्ते वानराः श्रुत्वा गिरं मुनिसमीरिताम्।

निश्चक्रमुर्वनात् तस्मात् तान् दृष्ट्वा वालिरब्रवीत्॥५९॥

‘मुनि के इस वचन को सुनकर वे सभी वानर मतंगवन से निकल गये। उन्हें देखकर वाली ने पूछा

किं भवन्तः समस्ताश्च मतङ्गवनवासिनः।

मत्समीपमनुप्राप्ता अपि स्वस्ति वनौकसाम्॥ ६०॥

“मतंगवन में निवास करने वाले आप सभी वानर मेरे पास क्यों चले आये? वनवासियों की कुशल तो है न?”॥

ततस्ते कारणं सर्वं तथा शापं च वालिनः।

शशंसुर्वानराः सर्वे वालिने हेममालिने॥६१॥

‘तब उन सभी वानरों ने सुवर्णमालाधारी वाली से अपने आने का सब कारण बताया तथा जो वाली को शाप हुआ था, उसे भी कह सुनाया॥ ६१॥

एतच्छ्रुत्वा तदा वाली वचनं वानरेरितम्।

स महर्षि समासाद्य याचते स्म कृताञ्जलिः॥ ६२॥

‘वानरों की कही हुई यह बात सुनकर वाली महर्षि मतंग के पास गया और हाथ जोड़कर क्षमा-याचना करने लगा॥६२॥

महर्षिस्तमनादृत्य प्रविवेशाश्रमं प्रति।

शापधारणभीतस्तु वाली विह्वलतां गतः॥६३॥

‘किंतु महर्षि ने उसका आदर नहीं किया। वे चुपचाप अपने आश्रम में चले गये। इधर वाली शाप प्राप्त होने से भयभीत हो बहुत ही व्याकुल हो गया। ६३॥

ततः शापभयाद् भीतो ऋष्यमूकं महागिरिम्।

प्रवेष्टुं नेच्छति हरिद्रष्टुं वापि नरेश्वर ॥६४॥

‘नरेश्वर! तबसे उस शाप के भय से डरा हुआ वाली इस महान् पर्वत ऋष्यमूक के स्थानों में न तो कभी प्रवेश करना चाहता है और न इस पर्वतको देखना ही चाहता है॥

तस्याप्रवेशं ज्ञात्वाहमिदं राम महावनम्।

विचरामि सहामात्यो विषादेन विवर्जितः॥६५॥

‘श्रीराम! यहाँ उसका प्रवेश होना असम्भव है, यह जानकर मैं अपने मन्त्रियों के साथ इस महान् वन में विषाद-शून्य होकर विचरता हूँ॥६५॥

एषोऽस्थिनिचयस्तस्य दुन्दुभेः सम्प्रकाशते।

वीर्योत्सेकान्निरस्तस्य गिरिकूटनिभो महान्॥ ६६॥

‘यह रहा दुन्दुभि की हड्डियों का ढेर, जो एक महान् पर्वतशिखर के समान जान पड़ता है। वाली ने अपने बल के घमंड में आकर दुन्दुभि के शरीर को इतनी दूर फेंका था॥६६॥

इमे च विपुलाः सालाः सप्त शाखावलम्बिनः।

यत्रैकं घटते वाली निष्पत्रयितुमोजसा॥६७॥

‘ये सात साल के विशाल एवं मोटे वृक्ष हैं, जो अनेक उत्तम शाखाओं से सुशोभित होते हैं। वाली इनमें से एक-एक को बलपूर्वक हिलाकर पत्रहीन कर सकता है॥६७॥

एतदस्यासमं वीर्यं मया राम प्रकाशितम्।

कथं तं वालिनं हन्तुं समरे शक्ष्यसे नृप॥६८॥

‘श्रीराम! यह मैंने वाली के अनुपम पराक्रम को प्रकाशित किया है। नरेश्वर! आप उस वाली को समराङ्गण में कैसे मार सकेंगे’॥ ६८॥

तथा ब्रुवाणं सुग्रीवं प्रहसँल्लक्ष्मणोऽब्रवीत् ।

कस्मिन् कर्मणि निर्वृत्ते श्रद्दध्या वालिनो वधम्॥ ६९॥

सुग्रीव के ऐसा कहने पर लक्ष्मण को बड़ी हँसी आयी। वे हँसते हुए ही बोले—’कौन-सा काम कर देने पर तुम्हें विश्वास होगा कि श्रीरामचन्द्रजी वाली का वध कर सकेंगे’।

तमुवाचाथ सुग्रीवः सप्त सालानिमान् पुरा।

एवमेकैकशो वाली विव्याधाथ स चासकृत्॥ ७०॥

रामो निर्दारयेदेषां बाणेनैकेन च द्रुमम्।

वालिनं निहतं मन्ये दृष्ट्वा रामस्य विक्रमम्॥ ७१॥

तब सुग्रीव ने उनसे कहा- ‘पूर्वकाल में वाली ने साल के इन सातों वृक्षों को एक-एक करके कई बार बींध डाला है। अतः श्रीरामचन्द्रजी भी यदि इनमें से किसी एक वृक्ष को एक ही बाण से छेद डालेंगे तो इनका पराक्रम देखकर मुझे वाली के मारे जाने का विश्वास हो जायगा॥ ७०-७१॥

हतस्य महिषस्यास्थि पादेनैकेन लक्ष्मण।

उद्यम्य प्रक्षिपेच्चापि तरसा द्वे धनुःशते॥७२॥

‘लक्ष्मण! यदि इस महिषरूपधारी दुन्दुभि की हड्डी को एक ही पैर से उठाकर बलपूर्वक दो सौ धनुष की दूरीपर फेंक सकें तो भी मैं यह मान लूँगा कि इनके हाथ से वाली का वध हो सकता है’ ॥७२॥

एवमुक्त्वा तु सुग्रीवो रामं रक्तान्तलोचनम्।

ध्यात्वा मुहूर्तं काकुत्स्थं पुनरेव वचोऽब्रवीत्॥ ७३॥

जिनके नेत्रप्रान्त कुछ-कुछ लाल थे, उन श्रीराम से ऐसा कहकर सुग्रीव दो घड़ी तक कुछ सोच-विचार में पड़े रहे। इसके बाद वे ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम से फिर बोले

शूरश्च शूरमानी च प्रख्यातबलपौरुषः ।

बलवान् वानरो वाली संयुगेष्वपराजितः॥७४॥

‘वाली शूर है और स्वयं भी उसे अपने शौर्य पर अभिमान है। उसके बल और पुरुषार्थ विख्यात हैं। वह बलवान् वानर अबतक के युद्धों में कभी पराजित नहीं हुआ है। ७४॥

दृश्यन्ते चास्य कर्माणि दुष्कराणि सुरैरपि।

यानि संचिन्त्य भीतोऽहमृष्यमूकमुपाश्रितः॥ ७५॥

‘इसके ऐसे-ऐसे कर्म देखे जाते हैं, जो देवताओं के लिये दुष्कर हैं और जिनका चिन्तन करके भयभीत हो मैंने इस ऋष्यमूक पर्वत की शरण ली है॥ ७५ ॥

तमजय्यमधृष्यं च वानरेन्द्रममर्षणम्।

विचिन्तयन्न मुञ्चापि ऋष्यमूकममुं त्वहम्॥ ७६॥

‘वानरराज वाली को जीतना दूसरों के लिये असम्भव है। उस पर आक्रमण अथवा उसका तिरस्कार भी नहीं किया जा सकता। वह शत्रु की ललकार को नहीं सह सकता। जब मैं उसके प्रभाव का चिन्तन करता हूँ, तब इस ऋष्यमूक पर्वत को एक क्षण के लिये भी छोड़ नहीं पाता हूँ॥७६॥

उद्विग्नः शङ्कितश्चाहं विचरामि महावने।

अनुरक्तैः सहामात्यैर्हनुमत्प्रमुखैर्वरैः॥ ७७॥

‘ये हनुमान् आदि मेरे श्रेष्ठ सचिव मुझमें अनुराग रखने वाले हैं। इनके साथ रहकर भी मैं इस विशाल वन में वाली से उद्विग्न और शङ्कित होकर ही विचरता हूँ॥ ७७॥

उपलब्धं च मे श्लाघ्यं सन्मित्रं मित्रवत्सल।

त्वामहं पुरुषव्याघ्र हिमवन्तमिवाश्रितः॥७८॥

‘मित्रवत्सल! आप मुझे परम स्पृहणीय श्रेष्ठ मित्र मिल गये हैं। पुरुषसिंह! आप मेरे लिये हिमालय के समान हैं और मैं आपका आश्रय ले चुका हूँ। (इसलिये अब मुझे निर्भय हो जाना चाहिये) ॥ ७८ ॥

किं तु तस्य बलज्ञोऽहं दुर्घातुर्बलशालिनः।

अप्रत्यक्षं तु मे वीर्यं समरे तव राघव॥७९॥

‘किंतु रघुनन्दन! मैं उस बलशाली दुष्ट भ्राता के बल-पराक्रमको जानता हूँ और समरभूमिमें आपका पराक्रम मैंने प्रत्यक्ष नहीं देखा है॥ ७९ ॥

न खल्वहं त्वां तुलये नावमन्ये न भीषये।

कर्मभिस्तस्य भीमैश्च कातर्यं जनितं मम॥८०॥

‘प्रभो! अवश्य ही मैं वाली से आपकी तुलना नहीं करता हूँ। न तो आपको डराता हूँ और न आपका अपमान ही करता हूँ। वाली के भयानक कर्मों ने ही मेरे हृदय में कातरता उत्पन्न कर दी है। ८० ॥

कामं राघव ते वाणी प्रमाणं धैर्यमाकृतिः।

सूचयन्ति परं तेजो भस्मच्छन्नमिवानलम्॥८१॥

‘रघुनन्दन! निश्चय ही आपकी वाणी मेरे लिये प्रमाणभूत है—विश्वसनीय है; क्योंकि आपका धैर्य और आपकी यह दिव्य आकृति आदि गुण राख से ढकी हुई आग के समान आपके उत्कृष्ट तेज को सूचित कर रहे हैं’॥ ८१॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा सुग्रीवस्य महात्मनः।

स्मितपूर्वमथो रामः प्रत्युवाच हरिं प्रति॥८२॥

महात्मा सुग्रीव की यह बात सुनकर भगवान् श्रीराम पहले तो मुसकराये। फिर उस वानर की बात का उत्तर देते हुए उससे बोले- ॥ ८२॥

यदि न प्रत्ययोऽस्मासु विक्रमे तव वानर।

प्रत्ययं समरे श्लाघ्यमहमुत्पादयामि ते॥८३॥

‘वानर! यदि तुम्हें इस समय पराक्रम के विषय में हम लोगों पर विश्वास नहीं होता तो युद्धके समय हम तुम्हें उसका उत्तम विश्वास करा देंगे’। ८३॥

एवमुक्त्वा तु सुग्रीवं सान्त्वयँल्लक्ष्मणाग्रजः।

राघवो दुन्दुभेः कायं पादाङ्गष्ठेन लीलया॥८४॥

तोलयित्वा महाबाहुश्चिक्षेप दशयोजनम्।

असुरस्य तनुं शुष्कां पादाङ्गुष्ठेन वीर्यवान्॥८५॥

ऐसा कहकर सुग्रीव को सान्त्वना देते हुएलक्ष्मण के बड़े भाई महाबाहु बलवान् श्रीरघुनाथजी ने खिलवाड़ में ही दुन्दुभि के शरीर को अपने पैर के अंगूठे से टाँग लिया और उस असुर के उस सूखे हुए कङ्काल को पैर के अँगूठे से ही दस योजन दूर फेंक दिया॥ ८४-८५॥

क्षिप्तं दृष्ट्वा ततः कायं सुग्रीवः पुनरब्रवीत्।

लक्ष्मणस्याग्रतो रामं तपन्तमिव भास्करम्।

हरीणामग्रतो वीरमिदं वचनमर्थवत्॥८६॥

उसके शररी को फेंका गया देख सुग्रीव ने लक्ष्मण और वानरों के सामने ही तपते हुए सूर्य के समान तेजस्वी वीर श्रीरामचन्द्रजी से पुनः यह अर्थ भरी बात कही— ॥८६॥

आर्द्रः समांसः प्रत्यग्रः क्षिप्तः कायः पुरा सखे।

परिश्रान्तेन मत्तेन भ्रात्रा मे वालिना तदा॥८७॥

‘सखे! मेरा भाई वाली उस समय मदमत्त और युद्ध से थका हुआ था और दुन्दुभि का यह शरीर खून से भीगा हुआ, मांसयुक्त तथा नया था। इस दशा में उसने इस शरीर को पूर्वकाल में दूर फेंका था॥ ८७॥

लघुः सम्प्रति निर्मांसस्तृणभूतश्च राघव।

क्षिप्त एवं प्रहर्षेण भवता रघुनन्दन॥८८॥

‘परंतु रघुनन्दन! इस समय यह मांसहीन होने के कारण तिनके के समान हलका हो गया है और आपने हर्ष एवं उत्साह से युक्त होकर इसे फेंका है। ८८॥

नात्र शक्यं बलं ज्ञातुं तव वा तस्य वाधिकम्।

आर्द्र शुष्कमिति ह्येतत् सुमहद् राघवान्तरम्॥ ८९॥

‘अतः श्रीराम ! इस लाश को फेंकने पर भी यह नहीं जाना जा सकता कि आपका बल अधिक है या उसका; क्योंकि वह गीला था और यह सूखा। यह इन दोनों अवस्थाओं में महान् अन्तर है॥ ८९॥

स एव संशयस्तात तव तस्य च यद्बलम्।

सालमेकं विनिर्भिद्य भवेद् व्यक्तिर्बलाबले॥ ९०॥

“तात! आपके और उसके बल में वही संशय अब तक बना रह गया। अब इस एक साल वृक्ष को विदीर्ण कर देने पर दोनों के बलाबल का स्पष्टीकरण हो जायगा॥९०॥

कृत्वैतत् कार्मुकं सज्यं हस्तिहस्तमिवाततम्।

आकर्णपूर्णमायम्य विसृजस्व महाशरम्॥९१॥

‘आपका यह धनुष हाथी की फैली हुई सँड़ के समान विशाल है। आप इस पर प्रत्यञ्चा चढ़ाइये और इसे कान तक खींचकर साल वृक्ष को लक्ष्य करके एक विशाल बाण छोड़िये॥

इमं हि सालं प्रहितस्त्वया शरोन संशयोऽत्रास्ति विदारयिष्यति।

अलं विमर्शेन मम प्रियं ध्रुवं कुरुष्व राजन् प्रतिशापितो मया॥९२॥

‘इसमें संदेह नहीं कि आपका छोड़ा हुआ बाण इस साल वृक्ष को विदीर्ण कर देगा। राजन्! अब विचार करने की आवश्यकता नहीं है। मैं अपनी शपथ दिलाकर कहता हूँ, आप मेरा यह प्रिय कार्य अवश्य कीजिये॥ ९२॥

यथा हि तेजःसु वरः सदारविर्यथा हि शैलो हिमवान् महाद्रिषु।

यथा चतुष्पात्सु च केसरी वरस्तथा नराणामसि विक्रमे वरः॥९३॥

‘जैसे सम्पूर्ण तेजों में सदा सूर्यदेव ही श्रेष्ठ हैं, जैसे बड़े-बड़े पर्वतों में गिरिराज हिमवान् श्रेष्ठ हैं और जैसे चौपायों में सिंह श्रेष्ठ है, उसी प्रकार पराक्रम के विषय में सब मनुष्यों में आप ही श्रेष्ठ हैं’॥ ९३॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे एकादशः सर्गः॥११॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में ग्यारहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥११॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

सुग्रीव का किष्किन्धा में आकर वाली को ललकारना और युद्ध में पराजित होना, वहाँ श्रीराम का पहचान के लिये गजपुष्पीलता डालकर उन्हें पुनः युद्ध के लिये भेजना

द्वादशः सर्गः

सर्ग-12


एतच्च वचनं श्रुत्वा सुग्रीवस्य सुभाषितम्।

प्रत्ययार्थं महातेजा रामो जग्राह कार्मुकम्॥१॥

सुग्रीव के सुन्दर ढंग से कहे हुए इस वचन को सुनकर महातेजस्वी श्रीराम ने उन्हें विश्वास दिलाने के लिये धनुष हाथ में लिया॥१॥

स गृहीत्वा धनुर्घोरं शरमेकं च मानदः।

सालमुद्दिश्य चिक्षेप पूरयन् स रवैर्दिशः॥२॥

दूसरों को मान देने वाले श्रीरघुनाथजी ने वह भयंकर धनुष और एक बाण लेकर धनुष की टंकार से सम्पूर्ण दिशाओं को जाते हुए उस बाण को साल वृक्ष की ओर छोड़ दिया॥२॥

स विसृष्टो बलवता बाणः स्वर्णपरिष्कृतः।

भित्त्वा सालान् गिरिप्रस्थं सप्तं भूमि विवेश ह॥

उन बलवान् वीरशिरोमणि के द्वारा छोड़ा गया वह सुवर्णभूषित बाण उन सातों सालवृक्षों को एक ही साथ बींधकर पर्वत तथा पृथ्वी के सातों तलों को छेदता हुआ पाताल में चला गया॥३॥

सायकस्तु मुहूर्तेन सालान् भित्त्वा महाजवः।

निष्पत्य च पुनस्तूणं तमेव प्रविवेश ह॥४॥

इस प्रकार एक ही मुहूर्त में उन सबका भेदन करके वह महान् वेगशाली बाण पुनः वहाँ से निकलकर उनके तरकस में ही प्रविष्ट हो गया॥४॥

तान् दृष्ट्वा सप्त निर्भिन्नान् सालान् वानरपुङ्गवः।

रामस्य शरवेगेन विस्मयं परमं गतः॥५॥

श्रीराम के बाण के वेग से उन सातों साल वृक्षों को विदीर्ण हुआ देख वानरशिरोमणि सुग्रीव को बड़ा विस्मय हुआ॥५॥

स मूर्ना न्यपतद् भूमौ प्रलम्बीकृतभूषणः।

सुग्रीवः परमप्रीतो राघवाय कृताञ्जलिः॥६॥

साथ ही उन्हें मन-ही-मन बड़ी प्रसन्नता हुई। सुग्रीव ने हाथ जोड़कर धरती पर माथा टेक दिया और श्रीरघुनाथजी को साष्टाङ्ग प्रणाम किया। प्रणाम के लिये झुकते समय उनके कण्ठहारादि भूषण लटकते हुए दिखायी देते थे॥६॥

इदं चोवाच धर्मज्ञं कर्मणा तेन हर्षितः।

रामं सर्वास्त्रविदुषां श्रेष्ठं शूरमवस्थितम्॥७॥

श्रीराम के उस महान् कर्म से अत्यन्त प्रसन्न हो उन्होंने सामने खड़े हुए सम्पूर्ण अस्त्र-वेत्ताओं में श्रेष्ठ धर्मज्ञ, शूरवीर श्रीरामचन्द्रजी से इस प्रकार कहा- ॥ ७॥

सेन्द्रानपि सुरान् सर्वांस्त्वं बाणैः पुरुषर्षभ।

समर्थः समरे हन्तुं किं पुनर्वालिनं प्रभो॥८॥

‘पुरुषप्रवर! भगवन्! आप तो अपने बाणों से समराङ्गण में इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओं का वध भी करने में समर्थ हैं। फिर वाली को मारना आपके लिये कौन बड़ी बात है ? ॥ ८॥

येन सप्त महासाला गिरिभूमिश्च दारिताः।

बाणेनैकेन काकुत्स्थ स्थाता ते को रणाग्रतः॥ ९॥

‘काकुत्स्थ! जिन्होंने सात बड़े-बड़े सालवृक्ष, पर्वत और पृथ्वी को भी एक ही बाण से विदीर्ण कर डाला, उन्हीं आपके समक्ष युद्ध के मुहाने पर कौन ठहर सकता है॥९॥

अद्य मे विगतः शोकः प्रीतिरद्य परा मम।

सुहृदं त्वां समासाद्य महेन्द्रवरुणोपमम्॥१०॥

‘महेन्द्र और वरुण के समान पराक्रमी आपको सुहृद् के रूपमें पाकर आज मेरा सारा शोक दूर हो गया। आज मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है॥ १० ॥

तमद्यैव प्रियार्थं मे वैरिणं भ्रातृरूपिणम्।

वालिनं जहि काकुत्स्थ मया बद्धोऽयमञ्जलिः॥ ११॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण! मैं हाथ जोड़ता हूँ। आप आज ही मेरा प्रिय करने के लिये उस वाली का, जो भाई के रूप में मेरा शत्रु है, वध कर डालिये’॥ ११॥

ततो रामः परिष्वज्य सुग्रीवं प्रियदर्शनम्।

प्रत्युवाच महाप्राज्ञो लक्ष्मणानुगतं वचः॥१२॥

सुग्रीव श्रीरामचन्द्रजी को लक्ष्मण के समान प्रिय हो गये थे। उनकी बात सुनकर महाप्राज्ञ श्रीराम ने अपने उस प्रिय सुहृद् को हृदय से लगा लिया और इस प्रकार उत्तर दिया- ॥ १२॥

अस्माद्गच्छाम किष्किन्धां क्षिप्रं गच्छ त्वमग्रतः।

गत्वा चाह्वय सुग्रीव वालिनं भ्रातृगन्धिनम्॥ १३॥

‘सुग्रीव! हमलोग शीघ्र ही इस स्थान से किष्किन्धा को चलते हैं। तुम आगे जाओ और जाकर व्यर्थ ही भाई कहलाने वाले वाली को युद्ध के लिये ललकारो’ ॥ १३॥

सर्वे ते त्वरितं गत्वा किष्किन्धां वालिनः पुरीम्।

वृक्षरात्मानमावृत्य ह्यतिष्ठन् गहने वने ॥१४॥

तदनन्तर वे सब लोग वाली की राजधानी किष्किन्धापुरी में गये और वहाँ गहन वन के भीतर वृक्षों की आड़ में छिपकर खड़े हो गये॥१४॥

सुग्रीवोऽप्यनदद् घोरं वालिनो ह्वानकारणात्।

गाढं परिहितो वेगान्नादैभिन्दन्निवाम्बरम्॥१५॥

सुग्रीव ने लँगोट से अपनी कमर खूब कस ली और वाली को बुलाने के लिये भयंकर गर्जना की। वेगपूर्वक किये हुए उस सिंहनाद से मानो वे आकाश को फाड़े डालते थे॥ १५॥

तं श्रुत्वा निनदं भ्रातुः क्रुद्धो वाली महाबलः।

निष्पपात सुसंरब्धो भास्करोऽस्ततटादिव॥१६॥

भाई का सिंहनाद सुनकर महाबली वाली को बड़ा क्रोध हुआ। वह अमर्ष में भरकर अस्ताचल से नीचे जाने वाले सूर्य के समान बड़े वेग से घर से निकला। १६॥

ततः सुतुमुलं युद्धं वालिसुग्रीवयोरभूत्।

गगने ग्रहयो?रं बुधाङ्गारकयोरिव॥१७॥

फिर तो वाली और सुग्रीव में बड़ा भयंकर युद्ध छिड़ गया, मानो आकाश में बुध और मंगल इन दोनों ग्रहों में घोर संग्राम हो रहा हो॥१७॥

तलैरशनिकल्पैश्च वज्रकल्पैश्च मुष्टिभिः।

जनतुः समरेऽन्योन्यं भ्रातरौ क्रोधमूर्च्छितौ॥ १८॥

वे दोनों भाई क्रोध से मूर्छित हो एक-दूसरे पर वज्र और अशनिके समान तमाचों और घूसों का प्रहार करने लगे।

ततो रामो धनुष्पाणिस्तावुभौ समुदैक्षत।

अन्योन्यसदृशौ वीरावुभौ देवाविवाश्विनौ॥ १९॥

उसी समय श्रीरामचन्द्रजी ने धनुष हाथ में लिया और उन दोनों की ओर देखा। वे दोनों वीर अश्विनीकुमारों की भाँति परस्पर मिलते-जुलते दिखायी दिये॥ १९॥

यन्नावगच्छत् सुग्रीवं वालिनं वापि राघवः।

ततो न कृतवान् बुद्धिं मोक्तुमन्तकरं शरम्॥ २०॥

श्रीरामचन्द्रजी को यह पता न चला कि इनमें कौन सुग्रीव है और कौन वाली; इसलिये उन्होंने अपना वह प्राणान्तकारी बाण छोड़ने का विचार स्थगित कर दिया॥

एतस्मिन्नन्तरे भग्नः सुग्रीवस्तेन वालिना।

अपश्यन् राघवं नाथमृष्यमूकं प्रदुद्रुवे॥२१॥

इसी बीच में वाली ने सुग्रीव के पाँव उखाड़ दिये। वे अपने रक्षक श्रीरघुनाथजी को न देखकर ऋष्यमूक पर्वत की ओर भागे॥२१॥

क्लान्तो रुधिरसिक्ताङ्गः प्रहारैर्जर्जरीकृतः।

वालिनाभिद्रुतः क्रोधात् प्रविवेश महावनम्॥ २२॥

वे बहुत थक गये थे। उनका सारा शरीर लहूलुहान और प्रहारों से जर्जर हो रहा था। इतने पर भी वाली ने क्रोधपूर्वक उनका पीछा किया। किंतु वे मतंगमुनि के महान् वन में घुस गये॥ २२॥

तं प्रविष्टं वनं दृष्ट्वा वाली शापभयात् ततः।

मुक्तो ह्यसि त्वमित्युक्त्वा स निवृत्तो महाबलः॥ २३॥

सुग्रीव को उस वन में प्रविष्ट हुआ देख महाबली वाली शाप के भय से वहाँ नहीं गया और ‘जाओ तुम बच गये’ ऐसा कहकर वहाँ से लौट आया॥ २३ ॥

राघवोऽपि सह भ्रात्रा सह चैव हनूमता।

तदेव वनमागच्छत् सुग्रीवो यत्र वानरः॥२४॥

इधर श्रीरघुनाथजी भी अपने भाई लक्ष्मण तथा श्रीहनुमान जी के साथ उसी समय वनमें आ गये, जहाँ वानर सुग्रीव विद्यमान थे॥२४॥

तं समीक्ष्यागतं रामं सुग्रीवः सहलक्ष्मणम्।

ह्रीमान् दीनमुवाचेदं वसुधामवलोकयन्॥ २५॥

लक्ष्मणसहित श्रीराम को आया देख सुग्रीव को बड़ी लज्जा हुई और वे पृथ्वी की ओर देखते हुए दीन वाणी में उनसे बोले- ॥२५॥

आह्वयस्वेति मामुक्त्वा दर्शयित्वा च विक्रमम्।

वैरिणा घातयित्वा च किमिदानीं त्वया कृतम्॥ २६॥

तामेव वेलां वक्तव्यं त्वया राघव तत्त्वतः।

वालिनं न निहन्मीति ततो नाहमितो व्रजे॥२७॥

‘रघुनन्दन! आपने अपना पराक्रम दिखाया और मुझे यह कहकर भेज दिया कि जाओ, वाली को युद्ध के लिये ललकारो, यह सब हो जाने पर आपने शत्रु से पिटवाया और स्वयं छिप गये। बताइये, इस समय आपने ऐसा क्यों किया? आपको उसी समय सच-सच बता देना चाहिये था कि मैं वाली को नहीं मारूँगा। ऐसी दशा में मैं यहाँ से उसके पास जाता ही नहीं’ ॥ २६-२७॥

तस्य चैवं ब्रुवाणस्य सुग्रीवस्य महात्मनः।

करुणं दीनया वाचा राघवः पुनरब्रवीत्॥२८॥

महामना सुग्रीव जब दीन वाणी द्वारा इस प्रकार करुणाजनक बात कहने लगे, तब श्रीराम फिर उनसे बोले- ॥२८॥

सुग्रीव श्रूयतां तात क्रोधश्च व्यपनीयताम्।

कारणं येन बाणोऽयं स मया न विसर्जितः॥ २९॥

‘तात सुग्रीव! मेरी बात सुनो, क्रोध को अपने मन से निकाल दो। मैंने क्यों नहीं बाण चलाया, इसका कारण बतलाता हूँ॥ २९॥

अलंकारेण वेषेण प्रमाणेन गतेन च।

त्वं च सुग्रीव वाली च सदृशौ स्थः परस्परम्॥ ३०॥

सुग्रीव! वेशभूषा, कद और चाल-ढाल में तुम और वाली दोनों एक-दूसरे से मिलते-जुलते हो॥३०॥

स्वरेण वर्चसा चैव प्रेक्षितेन च वानर।

विक्रमेण च वाक्यैश्च व्यक्तिं वां नोपलक्षये॥३१॥

‘स्वर, कान्ति, दृष्टि, पराक्रम और बोल चाल के द्वारा भी मुझे तुम दोनों में कोई अन्तर नहीं दिखायी देता॥ ३१॥

ततोऽहं रूपसादृश्यान्मोहितो वानरोत्तम।

नोत्सृजामि महावेगं शरं शत्रुनिबर्हणम्॥३२॥

‘वानरश्रेष्ठ! तुम दोनों के रूप की इतनी समानता देखकर मैं मोह में पड़ गया—तुम्हें पहचान न सका; इसलिये मैंने अपना महान् वेगशाली शत्रुसंहारक बाण नहीं छोड़ा ॥ ३२॥’

जीवितान्तकरं घोरं सादृश्यात् तु विशङ्कितः।

मूलघातो न नौ स्याद्धि द्वयोरिति कृतो मया॥ ३३॥

‘मेरा वह भयंकर बाण शत्रु के प्राण लेने वाला था, इसलिये तुम दोनों की समानता से संदेह में पड़कर मैंने उस बाण को नहीं छोड़ा। सोचा, कहीं ऐसा न हो कि हम दोनों के मूल उद्देश्य का ही विनाश हो जाय॥ ३३॥

‘ त्वयि वीर विपन्ने हि अज्ञानाल्लाघवान्मया।

मौढ्यं च मम बाल्यं च ख्यापितं स्यात् कपीश्वर ॥३४॥

‘वीर ! वानरराज! यदि अनजान में या जल्दबाजी के कारण मेरे बाण से तुम्ही मारे जाते तो मेरी बालोचित चपलता और मूढ़ता ही सिद्ध होती॥ ३४॥’

दत्ताभयवधो नाम पातकं महदद्भुतम्।

अहं च लक्ष्मणश्चैव सीता च वरवर्णिनी॥३५॥

त्वदधीना वयं सर्वे वनेऽस्मिन् शरणं भवान्।

तस्माद् युध्यस्व भूयस्त्वं मा माशङ्कीश्च वानर ॥ ३६॥

‘जिसको अभय दान दे दिया गया हो, उसका वध करने से बड़ा भारी पाप होता है; यह एक अद्भुत पातक है। इस समय मैं, लक्ष्मण और सुन्दरी सीता सब तुम्हारे अधीन हैं। इस वन में तुम्हीं हमलोगों के आश्रय हो; इसलिये वानरराज! शङ्का न करो; पुनः चलकर युद्ध प्रारम्भ करो॥ ३५-३६॥

एतन्मुहूर्ते तु मया पश्य वालिनमाहवे।

निरस्तमिषुणैकेन चेष्टमानं महीतले॥३७॥

‘तुम इसी मुहूर्त में वाली को मेरे एक ही बाण का निशाना बनकर धरती पर लोटता देखोगे॥ ३७॥

अभिज्ञानं कुरुष्व त्वमात्मनो वानरेश्वर।

येन त्वामभिजानीयां द्वन्द्वयुद्धमुपागतम्॥३८॥

‘वानरेश्वर! अपनी पहचान के लिये तुम कोई चिह्न धारण कर लो, जिससे द्वन्द्वयुद्ध में प्रवृत्त होने पर मैं तुम्हें पहचान सकूँ’॥ ३८॥

गजपुष्पीमिमां फुल्लामुत्पाट्य शुभलक्षणाम्।

कुरु लक्ष्मण कण्ठेऽस्य सुग्रीवस्य महात्मनः॥ ३९॥

(सुग्रीव से ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण से बोले—) ‘लक्ष्मण! यह उत्तम लक्षणों से युक्त गजपुष्पीलता फूल रही है। इसे उखाड़कर तुम महामना सुग्रीव के गले में पहना दो’ ॥ ३९॥

ततो गिरितटे जातामुत्पाट्य कुसुमायुताम्।

लक्ष्मणो गजपुष्पी तां तस्य कण्ठे व्यसर्जयत्॥ ४०॥

यह आज्ञा पाकर लक्ष्मण ने पर्वत के किनारे उत्पन्न हुई फूलों से भरी वह गजपुष्पी लता उखाड़कर सुग्रीव के गले में डाल दिया॥ ४० ॥

स तया शुशुभे श्रीमाँल्लतया कण्ठसक्तया।

मालयेव बलाकानां ससंध्य इव तोयदः॥४१॥

गले में पड़ी हुई उस लता से श्रीमान् सुग्रीव वकपंक्ति से अलंकृत संध्याकाल के मेघ की भाँति शोभा पाने लगे॥४१॥

विभ्राजमानो वपुषा रामवाक्यसमाहितः।

जगाम सह रामेण किष्किन्धां पुनराप सः॥४२॥

श्रीराम के वचन से आश्वासन पाकर अपने सुन्दर शरीर से शोभा पाने वाले सुग्रीव श्रीरघुनाथजी के साथ फिर किष्किन्धापुरी में जा पहुँचे॥४२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे द्वादशः सर्गः॥१२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में बारहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥१२॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

श्रीराम आदि का मार्ग में वृक्षों, विविधजन्तुओं, जलाशयों तथा सप्तजन आश्रम का दूर से दर्शन करते हुए पुनः किष्किन्धापुरी में पहुँचना

त्रयोदशः सर्गः

सर्ग-13


ऋष्यमूकात् स धर्मात्मा किष्किन्धां लक्ष्मणाग्रजः।

जगाम सह सुग्रीवो वालिविक्रमपालिताम्॥१॥

लक्ष्मण के बड़े भाई धर्मात्मा श्रीराम सुग्रीव को साथ लेकर पुनः ऋष्यमूक से उस किष्किन्धापुरी की ओर चले, जो वाली के पराक्रम से सुरक्षित थी॥१॥

समुद्यम्य महच्चापं रामः काञ्चनभूषितम्।

शरांश्चादित्यसंकाशान् गृहीत्वा रणसाधकान्॥ २॥

अपने सुवर्णभूषित विशाल धनुष को उठाकर और युद्ध में सफलता दिखाने वाले सूर्यतुल्य तेजस्वी बाणों को लेकर श्रीराम वहाँ से प्रस्थित हुए॥२॥

अग्रतस्तु ययौ तस्य राघवस्य महात्मनः।

सुग्रीवः संहतग्रीवो लक्ष्मणश्च महाबलः॥३॥

महात्मा रघुनाथजी के आगे-आगे सुगठित ग्रीवा वाले सुग्रीव और महाबली लक्ष्मण चल रहे थे॥३॥

पृष्ठतो हनुमान् वीरो नलो नीलश्च वीर्यवान्।

तारश्चैव महातेजा हरियूथपयूथपः॥४॥

और उनके पीछे वीर हनुमान्, नल, पराक्रमी नील तथा वानर-यूथपों के भी यूथपति महातेजस्वी तार चल रहे थे॥

ते वीक्षमाणा वृक्षांश्च पुष्पभारावलम्बिनः।

प्रसन्नाम्बुवहाश्चैव सरितः सागरंगमाः॥५॥

कन्दराणि च शैलांश्च निर्दराणि गुहास्तथा।

शिखराणि च मुख्यानि दरीश्च प्रियदर्शनाः॥

वे सब लोग फूलों के भार से झुके हुए वृक्षों, स्वच्छ जलवाली समुद्रगामिनी नदियों, कन्दराओं, पर्वतों, शिला-विवरों, गुफाओं, मुख्य-मुख्य शिखरों और सुन्दर दिखायी देने वाली गहन गुफाओं को देखते हुए आगे बढ़ने लगे॥

वैदूर्यविमलैस्तोयैः पश्चिाकोशकुड्मलैः।

शोभितान् सजलान् मार्गे तटाकांश्चावलोकयन्॥ ७॥

उन्होंने मार्ग में ऐसे सजल सरोवरों को भी देखा, जो वैदूर्यमणि के समान रंगवाले, निर्मल जल तथा कम खिले हुए मुकुलयुक्त कमलों से सुशोभित थे॥७॥

कारण्डैः सारसैहँसैर्वजुलैर्जलकुक्कुटैः।

चक्रवाकैस्तथा चान्यैः शकुनैः प्रतिनादितान्॥ ८॥

कारण्डव, सारस, हंस, वञ्जुल, जलमुर्ग, चक्रवाक तथा अन्य पक्षी उन सरोवरों में चहचहा रहे थे। उन सबकी प्रतिध्वनि वहाँ गूंज रही थी॥८॥

मृदुशष्याङ्कराहारान्निर्भयान् वनगोचरान्।

चरतः सर्वतः पश्यन् स्थलीषु हरिणान् स्थितान्॥

स्थलों में सब ओर हरी-हरी कोमल घास के अङ्करों का आहार करने वाले वनचारी हरिण कहीं निर्भय होकर चरते थे और कहीं खड़े दिखायी देते थे (इन सबको देखते हुए श्रीराम आदि किष्किन्धा की ओर जा रहे थे) ॥९॥

तटाकवैरिणश्चापि शुक्लदन्तविभूषितान्।

घोरानेकचरान् वन्यान् द्विरदान् कूलघातिनः॥ १०॥

मत्तान् गिरितटोत्कृष्टान् पर्वतानिव जङ्गमान्।

वानरान् द्विरदप्रख्यान् महीरेणुसमुक्षितान्॥११॥

वने वनचरांश्चान्यान् खेचरांश्च विहंगमान्।

पश्यन्तस्त्वरिता जग्मुः सुग्रीववशवर्तिनः॥१२॥

जो सफेद दाँतों से सुशोभित थे, देखने में भयंकर थे, अकेले विचरते थे और किनारों को खोदकर नष्ट कर देनेके कारण सरोवरों के शत्रु समझे जाते थे, ऐसे दो दाँतों वाले मदमत्त जङ्गली हाथी चलते-फिरते पर्वतों के समान जाते दिखायी देते थे। उन्होंने अपने दाँतों से पर्वत के तटप्रान्त को विदीर्ण कर दिया था। कहीं हाथी-जैसे विशालकाय वानर दृष्टिगोचर होते थे, जो धरती की धूल से नहा उठे थे। इनके सिवा उस वन में और भी बहुत-से जंगली जीव-जन्तु तथा आकाशचारी पक्षी विचरते देखे जाते थे। इन सबको देखते हुए श्रीराम आदि सब लोग सुग्रीव के वशवर्ती हो तीव्र गति से आगे बढ़ने लगे॥ १०–१२॥

तेषां तु गच्छतां तत्र त्वरितं रघुनन्दनः।

द्रुमषण्डवनं दृष्ट्वा रामः सुग्रीवमब्रवीत्॥१३॥

उन यात्रा करने वाले लोगों में वहाँ रघुकुलनन्दन श्रीराम ने वृक्षसमूहों से सघन वन को देखकर सुग्रीव से पूछा- ॥१३॥

एष मेघ इवाकाशे वृक्षषण्डः प्रकाशते।

मेघसंघातविपुलः पर्यन्तकदलीवृतः॥१४॥

‘वानरराज! आकाश में मेघ की भाँति जो यह वृक्षों का समूह प्रकाशित हो रहा है, क्या है? यह इतना विस्तृत है कि मेघों की घटा के समान छा रहा है। इसके किनारे-किनारे केले के वृक्ष लगे हुए हैं, जिनसे वह सारा वृक्षसमूह घिर गया है॥१४॥

किमेतज्ज्ञातुमिच्छामि सखे कौतूहलं मम।

कौतूहलापनयनं कर्तुमिच्छाम्यहं त्वया॥१५॥

‘सखे! यह कौन-सा वन है, यह मैं जानना चाहता हूँ। इसके लिये मेरे मन में बड़ा कौतूहल है। मैं चाहता हूँ कि तुम्हारे द्वारा मेरे इस कौतूहल का निवारण हो’ ॥ १५ ॥

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा राघवस्य महात्मनः।

गच्छन् नेवाचचक्षेऽथ सुग्रीवस्तन्महद् वनम्॥ १६॥

महात्मा रघुनाथजी की यह बात सुनकर सुग्रीव ने चलते-चलते ही उस विशाल वन के विषय में बताना आरम्भ किया॥

एतद् राघव विस्तीर्णमाश्रमं श्रमनाशनम्।

उद्यानवनसम्पन्नं स्वादुमूलफलोदकम्॥१७॥

‘रघुनन्दन! यह एक विस्तृत आश्रम है, जो सबके श्रम का निवारण करने वाला है। यह उद्यानों और उपवनों से युक्त है। यहाँ स्वादिष्ट फल-मूल और जल सुलभ होते हैं।

अत्र सप्तजना नाम मुनयः संशितव्रताः।

सप्तैवासन्नधःशीर्षा नियतं जलशायिनः॥१८॥

‘इस आश्रम में सप्तजन नाम से प्रसिद्ध सात ही मुनि रहते थे, जो कठोर व्रत के पालन में तत्पर थे। वे नीचे सिर करके तपस्या करते थे। नियमपूर्वक रहकर जल में शयन करने वाले थे॥१८॥

सप्तरात्रे कृताहारा वायुनाचलवासिनः।

दिवं वर्षशतैर्याताः सप्तभिः सकलेवराः॥१९॥

‘सात दिन और सात रात व्यतीत करके वे केवल वायु का आहार करते थे तथा एक स्थान पर निश्चल भाव से रहते थे। इस प्रकार सात सौ वर्षों तक तपस्या करके वे सशरीर स्वर्गलोक को चले गये॥ १९॥

तेषामेतत्प्रभावेण द्रुमप्राकारसंवृतम्।

आश्रमं सुदुराधर्षमपि सेन्द्रैः सुरासुरैः॥२०॥

‘उन्हीं के प्रभाव से सघन वृक्षों की चहारदीवारी से  घिरा हुआ यह आश्रम इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओं और असुरों के लिये भी अत्यन्त दुर्धर्ष बना हुआ है। २०॥

पक्षिणो वर्जयन्त्येतत् तथान्ये वनचारिणः।

विशन्ति मोहाद् येऽप्यत्र न निवर्तन्ति ते पुनः॥ २१॥

‘पक्षी तथा दूसरे वनचर जीव इसे दूर से ही त्याग देते हैं। जो मोहवश इसके भीतर प्रवेश करते हैं, वे फिर कभी नहीं लौटते हैं॥२१॥

विभूषणरवाश्चात्र श्रूयन्ते सकलाक्षराः।

तूर्यगीतस्वनश्चापि गन्धो दिव्यश्च राघव॥२२॥

‘रघुनन्दन! यहाँ मधुर अक्षरवाली वाणी के साथ साथ आभूषणों की झनकारें भी सुनी जाती हैं। वाद्य और गीत की मधुर ध्वनि भी कानों में पड़ती है और दिव्य सुगन्ध का भी अनुभव होता है॥ २२॥

त्रेताग्नयोऽपि दीप्यन्ते धूमो ह्येष प्रदृश्यते।

वेष्टयन्निव वृक्षाग्रान् कपोताङ्गारुणो घनः॥२३॥

‘यहाँ आहवनीय आदि त्रिविध अग्नियाँ भी प्रज्वलित होती हैं। यह कबूतरके अंगों की भाँति धूसर रंग वाला घना धूम उठता दिखायी देता है, जो वृक्षों की शिखाओं को आवेष्टित-सा कर रहा है॥ २३॥

एते वृक्षाः प्रकाशन्ते धूमसंसक्तमस्तकाः।

मेघजालप्रतिच्छन्ना वैडूर्यगिरयो यथा॥ २४॥

‘जिनके शिखाओंपर होम-धूम छा रहे हैं, वे ये वृक्ष मेघसमूहोंसे आच्छादित हुए नीलमके पर्वतोंकी भाँति प्रकाशित हो रहे हैं॥२४॥

कुरु प्रणामं धर्मात्मस्तेषामुद्दिश्य राघव।

लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा प्रयतः संहताञ्जलिः॥२५॥

‘धर्मात्मा रघुनन्दन! आप मन को एकाग्र करके दोनों हाथ जोड़कर भाई लक्ष्मण के साथ उन मुनियों के उद्देश्य से प्रणाम कीजिये॥ २५ ॥

प्रणमन्ति हि ये तेषामृषीणां भावितात्मनाम्।

न तेषामशुभं किंचिच्छरीरे राम विद्यते॥२६॥

‘श्रीराम! जो उन पवित्र अन्तःकरण वाले ऋषियों को प्रणाम करते हैं, उनके शरीर में किंचिन्मात्र भी अशुभ नहीं रह जाता है’ ॥ २६॥

ततो रामः सह भ्रात्रा लक्ष्मणेन कृताञ्जलिः।

समुद्दिश्य महात्मानस्तानृषीनभ्यवादयत्॥२७॥

तब भाई लक्ष्मणसहित श्रीराम ने हाथ जोड़कर उन महात्मा ऋषियों के उद्देश्य से प्रणाम किया॥२७॥

अभिवाद्य च धर्मात्मा रामो भ्राता च लक्ष्मणः।

सुग्रीवो वानराश्चैव जम्मुः संहृष्टमानसाः॥२८॥

धर्मात्मा श्रीराम, उनके छोटे भाई लक्ष्मण, सुग्रीव तथा अन्य सभी वानर उन ऋषियों को प्रणाम करके प्रसन्नचित्त हो आगे बढ़े॥२८॥

ते गत्वा दूरमध्वानं तस्मात् सप्तजनाश्रमात्।

ददृशुस्तां दुराधर्षां किष्किन्धां वालिपालिताम्॥ २९॥

उस सप्तजनाश्रम से दूर तक का मार्ग तय कर लेने के पश्चात् उन सबने वाली द्वारा सुरक्षित किष्किन्धापुरी को देखा॥

ततस्तु रामानुजरामवानराः प्रगृह्य शस्त्राण्युदितोग्रतेजसः।

पुरीं सुरेशात्मजवीर्यपालितां वधाय शत्रोः पुनरागतास्त्विह ॥३०॥

तदनन्तर श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण, श्रीराम तथा वानर, जिनका उग्र तेज उदित हुआ था, हाथों में अस्त्र-शस्त्र लेकर इन्द्रकुमार वाली के पराक्रम से पालित किष्किन्धापुरी में शत्रुवध के निमित्त पुनः आ पहुँचे॥ ३०॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे त्रयोदशः सर्गः॥१३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में तेरहवाँ सर्ग पूरा हुआ।१३॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

वाली-वध के लिये श्रीराम का आश्वासन पाकर सुग्रीव की विकट गर्जना

चतुर्दशः सर्गः

सर्ग-14


सर्वे ते त्वरितं गत्वा किष्किन्धां वालिनः पुरीम्।

वृक्षरात्मानमावृत्य व्यतिष्ठन् गहने वने॥१॥

वे सब लोग शीघ्रतापूर्वक वाली की किष्किन्धापुरी में पहुँचकर एक गहन वन में वृक्षोंकी ओटमें अपने-आपको छिपाकर खड़े हो गये॥१॥

विसार्य सर्वतो दृष्टिं कानने काननप्रियः।

सुग्रीवो विपुलग्रीवः क्रोधमाहारयद् भृशम्॥२॥

वन के प्रेमी विशाल ग्रीवावाले सुग्रीव ने उस वन में चारों ओर दृष्टि दौड़ायी और अपने मन में अत्यन्त क्रोध का संचय किया॥२॥

ततस्तु निनदं घोरं कृत्वा युद्धाय चाह्वयत्।

परिवारैः परिवृतो नादैभिन्दन्निवाम्बरम्॥३॥

तदनन्तर अपने सहायकों से घिरे हुए उन्होंने अपने सिंहनाद से आकाश को फाड़ते हुए-से घोर गर्जना की और वाली को युद्ध के लिये ललकारा ॥३॥

गर्जन्निव महामेघो वायुवेगपुरःसरः।

अथ बालार्कसदृशो दृप्तसिंहगतिस्ततः॥४॥

उस समय सुग्रीव वायु के वेग के साथ गर्जते हुए महामेघ के समान जान पड़ते थे। अपनी अङ्गकान्ति और प्रताप के द्वारा प्रातःकाल के सूर्य की भाँति प्रकाशित होते थे। उनकी चाल दर्पभरे सिंह के समान प्रतीत होती थी॥४॥

दृष्ट्वा रामं क्रियादक्षं सुग्रीवो वाक्यमब्रवीत्।

हरिवागुरया व्याप्तां तप्तकाञ्चनतोरणाम्॥५॥

प्राप्ताः स्म ध्वजयन्त्राढ्यां किष्किन्धां वालिनः

पुरीम्। प्रतिज्ञा या कृता वीर त्वया वालिवधे पुरा॥६॥

सफलां कुरु तां क्षिप्रं लतां काल इवागतः।

कार्यकुशल श्रीरामचन्द्रजी की ओर देखकर सुग्रीव ने कहा—’भगवन्! वाली की यह किष्किन्धापुरी तपाये हुए सुवर्ण के द्वारा निर्मित नगर द्वार से सुशोभित है। इसमें सब ओर वानरों का जाल-सा बिछा हुआ है तथा यह ध्वजों और यन्त्रों से सम्पन्न है। हम सब लोग इस पुरी में आ पहुँचे हैं। वीर! आपने पहले वाली-वध के लिये जो प्रतिज्ञा की थी, उसे अब शीघ्र सफल कीजिये। ठीक उसी तरह जैसे आया हुआ अनुकूल समय लता को फल-फूल से सम्पन्न कर देता है’॥ ५-६ १/२॥

एवमुक्तस्तु धर्मात्मा सुग्रीवेण स राघवः॥७॥

तमेवोवाच वचनं सुग्रीवं शत्रुसूदनः।

सुग्रीव के ऐसा कहने पर शत्रुसूदन धर्मात्मा श्रीरघुनाथजी ने फिर अपनी पूर्वोक्त बात को दुहराते हुए ही सुग्रीव से कहा- ॥ ७ १/२॥

कृताभिज्ञानचिह्नस्त्वमनया गजसाह्वया॥८॥

लक्ष्मणेन समुत्पाट्य एषा कण्ठे कृता तव।

शोभसेऽप्यधिकं वीर लतया कण्ठसक्तया॥९॥

विपरीत इवाकाशे सूर्यो नक्षत्रमालया।

‘वीर! अब तो इस गजपुष्पी लता के द्वारा तुमने अपनी पहचान के लिये चिह्न धारण कर ही लिया है। लक्ष्मण ने इसे उखाड़कर तुम्हारे कण्ठ में पहना ही दिया है। तुम कण्ठ में धारण की हुई इस लता के द्वारा बड़ी शोभा पा रहे हो। जिस प्रकार सूर्यमंडल आकाश में नक्षत्रमाला से घिरकर सुशोभित होता है उसी प्रकार इस कण्ठ-लम्बिनी लता से सुशोभित होने वाले तुम्हारी उस सूर्य से तुलना हो सकती है। ८-९ १/२॥

अद्य वालिसमुत्थं ते भयं वैरं च वानर ॥१०॥

एकेनाहं प्रमोक्ष्यामि बाणमोक्षेण संयुगे।

‘वानरराज! आज मैं वाली से उत्पन्न हुए तुम्हारे भय और वैर दोनों को युद्धस्थल में एक ही बार बाण छोड़कर मिटा दूंगा॥ १० १/२॥

मम दर्शय सुग्रीव वैरिणं भ्रातृरूपिणम्॥११॥

वाली विनिहतो यावदने पांसुषु चेष्टते।

‘सुग्रीव! तुम मुझे अपने उस भ्रातारूपी शत्रु को दिखा तो दो। फिर वाली मारा जाकर वन के भीतर धूल में लोटता दिखायी देगा॥ ११॥

यदि दृष्टिपथं प्राप्तो जीवन् स विनिवर्तते॥१२॥

ततो दोषेण मागच्छेत् सद्यो गर्हेच्च मां भवान्।

‘यदि मेरी दृष्टि में पड़ जाने पर भी वह जीवित लौट जाय तो तुम मुझे दोषी समझना और तत्काल जी भरकर मेरी निन्दा करना॥ १२ १/२॥

प्रत्यक्षं सप्त ते साला मया बाणेन दारिताः॥ १३॥

तेनावेहि बलेनाद्य वालिनं निहतं रणे।

‘तुम्हारी आँखों के सामने मैंने अपने एक ही बाण से सात साल के वृक्ष विदीर्ण किये थे, मेरे उसी बल से आज समराङ्गण में (एक बाण से ही) तुम वाली को मारा गया समझो॥ १३ १/२॥

अनृतं नोक्तपूर्वं मे चिरं कृच्छ्रेऽपि तिष्ठता॥१४॥

धर्मलोभपरीतेन न च वक्ष्ये कथंचन।

सफलां च करिष्यामि प्रतिज्ञा जहि संभ्रमम्॥ १५॥

‘बहुत समय से संकट झेलते रहने पर भी मैं कभी झूठ नहीं बोला हूँ। मेरे मन में धर्म का लोभ है। इसलिये किसी तरह मैं झूठ तो बोलूँगा ही नहीं। साथ ही अपनी प्रतिज्ञा को भी अवश्य सफल करूँगा। अतः तुम भय और घबराहट को अपने हृदय से निकाल दो॥१४-१५॥

प्रसूतं कलमक्षेत्रं वर्षेणेव शतक्रतुः।

तदाह्वाननिमित्तं च वालिनो हेममालिनः॥१६॥

सुग्रीव कुरु तं शब्दं निष्पतेद् येन वानरः।

‘जैसे इन्द्र वर्षा करके उगे हुए धान के खेत को फल से सम्पन्न करते हैं, उसी तरह मैं भी बाण का प्रयोग करके वाली के वध द्वारा तुम्हारा मनोरथ पूर्ण करूँगा। इसलिये सुग्रीव! तुम सुवर्णमालाधारी वाली को बुलाने के लिये इस समय ऐसी गर्जना करो, जिससे तुम्हारा सामना करने के लिये वह वानर नगर से बाहर निकल आये॥ १६ १/२॥

जितकाशी जयश्लाघी त्वया चाधर्षितः पुरात्॥ १७॥

निष्पतिष्यत्यसक्रेन वाली स प्रियसंयुगः।

‘वह अनेक युद्धों में विजय पाकर विजयश्री से सुशोभित हुआ है। सबपर विजय पाने की इच्छा रखता है और उसने कभी तुमसे हार नहीं खायी है। इसके अलावे युद्ध से उसका बड़ा प्रेम है, अतः वाली कहीं भी आसक्त न होकर नगर के बाहर अवश्य निकलेगा।

रिपूणां धर्षितं श्रुत्वा मर्षयन्ति न संयुगे॥१८॥

जानन्तस्तु स्वकं वीर्यं स्त्रीसमक्षं विशेषतः।

‘क्योंकि अपने पराक्रम को जानने वाले वीर पुरुष, विशेषतः स्त्रियों के सामने, युद्ध के लिये शत्रुओं के तिरस्कारपूर्ण शब्द सुनकर कदापि सहन नहीं करते

स तु रामवचः श्रुत्वा सुग्रीवो हेमपिङ्गलः॥१९॥

ननर्द क्रूरनादेन विनिर्भिन्दन्निवाम्बरम्।

श्रीरामचन्द्रजी की यह बात सुनकर सुवर्ण के समान पिङ्गलवर्ण वाले सुग्रीव ने आकाश को विदीर्ण-सा करते हुए कठोर स्वर में बड़ी भयंकर गर्जना की॥ १९१/२॥

तत्र शब्देन वित्रस्ता गावो यान्ति हतप्रभाः॥ २०॥

राजदोषपरामृष्टाः कुलस्त्रिय इवाकुलाः।

उस सिंहनाद से भयभीत हो बड़े-बड़े बैल शक्तिहीन हो राजा के दोष से परपुरुषों द्वारा पकड़ी जाने वाली कुलाङ्गनाओं के समान व्याकुलचित्त हो सब ओर भाग चले॥

द्रवन्ति च मृगाः शीघ्रं भग्ना इव रणे हयाः।

पतन्ति च खगा भूमौ क्षीणपुण्या इव ग्रहाः॥ २१॥

मृग युद्धस्थल में अस्त्र-शस्त्रों की चोट खाकर भागे हुए घोड़ों के समान तीव्र गति से भागने लगे और पक्षी जिनके पुण्य नष्ट हो गये हैं, ऐसे ग्रहों के समान आकाश से पृथ्वी पर गिरने लगे॥२१॥

ततः स जीमूतकृतप्रणादो नादं ह्यमुञ्चत् त्वरया प्रतीतः।

सूर्यात्मजः शौर्यविवृद्धतेजाः सरित्पतिर्वाऽनिलचञ्चलोर्मिः॥ २२॥

तदनन्तर जिनका सिंहनाद मेघ की गर्जना के समान गम्भीर था और शौर्य के द्वारा जिनका तेज बढ़ा हुआ था, वे सुविख्यात सूर्यकुमार सुग्रीव बड़ी उतावली के साथ बारंबार गर्जना करने लगे, मानो वायु के वेग से चञ्चल हुई उत्ताल तरङ्ग-मालाओं से सुशोभित सरिताओं का स्वामी समुद्र कोलाहल कर रहा हो। २२॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे चतुर्दशः सर्गः॥१४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में चौदहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥१४॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

सुग्रीव की गर्जना सुनकर वाली का युद्ध के लिये निकलना और तारा का उसे रोककर सुग्रीव और श्रीराम के साथ मैत्री कर लेने के लिये समझाना

पञ्चदशः सर्गः

सर्ग-15


अथ तस्य निनादं तं सुग्रीवस्य महात्मनः।

शुश्रावान्तःपुरगतो वाली भ्रातुरमर्षणः॥१॥

उस समय अमर्षशील वाली अपने अन्तःपुर में था। उसने अपने भाई महामना सुग्रीव का वह सिंहनाद वहीं से सुना॥१॥

श्रुत्वा तु तस्य निनदं सर्वभूतप्रकम्पनम्।

मदश्चैकपदे नष्टः क्रोधश्चापादितो महान्॥२॥

समस्त प्राणियों को कम्पित कर देने वाली उनकी वह गर्जना सुनकर उसका सारा मद सहसा उतर गया और उसे महान् क्रोध उत्पन्न हुआ॥२॥

ततो रोषपरीताङ्गो वाली स कनकप्रभः।

उपरक्त इवादित्यः सद्यो निष्प्रभतां गतः॥३॥

फिर तो सुवर्ण के समान पीले रंग वाले वाली का सारा शरीर क्रोध से तमतमा उठा। वह राहुग्रस्त सूर्य के समान तत्काल श्रीहीन दिखायी देने लगा॥३॥

वाली दंष्ट्राकरालस्तु क्रोधाद् दीप्ताग्निलोचनः।

भात्युत्पतितपद्माभः समृणाल इव ह्रदः॥४॥

वाली की दाढ़ें विकराल थीं, नेत्र क्रोध के कारण प्रज्वलित अग्नि के समान उद्दीप्त हो रहे थे। वह उस तालाब के समान श्रीहीन दिखायी देता था, जिसमें कमलपुष्पों की शोभा तो नष्ट हो गयी हो और केवल मृणाल रह गये हों॥

शब्दं दुर्मर्षणं श्रुत्वा निष्पपात ततो हरिः।

वेगेन च पदन्यासैर्दारयन्निव मेदिनीम्॥५॥

वह दुःसह शब्द सुनकर वाली अपने पैरों की धमक से पृथ्वी को विदीर्ण-सी करता हुआ बड़े वेग से निकला॥५॥

तं तु तारा परिष्वज्य स्नेहाद् दर्शितसौहृदा।

उवाच त्रस्तसम्भ्रान्ता हितोदर्कमिदं वचः॥६॥

उस समय वाली की पत्नी तारा भयभीत हो घबरा उठी। उसने वाली को अपनी दोनों भुजाओं में भर लिया और स्नेह से सौहार्द का परिचय देते हुए परिणाम में हित करने वाली यह बात कही- ॥६॥

साधु क्रोधमिमं वीर नदीवेगमिवागतम्।

शयनादुत्थितः काल्यं त्यज भुक्तामिव स्रजम्॥ ७॥

‘वीर! मेरी अच्छी बात सुनिये और सहसा आये हुए नदी के वेग की भाँति इस बढ़े हुए क्रोध को त्याग दीजिये। जैसे प्रातःकाल शय्या से उठा हुआ पुरुष रात को उपभोग में लायी गयी पुष्पमाला का त्याग कर देता है; उसी प्रकार इस क्रोध का परित्याग कीजिये।७॥

काल्यमेतेन संग्रामं करिष्यसि च वानर।

वीर ते शत्रुबाहुल्यं फल्गुता वा न विद्यते॥८॥

सहसा तव निष्क्रामो मम तावन्न रोचते।

श्रूयतामभिधास्यामि यन्निमित्तं निवार्यते॥९॥

‘वानरवीर! कल प्रातःकाल सुग्रीव के साथ युद्ध कीजियेगा (इस समय रुक जाइये) यद्यपि युद्ध में कोई शत्रु आपसे बढ़कर नहीं है और आप किसी से छोटे नहीं हैं। तथापि इस समय सहसा आपका घर से बाहर निकलना मुझे अच्छा नहीं लगता है, आपको रोकने का एक विशेष कारण भी है। उसे बताती हूँ, सुनिये॥८-९॥

पूर्वमापतितः क्रोधात् स त्वामाह्वयते युधि।

निष्पत्य च निरस्तस्ते हन्यमानो दिशो गतः॥ १०॥

‘सुग्रीव पहले भी यहाँ आये थे और क्रोधपूर्वक उन्होंने आपको युद्ध के लिये ललकारा था। उस समय आपने नगर से निकलकर उन्हें परास्त किया और वे आपकी मार खाकर सम्पूर्ण दिशाओं की ओर भागते हुए मतङ्ग वन में चले गये थे॥ १० ॥

त्वया तस्य निरस्तस्य पीडितस्य विशेषतः।

इहैत्य पुनराह्वानं शङ्कां जनयतीव मे॥११॥

‘इस प्रकार आपके द्वारा पराजित और विशेष पीड़ित होने पर भी वे पुनः यहाँ आकर आपको युद्ध के लिये ललकार रहे हैं। उनका यह पुनरागमन मेरे मन में शङ्का-सी उत्पन्न कर रहा है॥ ११॥

दर्पश्च व्यवसायश्च यादृशस्तस्य नर्दतः।

निनादस्य च संरम्भो नैतदल्पं हि कारणम्॥ १२॥

‘इस समय गर्जते हुए सुग्रीव का दर्प और उद्योग जैसा दिखायी देता है तथा उनकी गर्जना में जो उत्तेजना जान पड़ती है, इसका कोई छोटा-मोटा कारण नहीं होना चाहिये॥ १२॥ ।

नासहायमहं मन्ये सुग्रीवं तमिहागतम्।

अवष्टब्धसहायश्च यमाश्रित्यैष गर्जति॥१३॥

‘मैं समझती हूँ सुग्रीव किसी प्रबल सहायक के बिना अबकी बार यहाँ नहीं आये हैं। किसी सबल सहायक को साथ लेकर ही आये हैं, जिसके बल पर ये इस तरह गरज रहे हैं॥ १३॥

प्रकृत्या निपुणश्चैव बुद्धिमांश्चैव वानरः ।

नापरीक्षितवीर्येण सुग्रीवः सख्यमेष्यति॥१४॥

‘वानर सुग्रीव स्वभाव से ही कार्यकुशल और बुद्धिमान् हैं। वे किसी ऐसे पुरुष के साथ मैत्री नहीं करेंगे, जिसके बल और पराक्रम को अच्छी तरह परख न लिया हो॥ १४॥

पूर्वमेव मया वीर श्रुतं कथयतो वचः।

अङ्गदस्य कुमारस्य वक्ष्याम्यद्य हितं वचः॥१५॥

‘वीर! मैंने पहले ही कुमार अङ्गद के मुँह से यह बात सुन ली है। इसलिये आज मैं आपके हित की बात बताती हूँ॥

अङ्गदस्तु कुमारोऽयं वनान्तमुपनिर्गतः।

प्रवृत्तिस्तेन कथिता चारैरासीन्निवेदिता॥१६॥

‘एक दिन कुमार अङ्गद वन में गये थे। वहाँ गुप्तचरों ने उन्हें एक समाचार बताया, जो उन्होंने यहाँ आकर मुझसे भी कहा था॥ १६॥

अयोध्याधिपतेः पुत्रौ शूरौ समरदुर्जयौ।

इक्ष्वाकूणां कुले जातौ प्रथितौ रामलक्ष्मणौ ॥ १७॥

‘वह समाचार इस प्रकार है-अयोध्यानरेश के दो शूर-वीर पुत्र, जिन्हें युद्ध में जीतना अत्यन्त कठिन है, जिनका जन्म इक्ष्वाकुकुल में हुआ है तथा जो श्रीराम और लक्ष्मण के नाम से प्रसिद्ध हैं, यहाँ वन में आये हुए हैं ॥ १७॥

सुग्रीवप्रियकामार्थं प्राप्तौ तत्र दुरासदौ।

स ते भ्रातुर्हि विख्यातः सहायो रणकर्मणि॥ १८॥

रामः परबलामर्दी युगान्ताग्निरिवोत्थितः।

निवासवृक्षः साधूनामापन्नानां परा गतिः॥१९॥

‘वे दोनों दुर्जय वीर सुग्रीव का प्रिय करने के लिये उनके पास पहुँच गये हैं। उन दोनों में से जो आपके भाई के युद्ध-कर्म में सहायक बताये गये हैं, वे श्रीराम शत्रुसेना का संहार करने वाले तथा प्रलयकाल में प्रज्वलित हुई अग्नि के समान तेजस्वी हैं। वे साधु पुरुषों के आश्रयदाता कल्पवृक्ष हैं और संकट में पड़े हुए प्राणियों के लिये सबसे बड़ा सहारा हैं॥ १८-१९ ॥

आर्तानां संश्रयश्चैव यशसश्चैकभाजनम्।

ज्ञानविज्ञानसम्पन्नो निदेशे निरतः पितुः॥२०॥

‘आर्त पुरुषों के आश्रय, यश के एकमात्र भाजन, ज्ञान-विज्ञान से सम्पन्न तथा पिता की आज्ञा में स्थित रहने वाले हैं॥ २०॥

धातूनामिव शैलेन्द्रो गुणानामाकरो महान्।

तत् क्षमो न विरोधस्ते सह तेन महात्मना॥२१॥

दुर्जयेनाप्रमेयेण रामेण रणकर्मसु।

‘जैसे गिरिराज हिमालय नाना धातुओं की खान है, उसी प्रकार श्रीराम उत्तम गुणों के बहुत बड़े भंडार हैं। अतः उन महात्मा राम के साथ आपका विरोध करना कदापि उचित नहीं है। क्योंकि वे युद्ध की कला में अपना सानी नहीं रखते हैं। उनपर विजय पाना अत्यन्त कठिन है॥ २१ १/२॥

शूर वक्ष्यामि ते किंचिन्न चेच्छाम्यभ्यसूयितुम्॥ २२॥

श्रूयतां क्रियतां चैव तव वक्ष्यामि यद्धितम्।

‘शूरवीर! मैं आपके गुणों में दोष देखना नहीं चाहती। अतः आपसे कुछ कहती हूँ। आपके लिये जो हितकर है, वही बता रही हूँ। आप उसे सुनिये और वैसा ही कीजिये॥

यौवराज्येन सुग्रीवं तूर्णं साध्वभिषेचय॥२३॥

विग्रहं मा कृथा वीर भ्रात्रा राजन् यवीयसा।

‘अच्छा यही होगा कि आप सुग्रीव का शीघ्र ही युवराज के पद पर अभिषेक कर दीजिये। वीर वानरराज! सुग्रीव आपके छोटे भाई हैं, उनके साथ युद्ध न कीजिये॥

अहं हि ते क्षमं मन्ये तेन रामेण सौहृदम्॥२४॥

सुग्रीवेण च सम्प्रीतिं वैरमुत्सृज्य दूरतः।

‘मैं आपके लिये यही उचित समझती हूँ कि आप वैरभाव को दूर हटाकर श्रीराम के साथ सौहार्द और सुग्रीव के साथ प्रेम का सम्बन्ध स्थापित कीजिये॥ २४ १/२॥

लालनीयो हि ते भ्राता यवीयानेष वानरः॥२५॥

तत्र वा सन्निहस्थो वा सर्वथा बन्धुरेव ते।

नहि तेन समं बन्धुं भुवि पश्यामि कंचन॥२६॥

‘वानर सुग्रीव आपके छोटे भाई हैं। अतः आपका लाड़-प्यार पाने के योग्य हैं। वे ऋष्यमूक पर रहें या किष्किन्धा में सर्वथा आपके बन्धु ही हैं। मैं इस भूतल पर उनके समान बन्धु और किसी को नहीं देखती हूँ॥

दानमानादिसत्कारैः कुरुष्व प्रत्यनन्तरम्।

वैरमेतत् समुत्सृज्य तव पार्वे स तिष्ठतु ॥२७॥

‘आप दान-मान आदि सत्कारों के द्वारा उन्हें अपना अत्यन्त अन्तरङ्ग बना लीजिये, जिससे वे इस वैरभाव को छोड़कर आपके पास रह सकें॥२७॥

सुग्रीवो विपुलग्रीवो महाबन्धुर्मतस्तव।

भ्रातृसौहृदमालम्ब्य नान्या गतिरिहास्ति ते॥२८॥

‘पुष्ट ग्रीवावाले सुग्रीव आपके अत्यन्त प्रेमी बन्धु हैं, ऐसा मेरा मत है। इस समय भ्रातृप्रेम का सहारा लेने के सिवा आपके लिये यहाँ दूसरी कोई गति नहीं है॥२८॥

यदि ते मत्प्रियं कार्यं यदि चावैषि मां हिताम्।

याच्यमानः प्रियत्वेन साधु वाक्यं कुरुष्व मे॥ २९॥

‘यदि आपको मेरा प्रिय करना हो तथा आप मुझे अपनी हितकारिणी समझते हों तो मैं प्रेमपूर्वक याचना करती हूँ, आप मेरी यह नेक सलाह मान लीजिये॥ २९॥

प्रसीद पथ्यं शृणु जल्पितं हि मे न रोषमेवानुविधातुमर्हसि।

क्षमो हि ते कोशलराजसूनुना न विग्रहः शक्रसमानतेजसा॥३०॥

‘स्वामिन् ! आप प्रसन्न होइये। मैं आपके हित की बात कहती हूँ। आप इसे ध्यान देकर सुनिये। केवल रोष का ही अनुसरण न कीजिये। कोसलराजकुमार श्रीराम इन्द्र के समान तेजस्वी हैं। उनके साथ वैर बाँधना या युद्ध छेड़ना आपके लिये कदापि उचित नहीं है’।

तदा हि तारा हितमेव वाक्यं तं वालिनं पथ्यमिदं बभाषे।

न रोचते तद् वचनं हि तस्य कालाभिपन्नस्य विनाशकाले॥३१॥

उस समय तारा ने वाली से उसके हित की ही बात कही थी और यह लाभदायक भी थी। किंतु उसकी बात उसे नहीं रुची। क्योंकि उसके विनाश का समय निकट था और वह काल के पाश में बँध चुका था। ३१॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे पञ्चदशः सर्गः॥१५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में पंद्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥१५॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

वाली का तारा को डाँटकर लौटाना और सुग्रीव से जूझना तथा श्रीराम के बाण से घायल होकर पृथ्वी पर गिरना

षोडशः सर्गः

सर्ग-16


तामेवं ब्रुवतीं तारां ताराधिपनिभाननाम्।

वाली निर्भर्त्सयामास वचनं चेदमब्रवीत्॥१॥

तारापति चन्द्रमा के समान मुखवाली तारा को ऐसी बातें करती देख वाली ने उसे फटकारा और इस प्रकार कहा

गर्जतोऽस्य सुसंरब्धं भ्रातुः शत्रोर्विशेषतः।

मर्षयिष्यामि केनापि कारणेन वरानने॥२॥

‘वरानने ! इस गर्जते हुए भाई की, जो विशेषतः मेरा शत्रु है, यह उत्तेजनापूर्ण चेष्टा मैं किस कारण से सहन करूँगा॥२॥

अधर्षितानां शूराणां समरेष्वनिवर्तिनाम्।

धर्षणामर्षणं भीरु मरणादतिरिच्यते॥३॥

‘भीरु! जो कभी परास्त नहीं हए और जिन्होंने युद्ध के अवसरों पर कभी पीठ नहीं दिखायी, उनशूरवीरों के लिये शत्रु की ललकार सह लेना मृत्यु से भी बढ़कर दुःखदायी होता है॥३॥

सोढुं न च समर्थोऽहं युद्धकामस्य संयुगे।

सुग्रीवस्य च संरम्भं हीनग्रीवस्य गर्जितम्॥४॥

‘यह हीन ग्रीवा वाला सुग्रीव संग्रामभूमि में मेरे साथ युद्ध की इच्छा रखता है। मैं इसके रोषावेश और गर्जन-तर्जन को सहन करने में असमर्थ हूँ॥४॥

न च कार्यो विषादस्ते राघवं प्रति मत्कृते।

धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च कथं पापं करिष्यति ॥५॥

‘श्रीरामचन्द्रजी की बात सोचकर भी तुम्हें मेरे लिये विषाद नहीं करना चाहिये। क्योंकि वे धर्म के ज्ञाता तथा कर्तव्याकर्तव्य को समझने वाले हैं अतः पाप कैसे करेंगे॥

निवर्तस्व सह स्त्रीभिः कथं भूयोऽनुगच्छसि।

सौहृदं दर्शितं तावन्मयि भक्तिस्त्वया कृता॥६॥

प्रतियोत्स्याम्यहं गत्वा सुग्रीवं जहि सम्भ्रमम्।

दर्पं चास्य विनेष्यामि न च प्राणैर्वियोक्ष्यते॥७॥

‘तुम इन स्त्रियों के साथ लौट जाओ। क्यों मेरे पीछे बार-बार आ रही हो। तुमने मेरे प्रति अपना स्नेह दिखाया। भक्ति का भी परिचय दे दिया। अब जाओ, घबराहट छोड़ो। मैं आगे बढ़कर सुग्रीव का सामना करूँगा। उसके घमण्ड को चूर-चूर कर डालूँगा। किंतु प्राण नहीं लूंगा॥६—॥

अहं ह्याजिस्थितस्यास्य करिष्यामि यदीप्सितम्।

वृक्षैर्मुष्टिप्रहारैश्च पीडितः प्रतियास्यति॥८॥

‘युद्ध के मैदान में खड़े हुए सुग्रीव की जो-जो इच्छा है, उसे मैं पूर्ण करूँगा। वृक्षों और मुक्कों की मार से पीड़ित होकर वह स्वयं ही भाग जायगा॥ ८॥

न मे गर्वितमायस्तं सहिष्यति दुरात्मवान्।

कृतं तारे सहायत्वं दर्शितं सौहृदं मयि॥९॥

‘तारे! दुरात्मा सुग्रीव मेरे युद्धविषयक दर्प और आयास (उद्योग) को नहीं सह सकेगा। तुमने मेरी बौद्धिक सहायता अच्छी तरह कर दी और मेरे प्रति अपना सौहार्द भी दिखा दिया॥९॥

शापितासि मम प्राणैर्निवर्तस्व जनेन च।

अलं जित्वा निवर्तिष्ये तमहं भ्रातरं रणे॥१०॥

‘अब मैं प्राणों की सौगन्ध दिलाकर कहता हूँ कि अब तुम इन स्त्रियों के साथ लौट जाओ। अब अधिक कहने की आवश्यकता नहीं है, मैं युद्ध में अपने उस भाई को जीतकर लौट आऊँगा’ ॥ १० ॥

तं तु तारा परिष्वज्य वालिनं प्रियवादिनी।

चकार रुदती मन्दं दक्षिणा सा प्रदक्षिणम्॥ ११॥

यह सुनकर अत्यन्त उदार स्वभाववाली तारा ने वाली का आलिङ्गन करके मन्द स्वर में रोते-रोते उसकी परिक्रमा की॥ ११॥

ततः स्वस्त्ययनं कृत्वा मन्त्रविद् विजयैषिणी।

अन्तःपुरं सह स्त्रीभिः प्रविष्टा शोकमोहिता॥ १२॥

वह पति की विजय चाहती थी और उसे मन्त्र का भी ज्ञान था। इसलिये उसने वाली की मङ्गलकामना से स्वस्तिवाचन किया और शोक से मोहित हो वह अन्य स्त्रियों के साथ अन्तःपुर को चली गयी॥

१२॥

प्रविष्टायां तु तारायां सह स्त्रीभिः स्वमालयम्।

नगर्या निर्ययौ क्रुद्धो महासर्प इव श्वसन्॥१३॥

स्त्रियोंसहित तारा के अपने महल में चले जाने पर वाली क्रोध से भरे हुए महान् सर्प की भाँति लम्बी साँस खींचता हुआ नगर से बाहर निकला॥१३॥

स निःश्वस्य महारोषो वाली परमवेगवान्।

सर्वतश्चारयन् दृष्टिं शत्रुदर्शनकांक्षया॥१४॥

महान् रोष से युक्त और अत्यन्त वेगशाली वाली लम्बी साँस छोड़कर शत्रु को देखने की इच्छा से चारों ओर अपनी दृष्टि दौड़ाने लगा॥ १४ ॥

स ददर्श ततः श्रीमान् सुग्रीवं हेमपिङ्गलम्।

सुसंवीतमवष्टब्धं दीप्यमानमिवानलम्॥१५॥

इतने ही में श्रीमान् वाली ने सुवर्ण के समान पिङ्गल वर्ण वाले सुग्रीव को देखा, जो लँगोट बाँधकर युद्ध के लिये डटकर खड़े थे और प्रज्वलित अग्नि के समान प्रकाशित हो रहे थे॥ १५ ॥

तं स दृष्ट्वा महाबाहः सुग्रीवं पर्यवस्थितम।

गाढं परिदधे वासो वाली परमकोपनः॥१६॥

सुग्रीव को खड़ा देख महाबाहु वाली अत्यन्त कुपित हो उठा। उसने अपना लँगोट भी दृढ़ता के साथ बाँध लिया॥

स वाली गाढसंवीतो मुष्टिमुद्यम्य वीर्यवान्।

सुग्रीवमेवाभिमुखो ययौ योद्धं कृतक्षणः॥१७॥

लँगोट को मजबूती के साथ कसकर पराक्रमी वाली प्रहार का अवसर देखता हुआ मुक्का तानकर सुग्रीव की ओर चला॥ १७॥

श्लिष्टं मुष्टिं समुद्यम्य संरब्धतरमागतः।

सुग्रीवोऽपि समुद्दिश्य वालिनं हेममालिनम्॥ १८॥

सुग्रीव भी सुवर्णमालाधारी वाली के उद्देश्य से बँधा हुआ मुक्का ताने बड़े आवेश के साथ उसकी ओर बढ़े॥

तं वाली क्रोधताम्राक्षः सुग्रीवं रणकोविदम्।

आपतन्तं महावेगमिदं वचनमब्रवीत्॥१९॥

युद्धकला के पण्डित महावेगशाली सुग्रीव को अपनी ओर आते देख वाली की आँखें क्रोध से लाल हो गयीं और वह इस प्रकार बोला— ॥१९॥

एष मुष्टिर्महान् बद्धो गाढः सुनियताङ्गुलिः।

मया वेगविमुक्तस्ते प्राणानादाय यास्यति॥२०॥

‘सुग्रीव! देख ले यह बड़ा भारी मुक्का खूब कसकर बँधा हुआ है। इसमें सारी अङ्गुलियाँ सुनियन्त्रित रूप से परस्पर सटी हुई हैं। मेरे द्वारा वेगपूर्वक चलाया हुआ यह मुक्का तेरे प्राण लेकर ही जायगा’ ॥ २०॥

एवमुक्तस्तु सुग्रीवः क्रुद्धो वालिनमब्रवीत्।

तव चैष हरन् प्राणान् मुष्टिः पततु मूर्धनि॥२१॥

वाली के ऐसा कहने पर सुग्रीव क्रोधपूर्वक उससे बोले—’मेरा यह मुक्का भी तेरे प्राण लेने के लिये तेरे मस्तक पर गिरे’॥ २१॥

ताडितस्तेन तं क्रुद्धः समभिक्रम्य वेगतः।

अभवच्छोणितोद्गारी सापीड इव पर्वतः॥२२॥

इतने ही में वाली ने वेगपूर्वक आक्रमण करके सुग्रीव पर मुक्के का प्रहार किया। उस चोट से घायल एवं कुपित हुए सुग्रीव झरनों से युक्त पर्वत की भाँति मुँह से रक्त वमन करने लगे। २२ ।।

सुग्रीवेण तु निःशङ्कं सालमुत्पाट्य तेजसा।

गात्रेष्वभिहतो वाली वज्रेणेव महागिरिः॥२३॥

तत्पश्चात् सुग्रीव ने भी निःशङ्क होकर बलपूर्वक एक साल वृक्ष को उखाड़ लिया और उसे वाली के शरीर पर दे मारा, मानो इन्द्रने किसी विशाल पर्वत पर वज्रका प्रहार किया हो॥ २३॥

स तु वृक्षेण निर्भग्नः सालताडनविह्वलः।

गुरुभारभराक्रान्ता नौः ससार्थेव सागरे॥२४॥

उस वृक्ष की चोट से वाली के शरीर में घाव हो गया। उस आघात से विह्वल हुआ वाली व्यापारियों के समूह के चढ़ने से भारी भार के द्वारा दबकर समुद्र में डगमगाती हुई नौका के समान काँपने लगा॥ २४॥

तौ भीमबलविक्रान्तौ सुपर्णसमवेगितौ।

प्रवृद्धौ घोरवपुषौ चन्द्रसूर्याविवाम्बरे ॥२५॥

उन दोनों भाइयों का बल और पराक्रम भयंकर था। दोनों के ही वेग गरुड़ के समान थे। वे दोनों भयंकर रूप धारण करके बड़े जोर से जूझ रहे थे और पूर्णिमा के आकाश में चन्द्रमा और सूर्य के समान दिखायी देते थे॥

परस्परममित्रघ्नौ छिद्रान्वेषणतत्परौ।

ततोऽवर्धत वाली तु बलवीर्यसमन्वितः॥२६॥

सूर्यपुत्रो महावीर्यः सुग्रीवः परिहीयत।

वे शत्रुसूदन वीर अपने विपक्षी को मार डालने की इच्छा से एक-दूसरे की दुर्बलता ढूँढ़ रहे थे; परंतु उस युद्ध में बल-विक्रमसम्पन्न वाली बढ़ने लगा और महापराक्रमी सूर्यपुत्र सुग्रीव की शक्ति क्षीण होने लगी॥

वालिना भग्नदर्पस्तु सुग्रीवो मन्दविक्रमः॥२७॥

वालिनं प्रति सामर्षो दर्शयामास राघवम्।

वालीने सुग्रीवका घमण्ड चूर्ण कर दिया।

उनका पराक्रम मन्द पड़ने लगा। तब वाली के प्रति अमर्ष में भरे हुए सुग्रीव ने श्रीरामचन्द्रजी को अपनी अवस्था का लक्ष्य कराया॥ २७ १/२॥

वृक्षैः सशाखैः शिखरैर्वज्रकोटिनिभै खैः ॥ २८॥

मुष्टिभिर्जानुभिः पद्भिर्बाहुभिश्च पुनः पुनः।

तयोर्युद्धमभूद्घोरं वृत्रवासवयोरिव॥२९॥

इसके बाद डालियों सहित वृक्षों, पर्वत के शिखरों, वज्र के समान भयंकर नखों, मुक्कों, घुटनों, लातों और हाथों की मार से उन दोनों में इन्द्र और वृत्रासुर की भाँति भयंकर संग्राम होने लगा॥२९॥

तौ शोणिताक्तौ युध्येतां वानरौ वनचारिणौ।

मेघाविव महाशब्देस्तर्जमानौ परस्परम्॥३०॥

वे दोनों वनचारी वानर लहूलुहान होकर लड़ रहे थे और दो बादलों की तरह अत्यन्त भयंकर गर्जना करते हुए एक-दूसरे को डाँट रहे थे॥ ३० ॥

हीयमानमथापश्यत् सुग्रीवं वानरेश्वरम्।

प्रेक्षमाणं दिशश्चैव राघवः स मुहुर्मुहुः॥३१॥

श्रीरघुनाथजी ने देखा, वानरराज सुग्रीव कमजोर पड़ रहे हैं और बारंबार इधर-उधर दृष्टि दौड़ा रहे हैं। ३१॥

ततो रामो महातेजा आर्तं दृष्ट्वा हरीश्वरम्।

स शरं वीक्षते वीरो वालिनो वधकांक्षया॥३२॥

वानरराज को पीड़ित देख महातेजस्वी श्रीराम ने वाली के वध की इच्छा से अपने बाण पर दृष्टिपात किया॥

ततो धनुषि संधाय शरमाशीविषोपमम्।

पूरयामास तच्चापं कालचक्रमिवान्तकः॥३३॥

उन्होंने अपने धनुष पर विषधर सर्प के समान भयंकर बाण रखा और उसे जोर से खींचा, मानो यमराज ने कालचक्र उठा लिया हो॥३३॥

तस्य ज्यातलघोषेण त्रस्ताः पत्ररथेश्वराः।

प्रदुद्रुवुर्मुगाश्चैव युगान्त इव मोहिताः॥ ३४॥

उसकी प्रत्यञ्चा की टङ्कारध्वनि से भयभीत हो बड़े-बड़े पक्षी और मृग भाग खड़े हुए। वे प्रलयकाल के समय मोहित हुए जीवों के समान किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये॥ ३४॥

मुक्तस्तु वज्रनिर्घोषः प्रदीप्ताशनिसंनिभः।

राघवेण महाबाणो वालिवक्षसि पातितः॥ ३५॥

श्रीरघुनाथजी ने वज्र की भाँति गड़गड़ाहट और प्रज्वलित अशनि की भाँति प्रकाश पैदा करने वाला वह महान् बाण छोड़ दिया तथा उसके द्वारा वाली के वक्षःस्थल पर चोट पहुँचायी॥ ३५ ॥

ततस्तेन महातेजा वीर्ययुक्तः कपीश्वरः।

वेगेनाभिहतो वाली निपपात महीतले॥३६॥

उस बाण से वेगपूर्वक आहत हो महातेजस्वी पराक्रमी वानरराज वाली तत्काल पृथ्वी पर गिर पड़ा॥ ३६॥

इन्द्रध्वज इवोधूतः पौर्णमास्यां महीतले।

आश्वयुक्समये मासि गतश्रीको विचेतनः।

बाष्पसंरुद्धकण्ठस्तु वाली चार्तस्वरः शनैः॥ ३७॥

आश्विन की पूर्णिमा के दिन इन्द्रध्वजोत्सव के अन्त में ऊपर फेंका गया इन्द्रध्वज जैसे पृथ्वी पर गिर पड़ता है, उसी प्रकार वाली ग्रीष्मऋतु के अन्त में श्रीहीन, अचेत और आँसुओं से गद्गदकण्ठ हो धराशायी हो गया और धीरे-धीरे आर्तनाद करने लगा॥ ३७॥

नरोत्तमः कालयुगान्तकोपमं शरोत्तमं काञ्चनरूप्यभूषितम्।

ससर्ज दीप्तं तममित्रमर्दनं सधूममग्निं मुखतो यथा हरः॥ ३८॥

श्रीराम का वह उत्तम बाण युगान्तकाल के समान भयंकर तथा सोने-चाँदी से विभूषित था। पूर्वकाल में महादेवजी ने जैसे अपने मुख से (मुख-मण्डल के अन्तर्गत ललाटवर्ती नेत्र से) शत्रुभूत कामदेव का नाश करने के लिये धूमयुक्त अग्नि की सृष्टि की थी, उसी प्रकार पुरुषोत्तम श्रीराम ने सुग्रीवशत्रु वाली का मर्दन करने के लिये उस प्रज्वलित बाण को छोड़ा था। ३८॥

अथोक्षितः शोणिततोयविस्रवैः सुपुष्पिताशोक इवानिलोद्धतः।

विचेतनो वासवसूनुराहवे प्रभ्रंशितेन्द्रध्वजवत् क्षितिं गतः॥ ३९॥

इन्द्रकुमार वाली के शरीर से पानी के समान रक्त की धारा बहने लगी। वह उससे नहा गया और अचेत हो वायु के उखाड़े हुए पुष्पित अशोक वृक्ष एवं आकाश से नीचे गिरे हुए इन्द्रध्वज के समान समराङ्गण में पृथ्वी पर गिर पड़ा॥ ३९॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे षोडशः सर्गः ॥१६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में सोलहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥१६॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

वाली का श्रीरामचन्द्रजी को फटकारना

सप्तदशः सर्गः

सर्ग-17


ततः शरेणाभिहतो रामेण रणकर्कशः।

पपात सहसा वाली निकृत्त इव पादपः॥१॥

युद्ध में कठोरता दिखाने वाला वाली श्रीराम के बाण से घायल हो कटे वृक्ष की भाँति सहसा पृथ्वी पर गिर पड़ा॥

स भूमौ न्यस्तसर्वाङ्गस्तप्तकाञ्चनभूषणः।

अपतद् देवराजस्य मुक्तरश्मिरिव ध्वजः॥२॥

उसका सारा शरीर पृथ्वी पर पड़ा हुआ था। तपाये हुए सुवर्ण के आभूषण अब भी उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। वह देवराज इन्द्र के बन्धनरहित ध्वज की भाँति पृथ्वी पर गिर पड़ा था॥२॥

अस्मिन् निपतिते भूमौ हर्यक्षाणां गणेश्वरे।

नष्टचन्द्रमिव व्योम न व्यराजत मेदिनी॥३॥

वानरों और भालुओं के यूथपति वाली के धराशायी हो जाने पर यह पृथ्वी चन्द्ररहित आकाश की भाँति शोभाहीन हो गयी॥३॥

भूमौ निपतितस्यापि तस्य देहं महात्मनः।

न श्रीर्जहाति न प्राणा न तेजो न पराक्रमः॥४॥

पृथ्वी पर पड़े होने पर भी महामना वाली के शरीर को शोभा, प्राण, तेज और पराक्रम नहीं छोड़ सके थे। ४॥

शक्रदत्ता वरा माला काञ्चनी रत्नभूषिता।

दधार हरिमुख्यस्य प्राणांस्तेजः श्रियं च सा॥५॥

इन्द्र की दी हुई रत्नजटित श्रेष्ठ सुवर्णमाला उस वानरराज के प्राण, तेज और शोभा को धारण किये हुए थी॥

स तया मालया वीरो हैमया हरियथपः।

संध्यानुगतपर्यन्तः पयोधर इवाभवत्॥६॥

उस सुवर्णमाला से विभूषित हुआ वानरयूथपति वीर वाली संध्या की लाली से रँगे हुए प्रान्त भाग वाले मेघखण्ड के समान शोभा पा रहा था॥६॥

तस्य माला च देहश्च मर्मघाती च यः शरः।

त्रिधेव रचिता लक्ष्मीः पतितस्यापि शोभते॥७॥

पृथ्वीपर गिरे होने पर भी वाली की वह सुवर्णमाला, उसका शरीर तथा मर्मस्थल को विदीर्ण करने वाला वह बाण—ये तीनों पृथक्-पृथक् तीन भागों में विभक्त की हुई अङ्गलक्ष्मी के समान शोभा पा रहे थे॥७॥

तदस्त्रं तस्य वीरस्य स्वर्गमार्गप्रभावनम्।

रामबाणासनक्षिप्तमावहत् परमां गतिम्॥८॥

वीरवर श्रीराम के धनुष से चलाये गये उस अस्त्रने वाली के लिये स्वर्ग का मार्ग प्रकाशित कर दिया और उसे परमपद को पहुँचा दिया॥ ८॥

तं तथा पतितं संख्ये गतार्चिषमिवानलम्।

ययातिमिव पुण्यान्ते देवलोकादिह च्युतम्॥९॥

आदित्यमिव कालेन युगान्ते भुवि पातितम्।

महेन्द्रमिव दुर्धर्षमुपेन्द्रमिव दुःसहम्॥१०॥

महेन्द्रपुत्रं पतितं वालिनं हेममालिनम्।

व्यूढोरस्कं महाबाहुं दीप्तास्यं हरिलोचनम्॥ ११॥

इस प्रकार युद्धस्थल में गिरा हुआ इन्द्रपुत्र वाली ज्वालारहित अग्नि के समान, पुण्यों का क्षय होने पर पुण्यलोक से इस पृथ्वी पर गिरे हुए राजा ययाति के समान तथा महाप्रलय के समय काल द्वारा पृथ्वी पर गिराये गये सूर्य के समान जान पड़ता था। उसके गले में सोने की माला शोभा दे रही थी। वह महेन्द्र के समान दुर्जय और भगवान् विष्णु के समान दुस्सह था। उसकी छाती चौड़ी, भुजाएँ बड़ी-बड़ी, मुख दीप्तिमान् और नेत्र कपिलवर्ण के थे॥९–११॥

लक्ष्मणानुचरो रामो ददर्शोपससर्प च।

तं तथा पतितं वीरं गतार्चिषमिवानलम्॥१२॥

बहुमान्य च तं वीरं वीक्षमाणं शनैरिव।

उपयातौ महावीर्यौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥१३॥

लक्ष्मण को साथ लिये श्रीराम ने वाली को इस अवस्था में देखा और वे उसके समीप गये। इस प्रकार ज्वालारहित अग्नि की भाँति वहाँ गिरा हुआ वह वीर धीरे-धीरे देख रहा था। महापराक्रमी दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण उस वीर का विशेष सम्मान करते हुए उसके पास गये॥ १२-१३॥

तं दृष्ट्वा राघवं वाली लक्ष्मणं च महाबलम्।

अब्रवीत् परुषं वाक्यं प्रश्रितं धर्मसंहितम्॥१४॥

उन श्रीराम तथा महाबली लक्ष्मण को देखकर वाली धर्म और विनय से युक्त कठोर वाणी में बोला – || १४॥

स भूमावल्पतेजोऽसुर्निहतो नष्टचेतनः।

अर्थसंहितया वाचा गर्वितं रणगर्वितम्॥१५॥

अब उसमें तेज और प्राण स्वल्पमात्रा में ही रह गये थे। वह बाण से घायल होकर पृथ्वी पर पड़ा था और उसकी चेष्टा धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही थी। उसने युद्ध में गर्वयुक्त पराक्रम प्रकट करने वाले गर्वीले श्रीराम से कठोर वाणी में इस प्रकार कहना आरम्भ किया— ॥१५॥

त्वं नराधिपतेः पुत्रः प्रथितः प्रियदर्शनः।

परामखवधं कृत्वा कोऽत्र प्राप्तस्त्वया गुणः।

यदहं युद्धसंरब्धस्त्वत्कृते निधनं गतः॥१६॥

रघुनन्दन ! आप राजा दशरथ के सुविख्यात पुत्र हैं। आपका दर्शन सबको प्रिय है। मैं आपसे युद्ध करने नहीं आया था। मैं तो दूसरे के साथ युद्ध में उलझा हुआ था। उस दशा में आपने मेरा वध करके यहाँ कौन-सा गुण प्राप्त किया है—किस महान् यश का उपार्जन किया है? क्योंकि मैं युद्ध के लिये दूसरे पर रोष प्रकट कर रहा था, किंतु आपके कारण बीच में ही मृत्यु को प्राप्त हुआ॥१६॥

कुलीनः सत्त्वसम्पन्नस्तेजस्वी चरितव्रतः।

रामः करुणवेदी च प्रजानां च हिते रतः॥१७॥

सानुक्रोशो महोत्साहः समयज्ञो दृढव्रतः।

इत्येतत् सर्वभूतानि कथयन्ति यशो भुवि॥१८॥

इस भूतल पर सब प्राणी आपके यश का वर्णन करते हुए कहते हैं-श्रीरामचन्द्रजी कुलीन, सत्त्वगुणसम्पन्न, तेजस्वी, उत्तम व्रत का आचरण करने वाले, करुणा का अनुभव करने वाले, प्रजा के हितैषी, दयालु, महान् उत्साही, समयोचित कार्य एवं सदाचार के ज्ञाता और दृढ़प्रतिज्ञ हैं॥ १७-१८॥

दमः शमः क्षमा धर्मो धृतिः सत्यं पराक्रमः।

पार्थिवानां गुणा राजन् दण्डश्चाप्यपकारिषु॥ १९॥

‘राजन् ! इन्द्रियनिग्रह, मन का संयम, क्षमा, धर्म, धैर्य, सत्य, पराक्रम तथा अपराधियों को दण्ड देना ये राजा के गुण हैं ॥ १९॥

तान् गुणान् सम्प्रधा हमग्रयं चाभिजनं तव।

तारया प्रतिषिद्धः सन् सुग्रीवेण समागतः॥२०॥

‘मैं आपमें इन सभी सद्गुणों का विश्वास करके आपके उत्तम कुल को यादकर तारा के मना करने पर भी सुग्रीव के साथ लड़ने आ गया॥ २० ॥

न मामन्येन संरब्धं प्रमत्तं वेधुमर्हसि।

इति मे बुद्धिरुत्पन्ना बभूवादर्शने तव॥२१॥

जबतक मैंने आपको नहीं देखा था, तब तक मेरे मन में यही विचार उठता था कि दूसरे के साथ रोषपूर्वक जुझते हुए मुझको आप असावधान अवस्था में अपने बाण से बेधना उचित नहीं समझेंगे।

२१॥

स त्वां विनिहतात्मानं धर्मध्वजमधार्मिकम्।

जाने पापसमाचारं तृणैः कूपमिवावृतम्॥२२॥

‘परंतु आज मुझे मालूम हुआ कि आपकी बुद्धि मारी गयी है। आप धर्मध्वजी हैं। दिखावे के लिये धर्म का चोला पहने हुए हैं। वास्तव में अधर्मी हैं। आपका आचार-व्यवहार पापपूर्ण है। आप घासफूस से ढके हुए कूप के समान धोखा देने वाले हैं। २२॥

सतां वेषधरं पापं प्रच्छन्नमिव पावकम्।

नाहं त्वामभिजानामि धर्मच्छद्माभिसंवृतम्॥२३॥

‘आपने साधु पुरुषोंका-सा वेश धारण कर रखा है; परंतु हैं पापी। राख से ढकी हुई आग के समान आपका असली रूप साधु-वेष में छिप गया है। मैं नहीं जानता था कि आपने लोगों को छलने के लिये ही धर्म की आड़ ली है॥ २३॥

विषये वा पुरे वा ते यदा पापं करोम्यहम्।

न च त्वामवजानेऽहं कस्मात् तं हंस्यकिल्बिषम्॥ २४॥

‘जब मैं आपके राज्य या नगर में कोई उपद्रव नहीं कर रहा था तथा आपका भी तिरस्कार नहीं करता था, तब आपने मुझ निरपराध को क्यों मारा? ॥ २४ ॥

फलमूलाशनं नित्यं वानरं वनगोचरम्।

मामिहाप्रतियुध्यन्तमन्येन च समागतम्॥२५॥

‘मैं सदा फल-मूल का भोजन करने वाला और वन में ही विचरने वाला वानर हूँ। मैं यहाँ आपसे युद्ध नहीं करता था, दूसरे के साथ मेरी लड़ाई हो रही थी। फिर बिना अपराध के आपने मुझे क्यों मारा ? ॥ २५ ॥

त्वं नराधिपतेः पुत्रः प्रतीतः प्रियदर्शनः।

लिङ्गमप्यस्ति ते राजन् दृश्यते धर्मसंहितम्॥२६॥

‘राजन्! आप एक सम्माननीय नरेश के पुत्र हैं। विश्वास के योग्य हैं और देखने में भी प्रिय हैं। आपमें धर्म का साधनभूत चिह्न (जटा) वल्कल धारण आदि भी प्रत्यक्ष दिखायी देता है॥२६॥

कः क्षत्रियकुले जातः श्रुतवान् नष्टसंशयः।

धर्मलिङ्गप्रतिच्छन्नः क्रूरं कर्म समाचरेत्॥२७॥

‘क्षत्रियकुल में उत्पन्न शास्त्र का ज्ञाता, संशयरहित तथा धार्मिक वेश-भूषा से आच्छन्न होकर भी कौन मनुष्य ऐसा क्रूरतापूर्ण कर्म कर सकता है॥ २७॥

त्वं राघवकुले जातो धर्मवानिति विश्रुतः।

अभव्यो भव्यरूपेण किमर्थं परिधावसे ॥२८॥

‘महाराज! रघु के कुल में आपका प्रादुर्भाव हुआ है। आप धर्मात्मा के रूप में प्रसिद्ध हैं तो भी इतने अभव्य (क्रूर) निकले! यदि यही आपका असली रूप है तो फिर किसलिये ऊपर से भव्य (विनीत एवं दयाल) साधु पुरुष का-सा रूप धारण करके चारों ओर दौड़ते-फिरते हैं? ॥ २८॥

साम दानं क्षमा धर्मः सत्यं धृतिपराक्रमौ।

पार्थिवानां गुणा राजन् दण्डश्चाप्यपकारिषु॥ २९॥

‘राजन्! साम, दान, क्षमा, धर्म, सत्य, धृति, पराक्रम और अपराधियों को दण्ड देना—ये भूपालों के गुण हैं॥ २९॥

वयं वनचरा राम मृगा मूलफलाशिनः।

एषा प्रकृतिरस्माकं पुरुषस्त्वं नरेश्वर ॥३०॥

धर्मलिङ्गप्रतिच्छन्नः क्रूरं कर्म समाचरेत्॥२७॥

‘क्षत्रियकुल में उत्पन्न शास्त्र का ज्ञाता, संशयरहित तथा धार्मिक वेश-भूषा से  आच्छन्न होकर भी कौन मनुष्य ऐसा क्रूरतापूर्ण कर्म कर सकता है॥ २७॥

त्वं राघवकुले जातो धर्मवानिति विश्रुतः।

अभव्यो भव्यरूपेण किमर्थं परिधावसे ॥२८॥

‘महाराज! रघु के कुल में आपका प्रादुर्भाव हुआ है। आप धर्मात्मा के रूप में प्रसिद्ध हैं तो भी इतने अभव्य (क्रूर) निकले! यदि यही आपका असली रूप है तो फिर किसलिये ऊपर से भव्य (विनीत एवं दयाल) साधु पुरुष का-सा रूप धारण करके चारों ओर दौड़ते-फिरते हैं? ॥ २८॥

साम दानं क्षमा धर्मः सत्यं धृतिपराक्रमौ।

पार्थिवानां गुणा राजन् दण्डश्चाप्यपकारिषु॥ २९॥

‘राजन्! साम, दान, क्षमा, धर्म, सत्य, धृति, पराक्रम और अपराधियों को दण्ड देना—ये भूपालों के गुण हैं॥ २९॥

वयं वनचरा राम मृगा मूलफलाशिनः।

एषा प्रकृतिरस्माकं पुरुषस्त्वं नरेश्वर ॥३०॥

‘नरेश्वर राम! हम फल-मूल खाने वाले वनचारी मृग हैं। यही हमारी प्रकृति है; किंतु आप तो पुरुष (मनुष्य) हैं (अतः हमारे और आपमें वैर का कोई कारण नहीं है) ॥ ३०॥

भूमिर्हिरण्यं रूपं च विग्रहे कारणानि च।

तत्र कस्ते वने लोभो मदीयेषु फलेषु वा॥३१॥

‘पृथ्वी, सोना और चाँदी–इन्हीं वस्तुओं के लिये राजाओं में परस्पर युद्ध होते हैं। ये ही तीन कलह के मूल कारण हैं। परंतु यहाँ वे भी नहीं हैं। इस दिशा में इस वन में या हमारे फलों में आपका क्या लोभ हो सकता है॥३१॥

नयश्च विनयश्चोभौ निग्रहानुग्रहावपि।

राजवृत्तिरसंकीर्णा न नृपाः कामवृत्तयः॥३२॥

‘नीति और विनय, दण्ड और अनुग्रह-ये राजधर्म । हैं, किंतु इनके उपयोगके भिन्न-भिन्न अवसर हैं । (इनका अविवेकपूर्वक उपयोग करना उचित नहीं है)। राजाओं को स्वेच्छाचारी नहीं होना चाहिये। ३२॥

त्वं तु कामप्रधानश्च कोपनश्चानवस्थितः।

राजवृत्तेषु संकीर्णः शरासनपरायणः॥३३॥

परंतु आप तो काम के गुलाम, क्रोधी और मर्यादा में स्थित न रहने वाले–चञ्चल हैं। नय-विनय आदि जो राजाओं के धर्म हैं, उनके अवसर का विचार किये बिना ही किसी का कहीं भी प्रयोग कर देते हैं। जहाँ कहीं भी बाण चलाते-फिरते हैं॥ ३३॥

न तेऽस्त्यपचितिर्धर्मे नार्थे बुद्धिरवस्थिता।

इन्द्रियैः कामवृत्तः सन् कृष्यसे मनुजेश्वर ॥ ३४॥

‘आपका धर्म के विषय में आदर नहीं है और न अर्थ साधन में ही आपकी बुद्धि स्थिर है। नरेश्वर! आप स्वेच्छाचारी हैं। इसलिये आपकी इन्द्रियाँ आपको कहीं भी खींच ले जाती हैं॥ ३४ ॥

हत्वा बाणेन काकुत्स्थ मामिहानपराधिनम्।

किं वक्ष्यसि सतां मध्ये कर्म कृत्वा जुगुप्सितम्॥ ३५॥

‘काकुत्स्थ! मैं सर्वथा निरपराध था तो भी यहाँ मुझे बाण से मारने का घृणित कर्म करके सत्पुरुषों के बीच में आप क्या कहेंगे॥ ३५॥

राजहा ब्रह्महा गोजश्चोरः प्राणिवधे रतः।

नास्तिकः परिवेत्ता च सर्वे निरयगामिनः॥३६॥

‘राजा का वध करने वाला, ब्रह्महत्यारा, गोघाती, चोर, प्राणियों की हिंसा में तत्पर रहने वाला, नास्तिक और परिवेत्ता (बड़े भाई के अविवाहित रहते अपना विवाह करने वाला छोटा भाई) ये सब-के-सब नरकगामी होते हैं॥ ३६॥

सूचकश्च कदर्यश्च मित्रघ्नो गुरुतल्पगः।

लोकं पापात्मनामेते गच्छन्ते नात्र संशयः॥ ३७॥

‘चुगली खाने वाला, लोभी, मित्र-हत्यारा तथा गुरुपत्नीगामी—ये पापात्माओं के लोक में जाते हैं इसमें संशय नहीं है॥ ३७॥

अधार्यं चर्म मे सद्भी रोमाण्यस्थि च वर्जितम्।

अभक्ष्याणि च मांसानि त्वद्विधैर्धर्मचारिभिः॥ ३८॥

‘हम वानरों का चमड़ा भी तो सत्पुरुषों के धारण करने योग्य नहीं होता। हमारे रोम और हड्डियाँ भी वर्जित हैं (छूने-योग्य नहीं हैं। आप-जैसे धर्माचारी पुरुषों के लिये मांस तो सदा ही अभक्ष्य है; फिर किस लोभ से आपने मुझ वानर को अपने बाणों का शिकार बनाया है ?) ॥ ३८॥

पञ्च पञ्चनखा भक्ष्या ब्रह्मक्षत्रेण राघव।

शल्यकः श्वाविधो गोधा शशः कूर्मश्च पञ्चमः॥३९॥

‘रघुनन्दन! त्रैवर्णिकों में जिनकी किसी कारण से मांसाहार (जैसे निन्दनीय कर्म) में प्रवृत्ति हो गयी है, उनके लिये भी पाँच नखवाले जीवों में से पाँच ही भक्षण के योग्य बताये गये हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं—गेंडा, साही, गोह, खरहा और पाँचवाँ कछुआ॥ ३९॥

चर्म चास्थि च मे राम न स्पृशन्ति मनीषिणः।

अभक्ष्याणि च मांसानि सोऽहं पञ्चनखो हतः॥ ४०॥

‘श्रीराम! मनीषी पुरुष मेरे (वानर के) चमड़े और हड्डी का स्पर्श नहीं करते हैं। वानर के मांस भी सभी के लिये अभक्ष्य होते हैं। इस तरह जिसका सब कुछ निषिद्ध है, ऐसा पाँच नखवाला मैं आज आपके हाथसे मारा गया हूँ॥ ४०॥

तारया वाक्यमुक्तोऽहं सत्यं सर्वज्ञया हितम्।

तदतिक्रम्य मोहेन कालस्य वशमागतः॥४१॥

‘मेरी स्त्री तारा सर्वज्ञ है। उसने मुझे सत्य और हित की बात बतायी थी। किंतु मोहवश उसका उल्लङ्घन करके मैं काल के अधीन हो गया। ४१ ॥

त्वया नाथेन काकुत्स्थ न सनाथा वसुंधरा।

प्रमदा शीलसम्पूर्णा पत्येव च विधर्मणा॥४२॥

‘काकुत्स्थ! जैसे सुशीला युवती पापात्मा पति से सुरक्षित नहीं हो पाती, उसी प्रकार आप-जैसे स्वामी को पाकर यह वसुधा सनाथ नहीं हो सकती॥ ४२॥

शठो नैकृतिकः क्षुद्रो मिथ्याप्रश्रितमानसः।

कथं दशरथेन त्वं जातः पापो महात्मना॥४३॥

‘आप शठ (छिपे रहकर दूसरों का अप्रिय करने वाले), अपकारी, क्षुद्र और झूठे ही शान्तचित्त बने रहने वाले हैं। महात्मा राजा दशरथ ने आप-जैसे पापी को कैसे उत्पन्न किया॥४३॥

छिन्नचारित्र्यकक्ष्येण सतां धर्मातिवर्तिना।

त्यक्तधर्माङ्कशेनाहं निहतो रामहस्तिना॥४४॥

‘हाय! जिसने सदाचार का रस्सा तोड़ डाला है, सत्पुरुषों के धर्म एवं मर्यादा का उल्लङ्घन किया है तथा जिसने धर्मरूपी अङ्कश की भी अवहेलना कर दी है, उस रामरूपी हाथी के द्वारा आज मैं मारा गया। ४४॥

अशुभं चाप्ययुक्तं च सतां चैव विगर्हितम्।

वक्ष्यसे चेदृशं कृत्वा सद्भिः सह समागतः॥४५॥

‘ऐसा अशुभ, अनुचित और सत्पुरुषों द्वारा निन्दित कर्म करके आप श्रेष्ठ पुरुषों से मिलने पर उनके सामने क्या कहेंगे॥४५॥

उदासीनेषु योऽस्मासु विक्रमोऽयं प्रकाशितः।

अपकारिषु ते राम नैवं पश्यामि विक्रमम्॥ ४६॥

‘श्रीराम! हम उदासीन प्राणियों पर आपने जो यह पराक्रम प्रकट किया है, ऐसा बल-पराक्रम आप अपना अपकार करने वालों पर प्रकट कर रहे हों, ऐसा मुझे नहीं दिखायी देता॥ ४६॥

दृश्यमानस्तु युध्येथा मया युधि नृपात्मज।

अद्य वैवस्वतं देवं पश्येस्त्वं निहतो मया॥४७॥

‘राजकुमार! यदि आप युद्धस्थल में मेरी दृष्टि के सामने आकर मेरे साथ युद्ध करते तो आज मेरे द्वारा मारे जाकर सूर्यपुत्र यम देवता का दर्शन करते होते॥ ४७॥

त्वयादृश्येन तु रणे निहतोऽहं दुरासदः।

प्रसुप्तः पन्नगेनैव नरः पापवशं गतः॥४८॥

‘जैसे किसी सोये हुए पुरुष को साँप आकर डंस ले और वह मर जाय उसी प्रकार रणभूमि में मुझ दुर्जय वीर को आपने छिपे रहकर मारा है तथा ऐसा करके आप पाप के भागी हुए हैं। ४८॥

सुग्रीवप्रियकामेन यदहं निहतस्त्वया।

मामेव यदि पूर्वं त्वमेतदर्थमचोदयः।

मैथिलीमहमेकाना तव चानीतवान् भवेः॥ ४९॥

‘जिस उद्देश्य को लेकर सुग्रीव का प्रिय करने की कामना से आपने मेरा वध किया है, उसी उद्देश्य की सिद्धि के लिये यदि आपने पहले मुझसे ही कहा होता तो मैं मिथिलेशकुमारी जानकी को एक ही दिन में ढूँढ़कर आपके पास ला देता॥ ४९॥

राक्षसं च दुरात्मानं तव भार्यापहारिणम्।

कण्ठे बद्ध्वा प्रदद्यां तेऽनिहतं रावणं रणे॥ ५०॥

‘आपकी पत्नी का अपहरण करने वाले दुरात्मा राक्षस रावण को मैं युद्ध में मारे बिना ही उसके गले में रस्सी बाँधकर पकड़ लाता और उसे आपके हवाले कर देता।

न्यस्तां सागरतोये वा पाताले वापि मैथिलीम्।

आनयेयं तवादेशाच्छ्वेतामश्वतरीमिव॥५१॥

‘जैसे मधुकैटभ द्वारा अपहृत हुई श्वेताश्वतरी श्रुति का भगवान् हयग्रीव ने उद्धार किया था, उसी प्रकार मैं आपके आदेश से मिथिलेशकुमारी सीता को यदि वे समुद्र के जल या पाताल में रखी गयी होती तो भी वहाँ से ला देता॥ ५१॥

युक्तं यत्प्राप्नुयाद् राज्यं सुग्रीवः स्वर्गते मयि।

अयुक्तं यदधर्मेण त्वयाहं निहतो रणे॥५२॥

‘मेरे स्वर्गवासी हो जाने पर सुग्रीव जो यह राज्य प्राप्त करेंगे, वह तो उचित ही है। अनुचित इतना ही हुआ है कि आपने मुझे रणभूमि में अधर्मपूर्वक मारा है॥५२॥

काममेवंविधो लोकः कालेन विनियुज्यते।

क्षमं चेद्भवता प्राप्तमुत्तरं साधु चिन्त्यताम्॥५३॥

‘यह जगत् कभी-न-कभी काल के अधीन होता ही है। इसका ऐसा स्वभाव ही है। अतः भले ही मेरी मृत्यु हो जाय, इसके लिये मुझे खेद नहीं है। परंतु मेरे इस तरह मारे जाने का यदि आपने उचित उत्तर ढूँढ़ निकाला हो तो उसे अच्छी तरह सोच-विचारकर कहिये’॥ ५३॥

इत्येवमुक्त्वा परिशुष्कवक्त्रः शराभिघाताद व्यथितो महात्मा।

समीक्ष्य रामं रविसंनिकाशं तूष्णीं बभौ वानरराजसूनुः॥५४॥

ऐसा कहकर महामनस्वी वानरराजकुमार वाली सूर्य के समान तेजस्वी श्रीरामचन्द्रजी की ओर देखकर चुप हो गया। उसका मुँह सूख गया था और बाण के आघात से उसको बड़ी पीड़ा हो रही थी॥ ५४॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे सप्तदशः सर्गः ॥१७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में सत्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥१७॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

श्रीराम का वाली की बात का उत्तर देते हुए उसे दिये गये दण्ड का औचित्य बताना,वाली का अपने अपराध के लिये क्षमा माँगते हुए अङ्गद की रक्षा के लिये प्रार्थना करना

अष्टादशः सर्गः

सर्ग-18


इत्युक्तः प्रश्रितं वाक्यं धर्मार्थसहितं हितम्।

परुषं वालिना रामो निहतेन विचेतसा॥१॥

तं निष्प्रभमिवादित्यं मुक्ततोयमिवाम्बुदम्।

उक्तवाक्यं हरिश्रेष्ठमुपशान्तमिवानलम्॥२॥

धर्मार्थगुणसम्पन्नं हरीश्वरमनुत्तमम्।।

अधिक्षिप्तस्तदा रामः पश्चाद् वालिनमब्रवीत्॥ ३॥

वहाँ मारे जाकर अचेत हुए वाली ने जब इस प्रकार विनयाभास, धर्माभास, अर्थाभास और हिताभास से युक्त कठोर बातें कहीं, आक्षेप किया, तब उन बातों को कहकर मौन हुए वानरश्रेष्ठ वाली से श्रीरामचन्द्रजी ने धर्म, अर्थ और श्रेष्ठ गुणों से युक्त परम उत्तम बात कही। उस समय वाली प्रभाहीन सूर्य, जलहीन बादल और बुझी हुई आग के समान श्रीहीन प्रतीत होता था॥ १-३॥

धर्ममर्थं च कामं च समयं चापि लौकिकम्।

अविज्ञाय कथं बाल्यान्मामिहाद्य विगर्हसे॥४॥

(श्रीराम बोले-) ‘वानर! धर्म, अर्थ, काम और लौकिक सदाचार को तो तुम स्वयं ही नहीं जानते हो। फिर बालोचित अविवेक के कारण आज यहाँ मेरी निन्दा क्यों करते हो? ॥ ४॥

अपृष्ट्वा बुद्धिसम्पन्नान् वृद्धानाचार्यसम्मतान्।

सौम्य वानरचापल्यात् त्वं मां वक्तुमिहेच्छसि॥

‘सौम्य ! तुम आचार्यों द्वारा सम्मानित बुद्धिमान् वृद्ध पुरुषों से पूछे बिना ही उनसे धर्म के स्वरूप को ठीक-ठीक समझे बिना ही वानरोचित चपलतावश मुझे यहाँ उपदेश देना चाहते हो? अथवा मुझ पर आक्षेप करने की इच्छा रखते हो॥५॥

इक्ष्वाकूणामियं भूमिः सशैलवनकानना।

मृगपक्षिमनुष्याणां निग्रहानुग्रहेष्वपि॥६॥

‘पर्वत, वन और काननों से युक्त यह सारी पृथ्वी इक्ष्वाकुवंशी राजाओं की है; अतः वे यहाँ के पशु-पक्षी और मनुष्यों पर दया करने और उन्हें दण्ड देने के भी अधिकारी हैं॥६॥

तां पालयति धर्मात्मा भरतः सत्यवानृजुः ।

धर्मकामार्थतत्त्वज्ञो निग्रहानुग्रहे रतः॥७॥

‘धर्मात्मा राजा भरत इस पृथ्वी का पालन करते हैं। वे सत्यवादी, सरल तथा धर्म, अर्थ और काम के तत्त्व को जानने वाले हैं; अतः दुष्टों के निग्रह तथा साधु पुरुषों के प्रति अनुग्रह करने में तत्पर रहते हैं॥७॥

नयश्च विनयश्चोभौ यस्मिन् सत्यं च सुस्थितम्।

विक्रमश्च यथा दृष्टः स राजा देशकालवित्॥८

‘जिसमें नीति, विनय, सत्य और पराक्रम आदि सभी राजोचित गुण यथावत्-रूपसे स्थित देखे जायँ, वही देश-काल-तत्त्व को जानने वाला राजा होता है (भरत में ये सभी गुण विद्यमान हैं)॥८॥

तस्य धर्मकृतादेशा वयमन्ये च पार्थिवाः।

चरामो वसुधां कृत्स्नां धर्मसंतानमिच्छवः॥९॥

‘भरत की ओर से हमें तथा दूसरे राजाओं को यह आदेश प्राप्त है कि जगत् में धर्म के पालन और प्रसार के लिये यत्न किया जाय। इसलिये हमलोग धर्म का प्रचार करने की इच्छा से सारी पृथ्वी पर विचरते रहते हैं॥९॥

तस्मिन् नृपतिशार्दूले भरते धर्मवत्सले।

पालयत्यखिलां पृथ्वी कश्चरेद् धर्मविप्रियम्॥ १०॥

‘राजाओं में श्रेष्ठ भरत धर्म पर अनुराग रखने वाले हैं। वे समूची पृथ्वी का पालन कर रहे हैं। उनके रहते हुए इस पृथ्वी पर कौन प्राणी धर्म के विरुद्ध आचरण कर सकता है ? ॥ १०॥

ते वयं मार्गविभ्रष्टं स्वधर्मे परमे स्थिताः।

भरताज्ञां पुरस्कृत्य निगृह्णीमो यथाविधि॥११॥

‘हम सब लोग अपने श्रेष्ठ धर्म में दृढ़तापूर्वक स्थित रहकर भरत की आज्ञा को सामने रखते हुए धर्ममार्ग से भ्रष्ट पुरुष को विधिपूर्वक दण्ड देते हैं।॥ ११॥

त्वं तु संक्लिष्टधर्मश्च कर्मणा च विगर्हितः।

कामतन्त्रप्रधानश्च न स्थितो राजवर्त्मनि॥१२॥

‘तुमने अपने जीवन में काम को ही प्रधानता दे रखी थी। राजोचित मार्ग पर तुम कभी स्थिर नहीं रहे। तुमने सदा ही धर्म को बाधा पहुँचायी और बुरे कर्मों के कारण सत्पुरुषों द्वारा सदा तुम्हारी निन्दा की गयी। १२॥

ज्येष्ठो भ्राता पिता वापि यश्च विद्यां प्रयच्छति।

त्रयस्ते पितरो ज्ञेया धर्मे च पथि वर्तिनः॥१३॥

‘बड़ा भाई, पिता तथा जो विद्या देता है, वह गुरु —ये तीनों धर्ममार्ग पर स्थित रहने वाले पुरुषों के लिये पिता के तुल्य माननीय हैं, ऐसा समझना चाहिये। १३॥

यवीयानात्मनः पुत्रः शिष्यश्चापि गुणोदितः।

पुत्रवत्ते त्रयश्चिन्त्या धर्मश्चैवात्र कारणम्॥१४॥

‘इसी प्रकार छोटा भाई, पुत्र और गुणवान् शिष्य —ये तीन पुत्र के तुल्य समझे जाने योग्य हैं। उनके प्रति ऐसा भाव रखने में धर्म ही कारण है।॥ १४ ॥

सूक्ष्मः परमदुर्जेयः सतां धर्मः प्लवङ्गम।

हृदिस्थः सर्वभूतानामात्मा वेद शुभाशुभम्॥ १५॥

‘वानर ! सज्जनों का धर्म सूक्ष्म होता है, वह परम दुर्जेय है-उसे समझना अत्यन्त कठिन है। समस्त प्राणियों के अन्तःकरण में विराजमान जो परमात्मा हैं, वे ही सबके शुभ और अशुभ को जानते हैं ॥ १५॥

चपलश्चपलैः सार्धं वानरैरकृतात्मभिः।

जात्यन्ध इव जात्यन्धैर्मन्त्रयन् प्रेक्षसे नु किम्॥१६॥

‘तुम स्वयं भी चपल हो और चञ्चल चित्तवाले अजितात्मा वानरों के साथ रहते हो; अतः जैसे कोई जन्मान्ध पुरुष जन्मान्धों से ही रास्ता पूछे, उसी प्रकार तुम उन चपल वानरों के साथ परामर्श करते हो, फिर तुम धर्म का विचार क्या कर सकते हो?—उसके स्वरूप को कैसे समझ सकते हो? ॥ १६॥

अहं तु व्यक्ततामस्य वचनस्य ब्रवीमि ते।

नहि मां केवलं रोषात् त्वं विगर्हितुमर्हसि ॥१७॥

‘मैंने यहाँ जो कुछ कहा है, उसका अभिप्राय तुम्हें स्पष्ट करके बताता हूँ। तुम्हें केवल रोषवश मेरी निन्दा नहीं करनी चाहिये॥ १७ ॥

तदेतत् कारणं पश्य यदर्थं त्वं मया हतः।

भ्रातुर्वर्तसि भार्यायां त्यक्त्वा धर्मं सनातनम्॥१८॥

‘मैंने तुम्हें क्यों मारा है? उसका कारण सुनो और समझो। तुम सनातन धर्म का त्याग करके अपने छोटे भाई की स्त्री से सहवास करते हो ॥ १८॥

अस्य त्वं धरमाणस्य सुग्रीवस्य महात्मनः।

रुमायां वर्तसे कामात् स्नुषायां पापकर्मकृत्॥१९॥

‘इस महामना सुग्रीव के जीते-जी इसकी पत्नी रुमा का, जो तुम्हारी पुत्रवधू के समान है, कामवश उपभोग करते हो अतः पापाचारी हो॥ १९॥

तद् व्यतीतस्य ते धर्मात् कामवृत्तस्य वानर।

भ्रातृभार्याभिमशेऽस्मिन् दण्डोऽयं प्रतिपादितः॥२०॥

‘वानर ! इस तरह तुम धर्म से भ्रष्ट हो स्वेच्छाचारी हो गये हो और अपने भाई की स्त्री को गले लगाते हो। तुम्हारे इसी अपराध के कारण तुम्हें यह दण्ड दिया गया है।

नहि लोकविरुद्धस्य लोकवृत्तादपेयुषः।

दण्डादन्यत्र पश्यामि निग्रहं हरियूथप॥२१॥

वानरराज! जो लोकाचार से भ्रष्ट होकर लोकविरुद्ध आचरण करता है, उसे रोकने या राह पर लाने के लिये मैं दण्ड के सिवा और कोई उपाय नहीं देखता॥२१॥

न च ते मर्षये पापं क्षत्रियोऽहं कुलोद्गतः।

औरसीं भगिनीं वापि भार्यां वाप्यनुजस्य यः॥२२॥

प्रचरेत नरः कामात् तस्य दण्डो वधः स्मृतः।

‘मैं उत्तम कुल में उत्पन्न क्षत्रिय हूँ; अतः मैं तुम्हारे पाप को क्षमा नहीं कर सकता। जो पुरुष अपनी कन्या, बहिन अथवा छोटे भाई की स्त्री के पास कामबुद्धि से जाता है, उसका वध करना ही उसके लिये उपयुक्त दण्ड माना गया है॥ २२ १/२॥

भरतस्तु महीपालो वयं त्वादेशवर्तिनः॥२३॥

त्वं च धर्मादतिक्रान्तः कथं शक्यमुपेक्षितुम्।

‘हमारे राजा भरत हैं। हमलोग तो केवल उनके आदेश का पालन करने वाले हैं। तुम धर्म से गिर गये हो; अतः तुम्हारी उपेक्षा कैसे की जा सकती थी॥ २३ १/२॥

गुरुधर्मव्यतिक्रान्तं प्राज्ञो धर्मेण पालयन्॥२४॥

भरतः कामयुक्तानां निग्रहे पर्यवस्थितः ।

‘विद्वान् राजा भरत महान् धर्म से भ्रष्ट हुए पुरुष को दण्ड देते और धर्मात्मा पुरुष का धर्मपूर्वक पालन करते हुए कामासक्त स्वेच्छाचारी पुरुषों के निग्रह में तत्पर रहते हैं।

वयं तु भरतादेशावधिं कृत्वा हरीश्वर।

त्वद्विधान् भिन्नमर्यादान् निग्रहीतुं व्यवस्थिताः॥ २५॥

‘हरीश्वर! हमलोग तो भरत की आज्ञा को ही प्रमाण मानकर धर्ममर्यादा का उल्लङ्घन करने वाले तुम्हारे जैसे लोगों को दण्ड देने के लिये सदा उद्यत रहते हैं। २५॥

सुग्रीवेण च मे सख्यं लक्ष्मणेन यथा तथा।

दारराज्यनिमित्तं च निःश्रेयस्करः स मे॥२६॥

प्रतिज्ञा च मया दत्ता तदा वानरसंनिधौ।

प्रतिज्ञा च कथं शक्या मद्विधेनानवेक्षितुम्॥ २७॥

सुग्रीव के साथ मेरी मित्रता हो चुकी है। उनके प्रति मेरा वही भाव है, जो लक्ष्मण के प्रति है। वे अपनी स्त्री और राज्य की प्राप्ति के लिये मेरी भलाई करने के लिये भी कटिबद्ध हैं। मैंने वानरों के समीप इन्हें स्त्री और राज्य दिलाने के लिये प्रतिज्ञा भी कर ली है। ऐसी दशा में मेरे-जैसा मनुष्य अपनी प्रतिज्ञा की ओर से कैसे दृष्टि हटा सकता है॥ २६-२७॥

तदेभिः कारणैः सर्वैर्महद्भिर्धर्मसंश्रितैः।

शासनं तव यद् युक्तं तद् भवाननुमन्यताम्॥ २८॥

ये सभी धर्मानुकूल महान् कारण एक साथ उपस्थित हो गये, जिनसे विवश होकर तुम्हें उचित दण्ड देना पड़ा है। तुम भी इसका अनुमोदन करो॥ २८॥

सर्वथा धर्म इत्येव द्रष्टव्यस्तव निग्रहः।

वयस्यस्योपकर्तव्यं धर्ममेवानुपश्यता॥२९॥

‘धर्मपर दृष्टि रखने वाले मनुष्य के लिये मित्र का उपकार करना धर्म ही माना गया है; अतः तुम्हें जो यह दण्ड दिया गया है, वह धर्म के अनुकूल है। ऐसा ही तुम्हें समझना चाहिये॥ २९॥

शक्यं त्वयापि तत्कार्यं धर्ममेवानुवर्तता।

श्रूयते मनुना गीतौ श्लोकौ चारित्रवत्सलौ।

गृहीतौ धर्मकुशलैस्तथा तच्चरितं मया॥३०॥

‘यदि राजा होकर तुम धर्म का अनुसरण करते तो तुम्हें भी वही काम करना पड़ता, जो मैंने किया है। मनु ने राजोचित सदाचार का प्रतिपादन करने वाले दो श्लोक कहे हैं, जो स्मृतियों में सुने जाते हैं और जिन्हें धर्मपालन में कुशल पुरुषों ने सादर स्वीकार किया। उन्हीं के अनुसार इस समय यह मेरा बर्ताव हुआ है (वे श्लोक इस प्रकार हैं-)॥ ३० ॥

राजभिधृतदण्डाश्च कृत्वा पापानि मानवाः।

निर्मलाः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा॥ ३१॥

शासनाद् वापि मोक्षाद् वा स्तेनः पापात् प्रमुच्यते।

राजा त्वशासन् पापस्य तदवाप्नोति किल्बिषम॥३२॥

‘मनुष्य पाप करके यदि राजा के दिये हुए दण्ड को भोग लेते हैं तो वे शुद्ध होकर पुण्यात्मा साधुपुरुषों की भाँति स्वर्गलोक में जाते हैं। (चोर आदि पापी जब राजा के सामने उपस्थित हों उस समय उन्हें) राजा दण्ड दे अथवा दया करके छोड़ दे। चोर आदि पापी पुरुष अपने पाप से मुक्त हो जाता है; किंतु यदि राजा पापी को उचित दण्ड नहीं देता तो उसे स्वयं उसके पाप का फल भोगना पड़ता है* ।।

* मनुस्मृति में ये दोनों श्लोक किंचित् पाठान्तर के साथ इस प्रकार मिलते हैं

राजभिः कृतदण्डास्तु कृत्वा पापानि मानवाः।

निर्मलाः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा॥

शासनाद् वा विमोक्षाद् वा स्तेनःस्तेयाद् विमुच्यते।

अशासित्वा तु तं राजा स्तेनस्याप्नोति किल्बिषम्॥(८।३१८,३१६)

आर्येण मम मान्धात्रा व्यसनं घोरमीप्सितम्।

श्रमणेन कृते पापे यथा पापं कृतं त्वया॥३३॥

“तुमने जैसा पाप किया है, वैसा ही पाप प्राचीन काल में एक श्रमण ने किया था। उसे मेरे पूर्वज महाराज मान्धाता ने बड़ा कठोर दण्ड दिया था, जो शास्त्र के अनुसार अभीष्ट था॥ ३३॥

अन्यैरपि कृतं पापं प्रमत्तैर्वसुधाधिपैः।

प्रायश्चित्तं च कुर्वन्ति तेन तच्छाम्यते रजः॥ ३४॥

‘यदि राजा दण्ड देने में प्रमाद कर जायँ तो उन्हें दूसरों के किये हुए पाप भी भोगने पड़ते हैं तथा उसके लिये जब वे प्रायश्चित्त करते हैं तभी उनका दोष शान्त होता है॥ ३४॥

तदलं परितापेन धर्मतः परिकल्पितः।

वधो वानरशार्दूल न वयं स्ववशे स्थिताः॥३५॥

‘अतः वानरश्रेष्ठ! पश्चात्ताप करने से कोई लाभ नहीं है। सर्वथा धर्म के अनुसार ही तुम्हारा वध किया गया है; क्योंकि हमलोग अपने वश में नहीं हैं (शास्त्र के ही अधीन हैं)॥ ३५ ॥

शृणु चाप्यपरं भूयः कारणं हरिपुंगव।

तच्छ्रुत्वा हि महद् वीर न मन्युं कर्तुमर्हसि ॥३६॥

‘वानरशिरोमणे! तुम्हारे वध का जो दूसरा कारण है, उसे भी सुन लो। वीर! उस महान् कारण को सुनकर तुम्हें मेरे प्रति क्रोध नहीं करना चाहिये। ३६॥

न मे तत्र मनस्तापो न मन्युर्हरिपुंगव।

वागुराभिश्च पाशैश्च कूटैश्च विविधैर्नराः॥ ३७॥

प्रतिच्छन्नाश्च दृश्याश्च गृह्णन्ति सुबहून् मृगान्।

प्रधावितान् वा वित्रस्तान् विस्रब्धानतिविष्ठितान्॥ ३८॥

वानरश्रेष्ठ! इस कार्य के लिये मेरे मन में न तो संताप होता है और न खेद ही। मनुष्य (राजा आदि)बड़े-बड़े जाल बिछाकर फंदे फैलाकर और नाना प्रकार के कूट उपाय (गुप्त गड्ढों के निर्माण आदि) करके छिपे रहकर सामने आकर बहुत-से मृगों को पकड़ लेते हैं; भले ही वे भयभीत होकर भागते हों या विश्वस्त होकर अत्यन्त निकट बैठे हों॥ ३८॥

प्रमत्तानप्रमत्तान् वा नरा मांसाशिनो भृशम्।

विध्यन्ति विमुखांश्चापि न च दोषोऽत्र विद्यते॥३९॥

‘मांसाहारी मनुष्य (क्षत्रिय) सावधान, असावधान अथवा विमुख होकर भागने वाले पशुओं को भी अत्यन्त घायल कर देते हैं; किंतु उनके लिये इस मृगया में दोष नहीं होता॥ ३९॥ ।

यान्ति राजर्षयश्चात्र मृगयां धर्मकोविदाः।

तस्मात् त्वं निहतो युद्धे मया बाणेन वानर।

अयुध्यन् प्रतियुध्यन् वा यस्माच्छाखामृगो ह्यसि॥४०॥

‘वानर! धर्मज्ञ राजर्षि भी इस जगत् में मृगया के लिये जाते हैं और विविध जन्तुओं का वध करते हैं। इसलिये मैंने तुम्हें युद्ध में अपने बाण का निशाना बनाया है। तुम मुझसे युद्ध करते थे या नहीं करते थे, तुम्हारी वध्यता में कोई अन्तर नहीं आता; क्योंकि तुम शाखामृग हो (और मृगया करने का क्षत्रिय को अधिकार है) ॥ ४०॥

दुर्लभस्य च धर्मस्य जीवितस्य शुभस्य च।

राजानो वानरश्रेष्ठ प्रदातारो न संशयः॥४१॥

‘वानरश्रेष्ठ! राजा लोग दुर्लभ धर्म, जीवन और लौकिक अभ्युदय के देने वाले होते हैं। इसमें संशय नहीं है॥ ४१॥

तान् न हिंस्यान्न चाक्रोशेन्नाक्षिपेन्नाप्रियं वदेत्।

देवा मानुषरूपेण चरन्त्येते महीतले॥४२॥

‘अतः उनकी हिंसा न करे, उनकी निन्दा न करे, उनके प्रति आक्षेप भी न करे और न उनसे अप्रिय वचन ही बोले; क्योंकि वे वास्तव में देवता हैं, जो मनुष्य रूप से इस पृथ्वी पर विचरते रहते हैं॥ ४२ ॥

त्वं तु धर्ममविज्ञाय केवलं रोषमास्थितः।

विदूषयसि मां धर्मे पितृपैतामहे स्थितम्॥४३॥

‘तुम तो धर्म के स्वरूप को न समझकर केवल रोष के वशीभूत हो गये हो, इसलिये पिता-पितामहों के धर्म पर स्थित रहने वाले मेरी निन्दा कर रहे हो’। ४३॥

एवमुक्तस्तु रामेण वाली प्रव्यथितो भृशम्।

न दोषं राघवे दध्यौ धर्मेऽधिगतनिश्चयः॥४४॥

श्रीराम के ऐसा कहने पर वाली के मन में बड़ी व्यथा हुई। इसे धर्म के तत्त्व का निश्चय हो गया। उसने श्रीरामचन्द्रजी के दोष का चिन्तन त्याग दिया॥४४॥

प्रत्युवाच ततो रामं प्राञ्जलिर्वानरेश्वरः।

यत् त्वमात्थ नरश्रेष्ठ तत् तथैव न संशयः॥ ४५ ॥

इसके बाद वानरराज वाली ने श्रीरामचन्द्रजी से हाथ जोड़कर कहा—’नरश्रेष्ठ! आप जो कुछ कहते हैं, बिलकुल ठीक है; इसमें संशय नहीं है॥ ४५ ॥

प्रतिवक्तुं प्रकृष्ट हि नापकृष्टस्तु शक्नुयात्।

यदयुक्तं मया पूर्वं प्रमादाद् वाक्यमप्रियम्॥४६॥

तत्रापि खलु मे दोषं कर्तुं नार्हसि राघव।

त्वं हि दृष्टार्थतत्त्वज्ञः प्रजानां च हिते रतः।

कार्यकारणसिद्धौ च प्रसन्ना बुद्धिरव्यया॥४७॥

‘आप-जैसे श्रेष्ठ पुरुषको मुझ-जैसा निम्न श्रेणी का प्राणी उचित उत्तर नहीं दे सकता; अतः मैंने प्रमादवश पहले जो अनुचित बात कह डाली है, उसमें भी आपको मेरा अपराध नहीं मानना चाहिये। रघुनन्दन! आप परमार्थतत्त्व के यथार्थ ज्ञाता और प्रजाजनों के हित में तत्पर रहने वाले हैं। आपकी बुद्धि कार्य-कारण के निश्चयमें निर्धान्त एवं निर्मल है।

मामप्यवगतं धर्माद् व्यतिक्रान्तपुरस्कृतम्।

धर्मसंहितया वाचा धर्मज्ञ परिपालय॥४८॥

‘धर्मज्ञ! मैं धर्मभ्रष्ट प्राणियों में अग्रगण्य हूँ और इसी रूप में मेरी सर्वत्र प्रसिद्धि है तो भी आज आपकी शरण में आया हूँ। अपनी धर्मतत्त्व की वाणी से आज मेरी भी रक्षा कीजिये’ ॥४८॥

बाष्पसंरुद्धकण्ठस्तु वाली सार्तरवः शनैः।

उवाच रामं सम्प्रेक्ष्य पङ्कलग्न इव द्विपः॥४९॥

इतना कहते-कहते आँसुओं से वाली का गला भर आया और वह कीचड़ में फँसे हुए हाथी की तरह ‘ आर्तनाद करके श्रीराम की ओर देखता हुआ धीरे-धीरे बोला॥ ४९॥

न चात्मानमहं शोचे न तारां नापि बान्धवान्।

यथा पुत्रं गुणज्येष्ठमङ्गदं कनकाङ्गदम्॥५०॥

‘भगवन्! मुझे अपने लिये, तारा के लिये तथा बन्धु-बान्धवों के लिये भी उतना शोक नहीं होता है, जितना सुवर्ण का अङ्गद धारण करने वाले श्रेष्ठ गुणसम्पन्न पुत्र अङ्गद के लिये हो रहा है।॥५०॥

स ममादर्शनाद् दीनो बाल्यात् प्रभृति लालितः।

तटाक इव पीताम्बुरुपशोषं गमिष्यति॥५१॥

‘मैंने बचपन से ही उसका बड़ा दुलार किया है; अब मुझे न देखकर वह बहुत दुःखी होगा और जिसका जल पी लिया गया हो, उस तालाब की तरह सूख जायगा॥

बालश्चाकृतबुद्धिश्च एकपुत्रश्च मे प्रियः।

तारेयो राम भवता रक्षणीयो महाबलः॥५२॥

‘श्रीराम! वह अभी बालक है। उसकी बुद्धि परिपक्व नहीं हुई है। मेरा इकलौता बेटा होने के कारण ताराकुमार अङ्गद मुझे बड़ा प्रिय है। आप मेरे उस महाबली पुत्र की रक्षा कीजियेगा॥५२॥

सुग्रीवे चाङ्गदे चैव विधत्स्व मतिमुत्तमाम्।

त्वं हि गोप्ता च शास्ता च कार्याकार्यविधौ स्थितः॥५३॥

‘सुग्रीव और अङ्गद दोनों के प्रति आप सद्भाव रखें। अब आप ही इन लोगों के रक्षक तथा इन्हें कर्तव्य-अकर्तव्य की शिक्षा देने वाले हैं।। ५३॥

या ते नरपते वृत्तिर्भरते लक्ष्मणे च या।

सुग्रीवे चाङ्गदे राजस्तां चिन्तयितुमर्हसि॥५४॥

‘राजन्! नरेश्वर! भरत और लक्ष्मण के प्रति आपका जैसा बर्ताव है, वही सुग्रीव तथा अङ्गद के प्रति भी होना चाहिये। आप उसी भाव से इन दोनों का स्मरण करें॥ ५४॥

मद्दोषकृतदोषां तां यथा तारां तपस्विनीम्।

सुग्रीवो नावमन्येत तथावस्थातुमर्हसि ॥५५॥

‘बेचारी तारा की बड़ी शोचनीय अवस्था हो गयी है। मेरे ही अपराध से उसे भी अपराधिनी समझकर सुग्रीव उसका तिरस्कार न करे, इस बात की भी व्यवस्था कीजियेगा॥

त्वया ह्यनुगृहीतेन शक्यं राज्यमुपासितुम्।

त्वदशे वर्तमानेन तव चित्तानुवर्तिना॥५६॥

शक्यं दिवं चार्जयितुं वसुधां चापि शासितुम्।

‘सुग्रीव आपका कृपापात्र होकर ही इस राज्य का यथार्थ रूप से पालन कर सकता है। आपके अधीन होकर आपके चित्त का अनुसरण करने वाला पुरुष स्वर्ग और पृथ्वी का भी राज्य पा सकता और उसका अच्छी तरह पालन कर सकता है ।। ५६ १/२॥

त्वत्तोऽहं वधमाकांक्षन् वार्यमाणोऽपि तारया॥ ५७॥

सुग्रीवेण सह भ्रात्रा द्वन्द्वयुद्धमुपागतः।

‘मैं चाहता था कि आपके हाथ से मेरा वध हो; इसीलिये तारा के मना करने पर भी मैं अपने भाई सुग्रीव के साथ द्वन्द्वयुद्ध करने के लिये चला आया’। ५७ १/२॥

इत्युक्त्वा वानरो रामं विरराम हरीश्वरः॥५८॥

स तमाश्वासयद् रामो वालिनं व्यक्तदर्शनम्।

साधुसम्मतया वाचा धर्मतत्त्वार्थयुक्तया॥ ५९॥

न संतापस्त्वया कार्य एतदर्थं प्लवङ्गम।

न वयं भवता चिन्त्या नाप्यात्मा हरिसत्तम।

वयं भवद्विशेषेण धर्मतः कृतनिश्चयाः॥६०॥

श्रीरामचन्द्रजी से ऐसा कहकर वानरराज वाली चुप हो गया। उस समय उसकी ज्ञानशक्ति का विकास हो गया था। श्रीरामचन्द्रजी ने धर्म के यथार्थ स्वरूप को प्रकट करने वाली साधु पुरुषों द्वारा प्रशंसित वाणी में उससे कहा—’वानरश्रेष्ठ! तुम्हें इसके लिये संताप नहीं करना चाहिये। कपिप्रवर! तुम्हें हमारे और अपने लिये भी चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है; क्योंकि हमलोग तुम्हारी अपेक्षा विशेषज्ञ हैं, इसलिये हमने धर्मानुकूल कार्य करने का ही निश्चय कर रखा

दण्ड्ये यः पातयेद् दण्डं दण्ड्यो यश्चापि दण्ड्य ते।

कार्यकारणसिद्धार्थावुभौ तौ नावसीदतः॥६१॥

‘जो दण्डनीय पुरुष को दण्ड देता है तथा जो दण्ड का अधिकारी होकर दण्ड भोगता है, उनमें से दण्डनीय व्यक्ति अपने अपराध के फलरूप में शासक का दिया हुआ दण्ड भोगकर तथा दण्ड देने वाला शासक उसके उस फलभोग में कारणनिमित्त बनकर कृतार्थ हो जाते हैं—अपना-अपना कर्तव्य पूरा कर लेने के कारण कर्मरूप ऋण से मुक्त हो जाते हैं। अतः वे दुःखी नहीं होते॥६१॥

तद् भवान् दण्डसंयोगादस्माद विगतकल्मषः।

गतः स्वां प्रकृतिं धां दण्डदिष्टेन वर्त्मना॥ ६२॥

‘तुम इस दण्ड को पाकर पापरहित हुए और इस दण्ड का विधान करने वाले शास्त्र द्वारा कथित दण्डग्रहण रूप मार्ग से ही चलकर तुम्हें धर्मानुकूल शुद्ध स्वरूप की प्राप्ति हो गयी। ६२ ।।

त्यज शोकं च मोहं च भयं च हृदये स्थितम्।

त्वया विधानं हर्यग्रय न शक्यमतिवर्तितुम्॥६३॥

‘अब तुम अपने हृदय में स्थित शोक, मोह और भय का त्याग कर दो। वानरश्रेष्ठ! तुम दैव के विधान को नहीं लाँघ सकते॥ ६३॥

यथा त्वय्यङ्गदो नित्यं वर्तते वानरेश्वर।

तथा वर्तेत सुग्रीवे मयि चापि न संशयः॥६४॥

‘वानरेश्वर! कुमार अङ्गद तुम्हारे जीवित रहने पर जैसा था, उसी प्रकार सुग्रीव के और मेरे पास भी सुख से रहेगा, इसमें संशय नहीं है’॥ ६४॥

स तस्य वाक्यं मधुरं महात्मनः समाहितं धर्मपथानुवर्तितम्।

निशम्य रामस्य रणावमर्दिनो वचः सुयुक्तं निजगाद वानरः॥६५॥

युद्ध में शत्रु का मानमर्दन करने वाले महात्मा श्रीरामचन्द्रजी का धर्ममार्ग के अनुकूल और मानसिक शङ्काओं का समाधान करने वाला मधुर वचन सुनकर वानर वाली ने यह सुन्दर युक्तियुक्त वचन कहा-॥ ६५॥

शराभितप्तेन विचेतसा मया प्रभाषितस्त्वं यदजानता विभो।

इदं महेन्द्रोपमभीमविक्रम प्रसादितस्त्वं क्षम मे नरेश्वर॥६६॥

‘प्रभो! देवराज इन्द्र के समान भयंकर पराक्रम प्रकट करने वाले नरेश्वर! मैं आपके बाण से पीड़ित होने के कारण अचेत हो गया था। इसलिये अनजान में मैंने जो आपके प्रति कठोर बात कह डाली है, उसे आप क्षमा कीजियेगा। इसके लिये मैं प्रार्थनापूर्वक आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ’॥६६॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डेऽष्टादशः सर्गः॥१८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में अठारहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥१८॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

अङ्गदसहित तारा का भागे हुए वानरों से बात करके वाली के समीप आना और उसकी दुर्दशा देखकर रोना

एकोनविंशः सर्गः

सर्ग-19


स वानरमहाराजः शयानः शरपीडितः।

प्रत्यक्तो हेतमद्वाक्यैर्नोत्तरं प्रत्यपद्यत॥१॥

वानरों का महाराज वाली बाण से पीड़ित होकर भूमि पर पड़ा था। श्रीरामचन्द्रजी के युक्तियुक्त वचनों द्वारा अपनी बात का उत्तर पाकर उसे फिर कोई जवाब न सूझा॥१॥

अश्मभिः परिभिन्नाङ्गः पादपैराहतो भृशम्।

रामबाणेन चाक्रान्तो जीवितान्ते मुमोह सः॥२॥

पत्थरों की मार पड़ने से उसके अङ्ग टूट-फूट गये थे। वृक्षों के आघात से भी वह बहुत घायल हो गया था और श्रीराम के बाण से आक्रान्त होकर तो वह जीवन के अन्तकाल में ही पहुँच गया था। उस समय वह मूर्च्छित हो गया॥२॥

तं भार्या बाणमोक्षेण रामदत्तेन संयुगे।

हतं प्लवगशार्दूलं तारा शुश्राव वालिनम्॥३॥

उसकी पत्नी तारा ने सुना कि युद्धस्थल में वानरश्रेष्ठ वाली श्रीराम के चलाये हुए बाण से मारे गये॥३॥

सा सपुत्राप्रियं श्रुत्वा वधं भर्तुः सुदारुणम्।

निष्पपात भृशं तस्मादुद्विग्ना गिरिकन्दरात्॥४॥

अपने स्वामी के वध का अत्यन्त भयंकर एवं अप्रिय समाचार सुनकर वह बहुत उद्विग्न हो उठी और अपने पुत्र अङ्गद को साथ ले उस पर्वत की कन्दरा से बाहर निकली॥ ४॥

ये त्वङ्गदपरीवारा वानरा हि महाबलाः।

ते सकार्मुकमालोक्य रामं त्रस्ताः प्रदुद्रुवुः ॥५॥

अङ्गद को चारों ओर से घेरकर उनकी रक्षा करने वाले जो महाबली वानर थे, वे श्रीरामचन्द्रजी को धनुष लिये देख भयभीत होकर भाग चले॥ ५॥

सा ददर्श ततस्त्रस्तान् हरीनापततो द्रुतम्।

यूथादेव परिभ्रष्टान् मृगान् निहतयूथपान्॥६॥

तारा ने वेग से भागकर आते हुए उन भयभीत वानरों को देखा। वे जिनके यूथपति मारे गये हों, उन यूथभ्रष्ट मृगों के समान जान पड़ते थे॥६॥

तानुवाच समासाद्य दुःखितान् दुःखिता सती।

रामवित्रासितान् सर्वाननुबद्धानिवेषुभिः॥७॥

वे सब वानर श्रीराम से इस प्रकार डरे हुए थे, मानो उनके बाण इनके पीछे आ रहे हों। उन दुःखी वानरों के पास पहुँचकर सती-साध्वी तारा और भी दुःखी हो गयी तथा उनसे इस प्रकार बोली- ॥७॥

वानरा राजसिंहस्य यस्य यूयं पुरःसराः।

तं विहाय सुवित्रस्ताः कस्माद् द्रवत दुर्गताः॥ ८॥

‘वानरो! तुम तो उन राजसिंह वाली के आगे-आगे चलने वाले थे। अब उन्हें छोड़कर अत्यन्त भयभीत हो दुर्गति में पड़कर क्यों भागे जा रहे हो? ॥ ८॥

राज्यहेतोः स चेद् भ्राता भ्रात्रा क्रूरेण पातितः।

रामेण प्रहितैर्दूरान्मार्गणैर्दूरपातिभिः॥९॥

‘यदि राज्य के लोभ से उस क्रूर भाई सुग्रीव ने श्रीराम को प्रेरित करके उनके द्वारा दूर से चलाये हुएऔर दूर तक जाने वाले बाणों द्वारा अपने भाई को मरवा दिया है तो तुमलोग क्यों भागे जा रहे हो?’ ॥९॥

कपिपत्न्या वचः श्रुत्वा कपयः कामरूपिणः।

प्राप्तकालमविश्लिष्टमूचुर्वचनमङ्गनाम्॥१०॥

वाली की पत्नीका वह वचन सुनकर इच्छानुसार रूप धारण करने वाले उन वानरों ने कल्याणमयी तारा देवी को सम्बोधित करके सर्वसम्मति से स्पष्ट शब्दों में यह समयोचित बात कही— ॥ १० ॥

जीवपुत्रे निवर्तस्व पुत्रं रक्षस्व चाङ्गदम्।

अन्तको रामरूपेण हत्वा नयति वालिनम्॥११॥

‘देवि! अभी तुम्हारा पुत्र जीवित है। तुम लौट चलो और अपने पुत्र अङ्गद की रक्षा करो। श्रीराम का रूप धारण करके स्वयं यमराज आ पहुँचा है, जो वाली को मारकर अपने साथ ले जा रहा है।। ११॥

क्षिप्तान् वृक्षान् समाविध्य विपुलाश्च तथा शिलाः।

 वाली वज्रसमैर्बाणैर्वज्रेणेव निपातितः॥१२॥

‘वाली के चलाये हुए वृक्षों और बड़ी-बड़ी शिलाओं को अपने वज्रतुल्य बाणों से विदीर्ण करके श्रीराम ने वाली को मार गिराया है। मानो वज्रधारी इन्द्र ने अपने वज्र के द्वारा किसी महान् पर्वत को धराशायी कर दिया हो ॥ १२ ॥

अभिभूतमिदं सर्वं विद्रुतं वानरं बलम्।

अस्मिन् प्लवगशार्दूले हते शक्रसमप्रभे॥ १३॥

‘इन्द्र के समान तेजस्वी इन वानरश्रेष्ठ वाली के मारे जाने पर यह सारी वानर-सेना श्रीराम से पराजित-सी होकर भाग खड़ी हुई है॥ १३॥

रक्ष्यतां नगरी शूरैरङ्गदश्चाभिषिच्यताम्।

पदस्थं वालिनः पुत्रं भजिष्यन्ति प्लवंगमाः॥ १४॥

‘तुम शूरवीरों द्वारा इस नगरी की रक्षा करो। कुमार अङ्गद का किष्किन्धा के राज्यपर अभिषेक कर दो। राजसिंहासन पर बैठे हुए वालिकुमार अङ्गद की सभी वानर सेवा करेंगे॥१४॥

अथवारुचितं स्थानमिह ते रुचिरानने ।

आविशन्ति च दुर्गाणि क्षिप्रमद्यैव वानराः॥ १५॥

अभार्याः सहभार्याश्च सन्त्यत्र वनचारिणः।

लुब्धेभ्यो विप्रलब्धेभ्यस्तेभ्यो नः सुमहद्भयम्॥ १६॥

‘अथवा सुमुखि! अब इस नगर में तुम्हारा रहना हमें अच्छा नहीं जान पड़ता; क्योंकि किष्किन्धा के दुर्गम स्थानों में अभी सुग्रीवपक्षीय वानर शीघ्र प्रवेश करेंगे। यहाँ बहुत-से ऐसे वनचारी वानर हैं, जिनमें से कुछ तो अपनी स्त्रियों के साथ हैं और कुछ स्त्रियों से बिछुड़े हुए हैं। उनमें राज्यविषयक लोभ पैदा हो गया है और पहले हमलोगों के द्वारा राज्य-सुख से वञ्चित किये गये हैं। अतः इस समय उन सबसे हमलोगों को महान् भय प्राप्त हो सकता है ॥ १५-१६ ॥

अल्पान्तरगतानां तु श्रुत्वा वचनमङ्गना।

आत्मनः प्रतिरूपं सा बभाषे चारुहासिनी॥१७॥

अभी थोड़ी ही दूर तक आये हुए उन वानरों की यह बात सुनकर मनोहर हासवाली कल्याणी तारा ने उन्हें अपने अनुरूप उत्तर दिया- ॥१७॥

पुत्रेण मम किं कार्यं राज्येनापि किमात्मना।

कपिसिंहे महाभागे तस्मिन भर्तरि नश्यति॥ १८॥

‘वानरो! जब मेरे महाभाग पतिदेव कपिसिंह वाली ही नष्ट हो रहे हैं, तब मुझे पुत्र से, राज्य से तथा अपने इस जीवन से भी क्या प्रयोजन है ? ॥ १८ ॥

पादमूलं गमिष्यामि तस्यैवाहं महात्मनः।

योऽसौ रामप्रयक्तेन शरेण विनिपातितः॥१९॥

‘मैं तो, जिन्हें श्रीराम के चलाये हुए बाण ने मार गिराया है, उन महात्मा वाली के चरणों के समीप ही जाऊँगी’॥

एवमुक्त्वा प्रदुद्राव रुदती शोकमूर्च्छिता।

शिरश्चोरश्च बाहुभ्यां दुःखेन समभिनती॥ २०॥

ऐसा कहकर शोक से व्याकुल हुई तारा रोती और अपने दोनों हाथों से दुःखपूर्वक सिर एवं छाती पीटती हुई बड़े जोर से दौड़ी॥२०॥

सा व्रजन्ती ददर्शाथ पतिं निपतितं भुवि।

हन्तारं दानवेन्द्राणां समरेष्वनिवर्तिनाम्॥२१॥

आगे बढ़ती हुई तारा ने देखा, जो युद्ध में कभी पीठ न दिखाने वाले दानवराजों का भी वध करने में समर्थ थे, वे मेरे पति वानरराज वाली पृथ्वी पर पड़े हुए हैं। २१॥

क्षेप्तारं पर्वतेन्द्राणां वज्राणामिव वासवम्।

महावातसमाविष्टं महामेघौघनिःस्वनम्॥२२॥

शक्रतुल्यपराक्रान्तं वृष्ट्वेवोपरतं घनम्।

नर्दन्तं नर्दतां भीमं शूरं शूरेण पातितम्।

शार्दूलेनामिषस्यार्थे मृगराजमिवाहतम्॥२३॥

वज्र चलाने वाले इन्द्र के समान जो रणभूमि में बड़े बड़े पर्वतों को उठाकर फेंकते थे, जिनके वेग में प्रचण्ड आँधी का समावेश था, जिनका सिंहनाद महान् मेघों की गम्भीर गर्जना को भी तिरस्कृत कर देता था तथा जो इन्द्र के तुल्य पराक्रमी थे, वे ही इस समय वर्षा करके शान्त हुए बादल के समान चेष्टा से विरत हो गये हैं। जो स्वयं गर्जना करके गर्जने वाले वीरों के मन में भय उत्पन्न कर देते थे, वे शूरवीर वाली एक दूसरे शूरवीर के द्वारा मार गिराये गये हैं। जैसे मांस के लिये एक सिंह ने दूसरे सिंह को मार डाला हो, उसी प्रकार राज्य के लिये अपने भाई के द्वारा ही इनका वध किया गया है॥ २२-२३॥

अर्चितं सर्वलोकस्य सपताकं सवेदिकम्।

नागहेतोः सुपर्णेन चैत्यमुन्मथितं यथा॥२४॥

जो सब लोगों के द्वारा पूजित हो, जहाँ पताका फहरायी गयी हो तथा जिसके पास देवता की वेदी शोभा पाती हो, उस चैत्य वृक्ष या देवालय को वहाँ छिपे हुए किसी नाग को पकड़ने के लिये यदि गरुड़ ने

मथ डाला हो-नष्ट-भ्रष्ट कर दिया हो तो उसकी जैसी दुरवस्था देखी जाती है,वैसी ही दशा आज वाली की हो रही है (यह सब तारा ने देखा) ॥

अवष्टभ्यावतिष्ठन्तं ददर्श धनुरूर्जितम्।

रामं रामानुजं चैव भर्तुश्चैव तथानुजम्॥ २५॥

आगे जाने पर उसने देखा, अपने तेजस्वी धनुष को धरती पर टेककर उसके सहारे श्रीरामचन्द्रजी खड़े हैं। साथ ही उनके छोटे भाई लक्ष्मण हैं और वहीं पति के छोटे भाई सुग्रीव भी मौजूद हैं॥ २५ ॥

तानतीत्य समासाद्य भर्तारं निहतं रणे।

समीक्ष्य व्यथिता भूमौ सम्भ्रान्ता निपपात ह॥ २६॥

उन सबको पार करके वह रणभूमि में घायल पड़े हुए अपने पति के पास पहुँची। उन्हें देखकर उसके मन में बड़ी व्यथा हुई और वह अत्यन्त व्याकुल होकर पृथ्वी पर गिर पड़ी॥ २६॥

सुप्तेव पुनरुत्थाय आर्यपुत्रेति वादिनी।

रुरोद सा पतिं दृष्ट्वा संवीतं मृत्युदामभिः॥२७॥

फिर मानो वह सोकर उठी हो, इस प्रकार ‘हा आर्यपुत्र!’ कहकर मृत्युपाश से बँधे हुए पति की ओर देखती हुई रोने लगी॥ २७॥

तामवेक्ष्य तु सुग्रीवः क्रोशन्तीं कुररीमिव।

विषादमगमत् कष्टं दृष्ट्वा चाङ्गदमागतम्॥२८॥

उस समय कुररी के समान करुण क्रन्दन करती हुई तारा तथा उसके साथ आये हुए अङ्गद को देखकर सुग्रीव को बड़ा कष्ट हुआ वे विषाद में डूब गये॥ २८॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे एकोनविंशः सर्गः ॥१९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के कष्किन्धाकाण्ड में उन्नीसवाँ सर्ग पूराहुआ॥१९॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
किष्किन्धाकाण्डम्

तारा का विलाप

विंशः सर्गः

सर्ग-20


रामचापविसृष्टेन शरेणान्तकरेण तम्।

दृष्ट्वा विनिहतं भूमौ तारा ताराधिपानना॥१॥

सा समासाद्य भर्तारं पर्यष्वजत भामिनी।

इषुणाभिहतं दृष्ट्वा वालिनं कुञ्जरोपमम्॥२॥

वानरं पर्वतेन्द्राभं शोकसंतप्तमानसा।

तारा तरुमिवोन्मूलं पर्यदेवयतातुरा॥३॥

चन्द्रमुखी तारा ने देखा, मेरे स्वामी वानरराज वाली श्रीरामचन्द्रजी के धनुष से छूटे हुए प्राणान्तकारी बाण से घायल होकर धरती पर पड़े हैं, उस अवस्था में उनके पास पहुँचकर वह भामिनी उनके शरीर से लिपट गयी। जो अपने शरीर से गजराज और गिरिराज को भी मात करते थे, उन्हीं वानरराज को बाण से आहत होकर जड़से उखड़े हुए वृक्ष की भाँति धराशायी हुआ देख तारा का हृदय शोक से संतप्त हो उठा और वह आतुर होकर विलाप करने लगी- ॥ १-३॥

रणे दारुणविक्रान्त प्रवीर प्लवतां वर।

किमिदानीं पुरोभागामद्य त्वं नाभिभाषसे॥४॥

‘रण में भयानक पराक्रम प्रकट करने वाले महान् वीर वानरराज! आज इस समय मुझे अपने सामने पाकर भी आप बोलते क्यों नहीं हैं? ॥ ४॥

उत्तिष्ठ हरिशार्दूल भजस्व शयनोत्तमम्।

नैवंविधाः शेरते हि भूमौ नृपतिसत्तमाः॥५॥

कपिश्रेष्ठ! उठिये और उत्तम शय्या का आश्रय लीजिये। आप-जैसे श्रेष्ठ भूपाल पृथ्वी पर नहीं सोते हैं।॥ ५॥

अतीव खलु ते कान्ता वसुधा वसुधाधिप।

गतासुरपि तां गात्रैर्मां विहाय निषेवसे ॥६॥

‘पृथ्वीनाथ! निश्चय ही यह पृथ्वी आपको अत्यन्त प्यारी है, तभी तो निष्प्राण होने पर भी आप आज मुझे छोड़कर अपने अङ्गों से इस वसुधा का ही आलिङ्गन किये सो रहे हैं।

व्यक्तमद्य त्वया वीर धर्मतः सम्प्रवर्तता।

किष्किन्धेव पूरी रम्या स्वर्गमार्गे विनिर्मिता॥७॥

‘वीरवर! आपने धर्मयुक्त युद्ध करके स्वर्ग के मार्ग में भी अवश्य ही किष्किन्धा की भाँति कोई रमणीय पुरी बना ली है, यह बात आज स्पष्ट हो गयी (अन्यथा आप किष्किन्धा को छोड़कर यहाँ क्यों सोते) ॥७॥

यान्यस्माभिस्त्वया सार्धं वनेषु मधुगन्धिषु।

विहृतानि त्वया काले तेषामुपरमः कृतः॥८॥

‘आपके साथ मधुर सुगन्धयुक्त वनों में हमने जो-जो विहार किये हैं, उन सबको इस समय आपने सदा के लिये समाप्त कर दिया॥८॥

निरानन्दा निराशाहं निमग्ना शोकसागरे।

त्वयि पञ्चत्वमापन्ने महायूथपयूथपे॥९॥

‘नाथ! आप बड़े-बड़े यूथपतियों के भी स्वामी थे। आज आपके मारे जाने से मेरा सारा आनन्द लुट गया। मैं सब प्रकार से निराश होकर शोक के समुद्र में डूब गयी हूँ॥

हृदयं सुस्थितं मह्यं दृष्ट्वा निपतितं भुवि।

यन्न शोकाभिसंतप्तं स्फुटतेऽद्य सहस्रधा॥१०॥

‘निश्चय ही मेरा हृदय बड़ा कठोर है, जो आज आपको पृथ्वी पर पड़ा देखकर भी शोक से संतप्त हो फट नहीं जाता—इसके हजारों टुकड़े नहीं हो जाते॥१०॥

सुग्रीवस्य त्वया भार्या हृता स च विवासितः।

यत् तत् तस्य त्वया व्युष्टिः प्राप्तेयं प्लवगाधिप॥ ११॥

‘वानरराज! आपने जो सुग्रीव की स्त्री छीन ली और उन्हें घर से बाहर निकाल दिया, उसी का यह फल आपको प्राप्त हुआ है॥११॥

निःश्रेयसपरा मोहात् त्वया चाहं विगर्हिता।

यैषाब्रुवं हितं वाक्यं वानरेन्द्र हितैषिणी॥१२॥

‘वानरेन्द्र ! मैं आपका हित चाहती थी और आपके कल्याण-साधन में ही लगी रहती थी तो भी मैंने आपसे जो हितकर बात कही थी, उसे मोहवश आपने नहीं माना और उलटे मेरी ही निन्दा की। १२॥

रूपयौवनदृप्तानां दक्षिणानां च मानद।

नूनमप्सरसामार्य चित्तानि प्रमथिष्यसि ॥१३॥

‘दूसरों को मान देने वाले आर्यपुत्र ! निश्चय ही आप स्वर्ग में जाकर रूप और यौवन के अभिमान से मत्त रहने वाली केलिकला में निपुण अप्सराओं के मन को अपने दिव्य सौन्दर्य से मथ डालेंगे॥१३॥

कालो निःसंशयो नूनं जीवितान्तकरस्तव।

बलाद् येनावपन्नोऽसि सुग्रीवस्यावशो वशम्॥ १४॥

‘निश्चय ही आज आपके जीवन का अन्त कर देने वाला संशयरहित काल यहाँ आ पहुँचा था, जिसने किसी के भी वश में न आने वाले आपको बलपूर्वक सुग्रीव के वश में डाल दिया’ ॥ १४॥

अस्थाने वालिनं हत्वा युध्यमानं परेण च।

न संतप्यति काकुत्स्थः कृत्वा कर्मसुगर्हितम्॥ १५॥

(अब श्रीराम को सुनाकर बोली)—’ककुत्स्थकुल में अवतीर्ण हुए श्रीरामचन्द्रजी ने दूसरे के साथ युद्ध करते हुए वाली को मारकर अत्यन्त निन्दित कर्म किया है। इस कुत्सित कर्म को करके भी जो ये संतप्त नहीं हो रहे हैं, यह सर्वथा अनुचित है’॥ १५ ॥

वैधव्यं शोकसंतापं कृपणाकृपणा सती।

अदुःखोपचिता पूर्वं वर्तयिष्याम्यनाथवत्॥१६॥

(फिर वाली से बोली-) मैंने कभी दीनतापूर्ण जीवन नहीं बिताया था, ऐसे महान् दुःख का सामना नहीं किया था; परंतु आज आपके बिना मैं दीन हो गयी, अब मुझे अनाथ की भाँति शोक-संताप से पूर्ण वैधव्य जीवन व्यतीत करना होगा॥ १६॥

लालितश्चाङ्गदो वीरः सुकुमारः सुखोचितः।

वत्स्यते कामवस्थां मे पितृव्ये क्रोधमूर्च्छिते॥ १७॥

‘नाथ! आपने अपने वीरपुत्र अङ्गद को, जो सुख भोगने योग्य और सुकुमार है, बड़ा लाड़-प्यार किया था। अब क्रोध से पागल हुए चाचा के वश में पड़कर मेरे बेटे की क्या दशा होगी?॥ १७॥

कुरुष्व पितरं पुत्र सुदृष्टं धर्मवत्सलम्।

दुर्लभं दर्शनं तस्य तव वत्स भविष्यति॥१८॥

‘बेटा अङ्गद! अपने धर्मप्रेमी पिता को अच्छी तरह देख लो। अब तुम्हारे लिये उनका दर्शन दुर्लभ हो जायगा॥१८॥

समाश्वासय पुत्रं त्वं संदेशं संदिशस्व मे।

मूनि चैनं समाघ्राय प्रवासं प्रस्थितो ह्यसि॥ १९॥

‘प्राणनाथ! आप दूसरे देश को जा रहे हैं। अपने पुत्र का मस्तक सूंघकर इसे धैर्य बँधाइये और मेरे लिये भी कुछ संदेश दीजिये॥ १९ ॥

रामेण हि महत् कर्म कृतं त्वामभिनिघ्नता।

आनृण्यं तु गतं तस्य सुग्रीवस्य प्रतिश्रवे॥२०॥

श्रीराम ने आपको मारकर बहुत बड़ा कर्म किया है। उन्होंने सुग्रीव से जो प्रतिज्ञा की थी, उसके ऋण को उतार दिया।

सकामो भव सुग्रीव रुमां त्वं प्रतिपत्स्यसे।

भुक्ष्व राज्यमनुद्विग्नः शस्तो भ्राता रिपुस्तव॥ २१॥

(अब सुग्रीव को सुनाकर कहने लगी—) सुग्रीव! तुम्हारा मनोरथ सफल हो। तुम्हारे भाई, जिन्हें तुम अपना शत्रु समझते थे, मारे गये। अब बेखट के राज्य भोगो। रुमा को भी प्राप्त कर लोगे’ ॥ २१॥

किं मामेवं प्रलपती प्रियां त्वं नाभिभाषसे।

इमाः पश्य वरा बाह्वयो भार्यास्ते वानरेश्वर ॥ २२॥

(फिर वाली से बोली-) वानरेश्वर! मैं आपकी प्यारी पत्नी हूँ और इस तरह रोती-कलपती हूँ, फिर भी आप मुझसे बोलते क्यों नहीं हैं? देखिये, आपकी ये बहुत-सी सुन्दरी भार्याएँ यहाँ उपस्थित हैं’॥ २२॥

तस्या विलपितं श्रुत्वा वानर्यः सर्वतश्च ताः।

परिगृह्याङ्गदं दीना दुःखार्ताः प्रतिचुक्रुशुः॥२३॥

ताराका विलाप सुनकर अन्य वानर-पत्नियाँ भी सब ओर से अङ्गद को पकड़कर दीन एवं दुःख से व्याकुल हो जोर-जोर से क्रन्दन करने लगीं॥ २३ ॥

किमङ्गदं साङ्गदवीरबाहो विहाय यातोऽसि चिरं प्रवासम्।

न युक्तमेवं गुणसंनिकृष्टं विहाय पुत्रं प्रियचारुवेषम्॥२४॥

(तदनन्तर तारा ने फिर कहा-) ‘बाजूबन्द से विभूषित वीर भुजाओं वाले वानरराज! आप अङ्गद को छोड़कर दीर्घकाल के लिये दूसरे देश में क्यों जा रहे हैं? जो गुणों में आपके सर्वथा निकट है जो आपके समान ही गुणवान् है तथा जिसका प्रिय एवं मनोहर वेश है, ऐसे प्रिय पुत्र को त्यागकर इस प्रकार चला जाना आपके लिये कदापि उचित नहीं है ॥२४॥

यद्यप्रियं किंचिदसम्प्रधार्य कृतं मया स्यात् तव दीर्घबाहो।

क्षमस्व मे तद्धरिवंशनाथ व्रजामि मूर्जा तव वीर पादौ॥२५॥

‘महाबाहो! यदि नासमझी के कारण मैंने आपका कोई अपराध किया हो तो आप उसे क्षमा कर दें। वानरवंश के स्वामी वीर आर्यपुत्र! मैं आपके चरणों में मस्तक रखकर यह प्रार्थना करती हूँ’ ॥ २५ ॥

तथा तु तारा करुणं रुदन्ती भर्तुः समीपे सह वानरीभिः।

व्यवस्यत प्रायमनिन्द्यवर्णा उपोपवेष्टुं भुवि यत्र वाली॥२६॥

इस प्रकार अन्य वानर-पत्नियों के साथ पति के समीप करुण विलाप करती हुई अनिन्द्य सुन्दरी तारा ने जहाँ वाली पृथ्वी पर पड़ा था, वहीं उसके समीप बैठकर आमरण अनशन करने का निश्चय किया॥२६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे विंशः सर्गः॥२०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में बीसवाँ सर्ग पूराहुआ॥२०॥