॥श्री गणेशाय नम:॥
॥श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
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सम्पूर्ण वाल्मीकि रामायण
[काव्य बीजं सनातनम्]

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

( नारदजी का वाल्मीकि मुनि को संक्षेपसे श्रीरामचरित्र सुनाना )

प्रथमः सर्गः

सर्ग-01

 

ॐ तपःस्वाध्यायनिरतं तपस्वी वाग्विदां वरम्।
नारदं परिपप्रच्छ वाल्मीकिर्मुनिपुंगवम्॥१॥

तपस्वी वाल्मीकिजी ने तपस्या और स्वाध्याय में लगे हुए विद्वानों में श्रेष्ठ मुनिवर नारदजी से पूछा-॥ १॥

को न्वस्मिन् साम्प्रतं लोके गुणवान् कश्च वीर्यवान्।
धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च सत्यवाक्यो दृढव्रतः॥२॥

‘[मुने!] इस समय इस संसारमें गुणवान्, वीर्यवान्, धर्मज्ञ, उपकार माननेवाला, सत्यवक्ता और दृढ़प्रतिज्ञ कौन है ?॥२॥

चारित्रेण च को युक्तः सर्वभूतेषु को हितः।
विद्वान् कः कः समर्थश्च कश्चैकप्रियदर्शनः॥

‘सदाचारसे युक्त, समस्त प्राणियोंका हितसाधक, विद्वान्, सामर्थ्यशाली और एकमात्र प्रियदर्शन (सुन्दर) पुरुष कौन है ? ॥३॥

आत्मवान् को जितक्रोधो द्युतिमान् कोऽनसूयकः।
कस्य बिभ्यति देवाश्च जातरोषस्य संयुगे॥४॥

‘मनपर अधिकार रखनेवाला, क्रोधको जीतनेवाला, कान्तिमान् और किसीकी भी निन्दा नहीं करनेवाला कौन है? तथा संग्राममें कुपित होनेपर किससे देवता भी डरते हैं?॥ ४॥

एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं परं कौतूहलं हि मे।
महर्षे त्वं समर्थोऽसि ज्ञातुमेवंविधं नरम्॥५॥

‘महर्षे! मैं यह सुनना चाहता हूँ, इसके लिये मुझे बड़ी उत्सुकता है और आप ऐसे पुरुषको जानने में समर्थ हैं’॥ ५॥

श्रुत्वा चैतत्रिलोकज्ञो वाल्मीकेर्नारदो वचः।
श्रूयतामिति चामन्त्र्य प्रहृष्टो वाक्यमब्रवीत्॥६॥

महर्षि वाल्मीकिके इस वचनको सुनकर तीनोंलोकोंका ज्ञान रखनेवाले नारदजीने उन्हें सम्बोधित करके कहा, अच्छा सुनिये और फिर प्रसन्नतापूर्वक बोले-॥६॥

बहवो दुर्लभाश्चैव ये त्वया कीर्तिता गुणाः।
मुने वक्ष्याम्यहं बुद्ध्वा तैर्युक्तः श्रूयतां नरः॥७॥

‘मुने! आपने जिन बहुत-से दुर्लभ गुणोंका वर्णन किया है, उनसे युक्त पुरुषको मैं विचार करके कहता हूँ, आप सुनें॥७॥

इक्ष्वाकुवंशप्रभवो रामो नाम जनैः श्रुतः।
नियतात्मा महावीर्यो द्युतिमान् धृतिमान् वशी॥८॥

‘इक्ष्वाकुके वंशमें उत्पन्न हुए एक ऐसे पुरुष हैं, जो लोगोंमें राम-नामसे विख्यात हैं, वे ही मनको वशमें रखनेवाले, महाबलवान्, कान्तिमान्, धैर्यवान् और जितेन्द्रिय हैं॥ ८॥

बुद्धिमान् नीतिमान् वाग्मी श्रीमान् शत्रुनिबर्हणः।
विपुलांसो महाबाहुः कम्बुग्रीवो महाहनुः॥९॥

‘वे बुद्धिमान्, नीतिज्ञ, वक्ता, शोभायमान तथा शत्रुसंहारक हैं। उनके कंधे मोटे और भुजाएँ बड़ीबड़ी हैं। ग्रीवा शङ्खके समान और ठोढ़ी मांसल (पुष्ट) है॥

महोरस्को महेष्वासो गूढजत्रुररिन्दमः।
आजानुबाहुः सुशिराः सुललाटः सुविक्रमः॥१०॥

‘उनकी छाती चौड़ी तथा धनुष बड़ा है, गलेके नीचेकी हड्डी (हँसली) मांससे छिपी हुई है। वे शत्रुओंका दमन करनेवाले हैं। भुजाएँ घुटनेतक लम्बी हैं, मस्तक सुन्दर है, ललाट भव्य और चाल मनोहर है॥ १०॥

समः समविभक्तांगः स्निग्धवर्णः प्रतापवान्।
पीनवक्षा विशालाक्षो लक्ष्मीवान् शुभलक्षणः॥११॥

‘उनका शरीर अधिक ऊँचा या नाटा न होकर मध्यम और सुडौल है, देहका रंग चिकना है। वे बड़े प्रतापी हैं। उनका वक्षःस्थल भरा हुआ है, आँखें बड़ी-बड़ी हैं। वे शोभायमान और शुभलक्षणोंसे सम्पन्न हैं ॥ ११॥

धर्मज्ञः सत्यसंधश्च प्रजानां च हिते रतः।
यशस्वी ज्ञानसम्पन्नः शुचिर्वश्यः समाधिमान्॥१२॥

‘धर्मके ज्ञाता, सत्यप्रतिज्ञ तथा प्रजाके हित-साधनमें लगे रहनेवाले हैं। वे यशस्वी, ज्ञानी, पवित्र, जितेन्द्रिय और मनको एकाग्र रखनेवाले हैं॥ १२ ॥

प्रजापतिसमः श्रीमान् धाता रिपुनिषूदनः।
रक्षिता जीवलोकस्य धर्मस्य परिरक्षिता॥१३॥

‘प्रजापतिके समान पालक, श्रीसम्पन्न, वैरिविध्वंसक और जीवों तथा धर्मके रक्षक हैं॥ १३ ॥

रक्षिता स्वस्य धर्मस्य स्वजनस्य च रक्षिता।
वेदवेदांगतत्त्वज्ञो धनुर्वेदे च निष्ठितः॥१४॥

‘स्वधर्म और स्वजनोंके पालक, वेद-वेदांगोंके तत्त्ववेत्ता तथा धनुर्वेदमें प्रवीण हैं॥ १४ ॥

सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञः स्मृतिमान् प्रतिभानवान्।
सर्वलोकप्रियः साधुरदीनात्मा विचक्षणः॥१५॥

‘वे अखिल शास्त्रोंके तत्त्वज्ञ, स्मरणशक्तिसे युक्त और प्रतिभासम्पन्न हैं। अच्छे विचार और उदार हृदयवाले वे श्रीरामचन्द्रजी बातचीत करनेमें चतुर तथा समस्त लोकोंके प्रिय हैं॥ १५ ॥

सर्वदाभिगतः सद्भिः समुद्र इव सिन्धुभिः।
आर्यः सर्वसमश्चैव सदैव प्रियदर्शनः॥१६॥

‘जैसे नदियाँ समुद्रमें मिलती हैं, उसी प्रकार सदा रामसे साधु पुरुष मिलते रहते हैं। वे आर्य एवं सबमें समान भाव रखनेवाले हैं, उनका दर्शन सदा ही प्रिय मालूम होता है॥ १६॥

स च सर्वगुणोपेतः कौसल्यानन्दवर्धनः।
समुद्र इव गाम्भीर्ये धैर्येण हिमवानिव॥१७॥

‘सम्पूर्ण गुणोंसे युक्त वे श्रीरामचन्द्रजी अपनी माता कौसल्याके आनन्द बढ़ानेवाले हैं, गम्भीरतामें समुद्र और धैर्यमें हिमालयके समान हैं॥ १७॥

विष्णुना सदृशो वीर्ये सोमवत्प्रियदर्शनः।
कालाग्निसदृशः क्रोधे क्षमया पृथिवीसमः॥१८॥
धनदेन समस्त्यागे सत्ये धर्म इवापरः।

‘वे विष्णुभगवान् के समान बलवान् हैं। उनका दर्शन चन्द्रमाके समान मनोहर प्रतीत होता है। वे क्रोधमें कालाग्निके समान और क्षमामें पृथिवीके सदृश हैं, त्यागमें कुबेर और सत्यमें द्वितीय धर्मराजके समान हैं॥ १८ १/२ ॥

तमेवंगुणसम्पन्नं रामं सत्यपराक्रमम्॥१९॥
ज्येष्ठं ज्येष्ठगुणैर्युक्तं प्रियं दशरथः सुतम्।
प्रकृतीनां हितैर्युक्तं प्रकृतिप्रियकाम्यया॥२०॥
यौवराज्येन संयोक्तुमैच्छत् प्रीत्या महीपतिः।

‘इस प्रकार उत्तम गुणोंसे युक्त और सत्यपराक्रमवाले सद्गुणशाली अपने प्रियतम ज्येष्ठ पुत्रको, जो प्रजाके हितमें संलग्न रहनेवाले थे, प्रजावर्गका हित करनेकी इच्छासे राजा दशरथने प्रेमवश युवराजपदपर अभिषिक्त करना चाहा॥ १९-२० १/२॥

तस्याभिषेकसम्भारान् दृष्ट्वा भार्याथ कैकयी॥२१॥
पूर्वं दत्तवरा देवी वरमेनमयाचत।
विवासनं च रामस्य भरतस्याभिषेचनम्॥ २२॥

‘तदनन्तर रामके राज्याभिषेककी तैयारियाँ देखकर रानी कैकेयीने, जिसे पहले ही वर दिया जा चुका था, राजासे यह वर माँगा कि रामका निर्वासन (वनवास) और भरतका राज्याभिषेक हो। २१-२२॥

स सत्यवचनाद् राजा धर्मपाशेन संयतः।
विवासयामास सुतं रामं दशरथः प्रियम्॥२३॥

‘राजा दशरथने सत्य वचनके कारण धर्म-बन्धनमें बँधकर प्यारे पुत्र रामको वनवास दे दिया॥ २३॥

स जगाम वनं वीरः प्रतिज्ञामनुपालयन्।
पितुर्वचननिर्देशात् कैकेय्याः प्रियकारणात्॥२४॥

‘कैकेयीका प्रिय करनेके लिये पिताकी आज्ञाके अनुसार उनकी प्रतिज्ञाका पालन करते हुए वीर रामचन्द्र वनको चले ॥ २४ ॥

तं व्रजन्तं प्रियो भ्राता लक्ष्मणोऽनुजगाम ह।
स्नेहाद् विनयसम्पन्नः सुमित्रानन्दवर्धनः॥ २५॥
भ्रातरं दयितो भ्रातुः सौभ्रात्रमनुदर्शयन्।

‘तब सुमित्राके आनन्द बढ़ानेवाले विनयशील लक्ष्मणजीने भी, जो अपने बड़े भाई रामको बहुत ही प्रिय थे, अपने सुबन्धुत्वका परिचय देते हुए स्नेहवश वनको जानेवाले बन्धुवर रामका अनुसरण किया। २५ १/२॥

रामस्य दयिता भार्या नित्यं प्राणसमा हिता॥२६॥
जनकस्य कुले जाता देवमायेव निर्मिता।
सर्वलक्षणसम्पन्ना नारीणामुत्तमा वधूः ॥२७॥
सीताप्यनुगता रामं शशिनं रोहिणी यथा।
पौरैरनुगतो दूरं पित्रा दशरथेन च॥२८॥

‘और जनकके कुलमें उत्पन्न सीता भी, जो अवतीर्ण हुई देवमायाकी भाँति सुन्दरी, समस्त शुभलक्षणोंसे विभूषित, स्त्रियोंमें उत्तम, रामके प्राणोंके समान प्रियतमा पत्नी तथा सदा ही पतिका हित चाहनेवाली थी, रामचन्द्रजीके पीछे चली; जैसे । चन्द्रमाके पीछे रोहिणी चलती है। उस समय पिता दशरथ [ने अपना सारथि भेजकर] और पुरवासी मनुष्योंने [स्वयं साथ जाकर] दूरतक उनका अनुसरण किया॥ २६–२८॥

श्रृंगवेरपुरे सूतं गंगाकुले व्यसर्जयत्।
गुहमासाद्य धर्मात्मा निषादाधिपतिं प्रियम्॥२९॥

‘फिर शृंगवेरपुरमें गंगा-तटपर अपने प्रिय निषादराज गुहके पास पहुँचकर धर्मात्मा श्रीरामचन्द्रजीने सारथिको [अयोध्याके लिये] विदा कर दिया॥२९॥

गुहेन सहितो रामो लक्ष्मणेन च सीतया।
ते वनेन वनं गत्वा नदीस्तीक़ बहूदकाः॥३०॥
चित्रकूटमनुप्राप्य भरद्वाजस्य शासनात्।
रम्यमावसथं कृत्वा रममाणा वने त्रयः॥३१॥
देवगन्धर्वसंकाशास्तत्र ते न्यवसन् सुखम्।

‘निषादराज गुह, लक्ष्मण और सीताके साथ राम। ये चारों एक वनसे दूसरे वनमें गये। मार्गमें बहुत । जलोंवाली अनेकों नदियोंको पार करके [भरद्वाजके आश्रमपर पहुँचे और गुहको वहीं छोड़] भरद्वाज मुनिकी आज्ञासे चित्रकूटपर्वतपर गये। वहाँ वे तीनों देवता और गन्धर्वोके समान वनमें नाना प्रकारकी लीलाएँ करते हुए एक रमणीय पर्णकुटी बनाकर उसमें सानन्द रहने लगे॥ ३०-३१ १/२॥

चित्रकूटं गते रामे पुत्रशोकातुरस्तदा ॥३२॥
राजा दशरथः स्वर्गं जगाम विलपन् सुतम्।

‘रामके चित्रकूट चले जानेपर पुत्रशोकसे पीडित राजा दशरथ उस समय पुत्रके लिये [उसका नाम लेलेकर] विलाप करते हुए स्वर्गगामी हुए॥ ३२ १/२॥

गते तु तस्मिन् भरतो वसिष्ठप्रमुखैर्द्विजैः॥३३॥
नियुज्यमानो राज्याय नैच्छद् राज्यं महाबलः।
स जगाम वनं वीरो रामपादप्रसादकः॥ ३४॥

‘उनके स्वर्गगमनके पश्चात् वसिष्ठ आदि प्रमुख ब्राह्मणोंद्वारा राज्यसंचालनके लिये नियुक्त किये जानेपर भी महाबलशाली वीर भरतने राज्यकी कामना न करके पूज्य रामको प्रसन्न करनेके लिये वनको ही प्रस्थान किया॥३३-३४॥

गत्वा तु स महात्मानं रामं सत्यपराक्रमम्।
अयाचद् भ्रातरं राममार्यभावपुरस्कृतः॥३५॥
त्वमेव राजा धर्मज्ञ इति रामं वचोऽब्रवीत्।

‘वहाँ पहुँचकर सद्भावनायुक्त भरतजीने अपने बड़े भाई सत्यपराक्रमी महात्मा रामसे याचना की और यों कहा-धर्मज्ञ! आप ही राजा हों’ ॥ ३५ १/२॥

रामोऽपि परमोदारः सुमुखः सुमहायशाः॥३६॥
न चैच्छत् पितुरादेशाद् राज्यं रामो महाबलः।
पादुके चास्य राज्याय न्यासं दत्त्वा पुनः पुनः॥३७॥
निवर्तयामास ततो भरतं भरताग्रजः।

‘परंतु महान् यशस्वी परम उदार प्रसन्नमुख महाबली रामने भी पिताके आदेशका पालन करते हुए राज्यकी अभिलाषा न की और उन भरताग्रजने राज्यके लिये न्यास (चिह्न) रूपमें अपनी खड़ाऊँ भरतको देकर उन्हें बार-बार आग्रह करके लौटा दिया॥ ३६-३७ १/२॥

स काममनवाप्यैव रामपादावुपस्पृशन्॥ ३८॥
नन्दिग्रामेऽकरोद् राज्यं रामागमनकांक्षया।

‘अपनी अपूर्ण इच्छाको लेकर ही भरतने रामके चरणोंका स्पर्श किया और रामके आगमनकी प्रतीक्षा करते हुए वे नन्दिग्राममें राज्य करने लगे॥ ३८ १/२॥

गते तु भरते श्रीमान् सत्यसंधो जितेन्द्रियः॥३९॥
रामस्तु पुनरालक्ष्य नागरस्य जनस्य च।
तत्रागमनमेकाग्रो दण्डकान् प्रविवेश ह॥४०॥

‘भरतके लौट जानेपर सत्यप्रतिज्ञ जितेन्द्रिय श्रीमान्। रामने वहाँपर पुनः नागरिक जनोंका आना-जाना देखकर उनसे बचनेके लिये) एकाग्रभावसे दण्डकारण्यमें प्रवेश किया॥ ३९-४० ॥

प्रविश्य तु महारण्यं रामो राजीवलोचनः।
विराधं राक्षसं हत्वा शरभंगं ददर्श ह॥४१॥
सुतीक्ष्णं चाप्यगस्त्यं च अगस्त्यभ्रातरं तथा।

‘उस महान् वनमें पहुँचनेपर कमललोचन रामने विराध नामक राक्षसको मारकर शरभंग, सुतीक्ष्ण, अगस्त्य मुनि तथा अगस्त्यके भ्राताका दर्शन किया। ४१ १/२॥

अगस्त्यवचनाच्चैव जग्राहैन्द्रं शरासनम्॥४२॥
खड्गं च परमप्रीतस्तूणी चाक्षयसायकौ।

‘फिर अगस्त्य मुनिके कहनेसे उन्होंने ऐन्द्र धनुष, एक खड्ग और दो तूणीर, जिनमें बाण कभी नहीं घटते थे, प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण किये॥ ४२ १/२ ॥

वसतस्तस्य रामस्य वने वनचरैः सह ॥४३॥
ऋषयोऽभ्यागमन् सर्वे वधायासुररक्षसाम्।

‘एक दिन वनमें वनचरोंके साथ रहनेवाले श्रीरामके पास असुर तथा राक्षसोंके वधके लिये निवेदन करनेको वहाँके सभी ऋषि आये॥ ४३ १/२॥

स तेषां प्रतिशुश्राव राक्षसानां तदा वने॥४४॥
प्रतिज्ञातश्च रामेण वधः संयति रक्षसाम्।
ऋषीणामग्निकल्पानां दण्डकारण्यवासिनाम्॥४५॥

‘उस समय वनमें श्रीरामने दण्डकारण्यवासी अग्निके समान तेजस्वी उन ऋषियोंको राक्षसोंके मारनेका वचन दिया और संग्राममें उनके वधकी प्रतिज्ञा की॥

तेन तत्रैव वसता जनस्थाननिवासिनी।
विरूपिता शूर्पणखा राक्षसी कामरूपिणी॥४६॥

‘वहाँ ही रहते हुए श्रीरामने इच्छानुसार रूप बनानेवाली जनस्थाननिवासिनी शूर्पणखा नामकी राक्षसीको [लक्ष्मणके द्वारा उसकी नाक कटाकर] कुरूप कर दिया॥ ४६॥

ततः शूर्पणखावाक्यादुधुक्तान् सर्वराक्षसान्।
खरं त्रिशिरसं चैव दूषणं चैव राक्षसम्॥४७॥
निजघान रणे रामस्तेषां चैव पदानुगान्।

‘तब शूर्पणखाके कहनेसे चढ़ाई करनेवाले सभी राक्षसोंको और खर, दूषण, त्रिशिरा तथा उनके पृष्ठपोषक असुरोंको रामने युद्ध में मार डाला॥ ४७ १/२॥

वने तस्मिन् निवसता जनस्थाननिवासिनाम्॥४८॥
रक्षसां निहतान्यासन् सहस्राणि चतुर्दश।

‘उस वनमें निवास करते हुए उन्होंने जनस्थानवासी चौदह हजार राक्षसोंका वध किया। ४८ १/२॥

ततो ज्ञातिवधं श्रुत्वा रावणः क्रोधमूर्च्छितः॥४९॥ 
सहायं वरयामास मारीचं नाम राक्षसम्।

‘तदनन्तर अपने कुटुम्बका वध सुनकर रावण नामका राक्षस क्रोधसे मूर्च्छित हो उठा और उसने मारीच राक्षससे सहायता माँगी॥४९ १/२ ॥

वार्यमाणः सुबहुशो मारीचेन स रावणः॥५०॥
न विरोधो बलवता क्षमो रावण तेन ते।
अनादृत्य तु तद्वाक्यं रावणः कालचोदितः॥५१॥
जगाम सहमारीचस्तस्याश्रमपदं तदा।

‘यद्यपि मारीचने यह कहकर कि ‘रावण! उस बलवान् रामके साथ तुम्हारा विरोध ठीक नहीं है’ रावणको अनेकों बार मना किया; परंतु कालकी प्रेरणासे रावणने मारीचके वाक्योंको टाल दिया और उसके साथ ही रामके आश्रमपर गया॥ ५०-५१ १/२॥

तेन मायाविना दूरमपवाह्य नृपात्मजौ॥५२॥
जहार भार्यां रामस्य गृधं हत्वा जटायुषम्।

‘मायावी मारीचके द्वारा उसने दोनों राजकुमारोंको आश्रमसे दूर हटा दिया और स्वयं रामकी पत्नी सीताका अपहरण कर लिया, [जाते समय मार्गमें विघ्न डालनेके कारण] उसने जटायु नामक गृध्रका वध किया॥ ५२ १/२॥

गृधं च निहतं दृष्ट्वा हृतां श्रुत्वा च मैथिलीम्॥५३॥
राघवः शोकसंतप्तो विललापाकुलेन्द्रियः।

‘तत्पश्चात् जटायुको आहत देखकर और (उसीके मुखसे) सीताका हरण सुनकर रामचन्द्रजी शोकसे पीड़ित होकर विलाप करने लगे, उस समय उनकी सभी इन्द्रियाँ व्याकुल हो उठी थीं॥ ५३ १/२ ।।

ततस्तेनैव शोकेन गृधं दग्ध्वा जटायुषम्॥५४॥
मार्गमाणो वने सीतां राक्षसं संददर्श ह।।
कबन्धं नाम रूपेण विकृतं घोरदर्शनम्॥५५॥
तं निहत्य महाबाहुर्ददाह स्वर्गतश्च सः।

‘फिर उसी शोकमें पड़े हुए उन्होंने जटायु गृध्रका अग्निसंस्कार किया और वनमें सीताको ढूँढ़ते हुए कबन्ध नामक राक्षसको देखा, जो शरीरसे विकृत तथा भयंकर दीखनेवाला था। महाबाहु रामने उसे मारकर उसका भी दाह किया, अतः वह स्वर्गको चला गया।

स चास्य कथयामास शबरी धर्मचारिणीम्॥५६॥
श्रमणां धर्मनिपुणामभिगच्छेति राघव।

‘जाते समय उसने रामसे धर्मचारिणी शबरीका पता बतलाया और कहा—’रघुनन्दन! आप धर्मपरायणा संन्यासिनी शबरीके आश्रमपर जाइये’ ।। ५६ १/२ ।। ।

सोऽभ्यगच्छन्महातेजाः शबरीं शत्रुसूदनः॥५७॥
शबर्या पूजितः सम्यग् रामो दशरथात्मजः।

‘शत्रुहन्ता महान् तेजस्वी दशरथकुमार राम शबरीके यहाँ गये, उसने इनका भलीभाँति पूजन किया॥ ५७ १/२॥

पम्पातीरे हनुमता संगतो वानरेण ह॥५८॥
हनुमद्वचनाच्चैव सुग्रीवेण समागतः।

‘फिर वे पम्पासरके तटपर हनुमान् नामक वानरसे मिले और उन्हींके कहनेसे सुग्रीवसे भी मेल किया॥

सुग्रीवाय च तत्सर्वं शंसद्रामो महाबलः॥ ५९॥
आदितस्तद् यथावृत्तं सीतायाश्च विशेषतः।

‘तदनन्तर महाबलवान् रामने आदिसे ही लेकर जो कुछ हुआ था वह और विशेषतः सीताका वृत्तान्त सुग्रीवसे कह सुनाया॥ ५९ १/२॥

सुग्रीवश्चापि तत्सर्वं श्रुत्वा रामस्य वानरः॥६०॥
चकार सख्यं रामेण प्रीतश्चैवाग्निसाक्षिकम्।

‘वानर सुग्रीवने रामकी सारी बातें सुनकर उनके साथ प्रेमपूर्वक अग्निको साक्षी बनाकर मित्रता की।

ततो वानरराजेन वैरानुकथनं प्रति॥६१॥
रामायावेदितं सर्वं प्रणयाद् दुःखितेन च।

“उसके बाद वानरराज सुग्रीवने स्नेहवश वालीके साथ वैर होनेकी सारी बातें रामसे दुःखी होकर बतलायीं॥

प्रतिज्ञातं च रामेण तदा वालिवधं प्रति॥६२॥
वालिनश्च बलं तत्र कथयामास वानरः।
सुग्रीवः शङ्कितश्चासीन्नित्यं वीर्येण राघवे॥६३॥

‘उस समय रामने वालीको मारनेकी प्रतिज्ञा की, तब वानर सुग्रीवने वहाँ वालीके बलका वर्णन किया; क्योंकि सुग्रीवको रामके बलके विषयमें बराबर शंका बनी रहती थी॥ ६२-६३॥

राघवप्रत्ययार्थं तु दुन्दुभेः कायमुत्तमम्।
दर्शयामास सुग्रीवो महापर्वतसंनिभम्॥६४॥

‘रामकी प्रतीतिके लिये उन्होंने दुन्दुभि दैत्यका महान् पर्वतके समान विशाल शरीर दिखलाया॥ ६४॥

उत्स्मयित्वा महाबाहुः प्रेक्ष्य चास्थि महाबलः।
पादांगुष्ठेन चिक्षेप सम्पूर्णं दशयोजनम्॥६५॥

‘महाबली महाबाहु श्रीरामने तनिक मुसकराकर उस अस्थिसमूहको देखा और पैरके अँगूठेसे उसे दस योजन दूर फेंक दिया॥६५॥

बिभेद च पुनस्तालान् सप्तैकेन महेषुणा।
गिरिं रसातलं चैव जनयन् प्रत्ययं तदा॥६६॥

‘फिर एक ही महान् बाणसे उन्होंने अपना । विश्वास दिलाते हुए सात तालवृक्षोंको और पर्वत तथा रसातलको बींध डाला॥६६॥

ततः प्रीतमनास्तेन विश्वस्तः स महाकपिः।
किष्किन्धां रामसहितो जगाम च गुहां तदा॥६७॥

‘तदनन्तर रामके इस कार्यसे महाकपि सुग्रीव मनही-मन प्रसन्न हुए और उन्हें रामपर विश्वास हो गया। फिर वे उनके साथ किष्किन्धा गुहामें गये॥ ६७॥

ततोऽगर्जद्धरिवरः सुग्रीवो हेमपिंगलः।
तेन नादेन महता निर्जगाम हरीश्वरः॥६८॥
अनुमान्य तदा तारां सुग्रीवेण समागतः।
निजघान च तत्रैनं शरेणैकेन राघवः॥६९॥

‘वहाँपर सुवर्णके समान पिंगलवर्णवाले वीरवर सुग्रीवने गर्जना की, उस महानादको सुनकर वानरराज वाली अपनी पत्नी ताराको आश्वासन देकर तत्काल घरसे बाहर निकला और सुग्रीवसे भिड़ गया। वहाँ रामने वालीको एक ही बाणसे मार गिराया॥ ६८-६९॥

ततः सुग्रीववचनाद्धत्वा वालिनमाहवे।
सुग्रीवमेव तद्राज्ये राघवः प्रत्यपादयत्॥७०॥

‘सुग्रीवके कथनानुसार उस संग्राममें वालीको मारकर उसके राज्यपर रामने सुग्रीवको ही बिठा दिया।

स च सर्वान् समानीय वानरान् वानरर्षभः।
दिशः प्रस्थापयामास दिदृक्षुर्जनकात्मजाम्॥७१॥

‘तब उन वानरराजने भी सभी वानरोंको बुलाकर जानकीका पता लगानेके लिये उन्हें चारों दिशाओंमें भेजा॥

ततो गृध्रस्य वचनात् सम्पातेर्हनुमान् बली।
शतयोजनविस्तीर्णं पुप्लुवे लवणार्णवम्॥७२॥

‘तत्पश्चात् सम्पाति नामक गृध्रके कहनेसे बलवान् हनुमान जी सौ योजन विस्तारवाले क्षार समुद्रको कूदकर लाँघ गये॥७२॥

तत्र लङ्कां समासाद्य पुरीं रावणपालिताम्।
ददर्श सीतां ध्यायन्तीमशोकवनिकां गताम्॥७३॥

‘वहाँ रावणपालित लङ्कापुरीमें पहुँचकर उन्होंने अशोकवाटिकामें सीताको चिन्तामग्न देखा ॥७३॥

निवेदयित्वाभिज्ञानं प्रवृत्तिं विनिवेद्य च।
समाश्वास्य च वैदेहीं मर्दयामास तोरणम्॥७४॥

‘तब उन विदेहनन्दिनीको अपनी पहचान देकर रामका संदेश सुनाया और उन्हें सान्त्वना देकर उन्होंने वाटिकाका द्वार तोड़ डाला॥ ७४ ॥

पञ्च सेनाग्रगान् हत्वा सप्त मन्त्रिसुतानपि।
शूरमक्षं च निष्पिष्य ग्रहणं समुपागमत्॥७५॥

‘फिर पाँच सेनापतियों और सात मन्त्रिकुमारोंकी हत्या कर वीर अक्षकुमारका भी कचूमर निकाला, इसके बाद वे [जान-बूझकर] पकड़े गये। ७५ ॥

अस्त्रेणोन्मुक्तमात्मानं ज्ञात्वा पैतामहाद् वरात्।
मर्षयन् राक्षसान् वीरो यन्त्रिणस्तान् यदृच्छया॥७६॥

‘ब्रह्माजीके वरदानसे अपनेको ब्रह्मपाशसे छूटा हुआ जानकर भी वीर हनुमान जी ने अपनेको बाँधनेवाले उन राक्षसोंका अपराध स्वेच्छानुसार सह लिया॥७६॥

ततो दग्ध्वा पुरीं लङ्कामृते सीतां च मैथिलीम्।
रामाय प्रियमाख्यातुं पुनरायान्महाकपिः॥७७॥

‘तत्पश्चात् मिथिलेशकुमारी सीताके [स्थानके] अतिरिक्त समस्त लङ्काको जलाकर वे महाकपि हनुमान् जी रामको प्रिय संदेश सुनानेके लिये लंकासे लौट आये॥ ७७॥

सोऽभिगम्य महात्मानं कृत्वा रामं प्रदक्षिणम्।
न्यवेदयदमेयात्मा दृष्टा सीतेति तत्त्वतः॥७८॥

‘अपरिमित बुद्धिशाली हनुमान जी ने वहाँ जा महात्मा रामकी प्रदक्षिणा करके यो सत्य निवेदन किया—’मैंने सीताजीका दर्शन किया है’ ।। ७८॥

ततः सुग्रीवसहितो गत्वा तीरं महोदधेः।
समुद्रं क्षोभयामास शरैरादित्यसंनिभैः॥७९॥

‘इसके अनन्तर सुग्रीवके साथ भगवान् रामने महासागरके तटपर जाकर सूर्यके समान तेजस्वी बाणोंसे समुद्रको क्षुब्ध किया॥ ७९॥

दर्शयामास चात्मानं समुद्रः सरितां पतिः।
समुद्रवचनाच्चैव नलं सेतुमकारयत्॥८०॥

‘तब नदीपति समुद्रने अपनेको प्रकट कर दिया, फिर समुद्रके ही कहनेसे रामने नलसे पुल निर्माण कराया॥

तेन गत्वा पुरीं लङ्कां हत्वा रावणमाहवे।
रामः सीतामनुप्राप्य परां व्रीडामुपागमत्॥८१॥

‘उसी पुलसे लङ्कापुरीमें जाकर रावणको मारा, फिर सीताके मिलनेपर रामको बड़ी लज्जा हुई। ८१॥

तामुवाच ततो रामः परुषं जनसंसदि।
अमृष्यमाणा सा सीता विवेश ज्वलनं सती॥८२॥

‘तब भरी सभामें सीताके प्रति वे मर्मभेदी वचन कहने लगे। उनकी इस बातको न सह सकनेके कारण साध्वी सीता अग्निमें प्रवेश कर गयी॥८२॥

ततोऽग्निवचनात् सीतां ज्ञात्वा विगतकल्मषाम्।
कर्मणा तेन महता त्रैलोक्यं सचराचरम्॥८३॥
सदेवर्षिगणं तुष्टं राघवस्य महात्मनः।

‘इसके बाद अग्निके कहनेसे उन्होंने सीताको निष्कलङ्क माना। महात्मा रामचन्द्रजीके इस महान् कर्मसे देवता और ऋषियोंसहित चराचर त्रिभुवन संतुष्ट हो गया। ८३ १/२ ॥

बभौ रामः सम्प्रहृष्टः पूजितः सर्वदैवतैः॥ ८४॥
अभिषिच्य च लङ्कायां राक्षसेन्द्रं विभीषणम्।
कृतकृत्यस्तदा रामो विज्वरः प्रमुमोद ह॥८५॥

‘फिर सभी देवताओंसे पूजित होकर राम बहुत ही प्रसन्न हुए और राक्षसराज विभीषणको लङ्काके राज्यपर अभिषिक्त करके कृतार्थ हो गये। उस समय निश्चिन्त होनेके कारण उनके आनन्दका ठिकाना न रहा॥ ८४-८५ ॥

देवताभ्यो वरं प्राप्य समुत्थाप्य च वानरान्।
अयोध्यां प्रस्थितो रामः पुष्पकेण सुहृवृतः॥८६॥

‘यह सब हो जानेपर राम देवताओंसे वर पाकर । और मरे हुए वानरोंको जीवन दिलाकर अपने सभी साथियोंके साथ पुष्पक विमानपर चढ़कर अयोध्याके लिये प्रस्थित हुए॥८६॥

भरद्वाजाश्रमं गत्वा रामः सत्यपराक्रमः।
भरतस्यान्तिके रामो हनूमन्तं व्यसर्जयत्॥८७॥

‘भरद्वाज मुनिके आश्रमपर पहुँचकर सबको आराम देनेवाले सत्यपराक्रमी रामने भरतके पास हनुमान्को भेजा॥ ८७॥

पुनराख्यायिकां जल्पन् सुग्रीवसहितस्तदा।
पुष्पकं तत् समारुह्य नन्दिग्रामं ययौ तदा॥८८॥

‘फिर सुग्रीवके साथ कथा-वार्ता कहते हुए पुष्पकारूढ़ हो वे नन्दिग्राम को गये॥ ८८ ॥

नन्दिग्रामे जटां हित्वा भ्रातृभिः सहितोऽनघः।
रामः सीतामनुप्राप्य राज्यं पुनरवाप्तवान्॥८९॥

‘निष्पाप रामचन्द्रजीने नन्दिग्राममें अपनी जटा कटाकर भाइयोंके साथ, सीताको पानेके अनन्तर, पुनः अपना राज्य प्राप्त किया है।८९॥

प्रहृष्टमुदितो लोकस्तुष्टः पुष्टः सुधार्मिकः।
निरामयो ह्यरोगश्च दुर्भिक्षभयवर्जितः॥९०॥

‘अब रामके राज्यमें लोग प्रसन्न, सुखी, संतुष्ट, पुष्ट, धार्मिक तथा रोग-व्याधिसे मुक्त रहेंगे, उन्हें । दुर्भिक्षका भय न होगा॥९०॥

न पुत्रमरणं केचिद् द्रक्ष्यन्ति पुरुषाः क्वचित् ।
नार्यश्चाविधवा नित्यं भविष्यन्ति पतिव्रताः॥९१॥

‘कोई कहीं भी अपने पुत्रकी मृत्यु नहीं देखेंगे, स्त्रियाँ विधवा न होंगी, सदा ही पतिव्रता होंगी॥ ९१॥

न चाग्निजं भयं किंचिन्नाप्सु मज्जन्ति जन्तवः।
न वातजं भयं किंचिन्नापि ज्वरकृतं तथा॥९२॥

‘आग लगनेका किंचित् भी भय न होगा, कोई प्राणी जलमें नहीं डूबेंगे, वात और ज्वरका भय थोड़ा भी नहीं रहेगा॥ ९२॥

न चापि क्षुद्भयं तत्र न तस्करभयं तथा।
नगराणि च राष्ट्राणि धनधान्ययुतानि च ॥ ९३॥
नित्यं प्रमुदिताः सर्वे यथा कृतयुगे तथा।

‘क्षुधा तथा चोरीका डर भी जाता रहेगा, सभी नगर और राष्ट्र धन-धान्य सम्पन्न होंगे। सत्ययुगकी भाँति सभी लोग सदा प्रसन्न रहेंगे॥ ९३ १/२॥

अश्वमेधशतैरिष्ट्वा तथा बहुसुवर्णकैः॥ ९४॥

गवां कोट्ययुतं दत्त्वा विद्वद्भयो विधिपूर्वकम्।
असंख्येयं धनं दत्त्वा ब्राह्मणेभ्यो महायशाः॥९५॥

राजवंशान् शतगुणान् स्थापयिष्यति राघवः।
चातुर्वण्र्यं च लोकेऽस्मिन् स्वे स्वे धर्मे नियोक्ष्यति॥९६॥

‘महायशस्वी राम बहुत-से सुवर्णोंकी दक्षिणावाले सौ अश्वमेध यज्ञ करेंगे, उनमें विधिपूर्वक विद्वानोंको दस हजार करोड़ (एक खरब) गौ और ब्राह्मणोंको अपरिमित धन देंगे तथा सौगुने राजवंशोंकी स्थापना करेंगे। संसारमें चारों वर्गोंको वे अपने-अपने धर्ममें नियुक्त रखेंगे।

दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च।
रामो राज्यमुपासित्वा ब्रह्मलोकं प्रयास्यति॥९७॥

‘फिर ग्यारह हजार वर्षांतक राज्य करनेके अनन्तर । श्रीरामचन्द्रजी अपने परमधामको पधारेंगे॥९७॥ –

इदं पवित्रं पापघ्नं पुण्यं वेदैश्च सम्मितम्।
यः पठेद् रामचरितं सर्वपापैः प्रमुच्यते॥९८॥

‘वेदोंके समान पवित्र, पापनाशक और पुण्यमय इस रामचरितको जो पढ़ेगा, वह सब पापोंसे मुक्त हो जायगा।

एतदाख्यानमायुष्यं पठन् रामायणं नरः।
सपुत्रपौत्रः सगणः प्रेत्य स्वर्गे महीयते॥ ९९॥

‘आयु बढ़ानेवाली इस रामायण-कथाको पढ़नेवाला मनुष्य मृत्युके अनन्तर पुत्र, पौत्र तथा अन्य परिजनवर्गके साथ ही स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होगा॥ ९९॥

पठन् द्विजो वागृषभत्वमीयात् स्यात् क्षत्रियो भूमिपतित्वमीयात्।
वणिग्जनः पण्यफलत्वमीयाज्जनश्च शूद्रोऽपि महत्त्वमीयात्॥१००॥

‘इसे ब्राह्मण पढ़े तो विद्वान् हो, क्षत्रिय पढ़ता हो तो पृथ्वीका राज्य प्राप्त करे, वैश्यको व्यापारमें लाभ हो और शूद्र भी प्रतिष्ठा प्राप्त करे’॥ १०० ।।

 

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे प्रथमः सर्गः॥१॥
(इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें पहला सर्ग पूरा हुआ॥१॥)

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(रामायण काव्य का उपक्रम- तमसा के तटपर क्रौञ्चवध से संतप्त हुए महर्षि वाल्मीकि के शोक का श्लोक-रूप में प्रकट होना तथा ब्रह्माजी का उन्हें रामचरित्रमय काव्य के निर्माण का आदेश देना)

द्वितीयः सर्गः

सर्ग-02


 

नारदस्य तु तद् वाक्यं श्रुत्वा वाक्यविशारदः।
पूजयामास धर्मात्मा सहशिष्यो महामुनिम्॥१॥

देवर्षि नारदजीके उपर्युक्त वचन सुनकर वाणीविशारद धर्मात्मा ऋषि वाल्मीकिजीने अपने शिष्योंसहित उन महामुनिका पूजन किया॥१॥

यथावत् पूजितस्तेन देवर्षि रदस्तथा।
आपृच्छयेवाभ्यनुज्ञातः स जगाम विहायसम्॥२॥

वाल्मीकिजीसे यथावत् सम्मानित हो देवर्षि नारदजीने जानेके लिये उनसे आज्ञा माँगी और उनसे अनुमति मिल जानेपर वे आकाशमार्गसे चले गये॥२॥

स मुहूर्तं गते तस्मिन् देवलोकं मुनिस्तदा।
जगाम तमसातीरं जाह्नव्यास्त्वविदूरतः॥३॥

उनके देवलोक पधारनेके दो ही घड़ी बाद वाल्मीकिजी तमसा नदीके तटपर गये, जो गंगाजीसे अधिक दूर नहीं था।३॥

स तु तीरं समासाद्य तमसाया मुनिस्तदा।
शिष्यमाह स्थितं पार्श्वे दृष्ट्वा तीर्थमकर्दमम्॥४॥

तमसाके तटपर पहुँचकर वहाँके घाटको कीचड़से रहित देख मुनिने अपने पास खड़े हुए शिष्यसे कहा- ॥ ४॥

अकर्दममिदं तीर्थं भरद्वाज निशामय।
रमणीयं प्रसन्नाम्बु सन्मनुष्यमनो यथा॥५॥

‘भरद्वाज! देखो, यहाँका घाट बड़ा सुन्दर है। इसमें कीचड़का नाम नहीं है। यहाँका जल वैसा ही स्वच्छ है, जैसा सत्पुरुषका मन होता है॥५॥

न्यस्यतां कलशस्तात दीयतां वल्कलं मम।
इदमेवावगाहिष्ये तमसातीर्थमुत्तमम्॥६॥

‘तात! यहीं कलश रख दो और मुझे मेरा वल्कल दो। मैं तमसाके इसी उत्तम तीर्थमें स्नान करूँगा’॥६॥

एवमुक्तो भरद्वाजो वाल्मीकेन महात्मना।
प्रायच्छत मुनेस्तस्य वल्कलं नियतो गुरोः॥७॥

महात्मा वाल्मीकिके ऐसा कहनेपर नियम-परायण शिष्य भरद्वाजने अपने गुरु मुनिवर वाल्मीकिको वल्कलवस्त्र दिया। ७॥

स शिष्यहस्तादादाय वल्कलं नियतेन्द्रियः।
विचचार ह पश्यंस्तत् सर्वतो विपुलं वनम्॥८॥

शिष्यके हाथसे वल्कल लेकर वे जितेन्द्रिय मुनि वहाँके विशाल वनकी शोभा देखते हुए सब ओर विचरने लगे॥८॥

तस्याभ्याशे तु मिथुनं चरन्तमनपायिनम्।
ददर्श भगवांस्तत्र क्रौञ्चयोश्चारुनिःस्वनम्॥९॥

उनके पास ही क्रौञ्च पक्षियोंका एक जोड़ा, जो कभी एक-दूसरेसे अलग नहीं होता था, विचर रहा था। वे दोनों पक्षी बड़ी मधुर बोली बोलते थे। भगवान् वाल्मीकिने पक्षियोंके उस जोड़ेको वहाँ देखा॥९॥

तस्मात् तु मिथुनादेकं पुमांसं पापनिश्चयः।
जघान वैरनिलयो निषादस्तस्य पश्यतः॥१०॥

उसी समय पापपूर्ण विचार रखनेवाले एक निषादने, जो समस्त जन्तुओंका अकारण वैरी था, वहाँ आकर पक्षियोंके उस जोड़ेमेंसे एक–नर पक्षीको मुनिके देखते-देखते बाणसे मार डाला।१०॥

तं शोणितपरीतांगं चेष्टमानं महीतले।
भार्या तु निहतं दृष्ट्वा रुराव करुणां गिरम्॥११॥

वह पक्षी खूनसे लथपथ होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा और पंख फड़फड़ाता हुआ तड़पने लगा। अपने पतिकी हत्या हुई देख उसकी भार्या क्रौञ्ची करुणाजनक स्वरमें चीत्कार कर उठी॥ ११॥

वियुक्ता पतिना तेन द्विजेन सहचारिणा।
ताम्रशीर्षेण मत्तेन पत्रिणा सहितेन वै॥१२॥

उत्तम पंखोंसे युक्त वह पक्षी सदा अपनी भार्याके साथसाथ विचरता था। उसके मस्तकका रंग ताँबेके समान लाल था और वह कामसे मतवाला हो गया था। ऐसे पतिसे वियुक्त होकर क्रौञ्ची बड़े दुःखसे रो रही थी॥ १२ ॥

तथाविधं द्विजं दृष्ट्वा निषादेन निपातितम्।
ऋषेर्धर्मात्मनस्तस्य कारुण्यं समपद्यत॥१३॥

निषादने जिसे मार गिराया था, उस नर पक्षीकी वह दुर्दशा देख उन धर्मात्मा ऋषिको बड़ी दया आयी॥ १३ ॥

ततः करुणवेदित्वादधर्मोऽयमिति द्विजः।
निशाम्य रुदतीं क्रौञ्चीमिदं वचनमब्रवीत्॥१४॥

स्वभावतः करुणाका अनुभव करनेवाले ब्रह्मर्षिने ‘यह अधर्म हुआ है’ ऐसा निश्चय करके रोती हुई क्रौञ्चीकी ओर देखते हुए निषादसे इस प्रकार कहा- ॥१४॥

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।
यत् क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम्॥१५॥

‘निषाद! तुझे नित्य-निरन्तर—कभी भी शान्ति न मिले; क्योंकि तूने इस क्रौञ्चके जोड़ेमेंसे एककी, जो कामसे मोहित हो रहा था, बिना किसी अपराधके ही हत्या कर डाली’। १५॥

तस्येत्थं ब्रुवतश्चिन्ता बभूव हृदि वीक्षतः।
शोकार्तेनास्य शकुनेः किमिदं व्याहृतं मया॥१६॥

ऐसा कहकर जब उन्होंने इसपर विचार किया, तब उनके मनमें यह चिन्ता हुई कि ‘अहो! इस पक्षीके शोकसे पीड़ित होकर मैंने यह क्या कह डाला’ ॥ १६ ॥

चिन्तयन् स महाप्राज्ञश्चकार मतिमान्मतिम्।
शिष्यं चैवाब्रवीद् वाक्यमिदं स मुनिपुंगवः ॥१७॥

यही सोचते हुए महाज्ञानी और परम बुद्धिमान् मुनिवर वाल्मीकि एक निश्चयपर पहुँच गये और अपने शिष्यसे इस प्रकार बोले- ॥ १७॥

पादबद्धोऽक्षरसमस्तन्त्रीलयसमन्वितः।
शोकार्तस्य प्रवृत्तो मे श्लोको भवतु नान्यथा॥१८॥

‘तात! शोकसे पीड़ित हुए मेरे मुखसे जो वाक्य निकल पड़ा है, यह चार चरणोंमें आबद्ध है। इसके प्रत्येक चरणमें बराबर-बराबर (यानी आठ-आठ) अक्षर हैं तथा इसे वीणाके लयपर गाया भी जा सकता है; अतः मेरा यह वचन श्लोकरूप (अर्थात् श्लोक नामक छन्दमें आबद्ध काव्यरूप या यशःस्वरूप) होना चाहिये, अन्यथा नहीं’।

शिष्यस्तु तस्य ब्रुवतो मुनेर्वाक्यमनुत्तमम्।
प्रतिजग्राह संतुष्टस्तस्य तुष्टोऽभवन्मुनिः॥१९॥

मुनिकी यह उत्तम बात सुनकर उनके शिष्य भरद्वाजको बड़ी प्रसन्नता हुई और उसने उनका समर्थन करते हुए कहा —’हाँ, आपका यह वाक्य श्लोकरूप ही होना चाहिये।’ शिष्यके इस कथनसे मुनिको विशेष संतोष हुआ॥ १९॥

सोऽभिषेकं ततः कृत्वा तीर्थे तस्मिन् यथाविधि।
तमेव चिन्तयन्नर्थमुपावर्तत वै मुनिः॥२०॥

तत्पश्चात् उन्होंने उत्तम तीर्थमें विधिपूर्वक स्नान किया और उसी विषयका विचार करते हुए वे आश्रमकी ओर लौट पड़े॥२०॥

भरद्वाजस्ततः शिष्यो विनीतः श्रुतवान् गुरोः।
कलशं पूर्णमादाय पृष्ठतोऽनुजगाम ह॥२१॥

फिर उनका विनीत एवं शास्त्रज्ञ शिष्य भरद्वाज भी वह जलसे भरा हुआ कलश लेकर गुरुजीके पीछे-पीछे चला॥ २१॥

स प्रविश्याश्रमपदं शिष्येण सह धर्मवित्।
उपविष्टः कथाश्चान्याश्चकार ध्यानमास्थितः ॥ २२॥

शिष्यके साथ आश्रममें पहुँचकर धर्मज्ञ ऋषि वाल्मीकिजी आसनपर बैठे और दूसरी-दूसरी बातें करने लगे; परंतु उनका ध्यान उस श्लोककी ओर ही लगा था॥ २२ ॥

आजगाम ततो ब्रह्मा लोककर्ता स्वयं प्रभुः।
चतुर्मुखो महातेजा द्रष्टुं तं मुनिपुंगवम्॥२३॥

इतनेहीमें अखिल विश्वकी सृष्टि करनेवाले, सर्वसमर्थ, महातेजस्वी चतुर्मुख ब्रह्माजी मुनिवर वाल्मीकिसे मिलनेके लिये स्वयं उनके आश्रमपर आये॥ २३॥

वाल्मीकिरथ तं दृष्ट्वा सहसोत्थाय वाग्यतः।
प्राञ्जलिः प्रयतो भूत्वा तस्थौ परमविस्मितः॥२४॥

उन्हें देखते ही महर्षि वाल्मीकि सहसा उठकर खड़े हो गये। वे मन और इन्द्रियोंको वशमें रखकर अत्यन्त विस्मित हो हाथ जोड़े चुपचाप कुछ कालतक खड़े ही रह गये, कुछ बोल न सके॥२४॥

पूजयामास तं देवं पाद्याासनवन्दनैः।
प्रणम्य विधिवच्चैनं पृष्ट्वा चैव निरामयम्॥२५॥

तत्पश्चात् उन्होंने पाद्य, अर्घ्य, आसन और स्तुति आदिके द्वारा भगवान् ब्रह्माजीका पूजन किया और उनके चरणोंमें विधिवत् प्रणाम करके उनसे कुशल-समाचार पूछा ॥ २५ ॥

अथोपविश्य भगवानासने परमार्चिते।
वाल्मीकये च ऋषये संदिदेशासनं ततः॥२६॥

भगवान् ब्रह्माने एक परम उत्तम आसनपर विराजमान होकर वाल्मीकि मुनिको भी आसन-ग्रहण करनेकी आज्ञा दी।२६॥

ब्रह्मणा समनुज्ञातः सोऽप्युपाविशदासने।
उपविष्टे तदा तस्मिन् साक्षाल्लोकपितामहे ॥२७॥
तद्गतेनैव मनसा वाल्मीकिानमास्थितः।
पापात्मना कृतं कष्टं वैरग्रहणबुद्धिना॥२८॥
यत् तादृशं चारुरवं क्रौञ्चं हन्यादकारणात्।

ब्रह्माजीकी आज्ञा पाकर वे भी आसनपर बैठे। उस समय साक्षात् लोकपितामह ब्रह्मा सामने बैठे हुए थे तो भी वाल्मीकिका मन उस क्रौञ्च पक्षीवाली घटनाकी ओर ही लगा रहा। वे उसीके विषयमें सोचने लगे—’ओह ! जिसकी बुद्धि वैरभावको ग्रहण करनेमें ही लगी रहती है, उस पापात्मा व्याधने बिना किसी अपराधके ही वैसे मनोहर कलरव करनेवाले क्रौञ्च पक्षीके प्राण ले लिये’ ॥ २७-२८ १/२ ॥

शोचन्नेव पुनः क्रौञ्चीमुपश्लोकमिमं जगौ॥२९॥
पुनरन्तर्गतमना भूत्वा शोकपरायणः।

यही सोचते-सोचते उन्होंने क्रौञ्चीके आर्तनादको सुनकर निषादको लक्ष्य करके जो श्लोक कहा था, उसीको फिर ब्रह्माजीके सामने दुहराया। उसे दुहराते ही फिर उनके मनमें अपने दिये हुए शापके अनौचित्यका ध्यान आया। तब वे शोक और चिन्तामें डूब गये॥

तमुवाच ततो ब्रह्मा प्रहसन् मुनिपुंगवम्॥३०॥
श्लोक एवास्त्वयं बद्धो नात्र कार्या विचारणा।
मच्छन्दादेव ते ब्रह्मन् प्रवृत्तेयं सरस्वती॥३१॥

ब्रह्माजी उनकी मनःस्थितिको समझकर हँसने लगे और मुनिवर वाल्मीकिसे इस प्रकार बोले—’ब्रह्मन् ! तुम्हारे मुँहसे निकला हुआ यह छन्दोबद्ध वाक्य श्लोकरूप ही होगा। इस विषयमें तुम्हें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। मेरे संकल्प अथवा प्रेरणासे ही तुम्हारे मुँहसे ऐसी वाणी निकली है॥ ३०-३१॥

रामस्य चरितं कृत्स्नं कुरु त्वमृषिसत्तम।
धर्मात्मनो भगवतो लोके रामस्य धीमतः॥३२॥
वृत्तं कथय धीरस्य यथा ते नारदाच्छ्रुतम्।

‘मुनिश्रेष्ठ! तुम श्रीरामके सम्पूर्ण चरित्रका वर्णन करो। परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीराम संसारमें सबसे बड़े धर्मात्मा
और धीर पुरुष हैं। तुमने नारदजीके मुँहसे जैसा सुना है, उसीके अनुसार उनके चरित्रका चित्रण करो॥ ३२ १/२॥

रहस्यं च प्रकाशं च यद् वृत्तं तस्य धीमतः॥३३॥
रामस्य सहसौमित्रे राक्षसानां च सर्वशः।
वैदेह्याश्चैव यद् वृत्तं प्रकाशं यदि वा रहः॥ ३४॥
तच्चाप्यविदितं सर्वं विदितं ते भविष्यति।

‘बुद्धिमान् श्रीरामका जो गुप्त या प्रकट वृत्तान्त है तथा लक्ष्मण, सीता और राक्षसोंके जो सम्पूर्ण गुप्त या प्रकट चरित्र हैं, वे सब अज्ञात होनेपर भी तुम्हें ज्ञात हो जायेंगे॥ ३३-३४ १/२॥

न ते वागनृता काव्ये काचिदत्र भविष्यति॥ ३५॥
कुरु रामकथां पुण्यां श्लोकबद्धां मनोरमाम्।

‘इस काव्यमें अंकित तुम्हारी कोई भी बात झूठी नहीं होगी; इसलिये तुम श्रीरामचन्द्रजीकी परम पवित्र एवं मनोरम कथाको श्लोकबद्ध करके लिखो॥ ३५ १/२॥

यावत् स्थास्यन्ति गिरयः सरितश्च महीतले ॥३६॥
तावद् रामायणकथा लोकेषु प्रचरिष्यति।

‘इस पृथ्वीपर जबतक नदियों और पर्वतोंकी सत्ता रहेगी, तबतक संसारमें रामायणकथाका प्रचार होता रहेगा॥ ३६ १/२॥ यावद्

रामस्य च कथा त्वत्कृता प्रचरिष्यति ॥ ३७॥
तावदूर्ध्वमधश्च त्वं मल्लोकेषु निवत्स्यसि।

‘जबतक तुम्हारी बनायी हुई श्रीरामकथाका लोकमें प्रचार रहेगा, तबतक तुम इच्छानुसार ऊपर-नीचे तथा मेरे लोकोंमें निवास करोगे’ ॥ ३७ १/२॥

इत्युक्त्वा भगवान् ब्रह्मा तत्रैवान्तरधीयत।
ततः सशिष्यो भगवान् मुनिर्विस्मयमाययौ॥ ३८॥

ऐसा कहकर भगवान् ब्रह्माजी वहीं अन्तर्धान हो गये। उनके वहीं अन्तर्धान होनेसे शिष्योंसहित भगवान् वाल्मीकि मुनिको बड़ा विस्मय हुआ॥ ३८॥

तस्य शिष्यास्ततः सर्वे जगुः श्लोकमिमं पुनः।
मुहुर्मुहुः प्रीयमाणाः प्राहुश्च भृशविस्मिताः॥३९॥

तदनन्तर उनके सभी शिष्य अत्यन्त प्रसन्न होकर बार-बार इस श्लोकका गान करने लगे तथा परम विस्मित हो परस्पर इस प्रकार कहने लगे- ॥३९॥

समाक्षरैश्चतुर्भिर्यः पादैर्गीतो महर्षिणा।
सोऽनुव्याहरणाद् भूयः शोकः श्लोकत्वमागतः ॥ ४०॥

‘हमारे गुरुदेव महर्षि ने क्रौञ्च पक्षीके दुःखसे दुःखी होकर जिस समान अक्षरोंवाले चार चरणोंसे युक्त वाक्यका गान किया था, वह था तो उनके हृदयका शोक; किंतु उनकी वाणीद्वारा उच्चारित होकर श्लोकरूप* हो गया’॥ ४०॥ *काव्य या यशरूप।

तस्य बुद्धिरियं जाता महर्षेर्भावितात्मनः।
कृत्स्नं रामायणं काव्यमीदृशैः करवाण्यहम्॥४१॥

इधर शुद्ध अन्तःकरणवाले महर्षि वाल्मीकिके मनमें यह विचार हुआ कि मैं ऐसे ही श्लोकोंमें सम्पूर्ण रामायणकाव्यकी रचना करूँ॥४१॥

उदारवृत्तार्थपदैर्मनोरमैस्तदास्य रामस्य चकार कीर्तिमान्।
समाक्षरैः श्लोकशतैर्यशस्विनो यशस्करं काव्यमुदारदर्शनः॥४२॥

यह सोचकर उदार दृष्टिवाले उन यशस्वी महर्षिने भगवान् श्रीरामचन्द्रजीके चरित्रको लेकर हजारों श्लोकोंसे युक्त महाकाव्यकी रचना की, जो उनके यशको बढ़ानेवाला है। इसमें श्रीरामके उदार चरित्रोंका प्रतिपादन करनेवाले मनोहर पदोंका प्रयोग किया गया है॥ ४२ ॥

तदुपगतसमाससंधियोगं सममधुरोपनतार्थवाक्यबद्धम्।
रघुवरचरितं मुनिप्रणीतं दशशिरसश्च वधं निशामयध्वम्॥४३॥

महर्षि वाल्मीकि के बनाये हुए इस काव्यमें तत्पुरुष आदि समासों, दीर्घ-गुण आदि संधियों और प्रकृति-प्रत्ययके सम्बन्धका यथायोग्य निर्वाह हुआ है। इसकी रचना में समता (पतत्-प्रकर्ष आदि दोषों का अभाव) है, पदों में माधुर्य है और अर्थ में प्रसाद-गुण की अधिकता है। भावुकजनो! इस प्रकार शास्त्रीय पद्धति के अनुकूल बने हए इस रघुवर-चरित्र और रावण-वध के प्रसंग को ध्यान देकर सुनो॥४३॥

 

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे द्वितीयः सर्गः ॥२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्ड में दूसरा सर्ग पूरा हुआ॥२॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(वाल्मीकि मुनि द्वारा रामायण काव्य में निबद्ध विषयों का संक्षेप से उल्लेख)

तृतीयः सर्गः 

सर्ग-03


 

श्रुत्वा वस्तु समग्रं तद्धर्मार्थसहितं हितम्।
व्यक्तमन्वेषते भूयो यद् वृत्तं तस्य धीमतः॥१॥

नारदजी के मुखसे धर्म, अर्थ एवं कामरूपी फल से युक्त, हितकर (मोक्षदायक) तथा प्रकट और गुप्तसम्पूर्ण रामचरित्रको, जो रामायण महाकाव्यकी प्रधान कथावस्तु था, सुनकर महर्षि वाल्मीकिजी बुद्धिमान् श्रीरामके उस जीवनवृत्त का पुनः भलीभाँति साक्षात्कार करनेके लिये प्रयत्न करने लगे॥१॥

उपस्पृश्योदकं सम्यमुनिः स्थित्वा कृताञ्जलिः।
प्राचीनाग्रेषु दर्भेषु धर्मेणान्वेषते गतिम्॥२॥

वे पूर्वाग्र कुशोंके आसनपर बैठ गये और विधिवत् आचमन करके हाथ जोड़े हुए स्थिर भावसे स्थित हो योगधर्म (समाधि) के द्वारा श्रीराम आदिके चरित्रोंका अनुसंधान करने लगे॥२॥

रामलक्ष्मणसीताभी राज्ञा दशरथेन च।
सभार्येण सराष्ट्रण यत् प्राप्तं तत्र तत्त्वतः॥३॥
हसितं भाषितं चैव गतिर्यावच्च चेष्टितम्।
तत् सर्वं धर्मवीर्येण यथावत् सम्प्रपश्यति॥४॥

श्रीराम-लक्ष्मण-सीता तथा राज्य और रानियों सहित राजा दशरथसे सम्बन्ध रखनेवाली जितनी बातें थीं— हँसना, बोलना, चलना और राज्यपालन आदि जितनी चेष्टाएँ हुईं–उन सबका महर्षि ने अपने योगधर्म के बल से भलीभाँति साक्षात्कार किया॥ ३-४॥

स्त्रीतृतीयेन च तथा यत् प्राप्तं चरता वने।
सत्यसंधेन रामेण तत् सर्वं चान्ववैक्षत॥५॥

सत्यप्रतिज्ञ श्रीरामचन्द्रजी ने लक्ष्मण और सीता के साथ वन में विचरते समय जो-जो लीलाएँ की थीं, वे सब उनकी दृष्टि में आ गयीं॥५॥

ततः पश्यति धर्मात्मा तत् सर्वं योगमास्थितः।
पुरा यत् तत्र निर्वृत्तं पाणावामलकं यथा॥६॥

योगका आश्रय लेकर उन धर्मात्मा महर्षि ने पूर्वकालमें जो-जो घटनाएँ घटित हुई थीं, उन सबको वहाँ हाथपर रखे हुए आँवलेकी तरह प्रत्यक्ष देखा।६॥

तत् सर्वं तत्त्वतो दृष्ट्वा धर्मेण स महामतिः।
अभिरामस्य रामस्य तत् सर्वं कर्तुमुद्यतः॥७॥

सबके मनको प्रिय लगनेवाले भगवान् श्रीरामके सम्पूर्ण चरित्रोंका योगधर्म (समाधि) के द्वारा यथार्थरूपसे निरीक्षण करके महाबुद्धिमान् महर्षि वाल्मीकिने उन सबको महाकाव्यका रूप देनेकी चेष्टा की॥७॥

कामार्थगुणसंयुक्तं धर्मार्थगुणविस्तरम्।
समुद्रमिव रत्नाढ्यं सर्वश्रुतिमनोहरम्॥८॥

यह धर्म, अर्थ, काम, मोक्षरूपी गुणों (फलों) से युक्त तथा इनका विस्तारपूर्वक प्रतिपादन एवं दान करनेवाला है। जैसे समुद्र सब रत्नोंकी निधि है, उसी प्रकार यह महाकाव्य गुण, अलङ्कार एवं ध्वनि आदि रत्नोंका भण्डार है। इतना ही नहीं, यह सम्पूर्ण श्रुतियोंके सारभूत अर्थका प्रतिपादक होनेके कारण सबके कानोंको प्रिय लगनेवाला तथा सभीके चित्तको आकृष्ट करनेवाला है।

स यथा कथितं पूर्वं नारदेन महात्मना।
रघुवंशस्य चरितं चकार भगवान् मुनिः॥९॥

महात्मा नारदजीने पहले जैसा वर्णन किया था, उसी के क्रम से भगवान् वाल्मीकि मुनि ने रघुवंशविभूषण श्रीराम के चरित्रविषयक रामायण काव्य का निर्माण किया।

जन्म रामस्य सुमहद्वीर्यं सर्वानुकूलताम्।
लोकस्य प्रियतां क्षान्तिं सौम्यतां सत्यशीलताम्॥१०॥

श्रीराम के जन्म, उनके महान् पराक्रम, उनकी सर्वानुकूलता, लोकप्रियता, क्षमा, सौम्यभाव तथा सत्यशीलता का इस महाकाव्य में महर्षि ने वर्णन किया।

नाना चित्राः कथाश्चान्या विश्वामित्रसहायने।
जानक्याश्च विवाहं च धनुषश्च विभेदनम्॥११॥

विश्वामित्रजीके साथ श्रीराम-लक्ष्मणके जानेपर जो उनके द्वारा नाना प्रकारकी विचित्र लीलाएँ तथा अद्भुत बातें घटित हुईं, उन सबका इसमें महर्षिने वर्णन किया। श्रीरामद्वारा मिथिलामें धनुषके तोड़े जाने तथा जनकनन्दिनी सीता और उर्मिला आदिके विवाहका भी इसमें चित्रण किया॥११॥

रामरामविवादं च गुणान् दाशरथेस्तथा।
तथाभिषेकं रामस्य कैकेय्या दुष्टभावताम्॥१२॥

श्रीराम-परशुराम-संवाद, दशरथनन्दन श्रीरामके गुण, उनके अभिषेक, कैकेयीकी दुष्टता,

विघातं चाभिषेकस्य रामस्य च विवासनम्।
राज्ञः शोकं विलापं च परलोकस्य चाश्रयम्॥१३॥

श्रीरामके राज्याभिषेकमें विघ्न, उनके वनवास, राजा दशरथके शोक-विलाप और परलोक-गमन,

प्रकृतीनां विषादं च प्रकृतीनां विसर्जनम्।
निषादाधिपसंवाद सूतोपावर्तनं तथा॥१४॥

प्रजाओंके विषाद, साथ जानेवाली प्रजाओंको मार्ग में छोड़ने, निषादराज गुहके साथ बात करने तथा सूत सुमन्त को अयोध्या लौटाने आदि का भी इसमें उल्लेख किया।

गंगायाश्चापि संतारं भरद्वाजस्य दर्शनम्।
भरद्वाजाभ्यनुज्ञानाच्चित्रकूटस्य दर्शनम्॥१५॥

श्रीराम आदि का गंगाके पार जाना, भरद्वाज मुनिका दर्शन करना, भरद्वाज मुनिकी आज्ञा लेकर चित्रकूट
जाना और वहाँकी नैसर्गिक शोभाका अवलोकन करना,

वास्तुकर्म निवेशं च भरतागमनं तथा।
प्रसादनं च रामस्य पितुश्च सलिलक्रियाम्॥१६॥

(चित्रकूट में) कुटिया बनाना, निवास करना, वहाँ भरतका श्रीरामसे मिलने के लिये आना, उन्हें अयोध्या लौट चलने के लिये प्रसन्न करना (मनाना), श्रीरामद्वारा पिता को जलाञ्जलि दान,

पादुकाग्र्याभिषेकं च नन्दिग्रामनिवासनम्।
दण्डकारण्यगमनं विराधस्य वधं तथा॥१७॥

भरत द्वारा अयोध्या के राजसिंहासन पर श्रीरामचन्द्रजी की श्रेष्ठ पादुकाओं का अभिषेक एवं स्थापन, नन्दिग्राममें भरतका निवास, श्रीरामका दण्डकारण्यमें गमन, उनके द्वारा विराधका वध,

दर्शनं शरभंगस्य सुतीक्ष्णेन समागमम्।
अनसूयासमाख्यां च अंगरागस्य चार्पणम्॥१८॥

शरभंगमुनिका दर्शन, सुतीक्ष्णके साथ समागम, अनसूयाके साथ सीतादेवीकी कुछ कालतक स्थिति, उनके द्वारा सीताको अंगरागसमर्पण,

दर्शनं चाप्यगस्त्यस्य धनुषो ग्रहणं तथा।
शूर्पणख्याश्च संवादं विरूपकरणं तथा॥१९॥

श्रीराम आदिके द्वारा अगस्त्यका दर्शन, उनके दिये हुए वैष्णव धनुषका ग्रहण, शूर्पणखाका संवाद, श्रीरामकी आज्ञासे लक्ष्मणद्वारा उसका विरूपकरण (उसकी नाक और कानका छेदन),

वधं खरत्रिशिरसोरुत्थानं रावणस्य च।
मारीचस्य वधं चैव वैदेह्या हरणं तथा॥२०॥

श्रीरामद्वारा खरदूषण और त्रिशिराका वध, शूर्पणखाके उत्तेजित करनेसे रावणका श्रीरामसे बदला लेनेके लिये उठना, श्रीरामद्वारा मारीचका वध, रावणद्वारा विदेहनन्दिनी सीताका हरण,

राघवस्य विलापं च गृध्रराजनिबर्हणम्।।
कबन्धदर्शनं चैव पम्पायाश्चापि दर्शनम्॥२१॥

सीताके लिये श्रीरघुनाथजीका विलाप, रावणद्वारा गृध्रराज जटायुका वध, श्रीराम और लक्ष्मणकी कबन्धसे भेंट, उनके द्वारा पम्पासरोवरका अवलोकन,

शबरीदर्शनं चैव फलमूलाशनं तथा।
प्रलापं चैव पम्पायां हनूमद्दर्शनं तथा॥२२॥

श्रीरामका शबरीसे मिलना और उसके दिये हुए फल-मूलको ग्रहण करना, श्रीरामका सीताके लिये प्रलाप, पम्पासरोवरके निकट हनुमान जी से भेंट,

ऋष्यमूकस्य गमनं सुग्रीवेण समागमम्।
प्रत्ययोत्पादनं सख्यं वालिसुग्रीवविग्रहम्॥२३॥

श्रीराम और लक्ष्मणका हनुमान् जी के साथ ऋष्यमूक पर्वतपर जाना, वहाँ सुग्रीवके साथ भेंट करना, उन्हें अपने बलका विश्वास दिलाना और उनसे मित्रता स्थापित करना, वाली और सुग्रीवका युद्ध,

वालिप्रमथनं चैव सुग्रीवप्रतिपादनम्।
ताराविलापं समयं वर्षरात्रनिवासनम्॥२४॥

श्रीरामद्वारा वालीका विनाश, सुग्रीवको राज्य-समर्पण, अपने पति वाली के लिये तारा का विलाप, शरत्कालमें सीताकी खोज करानेके लिये सुग्रीवकी प्रतिज्ञा, श्रीरामका बरसातके दिनोंमें माल्यवान् पर्वत के प्रस्रवण नामक शिखरपर निवास,

कोपं राघवसिंहस्य बलानामुपसंग्रहम्।
दिशः प्रस्थापनं चैव पृथिव्याश्च निवेदनम्॥२५॥

रघुकुलसिंह श्रीरामका सुग्रीवके प्रति क्रोध-प्रदर्शन, सुग्रीवद्वारा सीताकी खोजके लिये वानरसेनाका संग्रह, सुग्रीवका सम्पूर्ण दिशाओंमें वानरोंको भेजना और उन्हें पृथ्वीके द्वीप-समुद्र आदि विभागोंका परिचय देना,

अङ्गुलीयकदानं च ऋक्षस्य बिलदर्शनम्।
प्रायोपवेशनं चैव सम्पातेश्चापि दर्शनम्॥२६॥

श्रीरामका सीताके विश्वासके लिये हनुमान जी को अपनी अंगूठी देना, वानरोंको ऋक्ष-बिल (स्वयंप्रभा-गुफा) का दर्शन, उनका प्रायोपवेशन (प्राणत्यागके लिये अनशन), सम्पातीसे उनकी भेंट और बातचीत,

पर्वतारोहणं चैव सागरस्यापि लङ्घनम्।
समुद्रवचनाच्चैव मैनाकस्य च दर्शनम्॥ २७॥

समुद्रलङ्घनके लिये हनुमान् जी का महेन्द्र पर्वतपर चढ़ना, समुद्रको लाँघना, समुद्रके कहनेसे ऊपर उठे हुए मैनाकका दर्शन करना,

राक्षसीतर्जनं चैव च्छायाग्राहस्य दर्शनम्।
सिंहिकायाश्च निधनं लङ्कामलयदर्शनम्॥२८॥

इनको राक्षसीका डाँटना, हनुमान्द्वारा छायाग्राहिणी सिंहिका का दर्शन एवं निधन, लङ्काके आधारभूत पर्वत लङ्काके आधारभूत पर्वत (त्रिकूट) का दर्शन,

रात्रौ लङ्काप्रवेशं च एकस्यापि विचिन्तनम्।
आपानभूमिगमनमवरोधस्य दर्शनम्॥२९॥

रात्रिके समय लङ्कामें प्रवेश, अकेला होनेके कारण अपने कर्तव्य का विचार करना, पैदल मार्ग में मिलने वाले निम्नकर्म वाले अवरोधों को देखना (रावण के मद्यपान-स्थान में जाना, उसके अन्तःपुरकी स्त्रियों को देखना) ,

दर्शनं रावणस्यापि पुष्पकस्य च दर्शनम्।
अशोकवनिकायानं सीतायाश्चापि दर्शनम्॥३०॥

हनुमान जी का रावणको देखना, पुष्पकविमानका निरीक्षण करना, अशोकवाटिकामें जाना और सीताजीके दर्शन करना,

अभिज्ञानप्रदानं च सीतायाश्चापि भाषणम्।
राक्षसीतर्जनं चैव त्रिजटास्वप्नदर्शनम्॥३१॥

पहचानके लिये सीताजीको अँगूठी देना और उनसे बातचीत करना, राक्षसियोंद्वारा सीताको डाँट-फटकार, त्रिजटाको श्रीरामके लिये शुभसूचक स्वप्नका दर्शन,

मणिप्रदानं सीताया वृक्षभंगं तथैव च।
राक्षसीविद्रवं चैव किंकराणां निबर्हणम्॥३२॥

सीताका हनुमान जी को चूड़ामणि प्रदान करना, हनुमान् जी का अशोकवाटिकाके वृक्षोंको तोड़ना, राक्षसियोंका भागना, रावणके सेवकोंका हनुमान जी के द्वारा संहार,

ग्रहणं वायुसूनोश्च लङ्कादाहाभिगर्जनम्।
प्रतिप्लवनमेवाथ मधूनां हरणं तथा॥३३॥

वायुनन्दन हनुमान् का बन्दी होकर रावणकी सभामें जाना, उनके द्वारा गर्जन और लङ्काका दाह, फिर लौटती बार समुद्रको लाँघना, वानरोंका मधुवनमें आकर मधुपान करना,

राघवाश्वासनं चैव मणिनिर्यातनं तथा।
संगमं च समुद्रेण नलसेतोश्च बन्धनम्॥३४॥

हनुमान् जी का श्रीरामचन्द्रजीको आश्वासन देना और सीताजीकी दी हुई चूड़ामणि समर्पित करना, सेनासहित सुग्रीवके साथ श्रीरामकी लङ्कायात्राके समय समुद्रसे भेंट, नलका समुद्रपर सेतु बाँधना,

प्रतारं च समुद्रस्य रात्रौ लङ्कावरोधनम्।
विभीषणेन संसर्ग वधोपायनिवेदनम्॥३५॥

उसी सेतुके द्वारा वानरसेनाका समुद्रके पार जाना, रातको वानरोंका लङ्कापर चारों ओरसे घेरा डालना, विभीषणके साथ श्रीरामका मैत्रीसम्बन्ध होना, विभीषणका श्रीरामको रावणके वधका उपाय बताना,

कुम्भकर्णस्य निधनं मेघनादनिबर्हणम्।
रावणस्य विनाशं च सीतावाप्तिमरेः पुरे ॥३६॥

कुम्भकर्णका निधन, मेघनादका वध, रावणका विनाश, सीताकी प्राप्ति, शत्रुनगरी लङ्कामें-

विभीषणाभिषेकं च पुष्पकस्य च दर्शनम्।
अयोध्यायाश्च गमनं भरद्वाजसमागमम्॥३७॥

विभीषणका अभिषेक, श्रीरामद्वारा पुष्पकविमानका अवलोकन, (उसके द्वारा दल-बलसहित उनका) अयोध्या के लिये प्रस्थान, श्रीरामका भरद्वाजमुनिसे मिलना,

प्रेषणं वायुपुत्रस्य भरतेन समागमम्।
रामाभिषेकाभ्युदयं सर्वसैन्यविसर्जनम्।
स्वराष्ट्ररञ्जनं चैव वैदेह्याश्च विसर्जनम्॥ ३८॥

वायुपुत्र हनुमान्को दूत बनाकर भरतके पास भेजना तथा अयोध्यामें आकर भरतसे मिलना, श्रीरामके राज्याभिषेकका उत्सव, फिर श्रीरामका सारी वानरसेनाको विदा करना, अपने राष्ट्रकी प्रजाको प्रसन्न रखना तथा उनकी प्रसन्नताके लिये ही विदेहनन्दिनी सीताको वनमें त्याग देना

अनागतं च यत् किंचिद् रामस्य वसुधातले।
तच्चकारोत्तरे काव्ये वाल्मीकिर्भगवानृषिः॥ ३९॥

इत्यादि वृत्तान्तोंको एवं इस पृथ्वीपर श्रीरामका जो कुछ भविष्य चरित्र था, उसको भी भगवान् वाल्मीकि मुनिने अपने उत्कृष्ट महाकाव्यमें अंकित किया॥ ३९॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे तृतीयः सर्गः॥३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में तीसरा सर्ग पूरा हुआ॥३॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(महर्षि वाल्मीकि का चौबीस हजार श्लोकों से युक्त रामायणकाव्य का निर्माण कर लव-कुशको पढ़ाना, लव और कुश का अयोध्या में श्रीराम द्वारा सम्मानित हो रामदरबार में रामायण गान सुनाना)

चतुर्थः सर्गः

सर्ग-04

प्राप्तराजस्य रामस्य वाल्मीकिर्भगवानृषिः।

चकार चरितं कृत्स्नं विचित्रपदमर्थवत्॥१॥

श्रीरामचन्द्रजीने जब वनसे लौटकर राज्यका शासन अपने हाथमें ले लिया, उसके बाद भगवान् वाल्मीकि मुनिने उनके सम्पूर्ण चरित्रके आधारपर विचित्र पद और अर्थसे युक्त रामायणकाव्यका निर्माण किया॥ १॥

चतुर्विंशत्सहस्राणि श्लोकानामुक्तवानृषिः।

तथा सर्गशतान् पञ्च षटकाण्डानि तथोत्तरम्॥२॥

इसमें महर्षिने चौबीस हजार श्लोक, पाँच सौ सर्ग तथा उत्तरसहित सात काण्डोंका प्रतिपादन किया है।॥ २॥

कृत्वा तु तन्महाप्राज्ञः सभविष्यं सहोत्तरम्।

चिन्तयामास को न्वेतत् प्रयुञ्जीयादिति प्रभुः॥३॥

भविष्य तथा उत्तरकाण्डसहित समस्त रामायण पूर्ण कर लेनेके पश्चात् सामर्थ्यशाली, महाज्ञानी महर्षिने सोचा कि कौन ऐसा शक्तिशाली पुरुष होगा, जो इस महाकाव्यको पढ़कर जनसमुदायमें सुना सके॥३॥

तस्य चिन्तयमानस्य महर्षे वितात्मनः।

अगृह्णीतां ततः पादौ मुनिवेषौ कुशीलवौ॥४॥

शुद्ध अन्तःकरण वाले उन महर्षि के इस प्रकार विचार करते ही मुनिवेष में रहने वाले राजकुमार कुश और लव ने आकर उनके चरणों में प्रणाम किया।

कुशीलवौ तु धर्मज्ञौ राजपुत्रौ यशस्विनौ।

भ्रातरौ स्वरसम्पन्नौ ददर्शाश्रमवासिनौ॥५॥

राजकुमार कुश और लव दोनों भाई धर्मके ज्ञाता और यशस्वी थे। उनका स्वर बड़ा ही मधुर था और वे मुनिके आश्रमपर ही रहते थे।

स तु मेधाविनौ दृष्ट्वा वेदेषु परिनिष्ठितौ।

वेदोपबृंहणार्थाय तावग्राहयत प्रभुः॥६॥

उनकी धारणाशक्ति अद्भुत थी और वे दोनों ही वेदोंमें पारंगत हो चुके थे। भगवान् वाल्मीकिने उनकी ओर देखा और उन्हें सुयोग्य समझकर उत्तम व्रतका पालन करनेवाले उन महर्षिने वेदार्थका विस्तारके साथ ज्ञान करानेके लिये-

काव्यं रामायणं कृत्स्नं सीतायाश्चरितं महत्।

पौलस्त्यवधमित्येवं चकार चरितव्रतः॥७॥

उन्हें सीताके चरित्रसे युक्त सम्पूर्ण रामायण नामक महाकाव्यका, जिसका दूसरा नाम पौलस्त्यवध अथवा दशाननवध था, अध्ययन कराया।

पाठ्ये गेये च मधुरं प्रमाणैस्त्रिभिरन्वितम्।

जातिभिः सप्तभिर्युक्तं तन्त्रीलयसमन्वितम्॥८॥

वह महाकाव्य पढ़ने और गानेमें भी मधुर, द्रुत, मध्य और विलम्बित–इन तीनों गतियोंसे अन्वित, षड्ज आदि सातों स्वरोंसे युक्त, वीणा बजाकर स्वर और तालके साथ गाने योग्य तथा-

रसैः शृंगारकरुणहास्य रौद्रभयानकैः।

वीरादिभी रसैर्युक्तं काव्यमेतदगायताम्॥९॥

शृंगार, करुण, हास्य, रौद्र, भयानक तथा वीर आदि सभी रसोंसे । अनुप्राणित है। दोनों भाई कुश और लव उस महाकाव्यको पढ़कर उसका गान करने लगे।

तौ तु गान्धर्वतत्त्वज्ञौ स्थानमूर्च्छनकोविदौ।

भ्रातरौ स्वरसम्पन्नौ गन्धर्वाविव रूपिणौ॥१०॥

सुन्दर रूप और शुभ लक्षण उनकी सहज सम्पत्ति थे। वे दोनों भाई बड़े मधुर स्वरसे वार्तालाप करते थे। जैसे बिम्बसे प्रतिबिम्ब प्रकट होते हैं, उसी प्रकार श्रीरामके शरीरसे उत्पन्न हुए वे दोनों राजकुमार दूसरे युगल श्रीराम ही प्रतीत होते थे॥११॥

तौ राजपुत्रौ कात्स्न्येन धर्म्यमाख्यानमुत्तमम्।

वाचोविधेयं तत्सर्वं कृत्वा काव्यमनिन्दितौ ॥१२॥

वे दोनों राजपुत्र सब लोगोंकी प्रशंसाके पात्र थे, उन्होंने उस धर्मानुकूल उत्तम उपाख्यानमय सम्पूर्ण काव्यको जिह्वाग्र कर लिया था और-

ऋषीणां च द्विजातीनां साधूनां च समागमे।

यथोपदेशं तत्त्वज्ञौ जगतुः सुसमाहितौ॥१३॥

जब कभी ऋषियों, ब्राह्मणों तथा साधुओंका समागम होता था, उस समय उनके बीचमें बैठकर वे दोनों तत्त्वज्ञ बालक एकाग्रचित्त हो रामायणका गान किया करते थे।

महात्मानौ महाभागौ सर्वलक्षणलक्षितौ।

तौ कदाचित् समेतानामृषीणां भावितात्मनाम्॥१४॥

एक दिनकी बात है, बहुत-से शुद्ध अन्तःकरणवाले महर्षियोंकी मण्डली एकत्र हुई थी। उसमें महान् सौभाग्यशाली तथा समस्त शुभ लक्षणोंसे सुशोभित महामनस्वी कुश और लव भी उपस्थित थे।

मध्ये सभं समीपस्थाविदं काव्यमगायताम्।

तच्छ्रुत्वा मुनयः सर्वे बाष्पपर्याकुलेक्षणाः ॥१५॥

उन्होंने बीच सभामें उन महात्माओंके समीप बैठकर उस रामायणकाव्यका गान किया। उसे सुनकर सभी मनियोंके नेत्रोंमें आँसू भर आये और-

साधु साध्विति तावूचुः परं विस्मयमागताः।

ते प्रीतमनसः सर्वे मुनयो धर्मवत्सलाः॥१६॥

वे अत्यन्त विस्मय-विमुग्ध होकर उन्हें साधुवाद देने लगे। मुनि धर्मवत्सल तो होते ही हैं; वह धार्मिक उपाख्यान सुनकर उन सबके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई।

प्रशशंसुः प्रशस्तव्यौ गायमानौ कुशीलवौ।

अहो गीतस्य माधुर्यं श्लोकानां च विशेषतः॥१७॥

वे रामायण-कथाके गायक कुमार कुश और लवकी, जो प्रशंसा के ही योग्य थे, इस प्रकार प्रशंसा करने लगे—’अहो! इन बालकों के गीत में कितना माधुर्य है। श्लोकों की मधुरता तो और भी अद्भुत है॥ १७॥

चिरनिर्वृत्तमप्येतत् प्रत्यक्षमिव दर्शितम्।

प्रविश्य तावुभौ सुष्ठ तथाभावमगायताम्॥१८॥

सहितौ मधुरं रक्तं सम्पन्नं स्वरसम्पदा।

‘यद्यपि इस काव्यमें वर्णित घटना बहुत दिनों पहले हो चुकी है तो भी इन दोनों बालकोंने इस सभामें प्रवेश करके एक साथ ऐसे सुन्दर भावसे स्वरसम्पन्न, रागयुक्त मधुरगान किया है कि वे पहलेकी घटनाएँ भी प्रत्यक्ष-सी दिखायी देने लगी हैं—मानो अभी-अभी आँखोंके सामने घटित हो रही हों’ ।

एवं प्रशस्यमानौ तौ तपः श्लाघ्यैर्महर्षिभिः॥१९॥

संरक्ततरमत्यर्थं मधुरं तावगायताम्।

इस प्रकार उत्तम तपस्यासे युक्त महर्षिगण उन दोनों कुमारोंकी प्रशंसा करते और वे उनसे प्रशंसित होकर अत्यन्त मधुर रागसे रामायणका गान करते थे।

प्रीतः कश्चिन्मुनिस्ताभ्यां संस्थितः कलशं ददौ॥२०॥

प्रसन्नो वल्कलं कश्चिद् ददौ ताभ्यां महायशाः।

अन्यः कृष्णाजिनमदाद् यज्ञसूत्रं तथापरः॥२१॥

उनके गान से संतुष्ट हुए किसी मुनि ने उठकर उन्हें पुरस्कार के रूप में एक कलश प्रदान किया। किसी दूसरे महायशस्वी महर्षि ने प्रसन्न होकर उन दोनों को वल्कल वस्त्र दिया। किसीने काला मृगचर्म भेंट किया तो किसीने यज्ञोपवीत।

कश्चित् कमण्डलुं प्रादान्मौजीमन्यो महामुनिः।

बृसीमन्यस्तदा प्रादात् कौपीनमपरो मुनिः॥२२॥

एकने कमण्डलु दिया तो दूसरे महामुनिने मुञ्जकी मेखला भेंट की। तीसरेने आसन और चौथेने कौपीन प्रदान किया।

ताभ्यां ददौ तदा हृष्टः कुठारमपरो मुनिः।

काषायमपरो वस्त्रं चीरमन्यो ददौ मुनिः॥२३॥

किसी अन्य मुनिने हर्षमें भरकर उन दोनों बालकोंके लिये कुठार अर्पित किया। किसीने गेरुआ वस्त्र दिया तो किसी मुनिने चीर भेंट किया।

जटाबन्धनमन्यस्तु काष्ठरज्जुं मुदान्वितः।

यज्ञभाण्डमृषिः कश्चित् काष्ठभारं तथापरः॥२४॥

किसी दूसरेने आनन्दमग्न होकर जटा बाँधनेके लिये रस्सी दी तो किसीने समिधा बाँधकर लाने के लिये डोरी प्रदान की। एक ऋषिने यज्ञपात्र दिया तो दूसरेने काष्ठभार समर्पित किया।

औदुम्बरी बृसीमन्यः स्वस्ति केचित् तदावदन्।

आयुष्यमपरे प्राहुर्मुदा तत्र महर्षयः॥ २५॥

ददुश्चैवं वरान् सर्वे मुनयः सत्यवादिनः।

 किसीने गूलरकी लकड़ीका बना हुआ पीढ़ा अर्पित किया। कुछ लोग उस समय आशीर्वाद देने लगे–’बच्चो! तुम दोनोंका कल्याण हो।’ दूसरे महर्षि प्रसन्नतापूर्वक बोल उठे—’तुम्हारी आयु बढ़े।’ इस प्रकार सभी सत्यवादी मुनियोंने उन दोनोंको नाना प्रकारके वर दिये॥ २४-२५ १/२ ॥

आश्चर्यमिदमाख्यानं मुनिना सम्प्रकीर्तितम्॥२६॥

परं कवीनामाधारं समाप्तं च यथाक्रमम्।

महर्षि वाल्मीकि द्वारा वर्णित यह आश्चर्यमय काव्य परवर्ती कवियों के लिये श्रेष्ठ आधारशिला है। श्रीरामचन्द्रजीके सम्पूर्ण चरित्रों का क्रमशः वर्णन करते हुए इसकी समाप्ति की गयी है।

अभिगीतमिदं गीतं सर्वगीतिषु कोविदौ॥२७॥

आयुष्यं पुष्टिजननं सर्वश्रुतिमनोहरम्।

सम्पूर्ण गीतोंके विशेषज्ञ राजकुमारो! यह काव्य आयु एवं पुष्टि प्रदान करनेवाला तथा सबके कान और मनको मोहनेवाला मधुर संगीत है। तुम दोनोंने बड़े सुन्दर ढंगसे इसका गान किया है।

प्रशस्यमानौ सर्वत्र कदाचित् तत्र गायकौ ॥२८॥

रथ्यासु राजमार्गेषु ददर्श भरताग्रजः।

एक समय सर्वत्र प्रशंसित होनेवाले राजकुमार कुश और लव अयोध्याकी गलियों और सड़कोंपर रामायणके श्लोकोंका गान करते हुए विचर रहे थे। इसी समय उनके ऊपर भरतके बड़े भाई श्रीरामकी दृष्टि पड़ी।

स्ववेश्म चानीय ततो भ्रातरौ स कुशीलवौ॥२९॥

पूजयामास पूजाौँ रामः शत्रुनिबर्हणः।

उन्होंने उन समादरयोग्य बन्धुओंको अपने घर बुलाकर उनका यथोचित सम्मान किया। तदनन्तर शत्रुओंका संहार करनेवाले (श्रीराम)-

आसीनः काञ्चने दिव्ये स च सिंहासने प्रभुः॥३०॥

उपोपविष्टैः सचिवैर्भ्रातृभिश्च समन्वितः।

सुवर्णमय दिव्य सिंहासन पर विराजमान हुए। उनके मन्त्री और भाई भी उनके पास ही बैठे थे।

दृष्ट्वा तु रूपसम्पन्नौ विनीतौ भ्रातरावुभौ॥३१॥

उवाच लक्ष्मणं रामः शत्रुजं भरतं तथा।

उन सबके साथ सन्दर रूपवाले उन दोनों विनयशील भाइयोंकी ओर देखकर श्रीरामचन्द्रजीने भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्नसे कहा —

श्रूयतामेतदाख्यानमनयोर्देववर्चसोः॥ ३२॥

विचित्रार्थपदं सम्यग्गायकौ समचोदयत्।

‘ये देवताके समान तेजस्वी दोनों कुमार विचित्र अर्थ और पदोंसे युक्त मधुर काव्य बड़े सुन्दर ढंगसे गाकर सुनाते हैं। तुम सब लोग इसे सुनो।’ यों कहकर उन्होंने उन दोनों भाइयोंको गानेकी आज्ञा दी॥

तौ चापि मधुरं रक्तं स्वचित्तायतनिःस्वनम्॥ ३३॥

तन्त्रीलयवदत्यर्थं विश्रुतार्थमगायताम्।

लादयत् सर्वगात्राणि मनांसि हृदयानि च।

श्रोत्राश्रयसुखं गेयं तद् बभौ जनसंसदि॥३४॥

आज्ञा पाकर वे दोनों भाई वीणाके लयके साथ अपने मनके अनुकूल तार (उच्च) एवं मधुर स्वरमें राग अलापते हुए रामायणकाव्यका गान करने लगे। उनका उच्चारण इतना स्पष्ट था कि सुनते ही अर्थका बोध हो जाता था। उनका गान सुनकर श्रोताओंके समस्त अंगोंमें हर्षजनित रोमाञ्च हो आया तथा उन सबके मन और आत्मामें आनन्दकी तरंगें उठने लगीं। उस जनसभामें होनेवाला वह गान सबकी श्रवणेन्द्रियोंको अत्यन्त सुखद प्रतीत होता था।

इमौ मुनी पार्थिवलक्षणान्वितौ कुशीलवौ चैव महातपस्विनौ।

ममापि तद् भूतिकरं प्रचक्षते महानुभावं चरितं निबोधत॥ ३५॥

उस समय श्रीरामने अपने भाइयोंका ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा—’ये दोनों कुमार मुनि होकर भी राजोचित लक्षणोंसे सम्पन्न हैं। संगीतमें कुशल होनेके साथ ही महान् तपस्वी हैं। ये जिस चरित्रका-प्रबन्ध काव्यका गान करते हैं, वह शब्दार्थालङ्कार, उत्तम गुण एवं सुन्दर रीति आदिसे युक्त होनेके कारण अत्यन्त प्रभावशाली है। मेरे लिये भी अभ्युदयकारक है; ऐसा वृद्ध पुरुषोंका कथन है। अतः तुम सब लोग ध्यान देकर इसे सुनो’।

ततस्तु तौ रामवचःप्रचोदितावगायतां मार्गविधानसम्पदा।

स चापि रामः परिषद्गतः शनै बुंभूषयासक्तमना बभूव ॥३६॥

तदनन्तर श्रीरामकी आज्ञासे प्रेरित हो वे दोनों भाई मार्गविधानकी* रीतिसे रामायणका गान करने लगे। सभामें बैठे हुए भगवान् श्रीराम भी धीरे-धीरे उनका गान सुननेमें तन्मय हो गये।  (* गान दो प्रकारके होते हैं—मार्ग और देशी। भिन्न-भिन्न देशोंकी प्राकृत भाषामें गाये जानेवाले गानको देशी कहते हैं और समूचे राष्ट्रमें प्रसिद्ध संस्कृत आदि भाषाका आश्रय लेकर गाया हुआ गान मार्गके नामसे प्रसिद्ध है। कुमार कुश और लव संस्कृत भाषाका आश्रय लेकर इसीकी रीतिसे गा रहे थे।)

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे चतुर्थः सर्गः॥४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें चौथा सर्ग पूरा हुआ॥४॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

( राजा दशरथ द्वारा सुरक्षित अयोध्यापुरी का वर्णन )

पञ्चमः सर्गः 

सर्ग-05

सर्वा पूर्वमियं येषामासीत् कृत्स्ना वसुंधरा।

प्रजापतिमुपादाय नृपाणां जयशालिनाम्॥१॥

यह सारी पृथ्वी पूर्वकालमें प्रजापति मनु से लेकर अब तक जिस वंशके विजयशाली नरेशों के अधिकार में रही है,

येषां स सगरो नाम सागरो येन खानितः।

षष्टिपुत्रसहस्राणि यं यान्तं पर्यवारयन्॥२॥

जिन्होंने समुद्र को खुदवाया था और जिन्हें यात्राकाल में साठ हजार पुत्र घेरकर चलते थे, वे महाप्रतापी राजा सगर जिनके कुलमें उत्पन्न हुए,

इक्ष्वाकूणामिदं तेषां राज्ञां वंशे महात्मनाम्।

महदुत्पन्नमाख्यानं रामायणमिति श्रुतम्॥३॥

इन्हीं इक्ष्वाकुवंशी महात्मा राजाओं की कुलपरम्परा में रामायण नाम से प्रसिद्ध इस महान् ऐतिहासिक काव्य की अवतारणा हुई है॥ १-३॥

तदिदं वर्तयिष्यावः सर्वं निखिलमादितः।

धर्मकामार्थसहितं श्रोतव्यमनसूयता॥४॥

हम दोनों आदिसे अन्ततक इस सारे काव्यका पूर्णरूपसे गान करेंगे। इसके द्वारा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थोंकी सिद्धि होती है; अतः आपलोग दोषदृष्टिका परित्याग करके इसका श्रवण करें॥४॥

कोशलो नाम मुदितः स्फीतो जनपदो महान्।

निविष्टः सरयूतीरे प्रभूतधनधान्यवान्॥५॥

कोशल नामसे प्रसिद्ध एक बहुत बड़ा जनपद है, जो सरयू नदीके किनारे बसा हुआ है। वह प्रचुर धनधान्यसे सम्पन्न, सुखी और समृद्धिशाली है॥ ५ ॥

अयोध्या नाम नगरी तत्रासील्लोकविश्रुता।

मनुना मानवेन्द्रेण या पुरी निर्मिता स्वयम्॥६॥

उसी जनपदमें अयोध्या नामकी एक नगरी है, जो समस्त लोकोंमें विख्यात है। उस पुरीको स्वयं महाराज मनुने बनवाया और बसाया था॥६॥

आयता दश च द्वे च योजनानि महापुरी।

श्रीमती त्रीणि विस्तीर्णा सुविभक्तमहापथा॥७॥

वह शोभाशालिनी महापुरी बारह योजन लम्बी और तीन योजन चौड़ी थी। वहाँ बाहरके जनपदोंमें जानेका जो विशाल राजमार्ग था, वह उभयपार्श्वमें विविध वृक्षावलियोंसे विभूषित होनेके कारण सुस्पष्टतया अन्य मार्गोंसे विभक्त जान पड़ता था॥७॥

राजमार्गेण महता सुविभक्तेन शोभिता।

मुक्तपुष्पावकीर्णेन जलसिक्तेन नित्यशः॥८॥

सुन्दर विभागपूर्वक बना हुआ महान् राजमार्ग उस पुरीकी शोभा बढ़ा रहा था। उसपर खिले हुए फूल बिखेरे जाते थे तथा प्रतिदिन उसपर जलका छिड़काव होता था॥ ८॥

तां तु राजा दशरथो महाराष्ट्रविवर्धनः।

पुरीमावासयामास दिवि देवपतिर्यथा॥९॥

जैसे स्वर्गमें देवराज इन्द्रने अमरावतीपुरी बसायी थी, । उसी प्रकार धर्म और न्यायके बलसे अपने महान्

राष्ट्रकी वृद्धि करनेवाले राजा दशरथने अयोध्यापुरीको पहलेकी अपेक्षा विशेषरूपसे बसाया था॥९॥

कपाटतोरणवतीं सुविभक्तान्तरापणाम्।

सर्वयन्त्रायुधवतीमुषितां सर्वशिल्पिभिः॥१०॥

वह पुरी बड़े-बड़े फाटकों और किवाड़ोंसे सुशोभित थी। उसके भीतर पृथक्-पृथक् बाजारें थीं। वहाँ सब प्रकारके यन्त्र और अस्त्र-शस्त्र संचित थे। उस पुरीमें सभी कलाओंके शिल्पी निवास करते थे॥ १० ॥

सूतमागधसम्बाधां श्रीमतीमतुलप्रभाम्।

उच्चाट्टालध्वजवतीं शतघ्नीशतसंकुलाम्॥११॥

स्तुति-पाठ करनेवाले सूत और वंशावलीका बखान करनेवाले मागध वहाँ भरे हुए थे। वह पुरी सुन्दर शोभासे सम्पन्न थी। उसकी सुषमाकी कहीं तुलना नहीं थी। वहाँ ऊँची-ऊँची अट्टालिकाएँ थीं, जिनके ऊपर ध्वज फहराते थे। सैकड़ों शतघ्नियों (तोपों) से वह पुरी व्याप्त थी॥११॥

वधूनाटकसंधैश्च संयुक्तां सर्वतः पुरीम्।

उद्यानाम्रवणोपेतां महतीं सालमेखलाम्॥१२॥

उस पुरीमें ऐसी बहुत-सी नाटक-मण्डलियाँ थीं, जिनमें केवल स्त्रियाँ ही नृत्य एवं अभिनय करती थीं। उस नगरीमें चारों ओर उद्यान तथा आमोंके बगीचे थे। लम्बाई और चौड़ाईकी दृष्टिसे वह पुरी बहुत विशाल थी तथा साखूके वन उसे सब ओरसे घेरे हुए थे। १२॥

दुर्गगम्भीरपरिखां दुर्गामन्यैर्दुरासदाम्।

वाजिवारणसम्पूर्णां गोभिरुष्टैः खरैस्तथा॥१३॥

उसके चारों ओर गहरी खाई खुदी थी, जिसमें प्रवेश करना या जिसे लाँघना अत्यन्त कठिन था। वह नगरी दूसरोंके लिये सर्वथा दुर्गम एवं दुर्जय थी। घोड़े, हाथी, गाय-बैल, ऊँट तथा गदहे आदि उपयोगी पशुओंसे वह पुरी भरी-पूरी थी॥ १३॥

सामन्तराजसंधैश्च बलिकर्मभिरावृताम्।

नानादेशनिवासैश्च वणिग्भिरुपशोभिताम्॥१४॥

कर देनेवाले सामन्त नरेशोंके समुदाय उसे सदा घेरे रहते थे। विभिन्न देशोंके निवासी वैश्य उस पुरीकी

शोभा बढ़ाते थे॥ १४॥

प्रासादै रत्नविकृतैः पर्वतैरिव शोभिताम्।

कूटागारैश्च सम्पूर्णामिन्द्रस्येवामरावतीम्॥१५॥

वहाँके महलोंका निर्माण नाना प्रकारके रत्नोंसे हुआ था। वे गगनचुम्बी प्रासाद पर्वतोंके समान जान पड़ते थे। उनसे उस पुरीकी बड़ी शोभा हो रही थी। बहुसंख्यक कूटागारों (गुप्तगृहों अथवा स्त्रियोंके क्रीड़ाभवनों) से परिपूर्ण वह नगरी इन्द्रकी अमरावतीके समान जान पड़ती थी॥ १५ ॥

चित्रामष्टापदाकारां वरनारीगणायुताम्।

सर्वरत्नसमाकीर्णां विमानगृहशोभिताम्॥१६॥

उसकी शोभा विचित्र थी। उसके महलोंपर सोनेका पानी चढ़ाया गया था (अथवा वह पुरी द्यूतफलकके* । आकारमें बसायी गयी थी)। श्रेष्ठ एवं सुन्दरी नारियोंके समूह उस पुरीकी शोभा बढ़ाते थे। वह सब प्रकारके रत्नोंसे भरी-पूरी तथा सतमहले प्रासादोंसे सुशोभित थी॥

* गोविन्दराजकी टीकामें अष्टापदका अर्थ शारिफल या द्यूतफलक किया गया है। वह चौकी जिस पर पासा बिछाया या खेला जाय, द्यूतफलक कहलाती है। पुरीके बीचमें राजमहल था। उसके चारों ओर राजबीथियाँ थीं और बीचमें खाली जगहें थीं। यही ‘अष्टापदाकारा’ का भाव है।

गृहगाढामविच्छिद्रां समभूमौ निवेशिताम्।

शालितण्डुलसम्पूर्णामिक्षुकाण्डरसोदकाम्॥१७॥

पुरवासियोंके घरोंसे उसकी आबादी इतनी घनी हो गयी थी कि कहीं थोड़ा-सा भी अवकाश नहीं दिखायी देता था। उसे समतल भूमिपर बसाया गया था। वह नगरी जड़हन धानके चावलोंसे भरपूर थी। वहाँका जल इतना मीठा या स्वादिष्ट था, मानो ईखका रस हो॥

दुन्दुभीभिर्मेदंगैश्च वीणाभिः पणवैस्तथा।

नादितां भृशमत्यर्थं पृथिव्यां तामनुत्तमाम्॥१८॥

भूमण्डलकी वह सर्वोत्तम नगरी दुन्दुभि, मृदंग, वीणा, पणव आदि वाद्योंकी मधुर ध्वनिसे अत्यन्त गूंजती रहती थी॥ १८॥

विमानमिव सिद्धानां तपसाधिगतं दिवि।

सुनिवेशितवेश्मान्तां नरोत्तमसमावृताम्॥१९॥

देवलोकमें तपस्यासे प्राप्त हए सिद्धोंके विमानकी भाँति उस पुरीका भूमण्डलमें सर्वोत्तम स्थान था। वहाँके सुन्दर महल बहुत अच्छे ढंगसे बनाये और बसाये गये थे। उनके भीतरी भाग बहुत ही सुन्दर थे। बहुत-से श्रेष्ठ पुरुष उस पुरीमें निवास करते थे॥१९॥

ये च बाणैर्न विध्यन्ति विविक्तमपरापरम्।

शब्दवेध्यं च विततं लघुहस्ता विशारदाः॥२०॥

जो अपने समूहसे बिछुड़कर असहाय हो गया हो, जिसके आगे-पीछे कोई न हो (अर्थात् जो पिता और पुत्र दोनोंसे हीन हो) तथा जो शब्दवेधी बाणद्वारा बेधने योग्य हों (अथवा युद्धसे हारकर भागे जा रहे हों) ऐसे पुरुषोंपर जो लोग बाणोंका प्रहार नहीं करते, जिनके सधे-सधाये हाथ शीघ्रतापूर्वक लक्ष्यवेध करनेमें समर्थ हैं, अस्त्र-शस्त्रोंके प्रयोगमें कुशलता प्राप्त कर चुके हैं तथा

सिंहव्याघ्रवराहाणां मत्तानां नदतां वने।

हन्तारो निशितैः शस्त्रैर्बलाद् बाहुबलैरपि॥२१॥

तादृशानां सहस्रेस्तामभिपूर्णां महारथैः ।

पुरीमावासयामास राजा दशरथस्तदा ॥ २२॥

जो वनमें गर्जते हुए मतवाले सिंहों, व्याघ्रों और सूअरोंको तीखे शस्त्रों से एवं भुजाओं के बल से भी बलपूर्वक मार डालने में समर्थ हैं, ऐसे सहस्रों महारथी वीरों से अयोध्यापुरी भरी-पूरी थी। उसे महाराज दशरथ ने बसाया और पाला था।

तामग्निमद्भिर्गुणवद्भिरावृतां द्विजोत्तमैर्वेदषडंगपारगैः।

सहस्रदैः सत्यरतैर्महात्मभिमहर्षिकल्पैर्ऋषिभिश्च केवलैः॥२३॥

अग्निहोत्री, शम-दम आदि उत्तम गुणोंसे सम्पन्न तथा छहों अंगोंसहित सम्पूर्ण वेदोंके पारंगत विद्वान् श्रेष्ठ ब्राह्मण उस पुरीको सदा घेरे रहते थे। वे सहस्रोंका दान करनेवाले और सत्यमें तत्पर रहनेवाले थे। ऐसे महर्षिकल्प महात्माओं तथा ऋषियोंसे अयोध्यापुरी सुशोभित थी तथा राजा दशरथ उसकी रक्षा करते थे।

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे पञ्चमः सर्गः॥५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें पाँचवाँ सर्ग पूरा हुआ॥५॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

( राजा दशरथ के शासनकाल में अयोध्या और वहाँ के नागरिकों की उत्तम स्थिति का वर्णन )

षष्ठः सर्गः 

सर्ग-06

तस्यां पुर्यामयोध्यायां वेदवित् सर्वसंग्रहः।

दीर्घदर्शी महातेजाः पौरजानपदप्रियः॥१॥

उस अयोध्यापुरी में रहकर राजा दशरथ प्रजावर्ग का पालन करते थे। वे वेदों के विद्वान् तथा सभी उपयोगी वस्तुओं का संग्रह करने वाले थे। दूरदर्शी और महान् तेजस्वी थे। नगर और जनपद की प्रजा उनसे बहुत प्रेम रखती थी।

इक्ष्वाकूणामतिरथो यज्वा धर्मपरो वशी।

महर्षिकल्पो राजर्षिस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः॥२॥

वे इक्ष्वाकुकुलके अतिरथी* वीर थे। यज्ञ करनेवाले, धर्मपरायण और जितेन्द्रिय थे। महर्षियोंके समान दिव्य गुणसम्पन्न राजर्षि थे। उनकी तीनों लोकोंमें ख्याति थी।

बलवान् निहतामित्रो मित्रवान् विजितेन्द्रियः।

धनैश्च संचयैश्चान्यैः शक्रवैश्रवणोपमः॥३॥

वे बलवान्, शत्रुहीन, मित्रोंसे युक्त एवं इन्द्रियविजयी थे। धन और अन्य वस्तुओंके संचयकी दृष्टि से इन्द्र और कुबेरके समान जान पड़ते थे।

यथा मनुर्महातेजा लोकस्य परिरक्षिता।

तथा दशरथो राजा लोकस्य परिरक्षिता॥४॥

जैसे महातेजस्वी प्रजापति मनु सम्पूर्ण जगत् की रक्षा करते थे, उसी प्रकार महाराज दशरथ भी करते थे॥१-४॥ *(जो दस हजार महारथियोंके साथ अकेला ही युद्ध करनेमें समर्थ हो, वह ‘अतिरथी’ कहलाता है।)

तेन सत्याभिसंधेन त्रिवर्गमनुतिष्ठता।

पालिता सा पुरी श्रेष्ठा इन्द्रेणेवामरावती॥५॥

धर्म, अर्थ और कामका सम्पादन करने वाले कर्मों का अनुष्ठान करते हुए वे सत्यप्रतिज्ञ नरेश उस श्रेष्ठ अयोध्यापुरी का उसी तरह पालन करते थे, जैसे इन्द्र अमरावतीपुरी का॥ ५॥

तस्मिन् पुरवरे हृष्टा धर्मात्मानो बहुश्रुताः।

नरास्तुष्टा धनैः स्वैः स्वैरलुब्धाः सत्यवादिनः॥६॥

उस उत्तम नगरमें निवास करनेवाले सभी मनुष्य प्रसन्न, धर्मात्मा, बहुश्रुत, निर्लोभ, सत्यवादी तथा अपने-अपने धनसे संतुष्ट रहनेवाले थे॥६॥ ।

नाल्पसंनिचयः कश्चिदासीत् तस्मिन् पुरोत्तमे।

कुटुम्बी यो ह्यसिद्धार्थोऽगवाश्वधनधान्यवान्॥७॥

उस श्रेष्ठ पुरीमें कोई भी ऐसा कुटुम्बी नहीं था, जिसके पास उत्कृष्ट वस्तुओंका संग्रह अधिक मात्रामें न हो, जिसके धर्म, अर्थ और काममय पुरुषार्थ सिद्ध न हो गये हों तथा जिसके पास गाय-बैल, घोड़े, धनधान्य आदिका अभाव हो॥७॥

कामी वा न कदर्यो वा नृशंसः पुरुषः क्वचित्।

द्रष्टुं शक्यमयोध्यायां नाविद्वान् न च नास्तिकः॥८॥

अयोध्यामें कहीं भी कोई कामी, कृपण, क्रूर, मूर्ख और नास्तिक मनुष्य देखनेको भी नहीं मिलता था।

सर्वे नराश्च नार्यश्च धर्मशीलाः सुसंयताः।

मुदिताः शीलवृत्ताभ्यां महर्षय इवामलाः॥९॥

वहाँके सभी स्त्री-पुरुष धर्मशील, संयमी, सदा प्रसन्न रहनेवाले तथा शील और सदाचारकी दृष्टिसे महर्षियोंकी भाँति निर्मल थे॥९॥

नाकुण्डली नामुकुटी नास्रग्वी नाल्पभोगवान्।

नामृष्टो न नलिप्तांगो नासुगन्धश्च विद्यते॥१०॥

वहाँ कोई भी कुण्डल, मुकुट और पुष्पहारसे शून्य नहीं था। किसीके पास भोग-सामग्रीकी कमी नहीं थी। कोई भी ऐसा नहीं था, जो नहा-धोकर साफ-सुथरा न हो, जिसके अंगोंमें चन्दनका लेप न हुआ हो तथा जो सुगन्धसे वञ्चित हो॥ १०॥

नामृष्टभोजी नादाता नाप्यनंगदनिष्कधृक्।

नाहस्ताभरणो वापि दृश्यते नाप्यनात्मवान्॥११॥

अपवित्र अन्न भोजन करनेवाला, दान न देनेवाला तथा मनको काबूमें न रखनेवाला मनुष्य तो वहाँ कोई दिखायी ही नहीं देता था। कोई भी ऐसा पुरुष देखनेमें नहीं आता था, जो बाजूबन्द, निष्क (स्वर्णपदक या मोहर) तथा हाथका आभूषण (कड़ा आदि) धारण न किये हो॥११॥

नानाहिताग्निर्नायज्वा न क्षुद्रो वा न तस्करः।

कश्चिदासीदयोध्यायां न चावृत्तो न संकरः॥

अयोध्यामें कोई भी ऐसा नहीं था, जो अग्निहोत्र और यज्ञ न करता हो; जो क्षुद्र, चोर, सदाचारशून्य अथवा वर्णसंकर हो ॥ १२॥

स्वकर्मनिरता नित्यं ब्राह्मणा विजितेन्द्रियाः।

दानाध्ययनशीलाश्च संयताश्च प्रतिग्रहे ॥१३॥

वहाँ निवास करनेवाले ब्राह्मण सदा अपने कर्मोमें लगे रहते, इन्द्रियोंको वशमें रखते, दान और स्वाध्याय । करते तथा प्रतिग्रहसे बचे रहते थे॥१३॥

नास्तिको नानृती वापि न कश्चिदबहुश्रुतः।

नासूयको न चाशक्तो नाविद्वान् विद्यते क्वचित्॥१४॥

वहाँ कहीं एक भी ऐसा द्विज नहीं था, जो नास्तिक, असत्यवादी, अनेक शास्त्रोंके ज्ञानसे रहित, दूसरोंके दोष ढूँढ़नेवाला, साधनमें असमर्थ और विद्याहीन हो॥

नाषडंगविदत्रास्ति नाव्रतो नासहस्रदः।

न दीनः क्षिप्तचित्तो वा व्यथितो वापि कश्चन॥१५॥

उस पुरीमें वेदके छहों अंगोंको न जाननेवाला, व्रतहीन, सहस्रोंसे कम दान देनेवाला, दीन, विक्षिप्तचित्त अथवा दुःखी भी कोई नहीं था॥१५॥

कश्चिन्नरो वा नारी वा नाश्रीमान् नाप्यरूपवान्।

द्रष्टुं शक्यमयोध्यायां नापि राजन्यभक्तिमान्॥१६॥

अयोध्यामें कोई भी स्त्री या पुरुष ऐसा नहीं देखा जा सकता था, जो श्रीहीन, रूपरहित तथा राजभक्तिसे शून्य हो॥ १६॥

वर्णेष्वग्र्यचतुर्थेषु देवतातिथिपूजकाः।

कृतज्ञाश्च वदान्याश्च शूरा विक्रमसंयुताः॥१७॥

ब्राह्मण आदि चारों वर्गों के लोग देवता और अतिथियोंके पूजक, कृतज्ञ, उदार, शूरवीर और पराक्रमी थे॥ १७॥

दीर्घायुषो नराः सर्वे धर्मं सत्यं च संश्रिताः।

सहिताः पुत्रपौत्रैश्च नित्यं स्त्रीभिः पुरोत्तमे॥१८॥

उस श्रेष्ठ नगरमें निवास करनेवाले सब मनुष्य दीर्घायु तथा धर्म और सत्यका आश्रय लेनेवाले थे। वे सदा स्त्री-पुत्र और पौत्र आदि परिवारके साथ सुखसे रहते थे।। १८॥

क्षत्रं ब्रह्ममुखं चासीद् वैश्याः क्षत्रमनुव्रताः।

शूद्राः स्वकर्मनिरतास्त्रीन् वर्णानुपचारिणः॥१९॥

क्षत्रिय ब्राह्मणोंका मुँह जोहते थे, वैश्य क्षत्रियोंकी आज्ञाका पालन करते थे और शूद्र अपने कर्तव्यका पालन करते हुए उपर्युक्त तीनों वर्गों की सेवामें संलग्न रहते थे॥ १९॥

सा तेनेक्ष्वाकुनाथेन पुरी सुपरिरक्षिता।

यथा पुरस्तान्मनुना मानवेन्द्रेण धीमता॥२०॥

इक्ष्वाकुकुलके स्वामी राजा दशरथ अयोध्यापुरीकी रक्षा उसी प्रकार करते थे, जैसे बुद्धिमान् महाराज मनुने पूर्वकालमें उसकी रक्षा की थी॥ २०॥

योधानामग्निकल्पानां पेशलानाममर्षिणाम्।

सम्पूर्णा कृतविद्यानां गुहा केसरिणामिव॥२१॥

शौर्यकी अधिकताके कारण अग्निके समान दुर्धर्ष, कुटिलतासे रहित, अपमानको सहन करनेमें असमर्थ तथा अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता योद्धाओंके समुदायसे वह पुरी उसी तरह भरी-पूरी रहती थी, जैसे पर्वतोंकी गुफा सिंहोंके समूहसे परिपूर्ण होती है॥ २१॥

काम्बोजविषये जातैर्बाह्नीकैश्च हयोत्तमैः।

वनायुजैर्नदीजैश्च पूर्णा हरिहयोत्तमैः॥ २२॥

काम्बोज और बालीक देशमें उत्पन्न हुए उत्तम घोड़ोंसे, वनायु देशके अश्वोंसे तथा सिन्धुनदके निकट

पैदा होनेवाले दरियाई घोड़ोंसे, जो इन्द्रके अश्व । उच्चैःश्रवाके समान श्रेष्ठ थे, अयोध्यापुरी भरी रहती थी॥ २२॥

विन्ध्यपर्वतजैर्मत्तैः पूर्णा हैमवतैरपि।

मदान्वितैरतिबलैर्मातंगैः पर्वतोपमैः ॥२३॥

विन्ध्य और हिमालय पर्वतोंमें उत्पन्न होनेवाले अत्यन्त बलशाली पर्वताकार मदमत्त गजराजोंसे भी वह नगरी परिपूर्ण रहती थी॥ २३॥

ऐरावतकुलीनैश्च महापद्मकुलैस्तथा।

अञ्जनादपि निष्क्रान्तर्वामनादपि च द्विपैः ॥२४॥

ऐरावतकुलमें उत्पन्न, महापद्मके वंशमें पैदा हुए तथा अञ्जन और वामन नामक दिग्गजों से भी प्रकट हुए हाथी उस पुरीकी पूर्णतामें सहायक हो रहे थे। २४॥

भद्रैर्मन्म॑गैश्चैव भद्रमन्द्रमृगैस्तथा।

भद्रमन्द्रैर्भद्रमृगैर्मुगमन्त्रैश्च सा पुरी॥२५॥

नित्यमत्तैः सदा पूर्णा नागैरचलसंनिभैः।

सा योजने द्वे च भूयः सत्यनामा प्रकाशते।

यस्यां दशरथो राजा वसञ्जगदपालयत्॥२६॥

हिमालय पर्वत पर उत्पन्न भद्रजाति के, विन्ध्यपर्वत पर उत्पन्न हुए मन्द्रजाति के तथा सह्यपर्वत पर पैदा हुए मृग जाति के हाथी भी वहाँ मौजूद थे। भद्र, मन्द्र और मृग -इन तीनों के मेल से उत्पन्न हुए संकरजाति के, भद्र और मन्द्र-इन दो जातियों के मेल से पैदा हुए संकर जाति के, भद्र और मृग जातिके संयोगसे उत्पन्न संकरजाति के तथा मृग और मन्द्र-इन दो जातियोंके सम्मिश्रण से पैदा हुए पर्वताकार गजराज भी, जो सदा मदोन्मत्त रहते थे, उस पुरीमें भरे हुए थे। (तीन योजनके विस्तारवाली अयोध्यामें) दो योजनकी भूमि । तो ऐसी थी, जहाँ पहुँचकर किसीके लिये भी युद्ध करना असम्भव था, इसलिये वह पुरी ‘अयोध्या’ इस सत्य एवं सार्थक नामसे प्रकाशित होती थी; जिसमें रहते हुए राजा दशरथ इस जगत् का (अपने राज्यका) पालन करते थे॥ २५-२६॥

तां पुरीं स महातेजा राजा दशरथो महान्।

शशास शमितामित्रो नक्षत्राणीव चन्द्रमाः॥२७॥

जैसे चन्द्रमा नक्षत्रलोकका शासन करते हैं, उसी प्रकार महातेजस्वी महाराज दशरथ अयोध्यापुरीका शासन करते थे। उन्होंने अपने समस्त शत्रुओंको नष्ट कर दिया था।। २७॥

तां सत्यनामां दृढतोरणार्गलां गृहैर्विचित्रैरुपशोभितां शिवाम्।

पुरीमयोध्यां नृसहस्रसंकुलां शशास वै शक्रसमो महीपतिः॥२८॥

जिसका अयोध्या नाम सत्य एवं सार्थक था, जिसके दरवाजे और अर्गला सुदृढ़ थे, जो विचित्र गृहोंसे सदा सुशोभित होती थी, सहस्रों मनुष्योंसे भरी हुई उस कल्याणमयी पुरीका इन्द्रतुल्य तेजस्वी राजा दशरथ न्यायपूर्वक शासन करते थे॥२८॥


इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे षष्ठः सर्गः॥६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में छठा सर्ग पूरा हुआ॥६॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(राजमन्त्रियों के गुण और नीति का वर्णन)

सप्तमः सर्गः 

सर्ग-07

तस्यामात्या गुणैरासन्निक्ष्वाकोः सुमहात्मनः।

मन्त्रज्ञाश्चेङ्गितज्ञाश्च नित्यं प्रियहिते रताः॥१॥

इक्ष्वाकुवंशी वीर महामना महाराज दशरथके मन्त्रिजनोचित गुणोंसे सम्पन्न आठ मन्त्री थे, जो मन्त्रके तत्त्वको जाननेवाले और बाहरी चेष्टा देखकर ही मनके भावको समझ लेनेवाले थे। वे सदा ही राजाके प्रिय एवं हितमें लगे रहते थे।

अष्टौ बभूवुर्वीरस्य तस्यामात्या यशस्विनः।

शुचयश्चानुरक्ताश्च राजकृत्येषु नित्यशः॥२॥

इसीलिये उनका यश बहुत फैला हुआ था। वे सभी शुद्ध आचारविचार से युक्त थे और राजकीय कार्यों में निरन्तर संलग्न रहते थे।

धृष्टिर्जयन्तो विजयः सुराष्ट्रो राष्ट्रवर्धनः ।

अकोपो धर्मपालश्च सुमन्त्रश्चाष्टमोऽर्थवित्॥३॥ ।

उनके नाम इस प्रकार हैं- धृष्टि, जयन्त, विजय, सुराष्ट्र, राष्ट्रवर्धन, अकोप, धर्मपाल और आठवें सुमन्त्र। जो अर्थशास्त्र के ज्ञाता थे।

ऋत्विजौ द्वावभिमतौ तस्यास्तामृषिसत्तमौ।

वसिष्ठो वामदेवश्च मन्त्रिणश्च तथापरे॥४॥

ऋषियों में श्रेष्ठतम वसिष्ठ और वामदेव— ये दो महर्षि राजा के माननीय ऋत्विज् (पुरोहित) थे।

सुयज्ञोऽप्यथ जाबालिः काश्यपोऽप्यथ गौतमः।

मार्कण्डेयस्तु दीर्घायुस्तथा कात्यायनो द्विजः॥५॥

इनके सिवा सुयज्ञ, जाबालि, काश्यप, गौतम, दीर्घायु मार्कण्डेय और विप्रवर कात्यायन भी महाराज के मन्त्री थे।

एतैर्ब्रह्मर्षिभिर्नित्यमृत्विजस्तस्य पौर्वकाः।

विद्याविनीता हीमन्तः कुशला नियतेन्द्रियाः॥६॥

इन ब्रह्मर्षियोंके साथ राजाके पूर्वपरम्परागत ऋत्विज् भी सदा मन्त्रीका कार्य करते थे। वे सब-के-सब विद्वान् होनेके कारण विनयशील, सलज्ज, कार्यकुशल, जितेन्द्रिय,-

श्रीमन्तश्च महात्मानः शस्त्रज्ञा दृढविक्रमाः।

कीर्तिमन्तः प्रणिहिता यथावचनकारिणः॥७॥

श्रीसम्पन्न, महात्मा, शस्त्रविद्याके ज्ञाता, सुदृढ़ पराक्रमी, यशस्वी, समस्त राजकार्यों में सावधान, राजाकी आज्ञाके अनुसार कार्य करनेवाले,

तेजःक्षमायशःप्राप्ताः स्मितपूर्वाभिभाषिणः।

क्रोधात् कामार्थहेतोर्वा न ब्रूयुरनृतं वचः॥८॥

तेजस्वी, क्षमाशील, कीर्तिमान् तथा मुसकराकर बात करनेवाले थे। वे कभी काम, क्रोध या स्वार्थके वशीभूत होकर झूठ नहीं बोलते थे।

तेषामविदितं किंचित् स्वेषु नास्ति परेषु वा।

क्रियमाणं कृतं वापि चारेणापि चिकीर्षितम्॥९॥

अपने या शत्रुपक्ष के राजाओं की कोई भी बात उनसे छिपी नहीं रहती थी। दूसरे राजा क्या करते हैं, क्या कर चुके हैं और क्या करना चाहते हैं—ये सभी बातें गुप्तचरोंद्वारा उन्हें मालूम रहती थीं॥९॥

कुशला व्यवहारेषु सौहृदेषु परीक्षिताः।

प्राप्तकालं यथा दण्डं धारयेयुः सुतेष्वपि॥१०॥

वे सभी व्यवहारकुशल थे। उनके सौहार्दकी अनेक अवसरोंपर परीक्षा ली जा चुकी थी। वे मौका पड़नेपर अपने पुत्रको भी उचित दण्ड देने में भी नहीं हिचकते थे।॥ १०॥

कोशसंग्रहणे युक्ता बलस्य च परिग्रहे।

अहितं चापि पुरुषं न हिंस्युरविदूषकम्॥११॥

कोषके संचय तथा चतुरंगिणी सेनाके संग्रहमें सदा लगे रहते थे। शत्रुने भी यदि अपराध न किया हो तो वे उसकी हिंसा नहीं करते थे॥११॥

वीराश्च नियतोत्साहा राजशास्त्रमनुष्ठिताः।

शुचीनां रक्षितारश्च नित्यं विषयवासिनाम्॥१२॥

उन सबमें सदा शौर्य एवं उत्साह भरा रहता था। वे राजनीतिके अनुसार कार्य करते तथा अपने राज्यके भीतर रहनेवाले सत्पुरुषोंकी सदा रक्षा करते थे॥ १२ ॥

ब्रह्मक्षत्रमहिंसन्तस्ते कोशं समपूरयन्।

सुतीक्ष्णदण्डाः सम्प्रेक्ष्य पुरुषस्य बलाबलम्॥१३॥

ब्राह्मणों और क्षत्रियोंको कष्ट न पहुँचाकर न्यायोचित धनसे राजाका खजाना भरते थे। वे अपराधी पुरुषके बलाबलको देखकर उसके प्रति तीक्ष्ण अथवा मृदु दण्डका प्रयोग करते थे॥१३॥

शुचीनामेकबुद्धीनां सर्वेषां सम्प्रजानताम्।

नासीत्पुरे वा राष्ट्र वा मृषावादी नरः क्वचित्॥१४॥

उन सबके भाव शुद्ध और विचार एक थे। उनकी जानकारीमें अयोध्यापुरी अथवा कोसलराज्यके भीतर कहीं एक भी मनुष्य ऐसा नहीं था, जो मिथ्यावादी,-

क्वचिन्न दुष्टस्तत्रासीत् परदाररतिर्नरः।

प्रशान्तं सर्वमेवासीद् राष्ट्र पुरवरं च तत्॥१५॥

दुष्ट और परस्त्रीलम्पट हो। सम्पूर्ण राष्ट्र और नगरमें पूर्ण शान्ति छायी रहती थी॥१५॥

सुवाससः सुवेषाश्च ते च सर्वे शुचिव्रताः।

हितार्थाश्च नरेन्द्रस्य जाग्रतो नयचक्षुषा॥१६॥

उन मन्त्रियोंके वस्त्र और वेष स्वच्छ एवं सुन्दर होते थे। वे उत्तम व्रतका पालन करनेवाले तथा राजाके हितैषी थे। नीतिरूपी नेत्रोंसे देखते हुए सदा सजग रहते थे।

गुरोर्गुणगृहीताश्च प्रख्याताश्च पराक्रमैः।

विदेशेष्वपि विज्ञाताः सर्वतो बुद्धिनिश्चयाः॥ १७॥

अपने गुणोंके कारण वे सभी मन्त्री गुरुतुल्य समादरणीय राजाके अनुग्रहपात्र थे। अपने पराक्रमोंके कारण उनकी सर्वत्र ख्याति थी। विदेशोंमें भी सब लोग उन्हें जानते थे। वे सभी बातोंमें बुद्धिद्वारा भलीभाँति विचार करके किसी निश्चयपर पहुँचते थे।

अभितो गुणवन्तश्च न चासन् गुणवर्जिताः।

संधिविग्रहतत्त्वज्ञाः प्रकृत्या सम्पदान्विताः॥१८॥

समस्त देशों और कालोंमें वे गुणवान् ही सिद्ध होते थे, गुणहीन नहीं। संधि और विग्रहके उपयोग और अवसरका उन्हें अच्छी तरह ज्ञान था। वे स्वभावसे ही सम्पत्तिशाली (दैवी सम्पत्तिसे युक्त) थे॥ १८ ॥

मन्त्रसंवरणे शक्ताः शक्ताः सूक्ष्मासु बुद्धिषु।

नीतिशास्त्रविशेषज्ञाः सततं प्रियवादिनः॥१९॥

उनमें राजकीय मन्त्रणाको गुप्त रखनेकी पूर्ण शक्ति थी। वे सूक्ष्मविषयका विचार करनेमें कुशल थे। नीतिशास्त्रमें उनकी विशेष जानकारी थी तथा वे सदा ही प्रिय लगनेवाली बात बोलते थे॥ १९॥

ईदृशैस्तैरमात्यैश्च राजा दशरथोऽनघः।

उपपन्नो गुणोपेतैरन्वशासद् वसुन्धराम्॥२०॥

ऐसे गुणवान् मन्त्रियोंके साथ रहकर निष्पाप राजा दशरथ उस भूमण्डलका शासन करते थे॥ २० ॥

अवेक्ष्यमाणश्चारेण प्रजा धर्मेण रक्षयन्।

प्रजानां पालनं कुर्वन्नधर्म परिवर्जयन्॥२१॥

वे गुप्तचरोंके द्वारा अपने और शत्रु-राज्यके वृत्तान्तोंपर दृष्टि रखते थे, प्रजाका धर्मपूर्वक पालन करते थे तथा प्रजापालन करते हुए अधर्मसे दूर ही रहते थे॥२१॥

विश्रुतस्त्रिषु लोकेषु वदान्यः सत्यसंगरः।

स तत्र पुरुषव्याघ्रः शशास पृथिवीमिमाम्॥२२॥

उनकी तीनों लोकोंमें प्रसिद्धि थी। वे उदार और सत्यप्रतिज्ञ थे। पुरुषसिंह राजा दशरथ अयोध्यामें ही रहकर इस पृथ्वीका शासन करते थे॥ २२ ॥

नाध्यगच्छद्विशिष्टं वा तुल्यं वा शत्रुमात्मनः।

मित्रवान्नतसामन्तः प्रतापहतकण्टकः।

स शशास जगद् राजा दिवि देवपतिर्यथा॥२३॥

उन्हें कभी अपनेसे बड़ा अथवा अपने समान भी कोई शत्रु नहीं मिला। उनके मित्रोंकी संख्या बहुत थी। सभी सामन्त उनके चरणोंमें मस्तक झुकाते थे। उनके प्रतापसे राज्यके सारे कण्टक (शत्रु एवं चोर आदि) नष्ट हो गये थे। जैसे देवराज इन्द्र स्वर्गमें रहकर तीनों लोकोंका पालन करते हैं, उसी प्रकार राजा दशरथ अयोध्यामें रहकर सम्पूर्ण जगत् का शासन करते थे। २३॥

तैर्मन्त्रिभिर्मन्त्रहिते निविष्टैवृतोऽनुरक्तैः कुशलैः समर्थैः ।

स पार्थिवो दीप्तिमवाप युक्तस्तेजोमयैर्गोभिरिवोदितोऽर्कः॥२४॥

उनके मन्त्री मन्त्रणाको गुप्त रखने तथा राज्यके हित-साधनमें संलग्न रहते थे। वे राजाके प्रति अनुरक्त, कार्यकुशल और शक्तिशाली थे। जैसे सूर्य अपनी तेजोमयी किरणोंके साथ उदित होकर प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार राजा दशरथ उन तेजस्वी मन्त्रियोंसे घिरे । रहकर बड़ी शोभा पाते थे॥२४॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे सप्तमः सर्गः ॥७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आपरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें सातवाँ सर्ग पूरा हुआ॥७॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(राजा दशरथ का पुत्र के लिये अश्वमेधयज्ञ करने का प्रस्ताव और मन्त्रियों तथा ब्राह्मणों द्वारा उनका अनुमोदन)

अष्टमः सर्गः 

सर्ग-08

तस्य चैवंप्रभावस्य धर्मज्ञस्य महात्मनः।

सुतार्थं तप्यमानस्य नासीद् वंशकरः सुतः॥१॥

सम्पूर्ण धर्मोको जाननेवाले महात्मा राजा दशरथ ऐसे प्रभावशाली होते हुए भी पुत्रके लिये सदा चिन्तित रहते थे। उनके वंशको चलानेवाला कोई पुत्र नहीं था॥१॥

चिन्तयानस्य तस्यैवं बुद्धिरासीन्महात्मनः।

सुतार्थं वाजिमेधेन किमर्थं न यजाम्यहम्॥२॥

उसके लिये चिन्ता करते-करते एक दिन उन महामनस्वी नरेशके मनमें यह विचार हुआ कि मैं पुत्रप्राप्तिके लिये अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान क्यों न करूँ? ॥

स निश्चितां मतिं कृत्वा यष्टव्यमिति बुद्धिमान्।

मन्त्रिभिः सह धर्मात्मा सर्वैरपि कृतात्मभिः॥३॥

अपने समस्त शुद्ध बुद्धिवाले मन्त्रियोंके साथ परामर्शपूर्वक यज्ञ करने का ही निश्चित विचार करके-

ततोऽब्रवीन्महातेजाः सुमन्त्रं मन्त्रिसत्तम।

शीघ्रमानय मे सर्वान् गुरूंस्तान् सपुरोहितान्॥४॥

उन महातेजस्वी, बुद्धिमान् एवं धर्मात्मा राजा ने सुमन्त्र से कहा—’मन्त्रिवर! तुम मेरे समस्त गुरुजनों एवं पुरोहितोंको यहाँ शीघ्र बुला ले आओ’ ॥ ४॥

ततः सुमन्त्रस्त्वरितं गत्वा त्वरितविक्रमः।

समानयत् स तान् सर्वान् समस्तान् वेदपारगान्॥५॥

तब शीघ्रतापूर्वक पराक्रम प्रकट करनेवाले सुमन्त्र तुरंत जाकर उन समस्त वेदविद्याके पारंगत मुनियोंको वहाँ बुला लाये।

सुयज्ञं वामदेवं च जाबालिमथ काश्यपम्।

परोहितं वसिष्ठं च ये चाप्यन्ये द्विजोत्तमाः॥६॥

तान् पूजयित्वा धर्मात्मा राजा दशरथस्तदा।

इदं धर्मार्थसहितं श्लक्ष्णं वचनमब्रवीत्॥७॥

सुयज्ञ, वामदेव, जाबालि, काश्यप, कुलपुरोहित वसिष्ठ तथा और भी जो श्रेष्ठ ब्राह्मण थे, उन सबकी पूजा करके धर्मात्मा राजा दशरथ ने धर्म और अर्थ से युक्त यह मधुर वचन कहा- ॥६-७॥

मम लालप्यमानस्य सुतार्थं नास्ति वै सुखम्।

तदर्थं हयमेधेन यक्ष्यामीति मतिर्मम॥८॥

‘महर्षियो! मैं सदा पुत्रके लिये विलाप करता रहता हूँ। उसके बिना इस राज्य आदिसे मुझे सुख नहीं मिलता; अतः मैंने यह निश्चय किया है कि मैं पुत्रप्राप्तिके लिये अश्वमेधद्वारा भगवान् का यजन करूँ॥८॥

तदहं यष्टुमिच्छामि शास्त्रदृष्टेन कर्मणा।

कथं प्राप्स्याम्यहं कामं बुद्धिरत्रविचिन्त्यताम्॥९॥

‘मेरी इच्छा है कि शास्त्रोक्त विधिसे इस यज्ञका अनुष्ठान करूँ; अतः किस प्रकार मुझे मेरी मनोवाञ्छित वस्तु प्राप्त होगी? इसका विचार आपलोग यहाँ करें’। ९॥

ततः साध्विति तद्वाक्यं ब्राह्मणाः प्रत्यपूजयन्।

वसिष्ठप्रमुखाः सर्वे पार्थिवस्य मुखेरितम्॥१०॥

राजाके ऐसा कहनेपर वसिष्ठ आदि सब ब्राह्मणोंने ‘बहुत अच्छा’ कहकर उनके मुखसे कहे गये पूर्वोक्त वचनकी प्रशंसा की॥१०॥

ऊचुश्च परमप्रीताः सर्वे दशरथं वचः।

सम्भाराः सम्भियन्तां ते तुरगश्च विमुच्यताम्॥११॥

फिर वे सभी अत्यन्त प्रसन्न होकर राजा दशरथसे बोले—’महाराज! यज्ञ-सामग्रीका संग्रह किया जाय। भूमण्डलमें भ्रमणके लिये यज्ञसम्बन्धी अश्व छोड़ा जाय तथा-

सरय्वाश्चोत्तरे तीरे यज्ञभूमिर्विधीयताम्।

सर्वथा प्राप्स्यसे पुत्रानभिप्रेतांश्च पार्थिव॥१२॥

यस्य ते धार्मिकी बुद्धिरियं पत्रार्थमागता।

सरयू के उत्तर तटपर यज्ञभूमि का निर्माण किया जाय। तुम यज्ञ द्वारा सर्वथा अपनी इच्छा के अनुरूप पुत्र प्राप्त कर लोगे; क्यों कि पुत्रके लिये तुम्हारे हृदय में ऐसी धार्मिक बुद्धि का उदय हुआ है’।

ततस्तुष्टोऽभवद् राजा श्रुत्वैतद् द्विजभाषितम्॥१३॥

अमात्यानब्रवीद् राजा हर्षव्याकुललोचनः।

सम्भाराः सम्भ्रियन्तां मे गुरूणां वचनादिह ॥१४॥

ब्राह्मणोंका यह कथन सुनकर राजा बहुत संतुष्ट हुए। हर्षसे उनके नेत्र चञ्चल हो उठे। वे अपने मन्त्रियोंसे

बोले— ‘गुरुजनोंकी आज्ञाके अनुसार यज्ञकी सामग्री यहाँ एकत्र की जाय।

समर्थाधिष्ठितश्चाश्वः सोपाध्यायो विमुच्यताम्।

सरय्वाश्चोत्तरे तीरे यज्ञभूमिर्विधीयताम्॥१५॥

शक्तिशाली वीरों के संरक्षण में उपाध्याय सहित अश्व को छोड़ा जाय। सरयू के उत्तर तट पर यज्ञभूमि का निर्माण हो।

शान्तयश्चापि वर्धन्तां यथाकल्पं यथाविधि।

शक्यः प्राप्तुमयं यज्ञः सर्वेणापि महीक्षिता॥१६॥

शास्त्रोक्त विधि के अनुसार क्रमशः शान्तिकर्म का विस्तार किया जाय (जिससे विघ्नोंका निवारण हो)। सभी राजा इसका सम्पादन कर सकते हैं;-

नापराधो भवेत् कष्टो यद्यस्मिन् क्रतुसत्तमे।

छिद्रं हि मृगयन्ते स्म विद्वांसो ब्रह्मराक्षसाः॥१७॥

यदि इस श्रेष्ठ यज्ञमें कष्टप्रद अपराध बन जानेका भय न हो; परंतु ऐसा होना कठिन है; क्योंकि विद्वान् ब्रह्मराक्षस यज्ञ में विघ्न डालने के लिये छिद्र ढूँढ़ा करते हैं ।

विधिहीनस्य यज्ञस्य सद्यः कर्ता विनश्यति।

तद्यथा विधिपूर्वं मे क्रतुरेष समाप्यते॥१८॥

तथा विधानं क्रियतां समर्थाः साधनेष्विति।

‘विधिहीन यज्ञ का अनुष्ठान करने वाला यजमान तत्काल नष्ट हो जाता है; अतः मेरा यह यज्ञ जिस तरह विधिपूर्वक सम्पन्न हो सके, वैसा उपाय किया जाय। तुम सब लोग ऐसे साधन प्रस्तुत करने में समर्थ हो’।

तथेति चाब्रुवन् सर्वे मन्त्रिणः प्रतिपूजिताः॥१९॥

पार्थिवेन्द्रस्य तद् वाक्यं यथापूर्वं निशम्य ते।

राजाके द्वारा सम्मानित हुए समस्त मन्त्री पूर्ववत् उनके वचनोंको सुनकर बोले-‘बहुत अच्छा, ऐसा ही होगा’

तथा द्विजास्ते धर्मज्ञा वर्धयन्तो नृपोत्तमम्॥२०॥

अनुज्ञातास्ततः सर्वे पुनर्जग्मुर्यथागतम्।

इसी प्रकार वे सभी धर्मज्ञ ब्राह्मण भी नृपश्रेष्ठ दशरथको बधाई देते हुए उनकी आज्ञा लेकर जैसे आये थे, वैसे ही फिर लौट गये॥

विसर्जयित्वा तान् विप्रान् सचिवानिदमब्रवीत्॥२१॥

ऋत्विग्भिरुपसंदिष्टो यथावत् क्रतुराप्यताम्।

उन ब्राह्मणोंको विदा करके राजाने मन्त्रियोंसे कहा —’पुरोहितोंके उपदेशके अनुसार इस यज्ञको विधिवत् पूर्ण करना चाहिये’

इत्युक्त्वा नृपशार्दूलः सचिवान् समुपस्थितान्॥२२॥

विसर्जयित्वा स्वं वेश्म प्रविवेश महामतिः।

वहाँ उपस्थित हुए मन्त्रियोंसे ऐसा कहकर परम बुद्धिमान् नृपश्रेष्ठ दशरथ उन्हें विदा करके अपने महलमें चले गये।

ततः स गत्वा ताः पत्नीनरेन्द्रो हृदयंगमाः॥२३॥

उवाच दीक्षां विशत यक्ष्येऽहं सुतकारणात्।

वहाँ जाकर नरेशने अपनी प्यारी पत्नियोंसे कहा –’देवियो! दीक्षा ग्रहण करो। मैं पुत्रके लिये यज्ञ करूँगा’।

तासां तेनातिकान्तेन वचनेन सुवर्चसाम्।

मुखपद्मान्यशोभन्त पद्मानीव हिमात्यये॥२४॥

उस मनोहर वचनसे उन सुन्दर कान्तिवाली रानियोंके मुखकमल वसन्तऋतुमें विकसित होनेवाले पङ्कजोंके समान खिल उठे और अत्यन्त शोभा पाने लगे।

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डेऽष्टमः सर्गः॥८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में आठवाँ सर्ग पूरा हुआ।

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(सुमन्त्र का दशरथ को ऋष्यशृंग मुनि को बुलाने की सलाह देते हुए उनके अंगदेश जाने और शान्ता से विवाह का प्रसंग सुनाना)

नवमः सर्गः 

सर्ग-09

एतच्छ्रुत्वा रहः सूतो राजानमिदमब्रवीत्।

श्रूयतां तत् पुरावृत्तं पुराणे च मया श्रुतम्॥१॥

पुत्र के लिये अश्वमेध यज्ञ करने की बात सुनकर सुमन्त्रने राजासे एकान्तमें कहा—’महाराज! एक पुराना इतिहास सुनिये। मैंने पुराण में भी इसका वर्णन सुना है।

ऋत्विग्भिरुपदिष्टोऽयं पुरावृत्तो मया श्रुतः।

सनत्कुमारो भगवान् पूर्वं कथितवान् कथाम्॥२॥

ऋषीणां संनिधौ राजंस्तव पुत्रागमं प्रति।

‘ऋत्विजों ने पुत्र-प्राप्तिके लिये इस अश्वमेधरूप उपाय का उपदेश किया है; परंतु मैंने इतिहासके रूपमें कुछ विशेष बात सुनी है। राजन्! पूर्वकालमें भगवान् सनत्कुमारने ऋषियों के निकट एक कथा सुनायी थी।

वह आपकी पुत्रप्राप्ति से सम्बन्ध रखने वाली है।

काश्यपस्य च पुत्रोऽस्ति विभाण्डक इति श्रुतः॥३॥

ऋष्यशृंग इति ख्यातस्तस्य पुत्रो भविष्यति।

स वने नित्यसंवृद्धो मुनिर्वनचरः सदा॥४॥

‘उन्होंने कहा था, मुनिवरो! महर्षि काश्यप के विभाण्डक नाम से प्रसिद्ध एक पुत्र हैं। उनके भी एक पुत्र होगा, जिसकी लोगों में ऋष्यशृंग नाम से प्रसिद्धि होगी। वे ऋष्यशृंग मुनि सदा वन में ही रहेंगे और वन में ही सदा लालन-पालन पाकर वे बड़े होंगे।

नान्यं जानाति विप्रेन्द्रो नित्यं पित्रनुवर्तनात्।

दैविध्यं ब्रह्मचर्यस्य भविष्यति महात्मनः॥५॥

लोकेषु प्रथितं राजन् विप्रैश्च कथितं सदा।

‘सदा पिताके ही साथ रहने के कारण विप्रवर ऋष्यशृंग दूसरे किसी को नहीं जानेंगे। राजन्! लोक में ब्रह्मचर्य के दो रूप विख्यात हैं और ब्राह्मणों ने सदा उन दोनों स्वरूपोंका वर्णन किया है। एक तो है दण्ड, मेखला आदि धारणरूप मुख्य ब्रह्मचर्य और दूसरा है ऋतुकाल में पत्नी-समागमरूप गौण ब्रह्मचर्य। उन महात्माके द्वारा उक्त दोनों प्रकार के ब्रह्मचर्यों का पालन होगा।

तस्यैवं वर्तमानस्य कालः समभिवर्तत॥६॥

अग्निं शुश्रूषमाणस्य पितरं च यशस्विनम्।

“इस प्रकार रहते हुए मुनि का समय अग्नि तथा यशस्वी पिता की सेवा में ही व्यतीत होगा।

एतस्मिन्नेव काले तु रोमपादः प्रतापवान्॥७॥

अंगेषु प्रथितो राजा भविष्यति महाबलः।

तस्य व्यतिक्रमाद् राज्ञो भविष्यति सुदारुणा॥८॥

अनावृष्टिः सुघोरा वै सर्वलोकभयावहा।

“उसी समय अंगदेश में रोमपाद नामक एक बड़े प्रतापी और बलवान् राजा होंगे; उनके द्वारा धर्मका उल्लङ्घन हो जाने के कारण उस देश में घोर अनावृष्टि हो जायगी, जो सब लोगोंको अत्यन्त भयभीत कर देगी॥

अनावृष्टयां तु वृत्तायां राजा दुःखसमन्वितः॥९॥

ब्राह्मणाञ्छुतसंवृद्धान् समानीय प्रवक्ष्यति।

भवन्तः श्रुतकर्माणो लोकचारित्रवेदिनः॥१०॥

समादिशन्तु नियमं प्रायश्चित्तं यथा भवेत्।

“वर्षा बंद हो जानेसे राजा रोमपादको भी बहुत दुःख होगा। वे शास्त्रज्ञानमें बढ़े-चढ़े ब्राह्मणों को

बुलाकर कहेंगे—’विप्रवरो! आप लोग वेद-शास्त्रके अनुसार कर्म करने वाले तथा लोगों के आचार-विचार को जानने वाले हैं; अतः कृपा करके मुझे ऐसा कोई नियम बताइये, जिससे मेरे पापका प्रायश्चित्त हो जाय’।

इत्युक्तास्ते ततो राज्ञा सर्वे ब्राह्मणसत्तमाः॥११॥

वक्ष्यन्ति ते महीपालं ब्राह्मणा वेदपारगाः।

“राजाके ऐसा कहने पर वे वेदों के पारंगत विद्वान्– सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण उन्हें इस प्रकार सलाह देंगे—॥

विभाण्डकसुतं राजन् सर्वोपायैरिहानय॥१२॥

आनाय्य तु महीपाल ऋष्यश्रृंगं सुसत्कृतम्।

विभाण्डकसुतं राजन् ब्राह्मणं वेदपारगम्।

प्रयच्छ कन्यां शान्तां वै विधिना सुसमाहितः॥१३॥

‘राजन्! विभाण्डक के पुत्र ऋष्यशृंग वेदों के पारगामी विद्वान् हैं। भूपाल! आप सभी उपायोंसे उन्हें यहाँ ले आइये। बुलाकर उनका भलीभाँति सत्कार कीजिये। फिर एकाग्रचित्त हो वैदिक विधिके अनुसार उनके साथ अपनी कन्या शान्ता का विवाह कर दीजिये। १२-१३॥

तेषां तु वचनं श्रुत्वा राजा चिन्तां प्रपत्स्यते।

केनोपायेन वै शक्यमिहानेतुं स वीर्यवान्॥१४॥

उनकी बात सुनकर राजा इस चिन्ता में पड़ जायँगे कि किस उपाय से उन शक्तिशाली महर्षि को यहाँ लाया जा सकता है॥१४॥

ततो राजा विनिश्चित्य सह मन्त्रिभिरात्मवान्।

पुरोहितममात्यांश्च प्रेषयिष्यति सत्कृतान्॥१५॥

“फिर वे मनस्वी नरेश मन्त्रियों के साथ निश्चय करके अपने पुरोहित और मन्त्रियों को सत्कारपूर्वक वहाँ भेजेंगे॥ १५ ॥

ते तु राज्ञो वचः श्रुत्वा व्यथिता विनताननाः।

न गच्छेम ऋषेीता अनुनेष्यन्ति तं नृपम्॥१६॥

“राजा की बात सुनकर वे मन्त्री और पुरोहित मुँह लटकाकर दुःखी हो यों कहने लगेंगे कि ‘हम महर्षिसे डरते हैं, इसलिये वहाँ नहीं जायँगे।’ यों कहकर वे राजासे बड़ी अनुनय-विनय करेंगे॥१६॥

वक्ष्यन्ति चिन्तयित्वा ते तस्योपायांश्च तान् क्षमान्।

आनेष्यामो वयं विप्रं न च दोषो भविष्यति॥१७॥

‘इसके बाद सोच-विचारकर वे राजा को योग्य उपाय बतायेंगे और कहेंगे कि ‘हम उन ब्राह्मणकुमार को किसी उपायसे यहाँ ले आयेंगे। ऐसा करनेसे कोई दोष नहीं घटित होगा’ ॥ १७॥

एवमंगाधिपेनैव गणिकाभिषेः सुतः।

आनीतोऽवर्षयद् देवः शान्ता चास्मै प्रदीयते॥१८॥

“इस प्रकार गणिकाओं की सहायता से अंगराज मुनिकुमार ऋष्यशृंग को अपने यहाँ बुलायेंगे। उनके आते ही इन्द्रदेव उस राज्य में वर्षा करेंगे। फिर राजा उन्हें अपनी पुत्री शान्ता समर्पित कर देंगे।॥ १८॥

ऋष्यश्रृंगस्तु जामाता पुत्रांस्तव विधास्यति।

सनत्कुमारकथितमेतावद् व्याहृतं मया॥१९॥

“इस तरह ऋष्यशृंग आपके जामाता हुए। वे ही आपके लिये पुत्रों को सुलभ कराने वाले यज्ञकर्म का सम्पादन करेंगे। यह सनत्कुमारजीकी कही हुई बात मैंने आपसे निवेदन की है” ॥ १९॥ ।

अथ हृष्टो दशरथः सुमन्त्रं प्रत्यभाषत।

यथर्ण्यश्रृंगस्त्वानीतो येनोपायेन सोच्यताम्॥२०॥

यह सुनकर राजा दशरथ को बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने सुमन्त्रसे कहा—’मुनिकुमार ऋष्यशृंगको वहाँ जिस प्रकार और जिस उपायसे बुलाया गया, वह स्पष्टरूपसे बताओ’ ॥ २० ॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे नवमः सर्गः॥९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्डमें नवाँ सर्ग पूरा हुआ॥९॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(अंगदेश में ऋष्यश्रृंग के आने तथा शान्ता के साथ विवाह होने के प्रसंग का विस्तार के साथ वर्णन)

दशमः सर्गः 

सर्ग-10

सुमन्त्रश्चोदितो राज्ञा प्रोवाचेदं वचस्तदा।

यथर्ण्यश्रृंगस्त्वानीतो येनोपायेन मन्त्रिभिः।

तन्मे निगदितं सर्वं शृणु मे मन्त्रिभिः सह ॥१॥

राजाकी आज्ञा पाकर उस समय सुमन्त्रने इस प्रकार कहना आरम्भ किया-“राजन् ! रोमपादके मन्त्रियोंने ऋष्यशृंगको वहाँ जिस प्रकार और जिस उपायसे बुलाया था, वह सब मैं बता रहा हूँ। आप मन्त्रियोंसहित मेरी बात सुनिये॥१॥

रोमपादमुवाचेदं सहामात्यः पुरोहितः।

उपायो निरपायोऽयमस्माभिरभिचिन्तितः॥२॥

“उस समय अमात्योसहित पुरोहितने राजा रोमपादसे कहा—’महाराज! हमलोगोंने एक उपाय सोचा है, जिसे काममें लानेसे किसी भी विघ्न-बाधाके आनेकी सम्भावना नहीं है॥२॥

ऋष्यशृंगो वनचरस्तपःस्वाध्यायसंयुतः।

अनभिज्ञस्तु नारीणां विषयाणां सुखस्य च॥३॥

“ऋष्यशृंग मुनि सदा वनमें ही रहकर तपस्या और स्वाध्यायमें लगे रहते हैं। वे स्त्रियोंको पहचानतेतक नहीं हैं और विषयोंके सुखसे भी सर्वथा अनभिज्ञ हैं।

इन्द्रियार्थैरभिमतैर्नरचित्तप्रमाथिभिः।

पुरमानाययिष्यामः क्षिप्रं चाध्यवसीयताम्॥४॥

“हम मनुष्योंके चित्तको मथ डालनेवाले मनोवाञ्छित विषयोंका प्रलोभन देकर उन्हें अपने नगरमें ले आयेंगे; अतः इसके लिये शीघ्र प्रयत्न किया जाय॥४॥

गणिकास्तत्र गच्छन्तु रूपवत्यः स्वलंकृताः।

प्रलोभ्य विविधोपायैरानेष्यन्तीह सत्कृताः॥५॥

“यदि सुन्दर आभूषणोंसे विभूषित मनोहर रूपवाली वेश्याएँ वहाँ जायँ तो वे भाँति-भाँतिके उपायोंसे उन्हें लुभाकर इस नगरमें ले आयेंगी; अतः इन्हें सत्कारपूर्वक भेजना चाहिये’॥ ५॥

श्रुत्वा तथेति राजा च प्रत्युवाच पुरोहितम्।

पुरोहितो मन्त्रिणश्च तदा चक्रुश्च ते तथा॥६॥

“यह सुनकर राजाने पुरोहितको उत्तर दिया, बहुत अच्छा, आपलोग ऐसा ही करें।’ आज्ञा पाकर पुरोहित और मन्त्रियोंने उस समय वैसी ही व्यवस्था की॥६॥

वारमुख्यास्तु तच्छ्रुत्वा वनं प्रविविशुर्महत्।

आश्रमस्याविदूरेऽस्मिन् यत्नं कुर्वन्ति दर्शने॥७॥

“तब नगरकी मुख्य-मुख्य वेश्याएँ राजाका आदेश सुनकर उस महान् वनमें गयीं और मुनिके आश्रमसे थोड़ी ही दूरपर ठहरकर उनके दर्शनका उद्योग करने लगीं॥ ७॥

ऋषेः पुत्रस्य धीरस्य नित्यमाश्रमवासिनः।

पितुः स नित्यसंतुष्टो नातिचक्राम चाश्रमात्॥८॥

“मुनिकुमार ऋष्यशृंग बड़े ही धीर स्वभावके थे। सदा आश्रममें ही रहा करते थे। उन्हें सर्वदा अपने पिताके पास रहनेमें ही अधिक सुख मिलता था। अतः वे कभी आश्रमके बाहर नहीं निकलते थे॥ ८ ॥

न तेन जन्मप्रभृति दृष्टपूर्वं तपस्विना।

स्त्री वा पुमान् वा यच्चान्यत् सत्त्वं नगरराष्ट्रजम्॥

“उन तपस्वी ऋषिकुमारने जन्मसे लेकर उस समयतक पहले कभी न तो कोई स्त्री देखी थी और न पिताके सिवा दूसरे किसी पुरुषका ही दर्शन किया था। नगर या राष्ट्रके गाँवोंमें उत्पन्न हुए दूसरे-दूसरे प्राणियोंको भी वे नहीं देख पाये थे॥९॥

ततः कदाचित् तं देशमाजगाम यदृच्छया।

विभाण्डकसुतस्तत्र ताश्चापश्यद् वरांगनाः॥१०॥

“तदनन्तर एक दिन विभाण्डककुमार ऋष्यशृंग अकस्मात् घूमते-फिरते उस स्थानपर चले आये, जहाँ वे वेश्याएँ ठहरी हुई थीं। वहाँ उन्होंने उन सुन्दरी वनिताओंको देखा॥१०॥

ताश्चित्रवेषाः प्रमदा गायन्त्यो मधुरस्वरम्।

ऋषिपुत्रमुपागम्य सर्वा वचनमब्रुवन्॥११॥

“उन प्रमदाओंका वेष बड़ा ही सुन्दर और अद्भुत था। वे मीठे स्वरमें गा रही थीं। ऋषिकुमारको आया देख सभी उनके पास चली आयीं और इस प्रकार पूछने लगीं- ॥११॥

कस्त्वं किं वर्तसे ब्रह्मन् ज्ञातुमिच्छामहे वयम्।

एकस्त्वं विजने दूरे वने चरसि शंस नः॥१२॥

“ब्रह्मन् ! आप कौन हैं? क्या करते हैं? तथा इस निर्जन वनमें आश्रमसे इतनी दूर आकर अकेले क्यों विचर रहे हैं? यह हमें बताइये। हमलोग इस बातको जानना चाहती हैं’ ॥ १२॥

अदृष्टरूपास्तास्तेन काम्यरूपा वने स्त्रियः।

हात्तिस्य मतिर्जाता आख्यातुं पितरं स्वकम्॥१३॥

“ऋष्यशृंगने वनमें कभी स्त्रियोंका रूप नहीं देखा था और वे स्त्रियाँ तो अत्यन्त कमनीय रूपसे सुशोभित थीं; अतः उन्हें देखकर उनके मनमें स्नेह उत्पन्न हो गया। इसलिये उन्होंने उनसे अपने पिताका परिचय देनेका विचार किया॥ १३॥

पिता विभाण्डकोऽस्माकं तस्याहं सुत औरसः।

ऋष्यशृंग इति ख्यातं नाम कर्म च मे भुवि॥१४॥

“वे बोले—’मेरे पिताका नाम विभाण्डक मुनि है। मैं उनका औरस पुत्र हूँ। मेरा ऋष्यशृंग नाम और तपस्या आदि कर्म इस भूमण्डलमें प्रसिद्ध है।। १४ ।।

इहाश्रमपदोऽस्माकं समीपे शुभदर्शनाः।

करिष्ये वोऽत्र पूजां वै सर्वेषां विधिपूर्वकम्॥१५॥

“यहाँ पास ही मेरा आश्रम है। आपलोग देखनेमें परम सुन्दर हैं। (अथवा आपका दर्शन मेरे लिये शुभकारक है।) आप मेरे आश्रमपर चलें। वहाँ मैं आप सब लोगोंकी विधिपूर्वक पूजा करूँगा’ ।। १५ । ।

ऋषिपुत्रवचः श्रुत्वा सर्वासां मतिरास वै।

तदाश्रमपदं द्रष्टुं जग्मुः सर्वास्ततोऽङ्गनाः॥१६॥

“ऋषिकुमारकी यह बात सुनकर सब उनसे सहमत हो गयीं। फिर वे सब सुन्दरी स्त्रियाँ उनका आश्रम देखनेके लिये वहाँ गयीं॥ १६॥

गतानां तु ततः पूजामृषिपुत्रश्चकार ह।

इदमर्ध्यमिदं पाद्यमिदं मूलं फलं च नः॥१७॥

“वहाँ जानेपर ऋषिकुमारने ‘यह अर्घ्य है, यह पाद्य है तथा यह भोजनके लिये फल-मूल प्रस्तुत है’ ऐसा कहते हुए उन सबका विधिवत् पूजन किया॥ १७॥

प्रतिगृह्य तु तां पूजां सर्वा एव समुत्सुकाः।

ऋषेीताश्च शीघ्रं तु गमनाय मतिं दधुः॥१८॥

“ऋषिकी पूजा स्वीकार करके वे सभी वहाँसे चली जानेको उत्सुक हुईं। उन्हें विभाण्डक मुनिका भय लग रहा था, इसलिये उन्होंने शीघ्र ही वहाँसे चली जानेका विचार किया। १८॥

अस्माकमपि मुख्यानि फलानीमानि हे द्विज।

गृहाण विप्र भद्रं ते भक्षयस्व च मा चिरम्॥१९॥

“वे बोलीं—’ब्रह्मन् ! हमारे पास भी ये उत्तम-उत्तम फल हैं। विप्रवर! इन्हें ग्रहण कीजिये। आपका कल्याण हो। इन फलोंको शीघ्र ही खा लीजिये, विलम्ब न कीजिये’ ॥ १९॥

ततस्तास्तं समालिङ्ग्य सर्वा हर्षसमन्विताः।

मोदकान् प्रददुस्तस्मै भक्ष्यांश्च विविधाञ्छुभान्॥२०॥

“ऐसा कहकर उन सबने हर्षमें भरकर ऋषिका आलिंगन किया और उन्हें खानेयोग्य भाँति-भाँतिके उत्तम पदार्थ तथा बहुत-सी मिठाइयाँ दीं॥२०॥

तानि चास्वाद्य तेजस्वी फलानीति स्म मन्यते।

अनास्वादितपूर्वाणि वने नित्यनिवासिनाम्॥२१॥

“उनका रसास्वादन करके उन तेजस्वी ऋषिने समझा कि ये भी फल हैं; क्योंकि उस दिनके पहले उन्होंने कभी वैसे पदार्थ नहीं खाये थे। भला, सदा वनमें रहनेवालोंके लिये वैसी वस्तुओंके स्वाद लेनेका अवसर ही कहाँ है ॥ २१॥

आपृच्छ्य च तदा विप्रं व्रतचर्यां निवेद्य च।

गच्छन्ति स्मापदेशात्ता भीतास्तस्य पितुः स्त्रियः॥२२॥

“तत्पश्चात् उनके पिता विभाण्डक मुनि के डरसे डरी हुई वे स्त्रियाँ व्रत और अनुष्ठान की बात बता उन ब्राह्मणकुमार से पूछकर उसी बहाने वहाँ से चली गयी। २२॥

गतासु तासु सर्वासु काश्यपस्यात्मजो द्विजः।

अस्वस्थहृदयश्चासीद् दुःखाच्च परिवर्तते॥२३॥

“उन सबके चले जानेपर काश्यपकुमार ब्राह्मण ऋष्यशृंग मन-ही-मन व्याकुल हो उठे और बड़े दुःखसे इधर-उधर टहलने लगे॥ २३ ॥

ततोऽपरेधुस्तं देशमाजगाम स वीर्यवान्।

विभाण्डकसुतः श्रीमान् मनसाचिन्तयन्मुहुः॥२४॥

मनोज्ञा यत्र ता दृष्टा वारमुख्याः स्वलंकृताः।

“तदनन्तर दूसरे दिन फिर मनसे उन्हींका बारम्बार चिन्तन करते हुए शक्तिशाली विभाण्डककुमार श्रीमान् ऋष्यशृंग उसी स्थान पर गये, जहाँ पहले दिन उन्होंने वस्त्र और आभूषणोंसे सजी हुई उन मनोहर रूपवाली वेश्याओं को देखा था।

दृष्ट्वैव च ततो विप्रमायान्तं हृष्टमानसाः॥२५॥

उपसृत्य ततः सर्वास्तास्तमूचुरिदं वचः।

एह्याश्रमपदं सौम्य अस्माकमिति चाब्रुवन्॥२६॥

“ब्राह्मण ऋष्यशृंग को आते देख तुरंत ही उन वेश्याओं का हृदय प्रसन्नतासे खिल उठा। वे सब-की सब उनके पास जाकर उनसे इस प्रकार कहने लगी —’सौम्य! आओ, आज हमारे आश्रम पर चलो। २५-२६॥

चित्राण्यत्र बहूनि स्युर्मूलानि च फलानि च।

तत्राप्येष विशेषेण विधिर्हि भविता ध्रुवम्॥२७॥

यद्यपि यहाँ नाना प्रकारके फल-मूल बहुत मिलते हैं तथापि वहाँ भी निश्चय ही इन सबका विशेषरूपसे प्रबन्ध हो सकता है’ ॥ २७॥

श्रुत्वा तु वचनं तासां सर्वासां हृदयंगमम्।

गमनाय मतिं चक्रे तं च निन्युस्तथा स्त्रियः॥२८॥

“उन सबके मनोहर वचन सुनकर ऋष्यशृंग उनके साथ जानेको तैयार हो गये और वे स्त्रियाँ उन्हें अंगदेशमें ले गयीं॥ २८॥

तत्र चानीयमाने तु विप्रे तस्मिन् महात्मनि।

ववर्ष सहसा देवो जगत् प्रह्लादयंस्तदा ॥२९॥

“उन महात्मा ब्राह्मणके अंगदेशमें आते ही इन्द्रने सम्पूर्ण जगत् को प्रसन्न करते हुए सहसा पानी बरसाना आरम्भ कर दिया॥ २९॥ ।

वर्षेणैवागतं विप्रं तापसं स नराधिपः।

प्रत्युद्गम्य मुनिं प्रह्वः शिरसा च महीं गतः॥३०॥

“वर्षासे ही राजाको अनुमान हो गया कि वे तपस्वी ब्राह्मणकुमार आ गये। फिर बड़ी विनयके साथ राजाने उनकी अगवानी की और पृथ्वीपर मस्तक टेककर उन्हें साष्टांग प्रणाम किया॥

अर्घ्यं च प्रददौ तस्मै न्यायतः सुसमाहितः।

वने प्रसादं विप्रेन्द्रान्मा विप्रं मन्युराविशेत्॥३१॥

“फिर एकाग्रचित्त होकर उन्होंने ऋषिको अर्घ्य निवेदन किया तथा उन विप्रशिरोमणिसे वरदान माँगा, ‘भगवन् ! आप और आपके पिताजीका कृपाप्रसाद मुझे प्राप्त हो।’ ऐसा उन्होंने इसलिये किया कि कहीं कपटपूर्वक यहाँतक लाये जानेका रहस्य जान लेनेपर विप्रवर ऋष्यशृंग अथवा विभाण्डक मुनिके मनमें मेरे प्रति क्रोध न हो ॥ ३१॥

अन्तःपुरं प्रवेश्यास्मै कन्यां दत्त्वा यथाविधि।

शान्तां शान्तेन मनसा राजा हर्षमवाप सः॥ ३२॥

“तत्पश्चात् ऋष्यशृंगको अन्तःपुरमें ले जाकर उन्होंने शान्तचित्तसे अपनी कन्या शान्ताका उनके साथ विधिपूर्वक विवाह कर दिया। ऐसा करके राजाको बड़ी प्रसन्नता हुई॥३२॥

एवं स न्यवसत् तत्र सर्वकामैः सुपूजितः।

ऋष्यश्रृंगो महातेजाः शान्तया सह भार्यया॥३३॥

“इस प्रकार महातेजस्वी ऋष्यशृंग राजा से पूजित हो सम्पूर्ण मनोवाञ्छित भोग प्राप्त कर अपनी धर्मपत्नी शान्ता के साथ वहाँ रहने लगे’ ॥ ३३॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे दशमः सर्गः॥१०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्डमें दसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १० ॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(सुमन्त्र के कहने से राजा दशरथ का सपरिवार अंगराज के यहाँ जाकर वहाँ से शान्ता और ऋष्यश्रृंग को अपने घर ले आना)

एकादशः सर्गः 

सर्ग-11

भूय एव हि राजेन्द्र शृणु मे वचनं हितम्।

यथा स देवप्रवरः कथयामास बुद्धिमान्॥१॥

तदनन्तर सुमन्त्रने फिर कहा-“राजेन्द्र! आप पुनः मुझसे अपने हितकी वह बात सुनिये, जिसे देवताओंमें श्रेष्ठ बुद्धिमान् सनत्कुमारजीने ऋषियोंको सुनाया था।

इक्ष्वाकूणां कुले जातो भविष्यति सुधार्मिकः।

नाम्ना दशरथो राजा श्रीमान् सत्यप्रतिश्रवः॥२॥

“उन्होंने कहा था-इक्ष्वाकुवंशमें दशरथ नामसे प्रसिद्ध एक परम धार्मिक सत्यप्रतिज्ञ राजा होंगे॥२॥

अंगराजेन सख्यं च तस्य राज्ञो भविष्यति।

कन्या चास्य महाभागा शान्ता नाम भविष्यति॥३॥

“उनकी अंगराजके साथ मित्रता होगी। दशरथ के एक परम सौभाग्यशालिनी कन्या होगी, जिसका नाम होगा ‘शान्ता’*।

पुत्रस्त्वंगस्य राज्ञस्तु रोमपाद इति श्रुतः।

तं स राजा दशरथो गमिष्यति महायशाः॥४॥

अंगदेशके राजकुमारका नाम होगा ‘रोमपाद’। महायशस्वी राजा दशरथ उनके पास जायेंगे और कहेंगे —

अनपत्योऽस्मि धर्मात्मन् शान्ताभर्ता मम

क्रतुम्। आहरेत त्वयाऽऽज्ञप्तः संतानार्थं कुलस्य च॥

‘धर्मात्मन् ! मैं संतानहीन हूँ। यदि आप आज्ञा दें तो शान्ताके पति ऋष्यशृंग मुनि चलकर मेरा यज्ञ करा दें। इससे मुझे पुत्रकी प्राप्ति होगी और मेरे वंशकी रक्षा हो जायगी’ ॥

[* शान्ता राजा दशरथ एवं कौसल्याकी औरस पुत्री थी। उन्होंने राजा रोमपादको उसे दत्तक पुत्रीके रूपमें दिया था। इस प्रकार वह राजा दशरथकी औरसी और राजा रोमपादकी दत्तक कन्या थी। (श्रीविष्णुपुराण ४।१८।१७-१८)]

श्रुत्वा राज्ञोऽथ तद् वाक्यं मनसा स विचिन्त्य

च। प्रदास्यते पुत्रवन्तं शान्ताभर्तारमात्मवान्॥६॥

“राजाकी यह बात सुनकर मन-ही-मन उसपर विचार करके मनस्वी राजा रोमपाद शान्ताके पुत्रवान् पतिको उनके साथ भेज देंगे॥६॥

प्रतिगृह्य च तं विप्रं स राजा विगतज्वरः।

आहरिष्यति तं यज्ञं प्रहृष्टेनान्तरात्मना॥७॥

“ब्राह्मण ऋष्यशृंगको पाकर राजा दशरथकी सारी चिन्ता दूर हो जायगी और वे प्रसन्नचित्त होकर उस यज्ञका अनुष्ठान करेंगे॥७॥

तं च राजा दशरथो यशस्कामः कृताञ्जलिः।

ऋष्यशृंगं द्विजश्रेष्ठं वरयिष्यति धर्मवित्॥८॥

यज्ञार्थं प्रसवार्थं च स्वर्गार्थं च नरेश्वरः।

लभते च स तं कामं द्विजमुख्याद्विशाम्पतिः॥९॥

“यशकी इच्छा रखने वाले धर्मज्ञ राजा दशरथ हाथ जोड़कर द्विजश्रेष्ठ ऋष्यशृंग का यज्ञ, पुत्र और स्वर्ग के लिये वरण करेंगे तथा वे प्रजापालक नरेश उन श्रेष्ठ ब्रह्मर्षि से अपनी अभीष्ट वस्तु प्राप्त कर लेंगे॥ ८-९॥

पुत्राश्चास्य भविष्यन्ति चत्वारोऽमितविक्रमाः।

वंशप्रतिष्ठानकराः सर्वभूतेषु विश्रुताः॥१०॥

“राजाके चार पुत्र होंगे, जो अप्रमेय पराक्रमी, वंशकी मर्यादा बढ़ानेवाले और सर्वत्र विख्यात होंगे॥

एवं स देवप्रवरः पूर्वं कथितवान् कथाम्।

सनत्कुमारो भगवान् पुरा देवयुगे प्रभुः॥११॥

“महाराज! पहले सत्ययुगमें शक्तिशाली देवप्रवर भगवान् सनत्कुमारजीने ऋषियोंके समक्ष । ऐसी कथा कही थी॥११॥

स त्वं पुरुषशार्दूल समानय ससत्कृतम्।

स्वयमेव महाराज गत्वा सबलवाहनः॥१२॥

“पुरुषसिंह महाराज! इसलिये आप स्वयं ही सेना और सवारियों के साथ अंगदेशमें जाकर मुनिकुमार ऋष्यशृंग को सत्कारपूर्वक यहाँ ले आइये”॥ १२॥

सुमन्त्रस्य वचः श्रुत्वा हृष्टो दशरथोऽभवत्।

अनुमान्य वसिष्ठं च सूतवाक्यं निशाम्य च॥१३॥

सान्तःपुरः सहामात्यः प्रययौ यत्र स द्विजः।

सुमन्त्रका वचन सुनकर राजा दशरथ को बड़ा हर्ष हुआ। उन्होंने मुनिवर वसिष्ठजी को भी सुमन्त्र की बातें सुनायीं और उनकी आज्ञा लेकर रनिवास की रानियों तथा मन्त्रियों के साथ अंगदेश के लिये प्रस्थान किया, जहाँ विप्रवर ऋष्यशृंग निवास करते थे॥ १३ १/२॥

वनानि सरितश्चैव व्यतिक्रम्य शनैः शनैः॥१४॥

अभिचक्राम तं देशं यत्र वै मुनिपुंगवः।

मार्गमें अनेकानेक वनों और नदियोंको पार करके वे धीरे-धीरे उस देशमें जा पहुँचे, जहाँ मुनिवर ऋष्यशृंग विराजमान थे॥ १४ १/२॥

आसाद्य तं द्विजश्रेष्ठं रोमपादसमीपगम्॥१५॥

ऋषिपुत्रं ददर्शाथो दीप्यमानमिवानलम्।

वहाँ पहुँचनेपर उन्हें द्विजश्रेष्ठ ऋष्यशृंग रोमपादके पास ही बैठे दिखायी दिये। वे ऋषिकुमार प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी जान पड़ते थे॥ १५ १/२॥

ततो राजा यथायोग्यं पूजां चक्रे विशेषतः॥१६॥

सखित्वात् तस्य वै राज्ञः प्रहृष्टेनान्तरात्मना।

रोमपादेन चाख्यातमृषिपुत्राय धीमते॥१७॥

सख्यं सम्बन्धकं चैव तदा तं प्रत्यपूजयत्।

तदनन्तर राजा रोमपाद ने मित्रता के नाते अत्यन्त प्रसन्न हृदय से महाराज दशरथ का शास्त्रोक्त विधि के अनुसार विशेषरूप से पूजन किया और बुद्धिमान् ऋषिकुमार ऋष्यशृंगको राजा दशरथ के साथ अपनी मित्रता की बात बतायी। उस पर उन्होंने भी राजा का सम्मान किया।

एवं सुसत्कृतस्तेन सहोषित्वा नरर्षभः॥१८॥

सप्ताष्टदिवसान् राजा राजानमिदमब्रवीत्।

शान्ता तव सुता राजन् सह भर्ना विशाम्पते॥१९॥

मदीयं नगरं यातु कार्यं हि महदुद्यतम्।

इस प्रकार भलीभाँति आदर-सत्कार पाकर नरश्रेष्ठ राजा दशरथ रोमपाद के साथ वहाँ सातआठ दिनों तक रहे। इसके बाद वे अंगराज से बोले —’प्रजापालक नरेश! तुम्हारी पुत्री शान्ता अपने पति के साथ मेरे नगरमें पदार्पण करे; क्योंकि वहाँ एक महान् आवश्यक कार्य उपस्थित हुआ है’। १८-१९ १/२॥

तथेति राजा संश्रुत्य गमनं तस्य धीमतः॥२०॥

उवाच वचनं विप्रं गच्छ त्वं सह भार्यया। ।

ऋषिपुत्रः प्रतिश्रुत्य तथेत्याह नृपं तदा ॥२१॥

राजा रोमपादने ‘बहुत अच्छा’ कहकर उन बुद्धिमान् महर्षिका जाना स्वीकार कर लिया और ऋष्यशृंगसे कहा- ‘विप्रवर! आप शान्ताके साथ महाराज दशरथके यहाँ जाइये।’ राजाकी आज्ञा पाकर उन ऋषिपुत्रने ‘तथास्तु’ कहकर राजा दशरथको अपने चलनेकी स्वीकृति दे दी। २०-२१॥

स नृपेणाभ्यनुज्ञातः प्रययौ सह भार्यया।

तावन्योन्याञ्जलिं कृत्वा स्नेहात्संश्लिष्य चोरसा॥२२॥

ननन्दतुर्दशरथो रोमपादश्च वीर्यवान्।

ततः सुहृदमापृच्छ्य प्रस्थितो रघुनन्दनः॥२३॥

राजा रोमपादकी अनुमति ले ऋष्यशृंगने पत्नीके साथ वहाँसे प्रस्थान किया। उस समय शक्तिशाली राजा रोमपाद और दशरथने एकदूसरेको हाथ जोड़कर स्नेहपूर्वक छाती से लगाया तथा अभिनन्दन किया। फिर मित्र से विदा ले रघुकुलनन्दन दशरथ वहाँ से प्रस्थित हुए। २२-२३॥

पौरेषु प्रेषयामास दूतान् वै शीघ्रगामिनः।

क्रियतां नगरं सर्वं क्षिप्रमेव स्वलंकृतम्॥२४॥

धूपितं सिक्तसम्मृष्टं पताकाभिरलंकृतम्।

उन्होंने पुरवासियोंके पास अपने शीघ्रगामी दूत भेजे और कहलाया कि ‘समस्त नगरको शीघ्र ही सुसज्जित किया जाय। सर्वत्र धूपकी सुगन्ध फैले। नगरकी सड़कोंको झाड़-बुहारकर उनपर पानीका छिड़काव कर दिया जाय तथा सारा नगर ध्वजा-पताकाओंसे अलंकृत हो’ ।। २४ १/२ ॥

ततः प्रहृष्टाः पौरास्ते श्रुत्वा राजानमागतम्॥२५॥

तथा चक्रुश्च तत् सर्वं राज्ञा यत् प्रेषितं तदा।

राजाका आगमन सुनकर पुरवासी बड़े प्रसन्न हुए। महाराजने उनके लिये जो संदेश भेजा था, उसका उन्होंने उस समय पूर्णरूपसे पालन किया॥ २५ १/२॥

ततः स्वलंकृतं राजा नगरं प्रविवेश ह॥२६॥

शङ्खदुन्दुभिनिर्हादैः पुरस्कृत्वा द्विजर्षभम्।

तदनन्तर राजा दशरथने शङ्ख और दुन्दुभि आदि वाद्योंकी ध्वनिके साथ विप्रवर ऋष्यशृंगको आगे करके अपने सजे-सजाये नगरमें प्रवेश किया॥ २६ १/२॥

ततः प्रमुदिताः सर्वे दृष्ट्वा वै नागरा द्विजम्॥२७॥

प्रवेश्यमानं सत्कृत्य नरेन्द्रेणेन्द्रकर्मणा।

यथा दिवि सुरेन्द्रेण सहस्राक्षेण काश्यपम्॥२८॥

उन द्विजकुमारका दर्शन करके सभी नगरनिवासी बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने इन्द्रके

समान पराक्रमी नरेन्द्र दशरथके साथ पुरीमें प्रवेश । करते हुए ऋष्यशृंगका उसी प्रकार सत्कार किया,

जैसे देवताओंने स्वर्गमें सहस्राक्ष इन्द्रके साथ । प्रवेश करते हुए कश्यपनन्दन वामनजीका समादर किया था॥ २७-२८॥

अन्तःपुरं प्रवेश्यैनं पूजां कृत्वा च शास्त्रतः।

कृतकृत्यं तदात्मानं मेने तस्योपवाहनात्॥२९॥

ऋषिको अन्तःपुरमें ले जाकर राजाने शास्त्रविधिके अनुसार उनका पूजन किया और उनके निकट आ जानेसे अपनेको कृतकृत्य माना॥ २९॥

अन्तःपुराणि सर्वाणि शान्तां दृष्ट्वा तथागताम्।

सह भा विशालाक्षीं प्रीत्यानन्दमुपागमन्॥३०॥

विशाललोचना शान्ताको इस प्रकार अपने पति के साथ उपस्थित देख अन्तःपुर की सभी रानियों को बड़ी प्रसन्नता हुई। वे आनन्दमग्न हो गयीं॥३०॥

पूज्यमाना तु ताभिः सा राज्ञा चैव विशेषतः।

उवास तत्र सुखिता कञ्चित् कालं सहद्विजा॥

शान्ता भी उन रानियोंसे तथा विशेषतः महाराज । दशरथके द्वारा आदर-सत्कार पाकर वहाँ कुछ

कालतक अपने पति विप्रवर ऋष्यशृंगके साथ बड़े सुखसे रही॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकादशः सर्गः ॥११॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें ग्यारहवाँ सर्ग पूरा हुआ। ११॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(ऋषियों का दशरथ को और दशरथ का मन्त्रियों को यज्ञ की आवश्यक तैयारी करने के लिये आदेश देना)

द्वादशः सर्गः 

सर्ग-12

ततः काले बहुतिथे कस्मिंश्चित् सुमनोहरे।

वसन्ते समनुप्राप्ते राज्ञो यष्टुं मनोऽभवत्॥१॥

तदनन्तर बहुत समय बीत जाने के पश्चात् कोई परम मनोहर-दोष रहित समय प्राप्त हुआ। उस समय वसन्त ऋतुका आरम्भ हुआ था। राजा दशरथने उसी शुभ समयमें यज्ञ आरम्भ करनेका विचार किया॥१॥

ततः प्रणम्य शिरसा तं विप्रं देववर्णिनम्।

यज्ञाय वरयामास संतानार्थं कुलस्य च॥२॥

तत्पश्चात् उन्होंने देवोपम कान्तिवाले विप्रवर ऋष्यशृंगको मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और वंशपरम्परा की रक्षा के लिये पुत्र-प्राप्तिके निमित्त यज्ञ कराने के उद्देश्य से उनका वरण किया॥२॥

तथेति च स राजानमुवाच वसुधाधिपम्।

सम्भाराः सम्भ्रियन्तां ते तुरगश्च विमुच्यताम्॥३॥

सरय्वाश्चोत्तरे तीरे यज्ञभूमिर्विधीयताम्।

ऋष्यशृंगने ‘बहुत अच्छा’ कहकर उनकी प्रार्थना स्वीकार की और उन पृथ्वीपति नरेश से कहा—’राजन! यज्ञकी सामग्री एकत्र कराइये। भूमण्डल में भ्रमण के लिये आपका यज्ञ सम्बन्धी अश्व छोड़ा जाय और सरयू के उत्तर तट पर यज्ञभूमि का निर्माण किया जाय’॥ ३ १/२॥

ततोऽब्रवीन्नृपो वाक्यं ब्राह्मणान् वेदपारगान्॥४॥

सुमन्त्रावाहय क्षिप्रमृत्विजो ब्रह्मवादिनः।

तब राजा ने कहा—’सुमन्त्र! तुम शीघ्र ही वेदविद्या के पारंगत ब्राह्मणों तथा ब्रह्मवादी ऋत्विजों को बुला ले आओ।

सुयज्ञं वामदेवं च जाबालिमथ काश्यपम्॥५॥

पुरोहितं वसिष्ठं च ये चान्ये द्विजसत्तमाः।

सुयज्ञ, वामदेव, जाबालि, काश्यप, पुरोहित वसिष्ठ तथा अन्य जो श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं, उन सबको बुलाओ’

ततः सुमन्त्रस्त्वरितं गत्वा त्वरितविक्रमः॥६॥

समानयत् स तान् सर्वान् समस्तान् वेदपारगान्।

तब शीघ्रगामी सुमन्त्र तुरंत जाकर वेदविद्या के पारगामी उन समस्त ब्राह्मणोंको बुला लाये॥ ६ १/२॥

तान् पूजयित्वा धर्मात्मा राजा दशरथस्तदा॥७॥

धर्मार्थसहितं युक्तं श्लक्ष्णं वचनमब्रवीत्।

धर्मात्मा राजा दशरथ ने उन सबका पूजन किया और उनसे धर्म तथा अर्थ से युक्त मधुर वचन कहा ॥७ १/२॥

मम तातप्यमानस्य पुत्रार्थं नास्ति वै सुखम्॥८॥

पुत्रार्थं हयमेधेन यक्ष्यामीति मतिर्मम।

‘महर्षियो! मैं पुत्रके लिये निरन्तर संतप्त रहता हूँ। उसके बिना इस राज्य आदिसे भी मुझे सुख नहीं मिलता है। अतः मैंने यह विचार किया है कि पुत्रके लिये अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान करूँ॥ ८ १/२॥

तदहं यष्टुमिच्छामि हयमेधेन कर्मणा॥९॥

ऋषिपुत्रप्रभावेण कामान् प्राप्स्यामि चाप्यहम्।

‘इसी संकल्पके अनुसार मैं अश्वमेध यज्ञका आरम्भ करना चाहता हूँ। मुझे विश्वास है कि ऋषिपुत्र ऋष्यशृंगके प्रभावसे मैं अपनी सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लूँगा’ ॥ ९ १/२ ॥

ततः साध्विति तद्वाक्यं ब्राह्मणाः प्रत्यपूजयन्॥१०॥

वसिष्ठप्रमुखाः सर्वे पार्थिवस्य मुखाच्च्युतम्।

राजा दशरथके मुखसे निकले हुए इस वचनकी वसिष्ठ आदि सब ब्राह्मणोंने ‘साधु-साधु’ कहकर बड़ी सराहना की॥ १० १/२॥

ऋष्यशृंगपुरोगाश्च प्रत्यूचुर्नृपतिं तदा ॥११॥

सम्भाराः सम्भ्रियन्तां ते तुरगश्च विमुच्यताम्।

सरय्वाश्चोत्तरे तीरे यज्ञभूमिर्विधीयताम्॥१२॥

इसके बाद ऋष्यशृंग आदि सब महर्षियोंने उस समय राजा दशरथसे पुनः यह बात कही —’महाराज! यज्ञसामग्रीका संग्रह किया जाय, यज्ञसम्बन्धी अश्व छोड़ा जाय तथा सरयूके उत्तर तटपर यज्ञभूमिका निर्माण किया जाय॥११-१२।।

सर्वथा प्राप्स्यसे पुत्रांश्चतुरोऽमितविक्रमान्।

यस्य ते धार्मिकी बुद्धिरियं पुत्रार्थमागता॥१३॥

‘तुम यज्ञद्वारा सर्वथा चार अमित पराक्रमी पुत्र प्राप्त करोगे; क्योंकि पुत्रके लिये तुम्हारे मनमें ऐसे धार्मिक विचारका उदय हुआ है’ ॥ १३॥

ततः प्रीतोऽभवद् राजा श्रुत्वा तु द्विजभाषितम्।

अमात्यानब्रवीद् राजा हर्षेणेदं शुभाक्षरम्॥१४॥

ब्राह्मणोंकी यह बात सुनकर राजाको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने बड़े हर्षके साथ अपने मन्त्रियोंसे यह शुभ अक्षरोंवाली बात कही॥ १४ ॥

गुरूणां वचनाच्छीघ्रं सम्भाराः सम्भ्रियन्तु मे।

समर्थाधिष्ठितश्चाश्वः सोपाध्यायो विमुच्यताम्॥१५॥

‘गुरुजनोंकी आज्ञाके अनुसार तुमलोग शीघ्र ही मेरे लिये यज्ञकी सामग्री जुटा दो। शक्तिशाली वीरोंके संरक्षणमें यज्ञिय अश्व छोड़ा जाय और उसके साथ प्रधान ऋत्विज् भी रहें॥ १५ ॥

सरय्वाश्चोत्तरे तीरे यज्ञभूमिर्विधीयताम्।

शान्तयश्चाभिवर्धन्तां यथाकल्पं यथाविधि॥१६॥

‘सरयूके उत्तर तटपर यज्ञभूमिका निर्माण हो, शास्त्रोक्त विधिके अनुसार क्रमशः शान्तिकर्म

पुण्याहवाचन आदिका विस्तारपूर्वक अनुष्ठान किया जाय, जिससे विघ्नोंका निवारण हो ॥ १६ ॥

शक्यः कर्तुमयं यज्ञः सर्वेणापि महीक्षिता।

नापराधो भवेत् कष्टो यद्यस्मिन् क्रतुसत्तमे॥१७॥

‘यदि इस श्रेष्ठ यज्ञमें कष्टप्रद अपराध बन जानेका भय न हो तो सभी राजा इसका सम्पादन कर सकते हैं॥ १७॥

छिद्रं हि मृगयन्त्येते विद्वांसो ब्रह्मराक्षसाः।

विधिहीनस्य यज्ञस्य सद्यः कर्ता विनश्यति॥१८॥

‘परंतु ऐसा होना कठिन है; क्योंकि ये विद्वान् ब्रह्म-राक्षस यज्ञमें विघ्न डालनेके लिये छिद्र ढूँढ़ा करते हैं। विधिहीन यज्ञका अनुष्ठान करनेवाला यजमान तत्काल नष्ट हो जाता है॥ १८॥

तद् यथा विधिपूर्वं मे क्रतुरेष समाप्यते।

तथा विधानं क्रियतां समर्थाः करणेष्विह॥१९॥

‘अतः मेरा यह यज्ञ जिस तरह विधिपूर्वक सम्पूर्ण हो सके वैसा उपाय किया जाय। तुम सब लोग ऐसे साधन प्रस्तुत करनेमें समर्थ हो’ ॥ १९ ॥

तथेति च ततः सर्वे मन्त्रिणः प्रत्यपूजयन्।

पार्थिवेन्द्रस्य तद् वाक्यं यथाज्ञप्तमकुर्वत॥२०॥

तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर सभी मन्त्रियोंने राजराजेश्वर दशरथके उस कथनका आदर किया और उनकी आज्ञाके अनुसार सारी व्यवस्था की। २०॥

ततो द्विजास्ते धर्मज्ञमस्तुवन् पार्थिवर्षभम्।

अनुज्ञातास्ततः सर्वे पुनर्जग्मुर्यथागतम्॥ २१॥

तत्पश्चात् उन ब्राह्मणों ने भी धर्मज्ञ नृपश्रेष्ठ दशरथ की प्रशंसा की और उनकी आज्ञा पाकर सब जैसे आये थे, वैसे ही फिर चले गये॥२१॥

गतेषु तेषु विप्रेषु मन्त्रिणस्तान् नराधिपः।

विसर्जयित्वा स्वं वेश्म प्रविवेश महामतिः॥२२॥

उन ब्राह्मणों के चले जानेपर मन्त्रियोंको भी विदा करके वे महाबुद्धिमान् नरेश अपने महल में गये॥ २२॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे द्वादशः सर्गः॥१२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें बारहवाँ सर्ग पूरा हुआ।॥१२॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(यज्ञ की तैयारी, राजाओं को बुलाने के आदेश एवं उनका सत्कार तथा पत्नियों सहित राजा दशरथ का यज्ञ की दीक्षा लेना)

त्रयोदशः सर्गः 

सर्ग-13

पुनः प्राप्ते वसन्ते तु पूर्णः संवत्सरोऽभवत्।

प्रसवार्थं गतो यष्टुं हयमेधेन वीर्यवान्॥१॥

वर्तमान वसन्त ऋतु के बीतने पर जब पुनः दूसरा वसन्त आया, तबतक एक वर्षका समय पूरा हो गया। उस समय शक्तिशाली राजा दशरथ संतानके लिये अश्वमेध यज्ञकी दीक्षा लेने के निमित्त वसिष्ठजी के समीप गये॥

अभिवाद्य वसिष्ठं च न्यायतः प्रतिपूज्य च।

अब्रवीत् प्रश्रितं वाक्यं प्रसवार्थं द्विजोत्तमम्॥२॥

वसिष्ठजीको प्रणाम करके राजाने न्यायतः उनका पूजन किया और पुत्र-प्राप्तिका उद्देश्य लेकर उन द्विजश्रेष्ठ मुनिसे यह विनययुक्त बात कही॥२॥

यज्ञो मे क्रियतां ब्रह्मन् यथोक्तं मुनिपुंगव।

यथा न विघ्नाः क्रियन्ते यज्ञांगेषु विधीयताम्॥

‘ब्रह्मन्! मुनिप्रवर! आप शास्त्रविधिके अनुसार मेरा यज्ञ करावें और यज्ञके अंगभूत अश्वसंचारण आदि में ब्रह्मराक्षस आदि जिस तरह विघ्न न डाल सकें, वैसा उपाय कीजिये॥३॥

भवान् स्निग्धः सुहृन्मह्यं गुरुश्च परमो महान्।

वोढव्यो भवता चैव भारो यज्ञस्य चोद्यतः॥४॥

‘आपका मुझपर विशेष स्नेह है, आप मेरे सुहृद्-अकारण हितैषी, गुरु और परम महान् हैं। यह जो यज्ञका भार उपस्थित हुआ है, इसको आप ही वहन कर सकते हैं ॥ ४॥

तथेति च स राजानमब्रवीद द्विजसत्तमः।

करिष्ये सर्वमेवैतद् भवता यत् समर्थितम्॥

तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर विप्रवर वसिष्ठ मुनि राजासे इस प्रकार बोले—’नरेश्वर ! तुमने जिसके लिये प्रार्थना की है, वह सब मैं करूँगा’॥ ५॥

ततोऽब्रवीद् द्विजान् वृद्धान् यज्ञकर्मसुनिष्ठितान्।

स्थापत्ये निष्ठितांश्चैव वृद्धान् परमधार्मिकान्॥६॥

कान्तिकान् शिल्पकारान् वर्धकीन् खनकानपि।

गणकान् शिल्पिनश्चैव तथैव नटनर्तकान्॥७॥

तथा शुचीन् शास्त्रविदः पुरुषान् सुबहुश्रुतान्।

यज्ञकर्म समीहन्तां भवन्तो राजशासनात्॥८॥

तदनन्तर वसिष्ठजीने यज्ञसम्बन्धी कर्मोंमें निपुण तथा यज्ञविषयक शिल्पकर्ममें कुशल, परम धर्मात्मा, बूढ़े ब्राह्मणों, यज्ञकर्म समाप्त होनेतक उसमें सेवा करनेवाले सेवकों, शिल्पकारों, बढ़इयों, भूमि खोदनेवालों, ज्योतिषियों, कारीगरों, नटों, नर्तकों, विशुद्ध शास्त्रवेत्ताओं तथा बहुश्रुत पुरुषोंको बुलाकर उनसे कहा—’तुमलोग महाराजकी आज्ञासे यज्ञकर्मके लिये आवश्यक प्रबन्ध करो॥

इष्टका बहुसाहस्री शीघ्रमानीयतामिति।

उपकार्याः क्रियन्तां च राज्ञो बहुगुणान्विताः॥९॥

‘शीघ्र ही कई हजार ईंटें लायी जायें। राजाओंके ठहरनेके लिये उनके योग्य अन्न-पान आदि अनेक उपकरणों से युक्त बहुत-से महल बनाये जाय॥ ९॥

ब्राह्मणावसथाश्चैव कर्तव्याः शतशः शुभाः।

भक्ष्यान्नपानैर्बहुभिः समुपेताः सुनिष्ठिताः॥१०॥

‘ब्राह्मणोंके रहनेके लिये भी सैकड़ों सुन्दर घर बनाये जाने चाहिये। वे सभी गृह बहुत-से भोजनीय अन्न-पान आदि उपकरणोंसे युक्त तथा आँधी-पानी आदिके निवारणमें समर्थ हों॥ १०॥

तथा पौरजनस्यापि कर्तव्याश्च सुविस्तराः।

आगतानां सुदूराच्च पार्थिवानां पृथक् पृथक्॥११॥

‘इसी तरह पुरवासियोंके लिये भी विस्तृत मकान बनने चाहिये। दूरसे आये हुए भूपालोंके लिये पृथक्-पृथक् महल बनाये जायें॥ ११ ॥

वाजिवारणशालाश्च तथा शय्यागृहाणि च।

भटानां महदावासा वैदेशिकनिवासिनाम्॥१२॥

‘घोड़े और हाथियोंके लिये भी शालाएँ बनायी जायँ। साधारण लोगोंके सोनेके लिये भी घरों की व्यवस्था हो। विदेशी सैनिकों के लिये भी बड़ी बड़ी छावनियाँ बननी चाहिये॥ १२ ॥

आवासा बहुभक्ष्या वै सर्वकामैरुपस्थिताः।

तथा पौरजनस्यापि जनस्य बहुशोभनम्॥१३॥

दातव्यमन्नं विधिवत् सत्कृत्य न तु लीलया।

‘जो घर बनाये जायँ, उनमें खाने-पीनेकी प्रचुर सामग्री संचित रहे। उनमें सभी मनोवांछित पदार्थ सुलभ हों तथा नगरवासियों को भी बहुत सुन्दर अन्न भोजन के लिये देना चाहिये। वह भी विधिवत् सत्कारपूर्वक दिया जाय, अवहेलना करके नहीं॥ १३ १/२॥

सर्वे वर्णा यथा पूजां प्राप्नुवन्ति सुसत्कृताः॥१४॥

न चावज्ञा प्रयोक्तव्या कामक्रोधवशादपि।

‘ऐसी व्यवस्था होनी चाहिये, जिससे सभी वर्ण के लोग भलीभाँति सत्कृत हो सम्मान प्राप्त करें। काम और क्रोध के वशीभूत होकर भी किसीका अनादर नहीं करना चाहिये।

यज्ञकर्मसु ये व्यग्राः पुरुषाः शिल्पिनस्तथा॥१५॥

तेषामपि विशेषेण पूजा कार्या यथाक्रमम्।

‘जो शिल्पी मनुष्य यज्ञकर्म की आवश्यक तैयारी में लगे हों, उनका तो बड़े-छोटे का खयाल रखकर विशेषरूप से समादर करना चाहिये॥ १५ १/२॥

ये स्युः सम्पूजिताः सर्वे वसुभिर्भोजनेन च॥१६॥

यथा सर्वं सुविहितं न किंचित् परिहीयते।

तथा भवन्तः कुर्वन्तु प्रीतियुक्तेन चेतसा॥१७॥

‘जो सेवक या कारीगर धन और भोजन आदिके द्वारा सम्मानित किये जाते हैं, वे सब परिश्रमपूर्वक कार्य करते हैं। उनका किया हुआ सारा कार्य सुन्दर ढंगसे सम्पन्न होता है। उनका कोई काम बिगड़ने नहीं पाता; अतः तुम सब लोग प्रसन्नचित्त होकर ऐसा ही करो’।

ततः सर्वे समागम्य वसिष्ठमिदमब्रुवन्।

यथेष्टं तत् सुविहितं न किंचित् परिहीयते॥१८॥

यथोक्तं तत् करिष्यामो न किंचित्परिहास्यते।

तब वे सब लोग वसिष्ठजीसे मिलकर बोले –’आपको जैसा अभीष्ट है, उसके अनुसार ही

करनेके लिये अच्छी व्यवस्था की जायगी। कोई भी काम बिगड़ने नहीं पायेगा। आपने जैसा कहा है, हमलोग वैसा ही करेंगे। उसमें कोई त्रुटि नहीं आने देंगे’ ॥ १८ १/२ ॥

ततः सुमन्त्रमाहूय वसिष्ठो वाक्यमब्रवीत्॥१९॥

निमन्त्रयस्व नृपतीन् पृथिव्यां ये च धार्मिकाः।

ब्राह्मणान् क्षत्रियान् वैश्यान् शूद्रांश्चैव सहस्रशः॥२०॥

तदनन्तर वसिष्ठजीने सुमन्त्रको बुलाकर कहा —’इस पृथ्वीपर जो-जो धार्मिक राजा, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और सहस्रों शूद्र हैं, उन सबको इस यज्ञमें आनेके लिये निमन्त्रित करो॥ २० ॥

समानयस्व सत्कृत्य सर्वदेशेषु मानवान्।

मिथिलाधिपतिं शूरं जनकं सत्यवादिनम्॥२१॥

तमानय महाभागं स्वयमेव सुसत्कृतम्।

पूर्वं सम्बन्धिनं ज्ञात्वा ततः पूर्वं ब्रवीमि ते॥२२॥

‘सब देशोंके अच्छे लोगोंको सत्कारपूर्वक यहाँ ले आओ। मिथिलाके स्वामी शूरवीर महाभाग जनक सत्यवादी नरेश हैं। उनको अपना पुराना सम्बन्धी जानकर तुम स्वयं ही जाकर उन्हें बड़े आदर-सत्कारके साथ यहाँ ले आओ; इसीलिये पहले तुम्हें यह बात बता देता हूँ॥ २१-२२ ।।

तथा काशिपतिं स्निग्धं सततं प्रियवादिनम्।

सदवृत्तं देवसंकाशं स्वयमेवानयस्व ह॥२३॥

‘इसी प्रकार काशीके राजा अपने स्नेही मित्र हैं और सदा प्रिय वचन बोलने वाले हैं। वे सदाचारी तथा देवताओं के तुल्य तेजस्वी हैं; अतः उन्हें भी स्वयं ही जाकर ले आओ॥ २३॥

तथा केकयराजानं वृद्धं परमधार्मिकम्।

श्वशुरं राजसिंहस्य सपुत्रं तमिहानय॥२४॥

‘केकयदेशके बूढ़े राजा बड़े धर्मात्मा हैं, वे राजसिंह महाराज दशरथ के श्वशुर हैं; अतः उन्हें भी पुत्रसहित यहाँ ले आओ॥२४॥

अंगेश्वरं महेष्वासं रोमपादं सुसत्कृतम्।

वयस्यं राजसिंहस्य सपुत्रं तमिहानय॥२५॥

‘अंगदेशके स्वामी महाधनुर्धर राजा रोमपाद हमारे महाराज के मित्र हैं, अतः उन्हें पुत्रसहित यहाँ सत्कारपूर्वक ले आओ॥२५॥

तथा कोसलराजानं भानुमन्तं सुसत्कृतम्।

मगधाधिपतिं शूरं सर्वशास्त्रविशारदम्॥२६॥

प्राप्तिशं परमोदारं सत्कृतं पुरुषर्षभम्।

‘कोशलराज भानुमान् को भी सत्कारपूर्वक ले आओ। मगधदेशके राजा प्राप्तिज्ञ को, जो शूरवीर, सर्वशास्त्रविशारद, परम उदार तथा पुरुषोंमें श्रेष्ठ हैं, स्वयं जाकर सत्कारपूर्वक बुला ले आओ। २६ १/२॥

राज्ञः शासनमादाय चोदयस्व नृपर्षभान्।

प्राचीनान् सिन्धुसौवीरान् सौराष्ट्रेयांश्चपार्थिवान्॥२७॥

‘महाराजकी आज्ञा लेकर तुम पूर्वदेशके श्रेष्ठ नरेशों को तथा सिन्धु-सौवीर एवं सुराष्ट्र देशके भूपालों को यहाँ आनेके लिये निमन्त्रण दो॥२७॥

दाक्षिणात्यान् नरेन्द्रांश्च समस्तानानयस्व ह।

सन्ति स्निग्धाश्च ये चान्ये राजानः पृथिवीतले ॥२८॥

तानानय यथा क्षिप्रं सानुगान् सहबान्धवान्।

एतान् दूतैर्महाभागैरानयस्व नृपाज्ञया॥२९॥

‘दक्षिण भारतके समस्त नरेशोंको भी आमन्त्रित करो। इस भूतलपर और भी जो-जो नरेश महाराजके प्रति स्नेह रखते हैं, उन सबको सेवकों और सगे-सम्बन्धियों सहित यथासम्भव शीघ्र बुला लो। महाराजकी आज्ञासे बड़भागी दूतोंद्वारा इन सबके पास बुलावा भेज दो’ ॥ २८-२९॥

वसिष्ठवाक्यं तच्छ्रुत्वा सुमन्त्रस्त्वरितं तदा।

व्यादिशत् पुरुषांस्तत्र राज्ञामानयने शुभान्॥

वसिष्ठका यह वचन सुनकर सुमन्त्रने तुरंत ही अच्छे पुरुषों को राजाओं की बुलाहट के लिये जाने का आदेश दे दिया॥ ३० ॥

स्वयमेव हि धर्मात्मा प्रयातो मुनिशासनात्।

सुमन्त्रस्त्वरितो भूत्वा समानेतुं महामतिः॥३१॥

परम बुद्धिमान् धर्मात्मा सुमन्त्र वसिष्ठ मुनिकी आज्ञा से खास-खास राजाओं को बुलाने के लिये स्वयं ही गये॥ ३१॥

ते च कर्मान्तिकाः सर्वे वसिष्ठाय महर्षये।

सर्वं निवेदयन्ति स्म यज्ञे यदुपकल्पितम्॥३२॥

यज्ञकर्म की व्यवस्था के लिये जो सेवक नियुक्त किये गये थे, उन सबने आकर उस समय तक यज्ञसम्बन्धी जो-जो कार्य सम्पन्न हो गया था, उस सबकी सूचना महर्षि वसिष्ठको दी॥ ३२॥

ततः प्रीतो द्विजश्रेष्ठस्तान् सर्वान् मुनिरब्रवीत्।

अवज्ञया न दातव्यं कस्यचिल्लीलयापि वा॥

वसिष्ठका यह वचन सुनकर सुमन्त्रने तुरंत ही अच्छे पुरुषोंको राजाओंकी बुलाहटके लिये जानेका आदेश दे दिया॥ ३० ॥

स्वयमेव हि धर्मात्मा प्रयातो मुनिशासनात्।

सुमन्त्रस्त्वरितो भूत्वा समानेतुं महामतिः॥३१॥

परम बुद्धिमान् धर्मात्मा सुमन्त्र वसिष्ठ मुनिकी आज्ञासे खास-खास राजाओं को बुलाने के लिये स्वयं ही गये॥३१॥

ते च कर्मान्तिकाः सर्वे वसिष्ठाय महर्षये।

सर्वं निवेदयन्ति स्म यज्ञे यदुपकल्पितम्॥३२॥

यज्ञकर्मकी व्यवस्थाके लिये जो सेवक नियुक्त किये गये थे, उन सबने आकर उस समयतक यज्ञसम्बन्धी जो-जो कार्य सम्पन्न हो गया था, उस सबकी सूचना महर्षि वसिष्ठको दी॥ ३२॥

ततः प्रीतो द्विजश्रेष्ठस्तान् सर्वान् मुनिरब्रवीत्।

अवज्ञया न दातव्यं कस्यचिल्लीलयापि वा दी॥ ३३॥

अवज्ञया कृतं हन्याद् दातारं नात्र संशयः।

यह सुनकर वे द्विजश्रेष्ठ मुनि बड़े प्रसन्न हुए और उन सबसे बोले—’भद्र पुरुषो! किसीको जो कुछ देना हो; उसे अवहेलना या अनादरपूर्वक नहीं देना चाहिये; क्योंकि अनादरपूर्वक दिया हुआ दान दाता को नष्ट कर देता है— इसमें संशय नहीं है’ ॥ ३३ १/२॥

ततः कैश्चिदहोरात्रैरुपयाता महीक्षितः॥३४॥

बहूनि रत्नान्यादाय राज्ञो दशरथस्य ह।

तदनन्तर कुछ दिनोंके बाद राजा लोग महाराज दशरथके लिये बहुत-से रत्नोंकी भेंट लेकर अयोध्यामें आये॥ ३४ १/२ ॥

ततो वसिष्ठः सुप्रीतो राजानमिदमब्रवीत्॥३५॥

उपयाता नरव्याघ्र राजानस्तव शासनात्।

मयापि सत्कृताः सर्वे यथार्ह राजसत्तम॥३६॥

इससे वसिष्ठजी को बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने राजासे कहा—’पुरुषसिंह! तुम्हारी आज्ञासे राजालोग यहाँ आ गये। नृपश्रेष्ठ! मैंने भी यथायोग्य उन सबका सत्कार किया है। ३५-३६॥

यज्ञियं च कृतं सर्वं पुरुषैः सुसमाहितैः।

निर्यातु च भवान् यष्टुं यज्ञायतनमन्तिकात्॥३७॥

‘हमारे कार्यकर्ताओं ने पूर्णतः सावधान रहकर यज्ञके लिये सारी तैयारी की है। अब तुम भी यज्ञ करनेके लिये यज्ञमण्डप के समीप चलो॥ ३७॥

सर्वकामैरुपहृतैरुपेतं वै समन्ततः।

द्रष्टमर्हसि राजेन्द्र मनसेव विनिर्मितम् ॥ ३८॥

‘राजेन्द्र! यज्ञमण्डपमें सब ओर सभी वाञ्छनीय वस्तुएँ एकत्र कर दी गयी हैं। आप स्वयं चलकर देखें। यह मण्डप इतना शीघ्र तैयार किया गया है, मानो मनके संकल्पसे ही बन गया हो’॥ ३८॥

तथा वसिष्ठवचनादृष्यशृंगस्य चोभयोः।

दिवसे शुभनक्षत्रे निर्यातो जगतीपतिः॥३९॥

मुनिवर वसिष्ठ तथा ऋष्यशृंग दोनोंके आदेशसे शुभ नक्षत्रवाले दिनको राजा दशरथ यज्ञके लिये राजभवनसे निकले॥ ३९॥

ततो वसिष्ठप्रमुखाः सर्व एव द्विजोत्तमाः।

ऋष्यशृंगं पुरस्कृत्य यज्ञकर्मारभंस्तदा॥४०॥

यज्ञवाटं गताः सर्वे यथाशास्त्रं यथाविधि।

श्रीमांश्च सह पत्नीभी राजा दीक्षामुपाविशत्॥४१॥

तत्पश्चात् वसिष्ठ आदि सभी श्रेष्ठ द्विजोंने यज्ञमण्डपमें जाकर ऋष्यशृंगको आगे करके शास्त्रोक्त विधिके अनुसार यज्ञकर्मका आरम्भ किया। पत्नियोंसहित श्रीमान् अवधनरेशने यज्ञकी दीक्षा ली॥ ४०-४१॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे त्रयोदशः सर्गः ॥१३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें तेरहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥१३॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(महाराज दशरथ के द्वारा अश्वमेध यज्ञ का सांगोपांग अनुष्ठान)

चतुर्दशः सर्गः 

सर्ग-14

अथ संवत्सरे पूर्णे तस्मिन् प्राप्ते तुरंगमे।

सरय्वाश्चोत्तरे तीरे राज्ञो यज्ञोऽभ्यवर्तत॥१॥

इधर वर्ष पूरा होनेपर यज्ञसम्बन्धी अश्व भूमण्डलमें भ्रमण करके लौट अया। फिर सरयू नदीके उत्तर तटपर राजाका यज्ञ आरम्भ हुआ। १॥

ऋष्यशृंगं पुरस्कृत्य कर्म चक्रुर्दिजर्षभाः।

अश्वमेधे महायज्ञे राज्ञोऽस्य सुमहात्मनः॥२॥

महामनस्वी राजा दशरथके उस अश्वमेध नामक महायज्ञमें ऋष्यशृंगको आगे करके श्रेष्ठ ब्राह्मण यज्ञसम्बन्धी कर्म करने लगे॥२॥

कर्म कुर्वन्ति विधिवद् याजका वेदपारगाः।

यथाविधि यथान्यायं परिक्रामन्ति शास्त्रतः॥३॥

यज्ञ करानेवाले सभी ब्राह्मण वेदोंके पारंगत विद्वान् थे; अतः वे न्याय तथा विधिके अनुसार सब कर्मोंका उचित रीतिसे सम्पादन करते थे और शास्त्रके अनुसार किस क्रमसे किस समय कौन-सी क्रिया करनी चाहिये, इसको स्मरण रखते हुए प्रत्येक कर्ममें प्रवृत्त होते थे॥३॥

प्रवर्दी शास्त्रतः कृत्वा तथैवोपसदं द्विजाः।

चक्रुश्च विधिवत् सर्वमधिकं कर्म शास्त्रतः॥४॥

ब्राह्मणोंने प्रवर्दी (अश्वमेधके अंगभूत कर्मविशेष) का शास्त्र (विधि, मीमांसा और कल्पसूत्र) के अनुसार सम्पादन करके उपसद नामक इष्टिविशेषका भी शास्त्रके अनुसार ही अनुष्ठान किया। तत्पश्चात् शास्त्रीय उपदेशसे अधिक जो अतिदेशतः प्राप्त कर्म है, उस सबका भी विधिवत् सम्पादन किया॥ ४॥

अभिपूज्य तदा हृष्टाः सर्वे चक्रुर्यथाविधि।

प्रातःसवनपूर्वाणि कर्माणि मुनिपुंगवाः॥५॥

तदनन्तर तत्तत् कर्मोके अंगभूत देवताओंका पूजन करके हर्षमें भरे हुए उन सभी मुनिवरोंने विधिपूर्वक प्रातःसवन आदि (अर्थात् प्रातःसवन, माध्यन्दिनसवन तथा तृतीय सवन) कर्म किये॥ ५॥

ऐन्द्रश्च विधिवद् दत्तो राजा चाभिषुतोऽनघः।

माध्यन्दिनं च सवनं प्रावर्तत यथाक्रमम्॥६॥

इन्द्रदेवताको विधिपूर्वक हविष्यका भाग अर्पित किया गया। पापनिवर्तक राजा सोम (सोमलता)* का रस निकाला गया। फिर क्रमशः माध्यन्दिनसवनका कार्य प्रारम्भ हुआ। ६॥

* इस विषयमें सूत्रकारका वचन है—सोमं राजानं दृषदि निधाय….दृषद्भिरभिहन्यात् अर्थात् ‘राजा सोम (सोमलता) को पत्थरपर रखकर……..पत्थरसे कूँचे।

तृतीयसवनं चैव राज्ञोऽस्य सुमहात्मनः।

चक्रुस्ते शास्त्रतो दृष्ट्वा यथा ब्राह्मणपुंगवाः॥७॥

तत्पश्चात् उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने शास्त्रसे देखभालकर मनस्वी राजा दशरथके तृतीय सवनकर्मका भी विधिवत् सम्पादन किया॥७॥

आह्वयाञ्चक्रिरे तत्र शक्रादीन्विबुधोत्तमान्।

ऋष्यशृंगादयो मन्त्रैः शिक्षाक्षरसमन्वितैः॥८॥

ऋष्यशृंग आदि महर्षियोंने वहाँ अभ्यासकालमें सीखे गये अक्षरोंसे युक्त-स्वर और वर्णसे सम्पन्न मन्त्रोंद्वारा इन्द्र आदि श्रेष्ठ देवताओंका आवाहन किया॥८॥

गीतिभिर्मधुरैः स्निग्धैर्मन्त्राह्वानैर्यथार्हतः।

होतारो ददुरावाह्य हविर्भागान् दिवौकसाम्॥

मधुर एवं मनोरम सामगानके लयमें गाये हुए आह्वान-मन्त्रोंद्वारा देवताओंका आवाहन करके होताओं ने उन्हें उनके योग्य हविष्यके भाग समर्पित किये॥९॥

न चाहुतमभूत् तत्र स्खलितं वा न किंचन।

दृश्यते ब्रह्मवत् सर्वं क्षेमयुक्तं हि चक्रिरे॥१०॥

उस यज्ञमें कोई अयोग्य अथवा विपरीत आहुति नहीं पड़ी। कहीं कोई भूल नहीं हुईअनजानमें भी कोई कर्म छूटने नहीं पाया; क्योंकि वहाँ सारा कर्म मन्त्रोच्चारण-पूर्वक सम्पन्न होता दिखायी देता था। महर्षियोंने सब कर्म क्षेमयुक्त एवं निर्विघ्न परिपूर्ण किये॥ १०॥

न तेष्वहःसु श्रान्तो वा क्षुधितो वा न दृश्यते।

नाविद्वान् ब्राह्मणः कश्चिन्नाशतानुचरस्तथा॥११॥

यज्ञके दिनोंमें कोई भी ऋत्विज् थका-माँदा या भूखा-प्यासा नहीं दिखायी देता था। उसमें कोई भी ब्राह्मण ऐसा नहीं था, जो विद्वान् न हो अथवा जिसके सौसे कम शिष्य या सेवक रहे हों॥ ११॥

ब्राह्मणा भुञ्जते नित्यं नाथवन्तश्च भुञ्जते।

तापसा भुञ्जते चापि श्रमणाश्चैव भुञ्जते॥१२॥

उस यज्ञमें प्रतिदिन ब्राह्मण भोजन करते थे (क्षत्रिय और वैश्य भी भोजन पाते थे) तथा शूद्रोंको भी भोजन उपलब्ध होता था। तापस और श्रमण भी भोजन करते थे॥ १२ ॥

वृद्धाश्च व्याधिताश्चैव स्त्रीबालाश्च तथैव

च। अनिशं भुञ्जमानानां न तृप्तिरुपलभ्यते॥१३॥

बूढ़े, रोगी, स्त्रियाँ तथा बच्चे भी यथेष्ट भोजन पाते थे। भोजन इतना स्वादिष्ट होता था कि । निरन्तर खाते रहनेपर भी किसीका मन नहीं भरता था॥ १३॥

दीयतां दीयतामन्नं वासांसि विविधानि च।

इति संचोदितास्तत्र तथा चक्रुरनेकशः॥१४॥

‘अन्न दो, नाना प्रकारके वस्त्र दो’ अधिकारियोंकी ऐसी आज्ञा पाकर कार्यकर्ता लोग बारम्बार वैसा ही करते थे॥ १४ ॥

अन्नकूटाश्च दृश्यन्ते बहवः पर्वतोपमाः।

दिवसे दिवसे तत्र सिद्धस्य विधिवत् तदा॥१५॥

वहाँ प्रतिदिन विधिवत् पके हुए अन्नके बहुतसे पर्वतों-जैसे ढेर दिखायी देते थे॥ १५ ॥

नानादेशादनुप्राप्ताः पुरुषाः स्त्रीगणास्तथा।

अन्नपानैः सुविहितास्तस्मिन् यज्ञे महात्मनः॥१६॥

महामनस्वी राजा दशरथके उस यज्ञमें नाना देशोंसे आये हुए स्त्री-पुरुष अन्न-पानद्वारा भलीभाँति तृप्त किये गये थे॥१६॥

अन्नं हि विधिवत्स्वादु प्रशंसन्ति द्विजर्षभाः।

अहो तृप्ताः स्म भद्रं ते इति शुश्राव राघवः॥१७॥

श्रेष्ठ ब्राह्मण ‘भोजन विधिवत् बनाया गया है। बहुत स्वादिष्ट है’—ऐसा कहकर अन्नकी प्रशंसा करते थे। भोजन करके उठे हुए लोगोंके मुखसे राजा सदा यही सुनते थे कि ‘हमलोग खूब तृप्त हुए। आपका कल्याण हो’ ॥ १७॥

स्वलंकृताश्च पुरुषा ब्राह्मणान् पर्यवेषयन्।

उपासन्ते च तानन्ये सुमृष्टमणिकुण्डलाः॥१८॥

वस्त्र-आभूषणोंसे अलंकृत हुए पुरुष ब्राह्मणोंको भोजन परोसते थे और उन लोगोंकी जो दूसरे लोग सहायता करते थे, उन्होंने भी विशुद्ध मणिमय कुण्डल धारण कर रखे थे।१८॥

कर्मान्तरे तदा विप्रा हेतुवादान् बहूनपि।

प्राहुः सुवाग्मिनो धीराः परस्परजिगीषया॥१९॥

एक सवन समाप्त करके दूसरे सवनके आरम्भ होनेसे पूर्व जो अवकाश मिलता था, उसमें उत्तम वक्ता धीर ब्राह्मण एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छासे बहुतेरे युक्तिवाद उपस्थित करते हुए शास्त्रार्थ करते थे॥ १९॥

दिवसे दिवसे तत्र संस्तरे कुशला द्विजाः।

सर्वकर्माणि चक्रुस्ते यथाशास्त्रं प्रचोदिताः॥२०॥

उस यज्ञमें नियुक्त हुए कर्मकुशल ब्राह्मण प्रतिदिन शास्त्रके अनुसार सब कार्योंका सम्पादन करते थे॥२०॥

नाषडंगविदत्रासीन्नाव्रतो नाबहुश्रुतः।

सदस्यास्तस्य वै राज्ञो नावादकुशलो द्विजः॥२१॥

राजाके उस यज्ञमें कोई भी सदस्य ऐसा नहीं था, जो व्याकरण आदि छहों अंगोंका ज्ञाता न हो, जिसने ब्रह्मचर्यव्रतका पालन न किया हो तथा जो बहुश्रुत न हो। वहाँ कोई ऐसा द्विज नहीं था, जो वाद-विवादमें कुशल न हो॥२१॥

प्राप्ते यूपोच्छ्रये तस्मिन् षड् बैल्वाःखादिरास्तथा।

तावन्तो बिल्वसहिताः पर्णिनश्च तथा परे॥२२॥

जब यूप खड़ा करनेका समय आया, तब बेलकी लकड़ी के छः यूप गाड़े गये। उतने ही खैर के यूप खड़े किये गये तथा पलाशके भी उतने ही यूप थे, जो बिल्वनिर्मित यूपोंके साथ खड़े किये गये थे॥ २२॥

श्लेष्मातकमयो दिष्टो देवदारुमयस्तथा।

द्वावेव तत्र विहितौ बाहुव्यस्तपरिग्रहौ॥ २३॥

बहेड़े के वृक्षका एक यूप अश्वमेध यज्ञके लिये विहित है। देवदारुके बने हुए यूपका भी विधान है; परंतु उसकी संख्या न एक है न छः । देवदारुके दो ही यूप विहित हैं। दोनों बाँहें फैला देनेपर जितनी दूरी होती है, उतनी ही दूरपर वे दोनों स्थापित किये गये थे॥ २३ ॥

कारिताः सर्व एवैते शास्त्रज्ञैर्यज्ञकोविदैः।

शोभार्थं तस्य यज्ञस्य काञ्चनालंकृता भवन्॥२४॥

यज्ञकुशल शास्त्रज्ञ ब्राह्मणोंने ही इन सब यूपोंका निर्माण कराया था। उस यज्ञकी शोभा ङ्केबढ़ानेके लिये उन सबमें सोमा जड़ा गया था। २४॥

एकविंशतियूपास्ते एकविंशत्यरत्नयः।

वासोभिरेकविंशद्भिरेकैकं समलंकृताः॥२५॥

पूर्वोक्त इक्कीस यूप इक्कीस-इक्कीस अरनि* (पाँचसौ चार अंगुल) ऊँचे बनाये गये थे। उन सबको पृथक्-पृथक् इक्कीस कपड़ोंसे अलंकृत किया गया था॥ २५॥

* तथा च सूत्रम्—’चतुर्विंशत्यङ्गलयोऽरत्निः’ अर्थात् एक अरनि चौबीस अङ्गलके बराबर होता है।

विन्यस्ता विधिवत् सर्वे शिल्पिभिः सुकृता दृढाः।

अष्टास्रयः सर्व एव श्लक्ष्णरूपसमन्विताः॥२६॥

कारीगरोंद्वारा अच्छी तरह बनाये गये वे सभी सुदृढ़ यूप विधिपूर्वक स्थापित किये गये थे। वे सब-के-सब आठ कोणोंसे सुशोभित थे। उनकी आकृति सुन्दर एवं चिकनी थी॥ २६ ॥

आच्छादितास्ते वासोभिः पुष्पैर्गन्धैश्च पूजिताः।

सप्तर्षयो दीप्तिमन्तो विराजन्ते यथा दिवि॥२७॥

उन्हें वस्त्रोंसे ढक दिया गया था और पुष्पचन्दनसे उनकी पूजा की गयी थी। जैसे आकाशमें तेजस्वी सप्तर्षियोंकी शोभा होती है, उसी प्रकार यज्ञमण्डपमें वे दीप्तिमान् यूप सुशोभित होते थे॥२७॥

इष्टकाश्च यथान्यायं कारिताश्च प्रमाणतः।

चितोऽग्निर्ब्राह्मणैस्तत्र कुशलैः शिल्पकर्मणि ॥२८॥

सूत्रग्रन्थों में बताये अनुसार ठीक मापसे ईंटें तैयार करायी गयी थीं। उन ईंटोंके द्वारा यज्ञसम्बन्धी शिल्पिकर्म में कुशल ब्राह्मणोंने अग्निका चयन किया था॥ २८॥

स चित्यो राजसिंहस्य संचितः कुशलैर्द्विजैः।

गरुडो रुक्मपक्षो वै त्रिगुणोऽष्टादशात्मकः॥२९॥

राजसिंह महाराज दशरथके यज्ञमें चयनद्वारा सम्पादित अग्निकी कर्मकाण्डकुशल ब्राह्मणोंद्वारा

शास्त्रविधिके अनुसार स्थापना की गयी। उस अग्निकी आकृति दोनों पंख और पुच्छ फैलाकर नीचे देखते हुए पूर्वाभिमुख खड़े हुए गरुड़की-सी प्रतीत होती थी। सोनेकी ईंटोंसे पंखका निर्माण होनेसे उस गरुड़के पंख सुवर्णमय दिखायी देते थे। प्रकृत-अवस्थामें चित्य-अग्निके छः प्रस्तार होते हैं; किंतु अश्वमेध यज्ञमें उसका प्रस्तार तीनगुना हो जाता है। इसलिये वह गरुड़ाकृति अग्नि अठारह प्रस्तारोंसे युक्त थी॥ २९॥

नियुक्तास्तत्र पशवस्तत्तदुद्दिश्य दैवतम्।

उरगाः पक्षिणश्चैव यथाशास्त्रं प्रचोदिताः॥३०॥

वहाँ पूर्वोक्त यूपोंमें शास्त्रविहित पशु, सर्प और पक्षी विभिन्न देवताओंके उद्देश्यसे बाँधे गये थे। ३०॥

शामित्रे तु हयस्तत्र तथा जलचराश्च ये।

ऋषिभिः सर्वमेवैतन्नियुक्तं शास्त्रतस्तदा॥३१॥

शामित्र कर्ममें यज्ञिय अश्व तथा कूर्म आदि जलचर जन्तु जो वहाँ लाये गये थे, ऋषियोंने उन सबको शास्त्रविधिके अनुसार पूर्वोक्त यूपोंमें बाँध दिया॥३१॥

पशूनां त्रिशतं तत्र यूपेषु नियतं तदा।

अश्वरत्नोत्तमं तत्र राज्ञो दशरथस्य ह ॥३२॥

उस समय उन यूपों में तीन सौ पशु बँधे हुए थे तथा राजा दशरथका वह उत्तम अश्वरत्न भी वहीं बाँधा गया था॥ ३२॥

कौसल्या तं हयं तत्र परिचर्य समन्ततः।

कृपाणैर्विशशारैनं त्रिभिः परमया मदा॥३३॥

रानी कौसल्या ने वहाँ प्रोक्षण आदि के द्वारा सब ओरसे उस अश्व का संस्कार करके बड़ी प्रसन्नता के साथ तीन तलवारों से उसका स्पर्श किया॥३३॥

पतत्त्रिणा तदा सार्धं सुस्थितेन च चेतसा।

अवसद् रजनीमेकां कौसल्या धर्मकाम्यया॥३४॥

तदनन्तर कौसल्या देवीने सुस्थिर चित्त से धर्मपालन की इच्छा रखकर उस अश्व के निकट एक रात निवास किया॥३४॥

होताध्वर्युस्तथोद्गाता हस्तेन समयोजयन्।

महिष्या परिवृत्त्यार्थं वावातामपरां तथा॥३५॥

तत्पश्चात् होता, अध्वर्यु और उद्गाता ने राजाकी (क्षत्रियजातीय) महिषी ‘कौसल्या’, (वैश्यजातीय स्त्री) ‘वावाता’ तथा (शूद्रजातीय स्त्री) ‘परिवृत्ति’-इन सबके हाथ से उस अश्वका स्पर्श कराया* ॥ ३५ ॥

* जाति के अनुसार नाम अलग-अलग होते हैं। दशरथ के तो कौसल्या, कैकेयी और सुमित्रा तीनों क्षत्रिय जाति की ही थीं।

पतत्त्रिणस्तस्य वपामुद्धृत्य नियतेन्द्रियः।

ऋत्विक्परमसम्पन्नः श्रपयामास शास्त्रतः॥३६॥

इसके बाद परम चतुर जितेन्द्रिय ऋत्विक्ने विधिपूर्वक अश्वकन्द के गूदे को निकालकर शास्त्रोक्त रीतिसे पकाया॥ ३६॥

धूमगन्धं वपायास्तु जिघ्रति स्म नराधिपः।

यथाकालं यथान्यायं निर्णदन् पापमात्मनः॥३७॥

तत्पश्चात् उस गूदेकी आहुति दी गयी। राजा दशरथ ने अपने पाप को दूर करने के लिये ठीक समय पर आकर विधिपूर्वक उसके धूएँ की गन्ध को सूंघा ॥ ३७॥

हयस्य यानि चांगानि तानि सर्वाणि ब्राह्मणाः।

अग्नौ प्रास्यन्ति विधिवत् समस्ताः षोडशर्विजः॥ ३८॥

उस अश्वमेध यज्ञके अंगभूत जो-जो हवनीय पदार्थ थे, उन सबको लेकर समस्त सोलह ऋत्विज् ब्राह्मण अग्निमें विधिवत् आहुति देने लगे॥ ३८॥

प्लक्षशाखासु यज्ञानामन्येषां क्रियते हविः।

अश्वमेधस्य यज्ञस्य वैतसो भाग इष्यते॥३९॥

अश्वमेधके अतिरिक्त अन्य यज्ञोंमें जो हवि दी जाती है, वह पाकरकी शाखाओंमें रखकर दी जाती है; परंतु अश्वमेध यज्ञका हविष्य बेंतकी चटाईमें रखकर देनेका नियम है॥ ३९ ॥

त्र्यहोऽश्वमेधः संख्यातः कल्पसूत्रेण ब्राह्मणैः।

चतुष्टोममहस्तस्य प्रथमं परिकल्पितम्॥४०॥

उक्थ्यं द्वितीयं संख्यातमतिरानं तथोत्तरम्।

कारितास्तत्र बहवो विहिताः शास्त्रदर्शनात्॥४१॥

कल्पसूत्र और ब्राह्मणग्रन्थोंके द्वारा अश्वमेध के तीन सवनीय दिन बताये गये हैं। उनमेंसे प्रथम दिन जो सवन होता है, उसे चतुष्टोम (‘अग्निष्टोम’) कहा गया है। द्वितीय दिवस साध्य सवनको ‘उक्थ्य’ नाम दिया गया है तथा तीसरे दिन जिस सवनका अनुष्ठान होता है, उसे ‘अतिरात्र’ कहते हैं। उसमें शास्त्रीय दृष्टिसे विहित बहुत-से दूसरे-दूसरे क्रतु भी सम्पन्न किये गये। ४०-४१॥

ज्योतिष्टोमायुषी चैवमतिरात्रौ च निर्मितौ।

अभिजिद्विश्वजिच्चैवमाप्तोर्यामौ महाक्रतुः॥४२॥

ज्योतिष्टोम, आयुष्टोम यज्ञ, दो बार अतिरात्र यज्ञ, पाँचवाँ अभिजित् , छठा विश्वजित् तथा सातवें-आठवें आप्तोर्याम—ये सब-के-सब महाक्रतु माने गये हैं, जो अश्वमेधके उत्तर कालमें सम्पादित हुए॥ ४२॥

प्राचीं होने ददौ राजा दिशं स्वकुलवर्धनः।

अध्वर्यवे प्रतीची तु ब्रह्मणे दक्षिणां दिशम्॥४३॥

अपने कुलकी वृद्धि करनेवाले राजा दशरथने । यज्ञ पूर्ण होनेपर होताको दक्षिणारूपमें अयोध्यासे पूर्व दिशाका सारा राज्य सौंप दिया, अध्वर्युको पश्चिम दिशा तथा ब्रह्माको दक्षिण दिशाका राज्य दे दिया॥४३॥

उद्गात्रे तु तथोदीची दक्षिणैषा विनिर्मिता।

अश्वमेधे महायज्ञे स्वयंभूविहिते पुरा॥४४॥

इसी तरह उद्गाताको उत्तर दिशाकी सारी भूमि दे दी। पूर्वकालमें भगवान् ब्रह्माजीने जिसका अनुष्ठान किया था, उस अश्वमेध नामक महायज्ञमें ऐसी ही दक्षिणाका विधान किया गया है* ॥४४॥

* ‘प्रजापतिरश्वमेधमसृजत (प्रजापतिने अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान किया।)’ इस श्रुतिके द्वारा यह सूचित होता है कि पूर्वकालमें ब्रह्माजीने इस महायज्ञका अनुष्ठान किया था। इसमें दक्षिणारूपसे प्रत्येक दिशाके दानका विधान कल्पसूत्रद्वारा किया गया है। यथा—’प्रतिदिशं दक्षिणां ददाति प्राची दिग्धोतुर्दक्षिणा प्रतीच्यध्वर्योरुदीच्युद्गातुः॥

क्रतुं समाप्य तु तदा न्यायतः पुरुषर्षभः।

ऋत्विग्भ्यो हि ददौ राजा धरां तां कुलवर्धनः॥४५॥

इस प्रकार विधिपूर्वक यज्ञ समाप्त करके अपने कुलकी वृद्धि करनेवाले पुरुषशिरोमणि राजा दशरथने ऋत्विजोंको सारी पृथ्वी दान कर दी। ४५॥

एवं दत्त्वा प्रहृष्टोऽभूच्छीमानिक्ष्वाकुनन्दनः।

ब्रह्मणः ऋत्विजस्त्वब्रुवन् सर्वे राजानं गतकिल्बिषम्॥४६॥

यों दान देकर इक्ष्वाकुकुलनन्दन श्रीमान् महाराज दशरथके हर्षकी सीमा न रही, परंतु समस्त ऋत्विज् उन निष्पाप नरेशसे इस प्रकार बोले- ॥ ४६॥

भवानेव महीं कृत्स्नामेको रक्षितुमर्हति।

न भूम्या कार्यमस्माकं नहि शक्ताः स्म पालने॥४७॥

‘महाराज! अकेले आप ही इस सम्पूर्ण पृथ्वीकी रक्षा करनेमें समर्थ हैं। हममें इसके पालनकी शक्ति नहीं है; अतः भूमिसे हमारा कोई प्रयोजन नहीं है॥४७॥

रताः स्वाध्यायकरणे वयं नित्यं हि भूमिप।

निष्क्रयं किञ्चिदेवेह प्रयच्छतु भवानिति॥४८॥

‘भूमिपाल! हम तो सदा वेदोंके स्वाध्यायमें ही लगे रहते हैं (इस भूमिका पालन हमसे नहीं हो सकता); अतः आप हमें यहाँ इस भूमिका कुछ निष्क्रय (मूल्य) ही दे दें॥४८॥

मणिरत्नं सुवर्णं वा गावो यद्वा समुद्यतम्।

तत् प्रयच्छ नृपश्रेष्ठ धरण्या न प्रयोजनम्॥४९॥

‘नृपश्रेष्ठ! मणि, रत्न, सुवर्ण, गौ अथवा जो भी वस्तु यहाँ उपस्थित हो, वही हमें दक्षिणारूपसे दे दीजिये। इस धरतीसे हमें कोई प्रयोजन नहीं है’। ४९॥

एवमुक्तो नरपतिर्ब्राह्मणैर्वेदपारगैः।

गवां शतसहस्राणि दश तेभ्यो ददौ नृपः॥५०॥

दशकोटिं सुवर्णस्य रजतस्य चतुर्गुणम्।

वेदोंके पारगामी विद्वान् ब्राह्मणोंके ऐसा कहनेपर राजाने उन्हें दस लाख गौएँ प्रदान की। दस करोड़ स्वर्णमुद्रा तथा उससे चौगुनी रजतमुद्रा अर्पित की।

ऋत्विजस्तु ततः सर्वे प्रददुः सहिता वसु॥

ऋष्यशृंगाय मुनये वसिष्ठाय च धीमते।

तब उस समस्त ऋत्विजोंने एक साथ होकर वह सारा धन मुनिवर ऋष्यशृंग तथा बुद्धिमान् वसिष्ठको सौंप दिया॥ ५१ १/२ ॥

ततस्ते न्यायतः कृत्वा प्रविभागं द्विजोत्तमाः॥

सुप्रीतमनसः सर्वे प्रत्यूचुर्मुदिता भृशम्।

तदनन्तर उन दोनों महर्षियोंके सहयोगसे उस धनका न्यायपूर्वक बँटवारा करके वे सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए और बोलेमहाराज! इस दक्षिणासे हम-लोग बहुत संतुष्ट हैं’॥ ५२ १/२॥

ततः प्रसर्पकेभ्यस्तु हिरण्यं सुसमाहितः॥५३॥

जाम्बूनदं कोटिसंख्यं ब्राह्मणेभ्यो ददौ तदा।

इसके बाद एकाग्रचित्त होकर राजा दशरथने अभ्यागत ब्राह्मणोंको एक करोड़ जाम्बूनद सुवर्णकी मुद्राएँ बाँटीं ॥ ५३ १/२ ॥

दरिद्राय द्विजायाथ हस्ताभरणमुत्तमम्॥५४॥

कस्मैचिद याचमानाय ददौ राघवनन्दनः।

सारा धन दे देनेके बाद जब कुछ नहीं बच रहा, तब एक दरिद्र ब्राह्मणने आकर राजासे धनकी याचना की। उस समय उन रघुकुलनन्दन नरेशने उसे अपने हाथका उत्तम आभूषण उतारकर दे दिया॥ ५४ १/२॥

ततः प्रीतेषु विधिवद् द्विजेषु द्विजवत्सलः॥५५॥

प्रणाममकरोत् तेषां हर्षव्याकुलितेन्द्रियः।

तत्पश्चात् जब सभी ब्राह्मण विधिवत् संतुष्ट हो गये, उस समय उनपर स्नेह रखनेवाले नरेशने उन सबको प्रणाम किया। प्रणाम करते समय उनकी सारी इन्द्रियाँ हर्षसे विह्वल हो रही थीं। ५५ १/२॥

तस्याशिषोऽथ विविधा ब्राह्मणैः समुदाहृताः॥

उदारस्य नृवीरस्य धरण्यां पतितस्य च।

पृथ्वीपर पड़े हुए उन उदार नरवीरको ब्राह्मणोंने नाना प्रकारके आशीर्वाद दिये॥ ५६१/२॥

ततः प्रीतमना राजा प्राप्य यज्ञमनुत्तमम्॥५७॥

पापापहं स्वर्नयनं दुस्तरं पार्थिवर्षभैः।

तदनन्तर उस परम उत्तम यज्ञका पुण्यफल पाकर राजा दशरथके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। वह यज्ञ उनके सब पापोंका नाश करनेवाला तथा उन्हें स्वर्गलोकमें पहुँचानेवाला था। साधारण राजाओंके लिये उस यज्ञको आदिसे अन्ततक पूर्ण कर लेना बहुत ही कठिन था।

ततोऽब्रवीदृष्यश्रृंगं राजा दशरथस्तदा॥५८॥

कुलस्य वर्धनं तत् तु कर्तुमर्हसि सुव्रत।

यज्ञ समाप्त होनेपर राजा दशरथने ऋष्यशृंगसे कहा—’उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मुनीश्वर! अब जो कर्म मेरी कुलपरम्पराको बढ़ानेवाला हो, उसका सम्पादन आपको करना चाहिये’॥ ५८ १/२॥

तथेति च स राजानमुवाच द्विजसत्तमः।

भविष्यन्ति सुता राजश्चत्वारस्ते कुलोद्रहाः॥५९॥

तब द्विजश्रेष्ठ ऋष्यशृंग ‘तथास्तु’ कहकर राजासे बोले-‘राजन् ! आपके चार पुत्र होंगे, जो इस कुलके भारको वहन करनेमें समर्थ होंगे’। ५९॥

स तस्य वाक्यं मधुरं निशम्य प्रणम्य तस्मै प्रयतो नृपेन्द्रः।

जगाम हर्षं परमं महात्मा तमृष्यश्रृंगं पुनरप्युवाच॥६०॥

उनका यह मधुर वचन सुनकर मन और इन्द्रियोंको संयममें रखनेवाले महामना महाराज दशरथ उन्हें प्रणाम करके बड़े हर्षको प्राप्त हुए तथा उन्होंने ऋष्यशृंगको पुनः पुत्रप्राप्ति करानेवाले कर्मका अनुष्ठान करनेके लिये प्रेरित किया॥ ६०॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे चतुर्दशः सर्गः॥१४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें चौदहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥१४॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(ऋष्यशृंग द्वारा राजा दशरथ के पुत्रेष्टि यज्ञ का आरम्भ, ब्रह्माजी का रावण के वध का उपाय ढूँढ़ निकालना तथा भगवान् विष्णु का देवताओं को आश्वासन देना)

पञ्चदशः सर्गः 

सर्ग-15

मेधावी तु ततो ध्यात्वा स किञ्चिदिदमुत्तरम्।

लब्धसंज्ञस्ततस्तं तु वेदज्ञो नृपमब्रवीत्॥१॥

महात्मा ऋष्यशृंग बड़े मेधावी और वेदोंके ज्ञाता थे। उन्होंने थोड़ी देर तक ध्यान लगाकर अपने भावी कर्तव्य का निश्चय किया। फिर ध्यानसे विरत हो वे राजा से इस प्रकार बोले-॥१॥


इष्टिं तेऽहं करिष्यामि पुत्रीयां पुत्रकारणात्।

अथर्वशिरसि प्रोक्तैर्मन्त्रैः सिद्धां विधानतः॥२॥

‘महाराज! मैं आपको पुत्रकी प्राप्ति करानेके लिये अथर्ववेदके मन्त्रोंसे पुत्रेष्टि नामक यज्ञ करूँगा। वेदोक्त विधिके अनुसार अनुष्ठान करनेपर वह यज्ञ अवश्य सफल होगा’॥ २॥


ततः प्राक्रमदिष्टिं तां पुत्रीयां पुत्रकारणात्।

जुहावाग्नौ च तेजस्वी मन्त्रदृष्टेन कर्मणा॥३॥

यह कहकर उन तेजस्वी ऋषिने पुत्रप्राप्तिके उद्देश्यसे पुत्रेष्टि नामक यज्ञ प्रारम्भ किया और श्रौत विधि के अनुसार अग्नि में आहुति डाली॥३॥


ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः।

भागप्रतिग्रहार्थं वै समवेता यथाविधि॥४॥

तब देवता, सिद्ध, गन्धर्व और महर्षिगण विधि के अनुसार अपना-अपना भाग ग्रहण करने के लिये उस यज्ञमें एकत्र हुए॥४॥


ताः समेत्य यथान्यायं तस्मिन् सदसि देवताः।

अब्रुवँल्लोककर्तारं ब्रह्माणं वचनं ततः॥५॥

उस यज्ञ-सभामें क्रमशः एकत्र होकर (दूसरोंकी दृष्टिसे अदृश्य रहते हुए) सब देवता लोककर्ता ब्रह्माजीसे इस प्रकार बोले- ॥ ५॥


भगवंस्त्वत्प्रसादेन रावणो नाम राक्षसः।

सर्वान् नो बाधते वीर्याच्छासितुं तं न शक्नुमः॥६॥

‘भगवन्! रावण नामक राक्षस आपका कृपाप्रसाद पाकर अपने बलसे हम सब लोगोंको बड़ा कष्ट दे रहा है। हममें इतनी शक्ति नहीं है कि अपने पराक्रमसे उसको दबा सकें॥६॥


त्वया तस्मै वरो दत्तः प्रीतेन भगवंस्तदा।

मानयन्तश्च तं नित्यं सर्वं तस्य क्षमामहे॥७॥

‘प्रभो! आपने प्रसन्न होकर उसे वर दे दिया है। तबसे हमलोग उस वरका सदा समादर करते हुए उसके सारे अपराधोंको सहते चले आ रहे हैं॥७॥


उद्धेजयति लोकांस्त्रीनुच्छ्रितान् द्वेष्टि दुर्मतिः।

शक्रं त्रिदशराजानं प्रधर्षयितुमिच्छति॥८॥

‘उसने तीनों लोकोंके प्राणियोंका नाकोंदम कर रखा है। वह दुष्टात्मा जिनको कुछ ऊँची स्थितिमें देखता है, उन्हींके साथ द्वेष करने लगता है देवराज इन्द्रको परास्त करनेकी अभिलाषा रखता है॥८॥


ऋषीन् यक्षान् सगन्धर्वान् ब्राह्मणानसुरांस्तदा।

अतिक्रामति दुर्धर्षो वरदानेन मोहितः॥९॥

‘आपके वरदानसे मोहित होकर वह इतना उद्दण्ड हो गया है कि ऋषियों, यक्षों, गन्धर्वो, असुरों तथा ब्राह्मणोंको पीड़ा देता और उनका अपमान करता फिरता है॥९॥


नैनं सूर्यः प्रतपति पार्वे वाति न मारुतः।

चलोर्मिमाली तं दृष्ट्वा समुद्रोऽपि न कम्पते॥१०॥

‘सूर्य उसको ताप नहीं पहुँचा सकते। वायु उसके पास जोरसे नहीं चलती तथा जिसकी उत्ताल तरंगें सदा ऊपर-नीचे होती रहती हैं, वह समुद्र भी रावणको देखकर भयके मारे स्तब्ध-सा हो जाता है उसमें कम्पन नहीं होता ॥ १० ॥


तन्महन्नो भयं तस्माद् राक्षसाद् घोरदर्शनात्।

वधार्थं तस्य भगवन्नुपायं कर्तुमर्हसि ॥११॥

‘वह राक्षस देखनेमें भी बड़ा भयंकर है। उससे हमें महान् भय प्राप्त हो रहा है; अतः भगवन्! उसके वधके लिये आपको कोई-न-कोई उपाय अवश्य करना चाहिये’ ॥ ११॥


एवमुक्तः सुरैः सर्वैश्चिन्तयित्वा ततोऽब्रवीत्।

हन्तायं विदितस्तस्य वधोपायो दुरात्मनः॥१२॥

तेन गन्धर्वयक्षाणां देवतानां च रक्षसाम्।

अवध्योऽस्मीति वागुक्ता तथेत्युक्तं च तन्मया॥१३॥

समस्त देवताओंके ऐसा कहनेपर ब्रह्माजी कुछ सोचकर बोले-‘देवताओ! लो, उस दुरात्माके वधका उपाय मेरी समझमें आ गया। उसने वर माँगते समय यह बात कही थी कि मैं गन्धर्व, यक्ष, देवता तथा राक्षसोंके हाथसे न मारा जाऊँ। मैंने भी ‘तथास्तु’ कहकर उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली॥ १२-१३॥


नाकीर्तयदवज्ञानात् तद् रक्षो मानुषांस्तदा।

तस्मात् स मानुषाद् वध्यो मृत्यु न्योऽस्य विद्यते॥१४॥

‘मनुष्योंको तो वह तुच्छ समझता था, इसलिये उनके प्रति अवहेलना होनेके कारण उनसे अवध्य होने का वरदान नहीं माँगा। इसलिये अब मनुष्यके हाथसे ही उसका वध होगा। मनुष्यके सिवा दूसरा कोई उसकी मृत्यु का कारण नहीं है’॥ १४॥


एतच्छ्रुत्वा प्रियं वाक्यं ब्रह्मणा समुदाहृतम्।

देवा महर्षयः सर्वे प्रहृष्टास्तेऽभवंस्तदा ॥१५॥

ब्रह्माजीकी कही हुई यह प्रिय बात सुनकर उस समय समस्त देवता और महर्षि बड़े प्रसन्न हुए॥१५॥

एतस्मिन्नन्तरे विष्णुरुपयातो महाद्युतिः।

शङ्खचक्रगदापाणिः पीतवासा जगत्पतिः॥१६॥

वैनतेयं समारुह्य भास्करस्तोयदं यथा।

इसी समय महान् तेजस्वी जगत्पति भगवान् विष्णु भी मेघके ऊपर स्थित हुए सूर्यकी भाँति गरुड़पर सवार हो वहाँ आ पहुँचे। उनके शरीरपर पीताम्बर और हाथोंमें शङ्ख, चक्र एवं गदा आदि आयुध शोभा पा रहे थे।


तप्तहाटककेयूरो वन्द्यमानः सुरोत्तमैः॥१७॥

ब्रह्मणा च समागत्य तत्र तस्थौ समाहितः।

उनकी दोनों भुजाओंमें तपाये हुए सुवर्ण के बने केयूर प्रकाशित हो रहे थे। उस समय सम्पूर्ण देवताओंने उनकी वन्दना की और वे ब्रह्माजीसे मिलकर सावधानीके साथ सभामें विराजमान हो गये॥ १६-१७ १/२ ॥


तमब्रुवन् सुराः सर्वे समभिष्ट्रय संनताः॥१८॥

त्वां नियोक्ष्यामहे विष्णो लोकानां हितकाम्यया।

तब समस्त देवताओंने विनीत भावसे उनकी स्तति करके कहा—’सर्वव्यापी परमेश्वर! हम तीनों लोकोंके हितकी कामनासे आपके ऊपर एक महान् कार्यका भार दे रहे हैं॥ १८ १/२ ॥


राज्ञो दशरथस्य त्वमयोध्याधिपतेर्विभो॥१९॥

धर्मज्ञस्य वदान्यस्य महर्षिसमतेजसः।

अस्य भार्यासु तिसृषु ह्रीश्रीकीर्तुपमासु च॥२०॥

‘प्रभो! अयोध्याके राजा दशरथ धर्मज्ञ, उदार तथा महर्षियोंके समान तेजस्वी हैं। उनके तीन रानियाँ हैं जो ह्री, श्री और कीर्ति—इन तीन देवियोंके समान हैं।


विष्णो पुत्रत्वमागच्छ कृत्वाऽऽत्मानं चतुर्विधम्।

तत्र त्वं मानुषो भूत्वा प्रवृद्ध लोककण्टकम्॥२१॥

अवध्यं दैवतैर्विष्णो समरे जहि रावणम्।

विष्णुदेव! आप अपने चार स्वरूप बनाकर राजाकी उन तीनों रानियोंके गर्भसे पुत्ररूपमें अवतार ग्रहण कीजिये। इस प्रकार मनुष्यरूपमें प्रकट होकर आप संसारके लिये प्रबल कण्टकरूप रावणको, जो देवताओंके लिये अवध्य है, समरभूमिमें मार डालिये॥


स हि देवान् सगन्धर्वान् सिद्धांश्च ऋषिसत्तमान्॥२२॥

राक्षसो रावणो मूो वीर्योद्रेकेण बाधते।

‘वह मूर्ख राक्षस रावण अपने बढ़े हुए पराक्रमसे देवता, गन्धर्व, सिद्ध तथा श्रेष्ठ महर्षियोंको बहुत कष्ट दे रहा है॥ २२ १/२ ॥


ऋषयश्च ततस्तेन गन्धर्वाप्सरसस्तथा ॥२३॥

क्रीडन्तो नन्दनवने रौद्रेण विनिपातिताः।

‘उस रौद्र निशाचरने ऋषियोंको तथा नन्दनवनमें क्रीड़ा करनेवाले गन्धर्वो और अप्सराओंको भी स्वर्गसे भूमिपर गिरा दिया है। २३ १/२॥


वधार्थं वयमायातास्तस्य वै मुनिभिः सह ॥२४॥

सिद्धगन्धर्वयक्षाश्च ततस्त्वां शरणं गताः।

‘इसलिये मुनियोंसहित हम सब सिद्ध, गन्धर्व, यक्ष तथा देवता उसके वधके लिये आपकी शरणमें आये हैं ॥ २४ १/२॥


त्वं गतिः परमा देव सर्वेषां नः परंतप॥ २५॥

वधाय देवशत्रूणां नृणां लोके मनः कुरु।

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले देव! आप ही हम सब लोगोंकी परमगति हैं, अतः इन देवद्रोहियोंका वध करनेके लिये आप मनुष्यलोकमें अवतार लेनेका निश्चय कीजिये’ ॥ २५ १/२ ॥


एवं स्तुतस्तु देवेशो विष्णुस्त्रिदशपुंगवः॥२६॥

पितामहपुरोगांस्तान् सर्वलोकनमस्कृतः।

अब्रवीत् त्रिदशान् सर्वान् समेतान् धर्मसंहितान्॥२७॥

उनके इस प्रकार स्तुति करनेपर सर्वलोकवन्दित देवप्रवर देवाधिदेव भगवान् विष्णुने वहाँ एकत्र हुए उन समस्त ब्रह्मा आदि धर्मपरायण देवताओंसे कहा- ॥ २६-२७॥


भयं त्यजत भद्रं वो हितार्थं युधि रावणम्।

सपुत्रपौत्रं सामात्यं समन्त्रिज्ञातिबान्धवम्॥२८॥

‘देवगण! तुम्हारा कल्याण हो। तुम भयको त्याग दो। मैं तुम्हारा हित करनेके लिये रावणको पुत्र, पौत्र, अमात्य, मन्त्री और बन्धुबान्धवोंसहित युद्धमें मार डालूँगा।


हत्वा क्रूरं दुराधर्षं देवर्षीणां भयावहम्।

दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च॥२९॥

वत्स्यामि मानुषे लोके पालयन् पृथिवीमिमाम्।

देवताओं तथा ऋषियोंको भय देनेवाले उस क्रूर एवं दुर्धर्ष राक्षसका नाश करके मैं ग्यारह हजार वर्षांतक इस पृथ्वीका पालन करता हुआ मनुष्यलोकमें निवास करूँगा’ ।। २८-२९ १/२॥


एवं दत्त्वा वरं देवो देवानां विष्णुरात्मवान्॥३०॥

मानुष्ये चिन्तयामास जन्मभूमिमथात्मनः।

देवताओं को ऐसा वर देकर मनस्वी भगवान् विष्णु ने मनुष्यलोक में पहले अपनी जन्मभूमि के सम्बन्ध में विचार किया॥ ३० १/२॥


ततः पद्मपलाशाक्षः कृत्वाऽऽत्मानं चतुर्विधम्॥३१॥

पितरं रोचयामास तदा दशरथं नृपम्।

इसके बाद कमलनयन श्रीहरि ने अपने को चार स्वरूपों में प्रकट करके राजा दशरथ को पिता बनाने का निश्चय किया॥ ३१ १/२॥


ततो देवर्षिगन्धर्वाः सरुद्राः साप्सरोगणाः।

स्तुतिभिर्दिव्यरूपाभिस्तुष्टवुर्मधुसूदनम्॥३२॥

तब देवता, ऋषि, गन्धर्व, रुद्र तथा अप्सराओंने दिव्य स्तुतियोंके द्वारा भगवान् मधुसूदनका स्तवन किया॥३२॥


तमुद्धतं रावणमुग्रतेजसं प्रवृद्धदएँ त्रिदशेश्वरद्विषम्।

विरावणं साधुतपस्विकण्टकं तपस्विनामुद्धर तं भयावहम्॥३३॥

वे कहने लगे—’प्रभो! रावण बड़ा उद्दण्ड है। उसका तेज अत्यन्त उग्र और घमण्ड बहुत बढ़ा। चढ़ा है। वह देवराज इन्द्रसे सदा द्वेष रखता है। । तीनों लोकोंको रुलाता है, साधुओं और तपस्वी । जनोंके लिये तो वह बहुत बड़ा कण्टक है; अतः तापसों को भय देनेवाले उस भयानक राक्षस की आप जड़ उखाड़ डालिये॥ ३३॥


तमेव हत्वा सबलं सबान्धवं विरावणं रावणमुग्रपौरुषम्।

स्वर्लोकमागच्छ गतज्वरश्चिरं सुरेन्द्रगुप्तं गतदोषकल्मषम्॥ ३४॥

‘उपेन्द्र! सारे जगत् को रुलानेवाले उस उग्र पराक्रमी रावणको सेना और बन्धु-बान्धवोंसहित नष्ट करके अपनी स्वाभाविक निश्चिन्तताके साथ अपने ही द्वारा सुरक्षित उस चिरन्तन वैकुण्ठधाममें आ जाइये; जिसे राग-द्वेष आदि दोषोंका कलुष कभी छू नहीं पाता है’ ॥ ३४ ॥


इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे पञ्चदशः सर्गः ॥१५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आपरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें पंद्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ।१५॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(देवताओं का श्रीहरि से रावणवध के लिये अवतीर्ण होने को कहना, पुत्रेष्टि यज्ञ में अग्निकुण्ड से प्राजापत्य पुरुष का प्रकट हो खीर अर्पण करना और रानियों का गर्भवती होना)

षोडशः सर्गः 

सर्ग-16

ततो नारायणो विष्णुर्नियुक्तः सुरसत्तमैः।

जानन्नपि सुरानेवं श्लक्ष्णं वचनमब्रवीत्॥१॥

तदनन्तर उन श्रेष्ठ देवताओंद्वारा इस प्रकार रावणवधके लिये नियुक्त होनेपर सर्वव्यापी नारायणने रावणवधके उपायको जानते हुए भी देवताओंसे यह मधुर वचन कहा- ॥१॥

उपायः को वधे तस्य राक्षसाधिपतेः सुराः।

यमहं तं समास्थाय निहन्यामृषिकण्टकम्॥२॥

‘देवगण! राक्षसराज रावणके वधके लिये कौन-सा उपाय है, जिसका आश्रय लेकर मैं महर्षियोंके लिये कण्टकरूप उस निशाचरका वध करूँ?’ ॥२॥

एवमुक्ताः सुराः सर्वे प्रत्यूचुर्विष्णुमव्ययम्।

मानुषं रूपमास्थाय रावणं जहि संयुगे॥३॥

उनके इस तरह पूछनेपर सब देवता उन अविनाशी भगवान् विष्णुसे बोले—’प्रभो! आप मनुष्यका रूप धारण करके युद्ध में रावणको मार डालिये॥३॥

स हि तेपे तपस्तीवं दीर्घकालमरिंदमः।

येन तुष्टोऽभवद् ब्रह्मा लोककृल्लोकपूर्वजः॥४॥

‘उस शत्रुदमन निशाचरने दीर्घकालतक तीव्र तपस्या की थी, जिससे सब लोगोंके पूर्वज लोकस्रष्टा ब्रह्माजी उसपर प्रसन्न हो गये॥ ४॥

संतुष्टः प्रददौ तस्मै राक्षसाय वरं प्रभुः।

नानाविधेभ्यो भूतेभ्यो भयं नान्यत्र मानुषात्॥

‘उसपर संतुष्ट हुए भगवान् ब्रह्माने उस राक्षसको यह वर दिया कि तुम्हें नाना प्रकारके प्राणियोंमेंसे मनुष्यके सिवा और किसीसे भय नहीं है॥५॥

अवज्ञाताः पुरा तेन वरदाने हि मानवाः।

एवं पितामहात् तस्माद वरदानेन गर्वितः॥६॥

‘पूर्वकालमें वरदान लेते समय उस राक्षसने मनुष्योंको दुर्बल समझकर उनकी अवहेलना कर दी थी। इस प्रकार पितामहसे मिले हुए वरदानके कारण उसका घमण्ड बढ़ गया है॥६॥

उत्सादयति लोकांस्त्रीन स्त्रियश्चाप्यपकर्षति।

तस्मात् तस्य वधो दृष्टो मानुषेभ्यः परंतप॥

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले देव! वह तीनों लोकोंको पीड़ा देता और स्त्रियोंका भी अपहरण कर लेता है;अतः उसका वध मनुष्यके हाथसे ही निश्चित हुआ है’॥ ७॥

इत्येतद् वचनं श्रुत्वा सुराणां विष्णुरात्मवान्।

पितरं रोचयामास तदा दशरथं नृपम्॥८॥

समस्त जीवात्माओंको वशमें रखनेवाले भगवान् विष्णुने देवताओंकी यह बात सुनकर अवतारकालमें राजा दशरथको ही पिता बनानेकी इच्छा की॥८॥

स चाप्यपुत्रो नृपतिस्तस्मिन् काले महाद्युतिः।

अयजत् पुत्रयामिष्टिं पुत्रेप्सुररिसूदनः॥९॥

उसी समय वे शत्रुसूदन महातेजस्वी नरेश पुत्रहीन होनेके कारण पुत्रप्राप्तिकी इच्छासे पुत्रेष्टियज्ञ कर रहे थे॥९॥

स कृत्वा निश्चयं विष्णरामन्त्र्य च पितामहम्।

अन्तर्धानं गतो देवैः पूज्यमानो महर्षिभिः॥१०॥

उन्हें पिता बनानेका निश्चय करके भगवान् विष्णु पितामहकी अनुमति ले देवताओं और महर्षियोंसे पूजित हो वहाँसे अन्तर्धान हो गये॥ १०॥

ततो वै यजमानस्य पावकादतुलप्रभम्।

प्रादुर्भूतं महद् भूतं महावीर्यं महाबलम्॥११॥

तत्पश्चात् पुत्रेष्टि यज्ञ करते हुए राजा दशरथके यज्ञमें अग्निकुण्डसे एक विशालकाय पुरुष प्रकट हुआ। उसके शरीरमें इतना प्रकाश था, जिसकी कहीं तुलना नहीं थी। उसका बल-पराक्रम महान् था॥ ११॥

कृष्णं रक्ताम्बरधरं रक्तास्यं दुन्दुभिस्वनम्।

स्निग्धहर्यक्षतनुजश्मश्रुप्रवरमूर्धजम्॥१२॥

उसकी अंगकान्ति काले रंग की थी। उसने अपने शरीरपर लाल वस्त्र धारण कर रखा था। उसका मुख भी लाल ही था। उसकी वाणीसे दुन्दुभिके समान गम्भीर ध्वनि प्रकट होती थी। उसके रोम, दाढ़ी-मूंछ और बड़े-बड़े केश चिकने और सिंहके समान थे॥ १२॥

शुभलक्षणसम्पन्नं दिव्याभरणभूषितम्।

शैलशृंगसमुत्सेधं दृप्तशार्दूलविक्रमम्॥१३॥

वह शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, दिव्य आभूषणोंसे विभूषित, शैलशिखरके समान ऊँचा तथा गर्वीले

सिंहके समान चलनेवाला था॥१३॥

दिवाकरसमाकारं दीप्तानलशिखोपमम्।

तप्तजाम्बूनदमयीं राजतान्तपरिच्छदाम्॥१४॥

दिव्यपायससम्पूर्णां पात्री पत्नीमिव प्रियाम्।

प्रगृह्य विपुलां दोभ्वा॒ स्वयं मायामयीमिव॥१५॥

उसकी आकृति सूर्यके समान तेजोमयी थी। वह प्रज्वलित अग्निकी लपटोंके समान देदीप्यमान हो रहा था। उसके हाथमें तपाये हुए जाम्बूनद नामक सुवर्णकी बनी हुई परात थी, जो । चाँदीके ढक्कनसे ढंकी हुई थी। वह (परात) थाली बहुत बड़ी थी और दिव्य खीरसे भरी हुई थी। उसे उस पुरुषने स्वयं अपनी दोनों भुजाओं पर इस तरह उठा रखा था, मानो कोई रसिक अपनी प्रियतमा पत्नीको अङ्कमें लिये हुए हो। वह अद्भुत परात मायामयी-सी जान पड़ती थी॥ १४-१५॥

समवेक्ष्याब्रवीद् वाक्यमिदं दशरथं नृपम्।

प्राजापत्यं नरं विद्धि मामिहाभ्यागतं नृप॥१६॥

उसने राजा दशरथकी ओर देखकर कहा —’नरेश्वर! मुझे प्रजापतिलोकका पुरुष जानो। मैं प्रजापतिकी ही आज्ञासे यहाँ आया हूँ’॥ १६॥

ततः परं तदा राजा प्रत्युवाच कृताञ्जलिः।

भगवन् स्वागतं तेऽस्तु किमहं करवाणि ते॥१७॥

तब राजा दशरथने हाथ जोड़कर उससे कहा – ‘भगवन्! आपका स्वागत है। कहिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ? ॥ १७॥

अथो पुनरिदं वाक्यं प्राजापत्यो नरोऽब्रवीत्।

राजन्नर्चयता देवानद्य प्राप्तमिदं त्वया॥१८॥

फिर उस प्राजापत्य पुरुषने पुनः यह बात कही —’राजन् ! तुम देवताओंकी आराधना करते हो; इसीलिये तुम्हें आज यह वस्तु प्राप्त हुई है॥ १८ ॥

इदं तु नृपशार्दूल पायसं देवनिर्मितम्।

प्रजाकरं गृहाण त्वं धन्यमारोग्यवर्धनम्॥१९॥

‘नृपश्रेष्ठ! यह देवताओंकी बनायी हुई खीर है, जो संतानकी प्राप्ति करानेवाली है। तुम इसे ग्रहण करो। यह धन और आरोग्यकी भी वृद्धि करनेवाली है॥१९॥

भार्याणामनुरूपाणामश्नीतेति प्रयच्छ वै।

तासु त्वं लप्स्यसे पुत्रान् यदर्थं यजसे नृप।२०॥

‘राजन् ! यह खीर अपनी योग्य पत्नियोंको दो और कहो—’तुमलोग इसे खाओ।’ ऐसा करनेपर उनके गर्भसे आपको अनेक पुत्रोंकी प्राप्ति होगी, जिनके लिये तुम यह यज्ञ कर रहे हो’ ॥ २० ॥

तथेति नृपतिः प्रीतः शिरसा प्रतिगृह्य ताम्।

पात्री देवान्नसम्पूर्णा देवदत्तां हिरण्मयीम्॥२१॥

अभिवाद्य च तद्भूतमद्भुतं प्रियदर्शनम्।

मुदा परमया युक्तश्चकाराभिप्रदक्षिणम्॥२२॥

राजाने प्रसन्नतापूर्वक ‘बहुत अच्छा’ कहकर उस दिव्य पुरुषकी दी हुई देवान्नसे परिपूर्ण

सोनेकी थालीको लेकर उसे अपने मस्तकपर धारण किया। फिर उस अद्भुत एवं प्रियदर्शन पुरुषको प्रणाम करके बड़े आनन्दके साथ उसकी परिक्रमा की॥ २१-२२॥

ततो दशरथः प्राप्य पायसं देवनिर्मितम्।

बभूव परमप्रीतः प्राप्य वित्तमिवाधनः॥२३॥

ततस्तदद्भुतप्रख्यं भूतं परमभास्वरम्।

संवर्तयित्वा तत् कर्म तत्रैवान्तरधीयत॥ २४॥

इस प्रकार देवताओंकी बनायी हुई उस खीरको पाकर राजा दशरथ बहुत प्रसन्न हुए, मानो निर्धनको धन मिल गया हो। इसके बाद वह परम तेजस्वी अद्भुत पुरुष अपना वह काम पूरा करके वहीं अन्तर्धान हो गया॥ २३-२४॥

हर्षरश्मिभिरुद्द्योतं तस्यान्तःपुरमाबभौ।

शारदस्याभिरामस्य चन्द्रस्येव नभोंऽशुभिः॥२५॥

उस समय राजाके अन्तःपुरकी स्त्रियाँ हर्षोल्लाससे बढ़ी हुई कान्तिमयी किरणोंसे प्रकाशित हो ठीक उसी तरह शोभा पाने लगी, जैसे शरत्कालके नयनाभिराम चन्द्रमाकी रम्य रश्मियोंसे उद्भासित होनेवाला आकाश सुशोभित होता है॥ २५ ॥

सोऽन्तःपुरं प्रविश्यैव कौसल्यामिदमब्रवीत्।

पायसं प्रतिगृह्णीष्व पुत्रीयं त्विदमात्मनः॥२६॥

राजा दशरथ वह खीर लेकर अन्तःपुरमें गये और कौसल्यासे बोले—’देवि! यह अपने लिये पुत्रकी प्राप्ति करानेवाली खीर ग्रहण करो’। २६॥

कौसल्यायै नरपतिः पायसार्धं ददौ तदा।

अर्धादर्धं ददौ चापि सुमित्रायै नराधिपः॥२७॥

ऐसा कहकर नरेशने उस समय उस खीरका आधा भाग महारानी कौसल्याको दे दिया। फिर बचे हुए आधेका आधा भाग रानी सुमित्राको अर्पण किया॥ २७॥

कैकेय्यै चावशिष्टार्धं ददौ पुत्रार्थकारणात्।

प्रददौ चावशिष्टार्धं पायसस्यामृतोपमम्॥२८॥

अनुचिन्त्य सुमित्रायै पुनरेव महामतिः।

एवं तासां ददौ राजा भार्याणां पायसं पृथक्॥२९॥

उन दोनोंको देनेके बाद जितनी खीर बच रही, उसका आधा भाग तो उन्होंने पुत्रप्राप्तिके उद्देश्यसे कैकेयीको दे दिया। तत्पश्चात् उस खीरका जो अवशिष्ट आधा भाग था, उस अमृतोपम भागको महाबुद्धिमान् नरेशने कुछ सोच-विचारकर पुनः सुमित्राको ही अर्पित कर दिया। इस प्रकार राजाने अपनी सभी रानियोंको अलग-अलग खीर बाँट दी॥ २८-२९॥

ताश्चैवं पायसं प्राप्य नरेन्द्रस्योत्तमस्त्रियः।

सम्मानं मेनिरे सर्वाः प्रहर्षोदितचेतसः॥ ३०॥

महाराजकी उन सभी साध्वी रानियोंने उनके । हाथसे वह खीर पाकर अपना सम्मान समझा। । उनके चित्तमें अत्यन्त हर्षोल्लास छा गया॥३०॥

ततस्तु ताः प्राश्य तमुत्तमस्त्रियो महीपतेरुत्तमपायसं पृथक्।

हुताशनादित्यसमानतेजसोऽचिरेण गर्भान् प्रतिपेदिरे तदा ॥३१॥

उस उत्तम खीरको खाकर महाराजकी उन तीनों साध्वी महारानियोंने शीघ्र ही पृथक्-पृथक् गर्भ धारण किया। उनके वे गर्भ अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी थे॥ ३१॥

ततस्तु राजा प्रतिवीक्ष्य ताः स्त्रियः प्ररूढगर्भाः प्रतिलब्धमानसः।

बभूव हृष्टस्त्रिदिवे यथा हरिः सुरेन्द्रसिद्धर्षिगणाभिपूजितः ॥ ३२॥

तदनन्तर अपनी उन रानियोंको गर्भवती देख राजा दशरथको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने समझा, मेरा मनोरथ सफल हो गया। जैसे स्वर्गमें इन्द्र, सिद्ध तथा ऋषियोंसे पूजित हो श्रीहरि प्रसन्न होते हैं, उसी प्रकार भूतलमें देवेन्द्र, सिद्ध तथा महर्षियोंसे सम्मानित हो राजा दशरथ संतुष्ट हुए थे॥ ३२॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे षोडशः सर्गः ॥१६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें सोलहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥१६॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(ब्रह्माजी की प्रेरणा से देवता आदि के द्वारा विभिन्न वानरयूथपतियों की उत्पत्ति)

सप्तदशः सर्गः 

सर्ग-17

पत्रत्वं त् गते विष्णौ राज्ञस्तस्य महात्मनः।

उवाच देवताः सर्वाः स्वयम्भूर्भगवानिदम्॥

जब भगवान् विष्णु महामनस्वी राजा दशरथ के पुत्रभाव को प्राप्त हो गये, तब भगवान् ब्रह्माजी ने सम्पूर्ण देवताओं से इस प्रकार कहा- ॥१॥

सत्यसंधस्य वीरस्य सर्वेषां नो हितैषिणः।

विष्णोः सहायान् बलिनः सृजध्वंकामरूपिणः॥२॥

मायाविदश्च शूरांश्च वायुवेगसमान् जवे।

नयज्ञान् बुद्धिसम्पन्नान् विष्णुतुल्यपराक्रमान्॥३॥

असंहार्यानुपायज्ञान् दिव्यसंहननान्वितान्।

सर्वास्त्रगुणसम्पन्नानमृतप्राशनानिव॥४॥

‘देवगण! भगवान् विष्णु सत्यप्रतिज्ञ, वीर और हम सब लोगों के हितैषी हैं। तुमलोग उनके सहायक रूप से ऐसे पुत्रों की सृष्टि करो, जो बलवान्, इच्छानुसार रूप धारण करने में समर्थ, माया जानने वाले, शूरवीर, वायु के समान वेगशाली, नीतिज्ञ, बुद्धिमान्, विष्णुतुल्य पराक्रमी, किसी से परास्त न होने वाले, तरह-तरह के उपायों के जानकार, दिव्य शरीरधारी तथा अमृतभोजी देवताओं के समान सब प्रकार की अस्त्रविद्या के गुणों से सम्पन्न हों।

अप्सरस्सु च मुख्यासु गन्धर्वीणां तनूषु च।

यक्षपन्नगकन्यासु ऋक्षविद्याधरीषु च॥५॥

किन्नरीणां च गात्रेषु वानरीणां तनूषु च।

सृजध्वं हरिरूपेण पुत्रांस्तुल्यपराक्रमान्॥६॥

‘प्रधान-प्रधान अप्सराओं, गन्धर्वो की स्त्रियों, यक्ष और नागों की कन्याओं, रीछों की स्त्रियों, विद्याधरियों, किन्नरियों तथा वानरियों के गर्भ से वानररूप में अपने ही तुल्य पराक्रमी पुत्र उत्पन्न करो॥५-६॥

पूर्वमेव मया सृष्टो जाम्बवानृक्षपंगवः।

जृम्भमाणस्य सहसा मम वक्त्रादजायत॥७॥

‘मैंने पहले से ही ऋक्षराज जाम्बवान् की सृष्टि कर रखी है। एक बार मैं अँभाई ले रहा था, उसी समय वह सहसा मेरे मुंह से प्रकट हो गया’ ॥ ७॥

ते तथोक्ता भगवता तत् प्रतिश्रुत्य शासनम्।

जनयामासुरेवं ते पुत्रान् वानररूपिणः॥८॥

भगवान् ब्रह्मा के ऐसा कहने पर देवताओं ने उनकी आज्ञा स्वीकार की और वानर रूप में अनेकानेक पुत्र उत्पन्न किये॥८॥

ऋषयश्च महात्मानः सिद्धविद्याधरोरगाः।

चारणाश्च सुतान् वीरान् ससृजुर्वनचारिणः॥

महात्मा, ऋषि, सिद्ध, विद्याधर, नाग और चारणों ने भी वन में विचरने वाले वानर-भालुओं के रूप में वीर पुत्रों को जन्म दिया॥९॥

वानरेन्द्र महेन्द्राभमिन्द्रो वालिनमात्मजम्।

सुग्रीवं जनयामास तपनस्तपतां वरः॥१०॥

देवराज इन्द्र ने वानरराज वाली को पुत्र रूप में उत्पन्न किया, जो महेन्द्र पर्वत के समान विशालकाय और बलिष्ठ था। तपने वालों में श्रेष्ठ भगवान् सूर्य ने सुग्रीव को जन्म दिया॥ १० ॥

बृहस्पतिस्त्वजनयत् तारं नाम महाकपिम्।

सर्ववानरमुख्यानां बुद्धिमन्तमनुत्तमम्॥११॥

बृहस्पति ने तार नामक महाकाय वानर को उत्पन्न किया, जो समस्त वानर सरदारों में परम बुद्धिमान् और श्रेष्ठ था॥

धनदस्य सुतः श्रीमान् वानरो गन्धमादनः।

विश्वकर्मा त्वजनयन्नलं नाम महाकपिम्॥१२॥

तेजस्वी वानर गन्धमादन कुबेर का पुत्र था। विश्वकर्मा ने नल नामक महान् वानर को जन्म दिया॥१२॥

पावकस्य सुतः श्रीमान् नीलोऽग्निसदृशप्रभः।

तेजसा यशसा वीर्यादत्यरिच्यत वीर्यवान्॥१३॥

अग्नि के समान तेजस्वी श्रीमान् नील साक्षात् अग्निदेव का ही पुत्र था। वह पराक्रमी वानर तेज, यश और बल-वीर्य में सबसे बढ़कर था॥ १३॥

रूपद्रविणसम्पन्नावश्विनौ रूपसम्मतौ।

मैन्दं च द्विविदं चैव जनयामासतुः स्वयम्॥१४॥

रूप-वैभव से सम्पन्न, सुन्दर रूपवाले दोनों अश्विनीकुमारों ने स्वयं ही मैन्द और द्विविद को जन्म दिया था॥ १४॥

वरुणो जनयामास सुषेणं नाम वानरम्।

शरभं जनयामास पर्जन्यस्तु महाबलः॥१५॥

वरुण ने सुषेण नामक वानर को उत्पन्न किया और महाबली पर्जन्यने शरभ को जन्म दिया। १५॥

मारुतस्यौरसः श्रीमान् हनूमान् नाम वानरः।

वज्रसंहननोपेतो वैनतेयसमो जवे॥१६॥

हनुमान् नामवाले ऐश्वर्यशाली वानर वायुदेवता के औरस पुत्र थे। उनका शरीर वज्र के समान सुदृढ़ था। वे तेज चलने में गरुड़ के समानथे॥ १६॥

सर्ववानरमुख्येषु बुद्धिमान् बलवानपि।

ते सृष्टा बहुसाहस्रा दशग्रीववधोद्यताः॥१७॥

सभी श्रेष्ठ वानरों में वे सबसे अधिक बुद्धिमान् और बलवान् थे। इस प्रकार कई हजार वानरों की उत्पत्ति हुई। वे सभी रावण का वध करने के लिये उद्यत रहते थे॥ १७॥

अप्रमेयबला वीरा विक्रान्ताः कामरूपिणः।

ते गजाचलसंकाशा वपुष्मन्तो महाबलाः॥१८॥

उनके बल की कोई सीमा नहीं थी। वे वीर,पराक्रमी और इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले थे। गजराजों और पर्वतों के समान महाकाय तथा महाबली थे॥ १८॥

ऋक्षवानरगोपुच्छाः क्षिप्रमेवाभिजज्ञिरे।

यस्य देवस्य यद्रूपं वेषो यश्च पराक्रमः॥१९॥

अजायत समं तेन तस्य तस्य पृथक् पृथक्।

गोलांगूलेषु चोत्पन्नाः किंचिदुन्नतविक्रमाः॥२०॥

रीछ, वानर तथा गोलांगूल (लंगूर) जाति के वीर शीघ्र ही उत्पन्न हो गये। जिस देवता का जैसा रूप, वेष और पराक्रम था, उससे उसी के समान पृथक्-पृथक् पुत्र उत्पन्न हुआ। लंगूरों में जो देवता उत्पन्न हुए, वे देवावस्था की अपेक्षा भी कुछ अधिक पराक्रमी थे॥ १९-२०॥

ऋक्षीषु च तथा जाता वानराः किन्नरीषु च।

देवा महर्षिगन्धर्वास्तार्थ्ययक्षा यशस्विनः॥२१॥

नागाः किंपुरुषाश्चैव सिद्धविद्याधरोरगाः।

बहवो जनयामासुहृष्टास्तत्र सहस्रशः॥२२॥

कुछ वानर रीछ जाति की माताओं से तथा कुछ किन्नरियों से उत्पन्न हुए। देवता, महर्षि, गन्धर्व,गरुड़, यशस्वी यक्ष,नाग, किम्पुरुष, सिद्ध, विद्याधर तथा सर्प जाति के बहुसंख्यक व्यक्तियों ने अत्यन्त हर्ष में भरकर सहस्रों पुत्र उत्पन्न किये॥ २१-२२॥

चारणाश्च सुतान् वीरान् ससृजुर्वनचारिणः।

वानरान् सुमहाकायान् सर्वान् वैवनचारिणः॥२३॥

देवताओं का गुण गाने वाले वनवासी चारणों ने बहुत-से वीर, विशालकाय वानरपुत्र उत्पन्न किये। वे सब जंगली फल-मूल खाने वाले थे। २३॥

अप्सरस्सु च मुख्यासु तथा विद्याधरीषु च।

नागकन्यासु च तदा गन्धर्वीणां तनूषु च।

कामरूपबलोपेता यथाकामविचारिणः॥२४॥

मुख्य-मुख्य अप्सराओं, विद्याधरियों, नागकन्याओं तथा गन्धर्व-पत्नियों के गर्भ से भी इच्छानुसार रूप और बल से युक्त तथा स्वेच्छानुसार सर्वत्र विचरण करने में समर्थ वानर पुत्र उत्पन्न हुए॥२४॥

सिंहशार्दूलसदृशा दर्पण च बलेन च।

शिलाप्रहरणाः सर्वे सर्वे पर्वतयोधिनः॥२५॥

वे दर्प और बल में सिंह और व्याघ्रों के समान थे। पत्थर की चट्टानों से प्रहार करते और पर्वत उठाकर लड़ते थे॥ २५॥

नखदंष्ट्रायुधाः सर्वे सर्वे सर्वास्त्रकोविदाः।

विचालयेयुः शैलेन्द्रान् भेदयेयुः स्थिरान्दुमान्॥२६॥

वे सभी नख और दाँतों से भी शस्त्रों का काम लेते थे। उन सबको सब प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञान था। वे पर्वतों को भी हिला सकते थे और स्थिरभाव से खड़े हुए वृक्षों को भी तोड़ डालने की शक्ति रखते थे।। २६ ॥

क्षोभयेयुश्च वेगेन समुद्रं सरितां पतिम्।

दारयेयुः क्षितिं पद्भ्यामाप्लवेयुर्महार्णवान्॥२७॥

अपने वेग से सरिताओं के स्वामी समुद्र को भी क्षुब्ध कर सकते थे। उनमें पैरों से पृथ्वी को विदीर्ण कर डालने की शक्ति थी। वे महासागरों को भी लाँघ सकते थे॥२७॥

नभस्तलं विशेयुश्च गृह्णीयुरपि तोयदान्।

गृह्णीयुरपि मातंगान् मत्तान् प्रव्रजतो वने॥२८॥

वे चाहें तो आकाश में घुस जायँ, बादलों को हाथों से पकड़ लें तथा वन में वेग से चलते हुए मतवाले गजराजों को भी बन्दी बना लें॥२८॥

नर्दमानांश्च नादेन पातयेयुर्विहंगमान्।

ईदृशानां प्रसूतानि हरीणां कामरूपिणाम्॥२९॥

शतं शतसहस्राणि यूथपानां महात्मनाम्।

ते प्रधानेषु यूथेषु हरीणां हरियूथपाः॥ ३०॥

घोर शब्द करते हुए आकाश में उड़ने वाले पक्षियों को भी वे अपने सिंहनाद से गिरा सकते थे। ऐसे बलशाली और इच्छानुसार रूप धारण करने वाले महाकाय वानर यूथपति करोड़ों की संख्या में उत्पन्न हुए थे। वे वानरों के प्रधान यूथों के भी यूथपति थे॥ २९-३० ॥

बभूवुर्मूथपश्रेष्ठान् वीरांश्चाजनयन् हरीन्।

अन्ये ऋक्षवतः प्रस्थानुपतस्थुः सहस्रशः॥३१॥

उन यूथपतियों ने भी ऐसे वीर वानरों को उत्पन्न किया था, जो यूथपों से भी श्रेष्ठ थे। वे और ही प्रकार के वानर थे—इन प्राकृत वानरों से विलक्षण थे। उनमें से सहस्रों वानर-यूथपति ऋक्षवान् पर्वत के शिखरों पर निवास करने लगे॥ ३१॥

अन्ये नानाविधान् शैलान् काननानि चभेजिरे।

सूर्यपुत्रं च सुग्रीवं शक्रपुत्रं च वालिनम्॥३२॥

भ्रातरावुपतस्थुस्ते सर्वे च हरियूथपाः।

नलं नीलं हनूमन्तमन्यांश्च हरियूथपान्॥३३॥

ते तार्थ्यबलसम्पन्नाः सर्वे युद्धविशारदाः।

विचरन्तोऽर्दयन् सर्वान् सिंहव्याघ्रमहोरगान्॥३४॥

दूसरों ने नाना प्रकार के पर्वतों और जंगलों का आश्रय लिया। इन्द्रकुमार वाली और सूर्यनन्दन सुग्रीव ये दोनों भाई थे। समस्त वानरयूथपति उन दोनों भाइयों की सेवा में उपस्थित रहते थे। इसी प्रकार वे नल-नील, हनुमान् तथा अन्य वानर सरदारों का आश्रय लेते थे। वे सभी गरुड़ के समान बलशाली तथा युद्ध की कला में निपुण थे। वे वन में विचरते समय सिंह, व्याघ्र और बड़े-बड़े नाग आदि समस्त वनजन्तुओं को रौंद डालते थे।

महाबलो महाबाहुली विपुलविक्रमः।

जुगोप भुजवीर्येण ऋक्षगोपुच्छवानरान्॥३५॥

महाबाहु वाली महान् बल से सम्पन्न तथा विशेष पराक्रमी थे। उन्होंने अपने बाहुबल से रीछों, लंगूरों तथा अन्य वानरों की रक्षा की थी॥ ३५॥

तैरियं पृथिवी शूरैः सपर्वतवनार्णवा।

कीर्णा विविधसंस्थान नाव्यञ्जनलक्षणैः॥

उन सबके शरीर और पार्थक्यसूचक लक्षण नाना प्रकार के थे। वे शूरवीर वानर पर्वत, वन और समुद्रोंसहित समस्त भूमण्डल में फैल गये॥ ३६॥

तैर्मेघवृन्दाचलकूटसंनिभैमहाबलैर्वानरयूथपाधिपैः।

बभूव भूर्भीमशरीररूपैः समावृता रामसहायहेतोः॥ ३७॥

वे वानरयूथपति मेघसमूह तथा पर्वतशिखर के समान विशालकाय थे। उनका बल महान् था। उनके शरीर और रूप भयंकर थे। भगवान् श्रीराम की सहायता के लिये प्रकट हुए उन वानर वीरों से यह सारी पृथ्वी भर गयी थी॥ ३७॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे सप्तदशः सर्गः॥१७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में सत्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ।१७॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

 (श्रीराम, भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न के जन्म, संस्कार, शीलस्वभाव एवं सद्गुण, राजा के दरबार में विश्वामित्र का आगमन और उनका सत्कार)

अष्टादशः सर्गः 

सर्ग-18

निर्वृत्ते तु क्रतौ तस्मिन् हयमेधे महात्मनः।

प्रतिगृह्यामरा भागान् प्रतिजग्मुर्यथागतम्॥

महामना राजा दशरथ का यज्ञ समाप्त होने पर देवतालोग अपना-अपना भाग ले जैसे आये थे, वैसे लौट गये॥१॥

समाप्तदीक्षानियमः पत्नीगणसमन्वितः।

प्रविवेश पुरीं राजा सभृत्यबलवाहनः॥२॥

दीक्षा का नियम समाप्त होने पर राजा अपनी पत्नियों को साथ ले सेवक, सैनिक और सवारियोंसहित पुरी में प्रविष्ट हुए॥२॥

यथार्ह पूजितास्तेन राज्ञा च पृथिवीश्वराः।

मुदिताः प्रययुर्देशान् प्रणम्य मुनिपुंगवम्॥३॥

भिन्न-भिन्न देशों के राजा भी (जो उनके यज्ञ में सम्मिलित होने के लिये आये थे) महाराज दशरथ द्वारा यथावत् सम्मानित हो मुनिवर वसिष्ठ तथा ऋष्यशृंग को  प्रणाम करके प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने देश को चले गये॥३॥

श्रीमतां गच्छतां तेषां स्वगृहाणि पुरात् ततः।

बलानि राज्ञां शुभ्राणि प्रहृष्टानि चकाशिरे॥४॥

अयोध्यापुरी से अपने घर को जाते हुए उन श्रीमान् नरेशों के शुभ्र सैनिक अत्यन्त हर्षमग्न होने के कारण बड़ी शोभा पा रहे थे॥४॥

गतेषु पृथिवीशेषु राजा दशरथः पुनः।

प्रविवेश पुरीं श्रीमान् पुरस्कृत्य द्विजोत्तमान्॥

उन राजाओं के विदा हो जाने पर श्रीमान् महाराज दशरथ ने श्रेष्ठ ब्राह्मणों को आगे करके अपनी पुरी में प्रवेश किया॥ ५ ॥

शान्तया प्रययौ सार्धमृष्यश्रृंगः सुपूजितः।

अनुगम्यमानो राज्ञा च सानुयात्रेण धीमता॥

राजा द्वारा अत्यन्त सम्मानित हो ऋष्यशृंग मुनि भी शान्ता के साथ अपने स्थान को चले गये। उस समय सेवकोंसहित बुद्धिमान् महाराज दशरथ कुछ दूर तक उनके पीछे-पीछे उन्हें पहुँचाने गये थे॥६॥

एवं विसृज्य तान् सर्वान् राजा सम्पूर्णमानसः।

उवास सुखितस्तत्र पुत्रोत्पत्तिं विचिन्तयन्॥७॥

इस प्रकार उन सब अतिथियों को विदा करके सफल मनोरथ हुए राजा दशरथ पुत्रोत्पत्ति की प्रतीक्षा करते हुए वहाँ बड़े सुख से रहने लगे। ७॥

ततो यज्ञे समाप्ते तु ऋतूनां षट् समत्ययुः।

ततश्च द्वादशे मासे चैत्रे नावमिके तिथौ॥८॥

नक्षत्रेऽदितिदैवत्ये स्वोच्चसंस्थेषु पञ्चसु।

ग्रहेषु कर्कटे लग्ने वाक्पताविन्दुना सह॥९॥

प्रोद्यमाने जगन्नाथं सर्वलोकनमस्कृतम्।

कौसल्याजनयद् रामं दिव्यलक्षणसंयुतम्॥१०॥

यज्ञ-समाप्ति के पश्चात् जब छः ऋतुएँ बीत गयीं, तब बारहवें मास में चैत्र के शुक्लपक्ष की नवमी तिथि को पुनर्वसु नक्षत्र एवं कर्क लग्न में कौसल्यादेवी ने दिव्य लक्षणों से युक्त, सर्वलोकवन्दित जगदीश्वर श्रीराम को जन्म दिया। उस समय (सूर्य, मंगल, शनि, गुरु और शुक्रये) पाँच ग्रह अपने-अपने उच्च स्थान में विद्यमान थे तथा लग्न में चन्द्रमा के साथ बृहस्पति विराजमान थे॥

विष्णोरर्धं महाभागं पुत्रमैक्ष्वाकुनन्दनम्।

लोहिताक्षं महाबाहुं रक्तोष्ठं दुन्दुभिस्वनम्॥११॥

वे विष्णुस्वरूप हविष्य या खीर के आधे भाग से प्रकट हुए थे। कौसल्या के महाभाग पुत्र श्रीराम इक्ष्वाकुकुल का आनन्द बढ़ाने वाले थे। उनके नेत्रों में कुछ-कुछ लालिमा थी। उनके ओठ लाल, भुजाएँ बड़ी-बड़ी और स्वर दुन्दुभि के शब्द के समान गम्भीर था॥ ११॥

कौसल्या शुशुभे तेन पुत्रेणामिततेजसा।

यथा वरेण देवानामदितिर्वज्रपाणिना॥१२॥

उस अमिततेजस्वी पुत्र से महारानी कौसल्या की बड़ी शोभा हुई, ठीक उसी तरह, जैसे सुरश्रेष्ठ वज्रपाणि इन्द्र से देवमाता अदिति सुशोभित हुई थीं॥ १२॥

भरतो नाम कैकेय्यां जज्ञे सत्यपराक्रमः।

साक्षाद् विष्णोश्चतुर्भागः सर्वैः समुदितोगुणैः॥१३॥

तदनन्तर कैकेयी से सत्यपराक्रमी भरत का जन्म हुआ, जो साक्षात् भगवान् विष्णु के (स्वरूपभूत पायस-खीर के) चतुर्थांश से भी न्यून भाग से प्रकट हुए थे। ये समस्त सद्गुणों से सम्पन्न थे। १३॥

अथ लक्ष्मणशत्रुघ्नौ सुमित्राजनयत् सतौ।

वीरौ सर्वास्त्रकुशलौ विष्णोरर्धसमन्वितौ॥१४॥

इसके बाद रानी सुमित्रा ने लक्ष्मण और शत्रुघ्न -इन दो पुत्रों को जन्म दिया। ये दोनों वीर साक्षात् भगवान् विष्णु के अर्धभाग से सम्पन्न और सब प्रकार के अस्त्रों की विद्या में कुशल थे॥ १४ ॥

पुष्ये जातस्तु भरतो मीनलग्ने प्रसन्नधीः।

सार्पे जातौ तु सौमित्री कुलीरेऽभ्युदिते रवौ॥१५॥

भरत सदा प्रसन्नचित्त रहते थे। उनका जन्म पुष्य नक्षत्र तथा मीन लग्न में हुआ था। सुमित्रा के दोनों पुत्र आश्लेषा नक्षत्र और कर्कलग्न में उत्पन्न हुए थे। उस समय सूर्य अपने उच्च स्थान में विराजमान थे॥ १५॥

राज्ञः पुत्रा महात्मानश्चत्वारो जज्ञिरे पृथक्।

गुणवन्तोऽनुरूपाश्च रुच्या प्रोष्ठपदोपमाः॥१६॥

राजा दशरथ के ये चारों महामनस्वी पुत्र पृथक्पृथक गुणों से सम्पन्न और सुन्दर थे। ये भाद्रपदा नामक चार तारों के समान कान्तिमान् थे* ॥ १६ ॥

* प्रोष्ठपदा कहते हैं-भाद्रपदा नक्षत्र को। उसके दो भेद हैं -पूर्वभाद्रपदा और उत्तरभाद्रपदा। इन दोनों में दो-दो तारे हैं। यह बात ज्यौतिषशास्त्र में प्रसिद्ध है। (रा०ति०)

जगुः कलं च गन्धर्वा ननृतुश्चाप्सरोगणाः।

देवदुन्दुभयो नेदुः पुष्पवृष्टिश्च खात् पतत्॥१७॥

इनके जन्म के समय गन्धर्वो ने मधुर गीत गाये। अप्सराओं ने नृत्य किया। देवताओं की दुन्दुभियाँ बजने लगीं तथा आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी॥ १७॥

उत्सवश्च महानासीदयोध्यायां जनाकुलः।

रथ्याश्च जनसम्बाधा नटनर्तकसंकुलाः॥१८॥

अयोध्या में बहुत बड़ा उत्सव हुआ। मनुष्यों की भारी भीड़ एकत्र हुई। गलियाँ और सड़कें लोगों से खचाखच भरी थीं। बहुत-से नट और नर्तक वहाँ अपनी कलाएँ दिखा रहे थे॥१८॥

गायनैश्च विराविण्यो वादनैश्च तथापरैः।

विरेजुर्विपुलास्तत्र सर्वरत्नसमन्विताः॥१९॥

वहाँ सब ओर गाने-बजाने वाले तथा दूसरे लोगों के शब्द गूंज रहे थे। दीन-दुःखियों के लिये लुटाये गये सब प्रकार के रत्न वहाँ बिखरे पड़े थे॥ १९॥

प्रदेयांश्च ददौ राजा सूतमागधवन्दिनाम्।

ब्राह्मणेभ्यो ददौ वित्तं गोधनानि सहस्रशः॥२०॥

राजा दशरथ ने सूत, मागध और वन्दीजनों को देने योग्य पुरस्कार दिये तथा ब्राह्मणों को धन एवं सहस्रों गोधन प्रदान किये॥ २० ॥

अतीत्यैकादशाहं तु नामकर्म तथाकरोत्।

ज्येष्ठं रामं महात्मानं भरतं कैकयीसुतम्॥२१॥

सौमित्रिं लक्ष्मणमिति शत्रुघ्नमपरं तथा।

वसिष्ठः परमप्रीतो नामानि कुरुते तदा ॥२२॥

ग्यारह दिन बीतने पर महाराजने बालकों का नामकरण संस्कार किया। उस समय महर्षि वसिष्ठ ने प्रसन्नता के साथ सबके नाम रखे। उन्होंने ज्येष्ठ पुत्र का नाम ‘राम’ रखा। श्रीराम महात्मा (परमात्मा) थे। कैकेयीकुमार का नाम भरत तथा सुमित्रा के एक पुत्र का नाम लक्ष्मण और दूसरे का शत्रुघ्न निश्चित किया॥ २१-२२॥

* रामायणतिलक के निर्माता ने मूल के एकादशाह शब्द को सूतक के अन्तिम दिन का उपलक्षण माना है। उनका कहना है कि यदि ऐसा न माना जाय तो ‘क्षत्रियस्य द्वादशाहं सूतकम्’ (क्षत्रिय को बारह दिनों का सूतक लगता है) इस स्मृतिवाक्य से विरोध होगा; अतः रामजन्म के बारह दिन बीत जाने के बाद तेरहवें दिन राजा ने नामकरण-संस्कार किया ऐसा मानना चाहिये।

ब्राह्मणान् भोजयामास पौरजानपदानपि।

अददद् ब्राह्मणानां च रत्नौघममलं बहु॥२३॥

राजा ने  ब्राह्मणों, पुरवासियों तथा जनपदवासियों को भी भोजन कराया। ब्राह्मणों को बहुत-से उज्ज्व ल रत्नसमूह दान किये॥ २३॥

तेषां जन्मक्रियादीनि सर्वकर्माण्यकारयत्।

तेषां केतुरिव ज्येष्ठो रामो रतिकरः पितुः॥२४॥

महर्षि वसिष्ठ ने समय-समयपर राजा से उन बालकों के जातकर्म आदि सभी संस्कार करवाये थे। उन सबमें श्रीरामचन्द्रजी ज्येष्ठ होने के साथ ही अपने कुल की कीर्ति-ध्वजा को फहराने वाली पताका के समान थे। वे अपने पिता की प्रसन्नता को बढानेवाले थे॥२४॥

बभूव भूयो भूतानां स्वयम्भूरिव सम्मतः।

सर्वे वेदविदः शूराः सर्वे लोकहिते रताः॥२५॥

सभी भूतों के लिये वे स्वयम्भू ब्रह्माजी के समान विशेष प्रिय थे। राजा के सभी पुत्र वेदों के विद्वान् और शूरवीर थे। सब-के-सब लोकहितकारी कार्यों में संलग्न रहते थे॥ २५ ॥

सर्वे ज्ञानोपसम्पन्नाः सर्वे समुदिता गुणैः।

तेषामपि महातेजा रामः सत्यपराक्रमः॥२६॥

इष्टः सर्वस्य लोकस्य शशाङ्क इव निर्मलः।

गजस्कन्धेऽश्वपृष्ठे च रथचर्यासु सम्मतः॥२७॥

धनुर्वेदे च निरतः पितुः शुश्रूषणे रतः।

सभी ज्ञानवान् और समस्त सद्गुणों से सम्पन्न थे। उनमें भी सत्यपराक्रमी श्रीरामचन्द्रजी सबसे अधिक तेजस्वी और सब लोगों के विशेष प्रिय थे। वे निष्कलङ्क चन्द्रमा के समान शोभा पाते थे। उन्होंने हाथी के कंधे और घोड़े की पीठपर बैठने तथा रथ हाँकने की कला में भी सम्मानपूर्ण स्थान । प्राप्त किया था। वे सदा धनुर्वेद का अभ्यास करते और पिताजी की सेवा में लगे रहते थे।

बाल्यात् प्रभृति सुस्निग्धो लक्ष्मणोलक्ष्मिवर्धनः॥ २८॥

रामस्य लोकरामस्य भ्रातुर्येष्ठस्य नित्यशः।

सर्वप्रियकरस्तस्य रामस्यापि शरीरतः॥२९॥

लक्ष्मी की वृद्धि करने वाले लक्ष्मण बाल्यावस्था से ही श्रीरामचन्द्रजी के प्रति अत्यन्त अनुराग रखते थे। वे अपने बड़े भाई लोकाभिराम श्रीराम का सदा ही प्रिय करते थे और शरीर से भी उनकी सेवा में ही जुटे रहते थे।

लक्ष्मणो लक्ष्मिसम्पन्नो बहिःप्राण इवापरः।

न च तेन विना निद्रां लभते पुरुषोत्तमः॥३०॥

मृष्टमन्नमुपानीतमश्नाति न हि तं विना।

शोभासम्पन्न लक्ष्मण श्रीरामचन्द्रजी के लिये बाहर विचरने वाले दूसरे प्राण के समान थे। पुरुषोत्तम श्रीराम को उनके बिना नींद भी नहीं आती थी। यदि उनके पास उत्तम भोजन लाया जाता तो श्रीरामचन्द्रजी उसमें से लक्ष्मण को दिये बिना नहीं खाते थे॥ ३० १/२॥

यदा हि हयमारूढो मृगयां याति राघवः॥३१॥

अथैनं पृष्ठतोऽभ्येति सधनुः परिपालयन्।

भरतस्यापि शत्रुघ्नो लक्ष्मणावरजो हि सः॥३२॥

प्राणैः प्रियतरो नित्यं तस्य चासीत् तथा प्रियः।

जब श्रीरामचन्द्रजी घोड़े पर चढ़कर शिकार खेलने के लिये जाते, उस समय लक्ष्मण धनुष लेकर उनके शरीर की रक्षा करते हुए पीछे-पीछे जाते थे। इसी प्रकार लक्ष्मण के छोटे भाई शत्रुघ्न भरतजी को प्राणों से भी अधिक प्रिय थे और वे भी भरतजी को सदा प्राणों से भी अधिक प्रिय मानते थे। ३१-३२ १/२॥

स चतुर्भिर्महाभागैः पुत्रैर्दशरथः प्रियैः॥ ३३॥

बभूव परमप्रीतो देवैरिव पितामहः।

इन चार महान् भाग्यशाली प्रिय पुत्रों से राजा दशरथ को बड़ी प्रसन्नता प्राप्त होती थी, ठीक वैसे ही जैसे चार देवताओं (दिक्पालों) से ब्रह्माजी को प्रसन्नता होती है।॥ ३३ १/२ ॥

ते यदा ज्ञानसम्पन्नाः सर्वे समुदिता गुणैः॥३४॥

ह्रीमन्तः कीर्तिमन्तश्च सर्वज्ञा दीर्घदर्शिनः।

तेषामेवंप्रभावाणां सर्वेषां दीप्ततेजसाम्॥३५॥

पिता दशरथो हृष्टो ब्रह्मा लोकाधिपो यथा।

वे सब बालक जब समझदार हुए, तब समस्त सद्गुणों से सम्पन्न हो गये। वे सभी लज्जाशील, यशस्वी, सर्वज्ञ और दूरदर्शी थे। ऐसे प्रभावशालीऔर अत्यन्त तेजस्वी उन सभी पुत्रों की प्राप्ति से राजा दशरथ लोकेश्वर ब्रह्मा की भाँति बहुत प्रसन्न थे॥ ३४-३५ १/२॥

ते चापि मनुजव्याघ्रा वैदिकाध्ययने रताः॥३६॥

पितृशुश्रूषणरता धनुर्वेदे च निष्ठिताः।

वे पुरुषसिंह राजकुमार प्रतिदिन वेदों के स्वाध्याय, पिता की सेवा तथा धनुर्वेद के अभ्यास में दत्त-चित्त रहते थे॥ ३६ १/२॥

अथ राजा दशरथस्तेषां दारक्रियां प्रति॥३७॥

चिन्तयामास धर्मात्मा सोपाध्यायः सबान्धवः।

तस्य चिन्तयमानस्य मन्त्रिमध्ये महात्मनः॥३८॥

अभ्यागच्छन्महातेजा विश्वामित्रो महामुनिः।

एक दिन धर्मात्मा राजा दशरथ पुरोहित तथा बन्धु-बान्धवों के साथ बैठकर पुत्रों के विवाह के विषय में विचार कर रहे थे। मन्त्रियों के बीच में विचार करते हुए उन महामनानरेशके यहाँ महातेजस्वी महामुनि विश्वामित्र पधारे॥ ३७-३८ १/२॥

स राज्ञो दर्शनाकांक्षी द्वाराध्यक्षानुवाच ह॥३९॥

शीघ्रमाख्यात मां प्राप्तं कौशिकं गाधिनःसुतम्।

वे राजा से मिलना चाहते थे। उन्होंने द्वारपालों से कहा—’तुमलोग शीघ्र जाकर महाराज को यह सूचना दो कि कुशिकवंशी गाधिपुत्र विश्वामित्र आये हैं’ ॥ ३९ १/२ ॥

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य राज्ञो वेश्म प्रदुद्रुवुः ॥४०॥

सम्भ्रान्तमनसः सर्वे तेन वाक्येन चोदिताः।

उनकी यह बात सुनकर वे द्वारपाल दौड़े हुए राजा के दरबार में गये। वे सब विश्वामित्र के उस वाक्य से प्रेरित होकर मन-ही-मन घबराये हुए थे। ४० १/२॥

ते गत्वा राजभवनं विश्वामित्रमृषिं तदा॥४१॥

प्राप्तमावेदयामासुर्नृपायेक्ष्वाकवे तदा।

राजा के दरबार में पहुँचकर उन्होंने इक्ष्वाकुकुलनन्दन अवधनरेश से कहा—’महाराज! महर्षि विश्वामित्र पधारे हैं’। ४१ १/२॥

तेषां तद् वचनं श्रुत्वा सपुरोधाः समाहितः॥४२॥

प्रत्युज्जगाम संहृष्टो ब्रह्माणमिव वासवः।

उनकी वह बात सुनकर राजा सावधान हो गये। उन्होंने पुरोहित को साथ लेकर बड़े हर्ष के साथ उनकी अगवानी की, मानो देवराज इन्द्र ब्रह्माजी का स्वागत कर रहे हों॥ ४२ १/२ ॥

स दृष्ट्वा ज्वलितं दीप्त्या तापसं संशितव्रतम्॥४३॥

प्रहृष्टवदनो राजा ततोऽर्ध्यमुपहारयत्।

विश्वामित्रजी कठोर व्रत का पालन करने वाले तपस्वी थे। वे अपने तेज से प्रज्वलित हो रहे थे। उनका दर्शन करके राजा का मुख प्रसन्नता से खिल उठा और उन्होंने महर्षि को अर्घ्य निवेदन किया॥ ४३ १/२॥

स राज्ञः प्रतिगृह्यार्घ्य शास्त्रदृष्टेन कर्मणा॥४४॥

कुशलं चाव्ययं चैव पर्यपृच्छन्नराधिपम्।

राजा का वह अर्घ्य शास्त्रीय विधि के अनुसार स्वीकार करके महर्षि ने उनसे कुशल-मंगल पूछा॥ ४४ १/२॥

पुरे कोशे जनपदे बान्धवेषु सुहृत्सु च॥४५॥

कुशलं कौशिको राज्ञः पर्यपृच्छत् सुधार्मिकः।

धर्मात्मा विश्वामित्र ने क्रमशः राजा के नगर, खजाना, राज्य, बन्धु-बान्धव तथा मित्रवर्गआदि के विषय में कुशल प्रश्न किया- ॥ ४५ १/२॥

अपि ते संनताः सर्वे सामन्तरिपवो जिताः॥

दैवं च मानुषं चैव कर्म ते साध्वनुष्ठितम्।

‘राजन् आपके राज्य की सीमा के निकट रहने वाले शत्रु राजा आपके समक्ष नतमस्तक तो हैं? आपने उनपर विजय तो प्राप्त की है न? आपके यज्ञयाग आदि देवकर्म और अतिथिसत्कार आदि मनुष्यकर्म तो अच्छी तरह सम्पन्न होते हैं न?’ ॥ ४६ १/२॥

वसिष्ठं च समागम्य कुशलं मुनिपुंगवः॥४७॥

ऋषींश्च तान् यथान्यायं महाभाग उवाच ह। ।

इसके बाद महाभाग मुनिवर विश्वामित्र ने वसिष्ठजी तथा अन्यान्य ऋषियों से मिलकर उन सबका यथावत् कुशल-समाचार पूछा॥ ४७ १/२॥

ते सर्वे हृष्टमनसस्तस्य राज्ञो निवेशनम्॥४८॥

विविशुः पूजितास्तेन निषेदुश्च यथार्हतः।

फिर वे सब लोग प्रसन्नचित्त होकर राजा के दरबार में गये और उनके द्वारा पूजित हो यथायोग्य आसनों पर बैठे॥

अथ हृष्टमना राजा विश्वामित्रं महामुनिम्॥४९॥

उवाच परमोदारो हृष्टस्तमभिपूजयन्।

तदनन्तर प्रसन्नचित्त परम उदार राजा दशरथ ने पुलकित होकर महामुनि विश्वामित्र की प्रशंसा करते हुए कहा- ॥ ४९ १/२॥

यथामृतस्य सम्प्राप्तिर्यथा वर्षमनूदके॥५०॥

यथा सदृशदारेषु पुत्रजन्माप्रजस्य वै।

प्रणष्टस्य यथा लाभो यथा हर्षो महोदयः॥५१॥

तथैवागमनं मन्ये स्वागतं ते महामुने।

कं च ते परमं कामं करोमि किमु हर्षितः॥५२॥

‘महामुने! जैसे किसी मरणधर्मा मनुष्य को अमृतकी प्राप्ति हो जाय, निर्जल प्रदेश में पानी बरस जाय, किसी संतानहीन को अपने अनुरूपपत्नी के गर्भ से पुत्र प्राप्त हो जाय, खोयी हुई निधि मिल जाय तथा किसी महान् उत्सव से हर्ष का उदय हो, उसी प्रकार आपका यहाँ शुभागमन हुआ है। ऐसा मैं मानता हूँ। आपका स्वागत है। आपके मन में कौन-सी उत्तम कामना है, जिसको मैं हर्ष के साथ पूर्ण करूँ? ॥ ५०–५२॥

पात्रभूतोऽसि मे ब्रह्मन् दिष्ट्या प्राप्तोऽसिमानद।

अद्य मे सफलं जन्म जीवितं च सुजीवितम्॥

‘ब्रह्मन्! आप मुझसे सब प्रकार की सेवा लेने योग्य उत्तम पात्र हैं। मानद! मेरा अहोभाग्य है, जो आपने यहाँ तक पधारने का कष्ट उठाया। आज मेरा जन्म सफल और जीवन धन्य हो गया। ५३॥

यस्माद् विप्रेन्द्रमद्राक्षं सुप्रभाता निशा मम।

पूर्वं राजर्षिशब्देन तपसा द्योतितप्रभः॥५४॥

ब्रह्मर्षित्वमनुप्राप्तः पूज्योऽसि बहुधा मया।

तदद्भुतमभूद् विप्र पवित्रं परमं मम॥५५॥

‘मेरी बीती हुई रात सुन्दर प्रभात दे गयी, जिससे मैंने आज आप ब्राह्मणशिरोमणि का दर्शन किया। पूर्वकाल में आप राजर्षि शब्द से  उपलक्षित होते थे, फिर तपस्या से अपनी अद्भुत प्रभा को प्रकाशित करके आपने ब्रह्मर्षि का पद पाया; अतः आप राजर्षि और ब्रह्मर्षि दोनों ही रूपों में मेरे पूजनीय हैं। आपका जो यहाँ मेरे समक्ष शुभागमन हुआ है, यह परम पवित्र और अद्भुत है।

शुभक्षेत्रगतश्चाहं तव संदर्शनात् प्रभो।

ब्रूहि यत् प्रार्थितं तुभ्यं कार्यमागमनं प्रति॥

“प्रभो! आपके दर्शनसे आज मेरा घर तीर्थ हो गया। मैं अपने-आपको पुण्यक्षेत्रों की यात्रा करके आया हुआ मानता हूँ। बताइये, आप क्या चाहते हैं? आपके शुभागमन का शुभ उद्देश्य क्या है ? ॥५६॥

इच्छाम्यनुगृहीतोऽहं त्वदर्थं परिवृद्धये।

कार्यस्य न विमर्श च गन्तुमर्हसि सुव्रत॥५७॥

‘उत्तम व्रत का पालन करने वाले महर्षे! मैं चाहता हूँ कि आपकी कृपा से अनुगृहीत होकर आपके अभीष्ट मनोरथ को जान लूँ और अपने अभ्युदय के लिये उसकी पूर्ति करूँ। ‘कार्य सिद्ध होगा या नहीं’ ऐसे संशय को अपने मन में स्थान न दीजिये।। ५७॥

कर्ता चाहमशेषेण दैवतं हि भवान् मम।

मम चायमनुप्राप्तो महानभ्युदयो द्विज।

तवागमनजः कृत्स्नो धर्मश्चानुत्तमो द्विज॥५८॥

‘आप जो भी आज्ञा देंगे, मैं उसका पूर्णरूप से पालन करूँगा; क्योंकि सम्माननीय अतिथि होने के नाते आप मुझ गृहस्थ के लिये देवता हैं। ब्रह्मन्! आज आपके आगमन से मुझे सम्पूर्ण धर्मों का उत्तम फल प्राप्त हो गया। यह मेरे महान् अभ्युदय का अवसर आया है’। ५८॥

इति हृदयसुखं निशम्य वाक्यं श्रुतिसुखमात्मवता विनीतमुक्तम्।

प्रथितगुणयशा गुणैर्विशिष्टःपरमऋषिः परमं जगाम हर्षम्॥५९॥

मनस्वी नरेश के कहे हुए ये विनययुक्त वचन, जो हृदय और कानों को सुख देने वाले थे, सुनकर विख्यात गुण और यशवाले, शम-दम आदि सद्गुणों से सम्पन्न महर्षि विश्वामित्र बहुत प्रसन्न हुए॥ ५९॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डेऽष्टादशः सर्गः॥१८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में अठारहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥१८॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(विश्वामित्र के मुख से श्रीराम को साथ ले जाने की माँग सुनकर राजा दशरथ का दुःखित एवं मूर्च्छित होना)

एकोनविंशः सर्गः 

सर्ग-19

तच्छ्रुत्वा राजसिंहस्य वाक्यमद्भुतविस्तरम्।

हृष्टरोमा महातेजा विश्वामित्रोऽभ्यभाषत॥

नृपश्रेष्ठ महाराज दशरथ का यह अद्भुत विस्तार से युक्त वचन सुनकर महातेजस्वी विश्वामित्र पुलकित हो उठे और इस प्रकार बोले॥१॥

सदृशं राजशार्दूल तवैव भुवि नान्यतः।

महावंशप्रसूतस्य वसिष्ठव्यपदेशिनः॥२॥

राजसिंह! ये बातें आपके ही योग्य हैं। इस पृथ्वी पर दूसरे के मुख से ऐसे उदार वचन निकलने की सम्भावना नहीं है। क्यों न हो, आपमहान् कुल में उत्पन्न हैं और वसिष्ठ-जैसे ब्रह्मर्षि आपके उपदेशक हैं ॥२॥

यत् तु मे हृद्गतं वाक्यं तस्य कार्यस्य निश्चयम्।

कुरुष्व राजशार्दूल भव सत्यप्रतिश्रवः॥३॥

‘अच्छा, अब जो बात मेरे हृदय में है, उसे सुनिये। नृपश्रेष्ठ! सुनकर उस कार्य को अवश्य पूर्ण करने का निश्चय कीजिये। आपने मेरा कार्य सिद्ध करने की प्रतिज्ञा की है। इस प्रतिज्ञा को सत्य कर दिखाइये॥३॥

अहं नियममातिष्ठे सिद्ध्यर्थं पुरुषर्षभ।

तस्य विघ्नकरौ द्वौ तु राक्षसौ कामरूपिणौ ॥४॥

‘पुरुषप्रवर! मैं सिद्धि के लिये एक नियम का अनुष्ठान करता हूँ। उसमें इच्छानुसार रूप धारण करने वाले दो राक्षस विघ्न डाल रहे हैं॥ ४॥

व्रते तु बहुशश्चीर्णे समाप्त्यां राक्षसाविमौ।

मारीचश्च सुबाहुश्च वीर्यवन्तौ सुशिक्षितौ॥

‘मेरे इस नियम का अधिकांश कार्य पूर्ण हो चुका है। अब उसकी समाप्ति के समय वे दो राक्षस आ धमके हैं। उनके नाम हैं मारीच और सुबाहु। वे दोनों बलवान् और सुशिक्षित हैं॥५॥

तौ मांसरुधिरौघेण वेदिं तामभ्यवर्षताम्।

अवधूते तथाभूते तस्मिन् नियमनिश्चये॥६॥

कृतश्रमो निरुत्साहस्तस्माद् देशादपाक्रमे।

‘उन्होंने मेरी यज्ञवेदी पर रक्त और मांस की वर्षा कर दी है। इस प्रकार उस समाप्तप्राय नियम में विघ्न पड़ जाने के कारण मेरा परिश्रम व्यर्थ गयाऔर मैं उत्साहहीन होकर उस स्थान से चला आया॥ ६ १/२॥

न च मे क्रोधमुत्स्रष्टुं बुद्धिर्भवति पार्थिव॥७॥

‘पृथ्वीनाथ! उनके ऊपर अपने क्रोध का प्रयोग करूँ- उन्हें शाप दे दूं, ऐसा विचार मेरे मन में नहीं आता है।

तथाभूता हि सा चर्या न शापस्तत्र मुच्यते।

स्वपुत्रं राजशार्दूल रामं सत्यपराक्रमम्॥८॥

काकपक्षधरं वीरं ज्येष्ठं मे दातुमर्हसि।

‘क्योंकि वह नियम ही ऐसा है, जिसको आरम्भ कर देने पर किसी को शाप नहीं दिया जाता; अतः नृपश्रेष्ठ! आप अपने काकपच्छधारी, सत्यपराक्रमी, शूरवीर ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम को मुझे दे दें॥ ८ १/२॥

शक्तो ह्येष मया गुप्तो दिव्येन स्वेन तेजसा॥९॥

राक्षसा ये विकर्तारस्तेषामपि विनाशने।

श्रेयश्चास्मै प्रदास्यामि बहुरूपं न संशयः॥१०॥

‘ये मुझसे सुरक्षित रहकर अपने दिव्य तेज से उन विघ्नकारी राक्षसों का नाश करने में समर्थ हैं। मैं इन्हें अनेक प्रकार का श्रेय प्रदान करूँगा, इसमें संशय नहीं है॥

त्रयाणामपि लोकानां येन ख्यातिं गमिष्यति।

न च तौ राममासाद्य शक्तो स्थातुं कथंचन॥११॥

‘उस श्रेय को पाकर ये तीनों लोकों में विख्यात होंगे। श्रीराम के सामने आकर वे दोनों राक्षस किसी तरह ठहर नहीं सकते॥११॥

न च तौ राघवादन्यो हन्तुमुत्सहते पुमान्।

वीर्योत्सिक्तौ हि तौ पापौ कालपाशवशंगतौ॥१२॥

रामस्य राजशार्दूल न पर्याप्तौ महात्मनः।

‘इन रघुनन्दन के सिवा दूसरा कोई पुरुष उन राक्षसों को मारने का साहस नहीं कर सकता। नृपश्रेष्ठ! अपने बल का घमण्ड रखने वाले वे दोनों पापी निशाचर कालपाश के अधीन हो गये हैं; अतः महात्मा श्रीराम के सामने नहीं टिक सकते॥ १२ १/२॥

न च पुत्रगतं स्नेहं कर्तुमर्हसि पार्थिव॥१३॥

अहं ते प्रतिजानामि हतौ तौ विद्धि राक्षसौ।

‘भूपाल! आप पुत्रविषयक स्नेह को सामने न लाइये। मैं आपसे प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ कि उन दोनों राक्षसों को इनके हाथ से मरा हुआ ही समझिये॥ १३ १/२॥

अहं वेद्मि महात्मानं रामं सत्यपराक्रमम्॥१४॥

वसिष्ठोऽपि महातेजा ये चेमे तपसि स्थिताः।

‘सत्यपराक्रमी महात्मा श्रीराम क्या हैं—यह मैं जानता हूँ। महातेजस्वी वसिष्ठजी तथा ये अन्य तपस्वी भी जानते हैं॥ १४ १/२ ॥

यदि ते धर्मलाभं तु यशश्च परमं भुवि॥१५॥

स्थिरमिच्छसि राजेन्द्र रामं मे दातुमर्हसि।

‘राजेन्द्र! यदि आप इस भूमण्डल में धर्म-लाभ और उत्तम यश को स्थिर रखना चाहते हों तो श्रीराम को मुझे दे दीजिये। १५ १/२ ॥

यद्यभ्यनुज्ञां काकुत्स्थ ददते तव मन्त्रिणः॥१६॥

वसिष्ठप्रमुखाः सर्वे ततो रामं विसर्जय।

‘ककुत्स्थनन्दन! यदि वसिष्ठ आदि आपके सभी मन्त्री आपको अनुमति दें तो आप श्रीराम को मेरे साथ विदा कर दीजिये। १६ १/२॥

अभिप्रेतमसंसक्तमात्मजं दातुमर्हसि ॥१७॥

दशरात्रं हि यज्ञस्य रामं राजीवलोचनम्।

‘मुझे राम को ले जाना अभीष्ट है। ये भी बड़े होने के कारण अब आसक्तिरहित हो गये हैं; अतःआप यज्ञ के अवशिष्ट दस दिनों के लिये अपने पुत्र कमलनयन श्रीराम को मुझे दे दीजिये॥ १७ १/२ ।।

नात्येति कालो यज्ञस्य यथायं मम राघव॥१८॥

तथा कुरुष्व भद्रं ते मा च शोके मनः कृथाः।

‘रघुनन्दन! आप ऐसा कीजिये जिससे मेरे यज्ञ का समय व्यतीत न हो जाय। आपका कल्याण हो। आप अपने मन को शोक और चिन्ता में न डालिये’ ।। १८ १/२ ॥

इत्येवमुक्त्वा धर्मात्मा धर्मार्थसहितं वचः॥१९॥

विरराम महातेजा विश्वामित्रो महामतिः।

यह धर्म और अर्थ से युक्त वचन कहकर धर्मात्मा, महातेजस्वी, परमबुद्धिमान् विश्वामित्रजी चुप हो गये॥

स तन्निशम्य राजेन्द्रो विश्वामित्रवचः शुभम्॥२०॥

शोकेन महताविष्टश्चचाल च मुमोह च।

विश्वामित्र का यह शुभ वचन सुनकर महाराज दशरथ को पुत्र-वियोग की आशङ्का से महान् दुःख हुआ। वे उससे पीड़ित हो सहसा काँप उठे और बेहोश हो गये॥ २० १/२ ॥

लब्धसंज्ञस्तदोत्थाय व्यषीदत भयान्वितः॥२१॥

इति हृदयमनोविदारणं मुनिवचनं तदतीव शुश्रुवान्।

नरपतिरभवन्महान् महात्मा व्यथितमनाः प्रचचाल चासनात्॥२२॥

थोड़ी देर बाद जब उन्हें होश हुआ, तब वे भयभीत हो विषाद करने लगे। विश्वामित्र मुनि का वचन राजा के हृदय और मन को विदीर्ण करने वाला था। उसे सुनकर उनके मन में बड़ी व्यथा हुई। वे महामनस्वी महाराज अपने आसन से विचलित हो मूर्च्छित हो गये।

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येबालकाण्डे एकोनविंशः सर्गः॥१९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में उन्नीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १९॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्

(राजा दशरथ का विश्वामित्र को अपना पुत्र देने से इनकार करना और विश्वामित्र का कुपित होना)

विंशः सर्गः 

सर्ग-20

तच्छ्रुत्वा राजशार्दूलो विश्वामित्रस्य भाषितम्।

मुहर्तमिव निःसंज्ञः संज्ञावानिदमब्रवीत्॥१॥

विश्वामित्रजी का वचन सुनकर नृपश्रेष्ठ दशरथ दो घड़ी के लिये संज्ञाशून्य-से हो गये। फिर सचेत होकर इस प्रकार बोले- ॥१॥

ऊनषोडशवर्षो मे रामो राजीवलोचनः।

न युद्धयोग्यतामस्य पश्यामि सह राक्षसैः॥२॥

‘महर्षे! मेरा कमलनयन राम अभी पूरे सोलह वर्ष का भी नहीं हुआ है। मैं इसमें राक्षसों के साथ युद्ध करने की योग्यता नहीं देखता॥२॥

इयमक्षौहिणी सेना यस्याहं पतिरीश्वरः।

अनया सहितो गत्वा योद्धाहं तैर्निशाचरैः॥३॥

‘यह मेरी अक्षौहिणी सेना है, जिसका मैं पालक और स्वामी भी हूँ। इस सेना के साथ मैं स्वयं ही चलकर उन निशाचरों के साथ युद्ध करूँगा॥३॥

इमे शूराश्च विक्रान्ता भृत्यामेऽस्त्रविशारदाः।

योग्या रक्षोगणैर्योढुं न रामं नेतुमर्हसि ॥४॥

‘ये मेरे शूरवीर सैनिक, जो अस्त्रविद्या में कुशल और पराक्रमी हैं, राक्षसों के साथ जूझने की योग्यता रखते हैं; अतः इन्हें ही ले जाइये; राम को ले जाना उचित नहीं होगा॥ ४॥

अहमेव धनुष्पाणिर्गोप्ता समरमूर्धनि।

यावत् प्राणान् धरिष्यामि तावद् योत्स्येनिशाचरैः॥५॥

‘मैं स्वयं ही हाथ में धनुष ले युद्ध के मुहाने पर रहकर आपके यज्ञ की रक्षा करूँगा और जब तक इस शरीर में प्राण रहेंगे तबतक निशाचरों के साथ लड़ता रहँगा॥५॥

निर्विघ्ना व्रतचर्या सा भविष्यति सुरक्षिता।

अहं तत्र गमिष्यामि न रामं नेतुमर्हसि॥६॥

‘मेरे द्वारा सुरक्षित होकर आपका नियमानुष्ठान बिना किसी विघ्न-बाधा के पूर्ण होगा; अतः मैं ही वहाँ आपके साथ चलूँगा। आप राम को न ले जाइये॥६॥

बालो ह्यकृतविद्यश्च न च वेत्ति बलाबलम्।

न चास्त्रबलसंयुक्तो न च युद्धविशारदः॥७॥

‘मेरा राम अभी बालक है। इसने अभी तक युद्ध की विद्या ही नहीं सीखी है। यह दूसरे के बलाबल को नहीं जानता है। न तो यह अस्त्रबल से सम्पन्न है और न युद्ध की कला में निपुण ही॥७॥

न चासौ रक्षसां योग्यः कूटयुद्धा हि राक्षसाः।

विप्रयुक्तो हि रामेण मुहूर्तमपि नोत्सहे॥८॥

जीवितुं मुनिशार्दूलं न रामं नेतुमर्हसि।

यदि वा राघवं ब्रह्मन् नेतुमिच्छसि सुव्रत॥९॥

चतुरंगसमायुक्तं मया सह च तं नय।

‘अतः यह राक्षसों से युद्ध करने योग्य नहीं है; क्योंकि राक्षस माया से–छल-कपट से युद्ध करते हैं। इसके सिवा राम से वियोग हो जाने पर मैं दो घड़ी भी जीवित नहीं रह सकता; मुनिश्रेष्ठ ! इसलिये आप मेरे राम को न ले जाइये। अथवा ब्रह्मन् ! यदि आपकी इच्छा राम को ही ले जाने की हो तो चतुरङ्गिणी सेना के साथ मैं भी चलता हूँ। मेरे साथ इसे ले चलिये॥ ८-९ १/२॥

षष्टिर्वर्षसहस्राणि जातस्य मम कौशिक॥१०॥

कृच्छ्रेणोत्पादितश्चायं न रामं नेतुमर्हसि।

‘कुशिकनन्दन! मेरी अवस्था साठ हजार वर्ष की हो गयी। इस बुढ़ापे में बड़ी कठिनाई से मुझे पुत्र की प्राप्ति हुई है, अतः आप राम को न ले जाइये॥ १० १/२॥

चतुर्णामात्मजानां हि प्रीतिः परमिका मम॥११॥

ज्येष्ठे धर्मप्रधाने च न रामं नेतुमर्हसि।

‘धर्मप्रधान राम मेरे चारों पुत्रों में ज्येष्ठ है; इसलिये उसपर मेरा प्रेम सबसे अधिक है; अतः आप राम को न ले जाइये॥ ११ १/२ ॥

किंवीर्या राक्षसास्ते च कस्य पुत्राश्च के च ते॥१२॥

कथं प्रमाणाः के चैतान् रक्षन्ति मुनिपुंगव।

कथं च प्रतिकर्तव्यं तेषां रामेण रक्षसाम्॥१३॥

‘वे राक्षस कैसे पराक्रमी हैं, किसके पुत्र हैं और कौन हैं? उनका डील डौल कैसा है? मनीश्वर! उनकी रक्षा कौन करते हैं? राम उन राक्षसों का सामना कैसे कर सकता है? ॥ १२-१३॥

मामकैर्वा बलैर्ब्रह्मन् मया वा कूटयोधिनाम्।

सर्वं मे शंस भगवन् कथं तेषां मया रणे॥१४॥

स्थातव्यं दुष्टभावानां वीर्योत्सिक्ता हि राक्षसाः।

‘ब्रह्मन्! मेरे सैनिकों को या स्वयं मुझे ही उन मायायोधी राक्षसों का प्रतीकार कैसे करना चाहिये? भगवन्! ये सारी बातें आप मुझे बताइये। उन दुष्टों के साथ युद्ध में मुझे कैसे खड़ा होना चाहिये? क्योंकि राक्षस बड़े बलाभिमानी होते हैं’॥ १४ १/२॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा विश्वामित्रोऽभ्यभाषत॥१५॥

पौलस्त्यवंशप्रभवो रावणो नाम राक्षसः।

स ब्रह्मणा दत्तवरस्त्रैलोक्यं बाधते भृशम्॥

महाबलो महावीर्यो राक्षसैर्बहुभिर्वृतः।

श्रूयते च महाराज रावणो राक्षसाधिपः॥१७॥

साक्षाद्वैश्रवणभ्राता पुत्रो विश्रवसो मुनेः।

राजा दशरथ की इस बात को सुनकर विश्वामित्रजी बोले—’महाराज! रावण नाम से प्रसिद्ध एक राक्षस है,जो महर्षि पुलस्त्य के कुल में उत्पन्न हुआ है। उसे ब्रह्माजी से मुँहमाँगा वरदान प्राप्त हुआ है। जिससे महान् बलशाली और महापराक्रमी होकर बहुसंख्यक राक्षसों से घिरा हुआ वह निशाचर तीनों लोकों के निवासियों को अत्यन्त कष्ट दे रहा है। सुना जाता है कि राक्षसराज रावण विश्रवा मुनि का औरस पुत्र तथा साक्षात् कुबेर का भाई है॥

यदा न खलु यज्ञस्य विघ्नकर्ता महाबलः॥१८॥

तेन संचोदितौ तौ तु राक्षसौ च महाबलौ।

मारीचश्च सुबाहुश्च यज्ञविघ्नं करिष्यतः॥१९॥

‘वह महाबली निशाचर इच्छा रहते हुए भी स्वयं आकर यज्ञ में विघ्न नहीं डालता (अपने लिये इसे तुच्छ कार्य समझता है); इसलिये उसी की प्रेरणा से दो महान् बलवान् राक्षस मारीच और सुबाहु यज्ञों में विघ्न डाला करते हैं’। १८-१९॥

इत्युक्तो मुनिना तेन राजोवाच मुनिं तदा।

नहि शक्तोऽस्मि संग्रामे स्थातुं तस्य दुरात्मनः॥ २०॥

विश्वामित्र मुनि के ऐसा कहने पर राजा दशरथ उनसे इस प्रकार बोले—’मुनिवर! मैं उस दुरात्मा रावण के सामने युद्ध में नहीं ठहर सकता ॥ २० ॥

स त्वं प्रसादं धर्मज्ञ कुरुष्व मम पुत्रके।

मम चैवाल्पभाग्यस्य दैवतं हि भवान् गुरुः॥२१॥

‘धर्मज्ञ महर्षे! आप मेरे पुत्र पर तथा मुझ मन्दभागी दशरथ पर भी कृपा कीजिये; क्योंकि आप मेरे देवता तथा गुरु हैं ॥ २१॥

देवदानवगन्धर्वा यक्षाः पतगपन्नगाः।

न शक्ता रावणं सोढुं किं पुनर्मानवा युधि॥२२॥

‘युद्ध में रावण का वेग तो देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, गरुड़ और नाग भी नहीं सह सकते; फिर मनुष्यों की तो बात ही क्या है॥ २२॥

स तु वीर्यवतां वीर्यमादत्ते युधि रावणः।

तेन चाहं न शक्तोऽस्मि संयोद्धं तस्य वा बलैः॥२३॥

सबलो वा मुनिश्रेष्ठ सहितो वा ममात्मजैः।

‘मुनिश्रेष्ठ! रावण समरांगण में बलवानों के बल का अपहरण कर लेता है, अतः मैं अपनी सेना और पुत्रों के साथ रहकर भी उससे तथा उसके सैनिकों से युद्ध करने में असमर्थ हूँ॥ २३ १/२॥

कथमप्यमरप्रख्यं संग्रामाणामकोविदम्॥२४॥

बालं मे तनयं ब्रह्मन् नैव दास्यामि पुत्रकम्।

‘ब्रह्मन्! यह मेरा देवोपम पुत्र युद्ध की कला से सर्वथा अनभिज्ञ है। इसकी अवस्था भी अभी बहुत थोड़ी है; इसलिये मैं इसे किसी तरह नहीं दूंगा॥ २४ १/२॥

अथ कालोपमौ युद्धे सुतौ सुन्दोपसुन्दयोः॥२५॥

यज्ञविघ्नकरौ तौ ते नैव दास्यामि पुत्रकम्।

मारीचश्च सुबाहुश्च वीर्यवन्तौ सुशिक्षितौ॥२६॥

‘मारीच और सुबाहु सुप्रसिद्ध दैत्य सुन्द और उपसुन्द के पुत्र हैं। वे दोनों युद्ध में यमराज के समान हैं। यदि वे ही आपके यज्ञ में विघ्न डालने वाले हैं तो मैं उनका सामना करने के लिये अपने पुत्र को नहीं दूंगा; क्योंकि वे दोनों प्रबल पराक्रमी और युद्धविषयक उत्तम शिक्षा से सम्पन्न हैं॥ २५-२६॥

तयोरन्यतरं योद्धं यास्यामि ससुहृद्गणः।

अन्यथा त्वनुनेष्यामि भवन्तं सहबान्धवः॥२७॥

‘मैं उन दोनों में से किसी एक के साथ युद्ध करने के लिये अपने सुहृदों के साथ चलूँगा; अन्यथा—यदि आप मुझे न ले जाना चाहें तो मैं भाई-बन्धुओंसहित आपसे अनुनय-विनय करूँगा कि आप राम को छोड़ दें’॥ २७॥

इति नरपतिजल्पनाद् द्विजेन्द्रं कुशिकसुतं सुमहान् विवेश मन्युः।

सुहुत इव मखेऽग्निराज्यसिक्तः समभवदुज्ज्वलितो महर्षिवह्निः॥२८॥

राजा दशरथ के ऐसे वचन सुनकर विप्रवर कुशिकनन्दन विश्वामित्र के मन में महान् क्रोध का आवेश हो आया, जैसे यज्ञशाला में अग्नि को भलीभाँति आहुति देकर घी की धारा से अभिषिक्त कर दिया जाय और वह प्रज्वलित हो उठे, उसी तरह अग्नितुल्य तेजस्वी महर्षि विश्वामित्र भी क्रोध से जल उठे॥२८॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे विंशः सर्गः ॥२०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।२०॥