श्री गुरू ग्रंथ साहिब दर्पण । टीकाकार: प्रोफैसर साहिब सिंह । अनुवादक भुपिन्दर सिंह भाईख़ेल |
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Page 945 रंगि न राता रसि नही माता ॥ बिनु गुर सबदै जलि बलि ताता ॥ बिंदु न राखिआ सबदु न भाखिआ ॥ पवनु न साधिआ सचु न अराधिआ ॥ अकथ कथा ले सम करि रहै ॥ तउ नानक आतम राम कउ लहै ॥६२॥ {पन्ना 945} शब्दार्थ: रंगि = रंग में, प्यार में। रसि = रस में। माता = मस्त, खीवा। ताता = जलता, खिझता। बिंदु = वीर्य। बिंदु ना राखिआ = उस मनुष्य ने वीर्य नहीं संभाला (भाव, वह कैसा जती?) पवनु न साधिआ = (प्राणायाम द्वारा) प्राण वश में नहीं किए। सरलार्थ: सतिगुरू के शबद (की कमाई किए) बिना मनुष्य (मायावी धंधों में) जल-बल के खिझता रहता है, (इस वास्ते उसका मन) प्रभू के प्यार में रंगा नहीं जाता और वह प्रभू के आनंद में मस्त नहीं होता। जिस मनुष्य ने गुरू-शबद नहीं उचारा, उसने जती बन के कुछ नहीं कमाया। जिसने सच्चे प्रभू को नहीं सिमरा, उसने प्राणायाम करके क्या लिया? हे नानक! अगर मनुष्य अकॅथ प्रभू के गुण गा के (दुख-सुख को) एक-समान जान के जीवन व्यतीत करे, तो वह सारे संसार की जिंद प्रभू को प्राप्त कर लेता है।62। गुर परसादी रंगे राता ॥ अम्रितु पीआ साचे माता ॥ गुर वीचारी अगनि निवारी ॥ अपिउ पीओ आतम सुखु धारी ॥ सचु अराधिआ गुरमुखि तरु तारी ॥ नानक बूझै को वीचारी ॥६३॥ {पन्ना 945} शब्दार्थ: रंगे = (प्रभू के) प्यार में। पीआ = पीया। अपिउ = अमृत, आत्मिक जीवन देने वाला नाम जल। पीओ = पीया। धारी = धारण किया, पाया। वीचारी = विचारवान। तरु तारी = तारी तैर, पार हो। को = कोई विरला। सरलार्थ: सतिगुरू की मेहर से जो मनुष्य प्रभू के प्यार में रंगा जाता है, वह नाम-अमृत पी लेता है, और सच्चे प्रभू में मस्त (खीवा) रहता है। जो मनुष्य गुरू- (शबद) के द्वारा विचारवान हो गया है उसने (तृष्णा) अग्नि बुझा ली है, उसने (नाम-) अमृत पी लिया है, उसने आत्मिक सुख पा लिया है। (हे जोगी!) गुरू के राह पर चल के सच्चे प्रभू का सिमरन करके ('दुष्तर सागर' से) पार हो। (पर) हे नानक! कोई विरला विचारवान (इस बात को) समझता है।63। इहु मनु मैगलु कहा बसीअले कहा बसै इहु पवना ॥ कहा बसै सु सबदु अउधू ता कउ चूकै मन का भवना ॥ नदरि करे ता सतिगुरु मेले ता निज घरि वासा इहु मनु पाए ॥ आपै आपु खाइ ता निरमलु होवै धावतु वरजि रहाए ॥ किउ मूलु पछाणै आतमु जाणै किउ ससि घरि सूरु समावै ॥ गुरमुखि हउमै विचहु खोवै तउ नानक सहजि समावै ॥६४॥ {पन्ना 945} शब्दार्थ: मैगलु = (संस्कृत: मदकल) मस्त हाथी। भवना = भटकना। आपै आपु = अपने आप को। धावतु = दौड़ता (है विकारों की ओर)। वरजि = रोक के। ससि = चंद्रमा। हउमै = हउ+मैं, मैं मैं, हर वक्त मैं का ही ध्यान, अपने आप के बारे में हर वक्त, खुदगर्जी, मतलब प्रस्ती। सहजि = सहज में, अडोल अवस्था में। सरलार्थ: (प्रश्न:) मस्त हाथी (जैसा) ये मन कहाँ बसता है? ये प्राण कहाँ बसतें हैं? हे जोगी (नानक!) वह शबद कहाँ बसता है (जिससे तुम्हारे मत के अनुसार) मन की भटकना खत्म होती है? (उक्तर:) अगर प्रभू मेहर की निगाह करे तो वह सतिगुरू मिलाता है और (गुरू के मिलने पर) ये मन अपने ही घर में (भाव, अपने आप में) टिक जाता है। (गुरू के हुकम में चल के जब) मन अपने आपको खा जाता है (भाव, अपने संकल्प-विकल्प समाप्त कर देता है, जब मनुष्य अपने मन के पीछे चलने की बजाएगुरू के हुकम में चलता है) तो मन पवित्र हो जाता है (क्योंकि इस तरह गुरू के उपदेशों से मनुष्य) माया की ओर दौड़ते मन को रोके रखता है। (प्रश्न:) मनुष्य (जगत के) आदि (प्रभू) को कैसे पहचाने? अपने आत्मा को कैसे समझे? चंद्रमा के घर में सूरज कैसे टिके? (उक्तर:) जो मनुष्य गुरू के हुकम में चलता है वह अपने अंदर से 'अहंकार' दूर करता है, तब हे नानक! वह सहज अवस्था में टिक जाता है।64। इहु मनु निहचलु हिरदै वसीअले गुरमुखि मूलु पछाणि रहै ॥ नाभि पवनु घरि आसणि बैसै गुरमुखि खोजत ततु लहै ॥ सु सबदु निरंतरि निज घरि आछै त्रिभवण जोति सु सबदि लहै ॥ खावै दूख भूख साचे की साचे ही त्रिपतासि रहै ॥ अनहद बाणी गुरमुखि जाणी बिरलो को अरथावै ॥ नानकु आखै सचु सुभाखै सचि रपै रंगु कबहू न जावै ॥६५॥ {पन्ना 945} शब्दार्थ: निहचलु = अडोल हो के (भाव, भटकने से हट के)। हिरदै = हृदय में। आसणि = आसन पर। बैसै = बैठता है। निज घरि = अपने असल घर में। आछै = है। अरथावै = अर्थ समझता है, अस्लियत समझता है। सचि = सच में। रपै = रंगा रहता है। सरलार्थ: जब मनुष्य गुरू के हुकम में चल के (जगत के) मूल- (प्रभू) को पहचानता है (प्रभू के साथ सांझ डालता है), तो यह मन अडोल हो के हृदय में टिकता है। प्राण (भाव, श्वास) नाभि-रूप घर में आसन पर बैठता है (भाव, प्राणों का आरम्भ नाभि से होता है), गुरू के माध्यम से खोज करके मनुष्य अस्लियत को तलाशता है। वह शबद (जो 'दुश्तर सागर' से पार लंघाता है) एक-रस अपने असल घर में (भाव, शून्य प्रभू में) टिकता है, मनुष्य उस प्रभू के द्वारा (ही) त्रिलोकी में व्यापक प्रभू की ज्योति ढूँढता है, (ज्यों-ज्यों) सच्चे प्रभू को मिलने की तमन्ना बढ़ती है (त्यों-त्यों) मनुष्य दुखों को समाप्त करता जाता है, सच्चे प्रभू में ही तृप्त रहता है। एक-रस व्यापक ईश्वरीय जीवन-रौंअ को किसी विरले गुरमुख ने जाना है किसी विरले ने ये राज़ समझा है। नानक कहता है (जिसने समझा है) वह सच्चे प्रभू को सिमरता है, सच्चे में रंगा रहता है, उसका ये रंग कभी उतरता नहीं।65। जा इहु हिरदा देह न होती तउ मनु कैठै रहता ॥ नाभि कमल असथ्मभु न होतो ता पवनु कवन घरि सहता ॥ रूपु न होतो रेख न काई ता सबदि कहा लिव लाई ॥ रकतु बिंदु की मड़ी न होती मिति कीमति नही पाई ॥ वरनु भेखु असरूपु न जापी किउ करि जापसि साचा ॥ नानक नामि रते बैरागी इब तब साचो साचा ॥६६॥ {पन्ना 945} शब्दार्थ: देह = शरीर। मनु = चेतन सक्ता। केठै = कहाँ? किस जगह पर? असथंभु = स्तम्भ, खम्भा, सहारा। पवनु = प्राण, श्वास। सहता = आसरा लेता था। सबदि = शबद ने। रकतु = रक्त, खून। बिंदु = वीर्य। मढ़ी = शरीर। मिति = अंदाजा। असरूपु = स्वरूप। इब = अब जबकि (शरीर मौजूद है)। तब = तब जब कि (शरीर नहीं था)। सरलार्थ: (प्रश्न:) जब ना ये हृदय था ना ही ये शरीर था, तब मन (चेतन सक्ता) कहाँ रहती थी? जब नाभि के चक्र का स्तम्भ नहीं था तो प्राण (श्वास) किस घर में आसरा लेते थे? जब कोई रूप-रेख नहीं था तब शबद ने कहाँ लिव लगाई हुई थी? जब (माँ का) रक्त और (पिता के) वीर्य से बना ये शरीर नहीं था तब जिस प्रभू का अंदाजा और मूल्य नहीं पड़ सकता उसमें ये मन लिव कैसे लगाता था? जिस प्रभू का रंग-भेख और स्वरूप नहीं दिखता, वह सदा कायम रहने वाला प्रभू कैसे देखा जाता है? (उक्तर:) हे नानक! प्रभू के नाम में रति हुए वैरागवान को हर वक्त सच्चा प्रभू ही (मौजूद) प्रतीत होता है।66। हिरदा देह न होती अउधू तउ मनु सुंनि रहै बैरागी ॥ नाभि कमलु असथ्मभु न होतो ता निज घरि बसतउ पवनु अनरागी ॥ रूपु न रेखिआ जाति न होती तउ अकुलीणि रहतउ सबदु सु सारु ॥ गउनु गगनु जब तबहि न होतउ त्रिभवण जोति आपे निरंकारु ॥ वरनु भेखु असरूपु सु एको एको सबदु विडाणी ॥ साच बिना सूचा को नाही नानक अकथ कहाणी ॥६७॥ {पन्ना 945} शब्दार्थ: अउधू = हे जोगी! सुंनि = अफुर प्रभू में। अनरागी = प्रेमी हो के। जाति = अस्तित्व, उत्पक्ति। अकुलीणि = अकुलीण में, कुल रहत प्रभू में। गउनु = गवनु, गमन, चाल, जगत की चाल, जगत का अस्तित्व। गगनु = आकाश। विडाणी = आश्चर्य। सरलार्थ: (उक्तर:) हे जोगी! जब ना हृदय था ना शरीर था, तब वैरागी का मन निरगुण प्रभू में टिका हुआ था। जब नाभि-चक्र-रूपी-स्तम्भ नहीं था तब प्राण (प्रभू के) प्रेमी हो के अपने असल घर (प्रभू) में बसते थे। जब (जगत का) का कोई रूप-रेख नहीं था तब वह श्रेष्ठ शबद (जो 'दुष्तर सागर' से पार लंघाता है) कुल-रहित प्रभू में रहता था; जब जगत की हस्ती नहीं थी, आकाश नहीं था, तब आकार-रहित त्रिभवणी ज्योति (भाव, अब त्रिलोकी में व्यापक होने वाली ज्योति) स्वयं ही स्वयं थी। एक मात्र आश्चर्य शबद-रूप प्रभू ही था, वही (जगत का) रूप-रंग और भेख था। हे नानक! (ऐसे उस) सदा कायम रहने वाले प्रभू (को मिले) बिना, जिसका कोई सही स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता, कोई मनुष्य सच्चा नहीं है।67। |
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धन्यवाद! |