सर्ग-01
प्रविश्य तु महारण्यं दण्डकारण्यमात्मवान्।
रामो ददर्श दुर्धर्षस्तापसाश्रममण्डलम्॥१॥
दण्डकारण्य नामक महान् वन में प्रवेश करके मन को वश में रखने वाले दुर्जय वीर श्रीराम ने तपस्वी मुनियों के बहुत-से आश्रम देखे ॥१॥
कुशचीरपरिक्षिप्तं ब्राह्मया लक्ष्या समावृतम्।
यथा प्रदीप्तं दुर्दर्श गगने सूर्यमण्डलम्॥२॥
वहाँ कुश और वल्कल वस्त्र फैले हुए थे। वह आश्रम मण्डल ऋषियों की ब्रह्मविद्या के अभ्यास से प्रकट हुए विलक्षण तेज से व्याप्त था, इसलिये आकाश में प्रकाशित होने वाले दुर्दर्श सूर्य-मण्डल की भाँति वह भूतल पर उद्दीप्त हो रहा था। राक्षस आदि के लिये उसकी ओर देखना भी कठिन था॥२॥
शरण्यं सर्वभूतानां सुसम्मृष्टाजिरं सदा।
मृगैर्बहुभिराकीर्णं पक्षिसंघैः समावृतम्॥३॥
वह आश्रमसमुदाय सभी प्राणियों को शरण देने वाला था। उसका आँगन सदा झाड़ने-बुहारने से स्वच्छ बना रहता था। वहाँ बहुत-से वन्य पशु भरे रहते थे और पक्षियों के समुदाय भी उसे सब ओर से घेरे रहते थे॥
पूजितं चोपनृत्तं च नित्यमप्सरसां गणैः ।
विशालैरग्निशरणैः स्रग्भाण्डैरजिनैः कुशैः॥४॥
समिद्भिस्तोयकलशैः फलमूलैश्च शोभितम्।
आरण्यैश्च महावृक्षैः पुण्यैः स्वादुफलैर्वृतम्॥
वहाँ का प्रदेश इतना मनोरम था कि वहाँ अप्सराएँ प्रतिदिन आकर नृत्य करती थीं। उस स्थान के प्रति उनके मन में बड़े आदर का भाव था। बड़ी-बड़ी अग्निशालाएँ, सुवा आदि यज्ञपात्र, मृगचर्म, कुश,
समिधा, जलपूर्ण कलश तथा फल-मूल उसकी शोभा बढ़ाते थे। स्वादिष्ट फल देने वाले परम पवित्र तथा बड़े-बड़े वन्य वृक्षों से वह आश्रममण्डल घिरा हुआ था॥ ४-५॥
बलिहोमार्चितं पुण्यं ब्रह्मघोषनिनादितम्।
पुष्पैश्चान्यैः परिक्षिप्तं पद्मिन्या च सपद्मया॥ ६॥
बलिवैश्वदेव और होम से पूजित वह पवित्र आश्रम समूह वेदमन्त्रों के पाठ की ध्वनि से गूंजता रहता था। कमलपुष्पों से सुशोभित पुष्करिणी उस स्थान की शोभा बढ़ाती थी तथा वहाँ और भी बहुत-से फूल सब ओर बिखरे हुए थे॥
फलमूलाशनैर्दान्तैश्चीरकृष्णाजिनाम्बरैः।
सूर्यवैश्वानराभैश्च पुराणैर्मुनिभिर्युतम्॥७॥
उन आश्रमों में चीर और काला मृगचर्म धारण करने वाले तथा फल-मूल का आहार करके रहने वाले, जितेन्द्रिय एवं सूर्य और अग्नि के तुल्य महातेजस्वी, पुरातन मुनि निवास करते थे॥७॥
पुण्यैश्च नियताहारैः शोभितं परमर्षिभिः।
तद् ब्रह्मभवनप्रख्यं ब्रह्मघोषनिनादितम्॥८॥
नियमित आहार करने वाले पवित्र महर्षियों से सुशोभित वह आश्रमसमूह ब्रह्माजी के धाम की भाँति तेजस्वी तथा वेदध्वनि से निनादित था॥ ८॥
ब्रह्मविद्भिर्महाभागैाह्मणैरुपशोभितम्।
तद् दृष्ट्वा राघवः श्रीमांस्तापसाश्रममण्डलम्॥ ९॥
अभ्यगच्छन्महातेजा विज्यं कृत्वा महद् धनुः।
अनेक महाभाग ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण उन आश्रमों की शोभा बढ़ाते थे। महातेजस्वी श्रीराम ने उस आश्रममण्डल को देखकर अपने महान् धनुष की प्रत्यञ्चा उतार दी, फिर वे आश्रम के भीतर गये॥९ १/२॥
दिव्यज्ञानोपपन्नास्ते रामं दृष्ट्वा महर्षयः॥१०॥
अभिजग्मुस्तदा प्रीता वैदेहीं च यशस्विनीम्।
श्रीराम तथा यशस्विनी सीता को देखकर वे दिव्यज्ञान से सम्पन्न महर्षि बड़ी प्रसन्नता के साथ उनके पास गये॥
ते तु सोममिवोद्यन्तं दृष्ट्वा वै धर्मचारिणम्॥ ११॥
लक्ष्मणं चैव दृष्ट्वा तु वैदेहीं च यशस्विनीम्।
मङ्गलानि प्रयुञ्जानाः प्रत्यगृह्णन् दृढव्रताः॥ १२॥
दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रत का पालन करने वाले वे महर्षि उदयकाल के चन्द्रमा की भाँति मनोहर, धर्मात्मा श्रीराम को, लक्ष्मण को और यशस्विनी विदेहराजकुमारी सीता को भी देखकर उन सबके लिये मङ्गलमय आशीर्वाद देने लगे। उन्होंने उन तीनों को आदरणीय अतिथि के रूप में ग्रहण किया। ११-१२॥
रूपसंहननं लक्ष्मी सौकुमार्यं सुवेषताम्।
ददृशुर्विस्मिताकारा रामस्य वनवासिनः॥१३॥
श्रीराम के रूप, शरीर की गठन, कान्ति, सुकुमारता तथा सुन्दर वेष को उन वनवासी मुनियों ने आश्चर्यचकित होकर देखा॥ १३॥
वैदेहीं लक्ष्मणं रामं नेत्रैरनिमिषैरिव।
आश्चर्यभूतान् ददृशुः सर्वे ते वनवासिनः॥१४॥
वन में निवास करने वाले वे सभी मुनि श्रीराम,लक्ष्मण और सीता–तीनों को एकटक नेत्रों से देखने लगे। उनका स्वरूप उन्हें आश्चर्यमय प्रतीत होता था।॥ १४॥
अत्रैनं हि महाभागाः सर्वभूतहिते रताः।
अतिथिं पर्णशालायां राघवं संन्यवेशयन्॥१५॥
समस्त प्राणियों के हित में तत्पर रहने वाले उन महाभाग महर्षियों ने वहाँ अपने प्रिय अतिथि इन भगवान् श्रीराम को पर्णशाला में ले जाकर ठहराया॥ १५॥
ततो रामस्य सत्कृत्य विधिना पावकोपमाः।
आजहस्ते महाभागाः सलिलं धर्मचारिणः॥ १६॥
अग्नितुल्य तेजस्वी और धर्मपरायण उन महाभाग मुनियोंने श्रीरामको विधिवत् सत्कारके साथ जल समर्पित किया॥१६॥
मङ्गलानि प्रयुञ्जाना मुदा परमया युताः।
मूलं पुष्पं फलं सर्वमाश्रमं च महात्मनः॥१७॥
फिर बड़ी प्रसन्नता के साथ मङ्गलसूचक आशीर्वाद देते हुए उन महात्मा श्रीराम को उन्होंने फल-मूल और फूल आदि के साथ सारा आश्रम भी समर्पित कर दिया।
निवेदयित्वा धर्मज्ञास्ते तु प्राञ्जलयोऽब्रुवन्।
धर्मपालो जनस्यास्य शरण्यश्च महायशाः॥ १८॥
पूजनीयश्च मान्यश्च राजा दण्डधरो गुरुः।
इन्द्रस्यैव चतुर्भागः प्रजा रक्षति राघव॥१९॥
राजा तस्माद् वरान् भोगान् रम्यान् भुङ्क्ते नमस्कृतः।
सब कुछ निवेदन करके वे धर्मज्ञ मुनि हाथ जोड़कर बोले—’रघुनन्दन! दण्ड धारण करने वाला राजा धर्म का पालक, महायशस्वी, इस जनसमुदाय को शरण देने वाला माननीय, पूजनीय और सबका गुरु है। इस भूतल पर इन्द्र (आदि लोकपालों) का ही चौथा अंश होने के कारण वह प्रजा की रक्षा करता है, अतः राजा सबसे वन्दित होता तथा उत्तम एवं रमणीय भोगों का उपभोग करता है। (जब साधारण राजा की यह स्थिति है, तब आपके लिये तो क्या कहना है, आप तो साक्षात् भगवान् हैं)॥ १८-१९॥
ते वयं भवता रक्ष्या भवद्विषयवासिनः।
नगरस्थो वनस्थो वा त्वं नो राजा जनेश्वरः॥ २०॥
‘हम आपके राज्य में निवास करते हैं, अतः आपको हमारी रक्षा करनी चाहिये। आप नगर में रहें या वन में, हमलोगों के राजा ही हैं। आप समस्त जनसमुदाय के शासक एवं पालक हैं ॥ २० ॥
न्यस्तदण्डा वयं राजञ्जितक्रोधा जितेन्द्रियाः।
रक्षणीयास्त्वया शश्वद् गर्भभूतास्तपोधनाः॥ २१॥
‘राजन्! हमने जीवमात्र को दण्ड देना छोड़ दिया है, क्रोध और इन्द्रियों को जीत लिया है। अब तपस्या ही हमारा धन है। जैसे माता गर्भस्थ बालक की रक्षा करती है, उसी प्रकार आपको सदा सब तरह से हमारी रक्षा करनी चाहिये’ ॥ २१॥
एवमुक्त्वा फलैर्मूलैः पुष्पैरन्यैश्च राघवम्।
वन्यैश्च विविधाहारैः सलक्ष्मणमपूजयन्॥ २२॥
ऐसा कहकर उन तपस्वी मुनियों ने वन में उत्पन्न होने वाले फल, मूल, फूल तथा अन्य अनेक प्रकार के आहारों से लक्ष्मण (और सीता) सहित भगवान् श्रीरामचन्द्रजी का सत्कार किया॥ २२॥
तथान्ये तापसाः सिद्धा रामं वैश्वानरोपमाः।
न्यायवृत्ता यथान्यायं तर्पयामासुरीश्वरम्॥२३॥
इनके सिवा दूसरे अग्नितुल्य तेजस्वी तथा न्याययुक्त बर्ताव वाले सिद्ध तापसों ने भी सर्वेश्वर भगवान् श्रीराम को यथोचित रूप से तृप्त किया॥२३॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे प्रथमः सर्गः॥१॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में पहला सर्ग पूरा हुआ॥१॥
सर्ग-02
कृतातिथ्योऽथ रामस्तु सूर्यस्योदयनं प्रति।
आमन्त्र्य स मुनीन् सर्वान् वनमेवान्वगाहत॥१॥
रात्रि में उन महर्षियों का आतिथ्य ग्रहण करके सबेरे सूर्योदय होने पर समस्त मुनियों से विदा ले श्रीरामचन्द्रजी पुनः वन में ही आगे बढ़ने लगे॥१॥
नानामृगगणाकीर्णमृक्षशार्दूलसेवितम्।
ध्वस्तवृक्षलतागुल्मं दुर्दर्शसलिलाशयम्॥२॥
निष्कूजमानशकुनिं झिल्लिकागणनादितम्।
लक्ष्मणानुचरो रामो वनमध्यं ददर्श ह॥३॥
जाते-जाते लक्ष्मणसहित श्रीराम ने वन के मध्यभाग में एक ऐसे स्थान को देखा, जो नाना प्रकार के मृगों से व्याप्त था। वहाँ बहुत-से रीछ और बाघ रहा करते थे। वहाँ के वृक्ष, लता और झाड़ियाँ नष्ट-भ्रष्ट हो गयी । थीं। उस वनप्रान्त में किसी जलाशय का दर्शन होना कठिन था। वहाँ के पक्षी वहीं चहक रहे थे। झींगरों की झंकार गूंज रही थी॥२-३॥
सीतया सह काकुत्स्थस्तस्मिन् घोरमृगायुते।
ददर्श गिरिशृङ्गाभं पुरुषादं महास्वनम्॥४॥
भयंकर जंगली पशुओं से भरे हुए उस दुर्गम वन में सीता के साथ श्रीरामचन्द्रजी ने एक नरभक्षी राक्षस देखा, जो पर्वतशिखर के समान ऊँचा था और उच्चस्वर से गर्जना कर रहा था॥ ४॥
गभीराक्षं महावक्त्रं विकटं विकटोदरम्।
बीभत्सं विषमं दीर्घ विकृतं घोरदर्शनम्॥५॥
उसकी आँखें गहरी, मुँह बहुत बड़ा, आकार विकट, और पेट विकराल था। वह देखने में बड़ा भयंकर, घृणित, बेडौल, बहुत बड़ा और विकृत वेश से युक्त था॥५॥
वसानं चर्म वैयाघ्रं वसाइँ रुधिरोक्षितम्।
त्रासनं सर्वभूतानां व्यादितास्यमिवान्तकम्॥६॥
उसने खून से भीगा और चरबी से गीला व्याघ्रचर्म पहन रखा था। समस्त प्राणियों को त्रास पहुँचाने वाला वह राक्षस यमराज के समान मुँह बाये खड़ा था॥ ६॥
त्रीन् सिंहांश्चतुरो व्याघ्रान् द्वौ वृकौ पृषतान् दश।
सविषाणं वसादिग्धं गजस्य च शिरो महत्॥७॥
अवसज्यायसे शूले विनदन्तं महास्वनम्।।
वह एक लोहे के शूल में तीन सिंह, चार बाघ, दो भेड़िये, दस चितकबरे हरिण और दाँतों सहति एक बहुत बड़ा हाथी का मस्तक, जिसमें चर्बी लिपटी हुई थी, गाँथ कर जोर-जोर से दहाड़ रहा था॥ ७ १/२॥
स रामं लक्ष्मणं चैव सीतां दृष्ट्वा च मैथिलीम्।
अभ्यधावत् सुसंक्रुद्धः प्रजाः काल इवान्तकः॥ ८॥
स कृत्वा भैरवं नादं चालयन्निव मेदिनीम्॥९॥
श्रीराम, लक्ष्मण और मिथिलेशकुमारी सीता को देखते ही वह क्रोध में भरकर भैरवनाद करके पृथ्वी को कम्पित करता हुआ उन सबकी ओर उसी प्रकार दौड़ा, जैसे प्राणान्तकारी काल प्रजा की ओर अग्रसर होता है।
अङ्केनादाय वैदेहीमपक्रम्य तदाब्रवीत्।
युवां जटाचीरधरौ सभार्यो क्षीणजीवितौ॥१०॥
प्रविष्टौ दण्डकारण्यं शरचापासिपाणिनौ।
वह विदेहनन्दिनी सीता को गोद में ले कुछ दूर जाकर खड़ा हो गया। फिर उन दोनों भाइयों से बोला ‘तुम दोनों जटा और चीर धारण करके भी स्त्री के साथ रहते हो और हाथ में धनुष-बाण और तलवार लिये दण्डकवन में घुस आये हो; अतः जान पड़ता है, तुम्हारा जीवन क्षीण हो चला है॥ १० १/२॥
कथं तापसयोर्वां च वासः प्रमदया सह ॥११॥
अधर्मचारिणौ पापौ कौ युवां मुनिदूषको।
‘तुम दोनों तो तपस्वी जान पड़ते हो, फिर तुम्हारा युवती स्त्री के साथ रहना कैसे सम्भव हुआ? अधर्मपरायण, पापी तथा मुनिसमुदाय को कलङ्कित करने वाले तुम दोनों कौन हो? ॥ ११ १/२ ॥
अहं वनमिदं दुर्गं विराधो नाम राक्षसः॥१२॥
चरामि सायुधो नित्यमृषिमांसानि भक्षयन्।
‘मैं विराध नामक राक्षस हूँ और प्रतिदिन ऋषियों के मांस का भक्षण करता हुआ हाथ में अस्त्रशस्त्र लिये इस दुर्गम वन में विचरता रहता हूँ॥ १२ १/२॥
इयं नारी वरारोहा मम भार्या भविष्यति॥१३॥
युवयोः पापयोश्चाहं पास्यामि रुधिरं मृधे।
‘यह स्त्री बड़ी सुन्दरी है, अतः मेरी भार्या बनेगी और तुम दोनों पापियोंका मैं युद्धस्थलमें रक्त पान करूँगा’॥
तस्यैवं ब्रुवतो दुष्टं विराधस्य दुरात्मनः॥१४॥
श्रुत्वा सगर्वितं वाक्यं सम्भ्रान्ता जनकात्मजा।
सीता प्रवेपितोद्वेगात् प्रवाते कदली यथा॥१५॥
दुरात्मा विराध की ये दुष्टता और घमंड से भरी बातें सुनकर जनकनन्दिनी सीता घबरा गयीं और जैसे तेज हवा चलने पर केले का वृक्ष जोर-जोर से हिलने लगता है, उसी प्रकार वे उद्वेग के कारण थरथर काँपने लगीं ॥ १५॥
तां दृष्ट्वा राघवः सीतां विराधाङ्कगतां शुभाम्।
अब्रवील्लक्ष्मणं वाक्यं मुखेन परिशुष्यता॥१६॥
शुभलक्षणा सीता को सहसा विराध के चंगुल में फँसी देख श्रीरामचन्द्र जी सूखते हुए मुँह से लक्ष्मण को सम्बोधित करके बोले- ॥ १६ ॥
पश्य सौम्य नरेन्द्रस्य जनकस्यात्मसम्भवाम्।
मम भार्यां शुभाचारां विराधाङ्के प्रवेशिताम्॥ १७॥
‘सौम्य! देखो तो सही, महाराज जनक की पुत्री और मेरी सती-साध्वी पत्नी सीता विराध के अङ्क में विवशतापूर्वक जा पहुँची हैं॥ १७ ॥
अत्यन्तसुखसंवृद्धां राजपुत्रीं यशस्विनीम्।
यदभिप्रेतमस्मासु प्रियं वरवृतं च यत्॥१८॥
कैकेय्यास्तु सुसंवृत्तं क्षिप्रमद्यैव लक्ष्मण।
या न तृष्यति राज्येन पुत्रार्थे दीर्घदर्शिनी॥१९॥
‘अत्यन्त सुख में पली हुई यशस्विनी राजकुमारी सीता की यह अवस्था! (हाय! कितने कष्टकी बात है!) लक्ष्मण! वन में हमारे लिये जिस दुःख की प्राप्ति कैकेयी को अभीष्ट थी और जो कुछ उसे प्रिय था, जिसके लिये उसने वर माँगे थे, वह सब आज ही शीघ्रतापूर्वक सिद्ध हो गया। तभी तो वह दूरदर्शिनी कैकेयी अपने पुत्र के लिये केवल राज्य लेकर नहीं संतुष्ट हुई थी॥ १८-१९॥
ययाहं सर्वभूतानां प्रियः प्रस्थापितो वनम्।
अद्येदानीं सकामा सा या माता मध्यमा मम॥ २०॥
‘जिसने समस्त प्राणियों के लिये प्रिय होने पर भी मुझे वन में भेज दिया, वह मेरी मझली माता कैकेयी आज इस समय सफलमनोरथ हुई है॥ २० ॥
परस्पर्शात् तु वैदेह्या न दुःखतरमस्ति मे।
पितुर्विनाशात् सौमित्रे स्वराज्य हरणात् तथा॥ २१॥
‘विदेहनन्दिनीका दूसरा कोई स्पर्श कर ले, इससे बढ़कर दुःख की बात मेरे लिये दूसरी कोई नहीं है। सुमित्रानन्दन! पिताजी की मृत्यु तथा अपने राज्य के अपहरण से भी उतना कष्ट मुझे नहीं हुआ था, जितना अब हुआ है’ ॥ २१॥
इति ब्रुवति काकुत्स्थे बाष्पशोकपरिप्लुतः।
अब्रवील्लक्ष्मणः क्रुद्धो रुद्धो नाग इव श्वसन्॥ २२॥
श्रीरामचन्द्रजी के ऐसा कहने पर शोक के आँसू बहाते हुए लक्ष्मण कुपित हो मन्त्र से अवरुद्ध हुए सर्प की भाँति फुफकारते हुए बोले- ॥२२॥
अनाथ इव भूतानां नाथस्त्वं वासवोपमः।
मया प्रेष्येण काकुत्स्थ किमर्थं परितप्यसे॥२३॥
‘ककुत्स्थकुलभूषण! आप इन्द्र के समान समस्त प्राणियों के स्वामी एवं संरक्षक हैं। मुझ दास के रहते हुए आप किसलिये अनाथ की भाँति संतप्त हो रहे हैं?॥
शरेण निहतस्याद्य मया क्रुद्धेन रक्षसः।
विराधस्य गतासोर्हि मही पास्यति शोणितम्॥ २४॥
‘मैं अभी कुपित होकर अपने बाण से इस राक्षस का वध करता हूँ। आज यह पृथ्वी मेरे द्वारा मारे गये प्राणशून्य विराध का रक्त पीयेगी।॥ २४॥
राज्यकामे मम क्रोधो भरते यो बभूव ह।
तं विराधे विमोक्ष्यामि वज्री वज्रमिवाचले॥ २५॥
‘राज्य की इच्छा रखने वाले भरत पर मेरा जो क्रोध प्रकट हुआ था, उसे आज मैं विराध पर छोडूंगा। जैसे वज्रधारी इन्द्र पर्वत पर अपना वज्र छोड़ते हैं॥ २५ ॥
मम भुजबलवेगवेगितः पततु शरोऽस्य महान् महोरसि।
व्यपनयतु तनोश्च जीवितं पततु ततश्च महीं विघूर्णितः॥२६॥
‘मेरी भुजाओं के बल के वेग से वेगवान् होकर छूटा हुआ मेरा महान् बाण आज विराध के विशाल वक्षःस्थल पर गिरे इसके शरीर से प्राणों को अलग करे। तत्पश्चात् यह विराध चक्कर खाता हुआ पृथ्वी पर पड़ जाय’ ॥ २६॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे द्वितीयः सर्गः ॥२॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्ड में दूसरा सर्ग पूरा हुआ॥२॥
सर्ग-03
अथोवाच पुनर्वाक्यं विराधः पूरयन् वनम्।
पृच्छतो मम हि ब्रूतं कौ युवां क्व गमिष्यथः॥
तदनन्तर विराध ने उस वन को [जाते हुए कहा —’अरे! मैं पूछता हूँ, मुझे बताओ। तुम दोनों कौन हो और कहाँ जाओगे?’॥१॥
तमुवाच ततो रामो राक्षसं ज्वलिताननम्।
पृच्छन्तं सुमहातेजा इक्ष्वाकुकुलमात्मनः ॥ २॥
क्षत्रियौ वृत्तसम्पन्नौ विद्धि नौ वनगोचरौ।
त्वां तु वेदितुमिच्छावः कस्त्वं चरसि दण्डकान्॥ ३॥
तब महातेजस्वी श्रीराम ने अपना परिचय पूछते हुए प्रज्वलित मुख वाले उस राक्षस से इस प्रकार कहा –’तुझे मालूम होना चाहिये कि महाराज इक्ष्वाकु का कुल ही मेरा कुल है। हम दोनों भाई सदाचार का पालन करने वाले क्षत्रिय हैं और कारण वश इस समय वन में निवास करते हैं। अब हम तेरा परिचय जानना चाहते हैं। तु कौन है, जो दण्डक वन में स्वेच्छा से विचर रहा है ?’ ॥ २-३॥
तमुवाच विराधस्तु रामं सत्यपराक्रमम्।
हन्त वक्ष्यामि ते राजन् निबोध मम राघव॥४॥
यह सुनकर विराध ने सत्यपराक्रमी श्रीराम से कहा- ‘रघुवंशी नरेश! मैं प्रसन्नतापूर्वक अपना परिचय देता हूँ। तुम मेरे विषय में सुनो॥४॥
पुत्रः किल जवस्याहं माता मम शतहदा।
विराध इति मामाहुः पृथिव्यां सर्वराक्षसाः॥५॥
‘मैं ‘जव’ नामक राक्षस का पुत्र हूँ, मेरी माता का नाम ‘शतह्रदा’ है। भूमण्डल के समस्त राक्षस मुझे विराध के नाम से पुकारते हैं॥५॥
तपसा चाभिसम्प्राप्ता ब्रह्मणो हि प्रसादजा।
शस्त्रेणावध्यता लोकेऽच्छेद्याभेद्यत्वमेव च॥६॥
‘मैंने तपस्या के द्वारा ब्रह्माजी को प्रसन्न करके यह वरदान प्राप्त किया है कि किसी भी शस्त्र से मेरा वध न हो। मैं संसार में अच्छेद्य और अभेद्य होकर रहूँ कोई भी मेरे शरीर को छिन्न-भिन्न नहीं कर सके। ६॥
उत्सृज्य प्रमदामेनामनपेक्षौ यथागतम्।
त्वरमाणौ पलायेथां न वां जीवितमाददे॥७॥
‘अब तुम दोनों इस युवती स्त्री को यहीं छोड़कर इसे पाने की इच्छा न रखते हुए जैसे आये हो उसी प्रकार तुरंत यहाँ से भाग जाओ। मैं तुम दोनों के प्राण नहीं लूँगा’॥ ७॥
तं रामः प्रत्युवाचेदं कोपसंरक्तलोचनः।
राक्षसं विकृताकारं विराधं पापचेतसम्॥८॥
यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजी की आँखें क्रोध से लाल हो गयीं। वे पापपूर्ण विचार और विकट आकार वाले उस पापी राक्षस विराध से इस प्रकार बोले- ॥ ८॥
क्षुद्र धिक् त्वां तु हीनार्थं मृत्युमन्वेषसे ध्रुवम्।
रणे प्राप्स्यसि संतिष्ठ न मे जीवन् विमोक्ष्यसे॥ ९॥
‘नीच! तुझे धिक्कार है। तेरा अभिप्राय बड़ा ही खोटा है। निश्चय ही तू अपनी मौत ढूँढ़ रहा है और वह तुझे युद्ध में मिलेगी। ठहर, अब तू मेरे हाथ से जीवित नहीं छूट सकेगा’ ॥ ९॥
ततः सज्यं धनुः कृत्वा रामः सुनिशितान् शरान्।
सुशीघ्रमभिसंधाय राक्षसं निजघान ह॥१०॥
यह कहकर भगवान् श्रीराम ने अपने धनुष पर प्रत्यञ्चा चढ़ायी और तुरंत ही तीखे बाणों का अनुसंधान करके उस राक्षस को बींधना आरम्भ किया॥१०॥
धनुषा ज्यागुणवता सप्त बाणान् मुमोच ह।
रुक्मपुङ्खान् महावेगान् सुपर्णानिलतुल्यगान्॥ ११॥
उन्होंने प्रत्यञ्चायुक्त धनुष के द्वारा विराध के ऊपर लगातार सात बाण छोड़े, जो गरुड़ और वायु के समान महान् वेगशाली थे और सोने के पंखों से सुशोभित हो रहे थे॥ ११॥
ते शरीरं विराधस्य भित्त्वा बर्हिणवाससः।
निपेतुः शोणितादिग्धा धरण्यां पावकोपमाः॥ १२॥
प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी और मोर पंख लगे हुए वे बाण विराध के शरीर को छेदकर रक्तरञ्जित हो पृथ्वी पर गिर पड़े॥१२॥
स विद्धो न्यस्य वैदेहीं शूलमुद्यम्य राक्षसः।
अभ्यद्रवत् सुसंक्रुद्धस्तदा रामं सलक्ष्मणम्॥ १३॥
घायल हो जाने पर उस राक्षस ने विदेहकुमारी सीता को अलग रख दिया और स्वयं हाथ में शूल लिये अत्यन्त कुपित होकर श्रीराम तथा लक्ष्मण पर तत्काल टूट पड़ा॥ १३॥
स विनद्य महानादं शूलं शक्रध्वजोपमम्।
प्रगृह्याशोभत तदा व्यात्तानन इवान्तकः॥१४॥
वह बड़े जोर से गर्जना करके इन्द्रध्वज के समान शूल लेकर उस समय मुँह बाये हुए काल के समान शोभा पा रहा था॥ १४॥
अथ तौ भ्रातरौ दीप्तं शरवर्षं ववर्षतुः।
विराधे राक्षसे तस्मिन् कालान्तकयमोपमे॥१५॥
तब काल, अन्तक और यमराज के समान उस भयंकर राक्षस विराध के ऊपर उन दोनों भाइयों ने प्रज्वलित बाणों की वर्षा आरम्भ कर दी॥ १५ ॥
स प्रहस्य महारौद्रः स्थित्वाजृम्भत राक्षसः।
जृम्भमाणस्य ते बाणाः कायान्निष्पेतुराशुगाः॥ १६॥
‘यह देख वह महाभयंकर राक्षस अट्टहास करके खड़ा हो गया और जंभाई के साथ अंगड़ाई लेने लगा। उसके वैसा करते ही शीघ्रगामी बाण उसके शरीर से निकलकर पृथ्वी पर गिर पड़े॥१६॥
स्पर्शात् तु वरदानेन प्राणान् संरोध्य राक्षसः।
विराधः शूलमुद्यम्य राघवावभ्यधावत॥१७॥
वरदान के सम्बन्ध से उस राक्षस विराध ने प्राणों को रोक लिया और शूल उठाकर उन दोनों रघुवंशी वीरों पर आक्रमण किया॥१७॥
तच्छूलं वज्रसंकाशं गगने ज्वलनोपमम्।
द्वाभ्यां शराभ्यां चिच्छेद रामः शस्त्रभृतां वरः॥ १८॥
उसका वह शूल आकाश में वज्र और अग्नि के समान प्रज्वलित हो उठा; परंतु शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी ने दो बाण मारकर उसे काट डाला॥ १८॥
तद् रामविशिखैश्छिन्नं शूलं तस्यापतद् भुवि।
पपाताशनिना छिन्नं मेरोरिव शिलातलम्॥१९॥
श्रीरामचन्द्रजी के बाणों से कटा हुआ विराध का वह शूल वज्र से छिन्न-भिन्न हुए मेरु के शिलाखण्ड की भाँति पृथ्वी पर गिर पड़ा॥१९॥
तौ खड्गौ क्षिप्रमुद्यम्य कृष्णसर्पाविवोद्यतौ।
तूर्णमापेततुस्तस्य तदा प्रहरतां बलात्॥२०॥
फिर तो वे दोनों भाई शीघ्र ही काले सो के समान दो तलवारें लेकर तुरंत उस पर टूट पड़े और तत्काल बलपूर्वक प्रहार करने लगे॥ २० ॥
स वध्यमानः सुभृशं भुजाभ्यां परिगृह्य तौ।
अप्रकम्प्यौ नरव्याघ्रौ रौद्रः प्रस्थातुमैच्छत॥२१॥
उनके आघात से अत्यन्त घायल हुए उस भयंकर राक्षस ने अपनी दोनों भुजाओं से उन अकम्प्य पुरुषसिंह वीरों को पकड़कर अन्यत्र जाने की इच्छा की॥२१॥
तस्याभिप्रायमाज्ञाय रामो लक्ष्मणमब्रवीत्।
वहत्वयमलं तावत् पथानेन तु राक्षसः॥ २२॥
यथा चेच्छति सौमित्रे तथा वहतु राक्षसः।
अयमेव हि नः पन्था येन याति निशाचरः॥ २३॥
उसके अभिप्राय को जानकर श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा—’सुमित्रानन्दन! यह राक्षस अपनी इच्छा के अनुसार हम लोगों को इस मार्ग से ढोकर ले चले। यह जैसा चाहता है, उसी तरह हमारा वाहन बनकर हमें ले चले (इसमें बाधा डालने की आवश्यकता नहीं है)। जिस मार्ग से यह निशाचर चल रहा है, यही हमलोगों के लिये आगे जाने का मार्ग है’ ॥ २२-२३॥
स तु स्वबलवीर्येण समुत्क्षिप्य निशाचरः।
बालाविव स्कन्धगतौ चकारातिबलोद्धतः॥ २४॥
अत्यन्त बल से उद्दण्ड बने हुए निशाचर विराध ने अपने बल-पराक्रम से उन दोनों भाइयों को बालकों की तरह उठाकर अपने दोनों कंधों पर बिठा लिया॥ २४ ॥
तावारोप्य ततः स्कन्धं राघवौ रजनीचरः।
विराधो विनदन् घोरं जगामाभिमुखो वनम्॥ २५॥
उन दोनों रघुवंशी वीरों को कंधे पर चढ़ा लेने के बाद राक्षस विराध भयंकर गर्जना करता हुआ वन की ओर चल दिया॥२५॥
वनं महामेघनिभं प्रविष्टो द्रुमैर्महद्भिर्विविधैरुपेतम्।
नानाविधैः पक्षिकुलैर्विचित्रं शिवायुतं व्यालमृगैर्विकीर्णम्॥ २६॥
तदनन्तर उसने एक ऐसे वन में प्रवेश किया, जो महान् मेघों की घटा के समान घना और नीला था। नाना प्रकार के बड़े-बड़े वृक्ष वहाँ भरे हुए थे। भाँति-भाँति के पक्षियों के समुदाय उसे विचित्र शोभा से
सम्पन्न बना रहे थे तथा बहुत-से गीदड़ और हिंसक पशु उसमें सब ओर फैले हुए थे॥ २६ ॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे तृतीयः सर्गः॥३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में तीसरा सर्ग पूरा हुआ॥३॥
सर्ग-04
ह्रियमाणौ तु काकुत्स्थौ दृष्ट्वा सीता रघूत्तमौ।
उच्चैः स्वरेण चुक्रोश प्रगृह्य सुमहाभुजौ॥१॥
रघुकुल के श्रेष्ठ वीर ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम और लक्ष्मण को राक्षस लिये जा रहा है यह देखकर सीता अपनी दोनों बाहें ऊपर उठाकर जोर-जोर से रोने-चिल्लाने लगीं- ॥१॥
एष दाशरथी रामः सत्यवाञ्छीलवान् शुचिः।
रक्षसा रौद्ररूपेण ह्रियते सहलक्ष्मणः॥२॥
‘हाय ! इन सत्यवादी, शीलवान् और शुद्ध आचार विचार वाले दशरथनन्दन श्रीराम और लक्ष्मण को यह रौद्ररूपधारी राक्षस लिये जा रहा है॥२॥
मामृक्षा भक्षयिष्यन्ति शार्दूलद्वीपिनस्तथा।
मां हरोत्सृज काकुत्स्थौ नमस्ते राक्षसोत्तम॥३॥
‘राक्षसशिरोमणे! तुम्हें नमस्कार है। इस वन में रीछ, व्याघ्र और चीते मुझे खा जायँगे, इसलिये तुम मुझे ही ले चलो, किंतु इन दोनों ककुत्स्थवंशी वीरों को छोड़ दो’॥३॥
तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा वैदेह्या रामलक्ष्मणौ।
वेगं प्रचक्रतुर्वीरौ वधे तस्य दुरात्मनः॥४॥
विदेहनन्दिनी सीता की यह बात सुनकर वे दोनों वीर श्रीराम और लक्ष्मण उस दुरात्मा राक्षस का वध करने में शीघ्रता करने लगे॥ ४॥
तस्य रौद्रस्य सौमित्रिः सव्यं बाहुं बभञ्ज ह।
रामस्तु दक्षिणं बाहं तरसा तस्य रक्षसः॥५॥
सुमित्राकुमार लक्ष्मण ने उस राक्षस की बायीं और श्रीराम ने उसकी दाहिनी बाँह बड़े वेग से तोड़ डाली।
स भग्नबाहुः संविग्नः पपाताशु विमूर्च्छितः।
धरण्यां मेघसंकाशो वज्रभिन्न इवाचलः॥६॥
भुजाओं के टूट जाने पर वह मेघ के समान काला राक्षस व्याकुल हो गया और शीघ्र ही मूर्च्छित होकरवज्र के द्वारा टूटे हुए पर्वत शिखर की भाँति पृथ्वी पर गिर पड़ा॥६॥
मुष्टिभिर्बाहुभिः पद्भिः सूदयन्तौ तु राक्षसम्।
उद्यम्योद्यम्य चाप्येनं स्थण्डिले निष्पिपेषतुः ॥७॥
तब श्रीराम और लक्ष्मण विराध को भुजाओं, मुक्कों और लातों से मारने लगे तथा उसे उठा-उठाकर पटकने और पृथ्वी पर रगड़ने लगे॥७॥
स विद्वौ बहुभिर्बाणैः खड्गाभ्यां च परिक्षतः।
निष्पिष्टो बहुधा भूमौ न ममार स राक्षसः॥८॥
बहुसंख्यक बाणों से घायल और तलवारों से क्षतविक्षत होने पर तथा पृथ्वी पर बार-बार रगड़ा जाने पर भी वह राक्षस मरा नहीं॥ ८॥
तं प्रेक्ष्य रामः सुभृशमवध्यमचलोपमम्।
भयेष्वभयदः श्रीमानिदं वचनमब्रवीत्॥९॥
अवध्य तथा पर्वत के समान अचल विराध को बारंबार देखकर भय के अवसरों पर अभय देने वाले श्रीमान् राम ने लक्ष्मण से यह बात कही— ॥९॥
तपसा पुरुषव्याघ्र राक्षसोऽयं न शक्यते।
शस्त्रेण युधि निर्जेतुं राक्षसं निखनावहे ॥१०॥
‘पुरुषसिंह! यह राक्षस तपस्या से (वर पाकर) अवध्य हो गया है। इसे शस्त्र के द्वारा युद्ध में नहीं जीता जा सकता। इसलिये हमलोग निशाचर विराध को पराजित करने के लिये अब गड्ढा खोदकर गाड़ दें॥ १०॥
कुञ्जरस्येव रौद्रस्य राक्षसस्यास्य लक्ष्मण।
वनेऽस्मिन् सुमहच्छ्वभ्रं खन्यतां रौद्रवर्चसः॥ ११॥
‘लक्ष्मण! हाथी के समान भयंकर तथा रौद्र तेज वाले इस राक्षस के लिये इस वन में बहुत बड़ा गड्ढा खोदो’ ॥ ११॥
इत्युक्त्वा लक्ष्मणं रामः प्रदरः खन्यतामिति।
तस्थौ विराधमाक्रम्य कण्ठे पादेन वीर्यवान्॥ १२॥
इस प्रकार लक्ष्मण को गड्ढा खोदने की आज्ञा देकर पराक्रमी श्रीराम अपने एक पैर से विराध का गला दबाकर खड़े हो गये॥ १२॥
तच्छ्रुत्वा राघवेणोक्तं राक्षसः प्रश्रितं वचः।
इदं प्रोवाच काकुत्स्थं विराधः पुरुषर्षभम्॥१३॥
श्रीरामचन्द्रजी की कही हुई यह बात सुनकर राक्षस विराध ने पुरुषप्रवर श्रीराम से यह विनययुक्त बात कही – ॥ १३॥
हतोऽहं पुरुषव्याघ्र शक्रतुल्यबलेन वै।
मया तु पूर्वं त्वं मोहान्न ज्ञातः पुरुषर्षभ॥१४॥
‘पुरुषसिंह ! नरश्रेष्ठ! आपका बल देवराज इन्द्र के समान है। मैं आपके हाथ से मारा गया। मोहवश पहले मैं आपको पहचान न सका॥ १४ ॥
कौसल्या सुप्रजास्तात रामस्त्वं विदितो मया।
वैदेही च महाभागा लक्ष्मणश्च महायशाः॥ १५॥
‘तात! आपके द्वारा माता कौसल्या उत्तम संतान वाली हुई हैं। मैं यह जान गया कि आप ही श्रीरामचन्द्रजी हैं। यह महाभागा विदेहनन्दिनी सीता हैं और ये आपके छोटे भाई महायशस्वी लक्ष्मण हैं। १५॥
अभिशापादहं घोरां प्रविष्टो राक्षसीं तनुम्।
तुम्बुरुर्नाम गन्धर्वः शप्तो वैश्रवणेन हि॥१६॥
‘मुझे शाप के कारण इस भयंकर राक्षस शरीर में आना पड़ा था। मैं तुम्बुरु नामक गन्धर्व हूँ। कुबेर ने मुझे राक्षस होने का शाप दिया था॥ १६॥
प्रसाद्यमानश्च मया सोऽब्रवीन्मां महायशाः।
यदा दाशरथी रामस्त्वां वधिष्यति संयुगे॥१७॥
तदा प्रकृतिमापन्नो भवान् स्वर्गं गमिष्यति।
‘जब मैंने उन्हें प्रसन्न करनेकी चेष्टा की तब वे महायशस्वी कुबेर मुझसे इस प्रकार बोले—’गन्धर्व! जब दशरथनन्दन श्रीराम युद्ध में तुम्हारा वध करेंगे, तब तुम अपने पहले स्वरूप को प्राप्त होकर स्वर्गलोक को जाओगे॥ १७ १/२ ॥
अनुपस्थीयमानो मां स क्रुद्धो व्याजहार ह॥ १८॥
इति वैश्रवणो राजा रम्भासक्तमुवाच ह।
‘मैं रम्भा नामक अप्सरा में आसक्त था, इसलिये एक दिन ठीक समय से उनकी सेवा में उपस्थित न हो सका। इसीलिये कुपित हो राजा वैश्रवण (कुबेर) ने मुझे पूर्वोक्त शाप देकर उससे छूटने की अवधि बतायी थी॥ १८ १/२॥
तव प्रसादान्मुक्तोऽहमभिशापात् सुदारुणात्॥ १९॥
भुवनं स्वं गमिष्यामि स्वस्ति वोऽस्तु परंतप।
‘शत्रुओं को संताप देने वाले रघुवीर! आज आपकी कृपा से मुझे उस भयंकर शाप से छुटकारा मिल गया। आपका कल्याण हो, अब मैं अपने लोक को जाऊँगा॥
इतो वसति धर्मात्मा शरभङ्गः प्रतापवान्॥२०॥
अध्यर्धयोजने तात महर्षिः सूर्यसंनिभः।
तं क्षिप्रमभिगच्छ त्वं स ते श्रेयोऽभिधास्यति॥ २१॥
‘तात! यहाँ से डेढ़ योजन की दूरी पर सूर्य के समान तेजस्वी प्रतापी और धर्मात्मा महामुनि शरभङ्ग निवास करते हैं। उनके पास आप शीघ्र चले जाइये, वे आपके कल्याण की बात बतायेंगे॥ २०-२१॥
अवटे चापि मां राम निक्षिप्य कुशली व्रज।
रक्षसां गतसत्त्वानामेष धर्मः सनातनः ॥२२॥
‘श्रीराम! आप मेरे शरीर को गड्डे में गाड़कर कुशलपूर्वक चले जाइये। मरे हुए राक्षसों के शरीर को गड्ढे में गाड़ना (कब्र खोदकर उसमें दफना देना) यह उनके लिये सनातन (परम्परा प्राप्त) धर्म है।॥ २२ ॥
अवटे ये निधीयन्ते तेषां लोकाः सनातनाः।
एवमुक्त्वा तु काकुत्स्थं विराधः शरपीडितः॥ २३॥
बभूव स्वर्गसम्प्राप्तो न्यस्तदेहो महाबलः।
‘जो राक्षस गड्ढे में गाड़ दिये जाते हैं, उन्हें सनातन लोकों की प्राप्ति होती है।’ श्रीराम से ऐसा कहकर बाणों से पीड़ित हुआ महाबली विराध (जब उसका शरीर गड्ढे में डाला गया, तब) उस शरीर को छोड़कर स्वर्गलोक को चला गया॥ २३ १/२॥
तच्छ्रुत्वा राघवो वाक्यं लक्ष्मणं व्यादिदेश ह॥ २४॥
कुञ्जरस्येव रौद्रस्य राक्षसस्यास्य लक्ष्मण।
वनेऽस्मिन्सुमहान् श्वभ्रः खन्यतां रौद्रकर्मणः॥ २५॥
(वह किस तरह गड्ढे में डाला गया?—यह बात अब बतायी जाती है-) उसकी बात सुनकर श्रीरघुनाथजी ने लक्ष्मण को आज्ञा दी—’लक्ष्मण! भयंकर कर्म करने वाले तथा हाथी के समान भयानक इस राक्षस के लिये इस वन में बहुत बड़ा गड्ढा खोदो’ ।। २४-२५ ॥
इत्युक्त्वा लक्ष्मणं रामः प्रदरः खन्यतामिति।
तस्थौ विराधमाक्रम्य कण्ठे पादेन वीर्यवान॥ २६॥
इस प्रकार लक्ष्मण को गड्ढा खोदने का आदेश दे पराक्रमी श्रीराम एक पैर से विराधका गला दबाकर खड़े हो गये॥२६॥
ततः खनित्रमादाय लक्ष्मणः श्वभ्रमुत्तमम्।
अखनत् पावतस्तस्य विराधस्य महात्मनः॥ २७॥
तब लक्ष्मण ने फावड़ा लेकर उस विशालकाय विराध के पास ही एक बहुत बड़ा गड्ढा खोदकर तैयार किया॥२७॥
तं मुक्तकण्ठमुत्क्षिप्य शङ्ककर्ण महास्वनम्।
विराधं प्राक्षिपच्छ्वभ्रे नदन्तं भैरवस्वनम्॥ २८॥
तब श्रीराम ने उसके गले को छोड़ दिया और लक्ष्मणने बँटे-जैसे कान वाले उस विराध को उठाकर उस गड्डे में डाल दिया, उस समय वह बड़ी भयानक आवाज में जोर-जोर से गर्जना कर रहा था॥ २८॥
तमाहवे दारुणमाशुविक्रमौ स्थिरावुभौ संयति रामलक्ष्मणौ।
मुदान्वितौ चिक्षिपतुर्भयावह नदन्तमुत्क्षिप्य बलेन राक्षसम्॥२९॥
युद्ध में स्थिर रहकर शीघ्रतापूर्वक पराक्रम प्रकट करने वाले उन दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण ने रणभूमि में क्रूरतापूर्ण कर्म करने वाले उस भयंकर राक्षस विराध को बलपूर्वक उठाकर गड्ढे में फेंक दिया। उस समय वह जोर-जोर से चिल्ला रहा था। उसे गड्ढे में डालकर वे दोनों बन्धु बड़े प्रसन्न हुए। २९॥
अवध्यतां प्रेक्ष्य महासुरस्य तौ शितेन शस्त्रेण तदा नरर्षभौ।
समर्थ्य चात्यर्थविशारदावुभौ बिले विराधस्य वधं प्रचक्रतुः॥३०॥
महान् असुर विराध का तीखे शस्त्र से वध होने वाला नहीं है, यह देखकर अत्यन्त कुशल दोनों भाई नरश्रेष्ठ श्रीराम और लक्ष्मण ने उस समय गड्ढा खोदकर उस गड्ढे में उसे डाल दिया और उसे मिट्टी से पाटकर उस राक्षस का वध कर डाला॥३०॥
स्वयं विराधेन हि मृत्युमात्मनः प्रसह्य रामेण यथार्थमीप्सितः।
निवेदितः काननचारिणा स्वयं न मे वधः शस्त्रकृतो भवेदिति॥३१॥
वास्तव में श्रीराम के हाथ से ही हठपूर्वक मरना उसे अभीष्ट था। उस अपनी मनोवाञ्छित मृत्यु की प्राप्ति के उद्देश्य से स्वयं वनचारी विराध ने ही श्रीराम को यह बता दिया था कि शस्त्र द्वारा मेरा वध नहीं हो सकता ॥ ३१॥
तदेव रामेण निशम्य भाषितं कृता मतिस्तस्य बिलप्रवेशने।
बिलं च तेनातिबलेन रक्षसा प्रवेश्यमानेन वनं विनादितम्॥३२॥
उसकी कही हई उसी बातको सुनकर श्रीराम ने उसे गड्ढे में गाड़ देने का विचार किया था। जब वह गड्ढे में डाला जाने लगा, उस समय उस अत्यन्त बलवान् राक्षस ने अपनी चिल्लाहट से सारे वन प्रान्त को गुँजा दिया॥
प्रहृष्टरूपाविव रामलक्ष्मणौ विराधमुर्त्यां प्रदरे निपात्य तम्।
ननन्दतुर्वीतभयौ महावने शिलाभिरन्तर्दधतुश्च राक्षसम्॥३३॥
राक्षस विराध को पृथ्वी के अंदर गड्ढे में गिराकर श्रीराम और लक्ष्मण ने बड़ी प्रसन्नता के साथ उसे ऊपर से बहुतेरे पत्थर डालकर पाट दिया। फिर वे निर्भय हो उस महान् वन में सानन्द विचरने लगे। ३३॥
ततस्तु तौ काञ्चनचित्रकार्मुको निहत्य रक्षः परिगृह्य मैथिलीम।
विजह्रतुस्तौ मुदितौ महावने दिवि स्थितौ चन्द्रदिवाकराविव॥३४॥
इस प्रकार उस राक्षस का वध करके मिथिलेशकुमारी सीता को साथ ले सोने के विचित्र धनुषों से सुशोभित हो वे दोनों भाई आकाश में स्थित हुए चन्द्रमा और सूर्य की भाँति उस महान् वन में आनन्दमग्न हो विचरण करने लगे॥ ३४ ॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे चतुर्थः सर्गः॥४॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में चौथा सर्ग पूरा हुआ॥४॥
सर्ग-05
हत्वा तु तं भीमबलं विराधं राक्षसं वने।
ततः सीतां परिष्वज्य समाश्वास्य च वीर्यवान्॥
अब्रवीद् भ्रातरं रामो लक्ष्मणं दीप्ततेजसम्।
कष्टं वनमिदं दुर्गं न च स्मो वनगोचराः॥२॥
अभिगच्छामहे शीघ्रं शरभङ्गं तपोधनम्।
आश्रमं शरभङ्गस्य राघवोऽभिजगाम ह॥३॥
वन में उस भयंकर बलशाली राक्षस विराध का वध करके पराक्रमी श्रीराम ने सीता को हृदय से लगाकर सान्त्वना दी और उद्दीप्त तेज वाले भाई लक्ष्मण से इस प्रकार कहा—’सुमित्रानन्दन! यह दुर्गम वन बड़ा कष्टप्रद है,हमलोग इसके पहले कभी ऐसे वनों में नहीं रहे हैं (अतः यहाँ के कष्टों का न तो अनुभव है और न अभ्यास ही है)। अच्छा! हमलोग अब शीघ्र ही तपोधन शरभङ्गजी के पास चलें’—ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजी शरभङ्ग मुनि के आश्रमपर गये॥ १३॥
तस्य देवप्रभावस्य तपसा भावितात्मनः।
समीपे शरभङ्गस्य ददर्श महदद्भुतम्॥४॥
देवताओं के तुल्य प्रभावशाली तथा तपस्या से शुद्ध अन्तःकरणवाले (अथवा तप के द्वारा परब्रह्म परमात्मा का साक्षात्कार करने वाले) शरभङ्ग मुनि के समीप जाने पर श्रीराम ने एक बड़ा अद्भुत दृश्य देखा॥ ४॥
विभ्राजमानं वपुषा सूर्यवैश्वानरप्रभम्।
रथप्रवरमारूढमाकाशे विबुधानुगम्॥५॥
असंस्पृशन्तं वसुधां ददर्श विबुधेश्वरम्।
सम्प्रभाभरणं देवं विरजोऽम्बरधारिणम्॥६॥
वहाँ उन्होंने आकाश में एक श्रेष्ठ रथ पर बैठे हुए देवताओं के स्वामी इन्द्रदेव का दर्शन किया, जो पृथ्वी का स्पर्श नहीं कर रहे थे। उनकी अङ्गकान्ति सूर्य और अग्नि के समान प्रकाशित होती थी। वे अपने तेजस्वी शरीर से देदीप्यमान हो रहे थे। उनके पीछे और भी बहुत-से देवता थे। उनके दीप्तिमान् आभूषण चमक रहे थे तथा उन्होंने निर्मल वस्त्र धारण कर रखा था॥५-६॥
तद्विधैरेव बहुभिः पूज्यमानं महात्मभिः।
हरितैर्वाजिभिर्युक्तमन्तरिक्षगतं रथम्॥७॥
ददर्शादूरतस्तस्य तरुणादित्यसंनिभम्।
उन्हीं के समान वेशभूषावाले दूसरे बहुत-से महात्मा इन्द्रदेव की पूजा (स्तुति-प्रशंसा) कर रहे थे। उनका रथ आकाश में खड़ा था और उसमें हरे रंग के घोड़े जुते हुए थे। श्रीराम ने निकट से उस रथ को देखा। वह नवोदित सूर्य के समान प्रकाशित होता था॥ ७ १/२ ॥
पाण्डुराभ्रघनप्रख्यं चन्द्रमण्डलसंनिभम्॥८॥
अपश्यद् विमलं छत्रं चित्रमाल्योपशोभितम्।
उन्होंने यह भी देखा कि इन्द्र के मस्तक के ऊपर श्वेत बादलों के समान उज्ज्वल तथा चन्द्रमण्डल के समान कान्तिमान् निर्मल छत्र तना हुआ है, जो विचित्र फूलों की मालाओं से सुशोभित है॥ ८ १/२ ॥
चामरव्यजने चाग्रये रुक्मदण्डे महाधने॥९॥
गृहीते वरनारीभ्यां धूयमाने च मूर्धनि।
श्रीराम ने सुवर्णमय डंडे वाले दो श्रेष्ठ एवं बहुमूल्य चँवर और व्यजन भी देखे, जिन्हें दो सुन्दरियाँ लेकर देवराज के मस्तक पर हवा कर रही थीं॥ ९ १/२ ।।
गन्धर्वामरसिद्धाश्च बहवः परमर्षयः॥१०॥
अन्तरिक्षगतं देवं गीर्भिरग्रया भिरैडयन्।
सह सम्भाषमाणे तु शरभङ्गेन वासवे॥११॥
दृष्ट्वा शतक्रतुं तत्र रामो लक्ष्मणमब्रवीत्।
रामोऽथ रथमुद्दिश्य भ्रातुर्दर्शयताद्भुतम्॥१२॥
उस समय बहुत-से गन्धर्व, देवता, सिद्ध और महर्षिगण उत्तम वचनों द्वारा अन्तरिक्ष में विराजमान देवेन्द्र की स्तुति करते थे और देवराज इन्द्र शरभङ्ग मुनि के साथ वार्तालाप कर रहे थे। वहाँ इस प्रकार शतक्रतु इन्द्र का दर्शन करके श्रीराम ने उनके अद्भुत रथ की ओर अँगुली से संकेत करते हुए उसे भाई को दिखाया और लक्ष्मण से इस प्रकार कहा— ॥ १०१२॥
अर्चिष्मन्तं श्रिया जुष्टमद्भुतं पश्य लक्ष्मण।
प्रतपन्तमिवादित्यमन्तरिक्षगतं रथम्॥१३॥
‘लक्ष्मण! आकाश में वह अद्भुत रथ तो देखो, उससे तेज की लपटें निकल रही हैं। वह सूर्य के समान तप रहा है। शोभा मानो मूर्तिमती होकर उसकी सेवा करती है॥ १३॥
ये हयाः पुरुहूतस्य पुरा शक्रस्य नः श्रुताः।
अन्तरिक्षगता दिव्यास्त इमे हरयो ध्रुवम्॥१४॥
‘हमलोगों ने पहले देवराज इन्द्र के जिन दिव्य घोडों के विषय में जैसा सुन रखा है, निश्चय ही आकाश में ये वैसे ही दिव्य अश्व विराजमान हैं। १४॥
इमे च पुरुषव्याघ्र ये तिष्ठन्त्यभितो दिशम्।
शतं शतं कुण्डलिनो युवानः खड्गपाणयः॥ १५॥
विस्तीर्णविपुलोरस्काः परिघायतबाहवः।
शोणांशुवसनाः सर्वे व्याघ्रा इव दुरासदाः॥१६॥
‘पुरुषसिंह! इस रथ के दोनों ओर जो ये हाथों में खड्ग लिये कुण्डलधारी सौ-सौ युवक खड़े हैं, इनके वक्षःस्थल विशाल एवं विस्तृत हैं, भुजाएँ परिघों के समान सुदृढ़ एवं बड़ी-बड़ी हैं। ये सब-केसब लाल वस्त्र धारण किये हुए हैं और व्याघ्रों के समान दुर्जय प्रतीत होते हैं ॥ १५-१६ ॥
उरोदेशेषु सर्वेषां हारा ज्वलनसंनिभाः।
रूपं बिभ्रति सौमित्रे पञ्चविंशतिवार्षिकम्॥ १७॥
‘सुमित्रानन्दन! इन सबके हृदयदेशों में अग्नि के समान तेज से जगमगाते हुए हार शोभा पाते हैं। ये नवयुवक पच्चीस वर्षों की अवस्था का रूप धारण करते हैं।॥ १७॥
एतद्धि किल देवानां वयो भवति नित्यदा।
यथेमे पुरुषव्याघ्रा दृश्यन्ते प्रियदर्शनाः॥१८॥
‘कहते हैं, देवताओं की सदा ऐसी ही अवस्था रहती है, जैसे ये पुरुष प्रवर दिखायी देते हैं। इनका दर्शन कितना प्यारा लगता है॥ १८॥
इहैव सह वैदेह्या मुहूर्तं तिष्ठ लक्ष्मण।
यावज्जानाम्यहं व्यक्तं क एष द्युतिमान् रथे॥ १९॥
‘लक्ष्मण! जबतक कि मैं स्पष्ट रूपसे यह पता न लगा लूँ कि रथ पर बैठे हुए ये तेजस्वी पुरुष कौन हैं? तबतक तुम विदेहनन्दिनी सीता के साथ एक मुहूर्त तक यहीं ठहरो’ ॥ १९॥
तमेवमुक्त्वा सौमित्रिमिहैव स्थीयतामिति।
अभिचक्राम काकुत्स्थः शरभङ्गाश्रमं प्रति॥ २०॥
इस प्रकार सुमित्राकुमार को वहीं ठहरने का आदेश देकर श्रीरामचन्द्रजी टहलते हुए शरभङ्ग मुनि के आश्रम पर गये॥ २०॥
ततः समभिगच्छन्तं प्रेक्ष्य रामं शचीपतिः।
शरभङ्गमनुज्ञाप्य विबुधानिदमब्रवीत्॥२१॥
श्रीराम को आते देख शचीपति इन्द्र ने शरभङ्ग मुनि से विदा ले देवताओं से इस प्रकार कहा- ॥२१॥
इहोपयात्यसौ रामो यावन्मां नाभिभाषते।
निष्ठां नयत तावत् तु ततो माद्रष्टमर्हति ॥ २२॥
‘श्रीरामचन्द्रजी यहाँ आ रहे हैं। वे जब तक मुझसे कोई बात न करें, उसके पहले ही तुम लोग मुझे यहाँ से दूसरे स्था नमें ले चलो। इस समय श्रीराम से मेरी मुलाकात नहीं होनी चाहिये॥ २२ ॥
जितवन्तं कृतार्थं हि तदाहमचिरादिमम्।
कर्म ह्यनेन कर्तव्यं महदन्यैः सुदुष्करम्॥ २३॥
‘इन्हें वह महान् कर्म करना है, जिसका सम्पादन करना दूसरों के लिये बहुत कठिन है। जब ये रावण पर विजय पाकर अपना कर्तव्य पूर्ण करके कृतार्थ हो जायँगे, तब मैं शीघ्र ही आकर इनका दर्शन करूँगा’॥ २३॥
अथ वज्री तमामन्त्र्य मानयित्वा च तापसम्।
रथेन हययुक्तेन ययौ दिवमरिंदमः॥२४॥
यह कहकर वज्रधारी शत्रुदमन इन्द् रने तपस्वी शरभङ्ग का सत्कार किया और उनसे पूछकर अनुमति ले वे घोड़े जुते हुए रथ के द्वारा स्वर्गलोक को चल दिये॥
प्रयाते तु सहस्राक्षे राघवः सपरिच्छदः।
अग्निहोत्रमुपासीनं शरभङ्गमुपागमत्॥२५॥
सहस्र नेत्रधारी इन्द्र के चले जाने पर श्रीरामचन्द्रजी अपनी पत्नी और भाई के साथ शरभङ्ग मुनि के पास गये। उस समय वे अग्नि के समीप बैठकर अग्निहोत्र कर रहे थे।॥ २५ ॥
तस्य पादौ च संगृह्य रामः सीता च लक्ष्मणः।
निषेदुस्तदनुज्ञाता लब्धवासा निमन्त्रिताः॥२६॥
श्रीराम, सीता और लक्ष्मण ने मुनि के चरणों में प्रणाम किया और उनकी आज्ञा से वहाँ बैठ गये। शरभङ्गजी ने उन्हें आतिथ्य के लिये निमन्त्रण दे ठहरने के लिये स्थान दिया॥२६॥
ततः शक्रोपयानं तु पर्यपृच्छत राघवः ।
शरभङ्गश्च तत् सर्वं राघवाय न्यवेदयत्॥ २७॥
तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजी ने उनसे इन्द्र के आने का कारण पूछा। तब शरभङ्ग मुनि ने श्रीरघुनाथजी से सब बातें निवेदन करते हुए कहा- ॥२७॥
मामेष वरदो राम ब्रह्मलोकं निनीषति।
जितमुग्रेण तपसा दुष्प्रापमकृतात्मभिः॥ २८॥
‘श्रीराम! ये वर देने वाले इन्द्र मुझे ब्रह्मलोक में ले जाना चाहते हैं। मैंने अपनी उग्र तपस्या से उस लोक पर विजय पायी है। जिनकी इन्द्रियाँ वश में नहीं हैं, उन पुरुषों के लिये वह अत्यन्त दुर्लभ है॥ २८॥
अहं ज्ञात्वा नरव्याघ्र वर्तमानमदूरतः।।
ब्रह्मलोकं न गच्छामि त्वामदृष्ट्वा प्रियातिथिम्॥ २९॥
‘पुरुषसिंह! परंतु जब मुझे मालूम हो गया कि आप इस आश्रम के निकट आ गये हैं, तब मैंने निश्चय किया कि आप-जैसे प्रिय अतिथि का दर्शन किये बिना मैं ब्रह्मलोक को नहीं जाऊँगा॥ २९॥
त्वयाहं पुरुषव्याघ्र धार्मिकेण महात्मना।
समागम्य गमिष्यामि त्रिदिवं चावरं परम्॥३०॥
‘नरश्रेष्ठ! आप धर्मपरायण महात्मा पुरुष से मिलकर ही मैं स्वर्गलोक तथा उससे ऊपर के ब्रह्मलोक को जाऊँगा॥३०॥
अक्षया नरशार्दूल जिता लोका मया शुभाः।
ब्राह्मयाश्च नाकपृष्ठ्याश्च प्रतिगृह्णीष्व मामकान्॥३१॥
‘पुरुषशिरोमणे! मैंने ब्रह्मलोक और स्वर्गलोक आदि जिन अक्षय शुभ लोकों पर विजय पायी है, मेरे उन सभी लोकों को आप ग्रहण करें’॥ ३१ ॥
एवमुक्तो नरव्याघ्रः सर्वशास्त्रविशारदः।
ऋषिणा शरभङ्गेन राघवो वाक्यमब्रवीत्॥३२॥
शरभङ्ग मुनि के ऐसा कहने पर सम्पूर्ण शास्त्रों के ज्ञाता नरश्रेष्ठ श्रीरघुनाथजी ने यह बात कही— ॥३२॥
अहमेवाहरिष्यामि सर्वांल्लोकान् महामुने।
आवासं त्वहमिच्छामि प्रदिष्टमिह कानने॥३३॥
‘महामुने! मैं ही आपको उन सब लोकों की प्राप्ति कराऊँगा। इस समय तो मैं इस वन में आपके बताये हुए स्थान पर निवासमात्र करना चाहता हूँ’॥ ३३॥
राघवेणैवमुक्तस्तु शक्रतुल्यबलेन वै।
शरभङ्गो महाप्राज्ञः पुनरेवाब्रवीद् वचः॥ ३४॥
इन्द्र के समान बलशाली श्रीरामचन्द्रजी के ऐसा कहने पर महाज्ञानी शरभङ्ग मुनि फिर बोले- ॥ ३४॥
इह राम महातेजाः सुतीक्ष्णो नाम धार्मिकः।
वसत्यरण्ये नियतः स ते श्रेयो विधास्यति॥ ३५॥
‘श्रीराम! इस वन में थोड़ी ही दूर पर महातेजस्वी धर्मात्मा सुतीक्ष्ण मुनि नियमपूर्वक निवास करते हैं।वे ही आपका कल्याण (आपके लिये स्थान आदि का प्रबन्ध) करेंगे॥ ३५॥
सुतीक्ष्णमभिगच्छ त्वं शुचौ देशे तपस्विनम्।
रमणीये वनोद्देशे स ते वासं विधास्यति ॥ ३६॥
‘आप इस रमणीय वनप्रान्त के उस पवित्र स्थान में तपस्वी सुतीक्ष्ण मुनि के पास चले जाइये। वे आपके निवासस्थान की व्यवस्था करेंगे॥ ३६॥
इमां मन्दाकिनी राम प्रतिस्रोतामनुव्रज।
नदी पुष्पोडुपवहां ततस्तत्र गमिष्यसि ॥ ३७॥
‘श्रीराम! आप फूल के समान छोटी-छोटी डोंगियों से पार होने योग्य अथवा पुष्पमयी नौका को बहाने वाली इस मन्दाकिनी नदी के स्रोत के विपरीत दिशा में इसी के किनारे-किनारे चले जाइये। इससे वहाँ पहुँच जाइयेगा॥ ३७॥
एष पन्था नरव्याघ्र मुहूर्तं पश्य तात माम्।
यावज्जहामि गात्राणि जीर्णां त्वचमिवोरगः॥ ३८॥
‘नरश्रेष्ठ! यही वह मार्ग है, परंतु तात! दो घड़ी यहीं ठहरिये और जब तक पुरानी केंचुल का त्याग करने वाले सर्प की भाँति मैं अपने इन जराजीर्ण अङ्गों का त्याग न कर दूँ, तब तक मेरी ही ओर देखिये ॥ ३८॥
ततोऽग्निं स समाधाय हत्वा चाज्येन मन्त्रवत् ।
शरभङ्गो महातेजाः प्रविवेश हुताशनम्॥ ३९॥
यों कहकर महातेजस्वी शरभङ्ग मुनि ने विधिवत् अग्नि की स्थापना करके उसे प्रज्वलित किया और मन्त्रोच्चारणपूर्वक घी की आहुति देकर वे स्वयं भी उस अग्नि में प्रविष्ट हो गये॥ ३९॥
तस्य रोमाणि केशांश्च तदा वह्निर्महात्मनः।
जीर्णां त्वचं तदस्थीनि यच्च मांसं च शोणितम्॥ ४०॥
उस समय अग्नि ने उन महात्मा के रोम, केश, जीर्ण त्वचा, हड्डी, मांस और रक्त सबको जलाकर भस्म कर दिया॥ ४०॥
स च पावकसंकाशः कुमारः समपद्यत।
उत्थायाग्निचयात् तस्माच्छरभङ्गो व्यरोचत॥ ४१॥
वे शरभङ्ग मुनि अग्नितुल्य तेजस्वी कुमार के रूप में प्रकट हो गये और उस अग्निराशि से ऊपर उठकर बड़ी शोभा पाने लगे॥ ४१॥
स लोकानाहिताग्नीनामृषीणां च महात्मनाम्।
देवानां च व्यतिक्रम्य ब्रह्मलोकं व्यरोहत॥४२॥
वे अग्निहोत्री पुरुषों, महात्मा मुनियों और देवताओं के भी लोकों को लाँघकर ब्रह्मलोक में जा पहुँचे॥ ४२॥
स पुण्यकर्मा भुवने द्विजर्षभःपितामहं सानुचरं ददर्श ह।
पितामहश्चापि समीक्ष्य तं द्विजंननन्द सुस्वागतमित्युवाच ह॥४३॥
पुण्यकर्म करने वाले द्विजश्रेष्ठ शरभङ्ग ने ब्रह्मलोक में पार्षदों सहित पितामह ब्रह्माजी का दर्शन किया। ब्रह्माजी भी उन ब्रह्मर्षि को देखकर बड़े प्रसन्न हुए और बोले- ‘महामुने! तुम्हारा शुभ स्वागत है’। ४३॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे पञ्चमः सर्गः॥५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में पाँचवाँ सर्ग पूरा हुआ।५॥
सर्ग-06
शरभङ्गे दिवं प्राप्ते मुनिसङ्घाः समागताः।
अभ्यगच्छन्त काकुत्स्थं रामं ज्वलिततेजसम्॥
शरभङ्ग मुनि के ब्रह्मलोक चले जाने पर प्रज्वलित तेज वाले ककुत्स्थवंशी श्रीरामचन्द्रजी के पास बहुत-से मुनियों के समुदाय पधारे॥१॥
वैखानसा वालखिल्याः सम्प्रक्षाला मरीचिपाः।
अश्मकुट्टाश्च बहवः पत्राहाराश्च तापसाः॥२॥
दन्तोलूखलिनश्चैव तथैवोन्मज्जकाः परे।
गात्रशय्या अशय्याश्च तथैवानवकाशिकाः॥ ३॥
मुनयः सलिलाहारा वायुभक्षास्तथापरे।
आकाशनिलयाश्चैव तथा स्थण्डिलशायिनः॥ ४॥
तथोर्ध्ववासिनो दान्तास्तथाऽऽर्द्रपटवाससः।
सजपाश्च तपोनिष्ठास्तथा पञ्चतपोऽन्विताः॥
उनमें वैखानस’, वालखिल्य, सम्प्रक्षाल, मरीचिप, बहुसंख्यक अश्मकुट्ट’, पत्राहार, दन्तोलूखली’, उन्मज्जक, गात्रशय्य, अशय्य’, अनवकाशिक, सलिलाहार, वायुभक्ष१२, आकाशनिलय, स्थण्डिलशायी’५, ऊर्ध्ववासी, दान्त, आर्द्रपटवासा, सजप, तपोनिष्ठ° और पञ्चाग्निसेवी२१–इन सभी श्रेणियों के तपस्वी मुनि थे॥२-५॥
१.ऋषियों का एक समुदाय जो ब्रह्माजी के नख से उत्पन्न हुआ है। २.ब्रह्माजी के बाल (रोम) से प्रकट हुए महर्षियों का समूह ३.जो भोजन के बाद अपने बर्तन धो-पोंछकर रख देते हैं, दूसरे समय के लिये कुछ नहीं बचाते। ४.सूर्य अथवा चन्द्रमा की किरणों का पान करके रहने वाले। ५.कच्चे अन्न को पत्थर से कूटकर खाने वाले। ६.पत्तों का आहार करने वाले। ७. दाँतों से ही ऊखल का काम लेने वाले। ८. कण्ठतक पानी में डूबकर तपस्या करने वाले। ९.शरीर से ही शय्या का काम लेने वाले अर्थात् बिनाबिछौने के ही भुजा पर सिर रखकर सोने वाले। १०. शय्या के साधनों से रहित। ११. निरन्तर सत्कर्म में लगे रहने के कारण कभी अवकाश न पाने वाले। १२. जल पीकर रहने वाले। १३. हवा पीकर जीवननिर्वाह करने वाले। १४. खुले मैदान में रहने वाले। १५. वेदी पर सोने वाले। १६. पर्वत शिखर आदि ऊँचे स्थानों में निवास करने वाले। १७. मन और इन्द्रियों को वश में रखने वाले। १८. सदा भीगे कपड़े पहनने वाले। १९. निरन्तर जप करने वाले। २०. तपस्या अथवा परमात्मतत्त्व के विचार में स्थित रहने वाले। २१. गर्मी के मौसम में ऊपर से सूर्य का और चारों ओर से अग्नि का ताप सहन करने वाले।
सर्वे ब्राह्मया श्रिया युक्ता दृढयोगसमाहिताः।
शरभङ्गाश्रमे राममभिजग्मुश्च तापसाः॥६॥
वे सभी तपस्वी ब्रह्मतेज से सम्पन्न थे और सुदृढ़ योग के अभ्यास से उन सबका चित्त एकाग्र हो गया था। वे सब-के-सब शरभङ्ग मुनि के आश्रम पर श्रीरामचन्द्रजी के समीप आये॥६॥
अभिगम्य च धर्मज्ञा रामं धर्मभृतां वरम्।
ऊचुः परमधर्मज्ञमृषिसङ्घाः समागताः॥७॥
धर्मात्माओं में श्रेष्ठ परम धर्मज्ञ श्रीरामचन्द्रजी के पास आकर वे धर्म के ज्ञाता समागत ऋषिसमुदाय उनसे बोले- ॥७॥
त्वमिक्ष्वाकुकुलस्यास्य पृथिव्याश्च महारथः।
प्रधानश्चापि नाथश्च देवानां मघवानिव॥८॥
‘रघुनन्दन! आप इस इक्ष्वाकुवंश के साथ ही समस्त भूमण्डल के भी स्वामी, संरक्षक एवं प्रधान महारथी वीर हैं। जैसे इन्द्र देवताओं के रक्षक हैं, उसी प्रकार आप मनुष्यलोक की रक्षा करनेवाले हैं।॥ ८॥
विश्रुतस्त्रिषु लोकेषु यशसा विक्रमेण च।
पितृव्रतत्वं सत्यं च त्वयि धर्मश्च पुष्कलः॥९॥
‘आप अपने यश और पराक्रम से तीनों लोकों में विख्यात हैं। आपमें पिता की आज्ञा के पालन का व्रत, सत्य भाषण तथा सम्पूर्ण धर्म विद्यमान हैं॥९॥
त्वामासाद्य महात्मानं धर्मज्ञं धर्मवत्सलम्।
अर्थित्वान्नाथ वक्ष्यामस्तच्च नः क्षन्तुमर्हसि॥ १०॥
‘नाथ! आप महात्मा, धर्मज्ञ और धर्मवत्सल हैं। हम आपके पास प्रार्थी होकर आये हैं; इसीलिये ये स्वार्थ की बात निवेदन करना चाहते हैं। आपको इसके लिये हमें क्षमा करना चाहिये॥ १० ॥
अधर्मः सुमहान् नाथ भवेत् तस्य तु भूपतेः।
यो हरेद् बलिषड्भागं न च रक्षति पुत्रवत्॥
‘स्वामिन् ! जो राजा प्रजा से उसकी आयका छठा भाग करके रूप में ले ले और पुत्र की भाँति प्रजा की रक्षा न करे, उसे महान् अधर्म का भागी होना पड़ता है॥ ११॥
युञ्जानः स्वानिव प्राणान् प्राणैरिष्टान् सुतानिव।
नित्ययुक्तः सदा रक्षन् सर्वान् विषयवासिनः॥ १२॥
प्राप्नोति शाश्वती राम कीर्तिं स बहवार्षिकीम्।
ब्रह्मणः स्थानमासाद्य तत्र चापि महीयते॥१३॥
‘श्रीराम! जो भूपाल प्रजा की रक्षा के कार्य में संलग्न हो अपने राज्य में निवास करने वाले सब लोगों को प्राणों के समान अथवा प्राणों से भी अधिक प्रिय पुत्रों के समान समझकर सदा सावधानी के साथ उनकी रक्षा करता है, वह बहुत वर्षों तक स्थिर रहने वाली अक्षय कीर्ति पाता है और अन्त में ब्रह्मलोक में जाकर वहाँ भी विशेष सम्मान का भागी होता है। १२-१३॥
यत् करोति परं धर्मं मुनिर्मूलफलाशनः ।
तत्र राज्ञश्चतर्भागः प्रजा धर्मेण रक्षतः॥१४॥
‘राजा के राज्य में मुनि फल-मूलका आहार करके जिस उत्तम धर्म का अनुष्ठान करता है, उसका चौथा भाग धर्म के अनुसार प्रजा की रक्षा करने वाले उस राजा को प्राप्त हो जाता है॥ १४ ॥
सोऽयं ब्राह्मणभूयिष्ठो वानप्रस्थगणो महान्।
त्वन्नाथोऽनाथवद् राम राक्षसैर्हन्यते भृशम्॥ १५॥
‘श्रीराम! इस वन में रहने वाला वानप्रस्थ महात्माओं का यह महान् समुदाय, जिसमें ब्राह्मणों की ही संख्या अधिक है तथा जिसके रक्षक आप ही हैं, राक्षसों के द्वारा अनाथ की तरह मारा जा रहा है इस मुनि-समुदायका बहुत अधिक मात्रा में संहार हो रहा है।॥ १५ ॥
एहि पश्य शरीराणि मुनीनां भावितात्मनाम्।
हतानां राक्षसैोरैर्बहूनां बहुधा वने॥१६॥
‘आइये, देखिये, ये भयंकर राक्षसों द्वारा बारम्बार अनेक प्रकार से मारे गये बहुसंख्यक पवित्रात्मा मुनियों के शरीर (शव या कंकाल) दिखायी देते हैं। १६॥
पम्पानदीनिवासानामनुमन्दाकिनीमपि।
चित्रकूटालयानां च क्रियते कदनं महत्॥१७॥
‘पम्पा सरोवर और उसके निकट बहने वाली तुङ्गभद्रा नदी के तट पर जिनका निवास है, जो मन्दाकिनी के किनारे रहते हैं तथा जिन्होंने चित्रकूट पर्वत के किनारे अपना निवासस्थान बना लिया है, उन सभी ऋषि-महर्षियों का राक्षसों द्वारा महान् संहार किया जा रहा है॥ १७ ॥
एवं वयं न मृष्यामो विप्रकारं तपस्विनाम्।
क्रियमाणं वने घोरं रक्षोभिीमकर्मभिः॥१८॥
‘इन भयानक कर्म करने वाले राक्षसों ने इस वन में तपस्वी मुनियों का जो ऐसा भयंकर विनाशकाण्ड मचा रखा है, वह हमलोगों से सहा नहीं जाता है। १८॥
ततस्त्वां शरणार्थं च शरण्यं समुपस्थिताः।
परिपालय नो राम वध्यमानान् निशाचरैः ॥१९॥
‘अतः इन राक्षसों से बचने के लिये शरण लेने के उद्देश्य से हम आपके पास आये हैं। श्रीराम! आप शरणागतवत्सल हैं, अतः इन निशाचरों से मारे जाते हुए हम मुनियों की रक्षा कीजिये॥ १९ ॥
परा त्वत्तो गतिर्वीर पृथिव्यां नोपपद्यते।
परिपालय नः सर्वान् राक्षसेभ्यो नृपात्मज ॥२०॥
‘वीर राजकुमार! इस भूमण्डल में हमें आपसे बढ़कर दूसरा कोई सहारा नहीं दिखायी देता। आप इन राक्षसों से हम सबको बचाइये’ ।। २० ॥
एतच्छ्रुत्वा तु काकुत्स्थस्तापसानां तपस्विनाम्।
इदं प्रोवाच धर्मात्मा सर्वानेव तपस्विनः ॥२१॥
तपस्या में लगे रहने वाले उन तपस्वी मुनियों की ये बातें सुनकर ककुत्स्थकुलभूषण धर्मात्मा श्रीराम ने उन सबसे कहा- ॥ २१॥
नैवमर्हथ मां वक्तुमाज्ञाप्योऽहं तपस्विनाम्।
केवलेन स्वकार्येण प्रवेष्टव्यं वनं मया ॥२२॥
‘मुनिवरो! आप लोग मुझसे इस प्रकार प्रार्थना न करें। मैं तो तपस्वी महात्माओं का आज्ञापालक हूँ। मुझे केवल अपने ही कार्य से वन में तो प्रवेश करना ही है (इसके साथ ही आपलोगों की सेवा का सौभाग्य भी मुझे प्राप्त हो जायगा) ॥ २२ ॥
विप्रकारमपाक्रष्टुं राक्षसैर्भवतामिमम्।
पितुस्तु निर्देशकरः प्रविष्टोऽहमिदं वनम्॥२३॥
‘राक्षसों के द्वारा जो आपको यह कष्ट पहुँच रहा है, इसे दूर करने के लिये ही मैं पिता के आदेश का पालन करता हुआ इस वन में आया हूँ॥ २३॥
भवतामर्थसिद्ध्यर्थमागतोऽहं यदृच्छया।
तस्य मेऽयं वने वासो भविष्यति महाफलः॥ २४॥
‘आपलोगों के प्रयोजन की सिद्धि के लिये मैं दैवात् यहाँ आ पहुँचा हूँ। आपकी सेवा का अवसर मिलने से मेरे लिये यह वनवास महान् फलदायक होगा॥ २४ ॥
तपस्विनां रणे शत्रून् हन्तुमिच्छामि राक्षसान्।
पश्यन्तु वीर्यमृषयः सभ्रातुर्मे तपोधनाः ॥ २५॥
‘तपोधनो! मैं तपस्वी मुनियों से शत्रुता रखने वाले उन राक्षसों का युद्ध में संहार करना चाहता हूँ। आप सब महर्षि भाईसहित मेरा पराक्रम देखें’ ॥ २५ ॥
दत्त्वा वरं चापि तपोधनानां धर्मे धृतात्मा सह लक्ष्मणेन।
तपोधनैश्चापि सहार्यदत्तः सुतीक्ष्णमेवाभिजगाम वीरः॥ २६॥
इस प्रकार उन तपोधनों को वर देकर धर्म में मन लगाने वाले तथा श्रेष्ठ दान देने वाले वीर श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण तथा तपस्वी महात्माओं के साथ सुतीक्ष्ण मुनि के पास गये॥ २६॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे षष्ठः सर्गः॥६॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में छठा सर्ग पूरा हुआ॥६॥
सर्ग-07
रामस्तु सहितो भ्रात्रा सीतया च परंतपः।
सुतीक्ष्णस्याश्रमपदं जगाम सह तैर्द्विजैः॥१॥
शत्रुओं को संताप देने वाले श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण, सीता तथा उन ब्राह्मणों के साथ सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम की ओर चले॥१॥
स गत्वा दूरमध्वानं नदीस्तीर्वा बहूदकाः।
ददर्श विमलं शैलं महामेरुमिवोन्नतम्॥२॥
वे दूर तक का मार्ग तै करके अगाध जल से भरी हुई बहुत-सी नदियों को पार करते हुए जब आगे गये, तब उन्हें महान् मेरुगिरि के समान एक अत्यन्त ऊँचा पर्वत दिखायी दिया, जो बड़ा ही निर्मल था॥२॥
ततस्तदिक्ष्वाकुवरौ सततं विविधैर्दुमैः ।
काननं तौ विविशतुः सीतया सह राघवौ॥३॥
वहाँ से आगे बढ़कर वे दोनों इक्ष्वाकुकुल के श्रेष्ठ वीर रघुवंशी बन्धु सीता के साथ नाना प्रकार के वृक्षों से भरे हुए एक वन में पहुँचे॥३॥
प्रविष्टस्तु वनं घोरं बहुपुष्पफलद्रुमम्।
ददर्शाश्रममेकान्ते चीरमालापरिष्कृतम्॥४॥
उस घोर वन में प्रविष्ट हो श्रीरघुनाथजी ने एकान्त स्थान में एक आश्रम देखा, जहाँ के वृक्ष प्रचुर फलफूलों से लदे हुए थे। इधर-उधर टँगे हुए चीर वस्त्रों के समुदाय उस आश्रम की शोभा बढ़ाते थे॥ ४॥
तत्र तापसमासीनं मलपङ्कजधारिणम्।
रामः सुतीक्ष्णं विधिवत् तपोधनमभाषत॥५॥
वहाँ आन्तरिक मल की शुद्धि के लिये पद्मासन धारण किये सुतीक्ष्ण मुनि ध्यान मग्न होकर बैठे थे। श्रीराम ने उन तपोधन मुनि के पास विधिवत् जाकर उनसे इस प्रकार कहा- ॥ ५॥
रामोऽहमस्मि भगवन् भवन्तं द्रष्टुमागतः।
तन्माभिवद धर्मज्ञ महर्षे सत्यविक्रम॥६॥
‘सत्यपराक्रमी धर्मज्ञ महर्षे ! भगवन् ! मैं राम हूँ और यहाँ आपका दर्शन करने के लिये आया हूँ, अतः आप मुझसे बात कीजिये’॥६॥
स निरीक्ष्य ततो धीरो रामं धर्मभृतां वरम्।
समाश्लिष्य च बाहुभ्यामिदं वचनमब्रवीत्॥७॥
धर्मात्माओं में श्रेष्ठ भगवान् श्रीराम का दर्शन करके धीर महर्षि सुतीक्ष्ण ने अपनी दोनों भुजाओं से उनका आलिङ्गन किया और इस प्रकार कहा- ॥७॥
स्वागतं ते रघुश्रेष्ठ राम सत्यभृतां वर।
आश्रमोऽयं त्वयाऽऽक्रान्तः सनाथ इव साम्प्रतम्॥ ८॥
‘सत्यवादियों में श्रेष्ठ रघुकुलभूषण श्रीराम! आपका स्वागत है। इस समय आपके पदार्पण करने से यह आश्रम सनाथ हो गया॥ ८॥
प्रतीक्षमाणस्त्वामेव नारोहेऽहं महायशः।
देवलोकमितो वीर देहं त्यक्त्वा महीतले॥९॥
‘महायशस्वी वीर! मैं आपकी ही प्रतीक्षा में था, इसीलिये अब तक इस पृथ्वी पर अपने शरीर को त्यागकर मैं यहाँ से देवलोक (ब्रह्मधाम) में नहीं गया॥९॥
चित्रकूटमुपादाय राज्यभ्रष्टोऽसि मे श्रुतः।
इहोपयातः काकुत्स्थ देवराजः शतक्रतुः॥१०॥
‘मैंने सुना था कि आप राज्य से भ्रष्ट हो चित्रकूट पर्वत पर आकर रहते हैं। काकुत्स्थ! यहाँ सौ यज्ञों का अनुष्ठान करने वाले देवराज इन्द्र आये थे॥ १०॥
उपागम्य च मे देवो महादेवः सुरेश्वरः।
सर्वांल्लोकाञ्जितानाह मम पुण्येन कर्मणा॥ ११॥
‘वे महान् देवता देवेश्वर इन्द्रदेव मेरे पास आकर कह रहे थे कि ‘तुमने अपने पुण्यकर्म के द्वारा समस्त शुभ लोकों पर विजय पायी है’ ॥११॥
तेषु देवर्षिजुष्टेषु जितेषु तपसा मया।
मत्प्रसादात् सभार्यस्त्वं विहरस्व सलक्ष्मणः॥ १२॥
‘उनके कथनानुसार मैंने तपस्या से जिन देवर्षिसेवित लोकों पर अधिकार प्राप्त किया है, उन लोकों में आप सीता और लक्ष्मण के साथ विहार करें। मैं बड़ी प्रसन्नता के साथ वे सारे लोक आपकी सेवा में समर्पित करता हूँ॥
तमुग्रतपसं दीप्तं महर्षिं सत्यवादिनम्।
प्रत्युवाचात्मवान् रामो ब्रह्माणमिव वासवः॥ १३॥
जैसे इन्द्र ब्रह्माजी से बात करते हैं, उसी प्रकार मनस्वी श्रीराम ने उन उग्र तपस्या वाले तेजस्वी एवं सत्यवादी महर्षि को इस प्रकार उत्तर दिया- ॥१३॥
अहमेवाहरिष्यामि स्वयं लोकान् महामुने।
आवासं त्वहमिच्छामि प्रदिष्टमिह कानने॥१४॥
‘महामुने! वे लोक तो मैं स्वयं ही आपको प्राप्त कराऊँगा, इस समय तो मेरी यह इच्छा है कि आप बतावें कि मैं इस वन में अपने ठहरने के लिये कहाँ कुटिया बनाऊँ? ॥ १४॥
भवान् सर्वत्र कुशलः सर्वभूतहिते रतः।
आख्यातं शरभरुन गौतमेन महात्मना॥१५॥
‘आप समस्त प्राणियों के हित में तत्पर तथा इहलोक और परलोक की सभी बातों के ज्ञान में निपुण हैं, यह बात मुझसे गौतमगोत्रीय महात्मा शरभङ्ग ने कही थी’ ॥ १५॥
एवमुक्तस्तु रामेण महर्षिर्लोकविश्रुतः।
अब्रवीन्मधुरं वाक्यं हर्षेण महता युतः॥१६॥
श्रीरामचन्द्रजी के ऐसा कहने पर उन लोकविख्यात महर्षि ने बड़े हर्ष के साथ मधुर वाणी में कहा—॥१६॥
अयमेवाश्रमो राम गुणवान् रम्यतामिति।
ऋषिसंघानुचरितः सदा मूलफलैर्युतः॥१७॥
‘श्रीराम! यही आश्रम सब प्रकार से गुणवान् (सुविधाजनक) है, अतः आप यहीं सुखपूर्वक निवास कीजिये। यहाँ ऋषियों का समुदाय सदा आता-जाता रहता है और फल-मूल भी सर्वदा सुलभ होते हैं॥१७॥
इममाश्रममागम्य मृगसंघा महीयसः।
अहत्वा प्रतिगच्छन्ति लोभयित्वाकुतोभयाः॥ १८॥
‘इस आश्रम पर बड़े-बड़े मृगों के झुंड आते और अपने रूप, कान्ति एवं गति से मन को लुभाकर किसी को कष्ट दिये बिना ही यहाँ से लौट जाते हैं। उन्हें यहाँ किसी से कोई भय नहीं प्राप्त होता है। १८॥
नान्यो दोषो भवेदत्र मृगेभ्योऽन्यत्र विद्धि वै।
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य महर्षेर्लक्ष्मणाग्रजः॥१९॥
उवाच वचनं धीरो विगृह्य सशरं धनुः।
‘इस आश्रम में मृगों के उपद्रव के सिवा और कोई दोष नहीं है, यह आप निश्चित रूप से जान लें।’ महर्षि का यह वचन सुनकर लक्ष्मण के बड़े भाई धीरवीर भगवान् श्रीराम ने हाथ में धनुष-बाण लेकर कहा – ॥ १९ १/२॥
तानहं सुमहाभाग मृगसंघान् समागतान्॥२०॥
हन्यां निशितधारेण शरेणानतपर्वणा।
भवांस्तत्राभिषज्येत किं स्यात् कृच्छ्रतरं ततः॥ २१॥
‘महाभाग! यहाँ आये हुए उन उपद्रवकारी मृगसमूहों को यदि मैं झुकी हुई गाँठ और तीखी धार वाले बाण से मार डालूँ तो इसमें आपका अपमान होगा। यदि ऐसा हुआ तो इससे बढ़कर कष्ट की बात मेरे लिये और क्या हो सकती है ? ॥ २०-२१ ॥
एतस्मिन्नाश्रमे वासं चिरं तु न समर्थये।
तमेवमुक्त्वोपरमं रामः संध्यामुपागमत्॥२२॥
‘इसलिये मैं इस आश्रम में अधिक समय नहीं निवास करना चाहता।’ मुनि से ऐसा कहकर मौन हो श्रीरामचन्द्र जी संध्योपासना करने चले गये॥ २२ ॥
अन्वास्य पश्चिमां संध्यां तत्र वासमकल्पयत् ।
सुतीक्ष्णस्याश्रमे रम्ये सीतया लक्ष्मणेन च। २३॥
सायंकाल की संध्योपासना करके श्रीराम ने सीता और लक्ष्मण के साथ सुतीक्ष्ण मुनि के उस रमणीय आश्रम में निवास किया॥ २३॥
ततः शुभं तापसयोग्यमन्नं स्वयं सुतीक्ष्णः पुरुषर्षभाभ्याम्।
ताभ्यां सुसत्कृत्य ददौ महात्मासंध्यानिवृत्तौ रजनीं समीक्ष्य॥२४॥
संध्या का समय बीतने पर रात हुई देख महात्मा सुतीक्ष्ण ने स्वयं ही तपस्वी-जनों के सेवन करने योग्यशुभ अन्न ले आकर उन दोनों पुरुषशिरोमणि बन्धुओं को बड़े सत्कार के साथ अर्पित किया॥२४॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे सप्तमः सर्गः॥७॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में सातवाँ सर्ग पूरा हुआ।७॥
सर्ग-08
रामस्तु सहसौमित्रिः सुतीक्ष्णेनाभिपूजितः।
परिणाम्य निशां तत्र प्रभाते प्रत्यबुध्यत॥१॥
सुतीक्ष्ण के द्वारा भलीभाँति पूजित हो लक्ष्मणसहित श्रीराम उनके आश्रम में ही रात बिताकर प्रातःकाल जाग उठे॥
उत्थाय च यथाकालं राघवः सह सीतया।
उपस्पश्य सशीतेन तोयेनोत्पलगन्धिना॥२॥
अथ तेऽग्निं सुरांश्चैव वैदेही रामलक्ष्मणौ।
काल्यं विधिवदभ्यर्च्य तपस्विशरणे वने॥३॥
उदयन्तं दिनकरं दृष्ट्वा विगतकल्मषाः।
सुतीक्ष्णमभिगम्येदं श्लक्ष्णं वचनमब्रुवन्॥४॥
सीतासहित श्रीराम और लक्ष्मण ने ठीक समय से उठकर कमल की सुगन्ध से सुवासित परम शीतल जल के द्वारा स्नान किया। तदनन्तर उन तीनों ने ही मिलकर विधिपूर्वक अग्नि और देवताओं की प्रातःकालिक पूजा की। इसके बाद तपस्वीजनों के आश्रयभूत वन में उदित हुए सूर्यदेव का दर्शन करके वे तीनों निष्पाप पथिक सुतीक्ष्ण मुनि के पास गये और यह मधुर वचन बोले- ॥२-४॥
सुखोषिताः स्म भगवंस्त्वया पूज्येन पूजिताः।
आपृच्छामः प्रयास्यामो मुनयस्त्वरयन्ति नः॥५॥
‘भगवन्! आपने पूजनीय होकर भी हमलोगों की पूजा की है। हम आपके आश्रम में बड़े सुख से रहे हैं। अब हम यहाँ से जायँगे, इसके लिये आपकी आज्ञा चाहते हैं। ये मुनि हमें चलने के लिये जल्दी मचा रहे हैं॥५॥
त्वरामहे वयं द्रष्टुं कृत्स्नमाश्रममण्डलम्।
ऋषीणां पुण्यशीलानां दण्डकारण्यवासिनाम्॥ ६॥
‘हमलोग दण्डकारण्य में निवास करने वाले पुण्यात्मा ऋषियों के सम्पूर्ण आश्रममण्डल का दर्शन करने के लिये उतावले हो रहे हैं॥६॥
अभ्यनुज्ञातुमिच्छामः सहैभिर्मुनिपुंगवैः।
धर्मनित्यैस्तपोदान्तैर्विशिखैरिव पावकैः॥७॥
‘अतः हमारी इच्छा है कि आप धूमरहित अग्नि के समान तेजस्वी, तपस्याद्वारा इन्द्रियों को वश में रखने वाले तथा नित्य-धर्मपरायण इन श्रेष्ठ महर्षियों के साथ यहाँ से जाने के लिये हमें आज्ञा दें॥७॥
अविषह्यातपो यावत् सूर्यो नातिविराजते।
अमार्गेणागतां लक्ष्मी प्राप्येवान्वयवर्जितः॥८॥
तावदिच्छामहे गन्तुमित्युक्त्वा चरणौ मुनेः।
ववन्दे सहसौमित्रिः सीतया सह राघवः॥९॥
‘जैसे अन्याय से आयी हुई सम्पत्ति को पाकर किसी नीच कुल के मनुष्य में असह्य उग्रता आ जाती है, उसी प्रकार यह सूर्यदेव जब तक असह्य ताप देने वाले होकर प्रचण्ड तेज से प्रकाशित न होने लगें, उसके पहले ही हम यहाँ से चल देना चाहते हैं।’ ऐसा कहकर लक्ष्मण और सीतासहित श्रीराम ने मुनि के चरणों की वन्दना की।
तौ संस्पृशन्तौ चरणावुत्थाप्य मुनिपुंगवः।
गाढमाश्लिष्य सस्नेहमिदं वचनमब्रवीत्॥१०॥
अपने चरणों का स्पर्श करते हुए श्रीराम और लक्ष्मण को उठाकर मुनिवर सुतीक्ष्ण ने कसकर हृदय से लगा लिया और बड़े स्नेह से इस प्रकार कहा—॥ १०॥
अरिष्टं गच्छ पन्थानं राम सौमित्रिणा सह।
सीतया चानया सार्धं छाययेवानवृत्तया॥११॥
‘श्रीराम! आप छाया की भाँति अनुसरण करने वाली – इस धर्मपत्नी सीता तथा सुमित्राकुमार लक्ष्मण के साथ यात्रा कीजिये। आपका मार्ग विघ्न-बाधाओं से रहित परम मङ्गलमय हो॥११॥
पश्याश्रमपदं रम्यं दण्डकारण्यवासिनाम्।
एषां तपस्विनां वीर तपसा भावितात्मनाम्॥ १२॥
‘वीर! तपस्या से शुद्ध अन्तःकरण वाले दण्डकारण्य-वासी इन तपस्वी मुनियों के रमणीय आश्रमों का दर्शन कीजिये॥
सुप्राज्यफलमूलानि पुष्पितानि वनानि च।
प्रशस्तमृगयूथानि शान्तपक्षिगणानि च॥१३॥
‘इस यात्रा में आप प्रचुर फल-मूलों से युक्त तथा फूलों से सुशोभित अनेक वन देखेंगे; वहाँ उत्तम मृगों के झुंड विचरते होंगे और पक्षी शान्तभाव से रहते होंगे॥ १३॥
फुल्लपङ्कजखण्डानि प्रसन्नसलिलानि च।
कारण्डवविकीर्णानि तटाकानि सरांसि च॥ १४॥
‘आपको बहुत-से ऐसे तालाब और सरोवर दिखायी देंगे, जिनमें प्रफुल्ल कमलों के समूह शोभा दे रहे होंगे। उनमें स्वच्छ जल भरे होंगे तथा कारण्डव आदि जलपक्षी सब ओर फैल रहे होंगे। १४॥
द्रक्ष्यसे दृष्टिरम्याणि गिरिप्रस्रवणानि च।
रमणीयान्यरण्यानि मयूराभिरुतानि च ॥१५॥
‘नेत्रों को रमणीय प्रतीत होने वाले पहाड़ी झरनों और मोरों की मीठी बोली से गूंजती हुई सुरम्य वनस्थलियों को भी आप देखेंगे॥ १५ ॥
गम्यतां वत्स सौमित्रे भवानपि च गच्छतु।
आगन्तव्यं च ते दृष्ट्वा पुनरेवाश्रमं प्रति॥१६॥
‘श्रीराम! जाइये, वत्स सुमित्राकुमार! तुम भी जाओ। दण्डकारण्य के आश्रमों का दर्शन करके आपलोगों को फिर इसी आश्रम में आ जाना चाहिये’। १६॥
एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वा काकुत्स्थः सहलक्ष्मणः।
प्रदक्षिणं मुनिं कृत्वा प्रस्थात्मपचक्रमे॥१७॥
उनके ऐसा कहने पर लक्ष्मणसहित श्रीराम ने ‘बहुत अच्छा’ कहकर मुनि की परिक्रमा की और वहाँ से प्रस्थान करने की तैयारी की॥ १७॥
ततः शुभतरे तूणी धनुषी चायतेक्षणा।
ददौ सीता तयोर्धात्रोः खड्गौ च विमलौ ततः॥ १८॥
तदनन्तर विशाल नेत्रोंवाली सीता ने उन दोनों भाइयों के हाथ में दो परम सुन्दर तूणीर, धनुष और चमचमाते हुए खड्ग प्रदान किये॥ १८ ॥
आबध्य च शुभे तूणी चापे चादाय सस्वने।
निष्क्रान्तावाश्रमाद् गन्तुमुभौ तौ रामलक्ष्मणौ। १९॥
उन सुन्दर तूणीरों को पीठ पर बाँधकर टंकारते हुए धनुषों को हाथ में ले वे दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण आश्रम से बाहर निकले॥ १९॥
शीघ्रं तौ रूपसम्पन्नावनुज्ञातौ महर्षिणा।
प्रस्थितौ धृतचापासी सीतया सह राघवौ॥ २०॥
वे दोनों रघुवंशी वीर बड़े ही रूपवान् थे, उन्होंने खड्ग और धनुष धारण करके महर्षि की आज्ञा ले सीता के साथ शीघ्र ही वहाँ से प्रस्थान किया॥ २० ॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डेऽष्टमः सर्गः॥८॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में आठवाँ सर्ग पूरा हुआ।८॥
सर्ग-09
सुतीक्ष्णेनाभ्यनुज्ञातं प्रस्थितं रघुनन्दनम्।
हृद्यया स्निग्धया वाचा भर्तारमिदमब्रवीत्॥१॥
सुतीक्ष्ण की आज्ञा लेकर वन की ओर प्रस्थित हुए अपने स्वामी रघुकुलनन्दन श्रीराम से सीता ने स्नेहभरी मनोहर वाणी में इस प्रकार कहा- ॥१॥
अधर्मं तु सुसूक्ष्मेण विधिना प्राप्यते महान्।
निवृत्तेन च शक्योऽयं व्यसनात् कामजादिह॥ २॥
‘आर्यपुत्र! यद्यपि आप महान् पुरुष हैं तथापि अत्यन्त सूक्ष्म विधि से विचार करने पर आप अधर्म को प्राप्त हो रहे हैं। जब कामजनित व्यसन से आप सर्वथा निवृत्त हैं, तब यहाँ इस अधर्म से भी बच सकते हैं॥२॥
त्रीण्येव व्यसनान्यत्र कामजानि भवन्त्युत।
मिथ्यावाक्यं तु परमं तस्माद् गुरुतरावुभौ ॥३॥
परदाराभिगमनं विना वैरं च रौद्रता।
मिथ्यावाक्यं न ते भूतं न भविष्यति राघव॥४॥
‘इस जगत् में काम से उत्पन्न होने वाले तीन ही व्यसन होते हैं। मिथ्याभाषण बहुत बड़ा व्यसन है, किंतु उससे भी भारी दो व्यसन और हैं-परस्त्रीगमन और बिना वैर के ही दूसरों के प्रति क्रूरतापूर्ण बर्ताव। रघुनन्दन! इनमें से मिथ्याभाषणरूप व्यसन तो न आप में कभी हुआ है और न आगे होगा ही। ३-४॥
कुतोऽभिलषणं स्त्रीणां परेषां धर्मनाशनम्।
तव नास्ति मनुष्येन्द्र न चाभूत् ते कदाचन ॥५॥
मनस्यपि तथा राम न चैतद् विद्यते क्वचित्।
स्वदारनिरतश्चैव नित्यमेव नृपात्मज॥६॥
धर्मिष्ठः सत्यसंधश्च पितुर्निर्देशकारकः।
त्वयि धर्मश्च सत्यं च त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम्॥७॥
‘परस्त्रीविषयक अभिलाषा तो आपको हो ही कैसे सकती है? नरेन्द्र! धर्म का नाश करने वाली यह कुत्सित इच्छा न आपके मन में कभी हुई थी, न है और न भविष्य में कभी होने की सम्भावना ही है। राजकुमार श्रीराम! यह दोष तो आपके मन में भी कभी उदित नहीं हुआ है। (फिर वाणी और क्रिया में कैसे आ सकता है?) आप सदा ही अपनी धर्मपत्नी में अनुरक्त रहने वाले, धर्मनिष्ठ, सत्यप्रतिज्ञ तथा पिताकी आज्ञा का पालन करने वाले हैं। आपमें धर्म और सत्य दोनों की स्थिति है। आपमें ही सब कुछ प्रतिष्ठित है॥५-७॥
तच्च सर्वं महाबाहो शक्यं वोढुं जितेन्द्रियैः।
तव वश्येन्द्रियत्वं च जानामि शुभदर्शन॥८॥
‘महाबाहो! जो लोग जितेन्द्रिय हैं, वे सदा सत्य और धर्म को पूर्णरूप से धारण कर सकते हैं। शुभदर्शी महापुरुष! आपकी जितेन्द्रियता को मैं अच्छी तरह जानती हूँ (इसीलिये मुझे विश्वास है कि आप में पूर्वोक्त दोनों दोष कदापि नहीं रह सकते) ॥ ८॥
तृतीयं यदिदं रौद्रं परप्राणाभिहिंसनम्।
निर्वैरं क्रियते मोहात् तच्च ते समुपस्थितम्॥९॥
‘परंतु दूसरों के प्राणों की हिंसारूप जो यह तीसरा भयंकर दोष है, उसे लोग मोहवश बिना वैर-विरोध के भी किया करते हैं। वही दोष आपके सामने भी उपस्थित है॥९॥
प्रतिज्ञातस्त्वया वीर दण्डकारण्यवासिनाम्।
ऋषीणां रक्षणार्थाय वधः संयति रक्षसाम्॥ १०॥
‘वीर! आपने दण्डकारण्यनिवासी ऋषियों की रक्षा के लिये युद्ध में राक्षसों का वध करने की प्रतिज्ञा की है।
एतन्निमित्तं च वनं दण्डका इति विश्रुतम्।
प्रस्थितस्त्वं सह भ्रात्रा धृतबाणशरासनः॥११॥
‘इसी के लिये आप भाई के साथ धनुष-बाण लेकर दण्डकारण्य के नाम से विख्यात वन की ओर प्रस्थित हुए हैं। ११॥
ततस्त्वां प्रस्थितं दृष्ट्वा मम चिन्ताकुलं मनः।
त्वद्धृत्तं चिन्तयन्त्या वै भवेन्निःश्रेयसं हितम्॥ १२॥
‘अतः आपको इस घोर कर्म के लिये प्रस्थित हुआ देख मेरा चित्त चिन्ता से व्याकुल हो उठा है। आपके प्रतिज्ञा-पालनरूप व्रतका विचार करके मैं सदा यही सोचती रहती हूँ कि कैसे आपका कल्याण हो? ॥ १२॥
नहि मे रोचते वीर गमनं दण्डकान् प्रति।
कारणं तत्र वक्ष्यामि वदन्त्याः श्रूयतां मम॥ १३॥
‘वीर! मुझे इस समय आपका दण्डकारण्य में जाना अच्छा नहीं लगता है। इसका क्या कारण है—यह बता रही हूँ; आप मेरे मुँह से सुनिये॥१३॥
त्वं हि बाणधनुष्पाणिर्धात्रा सह वनं गतः।
दृष्ट्वा वनचरान् सर्वान् कच्चित् कुर्याः शरव्ययम्॥१४॥
‘आप हाथ में धनुष-बाण लेकर अपने भाइ के साथ वन में आये हैं। सम्भव है, समस्त वनचारी राक्षसों को देखकर कदाचित् आप उनके प्रति अपने बाणों का प्रयोग कर बैठें॥ १४॥
क्षत्रियाणामिह धनुर्हताशस्येन्धनानि च।
समीपतः स्थितं तेजोबलमुच्छ्रयते भृशम्॥१५॥
‘जैसे आग के समीप रखे हुए ईंधन उसके तेजरूप बल को अत्यन्त उद्दीप्त कर देते हैं, उसी प्रकार जहाँ क्षत्रियों के पास धनुष हो तो वह उनके बल और प्रताप को उद्बोधित कर देता है।॥ १५॥
पुरा किल महाबाहो तपस्वी सत्यवान् शुचिः।
कस्मिंश्चिदभवत् पुण्ये वने रतमृगद्विजे॥१६॥
‘महाबाहो! पूर्वकाल की बात है, किसी पवित्र वन में, जहाँ मृग और पक्षी बड़े आनन्द से रहते थे, एक सत्यवादी एवं पवित्र तपस्वी निवास करते थे। १६॥
तस्यैव तपसो विजं कर्तुमिन्द्रः शचीपतिः।
खड्गपाणिरथागच्छदाश्रमं भटरूपधृक्॥१७॥
‘उन्हीं की तपस्या में विघ्न डालने के लिये शचीपति इन्द्र किसी योद्धा का रूप धारण करके हाथ में तलवार लिये एक दिन उनके आश्रम पर आये॥१७॥
तस्मिंस्तदाश्रमपदे निहितः खड्ग उत्तमः।
स न्यासविधिना दत्तः पुण्ये तपसि तिष्ठतः॥ १८॥
‘उन्होंने मुनि के आश्रम में अपना उत्तम खड्ग रख दिया। पवित्र तपस्या में लगे हुए मुनि को धरोहर के रूप में वह खड्ग दे दिया॥ १८॥
स तच्छस्त्रमनुप्राप्य न्यासरक्षणतत्परः।
वने तु विचरत्येव रक्षन् प्रत्ययमात्मनः॥१९॥
‘उस शस्त्र को पाकर मुनि उस धरोहर की रक्षा में लग गये। वे अपने विश्वास की रक्षा के लिये वन में विचरते समय भी उसे साथ रखते थे॥ १९ ॥
यत्र गच्छत्युपादातुं मूलानि च फलानि च।
न विना याति तं खड्गं न्यासरक्षणतत्परः॥ २०॥
‘धरोहर की रक्षा में तत्पर रहने वाले वे मुनि फलमूल लाने के लिये जहाँ-कहीं भी जाते, उस खड्ग को साथ लिये बिना नहीं जाते थे॥ २०॥
नित्यं शस्त्रं परिवहन् क्रमेण स तपोधनः।
चकार रौद्रीं स्वां बुद्धिं त्यक्त्वा तपसि निश्चयम्॥२१॥
‘तप ही जिनका धन था, उन मुनि ने प्रतिदिन शस्त्र ढोते रहने के कारण क्रमशः तपस्या का निश्चय छोड़कर अपनी बुद्धि को क्रूरतापूर्ण बना लिया॥ २१॥
ततः स रौद्राभिरतः प्रमत्तोऽधर्मकर्षितः।
तस्य शस्त्रस्य संवासाज्जगाम नरकं मुनिः॥ २२॥
‘फिर तो अधर्म ने उन्हें आकृष्ट कर लिया। वे मुनि प्रमादवश रौद्र-कर्म में तत्पर हो गये और उस शस्त्र के सहवास से उन्हें नरक में जाना पड़ा॥ २२ ॥
एवमेतत् पुरावृत्तं शस्त्रसंयोगकारणम्।
अग्निसंयोगवद्धेतुः शस्त्रसंयोग उच्यते॥२३॥
‘इस प्रकार शस्त्र का संयोग होने के कारण पूर्वकाल में उन तपस्वी मुनि को ऐसी दुर्दशा भोगनी पड़ी जैसे आग का संयोग ईंधनों को जलाने का कारण होता है, उसी प्रकार शस्त्रों का संयोग शस्त्रधारी के – हृदय में विकार का उत्पादक कहा गया है।॥ २३॥
स्नेहाच्च बहुमानाच्च स्मारये त्वां तु शिक्षये।
न कथंचन सा कार्या गृहीतधनुषा त्वया॥२४॥
बुद्धिर्वैरं विना हन्तुं राक्षसान् दण्डकाश्रितान्।
अपराधं विना हन्तुं लोको वीर न मंस्यते॥२५॥
‘मेरे मन में आपके प्रति जो स्नेह और विशेष आदर है, उसके कारण मैं आपको उस प्राचीन घटना की याद दिलाती हूँ तथा यह शिक्षा भी देती हूँ कि आपको धनुष लेकर किसी तरह बिना वैर के ही दण्डकारण्यवासी राक्षसों के वध का विचार नहीं करना चाहिये। वीरवर ! बिना अपराध के ही किसी को मारना संसार के लोग अच्छा नहीं समझेंगे॥
क्षत्रियाणां तु वीराणां वनेषु नियतात्मनाम्।
धनुषा कार्यमेतावदार्तानामभिरक्षणम्॥२६॥
‘अपने मन और इन्द्रियों को वश में रखने वाले क्षत्रिय वीरों के लिये वन में धनुष धारण करने का इतना ही प्रयोजन है कि वे संकट में पड़े हुए प्राणियों की रक्षा करें॥ २६॥
क्व च शस्त्रं क्व च वनं क्व च क्षात्रं तपः क्व च।
व्याविद्धमिदमस्माभिर्देशधर्मस्तु पूज्यताम्॥२७॥
‘कहाँ शस्त्र-धारण और कहाँ वनवास! कहाँ क्षत्रिय का हिंसामय कठोर कर्म और कहाँ सब प्राणियों पर दया करना रूप तप—ये परस्पर विरुद्ध जान पड़ते हैं। अतः हमलोगों को देशधर्म का ही आदर करना चाहिये (इस समय हम तपोवन रूप देश में निवास करते हैं, अतः यहाँ के अहिंसामय धर्म का पालन करना ही हमारा कर्तव्य है) ॥२७॥
कदर्यकलुषा बुद्धिर्जायते शस्त्रसेवनात्।
पुनर्गत्वा त्वयोध्यायां क्षत्रधर्मं चरिष्यसि ॥२८॥
‘केवल शस्त्रका सेवन करने से मनुष्य की बुद्धि कृपण पुरुषों के समान कलुषित हो जाती है; अतः आप अयोध्या में चलने पर ही पुनः क्षात्रधर्म का अनुष्ठान कीजियेगा॥ २८॥
अक्षया तु भवेत् प्रीतिः श्वश्रूश्वशुरयोर्मम।
यदि राज्यं हि संन्यस्य भवेस्त्वं निरतो मुनिः॥ २९॥
‘राज्य त्यागकर वन में आ जाने पर यदि आप मुनिवृत्ति से ही रहें तो इससे मेरी सास और श्वशुर को अक्षय प्रसन्नता होगी॥ २९॥
धर्मादर्थः प्रभवति धर्मात् प्रभवते सुखम्।
धर्मेण लभते सर्वं धर्मसारमिदं जगत्॥३०॥
‘धर्म से अर्थ प्राप्त होता है, धर्म से सुख का उदय होता है और धर्म से ही मनुष्य सब कुछ पा लेता है। इस संसार में धर्म ही सार है॥३०॥
आत्मानं नियमैस्तैस्तैः कर्षयित्वा प्रयत्नतः।
प्राप्तये निपुणैर्धर्मो न सुखाल्लभते सुखम्॥ ३१॥
‘चतुर मनुष्य भिन्न-भिन्न वानप्रस्थोचित नियमों के द्वारा अपने शरीर को क्षीण करके यत्नपूर्वक धर्म का सम्पादन करते हैं; क्योंकि सुखदायक साधन से सुख के हेतुभूत धर्म की प्राप्ति नहीं होती है।॥ ३१॥
नित्यं शुचिमतिः सौम्य चर धर्मं तपोवने।
सर्वं तु विदितं तुभ्यं त्रैलोक्यामपि तत्त्वतः॥ ३२॥
‘सौम्य ! प्रतिदिन शुद्धचित्त होकर तपोवन में धर्म का अनुष्ठान कीजिये। त्रिलोकी में जो कुछ भी है, आपको तो वह सब कुछ यथार्थ रूप से विदित ही है॥ ३२॥
स्त्रीचापलादेतदुपाहृतं मे धर्मं च वक्तुं तव कः समर्थः।
विचार्य बुद्ध्या तु सहानुजेन यद् रोचते तत् कुरु माचिरेण ॥३३॥
‘मैंने नारीजाति की स्वाभाविक चपलता के कारण ही आपकी सेवा में ये बातें निवेदन कर दी हैं। वास्तव में आपको धर्म का उपदेश करने में कौन समर्थ है? आप इस विषय में अपने छोटे भाई के साथ बुद्धिपूर्वक विचार कर लें फिर आपको जो ठीक ऊंचे, उसे ही शीघ्रतापूर्वक करें’॥ ३३॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे नवमः सर्गः॥९॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में नवाँ सर्ग पूरा हुआ॥९॥
सर्ग-10
वाक्यमेतत् तु वैदेह्या व्याहृतं भर्तृभक्तया।
श्रुत्वा धर्मे स्थितो रामः प्रत्युवाचाथ जानकीम्॥ १॥
अपने स्वामी के प्रति भक्ति रखने वाली विदेहकुमारी सीता की कही हुई यह बात सुनकर सदा धर्म में स्थित रहने वाले श्रीरामचन्द्रजी ने जानकी को इस प्रकार उत्तर दिया
हितमुक्तं त्वया देवि स्निग्धया सदृशं वचः।
कुलं व्यपदिशन्त्या च धर्मज्ञे जनकात्मजे॥२॥
‘देवि! धर्म को जानने वाली जनककिशोरी! तुम्हारा मेरे ऊपर स्नेह है, इसलिये तुमने मेरे हित की बात कही है। क्षत्रियों के कुलधर्म का उपदेश करती हुई तुमने जो कुछ कहा है, वह तुम्हारे ही योग्य है॥२॥
किं नु वक्ष्याम्यहं देवि त्वयैवोक्तमिदं वचः।
क्षत्रियैर्धार्यते चापो नार्तशब्दो भवेदिति॥३॥
‘देवि! मैं तुम्हें क्या उत्तर दूँ, तुमने ही पहले यह बात कही है कि क्षत्रिय लोग इसलिये धनुष धारण करते हैं कि किसी को दुःखी होकर हाहाकार न करना पड़े (यदि कोई दुःख या संकटमें पड़ा हो तो उसकी रक्षा की जाय) ॥३॥
ते चार्ता दण्डकारण्ये मुनयः संशितव्रताः।
मां सीते स्वयमागम्य शरण्यं शरणं गताः॥४॥
‘सीते! दण्डकारण्य में रहकर कठोर व्रत का पालन करने वाले वे मुनि बहुत दुःखी हैं, इसीलिये मुझे शरणागतवत्सल जानकर वे स्वयं मेरे पास आये और शरणागत हुए॥४॥
वसन्तः कालकालेषु वने मूलफलाशनाः।
न लभन्ते सुखं भीरु राक्षसैः क्रूरकर्मभिः॥५॥
भक्ष्यन्ते राक्षसैीमैर्नरमांसोपजीविभिः।
‘भीरु ! सदा ही वन में रहकर फल-मूल का आहार करने वाले वे मुनि इन क्रूरकर्मा राक्षसों के कारण कभी सुख नहीं पाते हैं। मनुष्यों के मांस से जीवननिर्वाह करने वाले ये भयानक राक्षस उन्हें मारकर खा जाते हैं।
ते भक्ष्यमाणा मुनयो दण्डकारण्यवासिनः॥६॥
अस्मानभ्यवपद्येति मामूचुद्धिजसत्तमाः।
‘उन राक्षसों के ग्रास बने हुए वे दण्डकारण्यवासी द्विजश्रेष्ठ मुनि हमलोगों के पास आकर मुझसे बोले —’प्रभो! हम पर अनुग्रह कीजिये’ ॥ ६ १/२॥
मया तु वचनं श्रुत्वा तेषामेवं मुखाच्च्युतम्॥७॥
कृत्वा वचनशुश्रूषां वाक्यमेतदुदाहृतम्।
‘उनके मुख से निकली हुई इस प्रकार रक्षा की पुकार सुनकर और उनकी आज्ञा-पालनरूपी सेवा का विचार मन में लेकर मैंने उनसे यह बात कही॥ ७ १/२॥
प्रसीदन्तु भवन्तो मे हीरेषा तु ममातुला॥८॥
यदीदृशैरहं विप्रैरुपस्थेयैरुपस्थितः।
किं करोमीति च मया व्याहृतं द्विजसंनिधौ॥९॥
‘महर्षियो! आप-जैसे ब्राह्मणों की सेवा में मुझे स्वयं ही उपस्थित होना चाहिये था, परंतु आप स्वयं ही अपनी रक्षा के लिये मेरे पास आये, यह मेरे लिये अनुपम लज्जा की बात है; अतः आप प्रसन्न हों। बताइये, मैं आपलोगों की क्या सेवा करूँ?’ यह बात मैंने उन ब्राह्मणों के सामने कही॥ ८-९॥
सर्वैरेव समागम्य वागियं समुदाहृता।
राक्षसैर्दण्डकारण्ये बहुभिः कामरूपिभिः॥ १०॥
अर्दिताः स्म भृशं राम भवान् नस्तत्र रक्षतु।
‘तब उन सभी ने मिलकर अपना मनोभाव इन वचनों में प्रकट किया—’श्रीराम! दण्डकारण्य में इच्छानुसार रूप धारण करने वाले बहुत-से राक्षस रहते हैं। उनसे हमें बड़ा कष्ट पहुँच रहा है, अतः वहाँ उनके भय से आप हमारी रक्षा करें। १० १/२॥
होमकाले तु सम्प्राप्ते पर्वकालेषु चानघ ॥११॥
धर्षयन्ति सुदुर्धर्षा राक्षसाः पिशिताशनाः।
‘निष्पाप रघुनन्दन! अग्निहोत्र का समय आनेपर तथा पर्व के अवसरों पर ये अत्यन्त दुर्धर्ष मांसभोजी राक्षस हमें धर दबाते हैं। ११ १/२॥
राक्षसैर्धर्षितानां च तापसानां तपस्विनाम्॥१२॥
गतिं मृगयमाणानां भवान् नः परमा गतिः।
‘राक्षसों द्वारा आक्रान्त होने वाले हम तपस्वी तापस सदा अपने लिये कोई आश्रय ढूँढ़ते रहते हैं, अतःआप ही हमारे परम आश्रय हों॥ १२ १/२॥
कामं तपःप्रभावेण शक्ता हन्तं निशाचरान्॥ १३॥
चिरार्जितं न चेच्छामस्तपः खण्डयितुं वयम्।
बहविघ्नं तपो नित्यं दृश्चरं चैव राघव॥१४॥
‘रघुनन्दन! यद्यपि हम तपस्या के प्रभाव से इच्छानुसार इन राक्षसों का वध करने में समर्थ हैं तथापि चिरकाल से उपार्जित किये हुए तप को खण्डित करना नहीं चाहते हैं; क्योंकि तप में सदा ही बहुत-से विघ्न आते रहते हैं तथा इसका सम्पादन बहुत ही कठिन होता है। १३-१४॥
तेन शापं न मुञ्चामो भक्ष्यमाणाश्च राक्षसैः।
तदर्घमानान् रक्षोभिर्दण्डकारण्यवासिभिः॥ १५॥
रक्ष नस्त्वं सह भ्रात्रा त्वन्नाथा हि वयं वने।
‘यही कारण है कि राक्षसों के ग्रास बन जाने पर भी हम उन्हें शाप नहीं देते हैं, इसलिये दण्डकारण्यवासी निशाचरों से पीड़ित हुए हम तापसों की भाई सहित आप रक्षा करें; क्योंकि इस वन में अब आप ही हमारे रक्षक हैं’॥ १५ ॥
मया चैतद्वचः श्रुत्वा कात्स्येन परिपालनम्॥
ऋषीणां दण्डकारण्ये संश्रुतं जनकात्मजे।
‘जनकनन्दिनि! दण्डकारण्य में ऋषियों की यह बात सुनकर मैंने पूर्णरूप से उनकी रक्षा करने की प्रतिज्ञा की है॥ १६ १/२॥
संश्रुत्य च न शक्ष्यामि जीवमानः प्रतिश्रवम्॥ १७॥
मनीनामन्यथा कर्तुं सत्यमिष्टं हि मे सदा।
‘मुनियों के सामने यह प्रतिज्ञा करके अब मैं जीते जी इस प्रतिज्ञा को मिथ्या नहीं कर सकूँगा; क्योंकि सत्य का पालन मुझे सदा ही प्रिय है॥ १७ १/२ ॥
अप्यहं जीवितं जह्यां त्वां वा सीते सलक्ष्मणाम्॥ १८॥
न त प्रतिज्ञा संश्रत्य ब्राह्मणेभ्यो विशेषतः।
‘सीते! मैं अपने प्राण छोड़ सकता हूँ, तुम्हारा और लक्ष्मण का भी परित्याग कर सकता हूँ, किंतु अपनी प्रतिज्ञा को, विशेषतः ब्राह्मणों के लिये की गयी प्रतिज्ञा को मैं कदापि नहीं तोड़ सकता।। १८ १/२॥
तदवश्यं मया कार्यमृषीणां परिपालनम्॥१९॥
अनुक्तेनापि वैदेहि प्रतिज्ञाय कथं पुनः।
‘इसलिये ऋषियों की रक्षा करना मेरे लिये आवश्यक कर्तव्य है। विदेहनन्दिनि ! ऋषियों के बिना कहे ही उनकी मुझे रक्षा करनी चाहिये थी; फिर जब उन्होंने स्वयं कहा और मैंने प्रतिज्ञा भी कर ली, तब अब उनकी रक्षा से कैसे मुँह मोड़ सकता हूँ॥ १९
मम स्नेहाच्च सौहार्दादिदमुक्तं त्वया वचः॥ २०॥
परितुष्टोऽस्म्यहं सीते न ह्यनिष्टोऽनुशास्यते।।
‘सीते! तुमने स्नेह और सौहार्दवश जो मुझसे ये बातें कही हैं, इससे मैं बहुत संतुष्ट हूँ; क्योंकि जो अपना प्रिय न हो, उसे कोई हितकर उपदेश नहीं देता॥ २० १/२॥
सदृशं चानुरूपं च कुलस्य तव शोभने।
सधर्मचारिणी मे त्वं प्राणेभ्योऽपि गरीयसी॥ २१॥
‘शोभने! तुम्हारा यह कथन तुम्हारे योग्य तो है ही, तुम्हारे कुल के भी सर्वथा अनुरूप है। तुम मेरी सहधर्मिणी हो और मुझे प्राणों से भी बढ़कर प्रिय हो’।
इत्येवमुक्त्वा वचनं महात्मा सीतां प्रियां मैथिलराजपुत्रीम्।
रामो धनुष्मान् सह लक्ष्मणेन जगाम रम्याणि तपोवनानि॥२२॥
महात्मा श्रीरामचन्द्रजी अपनी प्रिया मिथिलेशकुमारी सीता से ऐसा वचन कहकर हाथ में धनुष ले लक्ष्मण के साथ रमणीय तपोवनों में विचरण करने लगे॥ २२॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे दशमः सर्गः ॥१०॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में दसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०॥
सर्ग-11
अग्रतः प्रययौ रामः सीता मध्ये सुशोभना।
पृष्ठतस्तु धनुष्पाणिर्लक्ष्मणोऽनुजगाम ह॥१॥
तदनन्तर आगे-आगे श्रीराम चले, बीच में परम सुन्दरी सीता चल रही थीं और उनके पीछे हाथ में धनुष लिये लक्ष्मण चलने लगे॥१॥
तौ पश्यमानौ विविधान् शैलप्रस्थान् वनानि च।
नदीश्च विविधा रम्या जग्मतुः सह सीतया॥२॥
सीता के साथ वे दोनों भाई भाँति-भाँति के पर्वतीय शिखरों, वनों तथा नाना प्रकार की रमणीय नदियों को देखते हुए अग्रसर होने लगे॥२॥
सारसांश्चक्रवाकांश्च नदीपुलिनचारिणः।
सरांसि च सपद्मानि युतानि जलजैः खगैः॥३॥
उन्होंने देखा, कहीं नदियों के तटों पर सारस और चक्रवाक विचर रहे हैं और कहीं खिले हुए कमलों और जलचर पक्षियों से युक्त सरोवर शोभा पाते हैं। ३॥
यूथबद्धांश्च पृषतान् मदोन्मत्तान् विषाणिनः।
महिषांश्च वराहांश्च गजांश्च द्रुमवैरिणः॥४॥
कहीं चितकबरे मृग यूथ बाँधे चले जा रहे थे, कहीं बड़े-बड़े सींगवाले मदमत्त भैंसे तथा बढ़े हुए दाँत वाले जंगली सूअर और वृक्षों के वैरी दन्तार हाथी दिखायी देते थे॥४॥
ते गत्वा दूरमध्वानं लम्बमाने दिवाकरे।
ददृशुः सहिता रम्यं तटाकं योजनायुतम्॥५॥
दूरतक यात्रा तै करने के बाद जब सूर्य अस्ताचल को जाने लगे, तब उन तीनों ने एक साथ देखा-सामने एक बड़ा ही सुन्दर तालाब है, जिसकी लम्बाई-चौड़ाई एक-एक योजन की जान पड़ती है॥५॥
पद्मपुष्करसम्बाधं गजयूथैरलंकृतम्।
सारसैहँसकादम्बैः संकुलं जलजातिभिः॥६॥
वह सरोवर लाल और श्वेत कमलों से भरा हुआ था। उसमें क्रीड़ा करते हुए झुंड-के-झुंड हाथी उसकी शोभा बढ़ाते थे तथा सारस, राजहंस और कलहंस आदि पक्षियों एवं जलमें उत्पन्न होने वाले मत्स्य आदि जन्तुओं से वह व्याप्त दिखायी देता था। ६॥
प्रसन्नसलिले रम्ये तस्मिन् सरसि शुश्रुवे।
गीतवादित्रनिर्घोषो न तु कश्चन दृश्यते॥७॥
स्वच्छ जल से भरे हुए उस रमणीय सरोवर में गाने बजाने का शब्द सुनायी देता था, किंतु कोई दिखायी नहीं दे रहा था॥७॥
ततः कौतूहलाद् रामो लक्ष्मणश्च महारथः।
मुनिं धर्मभृतं नाम प्रष्टुं समुपचक्रमे॥८॥
तब श्रीराम और महारथी लक्ष्मण ने कौतूहलवश अपने साथ आये हुए धर्मभृत् नामक मुनि से पूछना आरम्भ किया— ॥८॥
इदमत्यद्भुतं श्रुत्वा सर्वेषां नो महामुने।
कौतूहलं महज्जातं किमिदं साधु कथ्यताम्॥९॥
‘महामुने! यह अत्यन्त अद्भुत संगीत की ध्वनि सुनकर हम सब लोगों को बड़ा कौतूहल हो रहा है। यह क्या है, इसे अच्छी तरह बताइये’ ॥९॥
तेनैवमुक्तो धर्मात्मा राघवेण मुनिस्तदा।
प्रभावं सरसः क्षिप्रमाख्यातुमुपचक्रमे॥१०॥
श्रीरामचन्द्रजी के इस प्रकार पूछने पर धर्मात्मा धर्मभृत् नामक मुनि ने तुरंत ही उस सरोवर के प्रभाव का वर्णन आरम्भ किया— ॥ १० ॥
इदं पञ्चाप्सरो नाम तटाकं सार्वकालिकम्।
निर्मितं तपसा राम मुनिना माण्डकर्णिना॥११॥
‘श्रीराम! यह पञ्चाप्सर नामक सरोवर है, जो सर्वदा अगाध जल से भरा रहता है। माण्डकर्णि नामक मुनि ने अपने तप के द्वारा इसका निर्माण किया था॥११॥
स हि तेपे तपस्तीव्र माण्डकर्णिमहामुनिः।
दशवर्षसहस्राणि वायुभक्षो जलाशये॥१२॥
‘महामुनि माण्डकर्णि ने एक जलाशय में रहकर केवल वायु का आहार करते हुए दस सहस्र वर्षों तक तीव्र तपस्या की थी॥ १२॥
ततः प्रव्यथिताः सर्वे देवाः साग्निपुरोगमाः।
अब्रुवन् वचनं सर्वे परस्परसमागताः॥१३॥
‘उस समय अग्नि आदि सब देवता उनके तप से अत्यन्त व्यथित हो उठे और आपस में मिलकर वे सब-के-सब इस प्रकार कहने लगे॥ १३॥
अस्माकं कस्यचित् स्थानमेष प्रार्थयते मुनिः।
इति संविग्नमनसः सर्वे तत्र दिवौकसः॥१४॥
‘जान पड़ता है, ये मुनि हमलोगों में से किसी के स्थान को लेना चाहते हैं, ऐसा सोचकर वे सब देवता वहाँ मन-ही-मन उद्विग्न हो उठे॥१४॥
ततः कर्तुं तपोविनं सर्वदेवैर्नियोजिताः।
प्रधानाप्सरसः पञ्च विद्युच्चलितवर्चसः॥१५॥
‘तब उनकी तपस्या में विघ्न डालने के लिये सम्पूर्ण देवताओं ने पाँच प्रधान अप्सराओं को नियुक्त किया, जिनकी अङ्गकान्ति विद्युत् के समान चञ्चल थी॥ १५॥
अप्सरोभिस्ततस्ताभिर्मुनिर्दृष्टपरावरः।
नीतो मदनवश्यत्वं देवानां कार्यसिद्धये ॥१६॥
‘तदनन्तर जिन्होंने लौकिक एवं पारलौकिक धर्माधर्म का ज्ञान प्राप्त कर लिया था, उन मुनि को उन पाँच अप्सराओं ने देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिये काम के अधीन कर दिया॥१६॥
ताश्चैवाप्सरसः पञ्च मुनेः पत्नीत्वमागताः।
तटाके निर्मितं तासां तस्मिन्नन्तर्हितं गृहम्॥१७॥
‘मुनि की पत्नी बनी हुई वे ही पाँच अप्सराएँ यहाँ रहती हैं। उनके रहने के लिये इस तालाब के भीतर घर बना हुआ है, जो जल के अंदर छिपा हुआ है॥ १७ ॥
तत्रैवाप्सरसः पञ्च निवसन्त्यो यथासुखम्।
रमयन्ति तपोयोगान्मुनिं यौवनमास्थितम्॥१८॥
‘उसी घर में सुखपूर्वक रहती हुई पाँचों अप्सराएँ तपस्या के प्रभाव से युवावस्था को प्राप्त हुए मुनि को अपनी सेवाओं से संतुष्ट करती हैं।॥ १८ ॥
तासां संक्रीडमानानामेष वादित्रनिःस्वनः।
श्रूयते भूषणोन्मिश्रो गीतशब्दो मनोहरः॥१९॥
‘क्रीड़ा-विहार में लगी हुई उन अप्सराओं के ही वाद्यों की यह ध्वनि सुनायी देती है, जो भूषणों की झनकार के साथ मिली हुई है। साथ ही उनके गीत का भी मनोहर शब्द सुन पड़ता है’ ॥ १९॥
आश्चर्यमिति तस्यैतद् वचनं भावितात्मनः।
राघवः प्रतिजग्राह सह भ्रात्रा महायशाः॥२०॥
अपने भाई के साथ महायशस्वी श्रीरघुनाथजी ने उन भावितात्मा महर्षि के इस कथन को ‘यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है’ यों कहकर स्वीकार किया। २०॥
एवं कथयमानः स ददर्शाश्रममण्डलम्।
कुशचीरपरिक्षिप्तं ब्राह्मया लक्ष्या समावृतम्॥ २१॥
इस प्रकार कहते हुए श्रीरामचन्द्रजी को एक आश्रममण्डल दिखायी दिया, जहाँ सब ओर कुश और वल्कल वस्त्र फैले हुए थे। वह आश्रम ब्राह्मी लक्ष्मी (ब्रह्मतेज) से प्रकाशित होता था॥२१॥
प्रविश्य सह वैदेह्या लक्ष्मणेन च राघवः।
तदा तस्मिन् स काकुत्स्थः श्रीमत्याश्रममण्डले॥ २२॥
उषित्वा स सुखं तत्र पूज्यमानो महर्षिभिः।
विदेहनन्दिनी सीता तथा लक्ष्मण के साथ उस तेजस्वी आश्रममण्डल में प्रवेश करके ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम ने उस समय सुखपूर्वक निवास किया। वहाँ के महर्षियों ने उनका बड़ा आदरसत्कार किया॥ २२ १/२॥
जगाम चाश्रमांस्तेषां पर्यायेण तपस्विनाम्॥ २३॥
येषामुषितवान् पूर्वं सकाशे स महास्त्रवित् ।
तदनन्तर महान् अस्त्रों के ज्ञाता श्रीरामचन्द्रजी बारीबारी से उन सभी तपस्वी मुनियों के आश्रमों पर गये, जिनके यहाँ वे पहले रह चुके थे। उनके पास भी (उनकी भक्ति देख) दुबारा जाकर रहे ॥ २३ १/२॥
क्वचित् परिदशान् मासानेकसंवत्सरं क्वचित्॥ २४॥
क्वचिच्च चतुरो मासान् पञ्च षट् च परान् क्वचित्।
अपरत्राधिकान् मासानध्यर्धमधिकं क्वचित्॥ २५॥
त्रीन् मासानष्टमासांश्च राघवो न्यवसत् सुखम्।
कहीं दस महीने, कहीं साल भर, कहीं चार महीने, कहीं पाँच या छः महीने, कहीं इससे भी अधिक समय (अर्थात् सात महीने), कहीं उससे भी अधिक (आठ महीने), कहीं आधे मास अधिक अर्थात् साढ़े आठ महीने, कहीं तीन महीने और कहीं आठ और तीन अर्थात् ग्यारह महीने तक श्रीरामचन्द्रजी ने सुखपूर्वक निवास किया॥ २४-२५ १/२ ॥
तत्र संवसतस्तस्य मुनीनामाश्रमेषु वै॥ २६॥
रमतश्चानुकूल्येन ययुः संवत्सरा दश।
इस प्रकार मुनियों के आश्रमों पर रहते और अनुकूलता पाकर आनन्द का अनुभव करते हुए उनके दस वर्ष बीत गये॥ २६ १/२॥
परिसृत्य च धर्मज्ञो राघवः सह सीतया॥२७॥
सुतीक्ष्णस्याश्रमपदं पुनरेवाजगाम ह।
इस प्रकार सब ओर घूम-फिरकर धर्म के ज्ञाता भगवान् श्रीराम सीता के साथ फिर सुतीक्ष्ण के आश्रम पर ही लौट आये॥ २७ १/२॥
स तमाश्रममागम्य मुनिभिः परिपूजितः॥२८॥
तत्रापि न्यवसद् रामः किंचित् कालमरिंदमः।
शत्रुओं का दमन करने वाले श्रीराम उस आश्रम में आकर वहाँ रहने वाले मुनियों द्वारा भलीभाँति सम्मानित हो वहाँ भी कुछ कालतक रहे ॥ २८ १/२॥
अथाश्रमस्थो विनयात् कदाचित् तं महामुनिम्॥ २९॥
उपासीनः स काकुत्स्थः सुतीक्ष्णमिदमब्रवीत्।
उस आश्रम में रहते हुए श्रीराम ने एक दिन महामुनि सुतीक्ष्ण के पास बैठकर विनीतभाव से कहा- ॥ २९ १/२॥
अस्मिन्नरण्ये भगवन्नगस्त्यो मनिसत्तमः॥३०॥
वसतीति मया नित्यं कथाः कथयतां श्रुतम्।
न तु जानामि तं देशं वनस्यास्य महत्तया॥३१॥
‘भगवन् ! मैंने प्रतिदिन बातचीत करने वाले लोगों के मुँह से सुना है कि इस वन में कहीं मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यजी निवास करते हैं; किंतु इस वन की विशालता के कारण मैं उस स्थान को नहीं जानता हूँ॥ ३०-३१॥
कुत्राश्रमपदं रम्यं महर्षेस्तस्य धीमतः।
प्रसादार्थं भगवतः सानुजः सह सीतया॥३२॥
अगस्त्यमधिगच्छेयमभिवादयितुं मुनिम्।
मनोरथो महानेष हृदि सम्परिवर्तते॥३३॥
‘उन बुद्धिमान् महर्षि का सुन्दर आश्रम कहाँ है ? मैं लक्ष्मण और सीता के साथ भगवान् अगस्त्य को प्रसन्न करने के लिये उन मुनीश्वर को प्रणाम करने के उद्देश्य से उनके आश्रम पर जाऊँ—यह महान् मनोरथ मेरे हृदय में चक्कर लगा रहा है। ३२-३३॥
यदहं तं मुनिवरं शुश्रूषेयमपि स्वयम्।
इति रामस्य स मुनिः श्रुत्वा धर्मात्मनो वचः॥ ३४॥
सुतीक्ष्णः प्रत्युवाचेदं प्रीतो दशरथात्मजम्।
‘मैं चाहता हूँ कि स्वयं भी मुनिवर अगस्त्य की सेवा करूँ।’ धर्मात्मा श्रीराम का यह वचन सुनकर सुतीक्ष्ण मुनि बड़े प्रसन्न हुए और उन दशरथनन्दन से इस प्रकार बोले- ॥ ३४ १/२॥
अहमप्येतदेव त्वां वक्तुकामः सलक्ष्मणम्॥३५॥
अगस्त्यमभिगच्छेति सीतया सह राघव।
दिष्ट्या त्विदानीमर्थेऽस्मिन् स्वयमेव ब्रवीषि माम्॥३६॥
‘रघुनन्दन ! मैं भी लक्ष्मणसहित आपसे यही कहना चाहता था कि आप सीता के साथ महर्षि अगस्त्य के पास जायँ। सौभाग्य की बात है कि इस समय आप स्वयं ही मुझसे वहाँ जाने के विषय में पूछ रहे हैं। ३५-३६॥
अयमाख्यामि ते राम यत्रागस्त्यो महामुनिः।
योजनान्याश्रमात् तात याहि चत्वारि वै ततः।
दक्षिणेन महान् श्रीमानगस्त्यभ्रातुराश्रमः॥३७॥
‘श्रीराम! महामुनि अगस्त्य जहाँ रहते हैं, उस आश्रम का पता मैं अभी आपको बताये देता हूँ। तात! इस आश्रम से चार योजन दक्षिण चले जाइये। वहाँ आपको अगस्त्य के भाई का बहुत बड़ा एवं सुन्दर आश्रम मिलेगा॥ ३७॥
स्थलीप्रायवनोद्देशे पिप्पलीवनशोभिते।
बहुपुष्पफले रम्ये नानाविहगनादिते॥३८॥
पद्मिन्यो विविधास्तत्र प्रसन्नसलिलाशयाः।
हंसकारण्डवाकीर्णाश्चक्रवाकोपशोभिताः॥ ३९॥
‘वहाँ के वन की भूमि प्रायः समतल है तथा पिप्पली का वन उस आश्रम की शोभा बढ़ाता है। वहाँ फूलों और फलों की बहुतायत है। नाना प्रकार के पक्षियों के कलरवों से गूंजते हुए उस रमणीय आश्रम के पास भाँति-भाँति के कमलमण्डित सरोवर हैं, जो स्वच्छ जलसे भरे हुए हैं। हंस और कारण्डव आदि पक्षी उनमें सब ओर फैले हुए हैं तथा चक्रवाक उनकी शोभा बढ़ाते हैं॥ ३८-३९॥
तत्रैकां रजनीं व्युष्य प्रभाते राम गम्यताम्।
दक्षिणां दिशमास्थाय वनखण्डस्य पार्श्वतः॥ ४०॥
तत्रागस्त्याश्रमपदं गत्वा योजनमन्तरम्।
रमणीये वनोद्देशे बहपादपशोभिते॥४१॥
‘श्रीराम! आप एक रात उस आश्रम में ठहरकर प्रातःकाल उस वनखण्ड के किनारे दक्षिण दिशा की ओर जायें। इस प्रकार एक योजन आगे जाने पर अनेकानेक वृक्षों से सुशोभित वन के रमणीय भाग में अगस्त्य मुनि का आश्रम मिलेगा। ४०-४१॥
रंस्यते तत्र वैदेही लक्ष्मणश्च त्वया सह।
स हि रम्यो वनोद्देशो बहुपादपसंयुतः॥४२॥
‘वहाँ विदेहनन्दिनी सीता और लक्ष्मण आपके साथ सानन्द विचरण करेंगेः क्योंकि बहुसंख्यक वृक्षों से सुशोभित वह वनप्रान्त बड़ा ही रमणीय है। ४२॥
यदि बुद्धिः कृता द्रष्टुमगस्त्यं तं महामुनिम्।
अद्यैव गमने बुद्धिं रोचयस्व महामते॥४३॥
‘महामते! यदि आपने महामुनि अगस्त्य के दर्शन का निश्चित विचार कर लिया है तो आज ही वहाँ की यात्रा करने का भी निश्चय करें’। ४३॥
इति रामो मुनेः श्रुत्वा सह भ्रात्राभिवाद्य च।
प्रतस्थेऽगस्त्यमुद्दिश्य सानुगः सह सीतया॥४४॥
मुनि का यह वचन सुनकर भाईसहित श्रीरामचन्द्रजी ने उन्हें प्रणाम किया और सीता तथा लक्ष्मण के साथ अगस्त्यजी के आश्रम की ओर चल दिये॥४४॥
पश्यन् वनानि चित्राणि पर्वतांश्चाभ्रसंनिभान्।
सरांसि सरितश्चैव पथि मार्गवशानुगान्॥४५॥
मार्ग में मिले हुए विचित्र-विचित्र वनों, मेघमाला के समान पर्वतमालाओं, सरोवरों और सरिताओं को देखते हुए वे आगे बढ़ते गये॥ ४५ ॥
सुतीक्ष्णेनोपदिष्टेन गत्वा तेन पथा सुखम्।
इदं परमसंहृष्टो वाक्यं लक्ष्मणमब्रवीत्॥ ४६॥
इस प्रकार सुतीक्ष्ण के बताये हुए मार्ग से सुखपूर्वक चलते-चलते श्रीरामचन्द्रजी ने अत्यन्त हर्ष में भरकर लक्ष्मण से यह बात कही— ॥ ४६॥
एतदेवाश्रमपदं नूनं तस्य महात्मनः।
अगस्त्यस्य मुनेमा॑तुर्दृश्यते पुण्यकर्मणः॥४७॥
‘सुमित्रानन्दन! निश्चय ही यह पुण्यकर्मों का अनुष्ठान करने वाले महात्मा अगस्त्यमुनि के भाई का आश्रम दिखायी दे रहा है। ४७॥
यथा हीमे वनस्यास्य ज्ञाताः पथि सहस्रशः।
संनताः फलभारेण पुष्पभारेण च द्रमाः॥४८॥
‘क्योंकि सुतीक्ष्णजी ने जैसा बतलाया था, उसके अनुसार इस वन के मार्ग में फूलों और फलों के भार से झुके हुए सहस्रों परिचित वृक्ष शोभा पा रहे हैं॥४८॥
पिप्पलीनां च पक्वानां वनादस्मादुपागतः।
गन्धोऽयं पवनोत्क्षिप्तः सहसा कटुकोदयः॥ ४९॥
‘इस वन में पकी हुई पीपलियों की यह गन्ध वायु से प्रेरित होकर सहसा इधर आयी है, जिससे कटु रस का उदय हो रहा है।। ४९॥
तत्र तत्र च दृश्यन्ते संक्षिप्ताः काष्ठसंचयाः।
लूनाश्च परिदृश्यन्ते दर्भा वैदूर्यवर्चसः॥५०॥
‘जहाँ-तहाँ लकड़ियों के ढेर लगे दिखायी देते हैं और वैदूर्यमणि के समान रंगवाले कुश कटे हुए दृष्टिगोचर होते हैं॥५०॥
एतच्च वनमध्यस्थं कृष्णाभ्रशिखरोपमम्।
पावकस्याश्रमस्थस्य धूमाग्रं सम्प्रदृश्यते॥५१॥
‘यह देखो, जंगल के बीच में आश्रम की अग्नि का धुआँ उठता दिखायी दे रहा है, जिसका अग्रभाग काले मेघों के ऊपरी भाग-सा प्रतीत होता है॥५१॥
विविक्तेषु च तीर्थेष कृतस्नाना द्विजातयः।
पुष्पोपहारं कुर्वन्ति कुसुमैः स्वयमर्जितैः॥५२॥
‘यहाँ के एकान्त एवं पवित्र तीर्थों में स्नान करके आये हुए ब्राह्मण स्वयं चुनकर लाये हुए फूलों से देवताओं के लिये पुष्पोपहार अर्पित करते हैं। ५२॥
ततः सुतीक्ष्णवचनं यथा सौम्य मया श्रुतम्।
अगस्त्यस्याश्रमो भ्रातुनूनमेष भविष्यति॥५३॥
‘सौम्य ! मैंने सुतीक्ष्णजी का कथन जैसा सुना था, उसके अनुसार यह निश्चय ही अगस्त्यजी के भाई का आश्रम होगा॥५३॥
निगृह्य तरसा मृत्युं लोकानां हितकाम्यया।
यस्य भ्रात्रा कृतेयं दिक्शरण्या पुण्यकर्मणा॥ ५४॥
‘इन्हीं के भाई पुण्यकर्मा अगस्त्यजी ने समस्त लोकों के हित की कामना से मृत्युस्वरूप वातापि और इल्वल का वेगपूर्वक दमन करके इस दक्षिण दिशा को शरण लेने के योग्य बना दिया॥५४॥
इहैकदा किल क्रूरो वातापिरपि चेल्वलः।
भ्रातरौ सहितावास्तां ब्राह्मणघ्नौ महासुरौ॥५५॥
‘एक समय की बात है, यहाँ क्रूर स्वभाव वाला वातापि और इल्वल—ये दोनों भाई एक साथ रहते थे। ये दोनों महान् असुर ब्राह्मणों की हत्या करने वाले थे॥
धारयन् ब्राह्मणं रूपमिल्वलः संस्कृतं वदन्।
आमन्त्रयति विप्रान् स श्राद्धमुद्दिश्य निघृणः॥ ५६॥
भ्रातरं संस्कृतं कृत्वा ततस्तं मेषरूपिणम्।
तान् द्विजान् भोजयामास श्राद्धदृष्टेन कर्मणा॥ ५७॥
‘निर्दयी इल्वल ब्राह्मण का रूप धारण करके संस्कृत बोलता हुआ जाता और श्राद्ध के लिये ब्राह्मणों को निमन्त्रण दे आता था। फिर मेष (जीवशाक) का रूप धारण करने वाले अपने भाई
वातापि का संस्कार करके श्राद्धकल्पोक्त विधि से ब्राह्मणों को खिला देता था। ५६-५७॥
ततो भुक्तवतां तेषां विप्राणामिल्वलोऽब्रवीत्।
वातापे निष्क्रमस्वेति स्वरेण महता वदन्॥५८॥
वे ब्राह्मण जब भोजन कर लेते, तब इल्वल उच्च स्वर से बोलता—’वाता पे! निकलो’ ॥ ५८॥
ततो भ्रातुर्वचः श्रुत्वा वातापिर्मेषवन्नदन्।
भित्त्वा भित्त्वा शरीराणि ब्राह्मणानां विनिष्पतत्॥ ५९॥
‘भाई की बात सुनकर वातापि भेड़े के समान ‘में-में’ करता हुआ उन ब्राह्मणों के पेट फाड़-फाड़कर निकल आता था॥ ५९॥
ब्राह्मणानां सहस्राणि तैरेवं कामरूपिभिः।
विनाशितानि संहत्य नित्यशः पिशिताशनैः॥ ६०॥
‘इस प्रकार इच्छानुसार रूप धारण करने वाले उन मांसभक्षी असुरों ने प्रतिदिन मिलकर सहस्रों ब्राह्मणों का विनाश कर डाला।। ६०॥
अगस्त्येन तदा देवैः प्रार्थितेन महर्षिणा।
अनुभूय किल श्राद्धे भक्षितः स महासुरः॥६१॥
‘उस समय देवताओं की प्रार्थना से महर्षि अगस्त्य ने श्राद्ध में शाकरूपधारी उस महान् असुर को जानबूझकर भक्षण किया॥६१॥
ततः सम्पन्नमित्युक्त्वा दत्त्वा हस्तेऽवनेजनम्।
भ्रातरं निष्क्रमस्वेति चेल्वलः समभाषत॥६२॥
‘तदनन्तर श्राद्धकर्म सम्पन्न हो गया। ऐसा कहकर ब्राह्मणों के हाथ में अवनेजन का जल दे इल्वल ने भाई को सम्बोधित करके कहा, ‘निकलो’ ।। ६२ ।।
स तदा भाषमाणं तु भ्रातरं विप्रघातिनम्।
अब्रवीत् प्रहसन् धीमानगस्त्यो मुनिसत्तमः॥ ६३॥
‘इस प्रकार भाई को पुकारते हुए उस ब्राह्मणघाती असुर से बुद्धिमान् मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य ने हँसकर कहा
कुतो निष्क्रमितुं शक्तिर्मया जीर्णस्य रक्षसः।
भ्रातुस्तु मेषरूपस्य गतस्य यमसादनम्॥६४॥
‘जिस जीवशाकरूपधारी तेरे भाई राक्षस को मैंने खाकर पचा लिया, वह तो यमलोक में जा पहुँचा है। अब उसमें निकलने की शक्ति कहाँ है’ ॥ ६४॥
अथ तस्य वचः श्रुत्वा भ्रातुर्निधनसंश्रितम्।
प्रधर्षयितुमारेभे मुनिं क्रोधान्निशाचरः॥६५॥
‘भाई की मृत्यु को सूचित करने वाले मुनि के इस वचन को सुनकर उस निशाचर ने क्रोधपूर्वक उन्हें मार डालने का उद्योग आरम्भ किया॥६५॥
सोऽभ्यद्रवद् द्विजेन्द्रं तं मुनिना दीप्ततेजसा।
चक्षुषानलकल्पेन निर्दग्धो निधनं गतः॥६६॥
“उसने ज्यों ही द्विजराज अगस्त्यपर धावा किया, त्यों ही उद्दीप्त तेजवाले उन मुनि ने अपनी अग्नितुल्य दृष्टि से उस राक्षस को दग्ध कर डाला। इस प्रकार उसकी मृत्यु हो गयी॥६६॥
तस्यायमाश्रमो भ्रातुस्तटाकवनशोभितः।
विप्रानुकम्पया येन कर्मेदं दुष्करं कृतम्॥६७॥
‘ब्राह्मणों पर कृपा करके जिन्होंने यह दुष्कर कर्म किया था, उन्हीं महर्षि अगस्त्य के भाई का यह आश्रम है, जो सरोवर और वन से सुशोभित हो रहा है’। ६७॥
एवं कथयमानस्य तस्य सौमित्रिणा सह।
रामस्यास्तं गतः सूर्यः संध्याकालोऽभ्यवर्तत॥ ६८॥
श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण के साथ इस प्रकार बातचीत कर रहे थे। इतने में ही सूर्यदेव अस्त हो गये और संध्या का समय हो गया। ६८॥
उपास्य पश्चिमां संध्यां सह भ्रात्रा यथाविधि।
प्रविवेशाश्रमपदं तमृषिं चाभ्यवादयत्॥६९॥
तब भाई के साथ विधिपूर्वक सायं संध्योपासना करके श्रीराम ने आश्रम में प्रवेश किया और उन महर्षि के चरणों में मस्तक झुकाया॥ ६९॥
सम्यकप्रतिगृहीतस्तु मुनिना तेन राघवः।
न्यवसत् तां निशामेकां प्राश्य मूलफलानि च॥ ७०॥
मुनि ने उनका यथावत् आदर-सत्कार किया। सीता और लक्ष्मणसहित श्रीराम वहाँ फल-मूल खाकर एक रात उस आश्रम में रहे ॥ ७० ॥
तस्यां रात्र्यां व्यतीतायामुदिते रविमण्डले।
भ्रातरं तमगस्त्यस्य आमन्त्रयत राघवः॥७१॥
वह रात बीतने पर जब सूर्योदय हुआ, तब श्रीरामचन्द्रजी ने अगस्त्य के भाई से विदा माँगते हुए कहा- ॥ ७१॥
अभिवादये त्वां भगवन् सुखमसम्युषितो निशाम्।
आमन्त्रये त्वां गच्छामि गुरुं ते द्रष्टुमग्रजम्॥७२॥
‘भगवन् ! मैं आपके चरणों में प्रणाम करता हूँ। यहाँ रात भर बड़े सुख से रहा हूँ। अब आपके बड़े भाई मुनिवर अगस्त्य का दर्शन करने के लिये जाऊँगा। इसके लिये आपसे आज्ञा चाहता हूँ’ ॥ ७२ ।।
गम्यतामिति तेनोक्तो जगाम रघुनन्दनः।
यथोद्दिष्टेन मार्गेण वनं तच्चावलोकयन्॥७३॥
तब महर्षि ने कहा, ‘बहुत अच्छा, जाइये।’ इस प्रकार महर्षि से आज्ञा पाकर भगवान् श्रीराम सुतीक्ष्ण के बताये हुए मार्ग से वन की शोभा देखते हुए आगे चले ॥ ७३॥
नीवारान् पनसान् सालान् वञ्जुलांस्तिनिशांस्तथा।
चिरिबिल्वान् मधूकांश्च बिल्वानथ च तिन्दुकान्॥७४॥
पुष्पितान् पुष्पिताग्राभिलताभिरुपशोभितान्।
ददर्श रामः शतशस्तत्र कान्तारपादपान्॥७५ ॥
हस्तिहस्तैर्विमृदितान् वानरैरुपशोभितान्।
मत्तैः शकुनिसद्धैश्च शतशः प्रतिनादितान्॥ ७६॥
श्रीराम ने वहाँ मार्ग में नीवार (जलकदम्ब), कटहल, साखू, अशोक, तिनिश, चिरिबिल्व, महुआ, बेल, तेंद्र तथा और भी सैकड़ों जंगली वृक्ष देखे, जो फूलों से भरे थे तथा खिली हुई लताओं से परिवेष्टित हो बड़ी शोभा पा रहे थे। उनमें से कई वृक्षों को हाथियों ने अपनी सूड़ों से तोड़कर मसल डाला था और बहुत-से वृक्षों पर बैठे हुए वानर उनकी शोभा बढ़ाते थे। सैकड़ों मतवाले पक्षी उनकी डालियोंपर चहक रहे थे॥ ७४–७६॥
ततोऽब्रवीत् समीपस्थं रामो राजीवलोचनः।
पृष्ठतोऽनुगतं वीरं लक्ष्मणं लक्ष्मिवर्धनम्॥७७॥
उस समय कमलनयन श्रीराम अपने पीछे-पीछे आते हुए शोभावर्धक वीर लक्ष्मण से, जो उनके निकट ही थे, इस प्रकार बोले- ॥ ७७॥
स्निग्धपत्रा यथा वृक्षा यथा क्षान्ता मृगद्विजाः।
आश्रमो नातिदूरस्थो महर्षे वितात्मनः॥७८॥
‘यहाँ के वृक्षों के पत्ते जैसे सुने गये थे, वैसे ही चिकने दिखायी देते हैं तथा पशु और पक्षी क्षमाशील एवं शान्त हैं। इससे जान पड़ता है, उन भावितात्मा (शुद्ध अन्तःकरण वाले) महर्षि अगस्त्य का आश्रम यहाँ से अधिक दूर नहीं है॥ ७८॥
अगस्त्य इति विख्यातो लोके स्वेनैव कर्मणा।
आश्रमो दृश्यते तस्य परिश्रान्तश्रमापहः॥७९॥
‘जो अपने कर्म से ही संसार में अगस्त्य* के नाम से विख्यात हुए हैं, उन्हीं का यह आश्रम दिखायी देता है. जो थके-माँदे पथिकों की थकावट को दूर करनेवाला है।
* अगं पर्वतं स्तम्भयति इति अगस्त्यः -जो अग अर्थात् पर्वत को स्तम्भित कर दे, उसे अगस्त्य कहते हैं।
प्राज्यधूमाकुलवनश्चीरमालापरिष्कृतः।
प्रशान्तमृगयूथश्च नानाशकुनिनादितः॥८०॥
‘इस आश्रम के वन यज्ञ-यागसम्बन्धी अधिक धूमों से व्याप्त हैं। चीरवस्त्रों की पंक्तियाँ इसकी शोभा बढ़ाती हैं। यहाँ के मृगों के झुंड सदा शान्त रहते हैं तथा इस आश्रम में नाना प्रकार के पक्षियों के कलरव गूंजते रहते हैं। ८० ॥
निगृह्य तरसा मृत्युं लोकानां हितकाम्यया।
दक्षिणा दिक् कृता येन शरण्या पुण्यकर्मणा॥ ८१॥
तस्येदमाश्रमपदं प्रभावाद् यस्य राक्षसैः।
दिगियं दक्षिणा त्रासाद् दृश्यते नोपभुज्यते॥ ८२॥
‘जिन पुण्यकर्मा महर्षि अगस्त्य ने समस्त लोकों की हितकामना से मृत्युस्वरूप राक्षसों का वेगपूर्वक दमन करके इस दक्षिण दिशा को शरण लेने के योग्य बना दिया तथा जिनके प्रभाव से राक्षस इस दक्षिण दिशा को केवल दूर से भयभीत होकर देखते हैं, इसका उपभोग भी नहीं करते, उन्हीं का यह आश्रम है। ८१-८२॥
यदाप्रभृति चाक्रान्ता दिगियं पुण्यकर्मणा।
तदाप्रभृति निर्वैराः प्रशान्ता रजनीचराः॥८३॥
‘पुण्यकर्मा महर्षि अगस्त्य ने जब से इस दिशा में पदार्पण किया है, तब से यहाँ के निशाचर वैररहित और शान्त हो गये हैं। ८३॥
नाम्ना चेयं भगवतो दक्षिणा दिक्प्रदक्षिणा।
प्रथिता त्रिषु लोकेषु दुर्धर्षा क्रूरकर्मभिः॥८४॥
‘भगवान् अगस्त्य की महिमा से इस आश्रम के आस-पास निर्वैरता आदि गुणों के सम्पादन में समर्थ तथा क्रूरकर्मा राक्षसों के लिये दुर्जय होने के कारण यह सम्पूर्ण दिशा नाम से भी तीनों लोकों में ‘दक्षिणा’ ही कहलायी, इसी नाम से विख्यात हुई तथा इसे ‘अगस्त्य की दिशा’ भी कहते हैं। ८४ ॥
मार्ग निरोधैं सततं भास्करस्याचलोत्तमः।
संदेशं पालयस्तस्य विन्ध्यशैलो न वर्धते॥८५॥
‘एक बार पर्वतश्रेष्ठ विन्ध्य सूर्य का मार्ग रोकने के लिये बढ़ा था, किंतु महर्षि अगस्त्य के कहने से वह नम्र हो गया। तब से आज तक निरन्तर उनके आदेश का पालन करता हुआ वह कभी नहीं बढ़ता॥ ८५॥
अयं दीर्घायुषस्तस्य लोके विश्रुतकर्मणः।
अगस्त्यस्याश्रमः श्रीमान् विनीतमृगसेवितः॥ ८६॥
‘वे दीर्घायु महात्मा हैं। उनका कर्म (समुद्रशोषण आदि कार्य) तीनों लोकों में विख्यात है। उन्हीं अगस्त्य का यह शोभासम्पन्न आश्रम है, जो विनीत मृगों से सेवित है।
एष लोकार्चितः साधुर्हिते नित्यं रतः सताम्।
अस्मानधिगतानेष श्रेयसा योजयिष्यति॥८७॥
‘ये महात्मा अगस्त्यजी सम्पूर्ण लोकों के द्वारा पूजित तथा सदा सज्जनों के हित में लगे रहने वाले हैं। अपने पास आये हुए हमलोगों को वे अपने आशीर्वाद से कल्याण के भागी बनायेंगे॥ ८७॥
आराधयिष्याम्यत्राहमगस्त्यं तं महामुनिम्।
शेषं च वनवासस्य सौम्य वत्स्याम्यहं प्रभो॥
‘सेवा करने में समर्थ सौम्य लक्ष्मण ! यहाँ रहकर मैं उन महामुनि अगस्त्य की आराधना करूँगा और वनवास के शेष दिन यहीं रहकर बिताऊँगा। ८८॥
अत्र देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः।
अगस्त्यं नियताहाराः सततं पर्युपासते॥८९॥
‘देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षि यहाँ नियमित आहार करते हुए सदा अगस्त्य मुनि की उपासना करते हैं। ८९॥
नात्र जीवेन्मृषावादी क्रूरो वा यदि वा शठः।
नृशंसः पापवृत्तो वा मुनिरेष तथाविधः॥९०॥
‘ये ऐसे प्रभावशाली मुनि हैं कि इनके आश्रम में कोई झूठ बोलने वाला, क्रूर, शठ, नृशंस अथवा पापाचारी मनुष्य जीवित नहीं रह सकता॥९० ॥
अत्र देवाश्च यक्षाश्च नागाश्च पतगैः सह।
वसन्ति नियताहारा धर्ममाराधयिष्णवः॥ ९१॥
‘यहाँ धर्म की आराधना करने के लिये देवता, यक्ष, नाग और पक्षी नियमित आहार करते हुए निवास करते हैं ॥ ९१॥
अत्र सिद्धा महात्मानो विमानैः सूर्यसंनिभैः।
त्यक्त्वा देहान् नवैर्दैहैः स्वर्याताः परमर्षयः॥ ९२॥
‘इस आश्रम पर अपने शरीरों को त्यागकर अनेकानेक सिद्ध, महात्मा, महर्षि नूतन शरीरों के साथ सूर्यतुल्यतेजस्वी विमानों द्वारा स्वर्गलोक को प्राप्त हुए हैं। ९२॥
यक्षत्वममरत्वं च राज्यानि विविधानि च।
अत्र देवाः प्रयच्छन्ति भूतैराराधिताः शुभैः॥ ९३॥
‘यहाँ सत्कर्मपरायण प्राणियों द्वारा आराधित हुए देवता उन्हें यक्षत्व, अमरत्व तथा नाना प्रकार के राज्य प्रदान करते हैं॥९३॥
आगताः स्माश्रमपदं सौमित्रे प्रविशाग्रतः।
निवेदयेह मां प्राप्तमृषये सह सीतया॥९४॥
‘सुमित्रानन्दन ! अब हमलोग आश्रम पर आ पहुँचे। तुम पहले प्रवेश करो और महर्षियों को सीता के साथ मेरे आगमन की सूचना दो’ ॥ ९४ ॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे एकादशः सर्गः ॥११॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में ग्यारहवाँ सर्ग पूरा हुआ।११॥
सर्ग-12
स प्रविश्याश्रमपदं लक्ष्मणो राघवानुजः।
अगस्त्यशिष्यमासाद्य वाक्यमेतदुवाच ह॥१॥
श्रीरामचन्द्रजी के छोटे भाई लक्ष्मण ने आश्रम प्रवेश करके अगस्त्यजी के शिष्य से भेंट की और उनसे यह बात कही— ॥१॥
राजा दशरथो नाम ज्येष्ठस्तस्य सुतो बली।
रामः प्राप्तो मुनिं द्रष्टं भार्यया सह सीतया॥२॥
‘मुने! अयोध्या में जो दशरथ नाम से प्रसिद्ध राजा थे, उन्हीं के ज्येष्ठ पुत्र महाबली श्रीरामचन्द्रजी अपनी पत्नी सीता के साथ महर्षिका दर्शन करने के लिये आये हैं॥
लक्ष्मणो नाम तस्याहं भ्राता त्ववरजो हितः।
अनुकूलश्च भक्तश्च यदि ते श्रोत्रमागतः॥३॥
‘मैं उनका छोटा भाई, हितैषी और अनुकूल चलने वाला भक्त हूँ। मेरा नाम लक्ष्मण है। सम्भव है यह नाम कभी आपके कानों में पड़ा हो ॥३॥
ते वयं वनमत्युग्रं प्रविष्टाः पितृशासनात्।
द्रष्टुमिच्छामहे सर्वे भगवन्तं निवेद्यताम्॥४॥
‘हम सब लोग पिता की आज्ञा से इस अत्यन्त भयंकर वन में आये हैं और भगवान् अगस्त्य मुनि का दर्शन करना चाहते हैं। आप उनसे यह समाचार निवेदन कीजिये’॥ ४॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा लक्ष्मणस्य तपोधनः।
तथेत्युक्त्वाग्निशरणं प्रविवेश निवेदितुम्॥५॥
लक्ष्मण की वह बात सुनकर उन तपोधन ने ‘बहुत अच्छा’ कहकर महिर्ष को समाचार देने के लिये अग्निशाला में प्रवेश किया॥५॥
स प्रविश्य मुनिश्रेष्ठं तपसा दुष्प्रधर्षणम्।
कृताञ्जलिरुवाचेदं रामागमनमञ्जसा॥६॥
यथोक्तं लक्ष्मणेनैव शिष्योऽगस्त्यस्य सम्मतः।
अग्निशाला में प्रवेश करके अगस्त्य के उस प्रिय शिष्य ने जो अपनी तपस्या के प्रभाव से दूसरों के लिये दुर्जय थे, उन मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य के पास जा हाथ जोड़लक्ष्मण के कथनानुसार उन्हें श्रीरामचन्द्रजी के आगमन का समाचार शीघ्रतापूर्वक यों सुनाया— ॥ ६ १/२॥
पुत्रौ दशरथस्येमौ रामो लक्ष्मण एव च॥७॥
प्रविष्टावाश्रमपदं सीतया सह भार्यया।
द्रष्टुं भवन्तमायातौ शुश्रूषार्थमरिंदमौ॥८॥
यदत्रानन्तरं तत् त्वमाज्ञापयितुमर्हसि।
‘महामुने! राजा दशरथ के ये दो पुत्र श्रीराम और लक्ष्मण आश्रम में पधारे हैं। श्रीराम अपनी धर्मपत्नी सीता के साथ हैं। वे दोनों शत्रुदमन वीर आपकी सेवा के उद्देश्यसे आपका दर्शन करने के लिये आये हैं। अब इस विषय में जो कुछ कहना या करना हो, इसके लिये आप मुझे आज्ञा दें’। ७-८ १/२॥
ततः शिष्यादुपश्रुत्य प्राप्तं रामं सलक्ष्मणम्॥९॥
वैदेहीं च महाभागामिदं वचनमब्रवीत्।
शिष्य से लक्ष्मणसहित श्रीराम और महाभागा विदेहनन्दिनी सीता के शुभागमन का समाचार सुनकर महर्षि ने इस प्रकार कहा- ॥ ९ १/२ ।।
दिष्ट्या रामश्चिरस्याद्य द्रष्टुं मां समुपागतः ॥१०॥
मनसा कांक्षितं ह्यस्य मयाप्यागमनं प्रति।
गम्यतां सत्कृतो रामः सभार्यः सहलक्ष्मणः॥
प्रवेश्यतां समीपं मे किमसौ न प्रवेशितः।
‘सौभाग्य की बात है कि आज चिरकाल के बाद श्रीरामचन्द्रजी स्वयं ही मझसे मिलने के लिये आ गये। मेरे मन में भी बहुत दिनों से यह अभिलाषा थी कि वे एक बार मेरे आश्रम पर पधारते जाओ, पत्नीसहित श्रीराम और लक्ष्मण को सत्कारपूर्वक आश्रम के भीतर मेरे समीप ले आओ। तुम अब तक उन्हें ले क्यों नहीं आये?’॥
एवमुक्तस्तु मुनिना धर्मज्ञेन महात्मना॥१२॥
अभिवाद्याब्रवीच्छिष्यस्तथेति नियताञ्जलिः।
धर्मज्ञ महात्मा अगस्त्य मुनि के ऐसा कहने पर शिष्य ने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया और कहा —’बहुत अच्छा अभी ले आता हूँ’॥ १२ १/२॥
तदा निष्क्रम्य सम्भ्रान्तः शिष्यो लक्ष्मणमब्रवीत्॥ १३॥
कोऽसौ रामो मुनिं द्रष्टमेतु प्रविशतु स्वयम्।
इसके बाद वह शिष्य आश्रम से निकलकर शीघ्रतापूर्वक लक्ष्मण के पास गया और बोला’श्रीरामचन्द्रजी कौन हैं? वे स्वयं आश्रम में प्रवेश करें और मुनि का दर्शन करने के लिये चलें’॥ १३ १/२॥ ततो
गत्वाऽऽश्रमपदं शिष्येण सह लक्ष्मणः॥ १४॥
दर्शयामास काकुत्स्थं सीतां च जनकात्मजाम्।
तब लक्ष्मण ने शिष्य के साथ आश्रम के द्वार पर जाकर उसे श्रीरामचन्द्रजी तथा जनककिशोरी श्रीसीता का दर्शन कराया॥ १४ १/२॥
तं शिष्यः प्रश्रितं वाक्यमगस्त्यवचनं ब्रुवन्॥ १५॥
प्रावेशयद् यथान्यायं सत्कारार्ह सुसत्कृतम्।
शिष्य ने बड़ी विनय के साथ महर्षि अगस्त्य की कही हुई बात वहाँ दुहरायी और जो सत्कार के योग्य थे, उन श्रीराम का यथोचित रीति से भलीभाँति सत्कार करके वह उन्हें आश्रम में ले गया॥ १५ १/२॥
प्रविवेश ततो रामः सीतया सह लक्ष्मणः॥१६॥
प्रशान्तहरिणाकीर्णमाश्रमं ावलोकयन्।
स तत्र ब्रह्मणः स्थानमग्नेः स्थानं तथैव च॥ १७॥
उस समय श्रीराम ने लक्ष्मण और सीता के साथ आश्रम में प्रवेश किया। वह आश्रम शान्तभाव से रहने वाले हरिणों से भरा हुआ था। आश्रम की शोभा देखते हुए उन्होंने वहाँ ब्रह्माजी का स्थान और अग्निदेव का स्थान देखा॥ १६-१७॥
विष्णोः स्थानं महेन्द्रस्य स्थानं चैव विवस्वतः।
सोमस्थानं भगस्थानं स्थानं कौबेरमेव च ॥१८॥
धातुर्विधातुः स्थानं च वायोः स्थानं तथैव च।
स्थानं च पाशहस्तस्य वरुणस्य महात्मनः॥१९॥
स्थानं तथैव गायत्र्या वसूनां स्थानमेव च।
स्थानं च नागराजस्य गरुडस्थानमेव च ॥२०॥
कार्तिकेयस्य च स्थानं धर्मस्थानं च पश्यति।
फिर क्रमशः भगवान् विष्णु, महेन्द्र, सूर्य, चन्द्रमा, भग, कुबेर, धाता, विधाता, वायु, पाशधारी महात्मा वरुण, गायत्री, वसु, नागराज अनन्त, गरुड़, कार्तिकेय तथा धर्मराज के पृथक्-पृथक् स्थान का निरीक्षण किया॥ १८-२० १/२॥
ततः शिष्यैः परिवृतो मुनिरप्यभिनिष्पतत्॥२१॥
तं ददर्शाग्रतो रामो मुनीनां दीप्ततेजसाम्।
अब्रवीद् वचनं वीरो लक्ष्मणं लक्ष्मिवर्धनम्॥ २२॥
इतने ही में मुनिवर अगस्त्य भी शिष्यों से घिरे हुए अग्निशाला से बाहर निकले। वीर श्रीराम ने मुनियों के आगे-आगे आते हुए उद्दीप्त तेजस्वी अगस्त्यजी का दर्शन किया और अपनी शोभा का विस्तार करने वाले लक्ष्मण से इस प्रकार कहा- ॥ २१-२२॥
बहिर्लक्ष्मण निष्क्रामत्यगस्त्यो भगवानृषिः।
औदार्येणावगच्छामि निधानं तपसामिमम्॥२३॥
‘लक्ष्मण! भगवान् अगस्त्य मुनि आश्रम से बाहर निकल रहे हैं। ये तपस्या के निधि हैं। इनके विशिष्ट तेज के आधिक्य से ही मुझे पता चलता है कि ये अगस्त्यजी हैं’ ॥ २३॥
एवमुक्त्वा महाबाहुरगस्त्यं सूर्यवर्चसम्।
जग्राहापततस्तस्य पादौ च रघुनन्दनः॥२४॥
सूर्यतुल्य तेजस्वी महर्षि अगस्त्य के विषय में ऐसा कहकर महाबाहु रघुनन्दन ने सामने से आते हुए उन मुनीश्वर के दोनों चरण पकड़ लिये॥ २४॥
अभिवाद्य तु धर्मात्मा तस्थौ रामः कृताञ्जलिः।
सीतया सह वैदेह्या तदा रामः सलक्ष्मणः॥२५॥
जिनमें योगियों का मन रमण करता है अथवा जो भक्तों को आनन्द प्रदान करने वाले हैं, वे धर्मात्मा श्रीराम उस समय विदेहकुमारी सीता और लक्ष्मण के साथ महर्षि के चरणों में प्रणाम करके हाथ जोड़कर खडे हो गये॥ २५॥
प्रतिगृह्य च काकुत्स्थमर्चयित्वाऽऽसनोदकैः।
कुशलप्रश्नमुक्त्वा च आस्यतामिति सोऽब्रवीत्॥ २६॥
महर्षि ने भगवान् श्रीराम को हृदय से लगाया और आसन तथा जल (पाद्य, अर्घ्य आदि) देकर उनका आतिथ्य-सत्कार किया। फिर कुशल-समाचार पूछकर उन्हें बैठने को कहा॥ २६॥
अग्निं हुत्वा प्रदायार्घ्यमतिथीन् प्रतिपूज्य च।
वानप्रस्थेन धर्मेण स तेषां भोजनं ददौ ॥ २७॥
अगस्त्यजी ने पहले अग्नि में आहुति दी, फिर वानप्रस्थधर्म के अनुसार अर्घ्य दे अतिथियों का भलीभाँति पूजन करके उनके लिये भोजन दिया। २७॥
प्रथमं चोपविश्याथ धर्मज्ञो मुनिपुंगवः।
उवाच राममासीनं प्राञ्जलिं धर्मकोविदम्॥२८॥
अग्निं हुत्वा प्रदायार्घ्यमतिथिं प्रतिपूजयेत्।
अन्यथा खलु काकुत्स्थ तपस्वी समुदाचरन्।
दुःसाक्षीव परे लोके स्वानि मांसानि भक्षयेत्॥ २९॥
धर्म के ज्ञाता मुनिवर अगस्त्यजी पहले स्वयं बैठे, फिर धर्मज्ञ श्रीरामचन्द्रजी हाथ जोड़कर आसन पर विराजमान हुए। इसके बाद महर्षि ने उनसे कहा —’काकुत्स्थ! वानप्रस्थ को चाहिये कि वह पहले अग्नि को आहुति दे। तदनन्तर अर्घ्य देकर अतिथि का पूजन करे। जो तपस्वी इसके विपरीत आचरण करता है, उसे झूठी गवाही देने वाले की भाँति परलोक में अपने ही शरीर का मांस खाना पड़ता है॥ २८-२९॥
राजा सर्वस्य लोकस्य धर्मचारी महारथः।
पूजनीयश्च मान्यश्च भवान् प्राप्तः प्रियातिथिः॥ ३०॥
‘आप सम्पूर्ण लोक के राजा, महारथी और धर्म का आचरण करने वाले हैं तथा मेरे प्रिय अतिथि के रूप में इस आश्रम पर पधारे हैं, अतएव आप हमलोगों के माननीय एवं पूजनीय हैं’॥ ३०॥
एवमुक्त्वा फलैर्मूलैः पुष्पैश्चान्यैश्च राघवम्।
पूजयित्वा यथाकामं ततोऽगस्त्यस्तमब्रवीत्॥ ३१॥
ऐसा कहकर महर्षि अगस्त्य ने फल, मूल, फूल तथा अन्य उपकरणों से इच्छानुसार भगवान् श्रीराम का पूजन किया। तत्पश्चात् अगस्त्यजी उनसे इस प्रकार बोले- ॥ ३१॥
इदं दिव्यं महच्चापं हेमवज्रविभूषितम्।
वैष्णवं पुरुषव्याघ्र निर्मितं विश्वकर्मणा॥३२॥
अमोघः सूर्यसंकाशो ब्रह्मदत्तः शरोत्तमः।
दत्तौ मम महेन्द्रेण तूणी चाक्षय्यसायकौ ॥३३॥
सम्पूर्णौ निशितैर्बाणैर्व्वलद्भिरिव पावकैः।
महाराजतकोशोऽयमसिर्हेमविभूषितः॥ ३४॥
‘पुरुषसिंह ! यह महान् दिव्य धनुष विश्वकर्माजी ने बनाया है। इसमें सुवर्ण और हीरे जड़े हैं। यह भगवान् विष्णु का दिया हुआ है तथा यह जो सूर्य के समान देदीप्यमान अमोघ उत्तम बाण है, ब्रह्माजी का दिया हुआ है। इनके सिवा इन्द्र ने ये दो तरकस दिये हैं, जो तीखे तथा प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी बाणों से सदा भरे रहते हैं। कभी खाली नहीं होते। साथ ही यह तलवार भी है जिसकी मूठ में सोना जड़ा हुआ है। इसकी म्यान भी सोने की ही बनी हुई है। ३२-३४॥
अनेन धनुषा राम हत्वा संख्ये महासुरान्।
आजहार श्रियं दीप्तां पुरा विष्णुर्दिवौकसाम्॥३५॥
तद्धनुस्तौ च तूणी च शरं खड्गं च मानद।
जयाय प्रतिगृह्णीष्व वज्र वज्रधरो यथा॥ ३६॥
‘श्रीराम! पूर्वकाल में भगवान् विष्णु ने इसी धनुष से युद्ध में बड़े-बड़े असुरों का संहार करके देवताओं की उद्दीप्त लक्ष्मी को उनके अधिकार से लौटाया था। मानद! आप यह धनुष, ये दोनों तरकस, ये बाण और यह तलवार (राक्षसों पर) विजय पाने के लिये ग्रहण कीजिये। ठीक उसी तरह, जैसे वज्रधारी इन्द्र वज्र ग्रहण करते हैं’।। ३५-३६॥
एवमुक्त्वा महातेजाः समस्तं तद्ररायुधम्।
दत्त्वा रामाय भगवानगस्त्यः पुनरब्रवीत्॥३७॥
ऐसा कहकर महान् तेजस्वी अगस्त्य ने वे सभी श्रेष्ठ आयुध श्रीरामचन्द्रजी को सौंप दिये। तत्पश्चात् वे फिर बोले॥३७॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे द्वादशः सर्गः॥१२॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में बारहवाँ सर्ग पूरा हुआ।१२॥
सर्ग-13
राम प्रीतोऽस्मि भद्रं ते परितुष्टोऽस्मि लक्ष्मण।
अभिवादयितुं यन्मां प्राप्तौ स्थः सह सीतया॥ १॥
‘श्रीराम! आपका कल्याण हो। मैं आप पर बहुत प्रसन्न हूँ। लक्ष्मण ! मैं तुम पर भी बहुत संतुष्ट हूँ।आप दोनों भाई मुझे प्रणाम करने के लिये जो सीता के साथ यहाँ तक आये, इससे मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है॥१॥
अध्वश्रमेण वां खेदो बाधते प्रचुरश्रमः।
व्यक्तमुत्कण्ठते वापि मैथिली जनकात्मजा॥२॥
‘रास्ता चलने के परिश्रम से आपलोगों को बहुत थकावट हुई है। इसके कारण जो कष्ट हुआ है, वह आप दोनों को पीड़ा दे रहा होगा। मिथिलेशकुमारी जानकी भी अपनी थकावट दूर करने के लिये अधिक उत्कण्ठित है, यह बात स्पष्ट ही जान पड़ती है ॥२॥
एषा च सुकुमारी च खेदैश्च न विमानिता।
प्राज्यदोषं वनं प्राप्ता भर्तृस्नेहप्रचोदिता॥३॥
‘यह सुकुमारी है और इससे पहले इसे ऐसे दुःखों का सामना नहीं करना पड़ा है। वन में अनेक प्रकार के कष्ट होते हैं, फिर भी यह पतिप्रेम से प्रेरित होकर यहाँ आयी है॥३॥
यथैषा रमते राम इह सीता तथा कुरु।
दुष्करं कृतवत्येषा वने त्वामभिगच्छती॥४॥
‘श्रीराम! जिस प्रकार सीता का यहाँ मन लगे जैसे भी यह प्रसन्न रहे, वही कार्य आप करें। वन में आपके साथ आकर इसने दुष्कर कार्य किया है। ४॥
एषा हि प्रकृतिः स्त्रीणामासृष्टे रघुनन्दन।
समस्थमनुरज्यन्ते विषमस्थं त्यजन्ति च॥५॥
‘रघुनन्दन ! सृष्टिकाल से लेकर अबतक स्त्रियों का प्रायः यही स्वभाव रहता आया है कि यदि पति सम अवस्था में है अर्थात् धनधान्य से सम्पन्न, स्वस्थ एवं सुखी है, तब तो वे उसमें अनुराग रखती हैं, परंतु यदि वह विषम अवस्था में पड़ जाता है—दरिद्र एवं रोगी हो जाता है, तब उसे त्याग देती हैं॥ ५ ॥
शतहदानां लोलत्वं शस्त्राणां तीक्ष्णतां तथा।
गरुडानिलयोः शैघ्रयमनुगच्छन्ति योषितः॥६॥
‘स्त्रियाँ विद्युत् की चपलता, शस्त्रों की तीक्ष्णता तथा गरुड एवं वायु की तीव्र गति का अनुसरण करती
इयं तु भवतो भार्या दोषैरेतैर्विवर्जिता।
श्लाघ्या च व्यपदेश्या च यथा देवीष्वरुन्धती॥ ७॥
‘आपकी यह धर्मपत्नी सीता इन सब दोषों से रहित है। स्पृहणीय एवं पतिव्रताओं में उसी तरह अग्रगण्य है, जैसे देवियों में अरुन्धती॥ ७॥
अलंकृतोऽयं देशश्च यत्र सौमित्रिणा सह।
वैदेह्या चानया राम वत्स्यसि त्वमरिंदम॥८॥
‘शत्रुदमन श्रीराम! आज से इस देश की शोभा बढ़ गयी, जहाँ सुमित्राकुमार लक्ष्मण और विदेहनन्दिनी सीता के साथ आप निवास करेंगे’॥ ८॥
एवमुक्तस्तु मुनिना राघवः संयताञ्जलिः।
उवाच प्रश्रितं वाक्यमृषिं दीप्तमिवानलम्॥९॥
मुनि के ऐसा कहने पर श्रीरामचन्द्रजी ने प्रज्वलितअग्नि के समान तेजस्वी उन महर्षि से दोनों हाथ जोड़कर यह विनययुक्त बात कही— ॥९॥
धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यस्य मे मुनिपुंगवः।
गुणैः सभ्रातृभार्यस्य गुरुर्नः परितुष्यति॥१०॥
‘भाई और पत्नीसहित जिसके अर्थात् मेरे गुणों से हमारे गुरुदेव मुनिवर अगस्त्यजी यदि संतुष्ट हो रहे हैं, तब तो मैं धन्य हूँ, मुझपर मुनीश्वर का महान् अनुग्रह है।
किं तु व्यादिश मे देशं सोदकं बहुकाननम्।
यत्राश्रमपदं कृत्वा वसेयं निरतः सुखम्॥११॥
‘परंतु मुने! अब आप मुझे ऐसा कोई स्थान बताइये जहाँ बहुत-से वन हों, जल की भी सुविधा हो तथा जहाँ आश्रम बनाकर मैं सुखपूर्वक सानन्द निवास कर सकूँ’ ।। ११॥
ततोऽब्रवीन्मुनिश्रेष्ठः श्रुत्वा रामस्य भाषितम्।
ध्यात्वा मुहूर्तं धर्मात्मा ततोवाच वचः शुभम्॥ १२॥
श्रीराम का यह कथन सुनकर मुनिश्रेष्ठ धर्मात्मा अगस्त्य ने दो घड़ी तक कुछ सोच-विचार किया। तदनन्तर वे यह शुभ वचन बोले- ॥ १२॥
इतो द्वियोजने तात बहुमूलफलोदकः।
देशो बहुमृगः श्रीमान् पञ्चवट्यभिविश्रुतः॥ १३॥
‘तात! यहाँ से दो योजन की दूरी पर पञ्चवटी नाम से विख्यात एक बहुत ही सुन्दर स्थान है, जहाँ बहुत-से मृग रहते हैं तथा फल-मूल और जल की अधिक सुविधा है॥
तत्र गत्वाऽऽश्रमपदं कृत्वा सौमित्रिणा सह।
रमस्व त्वं पितुर्वाक्यं यथोक्तमनुपालयन्॥१४॥
‘वहीं जाकर लक्ष्मण के साथ आप आश्रम बनाइये और पिता की यथोक्त आज्ञा का पालन करते हुए वहाँ सुखपूर्वक निवास कीजिये॥१४॥
विदितो ह्येष वृत्तान्तो मम सर्वस्तवानघ।
तपसश्च प्रभावेण स्नेहाद् दशरथस्य च॥१५॥
‘अनघ! आपका और राजा दशरथ का यह सारा वृत्तान्त मुझे अपनी तपस्या के प्रभाव से तथा आपके प्रति स्नेह होने के कारण अच्छी तरह विदित है॥ १५॥
हृदयस्थं च ते च्छन्दो विज्ञातं तपसा मया।
इह वासं प्रतिज्ञाय मया सह तपोवने ॥१६॥
‘आपने तपोवन में मेरे साथ रहने की और वनवास का शेष समय यहीं बिताने की अभिलाषा प्रकट करके भी जो यहाँ से अन्यत्र रहने योग्य स्थान के विषय में मुझसे पूछा है, इसमें आपका हार्दिक अभिप्राय क्या है ? यह मैंने अपने तपोबल से जान लिया है (आपने ऋषियों की रक्षा के लिये राक्षसों के वध की प्रतिज्ञा की है। इस प्रतिज्ञा का निर्वाह अन्यत्रा रहने से ही हो सकता है; क्योंकि यहाँ राक्षसों का आना-जाना नहीं होता) ॥ १६ ॥
अतश्च त्वामहं ब्रूमि गच्छ पञ्चवटीमिति।
स हि रम्यो वनोद्देशो मैथिली तत्र रंस्यते॥१७॥
‘इसीलिये मैं आपसे कहता हूँ कि पञ्चवटी में जाइये। वहाँ की वनस्थली बड़ी ही रमणीय है। वहाँ मिथिलेशकुमारी सीता आनन्दपूर्वक सब ओर विचरेंगी॥
स देशः श्लाघनीयश्च नातिदूरे च राघव।
गोदावर्याः समीपे च मैथिली तत्र रंस्यते॥१८॥
‘रघुनन्दन ! वह स्पृहणीय स्थान यहाँ से अधिक दूर नहीं है। गोदावरी के पास (उसी के तट पर) है, अतः मैथिली का मन वहाँ खूब लगेगा॥ १८॥
प्राज्यमूलफलैश्चैव नानाद्विजगणैर्युतः।
विविक्तश्च महाबाहो पुण्यो रम्यस्तथैव च॥ १९॥
‘महाबाहो! वह स्थान प्रचुर फल-मूलों से सम्पन्न, भाँति-भाँति के विहङ्गमों से सेवित, एकान्त, पवित्र और रमणीय है॥ १९॥
भवानपि सदाचारः शक्तश्च परिरक्षणे।
अपि चात्र वसन् राम तापसान् पालयिष्यसि॥ २०॥
‘श्रीराम! आप भी सदाचारी और ऋषियों की रक्षा करने में समर्थ हैं। अतः वहाँ रहकर तपस्वी मुनियों का पालन कीजियेगा॥ २० ॥
एतदालक्ष्यते वीर मधूकानां महावनम्।
उत्तरेणास्य गन्तव्यं न्यग्रोधमपि गच्छता ॥२१॥
ततः स्थलमुपारुह्य पर्वतस्याविदूरतः।
ख्यातः पञ्चवटीत्येव नित्यपुष्पितकाननः॥२२॥
‘वीर! यह जो महुओं का विशाल वन दिखायी देता है, इसके उत्तर से होकर जाना चाहिये। उस मार्ग से जाते हुए आपको आगे एक बरगद का वृक्ष मिलेगा।उससे आगे कुछ दूर तक ऊँचा मैदान है, उसे पार करने के बाद एक पर्वत दिखायी देगा। उस पर्वत से थोड़ी ही दूर पर पञ्चवटी नाम से प्रसिद्ध सुन्दर वन है, जो सदा फूलों से सुशोभित रहता है’ ।। २१-२२ ॥
अगस्त्येनैवमुक्तस्तु रामः सौमित्रिणा सह।
सत्कृत्यामन्त्रयामास तमृषि सत्यवादिनम्॥२३॥
महर्षि अगस्त्य के ऐसा कहने पर लक्ष्मणसहित श्रीराम ने उनका सत्कार करके उन सत्यवादी महर्षि से वहाँ जाने की आज्ञा माँगी॥ २३॥
तौ तु तेनाभ्यनुज्ञातौ कृतपादाभिवन्दनौ।
तमाश्रमं पञ्चवटी जग्मतुः सह सीतया॥२४॥
उनकी आज्ञा पाकर उन दोनों भाइयों ने उनके चरणों की वन्दना की और सीता के साथ वे पञ्चवटी नामक आश्रम की ओर चले॥ २४॥
गृहीतचापौ तु नराधिपात्मजौ विषक्ततूणी समरेष्वकातरौ।।
यथोपदिष्टेन पथा महर्षिणा प्रजग्मतुः पञ्चवटीं समाहितौ॥२५॥
राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण ने पीठ पर तरकस बाँध हाथ में धनुष ले लिये। वे दोनों भाई समराङ्गणों में कातरता दिखाने वाले नहीं थे। वे दोनों बन्धु महर्षि के बताये हुए मार्ग से बड़ी सावधानी के साथ पञ्चवटी की ओर प्रस्थित हुए॥२५॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे त्रयोदशः सर्गः॥१३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में तेरहवाँ सर्ग पूरा हुआ।१३॥
सर्ग-14
अथ पञ्चवटीं गच्छन्नन्तरा रघुनन्दनः।
आससाद महाकायं गृधं भीमपराक्रमम्॥१॥
पञ्चवटी जाते समय बीच में श्रीरामचन्द्रजी को एक विशालकाय गृध्र मिला, जो भयंकर पराक्रम प्रकट करने वाला था॥१॥
तं दृष्ट्वा तौ महाभागौ वनस्थं रामलक्ष्मणौ।
मेनाते राक्षसं पक्षिं ब्रवाणौ को भवानिति॥२॥
वन में बैठे हुए उस विशाल पक्षी को देखकर महाभाग श्रीराम और लक्ष्मण ने उसे राक्षस ही समझा और पूछा—’आप कौन हैं?’॥२॥
ततो मधुरया वाचा सौम्यया प्रीणयन्निव।
उवाच वत्स मां विद्धि वयस्यं पितुरात्मनः॥३॥
तब उस पक्षी ने बड़ी मधुर और कोमल वाणी में उन्हें प्रसन्न करते हुए-से कहा—’बेटा! मुझे अपने पिता का मित्र समझो’॥३॥
स तं पितृसखं मत्वा पूजयामास राघवः।
स तस्य कुलमव्यग्रमथ पप्रच्छ नाम च॥४॥
पिताका मित्र जानकर श्रीरामचन्द्रजी ने गृध्र का आदर किया और शान्तभाव से उसका कुल एवं नाम पूछा॥ ४॥
रामस्य वचनं श्रुत्वा कुलमात्मानमेव च।
आचचक्षे द्विजस्तस्मै सर्वभूतसमुद्भवम्॥५॥
श्रीराम का यह प्रश्न सुनकर उस पक्षी ने उन्हें अपने कुल और नाम का परिचय देते हुए समस्त प्राणियों की उत्पत्तिका क्रम ही बताना आरम्भ किया॥५॥
पूर्वकाले महाबाहो ये प्रजापतयोऽभवन्।
तान् मे निगदतः सर्वानादितः शृणु राघव॥६॥
‘महाबाहु रघुनन्दन! पूर्वकाल में जो-जो प्रजापति हो चुके हैं, उन सबका आदि से ही वर्णन करता हूँ, सुनो॥६॥
कर्दमः प्रथमस्तेषां विकृतस्तदनन्तरम्।
शेषश्च संश्रयश्चैव बहुपुत्रश्च वीर्यवान्॥७॥
‘उन प्रजापतियों में सबसे प्रथम कर्दम हुए। तदनन्तर दूसरे प्रजापति का नाम विकृत हुआ, तीसरे शेष, चौथे संश्रय और पाँचवें प्रजापति पराक्रमी बहुपुत्र हुए॥७॥
स्थाणुर्मरीचरत्रिश्च क्रतुश्चैव महाबलः।
पुलस्त्यश्चाङ्गिराश्चैव प्रचेताः पुलहस्तथा ॥८॥
‘छठे स्थाणु, सातवें मरीचि, आठवें अत्रि, नवें महान् शक्तिशाली क्रतु, दसवें पुलस्त्य, ग्यारहवें अङ्गिरा, बारहवें प्रचेता (वरुण) और तेरहवें प्रजापति पुलह हुए॥८॥
दक्षो विवस्वानपरोऽरिष्टनेमिश्च राघव।
कश्यपश्च महातेजास्तेषामासीच्च पश्चिमः॥९॥
‘चौदहवें दक्ष, पंद्रहवें विवस्वान्, सोलहवें अरिष्टनेमि और सत्रहवें प्रजापति महातेजस्वी कश्यप हुए। रघुनन्दन ! यह कश्यपजी अन्तिम प्रजापति कहे गये हैं॥९॥
प्रजापतेस्तु दक्षस्य बभूवुरिति विश्रुताः।
षष्टिर्दुहितरो राम यशस्विन्यो महायशः॥१०॥
‘महायशस्वी श्रीराम! प्रजापति दक्ष के साठ यशस्विनी कन्याएँ हुईं, जो बहुत ही विख्यात थीं॥ १०॥
कश्यपः प्रतिजग्राह तासामष्टौ सुमध्यमाः।
अदितिं च दितिं चैव दनूमपि च कालकाम्॥
ताम्रां क्रोधवशां चैव मनुं चाप्यनलामपि।
उनमें से आठ* सुन्दरी कन्याओं को प्रजापति कश्यप ने पत्नीरूप में ग्रहण किया। जिनके नाम इस प्रकार हैं- अदिति, दिति, दनु, काल का, ताम्रा, क्रोधवशा, मनु और अनला॥ ११ १/२॥
* यद्यपि पुराणग्रन्थों में ‘कश्यपाय त्रयोदश’ इत्यादि वचनों द्वारा कश्यप की तेरह पत्नियों का उल्लेख किया गया है, तथापि यहाँ जिस संतानपरम्परा का वर्णन करना है, उसमें इन आठों का ही उपयोग है, इसलिये यहाँ आठ की ही संख्या दी गयी है।
तास्तु कन्यास्ततः प्रीतः कश्यपः पुनरब्रवीत्॥
पुत्रांस्त्रैलोक्यभर्तृन् वै जनयिष्यथ मत्समान्।
तदनन्तर उन कन्याओं से प्रसन्न होकर कश्यपजी ने फिर उनसे कहा—’देवियो! तुमलोग ऐसे पुत्रों को जन्म दोगी, जो तीनों लोकों का भरण-पोषण करने में समर्थ और मेरे समान तेजस्वी होंगे’॥ १२ १/२ ।।
अदितिस्तन्मना राम दितिश्च दनुरेव च॥१३॥
कालका च महाबाहो शेषास्त्वमनसोऽभवन्।
‘महाबाहु श्रीराम! इनमें से अदिति, दिति, दनु और काल का-इन चारों ने कश्यपजी की कही हुई बात को मन से ग्रहण किया; परंतु शेष स्त्रियों ने उधर मन नहीं लगाया। उनके मन में वैसा मनोरथ नहीं उत्पन्न हुआ॥
अदित्यां जज्ञिरे देवास्त्रयस्त्रिंशदरिंदम॥१४॥
आदित्या वसवो रुद्रा अश्विनौ च परंतप।
‘शत्रुओं का दमन करने वाले रघुवीर! अदिति के गर्भ से तैंतीस देवता उत्पन्न हुए-बारह आदित्य, आठ वसु, ग्यारह रुद्र और दो अश्विनीकुमार शत्रुओं को ताप देने वाले श्रीराम! ये ही तैंतीस देवता हैं। १४ १/२॥
दितिस्त्वजनयत् पुत्रान् दैत्यांस्तात यशस्विनः॥ १५॥
तेषामियं वसुमती पुराऽऽसीत् सवनार्णवा।
‘तात! दितिने दैत्य नाम से प्रसिद्ध यशस्वी पुत्रों को जन्म दिया। पूर्वकाल में वन और समुद्रोंसहित सारी पृथिवी उन्हीं के अधिकार में थी॥ १५ १/२ ॥
दनुस्त्वजनयत् पुत्रमश्वग्रीवमरिंदम॥१६॥
नरकं कालकं चैव कालकापि व्यजायत।
‘शत्रुदमन! दनुने अश्वग्रीव नामक पुत्र को उत्पन्न किया और कालका ने नरक एवं कालक नामक दो पुत्रों को जन्म दिया॥ १६ १/२॥
क्रौञ्ची भासी तथा श्येनीं धृतराष्ट्रीं तथा शुकीम्॥१७॥
ताम्रा तु सुषुवे कन्याः पञ्चैता लोकविश्रुताः।
‘ताम्राने क्रौञ्ची, भासी, श्येनी, धृतराष्ट्री तथा शुकी -इन पाँच विश्वविख्यात कन्याओं को उत्पन्न किया॥ १७ १/२॥
उलूकाञ्जनयत् क्रौञ्ची भासी भासान व्यजायत॥१८॥
श्येनी श्येनांश्च गृध्रांश्च व्यजायत सुतेजसः।
धृतराष्ट्री तु हंसांश्च कलहंसाश्च सर्वशः॥१९॥
‘इनमें से क्रौञ्ची ने उल्लुओं को, भासी ने भास नामक पक्षियों को, श्येनी ने परम तेजस्वी श्येनों (बाजों) और गीधों को तथा धृतराष्ट्री ने सब प्रकार के हंसों और कलहंसों को जन्म दिया॥ १८-१९॥
चक्रवाकांश्च भद्रं ते विजज्ञे सापि भामिनी।
शुकी नतां विजज्ञे तु नतायां विनता सुता॥२०॥
‘श्रीराम! आपका कल्याण हो, उसी भामिनी धृतराष्ट्री ने चक्रवाक नामक पक्षियों को भी उत्पन्न किया था। ताम्रा की सबसे छोटी पुत्री शुकी ने नता नामवाली कन्या को जन्म दिया। नता से विनता नामवाली पुत्री उत्पन्न हुई।॥ २० ॥
दश क्रोधवशा राम विजज्ञेऽप्यात्मसंभवाः।
मृगीं च मृगमन्दां च हरी भद्रमदामपि॥२१॥
मातङ्गीमथ शार्दूलीं श्वेतां च सुरभी तथा।
सर्वलक्षणसम्पन्नां सुरसां कद्रुकामपि॥२२॥
‘श्रीराम ! क्रोधवशा ने अपने पेट से दस कन्याओं को जन्म दिया। जिनके नाम हैं—मृगी, मृगमन्दा, हरी,भद्रमदा, मातङ्गी, शार्दूली, श्वेता, सुरभी, सर्वलक्षणसम्पन्ना सुरसा और कद्रुका ॥ २१-२२॥
अपत्यं तु मृगाः सर्वे मृग्या नरवरोत्तम।
ऋक्षाश्च मृगमन्दायाः सृमराश्चमरास्तथा॥ २३॥
‘नरेशों में श्रेष्ठ श्रीराम! मृगी की संतान सारे मृग हैं और मृगमन्दा के ऋक्ष, सृमर और चमर ॥ २३॥
ततस्त्विरावतीं नाम जज्ञे भद्रमदा सुताम्।
तस्यास्त्वैरावतः पुत्रो लोकनाथो महागजः॥ २४॥
‘भद्रमदा ने इरावती नामक कन्या को जन्म दिया, जिसका पुत्र है ऐरावत नामक महान् गजराज, जो समस्त लोकों को अभीष्ट है ॥ २४॥
हर्याश्च हरयोऽपत्यं वानराश्च तपस्विनः।
गोलाङ्गलाश्च शार्दूली व्याघ्रांश्चाजनयत् सुतान्॥२५॥
‘हरी की संतानें हरि (सिंह) तथा तपस्वी (विचारशील) वानर तथा गोलांगूल (लंगूर) हैं। क्रोधवशा की पुत्री शार्दूली ने व्याघ्र नामक पुत्र उत्पन्न किये॥२५॥
मातङ्ग्यास्त्वथ मातङ्गा अपत्यं मनुजर्षभ।
दिशागजं तु काकुत्स्थ श्वेता व्यजनयत् सुतम्॥ २६॥
‘नरश्रेष्ठ! मातङ्गीकी संतानें मातङ्ग (हाथी) हैं। काकुत्स्थ! श्वेता ने अपने पुत्र के रूपमें एक दिग्गज को जन्म दिया॥ २६॥
ततो दुहितरौ राम सुरभिट्टै व्यजायत।
रोहिणी नाम भद्रं ते गन्धर्वी च यशस्विनीम्॥ २७॥
‘श्रीराम! आपका भला हो। क्रोधवशा की पुत्री सुरभी देवी ने दो कन्याएँ उत्पन्न की-रोहिणी और यशस्विनी गन्धर्वी॥ २७॥
रोहिण्यजनयद् गावो गन्धर्वी वाजिनः सुतान्।
सुरसाजनयन्नागान् राम कद्रूश्च पन्नगान्॥ २८॥
‘रोहिणी ने गौओं को जन्म दिया और गन्धर्वी ने घोड़ों को ही पुत्ररूप में प्रकट किया। श्रीराम! सुरसा ने नागों को और कद्रूने पन्नगों को जन्म दिया॥२८॥
मनुर्मनुष्याञ्जनयत् कश्यपस्य महात्मनः।
ब्राह्मणान् क्षत्रियान् वैश्यान् शूद्रांश्च मनुजर्षभ॥ २९॥
‘नरश्रेष्ठ! महात्मा कश्यप की पत्नी मनु ने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र जातिवाले मनुष्यों को जन्म दिया।
मुखतो ब्राह्मणा जाता उरसः क्षत्रियास्तथा।
ऊरुभ्यां जज्ञिरे वैश्याः पद्भ्यां शूद्रा इति श्रुतिः॥ ३०॥
‘मुख से ब्राह्मण उत्पन्न हुए और हृदय से क्षत्रिय। दोनों ऊरुओं से वैश्यों का जन्म हुआ और दोनों पैरों से शूद्रों का—ऐसी प्रसिद्धि है॥ ३० ॥
सर्वान् पुण्यफलान् वृक्षाननलापि व्यजायत।
विनता च शुकीपौत्री कद्रूश्च सुरसास्वसा॥ ३१॥
‘(कश्यपपत्नी) अनला ने पवित्र फलवाले समस्त वृक्षों को जन्म दिया। कश्यपपत्नी ताम्रा की पुत्री जो शुकी थी, उसकी पौत्री विनता थी तथा कद्रू सुरसा की बहिन (एवं क्रोधवशा की पुत्री) कही गयी है॥ ३१॥
कद्रूर्नागसहस्रं तु विजज्ञे धरणीधरान्।
द्वौ पुत्रौ विनतायास्तु गरुडोऽरुण एव च ॥३२॥
‘इनमें से कद्रू ने एक सहस्र नागों को उत्पन्न किया, जो इस पृथ्वी को धारण करने वाले हैं तथा विनता के दो पुत्र हुए–गरुड़ और अरुण॥ ३२ ॥
तस्माज्जातोऽहमरुणात् सम्पातिश्च ममाग्रजः।
जटायुरिति मां विद्धि श्येनीपुत्रमरिंदम॥३३॥
‘उन्हीं विनतानन्दन अरुण से मैं तथा मेरे बड़े भाई सम्पाति उत्पन्न हुए। शत्रुदमन रघुवीर! आप मेरा नाम जटायु समझें। मैं श्येनी का पुत्र हूँ (ताम्रा की पुत्री जो श्येनी बतायी गयी है, उसी की परम्परा में उत्पन्न हुई एक श्येनी मेरी माता हुई) ॥ ३३ ॥
सोऽहं वाससहायस्ते भविष्यामि यदीच्छसि।
इदं दुर्गं हि कान्तारं मृगराक्षससेवितम्।
सीतां च तात रक्षिष्ये त्वयि याते सलक्ष्मणे॥ ३४॥
‘तात! यदि आप चाहें तो मैं यहाँ आपके निवास में सहायक होऊँगा। यह दुर्गम वन मृगों तथा राक्षसों से सेवित है। लक्ष्मणसहित आप यदि अपनी पर्णशाला से कभी बाहर चले जायँ तो उस अवसर पर मैं देवी सीता की रक्षा करूँगा’ ॥ ३४॥
जटायुषं तु प्रतिपूज्य राघवो मुदा परिष्वज्य च संनतोऽभवत् ।
पितुर्हि शुश्राव सखित्वमात्मवा जटायुषा संकथितं पुनः पुनः॥ ३५॥
यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजी ने जटायु का बड़ा सम्मान किया और प्रसन्नतापूर्वक उनके गले लगकर वे उनके सामने नतमस्तक हो गये। फिर पिता के साथ जिस प्रकार उनकी मित्रता हुई थी, वह प्रसङ्ग मनस्वी श्रीराम ने जटायु के मुख से बारंबार सुना॥ ३५॥
स तत्र सीतां परिदाय मैथिली सहैव तेनातिबलेन पक्षिणा।
जगाम तां पञ्चवटीं सलक्ष्मणो रिपून दिधक्षन् शलभानिवानलः॥३६॥
तत्पश्चात् वे मिथिलेशकुमारी सीता को उनके संरक्षण में सौंपकर लक्ष्मण और उन अत्यन्त बलशाली पक्षी जटायु के साथ ही पञ्चवटी की ओर ही चल दिये। श्रीरामचन्द्रजी मुनिद्रोही राक्षसों को शत्रु समझकर उन्हें उसी प्रकार दग्ध कर डालना चाहते थे, जैसे आग पतिङ्गों को जलाकर भस्म कर देती है। ३६॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे चतुर्दशः सर्गः॥१४॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में चौदहवाँ सर्ग पूरा हुआ।१४॥
सर्ग-15
ततः पञ्चवटीं गत्वा नानाव्यालमृगायुताम्।
उवाच लक्ष्मणं रामो भ्रातरं दीप्ततेजसम्॥१॥
नाना प्रकार के सर्पो, हिंसक जन्तुओं और मृगों से भरी हुई पञ्चवटी में पहुँचकर श्रीराम ने उद्दीप्त तेजवाले अपने भाई लक्ष्मण से कहा- ॥१॥
आगताः स्म यथोद्दिष्टं यं देशं मुनिरब्रवीत्।
अयं पञ्चवटीदेशः सौम्य पुष्पितकाननः॥२॥
‘सौम्य! मुनिवर अगस्त्य ने हमें जिस स्थान का परिचय दिया था, उनके तथाकथित स्थान में हमलोग आ पहुँचे। यही पञ्चवटी का प्रदेश है। यहाँ का वनप्रान्त पुष्पों से कैसी शोभा पा रहा है॥२॥
सर्वतश्चार्यतां दृष्टिः कानने निपुणो ह्यसि।
आश्रमः कतरस्मिन् नो देशे भवति सम्मतः॥३॥
‘लक्ष्मण! तुम इस वन में चारों ओर दृष्टि डालो; क्योंकि इस कार्य में निपुण हो। देखकर यह निश्चय करो कि किस स्थान पर आश्रम बनाना हमारे लिये अच्छा होगा॥३॥
रमते यत्र वैदेही त्वमहं चैव लक्ष्मण।
तादृशो दृश्यतां देशः संनिकृष्टजलाशयः॥४॥
वनरामण्यकं यत्र जलरामण्यकं तथा।
संनिकृष्टं च यस्मिंस्तु समित्पुष्पकुशोदकम्॥५॥
“लक्ष्मण! तुम किसी ऐसे स्थान को ढूँढ़ निकालो, जहाँ से जलाशय निकट हो, जहाँ विदेहकुमारी सीता का मन लगे, जहाँ तुम और हम भी प्रसन्नतापूर्वक रह सकें, जहाँ वन और जल दोनों का रमणीय दृश्य हो तथा जिस स्थान के आस-पास ही समिधा, फूल, कुश और जल मिलने की सुविधा हो’ ॥ ४-५॥
एवमुक्तस्तु रामेण लक्ष्मणः संयताञ्जलिः।
सीतासमक्षं काकुत्स्थमिदं वचनमब्रवीत्॥६॥
श्रीरामचन्द्रजी के ऐसा कहने पर लक्ष्मण दोनों हाथ जोड़कर सीता के सामने ही उन ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम से इस प्रकार बोले- ॥६॥
परवानस्मि काकुत्स्थ त्वयि वर्षशतं स्थिते।
स्वयं तु रुचिरे देशे क्रियतामिति मां वद॥७॥
‘काकुत्स्थ! आपके रहते हुए मैं सदा पराधीन ही हूँ। मैं सैकड़ों या अनन्त वर्षों तक आपकी आज्ञा के अधीन ही रहना चाहता हूँ; अतः आप स्वयं ही देखकर जो स्थान सुन्दर जान पड़े, वहाँ आश्रम बनाने के लिये मुझे आज्ञा दें-मुझसे कहें कि तुम अमुक स्थान पर आश्रम बनाओ’ ॥ ७॥
सुप्रीतस्तेन वाक्येन लक्ष्मणस्य महाद्युतिः।
विमृशन् रोचयामास देशं सर्वगुणान्वितम्॥८॥
स तं रुचिरमाक्रम्य देशमाश्रमकर्मणि।।
हस्ते गृहीत्वा हस्तेन रामः सौमित्रिमब्रवीत्॥९॥
लक्ष्मण के इस वचन से अत्यन्त तेजस्वी भगवान् श्रीराम को बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने स्वयं ही सोच-विचारकर एक ऐसा स्थान पसंद किया, जो सब प्रकार के उत्तम गुणों से सम्पन्न और आश्रम बनाने के योग्य था। उस सुन्दर स्थान पर आकर श्रीराम ने लक्ष्मण का हाथ अपने हाथ में लेकर कहा – ॥ ८-९॥
अयं देशः समः श्रीमान् पुष्पितैस्तरुभिर्वृतः।
इहाश्रमपदं रम्यं यथावत् कर्तुमर्हसि॥१०॥
‘सुमित्रानन्दन! यह स्थान समतल और सुन्दर है तथा फूले हुए वृक्षों से घिरा है। तुम्हें इसी स्थान पर यथोचित रूप से एक रमणीय आश्रम का निर्माण करना चाहिये।
इयमादित्यसंकाशैः पद्यैः सुरभिगन्धिभिः।
अदूरे दृश्यते रम्या पद्मिनी पद्मशोभिता॥११॥
‘यह पास ही सूर्य के समान उज्ज्वल कान्तिवाले मनोरम गन्धयुक्त कमलों से रमणीय प्रतीत होने वाली तथा पद्मों की शोभा से सम्पन्न पुष्करिणी दिखायी देती है।
यथाख्यातमगस्त्येन मुनिना भावितात्मना।
इयं गोदावरी रम्या पुष्पितैस्तरुभिर्वृता॥१२॥
‘पवित्र अन्तःकरण वाले अगस्त्य मुनि ने जिसके विषय में कहा था, वह विकसित वृक्षावलियों से घिरी हई रमणीय गोदावरी नदी यही है॥ १२॥
हंसकारण्डवाकीर्णा चक्रवाकोपशोभिता।
नातिदूरे न चासन्ने मृगयूथनिपीडिता॥१३॥
‘इसमें हंस और कारण्डव आदि जलपक्षी विचर रहे हैं। चकवे इसकी शोभा बढ़ा रहे हैं तथा पानी पीने के लिये आये हुए मृगों के झुंड इसके तट पर छाये रहते हैं। यह नदी इस स्थान से न तो अधिक दूर है और न अत्यन्त निकट ही॥ १३ ॥
मयूरनादिता रम्याः प्रांशवो बहुकन्दराः।
दृश्यन्ते गिरयः सौम्य फुल्लैस्तरुभिरावृताः॥ १४॥
‘सौम्य! यहाँ बहुत-सी कन्दराओं से युक्त ऊँचे-ऊँचे पर्वत दिखायी दे रहे हैं, जहाँ मयूरों की मीठी बोली गूंज रही है। ये रमणीय पर्वत खिले हुए वृक्षों से व्याप्त हैं॥ १४॥
सौवर्णै राजतैस्तानैर्देशे देशे तथा शुभैः।
गवाक्षिता इवाभान्ति गजाः परमभक्तिभिः॥
‘स्थान-स्थान पर सोने, चाँदी तथा ताँबे के समान रंगवाले सुन्दर गैरिक धातुओं से उपलक्षित ये पर्वत ऐसे प्रतीत हो रहे हैं, मानो झरोखे के आकार में की गयी नीले, पीले और सफेद आदि रंगों की उत्तम
शृङ्गाररचनाओं से अलंकृत हाथी शोभा पा रहे हों। १५॥
सालैस्तालैस्तमालैश्च खजूरैः पनसैर्दुमैः ।
नीवारैस्तिनिशैश्चैव पुन्नागैश्चोपशोभिताः॥ १६॥
चूतैरशोकैस्तिलकैः केतकैरपि चम्पकैः ।
पुष्पगुल्मलतोपेतैस्तैस्तैस्तरुभिरावृताः॥१७॥
स्यन्दनैश्चन्दनैर्नीपैः पर्णासैर्लकुचैरपि।
धवाश्वकर्णखदिरैः शमीकिंशुकपाटलैः॥१८॥
पुष्पों, गुल्मों तथा लता-वल्लरियों से युक्त साल, ताल, तमाल, खजूर, कटहल, जलकदम्ब, तिनिश, पुनाग, आम,अशोक, तिलक, केवड़ा, चम्पा, स्यन्दन, चन्दन, कदम्ब, पर्णास, लकुच, धव, अश्वकर्ण, खैर, शमी, पलाश और पाटल (पाडर) आदि वृक्षों से घिरे हुए ये पर्वत बड़ी शोभा पा रहे हैं। १६–१८॥
इदं पुण्यमिदं रम्यमिदं बहुमृगद्विजम्।
इह वत्स्याम सौमित्रे सार्धमेतेन पक्षिणा ॥१९॥
‘सुमित्रानन्दन! यह बहुत ही पवित्र और बड़ा रमणीय स्थान है। यहाँ बहुत-से पशु-पक्षी निवास करते हैं। हमलोग भी यहीं इन पक्षिराज जटायु के साथ रहेंगे’।
एवमुक्तस्तु रामेण लक्ष्मणः परवीरहा।
अचिरेणाश्रमं भ्रातुश्चकार सुमहाबलः॥२०॥
श्रीराम के ऐसा कहने पर शत्रुवीरों का संहार करने वाले महाबली लक्ष्मण ने भाई के लिये शीघ्र ही आश्रम बनाकर तैयार किया॥२०॥
पर्णशालां सुविपुलां तत्र संघातमृत्तिकाम्।
सुस्तम्भां मस्करैर्दीधैः कृतवंशां सुशोभनाम्॥ २१॥
शमीशाखाभिरास्तीर्य दृढपाशावपाशिताम्।
कशकाशशरैः पर्णैः सुपरिच्छादितां तथा॥२२॥
समीकृततलां रम्यां चकार सुमहाबलः।।
निवासं राघवस्यार्थे प्रेक्षणीयमनुत्तमम्॥२३॥
वह आश्रम एक अत्यन्त विस्तृत पर्णशाला के रूप में बनाया गया था। महाबली लक्ष्मण ने पहले वहाँ मिट्टी एकत्र करके दीवार खड़ी की, फिर उसमें सुन्दर एवं सुदृढ़ खम्भे लगाये। खम्भों के ऊपर बड़े-बड़े बाँस तिरछे करके रखे। बाँसों के रख दिये जाने पर वह कुटी बड़ी सुन्दर दिखायी देने लगी। फिर उन बाँसों पर उन्होंने शमीवृक्ष की शाखाएँ फैला दीं और उन्हें मजबूत रस्सियों से कसकर बाँध दिया। – इसके बाद ऊपर से कुश, कास, सरकंडे और पत्ते बिछाकर उस पर्णशाला को भलीभाँति छा दिया तथा नीचे की भूमि को बराबर करके उस कुटी को बड़ा रमणीय बना दिया। इस प्रकार लक्ष्मण ने श्रीरामचन्द्रजी के लिये परम उत्तम निवासगृह बना दिया, जो देखने ही योग्य था॥ २१–२३॥
स गत्वा लक्ष्मणः श्रीमान् नदी गोदावरी तदा।
स्नात्वा पद्मानि चादाय सफलः पुनरागतः॥ २४॥
उसे तैयार करके श्रीमान् लक्ष्मणने गोदावरीनदीके तटपर जाकर तत्काल उसमें स्नान किया और कमलके फूल तथा फल लेकर वे फिर वहीं लौट आये॥२४॥
ततः पुष्पबलिं कृत्वा शान्तिं च स यथाविधि।
दर्शयामास रामाय तदाश्रमपदं कृतम्॥२५॥
तदनन्तर शास्त्रीय विधि के अनुसार देवताओं के लिये फूलों की बलि (उपहारसामग्री) अर्पित की तथावास्तुशान्ति करके उन्होंने अपना बनाया हुआ आश्रम श्रीरामचन्द्रजी को दिखाया॥ २५ ॥
स तं दृष्ट्वा कृतं सौम्यमाश्रमं सह सीतया।
राघवः पर्णशालायां हर्षमाहारयत् परम्॥२६॥
भगवान् श्रीराम सीता के साथ उस नये बने हुए सुन्दर आश्रम को देखकर बहुत प्रसन्न हुए और कुछ कालतक उसके भीतर खड़े रहे ॥ २६ ॥
सुसंहृष्टः परिष्वज्य बाहुभ्यां लक्ष्मणं तदा।
अतिस्निग्धं च गाढं च वचनं चेदमब्रवीत्॥२७॥
तत्पश्चात् अत्यन्त हर्ष में भरकर उन्होंने दोनों भुजाओं से लक्ष्मण को कसकर हृदय से लगा लिया और बड़े स्नेह के साथ यह बात कही— ॥२७॥
प्रीतोऽस्मि ते महत् कर्म त्वया कृतमिदं प्रभो।
प्रदेयो यन्निमित्तं ते परिष्वङ्गो मया कृतः॥२८॥
‘सामर्थ्यशाली लक्ष्मण ! मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूँ। तुमने यह महान् कार्य किया है। उसके लिये और कोई समुचित पुरस्कार न होने से मैंने तुम्हें गाढ़ आलिङ्गन प्रदान किया है॥२८॥
भावज्ञेन कृतज्ञेन धर्मज्ञेन च लक्ष्मण।
त्वया पुत्रेण धर्मात्मा न संवृत्तः पिता मम॥२९॥
‘लक्ष्मण! तुम मेरे मनोभाव को तत्काल समझ लेने वाले, कृतज्ञ और धर्मज्ञ हो। तुम-जैसे पुत्र के कारण मेरे धर्मात्मा पिता अभी मरे नहीं हैं—तुम्हारे रूप में वे अब भी जीवित ही हैं’।॥ २९॥
एवं लक्ष्मणमुक्त्वा तु राघवो लक्ष्मिवर्धनः।
तस्मिन् देशे बहुफले न्यवसत् स सुखं सुखी॥ ३०॥
लक्ष्मण से ऐसा कहकर अपनी शोभा का विस्तार करने वाले सुखी श्रीरामचन्द्रजी प्रचुर फलों से सम्पन्न उस पञ्चवटी-प्रदेश में सबके साथ सुखपूर्वक रहने लगे॥ ३०॥
कञ्चित् कालं स धर्मात्मा सीतया लक्ष्मणेन च।
अन्वास्यमानो न्यवसत् स्वर्गलोके यथामरः॥ ३१॥
सीता और लक्ष्मण से सेवित हो धर्मात्मा श्रीराम कुछ काल तक वहाँ उसी प्रकार रहे, जैसे स्वर्गलोक में देवता निवास करते हैं।॥ ३१॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे पञ्चदशः सर्गः॥१५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में पंद्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ।१५॥
सर्ग-16
वसतस्तस्य तु सुखं राघवस्य महात्मनः।
शरव्यपाये हेमन्तऋतुरिष्टः प्रवर्तत॥१॥
महात्मा श्रीराम को उस आश्रम में रहते हुए शरद् ऋतु बीत गयी और प्रिय हेमन्त का आरम्भ हुआ।१॥
स कदाचित् प्रभातायां शर्वर्यां रघुनन्दनः।
प्रययावभिषेकार्थं रम्यां गोदावरी नदीम्॥२॥
एक दिन प्रातःकाल रघुकुलनन्दन श्रीराम स्नान करने के लिये परम रमणीय गोदावरी नदी के तट पर गये॥२॥
प्रह्वः कलशहस्तस्तु सीतया सह वीर्यवान्।
पृष्ठतोऽनुव्रजन् भ्राता सौमित्रिरिदमब्रवीत्॥३॥
उनके छोटे भाई लक्ष्मण भी, जो बड़े ही विनीत और पराक्रमी थे, सीता के साथ-साथ हाथ में घड़ालिये उनके पीछे-पीछे गये। जाते-जाते वे श्रीरामचन्द्रजी से इस प्रकार बोले- ॥३॥
अयं स कालः सम्प्राप्तः प्रियो यस्ते प्रियंवद।
अलंकृत इवाभाति येन संवत्सरः शुभः॥४॥
प्रिय वचन बोलने वाले भैया श्रीराम! यह वही हेमन्तकाल आ पहुँचा है, जो आपको अधिक प्रिय है और जिससे यह शुभ संवत्सर अलंकृत-सा प्रतीत होता है॥४॥
नीहारपरुषो लोकः पृथिवी सस्यमालिनी।
जलान्यनुपभोग्यानि सुभगो हव्यवाहनः॥५॥
‘इस ऋतु में अधिक ठण्डक या पाले के कारण लोगों का शरीर रूखा हो जाता है। पृथ्वी पर रबी की खेती लहलहाने लगती है। जल अधिक शीतल होने के कारण पीने के योग्य नहीं रहता और आग बड़ी प्रिय लगती है॥५॥
नवाग्रयणपूजाभिरभ्यर्च्य पितृदेवताः।
कृताग्रयणकाः काले सन्तो विगतकल्मषाः॥६॥
‘नवसस्येष्टि’ कर्म के अनुष्ठान की इस वेला में नूतन अन्न ग्रहण करने के लिये की गयी आग्रयणकर्मरूप पूजाओं द्वारा देवताओं तथा पितरों को संतुष्ट करके उक्त आग्रयण कर्म का सम्पादन करने वाले सत्पुरुष निष्पाप हो गये हैं॥६॥
प्राज्यकामा जनपदाः सम्पन्नतरगोरसाः।
विचरन्ति महीपाला यात्रार्थं विजिगीषवः॥७॥
‘इस ऋतु में प्रायः सभी जनपदों के निवासियों की अन्नप्राप्ति विषयक कामनाएँ प्रचुर रूप से पूर्ण हो जाती हैं। गोरस की भी बहुतायत होती है तथा विजय की इच्छा रखने वाले भूपालगण युद्ध-यात्रा के लिये विचरते रहते हैं।
सेवमाने दृढं सूर्ये दिशमन्तकसेविताम्।
विहीनतिलकेव स्त्री नोत्तरा दिक् प्रकाशते॥८॥
‘सूर्यदेव इन दिनों यमसेवित दक्षिण दिशाका दृढ़तापूर्वक सेवन करने लगे हैं। इसलिये उत्तरदिशा सिंदूरविन्दु से वञ्चित हुई नारी की भाँति सुशोभित या प्रकाशित नहीं हो रही है॥ ८॥
प्रकृत्या हिमकोशाढ्यो दूरसूर्यश्च साम्प्रतम्।
यथार्थनामा सुव्यक्तं हिमवान् हिमवान् गिरिः॥
‘हिमालय पर्वत तो स्वभाव से ही घनीभूत हिम के खजाने से भरा-पूरा होता है, परंतु इस समय सूर्यदेव भी दक्षिणायन में चले जाने के कारण उससे दूर हो गये हैं; अतः अब अधिक हिम के संचय से सम्पन्न होकर हिमवान् गिरि स्पष्ट ही अपने नाम को सार्थक कर रहा है॥९॥
अत्यन्तसुखसंचारा मध्याह्ने स्पर्शतः सुखाः।
दिवसाः सुभगादित्याश्छायासलिलदुर्भगाः॥ १०॥
‘मध्याह्नकाल में धूप का स्पर्श होने से हेमन्त के सुखमय दिन अत्यन्त सुख से इधर-उधर विचरने के योग्य होते हैं। इन दिनों सुसेव्य होने के कारण सूर्यदेव सौभाग्यशाली जान पड़ते हैं और सेवन के योग्य न होने के कारण छाँह तथा जल अभागे प्रतीत होते हैं।
मृदुसूर्याः सुनीहाराः पटुशीताः समारुताः।
शून्यारण्या हिमध्वस्ता दिवसा भान्ति साम्प्रतम्॥ ११॥
‘आजकल के दिन ऐसे हैं कि सूर्य की किरणों का स्पर्श कोमल (प्रिय) जान पड़ता है। कुहासे अधिक पड़ते हैं। सरदी सबल होती है, कड़ाके का जाड़ा पड़ने लगता है। साथ ही ठण्डी हवा चलती रहती है। पाला पड़ने से पत्तों के झड़ जाने के कारण जंगल सूने दिखायी देते हैं और हिम के स्पर्श से कमल गल जाते हैं॥ ११॥
निवृत्ताकाशशयनाः पुष्यनीता हिमारुणाः।
शीतवृद्धतरायामास्त्रियामा यान्ति साम्प्रतम्॥ १२॥
‘इस हेमन्तकाल में रातें बड़ी होने लगती हैं। इनमें सरदी बहुत बढ़ जाती है। खुले आकाश में कोई नहीं सोते हैं। पौषमास की ये रातें हिमपात के कारण धूसर प्रतीत होती हैं।१२॥
रविसंक्रान्तसौभाग्यस्तुषारारुणमण्डलः।
निःश्वासान्ध इवादर्शश्चन्द्रमा न प्रकाशते॥ १३॥
‘हेमन्तकाल में चन्द्रमा का सौभाग्य सूर्यदेव में चला गया है (चन्द्रमा सरदी के कारण असेव्य और सूर्य मन्दरश्मि होने के कारण सेव्य हो गये हैं)। चन्द्रमण्डल हिमकणों से आच्छन्न होकर धूमिल जान पड़ता है; अतः चन्द्रदेव निःश्वासवायु से मलिन हुए दर्पण की भाँति प्रकाशित नहीं हो रहे हैं॥ १३॥
ज्योत्स्ना तुषारमलिना पौर्णमास्यां न राजते।
सीतेव चातपश्यामा लक्ष्यते न च शोभते॥१४॥
इन दिनों पर्णिमा की चाँदनी रात भी तुहिन बिन्दुओं से मलिन दिखायी देती है—प्रकाशित नहीं होती है। ठीक उसी तरह, जैसे सीता अधिक धूप लगने से साँवली-सी दीखती है—पूर्ववत् शोभा नहीं पाती॥ १४॥
प्रकृत्या शीतलस्पर्शो हिमविद्धश्च साम्प्रतम्।
प्रवाति पश्चिमो वायुः काले द्विगुणशीतलः॥ १५॥
‘स्वभाव से ही जिसका स्पर्श शीतल है, वह पछुआ हवा इस समय हिमकणों से व्याप्त हो जाने के कारण दूनी सरदी लेकर बड़े वेग से बह रही है॥ १५ ॥
बाष्पच्छन्नान्यरण्यानि यवगोधूमवन्ति च।
शोभन्तेऽभ्युदिते सूर्ये नदद्भिः क्रौञ्चसारसैः॥ १६॥
‘जौ और गेहूँ के खेतों से युक्त ये बहुसंख्यक वन भाप से ढंके हुए हैं तथा क्रौञ्च और सारस इनमें कलरव कर रहे हैं। सूर्योदयकाल में इन वनों की बड़ी शोभा हो रही है॥ १६॥
खजूरपुष्पाकृतिभिः शिरोभिः पूर्णतण्डुलैः।
शोभन्ते किंचिदालम्बाः शालयः कनकप्रभाः॥ १७॥
‘ये सुनहरे रंग के जड़हन धान खजूर के फूल के-से आकारवाली बालों से, जिनमें चावल भरे हुए हैं, कुछ लटक गये हैं। इन बालों के कारण इनकी बड़ी शोभा होती है॥ १७॥
मयूखैरुपसर्पद्भिर्हिमनीहारसंवृतैः।
दूरमभ्युदितः सूर्यः शशाङ्क इव लक्ष्यते॥१८॥
‘कुहासे से ढकी और फैलती हुई किरणों से उपलक्षित होने वाले दूरोदित सूर्य चन्द्रमा के समान दिखायी देते हैं॥ १८॥
आग्राह्यवीर्यः पूर्वाणे मध्याह्ने स्पर्शतः सुखः।
संरक्तः किंचिदापाण्डुरातपः शोभते क्षितौ॥ १९॥
‘इस समय अधिक लाल और कुछ-कुछ श्वेत, पीत वर्ण की धूप पृथ्वी पर फैलकर शोभा पा रही है। पूर्वाह्नकाल में तो कुछ इसका बल जान ही नहीं पड़ता है, परंतु मध्याह्नकाल में इसके स्पर्श से सुखका अनुभव होता है॥
अवश्यायनिपातेन किंचित्प्रक्लिन्नशादला।
वनानां शोभते भूमिर्निविष्टतरुणातपा॥२०॥
‘ओस की बूंदें पड़ने से जहाँ की घासें कुछ-कुछ भीगी हुई जान पड़ती हैं, वह वनभूमि नवोदित सूर्य की धूप का प्रवेश होने से अद्भुत शोभा पा रही है॥२०॥
स्पृशन् सुविपुलं शीतमुदकं द्विरदः सुखम्।
अत्यन्ततृषितो वन्यः प्रतिसंहरते करम्॥२१॥
‘यह जंगली हाथी बहुत प्यासा हुआ है। यह सुखपूर्वक प्यास बुझाने के लिये अत्यन्त शीतल जल का स्पर्श तो करता है, किंतु उसकी ठंडक असह्य होने के कारण अपनी सूंड़ को तुरंत ही सिकोड़ लेता है॥२१॥
एते हि समुपासीना विहगा जलचारिणः ।
नावगाहन्ति सलिलमप्रगल्भा इवाहवम्॥२२॥
‘ये जलचर पक्षी जल के पास ही बैठे हैं; परंतु जैसे डरपोक मनुष्य युद्धभूमि में प्रवेश नहीं करते हैं, उसी प्रकार ये पानी में नहीं उतर रहे हैं ॥ २२॥
अवश्यायतमोनद्धा नीहारतमसावृताः।
प्रसुप्ता इव लक्ष्यन्ते विपुष्पा वनराजयः॥२३॥
‘रात में ओसविन्दुओं और अन्धकार से आच्छादित तथा प्रातःकाल कुहासे के अँधेरे से ढकी हुई ये पुष्पहीन वनश्रेणियाँ सोयी हुई-सी दिखायी देती हैं। २३॥
बाष्पसंछन्नसलिला रुतविज्ञेयसारसाः।
हिमावालुकैस्तीरैः सरितो भान्ति साम्प्रतम्॥ २४॥
‘इस समय नदियों के जल भाप से ढके हुए हैं। इनमें विचरने वाले सारस केवल अपने कलरवों से पहचाने जाते हैं तथा ये सरिताएँ भी ओस से भीगी हुई बालूवाले अपने तटों से ही प्रकाश में आती हैं (जल से नहीं) ॥ २४॥
तुषारपतनाच्चैव मृदुत्वाद् भास्करस्य च।
शैत्यादगाग्रस्थमपि प्रायेण रसवज्जलम्॥२५॥
‘बर्फ पड़ने से और सूर्य की किरणों के मन्द होने से अधिक सर्दी के कारण इन दिनों पर्वत के शिखर पर पड़ा हुआ जल भी प्रायः स्वादिष्ट प्रतीत होता है। २५॥
जराजर्जरितैः पत्रैः शीर्णकेसरकर्णिकैः।
नालशेषा हिमध्वस्ता न भान्ति कमलाकराः॥ २६॥
‘जो पुराने पड़ जाने के कारण जर्जर हो गये हैं, जिनकी कर्णिका और केसर जीर्ण-शीर्ण हो गये हैं, ऐसे दलों से उपलक्षित होने वाले कमलों के समूह पाला पड़ने से गल गये हैं। उनमें डंठलमात्र शेष रह गये हैं,इसीलिये उनकी शोभा नष्ट हो गयी है।॥ २६॥
अस्मिंस्तु पुरुषव्याघ्र काले दुःखसमन्वितः।
तपश्चरति धर्मात्मा त्वद्भक्त्या भरतः पुरे ॥२७॥
‘पुरुषसिंह श्रीराम! इस समय धर्मात्मा भरत आपके लिये बहुत दुःखी हैं और आपमें भक्ति रखते हुए नगर में ही तपस्या कर रहे हैं।॥ २७॥
त्यक्त्वा राज्यं च मानं च भोगांश्च विविधान्बहून्।
तपस्वी नियताहारः शेते शीते महीतले॥२८॥
‘वे राज्य, मान तथा नाना प्रकार के बहुसंख्यक भोगों का परित्याग करके तपस्या में संलग्न हैं एवं नियमित आहार करते हुए इस शीतल महीतल पर बिना विस्तर के ही शयन करते हैं।॥ २८॥
सोऽपि वेलामिमां नूनमभिषेकार्थमुद्यतः।
वृतः प्रकृतिभिर्नित्यं प्रयाति सरयूं नदीम्॥२९॥
‘निश्चय ही भरत भी इसी बेला में स्नान के लिये उद्यत हो मन्त्री एवं प्रजाजनों के साथ प्रतिदिन सरयू नदी के तट पर जाते होंगे॥२९॥
अत्यन्तसुखसंवृद्धः सुकुमारो हिमादितः।
कथं त्वपररात्रेषु सरयूमवगाहते॥३०॥
‘अत्यन्त सुख में पले हुए सुकुमार भरत जाड़े का कष्ट सहते हुए रात के पिछले पहर में कैसे सरयूजी के जल में डुबकी लगाते होंगे॥ ३०॥
पद्मपत्रेक्षणः श्यामः श्रीमान् निरुदरो महान्।
धर्मज्ञः सत्यवादी च ह्रीनिषेवी जितेन्द्रियः॥ ३१॥
प्रियाभिभाषी मधुरो दीर्घबाहुररिंदमः।
संत्यज्य विविधान् सौख्यानार्यं सर्वात्मनाश्रितः॥ ३२॥
‘जिनके नेत्र कमलदल के समान शोभा पाते हैं, जिनकी अङ्गकान्ति श्याम है और जिनके उदर का कुछ पता ही नहीं लगता है, ऐसे महान् धर्मज्ञ,सत्यवादी, लज्जाशील, जितेन्द्रिय, प्रिय वचन बोलने वाले, मृदुल स्वभाव वाले महाबाहु शत्रुदमन श्रीमान् भरत ने नाना प्रकार के सुखों को त्यागकर सर्वथा आपका ही आश्रय ग्रहण किया है।। ३१-३२॥
जितः स्वर्गस्तव भ्रात्रा भरतेन महात्मना।
वनस्थमपि तापस्ये यस्त्वामविधीयते॥३३॥
‘आपके भाई महात्मा भरत ने निश्चय ही स्वर्गलोक पर विजय प्राप्त कर ली है; क्योंकि वे भी तपस्या में स्थित होकर आपके वनवासी जीवन का अनुसरण कर रहे हैं।॥ ३३॥
न पित्र्यमनवर्तन्ते मातृकं द्विपदा इति।
ख्यातो लोकप्रवादोऽयं भरतेनान्यथा कृतः॥ ३४॥
‘मनुष्य प्रायः माता के गुणों का ही अनुवर्तन करते हैं पिता के नहीं; इस लौकिक उक्ति को भरत ने अपने बर्ताव से मिथ्या प्रमाणित कर दिया है।॥ ३४ ॥
भर्ता दशरथो यस्याः साधुश्च भरतः सुतः।
कथं नु साम्बा कैकेयी तादृशी क्रूरदर्शिनी॥ ३५॥
‘महाराज दशरथ जिसके पति हैं और भरत-जैसा साधु जिसका पुत्र है, वह माता कैकेयी वैसी क्रूरतापूर्ण दृष्टिवाली कैसे हो गयी?’ ॥ ३५ ॥
इत्येवं लक्ष्मणे वाक्यं स्नेहाद् वदति धार्मिके।
परिवादं जनन्यास्तमसहन् राघवोऽब्रवीत्॥ ३६॥
धर्मपरायण लक्ष्मण जब स्नेहवश इस प्रकार कह रहे थे, उस समय श्रीरामचन्द्रजी से माता कैकेयी की निन्दा नहीं सही गयी। उन्होंने लक्ष्मण से कहा- ॥ ३६॥
न तेऽम्बा मध्यमा तात गर्हितव्या कदाचन।
तामेवेक्ष्वाकुनाथस्य भरतस्य कथां कुरु॥३७॥
‘तात! तुम्हें मझली माता कैकेयी की कभी निन्दा नहीं करनी चाहिये। (यदि कुछ कहना हो तो) पहले की भाँति इक्ष्वाकुवंश के स्वामी भरत की ही चर्चा करो॥३७॥
निश्चितैव हि मे बुद्धिर्वनवासे दृढव्रता।
भरतस्नेहसंतप्ता बालिशीक्रियते पुनः॥ ३८॥
‘यद्यपि मेरी बुद्धि दृढ़तापूर्वक व्रत का पालन करते हुए वन में रहने का अटल निश्चय कर चुकी है, तथापि भरत के स्नेह से संतप्त होकर पुनः चञ्चल हो उठती है॥
संस्मराम्यस्य वाक्यानि प्रियाणि मधुराणि च।
हृद्यान्यमृतकल्पानि मनःप्रह्लादनानि च॥३९॥
मुझे भरत की वे परम प्रिय, मधुर, मन को भाने वाली और अमृत के समान हृदय को आह्लाद प्रदान करने वाली बातें याद आ रही हैं॥ ३९॥
कदा ह्यहं समेष्यामि भरतेन महात्मना।
शत्रुजेन च वीरेण त्वया च रघुनन्दन॥४०॥
‘रघुकुलनन्दन लक्ष्मण! कब वह दिन आयेगा, जब मैं तुम्हारे साथ चलकर महात्मा भरत और वीरवर शत्रुघ्न से मिलूँगा’ ॥ ४०॥
इत्येवं विलपंस्तत्र प्राप्य गोदावरी नदीम्।
चक्रेऽभिषेकं काकुत्स्थः सानुजः सह सीतया॥ ४१॥
इस प्रकार विलाप करते हुए ककुत्स्थकुलभूषण भगवान् श्रीराम ने लक्ष्मण और सीता के साथ गोदावरी नदी के तटपर जाकर स्नान किया॥४१॥
तर्पयित्वाथ सलिलैस्तैः पितॄन् दैवतानपि।
स्तुवन्ति स्मोदितं सूर्यं देवताश्च तथानघाः॥ ४२॥
वहाँ स्नान करके उन्होंने गोदावरी के जल से देवताओं और पितरों का तर्पण किया। तदनन्तर जब सूर्योदय हुआ, तब वे तीनों निष्पाप व्यक्ति भगवान् सूर्य का उपस्थान करके अन्य देवताओं की भी स्तुति करने लगे।
कृताभिषेकः स रराज रामः सीताद्वितीयः सह लक्ष्मणेन।
कृताभिषेकस्त्वगराजपुत्र्या रुद्रः सनन्दिर्भगवानिवेशः॥४३॥
सीता और लक्ष्मण के साथ स्नान करके भगवान् श्रीराम उसी प्रकार शोभा पाने लगे, जैसे पर्वतराजपुत्री उमा और नन्दी के साथ गङ्गाजी में अवगाहन करके भगवान् रुद्र सुशोभित होते हैं। ४३॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे षोडशः सर्गः॥१६॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में सोलहवाँ सर्ग पूरा हुआ। १६॥
सर्ग-17
कृताभिषेको रामस्तु सीता सौमित्रिरेव च।
तस्माद् गोदावरीतीरात् ततो जग्मुः स्वमाश्रमम्॥
स्नान करके श्रीराम, लक्ष्मण और सीता तीनों ही उस गोदावरी तट से अपने आश्रम में लौट आये॥१॥
आश्रमं तमुपागम्य राघवः सहलक्ष्मणः।
कृत्वा पौर्वाणिकं कर्म पर्णशालामुपागमत्॥ २॥
उस आश्रम में आकर लक्ष्मणसहित श्रीराम ने पूर्वाणकाल के होम-पूजन आदि कार्य पूर्ण किये, फिर वे दोनों भाई पर्णशाला में आकर बैठे॥२॥
उवास सुखितस्तत्र पूज्यमानो महर्षिभिः।
स रामः पर्णशालायामासीनः सह सीतया॥३॥
विरराज महाबाहुश्चित्रया चन्द्रमा इव।
लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा चकार विविधाः कथाः॥ ४॥
वहाँ सीता के साथ वे सुखपूर्वक रहने लगे। उन दिनों बड़े-बड़े ऋषि-मुनि आकर वहाँ उनका सत्कार करते थे। पर्णशाला में सीता के साथ बैठे हुए महाबाहु श्रीरामचन्द्रजी चित्रा के साथ विराजमान चन्द्रमा की भाँति शोभा पा रहे थे। वे अपने भाई लक्ष्मण के साथ वहाँ तरह-तरह की बातें किया करते थे॥ ३-४॥
तदासीनस्य रामस्य कथासंसक्तचेतसः।
तं देशं राक्षसी काचिदाजगाम यदृच्छया॥५॥
सा तु शूर्पणखा नाम दशग्रीवस्य रक्षसः।
भगिनी राममासाद्य ददर्श त्रिदशोपमम्॥६॥
उस समय जब कि श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण के साथ बातचीत में लगे हुए थे, एक राक्षसी अकस्मात् उस स्थान पर आ पहुँची। वह दशमुख राक्षस रावण की बहिन शूर्पणखा थी। उसने वहाँ आकर देवताओं के समान मनोहर रूप वाले श्रीरामचन्द्रजी को देखा।५-६॥
दीप्तास्यं च महाबाहुं पद्मपत्रायतेक्षणम्।
गजविक्रान्तगमनं जटामण्डलधारिणम्॥७॥
उनका मुख तेजस्वी, भुजाएँ बड़ी-बड़ी और नेत्र प्रफुल्ल कमलदल के समान विशाल एवं सुन्दर थे। वे हाथी के समान मन्द गति से चलते थे। उन्होंने मस्तक पर जटामण्डल धारण कर रखा था॥ ७॥
सुकुमारं महासत्त्वं पार्थिवव्यञ्जनान्वितम्।
राममिन्दीवरश्यामं कंदर्पसदृशप्रभम्॥८॥
बभूवेन्द्रोपमं दृष्ट्वा राक्षसी काममोहिता।
परम सुकुमार, महान् बलशाली, राजोचित लक्षणों से युक्त, नील कमल के समान श्याम कान्ति से सुशोभित, कामदेव के सदृश सौन्दर्यशाली तथा इन्द्र के समान तेजस्वी श्रीराम को देखते ही वह राक्षसी काम से मोहित हो गयी। ८ १/२ ॥
सुमुखं दुर्मुखी रामं वृत्तमध्यं महोदरी॥९॥
विशालाक्षं विरूपाक्षी सुकेशं ताम्रमूर्धजा।
प्रियरूपं विरूपा सा सुस्वरं भैरवस्वना॥१०॥
श्रीराम का मुख सुन्दर था और शूर्पणखा का मुख बहुत ही भद्दा एवं कुरूप था। उनका मध्यभाग(कटिप्रदेश और उदर) क्षीण था; किंतु शूर्पणखा बेडौल लंबे पेटवाली थी। श्रीराम की आँखें बड़ी-बड़ी होने के कारण मनोहर थीं, परंतु उस राक्षसी के नेत्र कुरूप और डरावने थे। श्रीरघुनाथजी के केश चिकने और सुन्दर थे, परंतु उस निशाचरी के सिर के बाल ताँबे-जैसे लाल थे। श्रीराम का रूप बड़ा प्यारा लगता था, किंतु शूर्पणखा का रूप बीभत्स और विकराल था। श्रीराघवेन्द्र मधुर स्वर में बोलते थे, किंतु वह राक्षसी भैरवनाद करनेवाली थी॥९-१० ।।
तरुणं दारुणा वृद्धा दक्षिणं वामभाषिणी।
न्यायवृत्तं सुदुर्वृत्ता प्रियमप्रियदर्शना॥११॥
ये देखने में सौम्य और नित्य नूतन तरुण थे, किंतु वह निशाचरी क्रूर और हजारों वर्षों की बुढ़िया थी। ये सरलता से बात करने वाले और उदार थे, किंतु उसकी बातों में कुटिलता भरी रहती थी। ये न्यायोचित सदाचार का पालन करने वाले थे और वह अत्यन्त दराचारिणी थी। श्रीराम देखने में प्यारे लगते थे और शूर्पणखा को देखते ही घृणा पैदा होती थी॥ ११॥
शरीरजसमाविष्टा राक्षसी राममब्रवीत्।
जटी तापसवेषेण सभार्यः शरचापधृक् ॥१२॥
आगतस्त्वमिमं देशं कथं राक्षससेवितम्।
किमागमनकृत्यं ते तत्त्वमाख्यातुमर्हसि ॥१३॥
तो वह राक्षसी कामभाव से आविष्ट हो (मनोहर रूप बनाकर) श्रीराम के पास आयी और बोली —’तपस्वी के वेश में मस्तक पर जटा धारण किये, साथ में स्त्री को लिये और हाथ में धनुष-बाण ग्रहण किये, इस राक्षसों के देश में तुम कैसे चले आये? यहाँ तुम्हारे आगमन का क्या प्रयोजन है? यह सब मुझे ठीक-ठीक बताओ’ ॥ १२-१३॥
एवमुक्तस्तु राक्षस्या शूर्पणख्या परंतपः।
ऋजुबुद्धितया सर्वमाख्यातुमुपचक्रमे ॥१४॥
राक्षसी शूर्पणखा के इस प्रकार पूछने पर शत्रुओं को संताप देने वाले श्रीरामचन्द्रजी ने अपने सरलस्वभाव के कारण सब कुछ बताना आरम्भ किया— ॥ १४ ॥
आसीद् दशरथो नाम राजा त्रिदशविक्रमः।
तस्याहमग्रजः पुत्रो रामो नाम जनैः श्रुतः॥१५॥
‘देवि! दशरथ नाम से प्रसिद्ध एक चक्रवर्ती राजा हो गये हैं, जो देवताओं के समान पराक्रमी थे। मैं । उन्हीं का ज्येष्ठ पुत्र हूँ और लोगों में राम नाम से विख्यात हूँ॥ १५॥
भ्रातायं लक्ष्मणो नाम यवीयान् मामनुव्रतः।
इयं भार्या च वैदेही मम सीतेति विश्रुता॥१६॥
‘ये मेरे छोटे भाई लक्ष्मण हैं, जो सदा मेरी आज्ञा के अधीन रहते हैं और ये मेरी पत्नी हैं, जो विदेहराज जनक की पुत्री तथा सीता नाम से प्रसिद्ध हैं॥१६॥
नियोगात् तु नरेन्द्रस्य पितुर्मातुश्च यन्त्रितः।
धर्मार्थं धर्मकांक्षी च वनं वस्तुमिहागतः॥१७॥
‘अपने पिता महाराज दशरथ और माता कैकेयी की आज्ञा से प्रेरित होकर मैं धर्मपालन की इच्छा रखकर धर्मरक्षा के ही उद्देश्य से इस वन में निवास करने के लिये यहाँ आया हूँ॥ १७॥
त्वां तु वेदितुमिच्छामि कस्य त्वं कासि कस्य वा।
त्वं हि तावन्मनोज्ञाङ्गी राक्षसी प्रतिभासि मे॥ १८॥
इह वा किंनिमित्तं त्वमागता ब्रूहि तत्त्वतः।
‘अब मैं तुम्हारा परिचय प्राप्त करना चाहता हूँ। तुम किसकी पुत्री हो? तुम्हारा नाम क्या है? और तुम किसकी पत्नी हो? तुम्हारे अङ्ग इतने मनोहर हैं कि तुम मुझे इच्छानुसार रूप धारण करने वाली कोई राक्षसी प्रतीत होती हो। यहाँ किस लिये तुम आयी हो? यह ठीक-ठीक बताओ’ ॥ १८ ॥
साब्रवीद् वचनं श्रुत्वा राक्षसी मदनार्दिता॥१९॥
श्रूयतां राम तत्त्वार्थं वक्ष्यामि वचनं मम।
अहं शूर्पणखा नाम राक्षसी कामरूपिणी॥२०॥
श्रीरामचन्द्रजी की यह बात सुनकर वह राक्षसी काम से पीड़ित होकर बोली—’श्रीराम! मैं सब कुछ ठीक-ठीक बता रही हूँ। तुम मेरी बात सुनो। मेरा नाम शूर्पणखा है और मैं इच्छानुसार रूप धारण करने वाली राक्षसी हूँ॥
अरण्यं विचरामीदमेका सर्वभयंकरा।
रावणो नाम मे भ्राता यदि ते श्रोत्रमागतः ॥ २१॥
‘मैं समस्त प्राणियों के मन में भय उत्पन्न करती हुई इस वन में अकेली विचरती हूँ। मेरे भाई का नाम रावण है। सम्भव है, उसका नाम तुम्हारे कानों तक पहुँचा हो॥
वीरो विश्रवसः पुत्रो यदि ते श्रोत्रमागतः।
प्रवृद्धनिद्रश्च सदा कुम्भकर्णो महाबलः॥ २२॥
‘रावण विश्रवा मुनि का वीर पुत्र है, यह बात भी तुम्हारे सुनने में आयी होगी। मेरा दूसरा भाई महाबली कुम्भकर्ण है, जिसकी निद्रा सदा ही बढ़ी रहती है।
विभीषणस्तु धर्मात्मा न तु राक्षसचेष्टितः।
प्रख्यातवीर्यौ च रणे भ्रातरौ खरदूषणौ ॥ २३॥
‘मेरे तीसरे भाई का नाम विभीषण है, परंतु वह धर्मात्मा है, राक्षसों के आचार-विचार का वह कभी पालन नहीं करता। युद्ध में जिनका पराक्रम विख्यात है, वे खर और दूषण भी मेरे भाई ही हैं ।। २३॥
तानहं समतिक्रान्तां राम त्वापूर्वदर्शनात्।
समुपेतास्मि भावेन भर्तारं पुरुषोत्तमम्॥२४॥
‘श्रीराम! बल और पराक्रम में मैं अपने उन सभी भाइयों से बढ़कर हूँ। तुम्हारे प्रथम दर्शन से ही मेरा मन तुम में आसक्त हो गया है। (अथवा तुम्हारा रूप सौन्दर्य अपूर्व है। आज से पहले देवताओं में भी किसी का ऐसा रूप मेरे देखने में नहीं आया है, अतः इस अपूर्व रूप के दर्शन से मैं तुम्हारे प्रति आकृष्ट हो गयी हूँ।) यही कारण है कि मैं तुम-जैसे पुरुषोत्तम के प्रति पतिकी भावना रखकर बड़े प्रेम से पास आयी हूँ॥ २४॥
अहं प्रभावसम्पन्ना स्वच्छन्दबलगामिनी।
चिराय भव भर्ता मे सीतया किं करिष्यसि॥ २५॥
‘मैं प्रभाव (उत्कृष्ट भाव–अनुराग अथवा महान् बल-पराक्रम) से सम्पन्न हूँ और अपनी इच्छा तथा शक्ति से समस्त लोकों में विचरण कर सकती हूँ, अतः अब तुम दीर्घकाल के लिये मेरे पति बन जाओ। इस अबला सीता को लेकर क्या करोगे? ॥ २५ ॥
विकृता च विरूपा च न सेयं सदृशी तव।
अहमेवानुरूपा ते भार्यारूपेण पश्य माम्॥२६॥
‘यह विकारयुक्त और कुरूपा है, अतः तुम्हारे योग्य नहीं है। मैं ही तुम्हारे अनुरूप हूँ, अतः मुझे अपनी भार्या के रूप में देखो॥२६॥
इमां विरूपामसतीं कराला निर्णतोदरीम्।
अनेन सह ते भ्रात्रा भक्षयिष्यामि मानुषीम्॥ २७॥
‘यह सीता मेरी दृष्टि में कुरूप, ओछी, विकृत, धंसे हए पेटवाली और मानवी है, मैं इसे तुम्हारे इस भाई के साथ ही खा जाऊँगी॥२७॥
ततः पर्वतशृङ्गाणि वनानि विविधानि च।
पश्यन् सह मया कामी दण्डकान् विचरिष्यसि॥ २८॥
‘फिर तुम कामभावयुक्त हो मेरे साथ पर्वतीय शिखरों और नाना प्रकार के वनों की शोभा देखते हुए दण्डक वन में विहार करना’ ॥ २८ ॥
इत्येवमुक्तः काकुत्स्थः प्रहस्य मदिरेक्षणाम्।
इदं वचनमारेभे वक्तुं वाक्यविशारदः॥ २९॥
शूर्पणखा के ऐसा कहने पर बातचीत करने में कुशल ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामचन्द्रजी जोर-जोर से हँसने लगे, फिर उन्होंने उस मतवाले नेत्रोंवाली निशाचरी से इस प्रकार कहना आरम्भ किया॥ २९॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे सप्तदशः सर्गः॥१७॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में सत्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ।१७॥
सर्ग-18
तां तु शूर्पणखां रामः कामपाशावपाशिताम्।
स्वेच्छया श्लक्ष्णया वाचा स्मितपूर्वमथाब्रवीत्॥
श्रीराम ने कामपाश से बँधी हुई उस शूर्पणखा से अपनी इच्छा के अनुसार मधुर वाणी में मन्द-मन्द मुसकराते हुए कहा- ॥१॥
कृतदारोऽस्मि भवति भार्येयं दयिता मम।
त्वद्विधानां तु नारीणां सुदुःखा ससपत्नता॥२॥
‘आदरणीया देवि! मैं विवाह कर चुका हूँ। यह मेरी प्यारी पत्नी विद्यमान है। तुम-जैसी स्त्रियों के लिये तो सौत का रहना अत्यन्त दुःखदायी ही होगा। २॥
अनुजस्त्वेष मे भ्राता शीलवान् प्रियदर्शनः।
श्रीमानकृतदारश्च लक्ष्मणो नाम वीर्यवान्॥३॥
अपूर्वी भार्यया चार्थी तरुणः प्रियदर्शनः।
अनुरूपश्च ते भर्ता रूपस्यास्य भविष्यति॥४॥
‘ये मेरे छोटे भाई श्रीमान् लक्ष्मण बड़े शीलवान्, देखने में प्रिय लगने वाले और बल-पराक्रम से सम्पन्न हैं। इनके साथ स्त्री नहीं है। ये अपूर्व गुणों से सम्पन्न हैं। ये तरुण तो हैं ही, इनका रूप भी देखने में बड़ा मनोरम है। अतः यदि इन्हें भार्या की चाह होगी तो ये ही तुम्हारे इस सुन्दर रूप के योग्य पति होंगे॥ ३-४॥
एनं भज विशालाक्षि भर्तारं भ्रातरं मम।
असपत्ना वरारोहे मेरुमर्कप्रभा यथा॥५॥
‘विशाललोचने! वरारोहे! जैसे सूर्य की प्रभा मेरुपर्वत का सेवन करती है, उसी प्रकार तुम मेरे इन छोटे भाई लक्ष्मण को पति के रूप में अपनाकर सौत के भयसे रहित हो इनकी सेवा करो’ ॥ ५॥
इति रामेण सा प्रोक्ता राक्षसी काममोहिता।
विसृज्य रामं सहसा ततो लक्ष्मणमब्रवीत्॥६॥
श्रीरामचन्द्रजी के ऐसा कहने पर वह काम से मोहित हुई राक्षसी उन्हें छोड़कर सहसा लक्ष्मण के पास जा पहुँची और इस प्रकार बोली- ॥६॥
अस्य रूपस्य ते युक्ता भार्याहं वरवर्णिनी।
मया सह सुखं सर्वान् दण्डकान् विचरिष्यसि॥ ७॥
‘लक्ष्मण! तुम्हारे इस सुन्दर रूप के योग्य मैं ही हूँ, अतः मैं ही तुम्हारी परम सुन्दरी भार्या हो सकती हूँ। मुझे अङ्गीकार कर लेने पर तुम मेरे साथ समूचे दण्डकारण्य में सुखपूर्वक विचरण कर सकोगे’ ॥ ७॥
एवमुक्तस्तु सौमित्री राक्षस्या वाक्यकोविदः।
ततः शूर्पनखीं स्मित्वा लक्ष्मणो युक्तमब्रवीत्॥ ८॥
उस राक्षसी के ऐसा कहने पर बातचीत में निपुण सुमित्राकुमार लक्ष्मण मुसकराकर सूप-जैसे नखवाली उस निशाचरी से यह युक्तियुक्त बात बोले- ॥ ८॥
कथं दासस्य मे दासी भार्या भवितुमिच्छसि।
सोऽहमार्येण परवान् भ्रात्रा कमलवर्णिनि॥९॥
‘लाल कमल के समान गौर वर्णवाली सुन्दरि! मैं तो दास हूँ, अपने बड़े भाई भगवान् श्रीराम के अधीन हूँ, तुम मेरी स्त्री होकर दासी बनना क्यों चाहती हो?॥९॥
समृद्धार्थस्य सिद्धार्था मुदितामलवर्णिनी।
आर्यस्य त्वं विशालाक्षि भार्या भव यवीयसी॥ १०॥
‘विशाललोचने! मेरे बड़े भैया सम्पूर्ण ऐश्वर्यों (अथवा सभी अभीष्ट वस्तुओं) से सम्पन्न हैं। तुम उन्हीं की छोटी स्त्री हो जाओ। इससे तुम्हारे सभी मनोरथ सिद्ध हो जायँगे और तुम सदा प्रसन्न रहोगी। तुम्हारे रूप-रंग उन्हीं के योग्य निर्मल हैं॥ १० ॥
एतां विरूपामसतीं करालां निर्णतोदरीम्।
भार्यां वृद्धां परित्यज्य त्वामेवैष भजिष्यति॥ ११॥
‘कुरूप, ओछी, विकृत, धंसे हुए पेटवाली और वृद्धा भार्या को त्यागकर ये तुम्हें ही सादर ग्रहण करेंगे* ॥ ११॥
* यहाँ लक्ष्मण ने उन्हीं विशेषणों को दुहराया है, जिन्हें शूर्पणखा ने सीता के लिये प्रयुक्त किया था। शूर्पणखा की दृष्टि से जो अर्थ है, वह ऊपर दे दिया है; परंतु लक्ष्मण की दृष्टि में वे विशेषण निन्दापरक नहीं, स्तुतिपरक है, अतः उनकी दृष्टि से उन विशेषणों का अर्थ यहाँ दिया जाता है—विरूपा—विशिष्टरूपवाली त्रिभुवनसुन्दरी। असती—जिससे बढ़कर दूसरी कोई सती नहीं है ऐसी। कराला–शरीर की गठन के अनुसार ऊँचे-नीचे अङ्गोंवाली निर्णतोदरी-निम्न उदर अथवा क्षीण कटि-प्रदेशवाली। वृद्धाज्ञान में बढ़ी-चढ़ी अर्थात् तुम्हें छोड़कर उक्त विशेषणों वाली सीता को ही वे ग्रहण करेंगे।
को हि रूपमिदं श्रेष्ठं संत्यज्य वरवर्णिनि।
मानुषीषु वरारोहे कुर्याद भावं विचक्षणः॥१२॥
‘सुन्दर कटिप्रदेशवाली वरवर्णिनि! कौन ऐसा बुद्धिमान् मनुष्य होगा, जो तुम्हारे इस श्रेष्ठ रूप को छोड़कर मानवकन्याओं से प्रेम करेगा?’ ॥ १२ ॥
इति सा लक्ष्मणेनोक्ता कराला निर्णतोदरी।
मन्यते तद्वचः सत्यं परिहासाविचक्षणा॥१३॥
लक्ष्मण के इस प्रकार कहने पर परिहास को न समझने वाली उस लंबे पेटवाली विकराल राक्षसी ने उनकी बात को सच्ची माना॥ १३॥ ।
सा रामं पर्णशालायामुपविष्टं परंतपम्।
सीतया सह दुर्धर्षमब्रवीत् काममोहिता॥१४॥
वह पर्णशाला में सीता के साथ बैठे हुए शत्रुसंतापी दुर्जय वीर श्रीरामचन्द्रजी के पास लौट आयी और काम से मोहित होकर बोली- ॥१४॥
इमां विरूपामसती कराला निर्णतोदरीम्।
वृद्धां भार्यामवष्टभ्य न मां त्वं बह मन्यसे॥१५॥
‘राम! तुम इस कुरूप, ओछी, विकृत, धंसे हुए पेटवाली और वृद्धाका आश्रय लेकर मेरा विशेष आदर नहीं करते हो॥ १५ ॥
अद्येमां भक्षयिष्यामि पश्यतस्तव मानुषीम्।
त्वया सह चरिष्यामि निःसपत्ना यथासुखम्॥ १६॥
‘अतः आज तुम्हारे देखते-देखते मैं इस मानुषी को खा जाऊँगी और इस सौत के न रहने पर तुम्हारे साथ सुखपूर्वक विचरण करूँगी’॥ १६ ॥
इत्युक्त्वा मृगशावाक्षीमलातसदृशेक्षणा।
अभ्यगच्छत् सुसंक्रुद्धा महोल्का रोहिणीमिव॥ १७॥
ऐसा कहकर दहकते हुए अंगारों के समान नेत्रोंवाली शूर्पणखा अत्यन्त क्रोध में भरकर मृगनयनी सीता की ओर झपटी, मानो कोई बड़ी भारी उल्का रोहिणी नामक तारे पर टूट पड़ी हो ॥१७॥
तां मृत्युपाशप्रतिमामापतन्तीं महाबलः।
विगृह्य रामः कुपितस्ततो लक्ष्मणमब्रवीत्॥ १८॥
महाबली श्रीराम ने मौत के फंदे की तरह आती हुई उस राक्षसी को हुंकार से रोककर कुपित हो लक्ष्मण से कहा— ॥१८॥
क्रूरैरनार्यैः सौमित्रे परिहासः कथंचन।
न कार्यः पश्य वैदेहीं कथंचित् सौम्य जीवतीम्॥ १९॥
‘सुमित्रानन्दन! क्रूर कर्म करने वाले अनार्यों से किसी प्रकार का परिहास भी नहीं करना चाहिये। सौम्य! देखो न, इस समय सीता के प्राण किसी प्रकार बड़ी मुश्किल से बचे हैं॥ १९॥
इमां विरूपामसतीमतिमत्तां महोदरीम्।
राक्षसी पुरुषव्याघ्र विरूपयितुमर्हसि ॥२०॥
‘पुरुषसिंह! तुम्हें इस कुरूपा, कुलटा, अत्यन्त मतवाली और लंबे पेटवाली राक्षसी को कुरूप किसी अङ्ग से हीन कर देना चाहिये’ ॥ २० ॥
इत्युक्तो लक्ष्मणस्तस्याः क्रुद्धो रामस्य पश्यतः।
उद्धृत्य खड्गं चिच्छेद कर्णनासे महाबलः॥ २१॥
श्रीरामचन्द्रजी के इस प्रकार आदेश देने पर क्रोध में भरे हुए महाबली लक्ष्मण ने उनके देखते-देखते म्यान से तलवार खींच ली और शूर्पणखा के नाक कान काट लिये॥ २१॥
निकृत्तकर्णनासा तु विस्वरं सा विनद्य च।
यथागतं प्रद्राव घोरा शूर्पणखा वनम्॥२२॥
नाक और कान कट जाने पर भयंकर राक्षसी शूर्पणखा बड़े जोर से चिल्लाकर जैसे आयी थी, उसी तरह वन में भाग गयी॥ २२ ॥
सा विरूपा महाघोरा राक्षसी शोणितोक्षिता।
ननाद विविधान् नादान् यथा प्रावृषि तोयदः॥ २३॥
खून से भीगी हुई वह महाभयंकर एवं विकराल रूप वाली निशाचरी नाना प्रकार के स्वरों में जोर-जोर से चीत्कार करने लगी, मानो वर्षाकाल में मेघों की घटा गर्जन-तर्जन कर रही हो॥ २३॥
सा विक्षरन्ती रुधिरं बहधा घोरदर्शना।
प्रगृह्य बाहू गर्जन्ती प्रविवेश महावनम्॥२४॥
वह देखनेमें बड़ी भयानक थी। उसने अपने कटे हुए अङ्गोंसे बारंबार खूनकी धारा बहाते और दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर चिग्घाड़ते हुए एक विशाल वनके भीतर प्रवेश किया॥२४॥
ततस्तु सा राक्षससङ्गसंवृतं खरं जनस्थानगतं विरूपिता।
उपेत्य तं भ्रातरमुग्रतेजसं पपात भूमौ गगनाद् यथाशनिः॥२५॥
लक्ष्मण के द्वारा कुरूप की गयी शूर्पणखा वहाँ से भागकर राक्षस समूह से घिरे हुए भयंकर तेजवाले जनस्थान-निवासी भ्राता खर के पास गयी और जैसे आकाश से बिजली गिरती है, उसी प्रकार वह पृथ्वी पर गिर पड़ी॥
ततः सभार्यं भयमोहमूर्च्छिता सलक्ष्मणं राघवमागतं वनम्।
विरूपणं चात्मनि शोणितोक्षिता शशंस सर्वं भगिनी खरस्य सा॥२६॥
खर की वह बहन रक्त से नहा गयी थी और भय तथा मोह से अचेत-सी हो रही थी। उसने वन में सीता और लक्ष्मण के साथ श्रीरामचन्द्रजी के आने और अपने कुरूप किये जाने का सारा वृत्तान्त खर से कह सुनाया।
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डेऽष्टादशः सर्गः॥१८॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में अठारहवाँ सर्ग पूरा हुआ।१८॥
सर्ग-19
तां तथा पतितां दृष्ट्वा विरूपां शोणितोक्षिताम्।
भगिनीं क्रोधसंतप्तः खरः पप्रच्छ राक्षसः॥१॥
अपनी बहिन को इस प्रकार अङ्गहीन और रक्त से भीगी हुई अवस्था में पृथ्वी पर पड़ी देख राक्षस खर क्रोध से जल उठा और इस प्रकार पूछने लगा॥
उत्तिष्ठ तावदाख्याहि प्रमोहं जहि सम्भ्रमम।
व्यक्तमाख्याहि केन त्वमेवंरूपा विरूपिता॥२॥
‘बहिन उठो और अपना हाल बताओ। मूर्छा और घबराहट छोड़ो तथा साफ-साफ कहो, किसने तुम्हें इस तरह रूपहीन बनाया है ? ॥२॥
कः कृष्णसर्पमासीनमाशीविषमनागसम्।
तुदत्यभिसमापन्नमङ्गल्यग्रेण लीलया॥३॥
‘कौन अपने सामने आकर चुपचाप बैठे हुए निरपराध एवं विषैले काले साँप को अपनी अँगुलियों के अग्रभाग से खेल-खेल में पीड़ा दे रहा है? ॥३॥
कालपाशं समासज्य कण्ठे मोहान्न बुध्यते।
यस्त्वामद्य समासाद्य पीतवान् विषमुत्तमम्॥४॥
‘जिसने आज तुम पर आक्रमण करके तुम्हारे नाक-कान काटे हैं, उसने उच्चकोटि का विष पी लिया है तथा अपने गले में काल का फंदा डाल लिया है, फिर भी मोहवश वह इस बात को समझ नहीं रहा है। ४॥
बलविक्रमसम्पन्ना कामगा कामरूपिणी।
इमामवस्थां नीता त्वं केनान्तकसमागता॥५॥
‘तुम तो स्वयं ही दूसरे प्राणियों के लिये यमराज के समान हो, बल और पराक्रम से सम्पन्न हो तथा इच्छानुसार सर्वत्र विचरने और अपनी रुचि के अनुसार रूप धारण करने में समर्थ हो, फिर भी तुम्हें किसने इस दुरवस्था में डाला है; जिससे दुःखी होकर तुम यहाँ आयी हो? ॥ ५॥
देवगन्धर्वभूतानामृषीणां च महात्मनाम्।
कोऽयमेवं महावीर्यस्त्वां विरूपां चकार ह॥६॥
‘देवताओं, गन्धों , भूतों तथा महात्मा ऋषियों में यह कौन ऐसा महान् बलशाली है, जिसने तुम्हें रूपहीन बना दिया? ॥ ६॥
नहि पश्याम्यहं लोके यः कुर्यान्मम विप्रियम्।
अमरेषु सहस्राक्षं महेन्द्रं पाकशासनम्॥७॥
‘संसार में तो मैं किसी को ऐसा नहीं देखता, जो मेरा अप्रिय कर सके देवताओं में सहस्रनेत्रधारी पाकशासन इन्द्र भी ऐसा साहस कर सकें, यह मुझे नहीं दिखायी देता॥
अद्याहं मार्गणैः प्राणानादास्ये जीवितान्तगैः।
सलिले क्षीरमासक्तं निष्पिबन्निव सारसः॥८॥
‘जैसे हंस जल में मिले हुए दूध को पी लेता है, उसी प्रकार मैं आज इन प्राणान्तकारी बाणों से तुम्हारे अपराधी के शरीर से उसके प्राण ले लूँगा॥ ८॥
निहतस्य मया संख्ये शरसंकृत्तमर्मणः।
सफेनं रुधिरं कस्य मेदिनी पातुमिच्छति॥९॥
‘युद्ध में मेरे बाणों से जिसके मर्मस्थान छिन्न-भिन्न हो गये हैं तथा जो मेरे हाथों मारा गया है, ऐसे किस पुरुष के फेनसहित गरम-गरम रक्त को यह पृथ्वी पीना चाहती है ? ॥ ९॥
कस्य पत्ररथाः कायान्मांसमुत्कृत्य संगताः।
प्रहृष्टा भक्षयिष्यन्ति निहतस्य मया रणे॥१०॥
‘रणभूमि में मेरे द्वारा मारे गये किस व्यक्ति के शरीर से मांस कुतर-कुतरकर ये हर्ष में भरे हुए झुंडके-झुंड पक्षी खायँगे? ॥ १०॥
तं न देवा न गन्धर्वा न पिशाचा न राक्षसाः।
मयापकृष्टं कृपणं शक्तास्त्रातुं महाहवे॥११॥
‘जिसे मैं महासमर में खींच लूँ, उस दीन अपराधी को देवता, गन्धर्व, पिशाच और राक्षस भी नहीं बचा सकते॥
उपलभ्य शनैः संज्ञां तं मे शंसितमर्हसि।
येन त्वं दुर्विनीतेन वने विक्रम्य निर्जिता॥१२॥
‘धीरे-धीरे होश में आकर तुम मुझे उसका नाम बताओ, जिस उद्दण्ड ने वन में तुम पर बलपूर्वक आक्रमण करके तुम्हें परास्त किया है’ ॥ १२ ॥
इति भ्रातुर्वचः श्रुत्वा क्रुद्धस्य च विशेषतः।
ततः शूर्पणखा वाक्यं सबाष्पमिदमब्रवीत्॥ १३॥
भाई का विशेषतः क्रोध में भरे हुए भाई खर का यह वचन सुनकर शूर्पणखा नेत्रों से आँसू बहाती हुई इस प्रकार बोली- ॥ १३॥
तरुणौ रूपसम्पन्नौ सुकुमारौ महाबलौ।
पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ॥ १४॥
‘भैया ! वन में दो तरुण पुरुष आये हैं, जो देखने में बड़े ही सुकुमार, रूपवान् और महान् बलवान् हैं।उन दोनों के बड़े-बड़े नेत्र ऐसे जान पड़ते हैं मानो खिले हुए कमल हों। वे दोनों ही वल्कल-वस्त्र और मृगचर्म पहने हुए हैं॥ १४॥
फलमूलाशनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ।
पुत्रौ दशरथस्यास्तां भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ॥१५॥
‘फल और मूल ही उनका भोजन है। वे जितेन्द्रिय, तपस्वी और ब्रह्मचारी हैं। दोनों ही राजा दशरथ के पुत्र और आपस में भाई-भाई हैं। उनके नाम राम और लक्ष्मण हैं।॥ १५॥
गन्धर्वराजप्रतिमौ पार्थिवव्यञ्जनान्वितौ।
देवौ वा दानवावेतौ न तर्कयितुमुत्सहे ॥१६॥
‘वे दो गन्धर्वराजों के समान जान पड़ते हैं और राजोचित लक्षणों से सम्पन्न हैं। ये दोनों भाई देवता अथवा दानव हैं, यह मैं अनुमान से भी नहीं जान सकती॥ १६॥
तरुणी रूपसम्पन्ना सर्वाभरणभूषिता।
दृष्टा तत्र मया नारी तयोर्मध्ये सुमध्यमा॥१७॥
“उन दोनों के बीच में एक तरुण अवस्था वाली रूपवती स्त्री भी वहाँ देखी है, जिसके शरीर का मध्यभाग बड़ा ही सुन्दर है। वह सब प्रकार के आभूषणों से विभूषित है।
ताभ्यामुभाभ्यां सम्भूय प्रमदामधिकृत्य ताम्।
इमामवस्थां नीताहं यथानाथासती तथा॥१८॥
‘उस स्त्री के ही कारण उन दोनों ने मिलकर मेरी एक अनाथ और कुलटा स्त्री की भाँति ऐसी दुर्गति की है॥
तस्याश्चानृजुवृत्तायास्तयोश्च हतयोरहम।
सफेनं पातुमिच्छामि रुधिरं रणमूर्धनि॥१९॥
‘मैं युद्ध में उस कुटिल आचार वाली स्त्री के और उन दोनों राजकुमारों के भी मारे जाने पर उनका फेनसहित रक्त पीना चाहती हूँ॥ १९॥
एष मे प्रथमः कामः कृतस्तत्र त्वया भवेत्।
तस्यास्तयोश्च रुधिरं पिबेयमहमाहवे॥२०॥
‘रणभूमि में उस स्त्री का और उन पुरुषों का भी रक्त मैं पी सकूँ—यह मेरी पहली और प्रमुख इच्छा है, जो तुम्हारे द्वारा पूर्ण की जानी चाहिये॥२०॥
इति तस्यां ब्रुवाणायां चतुर्दश महाबलान्।
व्यादिदेश खरः क्रुद्धो राक्षसानन्तकोपमान्॥ २१॥
शूर्पणखा के ऐसा कहने पर खरने कुपित होकर अत्यन्त बलवान् चौदह राक्षसों को, जो यमराज के समान भयंकर थे, यह आदेश दिया— ॥२१॥
मानुषौ शस्त्रसम्पन्नौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ।
प्रविष्टौ दण्डकारण्यं घोरं प्रमदया सह ॥ २२॥
‘वीरो! इस भयंकर दण्डकारण्य के भीतर चीर और काला मृगचर्म धारण किये दो शस्त्रधारी मनुष्य एक युवती स्त्री के साथ घुस आये हैं ॥ २२ ॥
तौ हत्वा तां च दुर्वृत्तामुपावर्तितुमर्हथ।
इयं च भगिनी तेषां रुधिरं मम पास्यति॥२३॥
‘तुमलोग वहाँ जाकर पहले उन दोनों पुरुषों को मार डालो; फिर उस दुराचारिणी स्त्री के भी प्राण ले लो। मेरी यह बहिन उन तीनों का रक्त पीयेगी॥ २३ ॥
मनोरथोऽयमिष्टोऽस्या भगिन्या मम राक्षसाः।
शीघ्रं सम्पाद्यतां गत्वा तौ प्रमथ्य स्वतेजसा॥ २४॥
‘राक्षसो! मेरी इस बहिन का यह प्रिय मनोरथ है। तुम वहाँ जाकर अपने प्रभाव से उन दोनों मनुष्यों को मार गिराओ और बहिन के इस मनोरथ को शीघ्र पूरा करो॥
युष्माभिर्निहतौ दृष्ट्वा तावुभौ भ्रातरौ रणे।
इयं प्रहृष्टा मुदिता रुधिरं युधि पास्यति ॥२५॥
‘रणभूमि में उन दोनों भाइयों को तुम्हारे द्वारा मारा गया देख यह हर्ष से खिल उठेगी और आनन्दमग्न होकर युद्ध स्थल में उनका रक्त पान करेगी’ ॥ २५ ॥
इति प्रतिसमादिष्टा राक्षसास्ते चतुर्दश।
तत्र जग्मस्तया सार्धं घना वातेरिता इव ॥२६॥
खर की ऐसी आज्ञा पाकर वे चौदहों राक्षस हवा के उड़ाये हुए बादलों के समान विवश हो शूर्पणखा के साथ पञ्चवटी को गये॥२६॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे एकोनविंशः सर्गः ॥१९॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में उन्नीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।१९॥
सर्ग-20
ततः शूर्पणखा घोरा राघवाश्रममागता।
राक्षसानाचचक्षे तौ भ्रातरौ सह सीतया॥१॥
तदनन्तर भयानक राक्षसी शूर्पणखा श्रीरामचन्द्रजी के आश्रम पर आयी। उसने सीता सहित उन दोनों भाइयों का उन राक्षसों को परिचय दिया।
ते रामं पर्णशालायामुपविष्टं महाबलम्।
ददृशुः सीतया सार्धं लक्ष्मणेनापि सेवितम्॥२॥
राक्षसों ने देखा—महाबली श्रीराम सीता के साथ पर्णशाला में बैठे हैं और लक्ष्मण भी उनकी सेवा में उपस्थित हैं॥२॥
तां दृष्ट्वा राघवः श्रीमानागतांस्तांश्च राक्षसान्।
अब्रवीद् भ्रातरं रामो लक्ष्मणं दीप्ततेजसम्॥३॥
इधर श्रीमान् रघुनाथजी ने भी शूर्पणखा तथा उसके साथ आये हुए उन राक्षसों को भी देखा। देखकर वे” उद्दीप्त तेज वाले अपने भाई लक्ष्मण से इस प्रकार बोले- ॥३॥
मुहूर्तं भव सौमित्रे सीतायाः प्रत्यनन्तरः।
इमानस्या वधिष्यामि पदवीमागतानिह ॥४॥
‘सुमित्राकुमार! तुम थोड़ी देर तक सीता के पास खड़े हो जाओ। मैं इस राक्षसी के सहायक बनकर पीछे-पीछे आये हुए इन निशाचरों का यहाँ अभी वध कर डालूँगा’ ॥ ४॥
वाक्यमेतत् ततः श्रुत्वा रामस्य विदितात्मनः।
तथेति लक्ष्मणो वाक्यं राघवस्य प्रपूजयन्॥५॥
अपने स्वरूप को समझने वाले श्रीरामचन्द्रजी की यह बात सुनकर लक्ष्मण ने इसकी भूरि-भूरि सराहना करते हुए ‘तथास्तु’ कहकर उनकी आज्ञा शिरोधार्य की॥
राघवोऽपि महच्चापं चामीकरविभूषितम्।
चकार सज्यं धर्मात्मा तानि रक्षांसि चाब्रवीत्॥
तब धर्मात्मा रघुनाथजी ने अपने सुवर्णमण्डित विशाल धनुष पर प्रत्यञ्चा चढ़ायी और उन राक्षसों से कहा॥
पुत्रौ दशरथस्यावां भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ।
प्रविष्टौ सीतया सार्धं दुश्चरं दण्डकावनम्॥७॥
फलमूलाशनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ।
वसन्तौ दण्डकारण्ये किमर्थमुपहिंसथ॥८॥
‘हम दोनों भाई राजा दशरथ के पुत्र राम और लक्ष्मण हैं तथा सीता के साथ इस दुर्गम दण्डकारण्य में आकर फल-मूल का आहार करते हुए इन्द्रियसंयमपूर्वक तपस्या में संलग्न हैं और ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं। इस प्रकार दण्डक वन में निवास करने वाले हम दोनों भाइयों की तुम किसलिये हिंसा करना चाहते हो? ॥ ७-८॥
युष्मान् पापात्मकान् हन्तुं विप्रकारान् महाहवे।
ऋषीणां तु नियोगेन सम्प्राप्तः सशरासनः॥९॥
‘देखो, तुम सब-के-सब पापात्मा तथा ऋषियों का अपराध करने वाले हो। उन ऋषि-मुनियों की आज्ञा से ही मैं धनुष-बाण लेकर महासम रमें तुम्हारा वध करने के लिये यहाँ आया हूँ॥९॥
तिष्ठतैवात्र संतुष्टा नोपवर्तितुमर्हथ।
यदि प्राणैरिहार्थो वो निवर्तध्वं निशाचराः॥ १०॥
‘निशाचरो! यदि तुम्हें युद्ध से संतोष प्राप्त होता हो तो यहाँ खड़े ही रहो, भाग मत जाना और यदि तुम्हें प्राणों का लोभ हो तो लौट जाओ (एक क्षण के लिये भी यहाँ न रुको)’॥१०॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राक्षसास्ते चतुर्दश।
ऊचुर्वाचं सुसंक्रुद्धा ब्रह्मघ्नाः शूलपाणयः॥
संरक्तनयना घोरा रामं संरक्तलोचनम्।
परुषा मधुराभाष हृष्टा दृष्टपराक्रमम्॥१२॥
श्रीराम की यह बात सुनकर वे चौदहों राक्षस अत्यन्त कुपित हो उठे। ब्राह्मणों की हत्या करने वाले वे घोर निशाचर हाथों में शूल लिये क्रोध से लाल आँखें करके कठोर वाणी में हर्ष और उत्साह के साथ स्वभावतः लाल नेत्रों वाले मधुरभाषी श्रीराम से, जिनका पराक्रम वे देख चुके थे, यों बोले- ॥ ११-१२॥
क्रोधमुत्पाद्य नो भर्तुः खरस्य सुमहात्मनः।
त्वमेव हास्यसे प्राणान् सद्योऽस्माभिर्हतो युधि॥ १३॥
‘अरे! तूने हमारे स्वामी महाकाय खर को क्रोध दिलाया है; अतः हमलोगों के हाथ से युद्ध में मारा जाकर तू स्वयं ही तत्काल अपने प्राणों से हाथ धो बैठेगा॥१३॥
का हि ते शक्तिरेकस्य बहूनां रणमूर्धनि।
अस्माकमग्रतः स्थातुं किं पुनर्योद्धमाहवे॥१४॥
‘हम बहुत-से हैं और तू अकेला, तेरी क्या शक्ति है कि तू हमारे सामने रणभूमिमें खड़ा भी रह सके, फिर युद्ध करना तो दूरकी बात है॥ १४ ॥
एभिर्बाहुप्रयुक्तैश्च परिघैः शूलपट्टिशैः।
प्राणांस्त्यक्ष्यसि वीर्यं च धनुश्च करपीडितम्॥ १५॥
‘हमारी भुजाओं द्वारा छोड़े गये इन परिघों, शूलों और पट्टिशों की मार खाकर तू अपने हाथ में दबाये हुए इस धनुष को, बल-पराक्रम के अभिमान को तथा अपने प्राणों को भी एक साथ ही त्याग देगा’ ॥ १५ ॥
इत्येवमुक्त्वा संरब्धा राक्षसास्ते चतुर्दश।
उद्यतायुधनिस्त्रिंशा राममेवाभिदुद्रुवुः॥१६॥
ऐसा कहकर क्रोध में भरे हुए वे चौदहों राक्षस तरह-तरह के आयुध और तलवारें लिये श्रीराम पर ही टूट पड़े॥ १६॥
चिक्षिपुस्तानि शूलानि राघवं प्रति दुर्जयम्।
तानि शूलानि काकुत्स्थः समस्तानि चतुर्दश॥ १७॥
तावद्भिरेव चिच्छेद शरैः काञ्चनभूषितैः।
उन राक्षसों ने दुर्जय वीर श्रीराघवेन्द्र पर वे शूल चलाये, परंतु ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामचन्द्रजी ने उन समस्त चौदहों शूलों को उतने ही सुवर्णभूषित बाणों द्वारा काट डाला॥ १७ १/२ ॥
ततः पश्चान्महातेजा नाराचान् सूर्यसंनिभान्॥ १८॥
जग्राह परमक्रुद्धश्चतुर्दश शिलाशितान्।
गृहीत्वा धनुरायम्य लक्ष्यानुद्दिश्य राक्षसान्॥ १९॥
मुमोच राघवो बाणान् वज्रानिव शतक्रतुः।
तत्पश्चात् महातेजस्वी रघुनाथजी ने अत्यन्त कुपित हो शान पर चढ़ाकर तेज किये गये सूर्यतुल्य तेजस्वी चौदह नाराच हाथ में लिये। फिर धनुष लेकर उसपर उन बाणों को रखा और कान तक खींचकर राक्षसों को लक्ष्य करके छोड़ दिया। मानो इन्द्र ने वज्रों का प्रहार किया हो॥ १८-१९ १/२॥
ते भित्त्वा रक्षसां वेगाद् वक्षांसि रुधिरप्लुताः॥ २०॥
विनिष्पेतुस्तदा भूमौ वल्मीकादिव पन्नगाः।
वे बाण बड़े वेग से उन राक्षसों की छाती छेदकर रुधिर में डूबे हए निकले और बाँबी से बाहर आये हुए सर्पो की भाँति तत्काल पृथ्वी पर गिर पड़े। २० १/२ ॥
तैर्भग्नहृदया भूमौ छिन्नमूला इव द्रुमाः॥२१॥
निपेतुः शोणितस्नाता विकृता विगतासवः।
उन नाराचों से हृदय विदीर्ण हो जाने के कारण वे राक्षस जड़ से कटे हुए वृक्षों की भाँति धराशायी हो गये। वे सब-के-सब खून से नहा गये थे। उनके शरीर विकृत हो गये थे। उस अवस्था में उनके प्राण पखेरू उड़ गये॥ २१ १/२॥
तान् भूमौ पतितान् दृष्ट्वा राक्षसी क्रोधमूर्छिता॥ २२॥
उपगम्य खरं सा तु किंचित्संशुष्कशोणिता।
पपात पुनरेवार्ता सनिर्यासेव वल्लरी॥२३॥
उन सबको पृथ्वी पर पड़ा देख वह राक्षसी क्रोध से मूर्छित हो गयी और खर के पास जाकर पुनः आर्तभाव से गिर पड़ी। उसके कटे हुए कानों और नाकों का खून सूख गया था, इसलिये गोंदयुक्त लता के समान प्रतीत होती थी॥ २२-२३॥
भ्रातुः समीपे शोकार्ता ससर्ज निनदं महत् ।
सस्वरं मुमुचे बाष्पं विवर्णवदना तदा ॥२४॥
भाई के निकट शोक से पीड़ित हुई शूर्पणखा बड़े जोर से आर्तनाद करने और फूट-फूटकर रोने तथा आँसू बहाने लगी। उस समय उसके मुख की कान्ति फीकी पड़ गयी थी॥ २४॥
निपातितान् प्रेक्ष्य रणे तु राक्षसान् प्रधाविता शूर्पणखा पुनस्ततः।
वधं च तेषां निखिलेन रक्षसां शशंस सर्वं भगिनी खरस्य सा॥२५॥
रणभूमि में उन राक्षसों को मारा गया देख खर की बहिन शूर्पणखा पुनः वहाँ से भागी हुई आयी। उसने उन समस्त राक्षसों के वध का सारा समाचार भाई से कह सुनाया॥ २५॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे विंशः सर्गः॥२०॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।२०॥